
ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव करो
1) आप सभी ब्राह्मण आत्माओं ने जन्म लेते ही यह व्रत लिया है। कि हमें बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना है। जैसे सभी एवररेडी शब्द बोलते हो ऐसे सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने में एवररेडी बनो, इसमें अलबेलापन न आये।
2) ब्रह्मा बाप ने सम्पूर्ण बनने के लिए अपने सर्व खजाने आदि से अन्तिम दिन तक सफल किये, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखा-सम्पूर्ण फरिश्ता बन गये। तो लक्ष्य रखो मुझे बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना ही है। कुछ भी पुरुषार्थ करना पड़े लेकिन निश्चित है कि बाप समान बनना ही है।
3) बाप समान बनने के लिए ब्रह्मा बाप को फालो करते चलो। सोचो, ब्रह्मा बाप सम्पूर्ण कैसे बने? उनकी क्या विशेषता रही? सम्पूर्णता का विशेष आधार क्या रहा? ब्रह्मा बाप ने अपना हर समय सफल किया। श्वांस श्वांस, सेकण्ड सेकण्ड सफल किया। तो बाप समान बनने के लिए लक्ष्य रखो कि सफल करना है और सफलतामूर्त बनना है।
4) सम्पन्नता वा सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए देह के अभिमान से सम्पूर्ण समर्पण होना है। देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए तब कहा जायेगा सर्व समर्पणमय जीवन, ऐसे जो सर्व त्यागी, सर्व समर्पण जीवन वाले हैं उनकी ही सम्पूर्ण अवस्था गाई जाती है और जब सम्पूर्ण बन जायेंगे तब साथ जायेंगे।
5) जैसे हैं, जो भी परिस्थितियां सामने हैं, उन्हीं हालतों में रहते इस ही शरीर में हमको सम्पूर्ण बनना है, यह लक्ष्य रखो। आपका संगमयुगी सम्पूर्ण रूप शक्तियों और पाण्डवों के रूप में गाया हुआ है। जब इस स्वरूप में स्थित होंगे तब मालूम पड़ेगा कि हमारे भक्त कौन से हैं हैं और प्रजा कौनसी है। जो प्रजा होगी वह नज़दीक आयेंगे और जो भक्त होंगे वह पिछाड़ी में चरणों पर झुकेंगे।
6) अन्तिम सम्पूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए स्वयं को मेहमान समझकर चलो। जो अपने को मेहमान समझते हैं वह व्यक्त में होते हुए भी अव्यक्त स्थिति में रहते हैं, उनका किसके साथ भी लगाव नहीं होता है। हम इस शरीर में, इस पुरानी दुनिया में मेहमान हैं, सिर्फ थोड़े समय के लिए यह शरीर काम में लाना है।
7) पाण्डवों का गायन है कि गल कर खत्म हो गये। पहाड़ों पर नहीं लेकिन ऊंची स्थिति में गल कर अपने को निचाई से बिल्कुल ऊपर जो अव्यक्त स्थिति है, उसमें गल गये अर्थात् उस अव्यक्त स्थिति में सम्पूर्णता को प्राप्त हुए, यह आप पाण्डवों का ही यादगार है।
8) "बिन्दु और सिन्धु" यह दो शब्द भी अगर याद रखो तो सम्पूर्णता सहज आ सकती है। एक बिन्दु की याद और एकरस अवस्था, एक की ही मत और एक के ही कर्तव्य में मददगार। सिर्फ बिन्दु और एक, उसके आगे विस्तार में जाने की दरकार नहीं। विस्तार में जाना है तो सिर्फ सर्विस प्रति। उसके आगे अपनी बुद्धि को चलाने की आवश्यकता नहीं है।
