आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य : भाग-2
भूमिका
मूल्याधारित समाज के निर्माण की ओर
सन् 1996 प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के लिए "हीरक जयन्ती वर्ष" है। इस वर्ष, अपने निजी पुरुषार्थ के लिए हरेक व्यक्ति के सामने यह लक्ष्य रहेगा कि "सच्चे एवं अमूल्य हीरे की तरह बे-दाग़ एवं निर्दोष बनना है।" समाज सेवा के कार्य में हरेक इस नारे को लिये होगा कि "मूल्यों पर आधारित समाज की ओर आगे बढ़ना है।" कई लोग इस बात को स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं कि "मूल्याधारित समाज" (Value-based society) का क्या भावार्थ है और उसके लिये हमें क्या करना होगा। इस उद्देश्य से यह चर्चा करना जरूरी है कि इस प्रसंग में "मूल्य" शब्द से हमारा क्या भाव है?
"मूल्य" क्या है?
हम जिस वस्तु को जितना लाभकारी, ज़रूरी और महत्वपूर्ण मानते हैं, हमारे लिये वह वस्तु उतनी ही "मूल्यवान" होती है। "मूल्य" किसी वस्तु को केवल क्रय (खरीदने) या विक्रय (बेचने) के लिए आवश्यक धन राशि (रुपये-पैसे) ही को नहीं कहते बल्कि किसी वस्तु की प्राप्ति, किसी कार्य की सफ़लता या किसी लक्ष्य की सिद्धि के लिये जितनी मेहनत की आवश्यकता हो, उसको भी मूल्य कहते हैं। किसी वस्तु की 'गुणवत्ता', 'लाभकारिता', 'उपयोगिता' या सुख-शान्ति-सौंदर्य-सत्य की प्राप्त्यार्थ किसी चीज़ की 'महत्वात्मिकता' भी उसके मूल्यों को निर्धारित करती है। किसी चीज़ को प्राप्त करने में कितने उद्यम, परिश्रम, समय, सूझ इत्यादि को लगाना पड़ता है, उस पर भी उसका मूल्य आधारित होता है। जिस चीज़ को प्राप्त करने के लिए हमें कुछ भी मेहनत न करनी पड़ती हो और जो काफ़ी मात्रा में सहज सुलभ हो या जिस चीज़ की हमारे लिये कोई आवश्यकता या उपयोगिता न हो, उसका हमारे लिये कोई भी मूल्य नहीं होता या उस वस्तु का हमारी निगाह में उतना ही कम मूल्य होता है।
भौतिक मूल्य
यदि 'मूल्य' शब्द को इस अर्थ में ग्रहण किया जाये तो संसार में बहुत-से लोगों के लिये धन, भवन, भोग्य पदार्थों इत्यादि का अधिक मूल्य होता है क्योंकि वे मानते हैं कि इन पदार्थों ही से सुख और यश की सिद्धि होती है। वे भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति, प्रकृति के पदार्थों की उपलब्धि, इह-सांसारिक कामनाओं की सिद्धि, कर्मेन्द्रिय अथवा शरीर की सुख-सुविधा की सामग्री के संचय को ही सर्वाधिक महत्व देते हैं। इनके बिना वे जीवन को व्यर्थ, निरर्थक, निकृष्ट अथवा निम्न स्तर का मानते हैं। ऐसे लोग 'भौतिकवादी' (Materia-lists) कहलाते हैं और उनके लिए भौतिक मूल्य (Material Values) ही प्राथमिकता रखते हैं। वे वित्तैष्णा तथा व्यवसाय में ही प्रायः अपना सारा जीवन लगा देते हैं और पैसा तथा पदार्थ अर्जित और संचित करने में ही बिता देते हैं क्योंकि उनके जीवन का लक्ष्य "धन, पदार्थ और ऐन्द्रिय सुख" ही होता है। उसको ही वे एकमात्र अथवा सर्वोपरि एवं सर्वश्रेष्ठ प्राप्ति मानते हैं। यों पैसा कमाने या भौतिक सुखों को प्राप्त करने को 'बुरा' नहीं कहा जा सकता क्योंकि सुखी जीवन के लिये इनकी भी आवश्यकता है परन्तु कई लोग ईमानदारी, दया, प्रेम, सच्चाई, सहयोग, सहानुभूति इत्यादि को छोड़कर येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाना चाहते हैं, अर्थात् वे अन्य महत्वपूर्ण बातों को महत्व ही नहीं देते। अतः वे कट्टर, नितान्त अथवा कोरे भौतिकवादी होते हैं। वे अपनी माँ के प्रति स्नेह और सेवा-भाव से भी पैसे और मुनाफ़े को अधिक मूल्य तथा महत्व देते हैं। वे किसी का खून सुखा कर अथवा बहाकर भी पैसे की प्राप्ति को मूल्य देते हैं। उनके मन में 'बुराई' और 'भलाई' में इसके सिवा कोई भेद नहीं है कि 'अच्छाई' वह है जिससे अपने स्वार्थ की सिद्धि हो और विषय-वस्तु की प्राप्ति हो।
नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मूल्य
इन लोगों से भिन्न कुछ सज्जन ऐसे होते हैं जो 'अच्छाई' और 'बुराई' के भेद को ठीक तरह जानते हैं और वे उस कार्य विधि, व्यवहार-विधि तथा विचार- पद्धति को मूल्य देते हैं जिससे दूसरों का भी भला हो या कम-से-कम दूसरों की हानि तो न हो। ऐसे लोगों के मूल्यों को "नैतिक मूल्य", "सामाजिक मूल्य" या "आध्यात्मिक मूल्य" कहा जाता है क्योंकि उनके इस दृष्टिकोण एवं कार्यकलाप से उनकी अन्तरात्मा उन्हें कचोटती नहीं है और उन से समाज का भी भला होता है तथा उनकी अपनी भी आध्यात्मिक उन्नति होती है।
ऐसे लोग यह मानकर चलते हैं कि भौतिक वस्तुयें, ऐन्द्रिय सुख के पदार्थ तथा इह-सांसारिक प्राप्तियाँ क्षणभंगुर हैं, परिणामी हैं, अस्थाई हैं, नाशवान हैं और वे मनुष्य की इच्छाओं को बढ़ाने वाली हैं। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण वात यह है कि यदि व्यक्ति 'अच्छा' साधन न अपनाकर किसी 'बुरे' तरीके से धन-धान्य, महल-माड़ी या मान-यश की प्राप्ति करता है तो उसका मन उसे कचोटता रहता है, उसे सुख-चैन की नींद भी नहीं करने देता बल्कि भयभीत बनाये रखता है, चिन्ता चिता पर डाल देता है और कुछ ही समय में उसकी सुखानुभूति को धूमिल करता हुआ उसे उदास और निराश कर देता है। वह व्यक्ति स्वास्थ्य भी बिगाड़ बैठता है, लोगों की निगाहों में 'बुरा' भी बनता है, सम्बन्ध भी विगाड़ बैठता है और आखिर में पश्चाताप की अग्नि में दुःखी होता है। वह ईर्ष्या से जलता है, कामनाओं की गुलामी करता है, अपने भीतर की दैवी आवाज़ का गला घोंटता है, आत्म-सम्मान को कालिख से काला कर देता है और बाहर से चौधरी परन्तु भीतर से चौपट होता है। बुरे का अन्त बुरा और अच्छे का अन्त अच्छा ही होता है। कुछ समय तक तो यही देखने में आता है कि बुराई वाला व्यक्ति आगे बढ़ रहा है, तरक्की कर रहा है, पनप रहा है और प्रतिष्ठा प्राप्त करता जा रहा है परन्तु अन्ततोगत्वा वह ऐसा गिरता है कि "तोबा ही भली", अर्थात् उस पर "आह" भरने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं रहता। अतः जो नैतिकता को मूल्य देते हैं, वे अच्छाई को छोड़कर सांसारिक पदार्थों की मृग-तृष्णा से बच कर रहते हैं। वे प्राथमिकता नैतिकता को तथा सद्गुणों ही को देते हैं क्योंकि मूल्यों या गुणों के बिना सफलता भी समस्या का रूप ले लेती है, प्राप्ति भी पुलिस के पास ले जाती है, प्रतिष्ठा भी पाखण्ड की तरह भासती है।
'अच्छाई' क्या है और 'बुराई' क्या है?
गहराई से विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि "सम्पूर्ण और स्थाई सुख-स्वास्थ्य-सौंदर्य", "सदा के लिए पवित्रता-सुख-शान्ति", "स्थायी प्रसन्नता", सम्पत्ति और स्वास्थ्य", "सत्यं शिवं सुन्दरं" या "निर्मल एवं निर्विघ्न प्रेम, प्रसन्नता और पदार्थ प्राप्ति" ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। मनुष्य इन ही में से किसी-न-किसी को या इन सभी को प्राप्त करने के लिये निरन्तर कुछ-न-कुछ करता रहता है। इनकी प्राप्ति कराने के लिए जो व्यक्ति, वस्तुयें,वातावरण, वाक्य या व्यवस्था हैं, उनका ही वास्तव में मूल्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए जो दृष्टिकोण, विचार, या पुरुषार्थ हम करते हैं, वह "अच्छाई" अथवा "बुराई" को लिए हुए होता है। 'अच्छा' हम उसे कहते हैं जिससे हमें भी सुख-स्वास्थ्य-सौंदर्य इत्यादि की प्राप्ति हो और दूसरे को भी हमारे इस कार्य से कष्ट न हो, अर्थात् उसका भी पतन न हो। यदि किसी साधन को अपनाने से हम में मनोविकार की उत्पत्ति होती है तो उससे हमारे जीवन में और समाज में कुप्रथायें फैलती हैं, कुरीतियाँ प्रचलित होती हैं, उच्छृंखलता, उपद्रव, अत्याचार, दुराचार, पर-पीड़ा, पर-निंदा, पर-चिन्तन और पर-पतन बढ़ते हैं। तब वह साधन या प्रयोग या कार्य-पद्धति "बुरा" कहलाते हैं। इसी बात को सामने रखकर ही नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों की चर्चा होती है।
नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मूल्य
आज समाज में हमारे सामने जितनी भी समस्यायें हैं, चाहे वे पारिवारिक हों या वैश्विक, वे सभी किसी-न-किसी नैतिक मूल्य की अवहेलना या उन्माद ही के कारण हैं। उदाहरण के तौर पर सभी लड़ाई-झगड़े असहिष्णुता के कारण अथवा सहनशीलता के अभाव या उसकी कमी के कारण हैं। भ्रष्टाचार (Corruption), सन्तुष्टता और स्नेह-सौहार्द सहानुभूति की कमी के कारण है। स्वार्थ और लोभ ही लूट-खसूट, हेराफेरी, घूसखोरी और धोखा, बनावट, मिलावट, अधिक मुनाफाखोरी के मूल कारण हैं। पर्यावरण प्रदूषण भी पड़ोसियों के प्रति शुभ चिन्ता के अभाव तथा स्वार्थ परता के कारण है। यही बात दूसरी समस्याओं के बारे में भी कही जा सकती है। समाज के भले की बात न सोचकर व्यक्ति जब अपने ही स्वार्थ की सिद्धि के लिए नाजायज़ (अनुचित) तरीके भी अपनाता है, तब 'सामाजिक प्रदूषण' (Social Pollution) भी होता है। तब हर-कोई एक-दूसरे को देखकर ग़लत काम करने लगता है और, इस प्रकार, समाज की व्यवस्था टूट जाती है और सभी दुःखी हो उठते हैं। आज समाज की व्यवस्था की यही दशा है। सभी जगह हिंसा, नारियों का अपमान, घूसखोरी, लड़ाई-झगड़ा, विषय-भोग इत्यादि का वातावरण है। यही कारण है कि एक ओर तो बहुत से लोग निर्धन हैं और दूसरी ओर जो धनवान हैं, वे भी प्रसन्नचित्त और शान्ति-युक्त नहीं हैं। समाज में व्यक्ति को न सुरक्षा का अनुभव होता है, न जीवन में सच्चे सुख की स्थायी अनुभूति होती है।
मूल्यों पर आधारित समाज
अतः जब हम मूल्यों पर आधारित समाज की बात कहते हैं तो उससे हमारा अभिप्राय ऐसे समाज से होता है जहाँ हरेक व्यक्ति जीवन में नैतिक मूल्यों को धारण किये हुए है। नैतिक मूल्यों के बिना तो मनुष्य का जीवन पशुओं से भी बदतर होता है और समाज में "जंगल का नियम", अर्थात् "जिसकी लाठी उसी की भैंस" वाली उक्ति चरितार्थ होती है। उस समाज में दया और सुरक्षा नहीं होती बल्कि वर्बरता, हिंसा और एक-दूसरे को शिकार बनाकर लोग जीते हैं। परन्तु जब समाज में नैतिक मूल्यों का पालन होता है, तभी इन्सान सही अर्थ में 'इन्सान' होता है क्योंकि तभी वह मानव-धर्म को निभाता है। नैतिक मूल्यों के पालन के कारण ही वहाँ न वातावरण प्रदूषित होता है, न किसी वस्तु की कमी होती है, न वहाँ कोई भूख-प्यास से पीड़ित या निर्धन होता है, न वहाँ लड़ाई-झगड़े या दंगे-फसाद होते हैं। वह सभी सुख-शान्ति और स्वास्थ्य सुरक्षा का सात्विक जीवन जीते हैं।
नैतिक मूल्यों तथा सद्गुणों या दिव्य गुणों का मेल
जब व्यक्ति अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाते हैं, तो उनके अभ्यास से अथवा उनको व्यवहार में लाने से वो उनके गुणों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर व्यक्ति जब कुछ समय तक "सहनशीलता" का अभ्यास अथवा पालन करता है तो आगे चलकर "सहनशीलता" उसका स्वाभाविक गुण, दिव्य गुण अथवा सद्गुण बन जाता है। वह व्यक्ति उन गुणों के कारण देव-स्थिति को प्राप्त कर लेता है। उन गुणों रूपी बीजों को बोने से उसे सुख-शान्ति की खेती प्राप्त होती है। उसका स्वास्थ्य भी ठीक रहता है क्योंकि वह क्रोध नहीं करता, तनाव-मुक्त भी होता है, अभक्ष्य का भक्षण भी नहीं करता और कर्मेन्द्रियों का गुलाम बनकर विषय-लोलुप भी नहीं होता। वह धन-धान्य सम्पन्न भी होता क्योंकि वह धन का अपव्यय नहीं करता और सन्तुष्ट होने से आन्तरिक प्रसन्नता की स्थिति अनुभव करता है।
योग साधना और ज्ञान धारणा
जब तक मनुष्यों को ये बातें निश्चयात्मक रीति से स्पष्ट न हों कि (1) उसका वास्तविक एवं आदि स्वरूप पवित्रता एवं सद्गुणों वाला था, (2) वह अपने स्वरूप में एक अनादि अविनाशी आत्मा है, ज्योति बिन्दु है, शुद्ध है, नित्य है, अजर-अमर है और शरीर तो उसका रथ है, कलेवर है, ताना-बाना है, यन्त्र-साधन मात्र है और स्वयं को शरीर मानने की 'एकज भूल' के परिणाम-स्वरूप ही उसमें गिरावट, विकार, भौतिकता या बुराई आये हैं, (3) वह तो आत्मा के नाते परमपिता परमात्मा की शाश्वत सन्तान है और परमात्मा की अपार निधियों पर उसका अधिकार है और (4) कि वास्तव में तो वह ज्योति लोक, जिसे 'परमधाम' या 'ब्रह्मलोक' या 'शान्तिधाम' कहते हैं, वहाँ से ही वह इस धरा-धाम में आया है और आखिर उसे यहाँ से चले जाना है और (5) कि कर्म का फल हरेक को अवश्य मिलता है और इसलिए उसे हर हालत में अच्छे ही कर्म करने चाहिएं और (6) कि अब कलियुग के अन्त और सतयुग के आरम्भ का संधिकाल (संगम समय) है और, इसलिए, कलियुग जाने वाला है तथा देवी-देवताओं वाला, सतोप्रधान, पूर्णतः सुख-शान्ति सम्पन्न सतयुग अब आने ही वाला है, तब तक उसके जीवन में स्थायी परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होती। जब तक वह विश्व को एक बड़ा परिवार मानकर, सभी को वहन-भाई मान कर व्यवहार नहीं करता तब तक नैतिक मूल्य नहीं टिक पाते।
अन्यश्च, जब तक वह अपने मन की प्रीति, अपना सम्वन्ध परमपिता परमात्मा से नहीं जोड़ता, उसके गुणों का रसास्वादन नहीं करता और जीवन को उसके गुणों से प्रेरित होकर उसके अनुरूप बनाने का पुरुषार्थ नहीं करता तब तक उसके जीवन में निस्स्वार्थता, त्याग, सेवा-भाव, नम्रता, सहन-शीलता, सन्तुष्टता, मधुरता, पवित्रता इत्यादि नैतिक मूल्य या दिव्य गुण नहीं आते। अतः ज्ञान रूपी सद्विवेक और योग रूप तपस्या ही नैतिक मूल्यों की जननी और जनक या माता-पिता हैं।
इस प्रकार, इनकी शिक्षा देते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विद्यालय, जो पिछले 60 वर्षों से जन-जन को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता आया है, अपने इस हीरक जयन्ती वर्ष में कृत्संकल्प है कि वह इस वर्ष और अधिक तीव्रता से मूल्याधारित समाज की स्थापना का कार्य करेगा।
आज लोग नैतिक मूल्यों की आवश्यकता की बात तो करते हैं, वे उसके महत्व को तो जतलाते हैं परन्तु, साथ-ही-साथ, 'मनोयोग', 'बुद्धियोग' अथवा 'ध्यानयोग' पर बल नहीं देते। सभी दिव्य गुणों का आदि अनादि स्रोत तो एक परमात्मा ही है, उससे सम्पर्क सम्बन्ध जोड़े बिना सभी दिव्य गुणों का उत्कर्ष होगा कैसे ? आज मनुष्यों का 'मनोयोग', 'प्रेमयोग' या 'ध्यानयोग' तो देह-धारी नर-नारियों ही से है और दैहिक सम्बन्ध सम्पर्क में ही वे रात-दिन रमे हुए हैं तथा मोह-ममता में पड़े हुए हैं, तब भला वे ईश्वरीय गुणों से युक्त कैसे होंगे ? मनुष्य में गुण तो उसी के संचारित होते हैं, जिससे उसकी प्रीति हो; अतः धन-दारा, पुत्र-पौत्र, जन-जाति के 'प्रेम' में डूबे होने से मनुष्य में गुण तो उन्हीं ही के आ रहे हैं। ईश्वर के गुण तो तभी आयेंगे जब वह ईश्वर की सन्तति के रूप में ईश्वर ही से मन-बुद्धि को जोड़ेगा। अतः योग और योग का प्रयोग ही व्यवहार को सद्व्यवहार, आचार को सदाचार, विचार को सद्विचार तथा गुणों को सद्गुणों में परिणत करते हैं। इसलिये ही तो कहा है कि "तस्मात् योगी भवः अर्जुन!" हे अर्जुन, तू योगी बन! परन्तु केवल योगी ही नहीं बनना बल्कि योग का प्रयोग करते हुए 'प्रयोगी' भी बनना है, अर्थात् कर्म करते हुए भी योग-युक्त रहना है। यह विधि है गुणों के उत्कर्ष की। योग केवल 'मुक्ति' की प्राप्ति की युक्ति ही नहीं है बल्कि समाज के परिवर्तन की प्रक्रिया भी है। समाज को मूल्याधारित बनाने की विधि यही है।
-ब्र.कु. जगदीश चन्द्र
दिव्य गुण और उनसे सिद्धि
मनुष्य के हरेक कर्म का कुछ-न-कुछ फल तो अवश्य होता ही है। हरेक साधना से उसे कुछ-न-कुछ सिद्धि तो मिलती है। जब वह सहन-शीलता, सन्तोष, त्याग, नम्रता, मधुरता इत्यादि को धारण करता है तो हरेक गुण की धारणा से उस-उस अनुसार उसे सिद्धि भी प्राप्त होती है। यहाँ हम गुणों द्वारा प्राप्त होने वाली सिद्धियों की चर्चा करेंगे -
सहनशीलता, सन्तोष, त्याग, नम्रता और मधुरता
शीलपूर्ण किसी कष्ट, अनुचित व्यवहार, दुर्घटना इत्यादि को सहन करना ही सहनशीलता है। कष्टों और दुर्घटनाओं को अपने ही कर्मों का फल मानकर शान्तचित्त हो सहन करने से मनुष्य आगे के लिए बुरे कर्मों से बचता है और उसमें शान्ति का संस्कार दृढ़ होता है गोया उसकी अवस्था अचल बनती है और वह स्वरूप स्थित होता है। घृणा और द्वेष न करते हुए दूसरे के व्यवहार को सहन करने से मनुष्य का मन उतरती कला से बचकर चढ़ती कला को प्राप्त होता है और दूसरों का भला सोचने से उसका अपना भी भला होता है। दूसरे के बुरे कर्म को न देखते हुए जो स्वयं बुराई और अशान्ति और असहिष्णुता की अग्नि से बचकर रहता है, उसे शीलता का वरदान प्राप्त होता है जिसके द्वारा वह अनेकों को शान्ति देने का उच्च कर्त्तव्य करके अपना उच्च भाग्य बना सकता है। अतः सहनशीलता द्वारा ही मनुष्य अपने मार्ग के अनेक कष्टों, विषमताओं, तूफ़ानों, आलोचनाओं इत्यादि को पार करता हुआ अपने लक्ष्य पर पहुँचता है जहाँ विजय श्री उसका स्वागत करती है।
सन्तोष
भरसक पुरुषार्थ करने पर भी मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है, उतने से ही तृप्त होने वाला मानव सन्तोषी कहलाता है। जो इच्छाओं से छूटा है, उसकी ही सर्व इच्छायें स्वतः पूर्ण होती हैं। इच्छा प्रगट करने वाला व्यक्ति सदा भिखारी, कंगाल, गरीब अथवा मंगता दिखाई देता है। न केवल वह अपना स्वमान गँवाता है, बल्कि पानी होते हुए भी सदा प्यासा बना रहता है। अतः सन्तोष गुण ही एक ऐसा बड़ा कोष है जिसको पा लेने वाला व्यक्ति स्वयं को सदा भरपूर महसूस करता है। सन्तुष्ट वही रह सकता है जो यह मानता हो कि (1) वह सब शक्तियों के भण्डार, वरदानमूर्त एवं दाता परमात्मा की सन्तान है, (2) निकट भविष्य में कोई भी वस्तु उसके लिए अप्राप्त रहने वाली नहीं है, (3) मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है, वही उसके पुरुषार्थ और भाग्य का फल होता है और उससे अधिक इच्छा करना व्यर्थ है और (4) इच्छाओं की गुलामी सबसे बुरी गुलामी है। इसलिए वह इच्छाओं का दास बनने की बजाय सदा 'बेपरवाह बादशाह' बना रहता है। ऐसा ही व्यक्ति स्वर्ग में भी निश्चिन्त बादशाह बनने का अधिकारी बनता है और सब इच्छाओं को जीतने के फलस्वरूप सब खज़ाने उसे भेंट में मिलते हैं।
त्याग
साधनों की इच्छा न करके साधना में लगे रहना ही त्याग है। दूसरे को सुखी करने के लिए अपने सुख की भी परवाह न करना यही त्यागी का लक्षण है। प्रभु की लग्न में मग्न रहने के लिए अन्य सब प्रकार के आकर्षणों और रसों को फीका मानना ही त्याग का मार्ग अपनाना है। त्याग ही भाग्य की कुंजी है। जो मन से छोड़ता है, वही पाता है, जो मन से पकड़े रखता है वही उस वस्तु द्वारा पकड़ा जाता है। त्याग कई प्रकार का होता है, परन्तु देह-अभिमान का त्याग सर्वोत्तम है। त्याग करने वाले में ही दानी, महादानी और वरदानी बनने की शक्ति आती है। जो प्रभु के प्यार के लिए सब-कुछ न्यौछावर कर देता है, वह प्रभु के प्यार से सब-कुछ पा लेता है। त्याग वाले व्यक्ति को इस जीवन में वह सुख प्राप्त होता है जो पदार्थों के पीछे परेशान होने वाले व्यक्ति को नहीं प्राप्त होता। जब मनुष्य मान, शान, अहंकार, मैं-पन मेरा-पन, तू-पन और तेरा-पन त्याग देता है तब सभी उसे अपना प्रेम अर्पित करते हैं और तब वह कदम-कदम में पद्म-पद्म की कमाई कर लेता है।
नम्रता
स्वयं में योग्यता, समर्थ और साधन सम्पन्नता होते हुए भी उसका अहंकार न करना, उस द्वारा लोगों पर रोब न डालना ही नम्रता है। ऐसी नम्रता ही मनुष्य के मार्ग के विघ्नों को हटा देती है, दूसरों को उसका सहयोगी बना देती है और उसे वे-ताज बादशाह बना देती है। ऐसी नम्रता मनुष्य की कमज़ोरी की सूचक नहीं होती, बल्कि उसकी महानता का प्रतीक होती है। जो दूसरों के सामने झुकता है, वह ही विश्व को अपने सामने झुका लेता है। जो अकड़ता है और सामना करता है, वह टिक नहीं पाता। जो रोब डालता है, वह हृदय सम्राट नहीं बन सकता। अतः प्रेम और नम्रता ही ऐसे अमेद्य शस्त्र हैं जिन द्वारा मनुष्य देव-पद के ताउसी तख्त को जीत लेता है।
मधुरता
सबका मीठे वचनों से अभिवादन करना, मीठे वचनों द्वारा ही उनसे वार्तालाप में प्रवृत्त होना और उन द्वारा कोई अनुचित कार्य होने पर भी शिष्ट भाषा का प्रयोग करना, मधुरता रूपी गुण को धारण करना है। मधुरता मनुष्य की सज्जनता, सहिष्णुता, विशाल हृदयता और व्यक्तित्व की उच्चता का प्रतीक है। मधुरता द्वारा ही मनुष्य दूसरे को आह्वाद देकर उसे अपना बना लेता है। यह वह हथियार है जिसके सामने लोग अपने हथियार डाल देते हैं। मनुष्य के मन को जीतने का यदि कोई उपाय है तो वह मधुरता और नम्रता ही है। प्रेम के बिना मधुरता नहीं हो सकती और निःस्वार्थता के बिना प्रेम नहीं हो सकता और कल्याण भावना के बिना निःस्वार्थता नहीं हो सकती और कल्याणकारी शिव बाबा को याद किये बिना कल्याण वृत्ति नहीं हो सकती। अतः सच्ची, कृत्रिम नहीं और स्थाई मधुरता योगावस्था की ही सूचक है क्योंकि जैसे शहद, शहद के छत्ते से आती है, मधुर रस, मधुर फल से ही प्राप्त होता है, सुगन्धि, सुरभियुक्त पुष्प से ही प्राप्त होती है वैसे ही अलौकिक मधुरता, मधुरता के पुंज परमात्मा ही से प्राप्त होती है। मधुरता के पीछे सन्तुष्टता भी छिपी रहती है और शान्ति भी। मधुर अवस्था ही मन की एक ऐसी अवस्था है जो योग रूपी बीज बोने के वैसे ही अनुकूल है जैसे कि शोरे के बिना ज़मीन। तो जवकि मनुष्य को लोक-पसन्द बनना है और प्रभु-पसन्द भी तो मनुष्य को मृदुभाषी और प्रसन्न वदन-हर्षित मुख होना चाहिये, क्योंकि मधुरता और सम्मानपूर्वक व्यवहार करने वाले को ही सदा के लिए मधुरता और सम्मान से पूर्ण स्वर्ग में स्वराज्य मिलता है, यहाँ तक कि उनकी मूर्तियों को भी लोग जन्म-जन्मान्तर बूंदी, बर्फी आदि मिठाई का भोग लगाते हैं।
निर्विकारी क्यों बनें ?
आजकल का भयंकर समय कलियुग के अन्तर्गत माना जाता है। इस समय काम, क्रोध इत्यादि विकारों का दौर दौरा है। अव यदि लोगों को विकार छोड़ने के लिए कहा जाय तो वे इस बीसवीं शताब्दी के प्रचलित तरीके से पूछते हैं "क्यों जी, काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को 'विकार' क्यों कहते हो ? विकारों को छोड़ने से भला क्या होगा? यह तो बताओ कि निर्विकारिता आदि धार्मिक वातों का मनुष्य की दिनचर्या के साथ सम्बन्ध क्या है? क्या आज तक इनको किसी ने जीता भी है? इसके बिना तो संसार चल ही नहीं सकता....." अन्य कई जिज्ञासुओं से मिलिए तो आप उन्हें यह कहते सुनेंगे "भाई, मन तो बड़ा ही चंचल है! पदार्थों तथा विषयों के नाम-रूप के पीछे भागता ही रहता है। अनेक प्रयत्न करने पर भी वश नहीं होता। क्या किया जाये? हम तो परेशान हो गए हैं!!"
"प्रातः उठकर हम संध्या भी करते हैं, पूजा भी, पाठ भी! परन्तु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।"
फिर लुत्फ़ यह कि जिस्मानी बीमारियों से तो कोई बच भी गया होगा, लेकिन यह विकारों का मर्ज ऐसा है कि सत्य्य्य्यानाश ही हो गया। इससे तो कोई एक भी पूरी रीति नहीं बचा। इसका कारण यह भी नहीं कि किसी ने इसकी दवा नहीं की। परन्तु या तो यह मर्ज ही ला-दवा है या "नीम हकीम खतरा-ए-जान" के अनुसार इसका सही नुस्ख़ा देने वाला, सावधानी-उपचार (Precautions) बताने वाला, इन्जेक्शन लगाने वाला ही कोई नहीं रहा, क्योंकि "मुब्तला हैं सब मर्जे प्लेग में।" परन्तु इतना तो मानना होगा कि जब किसी बीमार को अपनी पुरानी वीमारी से जान बचाने की तरकीव (विधि) मालूम हो जाती है तो वह अन्य उम्मीदवारों को भी उस नुस्खे की 'अकल से नकल' करने के लिए कहे बिना रहता भी नहीं। और यह ला-ख़ता (त्रुटिरहित) साधन, संजीवनी बूटी, अमृतधारा अथवा इन्जेक्शन का नुस्खा एक परमात्मा ही से मिल सकता है, क्योंकि वही एक है जो इससे स्वयं पूर्ण मुक्त, अमर एवं ज्ञान-स्वरूप हैं। अतः बहुत ही संक्षेप और सरलता से स्वयं उस सर्व दुःखहारी परमात्मा ही से प्राप्त ज्ञान-इन्जेक्शन का यहाँ वर्णन किया जाता है-
काम, क्रोध आदि को विकार क्यों कहा जाता है?
यह बात जानने के लिए कि विकारों को छोड़ना क्यों आवश्यक है, पहले यह समझना चाहिये कि विकार कहते किसको हैं।'विकार' शब्दा का अर्थ है 'रूप अथवा गुणों का परिवर्तन'। विशेषकर, जब किसी सत्ता का प्रारम्भिक (आदिम) रूप अथवा गुण बदलकर दोषयुक्त अथवा हानिकारक हो जाता है तो उस परिवर्तन को 'विकार' तथा परिवर्तित सत्ता को 'विकारी' कहा जाता है। उदाहरण के रूप में, यदि रक्त में कुछ बिगाड़ (दोष) होने से शरीर को हानि पहुँचती है तो रक्त के परिवर्तन को रक्त का विकार कहा जाता है। इसी प्रकार शरीर में वायु का तथा पित्त का भी विकार होता है जिससे शरीर अपने पहले वाली स्वस्थ अवस्था में न रहकर कष्ट भोगता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टिकोण से काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को भी विकार इस कारण कहा जाता है कि उनसे मनुष्यात्मा का स्वरूप विगड़ जाता है। अर्थात् आत्मा स्वधर्म से पतित हो जाती है। या, यों कहिये कि उसकी अवस्था में ऐसा परिवर्तन आ जाता है जो दुःखदायक तथा हानिकारक होता है।
उदाहरण लीजिए जब मनुष्य क्रोध करता है तो उसके मन में आवेश आता हैं। उसकी शान्ति भंग होती है। उसमें ईर्ष्या, प्रतिशोध (बदले की भावना) इत्यादि के रूप में अपवित्रता अथवा कुवासना आ जाती है। अब अपवित्रता और शान्ति ही तो वास्तव में आत्मा का स्वधर्म और स्वरूप है, परन्तु क्रोध इत्यादि तो मनुष्यात्मा में अपवित्रता और अशान्ति ला देते हैं। अर्थात् वे मनुष्य के स्वरूप में बिगाड़, उसकी अवस्था में दुःखजनक परिवर्तन अथवा गुण, कर्म, स्वभाव में हानिकर अन्तर लाने का कारण बनते हैं; अतः उन्हें 'विकार' कहा जाता है।
विकारों को छोड़ने की आवश्यकता
अब कौन ऐसा मनुष्य है जो सुख और शान्ति नहीं चाहता, जो अपने आपे (स्वरूप) से बिगाड़ पैदा करना चाहता है? उत्तर मिलेगा "कोई भी नहीं।" तथा-कथित हिन्दू धर्म, बुद्ध धर्म, इस्लाम धर्म या ईसाई धर्म किसी को प्रिय हो या न, परन्तु स्वधर्म (पवित्रता और शान्ति) भला किसको प्रिय नहीं? लेकिन स्वधर्म में स्थित होने का अर्थ है विकारों (अपवित्रता और अशान्ति के कारण) का संन्यास करना। अब, जैसे स्वास्थ्य चाहने वाले मनुष्य के लिए रोग से छूटना आवश्यक है, वैसे ही लाभकर एवं प्रिय वस्तु (स्वधर्म) में स्थित होने के लिए हानिकर तथा अप्रिय वस्तु (विकारों) का छोड़ना भी अत्यावश्यक है। परन्तु जैसे मैले-कुचैले, सुस्त-नालायक और नादान बच्चों को जब माँ स्नान करने के लिए कहती है तो वह नटखट हो शेखी करते और अस्वीकृति देते हैं, वैसे ही आज बहुधा मनुष्यों को जब परमात्मा (जिसे वे 'त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव कहते रहते हैं) की आज्ञा सुनाई जाती है कि वे पवित्र (निर्विकारी) रहें, तो वे भी कहते हैं कि "भाई, मुश्किल है, हम निर्विकारी नहीं रहेंगे।"
निर्विकारी न बनना महान् भूल है
विचार की बात है कि जब किसी मनुष्य को यह मालूम हो जाये कि अमुक वस्तु विष है और अमुक अमृत परन्तु तब भी यदि वह विष ही सेवन कर अपनी आत्म-हत्या करना चाहे अथवा करता रहे तो यह उसकी भूल नहीं तो और क्या है? इसी प्रकार, यह जानकर कि पवित्रता और शान्ति ही मनुष्यात्मा का जीवन है और अपवित्रता अथवा विकार ही उस जीवन की हत्या करने वाला शत्रु अथवा विष है तो विचारवान् मनुष्य को किसी भी मूल्य पर उससे बचना चाहिये। इसलिए ही कहा जाता है कि "सिर धरती पर पड़े, परन्तु धर्म न छोड़िये"! जो लोग इस बात को जानते हुए भी निर्विकारी नहीं रहते, मानो कि वे अपना विनाश आप करते हैं। इसलिए किसी ने कहा है-
"धर्मएव हतो हन्ति। धर्मो रक्षतिरक्षितः ।।" अर्थात् जो स्वधर्म को नाश करते हैं यानी विकारी बनते हैं, वे मानो अविनाशी आत्मा के स्वत्व का नाश करते हैं और जो स्वधर्म की रक्षा करते हैं, यानी पवित्रता के व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं, उन्हीं का जीवन धन्य है।
क्या सृष्टि काम आदि विकारों से पैदा हुई है?
संसार की विचित्र ही गति है! एक ओर तो आजकल लोग महात्माओं के चरण छूते हैं और दूसरी ओर कहते हैं कि क्या कोई निर्विकारी बना भी है? एक ओर तो मन्दिरों में देवी-देवताओं का पूजन करते तथा उनकी महिमा में कहते हैं कि 'आप सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं' और दूसरी ओर स्वयं विकारी बने रहते तथा यह कहते हैं कि काम विकार ही से तो सृष्टि उत्पन्न हुई है। एक ओर तो शंकर महादेव को अपना इष्ट देव कहकर वन्दना करते हैं परन्तु दूसरी ओर कहते हैं कि वह मोहिनी रूप देखकर कामातुर हो गया। 'जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि' के अनुसार इस समय संसार में मन, वचन तथा कर्मों में विकारों ही का प्राबल्य होने के कारण खेद है कि कुछ भारतवासी देवी-देवताओं पर भी मिथ्या आरोप लगाते हैं। गीता के भगवान् के महावाक्य हैं कि जो लोग सृष्टि को स्त्री और पुरुष के भोगपूर्ण सम्भोग (काम) से उत्पन्न हुआ मानते हैं वे अज्ञानी लोग असुर हैं। मानो वे परमपिता परमात्मा, जो कि सृष्टि के रचयिता हैं, पर दोषारोपण करते हैं कि उसने सृष्टि विकारी रची। उनको यह मालूम ही नहीं कि सतयुग तथा त्रेता युग में लोग युगल निर्विकारी जीवन व्यतीत करते थे जहाँ काम आदि विकारों का नाम भी नहीं था। अस्तु, यह एक पृथक ही विषय है जिसका स्पष्टीकरण योग-युक्त सज्जन शीघ्र समझ सकते हैं।
विकारी मनुष्य पशु से भी तुच्छ
वर्तमान समय में मनुष्यों में जो काम, क्रोध, मोह तथा अहंकार का प्राबल्य है, उतना तो पशुओं में भी नहीं। यदि मनुष्य विचारवान जीव होकर भी विकारी रहे तो उसका जन्म किस कार्यार्थ सफल समझा जावे? फिर मनुष्य तो विकारों से अन्धा होकर अनेकों का खून नाहक करता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि क्रोधवश तथाकथित मनुष्यों ने अन्य मनुष्यों के साथ क्या व्यवहार किया। पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के विभाजन की, मिश्र (Egypt) देश या कोरिया की बात एक ओर रही, वर्तमान समय जिन्होंने ऐटम तथा हाईड्रोजन बाम्बस् के ढेर लगाये हुए हैं, समूची जीव सृष्टि का रक्त बहाने के लिए उद्यत उन क्रोधान्ध मनुष्यों को क्या नाम दिया जाये? इसी प्रकार, जब अन्य विकार भी जिस मनुष्य में प्रवेश कर जाते हैं, वह मनुष्य पशु से भी इतना हेय हो जाता है कि उसे अच्छे और बुरे की पहचान भी नहीं रहती, वह अपनी भूल को नहीं समझ सकता, वह अपने हितैषी को भी शत्रु समझ बैठता है। अपनी जाति का नाश तो प्रायः पशु भी नहीं करते और पशुओं में तो मनुष्य के समान बुद्धि भी नहीं। इस कारण मनुष्य-तन में जो मनुष्यात्मा विकारी होने के कारण आदि, मध्य और अन्त स्वयं भी दुःखी होती है और दूसरों को सताती-दुःखाती रहती है, उसे पशु से भी हीन न समझा जाये तो क्या समझा जाये ?
विकारों से निवृत्ति प्राप्त करने के लिए विकारों का कारण जानने की आवश्यकता है। विकारों के प्रसंग में जानने के योग्य एक बात यह भी है कि यद्यपि प्रकट रूप में तो विकार मुख्यतः पांच हैं, परन्तु उन पाँचों की उत्पत्ति का स्थान अथवा जन्म-भूमि मन है और मूल कारण कुछ और है। मन में संकल्प उठने पर ही कर्मेन्द्रियाँ अच्छे अथवा बुरे कर्म में तत्पर होती हैं। अतः जैसे एक वृक्ष के पत्तों को जल देना बुद्धिमत्ता नहीं है, बल्कि मूल को सींचना ठीक है अथवा जैसे रोग के लक्षण (Symptoms) दवाना युक्ति-युक्त नहीं, बल्कि रोग को मूल सहित नष्ट करना ठीक है। वैसे ही विकारों के विस्तर में से एक विकार को दबाने का प्रयत्न करने की अपेक्षा, अर्थात् ऊपरी साधन करके कुछ समय के लिए काम की वासना को दबाना अथवा मोह से छूट शान्ति पाना कोई वास्तविक और स्थायी उपाय नहीं। बल्कि, मन में जो इन विकारों का मूल है, उससे ही निवृत्ति पाने का उपाय करना चाहिए।
परन्तु कुछ लोग समझते हैं कि दुःख का कारण विकारों का होना नहीं, बल्कि पदार्थों अथवा विषयों का न होना है। यह वात सत्य नहीं। पहले एक दृष्टान्त के द्वारा इसे स्पष्ट किया जाता है। फिर मन में जो विकार हैं, उनके मूल कारण की चर्चा की जायेगी
मान लीजिये, कुछ मित्र एक स्थान पर मिलन-विलास के लिए इकट्ठे हुए हैं। मेजें और कुर्सियाँ सजी हुई हैं। दस्तख़नि (Tables) पर भिन्न-भिन्न प्रकार के खाने परोसे पड़े हैं। गाना-बजाना हो रहा है और मित्र मेज़ों के आर-पार आपस में हँसी-मज़ाक (मनोरंजन बहलाव) में मशगूल (व्यस्त) हैं, पुलावों की भी भीनी-भीनी खुशबू (सुगन्धि), चाइना-ग्रास (China grass) की सुन्दर प्लेटों का दृश्य, सन्तरे की फांकें ये सब खाने के लिए उन्हें दावत (निमंत्रण) दे रहे हैं। बस, खाना शुरू करने के लिए वे अपने हाथ में चमचा उठा ही रहे हैं लेकिन........ वह देखो........
दरवाज़े के बाहर कौन खटखटा रहा है? इस समय अचानक ही कौन आ गया होगा ? सबका ध्यान एक उस ओर जाता है। दावत करनेवाला (आतिथ्य करने वाला) चमचा हाथ से छोड़कर, कुर्सी से उठकर जाता है और दरवाज़ा खोलकर देखता है कि तार वाला खड़ा है। बेचारे की टाँगें लड़खड़ाने लगती हैं कि माँ बीमार थी, खुदा खैर करे! न जाने किसका तार होगा? काँपते हुए हाथों से तार खोलकर जब पढ़ता है तो वापिस अपनी जगह तक पहुँचने की भी शक्ति नहीं रहती क्योंकि उसकी माँ......इतनी प्यारी माँ, जिसने उसे लाड़ और मोहब्बत से पालकर इतना बड़ा किया है कि वह आज दोस्तों को खुश कर रहा है..... हाँ उसे न जाने किन गुप्त हाथों ने अपने बच्चे से छीन लिया है!!! बस, इतना बड़ा होते हुए भी, वह बच्चों की तरह बिलबिलाता हुआ अपने मित्रों तक पहुँचकर, तार उनके हाथों में देता है!!!
तब कहाँ गई उसकी वह हँसी और वह मुस्काती हुई सूरत ? इस पाँच मिनट के खेल में इतना परिवर्तन कैसे आ गया? प्रश्न है कि क्या उसे कोई प्रकृति का पदार्थ प्राप्त नहीं? उत्तर मिलेगा 'यह बात नहीं'। बल्कि, अब जबकि उसके दोस्त उसे खाना खाने के लिए मजबूर करते हैं तो वह भोजन, जिसे देखकर पहले उसके मुख में पानी आता था, अब फीका, कडुवा, बेज़ायका (अस्वादिष्ट) लगता है। अब दोस्तों की वह महफ़िल उसे भाती नहीं !! उसे न उनकी हँसी अच्छी लगती है, न वहाँ उनका बैठना, क्योंकि अब वह वहाँ से प्रस्थान कर, अपनी माँ के देहान्त स्थान पर जाने को आतुर है। अब यदि वही दोस्त उसको सलाह देते हैं कि 'भाई' खाना तो खाकर जाओ। तो यह बात सुनकर, मानो उस पर बिजली गिरती है। वही दोस्त उसे शत्रु मालूम होते हैं। वह सोचता है 'मेरी माँ मर गई है', इन लोभी पेटुओं को खाने और खिलाने की सूझी है। 'जिस तन लागे सो तन जाने! पीर पराई कोई न जाने.....।'
अतः स्पष्ट है कि यद्यपि खाने के पदार्थ अथवा विषय तो मौजूद हैं परन्तु मन में मोह का विकार आ जाने के कारण, अशान्ति अथवा बेचैनी आ जाने से वे पदार्थ भी अच्छे नहीं लगते। यही दशा दूसरे विकार उत्पन्न कर देते हैं। इसलिए याद रहे कि मन में विकारों के उत्पन्न होने से ही दुःख का अनुभव होता है।
अब प्रश्न उठता है कि मन में जो विकार आता है अर्थात् अपवित्रता आती है या दुःखदायक परिवर्तन आता है, उसका मूल कारण क्या है? इसको स्पष्ट जानने के लिए ऊपर वाले उदाहरण को ही लीजिए। संसार में न जाने कितने मनुष्य आए दिन मरते होंगे! उनमें पड़ोसी भी हो सकते हैं और परिचित भी। अपरिचित तो बहुत ही होते हैं।
तब, प्रश्न है कि उनके मरने से मनुष्य को दुःख क्यों नहीं होता है? उत्तर मिलेगा कि इसका कारण है देह अभिमान। जिनके साथ मनुष्य का दैहिक सम्बन्ध होता है वह उन ही के जीवन-मरण, निन्दा-स्तुति और हानि-लाभ को देखकर डाँवाडोल होता रहता है। वह यह नहीं समझता कि जिस आत्मा ने उसके साथ शरीर का सम्बन्ध जोड़ा था, वह नहीं मरी। वह यह भी नहीं जानता कि वह स्वयं भी आत्मा है और सब मनुष्य-देहों में देही हैं, जिनके साथ भी उसका अविनाशी प्यार होना चाहिए। वह यह नहीं समझता कि देह का सम्बन्ध तो क्षण-भंगुर है। देह के विनाशी होने के कारण उस पर आधारित सम्बन्ध तो एक दिन टूटता ही है। परन्तु उसकी आत्मा का (अर्थात् उसका अपना) अविनाशी पिता, माता, सखा अथवा स्वामी, पति अथवा पत्नी का सम्बन्ध किसी अविनाशी आत्मा (परमात्मा) ही से है जो देह के जन्म-मरण में नहीं आती, जो देह के विनाशी सम्बन्धों में नहीं आती। वह देही अथवा आत्मा के विषय में 'नहीं जानता' कहने का अभिप्राय है कि देह-अभिमान का भी मूल कारण है अज्ञान।
बस, यह निश्चय जानिये कि अज्ञान के कारण देह-अभिमान है, देह-अभिमान के कारण मन में विकारों की उत्पत्ति होती है। विकार ही दुःख तथा अशान्ति पैदा करने वाले हैं। दुःख और अशान्ति ही मृत्यु अथवा नरक है। इस मृत्यु से हर एक आदमी डरता है और इस नरक की बजाय स्वर्ग चाहता है अथवा विषय वैतरणी की बजाय अमृत चाहता है। अमर और स्वर्ग में निवास करने वाले देवता होते हैं, परन्तु देवता पवित्र होते हैं और अपने स्वधर्म, देवी-देवता धर्म में स्थित होते हैं। इसलिए मनुष्य को देवत्व या देवपद प्राप्त करने के लिए पवित्र यानी निर्विकारी बनना चाहिए।
विकारों को कैसे जीता जाय ?
पवित्र बनने के लिए अपवित्रता के मूल कारण अज्ञान की निवृत्ति आवश्यक है। अब, जैसे यदि एक कमरे में अन्धकार हो तो उससे छुटकारा पाने के लिए कमरे में अन्धकार को लाठी मारने से अथवा झाडू मार बाहर निकाल फैंकने का प्रयत्न करने से अन्धकार दूर नहीं होता, बल्कि सभी जानते हैं कि अन्धकार को दूर करने के लिए प्रकाश का दीपक चाहिए। इसी प्रकार, अज्ञान की निवृत्ति हठ, तप आदि ऊपरी साधनों से नहीं होती, बल्कि ज्ञान-ज्योति जगाने से होती है। परन्तु जैसे एक बुझा हुआ दीपक, बुझे हुए दीपक द्वारा नहीं जल सकता वैसे ही जिसकी अपनी आत्म-ज्योति नहीं जगी, अर्थात् जो स्वयं पवित्र और शान्त नहीं, वह दूसरों की ज्योति कैसे जगा सकेगा ? इसलिए आवश्यकता है कि मनुष्यात्मा परमपिता परमात्मा से योग-युक्त हो, क्योंकि वही एक 'सदा जागती ज्योति' है अर्थात् वही ऐसी ज्योति है जो सब ज्योतियों (आत्माओं) के बुझ जाने पर उनको फिर से जगाने में निमित्त बनता है।
नित्य ज्ञान धारण न करने वाला विकारी है
अब, जैसे नित्य प्रति स्नान न करने से शरीर में दुर्गन्ध पड़ जाती है और रोग अथवा उसके कीटाणु पैदा होने लगते हैं, वैसे ही नित्य-ज्ञान-स्नान न करने वाली आत्मा में भी विकारों की बदबू पड़ जाती है अथवा उसमें काम, क्रोध आदि विकारों रूपी प्लेग (Plague) के जीवड़े (कीटाणु) पैदा होने लगते हैं। दूसरे शब्दों में, जैसे मैले-कुचैले, निरक्षर, असभ्य मनुष्य में कोई भूत प्रवेश कर परेशान कर देता है, परन्तु एक उज्वल, पवित्र, श्रद्धालु आस्तिक बुद्धि मनुष्य में कोई दैवी आत्मा प्रविष्ट हो जाती है वैसे ही ज्ञान-स्नान न करने वाले में काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार रूपी पंच महाभूत घुस जाते तथा दुःखित करते हैं इसके विपरीत, नित्य ज्ञान-स्नान करने वाले अथवा ज्ञानामृत का पान करने वाले में देवत्व (दैवी गुणों) का प्रादुर्भाव होता जाता है।
आत्मा के विकार स्थूल गंगा जल से तो नहीं घुल सकते। बल्कि परमपिता शिव से ब्रह्मा तन के आधार से उद्गारित ज्ञान गंगा से ही मनुष्य पवित्र हो स्वर्ग को पधार सकता है। मरे हुए मनुष्य की हड्डियों अथवा अस्थियों की भस्म को स्थूल गंगा में बहाने से तो कोई वैकुण्ठ में नहीं पहुँचता, बल्कि मृत प्रायः आत्मा को ज्ञान-गंगा की धारा से धोने पर आत्मा कृष्णपुरी में पहुँचती है। अज्ञानी पण्डे का हाथ पकड़कर बीच गंगा में बहाकर या स्थूल केसर का तिलक पण्डे से लगवाकर, आज तक कौन पूर्ण शुद्ध होकर आया है? ज्ञान-पण्डों द्वारा ज्ञान गंगा में स्नान करने से तथा दैवी गुणों का तिलक लगाने से ही देही-अभिमानी आत्मा का कल्याण होने वाला है। स्थूल हरिद्वार पहुँचकर लौकिक पण्डों से पत्रिकाओं द्वारा यह जानकर कि "तुम्हारे पिता, पितामह परमपितामह आदि-आदि ने अमुक समय यहाँ यात्रा की थी, क्षणिक खुशी से फूलने में कोई स्थायी लाभ नहीं। बल्कि ज्ञान के पण्डों (अर्थात् आत्म-द्रष्टाओं) से यह जानकर कि हमारे पूर्वज देवी-देवता थे और कि उन्होंने भी ज्ञान गंगा में स्नान करके देव पद पाया था।" इस जानकारी से लाभ उठाना चाहिए। अतः जो नित्य प्रति ज्ञान-स्नान करने का अभ्यासी नहीं, वह विकारी और दुःखी रहेगा ही, क्योंकि वह तो गंगा में न बहकर मृत्यु लोक की पाप-वैतरणी में बहने वाला है।
क्या मन वश हो सकता है?
