
अव्यक्त इशारे - परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
1) परोपकार की भावना से सम्पन्न बनने के लिए हर आत्मा के गुणों को ही देखो। किसी की कमज़ोरी वा अवगुण को देखते भी अपनी शुभ भावना से, सहयोग की कामना से उस आत्मा को भी गुणवान बनाने की शक्ति का दान दो। अपने समय को, सुखों को, नाम, शान, मान सर्व प्राप्ति की इच्छा को कुर्बान कर, लेने की इच्छा को छोड़ देने वाले महादानी बनो तब कहेंगे परोपकार की भावना से सम्पन्न।
2) स्वयं के सर्व खजानों को अन्य आत्माओं प्रति दान देना यही है परोपकार करना। ऐसे परोपकारी स्वयं को सर्व खजानों से सम्पन्न बेगमपुर का बादशाह अनुभव करेंगे। उनके संकल्प में भी गम के संस्कार इमर्ज नहीं हो सकते। जहाँ सर्विस है, वहाँ किसी के कमजोर संस्कारों को न देख, उनके प्रति रहमदिल की दृष्टि रख, अपकारियों पर भी उपकार करो।
3) विशेष रूप से अपनी मन्सा अर्थात् संकल्प शक्ति द्वारा, वाणी की शक्ति द्वारा, अपने संग के रंग द्वारा, सम्बन्ध के स्नेह द्वारा, खुशी के अखुट खज़ाने द्वारा अखण्ड़ दान करते रहना - यही है परोपकार करना। कोई भी आत्मा सम्पर्क में आये तो खुशी के खज़ाने से सम्पन्न होकर जाए, ऐसे अखण्ड़ दानी बनो।
4) किसी भी आत्मा से कुछ ले करके देने की इच्छा न हो, संकल्प में भी यह न आये कि यह करे तो मैं करूँ, यह बदले तो मैं बदलूँ, कुछ वह बदले, कुछ मैं बदलूँ.... भिखारी को भी मालामाल बनाने वाला अपकारी के ऊपर उपकार करने वाला ही परोपकार की भावना से सम्पन्न है।
5) वह त्रिकालदर्शी होने के कारण आत्मा के सम्पूर्ण सहयोग को सामने रखते हुए, हर आत्मा की कमज़ोरी को परखते हुए उसकी कमज़ोरी को स्वयं में धारण नहीं करेगा, वर्णन नहीं करेगा लेकिन अन्य आत्माओं की कमज़ोरी का काँटा कल्याणकारी स्वरूप से समाप्त कर देगा। कांटे के बजाए -कांटे को भी फूल बना देगा।
6) जो परोपकार की भावना से सम्पन्न है, वह सदा सन्तुष्टमणी के समान स्वयं भी सन्तुष्ट होगा और सर्व को भी सन्तुष्ट करने वाला होगा। कमाल यह है जो होपलेस में होप पैदा कर देगा, जिसके प्रति सब निराशा दिखायें, ऐसे व्यक्ति वा ऐसी स्थिति में सदा के लिए उनकी आशा के दीपक जगा देगा। अपने उपकार की शुभ भावना से, स्नेह से, शक्ति से, मीठे बोल से, उत्साह-उमंग के सहयोग से दिलशिकस्त को शक्तिवान बना देगा अर्थात् भिखारी को बादशाह बना देगा।
7) अगर कोई आपके सहयोगी भाई व बहन, परिवार की आत्मायें, बेसमझी वा बालहठ से अल्पकाल की वस्तु को सदाकाल की प्राप्ति समझ, अल्पकाल का मान-शान-नाम वा अल्पकाल की प्राप्ति की इच्छा रखती हैं तो दूसरे को मान देकर के स्वयं निर्मान बनना यही परोपकार है। यह देना ही सदा के लिए लेना है।
8) इस समय ऐसा परोपकारी ग्रुप चाहिए जो देने वाला दाता हो। जैसे सम्पन्न राजायें सदा प्रजा को देने वाले होते हैं। सम्पन्न राजाओं का हाथ कभी भी लेने वाला नहीं होगा, देने वाला होगा। आप बच्चे तो स्वर्ग के विश्व महाराजा बन दाता रूप का पार्ट बजाने वाले हो तो अभी से वही संस्कार स्वयं में भरो।
