व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक

व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक

भ्राता जगदीश जी के प्रति साकार बापदादा के महावाक्य

"तुम महारथी बच्चे हो, तुम्हारी बुद्धि तेज चलती है। मेल्स भी अच्छे-अच्छे हैं। नम्बर वन तो है जगदीश, जो मैगज़ीन बनाते हैं।"
"देहली में सब से नामीगिरामी समझाने वाला कौन है? तो झट नाम लेंगे जगदीश का। तुम्हारे लिए मैगज़ीन भी निकालते हैं। उसमें सब-कुछ आ जाता है। अनेक प्रकार की प्वाइंट्स लिखते हैं। लिखना कोई मासी का घर थोड़े ही है? ज़रूर विचार सागर मंथन करते हैं, अच्छी सर्विस करते हैं। कितने लोग पढ़कर खुश होते हैं!"
"प्रदर्शनियाँ होती हैं तो लिखते हैं, बाबा, फलानी को भेज दो। अच्छा कुमारका है, मनोहर है, गंगे है इनमें से किसी को भेज दो। बच्चे तो ढेर हैं। जगदीश को भेज दो, रमेश को भेज दो।"

भ्राता जगदीश जी के प्रति अव्यक्त बापदादा के महावाक्य

"सेवा में शक्तियों के साथ पार्ट बजाने के निमित्त बनना यह भी विशेष पार्ट है। सेवा से जन्म हुआ, सेवा से पालना हुई और सदा सेवा में आगे बढ़ते चलो।"
"सेवा के आदि में पहला पाण्डव ड्रामा अनुसार निमित्त बने। इसलिए यह भी विशेष सहयोग का रिटर्न है। सहयोग सदा प्राप्त है और रहेगा।"
"हर विशेष आत्मा की विशेषता है, उसी विशेषता को सदा कार्य में लगाते विशेषता द्वारा विशेष आत्मा रहे हो।"
"सेवा के भण्डार में जा रहे हो। विदेश में जाना अर्थात् सेवा के भण्डार में जाना। शक्तियों के साथ पाण्डवों का भी विशेष पार्ट है। सदा चान्स मिलते रहे हैं और मिलते रहेंगे।"

दादी प्रकाशमणि जी - दिल का उद्‌गार

"आपको मालूम होगा कि सन् 1952 से कमला नगर सेन्टर पर आप पहला स्टूडेण्ट रहे। बराबर रोज़ दूर से आते थे और हमारी कुंज बहन से बहुत ही अच्छी रीति से प्रश्न-उत्तर करते, बहुत-बहुत प्यार से इस नॉलेज को सुनते रहे और जानते रहे क्योंकि सब जानते हैं कि आप आत्मा बहुत ही बुद्धिशाली हैं।"
"मुझे याद है कि पहले-पहले आप बापदादा से सम्मुख मिलने आये थे, उसी समय से, बाबा ने आपके प्रति यह प्रेरणा दी थी कि आप बच्चे इस नॉलेज को बहुत अच्छी तरह समझ के औरों तक पहुँचायेंगे, लिखेंगे। तब से लेकर छोटे-से बड़े लिट्रेचर यानि बुक्स कहो, लिखते रहे। बार-बार बाबा के सामने, मम्मा के सामने आते रहे। आपने बाबा-मम्मा से बहुत ही डायरेक्ट पालना ली है।"

दादी हृदयमोहिनी जी - दिल का उद्‌‌गार

"हमें भी याद है कि जब जगदीश भाई समर्पण हुआ, तब कमला नगर में सिर्फ दो छोटे कमरे थे। हाल भी नहीं था। एक में बहनें रहती थीं और एक में जगदीश भाई रहते थे। वहाँ ही सारा कारोबार चलता था। जगदीश भाई ने फिर मकान लेने में बहुत सहयोग दिया।
शुरू से इनका बहनों से बहुत प्यार था। हमें याद है, उन दिनों गरमी बहुत थी, तो कमला नगर से 4-5 किलोमीटर दूर बर्फखाना था, यह वहाँ जाकर सेवा करके वहाँ से अपने कंधे पर बर्फ की जो बड़ी ईंट (सिल्ली) होती है, वह ले आता था और सभी बहनों को ठण्डा पानी अथवा शरबत आदि पिलाने की सेवा करता था। बाबा के डायरेक्शन से पहले-पहले कुम्भ मेले के लिए लिटरेचर तैयार किया था। पहला वह बुक लिखा था। तो सेवा के निमित्त शुरू से ही बने।”

दादी जानकी जी - दिल का उद्‌‌गार

"जगदीश भाई से हमारा जो स्नेहयुक्त सम्बन्ध रहा वो बहुत वण्डरफुल था। उसको मेरी पहचान और मुझे उसकी पहचान बहुत महीन थी। दिल्ली, कमला नगर में हम रहते थे। जगदीश भाई को ज्ञान में लाने के लिए निमित्त मैं बनी हूँ। जैसे बाबा प्यार देता था, वैसे जगदीश भाई ने भी मुझे बहुत प्यार दिया, सन्मान दिया।
भाइयों में वह एक ही ऐसा भाई था जो ज्ञान की लेन-देन करने में, राय-सलाह देने में बहुत होशियार था। बाबा की याद कैसे की जाती है, उसकी गहराई क्या है-उसकी लेन-देन हम वहाँ सेन्टर पर करते थे। एक तरफ दीदी का कमरा था, उसके बगल में मेरा कमरा था, बाहर बालकनी में जगदीश भाई रहता था। हम साथ रहे हैं, आपस में एक-दो को समझने में, पहचानने में बिलकुल स्पष्ट थे। उसको बाबा की पहचान बहुत अच्छी रही।”

दादी मनोहर इन्द्रा जी - दिल का उद्‌गार

"जगदीश भाई के साथ का हमारा बिलकुल आदि का सम्बन्ध है। दिल्ली में जब पहला सेन्टर खुला कमला नगर में, हम वहाँ इकट्ठे रहते थे। जब हम कमला नगर गये तब जगदीश भाई नया-नया आया हुआ था। हम और सन्देशी बहन वहाँ गये, एक ही कमरे का सेन्टर था वो। उसी में हम सब रहते थे।
जब मैं कमला नगर गयी उस समय वह लौकिक में स्टूडेण्ट था। उसको जानने की बहुत उत्सुकता होती थी। बहुत प्रश्न करता था जानने की दृष्टि से।
शुरू से बाबा ने जगदीश भाई को लिखने का कार्य दिया था। पहले जगदीश भाई हिन्दी में लिखकर हमें देता था ताकि हम उसको सिन्धी में लिखें। सिन्धी में लिखकर बाबा को भेजा जाता था।"

दादी गंगे जी - दिल का उद्‌गार

"भ्राता जगदीश जी हम सब के अति प्रिय थे और सदा रहेंगे। मुझे याद आता है, जब हमारा साहित्य छपना शुरू हो गया उस समय हिन्दी भाषा की बहुत आवश्यकता थी। बाबा कह रहे थे बच्ची, एक दिन ऐसा रत्न आयेगा जो हिन्दी भाषा में आपका साहित्य तैयार करेगा। पहले से ही साकार बाबा ने हम लोगों को बता दिया था। ठीक समय अनुसार ये आ गये और अपनी सेवायें देना शुरू कर दीं।
मैं तो कानपुर में रहती थी। सुनती रहती थी कि दिल्ली में ऐसा एक भाई आया है। जगदीश भाई की बुद्धि बहुत तेज थी और वे भी आर्य समाजी थे।
आप जानते हैं आर्य समाजी हर बात में प्रश्न करने में बहुत होशियार होते हैं। जब ये मधुबन में थे, उन्हीं दिनों मैं भी कानपुर से पार्टी लेकर मधुबन आ रही थी।"

दादी कुंज जी - दिल का उद्‌गार

"जगदीश भाई का जब ज्ञान सीखने-अर्थ आना हुआ तो अनुभव होता था कि यह प्यारे बाबा का सच्चा परवाना है। उस में यह विशेषता थी कि जब प्रश्न पूछता था तो जब तक उस प्रश्न का उत्तर उसकी बुद्धि में ठीक रीति से फिट नहीं बैठता था, तब तक वही वही प्रश्न भिन्न-भिन्न रीति से पूछता ही रहता था। बाबा को, इन्हें साहित्य लिखने के निमित्त बनाना था, इसने लिखने का काम पाँचवें दिन से ही शुरू किया। पाँचवें दिन जब यह कोर्स करने आया, तब मैंने कहा, जगदीश भाई जी, आज हम कोर्स नहीं करायेंगे। उसने कहा, क्यों? मैंने कहा, 'मिरर' पत्रिका में छपा है कि ब्रह्माकुमारियाँ ईसाई धर्म की हैं। हम पत्रिका वालों के पास होकर आये हैं, उनको लेख लिखकर देना है। इसने कहा, हमारा कोर्स तो होगा ज़रूर, लेख लिखकर आप मुझे दे दो हिन्दी में उसको मैं लिखकर ठीक कर दूँगा।”

दादी रतनमोहिनी जी - दिल का उद्‌गार

"जगदीश भाई को बाबा कहते थे कि इसकी बुद्धि बहुत लम्बी है। बड़ा समझदार, बड़ा बुद्धिवान है।सबसे बड़ी बात तो यह थी कि इसको बाबा के लिए अर्थात् ईश्वर के लिए बड़ी लगन थी। जब से इसने बाबा को पहचाना, इसका बाबा से ऐसा ही रिश्ता रहा जैसे कि यह बहुत वर्षों से बाबा को जानता है।
बाबा के बनने के बाद इसका बाबा से ऐसा सम्बन्ध था जैसे कि सगे बाप-बच्चे का।
बाबा के प्रति कभी-कभी इसकी ऐसी एक्टिविटीज़ (हरकतें) होती थीं जैसे कि छोटा बच्चा अपने बाप से लाड-प्यार करता है। इस तरह इसका मिलन बाबा से होता रहता था।”

भ्राता रमेश शाह जी - दिल का उद्‌‌गार

"हम सबके अति प्रिय भ्राता जगदीश जी बहुत ही अनुभवी, शास्त्रों एवं विविध धर्मग्रंथों के समर्थ विद्वान तथा ईश्वरीय ज्ञान के विविध तथ्यों की गहराई को जानने वाले थे।
उनको समाज की विभिन्न व्यवस्थाओं और कारोबार का भी गहन अनुभव था। उनकी लेखनी ज्ञान के गूढ रहस्यों से युक्त और ज्ञान के गहन अर्थों को प्रत्यक्ष करने वाली थी।
बापदादा द्वारा, मेरे लिए दिये गये वरदान की जानकारी, भ्राता जगदीश जी द्वारा मुझे मिली इसलिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूँ। उन्होंने मुझे ईश्वरीय सेवा में आगे लाने का पुरुषार्थ किया और अन्त तक मेरे साथ बड़े भाई का सम्बन्ध निभाया।”

भ्राता निर्वैर जी - दिल का उद्‌गार

"मेरे ईश्वरीय जीवन की, ज्ञान के जीवन की शुरुआत में ही भ्राता जी से मिलन हुआ था। जब छह महीने मुझे ज्ञानमार्ग में चलते हुए थे तब माउण्ट आबू से देहली गया था। उस समय भ्राता जी और दादी गुलज़ार जी से मिलना हुआ था कमला नगर सेन्टर पर। तब से लेकर उनके साथ मेरा बहुत-बहुत प्यार का, सम्मान का सम्बन्ध रहा।
उनकी वाणी, उनके चरित्र, उनकी सेवा की योजना आदि देखकर बाबा उनको कहते थे कि इस बच्चे की तो सात फूट लम्बी बुद्धि है। उनके साथ अधिक से अधिक समय बिताने के संकल्प से कभी उनसे मैं मधुबन में मिलता, कभी किसी कार्यक्रम में इकट्ठे होते और कभी भ्राता जी मुंबई आते थे तो वहाँ कुछ समय साथ रहते, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।”

भूमिका

जीवन्त जीवन-पथ
इस संसार में अनगिनत सन्त, महात्मा, योगी, त्यागी, ऋषि, मुनि, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, भौतिकशास्त्री, जीवशास्त्री, खगोलशास्त्री, भूगर्भशास्त्री, दार्शनिक, चिन्तक, समाजसेवक, धर्मसेवक, साहित्यकार, कलाकार, कवि, शायर होकर गये हैं। उनमें से अनकों की जीवन-कथायें भी लिखी गयी हैं। इनमें से कइयों ने स्वयं ही अपनी आत्म-कथा लिखी है, कइयों की जीवन-कथायें उनके सम्बन्धी या अनुयायियों ने लिखी हैं ताकि आने वाली पीढ़ी के लोग उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी ऊँच बनायें और संसार में एक आदर्श पुरुष के रूप में प्रसिद्धि पायें।
यह पुस्तक भी एक ऐसे महापुरुष की जीवन-कथा है जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्रभुप्रेम के लिए, कन्याओं, माताओं, गृहस्थ जीवनधारियों, युवाओं, बाल-वृद्धों को आध्यात्मिक ज्ञानी, सहज राजयोगी, दैवीगुण संपन्न और निःस्वार्थ समाजसेवी बनाने में अर्पण किया। इतना ही नहीं, इस पुस्तक में जिस व्यक्ति के बारे में लिखा गया है वह व्यक्ति, आरम्भ में वर्णित विभिन्न व्यक्तित्वों के धनी थे इसलिए इस पुस्तक का नाम "व्यक्ति एक, व्यक्तित्व अनेक" रखा गया है।
वैसे देखा जाये तो यह पुस्तक उनकी जीवन-कथा नहीं है, उनके जीवन को जिन्होंने बहुत नज़दीक से देखा है, जिन्होंने दशकों तक उनके अंग-संग रहकर उनसे बहुत कुछ सीखा है, जिन्होंने सेवाक्षेत्र में उनके साथ रहकर प्रेरणायें प्राप्त की हैं, उन महान् अनुभवियों के अनुभवों का यह संग्रह है। अगर आप ध्यान से इन सब अनुभवों को पढ़ेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि भ्राता जगदीश जी न केवल व्यक्ति अथवा ब्रह्माकुमार थे बल्कि वे सबसे पहले एक सुशिक्षित, सज्जन, सभ्य तथा नेक इन्सान थे। उसके अलावा, वे एक महान विद्वान धर्म-प्रवर्तक, समाज सुधारक अर्थशास्त्रमनोवैज्ञानिक, थॉट रीडर, भविष्यवक्ता, प्रशासनतज्ञ, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक एवं चिन्तक, भौतिकशास्त्रज्ञ, संख्याशास्त्रज्ञ, तर्कशास्त्रज्ञ, वास्तुशास्त्रज्ञ, शिक्षाविद, शिक्षा-सुधारक, न्यायशास्त्रज्ञ, साहित्यकार, कवि, शायर, कथाकार, बहुभाषाज्ञाता, तपस्वी, राजयोग साधक तथा नारी-उत्थान समर्थक थे।
इस संकलन में भाई साहब के विभिन्न व्यक्तित्वों के विविध रूपों का दर्शन पाठकों को कराने का यत्न किया गया है। इस संकलन के दो लक्ष्य हैं। पहला है, ईश्वरीय विश्व विद्यालय के समस्त सिद्धान्तों और नियम-मर्यादाओं को सम्पूर्ण रूप से आत्मसात् करके आदर्श राजयोगी बने भ्राता जगदीश जी को, समस्त ईश्वरीय परिवार जाने तथा भविष्य में इस पथ पर चलने वाली नयी पीढ़ी भाई साहब की जीवन पद्धति को जानकर, उसका अनुसरण करे और अपना जीवन सार्थक बनाये। दूसरा लक्ष्य यह है कि भ्राता जगदीश जी के अंग-संग रहकर ईश्वरीय सेवा किये हुए भाई या बहनें, जहां भी जायें वहाँ के ईश्वरीय परिवार को भ्राता जगदीश जी के बारे में इस संकलन की बातों को सुना सकें। इसके अलावा कई स्थानों के, कई भाई-बहनों की सबल इच्छा थी कि भ्रात्ता जगदीश जी के बारे में एक पुस्तक होनी चाहिए। इस लिए दैवी परिवार और बरिष्ठ भाई-बहनों की शुभ-आशा और शुभ-भावना से प्रेरित होकर यह पुस्तक तैयार की गयी है।
मुझे खुशी है कि 10 सितम्बर, 2017 को भ्राता जगदीश चन्द्र जी का 88वां जन्म-दिवस है, इस शुभ अवसर पर यह पुस्तक तैयार हुई है।
अनुभवों के इन लेखों को आठ विभागों में विभाजित किया गया है। पहला है, भ्राता जी का लौकिक परिचय; दूसरा है, उनका अलौकिक परिचय; तीसरा है, वरिष्ठ ब्रह्माकुमारी शिक्षिका बहनों के अनुभवः चौथा है, युवा बहने, जो बचपन से ईश्वरीय ज्ञान के सम्पर्क में रहकर, आज इस विश्व विद्यालय की शिक्षिकायें बन देश-विदेश में सेवा कर रही हैं; पांचवां है, युवा भाइयों के अनुभव; छठवां है, गृहस्थ जीवन में रहते, आध्यात्मिक जीवन में चलने वालों के अनुभव; सातवाँ है, भ्राता जगदीश के शरीर को कर्मभोग का आना, उसका सामना करना और उस पर विजय प्राप्त करना; आठवां है, भ्राता जी के प्रति वरिष्ठ दादियों की पुष्पांजलि।
भ्राता जगदीश जी स्वयं ही एक जीवन्त जीवन-पथ थे। उनकी जीवन-शैली ही देखने वालों के लिए एक प्रेरणा पथ रही। इस पुस्तक में भ्राता जगदीश जी के शरीर छोड़ने के बाद जो अव्यक्त सन्देश आये थे, उन्हें एवं उनके प्रति अव्यक्त बापदादा के महावाक्यों को सम्मिलित करना चाहते थे परन्तु पुस्तक का आकार बहुत बड़ा होने की संभावना से उनको छोड़ना पड़ा।
अगर इस पुस्तक को पढ़कर पाठकगण अपने जीवन में प्रगति के लिए प्रेरित हो जायें, अपने पुरुषार्थ को तीव्रतम बनायें तो पुस्तक बनाने वाले का परिश्रम सार्थक हो जायेगा।
अपने अनुभव सुनाकर इस बृहद् पुस्तक को बनाने में सहयोगी बने समस्त भाई-बहनों को वरिष्ठ दादियाँ और भाई, जो आज हमारे बीच नहीं हैं, उनके अनुभवों के ऑडियो विडियो देकर सहयोगी बने आडियो-वीडियो विभाग के भाइयों को तथा भाई साहब के फोटो भेजकर यह पुस्तक बनाने में अपना अनमोल योगदान प्रदान करने वाले सभी दानी और उपकारी भाई-बहनों को प्रकाशक की ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।
मधुबन 3 अगस्त, 2017 - 'सेवाधारी'

लौकिक परिचय

भ्राता जगदीश जी का जन्म सन् 1929, सितम्बर 10, मंगलवार के दिन मुलतान शहर में हुआ, जो आज पाकिस्तान में है। मुलतान पंजाब प्रान्त का एक ज़िला है। यह पाकिस्तान की पांचवीं बहु आबादी वाली मेट्रोपोलिटन सिटी है। इसका क्षेत्र क़रीब 133 स्क्वायर किलोमीटर है। यह शहर चेनाब नदी के किनारे बसा हुआ है।
मुलतान सन्त, महन्त और सूफ़ियों का शहर कहा गया है क्योंकि इस शहर ने आध्यात्मिक संसार को असंख्य सूफियों और सन्तों का उपहार दिया है।
मुलतान शहर के अनेक नाम हैं। हिन्दू पुराणों के उल्लेख अनुसार इस शहर का नाम 'कश्यपपुर' था। कश्यप मुनि के नाम पर ही इसका नाम रखा गया था। इसके अलावा इस शहर को अलग-अलग समय पर अलग-अलग नाम से पहचाना जाता था। वो नाम हैं- हंसपुर, वेगापुर, सांबपुर इत्यादि। 'मुलतान' नाम संस्कृत के 'मूलस्थान' शब्द से उत्पन्न हुआ है। यह नाम यहाँ 'सूर्य मन्दिर' निर्माण होने के बाद रखा गया।
ऐसे आध्यात्मिक सन्त-महात्माओं के जन्मस्थान पर ही राजयोगी ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश जी का जन्म हुआ। इनका पूरा नाम है- जगदीश चन्द्र हसीजा। इनके पिता जी एक ज़मीनदार थे। भारत का विभाजन होने के बाद ये भारत के हरियाणा प्रान्त में आये और वहां सोनीपत में इनके पिता जी को सरकार की तरफ से जमीन मिली।
बचपन से ही जगदीश जी को धर्म, ज्ञान, योग, देशभक्ति, समाज सेवा, भगवत्-प्राप्ति की खोज़ में बहुत उत्कंठा और जिज्ञासा थी। अतः जहाँ भी सत्संग होते थे वहां जाकर वे बैठ जाते थे। परमात्मा के बारे में जानने के लिए ये 12 साल की उम्र से ही सन्त, महन्त और सुफ़ियों के पास जाया करते थे और चर्चा किया करते थे। अपने विद्यार्थी जीवन में ही ये सब धर्मों के मूलग्रंथों का अध्ययन कर चुके थे।
परमात्मा को पाने की इच्छा से वे कहाँ-कहाँ गये और क्या-क्या किया, इसके बारे में उन्हीं के शब्दों में जानेंगे, "अगर मेरी सारी कहानी सुनाऊँ, हैदराबाद, सिन्ध भी मैं गया। मैं पढ़ता था कॉलेज में और बहुत मन में आता था, 'हे भगवान! आपसे मिलन कब होगा? मेरे जीवन की यही इच्छा है। मैं तो भटक रहा हूं दुनिया में। जैसे किसी को कोई कमरे में बन्द कर दिया जाये, मैं अपने को समझता था कि इस संसार में किसी ने मुझे जेल में बन्द कर दिया है। मुझे निकालता क्यों नहीं? मिलता क्यों नहीं रोता था कई दफ़ा। एक दफ़ा जब बहुत तीव्रता में चला गया, तो अन्दर संकल्प आया कि हैदराबाद, सिन्ध की तरफ जाओ, कराची की तरफ जाओ। मैं हैदराबाद, सिन्ध की तरफ चल पड़ा। वहाँ पर सफ़ेद कपड़ों वाली बहनों को देखा। वहां वैसे भी बहुत सारी सिन्धी बहनें पजामा और कुर्ता जैसा कुछ सफ़ेद पहनती थीं। उनको मैंने देखा। कुछ झलक जैसी लगी लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। कुछ स्पष्ट बताया तो नहीं था। ये तो जैसे टचिंग हुई थी, उस टचिंग की वजह से मैं वहीं गया था। तीन-चार दिन तक, बिना बताये घर से मैं भाग गया इस ख्याल से कि मैं भगवान से मिलने जा रहा हूं। घर वाले मुझे ढूंढ़ते रहे। वहां मुझे कुछ नहीं मिला। देखकर वापस आ गया। वापस आने के बाद राजनीति शास्त्र (Political Science) की कुछ किताबें पढ़ीं तो उनमें जानकारी मिली कि सिन्ध में ओम् मंडली थी, सरकार ने यह किया, वह किया। मैंने फिर लोगों से पूछना शुरू किया कि ओम् मंडली क्या थी? सरकार ने क्यों ऐसा किया? इत्यादि-इत्यादि। लोगों को पूरा पता नहीं था। खैर, जो कुछ भी है, बहुत लम्बी दास्तान है।"
घर में इनको सब 'ऋषि' नाम से पुकारते थे। जगदीश जी घर में सबसे छोटे थे। इनके पिता जी जानते थे कि ये आगे जाकर संन्यासी अथवा ऋषि बनेंगे इसलिए किसी बात में वे इनके साथ जबर्दस्ती नहीं करते थे। इनको अपने ही फैसले पर छोड़ देते थे।
ज्ञान में आने के बाद सुचमुच भ्राता जी का जीवन 'ऋषि जीवन' था। 'ऋषि' शब्द संस्कृत भाषा से उद्भव हुआ है जिसका अर्थ है- 'द्रष्टा' अर्थात देखने वाला। 'द्रष्टा' उसको कहा जाता है जो गहन तपस्या में तल्लीन रहता है और उस तपस्या में अनेक दिव्य दृश्यों को देखता रहता है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ऋषि, दिव्य पुरुष होते हैं जो मनुष्य, देवता और असुरों से भिन्न होते हैं। ये सदैव ध्यान, योग और आध्यात्मिक साधना तथा परीक्षण द्वारा दिव्य अनुभवों में खोये रहते हैं।
ऋषियों में तीन वर्ग हैं- ब्रह्मर्षि, राजर्षि और देवर्षि। ब्रह्मर्षियों में तीन ऋषियों के नामों का उल्लेख आता है, वे हैं- वशिष्ठ, विश्वामित्र और पाज्ञवलक्य। इन तीनों में ऋषि विश्वामित्र ही ज्यादा प्रसिद्ध हैं।
ब्रह्मर्षि वो हैं जो ब्रह्मा समान नयी सृष्टि की स्थापना करते हैं या नवयुग की स्थापना के कार्य में मन-वचन-कर्म से परमात्मा के सम्पूर्ण सहयोगी बनते हैं। ब्रह्मर्षि महान तपस्वी और सिद्ध पुरुष होते हैं।
राजर्षि की उपाधि केवल राजा जनक को प्राप्त हुई है। राजर्षि उनको कहा जाता है जो अधिकार, सम्पत्ति, मान और परिवार होते हुए भी उन सब से न्यारे, उपराम, अनासक्त और नष्टोमोहा होकर ईश्वर के मार्गदर्शन में चलते रहते हैं।
देवर्षि की उपाधि केवल नारद जी को मिली है। देवर्षि वो हैं जो तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए सबको ईश्वरीय सन्देश, आदेश और योग-शिक्षा देते रहते हैं।
ये तीनों विशेषतायें अथवा ये तीनों 'ऋषित्व' भ्राता जगदीश जी में थे, ऐसा कहना, मैं समझता हूँ, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
भ्राता जगदीश जी के लौकिक सहपाठी रहे हुए ब्रह्माकुमार भ्राता लक्ष्मण जी, जिन्होंने कुरुक्षेत्र में कई सालों तक ईश्वरीय सेवा की और सोनीपत की ज़मीन की देखभाल के निमित्त रहे, उनके बारे में इस प्रकार बताते हैं-
"मेरा और जगदीश भाई का परिचय जून, 1946 में हुआ जब हम दोनों डी,ए,वी, कॉलेज में पढ़ रहे थे। वे खास मुलतान शहर में रहने वाले थे, मैं गाँव का रहने वाला था। मेरे पास मेडिकल के विषय थे, उनके पास इन्टर आर्ट्स के विषय थे। वे बहुत चुस्त और फुर्तिले थे। उनकी ड्रेस बहुत ही साधारण सफ़ेद कुर्ता और पायज़ामा थी। उन दिनों ही मैंने देखा कि उनकी रुचि ज़्यादातर योग में थी और परमात्मा की खोज़ में लगे रहते थे। समाज सेवा और देशभक्ति में उनकी बहुत रुचि थी। मुलतान में सूफ़ी सन्त बहुत होते थे, वे उनके पास जाते थे और पूछते थे कि मैं खुदा को कैसे याद करूँ? वहाँ की थियोसोफिकल सोसाइटी में भी कभी-कभी जाते थे। भगवान से कैसे योग लगायें, उसकी विधि की उनको बहुत खोज़ लगी रहती थी। उन्होंने शारीरिक योगासन भी सीखे थे। प्राणायाम करना भी वे जानते थे।

इन में देशभक्ति का बड़ा नशा था

सन 1947, मार्च को ऐलान हुआ कि मुस्लिम लीग का मंत्रीमंडल बन गया और कांग्रेस का नहीं बना। चार लड़के जिन में जगदीश भाई भी एक थे, इनको देशभक्ति का बड़ा नशा था। इन्होंने कॉलेज के लड़कों को इकट्ठा करके एक जुलूस निकाला और वहाँ के सारे स्कूल-कालेजों को बन्द करवाया। इन में से एक किसी ने वहाँ के एक बड़े दरवाजे 'बर्ड दरवाजे पर का मुस्लिम लीग का झंडा उतार कर, कांग्रेस का लगा दिया। इस से जातीय दंगा भड़क उठा। मई, 1947 में हमारा कॉलेज बन्द हो गया। सन् 1947 अगस्त में भारत का जो बंटवारा हुआ, उस में हम बिछुड़ गये। उसके बाद हम आपस में मिले सन् 1960 में, कमला नगर सेन्टर पर जब मुझे बाबा का ज्ञान मिला।
शुरू से ये हरेक चीज़ को विमर्शात्मक दृष्टि से देखते थे और परीक्षण करते थे। एक बार प्रोफेसर बक्षी साहब कॉलेज में हमें अंग्रेज़ी पढ़ा रहे थे। उसमें एक टॉपिक था 'थेअरी ऑफ डाउट' (Theory of Doubt)। उन्होंने पढ़ाकर खत्म किया, फिर पूछा, कोई प्रश्न है किसी का इसके बारे में? तब जगदीश भाई ने खड़े होकर कहा कि 'सर, आइ डाउट दि 'थेअरी ऑफ डाउट' (Sir, I doubt the Theory of Doubt)।' इस प्रकार, शुरू से ही इनकी बुद्धि विमर्शात्मक रही। हरेक का आदि-मध्य-अन्त खोजकर काम करते थे इसलिए ईश्वरीय विश्व विद्यालय में उनका अलौकिक जीवन सफल हआ।

वे अच्छे, गुणवान, शरीफ और रॉयल विद्यार्थी थे

वे आत्म-विश्वास के धनी थे। जिस बात पर उनका विश्वास हो जाता था, जिस बात पर वो अड़ जाते थे उस से टस से मस नहीं होते थे। किसी भी हालत में उससे समझौता नहीं करते थे। कॉलेज में वे बहुत बुद्धिमान और असामान्य (Extra-ordinary) विद्यार्थी तो नहीं थे लेकिन एक अच्छे, गुणवान, सज्जन (शरीफ़) और शालीन विद्यार्थी ज़रूर थे। कॉलेज में मैं उनके साथ सवा साल रहा। हम एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे। कॉलेज नया-नया था और संख्या भी कम थी। वे मुझे इसलिए जानते थे कि मैं डिविज़न में फर्स्ट आया था, मैट्रिक में भी फर्स्ट आया था। मेरे से उनका बहुत प्यार था। मैं 11वीं में पढ़ता था, वे 12वीं में पढ़ते थे। पढ़ाई में मेरे से एक साल आगे थे लेकिन आयु में छह महीने छोटे थे।
मुलतान शहर के बीचों-बीच 'हरम दरवाज़ा' था, वहीं इनका घर था। इनके पिता जी रेलवे में नौकरी करते थे। जगदीश भाई हसीजा परिवार के थे। 'हसीजा' अरोड़ा जाति की एक उपजाति है। इनके दादा और परदादा व्यापारी थे।
मुलतान में 'दिल्ली दरवाजे' पर दंगल मैदान था, जगदीश भाई वहां सूफी सन्तों के पास हर इतवार जाया करते थे। सूफी सन्त कट्टर नहीं होते, वे एक खुदा को मानते हैं, उसको खोज़ते रहते हैं। जगदीश भाई सनातन धर्मी तो थे ही, जहां भी भगवान के बारे में सत्संग होते थे वहां जाते थे, भगवान के बारे में जानने। डीएवी (दयानन्द ऑग्लो वेर्नाक्यूलर) कॉलेज में अंग्रेज़ी भी पढ़ायी जाती थी और वेर्नाक्यूलर माना हिन्दी, संस्कृत भाषा आदि भी पढ़ायी जाती थी।
विद्यार्थी जीवन में ही मैंने इनमें तीन विशेषतायें देखीं एक, देशभक्ति; दो, समाज सेवा और तीन, भगवान की खोज। एक-दो बार इनके लौकिक घर पर भी गया था। कॉलेज में 'स्टुडेण्ट कांग्रेस' थी, उसमें भी जगदीश जी जाया करते थे। मेरे को विद्यार्थी जीवन में सिर्फ पढ़ने में रुचि थी लेकिन जगदीश भाई को पढ़ने और परमात्मा की खोज- दोनों में रुचि थी।
लौकिक में ये अच्छे सम्पत्तिवान खानदान के थे। वैसे तो ये मुलतान से आगे मुज्जफरगढ़ के थे। जगदीश भाई के दादा परदादा वहां रहा करते थे। एक तरफ मुलतान था, दूसरी तरफ़ यह मुज्जरफरगढ़ था, बीच में सतलुज नदी का कैनाल था। इनके पिता जी वहाँ से मुलतान आये हुए थे। मुलतान शहर राजा रणजीत सिंह के राज्य में था। लाहौर महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी थी। मुलतान में मुस्लिम आबादी ज्यादा थी लेकिन ज़मीन हिन्दुओं की ज्यादा थी। महाराजा रणजीत सिंह का जो गवर्नर था, उसका नाम था मूलराज। उसने मुलतान को बसाया इसलिए उसका नाम मुलतान पड़ा। महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में एक दिवान थे, जिनका नाम दिवान सावनमल था, जगदीश जी उन दिवान के वंशज हैं।
मुलतान शहर चार चीज़ों के लिए मशहूर था। पहली, वहां मिट्टी बहुत उड़ती थी; दूसरी, वहाँ गरमी बहुत होती थी; तीसरी, वहां कब्रिस्तान बहुत थे; चौथी, फकीर और दरवेश बहुत थे। मुलतान में दानी भी बहुत थे। वहाँ के हिन्दुओं में दान-पुण्य का संस्कार बहुत था।
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ब्रह्माकुमारी चक्रधारी दीदी, शक्ति नगर, दिल्ली और रशिया सेवा की निर्देशिका, भ्राता जगदीश जी के साथ 40 सालों तक रही हुई हैं, उनके बारे में इस प्रकार सुनाती हैं- "लौकिक में जगदीश भाई के माता-पिता को कुल छह सन्तानें थीं, उनमें पांच लड़के और एक लड़की थी। जगदीश भाई सबसे छोटे थे। सब से छोटे होने के कारण सबका उनसे बहुत प्यार था। इनके बड़े भाई का लड़का (भतीजा), अक्सर इनसे मिलने आया करता था। भाई साहब से जो बड़े थे, उनका बचपन से इनसे बहुत प्यार था, खिलाना-पिलाना, देखभाल करना आदि करते थे। उनके माता-पिता भी कभी-कभी इनसे मिलने आते थे। वे बहुत सिम्पल (सादे) थे। वे मुलतानी वेष-भूषा पहना करते थे। सुना था कि मुलतान में इनकी जायदाद और जागीर बहुत थी। भारत विभाजन के बाद वे हरियाणा में आये। कुरुक्षेत्र और सोनीपत के आस-पास इनकी ज़मीन थी। भाई साहब ज्ञान में आ गये और इनके बड़े भाइयों ने नौकरी, व्यापार आदि के लिए दिल्ली में रहना शुरू किया। ज़मीन को जोतने के लिए वहां के किसानों को दिया गया। ज़मीन में किसी को रुचि न होने के कारण बाद में सारी ज़मीन बेचकर सब दिल्ली में ही रहने लगे। भाई साहब का ज़मीन का जो हिस्सा था, उसकी जो रकम आती थी, उसको देने के लिए हर साल बड़े भाई, जगदीश भाई साहब के पास आते थे। उनके जाने के बाद भाई साहब उस लिफाफे को मेरे हाथ में पकड़ा देते थे। पैसे के उस लिफ़ाफ़े को वे कभी खोलकर नहीं देखते थे।

लौकिक सम्बन्ध में भी अलौकिकता

कमला नगर सेन्टर तीन मंज़िल वाला मकान था। जब इनके बड़े भाई पैसे देने के लिए आते थे तब नीचे से ही ऋषि ऋषि आवाज़ लगाते आते थे ताकि उनको पता पड़े कि मैं आ रहा हूँ। भाई साहब अपने भाई को रिगार्ड तो देते थे लेकिन आफिशियल भी रहते थे। ऐसे नहीं कि लौकिक वालो को लौकिक रीति से ही मिलते थे। नहीं, उनके भाई लौकिक नाते से व्यवहार करते थे परन्तु भाई साहब अलौकिक रूप से ही उनसे व्यवहार करते थे। लगता नहीं था कि वे अपने लौकिक भाई से मिल रहे हैं। हाँ, उनका बहुत सम्मान करते थे। भाई साहब के जो तीसरे बड़े भाई थे उनकी युगल जम्मू में ज्ञान में आयी थी, वहाँ क्लास में जाया करती थी। यह देखकर घर वालों को डर लगा कि यह भी जगदीश भाई की तरह घर छोड़कर चली न जाये, इसलिए उन्होंने आपत्ति जतायी। इसलिए उनको क्लास में जाना बन्द करना पड़ा। फिर भी उनको ज्ञान के प्रति, ईश्वरीय परिवार के प्रति बहुत प्यार था।

इनके सब भाई बड़े पढ़े-लिखे और सुसंस्कृत थे

इनके सब भाई बहुत सुसंस्कृत और शिक्षित थे। सबसे बड़े भाई का बिजनेस या और नौकरी भी करते थे। वे बीमार रहते थे इसलिए भाइयों में उन्होंने सबसे पहले शरीर छोड़ा। दूसरे बड़े भाई स्कूल टीचर ये। वे दिल्ली के देव नगर में (करोलबाग के पास) रहते थे। तीसरे बड़े भाई जमुना पार रहते थे, वे चार्टर्ड आकाउण्टेंट थे। चौथे भाई वकील थे, वो दिल्ली के ईस्ट पटेल नगर में रहते थे। भाई साहब जब थे, उस समय उनके दो भाई जीवित थे लेकिन भाई साहब के जाने के बाद वो दोनों भी चले गये।
भाई साहब की माता जी भी भाई साहब से मिलने के लिए समय प्रति समय सेन्टर आया करती थीं। कुछ न कुछ बेटे के लिए ले आती थी। भाई साहब को भी घर बुलाया करती थी। जब भाई साहब घर पर जाते थे तो साथ में एक बहन को ज़रूर ले जाते थे। माता जी से कहते थे कि हम घर आयेंगे तो आपको ज्ञान सुनायेंगे इसलिए सब रिश्तेदार और आस-पास वालों को इकट्ठे करो। वे करती भी थी और साथ में गयी हुई बहन उन सबको ज्ञान सुनाती थी। भले ही, उनके परिवार वाले ज्ञान में नहीं आये लेकिन बहनों के प्रति उनका बहुत रिगार्ड था।

माँ के प्रति अगाध ममताभाव

भाई साहब कहा करते थे, "मेरी माँ बहुत काम करती थी। हमारा परिवार बहुत बड़ा होने के कारण माता जी को ही सब-कुछ करना पड़ता था।" माँ के प्रति उनकी यह भावना थी कि सब-कुछ माँ ही क्यों करें? जब मां सोयी हुई रहती थी, सुबह 3 बजे उठकर अंगीठी जलाकर, आटा गुंथकर, दूध उबालकर, सब्जी काटकर रख देते थे। माता जी जब उठती थी तो देखकर कहती थी, ऋषि, तुमने यह क्या किया? माता जी काम करने के लिए इनको मना करती थी, फिर भी ये कोई न कोई काम कर डालते थे। उनमें माँ के लिए सेवा की भावना बहुत थी कि मेरी माँ को कोई कष्ट न हो।

प्यार भरा लौकिक परिवार

परिवार में उनका आपस में बहुत प्यार था। उनके भाई को जब पता पड़ा कि जगदीश भाई साहब बीमार है, तो अपना वकालत का काम छोड़कर, उस दिन शाम तक सेन्टर पर आ गये। श्वास की तकलीफ़ होते हुए भी इनसे मिलने सीढ़ी चढ़कर ऊपर आये। इतना प्यार था उनका अपने भाई के प्रति। वे अकेले नहीं आते थे, दूसरे भाई को भी बताते थे कि ऋषि की तबीयत ठीक नहीं है, मैं देखने जा रहा हूँ, तुम भी आ जाओ। यदि वे नहीं मिलें तो उनके लड़के को फोन करके बताते थे, मैं जा रहा हूँ, तुम भी आ जाओ। इस प्रकार, भाई साहब के पास उनके सभी भाई और भतीजे पहुंच जाते थे। आते थे तो कोई खाली हाथ से नहीं आते थे, फल की टोकरी लेकर आते थे। इतना प्यार था उनके परिवार वालों का।
आरम्भ से ही जगदीश भाई साहब को पढ़ाने का बहुत शौक था। एक बार उन्होंने कहा था कि मुझे छोटे बच्चों को पढ़ाने की बहुत इच्छा थी, मन में आता था कि गली-गली में जाकर आवाज़ दूँ- बच्चों को भेज दो, बच्चों को भेज दो, मैं फ्री में पढ़ा दूँगा। वे अपने विद्यार्थी जीवन से ही कमज़ोर बच्चों को एक्स्ट्रा समय देकर पढ़ाते थे ।

लौकिक से ही सब के प्रति अपनापन

जब उनकी टीचर्स ट्रेनिंग पूरी हुई, उसके बाद ओखला में वे रिफ्रेशर कोर्स करने आये, तब इन्होंने थीयोसाफिकल सोसाइटी में बहनों को देखा। उन दिनों ओखला जंगल था। वहाँ से वे सेन्टर पर साइकिल पर जाया करते थे। जब टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में जॉब करने लगे, तब वे न केवल प्रिन्सिपल थे बल्कि बच्चों के हॉस्टल के वार्डन भी थे। कहते हैं, जब तक वे वार्डन रहे तब तक बच्चों को अच्छा अच्छा खाना, मक्खन, घी, दूध आदि बहुत खिलाया।
उनके परिवार वालों के नाम हमें मालूम नहीं हैं क्योंकि भाई साहब अपने परिवार वालों के बारे में ज़्यादा नहीं बताते थे। कभी-कभी बता देते थे कि उनके एक मामा जी थे, वे भी बहुत प्यार करते थे। उनके बड़े भाई, जब तक ये खाना नहीं खाते थे, तब तक खाना नहीं खाते थे। दूध में मलाई डालकर ले आते थे, सामने बैठाकर इनको पिलाते थे। जब तक भाई साहब नहीं पीते थे, तब तक वे छोड़ते नहीं थे।
जब वे सेन्टर पर आये, बहनों की बहुत ही सेवा की। जब सर्दी के दिन आते थे तब भाई साहब छत पर 3-4 खटिया लगवाते थे और सब बहनों को वहाँ बुलाकर सन्तरे और शहद खिलाते थे। उनको जो चीज़ खाने में अच्छी लगती थी, वही सबको खिलाते थे। जब रशिया वाले शक्ति नगर आने लगे तो भाई साहब कहते थे कि उनको पकौड़े और हलवा खिलाओ। मैं कहती थी, भाई साहब, वे विदेशी हैं, ये कैसे खायेंगे? कहते थे, नहीं, यह तो भारत का व्यंजन है, यह उन्हें ज़रूर खिलाओ।
उनसे मिलने कोई भी आता था तो उसको ज़रूर कोई-न-कोई सौगात देकर भेजते थे। मैं कहती थी, भाई साहब, वे तो आपसे दो मिनट मिलने आये हैं, ओम् शान्ति करने आये हैं, उनको भी सौगात देनी है क्या? कहते थे, देखो, वे बाबा के घर पर आये हैं, उनको खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने ऊपर छत पर एक किचन बनवायी थी। मैंने पूछा, भाई साहब, खाना तो नीचे बनता है, आपने क्यों ऊपर एक छोटी किचन बनवायी है? कहा, देखो, बहनें मुझे रोज़ खाना बनाकर खिलाती है, कभी-कभी मैं भी कुछ बनाकर बहनों को खिलाऊँ इसलिए बनवायी है। उनके पास एक भाई था सेवा में, उसके साथ मिलकर कुछ न कुछ सब्जी या कोई विशेष चीज़ बनाकर बहनों को खिलाते थे। वे खुद हमें परोसते थे। कमरे में चटाई बिछाते थे और हरेक के लिए एक-एक चौकी रखकर, हमें चटाई पर बिठाकर खाना खिलाते थे। कभी-कभी क्लास में आने वाले छोटे बच्चों को बुलाकर खिलाते थे। कहते थे, यही कल बड़े होकर बाबा की सेवा करेंगे। उन बच्चों को अपने हाथों से खिलाते थे। उनके सामने बैठकर प्यार से उनको कहते थे और खाओ, और खाओ। इस प्रकार बच्चों से भी उनका बहुत प्यार था। उनको खिलाकर भाई साहब बहुत खुश होते थे।

मधुबन की टोली में अपार भावना

क्लास में आने वाले भाई-बहनों से भी उनका अथाह प्यार था। मान लो मधुबन से टोली आयी पाँच की। भाई साहब कहते थे, चक्रधारी बहन, देखो बाबा के घर से टोली आयी है, क्लास वालों को खिला दो। मैं कहती थी, भाई साहब, 150 की क्लास है, इन पाँच तोशों को कैसे खिलाऊँ? कहते थे, अगर आप छुट्टी दो तो मैं अपने हाथों से खिला दूँ। मैं कहती थी, ठीक है भाई साहब, मुझे क्या ऐतराज़, खिलाने वाले आप हो, खिला लीजिये 5 पीस, 150 लोगों को। कहते थे, होमियोपैथी की गोली बीमार को ठीक कर देती है तो भगवान के घर से आयी हुई टोली को मैं छोटी-छोटी गोली बनाकर खिलाऊँगा तो इनको कितना फायदा होगा! भाई साहब के प्रति भाई-बहनों की इतनी श्रद्धा होती थी कि लाइन लगाकर उनके सामने खड़े हो जाते थे।

कभी उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाया

भाई साहब ने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया। कभी बहने सितम्बर की 10 तारीख को याद दिलाती थीं कि भाई साहब, आज आपका जन्मदिन है, तो कहते थे, छोड़ दो, जब मरजीवा जन्म हुआ, उसी समय मेरा जन्मदिन भी हो गया। आप बताओ, मेरा वो जन्म, मेरा नया जन्म कब हुआ, किम समय हुआ? हम सोच में पड़ जाते थे क्योंकि उन्होंने कभी बताया ही नहीं था कि कब और किस समय उनका अलौकिक जन्म हुआ।

कई भाई-बहनें मेरे से यह प्रश्न पूछते हैं…

कई भाई-बहने मेरे से पूछते हैं कि भाई साहब ने इतने साल कमला नगर और शक्ति नगर में सेवा की, इतने साल वहाँ रहे, जब मकान नया बना, उनका एक कमरा क्यों नहीं रखा? भाई साहब का हमेशा यह बिचार होता था कि मेरी यादगार में कोई भी चीज़ न हो। अपने होते हुए ही उन्होंने अपने सब कपड़े, यहाँ तक कि चप्पल भी क्लास में आने वाले भाइयों को बांट दी। कहते थे, मेरे नाम का कुछ भी यहां नहीं रहेगा। ग्लोबल हॉस्पिटल आने से पहले, शक्ति नगर में अपनी सब चीजें बांटकर आये थे। उनके नाम से कोई चीज़ रखना उनको बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। कभी-कभी उनके नाम से कोई खाने की चीज़ निकाल कर रखते थे ना, वे नहीं खाते थे। सबको बाँट देते थे और कहते थे, मेरे लिए कोई चीज निकाल कर नहीं रखना।
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भ्राता जगदीश जी की भतीजी ब्रह्माकुमारी मंजू बहन, अमेरिका, अपने चाचा जी के बारे में इस प्रकार सुनाती हैं-
"जब जगदीश भाई साहब ज्ञान में आये तब मैं पाँच साल की थी।
ज्ञान में आने के बाद उन्होंने घर पर आना-जाना बिलकुल बन्द कर दिया था। ईश्वरीय सेवा में ही लगे रहते थे इसलिए उसके बाद हमने उनको देखा ही नहीं। बस, इतना पता था कि मुझे चार चाचे हैं, सब से छोटे चाचा भगवान के लिए घर छोड़कर चले गये। वे कहाँ गये, क्या करते हैं, कुछ भी पता नहीं था।

लौकिक परिवार

हमारे सारे परिवार में सभी के घर दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर थे। भाई साहब के माता-पिता दिल्ली के देव नगर में रहते थे। उनके पिता जी का नाम या 'बुद्धराम' जी, माता जी का नाम था 'गंगादेवी'। 'भाई साहब के पिता जी बहुत ही सुलझे हुए पुरुष थे। बहुत कम बोलते थे। 'भाई साहब की माता जी भी बहुत सजन नारी थी। उनका भी बहुत सुलझा हुआ व्यक्तित्व था। ये दोनों आम लोगों जैसे नहीं थे। इन्होंने अपने पांच बच्चों के बहुत सुन्दर नाम रखे थे। सबसे बड़े बेटे का नाम था 'प्रभु दयाल', दूसरे का था 'राज नारायण', तीसरे का था 'विद्या सागर', चौथे का नाम था 'सच्चिदानन्द' और पाँचवें का नाम था 'जगदीश चन्द्र'। एक बच्ची भी थी जिनका नाम था 'शान्तिदेवी'। उनकी जल्दी शादी हुई थी, बाद में उन्होंने शरीर छोड़ दिया, मैंने भी उनको देखा नहीं। घर में जगदीश भाई को सब प्यार से 'ऋषि' कहकर बुलाते हमने भी उनको जगदीश चाचा कभी नहीं कहा, 'ऋषि चाचा' ही कहते थे। सबसे छोटे होने के कारण जगदीश भाई घर में बहुत ही लाडले थे। जगदीश भाई को भी अपने माता-पिता से बहुत प्यार था। खासकर माता जी से उनका प्यार बहुत था। जब मिलने घर पर आते थे, माँ के हाथ से ही खाना खाते थे। माँ की गोद में सिर रखकर छोटे बच्चे की तरह सो जाते थे। इतना प्यार था उनका माँ से।

समाज में सम्मानपूर्ण परिवार

मैं सन् 1990 में अमेरिका से एक बार देहली आयी थी। मेरे लौकिक पिता प्रभु दयाल जी ने कहा था कि इनके (भाई साहब के) पास जाओ। उन्होंने मुझे पहली बार कहा था, उनके पास जाओ। तब मैं शक्ति नगर में जाकर इन से मिली। इनकी शक्ल भी हमारे पिता जी जैसी ही थी। इन पांचों भाइयों का स्वभाव, व्यवहार इतना अच्छा था कि बात मत पूछिये। इस सम्मानपूर्ण परिवार का समाज में, कुल में बहुत सम्मान होता था। इनका बहुत ही सुसंस्कृत, पढ़ा-लिखा और ऊंचे पद वालों का परिवार था। मेरे पिता जी प्रभु दयाल जी एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफ़िसर थे, दूसरे राज नारायण जी स्कूल टीचर थे, तीसरे विद्यासागर जी अकाउटिंग आफिसर थे, चौथे सच्चिदानन्द जी एडवोकेट थे और पांचवें जगदीश जी, बी,एड, कॉलेज के प्रिन्सिपल थे।
मैं जगदीश भाई जी के चारों भाइयों को पहले ही जानती थी। इनको देखा तो लगा कि ये भी सादे जीवन वाले ही हैं जैसे इनके सब भाई हैं। उन्होंने मुझे कहा कि आप पहले आयी होती तो आपको मैं मधुबन ले जाता लेकिन आप तो अभी अमेरिका जा रही हो, अगली बार जब आओगी तब ले चलूंगा। मुझे पता भी नहीं था कि मधुबन क्या है। सन् 1998 में शिवरात्रि पर मुझे पहली बार मधुबन ले आये। उस समय बाबा से भी मिली। मैंने यहां जो कुछ भी देखा, समझा, उससे मैं हैरान रह गयी और जाना कि जगदीश भाई क्या हैं। घर में किसी को कुछ पता ही नहीं है। पाण्डव भवन में भाई साहब ने क्लास करायी, वो सुनी। मुझे लगा, इतनी महान् आत्मा को घर में कोई जानता ही नहीं। भले उन्होंने थोड़ा-बहुत ज्ञान सुना होगा लेकिन मधुबन आकर मैंने जो देखा, जो सुना, जो भाई साहब के बारे में जाना, उसे हमारे घर में कोई नहीं जानता था। फिर मैंने दादियों को देखा, बाबा को देखा, भाई-बहनों को देखा तो मुझे लगा कि यह तो अलग ही दुनिया है, बाहर की दुनिया बिलकुल बेकार है। भाई साहब ने भगवान को पाकर इतना सारा पाया लेकिन हम तो कुछ जानते ही नहीं। मुझे ऐसे लगने लगा कि वहाँ से जाना ही नहीं है। दुनिया में हम भगवान को, सुख-शान्ति को ढूंढ़ते रहे लेकिन भाई साहब ने घर वालों को कुछ भी बताया ही नहीं।

पाँच साल की आयु में ही ज्योति का साक्षात्कार

भाई साहब के जो चारों भाई थे, उनका इनसे बहुत प्यार था। अन्दर उनको बहुत फीलिंग भी थी कि हमारा एक भाई हमें छोड़कर चला गया। उनमें भी हमारे पिता जी, जो सबसे बड़े थे, उनका इनसे बहुत प्यार था। हमारी माता जी और पिता जी इनको अपने बच्चे जैसे देखते थे। मैं इनके सम्पर्क में आयी ही सन् 1998 से। ज़्यादा बातें करने का मौका भी नहीं मिला क्योंकि इनके पास समय ही नहीं होता था। जब थोड़े समय भी मेरे से मिलते थे तब अपने अनुभव सुनाते थे। एक बार कहा था कि 'पाँच साल की उम्र से ही मुझे एक ज्योति दिखायी पड़ती थी। बचपन से ही मैं भगवान की खोज़ में था।' इनके पिता जी जब भी इनको बाहर ले जाते थे, जैसे सम्बन्धियों के पास या मार्केट में तो यही कहते थे कि यह भगवान का बच्चा है। वे कभी नहीं कहते थे कि यह मेरा बच्चा है। जगदीश भाई ने एक बार बताया था कि विद्यार्थी जीवन से ही, जहाँ भी सत्संग होता या वहाँ जाकर बैठ जाता था। ऐसे ही जब दिल्ली में था तो अखबार में देखा था कि थियोसोफिकल सोसाइटी में ब्रह्माकुमारियाँ राजयोग के बारे में प्रवचन करेंगी। वहाँ जाकर दादी जानकी जी और दादी कुंज जी के प्रवचन सुने। प्रवचन के बाद सब चले गये लेकिन वे अकेले बैठे रहे। उस समय इनको ज्योति का साक्षात्कार हुआ था, उसको देखने में ही मगन हो गये थे।

मैं तो इनसे नाराज़ थी

ज्ञान मिलने के बाद 2-3 साल तक वे घर पर आये ही नहीं। यहाँ तक कि घर वालों को बताया तक नहीं कि मैं आश्रम पर हूँ। किसी दूसरे व्यक्ति ने उनके पिता जी को समाचार दिया था कि आपका बेटा ब्रह्माकुमारियों के पास रहता है। जब मैं पहली बार इनसे मिलने आयी थी तो बहुत नाराज़ होकर चली गयी थी। मैंने उनसे कहा कि आपने तो हम सबको छोड़ दिया, भूल भी गये और यहां तक कि हम से कभी मिले नहीं। हमारा इतना नज़दीक रिश्ता है, दिल्ली में रहते हुए भी हम सबसे इतना दूर चले गये। उन्होंने कहा कि अगर मैं आपके पास आता रहता और सब लौकिक सम्बन्ध निभाता रहता तो यहां इतना कार्य कैसे कर पाता मुझे तो यह भी पता नहीं था कि वे वहां क्या करते थे। जब मैं ज्ञान में चलने लगी तब मालूम पड़ता गया कि भाई साहब का क्या पार्ट है इस यज्ञ में और उनका क्या महत्व है यहाँ!

माँ के शरीर छोड़ने का आभास

उन्होंने घर छोड़ा तो पूरा छोड़ दिया। जब उनकी माता जी ने शरीर छोड़ा तब वे ट्रेन में थे और मधुबन आ रहे थे। उन दिनों मधुबन में एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला था। उन्होंने मुझे बताया था कि जब वे ट्रेन में बैठ रहे थे तब उनको आभास हो रहा था कि आज माता जी को कुछ होने बाला है। उसी समय माता जी ने शरीर छोड़ा था। जब ये मधुबन पहुंचे तो इनके भाई का सन्देश आया हुआ था कि माता जी ने शरीर छोड़ा है, आप आ जाओ लेकिन ये आये नहीं। इस कारण, इनके भाई, इन से नाराज़ और दुःखी थे कि माँ के अन्तिम संस्कार पर भी नहीं आया।
उन्होंने मुझे कभी लौकिक सम्बन्धी के रूप से नहीं देखा। दूसरे बाबा के बच्चों के प्रति जो उनकी दृष्टि रहती थी, वही दृष्टि और व्यवहार मेरे साथ था। ज्ञान में आने के बाद भी मैं उनको 'ऋषि चाचा' ही बोलती यी क्योंकि बचपन से हम घर में सुनते आ रहे थे कि हमारा एक चाचा है जिसका नाम 'ऋषि' है। मेरे ज्ञान में आने के बाद, जगदीश भाई साहब के पास मेरा आना-जाना भी शुरू हो गया और इनके भाइयों का फोन आदि करना और मिलना-जुलना भी ज्यादा हो गया।"
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अलौकिक जन्म और बचपन

भ्राता जगदीश चन्द्र जी का अलौकिक जन्म सन् 1952 में दिल्ली में हुआ। उनका साप्ताहिक कोर्स कराने वाली टीचर थीं, राजयोगिनी दादी कुंज जी, पटना। भ्राता जगदीश चन्द्र जी का अलौकिक जन्म कैसे हुआ तथा उनका अलौकिक बचपन कैसा था, उसके बारे में वे कहती हैं-
"जगदीश भाई का जब ज्ञान सीखने-अर्थ आना हुआ तो अनुभव होता था कि यह प्यारे बाबा का सच्चा परवाना है। उन दिनों हम बहनें, देहली की थिओसोफिकल सोसाइटी में भाषण करने के लिए 2-3 रविवारों तक लगातार गयीं। भाषण करने के बाद राजयोग की चर्चा चली। एक रविवार के दिन थियोसोफिकल सोसाइटी वालों ने अखबार में डाला कि "आज ब्रह्माकुमारियों प्रैक्टिकल राजयोग सिखायेंगी।" भाषण तो मैं करती थी लेकिन जब प्रैक्टिकल राजयोग सिखाने की बात आयी तो मैंने जानकी दादी से कहा, दादी, आज प्रैक्टिकल कराना है, आप चलो। उन्होंने मान लिया।

भाषण पूरा होते ही जगदीश भाई ने सवाल पूछा

थियोसोफिकल सोसाइटी का यह नियम था कि उनके जो 50-60 सदस्य होते थे, भाषण के बाद वो जो भी सवाल पूछें उनका जवाब भाषणकर्ता को देना पड़ता था। मैंने योग के बारे में भाषण किया और भाषण के द्वारा ही उनको बताया कि ऐसे-ऐसे योग करना है। मेरा भाषण पूरा हुआ लेकिन जानकी दादी पहुंची नहीं। भाषण पूरा होते ही जगदीश भाई ने सवाल पूछा, आज तो आपको प्रैक्टिकल राजयोग कराना था, आपने तो सिर्फ भाषण किया। मैंने उत्तर दिया, प्रैक्टिकल ऐसे थोड़े ही कराया जाता है? कुर्सी पर बैठे हैं, जूते पहने हैं, ऐसे आसन पर राजयोग कैसे होगा? उसके लिए दरी पर विधिपूर्वक बैठना पड़ेगा। जगदीश भाई ने कहा, अभी ही हम उसकी व्यवस्था करते हैं। उसने सबको दस मिनट में तैयार कर दिया। हॉल भी तैयार हो गया। उतने में जानकी दादी भी पहुँच गयीं। योग की कामेन्ट्री आदि उस समय नहीं थी लेकिन प्रैक्टिकल तो हम योग करते ही थे। राजयोग क्या है, उसके बारे में दादी जानकी ने 10 मिनट बताया और बाद में हम दोनों ने योग कराया। योग पूरा होने के बाद हमने पूछा, किसी को अनुभव हुआ हो तो हाथ उठाओ। जगदीश भाई ने ही हाथ उठाया और कहा, आज पहली बार है कि मैं बिलकुल एकाग्रचित्त हो गया। फिर उसने हमारे से पूछा, इसका पूरा कोर्स करने के लिए क्या करना पड़ेगा? हमने कहा, इसका एक सप्ताह का कोर्स है, जिसे सेन्टर पर आकर करना पड़ेगा।
अपने नियम अनुसार जगदीश भाई कोर्स करने 10 मिनट पहले ही आ गये। उस समय, किसी जिज्ञासु को कोर्स कराने से पहले उनसे एक फार्म भरवाया जाता था। उस फार्म में यह होता था कि आपके शरीर के माता-पिता का नाम क्या है? दूसरा था, आपकी आत्मा के पिता का नाम, रूप क्या है? जगदीश भाई ने फार्म भरना शुरू किया। लौकिक माता-पिता का नाम तो लिख दिया। जब आत्मा के माता-पिता का नाम लिखने की बात आयी तो अड़ गया। कहने लगा, आत्मा तो अनादि और अविनाशी है। परमात्मा भी अनादि और अविनाशी है, उसका पिता कैसे होगा?
जगदीश भाई में यह विशेषता थी कि जब प्रश्न पूछता था तो जब तक उसका उत्तर, उसकी बुद्धि में ठीक रीति से फिट नहीं बैठता था, तब तक वही-वही प्रश्न भिन्न-भिन्न रीति से पूछता ही रहता था। आखिर में मैंने एक लाइन में कहा कि आत्मा तो अनादि और अविनाशी है मगर जब पतित बन जाती है तो पावन कौन बनाता है? जो रिज्युनेट करता है, वही उसको रि-बर्थ (मरजीवा जन्म) देता है। रि-बर्थ देने वाला परमात्मा ही आत्मा का मात-पिता है। बस, उस लाइन पर वह कनविन्स (राज़ी) हो गया। उसने जितने दिन भी कोर्स किया, कोर्स का समय दो या ढाई घंटे से कम नहीं होता था। उस समय मनोहर दादी, जानकी दादी, बड़ी दीदी उसी सेन्टर (कमला नगर) में रहती थीं। हम आपस में चर्चा करती थीं कि यदि यह प्रश्न पूछे, तो कैसे उत्तर दें। मुझे लगता था और हमेशा अनुभव रहा कि यह जो भी प्रश्न पूछता था उसका जवाब तुरन्त बाबा मुझे टच करता था। मैं कहती थी, उसके लिए बाबा ने मुझे यह उत्तर टच कराया, इसलिए यह कनविन्स हुआ। ऐसे उनका सात दिन का कोर्स चला।

कोर्स पूरा होने से पहले ही लिखने की सेवा शुरू

बाबा को, उन्हें साहित्य लिखने के निमित्त बनाना था, उसने लिखने का काम पांचवें दिन से ही शुरू किया। पाँचवें दिन जब यह कोर्स करने आया, तब मैंने कहा, जगदीश भाई जी, आज हम कोर्स नहीं करायेंगे। उसने कहा, क्यों? मैंने कहा, 'मिरर' पत्रिका में छपा है कि ब्रह्माकुमारियों ईसाई धर्म की हैं। हम पत्रिका बालों के पास होकर आये हैं, उनको लेख लिखकर देना है। आप तो जानते हैं, हमें हिन्दी लिखनी आती नहीं है इसलिए लिखने में टाइम लगेगा। उसने कहा, हमारा कोर्स तो होगा ज़रूर, लेख लिखकर आप मुझे दे दो, उसको हिन्दी में मैं लिखकर ठीक कर दूँगा। समझ लो, पांचवें दिन से ही उसने साहित्य की सेवा करनी शुरू कर दी। उससे पहले हम पत्रिका के मालिक के पास गये थे, हमने उससे कहा था, देखिये, हम ब्रह्माकुमारियाँ ईश्वरीय आदि सनातन देवी-देवता धर्म की है, आपने लिख दिया कि ब्रह्माकुमारियों ईसाई धर्म की हैं, तो हमारी सारी मातायें बन्धन में आ गयीं। उनके घर वाले कहने लगे हैं कि तुम लोग उन ईसाइयों के पास मत जाओ। पत्रिका के मालिक ने कहा, यह गलती कैसे हो गयी! हमने कहा, आपके अखबार में ऐसा छपा है। फिर हमने कहा, अगर आप छापेंगे कि ईश्वरीय और ईसाई शब्द एक ही जैसे हैं, इसलिए हम लोगों से लिखने में ग़लती हो गयी, ऐसे लिखने से सही हो जायेगा। मालिक बहुत अच्छा था, सनातनी था। उसने कहा, शाम को हम आपके आश्रम में आयेंगे। उसने सारे चित्रों को देखा, प्यार से ज्ञान सुना, बहुत खुश हो गया। हमने उस लेख में यह भी लिखा था कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, भारतवासियों का धर्म है ईश्वरीय आदि सनातन देवी-देवता धर्म। लेख लिखकर जगदीश भाई को दिया। पहले उस दिन का उसका कोर्स पूरा किया और बाद में लेख लिखकर उसको दिया। जगदीश भाई ने उसको ठीक किया, हिन्दी में लिखा और हमने उस लेख को 'मिरर' वालों को दे दिया।

पत्र देखकर बाबा भी खुश हुए

उसे क्लास में आते-आते एक मास हो गया। उस अवधि में उसको हम मातेश्वरी का परिचय बहुत देते थे कि मातेश्वरी माँ है, सरस्वती है, जगदम्बा है, सारे लौकिक विद्यार्थी उनके चित्र की पूजा करते हैं। उसने मम्मा को इतना सुन्दर पत्र लिखा कि ओ माँ, जगदम्बा माँ…। पूरा पत्र केसर से लिखकर दिया। यह उसका पहला पत्र था। बाबा को यह पत्र दिखाया गया। बाबा को बहुत अच्छा लगा तो उसकी कॉपी कराकर मुंबई भेजी गयी। बाबा ने कहा, कुंज बेटी ने बहुत अच्छे बच्चे को पैदा किया है, देखो, उसने कैसा पत्र लिखा है। पाँच-छह महीने के बाद मधुबन जाने का प्रोग्राम आया। जगदीश भाई ने भी कहा, मैं भी मधुबन जाऊँगा। तब बड़ी दीदी ने कहा, जन्माष्टमी पर जा रहे हो, कुंज भी जा रही है, तुम भी जा रहे हो तो यहाँ जन्माष्टमी पर भाषण कौन करेगा? फिर जगदीश भाई ने कहा, दीदी, भाषण सुनने कितने लोग आयेंगे? सौ-दो सौ ही आयेंगे ना? कुंज बहन लेख लिखकर दे दे, मैं उसको ठीक करके अखबार में छपा दूंगा तो हज़ारों लोग पढ़ेंगे।
फिर दीदी ने बाबा को पत्र लिखा कि बाबा, जगदीश मधुबन आना चाहता है लेकिन उसकी बुद्धि बहुत तेज है। बाबा ने पत्र लिखा, पहले 108 का निश्चय पत्र लिखाके भेजो, पीछे दूसरी बात। जगदीश भाई अनुभव पूछता था कि किन-किन बहनों ने निश्चय-पत्र लिखा है, कैसे लिखा है? उसने मेरे से पूछा, कैसे निश्चय पत्र लिखना है? मैंने कहा, एक फार्म नहीं, एक-एक बात पर अलग-अलग 108 बार लिखना है। जैसे कि शिव बाबा अमरनाथ है, अमरकथा सुनाता है और अमरलोक का राज्यभाग्य देता है। शिव बाबा सोमनाथ है, सोमरस पिलाता है, माया से मूर्छित बच्चों को सुरजीत करता है। उन दिनों हम ऐसे-ऐसे अलग-अलग पाइंट पर लिखवाते थे जिस में बाबा का नाम भी आ जाये, कर्तव्य भी आ जाये और रिजल्ट भी आ जाये। मैंने कहा, ऐसे हम निश्चय पत्र लिखते हैं। फिर मैंने सोचा कि यह तो कुमार है, उसको तो मधुबन जाने के लिए सब चीज़ों की तैयारी करनी है। माँ-बाप को मनाना है, 108 वाला निश्चय-पत्र भी लिखना है। बाबा ने कहा है, माना उसको लिखना ही है।

108 क्यों, हज़ार बार, हज़ार क्यों, एक लाख बार लिखकर दूँगा

बड़ी दीदी तो बहुत स्ट्रिक्ट (सख्त) थी, कहने लगी, कुंज, जब तक यह 108 का निश्चय-पत्र नहीं लिखेगा तब तक जा नहीं सकता। जगदीश भाई ने कहा, ठीक है, मैं लिखकर ले आऊँगा। यह होशियार तो था ही, निश्चय-पत्र लिखकर ले आया। मैंने पूछा, जगदीश भाई, 108 बार लिख लिया? कहा, हाँ लिख लिया। मैं भी खुशी-खुशी से दीदी के पास वह निश्चय-पत्र लेकर गयी और कहा, देखिये, यह है 108 वाला निश्चय-पत्र। बड़ी दीदी हमारी जज तो थी ही, उन्होंने फौरन चैक किया और कहा, कहाँ 108 बार लिखा है? यह तो 27 बार लिखा है। मैंने पत्र ले जाकर कहा, जगदीश भाई, आपने कहा, 108 बार लिखा है, कहाँ है, यह तो 27 बार लिखा है। उसने कहा, आप पिछला पेज देखिये ना! पीछे देखा तो उसमें लिखा था, उसको चार बार पढ़िये। फिर दीदी के पास गयी और यह बात कही तो दीदी ने फिर मुझे ही डाँटा, कुंज, तुम तो हमेशा उसकी तरफ ही लेती हो। मैंने कहा, दीदी, आज रात की ट्रेन से तो जाना है, इतना लिखा है, छुट्टी दो ना! दीदी कहे, नहीं, जब तक वो 108 बार नहीं लिखेगा तब तक उसको छुट्टी नहीं है जाने की। जगदीश भाई ने कहा, दीदी, मुझे तो आज मधुबन जाना ही है कैसे भी करके। आप कहो, 108 क्यों, हज़ार बार, हज़ार क्यों, एक लाख बार, मैं आबू जाकर लिखकर दूँगा लेकिन आज मुझे बाबा के पास जाना ज़रूर है। इतनी मेहनत की, जन्माष्टमी का लेख लिखा, अखबार में डलवाया, निश्चय-पत्र लिखा, किस लिए? बाबा से मिलने जाने के लिए ही तो मैंने किया। फिर दीदी ने छुट्टी दी मधुबन जाने के लिए।

रोते-रोते जगदीश भाई बाबा के गले से लिपट गया

मधुबन पहुंचते ही यह बाबा के कमरे में गया। उस समय गीत बजा, आखिर वो दिन आया आज, जिस दिन का रस्ता तकते थे…।' बड़ी आवाज़ से रोते-रोते जगदीश भाई बाबा के गले में लिपट गया। मैं यह दृश्य देखकर निश्चिन्त हो गयी कि यह बलि चढ़ गया, अब मेरे को कोई चिन्ता नहीं। मैं तीन लोगों को लेकर गयी थी, एक था अविनाश चन्द्र, दूसरा था विशन चन्द्र और तीसरा था यह जगदीश चन्द्र। वो दो तो बहुत सीधे-सीधे थे, लगते थे बड़े निश्चय-बुद्धि हैं। यह एक ही था जिसकी खोपड़ी बहुत तेज थी। मगर यही एक सच्चा निकला, बाद में वो दोनों चले गये।

बाबा का अति लाडला लाल था

मैं तो बार-बार यही कहती हूं कि जगदीश भाई बाबा का अति लाडला लाल था। जिस दिन से पैदा हुआ, उस दिन से ही उसको लगन थी कि बाबा का नाम बाला करना है, बाप को प्रत्यक्ष करना है, स्वयं भगवान धरती पर आया है और उसी तन में आया है।
इस प्रकार, जगदीश भाई को ज्ञान की गहराई में जाने का बहुत शौक था, मुरली पर तो वो दीवाना था। हम यह कहें कि जगदीश भाई बाबा का सच्चा लाल था। पहले दिन फार्म भरने से लेकर अन्त तक वह बाबा का एकदम वफादार, ईमानदार, आज्ञाकारी, बलिहार बच्चा बनकर रहा।"
एक बार भ्राता जगदीश जी ने अपना अनुभव सुनाते-सुनाते यह बात कही कि बाबा भी उनको बहुत चाहते थे और महत्व देते थे-
"बाबा के साथ रहने का मुझे जो मौका मिला वो कोई कम नहीं मिला। वे बहनें तो सेन्टर पर चली जाती थीं सेवा करने के लिए। मैं तो रहता ही बाबा के पास था। रात-दिन वहीं रहता था। कहीं सेवा के लिए बाबा भेजते थे, तो जाता था। और हम कहाँ जाते? उस समय बहुत थोड़ी-सी सेवा थी। उन दिनों थोड़ी-सी मुरलियां निकलती थी, वो हाथ से लिखी जाती थीं। सिन्धी में लिखी रहती थी। क्योंकि उन दिनों सिन्धी जानने वाली ही टीचर्स थीं, वही सुनाती थीं। मेरे ख्याल में, शुरू-शुरू में 10-15 साल तक कोई एक भी मुरली ऐसी नहीं होगी जिसमें बाबा ने मुझे याद न किया हो, जगदीश बच्चे को याद न किया हो। दस-पन्द्रह साल तक लगातार। जो पुरानी बहनें हैं उनको मालूम है, जैसे गुलजार दादी है, मनोहर दादी है, जानकी दादी है। ये पढ़ते थे मुरली, कहते थे, बाबा ने उसको याद किया है। बाबा से हम मिलने जाते थे, तब कोई बहनें बैठी हों, बाबा से बात कर रही हों, तो बाबा बहनों को कहते थे, बच्चे, अब आप जाओ। सबको भेज देते थे, फिर मेरे से बात करते थे। कई दफ़ा उनको ऐतराज होता था कि बाबा, यह क्या करते हो। हम बात कर रहे हैं, हमको बाहर भेज दिया, उससे बात कर रहे हो, हँसी में कहते थे। बाबा कहते थे, जब यह बच्चा आता है, शिव बाबा मेरे में प्रवेश करता है, उनको कुछ डायरेक्शन देने होते हैं इसको। अभी तुम जाओ बेशक, अभी इसको बात करने दो। ऐसा सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ, बाबा की ऐसी पालना मिली। रोम-रोम में बाबा के कितनी प्रीत थी! ऐसा महसूस होता था कि केवल मैं ही बाबा को याद नहीं करता, बाबा भी मुझे बहुत याद करते हैं, मेरे साथ उनकी बहुत घनिष्ठता है। उनका मेरे से अनन्य प्यार है, जैसा मेरा उनसे अनन्य प्यार है।"
***
दिल्ली में टीचर्स ट्रेनिंग करते समय भ्राता जगदीश जी के सहपाठी थे ब्रह्माकुमार भ्राता सुन्दर लाल जी, हरि नगर, दिल्ली, वे उनके बारे में अपना अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं-
"मैं सन् 1956 में ज्ञान में आया। उससे चार साल पहले सन् 1952 में टीचर्स ट्रेनिंग करने में और जगदीश भाई दिल्ली में इकट्ठे हुए थे। दोनों दिल्ली के थे लेकिन उससे पहले हम दोनों की कोई आपसी पहचान नहीं थी। टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में ही हम दोनों का परिचय हुआ। जामिया मिलिया इस्लामिया, जो एक मुस्लिम संस्था थी, उसका यह बी,एड, कॉलेज था, वहाँ हम दोनों को एडमिशन मिला और हम दोनों एक ही कमरे में रहते ये। वे हसीजा हैं, मैं जुनेजा हूँ। मेरा लौकिक नाम है सुन्दरलाल जुनेजा और उनका लौकिक नाम है जगदीशचन्द्र हसीजा। हम दोनों थे पश्चिम पंजाब के (अब जो पाकिस्तान में है)। जब एक ही कमरे में रहते थे तो हम दोस्त हो गये। उनका घर था ओखला में, दिल्ली से थोड़ा बाहर। जब घर जाना होता था तो कॉलेज से हम दोनों इकट्ठे जाते थे।

वे बड़े हिम्मतवान थे

मैंने उनमें यह विशेषता देखी कि वे बड़े हिम्मतवान थे। मुसलमानों की संस्था होने के कारण विद्यार्थियों को पास या फेल करना उनके ही हाथ में था। कोई हिन्दू उनसे कुछ कह नहीं सकता था, वे जो करते थे वही अन्तिम फैसला होता था लेकिन जगदीश भाई ऐसे हिम्मतवान व्यक्ति थे, उन्होंने मैनजमेन्ट कमिटी वालों के साथ जंग लड़ी, उन लोगों से बात की, चर्चा की हिन्दू विद्यार्थियों के लिए। वे लोग साल भर के सारे पैसे - खाने के, फीस के, होस्टल के विद्यार्थियों से एडमिशन के समय ही ले लेते ये लेकिन खाने की, रहने की उतनी अच्छी सुविधा नहीं देते थे। जगदीश भाई हमारे मोनिटर भी थे। उन्होंने उनसे पूछा कि हमारे से इतने पैसे लेते हो, उसका हिसाब तो बताओ कि किस-किस का, कितना पैसा है? इस प्रकार, मैनेजमेंट वालों से बात करके, खाने-पीने रहने में जो असुविधायें थीं, उनको ठीक करवाया। जिस संस्था में हमें पढ़ना है, जिनसे हमें पास होना है, उनके साथ बात करके, उनकी कमियों को उनके ध्यान पर लाना, उन कमियों को और समस्याओं को ठीक कराना, यह बहुत बड़ी हिम्मत की बात थी।

उनके अन्दर उमंग बहुत था

दूसरी बात यह थी कि उनमें उमंग बहुत था। जब वे ज्ञान में आये तब दिल्ली में कमला नगर वाला ही सबसे पहला सेन्टर था। जामा मस्जिद के पीछे थीयोसोफिकल सोसाइटी थी, उसका काम ही था अच्छे-अच्छे वक्ताओं को बुलाकर उनसे भाषण करवाना। जगदीश भाई भी वहां जाया करते थे। जब उन्होंने ब्रह्माकुमारियों का भाषण सुना तो उनको पता लग गया कि ब्रह्माकुमरियों की बातें अच्छी हैं। वहाँ से अड्रेस लिया और वहां जाने का निश्चय किया। बहनें रहती थी कमला नगर के पीछे मलकागंज इलाके में। ये रहते थे ओखला में। दूरी थी लगभग 18 माइल की। उस समय इनको न रास्ता पता था, न बस का और न उनके पास कोई साइकिल आदि साधन थे लेकिन उन्होंने कहा, मैं उनके पास जाऊँगा और वे गये।उनको भगवान को जानने की बहुत तीव्रता थी।
कालेज में रोज सुबह पी,टी, (दैहिक व्यायाम प्रशिक्षण) होता था, वहां सब की हाजिरी जरूरी थी लेकिन जगदीश भाई कहते थे, मैं बहनों के पास जाऊंगा ज़रूर। यह है ना हिम्मत, उल्लास, उमंग! कई बार ये वहां बहुत जल्दी पहुंच जाते थे और बहनों को जगा देते थे। उनकी बुद्धि बड़ी तेज और विशाल थी। उनका बाबा पर बहुत ही निश्चय था। उस अटूट निश्चय के कारण बाबा उनसे जो भी कहते थे, उस कार्य को वे करके ही दिखाते थे।

मुझे ज्ञान में आने की प्रेरणा उन्होंने ही दी

हम साथ-साथ पढ़ते थे, उन्होंने मेरे में देखा कि यह व्यक्ति धार्मिक है। हमारे घर में सब धार्मिक लोग थे। घर में रामायण का अखण्ड पाठ चलता रहता था। मेरा भी नम्बर आता था पढ़ने का। जब पढ़ता था तो मन में यह बात आती थी कि श्लोकों को तो मैं पढ़ रहा हूँ लेकिन उनके अर्थ की समझ भी तो होनी चाहिए। घर वालों ने कहा कि अर्थ समझने लगोगे तो सुबह तक पूरी होगी नहीं। उस समय से ही मेरी बुद्धि चलने लगी कि भक्तिमार्ग में कितनी अन्धश्रद्धा है। यह भी मेरे मन में आने लगा कि केवल श्लोक पढ़ने में क्या होगा, उनका अर्थ तो समझना चाहिए। तब से मेंरी जिज्ञासा बढ़ने लगी कि भक्ति की बातों का रहस्य जानना चाहिए। एक दिन जगदीश भाई ने मुझे थोड़ा ज्ञान सुनाया और कहा कि एक बार आप ब्रह्माकुमारियों के पास जाओ। उससे पहले मैंने कुछ बातें सुन रखी थी कि ये ब्रह्माकु‌मारियां जादू करती हैं। जगदीश भाई ने कहा,ऐसी बात नहीं है, आप एक बार जाकर तो देखो, उसके बाद जैसे लगे वैसे करो। हम मॉडल टाउन में रहते थे, सेन्टर दूर पड़ता था इसलिए उस समय जाना नहीं हुआ।
कुछ सालों बाद हम शक्ति नगर में स्थानान्तरित हुए, वहाँ से कमला नगर नज़दीक पड़ता था। मेरी नौकरी भी उतनी मेहनत और व्यस्तता वाली नहीं थी। एक शाम को मैं कमला नगर सेन्टर पर गया। वहाँ का वातावरण बहुत अच्छा लगा। उस दिन भोग था तो उन्होंने भोग खिलाया। वो भी बड़ा अच्छा लगा। उसके बाद ज्ञान की बातें सुनीं तो वो भी ठीक लगीं। कोर्स भी करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह समझ में आ गया कि यह प्रैक्टिकल जीवन अच्छा है, इसको अपनाना चाहिए लेकिन यह निश्चय नहीं था कि यह ज्ञान कौन दे रहा है। मैं जब कोर्स लेने जाता था, तब जगदीश भाई सेन्टर पर ही रहते थे।

हमारे दैवी विवाह में वे ही पंडित थे

हमारे दैवी विवाह में जगदीश भाई का बड़ा पार्ट था। शादी के लिए दो पंडितों को चुना गया था, एक हमारी तरफ से और एक कन्या की तरफ से। उन दोनों पंडितों को जगदीश भाई ने ही ट्रेनिंग दी थी कि उनके मंत्रों, श्लोकों और रीति-रिवाज़ों में विकार की कोई भी बात नहीं होनी चाहिए। एक पंडित था शुक्ला बहन की तरफ़ से, पुराने सब भाई-बहनें उनको जानते हैं, उनको यज्ञ में 'कवि जी' कहते हैं। हमारी तरफ से थे जगदीश भाई। शादी के बाद जगदीश भाई ने बिरला मन्दिर के पास एक पब्लिक प्रोग्राम रखा था कि लोगों को और रिश्तेदारों को पता पड़े कि हमारी यह डिवाइन मैरेज है आध्यात्मिक और पवित्र जीवन जीने के लिए। उस प्रोग्राम में स्टेज पर दीदी मनमोहिनी जी और दादी चन्द्रमणि जी थीं। चन्द्रमणि दादी जी ने हम दोनों को एक-एक अलार्म घड़ी सौगात में दी और बताया कि यह इसलिए आपको दी गयी है ताकि आप दोनों रोज़ समय पर क्लास में जायें। शादी के बाद हमने फिर मॉडल टाउन में रहना शुरू किया। मॉडल टाउन से कमला नगर जाने के लिए कोई सुविधा नहीं होती थी उन दिनों। वो रास्ता जिसको जी,टी, रोड कहते हैं, जंगल था। बसें भी बहुत देर से चलती थीं, क्लास जल्दी पूरी होती थी। इसलिए हम दोनों गाँवों से जो सब्जी वाली ठेली आती थीं, उस पर टाट बिछाकर बैठकर जाते थे। कहने का मतलब यह है कि दादी के कहने का हमारे ऊपर इतना असर पड़ा कि कैसे भी करके रोज़ क्लास में जाना है और जाते भी थे।
ट्रेनिंग के बाद जगदीश भाई सोनीपत में नौकरी करने लगे। कुछ महीने ही उन्होंने वहां नौकरी की और समर्पित हो गये। मैंने हरियाणा के करनाल ज़िले में एक-डेढ़ साल नौकरी की, उसके बाद सिवानी के कॉलेज में दो साल प्राध्यापक के रूप में नौकरी की। हम दोनों सिर्फ इकट्ठे पढ़े लेकिन इकट्ठी नौकरी नहीं की, अलग-अलग जगह पर रहे। उसके बाद फिर मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली आने के बाद आपस में मिलते रहे। एक बार बड़ी दीदी पटेल नगर की तरफ गयी थीं तो उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा स्थान है यहाँ एक सेन्टर खोला जाये। उस एरिया में स्कूल-कॉलेज बहुत थे तो हमने वहाँ सेन्टर खोल लिया। हम और शुक्ला बहन वहाँ आकर रहने लगे। सेन्टर बनने के बाद जगदीश भाई से हमारा सम्बन्ध फिर जुड़ गया, कोई बात पूछनी होती तो हम फोन करके उनसे पूछते थे, राय लेते थे।
***

मेरे अलौकिक जीवन के प्रेरणास्रोत

ब्रह्माकुमारी सुदेश दीदी जी, जो वर्तमान समय जर्मनी में ईश्वरीय सेवा की निमित्त निर्देशिका हैं, भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने संस्मरण इस प्रकार प्रकट कर रही हैं- "जगदीश भाई के नज़दीक रहने का हमारा बहुत सौभाग्य रहा। उनके साथ दिल्ली में रहते हमें बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव और बहुत सारी प्रेरणायें मिलीं। तब मैं नयी-नयी ज्ञान में आयी थी और मुझे कमला नगर सेवाकेन्द्र पर रहने का सौभाग्य मिला था। वहाँ गुलज़ार दादी जी भी थीं। हमने देखा कि जगदीश भाई में बड़ी बहनों के लिए नेचुरल (स्वाभाविक) रूप से बहुत स्नेह और सम्मान था। वे समझते थे कि ये बहनें बाबा द्वारा इस यज्ञ में विशेष रूप से पली हुई हैं। इनकी धारणा बहुत श्रेष्ठ है, इसी रिस्पेक्ट से उनको देखते थे।
इस अलौकिक जीवन में जगदीश भाई मेरे प्रेरणास्रोत हैं। सचमुच, ज्ञान और योग का, रमणीकता का और साथ-साथ स्प्रिचुअल अथॉरिटी का, गंभीरता का, सादगी और शालीनता का, त्याग, तपस्या और सेवा का- इन सभी का सुन्दर बैलेन्स भ्राता जगदीश जी में था। उनमें जितनी ज्ञान की गहराई थी, उतनी सेवा की उछल भी बहुत थी।
सन् 1957 की बात है। कमला नगर सेन्टर पर गुलज़ार दादी, बड़ी दीदी, जगदीश भाई, मैं और भंडारे में सेवा करने के लिए एक माता रहते थे। यह मेरे शुरुआत के दिन थे, मेरी ट्रेनिंग का समय था। मैंने देखा कि जगदीश भाई में ज्ञान की चर्चा करना छोड़कर कुछ और होता ही नहीं था। इधर-उधर की बातें करना, सुनना उनको बिलकुल पसन्द नहीं था। वो ट्रेनिंग का समय होने के कारण मेरा तो हमेशा सीखने का ही लक्ष्य रहता था।

छोटी-छोटी बहनों पर ध्यान

उनका छोटी-छोटी बहनों पर बहुत ध्यान रहता था कि उनमें कैसे उमंग-उत्साह भरकर आगे बढ़ायें! मुझे भी बहुत उनसे सीखने की पूछने की, सुनने की रुचि थी। बाबा की शिक्षाओं को कैसे लोगों तक पहुंचायें, जगदीश भाई का यह बहुत ध्यान रहता था। और कोई साधन नहीं है, कम से कम लेखन द्वारा तो हम जन-जन तक ईश्वरीय सन्देश पहुंचायें- यह उनका लक्ष्य रहता था।
एक दिन वे रुकमणी दादी और गुलज़ार दादी के साथ बैठकर पवित्रता सप्ताह मनाने के लिए प्लान बना रहे थे। जगदीश भाई उनको प्रेरणा दे रहे थे कि पवित्रता के बारे में एक-एक प्वाइंट कैसे समझाना है, कैसे उसकी गहराई में जाना है। आज के समाज को किस तरह की बातें बतानी हैं, यह सब सुना रहे थे। उन दिनों हर काम अपने हाथों से ही करना होता था। मैं पहले झाडू लगाकर पोछी करना रख देती थी ताकि जब ये लोग रूहरिहान करें तब मैं पोछी भी लगाऊँगी और ज्ञान की चर्चा भी सुनूंगी। इतनी हिम्मत मेरे में नहीं थी कि इनके साथ जाकर बैठूं। दिल होती थी कि इनकी चर्चा सुनूँ ज़रूर। इसलिए मैं धीरे-धीरे, टाइम लगाते हुए पोछा लगाती थी। अन्दर के कमरे में जो रूहरिहान चलती थी, उसको मैं अच्छी तरह सुनती थी। ज्ञान की बहुत गहरी बातें वे सुनाते थे।
एक दिन जगदीश भाई ने मुझ से पूछा, तुमने सब बातें सुनी हैं ना, सब कार्यक्रमों में आयी थी ना! कौन-सी बातें अच्छी लगीं? मैं बताती गयी कि ये ये बातें अच्छी लगीं। इनमें पोछी लगाते समय जो सुनी थी वो भी थीं और जो भाषणों में दादियों से सुनी थीं वो भी थीं। फिर उन्होंने कहा कि यह सब समाचार रविवार की क्लास में सुनाना।
मैं हमेशा उनसे कहती थी, भाई साहब, आपका तो ऐसा है, 'जस केले के पात, पात में पात तस ज्ञानी की बात में बात, बात में बात।' जैसे केले के पत्ते आप निकालो, एक निकालेंगे तो दूसरा आयेगा, दूसरा निकालेंगे तो तीसरा आयेगा। पत्ते के अन्दर पत्ता, पत्ते के अन्दर पत्ता निकलता रहता है। ऐसी ही भाई साहब की बातें होती थीं, एक बात को छेड़ो, उस बात के पीछे अनेक बातें, उनके पीछे और अनेक बातें निकलती थीं। इससे हमें प्रेरणा मिलती थी कि जब तक ज्ञान का अन्तिम पत्ता नहीं निकलता है तब तक छोड़ना नहीं है। कहने का भाव यह है कि मुझे भी ज्ञान की गहराई में जाने की प्रेरणा भाई साहब से ही मिली।
रविवार की क्लास में भाई साहब बोल देते थे कि आज सुदेश बहन, अभी जो प्रोग्राम हुआ है, उसमें क्या-क्या हुआ, सुनायेगी। जैसे किसी को उठाकर पानी में डाल देते हैं तो बेचारे को तैरना न आते हुए भी निकलने के लिए हाथ-पांव चला कर बाहर निकलना पड़ेगा ना, वैसे भाई साहब ने कह दिया माना मुझे सुनाना ही पड़ता था। ऐसे सुनाते-सुनाते मन में भी ज्ञान सुनाने की बहुत हिम्मत आ गयी।

मैं रात को क्लास हाल में सोती थी क्योंकि…

जिज्ञासुओं को कोर्स देने की सेवा भी मुझे मिलती थी। कोर्स के बाद भाई साहब मुझे बुलाते थे और पूछते थे कि जिज्ञासु ने क्या-क्या पूछा और आपने क्या उत्तर दिया। वो सब सुनते थे और फिर मुझे बताते थे कि किस प्रश्न का क्या उत्तर देना है। बड़े प्यार से समझाते थे। मैं रात को क्लास हाल में सोती थी क्योंकि मुझे पता था कि भाई साहब सवेरे योग करने वहीं आयेंगे। भाई साहब का जीवन बहुत अनुशासित था। वे हमेशा चाहते थे कि क्लास रूम पूरा स्वच्छ रहना चाहिए, योग का वातावरण होना चाहिए, अगरबत्ती आदि जलाकर रखी होनी चाहिए, जितनी ज़रूरी है पूरी लाइट होनी चाहिए। ये सब उनके आने से पहले मैं तैयार करके रख देती थी। इस प्रकार शुरू की ट्रेनिंग बहुत अच्छी रही।

सदैव उन्होंने बहनों को आगे रखा

उन दिनों "त्रिमूर्ति" नामक हमारी पत्रिका निकली थी। उसके सारे के सारे लेख जगदीश भाई ही लिखते थे लेकिन उस पत्रिका को खोलो तो उसमें कभी मनोहर दादी का, कभी प्रकाशमणि दादी का, कभी गुलज़ार दादी का, कभी मनमोहिनी दीदी का, कभी मेरा भी नाम होता था। लेख उनके लिखे हुए होते थे लेकिन नाम बहनों के होते थे, बहनों को ही प्रत्यक्ष करते थे। एक की बहुत सारी पुस्तके जो थीं उनमें लेखक का नाम नहीं होता था। लिखा जाता था, 'ईश्वरीय ज्ञान, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय।' सबकुछ करते हुए भी जगदीश 'भाई ने अपने आपको बहुत गुप्त रखा। सेवाक्षेत्र में आगे बढ़ने में, मान-सम्मान पाने में सदैव उन्होंने बहनों को आगे रखा। जितने ज्ञान में तीक्ष्ण, विशाल बुद्धि, परखने में तीव्र, बुद्धिवान थे उतने ही भावना में भी परिपूर्ण थे। बड़ी दादी से या दादी जानकी से जब भी मिलते थे तो कहते थे, मेरे सिर पर हाथ रखो, वरदान दो मुझे। हमेशा उनके पाँव के पास जाकर नीचे बैठ जाते ये। लन्दन में भी गुरुवार के दिन दादी जानकी सबको अमृत पिलाती थी। अमृत देते समय दादी कहती थीं, इधर बैठो लेकिन नहीं, नीचे बैठकर ही अमृत लेते थे। कहते थे, मेरे सिर पर हाथ रखो, मुझे वरदान दो। दादी का हाथ लेकर अपने सिर पर रख लेते थे। बहनों को उन्होंने ऐसा मान दिया, आगे रखा जैसे साकार बाबा ने किया। बहनों को, माताओं को आगे बढ़ाने में उन्होंने ब्रह्मा बाप को 100% फॉलो किया।

वे कहते थे, यह फिलासफी है…

हर कार्य में एकॉनॉमी से चलना और चलाना उनको बहुत पसन्द था। कोई भी वस्तु वेस्ट न जाये यह उनका लक्ष्य रहता था। वे कहा करते थे, यह नेचुरल नियम है कि जो हमें खिलाता है पहले उसको खिलाकर हमें खाना चाहिए। एक माता थी, जिसका केले का व्यापार था। वह रोज़ सेन्टर पर केले लेकर आती थी। कमला नगर सेन्टर पर केले का भंडार रहता था। सेन्टर के लिए कोई कुछ भी लेकर आये, खाने के लिए या भोग के लिए, हमसे पूछते थे, सबको खिलाया? प्रसाद सबको मिला? जो भी, जो कुछ लाता है, पहले उसको खिलाना चाहिए। जैसे भगवान दाता है ना, उसको हम भोग लगाते हैं ना खाने से पहले ऐसे जो सेन्टर पर लेकर आते हैं वे दाता हैं, इसलिए पहले उनको खिलाना है, फिर हमको खाना है। यह फिलासफी है। जो भी बाबा के घर के लिए ले आते हैं,उसमें उनका भी हक़ है। उतना ही प्यार से, उतनी ही भावना से उनको खिलाना है, देना है।

उनके साथ रहना माना हर पल ज्ञान-योग में डुबकी लगाते रहना

कई बार ऐसी बातें भी समझाते थे कि बाहर के लोग, जो देही-अभिमान में नहीं रहते, शरीर-अभिमान में रहते हैं तो वे बाहर का ही देखेंगे, उनको अन्दर का अनुभव नहीं होगा। इसलिए हमारा ज्यादा ध्यान आत्मा का अनुभव करने और कराने की तरफ रहना चाहिए। वे रोज़ की बातचीत में यही कहते थे कि सेवाकेन्द्र पर रहने वाली बहनें न सिर्फ सादे जीवन और उच्च विचार वाली होनी चाहिएं, साथ-साथ दैवी जीवन, योगी जीवन, उदात्त जीवन, सात्विक जीवन, आदर्श जीवन वाली भी होनी चाहिए। ऐसी बातें वे शिक्षा के रूप में नहीं, हँसते-हँसाते चाय पीते समय जब सब इकट्ठे बैठे रहते थे या रात की क्लास में ज्ञान की चर्चा कर रहे होते थे, या भोजन पर बैठे होते थे तब बातों-बातों में कहा करते थे। जब हम सब मिलकर खाना खा रहे होते तो हँसते हुए पूछते थे कि पहले किसने खाया? बाबा ने खाया या आप ने? फिर कहते थे, पहले कौन बाबा को खिलायेगा, हम भी देखें। फिर कहते थे कि आज हम रेस करेंगे कि कौन ज़्यादा प्यार से बाबा को खाना खिलायेगा। इस प्रकार, हर वक्त, किसी-न-किसी रूप से वे हमारा ज्ञान की तरफ, योग की तरफ़, सेवा की तरफ, ईश्वरीय मर्यादाओं की तरफ ध्यान खिंचवाते थे। न केवल वे ज्ञान सुनाते थे बल्कि बीच-बीच में रमणीक कहानिया भी सुनाते थे और उनका सम्बन्ध ज्ञान और धारणा से भी जोड़ते थे। इस प्रकार, उनके साथ रहना माना हर पल ज्ञान-योग में डुबकी लगाते रहना।

विदेश-सेवा करने का उमंग-उत्साह उन्होंने ही भरा

दिल्ली में एक बार एक बड़े मैदान में प्रदर्शनी लगायी थी। उस मैदान का नाम याद नहीं है क्योंकि यह 40-45 साल पहले की बात है। उस प्रदर्शनी को देखने विदेशी भी आते थे। उन दिनों हमारे पास इंग्लिश बोलने वाले हैण्डस तो थे नहीं। मैंने इंग्लिश माध्यम से ही ड्रिगी क्लास पढ़ी थी लेकिन इंग्लिश में समझाने की, भाषण करने की प्रैक्टिस नहीं थी। जब कोई अंग्रेज़ आता था तो उसको समझाना तो पड़ता था, तो मैं टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में थोड़ा समझाती थी। जगदीश भाई जी देखते थे। सन् 1974 में दीदी जी और दादी जी ने यह पक्का किया कि हमें विदेश में जाना चाहिए। दादी जानकी जी लन्दन जा चुकी थीं। उन्होंने तय किया कि सुदेश बहन को (मुझ को) भी वहाँ भेजना है। लन्दन से मेरे लिए रिक्वेस्ट आयी थी कि सेवा के लिए आयें। एक दिन ऑफिस में दीदी दादी बैठी हुई थीं, तब उन्होंने कहा, सुदेश, लन्दन से पत्र आया है कि सेवा के लिए सुदेश को भेजो, क्या तुम जाओगी? मैंने कहा, दीदी, मुझे तो इंग्लिश की इतनी प्रैक्टिस नहीं है, मैं वहाँ जाकर क्या करूंगी? तब जगदीश भाई ने कहा, सुदेश बहन, आप लन्दन जाओगी ना, मुझे विश्वास है, आप अच्छी तरह से वहाँ अंग्रेज़ी में सेवा कर सकेंगी। आप तो अंग्रेज़ी बोलती हो, मैंने देखा है प्रदर्शनी में विदेशियों को समझाते हुए। मैंने कहा, मैं अच्छी रीति इंग्लिश नहीं बोल सकती। उन्होंने कहा, अच्छी नहीं बोल सकती लेकिन बोलती तो हो ना! वहाँ जाने के बाद अच्छी रीति बोलना सीख जाओगी। इस तरह, उन्होंने मुझे प्रेरणा देकर, उमंग भरकर आगे बढ़ाया। उन्होंने मुझे कहा, लन्दन आप ज़रूर जाओ। इतना सुन्दर चान्स है, आप चले जाओ। इस प्रकार, वे आगे बढ़ाने के लिए बहुत उमंग भरते थे और सेवा का चान्स भी देते थे।

कहा करते थे, कभी अनुमान नहीं लगाना

सन् 1957-58 में, कॉलेज से, मुरली सुनने मैं राजौरी गार्डन सेंटर पर जाती थी। उन दिनों जब विशेष कार्यक्रम होते थे तो दादी गुलज़ार और जगदीश भाई वहाँ आया करते थे। एक बार राजौरी गार्डन सेन्टर पर नवरात्रि कार्यक्रम था। गुलज़ार दादी को आना था लेकिन किसी कारण वश वे नहीं आ पाये। बहुत ब्रह्मावत्स इकट्ठे हुए थे, बाहर वाले भी बहुत आये हुए थे। आलराउण्डर दादी वहाँ की निमित्त थीं। मैं उस दिन भी सीधी कॉलेज से आकर क्लास में बैठी। आलराउण्डर दादी जी ने मुझे बुलाया और कहा, लाल, गुलज़ार नहीं आयी है, अभी भाषण कौन करेगा? तुम करो। मैंने कहा, मैं कैसे करूं? कोई तैयारी नहीं और मुझे कुछ पता भी नहीं, क्या भाषण करें? कॉलेज की ड्रेस पहनी हुई थी सूट आदि। साड़ी भी नहीं पहनी थी। दादी ने कहा, आओ, मैं तुमको ड्रेस देती हूँ। उन्होंने ही साड़ी पहनाकर तैयार किया। मुझे साड़ी पहनना भी नहीं आता था। फिर मैंने जो सुना था, जो समझा था उसी के आधार पर लगभग 20 मिनट भाषण किया देवियों पर। उस क्लास में सबसे पीछे जगदीश भाई और राजकुमार मित्तल भाई बैठे हुए थे। भाषण सुनते, मुस्कराते आपस में कुछ बोल रहे थे। मैंने समझा कि शायद मुझे ठीक बोलना नहीं आया होगा, भाषण अच्छा नहीं हुआ होगा इसलिए जल्दी से भाषण पूरा कर दिया। बाद में जगदीश भाई ने मेरे पास आकर कहा, सुदेश, तुम इतना अच्छा भाषण कर रही थी बन्द क्यों किया ? भाषण तो बहुत अच्छा था। अच्छा हुआ ड्रामा अनुसार गुलज़ार दादी नहीं आयी। इसका मतलब है, आपके पास जो कला है, उसको बाबा यूज़ करना चाहता है। मैंने कहा, आप दोनों पीछे बैठकर कुछ बाते कर रहे थे, मैंने समझा, मेरा भाषण ठीक नहीं होगा इसलिए मैने बन्द कर दिया। उन्होंने कहा कि कभी अनुमान नहीं लगाना चाहिए। अनुमान लगाने से नुकसान ही होता है। हम यह बात कर रहे थे कि देखो, इनको बाबा ने भाषण करने की कला दी है ना। जितना जितना हम इस कला का यूज़ करेंगे उतना लोगों को फायदा ही होगा। इस तरह वे बहनों को प्रेरणा देते थे, शक्ति भरते थे।
वे हरेक में विशेषता देखते थे और उस बिशेषता के बारे में दूसरों को बताकर उनको प्रेरणा देते थे कि देखो, फलानी बहन में यह विशेषता है, आपको भी उससे सीखना चाहिए। वे किसी को खुश करने का काम नहीं करते थे लेकिन किसी की विशेषताओं और कलाओं की प्रशंसा दूसरों के सामने, नाम सहित ज़रूर करते थे ताकि उसका फ़ायदा दूसरों को भी हो। प्रशंसा करके किसी को खुश करना उनका लक्ष्य नहीं होता था। उनका लक्ष्य विशेषताओं को दूसरों के सामने बताकर दोनों का उमंग-उत्साह बढ़ाने का होता था। उनका हृदय बड़ा शुद्ध था, बुद्धि बड़ी विशाल थी। यज्ञ के लिए वे बहुत केअरफुल (सावधान) थे, एकांनामी (मितव्ययता) के अवतार थे। हमने देखा, यज्ञ की कोई भी सेवा होती थी, उसमें बड़ी भावना से, दिल से सहयोग देते थे और भाग लेते थे।

बहुत सरल और साधारण

दिल्ली में सेवा-अर्थ जब हम साथ में यात्रा करते थे, बस में हो या रेल में, वहाँ भी सेवा की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ बताते थे। उन दिनों सेवा के साधन केवल चित्र प्रदर्शनी और भाषण होते थे। राजयोग शिविर और कामेन्ट्री का प्रयोग करना- उन्होंने ही बताया था। वे कहा करते थे कि भाषण, प्रदर्शनी, नृत्य नाटिकाओं के साथ लोगों को योग का वातावरण चाहिए, योग की अनुभूति चाहिए। इसलिए, जहाँ भी हमारे कार्यक्रम होते है, उनके साथ राजयोग शिविर भी रखना चाहिए। कामेन्ट्री से मेडिटेशन कराने की जो विधि है, यह जगदीश भाई की प्रेरणा से शुरू हुई।
इतने बड़े भाई होते हुए भी, वरिष्ठ होते हुए भी उन्होंने अपने लिए कोई पर्सनल (व्यक्तिगत) सुविधा कभी नहीं चाही। यूरोप यात्रा में भी मैं उनके साथ थी। मैने देखा, वहां भी उन्होंने कोई विशेष सुविधा नहीं ली। सादा खान-पान रहा। वहां बहनों को भी ऐसा नहीं लगा कि इतने बड़े भाई आये हैं, उनके लिए कुछ विशेष खाना आदि तैयार करें। नहीं, सेन्टर पर जो भी है, जैसा भी है सबके साथ बहुत प्यार से स्वीकार करते थे। उन्होंने सदा अपने जीवन को लाइट और इज़ी (हल्का और सरल) रखा ताकि उनके जाने पर किसी को भारी न लगे, उनके लिए विशेष व्यवस्था न करनी पड़े।

समानता और सन्तुलन

जहां भी जाते थे, वहां के बाबा के बच्चों को प्रेरणा देते थे, उनकी प्रशंसा करते थे। उनको जो भी देखते थे, लगता था कि ये अन्दर से बहुत सन्तुष्ट हैं, भरपूर हैं, उनमें कोई अपेक्षा नहीं है। वे न केवल ज्ञान की गहराई में जाने वाले थे बल्कि वे धारणा की मूर्ति भी थे। जटिल से जटिल ज्ञान की बातों को सहज रूप से, रमणीक रूप से समझाना- उनकी विशेष कला थी। ज्ञान की हर बात को लॉजिकली (तर्कबद्ध रूप से) सिद्ध करते थे, फिर भावनात्मक रूप से भी सिद्ध करते थे। वे हर आयाम से विवरण देकर ज्ञान के सच्चे रूप को सिद्ध करते थे।
व्यवहार में कुशलता तो थी ही, उसके साथ वे गंभीर और रमणीक भी थे बुद्धिजीवी भी और भावजीवी भी, ज्ञानी भी और योगी भी, शालीन भी और सेवाधारी भी। इस तरह उनके जीवन में हमने हर बात की समानता और सन्तुलन देखा। उन्होंने जितना बहनों को, माताओं को आगे बढ़ाया उनना ही भाइयों को भी, उनकी विशेषताओं के अनुसार आगे बढ़ाया। जैसे सत्यनारायण भाई थे, बलदेव भाई थे, आत्मप्रकाश भाई हैं, त्यागी जी है; और कई भाई थे। बाबा के कार्य में हरेक को साथ लेकर, हरेक की विशेषताओं को लगवाकर चलते थे वे।

माताओं पर बहुत ध्यान

वे न केवल सेन्टर पर रहने वाली बहनों पर ध्यान देते थे परन्तु घरों से आने वाली माताओं पर भी ध्यान देते थे। ये समझते थे कि लौकिक में उनके घर का, समाज का वातावरण कैसा होता है, ऐसे वातारण में मातायें कैसे ईश्वरीय नियम-मर्यादाओं की धारणा में रहें और कैसे अपने घरों का वातावरण अलौकिक बनायें, इसके बारे में उनको राय सलाह देते थे।
एक माता सेन्टर पर रहने आयी। आप जानते हैं, लौकिक माताओं को श्रृंगार करने का बहुत शौक होता है। वह घर से अपनी श्रृंगार पेटी ले आयी थी, आभूषणों को पहनकर श्रृंगार करती थी। एक-दो दिन जगदीश भाई चुप रहे और साक्षी होकर देखते रहे। दो दिन के बाद उस माता को बुलाकर उसको प्यार से समझाने लगे कि देखो, आप तो अभी आश्रमवासी बन गयी। आपका अभी अलौकिक, योगी और तपस्वी जीवन है। आपको अपनी तपस्या से सारी दुनिया के वातावरण को बदलना है। आपका श्रृंगार तो शरीर का है, विनाशी है। देखो, बाबा हमारा दैवीगुणों से श्रृंगार कर रहा है, अविनाशी श्रृंगार कर रहा है। इसके सामने वो श्रृंगार तो कुछ भी नहीं है ना! यह नहीं कहा कि यह श्रृंगार नहीं करो लेकिन उनको स्मृति दिलाकर, उनको सम्मान देकर, बाबा की शिक्षा की याद दिलाकर उनसे त्याग करवाया। वे माताओं को अनुभूति करवाते थे कि हमारी सुन्दरता शरीर की नहीं है, हमारा श्रृंगार शरीर का नहीं है। हमारी सुन्दरता और श्रृंगार आत्मा के हैं। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् ने हमारे में सत्य का, पवित्रता का, सुख का, शान्ति का प्रकाश भरा है, मेकअप किया है। यह भी बताते थे कि मेकअप क्या करना है। रमणीक रूप से, ज्ञान के आधार से समझाते थे और स्थूल श्रृंगार से मोह छुड़ाकर रूहानी श्रृंगार की तरफ आकर्षित करते थे।
उन्होंने माताओं को भी अच्छी तरह से आगे बढ़ाया। कमला नगर में उन दिनों भी बड़ी विद्या, छोटी विद्या, कौशल्या आदि कई मातायें थीं। उनको इतनी अच्छी ट्रेनिंग दी थी कि वे जाकर जगह-जगह भाषण करती थी, गीता पाठशाला खोलती थीं। ऐसी भावना जगदीश भाई में किंचित् भी नहीं थी कि मैं ज्ञान में बहुत होशियार हूँ, मैं ही सबसे आगे रहूँ। उनको हमेशा रहता था कि बाबा का हर बच्चा, जो भी बाबा के घर में आता है, रहता है, उसमें ये सब विशेषतायें होनी चाहिए और सेवा में आगे बढ़ना चाहिए। विशेषकर माताओं के लिए क्लासेस रखकर उनको ट्रेनिंग देते थे, भाइयों की क्लासेस रखते थे। उनकी विशेषताओं की स्मृति दिलाकर उनको बाबा की सेवा में लगाते थे। वैसे ही कुमारों की क्लासेस भी रखते थे, उनकी विशेषताओं और योग्यताओं के बारे में बताकर उनको सेवा में लगाते थे। जैसे ब्रह्मा बाबा हरेक की विशेषता देखकर उनको आगे बढ़ने की प्रेरणा देते थे, वैसे जगदीश भाई भी हरेक की विशेषताओं को पहचान कर, उनको ईश्वरीय सेवा में लगाने की प्ररेणा देते थे।