अब बहुत-से लोग कहते हैं कि हम तो बहुत पापी हैं। हमारा मन तो सुधरने वाला नहीं, बहुत ही विकारी और अशान्त हैं। पता नहीं हमने पिछले अनेक जन्मों में कितने विकर्म किए हैं। न जाने हमारा उद्धार कैसे होगा !! इन बातों का विचार कर विकर्मों की सज्ञाओं (दण्ड) से डर, वे और भी परेशान हाल (दुःखी) हो जाते हैं।
परन्तु वे भूल जाते हैं कि पापियों ही का तो उद्धार परमात्मा करते हैं जिस कारण उन्हें 'पतित-पावन' कहा जाता है। हाँ, उस सर्वशक्तिमान् के बिना कोई नहीं तार सकता। 'वही एक खिवैय्या है सारे जग का', जो साधुओं का भी परित्राण करता है और पापियों को भी ज्ञान नौका द्वारा पार लगाता है, इसलिए गीता में उस ही के महावाक्य हैं कि "हे वत्स, तू कितना भी पापी क्यों न हो, मेरी ज्ञान-नाव में सवार हो जा तो मैं तुझे अवश्य पार ले चलूँगा।" इसलिए ही भगवान का कथन है-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज।
अहम् त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षियिष्यामि मा शुच ।।
गीता १८/६६
अर्थात् 'हे वत्स, तू निरुत्साह मत हो, चिन्ता न कर, क्योंकि तू कितना ही पापी क्यों न हो मैं तुम्हें सब विकर्मों से मुक्त कर दूँगा।' परन्तु इस वचन के साथ भगवान् की एक शर्त (Condition) है कि "तू देह के सब धर्मों को त्याग कर एकमात्र मेरी शरण ले, अर्थात् ज्ञानी आत्मा बनकर, मन्मनाभव हो, मुझ अविनाशी पिता के साथ ही अनन्य भाव से योग लगा। बस, फिर मैं त्रिलोकी सहित तेरा हूँ, मैं तुझे अवश्य परमधाम तथा वैकुण्ठधाम ले चलूँगा।"
अन्तर्मुखी सदा सुखी
सर्व गुणों का मूल आधार है अन्तर्मुखता। अन्तर्मुखता का यह अर्थ नहीं कि मुख से कुछ न बोलें, परन्तु अन्दर जो व्यर्थ संकल्पों के तूफ़ान आ जाते हैं उसमें अन्तर्मुख। अन्तर्मुखता की परिभाषा क्या है? मुख कहते हैं मुखड़े को, मुखड़े में ये चार शक्तियां हैं सोचने की, देखने की, बोलने और सुनने की। यह मुख, सारे अंदर का भाव बताता है। आत्मिक स्थिति में स्थित हो कर इन शक्तियों को प्रयोग करें, इसको कहते हैं अन्तर्मुख। जैसे गुलाम मालिक की आज्ञा मानता है, गुलाम गुलाम की आज्ञा नहीं मानेगा, ठीक इसी प्रकार आत्मा अपनी आत्मिक स्थिति में स्थित हो कर अपनी कर्मेन्द्रियों को आर्डर करे तो ठीक काम होगा। ऐसे नहीं सोचने की शक्ति समर्थ की बजाए व्यर्थ सोच ले, इसके लिए अपने ऊपर नियन्त्रण चाहिए। नियन्त्रण शक्ति उनमें होगी जो सीट पर सेट होंगे। सीट है अन्तर्मुखता, इसलिए कहा जाता है अन्तर्मुखी सदा सुखी, वाह्यमुखी सदा दुःखी।
कोई कहते हमको खुशी नहीं, अन्दर अन्दर सन्नाटा है, अब वह दुःख ऐसा भी नहीं जो 'हाय' करे। जैसे एक होते हैं मोटे विकार दूसरे उसके वाल-बच्चे; तो दुःख का भी महीन रूप है न तो शिव बाबा की याद न माया का रूप वास्तव में यह स्टेज भी सूक्ष्म दुःख की है। अगर कोई सूक्ष्म कर्मेन्द्रिय धोखा देती है तो धोखा खाने वाला सदा दुःखी। अन्तर्मुखी सदा खुश रहेगा, उसको मायावी तूफ़ानों की कोई परवाह नहीं, सदा हर्षित। जैसे सागर में लहरें उठती हैं वैसे ही अन्तर्मुखी के अन्दर भी सदा खुशी की लहरें उठती रहती हैं।
दृष्टि परिवर्तन
शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा द्वारा जो हमें ज्ञान दिया है, उसने सबसे पहले हमारी दृष्टि में परिवर्तन लाया है। दृष्टि परिवर्तन से ही हमारे मनोपरिवर्तन, व्यवहार परिवर्तन तथा जीवन परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और हमारे व्यक्तिगत परिवर्तन द्वारा हमारे परिवार, समाज और विश्व के परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। दृष्टि परिवर्तन (Change in perspectives) से हमारे बोध, हमारी समझ, हमारे विचारों, हमारी मान्यताओं और हमारे एहसासों (Perceptions) में परिवर्तन आया और वह परिवर्तन हमारी जीवन परिवर्तन की पद्धति की बुनियाद बन गया। इसके कुछ उदाहरण दे देने से यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाएगी।
बाबा द्वारा ज्ञान मिलने से पहले संसार के प्रति हमारा यह दृष्टिकोण था कि इसमें सुख और दुःख सदा एक-साथ चले आये हैं। अतः यदि हम धार्मिक साधना करते थे तो उसके पीछे हमारा यह भाव रहता था कि हमें इस दुःखमय संसार से मुक्ति मिल जाये। यदि हम कोई सामाजिक कार्य करते थे तो उसके पीछे हमारा यह भाव रहता था कि संसार में दुःख की कुछ तो कमी हो। गोया हमें इस बात का बोध अथवा इस बात की समझ ही नहीं थी कि यह संसार किसी समय पूर्णतः सुख, शान्ति सम्पन्न था और अब फिर भी इसे वैसा ही बनाया जा सकता है। यह एहसास (Perception) न होने से हम जीवनमुक्ति के लिए अथवा सतयुगी देवताई जीवन के लिए तो कभी कोशिश ही नहीं करते थे। परन्तु दृष्टि परिवर्तन (Change in perspectives) ने हमारी मान्यता, हमारे बोध और हमारे एहसास (Perception) में परिवर्तन करके हमारे जीवन परिवर्तन की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया। इसका फल यह हुआ कि हम अपने जीवन को दैवी जीवन बनाने में तथा विश्व को सतयुगी बनाने में लग गये और इस प्रकार हमने विश्व परिवर्तन की श्रृंखला शुरू कर दी।
इसी प्रकार मानव जीवन के बारे में पहले हमारा यह दृष्टिकोण बना हुआ था कि ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना ही होता है और गृहस्थ में सम्भोग वर्जित नहीं है। हमारा ही नहीं, प्रायः हर मानव का यही दृष्टिकोण था और आज भी है कि सन्तानोत्पत्ति भी मानव जीवन का एक आवश्यक कर्त्तव्य है। अतः गृहस्थ जीवन को एक मर्यादित और नियमित जीवन की तरह चलाने का एहसास तो हरेक धर्म-परायण व्यक्ति के सामने रहता ही था। परन्तु इस संसार के प्रति हमारा यह दृष्टिकोण तो था ही नहीं कि पूर्व काल में अर्थात् सतयुग और त्रेतायुग में 'योगज' सृष्टि हुआ करती थी और तब गृहस्थ सही मानों में आश्रम था और तब पति-पत्नि के सम्बन्धों में काम विकार का लेश भी नहीं था। जब शिव वावा ने ब्रह्मा बावा द्वारा नर-नारी के बीच के सम्बन्ध के प्रति हमारे इस दृष्टिकोण को परिवर्तित किया अथवा संसार और गृहस्थाश्रम के प्रति हमें नया दृष्टिकोण दिया, तभी हमें नया जीवन बनाने का एहसास (Perception) मिला और उस एहसास अथवा बोध की नींव पर हमने नई इमारत बनाना शुरू कर दिया। संसार में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले कुछ लोग पहले भी थे; परन्तु वे संसार को मिथ्या मानकर अथवा प्रवृत्ति का बहिष्कार करके संन्यस्त जीवन जीते थे। गोया संसार के प्रति उनका दृष्टिकोण यथातथ्य (Matter of Fact: Realistic) नहीं था। परन्तु अब हमें परमात्मा से व्यथार्थ ज्ञान मिला, उससे यथार्थ बोध (right perception) हुआ और उससे सत्य-निष्ठ होकर हमने एक नये युग, नये समाज, नई मर्यादाओं और नये जीवन की नींव डालना शुरू कर दिया।
केवल काम विकार के बारे में ही नहीं, बाबा ने तो काल-चक्र के युग विभाग बताकर और संसार की चक्रिक गति (Cyclic movement) समझाकर, संसार के प्रति जो हमारा यह दृष्टिकोण बना हुआ था, कि छः विकार (Six evils) तो यहां सदा ही से चले आये हैं, ही बदल दिया। इससे हमें यह एहसास हो गया कि ये मनोविकार हमारे दुश्मन हैं जबकि पहले हम यह समझते थे कि ये स्वाभाविक हैं। पहले यह दृष्टिकोण था कि ऋषि मुनि भी विकारों को नहीं जीत सके और कि जैसे तरलता पानी का गुण हैं, स्निग्धता घी की विशेषता है, उष्णता धूप की सहगामिनी है वैसे ही ये विकार भी संसार की रचना का एक अविच्छिन्न और अमिट अंग अथवा गुण है। परन्तु अब हमारा दृष्टिकोण यह हो गया है कि विकारों ने तो इस संसार को उजाड़ दिया है, इसे कांटों का एक जंगल बना दिया है, इसे दलदल में परिवर्तित कर दिया और हमें फिर से कांटों को फूल बनाना है, दलदल में कमल पुष्प के समान रहना है और संसार को फिर से हरा-भरा करना है क्योंकि पहले यह सदा-बहार फुलवाड़ी थी। जब से हमें यह दृष्टिकोण मिला कि एक वो संसार था जिसे स्वर्ग कहते थे और एक यह संसार है जिसे नर्क कहते हैं तब हमें बोध हुआ कि हम बदलेंगे और इस संसार को बदल कर रहेंगे। पहले हम यह समझते थे कि भगवान ने यह संसार बनाया है परन्तु जब हमें यह दृष्टिकोण मिला कि भगवान द्वारा बनाया गया संसार एक सुन्दर और सुख शान्ति सम्पन्न संसार है और वर्तमान संसार तो मनुष्य के अपने ही कर्मों द्वारा एक दूषित हुआ संसार है तो हमारे बोध में ऐसा परिवर्तन हुआ कि निराशा आशा में, उत्साह हीनता उत्साह में और कर्तव्यविमुखता कर्तव्यपरायणता में बदल गई और हम अपने कर्मों को ठीक करते हुए चिरकालीन स्वप्नों को साकार करने में लग गए।
एक और दृष्टान्त दे देने से यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाय्येगी। पहले हम समझते थे कि अब कलियुग चल रहा है और कलियुग में तो सब अटपटी बातें, अनैतिकता और अनाचार होता ही है। भारत के अन्य सभी लोग भी प्रायः ऐसा ही मानते हैं। यदि किसी को यह देखकर कि हजारों की संख्या में एटम और हाइड्रोजन वम बन चुके हैं, यह विचार आता भी है कि ये तो वहुत विनाशकारी हैं तो भी वे विनाश को इस दृष्टिकोण से नहीं देखते कि इन द्वारा कलियुग का अन्त होने वाला है और कि उससे पहले ही सतयुग का सूत्रपात होना आवश्यक है। यह दृष्टिकोण न होने से भारत में तथा विश्व के अन्य देशों में इस होवनहार महाभारी महाविनाश से करोड़ों लोग डरते हैं परन्तु वे बदलते नहीं और अन्य बहुत से लोग डरते भी नहीं, बदलते भी नहीं बल्कि वे यह समझते हैं कि अगर विनाश होगा भी सही तो उससे पहले हमें खूब मौज मना लेना अच्छा रहेगा। और कि यह कैसे विश्वास से कहा जा सकता है कि इसका विनाश अवश्य ही होगा। इसके विपरीत हमारा अब यह दृष्टिकोण बन चुका है कि विनाश अवश्य होगा और कि कलियुग जा रहा है तथा सतयुग आ रहा है और परमपिता परमात्मा स्वयं अब सतयुग का सूत्रपात कर रहे हैं। इस दृष्टि परिवर्तन से ही हमारे एहसास में यह परिवर्तन आया है कि हमारा यह वर्तमान जीवन बहुत महत्वपूर्ण है और कि जबकि स्वयं भगवान हम पर वरदानों की वर्षा कर रहे हैं तब भी हम उसके अनमोल खज़ानों से वंचित रह जाते हैं तो यह हमारी अपरिवर्तनीय क्षति होगी और इसकी बजाय हमें दत्तचित्त होकर परमात्मा की मार्ग प्रदर्शना से स्वयं में परिवर्तन लाने का उत्कट यत्न करना चाहिए। "अब नहीं तो कभी नहीं" ये जो एक धुन हमें लग गई है और जी-जान लगाकर तथा सब कुछ न्योछावर करके जो हम इस कार्य क्षेत्र में कूद पड़े हैं, उसका कारण हमारा दृष्टि परिवर्तन ही है। हमारा यह जीवन साधारण नहीं है जब से यह दृष्टिकोण हमें मिला है तब से ही हमने इसे कौड़ी तुल्य से हीरे तुल्य बनाने का पुरुषार्थ प्रारम्भ किया है।
अतः यदि यह पूछा जाय कि ईश्वरीय ज्ञान का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है तो दो शब्दों में यह कहा जाय्येगा कि इससे मनुष्य का दृष्टिकोण बदलता है और उससे उसका बोध, उसका एहसास और उसके जज़बात परिवर्तित होते हैं। उससे उसकी चेष्टाएं, आशाएं, उसकी भाव-तरंगें, उसके विचार और विश्वास बदलने लगते हैं और परिवर्तन की इस प्रक्रिया से उसका सारा जीवन ही लौकिक से अलौकिक, तामसिक से सात्विक और अपवित्र से पवित्र बनने लग जाता है।
वास्तव में सृष्टि में छः मुख्य समस्याएं हैं और य्ये समस्याएं मनुष्य में दृष्टि परिवर्तन होने से अन्त हो सकती हैं। सबसे पहले तो इन छः मुख्य समस्याओं के बारे में समुचित दृष्टिकोण पेश किया गया ताकि ये मालूम पड़े कि इनका मूल कारण क्या है। इन छः समस्याओं के नाम ये हैं मानसिक तनाव इसमें बताया गया था कि इससे दमा, कैन्सर, ट्यूमर, अल्सर आदि-आदि जैसे रोग ही नहीं होते बल्कि समाज में जो अपराध होते हैं, लड़ाइयां होती हैं, गलत निर्णय होते हैं, उनका भी मूल कारण प्रायः मानसिक तनाव ही होता है। अगर कोई उद्योगपति मानसिक तनाव में कोई गलत निर्णय ले ले तो उसके परिणामस्वरूप हड़ताल हो जाने से उसे लाखों-करोड़ों रुपयों की क्षति हो सकती है। किसी देश का नेता मानसिक तनाव में कोई घोषणा कर दे तो देश में उथल-पुथल हो सकती है। आज यद्यपि डाक्टर लोग मानसिक तनाव को कई रोगों का कारण बताते हैं परन्तु मानसिक तनाव के आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दुष्परिणाम हैं, वे लोगों के सामने ठीक रीति से नहीं रखे गये वर्ना तो ये संसार की सभी समस्याओं यहाँ तक कि जनसंख्या में वृद्धि तथा द्रव्य प्रयोग (Drug Addiction) का भी एक कारण है। अतः इसे मानव का शत्रु मानकर इसका पूर्णतः वहिष्कार करना चाहिए।
इसी प्रकार इसमें निर्धनता, आण्विक अखों की दौड़ द्वारा अशान्ति, जनसंख्या में तीव्र गति से होती हुई अति वृद्धि पर भी अभिलेख पेश किये गए थे और साथ-साथ दो लेख इस विषय पर थे कि मनोपरिवर्तन अथवा व्यक्तित्व परिवर्तन (Personality Transformation) का क्या भावार्थ है और हमारा व्यक्तित्व समायोजित (Integrated), संतुलित (Balanced) और शान्त एवं निर्द्वन्द (Harmonious) कैसे बने। इनके अतिरिक्त एक लेख इस विषय पर भी था कि युवा पीढ़ी इस युवा वर्ष में तथा बाद में भी क्या रचनात्मक कार्य करे तथा अपनी प्रवृत्तियों को किस कार्य में लगाए।
अपराध युग से दिव्य गुण की ओर
आज मानव इस बात के प्रति उपेक्षा भाव रखता है कि उसके कार्यों का दूसरों पर क्या प्रभाव होगा? उसमें दूसरों के कल्याण का भाव तो नाम-मात्र ही है। उसकी तीव्र लालसा अन्यों का अमानवीय शोषण करने में लगी है। इस कारण, वह दूसरों को अनिवार्य आवश्यकताओं से वंचित करने तक पहुँच गया है। चोर बाज़ारी, जमाखोरी, रिश्वत और मिलावट की तो कोई सीमा रह ही नहीं गयी है। वह अन्न, मसाले और जीवन के लिए अनिवार्य औषधियों तक में भी मिलावट करने से नहीं हिचकिचाता, वह नकली दवाइयों को भी बेचने से नहीं रुकता, चाहे वे दूसरों के स्वास्थ्य के लिए अहितकर क्यों न हों? दूसरों के अपकार करने वाले उद्योग धन्धों के व्यर्थ माद्दे, उनकी धुएं की कालिख तथा वाहनों के धुओं से वह वातावरण भी दूषित कर रहा है। संक्षेप में यह है कि मनुष्य आज भाई अर्थात् अन्य मनुष्य के जीवन को बिगाड़ कर जीवन जीता है। वह कठोर व निर्दयी बन गया है।
उसका क्रोध अब जंगली पशुओं से भी अधिक जंगली बन गया है। तर्क व भाषा रूप साधन होने के बावजूद भी वह अपने झगड़ों को सुलझाने के लिए एक दूसरे के सिर से सिर फोड़ता है। और उसके सिर पर सींग भी हैं साथ ही हाथों में पंजे भी। यह उसके क्रोध की पराकाष्ठा है कि उसने 'सभ्यता' समाप्त करने के लिए अणु व हाइड्रोजन बमों के ढेर लगाने पर ही बहुत बड़ी जन-शक्ति और धन राशि खर्च कर दी है, हालांकि उसके करोड़ों भाइयों के पास खाने को कुछ भी नहीं है।
सम्भोग अब मनोरंजन का साधन बन गया है। लगभग चार करोड़ लोग प्रतिवर्ष बढ़ते जा रहे हैं जो कि मनुष्य जाति के लिए एक भयंकर खतरे का कारण बन रहे हैं। तो भी मनुष्य की पाश्विक वृत्ति इस चरम सीमा तक पहुँच चुकी है कि उसने इस काम कला में सभी जानवरों को भी मात दे दी है और जन्म रोकने के लिए उपायों की भी खोज कर ली है, साथ ही वह काम या पाश्विक वृत्ति को भी जारी रखे हुए है।
अपराधों व विकारों की अनन्त सूची को जितना चाहे बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि आज आदमी बन गया है अभद्र, झूठा, धोखेबाज़, कपटी....।
आज वह माइक्रोफ़ोन पर चिल्ला-चिल्लाकर प्रार्थना करके या अनुचित साधनों द्वारा कमाये धन से मन्दिर बनवाकर भगवान को भी धोखा देना चाहता है।
समाज की ऐसी हालत में, हम चेतावनी देते हैं कि संसार जनसंख्या में अति वृद्धि, अणु युद्ध, प्राकृतिक आपदायें, घरेलू कलह क्लेश के द्वारा एक महान् आपत्ति की ओर बढ़ता जा रहा है।
लेकिन यह ध्यान रहे कि जो दैवी पुकार सुनने और अपने मार्ग बदलने के इच्छुक हैं; उनकी बुद्धि में दिव्य गुणारोपण द्वारा दिव्य सृष्टि के बीज बोने के दिव्य प्रयत्न जारी हैं। जो सावधान होंगे; वे दिव्य ज्ञान एवं राजयोग और गुणों के द्वारा दिव्य सृष्टि में जाएंगे।
नारायणी नशे में एवं ईश्वरीय कुल के स्वभाव में टिककर, दिव्यगुणों से युक्त होकर प्रस्ताव या आवेदन करना चाहिये। हमारे वचनों में नम्रता तो हो, परन्तु हीनता-दीनता, भय-हास या गिरावट की दुर्गन्ध नहीं होनी चाहिये। हम स्वयं के लिये तो किससे कुछ धन मांगते नहीं; बाबा ने उसे भी 'भिखारीपन' कहा है। अतः हमारा आवेदन-निवेदन लोक-कल्याण ही के कार्यार्थ युक्त भाषा में होना चाहिये ।
आदतों के गुलाम
कहते हैं कि गुलामी का जमाना चला गया है। एक समय था जब मनुष्य को गुलाम बनाकर बेचा जाता था। उसे इतिहास का अन्धकारमय युग कहते हैं। फिर एक वह भी समय आया जब एक देश ने दूसरे देश को गुलाम बनाया। अब वह जमाना भी नहीं रहा परन्तु हम यह भी नहीं कह सकते कि इतिहास में गुलामी का अध्याय समाप्त हो गया है। सच तो यह है कि गुलामी बढ़ी ही है, हाँ उस का रूपांतर अवश्य हुआ है। इस संसार में पहला श्वांस लेने के समय से लेकर आखिरी श्वांस लेने के समय तक, हमारे विचार में तो गुलामी की बेड़ियाँ मनुष्य के हाथों और पाँवों को ही नहीं, उसके आत्मन् को जकड़े रखती हैं। एक प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो (Rousseau) ने एक जगह कहा है कि मनुष्य जब जन्मा था तब स्वतंत्र था परन्तु अब वह अपने को एक सामाजिक प्राणी पाकर जंजीरों में जकड़ा हुआ महसूस करता है। मालूम होता है कि रूसों ने इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया कि जन्म से ही मनुष्य अपने पूर्व कर्मों और संस्कारों की बेड़ियाँ पहने हुए होता है और जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे वह आदतों का भी गुलाम बनता जाता है और हालत यह होती है कि उसकी ज़हनीयत ही गुलामी की हो जाती है।
आज कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है तो उस आदत का वह इतना गुलाम हो जाता है कि सवा पाँच फुट का आदमी होकर भी सवा दो इंच की सिगरेट की गुलामी से छुटकारा नहीं पा सकता। सर्वशक्तिमान् परमात्मा का पुत्र होकर भी वह अपनी इस आदत और इल्लत की पुरानी सड़ी हुई रस्सी को नहीं तोड़ सकता। गोया इन्सान होकर भी वह हैवान की तरह एक नहीं, कई खूंटो से बंधा हुआ है। सिगरेट के कश लगाकर अपनी नाक और साँस की नली को विरला मिल की धुएं की चिमनी बनाने में उसको एतराज नहीं। 'फेफड़े जलें तो जलें पर इस मनचले का मन अपनी चाल चले' इस विधि वह अपना सब-कुछ लुटाने को तैयार रहता है। दूसरा कोई व्यक्ति अपनी नोंक-झोंक और टोका-टाकी की आदत से नहीं छूट सकता। उसकी वाणी ऐसी अश्रु गैस का काम करती है कि घर में लोगों के अश्रु टपकने लग पड़ते हैं, वह ऐसे क्लोरोफार्म का काम करती है कि लोग मूर्छित हो जाते हैं, काम छोड़ कर बैठ जाते हैं और हर दिन रसोई में आग जले न जले, अनबन की आग जलाकर वे अपने बातों की सड़ी खिचड़ी बनाया करते हैं। परन्तु यह गुलामी कब तब ? इस प्रकार सदमा लेने और देने की कोई हद भी है। वह शुभ घड़ी कब आयेगी जब इंसान सिग्रेट की साँस को छोड़ कर सुख की साँस, आज़ादी की साँस लेगा और जब वह अनवन की आग में जलने की बजाय प्यार के झूले में झूलेगा।
अब परमात्मा का अवतरण हुआ है। अब पुरानी आदतों को छोड़ने की बेला आई है। ये सब आदतें हमें उसके वरदानों से वंचित किए हुए हैं। कमाल है कि हम इन बेड़ियों को छोड़ना नहीं चाहते और जिसे हम जन्म-जन्मान्तर पुकारते थे, उसके पास पहुँचने के लिए इन आदतों की छोटी सी कुर्बानी भी नहीं कर सकते। शायद हम इन आदतों की गुलामी को गुलामी नहीं समझते; शायद हम इन बेड़ियों और हथकड़ियों को सजावटी पाजेब और सोने की चूड़ियाँ समझते हैं।
आज कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है तो उस आदत का वह इतना गुलाम हो चुका है कि सवा पाँच फुट का आदमी होकर भी सवा दो इंच की सिगरेट की गुलामी से छुटकारा नहीं पा सकता। सर्वशक्तिमान् पर-मात्मा का पुत्र होकर भी वह अपनी इस आदत और इल्लत की पुरानी सड़ी हुई रस्सी को नहीं तोड़ सकता। गोया इन्सान होकर भी वह हैवान की तरह एक नहीं, कई खूंटो से बंधा हुआ है।
हमारे बोल
आम तौर पर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि किसी सार्वजनिक सभा में भाषण करना एक कला है Public speaking is an art. परन्तु यदि देखा जाये तो केवल भाषण ही नहीं, बात को ऐसा प्रभावशाली, रोचक, विनोद-युक्त तथा युक्ति-युक्त बना देते हैं कि सुनने वाला और अधिक सुनना चाहता है अथवा प्रभावित हो जाता है और दूसरे कई उसी बात को निस्तेज, शुष्क एवं सारहीन ढंग से कहते हैं कि सुनने वाले जम्भाई लेने लगते हैं, ऊंघने लगते हैं या तो 'बोरिंग (Boring)' समझ कर अपने आसन को छोड़ चले जाते हैं। कुछ लोग बात मनवा लेते हैं अन्य अपनी सही और न्याय संगत बात को भी ओजस्वी तरीके से नहीं रख पाते।
बात करने के ढंग में अन्य दृष्टिकोण से भी अन्तर होता है। परन्तु हम यहाँ भाषण कला (Oratory) या वकालत (Pleading or Advocacy) की चर्चा नहीं कर रहे; हम तो वाककला को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जानना चाहते हैं। आप देखते हैं कि कुछ लोग तो ऐसे तरीके से बात करते हैं कि दूसरा व्यक्ति अज्ञान-निन्द्रा को छोड़ कर या किसी बुरी आदत को छोड़कर अपना जीवन ही पलट देता है और कुछ लोग ऐसी बात करते हैं कि दूसरे के मन में फफोले पैदा कर देता है अथवा आग लगा देता है। बात करने का ढंग ऐसा भी हो सकता है कि सुनने वाले के मन में शान्ति आ जाये और दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा मिट जाये और बात ऐसे तरीके से भी हो सकती है कि उक्साहट पैदा हो। अतः हम इस बात पर विचार करना चाहते हैं कि बात कैसे की जाए ताकि यह कला हमारे लिये 'चढ़ती कला' का साधन बन जाए।
सर्वेक्षण करने पर आप इस परिणाम पर पहुँचेगे कि बात या बात के विषय, या अवसर प्रायः सोलह प्रकार के होते हैं। बाबा ने इन पर प्रकाश डाला है। यदि हम बाबा के महावाक्यों पर ध्यान दें तो हम अपना तथा दूसरों का कल्याण करने के निमित्त बन सकते हैं। हम यहाँ संक्षेप में कुछेक पर चर्चा करेंगे-
१. चर्चा-परिचर्चा
बात या वार्तालाप के एक रूप को 'चर्चा' कहते हैं। राजनीतिक, सामाजिक, घरेलू किसी भी बात को लेकर अपने किसी मित्र, पड़ोसी इत्यादि से हम प्रायः चर्चा छेड़ देते हैं। जब दो व्यक्ति मिलते हैं तव वे सोचते हैं कि आपस में कुछ तो बात करनी ही चाहिये। परन्तु बाबा ने समझाया है कि इस जीवन के श्वास अनमोल हैं, चर्चा ऐसी करो जिससे उन्नति हो। पानी में मथनी मारने से तो मक्खन निकलेगा ही नहीं बल्कि समय व्यर्थ ही जाएगा। अतः चर्चा का विषय और लक्ष्य ऐसा हो जिस से कुछ लाभ हो, अवस्था कुछ ऊंची उठे। व्यर्थ उधेड़-बुन तो निकम्मे ही व्यक्ति करते हैं। हमें विश्व के कल्याण की सेवा करनी है, हमारे पास फ़ालतू समय कहाँ है? अतः रूह-रूहानियत की बातें करनी चाहिए और हंस की तरह क्षीर ले, नीर को छोड़ देना चाहिए। बाबा ने एक 'मुरली' में कहा है कि कई बार जब आपस में बातें करते दो व्यक्तियों से पूछते हैं "क्या कर रहे हो?", तो वे कहते हैं "ऐसे ही बातें कर रहे हैं!" परन्तु वास्तव में "ऐसे ही" बातें करने का क्या भाव है? बात तो किसी अच्छे प्रयोजन ही से करनी चाहिये। हमारी बात ऐसी हो कि मोती झड़ें हमारे बोल ऐसे हों कि पुष्पों की तरह कोमल तथा सुगन्धित करने वाले हों, हमारी चर्चा का विषय उन्नति कारक हो।
२. सलाह-विमर्श-सुझाव
कई वार हम इसलिए बोलते हैं कि हमारे पास बैठा व्यक्ति हम से कोई राय मांगता है, सलाह करना चाहता है अथवा किसी समस्या का हल पूछता है। इस अवसर पर हमें चाहिये कि हम ब्रह्मा बावा के जीवन को सामने रखें, स्वयं को भी शिव बाबा से योग-युक्त करके अच्छी स्थिति में स्थित हों ताकि हम ठीक सलाह दे सकें वरना दूसरे व्यक्ति के गुमराह या भ्रान्त होने की संभावना है। हम साक्षी अवस्था में टिककर, श्रीमत के आधार पर विश्व कल्याण ही के भाव से उसे राय दें और बड़ी ज़िम्मेवारी से तोल तोल कर बात करें, वरना उसे मार्ग-विमुख करने का पाप हमारे सिर पर चढ़ेगा। हमें अपने मत की बजाय उसे ईश्वरीय मत, दैवी या ब्राह्मण कुल की मर्यादा ही बताने के भाव से बोलना चाहिये।
३. समाचार
कुछ व्यक्ति इकट्ठे होते हैं तो एक-दूसरे से कहते हैं सुनाओ भाई, क्या समाचार है? कोई नई ताज़ी बात बताओ? आजकल क्या कर रहे हो, क्या चल रहा है? वह इस बात को लेकर समाचार सुनाना शुरू कर देता है। किसी ने मन को कोई चोट लगाई होती है या और ऐसा कोई किस्सा होता है तो वह भी 'समाचार' शीर्षक के अन्तर्गत आ जाता है। ऐसे समाचार से न तो सुनने वाले की उन्नति होती है, न सुनाने वाले को ही कोई लाभ होता है। सुनने वाला और लोगों को बताता है तो मनमुटाव होता है और वातावरण बिगड़ता है और सुनाने वाले के भी मन को टेर ही पड़ती है, दूसरा कोई लाभ तो होता नहीं। अतः समाचार ऐसा ही सुनाना चाहिये, जिससे कि दूसरे का पुरुषार्थ तीव्र हो, उसे प्रेरणा मिले, नैतिकता में उसकी भावना बढ़े और उसे खुशी मिले।
४. भाषण
यदि हम भाषण, प्रवचन, परिसंवाद आदि के रूप में बात करते हैं तो उसमें हमें रूहानियत भरी शिव बाबा की बातें ही अधिक कहनी चाहिए क्योंकि सबसे श्रेष्ठ बातें, जो संसार में अन्य न किसी को मालूम हैं और न कोई सुनाता है, तो शिव बाबा द्वारा ही बताई गयी हैं। उन्हीं बातों से ही कल्याण भी होने वाला है, और तो सब 'लवार' है। हाँ, वात को जिस प्रकार के व्यक्ति के सामने रखना हो और जैसा मौका हो वैसे तरीके से तो कहना पड़ता है परन्तु बात तो हमें ईश्वरीय ज्ञान ही की करनी चाहिये। हमें शिव बाबा का परिचय, संगमयुग की सूचना, आदि-आदि तो स्पष्ट रूप में बताना ही चाहिये।
५. प्रश्न-उत्तर
हमारी बात का एक रूप प्रश्न-उत्तर भी हुआ करता है। हम या तो कोई बात किसी से पूछते हैं और या कोई हम से प्रश्न करता है तो उसे हम उत्तर देते हैं। हमारा पहला प्रयास यह होना चाहिये कि हम अपने प्रश्न ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर स्वयं हल करें। इसलिए प्रश्न करने या पूछने की आदत के बारे में तो बाबा ने कह ही दिया है कि अब 'पूंछ निकाल दो' क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान के सार तथा विस्तार को हमने जान ही लिया है। बाबा ने हमें जो विस्तृत ज्ञान दिया है, वह हमारे सभी प्रश्नों को हल करने में समर्थ है। इसलिए बाबा कहते हैं कि अधिक पूछने से क्या लाभः "मन्मना भव!" मन को शिव बाबा में लगायेंगे, और प्रतिदिन मुरली सुनेंगे तो प्रश्नों का ठीक उत्तर अवश्य मिलता ही जायेगा। यदि हम किसी के प्रश्न का उत्तर देते हैं तो वह उसे 'प्रसन्न' करने वाला हो ऐसा हमारा उत्तर हो। वह प्रश्न और उसका उत्तर उसके जीवन को पवित्रता एवं योग के मार्ग पर लगा कर सदा के लिए उसे प्रसन्न-चित्त बना दे।
६. अनुभव सुनाना
कई बार हमारी बातचीत अनुभव के विषय में होती है। कोई हम से अनुभव सुनाने के लिये प्रस्ताव करता है या हम ही किसी से इस विषय पर बोलने लगते हैं। हमें अनुभव ऐसे सुनाने चाहिए जिनसे सुनने वाले को बल मिले और वह भी चढ़ती कला वाला हो जाय। अपनी कमज़ोरी का अनुभव, जिससे किसी के मन को बीमारी लग जाय, सुनाने से क्या लाभ ? हरेक मनुष्य का जीवन अनमोल है; अतः उसे जीवन के लक्ष्य पर पहुँचने का ही अनुभव सुनाना चाहिये, न कि ऐसा अनुभव जिससे कि उसमें आलस्य, कमज़ोरी या कोई अवगुण आये।
७. परिचय देना
कुछ लोग जब हमारा परिचय पूछते हैं तो उसी विषय पर बात शुरू होती है। ऐसे अवसर पर हमें लौकिक परिचय के साथ-साथ अपना अलौकिक तथा पारलौकिक परिचय भी देना चाहिये या दूसरे का लौकिक परिचय सुनने पर उसे अलौकिकता में स्थित करने वाली बातें भी सुनानी चाहिये। अपना परिचय शिव बाबा के परिचय से तो जुटा ही रहना चाहिये क्योंकि वही हमारे माता-पिता, सखा, मार्ग दर्शक एवं सर्वस्व हैं।
८. निवेदन, प्रस्ताव आदि
कई बार किसी से कुछ कार्य भी कराना होता है और उसके लिये अनुनय-विनय, निवेदन-आवेदन या प्रस्ताव झुकाव भी करना होता है। परन्तु शिव बाबा ने समझाया है कि सदा शुभ और अच्छे ही कार्य के लिए आवेदन करना चाहिए और अपनी स्थिति से नीचे नहीं गिरना चाहिये बल्कि नारायणी नशे में एवं ईश्वरीय कुल के स्वभाव में टिककर, दिव्यगुणों से युक्त होकर प्रस्ताव या आवेदन करना चाहिये। हमारे वचनों में नम्रता तो हो परन्तु हीनता-दीनता, भय-हास या गिरावट की दुर्गन्ध नहीं होनी चाहिये। हम स्वयं के लिये तो किससे कुछ धन मांगते नहीं; बाबा ने उसे भी 'भिखारीपन' कहा है। अतः हमारा आवेदन निवेदन लोक-कल्याण ही के कार्यार्थ युक्त भाषा में होना चाहिये।
९. अभिवादन, स्वागत, निमन्त्रण
हमें किसी के स्वागत, अभिवादन आदि के सिलसिले में भी कुछ बोलना पड़ता है। ऐसे अवसर पर हमें व्यक्ति विशेष के गुण भी बताने पड़ते हैं परन्तु आत्मा के गुणों के साथ हमें प्यारे शिव बाबा, जो कि सर्वगुणों के अतुल भण्डार हैं और गुणदाता हैं, के गुणों की चर्चा करना भी नहीं भूलना चाहिये। स्वागत, निमन्त्रण से सम्बन्धित हमारे बोलों में अलौकिकता अवश्य होनी चाहिये और शिव बाबा के निमित्त बनकर ही हमें यह कार्य करना चाहिये।
१०. सहानुभूति प्रगट करना, आदि
कोई व्यक्ति शरीर छोड़ देता है तो उसके मित्र-सम्बन्धियों से सहानुभूति प्रगट करने और यदि कोई रोग-ग्रस्त होता है अथवा व्यापार में हानि होने से पीडित होता है तो ऐसे अवसरों पर भी मनुष्य को बात करनी पड़ती है। परन्तु बाबा ने हमें समझाया है कि ऐसे अवसर पर शोक को बढ़ाने या देह-धारियों की याद दिलाने वाली बातें न कह कर, आत्मा और परमात्मा की, कर्मफल तथा दिव्य धारणा की वातें बतानी चाहिए ताकि आत्माओं को शान्ति मिले और वह देहाभिमान से निकल कर आत्मिक स्थिति को प्राप्त हों।
११. स्मृति-वार्ता
कई बार हम दूसरों को कोई बात याद दिलाने के लिये ही उनसे बोलते हैं। कोई बात जो वे भूल गये हों, उसकी ओर उनका ध्यान खिंचवाने के लिए या उनके बारे में ताकीद करने के लिये ही हम उनको सम्बोधित करते हैं। परन्तु देखने की बात यह है कि उन्हें याद दिलाते समय तुनका तो नहीं लगाते, अर्थात् 'टाँट' (taunt) तो नहीं करते? उदाहरण के तौर पर हम उन्हें ऐसा तो नहीं कहते "अरे भाई, आप कैसे आदमी हैं; आप बार-बार भूल जाते हैं। लगता है कि आपका दिमाग यहाँ न होकर कहीं और चक्कर लगाने चला जाता है। हम आपके नौकर थोड़े ही हैं कि आपको बार-बार याद दिलाते रहें। आप तो ऐसे व्यक्ति हैं कि यदि हम आपको याद न दिलाते तब आप तो बट्ठा ही बिठा देते..।" इसकी बजाय हमें या तो शुभ चिन्तक होकर दूसरे को वह बात याद दिलानी चाहिये जो हम जरूरी समझते हैं, वरना चुप ही रहना चाहिये। हमें सोचना चाहिये कि हमें भी तो शिव बावा पवित्र बनने और आत्मा निश्चय बुद्धि बनने की बात बार-बार याद दिलाते हैं। हम फिर-फिर भूल जाते हैं परन्तु शिव बाबा तो हमारे कल्याण की भावना से, विनोदपूर्वक हमें हजारों वार इसकी याद दिला चुके हैं। उन्होंने इस बात को कभी भी क्रोध से या डांट कर तो नहीं दुहराया। अतः हमें भी यदि स्मृति दिलाने के लिये बोलना हो तो चिड़चिड़ेपन से नहीं बल्कि सहानुभूति से बोलना चाहिये।
१२. प्रशंसा-वार्ता
किसी से हमें इसलिये भी बोलना पड़ता है कि हमें उसकी सफ़लता पर उसे मुबारिक देनी होती है और अपनी प्रसन्नता प्रगट करनी होती है अथवा किसी अन्य व्यक्ति के कार्य की उसके समक्ष सराहना करनी होती है। ऐसा करते समय हमें अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिये वरना वह वात चापलूसी का रूप ले लेगी अथवा सुनने वाले को भी या तो संकोच होगा या उसमें अभिमान आ जायेगा और अन्य जो उसकी प्रशंसा नहीं करता होगा उसके प्रति उसके मन में घृणा पैदा हो जायेगी। अधिक प्रशंसा पाने से उसके कार्य का फल भी उसे उतना ही कम मिलेगा क्योंकि काफ़ी फल तो उसने प्रशंसा के रूप में प्राप्त कर ही लिया होगा।
पुनश्चः किसी के भी कार्य या गुणों की सराहना करते समय हमें शिव बावा की भी स्मृति इस प्रकार बनी रहनी चाहिये कि सभी गुणों की खान तो शिव बाबा ही है और वही गुणदाता है। अतः मन में और वाणी में भी कल्याणकारी शिव बाबा की प्रशंसा प्रगट होनी चाहिये। ऐसे नहीं होना चाहिये जिससे शिव बाबा छिप जायें और कोई देहधारी व्यक्ति ही प्रत्यक्ष हो, बल्कि व्यक्ति की प्रशंसा द्वारा भी हमें शिव बावा ही को प्रत्यक्ष करना चाहिये।
१३. शिकायत-वार्ता
ऐसा भी होता है कि हम जिस व्यक्ति से सन्तुष्ट नहीं होते उसके बारे में हम उसी से या अन्य किसी से शिकायत करने के लक्ष्य से, या नाराज़गी प्रगट करने के भाव से बोलते हैं। ऐसे समय में हमारा मन खिन्न होता है और इसलिये सम्भव होता है कि हमारे मुख से कुछ वचन ऐसे निकलें जिससे सुनने वाले व्यक्ति को उत्तेजना आ जाये, क्योंकि अपनी शिकायत हर व्यक्ति नहीं सुन सकता और दूसरा व्यक्ति भी प्रायः शिकायत को तुरन्त नहीं मान लेता। अतः पहली बात यह है कि शिकवे और शिकायत का प्रायः कोई विशेष लाभ नहीं होता। अतः ऐसी बातें करते समय हमें यह स्मरण रहना चाहिये कि इसका शुभ परिणाम तो बहुत कम ही निकला करता है। परन्तु यदि हम इस भावना से कुछ कहते हैं कि दूसरे आगे के लिये ग़लत कर्म अथवा विकर्म करने से बच जायें तो हमारे बोल कम और यथार्थ होने चाहिये। हमें इसमें भी अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिये और हम से जो अन्याय, अपेक्षा, प्रतिशोध युक्त या स्वार्थ-युक्त व्यवहार होता है, उससे सहन करने में सफ़ल होने की या उससे छुटकारा पाने की कोशिश करनी चाहिये, वरना इस विषय में इधर-उधर, इसको उसको शिकायत करने का अन्त शुभ नहीं होता। अतः हम शिकायत के भाव से न वोलें, मर्यादा स्थापना के भाव से तथा कल्याण-भाव को सामने रख कर बोलें।
१४. विचार-प्राकट्य अथवा समालोचना
कई व्यक्ति मांगे बिना ही राय देने लग जाते हैं अथवा किसी की योजना अथवा विचार पर अपनी टीका करने लग जाते हैं। वे अनाधिकार रूप हरेक की समालोचना करते हैं और अपने वचनों से दूसरों पर छींटा डालते हैं। हमें मालूम होना चाहिये कि अपने बारे में कोई विरला ही व्यक्ति कटु आलोचना अथवा तर्क-युक्त, यथार्थ परन्तु निषेधात्मक आलोचना सुन सकता है। अतः हमें आमन्त्रित हुए बिना ही आलोचना या विचार-प्राकट्य शुरू नहीं कर देना चाहिये। और, जब हम आलोचना, तुलना या मूल्यांकन करते भी हैं तो हमारी भावना परस्पर उन्नति ही की अथवा कार्य में अधिक कुशलता एवं सफ़लता लाने की होनी चाहिये। हमारे बोल दूसरे व्यक्ति को हताश, परास्त, अपमानित या प्रताड़ित करने के अथवा बदला लेने के लिये नहीं होने चाहिये, बल्कि रचनात्मक, हित-भावना से तथा स्वयं को सहयोग के लिये अर्पण करने के शुभ संकल्प से होने चाहिये।
१५. भाव-भंगिमा
बोलते समय हम अपने हाथों को जिस तरह हिलाते, जैसा चेहरा बनाते, किसी बात पर ताली बजाते, किसी बात को कहते समय आवाज़ को ऊँचा करते, पास बैठे व्यक्ति को आँखों से इशारा करते अथवा कोहनी मारते, दूसरे की बात पर भद्दे तरीके से हँस पड़ते, उसकी बात पर ध्यान ही न देते या उसे उड़ा देते या उसके प्रति अस्वीकृति का भाव अशिष्ट हरकत या वचन से व्यक्त करते हैं, वे सभी भी हमारे बोलों में गिने जाते हैं। हमारा रवैया, हमारी भाव-भंगिमा बहुत बार हमारे वचनों से भी अधिक अभिव्यक्ति करते हैं। अतः मुख द्वारा न बोले गये परन्तु हमारे हाव-भाव या अंगांन्यास द्वारा व्यक्त किये गये बोल भी दिव्य मर्यादा से युक्त होने चाहिये। उनमें भी शालीनता, संयम तथा हित-भावना और प्रेम होना चाहिये।
१६. मौन
बहुत बार हमारा मौन, हमारी चुप्पी, हमारा मूक भाव भी बोलने का काम करता है। कभी तो चुप को लोग 'मौन अर्ध सम्मति लक्षणम् (Silence is half-consent)' मान लेते हैं और कभी नाराज़गी मानते हैं। कभी वे इसे हमारे मन में भय की उपस्थिति का सूचक समझते हैं तो कभी हमारे बारे में अलग एवं न्यारा रहने का बोधक मानते हैं। अतः जैसे हम अपने बोलों पर ध्यान देते हैं, वैसे ही हमें अपने मौन पर भी ध्यान देना चाहिये। हम से बड़े यदि हमसे वार-बार कोई बात पूछते हैं, और हम मौन रहते हैं तो यह एक प्रकार से उनका अपमान माना जाता है चाहे हमारे न बोलने का कारण हमारी अप्रसन्नता ही हो। अतः हमारा मौन भी हमारे बोल का काम करता है और उसे भी हमें शब्दों की तरह मर्यादापूर्वक प्रयोग करना चाहिये।
दैवी मर्यादा
हम सतयुग के देवी-देवताओं की महिमा करते हुए जहाँ उन्हें "सोलह कला सम्पूर्ण, गुणवान और सम्पूर्ण निर्विकारी" बताते हैं, वहाँ हम उनकी महिमा में 'मर्यादा पुरुषोत्तम' उपाधि का भी प्रयोग करते हैं। प्रश्न उठता है कि देवताओं की मर्यादा में ऐसी क्या विशेषता थी कि जिसके कारण उस मर्यादा को उत्तम अथवा सर्वोत्तम मर्यादा कहा जाता है।
इससे पूर्व कि हम उस सर्वोत्तम मर्यादा के बारे में चर्चा करें, पहले हम थोड़ा यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि 'मर्यादा' शब्द से हमारा भाव क्या है। वैसे शाब्दिक अर्थ में तो मर्यादा सीमा का वाचक है। उदाहरणार्थ, यदि नदी अपने दोनों किनारों अथवा सीमाओं के बीच ही बहती रहती है तो हम कहेंगे कि वह मर्यादित है। यदि उसमें बाढ़ आ जाती है और वह वेग में आकर अपनी सीमाओं को तोड़ देती है तो हम कह सकते हैं कि उसने अपनी मर्यादा को तोड़ दिया। इस प्रकार 'मर्यादा' शब्द जहाँ एक ओर चले आ रहे मार्ग, विधि-विधान और सभ्य व्यवहार के तौर-तरीके (Tradition) का पर्यायवाची हो गया है, वहाँ दूसरी ओर मर्यादा शब्द वेग-रहित, संतुलित एवं शान्त बुद्धि से उचित जीवन-चर्या का भी वाचक है। छोटों का बड़ों से कैसा व्यवहार हो और बड़े छोटों के प्रति अपना कर्तव्य कैसे निभायें, राजा अपनी प्रजा से कैसे पेश आये और प्रजा राजा का कैसे सम्मान करे इस प्रकार परस्पर व्यवहार को अनुशासन बद्ध करने वाले जो अलिखित नियम हैं, उन सब की परिगणना मर्यादा के अन्तर्गत होती है। संसार में हर देश की सरकार तो नागरिकों के व्यवहार के लिए विधि-विधान (Law) बनाती ही है परन्तु पिता-पुत्र, अध्यापक और शिष्य, पति-पत्नी, भाई और बहन, हमसाये और पड़ोसी, अर्थात् एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य के साथ जो सामान्य अथवा विशेष सम्बन्ध हैं, उन सब की रीति अथवा सीमा निर्धारित करने वाले सभी नियम लिखे नहीं जा सकते और सरकारी कानून द्वारा सभी पालन भी नहीं कराये जा सकते। तो भी उनका महत्व सरकार के बनाये हुए कानून से कई गुना ज्यादा है क्योंकि उनका पालन न करने से कलह-क्लेश और परस्पर वैर-विरोध पैदा होते हैं, तनाव बढ़ते हैं, मेल-मिलाप टूटता है, मनुष्य अनारक्षित अनुभव करता है, अशान्ति पैदा होती है और हरेक के लिए यह जानना अनिश्चित हो जाता है कि दूसरा व्यक्ति कल अमुक परिस्थिति में उससे कैसा व्यवहार करेगा। परिणाम यह होता है कि लोगों की आपस में कहा-सुनी हो जाती है, वे समाज में एक दूसरे की निंदा करना शुरू कर देते हैं; शब्द संयम टूट जाता है, सम्बन्धों का विच्छेद हो जाता है और किसी को हम त्योड़ी चढ़ाते देखते हैं तो दूसरे को मुट्ठी कसता हुआ पाते हैं, गोया सारे समाज का ताना-बाना बिखरता और टूटता हुआ-सा मालूम होता है और हम सभी को परेशान हाल में देखते हैं।
आजकल प्रचलित मर्यादा
बहन-भाई, पिता-पुत्र अथवा पड़ोसी और पड़ोसी में किस प्रकार का व्यवहार
होना चाहिए, इसकी शिक्षा व्यक्ति को अपने से बड़े सम्बन्धियों के द्वारा अथवा धर्म शास्त्रों के अध्ययन या श्रवण ही से होती है क्योंकि स्कूलों और कालेजों में जो शिक्षा मिलती है, उसमें तो इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित इत्यादि ही पढ़ाये जाते हैं जिनमें कि व्यवहार शिक्षा को विशेष स्थान नहीं दिया जाता। अब जहाँ तक बड़ों से यह शिक्षा मिलने का प्रश्न है, उस सम्बन्ध में हम देखते हैं कि स्वयं उनके जीवन में भी मर्यादाओं के पालन में ढीलापन होता चला आया है। स्वयं उनका अपना व्यवहार किसी न किसी विकार के वेग के वश, अमर्यादित होता गया है! इसका परिणाम यह हुआ है कि एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी में मर्यादाएँ अधिकाधिक टूटती चली गई हैं। पुनश्च विज्ञान के द्वारा औद्योगीकरण होने के फल स्वरूप भी मनुष्यों के रहने सहने के तरीकों में काफी अंतर आ गया है। जहाँ पहले छोटे-छोटे नगर और उपनगर होते थे, वहाँ आज महानगर दिखाई देते हैं और जीवन इतना तीव्र गति सम्पन्न हो गया है कि अब पुरानी सामाजिक रीतियाँ अपना रूप काफी बदल चुकी हैं। जहाँ तक धर्म शास्त्रों का सम्बन्ध है उनमें यद्यपि विधि और निषेध (Do's and Don'ts) का उल्लेख है तो भी उनमें एक ओर तो परस्पर मत-भेद है और दूसरी ओर उनमें पूर्वकाल में हुए जिन ऋषियों, मुनियों, राजाओं इत्यादि का उल्लेख किया गया है, स्वयं उनके जीवन में भी पदे पदे मर्यादाओं का उल्लंघन होते दिखाया गया है। अतः आज वे भी मनुष्य को मर्यादाओं का स्पष्ट ज्ञान देने वाली अथवा उन्हें श्रेष्ठता की ओर प्रेरित करने वाली अवस्था में नहीं हैं। वे शास्त्र उस व्याकरण के समान हैं, जिसके नियम कम लागू होते हैं, अपवाद (exceptions) ज्यादा। अतः लोग ऐसा मानते हैं कि उन शास्त्रों में जो बातें बताई गई हैं, वह अप्राप्य आदर्श हैं। उन शास्त्रों में स्वयं देवताओं का भी जो चित्र, चित्रण मिलता है, वह भी उत्साह भंजक है, वर्द्धक नहीं। तब कौन बताय्ये कि चिरातीत काल में जो हमारे पूर्वज थे, वह किस मर्यादा का पालन करते थे? सृष्टि के आदि युग में, जिसे 'देव युग' कहा गया है, देवी-देवता किस मर्यादा के अनुसार राज-काज, व्यवहार और व्यापार तथा पारिवारिक और सामाजिक जीवन को चलाते थे। स्वतः स्पष्ट है कि उस पुराकाल, जिसके बारे में इतिहास मौन है और जिसकी स्मृतियाँ भी काल में विलीन हो गई हैं, का असंदिग्ध और सुस्पष्ट परिचय स्वयं कालातीत अथवा त्रिकालज्ञ परमपिता परमात्मा ही बता सकते हैं।
सर्वोत्तम मर्यादा अथवा दैवी मर्यादा
उन्हीं परमपिता परमात्मा ने उस काल की सतोप्रधान सभ्यता, दैवी संस्कृति और उत्तम मर्यादा का रहस्योद्घाटन किया है। उन्होंने बताया है कि तब मनुष्यों के परस्पर व्यवहार की मर्यादा बताने वाले धर्म शास्त्र नहीं थे परन्तु लोग अपने स्वभाव और संस्कारों से ही सज्जन और सुशील थे। वहाँ सरकार की ओर से न कोई दण्ड संहिता थी और न कोई कारावास न पुलिस और न न्यायालय, बल्कि लोग स्वभाव से ही सत्कर्मा थे। उनमें अपराध-वृत्ति ज़रा भी न थी बल्कि उनका मन निर्मल, स्व-अनुशासित और श्रेष्ठ वृत्ति वाला था। उनका सारा व्यवहार परस्पर स्नेह पर आधारित था और सभी विकारों से पूर्णतः रहित पूर्णतः पवित्र था। अतः उस युग में बहन-भाई, पिता-पुत्र, राजा प्रजा इत्यादि के वीच के सम्बन्ध और व्यवहार सर्वोत्तम मर्यादा से युक्त था। इसीलिए आज तक दैवी मर्यादा का और देवताओं का गायन है।
घृणा की निवृत्ति कैसे हो ?