9) स्नेह और शक्ति जब इन दोनों का मिलन हो जाता है तो अवस्था अति न्यारी और अति प्यारी होती है, जिसके लिए स्नेह है उसके समान बनना है, यही स्नेह का सबूत है। लेकिन सिर्फ स्नेह रखने से सम्पूर्ण नहीं बनेंगे, स्नेह के साथ-साथ शक्ति भी होगी तो खुद सम्पूर्ण बन औरों को भी सम्पूर्ण बनायेंगे।
10) संगमयुग की सम्पूर्ण स्टेज का पिक्चर है फरिश्ता। फरिश्ता बिल्कुल हल्का होता है और जिसमें हल्कापन है वह हर परिस्थिति में अपनी श्रेष्ठ स्थिति बना लेता है। फरिश्ते संकल्पों में भी हल्के, वाणी में भी हल्के और कर्म करने में भी हल्के और सम्बन्ध में भी हल्के रहेंगे और जो हल्के होंगे वो एक सेकेण्ड में कोई भी आत्मा के संस्कारों को परख सकेंगे। जब यह सभी गुण हर कर्म में प्रत्यक्ष दिखाई दें तब समझो अब सम्पूर्ण स्टेज नजदीक है।
11) जितना सम्पूर्ण स्टेज समीप आती जायेगी उतना दूसरों के संकल्पों को रीड कर सकेंगे, इसके लिए अपने संकल्पों के ऊपर फुल ब्रेक चाहिए। जो अपने संकल्पों को समेट सकते हैं वही दूसरों के संकल्पों को समझ सकते हैं। तो संकल्पों का बिस्तर बन्द करते चलो।
12) सम्पूर्णता नम्बरवार होगी। माला के 108 मणके हैं, उसमें नम्बरवन मणका और एक सौ आठवाँ मणका दोनों को सम्पूर्ण वा विजयी रत्न तो कहेंगे। विजयी रत्न अर्थात् अपने नम्बर प्रमाण सम्पूर्णता को प्राप्त हुए, उनके लिए सारे ड्रामा के अन्दर वही सम्पूर्णता की फर्स्ट स्टेज है।
13) जब स्थूल और सूक्ष्म दोनों का अन्तर समाप्त हो जायेगा | तब सम्पूर्ण स्थिति के समीप आयेंगे। यह व्यक्त देश अव्यक्त देश बन जायेगा। जैसे बापदादा व्यक्त में आते हैं तो भी अव्यक्त रूप के अव्यक्त देश की अव्यक्ति प्रवाह में रहते हैं। वही बच्चों को अनुभव कराते हैं तो आप भी अपने अव्यक्त स्थिति का अनुभव औरों को कराओ।
14) इस समय को अमूल्य समझकर प्रयोग करो तब सम्पूर्ण बन सकेंगे। सम्पूर्ण होने में व्यर्थ संकल्प जो रुकावट डालते हैं इससे बचने के लिए कभी अन्दर वा बाहर की रेस्ट न लो। रेस्ट में नहीं होंगे तो वेस्ट नहीं जायेगा। दूसरा अपने को सदैव गेस्ट समझो।
15) व्यर्थ संकल्प वा विकल्प जो चलते हैं उसका कारण एक ही शब्द बुद्धि में आता है कि यह क्यों हुआ, क्यों से व्यर्थ संकल्पों की क्यू शुरू हो जाती है। इस क्यू के समाप्ति के बाद ही सम्पूर्णता आयेगी फिर वह क्यू लगेगी। जब क्यों शब्द खत्म होगा तब ड्रामा की भावी पर एकरस स्थेरियम रहेंगे।
16) एक दो की बातों को स्वीकार करना और सत्कार देना, जब यह दोनों ही बातें आ जाती हैं तो फिर सम्पूर्णता और सफलता दोनों ही समीप आ जाती है क्योंकि एक दो को सत्कार देना ही भविष्य का अधिकार लेना है।