9) जो स्वयं के प्रति इच्छा मात्रम् अविद्या है, अखण्ड दानी है, वही परोपकारी है। जैसे बाप ने स्वयं का समय भी सेवा में दिया। स्वयं निर्मान बन बच्चों को मान दिया। पहले बच्चे -नाम बच्चे का काम अपना। काम के नाम की प्राप्ति का भी त्याग किया। नाम में भी परोकारी बने। ऐसे फालो फादर करो।
10) ब्रह्मा बाप ने बच्चों को मालिक बनाया और स्वयं को सेवाधारी के रूप में रखा। मालिक-पन का मान भी दिया, शान भी दिया, नाम भी दिया। कभी अपना नाम नहीं किया -मेरे बच्चे। तो जैसे बाप ने नाम, मान, शान सबका त्याग किया, परोपकार किया, स्वयं का सुख बच्चों के सुख में समझा। बच्चों की विस्मृति के कारण दुःख का अनुभव सो | अपना दुःख समझा। ऐसे फालो फादर कर परोपकार की भावना से सम्पन्न बनो तब विश्व कल्याण का कार्य सम्पन्न होगा।
11) अपकारी पर भी उपकार करना, यही ज्ञानी तू आत्मा का कर्तव्य है। जैसे बाप ने ग्लानि को भी कल्याणकारी दृष्टि से देखा। उपकारी पर उपकार तो दुनिया वाले भी करते हैं, भक्त आत्मायें भी करते हैं लेकिन ज्ञानी तू आत्मा का अर्थ है सर्व के प्रति कल्याण की भावना, अकल्याण संकल्प मात्र भी नहीं हो। अपकारियों पर भी उपकार करे तब कहेंगे विश्व कल्याणकारी।
12) वर्तमान समय अनेक आत्माओं में स्व-उपकार करने की इच्छा है लेकिन हिम्मत और शक्ति नहीं है। ऐसी निर्बल आत्माओं का उपकार करने वाले आप पर-उपकारी बच्चे निमित्त हो। तो उपकार सच्चे दिल से होता है। विश्व राज्य अधिकारी बनना है तो स्व-उपकारी के साथ, पर-उपकारी बनो।
13) बापदादा सदा श्रीमत देते हैं कि मन में हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखो - अपकारी पर भी उपकार की वृत्ति रखो, संकल्प सदा सर्व के प्रति श्रेष्ठ हो, निःस्वार्थ हो, सदा दातापन की भावना हो। सदा स्व परिवर्तन अथवा स्व के श्रेष्ठ कर्मों द्वारा औरों को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाले कर्म हों, तब कहेंगे परोपकारी।
14) हर आत्मा के प्रति रहम की भावना, सदा सहयोग की भावना, हिम्मत बढ़ाने की भावना हो। हर परिस्थिति में, हर कार्य में, हर सहयोगी संगठन में निःस्वार्थ पन हो, तब कहेंगे पर उपकार की भावना। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्व के प्रति कुछ भी स्वीकार नहीं किया। न महिमा स्वीकार की, न वस्तु स्वीकार की, न रहने का स्थान स्वीकार किया। स्थूल और सूक्ष्म सदा "पहले बच्चे' - इसको कहते हैं पर-उपकारी। इसमें फालो फादर कर समान बनो।
15) ज्ञानी तू आत्मा सदैव हर एक के प्रति मास्टर स्नेह का सागर होते हैं। बिना स्नेह के उसके पास और कुछ है ही नहीं। कोई भी आयेगा तो उसे स्नेह ही देंगे। आजकल सम्पत्ति से भी ज्यादा स्नेह की आवश्यकता है। स्नेह की शक्ति से दुश्मन को भी मित्र बना सकते हो। अपकारियों पर भी उपकार कर सकते हो।
16) मन्सा सेवा करने के लिए सर्व के प्रति सदा ही श्रेष्ठ और निःस्वार्थ संकल्प हों, सदा पर-उपकार की भावना हो। अपकारी पर भी उपकार की श्रेष्ठ शक्ति हो। सदा दातापन की भावना हो। सदा स्व परिवर्तन, स्व के श्रेष्ठ कर्म द्वारा औरों को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाले हो।