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य इन छः विकारों को मनुष्य के लिए षट् रिपु अर्थात् छः शत्रु कहा गया है क्योंकि ये छः मनुष्य का खज़ाना लूटने वाले और उसके मन को अशान्त करने वाले हैं। परन्तु हम देखते हैं कि घृणा और द्वेष भी किसी तरह से इन विकारों से कम नहीं है। छः शत्रुओं में इनकी गणना न करने का यह अर्थ नहीं है कि ये कोई विकार नहीं है। बल्कि इनकी गणना अलग इसलिए नहीं की गई कि ये ऐसे विकार हैं जिनमें काम, क्रोधादि सभी विकार समाये हुए हैं। अतः घृणा रूपी महाबली शत्रु पर पूर्ण विजय प्राप्त करने का भरसक यत्न करना चाहिए क्योंकि घृणा एक ऐसी अग्नि है जिसमें कि मनुष्य का अपना ही रक्त और अपना ही मस्तिष्क ईंधन की तरह जलने लगता है। उसका खून खौलता रहता है, वह डाह एवं रोष के मारे जलता भुनता रहता है, वह सदा संतृप्त रहता है। उसका विवेक नष्ट हो जाता है और इसलिए उसका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लग जाता है। जो मनुष्य योग का अभ्यास करना चाहता हो, उसे तो तुरन्त ही घृणा को अपने मन से निकाल देना चाहिए क्योंकि घृणा सदा उस मनुष्य के चित्र को हमारे मन की आँख के सामने लाती है जिससे हम घृणा करते हों और उस व्यक्ति का चित्र हमारे मानस पटल पर आते ही हममें द्वेष, क्रोध और दुःख की लहरें पैदा होती हैं जबकि योगी का लक्ष्य किसी मनुष्य को याद न करके प्रभु ही की स्मृति में स्थित होना तथा द्वेष और क्रोध की बजाय प्रभु-प्रीति और शान्त-रस का अनुभव करना होता है।
घृणा की उत्पत्ति का एक कारण है किसी व्यक्ति का हमारे साथ अभिमान-पूर्ण व्यवहार
गहराई से विचार करने पर आप इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि जिन व्यक्तियों से हमारा कार्य-व्यवहार, लेन-देन या मेल-जोल रहता है, उनमें यदि अहंकार हो या वे हमें दबाये रहें, हमें उन्नति का अथवा अपने विचारों को कार्यान्वित करने का अवसर न दें अथवा हमारी बुद्धि, कार्य क्षमता अथवा सामर्थ्य को कम समझकर हमें छोटा ही मानते रहें तब भी हमारे मन में उन व्यक्तियों के प्रति घृणा का भाव जागृत होता है। जब साठ के दशक में काँग्रेस में फूट पड़ने से जो दल बने, उनमें परस्पर घृणा के कारणों पर यदि आप ध्यान दें तो आप देखेंगे कि यही मुख्य कारण था। पुरानी कॉंग्रेस के कामराज, श्री मोरारजी देसाई, श्री पाटिल आदि-आदि सभी इसी नशे में रहे कि हम बहुत ही अनुभवी और विचार-कुशल हैं और इन्दिरा गांधी राजनीति एवं प्रशासन के कार्य में अभी नई हैं। कुछेक व्यक्ति तो इसी अभिमान में रहे कि हमने ही तो श्रीमती इन्दिरा गांधी को प्रधान मंत्री बनाया है, गोया हमारी ही बात सर्वोपरि होनी चाहिए। उनके इस प्रकार के व्यवहार से श्रीमती इन्दिरा गांधी के मन में घृणा उत्पन्न हुई होगी। वह तथा अन्य युवक सदस्य पुरानी पीढ़ी के नेताओं के इस अभिमान एवं दबाव को आतंक समझकर उनसे घृणा करने लगे होंगे। वे अपने मन-ही-मन उनके अहंकार तथा रोब को पीते रहे और घृणा का बीज अंकुरित होता रहा। जब फूट स्पष्ट रूप से सामने आई तो श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अन्तरात्मा की आवाज (Conscience) की दुहाई दी अर्थात् भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के समय उन्होंने कहा कि हरेक को अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ के अनुसार वोट देने का अधिकार है, जिसका अर्थ यह हुआ कि अब इन पुराने पंथी, अभिमानी नेताओं के दबाव, रोब या अभिमान से दवेंगे नहीं। युवा पीढ़ी के नेताओं, जिन्हें की 'युवा तर्क' (Young Turks) का नाम दिया जाता था, ने कहा कि हम अब पुराने पंथियों के अफसराना रवैये (Bossism) को बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन्दिराजी के गुट ने यह भी कहा कि ये पुराने पंथी लोग हमारी प्रगतिवादी योजनाओं को कार्यान्वित होने में रुकावट बने रहे हैं। तो स्पष्ट है कि जब कोई व्यक्ति अभिमान से, अनुचित रोब या दबाव से व्यवहार करता है या अहंकार के नशे में दूसरों के विचारों को सुनता नहीं या उन्हें मूल्य नहीं देता तो वह अपने प्रति दूसरों के मन में घृणा उत्पन्न कर देता है।
२ . घृणा का दूसरा कारण है हित को
हानि पहुँचाने का भय
जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति हमें हानि पहुँचाना चाहता है, हमें दूसरों की नज़रों से गिराना चाहता है, हमारे पद से हमें हटाना चाहता है अथवा किसी प्रकार से हमारे हितों की रक्षा करने की बजाय हमें हानि पहुँचाना चाहता है तब भी उसके प्रति मन में घृणा पैदा हो जाती है। पिछले वर्षों में काँग्रेस की फूट और उसके बाद का जो नाटक सबके सामने चला, उसी की ओर आप ध्यान देकर देखें तो आप इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि राष्ट्रपति के चुनाव के बारे में जब इन्दिरा जी के विचार को निजिलिंगप्पा, कामराज इत्यादि ने ठुकरा दिया और इन्दिरा जी को संदेह हुआ कि ये लोग मन-चाहे व्यक्ति को राष्ट्रपति के पद पर आसीन करके मुझे प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए आपस में मेलजोल कर रहे हैं तो उसने उन्हें चुनौतीपूर्ण शब्दों में कहा कि "आपको इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।" और इसके बाद दोनों ओर से जो कुछ हुआ वह तमाशा सबने देखा। तो यह निश्चित है कि जिस किसी से भी हानि पहुँचती हो अथवा पहुँचने की आशंका मनुष्य को हो, उसके प्रति भी उसके मन में घृणा का आवेग उत्पन्न हो जाता है।
३. आलोचना के कारण घृणा की उत्पत्ति
यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से (Publicity) अथवा हमारे कुछेक साँझे मित्रों के कानों में हमारी निन्दा या आलोचना करता रहता है या हमारे प्रति भ्रान्तियाँ फैलाता है तो भी उसके प्रति हमारे मन में घृणा उत्पन्न हो जाती है। फिर काँग्रेस की फूट वाले ड्रामा पर ध्यान देने से आप देखेंगे कि पुराने पंथी काँग्रेसी नेताओं तथा कई साँझे मित्रों के द्वारा श्रीमती इन्दिरा गांधी को यह मालूम हुआ कि पुराने पंथी उनके विरुद्ध हैं और उसे हटाना चाहते हैं। अतः उसके मन में उनके प्रति घृणा और द्वेष पैदा हो गया।
४. दुर्व्यवहार से घृणा की उत्पत्ति
जो मनुष्य किसी से दुर्व्यवहार करता है, उससे स्नेह, सहयोग और सहानुभूति पूर्ण व्यवहार की बजाय अपमानजनक तरीके से या रूखे और अशिष्ट तरीके से व्यवहार करता है, वह भी अपने व्यवहार द्वारा दूसरों के मन में अपने प्रति घृणा पैदा कर देता है। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने श्री मोरारजी देसाई को जिस तरीके से वित्त मन्त्री के पद से हटाया, उससे मोरार जी के मन में श्रीमती इन्दिरा गांधी जी के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। इस बात का उल्लेख श्री मोरारजी भाई ने कई बार अपने भाषणों में किया। फिर जब इन्दिरा जी ने निजलिंगप्पा से भोजन का निमंत्रण स्वीकार करने के बाद अचानक ही भोजन के लिए आने से इन्कार कर दिया, तो निजिलिंगप्पा जी के मन में श्रीमती इन्दिरा जी के प्रति घृणा पैदा हो गई। इसी प्रकार, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार संजीव रेड्डी ने जब अपने प्रति इन्दिरा जी तथा उनके गुट का व्यवहार देखा तो उनके मन में भी उस गुट के प्रति घृणा पैदा हो गई।
५. दुर्गुणों के कारण घृणा की उत्पत्ति
कई बार ऐसा भी होता है कि जब मनुष्य यह देखता है कि अमुक व्यक्ति में सफाई, सच्चाई, शिष्टता इत्यादि ही नहीं है बल्कि वह चालाकी से और स्वार्थभाव से व्यवहार करता है, सदा अपना उल्लू सीधा करना चाहता है अथवा लोभी स्वभाव का और खाऊ-पिऊ है, तब भी उसके प्रति घृणा पैदा हो जाती है। कोई व्यक्ति वाचाल हो, बात में अश्लील शब्दों का प्रयोग करे, उठने-बैठने के सलीके से और सभ्य रीति से अपरिचित हो तो भी लोग उससे घृणा करने लगते हैं।
६. ईर्ष्या के कारण घृणा की उत्पत्ति
ऐसा भी होता है कि जब कोई मनुष्य यह देखता है कि अब दूसरा एक व्यक्ति ऐसा हो गया है जो कि उसके यश का भागी बन गया है अथवा मार्केट में उसका मुकाबला (Competition) करता है, अर्थात् उसके धन, मान, यश, सुविधा, सुख आदि का भागी बन गया है, तब उस व्यक्ति से उसकी ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा की भावना हो जाती है, उससे द्वेष पैदा होता है और उसमें घृणा का समावेश होता है। जिससे मनुष्य की ईर्ष्या हो, उसके गुण भी उसे अवगुण मालूम होते हैं अथवा काँटें की तरह खटकते हैं। एक ही घर में दो-तीन भाइयों में परस्पर अनबन या घृणा का यही कारण हुआ करता है। यही राजनीति में तथा सामाजिक सम्बन्धों में भी बड़ा रूप धारण करके बहुत बड़े पैमाने पर वैर, वैमनस्य और विरोध को जन्म देकर तोड़-फोड़ का कारण बनता है।
इन कारणों की निवृत्ति कैसे हो ?
पिछले पृष्ठों में हमने छः शीर्षकों के अन्तर्गत घृणा की उत्पत्ति के मुख्य कारणों का उल्लेख किया है। एक-एक शीर्षक के अन्तर्गत वास्तव में कई कारण गिनाये गए हैं। अब यह तो स्पष्ट है कि चाहे कोई भी कारण हो हमारे मन में घृणा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए क्योंकि घृणा योग में बाधक है और क्रोध, द्वेष तथा दुःख की उत्पादक है। हम घृणा की उत्पत्ति को यह कहकर उसका औचित्य (Justification) नहीं बता सकते कि अमुक व्यक्ति ने ऐसा किया और उसके परिणाम स्वरूप मेरे मन में उसके प्रति घृणा पैदा होना स्वाभाविक था। हम घृणा का औचित्य इस आधार पर नहीं बता सकते कि "यदि हममें घृणा न हो तो हम दूसरों के गलत कार्यों के विरुद्ध आवाज़ कैसे उठा सकेंगे और घृणा के अभाव में तो हम उनके गलत कार्यों को वर्दाश्त करके झुकते जायेंगे?" घृणा की उपस्थिति तो किसी तरह भी हमारे मन में अनुचित है क्योंकि दूसरे की बुराई को बुराई बताते हुए हम अपनी बुराई का औचित्य नहीं जतला सकते। अतः पीछे घृणा के जो कारण बताये गए हैं, अब नीचे सार रूप में उनका पुनःउल्लेख करके हम उनके निवारण के उपायों के बारे में विचार करेंगे।
(१) घृणा तब पैदा होती है जब कोई व्यक्ति हमारी बात का समर्थन, अनुमोदन या सम्मान नहीं करता और हमारे विचारों एवं प्रयत्नों के लिए हमें प्रशंसा अथवा प्रोत्साहन नहीं देता।
(२) घृणा तब पैदा होती है जब कोई जाने-अनजाने हमारे हितों को हानि पहुँचाता है अथवा हमारी किन्हीं इच्छाओं की पूर्ति में रुकावट बनता है।
(३) घृणा तव पैदा होती है जब कोई हमारी निंदा या कड़ी आलोचना करता है और हमें लोगों की निगाहों में गिराना चाहता है अथवा हमसे अशिष्ट व्यवहार या दुर्व्यवहार करता है।
(४) घृणा तब पैदा होती है जब किसी मनुष्य में हम दुर्गुण, भ्रष्टाचार या असभ्य व्यवहार देखते हैं।
(५) जब हम किसी मनुष्य को अहंकारी, दम्भी, चालाक, स्वार्थी और लोभी देखते हैं तब भी उसके प्रति घृणा पैदा होती है।
अब प्रश्न उठता है कि इन कारणों के होते हुए भी घृणा की निवृत्ति कैसे
हो ? अब हम उपरोक्त एक-एक कारण को लेकर उसके निवारण की युक्ति बतायेंगे।
पहला और दूसरा कारण और उसका निवारण
यदि कोई व्यक्ति आपकी बात को समर्थन अथवा अनुमोदन नहीं देता तो वह अन्य किसी को, जिससे उसका स्नेह है, समर्थन देता होगा। अतः यदि अब आप इस कारण से घृणा करेंगे तब तो आप उसे सदा के लिए वैरी और विरोधी बना लेंगे। इसकी बजाय यदि आप उससे स्नेह करते रहेंगे तो वह एक दिन बदलेगा और आपको भी समर्थन देगा, आपका सहयोगी बनेगा, आप से सहानुभूति करेगा। फिर, यह भी तो हो सकता है कि आपकी बात वजनदार न होती हो अथवा आप दूसरों को उसके गुण बताकर विचारानुकूल न बना सकते हों। यह भी हो सकता है कि आप अपनी बात बताते समय आवेग, असन्तोष, या रूखापन प्रगट करते हों और दूसरे व्यक्ति आपके इस रवैये के कारण ही आपके विचारों का विरोध करते हों। अतः यह तो आपकी अपनी ही कमी है जिसे कि ठीक करना ज़रूरी है। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी हो सकता है कि आपकी बात का समर्थन न करने वाले व्यक्ति को ऐसा आभास होता हो कि आपके विचार को यदि कार्यान्वित किया जाय तो उसके हितों को हानि होगी।
अतः उसे इसके बारे में सन्तुष्ट करना जरूरी है कि उसके उचित हित सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार, निष्कर्ष यह निकला कि दूसरों के समर्थन, अनुमोदन, सहयोग तथा सहानुभूति प्राप्त करने का तरीका उनसे स्नेह करना तथा उनके प्रति सद्भावना रखना ही है न कि घृणा करना। हमने इसी लेख के प्रारम्भ में पुरानी काँग्रेस और नई काँग्रेस के बीच घृणा का उदाहरण दिया था। इन्दिरा जी ने समर्थन अनुमोदन आदि न मिलने के कारण घृणा की तो घृणा के कारण पुरानी काँग्रेस के नेताओं में भी उससे घृणा ही पैदा हुई। उस घृणा के फलस्वरूप देश में वह फूट और झगड़ा उठ खड़ा हुआ था जो कि दुनिया जानती है। श्रीमती इन्दिरा जी ने घृणा की, तब यदि पुरानी काँग्रेस के नेता स्नेह, सम्मान और सहयोग देते रहते तब उनकी यह हालत न होती जो मध्यावधि चुनाव (Mid Terms Election) के बाद उस पार्टी की तथा उसके नेताओं की हुई थी। बल्कि एक दिन ऐसा आता जबकि उन्हें भी समर्थन और सम्मान मिलता और इन्दिरा जी का यह विचार अथवा भ्रम दूर हो जाता कि वे उन्हें पदच्युत करना चाहते थे। परन्तु घृणा के कारण वे अशान्ति की अग्नि से पीड़ित हो रहे थे। पुनश्च, श्रीमती इन्दिरा जी ने तो चुनाव जीत लिये थे परन्तु उसने भी वैर, विरोध, वैमनस्य इत्यादि के आधार पर जो सफ़लता प्राप्त की एक दिन उसका बदला विरोधी दल अथवा जनता ने दिव्य।
इसके अतिरिक्त, आपको चाहिये कि जिससे भी आपको समर्थन और सहयोग की आवश्यकता है, उससे आप ऐसे तरीके से व्यवहार करें कि वह समझे कि आप विनम्र भाव से उससे सहयोग माँग रहे हैं। यदि कोई मनुष्य ऐसा महसूस करता है कि दूसरा मनुष्य उससे सहायता अथवा सहयोग माँग रहा है और उसमें उसके अपने हितों की भी हानि नहीं होगी तो वह सहर्ष सहयोग दे देता है। उसके लिए उसके मन में घृणा उत्पन्न नहीं होती।
तीसरा कारण और उसका निवारण
यदि कोई व्यक्ति हमारी निंदा करता है अथवा दूसरों के सामने आलोचना करता है तो उससे हमें उत्तेजित नहीं होना चाहिए। कहावत भी है कि "यदि कोई व्यक्ति आकाश की ओर बट्टा फेंकता है तो वह लौट कर धरती पर आता है" अतः यदि हममें कोई दोष नहीं है, तो जो हमारी निंदा करेगा, वह मिथ्या सिद्ध होगी और लोग उसके बारे में सोचेंगे कि यह निदा करने वाला व्यक्ति मिथ्यावादी है, गोया वह निंदा उसकी ओर लौटकर आयेगी। यदि हममें कोई दोष है, तो हमें मधुर मुस्कान से स्वयं ही मान लेना चाहिए। उससे हमारी साख भी बनी रहेगी, मन भी अशान्त नहीं होगा और हम घृणा से भी बच जायेंगे।
अभिमानी के प्रति उत्पन्न हुई घृणा का निवारण
जब कोई व्यक्ति सम्पर्क में आने वाले किसी मनुष्य में अभिमान देखता है तो उसके अपने मन में उस मनुष्य के प्रति घृणा की उत्पत्ति के साथ-साथ कुछ इस प्रकार के विचार उठते हैं "इसने अपने आपको क्या समझ रखा है। वाह जी वाह! बड़ा बना फिरता है..... एक दिन इसका दिमाग ठीक हो जायेगा.... हमको इसने क्या समझ रखा है?.....'
परन्तु सोचने की बात है कि जैसे उस मनुष्य में अभिमान रूपी दुर्गुण हमें बुरा लग रहा है वैसे ही हममें यदि घृणा रूपी दुर्गुण होगा तब वह भी तो दूसरों को खटकता रहेगा। पुनश्च, जब हम यह कहते हैं कि "उसने हमें क्या समझ रखा है....." तब इन शब्दों से तो यह सिद्ध होता है कि हममें भी अभिमान है यद्यपि वह अभिमान पहले सुषुप्तावस्था में था और अब उस मनुष्य के अभिमान ने हमारे अभिमान को भी जगा दिया है। तो क्यों न पहले हम अपने मन में से अभिमान को निकाल बाहर करें और दूसरे के दुर्गुण को देखकर स्वयं भी किसी दुर्गुण के वशीभूत होने की बजाय अपने दुर्गुण को निकालें ?
यदि किसी मनुष्य में अभिमान है तो निश्चय ही 'जैसी करनी वैसी भरनी' के नियमानुसार उस अभिमानी का सिर एक दिन नीचा होगा। कहावत भी है कि - 'मैं-मैं..' करने वाली भेड़ अथवा बकरी का सिर एक दिन कसाई की छुरी के नीचे कटता ही है, तभी उसकी "मैं-मैं" बन्द होती है। तब क्या हम भी अभिमान के दोषी बनकर धर्मराज के दूतों द्वारा पीड़ित और प्रताड़ित होने की चेष्टा करते हैं।
एक मनुष्य यदि अभिमान के रस्सों में जकड़ा हुआ है अथवा घमण्ड की दलदल में फँसा हुआ है अथवा अहंकार की अग्नि में उसका मन जल रहा है, बुद्धि तप रही है, खून खौल रहा है और हृदय का पारा गर्म हो रहा है तो क्या उससे सहानुभूति करने की बजाय, उस विकट स्थिति से उस आत्मा को भी निकालने की चेष्टा करने की बजाय हमें भी अभिमान के ज्वर में अथवा ज्वार-भाटे से पीड़ित होने का यत्न करना चाहिए ?
पुनश्च, जब हम यह कहते हैं कि अमुक मनुष्य में अभिमान है तो हमारे इस कथन से स्पष्ट है कि उस आत्मा की ऐसी स्टेज (Stage) होनी चाहिए जिसमें अभिमान की बजाय नम्रता, प्रेम, और शीतलता आदि गुण हों। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह हुआ कि हरेक मनुष्यात्मा की पवित्रता एवं दिव्य-गुण सम्पन्न स्थिति भी हो सकती है और पहले कभी अवश्य ऐसी स्थिति थी भी। ऐसा जानकर और मानकर हमें पहले तो स्वयं ही उस स्थिति में स्थित होना -चाहिए और फिर दूसरे मनुष्य को भी इस दृष्टिकोण से देखना चाहिए कि उसकी पहले कभी उच्च स्थिति थी परन्तु वाद में उसमें गिरावट आई। जब हम ऐसा समझ लेंगे तब हम अभिमान के कारण गिरे हुए मनुष्य को देखकर स्वयं उस गिरावट में आने का यत्न नहीं करेंगे बल्कि स्वयं भी अपने आदिम स्वरूप में स्थित होने का पुरुषार्थ करेंगे।
जब एक बैल दूसरे बैल के सिर की ओर बढ़ता हुआ अपने सींगों द्वारा उसको आहत करने का कुकृत्य करता है तो दूसरा बैल भी वहाँ से हट जाने की बजाय अपने सींगों द्वारा उस पहले बैल पर वार करता है। इसका परिणाम यह होता है कि दोनों की एक दूसरे से ठन जाती है और वे दोनों एक दूसरे पर अपने सींगों का ऐसा प्रहार करते हैं कि मानों उनके मन में यह विचार चल रहा हो- "ठहरो, तुम अपने आपको क्या समझते हो? तुम जानते हो कि तुम्हारा किससे पाला पड़ा है ?...." दूसरा बैल सोच रहा हो "तुम्हारी यह मजाल..." उनको इस प्रकार सींग से सींग टकराते देखकर लोग तमाशा देखते हैं और वे एक दूसरे का सिर फाड़ देते हैं। ऐसा ही हाल उस मनुष्य का होता है जो अभिमानी मनुष्य के आगे से हटने की बजाय स्वयं भी अभिमान रूपी सींगों से उससे उलझ जाता है। परिणाम यह होता है कि लोग उन दोनों का तमाशा देखते हैं और वे एक-दूसरे को हानि पहुँचाते हैं।
इसी प्रकार, यदि किसी मनुष्य में दम्भ, कुटिलता, कटुता, अनाचार आदि दोष हैं, तो हमें उसके इन दुर्गुणों से घृणा करनी चाहिए, हमें उस व्यक्ति से घृणा नहीं करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति दलदल में फँस जाये तो क्या हम उसे बाहर निकालने का यत्न नहीं करेंगे? स्पष्ट है कि हम उसे सहायता देने की बात सोचेंगे। अतः हमें भी किसी में दुर्गुण देखकर उससे घृणा नहीं करनी चाहिए बल्कि उसके प्रति सहानुभूति का व्यवहार करके उसे उनसे निकालने की चेष्टा करनी चाहिए।
गुणों की गहराई
हरेक आध्यात्मवादी मनुष्य यह चाहता है कि उसके जीवन में दिव्य गुणों की धारण हो और दिव्यता का पूर्ण उत्कर्ष हो। परन्तु हम देखते हैं कि इस पुरुषार्थ में बहुत कम ही लोगों को यथेष्ट सफ़लता मिलती है। इसका कारण क्या है? ध्यान देने पर आप देखेंगे कि बहुत वार प्रत्यक्ष रूप में तो ऐसा लगता है कि अमुक मनुष्य किसी दिव्य गुण को धारण किये हुए है परन्तु वास्तव में उसकी धारणा दिव्यता रूपी बुनियाद पर नहीं होती बल्कि किसी लौकिक अथवा मायाजनित संस्कार पर होती है। दूसरे शब्दों में, गुण के साथ-साथ उसे कुछ घुन भी लगा होता है। वह घुन उसके गुण को पनपने नहीं देता बल्कि उसके गुण रूपी वृक्ष पर पराश्रयी वेल (Parasitic Plant) की तरह लिपटा रहता है तथा उसका शोषण करता रहता है। अतः हमें चाहिए कि हम अपने मन को टटोलें कि हमारे दिव्य गुण को कोई घुन तो साथ में नहीं लगा हुआ। जब हमारा वह दिव्य गुण अपने शुद्ध स्वरूप में होगा तभी सही अर्थ में हममें दिव्यता का उत्कर्ष होगा। हम यहाँ कुछेक उदाहरणों द्वारा इस भाव को व्यक्त करेंगे:-
स्पष्टवादिता
लोगों के सम्पर्क में आने से आप जानते ही होंगे कि कुछ लोग कहते हैं हम तो सरल स्वभाव के हैं। जो बात जैसी होती है, हम तो उसे सच्चाई से साफ़-साफ़ कह देते हैं। हम झूठ क्यों बोलें; हमें किसी का डर थोड़े ही है? हम तो अन्दर बाहर से एक हैं। अब निस्सन्देह, सच्चाई और मानसिक सफ़ाई तो दिव्य गुण हैं परन्तु हम देखते हैं कि कहीं-कहीं स्पष्ट वक्तव्य रूपी गुण के मूल में कई बार गम्भीरता का अभाव, धैर्य की कमी, दूसरे को ग़लत सिद्ध कर उसकी मान-हानि करने का विचार, अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करने का अहम् भाव और इस प्रकार के अन्य कई त्याज्य-भाव समाये होते हैं। अतः जहाँ उस व्यक्ति के जीवन में बेधड़क होकर बात करने का गुण पनपता है वहाँ उदण्डता अभद्रता, कटुता, विवाद प्रियता आदि घुन अथवा अवगुण भी पनपते हैं क्योंकि कई पुरुषार्थी इस बात से गाफ़िल होते हैं कि उनकी इस स्पष्टवादिता का आधार दिव्यता पर नहीं है। हमें चाहिए कि हम देखें कि हमारी स्पष्टवादिता में कटुता, उदण्डता या दूसरे को मान-हानि पहुंचाने का भाव तो नहीं है।
सादगी
आपने देखा होगा, कई लोग कहते हैं कि हम औपचारिकता (Formalities) अथवा तकल्लुफ़ में विश्वास नहीं करते। वे मन में सोचते हैं कि हम तो मिलनसार हैं, स्नेही हैं और दिखावे (Show) तथा कृत्रिमता (Artificiality) से दूर हैं। वे किसी के आने पर न ठीक तरह से अभिनन्दन करते हैं न उसके जाने पर शिष्टता का व्यवहार ही करते हैं। इस प्रकार उनके मन में जो दूसरों के प्रति आदर-भाव की कमी है अथवा अपने को बड़ा मानने का जो अहम् भाव है अथवा शिष्टता का जो अभाव है, उसको न समझते हुए वे कहते हैं कि हम तो सबसे घुल-मिल जाते हैं; हममें आत्मीयता तथा बन्धुत्व है। अतः अनौपचारिकता के साथ-साथ उनमें मर्यादा की कमी, शालीनता का अभाव आपेक्षित सत्कार करने के प्रति कर्तव्यविमुखता करने के संस्कार भी घुन की तरह उनकी रूहानियत को खोखला करते चले जाते हैं। अतः हमें सदा अपने ऊपर ध्यान देना चाहिये कि सादगी और आत्मीयता के साथ-साथ दूसरों को आदर सत्कार देने का गुण भी होना चाहिये वरना उस रूखी सादगी और थोथी आत्मीयता से हम कई लोगों को बेगाना बना लेंगे और दिव्यता की बजाय हम रूक्षता तथा गंवारूपन की सीमा में प्रविष्ट हो जायेंगे।
दूसरों का सत्कार और आतिथ्य
ऐसे भी लोग हैं जो दूसरों को आदर देते हैं, उनका सत्कार भी करते हैं और उनसे मधुर वचन भी बोलते हैं परन्तु वास्तव में उनके व्यवहार के मूल में उस व्यक्ति से अपना स्वार्थ निकालने का ही भाव समाया होता है। इसलिए उनका यह दिव्य गुण तो स्थिर हो नहीं पाता, साथ में स्वार्थ और चाटुकारिता के घुन भी उनकी दिव्यता को खाने लगते हैं।
गम्भीरता
और देखिये। एक व्यक्ति आजकल कम बोलता है। हम जब उसे कहते हैं कि "आजकल तो आप प्रायः शान्त रहते हैं तो वह कहता है "हमें मुँह-फट बनना अच्छा नहीं लगता, हम तो अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। जहाँ जितनी आवश्यकता होती है, वहाँ उतना ही बोलते हैं। हम इधर-उधर हरेक जगह बात करना पसन्द नहीं करते। अधिक बोलने का फायदा ही क्या है? गम्भीर रहना ही अच्छा है" वह व्यक्ति सोचता है कि अब वह अन्तर्मुखी बनता जा रहा है और दिव्य गुणों की धारणा के पुरुषार्थ में लगा है। अब, निस्सन्देह, गम्भीरता तो एक बहुत अच्छा गुण है परन्तु किसी-किसी मनुष्य का कम बोलना 'अन्तर्मुखता' और 'गम्भीरता' के कारण नहीं होता बल्कि इसका कारण होता है कि कई लोगों से रूठा हुआ होता है। रुष्टता के कारण उसके मन में घृणा की लहर होती है; इसलिए उस मूड में वह किसी से भी बात नहीं करना चाहता। दूसरे शब्दों में उसका मौन अथवा अल्प वक्तृत्व (Less-talk) गम्भीरता रूपी दिव्यता पर आधारित नहीं होता बल्कि रूठना रूपी संस्कार पर होता है? तो यह बात तो निर्विवाद है कि हम गम्भीरता तथा अल्प वकतृत्व का गुण धारण तो करें परन्तु साथ में यह देख लें कि उसे रुष्टता का घुन तो नहीं लगा।
सन्तुष्टता
इसी प्रकार, कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति या परिस्थिति में कहता है कि "मैं तो सन्तुष्ट हूँ"। जब कोई व्यक्ति उससे पूछता है कि "आप कैसे हैं," तो वह कहता है "मैं ठीक हूँ।" परन्तु गम्भीरता से विचार करने पर मालूम होता है कि उसकी इस सन्तुष्टता की बुनियाद में आलस्य, पराक्रम की कमी अथवा कृत्रिम सन्तुष्टता (False or make believe Contentment) होती हैं। अपने मन में तो वह व्यक्ति जानता है कि जैसा पुरुषार्थ वह कर रहा है, उससे वह सूर्यवंश का स्वराज्य पद प्राप्त नहीं कर सकता तो भी यह सोच कर कि चन्द्रवंश का स्वराज्य पद भी कोई कम तो नहीं है, वह स्वयं को दम-दिलासे से सन्तुष्ट कर लेता है। ऐसी सन्तुष्टता न उसे कल्याण की पराकाष्ठा पर ले जाती है, न ही दूसरों को दिव्यता की ओर प्रेरित करती है। सन्तुष्टता के साथ हमें पराक्रमी, उद्यमी, तीव्र पुरुषार्थी और परोपकारी भी होना चाहिए। यदि हमारी सन्तुष्टता इनसे रहित होगी तो उसे 'पुरुषार्थ हीनता और स्वार्थ' का घुन लग जायेगा और वह सन्तुष्टता उसकी उन्नति में तथा उसके बहुमुखी विकास में बाधा होगी। वह दिव्य गुणों के उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली नहीं होगी।
दूसरों का सुधार करने का संकल्प
कुछ लोग कहते हैं कि "अमुक व्यक्ति की अवस्था अथवा उसकी कृति ठीक नहीं है परन्तु वह समझता अपने को बहुत कुछ है अब हम उसे सीधे रास्ते पर लायेंगे। अथवा हम अमुक महान् व्यक्ति से बात करके इसे ठीक करा देंगे"। अब यद्यपि देखने में तो ऐसा लगता है कि इनकी भावना सुधार करने की ही है। परन्तु कोई-कोई व्यक्ति जो विधि अपनाते हैं, उससे मालूम होता है कि उसके मूल में कुछ और भाव मिश्रित होता है। परिणाम यह होता है कि वे दूसरों को तो ठीक करना चाहते हैं, परन्तु चलते-चलते स्वयं दूसरों की निन्दा के धन्धे में फंस जाते हैं। दूसरों का सुधार करने की कामना करते हुए उन लोगों का अपना सुधार पीछे रह जाता है परन्तु कुछ सज्जन सचमुच दूसरों का सुधार चाहते है क्योंकि उनकी इस भावना के मूल में दूसरों के कल्याण की भावना, दिव्य गुणों की धारणा इन सबका आधार दिव्यता ही है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और विश्व-कल्याण की भावना पर टिका है। इसी लिए वे अनेकानेक मनुष्यात्माओं के लिए आदर्श हैं और प्रेरणा की स्त्रोत हैं। उनके व्यवहार में शुद्ध सरलता, नम्रता, सन्तुष्टता, गम्भीरता इत्यादि का समावेश है। इसलिए अपने जीवन को ऐसा ही बनाना चाहिए।
कर्म करें तो कैसे करें ?
कुछ लोग पूछते हैं कि यह संसार बना क्यों है? मैंने तो यह संसार बनाया नहीं, इसलिए इस प्रश्न का मैं उत्तर भी नहीं दे सकता। परन्तु मैं इतना तो जानता ही हूँ कि यह प्रश्न प्रायः वे ही किया करते हैं जिन्हें संसार में किसी-न-किसी प्रकार का दुःख है अथवा हो चुका है। जो लोग स्वास्थ्य, यौवन, धन-धान्य एवं सम्मान सम्पन्न हैं, उन्हें यह प्रश्न करते प्रायः नहीं सुना गया। वे तो अपने सुख लूटने में ही मस्त हैं। परन्तु उन्हें भी यह मालूम होना चाहिए कि अब जिस प्रकार के कर्म वे कर रहे हैं, अपने लिए वे तदानुसार ही दुनिया बना रहे हैं। जिन लोगों का यह प्रश्न है कि यह दुनिया क्यों बनाई गई और ऐसी क्यों बनाई गई, उनसे भी मेरा निवेदन है कि वे इस बात पर गम्भीरता से विचार करें कि कम-से-कम उनके सम्पर्क तथा सम्बन्ध में आने वाली जो छोटी सी दुनिया है, उतनी तो उन्होंने स्वयं ही अपने कर्मों से बनाई है और आगे के लिए भी वे वर्तमान कर्मों द्वारा अपने सुख या दुःख के भोग के लिए अपनी छोटी-सी दुनिया रच रहे हैं। मेरे इस कथन का भाव यही है कि हम सभी जो अपने-अपने कर्म करते हैं, उससे हम में से हरेक अपने लिए ऐसा कर्मखाता बना लेता है कि जिसे भोगने के लिए वह अपने मित्रों, सम्वन्धियों, शत्रुओं इत्यादि की छोटी-सी दुनिया की नींव रखता है। यह बात ठीक वैसे ही है जैसे कि एक-एक प्लाट पर हरेक माली अपने हाथों से बीज बोकर भविष्य में अपने लिए वृक्ष लगा दे तो कई प्लाट मिलाकर एक बहुत बड़ा उपवन वन जाता है। हरेक मनुष्य द्वारा भी कर्मों के रूप में भविष्य के बीज बोये जाने से यह एक बड़ा उपवन अथवा वन रूप संसार बन जाता है। इस प्रकार अनादि काल से हम मनुष्यात्माएं इस में बोती और फल पाती चली आ रही हैं।
अतः मेरे विचार में प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि यह संसार किसने बनाया है और क्यों बनाया है? यह संसार तो जैसा है, वैसा हम सभी ने तथा हमारे पूर्वजों ने अपने ही कर्मों द्वारा मिल कर बनाया है। प्रश्न यह होना चाहिए कि अब हम पहले किये गये कर्मों के फलस्वरूप होने वाले दुःखों से छूटें कैसे तथा वर्तमान काल में भी कैसे कर्म करें, कि आगे चलकर यह भी हमारे दुःखोत्पादक न हों, जो लोग आज सुख-भोग में लगे हुए हैं और ऐसा प्रश्न नहीं करते, उनसे भी हमारा निवेदन है कि जिसे वे सुख माने बैठे हैं, वह तो दुखान्त सुख है, वह सम्पूर्ण, सार्वकालिक, सार्वदेशिक तथा सर्वांगीण नहीं है। फिर उसमें तन और मन का सुख है भी तो भी उसमें एक बहुत भारी कमी यह है कि उसमें आत्मा का सुख भी नहीं है जिससे आत्मा प्रफुल्लित हो जाय। अतः जिसे वे सुख मान रहे हैं, वह तो अंग-भंग है, क्षण भंगुर है, ऊपरी ऊपरी है और काया तथा काल के अन्तर्गत है। अतः उनको हम कहना चाहते हैं कि अपने कर्मों द्वारा वे भी सम्पूर्ण निरन्तर सात्विक एवं सर्वतोमुखी सुख की दुनिया रच सकते हैं तथा दुःख का मूलोच्छेदन कर सकते हैं।
नीति और रीति
उसके लिए शिव बावा ने हमें कर्म करने की जो नीति और रीति बताई है, उसे यदि जानकर हम आचरण में लायें तो हमारे कर्म हमारे लिए इस जन्म में सन्तुष्टि और खुशी का साधन बन सकते हैं और हमारे इस जन्म के सार्थक एवं सफल होने का कारण बन सकते हैं। यदि हम इस नीति और रीति को अथवा प्रणाली तजकर तुक्के से कार्य करेंगे तो परिणाम भी 'तुक्के शाह' अथवा 'भुल्लकड़' वाला हो जायेगा जिस से कि हम गलती पर गलती करते चले जायेंगे।
अतः हम इन लोगों के लिए जो कि काले कर्मों के कीचड़ से निकलना चाहते हैं तथा अब पिछले कर्मों की धूल और शूल से छूटना चाहते हैं, कुछ थोड़ी-सी कर्म-रेखा उनके आगे प्रशस्त करते हैं।
१. श्रीमत के अनुसार कर्म
संसार में कई प्रकार के मत हैं। एक तो मनुष्य का अपना ही मत है। मनुष्य का
मन जैसा कहता है, वैसा ही वह करता है। ऐसे मनुष्य को 'मन-मत' कहा जाता है। मनुष्य का अपना मन कभी ठीक भी कहता है, कभी गलत भी। मनुष्य अपूर्ण है; अतः उसका मन सर्व प्रकार की त्रुटियों से रहित मत तो उसे दे नहीं सकता। मनुष्य तो अल्पज्ञ है, वह एक संस्कृति विशेष, देश विशेष, परिस्थिति विशेष, जाति विशेष, वातावरण विशेष तथा कुटुम्ब विशेष की उपज है। अतः उसके विचार इन संकीर्णताओं से थोड़े-बहुत अवश्य ही रंगे हुए होते हैं। वे इन हदों में बंधे हुए होते हैं। वे पूर्णतः पक्षपात-रहित तथा सर्व स्वार्थ रहित नहीं होते। हरेक मनुष्य के अपने भी कुछ संस्कार होते हैं, उसकी अपनी भी कमियाँ कमजोरियाँ, विकार और विकृतियाँ तथा हालात और परिस्थितियाँ होती हैं। अतः मन-मत मनुष्य को एक ऐसे मार्ग पर चलाने में असमर्थ है जो मार्ग उसे सदाकाल के लिए दुःख से निकाल दे, तनाव, अशान्ति तथा आधि-व्याधि से छुड़ा दे।
मन-मत के अतिरिक्त दोस्तों, सम्बन्धियों, पड़ोसियों इत्यादि से भी मनुष्य सलाह किया करता है। उसके मत को 'पर मत' कहते हैं। दूसरे लोग मनुष्य की परिस्थितियों का पूरा माप-तोल तो कर नहीं सकते न ही उस मनुष्य की योग्यताओं को पूरी तरह जानते हैं। फिर उन के अपने भी स्वार्थ संस्कार, हिसाब-किताब, मानसिक अवस्था इत्यादि होते हैं। अतः पर-मत भी मनुष्य को दुःख सागर से निकाल कर सर्व कालीन सुख के तट पर पहुंचाने में समर्थ नहीं होता। आखिर मन-मत और पर-मत दोनों मनुष्य मत ही तो हैं और उक्ति प्रसिद्ध है कि मनुष्य गलतियों का पुतला है।
शास्त्र मत और गुरु मत में भी वे न्यूनताएँ पाई जाती हैं जो कि मनुष्य मत में होती हैं या कहा तो यही जाता है कि अमुक अमुक ग्रंथों में लिखा हुआ ज्ञान परमात्मा द्वारा दिया हुआ है परन्तु यदि सच्चाई की दृष्टि से देखा जाय तो वह भी प्रायः मनुष्यों द्वारा ही दिया हुआ है। यद्यपि वे मनुष्य आजकल के तमोप्रधान मनुष्यों की अपेक्षा बहुत अच्छे थे। मनुष्यकृत होने के कारण ही शास्त्रकर्ताओं के नाम उन-उन ग्रंथों के साथ सम्बद्ध हैं। उदाहरण के तौर पर मनुस्मृति के साथ 'मनु' का नाम, रामायण के साथ 'वाल्मीकि' का नाम, दर्शनों के साथ उनके कर्ता अथवा संकलनकर्ता का नाम, वेदों के साथ भी अग्नि-आदित्य इत्यादि के नाम लिये जाते हैं। अच्छा यदि मान भी लिया जाय कि कोई शास्त्र, अगम या निगम परमात्मा द्वारा हुआ परम पवित्र ज्ञान है, तो भी उसे लिखा तो किसी न किसी मनुष्य ही ने है? अतः वह उसे जितना और जैसा समझ पाया है, उतना तथा वैसा ही तो उसने लिखा है? गोया उसको भी उनके विचार, संस्कार, दृष्टिकोण (Subjectivity) इत्यादि की पुट तो लगी ही हुई है? इस पर भी यदि कहा जाय कि ऐसा भी नहीं है, बल्कि फलां शास्त्र में तो साक्षात् परमात्मा ही के शब्द, वाक्यांश, वाक्य, कॉमा, (अर्धविराम), फुल स्टाप (विराम) है तो प्रश्न उठेगा कि उसका अर्थ समझने वालों ने तो यथा योग्य, यथा संस्कार, यथा भावना ही अर्थ लिया है; तभी तो आज संसार में एक ही शास्त्र के अनेक भाज्य, टीकाएँ, वृत्तियाँ (Gloss), व्याख्याएँ इत्यादि उपलब्ध हैं और उन-उन पर आधारित अनेकानेक मत-मतान्तर हैं। तब भी अन्ततोगत्वा वे हैं तो मनुष्य मत ही ? अभी-अभी, हमारे ही जीवन काल में स्वयं परमात्मा ने आकर तो वह ज्ञान हमें नहीं दिया है? परमात्मा ने तो क्या, ज्ञान शिरोमणि ब्रह्मा अथवा सरस्वती ने या 'आदम (Adam) और हव्वा (Eve)' ने भी तो नहीं दिया है। तब हम किसको सत्य मानें और आजकल की परिस्थितियों में उनके अनुसार कैसे चलें, यह हमें कौन बतायेगा? हम कैसे कर्म करें, इस प्रश्न के उत्तर में क्या उत्तर है?
ऊपर हमने अनेक प्रकार के मतों की इसलिए व्याख्या की है कि पहले तो हम यह बात भली भाँति समझ लें कि उनसे हमारा पूर्ण कल्याण होने वाला नहीं है।
स्वयं गीता को लीजिए। आद्य शंकराचार्य जी तो उसे 'निवृत्तिपूरक शास्त्र'मानते हैं अर्थात् ज्ञान प्राप्त करके 'कर्म को त्यागने की प्रेरणा देने वाला शास्त्र मानते हैं, जबकि लोकमान्य तिलक उसे कर्म योग शास्त्र मानते हैं। फिर, शंकराचार्य ने गीता की जो व्याख्या की है, उससे वल्लाभाचार्य, माधवाचार्य, निम्बकाचार्य इत्यादि की व्याख्या अलग है। तब यदि आप गीता को 'भगवान'के वाक्य भी मान लें तो भी उसका कौन-सा अर्थ या दृष्टिकोण आप अपनायेंगे? आप जो भी अर्थ, दृष्टिकोण मानेंगे उसको वैसा ही मानने के लिए आपके पास सर्व-मान्य माप दण्ड कौनसे हैं?
