
दीदी जी द्वारा सुनाई हुई मुख्य शिक्षायें और ईश्वरीय मर्यादायें
मीठी दीदी मनमोहिनी जी 28 जुलाई 1983 को, अपनी भौतिक देह का त्याग कर अव्यक्त वतन वासी बनी। विशेष उनकी पुण्य स्मृति पर दीदी जी की अलौकिक पालना अथवा समय प्रति समय उनसे मिली हुई शिक्षाओं की स्मृतियां ताज़ी हो जाती हैं। दीदी जी का अलौकिक व्यक्तित्व, उनकी पालना जिन ब्रह्मा वत्सों ने ली है, उनके नयनों में दीदी जी की छवि सदा सामने रहती है, आज उनकी कुछ शिक्षायें आप सबके पास भेज रहे हैं, जिस पर क्लास में रूहरिहान करना जी
1) दूसरों का दोष निकालने के पहले हमें अपना दोष देखना है। कोई-कोई सेन्टर पर रहने वाली बहनें बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोलती हैं, कई बार दिल को चुभने वाले कटुवचन भी मुख से निकालती, जिससे बहुत बड़ी डिससर्विस होती है। हर एक को अपने बोल पर बहुत ध्यान देना है। बाबा कहते बच्चे, कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो। यह गांठ हम सबको पहले स्वयं को बांधनी हैं।
2) छोटी बहिनों की ग्लानी कभी जिज्ञासुओं के सामने नहीं करो, अगर वह करें तो उनकी बातों में हाँ करके ठप्पा नहीं लगाओ।
3) टीचर्स जब कहीं सेन्टर पर जाकर सर्विस करती हैं, जिज्ञासु महिमा करते उस महिमा को स्वीकार कर लेती हैं, जिज्ञासु यहाँ आकर उस बहन की मांगनी करते हैं तो वह बहुत खुश होती हैं कि मैंने अच्छी सर्विस की है इसलिए मांगनी होती है। फिर सूक्ष्म अहंकार आ जाता है। रिजल्ट यह होती जो दो पार्टी हो जाती हैं, जिज्ञासु टूट जाते, इसका सारा कारण टीचर का है, इसमें डिससर्विस भरी हुई है।
4) कोई माता व भाई सर्विस पर जाना चाहते हैं लेकिन धन की कमी के कारण नहीं जा सकते तो उनको किराया देकर भेजना चाहिए, यह सबको डायरेक्शन है।
5) ट्रायल के लिए वही कुमारी आये जो 12 मास सेन्टर पर रेग्युलर क्लास करती हो। उसे माँ बाप लिखकर दें कि इसे समर्पित करते हैं। वह कुमारी भी लिखे कि मैं समर्पित होना चाहती हूँ। पहले मधुबन में एक मास की ट्रेनिंग लेवे फिर कोई सेन्टर पर ट्रायल पर भेजें। जब कन्या ट्रायल पर है तब उसके माँ बाप जो कुछ भी भेजना चाहें वह मधुबन भेजें, सेन्टर पर नहीं। कुमारी समर्पण मधुबन की है।
6) जो माया के वश हो बाबा के बच्चे बन माया की मत पर शादी करते हैं, उन्हें 1 साल तो क्लास के संगठन में आने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। मुरली की मांगनी करते हैं तो उन्हें भेज सकते हैं। अगर सेन्टर पर आने की जिद्द करते हैं तो अलग से टाइम देना चाहिए, ताकि उन्हें संग का बल मिलता रहे।
7) जो भी जिज्ञासु आए उनसे फार्म जरूर भरायें, इस बात में ढीला नहीं होना चाहिए।
8) अमृतवेले क्लास सेन्टर की इन्चार्ज को ही करानी है, क्लास में नवीनता होनी चाहिए।
9) डायरेक्शन जो मधुबन से आयें उस पर पूरा ध्यान देना है, नहीं तो बहुत ही कारोबार में दिक्कत होती हैं।
