जीना है तो हंसके जियो

Happiness
0 Comments

डिक्शनरी की परिभाषा अनुसार मुस्कराहट, चेहरे का एक ऐसा भाव है जिसमें होठों के किनारे हलके से ऊपर की तरफ उठ जाते हैं, और इससे एक व्यक्ति का उत्साह, उसकी रज़ामंदी या खुशी ज़ाहिर होती है। मुस्कान तथा प्रसन्नता हमारे शरीर एवं मन पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालते हैं और शोक, भय, क्लेश जैसी प्राणघातक वृत्तियों का उन्मूलन क्षण भर में कर डालते हैं और इसी वजह से आनंद को ईश्वरीय गुण कहा गया हैं क्योंकि वह हमारे शरीर में मधुर रस उत्पन्न करता है और किसी अव्यक्त मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से शरीर और मन पर तत्काल शान्ति का अलौकिक प्रभाव डालता है। भौतिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए इंसानो को संयोग से यदि कोई मुस्कुराता हुआ व्यक्ति दिख जाता हैं, तो उसे देखकर वे बड़े प्रसन्न हो जाते हैं और उसकी ओर आकर्षित होते हैं | इसके पीछे का मूल कारण हैं ‘सकारात्मक प्रभाव’ जो केवल एक मुस्कान मात्र से व्यक्ति को अपने सर्व दुःख दर्द भुला देता हैं और सुख व् संतोष की अनुभूति कराता हैं, और इसीलिए ही मनुष्य को जब भी हँसने का अवसर मिले, तब जी भरके खूब हँसना चाहिये। याद रहे ! जो व्यक्ति हँसना नहीं जानता, वह जीना नहीं जानता।

हँसने वाले की ओर सारा संसार आकर्षित होता है और रोने वाले से सबको विकर्षण रहता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य जितनी देर हँसता है, उतनी ही अवधि की वृद्धि वह अपने जीवन में कर लेता है। तभी तो कहते हैं की जो सदा हँसता-मुस्कुराता हैं वह अस्सी वर्ष की अवस्था में भी नौजवान लगता हैं, वहीं इसके बिलकुल विपरीत जो मन-मलीन और उदास रहता है, वह बीस वर्ष की आयु में भी बूढ़ा लगने लगता हैं |

हँसने से अनेक द्रव्य मस्तिष्क में प्रवाहित होते हैं जो हमें अनेक बीमारियों से बचाते हैं और तंदुरुस्त रखते हैं, इसीलिए ही हास्य को स्वास्थ्य का मूल-मंत्र माना गया है | ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि उत्तेजनाओं से जो शारीरिक अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती हैं, मनोविकारों का जो विष अवयवों में संचित हो जाता है वह हँसने से दूर हो जाता है। हँसने से फेफड़ों को भी नवीन शक्ति मिलती है, जिससे शरीर का रक्त शुद्ध और सशक्त बनता है।

आज एक तरफ अनेक प्रकार के टीवी सीरियल्स मनुष्यों को ज़बरदस्ती हँसाने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी तरफ महानगरों में बने विविध लाफिंग क्लब्स मानव के चेहरे पर ज़बरदस्ती हँसी लाने का अल्प प्रयास कर रहे हैं| परन्तु यह कृत्रिम हास्य में क्या मज़ा ? असली मज़ा और आनंद तो वास्तविक मुस्कान में हैं, जो बदकिस्मती से हमें किसीके भी चेहरे पर दिखती नहीं है, क्यों? इसका कारण हैं हमारे मन का मैल| जी हाँ ! जैसे दीपक की बाती में चाहे कितनी भी रोशनी हो पर उस पर लगे कांच के आवरण पर यदि मिट्टी या कालिमा लगी हो तो वह प्रकाश मैले कांच से अवरुध्द हो जाता है एवं पूर्णरूपेण बाहर नहीं फैल सकता। ठीक इसी प्रकार से, जब तक हमारे मन पर छल, कपट,ईष्या, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की कालिमा है तब तक हमारी आत्मा की खुशी अवरुध्द होती रहेगी और हमारे चेहरे पर मुस्कराहट आयेगी नहीं। इसीलिए, सर्व प्रथम हमें इस कालिमा को दिव्य गुणों की धारणा द्वारा साफ़ करना होगा, अन्यथा हमारा जीवन इन्ही अवगुणों के वशीभूत सदा दु:खी व् असंतुष्ट रहेगा | क्या हमने मनुष्य जन्म ऐसे ही रोते-बिलखते काटने के लिए लिया हैं या हँसते-खेलते और गाते-मुस्कराते हुए महोत्सव की भाँति आनन्द लेने के लिए लिया हैं ?

Choose your Reaction!
Leave a Comment

Your email address will not be published.