अतः इन सभी कारणों से हम कहते हैं कि हम जन्म-जन्मान्तर मनुष्य मत पर ही चलते आये हैं। यदि ये शास्त्र या इनकी व्याख्याएँ सब ईश्वरीय मत के अनुसार होती तो अब तक हमारा कल्याण हो गया होता और आज संसार की स्थिति भी
स्वर्गमय अथवा सुख-शान्तिमय होती। परन्तु हम तो देखते हैं कि रोग, शोक इत्यादि संसार में वैसे ही चले आ रहे हैं, बल्कि अधिक ही हुए हैं। इसलिए अब हमें निश्चयात्मक बुद्धि से इन सभी के बजाय एक परमात्मा ही का सहारा लेने की जरूरत है। परमात्मा ही ज्ञान के सागर हैं, शान्ति के सागर हैं, आनन्द के सागर हैं, प्रेम के सागर हैं और पतित पावन तथा दुःख-हर्ता और सुखकर्ता हैं। अतः केवल उन द्वारा दिया हुआ ज्ञान ही मनुष्य को 'पतित से पावन', मनुष्य से देवता अथवा 'नर से नारायण' बनाने वाला और सुख-शान्ति सम्पन्न बनाने वाला है। हमें उस एक ही की मत पर चलना चाहिए। उसकी मत को ही 'श्रीमत' कहा जाता है।
तो हमें चाहिये कि हम 'श्री-मत' ही के अनुसार अपने कर्म करें। परमात्मा ही हम में से हरेक के अनेक जन्मों की जन्म-पत्री अर्थात् कर्म खाता जानते हैं। वे ही योग्यताओं तथा कमियों से परिचित हैं। उन द्वारा दिखाया हुआ मार्ग ही हमारे लिये श्रेयस्कर है। अतः मेरी यह मान्यता है कि उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा जो ज्ञान-मुरलियाँ हमें सुनाई हैं, उनका हम प्रतिदिन अध्ययन करें। उनके आदेश-निर्देश द्वारा खोले गये ज्ञान एवं योग केन्द्रों पर हम प्रतिदिन जायें और 'मुरलियों' की धारणा करें। उनकी ज्ञान मुरलियों में हमारी सभी समस्याओं का हल है, हमारे लिये पूरी कर्म संहिता दी गई है; उसमें साक्षात् उन्हीं के महावाक्य हैं जो कि हमें कर्तव्य का बोध कराते हैं। स्वयं प्रजापिता ब्रह्मा ने भी उन्हीं में लिखे महावाक्यों के अनुसार हो अपना जीवन महान् बनाया। उन्हीं को कर्मों के लिये आदर्श मानकर हम भी कर्म करें। कर्म करें तो वैसे करें। इससे न तो कर्म में ग़लती रहेगी, न चिन्ता होगी, न ही तनाव।
व्यवहार की श्रेष्ठता
ईश्वरीय ज्ञान का कोर्स कर लेने के बाद और योग की विधि सीख लेने के पश्चात् तथा दिव्य गुणों के महत्व को भी समझ लेने के बाद व्यवहार की श्रेष्ठता आने में बहुत लोगों को समय लग जाता है। दूसरों के सम्पर्क में आने पर अथवा विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में से गुजरने पर मनुष्य कर्म, अकर्म, की गति को जानते हुए भी व्यवहारिक श्रेष्ठता की कसौटी पर ठीक नहीं उतरता। व्यवहार के परिवर्तन की प्रक्रिया एक अलग ही पहलू है जिसमें वहुत-से लोग कमज़ोर पाये जाते हैं। अभद्रता, अशिष्टता, असन्तुलन, असहयोग, अनबन, खिन्नता, चिड़चिड़ापन, असामन्जस्य (Lack of adjustment) असहिष्णुता आदि-आदि उनके व्यवहार में झलकते रहते हैं जो पर-पीड़ा का और अपनी अशान्ति का नितांत कारण बने रहते हैं।
प्रश्न उठता है कि व्यवहार की इन सब त्रुटियों का कारण क्या है? श्रेष्ठ बनने की कामना करने वाला व्यक्ति भी निकृष्ट व्यवहार क्यों कर बैठता है? एक बार अभद्र व्यवहार करने के पश्चात् मन में पश्चाताप होने पर भी मनुष्य उस अभद्रता की गुलामी से क्यों नहीं छूट पाता ? आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद योगी-कुल-उचित, राजकुल-उचित या देवकुल-उचित व्यवहार करना चाहते हुए भी उसका व्यवहार इनमें से किसी भी मर्यादा के अनुसार न होकर जो व्यथा देने और लेने वाला हो जाता है, उसकी वजह क्या है?
इस संसार में प्रायः व्यवहार के लिए मनुष्य की तीन श्रेणियां बनाई जाती हैं -
१. पहली श्रेणी अपने से बड़ों के साथ व्यवहार से सम्बन्धित है।
२. दूसरी समतल, सम आयु अथवा सम-स्तर के लोगों से व्यवहार की श्रेणी है और
३. तीसरी अपने से छोटों की श्रेणी है।
वास्तव में एक-दो और श्रेणियाँ जिनका प्रायः वर्णन नहीं किया जाता, भी ज़रूरी हैं। उनमें से एक वर्ग अथवा संस्था का दूसरे के साथ जो व्यवहार होना चाहिए, उससे सम्बन्धित श्रेणी है और एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए, उससे सम्बन्धित श्रेणी है। इन सब से भी ऊपर जो सारे जगत् के परमपिता परमात्मा हैं, उनके साथ मनुष्य का क्या सम्बन्ध और व्यवहार होना चाहिए, वह प्रश्न अलग है। वास्तव में मनुष्य का परमात्मा से जो सम्बन्ध है, जब वह टूट या बिगड़ जाता है और परमात्मा के प्रति आज्ञा पालन और समर्पण भाव न होने से जब मनुष्य के व्यवहार में त्रुटी आती है, तभी उनके अन्य सभी व्यवहार भी उत्तम की बजाए मध्यम अथवा कनिष्ठ हो जाते हैं।
यदि हम मनुष्य के समस्त व्यवहारों का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि स्वार्थ और अहम् भाव ही सभी संघर्षों का मूल है। आज यदि दो राष्ट्र एक-दूसरे का विरोध करते हैं और एक दूसरे से बचाव के लिए युद्ध की तैयारी करते हैं तो अवश्य ही उनके परस्पर विरोध के मूल में दोनों के स्वार्थों का टकराव है। आज यदि दो संस्थाएं भी एक-दूसरे का खंडन करती हैं अथवा दो धार्मिक सम्प्रदाय या राजनीतिक दल एक-दूसरे के प्रति वैर, घृणा, द्वेष आदि से रंगा हुआ व्यवहार करते हैं तो उनके इस निकृष्ट व्यवहार के मूल में भी अहम् भाव और स्वार्थपरता का अस्तित्व ही है। "मैं ठीक हूँ, दूसरा ग़लत है, उसे अपने को ठीक करना चाहिए" - इस प्रकार का दृष्टिकोण तथा "हमारी मांगे पूरी करो" अथवा "हमारी यह आवश्यकता पूरी होनी चाहिए, हमने दूसरों का कोई ठेका थोड़े ही लिया है; वे जाने उनकी वला से" इस प्रकार की कट्टर स्वार्थपरता संसार में मानव-मानव के बीच दुःख को पैदा करने वाली एक नकारात्मक (Negative) प्रवृत्ति है। व्यापार में इसी के कारण से शोषण है। दो देशों के बीच इसी से दंगे और फ़साद होते हैं। राजनीतिक दल इसी के वशीभूत होकर आपस में खींचातानी करते हैं और इसी से ही पारिवारिक जीवन में तोड़-फोड़ होती है और बढ़ते-बढ़ते एक दिन ऐसा उत्पात होता है कि बसी हुई आबादियाँ एक दिन शमशान बन जाती हैं। एकता को भंग करने वाली, असहयोग की भावना को जन्म देने वाली, कटु आलोचना के लिए उकसाने वाली, ईर्ष्या और द्वेष की आग को भड़काने वाली, प्रेम को निर्बीज करके उसके स्थान पर घृणा फैलाने वाली ये दो प्रवृत्तियाँ स्वार्थ और अहम् भाव ऐसी हैं जिन्होंने स्वर्ग को नर्क और महकते बगीचों को जलते हुए जंगलों में परिवर्तित किया है। इन्हीं से ही संसार में लूटमार का बाज़ार गर्म है। आज इन्हीं से ही अलगाव का नारा बुलंद है। हर आए दिन जो हम मारकाट का समाचार पढ़ते हैं, उस रक्त-भरी दास्तान की कथावस्तु का केन्द्र बिन्दु यही दो प्रवृत्तियाँ हैं। आज संसार के लिए यही राहु और केतु हैं जिन्होंने ही इन्सान को इन्सानियत से गिराया है और करुणा, दया, क्षमा, सहयोग, सहिष्णुता, भ्रातृत्व, त्याग आदि मूल्यवान मानवीय गुणों को धूली-धूसरित कर दिया है।
कई बार मनुष्य का स्वार्थ अथवा अहम् भाव बाहर से बहुत ही चमत्कृत, अलौकिक अथवा सुन्दर रूप ले लेता है। दूसरे शब्दों में स्वार्थ अथवा अहम् भाव रूपी काले भूत मन को मोहित करने वाली अप्सरा अथवा देव का रूप ले लेते हैं।
मनुष्य समझता है कि अमुक कार्य करने से मैं संसार की सेवा कर सकूँगा परन्तु उसके पीछे भावना अपने मान और शान के बढ़ावे की होती है अथवा दूसरों से होड़ (Competition) करके उनको मात (Defeat) करने की होती है और इस दुर्भावना से मनुष्य दिव्य धारणाओं और मर्यादाओं को तोड़ने के लिए उद्यत हो जाता है क्योंकि यह तथाकथित (So called) सेवा उसके अहम् भाव व स्वार्थ की भूख के लिए निवाले का काम करती है। नाम कितना सुन्दर है 'सेवा!' परन्तु उसके पीछे भाव सेवा का नहीं अर्थात् त्याग, उत्सर्ग, परोपकार, अनुकम्पा, कृपालुता का नहीं बल्कि अपने को किसी क्षेत्र में प्रतिष्ठा की चोटी पर पहुँचाने का होता है चाहे उसके लिए दूसरों के अधिकारों को अपने पांव तले रौंदते हुए चलना पड़े, न्याय की बजाए अन्याय की नीति अपनानी पड़े और त्याग की बजाए हड़पने की अवधारणा अपनानी पड़े।
जीवन काल में शुभलक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ मानव चलते-चलते त्याग और परोपकार के पथ से हटकर, अधिकारों, आकांक्षाओं, उपाधियों एवं लौकिक उपलब्धियों को बटोरने में लग जाता है और इस प्रकार सात्विकता, साधना, सादगी, सद्भावना एवं सद्व्यवहार से विपरीत दिशा ले लेता है। उसका परिणाम स्वतः स्पष्ट है।
थोड़ा बड़ा होने पर, कुछ उपलब्धि हो जाने पर अथवा कुछ अधिकार प्राप्त कर लेने पर मनुष्य इतना उन्मत और मद मस्त हो जाता है कि वह बड़ों को पूछना, उनका सम्मान करना अथवा उनसे आदर युक्त व्यवहार करना भूल जाता है। ऐसा करने से वह स्वयं को ही बड़ों के आशीर्वाद से वंचित करता है उसे यह सुधि भी नहीं रहती जो उसके समतल हैं, उन्हें देखकर प्रसन्न होने की बजाए, उन्हें शुभकामनाएं देने की अपेक्षा वह उन्हें परास्त अथवा पोछे करने का यत्न करने लगता है उसे यह ख्याल ही नहीं रहता कि ऐसे व्यवहार से वह स्वयं ही सबके मन से पीछे हट रहा है। वह अपने से छोटों के साथ दवाव, अनादर, आतंक, शुष्क अथवा अभद्र व्यवहार कर लेता है और उसे यह मालूम ही नहीं होता कि वह अपने मित्रों को शत्रु, अपने प्रशंसकों को आलोचक, सहयोगियों को विरोधी और साथियों को सामना करने वाली उलट नीति को अपना रहा है। दैवी नीति की बजाए वह इस कलियुगी तमोगुणी नीति को अपनाता है कि छोटों को रोब से दबाकर, बड़ों को मार्ग से हटाकर और समतल वालों को पटाकर चलना ही आगे बढ़ना है।
मनुष्य स्वयं तो दूसरों से ऐसा व्यवहार कर लेता है परन्तु जब दूसरे उससे ऐसा व्यवहार करते, तब उसे यह खलता है। दूसरों के ऐसा व्यवहार करने पर वह उनसे रुष्ट अथवा खिन्न हो जाता है और जगह-जगह कहता फिरता है कि फलाँ मनुष्य कैसे निकृष्ट स्वभाव का है कि वह हमसे अभद्र व्यवहार करता है गोया वह स्वयं तो खोटा सिक्का नहीं लेना चाहता, दूसरों को जाली नोट देकर ठगने के लिए झट से तैयार हो जाता है।
अतः व्यवहार को श्रेष्ठ बनाने के लिए मनुष्य को एक तो यह सोचना चाहिए कि यदि मुझसे कोई ऐसा व्यवहार करे तो मुझे वह कैसा लगेगा? दूसरे, उसे यह याद रखना चाहिए कि जैसा व्यवहार मैं करूँगा मुझे वैसा करते देखकर और लोग भी यदि वैसा करने लगेंगे, तो परिवार का, संस्था का, समाज का, राष्ट्र का अथवा विश्व का क्या हाल होगा संसार में खलबली, दुर्व्यवस्था, अनाचार और कशमकश बढ़ेगी, तनाव को बढ़ावा मिलेगा या उससे शान्ति, प्रेम, मित्रता और सद्भावना का वातावरण बनेगा? इन दोनों बातों को सामने रखने से मनुष्य का व्यवहार दिनोंदिन श्रेष्ठ बन सकता है।
इस पर भी यदि यह याद रखा जाए कि योगी कुलभूषण के क्या लक्षण होने चाहिए, होवनहार देवता की क्या नीति होनी चाहिए अथवा भविष्य में स्वराज्यपद पाने वाले को किस मर्यादा का पालन करना चाहिए या स्वयं को ईश्वरीय सन्तान निश्चय करने वाले व्यक्तियों में किन ईश्वरीय गुणों की झलक मिलनी चाहिए तो मनुष्य श्रेष्ठ व्यवहार के मार्ग पर सतत आगे बढ़ता जायेगा।
याद रहे कि जो दूसरों को क्षमा नहीं करेगा धर्मराज उसे भी क्षमा नहीं करेगा; जो परोपकार नहीं करेगा उसका अपना भी उपकार अथवा उद्धार नहीं होगा। जो उदारचित्त बनकर दूसरों को खुश नहीं करेगा, उसका अपना चित्त भी खुशी के खज़ाने से वंचित रहेगा। जो दूसरों को आतंकित अथवा अपमानित करेगा, उसका भले ही कोई कुछ समय भयवश मान करे परन्तु न उसकी अपनी अन्तरात्मा उसे सम्मान योग्य मानेगी और न उसे लोग सच्चे मन से सम्मान योग्य समझेंगे। जो दूसरों को उन्नति का अवसर देगा, उसकी अपनी भी उन्नति होगी; जो दूसरों को बढ़ते हुए देख खुश होगा, उसकी खुशी की बेल सदा हरी-भरी रहेगी और वृद्धि को प्राप्त होगी। अतः यह जो उक्ति है कि "युक्ति से मुक्ति मिलती है" यह इसी पर चरितार्थ होती है। छोटों को स्नेह देने, बड़ों को सम्मान और समतल वालों को साथ देना तथा सभी को सद्भावना यही युक्ति है जिससे मुक्ति मिलती है, यही नीति है जिससे प्रीति बढ़ती है, श्रेष्ठ व्यवहार की यही नींव है ।
ज़बान के धनी और ज़बान के कंजूस
एक कहावत है कि तलवार के घाव तो जल्दी भर जाते हैं पर जबान के घाव भरने में ज्यादा देर लगती है। परन्तु हम देखते हैं कि हरेक देश की दण्ड संहिता (Penal Code) में तलवार से आघात पहुँचाने वाले ए व्यक्ति के लिए तो दण्ड निर्धारित है किन्तु जबान से घाव करने वाले व्यक्ति के बारे में वैसा कोई कड़ा दण्ड नहीं है। लोहे की तलवार से तन को आहत करने वाले व्यक्ति को तो कत्ल का अपराधी माना जाता है, परन्तु जवान की तलवार से मन को आहत करने वाले व्यक्ति का कर्म वैसा बड़ा दण्डनीय अपराध (Cognisable offence) नहीं माना जाता। यों सभाओं में और समाज में भाषण या वार्तालाप में शिष्टता का व्यवहार करने के लिए भी मर्यादायें प्रचलित हैं और सरकार के विरुद्ध भड़काने एवं उकसाने के बारे में भी विधि-विधान (Legal and constitutional provisions) हैं, परन्तु व्यक्तिगत व्यव-हार में तथा घरेलू एवं पारिवारिक वार्तालाप में यदिकोई किसी को अपने शब्द रूपी वाण से जख्मी करता है तो उसके अपराध के लिए कोई कड़ा दण्ड-विधान नहीं है।
ऐसा दण्ड निर्धारित न होने के कई कारण हो सकते हैं। शायद इस अपराध को दण्ड संहिता में इसलिए सम्मिलित नहीं किय्या गया होगा कि इस प्रकार के रगड़े-झगड़े इतनी संख्या में होते हैं कि यदि सरकार अथवा पुलिस इन्हें भी दण्डनीय अपराध मान लें तो न्यायालय में ऐसे अपराधों की अनन्त लड़ी लग जाएगी। यह भी कारण हो सकता है कि ऐसे अपराधों को अदालत के कटघरे में कानूनी तौर पर सिद्ध (Establish) करना कठिन होता है क्योंकि मन के घाव प्रगट नहीं होते और उसके लिये गवाह या दस्तावेज (Documents) आदि भी नहीं होते। यह भी हो सकता है कि मन के घाव लगने में स्वयं आहत व्यक्ति भी दोषी हो जो किसी बात को यों ही अपनी आदत के कारण महसूस कर गया हो। और, यह भी हो सकता है कि यह अपराध इतना आम हो कि इससे कोई भी छूटा न रह सकता हो। खैर इसके अपराध घोषित न होने का कारण चाहे कुछ भी रहा हो, इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि जबान से किसी के मन को आहत और पीड़ित करना भी एक बहुत बुरा कर्म है।
कटु शब्द एक कुचक्र का उत्पादक
ध्यान से देखा जाए तो एक दृष्टि से जवान के घाव ज्यादा खतरनाक होते हैं केवल इसलिए नहीं कि कटु शब्द से पीड़ित होकर कई व्यक्ति अपनी हत्या तक कर डालते हैं या कई परिवारों का संगठन टूट जाता है या परस्पर दुश्मनी के बढ़ने से कलह क्लेश को बढ़ावा मिलता है, बल्कि इसलिए भी कि यदि तलवार द्वारा कोई व्यक्ति जख्मी हो जाता है तो उसका जख्म उस तक ही सीमित रहता है परन्तु जब शब्द प्रहार से कोई व्यक्ति आहत होता है तो वह उत्तेजना, अपमान या अशिष्टता का अनुभव करने के परिणामस्वरूप सम्पर्क में आने वाले दूसरे व्यक्तियों को भी दुःखी करता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी गृहिणी को कोई कटु वचन बोलता है तो वह उद्विग्न होकर बच्चों या पति से खिन्न होकर बोलती है और पति बस में कन्डक्टर या यात्रियों से अथवा दफ़्तर में अपने सहकारियों से लड़ पड़ता है अथवा बच्चों पर अपना गुस्सा निकालता है और बच्चों की अपने पड़ोस के बच्चों से झड़प हो जाती है और इस प्रकार समाज में यत्र-तत्र-सर्वत्र तनाव तथा पर-पीड़ा का कुचक्र अथवा भँवर-सा चल पड़ता है। कटु अथवा अभद्रतापूर्ण वचनों से चेहरे की कान्ति सूख जाती है, मुख पर से मुस्कान मिट जाती है, मन से उत्साह नष्ट हो जाता है इसलिए कटु शब्द एक कुचक्र का उत्पादक बन जाता है।
युक्ति से मुक्ति मिलती है
बाबा अपनी बातचीत के दौरान कई बार कहा करते "बच्चे, युक्ति से मुक्ति मिलती है।" बाबा की 'मुरलियों' में भी हम यह वाक्य पढ़ते हैं।
परन्तु साथ-साथ बाबा कई बार यह भी कहते हैं कि "ज्ञान के बिना गति (या सद्गति) नहीं होती" और कि "योग द्वारा ही सहज मुक्ति मिलती है; आत्मा कर्मातीत अवस्था को प्राप्त होकर मुक्तिधाम को जाती है।" अतः प्रश्न उठता है कि - "युक्ति द्वारा मुक्ति कैसे मिलती है? और, यदि ज्ञान तथा योग द्वारा भी आत्मा कर्मातीत होकर मुक्ति को प्राप्त होती है, तब क्या युक्ति, ज्ञान और योग तीनों एक ही भाव को व्यक्त करते हैं? क्या यह तीनों पर्यायवाची शब्द हैं?”
युक्ति से संगत एक वृत्तान्त, एक उदाहरण
इस प्रश्न के पहले भाग के बारे में मुझे एक वृत्तान्त की याद आती है। एक बार एक पागलखाने में एक पागल किसी तरह अपने कमरे से बाहर निकल गया और तीसरी मंजिल के कमरों के बाहर निकल छत का जो हिस्सा थोड़ा बाहर निकला था, उस 'प्रोजेक्शन' (Projection: छज्जे) पर जा खड़ा हुआ। अचानक अस्पताल के वार्डन (Warden: रक्षक) ने जब देखा कि वह पागल अपने कमरे में नहीं है तो उसे ढूंढते-ढूंढते उसका ध्यान तीसरी मंजिल के बाहर की प्रोजेक्शन पर गया। उसने सोचा कि अगर यह रोगी वहाँ से छलांग लगा देगा या पागलपन में इस
पर बेपरवाही से घूमेगा तो यह मर जायेगा। इसलिये कुछ अधिक सोचे बिना वह भागा और स्वयं भी वहां प्रोजेक्शन पर जा पहुँचा।
वहाँ पहुँच कर उसने पागल से कहा "सुनाओ भाई क्या हालचाल है? यहाँ क्या कर रहे हो?"
पागल बड़ी मस्ती से बोला "सोच रहा था कि जैसे पक्षी पंख फैला कर उड़ते हुए नीचे उतरता है, मैं भी आज पक्षी की तरह फर्श पर उतरूं।" ऐसा कहते हुए पागल ने मुंह को भी नीचे की ओर झुकाया और अपनी दोनों भुजाओं तथा हथेलियों को पीठ से पीछे ले जाकर पंख की तरह रूप दिया।
वार्डन डर गया और चौंका। उसने पागल को एक हाथ से तो थपथपाया और दूसरे हाथ से उसके हाथ को पकड़ लिया ताकि वह कहीं नीचे छलांग न लगा दे।
परन्तु उसने देखा कि पागल में बल बहुत है और वह उसे पकड़ कर रोक नहीं सकेगा। उसे यह भी डर था कि अगर वह पागल को जबरदस्ती रोकेगा तो पागल कहीं उसे ही नीचे धक्का न दे दे। परन्तु मिनटों में ही कुछ हो जाने वाला था, इसलिये जल्दी ही कुछ करना था।
अचानक वार्डन को एक 'युक्ति' सूझी। उसने मुस्कराते हुए और दोस्ताना तरीके से पागल को कहा "वाह भाई वाह! आप जो करना चाहते हो वह कोई बड़ी बात तो है नहीं। आप तो कोई बड़ा काम करके दिखाओ। और, मुझे विश्वास है कि आप विशेष काम कर सकते हैं।”
पागल ने कहा "अच्छा, सुनाओ दोस्त, अगर यह बड़ा काम नहीं है तो और क्या चाहते हो?"
वार्डन ने कहा "नीचे चलकर, फर्श से अर्श की ओर एक पक्षी की तरह उड़ कर दिखाओ। पंख तो आपको लगे हुए ही हैं। चलो, आओ, हम दोनों एक-साथ नीचे से ऊपर की ओर उड़ेंगे।" यह कहते हुए पागल की अंगुली प्यार से पकड़ते उसे कमरे के रास्ते से नीचे ले चला। इस प्रकार उसने पागल की भी जान बचाई और अपना कत्र्तव्य भी ठीक निभाया। अगर वह पागल से जोर-जबरदस्ती या हाथापाई करता तो दोनों ही धड़ाम से धराशायी होते। तो सच है कि युक्ति से ही दोनों की (मौत के मुंह से) मुक्ति हुई।
एक अन्य वृत्तान्त; अन्य उदाहरण
कुछ इसी प्रकार की युक्ति की बात एक-दूसरे संदर्भ में हम आद्य शंकराचार्य की जीवन कहानी में पढ़ते हैं। शंकराचार्य घर-बार छोड़कर धर्म का प्रचार करना चाहते थे। परन्तु उनकी मां उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती थीं। शंकराचार्य ने आखिर युक्ति सोची।
वह एक बार अपनी मां के साथ नदी पर गये। कपड़े किनारे पर रखकर शंकराचार्य ने मां को किनारे पर बैठने को कहा। अचानक ही नहाते नहाते शंकराचार्य जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
"माँ..माँ...माँ... ओ मैं मरा। मगरमच्छ ने मेरा पांव पकड़ लिया! रे कोई बचाओ ....ब..।"
मां घबरा गयी और हाय-हल्ला करने लगी। शंकराचार्य ने कहा "मां, एक भगवान ही बचा सकते हैं वरना आज मैं मरा, हाय मरा, अरे मगरमच्छ, मां मैं मरा कह दो मैंने अपना बच्चा भगवान को दिया। जल्दी कह दो मां, एक सर्वशक्तिवान भगवान ही गज को ग्रह से बचाने की भाँति मुझे बचा सकते हैं...... हाय .... मरा, जल्दी करो माँ.....।"
जल्दी के कारण मां से कुछ सोचा नहीं गया। उसे तो बच्चे का जीवन प्यारा था। उसने तुरन्त कह दिया "मैंने यह बच्चा भगवान को दिया।" फिर वह कहने लगी "बचाओ भगवान बचाओ! अब यह आप ही की शरण में है; यह आप ही का बच्चा है, इसे मैंने आपकी शरण में सौंपा है।"
इस तरह शंकराचार्य तट पर आ पहुंचे और बोले "मां, तूने अच्छा किया, मुझे भगवान के हवाले कर दिया, वर्ना तो आज बचने की कोई आशा नहीं थी। तूने बचा लिया मुझे माँ ...।"
माँ बोली "मैंने नहीं, भगवान ने तुझे बचाया है शंकर; इस बात को कभी मत भूलना।"
शंकराचार्य बोले "ठीक कहती हो माँ! तो अब से मेरा यह जीवन भगवान ही के हवाले है; तुमने तो उसे सौंप दिया था न. मां? उसी ने बचाया है न मुझे ?"
माँ ने अब समझा कि शंकराचार्य किस अर्थ में उसे यह कह रहा है। धार्मिक स्वभाव की एवं श्रद्धालु माता होने के कारण उसने कह दिया "हां, हो तो तुम भगवान के ही। परन्तु क्या मुझे छोड़ जाओगे?"
तव शंकराचार्य ने कहा "माँ, मैं छोड़ने की भावना से नहीं जा रहा, धर्म का प्रचार करने जा रहा हूँ; जिस भगवान ने बचाया है, नया जीवन दिया है, उसकी महिमा करने जा रहा हूँ।" इस प्रकार शंकराचार्य ने भी (मां के मोह से) युक्ति द्वारा ही मुक्ति पाई थी।
मेरा अपना उदाहरण
मैं स्वयं जब शिव बाबा के इस अलौकिक कार्य में पूर्णतः समर्पित होना चाहता था तो मेरे लौकिक पिता मोह-ममता के वश मुझे इसके लिये स्वीकृति देने में तैयार नहीं होते थे। आखिर एक दिन उनसे यह वार्तालाप हुआ
पिता जी "आखिर मैं आपका पिता हूँ: आपके हित ही की बात कहता हूँ; आप सरकारी सेवा को न छोड़ो और घर में ही रहो।"
मैं "निश्चय ही आप पितृवत स्नेह और शुभ भावना ही से ऐसा कहते हैं। परन्तु अब मेरा लक्ष्य ही कुछ और है। यदि आप आज्ञा दें तो आप से एक बात पूछें ?"
पिता जी "इसी प्रसंग में कोई बात हो तो भले ही पूछो।" मैं "जब मैं बहुत छोटा था तब आप अंगुली पकड़ कर मुझे बाज़ार में ले जाते थे ताकि आप मुझे रास्तों से परिचित करायें और फल-सब्जी आदि वस्तुओं की खरीदारी सिखायें। तब आपका कोई परिचित व्यक्ति मिल जाता और आप से पूछता "यह आपका बच्चा है?", तो आप तुरन्त कहते "अजी, यह भगवान का बच्चा है।" ऐसा कहते हुए आप अंगुली ऊपर उठा लेते और नेत्र या मुख ऊपर की ओर कर लेते। अतः मैं तो कई बार आपके मुखारविन्द से यह सुनते-सुनते यह मान बैठा था कि मैं भगवान का बच्चा हूँ। परन्तु आज आप कह रहे हैं कि मैं आपका बच्चा हूँ और आप मेरे पिता हैं। तब में और अब में यह अन्तर कैसे पड़ गया है बस, यही मैं जानना चाहता हूँ।"
पिताजी (मुस्कराते हुए) "अच्छा, तो क्या तुम तब यह ध्यान से सुनते थे ? क्या तुमने इसी मन्तव्य को पक्का कर लिया था? तुम चालाकी कर रहे लगते हो। देखो, शरीर के दृष्टिकोण से तो तुम मेरे ही बच्चे हो, आत्मा के नाते से भगवान के बच्चे हो। इसलिए मैं तब भी ठीक कहता था और अब भी ठीक कहता हूँ।"
मैं "तो पिताजी, आप मेरा शरीर रख लो, मुझ आत्मा को पिता परमात्मा के पास जाने दो!"
मेरे लौकिक पिता भी धर्म-प्रिय व्यक्ति थे। वे खिलखिलाने लगे और बोले "तुम मानोगे तो नहीं। तुम भगवान के हो चुके हो तो रोकूं भी कैसे? फिर बात यह है कि तुम्हारे बचपन में मैं अपने मित्रों से जब कहता था कि "भगवान् का बच्चा है," तब मैंने यह सोचा ही नहीं था कि तुम इस बात को पकड़ लोगे।"
खैर, हमें तो इस युक्ति से (लौकिकता से) मुक्ति मिल गयी।
"युक्ति से मुक्ति" की जो कहावत है, इसके बारे में कई दृष्टान्त और वृतान्त बताये जा सकते हैं। मान लीजिये कि किसी को हलवा बनाना है। अब पहले तो उसे यह मालूम होना चाहिये कि हलवा बनाने के लिए सूजी, घी, चीनी, पानी, अग्नि, बर्तन आदि की आवश्यकता है। फिर उसे हलवा बनाने की युक्ति भी मालूम होनी चाहिये। यदि उसने पहले सूजी को घी में भूनने की बजाय पहले सूजी में पानी डाल दिया और फिर घी और चीनी डाल दी तब वह या तो कच्चा पक्का सत्तू-सा बन जायेगा या मीठी लेई ही बन जायेगी। युक्ति के बिना न हलवा बनेगा और न उस व्यक्ति को (भूख से) मुक्ति मिलेगी।
अब इसी प्रकार ईश्वरीय ज्ञान द्वारा तो मनुष्य को यह बोध होता है कि आत्मा क्या है और परमात्मा क्या है, आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध क्या है, इत्यादि। योग से उसे योगी जीवन के नियम, लाभ आदि-आदि का परिचय मिलता है। परन्तु यदि परमात्मा युक्ति का प्रयोग न करें तो शायद कोई भी उनका पूरी तरह अभ्यास
नहीं करेगा। बाबा सभी को उत्साहित करते हैं कि योग सहज है, ज्ञान तो तीन दिन में भी समझ आ जाता है और आप ही तो पहले देवी या देवता थे; आप विशेष आत्मा हैं, 'सिकीलधे' हैं, मैं आपको अपनी पलकों पर बिठा कर ले जाऊँगा; मैं आपके सिर पर ताज देखता हूँ, आदि-आदि।
इस प्रकार बाबा देहाभिमान और लौकिकता से छुड़ा कर आत्मा का स्नेह स्वयं (परमात्मा) से जोड़ देते हैं। वे कभी विनाश की बात बताकर मुर्दा हुई दुनिया से मुख मोड़ते हैं, कभी कोई सौगात देकर, कभी वे महिमा करके अपना साथी और सहयोगी बनने की बात कहते हैं तो कभी वे अपने हाथों से 'टोली' (प्रसाद) देते हैं। इस प्रकार वे अनेक युक्तियों से ज्ञान तथा योग के मार्ग पर चलाते चलते हैं। मुक्ति और जीवन-मुक्ति होती तो ज्ञान और योग ही से है परन्तु युक्ति के बिना मनुष्य ज्ञान और योग पथ पर ही नहीं चलता, और जब वह ज्ञान एवं योग को ही नहीं अपनाता तो उसे मुक्ति कैसे मिलेगी ?
फिर योग की भी युक्ति है। योग लगाने के लिये पहले स्वयं को आत्मा निश्चय करना है यह युक्ति ही तो है। यह युक्ति न आने के कारण पहले लोग अपने मन को परमात्मा में स्थित ही नहीं कर पाये क्योंकि वे देहाभिमान से ही न्यारे नहीं हो पाते थे। इसके अतिरिक्त, बाबा अनेक युक्तियों से ही योग-स्थित करते हैं। वह कहते हैं "देखो, अपने लौकिक मित्रों सम्बन्धियों को तो आप जन्म-जन्मान्तर याद करते ही आये हो; बस आप केवल याद को स्थानान्तरित (ट्रान्स्फर) करो!" इस प्रकार, जो व्यक्ति पहले विकारों तथा देहाभिमान की दलदल में फंसा था, अब बाबा उसे युक्ति से ही मुक्ति दिलाते हैं। जैसे वार्डन ने नीचे से ऊपर उड़ने की बात कहकर युक्ति से पागल को छज्जे से हटाया था, वैसे ही शिव बाबा भी युक्ति से ही मनुष्य को पवित्रता, ज्ञान और योग के मार्ग पर चला कर मुक्ति दिलाते हैं। वार्डन की तरह बाबा भी कहते हैं कि आप भी ऊपर उड़कर दिखाओ। बाबा भी कहते हैं कि शंकराचार्य से भी अधिक महान् युक्ति से स्वयं को लोक कल्याण की सेवा के लिये मुक्त करो।
प्रभु-चिन्तन या पर-चिन्तन
हमारी योग साधना के पाँच मूल तत्व हैं। एक तो यह है कि हम परमपिता परमात्मा के ईश्वरीय गुणों का मनन, चिन्तन और रसास्वादन करते हैं। दूसरा यह कि हम अपने बारे में भी इसी निष्ठा अथवा निश्चय को धारण करते हैं कि हमारा वास्तविक एवं आदिम स्वरूप पवित्रता, शान्ति तथा प्रेम है। तीसरा यह कि हम स्वयं को एक ज्योति-विन्दु आत्मा मानते हैं और परमात्मा को भी देह-रहित एक शाश्वत ज्योति बिन्दु रूप मानते हैं। और इस प्रक्रिया अथवा विधि से देह की विस्मृति कर आत्मा के स्वरूप में टिकते हैं। चौथा तत्व यह है कि हम आत्मा के स्वरूप की तथा परमात्मा के स्वरूप एवं गुणों की पुनःपुनः स्मृति में लगे रहते हैं और इस स्मृति को निरन्तर या एक तान बनाते हैं। पाँचवा तत्व यह है कि हम इस स्मृति में प्रेम, भावना, समर्पणमयता इत्यादि का समावेश करते हुए इसमें स्थिति तथा अनुभूति को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार के अभ्यास, पुरुषार्थ या योग से हमारे संस्कारों में परिवर्तन आता है, हममें पवित्रता, शान्ति आदि का उत्कर्ष होता है तथा हमारा जीवन आध्यात्मिक महानता को प्राप्त करता है। हमारे इस पुरुषार्थ से हमारे मन का मणका विजयमाला में पिरोने के योग्य हो जाता है।
परन्तु बहुत बार देखा गया है कि व्यक्ति, इस पुरुषार्थ को छोड़कर उल्टी माला फेरने लगता है। अथवा, वह घण्टा आधा घण्टा तो योग रूपी सुल्टी माला फेरता है और उसके बाद दिन-भर उल्टी माला फेरता है। कई बार तो कोई साधक योगाभ्यास के समय भी उल्टी माला फेरने लगता है। उसका परिणाम भी उल्टा ही होता है।
पर-चिन्तन-उल्टी माला
हम ऊपर योग के पाँच मूल तत्वों का उल्लेख कर आए हैं। अब मान लीजिए कि कोई व्यक्ति किसी मनुष्य-तन-धारी में कोई अवगुण, दुर्गुण या त्रुटि देखता है। उसकी कमी कमज़ोरी को देखने के बाद उसके मन में बार-बार उस देहधारी की स्मृति हो आती है और उसके अवगुण या दुर्गुण की भी याद आती है और उस याद में उसके प्रति घृणा या द्वेष का भी समावेश होता है और वह उस कटुता अथवा दुर्गुण की अनुभूति या स्थिति में होता है। तब इस प्रक्रिया को आप क्या कहेंगे ?
इसमें एक तो परमात्मा के ईश्वरीय गुणों और दूसरे आत्मा के आदि स्वरूप की पवित्रता के चिन्तन की बजाय किसी व्यक्ति के दुर्गुणों ही का तो मनन-चिन्तन है। तीसरे, इसमें ज्योति बिन्दु आत्मा और अशरीरी परमात्मा की स्मृति के बजाय देहधारी ही की तो याद है और अपनी स्थिति भी तो दैहिक ही है। चौथे, किसी के दुर्गुणों का पुनःपुनः चिन्तन या दूसरों से उसका वर्णन, अर्थात् उसकी निंदा भी तो इसमें समाई है। पाँचवे, उसकी निदा करते हुए उसकी त्रुटियों को सोचते हुए मन में उसके प्रति घृणा-भाव, क्रोध या अपमान की भावना भी तो समाई हुई है। अतः यह तो योग साधना (Meditation) के विरुद्ध ही प्रक्रिया है।
इसका स्पष्ट अर्थ तो यह हुआ कि योग या ध्यान से जो लाभ होते हैं, वे सभी लाभ तो इस प्रक्रिया से होंगे नहीं, बल्कि उनके विपरीत ही अब अनुभव होगा। दूसरे शब्दों में, लाभ की बजाय हानियाँ ही होंगी। योग से यदि स्वास्थ्य अच्छा होता है तो अब इस पर चिन्तन और दोष-दर्शन से स्वास्थ्य बिगड़ेगा ही। योग (Meditation) से यदि मन में शान्ति मिलती है तो इस अवगुण दृष्टि से अशान्ति ही होगी। योग से यदि देह से न्यारापन और हल्कापन अनुभव होता है तो इससे भारीपन अनुभव होगा। योग से यदि उड़ती कला प्राप्त होती है, आत्मा में बल भरता है और पवित्रता आती है तो इस पर चिन्तन से पतन होगा और गिरती कला होगी तथा आत्मा में कमज़ोरी आएगी। इसलिए ही कहा गया है कि पर-चिन्तन पतन की जड़ है और आत्मा चिन्तन उन्नति की सीढ़ी है।
आध्यात्मिक लक्ष्मण रेखा
भारतवर्ष में लक्ष्मण रेखा का महत्व काफी प्रसिद्ध है क्योंकि रामचरित मानस के अनुसार जब सीता जी ने पंचवटी में रहते हुए, उनके बचाव के लिए लक्ष्मण जी द्वारा खींची हुई लक्ष्मण रेखा पार की तभी रावण उन्हें हर ले गया फलस्वरूप उन्हें अपार कष्ट सहने पड़े और राम रावण युद्ध भी हुआ। वास्वत में लक्ष्मण रेखा का एक गहन आध्यात्मिक रहस्य है और उसके अनुसार जब हम जीवात्माएँ ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा निराकार शिव (जिन्हें हम स्नेह से बाबा शब्द से सम्बोधित करते हैं) द्वारा खींची हुई मर्यादाओं की रेखाओं को पार करते हैं जब हमारी बुद्धि रूपी सीता को देहअभिमान रूपी रावण हर लेता है जिस कारण हम दुःख व अशान्ति के चक्रवात में फंसते चले जाते हैं। अतः आज हम रूहानी ब्राह्मण परिवार के लिए प्रातः काल से रात्रि तक की जो मर्यादाएँ बाबा ने बताई हैं, उनकी चर्चा करेंगे:-
स्मृति
परमप्रिय बाबा ने हमें बताया है कि हमारी सारी अवस्था की नींव हमारी स्मृति पर है। अतः उक्ति प्रचलित है 'जैसी स्मृति वैसी स्थिति' हमारी स्मृति जब रूहानी हो जाती है तब हम देवता बन जाते हैं और जब वह दैहिक होती है तब असुर बन जाते हैं। अतः बाबा द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान, योग, धारणा व अलौकिक सेवा का स्वाभाविक फल हमारी रूहानी स्मृति है। रूहानी स्मृति से तात्पर्य यह है कि हम स्वयं को निरन्तर इस शरीर से न्यारी 'बिन्दु रूप आत्मा समझें' जिसका मूलरूप ज्ञान, प्रेम, शान्ति, आनन्द, शक्ति व पवित्रता स्वरूप है जो सर्वशक्तिमान् पतित पावन परमप्रिय शिव बावा की संतान हैं, परमधाम के निवासी हैं। ब्रह्मा तन द्वारा शिव बाबा की गोद लेने के पश्चात् मुझ आत्मा का अब रूहानी जन्म हुआ है। यह वास्तविक ब्राह्मण जन्म है अर्थात् अब देह-सहित देह के सर्व सम्बन्धों से बुद्धि की आसक्ति टूट कर केवल एक बाबा में ही है यही मरजीवा जन्म का लक्षण है। मेरा वर्तमान लक्ष्य फरिश्ता अर्थात् प्रकाशमान काया वाला बनना है व दिव्य गुणों से सुशोभित होना है। इस प्रकार, हमारी स्मृति की लक्ष्मण रेखा में वर्तमान समय आत्मा से सम्बन्धित उपरोक्त बातें ही रहनी चाहिए। यही स्वचितन का रूप है जिसे बाबा उन्नति की सीढ़ी बताते हैं। इसके निरन्तर अभ्यास से कुछ समय में ही बुद्धि दैहिक सम्पर्क,सम्बन्ध अथवा वस्तु से उपराम हो जाती है व पुरुषार्थी सहज ही अलौकिकता का अनुभव करता है।
दृष्टि
जैसे-जैसे हमारा स्वभाव रूहानी स्मृति का बनेगा हमारी दृष्टि भी रूहानी बनती जावेगी। रूहानी दृष्टि से तात्पर्य है कि किसी भी व्यक्ति को देखते हुए हमारी दृष्टि उसकी बिन्दु रूप आत्मा पर ही पड़े व शरीर गौण हो जावे। उसके प्रति अपना व्यवहार ठीक रखने के लिए हमें उसके संस्कार-स्वभाव को तो यथार्थ रूप से ऑक कर उसके प्रति अपना रुख अपनाना पड़ेगा किन्तु फिर भी विशेष रूप से हमारी दृष्टि उसके गुणों पर अवश्य पड़े। यह तो दैनिक अनुभव की बात है कि हमारी श्रद्धा अथवा प्रेम उसी व्यक्ति से होता है जिसके गुणों का प्रभाव हमारे मन पर होता है।
अतः प्रत्येक व्यक्ति के प्रति रूहानी दृष्टि रखने से हमारी मनोवृत्ति पर किसी के विषय में दुष्प्रभाव नहीं पड़ पावेगा और हमारा व्यवहार हर व्यक्ति के प्रति सम रह सकेगा और मन पर किसी प्रकार का बोझ न होने के कारण हमारे योग की अवस्था भी स्वाभाविक होगी। जब तक किसी भी व्यक्ति के प्रति दुर्भावना रहती है तब तक न चाहते हुए भी उसके प्रति कटु विचार उठते रहते हैं जो मनसा में काँटे सदृश्य चुभते हैं और खुशी की स्वाभाविक स्थिति नहीं बनने देते। हमारा व्यवहार भी उस आत्मा के प्रति सामान्य नहीं रह सकता बल्कि व्यवहार में प्रेम के स्थान पर शुष्कता या रूखापन आ जाता है। जब किसी पुरुषार्थी की किसी अन्य व्यक्ति के प्रति ऐसी मानसिक स्थिति हो तो थोड़ा पुरुषार्थ करके भी, जब कभी उसका विचार आये उसे तुरन्त विन्दु रूप समझ कर, परमधाम में बाबा के पास प्रकट (Emerge) कर दे तथा उसके गुणों का कुछ चिन्तन करें तो थोड़ा समय में ही उसकी मनसा सामान्य स्थिति को प्राप्त हो जायेगी। हमारी दृष्टि की मर्यादा रूहानी व गुण ग्राही है; अतः जहाँ दृष्टि इसके विरूद्ध जाये तुरन्त उसे रोकना चाहिए।
वृत्ति
वास्तव में बाबा के ज्ञान का अभिप्राय ही हमारे मन की वृत्ति को बाह्यमुखी अन्तर्मुखी करने का है। जब मन की वृत्ति अन्र्तमुखी होती है तव पुरुषार्थी को स्वयं की कमियाँ नज़र आती हैं और तब अपने ऊपर ध्यान देकर उन्हें ठीक करता है। स्मृति प्रायः परमधाम में रहने से उसे अन्य आत्माओं से भाई-भाई का यथार्थ सम्बन्ध अनुभव होता है जिससे उसके मन में उनके प्रति स्नेह रहता है व स्वयं का कर्तव्य-बोध होता है। यह तो जीवन का साधारण अनुभव है कि जहाँ प्रेम होता है वहाँ त्याग व सेवा स्वाभाविक रूप से होती है। अतः जैसे-जैसे पुरुषार्थी की अन्तर-आँखें खुलती हैं उसमें स्वयं के परिवर्तित जीवन, अपूर्व आनन्द तथा अतीन्द्रिय सुख को अन्य भाइयों को भी बांटने की प्रबल इच्छा होती है। इससे अन्य व्यक्तियों के प्रति उसमें रहम की अथवा उनके कल्याण की शक्तिशाली भावना जाग्रत होती है व धीरे-धीरे उसके रोम-रोम में छा जाती है। वास्तव में यही कल्याणकारी वृत्ति का द्योतक है जो उसे निरन्तर अन्य आत्माओं के कल्याण के लिए प्रेरित करती रहती हैं। इस प्रकार बाबा ने हम रूहानी ब्राह्मणों की वृत्ति की मर्यादा रखी है 'कल्याणकारी'। जब कभी वृत्ति का रुख इसके विरुद्ध हो जाये, तुरन्त यथार्थ स्मृति एवं दृष्टि के आधार पर इसे ठीक कर लेना चाहिए।
संकल्प
रूहानियत का स्वाभाविक स्वरूप बनाने के लिए पुरुषार्थी को स्वयं के संकल्पों पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा। वास्तव में बाबा ने हमें बताया है कि हमारी शक्ति का स्त्रोत संकल्प ही हैं। यदि हम एकाग्रचित होकर, अपनी संकल्प शक्ति को किसी ओर लगाते हैं तो वह कार्य सहज ही सफलता को प्राप्त हो जाता है। प्रायः असफलता तब मिलती है जब संकल्पों विकल्पों के प्रवाह के कारण व्यक्ति स्वयं के निर्धारित लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित्त होकर चिन्तन नहीं कर पाता। इसका मूल कारण है मन की चंचलता। जब व्यक्ति का लगाव विभिन्न व्यक्तियों व वस्तुओं में होता है तो उसका मन कभी किसी ओर खिचता है व कभी-कभी दूसरे व्यक्ति अथवा वस्तु की ओर। फलस्वरूप, वह एकाग्र नहीं हो पाता, भटकता रहता है, अतः उस विषय पर स्वस्थ चिन्तन न होने कारण उसको उचित रीति से करने की विधि नहीं आ पाती। सफलता कैसे मिले ? अतः बाबा ने बताया है कि मरजीवा ब्राह्मण बनने के बाद हम बच्चों का संकल्प केवल अन्य आत्माओं को नई दैवी सृष्टि का अधिकारी बनने की ओर ही चलते रहना चाहिए। यदि हम स्वयं के संकल्पों की इस मर्यादा को धारण करके, अपने ऊपर निरन्तर जाँच (Checking) करके, संकल्पों को मोड़ कर इस ओर लगा सकें, तो थोड़े समय में ही इसका विशेष लाभ अनुभव में आ सकता है। लेकिन यह तो तभी हो सकता है जब हम योग के तीव्र पुरुषार्थ द्वारा स्वयं का सम्पूर्ण स्नेह 'एक शिव बाबा व उनकी अलौकिक सेवा' दूसरा न कोई, से जोड़ लें। बाप-दादा के फरमान अनुसार ट्रस्टी (Trustee) बनकर तो अवश्य अपनी प्रवृति संभालनी है किन्तु उसे स्वयं की प्रवृत्ति समझकर नहीं बल्कि बाप दादा ने अपने बच्चों को हमें संभालने व बाप समान बनाने हेतु दिया है, यह समझ कर चलायें। इसका परिणाम यह होगा कि हम उसे संभालेंगे तो पूरे उत्तरदायित्व से किन्तु आसक्ति लगाव, राग, आकर्षण या खिचाव के बिना जिससे बुद्धि में कोई भारीपन महसूस नहीं होगा। हम तो केवल निमित्त हैं, बैंक बोन (Back-bone) तो सर्वशक्तिवान् बापदादा साथ-साथ हैं ही। साथ-साथ हमारा लक्ष्य उन्हें रूहानी सेवाधारी बनाने का अवश्य रहेगा। ताकि वे नई सृष्टि के अधिकारी बन सकें।
मर्यादा पालन से प्राप्ति
इस प्रकार यदि हम देखें तो हमारी आन्तरिक स्थिति की मर्यादा है रूहानी स्मृति या स्वचिन्तन, रूहानी दृष्टि, कल्याणकारी वृत्ति व अन्य आत्माओं को नई सृष्टि के मालिक बनाने वाले संकल्प। जब कभी इन चारों में से कोई भी अंग उपरोक्त मर्यादा का उल्लंघन करे, हमें ध्यान देकर उसे तुरन्त ठीक कर लेना चाहिए। यदि हम इन चारों अंगों पर उचित ध्यान देकर मास, दो मास भी चल सकें तो अवस्था में जो आश्चर्य्यजनक परिवर्तन होगा, वह वास्तव में अनुभव योग्य है। ऐसा होने से पुरुषार्थी की बुद्धि परमप्रिय शिव बाबा के साथ स्वतः ही लगी रहती है तथा बुद्धि की लगन, रूचि, लगाव अथवा आकर्षण केवल एक उसी ओर रहता है। आत्मा स्वयं को शरीर से सर्वथा न्यारी अनुभव करती रहती है तथा स्वयं को करावनहार व शरीर को कारोबार चलाने वाला केवल विभिन्न साधन समझती है, धीरे-धीरे कार्य करते हुए भी प्रकृति के स्वाद व रस के आकर्षण से मनोवृत्ति बिल्कुल निरासक्त व न्यारी हो जाती है। तब उसे जैसे सोना व मिट्टी एक सदृश्य लगता है। यह लक्षण उस अन्तिम स्थिति का है जब आत्मा का हिसाब-किताब शरीर से चुक्तु होने वाला होता है। वास्तव में यही बेहद की वैराग्यवृत्ति, उपराम अवस्था, साक्षीपन, न्यारी व स्थाई अवस्था का स्वरूप है। ऐसी की स्वाभाविक स्मृति आती रहती है। इस पुरुषार्थ से कभी डैड साइलेन्स (Dead Silence) अथवा बीजरूप स्थिति का खिचाव व कभी दिव्य गुणधारी सजा-सजाया भविष्य जीवन की स्मृति का आकर्षण होता है। इस पुरानी दुनिया की स्मृति गायब हो जाती है। ऐसा बार-बार अनुभव होता है, जैसे अभी-अभी यहाँ और अभी-अभी वहाँ अर्थात् एक पाँव परमधाम में व दूसरा सतयुगी राजधानी में। स्थूल वतन से तो बुद्धि का लंगर जैसे उठ ही जाता है। ऐसी अवस्था प्राप्त आत्मा का प्रत्येक बोल अन्य आत्माओं में रूहानी नशा, उमंग व उत्साह भरने वाला होता है अथवा उसका एक-एक बोल महावाक्य होता है स्वयं में अर्जित शक्ति व गुणों के आधार से, वह दूसरी आत्माओं में परिवर्तन की प्रेरणा के बीज बोने वाला होता है तथा निर्बल को शक्ति, भिखारी को दान व भक्त आत्मा में प्रभु मिलन का ज्ञान का बीज बो देता है व उन्हें सम्पन्न बना देता है। प्रत्येक कर्मेन्द्रिय शीतल व महान् हो जाती हैं तथा उनके कर्मों में रूहानी दिव्यता व अलौकिकता आ जाती है। वह व्यक्ति के संकल्पों व भावनाओं को ठीक से पकड़ लेता है व उसे सहज सन्तुष्ट कर सकता है उसकी परख शक्ति निखर जाती है। सहनशक्ति इतनी बढ़ जाती है कि बड़ी से बड़ी बात भी उसे छोटी लगती है। क्योंकि नथिग न्यू (Nothing New) की धारणा होती है और उसे मार्ग प्रदर्शना मिल जाती है जिससे सफलता स्पष्ट दिखाई दे जाती है। ऐसी आत्मा अपनी अर्जित शक्ति के भण्डार के आधार पर कोई भी जिम्मेवारी सहज संभाल लेती है। आने-जाने की निरंतर तीव्र गति के कारण उचित समय पर उचित कार्य की जैसे टचिंग हो जाती है जिससे उसे कोई भी आवश्यक कार्य करना नहीं भूलता। अतः दूसरों को तो ऐसा महसूस होता है जैसे ये बहुत कार्य कर रहें हैं परन्तु वह स्वयं तो बीजरूप, साकीपन व साक्षीपन की स्थिति में मगन रह हल्कापन महसूस करता है। तुम ही संग उर्दू, तुम्ही संग बैहूँ, गांऊँ, नाचूँ, खाऊँ पीऊँ के बढ़ते हुए अभ्यास से सर्वशक्तिवान् बाबा का सदा साथ अनुभव होता है। अतः उसकी सर्व इच्छाएँ उससे पूर्ण होने के कारण 'इच्छा मात्रम् अविद्या' भी हो जाती है। इस प्रकार रूहानी स्मृति के गहन अभ्यास द्वारा पुरुषार्थी का आध्यात्मिक स्तर इतना उठ जाता है कि वह व्यक्त शरीर में रहते भी अव्यक्त स्थिति (प्रकाशवान काया) का अनुभव करता है। सम्पूर्ण स्थिति अर्थात् फरिश्तेपन के समीप पहुंचने के यही लक्षण हैं मानों आत्मा ने योगबल से इस शरीर से अपना हिसाब-किताब चुकता कर लिया है। और अब वह अव्यक्त होना ही चाहता है।
योगी और सहयोगी
‘योगी' शब्द का उच्चारण करने से सबसे पहले तो हमारे मन पर वह चित्र उभर आता है जिसमें दिखाया गया है कि प्रकाश एवं शक्ति की एक तीव्र धारा योगाभ्यासी पर उतर रही है और उसे योग से चकाचौंध अथवा सराबोर करके दसों दिशाओं में प्रकाश एवं पवित्रता का संचार करते हुए. सारे वातावरण में एक नव चेतना, एक दिव्यता और एक अलौकिकता प्रकीर्ण करती हुई, अविरल गति से शान्ति फैलाती हुई चली जा रही है। इस चित्र में योगाभ्यासी पर दृष्टि डालने से लगता है कि योग के इस प्रवाह में वह अपने पार्थिव देह की सुध भूल चुका है और अपने लाल की लाली में स्वयं भी लाल हो गया है। अब उसे प्रकाशमय नेत्र, प्रकाश ही का अनुभव और प्रकाश ही की ईश्वरीय गोद अथवा प्रकाश ही का ओढ़ना मिला हुआ है जिसमें वह आन्तरिक सुख में विभोर होकर उस सुख ही में रमा हुआ है। उसकी वृत्ति, उसकी स्मृति, उसकी दृष्टि, उसकी काया सभी में ईश्वरीय शक्ति और ज्योति ने एक नया जीवन, एक नया रस, और एक नई स्फुरण भर दिया है कि जो एक सुहावनी बाढ़ की तरह उसके भीतर और बाहर उसमें आत्मसात और आलिंगन कर रहा है।
यह चित्र मन को इतना भला लगता है और इतना प्रभावशाली कि इस चित्र के कुछ क्षण मन पर अकिंत रहने से मन स्वयं को उस अनुभूति की स्थिति में पाता है। परन्तु जब हम सोचते हैं कि मनुष्य को व्यवहार क्षेत्र में भी तो पग धरने होते हैं तब हमारे सामने योगी का एक ऐसा चित्र प्रगट हो जाता है जो एक फरिश्ते की न्यायी एक उज्वल प्रकाश का बना हुआ है कि जिस प्रकाश में एक चुम्बकीय शक्ति भी है, एक अनोखी शीतलता भी और एक उत्साह भरने वाली उष्णता भी तथा अपावन को पावनता का स्पर्श देने वाली एक विमलता भी। इस चित्र में योगी के नेत्र, कर्ण, मुख इत्यादि दिखायी तो देते हैं परन्तु जैसे अतीत काल में प्रसिद्ध ढाका की बारीक मलमल के पीछे किसी का चेहरा थोड़ा अस्पष्ट-सा दिखाई दिया करता होगा वैसे ही यह कर्मयोगी मानो प्रकाश की एक बारीक-सी ओढ़नी ओढ़े हुए दिखाई देता है। किसी को ऐसा दिखाई न भी देता हो तो भी स्वयं में वह एक अजीब सी अंगड़ाई, प्रभु प्यार की एक मीठी-सी कसक, अपने प्रियतम के प्रति एक समर्पण भाव, अपने कर्तव्य के प्रति एक विशेष निष्ठा और अन्य के प्रति करुणा भाव का अनुभव करते हुए ऐसा महसूस
करता हैं कि दिनों दिन वह अपने चहुं ओर आकाश की बजाय प्रकाश में जाता जा रहा है और उसका शरीर स्थूल की बजाय ट्राँस लाईट के जैसे होता जा रहा है।
ऐसा जो योगी है, उसे किसी भी अच्छे कार्य में हाथ डालने में खुशी होती है। वह पात्र को आनन्द, शान्ति, शक्ति के ईश्वरीय वरदानों से लाभान्वित करने में गद्गद अनुभव करता है क्योंकि दूसरों का आशीर्वाद प्राप्त करने के अतिरिक्त उसे एक आन्तरिक आह्लाद का अनुभव होता है।
जैसे योगी सदा ईश्वरीय कार्य में सहयोगी होता है, वैसे ही सहयोगी भी योग-स्थिति की ओर बढ़ता है कोई व्यक्ति यदि योगाभ्यास न भी करता हो तो वह भी जब ईश्वरीय कार्य में सहयोग देने के लिए संकल्प करता है तो देखा गया है, उसमें योग के प्रति भी आकर्षण की लहर उत्पन्न होने लगती है। जब वह तन और धन से भी ईश्वरीय सेवा के कार्य में किसी-न-किसी प्रकार से निमित्त बनना शुरू करता है तो ईश्वरीय शिक्षा केन्द्रों में उसका आना-जाना तथा वहाँ के ज्ञान और योग रूपी धन से अपना सौभाग्य बनाना भी धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। ज्ञान और योग के प्रति पहले उसकी यदि रूचि नहीं होती थी और यदि वह उसके लिए समय नहीं निकालता था तो अब वह धीरे-धीरे सहयोगी बनने के फलस्वरूप यह सब करने लगता है। इसके विपरीत देखा गया है कि जो व्यक्ति आज अपनी परिस्थितियों में दुःख और अशान्ति के किन्हीं कारणों से निकल कर शान्ति प्राप्त करने के लिए योग की ओर आकर्षित होते हैं, वे यदि सहयोगी नहीं बनते तो आगे चलकर उनके पुरुषार्थ में ढीलापन आना शुरू होता जाता है क्योंकि वे अपने लाभ में सन्तुष्ट होकर दूसरों की हित-कामना नहीं करते। जैसे एक पेड़ जल प्राप्त न होने से धीरे-धीरे सूखने लगता है, वैसे ही सहयोग न देने वाले को योग और सहयोग रूपी जल मिलना बन्द होता जाता है। और अन्ततोगत्वा उसकी योग रूपी बढ़ती हुई लता मुरझाने और सूखने लगती है। अतः 'पवित्र बनो और योगी बनो' के साथ-साथ वास्तव में 'सहयोगी बनो' ये हित संकेत भी जरूरी है। जो ईश्वर से प्यार करता है, वह ईश्वर के कार्यों से ज़रूर प्यार करता होगा और इस प्यार को तन, मन, धन से अभिव्यक्त करता होगा। जिन देशों में अंग्रेज़ी भाषा बोली जाती है, वहाँ यदि एक व्यक्ति का दूसरे से स्नेह हो तो वह मुहावरे में कहता है। love your pet' अर्थात् मुझे तुम्हारे पालतू जानवर से भी प्यार है। भाव यह है कि जब तुम्हारे जानवर से प्यार है तो स्वयं तुमसे तो बहुत प्यार होगा ही। जब एक जानवर और मनुष्य के लिए लोग कह देते हैं तो प्रभु-प्यार, जिससे प्यार की और कोई ऊंची सीमा नहीं, के लिए तन, मन, धन से उद्गार व्यक्त करना अर्थात् ईश्वरीय सेवा में हाथ बटाना तो स्वाभाविक ही है।
सभी ईश्वर-विश्वासी लोग परमात्मा को अपना माता-पिता, सखा, स्वामी और सर्वस्व मानते हैं। तब सोचने की बात है कि सेवक अपने स्वामी के लिए, सखा अपने सखा के लिए तथा हर कोई अपने घनिष्ठ सम्बन्धियों के लिए संसार में क्या कुछ नहीं करता। अतः योग जो परमात्मा से टूटे हुए सम्बन्धों को फिर से जोड़ने का नाम है, उसमें स्थित होने वाला व्यक्ति यदि तन, मन, धन से प्रीत की रीति निभाना नहीं जानता तो वह अभागा है। योग की जिस स्थिति का हमने प्रारम्भ में वर्णन किया है, उस स्थिति में आत्मा को जिस ईश्वरीय प्यार का अनुभव और जिन अनमोल खज़ानों की प्राप्ति होती है, उनके बदले में वह मनुष्य, यदि वह विश्व का महाराजा भी हो, अपने सब खजाने प्रभु-अर्पण करने से भी नहीं चुका सकता। परन्तु यदि योग की दूसरी स्थिति को भी हम लें अथवा योग की प्रारम्भिक भूमिका ही पर हम विचार करें तो उससे मनुष्य बुरे कर्मों से जो मुक्ति पाता है, विकारों और वासनाओं की कैद से जो छुटकारा प्राप्त करता है और तन, मन तथा धन को बुराई के धन्धों में लगाने से जो छूट पाता है, उसका मोल भी कोई नहीं चुका सकता। तन, मन, धन को ईश्वरीय सेवा में प्रयोग करके सहयोग देना तो गोया अपने ही योग में बल भरना और उन्नति करना है। और हमें यह मालूम रहे कि ईश्वरीय कार्यों में जो सहयोग देता है, स्वयं ईश्वर उसको सहयोग और योग देता है। अतः 'पवित्र बनो, योगी बनो और सहयोगी बनो'।
आध्यात्मिक पुरुषार्थ में आने वाले
विघ्नों को कैसे पार करें ?