17) आप सम्पूर्ण आत्माओं का अन्तिम वाहन है कर्मबन्धन मुक्त, कर्मातीत स्थिति। ऐसी स्थिति बनाने के लिए ब्रह्मा बाप समान सर्व हदों पर विजय प्राप्त करने वाले विजयी रत्न बनो। तब अन्तिम कर्मातीत स्वरूप के अनुभवी बनेंगे। अनेक प्रकार की हदें अर्थात् अनेक मेरा मेरा। जब मैं और मेरा, तू और तेरा .. यह चार शब्द एक बाबा शब्द में समा जायेंगे तब सम्पूर्णता समीप आयेगी।
18) एक सेकेण्ड में आवाज में आओ और एक सेकेण्ड में आवाज से परे हो जाओ, अभी-अभी आवाज में, अभी-अभी आवाज़ से परे.. जब यह अभ्यास सरल और सहज हो जायेगा तब समझो सम्पूर्णता समीप है। अभी आपकी हर कर्मेन्द्रिय "जी हजूर" "जी हाज़िर" करती हुई चले। ऐसे जब आप राज्य अधिकारियों का यह कर्मन्द्रियां स्वागत अर्थात् सलाम करेंगी तब सम्पन्न व सम्पूर्ण कर्मातीत बन सकेंगे।
19) पुरुषार्थ में सरलता, ब्रह्मा बाप समान उपराम और साक्षीदृष्टा के संस्कार, यही सम्पूर्ण स्टेज की निशानी व लक्षण हैं। तो अब इन संस्कारों में समानता लानी है। इससे ही सर्व के दिलों पर विजयी होंगे, जो संगम पर सर्व के दिलों पर विजयी बनता है वही भविष्य में विश्व महाराजन् बनता है।
20) संकल्प किया और जिस स्थिति में स्थित होना चाहें उसमें स्थित हो जायें, यही है बाप समान सम्पूर्ण अवस्था वा कर्मातीत अन्तिम स्टेज। जितना सम्पूर्ण अवस्था के नज़दीक होंगे अर्थात् बाप के नजदीक होंगे, उसी अनुसार भविष्य प्रालब्ध में भी राज अधिकारी होंगे। जितना नशा होगा उतना अपना कर्मातीत अवस्था का निशाना नजदीक दिखाई देगा।
21) किसी भी प्रकार का देह का, सम्बन्ध का, वैभवों का बन्धन अपनी ओर आकर्षित न करे, ऐसी स्वतन्त्र आत्मा ही बाप-समान कर्मातीत स्थिति वा सम्पन्न स्थिति का अनुभव करती है। इसके लिए प्रैक्टिस करो अभी-अभी कर्मयोगी, अभी-अभी कर्मातीत स्टेज। कोई भी कर्म अपने बंधन में बांध न ले।
22) जैसे आपकी रचना कछुआ सेकेण्ड में सब अंग समेट लेता है। समेटने की शक्ति रचना में भी है। आप मास्टर रचता समेटने की शक्ति के आधार से सेकेण्ड में सर्व संकल्पों को समाकर एक संकल्प में सेकेण्ड में स्थित हो जाओ। जब सर्व कर्मेन्द्रियों के कर्म की स्मृति से परे एक ही आत्मिक स्वरूप में स्थित हो जायेंगे तब कर्मातीत अर्थात् सम्पन्न स्थिति का अनुभव होगा।
23) जैसे ब्रह्मा बाप के लिए सबके मुख से एक ही आवाज निकलती है - "मेरा बाबा"। ऐसे आप हर श्रेष्ठ आत्मा के प्रति यह भावना हो, महसूसता हो। हरेक से मेरेपन की भासना आये। हरेक समझे कि यह मेरे शुभचिन्तक, सहयोगी सेवा के साथी हैं, इसको कहा जाता है - बाप समान। यही है सम्पन्न वा सम्पूर्ण कर्मातीत स्टेज ।
24) अब सेवा के, कर्म के भी बन्धन में नहीं आओ। हमारा स्थान, हमारी सेवा, हमारे स्टूडेन्ट, हमारी सहयोगी आत्मायें, यह भी सेवा के कर्म का बन्धन है, इस कर्मबन्धन से न्यारे अर्थात् कर्मातीत। जैसे ब्रह्मा बाप ने सदा न्यारे और प्यारेपन का बैलेन्स रखा। सबको अपनेपन की अनुभति कराते भी हर एक का सम्बन्ध उस एक से (निराकार बाप से) जुटाया, ऐसे आप बच्चे भी सबको अपनेपन की महसूसता दिलाए आत्माओं को समीप ठिकाने पर पहुंचाने वाले बनो, तब कहेंगे बाप समान।