मम्मा को भी जगदीश भाई के लिखने का ढंग बहुत अच्छा लगता था

वे मुरलियों का बहुत अच्छी तरह अध्ययन करते थे। मुरलियों को अंडरलाइन करते थे। जिस लाइन के नीचे मार्क किया करते थे उसका एक टॉपिक बनाकर उसके बारे में गहराई से मनन करते थे। उन मुरली प्वाइंट्स को इकट्ठा करके उनकी 'सच्ची गीता' के नाम से पुस्तक तैयार की। वे सदैव अपने नियमों पर पूरे पक्के रहते थे, जैसे अमृतवेले का योग, मुरली का अध्ययन, नियम-मर्यादाओं की धारणा इत्यादि।
'सच्ची गीता' छपवाने की बात थी। 'सच्ची गीता' तैयार करके मम्मा के पास लेकर आये थे उनको दिखाने के लिए। उनका रूप ऐसा था कि बहुत रिस्पेक्ट से, श्रद्धा से, प्यार से, नम्रता से झुके-झुके मम्मा के सामने आये उसको दिखाने के लिए। मम्मा ने मुझे कहा, पढ़कर सुनाओ। मैंने देखा, बाबा के महावाक्यों को डायरेक्ट भगवान उवाच के रूप में उन्होंने उस पुस्तक में संग्रहित किया था, वो बड़ी कमाल की थी। भगवान ही खुद सीधा किसी भक्त या जिज्ञासु या पाठक को सुना रहा है। मेरे ईश्वरीय जीवन की फॉउण्डेशन वह 'सच्ची गीता' ही है। उन दिनों मैं कॉलेज से सेन्टर आती थी। कई बार जगदीश भाई मुझे उस पुस्तक का मैटर देते थे कि मम्मा को आप सुनाओ और मम्मा भी मुझे कहती थीं कि यह पढ़कर सुनाओ। सुनाते-सुनाते मम्मा से कुछ बातों का स्पष्टीकरण सुनती थी। इससे मुझे बहुत ही फ़ायदे हुए।
जब मैं उस पुस्तक का मैटर सुनाती थी, मम्मा बहुत अच्छी तरह ध्यान से सुनती थीं। कहती थीं, बहुत करके सब बातें राइट हैं और ठीक लिखी हैं। मम्मा ने बहुत कम ही करेक्शन की थी। शायद एक-दो शब्दों पर ध्यान खिंचवाया होगा। मम्मा को भी जगदीश भाई के लिखने का ढंग बहुत अच्छा लगता था। मम्मा ने उस पुस्तक की बहुत प्रशंसा की। जगदीश भाई को मम्मा का बहुत रिस्पेक्ट था और मग्मा को भी जगदीश भाई का बहुत रिस्पेक्ट था। उनके मन में ऐसा नहीं था कि मुझे बाबा का वरदान मिला है, मैंने लिखा है तो और किसी को क्यों दिखाऊँ ! उनकी भावना होती की बाबा की प्रेरणा से इस पुस्तक को तैयार किया है और मम्मा के आशीर्वाद से यह पुस्तक छपे।

उनका बहुत बड़ा और अमूल्य योगदान रहा

वे कहते रहे कि मैं बाबा को प्रत्यक्ष नहीं कर पाया लेकिन सच में इस संस्था को संस्था के रूप में और यह स्पिरिचुअल यूनिवर्सिटी (आध्यात्मिक विश्व विद्यालय) प्रैक्टिकली किस प्रकार से है उसको उन्होंने साहित्य के द्वारा प्रत्यक्ष किया है। कुछ समय पहले उन्होंने डायरेक्ट बाबा के शब्दों में एक पर्चा तैयार किया था, उसकी लाखों, करोड़ों प्रतियाँ छापी और बाँटी गयीं। उनमें बिलकुल भगवान के डायरेक्ट महावाक्य थे। वे हमेशा कहा करते थे कि सत्यता को प्रत्यक्ष करने में, परमात्मा के बारे में लोगों के सामने डायरेक्ट बोलने में कभी भी डरना नहीं चाहिए।
मधुबन में एक बार एक मीटिंग हुई थी। उसमें हम भी विदेश की तरफ से आयी थी। उस मीटिंग में वे बोल रहे थे कि बाबा के डायरेक्ट महावाक्य लोगों के पास जाने चाहिए, पोस्ट में जाने चाहिएँ, अखबारों में जाने चाहिएँ। मैं मानती हूँ, भले ही उन्होंने मुख (वाणी) से सारी दुनिया में बाबा को प्रत्यक्ष नहीं किया हो लेकिन अपने जीवन से, अपनी धारणाओं से ब्रह्मावत्सों के सामने बाबा की प्रत्यक्षता अवश्य की है। उन्होंने लेखनी से, वाणी से, धारणा से बहुत कुछ प्रत्यक्ष किया लेकिन उनके मन में बाबा को प्रत्यक्ष करने की विधि क्या थी, वो कैसे प्रत्यक्ष करना चाहते थे, वे क्या नहीं कर पाये, ये सब वो ही जानें। मैं कहती हु, अभी तक जितनी भी, जो भी सेवायें हुई हैं उनमें उनका बहुत बड़ा और अमूल्य योगदान रहा।

उन्होंने कभी अपनी बीमारी के बारे में सुनाया नहीं

जब बीमार पड़े थे, तब वे लन्दन आये थे। उस समय मैं वहाँ ही थी। उनको देखने से लगता नहीं था कि वे बीमार हैं। उनके चेहरे पर रमणीकता और हर्षितपना दिखायी पड़ता था। वे कभी किसी से बात करते थे तो देह और देह की बीमारी के बारे में कभी नहीं सुनाते थे। सदैव ज्ञान, योग, भगवत्-प्रेम के बारे में सुनाते थे और आये हुए भाई-बहनों को रिफ्रेश करके भेजते थे। उन्होंने कभी अपनी बीमारी के बारे में कम्प्लेन्ट नहीं की कि यह मेरा हिसाब-किताब है, किसी जन्म का कर्म का फल है। वे समझते थे कि यह कर्मभोग भी ईश्वरीय सेवा का साधन है। वहां लन्दन में भी कभी भाइयों के साथ बैठते थे, कभी बहनों के साथ बैठते थे। कुछ-न-कुछ ज्ञान की चर्चा करते ही रहते थे। लास्ट तक वहां बाबा की कहानी, मम्मा की कहानी और अपनी कहानी सुनाकर प्रेरणा देते रहे। मैं यह मानती हूं कि उनका जीवन ही प्रेरणादायी था।

उन्होंने ब्रह्मा बाबा को पूरा फॉलो किया

अन्त में मैं यही कहूंगी कि उन्होंने बाबा को, बाबा के ज्ञान और नियमों को अपने दिल से स्वीकार किया और ईमानदारी से, वफ़ादारी से धारण किया। ब्रह्मा बाबा को उन्होंने बहुत बारीकी से देखा, समझा और अनुसरण किया। उन्होंने कभी नहीं सोचा कि मैंने ब्रह्मा बाबा को फॉलो किया है इसलिए मुझे भी उन जैसा स्थान, मान भी मिलना चाहिए। कभी नहीं। वे सदैव सादे रहे, सरल रहे, विनम्र रहे। उन्होंने दूसरों को पालना और प्रेरणा ऐसे ही दी जैसे ब्रह्मा बाबा ने सब बच्चों को दी है। ब्रह्मा बाबा के कदम पर कदम रखकर वे चले हैं।
जैसे ब्रह्मा बाबा की यादगार में शान्ति स्तम्भ है, ज्ञान स्तम्भ है, शक्ति स्तम्भ है और पवित्रता स्तम्भ है, मैं मानती हूं जगदीश भाई यज्ञ के बड़े स्तम्भ हैं ज्ञान के, योग के, धारणा के और सेवा के।
***

रेडियो इन्टरव्यू के बाद फोन लाइन ही जाम हो गयी

विदेश यात्रा में भ्राता जगदीश जी के साथ सेवा में रही हई ब्रह्माकुमारी निर्मला दीदी जी, ऑस्ट्रेलिया, एशिया महाद्वीप तथा ज्ञान सरोवर की निमित्त सेवा-निर्देशिका, उनके साथ की यादें इस प्रकार वर्णन कर रही है-
"जगदीश भाई हमारे बहुत सीनियर भ्राता थे। ब्रह्माकुमारीज़ के प्रवक्ता भी थे। जब हम ज्ञान में आये तब से उनके लिए काफ़ी रिगार्ड था। उनकी बुक्स (पुस्तकें) हम पढ़ते रहते थे। मैगज़ीन के आर्टिकल्स (लेख) भी पढ़ते रहते थे। उनसे हमारा सम्पर्क शुरू से ही था।

उन्होंने ही सारे प्रश्नों के उत्तर दिये

सन् 1971 में देहली में 'इन्टरनेशनल योगा कॉन्फरेन्स (अन्तर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन)' था। उसमें मैं भी एक स्पीकर (भाषणकार) थी और जगदीश भाई भी स्पीकर थे। कुछ अन्य भाई-बहनें भी स्पीकर थे। जब मेरा स्पीच (भाषण) करने का टर्न (बारी) आया तो मैंने अपनी स्पीच पढ़कर सुनायी। उसमें 'मेडिटेशन और मेडिकेशन' (योग और औषधि) का टॉपिक था। उस सम्मेलन में काफी विदेशी भी थे और कुछ भारत के भी थे। लेक्चर (प्रवचन) पूरा होने के बाद प्रश्नोत्तर का समय था। सारा प्रोग्राम अंग्रेजी में था। जब भारतवासी प्रश्न पूछना शुरू करते हैं तो बहुत कुछ पूछते हैं ।विदेशियों ने इतने प्रश्न नहीं पूछे, भारत वालों ने ज़्यादा पूछे। भारत वालों को तो अक्सर मालूम रहता है कि ये ब्रह्माकमारियाँ ब्रह्मचर्य को ज्यादा महत्व देती हैं । तो उन्होंने ब्रह्मचर्य के बारे में और हमारे योग के नियमों के बारे में पूछा। स्पष्ट है कि उत्तर देने में थोड़ी बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि मैं भी उस समय ज्ञान में नयी-नयी थी। जगदीश भाई भी उस सभा में थे, वे उठकर मेरे पास आये और मेरी बगल में बैठकर, मेरी तरफ से उन्होंने ही सारे प्रश्नों के उत्तर दिये। इस प्रकार, बाबा ने उन द्वारा हमें मदद करायी। उस सम्मेलन से ही ब्रह्माकुमारियों को अगला निमन्त्रण मिला, उनका ही अगला सम्मेलन न्यूयार्क में होने वाला था।

पाँच जनों का डेलिगेशन रवाना हुआ

उस सम्मेलन में किसको किसको भेजें, इसके बारे में मधुबन में बातें होने लगीं। मैंने भी ऑफर (अपनी इच्छा प्रकट) की कि मैं विदेश जा सकती हूँ। मेरे लौकिक पिता जी भी चाहते थे कि मैं विदेश में पढूं लेकिन पढ़ने के लिए तो मैं विदेश जा नहीं सकी इसलिए मैंने कहा, सेवा के लिए मैं विदेश जा सकती हूँ। उस समय जगदीश भाई, मैं, मद्रास की रोजी बहन, मुंबई की शील दादी और रमेश भाई- कुल हम पाँच जनों का डेलिगेशन (दल) रवाना हुआ। लन्दन में हम सभी साथ में रहे क्योंकि लन्दन में तब बाबा के कई बच्चे थे इसलिए पांचों साथ रहे। पाँचों का इकट्ठे सफर करना मुश्किल लगता था, फिर भी न्यूयार्क तक हम सब साथ में ही रहे।

वे अपनी दिनचर्या में बहुत पक्के थे

उन दिनों जगदीश भाई के साथ रहकर हमने यह देखा कि वे अपनी दिनचर्या में बहुत रेग्युलर (पक्के) थे जैसे कि अमृतवेले का योग, मुरली सुनना और पढ़ना इत्यादि। जब तक हम पांचों इकट्ठे रहे तब तक सब मिलकर मुरली क्लास करते थे। उस समय वे एक स्टुडेण्ट की तरह बैठकर मुरली सुनते थे। ज्यादातर शील दादी ही मुरली सुनाती थीं। सब मिलकर अमृतवेले योग करते थे, मुरली क्लास करते थे। मैंने देखा कि उनमें बहनों के लिए बहुत रिगार्ड था। जहाँ भी हम सेवा में जाते थे, बहनों को आगे रखते थे। जिस किसी वीआईपी से मिलने जाते थे, हम बहनों को ही कहते थे कि पहले आप उनको परिचय देना। बाद में जो भी एड करना है, ठीक करना है, वो सब वे सुनाते थे।

विदेश में सेन्टर खोलने की सलाह उन्हीं की थी

अमेरिका जाने के लिए, लन्दन छोड़ने से पहले जगदीश भाई ने कहा कि यह ठीक नहीं है कि हम सिर्फ दुनिया की सैर करके वापस ऐसे ही भारत लौट जायें। कम-से-कम एक स्थान पर बाबा का सेन्टर खोलना चाहिए। लन्दन में 10-15 स्टूडेण्ट तो हैं ही, तो क्यों नहीं हम यहाँ बाबा का स्थान बनायें, यह उनकी पहली सलाह थी। उस समय हम मुरली दादा (जयन्ती बहन के पिता जी) के घर पर ठहरे हुए थे। मुरली दादा ने कहा, ठीक है, आप तो सेन्टर खोलना चाहते हो लेकिन खर्चा कैसे चलेगा? लन्दन तो बहुत महंगा है। तब जगदीश भाई ने, वहाँ के जो बाबा के बच्चे थे, उन्हों के साथ मीटिंग की। उनसे पूछा कि आप क्या-क्या मदद दे सकते हैं? उन सबने कहा कि हम यह-यह सहयोग दे सकते हैं। फिर यह बात मुरली दादा को बतायी गयी। उन सबने मिलकर मधुबन में एक पत्र लिखा कि हम यहाँ लन्दन में एक शाखा खोलने के लिए तैयार हैं, आप यहां के लिए कोई समर्पित टीचर भेज दीजिये। वहाँ से निकलने से पहले ही जगदीश भाई ने सारा इन्तज़ाम करवाया सेन्टर के लिए।
उसके बाद हम सब न्यूयार्क गये। वहाँ भी सेवा-अर्थ जहाँ-तहां जाना होता था। कहीं दो जने जाते थे, कहीं तीन जने जाते थे। फिर हम लोगों ने सोचा कि पाँच लोगों का ग्रुप बहुत बड़ा होता है, इसके छोटे-छोटे ग्रुप बनायें तो अच्छा होगा। इसलिए हम ग्रुप बना कर अलग-अलग हुए। रोजी बहन को अपने लौकिक भाई के पास जाना था, इसलिए वह जमाइका गयी। उसके साथ शील दादी भी गयी। मैं और रमेश भाई, जिस सम्मेलन में भाग लेना था, वहाँ गये। जगदीश भाई रह गये अकेले।

उन धरनी पर अच्छी तरह ज्ञान के बीज बोकर आये

जगदीश भाई आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, हांगकांग आदि देशों में गये और अच्छा समय देकर, अच्छी सेवा करके आये। वे जहां-जहां चक्कर लगाकर आये, वहाँ पर अच्छी तरह ज्ञान के बीज बोकर आये। जब मैं आस्ट्रेलिया की सेवा पर गयी तब मैंने देखा कि आस्ट्रेलिया में जगदीश भाई जहां भी गये थे, जिनके पास भी गये थे, जिनका उनसे परिचय हुआ था, उन्होंने हमें बहुत सहयोग दिया। हम भी उनके पास रहे, सेवा में सहयोग प्राप्त किया। वे जगदीश भाई को बहुत याद करते थे, महिमा भी करते थे कि उन्होंने हमें यह नया मार्ग बताया। उनसे मिलकर, सुनकर चहुत अच्छा लगा।

उनका यही लक्ष्य होता था कि हरेक को बाबा का परिचय ज़रूर सुनाना चाहिए

मुझे एक और घटना याद आ रही है, सन् 1983 के बाद ओम् शान्ति भवन में हर वर्ष सम्मेलन होते रहे। उस समय विदेश के ग्रुप भी आते रहते थे। एक बार सत्यानन्द स्वामी जी महाराज, जो आफ्रीका में सेवा करने जाते थे, उस सम्मेलन में आये थे। बड़ी दादी जी ने मेरे से कहा कि आप विदेश का एक ग्रुप लेकर उन स्वामी जी से मिलो। उनको ठहराया गया मुधबन के राजयोग भवन में। हम विदेश के कुछ भाई-बहनों के साथ उनके पास गयी। हमारे साथ वेदान्ती बहन भी थी। स्वामी जी की सेवा की प्रशंसा करते हुए उनके साथ बातें करते हम उनके पास बैठे थे। बाद में जगदीश भाई भी वहाँ आये। उन्होंने बाबा का परिचय देना शुरू किया। हम तो स्वामी जी से जनरल बातें कर रहे थे। जगदीश 'भाई, ब्रह्माकुमारियों की क्या मान्यता है, आंखें खुली रखकर वे कैसे राजयोग करती हैं इत्यादि के बारे में सुनाने लगे थे। लेकिन वे स्वामी जी आध्यात्मिकता और राजयोग की बातें सुनने में उतनी रुचि नहीं दिखा रहे थे। उनका चेहरा देखकर हमें लगा कि वे सुनते हुए भी नहीं सुन रहे हैं। जैसे हमारे साथ वह प्यार से बाते कर रहे थे, वैसे जगदीश भाई के साथ नहीं कर रहे थे। लेकिन जगदीश भाई का हमेशा यही लक्ष्य रहता था कि कोई भी हो, उसको बाबा का परिचय, ईश्वरीय ज्ञान जरूर देना चाहिए।

ब्रह्मा बाबा भी उनको आगे रखते थे

ब्रह्मा बाबा भी उनको आगे रखते थे। जब मधुबन में प्रदर्शनी लगायी थी तब बाबा ने जगदीश भाई को कहा था कि शाम को बैठकर प्रदर्शनी समझाने वालों को ट्रेनिंग दो, कैसे समझायी जाती है। जगदीश भाई रोज़ शाम को प्रदर्शनी के बारे में सबको बताते थे कि कोई सवाल पूछे तो क्या जवाब देना चाहिए।
इस प्रकार, वे न केवल महान ज्ञानी, प्रवचनकार और लेखक ये बल्कि दूसरों को ट्रेनिंग देने में, आगे बढ़ाने में भी बहुत होशियार थे। जब वे क्लास कराते थे, उसको सब बहुत पसन्द करते थे। कभी भी, कोई भी उनकी क्लास मिस नहीं करता था। जगदीश भाई का ज्ञानी और योगी जीवन आदर्श और अनुकरणीय था। प्लानिंग बुद्धि और दूरदर्शिता, ये उनकी विशेष विशेषतायें थीं।

बैक शो का समय 15 मिनट का था लेकिन वह दो घण्टे तक चलता रहा

जब मैं आस्ट्रेलिया में थी तब एक बार वे आस्ट्रेलिया के टूअर पर आये थे। हमने सारे स्थानों पर एक टॉपिक रखा था 'रीइनकॉरनेशन (पुनर्जन्म)'। इसका कारण यह था कि सब जगह एक ही टॉपिक होगा तो बहनों को सोचना नहीं पड़ेगा कि लिखत क्या हो क्योंकि उस समय हम सब विदेश सेवा में नये-नये थे। स्थान भी सब नये थे। इसलिए निर्णय किया गया कि टॉपिक एक ही हो और तारीख और स्थान अलग-अलग छाप दें। रेडियो पर इस विषय पर उनका इन्टरव्यू भी रखा गया। इनका इन्टरव्यू सुनकर इतने फोन उस समय वहां आने शुरू हो गये कि टेलीफोन लाइन ही जाम हो गयी। पुनर्जन्म का टॉपिक भी ऐसा था और जगदीश भाई का जवाब देने का तरीका भी ऐसा था कि लोगों की जिज्ञासा बढ़ती जाती थी। काफी समय तक बैंक शो चलता रहा। बैंक शो का समय 15 मिनट का था लेकिन वह दो घण्टे तक चलता रहा। उनमें यह भी कला थी कि हरेक को कैसे प्रसन्न करें।

बाबा को पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करना, उनकी ख़्वाहिश थी

जगदीश भाई की यह तमन्ना थी कि हम बाबा का सन्देश सबको पहुंचायें। लास्ट में भी जब वे बिस्तर पर थे, मैं और न्यूयार्क की मोहिनी बहन उनसे मिलने गये थे, तब उन्होंने कहा कि एक बात से मैं सन्तुष्ट नहीं हैं। मुझे एक बात का खेद है कि मैं बाबा को पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष नहीं कर सका। बाबा को प्रत्यक्ष करना, यह मेरी ख्वाहिश थी।
वैसे तो वे खान-पान, रहन-सहन में बहुत सादे थे। वे अचार नहीं खाते थे, पापड़ नहीं खाते थे, तली हई चीजें नहीं खाते थे। वे कहते थे, जिसमें फूड वेल्यू नहीं है, उसको नहीं खाना चाहिए। फिर भी उनको कैसे लीवर का कैन्सर हुआ, मुझे समझ में नहीं आता। परन्तु कई बार पीलिया से भी लीवर खराब हो सकता है और उसके कारण कैन्सर भी हो सकता है।"
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परमात्म-पिता पर अटूट प्रेम और विश्वास

दिल्ली, शक्ति नगर और रूस के सेवाकेन्द्रों की निमित्त संचालिका ब्रह्माकुमारी चक्रधारी दीदी जी, जिन्होंने कमला नगर और शक्ति नगर सेवाकेन्द्रों में लगभग चालीस सालों तक भ्राता जगदीश चन्द्र जी के साथ रह ईश्वरीय सेवा की है, भ्राता जी के बारे में अपने संस्मरण इस प्रकार सुनाती हैं-
"जब से मेरा समर्पित जीवन शुरू हुआ तब से मैं भाई साहब के पास रही यानि लगभग चालीस वर्ष भाई साहब के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पहले गुलज़ार दादी जी, भाई साहब, मैं और एक भंडारे की बहन होती थी। उसके पश्चात् जब देहली, पाण्डव भवन बना, तो गुलज़ार दादी जी वहाँ चली गयीं, मुझे कमला नगर में छोड़ दिया लेकिन जगदीश भाई होने के कारण मैं सदा निश्चिन्त रही क्योंकि पग-पग पर वे हमारा मार्गदर्शन करते थे। हालांकि सब कार्य स्वयं करते थे लेकिन नाम हमेशा बहनों का करते थे। कहते थे, ये सब कुछ बहने ही करती हैं। हर बात हमें सिखाते, फिर स्वयं पीछे हो जाते थे और हमें आगे कर देते थे।

वो भी बड़े आनन्द का जीवन था

जब मैं सेवाकेन्द्र में आयी, वहाँ उस समय एक चारपाई थी, दो कुर्सियां थीं और एक मेज़ थी। गुलज़ार दादी जी उस चारपाई पर सोती थीं। इतना ही फर्नीचर था सेन्टर पर। हमें सोने के लिए चटाई थी। बाद में किसी ने एक छोटा-सा खटोला दिया, जिसमें छोटे बच्चे को सुलाया जाता है। उसको गुलज़ार दादी जी की खटिया के नीचे डालते थे, रात को वहां से निकाल कर उस पर मैं सोती थी। भाई साहब के पास भी एक टेढ़ी-बांकी-सी खटिया थी। फिर भी उस समय बड़े आनन्द का जीवन था। यज्ञ में जब मै आयी तो बहुत छोटी थी। उस समय मुझे ज्ञान सुनाना आदि नहीं आता था। भाई साहब पहले मेरे से भाषण लिखवाते थे। उसके बाद साथ ले जाते थे तो रास्ते में मुझे सारी प्वाइटस याद दिलाते थे कि बोलो, इसके बाद क्या प्वाइंट बोलोगे, इसके बाद कौन-सा प्वाइंट बोलोगे। भूल जाती थी तो याद कराते थे। पूरे रास्ते में रटाकर, स्टेज पर बिठाकर, भाषण शुरू कराकर, फिर वहाँ से जाते थे। यह सिर्फ मेरे लिए नहीं, जितनी भी बहनें थीं, क्लास में आने वाली जितनी भी मातायें थी उनके प्रति भी करते थे। सप्ताह में दो बार माताओं के लिए क्लास रखते ये और भाषण कैसे करें, यह ट्रेनिंग देते थे, लिखवाते थे। माताओं से भाषण लिखवाने के बाद उसको सुनते थे उनके द्वारा ही। उनसे पूछते थे कि आप रटा हुजा सुनाती है या दिल से सुनाती है? बाबा ने उस क्लास का नाम दिया था 'मुरलीधर क्लास'। इस क्लास में भाषण करने वाली, कोर्स कराने वाली मातायें आती थीं। ऐसा नहीं कि भाई साहब ने सिर्फ ज्ञान दिया बल्कि सेवा में भी हड्डी मेहनत की। हरेक कार्य खुद करके हमें सिखाया। अगर समझो, सुबह तीन बजे संगठन का योग रखा है तो पौने तीन बजे हॉल में जाकर वे बेल पर बेल (घंटी) बजाते थे ताकि हम जल्दी उठकर आ जायें। इस प्रकार, वे हमें क़दम क़दम पर समय का महत्त्व रखना सिखाते थे।

वे सोचते थे, मेरे लिए कम-से-कम खर्च हो

एक बार भाई साहब ने मेरे से कहा, सुनने में आया है कि ज्ञान सरोवर में मेरे लिए एक कमरा बनाया है, उसमें मेरे लिए फर्नीचर रखा है। मेरे नाम से फर्नीचर आये, यह मुझे पसन्द नहीं है। जिस व्यक्ति ने सारा जीवन अपने लिए कुछ खर्च नहीं किया उसके नाम से फर्नीचर के लिए इतना खर्चा! यह नहीं चाहिए। मैंने कहा, भाई साहब, आपने ऐसे क्यों नहीं कहा कि मेरे पास बहुत फनींचर पड़ा हुआ है, उसी को रख दीजिये। उन्होंने मेरे से पूछा, कौन-सा फर्नीचर? मैंने कहा, यहाँ शक्ति नगर में जो आपका है, जो कराची से आया था। टूट गया है इसलिए हमने छत पर रखा हुआ है उसको ही ट्रक भरके भेज देते हैं। उन में एक कुर्सी थी, एक टेबल और अलमारी। टूटने पर भी उनको फेंकने नहीं दिया उन्होंने। हमने उनको छत पर रख दिया था। मैंने कहा, यही फर्नीचर ट्रक भरके ज्ञान सरोवर भेज देंगे आपका कमरा डेकोरेट (अलंकृत) हो जायेगा। वे चुप हो गये। कहने का भाव यह है कि वे हमेशा सोचते थे कि मेरे ऊपर यज्ञ से इतना खर्च नहीं होना चाहिए। मेरे लिए कम से कम हो। इस प्रकार, वे त्याग के मूरत थे। अन्त तक वे त्याग का जीवन जीते रहे। वे सदैव यही कहते थे कि यज्ञ में पैसा कैसे आता है, यह देखो कैसे-कैसे बावा के बच्चे पैसे कमा कर, बचा कर अपना पेट बाँध कर यज्ञ में देते हैं, यो सही रूप में इस्तेमाल होना चाहिए।

काग़ज़-पत्र और वस्तुओं के बारे में…

कभी-कभी भाई साहब से मैं कह देती थी कि भाई साहब, आपने किसी को अपना वारिस नहीं बनाया जो आपके सामानों का, किताबों का सही इस्तेमाल कर सके। मुस्करा देते थे, कुछ बोलते नहीं थे। हमें लगता था, ड्रामा अनुसार जो होगा सो होगा लेकिन दूरदर्शिता की उनकी ज़्यादा विशेषता थी। एक रूम में यज्ञ के कुछ रिकार्ड्स थे जिनको उन्होंने बहुत संभाल कर रखा था। कमरे में टोटल लकड़ी की अलमारियाँ बनवायी थीं। वो लकड़ी खराब निकली, कुछ दिनों के बाद अलमारियों में से लकड़ी का पॉउडर निकलने लगा। उन्होंने उन लकड़ी की अलमारियों को लोहे की अलमारियों में बदलने को कहा। हमने पूछा, भाई साहब, आप कहते हैं कि मैं 72 साल ही रहूँगा तो इन लकड़ी की अलमारियों के बदले लोहे की अलमारियाँ क्यों मँगवानी हैं? फिर उन्होंने कहा, ठीक है, लकड़ी की रहने दो। फिर उन्होंने कहा, नहीं, लोहे की अलमारी बनवा दो। मैं समझती है, अगर लोहे की अलमारियाँ नहीं बनवायी होती तो शायद वो यज्ञ के काग़ज़ पत्र, सामान आदि सब दीमक लगकर ख़राब हो गये होते। इस प्रकार, उन्होंने ऐसे प्रबन्ध कर दिये थे कि वर्षों तक वो चीजें पड़ी रहे लेकिन खराब न हों।

साहित्य के प्रति रुचि

कई प्रकार के साहित्य उनके पास थे। कहीं भी जाते थे, अच्छी किताबें - कहानियों की हों, हिस्ट्री जोग्राफी की हों, साइंस की हों या फिलासाफी की हो सभी को ले आते थे। हम कहते थे, इतने डब्बे आप भरते रहते हैं, आखिर कब पढ़ी जायेंगी? कोई भी चीज़ होती तो उसको कटिंग करके रख लेते थे। लिखने के टाइम उस कटिंग को अकेले ढूंढते रहते थे। किसी को अपने साथ रखा नहीं कि वो लिखने में थोड़ी-बहुत मदद करे। कभी-कभी हम बहनों से अपने लिखे हुए को फेयर करने या प्रूफ रीड करने को कहते थे लेकिन ज़्यादातर सारा काम खुद ही करते थे। बाकी आत्मप्रकाश भाई थे, सत्यनारायण भाई थे, इन दोनों से छपवाने का काम कराते थे। अपनी अलमारी ठीक करना, पुस्तक और पेपर्स आदि संभालना- वे खुद ही करते थे। कई बार मैं पूछती थी, भाई साहब, आज क्या ढूंढ़ रहे थे? कहते थे कि कोई काग़ज़ ढूंढ़ रहा था, तीन घंटे चले गये, पता नहीं, कहाँ रखा है! मैं हंसी-मज़ाक में कह देती थी कि भाई साहब, आज अखबार में अडवर्टाइजमेंट दे देंगे 'वांटेड वन ढूंढ़ाराम (एक ढूंढ़ाराम की जरूरत है)'। वो आकर आपके पास ढूंढ़ता रहेगा। भाई साहब कहते थे, वो आकर भी कहाँ ढूंढ़ेगा, रखा तो मैंने ना?

वे बड़े ऑफ़ीसियल रहते थे

इतनी सारी किताबें उनकी अलमारियों में थीं लेकिन कभी हमने वे अलमारियाँ खोलकर नहीं देखीं। भले, उनके साथ हम सालों साल रहे लेकिन कभी उनकी चीज़ों को हाथ नहीं लगाया। इन बातों में वे बड़े ऑफीसियल रहते थे। वे कहते थे कि जिसका जिस चीज़ से जितना सम्बन्ध है, उतने तक रहना चाहिए। अगर उसका उस चीज़ से कोई तैलुक नहीं है तो उस चीज के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। कभी हम कहते भाई साहब हम भी देखें आपकी कौन-सी किताबें है, कौन-से वे शास्त्र, पुराण आदि हैं। कहते थे, नहीं। बाबा ने यह कहा है कि बच्चों को बाहर की किताबें नहीं पढ़नी हैं लेकिन मझे आज्ञा दी है कि तुम पढ़ो और उनको ज्ञानयुक्त भावनाओं से लिखो और लिखकर यह साहित्य सभी के पास जाये लेकिन सभी को ये सब पढ़ने का अधिकार बाबा ने नही दिया। जो बाबा ने नहीं दिया तो मैं भी आपको नहीं दूंगा। तब से हमने कभी उनसे यह बात कही ही नहीं कि आपकी किताबें दिखाओ। बीसे अलमारियों भरी थी लेकिन हमें कुछ भी पता नहीं था कि किस अलमारी में किताबें हैं, किस अलमारी में काग़ज़ पत्र हैं।

गणेश का पेट बहुत बड़ा होता है

कई भाई-बहनें समझते हैं कि चक्रधारी बहन भाई साहब के पास रहती हैं, उन्हें कई गुप्त बातें मालूम होंगी। इसलिए मेरे से पूछते थे, यह बात वास्तव में क्या है? आपको भाई साहब ने बताया होगा लेकिन भाई साहब ऐसी बातें कभी भी हमें नहीं बताते थे। जो जरूरी है, वहीं बात बताते थे, बाक़ी जिसका हमसे सम्बन्ध नहीं, वह कभी नहीं सुनाते थे। हम उनको कहते थे, आपका पेट बहुत बड़ा है। दिखाते हैं, गणेश का पेट बहुत बड़ा है। बात को अपने अन्दर ऐसे समा लेते थे कि कभी किसी के सामने बाहर निकले, हो नहीं सकता। कई बार कोई-कोई बात वे आये हुए व्यक्ति को बता देते थे, तो हम कहती थी, भाई साहब आपको बात उस व्यक्ति को सुनानी नहीं चाहिए थी। अगर उसने जाकर उसी व्यक्ती को बता दी तो वो आपका नाम बतायेंगे कि जगदीश भाई ने ऐसा कहा। वे हंसकर कहते थे, मैं उस बात को डायरेक्ट सुना नहीं सकता है लेकिन यह बात अमुक व्यक्ति तक पहुंचानी जरूरी है इसलिए मैं ऐसे व्यक्ति को सुनाता हूं जो बात वहां पहुंचाये।
वे कभी अन्याय सहन नहीं करते थे। कहते थे, जिस यज्ञ का पौधा प्रभु ने लगाया है, जिस साकार बाबा ने अपना सब-कुछ स्वाहा करके इसको आगे बढ़ाया है, जिसके लिए जगदम्बा सरस्वती तथा दादियों ने, हम सबने इतना सारा सहन कर, मेहनत कर सब कुछ किया है, उसको कहीं, किसी से नुक़सान होता है तो मुझसे देखा नहीं जाता, सहा नहीं जाता। इसके लिए कोई बुरा मानता है, भले माने लेकिन कहना मेरा फर्ज बनता है और कहेंगा ज़रूर।
ऐसी बातों से कई लोग उनको बुरा भी मानते थे लेकिन वे सदैव कहते थे, बड़ों के लिए मेरे मन में कभी भूलकर भी डिस-रिगार्ड नहीं आता। मैं कोई बात बोल देता हूँ इसलिए कि सब ठीक हो जाये लेकिन उनके प्रति मेरे मन में रिगार्ड नहीं है, स्नेह नहीं है- यह हो नहीं सकता। आप मेरे मन को खोलकर देखें, मैं उनके लिए जान और जीवन न्योछावर कर दूँ। अगर उन पर कोई संकट आ जाये, मुश्किलें आ जायें मैं उनके लिए जान लगा दूँ।
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वे न केवल ब्रह्मावत्सों का परन्तु समस्त मानव जाति का आशीर्वाद लेकर गये हैं

यूरोप महाद्वीप तथा मध्यपूर्व देशों की ईश्वरीय सेवा की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी जयन्ती दीदी जी, भ्राता जगदीश के बारे में अपने उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त कर रही हैं-
जगदीश भाई के साथ मेरी पहली मुलाकात हुई थी सन् 1966 या 1967 में, साकार बाबा के समय। उस समय बाबा ने ही उनके साथ मेरा परिचय कराया था। उन्हें देखते ही मुझे लगा कि यह भाई बहुत बुद्धिमान (इंटेलिजेंट) है। उस समय उनसे ज़्यादा बात तो नहीं हुई लेकिन सन् 1968 में जब मैं समर्पित हुई तब जगदीश भाई का विचार था कि दिल्ली में एक ट्रेनिंग सेक्शन (विभाग) खुले। ट्रेनिंग सेक्शन खुलने की योजना के दौरान जगदीश भाई मुझे बार-बार बुलाते थे। यह थी अक्टूबर, 1968 की बात।
उसके बाद बड़ी दीदी के साथ मुझे बाबा ने टूअर पर भेजा। जब हम दिल्ली गये तो जगदीश भाई, बड़ी दीदी को ट्रेनिंग सेन्टर का स्थान दिखाने के लिए लेने आये थे तो उन्होंने मुझे भी चलने के लिए कहा। मुझे भी लगा कि यह अच्छी बात है, टीचर बहनों के लिए एक ऑफिशियल ट्रेनिंग होनी चाहिए।
बाबा का विचार था कि ट्रेनिंग का स्थान ऐसा हो जहाँ लोगों की दृष्टि कुमारियों पर न पड़े लेकिन अन्त में ट्रेनिंग सेक्शन मधुबन के पाण्डव भवन में ही बन गया जो अभी शान्ति स्तम्भ के पास है। बाबा ने मुझे कहा, तुम भी उस ट्रेनिंग में शामिल हो जाना।

मेरा पहला भाषण जगदीश भाई की उपस्थिति में हुआ

उस समय जगदीश भाई को नज़दीक से देखने को मिला जब मुझे पहली बार भाषण करने के लिए निमन्त्रण मिला था कानपुर में। वहां उत्तर प्रदेश के राज्यपाल आ रहे थे एक एज्युकेशन कॉन्फरेन्स में। बाबा चाहते थे कि कोई बहन वहाँ अंग्रेज़ी में भाषण करे। मोहिनी बहन (न्यूयार्क) दिल्ली से और रोजी बहन मद्रास से नहीं आ सकती थीं। इसलिए बाबा ने मुझे पत्र में लिखा कि तुम जाओ। तब तक मैंने कहीं भाषण नहीं किया था। उस समय मैं आगरा में रहती थी। बाबा के कहने अनुसार मैंने तैयारी कर ली थी। कानपुर में स्टेज पर मुझे और जगदीश भाई को साथ में ही बैठना था। जब हम कानपुर में मिले तो मैंने उनसे कहा, भाई जी, मैंने जो भाषण तैयार किया है, उसको आप देख लें और जो कुछ जोड़ना है, बता दें।उन्होने समय निकाल कर मेरा लिखा हुआ पढ़कर बहुत अच्छी-अच्छी प्वाइट्स मुझे भाषण के लिए बता दीं।
उसके बाद जब-जब मैं जगदीश भाई से मिलती थी, तब-तब वह मेरे से हालचाल पूछते थे और हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए, ईश्वरीय सेवा के लिए कुछ-न-कुछ विचार बताते थे। एक बड़े भाई की तरह मेरा बहुत अच्छा ध्यान रखते रहे।

रात को वे मेरे पिता जी की ज्ञान-सेवा करते थे

सन् 1971 में भारत से विदेश सेवा के लिए पहला डेलिगेशन जा रहा था। उनको जाना था अमेरिका में होने वाली एक 'योगा कॉन्फरेन्स' में। उन दिनों मैं और मेरी लौकिक माता रजनी बहन, लौकिक पिता मुरली भाई लन्दन में रहते थे। मैंने और मेरी माता जी ने सोचा कि ये भाई-बहनें लन्दन होकर अमेरिका जायें। जब हमने मधुबन में यह विचार रखा तो ऐसा ही प्रोग्राम बन गया। पाँच भाई-बहनों का यह डेलिगेशन था, वे पांचों लन्दन में हमारे घर में ही थे एक मास तक। उस समय हमारे लौकिक पिता जी ज्ञान में नहीं थे लेकिन जगदीश भाई रोज़ रात को उनके साथ संसारिक बातें करते-करते, उनके साथ अच्छी तरह ज्ञान की लेन-देन करते थे। जगदीश भाई का सवेरे जल्दी उठना होता था। पिता जी दिन भर काम पर होते थे, उनको रात को ही समय मिलता था। जब रात को सब सो जाते थे, तब जगदीश भाई शान्ति से बैठकर उनकी ज्ञान द्वारा सेवा करते थे। मैं देखती थी कि जगदीश भाई हरेक का कितना ध्यान रखते थे!

विदेश में पहला सेन्टर खुलने में बहुत बड़ा योगदान जगदीश भाई का भी है

उसके बाद लन्दन में सेन्टर खुला। सेन्टर खोलने का विचार भी जगदीश भाई का ही था। उन्होंने कहा कि हमें यहाँ सिर्फ चक्कर लगाना नहीं है, बाबा ने कहा है कि सेवा करके, सेन्टर खोलकर आना। बाबा की प्रेरणा से, ड्रामा अनुसार विदेश का पहला सेन्टर लन्दन में खुला उसके लिए जगदीश भाई ने किस तरह हमें, हमारी माता जी को, हमारे पिता जी को प्रेरणा दी, उनके साथ बात की, वह बड़ा वण्डरफुल था। विदेश में पहला सेन्टर खुलने में बहुत बड़ा योगदान जगदीश भाई का भी है।
सन् 1973 में जब मैं भारत में आयी थी, तब दिल्ली में एक आध्यात्मिक मेला हो रहा था। मुझे पता था कि उस मेले के आयोजन में जगदीश भाई की ही प्रेरणा और परिश्रम है। उस मेले की व्यवस्था और प्रबन्धन देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि देखो, इस भाई का बाबा के साथ कैसा कनेक्शन है! सबके सहयोग से ही इतना बड़ा कार्य हुआ लेकिन उसके पीछे प्लान, व्यवस्था, मेहनत, सबसे सहयोग लेना, सबको इकट्ठा करना, सबको उस कार्य में सम्मिलित करके साथ ले चलना, ये बहुत महान् कार्य था। उस मेले के आयोजन के लिए उन्होंने कितनी मीटिंग की थी, कितनी क्लासेस की थीं, इसके पीछे का परिश्रम बहुत जबर्दस्त था।

मैं कुछ दिन दिल्ली, कमला नगर में रही

उसके बाद सन् 1974, फरवरी मास में जगदीश भाई ने बड़ी दीदी और बड़ी दादी से रिक्वेस्ट (अनुरोध) किया कि जयन्ती बहन कुछ दिन दिल्ली, कमला नगर में आकर रहें क्योंकि वे लन्दन के लिए कुछ नये चित्र तैयार कराना चाहते थे। जब पहला डेलिगेशन लन्दन आया था तब वे भारत से चित्र लेकर गये थे। वे चित्र भारत के हिसाब से बने थे, पश्चिमी संस्कृति के हिसाब से वे उतने उपयोगी नहीं थे, भले ही उन में बाबा का ज्ञान ही था। वे विदेश की संस्कृति के अनुरूप ज्ञानयुक्त चित्र बनाना चाहते थे। जगदीश भाई को मालूम था कि हमने लन्दन में, शहर के बीच ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट, रीजन स्ट्रीट में सेवा-अर्थ मई मास के लिए बुकिंगस् की हुई थी। इसलिए वे नये तरीके से चित्र बनाना चाहते थे ताकि वहाँ सेवा अच्छी तरह हो जाये। मैं दिल्ली उनके पास आयी, छह सप्ताह तक रही।
सवेरे मुरली क्लास और नाश्ते के बाद मैं उनके साथ ऑफिस में बैठती थी। कोई विचार, जो चित्र में दिखाया जाये उसकी चर्चा करते थे कि विदेश के अनुकूल वो किस प्रकार बने। अब जो 'इलस्ट्रेशन्स ऑन राजयोगा' पुस्तक बनी है, उन्हीं चित्रों को मैं और जगदीश भाई तैयार कर रहे थे। उस चर्चा के समय मैं नोट्स भी लेती थी। जब चार-पांच चित्रों का आइडिया (विचार) फाइनल हो जाता था तो मैं कृष्णा नगर (जो जमुना पार है) जाती थी, जहां चित्रशाला थी। कई बार मुझे रात को वहीं रुकना पड़ता था क्योंकि आर्टिस्टों को समझाना, उसकी स्केच (रूपरेखा) देखना आदि करते देर हो जाती थी। फिर मैं वहाँ रात रुक कर, सुबह की क्लास करा के कमला नगर वापस आती थी। यह दिनचर्या हमारी लगभग छह सप्ताह तक चली।

एक दिन मधुबन से फोन आया

एक दिन जगदीश भाई के साथ आफिस में बैठी थी, उतने में मधुबन से जगदीश भाई को फोन आया। मैं सुन रही थी, वे फोन पर सिर्फ 'जी हाँ-जी हाँ' ही कह रहे थे। बात पूरी होने के बाद वे आये और मेरे से पूछा, आपको मालूम हुआ, किसका फोन था? मैंने कहा, यह तो मालूम पड़ा कि मधुबन का फोन है लेकिन किसका फोन है, यह मालूम नहीं हुआ। फिर उन्होंने कहा, बापदादा और दीदी दादी का संकल्प है कि जानकी दादी के साथ जयन्ती भी लन्दन जाये। तब तक मुझे विदेश की सेवा-अर्थ जाने का संकल्प ही नहीं था। मैंने कहा, विदेश में मुझे जो सेवा करनी थी, उसे करके आयी है। वहाँ सेन्टर भी बन गया है। दादी रतनमोहिनी जी भी वहाँ डेढ़ साल रहकर सेवा करके आयी थीं। उन दिनों न्यूयार्क वाली मोहिनी बहन भी वहाँ थी। इसलिए मैंने कहा, मुझे लगता है कि वहाँ मेरी ज़रूरत नहीं है क्योंकि इतने सारे वहाँ हैं और अनेक ट्रान्सलेटर (भाषानुवादक) भी आ चुके हैं। तब जगदीश भाई ने कुछ नहीं बोला और कहा, ठीक है, बापदादा से बात करेंगे।
जगदीश भाई को मधुबन आने के लिए बुलावा आया तो जगदीश भाई ने कहा, आप भी चलो। बापदादा की पधरामणी हुई। बाबा के सामने छोटा-सा ही ग्रुप था। दादियाँ, बड़े भाई, और भी कुछ भाई-बहने थे। बाबा ने मेरे से कहा, बच्ची, तुम्हारा वहाँ जाना ज़रूरी है। तुम जाओ। बाबा को मना नहीं कर सकते हैं ना। उसके बाद जगदीश भाई के विचार से जो चित्र बन रहे थे उनको उन्होंने जल्दी-जल्दी तैयार करवाया और कहा, उनको साथ लेकर जाना। दादी जानकी और मैं उन चित्रों को लेकर अप्रैल 24, 1974 में लन्दन गये। वहाँ प्रदर्शनियाँ बहुत ही सफल रहीं। दादी जानकी को वहाँ आना था, विदेश सेवा के लिए निमित्त बनना था। उनको इतनी सारी सेवा करनी थी। बाबा ने उनको वहाँ रखा।

जगदीश भाई के साथ मैं रोम में पाँच दिन रही

उसके बाद बीच-बीच में जगदीश भाई लन्दन आते रहे। सेवा तो जगदीश भाई बहुत ही करते थे लेकिन उनका विचार रहता था कि लौकिक म्यूज़ियम आदि जो भी लन्दन में हैं, उनको देखें ताकि उनके तरीके का उपयोग हमारे ज्ञान के लिए भी हो। इसलिए वे ब्रिटिश म्यूजियम आदि में जाते रहे। एक दिन उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें रोम भी जाना है। उस समय रोम में कोई सेन्टर नहीं था। हमारे सम्पर्क में एक माता थी। उसने प्रबन्ध करके दिया और एक फ्लैट में जगदीश भाई जाकर रहे। दादी जानकी जी ने कहा कि जगदीश भाई को अकेले थोड़े ही भेजेंगे? मुझे उनके साथ जाने के लिए कहा। उस समय जगदीश भाई और हम रोम में पाँच दिन इकट्ठे रहे। सवेरे क्लास करते थे, मुझे ही कहते थे कि आप मुरली सुनाओ। मैं कहती थी, भाई साहब, आप सुनाओ। कहते थे, नहीं, बाबा ने निमित्त बनाया है, बहनें ही मुरली सुनायें। मैं सुनाती थी लेकिन बीच-बीच में वे मुझे रोकते थे और प्रश्न पूछते थे। उन प्रश्नों का उत्तर मेरे पास नहीं होता था। उनका प्रश्न पूछने का लक्ष्य यह होता था कि उस बात का मैं दूसरों के आगे अच्छी तरह विवरण कर सकूँ। हर बात को वे मुझे विस्तार से समझाते थे। वो पाँच दिन बहुत ही सुन्दर रूप से बीते। हम वेटिकन में जाते थे और वापस लौटते समय मार्केट से सब्जी लेकर आते थे। मैं बहुत सादा खाना बनाती थी। जगदीश भाई को सादा खाना ही पसन्द था। जिस माता ने रहने के लिए हमें मकान दिया था उसके कुछ मित्र-सम्बन्धी वहाँ आये थे। जगदीश भाई ने उनकी भी सेवा की। वह एक तरह के नये ढंग की सेवा हुई। जगदीश भाई से हमें यह सीखने को मिला कि नये देश में जाकर कैसे सेवा करें।

हम सबको वे सूक्ष्म और स्थूल पालना अच्छी तरह देते थे

भारत में तो उनके साथ मुलाक़ात होती रहती थी। जब हम पार्टी लेकर आते थे तो हमें खास निमन्त्रण देकर जगदीश भाई कमला नगर सेन्टर पर बुलाते थे, बाद में शक्ति नगर स्थानान्तरित होने के बाद भी बुलाते थे। हम लोगों का वे बहुत अच्छा अतिथि सत्कार करते थे। बढ़िया नाश्ता, भोजन और जाते समय हरेक को सौगात, इन सब की व्यवस्था करते थे। हमें भी और सारे ग्रुप को भी रूहानी पालना और स्थूल पालना अच्छी तरह देते थे। विदेशियों के साथ बैठकर ज्ञान का स्पष्टीकरण करने का और योग का अनुभव कराने का जगदीश भाई विशेष ध्यान रखते थे। अन्तर्राष्ट्रीय सेवा की योजनाओं में भी जगदीश भाई अच्छी-अच्छी राय देते थे। 'ग्लोबल कोऑपरेशन' का प्रोजेक्ट शुरू हुआ था 1988 में। उस समय जगदीश भाई ने कहा, आप लोग प्रोफेसनल्स (विभिन्न वर्ग वालों) की सेवा करो। तब तक बाबा के आदेश अनुसार, जगदीश भाई ने भारत में विभिन्न वर्ग वालों की सेवा शुरू कर दी थी। विदशों में भी समाज के विभिन्न वर्ग वालों की सेवा करने की हमें प्रेरणा दी।

क्लास कराने की, भाषण करने की कला

सन 1989 और 1991 में ग्रीस में वैज्ञानिकों के सम्मेलन हुए। उनमें जगदीश भाई भारत से आये थे और उनके साथ एक भाई या एक बहन होती थी। मैंने देखा, उनका ब्रह्मावत्सों के सामने बोलना और वहां वैज्ञानिकों के सामने बोलना, दोनों बिलकुल अलग होते थे। उनकी क्लास कराने की, भाषण करने की कला विशेष प्रकार की थी। रिलिजन, फिलासांफी, हिस्ट्री, जोग्राफी, साइंस इत्यादि हर प्रकार की बातों को वे बहुत अच्छी तरह सुनाते थे। उन्होंने इन विषयों का बहुत अच्छी तरह अध्ययन किया था, सामने वाले के स्तर के अनुसार ज्ञान का स्पष्टिकरण करने में वे सिद्धहस्त थे। जब वे वैज्ञानिकों के साथ बात करते थे, वो दृश्य विशेष देखने लायक होता था। वे जहां भी जाते थे, वहां के रीति-रिवाज, रहन-सहन, नियम-मर्यादाओं का सम्मान करते हुए सबके साथ एडजस्ट होकर चलते थे। उनमें बहुत लचीलापन था, जैसा समय वैसा एडजस्ट होकर अपना रास्ता निकालकर आगे बढ़ते थे। कभी उन्होंने कोई मांग नहीं की, मेरे लिए वो चाहिए, यह नहीं चाहिए, कभी नहीं। हमेशा एडजस्ट होकर चलते थे। सचमुच योगी जीवन क्या है, उनके द्वारा पता चलता था।

हर प्रकार के नियमों में पक्के

और एक दृश्य मेरे सामने आ रहा है। जब जगदीश भाई की तबीयत ढीली होने लगी तो भारत में उनका इलाज़ चलता रहा लेकिन हमने जगदीश भाई से कहा, अगर आप यहाँ विदेश में आ जायें तो कुछ अच्छा इलाज़ हो सकता है। वे हमारे पास लन्दन में आये और दो मास रहे। तबीयत इतनी ढीली होते हुए भी वे हर प्रकार के नियमों में पक्के थे। पहले वे अपने कमरे में मुरली पढ़ लेते थे और फिर 7-15 बजे क्लास में आकर बैठते थे। उस दिन की मुरली से ही कुछ प्वाइंट्स लेकर मुरली बाद बहुत सुन्दर क्लास कराते रहे। जितने दिन वे लन्दन में रहे उतने दिन रोज़ मुरली क्लास के बाद वे ज्ञान की गहराई की क्लासेस से लन्दन वालों की सेवा करते रहे।
हम चाहते थे कि जितना ज्यादा हो सके वे लन्दन में रहकर इलाज़ कराते रहें। भले, भारत में भी अच्छे-अच्छे डॉक्टर्स हैं लेकिन वातावरण इतना अच्छा नहीं है, कलुषित है। लन्दन में वातावरण कलुषित नहीं है इसलिए यहाँ के इलाज़ से जल्दी ठीक हो जायेंगे लेकिन जगदीश भाई को दो बातों का ख्याल था, एक तो दीपावली भारत में ही करनी है और दूसरी, दिल्ली के विज्ञान भवन में वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन रखा था, उसमें जाने के लिए उन्हें बहुत ख़्याल था। हम सबसे विदाई लेकर भारत लौटे। वे दो बार लन्दन आकर लम्बे समय तक रहे, तबीयत के कारण।

अन्तिम श्वास तक उन्होंने विदेश की सेवा में सहयोग दिया

फिर भारत में रहे, उनकी तबीयत जैसी थी वैसी ही रही परन्तु जहां भी रहे वे बाबा की सेवा करते रहे। जगदीश भाई से मैं लास्ट में तब मिली जब विदेश के लिए कुछ चार्टर बनाने के विषय में चर्चा चल रही थी। कई सालों से यह बात चल रही थी लेकिन फाइनल नहीं हो पा रही थी। एक दिन वे शान्तिवन आये हुए थे, मुझे उन्होंने बुलाया और पूछा, चार्टर कहाँ तक पहुंचा है? मैंने मुस्करा कर कहा, भाई जी, वो अटक गया है तो मैंने भी छोड़ दिया है। उन्होंने कहा, नहीं, उसको बनाओ, तैयार करो और इस बार उसको फाइनल करना है। तबीयत बहुत खराब होने के बावजूद भी उन्होंने दो-ढाई घंटे समय निकाल कर उसके बारे में बात की। फिर मुझे विदेश जाना था तो मैं चली गयी। जब मैं इंडोनेशिया में थी तब जगदीश भाई का फोन आया कि उस चार्टर में और दो-तीन बातें एड हो सकती हैं। उन बातों का विवरण दिया। उनके आधार पर भारत के साथ "चार्टर ऑफ अण्डरस्टैंडिंग" बना। वो बनने में बहुत समय लगा लेकिन इस चार्टर की प्रेरणा और शक्ति जगदीश भाई जी से मिली थी। अन्तिम श्वास तक उन्होंने विदेश की सेवा में सहयोग दिया।

उनके साथ के संस्मरणों की अमिट छाप

जगदीश भाई के साथ के संस्मरणों की मुझ पर अमिट छाप लगी हुई है। मैं यह कह सकती हूं कि योगी जीवन में वे नम्बर वन थे। बाबा तो बाबा है परन्तु जगदीश भाई का जीवन, इनकी दिनचर्या, इनका योग, इनका ज्ञान, इनकी सेवा करने का तरीका बिलकुल उच्च कोटि का था। ये न केवल ब्रह्मावत्सों का वरन् विश्व की समस्त आत्माओं का आशीर्वाद लेकर गये हैं। इनकी जो प्लानिंग बुद्धि थी, जो ज्ञान की गहराई थी, उसके आधार पर हमें लगता है कि वो आत्मा जहां भी है, बाबा की सेवा में ज़रूर इन विशेषताओं का उपयोग करती रहेगी।
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वे परमात्मा का बहुत बड़ा अनमोल वरदान थे

दिल्ली में ही उनके साथ सेवा करके, वर्तमान समय अमेरिका महाद्वीप और करेबियन देशों की ईश्वरीय सेवा की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी मोहिनी दीदी जी, भ्राता जगदीश जी के साथ के अनुभव इस प्रकार हम सबके साथ बाँट रहे हैं-
भ्राता जगदीश जी को मैं बहुत सालों से जानती हूँ। देहली में जब से सेवा शुरू हुई तब बाबा को, इस संस्था को, ज्ञान को कैसे स्पष्ट रूप से हम जनता के सामने रखें, इसके बारे में उनके साथ मेरी बहुत चर्चा चलती थी। उनको बाबा से अति स्नेह था। ज्ञान की हर बात में अटूट निश्चय था। साथ-साथ उनकी बुद्धि बहुत विशाल थी। हर बात को विशाल बुद्धि से सोचते थे। बहुत दुरांदेशी बुद्धि वाले थे। बहुत ही समझदार थे। किस आत्मा को क्या ज़रूरत है, चाहे पालना में या सेवा में, उसको उसी प्रकार से देते थे। मेरे से भी उनका बहुत स्नेह रहा।

उनका हर कार्य व्यवस्थित होता था

हमेशा हर बात, हर चीज़ कितनी व्यवस्थित होनी चाहिए, इसके बारे में उनका बहुत ध्यान रहता था। बड़े-बड़े मेले करते थे, उसके लिए वी,आई,पी, से मिलने जाते थे, 5-6 लोगों को ले जाते थे। किसको क्या कहना है, यह तय जगदीश भाई करते थे। जैसे एक संस्था का परिचय देगा दादी गुलज़ार बाबा का सन्देश देगी और दृष्टि देगी, कोई एक प्रश्नों के उत्तर देगा, इस तरह से वे अच्छी तरह व्यवस्था करते थे। उनकी विशेषता थी ज्ञान की गहराई में अच्छी तरह से जाना। इसका कारण यह था कि उन्होंने फिलासॉफी (दर्शनशास्त्र) और अनेक धार्मिक किताबों का बहुत अध्ययन किया था। वे ज्ञान की हर बात को स्पष्ट करके समझाते थे। वे प्लानिंग बुद्धि तो थे ही, साथ-साथ बाबा से उनका कनेक्शन भी बहुत अच्छा था। यह तो आप सबको मालूम ही है कि उनकी कलम करामत थी। वे कहते थे, अमृतवेले जब मैं बाबा की याद में बैठता हूं तो मुझे क्या लिखना है, उसके बारे में बाबा बहुत प्रेरणा देते हैं। सवेरे सवेरे वे लिखते थे। आप लोग उनकी किताबे आदि पढ़ते होंगे। हरेक टॉपिक और हरेक क्षेत्र से सम्बन्धित विषयों पर उन्होंने लिखा है।

वे यज्ञ के फाउण्डेशन थे

वे यज्ञ के फाउण्डेशन तो थे ही लेकिन उनका यज्ञ से बहुत प्रेम और सम्मान भी था। यज्ञ की रक्षा के लिए, दादियों के लिए और टीचर बहनों के लिए उनकी बहुत आस्था थी। देहली में जब सेवा शुरू हई थी, उस समय इतने साधन भी नहीं थे, पर जगदीश भाई कम साधन होते हुए भी, अपनी साधना के आधार से सेवा की प्लानिंग करते थे।

गंभीरता और प्रसन्नता का सन्तुलन

जगदीश भाई का जीवन बहुत साधारण था। वे हमेशा कहते थे कि भोजन में, कपड़े में, रहन-सहन में जितने साधारण रहो उतना अच्छा रहता है। नहीं तो बुद्धि खिंचती है। इसलिए इनका बिलकुल साधारण तरीक़ा था रहन-सहन का। वे जितने ही गंभीर थे, उतने हर्षित भी थे। चलते-फिरते कितनी बातें सुनाते थे, हँसाते थे, सभी का दिल प्रसन्न हो जाता था। इस प्रकार गंभीरता और प्रसन्नता दोनों उनमें साथ-साथ रहती थीं।

जितनी प्लानिंग-बुद्धि उतनी ही प्लेन-बुद्धि

हम बहनों को, छोटी-बड़ी बातों में राय देते रहते थे। उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था। स्वमान में रहकर सबको सम्मान देते थे। उनकी भावना रहती थी कि कोई भी कार्य परफेक्ट (दोषरहित, सम्पूर्ण) होना चाहिए। उनको एकदम पता लग जाता था कि क्या कमी है और उसको कैसे ठीक किया जाये। उनमें नम्रता के साथ-साथ अथॉरिटी भी बहुत थी- ज्ञान की अथॉरिटी, बाबा के प्रेम की अथॉरिटी। वे नम्रता और स्वमान का सदा बैलेन्स रखते थे। बहुत सालों तक मैंने देहली में उनके साथ सेवा की। वे सदा उमंग-उत्साह में रहते थे। उनका सोचना बहुत विशाल होता था। वे सदा कहते थे कि जो मैं करूंगा, उसे देखकर और भी करेंगे इसलिए मुझे जो करना है, सही करना है, परफेक्ट करना है। उनकी जितनी प्लानिंग बुद्धि थी, उतनी प्लेन बुद्धि भी थी। इसलिए जगदीश भाई की जितनी महिमा करें, कम है।
मैं तो यही कहूँगी कि ऐसी महान् आत्मा जो हमारे यज्ञ की फाउण्डेशन थी, उनके त्याग, तपस्या और सेवा का क्या वर्णन करें। वे त्यागी भी थे, तपस्वी भी थे और सेवा में नम्बर वन थे।

'हाँ जी' के मंत्र का पक्का साधक

यज्ञ में कभी भी, किसी भी प्रकार की सेवा की आवश्यकता होती थी, जगदीश भाई हाज़िर हो जाते थे। बाबा को, दादियों को सदा 'हां जी, हां जी' करते थे। कभी किसी भी बात पर उन्होंने 'ना' नहीं कहा। बाबा का कार्य है, करन-करावनहार बाबा है, ऐसा संकल्प उनके मन में हमेशा रहता था। मैं तो यही कहूँगी कि उन महान आत्मा, पुण्य-आत्मा, श्रेष्ठ आत्मा के त्याग और तपस्या से आज तक भी बहुत तरह के कार्य चल रहे हैं। हम सबके दिल में उनकी याद, उनके प्रति सम्मान की भावना सदा रही और अभी भी रहती है।
इतने गुण, इतनी कलायें संगमयुग में ऐसी आत्माओं में होना, यह परमात्मा की बहुत बड़ी देन है, वरदान है। उस प्रभु की देन और वरदान को,एक उपहार समझकर उन्होंने सदा सेवा में उपयोग किया। उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं था, कुछ भी कठिन नहीं था। हर कार्य को वे सहज और सरल तरीके से कर लेते थे। जगदीश भाई के प्रति हमारी स‌द्भावना, शुभकामनायें सदैव हैं। मैं मानती हूँ कि जहाँ भी इस समय वे अपना पार्ट बजा रहे हैं वहाँ भी ईश्वरीय कार्य में पूरे सहयोगी हैं।
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ज्ञान के मोतियों से भरपूर कर उमंग-उत्साह भरते थे

आफ्रीका महाद्वीप की सेवा निर्देशिका ब्रह्माकुमारी बेदान्ती दीदी जी, भ्राता जगदीश जी के बारे में अपने संस्मरण इस प्रकार बाँट रही हैं,
"मैंने सन् 1965 में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया। जब मैं पहली बार मधुबन दादी जानकी जी के साथ आयी थी, उस समय दादी जानकी जी ने मुझे जगदीश भाई का परिचय करवाया था। मैं दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर पढ़ाई पढ़ रही थी तो मेरे मन में बहुत-से प्रश्न थे। उन सब प्रश्नों की जगदीश भाई के साथ चर्चा की। जगदीश भाई ने मेरे सब प्रश्नों के उत्तर बड़े प्यार से दिये और कहा कि "वेदान्ती बहन, आपको प्रश्न तो उठते ही रहेंगे लेकिन आप बाबा की मुरली का अध्ययन करो, आपको सब प्रश्नों के उत्तर मिलते जायेंगे; बाबा के ज्ञान में निश्चय रख आगे बढ़ते रहो। कहते हैं ना विद्यार्थी जीवन स्वर्णिम जीवन है, आप भगवान के विद्यार्थीं बनो और इस जीवन को मूल्यवान बनाओ।" उनकी इन बातों से मुझे ब्रह्माकुमारी जीवन बनाने की प्रेरणा मिली।

बहनों को वे निडर और मज़बूत बनाते थे

उसके बाद, एक बार उनसे अहमदाबाद में मिली। उस समय भी उन्होंने प्रेरणा दी कि "अपने कॉलेज, यूनिवर्सिटी में जाकर अपने प्रोफेसरों को बाबा का परिचय दो, डरो नहीं।" इस प्रेरणा ने मुझे निडर बनाया, नशा चढ़ाया। सेवा के क्षेत्र में आज तक उनके बोल मेरे काम में आ रहे हैं। ठंडी के दिनों में एक बार मैं मधुबन आयी थी। कान में रुई डालकर घूम रही थी। जगदीश भाई ने देखा तो बोला, "वेदान्ती बहन, क्या कानों में रूई डाली है?" मैंने कहा, हाँ, ठंडी लग रही है, इसलिए डाली है। उन्होंने कहा, "आपको ब्रह्माकमारी बनना है तो इतना नाजूक बनने से नहीं चलेगा, शरीर को ट्रेन्ड (प्रशिक्षित) करो। इस बेहद के घर में तो आपको घड़ी घड़ी आना पड़ेगा। शरीर को आदत डालो, समझा!" इस प्रकार प्रेरणा देकर बहनों को वे मज़बूत बनाते थे और कुछ न कुछ सिखाते थे।

सेवा के लिए प्रेरणा और शक्ति भरी

सन् 1974 में मेरा आफ्रीका सेवा के लिए जाना हुआ। उस समय मधुबन में छुट्टी लेने के लिए आयी थी। तब भी जगदीश भाई ने बहुत प्यार से प्रेरणा दी कि "वेदान्ती बहन, जाओ, ज़रूर जाओ। वहां बाबा के लाल छिपे हुए हैं, उन्हों को जगाओ और वारिस बनाकर बाबा के घर मधुबन लाओ, बाबा से और परिवार से मिलाओ।" उनकी इस बात ने भी मुझे प्रेरणा दी और शक्ति भरी कि मुझे विदेश में जाकर बाबा के बच्चों को ढूंढ़कर मधुबन ले आना है।

उनकी बात पोप भी बहुत प्यार से सुन रहे थे

एक बार जगदीश भाई नैरोबी आये थे। खास पोप से मिलने का कार्यक्रम था। जब मिलने गये तो जगदीश भाई ने पोप को सृष्टिचक्र के बारे में विस्तार से समझाया। पोप भी बहुत प्यार से सुन रहे थे और हां हां कर सिर हिला रहे थे। यह देखकर मुझे भी विधि आयी कि गणमान्य व्यक्तियों को बाबा
का ज्ञान कैसे समझाना चाहिए। बाद में पोप को सृष्टिचक्र का, फ्रेम किया हुआ एक चित्र भी उपहार के रूप में भेंट किया गया। इससे भी मुझे प्रेरणा मिली कि वीआईपी को उपहार देना है तो कैसे दें, क्या दें।

उपचार करने वालों में भी वे ज्ञान-रत्नों से उमंग-उत्साह भरते थे

जब वे बीमार थे, मधुबन में उनका इलाज चल रहा था, तब मैं उनसे मिलने गयी थी। साथ में आफ्रीका की एक बहन को लेकर गयी थी, वो जगदीश भाई के उपचार में मदद कर रही थी। जगदीश भाई उससे उपचार भी ले रहे थे, साथ-साथ अपने दर्द को भूलकर प्यार से उसको ज्ञान से बहला भी रहे थे, ड्रामा के बारे में सुना रहे थे। वो अफ्रीकन बहन बहुत प्यार से ज्ञान सुन रही थी। इससे भी मुझे प्रेरणा मिली कि देखो, शरीर में इतना दर्द होते हुए भी उन्होंने सेवा करना नहीं छोड़ा। हरेक को ज्ञान के मोतियों से भरपूर करते थे और उमंग-उत्साह भरते थे।
इस प्रकार, जगदीश भाई अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को, ईश्वरीय ज्ञान से कोई-न-कोई प्रेरणा देकर, उनमें ईश्वरीय मार्ग पर आगे बढ़ने की शक्ति भरते थे।"
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जगदीश भाई सफलता के सितारे थे

काठमाण्डु, नेपाल की ईश्वरीय सेवा की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी राज दीदी जी, जगदीश भाई के बारे में अपना अनुभव इस प्रकार हमारे सम्मुख रख रही हैं-
"अपने जगदीश भाई राजऋषि, तपस्वी और त्यागी आत्मा थे। प्यारे बाबा का परिचय हमने अमृतसर में पाया, उसके बाद जैसे बाबा हमें गाइड करते थे, वैसे ही जगदीश भाई ने भी गाइड किया। इससे सहज और सरल रूप से सफलता प्राप्त हुई।

मम्मा ने वरदान दिया कि तुम्हारी विजय होगी

लगभग 10 महीने हमने वहाँ (अमृतसर में) ज्ञान सुना, उस समय हमारा लौकिक परिवार (युगल) भी साथ में ज्ञान में चला। समाज में कई लोग ऐसे भी होते हैं ना, बिगाड़ने वाले। हमारे युगल को किसी ने कह दिया कि आप भले सत्संग में जाओ लेकिन अपनी युगल को मत ले जाओ। हमें बहुत लगन थी, पूरा निश्चय था तो हम कैसे जाना बन्द कर देंगे? फिर घर में झगड़ा शुरू हो गया। उन्हीं दिनों मम्मा दिल्ली, राजौरी गार्डन में आने वाली थीं। चन्द्रमणि दादी जी ने कहा, आप लोग दिल्ली चले जाओ, मम्मा से मिलो। वे जैसे कहेंगी, वैसे कर लेना। लौकिक पति भी बड़े घर के थे, बड़ा परिवार था। रात 10 बजे के लगभग हम राजौरी गार्डन सेन्टर पहुँचे। सुबह मम्मा के क्लास में जाने से पहले चन्द्रमणि दादी जी हमें मम्मा के कमरे में ले गयीं। मम्मा कमरे में गद्दी पर बैठी हुई थीं। हम उनके सामने खड़ी हो गयी। मम्मा ने मुझे दृष्टि दी और गले लगाया। मम्मा ने कहा, बच्ची, तुम शेरनी शक्ति हो, तुम विजयी रत्न हो, तुम्हारी बिजय होगी। चन्द्रमणि दादी जी ने पहले ही हमारा किस्सा उनको सुना दिया होगा।

मम्मा ने ही कहा कि जगदीश जी से जाकर मिलो

जब ससुराल में झगड़ा शुरू हो गया तो मैं 8 महीने लौकिक मां के घर चली गयी। फिर पति बुलाने आया लेकिन मैं जाने के लिए तैयार नहीं थी तो चन्द्रमणि दादी ने कहा कि दोनों मम्मा से मिलो और उनसे मार्गदर्शन लो। वे जैसे कहें, वैसे करो। मम्मा के सामने पति ने कहा कि हम पहले की तरह इसको सत्संग में जाने देंगे, ठीक रीति रखेंगे, कोई बन्धन नहीं डालेंगे। मम्मा ने कहा, तुम शिवशक्ति हो, वापस पति के घर जाओ। विजय तुम्हारी ही होने वाली है। तुम बेफ़िकर और निर्भय होकर जाओ। जाओ सदा तुम्हारी विजय है। मुझे विश्वास नहीं आ रहा था कि ससुराल वाले मुझे बन्धन नहीं डालेंगे। आधा-पौना घंटा समझाने के बाद मम्मा ने कहा, तुम इस केस के लिए कमला नगर में जगदीश जी के पास जाओ, वो तुम्हें जैसे गाइड करें, वैसे करो

मुझे ऐसा लगा कि कुटिया में ऋषि बैठे है

सुबह नाश्ता करके चन्द्रमणि दादी और मैं कमला नगर गये। जगदीश भाई का ऊपर एक छोटा-सा कमरा था और बहुत-सी किताबों से भरा हुआ था। जगदीश भाई उसी में बैठे थे। दादी चन्द्रमणि मुझे वहां लेकर गयी। जगदीश भाई मुझे देखकर मुस्कराये। उस समय 'ओम-शान्ति' तो बोलते नहीं थे, सिर्फ दृष्टि देते थे। उनके कमरे में जाने से ही मुझे ऐसा लगा कि यह एक ऋषि की कुटिया है, कुटिया में ऋषि बैठे हैं। जैसे ऋषि ममता, माया से परे त्यागी, तपस्वी और अकेले होते हैं, ऐसा मुझे उस समय अनुभव हुआ। उसके बाद चन्द्रमणि दादी ने उनको मेरे बारे में सब सुनाया। फिर जगदीश भाई ने गाइड किया कि जाते ही क्या करना है, कैसे रहना है और जाने के बाद क्या-क्या समस्यायें, परीक्षायें आयेंगी और उनके लिए क्या करना यह भी बताया। उसी अनुसार मैंने किया जैसे पुलिस में केस करना, कोर्ट जाना आदि। उन्होंने तो कहा था कि हम इसको ठीक रखेंगे, जो चाहे वो करे लेकिन वहाँ जाने के बाद वे मुकर गये। मुझे पुलिस केस करना पड़ा, कोर्ट जाना पड़ा। बहुत कुछ हुआ। जगदीश भाई ने जैसे-जैसे कहा था, वैसे-वैसे किया। पुलिस के सामने, वकीलों के सामने, जज के सामने मेरा निडर होकर बोलना देखकर वे सब दंग रह जाते थे। मैं खुद ही हैरान होती थी कि मैंने ऐसे कैसे सारे उत्तर दे दिये। जगदीश भाई ने मेरे में इतनी शक्ति, हिम्मत और उमंग भरी कि मैं केस में विजयी हो गयी, निर्बन्धन हो गयी।

वे तीन बार नेपाल आये थे

बाद में जगदीश भाई को सारी बातें सुना दीं। उसके बाद पार्ट बदल गया, हम ईश्वरीय सेवा में चले गये। हमें बाबा ने नेपाल भेजा। वहाँ जाने के बाद जगदीश भाई हमारे से जब भी मिलते थे, जहां भी मिलते थे, बहनों की उन्नति के बारे में, सेवा के बारे में मार्गदर्शन करते रहे। वे तीन बार नेपाल आये थे। प्यार से, बहुत प्यार से ऐसा करना, वैसा करना और आप तो विजयी रत्न हैं ही ऐसे-ऐसे वरदान देकर आगे बढ़ाते रहे और हमें मार्गदर्शन करते रहे। जगदीश भाई सफलता के सितारे थे ही और हमें भी ऐसे बनाया।”

संसार में जगदीश भाई का अ‌द्भुत व्यक्तित्व था

देहली, ओम् शान्ति रिट्रीट सेन्टर की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी आशा दीदी जी, भ्राता जगदीश जी के बारे में अपने दिल के उद्‌गार इस प्रकार प्रकट कर रही हैं-
"आदरणीय जगदीश भाई यज्ञ के एक ऐसे रत्न थे, जो यज्ञ को इस स्तर पर लाने के निमित्त बने। बाबा, जगदीश भाई को सात फूट की बुद्धि वाला कहते थे, उनके प्रति बाबा का प्यार भी बहुत था। ब्रह्मा बाप की, अलौकिक पिता के नाते, जगदीश भाई में बहुत ममता थी। ब्रह्मा बाबा जगदीश भाई को स्कूटर चलाने नहीं देते थे। जगदीश भाई ने भी कभी स्कूटर नहीं चलाया, कार नहीं चलायी। वे सिटी बस में ही आना-जाना करते थे। बाबा की इस आज्ञा का उन्होंने पूर्ण रूप से पालन किया।
जब वे समर्पित हुए तब वो समय था कि दिल्ली में ब्रह्माकुमारियों को कोई मकान देने के लिए तैयार नहीं था। जगदीश भाई ने अपने नाम से मकान लिया। ब्रह्मचारी होने के कारण अपने दोस्त के माध्यम से मकान लिया। उन दिनों अकेले, अविवाहित व्यक्ति को दिल्ली में मकान नहीं मिलते थे।

लेखनी से भी समर्पित

एक दिन इनके कॉलेज की कमिटी के चेयरमैन ने कहा, इस वर्ष कॉलेज की जो सोविनियर है, उसका सम्पादकीय आप लिखो। तब तक जगदीश भाई ईश्वरीय ज्ञान के बारे में कई लेख अखबारों और पत्रिकाओं में लिख चुके थे लेकिन जब इनके कॉलेज के चेयरमैन ने लिखने के लिए कहा तो इन्होंने इनकार कर दिया। कहा, यह कलम भगवान को समर्पित हो चुकी है और अब ये कलम कोई और कार्य नहीं कर सकती। यह थी उनकी समर्पण बद्धि कि मैंने अपना जीवन बाबा को दे दिया, अब बाबा की श्रीमत के प्रतिकूल, उन्हें पूछे बिना मैं कहीं अन्य कार्य में इसे लगा नहीं सकता और उन्होंने नहीं लगाया।

वे खुद ही मेरी सूटकेस उठाकर अन्दर ले गये

सन् 1973 में जब मैं दिल्ली पाण्डव में आयी, तब ही दिल्ली पाण्डव भवन की शुरुआत हुई थी। उससे पहले मैं बेंगलूरु में रहती थी। उन दिनों इन्दौर में 'गीता रहस्य सम्मेलन' का आयोजन किया गया था। दादी-दीदी ने आदेश दिया कि तुम इन्दौर जाओ। मैं ढाई महीने के लिए इन्दौर गयी थी बेंगलूरु से। दादी और दीदी भी इन्दौर आये थे तो उन्होंने कहा, दिल्ली में पाण्णव भवन बन रहा है, वहां हमे एक इंग्लिश हैण्ड चाहिए, आप चलोगे दिल्ली? मैंने 'हाँ' कह दिया। जब मैं इन्दौर से दिल्ली आयी तब दादी कमलमणि (अब दिल्ली, कृष्णा नगर में रहती हैं) और भ्राता आत्म प्रकाश (अभी जो शान्तिवन में ज्ञानामृत प्रिंटिंग प्रेस चलाते हैं) रेलवे स्टेशन पर आये थे मुझे लेने के लिए। मुझे वो घड़ी भूलती नहीं है। जब मैं उतरी कमला नगर सेन्टर पर, सामने गेट पर जगदीश भाई स्वागत करने के लिए खड़े हुए थे और खुद ही मेरी सुटकेस उठाकर अन्दर ले गये। मेरी आयु छोटी थी लेकिन उनका विश्वास मेरे पर बहुत था।

वे बड़े दूरदर्शी थे

जगदीश भाई का व्यक्तित्व संसार का अ‌द्भुत व्यक्तित्व था। ब्रह्मा बाबा के बाद अगर किसी ने यज्ञ का विस्तार किया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लाने का कार्य किया तो वो जगदीश भाई थे। उनकी सोच जैसी सोच आज तक किसी की नहीं है, वे इतने दूरदर्शी थे। संस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्टेज पर लाना, कड़े विरोध के बावजूद, यह कोई आसान काम नहीं था। वे लेकर आये। संयुक्तराष्ट्र संघ में सदस्यता मिलना, विदेशों में इतने सेन्टर खुलना, यह हमारे जगदीश भाई की ही सोच थी।

यज्ञ कदापि उन्हें भूल नहीं सकता

साथ ही साथ उन्होंने त्यागमय जीवन जीया। उनके त्याग का वर्णन करना, मेरे लिए कठिन बात है। सन् 1973 में दिल्ली में एक बड़ा मेला हुआ। उस मेले की तैयारी के लिए वे एक कमरे में रहते थे। अगर आज मैं आपको वह स्थान दिखाऊँ तो हम में से कोई भी उस स्थान पर रहना पसन्द नहीं करेगा। वो या पाण्डव भवन के गेस्ट हाउस में सीढ़ियों के भी बना हुआ छोटा-सा स्टोर। मेले के दौरान जगदीश भाई वहाँ रहते थे। उनको हमेशा यह रहता था कि किसी से सेवा नहीं लेनी है। जो लक्ष्य रखा है, उसे दृढ़ता से सम्पन्न करना है और बाबा की याद में रहकर करना है। विआईपीज़ की सेवा का विस्तार, विंगस् की सेवायें ये सब ईश्वरीय विश्व विद्यालय को उनकी देन हैं।इन सब बातों की जड़ है ज्ञान का मनन और चिन्तन। ज्ञान का मंथन करके जगदीश भाई ने एक-एक बात को बहुत स्पष्ट किया है। लिटरेचर स्टॉल पर देख लीजिये, ज्यादातर पुस्तकें जगदीश भाई की लिखी हुई हैं। यज्ञ कदापि उन्हें भूल नहीं सकता।

हमारे घर पर जगदीश भाई आते-जाते थे

जब कभी बहनों का या जहाँ कहीं यज्ञ का विरोध हुआ तब बाबा जगदीश भाई को टेलिग्राम भेजते थे, बच्चे, फलानी जगह पर पहुंच जाओ। आज हम उस बड़े भाई बडी दादियों जो साकार रूप में हमारे सामने नहीं हैं, के त्याग और तपस्या का फल खा रहे हैं। हमें तो कोई मेहनत नहीं लगी। संगठन बनाने की, इन्वेन्शन करने की उनकी जो शक्ति थी, वो मैचलेस (किसी से भेंट नहीं) थी। मेरा सौभाग्य है कि दिल्ली आने से पहले भी मैं जगदीश भाई को अपने घर में देखा करती थी। बचपन में हम कानपुर में थे, वहाँ हमारे घर पर जगदीश भाई आते-जाते थे। तब से लेकर उनकी आँख मुझ पर थी। उन्होंने ऐसे हैंडल किया जो आज मुझे इस स्तर पर लाया। वे बाबा के ऐसे रत्न थे जिनकी बुद्धि हमेशा नवनिर्माण की ओर चलती ही रहती थी।

वे हमारे लिए आदर्श हैं, उदाहरण हैं, अनुकरणीय हैं

अभी आप ही बताइये, आज हमारी इस सभा में कोई है ऐसा? सारे यज्ञ में है कोई ऐसा? ऐसी आत्मा जो हमारे लिए उदाहरण है। जगदीश भाई का जीवन हमारे लिए आदर्श है, अनुकरणीय है। अब हमारा कर्त्तव्य बनता है बाप समान बनना। ब्रह्मा बाप के लिए हम कह देते हैं कि उन में शिव बाबा है, जगदीश भाई में तो कोई शिव बाबा नहीं था। वो बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते! हाँ, उनकी योग्यता और विशेषता अपनी थी लेकिन भगवान ने, बाबा ने हमें भी कुछ योग्यताओं और विशेषताओं से भरपूर किया है। क्या हमारे में ऐसी सच्ची लगन है? हम चल रहे हैं, रोज़ ज्ञान सुनते हैं, मुरली सुनते हैं, योग लगाते हैं लेकिन क्या सच में, दिल में ऐसी लगन है कि मुझे सम्पूर्ण बनना है? इस लगन का नाम है तपस्या।"
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वे सिर्फ लेखक नहीं, शायर और कवि भी थे

खेल प्रभाग की उपाध्यक्षा ब्रह्माकुमारी शशी दीदी जी, जो मुख्यालय आबू की अनेक मिटिंग्स और सम्मेलनों के आयोजन में भ्राता जगदीश जी की सहयोगी रही हैं, उनके साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुना रही हैं-"जगदीश भाई यज्ञ के अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में बैकबोन रहे। उन महत्वपूर्ण कार्यों को करने में दिन-रात एक किया। उनका सदैव यही पुरुषार्थ रहता था कि समय से पहले सब कार्य पूर्ण होने चाहिएँ।

हर तैयारी समय से पहले

जब भी जगदीश भाई मधुबन में आते, उस समय उनके साथ सेवा करने का मौका मुझे मिलता रहा। वे यहाँ मुख्यालय में कई वर्षों से अनेक मीटिंग्स और कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। उनके साथ कार्य करने के सुअवसर जब मुझे प्राप्त होते थे तब मुझे कई बातों की अनुभूति हुई। जब भी कोई कार्य करना होता था, उनका सदा यह लक्ष्य रहता था और मुझे बताते थे कि कार्यक्रम शुरू होने से 20 मिनट पहले सब कार्य पूरा होना चाहिए। मीटिंग का अनुभव मैं बता रही हूँ कि जब हमें 10 बजे मीटिंग आरम्भ करनी है, तो मुझे कहते थे, 9-30 बजे आप जाकर देखो, सारी तैयारी पूरी हो गयी है। मुझे कह देते थे, साथ-साथ वे स्वयं भी वहाँ पहुंच जाते थे मेरे से पहले। एक बार मेरे मन में ख्याल आया कि जगदीश भाई से पहले मुझे वहाँ पहुंचना है। पता पड़ा कि वे किसी के साथ मिल रहे हैं। मैंने सोचा चलो, आज तो मैं उनसे पहले मीटिंग के हॉल में पहुंच ही जाऊँगी क्योंकि वे किसी से मिल रहे हैं लेकिन वे समय के इतने पक्के थे कि उस दिन भी वे दुसरी साइड से निकल कर मेरे से एक मिनट पहले ही पहुंच गये। जो वे कहते थे, करके दिखाते थे। न सिर्फ करके दिखाते थे लेकिन सिखाते भी थे।
जब वे हास्पिटल में थे, सोनीपत के बारे में एक मीटिंग करनी थी। उन्होंने मुझे कहा कि आप आकर के थोड़ी सैटिंग आदि देखना। सैटिंग तो पहले ही करा चुके थे, सिर्फ नामों की लिस्ट बनानी थी। पन्द्रह लोग ही ये आने वाले, पाँच मिनट का काम था, फिर भी मैं 15 मिनट पहले गयी। इतने में मीटिंग वाले सब आ गये। परदे के अन्दर से उन्होंने सब को आते हुए देख लिया, फिर मुझे कहा कि मैं हमेशा कहता हूँ, कार्यक्रम शुरू होने से 15 मिनट पहले ही सब तैयारियाँ रहनी चाहिएँ। हर समय उन्होंने हमें सिखाया कि समय से पहले कार्यक्रम की व्यवस्था होनी चाहिए।

लेखनी की स्पीड

उनकी लेखनी की जो स्पीड थी उसको कोई पार नहीं कर सका। पहले कंप्यूटर नहीं थे, टाइप मशीन पर ही टाइप करना पड़ता था। हम टाइप करते थे, हाथ से लिखे हुए पाँच पेज टाइपिंग में एक पेज बनता था। भाई साहब की लिखने की स्पीड इतनी होती थी कि मेरे एक पेज टाइप करने से पहले वे पाँच पेज हाथ से लिखकर देते थे। उस लिखत में न शब्दों की गलती होती थी, न समझने में उलझन। इतनी एक्यूरेसी (शुद्धता) उनकी लेखनी में होती थी। उनके समीप रहते यह मुझे देखने को मिला।

हर पत्र का जवाब ज़रूर देते थे

एक बड़े भाई होने के कारण, समय प्रति समय मैं भाई साहब को लैटर लिखती रहती थी। एक बार की बात है, मैंने उनको एक लैटर लिखा कि भाई साहब, आज आप हमारे सपने में आये थे, इसलिए इस बार आप मधुबन आयेंगे तो हमारे पास आना ही होगा। भाई साहब हर पत्र का जवाब ज़रूर देते थे, चाहे वो पत्र किसी बड़े ने लिखा हो या छोटे ने। मेरे उस पत्र का जवाब भाई साहब ने बड़ी सुन्दर रीति से एक शायरी के रूप में दिया था। उस पत्र की कुछ झलकियाँ इस प्रकार ह
देहली 28-12-92
अव्यक्त बाप-दादा की लाडली,
अथक सेवाधारी, स्नेह-मूर्त शशी बहन जी,
मधुर ईश्वरीय स्मृति।
रूहे गुलाब की सुगन्धि से सुगन्धित, आफताब की रोशनी से प्रदीप्त, प्रेम तथा स्नेह से स्निग्ध आपका अलौकिक पत्र मिला। जीवन में यही यादें रह जाती है और इस सफर का सामान है भी क्या और अब तो सफर लगभग तय हो चुका है- स्थूल भी और सुक्ष्म भी। "आया परवाना और हुआ रवाना" की कहावत के अनुसार अब तो बैठें हैं तैयार जाने के लिये। खुश रहो, अपने वतन, हम तो सफर कर चले।
हां, याद आ गया। पहाड़ी पर जाना है। कौन-सी पहाड़ी? बाबा की पहाड़ी। वह रही, वह, देखो न वह रही। उसकी ओर तो चल ही रहे हैं परन्तु आप जो कह रही हैं, उस पर भी चलेंगे अगर ड्रामा में होगा। हमारी आजमाइश और आपकी फ़रमायश, ड्रामा ने चाहा तो पूरी हो जावेगी।
आपने इतना स्नेह से लिखा। चलो स्वप्न में भी इस आत्मा के प्रति आपका ध्यान तो गया। उसके लिये कोटि-कोटि धन्यवाद।
सभी मधुबन-निवासियों को और सर्विस-साथियों को सस्नेह याद।
शिव बाबा की याद में,
भ्रातृस्नेह में,
ब्रह्माकुमार जगदीशचन्द्र
कई बार बहनों की क्लास में, दादियों की सभा में इस तरह कविता के रूप में, शायरी के रूप में सुनाकर, गाकर भी सबको खुश करते थे। उनका हमेशा यही लक्ष्य रहता था कि बाबा का हर बच्चा सदैव उमंग-उत्साह में रहे।

बड़ों के प्रति अथाह सम्मान

दादियों के प्रति भ्राता जगदीश चन्द्र जी को बहुत स्नेह और रिस्पेक्ट था। सदा उनके त्याग और तपस्या का वर्णन करते रहते थे। वे कहा करते थे, जो त्याग, तपस्या इन दादियों ने की है, वो हम सबके लिए आदर्श है। इन आदर्शों को हमें अपने सामने रखना चाहिए, अपने जीवन में धारण करना चाहिए। जितना स्नेह और रिस्पेक्ट उनका दादियों से था, उतना ही दादियों का भी उनके प्रति था।
एक बार क्लास कराते समय भ्राता जगदीश जी ने दादियों के प्रति अपने मन के उद्‌गार इस प्रकार प्रकट कियेः
ये जो पुरानी बहनें हैं, ये बहुत पवित्र हैं, इसलिए उनमें कुदरती प्यार है ही। ये रहमदिल हैं, हरेक के प्रति इनकी बहुत शुभ-भावना है। जब मैं आया था, मैं तो कुछ भी नहीं था। इन्होंने ही पालना दी। इन्होंने ही मुझे आगे बढ़ाया, मार्गदर्शन किया। स्वाभाविक है, इनके उगाये हुए फूल हैं हम, तो ये हमारी रखवाली तो करेंगे, स्नेह तो देंगे। ऐसा हमारा जीवन प्यार का मम्मा, बाबा और बड़े भाई-बहनों के साथ व्यतीत हुआ।"
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छोटी-छोटी कन्याओं का भाई साहब बहुत ध्यान रखते थे

जैसे साकार बाबा छोटी-छोटी कन्याओं का बहुत ध्यान देते थे, उनके उज्वल भविष्य के लिए उनको ईश्वरीय सेवा में लगाना चाहते थे वैसे ही भ्राता जगदीश जी भी छोटी-छोटी कन्याओं को मायावी आकर्षणों से मुक्त कर, ईश्वर के आकर्षण और संरक्षण में रहने लायक बनाते थे। उनको ईश्वरीय साधना और सेवा में आगे बढ़ाते थे और उनमें आध्यात्मिक शक्ति भर देते थे। उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने जीवन को ईश्वरीय सेवा में समर्पित करने वाली कुछ शिक्षिका बहनों के अनुभवों को यहां प्रस्तुत किया है।
दिल्ली, शक्ति नगर की कन्या ब्रह्माकुमारी पूनम बहन, भाई साहब के साथ की अपनी यादें इस प्रकार बता रही हैं-
"मुझे सन् 1986 में ज्ञान मिला और 1988 से मैंने शक्ति नगर सेवाकेन्द्र पर रहना शुरू किया। इस पथ पर चलने में मुझे लौकिक भाई का बहुत सहयोग रहा।

भाई साहब को कन्याओं के प्रति बहुत ही स्नेह था

जब मैं घर पर रहती थी तब सुना करती थी कि जगदीश भाई साहब सारा दिन लिखते रहते हैं। जब हम क्लास में आते थे तब एक भाई को देखते थे जो सारा समय मुरली लिखता रहता था। मैंने समझा, यही जगदीश भाई साहब है। मैं उनसे मिली तो नहीं थी इसलिए पता नहीं था कि वे कैसे हैं देखने में। एक दिन क्लास के बाद में ऊपर जा रही थी दीदी से मिलने। दीदी और भाई साहब ऊपर के विजिटिंग रूम में बातें कर रहे थे। दीदी ने भाई साहब को मेरा परिचय दिया कि यह राकेश भाई की बहन है। मेरे बड़े भाई, राकेश भाई बहुत रेग्यूलर थे क्लास में। भाई साहब को कन्याओं के प्रति बहुत ही स्नेह था। बाबा कहते है ना, कन्याओं को मैं अपने दिल की डिब्बी में रखता हूं ताकि किसी की नज़र न लगे। समझ लो कि जगदीश भाई साहब भी ऐसे ही थे। उनकी सदैव यही कोशिश रहती थी कि कोई भी कन्या एक बार बाबा की बन गयी तो फिर कभी भी पीछे मुड़कर न देखे। वे उनको इतना प्यार देते थे।

भाई साहब की पालना और प्यार ने ही लौकिक घर भुला दिया

मैं जब सेन्टर पर आयी तब मेरा यह लक्ष्य नहीं था कि सदाकाल सेन्टर पर रहूँ और समर्पित होकर ईश्वरीय सेवा करूँ। एक बार बहनें मधुबन चली गयी थीं, सेन्टर पर 1-2 बहनें ही थीं तो मेरे बड़े भाई (राकेश भाई)ने कहा कि कुछ दिन सेन्टर पर रहो दीदी के सहयोग के लिए। मुझे अच्छा लगा सेन्टर पर रहना, बाबा की सेवा में सहयोगी बनना। बाबा के कार्य में ज़रूरत के समय पर सहयोग देने में बहुत खुशी मिलती है और बाबा से शक्ति भी मिलती है। कुछ दिनों बाद बहनें आयीं और मेरी लौकिक परीक्षा भी थी। अतः लगभग 10 दिन सेन्टर पर रहकर मैं घर चली गयी। चक्रधारी दीदी जी ने कहा कि तुमको तो वापस यहीं आना है। मेरे को नहीं लगा कि मेरा दिल सेन्टर पर लगा है और समर्पित होना है। किसी भी बात में मैं ज़्यादा बुद्धि नहीं लगाती थी, जो कहा, जितना कहा उतना कर देती थी। यह बात मैं यहाँ इसीलिए बता रही हूं कि समर्पित होकर सेन्टर पर रहने के लिए और ईश्वरीय जीवन में आगे बढ़ने के लिए भाई साहब की पालना ही मूल कारण बनी। हम जो एक ही ग्रुप की समर्पित कन्यायें हैं, उनमें से किसी से भी आप पूछेंगे कि आप कैसे समर्पित हुई? सबका यही उत्तर होगा कि भाई साहब की पालना के कारण। भाई साहब तो थे ही बाप जैसी पालना देने वाले लेकिन साथ-साथ माँ की पालना भी हमें उन्होंने दी। हमारा घर सेन्टर के पास ही था, घर से मुझे बहुत प्यार था। घर वाले भी रोज़ सेन्टर पर आते थे। मुझे कभी-कभी ऐसा संकल्प आता था कि उनके साथ घर चली जाऊँ। बाद में भाई साहब की पालना और प्यार ने ही लौकिक घर भुला दिया। उनकी विशेषता थी, हरेक को एक पर्सनल टच (व्यक्तिगत स्पन्दन) देना। ऐसा नहीं कि यह बहन समर्पित हुई है, इसको आवश्यक चीजें दे देना और सेवा दे देना, बस। नहीं, ऐसा नहीं। भाई साहब का विचार होता था कि हर समर्पित बहन को यह आभास होना चाहिए कि यहाँ मेरी आवश्यकता है और यहां मेरा महत्व है, यहाँ मेरी अपनी विशेष पहचान है।

हर कन्या पर्सनली यही फील करती थी कि भाई साहब मेरे से सब से ज़्यादा प्यार करते हैं

अगर कोई बहन भाई साहब के पास मिलने जाती थी,वे कहते आओ बैठो, क्या समाचार है, कैसे आना हुआ? बहन कहती थी, भाई साहब, घर जाना है। भाई साहब पूछते थे, कब जाना है? बारह बजे। फिर पुछते थे कि कब वापस आना है? हम कहते थे, रात को आउंगी। भाई साहब कहते थे, नहीं-नहीं, चार बजे तक आपको आना है। आप आकर मुझे चाय बनाकर दोगी तब ही मैं चाय पीऊँगा, नहीं तो नहीं। इससे उस बहन को लगता था कि भाई साहब को मुझे चाय बना कर देनी है, मुझे चार बजे से पहले सेन्टर पर आना है। हर कन्या पर्सनली यही फील करती थी कि भाई साहब मेरे से सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं। वे करते थे सबको लेकिन अनुभव होता था कि भाई साहब सब से ज़्यादा मुझे ही प्यार करते हैं क्योंकि वे हम बहनों को महत्व देते थे, अनुभव कराते थे।

वे शिक्षक के रूप में सिखाने का और माँ के रूप में पालना देने का पार्ट बजाते थे

उनमें लव और लॉ का एक अनोखा सन्तुलन था। अगर किसी से कोई गलती होती थी तो भाई साहब उससे पत्र लिखवाते थे बाबा के नाम पर। अगर कोई नहीं लिखते थे तो उसको उस गलती की महसूसता कराते थे और क्षमापत्र लिखवाते थे। उसको रियलाइज करवाते थे कि अगर आप अपनी गलती बाबा को लिखकर देंगे, तो वो आपके मन से चली जायेगी नहीं तो आपके अन्दर इतनी गहराई में उतर जायेगी कि समय आने वा आपको धोखा देगी इसलिए आप अपनी गलती का अहसास करके बाबा को लिखकर दो। इस प्रकार, वे एक-एक बहन पर इतनी मेहनत करते कि उसके पुराने संस्कार मिट जायें। बहनों से उनका प्यार इतना था कि हरेक की आध्यात्मिक उन्नति के लिए वे बहुत प्रयास करते थे लेकिन जब कोई मूड ऑफ करके, भूखे सो गयी तो भाई साहब खुद दूध का गिलास ले जाकर उसको उठाकर, उसका मूड ठीक कर, हँसा कर, दूध पिलाकर आते थे। इस प्रकार, वे शिक्षक के रूप में सिखाने का और माँ के रूप में पालना देने का भी पार्ट बजाते थे।

कन्याओं से छोड़ो, माताओं से भी पर्सनल सेवा नहीं ली

सबकी कमी-कमज़ोरियों को जानते हुए भी वे कभी दूसरों के सामने बताते नहीं थे। सम्बन्धित व्यक्ति को बुलाकर उसी को ही सुनाते थे और ठीक करने के लिए युक्ति बताते थे। भाई साहब सिर्फ बहनों से ही नहीं, माताओं से भी बहुत प्यार करते थे। सेन्टर पर एक भाई रहता था, वो सेन्टर की गाड़ी भी चलाता था और भाई साहब के कपड़ों की घुलाई भी करता था। सुबह कपड़ों को भिगोकर रखता था और शाम को धोता था। एक बार गाड़ी चलाने में और अन्य कार्यों में वह इतना व्यस्त हो गया कि अगले दिन सुबह तक कपड़े वैसे ही रह गये। दीदी ने सोचा, किसी माता से धुलाई करवा दें। मुरली क्लास पूरी होने के बाद दीदी ने हमारी लौकिक माता जी से कहा कि भाई साहब के कपड़े दो दिनों से भिगे रखे हैं, आप उनको धो लो। पता नहीं, यह बात भाई साहब को कैसे पता पड़ गयी! जब माता जी कपड़े धोने के लिए, ऊपर जा रही थी, उन्होंने उनको अन्दर बुलाया, उनको सन्तरे खिला कर 'ॐ शान्ति' कह कर नीचे भेज दिया। कन्याओं से छोड़ो, माताओं से भी वे पर्सनल सेवा नहीं लेते थे। भाई ही उनके कपड़े धोते थे और प्रेस करते थे।
हमने तो साकार बाबा को देखा नहीं लेकिन साकार बाबा ने जैसे दादियों को पालना दी, स्नेह दिया, जीवन पद्धति सिखायी वो सब भाई साहब ने हमें सिखायी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भाई साहब ने साकार बाबा का पूरा-पूरा अनुसरण किया।

ज़्यादातर वे अकेले में भोजन करते थे

भाई साहब भोजन को बहुत रिगार्ड और प्यार से स्वीकार करते थे। कहते थे, यह ब्रह्मा भोजन है। ऐसा भोजन और कहीं नहीं मिल सकता। कई बार वे थाली को हाथ जोड़कर भी स्वीकार करते थे। ज़्यादातर वे अकेले में भोजन करते थे। उस समय किसी से बात नहीं करते थे। दिन में ग्यारह बजे भोजन कर लेते थे। पतली वाली लस्सी पीते थे और बूंदी वाला रायता उनको पसन्द था। नाश्ता करते समय उनके पास कोई भी आये, उसे छोड़कर नाश्ता नहीं करते थे। उसी में से आधा दे देते थे या बहनों से कह कर दूसरी थाली मंगवाते थे। भाई साहब को नाश्ते में छोटे-छोटे आलू और जीरे वाले सफ़ेद चावल पसन्द थे। भाई साहब को आम और उसका शेक बहुत पसन्द था। आमों में भी चौसे आम बहुत पसन्द थे। इसके अलावा उनको साबूदाने की खिचड़ी और साबुत मूँग की खिचड़ी पसन्द थी। अगर क्लास के समय बरसात आ गयी और क्लास पूरी होने के बाद भी नहीं रुकी और क्लास में आये हुए सब सेन्टर पर अटके पड़े हैं तो भाई साहब कहते थे कि सबके लिए साबुत मूंग वाली खिचड़ी बनाओ। उनको जो चीज़ पसन्द होती थी, वही सबको खिलाते थे। मीठी चीज़ों में उनको पनीर की खीर बहुत पसन्द थी।

उनका भोजन बहुत साधारण रहता था

भाई साहब का भोजन बहुत साधारण था। यहाँ (शक्ति नगर में) वे सदैव कास्य की थाली कटोरी में खाना खाते थे। भाई साहब के जाने के बाद किसी ने उनकी थाली कटोरी ली, किसी ने उनकी घड़ी ली, किसी ने उनके चप्पल लिये, सारी पुस्तकों को ओ,आर,सी, की लाइब्ररी में दे दिया गया। कपड़े तो वे पहले ही क्लास में आने वाले भाइयों को दे चुके थे।

कहते थे, बड़ों के सामने सदैव साफ़, स्वच्छ और स्पष्ट रहना चाहिए

एक बार दादी जानकी जी आने वाली थीं तो भाई साहब ने मुझे कहा कि पनीर की खीर बनाकर ले आओ। भाई साहब ने दादी जानकी जी और अन्यों को वो खीर खिलायी और दादी जी को मेरा परिचय करवाया कि इस बहन ने खीर बनायी है। इस प्रकार, भाई साहब का यह प्रयास होता था कि बहनें बड़ों की नज़र में रहें और दादियों के नज़दीक रहें। किसी-न-किसी बहाने से बहनों को दादी के पास भेजते थे और कहते ये कि दादियों को खुलकर दिल की बातें सुनाओ। बड़ों के सामने सदैव साफ़, स्वच्छ और स्पष्ट रहना चाहिए।

कैसे बोलना है, कैसे बैठना है- ये सब हम कन्याओं को सिखाते थे

जब हम किचन में खाना बनाते थे, पीछे आकर खड़े हो जाते थे और हम कैसे खाना बना रहे हैं, देखते थे। हमें तो पता ही नहीं पड़ता था कि भाई साहब आये हुए हैं। वे ऐसे चलते थे कि उनके पाँवों की आवाज़ ही नहीं होती थी। वे हमें भी ऐसा चलना सिखाते थे। उस समय वहाँ एक अल्युमीनियम की सीढ़ी हुआ करती थी। हम छोटे तो थे ही, उस सीढ़ी पर दौड़ते-दौड़ते चढ़ते थे और दौड़ते-दौड़ते उतरते थे। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि बिना आवाज़ के इस सीढ़ी पर चढ़ कर और उतरकर दिखाओ। ऐसे प्यार से, बातों-बातों में, कैसे चलना है, कैसे बोलना है, कैसे बैठना है, ये सब हम कन्याओं को सिखाते थे।

हरेक कन्या की विशेषता देख, उसके अनुसार उसे आगे बढ़ाने की कोशिश की

मुझे पेंटिंग का शौक था। पता नहीं उनको कैसे पता पड़ गया, उन्होंने रशिया से कलर मंगाये और बाज़ार से कैनवास। मेरे से कहा, आप पेंटिंग करो। उनका लक्ष्य होता था कि किसी भी तरीके से इन कन्याओं को बाबा की सेवा में लगाना है। फिर कहते थे कि सतयुग कैसा होगा, वहां के महल कैसे होंगे, इनके बारे में पेंटिंग बनाओ। वे चाहते थे कि किसी भी तरह से इनका ध्यान लौकिकता से हटकर आध्यात्मिकता में लग जाये। जब रशिया की सेवा शुरू हुई तब भाई साहब हर बहन को कहते थे कि जाओ रशियन भाषा सीखो, जाओ अंग्रेज़ी सीखो। कहते थे, कमरे में सिर्फ चारपाई रखो, रात में उस पर सोओ और दिन में उसको वहां से हटाओ, सारा दिन स्टडी करो, पढ़ो और लिखो। संगम का समय व्यर्थ नहीं गँवाओ। वे यह भी कहते थे, हरेक बहन एक-एक विंग में सेवा करे, सेवा में अपने आपको व्यस्त रखे। भाई साहब ने हरेक कन्या की विशेषता देखी और उसके अनुसार उस कन्या को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
उनकी यह विशेषता थी कि कैसा भी व्यक्ति हो, कितना ही टेढ़ा हो, प्यार से बता कर, समझा कर उससे सेवा ले लेते थे। वे कहते थे, किसी भी कारण से बाबा की सेवा नहीं रुकनी चाहिए। वे हर आत्मा को उसका महत्व महसूस कराते थे कि आपका पार्ट विशेष है, आपको यह कार्य करना है, आपके बिना और कोई करेगा ही नहीं। वे उसके हर कार्य की प्रशंसा करते थे और उमंग-उत्साह बढ़ाते थे।
प्रश्नः भाई साहब में आपने कौन-सा एक गुण देखा जो आपको बहुत विशेष लगा ?
उत्तरः भाई साहब में पालना का गुण बहुत जबर्दस्त था। यज्ञवत्सों की कमी-कमज़ोरियों को न देखकर, सबको साथ लेकर चले। यह बहुत बड़ी कला उनमें थी, यह मुझे बहुत अच्छी लगती थी। सबको अपनेपन की महसूसता कराते थे। मुझे तो भाई साहब माँ के स्वरूप में दिखायी पड़ते थे। रात्रि क्लास में भाई साहब हम सब भाई-बहनों को इतना स्नेह देते थे कि उस समय उनका माँ का रूप प्रकट होता था और हमारी आँखों में आंसू आ जाते थे। बचपन में तो मैंने भाई साहब से ही ज्यादा पालना ली, बड़े होने के बाद चक्रधारी दीदी के सम्बन्ध सम्पर्क में आयी।
प्रश्नः बाबा ने उनको कई टाइटल्स दिये हैं, क्या कभी उन्होंने आप लोगों के सामने अपने टाइटल्स के नशे को प्रदर्शित किया?
उत्तरः ऐसा कभी नहीं लेकिन शक्ति नगर में एक भाई आता था। वह थोडा टेढ़ा था। उसने कोई गलती की थी। भाई साहब उसको कह रहे थे कि तुमको ऐसा नहीं करना चाहिए था। वो मानता नहीं था तो उस दिन भाई साहब ने कहा कि तुम जानते हो, गणपति के हाथ में क्या होता है? पहली बार मैंने भाई साहब के मुख से अपने को गणपति कहते हुए सुना। सच में, भाई साहब में गणपति के सब लक्षण देखें। कहते हैं ना, गणपति के कान बड़े-बड़े, पेट बड़ा, सूंड बड़ा, आँखें छोटी-छोटी थीं। भाई साहब के पास इतने भाई-बहनें आते थे और इतनी सारी बातें सुनाते थे लेकिन उनका असर अपने पर होने नहीं देते थे, सबको अपने पेट के अन्दर समा जाते थे। हर बात को बारीकी से देखना, हरेक को अच्छी तरह परखना इत्यादि कलायें उनमें बहुत जबर्दस्त थीं।

दूसरों से काम कराने की कला उनमें बहुत अच्छी थी

सारा दिन भाई साहब से मिलने वालों की लाइन लगी रहती थी। खास तौर पर, जब बाबा की सीज़न शुरू होती थी तो विदेशी भाई-बहनें, भाई साहब से मिले बिना जाते ही नहीं थे। अगर किसी को दोपहर का 3.15 बजे का समय दिया है तो वे 3.10 पर तैयार होकर नीचे विजिटिंग रूम में बैठ जाते थे और उनके लिए चाय टोली का प्रबन्ध करवाते थे। कहते कि इतने समय पर विजिटिंग रूम में चाय टोली पहुँचनी चाहिए। मतलब उनका हर कार्य विधिवत् होता था और समय से पहले वे तैयार होकर बैठते थे। भाई साहब में कला थी दूसरों से काम कराने की। वे कार्य के लिए कहते थे तो किसी का मन ही नहीं होता था कि 'ना' कहें या भाई साहब मैं थका हूँ', ऐसा कहें। जब डेरेवाल सेन्टर बना, वहाँ नया साल मनाना था। मुझे सेवा मिली थी केक बनाने की। मैं सुबह से केक बनाने में लगी रही। भाई साहब ने उस दिन क्लास में आने वाले सब भाई-बहनों को केक खिलाया, उसके बाद सेन्टर पर रहने वाले भाई-बहनों को, उसके बाद, कार्पेन्टरी का काम करने के लिए मधुबन से कुछ भाई आये थे उनको।केक बनाते-बनाते दोपहर हो गयी, मैं थक गयी थी। फिर भाई साहब ने मुझे बुलाया और पूछा, थक गयीं होंगी? भाई साहब के पूछने के ढंग से मुझे हँसी आयी और मैंने कहा, नहीं भाई साहब, थकी नहीं, और कोई सेवा है तो बताइये। फिर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, और एक केक बना सकती है? आर्किटेक्ट को भेजनी है। 'ना' बोलने का सवाल ही नहीं था। सच में मैं बहुत थकी हुई थी लेकिन भाई साहब को देखते ही थकावट भूल गयी और मैंने और एक केक बनाकर दिया। इस प्रकार, उनमें सेवा करने की और सेवा कराने की दोनों विशेषतायें बहुत अच्छी थीं।

