भगवान शिव का छोटा नंदीगण दादी गुलज़ार

भगवान शिव का छोटा नंदीगण दादी गुलज़ार

आशीर्वचन

बापदादा का रथ, हम सब की प्राणप्यारी, अति स्नेही गुलजार दादी, जिसको बापदादा ने नाम दिया दिलों को मोहने वाली हृदयमोहिनी। गुलज़ार बहन इस यज्ञ की महत्वपूर्ण आधार स्तंभ थी। आप पवित्रता की मूरत, होलीहंस थी। आप अंतर्मुखी और विदेही फरिश्ता थी। आप समय, संकल्प और शब्दों की इकोनामी की अवतार थी इसलिए आपके शब्द बहुत-बहुत शक्तिशाली थे। आपके जैसी त्याग, तपस्या न किसी ने की और न कोई कर सकेगा। जिन्होंने अपना शरीर भी भगवान को दे दिया और 50 वर्षों तक हमें भगवान से मिलाया। गुलज़ार बहन के बारे में कुछ भी कहा जाए वह कम है! दादी हमसे यही चाहती थी कि जितना हो सके अंतर्मुखता की गुफा में रहकर बाबा को याद करना और सदा यह निश्चय रहे कि 'बाबा सदा मेरे साथ है, बाबा से ही सारे संबंध हैं, बाबा ही हमारा संसार है।' जहां भी मुश्किल आए, दिल से कहना, मेरा बाबा, मेरा साथी आ जाओ! तो बाबा बंधा हुआ है। गुलज़ार बहन को यह नशा रहता था कि हमें कौन मिला है! किसने हमें चुना है! सारी दुनिया में बाबा से अधिक प्यारा कोई हमें मिलना नहीं है। शिवबाबा ही विश्व कल्याणकारी है और हमें भी विश्वकल्याण के निमित्त बनाया है।
गुलज़ार बहन के वाइब्रेशन संपूर्ण सृष्टि को बल देते हैं। गुलज़ार बहन पुरुषार्थ के लिए कहती थी कि जैसे-जैसे अव्यक्त स्थिति में स्थित होते जाएंगे, वैसे-वैसे नयनों के इशारों से किसके भी भावों को जान जाएंगे, कोई से बोलने की आवश्यकता नहीं रहेगी। ऐसे करते-करते हम सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेंगे। आप अंतिम घड़ी में सबको यही याद दिलाती रही कि अब कर्मातीत बनना ही है।

राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज

भूमिका

दादी गुलज़ार का भोलापन और सच्चाई बेमिसाल थे। आज के इस चतुराई के युग में ऐसी श्रेष्ठ जीवात्माएं ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलती। परमपिता परमात्मा निराकार शिव का अवतरण सतयुग की पुनः स्थापना के लिए होता है। आज के कलियुग में चारों ओर झूठ है, सच की रत्ती भी नहीं। आने वाले सतयुग में सदा सर्वदा सत्य ही सत्य होगा, झूठ का नाम निशान भी नहीं रहेगा।
निराकार शिवबाबा के साकार नंदीगण पिताश्री ब्रह्माबाबा के 18 जनवरी, 1969 को अव्यक्त होने के बाद भगवान शिव ने दादी गुलज़ार को ही अपना छोटा नंदीगण बनाया। उनके शरीर रूपी रथ में शिवबाबा के अवतरण की भूमिका 48 वर्षों तक चली। अन्तिम पधारमणि 31 दिसम्बर, 2017 को हुई थी।
व्यक्तिगत जीवन में भी दादी गुलज़ार जिनका नाम राजयोगिनी हृदयमोहिनी था, सच्चाई, सफाई और सादगी को प्रतिमूर्ति थीं। उनकी प्यूरिटी की रॉयल पर्सनलिटी के वायब्रेशनस् अति प्रभावशाली थे। उनसे थोड़े समय का मिलन भी रूह को राहत और चित्त को प्रसन्नता से भरपूर कर देता था। अव्यक्त बापदादा की तरह ही दादी गुलज़ार के अपने बोल भी मधुर, उत्साहवर्धक और वरदानी होते थे।
दादीजी अब शरीर में नहीं हैं। उनका स्मारक 'अव्यक्त लोक' जो शान्तिवन, आबू रोड में स्थापित किया गया है, चिरकाल तक नए-पुराने भाई-बहनों को प्रेरणा, सकाश और शक्ति प्रदान करता रहेगा। दादीजी की मधुर स्मृति में

ब्रह्माकुमार बृजमोहन

दादी गुलज़ार सदैव हल्की और ड्रामा पर कायम रहती थी

ब्रह्माकुमार निर्वैर, शान्तिवन

मैं जब से ज्ञान में आया तब से समय प्रति समय परम आदरणीया दादी गुलज़ार जी से मिलना होता रहा, उनकी क्लासेज और संदेश सुनते रहे।

बापदादा केवल भारत के लिए नहीं परंतु समस्त विश्व के लिए हैं

साकार बाबा 18 जनवरी, 1969 को अव्यक्त हुए तो जीवन में खालीपन महसूस हो रहा था लेकिन 21 जनवरी, 1969 का अव्यक्त बापदादा का जो पार्ट दादी जी द्वारा चला, उसने हमें यह महसूस करा दिया कि बापदादा अभी भी यहीं हैं और हमें मार्गदर्शन करते, श्रीमत देते रहेंगे। हम सबने देखा कि कैसे अव्यक्त बापदादा ने गुलज़ार दादी द्वारा एक-एक की व्यक्तिगत पालना की, ज्ञान की गहराइयों में ले गए, दिव्य गुणों की महानता तथा शक्तियों की महानता बताई। उनके द्वारा अव्यक्त बापदादा मिलन में, बापदादा हर एक से नयन मुलाकात करते और व्यक्तिगत उन्नति के लिए मार्गदर्शन करते रहे। कलयुग का अंतिम समय है, 84वें जन्म का भी अंतिम समय है और आत्माओं में भी कितनी कमजोरी है, यह हम सब जानते हैं। ऐसे समय पर बाबा ने एक-एक आत्मा को कैसे दादी जी द्वारा हिम्मत दिलाई, साथ ही बहुत सहज भाषा में मार्गदर्शन किया कि जीवन को अति श्रेष्ठ बनाने के लिए क्या करना है। दादी जी के रथ द्वारा बापदादा के अव्यक्त मिलन में विदेशियों का भी आना शुरू हुआ तो यह प्रैक्टिकली सिद्ध हुआ कि बापदादा केवल भारत के लिए ही नहीं परंतु समस्त विश्व के लिए हैं। बापदादा ने गुलज़ार दादी द्वारा अनेकानेक सेवाएं की, हृदयस्पर्शी बातें सुनाई कि सब के प्रति शुभभावना रखनी है, सहयोग की भावना रखनी है आदि, आदि।

जो बीता सो बीता, अब आगे बढ़ो

दादी कभी किसी की कोई बात अपने चित्त पर नहीं रखती थी। किसी ने कोई कमी-कमजोरी की बात सुनाई भी तो उसको बहुत प्यार से दृष्टि देती, हाथ में हाथ लेकर के बड़े प्यार से कहती, 'अब सब ठीक हो जाएगा, सब अच्छा हो जाएगा, आप अभी बिल्कुल निश्चित हो जाओ।' किसी के मन में यदि बोझ भी होता तो एक सेकंड में दादी के मिलन के फलस्वरूप वह सहज ही हल्का महसूस करता था। ईश्वरीय सेवाओं में दादी का महत्वपूर्ण योगदान तो हम सभी जानते ही हैं। दिल्ली राजधानी होने के नाते सरकार की सेवा, अपने भाई-बहनों की सेवा की जिम्मेवारी दादी पर थी परंतु उन्हें कभी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं महसूस हुआ। सदैव हल्की रहती थी। ड्रामा पर सदा कायम रहती थी और सब को प्यार से यही कहती, 'जो बीता सो बीता, अब आगे बढ़ो।'
अगर हमारा बाबा वाली दादी से दिल से प्यार है, तो दादी जी की महीन से महीन शिक्षाओं को हम अपने जीवन में धारण करें। दादी जी सबसे बहुत प्रेम से मिलती थी, बच्चे उनको याद करते हैं और बड़े भी उनको याद करते हैं। यही निशानी है बाप समान बनने की। वे हमें भी यह लक्ष्य दे गई कि हमें भी उनके नक्शे कदम पर चलना है।

सादगी और भोलेपन की मूर्त दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमार बृजमोहन भाई, शान्तिवन
हम में से अधिकतर भाई-बहने वे हैं जिन्होंने शिवबाबा को गुलज़ार दादी के रथ के द्वारा जाना और उन लोगों की संख्या कम है जिन्होंने शिवबाबा को ब्रह्माजी के रथ के द्वारा जाना। जब शिवबाबा ब्रह्माजी के रथ में आते थे तो पता नहीं लगता था कि इस वक्त शिवबाबा बोल रहे हैं या ब्रह्माबाबा बोल रहे हैं। शिवबाबा 24 घन्टे रथ में नहीं रहते थे, ज्ञान सुनाने आते थे या जब-जब आवश्यकता होती थी तब आते थे। शिवबावा को ब्रह्माबाबा पर इतना फ़कुर था कि ब्रम्हा बाबा कभी गलती नहीं कर सकते, तो ब्रम्हा बाबा जो कुछ भी कहे तो शिवबाबा जिम्मेवार है।
बाबा ने 18 जनवरी, 1969 के बाद नया रथ लिया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि शिवबाबा पहले ब्रम्हा बाबा के मेल (पुरुष) शरीर में आये, उसके बाद गुलज़ार दादी के फीमेल (स्री) शरीर में आयेंगे, इसका भी कुछ रहस्य था। फीमेल शरीर के अंदर बापदादा को देख रहे हैं तो शरीर का भान सहज ही निकल जाता था जो अव्यक्त बनने में मदद करता है।

आपसी व्यवहार में विल्कुल भी लौकिकता नहीं देखी

गुलज़ार दादी और दादी की अलौकिक माता (ऑलराउंडर दादी) और मौसी (रुक्मणी दादी) भी दिल्ली में रहते थीं। रुक्मणी दादी, राजौरी गार्डन में रहते थे परन्तु दादी ऑलराउंडर और दादी गुलज़ार दोनों पांडव भवन में रहती थीं। हमने कभी उनके आपसी व्यवहार में बिल्कुल भी लौकिकता नहीं देखी। सबसे बड़ी बात कि दादी जी में बहुत सादगी, बहुत भोलापन था। उन्होंने लौकिक सम्बन्धों का ज्ञान ही नहीं रखा हुआ था।

दादी जी का भोलापन

एक बार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने ओ. आर. सी. (दिल्ली ज़ोन) में आना स्वीकार किया। पूरा स्टेज वी. आई. पीज़ से भरा हुआ था। जब दादी जी ने भाषण किया तो कहा कि 'भारत की प्रधानमंत्री प्रतिभा पाटिल जी आई है' जबकि वे थीं राष्ट्रपति। यदि कहीं और किसी प्रोग्राम में कोई ऐसा बोल देता तो बहुत बड़ी हलचल हो जाती लेकिन दादी जी का भोलापन था कि ऐसा भी कोई व्यक्ति हो सकता है जिसे भारत के राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री में अन्तर का ज्ञान ना हो। तो सभी ने हल्का मुस्करा दिया और बात वही समाप्त हो गई।

दादी जी के आने से अतिरिक्त उमंग-उत्साह की प्राप्ति

दादीजी को इस दुनिया का कुछ पता नहीं था। लोग खबर सुनाते कि दुनिया में यह हो रहा है, वह हो रहा है परंतु दादी जी को उससे कोई मतलब नहीं था। पांडव भवन फस्ट फ्लोर में दादी जी रहती थीं। कभी बाहर से कोई बारात आदि गुजरती तो दादी जी आगे आकर बच्चों की तरह उस बारात को देखती थीं। फिर हम उनसे पूछते थे तो वे कहतीं कि 'सतयुग में कैसा होता है और यहाँ कैसा होता है, यह देख रही हूँ। हम ऑफिस में काम कर रहे होते, वहा आ जाती, देखती थीं, हम क्या कर रहे हैं और उनके जाने के बाद हमे कुछ अतिरिक्त उमंग-उत्साह की ताकत महसूस होती थी। लोग कहते थे, तुम्हारा ईश्वरीय ज्ञान है तो इसका पुस्तक कहां है? तो जगदीश भाई जी, जिन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, उनको जहाँ भी इस दुनिया और उस दुनिया के ज्ञान का मिलान करना होता था तो वे गुलज़ार दादी से पुछवाते थे।
दादी जी ने भर दी आध्यात्मिक शक्ति
जब ज्ञानी जैल सिंह जी पंजाब के मुख्यमंत्री थे तब से हमारा उनसे मिलना-जुलना होता था। फिर जब वे दिल्ली में गृहमंत्री बने तो हम उन्हें कहते थे, 'एक बार माउंट आबू आइये', तो वे कहते थे कि अब मैं अपने सचिवों के अधीन हो गया हूँ, वे जैसा कहते है जैसा करना पड़ता है। फिर वे भारत के राष्ट्रपति बन गए। हमने उनसे टाइम लिया और दादी गुलजार जी को साथ लेकर मिलने गए। हमने उनसे कहा, कुछ समय साइलेंस में बैठेगे। उन्होंने सेक्रेटरी को कहा कि कोई अंदर ना आए, मैं शांति में बैठ रहा हूँ। फिर हम सब साइलेंस में बैठ गए। हमने देखा कि आधे मिनट के अंदर ही वे बिल्कुल शांति में गुम होकर बैठ गए। तीन मिनट हो गए, चार मिनट हो गए, पाँच मिनट हो गए, हम सोच रहे थे कि उनकी साइलेंस पूरी हो तो हम उनसे अपनी बात शुरू करें। फिर हमने इशारा किया और बात शुरू की, निमंत्रण दिया कि आपको माउट आबू आना चाहिए, अब तो आप राष्ट्रपति है, आप चाहे तो आ सकते हैं। तो दादी जी ने जैसे उनमें आध्यात्मिक शक्ति भर दी और वे प्रथम राष्ट्रपति थे जो मधुबन आए।
दादी जी की रूहानियत का प्रभाव
सन् 1994 में ब्रह्माबाबा का डाक टिकट तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी द्वारा राष्ट्रपति भवन से रिलीज़ करने की सारी तैयारी हो चुकी थी। आमतौर पर जो स्टैम्प निकलती है उसमें व्यक्ति के नाम के साथ उसको जन्म तारीख और मृत्यु की तारीख भी लिखी होती है। साथ ही एक फोल्डर होता है जिसमें उस व्यक्ति की संक्षिप्त जीवनी लिखी होती है। परंतु शिवबाबा ने उन लोगों की बुद्धि को ऐसे टच किया जो प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से सरकार ने डाक टिकट निकाला और साथ में जो फोल्डर था उसमें भी प्रजापिता ब्रह्मा लिखा, ना कि दादा लेखराज, तो यह अपने आप में एक बहुत बडी बात थी। हमने तय किया कि स्टैम्प लॉन्च होने के दूसरे दिन भिन्न भिन्न प्रांतों में भी इसके सैलिबेशन फंक्शन करेंगे। इस सिलसिले में मुंबई में रमेश भाई और उषा बहन जी वहां के गवर्नर, मिस्टर एलेग्जेंडर से मिलने गए। उन्होंने ठीक तरह से तारीख नहीं देखी जिस कारण उन्हें गलतफहमी हो गई और उन्होंने राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी को फोन करके कहा कि ये आप (राष्ट्रपतिजी) से भी स्टैम्प लॉन्च करा रहे हैं और हम से भी यहां लॉन्चिंग करने के लिए कह रहे हैं, जोकि नियमानुसार नहीं है। इस कारण से राष्ट्रपति जी ने रिलीज़ करने से दो दिन पहले मना कर दिया। हमने राष्ट्रपति जी से मिलने का समय मांगा और दादी गुलज़ार जी को साथ लेकर राष्ट्रपति जी से मिले। उन्होंने देखा कि साथ में बी. के. बहनजी आयी हैं। दादी जी ने कहा, बाबूजी, आपको हमारा काम जरूर करना है, तो वे मुस्कराने लगे और बताने लगे कि हमें भी नियम से चलना पड़ता है। हमने कहा, यह हमारा सैलिब्रेशन का निमंत्रण पत्र है, आप देख लीजिए, हमारा सैलिब्रेशन उसी दिन नहीं, अगले दिन है, तो उन्होंने कार्यक्रम को बड़े स्नेह से ओके कर दिया। हमने देखा कि यह दादी जी की रूहानियत का ही प्रभाव था।

जव तक पूछा ना जाए तब तक दादी कुछ बोलते नहीं थे

मैनेजमेंट कमिटी की मीटिंग में दादी गुलज़ार जी भी आते थे। सारे मेबर अपने-अपने विचार बड़ी खुशी-खुशी, बड़े उमंग से रखते थे और हम यही समझते थे कि मेरा विचार बहुत अच्छा है। हमने देखा कि दादी गुलज़ार जो को जब तक पूछा ना जाए कि आप भी कुछ बोलिए, तब तक दादी कुछ बोलते नहीं थे। पूछने पर कहते थे कि 'जो कुछ आप लोगों ने फैसला किया है, बहुत अच्छा है।' शुभ भावना, शुभ कामना देकर उसी की ही पुष्टि कर देते थे। शायद ही दादी ने अपनी तरफ से कभी कुछ एड किया हो। आप देखिए कि बाबा भी यही करता था, 'जो बच्चों ने किया, सब ने मिलकर किया, बहुत अच्छा है' आदि-आदि।

केवल कहती नहीं थी, अपनी शक्ति, अपनी पूरी शुभ भावना भी साथ में देती थी

दादी जी अपनी गुप्त शक्ति से काम करती थी। कभी दादी ने सामने आकर अपना नाम बताया या कहा कि मैने किया, ऐसे नहीं हुआ। एक बार दादी ने दिल्ली में बहुत बड़ा प्रोग्राम किया था, जो बहुत सफल हुआ था। यज्ञ के स्टेटस को ऊपर उठाने वाला वह प्रोग्राम था, जिसमें प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट आदि आए थे, इसका जिक्र अव्यक्त बापदादा ने बाबा-मिलन के समय मुरली में भी किया तथा प्रोग्राम के निमित्त सभी भाई-बहनों को स्टेज पर बुलाकर, एक-एक का नाम लेकर सराहना की। फिर कहा कि 'इस सफलता के पीछे गुप्त दादी गुलजार है।' इतने बड़े प्रोग्राम में क्या कुछ नहीं होता! दादी बोलती कुछ नहीं थी और यदि किसी को कहती थी कि तुम्हें यह करना है, तो अपनी शक्ति, अपनी पूरी शुभ भावना भी साथ में देती थी।

सबके प्रति स्नेह की भावना

दिल्ली की मुख्य सेवाओं में दादी जी का बहुत हाथ रहा। गुलज़ार दादी की धारणा प्रबल थीं। धारणा के आधार पर वे थोड़े से शब्द बोलती थी और सफलता मिल जाती थी। उनके पास लोग खिंचे चले आते थे। दादी जी के चेहरे की फलक और महक सेवा करती थी। उनके शब्द नपे-तुले, नम्रतापूर्ण होते थे। उनके मन में सबके प्रति स्नेह की भावना थी। वह सभी को बहुत सम्मान देती थी। कभी दादी जानकी जी और गुलज़ार जी एक ही प्लेन से आते थे तो गुलज़ार दादी यदि पहले व्हीलचेयर पर प्लेन से उतर जाती थीं तो जानकी दादी का इंतजार करती थीं। दोनों साथ-साथ ही बाहर आते थे। कभी जानकी दादी जी दिल्ली आते थे तो उन्हें रिसीव करने के लिए दादी स्वयं एयरपोर्ट पर जाते थे।
कौन सा ऐसा ब्राह्मण होगा, देश-विदेश में, पांचों महाद्वीपों में जिसने गुलज़ार दादी की पालना नहीं ली हो, उनकी क्लास ना सुनी हो। बाबा-मिलन के प्रोग्राम में आधे से ज्यादा नए भाई-बहने होते थे फिर भी सुबह मुरली के बाद जब दादी जी की क्लास का अनाउंस होता था, तो सभी ताली बजाते थे। इतनी उनकी शक्ति थी।
दादी जी ज्यादा नहीं बोलती थी, बस, हमेशा कहती थी कि खुश रहो, खुशी बांटो। कैसी भी परिस्थितियां आएं और जाएं पर आपकी खुशी न जाए। दादी जी का भाषण दिल को लगने वाला होता था।

सूक्ष्म रूप में बाबा, दादी जी सदा हमारे साथ हैं

ब्रह्माबाबा कहा करते थे कि अभी तो मुझसे कोई भी मिल लेता है। धारणा पर पूरे ना चलने वाले भी मिल लेते हैं और बाबा को मिलना पड़ता है लेकिन एक दिन आएगा जो कोई अपवित्र मुझे छू भी नहीं सकेगा। हम सोचते थे, ऐसा कैसे होगा। फिर बाबा अव्यक्त हो गए। उनको अब कोई मिल नहीं सकता, जब तक संपन्न संपूर्ण पवित्र बनने के एम ऑब्जेक्ट वाला ना हो। दादी जी का भी ऐसा ही हुआ। दादी जी फरिश्ता थीं, शरीर पुराना हो चुका था। अभी हम उनसे अव्यक्त होकर ही मिल सकते हैं। यह ड्रामा का दृश्य बताता है कि बहुत बड़ा परिवर्तन अब आएगा जिससे संपन्नता-संपूर्णता समीप आएगी। हमें भी यह दृश्य देखकर के समेटना है, एवररेडी बनना है। सूक्ष्म रूप में बाबा सदा हमारे साथ हैं। दादी जो भी हमारे साथ हैं।

बाबा ने दादी द्वारा जो पालना की, उसी से सारे विश्व में इतने सेंटर और बाबा के बच्चे हैं

ब्रह्माकुमारी जयंती बहन, लंदन (यू.के.)
सन् 1968 में कानपुर में एक बड़ी कॉन्फ्रेंस होने वाली थी। वहां का गवर्नर हिंदी नहीं बोल पाता था तो बाबा ने मुझे आगरा में पत्र लिखा कि कानपुर जाओ। वहां दिल्ली से दादी गुलज़ार जी आए हुए थे। दादी हमसे बहुत प्यार से मिले। मैं छोटी थी और वे जानते थे कि मैं दादी जानकी जी के सबंध में थी तो वे विशेष ध्यान दे रहे थे, बहुत प्यार से हमारी रेख-देख कर रहे थे।

जब बाबा अव्यक्त हुए तो दादी जी का विशेष पार्ट शुरू हुआ

सन् 1969 में बाबा के अव्यक्त होने पर दादी प्रकाशर्माण जी ने पहला कॉल दादी गुलज़ार जी को किया था कि ऐसा हुआ है। तो दादी भी रात की ट्रेन में बैठ कर तुरंत सुबह तक मधुबन पहुंच गए थे। उसी समय से दादी जी का यह विशेष पार्ट शुरू हुआ। दादी, कमला नगर सेवाकेंद्र पर रहते हुए अपनी सेवाएं दे रहे थे और वहां बहुत विशेष आत्माओं को उन्होंने ज्ञान में निकाला, पालना दी। जब बाबा अव्यक्त हुए तो दादी का पार्ट ही बदल गया। मैं उस समय महेंद्र भाई और विमला बहन के पास आगरा में थी। बाबा के अव्यक्त होने का समाचार मिलने पर मैं उन्हों के साथ सोमवार सुबह मधुबन पहुंची। अठारह जनवरी, शनिवार रात बाबा अव्यक्त हुए थे। पहुंचने पर हमें समाचार मिला कि अखंड योग चल रहा है। फिर 21 तारीख सुबह क्लास में दादी प्रकाशमणि जी ने बताया कि आज ही अंतिम क्रिया का सारा कार्यक्रम संपन्न होगा। मैं उस वक्त नई थी और यह जानती नहीं थी कि किस तरह से यह सारा प्रोग्राम फिक्स किया जाता है। उस दिन सारा कार्यक्रम हुआ और शाम को भोग लगाने दादी गुलज़ार जी आकर गद्दी पर बैठी। दादी वतन में गई, कुछ समय बाद आंखें खुली तो हमें लगा कि यह दादी गुलजार नहीं है परंतु बाबा है। फिर बाबा ने पूरा आधा घंटा दृष्टि दी और जब बाबा ने बोलना शुरू किया तो बाबा की वह आवाज सुनी। किसी को भी यह तो अंदाजा था ही नहीं कि बाबा इस तरह से आएंगे और ऐसी आवाज होगी, कोई तैयारी नहीं थी। एक छोटा-सा टेप रिकॉर्डर था जिसका माइक्रोफोन ले करके उसका एपलीफायर बना दिया। हमारा भाग्य रहा कि दादियों की पहली लाइन के बिल्कुल पीछे दूसरी लाइन में हम चार-पाच कुमारिया बैठी हुई थी क्योकि साकार बाबा छोटी कुमारियों को सामने बैठने को कहा करते थे।

अव्यक्त बाबा की पधरामणि का यह पहला दृश्य था

उस समय मधुबन में करीब 700 लोग होंगे और हिस्ट्री हॉल में एकदम तंग-तंग होके सिर्फ 100 लोग बैठे थे, बाकी सभी आंगन, वरांडा आदि में बैठे थे। बाबा की आवाज बहुत धीमी थी, सभी सुन भी नहीं पा रहे थे। बाबा ने कहा कि आज मैंने ब्रह्माबाबा को नहीं लाया, यदि लाता तो आप लोग छुट्टी नहीं देते। तीन, साढ़े तीन घंटे बाबा उस दिन रहे। सब शांति से बैठे सुनने की कोशिश कर रहे थे। इतने थोड़े समय में बाबा ने जैसे कि सारा नक्शा दे दिया कि उस समय से लेकर संगमयुग के अंत तक किस तरह से सारा कार्य चलेगा। फिर दादी जैसे ही गद्दी से उतरी, ऐसा लगा जैसे कि वे सिर्फ पांच मिनट ही गद्दी पर बैठी थी, फिर अपने कमरे में चली गई। अव्यक्त बाबा की पधरामणि का यह पहला दृश्य था। तब बाबा ने कहा कि बाबा आते रहेंगे, मिलते रहेंगे, सबका मन बहलाते रहेंगे। दूसरे दिन हमें पता चला कि दादी को भी पता नहीं था कि बाबा इस तरह आने वाले हैं।

बाबा ने मुझे वतन में सुला दिया

दादी ऑक्सफोर्ड को बहुत पसंद करती थी। कुछ समय तक हर वर्ष लगातार दादी ऑक्सफोर्ड रिट्रीट सेंटर पर आती रहीं।। बाबा ने दादी द्वारा जो पालना की, उसी से सारे विश्व में इतने सेंटर और बाबा के बच्चे हैं
तब हमें कई बार दादी के साथ व्यक्तिगत बातचीत करने का या बाहर वालों या अपने ब्राह्मण परिवार के बीच इंटरव्यू (साक्षात्कार) लेने का मौका मिलता रहा। एक बार हमने पूछा कि दादी, आपको बाबा ने कोई इशारा नहीं दिया था कि ऐसा कुछ पार्ट होने वाला है। दादी ने बड़े प्यार से दृष्टि देते हुए कहा कि 'नहीं, ड्रामा में क्या होने वाला है, बाबा वह पहले से ही नहीं बताते हैं। मैं भी ऊपर गई, बाबा से प्यार भरी दृष्टि से मुलाकात हुई और फिर जैसे कि बाबा ने मुझे वतन में सुला दिया। फिर मुझे कुछ पता नहीं कि कितना समय बीता और जब कुछ समय बाद मैं जागी तो बाबा सामने थे। मैंने बाबा से कहा कि बाबा, ब्राह्मणों की बहुत बड़ी सभा है और सभी के मन में बहुत से प्रश्न हैं, आप बताएं कि वापस जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँ! बाबा ने बताया कि मैं नीचे जाकर, सब से मिलकर, सब के प्रश्नों के उत्तर दे करके, अब आपके सामने खड़ा हूं। फिर जब मुझे बाद में वह सारी लिखत मिली कि बाबा ने क्या-क्या बताया, तब मुझे समझ में आया कि बाबा क्या करके आए है!'

आप को ही क्यों चुना बावा ने

एक बार हम दादी के साथ भोजन कर रहे थे तो नीलू बहन ने दादी से पूछा कि 'आप से तो और भी बड़ी-बड़ी आयु वाली बहनें, आप से ज्यादा अनुभवी संदेशियाँ थी, फिर भी आप को ही क्यों चुना गया?' तो दादी ने बताया कि 'हां, मेरे से तो बहुत-सी बड़ी बहनें और भी थी। दादी प्रकाशमणि ने हम सभी संदेशियों को इकट्ठा किया था 21 जनवरी के दिन कि आज के दिन भोग लगाने जाना है बाबा को। दादी ने पहले दादी पुष्पशांता (जिनके कनेक्शन में ग्लोबल हॉस्पिटल बना वे मबई में रहती थी) से पूछा कि आप बाबा को भोग लगाएंगे? क्योंकि हमें तो उस समय यही था कि बाबा का भोग लगाएंगे और कोई संदेश आएगा। तो दादी पुष्पशांता ने कहा कि 'नहीं, मैं नहीं लगा सकती, मेरी दिल भर आएगी, में बाबा के पास इस तरह भोग लगाने नहीं जाऊंगी।' फिर दादी प्रकाशमणि ने एक, दो और संदेशी दादियों से पूछा, जैसे संतरी दादी से, फिर एक और दादी से, तो सभी ने मना कर दिया। आखिर में दादी प्रकाशमणि जी ने मेरे को देखते हुए कहा, 'गुल, तुम तो मुझे ना नही कहेगी ना!' मैने कहा कि 'जी दादी, जो आपकी आज्ञा।' तो ड्रामा फिक्स होता है परंतु ड्रामा क्या होगा, वह लास्ट मिनट तक हमें पता नहीं चलता।'

बाबा ने संदेश भेजा कि अभी यही तन (गुलज़ार दादी का) निमित्त रहेगा

फिर तो तेरह दिन रोज भोग लगता रहा। अलग-अलग संदेशी भोग लगाने जाती थी और हर रोज बाबा या तो खुद आते या बहुत गहरे गहरे संदेश आते थे। वे सारे संदेश भी लिखित में मौजूद हैं। तो वह जैसे कि सभी संदेशियों की एक ट्रायल चल रही थी। फिर आखरी में बाबा ने एक संदेश भेजा कि अभी यही तन (गुलज़ार दादी का) निमित्त रहेगा, जिस तन में बाबा की पधरामणि होगी, शाम के समय ही बाबा आते रहेंगे और मधुबन में ही बाबा आते रहेंगे। यह सारा प्रोग्राम उस जनवरी मास में फिक्स होता गया। एक बार लंदन में इंटरव्यू के दौरान मैने दादी से पूछा कि आपको कुछ अंदाजा था कि आपका यह पार्ट इस तरह से होने वाला है?' तो कहा कि इस तरह से पार्ट का नहीं मालूम था परंतु एक बार मम्मा हमारी क्लास कुंज भवन में करा रही थी। तो मम्मा ने कुछ प्रश्न पूछा और मैंने जवाब दिया। मैं बहुत पीछे बैठी थी इसलिए मम्मा को दिखाई नहीं पड़ी तो मम्मा ने कहा, 'हाथ खड़ा करो जिसने उत्तर दिया है।' मैंने हाथ खड़ा किया तो मम्मा ने दृष्टि देते हुए कहा कि ये जो तुम्हारी आखें है, ये विश्व की सेवा करेंगी।' फिर कई बार बाबा मुझे कुंज भवन से अपने पास बाबा भवन क्लिफटन पर रहने के लिए बुलाते थे, जहां बाबा अपने परिवार सहित रहते थे। बाबा कहते थे कि कुंज भवन में तुम्हारी सखियां, तुमसे बहुत चिटचैट करती है, तुम्हें शांत रहने नहीं देती और तुम्हें तो आगे चलकर के साइलेंस की बहुत जरूरत पड़ेगी।' एक दिन वहां मैं सिधी भाषा में कुछ नोट्स लिख रही थी। बाबा ने वह लिखत देखकर के कहा कि 'एक दिन यह तुम्हारी लिखत सारे विश्व की सेवा करेगी।' तो दादी जी न सिर्फ बाबा का रथ थी परंतु यज्ञ कारोबार के अर्थ बहुत गुह्य संदेश भी दादी वतन से ले आती थी और फिर वे सारे संदेश विस्तार से दादी लिखती थी ताकि कोई बात भूल न जाए। सचमुच, उन सभी संदेशों ने सारे विश्व की बहुत सेवा की। कराची के दिनों में ही मम्मा, बाबा ने, दादी में कुछ ना कुछ चिन्ह देखकर उन्हें यह बताया था।

अंतिम जन्म भी इतना श्रेष्ठ

फिर हम कुमारियों की ट्रेनिंग थी। उस समय तो बाबा को जब बुलाओ, बाबा आ जाते थे। कोई समय फिक्स नहीं होता था क्योंकि बाबा जानते थे कि यह नई सीन ड्रामा में शुरू हुई है और बच्चे नाजुक हैं। तो हम कुमारियों की ट्रेनिंग में बाबा शुरू में आते और फिर अंत में आते थे बाकी और कोई विशेष प्रोग्राम नहीं होता था। दादी ने अथक होकर के 49 सालों तक यह पार्ट बजाया। बाबा इस तरह से दादी द्वारा सेवा करते रहे। करते रहे तो कितना पुण्य का खाता दादी ने जमा किया है, हम समझ सकते है। इस आत्मा की भक्ति भावना द्वापर से लेकर के कितनी रही होगी, हम यह भी समझ सकते हैं और अंतिम जन्म भी इतना श्रेष्ठ रहा।

दादी जी द्वारा लाए गये संदेशों से बाबा का कदम-कदम पर मार्गदर्शन

सन् 1973 में दिल्ली में बहुत बड़ा मेला होना था, रामलीला मैदान में और वहां सारी तैयारियां शुरू हो गई थी। तभी इंदिरा गांधी जी का संदेश आया कि उन्हें रशिया के राष्ट्रपति का स्वागत रामलीला मैदान में करना है। उसमें भी दादी जी द्वारा बाबा का बहुत खास संदेश आया कि 'आप अपना कार्य चालू रखो और योगभट्ठी भी चालू रखो।' फिर जब इंदिरा गांधी जी ने अपने लोगों को देखने के लिए भेजा तो उन लोगों ने वापस जाकर बताया कि इनकी तो बहुत सारी तैयारी हो चुकी है, देवी की मूर्तियां भी स्थापित हो चुकी हैं, अभी यदि हम देवियों को उतारेंगे तो हमें बहुत मुश्किलाते आएंगी, लोगों की भक्ति भावना के कारण। इस तरह दादी जी द्वारा कदम-कदम पर संदेश लाने के पार्ट से बाबा अपने बच्चों को स्पष्ट मार्गदर्शन करते रहे।

अकेले विदेश आगमन

फरवरी, 1974 में मै दीदी के साथ हरिद्वार गई और लौटने वक्त दादी गुलजार जी और एक कुमारी, हम तीनों एंबेसडर कार की पीछे की सीट पर बैठे हुए थे। छोटा एक्सीडेंट हुआ, दादी को माथे पर सामने का बेंच लगा, मामूली चोट आई परंतु मैंने देखा कि दादी बिल्कुल शांत थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हम कुछ कहते तो दादी 'कुछ नहीं हुआ' कहकर हमें भी शांत कर देती थी। पहली बार दादी विदेश में अकेली आई। दादी इंग्लिश इतनी जानती नहीं थी। नौ वर्ष की आयु में ही यज्ञ में आ गई थी और यज्ञ में ही बने बोर्डिंग स्कूल में केवल हिंदी भाषा में पढ़ाई होती थी। फिर भी बाबा साथ है, इस निश्चय से बिल्कुल निश्चिंत दादी अकेले विदेश पहुंच गई थी।
फिर दादी गयाना गए, वहां के वाइस प्रेसिडेंट अंकल स्टीव होस्ट थे उस कार्यक्रम के। वैसे तो वे जनवरी से ज्ञान में थे परंतु अब तक मधुबन नहीं पहुंचे थे। दादी जब जून-जुलाई मास में वहां पहुंचे तो उन पर दादी का बहुत प्रभाव पड़ा। अंकल, आंटी और उनका सारा परिवार ज्ञान में पक्के हो गए, गायत्री बहन और उनकी एक और बहन फिर समर्पित हो गई। दादी के जाने से न सिर्फ उस देश के लिए नवीनता हुई परंतु यह सारा परिवार भी बिल्कुल समर्पित होने के लिए तैयार हो गया। दादी ने फिर उन्हें मधुबन आने का निमंत्रण दिया और वे कुछ मास के बाद मधुबन भी आए।

बाबा ने दादी द्वारा बहुत सेवा की

बाबा उन दिनों एक दिन छोडकर आते थे। शाम का आते और देर रात तक मुरली चलाते या कभी तो सुबह भी हो जाती एक-एक आत्मा की बाबा ने दादी द्वारा बहुत सेवा की। नए-नये बच्चे, जो भी विदेश से आ रहे थे, उन्हें भी पर्सनल पालना मिल बाबा और दादी द्वारा, तो वे भी टीचर बन गए और उनसे ही फिर विश्वसेवा होती रही। तो बाबा ने दादी द्वारा जो पालना की, उसी से हम कहेंगे कि सारे विश्व में इतने सारे सेंटर और इतने सारे बाबा के बच्चे हैं।

लिखत से भी सेवा

एक बार हम स्पेन के करीब लासफॉर्मस में थे। सुबह अमृतवेले के बाद 4:45 बजे दादी के लिए भारत से कॉल आया। नागार्जुन सेंटर के निमित्त बीके राजू भाई जी ने शरीर छोड़ा था। वे बाबा के छः वर्ष के ही बच्चे थे और इतने कम समय में बहुत सेवा की थी उन्होंने, इस प्रकार अपना भाग्य बहुत ऊंचा बनाया। उन्होंने हो नागार्जुन फैक्ट्री में बाबा की सेवा शुरू की थी। उस समय के प्रधानमंत्री भी उनके मित्र थे। उन्होंने उस समय के प्रधानमंत्री को मधुबन भी लाया था। सब जानते थे कि दादी तो अंतिम कार्यक्रम में पहुंच नहीं पाएगी तो बाबा से संदेश ही ले आए। दादी वतन से संदेश ले आए और लिखा, वह लिखित हमने फिर फैक्स की। हमें पता चला कि अंतिम संस्कार के कार्यक्रम में भारत के सभी विशेष मंत्री आदि आए हुए थे। दादी के उस संदेश से न सिर्फ उस परिवार की परतु अन्य सभी आत्माओं की भी सेवा हुई। तो जो बाबा ने 1940 में कहा था कि तुम्हारी लिखत से भी सेवा होगी, वह हमने देखी। इस तरह से बाबा दादी द्वारा कई सेवा कराते रहे।

वरदान सुनते वा पढ़ते हो तो जैसे आपके मन में बाबा बीज डाल रहे हैं

एक बार विदेश में किसी ने दादी से कहा कि जब से मैं ज्ञान में आया हूं, तब से बाबा से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई है, तो मैं कैसे मान लूं कि बाबा से मुझे पर्सनल वरदान मिल रहे हैं? क्या आप हमारे पास यहां बाबा को बुला सकते हैं ताकि हम बाबा से यहीं मिले, भारत में तो बहुत संख्या होती है तो हम मिल नहीं पाते हैं पर अभी तो हम सिर्फ 300 ही हैं? तो दादी ने कहा कि 'नहीं, बाबा की मना है, बाबा सिर्फ मधुबन में ही आएंगे।' फिर दादी ने कहा कि 'रोज की मुरली का वरदान यही समझो कि यह मेरे लिए ही है। जब आप वरदान सुनते वा पढ़ते हो तो जैसे वह बीज आपके मन में बाबा डाल रहे हैं। फिर उस वरदान को आप दिनभर बार-बार स्मृति में लाओ तो जैसे उसे आप पानी दे रहे हो, तो वह वरदान प्रैक्टिकल हो जाएगा। फिर आपको लगेगा कि हां, यह बाबा ने मुझे व्यक्तिगत वरदान दिया है।' यह बात आज भी हमारे बहुत काम की है।

दादी किसी भी बात में रिएक्ट नहीं करती थी

जब दादी को देखते थे तो बाबा की ही याद आती थी। दादी एक बार लंदन आए थे, तो बड़े प्यार से दादी ने कहा था कि 'जब मैं आप लोगों से मिलती हूँ तो आप मुझे नहीं देखते हो, शिवबाबा को ही देखते हो और मुझे भी बड़ी खुशी होती है कि आप मुझे नही शिवबाबा को देखते हो।' दादी की इतनी नम्रता जो दादी अपनेको गायब कर लेते थे। ब्रह्माबाबा सदा यही कहते थे कि मुझे नहीं शिवबाबा को ही देखो, उसी तरह दादी जी खास अंडरलाइन करती थी कि मुझे नहीं, शिवबाबा को ही देखो। अव्यक्त बापदादा का रथ होते दादी का खुद का पुरुषार्थ तो रहा ही। दादी किसी भी बात में रिएक्ट नहीं करती थी। बापदादा मुरली में जो शिक्षाएँ देते हैं, दादां के जीवन में उन्हें प्रैक्टिकल में देखते थे जैसे बिल्कुल बाबा के संग का रंग लग गया हो। खास इतनी शांति की शक्ति की स्थिति, बाबा की याद की शक्ति की स्थिति, कई प्रकार से अनुभव है।

दादी की सकारात्मकता और शान्ति की स्थिति

एक बार दो सप्ताह में दादी ने पाँच देशों की यात्रा की, ऐसे यात्रा करना किसी जवान व्यक्ति के लिए भी सहज बात नहीं होती है। अलग-अलग भोजन, अलग-अलग लोग, अलग-अलग भाषाएं, कितनी प्रकार की बातें आती हैं। दादी को संकल्प था कि जहां भी बाबा के स्थान बने हुए हैं वहां पांव रखकर के उन आत्माओं की सेवा करूं, समीपता की भासना दूँ। पहले यात्रा में फ्रांस का प्रोग्राम था। वहां सरकार की तरफ से कुछ रुकावटें आ रही थी। दादी ने संदेश लाया कि आप लोग, सारा फ्रांस देश मिलकर के, सवेरे-शाम टाइम फिक्स करके ऐसी तपस्या कुछ समय तक करो, देश का वातावरण बदली करो। वहां कुछ ऐसे कायदे-कानून बन गए थे जो ब्रह्माकुमारियों को वहां हॉल लेना ही संभव नहीं था परंतु छह मास के बाद उन्होंने शुभ समाचार दिया कि 'अभी वातावरण चेंज हो गया है। हमें छुट्टी मिल गई है, अब हम हॉल भी ले सकते है और बड़े-बड़े लोगों से मुलाकात भी हो गई है।' दादी इतना क्लियर इंस्ट्रूमेंट थी कि दादी के द्वारा जो संदेश आता था, यदि कोई उसे एक्यूरेट पालन करे, तो सफलता जादू का खेल बन जाती थी। उन्होंने दोबारा दादी जी को आने का निमंत्रण दिया और दादी जी भी बहुत प्यार से, बहुत खुशी से वहां पहुंची। वहां विदेश के हिसाब से बहुत बड़ी संख्या थी (300)। वहां फ्रांस के और आजू-बाजू के देशों के भी ब्रह्मावत्स पहुंच गए थे, वे दादी से अलग होना ही नहीं चाहते थे। लास्ट दिन भी दादी का क्लास पूरा हुआ तो कोई डांस करे, कोई गीत गाए ती दादी लास्ट मिनट पर एयरपोर्ट के लिए निकले और उस दिन रास्ते पर बहुत जबरदस्त ट्रैफिक था। उस दिन किसी वजह से टिकट को कोई समस्या आ गई। मैं और मेरे साथ जो दो बहनें थी फ्रेंच भाषा जानने वाली, हम एक स्थान से दूसरे स्थान, दूसरे से तीसरे स्थान पर टिकट के लिए, पेरिस के एयरपोर्ट पर भागदौड़ कर रहे थे। बीच में मैने दादी के पास चक्कर लगाया तो देखा कि दादी बड़े प्यार से वहां बैठे ब्रह्मावत्सों को दृष्टि दे रही है, थोड़ी-थोड़ी इंग्लिश बोल रही हैं, बाबा की कुछ बातें सुना रही हैं और वे लोग भी मौज कर रहे है। फिर हमें पता चला कि मैं और मेरे साथ वाली लंदन की दो बहनों को टिकट मिल सकती है परंतु दादी और नीलू बहन को नहीं मिल सकती है। हम उन्हें छोड़ कर कैसे जा सकते थे, तो हमने वह टिकट कैंसिल करा दिया। हमें जहां जाना था वह इटली में एक छोटी-सी जगह थी। मुझे लगा कि अगली फ्लाइट तो दूसरे दिन ही मिलेगी परंतु प्रकृतिजीत दादी के तप से, डेढ़ घंटे के बाद हमे दूसरी फ्लाइट मिली और हम बिल्कुल आराम से उसे पकड सके क्योंकि हम एयरपोर्ट पर ही थे। मैंने देखा कि उस समय दादी के चेहरे पर एक सेकेंड के लिए भी कोई फर्क नहीं आया। नहीं बीच-बीच में कोई पूछ सकता है कि बताओ, क्या हो रहा है, क्यो नहीं जा रहे है। बताओ तो सही। हम बीच-बीच में चक्कर लगाते तो थोड़ा-थोड़ा बताते भी थे पर दादी के चेहरे पर कुछ फर्क नहीं आता था। दादी मुस्कराते थे, शांत स्वरूप थे। पेरिस वालों ने जल्दी-जल्दी दादी जी और हम सब के लिए भोजन भी भेज दिया तो दादी ने प्यार से सब के साथ पिकनिक करके, भोजन करके फिर सभी को छुट्टी दी। उस दिन दादी करीब 7 घंटे एयरपोर्ट पर रही, नहीं तो आमतौर पर दादी का एयरपोर्ट पर आना और जाना होता था। मुझे भी थोड़ा फिक्र हुआ तो दादी ने कहा, तुम सोचो नहीं, इनको एक्स्ट्रा पालना मिलने वाली थी। हर बात में पॉजिटिव सोचना और दादी की शांति की स्थिति का उस वक्त अनुभव हुआ।

बाबा की सेवा में हाजिर प्रकृतिजीत दादी

एक बार टर्की में एक माता का बहुत सुंदर मकान था एक टापू पर और उसकी इच्छा थी कि वह दादी को वहां अपनी नाव पर ले चले और अपनी सहेलियों से मुलाकात कराए। दादी ने भी बहुत प्यार से स्वीकार किया और हम सभी लोग नाव पर चढ़े, जिसमें 10 से ज्यादा लोग नहीं आ सकते थे। दस मिनट के बाद रास्ते में नाव बहुत हिलने लगी, हम दादी को देख रहे थे, दादी बिल्कुल शांत बैठी थी। करीब 10 मिनट तक प्रकृति का यह खेल चला, जैसे हमें दिखाने के लिए कि दादी प्रकृतिजीत है। हम फिर उस स्थान पर सुरक्षित पहुंच गए। वह माता भी घबराई हुई थी कि यह तो उसने बिल्कुल भी सोचा न था। उसने दादी से पूछा, 'दादी, आप ठीक हो? आप क्लास करा सकेंगे? आप सबसे मिल सकेगे? दादी ने कहा, मैं बिल्कुल ठीक हूं, ना मुझे रेस्ट बाहिए, ना कुछ और चाहिए, बस, जिस कार्य के लिए बाबा ने मुझे भेजा है, मैं उसमें हाजिर हूँ।'

बाबा की याद में प्रश्नों के सटीक उत्तर

टर्की मुसलमानों का, इजरायल यहूदियों का और ग्रीस ईसाईयों का देश है। इन सभी स्थानों की न सिर्फ भाषा अलग बल्कि धर्म भी अलग है परंतु दादी ने हर एक स्थान में ऐसी भासना दी जो उन्हें बाबा के और नजदीक ले आई। जेरूसलम में जहां तीन धर्मों - मुसलमानी, यहूदियों, ईसाईयों के यादगार स्थान एक माइल के अंदर पास-पास बने है वहां के इंटरफेथ आर्गेनाईजेशन संगठन के मुख्य अपनी पत्नी के साथ एक बार मधुबन होकर गए थे। वे दादी जानकी जी से मिले थे और इस बार दादी गुलजार जी का प्रोग्राम उन्होंने वहां खुद ही रखा था। उस सभा में तीन धर्मों वाले इकट्ठे बैठे थे। दादी ने न केवल शांति के ऊपर भाषण किया परंतु लोगों को शांति की महसूसता भी हो रही थी, वातावरण बहुत ही शक्तिशाली था। एक व्यक्ति के मन में कुछ बात चल रही होगी तो उसने उसके समाधान हेतु दादी जी से प्रश्न पूछा कि ओसामा बिन लादेन के लिए हम क्या सोचे, एक तरफ तो वह कहता है कि भगवान के नाम पर मैं यह सब कर रहा हूं और दूसरी तरफ इतनी दुर्घटनाएं हो रही है।उसके कारण, तो हमें क्या सोचना चाहिए? दादी जी जानती थी कि यहां तीन धर्म वाले लोग बैठे हैं, इससे ज्यादा हमने कुछ उन्हें बताया नहीं था। दादी ने बड़े प्यार से, शांति से विचार किया बाबा की यादमें, फिर उत्तर दिया कि 'हम यह नहीं सोचते कि यह क्या कर रहा है, क्या उसका नतीजा है, हम यह सोचते हैं कि हर आत्मा को परमात्मा की शांति की किरणें मिलें ताकि हर आत्मा को पता चले कि मुझे अब क्या करना चाहिए।' सारी सभा शांत हो गई। दादी का बाबा के साथ संबंध इतना घनिष्ठ, इतना गहरा था जो बाबा बोल रहे हैं या दादी बोल रही हैं, मालूम ही नहीं पड़ता था। उस समय बाबाकी टचिंग कहें या बाबा की हाजिरी कहें। दादी का जो बाबा से कनेक्शन था, उस कनेक्शन से बाबा टच करते थे और दादी उत्तर दे पाती थी। जब दादी लंदन में आती थी तो साइलेंस का अनुभव सभी को कराती थी। उस साइलेंस के वाइब्रेशन हर एक आत्मा को उड़ा देते थे। बड़ी-बड़ी सभाएं (15,00) होती थी, दादी की स्थिति बहुत सेवा करती थी। हम सब बहुत ही भाग्यवान हैं जो बाबा ने ऐसे दर्शनीयमूर्त के साथ हमारा संबंध रखा।

दादी गुलज़ार जी के बोल वरदानी थे

बह्माकुमारी मोहिनी बहन, न्यूयार्क
दादी गुलज़ार जी का आध्यात्मिक नाम हृदयमोहिनी था, जिस नाम में ही उनके गुण प्रत्यक्ष होते हैं कि वह हृदय को मोहने वाली हमारी दादी थी। उनके स्वरूप से परमात्मा का परिचय, परमात्मा की पहचान, परमात्मा से संबंध स्पष्ट दिखाई देते थे। यदि मुख से कहें कि मैं परमात्मा की संतान हूं परंतु परमात्मा के गुण व शक्तियां यदि स्वरूप में नहीं दिखते, तो कौन मानेगा। दादी हृदयमोहिनी जी हमारे सामने प्रत्यक्ष प्रमाण थी। उनके संकल्प, वाणी और कर्म से बाबा को पहचान स्वतः मिलती थी।

उतना सोचती थी, जितना जरूरी है

दादी जी उतना सोचती थी, जितना जरूरी है। कभी भी हमने उनके संकल्पों में व्यर्थ संकल्प नहीं देखे। व्यर्थ संकल्पों से शक्ति जाती है और जो श्रेष्ठ संकल्प करते हैं वे भी पूरे नहीं होते। दादी जी का हर संकल्प व्यवहारिक होता था। उनकी संकल्प शक्ति, जो उन्होंने जमा की थी, उसके आधार से परमात्मा ने उन्हें अपना माध्यम बनाया, उनके द्वारा महावाक्य उच्चारण किए और वे महावाक्य पढ़ कर हम सभी, अपने जीवन में हर प्रकार से प्रेरणा लेते हैं। दादी जी की तपस्या, साधना के कारण उनकी वाणी का हर उच्चारण वरदानी था। एक साधारण शब्द भी दादी कहती कि 'ठीक हो जाएगा, बहुत अच्छा होगा, जरूर हो जाएगा' तो वह वास्तव में हो जाता था। दादी ने कहा है। ठीक हो जाएगा, तो ठीक हो ही जाता था। उनके बोल वरदानी थे। हम उनके पास कोई समस्या ले जाते तो दादी बहुत ध्यान से सुनती थी और फिर मुस्कराके कहती थी, 'ठीक हो जाएगा, बड़ी बात नहीं है।' ये बोल सुनकर हम सभी का मन बहुत हल्का हो जाता था।
निश्चय के कारण सब कुछ निश्चित है, ऐसा कहकर निश्चिंत भी रहती थी।

निश्चय के कारण निश्चिंत

दादी की दृष्टि से परमात्म प्यार, रूहानी स्नेह मिलता था। दृष्टि लेते-लेते हर एक का मन परमात्मा से जुड़ जाता था। उनकी दृष्टि में बहुत बहुत दिव्यता, एक दिव्य नूर, प्रकाश था। उनका सरल स्वभाव था। मधुरता, नम्रता सभी गुण उनमें प्रत्यक्ष दिखाई देते थे। वे सदा ही ईश्वरीय सम्मान में रहकर सब को सम्मान देती थी। छोटा,बड़ा कोई भी हो, सबको बहुत सम्मान में देखती, उनकी बात सुनती और सम्मान की दृष्टि से देखते उनके भी स्वमान को बढ़ा देती थी। दादी जी का निश्चय परमात्मा से हर संबंध में बहुत था। निश्चय के कारण सब कुछ निश्चिंत है, ऐसा कहकर निश्चित भी रहती थी।

"मेरा वाप चिंता नहीं करता तो मैं क्यों करूं?'

