प्रेरणा स्रोत : निश्चिंत, निर्भय एवं उदारता की प्रतिमूर्ति – दादी मनोहरइंद्रा

दादी मनोहर इंद्रा नारी शक्ति की ऐसी मिसाल थीं, जिन्होंने निर्भय होकर देश-विदेश में राजयोग एवं आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की सेवा की। ब्रह्माकुमारीज संस्थान के आदि रत्नों में शामिल दादी संस्थान का इतिहास कुछ ऐसे सुनाती थीं कि लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। उन्होंने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में संस्था के तहत संचालित अनेकों राजयोग सेवा केंद्रों की शुरुआत की। काफ़ी समय तक उन्होंने माउंट आबू स्थित ज्ञान सरोवर, द एकेडमी फॉर अ बेटर वर्ल्ड की जिम्मेदारी संभाली। वे संस्था संचालित सहज राजयोग शिविरों की निदेशक थीं। बाद के वर्षों में उन्होंने राजयोग एजुकेशन ऐंड रिसर्च फाउंडेशन के अंतर्गत संचालित, महिला प्रभाग की अध्यक्ष का पद भी संभाला।

Dadi Manohar Indra
(पुण्य तिथि – 16-11-2008)

१९२४ में सिंध प्रांत के  हैदराबाद के एक संपन्न परिवार में जन्मीं दादी मनोहर इंद्रा को उनके परिजनों ने ‘हरि’ नाम दिया था। अपने नाम के अनुरूप उनके आचरण व विचार भी सूंपर्ण सात्विक थे। भक्ति में मन रमता था। उनका घर दादा लेखराज (प्रजापिता ब्रह्मा) के निवास स्थान के समीप ही था। बालावस्था में वे अक्सर उनके घर आया-जाया करतीं। वहां का वातावरण उन्हें काफी भाता था। आश्रम जैसी अनुभूति होती थी। जब दादा को दिव्य साक्षात्कार हुए, तो दादी मनोहर को ‘ओम मंडली’ की जानकारी मिली। अपने संस्मरणों में दादी ने बताया है कि कैसे एक दिन दादा के घर के सामने से गुजरते हुए उन्हें ‘ओम’ ध्वनि सुनाई दी और वह घर के अंदर बस खींची चली गईं। भीतर जाकर मन काफी भाव विभोर हो गया। दादी को वहां स्वयं का परिचय मिला कि, ‘मैं आत्मा हूं और शांत स्वरूप हूं’। इसका ऐसा असर हुआ कि जब उनके लौकिक पिता का देहावसान हुआ, तो उनका मन बिलकुल शांत रहा। हालांकि, आगे चलकर समाज एवं परिवार का दबाव बढ़ने लगा और उन्हें ओम मंडली में जाने से रोका जाने लगा। यहां तक कि मां का साथ भी नहीं मिल रहा था। लेकिन दादी को तो जैसे उनके प्रभु व जीवनसाथी मिल गए थे। १९३६ में उन्हें ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय (तत्कालीन ओम मंडली) में दाखिला मिल गया और एक साल बाद वे वहां समर्पित हो गईं। तब उनकी आयु मात्र १२ वर्ष थी। इसके अगले १४ वर्ष वे कराची में  कुल ३८५ महिलाएं, पुरुष व बच्चों के साथ ओम मंडली में रहीं। आध्यात्मिक ज्ञान अर्जन, राजयोग का अभ्यास किया औऱ अपने भीतर ईश्वरीय ज्ञान को समाने का प्रयत्न किया। वहीं उन्हें अपने जीवन को महान बनाने की प्रेरणा मिली।