17) कोई कैसी भी आत्मा सम्पर्क में आये - चाहे सतोगुणी, चाहे तमोगुणी सभी के प्रति शुभ चिन्तक अर्थात् अपकारी के ऊपर भी उपकार करने वाले। कभी किसी आत्मा के प्रति घृणा दृष्टि नहीं क्योंकि जानते हैं कि यह अज्ञान के वशीभूत है अर्थात् बेसमझ बच्चा है। बेसमझ बच्चे के कोई भी कर्म पर घृणा नहीं होती है और ही बच्चे के ऊपर रहम वा स्नेह आयेगा।
18) जैसे बापदादा सदा बच्चों के साथ हर कदम में सहयोगी हैं और अन्त तक रहेंगे। बाप को किसी के प्रति घृणा नहीं होती। सदैव अपकारी के भी शुभ चिन्तक हैं, ऐसे फालो फादर। हर आत्मा के प्रति सदा शुभ भाव और भावना रखो। इसने ऐसा क्यों किया, यह सोचने के बजाए इस आत्मा का कल्याण कैसे हो - यह सोचो तब कहेंगे शुभचिंतक वा विश्व कल्याणकारी आत्मा ।
19) कोई गाली भी दे, झूठा इल्ज़ाम भी लगाये, लेकिन आपको क्रोध न आये। अपकारी के ऊपर उपकार करना, यही आप ब्राह्मणों का कर्म है। वह गाली दे आप गले लगाओ, यही है कमाल। इसको कहा जाता है परिवर्तन। गले लगाने वाले को गले लगाना, यह कोई बड़ी बात नहीं लेकिन निन्दा करने वाले को सच्चा मित्र मन से मानो, तब कहेंगे उपकार करने वाले।
20) कल्याणकारी भावना वा वृत्ति रखकर कोई भी आत्मा की पालना करो तो कैसी भी अपकारी आत्मा को अपनी पालना से उपकारी बना सकते हो। कैसी भी पतित आत्मा, पतित-पावन की वृत्ति से पावन हो सकती है। जैसे माँ बच्चे की कमजोरियों वा कमियों को नहीं देखती है। उनको ठीक करने का ही रहता है। तो यह पालना करने का कर्तव्य इस रूप में स्थित रहने से यथार्थ चल सकता है।
21) सन्तुष्ट को सन्तुष्ट रखना, स्नेही को स्नेह देना, सहयोगी के साथ सहयोगी बनना - यह महावीरता नहीं है। लेकिन कोई कितना भी असहयोगी बने, अपने सहयोग की शक्ति से असहयोगी को सहयोगी बनाना इसको महावीरता कहा जाता है। कमजोर को कमजोर समझ छोड़ न दो। लेकिन | उसको बल देकर बलवान बनाओ, कमजोर को हाईजम्प देने योग्य बनाओ तब कहेंगे महावीर अथवा सब पर उपकार करने वाले।
22) जिसका आपके प्रति शुभ भाव है उसके प्रति आप भी शुभ भाव रखते हो, उपकारी पर उपकार करते हो, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन कोई आपको बार-बार गिराने की कोशिश करे, आपके मन को डगमग करे, फिर भी आपको उसके प्रति सदा शुभचिंतक का, अचल-अटल भाव हो, बात के कारण भाव न बदले, कोई अपकार करे, आप एक सेकेण्ड में अपकार को उपकार में परिवर्तित कर दो तब कहेंगे कमाल।
23) कोई अपने संस्कार वा स्वभाव के कारण आपके सामने परीक्षा के रूप में आये लेकिन आप सेकेण्ड में अपने श्रेष्ठ संस्कार से, एक की स्मृति से ऐसी आत्मा के प्रति भी रहमदिल का संस्कार वा स्वभाव धारण कर लो यही है उपकार करना।
24) कोई देहधारी दृष्टि से आपके सामने आये तो आप एक सेकेण्ड में उनकी दृष्टि को आत्मिक दृष्टि में परिवर्तित कर लो। कोई गिराने की वृत्ति से वा अपने संगदोष में लाने की दृष्टि से सामने आये तो आप उनको सदा श्रेष्ठ संग के आधार से, संगदोष से निकाल श्रेष्ठ संग लगाने वाले बना दो। ऐसी परिवर्तन करने की युक्ति आने से कभी भी विघ्न से हार नहीं खायेंगे। सम्पर्क में आने वाले आपकी इस सूक्ष्म श्रेष्ठ सेवा पर बलिहार जायेंगे।