एक बार हमने दादी से कहा, 'यह जो वर्तमान परिस्थिति चल रही है। इसका विचार तो नहीं चल रहा, चिंता तो नहीं हो रही तो दादी ने कहा, मेरा बाप चिंता नहीं करता तो मैं क्यों करू? दादी के वे शब्द मुझे बहुत याद आते है और मुझे स्मृति दिलाते रहते है कि मेरा बाप चिंता नहीं करता, तो मैं क्यों करू। दादी के दिल में हमेशा रहता था कि मुझे बाप के समीप रहना है, उनका निरंतर याद में रहने का पुरुषार्थ बहुत था।

परमात्मा ने उन्हें माध्यम बनाया परंतु उनकी अपनी साधना भी बहुत थी

जब दादी, बाबा से दृष्टि लेते तो मै पूछती कि दादी, आप baba से क्या ले रहे हो?' तो कहते, 'मैं बाबा की सर्वशक्तिया लेना चाहती हूं। हमने देखा कि उनका जो आतरिक ख्याल था। जो उनके जीवन की पवित्रता थी, वह सर्वश्रेष्ठ थी। साधारण रूप से रहते भी उनकी महानता, उनकी रॉयल्टी बहुत प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती थी। बाबा उनकी दृष्टि द्वारा हमें एकदम पार ले जाते थे। अव्यक्त बापदादा जब दादी जी द्वारा हमें दृष्टि देते तो हम अशरीरी हो जाते। एकाग्र हो जाते और अव्यक्त स्थिति का अनुभव होता था। चाहे कोई सांसारिक व्यक्ति भी दादी के सामने आता था, उसे भी शांति, शक्ति का अनुभव होता था। परमात्मा ने तो उन्हें माध्यम बनाया परंतु उनका अपना अभ्यास, साधना भी बहुत थी। उस साधना से उन्होंने अपनी सबसे बड़ी स्थिति, विदेही स्थिति, जिसमें देह का भान न रहे; अशरीरी स्थिति, जिसमें शरीर की कोई कर्मेंद्रिय खींचे नहीं, वह प्राप्त की, संपन्न, संपूर्ण स्थिति प्राप्त की। इसलिए हम सबके जीवन में वह एक उदाहरण, एक आदर्श रही। बहुत-बहुत प्यारी दादी जी में जिस तरीके से संपूर्ण समर्पण रहा, 'हां बाबा', 'जी बाबा' सदा कहा, हम सभी भी बाबा को हां जी करते हुए, बाबा को प्रत्यक्ष करने के लिए बाबा के सभी गुणों को, शक्तियों को अपने स्वरूप में और व्यवहार में जरूर लाएंगे। ऐसा हम सभी दृढ़ संकल्प करते हैं, सफलता हम सबका जन्मसिद्ध अधिकार है ही। हम सभी श्रद्धा, प्रेम से दादी जी का हर प्रकार से आह्वान करते रहते हैं। वे हमें परमात्मा की ही याद दिलाती हैं।

अनेकों से मिलते भी दादी हृदयमोहिनी सदा न्यारी-प्यारी रहती थी

ब्रह्माकुमारी सतोष बहन, मुंबई (सायन)
जिस दिन साकार बाबा अव्यक्त हुए उस दिन हम बच्चों को बड़ा शॉक लगा क्योंकि हम सभी ने तो यही समझ रखा था कि सतयुग आने तक बाबा हमारे साथ में रहेंगे और विश्व परिवर्तन भी हम बाबा के साथ-साथ देखेंगे। जब अचानक यह संदेश मालूम पड़ा तो थोड़ा आंखों के सामने अंधेरा-सा छा गया। परंतु उसके बाद अव्यक्त बापदादा ने 21 जनवरी को आकर गुलजार दादी के द्वारा भगवान ने मुरली चलाई और हर एक बात को एकदम स्पष्ट कर बताया। बादा ने हमें यह भी अनुभव कराया कि किसों के बाप को अगर ऊंचाई की डिग्री मिलती है। उसकी इवमेट होती है तो बच्चों को खुशा होती है, तो बाबा साकार से अव्यक्त बने ती उनको डियो ऊंची तसे गई ती बच्चों को इसकी खुशी होनी चाहिए।

दादी वहुत कम बोलती थी क्योंकि सोचती ही कम थी

बाबा ने गुलजार दादों का ही तन क्यों चुना क्योंकि दादी जी को निःसंकल्प अवस्था, पवित्रता, निर्मल वाणी और निमित्त भार था। दादी की वाणी में कभी भी कोई ऐसा शब्द नहीं होता था शे सामने वाले को चुभे। दादी का रथ जब बापदादा ने चुना, दादी रे अथक होकर के 12-14 घंटा एक ही पोज में बैठकर के सेवा की। भल इतनी बड़ी ऑलमाइटी अथॉरिटी और बह्माबाबा उनके तन में आते थे परंतु रथ को कमाल थी। दादी अनेकों से मिलते हुए भी जैसे सबसे न्यारी-प्यारी रहती थी। जैसे ब्रह्माबाबा के नेत्रों से हमने ऑलमाइटी बाबा को देखा वैसे ही दादी के नेत्रों से हमने वापदावा को देखा, उनकी अनुभूति की। दादी बहुत नम्रचित्त थी। उन्हें कभी भी किसी भी बात का अहंकार नहीं आया क्योंकि भगवान कभी भी किसी का अहंकार नहीं सहन कर सकता, तो दादी की नम्रता ने ही भगवान को अपनी ओर खींच लिया। हमने दादी की कभी ऊंची आवाज नहीं सुनी। बहुत कम बोलती थी क्योंकि सोचती हो कम थी। जिनका संकल्पों के ऊपर कंट्रोल होगा, उनका वाणी और कर्मों के ऊपर भी कंट्रोल रहता है। सभी ब्रह्मावत्स चातक की तरह इच्छा रखते थे कि हम दादी के मुख से कोई ना कोई महावाक्य सुनें क्योंकि दादी के मुख से निकलने वाला वाक्य सामने वाले के लिए वरदान सिद्ध हो जाता था। हम तो दूर मुंबई में रहते थे परंतु दिल नजदीक होने के कारण और बापदादा उनके तन में आने के कारण समीपता की भासना आती थी।

दादी सबको समान प्यार देती थी

भगवान को भगवान इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसमें पक्षपात नहीं, ऐसे ही हम ने देखा कि बाबा के साथ रहते-रहते बाबा के जो भी गुण थे उनका रंग दादी के ऊपर लग गया था। दादी के मन में भी किसी के लिए कोई पक्षपात नहीं था। उनके लिए सब समान थे। सबको समान प्यार देती थी, रूहानी पालना देती थी। दादी को यही रहता था कि सब को साकार बाबा की पालना मिले, किसी को ऐसा न लगे कि बाबा चला गया है। हमारे मन में जो संकल्प था कि साकार बाबा चला गया, वह कमी दादी की पालना द्वारा पूरी हो गई।

दादी का बहुत विशाल दिल था

कभी भी दादी किसी की बात वर्णन नहीं करती थी, जो भी बात होती उसे फुलस्टॉप लगा देती थी इसलिए वह सदा निःसंकल्प रहती थी। दादी का बहुत विशाल दिल था। दादी प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तो यही है कि हम भी दादी के समान, दादी के गुणों को अपने जीवन में धारण करते हुए, अधक होकर के, बापदादा से बेमुख आत्माओं को सम्मुख लाएँ और जो बापदादा के बने हैं उनको बापदादा की पालना देते हुए जल्द से जल्द संपूर्ण चनाएं संपन्न बनाए। बापदादा और एडवास पार्टी वाले हमसे यही चाहते है कि हम भी जल्द से जल्द तैयार हो जाएं तो इस पुरानी सुष्टि का भी परिवर्तन हो जाए। यही आदरणीया दादी जी को सच्चे सच्चे दिल श्रद्धांजलि है कि हम जरूर दादी की आशाओं को पूर्ण करेंगे और अपने जीवन के द्वारा अनेक आत्माओं को लाभ देंगे।

गुलज़ार दादी जी गम्भीर के साथ रमणीक भी थी

बह्माकुमारी आशा बहन, ओ. आर. सी. गुरुग्राम
हम सबकी अति स्नेही, मास्टर ज्ञान सागर, मास्टर सर्वशक्तिमान आदरणीय गुलज़ार दादी जी अब भी सूक्ष्म रूप में हम सबके साथ हैं। दादी गए नहीं है परंतु अभी अपने वाइब्रेशंस द्वारा, जीवन द्वारा, अनुभव तथा सकाश के द्वारा ब्राह्मण परिवार की पालना सूक्ष्म वतन से कर रहे हैं। ऐसी दादी भुलाई नहीं जा सकती। पढ़ाई हमारा जीवन है, पढ़ाई हमारी शक्ति है, दादियां भी हमारी शक्ति हैं। दादियों का जीवन हमारे सामने उदाहरण और आदर्श रहा। इन्हें सदा सम्मुख रख, अपना जीवन सफल करेंगे।

दादी बाबाकी बातें बताती थी और लक्ष्य को पक्का कराती थी

संगमयुग पर बापदादा का सानिध्य पालना प्राप्त होना ही बडा भाग्य है। उसके साथ-साथ मम्मा-बाबा की डायरेक्ट पालना में पले हुए आदिरत्न दादियों की पालना हमे मिले, वह भाग्य भी कम नहीं है। जब हम कॉलेज की गर्मियों की छुट्टियों में मधुबन आते थे तो बड़ी दीदी, गुलजार दादी जी से कहते थे कि 'इससे पूछो, इसके जीवन का लक्ष्य क्या है।' यह भी एक भाग्य है कि सभी दादियां, वरिष्ठ दादाएं लौकिक घर में अनेक बार आए हैं। तो गुलजार दादी जी बड़े प्यार से उंगली पकड़कर, अनेक बार शाम के वक्त, नक्की लेक पर ले जाती थी। वहां हम दोनों बैठ जाते थे तो दादी बाबा को बातें बताती थी और लक्ष्य को पक्का कराती थी। उस आयु में दादी जी की नजर मुझ पर पड़ी जो मुझे यज्ञ में समर्पित होने के लिए एक तरह से निमित्त बनी।

गो सून, कम सून

दादी जी बहुत क्विक संदेशी थी। बाबा मुरली चलाते थे कि ध्यान-दीदार की बातों में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं लेना है। एक बार हम हिस्ट्री हॉल में बैठे थे, गुरुवार का दिन था। ब्रह्माबाबा बीच को संदली में बैठे थे, गुलज़ार दादी एक तरफ की संदली पर बैठी थी और दूसरी तरफ की संदली खाली थी, हम सब सामने बैठे हुए थे बाबा ने कहा, 'बच्ची, गो सून एंड कम सून।' दादी की एकाग्रता की शक्ति, निर्संकल्पता की शक्ति, देह से न्यारे होने की शक्ति इतनी जबरदस्त थी कि एक गीत चला, 'चली कौन से देश गुजरिया तू सज-धज के।' दादी जी वतन में गई, भोग स्वीकार कराया और गीत खत्म होते-होते दादी जी वतन से वापस आ गए।
जब सेवाएं आरंभ हुई तो आदरणीय जगदीश भाई जी साहित्य की रचना करते थे और यदि कोई स्पष्टीकरण चाहिए होता तो प्रेस से फोन करते कि बाबा से मेरे लिए यह डायरेक्शन लेकर के दो। दादी उसी वक्त फोन का रिसीवर टेबल पर बाजू में रख ध्यान में जाती, भाई जी के लिए संदेश लेकर आती और उन्हें फोन पर बता देती, यह हमने अपनी आंखों से देखा। इसका कारण था कि दादी ने अपनी बुद्धि में दो चीजें कभी नहीं आने दी, व्यर्थ और साधारण। नेगेटिव की तो बात ही छोड़ दो। दादी की बुद्धि में ना व्यर्थ बसता था, ना साधारणता बसती थी।

क्लियर बुद्धि

कभी कोई बात हो जाती तो दादी कहते, तुम सोचो नहीं। दादी के साथ मेरा बहुत प्यारा, गहरा संबंध रहा। एक बार दादी इजराइल में थे, तो नीलू बहन को कहा, आज मुझे आशा की बहुत याद आ रही है, आशा मुझे याद कर रही है। उस समय मेरी छोटी बहन के युगल रमेश जी का ऑपरेशन हुआ था, बहुत डिफिकल्ट पोजिशन थी, डिसिजन लेना था और मैं घर में बड़ी थी। तो सोचा कि दादी जी द्वारा बाबा से संदेश लें। दादी उस वक्त विदेश में इजरायल के रेगिस्तान में थी, जहां फोन नहीं लग पा रहा था।परंतु मुझे बापदादा से डायरेक्शन चाहिए था तो मैने दादी को फोन लगाया, दादी जी कार में थी। कैसे भी करके उनको फोन लग गया और दादी जी को मैने सारी बात बताई। दादी जी ने मुझे तुरन्त उत्तर दे दिया। चलती कार में ही बाबा उनको बुला लेता था और उत्तर दे देता था। बाबा इतनी क्लियर बुद्धि को ही उड़ा सकता है। इसी तरह 16,16 घंटे अव्यक्त मिलन के लिए बैठे रहना कोई मासी का घर नहीं होता, यह तब होता है जब अपने शरीर पर शासन, प्रकृति पर आधिपत्य होता है।

मधुर व्यवहार

दादी की पालना-छत्रछाया बचपन से ही उपलब्ध हुई और यह भाग्य रहा कि जब दिल्ली, पांडव भवन सेवाकेंद्र खुला तो वहां ऑफिस के लिए अंग्रेजी बोलने वाली बहन चाहिए थी। बाबा ने मुझे यह अवसर दिया और मुझे वहां प्रथम दिन से ही रखा गया। मैंने दादी जी को देखा कि घर को सजा भी रही है, सफाई भी कर रही है। उस समय दादी को दादी नहीं कहते थे, गुलज़ार बहन कहते थे। सन् 1973 की बात है, मैंने देखा कि इतनी बड़ी दादी, बाबा का रथ, सफाई भी कर रही थी, सजावट भी कर रही थी। यह दादी का फर्स्ट इंप्रेशन मुझ पर पड़ा। दादी ने सारा पांडव भवन मुझे स्वयं उंगली पकड़ कर दिखाया। वहा के भाई को कहा, चाबियां लाओ, मालकिन आ गई है। ऐसी थी दादी मुझ में प्यार और विश्वास रखा। दादी ने कभी अपने आप को बड़ा नहीं समझा। सखियों के बीच में सखी के रूप से रहे। मेरा यह भाग्य रहा कि दादी ने मुझे अपने कमरे में कई वर्ष रखा। मैं तो बिल्कुल ही अनजान थी, सीधे घर से आई थी। सेंटर लाइफ क्या होती है, मुझे पता नहीं था लेकिन दादी ने ट्रेनिंग दी, मुझे सिखाया।
दादी कितना संभाल और अटेंशन रखती थी। ध्यान मुझे रखना चाहिए था परंतु दादी रखती थी कि सारा दिन यह सेवा करती है और जब कमरे में आती है तो इसे किसी भी तरह की कोई डिस्टरबेंस नहीं होनी चाहिए, दादी की कमाल थी। व्यवहार इतना मधुर, वह बहुत जल्दी सामने वाली आत्माओं को रूहानियत की शक्ति से, योग की शक्ति से, माधुर्य से अपना बना लेती थी। दादी जी बहुत दबे पांव से चुपचाप कमरे में रहते थे।

स्पर्श करने वाला भाषण

दादी बहुत ज्ञानवान थी, ज्ञानी तू आत्मा नंबरवन थी। दादी ने सुनाया था, एक बार बाबा माथुर जी की कोठी में दिल्ली में आए थे। बाबा ने कहा कि आप लोग कैसे कान्फ्रेन्स करते हैं, वह सब करके दिखाओ। तो एक चेयरमैन बना, एक मंच-सचिव बना, एक कुछ और बना और गुलज़ार दादी जी ने भाषण दिया। बाबा ने दादौ जी को पास किया नंबरवन। दादी जी का भाषण दिल्ली में व भारत में नंबरवन होता था, बिल्कुल स्पर्श करने वाला, कईयों की आंखों में आंसू भी आ जाते थे।

स्टडी करो और मुरली से नए प्रश्न निकालो

दादी जी नंबरवन स्टूडेंट थी और एक आदर्श टीचर भी थी। जब दादी जी क्लास में आकर मुरली सुनाते तो मुरली में से नई-नई बातें, नए-नए प्रश्न निकाल कर हमें पूछते थे। ऐसे प्रश्न दादी गुलजार पूछते थे जिससे हमारी बुद्धि चले। आज जो आप मुरली में शुरू में प्रश्न-उत्तर, धारणा के लिये सार आदि पढ़ते हैं वे उन दिनों मुरली में नहीं आते थे लेकिन दादी, ऐसी हाई क्वालिटी की टीचर थी कि सारी मुरली से विशेष प्रश्न निकालती थी और पूछती थी, हमें भी कहती थी कि इसी रीति से आपको भी निकालने हैं। दादी कहती थी, बैठकर स्टडी करो और मुरली से नए प्रश्न आदि निकालो। मैं क्लास कराने जाती थी तो दादी जी क्लास सुनते थे, पूछते थे, 'तुमने आज यह बात सुनाई?' ऐसे दादी जी अटेंशन देते थे।

दादी जी बहुत निर्माण थी

पांडव भवन की शुरुआत में टेलीफोन फिक्स करने वाले लाइनमैन आए। दादी जी सारे चित्र समझाते हुए आ रही थी। मैं स्वर्ग का मॉडल साफ कर रही थी। मैने देखा कि इतनी बड़ी दादी, इतनी साधारण आत्मा को स्वयं चित्र दिखा रही थी, दादी ने मुझे क्यों नहीं कहा? मैं भी तो समझा सकती थी। क्या दादी ने यह सोचा कि आशा प्रोफेसर है इसलिए दादी हिचकिचाये। उस घटना ने जीवन भर के लिए पाठ पढ़ा दिया कि सबको आत्मा रूप से देखना है। उनका स्टेटस नहीं।

दादी भाषण करना भी सिखाते थे

दादी हमें भाषण करना भी सिखाते थे। दादी स्वयं भी छत पर भाषण की स्टडी के लिए जाती और मुझे भी अपने साथ ले जाती। दादी कहती, तुम भी तैयार करो, मैं भी करती हूं। हम 5-7 कुमारियां दादी के साथ बैठते थे और दादी हम सब से कहती। तुम इस विषय में यह-यह सुनाना, तुम यह सुनाना, तुम यह-यह सुनाना। इस प्रकार दादी अच्छी ट्रेनिग देते थे, पालना भी करते थे, दादी स्वयं योग कराते, मुरली क्लास कराते थे और रात्रि क्लास भी दादो स्वयं कराते थे। रात में दादी हम सबके साथ बैठते थे। एक बार उस क्लास में गणेश की सारी विशेषताएं निकली कि गणेश के पेट का क्या मतलब है आदि-आदि और वे बातें फैलते-फैलते आज मैनेजमेंट में आ गई।

टीचर्स ट्रेनिंग की शुरुआत दादी ने की

कुमारियों की टीचर्स ट्रेनिग की शुरुआत दादी ने की कमला नगर सेंटर से। फिर वह ट्रेनिंग पांडव भवन, दिल्ली में होने लगी। फिर जब संख्या बढ़ने लगी तो आबू में ट्रेनिंग होने लगी। बहुत सारी बड़ी-बड़ी टीचर्स, जिन्हें हम आज मंच पर देखते हैं, सन् 1973 से 1979 तक की दिल्ली की ट्रेनिग से निकली हैं, सब दादी की पालना ली हुई है। दादी रात में पूछती थी कि ट्रेनिग में आज क्या-क्या सीखा? इस तरह दादी का पढ़ाई और पढ़ाने में ध्यान रहता था।

संग पर बहुत अटेंशन खिंचवाते थे

दादी संग पर बहुत अटेंशन खिचवाते थे। दादी सदा कहते कि आप लोगों का संग अच्छा होना चाहिए। यदि दो कुमारियां खड़ी आपस में बातें कर रही होती तो दादी पूछते कि 'तुम क्या बात कर रहे थे?' कभी पूछते कि 'तुम फोन पर बात कर रही थी ना, क्या बात कर रही थी?' हम कुमारियों का संगठन बहुत मजबूत था। खाने के समय हम इंतजार करते थे कि वह भी आ जाए, वह भी आ जाए फिर भोजन करेंगे, तो दादी कहते थे, यह भी टाइम वेस्ट करना है।

गारबेज बॉक्स (कूड़ादान) बंद कर दो

एक बार मैने दादी से कहा, 'मेरे पास सब आकर अपनी-अपनी बातें सुना कर जाते हैं।' दादी ने मुझे बहुत अच्छी बात कही कि 'वे इसलिए आते है क्योंकि तुमने अपना गारबेज बॉक्स (कूड़ादान) खोल कर रखा है, अगर तुम इसे बंद कर दो तो कोई नहीं आएगा।' तो दादियां हमें किस लेवल पर ले जाना चाहती हैं, इन बातों से हम परख सकते हैं। सदा हमारे प्रति शुभ भावना, कल्याण की भावना रखी। नहीं तो मैं सोचती थी कि सब मेरे पास आकर बोलते हैं तो मैं जैसे कि विशेष आत्मा हूं, मैंने तो ऐसे ही समझा था।

भाषा बड़ी अच्छी और नम्र

सुबह उठकर दादी सब कमरों में चक्कर लगाते थे। यदि हम सोए होते तो ऐसे नहीं कहते कि उठो... कहते, 'आशा, आज उठना नहीं है?' दादी में भाषा की बहुत रॉयल्टी थी। दादी की भाषा बड़ी अच्छी और नम्र होती थी। किसी को महसूस नहीं होता था कि दादी सख्त बात कर रही है क्योंकि एडमिनिस्ट्रेटर थी, जोन संभालती थी परंतु इस ढंग से बोलती थी जो सामने वाली आत्मा समझ जाती थी।
किसी बड़ी आयु वाले के लिए हम कहते कि वह बूढ़ा है। यह बूढ़ी हो गई है आदि तो दादी कहती थी कि 'ऐसे नहीं बोलो, बोलो कि बडी आयु हो गई है।' दादी कभी किसी कार्य के लिए ऐसे नहीं कहती कि यह करो। पूछती थी, 'यह हो सकता है?' दादी की एक छोटी बैग होती थी जिसमें मुरली, नोट्स आदि होते थे। कहीं जाते समय सामान पैक हो रहा होता तो नीलू बहन से पूछती, 'यह छोटी सी बैग इसमें आ सकती है?' कुछ कार्य करवाना हो तो पूछती, 'क्या आप यह कर सकेंगे?'

दादी में बहुत परख शक्ति थी

दादी पारखी थे, दादी में बहुत परख शक्ति थी। एक कुमारी के लिए मैने पूछा, 'दादी इसको रखें?' दादी ने बिल्कुल मना कर दिया। वह कुमारी बहुत अच्छी सेवा करती थी, मधुबन में आकर बहुत अच्छी सेवा करती थी, हमारे पास आकर भी बहुत अच्छी सेवा करती थी। दादी ने कहा, 'बिल्कुल नहीं रखना और सचमुच हमने देखा कि वह कुछ दिनों के बाद चली गई।

अपना कार्य अपने आप करते थे

दादी हमें कभी खाली नहीं बैठने देते थे। कभी कोई काम सफल नहीं होता तो दादी कहते, योग की कमी है। जैसे अगर म्यूजियम में हम बैठे हैं और कोई नहीं आया है तो कहते, 'योग की कमी है, बाबा की दुकान और जिज्ञासु ना हो, ऐसा हो नहीं सकता!' बाबा के म्यूजियम में बैठे हो ना तो बातें नहीं करो (हम कन्याएँ आपस में बातें करती थी), आत्माओं का आह्वान करो, आत्माएँ आनी चाहिएँ।' दादी स्वयं भी बिल्कुल साइलेंस में बैठ जाते थे। दादी इतनी नम्रचित्त, निर्मान थी, हम भी वहां बैठे है परंतु दादी को यदि किसी को बुलाना हो तो दादी खुद उठ कर जाती थी और अन्दर से बुलाती थी। हम कहते थे, दादी, आपने हमें क्यों नहीं कहा, हम भी तो यही बैठे हैं? परंतु, दादी किसी को आर्डर नही करते थे, अपना कार्य अपने आप करते थे।

इकोनॉमी की अवतार

दादी हर बात में बहुत इकोनॉमी से चलते थे। बहुत समय पहले जब यज्ञ में बेगरी पार्ट था तब बाबा ने दादी को कहा था, पेट को आधी रोटी कम दो, बचत करो, बचत से जो पैसे बचें उनसे साहित्य या पर्चे प्रिंट कराओ, सेवा करो। इसलिए सभी दादिया इकोनामी की अवतार है। आज हम सब दादियों के त्याग, तपस्या के बल से खड़े हैं। यह शीतल छाया उनकी बदौलत है।
दादी छोटे-छोटे कार्य जैसे सिलाई भी करती तो इतनी न्यारी होकर करती जैसे शरीर में है ही नहीं, खड़े-खड़े ही करती थी। कोई कपड़ा फट जाता तो चक्ति लगाकर पहनती थी। एक बार एक ब्लाउज की एक बाँह, दूसरे ब्लाउज की दूसरी बाँह जोड़कर कहा कि देखो, एक ब्लाउज तैयार हो गया। दादी को धन की बहुत कदर थी। कभी प्लेन में अगर छोटी बहन ने कोई चीज ली और कहा, दादी, आप भी ले लो, तो दादी कहती थी, यह इतनी महंगी होगी, मैं नहीं लूंगी। फिर दादी को बताते थे कि दादी, यह फ्री में है, हमने टिकट के साथ इसका पेमेंट किया हुआ है तो फिर दादी कहती थी, ठीक है। दादी का अंत तक यह अटेंशन रहा कि एक्स्ट्रा धन मुझ पर खर्च ना हो।
एक बार दिल्ली पांडव भवन में बहुत बड़ा आयोजन था।बड़ी-बड़ी दादियों बृजेंद्र दादी, निर्मल शांता दादी आदि और बड़े-बड़े भाई सारे भारत से आए हुए थे। उन्हीं दिनों संजय गांधी जी की मृत्यु हुई थी, तो निर्वैर भाईजी ने कहा कि आशा बहन, इंदिरा गाधी जो से टाइम ले लो। टाइम मिल गया और हम सब, दादियों के साथ मिलने चल पड़े। वहाँ जाने पर हमें किसी ने कहा था कि जिस रूम में संजय गांधी जी की बॉडी को रखा गया था, उस रूम में इंदिरा जी रोज आती है। आप भी यहीं आकर बैठ जाओ, तो हम वहीं बैठ गए। परंतु इंदिरा गांधी जी ने उस कमरे में आने से मना कर दिया क्योंकि अभी संजय गांधी जी को गए 13 दिन हो चुके थे और उस कमरे में वह जाना नहीं चाहती थी। वहां आने से वह भावुक हो जाती थी। फिर डॉक्टर कुमुद जोशी जी, जो संस्था को जानती थी, इंदिरा जी को लेकर आए और बड़ी दादी जी उन्हें मिले।

साक्षी होकर पार्ट प्ले करो

मेरी आयु छोटी थी, सेवा के क्षेत्र में नई-नई थी, मुझे धक्का लगा कि इतनी बड़ी दादियाँ गई और अपॉइंटमेंट जैसी सोची थी वैसी नहीं हुई, तो मेरा मन उदास हो गया। उसी शाम एक प्रोग्राम में मुझे मंच संचालन करना था तो मैंने गुलजार दादी जो को कहा, 'दादी, मैं शाम का प्रोग्राम नहीं करूंगी, आप किसी और को बोल दो।' दादी ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ एक बार कहा कि 'क्या यह ज्ञान है?' इस घटना ने मेरे दिमाग को बिल्कुल खोल दिया, मन-बुद्धि में यह बात सेट हो गई कि 'अच्छा हो तो खुश, ना हो तो नाखुश, नहीं, साक्षी होकर पार्ट प्ले करो और ज्ञान की रीति से करो।' मेरे कानों में शब्द गूंजते रहते हैं, 'क्या यह ज्ञान है?'

जिसने जो किया है उसको क्लियर करना ही होगा

हम कभी-कभी दादी गुलजार से पूछते थे, दादी, आप तो ट्रिब्यूनल में बैठेंगी ना? तो दादी बड़े फलक से कहती थी, मैं ट्रिब्यूनल में बैठूंगी। हम कहते थे कि दादी, आप दिल्ली वालों का थोड़ा एक आधा नंबर गड़बड़ हो तो एक्स्ट्रा मार्क दिला देना? तो दादी कहती थी कि उस वक्त 'मैं गुलज़ार नहीं होंगी, मेरा स्वरूप उस वक्त बाबा के साथ है, तो जिसने जो किया है उसको क्लियर करना ही होगा।' यह बहुत बड़ी चेतावनी है कि हमें सदा ट्रिब्यूनल के डर से भी एक अच्छा जीवन बिताना है, अच्छा जीवन बनाना है, इस प्रकार अपने आप को चलाना है।

ड्रामा और ज्ञान से स्वयं को बहलाते रहना

एक बार ओआरसी से दादी को विदाई देते वक्त मेरी आंखें गीली हो गई। मैंने कहा था कि दादी, आप जाते हो, सारा ओआरसी सुनसान हो जाता है, आपके होने से रौनक रहती है। दादी रुक गए, दरवाजा खोला और बाहर निकल कर बोले, जब ऐसा हो तो सदा ड्रामा और ज्ञान से स्वयं को बहलाते रहना। यह जैसे कि एक सौगात दादी ने मुझे सदाकाल के लिए दी कि हर बात को किस रूप से देखना है।

एकाग्रता हमारी रॉयल्टी है

दादी की जीवन में रॉयलटी, एकाग्रता से झलकती थी। कर्म इंद्रियों को स्थिर रखना, हमने दादी के जीवन में देखा। कभी दादी के मुंह से कोई नेगेटिव शब्द नहीं निकला, उसकी जगह कहती, यह थोड़ा ऐसा है ना। मंच पर भी कितनी एकाग्र होकर के बैठती थी। दादी कहती, एकाग्रता हमारी रॉयल्टी है। दादी की कितनी भी महिमा करो, तो दादी कहती, यह सारी महिमा बाबा की है।

साइलेंस बड़ी है

वीआईपी सेवा दादी दिल्ली में स्वयं करती थी। उस वक्त हमारे पास कार भी नहीं थी, बृजमोहन भाई जी स्कूटर से जाकर ऑटो लेकर आते थे और जब तक ऑटो रिक्शा नहीं मिलता था, हम पैदल-पैदल ही चलते थे। वीआइपीज को कैसे हैंडल करना है, वह मैंने दादी जी से सीखा। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी, दादी जी को राष्ट्रपति भवन में रिसीव करते थे। अपना ऑफिस छोड़कर बाहर गार्डन में बैठकर वार्तालाप करते थे, मेडिटेशन के बारे में, शिवबाबा के बारे में, इस संसार के बारे में, ज्ञान के बारे में। दादी को पैदल चलकर ना आना पड़े, तो दादी की गाड़ी भी पोर्च में आनी चाहिए, इतना ख्याल रखते थे। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कहा, साइंस बड़ी या साइलेंस? फिर खुद कहते थे कि साइंस। लेकिन दादी जी के सानिध्य में धीरे-धीरे उनकी बुद्धि में यह बैठा कि साइलेंस बड़ी है। साइलेंस का जितना महत्व आप में है उतना मैंने कहीं नहीं देखा, ऐसा वे कहते थे।

दादी जी की रमणीकता

दादी जी बहुत रमणीक भी थी। जब कॉलेज की छुट्टियों में मैं मधुबन आती थी तो एक डैम था जहां हम पिकनिक के लिए जाया करते थे। कभी म्युजियम में जाते थे। उस पिकनिक में ज्ञान प्रश्न-उत्तर होते थे। एक बार दादी जी ने मुझे प्रश्न किया आ बताओ कितने प्रकार के आलू होते है?' मैने कहा, 'दादी, छोटा आलू, बड़ा आलू, पहाडी आलू, शिमला का आलू । दादी बोले “और सुनाओ, और सुनाओ”। मैंने कहा, और नहीं आता ,कहती है। 'तुमने सुना है दयालु, कृपालु, श्रद्धालु, भक्तालु?'
एक दिन दादी ऊपर तीसरे माले पर थे और मैं नीचे ऑफिस के आगे बड़े ध्यान से कुछ पढ़ रही थी। दादी ने बड़े प्यार से तीसरे माले से मुझ पर एक अमरूद फेंका, बोली, कैच करना और हंसने लगी, देखो, यह बहुत ध्यान से पढ़ रही है और इसके ऊपर, ऊपर से अमरूद आया।
दादी जी सदा अपना भाषण खुद तैयार करते थे और मुझे भी अपने साथ हर जगह ले जाते थे। क्लास कैसे कराना है, भाषण कैसे करना है, कौन-से पॉइंट्स देने हैं, ये सब दादी सिखाते थे। मुझे कहते थे कि चलो तीसरी मंजिल पर, तुम अपना भाषण तैयार करना और मैं अपना भाषण तैयार करूंगी।
दादी गुलज़ार, जानकी दादी और बड़ी दादी के आगे सदा एक छोटी कुमारी की तरह चलती थी। एक फोटो है जिसमें दादी गुलज़ार, प्रकाशमणि दादी और जानकी दादी जी खड़े हैं। वह फोटो दिखाकर हमने दादी को जानबूझकर कहा कि 'दादी, आप सबसे बड़ी हो ना?' तो दादी ने कहा, 'नहीं, मैं बड़ी नहीं हूं, यह प्रकाशमणि दादी स्टेटस में बड़ी है और जानकी दादी आयु में बड़ी है और मैं शरीर की लंबाई में बड़ी हूं।"
मै स्वयं को प‌द्माप‌द्म भाग्यशाली समझती हूं कि दादी की डायरेक्ट पालना की अधिकारी रही। मुझे हर वक्त दादी की बताई बातें याद आती हैं। मैं अनुभव करती हूं कि अभी भी दादी जी वतन से मुझ पर प्यार और अपनी दुआएं बरसा रही हैं, उनकी शक्ति से चल रही हूं।
दादी जी का मेरे लौकिक माता-पिता से भी बहुत प्यारा रूहानी संबंध था, बहुत गहरा, समीप का, मित्र जैसा। दादी जी ने मुझे बताया था कि बाबा कहता है, (कभी-कभी ध्यान अवस्था से) इनकी याद पंहुचती है।

दादी ने अन्त में चित्र और चरित्र से सेवा की

ब्रह्माकुमारी नीलू बहन, शान्तिवन
जब मैं पहली बार मधुबन में संदेशी दादी के साथ आई थी, तब दादी गुलज़ार ने संदेशी दादी से पूछा, 'यह बालिका दादी के साथ रह सकती है?' तो सन्देशी दादी ने कहा, 'मैं इनके माता-पिता से पूछ कर बताती हूं।' तब तो हमारे घरवाले राजी नहीं थे कि मैं अपना जीवन समर्पित करूः परतु मुझे इच्छा थी क्योंकि यह जीवन, ऐसे समाज सेवा करना, बाबा का बनकर रहना मुझे अच्छा लगता था। कुछ समय बाद फिर एक बार बड़ी दादी ने मुझे बुलाकर पूछा, 'आप गुलज़ार दादी के साथ रहेगी?' उस वक्त मेरी उम्र 14 वर्ष थी, मैंने तुरंत ही बिना कुछ सोचे-समझे 'हां' कह दिया। गुलज़ार दादी साथ में ही बैठे थे। उन्होंने कहा कि मुझे यह बालिका पसंद है। उस दिन से बड़ी दादी ने मुझे गुलजार दादी के साथ रखा। इतनी कम आयु में मुझे ज्यादा समझ नहीं थी, तो दादी ने मुझे हर बात सिखाई, कैसे, किसके साथ बात करनी है, कैसे, किसके साथ रहना है, संगठन में कैसे चलना है, हर छोटी-छोटी बातें दादी जी ने सिखाई। दादी के साथ रहते-रहते दादी की जिम्मेदारियां हम संभालने लगे।

जबाब बताने के बाद मुझे कुछ याद नहीं रहता था

जब बापदादा आते थे तो सारी रात हम बाबा के पास बैठे रहते थे। यज्ञ कारोबार से संबंधित यदि कोई बातें होती थी तो बड़ी दादी हमें बता कर जाती थी कि बाबा से इस विषय में पूछ कर मुझे बताना। तो मैं बाबा से पूछती थी और फिर बड़ी दादी को बाबा का जवाब बताने के बाद मुझे कुछ याद नहीं रहता था, ऐसा लगता था कि बाबा ने अपना काम करा कर, मेरी बुद्धि क्लियर कर दी हो।

दादी के सामने आने वाला हर व्यक्ति संतुष्ट हो जाता था

ब्रह्मा बाबा के बारे में हम दादी से सुनते रहते थे कि बाबा ऐसे थे, ऐसे थे किंतु प्रैक्टिकली मैंने वह स्थिति दादी की देखी। दादी हमेशा बहुत गंभीर रहती थी, गंभीरतापूर्वक ही अपना हर कार्य करती थी। दादी बहुत कम बोलते थे, बहुत वाचा में आना दादी का स्वभाव नहीं था। परंतु, दादी गंभीर रहकर भी बहुत कुछ कर जाती थी। जैसे बापदादा के सामने जाते थे कुछ सोचकर परतु सामने पहुंचते ही सब कुछ भूल जाते थे और जो बाबा बोलते थे। बस वह याद रहता था, ऐसे ही दादी के सामने आने वाला हर व्यक्ति संतुष्ट हो जाता था। यदि वह कोई समस्या लेकर आता तो भी शांत हो जाता था। फिर बापदादा की पधरामणि के बाद दादी को कुछ पता नहीं रहता था। बापदादा की चलाई हुई मुरली दादी बाद में पढ़ती थी। दादी बहुत हल्का अनुभव करती थी, जैसे अपने में शक्ति भर कर आई हो।

दादी हर कार्य में हां जी कहती थी

दादी सभी कामों में बहुत एक्यूरेट थी, हर कार्य में हां जी कहती थी। आबू, पांडव भवन में बड़ी दादी और दादी का कमरा आमने-सामने ही था। कभी-कभी रात में या अमृतवेले, बड़ी दादो को कोई बात ख्याल में आती तो दादी के कमरे में आते और कहते कि तुरंत वतन में जाकर बाबा से पूछ कर आओ, नहीं तो बाबा को बुलाओ, मैं पूछूंगी। गुलज़ार दादी कहते, 'जैसा दादी आप कहो।' इस तरह निर्माण होकर, नम्र होकर हां जी का पार्ट बजाती थी। कभी हम कहते, दादी, यह आपने ही किया है, तो कहती, 'नहीं। यह बाबा ने करवाया।' उन्होंने कभी भी, किसी भी कार्य में मैपन नहीं दिखाया। हमेशा कहती, 'यह बाबा ने किया, हमारा नाम तो सिर्फ निम्मित मात्र रखा है।'

दादी हर परिस्थिति में एकरस, अचल, अडोल रहती थी

चाहे कुछ भी हो जाए दादी की स्थिति हर छोटी-बड़ी परिस्थिति में भी एकरस, अचल, अडोल रहती थी। वह कहती थी कि 'जो भी करेगा, बाबा ही करेगा, हम तो सिर्फ निमित्त मात्र हैं।' हर बात में दादी, बाबा और बड़ी दादी को आगे रखती थी। बाबा ने निमित्त बनाया है, हमको निमित्त बनकर इनका साथ देना है। बाबा का रथ हूं आदि कोई अभिमान उनमें नहीं था। दादी बिल्कुल निर्माण, निःसंकल्प, हर बात में छोटे बच्चे की तरह रहे। बाबा की प्रवेशता के बाद बाबा, ऑलमाइटी अधॉरिटी है, तो बहुत पावरफुल स्टेज में बाबा दादी को यूज करता था। दोनों अवस्थाओं में रात-दिन का फर्क था।

रथ को बाबा चला रहा है

सन् 2013 में दादी का एक छोटा ऑपरेशन हुआ था। दादी लेटे हुए थे। निर्वैर भाई जी भी साथ में थे और हम सब बैठे योग कर रहे थे। दादी उठी और कहती है, 'कैसे भी करके ले चलो मुझे।' भाई जी ने पूछा, 'दादी जी कहां ले चलो?' तो कहा, 'बहुत आत्माओं की पुकार मुझे सुनाई दे रही है। मुझे आप ले चलो शांतिवन।' भाई साहब ने कहा, 'दो ही दिन हुए हैं, ऐसे कैसे जाएंगे, नहीं जा सकते, सब मना कर रहे हैं।' तब दादी ने कहा, 'ठीक है।' मधुबन में बाबा-मिलन में आए सभी लोग तरस रहे होंगे वाबा से मिलने के लिये तो दादी तक वह पुकार पहुंच रही थी। फिर सुबह 4:00 बजे जब सभी चले गए तो दादी ने मुझे बुलाया और कहा, 'तुम कुछ नहीं कर सकती है?' मैंने कहा, 'मैं कुछ नहीं कर सकती, मैं क्या कर सकती हूं।' दादी ने कहा, 'नहीं, तुम कर सकती हो।' मैने कहा, 'अभी हमारे हाथ में कुछ नहीं है, अभी डॉक्टर्स के हाथ में है।' मैंने दादी को ऐसे जिद्द करते कभी नहीं देखा, जैसे बाबा की प्रेरणा मिल रही हो उन्हें। फिर सुबह 10:00 बजे दादी से मिलने एक भाई आया। हमें कुछ पता नहीं था कि उसके पास चार्टर प्लेन है। ऐसे ही कुछ बात करते हुए उसने कहा, मैं एक प्रोग्राम में जा रहा हूं, बस, दादी से मिलने आया था। तो दादी ने पूछा, 'कैसे जा रहे हो?' उसने कहा, 'मेरा प्लेन है, उसी से।' दादी ने हमारी तरफ देखा, हम समझ गए। फिर हमने उस भाई को बताया तो उसने कहा, 'कोई बात नहीं, आप दादी को ले जाओ, मैं अपना प्रोग्राम कैंसिल करता हूं।' डॉक्टर ने कहा कि 'भले आप दादी को ले जाओ फिर भी आपका प्रोग्राम नहीं होगा क्योंकि ज्यादा देर दादी बैठ नहीं सकते हैं।' निर्वेर भाई जी हंसने लगे, कहा, 'यह ऑलमाइटी अथॉरिटी का प्रोग्राम है, हम लोगों का नहीं है।' फिर हम दादी को शांतिवन ले आए, दो डॉक्टर्स भी साथ में आए थे। उस दिन दादो बहुत पावरफुल थी। बाबा को भी अपना कार्य कराना था।
हालत ऐसी थी कि दादी 10 मिनट भी नहीं बैठ सकते थे परंतु 4 घंटे बाबा ने मुरली चलाई। आखिर हमको बोलना पड़ा, 'बाबा, दादी की तबीयत ऐसी है। आप जाओ तो सही। तब बाबा ने कहा, 'इस रथ को बाबा चला रहा है। बाबा को पता है। बाबा इसे यहां सेवा के लिए लेकर आया है क्योंकि इन आत्माओं को इतनी आवाज बच्ची भी सहन नहीं कर पाई और बाप भी ऊपर सहन नहीं कर पाया इसलिए तो बाबा ले आया है और बच्ची की जो भी तबीयत है, बाबा संभाल रहा है। सचमुच बाबा ने अंत तक रथ को संभाला। अंत तक भी दादी से बाबा ने सेवा करवाई अपना परिचय दिलवाया और साक्षात्कार भी करवाया।
दादी का सदा ध्यान रहता था कि हमारे से कोई ऐसा काम न हो जाए जो बाबा का नाम बदनाम हो। दादी इस बात का बहुत अटेशन रखती थी।

चीफ हम नहीं, बाबा है

दादी जानकी ने शरीर छोड़ा तो सब ने मुझे कहा कि दादी की तबीयत देखकर यह समाचार सुनाना परंतु जब मैने दादी को बताया तो दादी ने कहा, 'मुझे पता है, मैं वतन में दादी से मिलकर आई, दादी बाबा के पास ही है।' हम जो भी यज्ञ की ऐसी बाते दादी को बताते तो ऐसा लगता जैसे कि हम बस रिपीट कर रहे हैं, दादी तो पहले से ही सब कुछ जानती है। फिर हमने कहा, दादी, अब आप संस्था की चीफ हो। तो दादी ने कहा कि 'चीफ हम नहीं, बाबा है।' दादी ने कभी भी कोई पद स्वीकार नहीं किया कि मैं बड़ी हु आदि। हमेशा कहती थी, 'बाबा ही बड़ा है, बाबा ही सब कुछ कर रहा है, जो बाबा सेवा देगा, हम करेंगे।' दादी ने कभी भी अमृतवेला या मुरली मिस नहीं की। दादी हर एक का क्लास कमरे में बैठकर सुनती थी, ऐसे भेद नहीं था कि आज छोटे की क्लास है या यह बड़े ने क्लास कराया।

दादी हर घडी ऐसे लगती थी जैसे बाबा है

सन् 2016 में हमने दिल्ली छोडी तो दीवाली मना कर, सब से मिलकर आए थे। फिर जब 31 दिसंबर 2017 को बापदादा ने कहा, 'समाप्ति वर्ष' तब हम दादी को मुंबई ले गए तो जैसे दादी ने अपना सब कुछ समेट लिया था। मुम्बई गामदेवी में हम पिछले तीन सालों से थे। दादी हर घड़ी ऐसे लगती थी जैसे बाबा है। कोई कार्य करती या किसी से मिलती थी तो ऐसा लगता था कि दादी थोड़े समय के लिए नीचे आई है। नहीं तो दादी के बोल, चेहरे और आखों से ऐसा लगता था कि जैसे बाबा ही देख रहा है। मैं साथ हो रहती थी इसलिए मैंने बाबा और दादी की हर चीज देखी है किंतु इन तीन सालों में ऐसे लगता नहीं था कि यह दादी है, जैसे बहुत कड़ी तपस्या कोई करता हो तो कैसे दिखाई देता है, इसी प्रकार की स्थिति दादी की थी।

दादी सबके मन के संकल्पों को जान जाती थी

एक डॉक्टर दादी को चेक करने आए। उनके मन में पद को लेकर कुछ संकल्प चल रहे थे। तो दादी ने उन्हें कहा कि 'आपके मन में कुछ दुविधा चल रही है।' उन्हें बहुत आश्चर्य लगा कि मेरे बिना कुछ कहे ही इन्हें कैसे पता चल गया। उन्होंने दादी को सारी बात बताई। फिर दादी ने कहा, 'देखो, आपका जो कर्तव्य है वह आप करते चलो, अपने कर्तव्य में कभी नीचे ऊपर नहीं करना, सफलता आपके साथ है।' एक महीने के बाद अपना अवार्ड और हार आदि लेकर वे दादी के पास आए और बताया कि उनकी पोस्ट उनको वापस मिल गई है और कहा कि 'दादी, आपके कारण ही हो पाया है। तो ऐसे दादी सबके मन के संकल्पों को भी जान आती थी।

वे अपना कार्य कर रहे हैं, मै अपना कार्य कर रही हूँ

हम सब साथ में बैठे होते और कुछ चर्चा कर रहे होते तो दादी कहती। अभी समय बहुत कम है इसलिए योग पर ध्यान दो और अपने हर कर्म पर अटेंशन दो, योग का पावर बढ़ाओ।' कोविड-19 से पहले दादी ने हमें बोल दिया था कि समय ऐसा आएगा, बाहर नहीं निकल सकेंगे इसलिए अपना योग का पावर बढ़ाओ। दादी को जैसे सब दिखाई देता था, पहले ही हमें बोल देती थी। दादी बीमार थी परंतु ऐसा लगता था जैसे दादी अलग है और उनका शरीर अलग है। शरीर को जो उपचार देना था, वह सब डॉक्टर दे रहे थे, दादी उन्हें कुछ नहीं कहती थी। दादी कहती थी, 'वे अपना कार्य कर रहे हैं, मैं अपना कार्य कर रही हूँ।' जैसे शरीर से बिल्कुल न्यारी हो करके रहती थी।

दृष्टि का प्रभाव

आखिरी एक-दो मास में दादी के बोल बिल्कुल ही कम हो गए थे। एक शब्द में दादी जवाब दे देती थी और दादी की साइलेंस और नैनों की भाषा से हम समझ जाते थे। जैसे बापदादा की पधरामणि के वक्त भी मैं सारा समय स्टेज पर होती थी। बाबा के नैनों से समझ जाती थी कि अब बाबा को क्या चाहिए। कोई बाबा के सामने आता था तो बाबा को इन्हें फूल देना है या फल देना है या कोई टोली देनी है बाबा के बिना कुछ कहे ही उनकी दृष्टि मैं समझ जाती थी। लास्ट समय में दादी की भी वही स्थिति थी ।आखों से ही दादी बता देती थी कि आप यह करो या नहीं करो, यह ठीक है वह नही ठीक है। डॉक्टर कहते थे कि दादा आंखों से बात करती है। जो भी आते थे उन्हें ऐसा ही महसुस होता था। थोड़े समय से दादी नैनों की भाषा से ही बोलती थी। कुछ अच्छा नहीं लगता था तो थोडी देर ऐसे दृष्टि देती थी और आंखें बंद कर लेती थी हम समझ जाते थे। दादी की दृष्टि ऐसी शक्तिशाली हो गई थी जो यदि कोई कुछ गलत कर रहा हो तो बैठे-बैठे ही बहुत विचलित हो जाता था कि हम ठीक नहीं कर रहे हैं। डॉक्टर भी कुछ करने जाते तो दादी की दृष्टि देखकर समझ जाते कि यह ठीक नहीं होगा और खुद संभल जाते थे। दादी की दृष्टि का इतना प्रभाव था।

दादी हर कदम बाबा से पूछ कर ही उठाती थी

कभी मैं दादी से कहती कि 'दादी, मधुबन चलो।' तो दादी कहती थी, 'मैं सोच कर बताती हूं।' फिर कभी कहती थी कि वहा अभी घमासान बहुत है। हम कहते थे, 'तो क्या हुआ?' तो कहते थी, 'अभी घमासान है, समय आएगा तब मैं बताऊंगी। शांतिवन से जाना होता था दिल्ली तो भी बाबा से पूछती थी, 'मैं जाऊ कि नहीं जाऊ?' जैसे बाबा कहते, वैसे ही करती थी। दादी अपना हर कदम बाबा से पूछ कर ही उठाती थी। ऐसे दादी ने अपनी कर्मातीत अवस्था प्राप्त की।

लेटे हुए भी दादी सूर्य समान किरणे चारों ओर फैलाती थी

दादी हॉस्पिटल में थी तो हॉस्पिटल वाले भी आकर कहते थे कि जैसे कोई बहुत बड़ी शक्ति है। डॉक्टर्स आते थे 15, 20 मिनट के लिए दादी को देखने और घंटो-घंटों बैठ जाते थे, कहते थे, 'यहां आने के बाद हमारा मन जैसे शांत हो जाता है और अंदर में शक्ति भर जाती है।' दादी के पास वाले कमरे में एक पेशेट था जिसका ऑपरेशन हुआ था। उसके रिश्तेदार खुद आकर कहते थे, 'ऐसा लगता है जैसे इस कमरे से हमारे पास बहुत शक्ति आ रही है, हमे इतनी ताकत महसूस होती है।' ऐसा लगता था जैसे लेटे हुए भी दादी सूर्य समान अपनी किरणें चारों ओर फैला रही है, शुभकामना-शुभभावना कहो वा मनसा सेवा कहो।

बाबा का यज्ञ है, बाबा ही चलाएगा

पहले भी बीच-बीच में दादी की तबीयत खराब होती थी तो एक बार दादी ने बापदादा से पूछा, बाबा ने कहा कि आगे चलकर बच्ची के चित्र और चरित्र सेवा करेंगे। यह बात दादी को इतनी पक्की हो गई जो हम अव्यक्त मुरली चलने पर दादी को दिखाते थे तो दादी कहती थी, 'हम थोड़े ही है, यह तो बाबा अपना कार्य करा रहा है, बाबा बैठा है।' मैं भी कभी कहती थी कि 'दादी, आप नहीं जाएंगे तो बाबा के कोई बच्चे नहीं आएंगे, आप चलेंगे तो बाबा आएगा।' तो दादी कहती थी, 'मधुबन, मधुबन है, बाबा, बाबा है, बाबा को जिन बच्चों को साक्षात्कार कराना होगा, बाबा, आपे ही कराएगा बाबा का यज्ञ है। बाबा ही चलाएगा। दादी को कभी ये संकल्प नहीं उठा कि यज्ञ कैसे चलेगा? बिलकूल निश्चिंत और निश्चित की स्थिति थी।
दादी से कभी कोई पूछता कि 'दादी आपका कोई संकल्प नहीं चलता है?' तो दादी कहती थी कि 'संकल्प क्या चलेगा, मेरा संसार बाबा है और मेरे संस्कार में भी बाबा है।' दादी ने हमें बहुत पक्का कराया कि 'बाबा तुम्हारे साथ है और बाबा हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।' अभी भी मुझे यही है कि बाबा और दादी दोनों ही हमारे साथ हैं। आगे भी साथ देकर चलाएंगे। दादी को बस यही शब्द सदा याद रहते थे, 'परिवर्तन और बाबा' सबको यही सुनाती थी। आखिरी तीन सालों में दादी ने अपने आप को बहुत समेट लिया था। दादी ने जो कुछ किया हमारे लिए किया, आखिरी सालों में भो हमें बहुत कुछ सिखाया।

डॉक्टर्स में भी परिवर्तन आया

जिन डॉक्टर्स का अपॉइंटमेंट लेने में दो-तीन महीने लगते हैं, वे सिर्फ एक फोन करने पर दादी जी के लिए आ जाते थे। डॉक्टर्स में भी परिवर्तन आया, आध्यात्मिक ज्ञान क्या होता है, दादी ने उन्हें सिखाया। उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि हम किसी पेशेंट को देखने आए हैं बल्कि कोई विशेष महान हस्ती की ट्रीटमेंट करने आए हैं। दादी अपनी मर्जी की मालिक थी। वह चाहती तो खुद मुक्त हो सकती थी परंतु वह चाहती थी सेवा हो। कभी-कभी दादी की कंडीशन ऐसी होती कि डॉक्टर सोचने लग जाते थे कि हम क्या -करें? फिर कभी कोई ट्रीटमेंट देकर जाते और देखते कि दादी दूसरे दिन बिल्कुल ठीक है, तो कहते कि 'यह हो नहीं सकता कि इतनी जल्दी ठीक हो जाए।'

दादी चारों धर्मों की सेवा कर के गई

दादी को कोई कर्मभोग नहीं था, नहीं तो एक सूई लगने पर भी कितना दर्द होता है, दादी ने कभी चूँ तक नहीं किया। बाबा ही सब कुछ कराता है। दादी चारों धर्मो की सेवा कर के गई। सब धर्म वालों ने दादी की सेवा की। सभी डॉक्टर्स की सेवाएं की। आज भी सभी डॉक्टर्स बाबा को मानते हैं। कई तो अभी से फोन कर रहे हैं कि हमको भी मेडिटेशन सीखना है और अपने जीवन में परिवर्तन लाना है, ज्ञान में हमें चलना है।

दादी हृदयमोहिनी ने सेवाकेन्द्र को शीतलता का कुंड बनाकर रखा

ब्रह्माकुमारी सुदेश बहन, जर्मनी
मुझे 1957, 58 के अपने आध्यात्मिक जीवन के आदिकाल को स्मृतियां इतनी स्पष्ट सामने आ रही है, जैसे कि वह आज का, अभी-अभी का ही नजारा हो। उस दिन मैं कॉलेज से करोल बाग सेवाकेन्द्र में पहली बार आई थी, तो पहली दफा गुलज़ार दादी जी को देखा, जो भोग लगाने के लिए संदली पर बैठे थे। दादी जी भोग लगाने वतन में गई, तुरंत वापस आई और कहा कि 'जो बाबा के नए बच्चे बैठे हैं, वे अपना जीवन ईश्वरीय सेवा में कब समर्पण करेंगे, लिख करके दो।' औरों ने क्या लिखा, वह तो मुझे पता नहीं परंतु मैंने लिखा कि 'मैं अपना जीवन अगले वर्ष समर्पित करूंगी।' क्योंकि उस समय में बीए फाइनल कर रही थी और संकल्प था कि यह वर्ष पूरा होने पर एक ट्रेनिंग की जाए। दादी बाबा के पास हम सबके पत्र लेकर गई। दीपावली का समय था, बाबा ने उन्हें दृश्य दिखाया कि बहुत से दीपक जग रहे हैं। जिन दीपकों में कम रोशनी है तो बाबा उनमें रोशनी भर कर के आगे रख रहे हैं। दादी जी ने बाबा का वह संदेश लाया 'लास्ट सो फास्ट जाने का' और अपने जीवन में ज्ञानघृत डालकर के ज्योत को प्रत्यक्ष करने का।' वह संदेश मेरे रूहानी जीवन का बीज बन गया। दादी जी ट्रांस मैसेंजर नहीं, ट्रांसमीटर थी, ट्रांसमीटर का काम है जनरेटर की एनर्जी को ट्रांसमिट करना।

जीवन का भोग लगा दादी जी द्वारा

दादी राजोरी गार्डन में भी भोग लगाने आते थे। मैं कॉलेज से आकर उनके एकदम सामने नीचे बैठती थी। गीत बजते थे, चल उड़ जा रे पंछी के अब यह देश हुआ बेगाना (6 मिनट का) दूसरा, धरती को आकाश पुकारे, आजा आजा प्रेम द्वारे, आना ही होगा (9 मिनट का)। उस वक्त इतना सुंदर अनुभव होता था, ऐसा लगता था कि जैसे दादी जी के नयन उड़न खटोला है और उन में बैठ कर के हम बाबा के पास जा रहे हैं। दादी जी की दृष्टि की दिव्यता, शुद्धि, प्रेम और परमात्मा की प्रवेशता के बाद की दृष्टि और प्रवेशता के पहले की दृष्टि खींचती थी। दादी जी को झटका लगता था, वह ध्यान में चली जाती थी, हमको झटका लगता था, हम वहीं रह जाते थे। हर बार हमे यही रहता था कि हमें भी जाना है। दादी भोग लगाने जाते थे तो हमे लगता कि हमें भी इस जीवन का भोग लगाना है समर्पण करना है और जीवन को समर्पण करने की प्रेरणा दादी जी से ही मिली।

भूलों को भूल जाती थी दादी

मेरा सौभाग्य रहा कि मैं समर्पित हुई तो मुझे दिल्ली, कमला नगर सेवाकेन्द्र में दादी जी, जगदीश भाई जी के साथ रहने का मौका मिला। दादी जी का चेहरा, व्यवहार, चिंतन इतना शुद्ध था जैसे कि स्वाभाविक रीति से स्वचितन में है। बाबा कहते हैं कि सेंटर का वातावरण शीतलता का कुंड बना दो, जो भी उसमें आए तो ऐसा प्रभाव लेकर जाए, तो दादी के साथ रहते हुए भी हमें ऐसा हो अनुभव होता था। दादी जी की रूहानियत की सुगंध में ऐसा लगता था कि हम खुशबूदार बगीचे में है। हम नए-नए थे तो जरूर कुछ भूले भी होती थी परन्तु दादी ने कभी यह नहीं महसूस कराया कि क्यों हुआ ऐसा, यह क्या किया। क्यों, क्या दादी जी के शब्दों में कभी नहीं देखा। दादी जी की शुद्ध दृष्टि और हृदय में जो भोलेपन की भावना थी जिसमें व स्वभाविक रीति से भूल को भूल जाती थी और हमको भी भूल भुला देती थी। कभी हमें आत्मग्लानि महसूस नहीं करायी, यह कमाल थी दादी जी के हृदय की शुद्धता और पवित्रता की। दादी जी ने सेंटर का वातावरण स्नेह का, शुभकामना शुभभावना का बनाकर रखा।

हृदय के शब्द हृदय को छूते थे

जगदीश भाई जी सेवा का उमंग-उत्साह दिलाते थे और सेवा में हमें सदा बिजी रखते थे इसलिए वहां एक-एक सप्ताह का कार्यक्रम चलता रहता था। कभी पवित्रता का सप्ताह, कभी शांति का सप्ताह इस तरह उसमें दादी जी प्रवचन करते थे तो वह प्रवचन भी प्रवचन नहीं लगता था लेकिन दादी के हृदय के शब्द हृदय को छूते थे। उस समय सेवा अर्थ जहां भी जाते थे तो इकोनोमी का पाठ पक्का था। बिल्कुल साधारण सिंपल जीवन था। हम एक जगह प्रदर्शनी करने गए। जिस हाल में सारा दिन प्रदर्शनी की उसी हॉल में दरी पर अपनी-अपनी चादर बिछाकर पटरानी बन कर सो गये। ऐसे थी दादी के साथ स्टूडेंट् लाइफ, परफेक्शन की लाइफ। दादी के साथ रहते 62 साल कैसे बीत गए। हर दिन, हर समय का अपना विशेष अनुभव रहा। दादी की पर्सनालिटी भी ऐसी थी जैसे मैग्नेट, मैग्नेट को आकर्षित करता है। जैसे साकार बाबा के आकर्षण में निराकार बाबा खिंच कर आ गए, ऐसे दादी के आकर्षण में बापदादा खिंचकर आ गए।

जिम्मेवारी होते भी न्यारापन, हल्कापन

दादी की अव्यक्त स्थिति पहले से ही थी। दादी में इतना भोलापन था, जो दादियों के प्रति, दीदी मनमोहिनी के प्रति, बड़ी बहनों के प्रति सदैव अपने को एक छोटी बच्ची समझा। नम्रता, दिव्यता और सर्व गुणों की मूर्ति थी। चेहरे पर कोई चिंता कभी दिखाई नहीं दी। जिम्मेवारी होते भी इतना न्यारापन, हल्कापन था। कोई और ने भी भूल कर दी होती तो उसका भी दादी पर प्रभाव नही रहता था। ऐसे क्षमा की मूर्ति स्नेह की मूर्ति दुसरी आत्माओ में भी क्षमा की भावना उत्पन कर देती थी।

सुंगध वाला बर्तन सुगन्धित हो जाता है

दादी के साथ विदेश में भी भिन्न-भिन्न स्थानों पर जाना हुआ। उस वक्त भी दादी सरलता और भोलेपन से चलती थी। यदि मै कोई टॉपिक ना भी दूं। तो भी दादी अपने जीवन के जो अनुभव सुनाती वे भी आकर्षित करते थे। एक बार हम स्कॉटलैंड गए थे। उस वक्त दादी ने इतनी सरल रीति से यह समझाया कि कैसे विश्व का परिवर्तन कल्याणकारी है, परमात्मा का प्लान क्या है, नई सृष्टि की स्थापना कैसे होनी है आदि। ऐसे ही पोलैंड में कम्युनिस्ट का प्रभाव था परंतु दादी जी के स्नेह, पवित्र वृत्ति और वाइब्रेशन, दृष्टि और भावना के कारण उन लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। दादी जी की अशरोरी स्थिति, देह से न्यारा होकर के बाबा के पास जाना, साइलेंस की शक्ति, फिर बाबा का उन में आना, दादी की दृष्टि से दृष्टि देना, तो जिस बर्तन में सुगंध रखी होती है वह बर्तन भी सुगंधित हो जाता है। दादी जी परम सुगंध से सुगंध खींचती थी।

अव्यक्त बाबा के साथ अव्यक्त दादी

ज्ञान स्वरूप आत्मा, गुणमूर्त कैसे बनती है, गुणमूर्त आत्मा शिवशक्ति कैसे बन जाती है, शिवशक्ति आत्मा, परमात्मा के प्यार का स्वरूप बनकर के देवात्मा कैसे बन जाती है, यह दादी के जीवन का हमारे सामने प्रेक्टिकल उदाहरण रहा। दादी जी के अव्यक्त होने के दिन बहुत ही स्पष्ट अनुभव हुआ। उस समय हम जर्मनी में थे, वहा रात भर योगभट्टी रखी थी। संदेश मिलते ही ऐसा अनुभव हुआ जैसे बाबा कह रहा हो, बच्ची, तुम समझती हो कि दादी ने अभी शरीर छोड़ा है, नहीं, यह तो पहले से ही मेरे साथ अव्यक्त रूप में है। ऐसे अव्यक्तमूर्त बाबा के साथ दादी साकार में होते भी अव्यक्त रूप में रहे और अव्यक्त के साथ, अव्यक्त होकर के अव्यक्त सुख-शांति-आनंद देकर के गए।

गुलज़ार दादी नम्बरवन संदेशी थी

बह्माकुमारी चक्रधारी बहन, शक्ति नगर, दिल्ली
जब हम ईश्वरीय ज्ञान में आए तो यह यज्ञ रूपी गुलशन आदिरत्नों से खिला हुआ था। उनकी दिव्यता, उनकी रूहानियत बहुत सुंदर रीति से इस उपवन को सुशोभित करती थी। अब फिर एक-एक करके कई पंछी अपनी संपन्नता की स्थिति को प्राप्त कर, हर्षित होकर अगले पार्ट में जा रहे हैं। उनका जाना हम सबको संकेत देता है कि 'तैयार रहो, अवस्था को मजबूत बना लो।' धीरे-धीरे इस उपवन में कई नए-नए पुष्प खिलेंगे और पुराने पुष्पों को बाबा कुछ अन्य कार्यों में प्रयोग करेगा, वह दृश्य हम सबको दिखने में आ रहा है। हम सबमें सबसे सुंदर वह पुष्प, जो अनेकों को प्यारे बाबा से मिलन बनाने का सौभाग्य प्राप्त कराता था, हम सबसे साकार रूप से ओझल हो वतनवासी बन गया।

दादी जी कोर्स के दौरान अच्छी से अच्छी बातें सुनाया करती थी

विश्व के प्रथम सेवाकेंद्र कमला नगर, दिल्ली में मेरी प्रारंभिक ईश्वरीय सेवा आरंभ हुई। जब मैं वहां आई तब गुलज़ार दादी जी, जगदीश भ्राता जी, एक भंडारे की माता और लिटरेचर के दो भाई। वहीं रहा करते थे। त्रिमूर्ति मैगज़ीन निकलती थी और जगदीश भाई जी कोई ना कोई कार्य में बहनों को व्यस्त रखते थे ताकि ज्ञान में इनकी रुचि बनी रहे। तो मेरा जाना वहाँ होता था परंतु मै क्लास वहाँ नहीं करती थी। ज्ञान का कोर्स करने के लिए मुझे कमला नगर सेंटर पर जाने का सुझाव दिया गया था। उस समय सुदेश बहन, जो वर्तमान समय जर्मनी में हैं, गुलज़ार दादी के साथ रहती थी। अभी दो-तीन दिन ही कोर्स के हुए होंगे कि हमारी आदरणीया मम्मा दिल्ली में आई और उनसे मिलन हुआ। मम्मा ने मुझे चक्रधारी कहकर प्रथम बार बुलाया। नाम बदलते ही मेरा दिव्य जन्म सेवाओं का शुरू हुआ। गुलज़ार दादी जी कोर्स के दौरान रोज पूछती थी कि आज क्या सुना और कुछ ना कुछ अच्छी से अच्छी बातें सुनाया करती थी।

दादी ने पूछा, क्या आप मेरे साथ रहेंगी?