योगेश्वर परमपिता परमात्मा शिव ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा समझाया है कि आध्यात्मिक पुरुषार्थ के मार्ग में अथवा योगाभ्यासी के सामने मुख्य रूप से आठ प्रकार के विघ्न आते हैं। वह विघ्न ये हैं 1. अलवेलापन 2. संशय 3. व्यर्थ संकल्प अथवा बुरे संस्कारों का उदय 4. विकट परिस्थितियाँ अथवा समस्यायें 5. थकावट, उत्साह की कमी अथवा अरुचि 6. पूर्व कर्मों का हिसाब-किताब तथा दूसरों के स्वभाव से टकराव 7. मानसिक दण्ड और 8. व्याधि।
चाहे कोई भी व्यक्ति हो, वह कितना ही तीव्र वेग वाला पुरुषार्थी क्यों न हो, उसे इन विघ्नों से पार अवश्य होना पड़ता है। किसी के सामने एक विघ्न पहले आता है तो दूसरे के सामने दूसरा, परन्तु ये विघ्न आने अवश्य हैं। अतः जो कोई भी आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुँचना चाहता है, उसे इन विघ्नों को पार करने की विधि जाननी चाहिये। परमपिता परमात्मा शिव ने सभी मनुष्यात्माओं के कल्याण के लिए इन्हें सहज रीति से पार करने की युक्तियाँ बताई हैं। अब हम एक-एक विघ्न का और साथ-साथ उसे पार करने की विधि का उल्लेख करेंगे।
तीन मौलिक बातों की स्मृति
इन विघ्नों को लाँघने की विधि को जानने से पहले हमें तीन मौलिक बातों को
सदा अपनी स्मृति में रखना चाहिये। परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि यदि किसी समस्या के बारे में हम पहले से ही जानते हों कि वह हमारे सामने आयेगी तो उसके लिए हम पहले से ही तैयार रहते हैं और उसके आ जाने पर हम ज़्यादा घबराते नहीं हैं क्योंकि उसका हमें पहले से ही पता होता है। अतः एक बात तो हमें यह याद रखनी चाहिये कि ये विघ्न आयेंगे। हमारे मार्ग में तूफ़ान, रोड़े-पत्थर, ऊंच-नीच, चढ़ाई उतराई इत्यादि अवश्य आयेंगे। दूसरा यह याद रखना चाहिये कि ये हमारी ईश्वरीय विद्या अथवा योग-विद्या के अर्जन में प्रैक्टिकल (पेपर) परीक्षा-पत्र के समान हैं। विद्यार्थी परीक्षा को पार करके ही तो आगे बढ़ता है और वह जितना आगे बढ़ता है, अगली कक्षा में उसके सामने उतने ही अधिक कठिन परीक्षा-पत्र अथवा प्रश्न रखे जाते हैं। उन्हें पार करने से तो योग्यता बढ़ती है और हर्ष में भी वृद्धि होती है। अतः इन विघ्नों को परीक्षायें मान कर इन्हें तत्परता से पार करना चाहिये और इन्हें मार्ग की यथार्थता के चिह्न समझना चाहिये, जैसे कि सड़क पर जाता हुआ कोई व्यक्ति फ़ासला इंगित करने वाले पत्थर (Mile Stone) को देखकर समझता है कि मैं आगे बढ़ रहा हूँ। तीसरी बात यह है कि सदा इसी निश्चय में स्थित रहना चाहिये कि सर्व समर्थ परमपिता परमात्मा की मार्ग प्रदर्शना मुझे प्राप्त होने से मैं इन्हें अवश्य पार कर ही लूँगा।
१. अलबेलापन
पुरुषार्थ में सबसे अधिक हानिकारक यात मनुष्य का अपना ही अलबेलापन है। जब मनुष्य अपने मन-वचन-कर्म पर ध्यान (Attention) नहीं देता और अपनी स्थिति या अवस्था की जाँच (Checking) नहीं करता-करवाता, तब उसका पुरुषार्थ ढीला पड़ जाता है, अभ्यास टूट जाता है, प्रगति रुक जाती है और परिणाम यह होता है कि उसका मन सांसारिक भोगों की ओर झुक जाता है या तो वह योग एवं नियमों के प्रति उदासीन हो जाता है। अतः अलबेलेपन को अपने मन में कभी भी नहीं घुसने देना चाहिये।
छोटी-छोटी भूलों को छोटी अथवा हल्की सी बात मानकर छोड़ देना, अर्थात् उन्हें मामूली बात मानकर भूलें करते रहना भी अलबेलापन है। योग साधन में लापरवाही करना, व्रतों को अधूरा छोड़ देना, कार्य बिगड़ जाने पर भी अपने को सुधारने तथा कार्य को सँवारने के लिए लग्न और तत्परता से काम न करना ये अलबेलापन है जो कि बहुत ही हानिकारक है।
हमें सात्विक बनाने वाले नियमों को किसी हालत में भी नहीं छोड़ना चाहिये और अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए सदा दृढ़ संकल्प धारण करना चाहिये। किसी के संग में, किसी के कहने पर, हँसी या विनोद में, किसी छोटी सी परिस्थिति में अपने जीवन की उच्च धारणाओं को छोड़ देना, किन्हीं भूलों अथवा अनियमितता (Lapses) को छोटा मानकर चला देना आगे जाकर बहुत ही घातक सिद्ध होता है। अतः छोटी बात को छोटा नहीं समझना चाहिये, बल्कि दूसरों के संग में रहते हुए भी हमें अपने धर्म से नहीं गिरना चाहिये, अपनी मान्यताओं को नहीं छोड़ देना चाहिये और दूसरों के कथन अथवा आग्रह के सामने हिम्मत हारकर या लज्जा एवं संकोच वश अपने असूलों को ढीला नहीं कर देना चाहिये। इसी प्रकार घर में, दफ्तर या दुकान में, यात्रा या यात्ना में हमें योगाभ्यास को, स्वभाव की दिव्यता को, ज्ञानाध्ययन तथा नित्य के पुरुषार्थ को भी नहीं छोड़ देना चाहिये।
ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि "कल से अमुक दैवी गुण धारण करना शुरू करूँगा......... अमुक परिस्थिति पार हो जाय तब से योगाभ्यास के लिए समय निकालूंगा, फलाँ अवसर के आने पर मैं अमुक पुरुषार्थ प्रारम्भ करूँगा......"
कल किसने देखा है? कौनसा श्वास अन्तिम श्वास होगा यह क्या पता है? अतः मनुष्य को यह सोचना चाहिये कि "यदि अभी मेरे प्राण निकल जायें, क्षण में, पल में, घड़ी में काल मुझे ले जाय तो मेरी क्या स्थिति होगी, क्या गति होगी और क्या वृत्ति तथा स्मृति होगी? इस प्रकार मनुष्य को चाहिए कि हर घड़ी को अपनी अन्तिम घड़ी समझे। आज का संसार ही ऐसा है कि मनुष्य के हृदय की गति अचानक ही रुक जाती है, अचानक ही दुर्घटना हो जाती है, कोई रोग घेर लेता है और कोई आपदा सिर पर आ बनती है। अतः अपने जीवन को ऊंचा उठाने के लिए, अपने भविष्य को उज्वल बनाने के लिए सदा वर्तमान में अच्छे संकल्प, श्रेष्ठ कर्म तथा तीव्र पुरुषार्थ को नहीं छोड़ना चाहिये। यह तब हो सकेगा जब हम इसी जीवन को सृष्टि-चक्र में अपना अन्तिम जीवन मानेंगे और हर घड़ी के बारे में यह सोचेंगे कि हो सकता है कि यह इस जीवन की अन्तिम घड़ी हो। अब कलियुगी सृष्टि का महाविनाश निकट है और इस रहे हुए समय में ही, अर्थात् इस पुरुषोत्तम युग में हमें नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनने का उद्यम करना है।"
इसके अतिरिक्त, हमें यह भी याद करना चाहिये कि यदि इस थोड़े से समय में हम अच्छा पुरुषार्थ करेंगे अर्थात् नियमों का पूर्णतः पालन करेंगे तथा अच्छी प्रकार से योगाभ्यास करेंगे तो सदा के लिए दुःख बन्धन से छूट जायेंगे और मुक्ति तथा स्वर्गिक सुख को प्राप्त करेंगे और यदि हमने अभी आलस्य किया, अलबेलेपन में पुरुषार्थ पर ध्यान न दिया तो न केवल धर्मराजपुरी में अपने पूर्वकाल में किये विकर्मों के कारण दण्ड भोगना पड़ेगा, बल्कि हर कल्प हमारी इस हानि तथा निम्नावस्था की पुनरावृत्ति होगी, क्योंकि इस सृष्टि-चक्र की कल्प-कल्प पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार, ज्ञान के इन रहस्यों की स्मृति से अलबेलापन हमारा पीछा छोड़ जायेगा।
योग-दर्शन में पातंजलि ने भी विघ्नों का उल्लेख करते हुए इस विघ्न को 'प्रमाद' नाम दिया है। परन्तु इसे पार करने के लिए उसने कोई विशेष साधन नहीं बताये न ही उसने धर्मराजपुरी में मिलने वाले दण्ड की चर्चा की है, न प्राप्त होने वाले स्वर्गिक सुख की, न ही आने वाले महाविनाश की, न सृष्टि-चक्र के पुनरावृत्ति के रहस्य की। उस समय तो सृष्टि के महाविनाश या सतयुग के पुनरागमन की बात ही नहीं थी, क्योंकि ऐसा समय तो अब आया है।
२. संशय
ज्ञान के किसी सिद्धान्त में, योग मार्ग की उपादेयता में अथवा अपनी योग्यता एवं सामर्थ्य में अथवा अपने मार्ग-प्रदर्शक में संशय हो जाना तो बहुत ही बड़ा विघ्न है। गीता के भगवान् ने स्पष्ट ही कहा है कि 'संशयात्मा विनश्यति।' पातंजलि ने भी संशय को विघ्न में गिनती किया है। "श्रद्धावान लभते ज्ञानम्" -यह वचन भगवान् ने श्रद्धा का महत्व दर्शाने के लिए कहा है। श्रद्धा से मनुष्य गुण ग्रहण करता है, कुछ सीखता है और आगे बढ़ता है। संशय वाला मनुष्य अवगुण अथवा दोष-दर्शन करता है और इससे उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। अतः निश्चय को योग के चार स्तम्भों में से एक स्तम्भ माना गया है। परन्तु निश्चय का अभिप्राय अन्ध-श्रद्धा नहीं है। मनुष्य को अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिये, परन्तु किसी द्वारा कान भरे जाने पर, किसी द्वारा अवगुण दर्शाये जाने पर, अपने मन की मलीनता के कारण किसी बात में संशय नहीं करना चाहिये। कई बातें ऐसी होती हैं कि हमारी वर्तमान समय की कलुषित अथवा भ्रान्त वृत्ति या दृष्टि के कारण अथवा हमारे अल्प ज्ञान तथा हमारे अनुभव की कमी के कारण हमें ग़लत मालूम पड़ती हैं, परन्तु जब हमने अन्य सिद्धान्तों को सही पाया है, पहले गुण भी देखे हैं तो अब धीरज धरकर अनुशीलन करना चाहिये, क्योंकि यों ही किसी संवेग-वश संशय हो जाने से हमारे ही पुरुषार्थ में बाधा पड़ेगी। यदि हमारी अवस्था ठीक रहेगी तो हम सब कुछ ठीक कर ही लेंगे, परन्तु यदि संशय में पड़कर हम ही ज्ञान-ध्यान, नियम-कर्म छोड़ देंगे तो गोया अपने ही पतन के लिए खड्डा खोदने का काम करेंगे।
फिर भी यदि हम पर संशय का वार होता है तो हमें स्पष्ट शब्दों में अपनी स्थिति बतलाकर उसका समाधान ले लेना चाहिये। इसके अतिरिक्त अच्छा होगा यदि हम ईश्वरीय सत्संग को न छोड़ें और ज्ञान की कक्षा में नित्य प्रति सम्मिलित होते रहें, क्योंकि संशय का निवारण भी तो ज्ञान के द्वारा ही होगा और ज्ञान के स्थान पर तथा ज्ञानियों के संग में यदि हम पहुँचेंगे ही नहीं तो हमारे संशय का निवारण कैसे होगा ?
फिर भी यदि संशय हमारे मन से नहीं जाता तो हमें यह सोचना चाहिये कि "पवित्र बनना तो अच्छा ही है ना? परमात्मा की स्मृति में स्थित होने का अभ्यास करना तो लाभप्रद ही है न? अच्छे कर्म का तो अच्छा ही फल मिलेगा ?......" अतः यदि किसी सिद्धान्त से हम पूर्णतः सहमत नहीं भी हैं तो फ़िलहाल उसे छोड़ देना चाहिये और पहले हमें बाकी सिद्धान्तों के आधार पर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के पुरुषार्थ में लग ही जाना चाहिये। इसमें तो कोई हानि नहीं है। यदि ऐसा करने के लिए भी हमारा मन नहीं मानता तो समझना चाहिये कि हम पर माया का ज़बर्दस्त वार हुआ हुआ है और उससे बचाव के लिए तो ज्ञान कक्षा में नित्य-प्रति जाना और भी अधिक जरूरी है। अतः इसके कारण से ज्ञान एवं योग को छोड़ना भूल है, इन्हें अपनाने में ही बुद्धिमत्ता है।
३. व्यर्थ संकल्प अथवा बुरे संस्कारों का उदय
वास्तव में मन की चंचलता का कारण मनुष्य के पुराने, अशुद्ध संस्कार ही हैं। जब वे वासना, विषय भोग की इच्छा तथा उद्वेग की लहर का रूप धारण करते हैं तब पुरुषार्थी परेशान हो जाता है। इन्हीं के कारण से अर्जुन ने कहा "भगवन् ! यह मन बड़ा उपद्रवी है, वेगवान् वायु के समान है।" परन्तु भगवान् ने क्या कहा है? यही कि तू अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे वशीभूत कर! भगवान् के महावाक्य हैं कि "हे वत्स! तू इनसे युद्ध कर।"
अतः जब कभी मनुष्य के मन में अशुद्ध संस्कारों का वेग आता है तो उसे चाहिए कि उनके कारण से परेशान या निराश न हो, बल्कि उनसे ज्ञान-गदा द्वारा, योग रूपी कवच पहन कर युद्ध करे। आख़िर इन संस्कारों को शुद्ध तो करना है ही, क्योंकि यदि ऐसा पुरुषार्थ नहीं किया जायेगा तब तो दुःख सदा बना ही रहेगा और ये अधिक पतन की ओर ले जायेंगे। अतः बारम्बार उस महा दुःख को स्वीकार करने की बजाय तो अभी इनसे युद्ध करके इन्हें मिटा डालने ही की थोड़ी-सी असुविधा को स्वीकार कर लेना उत्तम है। इन संस्कारों के जागृत होने से तो हमें पता चलता है कि अभी तक हमारा मन मैला है, उसमें अमुक अमुक विकारों के बीज हैं; अतः इन्हें देखकर तो हमें और भी अधिक पराक्रम से इनके साथ युद्ध ठान लेना चाहिये। बजाय इसके कि हम पुरुषार्थ रूपी धनुष को धरा पर डालकर, घुटने पर कोहनी रखकर, ठोडी के नीचे हाथ धर के बैठ जायें!
ऐसे समय में जबकि दूषित संस्कार अपना सिर उठाते हैं, हमें ज्ञान रूप स्वदर्शन चक्र का प्रयोग करके इनका अन्त करना चाहिए। हमें सदा यह सोचना चाहिये कि "हम सर्वशक्तिमान् परमपिता परमात्मा शिव की सन्तति हैं, ये संस्कार हमारे ज्ञान-बल तथा योग-बल के सामने भला टिक कैसे सकते हैं? हमने तो कल्प पूर्व भी इन्हें जीता था और विजय पताका फहराई थी; अब पुनः विजय का तिलक प्रभु ने हमारे मस्तक पर लगा ही दिया है क्योंकि हम सर्वभाव से उस ही के मत पर चल रहे हैं जिसे पराजय ने कभी छुआ नहीं और जिससे लोग विजय का सौभाग्य मांगते हैं। अतः हमारे संस्कार चाहे कितने ही पक्के या कड़े, क्रूर या गन्दे हों, भगवान् की स्मृति से इनका सारा कल्मिष धुल जायेगा।" तभी तो भगवान् ने कहा है कि " मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर।" (अहम् त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्ष्ययिष्यामि मा शुच)।
मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान एवं योग की शिक्षा प्राप्त करके बहुत खुश होता है। उस मार्ग पर थोड़ा चलने में उसे बहुत ही आनन्द अनुभव होता है। परन्तु आगे बढ़ते ही जब उसके अपने ही संस्कार आलस्य, काम-भोग, उत्तेजना इत्यादि के रूप में उसके मार्ग में बाधा बन जाते हैं तब वह सन्मार्ग को ही छोड़ने की सोच लेता है, क्योंकि कुछ ही दिन पहले उसका मन प्रभु की स्मृति में स्थित हो जाता था अथवा ईश्वरीय स्मृति के समय उसके मन में दूषित संस्कार विघ्न नहीं डालते थे, परन्तु अब जब वह योगाभ्यास के लिए बैठता है तो ये संस्कार उसे परेशान कर देते हैं। अतः उसका उखड़ा हुआ मन, शामियाने, तम्बू उखेड़कर, डेरा उठाने को कहता है। "क्या रखा है योग ध्यान में.... मैं तो परेशान हो गया हूँ....." इस प्रकार उसका मन तूफ़ान खड़ा कर देता है और उसे विषयों की ओर आकर्षित करता है, भोग सुख के दृश्य उसे दिखते हैं या उसे किसी चिन्ता, उत्तेजना इत्यादि की आंधी में उड़ा देते हैं। इस प्रकार दीये और तूफ़ान की लड़ाई होती है। उसके मन का पाँव लक्ष्य को छूता ही नहीं, स्वरूप को स्पर्श ही नहीं कर सकता, उसमें टिकने की बात तो एक ओर रही। पातंजलि ने इस विघ्न को 'उपलब्ध भूमिकत्व', 'अविरति' तथा 'अनवस्थितत्व' ये नाम दिये हैं। योगाभ्यास करने पर भी मन का टिक न पाना, संस्कारों के वेग के कारण बीच में ही रुक जाना 'उपलब्ध भूमिकत्व' कहलाता है और ऐसा होने से फिर से विषयों के साथ संयोग की इच्छा करना तथा उनके भोग में पड़ जाना, ईश्वरीय लग्न तथा अनासक्ति को गंवा बैठना यह 'अविरति' कहलाता है और मन का भटक जाना, पथ से हट जाना, स्थिति का डाँवाडोल होना यह 'अनवस्थित्व' कहलाता है।
परमपिता परमात्मा शिव ने हर प्रकार के संस्कार को मिटाने के लिए बहुत ही स्पष्ट रूप से साधन बताये हैं। परन्तु अभ्यासी को इतना तो समझना ही चाहिए कि पुराने संस्कारों को मिटाने का साधन भी तो योग ही है। अतः यदि इन संस्कारों के वेग को देखते हुए हम योगाभ्यास को ही छोड़ देंगे तब तो यह संस्कार कभी मिटेंगे ही नहीं। जैसे सोना तपाने से शुद्ध होता है, ऐसे ही संस्कार भी योग द्वारा शुद्ध होते हैं। अतः संस्कारों का वेग तो कुछ समय तक ढीला पड़ेगा ही, हमें योग-रूप साधन को नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि ज्ञान की चर्चा, परोपकार, जन सेवा इत्यादि में उसे लगाकर मन को ज्ञान के किसी दूसरे पहलू पर लगाकर उसकी भूमिका को ठीक करना चाहिए।
४. विकट परिस्थितियाँ अथवा समस्यायें
आध्यात्मिक पुरुषार्थ करते-करते, मनुष्य के जीवन में अनायास ही कई ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं जो उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और उसके मन में दुःख की लहर अथवा असुविधा की भासना पैदा करती हैं तथा मनुष्य का मन ऐसा खिचा-खिचा-सा, उलझा हुआ-सा, मुर्झाया हुआ-सा रहता है कि इस भूमिका में उससे ज्ञान और योग स्वतः ही छूटने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में यदि मनुष्य से कहा जाय कि "भाई! योगाभ्यास को तथा नित्य ज्ञानाध्ययन को मत छोड़ो" तो वह कहता है "क्या करूँ, कैसे करूँ, मेरी तो परिस्थिति ही ऐसी है.....।"
परमपिता परमात्मा शिव कहते हैं कि "ऐसी परिस्थिति को आत्मिक स्थिति से पार करो। परिस्थितियों से प्रभावित हो जाना कमज़ोरी है; आप अपनी स्थिति को बनाये रखोगे तो आपके आत्मिक बल से परिस्थितियाँ भी ठीक हो जायेंगी। यह सोचना गलत है कि पहले हमारा कार्य-व्यवहार ठीक हो जाय तब हम परमार्थ करेंगे, सही तो यह है कि परमार्थ में लगने से ही व्यवहार तथा गृहस्थ भी सुधरेगा। अतः कर्म करते हुए भी अपने धर्म को नहीं छोड़ना चाहिये। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो परिस्थितियाँ हमारे लिए क्लेश तथा दुःख का कारण बन जायेंगी। उन परिस्थितियों का सामना करने के लिए हमें मनोवल (Will Power) सहनशक्ति, पवित्रता बल तथा आत्मिक शक्ति और ईश्वरीय शक्ति नहीं मिल सकेगी। ऐसी स्थिति में यदि हम क्रोध, लोभ आदि के द्वारा अपनी परिस्थिति को ठीक करने का यत्न करेंगे तो हमें आध्यात्मिक दुःख झेलना पड़ेगा और तब ज्ञानी होते हुए विकर्मों का सौ गुणा दण्ड हमें भोगना पड़ेगा। अतः इसका मात्र उपाय यही है कि हम अपनी आत्मिक स्थिति को, योगाभ्यास को अथवा आध्यात्मिक पुरुषार्थ को न छोड़ें। तूफ़ानों को तोहफ़ा मानें और उनमें अपनी सहनशक्ति के विकास के अवसर को समझें तो कल्याणप्रद होगा।"
फिर, जो परिस्थितियाँ हमारे सामने आती हैं, वे हमारे अपने ही पूर्व कर्मों का तो फल हैं। उनके लिए तो हम अन्य किसी को तो दोषी ठहरा नहीं सकते। कर्म के नियम के अनुसार वे हमारे सामने आनी तो थीं ही। पहले भी स्व-स्थिति में हम नहीं टिके रहे, उसके कारण ही तो इनका आना हुआ है, तब क्यों न स्व-स्थिति द्वारा उनका सामना किया जाय ? यदि हम उनके कारण से अपना आध्यात्मिक पुरुषार्थ छोड़ देंगे तब फिर स्थिति और परिस्थिति सुधरेगी कैसे? तब तो गोया हम अपनी बिगड़ी हुई परिस्थिति द्वारा पुनः विकट परिस्थितियों को निमन्त्रण देने का यत्न कर रहे हैं।
मनुष्य के सामने हानि, निन्दा, प्राकृतिक प्रकोप द्वारा तोड़-फोड़, सम्बन्धियों की मृत्यु इत्यादि के रूप में जो क्लेशकारक परिस्थतियाँ आती हैं उनमें यदि मनुष्य कष्ट अनुभव करता है अथवा यदि किन्हीं इहलौकिक इच्छाओं की अपूर्ति के कारण उसे मानसिक क्षोभ होता है तो उसके अपने मन पर नियंत्रण न होने के कारण ही ऐसा होता है। ईश्वरीय ज्ञान हमें ऐसी परिस्थितियों में ही तो एकरस रहने का मार्ग दर्शाता है। यदि इन परिस्थितियों से ही हमारी अवस्था डोल जाती है और हम चिंतित, दुःखी, अशान्त अथवा क्षुब्ध महसूस करते हैं तो गोया यह हमारे ज्ञान की कमी के सूचक हैं। अतः इन परिस्थितियों में ज्ञान के बलप्रद रहस्यों को धारण करना चाहिये और इसके लिए अधिक ज्ञानवानों का संग करना चाहिये। इन तूफानों के सामने अध्यात्म पथ पर से पाँव उखड़ जाना तो दुर्बलता है।
पातंजलि ने विभिन्न परिस्थितियों में, आध्यात्मिक कष्ट, आधिदैविक या आधि-भौतिक क्लेष रूप विघ्न को 'दुःख' नाम दिया है तथा इच्छाओं की अपूर्ति से जो मानसिक क्षोभ अनुभव होता है उसे 'दौर्मनस्य' कहा है। इन दोनों विघ्नों को उसने उपविक्षेप माना है। परन्तु इसके निराकरण के लिए उसने ज्ञान के नुकते नहीं बताये, आध्यात्मिक साधन नहीं समझाये बल्कि उसने केवल यही कहा है कि मनुष्य को एक तत्व में मन टिकाना चाहिए और मित्रता, दया, प्रसन्नता तथा उपेक्षा को धारण करना चाहिए। परन्तु प्रश्न तो यह है कि मन लगता ही नहीं, परिस्थितियों ने उसे अपनी ओर आकृष्ट कर लिया है; अतः जब तक ज्ञान के द्वारा बुद्धि में बल, निश्चय और परिस्थिति के निराकरण की विधि स्पष्ट नहीं होगी तब तक वह मन को एक तत्व पर बाँधने में समर्थ कैसे हो सकेगी? पुनश्च, मित्रता, दया, प्रसन्नता तथा उपेक्षा मन में किस आधार पर टिक सकेंगे? किसी मनुष्य को व्यापार में एक लाख रुपयों की हानि हो गई तो प्रसन्नता तो उसकी उसी समय गुम हो गई जब उसे यह पता चला; अतः अब वह गँवाई हुई प्रसन्नता को कैसे धारण करे ? परमपिता परमात्मा शिव ने ऐसी हरेक परिस्थिति के लिए स्पष्ट विधि बताई है जिससे कि मनुष्य इन तथा अन्य सद्गुणों को धारण किये रह सकता है।
५. थकावट, उत्साह की कमी अथवा अरुचि
पुरुषार्थ पर चलते-चले कई बार मनुष्य का मन ऊब-सा जाता है। उसे ज्ञान के रहस्यों में से अब रस नहीं मिलता, योगाभ्यास में अरुचि उत्पन्न हो जाती है और वह नित्य-प्रति ब्रह्म मुहूर्त में उठना, स्नान करना, नियमों का पालन करना आदि-आदि के प्रति उदासीनता महसूस करता है। उसे कुछ थकावट अनुभव होती है और मन में यह प्रश्न उठता है "आखिर कब तक ऐसा ही करता रहूँगा....?" या तो वह देखता है कि "मैं इतने समय से काम, क्रोध इत्यादि को जीतने का पुरुषार्थ करता आया हूँ, परन्तु फिर भी मैं इसमें सफल नहीं हुआ हूँ, तब वह ऐसा सोचकर स्वयं को असमर्थ मानकर अकर्मण्यता की ओर झुक जाता है। योग-दर्शन में इस विघ्न अथवा विक्षेप को 'स्त्यान' नाम दिया गया है।
हमें चाहिये कि हम यह याद रखें कि हमारे ही कल्याण के लिये शिव बाबा प्रतिदिन सूर्य, चाँद और तारागण से भी परे के लोक परमधाम से आकर हमें ज्ञान तथा योग सिखाते हैं; तब क्या हम इन अनमोल वरदानों को प्राप्त करने के लिये भी थक गये हैं? क्या जन्म-जन्मान्तर के लिये इस अपरिमित कमाई से भी ऊब गये हैं? जबकि हमें यह बात भली-भाँति समझाई गयी है कि इस पुरुषार्थ से 21 जन्मों के लिये, 2500 वर्षों के लिये अथवा आधे कल्प के लिये सात्विक सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन से दुःख तथा अशान्ति का पूर्णतः अन्त हो जाता है, तब भला हमें थकावट या नीरसता का अनुभव कैसे हो सकता है? पुनश्च, अब हम यह भी जान चुके हैं तथा देख भी रहे हैं कि अब इस तमोप्रधान सृष्टि का महाविनाश एटम और हाइड्रोजन बमों द्वारा निकट भविष्य में होने वाला है, तब तो थकावट का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
यदि हम अपने संस्कारों को उस गति से बदल नहीं पा रहे हैं जिस गति से कि इन्हें बदलना चाहिये तब भी पुरुषार्थ न करने वालों के जीवन की अपेक्षा हममें कुछ तो परिवर्तन आया ही है, हम कुछ तो योगी बने ही हैं। अतः अभ्यास करते रहने से तो हम एक दिन सफल हो ही जायेंगे। परन्तु यदि हम पुरुषार्थ छोड़कर बैठ जायेंगे, तब तो आगे बढ़ नहीं पायेंगे। पुरुषार्थ करते-करते तो यह संस्कार ढीले पड़ ही जायेंगे। हमें चाहिये कि हम इन्हें कर्मों द्वारा व्यक्त न होने दें वर्ना ये पक्के हो जायेंगे और इनको मिटाना और ज़्यादा कठिन हो जायेगा। इनके प्रगट होने से तो हमें सोचना चाहिये कि हमें और भी अधिक तीव्र पुरुषार्थ की आवश्यकता है क्योंकि हमारे संस्कार बहुत कड़े हैं। इन्हें पवित्र करने का पुरुषार्थ छोड़ देना, स्वयं में असमर्थता अनुभव करना या योगी जीवन को नीरस महसूस करना तो गोया इन अपने ही संस्कारों से धोखा खाना, इनसे बाज़ी हार जाना सदा के लिये इन्हीं का गुलाम बने रहने को तैयार होना है। यह तो अज्ञान के लक्षण हैं, आध्यात्मिक शक्ति की कमी के चिह्न हैं। अतः हमें चाहिये कि हिम्मत न हार कर हम सतत, निरन्तर पुरुषार्थ पथ पर चलते चलें, आखिर मंजिल पर पहुँच ही जायेंगे, क्योंकि हमारा मार्ग-दर्शक समर्थ, सच्चा, सहायक और सम्पूर्ण ज्ञानवान् एक बाप ही है।
६. पूर्व कर्मों का हिसाब-किताब तथा
दूसरों के स्वभाव से टकराव
पिछले जन्मों के कर्म-खाते के कारण मनुष्य के सामने कई प्रकार के विघ्न आते हैं। किसी कार्य में सफ़लता नहीं मिलती, अधिक परिश्रम करने पर भी परिणाम सन्तोषजनक नहीं होता, खामख्वाह के झंझट आ पड़ते हैं, अवसर हाथ से निकल जाते हैं, अपने से बड़ों की दृष्टि में हम जँचते नहीं, हमारी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिये सहयोग और साधन नहीं मिलते और दूसरा कोई उन्हें पूर्ण करके यश पाता है। किसी से विचार नहीं मिलते तो मन में तनाव आता है और आरोप, उलाहने तथा वेदना का सामना करना पड़ता है। जिस कार्य में हाथ डालते हैं; उसमें रुकावटें आती तथा वह सूना सूना-सा हो जाता है, निराशा का सामना करना पड़ता है। जिनके प्रति स्नेह रखते हैं उनसे शुष्क व्यवहार मिलता है अथवा झाड़-झपट सुनने को मिलती है, जिन्हें मित्र और अवलम्बन मानकर बैठे हैं, वे पीठ फेर कर चल देते हैं। ऐसा मालूम होता है कि मित्र जनों में लौकिक या दैवी परिवार में हम पिछड़े हुए से, अभागे-से, अवहेलित अथवा परित्यक्त से हैं। जिनकी सुध-बुध लेने और जिन्हें सहयोग तथा उत्साह देने से सब दूर भागते हैं अथवा जिनको दुलार देने का भी किसी को विचार नहीं आता। यह सब देखकर मनुष्य का मन भरा-भरा-सा रहने लगता है और वह या तो सोचने लगता है कि "प्रभु! एक आप ही सहारा हो" और या इसके विपरित ही ऐसे संकल्प उठते हैं कि "प्रभो! आप भी मेरे लिये कुछ नहीं करते......"
परन्तु प्रभु क्या करें? हमारे अपने ही कर्मों का तो खाता है? हमने जो कुछ अच्छा किया है, जब उसका श्रेय हमें प्राप्त होता है, उसका सुख रूप फल हम पाते हैं तो अपने बुरे कर्मों का परिणाम भी तो हमारे ही सामने आयेगा? फिर धर्म-स्थापना के कार्य में विघ्न तो आते ही हैं, कठिनाइयों का सामना तो करना ही पड़ता है! राज्य-भाग्य स्थापित करने के कार्य में आलोचना तो सुननी पड़ती है, यहाँ तक कि थप्पड़ भी खाने पड़ते हैं। तो हम जो दैवी सृष्टि के चक्रवर्ती राज्य के लिये अथवा वैकुण्ठ के सम्पूर्ण सुखमय देवपद के लिये पुरुषार्थ कर रहे हैं, उसमें भी ये सब-कुछ तो हमें देखना ही पड़ेगा। अब परिश्रम, उद्यम तथा उत्साह से काम लेने से ही तो पिछले कर्मों के कष्टकारक परिणामों का हम सामना कर सकेंगे। अतः 'जो करेगा सो पायेगा' इस नियम को याद रखकर हमें करते चले जाना चाहिये और कोई हमें नहीं भी दुलारेगा, कोई हमारे पुरुषार्थ के लिये उत्साहप्रद दो वचन नहीं भी बोलेगा, कोई हमारी स्थिति को नहीं भी देखेगा तो क्या हुआ, प्रभु का हाथ हमारे सिर पर है। कर्म अविनाशी हैं; हमारा पुरुषार्थ हमारा साथ देगा, हम कठिनाइयों को पार करके जब सफ़लता के नगाड़े बजायेंगे तो लोग उसका गायन करेंगे। समय पर सब-कुछ ठीक हो जाता है, पुरुषार्थ की अवश्य विजय होती है, हिम्मत करने वाले को खुदा मदद देता है, साहस और सहनशीलता हमारा श्रृंगार है इन हित वचनों को ध्यान में रखते हुए यदि हम तीव्रवेगी पुरुषार्थी बने रहेंगे तो एक दिन अवश्य ही हम सफ़लता की सीढ़ी पर चढ़कर सम्पूर्णता को प्राप्त होंगे इसमें रिंचक भी सन्देह नहीं है।
७. मानसिक दण्ड
मनुष्य जब ईश्वराज्ञाओं का उल्लंघन करता है, दैवी मर्यादाओं को तोड़ता है, ज्ञान का अभिमान करता है, लोक संग्रह का ध्यान नहीं रखता है, ईश्वरीय यज्ञ की किसी प्रकार से हानि या ग्लानि का निमित्त बनता है तो उसकी बुद्धि को ताला लग जाता है। किये हुए बुरे कर्मों के प्रभाव से उसकी बुद्धि ज्ञान ध्यान की कुशलता को खोकर उलझन में पड़ी हुई सी लगती है। उसकी प्रगति रुक जाती है, खुशी गुम हो जाती है और किये हुए विकर्म के चिन्तन के कारण शिथिलता महसूस होती है। यह एक बहुत बड़ा विघ्न है। इससे आध्यात्मिक पुरुषार्थ अथवा योग रूप कमाई में घाटा पड़ जाता है। इसके निराकरण के लिये हमें चाहिये कि एक तो हम शिव बाबा के अथवा उन द्वारा निमित्त नियुक्त किये गये जो ज्ञानवान् बहन-भाई हैं, उनके समक्ष अपनी भूल को प्रायश्चित्त वृत्ति से रखकर मन को हल्का कर लें और अब विशेष रूप से योगाभ्यास करके उस भूल के शूल को निकाले। अन्तर्मुखता को धारण करने, ज्ञान-युक्त विनोद एवं सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने तथा आगे के लिये 'श्री-मत' अर्थात् प्रभु आज्ञा तथा ईश्वरीय शिक्षा के अनुसार चलने एवं योगाभ्यास से इन विघ्नों का निवारण हो जाता है।
८. व्याधि या शारीरिक शिथिलता
रोग, वृद्धावस्था, शारीरिक दुर्बलता अथवा प्रकम्पन इत्यादि भी मनुष्य के मन में शिथिलता, आलस्य अथवा बाधा उत्पन्न करते हैं। इनके लिये औषधि और उपचार तो करना ही चाहिये, परन्तु मन को अशान्त या क्षुब्ध नहीं होने देना चाहिये। इनके लिये यह सोचना चाहिये कि "ये बीमारियाँ अब अन्तिम विदाई लेने आयी हैं। अब तो मैं भोगी से योगी बना हूँ, अतः इसके बाद तो मैं सदा के लिये स्वस्थ तथा देवताओं के समान निरोगी काया प्राप्त कर लूँगा। इन द्वारा तो मेरे पूर्व कर्मों का खाता चुकता हो रहा है, अतः चिन्ता या दुःख की तो कोई बात ही नहीं, क्योंकि इससे तो मेरा ऋण चुकता हो रहा है। इस प्रकार, मनुष्य को सदा प्रसन्न-चित्त रहना चाहिये।"
उपर्युक्त में से कुछेक का वर्णन पातंजलि तथा अन्यान्य ने भी किया है। किसी ने इन्हें 'चित्त-विक्षेप', किसी ने 'अन्तराय', अन्य ने 'विघ्न' और दूसरे लोगों ने 'योग-प्रतिपक्षी' कहा है। परन्तु उन्होंने सभी विघ्नों का उल्लेख नहीं किया और उनके निवारण के लिये वह उपाय नहीं सुझाये जो परमपिता परमात्मा शिव ने सविस्तार समझाये हैं, जिनमें से कुछेक का संक्षिप्त उल्लेख ऊपर किया गया है।
निश्चिन्त
मानो एक राजकुमार का पिता एक बड़ी भूमि का मालिक है। अगर उस राजकुमार का सम्बन्ध अपने पिता से युक्त है तो क्या उसे कभी धन-धान्य इत्यादि की चिन्ता हो सकती है? उसके लिये ही तो उस राजा की समस्त राजाई तथा प्रजा है अथवा सुख सामग्री है। इसी प्रकार, जो मनुष्य स्वयं को त्रिलोकीनाथ, सर्वशक्तिमान्, सुखदाता पिता परमात्मा की सन्तान निश्चय करता है, तो क्या उसे भी कभी किसी बात की चिन्ता हो सकती है? वह तो नारायणी नशे में अथवा मौलाई मस्ती में ही हरदम रहता होगा, क्योंकि ऐसे निश्चय बुद्धि, स्नेह युक्त, मनुष्य पर ही तो परमपिता परमात्मा का सब-कुछ न्यौछावर है। बाप की प्रापर्टी (सम्पत्ति) बच्चे ही के लिये तो होती है? तो ऐसे समझो कि चिन्तायुक्त मनुष्यों को अभी परमात्मा पर निश्चय नहीं है; उसका परमात्मा से सम्बन्ध जुटा हुआ नहीं है! उसने अभी परमात्मा ही को अपने एकमात्र आधार के रूप में नहीं अपनाया अर्थात् अभी उसे परमात्मा की पहचान नहीं है और यह ज्ञान नहीं है, कि भले ही सच की बेड़ी डोलती है, परन्तु परमात्मा का सहारा लेने वाले की बेड़ी कभी भी डूबती नहीं है।
ज्ञानी मनुष्य तो तूफ़ानों और विघ्नों में निश्चिन्त रहता है। उसे तो एक ही चिन्ता रहती है कि मैं इस सृष्टि को पवित्र बनाने, सुखी करने, पिता परमात्मा की पहचान देने का निमित्त कैसे बनूँ, परन्तु इस शुभ चिन्ता को कोई 'चिन्ता' थोड़े ही कहा जा सकता है? यह तो लग्न है। जिस मनुष्य को ऐसी चिन्ता, ऐसी लग्न है, उसे और चिन्ता ही कौनसी हो सकती है? जबकि वह जानता है कि अनहोनी कभी होती नहीं और होनी हो के रहती है, तो वह मनुष्य पहले से ही व्यर्थ चिन्ता करके स्वयं को परेशान क्यों करे, ग़म का दाग़ क्यों लगावें और अपने ही जीवन को दुःखी बनाकर श्वास वृथा क्यों गँवाये ? वह तो सदा ज्ञान का चिन्तन करते हुये परमपिता परमात्मा की आनन्द की लहरों में सुख से विश्राम करता है। इस दुनिया में रहते हुए भी, मानो, वह अन्तर में निर्वाण और जीवन-मुक्ति का अनुभव करता है। इसलिए जब निश्चिन्त होकर ज्ञान का चिन्तन करेंगे तब आपको अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति होगी। जबकि अब हमको सारे संसार का खिवैय्या स्वयं परमपिता परमात्मा मिला है और अब चढ़ती कला (उन्नति) ही होनी है तो फिर हमें चिन्ता हो नहीं सकती। यही तो भोगी और योगी के जीवन में अन्तर है!