25) कोई रोज़ आपकी ग्लानि करे, वो सदा अकल्याण करे, आप उससे किनारा करने के बजाए उसका भी कल्याण करते रहो, यही आप ज्ञानी तू आत्मा का कर्तव्य है। जैसे बाप की महिमा में विशेष रहमदिल का गुण गाया जाता है। चाहे देश में, चाहे विदेश में बाप के आगे जायेंगे तो रहमदिल, मर्सीफुल कहेंगे। तो आप सभी भी मास्टर रहमदिल हो। ऐसे रहमदिल बन सब पर उपकार करो।
26) अति पाप आत्मा, अति अपकारी आत्मा, बगुले के ऊपर भी नफरत नहीं, घृणा नहीं, निरादर नहीं लेकिन विश्व -कल्याणकारी स्थिति में स्थित हो रहमदिल बन तरस की भावना रखते हुए सेवा का सम्बन्ध समझकर सेवा करो, जितने होपलेस केस की सेवा करेंगे उतने ही प्राइज़ के जायेंगे। पीसमेकर की प्राइज़ लेंगे। अधिकारी बनेंगे और नामीग्रामी विश्व-कल्याणकारी गाये
27) योगी जीवन की ऊंची मंजिल को प्राप्त करने वाली आत्मा निंदा को स्तुति में, ग्लानि को गायन में, ठुकराने को सत्कार में, अपमान को स्व-अभिमान में, अपकार को उपकार में परिवर्तित कर बाप समान सदा विजयी, अष्ट रत्न और भक्तों के इष्ट बनो। यह भावना नहीं रखो कि यह भी तो कुछ बदले, तो मैं बदलूं, यह लेने की भावना है। मुझे बायब्रेशन देना है। मुझे रहमदिल बनना है। मुझे गुणों का, शक्तियों का सहयोग देना है, इसमें मास्टर दाता, फ्राकदिल बनो।
28) बापदादा सदा श्रीमत देते हैं कि मन में हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखो, अपकारी पर भी उपकार की वृत्ति रखो - यह है स्वच्छ मन। स्वयं के प्रति वा अन्य के प्रति व्यर्थ संकल्प आता है तो यह स्वच्छ मन नहीं है। स्वच्छ मन, क्लीन और क्लीयर बुद्धि हो तब डबल लाइट स्थिति बन सकेगी। बाप समान स्थिति बनाने का यही सहज साधन है।
29) कोई भी बात फील करना फेल की निशानी है। कितना भी कोई अपकारी हो लेकिन आपकी दृष्टि और वृत्ति उपकारी हो। जितना अधिकारी उतना निरहंकारी। ज्ञान में चलने के बाद जो स्व अभिमान आ जाता है, उसका भी त्याग। जब इतनी त्याग की वृत्ति और दृष्टि हो तब स्मृति में बापदादा रहेगा और मुख पर भी यही बोल रहेंगे।
30) अपने तीन स्वरूप सदा स्मृति में रखोः एक उपकारी हूँ, दूसरा निरहंकारी और तीसरा अधिकारी हूँ। कितना भी कोई अपकारी हो लेकिन आपकी दृष्टि और वृत्ति उपकारी हो, फिर जितना अधिकारी उतना निरहंकारी। जब वृत्ति से भी मैं-पन का त्याग होगा, स्मृति में सदैव बाप और दादा रहेगा और मुख पर भी यही बोल रहेंगे तब विश्वपति बन विश्व की सर्विस कर सकेंगे।
31) जैसे होम्योपैथिक दवाई की छोटी-छोटी गोलियां कितने बड़े रोग को खत्म कर देती हैं, ऐसे आप मास्टर सर्वशक्तिमान् अपनी वृत्ति और दृष्टि से किसके भी कड़े संस्कार के रोग को खत्म कर सकते हो। जैसे वह दवाई यह नहीं कहती कि रोग को कैसे मिटायें, ऐसे आप परोपकारी आत्मायें मास्टर ज्ञान सूर्य बन सर्व आत्माओं के पतित संकल्पों वा वृत्तियों को भस्म करने की सेवा करो, अपकारी पर भी उपकार करो।