एक बार गुलज़ार दादी, बड़े प्यार से अपनी बाँह मेरे गले में डालकर, हॉल से होते हए बालकनी क्रॉस करके अपने कमरे में लेकर गई और कहा कि मैं अकेली हूं (उनके पास सुदेश बहन के बाद एक राज बहन थी। वह दसरे सेवाकेंद्र पर चली गई थी) तो क्या आप मेरे साथ रहेंगी? मैने इसे सुअवसर समझा, घर के बंधन को नहीं देखा। मैने कहां में अवश्य रहूंगी। उन्होंने पूछा, कब आ जाओगी? मैंने कहा, कल ही आ जाऊंगी। दूसरे दिन ही मने बैग तैयार किया और दोपहर लगभग 2:30 बजे मैं दादी के कमरे में पहुंच गई। दादी विश्राम कर रहे थे। मैंने पूछा, मुझे क्या करना दादी ने कहा, मेरी चारपाई के नीचे एक चटाई है, वह निकालो और आप भी विश्राम कर लो। मुझे वह चटाई भी ऐसी लगी कि कितना सुंदर गलीचा मिला है जिस पर मैं सोने जा रही हूं।

यही सर्वश्रेष्ठ जीवन है

मैं थोड़े से कपड़े लेकर गई थी। वहां एक दीवार पर सीमेंटेड चार खाने बने हुए थे। दादी ने कहा, एक खाने में मेरे कपड़े हैं, एक में जगदीश भ्राताजी के कपड़े हैं, एक में आप अपने कपड़े रख लो। एक में भंडारे वाली के कपड़े हैं। यही हमारी अलमारी थी, उसके आगे कोई दरवाजा या पर्दा नहीं था। ऐसे ही उसमें कपड़े रखे हुए थे। उसी दिन दादी ने कहा कि अगर आपको जमीन पर नीद ना आए तो खटिया मै आपको दे सकती हूं। मैंने कहा, नहीं दादी, मै जमीन पर सो सकती हूं। दादी ने कहा कि जैसे बाकी सब कपड़ा में पानी लगाते है और तह करके अच्छी तरह मेरी खटिया की दरों के ऊपर रख देते हैं, उसके ऊपर चादर बिछ जाती है और फिर मै रात को सोती हूं तो सब कपड़े प्रेस हो जाते हैं और प्रात वहीं कपडे सबको पहनने होते है। इसलिए आप भी अपने कपडे ठीक में तह करके इसके नीचे रख देना। मुझे कभी संकल्पमात्र में भी लौकिक जीवन की, इस अलौकिक जीवन से तुलना नहीं आई। ऐसा लगता था कि यही सर्वश्रेष्ठ जीवन है, इससे बढ़कर जीवन क्या हो सकता है। यह भावना हममें इसलिए जगी क्योकि हमारे बड़ों के जीवन में जो त्याग था, जो तप था, उस ने हमारे जीवन को प्रेरित किया था। उस समय दादी जी ने यही मुझे कहा, आप जो भी कर सकते हो। वह आप कर लो। मुझे नहीं पता था, घर में कभी नहीं सीखा था कि क्या करना है, क्या नहीं करना है लेकिन दादी ने कभी मुझे शब्दों से नहीं कहा कि यह करना है या नहीं करना है केवल मात्र उन्हें कर्म करते हुए देखा और फॉलो करना शुरू कर दिया कि छोड़ दीजिए यह काम, मै कर लूंगी। कभी उन्होंने शब्दों से नहीं मुझे सिखाया लेकिन कर्म करके सिखाया। ऐसी महान विभूतियां जिन्होंने जो कुछ बाबा से सीखा, अपने जीवन में संजोया और जो छोटी बहने उनके संबंध-संपर्क में आई उनको बहुत कुछ सिखा दिया।।

ऑलमाइटी बाबा गुलज़ार

दादी के द्वारा बहुत सुंदर रोल अदा करते थे
आज कई पूछते हैं कि पहले बाबा के होते दीवाली या इस तरह के पर्व कैसे मनाए जाते थे। पहले की दीवाली, एक अलौकिक दीवाली होती थी। प्रात 9:00 बजे तक सब घर से फारिंग होकर सेवाकेंद्र पर आ जाते थे कि आज दीवाली का दिन है और गुलजार दादी नंवरवन संदेशो थी। साकार तन में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण का आना, चलना, उनका उठना-बैठना खाना-पीना ये सब दश्य ऑलमाइटी बाबा अपने रथ गुलज़ार दादी के द्वारा हम लोगों को दिखाते थे और हमने उस समय यह अनुभव किया कि सचमुच त्यौहार मनाना किसको कहते हैं। सारी रात बीत जाती थी, पता ही नहीं चलता था कि सवेरा कब हो गया। इस प्रकार एक दिव्य अलौकिक बहुत सुंदर ईश्वरीय पालना प्यारे पिता ने इस साकार रथ द्वारा हम सबको दी। जन्माष्टमी के दिन भी बहुत सुंदर दृश्य होता था, छठ भी मनाई जाती थी। जो छोटे-छोटे सेंटर खुलते थे तो सभी को पता रहता था कि कमला नगर सेंटर पर छठी मनाई जाएगी और छठी के दिन किशोर आएगा और कैसे सबसे आके खेलेगा। स्वयं ऑलमाइटी बाबा गुलज़ार दादी के द्वारा बहुत सुंदर रोल अदा करते थे। नई दुनिया कैसी होगी, वहां के राजकुमार-राजकुमारी कैसे बोलते होंगे, वहां का आपसी प्यार और व्यवहार किस प्रकार का होगा, ये सब दृश्य बाबा ने दिखाए। गुलज़ार दादी बहुत सिंपल थे, शांत रहने वाले थे। दादी ने कभी किसी के मुंह में गिट्टी नहीं खिलाई, ना किसी को भाकी पहनी। गुलज़ार दादी गंभीर आत्मा थी, उन्होंने जो ज्ञान की पालना दी, जो ज्ञान की गहराई सब को सुनाई उससे सब लोग बहुत आकर्षित होते थे। दादी जी को हमने कभी एक सेकेंड के लिए भी खाली बैठे हुए नहीं देखा। जैसे बाबा कहते हैं कि चक्तियां लगाओ लेकिन फटा कपड़ा नहीं पहनो। दादी गुलज़ार को फटा हुआ कपड़ा सिलाई करते भी देखा और उनसे ऐसा करना सीखा भी। उस समय कॉमर्स मिनिस्टर, मिस्टर थॉमस थे। उन्होंने फोन किया कि मुझे आपके कमला नगर सेंटर पर आना है। हमने सोचा, फ्रॉड होगा, ऐसा मिनिस्टर जिससे हम अपॉइंटमेंट लेने जाते हैं और देते नहीं और ये फोन करके एड्रेस मांग रहे हैं। हमने एड्रेस बता तो दिया परंतु मन में शक रखा। वे उसी शाम तीसरी मंजिल पर सेंटर पर पहुंच गए और मैने देखा, वे गुलज़ार दादी जी के बार-बार दर्शन कर रहे थे। ऐसा ही लग रहा था कि जैसे भक्ति में कहा जाता है कि यदि आपको कोई साक्षात्कार हो जाए तो उसका वर्णन नहीं करना अन्यथा पुनः वह साक्षात्कार नहीं होगा। ऐसा प्रतीत होता था कि उनको दादी जी से अवश्य कोई साक्षात्कार जैसी प्रेरणा मिली जो वह आत्मा स्वयं हो बिना अपॉइंटमेंट के प्यारे बाबा के घर में आई और बाबा के बच्चों से आकर के मिली

दादी हृदयमोहिनी हर बात को सकारात्मक रूप से लेते थे

ब्रह्माकुमार गोपाल भाई, शान्तिवन
मैं सन् 1966 में ब्रह्माबाबा के द्वारा ईश्वरीय ज्ञान में आया, तब मेरी उम्र 20 साल की थी। मैं हर 15 दिन में बाबा से मिलने मधुबन आ जाता था। बापदादा को पहली पधारमणि 21 जनवरी, 1969 को जब गुलज़ार दादी के तन में हुई तब भी मै वही था। उस वक्त मैं बहुत दुख में था क्योंकि ब्रह्माबाबा से बहुत प्यार था। फिर जब मैं दिल्ली, कमला नगर सेवाकेन्द्र में गया तो गुलज़ार दादी ने नॉनस्टॉप 10 मिनट तक मुझे दृष्टि दी और मैं बैठा रहा। उस दृष्टि में इतना स्नेह, इतनी शक्ति थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं ब्रह्माबाबा से मिल रहा है और तभी निश्चय किया कि मुझे दादी के साथ ही रहना है। जब मैं ज्ञान में नहीं था परन्तु बाबा की मझे दृष्टि मिली थी तो में उनका हो गया था। ऐसे ही दादी की इस दृष्टि से मेरा दादी के साथ एक कनेक्शन जुड़ गया। मैंने दादी को स्टेशन से लाने और ले जाने की सेवा संभाल ली।

किसी सुविधा की चाह नहीं

जब कभी दादी प्रकाशमणि जी का कॉल आता था कि 10, 15 भाई-बहनें मधुबन में आ गए हैं, बाबा से मिलना है तो आप आ जाओ। तो मैं कहता था कि मैं जाऊंगा दादी को स्टेशन छोड़ने, मुझे अच्छा लगता था। उस वक्त किसी के पास कार नहीं थी, मैं ऑटो रिक्शा में गुलज़ार दादी को स्टेशन ले जाता था। दादी बाबा का रथ थी परंतु दिल्ली से आबू अकेले, बिना रिजर्वेशन के लेडीज कंपार्टमेंट में जाती थी, कोई भाई या बहन साथ में नहीं होते थे। मैंने देखा तो कहा, 'दादी, यह गाड़ी साफ-सुथरी नहीं है, दूसरी गाड़ी में मैं अगली बार आपका रिजर्वेशन फर्स्ट या सेकंड क्लास में करा दूंगा।' दादी ने कहा, 'नहीं, नहीं, यहां गरीब लोग होते हैं, जो हमारी बातें सुनते हैं, उस गाड़ी में तो लोग सिगरेट आदि पीते हैं और वे ईश्वरीय ज्ञान को मानते भी नहीं हैं। मैंने कहा, 'मैं साथ में चलूंगा और उन्हें प्यार से बोल कर उनकी सिगरेट बंद करवा दूंगा।' तो बोला, 'नहीं, मुझे यही ट्रेन अच्छी लगती है।' जैसे दादी को कोई चाह नहीं थी किसी सुविधा की, बिल्कुल खुशनसीब खुशनुमा चेहरा।दादी से ऐसे वाइब्रेशंस आते थे जैसे कोई बर्फ का पहाड हो। मै बहत फास्ट स्वभाव का व्यक्ति था परन्तु दादी जी के वाइब्रेशनसे मेरे सारे संकल्प शांत हो जाते थे। मैं दादी को कभी कोई बात सुनाता कि दादी, इसमें यह अवगुण है, तो कहती थी कि 'हां, इससे यह गुण है।' अवगुण शब्द दादी के मुख से नहीं निकलता था। किसी की बुराई उनको देखनी भी नहीं आती थी और उनसे बहुत अनोखा अनुभव होता था।
बाबा के संदेश से सफलता
एक बार इंदिरा गांधी स्टेडियम में बहुत बड़ा प्रोग्राम रखा था जिसमें राष्ट्रपति जी को आना था और उन्होंने लिखित में भी दे दिया था कि वे आएंगे। यह खबर सब तरफ पहुंच चुकी थी। परंतु, प्रोग्राम के चार-पांच दिन पहले ही राष्ट्रपति भवन से चिट्ठी आई कि कुछ सुरक्षा नियमों की वजह से राष्ट्रपति प्रोग्राम में नहीं आ पाएंगे। उस वक्त पांडव भवन के गार्डन में एक मीटिंग रखी गई, जिसमें दादी प्रकाशमणि जी, जगदीश भाई जी, बृजमोहन भाई जी और हम सब बैठे थे। गुलज़ार दादी को बुलाया गया। प्रकाशमणि दादी ने कहा, 'गुल, तुमने सुना, राष्ट्रपति ने प्रोग्राम में आने से मना कर दिया है।' गुलज़ार दादी ने कुछ नहीं कहा, चुप बैठे रहे। दादी ने फिर कहा, 'तुमने सुना, मैने क्या कहा, राष्ट्रपति ने मना कर दिया है।' तब दादो ने कहा, 'हां, मैंने सुना' जैसे दादी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। प्रकाशमणि दादी ने पूछा कि 'फिर क्या करना है?' तो गुलज़ार दादी ने कहा कि राष्ट्रपति के भाग्य में नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं। हम सब तो चिंता में थे कि राष्ट्रपति नहीं आ रहे हैं परंतु दादी का जवाब सुनकर हम सब खुश हो गए, दादी की स्थिति ऐसी होती थी। फिर बड़ी दादी ने गुलज़ार दादी को कहा कि 'बाबा से पूछो कि क्या करना चाहिए', अभी भी चार-पांच दिन है। दादी ने बाबा से संदेश लाया कि अखंड योग करो फिर सिक्योरिटी इंचार्ज से मिलो। तो दादी ने पूछा, 'बाबा ने क्या बताया, राष्ट्रपति आएंगे या नहीं?" तो उन्होंने कहा कि 'वह बाबा ने नहीं बताया।' फिर हमने पांडव भवन में रात 2:00 बजे तक अखंड योगभट्ठी रखी और सिक्योरिटी इंचार्ज से भी मिले। जिस वजह से सिक्योरिटी वालों ने मना किया था वह वजह हल हो गई थी। सिक्योरिटी वालों ने स्वीकृति दे दी और राष्ट्रपति प्रोग्राम में आ गए। इस तरह अखंड योग से और बाबा के संदेश से कई कार्य सफल हो जाते थे।

हर परिस्थिति में 'नो प्रॉब्लम'

दादी के साथ यात्रा करने में भी बड़ा आनंद आता था। एक बार हम लंदन जाने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे, चेक इन आदि हुआ, 15 मिनट में बोर्डिग करनी थी, हम सब बैठे थे तो अनाउंसमेंट हुई कि 'फ्लाइट एक घंटा लेट है।' मैने पूछा, 'दादी, आपने सुना तो दादी ने कहा, 'हां सुना।' उन दिनों लेटनाइट अंतर्राष्ट्रीय फ्लाइट चलती थी लेकिन देखा कि दादी को जरा-सा भी कोई संकल्प नहीं चला। मैंने कहा, 'दादी, मैं जयंती बहन को फोन कर देता हूं कि फ्लाइट एक घंटा देरी से है, तो कहा, 'वह तो पूछ कर ही एयरपोर्ट पर आएंगे ना, फोन करने की कोई जरूरत नहीं है।' परंतु में अपने आप को रोक नहीं सका और फोन कर दिया। आधे घंटे बाद फिर अनाउंसमेंट हुई कि फ्लाइट और एक घंटा लेट है। तो मैंने दादी से कहा, 'दादी, फ्लाइट अब एक घंटा और लेट हो गई है' तो दादी ने कहा, 'हां सुना।' बस, और कोई प्रतिकिया नहीं, कोई और बात नहीं की कि दो घंटे कैसे बैठे रहेंगे। मैंने कहा, 'मैं पूछ कर आऊँ, यहां आपके लिए थोड़ी लेटने की कोई सीट मिल जाए' तो कहा, 'नहीं, नहीं, यह बहुत अच्छी आरामदायक सीट है।' यानि कि बिल्कुल नो प्रॉब्लम। हमको प्रॉब्लम लगती थी पर दादी को कोई प्रॉब्लम नहीं और उन्हें देख कर के हम भी बिल्कुल शांत, निश्चिंत हो जाते थे कि कोई प्रॉब्लम नहीं है।
एक बार हमे फ्लाइट चेंज करनी थी। इसके लिए आधा घंटा लाइन में खड़ा होना था। दादी को एक जगह बिठाकर मै टिकट के लिए एक ऑफिस में गया। थोड़ी देर में मैंने देखा कि एक ऑफिसर दादी के पास कुछ बातें कर रहा है, तो मैं दादी के पास पहुंचा। दादी उससे बोली, 'नो इंग्लिश'। वह ऑफिसर हम सबको एक कमरे में बैठा कर खुद गया और टिकट पर स्टैप आदि लगाकर, नेक्स्ट फ्लाइट तक हम सभी को छोड़ने आया। कई बार हमने देखा कि दादी की फ्लाइट भी अपग्रेड हो जाती थी।

प्रकृति दासी

प्रकृति भी दादी की दासी थी। एक बार ऑस्ट्रेलिया में सिडनी रिट्रीट सेंटर का उद्घाटन करने दादी को बुलाया गया था। वहां एक महीने से लगातार बहुत बारिश हो रही थी जिस वजह से सब तरफ पानी-पानी हो गया था। मौसम विभाग की चेतावनी भी यही थी कि बारिश रुकने वाली नहीं है लेकिन अचानक चार दिन पहले ही बारिश रुक गई और धूप निकल गई जिस वजह से बहुत अच्छा वातावरण हो गया और बहुत अच्छा उ‌द्घाटन हुआ। मेलबॉर्न से सिडनी एक घंटे की पलाइट है। वह बहुत ही रफ फ्लाइट थी क्योंकि बादल बहुत घने थे और पायलट को तेजी से उन्हें क्रॉस करना था जिस वजह से फ्लाइट को झटके लग रहे थे और हम उछल रहे थे अपनी सीट पर। मैंने दादी से पूछा, 'आपको कोई डर तो नहीं लग रहा?' तो कहा, 'नहीं, नहीं, यह तो हम झूले में झूल रहे हैं ना, खाना हमारा हजम हो रहा है।' वह 3:00 बजे की फ्लाइट थी। दादी में निर्भयता का भी गुण था और हर चीज को पॉजिटिव में लेते थे दादी।
कई बार हमने महसूस किया कि ऑलमाइटी बाबा भी दादी के लिए पहले से ही इंतजाम करके रखता था। सन् 1996 में जब मानेसर बना तो मैने अखबार में पढ़ा था कि प्रदूषण की वजह से तबीयत खराब होती है तो मुझे संकल्प चला कि दादी को दिल्ली के इस प्रदूषण से कहीं दूर रखना चाहिए। उसी दौरान एक जमीन मुफ्त में मिली तो सोचा, यहां दादी के लिए एक फार्महाउस बनाएँ लेकिन दादी ने कहा कि 'मैं तो नहीं रहूंगी।' लेकिन बाबा को पता था कि 6-7 महीने बाद दादी की तबीयत खराब होने वाली है और बाबा मुझ द्वारा 24 घंटे सेवा लेकर के वह फार्महाउस जल्दी से जल्दी तैयार करवा रहा था जैसे कि इसकी कोई बहुत बड़ी ओपनिंग होने वाली हो। फिर जब छह-सात महीने बाद, सब तैयार हो गया तो दादी की तबीयत खराब हई और फिर दादी वहां तीन महीने रहे और दादी की तबीयत ठीक हो गई।

गर्मी का मेवा

मानेसर में बीच-बीच में बिजली जाती रहती थी। एक बार 44 डिग्री तापमान था और बिजली चली गईं। हमारे सोलर और जनरेटर दोनों फेल हो गए थे। दादी के पास गया तो दादी को बहने हवा कर रही थी। हमने कहा, अब क्या करें? दादी ने कहा, 'कोई बात नहीं। हमने कहा, 'दादी, आप तो पसीना-पसीना हो रहे है। तो कहा, 'यह तो गर्मी का मेवा है ना, आप सब सो जाओ।' इसके बाद दादी को एक मिनट के अंदर नींद आ गई। ऐसी बिल्कुल निःसंकल्प अवस्था में आराम से सो गई।

दादी जी से सीखा, बहुत कम सोचना और बहुत कम बोलना

ब्रह्माकुमारी भारती बहन, राजकोट (गुजरात)
जब मैं राजकोट सेवाकेंद्र पर सर्वप्रथम आई थी तब मीठे मीठे बापदादा ने दादी गुलज़ार जी द्वारा संदेश भेजा कि 'बच्ची, भले सेवार्थ जा रही हो परतु इस स्थान पर विघ्न बहुत आएंगे, उन विघ्नों को पार करने के लिए तुम्हें शिवशक्ति बनाना पड़ेगा।' मैं यह अनुभव करती हूं कि समय प्रति समय मीठी गुलज़ार दादी जी द्वारा बाबा के संदेशों के माध्यम से या सामने मिलने पर जो-जो वरदान उच्चारण किए गए, वे आज दिन तक सत्य सिद्ध हो रहे हैं।
सेवा के लिए जब में आई तो शुरू-शुरू में एक वर्ग विशेष ने बहुत विघ्न डाले। वे रोड पर भी लिख देते थे, 'ब्रह्माकमारियो से बचकर रहो।' तब मुझे बाबा के महावाक्य याद आते रहते थे उस समय तो आयु भी इतनी बड़ी नहीं थी परंतु बाबा के वरदान ने ही मुझे शिवशक्ति बनाया। आज 50 साल हो गए, कैसे निर्विघ्न बनकर हमने सफलता को प्राप्त किया, यह सचमुच बड़ा वंडरफुल अनुभव है।
दादी जी का बहुत बार यहां आना हुआ। सिल्वर जुबली का प्रोग्राम था तब भी दादी यहां आए थे। दादी बिजनेस एंड इंडस्ट्रीज विंग की चेयरमैन थी और मैं भी गुजरात की तरफ से यही सेवाएं कर रही थी। उस समय दादी प्रकाशमणि जी, जगदीश भाई जी भी यहाँ आए थे और एक नवीनतम प्रोग्राम बना कि राजकोट से मुंबई तक एक कारयात्रा निकाली जाए। मुंबई पहुंचने तक 111 इंडस्ट्रीज में प्रोग्राम किए गए। सब लोग वंडर खाते थे कि ये बहने, इंडस्ट्रीज में क्या करेंगी। बाबा ने इतना अच्छा हमें मैनेजमेंट का ज्ञान दिया, उसमें जब आध्यात्मिकता आ जाती है तो कैसे वह सफलता दिलाती है। इसका अनुभव मैने गुलज़ार दादी जी के अंग-संग रहकर के किया।
दादी जी जब भी हमे मिलती, हमारी खुश-खैराफत का समाचार पूछती थी कि 'अभी तो शांति है ना, अभी तो कोई विघ्न नहीं है ना?' बस, दादी का इतना कहना और मुझ में शक्ति आ जाती थी। मुझे तो अभी भी ऐसा अनुभव होता है, चाहे सपने में, चाहे सम्मुख में दादी जी हमें सूक्ष्म में मिलती रहती हैं और बहुत सारी प्रेरणाएँ भी देती रहती हैं। दादी जी से विशेष गुण मैंने ग्रहण किया। बहुत कम सोचना और बहुत कम बोलना। हा, ना में जरूरत पुरी हो आए तो दादी ज्यादा वाक्यों में नहीं जाती थी। अपने संकल्प, बोल की एनजीं की बचत कर निर्माण के कार्य में कैसे सफल करना है, यह मैने दादी जी से सीखा है। आज भी यही अनुभव हो रहा है कि वे हमारे अंग-संग हैं और अंत तक साथ ही रहेंगी, घर चलना भी उनके साथ है, यह पूरा विश्वास है।

गुलज़ार दादी जी अपना अधिक समय एकांत में व्यतीत करती थी

ब्रह्माकुमारी सुषमा बहन, जयपुर (राजस्थान)
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की एक महान विभूति, जो हमें पल-पल याद आती है, वह है हमारी परमश्रद्धेय दादी हृदयमोहिनी जी, जिन्हें हम प्यार से दादी गुलज़ार भी कहते हैं। दादी जी बाल्यकाल में ही अपनी मां के साथ इस विश्व विद्यालय में आ गई और परमात्मा को पहचान कर अपने जीवन को तपस्वी जीवन बनाया। बाल्यकाल से ही स्वभाव से वे बहुत शांत रहने वाली आत्मा थी। जैसे-जैसे बड़ी हुई, ईश्वरीय कार्य को समझने लगी। सन् 1969 में जब ब्रह्माबाबा अव्यक्त हुए, तब सर्व गुणों के भंडार परमपिता परमात्मा शिव ने गुलजार दादी जो एक ट्रांस मैसेंजर भी रही उनके तन को अपनाया। यूं कहे कि दादी निमित्त बने उस सर्वशक्तिमान का इस धरा पर लाने तथा सबकी ईश्वरीय पालना के लिए। बहुत समय तक दादी जी ने ईश्वरीय पालना अपनी तपस्या, गुणों व शक्तियों के आधार से की और विशेष रूप से तब, जब परमपिता परमात्मा का अवतरण उनके तन में होता रहा। वह तो एक वंडरफुल सीन रही जिसे देखने वाला जानने वाला, समझने वाला ही जान सकता है। कहावत है, गुड जाने गुड की गोथरी जाने। बहुतों ने अनुभव किया है, कैसे परमात्मा उस रथ द्वारा आकर आत्माओं से मिलते और वरदानों से, आशीर्वादों से झोलियां भरते। आत्माएं इतनी खुश हो जाती जो बाबा-बाबा तो कहती ही थी परंतु साथ-साथ दादी जी को भी दिल की दुआएं देती थी।

दादी दिल-दिमाग, मन-बुद्धि से एकदम बाबा के पास रहती थी

दादी जी अपने व्यवहार में बहुत-बहुत शांत और मधुर थी। कोई मीटिंग हो या कोई घटना हो गई हो, दूसरे लोग उग्र हो जाते थे। बोलने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते थे कि 'दादी जी, यह कैसे हुआ? यह नहीं होना चाहिए, ऐसे होता है, ऐसा करते हैं आदि-आदि।' परंतु दादी जी एकदम शांत, गंभीर हो उस व्यक्ति की बातें सुनते रहते। एक बार, एक बड़ी बहन ने दादी जी के आगे बहुत बोला। मैं भी वहीं थी। बाद में मैने पूछा, 'दादी जी, यह बहन तो हमेशा ही ऐसा करती है, यह होना नहीं चाहिए।' दादी ने मुझे प्यारा-सा जवाब दिया, 'बाबा बैठा है। बाबा का कार्य है। बाबा अपने आप देखेगा। तो दादी जी का यह निश्चय प्रेक्टिकल में देखा कि कुछ गलत भी कह रहा है। चाहे सही भी कह रहा है परंतु कहने का ढंग गलत है तो भी दादी जी एकदम न्यारी होकर रही। कैसी भी घटना में कैसी भी स्थिति-परिस्थिति में परमात्मा के पास जाकर बैठना, यह मैने प्रैक्टिकल में दादी जी में देखा और अनुभव किया वे दिल-दिमाग, मन-बुद्धि से एकदम बाबा के पास रहती। उनके ऊपर लेशमात्र भी उस बात का, उस व्यक्ति का, स्थिति, परिस्थिति का प्रभाव नहीं आता था। वैसे भी दादी जी अपना अधिक समयः एकांत में व्यतीत करती थी। एकांत में रहकर बाबा की मुरली पढ़ना और बाबा के पास बैठना, यह उनका एक शौक रहा। जब भी थोड़ा फ्री हुई, बस, बाबा के पास बैठे और बाबा के पास बैठने के कारण हम उनके चेहरे पर अलौकिकता, रूहानियत, शक्ति अनुभव करते थे। कभी लगता कि दादी ऐसे ही चुपचाप बैठी हुई है परंतु पास जाते तो महसूस करते कि दादी के चमकते चेहरे से बहुत शक्तिशाली प्रकंपन हम आत्माओ में आ रहे हैं। सृष्टि रूपी रंगमंच पर दादी जी ने दुआओं की कमाई, आशीर्वादों की कमाई की है क्योंकि जो भी उन से मिलता, वह बहुत खुश होकर जाता, संतुष्ट होकर जाता। दादी जी के दर्शन मात्र से ही लोग अपने आपको धन्य-धन्य समझते थे। ऐसे महान व्यक्तित्व की धनी हमारी दादी गुलज़ार जी थी। ऐसी महानता के लिए मैं तहेदिल से उन्हें कोटि-कोटि नमन करती हूं।

वो एक दिव्य अलौकिक आत्मा थी

ब्रह्माकुमार आत्मप्रकाश भाई, शांतिवन, ज्ञानामृत प्रेस
संसार में आना और एक दिन सबको अलविदा कर चले जाना, यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है परतु कुछ लोग अपने श्रेष्ठ कर्मों द्वारा, लोगों के मन में युगों-युगों तक अमर हो जाते हैं। ऐसी ही एक महान विभूति थी हम सबकी प्यारी आदरणीय दादी गुलजार जो।

जैसा नाम वैसा स्वभाव

दादी गुलजार जो अपने नाम के अनुरूप थी। जो भी उनसे मिलता, वह फूलो की तरह खिल उठता था। उनका एक और नाम था हृदयमोहिनी। सच में सबके हृदय को मोह लेती थी। उन्हें देखकर ही अथाह आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता था। उनके बोल सुनकर मन आनंद और उमंग से भर जाता था। उनका चलना देखना, दृष्टि देना, बात करना सब कुछ निराला और दिव्य था उनका हर कर्म अलौकिक था। सबके दिल को जीतने वाली दादी गुलज़ार सबसे न्यारी और सबको प्यारी थी। दिल इतना विशाल जिसमें सारा विश्व समा जाए।

बाबा उन्हें याद करते थे

परमात्मा को प्रायः सभी याद करते हैं परंतु दादी जो उन चंद हस्तियों में थी जिन्हें स्वयं परमात्मा याद करते थे। दादी जी की भाग्यशाली आत्मा थी जिनके रथ को स्वयं परमात्मा ने अपना रथ बनाया और जिस रथ के माध्यम से अनेकों आत्माओं को ज्ञानामृत का पान कराकर उनके भाग्य को संवारा।

उनकी दृष्टि बहुत रूहानी थी

आदरणीय दादी जी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1957 में दिल्ली, रजौरी गार्डन में हुई। मैं और लक्ष्मण भाई साकार बाबा से मिलने दिल्ली गए थे। उन दिनों बाबा रात्रि क्लास में सबसे मिलते थे परंतु उस दिन बाबा किन्हीं कारणों से क्लास में नहीं आए थे। जब हम वहां पहुंचे तो दादी गुलजार जी वलास करा रही थी। उनका ज्ञान सुनाने का तरीका बहुत ही मनमोहक था एवं वाणी भी बहुत मधुर थी। क्लास के बाद योग में जैसे ही दादी जी ने मुझे दृष्टि दी। मैं अपने आपको शरीर से अलग महसूस करने लगा, लगा जैसे मेरा शरीर है ही नहीं। एकदम हल्का महसूस कर रहा था। आज भी मुझे वह दिव्य अलौकिक दृष्टि याद है जिसने मुझे पहली बार अशरीरपन का अनुभव करा दिया था।
दूसरी बार मेरी मुलाकात दादी जी से कमला नगर में हुई, जहां बाबा ने मुझे जगदीश भाई जी के पास सेवा के लिए भेजा था। उसके बाद दादी जी से मिलना, उनसे ज्ञान सुनना, उनकी दृष्टि लेना यह सौभाग्य बार-बार मिलता रहा। दादी जी स्वयं भी ज्ञान, योग में रुचि रखती थी तथा अन्य सभी को भी ज्ञान, योग में मन लगाने के लिए प्रेरणा देती रहती थी। दादी जी एक अच्छे वक्ता के साथ-साथ बहुत अंतर्मुखी रहती थी। उनका रहन-सहन बहुत ही साधारण था परंतु उनका व्यक्तित्व बहुत ही रॉयल एवं प्रभावशाली था। दादी जी बहुत कम बोलती थी परंतु कम शब्दों में ज्ञान की बहुत ही गहरी बातें करती थी।

दिव्य गुणों की मूरत

दादी जी के व्यक्तित्व में दिव्य गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे। उनके कर्मों में दिव्यता, धैर्यता, मधुरता, शालीनता एवं अलौकिकता झलकती थी। एक बार हापुड़ में कुछ लोगों द्वारा आश्रम को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया गया। एक भारी भीड़ इकट्ठी होकर भाई-बहनों को परेशान कर रही थी, हाथापाई भी कर रहे थे। बाबा ने दादी गुलज़ार जी को वहां भेजा। दादी जी ने बड़ी सहजता एवं सरलता से सब को शांत किया एवं वातावरण को ठीक कर दिया। दादी जी में साकार बाबा की झलक दिखाई देती थी एवं कैसी भी परिस्थिति हो, वो उसे शालीनता के साथ सुधार देती थी। दुनिया को हर परेशानी उनकी हिम्मत और सरल स्वभाव के आ घुटने टेक देती थी।

शिक्षा भी बहुत प्यार से देती थी

एक बार मै दादी जी को दिल्ली पाडव भवन से दिल्ली कृष्णानगर की ओर गाड़ी में बैठा कर ला रहा था। गाडी में चल रहा था तो मन में उमंग आया और मैं गाड़ी तेज चलाने लगा। रास्ते में कहीं-कहीं भीड़ थी जिससे एकदम से ब्रेक लगाना पड़ता था दादी जो ने बड़े प्यार से सरलता के साथ कहा, 'आतम भाई, धीर धीरे चलकर भी हम लोग कृष्णानगर पहुंच जाएंगे।' मैं दादी जी का इशारा समझ गया और गाड़ी धीरे चलाने लगा। दादी जी कहती थी कि 'तन को जितना चलाओगे उतना मजबूत होगा परंतु मन को जितना शांत रखोगे, मन उतना मजबूत होगा।'

बाबा पर अटूट विश्वास

दादी जी को बाबा पर अटूट विश्वास था। वे कहती थी कि 'जब बाबा बैठा है चिंता करने के लिए फिर हम क्यों चिता करें एक बार दिल्ली में रामलीला मैदान में मेले का आयोजन किया गया था। सभी भाई-बहने, उमंग-उत्साह से सेवा में लगे हुए थे मेला सजाने में। उन्हीं दिनों रशिया के राष्ट्रपति भारत में आने वाले थे एवं श्रीमती इंदिरा गांधी चाहती थी कि उनका प्रोग्राम रामलीला मैदान में रखा जाए। यह सुनकर सभी चिंतित हो गए कि अब क्या होगा? सब बहुत घबराए हुए दादी जी के पास गए और उन्हें सारा वृतांत सुनाया। सब सूनने के बाद दादी जी ने बड़ी ही सहजता से कहा कि सब बाबा को याद करो, बाबा सब ठीक कर देगा। कुछ भाई-बहनें सोचने लगे कि इतनी बड़ी मुसीबत आई है और दादी जी को जरा भी चिता नहीं हो रही है। दादी जी की बात मान कर सब योग में बैठ गए। सरकार की ओर से कुछ लोग उस स्थान का निरीक्षण करने आए थे। सबको योग में बैठा देख, वे लोग वापस चले गए और उन्होंने रामलीला मैदान में प्रोग्राम करने का विचार त्याग कर लालकिला मैदान में प्रोग्राम बनाया। इस प्रकार बाबा ने समस्या का समाधान कर दिया। दादी ने सबको कहा, देखा, बाबा बैठा है ना चिता करने के लिए।

दादी जी का वरदान आज भी मेरे साथ है

सन् 1992 में प्रिंटिंग प्रेस दिल्ली से शांतिवन लाई गई। उस समय एक ही मशीन लग पाई थी, जिसका उ‌द्घाटन गुलजार दादो जी ने अपने हस्तकमल से किया था। उ‌द्घाटन के पश्चात् दादी जी ने मुझसे कहा, 'आत्म, आप जो चाहते हो वह पूरा ही हो जाता है।। इच्छा मात्रम् अविद्या का वरदान दादी जी ने मुझे दिया था। उनका वह वरदान आज भी मेरे साथ है और हर कार्य बड़ी ही सहजता से हो जाता है।
आज भी जब मैं दादी जी को याद करता हूं तो उनका वह दिव्य रुहानी व्यक्तित्व, वह अलौकिक दृश्य मेरी आखों के सामने आ जाता है। उनके अव्यक्त वाइवेशन को मै स्पष्ट महसूस करता हूं। उन अखंड तपस्विनी, पालनहार, बाप समान, अलौकिक फरिश्ते के साथ बिताए लम्हों को याद करके अत्यत हर्षित होता है तथा अपने आप को भाग्यशाली समझाता है।

दादी हृदयमोहिनी बहुत अंतर्मुखी और नम्रचित्त थी

बह्माकुमार डॉ. प्रताप भाई, ग्लोबल हॉस्पिटल, माउंट आबू
एक बार दादी हृदयमोहिनी हॉस्पिटत आई थी तो भाइयों ने गीत गाया, 'दादी आपकी आंखों में बाबा नजर आते है। हम सबको रूहानी दृष्टि से भरपूरता और संपन्नता का अनुभव कराया, यह कमाल दादीकी ही थी।

दादी बिल्कुल बेफिक्र और निश्चिंत थी

दादी सदा उस कॉन्शियस में रहती थी कि 'मैं भगवान का रथ हूँ।' दादी बहुत सिंपल और इनोसेंट थी, उसका आधार प्योरिटी थी। उन्होंने बाबा को संपूर्ण रीति समर्पण किया था, जैसे बाबा उन्हें तैयार कर रहा था। दादी का दृष्टिकोण सदा बेहद का रहता था। सन् 1988 में जब दादी को कैंसर हुआ था तो डॉक्टर ने कहा था कि दादी डेढ़ या दो साल ही रहेंगे। जब दादी को यह बताया गया तो दादी ने कहा कि 'हम तो कल भी जा सकते हैं।' दादी बिल्कुल बेफिक्र और निश्चिंत रहती थी। दादी का पद भले ऊंचा था परंतु उन्होंने पुरुषार्थ पर पूरा-पूरा अटेंशन दिया, दादी ने अपनी मेहनत की। हम लोग तो दादी और अव्यक्त बाबा में अंतर भी नहीं कर पाते थे। दादी के पास जाते तो वहां भी बाबा की ही भासना आती थी। उनका यह आंतरिक पुरुषार्थ ही देखने जैसा था। लंबे समय का पुरुषार्थ हमने दादियों में देखा।

सब कुछ बाबा को समर्पित

दादी बहुत अंतर्मुखी और नम्र चित्त थी। कभी-कभी दादी पास से गुजर जाती थी और हमें पता भी नहीं चलता था। दादी ने अपना रथ भगवान को ऑफर किया तो उसके लिए कितनी अपने पर मेहनत की होगी। बाबा रात-रात भर बैठे रहते तो कभी दादी ने प्रश्न नहीं उठाया, समर्पित तो समर्पित। कौन एक ही पोजिशन में इतने घंटों तक बैठ सकता है? दादी ने जैसे स्वयं का सब कुछ तन, मन, शक्तियां बाबा को समर्पण कर दिया, शरीर की व्याधि को भी नहीं देखा, इस वजह से भी सभी का दादी से बहुत प्यार था। डॉ. अशोक मेहता बताते हैं कि जब वे ज्ञान में नहीं थे और दादी का पहले-पहले ऑपरेशन किया और दादी के कमरे में जाते थे तो दादी उनसे पूछती थी कि 'आप कैसे हो?' और टोली देती थी।

एक लाइन में ही सारा सार

मैं कभी सोचता था कि हॉस्पिटल की सेवा छोड़कर अब ईश्वरीय सेवा करू तो दादी कहते थे, 'आप कर सकते हो ना, पहले आप समान तैयार करो, जब आप समान तैयार करोगे तभी छुट्टी मिलेगी।' दादी की एक लाइन में ही सारा सार समाया हुआ होता था। एक बार साकार बाबा को भी मैने पत्र लिखा था, 'बाबा, मुझे पढ़ना है।' तो बाबा ने भी एक लाइन में ही उत्तर लिखा था, 'भल पढ़ो, बाप का नाम बाला करना।' दादी की एक लाइन में ही सारा सार समाया होता था। हम कभी दादी के साथ हॉस्पिटल ट्रस्ट आदि की मीटिंग करते थे या कोई उलझन होती तो दादी यही कहती थी कि 'आपस में मिलकर राय करो।' एक बार गोपाल भाई ने सुनाया कि एक समय दो प्रोग्राम हो गए और दोनों दादी को निमंत्रण दे रहे थे तो दादी ने कहा, 'आप लोग आपस में निश्चित कर दो, दादी कैसे कहेगी कि मुझे यहां जाना है।'

दादी से शीतलता की महसूसता आती थी

दादी के अंतिम संस्कार के दिन भी गोपाल भाई सुना रहे थे कि दादी जैसे बर्फ का पहाड़ थी। दादी से शीतलता व निःसंकल्प अवस्था की महसूसत्ता सदैव आती थी। जैसे स्वच्छता को स्वच्छता आकर्षित करती है पवित्रता को पवित्रता वैसे ही दादी को भी फरिश्ते बहुत पसंद थे। मैं कभी-कभी दादी के कमरे में जाता था तो देखता था, वहां फरिश्तों के चित्र लगे हुए हैं। बाबा कहते हैं कि 'व्यर्थ संकल्प ना हो, वही संकल्प चले जिसको कार्य में लाना हो', तो दादी इस बात का स्वरूप थी, कभी संकल्प करती ही नहीं थी, जहां बिठा दो, वहीं बैठ जाती थी।

कमजोरी से पार ले जाती थी

कभी कोई बहन आकर सुनाती कि दादी, यह भाई बहुत गुस्सा करता है। तो दादी कहती, यह भी उसका गुण है ना। दादी अवगुण शब्द ही नहीं यूज करती थी और कभी दादी ने किसी को समझाने की कोशिश नहीं की, कभी किसी की कमजोरी पर ध्यान नहीं खिंचवाया परंतु बाबा की बात सुना कर उस कमजोरी से ही उसे पार ले जाती थी, दादी में यह विशेषता थी।

दादी बाबा के संग रहती थी

दादी तो जैसे सदा बाबा में मर्ज रहती थी, बेहद का दृष्टिकोण था। लास्ट के तीन सप्ताह दादी अस्पताल में रही तो मैं दो सप्ताह वहाँ रहा था। शुरू-शुरू में दादी अलर्ट थी। जब शरीर की व्याधि बढ़ जाती थी तो दादी अपने आपको शरीर से अलग कर लेती थी। जैसे संदेश में भी बाबा ने कहा कि दादी तो वतन में थी। बॉडी में क्या हो रहा है, वह कारण नहीं पता चल रहा था तो बार-बार टैस्ट होते रहे लेकिन दादी निश्चिंत थी। दादी ने बिल्कुल ही अपने आप को बाबा को समर्पण कर दिया था। दादी बाबा के संग रहती थी। बाबा को सदा अपने साथ रखती थी।

दादी के कमरे में गहन शांति

उस रात मैं दादी से मिलकर अपने कमरे में गया। दूसरे दिन 8:15 बजे नाश्ता करने बैठा ही था कि अस्पताल से कॉल आया कि तुरंत आ जाओ। मैं पहुंचा, दादी के कमरे में बहुत गहन शांति थी। दादी के अव्यक्त होने का समाचार सुनकर मुंबई के कई भाई-बहनें हॉस्पिटल में आए तो भी सैफी अस्पताल वालों ने बहुत सहयोग दिया। दादी को लाते वक्त भी उन्होंने कहा कि 'दादी चली गई है पर आप हमें भूल नहीं जाना।' उन्होंने दादी को रॉयल सूट दिया हुआ था, वेंटिलेटर, डायलिसिस, एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी आदि सारी व्यवस्था उन्होंने वहीं करके दी हुई थी जैसे दादी के प्रभाव में वे सब कर रहे थे।

मास्टर बाबा

कोविड के समय में वे डॉक्टर दादी के लिए सब्जियां भी ले आते थे। दादी के प्रति उनकी इतनी भावना रहती थी, वह भी दादी के धारणा स्वरूप जीवन के आधार पर। दादी हमारे सामने एक उदाहरण छोड़ गईं, 'वारिस स्थिति का, बेहद की स्थिति का।' जैसे बाबा कहते है ना, आप मास्टर हो, तो दादी मास्टर बाबा बनकर गई।

नजरों में जादू

दादी का नियम था 7:00 से 7:30 बजे शाम को योग करने का। यदि हम उस वक्त मिलने पहुंचते तो हमें भी बता देती थी। शब्द बहुत कम यूज करती थी लेकिन उनकी नजरों से ही वरदान मित जाता था। जो व्यक्ति स्ट्रगल कर रहा हो उसे शक्ति मिल जाए तो यह वरदान ही हो गया ना, दादी की नजरों में ही जैसे जादू था। दादी बहुत प्यार और नम्रता से बात करती थी और सबको सम्मान देती थी। जो पालना, देखभाल हमने दादियो में देखी इससे ही हमे पता बलता है कि ब्रह्माबाबा कैसे रहे होंगे। दादियों ने कितनी मेहनत की। कठिन परिस्थितियों का सामना किया लेकिन कितना अटूट विश्वास था उनका ज्ञान पर, ड्रामा पर।

त्रिकालदर्शी बनो

एक बार दादी से किसी ने पूछा कि अंतिम स्थिति का पुरुषार्थ क्या हो? तो दादी ने एक ही लाइन में उत्तर दिया, 'त्रिकालदर्शी बनो।' जब हम आदि-मध्य-अंत को समझकर कार्य करते हैं तो हमे संपन्नता का अनुभव होता है, पश्चाताप नहीं करना पड़ता। फिर किसी ने पूछा दादी से कि बाप समान कैसे बनें? दादी ने कहा, देहभान से परे हो जाओ तब बाप समान बन जाएंगे।

साधारण कर्म में भी अलौकिकता

दादियों के साधारण कर्म में भी अलौकिकता थी, रूहानियत थी। एक बाप दूसरा न कोई, यह हमने दादियों में देखा। दादियों को बाहर की दुनिया में बिल्कुल भी इंटरेस्ट नहीं था। उन्हें बाबा पर अटूट विश्वास था। उन्होंने अपने आपको रियलाइज किया, पक्के वारिस बन गए। हमारे सामने ये रोल मॉडल हैं, हम इन्हें फॉलो करें तो अपनी संपन्न अवस्था बनाने में मदद मिलेगी। दादियों के जीवन से छोटी-छोटी बातें सीखने को मिलती हैं। जो बाबा ने एक बार कह दिया, दादियों का लक्ष्य रहता था कि वह करना ही है।

योग कैसे बढ़ाएं?

दादी ने एक बार क्लास कराई, कहा, चार पेज की मुरली याद नहीं रहती। तो सार तो याद रहता है ववेचन तो रहता है। वह भी याद नहीं रहता तो वरदान याद करो वरदान तो स्लोगन याद करो, अगर स्लोगन भी याद नहीं रहता तो बाबा तो याद रहेगा। फिर एक बार किसने कहा, योग कैसे बढ़ाएं? दादी ने कहा कि अभी जैसे हम दिन में तीन बार भोजन करते है चाय-पानी पीते है, ट्रैफिक कंट्रोल होता है तो उस वक्त बाबा को याद करते रहें तो बहुत जमा हो जाएगा। ऐसे सहज शब्दों में दादों जी बताती थी।
बाबा और सभी वरिष्ठ हमारे साथ हैं, सिर्फ बुद्धि की लाइन क्लियर रखनी है, तभी हम टचिंग कैच कर पाएंगे।

गुलज़ार दादी जी अवतरित हुई थी यज्ञसेवा अर्थ

ब्रह्माकुमार डॉ. बनारसी भाई, शांतिवन
गुलज़ार दादी जी सचमुच बहुत महान, बहुत तपस्वी थी। दादी वतन से अवतरित हुई थी यज्ञ स्थापना के अर्थ बाबा का संदेशवाहक, बाबा का रथ बनने के लिए। सचमुच दादी उपराम रहती थी।

त्यागमूर्त

हिस्ट्री हॉल के पीछे सीढ़ी है, उसके नीचे एक छोटे-से कमरे में गुलज़ार दादी और मनोहर दादी रहते थे। वहां दो बेड भी बड़ी मुश्किल से आते थे। बाबा दादी के तन में आते थे। रात भर दादी का रथ इस्तेमाल करते थे तो दिन में दादी को आराम चाहिए होता था। मनोहर दादी उन दिनों करनाल में रहती थी। तो बहुत लोग मनोहर दादी से मिलने-जुलने आया करते थे। वे लोग दादी से उस छोटे से कमरे में मिल रहे हैं और वहीं बाजू में गुलज़ार दादी पतली शॉल ओढे आराम कर रही हैं। कितना इन्हों का त्याग रहा। कभी गुलज़ार दादी ने बड़ी दीदी से कहा नहीं कि बाबा रातभर शरीर को यूज करते हैं तो मुझे दिन में आराम करने की जगह चाहिए, नहीं जब दीदी की मां क्वीन मदर ने शरीर छोड़ा तब वह कमरा दीदी ने गुलज़ार दादी को दिया जिससे दादी को थोड़ा आराम मिल सके।

कमरे के शक्तिशाली वाइब्रेशंस

जहां दादी रही, वह स्थान सूक्ष्मवतन बन गया। पाडव भवन में उन दिनों मैं अकेला डॉक्टर था, कहीं भी कोई बुलाते, तो हम पहुंच जाते थे। जब भी दादी के कमरे में गए तो देखा कि दादो तपस्या कर रही है, दादी के कमरे के वाइब्रेशंस बहुत शक्तिशाली होते थे। बड़ी दादी के कमरे के सामने गुलज़ार दादी का कमरा था। बड़ी दादी को कुछ भी संकल्प चलता तो तुरंत दादी को बुला लेती और बड़े प्यार से कहती थी, 'गुल, इधर आओ, बाबा से जरा यह पूछ कर आओ।' गुलज़ार दादी ने कभी यह नहीं देखा कि हम तैयार नहीं हैं, नहीं। दादी की आज्ञा लेकर तुरंत वतन में जाती, दो मिनट में समाचार बाबा से पूछकर दादी को सुनाकर वापस अपने कमरे में चली जाती। मतलब कि उन्होंने इतना अपने आपको बाबा के नजदीक रखा कि वतन में कभी भी आना-जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी।

एक मिनट में अशरीरी स्थिति का अनुभव

शांतिवन में भी शक्ति भवन के उनके कमरे में बहुत शक्तिशाली प्रकंपन रहते हैं। हम कुछ भाई-बहने योग करने वहा जाते, दादी जी भी वहीं बैठती थी, एक मिनट में अशरीरी स्थिति का अनुभव होता था। मैंने कभी दादी में अहम् नहीं देखा। दादी बहुत निर्मान रहे। दादी हम लोगों की संभाल करती थी कि इन्हें टोली खिलाओ, यह करो आदि। एक बार सर्दी के दिन थे, नाश्ते के बाद दादी और हम बाहर धूप में बैठे थे। मैं कहीं से मेडिकल विंग की सेवा करके आया था तो दादी को सारा समाचार सुनाया कि क्या, क्या प्लैनिंग की है। दूसरे दिन बाबा आए थे और उन्होंने वे सारी बातें दोहराई कि मेडिकल विंग वालों ने यह-यह प्लानिंग की है। अच्छी सेवा कर रहे हैं।

आवाज में मिठास थी, शक्ति थी, सुकून था

दादी जब मुम्बई के एक हॉस्पिटल में एडमिट थी तो जो बड़े-बड़े डॉक्टर, दो मिनट से ज्यादा पेशेंट को नहीं देखते थे, उनके पास इतना समय नहीं होता था, वे दादी के पास बैठते थे। दादी बेड पर है तो वो चेयर पर बैठ जाते, दादी चेयर पर बैठे हैं तो वो दादी के बेड पर बैठ जाते थे। दादी उन्हें बड़े प्यार से पूछती कि 'डॉक्टर जी, आप कैसे हो?' तो डॉक्टर भी हैरान हो जाते कि इतने प्यार से तो किसी ने जिदगी में नहीं पूछा। कितनी उस आवाज में मिठास थी, शक्ति थी, सुकून था। डॉक्टर चाहे बुजुर्ग हो, बहुत सीनियर हो वह भी पिघल जाता था।

दादियों का इलाज करना मुश्किल, क्यों?

