17 जनवरी 2026 को प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के साकार संस्थापक पिता श्री ब्रह्मा बाबा के स्मृति दिवस के पावन अवसर पर मधुबन का वातावरण भावनाओं, श्रद्धा और शांति से सराबोर हो उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बाबा आज भी अपनी कर्मस्थली में साकार रूप से उपस्थित हों और बच्चों को पालना दे रहे हों।



ब्रह्मा बाबा की कर्मस्थली पांडव भवन सहित शांतिवन, ज्ञान सरोवर, मनमोहिनी वन एवं अन्य परिसरों को देश-विदेश से आए रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों से अत्यंत सुंदर रूप से सजाया गया। बाबा का कमरा, शांति स्तंभ, हिस्ट्री हॉल और बाबा की कुटिया को फूलों से इस प्रकार सजाया गया कि हर आने वाली आत्मा को साकार पालना का मधुर अनुभव हो रहा था। पूरा वातावरण मानो सूक्ष्म लोक का सजीव रूप बन गया हो।




इस दिव्य सजावट में गेंदा, गुलाब, जरबेरा, डेज़ी, कार्नेशन, रजनीगंधा सहित लगभग 25 प्रकार के पुष्पों का उपयोग किया गया। हैदराबाद, सूरत, राजकोट सहित विभिन्न स्थानों से आए लगभग 100 से अधिक भाई-बहन पूरे प्रेम, लगन और उमंग से इस सेवा में जुटे रहे। कई सेवाधारियों ने बताया कि वे वर्षों से इस सेवा के लिए आते हैं और इसे अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।
इस वर्ष सजावट की विशेष थीम “कर्मातीत बनने की” रखी गई, जिसके अंतर्गत आंगन और झोपड़ी में सूक्ष्म वतन का अनुभव कराने वाली रचनाएँ तैयार की गईं। फूलों की यह सजावट केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि तपस्या, पवित्रता और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गई।


स्मृति दिवस के अवसर पर देशभर से लगभग 20,000 ब्रह्मावत्स मधुबन पहुंचे। सभी ने गहन योग साधना, मौन और आत्मचिंतन के द्वारा विश्व शांति के दिव्य संकल्प फैलाए। शांतिवन में बड़ी संख्या में भाई-बहन ध्यान में लीन होकर विश्व को शांति के प्रकंपन दे रहे थे। खिले हुए चेहरे और शांत मुस्कानें भी इन फूलों के समान बाबा की बगिया को और अधिक महका रही थीं।


उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी को ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने की स्मृति में यह दिवस विश्व एकता दिवस, विश्व शांति दिवस एवं अव्यक्त दिवस के रूप में मनाया जाता है। संस्था के 140 देशों में स्थित हजारों सेवा केंद्रों पर इस अवसर पर विशेष योग एवं शांति कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मधुबन में फूलों से सजी यह दिव्य बगिया सभी को यह संदेश दे रही थी कि ब्रह्मा बाबा भले ही अव्यक्त हैं, परंतु उनकी यादें, शिक्षाएं और उनका प्रेम आज भी हर ब्राह्मण आत्मा के जीवन में सजीव हैं—और यही स्मृति दिवस का सच्चा अर्थ है।





