बहनों को चौदह घंटों की भट्टी कराते थे

यज्ञ के आदि में जैसे दादियों ने 14 साल भट्टी की वैसे बहनों को भी वे 14 घंटों की भट्ठी कराते थे। उस समय बहनों की हर बात का ध्यान रखते थे। बाबा के कमरे में भट्टी का उद्घाटन कराते थे और शाम को वहीं उसका समाप्ति समारोह भी। दोनों कार्य भाई साहब खुद करते थे। भाई साहब सबको दृष्टि देकर बिठाते थे और लास्ट में दृष्टि देकर उठाते थे।
इस भट्ठी में सारा दिन बाबा के कमरे में बैठकर शरीर से डिटैच होने का और अपने पुराने संस्कारों को चैक करने का तथा उनको मिटाने का अभ्यास कराते थे। इसके अलावा अन्तिम समय के लिए कैसे तैयार रहें, इसकी भी प्रैक्टिस कराते थे। जैसे कि अन्तिम समय खाने-पीने के लिए कुछ नहीं मिलेगा तो भट्ठी में एक खाना छोड़ने के लिए कहा जाता था। वह समय बचा तो उसमें बाबा की याद में बैठना है। ऐसे पुरुषार्थ कराते थे।

कहते थे, कभी परिस्थितियों से भागना नहीं

यदि कोई बहन या भाई परिस्थितियों से घबरा जाता और वहाँ से हटने की सोच लेता तो भाई साहब कहा करते थे कि परिस्थिति और परीक्षाओं से डरकर हार नहीं माननी चाहिए क्योंकि अगर तुम मैदान से पलायन कर भी लो और कुएँ में भी चले जाओ तो भी तुम्हारा हिसाब-किताब तुम्हें नहीं छोड़ेगा इसलिए परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए। मुझे बहुत खुशी है कि मैं 16 सालों तक भाई साहब के नज़दीक रही और उनसे पालना ली।

जब वे हँसने लगते थे तो उनकी आँखों में आँसू आते थे

भाई साहब आमतौर पर रात्रि की क्लास में बहुत हँसाते थे और खुद भी हंसते थे। वे जब हंसने लगते थे तो बहुत हंसते थे और उनकी आंखों में आंसू आते थे। उनकी हँसी देखकर सामने वाले बहुत खुश होते थे। वे बहनों का सेवाक्षेत्र में निडर भी बनाते थे। हमें कहते थे कि तुम अकेली जाओ फलाने सेन्टर पर। हम तो डरते थे कि अकेली कैसे जायें। जाते थे डर - डर के लेकिन भाई साहब पहले ही उस सेन्टर के किसी-न-किसी भाई को बोलकर रखते थे कि फलाने समय पर, फलानी बहन आपके यहां आ रही है उसको बस स्टैण्ड या रेलवे स्टेशन पर रिसीव करना। हमें निर्भय भी बनाते थे और हमारा ध्यान भी रखते थे। बीच-बीच में फोन करके हालचाल पूछते थे। अगर किसी सेन्टर पर हमारा दिल नहीं लगता तो फिर कुछ दिनों के लिए शक्ति नगर बुलाते थे और कुछ सुना-समझा कर दूसरे सेन्टर पर भेजते थे। हम नये-नये होने के कारण हमें पक्का करके ही छोड़ते थे। वे हमें कहा करते थे, आप किसी भी सेन्टर पर जाओ लेकिन वहाँ अपनी विशेषताओं की छाप छोड़के आना, अपना पार्ट ऐसा बजाओ कि वहाँ के लोग आपको याद करते रहें।

सेन्टर पर जो नयी कन्या आती, वही उनको मुरली सुनाती थी

जो बहन सुबह चार बजे भाई साहब को चाय देने जाती थी, वो ही उनको मुरली सुनाती थी। भाई साहब अमृतवेले ही मुरली सुन लेते थे। उसके बाद सुबह 7,30 बजे नाश्ता करते थे। सुबह दो बजे वे उठते थे और उठते ही लिखना शुरू करते थे। दोपहर में भाई साहब लुंगी पहनते ये खासकर गरमी के दिनों में। रात का खाना 7,30 बजे खाते थे। दिन का भोजन 11,00 बजे के लगभग करते थे और उसके बाद एक घंटा रेस्ट करके उठते थे तो सारा दिन जागे रहते थे। उनका सोना बहुत कम था। फिर रात्रि क्लास 10 बजे पूरी होती थी। रात्रि क्लास में सब बहनें पेन-कॉपी लेकर आती थीं और सेन्टर पर जो नयी-नयी कन्या आयी होती थी वही उस क्लास में मुरली सुनाती थी। बीच-बीच में भाई साहब ही प्रश्न पूछते थे कि इसका मतलब क्या है, उसका मतलब क्या है। कई बार उसी प्रश्न पर ही भाई साहब की क्लास होती थी।"
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शक्ति नगर की ही और एक कन्या ब्रह्माकुमारी लवली बहन, भाई साहब ने कैसे उसका मार्गदर्शन किया, उस अनुभव को इस तरह व्यक्त कर रही हैं-
"बचपन में ही मुझे ज्ञान मिला लेकिन अंगुली पकड़ कर साथ ले चलने में बड़ी बहनों के साथ-साथ जगदीश भाई साहब का साथ और हाथ बहुत मिला। यज्ञ में भाई साहब का बहुत बड़ा पार्ट और स्थान था, यह मैं जानती थी। उनको मैं दूर से देखती थी। जब 10वीं क्लास पूरी की तो छुट्टियों में सेन्टर पर आना, सेवा करना, यह शुरू हो गया। भाई साहब ऊपर से हमें देखा करते थे। हम 4-5 बच्चे इकट्ठे आते थे और कोई-न-कोई कर्मणा सेवा कर लेते थे। भाई साहब का ध्यान हमारे ऊपर रहता था। उन छुट्टियों के दौरान एक-दो बार भाई साहब से 'ॐ-शान्ति' हुई और परिचय भी हुआ। उन्होंने मेरे से पूछा कि क्या करती हो, क्या पढ़ती हो, आपका लक्ष्य क्या है आदि-आदि।

युक्ति से भाई साहब ने मुझे कोर्स कराया

हमारी लौकिक माता जी बन्धन में थी। मुझे कहती थी कि तुम सेन्टर पर जाकर बहनों को सेवा में सहयोग दोगी तो तुम्हारे बन्धन कट जायेंगे। वे कहती थीं कि विशेष स्थूल सेवा करोगी तो जल्दी कटेंगे। माता जी छुट्टियों में सेन्टर पर भेजती थी सेवा करने के लिए। एक बार भाई साहब ऊपर से देख रहे थे कि ये बच्चे कपड़े लेकर इधर-उधर घूम रहे हैं, कपड़े से कुछ पोछ रहे हैं। थोड़े समय के बाद उन्होंने हम बच्चों से पूछा कि आप लोग क्या कर रहे हो? हमने कहा कि इस समय तो मुरली पढ़ रहे है। दोपहर का समय था बहने सब व्यस्त थीं। फिर उन्होंने पूछा कि आप लोगों ने कोर्स किया है? मैंने कहा, नहीं, बचपन से ही मम्मी घर में मुरली सुनाती हैं। जब छुट्टियां पड़ती हैं तो यहां आकर सेवा भी करती हूं और मुरली भी पढ़ती हूं। मैंने एक-एक पाठ का कोर्स नहीं किया है। मम्मी ही कभी-कभी एक-एक चित्र पर सुनाती हैं, बस। भाई साहब ने कहा, ठीक है, आप मुरली पढ़ते हो, अच्छी बात है लेकिन दूसरों को समझाने के लिए आप यह कोर्स करो। भाई साहब ने कहा और हमने मान लिया। हम बड़े भाग्यशाली हैं कि वहाँ की सब बड़ी दीदियों से हमने कोर्स लिया। उस समय वहां 10 दीदियां थीं। सभी दीदियों ने मुझे एक-एक पाठ समझाया। जैसे चक्रधारी दीदी, सुधा दीदी, रानी दीदी आदि। उस समय हमें कोर्स उतना खास नहीं लगा लेकिन जब मैं मुरली पढ़ती थी तब मुरली समझने में और उसकी गहराई में जाने में बहुत मदद मिली।

भाई साहब हम कन्याओं की हर बात की जानकारी लेते थे

जब मेरी 12वीं की पढ़ाई पूरी हो गयी और छुट्टियाँ पड़ीं तो मैंने सेन्टर जाना शुरू किया। मैं जब भी सेन्टर आती थी तो मीटिंग रूम में चक्रधारी दीदी से मिलकर फिर ऊपर जाती थी। उस दिन जब मैं मीटिंग रूम में गयी तो भाई साहब भी बैठे थे और दीदी से बातें कर रहे थे। मैं उनसे ॐ-शान्ति कहकर ऊपर जाने लगी तो भाई साहब ने पूछा, अब क्या पढ़ रही हो? मैंने कहा, भाई साहब 12वीं पूरी हो गयी। भाई साहब ने पूछा, आगे क्या करना है? मैंने कहा, कोई टेक्निकल कोर्स करना है। आज ही आर्किटेक्ट कोर्स का एडमिशन मिला है। भाई साहब ने पूछा, आपको और कौन-कौन से कोर्स के विकल्प थे? मैंने कहा, इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रानिक्स आदि। भाई साहब ने कहा, आप इलेक्ट्रानिक्स में एडमिशन लिया होता तो अच्छा होता, सेवा में काम आता। चलो, कोई बात नहीं, ऐसा कहकर वे ऊपर अपने कमरे में चले गये। मुझे यह भी पता नहीं या कि आर्किटेक्ट में क्या होता है। मुझे तो तीन साल पढ़ना था, फिर सेवाकेन्द्र पर रहकर सेवा करनी थी। और कोई लक्ष्य तो मेरा था ही नहीं लेकिन अलौकिक जीवन में भी मुझे क्या करना है, कैसे रहना है, इसकी भी कोई स्पष्ट रूप-रेखा मेरे पास नहीं थी। राखी पर ख़ास सब कन्याओं को, बहनों को और माताओं को भाई साहब से मिलना होता था। मातायें भाई साहब के लिए राखी और ड्राइफ्रूट लेकर आती थी। टीचर्स बहनें और कन्यायें भाई साहब के लिए राखी और टोली लाती थीं। भाई साहब कन्याओं के हाथ की टोली थोड़ी खा लेते थे। राखी के दिन भाई साहब का पूरा हाथ राखियों से भर जाता था। मैं भी भाई साहब को राखी बांध कर टोली खिलाती थी।

पिता जी को शान्त कर समस्या का हल किया

पढ़ते समय 4-5 साल घर में विरोध रहा। उसमें भी पिता जी का बहुत कड़ा विरोध रहा इसलिए मैं दुविधा में थी कि क्या करूं। एक बार मेरी लौकिक माता जी मधुबन चली आयी बाबा से मिलने घर पर पिता जी को बिना बताये। माता जी एक पत्र रख कर चली आयी थी। इससे घर में बहुत हंगामा हो गया। पिता जी हम चार बच्चों- एक भाई और तीन बहनों को सेन्टर ले आये और कहा, मेरी पत्नी को तो आपने भेज दिया है, मेरा घर तो वैसे ही आप लोगों से ख़राब हो गया है, इन बच्चों को आप ही संभालो। एक तरह से वे सेन्टर पर अशान्ति फैला रहे थे। हमें आश्चर्य हुआ क्योंकि हमारे पिता जी बहुत शान्त स्वभाव के थे, हम सबको बहुत प्यार करते थे, अचानक यह कैसे हो गया। उस समय सेन्टर पर कोई कार्यक्रम चल रहा था। तब भाई साहब उठकर बाहर आये और उनके कंधे पर हाथ रखकर गंभीरता और शालीनता से उनको बाहर लेकर गये और कहा, देखिये, अभी कार्यक्रम चल रहा है। आप अभी चुप रहिये, कार्यक्रम पूरा होने के बाद आप से बात करेंगे। इस प्रकार, उनको शान्त करके समस्या का हल किया।

युक्ति से मुक्ति दिलाते थे

मेरे से बड़ी (जयन्ती) बहन 18 साल की होते ही सेन्टर पर आ गयी। पिता जी को उन्हें छुट्टी देनी ही पड़ी लेकिन मेरे लिए समस्या थी कि मैं क्या करूँ! मैं भी बड़ी बहन जैसे करूं या दोनों तरफ़ मिलकर चलु। पिता जी को भी खुश रखें और अपना अलौकिक जीवन भी आगे बढ़ाऊँ। चक्रधारी दीदी ने कहा, आप नौकरी करो और क्लास में आया-जाया करो लेकिन नौकरी करने का लक्ष्य मेरा था ही नहीं। मैं तो पूर्ण रूप से ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित होना चाहती थी। एक दिन एक बहन ने कहा कि क्यों नहीं तुम जगदीश भाई साहब से मिलती ? उनसे ही राय ले लो। उन्हीं दिनों मधुबन में धर्म सम्मेलन होने वाला था, तो चक्रधारी दीदी ने कहा कि तुमको 15 दिन के लिए मधुबन चलना है। तब तक मैंने जॉब करना शुरू कर दिया था। पन्द्रह दिन मधुबन जाने के लिए मुझे जॉब छोड़ना पड़ता। मैंने सोचा, अगर जॉब छोड़ेंगी तो दुबारा जॉब नहीं लूंगी।
उसके बाद मैंने भाई साहब के नाम से एक पत्र लिखा। उसमें ये सब लिखा कि मुझे बचपन से यही लक्ष्य है कि मैं बाबा की बनूँ और सेन्टर पर रहूँ। नौकरी करने का मेरा बिलकुल लक्ष्य नहीं है। घर में माता जी का समर्थन है लेकिन पिता जी का नहीं। अभी दीदी जी ने कहा है कि तुमको 15 दिन के लिए मधुबन चलना है सेवा के लिए। उसके लिए मुझे अभी जो नौकरी कर रही हूं वह छोड़नी पड़ेगी। इसलिए मुझे समझ में नहीं आ रहा है, आप मार्गदर्शन करें।
भाई साहब ने सन्देश भेजा कि अभी नौकरी भी मत छोड़ो और मधुबन कार्यक्रम में भी नहीं आओ। अभी ऐसे ही चलने दो, आगे चलकर देखेंगे, क्या करना है। फिर भाई साहब ने मेरा वह पत्र चक्रधारी दीदी को दिया होगा तो एक दिन दीदी ने मुझे बुलाकर कहा कि अभी हमें सेन्टर पर कन्याओं की ज़रूरत नहीं है, जब ज़रूरत पड़ेगी तब हम आपको कहेंगे, अभी आप जॉब करो और बीच-बीच में आकर सेन्टर पर सहयोग देते रहो।
कुछ दिनों बाद, भाई साहब ने मेरे से कहा, 500 लोगों के बैठने का एक हॉल बन रहा है, उसका एक नक्शा बना के दोगे? आर्किटेक्ट होने के कारण मैं कोई-न-कोई नक्शा तो बनाती ही थी, मैंने भाई साहब को हाँ कहा। मैंने सोचना शुरू किया, बाबा की प्रेरणा मिलती गयी और करती गयी। भाई साहब को प्लान दिखाती रही। भाई साहब दीदी से चर्चा करते रहे। ऐसे छह मास तक नक्शा बनाना चलता रहा कुछ-न-कुछ परिवर्तन के साथ। उसके बाद फिर एक और सेन्टर को जगह मिली, भाई साहब ने उसका नक्शा बनाने के लिए कहा। इस प्रकार, मैं नौकरी करते हुए ईश्वरीय सेवा में इस रूप में व्यस्त हो गयी। इस प्रकार मेरी लौकिक और अलौकिक सेवा चलती रही।
कुछ समय बाद, दीदी ने मुझे बुलाकर कहा कि फलाने सेन्टर पर अभी कन्याओं की ज़रूरत है। आप कुछ दिन के लिए वहाँ जाओगे क्या? अपने पिता जी से पूछो, अगर छुट्टी मिले तो चले जाना। मैंने कहा, मैं उनसे कहूँगी और छुट्टी लेकर आऊँगी। फिर मै भाई साहब के पास गयी और कहा, भाई साहब, दीदी ऐसे कहती है। मैं अपने फादर से कैसे पूछें? 'भाई साहब ने कहा, तुम यह नहीं बोलो कि मैं सेन्टर पर रहने जा रही हूँ, यह कहो कि वहां फ़लाने सेन्टर पर नक्शा बनाने की सेवा है। यहाँ रहकर करूं तो ज़्यादा समय लगेगा इसलिए वहाँ जाकर जल्दी से जल्दी काम पूरा करके आऊँगी। मैंने वैसे ही पिता जी से कहा कि फलाने स्थान पर एक सुन्दर सेन्टर बन रहा है, वहाँ का नक्शा बनाने का भाग्य मुझे मिल रहा है, आप मुझे छुट्टी दे दो। पिता जी ने छुट्टी दे दी। वहाँ सेवा करते-करते एक महीना बीत गया। फिर दीदी ने कहा, आपको यहाँ आये महीना हो गया, आपके पिता जी परेशान हो गये होंगे, आप एक बार घर होकर आओ। मैंने कहा, नहीं दीदी, उनको पता है कि यहां सेवा है, वे कुछ नहीं कहेंगे लेकिन दीदी ने कहा, नहीं, नहीं। आप एक बार कुछ दिन जाकर आओ। बाद में देखेंगे। घर आये तीन दिन ही हुए थे कि भाई साहब का फोन आया कि एक नया सेन्टर बनाना है, वहाँ का नक्शा बनाना है। अगले दिन चक्रधारी दीदी का फोन आया कि भाई साहब आपको याद कर रहे हैं, आप आ जाओ।
भाई साहब का लक्ष्य यह होता था कि जब किसी कन्या ने निर्णय ले लिया है कि मुझे सेन्टर पर ही रहना है, तो ऐसी कन्या को ज़्यादा दिन घर में नहीं रहने देना है, उसको घर के वातावरण के प्रभाव में आने नहीं देना है। उसको सदैव सेन्टर के वातावरण में ही रहना है। इसलिए वे चक्रधारी दीदी को बार-बार कहते थे कि उस कन्या को आप बुला लो, उससे जल्दी से जल्दी नक्शा बनवाना है। मैं सेन्टर पर जाने लगी तो पिता जी वहीं आँगन में खड़े थे और बोलने लगे कि मुझे पता है, तुम्हारी बहन भी चली गयी और तुम भी वहीं चली जाओगी। मैंने कहा, नहीं डैडी, ऐसा नहीं है। वहाँ नक्शा बनाने की सेवा है। सब आपको पूछते रहते हैं, आपके फादर क्या करते हैं, उनको यहां कभी बुलाओ, वे देखें तो सही कि उनकी बच्चियाँ क्या सेवा कर रही हैं, कितनी अच्छी सेवा कर रही हैं। इसलिए आपको बीच-बीच में हमें देखने के लिए आना चाहिए। वे चुप हो गये।
भाई साहब हमें कहा करते थे कि आप लोगों को अपने माता-पिता को ईश्वरीय विश्व विद्यालय से अवगत कराना चाहिए। उनकी बच्चियों जहाँ सेवा करती है, वहाँ के बारे में उनको पता होना चाहिए। लेकिन हमारे पिता जी भाई साहब से तब मिले थे जब उनके मन में संस्था के बारे में विरोध था। उस भावना से वे सेन्टर पर आये थे तो भाई साहब उनसे ऑफिशियल रूप में ही मिले थे। इसके कारण उनको भाई साहब के बारे में उतनी जानकारी नहीं हो पायी। अभी वो बाबा के रेग्यूलर स्टूडेण्ट हैं, यज्ञ से, बहनों से और बाबा से बहुत प्यार है। इस रूप में वे भाई साहब से मिल नहीं पाये। अभी वो अफ़सोस करते हैं कि मेरे मन में क्यों उस समय विरोध था। सब उनसे कहते हैं कि आपने भाई साहब को मिस किया, वे आपको बहुत याद करते थे, आपका हालचाल पूछते थे। उनको बहुत फीलिंग आती है कि मैं उनसे मिल नहीं पाया। उन्होंने हम दोनों बहनों का समर्पण समारोह भी कराया। अभी 12-13 सालों से वे बाबा के पक्के बच्चे हैं और यज्ञ के सहयोगी हैं।

भाई साहब ने मुझे सेवा करने की कई युक्तियाँ सिखायीं

भाई साहब रात्रि क्लास में या अमृतवेले की क्लास में जब ज्ञान की धारा बहाते थे तब उसको नोट कैसे करना है, कौन-सी डायरी में लिखना है, मैंने यह सब तैयारी करके रखी थी, उनकी ज्ञानधारा का एक भी बिन्दु मिस न हो, यह मेरा लक्ष्य होता था। उसके बाद भाई साहब ने मुझे बाहर आफिसर्स की सेवा कैसे करनी है, उसके लिए क्या स्थूल और सूक्ष्म तैयारियाँ होनी चाहिएँ- ये सब सिखाया। सेवा के लिए बाहर निकलते हैं तो बैग में टोली होनी चाहिए, लिट्रेचर होना चाहिए, मानसिक रूप से शक्तिशाली होकर रहना चाहिए। वे खुद टोली बनवा कर, बॉक्स में रखा कर, कौन-सा लिट्रेचर ले जाना है, वह भी तैयार करके एक बैग में रखकर हमें देते थे। अगर साथ में कोई बड़ा होता तो उसको क्या बोलना है और मुझे क्या बोलना है, यह भी बताते थे। वे कहते थे कि जिससे आप मिलने जाते हो, उसको हाथ जरूर जोड़ना, भले आप ओम् शान्ति भी कहते हो। उन्होंने सिखाया कि जब आप किसी के पास अपना काम कराने जाओ तो मन में यह भावना जरूर होनी चाहिए कि यह बाबा का बच्चा है, हमारा भाई है, इसको ज़रूर बाबा का प्रसाद मिलना चाहिए। भले ही वो हमारा काम करे या न करे हमें उसको बाबा की अंचली ज़रूर देनी है। फिर कोई भी बाबा का काम कराने के लिए उस ऑफ़िसर की पीठ करे। पीठ करते समय उनसे किस तरह मिलें, यह सब भाई साहब ने हमें सिखाया।

वे हमारी स्थिति की भी परीक्षा लेते थे

कभी-कभी सेवा-अर्थ 3-4 स्थानों पर जाना होता था तो वे हमारी स्थिति की भी परीक्षा लेते थे। वे हम से पूछते थे कि आप वहाँ कैसे जायेंगे? एक बार मैंने कहा, भाई साहब बस से भी जा सकते हैं और ऑटो से भी जा सकते हैं। भाई साहब कहते थे, ठीक है, बस में जाओ। बस भी दो-दो या तीन-तीन जगह बदली करनी पड़ती थी, फिर भी हम सेवा करने के लिए जाते थे। वापस आने के बाद फिर कहते थे कि फलानी जगह से और एक काम करवाना है, आप जा सकती हो? थके तो नहीं हो ना! हम कहते थे, नहीं भाई साहब। उस समय भाई साहब क्लास में आने वाले किसी भाई से गाड़ी मंगवाकर, गाड़ी में भेजते थे। कभी सेवा करके आने के बाद तुरन्त किसी को मुरली सुनाना या कोर्स कराना पड़ता था। भाई साहब कहते थे, बाहर जाकर सेवा करना और यहाँ सेन्टर पर मुरली सुनाना, कोर्स कराना अलग-अलग सेवायें हैं। दोनों करनी ज़रूरी हैं। बाहर जाने की सेवा अस्थाई है, उसको भी करना है और मुरली पढ़ना, कोर्स कराना आदि हमारा कर्त्तव्य है, इनको भी करना है। इस प्रकार, सेवाकेन्द्र के अन्दर और सेवाकेन्द्र के बाहर कैसे सेवा करनी चाहिए, ये सब हमें उन्होंने सिखाया।

हम छोटों को यज्ञ के बड़ों से मिलाते थे

हमें बड़ों से कैसे मिलना है, उनसे कैसे बातचीत करनी है, ये सब भाई साहब ने सिखाया। मैंने एक एलीवेशन बनाया था। उसे देखकर भाई साहब ने कहा कि इसको गुलज़ार दादी जी को दिखाओ। मैंने कहा, जी भाई साहब। उन्होंने पूछा, कैसे जाओगे? मैंने कहा, बस से जाऊँगी। ठीक है, वहाँ पहुंचने के बाद मुझे फोन करना। फिर वहाँ जाकर क्या बात करोगी? उन्होंने समझाया कि जब आप इसे दिखाओगी तब आप से वे पूछेंगे कि यह आपको कैसा लग रहा है? उस समय आप यह नहीं कहना कि मुझे अच्छा लगा रहा है। आप कहो कि दादी जी, आप बताइये, कैसा लग रहा है? मुझे आपकी राय लेनी है। अगर आप अपनी बात ही बताना शुरू करोगी तो आप उनकी राय नहीं ले पाओगी ना! इस तरह भाई साहब हर बात हमें सिखाया करते थे।

भाई साहब जो भी सेवा देते थे वो निश्चित होने वाली ही होती थी

इसके बाद मैंने सेन्टर पर ही रहना शुरू किया। हर रात्रि को भाई साहब की क्लास होती थी बहनों के लिए। हमें इन्तज़ार रहता था कि आज हमें कौन-सा खज़ाना मिलने वाला है। सेन्टर पर मुझे दो सेवायें मिली थी। एक थी, जो भी सेन्टर के भाई-बहनें मधुबन जाते हैं या मधुबन से आते हैं, तो उनके लिए फूल लेकर आना और भाई साहब के कमरे में रखना। सेन्टर के नज़दीक एक मन्दिर था, वहाँ फूल बेचने वाले बहुत होते थे, वहाँ से मुझे ले आने होते थे। जब वे बहनें या भाई, भाई साहब से मिलने आते थे तो भाई साहब उनको वो फूल देते थे।
एक बार गणेश चतुर्थीं थी। शक्ति नगर से गणेश-यात्रा निकलने वाली थी। उस दिन भाई साहब सब क्लास वालों को एक-एक फूल देकर बधाई देना चाहते थे। भाई साहब ने मेरे से कहा, मुझे 60-70 गुलाब के फूल चाहिएँ, सिस्टर क्या आप ला सकती हो? मैंने कहा, हाँ भाई साहब, ले आऊँगी। फिर कहा, सभी फूल डंडी वाले होने चाहिएँ और साबूत भी होने चाहिएँ। मैंने कहा, जी। फिर उन्होंने पूछा, एक फूल की कीमत कितनी होगी? मैंने कहा, मुझे नहीं मालूम भाई साहब। उन्होंने कहा, एक फूल एक रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए और 100 फूल ले आना। सौ फूल के लिए उन्होंने 100 रु, दिये। मैं मन्दिर के नज़दीक गयी। एक फूल वाली से मैं दाम पूछ ही रही थी कि उतने में एक व्यक्ति आकर वो पूरी टोकरी ही उठाकर ले गया। उसने बोला, यहाँ से यात्रा निकलने वाली है, में ये सब फूल ले जाऊँगा। दुसरी तरफ देखा तो उस फूल वाली के पास उतने फूल नहीं थे जितने हमें चाहिए थे। मैं सोच में पड़ गयी। मन ही मन कहा, बाबा, यह क्या हो गया! अभी मैं क्या करूं? बाबा, गणेश जी ने ही भेजा है, मैं कैसे जाऊँ? दो-तीन मिनट वहीं खड़ी रही चुपचाप। उतने में वो व्यक्ति दौड़ते-दौड़ते आया और उस महिला से कहा कि यात्रा इधर नहीं आयी, दूसरी तरफ़ से निकल गयी, ये फूल वापस ले लो। इससे फूल वाली परेशान हो गयी। उसने मेरे से कहा, आपको जितने भी चाहिएँ ले लो। फिर मैंने अच्छे-अच्छे फूल छाँट कर ले लिये।
इस घटना से मुझे यह निश्चय हुआ कि भाई साहब जो भी सेवा देते हैं वो निश्चित होने वाली है। वो कार्य पूर्वनियोजित है, हमें कोई चिन्ता करने या सोचने की दरकार नहीं। वो गणेश जी हैं, सिद्ध पुरुष हैं, उनका संकल्प सिद्ध होना ही है। बाबा के कार्य में उन्होंने कभी हार नहीं मानी। हर कार्य को सफल बनाकर ही दम लिया। हमें जो भी सेवा करने के लिए कहते थे उसके लिए दो-तीन विकल्प भी देते थे। इससे नहीं हुआ तो, ऐसे करना, इससे भी नहीं हुआ तो ऐसे करना। कैसे भी करके बाबा का कार्य सफल करना ही है, यह उनका लक्ष्य होता था।

छोटी-छोटी बातों की ट्रेनिंग भी हमें देते थे

भाई साहब बहनों की क्लास में शिष्टाचार (मैनर्स) के बारे में बहुत बताते थे। कहते थे, जब भी किसी के कमरे में जाना है तो पहले दरवाज़ा खटखटा कर जाना चाहिए। जब बड़े फोन पर बात कर रहे हैं तो वहाँ से उठकर चले जाना चाहिए। जब आप किसी को फोन करें, पहले अपना नाम और स्थान का नाम बताना चाहिए ताकि सामने वाले को मालूम पड़े कि आप कौन हैं और कहाँ से बोल रहे हैं। इस प्रकार, छोटी-छोटी बातों की ट्रेनिंग भी बहनों को दिया करते थे। परमपिता से जोड़ने वाले अलौकिक पिता अनुभव होते थे। मुझे पिता जी से बहुत स्नेह था। भाई साहब की पालना पाते-पाते लौकिक पिता का मोह खत्म हो गया और पारलौकिक पिता से गहरा सम्बन्ध हो गया।

दरवाज़ा खोलकर अन्दर देखा तो भाई साहब बाबा की याद में मग्न थे

लास्ट-लास्ट में जब भाई साहब की तबीयत ज़्यादा बिगड़ी तो वे शक्ति नगर छोड़कर डेरेवाल सेन्टर पर रहने लगे। वहाँ भी वे ऊपर ही रहते थे लेकिन वहाँ लिफ्ट थी। हम बहनें शक्ति नगर से बीच-बीच में भाई साहब से मिलने जाती थीं। कई बार मन होता था कि भाई साहब हम सबको योग करायें लेकिन सब बहनें इकट्ठी हो नहीं पाती थीं, हरेक अपनी-अपनी सेवा में व्यस्त रहती थीं। मुझे बार-बार संकल्प आता था कि भाई साहब मुझे योग करायें। एक बार उनसे मिलने गयीं और दरवाज़ा खटखटाया, कोई आवाज़ नहीं आयी। जब भी कोई दरवाज़ा खटखटाते थे तो भाई साहब पूछते थे, कौन ? या कहते थे, अन्दर आओ। मैं बहुत समय तक खड़ी रही लेकिन कुछ आवाज़ आयी नहीं तो खुद दरवाज़ा खोलकर अन्दर गयी। देखा तो भाई साहब बाबा की याद में मग्न थे। ऐसे लग रहा था कि वे बाबा से बातें करने में लीन हैं। कमरे में खुशी के प्रकम्पन फैले थे। उनकी स्थिति बहुत आनन्ददायी थी। अन्दर जाकर मैं खड़ी रही। थोडे समय के बाद भाई साहब ने इशारे से कहा, आओ, बैठो मेरे सामने। मैं बैठी और भाई साहब ने अच्छी तरह से मीठी और शक्तिशाली दृष्टि दी और मुस्कूराये। उसके दो दिन बाद ही भाई साहब मधुबन चले आये, फिर वापस दिल्ली आये नहीं।"
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अपने विद्यार्थी जीवन से ही भाई साहब से प्रभावित और जीवन के हर फैसले उनकी राय अनुसार लेने वाली ब्रह्माकुमारी लीना बहन, भुवनेश्वर, उनके साथ के अनुभव इस प्रकार बाँटती हैं-
"जगदीश भाई साहब को मैं बचपन से ही जानती थी। वे हमारे इतने नज़दीक थे कि जैसे हमारे परिवार के सदस्य ही हों। सन् 1975 में लौकिक पिता जी के साथ हम सब परिवार वाले ज्ञान में आये। सन् 1979 में हमारा पहली बार मधुबन आना हुआ, तब से हम जगदीश भाई साहब को जानते हैं। उनको देखकर मुझे ऐसा अनुभव होता था कि जीवन में अगर कोई मार्गदर्शन लेना हो तो इनके पास हम जा सकते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि उनसे मिलने में कोई झिझक नहीं होती थी, मैं तो उन से बहुत सहज रीति से मिलती थी।

छोटों को भी बहुत महत्व देते थे

उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का सुअवसर मुझे पहली बार तब मिला जब हमारे पिता जी, जो भारतीय सेना में थे, का स्थानान्तरण पंजाब के पटियाला में हुआ। हम लौकिक घर ओडिशा जा रहे थे। उन दिनों दिल्ली में रुक कर ओडिशा जाना होता था। मेरी 12वीं की परीक्षा पूरी हो गयी थी। आगे के लिए मुझे क्या करना है, इस बारे में जगदीश भाई साहब से राय लेना चाहती थी। मैंने भाई साहब को एक पत्र लिखा, भाई साहब, हम कटक जा रहे हैं, जाते समय आपसे मिलकर जायेंगे। एक छोटी-सी बच्ची ने पत्र लिखा कि हम आपसे मिलने आयेंगे और इस बात को उन्होंने इतना महत्व दिया, हमारे लिए अपना समय निकाल कर रखा, इस ने मुझे बहुत प्रभावित किया। हम से वे इतने प्यार से मिले जैसे वी.आई.पी. से मिलते हैं। मेरी छोटी-छोटी बातें उन्होंने बहुत प्यार से सुनी और मुझे मार्गदर्शन दिया।

आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बहुत अच्छी तरह मार्गदर्शन किया

सन् 1986 में मैंने ग्रैजुएशन (स्नातक) पूरा किया, उसके बाद पास्ट ग्रैजुएशन (स्नातकोत्तर) भी पूरा किया। आगे क्या करना है, उसके बारे में निर्णय लेने के लिए फिर मेरा भाई साहब से एक-दो बार व्यक्तिगत रूप में मिलना हुआ। मुझे और आगे पढ़ने की इच्छा थी, पी.एच.डी. करना चाहती थी। बचपन से ही मेरा लक्ष्य था कि ब्रह्माकुमारी बनना है, समर्पित जीवन जीना है लेकिन पढ़ने की बहुत उत्सुकता थी। इस विषय में मैं भाई साहब से जब मिली तो उन्होंने बहुत अच्छी तरह मार्गदर्शन किया कि किस विषय पर पी.एच.डी. करनी है, किस यूनिवर्सिटी में करनी है, किस से गाइडेन्स लेनी है, सब बातें बतायी। उन दिनों मैनेजमेंट (प्रबन्धन) के बारे में बहुत लहर चल रही थी दुनिया में। तो भाई साहब ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज मैनेजमेंट कैसा है, इसके बारे में आप रिसर्च करो। ब्रह्माकुमारीज़ का बहुत सुन्दर और श्रेष्ठ मैनेजमेन्ट है। आप रिसर्च द्वारा दुनिया को यह बताओ कि यह मैनेजमेन्ट कितना श्रेष्ठ है। भाई साहब ने मेरे गाइड के लिए भी सोच रखा था परन्तु उन दिनों पिता जी का स्थानान्तरण (ट्रान्सफर) जम्मू हो गया तो माता जी ने गाँव जाना चाहा, इसके कारण हमें भी ओडिशा जाना पड़ा तो पी.एच.डी. कर नहीं पायी। एम.कॉम. पास किये हुए होने के कारण भ्राता रमेश शाह जी ने कहा, आप मुंबई अकांउण्ट डिपार्टमेंट में आओ और सी.ए. करो। यज्ञ की सेवा अर्थ मैंने सी.ए. किया और अकॉउण्ट डिपार्टमेंट में सेवा करने लगी।
भाई साहब के बहुत नज़दीक रहने का एक और मौका मिला जब वे हमारे गाँव आये थे। हमारा गाँव ओडिशा के एक दूरवर्ती इलाके में है, नदी के किनारे और समुद्र के पास। वहाँ एक मठ है, उसमें एक साधु बाबा रहते हैं। उन्होंने उस गाँव में एक राष्ट्रीय सम्मेलन किया था। भाई साहब उस कार्यक्रम में आये थे तो उनके रहने की, खाने-पीने की व्यवस्था हमारे घर में ही की गयी थी। इस मौके का हमने खूब लाभ उठाया। हमारा मकान भी नया बना था तो उस मकान का तथा गीता-पाठशाला का उद्‌घाटन भाई साहब से करवाया।

हरेक को वे अपनेपन का स्पर्श देते थे

मैंने देखा कि भाई साहब हरेक को अपनेपन की टचिंग (स्पर्श) देते थे। जो भी उनके सम्पर्क में गया उसको यह आभास होता था कि भाई साहब मेरे अपने हैं। वे बच्चों के साथ बच्चे बनकर व्यवहार करते थे, बूढ़ों के साथ बूढ़े बनकर। गांव में आये तो गाँव वालों जैसे बनकर व्यवहार करते थे। हमारे घर में कटहल का पेड़ था। बहुत कटहल लगे हुए थे। उन्होंने कहा कि इससे पहले मैंने कभी कटहल का पेड़ और उसके फल देखे ही नहीं। कटहल, नारियल और ताड़ के पेड़ों को देखकर इतने खुश हुए कि उनकी बहुत तारीफ की। मकान की छत पर से नदी दिखायी पड़ती थी। उन्होंने उस चीज़ की भी बहुत प्रशंसा की। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने बड़े भाई साहब, एक छोटे से गाँव में सेवा अर्थ आये और हमारे छोटे-से घर में रहे और वहां की हर वस्तु की प्रशंसा की और हमारे में उमंग-उत्साह भरा।

हस्त-स्पर्श से ही सामने वाले में ऊर्जा की प्रवेशता

मेरा एक छोटा भाई है, उस समय वो कॉलेज में पढ़ता था। दोस्तों के संगदोष में आया था। फिल्मी हीरो बनने के लिए मुंबई चला गया था। वहां से असफल होकर आया था तो उसके मन में थोड़ा-सा मानसिक तनाव था। ज्ञान के प्रति उसकी रुचि बिलकुल कम हो गयी थी। भाई साहब से मिलने के बाद उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आ गया। मम्मी-पापा ने भाई साहब से कहा कि यह संगदोष में आकर ज्ञान-योग नहीं करता है और जल्दी दोस्त बना लेता है इत्यादि इत्यादि। तो भाई साहब ने कहा, अच्छा, ऐसा है? तो मैं उससे पर्सनली मिलना चाहता हूँ। भाई साहब, भाई को छत पर ले गये और कहा, देखो, आप कितने गुणवान हो ! कितने अच्छे हो! आपके इतने सारे दोस्त हैं, मेरा आज तक एक भी दोस्त नहीं है। क्या आप मेरे दोस्त बनोगे? ऐसे कहकर उन्होंने उससे हाथ मिलाया तो जैसे कि उस आत्मा में शक्ति भर गयी। उसने बहुत रोया, बहुत पश्चाताप किया। उसके बाद उसका जीवन बदल गया। अभी वो यज्ञ में पूर्ण रूप से समर्पित होकर सेवा कर रहा है। भाई साहब ने हमारे घर आकर, हमारे पूरे परिवार में एक सकारात्मक एवं श्रेष्ठ ऊर्जा (एनर्जी) भर दी और हमें अनुभव कराया कि हम यज्ञ में कितने मूल्यवान हैं!

सदैव बहनों को आगे रखने का भाव

मैं सन् 1991-92 में यज्ञ में अकाउण्ट डिपार्टमेंट में आयी तब से मधुबन में भाई साहब से कई बार मिलने के अवसर मिले। उन दिनों रोज़ कोई-न-कोई बात पूछने के लिए मुझे बार-बार ईशू दादी के पास जाना पड़ता था। एक दिन मैं ईशू दादी से मिलने उनके ऑफिस में गयी तो वहां बड़ी दादी, चन्द्रमणि दादी, ईशू दादी और जगदीश भाई बैठे थे। बड़ी दादी और चन्द्रमणि दादी पलंग पर बैठी थीं, ईशू दादी अपनी कुर्सी पर और जगदीश भाई एक स्टूल पर दादियों के सामने बैठे थे। यज्ञ की किसी बात की चर्चा के लिए दादी जी जगदीश भाई को वहाँ बुलाती थीं। उस दिन जब मैं वहां गयी तो इन सबको देखकर बाहर ही रुक गयी। सोच रही थी कि अन्दर जाऊँ या नहीं? उतने में दादी जी ने देखा तो मुझे अन्दर बुलाया। उन दिनों बाहर की दुनिया में अयोध्या में राम मन्दिर बनाने की बात चल रही थी। इस विषय पर हमारा चिन्तन क्या रहना चाहिए- भाई साहब इसके बारे में बात कर रहे थे। जब मैं अन्दर गयी तो भाई साहब ने कहा, दादी, अब यज्ञ में पढ़ी-लिखी अच्छी-अच्छी बहने आ गयी है, अब ये सब लिखने का काम उनको करना चाहिए। लौकिक गवर्नमेंट 60 साल में व्यक्ति को सेवा से निवृत्त करती है, अभी मैं 66 वर्ष का हो गया हूं, आपको मुझे सेवा से निवृत्त कर देना चाहिए। यह कहने का उनका तात्पर्य था कि अभी बहनों को सब कारोबार संभालना चाहिए, उनको आगे बढ़ना चाहिए।

वायदे के पक्के और समय के कदरदार

उन दिनों अकॉउण्ट डिपार्टमेंन्ट में हम चार बहने रहती थी। उस दिन उनमें से किसी एक बहन का जन्मदिन था। हमने सोचा कि आज एक छोटी-सी पार्टी रखें और केक काटें। बात चली कि किनको किनको बुलायें। जब मधुबन में ही मना रहे हैं तो सब दादियों को और वरिष्ठ भाइयों को बुला लें। सब से पहले जगदीश भाई साहब को निमन्त्रण देने गये। हमें निमन्त्रण देने की इतनी ख़ुशी थी कि कार्यक्रम का समय ही फिक्स नहीं किया था। हमने भाई साहब से कहा, भाई साहब, आज फलानी बहन का जन्मदिन है, आपको आना है। भाई साहब ने पूछा, कितने बजे आऊं हम एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। आखिर किसी ने बताया कि शाम 6.30 बजे। भाई साहब ने कहा, ठीक है, मैं आ जाऊंगा। सारे अकाउण्ट ऑफिस को सजाना था। हम सब आफिस में तैयारियां करने में व्यस्त हो सये, तैयारी पूरी होते-होते 7.30 बज गये। हमने देखा, भाई साहब आये नहीं, 8.45 हो गये, फिर भी वे आये नहीं। हम इधर-उधर देख रहे थे तो वहां टेबल पर एक स्लिप मिली, उसमें लिखा हुआ था कि "मैं 6.30 बजे आ गया हूं, कार्यक्रम शुरू होने में अभी समय लगेगा, मैं जा रहा हूं, जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाइयाँ हो।" वे शायद ठीक 6.30 बजे ही आ गये थे लेकिन हम तैयारी में इतने व्यस्त थे कि हमें पता ही नहीं पड़ा कि वे आये हुए हैं। हमें इतनी शर्म आयी कि भाई साहब से सॉरी कहने के लिए भी कैसे जायें? हमें पता था कि भाई साहब भोजन करते समय किसी से बात नहीं करते, मौन में रहकर करते हैं। हमने सोचा यही सही समय है उनसे सॉरी कहने का। अगले दिन जब भाई साहब भोजन कर रहे थे, तब हमने वहाँ जाकर उनसे सॉरी कही। उन्होंने देखा और मुस्कराये, कुछ नहीं कहा।
उसके बाद हम सब बहनें मिलकर उनके कमरे में गये। उस समय उन्होंने अपने जीवन के कई अनुभव सुनाये कि समय का पालन करने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, फिर भी मैं अपने इस उसूल के साथ कभी समझौता नहीं करूंगा। हम सब बाबा के बच्चों को समय का बहुत कदर रहना चाहिए, यह हमारी पहचान है। इस से भी हमें सीख मिली कि वे कितने महान आत्मा हैं कि कठिनाइयाँ आते हुए भी समय पर चलने की विशेषता को छोड़ा नहीं। उन्होंने हमेशा बहनों को बहुत ऊंची दृष्टि से ही देखा। उम्र में हमारे से बहुत बड़े होने के बावजूद भी वे हमें एक महान आत्मा के रूप में देखते थे।

दादा जी बनकर बच्चों को कहानियाँ सुनायीं

एक बार की बात है, ज्ञान सरोवर में सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहा था। मधुबन में, सब भाई-बहनें वहाँ जाने के लिए फटाफट खाना खाकर थालिया रखकर भाग रहे थे। हम भी खाना खाकर जाने के मूड में थे और डायनिंग हॉल से बाहर आये। आँगन में देखा तो जगदीश भाई साहब बैठे हुए थे। मैंने पूछा, भाई साहब, आप ज्ञान सरोवर नहीं जायेंगे? उन्होंने कहा, सब जा रहे हैं तो मैं यहाँ घर पर रहूंगा। हमने पूछा, भाई साहब, हम भी आपके साथ बैठ सकते हैं? भाई साहब ने कहा, बहुत अच्छी बात है लेकिन आपका कल्चरल प्रोग्राम मिस हो जायेगा। हमने कहा, कोई बात नहीं, हम आपके साथ बैठेंगे। फिर उन्होंने कहा, ठीक है, बैठ जाइये। उस दिन हमें ऐसा लगा कि हम छोटे-छोटे बच्चे हैं और दादा जी के साथ बैठे हुए हैं। जैसे दादा, पोते-पोतियों को कहानी सुनाता है वैसे भाई साहब ने हमें कहानी सुनाते-सुनाते जीवन की कई शिक्षायें दीं। हम चार बहनें थीं। हम भाई साहब के सामने बैठ गयीं। उन्होंने चार कहानियां सुनायीं। उनमें से यहाँ मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहती हूँ।

कहानी द्वारा शिक्षा

भाई साहब ने और एक कुर्सी मंगवायी। उसको अपने एकदम सामने रखवाया और उसके ऊपर अपनी दोनों टाँगें रखीं और दोनों हाथ बाजू में फैलाये। कहानी सुनाना शुरू किया। "एक गुरु जी थे, उनके दो शिष्य थे। उनके नाम थे रामा और दामा।" भाई साहब ने पूरी एक्टिंग करके दिखायी। "वे दोनों शिष्य गुरु जी के एक-एक पाँव के ज़िम्मेवार थे, रामा दायें पाँव का और दामा बायें पाँव का। रामा की ड्यूटी थी दायें पांव की मालिश करने की और दामा की डयूटी थी बायें पांव की मालिश करने की। दोनों अपनी-अपनी सेवा करते आ रहे थे। एक दिन गुरु जी कुछ अलग खयालों में खोये हुए थे। दोनों शिष्य एक-एक पांव की मालिश कर रहे थे। उतने में गुरु जी ने अपना दायाँ पाँव उठाकर बायें पाँव पर रख दिया।" भाई साहब ने ऐसे ही एक्टिंग की। "जब गुरु जी ने अपना दायां पाँव बायें पाँव पर रख दिया तो दामा ज़ोर से चिल्लाया, हे रामा, तेरा पांव मेरे पाँव पर आ रहा है, सम्भालो उसको। रामा ने उस पांव को उठाया और सीधा रख दिया। गुरु जी अपने ही विचारों में थे, बड़े आनन्द में डूबे हुए थे। तीन मिनट के बाद गुरु जी ने फिर अपना दायां पांव उठाकर बायें पाँव पर रख दिया। फिर दामा ने रामा को थोड़ी आंख दिखायी और बोला, देख, यह बहुत गड़बड़ हो रही है तुम्हारा पाँव मेरे पाँव पर क्यों आ रहा है फिर रामा ने उस पांव को उठाया और उसकी जगह पर रख दिया। फिर गुरु जी ने वैसे ही किया। यह क्रम 4-5 बार चलता रहा। अब दामा से बिलकूल सहन नहीं हआ और कहा, रामा, तुम्हें यह अन्तिम चेतावनी देता है, इसके बाद तुम्हारा पाँव मेरे पाँव पर नहीं आना चाहिए। रामा ने गुरु जी का पांव उठाया और यथा-स्थान पर रख दिया। थोड़े समय के बाद फिर गुरु जी ने पाँव उठाकर बायें पाँव पर रख दिया। यह देख कर दामा बहुत गुस्से में आया और कहा, मैं तुम्हारे पाँव को कुल्हाड़े से काट देता हूं। तुम्हारे पाँव की इतनी हिम्मत कि मेरे पाँव पर जैसे ही काटने के लिए उसने कुल्हाड़ा उठाया, गुरु जी ने देख लिया।" भाई साहब बहुत प्यार से, आनन्द से और सुन्दर तरीके से एक्टिंग करके दिखा रहे थे। वो देखकर हमें बहुत मज़ा आ रहा था लेकिन उनके चेहरे पर जो करुणा थी, जो भाव था उसे देखकर हमें लगा कि भाई साहब इस कहानी द्वारा हमें एक सन्देश, एक पाठ समझाना चाहते हैं। भाई साहब हमें बताना चाहते थे कि दोनों पांव गुरु जी के ही हैं, सारी सेवायें बाबा की हैं। कुछ भाई-बहनें समझते हैं कि यह मेरी सेवा है, यह तेरी सेवा है, इसके कारण वे समझते हैं कि फलाना व्यक्ति हमें तकलीफ़ दे रहा है। फलाने व्यक्ति की सेवा से हमें दिक्कत हो रही है। वास्तव में देखा जाये तो तकलीफ उन शिष्यों को नहीं थी। अगर दोनों में से, किसी भी शिष्य ने एक पाँव काट दिया तो तकलीफ़ उस गुरु को होगी, पाँव कटेगा उस गुरु का है ना! इस प्रकार, सेवा करने वाले सेवाधारी अपने-अपने क्षेत्र या स्थान को अपना न समझे सेवा बाबा की है, हम सिर्फ निमित्त है सेवा करने के लिए। अगर किसी से किसी को भी नुकसान हो सेवा में, वो उनका नुकसान नहीं, बाबा को नुकसान होता है। हम सब बाबा की ही सेवा कर रहे है, अपना यहाँ कुछ नहीं। हर सेन्टर बाबा का है हर बी के बाबा का बच्चा है। सब उसी के है। हमारे में तेरे मेरे की भावना ना हो। यह पाठ भाई साहब ने हमें कहानी-कहानी में समझा दिया। यह उनकी बहुत-बहुत ऊँची सोच थी।

मधुबन निवासियों से अत्यन्त प्रेम

जब भाई साहब की तबीयत खराब हो गयी थी, तब उपचार के लिए उन्हें मुंबई ले गये थे। उस से पहले वे कई दिनों तक मधुबन में थे। तब रोज़ मधुबन वाले उनसे कमरे में जाकर मिलते थे, थोड़ा समय बैठते थे और चिटचैट करते थे। जब वे मुंबई गये तो मधुबनवासी उनको बहुत मिस करने लगे। फिर सब मधुबनवासियों ने मिलकर एक बड़ा कार्ड बनाया जिसमें जल्दी ठीक होने की शुभ-कामना थी। उस कार्ड के साथ काफ़ी पत्र थे जिनमें कई भाई-बहनों ने भाई साहब के लिए अपने मन के उद्‌गार लिखकर अपनी सही की थी। वह कार्ड मुंबई में भाई साहब को दिया गया। जब कार्ड को उन्होंने देखा और सब मधुबनवासी भाई-बहनों के उद्‌गार पढ़े तो वे पिघल गये और कहा, अच्छा, मधुबन के भाई-बहनें मुझे इतना प्यार करते हैं, अभी मुझे यहाँ नहीं रहना है। डॉक्टरों से उन्होंने कहा कि मुझे हॉस्पिटल में नहीं रहना है, अपने घर मधुबन जाना है। दो-चार दिन ट्रीटमेन्ट लेकर भाई साहब मधुबन वापस आये। उसके बाद वे रोज़ पहले की तरह आँगन में बैठकर थोड़ा-बहुत बोलते थे, उसके बाद मधुबन के भाई-बहन कुछ-न-कुछ मनोरंजन करते थे। यह सिलसिला रोज चलता या रोज वे कुछ-न-कुछ नयी-नयी बातें सुनाते थे, ज्ञान की नयी-नयी प्वाइंटम सुनाते थे। इससे वे भी बहुत खुश होते थे और मधुबन वाले भी। इससे हमे पता पड़ता है कि मधुबन के भाई-बहनों से भी उनका कितना प्यार था।
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लखनऊ से ब्रह्माकुमारी सुमन बहन, भ्राता जगदीश चन्द्र जी के प्रति अपने मन के उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त कर रही हैं-

वे विधाता की अनमोल कृति थे

"अपनी रचना के पतन एवं उनके उत्थान को देखकर जगत्-नियन्ता फिर से जब नव-निर्माण के लिए इस धरा पर अवतरित होते हैं; पर अपनी बात बताने एवं समझाने के लिए ज्ञान सागर को ब्रह्मा-तन का आधार लेना पड़ता है। जिस प्रकार भगवान का ज्ञान प्रकट करने के लिए हमारे व उसके बीच में ब्रह्मा माध्यम बनते हैं, इसी प्रकार भगवान के गुह्य ज्ञान को जग के सामने रखने के लिए कोई ऐसा माध्यम चाहिए जो उस ज्ञान को ऐसे ढंग से समझा सके, जैसे भगवान जनमानस को समझाना चाहते हैं और जग वाले भी उस गहन ज्ञान को सहज रीति से समझ सकें व यह अनमोल ज्ञान उनके फ़ायदे का लगे।
भगवान सिर्फ उन लोगों के सामने प्रत्यक्ष होता है जो उसकी बातों को सुनने की अभिलाषा रखते हैं और समझते हैं। वह उन बच्चों से बात करते हैं जो उसकी बातों की वैल्यू समझते हैं। वे कोई भाषण या प्रवचन नहीं करते हैं, अपने बच्चों से बात करते हैं। फिर उनकी (भगवान की) बातें सारे जग में कैसे पहुंचायी जायें और कौन पहुंचाये? ब्रह्मा बाबा पहुँचा सकते थे क्योंकि वे अनुभवीमूर्त थे परन्तु ब्रह्मा बाबा के साथ तो स्वयं भगवान रहते थे इसलिए वे जनता के बीच गली-गली कैसे जाते! अतः कोई ऐसा बुद्धिमान व समर्पण भाव वाला व्यक्ति हो, जो पहले तो खुद भगवान की बातों को अच्छी रीति समझे, फिर बिना कोई मान-शान-अभिमान के वह भगवान की बातें सबके सामने स्पष्ट रूप से रखने का भाव एवं हिम्मत रखे। क्योंकि जो मान्यतायें 2500 वर्षों से चली आ रही थीं, उनके विपरीत बात जनमानस में रखना और जिन मान्यताओं का सम्बन्ध भावना से जुड़ा हुआ हो, उनको तोडकर नयी मान्यताओं के प्रति भावना बैठाना, जिनका कोई प्रैक्टिकल प्रमाण न हो। विज्ञान की नयी बातों को कहने में व्यक्ति फिर भी नहीं डरता क्योंकि वह तो स्थूल चीज़ों की बातें होती हैं, जो किसी-न-किसी यन्त्र के माध्यम से देखी जा सकती हैं, पर आत्मा-परमात्मा तो अदृश्य सत्तायें हैं उनकी बातों को स्पष्ट करना थोड़ा मुश्किल तो होता है।
जहाँ श्रद्धा एवं विश्वास की बात होती है, निश्चित ही वहाँ विरोध का सामना करना होता है। इसलिए भगवान को एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी, जो बुद्धिमान के साथ-साथ भावना प्रधान भी हो। समझदार होने के साथ-साथ सहनशील भी हो। निर्भय होने के साथ-साथ निर्दोष भी हो। अनुभवी होने के साथ निर्माणचित भी हो। सत्यता के साथ-साथ सभ्यता का धनी भी हो ।आध्यात्म के साथ-साथ विज्ञान का भी ज्ञान तथा समझ रखता हो। भक्ति के साथ-साथ आधुनिकता की भी समझ हो अर्थात् दुनिया का भी ज्ञान हो।ऐसा हिम्मतवान हो जो परीक्षाओं का अगर समन्दर भी पार करना पड़े तो भी दिलशिकस्त न हो। जिसमें रहमदिल के साथ उदारता एवं दातापन का भाव सदा हो। बार-बार असफलताओं के तिमिर में भी आँखों में अन्तिम सफलता की चमक सदा रोशन रही हो। अपमानों का दंश बार-बार झेलने के बाद भी जिसमें उत्साह का सागर सदा लहराता रहा हो। जिसे भगवान में सम्पूर्ण निश्चय हो अर्थात् सारी दुनिया एक तरफ़ क्यों न हो जाये, पर भगवान की बात पर किसी भी प्रकार का अंश मात्र भी संशय न हो। बाहर से कितना भी नुकसान का रूप हो, पर भगवान की मत पर अचल अडोल-अटल निश्चय हो। निर्मल वृत्ति के साथ-साथ निश्चलता की दृष्टि हो। विद्वत्ता के व्यक्तित्व के साथ विनम्रता की प्रतिमूर्ति भी हो। भगवान की जिन बातों को समाज के सामने रखने जा रहा है, पहले वह उनका प्रारूप और स्वरूप हो। जब ये सब गुण और विशेषतायें होंगी तब ही उसकी कही हुई बातें लोगों की बुद्धि में बैठेंगी।
ऐसी आत्मा जो बेदाग हो, भगवान के प्रति ललक हो, इस दुनिया में पूरे दिल से वैराग्य हो, पुरुषार्थ की पराकाष्ठा हो, दिल की गहराई से लगन हो, निःस्वार्थ भावना हो, समाज के प्रति कुछ कर गुज़रने का जज्बा हो, बेजोड़ प्रतिभा का धनी हो, हिम्मतवान हो, सेवा में पूरा समर्पण हो- वही इस कार्य के उपयुक्त हो सकता है। जिस पर भगवान को भी पूरा विश्वास हो कि हम जो भी कहेंगे उसके अनुरूप ये दिखेगा भी। वह खुद भी अच्छी रीति समझेगा और दूसरों को भी स्पष्ट एवं सरल भाषा में समझा सकेगा। फिर भगवान के प्रति वह भी उतना ही ईमानदार तथा ट्रस्टी हो। यह ज्ञान इतना ऊंचा, श्रेष्ठ एवं हितकर है कि जो भी इस ज्ञान को सुनता है और समझता है, वह सुनाने वाले की महिमा करने लगता है। यह ज्ञान किसका है, यह बताने पर भी उसका ध्यान उसकी ओर बहुत कम ही जाता है इसलिए कई बार सुनाने वाले को भी भ्रम होने लगता है कि यह तो मेरा ही कमाल है, मैंने बड़ा अच्छा ज्ञान सुनाया, मेरी बुद्धि तो बड़ी अद्भुत है। बिना मेहनत की महिमा, अभिमान पैदा करती है। अतः उसे बिलकुल निर्लिप्त रहना आता हो।
यह तो परवरदिगार का परम कमाल है जो उसके जहान में एक ऐसा भी फूल था, जिस पर उनकी नज़र पड़ी और वह उसे अत्यन्त उपयुक्त लगा। जिसे नूर-ए-इलाही ने निहारा, जिसे जहान-ए-माली ने संवारा, जिसे खुदा की अति विशिष्ट डाली मदर-ए-जहान ने संभाला। जिसे जानी-जाननहार, त्रिकालदर्शी, त्रिभुवननाथ ने ढूंढ कर निकाला। जिसे भगवान ने खुद फुर्सत में तराशा। पतित पावन परमात्मा, करन-करावनहार ने स्वयं अपनी लेखनी से जिसकी श्रेष्ठतम् तक़दीर की लकीर खींची। जिसे ज्ञान सागर ने स्वयं आकर पढ़ाया। स्वयं विधाता ने जिसमें रंग भरा। प्यार के सागर के अपार प्यार ने जिसकी भावना को सिंचित किया वरदाता सर्वशक्तिवान का वरद हस्त जिसके सिर पर रहा। जिसके विवेक को स्वयं बुद्धेश्वर ने जाग्रत किया। जगत्-नियन्ता, नव-सृष्टि का सृजनकर्ता जिसका खुद गुरु बना। सारे वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता आदिदेव ने स्वयं जिसकी लेखनी को शब्द दिया वह अ‌द्भुत रचना, सोचो तो भला कैसी होगी। जिसने स्वयं भगवान को अपनी आँखों से नवयुग रचते देखा, अकर्ता को हर कर्म करते देखा वे अति विशेष से विशेष, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ विधाता की अनुपम कृति थे हम सबके अतिशय प्रिय आदरणीय जगदीश भाई साहब।
एक बार भाई साहब पाण्डव भवन में हम लोगों को दो दिन की भट्ठी करा रहे थे। हम सभी छोटी बहनें ही थीं और बरसात भी लगातार बहुत जोरों की हो रही थी, जिसमें दो दिन सिर्फ भाई साहब के ही क्लास हुए थे। हर क्लास में भाई साहब से घड़ी मिलायी जा सकती थी, एक मिनट भी इधर-उधर नहीं। हम छोटी बहनों को भी ऐसा मान देकर क्लास कराया जैसे हम लोग बड़े समझदार और यज्ञ के लिए बड़े वैल्युबुल व्यक्ति हों। जिस संजीदगी के साथ उन्होंने हर क्लास कराया कि हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि वह दो दिन की भट्ठी सम्पूर्ण समर्पित जीवन की भट्टी थी, आदर्श ब्रह्माकुमारी के लिए भट्ठी थी। एक सम्पूर्ण शिक्षिका का जीवन कैसा होना बाहिए उसका एक शब्द-चित्र निकाल कर दे दिया था। यज्ञ के प्रतिकूल अगर आपने कुछ भी किया तो मैं आप लोगों को दुबारा क्लास कभी नहीं कराऊँगा की उलहने भरी हिदायत भी दी। इतनी छोटी बहनों के लिए वे एक अति सुन्दर उर्दू कविता बनाकर लाये और सबको क्लास में सुनाया भी, वो शब्द उनके दिल के उद्‌गार थे। कोई भी देखकर कह सकता था कि छोटी बहनों के लिए उनके हृदय में कितना प्यार, सम्मान एवं शुभ भावना थी।
हर क्लास में न सिर्फ वो वक्त के पाबन्द रहे बल्कि उन्होंने सभी को भी समय की कद्र करने की शिक्षा दी। जैसे एक बार भट्ठी के आखिरी क्लास में, कारण चाहे कोई भी रहा हो, पर कुछ बहनें देरी से क्लास में पहुंची थी तो भाई साहब ने कहा, आप लोग तो जैसे तशरीफ का टोकरा लाकर पटक रहे हो। तो कई बहनों ने कहा कि भाई साहब, हम लोगों का दोपहर का क्लास काफी लेट छूटा था। भाई साहब ने कहा, इसमें हमारा क्या दोष? आपका पिछला क्लास लेट छूटा लेकिन अगले क्लास में लेट आना- यह तो ठीक नहीं। वह कहते थे, हर कार्य एक निश्चित समय के अनुसार करो। अगर किसी को टाइम दिया है तो समय पर पहुँचो, उसे इन्तज़ार करवाना ठीक नहीं, उसके समय का भी महत्व समझो। अगर साधन ठीक नहीं, तो उसी अनुसार घर से निकलो, साधन नहीं मिला तो दौड़ के जाओ, पर समय पर पहुंचो। तुम समय से हर कार्य करना शुरू करोगे तो एक दिन सब समय से कार्य करना शुरू कर देगें, फिर हर कार्य समय से होने लगेंगे।
जगदीश भाई जी साकार मात-पिता की अति विशिष्ट से विशिष्ट रचना, बुलन्द हौंसलों की उड़ान, गगन के ध्रुव तारा, भगवान के नयनों के नूर, कुमारों के कोहिनूर, आध्यात्म में कलम की अविरल धारा थे। वे त्याग की परिभाषा, वैराग्य की विवेचना, सतत साधना के सजग साधक, मूर्धन्य लेखक थे। कुदरत का करिश्मा, खुदा का अनमोल तोहफ़ा, अमिट दस्तावेज़, वरदानों की खान, विशेषताओं के अनुपम भण्डार थे। क़ाबिलियत का बेजोड़ कमाल, विद्वत्ता की पहचान, अ‌द्भुत व्यक्तित्व के प्रारूप, सज्जनता की कसौटी, सिद्धान्तों की गरिमा तथा प्रेरक प्रसंग, कविता का अविस्मरणीय छन्द थे। वे शब्दों के जादूगर, सिद्धि विनायक, दिव्य दृष्टि के संजय, साहित्य के पुरोधा, कर्मठ, कुशल करिश्माई वक्ता, मंच की पहचान, शान्त सजग आली उस्ताद थे।"
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हमेशा कहते थे, 'साथ चलो और साथ लेकर चलो'

देहली, शक्ति नगर की ब्रह्माकुमारी प्रभा बहन जी, जो सेवा में भाई साहब के बहुत नज़दीक रहीं, भाई साहब, बहनों का कैसे मार्गदर्शन करते थे, उसका वर्णन इस प्रकार करती हैं-
"भाई साहब समय का महत्व बहुत रखते थे। दूसरों को भी उसका महत्व बताते थे। वे कछुए का मिसाल हमें देते थे कि उसको इतनी अक्ल है कि कर्मेन्द्रियों को कब इस्तेमाल करना है और कब समेट लेना है। हमें भी अपने विचारों को, कर्मों को समेट लेना है। मन की गुफा में मगन हो जाना है। आत्म-रस और प्रभु-रस का अनुभव करना है। मुझे याद आता है, एक बार मैंने कपड़ों को धोकर सूखने के लिए डाल दिया और पसीना सुखाने के लिए दो मिनट के लिए मीटिंग रूम में बैठी थी। अचानक वहां भाई साहब आये और समझाने लगे कि पंखा तो बाबा के कमरे में भी लगा हुआ है। आप बाबा के पास जाकर बैठो और पसीना सुखाओ। बाबा से बातें करो और बाबा को ही देखते रहो। जैसे बच्चा अपने पिता को ही देखता रहे तो आखिर पिता भी पूछता है कि बच्चे, तुमको क्या चाहिए? ऐसे बाबा के सामने ही बैठी रहो और बाबा को ही देखती रहो तो आखिर एक दिन बाबा भी पूछेगा कि बच्चे, क्या चाहिए तुमको? आप इधर-उधर नहीं बैठो। आप ज्ञान में 1982 में आयी हो। मैं तो 1952 से आया है। गुलज़ार दादी 1937 से आयी हैं। फलानी बहन 1962 में आयी हैं। अगर हमने रोज़ 4 घंटे याद किया और 4 को 365 दिनों में गुणा करो तो 1460 घंटे एक साल में हो गये। मैं सन् 1952 से ज्ञान में है, आप मन् 1982 से। तीस सालों का अन्तर रहा। तीस को 1460 से गुणा करो (1460x30-43,800 घंटे), तो आप मेरे से बहुत पीछे हैं। हम इतना टाइम बाबा को दे चुके हैं, आप यहां बैठकर टाइम बेस्ट कर रहे हो? तीस सालों में मैंने कितने पुण्य जमा किये हैं और कितने पाप बाबा ने दग्ध किये हैं। आप सब ज्ञान में लेट आये हो इसलिए आप लोग सीरियस हो जाओ और ज्ञान-योग का अध्ययन करो। एकान्तवासी बनो, अन्तर्मुखता की गुफा में बैठो, बाहरमुखी मत बनो। बाबा शमा है, उस पर फिदा हो जाओ। जैसे चकोर चांद को देखता है, ऊपर उसी की ओर उड़ता है ना, ऐसे ही आपका मुँह बाबा की तरफ ही होना चाहिए। बाबा की तरफ उड़कर फटाफट पहुंचना चाहिए, देर नहीं लगनी चाहिए। भाई साहब कहते थे कि लौकिक कामनायें भी हमारे मन में न रहनी चाहिए और न उत्पन्न होनी चाहिएँ।

आप सब बहनें दादियों की तरह हैं

रात्रि क्लास 9 से 10 बजे तक रोज़ होती थी। उसमें भाई साहब यज्ञ के वरिष्ठों का उदाहरण देते थे। बड़ी दादी, बड़ी दीदी, गुलज़ार दादी, मनोहर दादी, चन्द्रमणि दादी, सन्तरी दादी, ईशू दादी आदि दादियाँ शक्ति नगर सेन्टर पर जाती रहती थीं। उनको रिगार्ड देने के बारे में, उनकी सेवा के बारे में, उनके पुरुषार्थ के बारे में रात्रि क्लास में बताते थे। कहते थे कि आप सब बहनें दादियों की तरह हैं। आप सब उस सेन्टर पर बैठी हो जो भारत का सबसे पहला सेन्टर है। दुनिया के लिए एक आदर्श है। आप बहनें इस संस्था के फाउण्डेशन हैं, फाउण्डेशन मज़बूत होना बहुत ज़रूरी होता है। आपकी कमज़ोरी सारे पेड़ को कमज़ोर कर देगी। आपकी मज़बूती से सब में मजबूती आयेगी। ऐसे हमारे में उमंग-उत्साह तथा शक्ति भरते थे।

उनकी दिनचर्या बहुत टाइट रहती थी

भाई साहब दिनचर्या में बहुत टाइट रहते थे और हमें भी टाइट रखते थे। उनकी दिनचर्या सुबह 2.30 बजे शुरू होती थी। मुझे भी साहित्य लिखने में उन्हें पूरा सहयोग देना होता था। मैं रजिस्टर और पांच पेन लेकर सुबह 3.30 बजे उनके कमरे में पहुँच जाती थी। जब लिखने का काम ज़्यादा होता या तब योग में और क्लास में हम तीन बहनों को जाने नहीं देते थे। सुधा बहन, सन्तोष बहन और मैं। भाई साहब बैठे रहते थे, उनके सामने बाबा का फोटो होता था, उसको देखते-देखते वे बोलते जाते थे और मैं लिखती जाती थी। यह 5.30 बजे तक चलता था। लिखते-लिखते मैं थक जाती थी लेकिन बोलते-बोलते भाई साहब कभी नहीं थकते थे। छह बजे मै या और कोई बहन भाई साहब के लिए दूध और 4-5 भीगे हुए बादाम लेकर आती थी। उससे पहले 4.30 बजे चाय पीते थे। सुबह सिर्फ 10 मिनट नाश्ते के लिए समय मिलता था, बाकि 12.30 बजे तक लिखने की सेवा होती थी, कभी-कभी 2.00 बजे तक भी लिखना पड़ता था। हमारा काम सिर्फ लिखना ही नहीं होता था, लिखने के साथ खाना बनाना, कोर्स कराना, किसी-किसी को मुरली सुनाना भी होता था। हम बहनें तो बहुत थक जाती थीं। भाई साहब सबको कहते थे कि रात्रि क्लास के बाद सोने से पहले शुक्रिया बाबा, शुक्रिया बाबा, शुक्रिया बाबा-तीन बार बाबा को थैंक्स कहकर सोना है। जब लिखने का काम हल्का होता था तो 4.30 से 5.00 बजे मुरली सुनते थे किसी-न-किसी बहन द्वारा। सोफे पर कम बैठते थे, अपने पलंग पर ही ज़्यादा बैठते थे।
मुझे याद है, ऐसे समय पर रोज़ की मुरली हमें स्पीकर पर ही सुननी पड़ती थी। ओम् शान्ति भवन में सम्मेलन शुरू हो चुके थे। सन् 1983 में शान्ति सम्मेलन, सन्त सम्मेलन, राजा महाराजाओं के कार्यक्रम लगातार एक के बाद एक चल रहे थे। सन् 1985 के आस-पास देश-विदेश में सेवाकेन्द्र खुलते जा रहे थे। उन दिनों बहुत व्यस्त दिनचर्या चलती थी। इनके अलावा दिल्ली में भी हर साल एक बड़ा कार्यक्रम चलता था, कभी इंदिरा गाँधी स्टेडियम में, कभी नेहरु स्टेडियम में, कभी तालकटोरा स्टेडियम में, कभी विज्ञान भवन में। इन सब कार्यक्रमों में भाई साहब बहुत एक्यूरेट काम करते थे और कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से, सुचारु रूप से चलाते थे।

उनका हर कार्य एक्यूरेट होता था

अगर सुबह 6 बजे हमें इंदिरा गाँधी स्टेडियम पहुंचना है तो भाई साहब अपना सारा सामान लेकर 5.30 बजे बाहर गाड़ी के पास आकर खड़े हो जाते थे। जब भाई साहब आकर खड़े हो जाते थे तो हम बहनों को भी भाग-भाग कर आना पड़ता था। क्लास में आने वाले भाई-बहनें, जिनको अलग-अलग सेवा दी जाती थी, वे भी अपने-अपने घरों से वहाँ समय पर पहुंच जाते थे। तब सबको बिठाकर संगठन का महत्व, बड़ों के प्रति रिगार्ड, आपस में भी स्नेह और सहयोग की भावना कैसे हो, ये सब समझाते थे। सबको बार-बार शिव बाबा की स्मृति दिलाते थे कि आप किसका कार्य कर रहे हो। सबकी बुद्धि बाबा की तरफ जुटवाते थे।
सेन्टर पर भी कभी डॉक्टरों के, इंजीनियरों के, व्यापारियों के, महिलाओं के स्नेह-मिलन करवाते थे। उन सबका बहुत नम्रता से, हाथ जोड़कर स्वागत करते थे, मिलते थे और विदाई देते थे। कोई उनसे मिलने आते थे, तो फिक्स टाइम देते थे। हम बहनों को कहते थे कि इतने टाइम के बाद टोली लेकर मेरे पास आ जाना। वे किसी से न एक्स्ट्रा टाइम लेते थे और न अपना एक्स्ट्रा टाइम देते थे।
वे जनक महाराजा जैसे विदेही थे। मैंने उनकी सदैव योगयुक्त, विदेह अवस्था देखी। सुबह 3.30 बजे से लिखना, टाइप करवाना, करेक्शन करना आदि उनकी सेवा शुरू होती थी क्योंकि सुबह की पहली पोस्ट से वो सब पेपर्स भेजने होते थे। वे लैटर चाहे आबू के होते थे या विदेश के भी होते थे।

बहनों के प्रति उनका रिगार्ड

जीवन भर उन्होंने सादा और त्याग का जीवन जीया। मैं उनके साथ मधुबन भी आती थी और महीने भर उनके साथ रहती थी क्योंकि टाइप करना होता था और लिखना भी होता था। उन्होंने कभी फर्स्ट क्लास में यात्रा नहीं की, सेकण्ड क्लास में ही सफ़र करते थे। एसी में भी लास्ट-लास्ट में जाने लगे। एक बार की बात है, हम मधुबन आ रहे थे। दो में से एक टिकट कनफर्म थी, वे रात को बेडिंग नीचे बिछाकर सो गये। मेरे से कहा, पांच घण्टे आप स्लीपर पर सो जाओ, बाद में मुझे दे देना। मैने मना भी किया लेकिन वे माने नहीं। पहले बहनों को सुविधा देते थे, बाद में अपने लिए। बहनों के प्रति उनका रिगार्ड बहुत था।

भोजन का महत्व

भोजन में भी वे बहुत सरल थे। उनका भोजन बहुत साधारण रहता था। दाल-चावल, रोटी-सब्जी होती थी। मिर्च-मसाले उनके खाने में नहीं होते थे। वे भोजन करते समय किसी से बात नहीं करते थे। अकेले में शान्ति में बैठकर बाबा की याद में भोजन करते थे। कहते थे, यह दुःख भंजन ब्रह्मा भोजन है। जो यह भोजन खाता है वो दुःख से मुक्त होता है। उनकी थाली में एक चम्मच भी कुछ नहीं बचता था। कोई भाई या बहन थाली में खाना बचाते थे और फेंकते थे तो उनको अच्छा नहीं लगता था। उनसे कहते थे, यह भोजन किसी के दान के पैसे से बना है। बाबा एक-एक कण का हिसाब लेगा। बाबा के यज्ञ का एक-एक पैसा, एक-एक अन्न का कण, सोने की एक-एक मोहर है। आप इसको वेस्ट नहीं करो। ऐसे बिजली, पानी, टेलिफोन आदि सभी में कम खर्चे के लिए समझाते थे। उस समय सेन्टरों पर सुविधायें नहीं थीं। हम बहनों को और अन्य सबको यही पाठ पक्का कराते थे। साधना करो, तपस्या करो।

स्व-अध्ययन और स्व-पुरुषार्थ

जब लिखने का काम कम होता था तो सेन्टर पर योग का कार्यक्रम चलता था। रोज़ एक बहन का टर्न लगाते थे। मेरा टर्न सोमवार होता था, चक्रधारी दीदी का मंगलवार। ऐसे एक दिन सुधा बहन का और एक दिन रानी बहन का होता था। उन दिनों बहुत थोड़े-से भाई-बहनें सेन्टर पर रहते थे। सुबह 3.30 से 4.30 बजे तक उसी बहन को संदली पर बैठकर योग कराना होता था। फिर सुबह 6.00 से 6.45 तक मुरली से पहले भी उसी बहन को संदली पर बैठ योग कराना होता था। फिर 9.00 बजे से शाम 5.30 बजे तक उस बहन को बाबा के कमरे में मौन में रहकर योग-तपस्या करनी होती थी। बाबा के कमरे में अव्यक्त वाणी की एक किताब रखी होती थी। उसको कहा जाता था कि आप मन की बातें बाबा से करो। कुछ पूछना हो, कुछ कहना हो या कुछ समाधान लेना हो, वहां अव्यक्त वाणी की किताब रखी हुई है, उसको पढ़ो और उससे हल पाओ। भाई साहब खुद सुबह 9.00 से 9.30 बजे तक उस बहन को योग कराते थे, मुख मीठा कराते थे और दोपहर 2.00 बजे से 3.00 बजे तक दृष्टि देकर उसको फिर योग कराते थे। पूरे दिन, पूरे महीने सेन्टर पर योग चलता रहता था। कहते थे, राजयोग के अभ्यास से बुद्धि बहुत अच्छी बननी है। ऐसी बुद्धि वाले ही बाबा की सेवा के निमित्त बन जाते हैं। बाबा की सेवा के निमित्त बनना भी बहुत बड़ा भाग्य है।

सेवा करने की विधि

वे सब बहनों के लिए यही शुभभावना रखते थे कि किसी वे मन-बुद्धि कहीं भटके नहीं। हमें यह भी कहते थे कि यह सेवा बाबा की है, करन-करावनहार बाबा है। हमने अपना जीवन बाबा को दे दिया है। बाबा को हमारे से किस का कल्याण कराना है यह बाबा की मर्जी है, ड्रामा में निश्चित है। आप ज्ञान सुनाओ और मन ही मन बाबा से कहो कि बाबा इस आत्मा को क्या सुनाना है, आप ही टच करो, मैं तो निमित्त आत्मा हूँ। आत्मिक दृष्टि से देखते हुए ज्ञान सुनाओ, अपने पर रखो और याद रहे कि यह बाबा का कार्य है, बड़ों ने हमें यह कार्य दिया है, मुझे निभाना है। यह भी कहते थे कि बचपन से ही कोई ज्ञान में प्रवीण नहीं होता। अभ्यास करते-करते ही वह निपुण बन जाता है। इस प्रकार वे हम बहनों का मार्गदर्शन करते थे और साथ-साथ दैवीगुणों और ईश्वरीय मर्यादाओं पर ध्यान खिचवाते थे। कहते थे, ज्ञान बहुत नम्रता से दो, सम्मान दो तब उसका परिणाम निकलेगा, नहीं तो ज्ञान देना बेकार हो जायेगा। जैसे जलने के बाद कपूर उड़ जायेगा ना, वैसे नम्रता बिना ज्ञान भी उड़ जायेगा। वे अपनी क्लास में ब्रह्मा बाबा का उदाहरण रोज देते थे। ब्रह्मा बाबा सृष्टि की नंबर वन आत्मा, इतनी बड़ी अथॉरिटी होते हुए भी विपरीत परिस्थितियों में भी नम्रचित्त रहे। हम तो उनके सामने छोटे बच्चे हैं, घुटनों के बल से चलने वाले हैं, अपने पाँव पर भी खड़े नहीं हो सकते। कहाँ हम, कहाँ ब्रह्मा बाबा! अभिमान आपस में भी और दैवी परिवार में भी टकराव पैदा करता है। यह हमारी गिरावट का कारण बन जायेगा। याद रखो, नम्रता भी हो, सम्मान भी हो तब आप सेवा के क्षेत्र में सफल होंगे।
कहते थे, हरेक के जीवन में समस्यायें, परीक्षायें छोटी-बड़ी आती ही है। दूसरों के सामने उनका वर्णन करने में अपना टाइम वेस्ट नहीं करो। बाबा ने उन सबको कैसे पार कराया, पार करने में कितनी शक्ति दी यह सुनाओ। बाबा के ज्ञान-योग से मेरे में हिम्मत आयी है, ताक़त आयी है- यह कहो। बाबा की शक्तियों से मैंने सब बातें पार की हैं ये बातें सुनाओ तो सुनने वालों को बाबा के प्रति प्यार जगेगा, अपने जीवन में भी आगे बढ़ने की हिम्मत आ जायेगी। बाबा की जीवन कहानी सुनाओ। समस्यायें नहीं सुनाओ। यह है ही समस्याओं की दुनिया। मैं कैसे निकली-यह अनुभव सुनाओ, उनको भी हिम्मत आ जायेगी।
एक योगी कैसे बात करता है, कैसे उठता है, कैसे सोता है, योगी के क्या-क्या लक्षण होते हैं ये मैंने उनमें देखा। मैंने 18 साल भाई साहब को बहुत करीब से देखा और उनसे सीखने का भी बहुत मौका मिला। मेरा बहुत बड़ा भाग्य है, मैं भाई साहब के साथ रही, सेवा की।
वे कहते थे, बाबा कहते हैं, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो। जिससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है उसको सुनो, उसको देखो, बाक़ी कुछ नहीं देखो। अपनी कमी-कमज़ोरियों को निकालने के बारे में सोचो। दूसरों को कभी नहीं देखो, कोई सम्पूर्ण नहीं है। आत्मा सम्पूर्ण बन जायेगी तो वो इस शरीर को छोड़ जायेगी। अगर कोई शरीर में है माना वो सम्पूर्ण (परफेक्ट) नहीं है। वे यह भी कहते थे कि अगर बड़े हमें कुछ समझा रहे हैं तो हमें समझना चाहिए। ऐसा नहीं, वे शरीर में हैं तो वे परफेक्ट नहीं हैं, उनकी बात क्यों सुनें? आखिर वे हमसे बड़े हैं, अनुभवी हैं। वे कहते थे कि ज्ञानी का एक यह भी लक्षण है कि अगर कोई उसकी कमी-कमजोरियां सुनाये तो सुनेगा भी और उनके बारे में सोचेगा भी। वो यह नहीं कहेगा कि मैं भी तो अनुभवी हूँ, मैं क्या कम हूँ। अगर किसी में बुद्धि का, ज्ञान का, योग का या सेवा का अभिमान आ गया तो समझ लो कि उसकी प्रगति रुक गयी, उसकी गिरावट शुरू हो गयी। इसलिए अपनी मनोभावना अच्छी बनाओ। ऐसे हम बहनों को भाई साहब समझाते थे।

बाबा के महावाक्यों पर अचल विश्वास

बाबा पर और बाबा के महावाक्यों पर अचल विश्वास स्थिर रहने के लिए हम बहनों को कई बातें सुनाते थे। कहते थे, बाबा का एक-एक महावाक्य लाखों-करोड़ों रुपयों का है। इस ज्ञान से आत्मा का अन्धकार मिट जायेगा, जीवन पवित्र और श्रेष्ठ बन जायेगा, मनुष्य देवता बन जायेगा। भगवान सर्वज्ञ है, सत्य है, उसका कोई भी महावाक्य ग़लत नहीं हो सकता। मनुष्य से कोई गलती हो सकती है। वो भगवान है, उससे कोई भी ग़लती हो नहीं सकती। वह सर्व का कल्याणकारी है, शुभकारी है। हमेशा अपने जीवन में यह गांठ बाँधकर रखो कि इस संगमयुग में हमें जो ज्ञान मिला है, वही सत्य ज्ञान है, उसके अलावा और कोई ज्ञान सत्य हो नहीं सकता। ऐसे ज्ञान पर पूरा निश्चय रहना चाहिए।
इस ज्ञान में आने से पहले मैं माँ-बाप के साथ बहुत भक्ति करती थी। उनके साथ तीर्थों पर भी जाती थी। मेरे मन में एक ही आशा थी कि अगर भगवान मुझे मिले, मैं उनसे पूछेंगी कि आपने संसार क्यों बनाया? पिता जी हम बच्चों से बहुत दान-पुण्य करवाते थे। वे गरीबों को, भिखारियों को बहुत दान-पुण्य करते थे तो वही संस्कार उन्होंने हम बच्चों में भी डाल दिये। सन् 1982 में मुझे बाबा का ज्ञान मिला।
ज्ञान-योग करते हुए मुझे एक सप्ताह ही हुआ था, तब भाई साहब को पहली बार देखा सेन्टर पर। वे किसी भाई से छपाई के बारे में बातें कर रहे थे। उस समय मुझे यह पता नहीं था कि ये संस्था के एक बड़े भाई हैं। सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे, बाबा का बैज लगा हुआ था। मैंने उनको हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। तब उन्होंने कहा, आप ओम् शान्ति क्यों नहीं कहते ? चक्रधारी दीदी कुमारियों की क्लास कराती थी। एक दिन भाई साहब वहाँ आये। उस समय हम तीन कुमारियां थीं। भाई साहब ने पूछा, आप लोगों का क्या लक्ष्य है? चक्रधारी दीदी की तरफ देखते हुए मैंने कहा, मुझे इन जैसा बनना है और यहां सेन्टर पर रहकर सेवा करनी है। दूसरी बहन ने कहा, मुझे मुंबई में रहकर सेवा करनी है। तीसरी ने कहा, मुझे मधुबन में रहना है। फिर भाई साहब ने मेरे से पूछा, दूसरी दो तो अलग-अलग स्थान पर रहकर सेवा करना चाहती हैं लेकिन आपने यह क्यों कहा कि मैं शक्ति नगर में रहकर सेवा करूंगी? मैंने कहा, भाई साहब, मैं जब भी आपको देखती हूँ, आप मुझे गणेश के रूप में दिखायी पड़ते हैं। जहाँ विघ्नविनाशक गणेश जी रहते हैं वहां हर बात में सफलता हुई ही पड़ी है।
चक्रधारी दीदी ने ही हमें उनका परिचय करवाया कि ये बड़े भाई हैं, साहित्य लिखते हैं आदि-आदि। हर महीने के एक बुधवार को भाई साहब कुमारियों की क्लास कराते थे। हर शुक्रवार को भाइयों की क्लास होती थी। उसी प्रकार हर सोमवार को माताओं की क्लास होती थी। एक बार की माताओं की क्लास में एक माता ने भाई साहब से कहा कि मेरा पति मुझे जूतों से मारता है कि तुम ब्रह्माकु‌मारियों के पास क्यों जाती हो? भाई साहब उसको समझाते जा रहे थे, वो माता रोती ही जा रही थी। अभी भी वो माता क्लास में रेग्युलर आती है। तीस साल पहले भाई साहब ने उस माता को समझाया था, हिम्मत और साहस दिया था। क्लास में जब वे माताओं से पूछते थे कि आपका लौकिक जीवन कैसा चल रहा है तो मातायें अपने घर की समस्यायें सुनाती थीं। कोई अपने पति के बारे में, कोई अपने बच्चे के बारे में, कोई अपनी सास और बहु के बारे में बताती थी। एक माता ने भाई साहब से कहा कि उसका बेटा तोतला है। बिजनेस बहुत बड़ा है, धन-सम्पत्ति के लिए कोई कमी नहीं है लेकिन बेटा ऐसा है, क्या करें? भाई साहब उस तोतले बेटे को रात 9 बजे अपने पास बुलाते थे और बाबा की बातें समझाते थे। फिर हम बहनों को बोलते थे कि इनको मुरली के प्वाइंट्स सुनाओ। मैंने देखा, वह भाई सिर्फ तोतला नहीं था, उसका दिमाग भी थोड़ा ढीला था अर्थात् वह मन्दबुद्धि था। वो रोज़ सेन्टर पर आने लगा और तीन साल के बाद उसके जीवन में बहुत कुछ परिवर्तन आया। वह ठीक-ठाक कपड़े पहनने लगा, दूसरों के साथ अच्छी तरह व्यवहार करने लगा और अपने बाप के साथ दुकान पर भी जाने लगा।
भाई साहब की बहुत शुभ भावना और कल्याण की भावना होती थी कि बाबा के ज्ञान से सबका कल्याण हो जाये। वे कहते थे, बाबा का ज्ञान इतना श्रेष्ठ है, उसे सबको सुनाओ, उनका जीवन बनाओ।

योग का प्रयोग करना

एक बार भाई साहब ने हम बहनों को कहा कि सेन्टर के ऊपर बोर्ड लगाया हुआ है ना 'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय' इसे दृष्टि दो और संकल्प करो कि बाबा, जितने भी लोग ज्ञान छोड़कर गये हैं, वे आज और कल इन दो दिनों में आपके सेन्टर पर आ जायें। भले ही मिलकर जायें लेकिन आयें जरूर। हम सब बहने योग में बैठ गयीं। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था। सब बहनें लक्ष्य लेकर सुबह 10.30 बजे से दिन के 12.30 बजे तक योग में बैठ बोर्ड को दृष्टि देती रही और ज्ञान छोड़कर गये हुओं का आह्वान करती रही। दो दिन के अन्दर 15-20 वे लोग सेन्टर पर आ गये जो पहले आते थे। उनमें वो भी थे जो मेरे से पहले सेन्टर पर आते थे। जब मैंने उनसे पूछा, आप कहाँ से आये हो तो कहा, हम तो आप से पहले ही आते थे। मैं यह दृश्य देख करके हैरान हो गयी कि योग में इतनी शक्ति है।
एक बार की बात है, सेन्टर पर 18 जनवरी के निमित्त पब्लिक प्रोग्राम चल रहा था 17 जनवरी के दिन। उसमें एक माता आयी हुई थी। 'भाई साहब यज्ञ-कहानी सुना रहे थे। सुनते-सुनते वह माता बहुत रोने लगी। मैंने पूछा, आप क्यों रो रही हो? उसने कहा, यहाँ जो यज्ञ-कहानी सुना रहे हैं ना, उस ॐ-मंडली में मैं भी थी। मुझे एक मिनट के लिए भाई साहब से मिलवा दो। भाई साहब उस माता से मिले और बहुत प्यार से उसको स्टेज तक ले गये। उस माता ने कहा, बेगरी पार्ट के समय मैंने ज्ञान छोड़ दिया था और शादी कर ली थी। मैं रूप नगर में रहती हूँ। मेरे साथ उस समय जो क्लास में आती थीं वे सब दादियाँ बन गयीं, मैं अपने बच्चों की दादी बन गयी। इस तरह भाई साहब सबको सम्मान देते थे।

उनकी दिनचर्या

अगर उनका टाइम टेबल ज्यादा टाइट नहीं होता, सामान्य रूप से होता तो वे सुबह 3.00 बजे उठते थे। साढ़े तीन से साढ़े चार बजे तक नीचे क्लास हॉल में योग करने आते थे। लाल बत्ती खुद ही करते थे हॉल में। क्लास हॉल शक्ति नगर में ग्राउण्ड फ्लोर पर था। अगर भाई साहब का योग कराने का टर्न होता था तो वे सामने बैठकर योग कराते थे। एक-एक दिन सब का टर्न होता था। योग कराते समय उनके सामने हम सब चन्द्रमा के आकार में बैठते थे। योग कराने वे संदली पर बैठते थे। उस समय टेप नहीं बजती थी। योग के बाद 4.30 बजे कोई बहन जिसकी ड्यूटी लगी हुई होती थी, वो चाय लेकर आती थी और उनको मुरली सुनाकर जाती थी। पाँच से साढे पाँच बजे उनका स्नान का समय होता था। पौने छह या छह बजे कोई बहन दूध और पांच बादाम लेकर जाती थी। क्लास के बाद, दीदी एक दिन पहले ही सैट कर रखती थी और क्लास में आने वाले नये बाबा के बच्चों को भाई साहब से मिलाती थी 10-15 मिनट के लिए। वो समय होता था 8 से 9 बजे के बीच। वे सुबह 7.30 और 7.45 के बीच में नाश्ता कर लेते थे। नाश्ते में एक परोठा, उसके साथ दाल होती तो दाल, नहीं तो थोड़ी चटनी आदि ले लेते थे। रविवार के दिन गीता पाठशाला वाले, आस-पास के सेन्टर वाले आये होते थे तो उनसे भी उस दिन मिलते थे। उस समय अपने साथ किसी टीचर बहन को बैठने नहीं देते थे। एक-एक को मिलते थे।
उन दिनों भाई साहब विंग की सेवा करने की प्लान बना रहे थे। इसलिए डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, इलेक्ट्रिशियन्स इत्यादि से मिलते रहते थे। सर्दियों के दिनों में भाई साहब नौ बजे के बाद भी कई बार नीचे विजिटिंग रूम में ही बैठे रहते थे। मुझे कहते थे कि 10.30 बजे के ट्रैफिक कन्ट्रोल के गीत के बाद 8-10 लोगों के लिए संतरे और सेब छील करके ले आना, साथ में कटोरी में शहद भी लेकर आना। वहाँ आफिस में एक घंटी होती थी मन्दिर वाली। भाई साहब घंटी बजाते थे तो सब भाई-बहनें जहाँ भी हों, जो भी सेवा कर रहे हों, छोड़कर चले आते थे। उनको पता होता था कि यह भाई साहब ने ही घंटी बजायी है। एक-एक को दृष्टि देकर सेब और सन्तरे को शहद लगाकर खिलाते थे। सर्दियों में खासकर शहद लगाकर सन्तरा और सेब खिलाते थे।
लगभग 11.30 बजे भाई साहब को खाना देते थे। एक चपाती, सब्जी, थोड़ा-सा चावल, दाल और दही यह उनका खाना होता था। उनको परवल की सब्जी बहुत पसन्द थी। रोटी के साथ वे एक ही सच्जी खाते थे। भाई साहब कहीं बाहर गये होते और दिल्ली लौट आने तो उनके लिए हम खीर बनाते थे।
एक बार भाई साहब के टेलिफोन का बिल 3000/- रु, आया था। दीदी ने किसी व्यापारी भाई को बिल दिया और कहा, यह भाई साहब का टेलिफोन बिल है, आप भर दो। उसके बाद दीदी ने भाई साहब से कहा, देखिये इस महीने आपका टेलिफोन बिल 3000/- रु, आया है, बैठे-बैठे बातें ही करते रहते हैं क्या? भाई साहब कुछ नहीं बोले, चुपचाप सुनते रहे। हमारे में से एक बहन ने जाकर भाई साहब को कहा, भाई साहब, आप तो किसी से फालतू बातें नहीं करते, फिर भी दीदी क्यों आपको ऐसे बोल रही हैं? उन्होंने कहा, सही है ना, बिल भरना तो उनको पड़ता है ना! उनका कहना भी तो सही है ना! भाई साहब की बात ज़्यादातर बड़ी दादी जी से, गुलज़ार दादी जी से और मुंबई के रमेश भाई जी से होती थी। इनके बाद लन्दन बात होती थी जयन्ती बहन जी और दादी जानकी जी से।
एक बजे हम बहनों के भोजन के लिए घंटी बजती थी। कभी-कभी महीने में 1-2 बार छिपकर, बिना बताये आकर, हम बहनें भोजन कैसे करती है, शान्ति में रहकर बाबा की याद में करती हैं या बातचीत करती हैं- देखा करते थे। एक बार हम दीदी से ज्ञान की और सेवा की ही बातें करते खाना खा रहे थे। भाई साहब पीछे से हमारी बातें सुन रहे थे। अगले दिन ही डायनिंग हॉल में एक बोर्ड लगवा दिया दीवार पर कि 'ब्रह्मा भोजन दुःखभंजन भोजन है, शान्ति में बैठकर करना चाहिए।' बीच-बीच में हम लोगों को याद दिलाते थे। कहते थे, भोजन करने में 10 मिनट लगते हैं,क्या 10 मिनट शान्ति में रहकर भोजन नहीं कर सकते ? भोजन के बाद भी तो बाते कर सकते हैं। आपका तो ऐसा लगता है कि गाँधी जी का राउण्ड टेबल कॉन्फरेन्स हो रहा है। ऐसे हँसी-हंसी में समझाते थे।

ट्रिबुनल के ज्यूरियों में एक

हमें ऐसा लगता ही नहीं है कि भाई साहब गये हैं, अभी भी हमारे साथ हैं- ऐसा अनुभव होता है। कभी भी हंसी में भाई साहब बोलते थे कि धर्मराजपुरी में जब अष्ट रत्न बैठेंगे ना, मैं भी वहाँ बैठा रहूँगा, वहां मैं आप से मिलूंगा। मैं बाबा को बोलूंगा, बाबा, घर वालों को पहले सामने आने दो। साथ में रहने पर भी सुधरे नहीं। दीदी हंसी में कहती थी कि भाई साहब, घर वालों को तो थोड़ी-बहुत रियायत होनी चाहिए। वे कभी-कभी कहते थे, आपने अभी तक बाबा को पहचाना नहीं है, मैंने भी पूरा नहीं पहचाना। जितना ब्रह्मा बाबा ने बाबा को पहचाना, उतना हमारे में से किसी ने भी नहीं पहचाना। दीदी कहती थी, अगर आपने भी बाबा को जाना नहीं है तो इतनी पुस्तकें कैसे लिखी? मम्मा, ज्ञान की देवी, आपकी जीभ पर बैठी है, तो आप कैसे कह सकते हैं कि मैंने भी बाबा को पूरा जाना नहीं है? वे कहते थे, ब्रह्मा बाबा में कितना समर्पण भाव था, कितना उन्होंने बाबा को जाना था, यह विश्वकिशोर भाऊ जानते थे और मैं जानता हूं। ऐसी-ऐसी बातें वे हम बहनों को रात्रि क्लास में सुनाते थे। भाई साहब हमेशा बहनों को कहते थे सबके साथ चलो, सबको साथ लेकर चलो।"
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उनका सादगी, संयम-नियम, त्याग-तपस्या युक्त अनुशासन प्रधान जीवन था

दिल्ली, शक्ति नगर से ब्रह्माकुमारी रानी बहन जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने हृदयस्पर्शी अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं-
"लौकिक जन्मस्थान पानीपत है। बचपन से ही ज्ञान के सम्पर्क में आयी क्योंकि माता जी ज्ञान में चलती थी। रोज़ माता जी के साथ सेन्टर पर जाया करती थी। पिता जी सहयोगी थे, ज्ञान में नहीं चलते थे लेकिन सेन्टर पर जाने के लिए उन्होंने कभी मुझे मना नहीं किया। बचपन में ही रोज़ सुबह-सुबह उठकर सेन्टर पर जाना, खान-पान के नियम का पालन करना, सबके साथ अच्छा व्यवहार देख वे मुझ से बहुत प्रभावित थे और मुझे आगे बढ़ने में मददगार भी रहे। मेरी हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी हो गयी थी। एक दिन मैं करनाल गयी थी। उस समय दादी मनोहर जी ने पूछा कि आगे का तुम्हारा क्या प्लानिंग है? और पढ़ना चाहती हो या ट्रेनिंग लेना चाहती हो? देहली में कुमारियों की ट्रेनिंग होने वाली है, क्या तुम उस में जाना चाहती हो? मुझे तो लगन थी ही कि मुझे इन जैसा जीवन बनाना है। मैंने कहा कि ठीक है दादी, मैं जाऊँगी। दादी ने कहा, ठीक है, तुम अभी अपने लौकिक घर जाओ, वहाँ से अपना सामान लेकर देहली पाण्डव भवन जाओ। यह बात थी सन् 1978 की। मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई, गुलज़ार दादी जी ने मेरे से पूछा कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है? मैंने कहा कि मेरा लक्ष्य तो यही है कि ईश्वरीय सेवा करूँ लेकिन अभी मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है, कम-से-कम मुझे डिग्री पास करनी है इसलिए मुझे घर जाना पड़ेगा। दादी ने पूछा, पढ़कर क्या करोगी? अभी आपको बहुत अच्छा चान्स है अपने जीवन को ईश्वरीय सेवा में लगाने का, इसलिए लगा लो। गुलज़ार दादी जी की प्रेरणा ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला। गुलजार दादी जी से मेरा शुरू से जिगरी प्यार रहा है। इसलिए मैंने निश्चय किया कि मुझे यह जीवन ईश्वरीय सेवा में लगाना है। मैंने दादी जी से कहा कि दादी जी, अभी घर तो जाना पड़ेगा क्योंकि पिता जी से मैंने केवल 15 दिनों की छुट्टी ली थी और सर्दियों के दिन भी आने वाले हैं, मेरे पास गरम कपड़े भी नहीं हैं, जाकर ले आऊंगी। दादी जी ने कहा, उसके लिए जाने की कोई जरूरत नहीं, आपको यज्ञ से सब-कुछ मिल जायेगा।
दादी जी के कहने अनुसार मैं वहीं रहने लगी। दादी जी ने कहा कि पिता जी को पत्र लिखो, कुछ समय के लिए मैं यहाँ रह रही हूं। मैंने घर पर पत्र लिखा कि दादी जी की आज्ञा है कि कुछ दिन के लिए मैं यहाँ सेवा करूं इसलिए मैं दो महीने के बाद घर आऊँगी। लौकिक माता-पिता के सहयोग से मैं पाण्डव भवन में रहने लगी।

कुछ बहनें मुझे डराने लगीं

कुछ दिनों के बाद मुझे कहा गया कि आपको कमला नगर सेन्टर पर जाना है जहाँ जगदीश भाई और चक्रधारी बहन रहते हैं। उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जगदीश भाई कौन हैं, चक्रधारी दीदी कौन हैं। जब जाना तय हो गया तो पाण्डव भवन में किसी बहन ने मुझे बताया कि आप कमला नगर जा रही हो, वहाँ जगदीश भाई रहते हैं, वे बहुत स्ट्रिक्ट हैं। यह सुनकर मैं थोड़ा नर्वस हो गयी। फिर दादी गुलज़ार जी से कहा कि दादी किसी ने सुनाया कि जगदीश भाई ऐसे हैं, तो मुझे कहीं दूसरी जगह भेज दीजिये। दादी जी ने कहा, आपको दादी भेज रही है, किसी और की बात मत सुनना, कुछ हो गया तो आपके लिए दादी ज़िम्मेदार है, आप चिन्ता मत करो और चले जाओ। गुलज़ार दादी जी के कहने अनुसार मैं कमला नगर गयी।

अनुशासित जीवन

सेन्टर पर आकर देखा तो वहां बहुत अनुशासित जीवन था। जगदीश 'भाई साहब का जीवन भी अनुशासन वाला था और उनके साथ जो भी रहते थे वे भी अनुशासित थे। अगर अनुशासन से कोई थोड़ा भी ढीला रहता था, तो जगदीश भाई साहब को अच्छा नहीं लगता था। उदाहरण के तौर पर अमृतवेले योग के बाद कोर्ड सोता हो तो उनको अच्छा नहीं लगता था। कोई क्लास में देरी से आता है या समय पर खाना नहीं खाता वा समय पर रेस्ट नहीं करता तो उनको अच्छा नहीं लगता था। ऐसी स्थिति में वे हमे बुलाकर अपने पास बिठाकर बहुत प्यार से समझाते थे कि ऐसे नहीं करना है। दोपहर में सोना उनको अच्छा नहीं लगता था। वे कहते थे कि आप तो अभी छोटे हो, आपकी आयु छोटी है। यह आयु कुछ करने की है, कुछ दिखाने की है। इसलिए आप दिन में स्टडी करो, पुरुषार्थ करो। अगर कुछ थकावट लगती है तो कुर्सी पर बैठकर रेस्ट करो, सोना नहीं है। अभी से दिन में सोने की आदत पड़ गयी तो भविष्य में क्या करोगे? ख़ास कर नयी-नयी बहनों पर उनका ध्यान बहुत रहता था। उन दिनों कमला नगर में 9.30 बजे रात को लाइट बन्द कर देते थे। उस समय सबको सोना होता था। अगर कोई बहन लाइट बन्द होने के बाद भी बातचीत करती रहती थी तो भाई साहब पूछते थे कि क्या बात है, अभी तक बातें कर रहे हो? बातें करते-करते देर से सोयेंगे तो सुबह जल्दी उठ नहीं पायेंगे। इस प्रकार, उनका अमृतवेले योग पर बहुत ध्यान रहता था। मुझे यह अनुशासित जीवन अच्छा लगा, यह नहीं लगा कि यह बन्धन है। मुझे यह भी अनुभव हुआ कि अनुशासित जीवन में रहने से ही हमारा जीवन महान् बन सकता है।
लगभग तीन महीने मैं कमला नगर में रही। उन्हीं दिनों शक्ति नगर में मकान लेने की बात चल रही थी। मकान लेने के बाद चक्रधारी दीदी और भाई साहब ने कहा कि आप शक्ति नगर में रहो। तब से मैं शक्ति नगर सेवाकेन्द्र पर रहने लगी। शक्ति नगर वाले सेन्टर पर शुरू-शुरू में मैं अकेली रहती थी। उस बिल्डिंग में उस मकान वाले भी रहते थे। भाई साहब, एक बड़े भाई के नाते बहनों की कैसे रक्षा करनी होती है, कैसे उनका ध्यान रखना होता है, बहुत अच्छी तरह जानते थे। उस सेन्टर पर 6-7 महीने मैं अकेली रही, मकान वाले तो लौकिक वाले थे और उनकी भावना भी हमारे प्रति उतनी अच्छी नहीं थी। इसलिए भाई साहब रोज मेरे साथ रहने के लिए किसी-न-किसी बहन या माता को भेज देते थे ताकि मुझे डर न लगे। कुछ दिनों के बाद शक्ति नगर वाला मकान खाली हो गया था
उस मकान का जीणोंद्वार (रिन्यूवेशन) भी किया गया। कमला नगर में हम कब और कैसे स्थानान्तरित हुए, किसी को पता ही नहीं पड़ा। भाई माहब और कुछ भाई मिलकर रात में सामान तैयार रखते थे और सामने टेंट वालों का रिक्शा होता था, सुबह अमृतवेले उस में सामान भरकर शन्ति नगर सेन्टर पर भाई साहब और कुछ भाई मिलकर रोज़ थोड़ा-थोड़ा ले आते थे और मैं उसको बहाँ सैट करती थी। इस प्रकार हम कमला नगर में शक्ति नगर आ गये।

प्रशंसा कर उमंग बढ़ाना

भाई साहब में यह विशेषता थी कि किसी भाई या बहन ने कोई सेवा कर ली तो उसको देखकर वे अपनी खुशी प्रकट करते थे और उस व्यक्ति की प्रशंसा करते थे। ऐसा नहीं कि उस कार्य में कोई-न-कोई कमी ढूंढकर उसको शिक्षा दें। नहीं, वे प्रशंसा करके, उस की विशेषता का अहसास उस व्यक्ति को करा कर, उसको आगे बढ़ाते थे। जब शक्ति नगर सेन्टर के मकान का नवीनीकरण हो रहा था, पूरा नहीं हुआ था, एक ही कमरा तैयार हुआ था तब एक दिन सुबह आकर भाई साहब ने मेरे से कहा, आज शाम को गुलज़ार दादी जी आ रही हैं क्लास कराने। तब तक इस मकान की सफाई आदि करके तैयार करोगे? मैंने कहा, जी भाई साहब। मैं उतनी अनुभवी भी नहीं थी और आयु भी उतनी बड़ी नहीं थी लेकिन मन में यह था कि भाई साहब ने कहा है, दादी जी आ रही हैं तो कैसे भी करके सफ़ाई करके मकान तैयार करना है। मुझे जितना भी सुझा, जो भी समझ में आया वैसा किया। दादी जी के आने से 10 मिनट पहले भाई साहब ने आकर देखा और बहुत खुश हए। कहा, आप तो सेन्टर पर नयी-नयी हो, फिर भी कितना सुन्दर तैयार किया। इस प्रकार, उन्होंने मेरी प्रशंसा कर मेरा उमंग-उत्साह बढ़ाया।

हर टीचर बहन सर्व कलाओं से सम्पूर्ण हो

हर व्यक्ति, चाहे वह प्रवृत्ति-मार्ग का हो या सेन्टर पर रहने वाली समर्पित बहनें हों भाई साहब में सबको आगे बढ़ाने का गुण था। वे चाहते थे कि सेन्टर पर रहने वाली बहन हर तरह की सेवा में प्रवीण हो। उसको हर तरह की सेवा आनी चाहिए। समर्पित बहन सिर्फ ज्ञान सुनाने वाली एक टीचर ही नहीं है, वो विद्यार्थियों की माँ भी है, मार्गदर्शक भी और भाग्य बनाने वाली भी। वे कहते थे, हरेक टीचर बहन को भोजन बनाना, भोग बनाना और टोली बनानी आनी ही चाहिए। अगर आपको टोली बनानी नहीं आती तो अपने विद्यार्थियों को टोली कैसे खिलाओगे ? वे कहते थे, केवल ज्ञान से काम नहीं चलेगा, माँ जैसी पालना करने का गुण और स्वभाव भी चाहिए। वे, हम बहनों की ऐसी दिनचर्या बनाते थे कि हर बहन को सेन्टर की साफ-सफ़ाई भी करनी है, भोजन भी बनाना है, भोजन परोसना भी है, टोली भी बनानी है और ज्ञान भी सुनाना है। अगर कोई भी बहन केवल कर्मणा सेवा करती है और ज्ञान देने की सेवा नहीं करती है तो उनको अच्छा नहीं लगता था। पूछते थे कि क्या बात है, आज आपके मुख से कोई ज्ञान-रत्न नहीं निकला? वे कहते थे कि रोज़ किसी-न-किसी को कोर्स दें या ज्ञान सुनायें या मुरली सुनायें। सभी बहनों को आगे बढ़ाने का उनका बहुत लक्ष्य रहता था।