बचपन के एक वाक्ये का जिक्र करते हुए दादी ने बताया था कि कैसे छोटी आयु में उन सबने सहनशीलता का पाठ पक्का कर लिया था। एक बार की घटना है, वे सभी बस से मुरली सुनने जा रहे थे। बृजेंद्र दादी बस चला रही थीं। अचानक रास्ते में एक बड़ी दुर्घटना हुई। बावजूद इसके कोई भी (जिसमें बच्चे भी शामिल थे) हलचल में नहीं आया। न ही किसी के चेहरे पर कोई भय दिखाई दिया। सब बिलकुल शांत थे और ईश्वर की याद में थे। इस घटना की चर्चा तब के अखबारों ने भी की और ब्रह्मा बाबा के नाम की चारों ओर सकारात्मक चर्चाएं होने लगीं। दादी मनोहर को ‘ज्ञान गंगा’ व ‘शेरनी’ कहा जा था, क्योंकि उन्हें पढ़ाई, मनन-चिंतन का काफी शौक था। उनका हृदय भी बहुत उदार था। दूसरों के दुख को दूर करने में वे कभी संकोच नहीं करती थीं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय जब लोगों ने अपनी धन-संपत्ति, घर बार खो दिया। उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, तब दादी मनोहर ने अनेक परिवारों की मदद की। उन्हें यज्ञ में समर्पित कराया। वे सदा निमित्त और नम्रचित्त बनकर रहती थीं। इसलिए उनके सरल स्वभाव की छाप हरेक के दिल पर पड़ी। उदासी तो उनके चेहरे पर कभी आती ही नहीं थी। न ही कभी मूड ऑफ होता था। वे घंटों लोगों को ज्ञान के इतिहास के बारे में बताया करती थीं। इसमें रोचकता इतनी होती थी कि लोगों को अलौकिक अनुभव होते थे। यह अनुभव इतने गहरे होते थे कि घर जाकर भी उसका नशा नहीं उतरता था।

१९५० में दादी मनोहर इंद्रा पाकिस्तान से माउंट आबू आईं थीं। दादा ने उन्हें सेवा की जिम्मेदारी सौंपी। इस तरह पहली बार दिल्ली से सेवाओं की शुरुआत हुई। इसकी कहानी भी बेहद दिलचस्प है। जो दादी बीते कई वर्षों से यज्ञ में समर्पित थीं, उनके लिए अकेले किसी अनजाने शहर में जाकर सेवाएं करना कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। दिल्ली आने पर पहले पहल दादी चांदनी चौक स्थित गौरी शंकर मंदिर में गईं और वहां ज्ञान सुनाया। ट्रस्टी उसे सुनकर इतने संतुष्ट हुए कि उन्होंने वहीं उन्हें एक कमरा रहने के लिए दे दिया। सतसंग शुरू हुआ। लोग आने लगे और उनका ज्ञान में निश्चय पक्का होता गया। लेकिन फिर कुछेक कारणों से उन्हें वह स्थान छोड़ना पड़ा। कुछ पता नहीं था कि क्या करेंगी, बस परमात्मा पर विश्वास कर आगे Dadi Manohar Indraबढ़ती गईं। अकेले यमुना के कंठे पर बैठकर, बिना किसी साधन -सुविधा के उन्होंने निर्भीकता से ईश्वरीय सेवाओं का प्रारंभ किया। कम  साधन होते हुए, वे साधना की धनी थीं और त्याग व तपस्या की जीवंत मिसाल। उनकी दृष्टि में अलौकिक जादू था।  कड़ी से कड़ी परिस्थितियों को वे योगबल से जीत लेती थीं। बाद के वर्षों में वह भारत के अन्य हिस्सों में सेंटर व सेवा स्थान शुरू करने के निमित्त बनीं। विशेषकर पंजाब एवं हरियाणा में उन्होंने काफी सेवा केंद्र शुरू कराए। माउंट आबू की वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका ब्रह्मा कुमारी शशि के अनुसार, करनाल वासी ईश्वरीय ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना मकान तक सेवा केंद्र को समर्पित कर दिया। वहां दादी ने बहुत-सी कुमारियों की पालना की। एक घटना का उल्लेख करते हुए बीके शशि बताती हैं, उस दौर में आर्यसमाजी ब्रह्मा कुमारी के विरोधी हुआ करते थे। लेकिन जब आर्य समाजी से परिवार से आने वाली पुष्पा नामक बहन दादी मनोहर से मिलीं औऱ दादी ने उनकी पालना की, तो धीरे-धीरे सभी विरोध शांत होने लगे और लोगों ने ज्ञान समझना शुरू किया।