हमें कहते थे कि आपकी दादियों का इलाज करना बड़ा मुश्किल है। हमने कहा कि हमारी दादी आपको तंग करती है? तो कहा, 'तंग करे तो दवा लिखने में हमारी बुद्धि चले, हम दादी के पास जाते है तो वे मुस्कराती हैं, इतनी शक्तिशाली उनकी स्थिति होती है। प्रकंपन होते हैं, उनके चेहरे पर औरा रहता है, वे हमें पूछते है। डॉक्टर जी, आप ठीक हो ना, तो मैं क्या दवाई लिखु हम उनके पास जाते हैं तो जैसे हममें शक्ति आ जाती है, हमारी खुशी बढ़ जाती है तो हम क्या दवाई लिखें, इसलिए मुश्किल होता है। हम कहते कि 'दादियाँ इस तन में हैं ही नहीं, यह तो बाबा ने इन्हों को बिठाकर रखा है यज्ञसेवा के लिए, आप सभी को खुशी देने के लिए।

अपने लिए नहीं, विश्व की आत्माओं के लिए सोचती रही

आखिरी के कुछ साल दादी, मुंबई, गामदेवी सेंटर पर रहे। मै हर मास दादी को 1, 2 बार मिलने जरूर जाता रहा। एक शाम हम दादी से मिलने गए तो देखा, दादी चेयर पर बहुत शक्तिशाली स्थिति में अकलो बैठी हुई है। मैं प्लास्टिक की चेयर लेकर उनके पास बैठ गया। इतने शक्तिशाली प्रकंपन थे कि मै शरीर के भान से अलग हो गया, लगा जैसे मेरा शरीर है ही नहीं। कुछ देर बाद दादी ने मुझे देखा, मुस्कराया। मैंने पूछा, दादी, आप इतनी गहन शाति में ये आप बाबा को याद कर रहे थे? तो दादी ने कहा, "नहीं मै सारे विश्व को देख रही थी कि सारे विश्व में कितना दुख है, सभी कितने कष्ट में हैं और उनका कष्ट कैसे दूर किया जाए। देखा दादी खुद बीमार है और अपने कष्ट के लिए नहीं। विश्व के दुख-दर्द के लिए, विश्व की आत्माओं के लिए सोच रही है। हमारी दादी अपने लिए नहीं थी, यज्ञ के लिए, विश्व की आत्माओं के लिए थी। वह विश्व की दादी थी, विश्व के लिए थी, विश्व की सेवाओं के लिए थी।

दादी का कमरा जैसे सूक्ष्मवतन

दादी के कमरे में जाते ही ऐसे लगता था जैसे यह सूक्ष्मवतन है। दादी अंतिम दिनों में सैफी हॉस्पिटल में रहे। वह मुस्लिम हॉस्पिटल है परंतु वहां भी सभी को वाइब्रेशंस मिलते थे कि यह कोई खुदा के नूर है, खुदा के बंदे हैं। दादी को उन्होंने अपने गुरु का कमरा दिया था, जो कमरा वे कभी किसी को नहीं देते हैं। बीमार होने पर उनके गुरु वहां रहते थे इसलिए वह उनके लिए मंदिर समान था। दादी के लिए वह कमरा बड़ी खुशी से दे देते थे। हम भी महसूस करते थे कि जब दादी आती है तो हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल जाता है। उस हॉस्पिटल के मालिक मुस्लिम होते हुए भी रोज़ दादी से मिलने आते थे। उन्हें खींच होती थी, बहुत प्राप्ति अनुभव करते थे। बड़े-बड़े डॉक्टर भी कहते थे कि हम इतने थके होते हैं परंतु दादी के पास आते ही रिफ्रेश हो जाते हैं। वे हर पेशेट को दो ही मिनट देते थे परंतु दादी के पास आकर के आधा घंटा, 15 मिनट आराम से बैठते थे। दादी का समाचार लेते थे टोली भी खाते थे। एक बड़े डॉक्टर ने कहा कि आज तक हॉस्पिटल का हमने पानी भी नहीं पीया है और दादी के पास आकर हम प्रसाद लेकर जाते है।
दादी इस युग की दादी नहीं थी दादी फरिश्ता थी। बाबा के साथ रहती थी और हम लोगों की पालना हेतु दादी यहां रही, यज्ञ की सेवार्थ यहां रही। मेरा भाग्य है जो मुझे ऐसी महान दादी के साथ रहने का मौका मिला, उनकी सेवा करने का मौका मिला।

अंतर्मुखता, साइलेंस और मधुरता की जीवंत मूर्ति दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमारी शारदा बहन, अहमदाबाद
आदरणीय दादी गुलज़ार जी से सर्वप्रथम दिल्ली, कमला नगर सेवाकेंद्र पर मुलाकात हुई। दादी जी को देखते ही उनकी दिव्यता, अलौकिकता का अनुभव हुआ। उनकी दृष्टि मुझ पर पड़ी और मैं अशरीरी हो गई, डबल लाइट हो गई। उस ईश्वरीय रूहानी दृष्टि का एक जादू अनुभव किया।
अमृतवेले बैठने का तरीका सिखाया दादी के साथ मैं आठ वर्षों तक दिल्ली, पांडव भवन में रही। जब हम दिल्ली पाडव भवन में थे तो अमतवले हॉल में आकर योग करते थे। गुलज़ार दादी जी बिल्कुल आगे बैठती थी और हम एकदम पीछे बैठते थे। एक बार दादी जी ने कहा 'क्या आप बाबा से नाराज होकर बैठती हो?' इशारों-इशारों में दादी जी ने बहुत महसूस करा दिया। ईश्वर जो रचयिता है उसका सम्मान हो और बैठने का तरीका क्या होना चाहिए, वह महसूस कराया।

जो सोच रही है वह नहीं करे

एक बार एक घटना घटी और मेरे मन में बहुत कंफ्यूजन था, क्या करूं, कैसे करूं? तो बाबा की कमाल देखिए, बाबा ने
गुलज़ार दादी जी को वतन में मेरे लिए संदेश दिया कि 'बच्ची को कहना, जो सोच रही है वह नहीं करे।' दादी ने पूछा, 'बाबा क्या है?' तो बाबा ने कहा, 'वह बाप जाने और बच्ची जाने, आप मैसेज देना।' गुलज़ार दादी ने मुझे बुलाया, कहा, 'शारदा, बाबा का मैसेज है और वह मैसेज सुनाया।' फिर एक बार पूछा, 'क्या संकल्प चल रहा है?' मैने कहा, 'दादी, इस समय याद नहीं है।' ऐसे प्यारे बाबा और दादी ने संकल्प से भी पालना, शिक्षा और सावधानियां दी।

मैनर्स और रॉयल्टी

एक बार पांडव भवन, दिल्ली के लॉन में हम सभी बहने बैठी आपस में बातें कर रही थी। इतने में मेरे लिए फोन आया। गुलज़ार दादी ने फोन उठाया, बाहर लॉन में मेरे पास आई और कहा, 'आपका फोन है।' मैने कहा 'दादी, आप क्यों आए, वहीं से आवाज लगा लेते थे।' दादी ने कहा, 'यह रूहानियत, अलौकिकता और दिव्यता नहीं है जो दूर से आवाज लगाएं।' इतनी बड़ी दादी होते भी स्वयं बुलाने के लिए आई और उस घटना ने मुझे बहुत कुछ रियलाइज कराया। यदि दादी की जगह मै होती तो आवाज लगा लेती थी लेकिन दादी की इस निर्मानता ने मुझ आत्मा को भी मैनर्म और रॉयल्टी सिखा दी।

दिव्यता और रूहानियत

दादी के हर कार्य में दिव्यता और रूहानियत की बहुत गहरी झलक थी। बाबा हम बच्चों को सदा सिखाते हैं कि लौकिक को अलौकिक बनाओ। हमने देखा, दादी गुलज़ार और ऑलराउंडर दादी आपस में मां-बेटी होते हुए भी कभी रिंचक मात्र भी उनके इस रिश्ते की भासना नहीं आई। उन्हें देख लगता था कि अपने जीवन के पुराने संबंधों से भी संपूर्ण मरजीवा का प्रैक्टिकल स्वरूप हैं ये। दादी गुलज़ार अंतर्मुखता, साइलेंस और मधुरता की सच में एक जीवंत मूर्ति थी, कभी भी, किसी भी बात पर हमने दादी को जोर से बोलते हुए नहीं देखा है।

निर्मानता, सरलता और भोलापन

एक बार बड़ी दादी जी का फोन आया, जिसमें उन्होंने दादी गुलज़ार से कहा कि अहमदाबाद में बहुत बड़ा मेला लगा है, उसे देखने आप जरूर आओ। मैं उस समय तीन-चार दिन के लिए लौकिक घर गई थी। ऑलराउंडर दादी ने फोन किया, 'शारदा, दादी गुलज़ार इस ट्रेन से आ रही है, आप भी अपनी बुकिंग दादी जी के साथ अहमदाबाद तक कराना।' बापदादा का रथ गुलज़ार दादी जी उस समय ऑर्डिनरी क्लास में सफर करती थी। मे दादी के साथ उसी कोच में बैठी। भोजन होने के बाद दादी पूछती है। तुमको कुछ और चाहिए, कुछ और खाना है?' वह पालना दिल की भावनाओं को कशिश करने वाली थी। साथ में दो-तीन और लेडीज बैठी थी। एक ने पूछा, 'क्या यह आपकी मम्मी है। मैंने भी बड़े प्यार से बोला 'हां।' दादी जी सुन रही थी, सुनते सुनते दादी जी अपनी हंसी रोक नहीं पा रही थी। दादी जी की वह हसी मैंने ना उसके पहले कभी देखी थी, ना उसके बाद। मुझे आज से वह हंसता हुआ चेहरा याद है। दादी का चेहरा एकदम लाल-हो गया था। निर्मानता, सरलता और भोलापन दादी जी के चेहरे में सदैव दिखाई पड़ता था।

गंभीरता और रमणीकता

एक बार दादी हम सब बहनों से पूछती है। 'आप सबको आलू पसंद है ना, तो बताओ, आलू कितने प्रकार के होते हैं?' हमने कहना शुरू किया, 'छोटा आलू, बड़ा आलू, मोटा आलू, पतला आलू', दादी कहती है, 'दयालु, श्रद्धालु, भक्तालु.. ये आलू के प्रकार हैं।' ऐसी थी दादी गंभीरता की मूरत और रमणीकता भी दादी में हमने बहुत देखी।

दादी गुलज़ार निर्मान और महान थी

बह्माकुमारी राज बहन, काठमांडू, नेपाल
हमारी मीठी, प्यारी दादी गुलज़ार जी के सभी गुण हमारे मन में भरे हुए है। बाबा उनके रथ में आने लगे और हर प्रकार की शिक्षा देने लगे। इस रथ से बरसों बरसों लाखों-करोड़ों आत्माओं को बाबा ने दृष्टि दी, शक्ति भरी।।
अपनी प्यारी, मीठी गुलज़ार दादी मुंबई में बहुत समय रही। हम तीन-चार बार उन्हें वहां मिलने गए। नीलू बहन का फोन आता था कि दादी ने आपको याद किया है। राखी है, शिवरात्रि है, ऐसे-एसे समय पर दादी याद करती थी। हम शुरू से ही दादी के बहुत नजदीक रहे क्योंकि अमृतसर में हमारा चंद्रमणि दादी द्वारा अलौकिक जन्म हुआ, वहा दादी किसी न किसी सेवा के निमित्त, कभी-कभी आते-जाते थे, जगदीश भाई जी भी दादी के साथ आते-जाते थे। गुलज़ार दादी जी भी दिल्ली कमला नगर में रहते थे। शुरू से ही उनका मन भी ऊंचा रहने का स्थान कमला नगर भी इतना ऊंचा आश्रम था जिसमे गुलजार दादी सेवा के निमित्त रही।
जब हम पार्टी लेकर दिल्ली, पांडव भवन जाते, वहां रुकते, तब आलराउंडर दादी भी वहां होती थी। कभी-कभी दादी के कमरे में ही रह जाते, सो जाते थे। इस तरह बहुत-बहुत नजदीक से दादी गुलज़ार से पालना पाई। दादी के प्रकंपन, दादी का चलना, बोलना सब ऐसे था जैसे धरती पर उनके पैर नहीं हैं। वे गुणों की खान थी। उनके मन में हर आत्मा के प्रति शुभभावनाएं ही थी। बाबा के नए नए बच्चे बनते हैं, सभी का स्वभाव अपना-अपना होता है परंतु उन सभी के प्रति भी दादी जी के मन में सदैव शुभभावना ही रही। जिस संपूर्ण, संपन्न स्थिति का हम पुरुषार्थ करते हैं, दादी, उस समय भी संपत्र, संपूर्ण देखने में आती थी।
एक बार कोलकाता में मेला था। निर्मलशांता दादी ने हमारी ड्यूटी लगाई हुई थी, वहां गुलज़ार दादी भी आए, तो उन्हें काठमांडू आने का निमंत्रण दिया। वे आए, तब उनका लाल दरबार में भाषण हुआ। दो-तीन दिन दादी वहाँ रही, घूमी-फिरी, सबसे मिली, फिर दिल्ली वापस चली गई। इतनी बड़ी शक्ति और एकदम शांत। दादो सदा मुस्कराती रहती थी। शाम का क्लास होने के बाद हम उसे आसपास घुमाने ले चलते थे। एक बार घूमते-घूमते हम काफी दूर निकल गए। दादी को बोला, 'दादी कोई गाड़ी मंगवाएं? कहा, नही नहीं। फिर हमने कहा, 'टैक्सी मंगा लेते हैं।' तो दादी ने पूछा रिक्शा नहीं है? रिक्शा में चलते हैं। ओहो! आप विचार कीजिए, दादी इतनी निर्मान इतनी महान! इसलिए प्यारे बाबा ने उनके रथ को स्वीकार किया। जैसे ब्रह्मा के रथ को चलते-चलते स्वीकार किया, इस प्रकार दादी गुलज़ार जी को भी बाबा ने स्वीकार किया।
एक बार हम उन्हें जनकपुर ले गए। जनकपुर के मुख्य महंत ने सीता के मंदिर में उन्हें बुलाया, उनका स्वागत किया और मंदिर के दर्शन कराए। काठमांडू में पशुपतिनाथ का मंदिर है, जिसमें भगीरथ तो है ही, उसके आगे बना हुआ बड़ा नंदीगण भी है और उसके आगे छोटा नंदीगण भी है। एक बार वहां के पुजारी से हमने पूछा, 'यहां दो नंदीगण क्यों हैं, एक बड़ा, एक छोटा ?' उसने बतलाया, 'बड़े नंदीगण में शिव सवारी करते थे और गुप्त रूप में छोटे को साथ रखते थे।' गुप्त रूप में उन्होंने इनके द्वारा सेवा की है। तो हमें इतनी खुशी हुई कि हां, यह तो हमारी दादी गुलज़ार जी का रथ है, हम सबको इसका आध्यात्मिक अर्थ सुनाते हैं।

रूहानी जीवन के आरम्भ से ही दादी का सानिध्य मिला

ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन, दिल्ली, पांडव भवन
मैंने ईश्वरीय ज्ञान में अपने लौकिक माता-पिता के साथ, रजौरी गार्डन सेंटर, दिल्ली में जाना शुरू किया। वहां पर प्यारे बाबा, मम्मा और अन्य सभी दादियां भी आया जाया करती थी इसलिए मुझे छोटेपन से ही प्यारी दादी गुलज़ार जो को देखने-सुनने और मिलने का सौभाग्य मिलता रहा। मैं देखती थी कि दादी की छवि बड़ी अलौकिक है, दादी हमेशा स्थिर और एकाग्र दिखाई देती है। मंच पर दादी की बैठक बहुत ही स्थिरता वाली, नयन एकदम एकाग्र और कोई हलचल नहीं दिखाई पडती थी।

दादी बोलती बहुत कम थी

लौकिक पढ़ाई पूरी करके जब मैं समर्पित हई तो मुझे दादियो ने दिल्ली पांडव भवन में भेजा। तब से हर समय दादी गुलज़ार और दादी ऑलराउंडर की बहत अच्छी पालना मिलती रही। मेरे मन पर गुलज़ार दादी की एकाग्रता का, अलोकिकता का प्रभाव तो पड़ा हुआ था ही पर मै देखती थी कि दादी बोलती भी बहुत कम थी हम सब को भी कहती थी कि ज्यादा नहीं बोलना है। अकेली भी बैठी होती थी तो जैसे दादी अपनी मगन अवस्था में, किसी गहराई में खोई हुई है। दादी सुनती सब की थी लेकिन बोलती कम थी। कोई ऊंचा भी बोलता था तो दादी को अच्छा नहीं लगता था, दादी उसको कहती थी, तुम्हारा जिससे काम है, केवल उसको ही सुनाई देना चाहिए, औरों को क्यों सुनाई देता है, इससे औरों के संकल्प चलते है, सब क्या बहरे हैं, जो इतना ऊंचा बोलती हो, ऐसे दादी प्यार से समझाती थी।

सेवा के साथ धारणा वाला जीवन

दादी हम सबको जीवन की वैल्यू बताती थी कि तुम्हारा जीवन सबसे ऊंचा, श्रेष्ठ, अलौकिक है। सिर्फ सेवा करके खुश नहीं हो जाना, यह भी ध्यान रखना है कि चारों ही सब्जेक्टस् ज्ञान, योग, धारणा, सेवा ठीक होने चाहिएं। दादी मिसाल देती थी कि दुनिया में भी लोग बड़े-बड़े काम कर लेते हैं, बड़ी-बड़ी पोस्ट, कम्पनीज संभाल लेते हैं तो इस बाह्मण जीवन में सिर्फ कोई बड़ी सेवा करके खुश नहीं हो जाना लेकिन सेवा के साथ-साथ त्याग, तपस्या और धारणा वाला जीवन होना चाहिए। इन सारी बातों को हम दादी के जीवन से अनुभव भी करते थे और हमारे ऊपर उनका प्रभाव भी पड़ता रहा।

कुछ भी सोचो नहीं

एक बार, एक बहन दादी के पास अपनी कुछ बात लेकर आई थी, वह अपनी कहानी सुनाती जाए-सुनाती जाए और दादी बहुत प्यार से सुनती रही, यह दादी का नेचर था कि बहुत धैर्यवत् होकर प्यार से सुनती रहती थी, बोलती नहीं थी। जब उसने अपनी सारी बातें कह दी तो दादी ने पूछा, और कुछ कहना है, उसने कहा, नहीं। वह सब कुछ सुना कर खाली हो गई थी। फिर दादी ने सिर्फ दो हो शब्द बोले, अच्छा, अब कुछ भी सोचो नहीं। फिर वह बहन चली गई। कुछ दिनों के बाद वह दोबारा मिलने आई, तो उसके चेहरे पर खुशी थी। उसने दादी को कहा, मैं ठीक हूं और सब कुछ ठीक है। मैंने इस बात से यह समझा कि कई बार हम अपना ही सोच-सोच करके व्यथा बढ़ा लेते हैं। दादी ने सहज रोति से उसका मन हल्का कर दिया क्योंकि दादी खुद ज्यादा चिंतन नहीं करती, दादी का माइंड हमेशा पॉजिटिव, प्योर और पावरफुल रहता था। दादी हमें भी यह शिक्षा देती थी कि आपस में कोई छोटी-मोटी बात हो जाती है, तो इसमें भी टाइम वेस्ट नहीं करो। मैं कभी कोई बात दादी को सुनाती थी कि दादी फलाने-फलाने ने ऐसा किया, तो दादी बड़े प्यार से समझाती थी कि तुम हर एक के संस्कारों को समझ कर चलो.बातें तो होगी, समस्या भी होगी क्योंकि सब भिन्न-भिन्न संस्कारों वाली आत्माएं हैं, तुम्हें हैरान नहीं होना है लेकिन उसके संस्कार को समझ कर, उसके अनुसार अपने आप को सेट करना है। बड़ी युक्ति से और कम मेहनत से सब कुछ ठीक हो जाना चाहिए, दादी ऐसी समझानी देती थी।

अमृतवेले पर बहुत अटेंशन

दादी का अमृतवेले पर बहुत अटेंशन रहता था। दिल्ली में दिसंबर-जनवरी में बहुत ठंड पड़ती है। शुरू-शुरू में छोटेपन में, कभी-कभी हम कुमारियां सर्दी में अमृतवेले के समय ऊपर अपने कमरे में योग में बैठ जाती थी। दादी हमारे कमरे में आती और कहती, रजाई हटाओ, गर्म कपड़े किसलिए हैं, गर्म कपड़े पहन और नीचे हॉल में जाकर योग करो। तो सभी धारणाओं की हमारी फाउंडेशन दादी बहुत अच्छी तरह पक्की कराती रही, हमें अब तक भी वही आदत पक्की है।

दादी का ध्यान सब तरफ रहता था

क्लास कराते वक्त दादी देखते थे कि किस-किस को नजर देरी से आने वालों की तरफ गई और फिर समझाती कि देखो, तुम्हारा तो उनसे कोई मतलब नहीं है, तुम्हारी कोई उन्हें बिठाने को ड्यूटी भी नहीं है, फिर भी नजर गई, तो यह एकाग्रता नहीं हुई। छोटी-छोटी बातों में कैसे एकाग्र रहना है। इधर-उधर मन जरा भी ना जाए, दादी वे बातें बताती थी। दादी मेरे को कहती थी कि फलाना-फलाना भाई बहुत देर से आया, मैं हैरान होती थी कि दादी को कैसे पता चला। दादी अपने कमरे के बाहर गैलरी में सब कुछ देख लेती थी और कहती थी। इसको प्यार से समझा यह देरी से क्यों आया? जो जल्दी भी आते थे तो भी दादी कहते थी, देखो फलाना-फलाना टाइम पर आता है। उसकी विशेषता ध्यान पर रखो तो दादी का ध्यान सब तरफ रहता था। दादी हम सब पांडव भवन निवासियों के साथ जब बैठती थी तो कहती थी कि सेवा जितना दिल से करोगे, प्यार से करोगे तो आपके नंबर पूरे जमा होगे। कोई-कोई सेवा में थोड़ा आगे-पीछे करते हैं या अलबेलापन करते है या कोई ना कोई बहाना लगा लेते हैं तो दादी हंसी में कहती थी, सबसे अच्छा बहाना करते हैं कि पेट में दर्द है, अब पेट के दर्द का तो कोई थर्मामीटर भी नहीं है जो पता चल सके कि यह सच है या नहीं, बुखार हो तो उसका थर्मामीटर भी होता है। कभी भी किसी भी बात का बहाना नहीं करना है, नहीं तो वही संस्कार बन जाते है।

सेवा का उमंग-उत्साह

दादी बहुत शांत रहती थी लेकिन उनके अंदर सदा सेवा का उमंग-उत्साह भी बहुत रहता था और जो बात दादी कह देती थी तो मैने देखा कि सचमुच वह करना बहुत आसान हो जाता था। एक दिन दादी ने मुझे कहा कि आप पुलिस वालों की सेवा करो। मुझ धोड़ा अजीब लगा क्योंकि उस समय पुलिस वालों की सेवा इतनी आसान नहीं थी और सिक्योरिटी विंग तो बहुत बाद में बना। लेकिन पता नहीं दादी को कैसे यह ख्याल चला तो मैंने 'हां जी' तो कहा परतु थोड़ा-सा विचार आया कि मैं पुलिस वालों को बुलाऊ तो उनको क्या कहूं कैसे कहूं? थोडे ही दिनों में हमने पुलिस अधिकारियों से बात की और सचमुच पुलिस वालों का बहत बड़ा ग्रुप पांडव भवन में आ गया। मुझे बहुत आश्रर्थ लगा। आज तो यह बात बहुत कॉमन हो ग़ई है क्योंकि अब तो पुलिस के बड़े-बड़े पोजिशन वाले आते रहते है। समय बदल चुका है। तब दादी ने उनका क्लास कराया, वे बहुत खुश होकर के गए। पूरी क्लास दत्तचित्त होकर के बैठे रहे, नहीं तो उनके लिए तो समय निकालना भी बहुत मुश्किल होता है। ऐसे ही दादी किसी भी सेवा प्रति जो संकल्प करते थे, वह बहुत आसानी से हो जाता था। दादी की रूहानियत का ऐसा प्रभाव दिखाई पड़ता था।

बुद्धि हमेशा बेहद में रहती थी

एक बार शिवरात्रि के दिन समीप थे, दादी बाहर गए हुए थे और जब वापस लौटे तो देखा कि इतना कोई खास प्रोग्राम नहीं बना है। दादी ने आते ही एक ही दिन में शिव जयंती का बहुत बड़ा प्रोग्राम सेट कर दिया, हम सभी एकदम उसमें लग गए। सेवा का भी दादी को सदा बहुत उत्साह रहता था। एक बार हम दादी के साथ कार से जा रहे थे, चुनाव के दिन थे, दादी ने देखा कि रास्ते में अनेक स्थानों हर एक पार्टी के चुनाव के चिन्ह के झंडे लहरा रहे थे। दादी ने कहा, देखो कितने सुंदर लग रहे हैं, एक दिन ऐसा आएगा कि सब जगह बाबा के झंडे लहराएंगे। दादी की बुद्धि हमेशा बेहद में रहती थी और दादी भविष्य का भी काफी कुछ समझ लेती थी।

लिखने-पढ़ने का बहुत शौक

दादी को लिखने-पढ़ने का भी बहुत शौक था। अक्सर दादी को जब भी टाइम होता, कुछ ना कुछ पढ़ रही होती थी, मुझे बहुत अच्छा लगता था। दादी का कमरा हमारे कमरे के सामने दो है तो मैं कभी भी अंदर चली जाती थी। दादी कुछ लिख रही होती तो मैं कहती कि आप क्या लिख रहे हैं, तो दादी कहती, आपको मालूम है। अभी हमारा भाषण है। मैं उसकी तैयारी कर रही है। बाबा कहता है, बच्चे जब भाषण करने लगते हैं तो कई पॉइंट्स सुनाना भूल जाते हैं इसलिए मैं ध्यान पर रखती हूं और खुद लिखती हूं। जो भी पत्रिका, लिटरेचर आदि छपता था, उसे दादी जरूर देखती और पढ़ती थी। दादी यज्ञ की नंबरवन ऑफिशल संदेशी रही तां हर संदेश खुद लिखती थी। पांडव भवन में दादी ध्यान में जाती और संदेश लाती और उसे खुद ही लिखती फिर मधुबन फैक्स से भेजते, उस समय ई-मेल नहीं थे। हम दादी को कहते, दादी, आप बोलते जाओ, कोई बहन लिखती जाएगी। दादी कहती, नहीं, यह पहले मधुबन में बड़ी दादी के पास जाएगा, वहां से सब तरफ जाएगा। दादी कुछ भी पहले आउट नहीं करती थी। दादी के अंदर बहुत गंभीरता थी और साथ-साथ बहुत रमणीकता भी थी। जहां जैसी जरूरत होती, वैसा ही दादी का रूप दिखाई देता था। दादी को कल्चरल प्रोग्राम भी अच्छा लगता था और दादी आर्ट और कल्चरल विग की चेयरपर्सन भी थी। दादी कहीं आती-जाती, तो हम दादी के लिए बहुत अच्छे-अच्छे छोटे-छोटे डायलॉग भी किया करते थे, दादी को ये बहुत अच्छे लगते थे। दादी व्यापार विंग की भी चेयरपर्सन थी। दादी विंग के प्रोग्रामों में और अन्य सभी बड़े-बड़े प्रोग्रामों में बहुत अच्छी स्पीच देती थी, एक्यूरेट बोलती थी, सबको बहुत पसंद आता टू द पॉइंट बोलती थी। सबके दिल पर अच्छी छाप पड़ती थी।

मुझे कभी दर्द महसूस ही नहीं होता

एक विदेशी भाई, जो बहुत अनन्य था, उसने कहा, मैं दादी के पास मधुबन में भी जरूर मिलने जाता है और कही भी जाता है तो दादी से छुट्टी लेकर जाता है क्योकि दादी थोडे ही शब्दों में मुझे संतुष्ट कर देती है, अपना समय भी बचा लेती है और दूसरों का भी। प्यारी दादी की जब तबीयत थोड़ी नाजुक रहने लगी या कभी भी तबीयत थोड़ी ऊपर-नीचे होती, तो हम दादी को पूछते, दादी जी, दर्द तो नहीं हो रहा? दादी कहती, नहीं, मुझे कभी दर्द महसूस ही नहीं होता, यह मुझे बाबा की बहुत मदद है। सच में दादी जी की शक्ल से हमें कभी लगा ही नहीं कि कुछ दादी को है। हमेशा दादी जैसे बाबा की याद में ही खोई रहती।

'बच्चे, 'तुम विश्व की सेवा करोगे'

दादी व्यक्तिगत जीवन के अच्छे-अच्छे अनुभव भी शेयर करते थे। एक बार दादी ने सुनाया कि जब वे छोटी थी, बोर्डिंग में पढ़ती थी तो लाइन में खड़े हो जाते थे और साकर बाबा उन्हें दृष्टि देते और बड़े प्यारसे कहते, 'बच्चे, 'तुम विश्व की सेवा करोगे। तब हमें विश्व क्या है, यह तो मालूम ही नहीं था, हिंदुस्तान क्या है, यह भी मालूम नहीं था। वह तो बाद में पता चला और आज देखो मैं देश-विदेश में यात्रा पर जा रही हूं, तो यह समय, बाबा को उस समय ही दिखाई पड़ता था। उस समय हम बच्चों को देख कर के बाबा ने जो संकल्प किए थे, वे आज सभी साकार होते देख रही हूं'।
जगदीश भाई जी पाडव भवन में आते थे दादी से राह सलाह करने। एक बार उन्होंने भी मुझसे कहा था कि गुलजार दादी की गंभीरता सबसे ज्यादा है। फिर मुझसे पूछा कि क्या आप कोई बात दादी को सुनाते हो क्योंकि दादी जो बात सुन लेगी, वह अपने में समा कर रखेगी। मैंने कहा, जी भाई साहब, मैं तो हर बात करती ही दादी के साथ हूं। तो कहा, बहुत अच्छा करती हो तुम। मुझे दादी की पालना साकार और सूक्ष्म रूप में, हर पल मिलती रही, यह मेरा बड़ा सौभाग्य रहा इसलिए मुझे कभी लौकिक अलौकिक जीवन में किसी भी बात की दिक्कत या कोई मेहनत नहीं महसूस हुई। बस एक बाबा की श्रीमत है और जो निमित्त हमें कहें, उस पर हमें चलना है, तो कोई भी कार्य कठिन नहीं है, ऐसा मैने अनुभव किया। सदा ही दादी का वरद हस्त हमारे सिर पर रहा।
ऐसी दिव्यता की मूर्ति को, महान विभूति को, प्यारे बाबा के रथ को हम कितना न नमन करें। बारंबार दिल उनके प्रति शत-शत नमन करता है।

बापदादा के बाद किसी को देखना हो तो दादी गुलज़ार को देखो

ब्रह्माकुमारी तारा बहन, शांतिवन
मैं बचपन से ही ज्ञान में हूँ, पूरा लौकिक परिवार भी ज्ञान में चलता है और घर में गीता पाठशाला है। हमारे परिवार से सात सदस्य समर्पित है तथा दो भाई (ब्रह्माकुमार शिवप्रकाश भाई, बर्तन विभाग, शांतिवन तथा ब्रह्माकुमार अर्जुन भाई, बर्तन विभाग, ज्ञान सरोवर) मधुबन में समर्पित है। में 29 साल दादी गुलज़ार जी की सेवा में रही।

ईश्वरीय ज्ञान मिला तो वहुत अच्छा लगा

सन् 1976 में मेरे बड़े भाई अशोक जिस स्कूल में पढ़ते थे उसमें एक बार ब्रह्माकुमारीज़ की ओर से प्रदर्शनी लगी
जहां से वे कुछ किताबें ले आए थे।जैसे साप्ताहिक कोर्स की किताब पथ प्रदर्शनी, बाबा की जीवन कहानी आदि-आदि। उन्हें पढ़कर ही उनका सात दिन का कोर्स हो गया था। फिर उन्हाने हम सभी छोटे भाई बहनों का भी कोर्स करा दिया। लौकिक में बाह्मण परिवार के होने के कारण पिताजी पंडित थे। वे भागवत गीता रामायण अदि कथाएं सुनाते थे। वे कहते थे कि गलत काम करने की सजा मिलती है जैसे कि चोरी करेंगे तो हाथ काट लेंगे, मुख से गलत शब्द बोलेंगे तो बोलनाही बंद हो जाएगा। हमारी भी धार्मिक प्रवृत्ति थी बचपन से ही गलत काम करने से डरते थे। जब ईश्वराय ज्ञान मिला तो बहुत अच्छा लगा।

मुरली पढ़ने की आदत पक्की हो गई

सेंटर बहुत दूर होने के कारण हम नहीं जा पाते थे। बड़े भाई सेंटर से मुरली ले आते थे और हमें पढ़कर सुनाते थे। वे कहते थे। रोज चार्ट लिखना है, बाबा को याद करना है, ज्ञान-स्नान करना है तो हम समझते थे कि ज्ञान की कोई भी किताब या ज्ञानामृत मैगजिन पढ़ेंगे तो भी ज्ञान-स्नान हो जाएगा, मुरली नहीं पढ़ते थे क्योंकि समझ में नहीं आती थी। भाई पूछते कि आज ज्ञान-स्नान किया, क्या पढ़ा, सुनाओ। तो जो पढ़ा होता था, वह सुना देते थे। वे कहते थे कि यह नही मुरली ही भगवान के महावाक्य है। मुरली पढ़ेंगे तो आप के पाप कटेंगे, भगवान से प्रीत जुटेगी। जितनी मुरली पढ़ेंगे उतने विकर्म विनाश होंगे और पुण्य जमा होगा, भविष्य अच्छा होगा। फिर हम 4.5.8 और कभी 10 बार भी मुरली पढ़ते और बताते कि आज हमने 10 बार मुरली पढ़ी, हमारे 10 विकर्म विनाश हुए, ऐसे मुरली पढ़ने की आदत पक्की हो गई। भाई कहते कि ब्राह्मण वह जो कथा सुनाए अर्थात् ज्ञान सुनाए, तो हम बड़े भाई को मुरली पढ़कर सुनाने लगे और हमें जो नहीं समझ में आता था, भाई हमें समझाते थे।

घर में गीता पाठशाला खुल गई

बड़ा भाई सेंटर जाता था तो माता-पिता बहुत विरोध करते थे, उसे तंग करते थे, योग करने नहीं देते थे। शाम को स्कूल से लौटने पर सबके थैले चेक करते थे, मुरली मिली तो फाड़ देते थे। एक बार भाई गुलज़ार दादी के पास दिल्ली, करोलबाग चला गया और चार साल तक नहीं आया। हमें स्कूल में मुरली आदि भेजता था तो हम सभी भाई-बहने जानते थे कि वह दिल्ली में है परंतु माता-पिता को नहीं बताया था। चार साल में माता-पिता बहुत परेशान हो गए, बहुत रोते थे कि पता नहीं कहां चला गया, उसे कुछ हो तो नहीं गया! एक बार हमने माता-पिता से कहा कि अगर अशोक आ जाएगा तो आप क्या करेंगे? उन्होंने कहा कि वह जो कहेगा, वो करेंगे। फिर हम सभी ने अशोक भाई से कहा कि आप घर आ जाओ, अब ये विघ्न नहीं डालेंगे। फिर वह घर आया और गीता पाठशाला खोली, सभी ज्ञान में चलने लगे।

मुझे दादी जी की सेवा पर रखा गया

उसके बाद हम सभी मधुबन आए। अशोक भाई ने बाबा मिलन के कुछ दिन पहले दादी गुलज़ार जी से मिलवाया। साथ में दादी प्रकाशमणि जी भी बैठे थे। भाई ने कहा था कि यदि आप की स्थिति योगयुक्त होगी, देहभान नहीं होगा तो दादी से दृष्टि लेते वक्त आपको ऐसे ही लगेगा जैसे बाबा दृष्टि दे रहा हो। दादी के पूछने पर भाई ने मेरा परिचय कराया। दादी ने पूछा, ब्रह्माकुमारी बनोगी, सेंटर पर रहोगी? मैंने कहा, जी दादी। मैं तो पूरी तरह से तैयार थी, घर में रहते पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था और मैं जल्दी से जल्दी सेंटर पर जाना चाहती थी क्योकि सुना था कि विनाश होने वाला है। परतु मै छोटी थी इसलिए दादी ने कहा कि अभी आप जाओ, पढ़ाई करो फिर दादी आपको बहुत अच्छी जगह पर रखेगी। जब जनवरी, 1990 में हम बाबा से मिलने आए थे तो दादी ने मुझे कहा, आप दिल्ली जाओ, मैं छह माह मधुबन में रहती हूं, मन लगे तो वहां रहना, नहीं तो वापिस आ जाना। फिर मैं दिल्ली, पांडव भवन में सेवा पर रही। जब दादी मधुबन से वापस दिल्ली लौटे तो मैं सेंटर की सेवा के साथ-साथ दादी की भी सेवा करती थी।

दादी हर काम एकदम अनुशासन से करती थी

कहते हैं ना, दुनिया में अगर बाबा के बाद किसी को देखना हो तो दादी को देखो। दादी के बोल, चाल, चलन, हर कर्म में बहुत रॉयल्टी थी। दादी हर काम एकदम अनुशासन से करती थी। जैसे, चप्पल भी उतारती थी तो कायदेमुजीब, हमारी तरह नहीं कि चप्पल उतार कर पीछे मुड़कर भी नहीं देखते कि चप्पल सीधी है, या टेढी है या पलट गई है। चप्पल उतारने के तरीके से भी पता चलता है कि यह व्यक्ति कैसा है। ऐसे कई छोटी-छोटी बातें हम दादी से सीखते थे। कई बार हम कुछ सोच रहे होते हैं तो वह हमारे चेहरे पर नजर आता था परंतु दादी का कभी ऐसा नहीं देखा।

दादी जब भी फ्री होती थी, मुरली पढ़ती रहती थी

बाबा का रथ होते हुए भी उनका अपना पुरुषार्थ बहुत श्रेष्ठ रहा। दादी कभी भी मुरली मिस नहीं करती थी। एक बार दादी जानकी स्टेज पर मुरली सुना रही थी और दादी टीवी पर देख रही थी। दादी ने प्रश्न पूछा होगा, किसी ने उत्तर नहीं दिया और दिया भी हो तो टीवी पर दिखाई नहीं दिया, तो दादी ने कहा, देखो, दादी प्रश्न पूछ रही हैं और कोई उत्तर नहीं दे रहा है। दादी खुद डायरी पेन लेकर मुरली से नोट्स निकालती थी। एक बार मैने कहा, दादी, आपने तो इतनी मुरलियाँ पढ़ी हैं, अब मुरली पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत है? तो दादी ने कहा, नहीं, स्टूडेंट लाइफ है ना, जब तक जीना है तब तक पढ़ना है। दादी जब भी फ्री होती थी, मुरली पढ़ती रहती थी। क्लास कराती थी तो भी कहती थी कि भगवान भी अपने से आगे मुरली को रखता है, मुरली से प्यार माना मुरलीधर से प्यार, तो पहला प्यार मुरली से होना चाहिए। आप कहते हैं कि मेरा बाबा से 100 परसेंट प्यार है और बाबा की मुरली आप नहीं सुनते, उनका कहना नहीं मानते तो प्यार कैसे हुआ। आप रोज सुबह उठकर अपने माता-पिता के पांव छुएँ और वे जो कहते हैं, आप न मानें तो क्या वे खुश होगे? ऐसे ही मुरली सुनने का टाइम नहीं है या कभी-कभी सुन लेते हैं तो यह बाबा से प्यार नहीं हुआ।

दादी कहती, बाबा की मुरली साज के रूप में सुनो

यदि कभी कोई कहते कि मुरली में रोज वही वही तो पाँइट है कि अपने को आत्मा समझ मुझ पिता को याद करो तो दादी कहती कि रोज वही पॉइंट सुनते हैं परंतु परिवर्तन नहीं होता है लेकिन किसी दिन वही पॉइंट सुनके आपका जीवन परिवर्तन हो जाएगा। दुनिया में काठ की मुरली से जैसे भिन्न-भिन्न साज निकलते है। वैसे बाबा की मुरली भी आप साज के रूप में सुनो। मुरली में कभी कुछ लहर होती है, कभी कुछ लहर होती है, तो संगीत के रूप में सुनेंगे तो मुरली में मन लगेगा। मुरली में चारों सब्जेक्ट आते है। शुरू-शुरू में हम एक ही पेज पर चार कॉलम बनाते थे, ज्ञान की पॉइंट आई तो ज्ञान के कॉलम में लिखते थे, योग की, योग के कॉलम में, धारणा की, धारणा के कॉलम में और सेवा की, सेवा के कॉलम में। इससे मुरली में ध्यान (अटेंशन) रहता है, मन लगा रहता है। फिर कभी कहते कि भगवान इतनी दूर से हमें पढ़ाने के लिए आए हैं, हमने ही उन्हें बुलाया कि हम दुखी हैं, आओ और अब हम ही कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं है, या मुरली सुनते वक्त सोते हैं या उबासी आती है। बाबा कहते हैं ना कि अच्छे दुकानदार को खाने के लिए भी फुर्सत नहीं होती, वह इतना बिजी रहता है, कभी सोता हुआ या उबासी लेता हुआ दिखाई नहीं देता। मुरली इस तरह सुनेंगे तो अवस्था अच्छी रहेगी। लगेगा कि नई नई पॉइंट सुन रह है। कभी कहते कि आप सारी मुरली नहीं याद रख सकते तो कम से कम मुरली का सार प्रश्न-उत्तर, धारणा को पाँइट वरदान या स्लोगन तो याद रखो। स्लोगन तो आधी लाइन का होता है, वह तो याद रख ही सकते हैं।

दादी सरल रीति से समझाती थी

कई बार दादी से मिलने पार्टी वाले आते थे, दादी उनसे पूछती आज बाबा ने क्या सुनाया? उस दिन भले दादी ने उस वक्त एक बार भी मुरली नहीं पढी होगी फिर भी बाबा उनको ऐसे टच कर देता था जो दादी (जब कोई नहीं सुना पाता तो मुरली का सार, प्रश्नोत्तर, वरदान, स्लोगन सुना देती। कहती कि मुरली की आधी लाइन भी याद नहीं तो बाबा से प्यार कैसे हो सकता है? किसी माता के बच्चे का विदेश से चार पेज का पत्र आएगा तो वह पढ़ेगी, सुनेगी और वैसा का वैसा दस बार सुना देगी परंतु मुरली की एक भी पॉइट याद नहीं आती क्योंकि बच्चे से प्यार है ना इसलिए उसको सारी बातें याद हो जाती हैं। ऐसे ही अगर भगवान से प्यार होगा तो मुरली भी याद रहेगी और अमृतवेले से रात तक किसी भी नियम को धारणा करने में आपको कभी मेहनत नहीं लगेगी। कुछ भाई-बहने कहते कि पुरुषार्थ में बहुत मेहनत है, तो दादी कहती कि जहाँ मुहब्बत होती है वहाँ मेहनत नहीं होती, जैसेकि एक मां बच्चे के लिए रात भर जागती है, तो बोलती है क्या कि मैं सारी रात जागी? कभी किसी पड़ोसी के लिए जागना पड़ा, दवा आदि देने के लिए तो
सबको बताएगी कि मैं रात भर जागी। इस तरह दादी सरल रीति से समझाती थी।

दादी इस दुनिया में रहते भी देवता थी

हम अकेले रूम में हो तो सोचते हैं कि कौन देख रहा है कैसे भी चलते हैं। उठते बैठते हैं परंतु दादी रूम में अकेले होते तो भी बहत रॉयल रीति से उनका उठना बैठना लिखना, चलना आदि होता था। बहुत एकाग्रता से हर कार्य करते थे। कोई बाहर से आता-जाता, तो भी दादी का ध्यान उधर नहीं जाता इसलिए उनका हर कर्म कला के रूप में था। हम चलते हैं तो पैरों की आवाज होती है परंतु दादी, पास से चार बार भी गुजर जाए तो भी पता नहीं पड़ता था। दादी इस दुनिया में रहते भी देवता थी। दादी में इतनी रॉयल्टो थी कि यदि कोई सामने खड़ा है तो कभी खांसी नहीं, उबासी नहीं लेगी, अगर आती भी तो रूमाल इस्तेमाल करती। यदि कोई चीज किसी जगह पर नहीं होती, कहीं और होती तो दादी खुद वह चीज ठीक करती। हम कहते, दादी, आपने हमें क्यों नहीं कहा परंतु दादी किसी को कुछ कहके नहीं, करके सिखाती थी। एक बार दादी ने मुझे कहा कि ये सारी किताबें अलमारी में रख दो। मैंने अव्यक्त वाणी एक तरफ रखी, दूसरी किताबें दूसरी तरफ रखी, अच्छी तरह अलमारी जमा दी। दादी ने देखा तो कहा, ऐसे नहीं, सिरीयलवाइज रखो। पहले 1970 की अव्यक्त वार्थ्यािं, फिर 1980 की, उसके बाद 1990 की रखो। बड़ी किताबें नीचे रखो, छोटी उनके ऊपर रखो। उनके ऊपर फिर चिटकी भी लगवा दी कि यह अव्यक्त वाणी है या किताब है ताकि किसी को भी भेजे तो वह आराम से वह किताब ला सके। इस तरह दादी अपना हर कार्य बहुत एक्यूरेसी में करती थी।

दादी हर छोटी-छोटी बातें बहुत प्यार से सिखाती थी

बाबा-मिलन का टर्न खत्म होने के बाद दादी देश-विदेश में भी सेवार्थ जाती थी क्योंकि कई देश ऐसे थे जहां से बच्चे बाबा-मिलन में नहीं आ पाते थे, तो उनकी भावना होती थी कि हम कम से कम भगवान के रथ को तो देख लें। जब भी दादी कहीं जाती तो मैं नीलू बहन जी के साथ पैकिग करती थी, टोली, सौगात, कपडे आदि रखती थी। एक बार दादी एक माह के विदेश टूअर से वापस आए और मुझे कहा, आपसे एक बहुत बड़ी गलती हुई है। मुझे जब याद नहीं आया कि क्या गलती हुई है तो दादी ने कहा, मुरली आत्मा का भोजन है, आप मुरली रखना भूल गए। उस जमाने में इंटरनेट, मोबाइल आदि नहीं थे जो सिंधी मुरली मिल सके। तबसे दादों के सामान में पहले मुरली रखती थी फिर बाकी सामान। ऐसे दादी प्यार से समझाती थी, कभी डांटती नहीं थी। दादी हर छोटी-छोटी बातें बहुत प्यार से सिखाती थी। दादी ने कभी डांटा नहीं। एक बार हम क्लास में थर्मस से पानी निकाल रहे थे तो गिलास भी पूरा भर गया, पानी ट्रे में भी गिर गया और थोड़ा नीचे भी गिर गया। दादी ने फिर सिखाया कि इतना पानी गिलास में रहे जो किसी को उठा कर देने में गिलास छलके नहीं।

दादी बाबा की टचिंग बहुत स्पष्टता से कैच करती थी

बाबा-मिलन की सीजन में दिल्ली से मधुबन आने से पहले दादी दिल्ली के साथी निवासियों की क्लास में कुछ न कुछ होमवर्क देकर आती। एक बार कहा कि अभी क्रोधमुक्त का चार्ट रखना और मुझे मधुबन में भेजते रहना। उसके दो दिन बाद बाबा-मिलन की मुरली पूरी क्रोधमुक्त पर चली। ऐसे ही एक बार दादी ने परोपकारी विषय पर क्लास कराई और फिर बाबा-मिलन में बाबा की उसी टॉपिक पर मुरली थी। ऐसे कई बार हमने देखा कि दादी इतनी क्लीन एंड क्लियर माइंड थी कि बाबा की टचिंग बहुत स्पष्टता से कैच करती थी, तभी हमें लगता कि यह दादी नहीं, बाबा ही बोल रहा है। हमने कभी दादी के शब्दों को हल्के में नहीं लिया, यही समझा कि बाबा बोल रहा है।

दादी के कमरे में जाते तो अशरीरी हो जाते थे

दादी जानकी कई बार दादी को बाबा से अपने लिए संदेश लाने को कहते थे। दादी संदेश लाते और एक चिटकी पर लिख कर देते थे। जो भी संदेश दादी लाते, बहुत एकाग्रता से अपने कमरे में बैठकर जैसे का वैसा लिखते थे। कोई-कोई संदेश तो 3,4 पेज तक के बड़े-बड़े होते थे। लिखते वक्त दादी इधर-उधर नहीं देखती थी, नहीं तो थोड़ी भी आवाज हो तो हमारा ध्यान जाता है परंतु दादी एकदम एकाग्रता से हर कार्य करती थी। दादी के कमरे में बहुत साइलेंस रहती थी। हम यदि उनके कमरे में गए तो अशरीरी हो जाते थे और संकल्प शांत हो जाते थे।

दादी की दृष्टि पड़ते ही आत्माओं की समस्याएँ हल हो जाती थी

दादी के दिल्ली में आते ही सारा वातावरण ही बदल जाता था। हलचल मचाने वाली आत्माएं भी शांत हो जाती थी। दादी की दृष्टि पडते ही सामने वाली आत्मा की समस्या हल हो जाती थी। मधुबन में दादी पार्टियों से मिलती थी। उन लोगों के मन में कई प्रश्न होते थे, कोई बहुत दुखी होता था, कोई सोचता था कि हम दादी से मिलेंगे तो यह प्रश्न पूछेगे, वह पूछेंगे। परंतु, जैसे ही दादी आते, दृष्टि देते, कई तो अपने प्रश्न ही भूल जाते थे और कईयों को दादी की बातों में ही अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाता था। वे सभी भाव विभोर हो जाते थे।

दादी जानकी और दादी गुलज़ार, दोनों का आपस में बहुत प्यार और रिगार्ड था

सभी दादियाँ भी दादी का बहुत सम्मान रखती थी। दादी मधुबन में आते, सभी दादियाँ मिलते, बात करते, अपनी-अपनी राय रखते फिर आखिर में कहते कि जो दादी (गुलज़ार दादी) बोलेगी वोही ठीक। फिर दादी बहुत कम शब्दों में कुछ कहते थे, एकदम एक्यूरेट। ऐसे ही दादी भी सभी का रिगार्ड रखती थी। जानकी दादी उनसे मिलने आते, हम कहते दादी आराम कर रहे हैं तो दादी जानकी कहते मै बस उन्हें देख कर चली जाऊंगी और जैसे ही दादी जानकी उनके कमरे में जाते, दादी उठ जाते जैसे कि जाग रहे हो और खड़े हो जाते जानकी दादी मना करती तो कहते। आप खड़े हैं में कैसे लेटे रहूं ! तो उठकर दादी को मिलते फिर उन्हें दरवाजे तक छोड़ने भी जाते । एक बार हमे दादी को उठाने जाना था और दादी सोए थे। तो हम सोचे कि कैसे दादी को उठाएं और तभी दादी ने आंखें खोली, कहा, अच्छा समय हो गया क्या? दादी भोजन करने बैठते और जानकी दादी की गाडी की आवाज आती तो भोजन नहीं करते कि अभी दादी आयेंगे, पहले उनसे मिलेंगे। जानकी दादी भी रुक जाते कि पहले दादी भोजन करलें, फिर जाएंगे। ऐसे दोनों का आपस में बहुत प्यार और रिगार्ड था।

सभी धर्मों की आत्माओं के पिता ईश्वर, अल्लाह एक ही हैं

एक बार, एक मुस्लिम भाई बाबा-मिलन में आया। उसके मन में जिज्ञासा थी कि बाबा कैसे आते हैं दादी के तन में तथा दादी और बाबा में क्या अंतर है? वह बाबा मिलन के दो दिन पहले दादी जी से मिलने आया। दादी ने उसे बताया कि 'सभी धर्मों की आत्माओं के पिता ईश्वर, अल्लाह एक ही हैं, आप रात में सोने के पहले उन्हें अपने सारे दिन की दिनचर्या बता के, सब कुछ खत्म करके, गुडनाइट करके सोना, सुबह गुडमॉर्निंग करके उठना और भगवान, अल्लाह, परमात्मा को याद करना। सुबह 4:00 बजे संगठन में योग के लिए आना।' वह बहुत ध्यान से सुन रहा था और दादी को देख रहा था। उसने रात में बाबा को पोतामेल दिया परंतु उसके मन में संकल्प आया कि यदि यह बाबा मुझे हमारे धर्म के मुताबिक टोपी, कुर्ता और धोती में दिखेंगे तब मै मानूंगा यही हमारे अल्लाह है। सुबह 3:30 बजे का गीत बजा, उसकी नींद खुली। उसने देखा कि सभी लोग तैयार होकर संगठित योग के लिए जा रहे हैं परन्तु वह फिर सो गया। कुछ समय बाद 4:00 बजे उसकी खटिया हिली। उसने आखें खोली तो उसे बाबा, उसके धर्म के लिबास के मुताबिक टोपी, कुर्ता और धोती में नजर आए। तब निश्वय हुआ, उठकर संगठित योग में भी गया और वह बाबा का बच्चा बन गया। जैसे महाभारत में बताते हैं कि किसी का जन्म कान द्वारा हुआ, किसी का मुख द्वारा हुआ, किसी का नैनों द्वारा। ऐसे किसी का जन्म होता नहीं है परंतु यहां पर कोई का दृष्टि से या कोई का कानों द्वारा महावाक्य सनने से जीवन परिवर्तन हो जाता है।

जो भी सुनाओ उसका आध्यात्मिक अर्थ हो

हम घर में रामायण, महाभारत आदि पढ़ते थे। तो एक बार मैंने दादी को कहा था कि मैं आपको रामायण की चौपाई सुनाऊँ? दादी ने कहा, सुनाओ। तो हम जैसे गाते थे, बिना अर्थ समझे, वैसे सुना दी, 'प्रभु की कृपा भयो..।' दादी ने उसका अर्थ समझाया कि जब प्रभु की कृपा हुई तो हमारा जन्म हो गया, हमारा जीवन सफल हो गया। ऐसे ही दूसरी चौपाई सुनाई तो दादी ने उसका भी अर्थ मुझे समझाया। मैं जो भी चौपाई सुनाती, दादी अर्थ समझाती थी। मुझे बहुत अच्छा लगता था क्योंकि अर्थ पता नहीं था। दादी ने बताया कि आत्मा को भी राम कहते हैं, त्रेता वाला राम भी है, दशरथ थी जो भी साओ उसका आध्यात्मिक अर्थ सुनने वाले का बालाराम भी है भगवान को भी राम कहते हैं ऐसे दादी कहती फायदा हो। दुनिया को बाते फालतु की कहानियाँ टकल आरि व्यर्थ एनजी गंवाते है।

एक गुण भी धारण करेंगे तो सारे गुण हममें स्वतः आ जाएंगे

एक बार रविवार का दिन था। कई बुढी भोली माता मुरली सुनकर आ रही थी। मैने कहा कि अव्यक्त वाणी तीन-चार बार पढ़ते है तब जाकर हमें कुछ समझ में आता है। इन भोली माताओ को क्या समझ में आता होगा परन्तु नियम में पक्की है। दादी ने कहा नहीं, ये सुबह से उठती है तैयार होती है। यही धुन रहती है कि बाबा की मुरली सुनने जाना है या योग में जाना है तो उसके भी नंबर जमा होते है। इसलिए कभी दिलशिकस्त नहीं होना चाहिए कि मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता या मैं क्लास में जा नहीं सकती। सदा मन में रहे, कुछ भी हो, मुझे मुरली सुनने जाना है और योग भी करना है। सब समय पर करना है, उसके भी नंबर मिलते हैं। दुनिया में स्कूल में छात्र लेट गए तो क्या होता है? पनिशमेंट मिलती है और यहा ती हमारे बाप का घर है, जब मर्जी जाओ, जब मर्जी आओ लेकिन नहीं। बाबा ने टाइम रखा है तो जरूर समय पर पहुंचना अभी भी ऑनलाइन वीडियो चला देते हैं तो चलते-फिरते, घर के कामकाज करते मुरली सुनते हैं, कोई तो बिना स्नान किए भी बैठ जाते हैं। ऐसे मुरली नहीं सुनी जाती। आधी सुनी, आधी नहीं, कुछ समझा कुछ नहीं समझा। कायदे प्रमाण, अपनी यूनिफॉर्म में तैयार कर मुरली सुननी चाहिए, जैसे सेंटर या मधुबन में सुनते है। घर में बैठे भी पुरुषार्थ करो। बाबा ने जो कहा, वह हम सुनकर अपने जीवन में धारण करते चलना है। एक गुण भी धारण करेंगे तो सारे गुण हममें स्वतः आ जाएंगे। औरों को नहीं देखना है कि वह तो नही कर रहा यह तो नहीं कर रहा है। यदि हमें आगे जाना है तो हमें धारणा करनी है। दुनिया में भी सर्व प्राप्ति संपन्न व्यक्ति के बोल, चाल, चलन में वह नशा दिखाई देता है। हम तो भगवान के बच्चे है। हमारे चेहरे की चमक ऐसी हो जैसे दीदी-दादियों के चेहरे पर विश्व महाराज की चमक है। इसके लिए बाबा कहते। बीच-बीच में अपने संकल्पों को एकाग्र करने का अभ्यास करो।' दादी कहती थी कि 'यदि आपको दिन में समय नहीं मिलता, तो भी जब आप पानी पीते हैं तो बाबा की याद में रहो। ऐसे हर घंटे में बीच-बीच में याद का समय निकालो, जिससे लिंक जुटी रहेगी तो फिर योग लगाने में मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।'

अपनी कमी-कमजोरियां बाबा को दे दो

दादी कहती थी, 'भट्ठी माना परिवर्तन। एक लकड़ी से उतनी आग नहीं जलती है परंतु जहाँ ज्यादा लकड़ियां जलती हैं तो बड़ी से बड़ी चीज को भी भस्म कर देती हैं। जैसे कच्ची ईट भट्ठी में एक कर निकलती है, ऐसे मजबूत बनने के लिए भट्टी रखी जाती है कि संगठन में सबको एक-दो का सहयोग मिल सके।' दादी कहती थी 'हर एक को अपनी कमी-कमजोरियों का पता होता है कि मुझमें क्रोध ज्यादा है या कुछ और तो सबकुछ बाबा को दे दो जब क्रोध आएगा तो आपको याद आएगा कि यह बात तो मैंने बाबा को दे दी इससे परिवर्तन में मदद मिलेगी ।

हर काम में अनुशासन

एक बार दादी से किसी ने पूछा कि मम्मा ने ऐसा क्या पुरुषार्थ किया जो इतने कम समय में संपूर्ण बन गई? दादी ने कहा जो बाबा ने कहा, मम्मा ने किया। मम्मा-बाबा को फॉलो करना है और कुछ नहीं बस दुनिया में तो वो लोग कितनी कठोर तपस्या करते है, पानी में, जंगलों में, एक टांग पर खड़े होकर। हमारा तो सहयोग है । ऐसा कहकर हम अलबेले बन जाते । दादी हर काम बहुत अनुशासन से करती थी। एक बार अव्यक्त वाणी लेने में डिपार्टमेंट में गई, वहां ताला लगा था। मैने कहा, इंचार्ज नहीं है। ' मै अभी अव्यक्त वाणी ले आती हूं। बाद में उन्हें बता देंगे कि आपके लिए लेकर गए हैं।' दादी ने कहा, 'नहीं, जब इंचार्ज आएगे तो उन्हीं से लेकर आना।' दादी को सदा रहता था कि जैसे कर्म मैं करूंगी, मुझे देख और करेंगे। आज मैं दादी के लिए बिना पूछे किताब ले आती तो हो सकता है कल किसी और के लिए भी ले आऊं, ऐसे दादी छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखती थी। दादी छोटो से कहती कि यदि आपको कुछ चाहिए तो मुझे बताना और बड़ों से कहती, आप छोटों का भी ध्यान रखना।