सेवा के लिए नयी भाषा सीखनी पड़े तो सिखा भी लेते थे

भाई साहब के जीवन में मैंने यह देखा कि वे चाहते थे कि बाबा का हर कार्य अच्छी रीति हो और सहज हो। जब रशिया की सेवा शुरू हुई और रशिया के भाई-बहनें यहां आने शुरू हुए तो मैं भी उनकी सेवा करती थी लेकिन उनके साथ बात करनी नहीं आती थी। भाई साहब के मन में आया कि रानी बहन को रशिया भेज दिया जाये, वहाँ जाकर रशियन भाषा सीखकर आयेगी तो उनकी सेवा और अच्छी तरह कर सकेगी। वे बार-बार चक्रधारी दीदी को कहते थे कि रानी बहन को रशिया भेजो। मुझे तो विदेश जाने का संकल्प न मन में था, न चित्त में। फिर भी भाई साहब के कहने अनुसार मैं रशिया में कुछ दिन रहकर आयी और कुछ हद तक रशियन भाषा सीखकर आयी। सन् 1989 में रशिया की सेवा हुई, मैं 1990 में गयी। दूसरी बार 1991 में गयी और तीसरी बार 2005 में गयी। जब पहली बार रशिया गयी तो छह महीने रहकर आयी। उसी समय रशियन भाषा सीखकर आयी। कुछ हद तक समझना तथा बोलना सीख लिया। मेरे भारत आने से पहले वहाँ दादी जानकी जी आयी थीं। रशियन भाषा बोलते हुए, वहाँ के लोगों के साथ सेवा करते हुए मुझे उन्होंने देखा तो चक्रधारी दीदी से कहा कि इसको यहीं रख दो रशिया में सेवा अच्छी होगी। चक्रधारी दीदी ने भाई साहब को यह बात सुनायी तो भाई साहब ने कहा कि आप भी वहाँ, सुधा बहन भी वहाँ और सन्तोषः बहन भी वहाँ तो यहाँ दिल्ली में कौन सेवा करेगा? उनको यहीं भेज दो। जब रशिया वाले यहाँ शक्ति नगर आते हैं और हम उनकी भाषा बोलते हैं तो वे अपनापन फील करेंगे।

हरेक को अपनेपन की भासना देना

भाई साहब की और एक विशेषता यह थी कि कोई बहन बीमार पड़ जाती थी तो वे खुद उसको अस्पताल ले जाते थे। जब मैं नयी-नयी सेन्टर पर आयी थी, कुछ समय के बाद मेरे शरीर में कमज़ोरी आने लगी। 'भाई साहब ने पूछा कि रानी बहन, क्या हुआ है, आप बहुत कमज़ोर लग रही हैं, चलो आज डॉक्टर के पास जाकर आयेंगे। वे खुद मुझे अस्पताल लेकर गये और चैकअप कराया। उसके बाद मैं उनके साथ मधुबन आयी तो उन्होंने बनारसी भाई से कहा कि रानी बहन कमज़ोर होती जा रही है, उसको पालनपुर लेकर जाओ और पूरी चेकअप कराकर आओ। इस प्रकार, वे बहनों को हर प्रकार से तन से, मन से और कर्म से तन्दुरुस्त देखना चाहते थे। अगर किसी बहन का चेहरा किसी कारण से उदास दिखायी पड़ता तो तुरन्त उसको अपने कमरे में बुलाकर, कारण पूछकर उसका निवारण करते थे। जैसे घर में मां-बाप बच्चों के दिल की बात पुछकर उनको हल्का करते हैं या साकार में ब्रह्मा बाबा यज्ञ में जैसे हर बच्चे को अपने पास बिठाकर उसकी समस्याओं का हल करते थे, वैसे ही भाई साहब ने भी हम बहनों की पालना की। हमने साकार बाबा की पालना तो नहीं ली लेकिन साकार बाबा की भासना और पालना, भाई साहब ने ज़रूर दी। इसलिए हमें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमने साकार मम्मा-बाबा की पालना नहीं ली।

अमृतवेले के महत्व का अहसास कराना

भाई साहब बहनों के पुरुषार्थ पर बहुत ध्यान रखते थे। वे रोज़ 2.30 बजे उठकर कमरे में योग या लिखाई पढ़ाई करते थे और 3.30 बजे नीचे क्लास हॉल में आते थे योग करने। अगर 3.30 बजे तक बहने नीचे नहीं आयी होती तो वे खुद ही घंटी बजाकर सबको जगाते थे और सामने बैठकर सबको योग कराते थे। अगर कोई बहन योग करने लिए अपने कमरे से नहीं निकली होती तो योग करके जाते समय उस बहन के कमरे के पास जाकर ॐ शान्ति, ॐ शान्ति कहते रहते थे। जब तक वो बहन कमरे से बाहर नहीं आती तब तक वहीं दरवाज़े के बाहर ॐ शान्ति कहते खड़े रहते थे। इस प्रकार, हम बहनों में ईश्वरीय संस्कार भरने का, बाबा के प्रति प्यार जगाने का कार्य करते थे। अमृतवेले योग के बाद वे खुद भी विश्राम नहीं करते थे और बहनों को भी करने नहीं देते थे। वे योग के बाद लिखे हुए मैटर को टाइप कराना या रिराइट कराना या अपना और कोई कार्य करते थे।

ईश्वरीय नियम-मर्यादाओं की समझानी

भाई साहब तीसरी मंज़िल पर रहते थे। दूसरी मंज़िल पर बहनें रहती थी, साथ में किचन और डायनिंग हॉल था। मुरली क्लास के समय कोई बहन सुस्ती हटाने के लिए चाय पीने किचन में आकर चाय बनाती थी तो पता नहीं भाई साहब को कैसे पता पड़ जाता था, वे किचन में आ खड़े हो जाते थे। उस बहन को पता ही नहीं पड़ता था। जब वह बहन मुड़कर देखती थी तो भाई साहब को खड़े देखकर घबरा जाती थी। वे कहते थे कि चाय पीने के लिए मना नहीं है लेकिन जब मुरली चल रही है, उस समय मुरली छोड़कर खाना-पीना, यह अच्छा नहीं है। यह तो भगवान की मुरली के लिए डिसरिगार्ड है। जो भी पीना है, करना है वो मुरली शुरू होने से पहले करना चाहिए। इस प्रकार, वे हमें ईश्वरीय नियम, मर्यादाओं और संस्कारों के बारे में समझाते थे।
जब सर्दी आती थी तो भाई साहब सब बहनों को खास गरम चीजें खिलाते थे। सन्तरे, सेब आदि मंगाकर उनको शहद लगाकर खिलाते, घी मंगाकर हर बहन को एक-एक किलो घी एक डिब्बे में डालकर देते थे और कहते थे कि आप कैसे भी नाश्ते में या भोजन में घी खा लेना या दूध में डालकर पीना। जब गरमी आती थी तो सबको आमरस या रसना आदि ठंडा पेय बनवाकर पिलाते थे। कहते थे, आप सेवा करने वाली बाबा की शक्ति सेना हो, आप तन से और मन से दुरुस्त रहेगी तो बाबा की सेवा वृद्धि को पायेगी। इस प्रकार वे खिला-पिला कर स्थूल पालना और रात्रि में ज्ञान-योग की सूक्ष्म पालना देते थे।

सन्तुलित व्यक्तित्व

भाई साहब में नेम (नियम) और प्रेम का बहुत बैलेन्स था। वे हम लोगों को प्यार भी उतना ही देते थे और उतनी ही नियम-मर्यादायें भी सिखाते थे। अगर किसी बहन से कोई गलती हुई हो तो अकेली को अपने पास बुलाते थे, उसकी ग़लती का अहसास कराते थे और आगे के लिए सावधानी देते थे। किसी बहन का किसी बात पर मनमुटाव हुआ है और वो रूस करके, मूड ऑफ करके खाना-पीना छोड़कर कमरे में बैठी हो तो भाई साहब खुद उसके पास जाकर उसको मनाते थे और कहते थे कि आप भगवान को भोग नहीं लगाओगे? उसको नहीं खिलाओगे? ऐसी-ऐसी बातें सुनाकर उसको हंसाकर खाना खिलाते थे। वे बहुत गंभीर भी रहते थे और साथ-साथ बहुत रमणीक भी। शुरू-शुरू में, मैं समझती थी कि वे कभी हंसते नहीं हैं लेकिन जैसे-जैसे उनके नज़दीक गयी तो पता पड़ा कि वे इतना हंसते हैं और हँसाते हैं कि हँस-हँसकर उनकी आँखों में आंसु आ जाते हैं। हमें लगता था कि ये इतना क्यों हंसते हैं!
जैसे छोटों के प्रति प्यार और ध्यान रहता था वैसे बड़ों के प्रति बहुत सम्मान और स्नेह रहता था। दादी गुलज़ार के प्रति उनको बहुत सम्मान था। जब भी वे दिल्ली में रहती थीं तो सब बहनों को उनके पास ले जाकर कहते थे, दादी, इन बहनों से मिलिये, ॐ शान्ति कहिये। उनके मन में रहता था कि सब बहनें दादियों की नज़रों में रहें, उनकी पालना और प्यार पायें। कभी-कभी भाई साहब गुलज़ार दादी जी को फोन करके कहते थे, दादी, आज आप शक्ति नगर की बहनों के साथ नाश्ता करना, भोजन करना। हम सब बहने अपना-अपना खाना टिफिन में भरकर पाण्डव भवन जाते थे और दादी जी के साथ नाश्ता या भोजन करते थे। हम सबको भेजकर खुद सेन्टर पर रहकर सबकुछ करते थे। इस प्रकार उन्होंने हम बहनों को न सिर्फ अपनी पालना दी परन्तु दादियों की पालना भी दिलायी और उनके अंग-संग रहने का भाग्य भी प्राप्त कराया।

चंचलता उनको अच्छी नहीं लगती थी

भाई साहब को किसी की चंचलता अच्छी नहीं लगती थी। मान लीजिये कि हम उनके कमरे में गये। हम बैठे हैं, भाई साहब फोन पर किसी से बातें कर रहे हैं। वहाँ टेबल पर कुछ पेपर्स या कुछ चीजें पड़ी हैं, हम उनको उठाकर देखते हैं या पढ़ते हैं तो उनको अच्छा नहीं लगता था। बाद में कहते थे कि क्या आप में दो मिनट शान्ति से बैठने की स्थिरता नहीं है? एक फटा हुआ काग़ज़ का टुकड़ा भी वहाँ पड़ा हुआ हो तो उसको उठाकर भी नहीं देखना है। अपनी कर्मेन्द्रियों को संयम में रखो। वे हमें सिखाते थे कि बड़ों के सामने कैसे बैठना है, उनसे कैसे बातें करनी हैं और उनके सामने कैसे खड़े होना है। भाई साहब ने हमें बहुत सिखाया। उनसे हमने पाया ही पाया है। आज मैं डेरावाल सेन्टर पर रहती हूँ। उस सेन्टर को भाई साहब ने खुद खड़े होकर बनवाया। भले ही वे तन से यहां नहीं हैं लेकिन मैं अभी भी यह अनुभव करती हूं कि वे हमें पग-पग पर डायरेक्शन देते रहते हैं, मार्गदर्शन करते रहते हैं।
उनके अन्दर बचत का संस्कार बहुत था। वे एकॉनामी के अवतार थे। अपने लिए कम-से-कम लगाते थे और सेवा के प्रति सब-कुछ। उसमें भी उनका लक्ष्य रहता था कि कम खर्च बाला नशीन; ख़र्चा कम हो और सेवा ज्यादा हो। उन्होंने अपना जीवन सादगी का जीया। मुझे याद आता है, जब वे बीमार हुए थे तब दादी जानकी जी ने बार-बार फोन करके उनको लन्दन बुलाया था। वहाँ वे नौ महीने रहे। वहाँ से जब वे मुंबई आये तो मैं उनसे मिलने गयी। उन्होंने मुझे कहा कि पता नहीं आप फिर बंबई कब आओगी, अभी आयी हो, बंबई तो देख लो, सेन्टर तो देखकर आओ।मैंने कहा, भाई साहब, मैं आपको देखने आयी हूँ, ऐसे समय पर बंबई घूमना अच्छा थोड़े ही लगता है? आपके पास रहना छोड़कर, मैं बंबई घूमने जाऊँगी तो लोग क्या समझेंगे? कहते थे, ऐसी बात नहीं है, आप घूमने थोड़े ही जा रही हो? सेन्टर पर जाओगी, क्लास कराओगी, क्लास के भाई-बहनों को अनुभव सुनाओगी तो सेवा हो जायेगी ना! साथ-साथ थोड़े बहुत दर्शनीय स्थल देखकर के भी आ जाना। अस्पताल में रहते हुए कई सेन्टरों पर उन्होंने फोन किये और कहा कि रानी बहन आयी हुई है दिल्ली से। वो अच्छी क्लास कराती है, क्लास भी कराना और थोड़ा बहुत वहां का एरिया दिखा देना। एक हफ़्ता वहाँ रहकर मैं दिल्ली वापस आयी।
समाचार आया कि भाई साहब दिल्ली आ रहे हैं। उनके कमरे में ए,सी, (Air Conditioner) नहीं था, सिर्फ कूलर था। मुझे कहा गया था कि भाई साहब को कमज़ोरी बहुत है, उनको इन्फेक्शन न हो इसलिए उनके कमरे में ए,सी, लगाया जाये। डेरावाल सेन्टर पर उनके कमरे में ए,सी, लगवाया लेकिन पता पड़ा कि भाई साहब डेरावाल नहीं, शक्ति नगर आयेंगे। दिल्ली छोड़े साल भर हो गया था। हमने डेरावाल में लगे ए,सी, को शक्ति नगर ले जाकर उनके कमरे में लगवा दिया, कार्पेट आदि बिछाया। उनके वहाँ होते हुए ये सब नहीं कर सकते थे क्योंकि वे करने नहीं देते थे। उनकी मर्जी के खिलाफ हम कुछ नहीं कर सकते थे। वे आये शक्ति नगर। गुलज़ार दादी जी ने कहा, जगदीश भाई बहुत कमज़ोर हैं, चढ़कर तीसरी मंज़िल पर कैसे जायेंगे? इसलिए उनको नीचे ही रखा जाये। नीचे ऐसा कोई कमरा नहीं था जिसमें कोई ए,सी, हो। चक्रधारी दीदी का एक कमरा था उसमें ए,सी, नहीं, कूलर लगा हुआ था। चक्रधारी दीदी उन दिनों रशिया में थीं तो दादी जी ने कहा, इनको उसी कमरे में रखो। फिर मैंने दीदी के कमरे को ही तैयार कर दिया। भाई साहब को यह मालूम नहीं था कि उनको चक्रधारी दीदी के कमरे में रहना है। जब उनको कहा गया तो उन्होंने कहा कि यह तो बहनों का कमरा है, बहनों के कमरे में मैं कैसे रह सकता हूँ? मैं ऊपर ही चला जाऊँगा। गुलज़ार दादी जी ने कहा कि आपको यहीं रहना है। फिर दादी जी के कहने अनुसार वे उस कमरे में रहे लेकिन उस एक दिन के लिए। रात को चुपचाप किसी को बताये बगैर अपने कमरे में चले गये ऊपर। जाकर देखा तो वहाँ कार्पेट बिछाया हुआ था, ए,सी, लगा हुआ था। उस दिन तो चुपचाप रहे, अगले दिन डेरावाल सेन्टर पर सारी दिल्ली की तरफ़ से भाई साहब के स्वागत का कार्यक्रम था। उसमें गुलज़ार दादी जी और सब बड़ी बहनों को भी आना था। दादी जी ने मेरे से पूछा कि चक्रधारी बहन नहीं है, हम यह प्रोग्राम रखना चाहते हैं, आप करोगी? मैंने कहा, जी दादी, हम करेंगे। एक दिन में दिल्ली के सब भाई-बहनों को फोन किया और सब तैयारी कर ली। रात को भाई साहब को यह समाचार सुनाने के लिए मैं उनके कमरे में गयी और कहा कि भाई साहब, कल दिल्ली वालों की तरफ़ से आपका वेलकम प्रोग्राम है, इसमें गुलज़ार दादी जी भी आयेंगी। भाई साहब ने सुना और पूछा,यह ए,सी, किसको पूछकर लगवाया है? कार्पेट बिछाने के लिए किसने कहा? मैंने कहा, भाई साहब, ए,सी, और ये कार्पेट बिछाने की सेन्टर के भाई-बहनों की इच्छा थी, उन्होंने किया है। उन्होंने पूछा, मुझे क्यों नहीं बताया? मैंने कहा, भाई साहब, सारा जीवन हम आपकी मर्जी से चले, अभी तो हमें अपनी मर्जी से कुछ करने दीजिये। यह भी हमने अपनी मर्जी से नहीं किया, गुलज़ार दादी जी की आज्ञा अनुसार किया है। यह सुनकर उस समय तो वे चुप हो गये। प्रोग्राम पूरा होने के बाद भाई साहब ने दादी गुलज़ार जी को ये सब बातें सुनायीं। उन्होंने कहा कि क्या हुआ? समय अनुसार और तबीयत अनुसार सुविधा लेनी पड़ेगी ना? भाई साहब चुप हो गये। अगले दिन सबसे पहले कार्पेट उठवा दिया, उसके बाद ए,सी,हटवा दिया और उसको चक्रधारी दीदी के कमरे में लगवा दिया। उनके लिए एक ए,सी, गाड़ी ली गयी थी क्योंकि डॉक्टर के पास जाना-आना होता था लेकिन उस गाड़ी में बैठे नहीं। उन्होंने कहा, मैंने सारा जीवन सादगी में बिताया है, अभी अन्तिम समय अपने प्रति साधन नहीं इस्तेमाल करूंगा। मुझे ये सब नहीं चाहिएँ।
जो कुछ भी बाबा के नाम से उनको मिलता था, उन्होंने कभी अपने प्रति नहीं लगाया, सिर्फ बाबा की सेवा में ही लगाया। इस प्रकार उनका सादगी का, संयम-नियम का, त्याग तपस्या का और अनुशासन प्रधान जीवन था।
प्रश्नः उनका पुरुषार्थ कैसा था?
उत्तरः उनका पुरुषार्थ गुप्त था। वे किसी को दिखाते नहीं थे। वे रोज़ सुबह दो बजे उठते थे। अमृतवेले का योग कभी मिस नहीं करते थे। दिन में वे एक घंटे से ज़्यादा रेस्ट नहीं करते थे। उनकी दिनचर्या निर्धारित समय अनुसार ही चलती थी। अपने पुरुषार्थ की बातें हम से शेयर नहीं करते थे लेकिन हमें महसूस होता था कि उनका पुरुषार्थ गुप्त और निरन्तर है इसलिए वे हमें योग, सेवा, धारणा और ज्ञान के अनुभव कराते थे।
प्रश्नः क्या वे ढाई बजे से ही योग करने बैठते थे?
उत्तरः ढाई से साढ़े तीन बजे तक उनका योग का समय होता था लेकिन कई बार वे जब योग करने बैठते थे तो थोड़े समय के बाद ही कुछ नोट करना शुरू कर देते थे। हम पूछते थे तो कहते थे कि बाबा मुझे कुछ टचिंग दे रहे हैं, कुछ बोल रहे हैं, कुछ कह रहे हैं उसको नोट कर रहा हूँ। उसके बाद 3.30 से 4.30 बजे तक सबके साथ योग करते थे। उसके बाद, अमृतवेले बाबा से सुनकर जो नोट किया रहता था, उसके आधार पर कुछ लिखते थे, बाद में हम बहनों से उस लिखत को फेयर करवाते थे।
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वे एक ही थे, एक ही हैं और एक ही रहेंगे

रूस के सेन्ट पीटर्सबर्ग एवं उससे सम्बन्धित सेवाकेन्द्रों की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी सन्तोष बहन जी, भ्राता जगदीश जी के बारे में अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं-
"भाई साहब से मेरा सम्पर्क रहा सन् 1983 से। मुझे उनके बारे में कुछ पता नहीं था कि वे क्या हैं, क्या करते हैं। जब भी मैं उनसे मिलती थी, मुझे यह अनुभव होता था कि वे सिर्फ एक ही व्यक्ति या वस्तु को नहीं देख रहे हैं। जब हम किसी की तरफ देखते हैं तो उस एक वस्तु या एक व्यक्ति को ही देखते हैं, उसके आजू बाजू क्या है, क्या हो रहा है, यह बहुत कम देखते हैं लेकिन जगदीश भाई साहब देखते थे तो ऐसा लगता था जैसे लेज़र बीम चारों तरफ फैल रही है। उनको चारों तरफ की वस्तुएं और व्यक्ति तथा कार्य-कलाप दिखायी पड़ते थे। अगर वे एक ही व्यक्ति को देख रहे हैं तो उसके चरित्र के बारे में, उसकी सोच के बारे में, उसके संस्कारों के बारे में बहुत जल्दी अनुभव कर लेते थे। इससे मुझे अहसास हुआ कि उनकी एकाग्रता बहुत अच्छी है। जैसे-जैसे मैं उनके समीप गयी, ज्ञान की गहराई में गयी तो मुझे महसूस हुआ कि वे बहुत गहराई से आत्म-स्थिति का अभ्यास करते थे। ऐसा नहीं, सिर्फ योग करते समय या फ्री समय में ही आत्म-स्थिति का अभ्यास करते थे, नहीं। बात करते हुए भी, हँसते और हँसाते हुए भी वे आत्म-स्थिति का अभ्यास करते थे।
राजोरी गार्डन सेन्टर पर रहते हुए मुझे छह मास बीत गये थे। उन दिनों दिल्ली में एक बड़ा प्रोग्राम होने वाला था यूथ का, जिसकी ज़िम्मेदारी जगदीश भाई साहब ने ली थी। किसी कार्यवश वे राजोरी गार्डन सेन्टर पर आये हुए थे। उस समय उन्होंने मुझे देखा। दादी रुकमणि जी से उन्होंने कहा कि दादी, हमें एक इंग्लिश हैण्ड चाहिए, आप इनको कुछ दिनों के लिए हमें दे दो। दादी ने कहा, भले ले जाओ। तब मेरा शक्ति नगर सेन्टर आना हुआ। यह थी सन् 1984 की बात। रूस में सेवा शुरू हुई तो मुझे सन् 1990 में वहां भेजा गया।

कभी किसी की टीका-टिप्पणी नहीं की

जगदीश भाई साहब कभी किसी की ग्लानि नहीं करते थे। जिस किसी में कोई भी अच्छाई है, उसकी वे प्रशंसा करते थे। उसकी विशेषता का उपयोग बाबा की सेवा में कैसे करें यह सोचते थे। एक गुरु ने शरीर छोड़ा था, उनके बेटे गद्दी पर बैठने वाले थे। भाई साहब ने हम बहनों को तैयार करके उस कार्यक्रम में भेजा। कहा कि आप जाओ, अभी जो नया गुरु बनने वाला है, उससे आपको क्या अनुभव होता है, देखो। वे वाहते थे कि किसी व्यक्ति से जो भी प्राप्त हो सकता है, उसे लिया जाये, उसे परखा जाये और उसे देख हमारे में जो भी कमी है, उसको मिटाया जाये। उन्होंने कभी किसी सन्त महात्मा पर टीका-टिप्पणी नहीं की। वे कहते थे कि उन्होंने भी परमात्मा के लिए त्याग किया है, तपस्या की है, उनमें जो विशेषता है, उसकी हमें कदर करनी चाहिए। ऐसे लोगों से वे मिलते थे, कार्यक्रमों में बुलाते थे और आगे भी उनसे सम्बन्ध रखते थे।

वे बहुत दूर का सोचते थे

वे इतने एकाग्रचित्त रहते थे कि उनसे छोटी-छोटी बातें भी मिस नहीं होती थी। वे हर बात को दूर से सोच लेते थे। हम सोचते हैं तो एक या दो साल आगे की सोचते हैं लेकिन भाई साहब दस साल आगे का सोचते थे। आपको एक छोटा-सा मिसाल सुनाती हूँ। शक्ति नगर सेवाकेन्द्र के कनेक्शन से एक स्थान पर सेवा शुरू हुई। वहाँ मुझे कोर्स कराने के लिए भेजा गया, एक बहन भी मेरे साथ भेजी गयी। वो बहन जिज्ञासुओं को कोर्स कराती थी, मैं योग कराती थी, बाद में मुरली सुनाती थी। एक दिन कोर्स करने वाले एक भाई ने मेरे से प्रश्न पूछा। मैंने उस प्रश्न का कुछ उत्तर दिया और कुछ के लिए कहा कि कल देंगे। अगले दिन वहाँ मैं नहीं गयी, दूसरी बहन गयी। उस बहन से उस व्यक्ति ने पूछा कि कल वाली बहन कहाँ है, उन्होंने कहा था कि प्रश्न का उत्तर कल दूँगी। यह बात जब भाई साहब तक पहुंची तो उन्होंने कहा कि जब आपको पता ही नहीं था कि कल मैं आऊँगी या नहीं, फिर आपने कहा ही क्यों कि मैं कल बताऊँगी? है तो एक छोटी-सी बात लेकिन भाई साहब के कहने का भाव या कि हर बात हमें सोच-समझकर बोलनी चाहिए। ऐसे हमने उन में सैकड़ों उदाहरण देखे। विदेश की सेवा के बारे में वा शक्ति नगर के सम्बन्धित सेवाकेन्द्रों की सेवा के बारे में, उनकी जो सोच थी, वह बहुत दूरान्देशी होती थी। उनकी बुद्धि सात फूट की क्या, हज़ार फूट लम्बाई की थी। मैं समझती हूँ, इस विशाल बुद्धि का आधार निरन्तर आत्म-स्मृति थी।

ज्ञान में गहन, व्यवहार में सूक्ष्म और स्वभाव में साक्षी

सादगी के बारे में बताना हो तो, उसमें भी बाह्य व्यक्तित्व के शो के बारे में बताना हो तो, उन्होंने कभी उस पर विश्वास नहीं किया। वे कहते थे, भगवान का ज्ञान, पवित्रता और अन्दर की रॉयल्टी, यही आपकी पर्सनालिटी है। उसी से हमें दूसरों पर रुहानी प्रभाव डालना है। जब बात आती है उनके व्यवहार की, उनके स्वभाव की तो उसमें सादगी का बहुत अच्छा रूप था।
आप उनकी बात सुनेंगे तो एक बार में मालूम नहीं पड़ेगा कि आप से वे क्या कहना चाहते हैं। वे कभी मुरली पढ़कर सुनाते थे तो एक लाइन में एक घण्टे तक समझाते थे। हम समझते थे कि बाबा ने यह बात सहज रूप से कही है लेकिन भाई साहब उस एक बात की गहराई में ले जाकर हम बहनों के सामने एक घण्टे तक विवरण करते थे। उनके तो ज्ञान में गहनता, व्यवहार में सूक्ष्मता और स्वभाव में अति साक्षी स्थिति थी।

वे विघ्नविनाशक श्री गणेश थे

गणेश जी का नाम भक्ति में भी बहुत प्रसिद्ध है। धार्मिक और सामाजिक शुभ कार्यों में उसकी पूजा की जाती है। हमने यह देखा कि यज्ञ में कोई विघ्न आया या समस्या आयी, राय देने वाले या समझाने वाले बहुत थे लेकिन उसको विधिवत् समझ करके दूर करने वाले, हल करने वाले या समाधान करने वाले वे एक ही थे, इस में उन्होंने महारत हासिल की थी।
उनका स्वभाव था कि हरेक कार्य अर्जेन्ट होना चाहिए। आप कल तक नहीं टाल सकते। वे हमेशा कहते थे, टालना माना खतरा (पोस्टपोनमेण्ट ईज़ डेंजर)। अगर कोई काम कल पर छोड़ेंगे तो वो हमारे लिए डबल प्रोब्लम बन जायेगा। यह विशेषता उनमें थी। कोई भी बात को वे छोटा नहीं समझते थे। अगर वो समस्या है तो उसको जल्दी से जल्दी खत्म करना है। उनकी एक विशेष विशेषता यह भी थी कि उस समस्या का विस्तार देखते थे और उस विस्तार का कारण कौन है, उसे ढूंढकर उस व्यक्ति को ठीक करते थे। उस समस्या से सम्बन्धित व्यक्ति या व्यक्तियों से मिलकर, उनसे बातचीत करके उस समस्या का निवारण करते थे। बिना खर्च और बिना मेहनत हर समस्या का समाधान करने का प्रयास करते थे। मैं समझती हूँ इस गुण के कारण भगवान ने उनको विघ्नविनाशक का टाइटिल दिया है।

वे सामने वाले के संकल्प को भी पढ़ लेते थे

उनके हर कर्म में विशेषता थी। अगर वे किसी को देख रहे होते तो साथ-साथ उसके संकल्प को भी पढ़ रहे होते, उसकी फीलिंग्स को भी समझ रहे होते। इसके कारण कईयों को लगता था कि वे गंभीर हैं। उनके नज़दीक जाने पर ही यह अनुभव होता था कि ज्ञान स्वरूप होते हुए भी वे खुशी का, सरलता का और रमणीकता का स्वरूप हैं।

उनमें यज्ञ के प्रति वफ़ादारी और कटिबद्धता स्पष्ट दिखायी पड़ती थीं

अगर कोई व्यक्ति उनसे सहयोग माँगता लेकिन उसका मक़सद सही नहीं होता, ज्ञानस्वरूप नहीं होता और दूसरों के प्रति उसका भाव अच्छा नहीं होता अर्थात् वह ईमानदार और सच्चा नहीं होता तो भाई साहब उसका साथ कभी नहीं देते थे। स्पष्ट रूप से सीधा मना कर देते थे। ऐसे नहीं कि सामने एक और पीछे एक। वे सत्यवादी के साथ-साथ स्पष्टवादी भी थे। अगर उस व्यक्ति की मान्यता उनके बारे में बदल जाये, तो भी वे परवाह नहीं करते थे। यह भगवान के प्रति, यज्ञ के प्रति उनकी वफादारी और कटिबद्धता दर्शाती है। ये गुण लगातार उनमें देखने में आते थे। ज्ञान में अच्छी तरह चलने और उसको धारण करने में भाई साहब से मुझे अच्छी तरह प्रेरणा मिलती रही।

वर्गीकरण सेवा-योजना के लिए उन्होंने दो सालों तक लगातार मेहनत की

सन् 1983 से पहले, एक बार बाबा ने कहा था कि हर वर्ग के फूलों का गुलदस्ता तैयार कर बाबा के सामने ले आओ। वह मुरली सुनने के बाद भाई साहब की बुद्धि चलने लगी और योजना बनाना शुरू किया। योजना तो बाबा के बहुत बच्चे कर रहे थे लेकिन जगदीश भाई साहब ने इसकी ज़िम्मेवारी उठायी। पहले इन विविध वर्गों के बाबा के बच्चों की छोटी-छोटी मीटिंग बुलाकर, उनका संगठन तैयार कर एकत्रित किया और ये विंग बनाये। इन्हें बनाने के लिए उन्होंने दो सालों तक लगातार मेहनत की।
वे हम बहनों को कहते थे कि आप ऐसे कर्म करो जो आपके जाने के बाद भी लोग आपको याद करें। हमें वे बार-बार कहते थे कि 'जब मैं चला जाऊंगा, आपको मेरी ये बातें बहुत याद आयेंगी। मैं यह सोचती नहीं हैं कि वे नहीं हैं। वे अपने प्रेम से, शक्ति से, पालना से, सेवा से, कर्म से, व्यवहार से हमें अपनी उपस्थिति का आभास दिलाते हैं। हम कहते हैं ना कि बाबा जैसा, मम्मा जैसी, दादी जैसी अन्य कोई नहीं है, वैसे ही जगदीश भाई साहब जैसा दूसरा कोई नहीं है। वे एक ही थे, एक ही हैं और एक ही रहेंगे।
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उन में लव और लॉ का सन्तुलन बहुत जबर्दस्त था

रूस के मास्को तथा उसके आस-पास के सेवाकेन्द्रों की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी सुधा बहन जी, जगदीश भाई के साथ के लम्बे समय के अपने संस्मरण इस प्रकार सुना रही हैं-
"सन् 1968 में मुझे यह ज्ञान दिल्ली, कमला नगर से मिला। यह मेरा सौभाग्य है कि हमारा घर दिल्ली, कमला नगर में ही था। जिस समय हम ज्ञान में आये, उस समय कमला नगर सेन्टर पर दादी गुलज़ार जी रहती थीं। उनके साथ भ्राता जगदीश जी तथा चक्रधारी दीदी रहते थे। इनके अलावा वहाँ और कई भाई रहते थे, जैसे सत्यनारायण भाई, बलदेव भाई इत्यादि क्योंकि ईश्वरीय विश्व विद्यालय का प्रकाशन विभाग वहीं पर था। जब मैं ज्ञान में आयी, मेरी आयु 14 साल की थी। मेरी पढ़ाई सन् 1976 में पूरी हुई।
परीक्षा पूरी होने के बाद मैंने पिता जी से कहा कि मुझे आश्रम पर जाना है, तो उन्होंने कहा, भले जाओ। मैं वहां गयी। जाते ही मैंने सेन्टर पर दादी गुलज़ार जी, दीदी चक्रधारी जी और भ्राता जगदीश जी को देखा। जैसे ही उनको देखा, मन में आया कि मुझे भी इन जैसा बनना है। छुट्टियो के बाद फिर स्कूल खुले, मैं स्कूल जाने लगी। रोज़ सेन्टर पर नहीं जाती थी परन्तु हर रविवार ज़रूर जाती थी।
उस समय सेन्टर पर चालीस, बड़ी और छोटी कुमारियाँ आती थीं। रक्षा बन्धन आने वाला था। जगदीश भाई जी ने मेरे से पूछा, देखो, वह गीत है और अभी रक्षाबन्धन का त्योहार होगा, हम पब्लिक प्रोग्राम करेंगे तो आपस में मिलकर, यह गीत गा सकती हो? मैंने गीत देखा और कहा, हां, हम गा सकती हैं और सामूहिक गीत के रूप में भी प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने पूछा, कैसे कर सकते हो, दिखाओ। वहाँ छोटी-छोटी कुमारियाँ थीं, उनको लेकर मैंने थोड़ा रिहर्सल दिखा दिया। भाई साहब को बहुत अच्छा लगा। गीत था, 'पवित्र बन, पवित्र बन, माँ भारती पुकारती।' नौ कुमारियों के ग्रुप ने सफेद फ्रॉक और रिबन आदि पहनकर डान्स किया तो सबको बहुत पसन्द आया। वह गीत इतना जनप्रिय हो गया कि कम-से-कम सौ बार उस डान्स का प्रदर्शन किया गया। दिल्ली के सब सेन्टरों पर और मधुबन में भी इस डान्स का प्रदर्शन हुआ। इस तरह से मेरे ज्ञान का बचपन शुरू हुआ।
एक दिन जगदीश भाई साहब ने मेरे से पूछा कि अगर आपको मैं कोई लिखने का काम दूँ तो लिखोगी? मैंने कहा, हाँ, फेयर करके दूंगी। उस दिन से उनका लिखा हुआ मैटर फेयर करके देने की सेवा करने लगी। पहले-पहले फेयर करने की सेवा देते थे, उसके बाद डिक्टेट कराते थे, मैं सीधा लिख लेती थी। उसके बाद ज्ञानामृत के लेख तथा ईश्वरीय साहित्य की प्रूफ रीडिंग की सेवा देने लगे। इसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-व्यवहार की सेवा दी। भाई साहब के साथ मैंने बहुत सेवा की, एक-एक दिन चौदह-चौदह घण्टे भी सेवा की।

भाई साहब ने टोली खिलायी और शाबाशी दी

मुझे ज्ञान में आये दो साल हुए थे, गुलज़ार दादी जी पाण्डव भवन चली गयीं। उस समय चक्रधारी दीदी कहीं बाहर जाने वाली थीं तो उन्होंने कहा कि मैं एक हफ्ता बाहर जा रही हूँ, मेरे आने तक तुमको सेन्टर में रहना है। तुमको रोज़ मुरली सुनानी है और आये हुए जिज्ञासुओं को कोर्स कराना है। मैंने कहा, ठीक है। मैं कोर्स कराने की तैयारी करने लगी। उन दिनों सुबह की क्लास साढ़े पाँच बजे शुरू होती थी। क्लास में आने वाले भाई-बहनें तो बाबा के पुराने बच्चे थे, वे मेरे माता-पिता की उम्र वाले थे। वहाँ यह रिवाज़ था कि मुरली सुनाने से पहले, थोड़ा क्लास कराया जाता था, बाद में मुरली। मैं छोटी होने के कारण, क्लास वाले भी बहुत प्यार करते थे। वहाँ की क्लास फुल होती थी। मुरली सुनाना शुरू किया और आधे घण्टे में मुरली पूरी हो गयी। मैं हैरान हो गयी क्योंकि दीदी तो एक घण्टे में मुरली पूरी करती थी लेकिन मेरी तो आधे घण्टे में पूरी हो गयी। फिर मैंने भाई-बहनों से पूछा कि दूसरी मुरली भी पढ़ लें ? उन्होंने कहा, हाँ, पढ़ लो। मैंने पढ़ ली। क्लास के भाई-बहनें बहुत खुश हो गये, मेरी बहुत प्रशंसा करने लगे कि आपने बहुत अच्छी मुरली सुनायी। कुछ भाई-बहनों ने जगदीश भाई जी के पास जाकर भी बता दिया कि यह कुमारी तो बहुत बढ़िया मुरली सुनाती है। मुझे तो पता नहीं था कि मैंने क्या पढ़ा, कैसे पढ़ा। लेकिन क्लास के भाई-बहनों के समर्थन ने मेरा उमंग-उत्साह बहुत बढ़ा दिया। फिर जगदीश भाई जी ने टोली खिलायी,शाबाशी दी। क्लास पूरी ही हुई थी कि एक कोर्स वाला आ गया। पहले ही मैंने एक पर्ची में प्वाइंट्स नोट करके रखे थे, वो उसको सुना दिये। उसके बाद दूसरा आया, उसके बाद तीसरा, फिर चौथा। पहले दिन ही मैंने दिन के बारह बजे तक चार लोगों को कोर्स कराया। इस प्रकार, सेन्टर की सेवा के साथ-साथ मेरी लौकिक पढ़ाई भी चलती रही। मेरी कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो गयी, यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगी लेकिन अलौकिक पढ़ाई तथा सेवा में बहुत रुचि पैदा हो गयी थी। ज्ञान सुनाना, योग कराना, ड्रामा, डान्स सिखाना, कार्यक्रमों का आयोजन करना, कर्मणा सेवा तथा ऑफिस के काम करना सब प्रकार की सेवा करने को मिली।

भाई साहब काम के बहुत पक्के थे

भाई साहब बड़े कमाल के व्यक्ति थे। बचपन से ही मैं बहुत नाजुक स्वभाव की थी। भाई साहब काम के बहुत पक्के थे। अगर आपने उनसे कहा कि यह काम इतने समय में हो जायेगा, तो वह होना ही चाहिए, एक मिनट भी देर नहीं होनी चाहिए। कई बार मेरे से ऐसा नहीं हो पाता था। कारण मैं बताती थी कि जिज्ञासु को कोर्स कराना था, फलाना काम अर्जेन्ट आ गया, उसको करना पड़ा इसलिए यह काम नहीं हो पाया। ऐसी बातों को वे पसन्द नहीं करते थे। अगर आपने कहा है, तो किसी भी परिस्थिति में करके देना चाहिए। कई बार वे सीरियस हो कर कह देते थे, तो मुझे रोना आ जाता था। रोना आता था तो मेरी आँखें सूज जाती थी, मोटी-मोटी, लाल-लाल हो जाती थीं। उसके बाद मैं न खाना खाती थी, न नींद कर पाती थी। फिर भाई साहब आकर मुझे मनाते थे तो फिर खाना आदि खा लेती थी। जब तक मुझे खाना नहीं खिलाते थे, तब तक वे खुद भी नहीं खाते थे। खाना खाने के बाद मुझे हँसा लेते थे। जब तक हँसू नहीं, तब तक सामने से वे उठते ही नहीं थे। ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं था, किसी का भी मूड ऑफ होता था, तो जब तक वो ठीक नहीं होगा, तब तक छोड़ते नहीं थे। उसका मूड ठीक करके ही वहां से उठते थे।
एक बार की बात मुझे याद आ रही है। वह शुरू-शुरु की बात है। भाई साहब ने मुझे लिखने का काम दिया। उसको लेकर मैं दूसरे कमरे में चली गयी। वहां बलदेव भाई (जो जयपुर में रहते थे) बैठे थे। उन्होंने कहा, मुझे अर्जेन्ट प्रैस में जाना है लेकिन प्रूफ रीडिंग भी करनी है। क्या आप कर सकती हैं, बहुत अर्जेन्ट है। उनकी रिक्वेस्ट सुनकर मैंने सोचा, उनको प्रैस जाना है, तो उनका काम पहले करना चाहिए। तो मैंने प्रूफ रीडिंग करना शुरु किया। इस में टाइम लग गया। दो घण्टे बीत गये। भाई साहब ने मुझे बुलाया और पूछा, काम हो गया? मैंने कहा, नहीं। उन्होंने पूछा, और कितनी देर लगेगी? मैंने कहा, अभी तो शुरू ही नहीं किया। उन्होंने पूछा, क्यों नहीं शुरू किया? मैंने कहा, बलदेव भाई ने यह काम दिया। उन्होंने कहा, जब मेरे से काम लिया था तो उनसे आपने कैसे लिया मैंने कहा, भाई साहब, आप भी मेरे से बड़े है और वे भी मेरे से बड़े हैं। उन्होंने कहा कि मुझे अभी ही प्रैस में जाना है प्रूफ रीडिंग लेकर। भाई साहब ने कहा ठीक है, वे भी बड़े हैं, उनकी बात मना नहीं करो लेकिन क्या आपने यह बताया था कि जगदीश भाई ने भी मुझे काम दिया है? मैंने कहा, नहीं बताया। फिर भाई साहब ने कहा, अगर उनको पता होता, तो आपको यह काम नहीं देते थे। मैं तो आपके लिए इन्तज़ार कर रहा हूँ। आप उन से यह तो कह सकती थी कि आपका काम अर्जेन्ट है तो भाई साहब से पूछ लीजिये। अगर वे कहते हैं कि मेरा बाद में करना, इनका पहले कर दो, तो मैं करके दूंगी। तब मैंने उनसे यह सीखा कि जिस काम के लिए हमने 'हाँ' कहा है, उसको पहले करना चाहिए, अगर दूसरा अर्जेन्ट, काम आ भी जाये, तो पहले जिन्होंने काम दिया है उनसे छुट्टी लेकर दूसरा काम करना है, यह तरीक़ा है। लव और लॉ का सन्तुलन भाई साहब के पास बहुत अच्छा देखने में आता था।

वे मुश्किल से 2-3 घण्टे विश्राम लेते थे

सन् 1981 में दिल्ली में 'विश्वकल्याण महोत्सव' हुआ था। भाई साहब इसके मुख्य संगठनकर्ता थे। उसमें मेले तथा चित्रप्रदर्शनी का आयोजन करना था। बारह हज़ार लोग दिल्ली में इकट्ठे हुए थे, उनकी शान्ति यात्रा निकलनी थी, बहुत सारी झांकियों बनी थीं, हिन्दी और अंग्रेज़ी में दो स्मारिका निकालनी थीं, इनके अलावा 'डिवाइन एक्सपीरियन्स' तथा 'दिव्य अनुभव' नामक दो पुस्तकें प्रकाशित करवानी थी। उन्हीं दिनों में 'दि वे एण्ड गोल ऑफ राजयोगा' तथा 'महाभारत और गीता का श्रद्धा सार और स्वरूप' पुस्तकें छप रही थीं। स्मारिका तथा अनुभव की पुस्तकों के लिए लोगों से उनकी बॉयोग्राफी, अनुभव, फोटो आदि मंगवाने थे। इन सेवाओं के कारण पूरे साल सन् 1980 से लेकर 1981 तक, मुझे याद है, भाई साहब और मैं पूरे दिन में मुश्किल से 2-3 घण्टे विश्राम ले पाते थे। भाई साहब के साथ सेवा करते-करते मुझे साहित्य प्रकाशन के कार्य में बहुत कुछ सीखने को मिला, प्रूफ रीडिंग करना, डेमी बनाना, चार्ट बनाना, कंवर पेज बनाना, पेज सैटिंग कराना आदि। उस समय विदेश के सारे सेवाकेन्द्रों के एड्रेस मुझे याद थे। भाई साहब पूछते थे, सुधा बहन, जापान का क्या एड्रेस है? तो मैं फटाफट बोल देती थी। इस प्रकार, उनके साथ रहकर सेवा के विभिन्न तरीके सीखे।

उनके हर तरीके निराले होते थे

शक्ति नगर में रोज़ रात को हम सेन्टर पर रहने वाली बहनों की क्लास होती थी। उसमें अक्सर भाई साहब भी आते थे। उस क्लास में कोई अव्यक्त मुरली पढ़ी जाती थी या अगले दिन की साकार मुरली। एक-एक दिन, एक-एक बहन की बारी होती थी मुरली पढ़ने की। बहन जब मुरली पढ़ना शुरू करती थी, दो-तीन वाक्य ही पढ़ती थी, उतने में मुरली पढ़ने वाली से भाई साहब पूछते थे कि बाबा ने ऐसे क्यों कहा? इसका अर्थ क्या है? जब उस प्रश्न का उत्तर देते थे तो उस उत्तर में से और प्रश्न निकाल कर पूछते थे, ऐसे क्यों? उसका अर्थ क्या है? प्रश्नों पर प्रश्न पूछते थे। कई बार हम बहनें तंग आकर पूछ लेती थी कि भाई साहब, आप आगे पढ़ने देंगे या नहीं? फिर कहते थे, चलो पढ़ो लेकिन उस समय हमें समझ में नहीं आता था कि भाई साहब क्यों ऐसे बीच-बीच में प्रश्न पूछते हैं। जब मैं रूस की सेवा पर गयी तो मुरली की गहराई में जाने के लिए भाई साहब का वह प्रशिक्षण काम में आया। इस प्रकार, भाई साहब का सिखाने का तरीका, मनाने का तरीका, सम्मान और प्यार देने का तरीका सब बहुत निराले थे, अनुकरणीय थे।
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दधीचि ऋषि मुआफ़िक उन्होंने हड्डी-हड्डी सेवा में लगायी

दिल्ली, पाण्डव भवन, करोलबाग के सेवाकेन्द्रों की तथा न्यायविद् प्रभाग की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं-
"दिल्ली के कार्यक्रमों में मैं जगदीश भाई को देखती थी और उनसे सुनती थी। उन दिनों राजोरी गार्डन ही देहली का बड़ा सेन्टर था। वहाँ कोई-न-कोई मीटिंग या अन्य कार्यक्रम होते रहते थे। सन् 1970 में एक बड़ी मीटिंग सभी भाई-बहनों की थी जिसमें जगदीश भाई जी ने सबको सेवा के बारे में कहा। मैंने बहुत नज़दीकसे उनको देखा वे सब में एकदम उमंग उत्साह भर देते थे
उसी समय सबका हाथ खड़ा कराया कि कौन-कौन प्रदर्शनी करेंगे? हमारे लौकिक माता-पिता ने हाथ खड़ा किया और मुझ से जगदीश भाई जी ने पूछा, आपको प्रदर्शनी समझाना अच्छा लगता है? मैंने कहा, हां जी। उन्होंने कहा, बस फिर क्या, आप तो तुरन्त बाबा का नाम बाला कर देंगी। सचमुच उसके अगले ही दिन से हमारे लौकिक घर और आस-पास के क्षेत्र में कई प्रवचन और प्रदर्शनी के कार्यक्रम लगातार हुए जिनमें दादी आलराउण्डर (दादी गुलज़ार जी की लौकिक माता जी) और सुदेश बहन अक्सर आया करती थी जिससे सब तरफ बाबा का सन्देश मिलने की लहर फैल गयी और हमें भी बड़ा आनन्द आने लगा।

बहनों में हिम्मत भरकर उनको आगे बढ़ाते थे

भ्राता जी में हिम्मत भरने और परखने का जबरदस्त गुण था। जब मैं सन् 1976 में दिल्ली पाण्डव भवन में समर्पित हुई तब सेवा के कई कार्यक्रम हम करते रहते थे परन्तु सन् 1981 में पूरे भारत और विश्व का संगठित कार्यक्रम महायज्ञ के रूप से लाल किला मैदान पर हुआ, तब जगदीश भाई जी ने मेरे ऊपर बहुत बड़ी ड्यूटी लगा दी जबकि मुझे इतना अनुभव नहीं था। सभी राज्यों के अपने-अपने स्टाल थे। मुझे कहा गया कि आपको पूरे योग शिविर की ज़िम्मेवारी संभालनी है जिसमें 8 पंडाल बनाने थे, 6 हिन्दी के लिए और 2 इंग्लिश के लिए जिससे सभी लोग राजयोग की क्लासेज ले सकें। इसके अलावा, शिविर से सम्बधित सारा साहित्य छपवाने की भी ड्यूटी दे दी गयी थी, जैसे रोज़ के प्रवचन का पेपर, फार्म-बुक, रजिस्टर, रिकार्ड के लिए अनुभव-पत्र आदि। इन सबको हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में छपवाना था। इतनी बड़ी जिम्मेवारी उठाने की शक्ति मेरे में नहीं थी लेकिन भ्राता जी के सामने 'ना' भी कह नहीं पायी। बड़ी हिम्मत से मैंने यह कार्य शुरू किया। हिन्दी का मैटर तो मेरे पास था लेकिन इंग्लिश के लिए क्या करें? मैंने भाई साहब से कहा, भाई साहब, अग्रेजी मैटर के लिए क्या करें उन्होंने कहा, आपके सेन्टर पर कोई अंग्रेजी जानने वाले तो होंगे, उनसे अनुवाद करा लो। पाण्डव भवन के पास ज्ञान में चलने वाले एक परिवार में एक भाई बड़ा आफिसर था। उससे मैंने पूछा तो उसने खुशी-खुशी से करके दिया। इस प्रकार, क्लास में आने वाले भाई-बहनों से भी कैसे सेवा करायी जाये यह भी भाई साहब ने मुझे सिखाया। अनुवाद होने के बाद मैंने भाई साहब को कहा, इस मैटर को आप एक बार पढ़कर फाइनल कीजिये। वे मेले के कार्य में इतने व्यस्त थे कि उनके पास टाइम ही नहीं था। उन्होंने कहा, जैसे इसका अनुवाद कराया है, वैसे और एक व्यक्ति को ढूंढो जो इसका करेक्शन करे। मैने कहा, भाई साहब आप ही करके दीजिये, आपने देख लिया तो अच्छा होगा। फिर उन्होंने और किसी से कराकर दिया।

उनके बोल मेरे लिए वरदान बन गये

योग शिविर कराने की ज़िम्मेवारी गुजरात की बहनों की थी। वे रहती थीं दूसरे स्थान पर। सुबह छह बजे तक मेले में उनको आना होता था। कभी ट्रैफिक में फंस जाते थे, कभी दादी जी से मिलने उनको जाना होता था, कभी और कोई कारण बन जाता था। एक दिन साढ़े छह बज गये, कोई नहीं आया। पंडाल में लगभग 200 लोग योग-शिविर के लिए आये थे। शिविर कराने वाली बहन आयी नहीं। मैं तो घबरा गयी। तुरन्त मैंने शक्ति नगर फोन किया। मैंने कहा, भाई साहब, शिविर में 200 लोग बैठे हैं, फलानी बहन नहीं आयी है, मैं क्या करूं? मेरी आवाज़ रोने जैसी हो गयी थी। भाई साहब ने कहा, आपको आत्मा का ज्ञान पता है? मैंने कहा, जी। मुझे यह पता ही नहीं पड़ा कि भाई साहब ऐसे क्यों पूछ रहे हैं। फिर उन्होंने कहा, आप ही शुरू कर दो। मैंने कहा, भाई साहब, मैंने कभी इतनों को शिबिर नहीं कराया और मुझे इतना आता भी नहीं। भाई साहब ने ऐसी हिम्मत भर दी कि आप यह क्या कह रही हो? आत्मा का ज्ञान देना नहीं आता? आप तो बोलती भी मीठा हो, बस प्यार से जात्मा के बारे में सुना दो। सचमुच डेढ़ घंटे कैसे क्लास करायी, मुझे पता नहीं लगा। तब से शिविर या कोर्स कराने की कला मेरे लिए वरदान बन गयी। यह मेला बहुत सफल हुआ तो दिल्ली वालों ने मीटिंग की कि दिल्ली के चारों तरफ यह मेला करना चाहिए। दिल्ली की चारों दिशाओं में मेले का आयोजन होने लगा तो जहां भी मेला लगता था वहाँ शिविर के लिए मुझे ही बुलाया जाता था। इस प्रकार, शिविर कराने का मेरा पार्ट खुल गया। देखिये, बाबा का वरदान, जगदीश भाई साहब की परखने की शक्ति, बहनों में हिम्मत भरकर आगे बढ़ाने की उनकी शुभ-भावना ने मुझे शिविर कराने की कला में प्रवीण बना दिया। दिल्ली में कोई बड़ा मेला या कार्यक्रम होता था तो उस में योग-शिविर कराने की सेवा मुझे ही मिलती थी।

हालचाल पूछने में भी ज्ञान और सेवा

सेवा की मीटिंग्स के लिए और गुलज़ार दादी से मिलने के लिए भ्राता जगदीश जी का पाण्डव भवन में आना जल्दी-जल्दी होता रहता था। वे सबको बहुत बहलाते थे। जब तक दादी जी मिलने आये या मीटिंग शुरू हो तब तक वे हम बहनों से पूछते थे, क्या सेवा चल रही है? हम सुनाते थे तो कहते थे, अगर आप से कोई यह प्रश्न पूछे तो आप क्या उत्तर देती हो? तो हमने देखा, वे हमें थोड़े से समय में काफी कुछ सिखा देते थे और इससे हम उनके नज़दीक भी आते गये। वे थोड़ा-सा समय देकर भी बहनों को सेवा के प्रति नयी बातें सुना देते थे।
जगदीश भाई जी स्वभाव से गंभीर भी थे और रमणीक भी। जब वे फोन करते और हम बहनों में से कोई भी उठाते तो आवाज़ से ही पहचान लेते थे। अगर कोई नयी बहन या नया भाई उठाता तो उसका परिचय पूछते थे। अगर उनको कोई मैसेज देना होता था तो उससे रिपीट कराते थे कि सुनाओ, मैंने आपको क्या कहा है? अगर वह भाई या बहन रिपीट नहीं कर पाते तो वे समझ जाते थे कि इसको डर लग रहा है। उसके बाद जब कभी वे पाण्डव भवन आते तो उस व्यक्ति को अपने पास बुलाकर पूछते थे कि उस दिन आपको डर लग रहा था, क्यों? भाई साहब कोई-न-कोई बात सुनाकर उसको हँसाते थे और उसकी कोई-न-कोई विशेषता सुनाकर उसकी हिम्मत बढ़ाते थे और उसको अपनेपन का अहसास कराते थे। अपने प्रति उसके अन्दर रहा हुआ डर मिटा देते थे।

जब कोई नयी प्रेरणा आती थी, तब ब्रह्मा बाबा जगदीश भाई को याद करते थे

आप सब जानते ही हैं कि साहित्य द्वारा उन्होंने बाबा को और बाबा के ज्ञान की गुह्यता को स्पष्ट किया है। उनका साहित्य पढ़कर जो अपनी बुद्धि का कपाट खोल लेते हैं, वे दूसरों का भी खोल सकते हैं। जगदीश भाई का निवास स्थान देहली ही रहा। वे शुरू से ही मधुबन आते रहते थे, साकार बाबा से मार्गदर्शन, राय, सलाह लेते रहते थे। बाबा भी उनको अचानक, जब चाहें तब बुलाते रहते थे। साकार बाबा को कोई भी प्रेरणा आती थी, संकल्प आता था तो कहते थे, जगदीश बच्बा कहाँ है, उसको बुलाओ। तुरन्त जगदीश भाई मधुबन पहुँच जाया करते थे।
जब मैं सेन्टर पर रहने लगी, तब बहुत छोटी थी। जगदीश भाई के साथ सेवा करने के, उनसे मार्गदर्शन लेने के अवसर मिलते थे। उनसे हमने बहुत कुछ सीखा भी। वे ज्ञान के बहुत कुछ राज़ हम बहनों को सुनाते थे।

उनको एक ही धुन थी

यज्ञ के इतिहास में जगदीश भाई साहब का बहुत बड़ा और विशेष रोल रहा। वे अपने आप में सिर्फ एक महान् विभूति ही नहीं लेकिन पत्र के आधार स्तम्भ थे। प्यारे बाबा को प्रत्यक्ष करने में, इस यज्ञ को आगे बढ़ाने में, इस ईश्वरीय परिवार और संगठन को जोड़ने में, उनका बहुत बड़ा पार्ट रहा। यज्ञ के साहित्य की शुरुआत के आधार ब्रह्मा बाप तो रहे ही लेकिन ब्रह्या बाप के राइट हैंड जगदीश भाई रहे। वे अक्सर कहा करते थे कि बस, मुझे एक ही धुन है कि मैं कैसे बाबा को प्रत्यक्ष करूं। इसलिए मैं सोचता रहता हूँ, मंथन करता रहता हूँ और लिखता भी रहता हूं ताकि आत्मायें जग जायें, यह जान जायें कि भगवान धरती पर आ चुके हैं।

मधुबन के प्रति अपार भावना

जब भाई साहब की तबीयत अच्छी नहीं थी, उससे कुछ समय पहले वे पाण्डव भवन में गुलज़ार दादी जी से मिलने आये थे। मेरे से पूछा, सेवा कैसी चल रही है, आप सबको बाबा ने सेवा के निमित्त बनाया है। मैंने कहा, नहीं भाई साहब, असली बेहद की सेवा तो आप करते हैं। तो उन्होंने बोला, देखो, यह शरीर कितना समय और चलेगा। मैंने कहा, क्यों भाई साहब, आपको ब्रह्मा बाबा जितने समय तो रहना होगा, सेवा करनी होगी। भाई साहब बोले, बाबा तो आबू पर्वत पर रहे, स्वच्छ, शुद्ध - वातावरण में रहे, वहाँ तपस्या की। मैं तो यहां दिल्ली की गलियों में सेवा करता रहा। इतने प्रदूषण में रहा, यहाँ का वातावरण कैसा है, चारों ओर भीड़ ही भीड़ है और मैं दिन-रात सेवा में भागता रहा। कब तक चलता है! शायद उन्हें अपनी तबीयत का पहले ही अहसास रहा हो। मुझे उस समय तो कुछ नहीं लगा परन्तु कुछ समय बाद जब उनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ी तब उनकी यह बात बार-बार याद आयी।
उनमें विशालता, दूरदर्शिता, अडोलता देखने जैसी थीं। एक बल, एक भरोसे का विश्वास उन में बड़े कमाल का था। दधीचि ऋषि मुआफिक हड्डी-हड्डी सेवा में लगायी। ऐसे थे भ्राता जगदीश जी हमारे, उनको हमारा शत-शत नमन और सम्मान।
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जगदीश भाई, एक निरहंकारी व्यक्तित्व

पुणे, मीरा सोसाइटी सब जोन की निर्देशिका ब्रह्माकुमारी सुनन्दा बहन जी, भ्राता जगदीश जी के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाती है-"बात है 1985-86 की। शिव बाबा के यज्ञ में 1981 में मैंने सम्पूर्ण रूप में सेवाकेन्द्र पर रहना शुरू किया। तत्पूर्व 1979 में मेरी अलौकिक टीचर ट्रेनिंग दिल्ली, पाण्डव भवन में हुई जिस में जगदीश भाई जी ट्रेनिग के टीचर थे। एक मास की ट्रेनिंग में कई सारी ज्ञान की एवं धारणाओं की क्लासेस उन्होंने करायी। भाई जी की तेजस्वी और उमंग-उत्साह देने वाली वाणी, मेरे मन में उनके प्रति स्नेह और सम्मान निर्माण करने में निमित्त बनी। जगदीश भाई जी तो अपने आप में बहुत महान्, इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के बहुत ही अमूल्य विश्व सेवाधारी और पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। मेरा इतना नजदीकी सम्पर्क उनके साथ नहीं था क्योंकि वे दिल्ली में रहते थे और मैं पुणे की सुन्दरी दीदी की पालना और सम्बन्ध में रहती थी। टीचर्स ट्रेनिग होने के बाद मैं हर साल उनको राखी भेजा करती थी।

राखी की सौगात

सब से पहले 1983-84 में मैंने उन्हें राखी भेजी और पत्र के अन्त में लिखा कि भाई जी, राखी के बदले में बहन को कुछ-न-कुछ गिफ्ट देंगे? आप से मुझे यही गिफ्ट चाहिए कि आप एक बार कोल्हापुर आइये। आश्चर्य की बात, मैं क्या कहूँ कि एक साल के बाद उनका पत्र आया कि मैं कोल्हापुर आ रहा हूँ, सात दिन आपके पास रहूंगा, जहां-जहां मेरी सेवा लेनी है, ले लेना। अब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर उन दिनों सेवाकेन्द्र बहुत छोटे-छोटे होते थे, स्नान आदि की सुविधा ठीक नहीं होती थी। उस समय सेवाकेन्द्र पर कार, जीप आदि वाहन भी नहीं थे, विद्यार्थियों की संख्या भी उतनी नहीं थी।

भाई साहब के बोल सच सिद्ध हुए

भाई जी आये और कोल्हापुर, सांगली, गोवा इत्यादि स्थानों पर उन्होंने सेवा की। उस समय एक गीता-पाठशाला थी अब्दुललाट में। वहाँ एक नया भवन बना था। उसके उ‌द्घाटन के लिए उनको हम लेकर गये थे। अब्दुललाट कोल्हापुर से 70 किलोमीटर दूर है। जाते समय इचलकरंजी शहर रास्ते में पड़ा। वहाँ भी एक गीता-पाठशाला थी। जाते-जाते उस शहर को देखते हुए भाई जी ने मुझे कहा, बहन, यहां बहने रखो, अच्छी सेवा हो जायेगी। उनके ये वाक्य वरदानी सिद्ध हुए। उनके कहने अनुसार हमने वहां दो बहनों को रखा। वहां सेवा बहुत अच्छी होने लगी। बहुत बड़ा भवन भी बन गया। आस-पास 30-40 गाँवों में गीता पाठशालायें भी खुल गयीं। इस प्रकार, भाई साहब के बोल सच सिद्ध हुए।
कोल्हापुर सेवाकेन्द्र की सेवा अर्थ जब वे आये थे, तो हम उनको जहां भी बिठायें, जिस साधन में भी बिठायें बैठ जाते थे। उन्होंने कभी कहा ही नहीं कि मुझे कार चाहिए, जीप चाहिए या अच्छी सुविधा चाहिए। हम उनको कभी ऑटो रिक्शा से, कभी पैदल, कभी गाड़ी से ले जाते थे। हमने देखा कि हर बार वे समय से पहले तैयार रहते थे। नियमों में वे बहुत कटिबद्ध थे। सिवाय सेवा के और कोई बात उनमें नहीं थी। बहनों के प्रति उनका बहुत आदर भाव था। एक दिन उन्होंने मेरे से कहा, बहन, आप में बहुत गुण हैं। मेरा मन गद्गद हो गया। उनके ये बोल मेरे लिए वरदान बन गये।

जगदीश भाई जी में हमने अनेक रूप देखे

जब उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था तो मैं और गोवा की शोभा बहन उनसे मिलने गये थे। वे पलंग पर विष्णु समान लेटे हुए थे। उनको देखकर हमारी आँखों में आंसू आ गये पर भाई जी बिलकुल बेफ़िकर बादशाह थे। अपने हाथों से हमें टोली खिलाते हुए उन्होंने कहा, आप दोनों बहुत अच्छी हो। मैं कहता हूँ, दोनों के पास सेवा बहुत-बहुत बढ़ेगी। सचमुच इन वरदानी बोलों का साकार स्वरूप आज हम देख रहे हैं।
हमने उनके जीवन में यह देखा कि "जो बाबा कहे, वही हमें करना है; न मनमत, न परमत परन्तु श्रीमत-श्रीमत-श्रीमत।" पढ़ना और पढ़ाना, लव और लॉ, गंभीरता और रमणीकता, एकानॉमी और एकनामी, ज्ञान और योग, सेवा और स्व-पुरुषार्थ इन सबका सुन्दर सन्तुलन उनके जीवन में देखा। साथ ही साथ निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी का प्रैक्टिकल स्वरूप भी हमने उनमें देखा।
जगदीश भाई जी में हमने अनेक रूप देखे। महावीर का भी देखा और अचल, अडोल निश्चय के पैर वाले अंगद का भी देखा, ईश्वरीय सेवा में हड्डी-हड्डी देने वाले दधीचि ऋषि का भी देखा। पढ़ाई के चारों सब्जेक्टस की तरफ़ फुल अटेंशन देने वाले 'दी बेस्ट गॉडली स्टुडेण्ट' का भी देखा। त्याग का भी त्याग करने वाले त्यागी का भी देखा और आदर्श टीचर का भी देखा।
ऐसे बाप समान बड़े भाई जी को हृदय की गहराई से स्नेह सम्पन्न धन्यवाद करते हुए मैं उनको कोटि-कोटि प्रणाम करती हूँ, अभिवादन करती हूँ।
***

प्रेस में सेवारत रहने का आशीर्वाद और दृढ़ता भाई साहब ने दी

ज्ञानामृत पत्रिका की संयुक्त सम्पादिका ब्रह्माकुमारी उर्मिला बहन, भ्राता जगदीश जी के साथ के अनुभव इस प्रकार व्यक्त कर रही हैं-
मई, 2000 में मेरा शान्तिवन परिसर में ज्ञानामृत प्रेस में सेवार्थ आना हुआ। आते ही मुझे जून, 2000 की ज्ञानामृत के लिए लेख चयन करने, प्रूफ रीडिंग आदि करने की सेवायें सौंपी गयी। इसके कुछ समय बाद भ्राता जगदीश जी का अचानक शान्तिवन में आना हुआ। उन दिनों इस परिसर में अब की तरह गहमागहमी नहीं थी। थोड़े-से भाई-बहनें थे। भ्राता जी दोपहर के दो या ढाई बजे आये थे। परिसर में सन्नाटा था। प्रेस भी सुनी-सूनी थी। वे आकर प्रेस के प्रथम ऑफिस में बैठे। किसी ने मुझे बुलाया, कोई और दो-चार दिखे, उन्हें बुलाया और हम 5-7 उनके चारों ओर खड़े हो गये। एक माता ने पानी के लिए पूछा, उन्होंने मना किया। मैं बड़े संकोची भाव से उन्हें बस देख रही थी और सोच रही थी, ऐसी महान् हस्ती और इतनी सरलता। हम पांच-सात को देखते हुए उन्होंने महावाक्य उच्चारण करने प्रारम्भ कर दिये। मुझे यह स्वर्ण अवसर जान पड़ा। मैं उनकी एक-एक बात को पूरी एकाग्रता के साथ मन-बुद्धि में लिखती गयी। मैंने महसूस किया, यह एक-एक लाइन ईश्वरीय सेवा में मेरे लिए नींव का काम करेगी। साहित्य के पुरोधा से, साहित्य की उत्कृष्टता के लिए मिली वो मार्गदर्शना इस प्रकार थी, "आप जिस स्थान पर खड़े हो, उस स्थान का महत्व जानते हो? यह वह स्थान है जहाँ भगवान के महावाक्यों को लिखा और छापा जाता है। यह इस यज्ञ का अति महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यहां जो छपता है उसे सात महाद्वीपों में करोड़ों लोग पढ़ते हैं। अक्षर साफ हो। 'कल्याण' तथा गोरखपुर की अन्य किताबों में ढूंढने पर भी गलती नहीं मिलती, जैसे कि सम्पूर्णता उनका लक्ष्य है। हमारा भी ऐसे हो। पहले से सुधार है परन्तु अभी भी मारजिन है, और सुधार चाहिए। विदेशी अभी भी हमारी किताबों को कुछ नहीं समझते। यह स्थान मन्दिर है। कई बार रहते-रहते अपने स्थान का महत्व कम हो जाता है इसलिए ध्यान रखना है। अशुद्धियों की तरफ़ ध्यान दो।"

प्रेस में ही सेवा में रहना

इस घटना के तीन महीने बाद एक दिन ज्ञानामृत तथा वर्ल्ड रिन्युवल के सम्पादक आत्मप्रकाश भाई ने कहा, आपको जगदीश भाई ने मिलने के लिए बुलाया है, वे सुखधाम में हैं, मैं मिलने जा रहा हूँ, आप भी चलो। मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। मैं मन-ही-मन जो चाह रही थी, मेरे बिना प्रयास बाबा ने सम्भव कर दिया। खुशी में उड़ते हुए मै आत्मप्रकाश भाई के साथ सुखधाम में उनके कमरे में पहुँची। वे लेटे हुए, थे। देखते ही उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और अपने सिरहाने के पास ही बैठा लिया। आत्म भाई सोफे पर बैठे रहे। भ्राता जी ने पूछा, आपको शान्तिवन आये हुए और ज्ञानामृत की सेवा करते कितना समय हुआ है? मैंने कहा, 4-5 मास हो गये हैं। उन्होंने कहा, पिछले 4-5 मास से मैं देख रहा हूं, ज्ञानामृत में व्याकरणीय ग़लतियाँ नहीं दिख रही हैं, आप बहुत लगन से अच्छी तरह से सम्भाल रही हैं, आप इस सेवा को छोड़ना मत, प्रेस में ही सेवा में रहना।

लाखों-करोड़ों प्रजा बनेगी

इसके बाद उन्होंने मेरी पढ़ाई पूछी। फिर एक संस्कृत श्लोक उच्चारित किया, 'शैले-शैले न माणिक्यम् मौक्तिकं न गजे गजे…' और पूछा यह किस संस्कृत पुस्तक का श्लोक है? मैं मन-बुद्धि पर जोर देकर पुस्तक का नाम याद करने लगी तो उन्होंने कहा, ज़्यादा सोचो नहीं। फिर बोले, मुझे भी हिन्दी आती थोड़े ही थी? हम तो उर्दू पढ़े थे, यह तो बाबा ने अपनी सेवा करवा ली। फिर कहने लगे, आप सेन्टर से आयी हैं, वहाँ भाषण करने की (मुख की) सेवा रोज़ होती है। यहां आप सारा दिन लिखने-पढ़ने की सेवा करेंगी तो आपके मन में विचार आयेगा कि मैं वाणी की सेवा तो करती नहीं हूं। लेकिन आप वाणी द्वारा कितनों को सन्देश दे सकेंगी, 500 को, 1000 को, 5000 को? इससे बड़ी सभा मिलना इतना आसान नहीं है परन्तु आप पत्रिका में जो लिखेंगी, उसे लाखों लोग पढ़ेंगे। इस प्रकार, एक जगह रहते आपकी लाखों-करोड़ों प्रजा बनेगी, इतनी प्रजा वाणी से आप कभी नहीं बना पायेंगी। उनकी इस बात से मुझे साहित्य लेखन का और उसके द्वारा बेहद की सेवा का महत्व समझ में आया और इस सेवा के प्रति मैं पहले से अधिक प्रेरित हुई। आगे उन्होंने कहा, आपको साथ बहुत अच्छा मिला है, कभी कोई आवश्यकता हो तो मेरे से सहयोग ले सकती हो।

आपका मेरे से ज़्यादा स्नेह है या मेरा आपसे ?

इतनी देर तक भाई साहब बोल रहे थे, मैं भावविभोर हो, मुस्कराते हुए चुपचाप सुन रही थी। जब वे थोड़े रुके तो मेरा मन भी बोलने को हुआ। मैंने कहा, भाई साहब, ज्ञान में आने के बाद जब से आपका साहित्य पढ़ा है, तब से आपसे बहुत स्नेह रहा है। यह सुनकर वे तुरन्त बोले, अच्छा यह बताइये, आपका मेरे से ज़्यादा स्नेह है या मेरा आपसे ज़्यादा है? मैंने ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं की थी, मैं चुप रही, फिर सोचकर बोली, आपका ज़्यादा है हमसे। उन्होंने तुरन्त पूछा, आपको कैसे पता, मैं आपसे स्नेह करता हूँ? आस-पास बैठे लोग इस वार्तालाप पर हंस रहे थे, वे भी मुस्करा रहे थे और मैं निरुत्तर थी। फिर मैंने बहुत विचार कर कहा, बाबा ने बताया कि आपका स्नेह ज़्यादा है। वे मुस्कराये और अपने पास रखे ड्राईफ्रूट मुट्ठी में भरकर मेरे मुख में डालते रहे। मेरा मन अन्दर तक निस्वार्थ स्नेह और तृप्ति से भर गया। एक वरिष्ठ भाई का ऐसा अपनत्व, जिसमें बाबा के अपनत्व की झलक समायी थी, ने आत्मा को इतना सशक्त कर दिया कि इनकी कही बातों को अवश्य साकार करना है। कितनी भी परिस्थितियां आयें, इस मार्गदर्शन पर चलना ही है।

लेख फेयर करने की सेवा

इसके कुछ समय बाद उनका शान्तिवन की अष्टभुजा बिल्डिंग में आकर ठहरना हुआ और मुझे पुनः उनका आमन्त्रण मिला। मैं इतनी भावविभोर हुई कि खुशी में घड़ी देखना ही भूल गयी और मात्र पाँच मिनट की देरी से पहुंची। वे मेरे से अगले व्यक्ति से मिल रहे थे। उसके बाद मुझे बुलाया और कहा आप देर से आये तो मैने अगले मिलने वाले को बुला लिया। मुझे समय की पाबन्दी का एक सबक उनमे मिला। उन्होंने बाबा की जीवन कहानी भाग तीन के लिए एकत्रित किए गये, साकार पालना लिये भाई-बहनों के कुछ अनुभव फेयर करने के लिए दिये। इसके बाद वे दिल्ली चले गये। मैं बड़ी लगन से उनके दिये कार्य को पूरा कर इन्तजार करती रही कि वे कब शान्तिवन आये और मैं उनका सौपा कार्य उन्हें दिखाऊं, पर ड्रामा।

अमूल्य भेंट

इसके बाद मेरी उनसे मुलाक़ात ग्लोबल हॉस्पिटल के आई,सी,यू,में हुई। अनेक मिलने वालों की भीड़ के बीच में से केवल इस आत्मा को बुलाया गया। मैंने फेयर किये हुए काग़ज़ दिखाये। उनके मुख पर कपड़ा बंधा था। उन्होंने काग़ज़ हाथ में पकड़े और मुझे यह कहकर लौटा दिये, शान्तिवन में आकर देखूंगा। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। उन्होंने अपने सेवाधारी भाई को इशारा किया। वो एक बैग लेकर आया जिसमे फाइलें, अधूरी किताबें, हस्तलिखित अनुभव, बाबा के पत्र आदि भरे हुए थे। वो बैग उन्होंने अपने हाथों मुझे सौंपा और कहा, इनका सेवा में उपयोग करना। मैं उसे अमूल्य धरोहर समझ, हृदय से लगाये हुए नीचे शान्तिवन आ गयी। वह बैग आज भी अलमारी में ऐसी जगह रखा है, जो अलमारी खुलते ही उस पर नज़र पड़ती है। उसमें से प्रयोग होने योग्य बहुत-से मैटर का 'भाग्यविधाता-दो' में प्रयोग कर लिया गया है। बाक़ी को अभी भी सम्भाल कर रखा हुआ है अमूल्य भेंट के रूप में।
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वे सब भाइयों में विशेष थे

दादी जानकी जी के अंग-संग रहने वाली लन्दन की ब्रह्माकुमारी हंसा बहन, भ्राता जगदीश जी में क्या देखा, उसे इस प्रकार वर्णन कर रही हैं-
"ज्ञान में आने के बाद भारत में मैं सबसे पहले मधुबन ही आयी थी। उसके बाद कई बार मधुबन आना हुआ लेकिन जब मैं सन् 1985 में आयी थी उस समय दादी ने मुझे कहा, तुम एक-दो महीने मधुबन में रहो। इतने दिन मधुबन में रही तो जगदीश भाई को बहुत नज़दीक से देखना और सुनना हुआ।

वे बहुत सरलचित्त थे

एक बार वे मधुबन वालों को क्लास करा रहे थे शान्ति स्तम्भ के पास। उस समय मधुबन में एक अंग्रेज़ भी आया था, उसके लिए मुझे ट्रान्सलेट करना पड़ता था। वे ज्ञान सुनाते थे तो बड़े-बड़े हिन्दी शब्दों का इस्तेमाल करते थे। मुझे उनको ट्रान्सलेट करना नहीं आता था। मुझे हिन्दी उतनी नहीं आती थी, थोड़ी-बहुत बोलनी आती थी। वो मुझे देखते रहते थे कि यह बहन कैसे ट्रान्सलेट करती है। कभी-कभी मैं चुप बैठ जाती थी, अंग्रेज़ को कुछ नहीं सुनाती थी क्योंकि क्या ट्रान्सलेट करूँ- मुझे समझ में नहीं आता था। फिर उन्होंने सरल शब्द और छोटे-छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करना शुरू किया, सरल भाषा में बोलने लगे ताकि मुझे समझ में आये।
जब वे स्वदर्शन भवन आते-जाते रहते थे तब भी उनको देखती थी। वे बहुत गंभीर रहते थे लेकिन गंभीर होते हुए भी बहुत सरलचित्त थे।कभी-कभी कोई-न-कोई चीज़ पहुंचाने के लिए दादी मुझे जगदीश भाई के पास भेजती थी। मैं स्वदर्शन भवन में जाती थी देने। वे वहां भी कुछ नहीं बोलते थे, बहुत शान्त रहते थे। वे सब भाइयों में अलग ही थे। जब वो जाते थे, आते थे, यहाँ-वहां देखते नहीं थे। सीधा आँगन से स्वदर्शन भवन जाते थे सिर नीचे करके, किसी वस्तु की तरफ, किसी व्यक्ति की तरफ देखते नहीं थे। दादी जानकी से भी मिलने आते थे तो मैं देखती थी, दादी के साथ बहुत सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे। वे कितने आदर भाव से, प्रेम भाव से दादी के साथ बात करते थे, मैं देखती रह जाती थी।

उनके लिए मैं गाड़ी चलाती थी

सन् 1986 में मैंने सेन्टर पर रहना शुरू किया, उस समय जगदीश भाई लन्दन आये थे। उन दिनों वहां भाइयों के रहने के लिए स्थान नहीं
था। सिर्फ बाबा भवन था जिसमें बहनें रहती थी। बाबा भवन से 25 मील दूर एक युगल रहते थे, उनके घर में जगदीश भाई को ठहराया गया था। सिर्फ सोने के लिए और विश्राम करने के लिए वहाँ जाते थे। बाकी नाश्ता, भोजन आदि सब दादी के साथ बाबा भवन में होता था। मुझे बहुत बड़ा मौका मिला था उनको उस स्थान पर गाड़ी में ले जाने और ले आने का। उन दिनों हमारे पास कोई भाई न होने के कारण मैं ही गाड़ी चलाती थी। मैंने देखा, गाड़ी में भी वे कुछ नहीं बोलते थे, बहुत शान्त बैठे रहते थे। उनको देखकर मुझे लगता था कि वे मेरी सेवा से खुश हैं, सन्तुष्ट हैं। अगर मेरे से बात भी की तो सिर्फ ओम् शान्ति। इस प्रकार, उस समय मुझे उनकी सेवा करने का बहुत अच्छा मौका मिला। इतने बड़े भाई को ले जाना, ले आना, भोजन परोसना, यह भी मेरा सौभाग्य रहा।

वे कितने निर्माण थे!

एक बार दादी और मैं मैक्सिको गये थे 'कॉल आफ टाइम' कार्यक्रम के लिए। जगदीश भाई भी वहाँ थे। वहां कोई भारतीय बहन नहीं थी तो दादी और जगदीश भाई के लिए दाल, चावल, रोटी, सब्जी मुझे ही बनानी होती थी। एक बार की बात है, मैंने खाना बनाया, दाल को छौंक लगाना बाक़ी था। उतने में मुझे दादी की ओर से बुलावा आया। मैंने सोचा, चलो, दाल को तो उबाल दिया है, सिर्फ छोंक लगाना बाक़ी है, आने के बाद लगा देंगी। दाल ऐसे ही छोड़कर चली गयी। वहाँ जाकर सेवा में व्यस्त हो गयी। उतने में सेन्टर की बहनों ने दाल, सब्जी, चावल आदि हॉटकेस में डालकर, टेबल पर सजाकर रख दिये। भोजन के लिए दादी और जगदीश भाई आये। बहनें उनको परोसने लगीं फीकी दाल। जगदीश भाई चुपचाप खा रहे थे। उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला कि दाल में नमक नहीं है या कुछ स्वाद नहीं है। ऐसे ही सिर नीचे करके खाना खा लिया और उठकर चले गये। न दादी ने, न जगदीश भाई ने कुछ बोला। मैंने सोचा, देखो, हम होते तो तुरन्त बोल देते कि बहन जी, इसमें न नमक है, न मिर्च। क्या सब्जी बनायी है? लेकिन इतने बड़े भाई कुछ नहीं बोले, शांति में चुपचाप खाकर निकल गये। मैंने देखा, ऐसा भी नहीं, मजबूरी से खा रह थे, नहीं। बहुत प्यार से खा रहे थे, ऐसे खा रहे थे जैसे किसी ने बहुत स्वादिष्ट बनाया हो। वो घटना मेरे दिल को छू गयी कि कितनी निर्माणता है इस भाई में।
मैक्सिको में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए हमारे पास कोई छोटी गाड़ी नहीं थी। न जगदीश भाई के लिए और न दादी के लिए। सबके साथ वे भी बस में बैठकर चलते थे। कोई भी शिकायत कहो या विशेष मांग कहो, करते ही नहीं थे। ये सब देखते हुए हमें बहुत प्रेरणा मिली कि इतने बड़े होते हुए भी कितने निरहंकारी, नम्रचित्त और शांत रहते थे, हमें भी ऐसे रहना चाहिए।

दादी जानकी जी के लिए उनका बहुत रिस्पेक्ट था

जब जगदीश भाई बीमार थे, वे लन्दन आये थे तब वे ग्लोबल हाउस के लोटस हाउस में ठहरे हुए थे। मैं उनको दूर से देखती रहती थी। मैंने बहुत देखा भी और बहुत नोट भी किया कि दादी जानकी जी के लिए उनको बहुत रिस्पेक्ट (आदर भाव) था, एकदम जान-जिगर से। उन दिनों लन्दन में सुबह की मुरली दादी ही सुनाती थी। जगदीश भाई बीमार होते हुए भी, कैसे भी करके किसी को साथ लेकर बाल्कनी में आकर बैठ जाते थे मुरली सुनने के लिए। मुरली के बाद दादी थोड़ी क्लास भी कराती थी। वो दादी की क्लास भी सुनते थे। इतने बड़े भाई होकर भी, इतने नॉलेजफुल होकर भी, क्लास में आकर जरूर मुरली सुनते थे। वे कितने निर्माणचित थे। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मैं इतना बड़ा हूं, सीनियर हूं।,मुझे बहुत शारीरिक तकलीफ है, इतनी तकलीफ़ उठाकर क्यों जाऊँ? कमरे में रहकर ही स्पीकर द्वारा मुरली सुन सकते थे; लेकिन नहीं, मुरली सुनने वे क्लास में ही आते थे।

उन्होंने कहा, कुछ भी हो जाये बड़ों में विशेषता ही देखो

एक दिन की बात है। किसी कारण से दादी ने मुझे बहुत डांटा। मैं काफी अपसैट (उदास) रही। फिर मैंने साधना बहन से कहा कि "मुझे जगदीश भाई के साथ अपाइंटमेंट (मिला) दो ना! मुझे दो मिनट उनसे मिलना है।" उनके पास जाने के लिए मुझे डर भी लग रहा था लेकिन अन्दर मन कर रहा था कि उनसे यह बात बताऊँ। उन्होंने बुलाया, उनके पास बैठी। लेकिन वे इतने गंभीर दिखायी पड़ रहे थे कि मुझे डर लग रहा था कि उनसे कहूं या नहीं। फिर भी हिम्मत रखकर उनको दादी की शिकायत की। उन्होंने मेरी सारी बात प्यार से सुन ली और कहा, आप इतने सालों से दादी के पास रही हो, उनको आपने बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए दादी की क्या विशेषतायें हैं, उनकी एक लिस्ट बनाकर मुझे दो। मैं हैरान हो गयी क्योंकि मैं जो दादी की शिकायत कर रही हूं, उसके बारे में समाधान देने के बदले, दादी की विशेषताओं की लिस्ट लिखकर देने के लिए बोल रहे हैं! मैंने कुछ कहा नहीं, बहुत समय तक ऐसे ही बैठी रही। फिर उन्होंने ही कहा कि ठीक है, आप सोचकर लिस्ट बनाकर मुझे देना। मैं उठकर चली आयी।
उस दिन उनको हास्पिटल लेकर गये। उनको ज़्यादा तकलीफ हो रही थी। दादी को उनसे मिलने हास्पिटल जाना था। भले ही मैं अपसैट थी लेकिन दादी को कंपनी देने के लिए उनके साथ हास्पिटल गयी। वहाँ दादी जी ने उनसे ओम् शान्ति की। बाद में जगदीश भाई ने मुझे देखा और मुस्कराते हुए पूछा, मेरे लिए लिस्ट लेकर आयी हो? मैं समझी थी, वे भूल गये होंगे। उन्होंने अपने पास बिठाया और दादी की कई विशेषतायें मुझे सुनायीं। फिर कहा, "देखो, कुछ भी हो जाये, बड़ों की हर बात को पॉज़िटिव लो और उनकी विशेषतायें देखो। जो उनकी विशेषतायें हैं, उनका मनन-चिन्तन करो और उनको धारण करो।" उन्होंने मुझे पूर्णतः बदल दिया। ऐसे नहीं, जब मैंने दादी की शिकायत की तो 'हां में हां मिलायी। उन्होंने मुझे बात की गहराई, ज्ञान की ऊंचाई दिखायी और मुझे पोज़िटिव की तरफ ले आये।"
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वे मुझे बड़े भाई, पिता और दोस्त के रूप में दिखायी पड़ते थे

चीन की ब्रह्माकुमारी सिस्टर चेन ने भ्राता जगदीश जी को किस रूप में देखा और क्या अनुभव किया, इसका वर्णन इस प्रकार करती हैं-
"जगदीश भाई के बारे में सुनाने से पहले, मैं थोड़ा अपना अनुभव आपको सुनाना चाहती हूँ। अमेरिका में मैं जिस कंपनी में नौकरी करती थी, उसी कंपनी में ब्रदर ब्राइन भी करते थे। उन्होंने मुझे ज्ञान दिया। बौद्ध धर्मावलंबी होने के कारण ड्रामा, स्वर्ग इत्यादि पर मेरा जल्दी निश्चय नहीं बैठा लेकिन राजयोग मुझे अच्छा लगता था। ब्रह्माकुमारी बहनें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं, उनके सम्पर्क में आते-आते इस ज्ञान में अनुभव होने लगे और निश्चय बैठ गया।

जब अव्यक्त बापदादा से मिली…

यज्ञ के वरिष्ठ भाई-बहनों को देखा, उनके सम्बन्ध सम्पर्क में आयी, बापदादा से मिली तब मुझे इस मार्ग पर पूरा निश्चय हुआ। उन दिनों बाबा ॐ शान्ति भवन में विदेशी बच्चों से बहुत नज़दीक से मिलते थे। हम बाबा के अति समीप बैठा करते थे। जब मैं बाबा से पहली बार मिली, उस समय भी मुझे बाबा पर विश्वास नहीं था लेकिन बाबा जब आते थे तब 10-10 घंटों तक बच्चों के साथ बैठा करते थे। यह देखकर मुझे आश्चर्य होता था कि यह किसी मनुष्य के बस का काम नहीं है। चीन में अगर कोई बड़ा व्यक्ति बैठा है तो उसके सामने हमें हिलना तक नहीं होता। उसके सामने न बात कर सकते हैं और न आना-जाना कर सकते हैं। लेकिन यहाँ जब बाबा आया हुआ है, उसके सामने लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, डान्स कर रहे हैं, खा रहे हैं, पी रहे हैं लेकिन वो परम शक्ति एकदम शान्ति से, मुस्कराते हुए, अपनी दिव्य स्थिति में बैठे हुए हैं। यह देखकर मुझे विश्वास हुआ कि यह शक्ति सामान्य शक्ति नहीं है, परम शक्ति परमात्मा ही है। बाबा मुझे इशारे से नज़दीक बुला रहे थे लेकिन मैं नज़दीक जाना नहीं चाहती थी। सब बहनें कह रही थीं, सिस्टर चेन, बाबा आपको बुला रहे हैं, आओ-आओ। बाबा ने मुझे देखकर कहा कि 'आप एक महान् शूर, वीर और शेरनी शक्ति हो'। उस समय तो मैं बहुत नर्वस थी लेकिन जब बाबा ने कहा कि 'आप शूर, वीर और शेरनी शक्ति हो' तो मेरे में एक तरह से करेंट दौड़ गयी।

जगदीश भाई की आवाज़ चुम्बक जैसी थी

सन् 1992, फरवरी में मैंने पहली बार जगदीश भाई को मधुबन के ओम-शान्ति भवन और मेडिटेशन हॉल में क्लास कराते देखा था। उस समय वे मुझे बड़े भाई, पिता और दोस्त के रूप में दिखायी पड़ते थे
मैं उनसे पर्सनली मिली नहीं, केवल उनकी क्लास सुनने जाती थी। उनकी आवाज चुम्बक जैसी थी। उनके शब्द मन की गहराई में चले जाते थे। भारी मन को हल्का कर देते थे। परिस्थिति कैसी भी हो, पुरुषार्थ में आगे बढ़ने के लिए वे हरेक को प्रेरित करते थे, बाबा के प्रति प्यार जगाते थे। वे सरल, सादे और नॉलेजफुल (ज्ञानपूर्ण) व्यक्ति थे।
उनकी बातें दिल को छूने वाली होती थीं
दादी गुलज़ार सन् 1995 में चीन आयी थी। उन से पहले सन् 1994 में जगदीश भाई चीन आये थे। शायद वो सर्दी का मौसम था। उनका साथ देने के लिए मेरा भी चीन जाना हुआ। वहाँ उन्होंने क्लास कराया। सुनकर मुझे ऐसा लगा कि इस तरह की क्लास बहुत कम लोग करा पाते हैं। मैं उनके साथ चीन में कई जगह गयी। जहाँ भी वे जाते थे, युवाओं को, ब्रह्मावत्सों को अपनी क्लासेस द्वारा बहुत खुश करते थे और उमंग-उत्साह भरते थे। उनकी बातें दिल को छूने वाली होती थीं। क्लास के बाद सबके चेहरे खिल जाते थे और चमकने लगते थे। ऐसा लगता था कि उस क्लास से उन्होंने कई बातों की प्रेरणा पायी। उनके क्लास में रमणीकता भरी रहती थी। क्लास में सब हँस रहे होते थे और क्लास का आनन्द ले रहे होते थे। मुझे पूरी क्लास समझ में नहीं आती थी लेकिन श्रोताओं को देखकर ऐसा लगता था कि जगदीश भाई की क्लास में ऐसी बातें हैं जिन से ये सब इतने खुश हो रहे हैं। क्लासेस में वे बीच-बीच में बाबा के साथ के अपने अनुभव भी सुनाते थे। सुनने वालों को प्रेरणा मिलती थी कि हम भी बाबा से इस तरह के अनुभव करें।

उनकी क्लास में ज्ञान भी होता था और मनोरंजन भी

एक बार जब मैं मधुबन आई तब ज्ञान सरोवर के दादी कॉटेज में गयी। वहाँ स्पीकर में जगदीश भाई की आवाज़ सुनायी पड़ रही थी। वे ज्ञान सरोवर के हार्मनी हॉल में क्लास करा रहे थे। उस क्लास में एक कहानी सुना रहे थे एक भक्त की। "एक भक्त था, भगवान उससे मिलने आया। उसको देखकर भक्त ने कहा, भगवन आप तो मेरे पास आये हो लेकिन मेरे पास कुछ भी नहीं है। भगवान ने कहा, ठीक है बच्चे कोई बात नहीं। तुम्हारे पास समय तो होगा, तुम मेरे से मिलने आया करो। तब उस भक्त ने कहा, भगवन्, मैं बहुत व्यस्त हूँ, मेरे पास समय भी नहीं है। भगवान ने कहा, कोई बात नहीं, तुम्हारा तन तो है, उस तन द्वारा, जो मैं कहता हूं, वह सेवा करते रहो। तब उस भक्त ने कहा, भगवन्, तन तो है लेकिन वो भी ठीक नहीं, बीमार रहता है। भगवान मुस्कराने लगे और कहा, हे भक्त। तेरे पास कमी-कमजोरियां तो होंगी? वो मुझे दे दो।" मैं दादी कॉटेज में बैठकर ये बातें सुन रही थी तो मैं सोचने लगी, इस कहानी से हमें क्या पाठ सीखना चाहिए? भगवान को हमारे से कुछ नहीं चाहिए, उसको चाहिए, उसके बच्चे खुश रहे, सुखी रहे और पवित्र रहे। यह कहानी मै चीनी भाई-बहनों को सुनाती रहती हूं कि भगवान को हम से कुछ नहीं चाहिए, वो तो दाता है, वो हमें देने के लिए आया है। यह कहानी सुनकर कई चीनवासी प्रभावित होते हैं और ज्ञान सुनने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार, जगदीश भाई से और उनकी क्लास से मुझे बहुत प्यार है। उनकी क्लास में ज्ञान की गहराई भी होती है और मनोरंजन भी होता है।

उनके एक-एक शब्द में आत्मिक प्रकम्पन भरे रहते थे

कुछ सालों के बाद एक बार मैंने देखा, जगदीश भाई सुखधाम में ठहरे हुए हैं। किसी ने मेरे से कहा कि जगदीश भाई ने भगवद्‌गीता के बारे में एक अच्छी किताब लिखी है। मुझे गीता के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी। मैंने साहित्य विभाग में जाकर कहा तो उन्होंने अंग्रेज़ी की महाभारत और गीता का सच्चा स्वरूप और सार' किताब दे दी। वो बहुत बड़ी थी। मैने सोचा, इतनी बड़ी किताब कब पढ़ सकूंगी। वहां का एक भाई जगदीश भाई की एक के बाद एक किताब दिखाने लगा और उनके बारे में वर्णन करने लगा। उसकी बातें सुनकर मुझे लगा कि यह पुस्तक भी लेनी चाहिए, वह भी लेनी चाहिए। आखिरकार उनकी चार किताबें मैने खरीद लीं। उनको लेकर जाते समय मुझे सुखधाम में जगदीश भाई का रूम क्रास करना पड़ा। उस समय तो मैं ज्ञान में मै बहुत छोटी थी अर्थात् नयी-नयी थी। ज्ञान में आये 3-4 साल ही हुए थे। मैंने सोचा, जगदीश भाई हमारे वरिष्ठ भाई है, क्यो नहीं उनसे मिलकर जाऊं? मैंने दरवाजा को खटखटाया। अन्दर से आवाज आयी, अन्दर आइये। मैं अन्दर गयी और उनसे कहा, जगदीश भाई, आप की लिखी हुई इन पुस्तकों को मैंने खरीदा है, इन में से एक पर अपने सिग्नेचर करके दीजिये। मैंने यह नहीं कहा था कि मेरे लिए कुछ लिखिये। उन्होंने एक ही किताब पर नहीं चारों पर कुछ-न-कुछ मेरे लिए लिखा भी और सिग्नेचर भी किये। एक-एक किताब पर बहुत ध्यान से लिख रहे थे अर्थात् बहुत सोचकर लिख रहे थे। क्या लिखा, उस समय मैं देख नहीं पायी लेकिन जब कमरे में जाकर एक किताब का पहला पन्ना खोलकर देखा तो उसको पढ़कर मेरा दिल धड़कने लगा। उस में लिखा था, "माई रिस्पेक्टेड डिवाइन सिस्टर चेन" (मेरी आदरणीया दैवी बहन चेन)। उन शब्दों में इतनी शक्ति थी, इतनी प्रेरणा थी, इतनी ममता थी कि चीन जाकर बाबा की सेवा करने का मुझ में बहुत उमंग-उत्साह भर आया। मैंने सोचा, एक योगी के वायब्रेशन्स उसके एक-एक शब्द में भरे रहते हैं, वो वायब्रेशन्स हर किसी को आगे बढ़ाने का साधन बन जाते हैं। उनके उन शब्दों से मैं बहुत प्रेरित हो गयी और मन ही मन उड़ती रही।

उन्होंने मुझे शिव-संगिनी शिवशक्ति बनाया

इस घटना से मुझे लगा कि हम छोटों पर बड़ों का कितना नाज़ है। और उम्मीद है। इसके अलावा उनको हमारे में, हमारी विशेषतायें ही दिखायी पड़ती हैं। उन्होंने मेरे से कुछ पूछा नहीं कि आप क्या चाहती हो? आपकी क्या समस्या है? आपको क्या मदद चाहिए? लेकिन उन्होंने मेरे में ऐसी विशेषता देखी या भर दी कि मैं आगे जाकर रिस्पेक्टेड भी बनी और डिवाइन भी। जगदीश भाई कहा करते थे, "धन से और तन से समर्पित होना ही समर्पित होना नहीं है, जब तक हम मन से, बुद्धि से समर्पित नहीं होते तब तक बाकी सब समर्पण महत्वहीन हो जाते हैं।" इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उन्होंने मुझे यह भी कहा था कि "अपने को एक छोटी-सी कन्या मत समझो, अपने को सदैव बाबा की साथी-संगिनी शिवशक्ति समझ कर चलो तो सेवा में आगे बढ़ती रहोगी।"

वे बड़े सरल व्यक्ति थे

चीन में, बीजिंग में जब उनके साथ मैं 3-4 दिन रही तो उन से कई बातें सीखने को मिलीं, कई विशेषतायें देखने को मिलीं। जगदीश भाई बड़े सरल व्यक्ति थे। वे हमेशा नीट, क्लीन एण्ड एलेवेटेड (शुद्ध, स्वच्छ और उन्नत) व्यक्तित्व वाले थे। उनकी ध्वनि में नम्रता थी, बोल में मालिकपन था, स्पष्टिकरण में अधिकारपन था। जहाँ भी उन्होंने क्लास करायी, उन में हरेक को ऊँचा उठाने की बातें ही रहती थीं। एक बहन थी वहां, किसी समस्या से हताश और निराश हो गयी थी। वो जगदीश भाई से मिली। उसमें जगदीश भाई ने इतना उमंग-उत्साह भरा कि बाद में उसने वहाँ बहुत सेवा की। उसने चीनी भाषा में कई कॉमेन्ट्री तैयार की, हांगकांग में जाकर सेवा की। कोई भी जगदीश भाई से मिलता था, उन से कुछ-न-कुछ प्रेरणा लेकर जाता था और उनके मन में जगदीश भाई की अविनाशी छाप लग जाती थी।

वे बोलते तो बहुत वेग से बोलते थे, लगातार बोलते थे

उनकी क्लासेस का चीनी भाषा में अनुवाद मैं ही करती थी। मुझे भी 100% इंग्लिश समझ में नहीं आती थी। करीब 80% समझती थी। जगदीश भाई बोलते थे तो बहुत स्पीड (तेज़ी) से बोलते थे, लगातार बोलते थे। मैं मूंझ जाती थी। वे देखते थे कि मैं उलझन में पड़ गयी तो वे धीरे बोलना शुरू करते थे और सरल शब्दों का इस्तेमाल करते थे।
चीन में हम एक-दो कंपनियों में गये थे भाषण करने। एक कंपनी में व्यवस्था ठीक नहीं थी, हमारे जाने के बाद उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया। मैं बहुत नर्वस हो गयी। जगदीश भाई ने ही मुझे समझाया कि चिन्ता मत करो। कोई बात हो गयी तो हो गयी, उसको लाइट (हत्के) रूप में ले लो। कोई बात नहीं। मैं सोच रही थी, इतने बड़े वरिष्ठ भाई को हम लेकर गये, अरेंजमेन्ट्स (व्यवस्थायें) पूरी नहीं थी, ये क्या सोचेंगे। परन्तु नहीं, जगदीश भाई हर बात में बहुत सरल और सहज रहते थे, किसी बात या घटना के प्रभाव में नहीं आते थे और हमें हिम्मतहीन होने नहीं देते थे, बदले में हम में उमंग-उत्साह और हिम्मत और बढ़ाते थे। कहते थे, किसी भी बात को भारी नहीं समझना, अगर ऐसी बात हुई तो उसको हल्का लेना।

उनकी किताबों का अनुवाद करते बहुत खुशी होती थी

मैं चाइनीज़ कंपनी में जनरल मैनेजर थी। मुझे मैनेजमेन्ट ट्रेनिंग देनी पड़ती थी। तो मैंने जगदीश भाई की कई किताबों का चाइनीज़ भाषा में अनुवाद किया। उनकी लिखी हुई एक-एक किताब की, एक-एक लाइन इतनी सुन्दर है कि अनुवाद करने में बहुत खुशी होती थी और अनुभव भी होता था। मैंने अनुभव किया कि उनके मुख से जो भी शब्द निकले वो बहुत शक्तिशाली होते थे, सुनने वालों को प्रेरणा देने वाले होते थे। क्लास में आये हुए नये-नये बाबा के बच्चों को भी मैं जगदीश भाई के बारे में, उनके क्लासेस के बारे में सुनाती रहती हूँ। मैं जब निर्वैर भाई को देखती हूँ तो वे मुझे बड़े भाई के रूप में दिखायी पड़ते हैं। जब मैं जगदीश भाई को देखती थी तो वे मुझे बड़े भाई, पिता और दोस्त के रूप में दिखायी पड़ते थे। उनको देखकर अपनापन महसूस होता था।
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हम विदेशियों को वे बहुत याद आते हैं

संयुक्त राष्ट्रसंघ, न्यूयार्क में ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रतिनिधि के रूप में सेवारत ब्रह्माकुमारी सिस्टर गायत्री जी, भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने अनुभव इन शब्दों में व्यक्त कर रही हैं-
सन् 1976 में पहली बार मैं जगदीश भाई से मिली जब अपने माता-पिता के साथ भारत आयी थी। मेरा भाई और बहनें भी साथ में थीं। मेरे पिता जी स्टीव नारायण जी, जिनको सब अंकल कहते थे, सरकारी कार्यार्थ भारत विजिट पर थे। हम सब उनके साथ आये थे। भारत आने का यह भी हमारा लक्ष्य था कि हम आबू जायें और बाबा से मिलें। जब हम मधुबन आये उस समय यहाँ बड़ों की मीटिंग चल रही थी। तब ही मैंने जगदीश भाई को पहली बार देखा।

मैंने अन्दाजा लगाया कि ये बहुत गंभीर योगी हैं

जैसे ही मैंने उनको देखा तो मुझे लगा कि वे बहुत सीरियस (गंभीर) है। मुझ में उनके प्रति एक ऐसा चित्र तैयार हुआ कि वे बहुत सख्त आदमी है, बहुत अनुशासित व्यक्ति है, बहुत गंभीर व्यक्ति है और बहुत रिजर्व्ड (मूड भाव वाले या आरक्षित) व्यक्ति हैं। उस समय मेरी आयु करीब 22 साल की थी। उस युवा आयु में मैंने अन्दाज़ा लगाया कि ये एक बहुत गंभीर योगी है।
इसके बाद एक दिन मधुबन के मीटिंग हॉल में सब वरिष्ठ भाई-बहन के लिए भोज रखा गया था, उस में हम सबको भी आमन्त्रण मिला था। उस समय मुझे भारतीय व्यंजन अच्छे नहीं लगते थे। उनका स्वाद मुझे ठीक नहीं लगता था। हमें विविध भारतीय व्यंजन परोसे गये थे। मैं थाली में रखे हुए उन तरह-तरह के व्यंजनों को देख रही थी कि इन्हें कैसे खाऊँ। आपको पता होगा कि उन दिनों ब्रह्मा भोजन के लिए टेबल-कुर्सीयों का इस्तेमाल नहीं होता था। नीचे बैठकर ही भोजन करते थे। अचानक सिर उठाकर सामने देखा तो जगदीश भाई मुझे देख रहे थे, वे मुस्कराये। पहली बार मैंने उनको मुस्कराते हुए देखा था। उनकी उस मुस्कराहट ने उनके प्रति मेरे मन में जो चित्र था, उसको बदल दिया क्योंकि उनकी उस मुस्कराहट में इतनी शीतलता, सभ्यता, दिव्यता और ममता थी कि उनके प्रति अपनेपन की भासना आने लगी। मुझे अनुभव होने लगा कि अभी तक मैंने उनके बारे में जो सोच रखा था, वो उनका बाह्य रूप था लेकिन अन्दर से वे एक सरल, सभ्य और उदात्त व्यक्ति हैं।

मैं जब भी भारत आती थी, उनसे मिलकर ही जाती थी

जगदीश भाई हम डबल विदेशियों के लिए एक बहुत महान ज्ञानी थे उनकी बुद्धि, आत्मा और काया सदैव पूर्णतः यथार्थ एवं शुद्ध थी। बाबा मुरली में कहते हैं कि यह ज्ञान सारे विश्व के लिए है। यह एक ही विश्व विद्यालय है जो सारे विश्व के लिए ईश्वरीय ज्ञान पढ़ाता है। बाबा के ज्ञान को गहराई से अध्ययन करके, उसका चिन्तन करके, उसको वैश्विक ज्ञान बनाया भ्राता जगदीश जी ने। उन्होंने इस ज्ञान पर प्रभुत्व पाया था। ज्ञान का विस्तार करना, उसकी गहराई में जाना उनके लिए बायें हाथ का खेल था। इस ज्ञान को वैश्विक ज्ञान बनाने में वे सिद्धहस्त थे। उनके पास जाना माना ज्ञान के एक स्रोत के पास जाना होता था इसलिए मैं जब भी भारत आती थी, उनसे मिलकर ही जाती थी।

वे मास्टर नालेजफुल थे

जब भी वे डबल विदेशियों के लिए क्लास कराने आते थे, उनके साथ एक छोटा-सा काग़ज़ का टुकड़ा होता या जिसमें कुछ प्वाइंट्स लिखी होती थी। एक बार उन्होंने हमें जीवन की 16 कलाओं के बारे में क्लास करायी। उस काग़ज़ पर 16 लाइनें ही थीं लेकिन उन्होंने उन 16 प्वाइंट्स का इतना विस्तार से विवरण किया था कि वो टॉपिक 4 दिनों तक चली। उस क्लास में उन्होंने जीवन का लक्ष्य दिया, जीवन के नियमों का संविधान दिया। उस क्लास में उन्होंने जीवन का दर्शन करवाया और प्रैक्टिकल जीवन में 16 कलाओं का सहज प्रयोग कैसे करें, इसका सहज और सरल उपाय बताया। उस क्लास में उन्होंने जीवन का मार्गान्तरण कराया। उन दिनों डबल विदेशी बहुत कम संख्या में होते थे लेकिन हम वे भाग्यशाली आत्मायें हैं जिन्होंने मधुबन में बहुत कुछ सुविधायें और रुहानी पालना ली, जगदीश भाई और वरिष्ठ दादियों की क्लास सुनी। जगदीश भाई एक विशिष्ठ व्यक्तित्व वाले थे। तीक्ष्ण बुद्धि, ज्ञान की समझ, योग की अनुभूति, ये सब उनमें विशेष थे। उनकी बुद्धि इतनी दूरंदेशी और ज्ञानयुक्त थी कि कई बार उनको समझना बहुत कठिन होता था। उन्होंने इस ज्ञान को जिस रीति से समझा था, अपनाया था, उसको समझना हर किसी के बस की बात नहीं थी। मैं समझती हूं, वे शास्त्रों में भी बड़े विद्वान थे। उन्होंने भारत की और भारतीय समाज की पद्धतियों को, मत-सम्प्रदायो को अच्छी रीति समझा था। वे हिन्दू धर्म के बारे में सविस्तार जानते थे। इतना ही नहीं, मैं समझती हूं, वे मनोविज्ञान को भी अच्छी तरह जानते थे। हिन्दू धर्म के विधानों को मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता में समाकर, लोगों की ईश्वरीय ज्ञान में अभिरुचि पैदा करना यह उनकी बड़ी विशेषता थी। उन्होंने इस नये ज्ञान को सामान्य जनता के सामने बड़ी सरल पद्धति में और बुद्धिजीवियों के सामने एक गहन और महान् विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया।
वे मास्टर नालेजफुल थे, कभी बाबा के ज्ञान और बाबा के नियम-मर्यादाओं के प्रति उनका सम्मान और महत्व कम नहीं हुआ। बाबा की हर बात का उन्होंने पूर्ण रूप से अनुसरण किया। बाबा के ज्ञान को उन्होंने हिन्दू विधि-विधान के रूप में, मनोविज्ञान के रूप में, फिलासफी के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया। आप कभी जगदीश भाई से सीखना बन्द नहीं कर सकते क्योंकि हमेशा वे हर बार कुछ न कुछ नया ही सिखाते थे।

उनके लिए खाना बनाने का सौभाग्य मिला था

वे गयाना भी गये थे लेकिन मैं उस समय वहाँ नहीं थी। वे जब न्यूयार्क आये थे तब मैं उनके साथ सेवा में रही। सन् 1978 में ही मैं न्यूयार्क आ गयी थी। सन् 1986-87 में कोस्टारिका के शान्ति विश्वविद्यालय वालो के निमन्त्रण पर जगदीश भाई वहाँ आये थे। उस विश्वविद्यालय के जो अध्यक्ष थे, वे किसी एक सम्मेलन में जगदीश भाई से मिले थे। उन्होंने जगदीश भाई को निमन्त्रण दिलवाया था। उस समय मैं उनके साथ गयी थी। सेवा में उनके साथ रहते मैंने देखा कि वे अपने नियम और धारणा में कितने अनुशासित अर्थात् पक्के थे। वे अपनी जीवनशैली में भी बड़े नियमबद्ध थे। हम किसी एक परिवार वालों के घर में ठहरे हुए थे लेकिन वे अपने खाने-पीने, रहने-करने में पक्के थे। वे मेरे हाथ से बना हुआ खाना ही खाते थे। मुझे खाना बनाना नहीं आता था, फिर भी जो था, जैसा था उसको बहुत प्यार से, रिगार्ड से खाया करते थे और मेरी प्रशंसा कर मेरा उमंग-उत्साह बढ़ाते थे। खाना तो खास नहीं होता था। चावल और दाल-सब्जी। उन्होंने कहा था कि आप जो भी बनाओगी, जैसा भी बनाओगी, मैं खाऊँगा। मैं समझती थी कि मैं उनके लिए खाना बनाने के योग्य नहीं हूं लेकिन उनकी हिम्मत भरने वाली बातों से मैने खाना बनाना सीख लिया कुछ हद तक।

