
दीदी मनमोहिनी जी की विशेषतायें
- किसी भी कार्य को दीदी पहले खुद करती थी, फिर दूसरों से कराती थी । उनकी विशेषता थी, जो कहना है वो करना है। अपने कर्म से सिखाती थी | योग का चार्ट, यज्ञ की सेवा, सब एक्यूरेट रखती थी | सफाई में बहुत अच्छी थी । उनके संग में रहकर ये सब बातें हम बहुत अच्छे से सीखे |
- दीदी नंबर वन स्टूडेन्ट थी। उसने बाबा को कंप्लीट फॉलो किया। टाइम पर आना, लगन से पढ़ाई पढ़ना, प्वाइंट्स नोट करना और बाबा जो कहे वो करना। अंतिम समय तक भी चश्मा, पेन और डायरी लेकर क्लास में आती रही | मुरली से अच्छे-अच्छे प्रश्न निकालती थी । फिर आपस में ज्ञान-चर्चा करती थी | रात को एक बहन को कमरे में बुलाकर कहती थी, आज जो प्रश्न निकाले, वो मुझे सुनाओ फिर जो पार्टी मिलने आती, प्रश्न पूछकर उनको बहलाती थी | श्रीमत पर चलने की बहुत बड़ी शक्ति थी दीदी के अंदर | सारा जीवन हमने देखा, दीदी कदम-कदम श्रीमत पर चली।
- निश्चय का फाउंडेशन दीदी का बहुत गहरा था।
- दीदी को जो भी मिलती थी, उसको कहती थी, तुम तो मेरी सखी हो | छोटी हो या बड़ी हो, सखी कहकर उसका दिल जीत लेती थी
- हरेक से गुण उठाती थी। समझो किसी ने भाषण अच्छा किया तो झट दीदी का ध्यान जाता था कि देखो, इसने भाषण कितना अच्छा किया, समझो किसी ने अच्छा काम किया तो कहती थी, कितना अच्छा काम किया। फिर उसका उत्साह भी बढ़ाती थी, आफरीन भी देती थी। दीदी को देखकर हम सीखते थे कि छोटी-सी बच्ची का अच्छा काम देखकर दीदी ने कैसे उसे लिफ्ट दे दी | दीदी गुणचोर थी।
- सौगात देने की भी दीदी में वंडरफुल कला थी | बाबा के घर में बच्चे तो आते ही रहते हैं, उन्हें मीठे वचन बोलकर, प्यार से सौगात देती थी। डायरी-पेन देती थी तो डायरी का पन्ना खोलकर पढ़ाती थी कि देखो कितना अच्छा स्लोगन है| फिर पूछती थी कि स्लोगन से क्या प्रेरणा मिली | ज्ञान देकर ज्ञानयुक्त सौगात देती थी ।
- अगर कभी किसी कारण से छोटी-मोटी भूल हो भी जाये तो छोटे के सामने भी अपनी भूल मानने में हिचकती नहीं थी जैसे दीदी कहती थी, मैंने यह बात इस भाव से कही, अगर आपको फील हुई हो तो भूल जाना।
- दीदी सच्ची मस्तानी गोपिका थी | बाबा से इतना अटूट स्नेह था जो नज़रों में एक ही बाबा बसता था। दीदी के दिल में एक बाबा के सिवाय कोई भी नहीं समाया | बाबा के प्यार में कभी डांस करती तो सेमी ट्रांस में जाकर लवलीन (मगन) हो जाती |
- सदा तुम्हीं संग खाऊं, तुम्हीं संग बैठु, तुम्हीं से रास रचाऊं - ऐसी एकव्रता होकर, सदा एक के ही गुण गाते आज्ञाकारी, वफादार, ऑनेस्ट बनकर रही । कभी किसी वस्तु, व्यक्ति की तरफ आकर्षित नहीं हुई |