बाबा भी दादी का वहुत रिगार्ड रखते थे

दादी बहुत न्यारी-प्यारी रहती थी। दादी से सभी का बहुत प्यार था ।मीटिंग में भी दादी का सभी इंतजार करते थे। दादी कमलमणि रुकमणी दादी जब दादी आते तो खड़े हो जाते थे। दादी मना करते थे। भोजन करते भी इंतजार करते थे। दादी निरहंकारी निर्मान निरसंकल्प और बिल्कूल बाप समान थे। एक बार बाहर के बच्चों के प्रोग्राम में दादी आई थी। सभी बच्चे एक लाइन में खड़े होकर दादी से दृष्टि ले रहे थे। वे दृष्टि को इतना जानते नही थे फिर भी उन्हें दादी की बहुत कशिश हो रही थी। बाबा भी दादी का बहुत रिगार्ड रखते थे। कई संदेशो में हम सुनते हैं कि बाबा वतन में दादी का इंतजार करते हुए कहते कि आओ बाप की दिलतखतनशीन बच्ची आओ। बाँहें पसारे कभी कुछ, कभी कुछ टाइटल से दादी का स्वागत करते थे। दादी भी बाबा मिलन के दिन के लिए बहुत तैयारियां करती थी। उन दिनों बहुत ठंडी चीजे नहीं खाती थी, साइलेंस में बहुत रहती थी, जैसे वतन में ही हो क्योकि बाबा आने वाला है। उस दिन कॉटेज में भी सत्राटा छा जाता, जैसे बाबा आया हुआ हो।

दादी इशारों से बातें करती थी

जैसे ब्रह्माबाबा के अव्यक्त होने के दिन बाबा ने रात में मुरली चलाई और कहा, 'अच्छा, बच्चों से बिदाई।' ऐसे ही, 2017 में अव्यक्त बापदादा के आखिरी मिलन में बाबा से पूछा गया, 'अगले वर्ष क्या?' तो बाबा ने कहा, 'समाप्ति वर्ष।' उसके बाद से जैसे वह पार्ट समाप्त हो गया और दादी मुंबई चली गई। दादी इशारों से बातें करती थी। एकदम साइलेंस में रहती थी। जैसे बाबा के नैनों से हम समझ जाते हैं ना वैसे ही दादी के नैनों से भी हम समझ जाते थे। कभी कुछ दादी को दिखाते तो हमें खुश करने के लिए देखती थी, मुस्कराती थी। दादी से मिलने वालों के संकल्प पूरे हो जाते थे। एक बार किसी ने दादी से मिलने के बाद संकल्प किया कि ये बीके लोग क्लास कराते हैं, मिलते है तो ओमशांति कहते हैं परंतु इनका बाबा ओमशांति क्यो नहीं कहता? उस मिलन में बाबा आए तो बाबा ने कहा, 'ओमशांति।

बाबा का वरदान है, मुझे दर्द का अनुभव नहीं होता है

एक बार, एक माता पीछे कोने में बैठी रो रही थी कि मुझे आगे नहीं बैठने दिया गया और उस मुरली में बाबा ने कहा कि बाबा आगे वालों को नहीं, पीछे कोने में बैठने वालों को देख रहा है। दादी के लिए डॉक्टर को कॉल करते थे तो चाहे 2:00 बज रहे हो। 4:00 बज रहे हों, चाहे लॉकडाउन हो, चाहे डॉक्टर बहुत बिजी हो, तो भी दादी को देखने के लिए आ जाते थे। दादी उनसे पूछती थी, 'आप कैसे हो?' वे पूछते, 'दादी, आपको कहां दर्द है?' तो दादी कहती, 'बाबा का वरदान है, मुझे दर्द का अनुभव नहीं होता है।' वे लोग भी समझते कि मंदिर में आए हैं। वे भी कुछ संकल्प लेके आते थे कि यह ब्रह्माकुमारी संस्था की चीफ है, हम ऐसा संकल्प करेंगे तो हमें यह फायदा हो जाएगा। फिर वो अनुभव भी सुनाते थे। कई नर्स बहनों ने भी अनुभव सुनाए कि हमारा तबादला हो गया, हमारी पदोत्रति हो गई। किसी डॉक्टर का कोई काम नहीं हो रहा था तो उसका रुका हुआ काम भी हो गया।

दादी सवको दृष्टि देकर, शक्ति भर कर चली गई

दादी आखिरी तीन साल मुंबई में रही परंतु आखिरी एक माह ही अस्पताल में थी। बाकी समय सेंटर पर ही रही। आखिरी दिन कोरोना के होते भी अस्पताल वालों ने सारे बंधन हटा दिए, सभी को आने दिया। सभी वरिष्ठ भाई-बहने आए, दादी से मिले, दृष्टि ली। उस समय 10:30 बजे का रिकॉर्ड बज रहा था और जैसे बाबा जाता है, वैसे ही दादी ने आंखे बंद की, जैसे कि बाबा आया और दादी को ले गया। फिर कमरे में एकदम साइलेंस हो गयी। दुख वाली साइलेंस नहीं। सभी वहीं के वहीं खड़े रहे। ऐसे दादी सबको दृष्टि देकर, शक्ति भर कर चली गई। दादी ने कहा था, 'आपको अभी साइलेंस में रहना है, बाबा को याद करना है।' हमें रोज दादी याद आती है क्योंकि अव्यक्त बाबा को देखते हैं तो लगता है जैसे दादी ही है।

दादी जी की श्रेष्ठ मत ने किया निश्चिंत

ब्रह्माकुमारी कैलाश, गांधीनगर (गुजरात)
बाबा के अव्यक्त होने के बाद, वरिष्ठ दादियों के साथ मधुबन में रहने का परम सौभाग्य मुझे मिला। उस पालना को मैं कभी नहीं भूल सकती हूं। वह शक्ति आज भी अच्छी तरह से चला रही है।
जब भी किसी भाई या बहन को, किसी भी प्रकार की परिस्थिति आ जाती तो संदेशी होने के कारण वे मुझे फोन करते थे कि 'दीदी, हमारा भाई या बहन बीमार है, बहुत गंभीर स्थिति है, आप अभी ही बैठकर योग करो ।' कभी-कभी तो हम उन लोगो के कहने से विशेष योग कर पाते थे पर कभी-कभी योग में बैठना बहुत मुश्किल लगता था क्योंकि कोई न कोई ग्रुप कहीं न कही से आता रहता था तो उनको संभाले या योग करने बैठे। मेरे मन में ख्याल आया कि आदरणीय गुलज़ार दादी जो से पूंछू । मैंने दादी जी को बताया कि कई बार, कई लोग मुझे योग करने के लिए कहते हैं पर मेरे पास तब योग करने का समय नहीं होता है, स्थिति गंभीर होती है तो मैं क्या करूं? दादी जी ने मुझे बहुत अच्छी श्रीमत दी। दादी जी ने कहा, 'अगर आपके पास योग में बैठने का समय नहीं है पर योगदान देना जरूरी है तो एक मिनट में बाबा के कमरे में जाकर बाबा को बोल दो कि फलाने भाई या बहन की तबीयत बहुत खराब है या अमुक परिस्थिति है, बाबा, आप उस आत्मा को मदद करो। बाबा को बोल देने से बाबा अपने आप ही जवाबदारी ले लेंगे, बाबा उस आत्मा के पास पहुंच जाएंगे। जब आपका काम पूरा हो जाए तब आप भी योगदान देना।' तब से लेकर मैं बहुत निश्चित हो गई। कभी भी, कुछ भी होता है तो मैं तुरंत बाबा को बोलती हूं कि 'बाबा, आप उस आत्मा के पास जल्दी पहुंच जाओ, मैं पीछे से आती हूं। आप तो सेकंड में पहुंच जाएंगे, मुझे आने में देरी लगेगी।' जब से दादी ने ऐसे बोला है तब से मैंने अनुभव किया है कि सर्वशक्तिमान बाबा बहुत जल्दी वहां पहुंचकर, उन आत्माओं को मदद करते है। बाबा को कहने से, बाबा को सौंप देने से, बाबा जवाबदार हो जाते है। यह श्रेष्ठ श्रीमत अनेक आत्माओं के लिए समय पर मददगार बनी है।
एक बार की बात है, गुलजार दादी जी, सर्वशक्तिमान बाबा का रथ दिल्ली में अचानक बाथरूम में गिर गए थे , उनके कमर के मणके में चोट आई थी। कुछ समय दादी जी को अहमदाबाद स्टर्लिंग हॉस्पिटल में दाखिल किया गया था। स्टलिंग हॉस्पिटल में अचानक दादी जी बहुत सीरियस होती जा रही थी। डॉक्टरों की पुरी टीम कुछ पकड नहीं पा रही थी नीलू बहन ने तुरंत जानकी दादी जी को माउंट आबू से बुला लिया । दादी की तुरंत आ गई। दादी जानकी जी को तब सकल्प आया कि बाबा को पुछे और मुझे गांधीनगर में फोन आया कि कैलाश बहन आप अभी-अभी बाबा के पास जाओ मेरी भी याद देना और बाबाको कहना कि गुलज़ार दादी जी की तबीयत बहुत खराब हो रही है तो हम क्या करें? मैं बाबा के पास गई। बाबा ने कहा, गुलबर बच्ची ठीक हो जाएगी लेकिन डॉक्टर उनको जो दवाई दे रहे है उसमे कैल्शियम का हाई डोज जा रहा है, आप इतना कहना, तो डॉक्टर समझ जाएंगे।' फिर जानको दादी ने डॉक्टर्स की टीम को यह संदेश दिया। उन सभी ने दिल्ली वाली और अन्य अलग-अलग दवाइयां चेक की तो कैल्शियम ज्यादा जा रहा था, फिर डाउन करने की दवाई दी और दादी जी ठीक होने लगे। सभी डॉक्टर ने आश्चर्य खाया और पूछा कि किसने यह संदेश दिया? दादी जानकी जी ने बताया कि स्वयं परमात्मा ने यह संदेश दिया है। डॉक्टर्स की टीम मान गई कि सच में भगवान सुप्रीम सर्जन है।
बहुत समय के बाद जब मैं दादी जी को मिलने के लिए अहमदाबाद गई, तो बाहर बैठी हुई थी। दादी जी को किसी के द्वारा पता चला कि कैलाश बाहर बैठी हुई है तो दादी जी ने मुझे तुरंत ही बुला लिया। दादी जी मुझे दृष्टि देती रही। फिर कहा, 'कैलाश बहन, आप बाबा के पास जाकर बाबा का संदेश लेकर के आए और दादी ठीक हो गई। जानकी दादीजी ने संदेश लाने के आपको निम्मित बनाया। फिर दादी जी ने बड़े प्यार से एक बहुत अच्छी पेन दी टोली का बॉक्स दिया और एक सेब दिया। दादी जी बड़े प्यार से मिले और काफी समय तक फिर से दृष्टि देते रहे। देखो भगवान का रथ इतनी ऊंची हस्ती होते हुए भी कितनी निर्मानत्ता से हमें मिली। ऐसी थी हम सबकी प्यारी गुलज़ार दादी जी। ऐसी बाप समान दादी जो को कोटि-कोटि नमन।

बाबा वाली दादी ! तुम हो ओ दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमार सतीश, 'सरल' मधुबन
इतिहास में स्वर्णाक्षरों से नाम लिखा जाएगा,
दादी हृदयमोहिनी को याद रखा जाएगा,
ईश्वरीय परिवार की तुम शोभा और श्रृंगार,
बाबा वाली दादी। तुम हो ओ दादी गुलज़ार।।
नयन वरदानी तुम्हारे, प्रभु से मिले वरदान
भगवान ने देखा हमें हमने देखा भगवान,
रब का सबने था किया जिन आंखों से दीदार
बाबा वाली दादी! तुम हो ओ दादी गुलज़ार ।।
स्वप्न और संकल्प से भी सबको सुख देती रही,
सेवा में सब स्वाहा करके पालना करती रही,
सरलता की मूर्ति सब शिक्षाए थी साकार
बाबा वाली दादी। तुम हो ओ दादी गुलजार।
अव्यक्त मिलन-पालना तुम बिन न संभव रहा,
बाबा-दादी, दादी-बाबा कोई भी ना अंतर रहा
आधार संगमयुग की तुम, फिर भी निरहंकार,
बाबा वाली दादी! तुम हो ओ दादी गुलज़ार ।।
उड चले हैं फरिश्ते सभी वतन की ओर,
डाल कर कंठ अपने, प्रभुप्रेम की डोर
कह रही करके इशारा आ जाओ इस पार,
बाबा वाली दादी तुम हो ओ दादी गुलजार।।

बाबा ने गुलज़ार दादी को संदेशपुत्री का नाम दिया

ब्रह्माकुमार आत्मप्रकाश भाईजी, मधुबन
विशालहृदय, गंभीर एवं शांतचित्त परम आदरणीय गुलज़ार दादी जो इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की अति विशिष्ट एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं में से एक थी। मैंने इस ज्ञान मार्ग में सन् 1972 में प्रवेश किया, तब से मैं गुलज़ार दादी जी के संपर्क में आया। उनके जीवन को मैंने बहुत नजदीक से देखा और बहुत-सी बाते सीखी सन् 1988 में आदरणीय गुलज़ार दादी जी का मैंने इंटरव्यू लिया और दादी जी के जीवन से जुड़े हुए बहुत सुंदर अनुभव, प्रश्नों के रूप में उनसे पूछे-
प्रश्न - दादी जी आपका ध्यान का पार्ट कब से शुरू हुआ कैसे शुरू हुआ?
उत्तर: यज्ञ का शुरुआत में जब मैं आई 9 वर्षकी उम्र की थी । इसके बाद 6 वर्ष तक मुझे कोई भी साक्षात्कार नहीं हुआ। एक बार ब्रम्हा बाबा ने हमें मौन में रहने की प्रेरणा दी 8 दिन तक मैं और मेरे साथ एक बहन मौन रहकर शांति में बैठती थी। एक दिन कमरे के सामने बालकनी में हम बैठे हुए थे और अचानक मैं गुम हो गई। मैंने सक्ष्मवतन और ब्रह्माबाबा का साक्षात्कार किया। जब मैं नीचे आई तो मेरे साथ बैठी हुई बहन मुझे मम्मा के पास ले गई। मम्मा ने मुझसे पूछा, आपने क्या देखा? छोटी होने के कारण मैं ठीक से समझा नहीं सकी। लेकिन फिर भी जो देखा वह बताने की कोशिश की। सूक्ष्मवतन वह था जहां हजारों चंद्रमा की चांदनी चांदी जैसी चमकने वाली लाइट थी। उस लाइट में मैंने ब्रह्माबाबा को देखा। ब्रह्माबाबा मुझे इशारे से बुला रहे थे, 'आओ बच्ची, आओ मुझे संकोच हो रहा था कि यहां ब्रम्हाबाबा कैसे! प्रकाश के शरीर में बाबा के बहुत सुंदर फीचर्स दिखाई दे रहे थे। मम्मा के कहने पर यह दृश्य मैने बाबा को भी सुनाया लेकिन फिर भी स्पष्ट नहीं हुआ। बाबा ने मम्मा को कहा कि 'मम्मा इसमें कुछ गुह्य राज छुपा है, इस बच्ची को शांत वातावरण और एक बहन गाइड के रूप में देना जरूरी है।बाबा मुझे बाबा भवन में ले गए, जहां बाबा रहते थे। हर रोज नियम प्रमाण मै ध्यान में जाती तो बृजेंद्रा दादी जी मुझे कुछ प्रश्न देते थे कि ये प्रश्न पूछकर आना। मैं प्रश्न पूछ कर आती और बताती। बाद में यह बात स्पष्ट हई कि वह स्थान सूक्ष्मवतन था और वह ब्रम्हा बाबा का संपूर्ण फरिश्ता स्वरूप था। उसके बाद मेरा ध्यान का पार्ट शुरू हुआ और बाबा ने मुझे संदेशपुत्री का नाम दिया।
प्रश्न 2: दादी जी आप ध्यान में कैसे जाती है?
उत्तरः जैसे योग में बैठते हैं, वैसे मैं योग में बैठती हूं। मन में यह संकल्प होता है कि बाबा मुझे अभी बुलाएंगे, तो मैं धीरे-धीरे गुम हो जाती हूं और यहां का दृश्य भी जैसे दूर-दूर होता जाता है और लास्ट में एकदम गुम हो जाती हूं। बुद्धि में लास्ट तक स्मृति रहती है कि मैं यहां से जा रही हूं। कई बार अनुभव किया है कि मैं बादलों को क्रॉस करके जा रही हूं और कभी-कभी ऐसा अनुभव किया है कि मैं सीधे सूक्ष्मवतन में पहुंच गई हूँ। वहां जाकर मैं और बाबा दोनों सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं। उस समय बाबा मुझे जो दृश्य दिखाते, जो बातें मुझसे करते, वे अनुभव होती हैं जैसे कि प्रैक्टिकल रूप में हो रही हैं। जो दृश्य वहां देखती हूँ फिर यहां आकर बताती हूं।
प्रश्न 3: दादी जी यह जो ध्यान का पार्ट आपका चल रहा है, क्या यह आपको योग में मदद करता है?
उत्तरः अवश्य मदद करता है। जैसे कोई स्वर्ग को याद करता है तो बुद्धि से खींचकर उसको याद करना पड़ता है लेकिन मैंने वे नजारे बार-बार देखे हैं इसलिए मुझे बहुत सहज याद आते हैं। शुरू-शुरू में मेरे तन में शहजादी भी आती रही, उसके कारण उस जीवन के अनुभव मुझे सहज याद आते हैं। मूलवतन और सूक्ष्मवतन के जो दृश्य बार-बार मैने देखे और सूक्ष्मवतन में बाबा के पास बार-बार आते-जाते रहने से बाबा के साथ बहुत समीपता का अनुभव होता है, इससे योग और भी सहज लगता है।
प्रश्न 4: दादी जी आपके तन में बापदादा की प्रवेशता कब से शुरू हुई?
उत्तरः जब 1969 में ब्रह्माबाबा ने अचानक शरीर छोड़ा, तब बच्चों के मन में अनेक प्रकार के प्रश्न उठने लगे कि न जाने अभी क्या होगा, अभी मुरली चलेगी या नहीं, सेवाकेंद्रों पर सेवा चलेगी या नहीं, क्या जल्दी ही विनाश होगा? ऐसे विभिन्न प्रकार के प्रश्न बच्चो के मन में चलने लगे। जिस दिन ब्रह्माबाबा के शरीर का अंतिम संस्कार हुआ उस दिन विधि प्रमाण मैं बाबा को भोग लगाने बैठी। तो अचानक मेरे तन में बापदादा की प्रवेशता हुई और बाबा ने वाणी चलाई कि अभी रिवाइज कोर्स चलेगा, सेंटर्स की सेवाएं भी चलती रहेगी, बाबा बच्चों के साथ हैं और हमेशा रहेंगे, बाबा अंत तक यह वायदा निभाएंगे। बाबा ने केवल कमरा बदला है। दीदी, दादी जिस भी रथ को मुकर्रर करेंगी उसके द्वारा बापदादा बच्चों से मिलने आते रहेंगे। उसके बाद मेरा यह पार्ट शुरू हुआ।
प्रश्न 5: दादी जी आपके तन में बाबा की प्रवेशता कैसे होती है, वह अनुभव सुनाइए?
उत्तरः देखो, जैसे ध्यान में जाने के लिए मैं बैठती हूं और सूक्ष्मवतन में जाती हूं, ऐसे ही सूक्ष्मवतन में जाना होता है। वहां पहुंचकर बाबा से मुलाकात होती है, यहां तक ही मुझे याद रहता है। उसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं रहता। बाद में बाबा की प्रवेशता मेरे तन में होती है। जैसे क्लोरोफॉर्म देने से शरीर में आत्मा होते हुए भी क्लोरोफॉर्म के नशे से पता नहीं चलता कि क्या हुआ, ऐसे ही बाबा की प्रवेशता होने के बाद बाबा मेरे स्मृति के स्विच को ऑफ कर देते हैं और मै अपनी देह के भान से भी परे हो जाती है। बाबाने मेरे तन के द्वारा कितनी सेवा की, इसका भी मुझे भान नहीं होता है। मैं अपने को स्वीट साइलेंस में अनुभव करती है। जब बाबा वापिस जाते हैं तो मुझे सूक्ष्मवतन में इमर्ज करके मुलाकात करते है । मुझे छुट्टी देते है तो मैं यहां आती है। आते समय ऐसा लगता है मै स्वीट साइलेस की स्टेज से आई हूं। जिससे मै खुद को एकदम फ्रेश अनुभव करती हूं।
प्रश्न 6: दादी जी आपके तन में बाबा की प्रवेशता होती है क्या यह बात आपको पुरुषार्थ में आगे बढ़ने के लिए मददगार होती है?
उत्तर: बाबा की प्रवेशता से बाबा का प्रभाव मेरी स्थितिपर जरूर पड़ता है। वैसे मेरा संस्कार-स्वभाव निरसंकल्प रहने का बना हुआ है। इसलिए लंबे समय तक अव्यक्त स्थिति अर्थात् देह के भान से परे, डबल लाइट स्थिति रहती है जिससे ब्रह्मा बाप समान अव्यक्त स्थिति की, अधक सेवा करने की विशेषता नेचुरल हो गई और लंबे समय तक अशरीरी स्थिति का अभ्यास होने से ब्रह्मा बाप समान मेरी स्थिति बनती गई, जिसके कारण पावरफुल स्थिति, हल्केपन का अनुभव, फरिश्ता स्थिति का अनुभव मेरा स्वाभाविक बढ़ता गया।
मैं आशा करता हूं कि दादी जी से किए गए ये सुंदर प्रश्न उत्तर, आपको भी जरूर मदद करेंगे। इन गुह्य रहस्यों को समझने से आपको बाबा के साथ मिलन मनाते शक्तिशाली अनुभूति होगी और वे अनुभव तीव्र पुरुषार्थी बनाकर आपको आगे बढ़ने में मदत करते रहेंगे।

भोलेपन और समझदारी का बैलेंस देखा दादी गुलज़ार में

ब्रह्माकुमारी मीरा बहन, मलेशिया
जब भी मैं परम आदरणीय दादी गुलज़ार जी को याद करती हूं तो उनको शांत मूरत, बाबा की याद में खोयी हुई, इस दुनिया में रहते हुए भी अति न्यारी और अति प्यारी नजर आती है। दादी बहुत कम बोलती थी, जो भी वचन निकलता था वह औरों के लिए एक आशीर्वाद, एक वरदान बन जाता था।

तीन वरदान हुए साकार

दादी की जोवन कहानी में हमने सुना है कि एक बार साकार बाबा ने दादी को कुछ लिखने का काम दिया था। दादी ने बहुत सुंदर अक्षरों में लिखकर बाबा को दिया । तब बाबा ने दादी को तीन वरदान दिए कि आगे चलकर के आपकी आंखे आपकी आवाज और आपका लेखन सारे विश्व की सेवा करेगा। उस समय तो यह मालूम नहीं था कि अव्यक्त बापदादा का पार्ट दादी के द्वारा इतने वर्षों तक चलेगा परन्तु जैसे-जैसे ड्रामा का सीन खुलता गया तो समझ में आया कि बाबा का वरदान प्रेक्टिकल में साकार हो रहा है।

संस्कार में बाबा और संसार भी बाबा

मैंने एक बार दादी से पूछा, 'बाबा आपको इतना प्यार क्यों करते हैं? दादी ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि 'मेरे संस्कार में बाबा है और मेरा संसार ही बाबा है।' यह जवाब मेरे दिल को छू गया अगर हम भी यह अभ्यास करें कि हमारे संस्कार में ही बाबा हमारा संसार ही बाबा हो, तो बाबा क्यों नहीं हमें याद करेगा।

कौन ज्यादा समझदार है, परिस्थिति या मैं?

एक बार मैने दादी से बहुत हंसी की बात सुनी थी, वह भी मुझे बहुत शिक्षा भरी लगी। दादी ने कहा कि 'कोई भी परिस्थिती सारे कल्प में एक ही बार सामने आती है, वही परिस्थिति दोबारा नहीं आती परंतु हम आत्माओं में अकल कम है। बात आती है ओ चली जाती है परंतु उसके बारे में हम 50 बार चिंतन करते हैं।' तो दादी ने पूछा, 'कौन ज्यादा समझदार है परिस्थिति या मैं?' ऐसे सबको दादी बहुत हंसाती थी।

बातों को न मुख से, न मन में दोहराती थी

दादी एक तरफ एकदम भोली (इनोसेंट) थी क्योंकि बहुत कम उम्र में ही बाबा के पास आ गई थी दुनिया देखी ही नहीं थी तो बिल्कुल बच्चों जैसी भोली थी। परन्तु दूसरी तरफ बुजर्ग की तरह समझदार (मैच्योर) थी। हर एक चीज देख करके उसको सराहने की कला दादी में थी परन्तु उस चीज की तरफ आकर्षित कभी नही होती थी। विदेश में कई बार हमें दादी के साथ यात्रा करने का मौका मिला। एयरपोर्ट पर भी दुकानों में बहुत सुंदर सुंदर वस्तुए होती है। दादी रुचि से देखती कि यह क्या चीज है लेकिन किसी चीज के प्रति आकर्षित नहीं होती थी। भोलेपन और समझदारी का यह बैलेंस उनमें देखा। हमने दादी से सीखा कि जीवन में, खासकर के यात्रा के दौरान, कई बातें होती हैं। हमारे अनुसार कभी होता, कभी नहीं होता। परंतु एक बार बात हो गई तो फिर दादी उस बात को न मुख से रिपीट करती थी, ना मन में दोहराती थी। इसलिए दादी का बहुत समय बचता था, व्यर्थ नहीं जाता था।
बाबा-मिलन के समय कुमारों की रिट्रीट, कुमारियों की रिट्रीट आदि हम कराते थे तो दादी को थोड़ा समाचार सुनाते थे तकि वह बाबा को पहुंच जाए। मुझे सदैव ऐसा लगता था कि जो बाते हम दादी को सुनाते है वे बातें दादी द्वारा बाबा सुन लेता है और वही बात बाबा मुरली में भी कहता है।
दादी को ट्रांस मैसेंजर का वरदान मिला था परंतु दादी ने उसका कभी भी फायदा नहीं उठाया। खुद ही खुद अचानक ध्यान में चली जाए, नहीं। जब भी प्रोग्राम मिलते थे, उसी अनुसार दादी ट्रांस में जाती थी और संदेश ले आती थी। जब दादी की तबीयत ठीक नहीं थी तब उन दिनों संदेश लाने तथा बाबा के आने का भी कार्यक्रम बंद था। हमने एक बार दादी से पूछा कि 'बाबा क्यों नहीं आप के द्वारा संदेश दे रहा है। हम मिस करते हैं। तो दादी ने कहा कि बाबा मुझे नहीं बुलाते तो मै क्या करू। जब भी उन्हें ऑफिसियल प्रोग्राम मिलता था तभी वे बाबा के पास जाती थी और संदेश से आती थी । दादी हर एक बात की तरफ उचित ध्यान देती थी।

दादियों के आपसी प्यार का रहस्य

एक बार हम सभी विदेश की टीचर्स की क्लास थी और दादी गुलजार जी दादी जानकी जी और दादी प्रकाशमणि जी, तीनो बैठे थे मै भाषान्तर कर रही थी। किसी ने पूछा 'दादियों का आपस में इतना प्यार है, उसका रहस्य क्या है जबकि दादी प्रकाशमणि मधुबन में रहते हैं, दादी जानकी लंदन में रहते हैं, दादी गुलजार दिल्ली में रहते?' तो दादी ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि 'हम तीनो का ही आपस में इतना प्यार और सम्मान है, अगर कोई भी आकर के किसी के बारे में कुछ गलत कहता भी है तो भी एक-दो के प्रति हम मन में सम्मान कभी कम नहीं करते।' कई बार होता है कि किसी ने किसी की बातें बताई तो आपकी भावना खत्म हो जाती है। दादी ने कहा, 'हमारी भावना नहीं खत्म होती और ही हम उस आत्मा के मन में भी भावना बिठाते हैं।' तो हमने सीखा कि कोई किसी की ग्लानि करें, उसकी बात मानकर, उसी के अनुसार नहीं चलना है परंतु हमारे मन में भावना इतनी अच्छी हो जो उसके मन में भी अच्छी भावना बिठा दें।
एक चित्र है जिसमें तीना दादियों खड़ी है। तो दादी ने कहा, पता है तीनों दादियों का क्या अंतर है। में हाइट में लंबी है, दादी जानकी विज्डम में बहुत होशियार है और दादी प्रकाशमणि प्रशासन में आगे है।' इस तरह दादी ने रमणीक रूप से उस चित्र का वर्णन किया था।

कर्मातीत अवस्था का एक सुंदर उदाहरण

दादी जी जब भी क्लासेस कराते तो जिगर से यह बात जरूर कहते कि 'खुशी हमारे ब्राह्मण जीवन का खजाना है, कुछ भी हो जाए लेकिन खुशी को नहीं गंवाना, कोई भी सेवा करते यदि माया आती है, आपकी खुशी गुम हो जाती है तो वह सेवा छोड़ दो परंतु खुशी नहीं छोड़ो।' इतने तक दादी कहती कि 'मृत्यु भी आ जाए तो भी खुशी-खुशी से शरीर छोड़ो, दुख से नहीं।' दादी ने यह वरदान हम सभी को दिया है कि कभी भी खुशी को गंवाना नहीं। ब्राह्मण बनने के बाद खुशी गँवायी माना सब कुछ गँवाया। दादो हम सबके सामने कर्मातीत अवस्था का एक सुंदर उदाहरण है। इस शरीर में रहते हम कैसे उस अवस्था को प्राप्त कर सकते है, कर्मभोग को, कर्मयोग में कैसे परिवर्तित करना है, यह हमने उनमें देखा। दादी के लिए लोग पूछते हैं, इतनी बड़ी योगी, बाबा का रथ, उन्हें इतना शारीरिक कष्ट क्यों होता है? वास्तव में उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती परंतु बाबा उनके द्वारा उदाहरण देते हैं कि कैसे कर्मभोग को कर्मयोग से चुक्त करना है। उनको कोई भोगना नहीं होती परन्तु उनकी बीमारी द्वारा अनेकानेक आत्माओं का भाग्य जग जाता है। दादी का जब पहला ऑपरेशन हुआ था कैंसर का तब डॉक्टर अशोक मेहता दादी की मनोस्थिति दादी के वाइब्रेशन देखकर बहुत प्रभावित हुए थे।
दादी अंतिम दो वर्ष एकदम साइलेंस में रहे बोलना बंद कर दिया था। मै एक बार मुंबई में दादी से मिलने गई थी। उनके कमरे में जाते ही लगा जैसे सूक्ष्मवतन है। दादी का चेहरा कोई फरिश्ता नजर आता था। दादी कुछ नहीं बोलती थी, दृष्टि देती थी वह भी थोडे समय के लिए। इस दुनिया में रहते कैसे हमें इस दुनिया से उपराम रहना है, वैराग्य वृत्ति रखनी है, वह प्रैक्टिकल हमें दादी ने सिखाया। आज भी हम ब्राह्मण परिवार दादी को बहुत याद करते हैं। गुलज़ार दादी और बाबा के रथ को अलग ही नहीं कर सकते क्योंकि दादी को याद किया माना बाबा को याद किया। दादी के शांतस्वरूप और बोल की स्पष्टता से अनेक आत्माओं को परमात्मा के समीप आने का मौका मिला।
मैं अपने आप को बहुत-बहुत भाग्यशाली समझती हूं। सन् 1968 में मैं ज्ञान में आई। फिर अव्यक्त बापदादा का पार्ट भी शुरू हुआ और जब तक बाबा का यह पार्ट चला तब तक हमने हर वर्ष दादी को बहुत नजदीक से देखा और कुछ साल बापदादा के साथ-साथ भाषा अनुवाद करने का भी मौका मिला।

मानो पावर हाउस मेरे पास आ गया हो

हमने देखा, बाबा मिलन के दिन, दादी किस तरह तैयारी करती थी कितनी शांति में अंतर्मुखता में रहती थी। फिर कैसे दादी के तन में बापदादा आते थे और बाबा के जाने के बाद दादी ऐसे उठती थी जैसे कि नींद से उठी है, एकदम फ्रेश। हमने एक बार दादी से पूछा, 'दादी, हम सभी तो आपके द्वारा बाबा से मिल लेते है परंतु आप बाबा से कैसे मिलती हो? आपको तो बाबा से हमारी तरह मिलने का मौका नहीं मिलता।' दादी ने कहा, 'जब बाबा आप सभी से मिलकर वापस वतन में आते हैं, तब मुझसे मिलते हैं, फिर मुझे छुट्टी देकर नीचे भेजते हैं, उस समय बाबा का मुझे इतना प्यार मिलता है। लगता है जैसे पावर हाउस ही मेरे पास आ गया हो। इसलिए हम कुछ मिस नहीं करते हैं।'
हमें भी दादी से प्रेरणा लेकर दादी की तरह बाबा की आशाओं को पूर्ण करना है। हम दादी समान बन जाएंगे तो बाप समान बन ही जाएंगे।

संकल्प और बोल की एनर्जी को बचाकर, भगवान को समर्पित करने वाली आदरणीया दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमार राजू भाई, मुरली विभाग
यज्ञ इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दिवस है 18 जनवरी, 1969 जब निराकार परमपिता परमात्मा शिव के साकार माध्यम अव्यक होकर अव्यक्त वतनवासी बने। उसके पश्चात 21 जनवरी, 1969 को शिवबाबा और बह्माबाबा (बापदादा) दोनों ने दादी गुलजार जी के तन में प्रवेश किया और तब से 31 दिसम्बर 2017 तक लगाकर 48 वर्ष तक दादी जी के रथ द्वारा बापदादा को अव्यक्त पालना देश-विदेश के हजारों-लाखों ब्रम्हावत्सों को मिलती रही। दादी जी भी 11 मार्च, 2021 के दिन अव्यक्त-वतन वासी बनी। ब्रह्माकुमारीज़ के इतिहास में यह भी बहुत बड़े परिवर्तन का दिन है।
दादी जी का स्वभाव बचपन से ही बहुत सरल था, उनकी इसी नेचर के कारण उन्हें नम्बरवन ट्रांस का पार्ट मिला। अव्यक्त वतन के अनेक गुह्य रहस्य, अव्यक्त ब्रह्मा का राज, पहले-पहले दादी जी के द्वारा ही स्पष्ट हुआ। दादी जी कई दृश्य वतन में देखके आती थी, उसी आधार से चित्रों आदि का भी निर्माण हुआ।

दादी जी की बुद्धि बहुत स्वच्छ थी

दादी जी सदा एकांत में, अन्तर्मुखी रहती थी। कभी कोई से बातें करना, हंसना, इधर-उधर की बातों की लेन-देन करना, यह दादी जी की नेचर में ही नहीं था। बहुत शान्त, सरल स्वभाव, एकांतवास का गहन अभ्यास था। संगठन के बीच में होते भी, जब तक कोई उनसे पूछेगा नहीं, तब तक कोई भी शब्द नहीं बोलती थी। वे बहुत शार्ट एण्ड स्वीट जवाब देती, यथार्थ जो बात होती वह कहकर चुप हो जाती। बुद्धि बहुत स्वच्छ, दिव्य होने के कारण ट्रांस के बहुत क्लीयर मैसेज दादी जी द्वारा आते रहे।

सेकण्ड में उड़कर वतन में पहुंच जाती थी

मेरी पहली मुलाकात दादी गुलज़ार जी के तन में प्यारे बापदादा से सन् 1971 में बाबा के कमरे में हुई थी, जब वे गद्दी पर आए हुए थे बाबा जब दादी जी में प्रवेश होते तब दादीजी के चेहरे का हाव-भाव उनकी दृष्टि उनके नयन चयन सब अलग प्रकार से झलकने लगते पूरे चेहरे पर लाइट का आभामण्डल और अलौकिक मुस्कान छा जाती। ब्रह्मा बाप के अव्यक्त होने के पश्चात दीदी मनमोहिनी जी और दादी प्रकाशमणि जी के साथ विशेष सन्देशी के रूप में दादी जी का पार्ट रहा।जब दोनों दादिया दादीजी को कहती कि अभी बाबा को बुलाओ या बाबा से इस बात के लिए सन्देश लेकर आओ तो दादी आज्ञाकारी बन सदा हाँजी करती और सेकण्ड में बाबा के पास वतन में उड़कर पहुंच जाती कभी बाबा स्वयं प्रवेश हो जाते कभी वे सन्देश लेकर आ जाती।

वतन से लौटकर दादी मुरली पढ़ती थी

बापदादा कई बार शाम को 7 बजे दादी जी के तन में प्रवेश होते और 12-14 घण्टे तक बच्चों से मिलन मनाते। दादी जी ने अपना तन-मन पूरी तरह बापदादा को समर्पित किया हुआ था। बापदादा की प्रवेशता के बाद दादी जी के संकल्प मर्ज हो जाते और बापदादा उनके तन द्वारा ईश्वरीय महावाक्य उच्चारण करते, वे सब टाइप करने का सौभाग्य मुझे मिला। बापदादा सभा में ही होते और टाइप की हुई मुरली उन्हें हाथ में मिल जाती, जिसे दादी जी वतन से वापस आने के बाद पढ़ती थी।

दिलों को जीता

हमारी मीठी दादी जी, परम आत्मा और आदिपिता ब्रह्माबाबा दोनों का छोटा नंदी बन, अधक रूप से यह पार्ट बजाती रही। वह इतनी निर्माणचित्त थी जो कभी बोल चाल में भी मै शब्द का प्रयोग नहीं करती। जो बाबा कहे, जो दादियां कहें, सदा जी बाबा, जी दादी कहकर सबके दिलों को जीत लेती। उनकी मधुर वाणी अनेक आत्माओं के जीवन को परिवर्तन कर देती।

व्यर्थ से मुक्त

समय प्रति समय अव्यक्त बापदादा ने दादी की कई विशेषताओं का वर्णन किया है। एक बार बाबा ने कहा कि इस बच्चों ने अपने संकल्प और बोल की एनर्जी बचाई है, इसलिए वह एनजीं बाप के कार्य में आ रही है क्योंकि एनर्जी अधिक सोचने वा अधिक बोलने से खर्च होती है। इस बच्चों ने कभी व्यर्थ नहीं सोचा। क्यों, क्या, कैसे के प्रश्नों में नहीं गई। दादी जी हमेशा अपनी क्लासेज में कहती कि व्यर्थ से बचना है तो क्यों, क्या, कब, कहाँ और कैसे इन 5 प्रश्नों की क्यू में नहीं जाना। व्यर्थ संकल्पों की उत्पत्ति का कारण ये प्रश्न ही है, इनसे दादी खुद भी पार रही और सबको इनसे बचने की प्रेरणा दी।

सरल स्वभाव, मिलनसार

दादी के पास कभी भी जाओ, उनसे मिलो, सदा ऐसे मुस्कराते हुए लाइट रूप में मिलती थी। कभी उनके चेहरे पर उलझन नहीं दिखाई देती थी। दादी जी के साथ कई बार अलग-अलग स्थानों पर सेवा में अथवा पिकनिक आदि के लिए जाना होता था। दादी वहाँ भी सदा बहुत रमणीक रीति से मिलती-जुलती और यही कहती, खाओ, पीओ, मौज करो लेकिन इसके साथ मेडीटेशन भी जरूर करो। वास्तव में मेडिटेशन करना ही रुहानी मौज है । हम कभी जानबुझ कर दादी जी से कोई भी उल्टे-सीधे प्रश्न पूछते तो दादी बहुत प्यार से मुस्कराते हए जबाब देती और कभी-कभी कहती, इस बात का उत्तर तो बाबा ने ही अभी तक नहीं दिया है। कैसे दें। ऐसे शार्ट में सबको सन्तुष्ट कर देती। दादी जो सबके साथ सरल स्वभाव से मिलनसार होकर चलती उन्हें कहीं भी बिठा कुछ भी खिलाओ पिलाओ उनके हाव-भाव से किसी को यह लगता कि दादी इतनी बड़ी हैं। भगवान का रथ हैं। उन्हें किसी प्रकार का अभिमान रिंचक मात्र भी छू नहीं पाया। दादी जी ने एक बार मुझे कहा कि कोई एक ऐसा ग्रुप बनाओ जो केवल स्वचिंतन करने वाला हो। कभी मुरली से प्रश्न निकाल कर परीक्षा लो आपस में किसी टॉपिक पर वर्कशाप करो। कभी विशेष योग के प्रोग्राम रखो लेकिन पूरा ही ग्रुप केवल स्व-चिंतन करने वाला कभी कोई किसी का परचिंतन न करे। अगर किसी को अपनी उन्नति करनी है तो दादी यही कहती कि खुद को देखो और एक बाबा को देखो, किसी भी साइडसीन को नहीं देखना।

दिल में, मुख में सदा बाबा-बाबा

दादी जी जब वतन से कोई सन्देश लेकर आती तो वे खुद एक बार रफ लिखती फिर उसे फेयर करती, उसमें उनका काफ़ी समय जाता इसलिए मैं उनके द्वारा रफ लिखा हुआ सन्देश लेकर आता और उसे फेयर करके, टाइप करके देता। इस प्रकार दादी जी के साथ सेवा करने का सौभाग्य मुझ आत्मा को मिला। दादी जी से मिलने के लिए हमें कभी अपांइटमेंट लेने की जरूरत नहीं होती थी, दादी इजी रूप से मिलती, चाहे वह भोजन कर रही हो, या आराम कर रही हो... बहुत सरलता से देखते ही कहेंगी, आओ बैठो, कोई काम हो तो बताओ। ऐसी विश्व की सर्वश्रेष्ठ महान आत्मा, जो भगवान का साकार माध्यम बनी, जिनके द्वारा हजारो-लाखों आत्माओं को अलौकिक पालना मिली, उन्हें कभी मैंपन का अभिमान नहीं आया इसलिए अनेकों की दुआओं का पात्र बन गई। उनके दिल में, मुख में सदा बाबा, बाबा, बाबा के बोल ही रहे।
एक बार गुलज़ार दादी की तबियत खराब हो गयी, पाण्डव भवन में काफी भाई-बहनें बापदादा से मिलने के लिए पहुंचे हुए थे। उन्होंने कहा, जब तक हम बापदादा से नहीं मिलेंगे, तब तक वापस नहीं जायेंगे इसलिए गुलज़ार दादी ने सन्देश द्वारा बापदादा से कहा कि बाबा, आज तो मेरा बैठना मुश्किल है और इन बच्चों को जिद्द है, आप कोई दूसरे तन में आकर उन्हें अपनी भासना दे दो। तो मोहिनी बहन (मधुबन) बाबा के कमरे में, बाबा के पास वतन में गई और कुछ समय उनके तन में बापदादा पधारे। बापदादा ने आये हुए सभी बच्चों से मुलाकात की और अन्त में दादी गुलज़ार जी ने बाप-दादा को अपने हाथों से भोग स्वीकार कराते विदाई दी। यह भी बड़ा वन्डरफुल दृश्य आंखों के सामने घूम रहा है।
ऐसी अव्यक्ति पालना जो दादी जी ने सभी को दी है, अभी हम सबको उस पालना का रिटर्न करना है क्योंकि अभी बापदादा के साथ एडवांस पार्टी में गई हुए सभी दादियां भी देखेंगी कि स्थापना के रहे हुए कार्य को ये सब मिलकर कैसे संपन्न करते हैं। वैसे भी पेपर के समय टीचर्स साक्षी हो जाते है ऐसे अभी बापदादा और निमित दादिया साक्षीद्रष्टा बन देखेगी और सभी में सुक्ष्म शक्तियों भरती रहेंगी। बाबा का तो वायदा है। बच्चे जब दिल से मुझे याद करेंगे तो बाबा सम्मुख हाज़िर हो जायेगा।

स्वस्थिति अच्छी है तो परिस्थितियां परेशान नहीं करेंगी

हमें तो ऐसे लगता है जैसे स्थापना के प्रारम्भ में साक्षात्कार हुए कि इनके पास जाओ। ऐसे अब अन्त समय में साक्षात्कार की लीला चलेगी, उससे ही प्रत्यक्षता होगी। यह हमारी दादियां जो सम्पन्न बनकर के गयी है, अपने सम्पूर्ण स्वरूप का अनुभव करायेंगी और सबको प्रेरित करेंगी इसलिए बाबा ने शायद इस कोरोना-काल के अन्दर वाचा सेवा को कम कराया है। हर ब्राह्मण आत्मा मनसा सेवा की अनुभवी बनी है। परिस्थितियां तो आयी है, आती रहेगी लेकिन जिन्होंने स्वस्थिति अच्छी बनाके रखी है, उन्हें परिस्थितियां परेशान नहीं कर सकती। वे सदा मौज में रहते हैं। अभी समय ऐसा दिखाई देता है कि अचानक बहुत बड़ा परिवर्तन होगा क्योंकि इतनी बड़ी कलियुगी दुनिया का परिवर्तन होना है। अभी कितनी अधिक आबादी है। चारों ओर प्रदूषण है। पांचों तत्वों का विकराल रूप है। इस कलह क्लेश की दुनिया का महा-परिवर्तन होगा तो जरूर उसमे कुछ तो सहन करना पड़ेगा। लेकिन सहनशक्ति, धैर्य को शक्ति, सामना करने की शक्ति, समाने की शक्ति उन्हों में रहेगी जो अपने जीवन को बहुत न्यारा प्यारा तपस्वी बनाकर रखेंगे।

दादियों समान अचल-अडोल बनना है

अब समय है, हम सब तपस्वीमूर्त बनकर रहें, कोई भी प्रश्नों में उलझे नहीं। बाबा कहता है, जो सीन सामने आ रही है उसे साक्षी हो करके देखो, फुलस्टॉप लगाओ और आगे बढ़ जाओ। शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्पों से सम्पन्न रहो ताकि आने वाली समस्याओं का समाधान करने में सहयोगी बन सको। कोई भी बात अपनी तपस्या में बाधा रूप न बने, यह ध्यान रखना है क्योंकि जो कुछ ड्रामा में चल रहा है, उसमें कल्याण समाया हुआ है। हमारी दादियों ने यज्ञ को जिस प्रकार से आगे बढ़ाया है, अभी उनके इस रहे हुए कार्य को हम सबको मिल करके सम्पन्न करना है। कार्य भी सम्पन्न हो और हम सब भी सम्पन्न और सम्पूर्ण बनकर के बाबा के साथ चलें, बाबा घर का गेट खोले। सब आत्माओं को मुक्ति, जोवनमुक्ति मिले, दुःखों से सब छूट जायें, ऐसी शुभ भावना के साथ बहुत अच्छी तपस्या करनी है। संकल्पों की हलचल समाप्त। जैसे दादियों ने अपनी स्थिति एकरस बनायी ऐसे हम सबको भी एकरस, अचल, अडोल स्थिति में स्थित रहना है।

दादी मेरे लिए फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड थी

ब्रह्माकुमारी उषा बहन, शांतिवन
परम आदरणीय, परम श्रद्धेय, बाप समान, बाबा के नैनों में सदा समाई हुई मीठी-प्यारी दादी गुलज़ार जी मेरे लिए सिर्फ दादी नहीं लेकिन एक फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड रही। मुझे दादी जी द्वारा अव्यक्त बापदादा से प्रथम मिलन मनाने का सौभाग्य सन् 1975 में हिस्ट्री हॉल में मिला। जब सन् 1980 में मैं समर्पित हुई, उस शाम गुलज़ार दादी जी मुझे नक्की लेक तक पैदल लेकर गई और रास्ते में पूछा कि 'यह समर्पण का निर्णय तुमने किसके कहने पर लिया?' मैंने कहा, 'दादी, यह मेरा अपना फैसला है।' तो उन्होंने बहुत प्यार से समझाया कि 'जीवन का समर्पण कर रही हो, पूरे जीवन का सवाल है, किसी की बातों में आकर के समर्पण नहीं करना लेकिन विवेक से, निश्चय के आधार से यह फैसला किया है तो आगे की यात्रा सहज हो जाएगी।' आज जब कई बहनें मेरे सामने आती हैं कि हमें समर्पण होना है तो मैं यही प्रश्न उनसे करती हूं, जो दादी जी ने मुझसे किया था। उस समय तो मैं उस बात को समझी नहीं थी लेकिन आज समझ में आता है कि जब अपने दृढ़ निश्चय के आधार पर फैसला किया जाता है तो हर पेपर को पास करने की स्वयं की हिम्मत और शक्ति बनी रहती है।

जो भी सेवा मिले बहुत प्यार से और नम्रता से करना

इसके बाद मैं मुम्बई, विलेपार्ले सेवास्थान पर गई। जब दादी जी को कैंसर डिटेक्ट हुआ तब वे ऑपरेशन के लिए वहां आए थे। करीब एक महीने से ज्यादा समय वहां रहे थे, तब मुझे दादी जी के और अधिक समीप आने का मौका मिला। मुझे जिम्मेदारी दी गई थी कि दादी जी को किसी प्रकार का कोई इंफेक्शन नहीं लगना चाहिए इसलिए कोई भी सर्वेट दादी जी जहां रहती है, वहा न आए और तुम ही सारी साफ-सफाई करना, चाहे कमरों को, पूरे फ्लैट की या बाथरूम आदि की। जब यह जिम्मेवारी मिली, मुझे बहुत अच्छा लगा। में मुरली सुना कर, ऊपर आकर दादी जी से प्रेम में दृष्टि लेकर फिर सफाई में लग जाती थी दादी जी वही बैठे मुझे देखती रहती थी। कभी-कभी कहती थी कि अभी तो तुम टीचर बनकर मरली सुना कर आई हो और अभी सफाई कर रही हो। सफाई करने के बाद दादी विशेष प्यार करती थी टोली खिलाती थी और कहती थी कि जीवन में यह बैलेंस हमेशा रखना। जो भी सेवा मिले बहुत प्यार से और नम्रता से करना। दादी कई बार नीलू बहन को भी कहती कि देखो, यह अभी तो टीचर बनकर मुरली सुनाकर आई लेकिन अहम् नहीं है। निर्मानता से इतना झाड़ू, पोछा सफाई आदि करती है। इस बैलेंस को देखकर के दादी का विशेष ब्लेसिंग मुझे प्रतिदिन प्राप्त होता रहा और दादी का यही ब्लेसिग मुझे सूक्ष्म में आगे बढ़ा रहा है।

मधुवन बेहद सागर में तैरना सिखाया

जब मैं सेंटर से मधुबन महायज्ञ में आई तो देखा कि यहां का जीवन, सेंटर के जीवन से अलग है और यहां अनेक प्रकार की बातें भी सामने आती हैं। आरंभ में मुझे छोटी-छोटी बातों में फीलिंग आती थी, कोई हंसी में भी कुछ कह देता था तो मुझे रोना आ जाता था। एक बार मैं रो रही थी और नीलू बहन ने देखा तो दादी जी को बताया और दादी जी ने बुलाकर पूछा, 'तुम्हें मधुबन में रहना है या सेंटर पर जाने की दिल हो रही है?' मैंने कहा, 'मुझे मधुबन में रहना है।' तो कहा, 'मधुबन में रहना है तो यह तो सागर है, सागर में तैरना भी आना चाहिए। कैसे तैरना है? तो दादी ने बहुत अच्छी बात सुनाई, 'कुछ बातों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। बोलते है बोलने दो वह उनकी नेचर है। जब तुम इस तरह से चलोगी तो मधवन के बेहद सागर में तैरना आ जाएगा नहीं तो यहा रोज रोना पड़ेगा क्योंकि छोटी-बड़ी बाते तो होती ही रहेंगी फिर तो सेंटर पर चली जाओ। मैंने दादी से प्रॉमिस किया कि मैं फिर कभी छोटी मोटी बातों में रोऊंगी नहीं और सचमुच उस बात ने मुझे बहुत हिम्मत दी। मधुबन बेहद सागर में कैसे रहना चाहिए तैरना चाहिए यह दादी ने सिखाया।
ऐसे ही कभी जीवन में कोई बात आती थी तो दादी के पास जाकर दिल खोलकर बडी सहजता से वह बात कर सकती थी और दादी जी बहुत प्यार से उस का समाधान भी देती थी। बाबा की सिपल शिक्षाएं इतनी सटीक होती थी जो बात गले उत्तर जाती थी।
मधुबन में जब देश-विदेश से इंग्लिश में ईमेल आती थी तो शोलू बहन पढ़कर सुनाती थी परंतु जब दादी शांतिवन में रहने लगे तो फोन करके मुझे बुलाते थे कि जरा इधर आना। दादी का बुलावा होना और जैसे अंदर एनर्जी आ जाती थी और मैं तुरंत पहुंच जाती थी। कई कॉन्फिडेंशियल ईमेल होते थे, उनको पढ़कर दादी को मैं सार बताती थी, कभी पूरा पढ़कर सुनाती थी परंतु वह पढ़ने-सुनने के बाद जिस तरह दादी निःसंकल्प हो जाती थी, वैसे ही मुझे भी वे बाते जरा भी याद नहीं रहती थी। यह दादी की शक्ति का प्रभाव मैने मासूस किया। कभी कोई टॉपिक इंग्लिश में होता था तो कहती थी कि इस का मतलब समझा दो। कभी परीक्षा लेने के हिसाब से दादी पूछती थी कि इस टॉपिक पर क्या सुनाना चाहिए, तो हम अपनी रीति से बताते थे। तब दादी बहुत अच्छे से उस पर समझाती थी। दादी रोज नूमाशाम योग में बैठती थी तो कभी-कभी हम भी चले जाते थे, मन एकदम शांत हो जाता था, कोई भी बात हमारे मन में उत्पन्न नहीं होती थी। इतना पावरफुल वाइब्रेशन शक्तिभवन का होता था।
कभी-कभी तारा बहन दादी को कोई कहानी या जोक सुनाती थी तो कभी मुझे भी दादी कहती थी कि तुम भी कोई कहानी सुनाओ। तब कोई छोटी ज्ञानयुक्त कहानी दादी को सुनाती थी।
एक बार रक्षाबंधन के समय दादी के पास गई, दादी ने अपने पास बिठाया। नीलू बहन ने कहा, दादी, इसको प्यार करो। दादी ने इतना प्यार किया और सर पर हाथ घुमाया, वरदान दिया, इतनी मीठी स्मृतियां दी।
इस तरह हमने दादी को गंभीर भी देखा, लाइट मूड में भी देखा तो शिक्षा-सावधानी देते हुए शुभभावना-शुभकामनामूर्त भी देखा और बहुत कुछ सीखा दादी से। जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने वाली ये बातें एक अमूल्य सौगात की तरह हमारी स्मृति में सदा रहेंगी।

हृदय को मोहने वाली दादी

ब्रह्माकुमार शिवकुमार, पांडवभवन, दिल्ली
दादी हृदयमोहिनी जी का नाम उनके गुण व कर्तव्यवाचक है। जिस प्रकार ब्रह्माबाबा को भगवान के बाद दूसरा (Next to God) कहते हैं, वैसे ही दादी हृदयमोहिनी जी भी ब्रह्मा मां के बाद दूसरी रही। मंदिर में दो नंदी दिखाने का भी यादगार है, जो क्रमशः ब्रह्माबाबा और दादी जी का ही यादगार है। दादी जी ने मात्र 9 वर्ष की आयु में साक्षात्कार द्वारा बह्मापुरी और सूक्ष्मवतन का राज़ जाना। पिताश्री, दादी जी को कहा करते थे कि आप विश्व का कल्याण करेंगे, आप बाबा जैसे बोलेंगे बाबा जैसे लिखेंगे आप में बाबा का अनुभव होगा।

नैनों और चेहरे द्वारा अव्यक्त बाबा का अनुभव

दिल्ली, पांडव भवन में दादी जी मुरली क्लास और योग कराती थी। कई बार मैंने उनके नैनों और चेहरे द्वारा अव्यक्त बावा का अनुभव किया। एक बार मैने उनसे पूछ ही लिया कि 'दादी जो आज आप योग करा रहे थे तो आपसे अव्यक्त बाबा का अनुभव हुआ है, क्या आपमें अव्यक्त बाबा आए थे?' दादी जी ने बड़ी ही मधुरता और निर्मानता से बताया कि 'जैसी अपनी स्थिति होती है वैसा ही अनुभव होता है।' दादी जी में अव्यक्त बापदादा का पार्ट 50 वर्षों तक चला इसलिए सब उन्हें प्यार से 'बाबा वाली दादी' भी कहते थे।

रूहानियत से मुस्कराते हुए मिलो

ऑलराउंड सेवा देकर के दादी जी ने मुझे ऑलराउंडर बना दिया। दिल्ली में जो विदेशी आते थे उन्हें रिसीव करना, ट्रेन की टिकट बनवाना, उन्हें ट्रेन में बिठाना आदि-आदि सेवाओं द्वारा मेरा भाग्य बनवाया। दादी जी कहा करती थी कि 'जब भी किसी से मिलो तो रूहानियत से मुस्कराते हुए मिलो। मैं जब फ्लाइट या ट्रेन में जाती हूं, लोग मुझे नहीं भी जानते हैं पर मेरी तरफ देखते हैं तो मैं उनसे मुस्कराकर मिलती हूं, इससे उनके मुरझाए चेहरे पर भी खुशी की झलक आ जाती है। चिंता वाले चेहरे को कुछ समय के लिए मुस्कराहट में बदलना, यह भी सेवा है।' दादी जी कहती थी.जब बाबा को मेरा बना लोगे तो बाबा भुलेगा नहीं। मेरी चीज कभी भूलती नहीं चाहे वह एक छोटा सा रूमाल ही क्यों न हो। दिल से कहाँ बाबा मेरा है मेरे साथ है तो बाबा हाजिर हो आपके कार्य में सहयोगी बन जाएगा।'