हर स्थान पर मुझे ही पहला अवसर देते थे

वह मेरे लिए पहला मौका था उनके साथ सेवा करने का। विश्वविद्यालय में भाषण उनको ही करना था क्योंकि निमन्त्रण उनको ही था लेकिन भाषण करने से पहले, मुझ से अति नम्रतापूर्वक उन्होंने विनती की कि मेरे से पहले आप कुछ सुनाओ। मुझे सुनाना पड़ा। मेरे भाषण के बाद उन्होंने भाषण किया और प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम भी हुआ। मैं तो उनकी भेंट में बहुत छोटी थी लेकिन इस बात से मुझे पता चला कि बाबा का जो आदेश है कि बहनों को आगे रखना चाहिए, बहनों को महत्व देना है और बहनों का पार्ट विशेष है, इसका उनको पूरा सम्मान था और वे ऐसा करते भी थे। उनमें यह भाव नहीं था कि मैं इतना पुराना और योग्य हूं, यह तो बहुत छोटी है, इतने बड़े विश्वविद्यालय में यह कैसे बोलेगी, क्या बोलेगी। बाबा ने जो ट्रेनिंग उनको दी थी कि बहनों को आगे रखना चाहिए, इसे वे सदैव निभाते रहे।
वे जानते थे कि मैं उम्र में भी और अनुभव में भी छोटी है लेकिन वे यह भी जानते थे कि बहनों के लिए बाबा की विशेष मदद होती है और दुआयें होती हैं। इसलिए हमेशा उन्होंने हर स्थान पर ऐसा ही किया और करते आये। यह एक सूक्ष्म और गहरी बात है। मैं नहीं जानती कि बहुत-से लोग इस सूक्ष्म बात को जानते हैं या नहीं, मानते हैं या नहीं कि बाबा की इन मर्यादाओं में बहुत सूक्ष्म रहस्य और सफलता छिपी है। हरेक ईश्वरीय मर्यादा एक आध्यात्मिक विधि है, उसमें बहुत गहरा राज़ समाया हुआ है। सफलता का मूलाधार ये मर्यादायें हैं। यह बात जगदीश भाई भली भांति समझते थे और अनुसरण करते थे।

वे एक महान् स्पिरिचुअल मास्टर माइण्ड थे

मेरी दृष्टि में जगदीश भाई एक महान् स्पिरिचुअल मास्टर माइण्ड थे। मैं कहती हूं, इस संस्था के लिए उनकी बुद्धि मास्टर प्लान थी। उनमें हर बात को, हर घटना को दूरदर्शी दृष्टि से देखने की कला थी। इसलिए मैं उनको कहती हैं कि वे न केवल मास्टर माइण्ड थे बल्कि मास्टर फ्यूचर सीनर भी थे।
बुद्धि दूरादेशी होने के कारण उन्होंने व्यवसायिक प्रभागों (विंग्स) की रचना की। इनकी रचना करने के पीछे उनका उद्देश्य यही था कि इस संस्था को एक शैक्षणिक अकादमी के रूप में समाज और सरकार के सामने पेश करें। उनका यह भी मानना था कि समाज के, दुनिया के हर व्यावसायिक वर्ग के लिए ये आध्यात्मिक नीति-नियम बहुत ही आवश्यक हैं और लाभदायक हैं। उन्होंने उन सामाजिक वर्गों के कल्याण के लिए बाबा के सिद्धान्तों को चुना और उनको दिया। उनका हर विचार और योजना बाबा के ज्ञान और नियम-मर्यादाओं के आधार पर ही होते थे।

दादी जी के निःस्वार्थ स्नेह और जगदीश जी की प्लानिंग बुद्धि ने ही संस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया

दादी प्रकाशमणि जी और भ्राता जगदीश जी के बीच अलौकिक और रूहानी प्रेम का एक ऐसा तालमेल था कि इस संस्था की उन्नति और प्रगति में उन दोनों ने बहुत महत्वपूर्ण पार्ट बजाया। दादी जी के निःस्वार्थ स्नेह, मन को शीतलता देने वाली उनकी मुस्कराहट और जगदीश भाई की प्लानिंग बुद्धि और नियमों को सख्ती से पालन कराने की कला ने इस संस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया।
संयुक्त राष्ट्र संघ में संस्था की तरफ से मेरे वहाँ रहने के कारण बड़ों की मीटिंग में दादी जी मुझे भी बुलाती थी। वहां जगदीश भाई भी हुआ करते थे। दादी जी इस संस्था की मुखिया थी। मुझे लगता था कि दादी जी स्पिरिचुअल लीडर (आध्यात्मिक नेता) हैं। अपने विलक्षण और विशेष व्यक्तित्व से, अपनी पवित्रता की शक्ति से और निःस्वार्थ, बेहद के प्यार से उन्होंने इस संस्था को इतना ऊँचा बनाया और विश्व में विशेष स्थान दिलाया। जगदीश भाई ने भविष्य के लिए इस संस्थान की उन्नति की योजना बनायी, इसके सिद्धान्तों और संविधान को निर्धारित किया। ये दोनों मिलकर इस संस्था के लिए ऐसे कार्य करते थे कि मुझे देख-देखकर आश्चर्य लगता था। एक ने कहा, दूसरे ने उसको प्रैक्टिकल में लाने के लिए योजनाबद्ध कर दिया। उन दोनों का सुन्दर संचालन और सामंजस्य था। उनके एक-दूसरे के समर्थन और सहयोग के बल ने ही इस संस्था को इतना आगे बढ़ाया। मैं मानती हूं, दादी जी और जगदीश भाई दोनों महान् चिन्तक थे और विश्व सेवाधारी थे।

वे बहुत ही समर्थ आयोजक थे

जगदीश भाई बहुत ही समर्थ और आश्चर्यजनक आयोजक थे। बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करने में उनकी योजना की कितनी भी प्रशंसा करें, वो कम है। सन् 1981 में शायद दिल्ली के लाल किला मैदान में एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन और महोत्सव का आयोजन हुआ था। उसमें विश्व के सारे सेवाकेन्द्र वालों ने भाग लिया था। उसकी तैयारियाँ, व्यवस्थायें, कार्यक्रमों की रूपरेखा, झांकियों की तैयारी, पूरे भारत और विदेशों से आये हुए मेहमान और ब्रह्मावत्सों के लिए रहने-खाने-पीने की व्यवस्था, आने वाली जनता के लिए बैठने की व्यवस्था, अलग-अलग वर्गों के सम्मेलन और स्नेह-मिलनों का आयोजन वे सभी देखने लायक थे। इन सबके पीछे जगदीश भाई की योजना, मेहनत और सबको साथ ले चलने के विधान ही मूल कारण थे।
इस कार्यक्रम के आर्किटेक्ट जगदीश भाई थे। उन्होंने सिर्फ प्लान बना कर नहीं दिया परन्तु उस प्लान को अमल में लाने के लिए खुद दिन-रात लगे रहते थे सबके साथ। वो सम्मेलन बहुत ही सफल रहा।

वे टीचरों को ट्रेनिंग देने वाले टीचर थे

मैं जगदीश भाई को बहुत ही मिस करती हूँ। कई बार कोई बात मुझे समझ में नहीं आती है तो जगदीश भाई की याद बहुत आती है। किसी बात को समझाने में, कोई राय सलाह देने में या किसी भी समस्या को कैसे विधिपूर्वक और युक्तियुक्त, बाबा की याद और ज्ञान के आधार से निवारण करना है, इसे बताने में वे बहुत माहिर थे। हरेक की बुद्धि अपनी-अपनी होती है लेकिन जगदीश भाई की बुद्धि ऐसी थी कि हर बात को स्टेप बाई स्टेप समझा कर, उस समस्या को जड़ सहित कैसे मिटाये- यह विधि बताती थी। टीचर्स ट्रेनिंग की फाउण्डेशन उन्होंने ही डाली। कैसे भाषण करना है, कैसे कोर्स देना है, कैसे मुरली पढ़नी है और कैसे उसकी गहराई में जाना है- इन सब बातों की वे ट्रेनिंग टीचर्स को दिया करते थे। वे टीचरों को ट्रेनिंग देने वाले टीचर थे। वे टीचर बहनों को बहुत ऊँची दृष्टि से देखते थे। वे सदैव यही चाहते थे कि प्रत्येक टीचर बहन बाबा को रॉयल्टी से, उदात्त भाव से, दिव्यता से, सम्मान से और भव्यता से दुनिया के सामने प्रत्यक्ष करे।

वे जन्मजात मेधावी थे

जगदीश भाई जन्मजात मेधावी थे। उनका व्यक्तित्व एक महान् नायक का था। उनके गुण और योग्यतायें एक सम्पन्न चिन्तक और त्यागी के थे। वे ब्राह्मण जीवन का एक अति उत्तम उदाहरण थे। मैं यह मानती कि उनका जीवन संगमयुगी ब्राह्मण जीवन जीने वालों के लिए आदर्श है।
मेरे फादर और मदर को जगदीश भाई के प्रति बहुत सम्मान था। मुझे याद है जब हम पहली बार मधुबन आये थे उस समय जगदीश भाई भी यहीं थे। मेरे पिता जी के मन में अनेक प्रश्न थे कि इस दुनिया का परिवर्तन कैसे होगा? उसकी प्रक्रिया क्या और कैसी होगी आदि-आदि। बड़ी दीदी और दादी ने जगदीश भाई को कहा था कि अंकल के साथ बैठो और उनके प्रश्नों को हल करो। निर्वैर भाई के आफिस में जगदीश भाई हमारे माता-पिता के साथ बहुत लम्बे समय तक बैठे थे। जब अंकल बाहर आये तो अंटी (मेरी मम्मी) से कह रहे थे, वो भाई बड़े बुद्धिमान और अनुभवी हैं। उस पहली मुलाक़ात में ही पिता जी और जगदीश भाई के बीच, दो महान् बुद्धिजीवियों के बीच, वो अविनाशी भ्रातृप्रेम जाग्रत हुआ था और वो अन्त तक बढ़ता ही गया। उन दोनों के बीच विचार-विमर्श बड़े ऊंचे स्तर के होते थे।
प्रश्नः आपने अपने इस रूहानी जीवन में व्यक्तिगत रूप में उनसे क्या प्रेरणा ली है?
उत्तरः मैं इस ज्ञान में केवल भावना और प्रेम के आधार पर चली। अगर ज्ञान की कोई बात समझ में नहीं आती थी तो सुनाने वाले व्यक्ति पर विश्वास और प्यार के कारण मैं उस बात को स्वीकार कर लेती थी। विशेषकर दादी जी की शीतल दृष्टि, निःस्वार्थ प्यार, मातृ-पालना ने हम सारे परिवार वालों को इस ज्ञान में कोई संशय आने नहीं दिया। उस समय मैं तो छोटी थी, दुनिया के कोई अनुभव मुझे नहीं थे लेकिन जगदीश भाई मेरे लिए अपना समय निकाल, ज्ञान को अच्छी तरह समझने के लिए और बाबा के प्रति प्यार बढ़ाने के लिए जो प्रेरणा और उत्साह भरते थे- उनकी इस विशेषता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। दूसरा प्रभाव मुझ पर जिसका पड़ा, वो है उनका डिसिप्लिन्ड लाइफ (अनुशासित जीवन)।

एक लम्बी दृष्टि दी और मेरी विशेषतायें बतायीं

जब मुझे पता पड़ा कि वे बहुत बीमार हैं तब मुझे बहुत अफसोस हुआ। मैं उनसे मिलने के लिए भारत आयी। वे मधुबन के सुखधाम में थे। यह थी सन् 2001, फरवरी-मार्च की बात। उस समय भले ही उनका शरीर कमज़ोर था लेकिन वे बौद्धिक रूप से बहुत शक्तिशाली थे। अच्छी तरह बात करते थे, सोचते थे और मार्गदर्शन देते थे। उस समय मैंने उनसे एक प्रश्न पूछा, जगदीश भाई, मेरी क्या विशेषता है? उन्होंने मुझे एक लम्बी दृष्टि दी और मुस्कराये। उसके बाद उन्होंने मुझे एक सुन्दर बात कही कि आपकी विशेषता यह है कि आप एक विशेष क्षेत्र में सेवा कर रही हैं। इस विशेष सेवा के लिए आप इसी लिए निमित्त हैं क्योंकि आपके अन्दर एक विशेष गुण है। वो है, आप कोई साधारण सेवा करना नहीं चाहती। इसलिए ड्रामा ने आपको यह विशेष सेवा सौंपी। लेकिन इसके लिए आपको बहुत निर्भय होकर आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा। इस विशेष सेवा में सफलता पाने के लिए आपको विनम्र हो रहना पड़ेगा, कर्मठ हो रहना पड़ेगा। यह सुनकर मैंने प्रश्न किया कि क्या आप अपनी विशेषता वरदान के रूप में मुझ में स्थानान्तरित कर रहे हैं या सच में यह विशेषता मेरे में है? वे सिर्फ मुस्कराये और कुछ कहा नहीं। यह मेरी उनके साथ की अन्तिम मुलाक़ात थी। जब उन्होंने शरीर छोड़ा उस समय मैं लैटिन अमेरिका में सेवा-टूअर पर थी। मैं मधुबन नहीं आ पायी।

युवाओं के लिए वे आदर्श और अनुकरणीय थे

भ्राता जगदीश जी ने युवाओं के उत्थान के लिए बहुत-सी योजनायें बनायी थीं। हर साल दिल्ली के सब कुमारों को एक स्थान पर इकट्ठा कर स्वामी विवेकानन्द जी के जन्मदिन पर 'युवा दिवस' मनाते थे। इन्होंने अपने वक्तव्यों और लेखों द्वारा लाखों युवाओं में परिवर्तन लाया। युवाओं के लिए इन्होंने अनेक लेख लिखे। 'युवा जागो', 'नवयुवकों के लिए धर्म की आवश्यकता', 'युवा वर्ग एक पुराने समाज के परिवर्तक और एक नये समाज के लिए प्रणेता' ऐसे सैकड़ों लेख और प्रवचन देकर, युवाओं को जाग्रत कर इनको अखण्ड ब्रह्मचारी, सात्विक योगी, समाज सेवक और आध्यात्मिक योद्धा बनाया है। इनमें से कुछ युवा भाइयों के अनुभवों को आपके समाने हम रख रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. कर, भाई साहब के सम्पर्क में आकर जीवन को ईश्वरीय सेवा में समर्पित कर, रूस की ईश्वरीय सेवा के लिए निमित्त बन, वर्तमान समय मॉस्को में सेवारत ब्रह्माकुमार विजय भाई जी जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"जगदीश चन्द्र हसीजा, जैसा नाम वैसा उनका व्यक्तित्व था। वे बड़े विद्वान थे, धार्मिकता से भरपूर थे और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। धर्म, विज्ञान, साहित्य, न्याय, समाज, अर्थ, राजनीति आदि सब क्षेत्रों के ज्ञान के ज्ञाता थे। हम उनको प्यार से 'भाई साहब' कहते थे। वे भी मुझे अपना छोटा भाई समझकर मेरे साथ व्यवहार करते थे। बहुत नज़दीक से, अपना समझकर,आप समान मानकर मुझ से व्यवहार करते थे।
सन् 1983, जून महीने में मैं इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में राजयोग सीखने आया था। उस समय दिल्ली यूनिवर्सिटी में एम.एस.सी. पूरी करके पी.एच.डी. कर रहा था। साप्ताहिक कोर्स के बाद मुझे भाई साहब से मिलने का पहला मौका मिला। वे स्टेज पर बैठे थे, वहीं मिले, उनको तुरन्त लन्दन जाना था। मेरा कोर्स चल ही रहा था। लन्दन से लौटने के बाद बहनों ने मुझे उनसे परिचित करवाया समय लेकर। वह शाम का समय था। कमरे में बिठाकर मुझे उनका परिचय कराया गया कि ये ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के चीफ स्पोकमैन (मुख्य प्रवक्ता) हैं, लेखक हैं, सम्पादक हैं, राजयोगी हैं, इतने समय से राजयोग का अभ्यास करते हैं इत्यादि। उसके बाद बहन जी चली गयी, उस कमरे में मैं और भाई साहब दो ही रह गये। उन्होंने मेरे से पूछा, आप क्या करते हो? कहाँ से आये हो आपके परिवार में कोई ज्ञान में हैं ऐसी ऐसी बाते पूछी। यह मेरी मुखामुखी पहली भेट थी भाई साहब से।

उनके चारों तरफ़ लाइट ही लाइट दिखायी पडती थी

शुरू से मैं उनके प्रति आकर्षित था, भले ही उनसे परिचय नहीं हुआ था लेकिन कोर्स के दौरान बहने, भाई साहब के बारे में जो कुछ बताती थी, उसके आधार पर मुझे लगता था कि वे एक विशेष व्यक्ति हैं। मुझे बचपन से ही राजयोग के प्रति एक तरह का लगाव था। राजयोग सीखने की बहुत तमन्ना थी। इसलिए जब सेवाकेन्द्र का बोर्ड देखा 'राजयोग केन्द्र' तो मैं राजयोग सीखने की इच्छा से ही अन्दर गया और कोर्स लिया। उसके बाद जब भी भाई साहब से मिलता था, उनसे बातचीत करता था, उनके वाइब्रेशनस मुझे बहुत अच्छे लगते थे। भाई साहब जो सुनाते ये वो मैं सुनता था लेकिन मैं उनके चारों ओर की लाइट भी देखता रहता था। उनके चारों तरफ मुझे लाइट ही लाइट दिखायी पड़ती थी। मैं तो साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) था, इस बात को जानता था कि औरा (प्रभामंडल) क्या है, बॉडी क्या है। मैं जानता था कि यह कोई भ्रम नहीं है, कल्पना नहीं है या काई सम्मोहन क्रिया नहीं है। उनके हाव-भाव, बातचीत, दृष्टि-व्यवहार, यौगिक वायब्रेशन्स - ये सब देखकर मैंने तसल्ली कर ली कि मैं सही स्थान पर आया हूं और मैंने सही रास्ता चुना है।

उनकी बहुत वण्डरफुल पर्सनालिटी थी

भाई साहब की बहुत वण्डरफुल पर्सनालिटी (विचित्र व्यक्तित्व) थी, यह सिर्फ मेरा अनुभव नहीं है, उनके सम्बन्ध सम्पर्क में जो भी आते थे उनको विशेष अनुभव होता था और पास आने से ही उनके जीवन में एक अनोखा परिवर्तन आ जाता था। उनके सामने जाने वाले की दृष्टि-वृत्ति, सम्बन्ध-सम्पर्क, आचार-विचार सब बदल जाते थे। बाबा कहते हैं ना, फॉलो फादर, फॉलो अनन्य बच्चे! भाई साहब को पहली बार देखते ही मैं बहुत प्रभावित हो गया। उसके बाद दादी प्रकाशमणि जी से मिला तो उनकी बड़ी वण्डरफुल और प्रेरणादायी पर्सनालि केटी थी। उसके बाद मैं सम्पर्क में आया दादी जानकी जी, दादी गुलज़ार जी, दादी मनोहर इन्द्रा जी, दादी हृदयपुष्पा जी, दादी चन्द्रमणि जी के। वाह! ये भगवान के वण्डरफुल सैम्पल्स हैं, उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना हैं। इनको देखना, इनसे मिलना, इनके साथ बातचीत करना बड़ी भाग्य की बात है।
ज्ञानमार्ग का लक्ष्य बहुत ऊँचा है। यहाँ अन्त तक पढ़ना है, अन्त तक पुरुषार्थ करना है, अन्त तक सेवा करनी है। तब जाकर सम्पूर्ण बनना है। सम्पूर्णता के हमारे सामने सैम्पल्स हैं ये सब वरिष्ठ। उनमें जगदीश भाई साहब भी एक थे और अनोखे थे।

उनकी आवाज़, उनके वायब्रेशन्स, उनका हँसाने का तरीक़ा- ये सब उनके पास खींचकर ले जाते थे

जैसे-जैसे इस ज्ञान में आगे बढ़ने लगा, भाई साहब के नज़दीक जाने लगा, उनके साथ सेवा करने के, उनसे ज्ञानचर्चा करने के मौके मिलने लगे। ज्ञान में चलने के बाद भी मैं 'परमात्मा सर्वव्यापी है' यह मानकर चलता था क्योंकि भक्तिमार्ग में भगवान को सर्वव्यापी मानते हैं। कोर्स के बाद भी मेरा मन परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है यह मानने के लिए तैयार नहीं था। जब भाई साहब के सम्पर्क में आया, तब उनसे यह प्रश्न पूछा कि परमात्मा कैसे सर्वव्यापी नहीं है? भाई साहब का समझाने का तरीक़ा बड़ा वण्डरफुल था। उन्होंने इतनी आसानी से सिद्ध करके बताया कि मुझे मानने में और निश्चय करने में देर नहीं लगी। उन्होंने कहा, भगवान हमारा बाप है ना, टीचर और सद्‌गुरु है ना! तो बाप कभी सर्वव्यापी होता है क्या? टीचर सर्वव्यापी है तो वो हमें सिखायेगा कैसे? इस प्रकार, छोटी-छोटी बातों का मिसाल देकर उन्होंने मुझे समझाया और ज्ञान में निश्चय बिठाया।
भाई साहब से ज्ञान सुनने का जब स्वाद लग गया तो मैं छोटी-छोटी बातें पूछने के बहाने से बार-बार उनके पास जाने लगा। उनकी आवाज़, उनके पास के वायब्रेशन्स, उनका हँसाने का तरीक़ा- ये सब मुझे उनके पास खींचकर ले जाते थे। मैंने देखा, उनका सिद्धान्त ही था कि हर कार्य समय पर होना चाहिए। जिस समय, जो कार्य पूर्ण करने के लिए मान लिया होता तो ठीक उस समय वो कार्य तैयार रहना चाहिए। नहीं तो वे बहुत सीरियस (गंभीर) हो जाते थे।

कितना निरहंकारीपन था उनमें !

एक बार की बात है, शक्ति नगर सेन्टर का कन्स्ट्रक्शन चल रहा था। भाई साहब खुद ही लकड़ी का बीम उठाकर ऊपर तीसरी मंज़िल पर ले जा रहे थे। यह देखकर मुझे आंसू आ गये। इतना बड़ा भाई, ऐसा साधारण काम करते हैं। कितना निरहंकारीपन था उनमें वे कहा करते थे, परमात्मा ऊँचे-ते-ऊँच है ना! वो भी आकर बच्चों की सेवा करता है। वो निराकारी होते हुए भी दूसरे का तन उधार लेकर निरहंकारी होकर, निः स्वार्थी होकर सेवा करता है। हम तो साकारी हैं, हमारे पास अपने शरीर हैं, तो हम क्यों नहीं अपने-अपने काम खुद करें?
मुझे आज भी नाज़ है कि मैं उस सेन्टर से निकला हूँ जिस सेन्टर पर जगदीश भाई, गुलज़ार दादी रहते थे। मैं उस सेन्टर से हूँ जो सारे विश्व का (बाबा का) पहला पहला सेन्टर है।

देहली यूनिवर्सिटी में यूथ विंग तैयार करवाया

जहां-तहां बड़े-बड़े हॉल में, स्टेडियम में और यूनिवर्सिटी के अलग-अलग डिपार्टमेंट में भाषण आदि करना होता तो उनके लिए लैटर ड्राफ्ट करना, सम्बन्धित व्यक्तियों से मिलना इत्यादि सेवाओं में मैं भाई साहब को सहयोग देता था। मैंने देखा, भाई साहब एक-एक रुपया भी सोच-सोचकर खर्च करवाते थे। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में था तो वहाँ सेवा शुरू हुई। वहां मेरे से पहले सेवा 'ना' के बराबर हुई थी। वहाँ तो कितने डिपार्टमेंट्स हैं, साइंटिस्ट्स हैं, फिलासफर्स हैं, स्टूडेण्ट्स हैं और स्टाफ मेम्बर्स हैं। मुझे नशा चढ़ा रहता था कि मैं गॉडली यूनिवर्सिटी का स्टूडेण्ट हूं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में कोई भी हो, प्रोफ़ेसर हो या स्टुडेण्ट, उन से मैं कहता था कि मैं ईश्वरीय विश्व विद्यालय, गॉडली यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा हूँ। वहां का लक्ष्य यह फलाना है। कोई भी मेरे से वाद-विवाद नहीं करता था। भले वो बड़े सीनियर प्रोफेसर होते थे लेकिन सुनते थे ध्यान से। हर साल, भाई साहब पूरे साल का प्रोग्राम बनाते थे कि हमें किस डिपार्टमेंट में क्या नेवा करनी है। एक भी डिपार्टमेंट नहीं जिसमें हमने कार्यक्रम नहीं किया हो और एक भी कॉलेज नहीं जहां हम गये नहीं। भाई साहब के साथ मिलकर पूरा प्लान बनाया और दो-ढाई साल में दिल्ली यूनिवर्सिटी और उसके सम्बन्धित सब कॉलेजों में प्रोग्राम कर लिये। इस सेवा से उन दिनों यूनिवर्सिटी में यूथ विंग भी बन गया। लौकिक स्टडी में भी भाई साहब ने मुझे बहुत सपोर्ट (समर्थन) किया। मुझे डिग्री भी मिल गयी, डॉक्टरेट भी।

कहते थे, यह बाबा का कार्य है, हुआ ही पड़ा है, बस हमें पीछा करना है

भाई साहब सेवा करना शुरू करते थे तो दिन-रात लग जाते थे। वे करते थे तो हमें भी उनके साथ करना पड़ता था। वे सेवा में लग गये माना खाने-पीने का ध्यान ही नहीं रहता था लेकिन हमारा ख्याल ज़रूर रखते थे। वे जानते थे, कुमार तो कमरे में खाना बनाकर तो नहीं रखते हैं। इसलिए वे ऊपर से हमारे लिए 1-2 केले या सेब या अमरूद फेंक देते थे। उन दिनों उतने सेवाधारी भी नहीं थे। थोड़ा बहुत समय निकालने वाले कुछ कुमार होते थे।
सेवार्थ बाहर जाना होता तो हम बस या ऑटो में जाते थे। टैक्सी या अपनी गाड़ी की बात ही नहीं थी। गुलज़ार दादी जी को भी हम थ्रीव्हीलर में ले जाते थे। जब इंदिरा गांधी स्टेडियम में प्रोग्राम था, उस समय भी हम और भाई साहब बस स्टाप तक पैदल ही जाते थे। रात 10-11 बजे तक स्टेडियम में तैयारी के कार्य में लगे रहते थे। ऐसी कोई सेवा होती तो भाई साहब रात भर जागा करते थे। सेवा के लिए भाई साहब ने न स्थान देखा, न समय देखा, न खाने-पीने को देखा। बहुत मेहनत करते थे। कार्य सेवा, किसी से करानी होती तो एक-दो बार कोशिश करके छोड़ते नहीं थे। कहते थे, बार-बार जाओ, दस बार जाओ, बारह बार जाओ। उनको ज्ञान समझाओ, प्रसाद खिलाओ और उससे ही काम कराके आओ वे भी ऐसे ही करते आये थे और हमें भी ऐसे करने के लिए कहते थे।वे कहते थे कि बाबा का कार्य है, हुआ ही पड़ा है, बस हमें पीछा करना है
डेरावाल सेन्टर की जगह लेने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ी हम लोगों को (त्यागी जी, सुधा बहन आदि) रोज़ वहां मन्दिर के पास जाते थे, ट्रस्टी से मिलने के लिए घंटों बैठते थे। उनको ज्ञान समझाते थे व टोली खिलाते थे और बैठकर योग भी करते थे। कितने साल तक मेहनत करने के बाद वो स्थान मिला हमको। भाई साहब ने जीवन में सहज मार्ग को चुना नहीं और किसी सेवा में हार मानी नहीं। यह किस का कार्य है जानीजाननहार, सर्वशक्तिवान बाबा का कार्य है। उसने आदेश दिया है, तो यह होना ही है। कुछ भी हो जाये, इसको करना ही है यह उनका संकल्प होता था। वे किसी भी कार्य को ऊपर-ऊपर से नहीं करते थे। शुन्य से शुरू करते थे और 100% तक ले जाकर पूरा करते थे अर्थात् फाउण्डेशन से लेकर ऊपर छत पूरी होने तक छोड़ते नहीं थे। यह था आध्यात्मिक शक्ति का चमत्कार! असंभव कार्य भी संभव होना यह कोई छू मंत्र नहीं था उनमें जो योगबल, आत्मबल और अविचल परमात्म-विश्वास था, उनसे वे कार्य करते थे। भाई साहब के पास यज्ञ के सब प्रकार के कार्य होते थे सेन्टर का काम, साहित्य का काम। हर काम बड़ी प्लानिंग से करते थे।
उनको ज्ञान समझाते थे, टोली खिलाते थे और बैठकर योग भी करते थे। कितने साल तक मेहनत करने के बाद वो स्थान मिला हमको। भाई साहब ने जीवन में सहज मार्ग को चुना नहीं और किसी सेवा में हार मानी नहीं। यह किस का कार्य है? जानीजाननहार, सर्वशक्तिवान बाबा का कार्य है। उसने आदेश दिया है, तो यह होना ही है। कुछ भी हो जाये, इसको करना ही है- यह उनका संकल्प होता था। वे किसी भी कार्य को ऊपर ऊपर से नहीं करते थे। शून्य से शुरू करते थे और 100% तक ले जाकर पूरा करते थे अर्थात् फाउण्डेशन से लेकर ऊपर छत पूरी होने तक छोड़ते नहीं थे। यह था आध्यात्मिक शक्ति का चमत्कार! असंभव कार्य भी संभव होना यह कोई छूमंत्र नहीं था। उनमें जो योगबल, आत्मबल और अविचल परमात्म-विश्वास था, उनसे वे कार्य करते थे। भाई साहब के पास यज्ञ के सब प्रकार के कार्य होते थे। सेन्टर का काम, साहित्य का काम। हर काम बड़ी प्लानिंग से करते थे।

वे जिन से भी मिलते थे, उनके दिल में बस जाते थे

एक बार वे मुझे हैदराबाद ले गये थे सेवा-अर्थ। वहाँ मैं उनको अपने लौकिक घर पर भी ले गया था। उससे हमारी लौकिक माता जी की बहुत सेवा हुई। हालांकि वो ज्ञान में थी लेकिन भाई साहब से मिलकर बहुत प्रभावित हुई। उसके मन में भाई साहब के प्रति इतना रिगार्ड और प्रेम था कि बात मत पूछो। माता जी भगवद्गीता बहुत पढ़ती थी। जब मैं घर जाता था, भाई साहब की लिखी हुई 'महाभारत और गीता का सच्चा सार और स्वरूप' उन्हें पढ़कर सुनाता था। जब भाई साहब को घर ले गया तो माता जी को बताया कि इन्होंने ही वह किताब लिखी है। माता जी को भाई साहब से दृष्टि लेना, उनसे ज्ञान की चर्चा करना बहुत अच्छा लगा। उस समय उन्होंने भाई साहब को एक छोटी-सी चांदी की डिब्बी में एक छोटी-सी लौकिक गीता उपहार के रूप में दी। माता जी भाई साहब से मिलकर बहुत खुश हो गयी। उसके बाद लौकिक गीता पढ़ना छोड़ दिया और अलौकिक गीता ही वे पढ़ती रही। भाई साहब से जो भी मिलते थे, लौकिक वाले हों या अलौकिक वाले, भाई साहब उनके दिल में बस जाते थे, उनकी छाप मिलने वाले के दिल और दिमाग पर बहुत समय तक रहता था।

ख़ास कुमारों को योग का विशेष अनुभव कराते थे

एक दिन सुबह क्लास के बाद उन्होंने मेरे से पूछा कि आपका योग कैसा है? प्रश्न सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि ज्ञान मिल गया, बाबा मिल गया, ब्राह्मण परिवार मिल गया, कुमार जीवन था, अच्छी पढ़ाई और डिग्री थी। मौज-मस्ती में संगमयुगी जीवन चल रहा था। भाई साहब का प्रश्न सुनकर मैं सोच में पड़ गया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण जीवन में सब-कुछ है लेकिन योग नहीं है तो यह संगमयुगी सुहावना जीवन ठीक नहीं चलेगा, लंगड़ाते चलेगा। चलते-चलते ईश्वरीय जीवन में सुस्ती और नीरसता आ जायेगी। इसलिए योग की साधना करना बहुत जरूरी है। उस प्रश्न का उत्तर मैंने ऐसे दिया कि योग करता हूँ भाई साहब, पुरुषार्थ करता हूं। भाई साहब ने कहा, आज शाम छह बजे बाबा के कमर में आ जाओ, मैं भी आऊंगा। ठीक छह बजे मैं बाबा के ट्रान्सलाइट के सामने जाकर बैठ गया। थोड़ी देर के बाद भाई साहब भी आये। भाई साहब ने कहा, आप थोड़ा पीछे आ जाओ, दीवार की तरफ़ बैठो। भाई साहब ने जैसे कहा, वैसे में बैठा। भाई साहब मेरे सामने बैठे, हम दोनों के बीच बाबा (बाबा का ट्रान्सलाइट)। मैं आँखें खोलकर भाई साहब को देख रहा हूं, भाई साहब मुझे दृष्टि दे रहे हैं। उस समय ज्ञान में चले मुझे दो-ढाई साल हो गये होंगे। आज तक भी वो दृश्य, वो अनुभव पूरा स्पष्ट है। उस दिन मैंने यह अनुभव किया कि निराकारी और लाइट-माइट अवस्था क्या होती है। इस भौतिक शरीर के भान से ऊपर उठना, उसके लिए बहुत शक्ति चाहिए, बहुत लाइट चाहिए तब ही आत्मा को विदेह अवस्था का अनुभव होता है। भाई साहब के अन्दर जो भावना थी, जो वायब्रेशन्स थे उन्होंने यह काम किया कि मुझे देह से ऊपर उड़ा दिया। आत्म-अभिमान क्या होता है, सोल-रियलाइजेशन क्या होती है इसका अनुभव भाई साहब ने मुझे कराया। उस अनुभव को मैं आज तक भूल नहीं पाया है। अपनी योगशक्ति से अपने में परिवर्तन लाना यह कोई बड़ी बात
नहीं है परन्तु स्वयं के साथ-साथ दूसरों में भी परिवर्तन लाना, दूसरों को अनुभव कराना, बॉडी कॉन्शस से सोल कान्शस में लेकर आना, यह बहुत बड़ी बात है। उस दिन भाई साहब ने स्वयं मेरे से ऑफर की थी कि आज मैं आपको योग कराऊँगा। योग कराने का मतलब है योग सिखाना। उन्होंने जितना समय मेरे साथ योग किया या मुझे योग कराया उत्तना समय ऐसा हो गया था कि एकदम डेड साइलेन्स, एकदम परमधाम वाली साइलेन्स।

विघ्न विनाशक बनने के लिए कहते थे

भाई साहब हमेशा बिजी (व्यस्त) रहते थे और हमें भी सेवा में बिजी करते थे। ऐसी कोई सेवा नहीं जो हमने की नहीं। सेवा में तो बहुत विघ्न आते थे लेकिन उन विघ्नों से हम कभी डरे नहीं। भाई साहब कहते थे, अगर विघ्न नहीं आयेंगे और हम उनको पार नहीं करेंगे तो हम विघ्नविनाशक कैसे बनेंगे? उन दिनों यूनिवर्सिटी में प्रोग्राम करना सहज नहीं था। हेड ऑफ दी डिपार्टमेंट 'हाँ' कर देता था तो कोई क्लर्क 'ना' कर देता था। क्लर्क 'हाँ' बोल देता तो उसका बॉस ढीला हो जाता था। फिर सबको मिलाके साथ लेकर चलना पड़ता था। नहीं मानते तो मैं पीछे पड़ जाता था कि अरे, यह भगवान का कार्य है, क्यों मना कर रहे हो? बार-बार मेरा आना देखकर तंग होकर 'हाँ' कर देते थे और हम बाबा की सेवा कर लेते थे। एक तरफ हमारी पढ़ाई भी चलती थी, दूसरी तरफ हमारी रिसर्च भी चलती थी और तीसरी तरफ बाबा की सेवा भी चलती थी।

भाई साहब की दृष्टि में बड़ी शक्ति थी

एक बार हमारे होस्टेल में भी भाई साहब का प्रवचन रखा था। सब स्टूडेण्ट्स बैठे हुए थे। उनमें से एक स्टूडेण्ट था जो बड़ा होशियार था और फिलासाफी बहुत पढ़ा हुआ था। वो अपनी मान्यताओं पर चलता था, किसी का ज्ञान सुनना ही नहीं चाहता था। उस दिन वह भी भाई साहब का प्रववन सुनने आया था। भाई साहब उस दिन आत्मा, परमात्मा और योग के बारे में बोल रहे थे। जब भाई साहब ने कहा कि आत्मा ही परमात्मा को याद करती है, याद करने की उस विधि को ही योग कहा जाता है तो वो व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया और ज़ोर-जोर से बोलने लगा कि आत्मा-परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं, दोनों एक ही हैं। भाई साहब ने समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो मानने के लिए तैयार नहीं था। वो बोलता गया कि उस शास्त्र में वो लिखा है, इस शास्त्र में यह लिखा है। भाई साहब शान्ति से उसकी सारी बातें सुन रहे थे। वो अपना सारा सुनाकर चुप हो गया और शान्त होकर खड़ा हो गया। तब भाई साहब ने कहा, ठीक है। एक काम करते हैं, दो मिनट राजयोग मेडिटेशन करते हैं। भाई साहब ने सबको योग कराया, सबने बहुत अच्छा अनुभव किया। लास्ट में वो व्यक्ति भी आकर भाई साहब से बहुत प्यार से मिला, योग का अपना अनुभव सुनाने लगा और कुछ लेन-देन भी किया।

सदैव उन्होंने बहनों को ही आगे रखा

बाबा कहते हैं ना, पाण्डवों को शिकार लेकर आना है और शक्तियों को उस शिकार को समर्पित कराना है। शुरू से भाई साहब ने बाबा की इस आज्ञा का परिपालन किया। सेवा में मेहनत खुद करते थे लेकिन हमेशा बहनों को आगे रखते थे। जो भी करना है, बहनों से पूछो, बहनों से राय लो, बहनों को ले जाओ। कहते थे, बाबा की सेवा तथा बाबा की दृष्टि सारी दुनिया के लिए होती है। रशिया की सेवा के लिए भाई साहब ही बीज स्वरूप हैं। निमित्त तो ड्रामा में मैं था लेकिन उसके लिए प्रेरणास्रोत भाई साहब थे। मेरी इच्छा थी कि चक्रधारी दीदी और उनके साथ सुधा दीदी, सन्तोष दीदी रशिया की सेवा को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठायें। उनके ही उमंग-उत्साह से वह सेवा आरम्भ हुई। शुरू-शुरू में भाई साहब ने सब-कुछ किया। जब वहाँ सेवा स्थिर हो गयी, सब प्रबन्ध हो गये तब भाई साहब किनारे हो गये। कहने लगे, बड़ी दादी और दादी जानकी जैसे चाहे वैसे करें, मेरा काम अभी पूरा हो गया। आगे क्या करना है- वे जानें। आश्चर्य की बात थी कि दादी जी ने हमें यही कहा कि जगदीश भाई ने जिस तरीके से सेवा शुरू की है, उसी अनुसार आगे भी चलें। उन्होंने जो मार्ग प्रशस्त किया, आज तक उसी मार्ग पर रशिया में सेवा चल रही है।
भाई साहब रशिया आते थे विशेष कर ट्रेनिंग देने। सेवा के लिए वहां के ही भाई-बहनों को ट्रेनिंग देकर तैयार करते थे। जब पहली बार भाई साहब रशिया आये, उस समय लगभग 10 टीचर्स को उन्होंने तैयार किया। अभी रशिया में लगभग 70 टीचर्स तैयार हुए हैं जो सेन्टर पर रहते हैं, सेन्टर भी 70 हैं।

भाई साहब में दृढ़ता का गुण बहुत विशेष था

विंग बनाने में भी उनको बहुत मेहनत लगी। सब विंग्स की रूप-रेखा बनाना, उनके कोआर्डिनेटर्स, चेयरपर्सन्स, मेम्बर्स कौन-कौन होने चाहिए- इसका चयन करना बहुत मुश्किल काम था। ये सब उन्होने किया।
भाई साहब में दृढ़ता का गुण बहुत विशेष था। भाई साहब जितने भी निर्णय लेते थे, लेने के बाद उनमें पूरे दृढ़ रहते थे। एक बार फाइनल कर दिया माना वो कार्य पूर्ण होना ही चाहिए। किसी भी बात को वे कभी हत्का नहीं छोड़ते थे। उनको बाबा के कार्य और आदेश में इतना विश्वास रहता था कि यह किसने कहा है। यह किसका कार्य है! यह भगवानुवाच है। कार्य हुआ ही पड़ा है। हमें भी ऐसा ही अभ्यास और विश्वास हो गया था कि भाई साहब ने कहा है माना इस कार्य को करना ही है क्योंकि वे कभी अपने निर्णय से पीछे हटने वाले नहीं हैं। धीरे-धीरे हमारे में यह संस्कार भर गया कि भाई साहब ने कहा माना उसको करना ही है और वो कार्य होना ही है।
भाई साहब मम्मा की बहुत महिमा करते थे। वे जब मम्मा-बाबा की महिमा करना शुरू करते थे ना, ऐसा लगता था कि वे उनकी याद में खोये हुए हैं और हमें भी लगता था कि मम्मा-बाबा के साथ उस समय हम भी मौजूद हैं और उनसे प्यार पा रहे हैं।
जब भाई साहब बीमार पड़े, बहुत पतले हो गये थे। सब भाई साहब से कहते थे, भाई साहब, आप अभी रेस्ट कीजिये। आप हमें बोलते जाइये, हम करेंगे लेकिन वे छोड़ते ही नहीं थे, खुद ही करते थे। साथ-साथ बहुत उपराम भी रहते थे।

भाई साहब के साथ रहने का मुझे बड़ा नाज़ है

दिल्ली में रहते हुए भी उनका सारा कनेक्शन मधुबन से था। मधुबन के सारे कारोबार में उनकी स्थिति उपस्थिति हुआ करती थी। साहित्य लिखने के कारण वे दिल्ली में रहते थे। कई बार ब्रह्मा बाबा ने भी कहा है कि 'जगदीश बच्चा बाबा का राइट हैण्ड है, उसको यहां मधुबन में रहना चाहिए लेकिन ड्रामा में नहीं है, उसको वहीं रहना है।" मुझे नाज़ है कि भाई साहब के साथ रहने के, उनके साथ रहकर बाबा की सेवा करने के, उनसे ज्ञान के राज़ को जानने के, योग की गहरी अनुभूति करने के अनेक सुअवसर मुझे मिले।
उन्होंने कभी अपने नाम, मान, शान की परवाह नहीं की। किसी भी कार्यक्रम में उनका नाम लिया, न लिया, उसका कोई फरक उन्हें नहीं पड़ता था। जो करना था, वो कार्य किया और वहाँ से गायब, किसी कोने में या सभा के बीच में जाकर बैठ जाते थे।"
***

आदर्श व्यक्तित्व का स्वरूप-आदरणीय जगदीश भाई साहब

अपनी लौकिक नौकरी करते, भ्राता जगदीश जी के साथ दिन-रात आफिस के कार्य में सहयोगी, शक्ति नगर के ब्रह्माकुमार राकेश भाई जी, उनके साथ के अपने अनुभवों को इस प्रकार हमारे साथ बांट रहे हैं-
"आदर्श जीवन बनाना एक बहुत गहन तपस्या है। आदर्शों का वर्णन करना बहुत सहज और सरल है परन्तु स्वयं को उन वर्णित आदर्शों पर चलाना - एक कड़ी तपस्या है। जीवन तो सभी जी रहे हैं परन्तु जीवन को महानता की सीढ़ी पर चढ़ाना यह एक कठिन तपस्या है। आदर्शों का वर्णन करना अलग बात है परन्तु स्वयं को औरों के लिए आदर्शमूर्त बनाना, अनेकों का उन आदर्शों पर चलना सहज कर देना यह उससे भी ऊंची बात है। ऐसे ही एक महान् व्यक्तित्व तथा सर्व के लिए आदर्शमूर्त थे आदरणीय जगदीश भाई साहब। त्याग, तपस्या, सेवा की प्रतिमूर्ति थे। ब्रह्मा बाबा को फालो कर, उनके प्यार का सबूत देने वाले सपूत थे आदरणीय जगदीश भाई साहब। इस दुनिया में बड़े-बड़े विद्वान हुए हैं, दार्शनिक हुए हैं, वैज्ञानिक हुए हैं परन्तु तीनों ही विशेषतायें एक ही व्यक्ति में दिखायी दें, ऐसे ही व्यक्तित्व वाले थे भ्राता जगदीश जी।
आज सर्व दैवी परिवार के लिए आदर्श बन चुके जगदीश भ्राता जी, शरीर तजने के बावजूद भी सर्व ब्राह्मणों के दिल में अमर स्थान बनाये हुए हैं। अपनी सुन्दर लेखनी के माध्यम से आज भी वे जीवित हैं। गंभीरता और रमणीकता, लव और लॉ का बैलेन्स रखने वाले, सहयोग और स्नेह की प्रतिमूर्ति आदरणीय भाई साहब सम्पूर्ण ब्राह्मण परिवार के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके सानिध्य में 15 वर्षों तक रहने का सौभाग्य इस आत्मा को भी प्राप्त हुआ।

अनुकरणीय जीवन था उनका

मैं 1986 में ज्ञान में आया, आते ही ज्ञान और ज्ञानदाता तथा समय की समीपता पर निश्चय हो गया था। कोर्स करते-करते ही ईश्वरीय नियमों तथा मर्यादाओं के प्रति दिल में महत्व उत्तर गया और उसी समय से ही उनका पालन करते हुए एक नये जीवन की शुरुआत हो गयी। धीरे-धीरे बहनों के द्वारा जगदीश भाई साहब के विषय में सुनने को मिलता रहा। ब्रह्मा बाबा की जीवन-कहानी सुनकर और पढ़कर बहुत नशा बढ़ा कि मैं आदिदेव वा आदिदेवी (मम्मा) की सन्तान है। नशे के साथ-साथ रह-रहकर एक पीड़ा भी अन्दर में होती थी कि काश! मैं भी मम्मा-बाबा की साकार उपस्थिति में आ जाता। यह कैसी कल्प-कल्प की नूंध हो गयी।बार-बार यह सोचकर नयन गीले हो जाते थे और दिल भर आता था परन्तु कोई उपचार तो था नहीं क्योंकि ड्रामा एक्यूरेट है।
जब प्रथम बार भ्राता जी से बहनों ने मिलवाया, उस घड़ी उनकी अलौकिक छवि, उनका व्यक्तित्व एक खुली किताब के समान दिखायी दिया। जीवन का मार्ग स्पष्ट हुआ। योगी जीवन का अनुशासन क्या होता है- यह भी स्पष्ट हुआ। ईश्वरीय नियमों वा मर्यादाओं के प्रति सम्मान कैसे करना होता है- ये भी ज्ञात हुआ। कहने का भावार्थ यह है कि ईश्वरीय जीवन में कैसे चलना है- ये सब सहज समझ में आ गया, बिना उनसे कुछ पूछे।
भ्राता जी का विशेष अटेन्शन रहता था कि जैसा कर्म मैं करूंगा, मुझे देख और करेंगे। प्यारे ब्रह्मा बाबा को फॉलो करते हुए सभी को यही प्रेरणा देते रहे। त्याग, तपस्या और सेवा का अनूठा सन्तुलन उनके जीवन में देखा।

योग्य बनाने की कला

एक छोटी-सी योग्यता के कारण मेरा उनके सम्पर्क में आना हुआ। जब मुझे ये ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तब मैंने अनचाहे रूप से 15 दिन टाइपिंग स्कूल में जाकर टाइपिंग सीखी। रुचि नहीं थी, बस ये देखने के लिए कि टाइपिंग कैसे करते हैं और 15 दिन करके छोड़ दी थी। ज्ञान प्राप्त होने के 8-10 मास बाद बहनों ने भाई साहब से कहा कि ज़रूरत है तो आप इस भाई का सेवा में सहयोग ले सकते हैं। उन्होंने पूछा, टाइपिंग कर सकते हो? मैंने कहा कि केवल कीबोर्ड (keyboard) की नॉलेज है, स्पीड नहीं है। भाई साहब ने कहा, चलेगा। उस समय पहली बार एक लैटर टाइपिंग के लिए दिया गया। मैंने 1-1/2 घंटे में टाइप किया, वो तब भी खुश हुए। कहा, ठीक है। फिर धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता रहा और टाइपिंग स्पीड भी बहुत अच्छी हो गयी। इस बात में मैंने महसूस किया कि भाई साहब के कारण बाबा मुझ आत्मा को बहुत-बहुत मदद करते रहे। यह दृष्टान्त मैंने इसलिए बताया कि उनके अन्दर के धैर्य को देख मै विस्मित होता था। उन्हीं के धैर्य की शक्ति थी जिस कारण मैं आत्मा भी अपनी योग्यता को बढ़ाने में उत्साहित रही।

सेवा का महत्व बताते थे

भ्राता जी में ये विशेषता थी कि वे सेवा के हर कार्य को परफेक्शन (परिपूर्णता) से करते थे और करवाते भी थे। लैटर टाइपिंग हो या कारोबार से सम्बन्धित कोई भी कार्य, जब तक वो सन्तुष्ट नहीं हो जाते थे तब तक एक ही चीज़ (मैटर) को बार-बार टाइप करना पड़ता था क्योंकि उन दिनों (1986-87) में मैनुअल टाइप राइटर होते थे; उनका मानना था कि ये भगवान के यज्ञ का कारोबार है, यहाँ से परफेक्ट लैटर ही जाना चाहिए। मैं कहता था कि भाई साहब, आप चाहे 100 बार एक ही मैटर टाइप करायें, मेरे लिए तो भाग्य ही है, मेरे भाग्य का मीटर तो चालू रहता है। चाहे एक ही चीज़ 100 बार करायें, चाहे 100 लैटर टाइप करायें लेकिन मेरा तन, मन, समय और श्वास सब सेवा में ही तो रहता है। तब वो बहुत स्नेह भरी मुस्कान से मेरी ओर देखते और मैं भी एक मीठी-सी मुस्कान देते हुए सेवा में तत्पर रहता था। भाई साहब ऐसे उत्तर से एकदम हत्के हो जाते थे और मैं आत्मा बाबा को शुक्रिया करते हुए यही शुभ कामना करता था कि बुद्धि को सदा समर्पित रखते हुए सेवा करनी है। क्यों, क्या नहीं करना, जैसा वो चाहते हैं वैसा ही कार्य करते हुए उन्हें सन्तुष्ट करना है। मैं सोचता था, अगर भाई साहब मुझ आत्मा से सन्तुष्ट रहेंगे तो मीठे बाबा का प्यार भी मुझ पर बरसेगा, ऐसा हुआ भी।

स्व-पुरुषार्थ और सेवा का अनूठा सन्तुलन

मैंने व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया कि सेवाओं की इतनी ज़िम्मेवारी होते भी तथा सेवा में इतना व्यस्त होने के बावजूद भी उन्होंने कभी स्व-पुरुषार्थ नहीं छोड़ा अर्थात् स्टूडेण्ट लाइफ को अन्त तक निभाया। रोज़ अमृतवेला योग, मुरली श्रवण, मनन-चिन्तन और विद्यार्थी जीवन के नियम पालन करते रहे। प्रातः काल से ही यज्ञ के कारोबार अथवा सेवाओं को लेकर फोन आते थे, इसलिए वे जल्दी उठकर अमृतवेला योग कर, मुरली सुन फिर सेवा की ज़िम्मेवारी निभाते थे। जैसे ही समय मिलता था, मुरली का मनन-चिन्तन कर प्वाइंट्स भी लिखते थे, जिनको इकट्ठे कर मैं फाइल में लगा देता था। उनकी इस धारणा से मैंने सीखा कि सेवा में सफल होने के लिए अपनी स्थिति को श्रेष्ठ वा शक्तिशाली बनाकर रखना बहुत जरूरी है और उसके लिए पढ़ाई नियमित रूप से पढ़ना और बाद का चार्ट नियमित रूप से लिखना बहुत ज़रूरी है। इस प्रकार उनकी प्रैक्टिकल जीवन-शैली ही मेरे लिए पर्याप्त रही, वो खुली किताब रही जिसे रोज पढ़-पढ़कर मैं सीखता रहा कि मुझे भी ऐसा ही करना है, ऐसा ही बनना है। अपने भाग्य पर नाज़ करता था कि जो भगवान का राइट हैण्ड है, मुझे उनके साथ पार्ट बजाने का कल्प-कल्प के लिए अवसर मिला है। मैं प्यारे बापदादा को दिल से शुक्रिया अदा करता रहा और ध्यान रखता रहा कि सदा अपनी चलन द्वारा उन्हें सन्तुष्ट रखूँ।

उनकी स्थिति का प्रभाव

जब भी मैं उनके कमरे में जाता था, एक अलौकिक अनुभूति होती थी। ऐसा महसूस होता था कि यह देह कमरे के बाहर ही रह गया और मैं आत्मा स्वरूप अन्दर प्रवेश कर रहा हूँ। कमरे में जाने से ही गहरी शान्ति की अनुभूति होती थी। मैं सहज ही अशरीरी स्थिति और सुनहरे लाल प्रकाश की दुनिया का अनुभव कर रहा होता था। जब भी मैं टाइप करके भाई साहब के पास प्रूफ दिखाने जाता था, जितना समय वे उसको पढ़ते थे, करेक्ट करते थे मैं इस अलौकिक अनुभूति में खोया रहता था।
उनकी पवित्रता का आभामण्डल उनके चारों ओर महसूस होता था। जैसे सफ़ेद प्रकाश-सा उनके चारों ओर बिखरा हुआ हो। उस स्वरूप को देख मुझे आता था कि मैं इन्हें पकड़ लूं परन्तु संकोचवश स्वयं को नियन्त्रित कर लेता था। अपने विषय में सोचता था कि मैं ऐसा कब बनूंगा! यह दृष्टान्त इसीलिए बताना चाहता हूँ कि वातावरण शक्तिशाली तो उनकी शक्तिशाली वृत्ति के प्रभाव से ही बना था अर्थात् वे गुप्त रीति से सेवा करते हुए भी स्व पुरुषार्थ के प्रति सदा जाग्रत रहे।

बड़ों की समीपता के लिए प्रेरित करना

कभी-कभी वे मुझे प्रेरणा देते थे कि आप बीच-बीच में गुलज़ार दादी जी से मिलकर आया करो। दादी जी को क्या पसन्द है, कौन-सा फल उन्हें पसन्द है, वो लेकर जाना। मैं नारियल पानी और हरे-हरे अमरूद लेकर बहुत खुशी-खुशी से दादी जी से मिलने गया। भाई साहब ने फोन पर पहले से ही नीलू बहन को सूचित कर दिया था। जब मैं पहुंचा तो दादी जी ने पाण्डव भवन (दिल्ली) में ऊपर, जहाँ उनका कमरा था, वहाँ बुलवा लिया। बहुत प्यार से दादी जी मिले, हाल-चाल पूछा, पुरुषार्थ के विषय में भी चर्चा की। कहने का भावार्थ यह है कि दादियों की नज़र भी इस पर पड़े, उनकी शक्तिशाली दृष्टि इसे मिले तो इसे और प्राप्ति होगी, ऐसी उनकी शुभ भावना थी।
उनका नाम सुनते ही कि जगदीश भाई ने किसी को भेजा है, आलराउण्डर दादी जी भी, जोकि नीचे के कमरे में रहती थीं, बहुत प्यार से कहती थी, 'लाल, टोली खाओ। जगदीश के यहाँ से आये हो'। बहुत ही स्नेह-प्यार से पालना देती थीं। उनका इस दैवी परिवार में कुछ ऐसा भाव था कि उनके नाम से ही हमें स्नेह-प्यार सबके द्वारा मिलता था। हम अपने भाग्य और भाग्यविधाता बाप का गुणगान करते थे।

व्यक्तिगत पालना का सौभाग्य

सेवा में सहयोगी होने के कारण अब मेरा अधिक समय उन्हीं के साथ बीतता था। दिन में आठ घंटे नौकरी करने के साथ-साथ सुबह और ऑफिस के बाद का समय उन्हीं के साथ रहना होता था। यज्ञ में चारों ओर जो कारोबार चलता था, कॉन्फ्रेंस, भट्ठियाँ या अन्य कोई विंग्स आदि के कार्यक्रम, सभी की लिखत-पढ़त उन्हीं के द्वारा होती थी। उस कार्य व्यवहार के लिए मेरे द्वारा समय कम दिया जाता था क्योंकि कारोबार इतना होता था कि सारा दिन भी किया जाये तो भी कम पड़े। मेरी पारिवारिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कभी नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहा। कहते थे, आप चार घंटे सुबह, चार घंटे शाम को सेवा के लिए देते हो, आपका आठ घण्टे का सेवा का चार्ट हो ही जाता है, क्या ज़रूरत है नौकरी छोड़ने की ? बाबा की आज्ञा याद दिलाते थे, देखो, आठ घण्टे सेवा, आठ घण्टे नौकरी और आठ घण्टे में नींद और पुरुषार्थ; सब ठीक तो चल रहा है। इस प्रकार, कर्मयोगी बन जीवन को चलाने की प्रेरणा देते थे।
कारोबार बहुत बढ़ता जा रहा था। सेवायें ज़ोर पकड़ती जा रही थीं। ऐसे में खाने-पीने-सोने आदि की फुर्सत में भी कमी आती जा रही थी। भाई साहब देखते थे कि इसका खाना-पीना ऊपर-नीचे हो रहा है तो वे इस विषय में ध्यान देते हुए समय पर नाश्ता-भोजन आदि के लिए पूछते थे और खिलाते थे। बहनों का पूरा सहयोग इस विषय में रहता था, वे भी पूरा ध्यान रखती थीं।
बीच-बीच में अपनी ही थाली से आधा भोजन दे देते थे। बहुत मना करने पर भी वे दे ही देते थे। मैं कहता था कि भाई साहब, मैं किचन से ले लेता हूँ, वे बहुत आत्मिक स्नेह से देखते हुए कहते थे, नहीं, यही लेना है। मैं भाव-विभोर हो जाता था और बाबा का गुणगान करते प्रभु प्रसाद समझ ले लेता था। उसी पालना का प्रभाव रहा जो बाबा से बुद्धियोग बढ़ता गया।
उनकी धारणा का अद्भुत प्रभाव देखा कि उनके सम्पर्क में आने वाली आत्मा अर्थात् उनसे पालना लेने वाली आत्मा उनके प्रति दिल का गहरा रिगार्ड तो रखती ही थी परन्तु अटैचमेन्ट हो जाये ऐसा नहीं होता या बल्कि उन आत्माओं की अटैचमेन्ट बाबा से बढ़ती जाती थी। ऐसी शक्ति उनसे मिलती थी।
जब वे कोई बातचित कर रहे होते थे तो मैं उनकी आँखों की तरफ देखता रहता था। छोटी-छोटी आँखों में पुतलियाँ जब घूमती थीं, महसूस होता था कि अन्दर से कोई (आत्मा) इन पुतलियों को चला रही है अर्थात् बातचीत करते भी अशरीरीपन की महसूसता आती थी।
एक बार उन्होंने कहा, राकेश भाई, आप तो हमसे भी आगे जाओगे। मैंने कहा, भाई साहब, आप क्यों मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं। वे बोले, देखो, आप तन-मन के साथ धन भी सेवा में लगाते हो (जैसा कि मैंने पहले बताया है कि मैं लौकिक में नौकरी करता था), हमारे पास तो अपना पर्सनल धन नहीं है जो लगायें। आपका यह भाग्य हमसे ऊँचा है। ऐसे समय प्रति समय वे मुझ आत्मा का उमंग-उत्साह बढ़ाते थे।
वे हमेशा मुझे समर्पित भाई के रूप से ही देखते थे। कहते थे कि आप केवल रात को सोने के लिए ही तो घर जाते हो, सारा दिन तो यहीं सेवाकेन्द्र में सेवा पर रहते हो। इसलिए मधुबन से जब भी दादी जी आम, टोली आदि भिजवाते थे, भाई साहब सभी समर्पित बहनों और भाइयों का हिस्सा निकलवाते समय एक हिस्सा मेरे लिए भी निकलवाते थे। कहते थे, दादी जी ने सेन्टर वासियों के लिए भिजवाया है, आप भी समर्पित हो इसलिए ले लो। इस तरह व्यक्तिगत पालना की शक्ति मुझ आत्मा के रोम-रोम में समाती जा रही थी।
यज्ञ के प्रति सम्मान रखवाना, यज्ञ में त्याग तपस्या और सेवा के महत्व को समझाते हुए जीवन को प्रेरित करना, दादियों के प्रति दिल का गहरा रिगार्ड बिठाना- ये सब उनकी जीवन-शैली में थे।

सेवा-सेवा, सेवा नहीं तो भाग्य नहीं

एक बार हम मधुबन आये हुए थे, वापस जाने से पहले दादी जी से छुट्टी लेने उनके मीटिंग रूम में गये, जो कि ईशू दादी जी के ऑफिस से पहले बायी ओर (दीदी का कमरा) है। दादी जी आयीं, मैं और चक्रधारी दीदी ही थे। दादी जी पहले दीदी से मिले, फिर दीदी ने दादी जी को कहा कि दादी, यह राकेश भाई है, आजकल जगदीश भाई के साथ सेवा में है, उनके ऑफिस का कार्य देखता है (इससे पहले दादी जी को इतना ही परिचय था कि यह शक्ति नगर का कुमार है)। जैसे ही दादी जी ने यह सुना, बहुत प्यार से टोली मेरे हाथ में रखते हुए बहुत ही मीठी दृष्टि दी और कहा, आपने हमारे जगदीश भाई का कारोबार सम्भाल कर हमें हत्का कर दिया; हमें संकल्प रहता था कि हमारे जगदीश भाई के पास कोई स्थायी सहयोगी नहीं है। जैसे ही मैंने सुना, एक सेकण्ड के लिए मैं स्तब्ध रह गया कि ऐसा तो कुछ मैंने किया नहीं, मैं तो प्यारे बाबा की सेवा के लिए ही तो हैं। यह तो मेरा भाग्य है। दादी जी के ऐसा कहने के बाद मुझे सेवा की ज़िम्मेवारी और उसके महत्व का पता लगा।

सादगी और शालीनता का सन्तुलन

भाई साहब के जीवन में सादगी अपनी महानता को लिये हुए थी। उनके रहने का कमरा बिल्कुल साधारण-सा था। वह कमरा सबसे ऊपर वाली मंज़िल पर था जहाँ बहुत गरमी रहती थी। उसमें रखा हुआ सामान चाहे उनका पलंग, चाहे सोफा सब बहुत साधारण थे। अगर उन्हें कह देते कि सोफा चेंज कर लीजिये, कमरे में ए.सी. लगवा लीजिये तो कहते थे, "बाबा ने सारा जीवन झोपड़ी और पुराने कमरे में बिताया। जब आदिपिता एक साधारण से कमरे में रहते थे, मैं कैसे नये कमरे में या अच्छे कमरे में रहूँ।" ऐसे बाबा का उदाहरण देते हुए, वे उस बात को वहीं समाप्त करा देते थे।
सादगी के साथ-साथ उनमें व्यवहारिक शालीनता थी, देखकर लगता था कोई राजा बात कर रहा है। उनके शब्दों में बोलने के तरीके आदर्श व्यक्तित्व का स्वरूप आदरणीय जगदीश भाई साहब
में बहुत रोयल्टी महसूस होती थी। यज्ञ में एक अथॉरिर्टी होने के बावजूद भी उन्होंने कभी ऐसा एहसास नहीं दिलाया कि हम सब भाई-बहनों के लिए उनके पास समय नहीं या वो बड़े हैं। सबके साथ बहुत ही सिम्पल तरीके से मिलना-जुलना, सबकी अवस्थाओं को जानते हुए दिशा निर्देश देना- ये सब सहयोग उनसे मिलता था। उनकी सादगी के गुण के कारण सभी को महसूस होता था कि वे हमारे अपने हैं और अपने जीवन के लिए सहज रूप से सलाह लेते थे। सभी बातें या कहें कमी-कमज़ोरी की बातें सहज रूप से उन्हें बताते हुए उनसे मुक्त होने का उपाय लेते थे क्योंकि वे जानते थे कि उनकी यह बात किसी के पास नहीं जायेगी। भाई साहब को बताया माना बापदादा को बताया। सभी का ऐसा अनुभव था कि हमने साकार बाबा को तो नहीं देखा परन्तु जगदीश भाई से मिलकर हम बाबा की महसूसता लेते हैं।

सेवा में ईमानदारी

जैसे बाबा कई बार मुरलियों में ब्राह्मण जीवन की दिनचर्या को तीन भागों में बाँटते हैं: 8 घंटे सेवा, 8 घंटे याद और 8 घंटे लौकिक कार्य। भाई साहब सेवाकेन्द्र में रहते भी अपनी दिनचर्या में इस बात को महत्व देते थे। कम से कम 8 घंटे तो सेवा करनी ही है। वैसे तो हमने उनको 18-19 घंटे लगातार सेवा करते देखा। जब कभी तबीयत के कारण उनसे कहा जाता था कि थोड़ा आराम कर लीजिये, तब वे ऐसा ही कहते कि बाबा का अन्न खाता हूँ, कम से कम इतनी सेवा तो (8 घंटे) मुझे करनी ही है। एक-एक दाने का हिसाब देना होगा, यह कोई साधारण यज्ञ नहीं है। भगवान का रचा हुआ यज्ञ है। हम यहाँ सेवाधारी बनकर आये हैं, सेवा तो हमारा धर्म है, ऐसा कहते हुए हमारी भावना भी यज्ञ की सेवा प्रति बढ़ाते थे।
मैने देखा, सेवा करते दिन-रात क्या होता है, भूख-प्यास क्या हाता है, इन सभी बातों से बेखबर अथक होकर सेवा में लगे रहते थे तथा औरो को भी लगाये रखते थे। साथ ही, हर कार्य के प्रति वे समय के पाबन्द रहते और समय पर ही कार्य पूरा करते थे।

निश्चयबुद्धि विजयन्ती

सन् 1996 वर्ष को यज्ञ की डॉयमण्ड जुबली वर्ष के रूप में मनाया जा रहा था। दिल्ली में सबकी तरफ से संगठित कार्यक्रम की योजना बनी, जिसके लिए इंदिरा गाँधी इंडोर स्टेडियम को चुना गया। उस हॉल में 25000 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। उस कार्यक्रम में यज्ञ की तरफ़ से, मधुबन से बड़ी दादी जी (प्रकाशमणि दादी जी) तथा अन्य दादियों, बड़े भाई-बहनों को निमन्त्रण था। मुख्य अतिथि के तौर पर प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति आदि को निमन्त्रण दिया गया था। कार्यक्रम के पर्चे, निमन्त्रण-पत्र सब बंट चुके ये। कार्यक्रम की जोर-शोर से तैयारी चल रही थी। उसकी व्यवस्था की जिम्मेवारी जगदीश भाई साहब के ऊपर थी। उस समय उनकी शारीरिक अवस्था इतनी अच्छी नहीं थी। कार्यक्रम से एक दिन पहले सरकार की तरफ से नियुक्त सेक्युरिटी डिपार्टमेंट वाले आये और चैकिंग के बाद किसी कारण से हॉल को रिजेक्ट (अस्वीकार) कर दिया कि यह सेक्युरिटी के हिसाब से ठीक नहीं है, राष्ट्रपति जी यहां नहीं आ सकते। कारण था ऊपर छत पर एक टाइल हल्की-सी लटकी हुई थी। इन्होंने उस कारण से हॉल रिजेक्ट कर दिया। भाई साहब का अटल निश्चय था, उन्होंने संकल्प की दृढ़ता को नहीं छोड़ा; कहा प्रोग्राम होगा तो यहीं होगा, यह भगवान का कार्य है, इसे कोई रोक नहीं सकता। भगवान के कार्य में विघ्न तो पड़ते ही हैं, कोई बात नहीं। थोड़े-से भाई-बहने, जो मुख्य थे, उन्हें ही इस बात की खबर थी। बाकी सभी भाई-बहनें अथक होकर हॉल की सजावट
की तैयारी में लगे हुए थे। स्टेज वाले अपना कार्य कर रहे थे। भाई साहब के कहा कि सभी बाबा को याद करते हुए सेवा करते रहे और स्वयं उस विघ्न को दूर करने के लिए जो भी परुषार्थ करना था, करते रहे। आखिर उनकी दृढ़ता और निश्चय की विजय हुई और सुबह फोन पर सूचना आयी कि राष्ट्रपति इस कार्यक्रम में आ रहे हैं। प्रधानमन्त्री जी भी आ रहे हैं और अन्य गणमान्य भी उस कार्यक्रम में पधार रहे हैं। कार्यकम समय पर शुरू हुआ। सारा हॉल भरा हुआ था। हॉल के बाहर भी भाई-बहनें अन्दर आने के लिए खड़े थे। कार्यक्रम बहुत सफल रहा।
जब कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ, स्टेज पर सभी अतिथि विराजमान थे, आदरणीया दादी जी भी उपस्थित थीं। जब कार्यक्रम चल रहा था तब किसी को भी नहीं मालूम कि जगदीश भाई साहब कहाँ हैं। भाई साहब कार्यक्रम के दौरान पब्लिक के बीच में पीछे की तरफ कुर्सी पर बैठे थे। मुझे उन्होंने अपने से थोड़ी-सी दूरी पर खड़े रहने को कहा कि आप यहां रहना ताकि मुझे ज़रूरत पड़ेगी तो आपको बुलाऊँगा; साथ ही यह हिदायत भी दी कि किसी को भी मालूम न पड़े कि मैं यहां बैठा हूँ। यह उनकी निरहंकारिता थी, उनकी निर्माणता थी कि सब-कुछ करके अपने को छिपा कर बैठे थे। कार्यक्रम के बीच में दादी जी को जगदीश भाई साहब का संकल्प उठा कि जगदीश भाई नज़र नहीं आ रहे हैं, उन्होंने सन्देश भिजवाया कि वो स्टेज पर आयें। जो सन्देश लाया वो भाई मेरे पास आया और पूछा, भाई साहब कहाँ हैं? मेरी नज़र पब्लिक के बीच बैठे भाई साहब के ऊपर गयी, उन्होंने आँखों से इशारा किया कि नहीं बताना। मैंने कहा कि भाई, मुझे मालूम नहीं कि कहाँ हैं; मैं तो यहाँ सेवार्थ खड़ा हूँ। फिर जब दादी जी के भाषण की बारी आयी तब उन्होंने स्वयं कहा कि हमारे स्नेही जगदीश भाई जहाँ भी हों, वो दो मिनट के लिए स्टेज पर जरूर आयें। जैसे ही दादी जी की आवाज़ सुनी, भाई साहब वहाँ से उठकर तुरन्त दादी जी के पास पहुंचे और उनकी आज्ञा का पालन किया। इस प्रकार, भाई साहब जिम्मेवारियों को निभाते, फॉलो फादर करते अपने जीवन को हम सबके सामने एग्ज़ाम्पल बना रहे थे। नाम-मान-शान से परे रहते हुए, अन्य आत्माओं को आगे बढ़ाने की भावना को स्वयं के भीतर बनाये रखते हुए, निरहंकारी, निर्माण, दृढ़, अथक सेवाधारी, योगयुक्त, युक्तियुक्त आदरणीय जगदीश भाई साहब आज भी अपने श्रेष्ठ चरित्र के कारण विश्व भर में ब्रह्मावत्सों के दिलों में अपनी छाप बनाये हुए हैं।

घर जाने की तैयारी

आध्यात्मिकता में सुना है कि यह संसार एक मुसाफिरखाना है, यहाँ आना और जाना है परन्तु किसी को प्रैक्टिकल में जीवन की मुसाफ़िरी करते देखा नहीं। जहाँ भी लोगों को देखते, किसी को इस भाव में नही देखा कि उन्हें जाने का भी ख्याल हो। सब यहाँ ऐसे रहे पड़े हैं जैसे कि कभी जाना ही न हो। परन्तु भाई साहब को देखकर बहुत आश्चर्य होता था कि वे जाने की तैयारी कर रहे हैं। वे कहते थे, मेरी शारीरिक आयु 71-72 वर्ष तक है, बस। और जैसे-जैसे आयु की वो समीपता आयी, लगभग 1-1/2 वर्ष पहले से ही उन्होंने समेटना शुरू कर दिया था। हमें ऐसा लगता था कि भाई साहब कहीं से आये थे, किसी कार्यवश और समय पूरा हुआ, अब वापस जाने का समय आ रहा है, इसलिए जो भी रहे हुए कार्य हैं, जाने से पहले पूरे कर रहे हैं। शरीर छोड़ने से पूर्व दो वर्ष, हमने ऐसी ही उनकी जीवनचर्या देखी। बात-बात में कहते थे, मेरे पास समय थोड़ा है, मुझे फलाना कार्य भी करना है, मुझे कुछ किताबें और लिखनी हैं परन्तु समय थोड़ा है। समय थोड़ा है…समय थोड़ा है- यही धुन लगी हुई थीं। मुझे याद आता है, 'वर्ल्ड ड्रामा' किताब अंग्रेज़ी में तो छपी थी परन्तु उसका हिन्दी रुपान्तरण तब तक नहीं बना था। उन्होंने किसी भाई से पहले उसका हिन्दी अनु‌वाद कराना शुरू किया, उसको भी यही कहा कि मुझे जल्दी चाहिए। जब वो हिन्दी अनुवाद होकर आया तो उन्होंने मुझ से कहा कि राकेश भाई, 'वर्ल्ड ड्रामा' की हिन्दी किताब की प्रूफ रीडिंग करनी है और यह कार्य जल्दी ही करना होगा क्योंकि मेरे पास वक्त कम है। मैं इसे अपने सामने छपवाना चाहता हूं। आप कैसे भी करके जल्दी ही इस कार्य को करें। उस समय तक भी मैं लौकिक जॉब करता था। समय बहुत कम मिल पाता था क्योंकि सुबह-शाम भाई साहब के साथ अन्य सेवाओं में समय देना होता था। फिर भी उसे पूरा तो करना ही था। जैसे-तैसे मेहनत करके उस कार्य को पूरा किया गया। प्रूफ रीडिंग पूरी करने के बाद भाई साहब ने जल्दी ही उसे प्रिंटिंग के लिए दे दिया। उनका भाव यह था कि बाबा के बच्चे सभी प्रकार के हैं, जो भाई-बहनें अंग्रेज़ी ठीक से नहीं जानते, उनकी तरफ से यह डिमाण्ड थी कि 'वर्ल्ड ड्रामा' का हिन्दी अनुवाद भी कराया जाये। उनकी इस भावना के कारण भाई साहब ने जल्दी ही इस कार्य को करवाया। सर्व कार्य करते हुए भी वे यही कहते थे, अभी दो-तीन कार्य और पूरे करने हैं, देखो कहाँ तक पूरे कर पाता हूँ क्योंकि मेरे पास समय थोड़ा है।

बीमारी में भी सेवा

अन्तिम दिनों में जब उनकी बीमारी ज़ोर भरने लगी तो देहली में हास्पिटल में भर्ती होना पड़ा। जब हास्पिटल जाना था तो मुझे एक लिस्ट दी और कहा, ये सारा सामान निकाल कर मेरे ब्रीफकेस में रख दो। उसमें पेपर, पैन, उनकी तख्ती, आवश्यक फाइलें आदि सामान था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि यह ऑफिस शिफ्ट हो रहा है। हास्पिटल तो एक बहाना है। भाई साहब तो सारा ऑफिस ही उठाकर वहाँ ले जा रहे हैं। आज जब सोचता हूँ तो ऐसा ही महसूस होता है जैसे कोई दुकान का मालिक, दुकान का शटर डाउन करते समय भी कमाई की इच्छा रखता है कि शायद ग्राहक आ जायें, कमाई हो और आधा शटर गिराने पर भी कोई ग्राहक आता है तो दुकानदार उसे सामान देकर कमाई कर लेता है, बिक्री कर देता है। वैसे ही भाई साहब भी जीवन के उन क्षणों में भी अपनी सच्ची कमाई करते जा रहे थे, भले ही जीवन का अन्तिम काल आ रहा था परन्तु वो कमाई में अथवा अपना कर्त्तव्य पालन करने में लगे हुए थे।
इस तरह, हास्पिटल में भी उनकी सेवाओं का कारोबार उसी प्रकार चलता रहा जैसे कि वो सेवाकेन्द्र पर रहते हुए कर रहे थे।

श्रद्धाञ्जली

आखिर वो दिन भी आ ही गया जब इस ईश्वरीय यज्ञ का एक आदर्श स्तम्भ अपने सब हिसाब-किताब चुक्ता कर इस देह रूपी कलेवर को छोड़ बापदादा की गोद में समा गया। यज्ञ के इतिहास का एक पन्ना और पलट गया।
जैसे ही चारों ओर ये समाचार पहुंचा, भाई-बहनों का मधुबन की ओर प्रस्थान आरम्भ हो गया। सभी भाई-बहनों के दिलों में एक पीड़ा महसूस हो रही थी। भाई साहब के शरीर छोड़ने से एक सप्ताह पहले मैं मधुबन उनसे मिलने गया हुआ था, शक्ति नगर सेवाकेन्द्र से अन्य भाई-बहनें भी गये थे। आई.सी.यू. में जब हम उनसे मिलने गये तो वो दृश्य हमारी सोच से दूर था। भाई साहब का सारा शरीर गहरा पीला हो गया था। चेहरा, आँखें सब बहुत पीले हो गये थे। पता लगा, शरीर के सभी अंग लगभग काम करना बन्द कर रहे हैं लेकिन उनका ब्रेन (मस्तिष्क) बहुत अच्छी तरह काम कर रहा है, उनकी स्मृति भी बहुत अच्छी तरह काम कर रही ही। वे एक-एक से लेटे-लेटे ही मिले क्योंकि बैठने की भी ताकत नहीं थी। एक-एक को उनके परिवार-जन के नाम सहित याद का वातावरण था। सारे मधुबन में योग चल रहा था। भाई-बहनों का जगह-जगह से आना हो रहा था। हर एक के चेहरे पर योग की स्थिति थी, ड्रामा के दृश्य को देख समय की नज़दीकता का एहसास था। भाई साहब के जीवन-चरित्र की स्मृतियाँ उभर रही थीं। हर कोई गहरी शान्ति में डूबा हुआ था।
भाई साहब के शक्ति नगर में रहने के कारण उनकी अन्तिम यात्रा की तैयारी में शक्ति नगर के कुमारों को भी शामिल किया गया। हिस्ट्री हॉल में अन्तिम यात्रा के लिए उस महान् आत्मा के पार्थिव शरीर को तैयार करने के बाद शान्ति स्तम्भ पर ले जाया गया, फिर बाबा के कमरे और कुटिया के सामने भी ले जाया गया। मैं भीड़ से अलग एक ओर यात्रा के साथ-साथ चल रहा था। उनके पार्थिव शरीर को कंधा देने वालों की बहुत भीड़ थी। सब एक-दो को धकेलते हुए कंधा बदलते जा रहे थे। मेरी भावनायें भी उमड़ रही थी, दिल चाह रहा था कि मैं आत्मा भी अपना कर्तव्य निभाऊँ, कंधा दूँ परन्तु घमसान होने के कारण मैं साइड में चलता रहा परन्तु मन-बुद्धि बीते 16 सालों की इस यात्रा के उन दृश्यों को देखने में व्यस्त हो गयीं, जिन्हें आदर्श के रूप में भाई साहब ने हम सभी के सामने रखा। उनकी अमिट छाप मुझ आत्मा के तथा शायद अनेक भाई-बहनों के दिलों में सदा रहेगी।
भाई साहब ने यज्ञ के एक मर्यादित, अनुशासित स्तम्भ के रूप में जो आदर्श प्रस्तुत्त किये उन ईश्वरीय नियमों, मर्यादाओं, अनुशासन को अपने जीवन में अपनाते हुए हम भी सच्चे यज्ञ-रक्षक बनकर चलें- यही उन महान् आत्मा के प्रति सच्ची-सच्ची श्रद्धाञ्ली होगी।"
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यज्ञ-सेवक और यज्ञ-रक्षक

शक्ति नगर सेवाकेन्द्र पर समर्पित रूप से सेवारत ब्रह्माकुमार रामचन्द्र भाई, सेवाकेन्द्र की सेवाओं के अलावा वहाँ की गाड़ी चलाने की सेवा भी करते थे और भाई साहब की पर्सनल सेवा में थोड़ी-बहुत मदद भी करते थे। वे अपने अनुभव ऐसे सुना रहे हैं-
"जगदीश चन्द्र हसीजा, जी हां, ब्रह्माकुमार जगदीश जी का आफिशियल नाम यही था। उनके लौकिक परिवार में मैंने उनके दो भाई और दो भाभियों को नज़दीक से देखा है जिनके संस्कार भी बहुत रॉयल थे। बोल-चाल, चाल-चलन से रायल्टी दिखायी पड़ती थी। जब भी हम उनसे मिलने जाते थे, बहुत सम्मान देते थे। मैं तो उनसे बहुत छोटा था, फिर भी आप-आप कहकर बोलते थे। मिलने पर खड़े हो जाते थे और वापस जाते समय बाहर तक छोड़ने आते थे। उनकी ऐसी कई बातें थी जिनमें सभ्यता और शालीनता झलकती थी।

उनके लिए यज्ञ-सेवा सर्वोपरी थी

जगदीश भाई साहब कार्य-व्यवहार में स्ट्रिक्ट थे, पर प्यार और सम्मान देने में कोई कम नहीं थे और हमें भी सिखाते थे कि बड़ों के साथ कैसे सम्मान से व्यवहार करना चाहिए। उनको जो भी जानते हैं या जो उनके सम्बन्ध-सम्पर्क में आये हैं वे ज़रूर जानते हैं कि जगदीश भाई साहब स्ट्रिक्ट हैं, उनको हर काम एक्यूरेट और फास्ट चाहिए आदि-आदि। यह बात सही भी है, जब वे सेवा के क्षेत्र में होते थे तो उनके लिए यज्ञ-सेवा सर्वोपरी थी। उनका मानना था कि खाना-पीना-सोना ऐसी चीजें हैं जिनको हम रोज़ करते हैं। अगर उनको थोड़े समय के लिए टाल भी दिया जाये तो कोई बात नहीं। यह बात पहले वे अपने पर लागू करते थे इसलिए हमें भी उस बात को करने में दिक्कत नहीं आती थी। हम भी सोचते थे कि भाई साहब ने अभी तक नाश्ता नहीं किया तो हम क्यों करें?

मम्मा-बाबा की बातें सुनाते थे तो उनका चेहरा चमकता था

भाई साहब क्या थे उसके बारे में ज़्यादा कहने के बजाय उनके जीवन की कुछ घटनाओं को सुनाऊँगा, जो मुझे याद हैं। जगदीश भाई साहब ब्रह्मा बाबा के बहुत करीब थे (स्थूल में भी और संस्कारों में भी)। मैंने उनमें मम्मा-बाबा के प्रति अपार रिगार्ड देखा। सेन्टर पर रहने वाले भाई-बहनों के लिए रोज़ रात नौ बजे क्लास होती थी और अभी भी होती है। भाई साहब चाहते थे कि सेन्टर पर रहने वाले सारा दिन सेवा में व्यस्त रहते हैं इसलिए रात्रि का भोजन मिलकर करें और रात्रि की क्लास में सब बैठे और आपस में सेवा-समाचार का लेन-देन करें। भाई साहब दिल्ली में होते तो रात्रि-क्लास उनकी ही होती थी। क्लास में वे मम्मा-बाबा की बातें सुनाते थे। जब मम्मा-बाबा की बातें सुनाते थे तो उनका चेहरा चमकता था। उनके मुख द्वारा निकलने वाले शब्द, सुनने वालों को अनुभव कराते थे कि मम्मा-बाबा के प्रति उनका कितना प्यार और सम्मान है। ऐसे ही यज्ञ के प्रति भी उनका बहुत रिगार्ड और प्यार था।

बहनों की सेवा के लिए हर वक्त तैयार

बहनों के प्रति भी उनका बहुत सम्मान था। जब भी सेवा में जाते थे, साथ में बहनों को ज़रूर ले जाते थे। किसी से मिलने जाते थे तो उनको बहनों से ऐसे परिचित करवाते थे जैसे कि बहनें उनके साथ नहीं आयी हैं बल्कि वे बहनों के साथ आये हुए हैं। बहनों को सदैव वे आगे रखते थे। देश-विदेश की कोई भी बहन हो, उसकी समस्या के समाधान के लिए, वे सदैव तैयार रहते थे इसलिए बाथरूम में भी फोन का कनेक्शन था। कई बार वे बाथरूम में ही घंटों बात करते रहते थे। कोशिश करके वे हर फोन खुद ही उठाते थे। अगर बाहर से किसी बहन का फोन आया और वे उपलब्ध नहीं होते तो बाद में खुद फोन करते थे। कई बार बहनें कहती थीं, काम उनका है तो आप क्यों फोन कर रहे हैं? उनकी ज़रूरत है तो वे खुद करेंगे ना! भाई साहब कहते थे, देखो, फोन किया माना कोई तकलीफ़ में है। फिर फोन नहीं किया माना उसको लाइन मिल नहीं रही है।

भाइयों को भी वे बहुत सम्मान देते थे

पहले भाई साहब की सेवा मैं ही करता था। जब योगेश भाई आया तो वो भाई साहब की सेवा करने लगा। उसके बाद मैं एक बार भाई साहब के पास कमरे में गया था, उनके साथ त्यागी जी भी बैठे हुए थे। उनको पीने के लिए पानी चाहिए था। जब मेरा काम पूरा हो गया, मैं जाने लगा तो भाई साहब ने कहा, रामचन्द्र भाई, नीचे कोई है तो पानी भिजवाना। हालांकि पहले मैं ही उनकी सेवा करता था लेकिन उनकी सेवा के लिए दूसरा भाई है तो मुझे नहीं कहा कि पानी लेकर आओ। इस प्रकार, व हरेक को सम्मान देते थे। जिसको जो सेवा देनी है, वही देनी है।
एक बार जब डेरावाल नगर में बड़ा सेन्टर बना तो सेवा के लिए कई नये भाई सेन्टर पर आये। उनमें एक ही प्रान्त के 4-5 भाई थे। वे आपस में अपनी प्रान्तीय भाषा में बातें करते थे। मैं कुछ उनसे कहता था तो कभी-कभी सुना-अनसुना करते थे। यह भाई साहब को पत्ता लगा तो उन्होंने एक दिन उन सभी भाइयों को कमरे में बुलाया और मुझे अपने साथ बिठाया। उन सबके सामने भाई साहब ने मेरी महिमा की और कहा, देखो, आप लौकिक पढ़ाई और पद से बड़े होंगे लेकिन रामचन्द्र भाई त्याग, तपस्या और सेवा में आप सभी से आगे हैं। उसके बाद मेरे प्रति उनके व्यवहार में बहुत परिवर्तन आया। इस प्रकार, भाई साहब जैसे बहनों को रिगार्ड देते थे, वैसे समर्पित भाइयों को भी बहुत रिगार्ड देते थे।

उनमें मातृवत् संस्कार भी थे

कई बार रात्रि क्लास में बड़ी बहनों को आने में देर हो जाती थी और छोटी-छोटी बहनें पहले से आकर बैठ जाती थीं। उनके लिए जगह नहीं होती थी। भाई साहब उन छोटी बहनों को समझाते थे कि बड़ी बहनों के लिए जगह छोड़कर आपको अपना स्थान ग्रहण करना चाहिए। भाई साहब का शरीर पुरुष का था तो उनके पितृवत् संस्कार तो थे लेकिन माता के संस्कार ज़्यादा थे। अगर कोई बहन मूड ऑफ होकर भूखी सो जाती थी या कमरे में बैठ जाती थी तो भाई साहब खुद उसके कमरे में जाकर अपने हाथों से खाना खिलाते थे, उसका मूड ठीक करते थे। उनका विचार था कि जितने समय किसी का मूड ठीक नहीं रहेगा तो उसके व्यर्थ संकल्प चलते रहेंगे, इससे सेन्टर के वातावरण पर प्रभाव पड़ेगा इसलिए जितनी हो सके उतनी जल्दी उसको ठीक करने की कोशिश करते थे।

व्यर्थ से बचने के लिए सबको बहुत सावधानी देते थे

भाई साहब हमेशा कहते थे कि व्यर्थ से बचे रहो। शक्ति नगर सेन्टर पर रोज़ काफी सारे लैटर आते थे, उन्हें लैटर बाक्स से निकाल कर भाई साहब के कमरे में मैं रखता था। एक दिन सिर्फ एक ही लैटर आया था। मैंने उसको ले जाकर भाई साहब के कमरे में रख दिया। भाई साहब ने पूछा कि आज कोई पोष्ट नहीं आयी है क्या? मैंने कहा, फलानी जगह से एक ही लैटर आया है। भाई साहब ने पूछा, क्या वह लैटर आपके लिए था? मैंने कहा, नहीं। उन्होंने कहा कि आपने क्यों पढ़ा? मैंने तो सिर्फ़ यही पढ़ा था कि वो कहाँ से आया है। भाई साहब ने समझाया कि जिस चीज़ की ज़िम्मेवारी मेरी नहीं है, वह करना या उसके बारे में सोचना भी बुद्धि में व्यर्थ बढ़ाता है। इस प्रकार, वे हमें व्यर्थ से बचने के लिए और जो काम मेरा नहीं है, उसमें हाथ डालने से दूर रहने के लिए शिक्षा देते थे।

खेल-कूद को भी वे महत्व देते थे

मुझे खेलने का बहुत शौक था। जब मैं सेन्टर पर आया तो क्लास के 2-3 भाइयों को लेकर छत पर जाता था और वहाँ टेनिस खेलता था। बहनों ने भाई साहब से इसकी शिकायत की। एक दिन भाई साहब ने सब बहनों के सामने मेरे से पूछा कि आप छत पर टेनिस खेलते रहते हो? मैंने कहा, हाँ जी। किसके साथ खेलते हो? मैंने उन भाइयों के नाम बताये। फिर पूछा, किस पर खेलते हो? मैंने कहा, एक पुराना तख्त छत पर है, उसी पर। भाई साहब ने कहा, क्या पुराने तख्त पर? एक टेबल नहीं खरीद सकते? अगले दिन वे तीन कुमार एक नया टेबल लेकर आये और रोज़ टेबल टेनिस खेलने लगे। इसी संगठन से धीरे-धीरे हमारा यूथ ग्रुप बन गया। भाई साहब से छुट्टी लेकर हम हर रविवार क्रिकेट या वालीबाल खेलते थे जिससे सभी युवाओं का मनोरंजन भी होता था और सेवा के लिए युवाओं का एक संगठन भी बन गया।

उनके हर कार्य दूरदृष्टि वाले होते थे

सेवा में भाई साहब बहुत दूरदर्शीं थे। कई बार ऐसी सेवा देते थे जो हमें लगता था, इसकी क्या ज़रूरत है लेकिन वे फोर्स से कहते थे कि हमको यह करना ही है। बाद में जब उसका परिणाम देखते थे तो लगता था कि यह ज़रूरी था। एक बार दिल्ली बोटक्लब में किसी पार्टी का धरना होना था। उसी दिन हमारे पास रशिया से ग्रुप आना था। भाई साहब ने एक लैटर बनाकर कहा कि पुलिस हेडक्वार्टर से आज्ञा लेकर आओ कि हमारे मेहमान आ रहे हैं इसलिए हमारी गाड़ी को चलने दिया जाये। पुलिस वालों ने कहा कि जिस रूट में आपकी गाड़ियाँ जायेंगी वहाँ कुछ नहीं है, आपको आज्ञा की ज़रूरत नहीं। हमने भाई साहब को बताया तो उन्होंने कहा, नहीं, आप आज्ञा लेकर ही आना। सारे हैरान थे कि पुलिस अफसर खुद कह रहा है, ज़रूरत नहीं, फिर भी भाई साहब क्यों जिद्द कर रहे हैं। हमने पुलिस अफसर से कहा कि जब वहाँ कुछ नहीं है तो आपको आज्ञा देने में क्या समस्या है? बहनों ने रिक्वेस्ट की तो उन्होंने आज्ञा-पत्र दे दिया। अगले दिन सरकार ने हर मुख्य सड़क को वाहनों के आने-जाने के लिए बन्द करवा दिया लेकिन हमारी गाड़ियाँ चलती रहीं क्योंकि हमारे पास आज्ञा-पत्र था। ऐसी कई छोटी-बड़ी बातें हैं जो हमारी समझ में नहीं आती थीं, बाद में पता चलता था कि भाई साहब कितनी दूर की सोचते थे।
***

जगदीश भाई साहब बिलकुल ब्रह्मा बाबा के आचरण पर चले

भाई साहब की सेवा के लिए मधुबन से बड़ी दादी जी ने ब्रह्माकुमार योगेश भाई को दिल्ली, शक्ति नगर भेजा। वे भाई साहब के साथ के अपने संस्मरण इस प्रकार सुना रहे हैं-
"सन् 1997 में मधुबन (पाण्डव भवन) में सेवा करने आया था, तब मैं जगदीश भाई साहब के बारे में बिलकुल ही नहीं जानता था। मैं इस लक्ष्य से मधुबन आया था कि मधुबन तपस्या भूमि है, वहाँ तपस्या करके अपना जीवन सफल कर लूँ लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि जगदीश भाई साहब के साथ रहने का, उनके पास सेवा करने का सुअवसर मिलेगा। सभी मधुबन वाले, जगदीश भाई जी का बहुत रिगार्ड करते थे, परन्तु मैंने कभी उन्हें देखा नहीं था। उनके बारे में सुना बहुत था।
मधुबन में अमृतवेले योग के बाद ओम् शान्ति भवन के रिसेप्शन में 'तीव्र पुरुषार्थी ग्रुप' का क्लास चलता था, उसमें मैं भी जाता था। उस क्लास में साकार बाबा के बारे में और जगदीश भाई जी के बारे में बहुत गहरी बातों की चर्चा होती थी। साकार बाबा ने जगदीश भाई जी को कैसे आगे बढ़ाया, जगदीश भाई ने यज्ञ के लिए क्या-क्या किया, यज्ञ को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कितनी मेहनत की तथा कैसी-कैसी परिस्थितियों का सामना किया, ये सब बातें वहां होती थीं। इन बातों को सुनकर मुझे अन्दर ही अन्दर इस अलौकिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए नयी दिशा मिलती थी।

मेरा नम्बर लग गया

एक दिन अचानक जगदीश भाई जी के बारे में मधुबन में बातें हो रही थीं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। कुछ दिनों के बाद यह भी समाचार मिला कि उनके लिए एक सेवाधारी चाहिए और वो ऑलराउण्डर होना चाहिए। यह भी समाचार मिला कि वे खुद नहीं चाहते कि कोई उनकी सेवा करे, फिर भी बड़ों से बात निकली है कि उनके लिए एक सेवाधारी देना है। उनकी सेवा करने के लिए अनेक भाइयों ने अपने नाम दिये। मैंने भी अपना नाम दिया। उनमें से तीन भाइयों के नाम चुने गये। उन तीन में मैं भी एक था। आश्चर्य की बात यह थी कि वह चान्स मुझे मिला। जगदीश भाई साहब उस समय मधुबन के स्वदर्शन भवन में थे। दादी प्रकाशमणि जी और दादी गुलज़ार जी ने मुझे चुना था और एक दिन खुद दोनों मुझे जगदीश भाई जी के पास ले गये और उनसे कहा कि यह भाई आपकी सब सेवा करेगा। जगदीश भाई चुप रह गये, कुछ बोला नहीं। न चाहते हुए भी उनको दोनों दादियों की बात माननी पड़ी।
फिर जगदीश भाई जी ने मुझे 10 दिन तक मधुबन में रखा और कहा कि आपको जो सेवा नहीं आती है वो यहां सीख लो क्योंकि दिल्ली जाकर तुम्हें सिर्फ मेरी सेवा नहीं करनी है, सारी बहनों की अर्थात् सेन्टर की भी सेवा करनी है। मैंने 'हाँ' कह दिया और मधुबन में रहकर सब तरह की सेवा सीख ली।
दिल्ली में मैं बिलकुल नया था और आयु में छोटा भी। लोगों से सुना था कि दिल्ली वाले बहुत होशियार होते हैं और साथ-साथ बहुत चालाक भी होते हैं। लेकिन मैंने तो एक बाबा के सहारे और दादियों की शुभ-आशीर्वाद को सामने रखकर वहां रहने का निश्चय कर लिया था। मैंने वहां जाकर भाई साहब के लिए खाना बनाना भी सीख लिया। उनकी पसन्द क्या है, नमक-मिर्च कितने चाहिएँ, ये सब जानकर उसी अनुसार ही बनाना सीख लिया। वे कभी यह नहीं चाहते थे कि यह सेवाधारी सिर्फ मेरी ही सेवा करे। वे अपने से ज़्यादा मुझे सेन्टर की सेवा में लगाते थे। उनकी पर्सनल सेवा करते हुए भी उन्होंने ज्ञान-योग के प्रति मेरा ध्यान कभी कम नहीं होने दिया। मुझे आये हुए जिज्ञासुओं को कोर्स कराने के लिए भी कहते थे, आये हुए मेहमानों को अटैंड करने को भी कहते थे।

वे समय की बहुत कदर रखते थे

हर कार्य में वे पंक्चुअल थे और समय की बहुत कदर रखते थे। एक बार मुझे मुंबई ले गये। वहाँ उनकी सेवा करने के लिए बहुत भाई-बहनें थे लेकिन भाई साहब किसी से नहीं लेते थे, मुझे ही बताते थे। भाई साहब को जसलोक हास्पिटल में भर्ती किया गया था। जसलोक हास्पिटल से गामदेवी सेन्टर करीब 4-5 कि,मी, दूरी पर है। भाई साहब के सारे सामान उस सेन्टर पर थे। वहाँ की बहनों से भाई साहब ने कहा कि मेरे लिए यह भाई खाना बनायेगा और यह खुद मेरे पास ले आयेगा। बहनों ने कहा, भाई साहब, हम सुबह आपके पास आते समय नाश्ता लेकर आयेंगे और दिन में आते समय खाना बनाकर लेकर आयेंगे लेकिन भाई साहब ने उनको मना किया और कहा, यही भाई (मैं) बनाकर ले आयेगा। भाई साहब रहते थे जसलोक हास्पिटल की 22वीं मंज़िल पर। एक दिन नाश्ता बनाकर मैं ले आया टैक्सी से लेकिन हास्पिटल पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी। उनको किसी ट्रीटमेन्ट के लिए जाना था। नाश्ता लेकर मुझे 22 मंज़िल ऊपर चढ़ना था लेकिन लिफ्ट वहाँ नहीं थी, ऊपर चली गयी थी। दीदी नीचे खड़ी थी। मैंने उनसे कहा कि मुझे भाई साहब को नाश्ता देना है। उन्होंने कहा, ठीक है सीढ़ी चढ़कर जाओ। सातवीं मंजिल तक तो मैं चढ़कर गया, वहाँ जाकर रुक गया क्योंकि भाई साहब को नाश्ता पहुँचाने का टाइम भी पूरा हो गया था और मैं बहुत थक भी गया था। अन्दर से मुझे डर लग रहा था क्योंकि भाई साहब ने बहनों से कहा था कि यह टाइम पर नाश्ता ले आयेगा। मुझ में ऊपर चढ़ने की ताक़त तो थी नहीं, लिफ्ट से वहाँ पहुंचा तो भाई साहब कमरे में नहीं थे, वो ट्रीटमेन्ट लेने के लिए चले गये थे। कहने का भाव यह है कि वे समय के कितने पक्के थे और हर किसी की विशेषता को परखकर उसको उस कार्य में लगाते थे और आगे बढ़ाते थे।

वे विशेषताओं की खान थे

भाई साहब की एक विशेषता नहीं, कई विशेषतायें थीं। उनमें से एक खास खूबी यह थी कि उनके सम्पर्क में आने वाले जो भी भाई-बहन थे, उनकी विशेषता को देखकर उसी अनुसार सेवा में लगाते थे। दूसरी विशेषता जो मुझे अच्छी लगी वो यह कि बड़े हों, बूढ़े हों या छोटे बच्चे हों उनसे इतने प्यार और स्नेह से व्यवहार करते थे कि जैसे उनके हमशरीक हों। उनके पास रहते थोड़ा समय होने के बाद वे मेरे साथ एक दोस्त, साथी जैसे रहने लगे। वे कई बातें अनुभव की, ज्ञान की, सेवा की मुझ से शेयर करते थे लेकिन प्रशासनिक या दादियों एवं यज्ञ की कोई बात मेरे से नहीं कहते थे।
उनकी विशेषतायें तो अनगिनत हैं। उन सबका वर्णन करना मेरे लिए असम्भव है। अगर आपने ब्रह्मा बाबा की अ‌द्भुत जीवन कहानी पढ़ी हो या सुनी हो तो कहूँगा कि जगदीश भाई साहब बिलकुल ब्रह्मा बाबा के आचरण पर चले और अपना जीवन भी उनके जैसे बनाया।
भाई साहब हमेशा यह सोचते थे कि मेरे लिए कम-से-कम खर्च हो। जितना समय किसी चीज़ से काम चल सकता है, चला लो। नहीं चल सकता, और कोई चारा नहीं है तो उसको बदल लो। वे हमेशा यही सोचते थे कि किसी भी सुविधा को पहले बहने स्वीकार करें। आप तो जानते हैं, बहनों के लिए सदैव उनके मन में कितना स्नेह और सम्मान था।

उन्होंने अपना सारा समय यज्ञ की और यज्ञ-निमित्त बहनों की सेवा के लिए दिया

उनका रहना इतना साधारण था कि आप उनका कमरा और बाथरूम देखकर दंग रह जायें कि क्या इतने बड़े भाई ऐसा कमरा और बाथरूम यूज करते हैं! उनका कमरा एक तरफ और उनका बाथरूम दूसरी तरफ था। उनके कमरे से तीन कमरे छोड़कर उनका बाथरूम था। उस बाथरूम में भी टेलिफोन की सुविधा थी क्योंकि उनके पास रोज़ देश-विदश से फोन आते थे। विदेश के लोग अपने समय अनुसार फोन करते थे। जब उनका सोने का समय होता है तो यहां भारत में जागने का समय होता है। जब हमारा सोने का समय होता है तो उनका जागने का समय होता है इसलिए वे बाथरूम में भी फोन उठाते थे। कई बार मैंने देखा, घंटों भर बाथरूम में ही रहते थे। वहीं बात करके उनको डायरेक्शन देते थे। मैंने देखा, वे अपना सारा समय यज्ञ की सेवा और यज्ञ-निमित्त बहनों के लिए दिया करते थे। उन्होंने कभी अपनी तबीयत के बारे में सोचा ही नहीं। बहनों के सहयोग के लिए हर वक्त तैयार रहते थे।
बहनों के लिए उनका प्यार और रिस्पेक्ट इतना था कि बहनें कहीं सेवा के लिए जा रही होतीं और उनको भी कहीं जाना होता तो गाड़ी बहनों के लिए दे देते और खुद रिक्शा में चले जाते। आटो रिक्शा भी नहीं साइकिल रिक्शा में। देखिये, उन्होंने कितना सादा जीवन जीया। दिल्ली में कोई बड़ा कार्यक्रम होता तो खुद खड़े होकर दिन-रात लगाकर मेहनत कर सारा काम करेंगे और करायेंगे, जब स्टेज पर जाने की बात आती तो बहनों को आगे कर देते और खुद कहीं पीछे बैठकर कार्यक्रम देखते। उन्होंने सदैव बहनों को आगे रखा, आगे बढ़ाया। उन्होंने बहुत मेहनत की। जब उनका स्वास्थ्य खराब हुआ, इतना खराब हुआ कि उनकी जगह पर और कोई होते तो बिस्तर से उठते ही नहीं लेकिन उन्होंने अन्त तक सेवा की। इतने दिनों से बीमार होते हुए भी उन्होंने बीमारी को महसूस नहीं किया। जब उनकी बीमारी लास्ट स्टेज में थी तब उपचार करना आरम्भ किया।
वे बीमारी के बारे में क्यों इतना बेपरवाह रहे? मैं समझता हूँ, इसका भी कारण है। वे जानते थे कि उनका शरीर कब छूटने वाला है, कैसे छूटने वाला है और कौन-सी बीमारी आने वाली है। जब उनकी बीमारी (लीवर कैन्सर) का पता चला तो दादी जानकी जी ने उनको लन्दन बुलाया उपचार के लिए लेकिन वे माने नहीं। अगर मान लेते, लीवर बदली करवा लेते तो शायद बच भी जाते। कहते थे, मैं और किसी का लीवर नहीं लगा सकता। यह मेरा कर्मभोग है, मुझे ही भोगना है, सहन करना है। हास्पिटल में आई.सी.यू. में रहते हुए भी उन्होंने यज्ञसेवा नहीं छोड़ी। वहाँ भी मीटिंग बुलाते रहे, डायरेक्शन देते रहे।

उनकी दो इच्छायें थीं

भाई साहब आदि से लेकर अन्त तक के ईश्वरीय ज्ञान और यज्ञ-इतिहास को जानते थे। यज्ञ का इतिहास उनसे ज़्यादा और किसी को मालूम नहीं था। उनकी दो इच्छायें थीं, एक शिव बाबा को सारे विश्व में प्रत्यक्ष करें और दूसरा 'सतयुग में योगबल से कैसे सन्तान उत्पत्ति होती है' पर पुस्तक लिखें। उसके लिए उन्होंने बहुत कुछ अंग्रेज़ी लेखों से इकट्ठा भी किया था लेकिन लिखना बाकी रह गया क्योंकि लिखना उनको ही था, और किसी से लिखना हो ही नहीं सकता था।

मैंने उनको बहुत करीब से देखा है

उन्होंने मुझे अपनी लायब्रेरी और ज़मीन के कागज़ पत्र संभालने की सेवा दी थी। अन्त तक मैंने उस सेवा को अच्छी तरह से किया। जब भी वे विदेश जाते थे तो आने तक करने के लिए मुझे काम दे जाते थे। कभी-कभी विदेश से भी मेरे लिए फोन करते थे कि फलानी किताब निकाल कर रखो या फलानी बहन को दो।
मैंने उनको बहुत करीब से देखा है। उनमें सच्चाई के प्रति बहुत लगाव था और उसको अपने जीवन में पूर्ण रूप से उतारा भी था। झूठ बोलने वालों को कभी वे अच्छे नहीं मानते थे और झूठ को तुरन्त पकड़ लेते थे। उनको पता भी पड़ता था कि यह झूठ बोलता है। वे ईश्वरीय नियमों के पक्के थे इसलिए कई लोग उनके पास आने के लिए डरते भी थे लेकिन सबके प्रति उनके मन में स्नेह था, कल्याण का भाव रहता था।
वे हरेक की विशेषता देखकर उसके अनुसार ही सेवा देते थे लेकिन एक शर्त होती थी कि जैसे चाहिए, वैसे और समय पर वो कार्य करके देना होता था। वे स्वभाव से बहुत उदार और स्नेही थे। किसी के भी प्रति उनकी नेगेटिव भावना नहीं थी। हां, अगर किसी से कोई गलती होती तो वे जरूर शिक्षा देते, सलाह देते।
ज़िम्मदारी से सेवा करने वालों को वे बहुत पसन्द करते थे। वे खुद भी कार्य ज़िम्मेवारी से करते थे और दूसरों से भी वही चाहते थे। अगर एक दिन भी वे सेन्टर में नहीं होते तो ऐसे लगता था कि घर में कोई बड़ा नहीं है। जैसे माँ-बाप नहीं हों तो बच्चों को उनकी कमी महसूस होती है।
वे प्यार भी उतना ही करते थे और सेवा भी उतनी ही लेते थे। वे हंसी-मज़ाक भी करते थे। उनके कमरे के साथ ही मेरा कमरा था। वे तो दिन में जल्दी रेस्ट करके उठते थे, मैं एक बजे खाना खाकर रेस्ट करने जाता था। वे ग्यारह बजे रेस्ट करके साढ़े बारह बजे तक उठ जाते। जैसे मैं खाना खाकर रेस्ट करने जाता था, तब तक वे मुझे उठाने आ जाते थे। कहते थे, अरे तुमने अभी तक रेस्ट नहीं किया? प्यार से और हँसते हुए कहते थे, तुम तो छत्रपति शिवाजी के गाँव के हो। उसके बारे में तो तुम अच्छी तरह जानते ही हो। उन्होंने देश की सेवा के लिए कितनी मेहनत की! तुम तो ईश्वर की सेवा कर रहे हो। मुझे भी हंसी आती थी और मैं उठ खड़ा हो जाता था। इस प्रकार मेरे साथ उनका बहुत ही मित्रता का व्यवहार था, भातृप्रेम था।

उनका दिल था कि मधुबन में रहकर ही शरीर का हिसाब-किताब चुक्ता करना है

जब उनको मधुबन के ग्लोबल हास्पिटल में ले जाया गया, मुझे उनके पास चोबीसों घण्टों रहना पड़ता था। एक बार रात के 12.30 बज गये थे। भाई साहब आई.सी.यू. में थे। उनका दिल था कि मधुबन में रहकर शरीर का हिसाब-किताब चुक्ता करना है। मैं उनके पास ही एक कुर्सी लेकर बैठा हुआ था। तब उन्होंने कहा कि अभी, इसी समय मुझे बेड समेत मधुबन ते चलो। मैं सोचने लगा कि क्या करें? सब सोये हुए हैं, डॉक्टर भी। मैंने कहा, भाई साहब, ऐसा हो नहीं सकता। अगर मैं आपका बेड लेकर बाहर जाऊँ तो सारे मरीज़ और डॉक्टर जाग जायेंगे। भाई साहब ने कहा, अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम्हें सेवा से हटा दूंगा। मैंने तो दृढ़ संकल्प किया था कि भाई साहब जो भी सेवा कहें, मुझे करनी ही है। लेकिन अब क्या करूँ, मेरे लिए भाई साहब की यह बात मानने वाली भी नहीं थी और छोड़ने वाली भी नहीं थी। फिर भाई साहब की आज्ञा का पालन करने के लिए उनके बेड को गेट तक खींचकर ले गया और कहा, भाई साहब, आप यहीं से ही देख लीजिये पाण्डव भवन। फिर वापस वहीं लगा दिया बेड और उनको किसी तरह से सुला दिया।

मैं अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझता हूँ

मैं अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझता हूँ क्योंकि संगमयुग पर इतने महान् महारथी के साथ रहना, उनकी सेवा करना, कोई कम बात नहीं है। साथ-साथ मैं यह कह सकता हूं कि बड़ों के साथ रहना, उनको सन्तुष्ट करना, साधारण पुरुषार्थी के लिए बड़ी चुनौती भरी परीक्षा है। मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया और पास भी हुआ। वे मेरे से बहुत सन्तुष्ट भी थे और खुश भी। दिल्ली भेजते समय बड़ी दादी जी और गुलज़ार जी ने भी मुझे यही कहा था कि अगर तुम जगदीश भाई को सन्तुष्ट करोगे तो हम समझ लेंगे, तुम पास हो गये। मुझे गर्व है कि मैंने उनको सन्तुष्ट भी किया और उनका स्नेह भी पाया।
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उनके नयन और मुखमंडल से बाबा के प्रति अटूट निश्चय, अथाह प्रेम झलकता था

ग्लोबल अस्पताल के डॉ, ब्रह्माकुमार श्रीमन्त कुमार साहू, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
सन् 1986 में जब मैं इस संस्था के सम्पर्क में आया, तब एक ज़िला मुख्य अस्पताल में सेवारत था। उस समय मेरा जीवन बहुत ही तनावग्रस्त था। उस अस्पताल में रोज़ 200-250 मरीज़ों को देखना पड़ता था। वहां मरीज़ लाइन लगाकर, एक के बाद एक आते नहीं थे। एक ही समय 20-25 मरीज़ चारों तरफ से चिल्लाते थे तो मेरी मानसिक स्थिति कैसी होगी- आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं। ऐसे मानसिक तनावग्रस्त समय पर मुझे इस आध्यात्मिक संस्था का परिचय हुआ। मेरे एक चचेरे भाई इस संस्था में जाते थे। एक दिन शाम को मैं उनके घर गया, वे कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे। मैंने पूछा, आप कहीं जा रहे हैं? उन्होंने कहा, हाँ, मैं एक सत्संग में जा रहा हूँ। आप भी चलो, आपको बहुत अच्छा लगेगा। वे मुझे ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेवाकेन्द्र पर ले गये।

ईश्वरीय साहित्य पढ़ते-पढ़ते उसके लेखक के प्रति उत्सुकता बढ़ती गयी

उस दिन उन्होंने मुझे एक किताब पढ़ने को दी। वो अंग्रेज़ी किताब थी जिसका नाम था ‘वन वीक कोर्स फॉर अटेनमेंट ऑफ कमप्लीट पीस, प्युरिटी एण्ड प्रासपेरिटी इन लाइफ' (जीवन में सम्पूर्ण शान्ति, पवित्रता एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए साप्ताहिक पाठ्यक्रम)। उस किताब को मैंने उस रात को ही पढ़ लिया। दूसरे दिन फिर वहाँ गया और बहन जी से पूछा कि ऐसी किताब और है क्या? उन्होंने और एक किताब दी, उसको भी उसी दिन पूरा किया। तीसरे दिन गया और पूछा कि और ऐसी किताब है तो दीजिये। वे चार दिन तक एक-एक किताब देती रहीं। मैं उसी रात पूरी करके सुबह लौटाता रहा। पाँचवें दिन मैंने कहा कि आपकी लायब्रेरी में जितनी भी किताबें हैं, मुझे दे दीजिये, मैं खरीदने के लिए तैयार हूँ। लगभग दो-ढाई महीने के अन्दर इस संस्था की जितनी भी पुस्तकें थीं उन सबको मैंने पढ़ लिया। उन पुस्तकों में जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, ज्ञान को स्पष्ट करने का जो तरीक़ा था, लिखने की जो शैली थी, उनसे जितने भी मेरे संशय ये 90% निवारण हो गये। उन किताबों के अन्त में, लेखक ने जिन पुस्तकों का आधार लिया था, उनकी लिस्ट होती थी। मैं सोचता था कि इस लेखक ने कितनी पुस्तके पढ़ी होगी। ऐसा भी नही उन किताबों में जो लिखा था वही उन्होने पुनः लिखा। उन पुस्तकों का आधार तो लेते थे लेकिन ईश्वरीय ज्ञान का जो स्पष्टीकरण देते, उससे पढ़ने वाले के मन में छाप लग जाती थी।
ज्ञान की किताबें पढ़ने के बाद लेखक के बारे में उत्सुकता बढ़ती गयी। लेखक का नाम ढूंढ़ा तो पता पड़ा, जगदीश चन्द्र हसीजा। मैं सोचता रहा कि यह व्यक्ति कौन है और कैसा होगा! जब मैं स्टूडेण्ट था, मुझे संसार का उतना ज्ञान नहीं था क्योंकि कॉलेज जाना, घर जाना, अपनी स्टडी करना, बस। लेकिन जब मैं नौकरी करने लगा तो मुझे आभास होने लगा कि यह संसार कैसा है, कितने दुःख हैं इसमें! यह तो जीने के लायक ही नहीं है। लगता था, यह संसार भवसागर है, यहाँ जीना बहुत मुश्किल है। जब इन पुस्तकों को पढ़ा तो मन में उत्कंठा बढ़ने लगी कि इस लेखक से एक बार मिलना चाहिए। ऐसा भी लगा कि अगर इनकी सेवा करने का अवसर मिल जाये तो यह नौकरी छोड़कर चला जाऊँ। इतनी सुन्दर बाते इन्होंने लिखी हैं तो इनका व्यक्तित्व कितना सुन्दर होगा!