मान और शान की भूख
इस कलिकाल में यों तो सभी मनोविकार जोरों पर हैं, परन्तु ऐसा मालूम होता है कि एक-दूसरे की निन्दा करना अथवा एक-दूसरे के मत का खण्डन करना, एक-दूसरे के प्रस्ताव का विरोध करना, एक-दूसरे के दोषों को दर्शाना इस युग की प्रधान प्रवृत्ति है। आज मज़दूर निन्दा-भरे शब्दों में कहते हैं कि कारखानेदार लोभी और शोषक हैं। मिल मालिक भी ग्लानिपूर्ण शब्दों में कहते हैं कि मज़दूर जी लगाकर काम नहीं करते और उनके मन में न सहानुभूति है, न दूसरों के लिये सम्मान। संसद में अथवा विधान सभाओं में भी एक-दूसरे के प्रति निन्दा के प्रस्ताव (Censure motions) पेश किये जाते हैं अथवा विरोधी दल सत्तारूढ़ दल का विरोध करना ही अपना मुख्य कर्त्तव्य समझते हैं। उधर सत्तारूढ़ दल के सदस्य भी विरोधी दल के प्रतिनिधियों की गति-विधियों में दोष चुनने की कोशिश करते रहते हैं।
इसी प्रकार, विद्यार्थी कहते हैं कि आजकल के अध्यापकों में उन्हें उस महानता के दिग्दर्शन नहीं होते जो प्राचीन काल में अध्यापक वर्ग में थी और अध्यापक आजकल के विद्यार्थियों की निन्दा करते हुए कहते हैं कि उनमें अनुशासन तथा नैतिकता नहीं है, और तो क्या, धर्म-प्रेमी लोग, यहाँ तक कि कई 'ज्ञानी' कहलाने वाले लोग भी एक-दूसरे की निन्दा करने में नहीं थकते। वे किसी कार्य को सुचारु रूप से करने के लिए साक्षी-भाव से किसी के व्यक्तित्व का वर्णन कर रहे हों ताकि हम इस व्यक्ति से सोच-समझकर व्यवहार करें-ऐसा उनकी वाणी से प्रतीत नहीं होता, बल्कि लगता है कि कुछेक 'ज्ञानी' कहलाने वाले लोग भी दूसरों की निन्दा करने में एक प्रकार का सुख अनुभव करते हैं। आजकल तो संसार में हरेक के मन की ऐसी स्थिति हो गई है कि वह दूसरे का झट से अपमान कर देता है, फट से उसकी निन्दा करने लगता है।
स्तुति की लालसा
हाँ, हर कोई अपनी स्तुति सुनना चाहता है। अपने मान में जरा भी कमी होते देखकर वह भड़क उठता है अथवा रूठ जाता है; अपनी प्रशंसा सुनकर उसे विशेष खुशी का अनुभव होता है; दूसरे की प्रशंसा होती देखकर वह जल-भुन-सा जाता है और उसके दोष दर्शाने में तत्पर हो जाता है और अपने गुणों का, स्वयं ही 'मियाँ मिट्टू' बनकर, वर्णन करता है ताकि लोग प्रथम से घृणा करके उससे ही प्रेम करें। वह ऐसे-ऐसे कामों में हाथ डालना चाहता है जिससे उसका मान हो, उसका नाम हो। यदि उसके काम की कोई महिमा न करे तो वह काम को भी छोड़ देता है और यदि उसके काम में रही थोड़ी त्रुटी की ओर उसका कोई ध्यान खिचवाये तो उसे मित्र मानने की बजाय और उसे संशोधन तथा उन्नति का साधन मानने की अपेक्षा वह उस व्यक्ति से वैर करने लगता है। वह कहता है कि "मैं सेवा करना चाहता हूँ" परन्तु भीतर से चाहता यही है कि मेरी प्रशंसा हो, मेरा भी नाम हो। यों तो वह स्वयं को प्रभु अर्पित मानता है, परन्तु वह अपने कर्म को प्रभु-अर्पण नहीं करता। जैसे कई लोग मन्दिर के देवता के आगे प्रसाद चढ़ाने जाते हैं और अन्दर से चाहते हैं कि लोगों में यह चर्चा हो कि मैं भक्त हूँ, अथवा कि मैं पांच रुपये का प्रसाद हर सप्ताह चढ़ाता हूँ" वैसे ही वह भी चाहता है कि लोगों में यह बात फैले कि मैं बहुत ही ईश्वरीय सेवा करता हूँ।
हालत ऐसी हो गई है कि आज हरेक मनुष्य मान-शान का भूखा है। वह दूसरे की हरेक बात को सुनते समय यह सोचता रहता है कि कहीं उसने उसकी ग्लानि तो नहीं की। किसी के द्वारा थोड़ा-सा संशोधन मिलने पर वह एकदम भड़क उठता है। इतना ही नहीं, उसने जिस किसी से कोई कला सीखी हो, कोई गुण ग्रहण किया हो, कोई रहस्य अथवा विद्या उपलब्ध की हो उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की बात तो एक ओर रही, वह उसका नाम ही नहीं लेता, क्योंकि उसमें मान और शान की ऐसी अदृश्य तृष्णा है कि वह दूसरे को सहभोगी भी नहीं बनाना चाहता। यद्यपि यह एक प्रकार की चोरी है तथापि उसकी मान-लालसा उसे इस चोरी को भी पाप मानने नहीं देती। यह भी धर्मग्लानि के, देहाभिमान के और योग-च्युत अवस्था के ही तो लक्षण हैं।
मिथ्या अभिमान
देखा जाय तो मनुष्य के मन में मान-शान यह तृष्णा उसके अतृप्त अभिमान को सूचित करती है। योगी मनुष्य तो इससे दूर रहता है, क्योंकि वह भलीभांति समझता है कि उसके जीवन में प्राप्त सभी शक्तियाँ, कलायें, योग्यता और सिद्धियाँ ईश्वर प्रदत्त ही तो हैं। अतः वह मानता है कि मान तो वास्तव में दाता का होना चाहिये न कि भोक्ता का।
पुनश्च, यदि संसारिक दृष्टि से देखा जाय तो भी हरेक मनुष्य में जो क्षमतायें, विद्यायें अथवा कार्य-कुशलताएं हैं, वे किसी व्यक्ति से प्रशिक्षण द्वारा, समाज के प्रबन्ध से प्राप्त सुविधा द्वारा, माता-पिता, परिवार अथवा देश की व्यवस्था में प्राप्त अवसरों द्वारा, सहयोग द्वारा, संरक्षण द्वारा, सहानुभूति द्वारा एवं साधनों द्वारा ही तो हुई हैं। अतः मात-पिता, बन्धु बान्धव, मित्र सखा, राष्ट्र और समाज तथा पूर्वजों की कृतियों के ऋणी मानव को अभिमान एकदम मिथ्या, थोथा, निराधार और निरर्थक ही तो है। क्या कोई ऐसा मनुष्य है जो यह कह सके कि उसने किसी से कुछ नहीं सीखा, कोई साधन सहयोग, स्नेह-सहानुभूति, संरक्षण और सन्मार्ग नहीं पाया और कि वह केवल अपने ही बल-बूते पर बीज से वृक्ष या कली से पुष्प बना है? यह तो हो सकता है कि मनुष्य ने समाज से कुछ भलाई सीखी हो, कुछ बुराई भी, समाज से कुछ लिया हो और उसे कुछ दिया भी हो; परन्तु तराजू में डालकर देखने से नतीजा यही निकलेगा कि समाज के प्रति उसे कुछ देना ही बनता है, अर्थात् उस पर ऋण अधिक है। ऐसी स्थिति में मनुष्य का गर्व, उसकी मान की लालसा; दूसरों के प्रति उसकी अकृतज्ञता (Thanklessness), उसकी अज्ञानता ही का तो सूचक है।
मनुष्य में नम्रता तभी आती है जब वह अपने मन में यह समझता है कि मैं दूसरों का बहुत आभारी हूँ, विशेषकर जब वह यह महसूस करता है कि मेरे पास जो कुछ भी है प्रभु का दिया हुआ है। पुनश्च, लोगों द्वारा स्तुति सुनते समय भी जब उसकी बुद्धि में यह धारणा बनी रहती है कि यह जो महिमा हो रही है, यह वास्तव में गुण-दाता प्रभु की महिमा है अथवा यह स्वयं गुणों ही की महिमा है न कि मेरी, तभी वह स्तुति करने वालों से घिरा होने पर भी निराभिमानी स्थिति में टिका रह सकता है। इसके अतिरिक्त, जब वह अपने मन में उनके प्रति भी धन्यवादी तथा कृतज्ञ अनुभव करता है जिन्होंने कि उसको वह कला, विद्या, या गुण दिया, तब ही उसके मन में नम्रता का सद्गुण पनपता है वर्ना तो वह अभिमान के मारे योग के परम रस से दिनों-दिन वंचित होता जाता है और मान-शान की भूख में अधिकाधिक व्यवहारी ही बनता जाता है।
स्वमान और यश
हमारे इस सारे कथन का यह भाव नहीं है कि यश बुरी चीज़ है। जिस कार्य से यश फैलता है, प्रायः वह कार्य किसी दिव्य गुण पर आधारित होता है। अतः यश होने पर हमें यह मालूम होता है कि हमने अच्छा कार्य किया है। परन्तु हमें सदा कामना अच्छा कार्य करने की होनी चाहिये न कि यश की। यदि हमें यश की कामना रहेगी तब कई बार हमें निराशा का भी मुँह देखना पड़ेगा, क्योंकि बहुत बार अच्छे कार्य की भी लोग सराहना नहीं करते, कारण कि अच्छे कार्य का विरोध करने वाले भी संसार में बहुत लोग हैं। तब यश कामना वाला मनुष्य निरुत्साहित, (Frustrated) क्षीणमनसा एवं हतप्रभ स्थिति वाला होकर अच्छे कार्य को भी छोड़ देता है और आत्म-विश्वास को भी खो बैठता है। अतः वह मान और शान के पीछे अपने मन में अपना भी उचित मान (स्वमान) खो बैठता है और लोगों द्वारा भी अपमानित होता है क्योंकि लोग उसके बारे में कहने लगते हैं कि "यह तो किसी काम का आदमी नहीं है......."
अतः यदि दो शब्दों में इस चर्चा के सार का उल्लेख करना हो तो कहना होगा कि 1. मान और शान के पीछे मनुष्य को अपना योग-बल नहीं गँवाना चाहिये 2. उसे दूसरों का यथोचित कृतज्ञ होना चाहिये 3. स्वयं में जो गुण या शक्तियाँ हैं, उन्हें प्रभु-प्रदत्त अथवा समाज का फल मानकर नम्र स्वभाव का होना चाहिये 4. उस यश को भाग्य की अथवा कार्य की सफ़लता का सूचक मानना चाहिये परन्तु यश की जंजीरों में स्वयं को जकड़ना नहीं चाहिये 5. यश के गुणदाता प्रभु ही की कीर्ति मानकर साक्षी भाव में टिकना चाहिये और प्रभु ही को मन, वाणी, कर्म से धन्यवाद देना चाहिये कि उसने इस स्थिति तक पहुँचाया तथा 6. स्वमान को नहीं गँवाना चाहिये और मान के लिये भूखा नहीं रहना चाहिये।
प्रभु-अर्पण हो कर्म करो, जीवन सुखी बनाओ
यह सृष्टि एक रंगमंच है जहाँ सर्व आत्मायें अपने-अपने समयानुसार अपना-अपना पार्ट बजाती हैं। परन्तु ज्ञानी तू आत्मा सृष्टि नाटक को देखते हुए, अपने पुरुषार्थ रूपी कदम को आगे बढ़ाते और उनमें पद्म समाते सबकी आत्मिक सेवा कर उन्हें परमपिता शिव द्वारा प्रदत्त ज्ञान-योग से परिचित कर उन्हें भी मंज़िल (मुक्ति एवं जीवनमुक्ति) की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर देते हैं। परन्तु इस सन्मार्ग में आगे बढ़ने पर विकारों के प्रहार विभिन्न रूपों में आते ही रहते हैं। परन्तु एक तीव्र पुरुषार्थी इस सृष्टि रूपी नाटक में अपना पार्ट अदा करते हुए दूसरों के भी पार्ट को धैर्यवत हो देखता है। और, तभी वह अपनी स्व-स्थिति की स्थिति में स्थित रहते हुए, प्रसन्नचित्त रहते इस अनमोल जीवन को प्रभु मिलन के सुख एवं आत्मिक शान्ति के सरोवर में सराबोर होते हुए व्यतीत कर सकता है।
इस संसार रूपी नाटकशाला के दो प्रमुख अंग सुख एवं दुःख हैं जिनका कि इस पंच भौतिक शरीर से अटूट सम्बन्ध है। दुःख को कर्मभोग समझकर और परमपिता परमात्मा शिव से योगयुक्त होने पर उसकी पीड़ा की मात्रा अनुपाततः घट जाती है। शारीरिक कष्ट तो सहन करने ही पड़ेंगे, चाहे रो-रो कर सहें या ड्रामा, नियति या कर्मफल को सामने रखकर सहें। सहने में फर्क सिर्फ इतना ही है कि शारीरिक कष्ट भोगी रो-रो कर काटता है, जबकि योगी हँस-हँस कर।
शारीरिक दुःख अथवा कष्ट का मानसिक स्थिति से बड़ा ही घनिष्ट सम्बन्ध है। कभी-कभी ऐसा होता है कि थोड़े से शारीरिक कष्ट का मन्सा में तूफान मच जाने के कारण वह असह्य हो जाता है जबकि आत्मिक स्थिति एवं परमात्मा याद में बड़े से बड़ा कष्ट भी नगण्य प्रतीत होता है। कहने का भाव यह है कि आत्मिक उन्नति में एवं योगाभ्यास में हमारी मानसिक स्थिति का विशेष स्थान है। वस्तुतः ऐसे मौके पर योगी की धैर्यवत अवस्था की परीक्षा होती है और उसकी सहन-शक्ति भी बढ़ती है।
जब कभी हम किसी से स्वयं के साथ इतने अच्छे व्यवहार की आश रख बैठते हैं, जिसे वह कर सकने में असमर्थ होता है, तो हम दुःखी हो जाते हैं, मन अशान्त हो जाता है। कभी हम दूसरों को उनकी इच्छानुसार तृप्त नहीं कर पाते तो भी मानसिक दुःख भासता है। एक कहावत है कि "जो सबको खुश रखना चाहता है, वह किसी को भी खुश नहीं रख सकता।" (He who wants to please all, will please none.) लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि यदि हम सबको खुश नहीं रख सकते तो रुष्ट रखें। नहीं, सबको भाई-भाई की आत्मिक दृष्टि से देखते हुए, कल्याणकारी भाव रखते हुए भरपूर स्नेह एवं सहयोग दें। फिर यह उसके ऊपर निर्भर करता है कि उसने इसे कितना मूल्य दिया है, किस लक्ष्य से आंका है। आत्मोन्नति के लिए एक गुह्य सूत्र है - प्रभु से साफ दिल रहना। हमारी मनसा, वाचा, कर्मणा तथा दिल प्रभु के समक्ष दर्पण हो। हम पवित्र हृदय से एवं शिव बाबा की याद में, साखी, साक्षी एवं साथीपने की दृष्टि रखते हुए कर्म करते चलें और फिर भी यदि कोई सन्तुष्ट नहीं होता तो यह हमारा अपराध नहीं है।
जैसे एक किसान अपनी सन्तुष्टतानुसार खेत जोतकर बीज डाल देता है। फिर उसमें से कैसे और कितनी पैदावार होगी यह उसके अधीन नहीं। ठीक यही हाल हमारे कर्मों का है जिसे ड्रामा की भावी पर छोड़ निश्चिन्त हो रहना चाहिए। ज्ञानी तू आत्मा सृष्टि-नाटक में एक्टर की तरह काम करता है और वह अपने पात्र तथा चीज़ों में आसक्त नहीं होता। ऐसी हमारी स्थिति होनी चाहिए।
सबसे ऊंची अवस्था यह है कि प्रत्येक कर्म हम निमित्त भाव से ईश्वरार्पण करते हुए करें। शिव बाबा ही हमसे करवा रहे हैं, मैं नहीं कर रहा हूँ और मुझ में करने की क्षमता भी नहीं है, इससे अहम् भाव खत्म हो जायेगा।
संसार में दुःख और अशुभ क्यों है ?
हम देखते हैं कि संसार में तीन प्रकार के दुःख, कष्ट अथवा अशुभ का अस्तित्व है एक तो दैहिक, जैसे कि शारीरिक रोग, पीड़ाएं, दर्द, मृत्यु आदि और दूसरे, दैविक, जैसे कि भूकम्प, बाढ़, अतिवृद्धि, अनावृद्धि आदि और तीसरे, आध्यात्मिक, अथवा मानसिक जैसे चिन्ता, अशान्ति, वेदना, तनाव आदि। कुछ लोग अशुभ का इस प्रकार वर्गीकरण न करके सत्यं शिवं सुन्दरं के विरोधी भाव असत्य, पीड़ा, कुरूपता तथा पाप को ही अशुभ के चार विशेष रूप मानते हैं। परन्तु अशुभ का वर्गीकरण चाहे किसी तरह भी किया जाय, अशुभ का अस्तित्व तो संसार में स्पष्ट है और झूठ, चोरी, अन्याय, आतंक, दरिद्रता, प्राकृतिक प्रकोप आदि से मनुष्य को कष्ट होते स्पष्ट दिखाई देते हैं। इन्हीं के निवारण के लिये व्यक्ति, संस्थाएं और सरकारें दिन-रात पुरुषार्थ करती रहती हैं। इन्हीं दुःखों आदि से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये ही अनेक धर्म, मत, वाद तथा सम्प्रदाय स्थापन हुए हैं। परन्तु यदि हम संसार के इतिहास को, विशेषकर धर्मों और दर्शनों के इतिहास (History of Religions and Philosophies) को उठाकर देखें तो हमें मालूम होगा कि संसार में दुःख और अशुभ (Sufferings and Evils) के अस्तित्व और उनके कारण के बारे में जो अनेक दर्शनों और धर्मों की मान्यताएं हैं, वे बड़ी विचित्र हैं। उनके बारे में कोई सन्तोषजनक उत्तर न होने के कारण ही बहुत से तर्कशील मनुष्यों की श्रद्धा ही धर्म से उठ जाती है और वे धर्म-विश्वासी लोगों को 'अन्ध श्रद्धालु' की संज्ञा देते हैं। संसार में दुःख, बुराई, पाप, मनोविकार अथवा अशान्ति क्यों है? इस प्रश्न को लेकर संसार के कुछ मुख्य धर्मों की जो मान्यताएं हैं, उन पर हम विचार करके देखेंगे कि तर्कशील मनुष्य उससे सन्तुष्ट क्यों नहीं होते।
संसार में अशुभ क्यों हैं?
अब बहुत से ईश्वरवादी धर्म मानते हैं कि यह पृथ्वी, सूर्य, चाँद आदि संसार परमात्मा ने रचा और कि परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक तथा दयालु और प्रेममय हैं। उनसे जब यह प्रश्न किये जाते हैं कि "यदि परमात्मा सर्वज्ञ भी है और सर्वशक्तिमान् भी तो उसने जो सृष्टि बनाई उसमें अशुभ एवं दुःख क्यों है? परमात्मा ने ऐसी दुःखमय सृष्टि बनाई क्यों? यदि परमात्मा इस संसार से दुःख को मिटा नहीं सकता तो वह सर्वशक्तिमान् नहीं है और यदि उसे पता नहीं था कि संसार की रचना करने पर उसमें ऐसा दुःख होगा तो वह सर्वज्ञ सिद्ध नहीं होता और यदि वह सर्वशक्तिमान् भी है तथा सर्वज्ञ भी है तब भी यदि वह अशुभ का अन्त नहीं करता तो इसका अर्थ यह है कि वह दयावान नहीं है। बल्कि अनिष्टकारी है। तव परमात्मा के स्वरूप के बारे में क्या माना जाय?" ये जो प्रश्नों की झड़ी लग जाती है, इसके उत्तर विभिन्न धर्म विभिन्न प्रकार से देते हैं; इसलिए धर्मों में अनेकता है। यहाँ हम कुछ उदाहरण देंगे।
शैतान या अहर्मान के अस्तित्व की मान्यता
ईसाई धर्म और मुहम्मदी धर्म तो यह मानते हैं कि संसार की रचना तो परमात्मा ने की और परमात्मा है भी दयावान परन्तु परमात्मा के अतिरिक्त 'शैतान' (Devil) नामक एक 'फरिश्ते' (Angel) का अस्तित्व है जो परमात्मा से बाग़ी हो गया था। वही मनुष्यों को वरग़लाता है और दुःख उत्पन्न करता है। इसी प्रकार पारसी लोग अहुर्मज्ञदा (परमात्मा) के अतिरिक्त अहर्मान का भी अस्तित्व मानते हैं जो कि अशुभऔर कष्ट लाता है। इसका अर्थ तो यह है कि परमात्मा की शक्ति सीमित है, क्योंकि उसके अलावा एक शक्तिशाली और भी है जिसका वह पूर्णतः अन्त नहीं कर सकता और जिसके बारे में उसे पहले से मालूम नहीं था कि वह बाग़ी हो जायेगा और लोगों को वरगलायेगा।
दूसरी प्रकार के ईश्वरवादी लोग कहते हैं कि परमात्मा है तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और दयालु और उसी ने ही जगत की रचना की है। वास्तव में दुःख और अशुभ नहीं है। उनका कथन है कि जैसे माता अपने किसी बच्चे को पीटती है तब उस बच्चे को तो पीड़ा अनुभव होती है परन्तु उस दण्ड से वह बच्चा सुधर जाता है और उसका शेष सारा जीवन शुभ बन जाता है। अतः यदि समस्त जीवन को सामने रखा जाय तो अशुभ वास्तव में अशुभ नहीं, क्योंकि अशुभ मनुष्य को बुरे कर्म से बचने और अच्छाई की ओर बढ़ने में सहायक होता है। परन्तु इस व्याख्या को सुनकर तर्कशील लोग कहते हैं "परन्तु कितने ही मनुष्य ऐसी अशुभ परिस्थिति में होते हैं कि वे आत्महत्या भी कर डालते हैं। अन्य कितने लोग ऐसे भी होते हैं जो अशुभ से घिरे होने पर अधिक ही पतन की ओर अग्रसर होते हैं। हम तो संसार में प्राकृतिक तथा नैतिक अशुभ को बढ़ते हुए ही देखते हैं; संसार में अशुभ भला शुभ की ओर ले जाने में कहाँ निमित्त बन रहा है? अच्छा यदि अशुभ मनुष्य को शुभ की ओर प्रेरित करने का निमित्त बनता है जैसे कि माता द्वारा बच्चे को दिया गया दण्ड उसमें सुधार लाता है तो क्या परमात्मा को इतना कठोर साधन अपनाना पड़ता है? उसके पास इससे अधिक सरल और कष्ट-रहित और कोई साधन नहीं है? फिर, प्रश्न तो यह है कि परमात्मा ने ऐसी सृष्टि रची ही क्यों जिसमें अशुभ इतना अधिक है? ऐसी सृष्टि रचने से उसका क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? यदि परमात्मा सम्पूर्ण है तो उसने ऐसी अपूर्ण सृष्टि क्यों रची?" उनका कथन है कि यदि अशुभ शुभ के निर्माण में सहायक है तब तो मनुष्य उसके निवारण का प्रयत्न ही क्यों करे और यदि वह ऐसा प्रयत्न नहीं करेगा तब तो संसार में अशुभ की वृद्धि ही होगी? इन प्रश्नों का उत्तर संसार में ईश्वरवादी धर्म नहीं दे सकते।
अद्वैतवादी क्या कहते हैं?
संसार में 'अशुभ' के बारे में अद्वैतवादियों की मान्यता सबसे विचित्र है। अद्वैतवादियों के अनुसार ईश्वर अथवा ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है और इसके सिवा दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं। इसके अनुसार तो जगत भी मिथ्या है और संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह भी भ्रान्ति अथवा कल्पना है। अतः उनकी विचित्र मान्यता यह है कि अशुभ का भी अस्तित्व नहीं है और अज्ञान के कारण उसे अशुभ की प्रतीति मात्र होती है।
अब यह कितनी विचित्र बात है कि कोई मनुष्य भूख से पीड़ित हो और हम उसे कहें कि भूख कल्पित है अथवा किसी के सर पर कड़ी चोट आयी हो और हम कहें कि दर्द केवल अज्ञानता ही के कारण भ्रम मात्र है और आत्मा तो सुख-दुःख से अतीत है। इस अद्वैतवादी व्याख्या से मनुष्य न तो अशुभ से छूटने का पुरुषार्थ कर सकता है, न अशुभ और शुभ के स्वरूप को जान सकता है और न ही उसे इससे राहत मिलती है। क्योंकि दुःख-दर्द से कराहते हुए मनुष्य को यह कहने से कि उसका दुःख कल्पित है, उसे शान्ति नहीं मिलती बल्कि उसके जखम पर नमक पड़ता हुआ मालूम होता है।
पुनश्च, यदि इस व्याख्या पर दार्शनिक दृष्टि से विचार किया जाय तो प्रश्न उठता है कि यदि अशुभ है ही नहीं तब तो फिर शुभ भी नहीं रहा क्योंकि शुभ तो अशुभ की तुलना में ही 'शुभ' कहला सकता है। इसके अतिरिक्त, जिस तर्क और बुद्धि के आधार पर अद्वैतवाद अशुद्ध को प्रतीतिमात्र मानता है, उस आधार पर तो शुद्ध को भी प्रतीति अथवा कल्पना सिद्ध किया जा सकता है। तीसरे, अद्वैतवाद इस प्रश्न का भी सन्तोषजनक निराकरण नहीं करता कि यदि एक पूर्ण ब्रह्म है और ज्ञानस्वरूप है तो दुःख की प्रतीति क्यों होती है और वह अज्ञानता से आवृत्त क्यों होता है और यदि स्वयं ब्रह्म को स्वेच्छा ही से ऐसी प्रतीति होती है तो फिर इससे मुक्त होने के पुरुषार्थ की क्या आवश्यकता है और उसका संकल्प कौन करता है? अद्वैतवादी कहते हैं कि 'माया' जो ही जीव को आवृत्त किए हुए है, स्वयं ईश्वर अथवा ब्रह्म ही की एक शक्ति है और इसी के कारण जीव अज्ञानता अथवा अविद्या से ढका हुआ है। यदि ऐसा है तव भी भाव तो यही हुआ कि स्वयं परमात्मा ही ने जीव को दुःख के वशीभूत किया है। अतः फिर भी वही प्रश्न बना रहता है कि पूर्ण परमात्मा ने ऐसा क्यों किया ? इसका उत्तर वे नहीं दे पाते।
हाँ, कई अद्वैतवादी कहते हैं कि परमात्मा ने लीला करने के लिए ऐसा किया। इस विषय में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के निम्नलिखित शब्द पढ़िये-
"सभी ईश्वर के अधीन हैं। उन्हों की लीला है। उन्होंने अनेक वस्तुओं की रचना की है छोटी-बड़ी, भली-बुरी, मज़बूत कमज़ोर, अच्छे आदमी-बुरे आदमी। यह सब उन्हीं की माया है, उन्हीं का खेल है। देखो न बगीचे में सभी पेड़ बराबर नहीं होते।" इसमें अद्वैतवादी विचारधारा का स्पष्ट उल्लेख है कि अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के मनुष्य भगवान ने रचे हैं। अतः वही प्रश्न फिर सामने आता है कि ईश्वर ने बुरे
मनुष्य क्यों रचे हैं और ऐसी लीला क्यों की जिसमें दुःख है?
इस प्रकार, हम देखते हैं कि परमात्मा और अशुभ के बारे में कहीं भी सन्तोषजनक व्याख्या नहीं मिलती।
स्वयं परमपिता परमात्मा द्वारा प्राप्त स्पष्टीकरण
अब परमपिता परमात्मा ने स्पष्ट किया है कि हरेक आत्मा परमात्मा से अलग अस्तित्व रखती है और हरेक के संस्कार, विचार तथा कर्म अलग हैं और उन अपूर्ण एवं अल्पज्ञ आत्माओं के अपने-अपने मनोविकारों के परिणामस्वरूप ही संसार में अशुभ अथवा दुःख का अस्तित्व है। उन्होंने समझाया है कि उन्होंने जिस संसार की रचना की थी, उसमें अशुभ नाम मात्र भी न था, बल्कि उसमें पूर्ण पवित्रता, सुख और शान्ति थी। पुनश्च, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने सूर्य, चाँद, पृथ्वी आदि की रचना नहीं की बल्कि पूर्व कल्प की अत्यन्त अशुभ एवं दुःख वाली सृष्टि को सतयुगी शुभ सृष्टि में परिवर्तित किया। इस व्याख्या से परमात्मा ज्ञान, शान्ति, आनन्द और प्रेम आदि गुणों से सदा युक्त सिद्ध होते हैं और प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्नों का भी समाधान मिल जाता है। इस बात को जानकर मनुष्य निर्विकार बनने का पुरुषार्थ भी करता है और आगे के लिए बुरे कर्मों से बचने का भी। इससे परमात्मा पर कोई दोष भी नहीं आता और सद्गुणों तथा नैतिक मूल्य रूपी शुभ का यथार्थ बोध भी होता है।
श्री.म. श्रीरामकृष्ण वचनामृत प्रथम भाग, पृष्ठ २७६
अच्छे पुरुषार्थी के लिये कुछ लाभदायक बातें
यादें तो ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग का मार्ग बहुत रुचिकर, सहज और कल्याण-कारी है, परन्तु फिर भी किन्हीं कारणों से कुछ व्यक्ति कुछ समय के बाद ढीले, पुरुषार्थहीन अथवा उत्साह-हीन होने लगते हैं। वह कारण क्या है और वह कौन-सी बातें हैं जिन पर हमारा ध्यान बना रहे ताकि हमारे पुरुषार्थ में सुस्ती, थकावट आदि न आये, उनकी चर्चा यहाँय की गयी है।
१. माया से हमारा युद्ध है
सबसे पहली बात तो हरेक पुरुषार्थी को अपने मन में यह धारण करनी चाहिये कि "अब हमने माया अर्थात् अज्ञान और विकारों से युद्ध करने की ठानी है, अतः माया, जिसको कि हमने अपना शत्रु माना है, की ओर से हमारे मार्ग में रुकावटें आयेंगी अवश्य। वह रुकावटें अथवा विघ्न ऐसे होंगे जो कि ईश्वर से हमारा हाथ छुड़ाकर माया के पंजे में फंसाने वाले होंगे। यह बात याद रखते हुए हमारा पुरुषार्थ प्रतिक्षण, प्रतिपल यही होना चाहिये कि हम इस ईश्वरीय मार्ग से न हटें।"
सभी जानते हैं कि युद्ध के समय शत्रु की एक बड़ी कोशिश यही रहती है कि विरोधी की रसद अथवा सप्लाई लाइन (Supply Line) काट दी जाय। अब ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग मार्ग के हम पुरुषार्थियों के लिये सहायता का क्षेत्र हमारी दैनिक ज्ञान-कक्षा (Class) ही है। अतः हरेक पुरुषार्थी को सदैव यह संकल्प दृढ़ रखना चाहिये कि चाहे क्या भी हो, चाहे हमारे लौकिक 'मित्र सम्बन्धी' विघ्न डालें या हमारी अपनी शारीरिक अथवा मानसिक सुस्ती हो या हमारे सहपाठियों द्वारा किसी रूप में भी कभी हमारे सामने कोई रुकावट आवे, चाहे हमारे अपने ही विकल्पों के कारण हम योग-निष्ठ न हो सकते हों, हमें प्रतिदिन क्लास (Class) अवश्य करना है, अर्थात् इस ईश्वरीय ज्ञान के शिक्षा केन्द्र पर अवश्य जाना है।
२. माया के अनेक रूपों की पहचान
प्रश्न उठता है कि 'माया' की पहचान क्या है? देखा जाय तो ईश्वर को पहचानना सहज है, परन्तु माया को पहचानना अधिक कठिन है, क्योंकि माया बहुरूपिणी है। परन्तु एक बात स्पष्ट है कि "जो भी बात ईश्वरीय ज्ञान से अथवा ईश्वर से हटाती है वह 'माया' है।"
मनुष्य को पहले तो सांसारिक लोगों से तथा अज्ञानियों की ओर से ही विघ्न आते हैं, परन्तु बाद में ज्ञान-मार्ग पर चलने वाले कुछेक व्यक्तियों की ओर से भी उसके सामने कुछ परीक्षाएं या कुछ कठिनाइयां उपस्थित हो सकती हैं। कई मनुष्य अज्ञानी लोगों द्वारा सामने आये विघ्नों को तो दृढ़ मन्सा से पार कर लेते हैं, परन्तु ज्ञान-मार्ग के अपूर्ण पुरुषार्थियों द्वारा आने वाली कठिनाइयों के सामने वे रुक जाते हैं यह उनकी कमज़ोरी होती है। अच्छे पुरुषार्थी को उन्हें भी सफ़लतापूर्वक पार करना चाहिये।
फिर, मनुष्य को अपनी ही देह की ओर से भी कुछ रुकावटों का सामना करना पड़ता है। दैहिक रोग एक प्रकार का विघ्न ही है। यह मार्ग तो बहुत सहज है, परन्तु अपने ही कर्मों के आधार पर इस रास्ते में चलते-चलते दैहिक हिसाब-किताब आदि सामने आते हैं तो कठिनाई का अनुभव होता है। ऐसी परिस्थिति में अच्छे पुरुषार्थी को याद रखना चाहिये कि वर्तमान जन्म हमारा अन्तिम जन्म है, हमें 63 जन्मों के विकर्मों का खाता चुकता करना है और यह पुरुषार्थ करना है कि धर्मराजपुरी में पूर्व काल में किये विकर्मों का दण्ड न भोगना पड़े, बल्कि उन्हें यहीं चुक्ता करके हम 21 जन्मों के लिये स्वर्गिक सुख पा सकें। तो स्पष्ट है कि शारीरिक रोग आदि-आदि के रूप में विघ्न तो आयेंगे ही। आर्थिक कठिनाई भी होगी ही, और भी परीक्षाएं होंगी ही। इस बात को याद रखने से अच्छा पुरुषार्थी दृढ़ता से चलता चलेगा और डिगेगा नहीं। वर्ना कई पुरुषार्थी अज्ञानता-वश कहते हैं "हम शिव परमात्मा का ज्ञान तो प्रति दिन सुनते हैं, यथा-योग्य इस ईश्वरीय सेवा कार्य में सहयोग भी देते हैं, फिर भी शिव बाबा (परमपिता) हमारी सहायता नहीं करता! शायद परमपिता शिव यह नहीं चाहता कि हम ज्ञान मार्ग पर चलें, शायद इस सृष्टि रूपी नाटक में, इस ज्ञान-मार्ग पर चलने का हमारा पार्ट (Part) नहीं है!" इस प्रकार, माया उनके मन में आती है और वे उसे न पहचान कर, ज्ञान-मार्ग को छोड़कर अपना भाग्य गँवा बैठते हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि पुरुषार्थ के प्रारम्भिक दिनों में मनुष्य को बहुत खुशी, बहुत उल्लास और बहुत शक्ति का अनुभव होता है, परन्तु कुछ समय के बाद वे अपनी प्रगति में तीव्रता न पाकर निराश से होने लगते हैं। वास्तव में बात यह है कि पुरुषार्थ के प्रारम्भिक दिनों में परमपिता शिव परमात्मा की विशेष सहायता पुरुषार्थी को मिलती है, ताकि वह ज्ञान-मार्ग पर चलने का साहस करे, परन्तु धीरे-धीरे उसे अपने हौ पाँव पर खड़ा करने के लिये कभी-कभी उतनी सहायता नहीं भी मिलती। वास्तव में यह सब होता तो पुरुषार्थी के अपने ही कल्याण के लिये है, परन्तु इस रहस्य को न समझने के कारण कोई-कोई पुरुषार्थी डाँवाडोल हो जाता है यह उसकी ग़लती है। कभी-कभी तो मनुष्य अपने सहगामियों से पूर्ववत अथवा अधिक स्नेह और सम्मान न मिलने जैसी मामूली बात के परिणामस्वरूप भी ज्ञान मार्ग से पीछे हटने सा लगता है, परन्तु सोचने की बात यह है कि इसमें मार्ग की क्या कमी है? मार्ग तो ठीक ही है, परीक्षाएं भी हर प्रकार की आनी ही हैं, अतः 'पुरुषार्थ' तो उन्हीं का सामना करने का नाम है।
माया का एक विकराल रूप और भी हैं। जब कोई पुरुषार्थी किसी चिरकालीन पुरुषार्थी में कोई कमज़ोरी या त्रुटि देखता है तो कभी वह घबराकर, उत्तेजित होकर या निरुत्साहित होकर यह संकल्प कर लेता है कि जब इतने वर्षों में भी इसमें यह कमी नहीं गयी तो क्या फायदा? वास्तव में ऐसा विचार भी ग़लत और हानिकारक है, क्योंकि हमें तो यह ईश्वरीय शिक्षा मिली है कि दूसरों के पुरुषार्थ की ओर हमें नहीं देखना चाहिये और यदि हम देखते भी हैं तो उनके गुणों को ही देखना चाहिए वर्ना तो हमें सदैव प्रजापिता ब्रह्मा तथा जगदम्बा सरस्वती को या परमपिता परमात्मा शिव को ही अपने सामने रखना चाहिए।
यज्ञ के लिये मन, वचन और शरीर से कोई कार्य
अच्छे पुरुषार्थी को एक बात यह भी ध्यान में रखनी चाहिये कि जैसे-जैसे वह इस ईश्वरीय पढ़ाई में आगे बढ़ता है, उसे तन, मन और धन से कोई सेवा भी करनी चाहिये। वास्तव में यह सेवा ही उसके लिये अब आत्मिक खुराक सिद्ध होगी। जैसे बच्चे से बड़ा होकर मनुष्य के भोजन की मात्रा भी बढ़ जाती है, वैसे ही हम भी इस पढ़ाई में जितने पुराने अथवा बड़े होते जाते हैं, हमें भी उतनी ही अधिक सेवा करनी चाहिये।
३. परीक्षाएं बड़ी होती जायेंगी, उन्हें पार करना है
अच्छे पुरुषार्थी को यह याद रखना चाहिये कि हम पढ़ाई पढ़ रहे हैं। जैसे बच्चा किडरगार्डन (K.G.; बाल-विहार) पढ़ने के बाद आगे-आगे पढ़ता है तो मैट्रिक, एफ.ए., बी.ए., एम.ए., पी.एच.डी. डॉ. आदि-आदि उत्तरोत्तर बड़ी परीक्षाएं उसे पार करनी पड़ती हैं, वैसे ही इस ईश्वरीय ज्ञान में भी होता है। दिनोंदिन हमारे सामने बड़ी परीक्षाएं आयेंगी, वह हमें ही अनुभवी बनाने के लिये हैं। हमें उन्हें पार करने का यत्न करना चाहिये। यदि हम असफ़ल भी होते हैं तो भी हमें घबराना नहीं चाहिए।
इस प्रकार अंगद की तरह दृढ़ता से हमें ज्ञान मार्ग पर अपना पांव जमाना चाहिये। माया हमारे पग को हिलाने की कितनी ही कोशिश क्यों न करे हमें दृढ़ और अडिग रहना चाहिये। कभी भी संशय न लाकर हमें "एक बल, एक भरोसे" ही का आधार लेना चाहिये। ऐसा करने पर भले कठिनाइयाँ आयेंगी परन्तु माया हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी !
कष्ट के लिए क्षमा कीजियेगा
आज लोग जब किसी को कोई कार्य करने के लिए कहते हैं तो कार्य प्रारम्भ होने से पहले अथवा कार्य हो चुकने के बाद वे उसे यह भी कहते हैं कि "कष्ट के लिये क्षमा कीजियेगा।" उर्दू भाषा-भाषी कहते हैं "तकलीफ़ माफ़ !" अंग्रेज़ी बोलने वाले लोग कहते हैं "प्लीज़ ऐक्सक्यूज़ मी फॉर दिस ट्रबल" (Please excuse me for this trouble) ऐसा कहना आजकल के शिष्टाचार में शामिल है। वह वर्त्तमान सभ्यता का प्रतीक है। परन्तु प्रश्न उठता है कि हम ऐसा क्यों कहते हैं?
ध्यान दीजिए कि जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को कोई कार्य देते हुए कहता है कि "कष्ट के लिए क्षमा कीजियेगा," तो दूसरा व्यक्ति इन पांच उत्तरों में से ही प्रायः कोई-न-कोई उत्तर देता है-
पाँच प्रकार के उत्तर
या तो वह कहता है "अजी वाह, कष्ट की क्या बात है, यह कोई केवल आपका कार्य थोड़े ही है, यह तो हमारा भी कार्य है। अपने कार्य के लिए क्या कष्ट?" ऐसा उत्तर प्रायः तब मिलता है जब दोनों व्यक्ति एक ही परिवार, धर्म, जाति, संस्था आदि के हों या व्यापार आदि में साझीदार हों या कार्य में दोनों की दिलचस्पी हो।
कई बार ऐसा उत्तर भी मिलता है "नहीं, नहीं, इसमें कष्ट की तो कोई बात ही नहीं, यह तो हमारा कर्त्तव्य है। इसे करने से हम आप पर कोई एहसान थोड़े ही करेंगे? यह तो हमें करना ही चाहिए।" यह उत्तर तब मिलता है जब कार्य देने वाले ने "कष्ट के लिए क्षमा" ऐसा कह तो दिया हो, परन्तु वास्तव में उस कार्य में उसका अपना कोई स्वार्थ न हो, बल्कि वह दूसरे व्यक्ति को चतुराई से उसका कर्त्तव्य बता रहा हो यह कर्त्तव्य किसी दफ्तर का कर्मचारी होने के नाते या अन्य किसी कारण से हो सकता है।
कभी-कभी ऐसा भी उत्तर सुनने को मिलता है "लो, आप यह क्या कह रहे हैं! इस कार्य को करने में तो मेरा अपना ही लाभ है। इसमें तो कष्ट का प्रश्न ही नहीं उठता।"
यह उत्तर भी कई लोग देते हैं "नहीं, नहीं, कष्ट की कोई बात नहीं, यह तो खुशी की बात है। मैं इस कार्य को जरूर करूँगा! आप तो हमारे मेहरबान हैं। आपके तो हम पर बहुत एहसान हैं।"
एक उत्तर यह भी होता है "कोई बात नहीं, कर दूँगा! जब कोई कार्य करना ही है तो कष्ट या न-कष्ट की क्या बात है? आप भी तो हमारी सहायता करते ही हैं!"
ऊपर जो पहले चार उत्तर दिये गये हैं, उनसे स्पष्ट है कि जब हम किसी व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य करने के लिए कहते हैं जो कि देश, धर्म, संस्था, परिवार या साझे व्यापार आदि-आदि के हित के लिये अर्थात् सामूहिक हित के लिए हो तो उस व्यक्ति को कोई कष्ट अनुभव नहीं होता। जिस कार्य को करना उसका कर्त्तव्य हो अथवा जिसे करना उसके अपने लिए लाभकर हो, उसे करने में भी वह कष्ट नहीं मानता। यदि किसी व्यक्ति ने उसका उपकार किया हो, उसे स्नेह और सहायता दी हो, उसका कार्य करने में भी वह खुशी मानता है। वह कष्ट तो केवल तव मानता है जब कोई व्यक्ति विना अधिकार के उससे निजी लाभ के लिये कार्य लेने की चेष्टा कर रहा हो।
इसके अतिरिक्त, मनुष्य को कष्ट तब भी अनुभव होता है जब उसकी अपनी परिस्थितियों, सामर्थ्य तथा अभिरुचियों का ख्याल न करके ज़बरदस्ती उस पर कोई कार्य लादा जा रहा हो।
इनका निष्कर्ष
इन सभी बातों पर विचार करते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जहाँ तक सम्भव हो सके मनुष्य को एक तो अपने निजी कार्य के लिए अन्य किसी को नहीं कहना चाहिए। बहुत मजबूरी की हालत में ही अपने लिए दूसरे को कोई कार्य कहना चाहिए। अपने लिए दूसरों को कष्ट देने से सचमुच हम पर कर्मों का बोझ चढ़ता है; हम कष्ट के भागी बनते हैं। "कष्ट के लिए क्षमा" या "मैं आपका एहसानमन्द हूँ" ऐसा कहने से कर्म का बोझ नहीं उतर जाता।
दूसरे, किसी को कार्य देते समय उसकी परिस्थितियों आदि की ओर भी हमें थोड़ा ध्यान देना चाहिए। मनुष्य को यह कोशिश करनी चाहिए कि जिसे कार्य दिया जा रहा है, वह उस कार्य को भार न समझे, उसे उस कार्य को करने में कष्ट न अनुभव हो, बल्कि खुशी हो अथवा उसमें उसकी कर्तव्य-भावना रहे। परन्तु आज लोग इन बातों पर तो ध्यान नहीं देते, बल्कि जल्दी ही दूसरों को असुविधा अथवा कठिन परिस्थिति में डालकर केवल इतना कह देना ही पर्याप्त समझते हैं कि "कष्ट के लिए क्षमा कीजिएगा!" बस, उन्होंने यह एक तकिया-ए-कलाम बना लिया है।
"कष्ट के लिये क्षमा" ज़रूरत क्या ऐसा कहने की है ?
यदि हम किसी व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य देते हैं जो कि जन-हित का कार्य है, तब हमें "कष्ट के लिए क्षमा" ऐसा क्यों कहना चाहिए? इन शब्दों का प्रयोग करके तो हम वातावरण में उल्लास और कर्त्तव्य परायणता की लहरें पैदा करने की बजाय मायूसी लाते हैं! ऐसे कार्य के लिए तो हमें यह कहना चाहिए कि "क्या आप यह पुण्य का कार्य करेंगे?" अथवा यदि हम जानते हैं कि अमुक कार्य किसी का कत्र्तव्य है तो हम कह सकते हैं कि "क्या आप कृपया इसे करेंगे?" अथवा "मेहरबानी करके जरा इसे कीजिएगा।" इस प्रकार के शिष्टाचार-युक्त शब्द भी तो हम प्रयोग कर सकते हैं। फिर कार्य हो चुकने के बाद हम "धन्यवाद", ऐसे शब्दों का भी प्रयोग कर सकते हैं। हम एक-दूसरे को कष्ट देने और फिर "कष्ट के लिए क्षमा" ऐसा कहने की बात ही क्यों सोचें? परन्तु आज यह वाक्य (कष्ट के लिये क्षमा कीजिएगा) हमारी जिह्वा पर चढ़ चुका है और हम दूसरों को कष्ट देने के कार्य भी करते रहते हैं और "माफ़ कीजिएगा" (I am sorry) ऐसा भी हम सहज रूप से कहते रहते हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम ऐसे कर्मों को छोड़ते जाएं जिनके लिए "क्षमा" (Sorry)-- ऐसा कहना पड़ता है। इस वाक्य का अधिक प्रयोग आजकल के शिष्टाचार का सूचक तो है, परन्तु श्रेष्ठाचार का सूचक नहीं है। श्रेष्ठ आचार वाला व्यक्ति दूसरों को कष्ट पहुँचाने का कोई कर्म ही नहीं करता और यदि किसी परिस्थिति में या मज़बूरी के वश ऐसा कर्म हो भी जाय अथवा बिना समझे ही कोई ऐसा कर्म वह कर भी बैठे, तब वह सच्चे दिल से, न कि रस्म के तौर पर कहता है कि "कष्ट के लिए क्षमा कीजिएगा!"
कर्मातीत अवस्था
इस संसार में हरेक मनुष्य की अवस्था अथवा मानसिक स्थिति अलग-अलग है। देखा गया है कि मनुष्य की जैसी मान्यतायें होती हैं अथवा जैसी उसकी धारणायें होती हैं, वैसे ही उसकी अवस्था होती है। सब प्रकार की अवस्थाओं में से कर्मातीत अवस्था को श्रेष्ठ माना गया है। यह अवस्था ईश्वरीय ज्ञान की धारणा से और सहज राजयोग के अभ्यास से ही प्राप्त होती है। अतः जो मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग की शिक्षा प्राप्त करता है, उसे यह तो पता होना ही चाहिये कि कर्मातीत अवस्था, जोकि उसके जीवन का लक्ष्य है, के लक्षण क्या हैं?