- दीदी ने कभी बड़ी स्टेज पर जाकर प्रवचन नहीं दिये लेकिन एक-एक को जिगरी पालना देकर स्नेह की भासना दी। सभी का प्यार एक बाबा से जुड़ाया। हर एक को इतना निःस्वार्थ प्यार दिया जो और किसी में उसकी बुद्धि न जाये ।
- दीदी की बुद्धि इतनी स्वच्छ स्पष्ट थी, जो सामने कैसी भी आत्मा आये, उसे फौरन परख लेती और उसकी हर आवश्यकता को पूरा कर उसे बाबा का बना देती | दीदी के बात करने का ढंग ऐसा था जो बड़े-बड़े वी.आई.पी. भी दीदी से मिलने के बाद रेग्यूलर स्टूडेन्ट बन जाते ।
- दीदी की दृष्टि में रूहानी जादू था। जो भी दृष्टि लेते, उन्हें वैकुण्ठ की दुनिया का साक्षात्कार हो जाता | योग की ऐसी स्थिति थी, आत्मिक स्थिति का ऐसा अभ्यास था जो नजर से निहाल कर हर आत्मा को तृप्त कर देती |
- दीदी इतनी अंतर्मुखी रहती जो उनके मुख से कभी व्यर्थ बोल नहीं निकले। कभी किसी का परचिंतन, परदर्शन नहीं किया। उनके जीवन में गंभीरता के साथ रमणीकता का बैलेन्स था। वे सभी से अलौकिक चिटचैट करके खूब रिफ्रेश कर देती | उनके साथ बहुत रमणीकता से खेलपाल करती |
- दीदी कभी सुनी-सुनाई एक तरफ की बातों के आधार पर निर्णय नहीं लेती थी। अगर कोई किसी की कम्प्लेन करता, तो उसी समय उनके सामने उसे भी बुलाकर फैसला करती और जिसे जो शिक्षा देनी होती उसे स्पष्ट शब्दों में दे देती |
- दीदी कभी किसी बात में भयभीत नहीं होती थी | बाबा की शक्तियों में उनका अटूट विश्वास था| निश्चय अटल था इसलिए सदा निर्भय रही | यज्ञ के सामने कैसी भी परिस्थितियाँ आईं, उनमें सदा निश्चिंत रही, कभी क्यों-क्या का प्रश्न नहीं किया, सदा प्रसन्नचित्त रही । कभी उनके चेहरे पर चिंता के चिन्ह दिखाई नहीं दिये ।
- दीदी अंदर-बाहर स्वच्छ साफ थी। सच्चाई अति प्रिय थी, अगर कोई अपनी गलतियाँ सच्चे दिल से महसूस कर लेता तो उसे क्षमा कर देती और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती । कथनी और करनी सदा समान रहीं । जो दूसरों को कहती, वह पहले खुद करके दिखाती |
- दीदी यज्ञ की मालिक थी लेकिन उनके जीवन में बालक और मालिकपन का बैलेन्स देखा । जो यथार्थ बात होती वह मालिक बन सबके सामने रखती लेकिन अगर सबकी एकमत नहीं होती तो बालक बन उसे भूल जाती। कभी बहस या डिबेट में समय नहीं गंवाती थी | दीदी बालक बन बाबा की अंगुली पकड़कर यज्ञ की हर डिपार्टमेन्ट का चक्कर लगाती। बाबा उन्हें कहते, अभी आपने बाबा की अंगुली पकड़ी है, भविष्य में श्रीकृष्ण आपकी अंगुली पकड़कर चलेगा । ऐसा नशा है ना!