दादी को बाबा पर अटूट विश्वास था, जिसकारण वे सदा निश्चिंत व निर्भय रहीं। लेकिन वे मिलनसार भी कम नहीं थीं। उनसे बात करके लगता ही नहीं था कि वह अमुक व्यक्ति को न जानती हों। वह हरेक के अंदर को जानती थीं। लोगों को केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि आत्मिक दृष्टि से देखा करती थीं। उनका मन इतना स्वच्छ था कि कभी किसी की कमजोरी को चित्त पर नहीं रखती थीं। किसी में कोई कमजोरी होती भी थी, तो उसे अलग से जाकर बता देती थीं और ऐसे घुलमिल जाती थीं, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। वे सिर्फ विशेषताएं ही देखा करती थीं। यज्ञ से तो उनका अटूट प्रेम था और दादियों के प्रति अति सम्मान रखती थीं।उनमें मोल्ड होने की बहुत बड़ी शक्ति थी। कैसे भी परिस्थिति हो, दादी उससे अपना सामंजस्य बना ही लेती थीं। कभी हलचल में नहीं आती थीं और न ही किसी बात के लिए ना कहती थीं। श्रीमत का एक्यूरेट पालन करना। कभी उसमें अपना मनमत नहीं मिलाना, उनकी विशेषता थी। ब्रह्मा कुमार, राजयोगी अमीर चंद भाई जी के शब्दों में मनोहर दादी का व्यक्ति, वैभव अथवा पदार्थ से कोई लगाव नहीं था। उन्होंने कई सेंटर खोले, पर किसी से लगाव नहीं रखा।

यज्ञ में 10-12 बहनों की एक पार्टी थी, जो ‘मनोहर पार्टी’ के नाम से जानी जाती थी। वे सभी ज्ञान के मनन-चिंतन व सेवा में रमी रहती थीं। दादी में तो विशेषतौर पर पालना के संस्कार थे। उनके साथ गंगे दादी हमेशा सेवा के लिए तत्पर रहती थीं। जब ब्रह्मा बाबा अव्यक्त हुए, तो दादी मनोहर इंद्रा को मधुबन यानी मुख्यालय में आकर रहने के लिए कहा गया। इस तरह, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और भारत के विभिन्न स्थानों की सेवा कर वर्ष १९७० में वह स्थायी रूप से ब्रह्मा कुमारी के माउंट आबू स्थित मुख्यालय में रहने आ गईं। यहां उन्होंने राजयोग व टीचर्स की ट्रेनिंग देती थीं। उन्होंने महिला प्रभाग की जिम्मेदारी संभाली। उनके लिए कोई कर्म छोटा नहीं होता था। १९८० में दादी मनोहर ने मॉरीशस की यात्रा की। इसके बाद १९८३ वे सिंगापुर एवं मलेशिया समेत दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की यात्रा पर गईं और वहां आध्यात्मिक ज्ञान दिया।  उन्होंने हॉन्ग कॉन्ग में आयोजित महिला सम्मेलन को भी संबोधित किया। तत्पश्चात् १९९२ में उन्होंने अफ्रीका, अमेरिका, करिबियाई द्वीप एवं ब्रिटेन की वृहद यात्रा  की।

२००८ में १७ नवंबर को दादी ने आखिरकार अपना देह त्याग कर ईश्वर की गोद ली। वे हमेशा एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद रखी जाती हैं, जो दृढ़ निश्चयी, नीडर व निर्भीक थीं। नारी शक्ति की ऐसी मिसाल, जिसने जो ठान लिया, तो उसे करके दिखाया।