पुस्तक पढ़कर खुशी से दिन-रात नाचता रहा

एक दिन की बात मैं कभी भूल नहीं सकता। जिस दिन मैंने 'शिव और शिवरात्रि' की किताब पढ़ी, उस दिन और रात मैंने न खाया, न पीया और न सोया। किताब पढ़ते-पढ़ते बीच में उठकर नाचना शुरू करता था कि मुझे जो चाहिए था वो मिल गया। उस किताब में भाई साहब ने विश्व का पिता, परमात्मा शिव ही है इसको जिस तरीके से सिद्ध किया है उसको पढ़कर मन खुशी से नाच उठा। उस पुस्तक में उन्होंने यह सिद्ध किया है कि एक समय सारे विश्व में एक शिव परमात्मा की पूजा-आराधना होती थी। वही सर्व के मुक्ति जीवनमुक्तिदाता है। बचपन - ही मैं शिव की भक्ति करता था। रोज़ घर में पूजा तो करता ही था लेकिन पिता जी के साथ हर सोमवार शिव मंदिर भी जाता था। प्रार्थना में शिव के नाम से शंकर की महिमा करता था। शिव की भक्ति करना मुझे अच्छा लगता था लेकिन वो शिव जी कौन हैं यह मालूम नहीं था। उस पुस्तक में शिव बाबा के कई नाम हैं गोपेश्वर, रामेश्वर, विश्वंभरेश्वर, नारीश्वर, शंकरेश्वर, ब्रह्मेश्वर, सर्वेश्वर, बालेश्वर आदि-आदि। उन्होंने प्रश्न पूछा है कि जो सर्व के ईश्वर हैं, ब्रह्मा-विष्णु-शंकर त्रिमूर्ति के ईश्वर- त्रयंबकेश्वर हैं, उनसे बड़ा और कोई हो सकता है? इसलिए शिव ही परमात्मा है, वही सबका ईश्वर है। यह जानकर मैं पलंग से जम्प लगाकर खुशी से नाचने लगा कि मुझे शिव परमात्मा मिल गये।

उनको नज़दीक देख मन गद्गद हो रहा था

मेरे ज्ञान में आने के तीन महीने बाद सम्बलपुर (ओडिशा) में एक सम्मेलन होने वाला था। वो था 'मिलियन मिनट्स ऑफ पीस'। उस सेन्टर पर आने वाले भाई-बहनों में ज़्यादा पढ़े हुए बहुत कम थे, इसलिए वहाँ की बहन ने उस सम्मेलन के आयोजन की ज़िम्मेवारी मुझे दे दी। मेरा बड़ा सौभाग्य था कि उस सम्मेलन में आदरणीय भ्राता जगदीश जी, दीदी चक्रधारी जी और दीदी सुधा जी का आगमन हुआ था। भ्राता जगदीश जी को उन दिनों मैंने बहुत नज़दीक से देखा। उनकी पुस्तकों को पढ़कर उनके प्रति भावना तो थी ही, जब नज़दीक से देखा तो मन गद्गद हो रहा था। उनसे मेरी पहली मुलाक़ात तब हुई जब वे सम्बलपुर सेन्टर के विजिटिंग रूम में बैठे हुए थे। मैं भी वहां गया, उनके सामने बैठा। उस रूम में ज्ञान के कई चित्र लगे हुए थे। उनमें से एक चित्र में एक डॉक्टर का, एक वकील का, एक साहूकार का, एक पहलवान का, एक नारी का, एक अफ़सर का चित्र था। उसको दिखाते हुए भाई साहब ने मेरे से पूछा कि इस चित्र का अर्थ क्या है, जानते हो? मैं तो ज्ञान में नया नया था, केवल तीन महीने ही हुए थे ज्ञान में आये। मैं चुप बैठकर उनको ही देखता रहा। उन्होंने कहा, मैं डॉक्टर हूँ, वकील हूं, साहू‌कार हूं, अफसर हूँ, औरत हूं, पहलवान हूं, यह समझना देह-अभिमान है, आप एक आत्मा हो।
फिर उन्होंने मेरे से पूछा कि आपका योग लगता है? क्या बताऊँ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। आप जानते ही हो, युवा अवस्था में दुनिया में लोगों का जीवन कैसा होता है, मनोस्थिति कैसी होती है। मित्र-सम्बन्धियों के साथ घूमना-फिरना, फिल्में देखना, फिल्मी गीतों को सुनना, गाना, यही करता था। मन तो बन्दर जैसा इधर-उधर छलांग लगाता था। मैंने कहा, भाई साहब, मेरा मन तो भागता रहता है। उन्होंने पूछा, आपके पास टेपरिकार्डर है? मैंने कहा, नहीं। उन्होंने कहा, अपने पास एक टेपरिकार्डर रखो। दिन-रात बाबा के गीत सुनो। मैंने वही किया। एक टेपरिकार्डर और बाबा की जितनी भी कैसेट थीं उन सबको खरीदा और दिन-रात टेप चलाता ही रहा। पढ़ते समय, नहाते समय, कपड़े धोते समय, खाना बनाते समय और खाना खाते समय। इतना ही नहीं, सोते समय भी बाबा के गीत सुनता रहा। सुबह उठकर देखता तो टेपरिकार्डर अपने आप बन्द हुआ रहता था। हम तीन डॉक्टर्स इकट्ठे रहते थे, तीनों मिलकर खाना बनाते थे। वे मुझे कहने लगे कि तुम तो पूरे पागल हो गये। तुम रेस्ट नहीं लेते, कम-से-कम इस टेपरिकार्डर को तो रेस्ट दे दो, चौबीस घंटे बजाते रहते हो। सारे दिन गीत सुनने का परिणाम यह हुआ कि मेरी बद्धि में जो दुनियावी बातें, कचड़ा भरा हुआ था वो मिट गया। सारे दिन बाबा के गीतों को ही गुनगुनाता रहता था। भाई साहब की पहली मुलाक़ात में ही मुझे बहुत-सी प्रेरणायें मिलीं। उस कार्यक्रम में उनका भाषण बहुत सुन्दर था। उस कार्यक्रम में बहुत से पढ़े-लिखे लोग आये हुए थे। कार्यक्रम बहुत सफल रहा।

वे कितने निरहंकारी थे!

मेडिकल की बहुत-सी बातें, विज्ञान की बहुत-सी अटपटी बातें मन में थी, उन सब शंकाओं को मैंने एक काग़ज़ पर नोट करके रखा था। जब मैं पहली बार मधुबन आया उस समय जगदीश भाई साहब भी मधुबन आये हुए थे। मैंने उनसे कहा कि भाई साहब, मेरे व्यक्तिगत कुछ प्रश्न हैं, शंकायें हैं इसलिए आपसे अकेले में मिलना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, भले आओ। समय दिया शाम 7.30 बजे का। मैं पार्टी के साथ आया था, बहनें और पार्टी वालों ने कहा कि आज हम मार्केट जायेंगे। मार्केट गये तो बहनें कुछ खरीदने लगे। मुझे लेट हो रहा था क्योंकि शाम हो रही थी। भाई साहब ने टाइम दिया था 7.30 बजे, तो बहन जी से कहकर मैं दौड़ा-दौड़ा पाण्डव भवन आया। भाई साहब के पास पहुंचते पाँच मिनट लेट हो गया था। रिसेप्शन में जाकर देखा तो भाई साहब थे नहीं। इधर-उधर ढूंढ़ा तो हिस्ट्री हॉल में मधुबन की मीटिंग चल रही थी, भाई साहब वहीं बैठे हुए थे। मैंने दरवाज़े से झांका तो मुझे देखते ही वे बाहर चले आये। आते ही उन्होंने मेरे से कहा, आइ एम सॉरी। पितृतुल्य व्यक्ति मेरे से कह रहे हैं कि आई एम सॉरी। वैसे तो मैं भी लेट हो गया था। मुझे इतना अफसोस हुआ कि मुझे भी समय का ध्यान रखना चाहिए। फिर भाई साहब आये और मेरे से बातें करने लगे।

जीवशास्त्र में भी वे बड़े विद्वान थे

मैंने जाना था कि वे साइंस के स्टूडेण्ट तो नहीं थे। मेडिकल का स्टुडेण्ट होने के कारण मुझे बहुत अहम् था कि मैं एक डॉक्टर हूँ, साइंस की बहुत बातें जानता हूँ। मेरे मन में कुछ प्रश्न थे जैसे कि ईश्वरीय ज्ञान कहता है कि यह सृष्टिचक्र 5000 वर्ष का है, हर 5000 वर्षों के बाद हुबहू रिपीट होता है। साइंस में हमने पढ़ा था कि एक समय डायनासोर, रायनासोर आदि थे जिनके अस्थिपिंजर (कंकाल) आज भी उपलब्ध हैं लेकिन वे लुप्त हो गये हैं। अगर यह कालचक्र फिर रिपीट होता है तो आज जो लुप्त हुए हैं, वो जीव कहाँ गये?
भाई साहब से मैंने यह प्रश्न पूछा कि ये डायनासोर और रायनासोर जो आज नहीं हैं, वे नयी सृष्टि पर कहाँ से आयेंगे? यह प्रश्न भाई साहब को सुनाने के लिए मैं साइंस की बैकग्राउण्ड (भूमिका) बनाता रहा। मुझे अन्दर पक्का था कि ये इसका उत्तर नहीं दे पायेंगे क्योंकि ये तो इतिहास पढ़े हुए हैं, हिस्ट्री के स्टूडेण्ट हैं। भाई साहब मुझे देखते रहे, मेरा कहना सुनते रहे और मुस्कराते रहे, हां जी हाँ जी करते रहे। जब मैंने बोलना पूरा कर दिया तो उन्होंने पूछा, हो गया? मैंने कहा, हाँ जी। एक वाक्य में ही उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया। उत्तर सुनकर मुझे बहुत लज्जा आ गयी क्योंकि मेरे लिए जो बहुत बड़ा प्रश्न था, उसका उत्तर इनके लिए कितना छोटा और सहज था। प्रश्न सुनाने में मुझे 5-6 मिनट लगे थे, उत्तर देने में उनको एक ही मिनट लगा था। मुझे लगा यह व्यक्ति साधारण नहीं है, बहुत महान् और मेधावी है। उनमें से एक उत्तर मैं आपको सुनाता हूँ। उन्होंने मेरे से पूछा कि एक जानवर है जिसको खच्चर कहते हैं, आप उसको जानते हो? मैंने कहा, हाँ जी। उन्होंने पूछा, वो क्या है? मैंने कहा, घोड़े और गधे की मिश्रित सन्तति है। ऐसे ही इस सृष्टि पर कई हाइब्रीड (मिश्रित) उत्पत्ति हैं। आपने देखा होगा, बरसात के दिनों में मेंढक सारे ट्रां-ट्रां करते रहते हैं। मैंने कहा, हाँ जी। फिर उन्होंने पूछा, सर्दी के दिनों में आप इनको देखते हैं? मैंने कहा, जी नहीं। जीवशास्त्र में पढ़ा था कि ऐसे समय पर वे मिट्टी के नीचे चले जाते हैं और उनके अनुकूल वातावरण उत्पन्न होते ही वे फिर दिखने लगते हैं। उसी प्रकार, ये जो कई हाइब्रीड उत्पत्ति हैं, इस सृष्टिचक्र में उनके अनुकूल वातावरण निर्माण होते ही फिर .... से वे प्रदुर्भाव होंगे और उनके विपरीत वातावरण निर्मित होते ही प्रायःलोप होंगे। ऐसे ही ये डायनासोर आदि का भी है। इस प्रकार, मेरे मन में जितने भी प्रश्न थे उन सबका भाई साहब ने निवारण कर दिया। आज मै गर्व से कह सकता हूं कि मेरे मन में एक भी प्रश्न नहीं है। भाई साहब की लिखी हुई सारी हिन्दी और अंग्रेज़ी किताबें मैंने पढ़ी हैं, उनसे मेरे सारे संशय और प्रश्न दूर हो गये हैं।

जिस गणेश जी को भक्त पूजते हैं, उस गणेश जी से मै साक्षात् मिला और वरदान पाया

उनकी बुद्धि और मस्तिष्क इतने शक्तिशाली थे कि मैं उनको सुपर कम्प्यूटर कह सकता हूँ। एक बार मैंने उनसे पूछा, भाई साहब, आपने कितनी किताबें पढ़ी होंगी? उन्होंने कहा, कुछ हज़ार पड़ी होंगी। भक्तिमार्ग में हम सब गणेश जी की, सरस्वती जी की पूजा करते थे लेकिन जानते नहीं थे कि वे कौन हैं? सरस्वती जी को साकार में देखने, मिलने का सौभाग्य नहीं मिला लेकिन उनकी आवाज़, उनके महावाक्य सुनने का, उनके चरित्र पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लेकिन जिसको भगवान ने गणेश जी का नाम दिया है, जिसने यज्ञ के सारे इतिहास रूपी सागर को गागर में समा दिया, उस गणेश जी से मैं साक्षात् मिला, न सिर्फ मिला उनसे प्यार पाया, पालना पायी और वरदान भी प्राप्त किया। मैं उनसे बहुत समय तक मिला, बहुत बार मिला। मैं साकार बाबा को देख नहीं पाया लेकिन ब्रह्मा बाबा जैसे रोल मॉडल (मार्गदीप, आदर्श, मिसाल) भ्राता जगदीश जी मुझे नज़र आये।
उनका त्याग, तपस्या और सेवा देखकर मैं दंग रह जाता था। जब मुझे पता पड़ा कि वे रोज़ अमृतवेले दो बजे या दो से पहले उठकर तपस्या करते हैं या ईश्वरीय साहित्य लिखते हैं तो मुझे भी प्रेरणा मिली और मैंने भी ठान लिया कि मुझे रोज सुबह दो बजे उठकर तपस्या करनी है। उनके बोल सदैव मिठास और नम्रता से भरे रहते थे। छोटे बच्चे या बच्ची को भी उन्होंने 'आप' शब्द से सम्बोधित किया, कभी तू-तुम शब्द का प्रयोग करते मैंने नहीं देखा। वे सबके साथ बहुत नम्रता और सम्मान के साथ व्यवहार करते थे।

उन में ज्ञान-बल और योग-बल अपने उच्चतम स्तर पर थे

जब भी मैं उनके पास जाता था, वे मुझे खाली हाथ नहीं भेजते थे। कुछ-न-कुछ प्रसाद देकर ही भेजते थे परन्तु उसके साथ-साथ अपने जीवन के बहुत-से अनुभव सुनाते थे। कहते थे, बाबा की आज्ञाओं का पालन करने से बाबा की मदद मिलती है और सूक्ष्म शक्तियों की प्राप्ति होती है। मैं देखता था, सुनाते समय उनके चेहरे से क्या नशा, क्या निश्चय छलकता था। इसके अलावा बाबा के प्रति अटूट निश्चय, अथाह प्रेम उनके नयनों और मुखमंडल से झलकते थे। मैं लौकिक दुनिया में कई बड़े-बड़े व्यक्तियों के सम्पर्क में आया हूँ। उनके साथ बात करने के, चर्चा करने के और सफ़र करने के कई मौके मिले हैं लेकिन जगदीश भाई साहब जैसे व्यक्तित्व मैंने नहीं देखे। दुनिया में जितनी भी उच्च योग्यताओं और विशेषताओं की गिनती होती है, वे सब जगदीश भाई साहब में थीं- यह मैंने उनसे अनुभव किया है। एक बात विशेष यह देखी कि उनमें ज्ञान-बल और योग-बल अपने उच्चतम स्तर पर थे। बाबा के प्रति उनका अटूट प्यार, अटल विश्वास तथा सेवा के प्रति उमंग-उत्साह मैंने उनके अन्तिम श्वास तक देखा।"
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ईश्वरीय नियमों की पालना के लिए बहुत ही ध्यान खिचवाते थे

शान्तिवन में स्थित 'ज्ञानामृत' प्रिंटिंग प्रेस में समर्पित रूप से डिज़ाइनिंग की सेवा में सेवारत ब्रह्माकुमार सन्तोष भाई, जगदीश भाई के सम्पर्क में आते ही कैसे उनके जीवन में परिवर्तन आया, उसका विवरण इस प्रकार दे रहे हैं-
"सन् 1975 में परिवार के हम सब पिता जी, माता जी, बड़ा भाई, बड़ी बहन और मैं ज्ञान में आये। हमारा घर स्वर्ग बन गया था। सब बाबा की याद और सेवा में मस्त थे। हमें ज्ञान पंजाब में मिला था। पंजाब में मेरी मेट्रिक्युलेशन की पढ़ाई के बाद हमारा परिवार पूरा बिखर गया। तब तक हम सब साथ में ही थे परन्तु पिता जी की जम्मू ट्रान्सफर हो गयी, बड़े भाई आर्मी में भर्ती हो गये, माता जी गाँव चली गयी, बड़ी बहन अपनी पढ़ाई के लिए पंजाब में ही रह गयी और मैं पढ़ने के लिए कटक आ गया। पहले मैं हॉस्टल में रहा, वहाँ खान-पान बिगड़ गया, उसके बाद संग बिगड़ गया। कॉलेज के उन 2-3 सालों में मेरा जीवन पूरा बदल गया। नशीली वस्तुओं का भी आदी बन गया।
मेरी हालत देखकर घर में सब चिन्तित और परेशान थे। उन्हीं दिनों गांव में भ्राता जगदीश जी से मेरी पहली मुलाक़ात हुई। हमारे गाँव में एक साधु हैं, वहाँ उनका आश्रम है। उन्होंने सन् 1987 में विश्व शान्ति यज्ञ रचा था। उस कार्यक्रम में जगदीश भाई जी आये थे। हमारे घर में गीता-पाठशाला खोली गयी। जगदीश भाई साहब ने ही उसका उद्घाटन किया। उस समय मेरे पिता जी ने जगदीश भाई से कहा कि सारा परिवार ज्ञान में चलता है लेकिन यह एक नहीं चल रहा है। पहले बहुत अच्छा चलता था। रोज अमृतवेले उठता था, हमें भी उठाता था, लाल बत्ती जलाता था, हम सब मिलकर योग करते थे। बड़ी दीदी (दीदी मनमोहिनी जी) से, मिट्ठू दादी से इसने बहुत पालना ली है ऐसी-ऐसी बातें उन्होंने जगदीश भाई को सुनायी। घर होते हुए भी मैं कमरा लेकर बाहर रहता था। उन्होंने यह भी कहा कि यह दोस्त बनाने में बहुत माहिर है, दोस्तों के कारण ही यह बिगड़ा हुआ है।

वे भविष्य द्रष्टा थे, उनके बोल वरदानी थे

उसके बाद पिता जी, भाई साहब को घर की छत पर ले गये बाबा का झंडा लहराने। उस समय वहां सैकड़ों भाई-बहनें इकट्ठे हुए थे। कमलेश दीदी भी वहां थी। पता नहीं क्या हुआ, भाई साहब ने एक सेकण्ड मुस्कराते हुए दृष्टि दी, मेरा हाथ पकड़ा और पिता जी से कहा, "यह आप सबसे आगे निकल जायेगा।" सबने समझा कि जगदीश भाई हमें दिलासा देने के लिए कह रहे हैं लेकिन उनके ये शब्द मेरे लिए वरदान बन गये। उन दिनों मैं सेन्टर पर जाने से बचने के लिए कोई-न-कोई बहाना करता था, मज़बूरी वश ही जाता था। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर पिता जी से ये शब्द बोले कि "यह वो कर जायेगा, जो आपने सोचा भी नहीं होगा।" यह सुनकर पिता जी की आँखों में आंसू आ गये। उसके बाद मैं धीरे-धीरे ज्ञान से जुड़ने लगा, कुछ दिनों के बाद सेवा के लिए मधुबन आ गया। मेरा मन कहीं टिकता नहीं था, जब सेवा के लिए कुछ दिन मधुबन में रुका तो यहीं दिल लगने लगा। इस प्रकार, भाई साहब के साथ पहली मुलाक़ात में यह चमत्कार हुआ।
मैंने तो साकार में न बाबा को देखा है, न मम्मा को। जब जगदीश भाई साहब ने मेरे साथ हाथ मिलाया, यकीन मानिये, तब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि ये साधारण व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने मुझे अपने पास ही बिठाकर ब्रह्मा भोजन किया। सिर्फ 10 मिनट की उस मुलाकात ने मेरे में पूरी शक्ति भर दी। जैसे गाड़ी में पेट्रोल पूरा भर जाये तो अच्छी रीति से भागेगी, वैसी स्थिति मेरी हो गयी। उस दिन की मुलाक़ात ने मेरे में फुल (खूब) शक्ति भर दी और मेरे जीवन की गाड़ी चल पड़ी।
पहली बार गोलक भाई की जबर्दस्ती से मधुबन में सेवा के लिए रुका। तीन महीने सेवा करने के बाद मुझे वापस घर जाने के लिए कहा गया। मैं जाने के लिए तैयार ही नहीं था, यहीं रहने की इच्छा हो रही थी। उन्हीं दिनों सन् 1992 में शान्तिवन में दिल्ली से ज्ञानामृत प्रेस आयी। गोलक भाई ने मेरे से पूछा कि क्या तुम प्रेस में रहोगे? मुझे यहाँ रहना ही या तो 'हाँ' बोल दिया। मेरे में वो हिम्मत और शक्ति नहीं थी कि ओडिशा जाकर ज्ञानमार्ग में चल सकूँ क्योंकि मेरी संगत इतनी खराब थी कि वहाँ जाने के बाद इस तरफ आना नामुमकिन था।

सेवा प्रति सम्पूर्ण समर्पणता

प्रिंटिंग प्रेस में रहने के बाद तो उनसे कई बार मिलना हुआ, उनके कई काम जैसे कि टाइपिंग करने का, उनको प्रूफ दिखाने आदि का मौका मिला। जब तक काम पूरा नहीं होता, वे वहाँ से हटते नहीं थे। एक बार की बात है, सारा दिन टाइप किया था, फिर रात को भी वे आये। रात के 10 बज रहे थे, वे बैठे हुए थे मेरे पास। टाइप करता रहा और एक पेज पूरा होते ही प्रिंट करके उनको देता रहा। भाई साहब प्रूफ रीडिंग कर रहे थे। मुझे ज़ोर से नींद आ रही थी, मैंने कहा, भाई साहब, आप रेस्ट कीजिये, सवेरे तक आपको सब दे दूंगा। बिना मेरी तरफ देखे, उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, मैं ठीक हूँ, आप करते रहो मैं बैठा रहूँगा। मैं करता रहा, नींद आने के कारण मेरे हाथ रुक जाते थे। मैंने फिर उनसे कहा, भाई साहब, आप रेस्ट कीजिये, मैं आपको सुबह अमृतवेले लाकर दूँगा। उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, मुझे कोई तकलीफ नहीं, मैं बैठा रहूँगा। थोड़े समय के बाद मेरी आँखें बन्द हो गयीं, टाइप कर ही नहीं सका। उन्होंने देखा होगा तो पूछा, क्या आपको नींद आ रही है? मैंने कुछ नहीं बोला, सिर्फ मुस्कराया। फिर उन्होंने कहा, ठीक है, आप सुबह अमृतवेले ले आना। इस प्रकार, जब वे सेवा में लग जाते थे, तो न दिन देखते थे, न रात। काम पूरा होने तक वे दम नहीं लेते थे।

मैंने बाबा के बारे में सुना था, इनमें बाबा के गुण प्रत्यक्ष देखे

एक बार मैं जगदीश भाई साहब को छोड़ने रेलवे स्टेशन गया था। रास्ते में पुल के पास ट्रैफिक जाम हो गया। गाड़ियों की लाइन बहुत लम्बी थी। उन्होंने देखा, गाड़ी का समय हो रहा है तो एक छोटी-सी हैंडबैग ली और कहा, मैं जाता हूँ, आप जाम खुलने के बाद सारा सामान ले आना।अगर गाड़ी चल चुकी हो तो किसी से भिजवा देना। वहाँ एक मेरा दोस्त था, उसको कहा, भाई साहब को स्कूटर पर स्टेशन छोड़ दो, उसने छोड़ा। आधे घंटे के बाद रास्ता खुल गया। मैं सामान लेकर स्टेशन गया तो गाड़ी लेट थी, आने वाली थी। गाड़ी आ गयी, सारा सामान गाड़ी में रखा। उस दिन का अखबार लाने के लिए उन्होंने मुझे कहा। मैं लेने के लिए गया और दुकानदार से कहा कि पेपर दे दो। जेब में हाथ डाला तो जेब में पैसे नहीं थे। अचानक उठकर आया था, जेब में पैसे नहीं रखे थे। फिर मैं भाई साहब के पास गया। उन्होंने पूछा, क्या हुआ? मैंने कहा, भाई साहब जल्दी में मैं पैसे लाना भूल गया। वे हँसते हुए बोले, "तू भी फक्कड़ (फकीर), मैं भी फक्कड़।" मैंने बाबा के बारे में सुना था कि बाबा पैसे अपने पास नहीं रखते थे। वही दृश्य आज मैंने जगदीश भाई में देखा।
मुझे संकल्प चलने लगा कि भाई साहब ने पेपर लाने के लिए कहा, मैं ला नहीं सका। फिर मैं उस दुकानदार के पास गया और कहा, "देखो भाई, हमारे बड़े भाई साहब को पेपर चाहिए, अब मेरे पास पैसे नहीं हैं, बाद में लाकर दूंगा, अगर मेरे ऊपर विश्वास है तो दे दो।" उसने कहा, "भाई साहब, आप ले जाइये, आप ब्रह्माकुमारी वाले हैं, हमें पूरा विश्वास है, आप ले जाओ।" मैं तीन अखबार ले गया और उनको दिये। उन्होंने पूछा, "कैसे लेकर आया?" मैंने कहा, "भाई साहब मैंने उससे कहा कि मैं कल पैसे लाकर दूंगा। उसने 'हाँ' बोला और मैं लेकर आया।" वे चुप हो गये और गाड़ी चल पड़ी। मन सोचने लगा कि कौन है ऐसा जो सफ़र में बिना पैसे चलता है। मैंने तो ज़िन्दगी में पहली बार ऐसे व्यक्ति को देखा। ऐसे थे हमारे भ्राता जी।

कहते थे, देखने वालों को आपकी दिव्यता दिखायी पड़नी चाहिए

भाई साहब की कथनी और करनी एक थी। ऐसे व्यक्ति बहुत कम देखने को मिलते हैं। मैं उनके साथ ज़्यादा समय तो नहीं रहा लेकिन 8-10 बार उनके साथ चलने का, रहने का, सेवा करने का मौका मिला था। मैंने उनको बहुत करीब से देखता था। लौकिक में भी मैं मानव स्वभाव और व्यवहार (Human behaviour and attitude) का अध्ययन करता था। मैंने उनमें यह देखा कि वे हर बात का बहुत ध्यान रखते थे। जो भी कार्य करते थे, उससे पहले सोचते थे कि इस कार्य का परिणाम क्या होगा! जो क्रिया हम कर रहे हैं उसकी प्रतिक्रिया ज़रूर होती है, तो देखने वालों पर इसका क्या प्रभाव होगा। एक बार शान्तिवन में सबको नारियल मिला था पीने के लिए। भाई लोग खड़े-खड़े पी रहे थे। यह देखकर जगदीश भाई साहब को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने एक बार क्लास में सुनाया कि हम रॉयल बाप के रॉयल बच्चे हैं, दुनिया के लिए आदर्श हैं। हर कर्म हमारा रॉयल तरीके से होना चाहिए। शान्ति से एक स्थान पर बैठकर, बाबा की याद में पीना चाहिए।
आजकल ब्राह्मण संसार में जो फैशन चला है 'कोल्ड ड्रिंक्स' पीने का, उनको यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। शान्तिवन में डायमंड हॉल बनाने के लिए एक मीटिंग हुई थी। उस समय सबके लिए कोल्ड ड्रिंक्स मंगाया था। इसको देखकर वे खूब बिगड़े। इन चीज़ों को पीने के लिए किसने छुट्टी दी है? बाबा ने किस मुरली में कहा है कि बच्चे, कोल्ड ड्रिंक्स पी सकते हैं! जो लोग वहाँ टूट पड़े थे, उनकी बात सुनकर भाग गये। वे कहते थे, पानी का गिलास भी आप पीते हैं तो रॉयल्टी से पीया करो। उसमें भी देखने वालों को आपकी दिव्यता दिखायी पड़नी चाहिए। कहते थे, नारियल पानी को भी आप सड़क पर खड़े होकर मत पीओ। एक स्थान पर बैठकर योगयुक्त होकर पीओ। ईश्वरीय नियमों की पालना के लिए वे ब्राह्मणों का ध्यान खिंचवाते थे।

उनकी हर बात प्रैक्टिकल होती थी

वे सिर्फ ज्ञान सुनाते नहीं थे, वे खुद भी धारण करते थे। वहीं दूसरों से कहते थे। उनका जीवन प्रेरणा का स्रोत था। उनकी क्लासेस सुनने वालों के दिलों को छू लेती थी। एक बार कुमारों की भट्ठी थी मधुबन में, वे क्लास कराने आये थे। क्लास की शुरुआत में उन्होंने कहा कि अगर किसी का कोई प्रश्न हो तो लिखकर देना। चार-पाँच लोगों का एक ही प्रश्न था और वह बहुत अच्छा प्रश्न था। उस प्रश्न का उनका उत्तर भी उतनी ही सच्चाई से भरा हुआ था। उसे सुनकर मेरे मन में जो प्रश्न थे वो ख़त्म हो गये। प्रश्न था कि बाबा को तो सब पता रहता है। वे सबका सब-कुछ जानते हैं। एक तरफ़ कुछ आत्मायें ऐसी हैं जो काबिल (योग्य) नहीं हैं, फिर भी उनको अच्छा स्थान मिला हुआ है, उस पद के लिए वे बिलकुल लायक नहीं हैं। दूसरी तरफ कुछ आत्मायें ऐसी हैं जिन में सब योग्यतायें हैं, वे भटक रही हैं, उनको सही स्थान नहीं मिल रहा है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो यज्ञ के हितैषी नहीं हैं लेकिन उनको यज्ञ में सम्पूर्ण संरक्षण मिला हुआ है। कुछ लोग सच में यज्ञ रक्षक हैं लेकिन उन पर विश्वास नहीं रखा जा रहा है या उनको साधारण स्थान या सेवा दी गयी है। सार यह था कि अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है और बुरे लोगों के साथ अच्छा क्यों होता है? भगवान जानी-जाननहार है। ऐसा क्यों? यह उन कुमारों का प्रश्न था। यह प्रश्न पढ़कर भाई साहब मुस्कराये और हम सबसे पूछा कि 'अच्छा और बुरा' की परिभाषा आप किस रूप से दे रहे हैं? किसी ने उत्तर नहीं दिया।
फिर उन्होंने पूछा कि रामायण में मंथरा एक कैरेक्टर है, आप जानते हो? सबने कहा, जी हाँ। उन्होंने पूछा, उसका कैरेक्टर कैसा था? सबने कहा, नेगेटिव। फिर उन्होंने पूछा, क्यों नेगेटिव था? सबने कहा, उसने कैकेयी के कान भरे, राम को वनवास भेजा। उसके कारण राजा दशरथ ने प्राणत्याग किये। भाई साहब ने कहा, ठीक है, यह एक पहलू है। अभी दूसरे पहलू से सोचो। अगर राम वनवास नहीं जाता तो असुरों का वध कैसे होता? अहिल्या, जटायु, रावण और ऋषि-मुनियों का उद्धार कैसे होता? दुष्टों का संहार, शिष्टों का उद्धार जो हुआ, किस के कारण? सब भाई चुप हो गये। उन्होंने पूछा, असुरों का संहार और ऋषि-मुनियों के उद्धार के लिए कारण कौन बना? उत्तर मिला, मंथरा। अब बताओ, मंथरा नेगेटिव रोल है या पोज़िटिव? सबने बोला, पोजिटिव। भाई साहब ने कहा, "ड्रामा में कुछ ऐसी चीजें हैं, आपको अभी समझ में नहीं आती। ड्रामा एक बहुत लम्बी चीज़ है, हमारी दृष्टि बहुत हद की है। हमारी दृष्टि इस दीवार तक जा सकती है लेकिन दीवार के पीछे क्या है, हमें दिखायी नहीं पड़ती। जो दिख रहा है उतना ही सत्य नहीं है, उसके पार भी सत्य है। यह ड्रामा भी ऐसा बना हुआ है। आप समझते हैं, आपके साथ बुरा हो रहा है लेकिन मैं कहता हूं, आपका बुरा नहीं हो रहा है, आपका अच्छा हो रहा है। अच्छे व्यक्ति के साथ बुरा हो ही नहीं सकता और बुरे व्यक्ति के साथ अच्छा हो ही नहीं सकता। आपको लग रहा है कि बुरे लोग मौज़ कर रहे हैं, नहीं, वे मौज नहीं कर रहे हैं, बुरा कर रहे हैं। अभी उनका कुछ पुण्य का खाता है, इसलिए अच्छा पा रहे हैं या अच्छा मिल रहा है। वे, अपने जमा पुण्य को भी बर्बाद कर रहे हैं। जब उनका पुण्य का खाता शुन्य हो जायेगा, उसके बाद उनके लिए सज़ा ही सज़ा है, पश्चात्ताप ही पश्चात्ताप है। आप कह रहे हो कि अच्छी आत्माओं का बुरा हो रहा है, इसका कारण यह है कि उनका विकर्म का खाता रहा हुआ है, वो चुक्ता होने तक उनका बुरा होता है, उसके बाद उनकी मौज़ ही मौज़ है। वास्तव में उनके लिए कुछ बुरा नहीं है, विकर्म भस्म हो रहे हैं।" इस प्रकार भाई साहब ने कर्म और ड्रामा के रहस्य को स्पष्ट किया।"
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भ्राता जी एक सज्जन और बड़े अनुभवी पुरुष थे

पूर्व निजी सहायक, स्पीकर, पंजाब विधान सभा एवं वर्तमान प्रबन्धक, प्रशासन, ग्लोबल अस्पताल, आबू पर्वत, ब्रह्माकुमार महिन्दर भाई, भ्राता जगदीश चन्द्र जी के बारे में अपने अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"मैं सन् 1967 में ज्ञान में आया और जगदीश भाई जी के बारे में सुना। उनका साहित्य भी पढ़ा तो बहुत ही प्रभावित हुआ। बाबा की फ़िलासॉफ़ी और उनके साहित्य का अध्ययन किया तो परमात्मा और आध्यात्मिकता के प्रति मेरा विश्वास पैदा हुआ।
यज्ञ के हर ब्रह्मावत्स के दिल में भ्राता जगदीश जी के प्रति अगाध स्नेह और सत्कार की भावना थी और आज भी है। विशेषकर अति विकट परिस्थितियों में तो उनको बहुत ही याद किया जाता है।

इनकी लिखने की शैली अद्भुत थी

इनकी लिखने की शैली अ‌द्भुत थी। उसे पढ़ते-पढ़ते ही बाबा की फ़िलासॉफ़ी में सत्यता ज़रूर नज़र आती थी। सन् 1980 के दशक में मैं व्यक्तिगत तौर पर इनके सम्बन्ध सम्पर्क में आया। जगदीश भाई जी ही सर्वशक्तिवान परमपिता परमात्मा शिव द्वारा स्थापित इस संस्था के मुख्य प्रवक्ता और साहित्य लिखने के अधिकारी थे। इनकी स्वीकृति से मैंने इनसे लिखी हुई छह मुख्य किताबें : 1. साप्ताहिक पाठ्यक्रम, 2. पथ-प्रदर्शनी, 3. नैतिक शिक्षा, 4. विकारों पर विजय, 5. घर-गृहस्थ में रहते सहज राजयोग और 6. हीरे तुल्य जीवन- इनका पंजाबी भाषा में अनुवाद किया। इनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से ही यह कार्य संभव हो पाया जिसका मुझे नाज़ है। संकल्प आते ही इनके प्रति मेरा आदर और सत्कार भाव पैदा हो जाता है। उनके सम्पर्क में आते ही जीवन में अनुशासन और बाबा के कार्य के प्रति गंभीरता तथा कर दिखाने की शक्ति आ जाती थी। उनके साहित्य में सत्यता और निर्भीकता की झलक और फलक दिखायी देती है जिसको पढ़कर व्यक्ति को वैसा बनने की प्रेरणा भी मिलती है।

उनके सानिध्य में रहने से, उनके कार्य करने से अलौकिक गर्व महसूस होता था

सन् 1983 में मैं भ्राता बृजमोहन जी के साथ मधुबन आया था कॉन्फरेन्स की सेवा के लिए। मैं और चंडीगढ़ के करमचन्द भाई दोनों शशी बहन के आफिस में बैठकर प्रोग्राम के मैटर टाइप करते थे, स्टेनसील काटते थे। सन् 1983 से लेकर जितनी भी यूनिवर्सल पीस कॉन्फरेन्स 'ओम् शान्ति भवन' में हुईं, उनमें पूरे विश्व के उच्च कोटि के नेता, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र संघ के सहायक महासचिव भ्राता राबर्ट मुल्लर, मिस्र की मैडम सादात, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी, प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी, नरसिंह राव जी, अटल बिहारी वाजपेयी जी आदि सम्मिलित होते रहते थे। उस समय मुझे हर कॉन्फरेन्स में स्टेज प्रोग्राम बनाने का सौभाग्य प्राप्त होता था जो कि भ्राता जगदीश जी की मंजूरी से बनता था। उनकी पारखी नज़र बहुत ही अचूक थी। उनके सानिध्य में रहने से, उनके कार्य करने के तरीके से, उस कार्य की गंभीरता और मूल्य का साक्षात्कार होता था और करने के बाद बहुत ही ईश्वरीय नशा और शक्ति का संचार महसूस होता था, अपने पर अलौकिक गर्व महसूस होता था।

यज्ञ के प्रति ज़िम्मेवारी और ज्ञान के प्रति सत्यता

मेरा सौभाग्य यह भी रहा कि अपने अन्तिम दिनों में उन्होंने मुझे याद किया और मुझे उनकी अन्तिम बिल / टेस्टामेन्ट बनाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह उनके सच्चे राजयोगी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि उनको पूर्व में ही आभास हो गया था कि अब उनका अन्तिम समय आ गया है। अन्तिम दिनों में इतना बीमार होते हुए भी उन्होंने मुझे इस सम्बन्ध में डिक्टेशन दी। आज भी मुझे याद है कि एक-एक शब्द जो कि वास्तव में चाहिए था, उन्होंने लिखवाया। उनकी स्मरण शक्ति तथा यथार्थता को देखकर मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हुआ। वे एक सच्चे और उच्च कोटि के राजयोगी थे। उनकी यज्ञ के प्रति ज़िम्मेवारी और ज्ञान के प्रति सत्यता को देखकर कोई भी व्यक्ति प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। अद्भुत थी उनकी ईश्वर के प्रति आस्था और उनकी प्रतिभा जो कि हर ब्रह्मावत्स को ईश्वरीय नियमों पर चलने के लिए प्रेरित करती है।

आकर्षक व्यक्तित्व और प्रतिभा

जगदीश भाई की प्रतिभा और व्यक्तित्व बहुत आकर्षक थे। उनको जो भी देखता था, लगता था कि यह व्यक्ति अन्दर बाहर सच्चा है। उनका जो औरा था, वह बहुत ही खींचता था। उनका चलना भी विशेष था। उन्हें मैंने कभी नहीं देखा किसी का हाथ पकड़कर या हाय में हाथ डालकर चलते हुए। उनकी चलन से ऐसा लगता था कि ये एक सज्जन पुरुष हैं, बड़े अनुभवी व्यक्ति हैं। हर किसी में उनके प्रति सत्कार अपने आप पैदा होता था कि मैं ऐसे महान् व्यक्ति के साथ बात कर रहा हूँ। हम किसी से मिलते हैं तो हमें होता है कि सामने वाले को कुछ-न-कुछ सुना लूँ लेकिन जब भी हम उनके पास जाते थे तो मन करता था कि उनसे कुछ सुनें और उनकी बातों पर अमल करें। वे कभी वैसी-तैसी या अनावश्यक बातें नहीं सुनाते थे, जो सुनाते थे वो एकदम एक्यूरेट होता था। वे किसी से भी मिलते थे तो कम-से-कम बोलते थे और यथार्थ बोलते थे। जगदीश भाई और दादी प्रकाशमणि जी से जो भी व्यक्ति मिलता था उसको अनुभव होता था कि इनकी संस्था बहुत बड़ी है और इस संस्थान में रहने वाले बड़े महान् हैं।

ईश्वरीय ज्ञान का निर्भयता से व्याख्यान करना और सिद्ध करना

चंडिगढ़ सेक्टर-24 में सरकारी योग संस्थान है। सन् 1973-74 में उन्होंने योगा सम्बन्धी एक ज्ञानगोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें हमारे विद्यालय के शीर्ष वक्ताओं को भी बुलाया गया। उस समय, मुझे याद है, भ्राता जगदीश जी, भ्राता बृजमोहन जी और दादी गुलज़ार जी स्टेज पर सशोभित थे। अन्य वक्ताओं के साथ ऋषिकेश के हिमालयन संस्थान के संस्थापक स्वामी राम जी भी स्टेज पर थे। उनके साथ देश-विदेश के उनके शिष्य भी सभा में मौजूद थे। भ्राता बृजमोहन जी मंच संचालन कर रहे थे। वर्णन योग्य प्रसंग यह रहा- स्वामी राम जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि उन्होंने एक ऐसी मशीन ईज़ाद की है जो किसी भी व्यक्ति की सोच और एकाग्रता के बारे में बता सकती है। इसके अलावा उस मशीन
की उपयोगिता के बारे में भी उन्होंने बताया। इस वक्तव्य के बाद भ्राता जगदीश जी को आमंत्रित किया गया। उन्होंने बड़े सम्मान पूर्वक स्वामी जी की बात का उद्धरण देते हुए कहा कि हमें ऐसी मशीन की आवश्यकता है जो हमें बताये कि हमारी एकाग्रता अच्छी बात पर है या गलत बात पर है। इनकी मशीन यह तो नहीं बता सकती। गीता के भगवान ने कहा है कि मन्मनाभव होने से परमात्मा की याद में स्थित हो सकते हैं। क्या इनकी मशीन यह बता सकती है कि अमुक व्यक्ति की इस समय एकाग्रता परमात्मा व उनकी शक्तियों पर केन्द्रित है? यह बात सुनते ही स्वामी राम जी गुस्साये हुए अपनी कुर्सी से उठे और भ्राता जगदीश जी का माइक लेकर, ईश्वरीय विश्व विद्यालय के बारे में अनाप-शनाप बातें बोलने लगे। फिर एकाएक स्टेज से उतर कर अपने शिष्यों के साथ सभागार से बाहर चले गये। उसके बाद भ्राता जगदीश जी ने सप्रेम बोला कि देखो, आजकल योगा-प्राचार्य का यह हाल है कि बात को बिना समझे ही क्रोधित हो जाते हैं। राजयोग तो व्यक्ति का क्रोध समाप्त कर देता है तथा सच्ची शान्ति प्रदान करता है।
इस घटना का वर्णन करने का तात्पर्य यह है कि कितने भी बड़े-बड़े विद्वानों की सभा हो, भ्राता जगदीश जी परमात्म-ज्ञान की सत्यता का वर्णन करते डरते नहीं थे। निर्भयता से ईश्वरीय ज्ञान का व्याख्यान करते थे और उसको सिद्ध करते थे।
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छोटों के कार्य देख खुश भी होते थे और प्रशंसा भी करते थे

कटक सेवाकेन्द्र पर समर्पित रूप से सेवा कर रहे ब्रह्माकुमार नथमल भाई, भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-"आदरणीय भ्राता जगदीश जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1973 में दिल्ली में हुई थी। उस समय मैं उम्र में छोटा था। जब उनसे मिला तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि ये साकार ब्रह्मा बाबा का स्वरूप हैं। मैंने तो ब्रह्मा बाबा को देखा नहीं था लेकिन उनको देखते ही ऐसा अनुभव हुआ। उन दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान में हमारा एक मेला लगा हुआ था। मैं कमलेश दीदी के साथ ओडिशा की तरफ से लगने वाले मंडप की सेवा करने के लिए वहाँ गया था। उनसे मिलने के बाद बार-बार उनके सानिध्य में रहने का मन करता था। उनके सम्पर्क में आने से मुझे यह अनुभव हुआ कि उनका हर कार्य एक्यूरेसी (पूर्णता, श्रेष्ठता) से भरा रहता है।

छोटे भाई-बहनों का आगे बढ़ना देख बहुत खुश होते थे

उनमें पालना की शक्ति बहुत अच्छी थी, बाबा के छोटे बच्चों को भी बहुत पालना देते थे। ओडिशा में एक बार डी.पी.आई. (डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इनस्ट्रक्शन) से हमारे एक कार्यक्रम के लिए स्वीकृति पत्र लेकर मै मधुबन की वार्षिक मीटिंग में आया और भाई साहब को दिखाया। भाई साहब उस सेवा से इतने खुश हुए और मीटिंग में भरी सभा में मुझे स्टेज पर बुलाया और सबके सामने मेरी तारीफ की। उन्होंने कहा कि देखो, यह आयु में भी छोटा है और ज्ञान में भी फिर भी कितना बड़ा कार्य करके आया है। इस प्रकार उन्होंने प्रशंसा करके मेरे में और उमंग उत्साह भरा।
उड़िया भाषा में मैगजिन शुरू करने के लिए मैंने एक मैगजिन का सैम्पल (डेमी) बनाकर उनको दिखाया। भाई साहब को वह बहुत अच्छा लगा और खुश होकर मीटिंग में कहा, देखो, नथमल भाई को मैगज़िन बनाने में कितनी रुचि है! कितनी अच्छी तैयारी करके आया है। इस प्रकार, वे छोटों के कार्य को देखकर खुश भी होते थे और आगे बढ़ाने के लिए उनकी प्रशंसा भी करते थे।

बाबा और ड्रामा पर अटूट विश्वास

ओडिशा में जब भी बड़े कार्यक्रम करते थे तो हम उनको याद करते थे। वे बहुत खुशी-खुशी से हमारा निमन्त्रण स्वीकार करते थे। एक बार ओडिशा में उनका 7 दिन का टूअर था, उसमें मैं सातों दिन उनके साथ रहा। सेवा के प्रति, अपने कर्तव्य के प्रति उनका बहुत ध्यान रहता था। वे कहते थे, जिस सेवा के लिए हमें बुलाया है, उस सेवा के लिए समयपर पहुंचना जरूरी है। निकलने में किसी कारण वश देर होती थी तो वे कार में ही नाश्ता या भोजन करते थे और समय पर उस स्थान पर पहुंच जाते थे। एक साधु महाराज ने भाई साहब को एक कार्यक्रम में बुलाया था। कार्यक्रम पूरा करके निकलने में लेट हो गया। समय पर हम एयरड्रम नहीं पहुंच सके और फ्लाइट मिस हो गयी। फिर भी उनके मन में यह नहीं था कि इनके कारण हमारी फ्लाइट मिस हुई, आगे के कार्यक्रम ऊपर-नीचे हो गये। उसी दिन दिल्ली में उनको एक मीटिंग अटेंड करनी थी। उन दिनों भुवनेश्वर से दिल्ली सारे दिन में एक ही फ्लाइट जाती थी। उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, बाबा मुझे किसी-न-किसी तरीके से दिल्ली पहुंचायेगा। वे इतने निश्चिन्त थे, उनमें कोई आवेश या चिन्ता नहीं थी। हम सोच रहे थे कि इनको कैसे दिल्ली पहुंचाया जाये। हमें पता पड़ा कि भुवनेश्वर से एक ट्रेन चलती है कोलकाता और वहाँ से शाम को दिल्ली के लिए एक फ्लाइट है। प्रयत्न करने पर भी ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिला लेकिन भाई साहब बिना रिजर्वेशन उस ट्रेन से कोलकाता गये। मैंने उनसे कहा, सॉरी भाई साहब, हम आपके लिए कुछ नहीं कर सके। उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, इसमें आपका क्या दोष है, ड्रामा में यही था। इस प्रकार, तकलीफ होने पर भी उसे हमें फील होने नहीं दिया, वे खुद निश्चिन्त थे। भाई साहब, हर पल ड्रामा पर इतना अटल रहते थे कि वे कहते थे, हर सेकण्ड का जो भी ड्रामा बना हुआ है, वह एक्यूरेट है और उसी अनुसार सारा कार्य होना है। जरा भी उनके मन में कोई भी संकल्प नहीं चलता था।
किसी भी छोटे कार्य को उन्होंने छोटा नहीं समझा। किसी बहन या भाई को छोटा नहीं समझा। हरेक बाबा के बच्चों को उन्होंने बड़ा समझा, महान समझा और माननीय समझा क्योंकि हरेक आत्मा में कोई-न-कोई विशेषता रहती है जो बाबा से मिली हुई देन है। मुझे हमेशा उनके प्रति समर्पित भाव रहता है, जब-जब मैं उनके सम्पर्क में आया, कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य मिलती थी।

हर बार स्टेट गेस्ट के रूप में

वे कटक चार बार आये थे। एक बार यहाँ अन्तर्राष्ट्रीय महासम्मेलन रखा था, तब आये थे। दूसरी बार आये थे जब भट्ठी का कार्यक्रम रखा था। इस कार्यक्रम में वे एक सप्ताह रहे। तीसरी बार शिक्षणवेत्ता और न्यायविदों के सम्मेलन में आये थे। चौथी बार चक्रधारी बहन जी और भाई साहब दोनों आये थे। ओडिशा के प्रति उनकी भावना बहुत ऊंची थी। वे कहते थे, ओडिशा की आत्मायें बहुत भावना वाली हैं। बाबा के प्रति और बाबा की सेवा के प्रति यहाँ के भाई-बहनों में बहुत ऊंची भावनायें हैं। वे उन्नति पाते रहेंगे और बाबा का नाम रोशन करते रहेंगे। जब भी वे ओडिशा आते थे, उनकी राज्य अतिथि (स्टेट गेस्ट) के रूप में ही देखरेख की जाती थी।"
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भ्राता जगदीश जी युवाओं के प्रेरक थे

आन्ध्रप्रदेश, सिद्धिपेठ के ब्रह्माकुमार ओमकारम् भाई, जगदीश भाई साहब के बारे में अपने अनुभव इस रीति सुनाते हैं-
"दिसम्बर 1987 में जब मैं पहली बार बापदादा से मिलने मधुबन गया था, तब भ्राता जगदीश जी से मेरी पहली मुलाकात हुई। उनके बारे में बाबा ने भी मुरलियों में कई बार सुनाया था और ईश्वरीय विश्व विद्यालय की पुस्तकों में उनका नाम भी देखा करता था। इसके अलावा हमारी दीदी ब्रह्माकुमारी भवानी जी भी हर बात में भाई साहब का नाम लिया करती थीं क्योंकि जब वे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली शक्ति नगर गयी थी, जहां भाई साहब रहते थे, वहीं उनको बहुत नज़दीक से देखा था और उनसे मार्गदर्शन भी पाया था। इसके कारण वे बात-बात पर भाई साहब का उदाहरण देती थीं। इसके बाद तो मैं भी उनको समीप से देखने का, उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का इन्तज़ार कर रहा था।

आखिर वो दिन मेरे लिए आया

मैं यूथ विंग का मेंबर था। यूथ विंग की तरफ से सात दिन की ट्रेनिंग और भट्ठी के लिए मुझे निमन्त्रण आया। वह ट्रेनिंग अहमदाबाद के स‌द्भावना भवन' में थी। उस ट्रेनिंग में भाई साहब भी आये थे और सात दिन हम युवाओं के बीच थे। उन दिनों मुझे भाई साहब से मिलने और उनको समीप से देखने का सौभाग्य मिला। अनेक दिनों की मेरी इच्छा पूर्ण हुई। उस ट्रेनिंग में भाई साहब से अनेक क्लासेस, वर्कशाप्स, क्वेश्चन आन्सर्स के द्वारा पर्सनल लेन-देन हुई। अमृतवेले से लेकर रात तक भाई साहब के साथ रहकर उनको नजदीक से देखने का, उनसे सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।
भाई साहब में मैंने बाप समान विशेषतायें देखीं। भाई साहब उस ट्रेनिग में अपने अनुभवों के साथ हमें आप समान बनने की प्रेरणा देते थे। इतना बड़ा भाई होते हुए भी वे कभी खाली नहीं बैठते थे। उन सात दिनों में उनको कभी खाली बैठे या लेटे हुए हमने नहीं देखा। वे एक स्थान पर बैठे हुए भी चारों तरफ़ दृष्टि डालते थे, निरीक्षण करते थे। सन् 1987 से 2001 के बीच उनसे कई बार मिलने के अवसर मुझे मिले। हर साल 1-2 बार मधुबन में सेवा करने के लिए मेरा जाना होता था। इस दौरान मधुबन में उनकी क्लासेस सुनने का और आते-जाते मिलने का अवसर मिलता था।

उनका हर शब्द पुरुषार्थ के लिए प्रेरणाप्रद होता था

भाई साहब देखने में बहुत गंभीर लगते थे लेकिन बात करते समय, क्लास कराते समय इतना हंसाते थे कि कोई हंसे बिगर रह नहीं सकता था। उनके बोल में शालीनता और रमणीकता होती थी। ज्ञान की गुह्य बातों को अति सहज करके सुनाते थे और समाज के विभिन्न वर्ग वालों को इस ज्ञान को कैसे सहज रीति से समझायें इस विधान को भी सरल रूप से समझाते थे। उनकी यह समझानी सुनने के बाद किसी का मन दूसरों को ज्ञान दिये बिगर शान्त नहीं हो सकता था। उनके अनुभवों में मम्मा और बाबा की बातें और सेवा करने की विधि के सिवाय और कुछ होता ही नहीं था। उनका हर शब्द पुरुषार्थ के लिए प्रेरणाप्रद होता था।
उनके क्लासेस से हमें, बाबा को प्रत्यक्ष करने में अपने समय, संकल्प, बोल और जीवन को सफल करने की विधि; समय, स्थान, व्यक्ति, वातावरण इत्यादि को देखकर ज्ञान देने की कला प्राप्त हुई।"
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भाई साहब सबको समान दृष्टि से, आत्मिक भाव से देखते थे

दिल्ली, शक्ति नगर से ब्रह्माकुमार कृष्णा भाई, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने संस्मरण इस प्रकार सुना रहे हैं-
"मैं सन् 1981 से इस संस्था के सम्पर्क में है। मैं दिल्ली के एक कालेज में प्रिन्सिपल के पद पर सेवारत हूं। मुझे ईश्वरीय ज्ञान आबू में ही मिला मई 1973 में, उस समय में 13 साल का था। अभी जहां ग्लोबल अस्पताल है उसके पास विकलांगों (दिव्यांगों) के लिए एक प्रशिक्षण केन्द्र है, उस समय मैं वहां प्रशिक्षण के लिए आया था। उन दिनों में दोस्तों के साथ रोज नक्की लेक पर घूमने जाता था। वहाँ ब्रह्माकुमारियों का जो म्यूजियम है, एक दिन उसको देखने गया। म्यूज़ियम देखकर बहुत अच्छा लगा और कोर्स करने लगा। कोर्स के दौरान जब मुझे योग में बिठाया गया, ॐ की ध्वनि की तो उसे सुनते-सुनते मुझे शिव बाबा का साक्षात्कार हो गया। ट्रेनिंग पूरी हुई तो दिल्ली चला आया और फिर पढ़ने लगा। पढ़ाई में लग गया तो ज्ञान भूल गया।
सन 1981 में 'अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग वर्ष' मनाया जा रहा था। विकलांग वर्ष मनाने के लिए इस संस्था की तरफ़ से दिल्ली के लालकिला मैदान में एक बड़ा मेला लगा हुआ था। उस मेले में दिल्ली की जितनी भी दिव्यांग संस्थाएं हैं, सबको निमन्त्रण दिया गया था। जब उस मेले को देखा तो सन 1973 की आबू की यादें ताजा हो गयीं। तब से लेकर मैं इस संस्था का नियमित विद्यार्थी बन गया। मैं कुमार भी हुं और ब्रह्माकुमार भी।

वे सदैव सोचते थे, कैसे हर आत्मा को आगे बढ़ायें और कैसे उसका भाग्य बनायें

जगदीश भाई साहब शक्ति नगर सेन्टर की तीसरी मंजिल पर रहते थे और क्लास चलती थी ग्राउण्ड फ्लोर पर। जब क्लास पूरी होती थी तो भाई साहब अपने कमरे से नीचे उतरकर पहली मंज़िल पर खड़े होकर क्लास में आये हुए भाई-बहनों को गौर से देखते थे कि मुरली सुनने के बाद मुरली का प्रभाव किन-किन पर, कितना कितना हुआ है। इसके अलावा वे क्लास में आने वाले में कौन-सी विशेषतायें हैं और उन विशेषताओं के आधार पर उस आत्मा को कैसे आगे बढ़ायें और कैसे उसका भाग्य बनायें-यह भी सोचते थे। इस आत्मा का तन-मन-धन और श्वास-समय कैसे सफल हो ताकि इसका जन्म-जन्मान्तर का भाग्य बने, वे यह भी सोचते थे। इसी सिलसिले में उन्होंने मुझे भी देखा। वे जानते थे कि कुमारों में जोश, उमंग-उत्साह और साहस बहुत होता है, उसको ईश्वरीय सेवा में लगा दिया तो देश का भी कल्याण और उस आत्मा का भी कल्याण होगा। कुमारों के ज्ञान और योग के विकास के लिए वे सप्ताह में एक बार सेन्टर पर योग-तपस्या और विशेष क्लास रखते थे। हम कुमारों को पहले ही टॉपिक देते थे कि आने वाले सप्ताह में चार कुमार इस टापिक पर बोलेंगे। इसी प्रकार, सेवा के विषय में भी वे हमें अवसर देते थे। एक बार उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि हमें एक प्रोग्राम करना है, फलाने स्टेडियम में जाकर पूछताछ करके आओ कि वहां कितने लोग बैठ सकते हैं, एक दिन का उसका किराया कितना है, वहां क्या-क्या व्यवस्था है। एक बार उन्होंने कहा, जाओ, दिल्ली के जो टॉपमोस्ट होटल हैं उनके हॉल देखकर आओ और पता करके आओ कि उनके साइज़ क्या हैं, उनमें कितने लोग बैठ सकते हैं और किराया कितना है। कभी यूनिवर्सिटी में भेजते थे कि भाई साहब सबको समान दृष्टि से, आत्मिक भाव से देखते थे
इसके अन्तर्गत आने वाले कॉलेज और होस्टलों की लिस्ट ले आओ और वहां कार्यक्रम के लिए आज्ञा भी लेकर आओ। इस प्रकार भाईसाहब ने कालेजों और होस्टलों में सेवा करने का मौका मुझे दिया।

कितने भी बीमार हों लेकिन सेवा कभी नहीं छोडी

एक बार यूनिवर्सिटी में उनका भाषण था लेकिन उस दिन उनको बहुत तेज़ बुखार था। फिर भी वे गये और भाषण करके आये। भाषण के बाद खड़े होना भी उनके लिए बहुत मुश्किल था। इस प्रकार, वे सेवा के सामने अपने बारे में कुछ भी नहीं सोचते थे। वे कहा करते थे कि बाबा के मैसेज (सन्देश) से कोई भी वंचित नहीं रहना चाहिए। कितने भी बीमार हों लेकिन वे सेवा कभी नहीं छोड़ते थे। वे हमें सिखाते थे कि बाबा की सेवा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे कैसे भी हालात हो। वे सेवा का महत्व अच्छी तरह समझते थे और हमें भी अहसास कराते थे। उन्होंने हमें यह भी अनुभव कराया कि सेवा से शरीर और आत्मा को कितना बल मिलता है। वे खुद करके दिखाते थे और कहते थे कि कभी मन को और तन को फ्री नहीं रखना चाहिए। फ्री रहेगे तो माया कच्च्चा खा जायेगी। इसलिए क्लास में आने वाले हर भाई-बहन को बाबा की किसी-न-किसी सेवा में व्यस्त रखते थे।

कहते थे, हर आत्मा का सम्मान करना चाहिए

वे हमें कहा करते थे कि हर व्यक्ति में कोई-न-कोई विशेषता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें एक भी विशेषता न हो। इसलिए हर आत्मा का, हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। एक बार मधुबन में कुमारों की भट्ठी थी। उसमें मैं दिल्ली से आया हुआ था। भट्टी पूरी करके जब मैं दिल्ली लौटा तो उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा कि भट्ठी में किस-किस ने कौन-कौन-सी क्लास करायी और क्या सुनाया। वे मानते थे कि हरेक निमित्त सुनाने वाले ने कोई-न-कोई विशेष ज्ञान की बात अवश्य सुनायी होगी। वे संस्था के मुख्य प्रवक्ता थे, साहित्य लिखने के निमित्त थे, फिर भी उन्होंने मुझे पूछा कि क्या-क्या क्लास करायी गयी। उनका मानना था कि हर कोई कुछ-न-कुछ अच्छी बात अवश्य सुनाता है और हर किसी से कोई-न-कोई गुण वा कला, अवश्य सीखनी चाहिए। भाई साहब से मुझे यह प्रेरणा मिली।

हर बात की मर्यादा हमने उनमें देखी

उनसे एक और प्रेरणा मिली कि कम खर्च बाला नशीन अर्थात् एकनामी और एकॉनमी। भाई साहब हमारे साथ बातें करते थे, हंसी-मजाक भी करते थे, सेवा के लिए हमें गाइड भी करते थे लेकिन मर्यादा के अन्दर रहकर। वे न सिर्फ पैसे की एकॉनमी करते थे बल्कि संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क में भी एकॉनमी करते थे। ईश्वरीय मर्यादायें क्या हैं उनका खुद पालन करते हुए हमें सिखाया। अमर्यादायुक्त कोई भी शब्द, कोई भी व्यवहार, कोई भी चलन उनमें हमने कभी नहीं देखी। उनसे सीखने को मिला कि हम जो मर्यादायुक्त दुनिया की स्थापना करने जा रहे हैं, वो मर्यादायें पहले हमारे में दिखायी पड़नी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, सोने की मर्यादा, खाने-पीने की मर्यादा, क्लास की मर्यादा, भाई-बहनों से बातचीत करने की मर्यादा, इस प्रकार हर प्रकार की मर्यादा हमने उनमें देखी और सीखी। इसके अलावा, मैंने उनमें यह विशेषता भी देखी कि जैसे ब्रह्मा बाबा साधारण-से-साधारण और लौकिक दृष्टि से ऊँच से ऊँच व्यक्ति को समान दृष्टि से देखते थे, ऐसे भाई साहब भी सबको समान दृष्टि से, आत्मिक भाव से देखते थे। गाँव की कोई बुजुर्ग माता हो या शहर का कोई बड़ा सेठ हो, उसी आदर भाव, शुद्ध भाव, प्रेम भाव से व्यवहार करते थे कि ये बाबा के अनन्य बच्चे हैं, हमारे बहन-भाई हैं। ज्ञान, योग और अपने अनुभवों के द्वारा हरेक को ईश्वरीय मार्ग में आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते थे।
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शिव बाबा ज्ञान के सागर हैं जगदीश भाई उस ज्ञान की परिपक्वता के स्वरूप

कनेडा, टोरन्टो के ब्रह्माकुमार ब्राइन भाई, जो 31 सालों से ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग का अभ्यास कर रहे हैं और अपने ही गांव में ईश्वरीय विश्व विद्यालय की एक शाखा खोलकर कई आत्माओं को बाबा का बनाने के निमित्त बने हैं, वे जगदीश भाई के साथ के भावपूर्ण अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"सन् 1980 में जब मैं यूनिवर्सिटी में दूसरे साल की इंजीनियरिंग पढ़ रहा था, तब क्रिसमस मनाने घर गया था। उस समय मेरी बहन ने मुझे ज्ञान का सात दिन का कोर्स दिया। वह चाहती थी कि मैं ब्रह्माकुमार बनू। जब वह बाबा का परिचय दे रही थी, योग की दृष्टि दे रही थी तब मुझे कानों में बाबा की ध्वनि सुनायी पड़ी। इस अनुभव से मुझे शिव बाबा में निश्चय होता गया। लौकिक में मैं एक जियोलॉजिकल इंजीनियर हुं।
उसके बाद मैं दादी जानकी से मिला, दादी ने मुझे लन्दन में सात महीनों तक रखा। उसके बाद मुझे मधुबन भेजा गया। मधुबन में मैं लगभग चार महीने रहा। मधुबन में बेहद के परिवार से मिला। उन दिनों भ्राता बृजमोहन जी से मेरा मिलना हुआ। दादी प्रकाशमणि जी ने मुझे दिल्ली भेजा 'प्युरिटी' पत्रिका में सेवा करने के लिए। वहाँ भ्राता जगदीश जी से मिलना हुआ। 'दि वर्ल्ड रिन्युअल' अंग्रेज़ी मैगज़ीन के कुछ लेखों की करेक्शन करने की सेवा भी मुझे मिली। उस मैगज़ीन में जगदीश भाई के ही लेख ज्यादा होते थे। उनका करेक्शन भी मैं करता था। जगदीश भाई बड़े विनम्र थे। जब मैं उनके लेखों का करेक्शन करता था, व बड़ी नम्रता से स्वीकार करते थे।

वे मुझे पिता-तुल्य लगते थे

उनको देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे कि मेरे पिता हैं। उनके मन में सबके प्रति जो प्यार था, यज्ञसेवा के प्रति जो अथकपन था और देवी परिवार की एकता के प्रति उनका जो परिश्रम था वो बहुत अदभुत था। मैने देखा, कुमारों में उमंग-उत्साह भरने में, बहनों की कोई भी समस्या हो उसका निवारण करने में, उनका समर्थन करने में, अलौकिक जीवन में उनके स्थिर होकर चलने में उन्होंने बहुत ही योगदान दिया। मेरे ईश्वरीय जीवन की शुरुआत में उन्होंने मुझे बहुत-सी बातों की जानकारी दी। उन्होंने मुझे बताया कि बाबा के प्रति, यज्ञ के प्रति हमारी कैसी भावना होनी चाहिए और ईश्वरीय सेवा में कैसे बहनों को आगे रखना है। उन्होंने बताया कि हम जितना बहनों को आगे रखेंगे और सम्मान करेंगे उतनी सेवा भी आगे बढ़ेगी और हमारा पुरुषार्थ भी निर्विघ्न चलता रहेगा।

वे बड़े बुद्धिजीवी और महान् चिन्तक थे

वे अपने अनुभव सुनाया करते थे कि बाबा से उनको कैसे मदद मिलती थी, बाबा कैसे कई विकट परिस्थितियों में बचाते हैं इत्यादि। उनके अनुभवों की बातें मेरे दिल को छू लेती थीं। उनकी क्लासेस ज्ञान की गहराई में ले जाती थीं। जो भी उनकी क्लासेस सुनता था, महसूस करता था कि वे बड़े ज्ञानी हैं और अनुभवी हैं। वे किसी भी विषय पर बोल सकते थे, वे बड़े मेधावी थे, बड़े पढ़े-लिखे महान् चिन्तक थे। ऐसे बुद्धिजीवी को अन्यत्र मैंने देखा नहीं और मिला नहीं।वे जितने बुद्धिवान थे, उतने ही भावुक भी थे

वे जितने बुद्धिवान थे, उतने भावुक भी थे।

जब वे मम्मा-बाबा के बारे में सुनाते थे तो सुनाते सुनाते उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे।
वे सच्चे व्यक्ति थे, अन्दर और बाहर एक जैसे थे। उनमें दिखावा बिलकुल नहीं था। एकदम सादे और सरल व्यक्ति थे। अपने बड़प्पन का, ज्ञान का, वरिष्ठता का उनमें बिलकुल अभिमान नहीं था। कोई बात बोलनी हो तो निडर होकर बोलते थे। उनको यह चिन्ता कभी नहीं होती थी कि मेरे ऐसा कहने से दूसरे क्या सोचेंगे या क्या कहेंगे। वे सच को निर्भय होकर सीधा-सीधा सुना देते थे। एक अभिभावक के रूप में उन्होंने मुझे मार्गदर्शन दिया कि ईश्वरीय मार्ग पर चलते समय किसी से डरना नहीं। एक बाबा के सहारे सेवा और पुरुषार्थ में आगे बढ़ते रहना। जब अनुभव हो गया कि यह ज्ञान सत्य है, बाबा सत्य है तो किसी से डरना काहे को है?

उनका योग और दृष्टि बड़े शक्तिशाली थे

सन् 1986 में वे कनेडा आये थे। वहाँ जब हम सेवा पर जाते थे, तब रास्ते में वे यज्ञ की कहानियाँ सुनाते थे और अपनी जीवन-कहानी भी। उनकी योग की स्टेज बहुत शक्तिशाली थी। एक बार वे क्लास में मुरली सुनाने बैठे। मुरली से पहले सबको दृष्टि दे रहे थे। दृष्टि लेते ही क्लास वालों को बह्या बाबा दिखायी पड़े। मुझे याद है, जब वापस मधुबन आकर वे बाबा से मिल रहे थे तो अव्यक्त बापदादा ने उनसे पूछा कि 'वहां जाकर हरेक को ब्रह्मा बाप का अनुभव कराया ना!' उससे पहले मुझे ब्रह्मा बाबा के प्रति उतना आकर्षण नहीं था लेकिन उस दिन से ब्रह्मा बाबा के प्रति मेरा प्यार जाग्रत हुआ और बड़ी माँ की पालना का अनुभव होने लगा।

उनकी पवित्रता की शक्ति बड़ी महान् थी

जगदीश भाई अपनी योजना और सेवा में दृढ़ रहते थे। उनकी पवित्रता की शक्ति बहुत महान् थी। उनके मन में हर आत्मा के प्रति शुभभावना, प्रेम की भावना, कल्याण की भावना और बाबा के प्रति उस आत्मा में अटूट प्यार जाग्रत करने की भावना जबर्दस्त थी। उनकी बुद्धि बड़ी विशाल थी। उनकी सेवा की योजनायें, कार्यक्रमों की आयोजनायें बहुत एक्यूरेट और व्यवस्थापूर्ण होती थी। वे स्टेज पर बोलना शुरु करते थे तो नॉनस्टॉप (बिना रुके) बोलते थे और बहुत स्पीड (तेज गति) से बोलते थे। सुनने वालों को यह अनुभव होता था कि इनमें बहुत ज्ञान भरा हुआ है। दादी जी (दादी प्रकाशमणि जी) और जगदीश भाई जैसी हस्तियों को मैंने और कहीं देखा नहीं है।

हर बात सन्तुलित और समर्थ

उन जैसे ईमानदार, वफादार और आज्ञाकारी व्यक्ति को मैंने यज्ञ में आज तक नहीं देखा है। उनमें निमित्त भाव उन्नत शिखर पर था। मैंने चक्रधारी दीदी से उनके बारे में सुना था कि किसी भी चीज़ के लिए पैसे चाहिए तो वे बहनों से ही मांगकर लेते थे। वे अपने पास पैसे रखते ही नहीं थे। वाह! कितनी बड़ी बात है। कोई चीज चाहिए, पैसे चाहिए तो बहनों से ही मांगे। उन्होंने उच्च दर्जे का ईश्वरीय जीवन जीया। बाबा के नये बच्चों के लिए उनका जीवन एक आदर्श है, मार्गदर्शक है। अगर किसी को संगमयुग का ईश्वरीय जीवन जीना है तो जगदीश भाई जैसे जीना चाहिए। उनसे मुझे बहुत-सी प्रेरणायें मिली हैं। उनके जीवन में मैंने हर बात का सन्तुलन देखा, जैसे नियम और प्रेम, ज्ञान और योग, सेवा और तपस्या, समर्पणता और पारदर्शिता, गंभीरता और रमणीकता, सरलता और कर्मठता, आलिप्तता और समरसता, निर्भयता और नम्रता। जब भी पुरुषार्थ में डगमगाता हूं या कोई परिस्थिति आती है तो मैं उनकी कही हुई बातों को याद करता हूँ, उससे मेरे में उत्साह और शक्ति भर जाती है। जगदीश भाई मेरे पुरुषार्थ और ईश्वरीय जीवन के लिए प्रेरणास्रोत हैं। मैं उनको भूल नहीं सकता क्योंकि इस आध्यात्मिक मार्ग पर कैसे चलना है, कैसे आगे बढ़ना है- यह उन्होंने सिखाया। उनके लिए मैं बहुत आभारी हूँ।

ब्रह्मावत्सों की उन्नति, प्रगति और एकता के लिए उनके मन में बहुत योजनायें चलती र्थी

सेवार्थ मैं उनके साथ कनेडा और अमेरिका के कई स्थानों पर गया है। उनके साथ मैं वर्ल्ड रिलिजियस पार्लियामेण्ट में भी गया था। उन्होंने मुझे चाय बनाना सिखाया। मुझे चाय बनानी नहीं आती थी, उनको सुबह-सुबह चाय चाहिए होती थी। उन्होंने चाय बनाकर दिखायी कि कब चाय पत्ती डालनी होती है, कब चीनी डालनी होती है। उन्होंने बहुत प्यार से और सम्मान से सिखाया जैसे एक पिता अपने बच्चे को सिखाता है। वे बहुत प्यार से, मधुरता से और सम्मान से बोलते थे। सिर्फ मेरे साथ नहीं, सबके साथ वे बहुत शालीनता से, शान्ति से, नम्रता से बोलते थे। रात को सेवा करके न्यूयार्क सेन्टर पर आते थे तो रास्ते में वे बहुत जोक्स सुनाते थे या सेवा की ही बातें करते थे कि कैसे सेवा करनी है, कहां-कहां सेवा करनी है, किस-किस से कैसे मिलना है। वे कहते थे कि संसार की हरेक आत्मा के प्रति हमें शुभ सोचना चाहिए। हर आत्मा को बाबा का परिचय देना चाहिए। वे यह भी कहते थे कि ईश्वरीय कुल की हर आत्मा के प्रति हमारा श्रेष्ठ भाव होना चाहिए और उनके प्रति योगदान देना चाहिए। वे कहते थे कि जब हम सेवा करते हैं तो उस स्थान की हर ब्राह्मण आत्मा सम्मिलित होनी चाहिए। तन-मन-धन से बाबा के हर बच्चे का सहयोग उस सेवा में होना चाहिए। ब्रह्मावत्सों की एकता ही सेवा में सफलता लायेगी। ईश्वरीय जीवन में, ईश्वरीय सेवा में कैसे सफलता पानी है, इस विषय पर उन्होंने बहुत बातें बतायीं।

उनमें उत्साह और ऊर्जा बहुत थी

दुनिया में बहुत-से लोग हैं जो बहुत बद्धिमान हैं, अच्छे वक्ता है लेकिन जगदीश भाई जैसी प्रैक्टिकल बातें सुनाने वाले, रूहानी व्यवहार करने वाले, सबके प्रति सदैव अच्छा ही सोचने वाले मैंने कहीं देखे नहीं। उनमें उत्साह और ऊर्जा बहुत थी। अभी-अभी लिख रहे हैं, अभी-अभी सेवा की योजनायें बना रहे हैं। अभी-अभी किसी से बात कर रहे हैं, अभी-अभी किसी कार्यक्रम में भाषण कर रहे हैं। मैंने देखा, वे बहुत कम खाते थे और कम सोते थे।

उनकी आँखों में ज्ञान की परिपक्वता झलकती थी

उन्होंने मेरे से कहा था कि बाबा पर, स्वयं पर और ड्रामा पर निश्चय कभी कम नहीं करना; सदैव पूर्ण निश्चय को बरकरार रखना। उनकी इन बातों को मैं हमेशा याद रखता हूँ। मैं उनकी कुछ विशेषताओं को अपने में धारण करने की कोशिश कर रहा हूं। दादी जानकी जी में भावना की ऊँचाई है, दादी चन्द्रमणि जी में निर्भयता की ऊँचाई थी और भ्राता जगदीश जी में नम्रता और सम्मान देने की विशेषताओं की ऊंचाई थी। वे हरेक को सम्मान देते थे, चाहे वो छोटा हो, बड़ा हो, ज्ञानी हो या भक्त, भारत का हो या विदेश का। यह गज़ब की विशेषता मैंने उनमें देखी। शिव बाबा ज्ञान के सागर हैं, जगदीश भाई में उस ज्ञान की परिपक्वता और परिपूर्णता थी, यह उनकी आंखों से झलकती दिखायी पड़ती थी।
मैं जानता हूं, वे बहुत सख्त थे लेकिन उतने ही नरम, उदार और रहमदिल थे। सख्त मतलब वे श्रीमत के, ईश्वरीय नियम-मर्यादाओं के समर्थक थे। कहते थे, अगर इन बातों में हम ढीले हैं तो यह बाबा के लिए डिसरिगार्ड (अवमानना) है। अन्त में मैं यही कहूंगा कि बाबा के लिए, बाबा के ज्ञान के लिए, बाबा की श्रीमत के लिए, ब्राह्मण परिवार के लिए, ईश्वरीय सेवा के लिए और ईश्वरीय नियम और मर्यादाओं के लिए जगदीश भाई का जिगरी प्यार था, अथाह सम्मान था और बड़ा योगदान था।

बीमारी के प्रभाव से परे

जब जगदीश भाई बीमार थे, मैं उनसे मिलने गया था। वे बेड पर लेटे हुए थे। इतने बीमार होते हुए भी, शरीर में इतना दर्द होते हुए भी कभी दिखाया नहीं कि उनको इतना दर्द है। उनसे मिलने जो भी जाते थे उनको बहुत प्यार से मिलते थे, उनको दृष्टि देते थे, उनका हालचाल पूछते थे, सेवा-समाचार पूछते थे और बहुत प्यार से टोली भी देते थे। ऐसे अद्भुत व्यक्ति को मैंने जीवन में कहीं और देखा नहीं। वे बड़े दिल वाले थे, बड़े उदारचित्त थे। जैसे दादी चन्द्रमणि हंसती थीं तो उनकी हंसी में शक्ति रूप और निर्भयता का स्वरूप दिखायी पड़ता था, वैसे ही जगदीश भाई हँसते थे तो उतने ही ज़ोर से हँसते थे कि कोई शेर गरज रहा हो। उनकी उस हंसी में शक्ति और निर्भयता का आभास होता था।
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भाई साहब के कारण ही हमारा घर पवित्र गृहस्थाश्रम बना

भ्राता जगदीश चन्द्र जी ने न केवल कुमार-कुमारियों को आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने में मदद की बल्कि गृहस्थ जीवन में रहने वाली माताजी और पुरुषों के लिए भी उन्होंने बहुत मदद की और उनके लिए अनेक पुस्तके लिख कर उनमें परमात्मा के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव पैदा किया तथा उनका जीवन पवित्र गृहस्थाश्रम वाला बनाया। ऐसे परिवार वालों में से कुछ मातायें और पुरुषों के अनुभव यहाँ आपके सामने रख रहे हैं। शक्ति नगर की ब्रह्माकुमारी निर्मल माता, भाई साहब के बारे में इस प्रकार सुना रही हैं-
"मुझे ज्ञान में आये 40 साल हो गये लेकिन शुरुआत के 5-6 साल बहुत बन्धन में थी, मेरे युगल मानते नहीं थे। मुझे सुबह की क्लास में जाने नहीं देते थे तो मैंने दोपहर में जाना शुरू किया। वे बैंक में नौकरी करते थे। एक बार शक्ति नगर में कोई कार्यक्रम था, उसमें मैं भी गयी। वहां जगदीश भाई साहब से मुलाक़ात हुई। उनको मैंने अपनी सारी बाते सुना दीं। सुनाते समय आँखों से आँसू बह रहे थे। भाई साहब ने जान लिया कि इसको लगन है परन्तु बन्धन है। भाई साहब ने कहा, कोई बात नहीं, आप जैसे दोपहर में क्लास में आते हो ऐसे ही आते रहना लेकिन एक बात याद रखना कि आप अभी घर से जिस मंजिल पर पहुंचने के लिए निकली हो, उसको नहीं छोड़ना और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना। अगर पीछे देखोगी तो रस्सियां खींचने लगेंगी। न रास्ते के नज़ारे देखना, न पीछे देखना, जो रास्ता पकड़ा है उस पर चलते रहना मंजिल की ओर। दूसरा, कभी मुरली मिस नहीं करना। अगर मुरली कभी मिस नहीं करोगे तो रुकोगे नहीं।

जगदीश भाई साहब ने जो कहा था, वही करती रही

मैं चोरी-चोरी क्लास में चलती रही लेकिन यह कितने दिन तक चलता एक दिन यूगल ने कहा कि मुझे समाचार मिला है, तुमने फिर ब्रह्माकुमारियों के पास जाना शुरू किया है। मैंने कहा, हां । उन्होंने कहा, मत जाओ। मैंने कहा, मैं आपकी बात मानती हूं और आप भी मेरी एक बात मानो। उन्होंने कहा, ठीक है, क्या है? मैंने कहा, मैं सेन्टर जाना छोड़ देती हूं, आप मुझे पवित्र रहने दो। उन्होंने 'हाँ' कह दिया, फिर गाडी चलती रही। उन्होंने पवित्र रहने दिया और मैं चोरी-चुपके बीच-बीच में सेन्टर पर जाती रही। हमारे घर के पास एक छोटी-सी गीता-पाठशाला थी, वहां जाना शुरू किया। वहां से आते समय घर के लिए जो जरूरी चीजें होती थीं जैसे बेसन, सब्जी आदि लेकर आती थी। पति को किसी ने कह दिया, आपकी युगल सेन्टर पर गयी थी। मैं कहती थी कि मैं ये चीज़े लेने गयी थी। इस तरह युक्ति से काम लेना शुरू किया। रंगीन कपड़े पहनती थी। जगदीश भाई साहब ने कहा था कि मुरली मिस नहीं करनी है तो मैं कैसे भी करके, कोई-न-कोई युक्ति रचकर मुरली सुनने जाती थी।
अगर घर में युगल को कहीं मुरली दिखायी पड़ती तो उसको वे फाड़ देते थे। जगदीश भाई साहब ने बोला था कि कभी-कभी बाबा का भोग ले जाकर उनको खिलाओ। भोग देती थी तो वे फेंक देते थे। तो मैंने भोग को भोजन में मिलाकर खिलाना शुरू किया, उनको पता ही नहीं पड़ता था, खा लेते थे। पांच-छह साल मैंने ऐसे ही बिताये।

बच्ची भी ज्ञान में रुचि लेने लगी

तब हमारी एक लड़की कालेज पढ़ रही थी, बचपन में ही उसको जाना अच्छा लगता था। उसको मेडिकल कालेज में सीट मिल गयी और एम.बी.बी.एस. पढ़ने लगी। उसका नाम आप सब जानते ही होगे, डॉ. ऊषा किरण। एक दिन उसने अपने पिता जी से पूछा कि डैडी, घर में ब्रम्हाकुमारियों का सत्संग करायें? युगल को गुस्सा आया और कहा, इतने पैसे खर्च करके तुमको इसीलिए पढ़ा रहा है क्या ब्रह्माकुमारी बनने ? वो चुप हो गयी। कुछ दिनों के बाद किरण ने फिर कहा, डैडी, आप एक बार माउण्ट आबू जाकर आओ ना। वहां अभी योग शिविर होने वाला है। वो लोग क्या करते हैं, यह आप जानकर तो आओ। उन्होंने कहा, मैं जानता हूं, ये ब्रह्माकुमारियां क्या है। किरण ने कहा, आप तो ऊपर ऊपर से दूर-दूर से जानते हैं, उस संस्था के अन्दर तो जाकर आइये। मै किरण को कहती थी कि तुम सेन्टर मत आओ, तुम्हारे आने से मेरा भी बिगड़ जायेगा लेकिन वो मानती नहीं थी, क्लास पूरी होते ही सब से पहले भाग जाती थी घर। धीरे-धीरे उसके पिता जी समझने लगे, मानने लगे तो एक दिन फिर से किरण ने कहा,डैडी, सत्संग करा लें? उन्होंने कहा, तुम मां-बेटी तो मानने वाली नहीं हो, ठीक है, करवा लो। सत्संग कराने के लिए प्रबन्ध उनको भी करना पड़ा। उन्होंने हर प्रकार का सहयोग दिया। सत्संग के दौरान उन्होंने भी ज्ञान सुना, समझा और अच्छा लगा। कुछ दिनों के बाद उन्होंने खुद ही कहा, आप मानेंगे नहीं, जाओ, सुबह भी जाओ और शाम को भी जाओ। इस तरह, धीरे-धीरे युगल ने दोनों समय क्लास में जाने की छुट्टी दे दी।

भाई साहब ने युक्ति से युगल को भी ज्ञानी और योगी बनाया

एक दिन जगदीश भाई साहब, चक्रधारी दीदी के सामने मेरे से कह रहे थे, फूल (मेरा युगल) अच्छा है, धीरे-धीरे खिल जायेगा। अभी कली है ना, मुरझाता है। जब वे सहयोगी होते गये तो एक दिन किरण ने कहा, डैडी, जगदीश भाई साहब कह रहे हैं, आपको योग शिविर में ले जाना है। चलो, देख करके आयेंगे। वे आये, मधुबन देखा, शिबिर अटैंड किया। उनको अच्छा लगा, मन में जो भ्रम था वो दूर हो गया। जब शिविर करके दिल्ली आये तो चक्रधारी दीदी ने कहा, आपको सात दिन का कोर्स करना चाहिए। उन्होंने कहा, ठीक है, करूंगा। रशिया की सन्तोष बहन ने उनको अच्छी तरह कोर्स कराया और वे बाबा के पक्के बच्चे बन गये।
इस प्रकार, हमारे पूरे परिवार को बाबा का बनाने के लिए जगदीश भाई साहब ही निमित्त थे। उन्होंने धीरे-धीरे युक्ति से मेरे युगल को भी ज्ञानी और योगी बना दिया।
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आज भी कोई समस्या आती है तो भाई साहब का वो हँसता हुआ चेहरा सामने आता है

दिल्ली, शक्ति नगर सेवाकेन्द्र की और एक माता ब्रह्माकुमारी पुष्पा, भाई साहब के प्रति अपने उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त कर रही हैं-
"सन् 1994 की बात है। मैं दिल्ली के मॉडल टाउन में रहती थी। एक दिन मैं घर से बाज़ार जा रही थी तो वहां बोर्ड लगा हुआ था 'ब्रह्माकुमारीज़'। मैं उसे देखकर अन्दर गयी। अन्दर गयी तो वहां शिवरात्रि का कार्यक्रम चल रहा था। मैं भी उस कार्यकम्र में बैठी। कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा। ज्ञान के बारे में और ज्यादा सुनने की उत्सुकता हुई। मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि आपको सात दिन का कोर्स लेना पड़ेगा और कोर्स लेने के लिए शक्ति नगर सेन्टर पर जाना पड़ेगा।

भाई साहब मुझे देख रहे थे

मैंने मन में सोच लिया कि सात दिन का कोर्स लेना है। कोर्स के तीसरे दिन जगदीश भाई साहब से मेरी मुलाक़ात हुई। दो दिन से भाई साहब मुझे देख रहे थे, मैं भी उनको दूर से देखती थी लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि ये यहां के वरिष्ठ भाई हैं। उस दिन दीदी ने भाई साहब से मेरा परिचय कराया।

मुझे भगवान के रथ से मिलवाया

चौथे दिन का कोर्स पूरा होने के बाद भाई साहब आये और मेरे से कहा कि चलिये, आज हम आपको उनसे मिलवायेंगे जिनके शरीर में भगवान आते हैं। मैंने कहा, भाई साहब, मैं नहीं आ सकती, हमारा घर तो यहां से दूर है, अभी शाम हो गयी है, मुझे जल्दी घर पहुंचना है। भाई साहब ने कहा, कोई बात नहीं, हम आपको घर पहुंचा देंगे। उनके साथ चली तो वे मुझे रेलवे स्टेशन ले गये और वहाँ गुलज़ार दादी जी से मिलवाया और कहा, यह अभी कोर्स कर रही है। गुलज़ार दादी जी को देखकर में हैरान रह गयी क्योंकि जिनके तन में भगवान आते हैं वे थ्री टायर में जा रही थीं।

फिर एक दिन चन्द्रमणि दादी जी और मनोहर दादी जी से भी मिलवाया

ज्ञान में आने से पहले मैं बहुत फैशनेबल थी। मुझे देखकर ये बहने कहती थीं कि यह ज्ञान में चलने वाली नहीं है। मैं सिन्धी परिवार से है। बाबा भी कभी-कभी कहते हैं ना, सिन्धी परिवार की औरतें बहुत फैशनेबल होती है। हर बात में हम माडर्न कहो या हाईफाई कहो, ऐसे थे। क्लबों में जाना, पार्टियों में जाना, पंच तारा होटलों में खाना आदि-आदि...। लेकिन बचपन से मुझे रोज भगवद्‌गीता पढ़ने की रुचि थी। मेरे में भक्ति-भावना बहुत थी। यहां एक बात मैं कहना चाहती हूं कि जगदीश भाई साहब की बुद्धि बहुत दूरान्देशी थी। उन्होंने मुझे पहचान लिया और दीदियो से कहा कि यह बहुत आगे जायेगी। उसके बाद मुझे भाई साहब ने चन्द्रमणि दादी जी से मिलवाया, मनोहर दादी जी से मिलवाया। भाई साहब ने मुझे इतना आगे बढ़ाया कि मुझे कोई खास पुरुषार्थ नहीं करना पड़ा, मेहनत नहीं करनी पड़ी। वे दादियों के समीप लेकर गये, उनकी सेवा करने का बड़ा भाग्य दिलाया। एक बार दादी चन्द्रमणि जी का शृंगार करना था फूलों से। भाई साहब ने मुझे कहा कि आप दादी जी का श्रृंगार करो। भाई साहब मुझे हर तरीके से पुरुषार्थ में आगे बढ़ने में मदद करते ये। इतना ही नहीं, जब भी वे मुझे देखते थे तो कहा करते थे कि चलो आज आप हमारे साथ नाश्ता करो। वे हम माताओं को लौकिक भाइयों से ज्यादा स्नेह और पालना देते थे। मुझे छह भाई हैं और मैं इकलौती बहन। इतना स्नेह मैंने अपने छह भाइयों से भी नहीं पाया जितना जगदीश भाई साहब से पाया।

बातों-बातों में ज्ञान देने का उनका तरीका बहुत अच्छा और निराला था

भाई साहब इतना हंसाते थे कि हंस-हंस कर हम पक जाते थे। कई बार नाश्ते पर हम उनके साथ बैठते थे। उनकी प्लेट में दही होता और हमारी प्लेट में नहीं होता तो तुरन्त अपनी प्लेट से दही की कटोरी निकालकर हमें दे देते थे कि पहले आप खाओं, आपको देर हो जावेगी जाने में। इस प्रकार, उनसे हमें स्नेह भी मिला, रमणीकता भी मिली। मुझे घर में विघ्न बहुत आते थे, मैं भाई साहब को वो सब बातें सुनाती थी। बातों-बातों में ज्ञान देने का उनका तरीक़ा बहुत अच्छा और निराला था। एक बार मेरे युगल ने किसी कार्य में यज्ञ में सहयोग दिया। वे कभी-कभी मुझे सेन्टर छोड़ने भी आते थे और लेने भी आते थे कार लेकर। उनको मैने भाई साहब से मिलवाया। भाई साहब ने पति से कहा कि जिसका धन यहां लगता है, उसका मन भी यहां लग जाता है। जो जितना-जितना धन ईश्वरीय सेवा में लगायेगा उतना उतना उसका मन ईश्वर में लगेगा। आप इनको छु‌ट्टी देते हो ज्ञान में चलने के लिए, इसलिए आप सहज योगी बन जायेंगे। जो सहयोगी होता है वह सहजयोगी बनता है। भाई साहब ने उनसे पूछा कि आप कैसे आये? उन्होंने कहा, कार चलाकर। भाई साहब ने फिर पूछा, कार किसने चलायी। उन्होंने कहा, मैं खुद चलाकर आया। तब उन्होंने बोला, जैसे कार और कार चलाने वाला अलग-अलग है ऐसे ही इस शरीर को चलाने वाला कौन है, आप जानते हैं? फिर उनको समझाते थे, आप आत्मा हो, आत्मा और शरीर अलग-अलग हैं, आत्मा शरीर में यहां रहती है, वो शरीर रूपी कार को चलाती है। उनकी बातें सुनकर युगल बहुत खुश होते थे। इसके बाद पति रोज मॉडल टाउन से शक्ति नगर तक कार में छोड़ने आते थे और लेने आते थे।
मुझे ज्ञान मिलते ही इतना नशा चढ़ गया कि भगवान आये हैं, उनसे मिलने मुझे मधुबन जाना है। जब चक्रधारी दीदी से मैंने यह बात कही तो उन्होंने कहा कि आप तो ज्ञान में अभी-अभी आयी हो, जब तक पवित्रता में पक्की नहीं होगी तब तक हम आपको मधुबन नहीं ले जा सकते। मैने कहा, ठीक है, मैं अपने पति से छुट्टी लेकर आती हूं और लिखवा कर भी लाती हूं। आटो से मुझे घर जाना था, तो मैंने ऑटो वाले से कहा, भैया, माउण्ट आबू चलोगे? मुझे कहना था, मांडल टाउन चलोगे? कह दिया माउंट आबू चलोगे? वह मेरा मुंह ताकता रहा और पूछा, बहन जी, आपको कहाँ जाना है। मुझे अहसास हुआ कि मैंने क्या बोल दिया है। फिर मैंने कहा, मॉडल टाउन जाना है। इस प्रकार, मधुबन जाने का मुझे इतना नशा चढ़ गया था कि बुद्धि में मधुबन ही बैठा हुआ था।

घर-परिवार वालों के प्रति भी उनकी बहुत ही शुभ-भावना और शुभ-कामना होती थी

भाई साहब बीमार पड़े तो यहीं मधुबन में रहने लगे। हम उनसे मिलने आते थे और वे खुद हम से पूछते थे कि कैसे हैं, ठीक है? घर-परिवार में सब ठीक हैं? इस प्रकार, सिर्फ क्लास में आने वालों के प्रति उनका स्नेह नहीं था, उनके घर-परिवार वालों के प्रति भी उनकी उतनी ही शुभ-भावना और शुभ-कामना होती थी। भाई साहब से मिलकर मैं दिल्ली वापस चली गयी। कुछ दिनों के बाद एक दिन मैं बाबा के कमरे में योग कर रही थी। बाबा को देखते-देखते ऐसा होने लगा कि भाई साहब और ब्रह्मा बाबा एक होते जा रहे हैं। यह अनुभव एक बार नहीं, अनेक बार हुआ। मैंने दीदी से कहा, दीदी, भाई साहब और ब्रह्मा बाबा एक होते जा रहे हैं। मैं बैठती थी शिव बाबा को याद करने लेकिन मुझे अनुभव होता था यह। मैं दीदी से बार-बार कहती थी कि मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है। मुझे लगा, भाई साहब का अन्तिम समय का पुरुषार्थ भी बहुत ऊंचे स्तर का था। उनका पुरुषार्थ गुप्त था, किसी को पता नहीं लगता था कि वे पुरुषार्थ कर रहे हैं।
जब उनके पार्थिव शरीर को हिस्ट्री हॉल में रखा तो हम उनके अन्तिम दर्शन करने गये। उनके शरीर के चारों तरफ चक्कर लगा रहे थे तब भी मुझे अच्छे अनुभव हो रहे थे। कहते हैं ना, सन्त महात्मा, योगी-ऋषि के शरीर छोड़ने के बाद भी उनके शक्तिशाली वायब्रेशन्स उनके पार्थिव शरीर के आस-पास रहते हैं। मैंने उस पूरी रात वहां बैठकर योग किया, मुझे बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव हुए। उन्होंने शरीर छोड़ने से पहले शक्ति नगर की सब माताओं और बहनों के लिए चिट्ठी भी लिखकर रखी थी।

बाबा कभी अनन्य बच्चों की बात टाल नहीं सकते

जब उनके शरीर को अन्तिम संस्कार के लिए ले जाना था, उस समय आबू में बहुत तेज धूप थी। अन्तिम यात्रा निकलने से पहले हल्की-सी बूंदाबारी हुई और मौसम ठंडा हुआ। बाद में जब भाई साहब का सन्देश आया, उससे पता पड़ा कि भाई साहब ने बाबा से कहा, बाबा, अन्तिम संस्कार में इतने सारे भाई-बहनें आये हैं, इतनी तेज धूप है, थोड़ी बूंदीबारी होनी चाहिए। बाबा भी ऐसे अनन्य बच्चों की बात टाल नहीं सकते हैं। बाबा ने हल्की-सी वर्षा वर्षायी।
आज भी हमें कोई भी समस्या आती है तो भाई साहब का वो हंसता हुआ चेहरा सामने आता है। उनका सदैव यही कहना होता था कि बाबा को अपने साथ रखकर चलो तो सब समस्यायें भाग जायेंगी। भाई साहब का यह कहना मैं हमेशा याद रखती हूँ और बाबा को बार-बार शुक्रिया कहती हूँ कि बाबा, हमें ऐसी महान् आत्मा से पालना और मार्गदर्शन पाने का मौका मिला इसके लिए आपको और जगदीश भाई को बहुत-बहुत धन्यवाद।
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उनके हर श्वास में सिर्फ़ बाबा और सेवा ही भरे हुए थे

शक्ति नगर के ही ब्रह्माकुमार डॉ. एम. डी. गुप्ता जी, जो भाई साहब के बहुत करीब रहे, उनके साथ के संस्मरण ऐसे याद कर रहे हैं-"दिल्ली सिविल लाइन में हमारा घर है। मैं दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन के हॉस्पिटल का डायरेक्टर था। सन् 2004 में सेवानिवृत्त होने के बाद शक्ति नगर में अपनी ही डिसपेन्सरी 'मेडी केअर' खोलकर प्राइवेट प्रैक्टिस करता हूँ। मेरे साथ मेरी धर्मपत्नी हैं डॉक्टर मंजू गुप्ता, वे स्त्रीरोग तज्ञ हैं। एक बेटा है जो हृदय-तज्ञ है और एक बेटी है जो सॉफ्टवेयर कंपनी में सीईओ है। हमारा सारा परिवार इस ईश्वरीय ज्ञान-मार्ग में है।

हमारा अलौकिक जन्म मधुबन के आँगन में ही हुआ

हमारा ईश्वरीय बचपन सन् 1985 में शुरू हुआ। उन दिनों मैं अपने परिवार के साथ आबू घूमने आया था और मधुबन में भी आया था। मधुबन के उस रुहानी वातावरण ने हमें इतना परिवर्तन किया कि हम चारों के चारों बाबा के बन गये। हमने ईश्वरीय पालना ली दिल्ली, शक्ति नगर सेवाकेन्द्र से। पालना चक्रधारी दीदी के संरक्षण में हुई। उनके साथ-साथ सुधा बहन, सन्तोष बहन, प्रभा बहन और रानी बहन, इन्होंने भी हमें आध्यात्मिक पालना दी। इनके अलावा, भ्राता जगदीश जी का भी संरक्षण था। उन्होंने इस ईश्वरीय बचपन में मुझे और मेरे परिवार को जो पालना दी उसके लिए मैं जिन्दगी भर का ऋणी रहूंगा। कैसे परिवार के साथ ज्ञान में चलें, कैसे गृहस्थ जीवन और पारमार्थिक जीवन का सन्तुलन करके चले, भाई साहब ने सिखाया। उन्होंने हमें इतना अच्छा मार्गदर्शन दिया कि कैसे पवित्र प्रवृत्ति मार्ग में रहते इस दुनिया की भी सेवा करनी है लेकिन साथ-साथ अपनी और परिवार की प्रगति पर भी अवश्य ध्यान देना है।

भाई साहब अलौकिक जीवन के साथ लौकिक सेवा में भी प्रेरणा देते थे

भाई साहब की हमेशा यह कोशिश रहती थी कि ज्ञान के साथ-साथ योग पर भी हमारा ज़्यादा अटेंशन रहना चाहिए। इसलिए वे कहा करते थे कि आप जितना-जितना योग पर ध्यान देंगे उतना उतना आपके अन्दर तीव्र गति से परिवर्तन होगा। यह परिवर्तन आपके लिए, आपके परिवार के लिए और आपके रोगियों के लिए बहुत लाभदायक होगा। जब भाई साहब की ऐसी प्रेरणा मिली, हमने देखा, हमारे हॉस्पिटल में इसका प्रभाव पड़ा। हमने हॉस्पिटल के कार्डों पर छपवाया था 'ओम् शान्ति', 'प्रभु को याद करो तो तुम्हारे कष्ट मिट जायेंगे'। मरीज़ पूछते थे कि यह क्या है उनको उत्तर देना पड़ता था तो ऑटोमेटिकली सेवा हो जानी थी। जब मरीज़ के बेड पर उनका यह कार्ड रखा जाता था तो वे इसको पढ़कर आपस में कहा करते थे कि प्रभु तो पहला डॉक्टर है ना, ये तो दूसरा डॉक्टर है। प्रभु को याद तो करना पड़ेगा ना। इससे उनको जल्दी ठीक होने में मदद मिल जाती थी।

कहते थे, बच्चों के लिए भी मुरली ले जाया करो

जब हम युगल रोज़ मुरली सुनने के लिए सेन्टर पर आते थे तो भाई साहब कहते थे कि आप तो रोज़ क्लास में आते हो लेकिन बच्चों के लिए भी मुरली ले जाया करो। उनको मुरली पढ़कर सुनाओ। वो दिन और आज का दिन, हम सारे के सारे परिवार ने कभी मुरली मिस नहीं की। यह हमारा रिकार्ड है। जब बेटे का एम.बी.बी.एस. पूरा हुआ तो एम.डी. के लिए उसको विदेश जाना था। भाई साहब ने उसको बताया, मोहित भाई, विदेश में खान-पान का और संग का बहुत ध्यान रखना। फल, ड्राइफ्रूट इत्यादि खाते रहना और संग का तो बहुत जबर्दस्त ध्यान रखना। यह सीख उन्होंने उसको तब दी थी जब वे ग्लोबल हॉस्पिटल में एडमिट (भर्ती) थे। कई बार उन्होंने मोहित के लेक्चर्स भी सुने तो उन्होंने कहा कि यह अच्छी सेवा कर सकता है और वह होवनहार लड़का है। उनके इन शब्दों से उसको बहुत उमंग-उत्साह और प्रोत्साहन मिला। बाबा के ज्ञान के प्रचार-प्रसार में मोहित को बहुत मदद मिली।

भाई साहब ने कहा, भोजन बाबा को भोग लगाकर ही खाना

जब भी मैं भाई साहब से मिलने जाता था तो उनको लगता था कि सब ज्ञानी परिवारों में यह अलग ही परिवार है। उनको भासना आती थी कि ये सब निर्विकारी ही हैं। बातों-बातों में वे कहते थे कि आप तो हैं ही सात्विक और योगी आत्मायें। फिर भी भोजन बाबा की स्मृति में बनाकर, उनको भोग लगाकर ही खाना। लौकिक में हमारा परिवार भक्ति के संस्कार वाला होने के कारण, हमें यह कार्य कोई कठिन नहीं लगा। जिस दिन से भाई साहब ने भोग लगाने की बात कही, उस दिन से लेकर आज तक हम भोग लगाये बिगर कुछ नहीं खाते।
हम पहले घर में रोज़ भगवत गीता पढ़ते थे। भाई साहब को यह पता पड़ा कि हम घर में गीता पढ़ते हैं तो एक दिन उन्होंने हमें बुलाकर 'गीता का सच्चा सार' नामक किताब देकर कहा, डॉक्टर साहब, इस किताब को पढ़कर मुझे बताइये कि उस गीता में और इस गीता में क्या फरक है। मैंने उसी रात पूरी किताब पढ़ी। अगले दिन भाई साहब ने पूछा, क्या आपने पढ़ना शुरू किया? मैंने कहा, रात को ही पढ़कर पूरी कर दी लेकिन गीता के सार को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। बाद में भाई साहब ने मेरे जो भी संशय थे, उन सबका निवारण किया।
बहनों की तबीयत की कोई समस्या होती थी तो मुझे बुलाकर चर्चा करते थे और उनका इलाज कराने के लिए सलाह लेते थे।

कहते थे, आप लोग तो बाबा के सैम्पल बच्चे हो

व्यक्तिगत रूप से मैं उनके बहुत नज़दीक रहा। यज्ञ की किसी समस्या का सरकार के स्तर पर या क़ानूनी तौर पर कैसे समाधान किया जाये, किससे मिला जाये इत्यादि के बारे में मेरे से कई बार चर्चा करते थे। इसके अलावा वे हमें कहा करते थे कि आप बाबा के लिए समर्पित परिवार हो। आपको अलग से समर्पित होने की कोई ज़रूरत नहीं है। गृहस्थ जीवन वालों के लिए आप बाबा के सैम्पल बच्चे हो। आप तो डबल और बेहद के सेवाधारी हो। आप दिल्ली में सेवा करते हो और मधुबन में भी।
वीआईपी की सेवा कैसे करनी होती है उन्होंने यह भी सिखाया क्योकि दिल्ली के बहुत से वीआईपीज़ हमारे सम्पर्क में होने के कारण वे मुझे कहते थे, आज इनकी सेवा करनी है, आज इनकी सेवा करनी है। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स, वाइस चान्सलर्स, डीन आदि कुछ मेरे सम्पर्क में थे, कुछ मेरे क्लासमेट्स (सहपाठी) भी थे और कुछ मेरे मरीज़ थे। भाई साहब ने अपनी देखरेख में हमारे से उन सबकी सेवा करवायी। उनका ज्ञान सुनाने का तरीका बड़े गज़ब का था। वे जब वी.आई.पी को ज्ञान सुनाते थे, हमें भी बहुत कुछ सीखने को मिलता था। भाई साहब की लक्ष्य जनित सेवा होती थी। किस आत्मा को क्या देना है, कितना देना है, कैसे देना है- उनकी यह योजना पहले ही तैयार रहती थी, उसके अनुसार ही वे सेवा करते थे। कोई भी व्यर्थ और अनावश्यक बातें उनको नहीं सुनाते थे। जो भी आते थे उनको सेन्टर से चाय-नाश्ता खिलाये बगैर नहीं भेजते थे। मैं उनको सेन्टर पर लाकर भाई साहब से मिलवाता था और भाई साहब उनकी ज्ञान द्वारा सेवा करते थे। उन लोगों को कोर्स बहनों से करवाते थे।

क्लास में आने वाले भाई-बहनों का भी ख्याल रखते थे

मुझे यह फ्रीडम (आज़ादी) दे रखी थी कि मैं कभी भी उनके कमरे में जा सकता था चाहे वे लिख रहे हों, किसी से बात करे रहे हो, नाश्ता-पानी कर रहे हों या सो भी रहे हों। जब हम अन्दर पाँव रखते, कह देते, आइये डॉक्टर साहब। उनकी नींद भी इतनी हल्की होती थी कि किसी की आहट से ही जाग जाते थे। हमेशा वे मुझे डॉक्टर कहकर ही बुलाते थे। जब मैं नाश्ते या भोजन के समय उनके पास जाता था तो वे मुझे भी नाश्ता या भोजन खिलाये बगैर नहीं खाते थे। उनमें एक खूबी यह भी थी कि सेन्टर में कोई भी खाने की या पीने की नयी चीज बनती थी तो वे खुद खाने से पहले बहनों से पूछते थे कि बाकी भाई-बहनों को भी मिली या नहीं मिली? बहनों से कहते थे कि पहले उनको दो तो मैं स्वीकार करूंगा। उनसे पहले खाने का हक मेरा नहीं बनता।
क्लास में आने वाले भाई-बहनों का भी वे ख्याल रखते थे। उनकी आध्यात्मिक उन्नति के बारे में बीच-बीच में पूछा करते थे। योग की प्रगति के बारे में पूछा करते थे। इससे क्लास वालों को भी ध्यान रहता था कि हमे भी पुरुषार्थ करना है और आगे बढ़ना है।

योग में पक्के और अनुभवी बनाते थे

भाई साहब का हमेशा यह लक्ष्य रहता था कि क्लास में आने वाले बाबा के सभी बच्चे योग में अच्छे अनुभवी हों। वे बहनों को भी कहते थे कि आप एक-एक विद्यार्थी को बिठाकर उनको दृष्टि देकर योग कराया करो, अनुभव कराया करो। चक्रधारी दीदी और सुधा बहन जी ने हमें बाबा के कमरे में दृष्टि देकर योग कराया था। जब हमारा सात दिन कोर्स पूरा हुआ तब बहनों ने योग कराया। उसके बाद, एक रविवार भाई साहब ने कहा कि आज मैं इन लोगों को योग कराऊँगा। उन्होंने बाबा के कमरे में बिठाकर योग कराया, उनके सामने मैं और मेरी युगल दोनों बैठे थे। उसके पश्चात् उन्होंने पूछा कि आपको क्या अनुभूति हुई? उस समय मुझे अनुभूति हुई थी अष्ट शक्तियों की। उसके बाद लक्ष्मी-नारायण का भी साक्षात्कार हुआ था, मैंने यह सुनाया। इसके अलावा मुझे इतना हल्कापन अनुभव हुआ जैसे कि मैं सूक्ष्मवतन में हूँ।

भाई साहब घर के बुजुर्ग जैसे थे

बीब-बीच में हमारे लिए सेन्टर पर ब्रह्मा भोजन का प्रबन्ध करते थे। वे बहनों से कहते थे कि ये प्रवृत्ति मार्ग वाले हैं और दोनों नौकरी करने वाले हैं इसलिए इनको आश्रम का प्रसाद कभी-कभी मिलना चाहिए। इस प्रकार, भाई साहब हमारी आध्यात्मिक उन्नति के अलावा पारिवारिक शासन का स्थूल पालना का भी ध्यान रखते थे। दिल्ली में कहीं भी कोई बड़ा प्रोग्राम होता था, वे मुझे साथ ले चलते थे। इससे यज्ञ के बड़े-बडे महारथियों और दादियों से मेरा परिचय हुआ, उनसे सम्बन्ध सम्पर्क जुड़ा। उनकी भावना यही होती थी कि बाबा के समर्पित बुद्धि बच्चे यज्ञ के नजदीक रहे यज्ञ के निमित्त भाई-बहनों के सम्पर्क में रहे, उनकी नजरों में रहें। उनमें मैंने बुजुर्गपना देखा। परिवार में बुजुर्ग व्यक्ति की नज़र सबके ऊपर होती है। उनकी भावना होती है कि मैं सबकी पालना करूं, सबकी भलाई के लिए कुछ-न-कुछ करता रहूँ, अपने अनुभव के आधार पर परिवार के सदस्यों का मार्गदर्शन करूँ। ऐसे भाई साहब भी ईश्वरीय परिवार के बुजुर्ग और अनुभवी थे और सबकी भलाई के बारे में सोचते थे, न सिर्फ आध्यात्मिक प्रगति के बारे में बल्कि खाना-पीना-सोना हर तरह की प्रगति के बारे में सोचा करते थे।

मुझे भी लिखना और भाषण करना सिखाया

कई बार जब वे अंग्रेज़ी में लिखते थे, मुझे पढ़ने के लिए देते थे और कहते थे, डॉक्टर साहब, आप थोड़ा इस मैटर को देख लीजिये। देखिये, उनमें कितना बड़प्पन था। बाबा-मम्मा ने उनको लिखने का अधिकार और वरदान दिया हुआ है और कई पुस्तकें लिख चुके हैं, फिर भी मुझे कहते हैं, डॉक्टर साहब, कोई करेक्शन है तो देख लीजिये। यह उनका निर्मान भाव था। उनका लिखा हुआ देखने में मुझे भी बहुत मजा आता था और सीखने को मिलता था। एक-एक प्वाइंट को वे कितनी गहराई में से जाते थे और सन्दर्भ अनुसार कैसे शब्दों का प्रयोग करते थे ये सीखने और समझने की बात होती थी।
मुझे स्टेज पर भाषण करना नहीं आता था। मैं भाषण करने से हमेशा बचता था। एक बार 'भाई साहब ने मुझे और मेरी युगल को एक-एक टॉपिक दिया और कहा कि इन विषयों पर आप भाषण तैयार करो और मधुबन की कॉन्फरेन्स में बोलना। मैंने कहा, भाई साहब, मुझे स्टेज पर बोलना नहीं आता, और किसी को दीजिये। उन्होंने कहा, आप भाषण मत करना, मुझे इस विषय पर भाषण लिखकर दीजिये। टॉपिक भी मेडिकल साइंस पर ही था तो मैंने लिखकर दिया। उस लेख का करेक्शन करके मुझ से कहा, आपने यह जो लिखा है, इसी को वहां बोलना है। कैसे बोलना है, यह भी उन्होंने सिखाया। इस प्रकार, मुझे मेडिकल साइंस और स्प्रिचुअल साइंस पर बोलना सिखाया। सदैव उनकी यह कोशिश होती थी कि छोटों को कैसे आगे बढ़ायें।

यह उनकी बड़ी इच्छा थी...