- दीदी की रग-रग में यज्ञ के प्रति अटूट प्यार था, यज्ञ को किसी भी प्रकार की आंच न आये, उसके लिए बहुत ध्यान रखती थी और हर एक को यज्ञ की अमानत संभालने की, निःस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा देती थी ।
- दीदी ने अनेकों का तन-मन-धन सफल कराया । दीदी ने यह परखकर कि यज्ञ को कौन सम्भाल सकते हैं, उन्हें समर्पित कराया और उनके दिल में यज्ञ के प्रति भावना भरी |
- दीदी अलौकिक माँ के रूप में सबको स्नेह भी देती, हर प्रकार से यज्ञ वत्सों को खाने-पीने, पहनने, रहने की सुविधा देती, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखती, लेकिन कभी कोई ईश्वरीय नियम एवं मर्यादाओं में अलबेला होता, आलस्य करता या किसी मर्यादा को तोड़ता तो उसे फौरन सज़ा देती या डायरेक्ट बुलाकर इशारा देती |
- दीदी स्वयं को ईश्वरीय मर्यादाओं का कंगन बांधकर रखती और सभी का उन पर ध्यान खिचवाती | ब्राह्मण सो देवता बनने वाली आत्माओं को विशेष संगदोष, अन्नदोष न लग जाए इसलिए दीदी पहली शिक्षा यही देती कि संग से अपनी संभाल करना । पवित्रता के व्रत को कभी खंडित होने नहीं देना| ब्रह्मचर्य के साथ ब्रह्माचारी बनकर रहना|
- दीदी का ध्यान यज्ञ की आलराउण्ड सेवा पर रहता, वे मुरली क्लास के पश्चात् स्वयं भण्डारे में चक्कर लगाती और कुछ समय सबके साथ बैठकर सब्जी काटने में मदद करती | एक्यूरेसी उनके जीवन में कुट-कूटकर बाबा ने भरी थी | वे बाबा के अव्यक्त होने के बाद सभी पत्रों का जवाब खुद बैठकर लिखती या लिखवाती | कभी दीदी ने कोई भी सेवा पैन्डिंग नहीं रखी । जो सेवा जब जरूरी है, उसे उसी समय अलर्ट बनकर किया और कराया।
- स्वयं सर्वशक्तिवान बाबा हमारा साथी है, दीदी सदा इसी स्वमान में रहती और सबको दिल से सम्मान देती । अगर कोई अपनी सेवा समय प्रमाण सच्चाई से करता तो उसे इतना ही सम्मान देती, खातिरी करती, विशेष सौगात देती । दीदी के दिल में यज्ञ के सच्चे सेवाधारियों प्रति अति रिस्पेक्ट था।
- दीदी स्वयं योग के गहरे अनुभवों में सदा रहती और अमृतवेले विशेष खुद सबको संगठित रूप में योग की ड्रिल कराती, साथ-साथ कर्म करते कैसे योग में रहना है, उस पर भी ध्यान खिंचवाती |
- दीदी कभी तेरे-मेरे की हदों में नहीं आई, यह जोन अथवा यह एरिया इसकी है या उसकी है, इस प्रकार की भाषा दीदी के मुख से कभी नहीं सुनी | वे सदा बेहद में रही, बेहद की सोच वा समझ से सबकी पालना की।| मैं और मेरेपन की भाषा से मुक्त रही |
- यज्ञ की अनेक जवाबदारियों को संभालते हुए, “करावनहार बाबा है, वही करता कराता है”, इसी निश्चय से स्वयं को निमित्त बनाये दीदी सदा निर्माण होकर रही । दीदी के बोल में कभी अभिमान का अंश नहीं दिखाई दिया ।
- दीदी यज्ञ की इकानामी का बहुत ध्यान रखती, दीदी कहती, गरीब-गरीब बच्चे, भोली-भोली मातायें अपनी मेहनत की कमाई यज्ञ में भेजती हैं, इसलिए कोई भी व्यर्थ खर्च नहीं करना है। अपने प्रति कम से कम खर्च हो, इस बात पर ध्यान रखना है। साधन-सुविधायें सब सेवा के लिए हैं, अपने प्रति नहीं।
- कभी कोई यज्ञ की वा बड़ों की इनसल्ट करता, कोई उल्टा-सुल्टा बोलता तो भी दीदी कहती, बाबा ने सब पर उपकार किया है, इसका दोष नहीं है। इसलिए कभी भी बदला लेने का ख्याल नहीं रखना। दूसरे को बदलने के बजाय खुद को बदल लो, इसमें ही भलाई है।
- दीदी अव्यक्त होने के कुछ महीने पहले से ही हर कारोबार से उपराम होती गई। कभी कोई बात दीदी को सुनाते तो दीदी कहती, छोड़ो इन बातों को, अब तो घर चलना है। दीदी के इस वाक्य के आधार पर ही एक गीत बना, “अब घर चलना है।” इसी एक स्मृति से दीदी साक्षीद्रष्टा बनती गई, कार्य व्यवहार से भी उपराम होते, 28 जुलाई1983 में इस भौतिक देह से अलग हो अव्यक्तवतन- वासी बन बेहद सेवा में चली गई ।