10) टीचर्स को खरीददारी करने मार्केट में बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। अभी तक यह रिपोर्ट आती है कि वही भाषण करती, वही दुकानों पर जाकर खरीददारी करती। कई तो भाईयों के साथ स्कूटर पर बैठकर जाती, यह ईश्वरीय मर्यादा का उल्लघंन हैं। कृपया इन मर्यादाओं का कंगन बांधकर रहें।
11) सावधानी देने वाला हमारा बाबा है, हमें किसी को शिक्षा के रूप में कुछ नहीं कहना है, मुरली में शिक्षा के महावाक्यों को अपनी तरफ से बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बोलना चाहिए। कोई भी बात हो राय दे सकते हैं। शिक्षा का रूप नहीं हो। मुरली में कुछ कट भी नहीं करना चाहिए।
12) कुमारियों के समर्पण पत्र ज़ोन इन्चार्ज के पास होने चाहिए। ज़ोन इन्चार्ज को तीन मास या दो मास के बाद ज़ोन की सब टीचर्स को बुलाकर दिल लेनी चाहिए। ज़ोन में कोई सेन्टर में कमी है तो ज़ोन इन्चार्ज पूरी रेख देख करे, कमी पूरी करे।
13) हर क्लास में एक हेड भाई होना चाहिए, उसे सर्विस का जिम्मेवार बनाना चाहिए। हर 15 दिन में सर्विस की मीटिंग करनी चाहिए ताकि सर्विस ठण्डी न हो।
14) गीता पाठशाला की माताओं को ट्रेनिंग देना बहुत जरूरी है, जिसके घर में क्लास होता है उसका जीवन आदर्श होना चाहिए ताकि आने वालों पर प्रभाव पड़े। कहीं अमर्यादा का कार्य उनके घर में होते देख डिससर्विस न हो।
15) बाबा कहते बच्चे, यज्ञ में आने वालों पर अधिक बोझ नहीं चढ़ाओ, यह गुह्य राज़ तो सब समझते हैं इसलिए सौगात को भी हल्का किया गया है। डायरी पेन आदि...
16) रास्ते में मुसाफिरी में ज्यादा खाने पीने का सामान ले जाते जैसेकि पिकनिक पर जाते हैं इससे और ही डिससर्विस होती है, यह बात भी विशेष ध्यान पर रखनी चाहिए।
17) पहली सीढ़ी देह सहित देह के सम्बन्धियों से उपराम। लेकिन अभी तक तो इस सीढ़ी पर चढ़े ही नहीं हैं। कारण पूरी दिल अपने साथ रहने वाली बहिनों की भर दें तो सम्बन्धियों में बुद्धि न जाये। यह भी बड़ों की जिम्मेवारी है।
18) बाबा ने सम्पन्न बनाने लिए हम बच्चों को श्रीमत दी है। श्रीमत पर चलने का आधार है - एक बल एक भरोसा। यह श्रीमत की नींव है। बाबा के हर इशारे को हम एक्ट में तभी ला सकेंगे जब पूरा फेथ होगा। जिसमें फेथ होता है, उसकी राय में कभी अपनी राय मिक्स नहीं हो सकती। एक बाबा की राय पर चलने से हल्के रहेंगे। बाबा ने कहा है जिम्मेवारी बाबा को दे दो और खुद हल्के रहो। अगर किसी के मन में यह संकल्प चलता है कि बाबा तो अब साकार में नहीं है तो यह भी संशय है। अमृतवेले विधिपूर्वक योग में बैठते हैं तो अनुभव करते हैं कि बाबा लेन-देन कर रहे हैं। स्व-स्मृति में रहेंगे तो बाबा को जो अपना कार्य कराना है, कराते रहेंगे। कराते हैं, ऐसा अनुभव करेंगे।