जब सोनीपत की ज़मीन ली गयी तब उनका प्लान था कि वहां एक गुरुकुल जैसी पाठशाला या ट्रेनिंग सेन्टर की स्थापना की जाये जिसमें होवनहार देवी-देवताओं को तैयार किया जाये। भविष्य में आने वाली सतयुगी दुनिया का सैम्पल वो स्थान बन जाये यह उनकी बड़ी इच्छा थी। मैने उनमें यह खूबी भी देखी कि जहां राय देनी होती थी वहां मालिक बन राय देते थे और जहां राय माननी होती थी वहाँ बालक बन जाते थे।

वे बहुत मिलनसार और सरल स्वभाव के थे

वे सबके साथ मिलनसार थे। देखने में गंभीर लगते थे लेकिन उनके समीप जो भी जाता था उसको यह अनुभव होता था कि ये मेरे बड़े भाई हैं। उन्होंने दूसरों की बहुत सेवा की लेकिन अपने लिए कुछ भी नहीं। अन्त तक उन्होंने अपने लिए कम-से-कम साधन-सुविधाओं का इस्तेमाल किया। जैसे ब्रह्मा बाबा अन्त तक झोपड़ी में रहे वैसे इन्होंने भी अन्त तक सादा जीवन ही बिताया, अपने लिए कोई विशेष सुविधा नहीं ली। वे जब भी विदेश जाते थे तब ही बहने पीछे से उनके कमरे की मरम्मत कराती थी। उनका जो पलंग था वही उनका डाइनिंग टेबल भी था, वही उनकी स्टडी-टेबल थी। वही सब-कुछ था। शारीरिक सुख के लिए उन्होंने बहुत कम, कम-से-कम साधन यूज किये।

वे विश्राम कम और सेवा ज़्यादा करते थे

वे कहते थे, अगर मुझे दो घंटे भी अच्छी नींद आ गयी तो वो मेरे लिए बहुत है। वे संस्था के इन्टरनेशनल एडवाइज़र (अन्तर्राष्ट्रीय सलाहकार) और चीफ स्पोकसमैन (मुख्य प्रवक्ता) होने के कारण किसी भी समय पर, विश्व के किसी भी सेन्टर से फोन आता था। विदेश में दिन है तो भारत में रात होती है। फोन करने वालों को क्या पता कि भाई साहब सोये हैं या जागे हैं! भाई साहब ने किसी को भी फोन करने के लिए मना नहीं किया। किसी का फोन उन्होंने अस्वीकार नहीं किया। हरेक का फोन उन्होंने उठाया। वे कहते थे, अगर कोई मुझे फोन करता है माना वह कोई मुसीबत में है। वो मेरे से सहायता या सहयोग मांग रहा है, मैं उसे छोड़ विश्राम करता रहूं, यह अन्याय है। उसको मदद करना मेरा फर्ज है।
इस प्रकार, उनके श्वास-श्वास में सेवा ही भरी हुई थी। बाबा के लिए और बाबा के बच्चों के लिए, बाबा के यज्ञ के लिए वे हर वक्त तैयार रहते थे इसीलिए मैं समझता हूं , बाबा ने उनको दधीचि की उपाधि दी।
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भाई साहब विशेष कलाओं के विशेष धनी थे

शक्ति नगर के ही ब्रह्माकुमार अनिल भाई जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं-
"मैं सन् 1985 में ईश्वरीय ज्ञान में आया। दिल्ली सदर बाज़ार में मेरा बिजनेस (व्यापार) है। भाई साहब के अंग-संग रहने के, उनके साथ ईश्वरीय सेवा करने के अनेक मौके इस आत्मा को मिले।
भाई साहब विशेष कलाओं के धनी थे, उनमें से एक कला थी, साधारण-सी साधारण आत्मा को भी आगे बढ़ाने की। उस आत्मा में छिपी हुई विशेषताओं को जाग्रत करके उसको ऊंचा उठाते थे। मुझे स्टेज पर जाकर माइक के सामने बोलने में बहुत संकोच होता था लेकिन भाई साहब ने स्टेज पर जाकर माइक पर बोलने की कला सिखायी। ज्ञान की गुह्य-गुह्य बातें बताकर, अनेक टॉपिक्स देकर उन पर सेमिनार आदि कराते थे। क्लास में आने वाले हम सब भाइयों को बोलने का अवसर देते थे। जिसको स्टेज पर जाने का साहस नहीं होता था तो उनसे कहते थे, देखो, यहाँ जो भी हैं, वे सब अपने परिवार के हैं। परिवार वालों के सामने बोलने के लिए संकोच की क्या दरकार है? इस प्रकार, हिम्मत देकर, उमंग भरकर छिपी हुई हमारी प्रतिभाओं को ऊपर उठाते थे।

इतने बड़े होते हुए भी उनको लेशमात्र अभिमान नहीं था

उनमें मैंने और एक विशेष कला देखी कि 'कम खर्चा और बाला नशीन'। उनको कहीं भी जाना होता था तो वे बस का सफर चुनते थे। अगर किसी विशेष स्थान पर जाना है या किसी विशेष व्यक्ति से मिलना है तो किसी साधन वाले भाई का सहयोग लेते थे। एक बार उन्होंने मेरे से कहा, अनिल भाई, आपके पास समय है तो मेरे साथ फलानी जगह पर चलिये। मैंने कहा, ठीक है 'भाई साहब, घर जाकर कार ले आता हूं । उन्होंने कहा, हम दोनों को ही जाना है, आपका स्कूटर ही काफी है। देखिये, इतने बड़े, इतने महान् होते हुए भी उनको लेशमात्र अभिमान नहीं था कि हम स्कूटर से कैसे जायेंगे। वे सोचते थे, जाने वाले हम दो ही हैं तो कार से जाकर ज़्यादा खर्चा क्यों करें।
वे छोटी-छोटी बातों पर भी हमें अटेन्शन दिलवाते थे। एक बार मेरे साथ स्कूटर पर बैठकर एक गली में से गुजर रहे थे, एक कुत्ता रास्ते में बैठा था। मैंने उसके पास से स्कूटर निकाल दिया। तब उन्होंने मुझे धीरे से समझाया कि कुत्ते के इतने पास से नहीं ले जाना चाहिए क्योंकि वह कभी भी हमला कर सकता है आपके ऊपर।

वे हर आत्मा की उन्नति के प्रति ध्यान रखते थे

वे हर आत्मा की उन्नति के प्रति ध्यान रखते थे। एक बार मैंने अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए सदर बाज़ार में एक दुकान ली। उसके उद्‌घाटन के लिए दीदी चक्रधारी और जगदीश भाई साहब को बुलाया। जब वे गाड़ी से उतरे तो आस-पास देखकर दीदी से बोले कि अगर अनिल भाई ने अपनी दुकान यहां खोली है तो उसका सारा ध्यान इसी में ही चला जायेगा। ये ज्ञान-योग में ढीले हो जायेंगे, इनकी उन्नति कम हो जावेगी। बाबा के बच्चे घर-परिवार में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति कैसे करे, यह ध्यान वे सदैव रखते थे। एक बार मुझे किसी दवाई के कारण सारे शरीर में एलर्जी हो गयी। मुझे हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा। जब भाई साहब को पता पड़ा तो इतने व्यस्त होते हुए भी वे मुझे देखने आ गये दीदी के साथ। मुझे दृष्टि दी, टोली दी और शुभ-भावना प्रगट की कि आप जादी से जल्दी ठीक होकर घर आ जाये। इस प्रकार, वे हम जैसे छोटे-छोटे भाइयों का भी इतना ध्यान रखते थे। हम परिवार वालों से मिलना, बैठना, ज्ञान और योग की गहराई के बारे में समझाना आदि करते थे।
यज्ञ-सेवा के प्रति उनकी बहुत लगन होती थी। अपने स्वास्थ्य का भी वे ख्याल नहीं करते थे। जिस सेवा का बीड़ा उठाते थे, वो कार्य पूरा होने तक सोने का, खाने का, पीने का भी ध्यान नहीं रखते थे। उनमें यह भी एक विशेषता थी कि खुद कभी खाली नहीं बैठते थे और भाई-बहनों को खाली बैठने नहीं देते थे। समर्पित हो या कुमार हो या गृहस्थी हो, सबका तन-मन-धन सेवा में लगवा कर उनका भाग्य बनाते थे।

भाई साहब बड़े ही निरहंकारी थे

भाई साहब बड़े ही निरहंकारी थे। बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजन करते थे, दिन-रात लगकर तैयारी कराते थे, सेवा को सम्पूर्ण सफल बनाते थे लेकिन उसका सम्मान, उसकी कीर्ति वे नहीं लेते थे। वे सम्मान और प्रशंसा बहनों, माताओं और भाई-बहनों को दे देते थे और कहते थे कि यह सब इन्होंने किया है, मैंने कुछ नहीं किया है।
क्लास में आने वाले हर एक बाबा के बच्चे का ध्यान रखते थे। अगर कोई सेवा करके आया तो उससे पूछते थे, आपने खाना खाया, नाश्ता किया? नहीं किया होता तो सेन्टर पर कराके भेजते थे। सिर्फ इतना ही नहीं, उनके पुरुषार्थ के बारे में भी बहुत ध्यान देते थे। बीच-बीच में एक-एक क्लास वाले को बुलाकर उसके योग और मानसिक अवस्था के बारे में पूछते थे। अगर योग करने में उसको कोई समस्या हो तो सुधारने के लिए मदद भी करते थे। योग में कैसे अनुभव करना है- यह अपने साथ बिठाकर अनुभव कराते थे।

अन्त में भी उनकी जबर्दस्त स्मरण शक्ति थी

जब वे बीमार पड़े और ग्लोबल हास्पिटल में थे तो हम शक्ति नगर के कुछ भाई-बहने उनसे मिलने गये। इतने बीमार होते हुए भी, शरीर को इतनी तकलीफ़ होते हुए भी उसका प्रभाव उनके चेहरे पर नहीं था। वे सब से मिले। उनकी स्मरण शक्ति इतनी जबर्दस्त थी कि मुझे दृष्टि और टोली देने के बाद हमारे परिवार वालों को नाम सहित याद-प्यार दी और टोली भी दी।
अन्त में मैं यही कहूँगा कि आज हमारे सामने भाई साहब नहीं है लेकिन वे जो कार्य करके गये हैं उनको हम अपने आदर्श मानकर उनकी धारणाओं पर चलेंगे तो ईश्वरीय जीवन में सफलता जरूर पायेंगे और शीघ्र ही बाबा की प्रत्यक्षता का कार्य पूरा कर सकेंगे।"
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बाबा-मम्मा को पूर्ण रूप से फोलो करने वालों में जगदीश भाई साहब नम्बर वन थे

दिल्ली, शक्ति नगर के ब्रह्माकुमार गणेश भाई जी, भ्राता जगदीश जी के साथ का अपना अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"सन् 1989 में मुझे ज्ञान मिला। मेरा अलौकिक जन्म शक्ति नगर सेवाकेन्द्र पर हुआ, पालना भी वहीं हुई और पढ़ाई भी वहीं हुई। मैं दिल्ली म्यू‌निसिपल कॉर्पोरेशन में नौकरी करता हूँ। मेरा एक मित्र एयरफोर्स में था। हम दोनों एक ही गांव के थे। एक बार जब मैं गाँव गया तो उस मित्र से मुलाक़ात हुई। बातों-बातों में उसने कहा कि दिल्ली, शक्ति नगर में एक अच्छी संस्था है। वहाँ दीदी चक्रधारी और भ्राता जगदीश जी रहते हैं, उनसे एक बार मिल लो।

मैंने 'हाँ' तो कह दिया लेकिन गया नहीं

एक रविवार के दिन मैं शक्ति नगर सेवाकेन्द्र पर गया। दरवाज़ा खटखटाया। एक भाई ने दरवाज़ा खोला। मैं उससे बोला, मुझे फलाने व्यक्ति ने भेजा है, यहाँ मिस्टर चक्रधारी और मिस्टर जगदीश रहते हैं, उनसे मिलने के लिए कहा है। मुझे यह भूल गया कि मित्र ने चक्रधारी दीदी बोला है। वह भाई मुझे एक कमरे में बिठाकर गया। थोड़ी देर के बाद एक सफेद वस्त्रधारी बहन आयी। उसने मेरे से बात की। ज्ञान सुनाने लगी। जब बहन जी ज्ञान सुना रही थी तो मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था कि यह यहां है ही नहीं। उसकी आवाज़ सुनायी पड़ रही थी लेकिन जैसे कहीं दूर से आ रही थी। सामने दीदी (चक्रधारी) बैठी हुई थी लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि वे प्रकाश के अन्दर बैठी हुई हैं। बहुत अच्छा अनुभव हो रहा था। उसके बाद उन्होंने बताया कि यहां सात दिन का कोर्स होता है, आप उसको पूरा करो। मैंने 'हाँ' कह दिया लेकिन गया नहीं कुछ दिनों तक; भूल गया।

आवाज़ आने लगी, बच्चे, यह सोने का समय नहीं है, जागो

दो सप्ताह के बाद रात का करीब 11 बजे का समय होगा। एक अव्यक्त आवाज़ सुनायी पड़ी कि 'बच्चे, यह सोने का समय नहीं है, जागो'। मैंने सुन तो लिया लेकिन ध्यान नहीं दिया, फिर सो गया। फिर वही शब्द सुनायी देने लगे, 'बच्चे, सोने का समय नहीं है, जागो। मैं फिर सोता रहा, फिर यही शब्द सुनायी पड़ने लगे। रात भर ऐसे चलता रहा। मैं सोता रहा और वो जगाता रहा। अगली रात 11 बजे फिर वहीं आवाज़ 'बच्चे, सोने का समय नहीं है, जागो'। तब मुझे थोड़ी-सी याद आयी कि उस दीदी ने कहा था कि सात दिन का कोर्स करना पड़ेगा और मैंने भी कहा था कि आऊंगा। मैंने पक्का कर लिया कि कल सुबह कोर्स करने जाना है। तब मुझे तुरन्त नींद आ गयी और अच्छी नींद आ गयी। दूसरे दिन से मैंने कोर्स करना शुरू कर दिया।

भाई साहब को देखते ही मुझे ऐसा लगा कि हनुमान जी आ गये

कोर्स पूरा हुआ, मुरली सुनने लगा। एक दिन दीदी ने क्लास में कहा कि इस रविवार जगदीश भाई साहब का क्लास है, कोई मिस नहीं करना। मैं भी उस रविवार के दिन क्लास में आया था। भाई साहब के बारे में सुना था कि वे ईश्वरीय साहित्य लिखते हैं, बहुत किताबें लिखी हैं। मुरली पूरी होने के बाद भाई साहब क्लास में आये। भक्तिमार्ग में मैं हनुमान का भक्त था, हनुमान चालीसा पढ़ा करता था। भाई साहब को देखते ही मुझे ऐसा लगा कि हनुमान जी आ गये। मैं अपनी यूगल को भी उस दिन क्लास में ले गया था। क्लास के बाद मैंने उससे कहा कि मुझे ऐसा लगा, हनुमान जी आ गये। उसको भी ऐसा ही अनुभव हुआ था। उन दिनों बाबा की मुरली भी चली थी कि बच्चे, तुम ही हो महावीर, हनुमान और अंगद। भाई साहब कौन हैं, यज्ञ में उनका महत्व क्या है, उनका व्यक्तित्व क्या है, ये सब मैंने बाद में धीरे-धीरे जाना।

उनके पास रहने से मुझे लगता था कि ये देवांश हैं

उसके बाद मैं उनसे मिलता रहा, वे मुझे कोई-न-कोई सेवा देते रहे। उनको देखने से, उनके पास रहने से मुझे ऐसा लगता था कि वे आम व्यक्ति नहीं हैं, एक अनोखे व्यक्ति हैं, असाधारण व्यक्ति हैं। जैसे कहते हैं ना, ये तो देवांश हैं अर्थात् वे मनुष्य नहीं हैं, देवता के अंश से सम्पन्न हैं।
आफिस में मैंने नमस्ते, नमस्कार, गुड मार्निंग आदि कहना बन्द कर दिया और सबको 'ओम शान्ति' बोलने लगा। फिर मेरा नाम ही पड़ गया 'ओम शान्ति'। भाई साहब की लौकिक भतीजी हमारे आफिस में काम करती थी। वे कभी-कभी मेरे पास दवाई लेने आती थी। मैंने अपनी मेज पर 'सच्ची मन की शान्ति' पुस्तकें रखी थीं। जो कोई आता उसे एक दिया करता था। जब वो आयी तो उसको भी मैंने एक किताब दी। उसने खोलकर देखा तो उसमें जगदीश भाई साहब का नाम था। उसको देख उसने तुरन्त बोला कि यह तो हमारे ऋषि चाचा की लिखी हुई किताब है। शायद उनको घर में 'ऋषि' बोलते होंगे। उसने यह भी नहीं बताया कि वो मेरे चाचा जी हैं। एक दिन उस बहन ने मेरे से कहा कि चाचा जी जब भी हमारे घर पर आते थे, कभी हम से ज्ञान सुनने के बारे में कहते नहीं थे। हमें उनको देखकर डर लगता था। मैंने पूछा, क्यों? उसने कहा, क्योंकि उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था ना! इतना लंबा-चौडा, हट्टा-कट्टा शरीर और गंभीर चलन।

उनका जीवन और उनका कमरा एक प्रयोगशाला थे

जगदीश भाई साहब को देखकर किसी के मन में व्यर्थ संकल्प या जुबान से व्यर्थ बोल निकलते ही नहीं थे। उनका जीवन और उनका कमरा प्रयोगशाला थे। उनके कमरे में जाते ही सन्नााटे का अनुभव होता था। बहुत शक्तिशाली वायब्रेशन्स का अनुभव होता था। मन करता था कि इस वातावरण में और कुछ समय रह जायें।
जैसे हमारे चार विषय हैं ज्ञान, योग, धारणा और सेवा, वैसे ही भाई साहब के व्यक्तित्व को भी मैं इन चार विषयों के आधार पर देखता हूँ। ज्ञान के विषय में उनकी मास्टरी को तो आप सब जानते ही हैं। ज्ञान की गहराई में जाना उनके लिए बायें हाथ का खेल था। उन्होंने एक बार पारदर्शिता के बारे में क्लास करायी थी। पारदर्शिता किसको कहते हैं, पारदर्शिता क्या है और उसका विस्तार क्या है- ये सब उन्होंने उस क्लास में बताया था। ईश्वरीय ज्ञान की गहराई उनकी पुस्तकों से पता पड़ती है।

आफ़िसर ने कहा, मेरे लिए उनकी सारी बुक्स ले आओ

एक बार की बात है, राखी के दिन चल रहे थे। मैं एक सीनियर आई.ए.एस. आफ़िसर को राखी बाँधने बहनों को ले गया। उस आफ़िसर ने पहले ही अपने पर्सनल सेक्रेटरी से बोल रखा था कि ब्रह्माकु‌मारिया आयें तो उनको अन्दर लाना नहीं। जब मैं गया तो पर्सनल सेक्रेटरी ने अन्दर जाने से मना किया। मैंने कहा, कोई बात नहीं, मैं साथ में हूं ना! ऐसे कहकर बहनों को लेकर अन्दर चला गया और कहा, सर, आपका ज़्यादा समय नहीं लेंगे, केवल पाँच मिनट लेंगे। बहनों ने उनको राखी बांधी। उस आफिसर को मैंने 'इटर्नल वर्ल्ड ड्रामा' की दो किताबें दीं। आश्चर्य की बात है कि दो दिन के बाद जब मैं पैदल चल रहा था, पीछे से आवाज आयी, मिस्टर जोशी, मिस्टर जोशी। पीछे मुड़कर देखा तो वो आफिसर कार में थे। उन्हें देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। वे आये और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले, भाई, ब्रह्माकुमारियों को तो मैं ऐसे ही समझता था। आपने जो दो किताबें दी थीं वे मैंने पढ़ीं, उनमें से एक में 99 बुक्स का रेफरेन्स दिया हुआ है। आप मेरे लिए उनकी सारी बुक्स ले आओ। उन्होंने मुझे अडवान्स में पैसे दिये। इंग्लिश में भाई साहब की जितनी भी किताबें थीं, उनको लाकर दी। वे रिटायर्ड होने के बाद भी मुझे फोन करते रहे और बाद में आबू भी होकर गये। इस प्रकार, भाई साहब की लेखनी कैसी है यह मालूम पड़ता है।

मैंने पहली बार उनको इतना हँसते हुए देखा

भाई साहब बहुत रमणीक भी थे। एक बार मैं उनसे मिलने उनके कमरे में जा रहा था। मेरे जाने से पहले वहाँ एक कुमार भाई बैठा था जिसका नाम भी जगदीश या। भाई साहब ने पहले अपने कानों में स्टेथोस्कोप लगाकर उसको चैक किया, फिर बोले, अभी आप इसको लगाकर मुझे चैक करो कि मेरी धड़कन ठीक है और हर धड़कन में बाबा की याद समायी हुई है? वह भाई थोड़ा संकोच कर रहा था। भाई साहब ने कहा, लगाओ, लगाओ। भाई साहब भी हँस रहे थे और वो भाई भी हंस रहा था। फिर उससे पूछ रहे थे कि क्या हर धड़कन बाबा-बाबा बोल रही है? इतना हंसते हुए उनको मैंने पहली बार देखा।
भाई साहब के योग के बारे में तो क्या कहें। उनका जीवन ही योगी जीवन था। एक बार की बात है। सिंगापुर एक छोटी-सी चीज भेजनी थी। उसको पैक करके त्यागी जी रजिस्टर पार्सल करने के लिए, जी.पी.ओ जा रहे थे। रास्ते में किसी ने उनकी जेब काट ली। पोस्ट ऑफिस जाकर देखा तो वो चीज़ थी ही नहीं। वापस आकर उन्होंने भाई साहब से कहा कि जेब कट गयी। भाई साहब ने कहा, ठीक है, चलो कुछ समय योग करेंगे। भाई साहब और त्यागी जी दोनों ने बाबा के कमरे में उस दिन तीन घंटे तक योग किया। इसके 4-5 दिन बाद सिंगापुर से भाई साहब को फोन आया कि आपने जो चीज़ भेजी थी वो पहुँच गयी, उससे यहां बहुत सेवा हुई। देखिये, चोर ने जेब तो काट ली लेकिन पता नहीं उसको क्या हुआ, बाद में उसने उस चीज़ को उसी पते पर भेज भी दिया। यह था योग का प्रयोग। इस प्रकार, भाई साहब असम्भव कार्य को योगबल से सम्भव बनाते थे। भाई साहब योग को बहुत महत्व देते थे।

भाई साहब नियम-मर्यादायें, धारणायें और सभ्यता के बारे में शिक्षा देते थे

एक बार सन् 1994 की बात है, भाई साहब की लाइब्रेरी की अलमारियां बहुत पुरानी हो गयी थीं तो नयी अलमारियाँ बनवायी। उन अलमारियों में भाई साहब की किताबों को सैट करना था। मैं और 2-3 कुमार भाई मिलकर पुरानी अलमारियों से नयी अलमारियों में शिफ्ट कर रहे थे। एक पुराना गत्ते का बाक्स था, उसको उठाकर चलते समय वह फट गया। उसमें से कुछ छोटी-छोटी बुकलेट गिर गयी। मैंने एक बुकलेट को पढ़ा तो बहुत अच्छा लगा। मैंने साथी भाई को कहा कि यह तो बहुत अच्छा मैटर है। उनमें से दो हमने ले ली और बाक़ी को एक थैली में डालकर उस अलमारी में शिफ्ट कर दिया। भाई साहब अन्दर बैठे हुए थे। हमें पता ही नहीं पड़ा कि वे कब आये और कब वो दोनों बुकलेट, जिनको हमने निकाल कर रखा था, उठाकर ले गये। यह देख मेरा चेहरा पीला-सा पड़ गया। अभी क्या करें, कैसे भाई साहब के पास जाये उस रात को मुझे नींद आयी ही नहीं। भाई साहब ने मेरे से कुछ कहा भी नहीं था। अगले दिन भाई साहब से कुछ पूछने या कहने से डर लगने लगा। इसलिए मैंने चक्रधारी दीदी के पास जाकर उनको सब-कुछ बता दिया। दीदी ने भी कुछ कहा नहीं लेकिन अगले दिन क्लास में भाई साहब ने कहा कि यज्ञ की कोई भी वस्तु, चाहे वो छोटी-सी सुई ही क्यों न हो, बिना पूछे किसी को लेनी नहीं चाहिए। क्योंकि आज छोटी चीज ले जाऊंगा, कल बड़ी चीज भी ले जा सकता हूं। इस प्रकार, भाई साहब हमें नियम-मर्यादायें, धारणाये और सभ्यता के बारे में शिक्षा देते थे।

सेवा करने का उनका ढंग भी विशेष होता था

सेवा के विषय में भाई साहब के बारे में क्या बताये। सेवा में तो वे निडर थे। भगवान की आज्ञा सिर माथे। हाथ में ली हुई सेवा पूरी होने तक दम नहीं लेते थे। कुछ भी हो, कितने भी विघ्न और परीक्षायें आयें लेकिन पूरी करके ही छोड़ते थे। सेवा करने का उनका ढंग भी विशेष होता था। यह सन् 1990 की बात है। रशिया से एक ग्रुप आया था। उनको हमने दो बसों में बिठाया था। दो पुलिस वाले आकर बस ड्राइवर को बहुत तंग कर रहे थे। मैंने पूछा, क्या बात है? पुलिस वालों ने कहा कि भाई, हमें भी कोऑपरेट करो। मैं उन दिनों ज्ञान में नया-नया था। मैंने कहा, अरे, यह तो भगवान की सेवा है। हम आपको इस तरह का कोऑपरेशन नहीं कर सकते। भाई साहब खिड़की से यह सब देख रहे थे। उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा कि क्या बात है? मैंने कहा कि भाई साहब वो पुलिस वाले ड्राइवर से कोऑपरेशन मांग रहे थे। फिर पूछा, आपने क्या कहा? मैंने कहा, यह भगवान का कार्य है, हम ऐसा कोऑपरेशन नहीं कर सकते। भाई साहब ने कहा, ऐसा नहीं कहना था, उनसे कहना था कि हम कोऑपरेशन नहीं करते बल्कि ऑपरेशन करते हैं। यह बात सुनाने के लिए मैं वहां गया तो वो पुलिस वाले वहाँ से चले गये थे। इस प्रकार, वे ज्ञानयुक्त और योगयुक्त होकर कोई भी सेवा करते थे।
भाई साहब की रॉयल्टी बहुत जबर्दस्त थी। हमारे बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे। एक बार भाई साहब ने सेन्टर के सारे बच्चों का, जो चौथी-पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले थे, एक स्नेह मिलन रखा। उनमें डॉक्टर गुप्ता जी के बच्चे मोहित और मोना भी थे। उस स्नेह मिलन का निमन्त्रण पत्र छपवाया और हर बच्चे के नाम सहित निमन्त्रण-पत्र भिजवाया और उन सबके लिए ब्रह्मा भोजन और सौगात भी तैयार करवायी। सुबह के 10 बजे उन सबको बुलाया और उनके साथ चिटचैट की, उनके साथ ब्रह्मा भोजन किया और हरेक को सौगात भी दी। इस प्रकार, वे बाबा के हर बच्चे को रिगार्ड देते थे और हरेक का महत्व रखते थे। वे छोटा-बड़ा शरीर नहीं देखते थे, वे आत्मा को ही महत्व देते थे।

वैज्ञानिक ने भाई साहब से कहा, कल मैंने आपके एंजिल स्वरूप को देखा

भाई साहब की अवस्था बहुत जबर्दस्त थी। जब वे वैज्ञानिकों के सम्मेलन में भाग लेने मैक्सिको गये थे, तब वहां एक वैज्ञानिक ने असन्तुष्टता जतायी कि भारत का एक लेखक वैज्ञानिकों के सामने क्या बोलेगा? क्योंकि भाई साहब के बायोडाटा में लिखा था कि वे एक लेखक भी हैं। भाई साहब स्टेज पर जाकर बैठे और अपने विचार सबके सामने रखे। अगले दिन जब भाई साहब नाश्ता कर रहे थे, तब उस वैज्ञानिक ने आकर भाई साहब से कहा, मैं आपके पास बैठ सकता हूँ? भाई साहब ने कहा, बैठिये। बातचीत के दौरान उसने भाई साहब से कहा कि कल मैंने आपका एंजिल स्वरूप देखा और आपने मुझे बहुत प्यार किया। इस प्रकार, भाई साहब की अव्यक्त स्थिति, योगयुक्त अवस्था और उनके आसपास के वायब्रेशन्स बहुत शक्तिशाली होते थे।
मैं तो यह कहता हूँ कि बाबा-मम्मा को पूर्ण रूप से फोलो करने वालों में जगदीश भाई साहब नंबर वन थे। अगर हम उनको 10% भी फॉलो करेंगे तो भी हमारा पुरुषार्थ तीव्र हो जायेगा।"
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भाई साहब ने कहा, डिब्बा लेडीज़ का है लेकिन ट्रेन तो मेल है ना!

भारतीय सेना से निवृत्त कटक के ब्रह्माकुमार योद्धासिंह जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त कर रहे हैं-
"सन् 1982 में पहली बार मैंने जगदीश भाई साहब को जयपुर के मेले में देखा। उनके बगलवाले कमरे में ही मेरा निवास था। मैंने देखा, वे रात को बहुत ही कम सोते थे। उनके पास दो थर्मास रहते थे, एक में दूध और एक में चाय होती थी। मैंने देखा रात 12.30-1.00 बजे तक वे लिख रहे थे। फिर मैं सो गया और दो बजे उठा तो उस समय भी वे लिख रहे थे। मैं समझता हूँ, वे रात को 2-3 घंटे ही सोते थे। अगले दिन हम दोनों इकट्ठे ही नाश्ते पर बैठे थे, उसी समय उनके साथ मेरी थोड़ी-बहुत बातचीत हुई। थोड़े समय की उस मुलाक़ात से मुझे लगा कि वे बहुत सरल, निरहंकारी और मिलनसार व्यक्ति हैं। वे सबसे बहुत अच्छी तरह मिलते थे।

अनुभव और चुटकुले सुनाकर हमें बहुत हँसाया

दूसरी बार उनसे मुलाक़ात हुई जब वे हमारे गाँव आये थे। हमारे यहां एक बाबा थे, उन्होंने दादी जी को अपने यहाँ आने का निमन्त्रण दिया था। उन्होंने एक महासम्मेलन का आयोजन किया था। दादी जी ने अपनी तरफ से जगदीश भाई साहब को भेजा था। यह समय था सन् 1986 का। जब वे उस कार्यक्रम में आये थे तो उनके रहने की व्यवस्था हमारे घर में की हुई थी। हमने भाई साहब द्वारा हमारी गीता-पाठशाला का उ‌द्घाटन करवाया। सब टीचर बहने भी वहां आयी हुई थी। घर में मैं, मेरी युगल, दो बेटे और एक बेटी रहते थे। एक दिन वे घर की छत पर गये, उनके साथ बच्चे भी गये। राजेश और सन्तोष दोनों पुत्र बहुत मोनो एक्टिंग करते थे। उस दिन छत पर सन्तोष ने भाई साहब के सामने मोनो एक्टिंग की। इसे देख जगदीश भाई भी रुक नहीं पाये और उन्होंने भी एक चुटकुला सुनाया। साथ-साथ एक हँसी-मज़ाक बाली घटना भी सुनायीः
एक बार दादी जी को बेंगलूरु जाना था। दादी जी ने जगदीश भाई को कहा कि आप भी साथ में चलो। अचानक जाने का प्रोग्राम बनने के कारण रिजर्वेशन नहीं थी तो उनको जनरल डिब्बे में चढ़ना था, उतने में ट्रेन चल पड़ी। जगदीश 'भाई दौड़ते हुए एक डिब्बे में चढ़ गये। वो डिब्बा था लेडीज़। वहां की लेडीज़ कहने लगी, भाई साहब, आप तो पढ़े-लिखे लगते हैं, लेडीज़ डिब्बे में कैसे चढ़ गये, उतर जाइये। भाई साहब ने कहा, बहन जी, अचानक गाड़ी चल पड़ी, इसलिए मैं इस डिब्बे में चढ़ा, अगला स्टेशन आते ही उत्तर जाऊंगा। उन महिलाओं ने माना नहीं, कहने लगीं नहीं-नहीं, आपको अभी उतरना पड़ेगा। भाई साहब सोचने लगे कि अभी क्या करें, चलती गाड़ी से कैसे उतरें? फिर उन्होंने कहा, बहन जी, डिब्बा तो लेडीज़ का है लेकिन ट्रेन तो मेल है ना! फिर वे सोच में पड़ गयीं, क्या कहें, उनकी समझ में नहीं आ रहा था, वे एक-दूसरे के चेहरे देखने लगीं। उतने में एक स्टेशन आया तो जगदीश भाई उतर कर अपने डिब्बे में चले गये। यह घटना सुनाकर उन्होंने हमें बहुत हंसाया।

उनमें परिवार की भावना बहुत थी

मैंने देखा, जगदीश भाई साहब मिलनसार बहुत थे। वे सबसे बहुत प्यार से मिलते थे, सबको अपनेपन का अहसास कराते थे। उनके अन्दर यह भाव नहीं था कि में बड़ा हूं, यह छोटा है। सबको एक जैसे देखते थे, उनमें परिवार की भावना बहुत थी। उनके सामने जो भी जाता था उसको महसूस होता था कि ये बहुत बड़े व्यक्ति हैं, बहुत अनुभवी हैं। वे हरेक को सन्तुष्ट करते थे। उस बाबा (जिसने निमन्त्रण दिया था) के यहाँ उनका भाषण अंग्रेज़ी में था। एक घंटे के बाद बहुत लोगों ने प्रश्न पूछे। उन सबको बहुत प्यार से उत्तर दिये, सभी लोग सन्तुष्ट हो गये। वहाँ गणमान्य व्यक्ति आये थे परन्तु हमारी संस्था के बारे में उनकी भावना अच्छी नहीं थी लेकिन जगदीश भाई साहब द्वारा प्रश्नों के उत्तर दिये जाने के बाद उनमें हमने परिवर्तन देखा। जगदीश भाई साहब के जाने के बाद कई लोग सेन्टर पर आने लगे, संस्था के प्रति रुचि दिखाने लगे। उनके आने से बहुत अच्छी सेवा हुई। सभा में उन्होंने उन लोगों को मधुबन आने का निमन्त्रण दिया था, उसके बाद बहुत वी.आई.पी लोग मधुबन आये और बहुत खुश होकर गये।
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वे इतना लिखकर दे गये हैं कि हम उनको भूल नहीं सकते

ज्ञानामृत मासिक के मुख्य सम्पादक तथा ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रकाशनों के प्रकाशक ब्रह्माकुमार भ्राता आत्मप्रकाश जी, 'भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने संस्मरण इस प्रकार सुना रहे हैं-
"भ्राता जगदीश जी से मेरा प्रथम मिलन सन् 1957 में हुआ। उस समय मम्मा-बाबा दिल्ली, राजोरी गार्डन में आये हुए थे। मैं भी बाबा से मिलने गया तो वहीं उनसे मुलाक़ात हुई। उन्होंने बड़े प्यार से गले लगाया और मुझे महसूस हुआ कि जैसे लम्बे समय से बिछुड़े अति स्नेही भाई ने मुझे स्नेह दिया। विद्यालय की पहली हिन्दी पत्रिका 'त्रिमूर्ति' उस समय उनके सम्पादन में ही निकलती थी। इनके द्वारा लिखी 'सच्ची गीता' और 'रीयल गीता' का भी मैं अध्ययन कर चुका था। इन दोनों पुस्तकों ने भी हमें बहुत प्रेरणायें प्रदान की थीं इसलिए मन-ही-मन उनका प्रशंसक तो मैं था ही, फिर उनसे सम्मुख मिले तो मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी।
सन् 1962 में प्यारे साकार बाबा ने मुझे साहित्य की सेवा-अर्थ इनके पास भेजा। उस समय लगभग दो वर्ष इनके अग-संग रहकर विभिन्न प्रकार की ईश्वरीय सेवाओं के अनुभव प्राप्त किये और इनके त्यागमय, उच्च धारणाओं वाले जीवन से लाभान्वित भी बहुत हुए।

सुबह दो बजे से उनकी दिनचर्या शुरू होती थी

वे कभी खाली बैठे नहीं। मुझे मालूम है, उनकी दिनचर्या सुबह दो बजे से शुरू होती थी। उठकर वे लिखते थे रोज़। उनको लिखने का काम बहुत था। बाबा ने लिखने की ज़िम्मेवारी उनको दी थी। अपने शरीर से उन्होंने बहुत कार्य लिया। उन दिनों ज़्यादा साधन भी नहीं थे। यहां तक कि न टेबल, न कुर्सी होती थी। वे अपनी चारपाई पर बैठ, तकिया रखकर, लकड़ी की तख्ती पर लिखते रहते थे, लिखते रहते थे। बहुत लिखा उन्होंने।

उन्होंने सब तरह की सेवा की

पहले-पहले हमारी संस्था क्या थी? ॐ मंडली, एक सत्संग। उसके
बाद प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय नाम पड़ा लेकिन विद्यालय का रूप भरा जगदीश जी ने दिया। इसमें क्या पाठ्यक्रम होना चाहिए, कैसी शिक्षा-पद्धति होनी चाहिए इत्यादि उन्हों से ही बाबा ने तैयार करवाया। आजकल तो ईश्वरीय सेवा करना बहुत सहज है, सब भाई-बहनें करना भी चाहते हैं क्योंकि बहुत-से साधन-सुविधायें हैं, संस्था की एक अच्छी छवि है, जहां भी सेवा करने जाते हैं, लोग इज़्ज़त करते हैं लेकिन जगदीश जी के शुरुजात के समय में यज्ञ में बेगरी पार्ट था। लोग संस्था को नहीं जानते थे। अगर जानते भी थे तो गलत उड़ायी गयी बातों के रूप से, गाली भी देते थे। सहयोगी कम थे, विरोधी ज्यादा थे। ऐसे समय पर जगदीश जी ने सब तरह की सेवा की। उन्होंने न केवल साहित्य की सेवा की, यज्ञ की हर तरह की सेवा की।
आज तो हमारी एक से बढ़कर एक ऑटोमेटिक प्रिंटिंग मशीनें हैं, कम्पोज़िंग के लिए कम्यूटर हैं। सब साधन हैं। उन दिनों हाथ से कम्पोज़ किया जाता था। एक-एक पेज सैट करके उस पर स्याही लगाकर एक-एक पेज का प्रूफ निकालते थे। उसको पढ़ेंगे, करेक्शन निकालेंगे, फिर कुछ मैटर जोड़ना या निकालना है तो दुबारा हाथ से उन अक्षरों को जोड़ना या निकालना पड़ता था। उन दिनों, प्रिंटिंग का काम बहुत कठिन था, मेहनत का काम था। कहने का मतलब यह है कि मेरे सामने ही लगभग आधी सदी तक भ्राता जगदीश जी ने बहुत मेहनत की, अथक होकर मेहनत की।

उनमें मैंने खासकर के पाँच विशेषतायें देखीं

कई मुझ से पूछते हैं कि जगदीश जी में क्या-क्या विशेषतायें थीं तो मैं यही कहूंगा कि साकार बाबा में जो भी विशेषतायें और गुण थे, वो सब उनमें थे। सार में बताऊँ तो उनमें मैंने ख़ासकर के पाँच विशेषतायें देखीं (1) वे एक महान् ज्ञानी, (2) योगी, (3) त्यागी, (4) तपस्वी और (5) सेवाधारी थे। इसके अलावा वे महान् मितव्ययी थे। बहुत ज़्यादा खर्च करना उनको पसन्द नहीं था। वे एक बात हमेशा मुझे कहा करते थे कि हमारी हर वस्तु और कार्य बेस्ट (अति उत्तम), चीपेस्ट, (बहुत सस्ता) और अर्लिएस्ट (बहुत जल्दी) होना चाहिए ये उनके तीन शब्द थे। वे कहते थे कि जल्दी और सस्ते में काम कराने का अर्थ यह नहीं है कि वो घटिया हो। बाबा हमेशा कहते थे कि बच्चे, यह काम जल्दी कराओ, समय बहुत कम है। जहां भी मेला होता था, प्रदर्शनी होती थी या शिवरात्रि आदि कोई त्योहार आता था तो बाबा कहते थे कि पर्चे जल्दी छपवाके, जल्दी उनको पहुंचाओ। प्रिंटिंग का ऐसा काम है कि हर पहलू पर ध्यान से काम करो तब वह पूरा होगा। इसको भी वे जानते थे, फिर भी कहते थे कि जल्दी से जल्दी होना चाहिए ताकि उससे बहुतों की सेवा हो।

उनमें ज्ञान समझाने की कला बहुत विशेष थी

दूसरों को ज्ञान समझाने की उनकी विधि विचित्र होती थी। उर्दू में 'सच्ची गीता' लिखवानी थी। आज तो उर्दू की भी टाइप मशीन और फॉन्ट्स आ गये हैं। उन दिनों उर्दू की टाइपिंग भी नहीं होती थी। उर्दू तो ज्यादातर मुसलमान लोग ही लिखते थे और हाथ से ही लिखते थे। हम दोनों उर्दू लिखने वाले एक मुसलमान व्यक्ति के पास गये। उस व्यक्ति को भ्राता जी ने कहा कि यह तो सच्ची गीता है, परमात्मा के महावाक्य हैं। इसको लिखने वाला कैसा होना चहिए, उसे क्या-क्या नहीं करना चाहिए, ये सब बातें उसको समझायी। मैं देख रहा था कि जगदीश भाई से सुनते-सुनते वह व्यक्ति देह से परे की स्थिति का अनुभव कर रहा था। उसको देखने से पता लगता था कि वह यहां नहीं है। उसने भाई साहब से कहा कि मैं तो खुदा से बाद में मिलूंगा लेकिन आज मैं आप में ही खुदा को देख रहा हूँ। कहने का मतलब यह है कि वे योग में रहकर ऐसे समझाते थे कि सामने वाला देहातीत स्थिति का अनुभव करता था। ऐसा अनुभव कई दफ़ा मैं खुद भी अनुभव करता था और दूसरों को भी करते हुए देखता था।

वे जहाँ पहुँचते थे, वहाँ का वायुमण्डल बदल जाता था

जब मैं उनसे मिलने जाता था तो उनके पास पहुंचने से पहले मुझे आभास होता था कि अभी मुझे योगयुक्त स्थिति में रहना है, आत्म-अभिमानी स्थिति में स्थित होना है। जब उनका आना होता था, मैं उस स्थिति में स्थित होकर बैठा रहता था। जब मैं उनसे मिलने के लिए जाता था तो वहां का वातावरण बहुत शक्तिशाली और योगयुक्त रहता था। मुझे भी उस स्थिति में स्थित रहने की प्रेरणा मिलती थी।

उनकी बहुत ज़बर्दस्त मेमोरी पॉवर थी

उनकी स्मरणशक्ति बहुत अधिक थी। एक बार किसी बात को सुन लेंगे तो वह पक्की याद रहेगी। एक बार दिल्ली में एल.एस. माथुर जी, जो वैज्ञानिक थे और बाबा के बच्चे भी थे, का एक कार्यक्रम था। उस कार्यक्रम में उन्होंने इंग्लिश में आधा घण्टा भाषण किया। उस कार्यक्रम में हमारे कई भाई-बहनें भी बैठे थे जो अंग्रेज़ी नहीं समझते थे तो उन्होंने कहा कि इसको कोई हिन्दी में बताये। आप मानेंगे या नहीं, माथुर जी के भाषण को जगदीश जी ने बगैर लिखे हुबहू हिन्दी में रिपीट किया। कार्यक्रम पूरा होने के बाद माथुर जी ने जगदीश जी को मुबारक़ दी और कहा कि मैंने आधा घण्टा बोला, आपने उसकी एक भी प्वाइंट मिस किये बगैर हुबहू रिपीट किया। उनकी बहुत जबर्दस्त मेमोरी पॉवर (स्मरण शक्ति) थी। उनको मैंने बहुत नज़दीक से देखा है, उनका जीवन सादगी तथा त्याग से सम्पन्न था।

वे हमेशा बहुत जल्दी में होते थे

शरीर छोड़ने के चार-पाँच साल पहले से, मैं यह अनुभव कर रहा था कि वे हमेशा बहुत जल्दी में होते थे। वे दादी जी से भी कहते थे कि मुझे अमुक कार्यों से छुड़ा दो, नये कार्य मुझे मत दो। मुझे बहुत कुछ करना है। जब उनसे मिलने जाता था तो मैं कहता था कि भाई साहब, मेरे लिए कोई सेवा है तो बताइये। वे कहते थे कि मुझे बहुत कुछ छपवाना है। मैं कहता था कि दीजिये। कहते थे कि आपको देने से पहले, मुझे उनको तैयार करना पड़ेगा ना! मुझे कई किताबें लिखनी हैं, छपवानी हैं। उन्हीं दिनों बहुत मोटी-मोटी किताबें छपीं। जब भी मैं कोई किताब प्रकाशित करके उनको दिखाने जाता था तो कहते थे, थैंक्स, चलो, यह भी काम पूरा हुआ। उनके शरीर छोड़ने से कुछ ही दिन पहले एक किताब छप रही थी 'कार्टून और कहावतें'। मैगज़ीन साइज़ की करीब 400 पृष्ठ वाली किताब है वो। उसके 50 फर्म बनते हैं। अगर 5000 भी छापेंगे तो ढाई लाख छपाई होती है। इतना लम्बा काम था। मुझे उन्होंने कहा, छपाइये, ध्यान रखिये उसमें एक ही तरह का काग़ज़ होना चाहिए। लगभग 250 रिम काग़ज़ चाहिए था। एक रिम में 500 शीटें होती हैं। हमने जोधपुर फोन करके फटाफट काग़ज़ मंगाया एक ही फैक्टरी का। छापना शुरू किया। इसी बीच जगदीश जी का फोन आया। पूछने लगे कि किताब का क्या समाचार है? ग्लोबल हॉस्पिटल में दाखिल होते हुए भी उन्होंने किताब की जानकारी चाही। मैंने कहा, भाई साहब, जल्दी छप जायेगी, थोड़ी रह गयी है। उन्होंने कहा कि ओवर टाइम (अतिरिक्त समय) लगा के, रात-दिन लगाके जल्दी छपवाओ। मैंने कहा, तीन-चार दिन तक छप जायेगी। वे बोले, तब तक बहुत देर हो जायेगी। मुझे आभास हुआ कि वे शरीर छोड़ने से पहले किताब को पूर्ण देखना चाहते हैं। कंवर पेज की स्कैनिग नहीं हुई थी तो सुबह हमने अहमदाबाद जाकर वहीं बैठकर स्कैनिंग करवायी और रात को आकर रातों रात कंवर पेज छापके सुबह बाइण्डर्स के आते ही वह पुस्तक तैयार करवायी। शाम को जाकर उनको पुस्तक दिखायी, देखकर बहुत खुश हुए और उनके मुख से वही शब्द निकले, थैंक्स, यह भी काम पूरा हुआ। उनके शरीर छोड़ने के तीन-चार दिन पहले की यह बात है। उनके मन में था कि जो चीजें मेरे से रह गयी हैं, उनको अपने सामने ही पूरा करके जाऊं। अन्त तक वे सेवा करते रहे। उनको आभास था कि मैं जल्दी ही जाने वाला है।

मैंने कहा, आप राम समान हैं और मैं भरत समान हूँ

जब वे बीमार थे और मधुबन सुखधाम में रहते थे तब मैं उनसे मिलने गया था कुछ किताबें लेकर। उस समय उन्होंने बहुत दिलसे, खुलकर बातें की। मैगज़ीन के बारे में पूछा, उसकी संख्या के बारे में पूछा। 'ज्ञानामृत' और 'वर्ल्ड रिन्युअल' पत्रिकायें भी दिखायीं। बहुत खुश हुए और कहा कि "आपने स्टैण्डर्ड अच्छा मेन्टेन किया है।" मैंने कहा, "भाई साहब, मैं तो आपका ही कारोबार सम्भाल रहा हूँ। आप राम के समान हैं, मैं भरत के समान है। आपके मार्गदर्शन में आपका ही कार्य सम्भाल रहा हूं।" उन्होंने कहा, "नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं। आप भी बहुत अच्छे अनुभवी हो गये हो।" उन्होंने कहा कि "मैगज़ीन और पुस्तकों का प्रिंटिंग स्तर बढ़ा है। आपस में सब भाई-बहनें मिलकर बहुत अच्छी तरह से कारोबार सम्भाल रहे हो। बहुत अच्छा कार्य चल रहा है। मुझे बहुत खुशी है, मैं अभी सन्तुष्ट हूं ।" उनके मुख से इन बातों को सुनकर मेरा दिल भर आया। मेरा लक्ष्य था कि कभी मैं उनको सन्तुष्ट करूँ, आज वो पूरा हो गया। मुझे बहुत खुशी हुई।

उन्होंने बाबा का और ईश्वरीय विश्व विद्यालय का नाम प्रत्यक्ष किया

वे अन्त तक कहते रहे कि मैं बाबा को प्रत्यक्ष नहीं कर सका लेकिन मैं कहता हूं कि उन्होंने बाबा का और ईश्वरीय विश्व विद्यालय का नाम प्रत्यक्ष किया ही है। उनकी आयु 72 वर्ष की थी लेकिन उन्होंने 100 वर्षों जितनी सेवा की। उन्होंने बहुत लिखा है। उनकी एक किताब छपी है महिलाओं पर, जिसका नाम है, "महिला सशक्तिकरण", बहुत जबरदस्त किताब है। उसके लिए उन्होंने बहुत रिसर्च की है। महिलाओं के बारे में वेदों में क्या कहा हुआ है, सूरदास ने क्या कहा है, कबीरदास ने क्या कहा है, ऋषि-मुनियों ने क्या कहा है, नारी की किन्होंने क्या ग्लानि की है- वो सब खोज़ करके उस पुस्तक में लिखा है। उसमें ऐसी-ऐसी खोजपूर्ण बातें हैं कि बहुतों को पता ही नहीं हैं। वे इतना लिखकर हमें दे गये हैं कि उसको हम पढ़ते और रिवाइज़ करते रहेंगे तो पुरुषार्थ में, ज्ञान में हमें बहुत लाभ होगा।

उन्होंने अपने शरीर के रोम-रोम को, एक-एक हड्डी को सेवा में लगाया

उनके शरीर छोड़ने से कुछ मास पूर्व वे मधुबन से दिल्ली जा रहे थे। सी ऑफ़ करने मैं भी रेलवे स्टेशन पर गया था। उस समय वे बहुत कमज़ोर थे। व्हीलचेअर पर बिठाकर उनको गाड़ी में बिठाया गया। उन्हें देखकर फ़ौरन मुझे 40 साल पुराना दृश्य याद आया। उस समय बाबा ने मुझे पहले-पहले उनके पास कमला नगर भेजा था। आप जानते हैं, दिल्ली तो बहुत बड़ा शहर है। भ्राता जी खुद मुझे घुमाने ले गये और हमारे काम जहाँ-जहाँ होते थे, उन सब स्थानों का अवलोकन कराया, जैसे कि ब्लॉक बनने का स्थान, पेपर मिलने का स्थान, प्रिंट होने का स्थान इत्यादि। उस समय उनका हृष्ट-पुष्ट शरीर था, लम्बी-लम्बी टांगें, भुजाये, छः फुट का कद था। वे चलते थे तो मैं भागता था। इतनी उनकी चलने की रफ्तार थी। चालीस वर्ष पहले वे कैसे थे और चालीस वर्ष बाद आज वे कैसे हैं। इन चालीस वर्षों में उन्होंने कितने कार्य किये हैं। जाना तो हम सभी को है, आज नहीं तो कल। सबको एक दिन शरीर को तो छोड़ना ही है लेकिन उन्होंने अपने शरीर के रोम-रोम को, एक-एक हड्डी को सेवा में लगाया।

जीवन भर बाबा की सेवा में लगे रहे

एक बार वे मेरे से कह रहे थे कि जब वे शुरू-शुरू में आये थे तब उनको देखकर मम्मा ने कहा था कि "अगर आप इसी रीति से पुरुषार्थ करते रहोगे तो नम्बर वन में आओगे। लेकिन उन पर सेवा की बड़ी जिम्मेवारी थी। उन्होंने न केवल साहित्य की सेवा की बल्कि प्रशासनिक सेवा भी बहुत की। यज्ञ में आने वाले तरह-तरह के विघ्नों, परिस्थितियों का सामना करने में, सुलझाने में ही उनका ज्यादा समय गया। फिर उनका पुरुषार्थ बहुत ज़बरदस्त था। उन्होंने कभी न मान चाहा, न स्थान, न सुख, न वैभव। जीवन भर बाबा की सेवा में लगे रहे, लगे ही रहे। एक विशेष बात उनमें यह थी कि वे यज्ञ के किसी भी नुक़सान को, व्यर्थ व्यय को सहन नहीं कर सकते थे।

अन्त तक सेवारत

वे पुस्तकों, लेखों, अनुभवों के रूप में इतना ज्ञान खज़ाना हमें प्रदान करके गये हैं कि आगे के समय में हम उनसे लाभान्वित होते रहेंगे। उनके द्वारा निर्मित ईश्वरीय संविधान, उनका स्वयं का नष्टोमोहा स्मृतिर्लब्धा स्वरूप, ईश्वरीय नियम, धारणाओं में अचल अडोल जीवन हमें सदा प्रेरित करता रहेगा। अन्तिम श्वास तक उनको स्वयं से एक ही गिला रहा कि मैं शिव बाबा को सम्पूर्ण जगत में प्रत्यक्ष नहीं कर पाया। सच्चे स्नेही के रूप में अब हम उनकी प्रत्यक्षता की इस शुभ आशा की पूर्णता का दृढ़ संकल्प करें और उसमें जी-जान से जुट जायें।
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बाबा ने वरदान दिया और सरस्वती उनकी कलम पर चढ़ गयी

भ्राता जगदीश जी की अंग्रेज़ी किताबों की प्रूफ रीडिंग करने वाले और अंग्रेज़ी मैगज़ीन 'दि वर्ल्ड रिन्युअल' के सह-सम्पादक, कुरुक्षेत्र के ब्रह्माकुमार भ्राता लक्ष्मण जी ने, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाये हैं-
दिल्ली में इन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग की। डॉ जाकीर हुसैन, जो बाद में भारत के तृतीय राष्ट्रपति बने, वे इनके प्रिन्सीपल थे और उन्होंने इनको पढ़ाया भी था। इन्होंने बी. एड. सन् 1951 में की और मैंने सन् 1952 में की क्योंकि डिग्री के बाद मैंने एक साल नौकरी की।
जगदीश भाई के पिता जी नहीं चाहते थे कि जगदीश भाई ज्ञान में चलें। वे चाहते थे कि ये नौकरी करें। जब जगदीश भाई ने नौकरी छोड़ी और सेन्टर पर रहने के लिए तैयार हुए तो उनके पिता जी इनको डॉ. ज़ाकीर हुसैन जी के पास ले गये समझाने के लिए। उस समय वे भारत के उपराष्ट्रपति थे। जाकीर हुसैन जी ने जगदीश भाई से कहा, तुम वहां जाना छोड़ दो, तुमको मैं आई.ए. एस. करवा देता हूँ। कलेक्टर की नौकरी दिला देता हूँ लेकिन जगदीश भाई ने नहीं माना। उन्होंने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए, जो चाहिए वो मिल गया है।
ज्ञान में आने के बाद जब उनको देखा तो मुझे ये तीन विशेषतायें उनमें नज़र आयी एक, स्वयं की पहचान, दूसरी, बाप परमात्मा की पहचान और तीसरी, समय की पहचान। इन तीनों को उन्होंने अच्छी तरह पहचाना था इसलिए इन तीनों को वे बहुत महत्व देते थे। वे हर वक्त बाबा की याद में रहते थे। उनमें अलौकिकता बहुत थी। हर बात वे ज्ञानयुक्त बोलते थे। एक बार करनाल में प्रदर्शनी लगी हुई थी। वे भी आये थे। रात को जब सोने लगे तो रजाई ओढ़ते उन्होंने कहा कि चलो भाई, अब कब्र दाखिल होना है। वे गंभीर भी उतने ही थे और हंसमुख भी उतने ही थे। कार्य करने में उनको अपने में बहुत विश्वास था। दूसरों को भी वे ऐसे ही बनाने की कोशिश करते थे और बनाते भी थे।

तेज़ बुद्धि वाले और तेज़ नज़र वाले

ज्ञानामृत पत्रिका का नाम पहले 'त्रिमूर्ति' था, छपवाने के लिए कागज के बंडल कंधे पर रखकर छापेखाने में ले जाते थे। लोग इनको देखकर हँसते थे कि देखो यह ज्ञानामृत का संपादक क्या कर रहा है! पत्रिका छपने तक लेखों को लिखते ही रहते थे और करेक्शन करते ही रहते थे। उनकी बुद्धि और नज़र इतनी तेज़ थी कि पुस्तक या मैगज़ीन की ग़लतियां जहाँ होती थीं वहीं नज़र जाती थी। एक बार मुझे ज़िम्मा दिया, हिन्दी और अंग्रेज़ी मैगज़ीन छपवाने का। मैगज़ीन छप चुकी थी लेकिन जगदीश भाई ने उसकी ग़लती निकाल कर सुधारने के लिए कहा। प्रेस में जो कंपोज़र था, वो हंस पड़ा। कहता है, एक ऐसा भी संपादक है जो मैटर छपने के बाद भी ग़लतियाँ निकाल कर ले आता है करेक्शन के लिए।

साहित्यकार भी और भौतिक शास्त्री भी

जगदीश भाई आर्टस पढ़े थे लेकिन साइंस में भी उनकी अच्छी पकड़ थी। उन्होंने एक किताब लिखी थी 'साइंस एण्ड स्पिरीचुअलिटी' (विज्ञान एवं अध्यात्म)। इसको पढ़कर साइंस वाले भी हैरान होते थे। इनकी 'इटरनल वर्ल्ड ड्रामा' ('अविनाशी विश्व नाटक') पुस्तक साहित्य और भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में अ‌द्भुत है। जब मैंने कई वैज्ञानिकों और भौतिकशास्त्रियों को उसे पढ़ने के लिए दिया तो उन्होंने कहा कि यह कौन-सा महान भौतिकशास्त्री है जिसने इसको लिखा है। वह किताब लिखकर उन्होंने भौतिकशास्त्र (Physics) को ही बदल दिया। हालांकि वे दिव्यदृष्टि में कभी नहीं गये लेकिन उनकी दिव्यबुद्धि बहुत तेज़ थी। वे हर वक्त सोचते रहते थे। उन्होंने साइंसदानों की कई महफ़िलों में भाषण दिये। उन्होंने 'लॉ ऑफ एन्ट्रोपी' को सिद्ध किया कि जैसे यह लॉ भौतिकशास्त्र में है ऐसे अध्यात्म में भी है। उन्होंने वैज्ञानिकों के सम्मेलनों में सिद्ध किया कि सतो, रजो और तमो अवस्थायें भौतिकशास्त्र में भी हैं और आध्यात्मिक शास्त्र में भी हैं।

मम्मा-बाबा भी उनको बहुत रिस्पेक्ट देते थे

बहनों का वे बहुत आदर करते थे। उन्हें वे 'शक्ति', 'देवी' समझते थे। मम्मा की बहुत-बहुत रिस्पेक्ट करते थे। जैसे भक्त दुर्गा माता वा जगदम्बा को भक्ति भाव से देखते हैं, वैसे जगदीश भाई मम्मा को दुर्गा माता के रूप में देखते थे। बहनों के आगे सिर झुकाकर मिलते थे। जिन्होंने भी उनके साथ सेवा की है वे कर्मठ (हार्डवर्कर) बने और आत्मविश्वासी बने। साथियों में जगदीश भाई ये विशेष गुण भरते थे। बाबा भी उनको बहुत प्यार करते थे।
सन् 1962 में हम दिल्ली में मेजर की कोठी पर गये थे। जगदीश भाई उन दिनों लिख रहे थे भक्ति और ज्ञान में क्या अन्तर है। उनको सर्दी, जुकाम, बुखार आये हुए थे। यह समाचार सुनकर बाबा कमला नगर सेन्टर की तीन मंज़िल चढ़कर उनसे मिलने गये थे।

वे बुद्धिमान, कर्मठ और समर्पण भाव वाले थे

वे आयु में मेरे से छोटे थे लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता, कर्मठता, व्यवहार, सेवा के प्रति समर्पण भाव से मैं प्रभावित था। उन के लिए मेरा बहुत रिस्पेक्ट था। महीने में कम से कम तीन बार मैं उनके पास ज़रूर जाता था। एक बार जाता था 'वर्ल्ड रिन्युअल' मैगज़ीन का मटीरियल (लेखन सामग्री) लेने। पहले मैं उन लेखों को पढ़कर उनमें से कुछ सिलेक्ट करता था, उनको छापें या न छापें, यह पूछने के लिए दूसरी बार जाता था। कंपोज़िंग और प्रूफ रीडिंग के बाद उनको दिखाने के लिए तीसरी बार जाता था। कृष्णा नगर से बस में जाता था। वहां पहुंचने के लिए कभी-कभी दो बसें भी बदलनी पड़ती थी। जो भी जगदीश भाई ने कहा, मैंने उस आज्ञा का पालन किया क्योंकि उनमें सच्चाई, त्याग और तपस्या का बल था। बाबा की सेवा और बाबा से सम्बन्ध में वे सच्चे थे।

वे दिलेर बहुत थे

वे दिलेर (साहसी) बहुत थे। एक दफ़ा हापुड़ में गड़बड़ हो गयी। एक माता थी रिजू माता। अग्रवाल परिवार की थी। उसका पति पवित्र रहना नहीं चाहता था। पचास साल के ऊपर उनकी उम्र थी। उस व्यक्ति के कारण यह हंगामा हो गया। उसने सेन्टर की बिजली कटवायी, पानी के पाइप कटवाये। वहां की बहनों के लिए राशन पहुंचाने जगदीश भाई दिल्ली, कमला नगर से जाते थे। एक दिन उन लोगों ने सोचा कि जब यह बस से उतरेगा, इसके ऊपर ट्रक चढ़ा देंगे। लेकिन उस दिन जगदीश भाई को बाबा की टचिंग हुई कि आज पैदल नहीं जाना है, रिक्शे में जाना है और साथ में पुलिस वालों को ले चलना है। वे बस से उतर कर सीधे पुलिस थाने गये। वहां से पुलिस वालों को लेकर, रिक्शे में सेन्टर पर जाकर राशन देकर आये। उन्होंने बताया कि अगर उस दिन पुलिस वाले मेरे साथ नहीं होते, तो वो लोग मेरे ऊपर ट्रक चढ़ा देते।

उन पर बाबा और दादियों का अति प्रेम और विश्वास था

बाबा ने उनको हर प्रकार की सेवा पर भेजा और हर प्रकार से उनकी रक्षा की। उनके सिर पर बाबा का हाथ था, उनका साथ था। बाबा ने उनको 'संजय' इसीलिए कहा कि उन्होंने बाबा के ज्ञान को कलियगी मनुष्यों के समझने लायक बनाया। यह उनका पार्ट रहा। जगदीश भाई उर्दू, पर्शियन, अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी आदि कुल छह भाषाये जानते थे। वे बाबा के राइट हैंड थे। दादियां और बहनें भी जगदीश भाई का बहुत रिस्पेक्ट करती थीं। जो काम कोई नहीं कर सकता था, वो काम दादी जी उनको देती थीं। मैंने देखा, उनमें प्लानिंग बुद्धि बहुत थी।
एक बार हमने शिमला में प्रदर्शनी लगायी थी। उसमें मुंबई से निर्वैर भाई भी आये थे। वो प्रदर्शनी दिल्ली की तरफ से लगी थी। मेरे को लिटरेचर काउण्टर पर बिठा दिया गया। उस समय किताबों का दाम दो आने, चार आने से ज़्यादा नहीं होता था। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नन्दा जी ने एक साधु समाज की स्थापना की थी और एक नारा निकला था कि 'भ्रष्टाचार मिटे और श्रेष्ठाचारी बनें! जगदीश भाई ने एक किताब लिखी थी 'श्रेष्ठाचारी कैसे बनें ?' उस किताब के कवर पर लक्ष्मी-नारायण का चित्र था। उस प्रदर्शनी में मैंने वह किताब खूब बेची। एक दिन में ही 740 रुपये की किताबें बेचीं। तो जगदीश जी ने बाबा को पत्र लिखा कि बाबा, लक्ष्मण भाई, जो नया निकला है, इसको बेचने का ढंग आता है। एक दिन में ही इसने इतनी सारी किताबें बेचीं। फिर बाबा ने मुझे पत्र लिखा कि आप सेल्समैन भी बहुत अच्छे हो।

कभी हार न मानने वाले अजेय वीर

सन् 1987 में कुरुक्षेत्र में मेला लगाया गया था। वो सूर्यग्रहण मेला था। वैकुण्ठ तालाब के ऊपर लगा था। आज वहाँ गुलजारी लाल नन्दा जी का स्मारक बना हुआ है। उस दिन इतनी आन्धी और तूफान आये कि टेंट उड़ गया। फिर हम वहाँ के एक हॉल में गये। उस मेले में गुलज़ार दादी, चन्द्रमणि दादी और चक्रधारी बहन भी आयी थीं। जगदीश भाई भी आये थे। लोगों ने कहा, यह मेला फिर नहीं लगेगा, इन ब्रह्माकुमारियों से फिर लगने वाला नहीं है लेकिन जगदीश भाई ने भाषण किया, यह मेला दुबारा लगेगा ज़रूर। जगदीश भाई ने सबको साथ लेकर उस मेले को दो दिन में फिर खड़ा कर दिया। मेले में लगभग 26 बड़े-बड़े आफिसर्स आये हुए थे। इस प्रकार, कोई भी काम एक बार हाथ में लिया माना उसको पूरा करना ही है। वे कभी हार नहीं मानते थे।
अन्त समय में उन्होंने हमें सोनीपत की ज़मीन दिलवायी। शरीर छोड़ने से तीन दिन पहले मैं उनसे मिला था आई.सी.यू. में। हाथ उनके बहुत पतले और कमज़ोर हुए थे। फिर भी वे हमारे साथ बोलते रहे, उस ज़मीन में क्या-क्या बनाना है, कैसे सेवा करनी है यह बताते रहे। अन्त तक वे बाबा-बाबा, सेवा-सेवा करते रहे। मैंने उनको लौकिक में भी देखा था और अलौकिक में भी देखा। लौकिक में उनमें जो गुण, विशेषतायें और आदतें थीं उनको ही उन्होंने अलौकिक में पोज़िटिव रूप में लगाकर ईश्वरीय सेवा की।

निराभिमानी और निरहंकारी

यज्ञ में जब बेगरी पार्ट चल रहा था, तब जगदीश भाई ही भारत के पहले-पहले ईश्वरीय विद्यार्थी और समर्पित कुमार थे। जगदीश भाई बहुत सिम्पल (सादे) और हम्बल (विनम्र) थे। उनमें अभिमान या अहंकार नामक चीज़ ही नहीं थी। समय अनुसार, स्थान अनुसार एडजस्ट होकर चलते थे। किसी वस्तु की डिमाण्ड नहीं करते थे। जो मिले, रूखी-सूखी स्वीकार करते थे। यह बाबा की सेवा है, इसको पूर्ण करना है, बस, इसी धुन में लगे रहते थे। एक बार एक प्रकाशक उनके पास आया। उसने कहा कि आपने बहुत पुस्तकें लिखी हैं, सब मुझे दे दो, मैं छापता रहूंगा और घर बैठे आपको रॉयल्टी पहुंचाता रहूंगा लेकिन जगदीश भाई ने नहीं माना। एक बार अमृतसर में प्रोग्राम हो रहा था। जगदीश भाई आये वहाँ। सब कुर्सियाँ भर गयी थीं, एक भी खाली नहीं थी। वे खुद जाकर एक कुर्सी ले आये और वहाँ लगाकर बैठ गये। इतने निरहंकारी और सरल व्यक्ति थे। जगदीश भाई को सारी दुनिया का ज्ञान था। अगर कोई शास्त्रार्थ करने वाले आते थे तो उनके साथ शास्त्रार्थ भी करते थे। संस्कृत में श्लोक भी बोलते थे। वे उर्दू भी अच्छी बोलते थे। आर्य समाज वालों के साथ भी अच्छी चर्चा करते थे। हर धर्म वालों के साथ वे बात करते थे और उनको ईश्वरीय ज्ञान का स्पष्टीकरण देते थे। विद्यार्थी जीवन में वे इतने अच्छे वक्ता और लेखक नहीं थे लेकिन बाबा के बनने के बाद वक्ता भी बहुत अच्छे बने और लेखक भी बहुत अच्छे। बाबा ने उनको वरदान दिया और सरस्वती उनकी कलम पर चढ़ गयी। बाबा से मिलने के बाद बुद्धि तो सबकी खुलती है लेकिन जगदीश जी की विशेष खुली और विशेष वरदान मिला।"
इस विषय में भ्राता जगदीश जी खुद इस प्रकार कहते हैं:
"संसार में इतने अच्छे-अच्छे लेखक हैं, वे लिखते हैं तो लाखों की संख्या में पुस्तकें बिकती हैं, लोग पढ़ते हैं और उन्हें पुरस्कार भी मिलते हैं। मैं वैसे तो लेखक नहीं था लेकिन पढ़ने वालों को स्पष्ट रूप से समझ में आने जैसा कुछ लिख सकता था। जब बाबा ने कहा लिखने के लिए तो मेरा भी मन हुआ कि चलो, बाबा की सेवा हो सकती है तो मैं भी लिख दूं।
हुआ यह कि जब हम कमरे में गये तो बत्ती बुझ गयी। उन दिनों सुबह की क्लास साढ़े चार बजे होती थी। चार से साढ़े चार बजे तक योग होता था, उसके बाद मम्मा आती थीं, वाणी चलाती थीं और उसके बाद बाबा आते थे, मुरली सुनाते थे। सुबह तो नहाने-धोने, क्लास में जाने का समय होता था, यही समय (रात का) था लिखने का। जब बत्ती बुझ गयी तो कैसे लिखें?
मैंने सोचा कि मेरे लिए तो यह बाबा का पहला आदेश है, सदगुरू कह दीजिये, शिक्षक कह दीजिये, पिता कह दीजिये, उनका यह मेरे प्रति पहला फरमान है। यदि हम कहेंगे कि हम नहीं करेंगे, तो यह अवज्ञा करने की आदत पड़ जायेगी। शिव बाबा तो त्रिकालदर्शीं हैं, उनको मालूम रहा होगा कि लाइट चली जायेगी, उसके बावजूद भी उन्होंने कहा है कि कल लिख लाना अतः मैं तो लिखकर ले जाऊँगा।
फिर मैंने बाहर देखा तो नीचे रोड पर स्ट्रीट लाइट जल रही थी। मैने सोचा कि वहां जाकर लिख लूं। जैसे आज कड़ाके की सर्दी है, वैसे उन दिनों में भी कड़ाके की सर्दी थी। लगभग ये ही दिन थे। वहां जाकर मैंने पहले हिन्दी में लिखा, उसको पढ़ा, ठीक किया फिर उसको दुबारा लिखा एक अच्छे काग़ज़ पर क्योंकि शिव बाबा को दिखाना है जो सबसे बड़ी अथॉरिटी है। फिर अंग्रेज़ी में लिखना शुरू किया। अंग्रेजी की शैली अलग होती है। एकदम सौ प्रतिशत अनुवाद नहीं हो सकता है। उसको लिखकर फिर ठीक किया, उसको दुबारा अच्छे कागज पर लिखा। उतने में लगभग सुबह के तीन साढ़े तीन बज गये। जब मैं कमरे में गया तो गीत बज रहा था, "जाग सजनिया जाग..."।
बाबा ने मेरे से कहा, अच्छा बच्चे, क्या लिख लाये हो, पढ़ो। मैंने पढ़ा। लेख इतना चमत्कारी नहीं था, साधारण ही था। सिर्फ जो कहना था उसको स्पष्ट रूप से कहा था। वो मेरा श्रद्धा का फूल था बाबा के प्रति, वो मेरी भावना थी बाबा के प्रति। उसमें कोई विशेष शैली, चमत्कार नहीं था। बाबा की आज्ञा का पालन करने के लिए ही तो लिखा था। मैंने सुनाया। बाबा तो भोलानाथ है, बच्चों पर सब-कुछ लुटाने वाला है, उसको अपने बच्चे को आगे बढ़ाना था तो अपने वरदानी महावाक्य बोला कि "बच्चे, इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का साहित्य लिखने का बाबा आपको वरदान देता है।" उसी दिन से बाबा ने मुझे कहा कि "ईश्वरीय विश्व विद्यालय के ज्ञान को कहीं भी पेश करने के लिए मुख्य वक्ता आप ही हो।" यह तो मेरे लिए एक आश्चर्य था, अजीब सी बात थी। मैने यह सोचा भी नहीं था। शुरू से बाबा में मेरी जो भावना थी, स्नेह था, श्रद्धा थी, अगाध प्यार था उसके लिए मैंने यह लिखने का काम किया था।
मेरी आंखें गीली हो गयीं। मुझे ऐसा लगा कि ओहो एक पल में बाबा ने मुझे क्या दे दिया मै लिखूंगा, वो छपेगा और संसार के सामने जायेगा, उसके द्वारा सेवा हो जायेगी, उनके आशीर्वाद मुझे मिलेंगे। बाबा ने मुझे इतना दे दिया, इतना दे दिया कि मुझे अपार कृपा, अकारण कृपा मिल गयी। बाबा को कहते हैं कृपालु, दयालु, वरदानों के भंडार, भोले भंडारी हैं। यह उसकी पहली झलकी थी, पहला स्वरूप था।
इसके बाद भी ऐसी कई घटनायें हुई। एक बार, मम्मा भी बैठी थीं, मैं भी बैठा था चेम्बर में क्लास के बाद। मम्मा तो माँ सरस्वती है ही।
बाबा ने मम्मा को संबोधित करते हुए हम सबको, जो वहाँ बैठे थे, कहा कि यह तो साक्षात् सरस्वती है। मम्मा तुम इसकी बुद्धि में बैठ गयी हो? यह बाबा ने कहा मम्मा को। मम्मा का स्वाभाविक संस्कार कहो, स्वभाव कहो यह था कि बाबा जो भी कहे, उसके लिए "हाँ जी" कहना। अगर बाबा कहे, तुम उल्लू हो, उसके लिए भी मम्मा "जी बाबा" कहती थी। जब बाबा ने यह बात कही कि मम्मा तुम इसकी बुद्धि में बैठी हो, मम्मा ने कहा, हां बाबा। मुझे बड़ी खुशी हुई कि साक्षात् सरस्वती जो विद्या की देवी हैं, वो भी मुझे आशीर्वाद दे रही हैं, साक्षात् प्रजापिता ब्रह्मा जो सृष्टि के आदि पिता हैं, ज्ञान के आदि भंडार हैं उन्होंने भी अपना हाथ मेरे ऊपर रखा है, आशीर्वाद दिया है। यह मेरा परम सौभाग्य है। उस दिन से मैंने सोचा कि बाबा की कोई भी आज्ञा हो, उसको टालना नहीं चाहिए। बाबा की आज्ञा का पालन हम करते चलेंगे तो बाबा हमें भंडारों से भरपूर करेंगे।"

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उनमें यह खूबी थी कि आपका वर्णन आपके सामने नहीं, दूसरों के सामने करेंगे

ब्रह्माकुमार भ्राता ओम् प्रकाश जी, जो मधुबन के ट्रान्सपोर्ट और टुरिज्म विभाग के अध्यक्ष थे, दिल्ली में जगदीश भाई साहब के साथ कमला सार सेवाकेन्द्र में सेवारत रहे थे, अपने संस्मरण इस तरह सुना रहे हैं-
"जगदीश भाई से हमारी पहली मुलाकात दिल्ली में सन् 1953-54 में हुई थी। मुझे ज्ञान कमला नगर सेन्टर से मिला, वहीं मैं उनसे भी मिला। जगदीश जी हमारे से पहले ज्ञान में आ चुके थे। मैंने देखा, वे कमला नगर सेन्टर के एक छोटे-से कमरे में रहते थे। ज्ञान में आने से पहले भी मैं उनको जानता था। उनसे पहचान इसलिए हुई थी कि मैं देहली यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में नौकरी करता था। पुस्तकें देखने के लिए वे वहां आया करते थे। मैं ही उनको पुस्तक, मैगज़ीन आदि निकाल कर देता था। उस तरीके में मैंने उनको देखा था। तब मुझे यह पता नहीं था कि वे ब्रह्माकुमार हैं। उसके बाद जब मैं सेन्टर पर गया तब इनको वहाँ दूर से देखा था। ज्ञान में चलने के बाद अच्छा परिचय हुआ। कुछ साल मैं कमला नगर सेन्टर पर रहा भी। वे जो सेवा कहते थे, कर देता था लेकिन मेरी सेवा सिर्फ उनका ही काम करना नहीं थी, मैं सेन्टर के हर तरह के काम करता था। उनका विशेषकर लिखने का काम रहता था, उस छोटे-से कमरे में बैठकर लिखते रहते थे।

वे थोड़े में सन्तुष्ट नहीं होते थे

उनकी यह खूबी थी कि वे थोड़े-से काम से सन्तुष्ट नहीं होते थे। अगर उन्होंने एक काम बता दिया, उसको पूर्ण करके उनके पास वापस पहुंचते ही, वे दूसरा काम तैयार रखते थे, उसे करने भेज देते थे। भले ही वह व्यक्ति थका हुआ भी हो, उसकी परवाह नहीं करते थे, उनको तो समय पर बाबा का काम करवाने से मतलब था। मैं जगदीश भाई के पास ज़्यादा नहीं रहता था, मेरा काम था आने वालों को रिसीव (स्वागत) करना, जाने वालों को सी-ऑफ करना (छोड़ आना) और पार्सल वगैरह भेजना तथा ले आना। हाँ, जो भी काम वे मुझे बताते थे, मैं कर देता था। सन् 1956 तक मैं अपने घर में था, उसके बाद कमला नगर सेन्टर पर रहने लगा। मैं और जगदीश भाई इकट्ठे रहते थे। जगदीश भाई ऊपर अपने कमरे में सोते थे, मैं क्लास हॉल में नीचे सो जाता था और जल्दी उठकर स्नान आदि करके स्टेशन या बस स्टैण्ड भागना पड़ता था। साथ-साथ मैं नौकरी भी करता था। देहली में उस समय जितने भी सेन्टर थे, उन सब में मैं रहा हुआ हूँ। सबसे ज़्यादा समय रहा राजोरी गार्डन सेन्टर पर। सन् 1970 में मैंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझे मधुबन के लिए बुलावा आया। जगदीश जी के साथ हमारा अलौकिक बचपन से ही स्नेह रहा। वे बहुत हार्ड वर्कर (कठिन परिश्रमी) थे। उनको देख-देखकर हमें प्रेरणा मिलती रही जिससे हम भी उन जैसे हार्डवर्क करते थे।
बाबा के अव्यक्त होने के बाद 1970 में दीदी और दादी ने मुझे मधुबन बुलाया तीन मास के लिए लेकिन वो तीन मास पूरे ही नहीं हुए। जब से आया तब से यहीं रह गया। उन दिनों मधुबन में ज़्यादा भाई लोग तो थे नहीं। मैं सेवा में इतना व्यस्त हो गया कि वापस जाने की याद ही नहीं आयी।
जगदीश जी मेरे से बहुत सेवा लेते थे और हार्ड वर्क कराते थे लेकिन उतना ही मेरे प्रति उनका अन्तः स्नेह था। मेरे से उनका इतना स्नेह था कि उन्होंने खास पासपोर्ट बनवाया मुझे रशिया भेजने के लिए लेकिन कुछ दिनों के बाद उन्होंने शरीर छोड़ दिया। उनके जाने के बाद रशिया जाने का मन नहीं बना, मैं गया नहीं।

जगदीश भाई बड़े बुद्धिवान थे

जगदीश भाई बड़े बुद्धिवान थे। उनकी लेखनी बहुत जबर्दस्त थी। आज तक किसी ने भी उन जैसे साहित्य लिखा नहीं है और न लिख पायेगा। बाबा ने ऐसे ही उनको टाइटिल नहीं दिया था 'गणेश जी'। उनका सबके साथ स्नेह था। अपने साथ रहने वालों से काम खूब लेते थे लेकिन स्नेह भी उतना और ख्याल भी उतना रखते थे। साथ में कहीं जाते थे तो खाने-पीने का, रहन-सहन का बहुत ख्याल रखते थे। जब भी हम शक्ति नगर सेन्टर पर जाते थे तो हर चीज़ का ख्याल रखते थे। सबके साथ उनका व्यवहार बहुत सम्मानपूर्ण और स्नेहपूर्ण रहता था। उनमें यह खूबी थी कि आपका वर्णन आपके सामने नहीं करेंगे, दूसरों के सामने करेंगे।
मैं यह निश्चय से कहता हूँ कि जो एक बार उनके साथ रहेगा वह कभी अलौकिक जीवन में हार नहीं खायेगा, सेवा में न थकेगा, न घबरायेगा।

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जगदीश भाई साकार बाबा के राइट हैण्ड थे और यज्ञ के कार्य-कलापों में मुख्य व्यक्ति थे

पंजाब ज़ोन की ईश्वरीय सेवा के निर्देशक तथा समाजसेवा प्रभाग के उपाध्यक्ष ब्रह्माकुमार भ्राता अमीर चन्द जी, भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"जगदीश भाई दिल्ली में रहते थे, मैं चंडीगढ़ में रहता था, उससे पहले मैं हरियाणा के करनाल में रहता था। जब दिल्ली में हरिनगर की शुक्ला बहन और सुन्दर लाल भाई की अलौकिक शादी हो रही थी उस समय करनाल से मनोहर दादी जी मुझे उस प्रोग्राम में ले गयी थीं। उस कार्यक्रम में उन्होंने ब्राह्मण का पार्ट निभाया था। तभी उनको मैंने पहली बार देखा था। जगदीश भाई तो वैसे ही संस्कृत में प्रवीण थे। उन्होंने उस शादी में ऐसे मंत्र और श्लोक आदि पढ़े कि देखने वाले दंग रह गये। सुन्दर लाल भाई के और शुक्ला बहन के लौकिक परिवार वालों को लौकिक रीति से शादी कराने की इच्छा थी। वे सुन्दर लाल भाई को घोड़ी पर बिठाकर ले आये थे। लड़की की तरफ़ से चन्द्रमणि दादी जी और लड़के की तरफ़ से मनमोहिनी दीदी जी थीं। यह प्रोग्राम बड़े पैमान पर हुआ था। उस समय मैंने जगदीश भाई को सिर्फ देखा था, परिचय नहीं था।

एक महान् योजनाकर्ता

उसके बाद सन् 1973 में जब दिल्ली रामलीला मैदान में मेला हुआ, तब मैं दिल्ली में एक महीना रहा, उस समय मैं जगदीश भाई के ज्यादा नज़दीक आया। मैं समझता हूँ, वो हमारी संस्था का पहला पहला मेला था। उस मेले में हर ज़ोन को एक-एक स्टाल दिया गया था। हम लोगों को दो स्टॉल लगाने के लिए कहा गया था। उस मेले का पूरा मार्गदर्शन जगदीश भाई कर रहे थे कि कैसे-कैसे चित्र बनाने हैं, किस चित्र को कहां लगाना है, उसका रंग-रूप क्या होना चाहिए। ये सब बातें हमें सुनाते थे और हमारे साथ चर्चा करते थे। उस समय मैंने उनको बहुत नज़दीक से देखा। उनकी यह विशेषता थी कि वे जो भी प्लानिंग करते थे, बहुत मेहनत से करते थे। हम लोगों के साथ चर्चा करने से पहले वे खुद समय लगाकर प्लानिंग करते थे। समझो, आज हमसे किसी बात की चर्चा करनी है तो पहले ख़ुद तैयारी करते थे कि इन लोगों से क्या-क्या पूछना है और इन लोगों को क्या-क्या बताना है। मीटिंग के लिए वे न केवल प्लानिंग करते थे बल्कि मीटिंग में चर्चा की जाने वाली बातों को कागज़ पर प्वाइंट्स के रूप में नोट कर लेते थे। हर चीज़ की गहराई में जाते थे और हम लोगों को सुनाते थे, साथ-साथ हमारे से राय भी पूछ लेते थे।
मधुबन में हर साल जो वार्षिक मीटिंग होती थी पूरे भारत की, उस मीटिंग का अजेंडा (कार्य सूची) वो खुद बनाते थे। एक-एक चीज़ का विस्तारपूर्ण विवरण उस में रहता था। वे खुद पहले ही सोचकर तथा लिखकर ले आते थे कि किस सेवा की ज़िम्मेदारी, किस जोन को देनी है।
क्या-क्या सेवा आगे करनी है, मीटिंग में उसकी चर्चा करते थे, सबकी राय पुछते थे और लेते थे। हर साल के लिए वे एक थीम (ध्येय-वस्तु) बनाते थे, अभी भी बनती है। जगदीश भाई में यह विशेषता थी कि थीम फाइनल होने के बाद, उसको अमल में लाने के लिए पीठ किसको करनी है, कैसे करनी है यह भी उसी मीटिंग में फाइनल करते थे। उस थीम पर यदि कोई ज़ोन या सेन्टर वाले कार्यक्रम करना चाहते हैं, उनको लिखत की, प्लानिंग की या अन्य किसी प्रकार की सहायता चाहिए तो उसका प्रबन्ध भी करते थे। खुद लिखकर सहयोग देते थे। जब समाज सेवा प्रभाग आरम्भ हुआ तब उसका फोल्डर, उसके चित्र कैसे हों, क्या-क्या हों, उन सबकी आयोजना उन्होंने ही बनायी थी। मैंने देखा, किसी भी कार्यक्रम का आयोजन करना है, उसके सम्बन्धित जो भी लेटर्स हैं, कार्ड मैटर है, फोल्डर मैटर है, बैनर और होल्डर का मैटर है सब वे ही तैयार करके देते थे। सेवा के सहयोग के लिए हर दम वे तैयार रहते थे।

एक महान् व्यवस्थित प्रबन्धक

जब 1983 में ओम् शान्ति भवन बना तब उनके साथ मेरा और बहुत नज़दीक का सम्बन्ध बन गया। हर साल हम उनके साथ रहकर 'यूनिवर्सल पीस कान्फरेन्स' करते थे। जगदीश भाई, बृजमोहन भाई और मैं- हम तीनों मिलकर कॉन्फरेन्स के प्रोग्राम बनाते थे। जगदीश भाई मुख्य थे और हम दोनों उनके सहयोगी थे। कान्फरेन्स में थीम क्या होना चाहिए, कितने मेन सेसन्स (मुख्य अधिवेशन), कितनी वर्कशाप्स (कार्यशालायें), कौन स्पीकर्स (प्रवचनकार), कौन डेलिगेट्स (प्रतिनिधि), ये सब भाई साहब ही तय करते थे। सम्मेलनों में और मीटिंगों में जगदीश भाई का पार्ट बहुत बड़ा था।
सन् 1987 में मधुबन में सन्त सम्मेलन हुआ। उस समय मैं जगदीश भाई के बहुत ज़्यादा नज़दीक आया। इस सम्मेलन में, यज्ञ के इतिहास में, पहली बार हरिद्वार के महामंडलेश्वरों को बुलाने का लक्ष्य रखा गया था। उनको हमारी स्टेज पर बुलाना, उनको बोलने का अवसर देना, उनके लिए कौन-से टॉपिक्स रखें, कितने सेसन्स और वर्कशाप्स रखें, इन सबकी व्यवस्था करना, यह हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौति थी। भाई साहब ने ही खुद ये सब तैयारियां कीं। सम्मेलन की थीम और फोल्डर्स देखकर महामंडलेश्वरों ने भी आश्चर्य खाया कि कितने अच्छे-अच्छे टॉपिक्स रखे हैं। जगदीश भाई ने ऐसे टॉपिक्स चुने थे कि वे ज्ञानमार्ग में भी मान्य हों और उन महामंडलेश्वरों के भक्तिमार्ग में भी मान्य हों। टॉपिक्स देखकर महामंडलेश्वर कहते थे कि ऐसे टॉपिक्स रखने वाले महा विद्वान भी आपके पास हैं! फोल्डर, निमन्त्रण-पत्र इत्यादि तो सम्मेलन से कई दिन पहले ही तैयार हो गये थे लेकिन सम्मेलन नज़दीक आने के बाद उसकी तैयारी करने और कराने में भाई साहब का पार्ट बड़ा जबर्दस्त था। उन सन्त-महात्माओं का मिनट टु मिनट प्रोग्राम, उनके रहने के स्थान का प्रबन्ध, उनके खाने-पीने का प्रबन्ध, उनको ले आने, ले जाने का प्रबन्ध, जब वे आयेंगे उनका स्वागत कैसे करें, इसका प्रबन्ध, स्टेज पर उनको कैसे बिठायें, उसका प्रबन्ध और अन्त में उनकी विदाई कैसे की जाये इन सब व्यवस्थाओं की प्लानिंग जगदीश भाई जी की ही थी। लौकिक में बड़े-बड़े सन्त-महात्माओं के सम्पर्क में रहने के कारण, वे उनके आचार-विचार, आहार-विहार, पूजा-अर्चना करने की विधि आदि सब जानते थे। जो भी सन्त-महात्मा आने वाले थे, उन सबके भोजन के बारे में जानकारी लेने के लिए मुझे कहा गया था। वे क्या खाते हैं, कब खाते हैं, कैसे खाते हैं- टेबल पर बैठकर या फर्श पर बैठकर। दिन में तीन बार या दो बार या एक बार खाते हैं। वे भोजन में क्या-क्या लेते हैं ये सब जानकारियों इकट्ठी करने की सेवा मुझे दी थी।
विदाई का कार्यक्रम तो बहुत अद्भुत था। मुझे याद है, पहले दीदी के कमरे में, दादी से मिलकर सौगात और टोली लेकर बाहर आना। उस समय एक गीत बजाना, इसके बाद उनको शान्ति स्तम्भ के पास ले जाना, वहाँ एक गीत बजाना और वो गीत कौन-सा होना चाहिए, यह भी उन्होंने फिक्स किया था। वो गीत था 'हम तो आपकी छोटी बहनें हैं, आप तो प्रभु के अनुभवी रत्न हो, हमारे से कोई भूल हुई हो तो क्षमा करना।' उस गीत में ऐसे-ऐसे शब्द थे, उनको सुनकर कई सन्तों की आंखों में आसू आये। शान्ति स्तम्भ से निकल कर, अपने लिए मुकरर्र गाड़ी में बैठकर सीधा आबू रोड जाना था। गाड़ी के पास आने से पहले उनके सामानों को उनकी गाड़ी में रखवाना, उससे पहले सब सामानों को बंधवाकर वहां ले आना- ये ड्यूटी अलग-अलग भाइयों को सौंपी थी। मैंने देखा, उनमें यह विशेषता बहुत जबर्दस्त थी कि हर काम परफेक्ट, एक्यूरेट और समय पर करना। हर कार्यक्रम की तैयारी समय से पहले ही करते थे और हम लोगों से भी करवाते थे। अगर समझिये कार्यक्रम सुबह 10 बजे शुरू होना है तो वे 9.30 या 9.45 बजे आ जाते थे और सारी व्यवस्था देखते थे, चेक करते थे।

वे धीरे-धीरे पीछे हटते गये, दूसरों को आगे बढ़ाते रहे

लास्ट के दिनों में कार्यक्रमों में प्रवचन करना उन्होंने कम कर दिया था। सन् 1997 में दादी चन्द्रमणि जी के शरीर छोड़ने के बाद अमृतसर में एक बहुत बड़ा कार्यक्रम रखा गया था। उस प्रोग्राम में वे खुद आये थे। हमने कहा, भाई साहब, आप स्टेज पर आइये। उन्होंने कहा, अभी मेरा स्टेज पर का कार्य पूरा हो गया। लेकिन प्रोग्राम की सारी तैयारी उन्होंने खुद खड़े होकर करायी जैसे शामियाना लगवाना, कुसीं डलवाना, स्टेज तैयार करवाना।
एक बार दिल्ली में हमने सोशल विंग की ट्रेनिंग रखी थी। ट्रेनिंग किस विषय पर होगी- इसकी एक पूरी फाइल बनाकर हमने भाई साहब को दी। उस ट्रेनिंग के टॉपिक आदि देखकर वे बहुत खुश हुए। उसमें एक टांपिक था "आर्ट ऑफ प्रोब्लम सॉलविंग" (समस्याओं का समाधान करने की कला), इसे देखकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, अगर यह कला सब समझ जायें और उनमें यह कला आ जाये तो सारी समस्यायें ही समाप्त हो जायेंगी। जहां हमने ट्रेनिंग रखी थी वो स्थान था एक कोने में और शक्ति नगर था उसके एकदम उल्टी तरफ। प्रोग्राम शुरू होना था सुबह 10.00 बजे। वे पहुंच गये ठीक 9.45 बजे। हम तो अभी भी तैयारी में लगे हुए थे। इस प्रकार वे समय के बहुत पाबन्द थे।

जहाँ जाते थे, वहाँ के हो जाते थे

वे चंडीगढ़ कई बार आ चुके थे। कोई बड़ा प्रोग्राम हम अरेंज (आयोजन) करते थे तो उनको हम बुलाते थे। उनकी एक विशेषता यह भी देखी कि वे जहां भी जाते थे, वहाँ के हो जाते थे। वहां के भाई-बहनों से मिलजुल जाते थे। ऐसा नहीं, मैं मुख्य वक्ता हूँ, सीनियर हूं, मुझे अलग से और विशेष रूप से व्यवस्था और खाना-पीना चाहिए। नहीं। वे बहुत सिम्पल थे। एक बार वे दिल्ली से चण्डीगढ़ आये थे, साथ में एक टिफ़न बॉक्स लाये थे छोटा-सा। मैंने पूछा, भाई साहब, आप इतना छोटा-सा टिफ़न बाक्स लाये हैं? उसमें भी उन्होंने हमें हंसाया कि छोटा कहाँ है, तीन मंज़िलें हैं! बहुत बड़ा है।

वे बड़े रॉयल थे

अमृतवेले उठना, मुरली सुनना आदि सब नियम-मर्यादाओं में वे बहुत एक्यूरेट थे, कोई समझौता नहीं था। चलना है तो भी, बात करनी है तो भी, डायरेक्शन देना है तो भी बड़े नियमबद्ध, शिष्टाचारयुक्त थे। मधुबन में भी मैं देखता था, क्लास के बाद वे सीधे अपने कमरे में जाते थे। इधर-उधर देखते भी नहीं थे। किसी ने 'ओम् शान्ति' भी कही तो उसका रेस्पाण्ड दिया और चल पड़े। अगर किसी से बात करनी है तो समय देकर बात करते थे। उनसे फोन करके समय लेना पड़ता था ताकि उनसे अच्छी तरह बात की जा सके।

बाथरूम के पास चद्दर बिछाकर सो गये

मैंने उनके साथ रहकर बहुत सेवायें की। एक बार की बात है। बाबा ने कहा था कि हवाई जहाज से पर्चे गिराने चाहिएं। तब जगदीश भाई और मैंने मिलकर जालंधर में यह कार्य किया था। उसके बाद हमें शिमला जाना था क्योंकि वहां मीटिंग रखी थी। उन दिनों आज की तरह ट्रेनों में रिज़र्वेशन आदि होती नहीं थी, टिकट लेना और चल पड़ना। वहां से कालका मेल चलती थी देर रात से। मैं और जगदीश भाई दोनों चल पड़े शिमला के लिए। ट्रेन में बहुत भीड़ थी। बैठने के लिए जगह नहीं थी। जगदीश भाई जी ने क्या किया। अपने पास की एक चद्दर ली और बाथ रूम के पास जो जगह रहती है, वहां बिछाकर सो गये। ऐसे वे बहुत सिम्पल भी थे और रॉयल भी।

इनका अटूट विश्वास बाबा पर और बाबा का इन पर

बाबा पर उनका पूरा और अथाह विश्वास था। बाबा जिस सेवा पर भी भेजें, वे पूरे उमंग-उत्साह और निश्चय के साथ जाते थे। बाबा का भी उन पर उतना ही विश्वास था। दिल्ली में पवित्रता के कारण माताओं पर जो अत्याचार हुए, कोर्ट केस हुए उन सब समस्याओं का हल करने में जगदीश भाई साहब का बहुत बड़ा योगदान रहा। यहां तक कि उनको मारने के लिए भी उन लोगों ने सोच रखा था। इसके अलावा अमृतसर की घटना हो या हापुड़ की इन सब में आगे रहकर सब परिस्थियों का सामना किया और समाधान निकाला। वे कहते थे, यह कार्य करने के लिए किसने कहा है। यह किसका कार्य है। वे किसी बात की परवाह नहीं करते थे। एकदम निर्भय आत्मा थी। जब बाबा दिल्ली में आते थे, जगदीश भाई ही मुख्य भाई थे जो उनका पूरा ध्यान रखते थे। हम करनाल से बाबा से मिलने जाते थे। जब हम बाबा से मिलते थे तो बीच-बीच में जगदीश भाई चक्कर लगाते थे। भौतिक रूप से भी बाबा को वे बहुत संभालते थे। निराकार बाबा का, साकार बाबा का उनमें बहुत अटूट विश्वास और रिस्पेक्ट था। बाबा का भी उन पर उतना ही विश्वास, स्नेह और सम्मान था।

जब बाबा अव्यक्त हुए उस समय जगदीश भाई ने

बहुत सम्भाला

जब साकार बाबा अव्यक्त हुए उस समय जगदीश भाई ने बहुत सम्भाला। दादी प्रकाशमणि जी संस्था की हेड बाद में बनी, वे मुंबई में रहती थीं। साकार बाबा के समय जगदीश भाई ही मुख्य व्यक्ति थे यज्ञ के कार्य-कलापों में। जगदीश भाई साकार बाबा के राइट हैण्ड थे। यज्ञ के कारोबार में दीदी मनमोहिनी और जगदीश भाई ही मुख्य थे। जब अव्यक्त बाबा ने दादी प्रकाशमणि जी को निमित्त बनाया, उनको उन्होंने दिल से स्वीकार किया और उनके आज्ञाकारी रहे।
मैंने उनमें देखा कि वे खुद भी बाबा के प्रति, बहनों के प्रति और यज्ञ के प्रति ईमानदार और मेहनती थे और दूसरों से भी यही अपेक्षा रखते थे। वे यही चाहते थे कि जो हमारी मान्यतायें हैं, नियम-मर्यादायें हैं, वे हमारे कर्म में आनी चाहिएँ, दिखायी पड़नी चाहिएं। हमारी कथनी और करनी में समानता होनी चाहिए।
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वे ब्राह्मण परिवार के लिए प्रेरणास्रोत, आदर्श और मार्गदर्शक हैं

शिक्षा प्रभाग के उपाध्यक्ष एवं कॉन्फरेन्स के कार्यकारी सचिव ब्रह्माकुमार भ्राता मृत्युन्जय जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभवों को इस तरह बांट रहे हैं-
"जब भी मैं आदरणीय भ्राता जगदीश को याद करता हूं, मेरे में ऊर्जा (शक्ति) बढ़ जाती है। मेरे इस अलौकिक जन्म की निमित्त हस्ती मैं इनको मानता हूं। इनकी एक अंग्रेज़ी किताब 'रीयल गीता' पढ़कर ही मैं इस ज्ञान में आया। रोज उस गीता को पढ़ता था तो रोज़ मेरी आँखों में आंसू आ जाते थे। उस किताब के पहले पृष्ठ पर 'वर्ल्ड एंथम' (विश्व गान) छपा हुआ था। उसके नीचे लेखक का नाम लिखा हुआ था 'जे.सी. संजय'। मेरे मन में बड़ी तमन्ना थी उस व्यक्ति से मिलने के लिए। साहित्य के रूप में उन्होंने पढ़ने वालों को एक ऐसा विज़न दिया था कि 'रीयल गीता' पढ़ने के बाद दुनिया की और कोई किताब पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। अन्य किताबों में ऐसा सार नहीं मिलता जो इस किताब में है। ऐसी पुस्तक लिखने वाले व्यक्ति ने क्या अनुभव किया है, उसका जीवन क्या है, वो कैसा है, यह जानना और देखना चाहता था। उस समय मुझे हिन्दी बिलकुल नहीं आती थी। उनकी अंग्रेज़ी किताबें पढ़कर ही मैंने ईश्वरीय ज्ञान को समझा और विकसित किया। उसके बाद मुझे बाबा की मुरली समझ में आने लगी।

ऐसा लगा उनकी जिह्वा से विद्यादेवी बोल रही हैं

यह मेरी इच्छा पूरी हुई सन् 1969 में, जब मधुबन में कुमारों की भट्ठी थी। उसमें मैं भी आया था। भट्ठी की क्लास कराने वालों में जगदीश भाई के नाम की उद्‌घोषण हुई। उसे सुनते ही मेरे मन में उनसे मिलने की एक भावना कहो, तीव्र इच्छा कहो, उत्सुकता कहो, उत्पन्न हुई। मेरी दोनों आंखें उनके लिए हिस्ट्री हॉल के चारों ओर टिकी हुई थीं कि वे कैसे होंगे, क्या बोलेंगे, कैसे बोलेंगे। इनकी वाणी सुनते ही मुझे ऐसा अनुभव होने लगा कि इनके मुख से विद्यादेवी सरस्वती जी बोल रही हैं, सर्व वेद-शास्त्रोपनिषद के दृष्टा ब्रह्मा जी बोल रहे हैं। उनके प्रथम मिलन से ही मुझे यह अनुभव हुआ। उस भट्ठी में थोड़े ही कुमार थे। उन्होंने क्या बोला- वो मुझे याद नहीं है लेकिन उनको देखते ही मुझे क्या अनुभव हुआ, यह मुझे आज तक याद है।

वे एक महानायक थे

उनके अन्दर हरेक को प्रेरणा देने वाला महानायकत्व का गुण मैंने देखा। किसी भी स्थान पर हों, किसी भी परिस्थिति में हो, कोई भी व्यक्ति हो, उसमें भ्राता जगदीश जी उमंग-उत्साह भर देते थे। सन 1973 में पहली बार जोनल स्तर पर मधुबन में एक मीटिंग हुई। उस मीटिंग में दादी हृदयपुष्पा जी मुझे अपने साथ लेकर आयी थीं। उस समय मैं आयु में छोटा ही था। मुझे भी मीटिंग में बोलने के लिए कहा गया। मुझे हिन्दी तो आती नहीं थी, फिर भी बड़ों के आदेश के कारण टूटी-फूटी हिन्दी में कुछ बोला। मेरी हिन्दी सुनकर दादी प्रकाशमणि जी, दीदी मनमोहिनी जी सहित सब हंस रहे थे। मैंने उस समय एक सुझाव दिया था। मेरा सुझाव सुनकर जगदीश भाई मुस्करा रहे थे। फिर जगदीश भाई ने मुझे बुलाकर अपनी बगल में बिठाया और बहुत प्यार किया।