इकोनॉमी का ध्यान रखती थी

पहले दादी जी के कमरे में रूम कूलर था, उसमें मै रोज पानी भरता था। कभी देर हो जाती तो दादी स्वयं उसमें पानी डालने लगती थी। एक बार दादी जी को कार से स्टेशन छोड़ने जा रहा था। कारचालक ने बताया कि किसी कारण से कार खड़ी हो गई है। तब दादी जी साइकिल रिक्शा में बैठी और मैं भी सामान पकड़कर के साथ में बैठ गया। दादी जी इतनी निर्मान थी जो शुरू-शुरू में ट्रेन में, बिना गद्दे के स्लीपर में यात्रा करती थी। एक बार मुझे भी उनके साथ मधुबन जाने का अवसर मिला। बाबा-मिलन का पार्ट चल रहा था। आबूरोड पर दादी जी को लेने कार आई थी। तब दादी जी ने कहा, 'मेरे पास जगह है, और भी बहनें बैठ सकती हैं।' इस प्रकार वे इकोनॉमी का भी और अन्य आत्माओं का भी ध्यान रखती थी।

मां की तरह सिखलाती थी

जब भी मुझसे कुछ गलती हो जाती थी तो दादी जी बड़े हो प्यार से मां की तरह समझाती सिखलाती थी। एक बार में दादी जो को बस में कुछ बहनों सहित एयरपोर्ट छोडने जा रहा था तब दादी जी ने कहा, 'ऐसा समय आएगा जो एयरबस भर कर के विदेश में जाएंगे। उस समय तो बहुत बड़ी बात लग रही थी परतु अभी कुछ समय पहले 50 भाई-बहने रशिया में गए तो दादी जी के बोल साकार होते देखे।

पहले-पहले यज्ञ में मदोगरी

यज्ञ के शुरू-शुरू में मधुबन से बाबा ने दादी जी को लखनऊ में सेवा में भेजा। उस समय कोई पहचान तो थी नहीं। रिक्शा वाला धर्मशाला में ले गया। दादी जी गेट पर खड़ी थी, तो वहां से एक सिंधी युगल गुजरा दादाराम भाई और सावित्री बहन। उन्होंने देखा कि यह तो सिंधी बहन लग रही है और बड़ी रॉयल है। उन्होंने पूछा, यहां कैसे? दादी जी ने बताया, 'ज्ञान सुनाते है, मेडिटेशन कराते हैं।' सावित्री बहन, दादी जी को अपने घर ले गई। पहले-पहले यही युगल ज्ञान में चले। बाबा ने दादी जी को कहा था, 'अच्छी सेवा करोगी तो गिन्नी मदोगरी होगी।' उन्होंने ही पहले-पहले यज्ञ में मदोगरी की।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव कराती थी

दादी जी को बहुत बातों का पहले से आभास हो जाता था। एक बार मैं, चार भाइयों के साथ मधुबन जा रहा था, ज्ञान-योग की भ‌ट्ठी करने। जब छुट्टी ले रहे थे तो दादी जी ने कहा, 'भोजन के साथ अचार ले लेना।' ट्रेन में चढ़ते समय, जिस भाई के हाथ में भोजन का टिफिन था, वह खुल गया और सारी सब्जी गिर गई। तो रोटी और अचार ही काम में आये। कई बार दादी जी हम सभी को विशेष अव्यक्त स्थिति का अनुभव कराती थी, धारणा, ज्ञान, योग आदि-आदि से पुरुषार्थ में आगे बढाती थी। ऐसी थी हमारी प्यारी दादी जी।

दादी के जीवन से सीखा, यज्ञरक्षक होकर चलना

ब्रह्माकुमारी गीता बहन, सानफ्रांसिस्को
विश्व की दादी, गुलज़ार दादी जब सन् 1985 में अमेरिका टूर पर आई थी, तब मैं लंदन में थी। दादी जानकी ने मुझे कहा, अमेरिका जाओ। उस समय हमें यह पाठ पक्का कराया गया था कि एक ही शब्द बड़ों के सामने बोलना और वह है 'हां जी।' दादी गुलज़ार जी के साथ बहुत से देशों में यात्रा करने का मौका मिला। बाबा के सभी बच्चे, दादी जी और बाबा को एक ही दृष्टि से देखते थे क्योंकि विदेश में अव्यक्त बापदादा के पार्ट के दौरान ही बाबा के बच्चों का आना शुरू हुआ। दादी की रूहानियत की दृष्टि, रूहाएनियत की वृत्ति और वाइब्रेशन सभी को बहुत आकर्षित करते थे। हमने अपनी आंखों से, दादी के जीवन द्वारा देखा कि कैसे यज्ञरक्षक, यज्ञप्रेमी हो कर चलना है।
एक बार एक अंग्रेज भाई ने दादी जी से पूछा कि, ' मै 25 वर्षों से ईश्वरीय ज्ञान में चलता हूं, मुझे बाबा से बहुत प्यार है, मगर बाबा का प्यार मुझे अनुभव नहीं हो रहा है।' दादी ने बहुत ही सरल जवाब दिया था, जो आज तक मुझे याद रहता है कि 'जब से आपने ब्राह्मण जीवन अपनाया है, तब से जो बाबा से आपको प्राप्तियां हुई हैं, उन एक-एक प्राप्ति को सामने रखते जाएंगे तो बाबा के प्यार का अनुभव होता जाएगा।'
हम भी बाबा की प्राप्तियों को सामने रखते हैं तो कोई भी बात मुश्किल नहीं लगती है। दादी जी पिछले तीन वर्षों से मुंबई में ही थी तो हमने यह अनुभव किया कि कैसे दादी जी, साइलेंस की शक्ति द्वारा अशरीरीपन का अनुभव कराती थी। बोलती कुछ नहीं थी पर नैनों की भाषा से बहुत कुछ सिखाया। साइलेंस से कैसे कम्युनिकेशन किया जाए, वह हमने दादी जी में देखा। मार्च, 2020 में जब मैं अमेरिका वापस जाने के लिए दादी से छुट्टी लेने गई, तब दादी जी ने बहुत लंबी दृष्टि दी और फिर आंखें बंद कर ली। उस दृष्टि में बहुत सारा रहस्य छुपा हुआ था जो मैं उस वक्त तो समझ नहीं पाई परंतु जैसे ही मैने अमेरिका की धरती पर कदम रखा, उसके दो दिन के बाद ही कोरोना के कारण सब कुछ बंद हो गया। दादी को दृष्टि में जो बातें समाई थी, वे एक के बाद एक मुझे अनुभव होती गई और वहां के सभी भाई-बहनों को बाबा के प्यार का अनुभव कराती रही। दादी से मिलने के लिए जो भी आता वह दादी की दृष्टि से अपनेपन का अनुभव करता था। चाहे बड़े हो चाहे छोटे सभी को दादी हमेशा एक समान ही दृष्टि से देखती थी। दादी जी के साथ हमारा दोस्ती का संबंध था। दिल की कोई बात कभी दादी को बताते थे तो दादी बहुत कम शब्दों में एक ही वाक्य में जवाब दे देती थी। हमने सीखा कि कैसे शार्ट और स्वीट जवाब दिया जाता है। ऐसी अनुभूति हो रही है कि हमारी फरिश्ता दादी हमारे साथ ही है और सदैव साथ रहेगी। हम सभी यज्ञरक्षक और यज्ञप्रेमी होकर रहेंगे और बाबा ने जो लक्ष्य दिया है, जो दादियों ने अपने प्रैक्टिकल जीवन से सिखाया है, बस उसे ही फॉलो करते रहना है।

मन-चित्त से सम्पूर्ण स्वच्छ दादी हृदयमोहिनी

ब्रह्माकुमारी मंदा, लंदन
दादी हृदयमोहिनी जी को मैंने 40 वर्ष देखा। जैसे पहली मुलाकात में देखी थी शांतमूर्त, मधुरता की अवतार, नम्रतायुक्त वैसी अन्त तक देखी। दादी में बिल्कुल भी हिंसा के संस्कार नहीं थे। गुस्सा करना तो दूर लेकिन दादी जी के वाइब्रेशन ऐसे थे जैसे एक सॉफ्ट एनर्जी, किसी भी तरह के फोर्स के संस्कार नहीं थे। जबरदस्ती कोई भी बात करना, सोचना, व्यवहार में लाना भी एक तरह की हिंसा है, वह भी उनमें हमने नहीं देखी।

दादी जी के वाइब्रेशन अव्यक्त बापदादा के वाइब्रेशंस अनुभव होते थे

दादी जी के वाइब्रेशन अव्यक्त बापदादा के वाइब्रेशन अनुभव होते थे। इतनी एकाग्रता की शक्ति थी दादी में। हमने अनुभव किया कि अगर हम दादी के सामने हैं तो उस वक्त दादी का अटेंशन और कहीं नहीं जाएगा, जैसे हम ही उस वक्त के लिए दादी का संसार बन गए हो उस कारण से ऐसा लगता था कि हम परमात्मा के वाइब्रेशन और प्यार में बैठे हैं। दादी को कभी भी भूलता नहीं था कि में बाबा का रथ हूं, बाबा मुझ में आते हैं। परमात्मा किस तन में आएंगे? उस तन में जिस तन की आत्मा में संस्कार है कि वह कभी किसी बात में दखल नहीं करेगी, ना सिर्फ बापदादा की पधरामणी के समय बल्कि अन्य समय भी।

दादी जी की दृष्टि से स्वयं का स्पष्टीकरण मिल जाता था

मैं पहली दफा बापदादा से 1981-82 में मेडिटेशन हॉल में मिली। उन दिनों मैं इतनी शांत नहीं थी और दादी इतनी शांतमूर्त थी जिस वजह से मुझे दादी से डर लगता था क्योंकि सभी दादियो से दृष्टि लेते वक्त यह महसूस होता था कि हमारा भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल देख रही हैं। उनकी दृष्टि के वक्त हमें भी अपने आप का स्पष्ट स्पष्टीकरण मिल जाता था।

दादी के मन में एक ही सीट थी, बाबा के लिए

दादी एकदम निष्पक्ष थी, कभी पक्षपात नहीं करते देखा। दो व्यक्तियों में कछ अनबन हुई और एक पहुंचा दादी के पास। दादी उसकी बात सुनती बड़े प्यार से राय देती। फिर दूसरा व्यक्ति आकर अपनी बात बताता तो दादी उसे भी उतने ही प्यार और अटेंशन से सुन कर राय देती थी। इससे दोनों में ही शक्ति आ जाती प्रेरणा आ जाती कि हमें अब क्या करना चाहिए। दादी के अंदर जो बाबा की हाजरी थी, वह और कहा नहीं देखी। दादी के मन में एक ही सीट थी, बाबा के लिए बस।

दादी को नया सीखना, समझना अच्छा लगता था

सबको मान देना, प्यार देना परंतु दिल और मन में सिवाय एक बाबा के और कोई नहीं। इसलिए दादी को कभी कशमकश नहीं हुई कि इसकी सुनें या उसको सुनूँ। एक के प्रति वफादार होने से ही औरों के प्रति वफादार हो सकते हैं। काफी देशों में दादी के साथ भाषा अनुवाद के लिए यात्रा करना हुआ। दादी से सदा समानता का अनुभव होता था, कभी ऐसा नहीं लगता था कि हम छोटे हैं। दादी बड़ी हैं। दादी कभी हमारे कमरे में आती देखने के लिए कि कमरा कैसा है? कभी दादी के साथ हम घूमने जाते थे। दादी को अच्छा लगता था नई जगह देखना, नया कुछ सीखना, समझना।

दो मिनट पहले की भी बात मन से समाप्त

एक बार दादी हमारे पास लंदन आई थी, साथ में गोपाल भाई थे, तो भाई जी ने कहा, चलो बाजार चलते हैं। दादी से पूछा तो दादी ने कहा, 'हा चलेंगे।' बाज़ार में हम घूम रहे थे। एक दुकान के सामने छोटी-छोटी बास्केट में कुछ छोटी-छोटी चीजें रखी थी। दादी ने देखा और एक चीज उठाकर उसे एक छोटे बच्चे की तरह बहुत प्यार से देखने लगी फिर रख दिया। बस खत्म, फिर दोबारा उसके बारे में ना सोचा ना बोला। दादी के वाइब्रेशन से ऐसा लगता थी कि जो बात या सीन खत्म हो गई वह दादी के मन-चित्त में भी खत्म हो गई। बीती हुई कोई भी बात को मन में रखना अर्थात मन को अस्वच्छ बनाना। गुलज़ार दादी की स्वच्छता हमने देखी। स्वच्छता माना हर सेकंड वर्तमान में हाजिर रहना। कल की बात तो छोड़ो, दो मिनट पहले की भी बात मन में ना रहे।

दादी से की गई हर मुलाकात नई लगती थी

दादी बोलती बहुत कम थी लेकिन देखती सब कुछ थी और देख कर ही उन्हें पता चल जाता था कि सामने वाले में कितनी सफाई है, सामने वाले के वाइब्रेशन आदि कैसे हैं। लेकिन, कभी दादी सामने वाले को यह महसूसता नहीं आने देती थी कि वे सब समझती हैं। दादी की इसी विशेषता की वजह से दादी से की गई हर मुलाकात नई लगती थी। दादी को भले ही हमारा नाम आदि याद ना भी हो परंतु हम भविष्य में क्या बन सकते हैं, वह पहचान दादी से मिलती थी।

कैसे वैराग्य आए?

एक बार मैने दादी से पूछा, हमें कैसे वैराग्य आए? दुनिया वालो को कब वैराग्य आएगा? दादी कहती थी, जितनी-जितनी हमारे में वैराग्य वृत्ति आएगी, उतनी-उतनी दुनिया वालों में भी वैराग्य वृत्ति आएगी तो हमें अपने आपको देखना है कि मुझ में कितनी वैराग्य वृत्ति है?

निराकारी पालना

गुलज़ार दादी के रहन-सहन के साथ-साथ उनके विचारो में भी बहुत सादगी थी। कोई उलझन नहीं थी। हमारा मन भी ऐसा साफ हो जो हमें भी टचिग आए कि सामने वाले को क्या देना है जैसे दादियों को आ जाती थी। अभी समय है निराकारी पालना लेने का बाहर की जिन बातों को हमने सहारा बना रखा था, वे सब छूट गई। घर-घर सेंटर बन गया। वही भोग लगाना, वही मुरली पढ़ना। यही निराकारी पालना अंत में हमें बाबा के साथ ले जाएगी।

गुलज़ार दादी की स्मृति आते ही हमारी बुध्दि, तारों के पार चली जाती है

ब्रह्माकुमारी सुधा बहन, रशिया
मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि मेरा आध्यात्मिक जन्म उस सेवाकेंद्र में हुआ, जहां गुलज़ार दादी जी रहा करती थी। दिल्ली का कमला नगर सेवाकेंद्र, विश्व में मधुबन के बाद प्रथम सेवाकेंद्र रहा। वहां दादी गुलज़ार जी, जगदीश भाई साहब और चक्रधारी दीदी रहती थी, जब 1968 में पहली बार मैं वहां गई। मेरे मन में एक संकल्प था कि मुझे अपने जीवन को अलग तरह से जीना है, सभी लोगों की तरह नहीं। वह संकल्प एक क्षण में स्पष्ट हो गया कि किस तरह से जीना है। जब मैने पहले दिन सेवाकेंद्र पर दादी को देखा। दादी जी हॉल के बाहर ही खड़े थे। तब तक मैने कोई ज्ञान नहीं सुना था लेकिन उन्हें देखते ही लगा कि बस, मुझे ऐसा ही बनना है। घर जाकर मैने अपने पिताजी को यह बात बता दी। ऐसा था दादी का स्वरूप जो फौरन प्रेरित कर देता था।
हमें बचपन में गाने का बहुत शौक था। एक दिन दादी जी से पूछा, 'आपको कौनसा गीत पसंद है?' दादी ने कहा कि मैंने जिंदगी में एक फिल्म देखी है, उस फिल्म का गीत है, 'कहां ले चले हो बता दो मुसाफिर, सितारों से आगे यह कैसा जहां है, ख्यालों की मंजिल, दुआओं की महफिल, समझ में ना आए, ये दुनिया कहां है।.।' यह गीत 1968 में दादी जी को पसंद था, अभी तो वे प्रैक्टिकल में सितारों के पार खुद गई ही हैं लेकिन उनकी स्मृति आते ही हमारी बुद्धि भी सितारों के पार चली जाती है।

मौके पर सही बात

दादी बहुत कम बोलते थे लेकिन टू द पॉइंट बोलते थे कि व्यक्ति के अंदर वह बात चली जाती थी। जब हम इस ईश्वरीय मार्ग पर चले तो पिताजी का विरोध तो नहीं था परंतु वे फेवर में भी नहीं थे। एक बार एक मेले में हमने अपने पिताजी को दादी से मिलवाया। दादी ने उन्हें देखते ही बहुत प्यार से कहा कि 'हम तो आपको रोज याद करते हैं।' हमारे पिताजी हैरान हो गए कि मुझे तो आपने देखा ही नहीं तो याद कैसे करते हैं? उन्होंने आश्चर्य से दादी की ओर देखा। दादी ने कहा, "ऐसा है, हमारे पास एक गीत है, जिसकी रचना इतनी सुंदर वह कितना सुंदर होगा। हम आपकी रखना को देखते हैं तो आपकी याद तो स्वतः ही आ जाती है। यह बात हमारे पिताजी को लग गई, गहराई से और उनके मन में दादी जी के लिए जिगरी प्यार और सम्मान रहा और कुछ समय बाद वे भी ज्ञान में चल पड़े। मौके पर सही बात कह देना, दादी जी की विशेषता थी।

कम वोलती थी, कम सोचती थी

एक बार हम एक रशियन भाई को लेकर मधुबन में दादी से मिलने उनके कॉटेज में गए। उसने दादी से पूछा, 'मेरे लिए कुछ शिक्षा दीजिए कि मुझे किस गुण, शक्ति या विशेषता का अभ्यास करना चाहिए?' दादी ने दृष्टि दी और कहा, 'आपको जरूरत है धीरज की, आप बहुत जल्दबाज़ हो।' बाहर जाने पर उसने सोचा कि मैं जो भी निर्णय लेता हूं, बहुत जल्दी लेता हूं। वह बहुत बड़ा विजनेसमैन है। तो उसने समझा कि वाकई मुझे धीरज की बहुत जरूरत है। इस तरह से दादी, सामने वाले को पहचान लेती थी क्योंकि वह न केवल कम बोलती थी लेकिन कम सोचती भी थी। बहुत साल पहले एक बार दादी जानकी ने कहा था, 'कम सोचो।" हम सोचते थे कि कम कैसे सोचें? तो जब हमने दादी गुलजार जी को देखा तो समझ में आया कि कम सोचना किसे कहा जाता है। कम सोचने की वजह से दादी जी का एनर्जी लेवल बहुत ज्यादा था। जिससे उन्हें किसी को भी परखना बहुत आसान होता था।

शांति के अभ्यास

रशिया में दादी तीन बार आए। एक बार दुसरी वर्षगांठ पर, फिर सतरहवी वर्षगांठ पर और तीसरी बार बीसवीं वर्षगांठ पर। उस देश के लोग धर्म पर विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें मना किया गया है। जब 1991 में हमारा वर्षगांठ का कार्यक्रम था तब दादी को मैं पीछे से स्टेज पर ले गई। दादी अपनी सीट की और न जाकर धीरे-धीरे चलते हुए स्टेज के एकदम सामने छोर पर पहुंच गई। वहां कुछ लोग शोर मचा रहे थे कि यह योग शब्द हमारे लिए नहीं है आदि। धीरे-धीरे दादी का हाथ उठकर वरदानीमूर्त में आ गया। उस हॉल में 2000 से भी अधिक लोग थे परंतु एक सेकंड में ही सूई पटक सन्नाटा छा गया। ऐसा वातावरण हॉल के भीतर बन गया। दादी पूरे हॉल को दृष्टि देती रही फिर अपनी सीट पर बैठी और महावाक्य उच्चारण किए। शांति के अभ्यास का प्रभाव ऐसा होता है कि कहीं पर कोई अशांति हो तो उसे शांत कर सकते हैं।
दादी की कोई भी क्लास बहुत सिस्टेमेटिक, टू द प्वाइंट होती थी। एक टॉपिक पर शुरू करती तो उस की गहराई में ले जाती थी। एक बार मुझे कॉलेज से एजुकेशन टूर पर जाना था। मैं दादी से छुट्टी लेने गई। दादी ने मुझे एक बहुत सुंदर छोटा सिल्क पर्स दिया लाल रंग का, जिसमें एक किचेन था जो बुक की तरह खुलता था, जिसमे मम्मा-बाबा का फोटो था। दादी ने कहा, इसे हमेशा अपने पास रखना, भूलना नहीं, इससे तुम्हारा सब सफल होगा। एक बार, मॉस्को के एक भाई को दादी ने छोटी-सी चांदी की डिब्बी में इलायची डालकर दी थी। इस भाई ने इसी वर्ष शरीर छोडा है। तो जिंदगी के अंत तक भी उन्होंने वह सौगात अपने पास बहत संभाल कर रखी थी।
दादी हर बात में ऐसी शक्ति भर देती थी कि लगता था कि हमारा जोवन बस बाबा और बाबा के कार्य में ही समर्पित हो।

दादी गुलज़ार में साइलेंस की अनोखी कशिश थी

ब्रह्माकुमारी गीता बहन, शान्तिवन
रूहानियत की अवतार, परम आदरणीय दादी गुलज़ार जी, समस्त ब्राह्मण परिवार में आकर्षण की केंद्र रही। दादी जी साकार में होते हुए इतनी अव्यक्त, अशरीरी, न्यारी-प्यारी और साइलेंस की स्थिति में रही जो हर कोई उनको दूर से देखकर ही निहाल हो जाता था। सन् 1971 में जब मैं 15 वर्ष की आयु में मधुबन भट्ठी करने के लिए आई, तब सभी दादियां ही भट्ठी कराती दादी गुलज़ार में साइलेस की अनोखी कशिश
थी इसलिए बहुत सारी दादियां मधुबन में होती थी पर हमें गुलजार दादी का बहुत आकर्षण रहता था। मुरली क्लास के बाद नाश्ता करके जब हम आंगन में या शांति स्तंभ के आसपास होते थे और दादी जी अपने कमरे से निकलते तो हम उनके पीछे-पीछे दौडते थे। इतना आकर्षण होता था कि हम उनसे मिले और दादी जी की साड़ी का पल्लू पकड़ें। पल्लू भी थोड़ा टच हुआ तो हम बहुत खुश होते थे, इतना उनका अलौकिक आकर्षण था। भल हमारी सभी बड़ी दादियां ज्ञान, योग, प्यार, रूहानियत हर चीज में बड़ी विशेष निमित्त आत्माएं थी पर दादी गुलज़ार में जो साइलेंस की अनोखी कशिश थी, वह हमें बहुत खींचती थी।

प्रेरणा मिली कि ज्यादा से ज्यादा यज्ञ को देना है

फिर हम सेंटर में रहने लगे, बाद में अहमदाबाद आए और उस वक्त शिविर की सेवार्थ बड़ी दादी और सरला दीदी ने हमे बिहार में मुजफ्फरपुर में भेजा। दिल्ली से एक टीचर बहन भी मेरे साथ आने वाली थी इसलिये मैं अहमदाबाद से दिल्ली, पांडव भवन पहुंची। नाश्ते के बाद मुझे दादी जी से मिलवाया गया, मेरा तो भाग्य ही खुल गया। उस वक्त दादी किसी कपड़े की सिलाई कर रही थी। मुझसे बातें भी कर रही थी और मुझे बता भी रही थी। हमने देखा, इतनी बड़ी, महान, दिव्यता की अवतार, भगवान की माध्यम दादी इतनी सहज रीति से हमसे मिली और दादी खुद छोटे-मोटे कार्य भी कर रही थी। उन्हें देखकर मुझे प्रेरणा मिली कि इतनी महान दादिया प्रैक्टिकल में भी इतनी महान हैं, कैसे इकॉनामी कर रही हैं। मुझे बहुत प्रेरणा मिली कि हमें भी यज्ञ का कुछ भी वेस्ट नहीं करना है। सदा यह लक्ष्य रखना है कि हमें ज्यादा से ज्यादा यज्ञ को देना है और कम से कम खुद के प्रति लेना है। बाबा कहते हैं, सादा रहो और स्वच्छ रहो। जैसे गांधी जी कहते थे, कपड़े धुले हुए हो, फटे ना हो, सिलाई कर लें, तो दो जोड़ी कपड़ों से भी तुम्हारा गुजारा हो सकता है। तो दादी के जीवन में हमने यह प्रैक्टिकल देखा और सीखा कि यज्ञ की मालिक, निमित्त अथॉरिटी दादियां, कितनी सादगी से अपना जीवन जी रहे हैं। तो दादी आदर्शमूर्ति रहे।

भगवान की सेवा के लिए सदा हाजिर रहना है

एक बार गुजरात की सभी टीचर्स बहनों की गुजरात के प्रसिद्ध उकाई डैम पर बने बहुत अच्छे गेस्ट हाउस में भट्ठी रखी गई थी और गुलज़ार दादी जी भट्ठी कराने आई थी। हम वहां दादीजो के साथ दिनभर क्लास करते, योग करते, साइलेंस में बैठते। रात को हम दो-तीन बहने, दादी के कमरे में जाती थी क्योंकि दादी की सेवा करने की बहुत इच्छा रहती थी। हम दादी के पैरों की मालिश करते, पैर दबा देते थे। हमने देखा कि दादी के पांवों में बहुत बड़ी-बड़ी गांठें हुई हैं। बापदादा आते थे दादी के तन में तो बहुत देर तक बैठते थे। कभी-कभी तो सोलह घंटे, कभी बारह, कभी पांच-छह घंटे बैठे रहते थे, ज्ञान देते थे, सब से मिलते थे जिस वजह से वे गांठे पड़ी थी। हमने जब दादी से पूछा तो दादी ने सहज रीति से मुस्कराते हुए कहा, डॉक्टर को दिखाया था, डॉक्टर ने कहा कि आप बहुत बड़ी स्पोर्ट्समैन हैं जो इतने मजबूत मसल्स बने हैं। ऐसे डॉक्टर हसता था। हमने देखा कि दादी किसी भी बात में भारी नहीं थी। भगवान का माध्यम बनने की खुशी में और किसी भी बात को दादी सहज रीति से लेती थी और चलती थी। यह भी सीखने को मिला कि भगवान का माध्यम बनना कोई सहज बात नहीं है क्योंकि इतने घंटे बैठे रहने से शरीर को भी कष्ट होता है। परंतु, बस कुर्बानियां, भगवान की सेवा के लिए हमें सदा हाजिर रहना है, तैयार रहना है और खुशी के साथ हर सेवा स्वीकार करनी है, चाहे कुछ तकलीफ भी हो तो क्या है। भगवान हमारा उपयोग करते हैं तो भगवान ही हमें मदद भी करते हैं, बात को सहज भी कर देते हैं।

दादी की स्थिति से दूसरों को प्रैक्टिकल अनुभव होते थे

सन् 1988 में ओमशांति भवन बना, जिसमें लगातार 10, 12 कॉफ्रेंसिज हुई। उसके बाद 1995 में ज्ञान सरोवर बना। एक कॉन्फ्रेंस में हम भावनगर के एक साइंटिस्ट को लेकर गए थे, सौभाग्य से उसके सेमिनार में दादी जी चेयरपर्सन थी, वे स्पीकर थे और उन्हें दादी जी के नजदीक बैठने का मौका मिला। सेमिनार संपन्न हुआ तो वैज्ञानिक भाई से मैंने पूछा, 'कैसा रहा, अच्छा लगा?' उसने बताया कि मुझे बहुत ही अलौकिक अनुभव हुए, मैं दादी के पास बैठा था, दादी की साइलेंस पावर से देह से डिटैच हो गया, मैंने बहुत एकाग्रता से सेमिनार अटेंड किया और मैं देहभान से उड़ ही गया। तो यह थी दादी की स्थिति, दादी की पावर, जो पास में बैठने वाले व्यक्ति ने जिसे ज्ञान भी नहीं, योग भी जिसके जीवन में नहीं, उसने भी हत्कापन और साइलेंस की शक्ति का अनुभव किया। वह वैज्ञानिक बाबा की सेवाओं में आगे भी मदद करता रहा। दादी की स्थिति में दूसरों को प्रैक्टिकल अनुभव होते थे।

दादी जी जाते-जाते जीवनदान देती गई

ग्यारह मार्च, 2021 को दादी जी अव्यक्त हुए। उन दिनों मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। शरीर के हिसाब-किताब और कार्मिक अकाउंट चल रहे थे। एक सप्ताह से मुझे ना दिन में, ना रात में नींद आई थी, खाना बिल्कुल भी नहीं खा रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था कि पता नहीं कभी भी मैं उड़ जाऊंगी, शरीर छूट जाएगा। मैने कहा, 'बाबा, मैं दादी का अग्नि संस्कार करके जाऊंगी, उसके पहले नहीं जाऊंगी।' उस रात भी मुझे नींद नहीं आई। बारह मार्च, 2021 अमृतवेले दो बजे मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे दादी जी जाते-जाते मुझे जीवन दान देती गई। मुझ आत्मा को कार्मिक अकाउंट से मुक्त करके गई। दादी एक फरिश्ते के रूप में और बाबा एक बहुत तेजोमय ज्योतिबिंदु के रूप में नजर आए। फरिश्ते के रूप में दादी उड़ती-उड़ती मेरी आंखों के सामने से गुजरी और मुझे ऐसा अलौकिक आनंद अनुभव हुआ जो मैने कभी भी नहीं किया होगा। इतना अलौकिक आनंद, एक दिव्य आनंद और एकदम साइलेंस, मुझे सुनाई दिया कि मुक्त हो गई। बस, उसके बाद उस आनंद में मैं सो गई, पूरे सप्ताह के बाद मुझे नींद आई। फिर मैं 3:30 बजे उठी, बाबा को याद किया और दादी का अंतिम विधि का सारा कार्यक्रम अटेंड किया। उसके बाद से मेरी तबीयत धीरे-धीरे सुधरती गई, जैसे कि मुझे प्यारे बाबा और फरिश्ता दादी की मदद मिली। जो मैं रोग की पीड़ा से मुक्त हुई और बहुत दिव्य आनंद का अनुभव किया। यह तो मैं ही जानती हूं पर अब सबको बता रही हूं। ऐसी महान दादीको हम नित्य याद करते हैं। अपनी आंखों के सामने रखते हैं और उनको फॉलो करते हैं।

गुलज़ार दादी जी की दृष्टि में असीम स्नेह, रूहानियत, अपनापन और शक्ति थी

ब्रम्हाकुमारी डॉ सविता बहन, शांतिवन
सन् 1985 जनवरी में मैं पहली बार बापदादा मिलन के लिए उदयपुर से आई थी। तब गुलज़ार दादी जी से प्रथम साक्षात्कार हुआ। उनके तन द्वारा ही बाबा से मिले, बाबा से वरदान लिये, दृष्टि, टोली ली। वो मेरे जीवन का अविस्मरणीय अनुभव था। उसके बाद सन् 1987 में भी बापदादा मिलन हुआ जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। बाबा के स्नेह की शक्तिशाली दृष्टि ने अनुभव कराया कि यह मेरे अनादि पिता है, जिन्हें मैने ढूंढा, पर अब पाया है। सन् 1988 में में चिकित्सक सम्मेलन में आई थी। सम्मेलन से वापस आने का दिन गुरुवार था, गुलज़ार दादी जी ही तब भोग लगाते थे। मधुबन में मुरलो क्लास के बाद ही भोग लगता है लेकिन हम को जल्दी निकलना था, तो मैं थोड़ी-सी उदास थी कि गुलज़ार दादी जी के द्वारा मैं बाबा का सन्देश नहीं सुन पाऊंगी। पर जब मैं मुरली क्लास में पहुंची, मैने देखा, गुलज़ार दादी जी संदली पर बैठे हैं। उनके सामने भोग रखा है और भोग के गीत के बाद दादी जी ने डॉक्टर्स के निमित्त बाबा का सन्देश सुनाया। मैं बता नहीं सकती कि मुझे कितना आश्चर्य और खुशी हुई। कैसे बाबा तक मेरा संकल्प पहुंचा और जाने से पहले मैं दादी जी से सन्देश सुन पाई।

दादी जी का जीवन लाखों आत्माओं की प्रेरणा बना

जब मैं 1990 में मधुबन डिस्पेंसरी सेवा में थी तब हमारा निवास गुलज़ार दादी जी के कमरे के ठीक ऊपर था। उसकी भी बहुत खुशी रहती थी और ऊपर से नीचे आते-जाते कई बार दादी जी अनायास मिल जाते थे। उनकी दृष्टि मिलती थी तो विशेष खुशी का अनुभव होता था। ऐसा लगता था जैसे बाबा की दृष्टि मिल गई। दादी जी की दृष्टि में असीम स्नेह, रूहानियत, न्यारेपन के साथ अपनापन और शक्ति भी थी। डॉक्टर होने के नाते दादी जी के पास कभी-कभी उनकी तबियत के कारण या उनको चेक करने या कभी दवाई देने इत्यादि के कारण मेरा जाना होता था। लेकिन दादी जो शरीर की बीमारी से न्यारे दिखाई देते थे। दर्द की महसूसता या बीमारी के चिन्ह उनके चेहरे पर प्रकट नहीं होते थे। अपनी इसी अवस्था के कारण वो यज्ञ में ग्लोबल हॉस्पिटल की सेवाओं के निमित्त बने। जब उनका इलाज मुंबई में चल रहा था तब डॉक्टर अशोक मेहता जो उनकी मन की स्थिति से बहुत प्रभावित हुए। वे उनके निमंत्रण पर आबू भी आये और यहाँ की सेवाओं को देखकर उन्हें संकल्प आया कि यहाँ अस्पताल होना चाहिए। बापदादा और दादियों की दुआओं से दो वर्ष में ग्लोबल हॉस्पिटल तैयार हुआ और डॉ. अशोक मेहता जी, जो संपर्क में थे, वे बापदादा के समीप आये और बाबा के वारिस बच्चे बने। दादी जी का जीवन, चेहरा, चलन लाखों आत्माओं की प्रेरणा बने।

शब्दों में भरी होती थी शक्ति, सहज ही धारण हो जाते थे

मधुबन में रहते हुए कई बार मैं अपनी व्यक्तिगत समस्यायें भी दादी जी के पास लेकर गई। दादी जी बहुत प्यार से सुनते थे, फिर बाबा की श्रीमत के अनुसार जवाब देते थे और उन शब्दों में इतनी शक्ति भरी होती थी कि वे सहज ही मुझे धारण हो जाते थे। मुंबई में एक बार हमें दादी जी के साथ पिकनिक पर जाने का अवसर मिला। पूरा दिन दादी जी के साथ रहे, उनके साथ भोजन किया। वो इतने सहज, सरल और निर्माणचित्त थे, जो ऐसे महसूस होता था जैसे कि माँ के साथ हैं, उनका प्यार, दुलार मिल रहा है। दादी जी में भगवान का रथ होने का अंशमात्र भी देहअभिमान नहीं था। मैं ड्रामानुसार अपने को सौभाग्यशाली समझती हूं कि बाबा ने हमें दादियों के समीप, अंगसंग रहने का भाग्य दिया।

दादियों का आपस में प्यार, एकता, समर्पणभाव अद्भुत था

जब मैं दादी प्रकाशमणि जी की सेवा में थी तब गुलज़ार दादी यदि मधुबन में होते थे तो दिन का भोजन दादी जी के साथ ही करते थे। दादी जानकी जी भी साथ होते थे। भोजन के पश्चात् दादी प्रकाशमणि जी थोड़ा पैदल करते थे। मैं उनका हाथ पकड़कर उनके साथ रहती थी। वे दोनों दादियों को विश्वकल्याणी भवन तक छोड़ने आते थे, मुझे वो सौभाग्य भी मिला जो मैं तीनों दादियों की रूहरिहान सुनती थी, उनका आपस में प्यार, एकता, समर्पण भाव अद्भुत था। गुलज़ार दादी जी को सदा दादी जी का आज्ञाकारी, वफादार देखा। मुझे एक घटना याद आती है, पाण्डव भवन, ओमशांति भवन में शिवरात्रि का झंडा लहराने के लिए सभी वरिष्ठजन के साथ भाई-बहनें खड़े थे कि अचानक दादी प्रकाशमणि जी ने गुलज़ार दादी को बाबा के पास जाकर सन्देश लाने को कहा और दादी बिना कोई प्रश्न किये, कुर्सी पर बैठी और वतन में गई, सन्देश लेकर आई। दादी गुलज़ार को सदा दादी प्रकाशमणि को 'हाँ जी' कहते ही सुना।

दादी जी की वाणी में मिठास, अपनत्व, प्यार भरा होता था

मैं महिला प्रभाग की सेवाओं की मधुबन संयोजिका हूँ। दादी जी को महिला सम्मेलन के उ‌द्घाटन सत्र में आशीर्वचन देन के लिए आमंत्रित किया। दादो जो की वाणी में मिठास, अपनत्व, प्यार भरा होता था और मैंने नोट किया कि दादी जो बाबा के दिए हुए ज्ञान एवं श्रीमत का विषय के अनुरूप ढालकर भाषण करते थे। उनके एक-एक शब्द जैसे दिल में छप जाते थे। कभी भी विदेश सेवा पर जाती थी तो मैं दादी जी से शुभकामनाएं लेकर जाती थी। मैंने पूछा, दादी जी विदेश के भाई-बहनों को आपको तरफ से क्या सन्देश दूँ, तो दादी जी ने कहा, 'कहना रोज जो बाबा मुरली में कहते हैं, उसे उसी दिन यूज़ करें। जो वरदान बाबा से मिलता है। उसे कार्य में लगायें, तो बाबा की दुआएं मिलेंगी, सहज पुरुषार्थ आगे बढ़ते जायेंगे।' दादी जी कहते थे, आप मधुबन यज्ञ में रहते हो तो आपके लिए माया भी यहीं आयेगी। जिस कमरे में आप रहते हो, आपके साथी ही आपका पेपर लेने के निमित्त बनेंगे, यही आपका पेपर हॉल है।

हर आत्मा के प्रति शुभभावना कि यह आगे बढ़े

एक बार मैने दादी जी से पूछा, मेरी कोई कमी दादी जी आपके ध्यान में हो, जिसे दूर कर मैं पुरुषार्थ में आगे बढूँ, तो मुझे बताएं। दादी जी ने मुझे बताया, जिस पर मेरा बिलकुल भी ध्यान नहीं था। दादी जी की हर आत्मा के प्रति शुभभावना रहती थी कि यह आगे बढ़े। दादी जी को सदा अन्तर्मुखी, शांतचित, गंभीर परन्तु सरल, सहज, निःसंकल्प, साधारणता में महान, अलौकिक व्यक्तित्व के रूप में देखा। उनकी उपस्थिति ही मन की स्थिति, वायुमंडल, वाइब्रेशन को परिवर्तन कर पावन, शक्तिशाली कर देती थी। ऐसी मीठी, प्यारी दादी गुलज़ार को कोटि-कोटि वंदन, नमन, अभिनंदन।

दादी गुलज़ार जी ने मुस्कराना सिखा दिया

भ्राता सुरेश ओबेरॉय, मुम्बई

दादी गुलज़ार जी, यह नाम लेते ही मुझे बाबा की याद आती है, छोटी सी-बच्ची की मुस्कान याद आती है, एक शुद्ध आत्मा की याद आती है। मैं कितना लक्की हूं कि दादी से मेरी बहुत बार मुलाकात हुई, बहुत प्यार मिला, बहुत आशीर्वाद मिला और ज्ञान मिला। सबसे पहले मैं उन्हें माउंट आबू में मिला, जहां गौतमी बहन मुझे ले गई थी, दादी ने मुझे बैज पहनाया और कहा, 'सैंपल बनना है, एग्जांपल बनना है!' बहुत अच्छा लगा।

अगली मुलाकात मुंबई में विलेपार्ले सेंटर पर हुई जहां मेरी बेटी भी मेरे साथ में थी। मेरी बेटी दादी से बातें कर रही थी और मैं थोड़ी दूरी पर खड़ा था। उनकी बातें मुझे कुछ ज्यादा सुनाई नहीं दे रही थी। कुछ देर बाद दादी ने श्री कृष्ण की तस्वीर मेरी बेटी की गोद में रखी। यकीन मानिए, जब उसका बच्चा हुआ, तो नाम तो हमने बच्चे का अर्जुन रखा था परंतु पहला शब्द वह कहने लगा, बाबा, बाबा। कभी अलमारी की चाबी के रिंग में भी बाबा की तस्वीर लगी होती तो पकड़ने की कोशिश करता है, बाबा, बाबा। बिल्कुल बीके जैसा निकला।
एक बार मुझे दादी ने पूछा, 'तेरी शक्ल ऐसी क्यों है!' कहा, 'थोड़ा-सा मुस्कराओ, इमेजिन करो कि मेरे हाथ में एक गुलाब का फूल है, उसे देखकर मैं मुस्करा रहा हूं।' इस तरह दादी ने मुस्कराना भी सिखा दिया।
एक बार मेरी बहू और बेटे दादी से मिल रहे थे तो दादी ने उनको बहुत आशीर्वाद दिये, प्यार दिया और मुझे कहा, 'देखो, तुम कितने लक्की हो, जो तुम्हारे एक फोन पर तुम्हारा बेटा पहुंच गया और वहू भी कितनी आज्ञाकारी है।' इस तरह से दादी हर बात में सकारात्मक रहती थी। जब उन्हें बच्चे हुए तो वे भी हंड्रेड परसेंट वेजिटेरियन ही हुए। दादी जी सोचती थी, जो बोलती थी, वह पूरा हो जाता था। एक दिन दादी ने एक बहुत पुरानी बात सुनाई। दादी ने कहा, 'हम ट्रेन से जा रहे थे तो हमने टीटी से कहा कि भैया, 'यहां लोग सिगरेट आदि पी रहे हैं, हम से नहीं बर्दाश्त होता। तो अगले स्टेशन पर उस टीटी ने दादी को फर्स्ट क्लास में बिठाया।
मैंने सोचा कि दादियों और उनके साथियों ने कितनी मेहनत की होगी। ट्रेन की एक आर्डिनरी क्लास में यात्रा करना, इतनी मेहनत करना और आज उनकी सारी मेहनत का फल हमें मिल रहा है। आज हमें सेवन स्टार ट्रीटमेंट मिलती है। दादी और उनके साथियों का बहुत-बहुत शुक्रिया, दादी गुलज़ार जी को कोटि-कोटि प्रणाम।

गुलज़ार दादी जी सदा दूसरों का उमंग-उत्साह बढ़ाती थी

ब्रह्माकुमारी उर्मिल बहन, गुरुग्राम (हरियाणा)
आदरणीय दादी जी हमारे लिए एक प्रेरणास्त्रोत थी। दादी दिल्ली, पांडव भवन में रहती थी और हमारा उनसे अक्सर मिलना होता था। मैं जब 16 साल की उम्र में ज्ञान में आई तब परिवार की तरफ से बहुत ज्यादा बंधन थे, जिस कारण मुझे लगता था कि कोई भी बात सामने आती है तो उसका समाधान हमें बड़ों से मिलता जाए। मैं यूनिवर्सिटी जाती थी तो लौटते समय पांडव भवन करोलबाग, जोकि बीच में ही पड़ता था, वहा अक्सर चली जाती थी जहा दादी जी से सहज ही मिलना हो जाता था। यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य रहा। मैं दादी से कहती कि 'मुझे बहुत बंधन है, क्या करे, परिवार वाले ज्ञान में नहीं चलने देते?' दादी हमेशा समझाती कि देखो, जैसे दुनिया वाले लोग भगवान को निरंतर याद नहीं कर सकते तो वे लोग निरंतर आपको कब तक रोक सकते हैं, आप कभी भी अपने मन को भारी नहीं करो, तन के बंधन तो कट जाएगे लेकिन मन का बंधन नहीं होना चाहिए।' दादी जी की यह बाते मुझे छू गई और मुझे एक शिक्षा मिली कि जैसे दादी जी ने हमेशा दूसरो का उमंग-उत्साह बढ़ाया, ऐसे हमें भी औरों का उमंग-उत्साह सदा बढ़ाना है और अपनी ऊर्जा को भी कभी कम नहीं करना है। अपनी एनर्जी लेवल कम होने से हम औरों का भी एनर्जी लेवल कम कर देते है

भोलेपन को खोना नहीं है

एक और शिक्षा मुझे दादी जी के जीवन से मिलो, वह शिक्षा थी उनका भोलापन, जो मेरे दिल को बहुत छूती था। एक बार निमंत्रण पत्रों पर नाम लिखने थे, जो मंत्रियों को पहुंचाने थे। दिल्ली में बहुत बडा प्रोग्राम होने वाला था। गुलजार दादी पांडव भवन के बगीचे में आई, जहां हम दो-तीन कुमारियां खड़ी थी और हम सभी को बड़े भोलेपन से कहा कि 'पहले आप आशा बहन के पास जाओ, वहां जाकर के अपनी हैडराइटिंग दिखाओ, उसके बाद आप नाम लिखना।' मुझे थोड़ी हंसी-सी आई, उन दिनों में मै एमएससी कर रही थी। एक बार दादी जी ओ. आर. सी. में थे। एक निमंत्रण-पत्र पर इंग्लिश में नाम लिखा हुआ था। दादी जी कॉरिडोर में टहल रहे थे और इशारे से मुझे बुलाया। मुझे लगा जैसे किसी फरिश्ते ने अपने पास बुलाया है। दादी ने पूछा, 'इसका मतलब क्या है?' मैने दादी जी को बताया और पूछा, 'दादी जी, कुछ और मदद चाहिए?' दादी ने इशारे से कहा, 'नहीं।' मुझे सीखने को मिला कि कभी भी हमें अपने भोलेपन को खोना नहीं है क्योंकि बाबा हमेशा कहते हैं, बालकपन और मालिकपन का बैलेंस रखकर चलने वाले जीवन में सदा आगे बढ़ते हैं।

कम वोलना अच्छा होता है, हमारी शक्ति को बचाता है

अंतर्मुखता का गुण भी हमें अपनी शक्ति को बचाने में बहुत मदद करता है। दादी जी बहुत कम बोलती थी। एक बार हम दादी जी के साथ ट्रेन से दिल्ली से आबू आ रहे थे। पूरी यात्रा के दौरान शायद ही दादी ने तीन-चार वाक्य से ज्यादा कुछ बोला होगा। हम दादी के साथ सखी रूप से रहते थे, तो मैंने कहा, 'दादी जी आप बहुत कम बोलते हो।' दादी ने कहा कि 'कम बोलना अच्छा होता है, हमारी शक्ति को बचाता है।' मैंने भी अपने जीवन में गांठ बांध ली कि हमें ज्यादा नहीं बोलना चाहिए क्योंकि हम देवता घराने की आत्माएं हैं। हमारे बोल वरदानी होने चाहिएँ ताकि दूसरो को हमारे जीवन से कोई प्रेरणा मिले। साथ ही हमें अंतर्मुखी होना चाहिए, दूसरों की बातों को समझना चाहिए, उनकी समस्याओं को समझकर उन्हें समाधान देना चाहिए और खुले दिमाग वाला होना चाहिए, यह सब मैंने दादी जी से सीखा। दूसरों की समस्या को समझ कर जवाव देना चाहिए
जब हम भाई-बहनों को (मै, सुदेश बहन और वीरेंद्र भाई) घर-परिवार वालों की ओर से बंधन था तब दादी जी ने हमारी समस्या को समझा। हमने कहा, 'दादी जी इस प्रकार से हमें सेंटर पर नहीं आने देते हैं तो क्या हम कहीं और चले जाएं? आप हमें राय दे।' दादी ने कहा कि 'यदि वे आपको इकट्ठे रहने देते हैं, सेंटर भी बना कर देते हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं है, आप सब मिलकर के सेवाकेंद्र बनाओ, इससे बहुत सेवा होगी, अन्य आत्माओं को भी प्रेरणा मिलेगी।' दादी के हमारे प्रति ये उद्गार देखकर मन को बहुत अच्छा लगा। मैंने यह धारणा बना ली कि हमेशा दूसरों की समस्या को समझ कर, अपने आप को उस जगह रख कर फिर जवाब देना चाहिए। दादी जी को हमारे ऊपर बहुत हुज्जत थी। कभी भी दिल्ली कोई बड़ा प्रोग्राम होता तो दादी हमेशा याद करती और बड़ों को कहा करती कि उर्मिल को बुला लो, कोई भी बड़ा कार्य बहुत सहज कर लेगी। सचमुच, बाबा ऐसी शक्ति देता था कि बड़े से बड़े कार्य के लिए मैंने कभी ना नहीं की, जिस वजह से बड़ों का प्यार मिला और दुआएं मिली।

मेरा मन क्या सोच रहा है?

अंतिम मुलाकात दादी से तब हुई जब दादी मुबई से शांतिवन आये और हम बहने उस समय शांतिवन में दादी कॉटेज में मिले। उस समय दादी जी अपने बैठक रूम में टहल रहे थे। दादी जी ने मुझे देखा। मैन कहा आपने मुझे पहचाना? तो दादी ने कहा, 'क्यों नही पहचानूंगी तुम उर्मिल हो ना! 'मैंने कहा, 'हा दादी।' फिर एक सेकंड दादी रुकी और एकदम अंतर्मुखी होकर जैसे फरिश्ता कोई संदेश देता है। कहा, 'कभी भी जीवन में कोई कार्य कर रहे होते हो तो एक मिनट रुक कर अपने आप से जरूर पूछो कि मेरा मन क्या कह रहा है, कहां चल रहा है, अगर वह किसी गलत दिशा में जा रहा है तो उसकी डायरेक्शन को तुरंत परिवर्तित कर दो।' दादी जी का यह मेरे प्रति अंतिम मैसेज था और मैंने इसे सदा जीवन में धारण किया और कोई भी कार्य करते मन को चेक करती हूँ, 'मेरा मन क्या सोच रहा है?'

