पश्चाताप की पीड़ा से अधिक श्रेष्ठ हैं- स्व-परिवर्तन की भावना

Self change
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पश्चाताप या अफसोस करना यह हमारे जीवन की एैसी दुःखदायी भावनाएँ है, जिसका असर बाहर से तो दिखाई नही पड़ता है लेकिन अंदर बड़ी अजीब सी घुटन महसूस कराता हैं जिससे हमारा मन अंदर ही अंदर खाता रहता हैं। इसका मूल कारण है भूतकाल की कुछ घटनाओं को परिवर्तित करनेकी हमारी तीव्र इच्छा। जो अवसर हमनें खो दिए हैं, उन्हें फिर से हम प्राप्त करना चाहते हैं। कई बार हम सोचते हैं कि ऐसा न होकर ऐसा होता तो…..जैसे कि मैं अपने बच्चे पर नहीं चिल्लाता तो …., मैं अपने दोस्त से बुरी तरह से झगड़ा नहीं करता तो आज मेरा दोस्त मेरे साथ होता….ऐसी अनेकानेक बातें सोच-सोचकर हम अफसोस या पश्चाताप करते रहते हैं। अफसोस करना यह अपने समय, संकल्प और शक्ति को व्यर्थ बर्बाद करना हैं। एक तो गलती करते वक्त अपना समय, अपनी शक्ति को व्यर्थ बर्बाद किया, फिर उसका चिंतन या पश्चाताप करने में अपना अमूल्य समय और अपनी शक्ति को व्यर्थ बर्बाद किया।

पश्चाताप की भावना में बुद्धि का सोचना बिलकुल बंद हो जाता हैं। ! याद रखें !, निराश होकर हम कभी भी भूतकाल की बीती हुई बातों को परिवर्तन नहीं कर सकते। इसलिए जीवन में पीछे मुड़ कर देखने के बजाए आने वाले समय की ओर देखें । बेहतर यही होगा की पश्चाताप या अफसोस पर विजय प्राप्त करने के लिए अतीत को एक अनुभव के रुप में स्वीकार करें । उस अनुभव से हमें क्या सीख मिली इसका चिंतन करें और बीती हुई बात को पूर्णविराम देकर आगे के लिए सावधानी बरतें । शांति में बैठकर भविष्य में ऐसी गलती दुबारा न हो, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए इसे सोचें। पश्चाताप की भावना को मन से निकाल दें और जीवन में आगे बढ़ते रहें। कुछ पल के लिए आरामदायी स्थिति में बैठे और अपनें मन से पश्चाताप की पीड़ा को निकाल दे। लेकिन! इतना बेपरवाह नही बनें की वह गलती दुबारा हमसे हो जायें। गिरे हुए दुध पर रोने से कोई फायदा नहीं। पर यदि आप गिरे हुए दूध की किंमत को जान नही सके, तो आगे इससे अधिक दूध गिरा सकने की संभावनाएँ निर्मित हो सकतीं हैं। इसलिए प्रति दिन सोने से पहले अंतर्मन के दर्पण में स्वयं को देखे और जीवन में कुछ अच्छा लक्ष्य बनाकर यथार्थ रीति से अपने जीवन का आनंद ले।

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  • बहुत ही सही बात सरल शब्दों में समझाई है , धन्यवाद जी

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