वे एक अद्भुत वैज्ञानिक भी थे

उसके बाद जगदीश भाई से मिलने के कई अवसर मिलते रहे। सन् 1972 में जगदीश भाई विदेश होकर आये। उनके साथ जो भी गये थे, वे उनसे पहले वापस आये थे लेकिन जगदीश भाई एक साल के बाद भारत वापस आये। विदेश से आते ही हमने जगदीश भाई को बेंगलुरु बुलाया। विदेश से दिल्ली आये और दिल्ली से सीधा बेंगलूरु आये। हमने दादी प्रकाशमणि जी से रिक्वेस्ट की थी कि जगदीश भाई विदेश से आते ही बेंगलूरु आयें। दादी जी ने उनको सन्देश दिया था कि आप बेंगलूरु जाओ। जगदीश जी आये। उस समय वे बेंगलूरु में 10 दिन रहे सेवा-अर्थ। दस दिनों में हमने लगभग 40 कार्यक्रम किये। कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यक्रमों का आयोजन किया था। जैसे इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ साइस। उस संस्थान में बड़े-बड़े वैज्ञानिक रहते हैं। वहां जगदीश भाई का भाषण रखा था। उस स्थान में ब्रह्माकुमारियों का पहला कार्यक्रम था। वहां उन्होंने एक घंटे का भाषण किया था। आज भी मुझे वो दृश्य याद है कि वहां के सभी प्रोफेसरों ने आकर भाई साहब को थैंक्स दिया। उन्होंने भाई साहब से पूछा कि आपने साइंस में क्या पढ़ा है, कहां तक पढ़ा है। क्योंकि जगदीश भाई ने उस भाषण में इतनी पुस्तकों का उद्धरण किया था कि वे वैज्ञानिक और प्रोफेसर भी हैरान रह गये और खुश भी हो गये।

वे एक महान् योगी और अर्थशास्त्री थे

वहां एक इकॉनोमिक संस्थान था, वहां भी इन्होंने अर्थशास्त्र (इकॉनोमिक्स) के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों का उद्धरण देकर अर्थशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र- इस विषय पर भाषण किया। उस संस्थान के डायरेक्टर और प्रोफेसर डॉ. पाटील जी जगदीश जी से बहुत ही प्रभावित हुए और बाद में वे मधुबन भी होकर गये। वहाँ 'इन्स्टिटयूट ऑफ वर्ल्ड कल्बर' नामक एक संस्थान है, वहां भी जगदीश जी ने भाषण किया। मैंने देखा, उनमें हर विषय और हर क्षेत्र का इतना ज्ञान था कि आधे घंटे पहले भी टापिक मिले तो भी उस पर इतनी गहराई से और सुन्दर रूप से भाषण करते थे कि सुनने वाले समझते थे कि यह व्यक्ति इस विषय में विशेषज्ञ है। किसी भी मंच पर, उनके सिद्धान्तों के साथ तालमेल कर, ईश्वरीय ज्ञान की उत्कृष्टता को सिद्ध करने की कला उनमें उच्च स्तर पर थी।

वे निद्राजीत और मनजीत थे

उनके आध्यात्मिक जीवन के बारे में भी हम देखते हैं तो उनका पूरा योगी जीवन था। वे बहुत कम नींद करते थे। मैं तो कहता हूं कि वे निद्राजीत थे। उनको आप जब देखो, वे जाग्रत अवस्था में मिलेंगे। पांच मिनट के विश्राम में भी वे रिलैक्स हो जाते थे। मन और बुद्धि पर उनका इतना नियन्त्रण था कि वे जब चाहें तब और जितने समय तक चाहें जाग सकते थे। संकल्प को नियन्त्रण करने की शक्ति उनमें थी, मैंने यह देखा है।
ज्ञान और योग में तो वे बेमिसाल थे। ज्ञान और योग पर उन्होंने जो किताबें लिखी हैं उनको पढ़ने से हमें पता पड़ता है कि उनमें ज्ञान और योग के कितने गहन अनुभव थे। उनकी अंग्रेज़ी किताब 'दि वे एण्ड गोल ऑफ राजयोगा' एक गज़ब प्रकार की है। योग के बारे में उसमें उन्होंने इतना विस्तार से लिखा है कि उसको पढ़ने के बाद योग की और कोई पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।

वे मेरे सेवा के प्रशिक्षक रहे

मुझे उनके साथ सेवा करने का सौभाग्य मिला सन् 1976 में। उस समय देहली में एक सम्मेलन होने वाला था 'मानवकुल का भविष्य' (Future of Mankind)। मुझे उस सम्मेलन के आफिस काम के लिए और उससे सम्बन्धित विषयवस्तु और लैटर टाइपिंग करने की सेवा मिली थी। जगदीश भाई डिक्टेट करते थे, मैं टाइप करता था। वी.आई. पीज़ से मिलने जब जाते थे, मुझे भी साथ में ले जाते थे। कई बार मुझे कह देते थे कि फलाने व्यक्ति के साथ मिलने का समय ले लो, हम जायेंगे। लगभग पांच महीने में दिल्ली में रहा इस सेवा के लिए। जगदीश भाई का मेरे साथ एक मानसिक शुभभावना का सम्बन्ध था, वे कभी भी ऐसी सेवा के लिए मुझे बेंगलुरु से बुलाते थे। बड़ी दादी जी को भी आश्चर्य होता था कि दिल्ली में इतने लोग होते हुए भी जगदीश भाई इसको क्यों इतनी दूर से बुलाता है। अभी बाबा ने मुझे जो सेवा दी है सम्मेलनों का आयोजन करना, गणमान्य व्यक्तियों को बुलाना, उनकी सेवा करना इन सबके पीछे भ्राता जगदीश जी का ही प्रशिक्षण है, उनका ही प्रोत्साहन है। इसके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूं।
सन् 1978 में बेंगलुरु में हमने एक महासम्मेलन किया था। यह कार्यक्रम विधान सभा के बांक्वेट हॉल में किया था। उसकी सारी जिम्मेवारी भ्राता जगदीश जी ने उठायी थी। खुद वहां रहकर उन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाया। उस सम्मेलन में तत्कालीन राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के जज आदि आये थे। ईश्वरीय विश्व विद्यालय के इतिहास में विधान सभा के हॉल में किया हुआ यह पहला, बड़ा और मुख्य कार्यक्रम था। दादी प्रकाशमणि जी भी इस में पधारी थी।

वे साधनों पर नहीं, साधना पर निर्भर थे

सन् 1983 से मधुबन में अन्तर्राष्ट्रीय महासम्मेलनों का आयोजन होता रहा, तब से मुझे उनके साथ सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर कॉन्फरेन्स का फोल्डर बनाना पड़ता था। पहले जगदीश जी मैटर लिखकर देते थे। मैं टाइप करके देता था। कई बार देहली जाकर बहरगा में छपवाकर लाता था। उनकी बुद्धिमत्ता इतनी शक्तिशाली थी कि 2-3 दिनों के अन्दर वे कॉन्फरेन्स के सारे के सारे मैटर का स्वरूप तैयार करते थे। उन जैसी योजना-कुशलता, विज़नरी (दूरदर्शिता), कार्य में परिपूर्णता, सेवा में कर्मठता और समर्पणता आज तक मैंने और किसी में देखी नहीं। आज बहुत साधन हैं, मानव संसाधन हैं लेकिन उन दिनों में साधन नहीं थे और करने वाले लोग भी नहीं थे। न कम्प्यूटर थे, न आटोमैटिक प्रिंटिंग मशीन। टाइप-राइटर होता था और हाथ से कम्पोज़ करना पड़ता था। फिर भी उन्होंने कार्यक्रमों का जितना सफल आयोजन किया, उतना आज भी हम पूर्णरूप से नहीं कर पा रहे हैं।
जगदीश जी में सब्र करने की और समय का पालन करने की शक्ति जबर्दस्त थी। जो समय दिया गया है उसी समय आना, जाना और करना उनको अच्छा लगता था। अगर कोई उनके पास पाँच मिनट पहले भी पहुंचा, वो भी उनको अच्छा नहीं लगता था और पांच मिनट देरी से पहुंचा, वो भी उनको अच्छा नहीं लगता था। ठीक समय पहुंचना या करना, उनको अच्छा लगता था।
मैंने देखा कि सन्तों के साथ उनके सम्बन्ध बहुत अच्छे थे। इस संस्था में सन्तों को बुलाने का और सेवा करने के सिलसिले को शुरू करने का श्रेय उनको ही जाता है। दादी जी इस संस्था की हेड हैं लेकिन सन्तों के सामने कौन-सी बात रखनी चाहिए और उनके लिए कौन-से टॉपिक रखने चाहिएँ, उनको ईश्वरीय ज्ञान का परिचय कैसे देना है, ये सब जगदीश जी अच्छी रीति जानते थे। जब वे धर्म और दर्शन के बारे में बोलते थे तो बड़े-बड़े जगतगुरू, पण्डित, विद्वान आदि भी दंग रह जाते थे कि इन्होंने कितने शास्त्र आदि पढ़ें हैं।

वे एक सशक्त राजकीय दार्शनिक थे

ईश्वरीय ज्ञान के सार को विस्तार करके और विस्तार को सार करके बोलने की कला उनमें खूब थी। बाबा के एक छोटे-से इशारे को भी विस्तार में ले जाकर भाई-बहनों को ऐसे समझाते थे कि उसका महत्व बढ़ा देते थे। तर्कशास्त्र में, भौतिकशास्त्र में, मनोविज्ञान में, दर्शन में, शिक्षा में- हर विषय में वे प्रवीण थे, परिपूर्ण थे। मैंने संसार में बहुत बड़े-बड़े नायकों (लीडरों) को देखा है लेकिन जगदीश जी एक महान् आध्यात्मिक लीडर थे, आर्थिक लीडर थे, वैज्ञानिक लीडर थे, सामाजिक लीडर थे। इसके अलावा वे एक सशक्त राजकीय दार्शनिक (Political Philosopher) तथा राजनीति शास्त्री (Political Scientist) थे। वे राजनेता नहीं थे लेकिन राजनीति और प्रशासन कैसे होने चाहिएँ, उनके पास एक श्रेष्ठ कल्पना या चित्र था।
उनमें एक विलक्षण विशेषता यह देखी कि हर बाबा के बच्चे पर उनका बहुत विश्वास रहता था। अपने साथियों पर, अपने से छोटों पर विश्वास रखना, यह बहुत बड़ी बात है। जगदीश जी सिर्फ विश्वास नहीं करते थे, उस व्यक्ति में योग्यता भरकर, योग्य बनाकर विश्वासपात्र बनाते थे। हरेक की विशेषता को पहचान कर, उस विशेषता को ईश्वरीय सेवा में लगाकर उस आत्मा को आगे बढ़ाना जगदीश जी में यह कला बहुत अच्छी थी। उस व्यक्ति में वे आत्म-विश्वास भरते थे और उसको उमंग-उत्साह दिलाकर सेवा में विजयी बनाते थे।

दादी जी को भी उन पर बहुत विश्वास था

जगदीश जी में मीटिंग का आयोजन करने की कला बहुत अच्छी थी। दादी प्रकाशमणि जी को भी उन पर बहुत विश्वास था और जगदीश जी भी दादी जी को बहुत सम्मान देते थे, उनके आज्ञाकारी थे और उनका भी उन पर बहुत विश्वास और प्यार रहा। ईश्वरीय सेवा की वार्षिक मीटिंग का संचालन वे करते थे, हर मीटिंग में वे कुछ-न-कुछ नयी बात, नयी दिशा सबको देते थे और सेवा में सबको आगे बढ़ाते थे। मीटिंग में वे कई छोटी बातों को गंभीर रूप से रखते थे और गंभीर बातों को रमणीक रूप से जैसे कविता, शायरी, चुटकुले के रूप में सबके सामने रखकर हल्का कर देते थे।

भगवान की भी उन पर विशेष नज़र थी

वे महान् चिन्तक थे, ज्ञानी और योगी थे। यज्ञ के मज़बूत स्तम्भ थे। इसलिए जब भी अव्यक्त बापदादा आते थे, जगदीश भाई कितने भी दूर बैठे होते, बाबा उनको स्टेज पर बुलाते थे। खुद बाबा उनको गुलदस्ता देते थे। इतना ही नहीं, अपने गले में डाली हुई माला निकाल कर उनके गले में डाला करते थे। इतना आदर-सम्मान भगवान को भी उनके प्रति था। बाबा उनके साथ ऐसे वार्तालाप करते थे, देखने वालों को भी एक अलौकिक आनन्द का अनभव होता था।
वे ब्राह्मण परिवार के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं, आदर्श हैं, मार्गदर्शक हैं। वे मीटिंग में कहा करते थे कि जैसे हम समाज के अन्य लोगों की सेवा के लिए समय देते हैं, वैसे ब्राह्मणों की प्रगति के लिए भी हमें समय निकालना चाहिए। ब्राह्मणों की अवस्था ठीक रहेगी तो सब व्यवस्था अपने आप ठीक चलेगी। इस तरह हरेक के कल्याण के प्रति उनकी भावना रहती थी। वे कहते थे, ब्राह्मणों की प्रगति से ही विश्व की प्रगति होगी।
यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि बहुत बार उनके साथ सेवा करने के, यात्रा करने के मौके मिले। वो मेरे जीवन के स्वर्णिम पल थे।"
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मुझे विश्वास है, किसी न किसी जन्म में छोटे भाई के रूप में अवश्य ही उनकी सेवा करूँगा

न्यायविद् एवं कला तथा संस्कृति प्रभाग के अध्यक्ष, ब्रह्माकुमार भ्राता रमेश शाह जी ने, भ्राता जगदीश जी के बारे में अपने संस्मरण इस प्रकार व्यक्त किये हैं-
"हम सबके अति प्रिय भ्राता जगदीश जी बहुत ही अनुभवी, शास्त्रों एवं विविध धर्मग्रंथों के समर्थ विद्वान एवं ईश्वरीय ज्ञान के विविध तथ्यों की गहराई को जानने वाले थे। उनको समाज की विभिन्न व्यवस्थाओं और कारोबार का भी गहन अनुभव था। उनकी लेखनी ज्ञान के गूढ रहस्यों से युक्त और ज्ञान के गहन अर्थों को प्रत्यक्ष करने वाली थी।

अन्त तक उन्होंने मेरे साथ बड़े भाई का सम्बन्ध निभाया

मैं जब सन् 1952 में इस ईश्वरीय ज्ञान के सम्पर्क में आया तब से ही जगदीश भाई का नाम सुना। सन् 1957 में प्यारे ब्रह्मा बाबा ने उनको मुंबई आने का निमन्त्रण दिया। वे मुंबई में आये और आते ही लौकिक गीता ज्ञानयज्ञ करने वालों की ईश्वरीय सेवा के कार्य में जुट गये। मैं उनकी लगन को देख रहा था। उन्होंने शास्त्र जानने वालों की सेवा में मुझे जुटा दिया और धर्मनेताओं की सेवा कैसे की जाये वह भी मुझे सिखाया। जब मैंने उनसे पूछा कि आप मेरे साथ ऐसा प्रेमपूर्वक व्यवहार क्यों कर रहे हैं। तब उन्होंने बताया कि प्यारे ब्रह्मा बाबा ने आपके लिए मुझे कहा है कि ज्ञान चर्चा करके उसे भी इस ईश्वरीय सेवा में लगा दो क्योंकि आगे चल कर उसका इस ईश्वरीय सेवा में बहुत बड़ा पार्ट है। इस प्रकार, बापदादा द्वारा, मेरे लिए दिये गये वरदान की जानकारी, भ्राता जगदीश जी द्वारा मुझे मिली, इसलिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूं। उन्होंने मुझे ईश्वरीय सेवा में आगे लाने का पुरुषार्थ किया और अन्त तक मेरे साथ बड़े भाई का सम्बन्ध निभाया।

पोप को उपहार दिया

बाद में मुझे जगदीश भाई के साथ अनेक प्रकार की ईश्वरीय सेवा करने का अवसर मिला। मुंबई में ईसाई धर्म की इक्राइस्ट कॉन्फ्रेन्स हुई तो ईसाई धर्म के धर्मगुरु पोप, पहली बार भारत में आये। उस कॉन्फ्रेन्स में ईसाई धर्म के बड़े-बड़े आर्च बिशप आदि की सेवा करने की योजना भी जगदीश भाई ने बनायी और 30 x 40" आकार के छपे हुए झाड़, त्रिमूर्ति,सृष्टिचक्र के चित्रों को कास्केट में रखकर पोप को उपहार दिया। वो चित्र आज भी रोम के वेटीकन म्यूज़ियम में लगे हुए हैं।

प्रदर्शनी के चित्रों पर क्या और कैसे समझाया जाये-यह स्पष्ट किया

सन् 1964 में मुंबई में पहली प्रदर्शनी का आयोजन हुआ तब जगदीश भाई भी ईश्वरीय सेवा में सहयोग करने आये। सन् 1964, दिसम्बर 29 के दिन शाम को प्यारी मम्मा ने हम सभी को बिठा कर प्रदर्शनी की उपयोगिता बतायी। जगदीश भाई ने मातेश्वरी जी को कहा, अब तक मैं नहीं समझ सकता था कि बाबा जो मुरली में कहते हैं कि एक दिन आबू रोड से आबू पर्वत तक लम्बी लाइन लगेगी किन्तु इस प्रदर्शनी को देखने के लिए जो लम्बी लाइन लगती है, उससे मुझे विश्वास हो गया कि अवश्य ही आगे चलकर ऐसा होगा। फिर उन्होंने प्रदर्शनी की सेवा कैसे आगे बढ़े और देहली में भी प्रदर्शनी की जाये इस पर अपने विचार प्रकट किये। उस समय प्रदर्शनी में गीता के भगवान के विषय में तीन चित्र थे। जगदीश भाई ने इन चित्रों पर क्या और कैसे समझाया जाये, यह भी स्पष्ट किया। जगदीश भाई ने जो ढंग सिखाया, उससे सबको यथार्थ रूप में गीता का भगवान कौन है यह बताना आसान हो गया।

ईश्वरीय सेवार्थ पहली विदेश यात्रा

बाद में राजयोग की प्रदर्शनी मुंबई में हुई और उसके बाद देहली में हुई। देहली में आयोजित उस प्रदर्शनी में, अमेरिका में होने वाली 'एवास्टिंग रिट्रीट' में जो कॉन्फ्रेन्स होने वाली थी, उसका निमन्त्रण मिला और उस निमन्त्रण के आधार पर विदेश सेवा का शुभारम्भ हुआ। विदेश सेवा के लिए जाने वाले ग्रुप में जिन छह डेलीगेट्स के नामों का चयन बापदादा ने किया, उनमें चार बहनों और दो भाइयों का अर्थात मेरा और जगदीश भाई का नाम बापदादा ने लिया। जाने के दिन देहली से जगदीश भाई हवाई जहाज़ से मुंबई आये और मुझे बताया कि पहली बार उन्होंने हवाई जहाज से यात्रा की है। उसी रात को हम सभी विदेश यात्रा को निकले। हवाई जहाज़, बीच में ग्रीस की राजधानी एथेन्स में रुका और तब हम दोनों ने पहली बार विदेश की धरती पर क़दम रखे और एक घण्टे तक ग्रीक दर्शन (ग्रीक फिलासफी) के विषय में चर्चा की। फिर हम लन्दन पहुंचे, जयन्ती बहन के घर पर रहे। अंग्रेज़ी में प्रवचन करने का हम दोनों को ही अभ्यास था इसलिए इंग्लैण्ड में सभी स्थानों पर हम दोनों ने मिलजुल कर ईश्वरीय सेवा का कारोबार किया।

उनके दृढ़ संकल्प के कारण ही विदेश में प्रथम राजयोग सेवाकेन्द्र की स्थापना हुई

जगदीश भाई के मन में दृढ संकल्प था कि हमारी इस विदेश यात्रा का कुछ फल अवश्य निकलना चाहिए। हम लोगों को अवश्य ही पूर्व और पश्चिम में कम-से-कम एक-एक स्थान पर, ईश्वरीय सेवाकेन्द्र की स्थापना करके ही जाना चाहिए। उन्होंने इसी कारण मधुबन में फोन किया और लन्दन तथा हांगकांग में सेवाकेन्द्र की स्थापना की स्वीकृति मांगी। उनके इस दृढ़ संकल्प के कारण लन्दन में 23 सितम्बर, 1971 में पहले-पहले राजयोग सेवाकेन्द्र की स्थापना हुई। उनकी यह एक विशेषता थी कि वे जो भी सेवा करते थे, उसको कार्यान्वित करने और सफल बनाने का बहुत दिल से पुरुषार्थ करते थे।

विदेश में मैं बर्तन साफ करता था, वे झाडू लगाते थे

न्यूयार्क में जब हम रहते थे, तब हम दोनों का स्थूल सेवा का भी विशेष पार्ट था। मेरी बर्तन साफ करने और कपडे धुलाई की ड्यूटी थी और जगदीश भाई को रहने के स्थान की सफाई आदि की सेवा मिली।
अपनी-अपनी सेवा को करते हुए, हम लोग हंसी में गीत गाते थे 'किसी ने अपना बनाके हमको बर्तन साफ़ करना सिखा दिया और किसी ने अपना बनाके हमको झाडू लगाना सिखा दिया।' जिनके घर में हम रहते थे, वे भाई एक दिन हमारे पास आये और उन्होंने जगदीश भाई को झाडू लगाते देखा। तब उन्होंने कहा कि आप भारत में ऐसे झाडू लगाते हो तो कमर टेड़ी होती है परन्तु हमारे पास होवर मशीन से झाडू लगाया जाता है और उनके घर में जो होवर मशीन थी, उससे सफ़ाई करना सिखाया। उस पर जगदीश भाई ने मुझे कहा कि अब हमारी कमर सीधी रहेगी और मैं अधिक सेवा कर सकूँगा। तब मैं उनको कहता था कि आप ज्ञान-योग की झाडू से सबके अन्दर से माया का किचड़ा साफ कर ही रहे हैं।

वे हमें बहुत हँसाते थे

विदेश यात्रा में हम सभी जगदीश भाई के साथ नाश्ता, भोजन करते थे। उनका नियम था कि वे तीन रोटी ही खाते थे परन्तु खाते समय ईश्वरीय सेवा के विषय में चर्चा करने में इतने मगन हो जाते थे कि वे भूल जाते थे कि उन्होंने कितनी रोटियां खायी हैं और बहने उनको झूठी गिनती बताकर अधिक रोटियां खिला देती थी। उस समय जगदीश भाई कहते थे कि बहनें उनके साथ रोटियों की गिनती में ठगी करती हैं परन्त बड़े प्रेम से सबके साथ भोजन करते थे। जगदीश भाई हमको यह भी कहते थे कि जब मैं वापस जाऊंगा तब कमला नगर में सब मुझ से पूछेंगे कि आपने क्या किया, तो कुछ नवीनता करके दिखायी जाये। खुद पर हंसते थे कि मैं विग पहन कर जाऊंगा और सबको बताऊँगा कि विदेश सेवा के कारण मेरे सिर पर चमत्कारिक रूप से बाल उग आये हैं। इस प्रकार, हँसते-हँसते सेवा करते थे।

उनसे मुझे बहुत-सी बातें सीखने को मिलीं

हांगकांग में जब ईश्वरीय सेवायें प्रारम्भ की, तब मैंने जगदीश भाई को कहा कि मुझे तो लौकिक कार्य अर्थ जल्दी भारत जाना होगा। तो जगदीश भाई ने सहर्ष हमको छुट्टी दे दी और सारा कार्यभार स्वयं ही सम्भाल लिया। हांगकांग में प्रदर्शनी आदि करने के बाद जगदीश भाई सिंगापुर, वियतनाम आदि देशों में ईश्वरीय सेवा करने गये। इस प्रकार, उन्होंने लगभग 12 मास तक दिल व जान से विदेश में ईश्वरीय सेवा की। उनके अंग-संग रहकर सेवा करने का जो सौभाग्य मिला; उनसे मुझे बहुत-सी बातें सीखने को मिलीं, जो हमें ईश्वरीय सेवा में बहुत मददगार बनीं। उनका एक लक्ष्य था कि जो भी प्रदर्शनी देखने आये, उसे ईश्वरीय ज्ञान के सभी पहलुओं का ज्ञान, सार रूप में अवश्य समझाना चाहिए। इसलिए वे पवित्रता, सत्यता, सर्वव्यापी, ड्रामा की पुनरावृत्ति के ज्ञान को निर्भय होकर सबको बताते थे।

उन्होंने बापदादा की आज्ञा को पूर्ण रूप से पालन किया

प्यारे बापदादा ने हमारे डेलीगेशन को एक श्रीमत दी थी कि हम विदेश में देवता अर्थात् देने वाले बनकर जा रहे हैं। इस बात को उन्होंने पूरा ही पालन किया। जगदीश भाई ने कहीं भी किसको भी यह आभास तक नहीं होने दिया कि हम उनसे कुछ लेना चाहते हैं। सदा देने का ही संकल्प रखा।
मैं समझता हूं कि जगदीश भाई की महानता में यह श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ शिष्टाचार था कि उनकी लेखनी इतनी ओजस्वी, ज्ञान की गहराई से सम्पन्न और योग के अनुभवों से युक्त थी कि वह कुछ भाई-बहनों को शिव बाबा की मुरली के समान अनुभव प्रदान करती थी।

जब तक यज्ञ चलेगा तब तक ईश्वरीय सेवा में उनका सहयोग अमर रहेगा

अन्तिम दिनों में जब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, उस समय मैं मुंबई से उनसे मिलने आया। मिलते समय मैं उनसे उनके स्वास्थ्य के विषय में पूछता, उससे पहले बड़े भाई के नाते वे मुझ से, मेरे स्वास्थ्य के विषय में पूछने लगे। फिर जब मैं यज्ञ के ऑडिट के कारोबार के अर्थ मधुबन में आया तो अनेक बार उनसे हॉस्पिटल में मिला, फिर उन्होंने बड़े भाई के नाते अनेक प्रकार की शिक्षायें दीं। एक विशेष बात उन्होंने मुझ से कही कि मुझे बहनों के हिसाब-किताब को तुरन्त और सहज ही चेक करके बहनों की आशीर्वाद प्राप्त करनी चाहिए। उनकी यह बहुत बड़ी महानता थी कि वे सदा ही बहनों को देवी के स्वरूप में देखते थे और सभी छोटी-बड़ी बहनों का देवी के रूप में आशीर्वाद प्राप्त करने का संकल्प रखते थे।
जब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो रहा था, उसी बीच आदरणीया दादी प्रकाशमणि जी का अफ्रीका की सेवा पर जाने का कार्यक्रम था और उनको 13 मई, 2001 के बाद आना था। तो अव्यक्त बापदादा ने दादी जी को विदेश जाने की मना कर दी। मई 12, 2001 को मैंने ऊषा को सुखधाम में जगदीश भाई की तबीयत को देखने के लिए भेजा। पौने आठ बजे तक, वह वहाँ थी, फिर हमको समाचार देने पाण्डव भवन आ रही थी, तभी समाचार आया कि जगदीश भाई ने प्यारे बापदादा की गोद में विश्रान्ति पायी। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि हम दोनों का जैसे ईश्वरीय सेवा
में गहरा सम्बन्ध रहा वैसे ही सारे कल्प में भी भिन्न नाम-रूप, देश-काल में सम्बन्ध रहेगा और मुझे अवश्य ही किसी-न-किसी जन्म में लौकिक में छोटे भाई के रूप में उनकी सेवा करने का अवश्य ही सौभाग्य प्राप्त होगा।
अब तो जगदीश भाई ने आगे एडवान्स पार्टी में ईश्वरीय सेवा का पार्ट बजाने के लिए हम सबसे विदाई ले ली फिर भी उनके लिखे साहित्य और दी गयी मार्गदर्शना द्वारा, जब तक यज्ञ चलेगा तब तक ईश्वरीय सेवा में उनका सहयोग अमर रहेगा।"
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उनका आदर्शमय जीवन, उनकी सेवायें और उनकी रमणीकता हमें कभी भूलेगी नहीं

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेक्रेटरी जनरल, शिक्षा प्रभाग के अध्यक्ष ब्रह्माकुमार भ्राता निर्वैर जी, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभवों का ज़िक्र इस प्रकार करते हैं-
"ईश्वरीय जीवन में हम सबको प्रेरणा देने के निमित्त साकार ब्रह्मा बाबा, मातेश्वरी सरस्वती, दीदी मनमोहिनी, दादी प्रकाशमणि, दादा विश्व किशोर, दादा आनन्द किशोर, दादी गुलज़ार, दादी जानकी, दादी रतनमोहिनी, दादी मनोहर, दादी चन्द्रमणि, दादी शान्तामणि तथा अन्य दादियाँ रहीं। भाइयों में एक आदर्श कुमार जीवन क्या होता है, समर्पित जीवन का आनन्द क्या है, हर पल कैसे सफल करना और बापदादा के दिलतख्त नशीन कैसे बनना, उसका एक मिसाल हमारे सामने भ्राता जगदीशचन्द्र जी हैं।

उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला

ज्ञान के जीवन के शुरू में ही मेरा भ्राता जी से मिलन हुआ था। मुझे ज्ञानमार्ग में चलते हुए जब छह महीने हुए थे, तब माउण्ट आबू से देहली गया था। उस समय भ्राता जी और दादी गुलज़ार जी से मिलना हुआ था कमला नगर सेन्टर पर। तब से लेकर उनके साथ मेरा बहुत-बहुत प्यार का, सम्मान का सम्बन्ध रहा। उनकी वाणी, उनके चरित्र, उनकी सेवा की योजना आदि देखकर बाबा उनको कहते थे कि इस बच्चे की तो सात फुट लम्बी बुद्धि है। उनके साथ अधिक से अधिक समय बिताने के संकल्प से कभी उनसे मैं मधुबन में मिलता, कभी किसी कार्यक्रम में हम इकट्ठे होते और कभी भ्राता जी मुंबई आते थे तो वहाँ कुछ समय रहते, तब भी उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।

लिखने के कार्य में मुझे आगे बढ़ाया

सन् 1967 में 'वर्ल्ड रिन्युअल' मैगज़ीन की शुरुआत हुई। मुझे इसका अनुभव नहीं था लेकिन उन्होंने मुझे बहुत हिम्मत दिलाकर, बहुत प्यार से गाइड कर, कभी-कभी मेरे साथ स्ट्रिक्ट भी होकर लिखने के कार्य में आगे बढ़ाया। हालांकि मैं उन जैसा बड़ा लेखक तो नहीं था। उनकी भेंट में मैं 5% भी लेखक नहीं था। फिर भी उन्होंने मुझे लिखने के लिए उमंग भरा, आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 200 से अधिक पुस्तकें लिखीं और मैगज़ीन में अनेकानेक लेख लिखे, बहुत प्रवचन दिये। एक प्रकार से भ्राता जी तो ईश्वरीय ज्ञान के ही नहीं बल्कि विज्ञान के भी विश्वकोष (Encyclopedia) थे। कई साइंस कॉन्फ्रेंसो में उन्होंने भाग लिया।

उनका जीवन आदर्श सेवाधारी तथा राजयोगी का था

महाभारत और गीता के बारे में इतने सुन्दर विचार उन्होंने व्यक्त किये और महासम्मेलनों में भाग लिया। यज्ञ की सेवाओं को बेहद में ले जाने के लिए 'विश्व नव निर्माण मेले' का आयोजन, आध्यात्मिक संग्रहालयों का निर्माण, सम्मेलनों का आयोजन इत्यादि बहुत कार्य उन्होंने किये। मेरे लिए उनकी सब से बड़ी बात है, एक आदर्श राजयोगी जीवन क्या होता है, एक आदर्श ज्ञानी तू आत्मा क्या होती है और एक आदर्श सेवाधारी ब्रह्माकुमार का जीवन क्या होता है यह प्रैक्टिकल करके दिखाया। सारे विश्व में बाबा का सन्देश देने के लिए उन्होंने जिगरी मेहनत की। जीवनभर सादगी और श्रेष्ठता अपनायी। उनका त्याग, तपस्या और बुद्धिमत्ता यज्ञ की प्रगति और कारोबार को सुचारु रूप से चलाने में बहुत काम आये। इस संस्था की विश्व-स्तर पर पहुंचाने में, संयुक्त राष्टसंघ तक पहुंचाने में और भारत के हर प्रान्त तक पहुंचाने में भ्राता जी का बहुत बड़ा योगदान रहा।
उनका आदर्शमय जीवन, उनकी सेवाये और उनकी रमणीकता हमें कभी भूलेगी नहीं। हमारे ईश्वरीय विश्व विद्यालय के संगठन को शक्तिशाली बनाने में और इसका संविधान बनाने में, उसको अमल में लाने में, भ्राता जी का योगदान सदा-सदा हमें याद रहेगा।"
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कर्मभोग का आगमन तथा सम्पूर्णता की ओर निर्गमन

भ्राता जगदीश जी के निरोगी शरीर में रोग के लक्षण कब और कैसे दिखायी पड़े, इसके बारे में दिल्ली के डॉक्टर गुप्ता जी सुना रहे हैं-
"भाई साहब यज्ञ के प्रति इतने समर्पित थे कि वे सदा ध्यान रखते थे कि मेरे ऊपर यज्ञ के कोई पैसे खर्च न हो। एक बार दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में बड़ी कॉन्फरेन्स थी। उसमें भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और दिल्ली के मुख्यमन्त्री आदि को आना था। उन दिनों भाई साहब की तबीयत काफी खराब थी। यह सन् 1995-96 की बात होगी। उन्हें खून की उल्टी शुरू हो गयी। तब मेरे से कहते हैं, डॉक्टर साहब, आज मुझे थोड़ा खून आया है, रात को मैंने चूर्ण खा लिया था, उसकी वजह से ऐसा हुआ होगा। सुनते ही हम उनकी जाँच करवाने चले। मेरे से कहते हैं, डॉक्टर साहब, प्राइवेट डॉक्टर के पास नहीं ले चलना, किसी सरकारी अस्पताल में ले चलिये। हम उनको लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पत्ताल ले गये और एडमिट कराया। मशीनों से कई तरीके की जांच करायी। जब मधुबन में यह पता पड़ा कि भाई साहब अस्पताल में एडमिट है तो फोन आने लगे कि उनको मुंबई ले जाये। जब भाई साहब को पता पड़ा कि उनको मुंबई जाना है तो उन्होंने कहा कि मेरे से बात कराइये। फोन पर उन्होंने दादी जी से और अन्य वरिष्ठ भाई-बहनों से कहा कि मुझे कोई तकलीफ नहीं है, वहां ट्रीटमेंट (उपचार) ठीक चल रहा है, मुंबई जाने की कोई जरूरत नहीं है, मैं यहां ठीक हूं। ऐसी स्थिति में भी दिन-रात खड़े होकर इंदिरा गांधी स्टेडियम के कार्यक्रम की तैयारी करावायी। उस समय भी अपने खाने-पीने की परवाह न करते दिन-रात लगे रहे। हमने कहा, भाई साहब, आपको रेस्ट करना ज़रूरी है। कहते हैं, डॉक्टर साहब, मैं किस लिए रेस्ट करूं? यहाँ भी तो चुप बैठा हूँ, कुछ काम तो करता नहीं हूँ, यह भी रेस्ट है ना। मेन्टल रेस्ट (मानसिक विश्राम) मिल गया तो फिज़िकल रेस्ट (शारीरिक विश्राम) भी मिल जायेगा ना! मुझे यह काम देखना है, आप कृपया ज्यादा मत कहियेगा। उनके पैर मोटे-मोटे हो गये थे, सूज गये थे। चलने में भी दिक्कत हो रही थी क्योंकि जिगर (लीवर) में तकलीफ थी। प्रोग्राम पूरा होने तक वे सेवा में लगे रहे। बाद में ट्रीटमेन्ट कराया।

बीमारी का कारण अपर्याप्त पोषण था

ईश्वरीय सेवा के आगे उन्होंने अपने तन का ध्यान नहीं रखा। पहली पसन्द उन्होंने ईश्वरीय सेवा ही रखी। जिस सेवा को उन्होंने हाथ में लिया वो पूरा होने तक खान-पान, निद्रा विश्राम के बारे में सोचते ही नहीं थे। बाद में पता पड़ा कि इनकी बीमारी का कोई विशेष कारण नहीं था। यही था कि खान-पान और विश्राम का ध्यान नहीं रखा। अगर सेवा के साथ उन्होंने खान-पान और विश्राम का भी ध्यान रखा होता तो इतनी तकलीफ उनको नहीं होती। सब टेस्ट (जांच) कराने के बाद सब टेस्टो का यही सार था- मॉलन्यूट्रेशन (अपर्याप्त पोषण)। ठीक आहार न मिलने के कारण जिगर कमज़ोर हो गया, कमज़ोर होने के बाद सूजन आने लगी। सूजन आने के बाद लीवर पर इतना प्रैशर पड़ता रहा कि खून की उल्टी शुरू हो गयी (यह उनको 1993 के आस-पास होना शुरु हो गया)। इसके बाद दादी जानकी जी का लन्दन से बार-बार फोन आता या कि जगदीश भाई को यहाँ भेज दो, हमारे पास ऐसे-ऐसे डॉक्टर्स हैं, हम उनसे जाँच करा देंगे। वहां भाई साहब गये भी थे। वहाँ के डॉक्टर रे भट्ट जी ने भी कहा कि हां, इनको प्रोब्लम है, उन्होंने भी यही बताया कि इसका कारण है ठीक ढंग से खाने-पीने का ध्यान न रखना। उन्होंने वहाँ कुछ उपचार किया था, उससे वे कुछ हद तक ठीक भी हो गये थे।
लेकिन उनके मन में हमेशा यह होता था कि मेरी उम्र 72 साल से ज्यादा नहीं है इसलिए मुझे जो कुछ भी सेवा करनी है, इससे पहले करनी है, इसलिए वे निश्चिन्त भी थे। उस समय उनकी आयु 71 साल चल रही थी। वे कहते थे, "इससे कोई फायदा नहीं है, अगर आप करना चाहते हैं तो करते रहिये, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं अपनी सेवा करता रहूंगा।"
इस विषय पर एक बार मधुबनवासियों के क्लास में भ्राता जगदीश जी ने खुद सुनाया था, "शुरू-शुरू में जब मैं इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में आया था तो दिन में एक ही बार खाना खाता था। मैं समझता था कि योगी लोग एक दफा खाना खाते हैं। बार-बार नहीं खाता था। यहां तक कि कोई टोली भी दे दे, तो रख लेता था और जब भोजन करता या तब ही खा लेता था। बार-बार खाना ठीक नहीं, यह इन्सान का काम नहीं है। मुझे बाबा ने कहा, बच्चे, सुना है, तुम नाश्ता नहीं करते, रात को भी खाना नहीं खाते। मैंने कहा, जी हां। तो बाबा ने कहा कि नहीं, तुम खाने पर ध्यान दो। मैंने कहा, बाबा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है। अपने में मैं एनर्जी फील (ताकत का अनुभव) करता हूं। आप कोई काम बता दीजिये, मैं कर लूंगा। मैं कोई कमज़ोर नहीं हूं। जितना खाता हूं, उससे मेरा शरीर ठीक चलता है। दिन में एक ही बार खाना खाता था, वो भी ज्यादा नहीं, दो-ढाई रोटी खाता था उस उम्र में। मैं समझता था कि जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है, जिसको कोई चिन्ता नहीं है, दुःख नहीं है, कोई झंझट नहीं है, उसके लिए इतनी एनर्जी काफी है। उसको गाय की तरह टब भरके चारा खिलाओ, क्या ज़रूरत है? दो रोटी बहुत हैं। मुझे कोई दिक्कत भी नहीं थी। बाबा ने कहा, बच्चे, बाद में जाके तकलीफ होती है; खाना ठीक तरह से खाओ। कई दफा बाबा बच्चों को भोजन के बाद, मौसमी, कुछ अनार के दाने इत्यादि देते थे। मुझे भी देते थे, बच्चे, खाओ। मैं कहता था, बाबा अब खाना खा लिया है। एक दफा खाने के बाद, दांत साफ करने के बाद मैं दुबारा कुछ नहीं खाता था। खा लिया सो खा लिया। कितनी भी बढ़िया चीज़ दे दें, मैं नहीं खाता था। बाबा मुझे कहते थे, खाना चाहिए। खाने पर पूरा ध्यान दो लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। बाबा ने मुझे कई दफ़ा अपने साथ बिठाकर खाना खिलाया। बाबा के कमरे में एक छोटी-सी टेबल रखी जाती थी। एक तरफ अकेले बाबा बैठकर खाते थे और दूसरी तरफ़ मुझे अकेले बिठाकर अपने हाथों से खिलाते थे। इतना प्यार से बाबा ने खिलाया। फिर भी मैंने अपनी तरफ से कोई ध्यान नहीं दिया। काम में लगा रहा और कुछ कठिनाइया भी थी। काम ऐसा होता था कि काफ़ी दूर निकल गये शहर से, अब काम छोड़कर वापस आकर कैसे खाना खाने आयें? उस समय यज्ञ में इतनी आर्थिक सम्पन्नता तो थी नहीं जो कोई साधन करके, खाना खाके दुबारा चले जायें। रात को पहुँचते तो भूख मर चुकी होती थी, फिर कहते थे, हमें भूख नहीं है, कल खायेंगे, छोड़ दो। सारा-सारा दिन कई दफ़ा खाना नहीं खाया। डॉक्टर लोग कहते हैं कि आपकी बीमारी इसी वजह से है कि आपने खाना नहीं खाया। दूसरों को बीमारी इसलिए होती है कि ज्यादा खाना खाया। आपका लीवर कमज़ोर हो गया है, उसको आपने खाने को कुछ दिया नहीं। उसने काम करना छोड़ दिया, हड़ताल कर दी। उसमें खराबी हो गयी। ऐसा वो कहते हैं। संदूषण (infection) भी हो गया था जब मैं विदेश में गया था। वहाँ का पानी पीया, वह पीने जैसा नहीं था लेकिन पी लिया। लगभग 50 देशों में मैं गया था, वहां नगरपालिका का पानी ही पी लेता था। लोग कोकाकोला, लिम्का, डिमका इत्यादि पीते थे। मैं पानी पीता था। वहाँ भी पी लिया। एक दफ़ा ग़लत पानी पी लिया तो उससे नुकसान हो गया। फिर वो बढ़ता गया और उसके साथ कई तकलीफें और हो गयीं। लीवर को तो मैं संभाल रहा था, वो मेरे लिए ज़्यादा बड़ी समस्या नहीं थी लेकिन उसके साथ और बीमारियों जुड़ गयी, उनसे समस्या बढ़ती गयी।
बाबा ने मुझे कई इशारे दिये कि तुम ज़्यादा मत खड़े रहो, बैठ के काम कर लो। किसी को डायरेक्शन भी देने हैं, तो कुर्सी पर बैठकर दो। मुझे कोई थकावट नहीं लगती थी इसलिए मैं खड़ा होके, चलके, ऊपर चढ़के करता रहा। करता रहा तो वो भी नुकसान उठाया। लीवर के लिए मुझे सीढीयां नहीं चढ़नी चाहिए थी लेकिन मैं और ही तेज रफ्तार से चढ़कर दिखाता था कि देखो, मैं आराम से चढ़ सकता हूं। कई ऐसी बातें गफलत वाली की थी।"
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जगदीश भाई साहब उपचार अर्थ जब लन्दन गये थे तब वहाँ के डॉक्टर रे भट्ट जी ने भाई साहब के साथ दिन-रात बिताये और उनसे बहुत आनन्द पाया। वे उनके साथ के अपने अनुभव इस प्रकार हमारे सामने रख रहे हैं-
"देखो, लन्दन में कितना बड़ा भाग्य हमें मिला हुआ था। एक तरफ दादी जानकी, दूसरी तरफ जगदीश भाई। लन्दन में रोज़ दोनों की लेन-देन होती थी। अगर मुझे दादी जानकी के बारे में जानना है तो जगदीश भाई के पास चला जाता था और जगदीश भाई के बारे में जानना है तो दादी जानकी के पास चला जाता था। हर रोज़ एक्सपोर्ट इम्पोर्ट करता था। यहाँ तक कि दोनों के मेरे पास वायब्रेशन्स आते थे। मुझे यह सोचना पड़ता था कि पहले किसके पास जाऊँ?
जब जगदीश भाई इलाज़ कराने के लिए लन्दन आये थे, उस समय मैं उनसे पहली बार मिला। मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसा दर्दी मरीज़ मुझे जिन्दगी में कभी नहीं मिला। उनके साथ की पहली मुलाकात के बाद दादी जी ने मेरे से पूछा- क्या पता चला आपको? मैंने कहा, दादी, इनको बड़ा डेंजरस से डेंजरस (बड़ी खतरनाक, भंयकर) बीमारी है। दादी ने पूछा, अच्छा, लीवर में इतनी कुछ खराबी आयी हुई है? मैंने कहा, लीवर की तो बात ही छोड़ दीजिये। लीवर में तो कुछ है ही नहीं। दादी ने कहा, अच्छा, कुछ नहीं है लीवर में। फिर मैंने कहा कि उनकी जो बीमारी है वो इतनी खतरनाक और फैली हुई है कि बात मत पूछिये। दादी ने पूछा,कौन-सी ऐसी बीमारी है? मैंने कहा, दादी, मैं गया था पेशंट को देखने। जब से मैं इनसे मिलकर आया हूँ ना, तब से लेकर अब तक मेरा पेट दुख रहा है। उन्होंने मुझे इतना हंसाया, इतना हंसाया, बात मत पूछो।

डॉक्टर मरीज़ों को ठीक करते हैं और जगदीश भाई डॉक्टरों को ठीक करते थे

रोज़ रात को 8.30 या 8.45 बजे हास्पिटल से निकल कर, कार को पार्क कर पीछे से अन्दर चला जाता था लेकिन पता नहीं, दादी को कैसे पता चल जाता था! दो-तीन दिन के बाद मुझे उन्होंने बुलाया और पूछा कि सुनने में आया है कि रात को आप घर नहीं जाते हो। मैंने कहा, दादी, आपको किसी ने गलत बताया है। यह सही नहीं है, मैं घर पहुंचता हूं हर रोज़ और घर से ही आता हूँ। दादी ने पूछा, अच्छा, घर जाते हो? मैंने कहा, हाँ। दादी ने कहा, मैंने सुना है कि रात 12.30 बजे तक ऊपर शोर मचता रहता है। मैंने कहा, दादी, आप कहाँ की बात कर रहे हो? फिर दादी ने कहा, मैंने सुना है, जगदीश भाई के कमरे में कुछ शोर होता है देर रात तक। मैंने कहा, मैं तो होता नहीं वहाँ, शायद बलवन्त भाई होता होगा।
जब तक जगदीश भाई लन्दन में रहे, हर रोज़ रात को उनके साथ हमारी मीटिंग होती थी। दर्दी का रूप लेकर मैं उनके पास जाता था। रात को मुझे उनसे जो टैबलेट (खुशी की) मिलती थी, मैं उसका एडिक्ट (आदी) बन गया था। आपको पता है, जगदीश भाई जब किसी को हँसाना शुरू करते थे तो रुकते नहीं थे। आपने सुनी होगी, वे खीर की कहानी सुनाते थे। एक अन्धे को पूछा गया कि क्या कभी तुमने खीर खायी है? उसने पूछा, वो क्या होती है? उत्तर दिया गया, वो सफेद होती है, अन्दर दाने-दाने होते हैं। फिर उसने पूछा, सफेद क्या होती है? उत्तरःदिया गया, वो बतख के जैसी होती है। फिर उसने पूछा, बतख कैसी होती है? फिर जगदीश भाई ने हाथ ऐसे टेढ़ा करके उसको पकड़ा कर समझाया, बतख ऐसी होती है। उस अन्धे ने कहा, अगर खीर इस बतख जैसी होती है तो यह मेरे गले में फंस जायेगी इसलिए मुझे खीर खानी ही नहीं है। इसको सुनाते-सुनाते खुद भी इतना हंसते थे और हमें भी इतना हंसाते थे। छोटी-छोटी बातें सुनाते-सुनाते अन्त में इतनी गहराई में ले जाते थे कि हमें पता ही नहीं पड़ता था। उन्होंने हमें इतना हंसाया कि हम भूल ही नहीं सकते।
डॉक्टर मरीज़ों को ठीक करते हैं और जगदीश भाई डॉक्टरों को ठीक करते थे ऐसे हंसाकर, ज्ञान की दवाई देकर। अगर ऐसी दवाई डॉक्टरों को नहीं मिले तो उनका जीवन भारी हो जायेगा। जगदीश भाई हमें सुनाते थे, वैसे तो डॉक्टर्स रिफ्रेश रहते हैं परन्तु मरीज़ों को देखते-देखते एग्रेशन में आ जाते हैं, फिर डिप्रेशन में आ जाते हैं। यह बात सच है, ज्यादातर डॉक्टर्स डिप्रेशन में रहते हैं।
जब वे लन्दन पहुंचे थे, उनकी हालत बहुत गंभीर थी, तो भी उनके सामने जाने वालों को, देखने वालों को यह पता ही नहीं पड़ता था कि इनकी बीमारी इतनी भयानक है। न्यूयार्क के प्रसिद्ध प्रोफेसर विक्टर हरबर्ट, जो उनसे आबू में मिले थे, जगदीश भाई को उनसे मिलाने के लिए ले गये। उससे मैंने पूछा, अमेरिका में लीवर पर बहुत रिसर्च हुआ है, जगदीश भाई के बारे में आपकी क्या राय है? जब विक्टर जगदीश भाई से मिला, उसकी भी वही हालत हो गयी। हँस-हँसकर उसका भी पेट दुखे और मेरा भी दुखे। मैंने कहा, ये हमारे डॉक्टर हैं, हम दोनों की दवाई ये कर देंगे। आज तक डॉ. विक्टर को यह घटना नहीं भूली। एक ही बार उसकी जगदीश भाई से मुलाक़ात हुई थी। आज तक जब भी वो मेरे से मिलता है, उस घटना को याद ज़रूर करता है। इसलिए मैं कहता हूं कि हमारा कितना बड़ा भाग्य है कि उन जैसी महान् आत्मा के साथ हम रात-रात बिताया करते थे।

उनको ब्लड की सारी की सारी बायलोज़ी पता थी

जगदीश भाई के बारे में तो आप सबको मालूम है। जब वे हमारे पास आये थे, उनको बहुत बड़ा अनीमिया हुआ था। मैंने उनसे कहा, आपको इस बीमारी में चलना भी नहीं चाहिए, सोचना भी नहीं चाहिए। लिखने की, बोलने की बात तो और दूर की है। आप कैसे ये सब कर रहे हैं! आपके शरीर में तो आधे से भी कम खून रह गया है और हर रोज़ खून बहता भी है। फिर उन्होंने मेरे से पूछा, अच्छा इलाज़ क्या है? मैंने कहा, इलाज़ तो सिम्पल है। खून बनाना पड़ेगा ना! उन्होंने कहा, हां बनाना तो पड़ेगा। मैंने कहा, बनाना है तो खून डालना पड़ेगा। उन्होंने कहा, फिर इसके बारे में मुझे सोचना पड़ेगा। मैंने कहा, इसमें क्या सोचना है? मैं हैरान था कि जगदीश भाई को ब्लड की सारी की सारी बायलोज़ी पता थी। ब्लड में क्या होता है, किस चीज़ से क्या बीमारी होती है। वे ऐसे जानते थे कि जैसे वो ब्लड के रिसर्च स्टूडेण्ट हों। फिर मैंने कहा, देखो जगदीश भाई, आप विकारियों का खून नहीं लेंगे, हम आपको ब्राह्मणों का ही देंगे। मैं भी तो तैयार हूँ आपको ब्लड देने के लिए। उन्होंने कहा, यह तो हो नहीं सकता। वे मुझे कर्म फिलासफी समझाने लगे। मैंने बोला, देखो, इन बातों में मैं जाना नहीं चाहता, मुझे ऐसी बातें चाहिएं भी नहीं। अगर आपको लेना है तो आज ही बता दो क्योंकि मुझे ब्लड ट्रान्समिशन सेन्टरों में अरेंजमेंट करना पड़ेगा।
आपको पता होगा कि अगर भारत से कोई होकर गया है तो दो साल तक लन्दन में उसका ब्लड कोई नहीं लेता। लन्दन में कोई ऐसा ब्राह्मण होगा जो दो साल तक मधुबन नहीं गया हो? उनको हमने यह बात नहीं बतायी लेकिन पता नहीं, बलवन्त भाई ने क्या किया, ब्लड ट्रान्समिशन सेन्टर पर 25 ब्राह्मण पहुंच गये। जगदीश भाई को पता था कि ब्राह्मणों का ही ब्लड उनको मिलेगा। अन्त में उन्होंने मान लिया ब्लड लेने के लिए क्योंकि उन्होंने बोला, मुझे बाबा का यह यह कार्य करना है, यह-यह लिखना है। मैंने दादी जानकी से कहा कि जगदीश भाई को ब्लड दे रहे हैं। उन्होंने भी कहा, हाँ हाँ, दादी प्रकाशमणि को भी ब्लड ट्रान्समिशन किया हुआ है।
जब ब्लड लेने की बात फाइनल हुई तो जगदीश भाई मेरे से पूछते हैं, कितना दोगे? मैंने कहा, जितनी आवश्यकता है उतना। फिर पूछने लगे, वो कितना होता है? फिर वहीं खीर वाली बात आ गयी। मैंने फिर उनको हंसा दिया कि यह बतख का काम नहीं है। खून का काम है, जितना जरूरी है उतना ही ले लेंगे। क्या ड्रामा रहा वो ब्लड ट्रान्समिशन का ! सुबह उनको भर्ती किया। वैसे उनको 48 घंटे हॉस्पिटल में रखना था। दो घंटे के बाद कहते हैं, अब मुझे घर जाना है। मैंने कहा, जगदीश भाई, ऐसे कैसे जायेंगे घर? उन्होंने कहा, मैं शाम तक वापस आ जाऊँगा। मुझे पता था, दादी जानकी भी ऐसे ही कहती थीं, मैं वापस आ जाऊंगी। जब गयी तो गयी, वापस कभी नहीं आयेंगी। अगले दिन शनिवार था। फिर बहुत कोशिश करने के बाद छुट्टी मिली कि शाम तक वापस आ जाना। फिर शनिवार सुबह आये, ब्लड ट्रान्समिशन ठीक तरह से हुआ, उनकी तबीयत भी ठीक हुई। चैप्टर वन समाप्त हुआ। वापस आ गये दिल्ली।
जाते समय मैंने उनसे कहा, आपको तो दिल्ली छोड़ना ही है। आप चाहे मधुबन में रहो या केंब्रिज में रहो या लन्दन में रहो। दिल्ली की हवा आपके लिए बिलकुल ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, ऐसा नहीं हो सकता। मेरा सारा काम दिल्ली में ही है।

जब मैंने उनको देखा, महसूस किया और कहा, फिर मिलेंगे अगले कल्प

अन्त में मैं इतना ही कहूँगा, 2 मार्च, 2001 को मैं जगदीश भाई से मिलने दिल्ली गया। यह मेरी उनसे अन्तिम मुलाकात थी। जिस स्थिति में मैंने उनको देखा, महसूस किया और कहा, फिर मिलेंगे अगले कल्प। जब आप याद करोगे तब हम मौजूद होंगे। शुक्रवार, मई 11, सुबह ढाई बजे मैं 'बाबा भवन' गया। अमृतवेले योग करके दादी के पास गया और कहा, मैं मधुबन जा रहा हूं। दादी ने पूछा, क्यों जा रहे हो? मैंने कहा, वहाँ मेरी जरूरत है। साढ़े तीन बजे लन्दन के टाइम, योग में बैठा था, बहुत पांवरफुल वाइब्रेशन आ रहे थे। उसके पाँच मिनट बाद उन्होंने शरीर छोड़ा था। यह है मेरे और जगदीश भाई के अविनाशी सम्बन्ध की छोटी-सी झलक।"
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हुबली के ब्रह्माकुमार आनन्द भाई, दिल्ली के डेराबाल सेन्टर पर भाई साहब के साथ लगभग पाँच दिन रहे। उन दिनों के अनुभवों को हमारे साथ इस प्रकार बाँट रहे हैं-
"यह बात सन् 2001, फरवरी की है। आदरणीय जगदीश भाई जी तब शारीरिक व्याधि से ग्रस्त थे, उनका इलाज़ एलोपैथी और हर्बल दवाइयों से चल रहा था। हुबली के बसवराज भाई जी, भ्राता जगदीश जी को कुछ आयुर्वेदिक दवाई दिलाना चाहते थे, जिससे अनेकों के कैंसर की बीमारी ठीक हुई थी। भ्राता जगदीश जी से 2-3 मास से फोन ई-मेल द्वारा इसके बारे में बातचीत चल रही थी। अन्त में वह आयुर्वेदिक दवाई दिल्ली भेजने के लिए भ्राता जगदीश जी ने ई-मेल द्वारा सूचना दी।
उस अनुसार बसवराज भाई जी दवाई लेकर खुद दिल्ली पहुंचने वाले थे लेकिन आबू से आदरणीय दादी जी का बुलावा आया, अतः उनको आबू जाना पड़ा। तब भाई जी ने मुझे दिल्ली जाने के लिए कहा। इस तरह मुझे भ्राता जगदीश जी से निकट से मिलने का सुनहरा मौका मिला। ऐसे तो भ्राता जगदीश जी से इससे पहले 2-3 बार मिल चुका था लेकिन यह मिलना केवल दृष्टि और टोली तक सीमित था।
जब मैं दिल्ली पहुंचा तो भ्राता जी ने स्टेशन पर गाड़ी भेजी थी। हम डेरावल नगर सेवाकेन्द्र पर पहुंचे। दो घंटे के बाद भ्राता जी से बुलावा आया। मैं तो इतनी महान् हस्ती से पहली बार मिल रहा था तो दिल धड़कने लगा। भ्राता जी के कमरे में गया तो वे नहीं दिखायी दे रहे थे। मुझे अजीब सा लगा। क्या करना है, समझ में नहीं आया। वहाँ सोफा था, उस पर बैठ गया। शिव बाबा को याद करने लगा।

मेरे कंधों पर हाथ रख कर प्यार से पूछने लगे

थोड़े समय के बाद भ्राता जगदीश जी आये। मैं झट उठ खड़ा हो गया। भ्राता जी मेरे पास आये और मुस्कराते हुए मेरे कंधों पर अपने हाथ रखकर प्यार से पूछने लगे, 'सफर अच्छा रहा? बहुत दूर से आये हो, तकलीफ़ तो नहीं हुई?' मैंने कहा, 'जी नहीं भाई साहब। सफ़र अच्छा रहा।' मेरी आवाज में कुछ कंपन हो रहा था। भ्राता जी ने पहचान लिया। वे अपने बिस्तर पर आधे लेटे, आधे बैठे पोज़िशन में रहे। मुझ से कहा कि कुर्सी लेकर सामने बैठो।
मैं जाकर बैठ गया। फिर भाई साहब मेरे संकोच को मिटाने के लिए प्यार से दृष्टि देने लगे। मुस्कराते हुए उन्होंने मेरा नाम पूछा। मैंने बताया कि मेरा नाम आनन्द है। भ्राता जी ने कहा कि आनन्द नाम तो गुजरात में ज़्यादा हैं, क्या आपके यहां भी ज्यादा हैं? मैंने कहा, जी भाई साहब। फिर भ्राता जी ने कहा कि दक्षिण भारत के लोगों में एक बहुत अच्छा संस्कार मैंने देखा है कि अगर किसी को जाने-अनजाने में पाँव लग जाता है तो उसे नमस्कार करेंगे या ग़लती के लिए 'सारी' कहेंगे। यह मैंने कई बार देखा है। इस तरह बातें करते-करते भ्राता जी ने मेरे संकोच को मिटा दिया। फिर दवाई कैसे लेनी है, परहेज क्या-क्या हैं, इसके बारे में उन्होंने डीटेल में सुना और उनके साथ सेवा में रहने वाले योगेश भाई को भी सुनने के लिए बुलाया। घंटे भर में यह सब बातचीत खत्म हो गयी।

मेरी टिकट कैन्सल करा कर पाँच दिन रुकवाया

मैं तो सिर्फ दवाई देकर अगले दिन निकलने के लिए रिटर्न टिकट लेकर ही पहुंचा था। भ्राता जी ने मुझे नाश्ता करने के लिए भेज दिया। एक घंटे के बाद उन्होंने बुलाया तो भोजन के समय तक मुझे अपने पास ही बिठा लिया और कहा कि आनन्द भाई, आपको 4-5 दिन रुकना होगा। मैंने कहा, "भाई साहब कल का मेरा रिटर्न रिजर्वेशन है। भ्राता जी ने मुझ से टिकट ली और प्यार से कहा, 'इतनी दूर से आये हो, आपसे कुछ बातें करने का मन कर रहा है इसलिए 4-5 दिन रुको। मै बसवराज भाई को फोन करके बताऊंगा।"
मैं तो आश्चर्यचकित हो गया। भ्राता जी जैसे महारथी, महान हस्ती, बाबा के दिलपसन्द आदिरत्न कहां और मैं कहाँ। मन में प्रश्न उठने लगा कि भ्राता जी मुझ से क्या बात करना चाहते हैं? पहले से ही मैंने कईयों से सुना था कि भ्राता जी बहुत स्ट्रिक्ट हैं। अपाइंटमेंट के बिना किसी से नहीं मिलते। उनके दिये गये समय पर नहीं पहुंचेंगे तो मिलेंगे नहीं। ऐसी-ऐसी बाते मेरे कानों में पड़ी थीं लेकिन आज तो भ्राता जी ने सवेरे से मेर साथ घंटों बिताये थे। उनकी देखभाल करने वाले भाई-बहनें 2-3 बार भ्राता जी को रेस्ट लेने के लिए इशारा करने आये तो उन्होंने कह दिया कि जब मैं घंटी बजाऊंगा तभी आप अन्दर आना। भ्राता जी ने मेरा अगले दिन का टिकट कैंसल कराया। देखिये, भ्राता जी कितने विशाल दिल वाले थे और मेहमानों का कितना सत्कार करते थे।

छोटे पर भी कितना प्यार-विश्वास जताया

भ्राता जी ने बहनों से समाचार लिया कि आनन्द भाई ने सबेरे क्या नाश्ता खाया। बहनों ने बताया 'आधा परोठा'। भ्राता जी ने उनको निर्देश दिया-'देखो वे दक्षिण भारत से आये हैं, वहां भोजन में चावल का ज्यादा उपयोग करते हैं इसलिए तुरन्त बाज़ार से 5 किलो बासमति चावल मंगवा लेना। जब तक मैं वहां रहा तब तक चावल के विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर खिलाने के लिए भ्राता जी ने बता दिया। मुझे बाद में यह समाचार भोजन खिलाने वाली बहन ने बताया। मैंने तो आश्चर्य खाया। मैं कितना छोटा हूं, फिर भी मेरे ऊपर कितना प्यार-विश्वास जताया। यह याद कर अब भी आंखें भर आती हैं।
मैं वहाँ पाँच दिन भ्राता जी के पास ही रहा। चार दिन तो नाश्ता, भोजन और एक घण्टा रेस्ट का समय छोड़कर भाई साहब सारे दिन मुझे अपने पास बिठाकर ज्ञान की अनोखी, अति गुह्य, रमणीक, यज्ञ इतिहास की बातें और अपने जीवन की अनेक घटनाओं के बारे में सुनाते रहे। मैं कितना भाग्यशाली हूं कि भगवान ने जिन्हें 'व्यास', 'संजय' जैसी उपाधि दी है, ऐसी श्रेष्ठ आत्मा से अखुट अलौकिक ज्ञान का खज़ाना मुझे मिला। वह सब मैं यहां वर्णन नहीं कर पाऊंगा लेकिन एक-दो बातें जरूर आपके सामने रखना चाहूँगा।

बाबा ने उनको 'संजय' नाम क्यों दिया-वो कारण मुझे बताया

जब भ्राता जी बोलते थे तब मैं ध्यान से सुनता था। एक बार मैंने बातचीत के सिलसिले में भाई साहब से पूछा कि बाबा ने आपको 'संजय' नाम क्यों दिया? भ्राता जी ने गंभीर और योगयुक्त होकर उत्तर दिया कि मेरे ऊपर प्रभु की कृपा अपरम-अपार है। मेरा मन बहुत निर्मल है। मैं एक संकल्प करता हूं तो डायरेक्ट शिवबाबा को पहुंचता है और बाबा जो रिटर्न संकल्प करता है वह मेरे तक पहुँचता है। ये सब रहमदिल बाबा की कृपा है। उसके लिए एक उदाहरण सुनो मैं ईश्वरीय सेवार्थ अनेक देशों में जा चुका हूँ लेकिन एक बार भी प्लेन मिस नहीं किया है। कभी रात को 12 बजे, 1 बजे, 2 बजे प्लेन पकड़ना था। जब भी मैं सोता था तो बाबा को 45 मिनट पहले उठाने के लिए कहता था। बाबा ठीक समय पर उठाते थे। यह बाबा का ही गिफ्ट है। मेरा मन उतना साफ़ और स्वच्छ है कि बाप से तुरन्त संकल्प कैच कर लेता है इसलिए बाबा ने मुझे "संजय" कहा है।
जितना समय भी मैं भ्राता जी के पास रहा, मुझे वे जैसे फरिश्ते लगते थे। उनके अंग-संग में बहुत न्यारा, प्यारा और योगयुक्त वातावरण अनुभव होता था। भ्राता जी की उन दिनों की श्रेष्ठ अवस्था को देख मैंने मन ही मन यही महसूस किया कि
"भ्राता जगदीश जी सद्विवेक सम्पन्न आत्मा है,
शुभ भावना सम्पन्न आत्मा है। स्व-स्वरूप सम्पन्न आत्मा है, परमात्म-प्यार से भरपूर आत्मा है।"

वे ज्योतिष विद्या जानते थे

और एक घटना उन्होंने सुनायी वे किसी भी आत्मा को देखते थे तो उनको पता चलता था कि उनका देहान्त कैसे होगा और किस उम्र में होगा। उन्होंने ज्योतिष विद्या भी पढ़ी थी। जो भी उनसे मिलने आते तो झट उन्हें बता देते थे कि उनकी मृत्यु किस प्रकार होगी। एक बार दादी प्रकाशमणि जी ने उनसे यह आदत छोड़ने का वायदा लिया। तब से उन्होंने ऐसे कहना छोड़ दिया। उन्होंने कहा 'अब भी मुझे पता तो लगता है लेकिन मैं किसी को बताता नहीं हूँ।'
भ्राता जी जब यह बातें कह रहे थे, उसी बीच मेरे मन में प्रश्न उठा, भ्राता जी को पता होगा कि उनका देहान्त कैसे होगा? मैं अभी संकल्प कर ही रहा था, तुरन्त उन्होंने उत्तर दिया, आनन्द भाई, इस देह की मृत्यु का कारण जलोदर रोग होगा और 72 वर्ष की आयु में मृत्यु होगी। यह मुझे पहले से ही पता है।
मैं हैरान हो गया। मैं जो भी संकल्प करता हूं, वह भ्राता जी कैच कर लेते हैं। एकदम मेरे मन में प्रश्न उठा कि अब भ्राता जी की उम्र क्या होगी? हंसते हुए उन्होंने बोला 'अभी मेरी उम्र 72 है।' मैं चकित और स्तब्ध हो गया। क्या भ्राता जी की उम्र 72 चल रही है तो आयूर्वेदिक दवाई क्यों लेनी है? तुरन्त उन्होंने उत्तर दिया, 'सुनो आनन्द भाई, यह बात शिव बाबा जानें। मैं निश्चिन्त हूं। मुझे जो सेवा करनी थी, वह मैंने कर दी। अगर शिव बाबा चाहता है कि मुझे इसी शरीर में रहकर सेवा करनी है तो वह आयु बढ़ायेगा। यह कैसे, क्यों, कभी नहीं सोचो। यज्ञ के इतिहास में 2-3 उदाहरण देता हूँ। सुनो, कहकर मुझे सुनाया। फिर भ्राता जी ने बताया, 'अगर शिव बाबा चाहता है कि मैं शरीर छोड़कर अड्वान्स पार्टी में चलूं तो भी मुझे मंजूर है। शिव बाबा जैसे कहते हैं, वैसे मैं चलूंगा। उनके इशारे पर मैं यह दवाई ले रहा हूँ। आप हुबली से भेजते रहना।'

ड्रामा को यही मंजूर था

बाद में हमने दो बार दवाइयाँ भेजी। भ्राता जी ने स्वीकार किया और ई-मेल भी भेजा कि मेरे लीवर में कैंसर की कोशिकायें बढ़नी रुक गयी हैं। लेकिन ड्रामा! बाबा ने उनको एडवान्स पार्टी में बुलाना पसन्द किया। भ्राता जी से मिलने फरवरी, 2001 में मैं दिल्ली गया था। उसी वर्ष में मई 12 को वे व्यक्त से अव्यक्त हो गये। भ्राता जी के बारे में जितना लिखेंगे उतना कम है।
आखिर में मैं राजयोगी, सहज योगी, सरल योगी भ्राता जगदीश जी के बारे में यही शब्द-सुमन अर्पित करना चाहता हूं कि "वे एक सन्त थे, एक महन्त थे। सबसे ज़्यादा वे प्रभु के दिल-पसन्द थे।"
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जगदीश भाई साहब लन्दन से आने के बाद कुछ दिन दिल्ली में रहे। दिल्ली में बहुत प्रदूषण होने के कारण उनको मधुबन में रखने का और ग्लोबल अस्पताल में ही उपचार कराने का निर्णय लिया गया। जब ग्लोबल अस्पताल में रहते थे तो वहाँ के डॉक्टर श्रीमन्त जी भी उनको अटैंड करते थे। वे भाई साहब के साथ के उन दिनों के अनुभव इस प्रकार सुना रहे हैं-
"सबसे ज्यादा उनको नज़दीक से देखने का मौका तब मिला जब वे शारीरिक व्याधि से ग्रस्त हो गये। जब वे ग्लोबल अस्पताल में आकर एडमिट हुए और मधुबन में लम्बे समय तक रहे तब उनके सानिध्य की प्राप्ति हुई। मैं उनकी मानसिक अवस्था देखकर दंग रह जाता था। उनका लिवर खराब होने के कारण पेट में पानी भरता था। जब पेट में पानी भरना शुरू होता है तो व्यक्ति को श्वास लेने में, उठने-बैठने में और चलने में बहुत तकलीफ होती है। लेकिन मैं उनको देखता था, उनके बोल में, उनके चेहरे पर इतनी रमणीकता रहती थी कि सामने वाले उनसे मिलकर बहुत खुश हो जाते थे। एक बार रात को उनको एण्डोस्कोपी करने ले गये ताकि पता चले कि उनके पेट में कोई ब्लीडिंग (रक्तश्राव) तो नहीं हो रही है। उसके लिए अहमदाबाद से एक प्रसिद्ध एक्सपर्ट डॉक्टर आये हुए थे। जब वे डॉक्टर, भाई साहब से मिलने आये थे तो भाई साहब ने उनसे पूछा, डॉक्टर, आप कैसे हैं? डॉक्टर ने पूछा, आप कैसे हैं? देखो ना! मैं एक सेठ हूँ, यह मेरा पेट है। वे इतनी रमणीकता से बोले कि वो डॉक्टर भी हँस पड़े। आमतौर पर देखा जाता है कि जब भी डॉक्टर मरीज़ के पास जाता है तो उसको मरीज़ से सहानुभूति दिखानी पड़ती है, उसमें उमंग-उत्साह और हिम्मत भरनी पड़ती है। मैंने देखा, जगदीश भाई साहब जब तक अस्पताल में रहे, डॉक्टरों को रिफ्रेश करते रहे, खुश करते रहे।

ऐसी बीमारी में भी उन्होंने अमृतवेले उठना नहीं छोड़ा

जब तक वे ग्लोबल में रहे, मैं रोज़ सुबह चार बजे उनसे गुडमार्निंग करने जाता था। वे चार बजे से पहले ही तैयार होकर बाबा की याद में बैठे रहते थे। इतने बीमार होते हुए भी उनको एक दिन भी चार बजे सोते हुए मैंने नहीं देखा। हमारे में कई लोग, कभी बीमार पड़े तो अमृतवेले सोते रहते हैं या कहीं से यात्रा करके आते हैं तो उस दिन अमृतवेले विश्राम करते हैं लेकिन जगदीश भाई साहब ने इतनी गंभीर बीमारी में भी कभी अमृतवेले उठना नहीं छोड़ा। यह घटना मेरे पुरुषार्थ के लिए बहुत प्रेरणादायी रही। और एक मेरे लिए सौभाग्य की बात रही कि भाई साहब को जब भी इंजेक्शन लेना होता तो वे हमेशा मुझे ही बुलाते थे। मैं ऑपरेशन थियेटर में मरीज़ों को बेहोश करने के लिए नियमित रूप से इंजेक्शन देता था तो इंजेक्शन देने की कला मेरे में सहज रूप में आ गयी थी। जब मैं किसी को इंजेक्शन देता था, उनको पता ही नहीं पड़ता था कि उनको इंजेक्शन लगा दिया गया है। इसलिए वे कहते थे कि डॉक्टर श्रीमन्त को बुलाओ, वे अच्छी तरह इंजेक्शन देते हैं। वे मुझे नाम से नहीं बुलाते थे, हेलो मिस्टर पेन किल्लर (हेलो मिस्टर दर्द निवारक)। यह मेरे लिए उनका वरदान था। इसके अलावा जब भी उनके पेट में बहुत पानी भर जाता था, वह पानी निकालने की सेवा मुझे ही मिलती थी। उनकी सेवा करने में बहुत गर्व महसूस होता था कि इतनी बड़ी हस्ती की सेवा करने का सौभाग्य मुझे मिला है। उसके लिए कोई एक्सपर्ट ही चाहिए था। यह मेरा सौभाग्य है कि वो कला बाबा ने मुझे दी।

अन्त तक वे दयालु बाबा, कृपालु बाबा, मीठा बाबा, प्यारा बाबा कहते रहे...

कहा जाता है, अन्त मति सो गति। मैंने मरते हुए हजारों लोगों को देखा है। व्यक्ति की पहचान, जब वह शरीर छोड़ता है, उस समय होती है। शरीर छोड़ते समय कोई अचार खाने की इच्छा प्रकट करता है, कोई कहता है कि मुझे साबूदाने की खिचड़ी खिलाओ, कोई कहता है, फलाने सम्बन्धी को बुला लो। मैंने जगदीश भाई साहब की अन्तिम स्थिति देखी, उस दृश्य को मैं कभी भूल नहीं सकता। ग्लोबल हास्पिटल से डिस्चार्ज होने से एक दिन पहले के अमृतवेले मैं उनसे मिलने गया। उनसे ओम् शान्ति और गुड मार्निंग की। उसके बाद मैंने पूछा, भाई साहब, कैसे हैं? उन्होंने जो शब्द बोले, उन्हें सुनकर मेरी आंखें भर आयीं। आज भी वे शब्द मुझे याद आते हैं तो भाव-विभोर हो जाता है। उन्होंने कहा, "बस, अभी चलना है ना! तैयारी कर रहा हूँ।" यह सुनकर मैं वहां रह नहीं पाया, वहाँ से निकल कर बाहर आ गया। उसी दिन उन्होंने कहा कि अभी मुझे हॉस्पिटल से मुधबन ले चलो। उनकी इच्छा अनुसार उसी दिन उनको मधुबन के सुखधाम में लाया गया। अगले दिन सुबह से लेकर शाम तक मैं उनके पास ही रहा। मैंने देखा, सुबह से लेकर शाम तक लगातार उनके मुख से "मीठा बाबा, प्यारा बाबा, कृपालु बाबा, दयालु बाबा" शब्द अनहद निकलते रहे। उन्होंने पहचानना बन्द कर दिया था। बड़ी दादी जी ने कहा, श्रीमन्त भाई, कल से ही जगदीश भाई लगातार मीठे बाबा, प्यारे बाबा, दयालु बाबा, कृपालु बाबा बोल रहा है। थक गया है, इसको सुला दो, प्लीज़ सुला दो। उनको सुलाने के लिए मैंने एक इंजेक्शन लगाया। थोड़े समय सो गये, फिर जाग गये। दादियां भाई साहब को दृष्टि देती रहीं, भाई साहब भी दृष्टि लेते रहे। दृष्टि लेते लेते आत्म-पंछी इस स्थूल शरीर और स्थूल लोक से उड़ गया बाबा के पास।
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जगदीश भाई साहब ने शरीर के कर्मभोग को चुक्ता कर, कैसे 71-72 वर्षों तक साथ देने वाले शरीर को त्यागा, इसका वर्णन दीदी चक्रधारी जी इस प्रकार कर रही हैं-
"जब अन्तिम समय था, मैं मुधबन के सुखधाम में उनके पास में ही खड़ी थी, उस समय डॉक्टर मित्तल जी और डॉक्टर गुप्ता जी भी थे। उनसे पहले और डॉक्टर थे, वे चले गये थे। मित्तल जी ने कहा, जब तक और डॉक्टर का प्रबन्ध नहीं होता तब तक मैं यहां रहूंगा। वे बहुत ध्यान रखते रहे। मैंने डॉक्टर गुप्ता जी (शक्ति नगर) में पूछा, अभी आप क्या समझते हैं? उन्होंने कहा, दीदी, अभी स्टेज ऐसी है, ठीक नहीं हो सकती क्योंकि अभी लिवर पूरा चला गया है, लिवर के कारण किडनी भी फेल हो गयी है। किडनी फेल हो गयी है, यह भाई साहब को पता नहीं चला। उनको यूंरीन का इतना ज़्यादा प्रेशर होता था तो लगता था कि यूरीन पास हो गया लेकिन यूरीन पास होता नहीं था। इसलिए उनको इस चीज़ का पता नहीं चला कि मेरी किडनी भी जा चुकी है।

ऐसा लगता था कि आज भाई साहब के पास बैठे रहना चाहिए

जिस समय लास्ट दिन था (12 मई, 2001), उस दिन मैं थोड़ा रेस्ट करने के लिए गयी लेकिन नींद नहीं आ रही थी। ऐसा लगता था कि आज भाई साहब के पास बैठे रहना चाहिए। फिर मैं उठकर भाई साहब के पास आयी। उस दिन दोपहर दो बजे तक जो भी भाई-बहनें आये, उनसे हमने कहा, भले भाई साहब से मिल लें। उसके पश्चात् तीन बजे से लगातार लोगों का आना शुरू हो गया। हमने किसी को भी नहीं रोका, सबको मिलने दिया। उस समय भाई साहब बोल नहीं पा रहे थे और आंखें बन्द थीं। फिर शाम को पांच बजे मुझे ऐसा लगा कि कुछ ज्यादा ही तबीयत खराब लग रही है क्योंकि किसी दिन भी उन्होंने यह नहीं कहा कि मुझे दर्द हो रहा है। कभी नहीं कहा। वे कहते थे, बाबा मेरा दोस्त है, उसकी गैरन्टी है, मुझे दर्द नहीं होने देगा। मुझे विश्वास है कि मुझे दर्द नहीं होगा। शरीर छोड़ेंगा लेकिन दर्द नहीं होगा। कहते हैं, इस तरह (लिवर) के रोगियों को बहुत दर्द होता है लेकिन वे कहा करते थे कि बाबा मुझे ऐसे होने नहीं देगा। मैंने डॉ. गुप्ता जी से कहा तो उन्होंने टांग ऊपर उठाकर रखी, वो गिर गयी। उन्होंने कहा कि दीदी, अभी इनको कोमा की स्टेज आ रही है। तब हमने गुलज़ार दादी को फोन किया और बड़ी दादी को भी बताया कि ऐसी-ऐसी स्थिति आ गयी है। गुलज़ार दादी जी आ गयीं।

पता नहीं चला कि ये जा रहे हैं

उनकी आवाज़ से ऐसा लगता था कि बलगम बहुत इकट्ठा हो गया है। तब डॉक्टरों ने उसको निकालना शुरू किया। उनका गला साफ़ करने लगे तो हम वहां से बाहर निकल गये ताकि वे अपना काम आराम से करें। रात को आठ बजे के करीब बड़ी दादी जी आयी। उससे पहले हमने निर्वैर भाई जी को भी बुलाया था। दादी जी आकर, जगदीश भाई 'ओम् शान्ति.. ओम् शान्ति' कहने लगीं लेकिन भाई साहब ने कोई रिस्पान्स (प्रत्युत्तर) नहीं दिया। तो दादी जी बाहर चली गयीं और हम भी आ गयी।
डॉक्टर गुप्ता जी और डॉक्टर श्रीमन्त जी अन्दर ही थे, गला साफ़ कर रहे थे। उतने में डॉक्टर ने देखा कि मोनिटर में हार्ट की लाइन सीधी जा रही है तो उन्होंने हमें तुरन्त अन्दर बुलाया। हम और गुलज़ार दादी जी अन्दर गये, उस समय डॉक्टर उनकी छाती को दबा रहे थे लेकिन हाथ-पाँव-चेहरा जैसे कि नीले हो गये सेकण्ड में। पता नहीं चला कि ये जा रहे हैं। डॉक्टर और नर्सेस कुछ कर रहे थे, उसी समय आत्मा उड़ गयी। हमने पहला फोन दादी जानकी जी को किया। दादी जानकी जी का उनके प्रति बहुत स्नेह रहा। हर दो-तीन दिन में वे लन्दन से फोन करती थी। उसके बाद का समाचार तो आप सब जानते ही हैं।
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भ्राता जगदीश जी के प्रति आदिरत्नों की अविनाशी पुष्पाञ्जली

आदरणीया राजयोगिनी गंगे दादी जी यज्ञ के आदि रत्न हैं। साकार बाबा इनको 'पतित पावनी हर हर गंगे' कहते थे। उत्तर प्रदेश ज़ोन की संचालिका के रूप में, कानपुर में रहकर इन्होंने सेवायें दीं। वे जगदीश भाई साहब के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि इस प्रकार अर्पित कर रही हैं-
"भ्राता जगदीश जी हम सबके अति प्रिय थे और सदा रहेंगे। मुझे याद आता है, जब हमारा साहित्य छपना शुरू हुआ, तब हिन्दी भाषा के जानकार की बहुत आवश्यकता थी। बाबा ने कहा, बच्ची, एक दिन ऐसा रत्न आयेगा जो हिन्दी भाषा में साहित्य तैयार करेगा। पहले से ही साकार बाबा ने हम लोगों को बता दिया था। ठीक समय अनुसार ये आ गये और अपनी सेवायें देनी शुरू कर दीं।

इनके बारे में पहले से ही सुन रखा था

मैं तो कानपुर में रहती थी। इसके बारे में सुनती रहती थी कि दिल्ली में ऐसा एक भाई आया है। जगदीश भाई की बुद्धि बहुत तेज थी और वे आर्य समाजी थे। आप जानते हैं, आर्य समाजी हर बात में प्रश्न करने में बहुत होशियार होते हैं। एक बार ये मधुबन में थे, उन्हीं दिनों मैं भी कानपुर से पार्टी लेकर मुधबन आ रही थी। बाबा ने उनको कहा था कि गंगे बेटी आ रही है, आपको कोई भी प्रश्न पूछना हो तो उससे पूछ लेना। टाइम लेकर ये हमारे साथ बैठे। हमारे साथ कानपुर के बड़े बड़े महारथी भाई भी बैठे हुए थे, जैसे गुप्ता भाई, सन्तराम भाई, त्रिलोकचन्द भाई आदि-आदि। ये भाई भी कोई कम नहीं थे, इसी की टक्कर के थे। बहुत प्रश्न-उत्तर करते-करते आखिर वे निश्चयबुद्धि बने। एक मिसाल आपको देती हूँ। गुप्ता जी (बनारस वाले) का यही प्रश्न बार-बार चलता था कि यह कैसे समझें कि यह हिस्ट्री हुबहू-हूबहू रिपीट होती है? वो भी पढ़ा-लिखा था। रामायण आदि कई शास्त्रों का अध्ययन किया हुआ था। वो कहते थे, इस पर आप हमें समझाइये। मैंने भिन्न-भिन्न रीति से, जितनी मेरे पास शक्ति थी, समझाने की कोशिश की। हमने कहा, एक समय आयेगा कि बाबा आपको टच करेगा। वण्डरफुल बात है, एक दिन ये योग में बैठे थे। इसको वो बात याद आयी कि भीष्म पितामह ने कहा था कि मैं जब शरीर छोड़ेंगा, मेरा संस्कार उसी जगह पर करना, जहाँ कभी किसी का संस्कार न हुआ हो। यह बात महाभारत में लिखी हुई थी। जब भीष्म पितामह को लेकर गये, तो वहां आवाज आयी कि पहले भी तुम यहां आ चुके हो। इस प्वाइंट ने इनको इतना टच किया कि पहले भी तुम यहां आ चुके हो और आज भी आ गये हो, तुम नयी जगह पर नहीं आये हो। बाद में खुशी से आकर गुप्ता जी ने मुझे सुनाया कि इस प्वाइट से मुझे निश्चय हुआ बरोबर हिस्ट्री हूबहू रिपीट होती है। मैंने कहा, चलो अच्छा हुआ, निश्चय तो हो गया ना। फिर मैंने कहा कि योग में रहने से कई प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं।
जगदीश भाई भी ऐसे ही प्रश्न पर प्रश्न पूछा करते थे। मैं तो बाबा की याद में रहकर उत्तर देती थी। उनको समझ में आ जाता था। वो ज्ञान को अच्छी रीति से, गहराई से समझना चाहते थे। वो हमें टेस्ट करने के लिए या अपनी होशियारी दिखाने के लिए प्रश्न नहीं पूछते थे, जानने के लिए, समझने के लिए पूछते थे। ज्ञान को जानने की उत्सुकता उनमें बहुत होती थी।

पब्लिक प्रोग्राम में भाषण करना होता था तो जगदीश भाई ही हमें गाइड करते थे

हम बहनों को जब भी, जहां-तहाँ सम्मेलनों में, पब्लिक प्रोग्राम में भाषण करना होता था तो जगदीश भाई हमें गाइड करते थे कि क्या बोलना है, कैसे बोलना है, कितना बोलना है। इसके अलावा वे भाषण लिख कर भी देते थे। साहित्य लिखने में, अखबारों के लिए मैटर तैयार करके देने में, वी.आई.पी की सेवा करने में उन्होंने हम बहनों को बहुत गाइड किया। जगदीश भाई हमारे यज्ञ के बहुत अनमोल रत्न थे। परमात्मा के दिये हुए ज्ञान को सामान्य जनता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाने वाली वह महान आत्मा थी। उनको बापदादा द्वारा इतना बड़ा वरदान मिला था। उनकी किताबें पढ़ने के बाद कभी किसी ने प्रश्न नहीं उठाया कि यह कैसे? पढ़ने वाले हरेक व्यक्ति ने इनकी लेखनी को पसन्द किया। बाबा का दिया ज्ञान देश-विदेश में पहुंचाना, प्रत्यक्ष करना यह हमारे भ्राता जगदीश जी का विशेष पार्ट रहा।

जैसे हम पुरानी बहनें हैं, आदि से मुख्य पार्ट रहा, ऐसे ही इनका भी मुख्य पार्ट रहा

हम लोग भाषणों द्वारा लोगों को समझाते थे लेकिन इन्होंने भाषण तो किये ही लेकिन भाषण से भी ज़्यादा अपने हस्त-कमल द्वारा बहुत कुछ लिखा। इन्होंने यज्ञ में आकर बहुत कुछ सीखा भी, दूसरों को सिखाया भी और बहुत मीठा पार्ट बजाया भी। बाबा सागर है, वे उस सागर के समीप भी रहे और जो कुछ बाबा कहते थे उसको उसी रूप में ग्रहण भी किया। बिलकुल जैसे हम पुरानी बहनें हैं, आदि से मुख्य पार्ट रहा, ऐसे ही जगदीश भाई का भी मुख्य पार्ट रहा। विशेषतायें जो उनके अन्दर भरी हुई थीं, उनको ठीक से प्रत्यक्ष किया। इस आत्मा ने यज्ञ में विशेष पार्ट बजाया। बाबा कहा करते थे, भगवानुवाच संजय प्रति। यह निमित्त बना, संजय द्वारा अनेक आत्माओं को भगवान का सन्देश मिलता रहा। क्या यह कम बात है? कितना उनका ऊँचा पार्ट रहा। विश्व की बड़ी-बड़ी आत्माओं के सामने अपने विचारों को, ईश्वरीय ज्ञान के रहस्यों को रखना, कम बात नहीं है। आज भी बड़े-बड़े विद्वान, फिलॉसफर्स आदि उनका साहित्य पढ़कर प्रेरणा लेते हैं और आगे भी अनेकों को प्रेरणा मिलती रहेगी। मैं यह कहूंगी कि इनकी सेवा आज भी है, कल भी थी और अविनाशी बनकर रहेगी। वो कहीं गये नहीं। भले निमित्त पुराने शरीर का हिसाब-किताब था, उन्होंने कर्मयोग द्वारा कर्मभोग पर विजय प्राप्त की। बीमारी की इतनी तकलीफ होते हुए भी उन्होंने बाबा की सेवा छोड़ी नहीं, अपनी स्मृति खोयी नहीं। सुना है, अन्त तक जाग्रत रहे, क्लासेस कराते रहे, लिखते रहे। यह भी विशेषता रही।

इनको टीचर बहनों का बहुत ध्यान रहता था

विशेषकर, इनको टीचर बहनों का बहुत ध्यान रहता था कि हमारी टीचर बहनें निमित्त बनी हैं अनेक आत्माओं का कल्याण करने के लिए, ईश्वरीय सेवा बढ़ाने के लिए, उनकी स्वयं की स्थिति बहुत श्रेष्ठ और शक्तिशाली होनी चाहिए। जितना वो भरपूर आत्मा होंगी, आने वाली आत्माओं को भी उतना ही भरपूर करेंगी। बहनों की उन्नति के लिए किसी-न-किसी कार्यक्रम का आयोजन और क्रियान्वयन करते रहे। विशेष रूप से तथा बहुत रुचि से वे टीचर बहनों की क्लास लेते थे और अच्छे ढंग से उनको समझाते थे। चाहे ज्ञान के बारे में, चाहे धारणा के बारे में, चाहे योग और सेवा करने की विधि के बारे में, चाहे मर्यादाओं के बारे में। उनकी यही आशा होती थी कि ये निमित्त आत्मायें बहुत पॉवरफुल और भरपूर हों ताकि इनसे अनेक आत्माओं का कल्याण हो।
हमारी यह शुभभावना है कि ऐसी पॉवरफुल आत्मा, विशेष आत्मा, ज्ञानी और योगी आत्मा जहां भी गयी है, जिस कुल में भी गयी है वहां रहकर भी बाबा की बहुत बड़ी सेवा करेगी। बाबा को प्रत्यक्ष करने का इनका विशेष पार्ट रहेगा।"
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आदरणीया राजयोगिनी मनोहर दादी जी ने अनेक वर्षों तक दिल्ली, पंजाब तथा हरियाणा आदि प्रान्तों में ईश्वरीय सेवा की। उसके बाद, ज्ञान सरोवर अकादमी की निर्देशिका रहीं। इन्होंने भ्राता जगदीश जी के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि इस रीति व्यक्त की है-
"जगदीश भाई के साथ हमारा बिलकुल आदि का सम्बन्ध है। दिल्ली में जब पहला सेन्टर खुला कमला नगर में, हम वहीं इकट्ठे रहते थे। जब हम कमला नगर गये तब जगदीश भाई नया-नया आया हुआ था। हम और सन्देशी बहन वहां गये, एक ही कमरे का सेन्टर था वो। उसी में हम सब रहते थे।

ऐसा लगता था कि यह भागवत की गोपी है

जब मैं कमला नगर गयी उस समय वह लौकिक स्टूडेण्ट था। उसको जानने की बहुत उत्सुकता होती थी। बहुत प्रश्न करता था जानने की दृष्टि से। यज्ञ की कहानी सुनाते समय मुझे ऐसा लगता था कि यह भागवत की गोपी है। यह इतना मगन होकर सुनता था मानो यहाँ है ही नहीं, उसी अनुभव में खोया रहता था। उसको सुनाने में हमें भी अच्छा लगता था और सुनते-सुनते वह खुश होता था।
शुरू से बाबा ने जगदीश भाई को लिखने का कार्य दिया था। पहले जगदीश भाई हिन्दी में लिखकर हमें देता था ताकि हम उसको सिन्धी में लिखें। सिन्धी में लिखकर बाबा को भेजा जाता था। हमारा एक साथ सोने और एक साथ उठने का समय होता था। वो दो बजे उठकर लिखना शुरू करता था और हम भी दो बजे उठकर सिन्धी में लिखना शुरू करते थे क्योंकि छह बजे पोस्ट से उसको बाबा के पास भेजना पड़ता था। रात 11 बजे तक मीठी-मीठी ज्ञान की बातें सुनाता था और 12 बजे सो जाता था। फिर सुबह 2.00-2.30 बजे उठकर लिखना शुरू करता था। पन्द्रह मिनट के बाद लिखा हुआ हमें दे देता था सिन्धी में लिखने के लिए।
पहली बार हम किसी भाई के साथ एक सेन्टर में रहे थे। उनके वायब्रेशन्स एक पक्के योगी के थे। वे पक्के निश्चयबुद्धि, धारणामूर्ति, मर्यादायुक्त थे। एक ही सेवाकेन्द्र में होते हुए भी कभी भी हत्के रूप में चले नहीं। इसलिए हमें कभी फीलिग ही नहीं आती थी कि हम किसी भाई के साथ रह रहे हैं। हमें ऐसी भासना आती थी कि वह हमारा बड़ा भाई है। भले उम्र में, ज्ञान में हम बड़ी थीं लेकिन व्यवहार में, अनुभव में वह हमारे बड़े भाई की तरह रहा और हमने भी ऐसा ही अनुभव किया।

उसको बातों में कोई हरा नहीं सकता था

कई बार धारणाओं की बातें होती थीं। उसमें वह खुले दिल से लेन-देन करता था। कुछ कहना हो तो कहता था, कुछ स्पष्टीकरण देना हो तो देता था और कुछ हमारी बात सुननी हो तो सुनता था। कोई भी बात हो, स्पष्ट रूप में बोलता था। जितने समय भी साथ रहे, हम बहुत इजी रहे। फिर हम सेवा के लिए दूसरी जगह चले गये। जब हम यहां मधुबन, ज्ञान सरोवर में आयीं तब जगदीश भाई का फोन आया कि आपको दादी प्रकाशमणि, दादी जानकी और दादी चन्द्रमणि की विशेषताओं के बारे में लिखकर भेजना है। मैंने कहा, भाई, आप तो मास्टर नालेजफुल आत्मा हो, मेरे से ज़्यादा आप अच्छी रीति लिखते हो, यह काम मुझे क्यों देते हो? तब उन्होंने कहा, दादी, आप में ग्रहण करने की शक्ति और विशेषता देखने की शक्ति बहुत अच्छी है इसलिए आप लिखकर दो मुझे, हम आपकी इस कला से लाभ लेना चाहते हैं। उसको बातों में कोई हरा नहीं सकता था। जब वह कहता था, यह काम आपको करना ही है तो मुझे करके देना ही पड़ता था। जब हम कमला नगर में रहते थे उस समय भी वह मेरे से बाबा के बारे में, मम्मा के बारे में लिखवाता था। कहता था, आप मम्मा-बाबा के साथ रह चुके हो इसलिए मुझे वो सब अनुभव चाहिएँ, आप लिखकर दो। उस समय से मैं उनको लिखकर देती थी।
जब भी सेवा पर हम मिलकर जाते थे तो ट्रेन में आपस में ज्ञान की लेन-देन करते थे, खुले दिल से लेन-देन करते थे। यज्ञ की या प्रशासन की कोई बात हो, उनको अच्छी नहीं लगती तो वे खुलकर मुझे बताते थे और उनकी कोई बात मुझे अच्छी नहीं लगती तो मैं भी उनको कह देती थी, बाद में वे उस बात का पूरा स्पष्टीकरण देते थे। इस प्रकार, वे हमारे बहुत नज़दीक थे, हमारे से सुनते भी थे और हमें सुनाते भी थे।

उन्होंने देखा, मेरा हाथ पकड़ा और ऐसे देखता रहा-यही हमारी अन्तिम भेंट थी

जब विदेश जा रही थी, मैं उनसे मिलने सुखधाम गयी। मैंने कहा, जगदीश भाई, मैं जापान जा रही हूँ, वहाँ जाकर क्या सेवा करूं? उन्होंने कहा, बाबा ने आपको जो दिया है उसे देकर आना है। स्नेह देना, मीठी दृष्टि देना और बाबा की टोली खिलाकर आना। अगर वे बाबा के बारे में या मम्मा के बारे में कुछ पूछें तो जरूर सुनाकर आना क्योंकि वे चात्रक होते हैं। उस दिन बातें करते-करते पहली बार उन्होंने मेरे बारे में खुले दिल से सुनाया कि आप में क्या-क्या विशेषतायें हैं, गुण हैं, आप कैसी सेवा करती हैं, उसका रिजल्ट क्या होता है आदि का पूरा चित्रण मेरे सामने लाया। उसके बाद मैं विदेश चली गयी।
विदेश से आने के बाद, फिर उनसे मिलने गयी। चक्रधारी बहन ने कहा, भाई साहब-भाई साहब, मनोहर दादी जी आयी हैं। उन्होंने देखा, मेरा हाथ पकड़ा और देखता रहा जैसे कि मैं हाथ पकड़कर आपसे मिल रहा हूँ। बस, यही हमारी अन्तिम भेंट थी। बाक़ी तो यज्ञ के इतिहास में तो जगदीश भाई का बहुत विशेष पार्ट रहा।"
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प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की वर्तमान मुख्य प्रशासिका आदरणीया राजयोगिनी दादी जानकी जी, भ्राता जगदीश के प्रति अपनी स्मरणाञ्जलि इस प्रकार प्रकट कर रही हैं-
"जगदीश भाई से हमारा जो स्नेहयुक्त सम्बन्ध रहा वो बहुत वण्डरफुल था। उसको मेरी पहचान और मुझे उसकी पहचान बहुत महीन थी। दिल्ली, कमला नगर में हम रहते थे। जगदीश भाई को ज्ञान में लाने के निमित्त मैं बनी है। जैसे बाबा प्यार देता था, वैसे जगदीश भाई ने भी मुझे बहुत प्यार दिया, सन्मान दिया। भाइयों में वह एक ही ऐसा भाई था जो ज्ञान की लेन-देन करने में, राय सलाह देने में बहुत होशियार था। बाबा की याद कैसे की जाती है, उसकी गहराई क्या है, इसकी लेन-देन हम वहां सेन्टर पर करते थे। एक तरफ़ दीदी का कमरा था, उसके बगल में मेरा कमरा था, बाहर बालकनी में जगदीश भाई रहता था। हम साथ रहे हैं, आपस में एक-दो को समझने में, पहचानने में बिलकुल स्पष्ट थे। उसको बाबा की पहचान बहुत अच्छी रही।

बाबा को भी इसका इन्तज़ार था

जगदीश भाई को देखते ही बाबा को भी निश्चय हो गया कि यह वही कल्प पहले वाली आत्मा है जिसका मैं अभी तक इन्तज़ार कर रहा था। बाबा ने भी जाना कि यह बच्चा ज्ञान में मेरे समान है। जब दिल्ली की थियोसोफिकल सोसाइटी में मैं और कुंज बहन भाषण करने गयी थीं, उस सभा में जगदीश भाई भी बैठा हुआ था। वहाँ मैं बोली तो मेरी बात इसको अच्छी लगी और उसने जो प्रश्न पूछे वो भी मुझे अच्छे लगे। कार्यक्रम पूरा होने के बाद हम जा रहे थे। मैंने मुड़कर देखा तो यह मेरे पीछे-पीछे आ रहा था। मैं सोचने लगी कि यह लड़का हमारे पीछे क्यों आ रहा है? मैं रुक गयी तो उसने कहा, मुझे आपसे मिलना है। मैंने कहा, अभी रात हो रही है, मिलना है तो कल मिलना। उसने कहा, कल मुझे सोनीपत जाना है नौकरी करने। मैंने कहा, कल सुबह पांच बजे आ जाना। वह ठीक पाँच बजे हमारे पास पहुंच गया। उसके साथ ज्ञान की चर्चा करते मुझे मन में आने लगा कि यह तो बहुत अच्छा भाई है, पढ़ा-लिखा है। बाबा को ऐसा बच्चा मिल जाता है तो सेवा के लिए बहुत अच्छा होगा। दिल्ली में पहला पहला पढ़ा-लिखा, अच्छा स्टूडेण्ट, कुमार, यह जगदीश भाई ही था। इसको देखकर बाबा को भी बहुत अच्छा लगा। बाबा का ज्ञान लिखने वाला तब तक कोई मिला नहीं था। आनन्द किशोर भाई तो था ही यज्ञ में, वो ही लिखा-पढ़ी करता था पर साहित्य के रूप में लिखने वाला चाहिए था बाबा को। जब इसको सेन्टर पर रखने की बात आयी तो बाबा ने कहा, भले इसको सेन्टर पर रखो। उस समय तक सेन्टर पर कोई भाई नहीं रहता था। विदेश की सेवा के लिए भी दीदी-दादी ने जगदीश भाई को ही बोला। विदेशियों के साथ यह अच्छी लेन-देन भी करता था।

बाबा इसको 'जय जगदीश' कहता था

जैसे बाबा ने मेरा नाम 'जनक' कहा, विदेही और ट्रस्टी कहा, ऐसे मेरे भाई का नाम 'जय जगदीश' कहा। भक्त आरती उतारते हैं, जय जगदीश हरे, पाप हरो देवा। प्रैक्टिकली इसने अपनी याद के बल से वो स्टेज प्राप्त की। वो याद में ऐसे बैठता था, मैंने आंखों से देखा है। पूरा याद में डूबा रहता था। वो मुस्कान द्वारा भी सभी को अपनेपन की फीलिग देता था।

जगदीश भाई के सात स्वरूप थे

अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम और युधिष्ठिर इन पांचों पाण्डवों के गुण, अलौकिक जन्म लेते ही हमने जगदीश भाई में देखे। अर्जुन बनकर गीता का ज्ञान सुन रहा है। भगवान के गोपनीय ज्ञान, गुह्यतीगुह्य ज्ञान को इसने सुना और दूसरों को सरल बनाकर दिया ताकि सब सहज रीति से समझ सकें। योग क्या चीज है, इसने अनुभव किया और दूसरों को कराया। भीम बनकर बाबा के यज्ञ की रक्षा की। नकुल बनकर बाबा की डिटो नकल की। नकल करने की भी अक्ल चाहिए। पूरी उसने बाबा की नकल की। ब्रह्मा द्वारा शिव बाबा क्या सुना रहा है, उस सारे के सारे ज्ञान की नकल की, फॉलो किया। उसने सुना, समझा और फोलो किया। यह सहदेव भी था। सबका सदा सहयोगी रहा। छोटे-बड़े, बाल-वृद्ध सबके साथ मिलकर रहा और सबका सहयोगी बनकर रहा। निर्विकारी, निरहंकारी, नम्र बन सबका सहयोगी बनकर रहा। यधिष्ठिर अर्थात् सदैव सत्य और धर्म में रहने वाला। जगदीश भाई व्यवहार, कारोबार और यज्ञ में सच्चाई से रहा तथा स्वधर्म में रहा। धर्म और राज्य वे शब्द गीता में हैं।
जगदीश भाई को बाबा कहते थे, यह गणपति है। हमने इनको गणेश के रूप में भी देखा है। गणेश ने कलम से महाभारत को लिखा था। जब हम दिल्ली, कमला नगर में रहती थी, तब इसको हम देखती थी। यह लिखता रहता तो लिखता ही रहता था। मुझे ऐसा अनुभव होता था कि बाबा इसको कलम से लिखना सिखा रहा है।
बाबा ने इसको संजय भी कहा। हमने आंखों से देखा, भगवानुवाच अर्जुन के प्रति। संजय अन्धे धृतराष्ट्र को भी ज्ञान की आँखें देने वाला था। ज्ञानहीन अन्धों को ज्ञान के चक्षु देने वाला जगदीश भाई हमारा संजय भाई है।
जब मैं विदेश में चार साल रहकर आयी, तब जगदीश भाई ने ही मेरा स्वागत करने की व्यवस्था की थी। पाण्डव भवन का यह मेडिटेशन हॉल तभी बना था। उसी समय एक नया गीत बना था 'बाबा, तेरा बनने में सुख मिलता इलाही है...'। जगदीश भाई को मेरे लिए बहुत रिगार्ड था।"
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आदरणीया राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी ने इस अन्तरर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था की मुख्य प्रशासिका बनकर 38 वर्षों तक एक सशक्त और आदर्श प्रशासन संसार को उपहार के रूप में दिया, उन्होंने भ्राता जगदीश के बारे में अपने उद्‌गार इस तरह व्यक्त किये हैं-

वे बाबा-मम्मा के बहुत करीब थे

"आप और हम सब का, सारे ईश्वरीय परिवार का, देश-विदेश के सभी भाई-बहनों का, मीठे-मीठे जगदीश भाई से जितना स्नेह है, उतना ही बहुत रिगार्ड है। आपको मालूम होगा कि सन् 1952 से कमला नगर सेन्टर पर आप पहले स्टूडेण्ट रहे। बराबर रोज़ दूर से आते थे और हमारी कुंज बहन से बहुत ही अच्छी रीति से प्रश्न-उत्तर करते, बहुत-बहुत प्यार से इस नॉलेज को सुनते रहे और जानते रहे क्योंकि सब जानते हैं कि आप आत्मा बहुत ही बुद्धिशाली थे। मुझे याद है कि पहले-पहले आप
बापदादा से सम्मुख मिलने आये थे और बाबा ने आपके प्रति उसी समय यह प्रेरणा दी थी कि आप बच्चे, इस नॉलेज को बहुत अच्छी तरह समझ के औरों तक पहुंचायेंगे, लिखेंगे। तब से लेकर छोटे-से बड़े लिट्रेचर यानि बुक्स लिखते रहे। बार-बार बाबा के और मम्मा के सामने आते रहे। आपने बाबा-मम्मा से बहुत ही डायरेक्ट पालना ली है।
एक बात मुझे पर्सनल याद है कि जब हम ईश्वरीय सेवा-अर्थ जापान जा रही थी सन् 1954 में, तब सारा जापान का प्रोग्राम कहां-कहां, क्या-क्या हमें लेक्चर्स करने हैं, वो सब हमें आपने ही लिख करके दिया था, जिस आधार पर हम वहां इंग्लिश में स्पीच देते थे।

बापदादा ने उनको दधीचि का टाइटल दिया

तब प्यारे बापदादा ने भी सन्देश में कहा कि आपने तो दधीचि ऋषि' की तरह हड्डी-हड्डी सदा ही सेवा में दी है। चाहे देश, चाहे विदेश में बहुत ही अच्छी तरह लेक्चर्स देते रहे जो सभी को बहुत ही प्रेरणा देते हैं। जैसे आप सभी जानते हैं कि समय प्रति समय यहां भट्ठियों में भी आकर के क्लासेस देते थे, जो धारणा योग्य होते थे।

उनकी इच्छा अनुसार उनको मधुबन में लाया गया

काफी दिनों से उनकी ट्रीटमेन्ट चलती रही। आप लन्दन भी गये थे। फिर मधुबन में ग्लोबल हास्पिटल में भी आपकी ट्रीटमेन्ट चलती रही। दो दिन पहले ही आपने कहा कि मुझे मधुबन ले चलो, अब हॉस्पिटल में मैं नहीं रहूंगा। आपकी वहां ट्रीटमेन्ट चल रही थी, फिर भी आपने कहा कि मुझे मधुबन के सुखधाम में ले चलो। उनको जैसे चाहिए था, वैसे ही सुखधाम में उनका कमरा बना हुआ था। उनके शुभ संकल्प अनु‌सार हॉस्पिटल से उनको सुखधाम में ले आये।
पहले तो जब भी हम उनसे मिलने जाते थे, ओम शान्ति ओम् शान्ति होती थी परन्तु शरीर छोड़ने के दो दिन पहले से ओम् शान्ति भी नहीं करते थे, आंखें भी बन्द रहती थीं, थोड़ा समय खोलते थे, फिर बन्द करते थे। डॉक्टर्स तो हर प्रकार से ट्रीटमेन्ट देते रहे, हमें रिपोर्ट मिलती रहती थी।

उस आत्मा को तो पहले से ही मालूम था

उस दिन मैं सुबह शान्तिवन गयी थी, शाम को लौटी और क्लास में गयी। क्लास से सीधा हम जगदीश भाई के पास गयी। वहाँ सब थे, उनके लौकिक दो भाई भी वहाँ पर उपस्थित थे। दादी गुलज़ार भी वहां पर बैठी थीं। निर्वैर भाई, डॉक्टर्स आदि वहाँ सब बैठे हुए थे। जब हम वहां पहुंची तो बिलकुल लगा कि वे अनकॉन्सेस हैं जिसको कहते हैं कोमा। लगता था कि यह आत्मा अभी बाबा के पास ही है। खैर, हम उनसे मिलकर मधुबन आयी, दादी गुलज़ार और अन्य वहाँ ही बैठे थे। जैसे ही मैं मधुबन में आयी, तुरन्त एक मिनट में ही निर्वैर भाई का फोन आया कि दादी, जगदीश भाई बाबा की गोदी में पहुँच गये, आप जल्दी आओ। हम गयी और देखा तो आत्मा उड़ चुकी थी।
उस आत्मा को तो पहले से ही मालूम हो चुका था कि मैं बाबा के पास जाने वाला हूँ। उस घड़ी उसको अनुभव भी हो रहा था। उस समय हम सब बाबा की याद में उस आत्मा को दृष्टि देते रहे।"
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आदरणीया राजयोगिनी दादी गुलज़ार जी, जो इस संस्था की सह-मुख्य प्रशासिका है और भ्राता जगदीश जी के शरीर छोड़ते समय उनके सामने ही थीं, वे उनके अन्त समय के दृश्य का वर्णन इस प्रकार कर रही है-
"ड्रामा में भिन्न-भिन्न दृश्य हम सबके सामने आते हैं। बाबा यही शिक्षा देते हैं कि जो भी दृश्य हैं उन्हें साक्षी होकर देखें और जो सहयोग हम दे सकते हैं, वो दें। उस समय हम, निर्वैर भाई, चक्रधारी बहन आदि उस आत्मा को स्नेह और शक्ति का योगदान दे रहे थे, उतने में वो आत्मा बहुत सहज ही चली गयी। एक सेकण्ड की बात थी, मैंने तो यह समझा ही नहीं कि वे जा रहे हैं। एक सेकण्ड में ही यह सब-कुछ हुआ। आंखें खुली हुई थीं, बॉडी एकदम शान्त। आत्मा बाबा के पास चली गयी। उनको दो संकल्प थे कि एक, मुझे बाबा के पास जाना है और दूसरा, हॉस्पिटल में नहीं जाना है। दो-तीन दिन पहले से वे कह रहे थे कि मुझे पाण्डव भवन ले चलो। बाबा ने उनके ये दोनों संकल्प पूरे किये। वे बहुत सहज ही गये, एक सेकण्ड का खेल था।"
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