निमित्तभाव और साक्षीपन

एक बार हम पांडव भवन में, मेडिटेशन हॉल में बापदादा से मिल रहे थे। सेंटर की पार्टी बाबा के सामने बैठी हुई थी। बाबा ने सब को देखा और मुझे भी दृष्टि दी, फिर सुदेश बहन को भी दी और वीरेंद्र भाई को भी देखा और कहा, 'आप सभी अपने आप से सतुष्ट हो?' मैंने कहा, 'नहीं बाबा, जितना होना चाहिए उतना नहीं है।' तो बाबा ने कहा, 'यह जीवन में जो छोटी-मोटी बातें आती है या शारीरिक बंधन आते है, ये कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन यदि हमारा मन मजबूत है तो हम सब समस्याओं को पार कर सकते हैं।' मुझे लगा, ये सारी बातें बाबा को किसने बताई होंगी? फिर जब हम बाद में दादी से दिल्ली, पांडव भवन में मिले तो दादी ने मुझसे पूछा कि 'उर्मिल, बाबा ने आप से क्या बात की?' मैंने बताया और कहा, 'दादी, आपने बाबा को बताया होगा।' दादी ने कहा कि नहीं, में तो निमित्त, साक्षी होती हूं, मैं तो कोई भी बात बाबा को नहीं बताती हूँ, बाबा तो जानीजाननहार है। मुझे मन में एक सुकून सा मिला और गहरा अनुभव भी हुआ कि हमारे बड़े इतने साक्षी होकर चलते है और निमित्त होकर कार्य करते हैं, तो हमें भी इस श्रीमत में उन्हें फॉलो करना है। उस समय से मैं निमित्तभाव और साक्षीपन को धारण कर समस्या को देखती हूँ, तो बड़ी बातें भी छोटी दिखाई पड़ती हैं।
जब हमने दिल्ली में एक नया-नया सेंटर शुरू किया था तब करुणा भाई जी सेंटर पर आए थे। उन्होंने कहा कि मधुबन में आजकल एक बात चल रही है कि दिल्ली में एक बहुत बड़ा स्थान होना चाहिए ताकि दिल्ली के वीआईपी वहां पर आ सकें। यह सुनते ही मैने मन में ठान लिया कि मैं यह कार्य करूंगी। बाबा के कमरे में गई और प्यार से बाबा को कहा, 'बाबा, मैं पीछे नहीं हटूंगी और आप भी मेरी वैकबोन बनकर के रहना।' तो यह कार्य बहुत आसानी में हो गया। डेढ़ साल लगा परंतु बहुत अच्छी तरह कार्य पूरा हुआ। उस समय दादी जी ने भी मुझे बहुत प्यार किया और कहा, आपने दिल्ली में एक बहुत बड़ा कार्य किया है और इस कार्य से बहुत बड़ी सेवा होने वाली है, इससे आपका बहुत भाग्य बनेगा।' मैंने अपना भाग्य बनाने के लिए तो यह कार्य नहीं किया, मैने तो सेवाभाव से किया है, जिससे मैं यज्ञ के काम आ जाऊँ, इससे बड़ा मेरा सौभाग्य क्या हो सकता है। लेकिन दादी जी के उस बोल ने मुझे बहुत शक्ति दी और शिक्षा मिली कि यदि कोई कुछ कार्य करता है तो उसका अप्रिशिएट (सराहना करना बहुत जरूरी है क्योंकि एप्रिशिएट करने से आत्माओं की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

गुलज़ार दादी दैवी गुणों की चैतन्य मूर्ति थी

ब्रह्माकुमार रामनाथ भाई, मधुबन
जब मैं मधुबन में आया तो सुना कि यहाँ वैल्यू बेस्ड एजुकेशन है। मैंने सोचा कि सारे वैल्यूज या दिव्यगुण कहां दिखाई देते हैं? मैने दादी गुलज़ार जी के जीवन में सभी दिव्य गुण देखे। उनके चेहरे और चलन में गंभीरता, मुस्कराहट, प्रसन्नता और दिव्यता देखी। कोई कुछ बोलता है तो धैर्य से सुनते रहेंगे, तो धैर्य का गुण भी देखा। रॉयल्टी भी देखी, बहुत सुंदर, एकदम नीट एंड क्लीन जीवन देखा। नम्रता भी देखी, संतुष्टता भी, कुछ चाहिए नहीं, हर बात में संतुष्ट थे। निमित्तभाव और निर्मानता भी उनके जीवन में देखी। एकांत भी देखा, गुप्त भी रहती थी। बैठती भी थी एकदम एकाग्रचित्त होकर, स्थितप्रज्ञ योगी की तरह, शरीर में कोई हलचल नहीं। बोल में मधुरता, निर्मानता रही। जितने दिव्य गुण बताए जाते हैं, जो कि भविष्य में देवताओं में होंगे, वे इसी पुराने शरीर में, संगम पर ही देखे। तो दादी दैवीगुणों की चैतन्य मूर्ति थी।

होवनहार विश्वमहाराजन

क्लास में दादी जी बताते थे कि जब शुरू-शुरू में मैं, ईशू दादी, कुंज दादी आदि यज्ञ में आए तब बहुत छोटे-छोटे थे। बाबा इन्हें कहता था कि 'आओ, मेरे विश्व महाराजन बच्चे!' तो दादी अंदर ही अंदर मुस्कराती और सोचती थी कि 'अभी तो भारत का नक्शा भी नहीं देखा है, विश्व का महाराजन कहां! कैसे बाबा बोल रहे हैं?' लेकिन भगवान की नजर त्रिकालदर्शी होती है, हम सिर्फ वर्तमान देखते हैं। अंत में दादी जी ने सारे विश्व का चक्कर लगाया और बापदादा ने उनके शरीर द्वारा सारे विश्व की आत्माओं की सेवा की। जो व्यक्ति सारे विश्व की आत्माओं की सेवा करता है, वह उन पर राज्य भी करता है, उनके ऊपर अधिकार प्राप्त करता है। तो बाबा जो उन्हें विश्व महाराजन कहते थे, सही कहते थे।

दादी जी आज्ञाकारी थी

दादी चलती थी तो आंखें इधर-उधर नहीं, एकाग्रचित्त, सिर नीचे, मर्यादा पुरुषोत्तम। श्रीराम का गायन है मर्यादा पुरुषोत्तम।मर्यादाएँ दादी जी के जीवन में, चलन में दिखाई देती थी। दादी जी आज्ञाकारी थी। दादी प्रकाशमणि जी कभी भी कहती थी, 'बाबा से संदेश लेकर आओ।' तो गुलज़ार दादी तुरंत जाती थी। कभी कोई बहाना नहीं दिया कि अभी नहीं, बाद में, गुरुवार को...। जैसे श्रीराम के लिए कहते हैं, जो पिता ने कहा, वही किया, ऐसी आज्ञाकारिता दादी जी के जीवन में देखी।

नॉलेजफुल भरपूर आत्मा

बहुत सिंपल थी, किसी प्रकार का कोई दिखावा नहीं। गुलज़ार दादी की क्लासेस भी ऊंचे विचारों वाली थी, साधारण नहीं, जैसे बीजरूप स्थिति, ज्वालामुखी योग, ब्राह्मणों के जीवन में धारणाएं कैसी होनी चाहिएँ। सिंपल लिविंग, हाई थिंकिंग वाला जीवन था। कुछ भी करती तो बाबा को याद करके करती थी, कर्म करते कैसे याद करना चाहिए, क्या मर्यादाएं जीवन में होनी चाहिएँ। ऐसी नॉलेजफुल भरपूर आत्मा थी दादी। दृष्टि भी एकदम रूहानियत भरी, साधारण नहीं। बचपन से ही तन, मन, समय, संकल्प, श्वास स्वाहा अर्थात् समर्पित किये, सम्पूर्ण समर्पित आत्मा थी। 'मैं', 'मेरा' ये शब्द कभी उनके महावाक्यों में नजर नहीं आते थे। कभी दिल्ली में है, कभी मधुबन में हैं, कभी और कहां हैं। ऐसे एकदम डिटैच, प्रसन्न आत्मा थी।

दादी ने एक, एक को दृष्टि दी, वे सबकुछ भूल गए

ज्ञान सरोवर में एक बार संत सम्मेलन था, जिसमे स्वामी चक्रपाणि थे, हिंदू महासभा के अध्यक्ष, अयोध्या रामजन्म भूमि के अध्यक्ष स्वामी जी भी थे, बुद्धिस्ट भंते करुणाकरण थे, जो 5 देशों के अध्यक्ष थे, नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया, श्रीलंका, भारत के यूपी के कई दफा मधुबन भी आए थे। उस समय सबकी इच्छा थी कि गुलज़ार दादी जी से हम व्यक्तिगत रूप से मिलें। राखी का समय था। दादी ने खुद बैठकर एक, एक को राखी बांधी, दृष्टि दी और वे सबकुछ भूल गए। जैसे मां और बच्चों का मिलन था। फिर साधारण बच्चे जैसे बन गए थे। वे भी कहते हैं कि कितना पवित्र जीवन उनका था, कितनी स्वच्छता, कितनी सादगी, कितनी निर्मानता उनके जीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देती थी। दादी बोलती बहुत कम थी। कुछ पूछो तो भी दो, तीन शब्दों में ही जवाब देंगी। जैसे साधु-संतों के लिए कहते हैं, 'पूजनीय', तो यह शब्द दादी जी के लिए हम कह सकते हैं। दैवी गुणों से, सर्वशक्तियों से संपन्न, मर्यादा पुरुषोत्तम आत्मा हमने सिर्फ सुनी नहीं, देखी है।
मैं सभी दादियों से व्यक्तिगत मिला हूं सिर्फ एक पुष्पशांता दादी को छोड़कर। सभी दादियों का जीवन, आचरण, बोल, शिक्षा देख महसूस होता है कि कैसे ब्रह्माबाबा ने उन्हें पालना दी, जैसी देवताओं की पूजा करते हैं, ऐसी। ऐसी चैतन्य मूर्तियों को देखा। अभी भी उनके चित्र को भी देखो तो देखते रहो। ऐसी हमारी आदरणीय पूजनीय, गुलज़ार दादी जी के प्रति दिल के उद्गारों को शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसी दादी जी को शत-शत नमन करता है। धन्य है आपका जीवन इस धरती पर

प्रकृतिजीत दादी की दासी बन गई प्रकृति

ब्रह्माकुमारी राधा बहन, लखनऊ (उ.प्र.)
हम लखनऊ निवासी बहुत ही सौभाग्यशाली हैं क्योंकि गुलज़ार दादी जी, जिन्हें भगवान ने अपना रथ चुना, उन्होंने लखनऊ की सेवाओं की शुरुआत की। जिस स्थान पर गुलज़ार दादी जी थी, जहा मम्मा-बाबा आए, दादियाँ रही उसी स्थान पर बडी दादी प्रकाशमणि जी ने हमें सेवाओं के लिए भेजा। उनकी ही सेवाओं का त्याग तपस्या का फल है जो आज लखनऊ में बेहद की सेवाएं हो रही है।

दादी जी बिलकुल मौन रहती थी

मैने दादी जी का एक न्यारा प्यारा स्वरूप देखा। हम बड़े प्यार से कहते, 'दादी जी, हम आपके सेंटर से आए हैं।' दादी को याद रहता था। हजरतगंज सेंटर को दादी जी अक्सर याद किया करती थी। दादी जी के त्याग और तपस्या की बातें पुराने-पुराने लखनऊ के बड़े भाई-बहनें सुनाते हैं कि दादी जी बिलकुल मौन रहती थी, बहुत कम बोलती थी। कोई चीज चाहिए, यह शब्द दादी ही के मुख से कभी नहीं सुना। सेवा के लिए दूर तक चल कर जाना, ठंडी में भी नहीं चाहती थी कि कोई चाय दोबारा गर्म करके दे, इतनी दादी में त्याग भावना रही। उस समय दादी जी बाबा का रथ तो नहीं थी लेकिन उन्हीं के द्वारा नींव डाला हुआ यह लखनऊ का स्थान है।

प्रकृतिपति दादी

सन् 2009 में दादी लखनऊ में आए तो दो दिन उनके अंग-संग रहने का सौभाग्य मिला। तब उनकी दिव्य तपस्या की छवि देखी, उनकी प्यार भरी शीतल शक्तिशाली दृष्टि पाई। उस समय एक ग्राउंड में हमने ईश्वरीय विश्व विद्यालय की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में बहुत बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया था। हजारों लोगों को निमंत्रण दिया था। सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी। वह बारिश का मौसम नहीं था परंतु कार्यक्रम के एक दिन पहले मूसलाधार बारिश हुई। पूरा ग्राउंड पानी से भर गया। लेकिन, जैसे ही दादी जी की फ्लाइट इस धरती पर लैंड हुई, एकदम बारिश बंद हो गई और सुंदर सुहावना मौसम छा गया। शाम को कार्यक्रम होना था। माउंड एकदम खचाखच भर गया था। सब लोग कहने लगे कि यदि बारिश नहीं होती तो हम पब्लिक को कंट्रोल नहीं कर पाते। तो शायद इस बारिश ने पब्लिक को कंट्रोल किया। जितनी व्यवस्था की थी उसो व्यवस्था के अनुरूप पब्लिक आई और सब ने दादी के आगमन पर उनकी दिव्य दृष्टि, दिव्य वरदानी बोलों का अनुभव किया। आत्मचिंतन भवन के बाबा के कमरे में पंखा और दीया साथ-साथ चलते और जलते रहे। दूसरे दिन जब दादी का लखनऊ की धरती से पांव उठा, तब फिर से झमाझम बारिश शुरू हो गई। हमने प्रकृतिपति को देखा कि कैसे प्रकृति भी उनकी दासी बन जाती है। कैसे बाबा ने इस बेहद के कार्य को सहज रीति सफल किया।

दादी गुणों की खान थी

दादी जी बहुत निर्मान और महानता की मूर्त थी। इतनी महान होते हुए भी दादी में बहुत सरलता, मधुरता और हरेक के प्रति रिस्पेक्ट था। हम दादी से छोटे थे फिर भी दादी बहुत प्यार और सम्मान से बात करती थी। हमने सोचा, देखो, भगवान ने दादियों को कैसा बनाया है। उनकी उपस्थिति हमें भी जीवन में प्रेरणा देती रही। बहुत अच्छी-अच्छी चीजें खाने के लिए बनाई थी, एक बार भी दादी की दृष्टि कहीं नहीं गई। दादी को बहुत प्यार से श्रृंगारा था, एक बार भी उन्होंने अपनी ओर नहीं देखा कि मेरा श्रंगार कैसा हुआ है। एक बाबा ही उनकी बुद्धि में समाया हुआ था। कितनी भी संख्या हो, कुछ भी हो, दादी जी ने एक बार भी नहीं कहा कि यह क्या है, यहां ऐसे कैसे है? नहीं, ऐसे दादी गुणों की खान थी।

उनकी दृष्टि कमाल का कार्य करती थी

समय प्रति समय हम लोग शांतिवन में दादी जी से मिलते रहे। मुंबई में भी दो बार दादी जी से मुलाकात हुई। शांतिवन में जब आखिरी बार मिले तब बड़े प्यार से दादी ने राखी बांधी और दिव्य दृष्टि दी। आज वही शक्ति हमारे काम आ रही है। लखनऊ में उनके यादगार स्वरूप 'गुलज़ार उपवन' का निर्माण कर रहे हैं। दादी जी के अव्यक्त रूप की भासना, यहां प्रवेश होते ही आ जाए, ऐसी अनुभूति का स्थान हम बनाएंगे। मैं रोज अनुभव करती हूं कि हमारी प्यारी आदरणीय श्रद्धेय गुलज़ार दादी जी, हमारे गुलज़ार भवन में रोज चक्कर लगाने के लिए आती हैं और समय प्रति समय हम सभी को प्रेरणाएं भी देती रहती हैं। उनके शब्दों, वाइब्रेशन को हम महसूस करते रहते हैं। जो भी वीआईपी हमारे संबंध-संपर्क में आए, वे दादी जी की दृष्टि से ही प्रेरित होकर, कोर्स करके, बाबाके बच्चे बनकर, बाबा के कार्य में मददगार बने हुए हैं। उनकी दृष्टि कमाल का कार्य करती थी, उनकी दृष्टि, सृष्टि को परिवर्तन करने वाली थी। ऐसी प्यारी, मीठी दादी को हम लखनऊ निवासी सदैव याद रखेंगे। हमें लगता है कि दादी आज भी हमारे साथ में हैं। आज भी हमें दादी के गुण, प्यार, स्नेह, शिक्षाएं, उनकी मधुर छाप याद रहती है।

दादी गुलज़ार, सबसे गुण लेकर सर्वगुण संपन्न बन गई

ब्रह्माकुमारी कमलेश बहन, कटक
परमआदरणीय गुलज़ार दादी जी की विशेषताओं का जितना वर्णन करे उतना कम होगा। गुलज़ार दादी नम्रता और गंभीरता की मूर्ति, हर्षितमुख, शांतमूर्त, बहुत सहनशील व सर्व दिव्य गुणों से भरपूर थी। दादी में इतनी नम्रता थी कि यदि कोई उन्हें कुछ कह भी दे तो भी वे किसी को कुछ नहीं कहती थी। उन्हें मान-अपमान का कोई फर्क नहीं था, मान-अपमान में एक समान थी। बहुत प्यार स्वरूप थी। देवी के समान एक मूर्ति थी। उनका गम्भीर चेहरा देख लगता था, सचमुच एक देवी बैठी है।जरा भी अभिमान नहीं था, शीतलता की देवी थी।
दादी को हमने बहुत नज़दीक से देखा है। वे बुरे को भी अच्छा देखती थी, अच्छा तो अच्छा है ही। वे कभी किसी का अवगुण चित्त पर नहीं रखती थी। सबके गुणों को देखकर जीवन में धारण करती थी और सबसे गुण ही लेकर सर्वगुण संपत्र बन गई। औरो को भी यही शिक्षा देती थी कि कभी किसी की निंदा मत करो, अवगुण मत देखो, सभी की विशेषताओं को, गुणों को देखो और उन्हें धारण करो।
हर बात में सरल थी। कोई कुछ पूछता था, कैसा भी प्रश्न हो सबको शांति से कहती थी, रुको, मैं आपको जवाब दूंगी और बहुत प्रेम से शांतिपूर्वक अच्छी तरह से जवाब देती थी, सब संतुष्ट हो जाते थे। उनके नजदीक जाकर के हम प्रेम और संतुष्टता से भर जाते थे। दादी जी में संतुष्टता का बहुत गुण था।

शब्दों की सीमा से परे दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमारी मंजू बहन, ब्रह्मपुर (उड़ीसा)

मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तवा चाहे
दाना खाक में मिलकर गुले गुलज़ार होता है।
जब प्रथम बार आदरणीया दादी गुलजार जी को देखा तो शायर की इस शायरी से यह समझ में आया कि यह दादी जो के लिए ही लिखी गई है। वह इस धरा पर शान्ति का फरिश्ता, शान्ति को देवी, विचित्र अलोकिक आभा से सम्पन्न, शिवबाबा की अद्वितीय रचना रही।

दादी जी आवाज की दुनिया से परे महसूस हुई

जब मैने सन् 1963 में पहली बार अपने लौकिक घर में दादी जी को देखा तो लगा कि इनका जीवन शब्दातीत है, जबकि उस समय उनका अव्यक्त पार्ट नहीं था लेकिन उस समय भी दादी जो आवाज की दुनिया से परे महसूस हुईं। इतनी गहराई से ज्ञान की समझ न होते हुए भी मुझे ऐसा लगा कि इन्होंने वाणी को विराम दे दिया है। कुछ वर्षों के पश्चात् दिल्ली, कमलानगर सेवाकेन्द्र पर जाना हुआ, उस समय मेरा ईश्वरीय ज्ञान का कोर्स नहीं हुआ था। मीठी दादी जी ने मुझे आत्मा का पाठ पढ़ाया, फिर दूसरे दिन आने को कहा लेकिन दूसरे दिन वे कहीं ईश्वरीय सेवा पर चली गई थी। उस दिन आदरणीय जगदीश भाई जी ने परमात्मा के विषय में क्लास कराया। इन्हीं दो क्लास के द्वारा मैं ज्ञान में चलने लगी।
सन् 2007 से शान्तिवन में अलग-अलग स्थानों पर हमने त्रिमूर्ति दादियों के चित्र लगे हुए देखे जबकि उस समय सिर्फ दादी जी ही अव्यक्त हुए थे और दोनों दादियां साकार जगत में फरिश्ते रूप से सेवा कर रहे थे। तब कभी-कभी संकल्प चलता था कि यह साकार वतन और अव्यक्त वतन का चित्र एक साथ क्यों बना हुआ है लेकिन आज वह चित्र साकार हो गया। तीनों दादियां वतन में रहकर विश्वसेवा कर रही हैं और ड्रामा अनुसार प्रकाश स्तम्भ और शक्ति स्तम्भ के बीच में ही अव्यक्त पालना का आधार स्तम्भ बनने जा रहा है।
दादी गुलज़ार जी ने अपनी कोई इच्छा कभी व्यक्त नहीं की, जो पार्ट मिला उस पार्ट को वही रूप देकर आगे बढ़ाती रही। आज विश्व के पांचों महाद्वीपों में शिवबाबा का झण्डा लहरा रहा है और उनको योग की पावर सर्व आत्माओं को यह अनुभव करा रही है कि साकार में भले ही प्यारे ब्रम्हाबाबा को नहीं देखा लेकिन आज भी ब्रम्हाबाबा हम सबके साथ हैं।

दादी जी की साइलेन्स से सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गये

वे मुख से बहुत कम शब्दों का प्रयोग करती थी लेकिन चेहरे और नयनों की भाषा से सब समझा देती थी। एक बार की बात है कि मोदीनगर में विशाल मेले का आयोजन किया गया, उसमें प्रेस कान्फ्रेन्स रखी गई। जब पत्रकार उस कान्फ्रेन्स में पहुंचे तो उनको इस मेले का उद्देश्य बताया गया कि समाज में एकता, शान्ति, सद्भाव बढ़ाने के लिए यह मेला किया जा रहा है लेकिन उनके पास पहले से ही बहुत सारी भ्रांतियां थी, वे कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे। लगभग आधा घण्टा वाद-विवाद करते रहे। इतने में ही प्रोग्राम प्रमाण दादी जी उस कान्फ्रेन्स में पहुंच गई और दादी जी का उद्बोधन सुनते हुए सभी पत्रकार शान्ति से स्तब्ध होकर देखते रहे। अंत में तीन मिनट साइलेन्स के बाद उनसे पूछा गया कि आपका कोई प्रश्न हो तो आप दादी जी से पूछ सकते हो। तो सभी ने यही कहा कि हमें दादी जी की साइलेन्स से सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गये है और हम इस मेले के उद्देश्य और समाज को होने वाले लाभों का समाचार सभी अखबारों में प्रकाशित करेंगे और अधिक से अधिक संख्या में लोग इस मेले का लाभ लें। ऐसी प्रेरणा देंगे। दादी जी के शुभ संकल्पों से और इस अव्यक्त पालना द्वारा जो सेवायें चली हैं। उससे सभी परिवारों को एकजुट होकर रहने की प्रेरणा मिली है। पारिवारिक मुल्यों के महत्व को उन्होंने समझा है। धन का दुरूपयोग बन्द हुआ है और विश्व सेवा के कार्य में विभिन्न सेवा के प्रोग्रामों द्वारा धन का उपयोग कर सम्पूर्ण विश्व इस अनुभव पर पहुंचा है कि यह विद्यालय सिद्धांन्तों के आधार पर समाज में चल रही विकृतियों को समाप्त कर रहा है। युवाओं के चरित्र का निर्माण हो रहा है। विश्व को कुछ मिलेगा, इस आशा की किरण यह विद्यालय ही है। सारा जीवन दादी जी के सिर्फ अव्यक्त पार्ट से ही सेवा नहीं हुई लेकिन उनकी कुछ स्वाभाविक धारणायें ऐसी रही जो सदा सेवा में आने वाले विघ्नों का शान्तिपूर्वक समाधान करती रही।
कितना वर्णन करें, अभी तो इतना ही कहेंगे कि अब दादी जो शान्ति का फरिश्ता, शान्ति की देवी बन, समय-शरीर के सभी बंधनों से परे होकर सेवा कर रही हैं और करती रहेंगी। इस साकार जगत को पिछले 86 वर्षों से नई दिशा प्रदान की है और करती रहेंगी।
सन् 1991 में जब दादी जी प्रथम बार ब्रह्मपुर, उड़ीसा में आई थी तो बहुत से लोगों ने कहा कि हमने इनको देखा है, जबकि वे इससे पहले कभी वहाँ नहीं आई थी और वे लोग भी मधुबन में कभी नहीं आये थे। इससे लगता है कि दादी जी सदा शान्ति में रहकर, सूक्ष्म सकाश द्वारा विश्व कल्याण की सेवा करती रही हैं।

दादी ने सभी को खुशी और प्यार दिया

ब्रह्माकुमार निज़ार जुमा भाई, नैरोबी (केन्या)

जब हम दादी गुलज़ार के बारे में सोचते हैं तो ऐसा कोई नहीं होगा जिसका चेहरा ना चमक उठता हो। दादी जी वह आत्मा थी जो सदैव खुश और निश्चित रहती थी, सदैव सेवा में हाज़िर रहती थी, सदा कहती थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, खुशी ना जाए। वह न सिर्फ यह कहती थी परंतु स्वयं इसका अभ्यास करती थी।
मेरा परम सौभाग्य रहा कि मैं दादी गुलज़ार जी को करीब 30 वर्षों से जानता हूं। अफ्रीका के देशों की यात्रा के दौरान मुझे उनके साथ रहने का मौका मिला। मुझे बहुत अनुभव हुए जिनमें मै बहुत कुछ सीखा। हम 5-6 देशों में गए। दादी वहाँ थी भी और नहीं भी। ऐसा नहीं कि वह कुछ नहीं कर रही थी परतु वहा होते वहीं नहीं थी। उपराम रहती थी। हमें दादी को बताना पड़ता था कि दादी हम पहुंच गए हैं या अब हमें कार से उतरना है आदि। कि जब भी दादी को थोड़ा भी समय मिलता वो बाबा में एकाग्र हो जाती थी।
एक बार हम दादी को केन्या में प्राणियों के लिए प्रसिद्ध हेचुरी मसाईमारा में ले गए। सुबह वहाँ जाने के लिए जब हम तैयार हो रहे थे तो दादी हमेशा की तरह सबसे पहले तैयार होकर हमारा इंतजार कर रही थी। वहां सभी को बहुत मजा आया। दादी भी बहुत उत्साहित थी। एक हाइना हमारी गाड़ी के पीछे भागने लगा तो एक छोटी बच्ची की तरह दादी, ड्राइवर को कहने लगी, 'और तेज चलाओ, और तेज चलाओ।'
एक बार रामदेव बाबा अफ्रीका की यात्रा पर आना चाहते थे और फिर मधुबन भी आए थे। तब मुझे ही उनके साथ रहना था। में कुछ वरिष्ठ भाईयों और दादी जानकी जी के साथ योजना बना रहा था। अचानक दादी गुलज़ार जी ने कहा कि 'वह एक अच्छा इंसान है, देरी मत करो, फोन नंबर हो तो अभी कि अभी उन्हें कॉल करके प्रोग्राम फिक्स कर लो।' मैने उन्हें तुरंत कॉल किया और आने का निमंत्रण दिया। वह प्रोग्राम बहुत सफल रहा।
दादी गंभीर थी। हम जब भी उनसे मिलते, कोई राय लेते तो वे सदा गंभीरता से दिल से सलाह देती थी। इतने वर्षों में जितनी भी सलाह उनसे ली सभी सही थी। जब दादी गुलजारजी मुंबई में थी तब भी मै उन्हें मिलने गया था।उनके आसपास सदाही एक तेजोमय प्रकाश नजर आता था। उन्होंने हम सभी को कई वर्षों तक सेवा की । सन् 1969 से उन्होंने हम सभी ब्राह्मण बच्चों को बाबा के टच में रखा। वे सदैव वतन से संदेश लाती रही, बाबा उनके द्वारा हमसे बातें करते रहे। पूरे 50 साल उन्होंने यह पार्ट बनाया। हमे खुशी है कि अब वे सुक्ष्मवतन में ब्रह्माबाबा के पास है। वहां भी सेवा कर रही हैं।
उन्होंने सदैव सभी को खुशी और प्यार दिया। हम उन्हें सूक्ष्मवतन में मिल सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं, फिर भी मै उन्हें याद करता हूं। जब भी मधुबन आता हूं तो अधूरा-सा लगता। कि अब हम उन्हें और उनकी मधुर मुस्कान को नहीं देख सकते।
वह एक बहुत ही सुंदर आत्मा थी। मेरा उनसे प्यार था और अभी भी है और हम सभी उन्हें बहुत याद करते हैं।

दादी जी के सम्पूर्णता के सफर को साक्षी हो देखने का सौभाग्य मिला

ब्रह्माकुमारी निहा बहन, मुम्बई, गामदेवी
बेहद ड्रामा में हर आत्मा का विशेष पार्ट है लेकिन सबसे श्रेष्ठ पार्ट है भगवान का रथ बनने का पार्ट, जो प्यारे ब्रह्माबाबा और हम सबके दिलों की जान, प्यारी गुलजार दादी जी को प्राप्त हुआ। विश्व का पिता, सर्वशक्तिमान भगवान जिस रथ, जिस साधन को अपनाए, वह कोई साधारण तो हो ही नहीं सकता है। वह जरूर असाधारण और अनेक विशेषताओं से भरा हुआ होगा। दादी जी को हम सब ने सालों साल इन आंखों से देखा है। आज भी दादी जी की वह दिव्य सुरत हमारे मन की आखो से दूर नहीं जा सकती है। दादी जी के नयन और चेहरा शिवबाबा के अवतरण के समय तो हम सबको लूभाने वाला रहता ही था । लेकिन बाबा की अनुपस्थिति में भी दादी के चेहरे में परमात्मा की ही दिव्यमुर्त दिखाई देती थी। इसका कारण था दादी जी की अटूट तपस्या और दिव्य गुणों का प्रभाव।

दिव्यभाषी, अल्पभाषी

हम सबने दादी जी के जीवन में अनेक गुण और विशेषताए देखी है। हमें भी दादी जी के करीब रहने का परम सौभाग्य मिला। वैसे तो पहले भी दादी जी से मिला करते थे लेकिन दादी जी के अंतिम संपूर्णता के सफर को हमें साक्षी होकर देखने का सुअवसर मिला। दादी जी गामदेवी सेंटर पर अंतिम साढ़े तीन वर्ष रही। जब भी दादी जी को देखते थे तो बहुत अच्छा लगता था, यह दादी जी की अंतर्मुखता का प्रभाव था। हमने जब भी दादी जी को देखा शांतमूर्त देखा। बहुत ही दिव्यभाषी, अल्पभाषी दादी जी रहे। जो भी शब्द उनके मुख से निकलते, वे जैसे बाबा के महावाक्य लगते।

शहजादी के संस्कार और रॉयल्टी

दादी जी ने कभी भी अपने आपको साधारणता में नहीं आने दिया। जब भी दादी जी के साथ पिकनिक आदि में कुछ खेल खेलते, दादी जी सदा बाबा के साथ ही रहती, हर बात में बाबा को याद दिलाती थी कि 'देखो, बाबा ऐसे कहते हैं, बाबा ने ऐसा कहा है' आदि-आदि। दादी जी की सबसे बड़ी विशेषता, जो उन्हें सबसे अलग कर देती थी, वह थी उनके संस्कारों की रॉयल्टी। जैसे बाबा कहते हैं कि बच्चे, आप तो शहजादा-शहजादी बनने वाले हो, तो शहजादी के संस्कार और रॉयल्टी क्या होती है, देवी-देवताएँ किस रॉयल्टी से बात करेंगे, किस रीति से चलेंगे, किस रॉयल्टी से भोजन करेंगे, इन सभी बातों की झलक दादी जी के कर्मों से हमने देखी। हमने कभी भी दादी जी को किसी से भी बड़ी आवाज से बोलते नहीं देखा।
एक बार एक बहन से कोई गलती हो गई तो निमित्त बहन जब देखेगी कि दादी के काम में गलती हुई है तो स्वाभाविक है कि वह डाँटेगी। जैसे ही वह आई, उसने बोलना शुरू किया, तो दादी ने तुरंत कहा, 'नहीं, उसने नहीं किया है, मैंने उसको ऐसे बोला था, उसकी कोई गलती नहीं है।' हम तो देखते ही रह गए। दादी जी यह पसंद नहीं करती थी कि कोई एक व्यक्ति, दूसरे किसी को आवाज से बोले, चाहे उसकी गलती ही क्यों न हो। बड़े प्यार से दादी जी बोलते थे।

कमजोर आत्मा को शक्ति देनी होती है

एक बार किसी आत्मा से बहुत बड़ी गलती हो गई, तो दादी जी को बताया गया कि अभी तो आपको इसको कुछ बोलना ही पड़ेगा, इतनी बड़ी गलती हुई है! दादी जी ने कहा, 'ठीक है, मेरे पास भेजो।' जब वह आत्मा दादी जी के पास गई तो सब ने सोचा कि इतनी बड़ी गलती है तो दादी जी आज तो जरूर उसको अच्छी तरह बोलेगी। दादी जी ने उसके आते ही बड़े प्यार से मुस्कराया बाबा की याद में दृष्टि दी और कहा, 'देखो आपसे जो-जो गलतिया हो गई हैं ना, अब बाबा के कमरे में जाओ, बाबा को बता दो, लिख दो और आगे से ऐसी गलती कभी न हो, उसकी प्रतिज्ञा करना। इस तरह बड़े प्यार से दादी ने उससे बात की, सब देखते रह गए। फिर दादी को कहा, दादी, आपने कुछ बोला नहीं। दादी जी ने कहा, 'बाबा तो जानते है ना कि उसने क्या गलती की है और बाबा से माफी मांग लेंगे। कमजोर आत्मा को जोर से बोलकर और कमजोर नहीं करना है, उसे शक्ति देनी होती है।' तो यह थी दादी की महानता। कोई छोटे हो या बड़े, कोई गुणों वाला हो वा अवगुण वाला, दादी जी हर एक को समानता की नजर से, ऊंची नजर में देखती थी।

कर्मेंद्रियों की विजयी राजा

हमेशा दादी जी को हमने मौन में पाया। वे अंतर्मुखी रहा करती थी क्योंकि बाबा से सदा जुड़ी रहती थी। हमने अंतिम तीन सालों में देखा कि कैसे दादी जी अपनी यात्रा को धीरे-धीरे संपन्नता की ओर ले गई। शरीर के हिसाब-किताब तो थे परंतु अशरीरीपन की स्थिति दादी की इतनी वंडरफुल थी कि जिस फ्लैट में दादी रह रही थी वह तो जैसे पूरा सुक्ष्मवतन बन गया था। डॉक्टर्स आते थे। दादी जी सबसे मिलती थी और कहती थी, 'कैसे हो, ठीक' दादी जी के बस यही शब्द उस आत्मा को शक्ति दे देते थे। धीरे-धीरे दादी जी ने अपनी वाणी को समेट लिया क्योंकि वह सपन्नता की ओर जा रही थी। हममें से कई भाई-बहनों के मन में यह बात थी कि ब्रह्माबाबा संपन्न बन गए, कैसा पुरुषार्थ किया होगा? हम तो देख नहीं पाए। परंतु वैसा ही पुरुषार्थ बाबा के दूसरे रथ ने किया और सारे ब्राह्मण परिवार के सामने एक आदर्श प्रत्यक्ष कर दिखाया कि ऐसे संपन्नता को पाना है। पहले बाबा का रथ बनकर सभी को प्रेरणा दी। अंतिम समय में बाबा के सारे महावाक्यों को प्रैक्टिकल जीवन में लाकर के, याद की संपन्न स्थिति क्या होती है, वह दादी ने करके बताई। अपनी कर्मेंद्रियों की विजयी राजा बन गई थी दादी। कोई असर नहीं पड़ता था, न शारीरिक कष्ट का, न स्वाद का। वाणी को विराम देकर संपूर्ण अंतर्मुखता की गुफा में दादी रहती थी।

नयनों की भाषा

जहां दादी रहती थी अंतिम समय में, तो प्रकृति ने भी सहयोग दिया, लॉक डाउन हो गया, ताकि कोई मिलने न आ सके। दादी जी एकांत में रहा करती थी। उन्हें देखते ऐसा लगता था कि वे यहा नहीं, वतन में, बेहद सेवा में उपस्थित हैं। आवाज देकर जब-जब दादी को बुलाते, दादी देखती थी, प्यार से दृष्टि देती थी, फिर से वतन में चली जाती थी। दादी जी के सभी डॉक्टर्स भी उनकी दृष्टि से सबकुछ समझ जाते थे, यह बड़ा वंडर था! नयनों की भाषा से दादी जी डॉक्टर्स से भी बात करती थी। फिर दादी ने अपनाई संकल्पों की भाषा। दादी जी के संकल्प और वाइवेशंस से सबको सारे मैसेज मिल जाते थे। हमने हमेशा उनके चेहरे पर रूहानी मुस्कान देखी। कष्ट का तो नाम-निशान न था। शरीर में इतने उपचार चल रहे थे लेकिन हमें और डॉक्टर्स को आश्चर्य होता था कि दादी जी पर तो कोई असर नहीं है। यह तो भगवान का जादुई चिराग है। डॉक्टर्स कहते कि 'यह तो हमारा पावर स्टेशन है। दादी जी ने तो खुद ही अपने शरीर पर नियंत्रण करके रखा है। दादी जी अपनी मर्जी से अपने शरीर को चलाती है। ये सारी बाते बाहर वालों ने अनुभव की। जब भी दादी से कहते, मधुबन चले सभी आपको याद कर रहे हैं तो मुस्कराती और कहती, 'समय आएगा, बाबा बताएंगे अभी नहीं।'

अब कर्मातीत बनना है

अब हमें समझ में आता है कि क्यों दादी जी तीन साल तक एक ही स्थान पर रही। बाबा का पहला रथ, बह्माबावा भी अपने अंतिम संपन्नता के काल में तीन साल कहीं बाहर नहीं गए, दादी जी भी कहीं नहीं गई। बस एक ही स्थान पर तपस्या करते-करते बाप समान संपूर्ण फरिश्तेपन की स्थिति को प्राप्त कर लिया। सारे दिन ऐसे लगता था कि दादी जी बाबा के साथ है। अंतिम दिनों में तो दृष्टि इतनी शक्तिशाली लगती थी, महसूस होता था कि बाबा को दादी ने पूरा समय पकड़ कर रखा है। रात को भी दादी भल बिस्तर पर होते लेकिन आंखें खुली हुई होती, बाबा की याद में मगन रहते थे। कई सारे इशारे दादी जी ने अपने इस साधना काल में दिए कि 'हमेशा बाबा-बाबा करते रहो, बस आना और जाना, यही पुरुषार्थ करो, अब कर्मातीत बनना है, अब तो बस परिवर्तन ही परिवर्तन है, संपन्न बनना है।' ये सारे दादी जी के अंतिम संदेश थे। हमें तो ऐसा ही लग रहा था कि हम तो भगवान के साथ रह रहे हैं। आज भी वह स्थान जैसे एक तपस्या-कुंड बन गया है। वाइब्रेशंस है कि जैसे दादी जी हमारे साथ-साथ है। आज भी दादी जी फरिश्ता बनकर बाबा के साथ वतन में रहते हुए, हम सब बच्चों में बल भर रही हैं। ऐसी प्यारी दादी जी तब भी हमारे साथ थी और अब तो लग रहा है कि और ज्यादा ही हमारे साथ है। बस, याद किया और दादी आ जाती हैं। ऐसी महान आत्मा को हम सबके दिल की लाख-लाख दुआएं। दादी जी के समान पुरुषार्थ करके, संपत्र बन करके पालना का रिटर्न हमे देना ही है।

बाबा के रथ के रूप में अपने शरीर को भी दादी साक्षी हो देखती थी

ब्रह्माकुमारी दीपा, विलेपार्ले, मुम्बई
मेरा परम सौभाग्य है कि संगमयुग पर बाबा ने मुझे विलेपार्ले, मुम्बई सेंटर पर सेवा के लिए रखा जहां गुलज़ार दादी जी प्रतिवर्ष स्वास्थ्य लाभ लेने आते रहे। तब समीप से उन्हें साक्षी हो देखने का बहुत सुंदर अनुभव रहा। दादी साइलेंस की दिव्यमूर्ति थी, उनकी दिव्यता सहज ही आकर्षित करती थी।

बाबा तो है ही सत्यम शिवम सुंदर

एक बार विलेपार्ले मुंबई सेंटर से एक अतिथि को मै बाबा मिलन के लिए पहली बार शांतिवन लेकर गई थी । बाबा मिलन के दूसरे दिन जब वे दादी जी से मिल रहे थे तब उन्हें बहुत खुशी हो रही थी । दादी जी की दिव्यमूर्त का आकर्षण महसूस करते हुए शुद्धभावना से कह रहे थे कि दादी आप इतनी सुंदर हो , दादी उन्हें देख और सुन रही थी लेकिन दादी ने इन शब्दों का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। उसके बाद दादी जी जब उनको ज्ञान की कुछ बाते सुना रही थी तब उस भाई ने कहा कि दादी बाबा भी कितने सुंदर है। तब दादी की आंखों में चमक थी कि हा बाबा तो है ही सत्यम् शिवम् सुंदरम्।'

दादियों की चिटचैट

दादी जी सदैव देह के भान से न्यारी रहती थी। उनमें न्यारेपन का बहुत वर्षों का अभ्यास नजर आता था। एक बार उनके कॉटेज में, बाबा मिलन के लिए उनको तैयार कर रहे थे। दिखाई तो दे रहा था कि दादी बैठी है और तैयार हो रही है लेकिन दादी का इतना न्यारापन था कि यह बाबा का रथ तैयार हो रहा है। अपने आपको बाबा के रथ के रूप में भी साक्षी होकर देख रही थी। बाबा मिलन के बाद दादी जी को दादी जानकी जी कॉटेज में लेकर आते, इस समय कुछ भाई-बहनें भी साथ होते। दादी जी के वाइब्रेशंस तो है ही शुद्ध और अभी-अभी बाबा का अवतरण हुआ है तो वे बाइवेशंस बहुत शक्तिशाली होते थे। एक बार आपस में दोनों दादियों की चिटचैट चल रही थी। जानकी दादी ने दादी से पछा, 'बाबा ने आपको ज्यादा प्यार किया या हमे?' तो गुलज़ार दादी बहुत प्यार से दादी जानकी को कह रहे थे कि 'दादी आपको प्यार किया, आप बाबा के मुरब्बी बच्चे हो, आप निमित्त हो।' फिर जानकी दादी जी ने उन्हें कहा कि 'देखो दादी, आपमें कितनी लाइट है, कितनी चमक है।' तो गुलज़ार दादी ने कहा, 'दादी, बाबा आए थे ना, इसलिए।' सूक्ष्म में भी दादी ने कभी क्रेडिट नहीं लिया, हमेशा कहा, 'बाबा आए थे, बाबा का रथ है, बाबा कार्य करा रहे हैं।'

बाबा अपना प्रोग्राम वताएगा

दादी को सभी बाबा वाली दादी कहते थे। हम कई बार कहते थे कि दादी, 'आपको देखते है तो बाबा ही बाबा दिखाई देता है।' तब दादी सदा कहती कि यह बाबा आपको अनुभव करा रहा है। दादी ने निरहंकारी रहकर सदा बाबा को आगे रखा। दादी आखिरी तीन वर्ष स्वास्थ्य लाभ के लिए गामदेवी सेंटर में रहे। वहां एक बार आशा दीदी और बृजमोहन भाई जी, दादी से मिलने आए थे, बाबा मिलन के एक-दो दिन पहले। डॉक्टर ने छुट्टी नहीं दी थी इसलिए दादी मधुबन नहीं गए थे। उस समय बृजमोहन भाई जी ने बड़ी रमणीकता से, बहुत प्यार से कहा, 'दादी, बाबा आएगा? हम सब दादी को देख रहे थे और सोच रहे थे कि दादी कहेगी कि बाबा नहीं आएगा क्योकि दादी तो मुंबई में है। लेकिन दादी ने बड़े प्यार से कहा कि 'वह तो बाबा का प्रोग्राम है ना, बाबा बताएगा। नीलू बहन ने कहा कि दादी,'आप तो बाबा का रथ हो, आप तो गामदेवी में हो, हमें छुट्टी नहीं है मधुबन जाने की तो आप कह सकते हो ना कि बाबा नहीं आएगा।' फिर भी दादी ने कहा कि नहीं, बाबा अपना प्रोग्राम बताएगा।' 'मैं बाबा का रथ हूं', इस भान से भी दादी अपने को न्यारा रखते रहे। दादी ने यह नहीं कहा कि मैं रथ है। यहां बैठी है इसलिए बाबा नहीं आएगा, नहीं। इतना न्यारापन, बाबा को हमेशा आगे रखती, बाबा की ही हमेशा याद दिलाती थी।
अंतिम तीन साल दादी जी किसी के साथ बैठकर ज्ञान की रूहरिहान नहीं कर सकती थी लेकिन साइलेंस पावर ऐसी थी जो कोई भी आत्मा, विशेष डॉक्टर्स, चाहे किसी भी धर्म, किसी भी विचारधारा के हों लेकिन हरेक को यह अनुभव होता था कि हम जो संकल्प लेकर दादी जी के पास जाते है, वह पूरा हो जाता है। दाटी जी से हमें प्राप्ति का अनुभव होता है।

दादी हमेशा अपने को स्टूडेंट लाइफ में देखती थी

एक बार मैं मधुबन में दादी कॉटेज में थी और नीलू बहन दादी को भोजन करा रही थी। दादी को खिड़की से हरियाली आदि देखना अच्छा लगता था तो वहीं भोजन कर रही थी और बाहर भी देख रही थी। उन दिनों दादी, बाबा मिलन के एक दिन पहले क्लास कराती थी। उस दिन शाम को दादी का क्लास था। कुछ माताए दादी को मिलने के लिए दादी कॉटेज की तरफ आ रही थी तो बाहर बड़े सिक्योरिटी वाले भाई ने उन्हें मना करते हुए कहा कि दादी नहीं मिलेगी, आज उनका क्लास है। वे माताएं वापस जाने लगी तो दादी ने नीलू बहन को कहा कि 'वे बुढ़िया दादी को मिलने आई थी। नीलू बहन ने बहुत प्यार से कहा, 'दादी आप बूढ़े नहीं है?' दादी ने प्यार से नीलू बहन को देखा और फिर कहा कि 'हा शरीर वृद्ध हो गया है। पर दादी तो विद्यार्थी है। तो दादी हमेशा अपने को स्टुडेंट लाइफ में देखती थी और इसलिए ज्ञान और योग की पढ़ाई के उमंग में हमेशा रहती थी। दादी की बहुत सुंदर डायरी होती थी जिसमें दादी अपना मनन-चिंतन, मुरली आदि लिखती थी। दादी की अलमारी में भी उनकी डायरी, किताबें आदि बहुत व्यवस्थित रूप से रखी होती थी। ज्ञान-योग का लिटरेचर, ज्ञानामृत आदि दादी बड़े प्यार से पढ़ती थी। मुरली और उनका चश्मा तो हमेशा सामने ही रहता था।

दादी से मिलते तो परिस्थिति लाइट हो जाती थी

बाबा दादी के तन में आते, मुरली चलाते फिर जब दादी अपने कमरे में आती तो जैसे ही समय मिलता, पहले वह मुरली पढ़ती, उस पर मनन-चिंतन करती कि बाबा ने यह कहा, आज यह कहा..। बाबा की हर एक बात को अपने अंदर धारण करने की जो उनमें लगन थी, वह विशेष सभी दादियों में हमने देखी है। बाबा की याद में समाये हुए अपने स्वरूप से वे साइलेंस से ही हमें सब कुछ कह देते थे। कई बार कोई बात, कोई विघ्न समस्या आदि हमें दादी को कहनी भी होती तो जैसे ही दादी के समीप जाते, महसूस होता कि बापदादा सम्मुख हैं। जैसे बापदादा से मिलते वक्त सारी बातें भूल जाती थी और शक्ति हममें भर जाती थी, ऐसे ही दादी से मिलते तो परिस्थिति लाइट हो जाती थी। दादी की अवस्था नेचुरल रूप में बहुत ही लाइट और माइट स्वरूप थी, निरसंकल्प अवस्था थी कि कैसे निसंकल्प और अशरीरी अवस्था का बहुत वर्षों का दादी का अभ्यास था। दादी निमित्त मात्र शरीर में थी। कभी भी डॉक्टर आते या कोई बात करते तो दादी उन्हें रिस्पांस जरूर देती थी परन्तु फिर तुरंत बाबा के पास पहुंच जाती। हर प्रकार का रोल, चाहे पेशेट का, चाहे कोई अन्य रोल, दादी ने बाबा की याद में रहकर परफेक्ट निभाया।
बाबा के साथ वतन में रहते भी दादी आज भी हमें लाइट-माइट दे रही है। दादी की दृष्टि हममें बहुत शक्ति भरती रहती है।

आध्यात्मिकताके साथसाथ प्रशासनमें भी कुशल थी दादीजी

ब्रह्माकुमार सी.ए. ललित भाई, शातिवन
आदरणीय दादी हृदयमोहिनी जी (दादी गुलज़ार जी) का मात्र 9 साल की उम्र में रूहानियत से भरा अविनाशी फाउंडेशन पड़ा। जब मैं उनके संपर्क में आया तब तक वह एक वटवृक्ष की तरह शोभायमान हो रही थी। दादी जी के नजदीक जाते ही विशेष खुशी, आनंद, निश्चितता की अनुभूति होती थी। दादी जी प्रायः मन का मौन संकल्पों का मौन रखने का अभ्यास करती थी, जिस वजह से उनकी परखशक्ति बहुत तेज थी। कोई भी व्यक्ति कोई भी बात लेकर उनके सामने जाता, थोडा भी सुनाता तो तुरंत परख लेती थी कि समस्या क्या है और क्या समाधान देना है। थोड़े शब्दों में ही दादी जी तृप्त कर देती थी। आते वक्त निराश होते रो रहे होते लेकिन दादी जी से समाधान पाकर बहुत ही संतुष्ट और खुश होकर जाते थे। दादी जी भी उस बात को वहीं पर फुलस्टॉप लगा देती थी, कभी भी इधर-उधर उसकी चर्चा नहीं करती थी। यह दादी की बहुत बड़ी विशेषता थी, जो हमने प्रैक्टिकल में सीखी।
सन् 2007 में मैं यज्ञ का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करके गुलज़ार दादी जी से मिलने गया। दादी जी को बताया कि दादी जी, यह कार्य हो गया है। दादी जी ने मुझे कहा कि तुम्हे सफलता इसलिए मिलती है क्योंकि तुम्हारे संकल्पों में सफलता है।। इस बात का गहरा अर्थ उस समय मुझे समझ में नहीं आया। बाद में जब इस पर मंथन किया तो समझ में आया कि हम सदा यही सोचते है कि बाबा का कार्य है, यह हुआ ही पड़ा है, बड़ों ने सौंपा है तो इसमें सफलता है ही है। असफलता का संकल्प मात्र भी मन में नहीं होता है। हंड्रेड परसेंट सक्सेसफुल होगा और सहज रीति से होगा। यह सोचते हैं और इसी कारण से सफलता मिल जाती है। दादी का महावाक्य मेरे लिए वरदान बन गया। उसके बाद हमने देखा कि ईश्वरीय कार्य में सहज रूप से सफलता मिलती ही रही।
दादी जी की दृष्टि बहुत पावरफुल थी। एक बार एक कारोबार को लेकर थोड़ा द्वंद्व चल रहा था। कुछ लोग चाहते थे कि यह नहीं हो। कुछ चाहते थे कि यह हो और मै उसके केंद्रबिंदु में था तो मुझे दुविधा हो रही थी। मैं दादी जी के पास गया और सारी बात विस्तार से बताई, उससे संबंधित पेपर्स भी दादी जी को दिखाए। दादी जी ने कहा, 'आप मुझे कल मिलना।' में दूसरे दिन दादी से मिलने गया तो दादी जी ने कहा कि 'जब सभी इससे खुश है, सभी को इससे कुछ समाधान मिल रहा है तो इसे कंटिन्यू रखो, बाकी जो थोड़ा दूसरा विचार रखते हैं उन्हें मैं समझा दूंगी।' ऐसे कहकर यज्ञ में एक बहुत अच्छा सिस्टम दादी जी ने शुरू करवाया।
दादी जी सिर्फ आध्यात्मिक क्षेत्र से सरोकार नहीं रखती थी। आध्यात्मिकता में तो वे सर्वोपरि थी ही, साथ-साथ प्रशासन में भी दादी जी उतनी ही कुशल थी। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका तो थी ही, साथ में दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण जोन की इंचार्ज भी, कुछ विंग्स की चेयरपर्सन भी थी। इस नाते से आध्यात्मिकता समाए हुए प्रशासन का जो कार्य करती थी उसमें प्रशासन बहुत अच्छा होता था, सभी संतुष्ट रहते थे और सरल विधि से सभी कार्य संपन्न हो जाते थे।
दादी जी को शारीरिक रूप से कुछ पेपर आए। हम उन दिनों में भी मिले लेकिन दादी जी के चेहरे पर हमने बीमारी का कोई असर कभी नहीं देखा। हमने सदा ही उन्हें रूहानियत से भरपूर देखा। उस परिस्थिति में भी बात सुन रहे हैं, शुभ भावना भी रख रहे है, समाधान भी दे रहे हैं, ऐसा हमने पाया। हम अनुभव कर सकते हैं कि दादी जी का जो बचपन से फाउंडेशन पड़ा था, उस के कारण वे हर परिस्थिति में मायाजीत, विजयी, कर्मातीत बनकर रही। मेरा तो हजार प्रतिशत सौभाग्य रहा, जो दादी जी की पालना लेने का अवसर प्राप्त हुआ। मैंने अपने जीवन में दादी जी की शिक्षाओं को अपनाते हुए इस आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाया है।

दादी गुलज़ार जी का स्नेह और उनकी शांतमूर्त बहुत आकर्षित करती थी

ब्रह्माकुमार डॉ. मोहित, दिल्ली
कभी-कभी जीवन में ऐसे अद्भुत पल आते हैं, ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व आते हैं, जिनके प्रति अपने मन के उद्‌गारों को शब्दों में पिरोना असंभव होता है। हमारे जीवन में ऐसी ही अद्भुत व्यक्तित्व रही परम आदरणीय गुलज़ार दादी जी।

परमात्मा के प्यार की अनुभूति दादी जी के द्वारा हुई

दादी गुलज़ार जी से हम छः वर्ष की आयु में पहली बार मिले,तब वे दिल्ली ज़ोन की इंचार्ज थी। दादी के पास हम बच्चे कभी उनके कमरे में, कभी उनकी गोदी में, कभी उनके आसपास दौड़ते हुए चले जाते थे। हमें उस आयु में ना ज्ञान से ज्यादा मतलब था, न किसी और चीज से लेकिन दादी जी का स्नेह और उनकी शांतमूर्त हमें बहुत आकर्षित करती थी। उन्हें देखने से ही सुकून-सा महसूस होता था। कोई शक्ति हमको खींच रही है, ऐसा लगता था। परमात्मा के प्यार की अनुभूति हमें दादी जी के द्वारा हुई। जब हम पहली बार मधुबन गए तब बहुत सुंदर रूप से हमारे माता-पिता को दादी ने यह शिक्षा दी। 'ये आपके दो बालक, बाबा के बच्चे हैं, आपके नहीं हैं लेकिन इनकी पालना आपको बहुत प्यार से, साक्षी होकर करनी है। इन बच्चों को अच्छा पढ़ाना है और पढ़ा कर इस तरह से इन्हें तैयार करना है कि आगे जाकर ये अपने व्यक्तित्व द्वारा बाबा का नाम रोशन करें' और देखिए, ऐसा ही हुआ।

बाबा को साथ लेकर जाया करो स्कूल

जब भी कोई बात होती तो हम प्यार से उड़कर दादी के पास चले जाते। कभी कोई सफलता होती, कभी कोई स्कूल की बात होती। तो हम कहते, दादी, हम आ रहे हैं। दादी भी बड़े प्यार से कहते कि 'आ जाओ।' जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो दादी ने प्यार से बुलाकर हमे कहा, 'देखो मोहित, जब भी तुम स्कूल जाते हो ना तो अकेले मत जाया करो, हमेशा बाबा को साथ लेकर जाया करो, इसमें तुम्हें बहुत आनंद आएगा।' आज इतने लंबे जीवनकाल में एक भी दिन ऐसा नहीं गया कि मैं घर से बाहर बाबा के बिना निकला हूँ एमएल। वह बात मेरे मन में ऐसी घर कर गई कि जब भी मैं घर से जाता हूं तो बाबा के कमरे से होकर जाता हूं और जब भी आता हूं तो बाबा को थैंक्स करता हूं। मुझे हर पल यह अनुभव होता है कि बाबा मेरे साथ है। ऐसी शिक्षाएं प्यार से दादी हमे देती थी।

दादी हर खुशी बहुत अच्छे से मनाती थी

दादी पढ़ाई पर बहुत ज्यादा ध्यान न देकर अनुभव पर ज्यादा ध्यान देती थी। अक्सर कहती थी कि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति अनुभव की शक्ति है और यही कहती कि आप लोग जैसे वह पढ़ाई करते हो, ऐसे बाबा की भी पढ़ाई रोज पढ़नी चाहिए। रोज सुबह उठकर, जब भी समय मिले बाबा की मुरली जरूर पढ़ो। आज 37 वर्ष हो गए है, बाहे हम विश्व के किसी भी कोने में हों, हमने कभी भी बाबा की मुरली मिस नहीं की है। सदा मुरली पढ़ने के बाद हम अपने कॉलेज व स्कूल जाते थे। ऐसी-ऐसी शिक्षाएं देकर दादी जी ने सरलता से, बहुत प्यार से हमारा पोषण किया, हमारी पालना की जैसे कि एक मां होती है, जैसे दादी होती है, घर की बड़ी होती है। कभी-कभी हमें स्कूल में सफलता मिलती, मैडल मिलते, हमें बहुत खुशी होती। मुझे याद है जब मैने यूनिवर्सिटी में टॉप किया था तो बहुत सारे मैडल मिले और जब घर आया तो दादी जो को बताया। दादी हर बच्चे की, हर खुशी बहुत अच्छे से मनाती थी। दादी उस समय विशेष घर पर आए और उन्होंने प्यार से मुझे वे मैडल तो पहनाए ही लेकिन साथ ही बाबा का बैज भी पहनाया। उन्होंने कहा कि 'देखो, ये तो फिर भी नकली मैडल है लेकिन बाबा तुमको असलों गोल्डन बैज का मैडल पहना रहा है।' इतना प्यार दादी के चित्त में होता था। इतनी सरलता, इतनी निर्मानता उनके जीवन में थी।

बाबा को अपने जीवन में यूज करना सिखाया

जब मेरी परीक्षा होतो तो मैं कहता, 'दादी, मुझे तो याद ही नहीं रहता ।
जैसे बच्चे अपने दिल की बात अपनी मां से कह देते हैं वैसे मैं दादों को कह देता था। तो दादी भी मुस्कराते हुए कहती कि 'तुम्हें नहीं धान में रखना होता, तुम्हें तो केवल पढ़ना होता है, बाबा को कहो, बाबा, मैं तो बैठा हूँ, मेरे एग्जाम लिखना आपका काम है।' सच मानिए, मैं केवल कलम चलाता था, कलम उठाकर बस बाबा की स्मृति में बैठता था, ऐसा लगता था कि शक्तिशाली कनेक्शन खुल गया और बाबा लगातार ज्ञान दिए जा रहे है। वे सब बातें जो मुझे लगती थी कि मैं भूल गया, याद आ जाती थी। इतने प्यार और सहजता से दादी ने हमें बाबा को अपने जीवन में यूज करना सिखाया। दादी हमेशा कहती कि बाबा को सदा अपने साथ कंबाइड रखो, बाबा के स्नेह में, प्यार में समाए रहो, भोजन भी करना है तो बाबा के साथ करो, प्यार से खाओ।

निर्मानता और सरलता

जब कभी दादी का घर पर आना होता तो प्यार से किचन में आकर खड़ी हो जाती और बताती कि इस चीज को इस तरह बनाओ, इस चीज को इस तरह बनाओ। विश्वमहाराजा-महारानी बनने वाली ऐसी श्रेष्ठ आत्मा कितनी निर्मानता और सरलता से हर कार्य को स्वयं कर दिखाती थी, इतनी श्रेष्ठता उनके जीवन में थी। दादी भोजन कर रही होती और हम यदि आसपास घूम रहे होते तो अपनी थाली में से हमें एक कौर जरूर खिलाती, हमेशा खिलाती। वह स्मृति आज भी मन में अंकित है। बहुत खुशी, बहुत आनंद, बहुत सुकून की अनुभूति होती है। जब हमें वे पल याद आते हैं।

योग की शक्ति का प्रैक्टिकल प्रयोग

एक बार मेरी एक बीमारी को बहुत सारी दवाइयां चल रही थी रोज के 13-14 इंजेक्शन लग रहे थे। सर्जरी भी हुई लेकिन उसके कुछ महीने बाद फिर वही लीजन हो गया। तो मुझे थोड़ी चिंता हुई, मैं दादी से मिलने गया। दादी अपने कमरे में बैठे हुए थे। उन्होंने कहा, 'बीमारी तो है ही नहीं, यह तो बाबा देख लेगा, तुम योग का प्रयोग करो। रोज सवेरे उठकर बाबा की याद में एक ग्लास में पानी लेकर उसमें माखी (शहद) डालो और बाबा की स्मृति से उसे चार्ज करो, फिर वह पी लो।' यह कार्य मैने लगातार एक साल तक किया और मेडिकल साइंस जिस बीमारी का कारण नहीं बता पा रहा था, अधिक से अधिक दवाइयां मिलने पर भी जो ठीक नहीं हो पा रही थी, बाबा की योग की शक्ति से वह लीजन ही ब्रेन से गायब हो गया। योग की शक्ति को प्रैक्टिकल स्वरूप में प्रयोग करना हमें दादी ने सिखाया।
जब दादी शारीरिक रूप से बीमार थी तो दादी हमेशा डॉक्टर से पूछती कि 'आपका स्वास्थ्य कैसा है, आप बताओ, आप ठीक हो?" तो सभी हैरान हो जाते थे कि एक पेशेंट डॉक्टर से पूछ रहा है कि डॉक्टर का स्वास्थ कैसा है। बाबा की शिक्षाओं का प्रैक्टिकल स्वरूप, प्रैक्टिकल उदाहरण, सहजयोगी जीवन हमने दादी में देखा।

भोजन परोसने की सेवा

एक बार हम 15 अगस्त को अपने परिवार के साथ पिकनिक पर गए। दादी ने हमें निमंत्रण दिया था। हमने बहुत मजे किए, हंसी की, खेलपाल किए, पतंग आदि उड़ाए। उसके बाद भोजन का समय आया तो हम सब बैठे और दादी को भी बैठने को कहा। दादी ने कहा, 'हरबार आप सब दादी को खिलाते हैं, आज दादी आप सभी को खड़े होकर के खिलाएगी।' इतनी श्रेष्ठ आत्मा, इतनी निर्मानः दादी बैठे ही नहीं। उन्होंने सारे परिवार को बिठाया, हाथ में बर्तन लेकर एक-एक को अपने हाथसे थाली में सब्जी परोसी। यह देख कर मेरा दिल भर आया कि यह भी परम सौभाग्य है कि स्वय दादी हमें भोजन परोस रही है भोजन खिला रही है। बाबा कहता है कि हमे जीवन में निर्मान होना चाहिये उसका उदाहरण दादी के जीवन में देखा।

रमणीकता की मूर्ति

दादी जी न सिर्फ ज्ञान सुनाती परंतु रमणोंकता की भी मूर्ति थी। दिवाली के दिन हम घर से थोड़ा बहुत पूजन करके भोग लगा कर सीधा दादों के पास दौड़ते थे। पाडव भवन में जाते थे। दादी को चौपाल बहुत बड़ी सजती थी। हम सब रास करते थे, दादी भी हमारे साथ रास करते थे। उनके साथ वहां पर पटाखे, दीपदान आदि द्वारा बहुत सुंदर दिवाली मनाते थे। होली पर हम दादी के पास जाएं और दादी अपने हाथसे गुलाल न लगाएं या हम पर रंगित पानी न डाले, ऐसा हो नहीं सकता था। इस तरह दादी के जीवन में रमणीकता भी बहुत देखी।

दादी की विद्वता

एक बार हम दादी जी को घर ले जा रहे थे कि आइए हम भोजन साथ ही करेंगे। तो ट्रैफिक बहुत था, 15,20 मिनट के रास्ते में करीब एक घंटा लग गया। परंतु दादी ने हमसे ज्ञानयुक्त पहेलियां पूछनी आरंभ कर दी। गाड़ी मैं चला रहा था, साथ में लौकिक बहन मोनिका थी। आधा-पौना घंटा दादी की पहेलियां, हमारे जवाब, इससे रमणांकता और रूहानियत से परिपूर्ण जो वातावरण गाड़ी के अंदर बना, उससे हमें समय का पता ही नहीं चला और हम घर पहुंचे। घर पर बाबा के कमरे से होकर निकले तो दादी कहती है, 'यह तो बहुत प्यारा बाबा का घर है। वंडरफुल घर है, ऐसा लगता है जैसे कि बाबा स्वयं यहां पर रहता है। फिर दादी ने एक बहुत सुंदर गिफ्ट दिया। दादी ने कहा, बावा के घर से गिफ्ट आई है। हमने स्वीकार किया और रख दिया। तो दादी ने कहा, नहीं इसे अभी खोलो। दादी ने अपने हाथ में खोला। उसमें टी-सेट था, कप-प्लेटस और डिनर प्लेट्स भी थे। दादी ने कहा कि खोलकर इसलिए रख रही हूं ताकि यह आप किसी और को न दो। जब भी इस सेट को आप यूज करोगे तब आपको बाबा की याद आएगी।' हम सब मुस्कराते रहे और दादी की इस विद्वता पर बहुत मोहित हुए।
दादी का स्वास्थ कुछ ऊपर-नीचे होता तो हमें उनसे मिलना बहुत सहज होता था क्योंकि दादी हमारे पिताजी के पास ही आती थी। जब दादी को थोडी बडी बीमारी हुई तो उनके साथ पांडव भवन में कुछ वक्त गुजारने का, रात को रुकने का भी हमें मौका मिला। हमने देखा, तब भी दादी बहुत शांत रहते थे। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उन्हें कोई बीमारी भी है। हमेशा पावरफुल वाइब्रेशन, पावरफुल वातावरण, बहुत आनंद की अनुभूति होती थी।