25) जैसे ब्रह्मा बाप सदा आवाज से परे अपनी श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहने का अभ्यास करते रहे। इससे वे सर्व व्यक्त आकर्षणों से परे शक्तिशाली न्यारी और प्यारी स्थिति में रहे। ऐसे आप बच्चे भी उस श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहने का अभ्यास करते रहो, तो कर्म करते भी विशेष शान्ति की शक्ति का अनुभव करते रहेंगे, इसी अभ्यास से बाप समान सम्पन्न व सम्पूर्ण बन जायेंगे।
26) ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न वा कर्मातीत बनना। इस लक्ष्य को पाने के लिए विशेष स्वयं में समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति धारण करो। कर्मबन्धनी आत्माएं | जहाँ हैं वहाँ ही कार्य कर सकती हैं और कर्मातीत आत्मायें एक ही समय पर चारों ओर सेवा का पार्ट बजा सकती हैं क्योंकि कर्मातीत हैं। उनकी स्पीड बहुत तीव्र होती है, सेकण्ड में जहाँ चाहे वहाँ पहुँच सकती हैं।
27) हर ब्राहमण बाप-समान चैतन्य चित्र बनो, लाइट और माइट हाउस की झाँकी बनो। संकल्प शक्ति का, साइलेन्स का भाषण तैयार करो और कर्मातीत स्टेज पर वरदानी मूर्त का पार्ट बजाओ तब सम्पूर्णता समीप आयेगी। फिर सेकेण्ड से भी जल्दी जहाँ कर्तव्य कराना होगा वहाँ वायरलेस द्वारा डायरेक्शन दे सकेंगे। सेकेण्ड में कर्मातीत स्टेज के आधार से संकल्प किया और जहाँ चाहें वहाँ वह संकल्प पहुंच जाए।
28) जैसे साकार में देखा लास्ट सम्पन्न व कर्मातीत स्टेज का पार्ट सिर्फ ब्लैसिंग देने का रहा, बैलेन्स की भी विशेषता और ब्लैसिंग की भी कमाल रही। ऐसे फालो फादर। सहज और शक्तिशाली सेवा यही है। अब विशेष आत्माओं का पार्ट है
ब्लैसिंग देने का। चाहे नयनों से दो, चाहे मस्तकमणी द्वारा। कर्म करते भी कर्म के बन्धनों से सदा अतीत अर्थात् न्यारे रहो। कभी कर्मों के वशीभूत नहीं, कर्मेन्द्रियों द्वारा हर कर्म करते हुए अधिकारीपन के नशे में रहो, यही सम्पूर्णता की स्टेज है।
29) जैसे ब्रह्मा बाप सदा अशरीरी स्थिति में रह, शरीर का आधार लेकर कर्म किया फिर न्यारे हो गये। इसी प्रैक्टिस से वे कर्मातीत बने। आप बच्चे भी कर्म करते भी ऐसा अनुभव करो जैसे कोई वस्त्र धारण कर कार्य रहे हैं। कार्य पूरा हुआ और वस्त्र से न्यारे हुए। शरीर और आत्मा दोनों का न्यारापन चलते-फिरते भी अनुभव हो।
30) अभी ब्रह्मा बाप के संस्कार, बाप के गुण, बाप के कर्तव्य की स्पीड और बाप के अव्यक्त निराकारी स्थिति की स्टेज सभी में समानता का मेला मनाओ। जब आप बाप की समानता का मेला मनायेंगे तब जय-जयकार होगी, विनाश के समीप आयेंगे। तो अब कर्मों की गुह्य गति को जानकर, त्रिकालदर्शी बन न्यारे प्यारे बन हर कर्म करो तब कर्मातीत बन सकेंगे।