१. 'कर्मातीत' का अर्थ है कर्म के परिणाम से अतीत
मनुष्य के हरेक काम का कोई-न-कोई परिणाम तो निकलता ही है। कर्म करने पर उसे या तो सफ़लता मिलती है या असफ़लता का सामना करना पड़ता है। परन्तु ज्ञानवान और योगाभ्यासी मनुष्य कर्मातीत अवस्था के जितना जितना निकट पहुँचता है, उतना उतना वह कर्म के परिणाम से कम प्रभावित होता है। वह सफ़लता, असफ़लता दोनों में एक समान रहता है। कार्य में असफ़लता होने पर, विघ्न आने पर वह निराश (Frustrated) नहीं होता, थकावट (Fatigued) अनुभव नहीं करता, उदास या मायूस (Dejected) नहीं हो जाता और रुकावट डालने वालों से जला-भुना या कटा हुआ-सा (Stung or hurt) अनुभव नहीं करता, बल्कि इन प्रभावों से अतीत रहता है। असफलता सामने आने पर वह अपने योग-बल को बढ़ाने, अवस्था को उच्च, अव्यक्त और शक्तिशाली बनाने के यत्न में और अधिक तीव्रता लाने का पुरुषार्थ करता है। उसके चेहरे पर असन्तुष्टता (Dis-satisfaction & unenthused) के चिह्न नहीं आते, मन में हिम्मतहीन (Broken-hearted) होने का भाव पैदा नहीं होता तथा वचन में हताश होने, अपने भाग्य से नाराज होने या दूसरों के असहयोग के कारण उनसे रुष्ट होने के भाव प्रकट नहीं होते। वह उलाहना (Regret, Complaint), अवहेलना (Disinterestedness), अलबेलापन (unconcerned), अलग होकर अथवा असहयोगी होकर रहने के भाव को प्राप्त नहीं होता, बल्कि अपने कर्म का जो भी परिणाम उसके सामने आता है, वह उसे सृष्टि रूपी ड्रामा अथवा चल-चित्र का एक दृश्य मानकर, साक्षी होकर उसे देखता रहता है। 'यह सृष्टि एक अनादि बना-बनाया विराट ड्रामा है, हरेक मनुष्य इसमें अपना-अपना पार्ट बजा रहा है, जो हो रहा है वह किन्हीं अटल नियमों के अनुसार ठीक ही हो रहा है' इस ज्ञान के पट्टे पर अथवा ड्रामा के पट्टे पर वह ठीक ही चलता रहता है। अथवा सफ़लता असफ़लता के सामने वह इस ज्ञान को ढाल के रूप में अपनाता है और इस प्रकार अप्रभावित और न्यारा होकर रहता है। सफ़लता हो तो वह बहुत ज्यादा उछलता और इठलाता नहीं बल्कि उससे निष्कर्ष लेता है कि पुरुषार्थ ठीक था। असफ़लता हो तो वह घबराता, सकुचाता और सटपटाता नहीं, बल्कि 'होनी' अथवा 'भावी' को अटल मानकर अपने पुरुषार्थ को ठीक करने पर ध्यान देता है। इस प्रकार वह कर्म के परिणाम से अतीत रहता है और हर हाल में खुश तथा पुरुषार्थ में सदैव तत्पर रहता है।
२. पूर्व कर्मों के फल से भी अतीत
पिछले कर्मों की प्रारब्ध के तौर पर यदि रोग, दुर्घटना, आर्थिक हानि, मित्र की मृत्यु आदि के रूप में परिस्थितियाँ उसके सामने आएं तो भी वह दुःखित नहीं होता बल्कि ऐसा समझता है कि पिछले कर्मों का हिसाब-किताब चुकता हो रहा है। उदाहरण के तौर पर यदि खाँसी हो जाय और इलाज करने के बावजूद भी वह न जाय तो वह कहता है कि 'यह तो मेरी पुरातन सखी है।' यदि पुरुषार्थ करने के बावजूद भी कोई आर्थिक संकट आ जाय तो वह कहता है कि 'हम बिल्कुल फ़कीर (Beggar) बनने के बाद ही तो विश्व के मालिक (Prince) बनेंगे।' वह यह सोचता है कि 'यह हमारी निश्चय की परीक्षा हो रही है। यदि हम ईश्वरीय निश्चय पर कायम रहकर पुरुषार्थ करेंगे तो हम भूखे नहीं मरेंगे। वाकी, हाँ, भूख-प्यास, हानि-लाभ यह सब भी सहन करना तो सीखना ही है न।' इस प्रकार वह खुशी-खुशी प्रभु-आश्रित होकर अपने पिछले कर्मों के प्रारब्ध के रूप में सामने आयी परिस्थिति को पार करता है। वह उसके दुःख रूपी फल से अतीत रहता है।
३. कर्म-सम्बन्ध से अतीत
साधारण मनुष्य जब कर्त्तव्य करता है तो उसे कर्म-सम्बन्ध का भान रहता है। 'ये मेरे बच्चे हैं, वह मेरी बहन है' इस प्रकार की दृष्टि उसकी सदा ही बनी रहती है। परन्तु जो कर्मातीत अवस्था के निकट पहुँचता है, उसे इन कर्तव्यों का भान नहीं रहता। वह कर्म तो करता है, उन सम्बन्धों का परिचय भी उसे होता है, परन्तु उसकी सम्बन्ध की रग उनसे नहीं जुटी होती अर्थात् उसका मन उन सम्बन्धों के रस में घुल नहीं जाता. वह संवेदनायुक्त नहीं होता, भावावेश में नहीं आता, उन सम्बन्धों में विलीन भी नहीं हो जाता, बल्कि वह उन सभी को आत्मिक ही दृष्टि से देखते हुए उनसे व्यवहार करता है। वह उनके प्रति कल्याण की भावना तो रखता है, उनसे उचित स्नेह भी करता है, परन्तु उनमें उसकी ममता नहीं रहती, आसक्ति नहीं होती, घनिष्ठता (Familiarity) नहीं होती, हार्दिक आकर्षण (Attraction) नहीं होता, उनके नाम-रूप के प्रति लगाव नहीं होता अथवा उनसे लौकिक बातों के लेन-देन करने की उसे उत्कण्ठा नहीं होती। वह न उनका शरीरान्त होने पर आंसू बहाता है, न ही उनके लिए उसका हृदय कभी विह्वल होता है। वह कर्तव्य समझकर कर्म करता है परन्तु न्यारा और प्यारा होकर बरतता है।
४. कर्म के फल की इच्छा से अतीत
कर्मातीत अवस्था के निकट पहुँचने वाले मनुष्य को किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रहती। वह लोक कल्याण के लिए अथवा आत्मा की उन्नति के लिए तो कर्म करता ही है, परन्तु उसे सांसारिक वैभवों की, ऐश-आराम की, मोटर गाड़ियों की, महल-माड़ियों की इच्छा नहीं रहती। वह भोजन तो करता है, परन्तु किसी विशेष पदार्थ की इच्छा से नहीं करता, बल्कि आध्यात्मिक पुरुषार्थ के लिए शरीर को एक अनमोल साधन मानकर शरीर को स्वस्थ और शक्ति सम्पन्न बनाये रखने के लिए ही करता है। वह जो कुछ भी करता है, लोक-संग्रहार्थ करता है, उसे किसी चीज़ की तृष्णा या लालसा नहीं होती, बल्कि उसमें त्याग और सेवा की भावना ही प्रधान होती है और उसकी वृत्ति उपराम होती है। उसे न मान और यश की इच्छा होती है, न ठाठ-बाट की, बल्कि वह सन्तोषी और मुदित अवस्था में रहता है और ईश्वरीय मस्ती में मस्त रहते हुए अथक होकर सेवा में लगा रहता है। सेवा-सेवा-सेवा यही तात उसे दिन-रात लगी रहती है।
५. कर्म-जन्य शरीर के भान से अतीत
कर्मातीत अवस्था के समीप पहुँचने वाले मनुष्य को अपने कर्म-जन्य शरीर का भान नहीं होता, बल्कि वह अव्यक्त में रहता है। उसे कर्मेन्द्रियाँ आकर्षित नहीं करतीं। वह विदेह अवस्था को प्राप्त होता है। वह अशरीरी अथवा आत्म-निष्ठ अवस्था में टिक जाता है। यह बहुत उच्च स्थिति है। यह निरन्तर व्योगाभ्य्यास से ही प्राप्त होती है। इस अवस्था वाले में बहुत हर्ष, बहुत उल्लास, निर्भीकता, मधुरता और स्फूर्ति होती है। ऐसी अवस्था वाले के निकट बैठने से ही वातावरण में पवित्रता, प्रकाश और शान्ति महसूस होती है। प्रारम्भ में मनुष्य कर्म करते हुए शरीर भान से अतीत नहीं हो सकता, परन्तु धीरे-धीरे, ऊपर लिखी बातों का अभ्यास करते-करते उसे सर्व प्राप्तियाँ हो जाती हैं।
मनुष्य ईश्वरीय स्मृति का आनन्द लेने से वंचित गृहस्थ-व्यवहार में व्यस्तता के झूठे बहाने
वर्तमान समय मनुष्य का जीवन बहुत ही दुःखी और अशान्त है। कभी तो उसे स्वजनों द्वारा ही वेदना होती है, कभी वह प्राकृतिक आपदाओं के कारण पीड़ित हो जाता है और कभी उसका अपना ही मन व्यर्थ की उधेड़-बुन के कारण अथवा वासनाओं तथा विकारों के कारण अशान्त रहता है। ऐसी अवस्था में मनुष्य को स्थायी और सम्पूर्ण शान्ति देने के लिए स्वयं परमपिता परमात्मा शिव परमधाम से ज्ञानामृत और सहज योग रूपी साधन लाये हैं जिससे कि वह जन्म-जन्मान्तर के लिए तृप्त हो सकता है। परन्तु कितनी अजीब बात है कि मनुष्य शान्ति चाहता हुआ भी शान्ति लेता नहीं, आनन्द की कामना करता हुआ भी आनन्द के सागर परमात्मा से अपना नाता जोड़ता नहीं, जीवन को सुखी और श्रेष्ठ बनाने की इच्छा होने पर भी उसके लिए जो ज्ञान है उसकी ओर वह ध्यान नहीं देता, बल्कि गृहस्थ-व्यवहार में व्यस्तता का बहाना तथा अन्य बहाने बनाकर टाल देता है, गोया अपने सौभाग्य को टाल देता है और ईश्वर से अविनाशी विरासत लेने से इन्कार कर देता है।
गृहस्थ-व्यवहार में व्यस्तता का बहाना व्यर्थ कैसे है?
आज जब मनुष्य को हम यह निमंत्रण देते हैं कि दो घड़ी तो अपने उस परमपिता की चर्चा भी सुन लिया करो और उसकी मधुर स्मृति का अलौकिक सुख लूट लिया करो; तब भी वह यही तान छेड़ देता है कि "अवकाश नहीं, मैं एक गृहस्थी हूँ।" परन्तु सोचने की बात है कि गृहस्थ तो अनादि काल से चला आया है, गृहस्थ अथवा प्रवृत्ति के ताने-बाने से ही तो यह संसार बना हुआ है। परन्तु यह कहना कि हम प्रवृत्ति में वर्तते हुए प्रभु को याद नहीं कर सकते, यह व्यर्थ बहाना है, क्योंकि यदि मनुष्य इसमें अपना कल्याण समझते हुए इसे अपना कर्त्तव्य समझे तो वह ईश्वरीय स्मृति का सुख प्राप्त कर सकता है।
आप मनुष्य की दिनचर्या पर ध्यान देंगे तो देखेंगे कि मनुष्य अपना अधिकतर समय उस कार्य में लगाता है जिसे वह अपना कर्त्तव्य मानता है। दुकान पर या दफ्तर में जाने की बात होती है तो वह कहता है कि "यह मेरा कर्तव्य है, क्योंकि बाल-बच्चों का पालन-पोषण और गृहस्थ को चलाने के लिए कमाना ज़रूरी है।" परन्तु यदि किसी दिन घर में बच्चा सख्त बीमार हो जाता है या पत्नी को कोई बड़ा कष्ट होता है तो वह उस दिन दुकान पर भी नहीं जाता। पहले वह दुकान पर जाना कर्त्तव्य और आवश्यक मानता था, परन्तु अब उससे भी अधिक महत्व वह बच्चे या बीबी की औषधि उपचार का प्रबन्ध करने के कार्य को देता है। गोया वह पैसा कमाने के साधन को भी छोड़कर बच्चे बीवी को डाक्टर के पास ले जाता है और अपने पल्ले से दवा दारू पर कुछ खर्च भी कर आता है। भला क्या कारण है कि अब वह पैसे कमाने के समय में भी पैसे खर्च करने के लिए तैयार हो जाता है? यही कि वह अपना कर्तव्य समझता है और उसे आवश्यक मानता है। इसी प्रकार, एक माता की दिनचर्या पर ध्यान दीजिये। वह भी प्रातः बच्चे को नहलाती धुलाती है और तैयार करके स्कूल भेजती है, क्योंकि वह समझती है कि माँ होने के नाते यह उसका कर्त्तव्य है। तो आपने देखा कि कर्त्तव्य के लिए मनुष्य खुद-ब-खुद समय निकालता है। माँ को भला रोज़ यह उपदेश तो दिया नहीं जाता कि उसे वच्चों की यह सेवा करनी है, बल्कि उसे कर्म को करने या न करने के परिणाम का ज्ञान होता है और यह ज्ञान उसे कर्त्तव्य करने के लिए प्रेरित करता है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आज मनुष्य परमपिता परमात्मा की याद में नहीं रहता, क्योंकि वह इसे अपना परम कर्त्तव्य नहीं मानता। ईश्वरीय स्मृति में स्थित होने तथा ज्ञानामृत द्वारा पवित्र बनने का पुरुषार्थ रूपी कर्त्तव्य करने का क्या फल होगा और इसे न करने का क्या परिणाम होगा, इसे वह पूरी तरह नहीं जानता। उसे यह बात भी पूरी तरह ज्ञात नहीं है कि उसके जीवन में जितने भी प्रकार के दुःख हैं, उनका कारण यह है कि वह आत्मिक स्वरूप के ज्ञान में तथा परमपिता परमात्मा की स्मृति में स्थित नहीं है। यदि वह इस रहस्य को जानता और मानता तो अवश्य ही इसके लिए भी समय निकालता।
ध्यान देने के योग्य एक दूसरी बात यह है कि मनुष्य कर्त्तव्य भी उन लोगों के प्रति करता है जिसमें वह अपना कोई सम्बन्ध समझता है। उदाहरण के तौर पर यदि उसके लौकिक सम्बन्धियों में से किसी की शादी हो या किसी की मृत्यु हो या किसी को किसी रोग ने ग्रसित कर लिया हो तो वह उनके लिये समय निकाल लेता है। वह कहता है कि उनके यहाँ मुझे अवश्य जाना है, क्योंकि वे मेरे सम्बन्धी हैं और आज मैं उनके यहाँ जाऊंगा तभी कल वे भी मेरे पास आयेंगे और मेरे सहायक बनेंगे। परन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि परमात्मा के बारे में यह जो कहा गया है कि "पितु-मात सहायक स्वामी सखा, तुम ही एक नाथ हमारे हो...।" इसका निश्चयात्मक ज्ञान न होने के कारण वह उस सच्चे माता-पिता, सखा सहायक अथवा परम सम्बन्धी को भूल जाता हैं, तभी तो वह कहता है कि उससे नाता जोड़ने का, उसकी स्मृति में रहने का मुझे समय ही नहीं है। उसको यह मालूम ही नहीं कि उस मात-पिता से क्या सहायता प्राप्त होती है। अतः गृहस्थ-व्यवहार में व्यस्तता का बहाना विल्कुल ही निराधार है, क्योंकि जब मनुष्य दूसरे सम्बन्धियों को सारा दिन याद कर सकता है, उनके लिये समय भी निकाल सकता है और उनके लिये कर्त्तव्य कार्य भी करता है तो वह परम हितैषी, समर्थ सम्बन्धी परमपिता की याद भला क्यों नहीं कर सकता ? वह कर सकता है, परन्तु इस कर्त्तव्य का महत्व नहीं जानता, इससे होने वाले लाभ को नहीं समझता। इसके लिये उसे ज्ञान लेना चाहिए।
"ईश्वरीय ज्ञान की धारणा और योग का अभ्यास
कठिन है" यह बहाना भी ग़लत है
आप देखेंगे कि मनुष्य हमेशा उसी काम को करता है जो सहज हो। वह कोशिश करता है कि कठिन काम भी किसी तरह सहज हो जाय। परन्तु आज लोगों ने यह ग़लत धारणा बना रखी है कि परमात्मा को याद करना, उसकी स्मृति में मन को स्थित करना बहुत ही कठिन है, उसके लिये हठ-क्रियाएं करनी पड़ती हैं, उपवास करने पड़ते हैं, जंगलों में कन्द-मूल पर निर्वाह करना पड़ता है आदि-आदि। साधु-सन्त भी प्रतिदिन उन्हें अपने व्याख्यान में यही कहते हैं कि मन बड़ा चंचल है, इसलिए मनुष्य आज पुरुषार्थ करना छोड़ देते हैं, वे कहते हैं कि मन चंचल है तो चंचल ही सही। वह कभी घण्टा-आध परमात्मा की स्मृति में बैठते भी हैं तो यदि मन में आनन्द-रस की प्राप्ति नहीं होती तो आगे के लिये वे यत्न छोड़ देते हैं, वे कहते हैं कि आंखें बन्द करके दो सेकेण्ड ईश्वर के प्रति हाथ जोड़ देना ही काफ़ी है। परन्तु उन दो मिनटों में भी उनका मन स्मृति में स्थिति का परम आनन्द लेने का सौभाग्य नहीं पाता। अब वास्तव में देखा जाय तो मनुष्य की यह हालत उस परमपिता का तथा अपना यथार्थ परिचय न होने के कारण, परमात्मा की स्मृति में एकतानता के बारे में साधुओं के झूठे कथनों के कारण और पुरुषार्थ-हीनता का भाव तथा आलस्य के स्वभाव के कारण ही है। ज़रा बताइये कि माँ अपने बच्चे को बोलना सिखाने के लिये कितनी मेहनत करती है? अथवा यदि किसी माँ का कोई बच्चा बोलना नहीं सीखता या सिखाये जाने पर भी नहीं बोल सकता तो माँ को कितनी चिन्ता हो जाती है? वह लोगों तथा वैद्यों द्वारा बताये सभी उपाय उस बच्चे को बोलना सिखाने के लिये करती है।
फिर उसे चलना सिखाने में कितना परिश्रम उसे करना पड़ता है! तब कहीं उस मेहनत के फलस्वरूप वह बच्चा बड़ा होकर कोई बड़ा स्पीकर (वक्ता), विचारक अथवा विद्यावान् एवं गुणवान व्यक्ति बन जाता है। यदि पहले उस पर मेहनत न होती तो वह गूँगा रह जाता और चलने की बजाय खिसक-खिसक कर बढ़ता। अतः लोग बच्चों के लिये कोशिश करते हैं कि उसका पूरा विकास हो, वे उसे किताबें खरीद कर देते हैं ताकि उसकी बुद्धि विकसित हो, वह अपने पाँव पर खड़ा हो सके। फिर वे यह भी ख्याल करते हैं कि उसे कमाई का भी कोई साधन प्राप्त हो, फिर उसको वे घर भी बनाकर देते हैं ताकि उसका कोई ठिकाना हो, वह कहीं दुःखी न हो। इस प्रकार, बच्चे के जन्म के समय से लेकर उस पर कितनी मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि इस मेहनत का हज़ारवाँ या लाखवाँ हिस्सा भी मनुष्य अपने जीवन को सच्ची शान्ति एवं सुख से सरसाने के लिये नहीं लगाता जिससे कि भविष्य में भी जन्म-जन्मान्तर के लिए स्वर्गिक सुख प्राप्त कर ले। इस पुरुषार्थ के लिये तो वह कहता है कि मेरे पास समय नहीं है अथवा कि इस कार्य में मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु वह यह नहीं सोचता कि मेहनत तो हर एक कार्य के लिए करनी पड़ती है और मेहनत के बाद ही तो मीठा फल प्राप्त होता है और ईश्वर से विरासत प्राप्त करने की थोड़ी-सी मेहनत तो अमिट और अतुल फल देने वाली तथा अति सहज है, इससे तो मनुष्य सदा के लिए मालामाल हो जाता है।
पुरुषार्थ करते-करते तो मनुष्य ने रॉकेट बना लिए हैं अथवा ऐटामिक शक्ति खोज डाली है। यह कहना कि परमात्मा को याद करना कठिन है, यह तो पुरुषार्थ-हीनता तथा अज्ञानता की निशानी है। मनुष्य के जितने लौकिक सम्बन्धी आज हैं उनसे यदि एक ज्यादा होता तो क्या वह उसे याद न कर सकता? किसी माँ का यदि एक बच्चा बढ़ जाता है तो क्या वह उसके लिए समय नहीं निकालती ? अतः समय न मिलने या याद न कर सकने का बहाना झूठा है। जो लोग कहते हैं कि "मन चंचल है, वह टिकता नहीं है", उन्हें सोचना चाहिए कि जब तक यह ज्ञान न हो कि मन को टिकाना कहाँ है, वह टिकेगा कैसे ? इसीलिए, हम कहते हैं कि बच्चों पर तो इतना ध्यान देते हो, धन भी खर्च करते हो, कुछ तो अपना भी भविष्य सुधार लो, ज्ञान प्राप्त करके मन की सच्ची शान्ति का उपाय कर लो।
जंगल में रोड़े-पत्थरों से आश्रम बनाते हैं,
घर को आश्रम नहीं बनाते
वास्तव में माँ-बाप पर तो दुगनी जिम्मेदारी होती है। यदि उनका स्वभाव शीतल और अवस्था योग-युक्त होगी तो उसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ेगा। नकल करने में तो बच्चा बन्दर के समान होता है। बच्चा सब नकल करता है।
अगर पिताजी अपनी बात मनवाने के लिये माताजी से गुस्सा करते हैं तो बच्चा इस बात को देखता है और सोचता है कि कल यदि उसे भी अपनी बात मनवानी होगी तो वह भी ऐसे ही जोश से बात करेगा। अतः कल वह भी हाथ में छड़ी उठा लेता है। इस प्रकार, वह अच्छी बात भी सीखता है और बुरी भी। अतः गृहस्थी लोगों पर तो दुगनी जिम्मेदारी है अपने जीवन को पवित्र बनाने की भी और बच्चों के जीवन को भी उच्च बनाने की, वर्ना यदि वे स्वयं ईश्वरीय ज्ञान नहीं लेंगे और जीवन को उच्च नहीं बनायेंगे तो बच्चों का जीवन भी बिगड़ जायेगा। जंगल में झोंपड़ी बनाकर आश्रम बना लेने में कोई खास बात नहीं है, घर को 'आश्रम' बनाने की बात बहुत ऊंची है। जंगल में तो मिट्टी, पत्थर, रोड़े लेकर आश्रम बन सकता है, परन्तु घर को तो ईश्वरीय ज्ञान द्वारा ही 'आश्रम' बनाया जा सकता है।
परन्तु आज घर वालों को यह तो ज्ञान है कि घर में घी नहीं है और मिट्टी का तेल भी खत्म हो गया है, इसलिये आज घी और तेल लाना है और राशन भी लाना है, लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि आत्मा की ज्योति बुझ रही है, उसमें ज्ञान-घृत डालना है, आत्मा को भोजन भी देना है। अभी सरदी का मौसम शुरू हुआ तो लोगों ने गरम कपड़े निकालने शुरू किये, अभी दिन का भोजन बना है, फिर रात के भोजन की फ़िक्र लग जाती है। इस प्रकार, मनुष्य भविष्य का विचार तो करता ही है, कोई आगे के दो दिनों की बात सोचता है तो कोई बीस वर्षों के बाद की, परन्तु आज हर कोई कल की बात सोचता तो है ही, चाहे उसे कल का पता न हो। वह दस-बीस रुपये भी इकट्ठे कर रखता है कि कल बच्चों के काम आयेंगे। लेकिन क्या आपने कभी बैठकर जीवन के विषय में भी सोचा है, कभी मन को ठिकाना देने की बात पर भी विचार किया है, भविष्य के लिये अविनाशी कमाई की बात पर भी ध्यान दिया है?
मन चंचल क्यों है ?
अगर किसी मनुष्य के पास रहने के लिये कोई मकान न हो, तो वह गली-गली में घूमता है कि कोई खाली मकान रहने के लिये मिले। इसी प्रकार आज मन भी इसीलिये चंचल है कि वह इधर-उधर घूमता है कि कहीं कोई शान्ति का ठिकाना मिले। अगर मन को ऐसा ठिकाना मिल जाय तो वह भटके ही क्यों ? अतः आज मनुष्य, जो अपने को इतना समझदार मानता है, उसे इतनी तो समझ चाहिये कि आखिर मुझे जाना कहाँ है और मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? आज जीवन-निर्वाहार्थ धन कमाने में जो सारा दिन लगता है, क्या यही जीवन का लक्ष्य है, क्या यही अनन्त काल तक चलेगा या जीवन इससे कोई ऊंची चीज़ है? जीवन के मूल्य को जानना, स्वयं को पहचानना और शान्ति के सागर परमपिता को पहचानना ही ज्ञान है और यह जानकर उसमें मन को ठिकाना देने से सब दुःख दूर हो सकते हैं और जीवन में पूर्णतः सुख-शान्ति की प्राप्ति हो सकती है। इसके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है। इस उपाय द्वारा अपने जीवन को सदा के लिये सुख-शान्ति सम्पन्न बनाने में भी जो मनुष्य बहाने बनाता है वह अपनी अपार हानि करता है।
निश्चय-बुद्धि और स्थिर-बुद्धि
मनुष्य से अकर्त्तव्य अथवा भूल दो कारणों से होती है। भूल का या तो यह कारण होता है कि मनुष्य की बुद्धि समय पर यह नहीं जान सकती कि जो कर्म वह कर रहा है अथवा करना चाहता है वह कर्तव्य है या अकर्त्तव्य। दूसरे, यदि उसको मालूम हो भी जाय कि अमुक कर्म वास्तव में अकर्त्तव्य है तो उसकी बुद्धि डोल जाती है, स्थिर नहीं रहती। डोलने का अर्थ यह है कि वह मनुष्य अपने ही निर्णय में संशय करने लगता है अथवा दृढ़तापूर्वक तथा डटकर खड़ा नहीं हो सकता, बल्कि मान-अपमान या लोक-लाज इत्यादि की भावना के वश होकर वह अपने विवेक का हनन कर देता है।
मान लीजिये, किसी मनुष्य को यह मालूम हो गया है कि विकारी मनुष्य के हाथ से बनाया हुआ भोजन मन पर बुरा प्रभाव डालता है। परन्तु जब वह मनुष्य किन्हीं विकारी सम्बन्धियों के पास जाकर ठहरता है तो उसके मन में इस प्रकार संशय उठने लगते हैं कि "यह खाने से क्या हानि हो जायेगी? जबकि मैं बाज़ार से दूध, मिश्री, औषधि इत्यादि अन्यान्य वस्तुयें ले लेता हूँ, तो खाना खाने से क्या अन्तर पड़ जायेगा?" बस, इस प्रकार संशय हो जाने से वह मनुष्य भगवान् का हाथ छोड़ देता है और अकर्त्तव्य कर बैठता है और भगवान् की आज्ञा के उल्लंघन के कारण दुःख का भागी बन जाता है। इसलिए ही कहा गया है कि 'संशयात्मा विनश्यन्ति' अर्थात् संशय करने वाले मनुष्य का अधोपतन होता है।
बुद्धि की दूसरी स्थिति यह है कि मनुष्य लोक-लाज से घबराता है। वह सोचता है कि "यदि मैं इन द्वारा भेंट किया गया खाना न खाऊंगा तो ये लोग नाराज हो जायेंगे, मेरे इस व्यवहार को बुरा मानेंगे, वे मुझसे सम्बन्ध तोड़ देंगे और मैं इनको ज्ञान भी नहीं सुना सकूँगा। इन बेचारों को क्या मालूम कि मैं कैसा ज्ञान धारण कर रहा हूँ? जब तक इनको मालूम न हो जाय तब तक तो मुझे खाना ही पड़ेगा। यदि ऐसा 'न' करूँगा तो यह मेरी बात समझेंगे ही नहीं।" इस प्रकार उसका चित्त डोल जाता है, वह अपनी दृढ़ता और धारणा को छोड़कर, दैहिक सम्बन्धियों के प्रभाव में आ जाता है। ऐसे मनुष्य को 'अस्थिर बुद्धि' कहा जाता है। यह आत्मा की निर्बलता, निश्चय की कमी और बुद्धि के व्यभिचारीपन के लक्षण हैं जिनके कारण ही वह व्यक्ति कल्याणकारी परमात्मा की आज्ञा का भी उल्लंघन कर देता है और उसके परिणाम को भी गम्भीरतापूर्वक नहीं सोचता। वह मनुष्यों से सम्बन्ध जोड़े रखने के लिए परमात्मा से सम्बन्ध तोड़ने को झट तैयार हो जाता है।
ऊपर खाने के बारे में कर्तव्य अकर्तव्य की जो चर्चा की गई है, वह दूसरे कर्मों के बारे में भी लागू होती है। अस्थिर बुद्धि वाले मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते। निश्चय बुद्धि अथवा स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य वह है जिसकी बुद्धि ठीक निर्णय दे देती है और जो उस निर्णय पर दृढ़तापूर्वक अर्थात् अडोल मन से टिका रहता है। बुद्धि के इस सद्विवेक के लिये ईश्वर द्वारा प्राप्त ज्ञान और ईश्वरीय योग की आवश्यकता होती है। सभी दुःखों की निवृत्ति के लिए अकर्त्तव्य की निवृत्ति आवश्यक है, अकर्त्तव्य की निवृत्ति के लिए परमात्मा की मार्ग प्रदर्शना की आवश्यकता है और उसके लिए योग जरूरी है क्योंकि योग-युक्त मनुष्य ही परमात्मा की प्रेरणाओं को पकड़ पाता है।
परमपिता परमात्मा तो सदा स्थिर अर्थात् एकरस हैं। उनका सहारा लेने वाले अथवा उनसे बुद्धि का योग लगाने वाले मनुष्य का चित्त डोलता नहीं है। इसी प्रकार, ईश्वरीय ज्ञान को प्राप्त करने वाला मनुष्य भी एकरस अवस्था में ही रहता है। वह इस सृष्टि रूपी विराट नाटक के भेद को जानता है। वह हर वृत्तान्त और हर घटना को इस बने बनाये विराट नाटक की एक नूँध (पूर्व-निश्चित चीज़) मानकर, स्वयं साक्षी होकर इसे गुज़ार देता है, क्योंकि वह जानता है कि इस सृष्टि-लीला में सदा एक ही पार्ट नहीं चलता और इस नाटक में होने वाले किसी भी वृत्तान्त को टाला नहीं जा सकता क्योंकि "बनी बनाई ही बन रही है"; अतः जबकि सब कुछ भावी के अनुसार ही हो रहा है तो हर्ष और शोक किस बात का और क्यों किया जाय ? यह रहस्य जान लेने पर कि हर एक मनुष्य इस पूर्व निश्चित नाटक में एक पार्टधारी अथवा निमित्त मात्र है, उसका मन अडोल, बुद्धि स्थिर और अवस्था एकरस हो जाती है।
जब किसी मनुष्य के सामने संशय, लोक-लाज अथवा हर्ष-शोक की परिस्थिति आ जाती है तब उसे यह सोचना चाहिए कि "अब इस विराट सृष्टि-नाटक की शूटिंग (Shooting) हो रही है अर्थात् इसकी फिल्म (Film) बन रही है, अतः मुझे सावधान रहना चाहिए।" जब कोई मनुष्य फोटो (छायाचित्र) खिचवाने के लिए बैठता है तो वह खूब तैयार होकर बैठता है ताकि उसकी फोटो अच्छी निकले। वह उस समय हिलता-डुलता नहीं है, बल्कि स्थिर रहता है, हर्षित-मुख होकर बैठता है और कोई ऐसी हरकत नहीं करता कि जिससे उसकी फिल्म खराब हो जाय, क्योंकि एक बार ख़राब शूटिंग हो जाने से उस फिल्म में परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी
प्रकार, यह सृष्टि भी एक विराट नाटक है; हम इसके ऐक्टर्स (Actors) हैं। वर्तमान समय सन्धियुग है। अव हमारे कर्मों की जो शूटिंग (Shooting) हो रही है, वह ही अनादि सृष्टि-नाटक के फिल्म की अनादि नूँध हो जायेगी। परमात्मा का मूवी कैमरा (Movie camera) तो इतना तेज़ अथवा पावरफुल (Powerful) है कि उससे मनुष्य के तन, मन और धन द्वारा किये गए हर क्षण के कर्मों के फोटो निकलते रहते हैं। अतः मनुष्य को स्थिर बुद्धि एवं अडोल-चित्त होना चाहिये और अपने कर्मों के प्रति सतर्क होना चाहिए वर्ना ठीक फोटो नहीं निकलेगा।
निश्चय-बुद्धि अथवा स्थिर-बुद्धि वाला मनुष्य वह है-जिसकी बुद्धि ठीक निर्णय देती हो और जो उस निर्णय पर दृढ़तापूर्वक अर्थात् अडोल मन से टिका रहे।
एक से अनेक की उत्पत्ति
भगवान् के महावाक्य हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार नाम के जो विकार हैं उनमें से काम मनुष्य का महाशत्रु है, क्योंकि काम से ही अन्य विकारों की भी उत्पत्ति होती है। इस विषय में कई लोग सोचते हैं कि काम से अन्य विकारों की भला कैसे उत्पत्ति होती है? काम ही सभी विकारों का मूल कैसे है?
कुछ लोग 'काम' का अर्थ 'कामना' मानते हैं। अशुद्ध कामनाओं से तो विकारों की उत्पत्ति होती ही है, परन्तु यहाँ 'काम' का विशेष अर्थ देह के नाम-रूप, स्पर्श, सम्बन्ध इत्यादि के भान अथवा उसके प्रति अशुद्ध आकर्षण है। काम चेष्टा की स्थिति में, मनुष्य के मन में शरीर के प्रति राग और स्त्री में ममत्व और देह-अभिमान तो समाया ही होता है। अतः जब 'काम' अर्थात् मैथुन के परिणामस्वरूप सन्तति होती है तो सन्तान, स्त्री और सम्पत्ति में मनुष्य का मोह जाग्रत होता है। जब अशुद्ध प्यार में अथवा काम चेष्टा के भोग में कोई बाधा पड़ती है अथवा 'काम' के सम्बन्ध वाली उसकी स्त्री को अथवा 'काम' से उत्पन्न हुए उसके बच्चों को कुछ कष्ट पहुँचता है या उनकी कोई मनोकामना पूरी नहीं होती तो 'क्रोध' की उत्पत्ति होती है। इसलिए ही कहा गया है कि 'कामात् क्रोधोपजायते' अर्थात् काम से क्रोध की उत्पत्ति होती है। स्त्री और सन्तान के दुःखों की निवृत्ति करना चाहते हुए अथवा उनकी आवश्यकताओं एवं लौकिक कामनाओं को पूर्ण करना चाहते हुए मनुष्य के मन में लोभ जाग्रत होता है। "मैं अपने कुटुम्ब के लिए अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा करूँ", अधिक सुख-सामग्री जुटाऊं, महल माड़ियाँ बनाऊं, सम्पत्ति एकत्रित करूँ, इस प्रकार ही मनुष्य का चिन्तन चलता है।
तब मनुष्य के मन में यह भावना जाग्रत होती है कि "मैं घर का स्वामी हूँ, मैं स्त्री का पति हूँ, इन बच्चों का पिता हूँ, यह सब धन-माल मेरा है, मैं अमुक हस्ती वाला हूँ, अमुक दर्जे वाला हूँ, अमुक कुटुम्ब का मनुष्य हूँ।" -इस प्रकार उस पर अहंकार का रंग चढ़ता है।
इससे सिद्ध हुआ कि 'काम' ही मनुष्य का महाशत्रु है। इसने मनुष्य को आदि, मध्य और अन्त दुःखी किया है, क्योंकि कामी मनुष्य विकारी अर्थात् आसुरी सृष्टि रचता है और दूसरों के जीवन को नर्कमय बनाता है। उसकी सन्तति में भी "यथा पिता तथा पुत्र" के नियमानुसार वही संस्कार (मोह, अहंकार आदि) भर जाते हैं तथा कामी मनुष्य अपनी सन्तान को भी अपने ही कुमार्ग पर लगाकर अपनी सन्तति का भी अकल्याण करता है। इस प्रकार, वह अपने तथा दूसरों के जीवन में जन्म-जन्मान्तर के लिए दुःख और अशान्ति तथा विकार और विकर्म लाने के निमित्त बनता है।
जब सृष्टि में 'काम' रूपी विकार नहीं था तब क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार भी न थे। इसलिए, तब सृष्टि पर पूर्ण सुख था और पूर्ण शान्ति थी। अगर मनुष्य को किसी ने दुःखी किया तो वह 'काम' ही है। इसलिए सारे ज्ञान का सार यह है कि काम को, नाम-रूप के भान को अथवा देह के प्रति अशुद्ध आकर्षण को समाप्त किया जाय। जब तक मनुष्य के मन से यह विकार नहीं गया तब तक उसके जीवन में शान्ति और शीतलता, आनन्द और उपराम वृत्ति, एकाग्रता और एक-रस अवस्था नहीं आ सकती।
कुछ लोग तो समझते हैं कि अपनी स्त्री के साथ काम का सम्बन्ध कोई विकार नहीं होता। परन्तु प्रश्न यह है कि अपनी स्त्री के साथ हो या अन्य किसी के साथ 'काम' तो 'काम' ही है। अतः इसे विकार तो माना ही जायेगा। उससे क्रोध, लोभ और मोह की उत्पत्ति तो होती ही है। उसके परिणामस्वरूप मनुष्य को कष्ट, दुःख अथवा अशान्ति तो भोगनी ही पड़ती है। निश्चय ही वह मनुष्य ज्ञान की रसना का, योग के आनन्द का और अतीन्द्रिय सुख का तो अनुभव नहीं कर सकता। क्या आज तक कोई ऐसा मनुष्य हुआ है जो काम वासना का भी भोग करता रहा है और आत्मिक सुख तथा ईश्वरीय आनन्द का भी अनुभव करता रहा है? काम-विकार के कारण ही मनुष्य को गर्भ जेल से लेकर मृत्यु तक इस सृष्टि में अपने विकर्मों का दण्ड भोगना ही पड़ता है। 'काम' को विकार मानने के कारण ही तो लोग गुप्त रीति से काम चेष्टा का उपभोग करते हैं। अतः यदि मनुष्य सर्वदा सुख और शान्ति का जीवन प्राप्त करना चाहता है तो वे भले ही युगल जीवन व्यतीत करें, परन्तु उसे कमल पुष्प के समान पवित्र, देही-निश्चय बुद्धि और कर्मातीत होकर रहना चाहिए।
जबकि 'काम' देह-अभिमान ही के कारण है और ज्ञान को नष्ट करने वाला है, तो ज्ञान और काम दोनों इकट्ठे कैसे रह सकते हैं? जबकि परमात्मा को ज्ञानी आत्मा प्रिय है और ज्ञानी देही अभिमानी होता है तो परमात्मा से योग-युक्त होना चाहने वाला मनुष्य इसे छोड़े विना कैसे रह सकता है?
अतः सभी दुःखों के कारण रूप 'विकारों' को नष्ट करने के लिए विकारों के भी मूल को नष्ट करना जरूरी है। काम को नष्ट करने के लिए उसके मूल देह-अभिमान को मिटाने के लिए अज्ञान की निवृत्ति आवश्यक है; अज्ञान की निवृत्ति और देही-निश्चय में स्थिति ज्ञान और योग से ही होती है और वास्तव में ज्ञान और योग की शिक्षा गीता के भगवान् ही उस समय अवतरित होकर देते हैं जबकि सभी मनुष्य 'काम' से (मैथुन से) उत्पन्न होते हैं और स्वयं भी काम-वासना से युक्त होते हैं अर्थात् जब योग-बल और धर्म-बल की पूर्ण हानि हो गई होती है। अतः धर्म ग्लानि के वर्तमान समय परमात्मा ही से ज्ञान और योग की शिक्षा प्राप्त करके काम-रूपी महाशत्रु को जीतना चाहिए, क्योंकि अब योग-भ्रष्ट, धर्मभ्रष्ट, देह-अभिमानी और कामी सृष्टि की बजाय योगनिष्ठ एवं पवित्र सृष्टि की पुनः स्थापना का समय है।
सहनशील व्यक्ति गृहस्थ-व्यवहार में रहते हुए भी कमल फूल के समान न्यारा और प्यारा जीवन व्यतीत कर सकता है।
सहनशीलता से सफ़लता
हर व्यक्ति चाहता है कि उसे अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में सफ़लता मिले। सफ़लतामूर्त बनने के लिए जीवन में सहनशीलता का गुण धारण करना जरूरी है। सहनशीलता एक मुख्य दिव्य गुण है जिसकी धारणा से बिगड़े हुए कार्य बन जाते हैं और जिसके अभाव से बने हुए कार्य भी बिगड़ जाते हैं। परन्तु, सहनशीलता के अनमोल गुण को धारण व्या ग्रहण करने से जीवन में सफ़लता की सिद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है, इस रहस्य श्रृंखला को अच्छी रीति से समझने के लिए सर्वप्रथम तो यह जानना ज़रूरी है कि मनुष्य-जीवन पर दिव्य-गुणों और आसुरी अवगुणों का क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे ?
दिव्य-गुणों का महत्व
मनुष्य के गुणों और अवगुणों का सीधा प्रभाव उसके कर्मों, स्वभाव एवं संस्कारों पर पड़ता है। दिव्य गुणों को धारण करने से उसे वर्तमान जीवन में भी सुख, शान्ति और सफ़लता मिलती है तथा उसका भविष्य भी उज्ज्वल बनता है क्योंकि मृत्यु के बाद यह दिव्य गुण ही संस्कार रूप में आत्मा के साथ जाते हैं। इसी तरह अवगुणों अर्थात् काम, क्रोध इत्यादि विकारों में फँसने से मनुष्य इस लोक तथा परलोक दोनों की निधि और सिद्धि से हाथ धो बैठता है। अपने दिव्य गुणों को गंवा कर, उनके बदले में अवगुणों की शक्ति का आधार लेकर धन पदार्थों को इकट्ठा करने में लगे रहना बहुत घाटे का सौदा है। यह धन-पदार्थ इत्यादि तो सुख के साधन मात्र हैं। इनका यथार्थ उपार्जन और उपभोग तथा इनसे जीवन में सच्चे, स्थाई और सम्पूर्ण सुख-शान्ति की प्राप्ति और अनुभूति भी केवल एक गुणवान व्यक्ति ही कर सकता है। आसुरी अवगुणों वाले मनुष्य को सच्ची मन की शाान्त कहाँ? फिर, मृत्यु के बाद उसके भ्रष्टाचार द्वारा एकत्रित किये हुए स्थूल धन-पदार्थ तो यहाँ ही धरे रह जाते हैं। परन्तु, उसके आसुरी संस्कार आत्मा के साथ रह जाते हैं। 'अन्त मति सो गति' के नियमानुसार ऐसी पापात्मा भविष्य में दुर्गति को प्राप्त होती है। सामाजिक दृष्टिकोण से भी गुणवान व्यक्ति का जीवन हीरे-तुल्य (Worth Diamond) और फूल के समान है। वह कर्म करते समय अन्य प्राणियों के हित का भी ख्याल रखता है और समाज को भी अपने गुणों से सुगन्धित करता है। अवगुणी मनुष्य का जीवन कौड़ी-तुल्य (Worth not a penny) और काँटे के समान है जो दूसरों को भी चुभता अर्थात् दुःखी और अशान्त करता रहता है। दिव्य गुण ही वह अनमोल और अविनाशी निधि है जिसको धारण करने से नर को श्री नारायण और नारी को श्री लक्ष्मी जैसे जीवनमुक्त देवी-देवता पद की प्राप्ति होती है। सर्वगुण सम्पन्न होने के कारण ही श्री राधे श्रीकृष्ण, श्री लक्ष्मी श्री नारायण, श्री सीता श्री राम इत्यादि देवी-देवताओं का इतना गायन और पूजन आज दिन तक होता आ रहा है। अतः मनुष्य को अपने दिव्य गुणों को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहिए। प्रत्येक दिव्य गुण के मूल्य को जान कर उसे जीवन में धारण करने का पुरुषार्थ ही मनुष्य जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य है।
सहनशीलता बहुत मुख्य धारणा है।
सहनशीलता का गुण जीवन में सफलता प्राप्त करने की कुंजी है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता होगी वह गम्भीर भी अवश्य होगा। जो गम्भीर है वह किसी भी कर्म या परिस्थिति में घबरायेगा नहीं बल्कि हर बात की गहराई में जाकर सफ़लता का साधन सोचकर उपाय करेगा और सफ़लता को प्राप्त होगा। जैसे धैर्यवान व्यक्ति हर कार्य को सोच-समझकर करता है तो उसे सफ़लता प्राप्त होती है, उसी रीति सहनशीलता की शक्ति किसी भी कठोर कार्य अथवा कठोर संस्कार को सहज और सरल बना देती है। सहनशीलता से शीतलता आती है। इस शीतलता से मनुष्य की बुद्धि का सन्तुलन सदा कायम रहता है जिससे हर कार्य में सफ़लता मिलती है। सहनशीलता की कमी मनुष्य के जीवन को दुःखी और अशान्त बनाने वाले बहुत से फालतू झगड़ों और झमेलों का कारण बन जाती है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता नहीं होती; उसे बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी जीवन में सफ़लता का मुंह देखना नसीब नहीं होता। इस एक कमी के कारण ही मनुष्य की अन्य अनेक खूबियाँ भी व्यर्थ होकर रह जाती हैं। कई लोग प्रायः यह कहते हैं कि यदि उन्होंने सचमुच कोई अपराध किया हो, तब तो वह स्वीकार भी कर लें, परन्तु किसी झूठे आरोप को वह भला क्यों सहन करें? वास्तव में उनका यह तर्क विवेक संगत नहीं है। उदाहरणार्थ, यदि किसी मनुष्य ने सचमुच चोरी की हो और लोग उसे चोर कहें, इसमें तो सहनशीलता की कोई बात ही नहीं, क्योंकि चोर तो वह है ही। सहनशीलता का तो प्रश्न ही तब उठता है जब मनुष्य पर कोई झूठा आरोप लग जाये। इसी प्रकार कई मनुष्य 'जुल्म सहना पाप है' का नारा बुलंद करके अपनी सहनशीलता के गुण को तिलांजलि दे देते हैं और फिर अनेक अकर्त्तव्य कार्य कर बैठते हैं जिससे उन्हें नाकामयाबी का मुँह देखना पड़ता है और समाज में भी अशान्ति फैलती है। हमारा अभिप्राय यह नहीं कि अन्याय को दूर करने का उपाय न किया जाय, बल्कि यह है कि इसका सही उपाय भी सहनशील व्यक्ति ही कर सकता है। वरना, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले स्वयं ही अन्याय करने लग पड़ते हैं। खून का बदला खून से लेने अथवा ईंट का जवाब पत्थर से देने के उपाय सोचने वाले व्यक्ति को सहनशील नहीं कहा जा सकता है।
वर्तमान कलियुगी जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं तो आती ही रहेंगी परन्तु सहनशील व्यक्ति गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए भी कमल के फूल के समान न्यारा और प्यारा जीवन व्यतीत कर सकता है। सहनशीलता बहुत मुख्य धारणा है। सहनशीलता का गुण धारण करने वाला व्यक्ति ही इस सृष्टि-लीला को एक नाटक-समझता हुआ साक्षी होकर कार्य कर सकता है और 'बीती को बीती' (Past is past) समझ कर सृष्टि ड्रामा की ढाल को पकड़ सकता है। यदि सहनशील नहीं बने हैं तो ड्रामा की ढाल को पकड़ना भी मुश्किल है। जैसे मोटर में गद्देदार (Coshioned) सीट पर बैठने से ऊंचे-नीचे रास्ते के धक्के महसूस नहीं होते बल्कि और ही मज़ा आता है उसी तरह सहनशील व्यक्ति भी हर्ष-शोक, स्तुति-निदा, हानि-लाभ, जय-पराजय इत्यादि परिस्थितियों में समान रह सकता है और साक्षी होकर इस सृष्टि-लीला का आनन्द ले सकता है। सहनशीलता भी केवल बाहर की व शरीर की ही नहीं चाहिए लेकिन मन में जो अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प भी उत्पन्न होते रहते हैं, उन विकल्पों को देखकर भी घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना करना चाहिए।
सहनशील व्यक्ति के लक्षण
सहनशीलता के गुण को धारण करने वाले व्यक्ति के लक्षण ये हैं कि वह सन्तुष्ट दिखाई देगा। उसके नैन-चैन कभी भी असन्तुष्ट नहीं होंगे। जो सन्तुष्ट-मूर्त रहता है वही दूसरों को भी सन्तुष्ट कर सकता है। सहनशील व्यक्ति के कर्मों से ऐसा अनुभव होगा कि जैसे मानो कोई फरिश्ता इस धरती पर चल-फिर रहा है। जितना कोई सहनशील बनता है उतना ही वह स्वयं से भी सन्तुष्ट हो सकता है।
संतुष्ट होना माना सफ़ल होना। यह बात भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक दिव्य गुण की धारणा से मनुष्य को अनेक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं जिससे उसे अपने कर्मों में सफ़लता और सिद्धि मिलती है। जैसे सागर की तह में जाने वाले ही रत्न निकाल कर लाते हैं उसी तरह जो सहनशील होते हैं वह हर बात की गहराई में जाते हैं। गहराई में बहुत शक्ति मिलती है। सहनशील ही मनन शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। जो सहनशील होगा वह अन्दर ही अन्दर मनन करेगा। जो मनन करता है वही मगन रह सकता है। सहनशीलता के गुण की धारणा से ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, अहंकार इत्यादि विकार खत्म हो जाते हैं और अन्तर्मुखता, निर्माणता, अडोलता इत्यादि कई अन्य दिव्य गुणों की धारणा स्वतः ही हो जाती है। सहनशील व्यक्ति का चेहरा गुण-मूर्त दिखाई देगा और वह हर्षित मुख और लोक प्रिय बन जायेगा जिससे हर कर्म में सफलता उसके पाँव चूमेगी।
सहनशीलता के गुण की गहराई में जाना चाहिए क्योंकि इसकी धारणा से प्राप्त होने वाली शक्तियों के द्वारा मनुष्य का जीवन संवर जाता है, जिसमें उसका अपना भी हित है तो समाज का कल्याण भी समाया हुआ है। जितना-जितना इस गुण की गहराई में जायेंगे उतना उतना ही इसके मूल्य का पता पड़ेगा। जितना मूल्य का पता पड़ेगा उतना ही इस गुण को धारण करने का पुरुषार्थ करेंगे। विचार करें कि जिस गुण को धारण करने से मनुष्य का जीवन इतना श्रेष्ठ बनता हो उसका कितना मूल्य रखना चाहिए? जितना स्वयं को सहनशीलता के गुण के मूल्य का पता होगा उतना ही औरों को भी बतला सकेंगे। अतः हमें सहनशीलता के गुण को धारण करने और करवाने के लिए बीसों नाखूनों का जोर लगा कर तत्पर हो जाना चाहिए।
दोष दृष्टि
अज्ञानी और ज्ञानी के जीवन में बहुत अन्तर होता है और होना ही चाहिए। अज्ञानी मनुष्य की दृष्टि अपने सम्पर्क में आने वाले हर-एक मनुष्य के दोषों पर ही जाती है। वह दूसरे के अवगुणों का चिन्तन करता है और इस प्रकार न स्वयं हर्षित और प्रफुल्लित रहता है और न ही दूसरों को मीठी दृष्टि से देखता है। जिस मनुष्य की दृष्टि में जितनी वक्रता और कटुता है मानो कि वह उतना ही अधिक अज्ञानता अथवा विस्मृति में है।
"दूसरा व्यक्ति अगर दोषी है तो उसके दोषों का दण्ड वह पायेगा। हम उसके दोषों का व्यर्थ ही चिन्तन करके उसका दुःख स्वयं को क्यों लगाय्यें अथवा हम उसके अवगुणों की माला को क्यों जपें?" ऐसा ही ज्ञानी सोचा करते हैं। अवगुण कम हों या ज्यादा, हर-एक मनुष्य में कुछ तो गुण भी हुआ करते हैं। बुद्धिमान आदमी दूसरों के अवगुणों को छोड़कर गुणों को चुगता है। इसलिए, उसकी दृष्टि गुणों पर ही जाती है।
दूसरों के दोष दिखाई दे जायें तो अपने हृदय को प्रसन्न रखने का तरीका यही है कि हम स्वयं में देखें कि स्वयं हम में तो किसी अंश में वह दोष नहीं छिपा है। जैसे दूसरों में वह दोष हमको अप्रिय लग रहा है, वैसे ही हम में भी तो वह दोष दूसरों को अप्रिय लगता होगा। तब क्यों न हम दूसरों के दोषों को देखकर भी स्वयं में से वह दुर्गुण निकालें ?