19) जैसे श्वांस के बाद श्वांस उठता है, वैसे संकल्प के बाद संकल्प उठता है, दोनों की रेस है। कर्म में श्वांस जल्दी चलते, योग में संकल्प जल्दी चलते। योग में एक बाप की याद के प्यार के संकल्प में एकाग्र हो जाएं तो सब रस प्राप्त होते हैं। एकाग्रवृत्ति की धरनी पर हर संकल्प फलदायक होता है। इसके लिए कर्मयोग का अभ्यास चाहिए। दिनचर्या पर अटेन्शन हो। न्यारे और प्यारे की स्थिति बहुत मीठी अवस्था है।
20) सदा अपने स्वमान में स्थित रहो तो फरिश्ते पन की स्टेज दूर नहीं। कभी-कभी अगर कमजोरी के संकल्प उठते हैं तो कहेंगे स्वमान की स्टेज से नीचे आ गये। महारथी की मुख्य निशानी है फालो फादर। और हर कदम श्रीमत पर। तो जो स्वरूप बाबा हमारे से चाहते हैं, वह अभी प्रत्यक्ष होना चाहिए। सदैव याद रहे जैसा कर्म हम करेंगे... हमें बाबा के दिल तख्तनशीन बनना है। अगर दिल कहाँ टुकड़ा-टुकड़ा होगी तो बाबा स्वीकार नहीं करेंगे।
21) बाबा की दिल और मेरी दिल में अन्तर न हो। कोई कितना भी गुणवान हो, हमें उस पर न्योछावर नहीं जाना है। देखना है इसको ऐसा गुणवान बनाया किसने ? तो बुद्धि डायरेक्ट उस तरफ (बाप की तरफ) चली जायेगी। जब बाबा की दिल से दिल मिल गई तो और कहाँ जा नहीं सकती। इसमें गुण हैं इसके लिए इनसे हमारा स्नेह है, यह भी बहुत सूक्ष्म माया है। बाबा हमें अभी इससे भी पार लिये जा रहे हैं। जब दिलवर को दिल दे दी तो हमारा फरिश्ता स्वरूप दूर नहीं। ईश्वरीय परिवार में भी बुद्धि नहीं फंसानी है। हमारा संसार, हमारा परिवार एक ही है - हमारा तो एक बाप दूसरा न कोई। यह भी महारथियों की निशानी है। इससे ही किला मजबूत होगा।
22) जो हम सबको पहले दिन सुनाते हैं कि तुम्हें चार नियमों का पालन करना है - 1- ब्रह्मचर्य 2- सतसंग 3-शुद्ध अन्न और 4- दैवीगुण। तो हम अपने में चेक करें कि कहाँ तक इन नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया है! कर्मणा में तो नहीं आते लेकिन मन्सा में भी संकल्प न आये। सदैव संगदोष से बचे रहें। सदैव एक बात याद रहे कि एक की सुननी है, एक को ही दिल में बसाना है।
23) योग द्वारा हमारे विकर्म विनाश होते हैं उसकी निशानियां उसकी नेचर ही बदल जायेगी। 2- बुद्धि की लाइन क्लीयर हो जायेगी। 3- बोझ से हल्के रहेंगे। उनके मुख से कभी यह नहीं निकलेगा कि यह मेरे आगे कोई परीक्षा आई है। 4-चढ़ती कला होगी, जिससे उसे फीलिंग आयेगी कि ये मेरे विकर्म विनाश होते हैं। 5 मेहनत कम सफलता ज्यादा का अनुभव होगा।
24) "अब घर चलना है" यह याद रहे तो आटोमेटिक सब तरफ से दिल हल्की हो जाती है, कोई परवाह नहीं। खाते-पीते-उठते... घर चलना है। इससे बाप याद रहेगा, पुरानी दुनिया से किनारा हो जायेगा। फिर तेरा, मेरा, इसने किया, उसने किया... यह शब्द भी मुख से नहीं निकलेंगे। यह भी महारथी की निशानी है।
25) अगर कोई कहे तुम्हारे में यह कमजोरी है तो उसे फौरन मानना चाहिए। बैठकर जिद्द करना, शो करना, यह हमारे ब्राह्मण परिवार का नियम नहीं है।
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