हम में वह दोष न भी हो, परन्तु जब तक हम देवता नहीं बने, तब तक हम में और कोई दोष, ज़्यादा नहीं तो कम, प्रत्यक्ष नहीं तो गुप्त रूप में हो तो सकता ही है। जबकि दोष अप्रिय वस्तु है और हानिकारक है और दूसरों को और स्वयं को चुभने वाला कांटा है; तो क्यों न हम भी यह कोशिश करें कि दूसरों के दोषों को देखने की बजाय अपने दोषों को ढूंढकर निकाल दें।
मनुष्य के श्वास का क्या भरोसा है? जबकि इन्सान की मृत्यु की तिथि और घड़ी मनुष्य को मालूम नहीं तो क्यों न दोषों को आज ही निकाल दिया जाय ? अथवा जबकि "अन्ते या मति सा एव गति" होती है; तो दोषों का चिन्तन ही क्यों किया जाय ? क्यों न हम साक्षी होकर एक सर्व गुण सम्पन्न परमात्मा ही के गुणों को देखें, उस ही से गुण लें और दोष-रहित अर्थात् देवता बनें ?
दोषी का दोष देखकर उससे घृणा करना 'शुभ-चिन्ता' नहीं कहलाता। यदि तुम्हें उसका दोष अप्रिय है परन्तु वह स्वयं तुम्हें प्रिय है; तो उससे घृणा न होकर के उसके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए। किसी मनुष्य को कांटा लगा हुआ हो तो क्या हमें उससे घृणा करनी चाहिए या उस पर दया आनी चाहिए? जबकि परमपिता परमात्मा हम (जो कि दोषी थे अथवा अब भी हैं) पर दया करके हमें ज्ञान-योग द्वारा निर्दोष बनाते हैं (न कि हम से घृणा करके हमें छोड़ देते हैं) तो सिद्ध है कि दोषी से घृणा करना हमारे निर्दय भाव को प्रकट करता है।
किसी के दोष निकाल कर उससे घृणा करना अथवा सारा समय दोषों की ही दृष्टि अथवा स्मृति में रहना स्वयं एक दोष है। इसलिये जब हम स्वयं अपने में से यह दोष निकाल देंगे तो दूसरे के दोषों को भी निकाल सकेंगे।
कुछ लोगों का ख्याल है कि किसी के ऐबों (दोषों) पर पर्दा डालना चाहिए, क्योंकि जैसे गन्द (कीचड़े) को खोदना बुरा है वैसे अवगुणों का वर्णन भी अच्छा नहीं।
दोषी का दोष न देखने का यह अभिप्राय नहीं कि जो मनुष्य अवगुण अथवा आसुरी लक्षण वाला है उसको हम वैसा न मानें, देवता मानें अथवा उसे सर्वगुण सम्पन्न मानें। दोषी को दोषी न मानकर पवित्र मानना तो मिथ्या ज्ञान है। दोष-दृष्टि न रखने का अर्थ यह है कि हम व्यर्थ ही किसी के दोषों का चिन्तन कर अपने अनमोल समय को न गंवाएं और उस चिन्तन द्वारा अपनी खुशी को न खो बैठें। परमात्मा सर्वगुण सम्पन्न हैं, 'दोष' अथवा 'विकार' माया ही के नाम हैं। अतः जब हम किसी के दोषों अथवा विकारों का व्यर्थ ही चिन्तन करते हैं तो उसका अर्थ यह हुआ कि हम माया से बुद्धियोग लगाते हैं, ईश्वर से विमुख होते हैं। ऐसा करने से अकल्याण हो जाता है।
दोषों से मनुष्य दुष्ट बनता है और निर्दोषता से इष्ट। दुष्ट सबको अप्रिय और इष्ट ही सबको प्यारा लगता है। परमात्मा को हम इसलिए चाहते हैं और इसलिए 'इष्ट' मानते हैं कि वह सम्पूर्ण निर्दोष और पवित्र है। देवता भी मनुष्य के लिए 'इष्ट' हैं क्योंकि वे निर्दोष मनुष्य हुए हैं। महात्माओं का वन्दन इसलिए होता है कि उनमें दोष कम हैं। इसलिए दोष दृष्टि तो अपने ऊपर होनी चाहिए। इससे ही मनुष्य दुष्ट से इष्ट, विकारी से निर्विकारी अथवा मनुष्य से देवता बनता है।
वर्तमान समय एक 'दोष' सभी में है। उस ही के कारण अन्य सभी दोष भी विराजमान हैं। मनुष्य परमपिता परमात्मा को भूल गया है और उस भूल ही के कारण अकर्तव्य करता है। अतः परमात्मा की विस्मृति ही एक ऐसा दोष है जिससे कि संसार में दोष और द्वेष फैला है। इस दोष से कौन बचा है? अतः विचारवान् मनुष्य को चाहिए कि यह दोष निकालने का पुरुषार्थ करे, क्योंकि मनुष्य से देवता बनने की यही युक्ति है।
जन्म-जन्मान्तर के दोषों ही के कारण तो मनुष्य अब दुःख और अशान्ति भोग रहा है। यह बात तो हमारी ये आंखें भी देखती हैं। दोषी मनुष्य के सिर पर दोषों का बोझ और भी बढ़ता हुआ साफ़ दिखाई देता है। उसके दोषों को देखकर उचित है कि मनुष्य स्वयं भी सावधान हो और दूसरों को भी सावधान करे।
"जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" के अनुसार निर्दोष को सृष्टि में सद्गुण दिखाई देंगे। परन्तु जैसे प्रायः इसका अर्थ लिया जाता है वैसा अर्थ ठीक नहीं है। "दोष-रहित दृष्टि से देखने से सृष्टि का दोष रहित दिखाई देना" वास्तव में इस प्रकार होता है कि जब मनुष्य दोष रहित दृष्टि से देखने वाले अर्थात् निर्दोष हो जाते हैं तो सारी सृष्टि ही निर्दोष हो जाती है अर्थात् सतयुग आ जाता है।
सुख और दुःख
सुख और दुःख का सम्बन्ध किसके साथ है और वह किस रीति से उत्पन्न होता है, यह जानने की अत्यन्त आवश्यकता है, क्योंकि जीवन में पल-पल हम सुख या दुःख का अनुभव करते हैं। सुख और दुःख कर्म-जन्य हैं और इनका सम्बन्ध सीधा कर्म के साथ है। कर्म करते समय जैसी भावना होगी, जैसा उसका साधन होगा, तदनुसार ही उसका फल होगा। श्रेष्ठ कर्म का फल श्रेष्ठ ही होगा। अतः सदाकाल के लिये सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति के लिये सर्वश्रेष्ठ कर्मों की आवश्यकता है। जब तक बुरे कर्मों में पूर्ण परिवर्तन न आये तब तक पूर्ण सुख का अनुभव कदापि नहीं हो सकता है।
कर्म की महिमा
बहुतों की यह मान्यता है कि सुख एवं दुःख दोनों परमात्मा ही देते हैं और इस रीति से वे "ईश्वरेच्छा" कहकर स्वयं को निर्दोष ठहराने की कोशिश करते हैं, परन्तु वास्तव में इस प्रकार "ईश्वरेच्छा" कहना भी निर्बल अथवा मिथ्या ज्ञान वाले मनुष्य की अपनी मनोवृत्ति का प्रतीक है। परमात्मा की महिमा सदैव "सुख-कर्ता" एवं "दुख-हर्त्ता" जैसे शब्दों से की जाती है, न कि "सुख एवं दुःख दाता" इत्यादि शब्दों से। अगर सुख के साथ दुःख भी परमात्मा ही देते होते तब तो उनकी महिमा की आवश्यकता ही न रहती। क्या कभी कोई व्यक्ति सूर्य को "प्रकाश एवं अन्धकार दोनों ही का देने वाला" मानता है? कदापि नहीं। सूर्य का कार्य सदैव प्रकाश देना और अन्धेरे को भगाने का है। बस, इसी प्रकार परमात्मा भी सदैव सुख-कर्त्ता एवं दुःख हर्त्ता है। जब-जब मनुष्य दुःखी होता है तब-तब वह परमात्मा को पुकारता है; इससे भी यह बात सिद्ध होती है कि परमात्मा का कार्य दुःख से छुड़ाने का है, न कि दुःख के बन्धनों में जकड़ रखने का। परमात्मा सुखदाता तो अवश्य हैं परन्तु कर्म के सिद्धान्तों को वह भी नहीं तोड़ते हैं। इसलिये ही तो वे कहते हैं कि "मैं जो मत दूँ, उसके अनुसार कर्म करोगे तभी सुखी बनोगे।" इस प्रकार आचरण अर्थात् कर्म की महिमा उन्होंने भी बताई है। अतः दुःख के नाश एवं सुख की प्राप्ति के लिये पवित्र प्रवृत्ति की ही अपेक्षा रहती है।
सुख के लिये ज्ञान को व्यवहार में लाना आवश्यक है
बहुतों की मान्यता है कि ज्ञान से सुख मिलता है। अतः सुख की प्राप्ति के लिये वे ज्ञानी बनने का पुरुषार्थ करते हैं। किन्तु वास्तव में ज्ञान तो 'समझ' ही का दूसरा नाम है। 'समझ' अथवा ज्ञान तो साधन है, साध्य नहीं।
ज्ञान लेने के बाद भी कर्म को श्रेष्ठ करने की आवश्यकता तो फिर भी रहती ही है। अतः याद रहे कि जान को भी आचरण एवं व्यवहार में लाने की आवश्यकता है। ज्ञान को जीवन के लक्ष्य में बदलकर के तदनुसार आदर्श पुरुषार्थ करना चाहिए। ज्ञान बुद्धि में भरकर रखने की चीज़ नहीं है। जब तक ज्ञान का कर्मों के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा जायेगा तब तक मनुष्य इस जीवन को पूर्ण सुखी, कल्याणयुक्त या अमृतमय बनाने में निष्फल रहेगा। ज्ञान को व्यवहार में न लाने से हमारी नासमझी के कारण ज्ञान का मार्ग भी बदनाम होगा।
दुःख की निवृत्ति संकल्पों को जीतने से नहीं होती
सुख एवं दुःख का अनुभव मन द्वारा होता है। इससे बहुत लोगों की यह धारणा हो गई है कि मन को जीतने से दुःख को जीत सकेंगे। किन्तु मन तो एक साधन मात्र है जिसके द्वारा हम अनुभव करते हैं। मन का कार्य संकल्प करना है। संकल्प तो उठेंगे ही। उपनिषद् में यह जो लिखा है कि परमात्मा को नई सृष्टि रचने की इच्छा हुई, इससे सिद्ध है कि संकल्प तो निराकार परमात्मा भी करते हैं। संकल्प तो देवताओं के मन में भी उठते हैं। गीता में भी भगवान् ने यह जो कहा है कि जब-जब अति धर्म की ग्लानि होती है तब-तब मैं अवतार धारण करता हूँ, इससे भी सिद्ध है कि ज्ञान के सागर परमात्मा को भी संकल्प होते हैं। इस रीति से संकल्प तो अवश्य चलते ही रहेंगे। स्वप्न भी संकल्पों ही का एक रूप है। इसलिये संकल्प जीतने से या बन्द करने से या मन को जड़ कर देने से दुःख का अन्त नहीं होगा। अतः प्रश्न उठता है कि दुःख को दूर करने के लिये क्या पुरुषार्थ करना चाहिए?
विकल्प और विकर्म ही दुःख का कारण
दुःखों को दूर करने के लिये मन में जो विकल्प चलते हैं, उन्हें जीतने की जरूरत है। ये विकल्प ही माया जाल है। 'माया' प्रकृति या धन सम्पत्ति का नाम नहीं है, बल्कि विकारों ही का दूसरा नाम है। मुख्य रूप से विकार पांच ही हैं जिनके नाम काम, क्रोध, लोभ, मोह और अशुद्ध अहंकार हैं। विकार के वश जो विचार चलते हैं, उनको विकल्प कहते हैं और विकारयुक्त जो कर्म हों उन्हें विकर्म कहा जाता है। उदाहरण के लिये, घर में यदि बालक ऊधम मचाता है और माँ को उस पर क्रोध आता है: तो क्रोध के विचार को 'विकल्प' कहा जायेगा और यदि वह क्रोधवश उसे पीट दे तो उसके कर्म को 'विकर्म' कहा जायेगा। यदि विकार केवल मन तक ही रहे तो उसे 'विकल्प' कहते हैं और यदि वह वाणी या कृति में आ जाय तो उसे 'विकर्म' कहते हैं। इस रीति से जब विकार हमारी वाणी या कृति में प्रविष्ट होकर हमारे कर्म को दूषित करते हैं तब वे कर्म द्वारा हमारे विकर्म बनते हैं और इससे दुःख की उत्पत्ति होती है।
'सत्कर्म' किसे कहते हैं?
ये विकल्प और विकर्म के उदाहरण तो प्रति-क्षण हमें इस जगत् में देखने को मिलते हैं। किसी समय हम अन्य किसी व्यक्ति को विकारों के वश कर्म करते देखते हैं तो अन्य किसी समय साक्षी हो हम यदि अपनी कृति की ओर दृष्टि डालकर देखते होंगे तो अपनी कृति भी विकारी मालूम होती होगी। ऐसे जब विकर्म और विकल्प के मापदण्ड से सबको मापेंगे तो मालूम पड़ेगा कि आज की सृष्टि में सब विकारी हैं अर्थात् विकार वश होकर ही सामान्य रीति से अपने कर्म करते हैं। सत्कर्म तो सभी सतत् करने की चाहना रखते हैं, किन्तु सत्कर्म क्या है, उसका सत्य ज्ञान मालूम न होने के कारण विकार-मुक्त सत्कर्म तो बहुत कम होते हैं। इसके विपरीत, यानी विकर्म तो सतत् होते ही रहते हैं और इससे दुःख का बीज दिन-प्रति-दिन बढ़ता ही रहता है। ऐसे विकर्मों को रोककर अर्थात् कर्म करते हुए विकार रूपी बीज को दूर करने से ही कर्म, अकर्म अथवा सत्कर्म बनेगा।
अतः सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति के लिए हमारे जो कर्म हैं उन्हें विकर्म न बनने देते हुए सत्कर्म करने का पुरुषार्थ करना चाहिए और उसके लिए आवश्यक ज्ञान लेना चाहिए। ज्ञान एक साधन है और उसे साधन रूप में प्रयोग में लाने से ही ज्ञान की सार्थकता बढ़ेगी और तभी ज्ञान भी फलीभूत होगा। किन्तु आज तो ज्ञान पेट के लिए रोटी कमाने अर्थ अथवा सत्ता या कीर्ति बढ़ाने के अर्थ ही उपयोग में आ रहा है। ज्ञान का उपयोग विकारों के नाश हेतु अर्थात् पवित्रता की प्राप्ति के लिए तो बहुत ही कम हो रहा है। ज्ञानी आत्मा को मनोमंथन करके अपने से ही पूछना चाहिए कि मैं स्वयं कितना पवित्र या निर्विकारी बना हूँ? भक्ति करते समय भी इसी दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए कि भक्ति का अर्थ केवल भगवान् का नाम रटना या पूजना नहीं, बल्कि जैसे भगवान् पूज्य और पवित्र हैं वैसे ही अपने कर्मों को स्वच्छ बनाकर पूज्य तथा पवित्र बनने का पुरुषार्थ करना भी है। इस प्रकार सच्चे भक्त को भी चाहिए कि अपने कर्मों को विकारों से मुक्त करे, अर्थात् अपनी दिनचर्या को पवित्र बनाये। जब तक भक्त का व्यवहार विकार मुक्त नहीं बना है तब तक भक्त के दुःख का भी सम्पूर्ण नाश नहीं होगा।
पवित्र बनने के लिए प्रयत्न करो
जो लोग जप-तप, दान इत्यादि करते हैं उन्हें भी ये ध्यान में रखना चाहिए कि यदि दान करते हुए कीर्ति रूपी मोह सूक्ष्म रूप से मन में है तो वह विकारी दान हुआ और उससे दान का श्रेष्ठ फल नहीं मिलेगा। यदि दान, जप-तप आदि सब पुण्य कर्मों को पुण्य-युक्त बनाना है तो ये कर्म करते समय विकारों से मुक्त रहना पड़ेगा। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ये तीनों उन्नतियाँ कर्म की पवित्रता के बिना व्यर्थ हैं। पवित्रता तो सच्चे सुख का आधार है। शुद्ध कर्म जीवन की आधारशिला है। यही न हो तो, ऊपर का ज्ञान, भक्ति, दान, उपवास आदि सबकी कितनी भी भव्य इमारत हो, परन्तु वे ठहर नहीं सकेगी और मनुष्य के जीवन में कभी भी सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम देवी-देवताओं के जैसी सुख-शान्ति एवं समृद्धि प्राप्त नहीं हो सकेगी। अतः प्रति दिन, रात को सोते समय मनोमंथन करना चाहिए कि आज मैं कितना पवित्र रहा? काम, क्रोध या मोह रूपी भूतों के पंजे में कितना फँसा? बाहरी शत्रुओं को जीतने या उनके बचने के लिए लोग बहुत ही प्रयत्न करते हैं। लेकिन पवित्रता की बातें तो अपने जीवन सम्बन्धी सूक्ष्म बातें हैं। उसके लिए अन्य कोई भी दवा नहीं है। किसी की भी कृपा या दया से हम निर्विकारी नहीं बन सकेंगे। जैसे किसी के शरीर में थोड़ी भी बीमारी होती है तो उसे तुरन्त ही दूर करने का प्रयत्न किया जाता है, वैसे ही कर्मों में रही हुई इस विकृति को भी दूर करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
महावाक्य का अर्थ
लेकिन आज के इस समाज में बहुत लोग निर्बलता को नम्रता, आसक्ति को अहिंसा, प्रवृत्ति को प्रगति और फेरफार को विकास मान बैठे हैं और इसलिए कहते हैं कि सुख तो काग-विष्ठा के समान है। कविजन भी कहते हैं कि "सुख-दुःख मन में न लाइये।" और तो क्या, वे कहते हैं कि गीता में भी लिखा हुआ है कि "सुख दुःखे समे कृत्वा ....।" अर्थात् "दुःख-सुख को समान समझकर....." गीता के इस महावाक्य का अर्थ भी अयथार्थ रीति से समझने के कारण बड़ा अनर्थ हुआ है। इससे बहुत लोग मान बैठे हैं कि दुःख को दुःख न मानना चाहिए। परन्तु दुःख को दुःख न मानना यह तो कोई सिद्धि नहीं है। कदाचित् मन की आदत होगी तो दुःख का धक्का मन को नहीं लगेगा, किन्तु प्रसंग ने दुःख का निर्माण किया यह तो वास्तविक और प्रत्यक्ष बात है, तब भला हम वास्तविकता को मानने से इन्कार कैसे कर सकते हैं? जीवन में रोग आया, किसी की अकाल मृत्यु हुई, गरीबी आई या कोई झगड़ा इत्यादि होने से दुःख उत्पन्न हुआ तो उसे हम मानें ही न, यह भला कैसे हो सकता है?
ऐसे दुःखों की परिस्थितियाँ यदि जीवन में पैदा होंगी तो वे निश्चित ही मन को कभी-न-कभी विचलित करेंगी। इसलिए ऐसे दुःखोत्पादक प्रसंग ही जीवन में न होने चाहिए। दुःख कोई कल्पना नहीं है। वैसे ही सृष्टि भी कोई कल्पना नहीं है। दोनों सत्य हैं। अतः दुःख का सामना, समझ अथवा ज्ञानपूर्वक होना चाहिए। दुःख को दुःख मानने की बजाय दुःख के कारण ही जीवन में न रहें और 'दुःख' शब्द शब्दकोष में ही न रहे, ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए। सम्पूर्ण तथा शाश्वत सुख का भी जमाना था, ऐसा हमें देवी-देवताओं के वास्तविक जीवन चरित्र को जानने से मालूम होता है कि मनुष्य सतयुग तथा त्रेतायुग में सम्पूर्ण सुखी था। तब उसे काल का भी डर न था, निर्धनता न थी, धन-धान्य से भरपूर जीवन था, तब माया अर्थात् विकार का नाम मात्र भी न था।
क्या पुरुषार्थ करना चाहिए ?
गीता के उस महावाक्य का भी अर्थ है। जब विकल्प अर्थात् माया को हम जीतने का पुरुषार्थ करेंगे तभी वह (माया) हमारी शत्रु बनेगी। दुश्मन बनी हुई माया विघ्न भी निश्चित खड़ा करेगी और आघात प्रत्याघात करेगी। ऐसे पुरुषार्थी जीवन में ऐसे आघातों को दुःख न समझना ही इस महावाक्य का वास्तविक अर्थ है। इस तीव्र पुरुषार्थ के समय पिछले कर्मों के हिसाब-किताब चुक्तू होने के हेतु अधिक दुःखजनक प्रसंग उपस्थित होते हैं। तब उन नये-नये दुःखदायक प्रसंगों के समय दुःख नहीं भासना चाहिए, यह इसका दूसरा अर्थ है। वैसे ही इस समय देह के सभी सम्वन्धों में से बुद्धि को हटाने की तथा जीते-जी ज्ञान द्वारा मरने से (मरजीवा जीवन
से) जो थोड़ा-बहुत कष्ट होता है उसे कष्ट नहीं समझना चाहिए, यह तीसरा अर्थ है। दुःख के समय एकरस अवस्था रहे, इसलिए लिखा हुआ है कि उस दुःख को दुःख न मानो। बाकी कर्म-भोग के रूप से आये हुए दुःख को तो निश्चित दुःख ही समझकर उसे सदा के लिये जीवन में से दूर करने का पुरुषार्थ अवश्यमेव होना चाहिए।
मैं आपका शुभचिंतक
भारत में चिरातीत से यह एक रिवाज चला आया है कि जब यहाँ के लोग एक दूसरे को पत्र भी लिखते तो उसके प्रारम्भ में सबसे ऊपर या तो स्वास्तिक बनाते या ओम् लिखते या 'ओम् नमो शिवाय' आदि अंकित करते। फिर पत्र की प्रारम्भिक पंक्तियों में वे 'जय कृष्ण जी की' अथवा 'राम-राम वाँचना' अथवा और कोई ऐसे शब्द लिखते और साथ में मंगल-कामना अभिव्यन्जित करने के लिए कुछ इस प्रकार के शब्दों का भी उल्लेख करते जैसे 'अत्र कुशलम्, तत्र अस्तु' अथवा 'ईश्वर की कृपा से यहाँ सब ठीक हैं और पूर्ण आशा है कि आप भी सब कुशलतापूर्वक होंगे।' इस प्रकार पत्र में थोड़ी-कुछ रूहानियत भी आ जाती और एक-दूसरे के प्रति कुछ शुभभाव भी उभर आते। पहले तो लोग अपने हाथों से ही ये शब्द उस भाव में स्थित होकर लिखते परन्तु जब छापेखाने खुल गये तब से लोगों ने सोचा होगा कि इन शब्दों का प्रयोग तो अच्छा ही है परन्तु बार-बार हर किसी को पत्र लिखते समय इन शब्दों को स्वयं लिखने में समय खर्च करने की बजाय उन्हें छपवा ही दिया जाये तो अच्छा है। अतः उन्होंने ऐसे पोस्ट कार्ड अथवा कागज छपवा कर ही रखने शुरू किये ताकि पोस्ट कार्ड अथवा कागज़ पर छपे हुए उतने हिस्से को छोड़कर 'जरूरी बातों' अथवा 'काम की बातों' को लिखने में ही समय लगे। गोया ये सब पंक्तियाँ अब द्वितीय स्थानीय महत्व (Secondary Importance) की मानी जाने लगीं। विशेषकर व्यापार सम्बन्धी पत्रों में तो इन पंक्तियों को लिखने की बजाय इन्हें छापने ही का प्रयोग आम हो गया। कारोबारी पत्रों के आरम्भ में भगवान् का नाम अथवा मंगल कामना केवल एक रस्म ही रह गई है और उसमें रूहाब अथवा रस नहीं रहा।
जब लोग उपरोक्त प्रकार से पत्र लिखते थे, तब कम से कम ईश्वर का नाम बीच में ले आने से पत्र प्रेषक तथा पत्र-संग्राहक दोनों को कर्मों की अच्छाई का थोड़ा-बहुत ध्यान तो रहता ही होगा। हर बार पत्र लिखते समय ईश्वर अथवा इष्ट को उल्लेख करने से उनके मन में कुछ तो प्रभु-प्रेम अथवा खौफे खुदा रहता ही होगा। पुनश्च, हर पत्र में वे जिस व्यक्ति के प्रति भक्ति भाव से मंगल-कामना व्यक्त करते, उसके प्रति उनका कुछ तो हितभाव या सद्भाव रहता ही होगा। यही कारण था कि तब लोग एक-दूसरे के विरुद्ध मुकदमाबाजी करने, व्यापारिक लूट-खसूट मचाने अथवा दूसरे का अमंगल करने में कुछ तो अपने ऊपर काबू रखते थे।
समय परिवर्तन
परन्तु अब ज़माना काफ़ी बदल गया है। जिनके हाथ में बड़े उद्योग और बहुत बड़े व्यापार हैं उनके यहाँ तो पत्राचार प्रायः अंग्रेज़ी भाषा में ही होता है। अतः अब स्वास्तिक बनाने, ईश्वर के नाम का उल्लेख करने अथवा मंगल-कुशल पूछने का रिवाज काफी कम सा हो गया है और धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। अब भक्ति मार्ग की यह रस्म भी मिटती-सी जा रही है। अब परमात्मा के नाम को बीच में से निकाल देने से पत्रों में बिल्कुल लौकिकता ही आ गई है और मनुष्यों के पारस्परिक नाते से भगवान् का नाम भी मिटता-सा जा रहा है। यदि कहीं किसी के पत्र में भगवान् या देवताओं की याद दिलाने वाले ऐसे कोई शब्द लिखे होते हैं, तो भी वे केवल औपचारिकता के प्रतीक होते हैं, वे हृदय के भावों से तो शून्य ही होते हैं।
स्नेह का अभाव
पत्र-लेखन में जैसे प्रारम्भ में प्रयुक्त मंगल-कुशल सूचक शब्द निस्सार हो गये हैं वैसे ही आज पत्र के अन्त में अपने हस्ताक्षर से पूर्व लिखे जाने वाले शब्द भी स्नेह और सम्बन्ध की सुगन्धि से रहित, कागज़ के फूलों की तरह से केवल सजावटी हो गये हैं। आज भी पत्र लेखक पत्र का अन्त प्रायः इन शब्दों से करते तो 'मैं हूँ आपका शुभचिंतक (Yours Faithfully)', 'मैं हूँ आपका आज्ञाकारी सेवक (Yours Obediently)' सचमुच आप ही का (Yours Truly)' अथवा 'भवदीय' (Your Own) इत्यादि, परन्तु पारस्परिक व्यवहार में वे इन शब्दों के अर्थ के अनुसार आचरण नहीं करते। लिखने को तो हरेक व्यक्ति लिख देता है कि "मैं हूँ आपका विश्वसनीय मित्र (Faithful Friend)" परन्तु आज व्यवहार में इस कथन का कोई महत्व नहीं रहा।
एक चिराकालीन परम्परा का अन्त
एक समय था जब हरेक सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी अपने पत्र के अन्त में लिखता था 'मैं हूँ आपका आज्ञाकारी सेवक' (I am your obedient servent) परन्तु आज 'सेवक' शब्द का प्रयोग तो बिल्कुल ही बन्द हो गया है और प्रायः 'आज्ञाकारी' शब्द भी निकाल दिया गया है और सब प्रकार के सरकारी और व्यापारिक पत्रों में 'मैं हूँ आपका शुभचिंतक' (Yours Faithfully) अथवा 'आपका मित्र' (Sincerely yours) शब्दों का ही प्रयोग प्रचलित है। लोग इस रिवाज़ को बन्द करने का कारण बताते हुए कहते हैं कि ऐसे शब्दों में साम्राज्यवाद अथवा नौकरशाही (Feudalistic society) की दुर्गन्ध आती है। वे कहते हैं कि हम किसी के नौकर थोड़े ही हैं कि हम उसके प्रति लिखे गये पत्र में अपने लिए 'सेवक' शब्द का प्रयोग करें ?
निस्सन्देह इतिहास में ऐसा समय था जब साम्राज्यवाद और नौकरशाही ही का प्रचलन था और उन दिनों कई लोग ऐसे भी रहे होंगे जिनमें गुलामी की ज़हनियत थी और जो हर तरह से अपने अफसरों और अधिकारियों को 'जी-हजूर 'कहते थे परन्तु तब भी बड़े से बड़े अफ़सर भी तो अपने लिए 'मैं हूँ आपका सेवक' इन्हीं शब्दों को प्रयोग करते थे।
उन दिनों अधिकारी वर्ग इन शब्दों का प्रयोग न भी करता हो तो भी अब जबकि जनता का जनता पर राज्य है, इन शब्दों का प्रयोग करने से नौकरशाही का भाव न आकर परस्पर व्यवहार में सेवाभाव ही तो जाग्रत होगा? अब इस रिवाज़ को छोड़ने की बजाय तो इसे और भी अधिक अर्थ-युक्त बनाने की वेला है। अतः लगता है कि जहाँ मनुष्य ने गुलामी की जंजीरों को उतार फेंका है वहाँ उसने शायद सेवा-भाव को भी तिलांजली दे दी है।
नई पृष्ठभूमिका में स्नेह से इन शब्दों का प्रयोग
इस प्रकार कहने का भाव यह कि पहले जिन शब्दों का प्रयोग होता रहा है, वे मनुष्य के कर्मों को कुछ हद तक अंकुश में रखने के लिए सहायक होते थे और उनसे एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच व्यक्तिगत स्नेह और सौहार्द बना रहता था और निकटतापूर्ण सम्बन्ध जुटता था जिससे पारस्परिक व्यवहार में एक ऐसा तालमेल पैदा हो जाता था कि थोड़ी कुछ मर्यादा बनी रहती थी और यदि कहीं सम्बन्धों में विषमता आती भी थी तो उसको निबटाह लिया जाता था। आज भी यदि उन शब्दों का नयी पृष्ठभूमिका में व्यवहारिक प्रयोग होता तो समाज का कुछ भला ही होता।
उदाहरण के तौर पर 'शुभचिंतक' शब्द को ही लीजिए। यदि सच्चे अर्थ में हरेक व्यक्ति हर दूसरे का शुभ चिंतक होकर बातचीत अथवा पत्राचार करे तो संसार के बहुत से झगड़े पैदा ही नहीं होंगे। और यदि कोई संकट पैदा हो भी जाय तो उसे भी शुभ-चिन्तन के आधार पर जीवन में निवटाय जा सकेगा। बात स्पष्ट है कि यदि कोई व्यापारी अपने ग्राहकों का शुभचिंतक होकर व्यापार करेगा तो वह न केवल अनुचित मुनाफा नहीं लेगा, चीज़ों में मिलावट भी नहीं करेगा और अवांछित संग्रह (Holding) तथा चोर बाज़ारी जैसे निकृष्ट कर्म भी नहीं करेगा। यदि कोई उद्योगपति स्वयं को अपने कारखाने के कर्मचारियों का शुभचिंतक मानेगा तो वह उनका शोषण नहीं करेगा और यदि कारीगर भी स्वयं को कारखाने के मालिकों का शुभचिंतक अथवा आज्ञाकारी सेवक समझेंगे तो वे भी हर आये दिन हड़ताल, नाराबाजी, तोड़-फोड़ या ऐसे प्रकार के आन्दोलन नहीं करेंगे। यदि पुलिस स्वयं को जनता की शुभचितक माने तो वह केवल अपराधी ही को पकड़ेगी और निर्दोष लोगों पर अत्याचार नहीं करेगी। यदि अध्यापक स्वयं को विद्यार्थी के शुभचिंतक मानकर उन्हें पढ़ायेंगे तो वे उनके आचरण को भी उच्च बनाने का यत्न करेंगे तथा उन्हें विद्या पढ़ाने के कार्य पर भी अपना पूरा ध्यान देंगे और यदि विद्यार्थी स्वयं को समाज तथा अध्यापक वर्ग के शुभचिंतक मानेंगे तो वे भी तोड़-फोड़ नहीं करेंगे और अनुशासन भंग नहीं करेंगे। आज राजनीतिज्ञ भी कहते तो हैं कि हम समाज सेवा (Social Service) पर तत्पर हैं परन्तु यदि वे सही अर्थ में समाज की सेवा ही का भाव सदा बनायें रखें और सभी के शुभचिंतक बनकर कार्य करें तो निश्चय ही समाज की स्थिति में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आ जायेगा। गोया इस समाज में एक प्रेम की लहर दौड़ जायेगी और सर्वत्र सभी का भला ही देखने में आयेगा।
उत्तम विधि
इससे भी अच्छा हो कि सभी लोग उन शब्दों को अपनायें जिन्हें अपनाने की शिक्षा हमें परमपिता परमात्मा शिव ने दी है। यदि हम हरेक व्यक्ति को "परमपिता परमात्मा शिव की प्रिय सन्तान, प्रिय भाई.... अथवा प्रिय बहन..." इस प्रकार सम्बोधन करें तो पत्र की बुनियाद भी रूहानियत और स्नेह पर आधारित हो जायेगी और यदि हम पत्र के अन्त में 'ईश्वरीय सेवा में' अथवा 'ईश्वरीय स्मृति में आपका स्नेही भाई' अथवा 'आपकी स्नेही बहन' इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करें तो पत्र का अन्त भी शुभ होगा। इन शब्दों से हमारा योग भी परमपिता परमात्मा से जुटेगा, हमें अपने स्वरूप की भी स्मृति रहेगी और पारस्परिक आत्मिक सम्बन्ध की भी पहचान रहेगी। परन्तु यदि किसी को ये शब्द भी अस्वीकार्य हों तो कम-से-कम 'ओम् शान्ति' और 'आपका शुभचिंतक' ऐसे शब्द तो लिखने ही चाहिए और इन सूत्रों के अनुसार ही व्यवहार भी करना चाहिए। परन्तु इस विषय में इतना तो याद रखना चाहिए कि किसी को दुःख न देना, उसे दुःख देने का संकल्प तक भी न करना ही उसका शुभचितक होना है और इसी अर्थ में हम पूर्ण रूपेण किसी के शुभ चिंतक तभी हो सकते हैं जब हम निर्विकार जीवन व्यतीत करने का पुरुषार्थ करें, हमारे मन-वचन-कर्म एक हों और हम कल्याणकारी परमपिता परमात्मा से युक्त होकर शुभ ही कर्म करने वाले हों तथा परमपिता शिव ने जो ज्ञान और योग सिखाया है उस द्वारा दूसरों का शुभ करने का यथा सम्भव पुरुषार्थ करें। हम स्वयं भी शान्त रहें और दूसरों की शान्ति के लिए यत्न करें।
मूल्यों का मूल्य
स्नेह, सन्तुष्टता, सद्भावना, सहानुभूति, सहनशीलता, धैर्य, नम्रता, ईमानदारी इत्यादि को 'नैतिक मूल्य', 'मानवीय मूल्य' या 'आध्यात्मिक मूल्य' कहा जाता है। क्योंकि जीवन में हम जिन उद्देश्यों या उपलब्धियों को मूल्य देते हैं, उनकी प्राप्ति में ये सहायक होते हैं अथवा साधन बनते हैं। जैसे हम अपने दैनिक जीवन में उन वस्तुओं अथवा पदार्थों को 'मूल्यवान' मानते हैं जिनसे हमारी कुछ महत्वपूर्ण आवश्यक्ताएं पूरी होती हैं या जिन द्वारा हमें सुख या आराम या वांछित लक्ष्य की प्राप्ति होती है, वैसे ही हम इन गुणों को भी 'मूल्य' संज्ञा देते हैं क्योंकि इनसे भी हमारे नैतिक तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष का लक्ष्य प्राप्त होता है और हम जीवन में खुशी तथा सफ़लता का अनुभव करते हैं।
एक-दो और उदाहरणों से यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाएगी कि हम इन्हें 'मूल्य' क्यों कहते हैं? जब कोई व्यक्ति हमें ऐसा परामर्श या ऐसा मार्गदर्शन देता है कि उससे हमारी समस्या हल हो जाती है, हमारी परेशानी और हमारा मानसिक तनाव दूर होता है, चिन्ता मिट जाती है, और सफ़लता तथा खुशी प्राप्त होती है तो हम उस परामर्श या मार्गदर्शना को 'मूल्यवान' मानते हैं। अन्यश्च, यदि किसी व्यक्ति में ऐसी योग्यताएँ होती हैं जिससे कि वह ऐसे कार्य को कर देता है जिसे कि हम बहुत महत्व अथवा मूल्य देते हैं या वह ऐसी सेवा करता है कि जिससे कोई उच्च प्राप्ति होती है तो हम कहते हैं कि उस व्यक्ति के समय का बड़ा 'मूल्य' है। ठीक इसी प्रकार, जिन सद्गुणों या विशेषताओं से मनुष्य को उच्च मानसिक तथा आध्यात्मिक अवस्था का लाभ हो, उन्हें भी हम 'मूल्य' कहते हैं। पुनश्च, जैसे हम सोने से बने जेवरों को या रत्न जड़ित अलंकारों एवं श्रृंगारों को, जो कि पहनने वालों के सौन्दर्य में वृद्धि करते हैं, उसके व्यक्तित्व को उभारते हैं, को 'मूल्यवान' मानते हैं, वैसे ही हम इन गुणों को भी 'मूल्य' मानते हैं क्योंकि जो कोई भी इन्हें अपने जीवन में धारण करता है, उसका जीवन 'मूल्यवान', महान् तथा सुन्दर बन जाता है और उसे मूल्यवान व्यक्ति समझा जाता है क्योंकि अब उसके व्यक्तित्व में हीरे-मोतियों जैसी चमक और आभा आ जाती है।
परन्तु प्रश्न यह उठता है कि इन 'मूल्यों' का मूल्य क्या है? दूसरे शब्दों में, सन्तुष्टता, सहनशीलता, धैर्य, नम्रता इत्यादि का मूल्य क्या है? सोने या हीरे का मूल्य उसकी सच्चाई (Reality, purity) या उनके अमिश्रित या बेदाग (Flawless, unalloyed) होने पर निर्भर करता है और उनके वज़न अथवा उनके माप या उनकी चमक-दमक के अनुसर आंका जाता है। अतः इन मूल्यों के मूल्य को आंकने के लिए भी ये जानना ज़रूरी है कि ये हमारे आचार और व्यवहार को कितना बेदाग और सुन्दर बनाते हैं और हमारे व्यक्तित्व में क्या आभा और अलौकिकता भर देते हैं।
'मूल्य' का मूल्य क्या है?
हम यह देखते हैं कि किसी वस्तु का मूल्य समय-समय पर बदलता है। यों सदा इनका मूल्य होता ही है परन्तु किन्हीं विशेष परिस्थितियों में इनका मूल्य बढ़कर कई गुणा हो जाता है। ये ऐसे गुण हैं जो व्यक्तित्व को कई गुणा महान् बना देते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे से झगड़ा कर लेता है और बीं हाथ में लेकर उसे धमकी देता है और ऐसी स्थिति में वह दूसरा व्यक्ति मधुरता, प्रेम और नम्रता नामक मूल्यों का व्यवहार करता है तो उसकी जान बच जाती है वर्ना तो अपनी जान भी गंवा बैठता और उसके साथ उसकी जो मूल्यवान सम्पत्तियाँ उनसे भी हाथ धो बैठता।
इसी सन्दर्भ में ईराक के प्रधान और उसके पिट्टू परामर्शकों के उदाहरण पर विचार करना उपयोगी होगा। सद्दाम हुसैन और उसके साथियों ने सन्तुष्टता को धारण नहीं किया बल्कि उसकी बजाय कुवैत पर हमला करके उसे अपने देश के साथ जोड़ लिया। जब संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा समिति ने उनसे ये प्रस्ताव किया कि वे कुवैत को छोड़ दें और उसे अपने देश का हिस्सा न बनायें वर्ना उन्हें इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे, तब भी उन्होंने नम्रता से व्यवहार नहीं किया। अपने देश के लोगों के हित का भी ख्याल नहीं किया। न उन्होंने आत्म-नियंत्रण या संयम का पालन किया, न उन्होंने अन्य राष्ट्रों के विचार का सम्मान किया, यहाँ तक कि जो उनके मित्र राष्ट्र थे अथवा जो पक्षपात रहित देश थे, उनकी बात भी उन्होंने नहीं सुनी। इसके विपरीत वे सदा अपने सैनिक शक्ति के अभिमान की गाथा गाते रहे और अपने मानवीय बल और सैन्य बल के नशे में चूर हो कर दूसरे राष्ट्रों को चुनौती देते रहे, उन्हें युद्ध के लिए ललकारते रहे और उनका विध्वंस या विनाश करने की धमकी ही देते रहे। उन्होंने धैर्य और सहनशीलता नामक मूल्यों का प्रयोग नहीं किया न ही मिठास और प्रेम से बात की बल्कि हर बार अन्य शक्तिशाली राष्ट्रों को उत्तेजित करने वाला ही व्यवहार किया।
इसका परिणाम यह हुआ कि उनके देश को अरबों डालर के मूल्य की सम्पत्ति की क्षति हुई। उन्हें कितनी शर्मिंदगी सहन करनी पड़ी। और अब तो उन्हें उन खतरों का सामना करना पड़ा है कि कहीं उनके देश को अखंडता ही से वंचित न होना पड़े। इस प्रकार उन्हें अवर्णनीय दुःख उठाने पड़े और उन्होंने पिछले 50 या अधिक वर्षों की अवधि में देश में जो कुछ बनाया था वो प्रायः सब बरबाद हो गया। अपनी ईमानदारी और नेक नीयत खो बैठने के बाद दूसरे पर ललचाई नज़र उठाने से और अपने मन का सन्तुलन और उसकी शान्ति को खो बैठने के बाद वे प्रायः सब कुछ ही तो गँवा बैठे हैं। चूंकि सद्दाम हुसैन ने अपने ऊपर नियंत्रण अथवा आत्म-अनुशासन गंवा दिया था, इसलिए उसका अपने लोगों पर से भी शासन और प्रशासन ढहता जा रहा है। देखिये तो देश के उन थोड़े से नेताओं में कुछेक मूल्यों के अभाव के कारण सारे देश को कितना दुःख सहन करना पड़ रहा है। कितने तो आदमी मारे गये हैं और अथाह संपत्ति भी नष्ट हुई है। शान्ति तो नाम मात्र भी नहीं रही और खेद की बात है कि राष्ट्रों की पंक्ति में उनका सम्मान जाता रहा है। अब आप ही सोचिए कि उन 'मूल्यों' का कितना मूल्य है। क्या ये कहना सत्य नहीं होगा कि कई बार मूल्यों का मूल्य अतुल्य, अवर्णनीय, अनगिनत अथवा अन्दाज़े से बाहर होता है और ऐसा तो कभी भी नहीं होता कि उन मूल्यों का कुछ भी मूल्य न हो। तब क्या वे सही मानों में 'मूल्य' न हुए ?
मूल्यों के अभाव में ये जीवन भी जीने जैसा नहीं होता
मूल्यों की चर्चा में एक पहलू और है। मूल्यों का पालन करने या न करने का एक परिणाम यह होता है कि मनुष्य की क्रमशः सकारात्मक और नकारात्मक आदत-सी बन जाती है और, बदले में, ये आदत अथवा संस्कार उसके दैनिक व्यवहार, आचार, आदि को प्रभावित अथवा निश्चित करते हैं। ये आदत अथवा संस्कार, और इस पर आधारित आचार व व्यवहार उसके वर्तमान जीवन के बाद आनेवाले समय में या इसके बाद के जन्म-जन्मान्तरों में व्यवहृत होते रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य से बार-बार गलतियाँ, भूलें, अपराध और पाप होते हैं और उसके चरित्र में दाग-धब्बे लगते हैं। फिर चरित्र के ये जो दाग हैं ये बुरे कर्मों के लिए बाध्य करते हैं और फिर ये विकर्म बार-बार दुःख, अशान्ति, असफ़लता इत्यादि मनुष्य के सामने लाते हैं। इस प्रकार नैतिक मूल्यों को गंवाने के बाद व्यक्ति बारम्बार अपने स्वार्थ-सम्पत्ति, सम्मान और हर्ष और चरित्र को गंवाता है और जब तक पुनः वो इन मूल्यों को अपने जीवन में धारण न कर ले तब तक उसकी दुःख-गाथा का अन्त नहीं होगा। ये निश्चित है कि जब तक वो इन मूल्यवान मूल्यों को अपने जीवन में धारण नहीं कर लेता तब तक उसके दुःखों का अतिशय और स्थाई अन्त नहीं होता। सच ही तो है कि जो मनुष्य इन मूल्यों को धारण नहीं करता वो दूसरों के लिए और अपने लिए एक अनर्बकारी, अमंगलकारी और उपद्रवकारी (Nuisance Value) के रूप में ही नकारात्मक मूल्य रखता है। यदि किसी के जीवन में ये नैतिक मूल्य नहीं है तो वास्तव में उसका अपना भी कोई मूल्य नहीं हैं। वास्तविकता तो ये है कि जिस व्यक्ति में जिस मात्रा तक ये मूल्य होते हैं, तदनुसार ही उसका अपना भी मूल्य और उसकी अपनी भी महानता होती है। जिसके जीवन में इन मूल्यों का अभाव होता है या कमी होती है, वह स्वयं ही महसूस करता है कि उसका ये जीवन ही जीने-जैसा नहीं है।
यदि हम ध्यान दें तो हम स्वयं देखेंगे कि सभी नर-नारियों के अपने जीवन का मूल्य एक-सा नहीं होता। उनकी उपादेयता अथवा उनका मूल्य न केवल उनकी लौकिक योग्यताओं और कला कौशल पर निर्भर करता है बल्कि उसके व्यक्तित्व में जो गुण या मूल्य भासित होते हैं या जिन मूल्यों को वो अपने दैनिक जीवन में लगाता है, उन पर भी उसके जीवन का मूल्य निर्भर करता है। हमारे लिए उस मित्रता का कोई मूल्य नहीं होता जिसमें साफदिल, सहानुभूति और समय पर सहयोग का गुण न हो। इसी प्रकार, पति-पत्नी के बीच का सम्बन्ध उनके पारस्परिक वफादारी, सेवाभाव, एक दूसरे के प्रति उत्सर्ग, स्नेह और हित की भावना इत्यादि मूल्यों पर निर्भर करता है। किसी राष्ट्र की महानता वहाँ के लोगों में एकता एवं उनकी चरित्र की उज्जवलता से ही आंकी जाती है। कोई व्यक्ति अथवा वस्तु यदि किसी की सेवा नहीं करते न किसी के सुख या आराम के काम में आते हैं तो वे बेकार अथवा 'मूल्य-रहित' या 'व्यर्थ' माने जाते हैं। उन्हें निरर्थक या निर्मूल्य मान कर उनसे छुटकारा पाया जाता है क्योंकि वे कष्टदायक होते हैं। अतः हम सन्तुष्टता इत्यादि मूल्यों को इसलिए स्वीकार करते और जीवन में लाते हैं कि वे हमारा लक्ष्य सिद्ध करते हैं, हमारी खुशी में बढ़ावा करते हैं, हमारे जीवन की रक्षा करते हैं और हमारे उद्देश्य की प्राप्ति कराते हैं।
मूल्यों को पहचानने का रवैय्या
कई ऐसे भी लोग हैं जिन्हें किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु के मूल्य को समझने की बुद्धि या सूझ नहीं होती। वे न मानव जीवन के मूल्य को समझते हैं, न एक अच्छे समाज के मूल्य को समझते हैं और न ही एक अच्छे देश की नागरिकता के मूल्य को। और तो क्या, वे अपने मूल्य को भी नहीं जानते। ऐसे लोग मानवता के स्तर से नीचे का जीवन जीते हैं। उन्हें ये एहसास ही नहीं कि हर एक चीज़ का एक अन्तर्निहित मूल्य या उसकी अपनी कुछ उपयोगिता या कीमत हुआ करती है। वे इस बात को समझ ही नहीं पाते कि सन्तुष्टता और स्वमान, आत्म-विश्वास और आत्म-नियंत्रण सबके प्रति स्नेह और सद्भावना, मन का सन्तुलन और सहनशीलता तथा धैर्य और सेवाभाव नामक मूल्य ही हमारे जीवन को मूल्यवान बनाते हैं और हमें खुशी और सुख का अनुभव करने की स्थिति में लाते हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में सन्तुष्टता न हो, वह चाहे कितना भी धनवान या सम्पत्तिवान हो, मनोदशा में तो वह सदा एक भिखारी ही बना रहता है। किसी व्यक्ति के पास यदि एक करोड़ रुपये की सम्पत्ति हो, उससे भी ज़्यादा मूल्य सन्तोष का है क्योंकि उस संपत्ति से कहीं ज्यादा सुखदायक और हर्षप्रद 'सन्तोष' नामक गुण ही है। सन्तोष से अधिक उपलब्धि है ही नहीं। मन के सन्तुलन से ऊंची तो कोई सफलता होती नहीं। धैर्य से अधिक चमत्कारी कोई दवाई तो अभी तक ईजाद ही नहीं हुई और सहनशीलता जैसी जीवनरक्षक औषधि (Life saving drug) तो अभी तक बनाई ही नहीं जा सकी। परन्तु खेद की बात ये है कि उन्हें किसी चीज़ के मूल्य को समझने की इतनी भी सूझ नहीं कि वे 'मूल्य' को समझ सकें। भला श्री लक्ष्मी की पूजा 'धन की देवी' के रूप में क्यों होती है? लोग श्री लक्ष्मी और श्री नारायण की अराधना करते हुए उनसे स्वास्थ्य, सुख, सफ़लता, सुयश और संपत्ति की याचना-प्रार्थना क्यों करते हैं? यों तो श्री लक्ष्मी, श्री नारायण भी अपने पूर्व काल में इस धरा पर मानव तनधारी ही थे। परन्तु भेद ये है कि उन्होंने अपने जीवन में दिव्य गुणों और इन मानवीय मूल्यों को धारण करने का भरसक पुरुषार्थ किया; इसलिए वे पूज्य हो गये। उनका जीवन इतना मूल्यवान और महान हो गया कि आज लोग उनसे धन-सम्पत्ति मांगते हैं। कारण यही तो हुआ न कि उन्होंने अपने पूर्व जन्म में उन मूल्यों को आत्मसात् किया जिससे वे देव पद को प्राप्त हुए और अपार धन के स्वामी भी बने। उन्होंने उन मूल्यों और दिव्य गुणों रूपी धन के कारण स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ में ये सर्वोच्च पद को प्राप्त किया। अतः भौतिकवादियों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए कि भौतिक उपलब्धियों की पराकाष्ठा भी मूल्यों को ही जीवन में धारण करने से ही होती है। इन नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को धारण किए बिना या तो भौतिक सुख-सामग्री भी सच्चा सुख देने वाले नहीं होते और या फिर जीवन-भर मनुष्य सुख-सामग्री को इकट्ठा करने या उसके पीछे पागल बना रहता है और सच्चे सुख से वंचित रह जाता है।