नंबरवन दोस्त है प्यारा बाबा

सन् 2001 में अमेरिका जाने से पहले मैं दादी के पास गया। दादी ने बड़े प्यार से मुझे कहा कि 'देखो मोहित, अमेरिका जाने से पहले तुम्हें मधुबन जरूर जाना चाहिए क्योंकि जगदीश भाई साहब की तबीयत ठीक नहीं है।' मैने एग्जाम अभी-अभी दिए थे और रातभर ड्राइव करके हम भाई साहब के पास गए और बहुत अच्छा हुआ क्योंकि वह परम आदरणीय जगदीश भाई जी के अंतिम दर्शन थे। दादी ने बड़े प्यार से हमें बुलाया, टोली दी और कहा कि 'बाबा को सदा साथी बना कर रखो ।तुम्हारा नंबरवन दोस्त केवल एक है, वह है प्यारा बाबा।' दादी की वह शिक्षा मैंने सदा अपने जीवन में संभाल कर रखी। मैं हॉस्पिटल भी जाता,,हार्ट के पेशेंट भी देखता। जब दादी दिल्ली से आखिरी बार जा रही थी तो मुझे याद है कि बहुत हल्की आवाज में दादी ने मेरे कान में कहा, मोहित, तुम जिस हॉस्पिटल में काम करते हो। वहा अनेको आत्माओं की सेवा का तुम्हें भाग्य मिलता है, तुमको यह एक मौका मिलता है किः तुम उनका ध्यान रख सको, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं की तुम सदा वाचा के ज्ञान द्वारा सेवा करना, क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों सेवाओं पर सदा ध्यान देना।' दादी भले शारीरिक रूप से आज हमारे सामने नहीं है लेकिन दादी की वह प्यारी सी मूरत, दादी की एक-एक शिक्षा हर पल, हर दिन मेरे स्मृति पटल पर रहती है। हमारी आत्मा उनके महान प्यार के सामने आज भी झुक जाती है। हमारे दिल के उद्गार सदा यही कहते हैं कि बाबा, ऐसी श्रेष्ठ आत्मा के साथ हमारे जीवन के कुछ पल बीते, उसके लिए हम आपका दिल से शुक्रिया करते हैं।

शिव हृदय स्वामिनी : दादी हृदयमोहिनी जी

ब्रह्माकुमार हेमंत भाई शांतिवन
फरिश्ता रूप, ममतामई दादी गुलजार जी ने माँ बन, मुझ बालक को बुद्धिरूपी अंगुली थाम अध्यात्म पथ पर चलना सिखाया। मीठी-मीठी बातों से हृदयनाथ में हृदय का नाता जोडना सिखाया। अनेको बार प्राणप्यारे प्रभु में मिलन कराया व सच्चा परवाना बनाकर शिवशमा पर फिदा कराया। वे रहनुमा बन जिंदगी के हर मोड पर साया बन खड़ी रही। सदा खुशहाल व फरिश्ते की चाल से दादी जी की देह दुनिया से दूर ले जानी वाली रूहानी अदाएं यहीं कहती, 'मै परियों की रानी हूं, मै आसमा से आई हूँ..।' सच पूछो तो उनका नहीं था विकारों दुनिया से कोई रिश्ता, वे तो थी ही जन्मजात (बाईबर्थ) एक प्यारा फरिश्ता! कैसी मनमोहक मनोहर छवि, कैसा न्यारा-निराला नूरानी तेज व ओज से दमकता हर्षित मुखमण्डल! आज भी वे परियों की शहजादी सूक्ष्मवतन से, फरिश्ता बनाने के मानो अव्यक्त इशारे कर रही हैं।

नौ वर्षीया शोभा का ओमनिवास बोर्डिंग में प्रवेश

दादी जी का दैहिक जन्म कराची में भक्तिभाव से भरे परिवार में 1-7-1926 के शुभदिन हुआ। पिता हासाराम व माता रुकमनी (ससुराल का नाम) ने नाम दिया शोभा। ब्रह्माबाबा उन्हे प्यार से कहते 'गुलज़ार।' शिवपिता ने दादी जी को अव्यक्त नाम दिया 'हृदयमोहिनी।' एक बार कराची में दादी की लौकिक माँ की मामी ने ब्रह्माबाबा को महान पुरुष जान निमंत्रण दिया। शोभा, दादी आलराउण्डर के साथ मामी के घर गई, वहां सत्संग में जाते ही ट्रांस में गई। सत्संग पूरा हुआ पर वे जागृत अवस्था में न लौटी तो माँ ने जगाया। माँ ने पूछा, 'क्या देखा?' वे कुछ बता न सको, तब मां ने उन्हें श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि के चित्र दिखाये। उन द्वारा दीदार में देखे श्रीकृष्ण की छवि तो उन चित्रों से अति सुंदर थी। इसके बाद उनका ज्ञानमार्ग में पदार्पण हुआ। उन दिनों ब्रह्माबाबा ने सिंध-हैदराबाद में बच्चों के लिए होस्टल खोला था। गीतापाठी मां ने श्रेष्ठ संस्कार देने के लिए नौ वर्षीया शोभा को ओमनिवास बोर्डिंग में प्रवेश दिलाया।

बाबा कहते, चैतन्य ठाकुर

दादी जी को बाबा-मम्मा से राजकुमारी से बढ़कर प्यार दुलार मिला। बाबा कहते, भक्त तो जड मूर्तियों को भोग लगाते आप तो चैतन्य ठाकुर हो। मै चैतन्य मूर्तियों को खिलाता हू।' बाबा स्वहस्तों से बच्चों को गोद में बिठाकर मौसम का पहला फल खिलाते। एक बड़े हॉल में 80 पलंग थे। बच्चों को पेस्ट भी ब्रश में डालकर मिलती। स्नानागार में वस्त्र तैयार होते। रोज रात को मालिश होती। श्वेत चादर से सजी शैय्या पर मच्छरदानी लगाई जाती व संभालने वाली बहन टार्च से चैक करती कि कोई मच्छर तो नहीं है? बाबा-मम्मा आकर गुडनाईट करते। मच्छरदानी गिरते ही गीत बजता, 'सो जा राजकुमारी, सो जा..।' सोने से पूर्व बाबा तीन मिनट में सारे दिन का चार्ट चेक कराते। प्रातः 'जाग सजनिया जाग..। इस गीत से जगाते। सुबह दादी चंद्रमणि ड्रिल कराती, साथ ही एक-दूजे को आत्मा देखने का अभ्यास कराती। बाबा स्वयं पाठ लिखते व दादियां पढ़ाती। बाबा के लिखे गीत-कविताएं मिट्ठू दादी मधुर स्वर में गाती। दीदार में देखे दिव्य दृश्यों का बाबा डांस ड्रामा लिख मंचन कराते। दादी ने तो वो निःस्वार्थ प्यार भरी पालना पाई, जो राजा-महाराजाओं को नसीब न हो।

दादी के नैनों से पाई परमात्म दृष्टि

इसी बीच हैदराबाद में पवित्रता पर हंगामे, पिकेटिंग हुई। बच्चों के नाम वारंट निकले तो उन्हें घर भेजा। शोभा भी वारंट आने से घर आई। इधर बाबा भी कराची आ गये। दादी आलराउण्डर ने कडे विरोध का डटकर सामना किया। उन्हें बार-बार लगता कि दान में दी बीज (शोभा) को वापिस नहीं लेना चाहिए। अतः एक साल बाद वे एक दिन सवेरे सवेरे शोभा को तांगे में बिठाकर ओमनिवास छोड़ आई। चौदह वर्ष की गहन योगभट्टी में तपकर दादी कंचन बनी। दादी जी ने ही मुख्य संदेशी बन सूक्ष्मवतन तथा सतयुगी दुनिया के अनेक राज़ खोले। पिताश्री ब्रह्मा बाबा ने दादी की आंखे देख वरदान दिया कि ये नैन बहुत सेवा करेंगे। ऐसे ही एक दिन मातेश्वरी जी ने मीठी आवाज सुन कहा कि उनकी मधुर वाणी से सेवा होगी। सचमुच ब्रह्माबाबा अव्यक्त हुए तो दादी हृदयमोहिनी जी के नैनों से असंख्य ब्रह्मावत्स परमात्म दृष्टि पाकर निहाल होते रहे। साथ-साथ पांच स्वर्णिम दशकों तक दादी जी के मुखकमल से ही ईश्वरीय अमृतवचनों का पान कर ईश्-मिलन का पदमापदम सौभाग्य पाते रहे।

दादी का निष्याप और भोला मन

मुझ आत्मा को दादी जी से मिला अथाह प्यार व पालना अवर्णनीय है। मैं 1990 में मधुबन में समर्पित हुआ। मातेश्वरी भवन में सेवा में उपस्थित था, जहां हमने वेस्ट चीजों से रॉक गार्डन व झरने का निर्माण किया था, जिसमें कुछ मिट्टी की मूर्तियाँ भी सजाई थी। उसे निहारने हेतु दादी जी को सस्नेह निमंत्रण दिया, तो सहज भाव से निमन्त्रण स्वीकार कर दादी जी पधारी। हम भावविभोर हो पुष्पगुच्छ दे स्वागत करने को उत्सुक थे। पर जैसे ही दादी जी कार से नीचे उतरी, तो कुछ आदिवासी बच्चे बगीचे में सजे खिलौनों को देख रहे थे। उनसे दादी आत्मीयता से संवाद करने में मगन हो गई। शायद ही बच्चे नहाये धोये हो। फटे-पुराने, मैले कुचैले कपडे, बिखरे बालो की जटाये बच्चों की ऐसी अस्वच्छ भावभंगीमा देख कोई भी उनसे दूर भाग जाए। पर दादी जी तन की गंदगी न देख मन के भोलेपन पर रीझकर मासुमियत से कह रही थी। 'इन्हें (मूर्तियों को) हाथ नहीं लगाना। दूर से ही देखना।' दादीजों का हावभाव व उन बालसुमनो से हृदय का वार्तालाप देख मै तो अवाक रह गया। कैसा था निष्पाप मन। कैसा भोलापन था दादी जी का ! उनके निर्मल हृदय से स्नेह का झरना झर-झर बह रहा था। दिल सहसा गा उठा, 'ओ मैय्या मोरी, तू मन की अति भोरी....!'

चेतन शिवालय थी दादी

उपरोक्त प्रसंग ने 'स्वयं भगवान दादी जी में क्यों आते हैं?' इस प्रश्न का मुझे उत्तर दिया। दादी जी के निर्मल हृदय ने तो सत्यम् शिवम् सुंदरम् को भी मोह लिया। उनके पावन मनभावन चितवन ने खुदा को भी फिदा करा लिया। उनके पवित्र हृदय कुंज ने सर्वशक्तिवान को भी सम्मोहित कर लिया! दादी जी की सहज सरल बालसुलभ निष्कपटता ने शिवहृदय पर सदा राज किया। दादी जी तो चेतन शिवालय थी। जब-जब भी दादी जी से मिलना होता, तो अनुभव होता, 'स्वयं शिव उनमें विराजमान हैं।' वे चलते-फिरते भी प्रभु मिलन की अनुभूति करा देती थी। सचमुच दादी थी ही शिवप्रिया-शिवभार्या, शिव अनुरागिनी, शिव अर्धांगिनी, शिव हृदय स्वामिनी, दादी हृदयमोहिनी!

विघ्नविनाशक दादी जी

कहते हैं, तूफानों में तोहफे होते हैं। मुझ आत्मा की भी तन-मन की स्थिति की परीक्षाएं चल रही थी। मैं दादी जी के पास दिल्ली पाण्डव भवन गया। वहा दादी जी के सप्ताह भर के सानिध्य ने अनुभव कराया कि एक मां बच्चे के साथ खड़ी ही कैसे विघ्नों में पार कराती है। दादी जी रोज दिल का हाल पूछती, कहती, हेमंत यह खेल है, पेपर है।' उन शक्तिशाली शब्दों ने पहाड़ को भी राई तो क्या रूई बना दिया। एक दिन दादी मानेसर में गई हुई थी। तो दादी जी के कमरे के बाहर ताज, पुष्पहार, चुन्नी, चंदन का तिलक, फल, चांदी का कटोरा, चम्मच आदि तैयार कर उनका इंतजार कर रहा था। दादी जी आई व मेरे मन की मुराद पूरी की। पाण्डव भवन की कुछ बहनों के समक्ष दादी जी का श्रंगार किया, तिलक लगाया, चुन्नी ओढ़ाई व चांदी के कटोरे में, चांदी के चम्मच से स्वयं बनाये गाजर के हलवे का भोग भी स्वीकार कराया, तो लगा जैसे दादी बालकृष्ण का मोहिनी रूप धर भावना का भोग स्वीकार कर रही है। उस समय दादी सहित कुल आठ आत्माएं विराजमान थी। ये भी कमाल थी कि अष्ट सो ईष्ट दादी ने भविष्य दैवी स्वरूप की झलक दिखाकर, विघ्नविनाशक बन मुझे निर्विघ्न किया, मुझे नवजीवन मिल गया।
दादी जी तो पवित्रता का जीता-जागता चैतन्य दीपस्तंभ थी। उनके शीतल तन-मन से सुख-शांति की तरंगें निकलती रहती थी। जैसे पार्वती ने हिमालय पर तप कर शिव का वरण किया, ऐसे ही पार वतन की अनुगामिनी दादी, महाशिवराात्रि के पावन पर्व की मंगल वेला में शिवशमा पर कुर्बान हो गई।

शिवबाबा के रथ की सेवा का परम सौभाग्य

बाह्माकुमारी भारती बहन, शांतिवन
मार्च, 2018 से मुझे दादी गुलजार की सेवा में मुम्बई बुलाया गया, तब से अंतिम समय तक (3 साल) मैं आत्मा दादी जी के साथ रही और दादी जी ने किस तरह कर्मातीत स्थिति को पाया, यह देखने का सुअवसर मिला। दादी गामदेवी सेंटर में थे और जब दादी का स्वास्थ्य ठीक रहता तो दादी कभी हमे मुरली पढ़‌कर सुनाती, तो कभी क्लास भी कराती थी। हम सभी बहनों से मुस्करात हुए बात करती और दृष्टि देती थी। किसी बात में कभी हमारी स्थिति ऊपर-नीचे होती तो दादी को देख कर हम अपनी तकलीफ भूल जाते थे। दादी हमारी हर तरह की बातों का जवाब देती थी लेकिन एक शब्द में। दादी बहुत कम बोलती थी। उनके शब्दों को हमें समझना पड़ता था।
दादी के खाने-पीने और स्वास्थ्य संबंधित चेकअप और हर प्रकार के उपचार में बहुत अलर्ट और एक्यूरेट होकर बहुत अच्छी तरह से ध्यान रखना होता था। हर वक्त हमें ऐसा महसूस होता था कि हम दादी कि नहीं, बाबा के रथ की यानी डायरेक्ट बापदादा की सेवा कर रहे हैं, इसलिए हमसे किसी भी प्रकार की छोटी-बड़ी कोई गलती ना हो।
एक बार बहनों ने पूछा कि दादी, आप ट्रिब्यूनल में बाबा के साथ बैठेंगे तो हमारी अगर कोई गलती रही हो तो आप बाबा को कह कर माफ करवा देंगे ना। दादी ने बहुत अच्छा जवाब दिया कि उस समय मै गुलज़ार दादी नहीं रहेंगी, दादी का रूप बदल जाएगा। इससे पता चला कि दादी किसी के मोह में भी नहीं है और लॉफुल भी है। दादी के बोल से ऐसा लगता कि यह दादी नहीं, बाबा ही बोल रहे हैं।
हमें कभी संकल्प चलता था कि मधुबन छोड़कर दादी गामदेवी सेंटर पर क्यों रह रहे है? लेकिन इसका राज़ अभी पता पड़ रहा है कि अपनी संपूर्ण कर्मातीत स्टेज बनाने के लिए दादी ने यह स्थान चुना, जिसमें दादी अच्छी तरह तपस्या कर सके, कोई डिस्टर्ब ना कर सके। एक छोटी-सी गुफा (दादी का कमरा) में दादो तपस्या कर रही थी।
आखिरी साल में दादी की तबीयत बहुत खराब होने लगी थी तो हम दादी से कहते, दादी, बाबा से बोलो कि आपकी तबीयत ठीक करा दे। तो दादी कहती थी मैं क्यों बोलूं यदि बाबा को सेवा करवानी होगी तो आपेही ठीक करा देंगे, मैं इसमें क्यों बोलू?
बाबा मिलन के दिन हम दादी से कहते, दादी आज बावा आने वाले हैं। शाम 5-6 बजे हम उन्हें एक बार जब तैयार कर रहे थे तो दादी ने कहा, मै सभा में गई और सबको मिलकर आई। उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे कि बाबा आए हैं और बाबा बोल रहे है। जब बाबा आते थे। वहीं एकरस दृष्टि और एकरस मुस्कराहट थी। अभी हमें समझ आ रहा है कि दादी तो बाप समान बन चुकी थी। उनका बोलना, चेहरा बाप और दादा दोनों जैसे लगता था।
एक बार जब मैं मुंबई गई तो दादी को कहा, दादी, चलो, मैं आपको आबू ले जाने आई हूँ। दादी ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि बड़ों से पूछना पड़ेगा। मैंने कहा, आप तो इतने बड़े हो, आपसे और कोई बड़े हैं क्या? दादी बहुत इनोसेंट और कायदे अनुसार चलने वाली थी।
दादी जब शिवरात्रि के दिन अव्यक्त हुए तो ऐसा लग रहा था जैसे बाबा खुद दादी को लेने के लिए आए हैं। वातावरण बिल्कुल ही बदल गया था, बहुत शक्तिशाली और शीतलता का हो गया था। किसी के मन में दुख की लहर नहीं आई मानो दादी ने सभी में रूहानियत की शक्ति भर दी हो ताकि वे जाएँ तो सब उन्हें आराम से जाने दे सके। हम सब दादी के चारों ओर ही खड़े थे और आत्मा (दादी) बहुत सहजता से बाबा के पास चली गई।
मैं स्वयं को बहुत ही खुशकिस्मत समझती हूं जो आदिरत्न दादी की पालना पाने का ऐसा सुंदर भाग्य बाबा ने मुझे दिया।

दादी जी वतन से हम सबको देख रहे हैं

ब्रह्माकुमारी नम्रता बहन नर्स, एवर हैल्दी हॉस्पिटल, शांतिवन
प्यारे बाबा का प्यार और पालना जिस माध्यम द्वारा हम सभी बच्चों को प्राप्त हुए। उन गुलजार दादी जी की बहुत सारी विशेषताओं और महानता को प्रत्यक्ष निहारने का गोल्डन चांस बाबा द्वारा हमको प्राप्त हुआ। हमने दादी जी से एक या दो बार नही, बहुत बार अनुभव किया कि बिना कुछ बोले, दादी जी हमारे मन के भावों को जानकर उनका जवाब अपने बोल द्वारा दे देते थे।

बिना बोले मन के प्रश्नों को पढने वाली दादी

समर्पित जीवन का प्रारम्भ ही दादी जी के साथ रहकर हुआ ।सब कुछ नया था। रहन-सहन नया, भोजन की वैरायटी नयी ,नया देश और भाषा नयी, यहां तक कि नाम भी नया हो गया था मन में यह सोच चलता था, क्या सारी नई सिचुएशंस को समाकर और समेटकर मैं आगे बढ़ सकूगी? दादी जी ने हमारे बिना बोले दृष्टि देते हुए हमारे मन के प्रश्नों को पढ़ लिया और जवाब दिया "सब कुछ देखते हए भी नहीं देखो सुनते हए भी नहीं सुनो, न्यारा और प्यारा होकर चलो, चलोगे ना?" दादी जी की इन बातों ने हमारे मन को छू लिया। बहुत भावना में आकर फिर हमने भी दादी जी से वायदा किया, हां दादी, जरूर चलूंगी।

तन की सारी परिस्थितियों के ऊपर विजयी दादी

मायाजीत, प्रकृतिजीत, कर्मातीत, संपूर्णता, संपन्नता ये जो शब्द सुनने में ही बहुत बड़े लगते हैं परंतु इन सब स्थितियों का प्रैक्टिकल स्वरूप हमने दादी जी में देखा। अंतर्मन से आवाज निकलती थी, हां, यही है वह विजयी आत्मा जिसकी व्याख्या बाबा मुरलियों के माध्यम द्वारा करते हैं। पिताश्री ब्रह्माबाबा के साथ के अनुभवों में हमने सुना है कि बाबा कभी भी प्रकृति को अपने ऊपर हावी होने नहीं देता था, उसके अधीन नहीं रहता था। दादी जी में भी हमने यही अनुभव किया। जैसी भी परिस्थिति हो, उसके अधीन दादी जी नहीं होते थे। एक बल एक भरोसे के पाठ द्वारा अपने तन की सारी परिस्थितियों के ऊपर दादी जी को विजय प्राप्त करते हए हमने प्रेक्टिकल में देखा। उनकी अवस्था हर पल एकदम शांत और स्थिर होती थी। दादी जी को न बाहरी वातावरण प्रभाव में ला सकता था और न ही प्रकृति का कोई भी विघ्न उनके मन की शांति को कम कर सकता था।

एक बल एक भरोसे का पाठ

इक्कतीस दिसंबर, 2017 के दिन सवेरे से दादी जी की तबीयत में थोड़ा ऊपर-नीचे होना शुरू हो गया था। दादी जी को सांस लेना ही मुश्किल लग रहा था। दिन भर भी तबीयत के कारण अच्छा आराम नहीं हो पाया और शाम को बाबा मिलन होने वाला था। डायमंड हॉल में जाने का समय हो चुका था लेकिन दादी जी की तबीयत में उतना सुधार नहीं था। दादी जी को ऐसी अवस्था में देख आदरणीय नीलू दीदी जी ने दादी जी से पूछा, दादी, अभी तक भी आपकी तबीयत में सुधार नहीं है, आप हॉल में नहीं जा सकते, क्या मैं यहीं कमरे से ही उनको वीडियो कॉफ्रेंस कराने के लिए बोलूं। दादी जी ने उत्तर दिया, एक बल एक भरोसा, हॉल में जरूर जाना है। ऐसे दादी जी ने एक बल एक भरोसे के पाठ द्वारा तन के विघ्न पर भी विजय प्राप्त कर ली और उसी दिन बाबा ने समाप्ति वर्ष की घोषणा भी कर दी।

भिन्न-भिन्न भावों को समा कर निरंतर एक के संग में

एक कहावत है, बुरा होने पर जिसके मन में दुख का अनुभव नहीं हो, अच्छा होने पर भी मन बिल्कुल शांत रहे, खुशी में बेकाबू ना हो, गुस्सा, डर व प्रेम आदि सब कुछ एक ही भाव से, एक जैसा देखता है। उसका मन और बद्धि स्थिर रहते है। वही सच्चा मुनि अर्थात् सच्चा योगी कहलाता है और उसकी उपस्थिति ही संसार के लिए वरदान है। दादी जी की अवस्था भी बिल्कुल ऐसी ही थी। ना दुख, ना ही सुख, दादी जी पर कोई भी प्रभाव नहीं होता था। सबके भित्र-भित्र भावों को समा के दादी जी बस एक के ही संग में निरंतर रहते थे। सबमुच, दादी जी की उपस्थिति ही इस संसार के लिए एक वरदान था।

अशरीरीपन की परफेक्ट स्टेज

बाबा ने कहा है कि जैसे-जैसे आप बच्चों की अशरीरी स्टेज होती जाएगी तब इस देह के हर प्रकार के बंधन से मुक्त होते जाएंगे। शारीरिक कर्मभोग भी ऐसा अनुभव होगा कि जैसे भोगना शरीर भोग रहा है, मैं आत्मा नहीं। ऐसी स्थिति नेचुरल होगी कि यह तन अलग है और मैं आत्मा अलग हूं। दादी जी में हमने यह स्वरूप प्रैक्टिकल में देखा।
दादी जी का डेली रूटीन इतना इजी नहीं था। एक मेडिकल सेवा, एक दिन में कई बार करनी पड़ती थी परंतु दादी जी की अशरीरीपन की स्टेज इतनी परफेक्ट थी कि उन्हों को वह कष्ट बिल्कुल अनुभव नहीं होता था। मुख से कोई भी आवाज नहीं निकलती थी। इतने तक कि दादी जी मंदिर की देवियों की मूर्ति के समान स्थिर होकर वह सेवा करवाते थे। हाथ की उंगली तक भी नहीं हिलती थी। दादी जी को देख हम बहनों को रहम आता था। कभी भी, कोई भी ऐसी सेवा हो, दादी जी बिल्कुल शांत रहते थे और स्थिर होकर डॉक्टरों से वह सेवा करवाते थे। दादी जी के डॉक्टर भी कहते थे। हमने आज तक अपने अनुभव में ऐसी पेशेंट कभी नहीं देखी। दादी जी ने अपने अंदर अशरीरीपन की स्थिति द्वारा इतनी शांति भरी हई थी कि बाहर की अशांति को भी अपने अंदर ही समा देते थे। जितनी बड़ी परिस्थिति, उतनी ही गहरी शांति और निर्सकल्प स्थिति में दादी जी को रहते हुए हम सब ने अनुभव किया।
फरवरी 9 से 11 मार्च, 2021 तक एक महीने का समय जो था, दादी जी की संपूर्ण स्टेज का अंतिम चरण था। उस समय ऐसा अनुभव होता था कि दादी जी अपने शरीर से विल्कुल ही न्यारे हो गए हैं। जो भी ट्रीटमेंट चल रही थी उसमें आम व्यक्तियों को, दर्द की दवाई देनी पड़ती है, एनएसथीसिया देना पड़ता है, लेकिन हमने देखा, दादी जी को किसी भी चीज की जरूरत ही नहीं पड़ी। दादी जी को शरीर में दर्द महसूस ही नहीं होता था। और ही दादी जी सारे डॉक्टर्स, नर्सेज और हम बहनों को भी प्यार भरी दृष्टि देते थे। ऐसे हमने दादी जी के अशरीरीपन की संपूर्ण स्टेज और संपूर्ण प्रकृतिजीत की स्टेज को प्रत्यक्ष अनुभव किया।

स्वीट साइलेंस की स्टेज का अनुभव

दादी जी निरंतर बाबा के साथ में स्वीट साइलेंस में रहते थे। दादी जी के नजदीक जाते ही हमारा मन भी बिल्कुल निर्सकल्प और शांत हो जाता था। चाहे बाहरी हलचल हो या अपने तन की ही कोई हलचल हो परंतु दादी जी एकदम शांत, निरंतर बाबा की याद की लगन में मगन अवस्था में स्वीट साइलेंस की स्टेज में रहते थे। दादी जी जब हमारे साथ बात करते थे। हमको दृष्टि देते थे तो हम बहनों को बहुत अच्छा लगता था। दादी जी नीचे वतन में हमारे साथ ही रहे उसके लिए हम सारी बहने दादी जी के समक्ष कभी रास करके दिखाते थे। कभी गाना गाकर ध्यान खिचवाते थे कभी कुछ कह बच्चों का खेल दिखाते थे। दादी जी भी हम छोटी बालकियों की मेहनत देखकर कुछ समय हमारे साथ रहते थे। हमसे बात करते थे, हम जो दिखाते थे, वह देखते थे और जब खत्म हो जाता था तो तुरंत दादी जी साइलेंस में चले जाते थे। इसी विषय में एक बार मुंबई स्थित गामदेवी सेंटर की मुख्य प्रशासिका आदरणीय नेहा दीदी ने, दादी जी को प्रश्न किया, दादी जी, हम भी आपकी तरह अपनी स्थिति को महान बनाएं इसके लिए क्या पुरुषार्थ करें? दादी जी ने उत्तर दिया, बस, आना और जाना, यही पुरुषार्थ बार-बार करते रहो, हर बात में बाबा-बाबा करते रहो। निरंतर बाबा के साथ में रहने से दादी जी को बाबा के संग का रंग ऐसा लग गया था कि जब भी दादी जी से दृष्टि लेते थे तो कोई साधारण दृष्टि नहीं होती थी, दादी जी के नैनों से ऐसा लगता था कि स्वयं बापदादा दृष्टि दे रहे है। बाबा और दादी जी में कोई अंतर नजर ही नहीं आता था।

वाणी से परे साइलेंस की स्थिति

अंतिम समय की दादी जी की स्थित्ति आवाज से परे वाली स्थिति थी। बाबा ने मुरलियों के माध्यम द्वारा हम बच्चों को कहा है, जैसे आप बच्चों को अभी वाणी में आना सहज लगता है और आवाज से परे साइलेंस की स्थिति में स्थित रहना मुश्किल, ऐसे ही जैसे-जैसे साइलेंस में रहने का अभ्यास बढ़ता जाएगा तब साइलेंस की अवस्था नेचुरल हो जाएगी और वाणी में आना मुश्किल लगेगा।

रूहानी दृष्टि और मुस्कराहट

दादी जी को जब खुद इच्छा होती थी वाणी में आने की तब वाणी में आते थे परंतु कोई भी परिस्थिति के प्रभाववश दादी जी के मुख से कोई बोल (एक शब्द भी) नहीं निकलता था। एक बार हर दिन की तरह दादी जी तैयार होकर बाहर हॉल में बैठे थे, उनसे मिलने एक अनन्य भाई, जो अच्छे सेवाधारी थे, आ गए। दीदी जी ने दादी जी से उनका परिचय कराया। दादी जी ने भी सब सुना लेकिन भाई के प्रति कुछ भी नहीं कहा। दृष्टि से ही वह भाई संतुष्ट और खुश हो कर चला गया। बाद में जब दीदी जी ने दादी जी से पूछा, दादी, बहुत अच्छा अनन्य भाई था, आपने तो उसके प्रति कुछ बोला भी नहीं? दादी जी ने बड़े प्यार से इनोसेंटली कहा, मुस्करा तो दिया ना। ऐसे हम सब बहनें जब भी दादी जी के समक्ष जाते थे तो दादी जी की दृष्टि और मुस्कराहट से अपने देश और दुनिया को ही भूल जाते थे। दादी जी अपनी रूहानी दृष्टि और मुस्कराहट से सबको संतुष्ट और तृप्त कर देते थे।

दादी जी की सेवा की नहीं लेकिन दादी जी से भरपूर सेवा ली

ब्राह्मण परिवार जन हमसे बोलते हैं, बहन, आपने दादी जी की बहुत सेवा की लेकिन हमारे अंतर्मन को पता है कि वास्तव में हमने दादी जी की सेवा नहीं की लेकिन दादी जी से भरपूर सेवा ली है। संगमयुग में बाबा द्वारा हमारा सौभाग्य रहा, दादी जी द्वारा निस्वार्थ और यथार्थ प्रेम भरी पालना प्राप्त करने का। दादी जी के समक्ष आते ही हमको ऐसा अनुभव होता था कि परमात्मा के प्रेम की वर्षा हमारे ऊपर बरस रही है। दादी जी निरंतर बाबा की प्रेमपूर्ण याद में रहते थे। उनके रूहानी प्रेम का वाइब्रेशन, हमारी आत्मा को तो पूरा ही न्योछावर कर देता था। सेकंड में हम भी उस परमात्मा के प्यार को लगन में मगन हो जाते थे। दादी जी हमारे मन के भावो को तुरंत कैच करते थे और बोलते थे, बस, बाबा में समा जाओ। संगमयुग का जितना समय हमने दादी जी के साथ गुजारा, दादी जी ने शरीर और आत्मा दोनों की भरपूर पालना की।

बाहर की परिस्थिति कुछ भी हो, अंदर की खुशी न जाए

कभी-कभी दादी जी के साथ हमारी रात्रि सेवा होती थी। दादी जी रात में इशारे से हमें अपने नजदीक बुलाते थे और हमारे चेहरे पर प्यार भरे हाथ फिराकर कहते थे, आप थक गई होंगी, थोड़ा यही लेट जाओ। कभी-कभी अपने अंदर की ही किसी कमजोरी के कारण हमारा मन अशांत हो जाता था तब दादी जी हमारे मन की स्थिति को भी तुरंत जानकर कहते थे, बाबा ने इशारा दिया, शांत हो जाओ। एक बार दादी जी को दवाई देते समय हाथ से पानी का गिलास फिसल गया। पानी दादी जी के कमरे में गिर गया। दादी जी वह सब देख रहे थे और समझ रहे थे। नीलू दीदी ने दादी जी से पूछा, दादी, कमरे में पानी किसने गिराया? दादी जी को लगा कि इस छोटी बालकी को कोई कुछ बोल ना दे, इसलिए जवाब दिया, यह पानी मेरे से ही गिर गया होगा। दादी जी अपने हाथों से हमको खिलाते थे और कहते थे, दिल का प्यार है ना। कभी किसी बात पर मन में अशांति आ जाती, तो हम दादी जी के सामने बैठते थे। दादी जी मुस्कराते हुए प्यार भरी दृष्टि देते थे तो हम सारी अशांति वाली बातों को ही भूल जाते थे। दादी जी हमारे अंदर की ज्ञान की गहराई को बढ़ाकर धारणास्वरूप बनाने के लिए हमें शिक्षा भी देते थे।
एक दिन दादी जी से हमने पूछा, दादी, जैसे आप हर परिस्थिति में शांत रहते हो, उसकी विधि क्या है? दादी जी ने जवाब दिया, हर परिस्थिति में शांत और खुश रहने की बस एक विधि है, न्यारा और प्यारा। चाहे बाहर की परिस्थिति कुछ भी हो जाए, अंदर की खुशी नहीं जानी चाहिए, खुशी का डांस करना है। अंत समय तक भी दादी जी हमारी स्थिति को ऊंचा बनाने के लिए हम को इशारा देते हुए कहते थे, अभी सब छोड़ो, अभी ऊपर उड़ो, हर बात में बाबा-बाबा बोलो। इस थोड़े समय में ही दादी जी ने जो प्यार और पालना हमको दी, उसकी छाप हमारे दिल पर लगी हुई है, जो शब्दों के द्वारा संपूर्ण रूप में नहीं बतायी जा सकती।

मुरलीधर की मुरली की दीवानी थी दादी जी

कभी-कभी दादी जी के साथ जो भी भाई-बहने रहते थे, उनको बिठाकर दादी जी क्लास कराते थे। यही बताते थे, जब भी मुरली में और याद में मन नहीं लगता तो समझना चाहिए, अंदर भरा हुआ है। इस परिस्थिति में बाबा से बैठकर डिटेल में बात करो। ऐसे ही लोड मत दो। मुरलीधर बाबा से दादी जी का बहुत प्यार था। हमने प्रत्यक्ष देखा कि दादी जी को मुरली से बेशुमार प्यार था। अमृतवेले के योग के बाद दादी जी की दिनचर्या ही बाबा की मुरली पढ़ने से शुरू होती थी। दादी जी खुद तैयार होकर एकांत में मुरली पढ़ते थे। मुरली पढ़ने के बाद ही चाय पीते थे। मुरली क्लास के समय भी हमने देखा, रोज दादी जी तैयार होकर नोटबुक और लेकर कुर्सी पर बैठकर मुरली सुनते थे। आदरणीय रतन मोहिनी दादी जो जब मुरली सुना रहे होते थे और जब प्रश्न पूछते थे तो दादी जी अपने कमरे से ही प्रश्न का जवाब देते थे।
दादीजी दिन में भी बीच-बीच में हमको मुरली सुनाने के लिए बोलते थे। हमको कहते थे, आपके पास टाइम है तो मुरली सुनाओगे? दादी जी को मुरली के सार, वरदान, स्लोगन और बीच के कुछ गहन पॉइंट्स दिन भर याद रहते थे और हमें भी बीच-बीच में पूछते थे, आज बाबा ने क्या कहा? दादी जी दिन में भी नोटबुक और पेन लेकर मुरली के कुछ पॉइंट्स लिखते थे और हम से भी लिखवाते थे।
एक दिन दादी जी रोज की तरह तैयार होकर हॉल में बैठे थे। दीदी ने इशारे से बोला, नोटबुक और पेन के लिए, हमने दिया लेकिन दादी जी की उंगली में फ्रैक्चर हुआ था। हमने कहा, दादी, आपके हाथ में चोट लगी है, आज आप मुरली नहीं लिख सकते, हाथ को आराम चाहिए। दादी जी ने प्यार से जवाब दिया, ऐसे नहीं, स्टूडेंट लाइफ है ना, लिखना है। हमने अंदर ही अंदर सोचा इस उम्र में भी स्टूडेंट लाइफ का इतना नशा और मुरली से इतना प्यार सचमुच दादी जी के साथ का यह अनुभव दर्शाता है कि विद्यार्थीपन का हमको कितना नशा होना चाहिए और मुरली में कितना प्यार होना चाहिए। मुरलीधर की मुरली की दीवानी थी दादीजी ।
सरलता और सहनशीलता की विशेषता की खान थी दादी जी
अप्रैल 7, सन् 2000 की मुरली में बाबा ने स्पष्ट कहा है कि, परम आदरणीय गुलज़ार दादी जी को सरलता और सहनशीलता की विशेषता के कारण रथ का निमित्त पार्ट मिला हुआ है। चाहे छोटे हो या बड़े, दादी जी बड़ी सरलता से सबके साथ चलते थे। हम छोटी-छोटी बहने सेवा के क्रम में दादी जी को जो करने के लिए बोलते थे, दादी जी बड़ी सरलता से वही करके हमको सहयोग देते थे। चाहे खुद को सहन करना पड़े लेकिन दादी जी हम बहनों को सेवा में हर प्रकार का सहयोग देते थे। अंदर से दादी जी को लगता था कि यह छोटी बहन मेरी सेवा में है तो कोई भी सेवा लेने के बाद दिन से हम सबको दृष्टि देते हुए बोलते थे, बाबा की तरफ से थैंक यू। बाबा ने दादी जी में सरलता का गुण इतना भरा हुआ था कि दादों जी अपनी रूहानी अथॉरिटी में हर सेकंड रहते थे लेकिन बाहरी अथॉरिटी होते हुए भी उसको यूज नहीं करते थे। इतनी सरलता थी कि अपनी पर्सनल चीजों की अथॉरिटी भी दादी जी ने अपने साथियों को दी हुई थी।
एक दिन दादी जी को किसी वी आई पी गेस्ट से मिलने के लिए तैयार होना था। हम बहने दादी जी के साथ में ही थे। इतने में आदरणीय तारा दीदी ने दो अच्छी चुन्नी दादी जी के सामने रखकर पूछा, दादी जी, कौन सी चुन्नी डाल दू? दादी जी ने हम बहनों की तरफ देखकर बोला, इनसे पूछो। ऐसे दादी जी अथॉरिटी होते हुए भी हम सबके साथ बहुत सरलता से रहते थे।
एक दिन दादी जी की तबीयत थोडी ठीक नहीं थी। दादी जो के डॉक्टर ने कहा था, आज दादी को दिन भर आराम की जरूरत है। आदरणीय नीलू दीदी ने डायरेक्शन दिया, आज दादी जी को आराम की जरूरत है, किसी से भी नहीं मिलाना है, रेस्ट करने देना है। दादी जी से तो बहुतों को खिचाव होता था। उसी दिन एक बड़ा व्यक्ति दादी जी से मिलने के लिए आया जिनको हम मना नहीं कर सकते थे। हम बहनों ने दादी जी को कहा, दादी, आपके डॉक्टर ने और नीलू दीदी ने भी कहा है, आज आपको दिन भर आराम करना है। किसी से भी ज्यादा नहीं मिलना है। दादी जी ने अच्छा बोल कर आंखें बंद कर ली। वह व्यक्ति दादी जी से मिलने आया, दादी जी के चारों ओर घूम कर 'ओम शांति ओम शांति' बोलता रहा। फिर भी दादी जी ने आंख खोली नहीं। जब वह व्यक्ति चला गया और हमने एक बार ओम शांति दादी कहा तो दादी जी ने तुरंत आंखे खोल दी। दादी जी इतनी सरलता से हम सबको सेवा में सहयोग देते थे।
दादी जी के हाथ-पांव की फिजियो कसरत रोज होती थी। हम दादी जी से कभी हाथ ऊपर करने के लिए बोलते थे कभी नीचे कभी पांव के लिए बोलते थे दादी जी बहुत सरलता से हमे सहयोग देते थे। कभी दादी जी के शरीर में इतनी ताकत नहीं होती थी, फिर भी दादी जी हर प्रकार से सहयोग देते थे। ऐसी सरलता देख हम से रहा नहीं गया। हमने दादी जी से पूछा, दादी आप इतने बड़े हो, हम छोटी-छोटी बहने आपको जो बोलती है, बहुत सरलता से करते हो, यह कैसे कर पाते हो दादी आप? दादी जी ने दृष्टि देते हुए कहा, हमेशा याद रखना, जितना बड़ा उतना छोटा।
प्रत्यक्ष कर्म में भी हमने दादी जी की सहनशीलता की विशेषता के बड़े-बड़े उदाहरण देखे। हमने सुना है, दादी जी पर यज्ञ की बड़ी जिम्मेदारियां थी। स्थिति को ऊपर-नीचे करने वाली विभिन्न परिस्थितियां भी आई लेकिन दादी जी को थोड़ी भी सख्ती से किसी को शिक्षा देते हुए, किसी ने भी न देखा, न सुना। सबके भिन्न भिन्न स्वभाव-संस्कार, भाव-भावना को अपने अंदर समाकर, दिल का स्नेह, शुभ-भावना और शुभ-कामना भरे बोल और व्यवहार से सबको संतुष्ट करते थे दादी जी। कमल पुष्प पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। देवताओं को कमल आसन पर दिखाया जाता है। भक्ति मार्ग में देवताओं की महिमा भी है, नयन कमल, चरण कमल, हस्त कमल, मुख कमल, कमल काया आदि। जरूर संगमयुग में देवताओं की आत्मा और शरीर दोनों के प्यूरिफिकेशन का कार्य चला होगा जिसके कारण उनकी यह महिमा भक्ति मार्ग में गाई जाती है। दादी जी की आत्मा पवित्र और पावरफुल तो थी ही लेकिन हमने इन आंखों से प्रैक्टिकल देखा, दादी जी के शरीर के एक एक ऑर्गन के प्यूरिफिकेशन का कार्य चलते हुए। सपूर्ण पवित्रता की परीक्षा को भक्ति मार्ग में कहा हुआ है, "पवित्रता की अग्नि परीक्षा"। ऐसी कठिन अग्नि परीक्षाओं को भी अंदर की शांति को शक्ति और सहनशीलता की शक्ति द्वारा सहज पार करते हुए दादी जी को हमने प्रत्यक्ष देखा। दादी के शरीर के भी बड़े-बड़े पेपर आते हुए हमने प्रैक्टिकल में देखे लेकिन जैसे पिताश्री ब्रह्माबाबा ने किसी को भी अपने कर्मभोग के बारे में पता लगने नहीं दिया, ऐसे दादी जी को भी शरीर में कहीं दर्द या तकलीफ है, ऐसे बोलते हुए हमने कभी नहीं सुना। मेडिकल रिपोर्ट से पता लगता था कि दादी जी को शरीर की कौनसी कौनसी जगह दर्द हो सकता है, तकलीफ हो सकती है लेकिन दादी जी को पूछने पर भी उन्होंने कभी भी अपने शारीरिक कर्मभोग के बारे में नहीं बताया। दादी हमेशा यही जवाब देते थे, बीमारी भी साथ में है और दवाई (योग, बाबा की याद) भी साथ है, प्रयोग करो। ऐसे सहनशक्ति की प्रतिमूर्ति श्रेष्ठ योगिनी थी हमारी गुलज़ार दादी जी।

हर आत्मा को दिल का स्नेह, रिस्पेक्ट और

रिगार्ड देने की कला

दादी जी से कोई भी एक बार भी मिलता था तो उसके दिल में दादी जी के सच्चे दिल के स्नेह की छाप लग जाती थी। ब्राह्मण परिवार तो जानता है दादी जी को इसलिए खिंचा चला आता था लेकिन दुनिया में रहने वाले भी कोई एक बार दादी जी से मिलते थे तो उन्हों को भी दादी जी से रूहानी खिंचावट होती थी। मुंबई गामदेवी में रहते हमने देखा, ब्रह्माकुमारी संस्था के बारे में पूरी जानकारी ना होने के कारण थोड़ा विरोध करने वाले भी, दादी जी के रूहानी वाइब्रेशन से परिवर्तन होकर संस्था के लिए कुछ भी सहयोग देने के लिए तैयार हो जाते थे। दादी जी अपनी रूहानी दृष्टि और मीठी मुस्कराहट द्वारा आत्माओं को ऐसे स्नेह की डोर में बांध देते थे कि मुंबई के बड़े-बड़े हॉस्पिटल के, बड़े-बड़े नामी-ग्रामी डॉक्टर्स, बिना कोई चार्ज के, जब भी जरूरत पड़े दादी जी से मिलने बाबा के घर में ही आते थे। चाहे बड़े हों या छोटे, सबको रेस्पेक्ट और रिगार्ड देने की विशेष कला थी दादी जी में। साथ में रहने वाली छोटी-छोटी बहनों से भी कुछ पूछना हो, कुछ बोलना हो तो दादी जी आप कह कर पुकारते थे। कुछ भी सेवा के लिए बोलना हो तो कहते थे, सुनो, आपके पास अगर टाइम है तो यह कर दोगे।
हमको याद है, एक बार दादी जी के कपड़ों पर प्रेस ठोक से नहीं हुई थी, जगह-जगह पर सिलवटें पड़ रही थी। दादी जी ने कहा, जिसने यह कपड़ा प्रेस किया है उसको बुलाओ। दादी जी ने उस व्यक्ति को पूछा, ये कपड़े आपने प्रेस किये है और साथ में जो दोदी थे, उनसे कहा, इनके लिए वी.आई.पी. टोली लेकर आओ। प्यार भरी दृष्टि देकर मुस्कराते हुए उसको टोली खिलायी। इतने में ही उसने समझ लिया कि आगे से उसको कपड़े कैसे प्रेस करने है। वह गलती उसने दोहरायी नहीं। दादीजी अपने रूहानी स्नेह से कैसी भी आत्मा को परिवर्तन कर देते थे।
दादी जी जब स्वास्थ्य लाभ हेतु मुंबई स्थित गामदेवी बाबा के घर में रहने लगे तब एक दिन दादी जी से मिलने के लिए परम आदरणीय जानकी दादी जी आ गए थे। वह दृश्य हमें अभी भी मस्तिष्क में स्पष्ट है। दादी जी के शरीर में कमजारी बहुत थी खुद खड़ी भी नहीं हो पाती थी। व्हील चेयर में थी। जब दादी जी ने जानकी दादी जी को दरवाजे से आते हुए देखा तो बार-बार हाथ के बल खड़े होने की कोशिश कर रही थी। खड़ी नहीं हो पा रही थी लेकिन बार-बार कोशिश कर रही थी। इतना स्नेह और रिगार्ड भरा यह दृश्य हम जब साक्षी हो देख रहे थे तब मन में एक गीत बज रहा था, जिसकी रचना इतनी सुंदर वह कितना सुंदर होगा। सचमुच, हमारी दादी जी मीठे रचता की अति मीठी और अद्भुत रचना थे।

बिना एनएसथीसिया दादी जी की सेवा

अव्यक्त होने के कुछ साल पहले से ही दादी जी इस लोक में कम, वतन में ज्यादा रहती थी। दादी जी अपनी देह और दुनिया से बिल्कुल न्यारी थी। शरीर में क्या हो रहा है, कौन शरीर में क्या कर रहा है। कुछ भी दादी जी को ज्ञान ही नहीं होता था। हमें याद है, एक बार दादी जी की छोटी सर्जरी करनी पड़ी थी, घर में डॉक्टर आए थे, सर्जरी होने से पहले हम बहनें दादी जी को सर्जरी की विधि (प्रोसिजर) बताते थे और कहते थे, दादी इस सेवा के लिए 15 मिनट लगेंगे, आप 15 मिनट बाबा के पास चले जाना। वे 15 मिनट जब डॉक्टर अपना काम कर रहे होते थे, दादी जी अशरीरी हो जाते थे। बिना एनएसथीसिया दादी जी की सेवा चल रही होती थी लेकिन दादी जी को थोड़ा भी उसका अनुभव नहीं होता था, हाथ की उंगली तक भी नहीं हिलती थी। पन्द्रह मिनट के बाद जब सेवा पूरी हो जाती थी तो दादी जी हमें पूछते थे, हो गया ऑपरेशन ? अपनी देह से सेकंड में न्यारी हो जाती थी दादी जी।

हमे अनुभव हुआ, दादी जी का नाश्ता, भोजन, क्लासेज भी वतन में ही होती थी

दादी जी का सवेरे का नाश्ता कुछ समय से बंद था। हमने ऐसे ही दादी जी से पूछा, दादी, आपने नाश्ता किया? दादी जी ने हां बोला। फिर हमने पूछा दादी जी, आपने क्या खाया और कहा नाश्ता किया? दादी जी ने जवाब दिया, नाश्ता ऊपर किया, पराठा खाया, मीठे के साथ, दादी जी ने यह बात स्पष्ट कही। हम सब दादी जी को रोज मुरली सुनाते थे। एक दिन देर हो गई थी, हमने मुरली नहीं सुनायी थी। ऐसे ही हमने दादी जी से पूछा, दादी, आज आपने मुरली सुनी? दादी जी ने हां बोला। हमने सोचा, शायद किसी ने सुनायी होगी। फिर दादी जी ने कहा, ऊपर सुनी, वहां की मुरली अलग होती है। एक बार हम दादी जी को फिजियो कसरत करा रहे थे। दादी जी ने हम बहनों को दृष्टि देते हुए मुस्कराकर कहा, वतन में आप सब के फरिश्ते रूप है। बाबा, दादी के माध्यम द्वारा हमारा भी ध्यान रखते थे। बहुत सारी वरिष्ठ दीदियां और भाई, दादी जी से मिलने आते थे। दादी जी और हमें देख कर कहते थे, ऐसा अनुभव हो रहा है, बापदादा और बापदादा के साथ में फरिश्ते बैठे हुए हैं। दादी जी की अव्यक्त स्थिति इतनी पावरफुल होती थी, हम जो साथ में होते थे उनको भी सहज ही अव्यक्त स्थिति का अनुभव करा देते थे।

दादी जी के साथ का वह अंतिम क्षण

ग्यारह मार्च 2021 शिवरात्रि का पावन दिन, जिस मुस्लिम हॉस्पिटल में दादी जी का कमरा था। उनका भी यह दिन बहुत ही पुण्य का दिन था, सवेरे के 10:30 बजने से कुछ समय पहले का दृश्य ऐसा था -
हम साक्षी होकर वह दृश्य देख रहे थे, आई.सी.यू. खटिया पर गहरी शान्ति और विश्राम की अवस्था में लेटे हुए हमने दादी जी को अनुभव किया। आई.सी.यू. के मॉनिटर की आवाज आ रही थी, सिर्फ कुछ वरिष्ठ दादियां और डॉक्टर ही दादी जी के साथ में खड़े थे। आदरणीय नीलू दीदी जी और तारा दीदी जी के नयनों से दादी जी के प्रति स्नेह भरे मोती नहीं रुक रहे थे। हमारा एक हाथ दादी जी के चेहरे पर था। अचानक से जैसे वापदादा की, दादी जी के तन में पधरामणि होने पर छोटा सा झटका लगता था, वैसे ही एक झटके में दादी जी ने जोर से आंखें बंद कर ली। फिर आंखे थोड़ी खुली फिर से 8-10 सेकंड के बाद दादी जी ने उसी तरीके से आंखें बंद कर ली। उसके पश्चात् मॉनिटर में हर जगह पैरामीटर्स जीरो आने लगे।
यह जो 8-10 सेकंड का समय था, उस में जो भी एक दूसरे से बात कर रहे थे, चुप हो गए, कमरे में सन्नाटा छा गया, दीदियों के स्नेह भरे मोती भी रुकने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शांति के सागर बाप और दादा दोनों ने दादी जी के तन में प्रवेश किया है और सारा कमरा ही शांतिधाम बन गया है। हमें अनुभव हुआ कि बाबा खुद आए और अपनी किरणों रूपी गोदी में दादी जी को बिठाकर साथ में ले कर चले गए। उस समय जो भी वहा पर थे सभी ने अपने अंदर एक अनोखी शक्ति अनुभव की। दादी जी न जाते जाते आदरणीय नीलू दीदी जी, तारा दीदी जी जो बहुत समय से दादी जी के साथ रह उनका भी इस स्थूल वियोग के समय को पार करने की शक्तिया प्रदान की। दादी जी ने हम सभी में भी शक्ति भरकर उस क्षण को सहज पार कराया।
दादी जी के साथ बिताए हुए थोड़े से समय के भी दिल में अनुभव संग्रह बहुत है, कुछ शब्दों में उनको स्पष्ट नहीं किया जा सकता। अभी भी ऐसा अनुभव होता है, दादी जी वतन से हम सबको देख रहे है और वतन में जाते है, तो उन्हें बिल्कुल वही प्यार भरी रूहानी दृष्टि और मुस्कराहट देते हुए अनुभव करते हैं। यह सत्य है, दादी जी स्थूल में हमारे साथ नहीं है लेकिन सूक्ष्म रूप में उनके वरदानी हाथ और साथ का अनुभव अभी भी हम सबको होता है।

दादीजी की सूरत और सीरतसे बापदादाका अनुभव होता था

ब्रह्माकुमारी पार्वती बहन, सम्बलपुर
मैं सन् 1970 में दिल्ली, पाण्डव भवन में परम आदरणीय दादी गुलज़ार जी के सम्पर्क में आई। लौकिक बड़े भाई (राव भाई) तब दिल्ली में रहते थे, उनके साथ में हमारा दादी जी के पास आना-जाना लगा रहता था अतः दादी जी से समीप से मिलने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त होता रहता था। दादी की पावरफुल दृष्टि ने मुझे हिम्मत एवं अलौकिक शक्तियों से भर दिया। दादी जी के मुख से निसृत अमृतवाणी मुझ आत्मा के दिल को छू जाती थी। दादी जी ने हमेशा मुझे पुरुषार्थ में तीव्रता लाने की एवं एकरस स्थिति बनाने की प्रेरणा दी। मुझमें वो उमंग उत्साह भरा जो मै आज तक अपने अन्दर अनुभव करती हूं। दादी जी बहुत छोटे छोटे उदाहरण दे कर ज्ञान को इतना सरल रीति में समझाती थी जो कोई भी आत्मा सहज परिवर्तन हो जाती थी। दादी जी के संपर्क में आते ही कोई भी न्यारी-प्यारी स्थिति का अनुभव कर सकता था। दादी जी बोलती थी तो ऐसा लगता था, बापदादा बोल रहे हैं। उनकी सूरत और सीरत से सदा बापदादा का अनुभव होता था। वे सदा अंतर्मुखी, गम्भीर और साथ-साथ रमणीक भी रहती थी।
एक बार मैने दादी जी से पूछा कि दादी जी, हम ऐसा क्या पुरुषार्थ करें जो स्थिति सदा एकरस रहे? तो दादी जी ने बड़ी ही सहजता से उत्तर दिया कि अपने वास्तविक बिन्दु स्वरूप में स्थित रह बिन्दु बाप को याद करने और हर बात में बिन्दु लगाने से हमारी अवस्था एकरस रहेगी। दादी जी की शिक्षायें आज भी हमें मुश्किल परिस्थितियों में राह दिखाती है।
सन् 2004 में आदरणीय दादी जी का शुभ आगमन सम्बलपुर भूमि में हुआ और यह धरती पावन-पावन हो गई। यहा की 16 बहनों का समर्पण समारोह दादी जी के हाथों संपन्न हुआ तथा डेढ़ लाख भाई-बहनों की सभा को दादी जी ने अपने आशीर्वचनों से निहाल कर दिया। दादी जी ने यहां के रिट्रीट सेण्टर पावन सरोवर का शिलान्यास कर ढेर सारे वरदान भी दिये। उन अविस्मरणीय लम्हों को याद करते हम सम्बलपुर सबजोन के सर्व भाई-बहने मीठी-प्यारी दादी मां के सदा कृतज्ञ रहेंगे।

दादी ने वरदान दिया, बाबा हमेशा आपके अंग-संग है

ब्रह्माकुमारी अंजली बहन, बहादुरगढ़
सन् 1993 में मैं पहली बार दिल्ली आई थी और तीन महीने दिल्ली, पांडव भवन ही रही थी। मैं देखती थी, दादी जी का मधुबन और सेवाओं में आना-जाना लगा रहता था लेकिन जब वे पांडव भवन में होती थी तो पता भी नही चलता था कि दादी सेंटर पर है। इतनी शांति से वे वहां पर रहतो थी।

छोटी-छोटी बातों पर ध्यान

जब दिल्ली में, पांडव भवन में रहते हुए 10, 15 दिन ही हुए थे, तब दादी ने मुझे पूछा, भोजन अच्छा लगता है? मैं कर्नाटक से थी और कुछ बहने उत्तर भारत से थी, तो दादी को पता नहीं चलता था कि भोजन इनको अच्छा लगता है या नहीं। यज्ञ में जो भोजन बनता था, सब वही खाते थे लेकिन फिर भी दादी विशेष ध्यान रखती थी, बोलती थी, किसी को भी कुछ भी चाहिए, जैसे, साबुन, तेल, आदि तो स्टॉक वाली बहन से बोल कर लेना। दादी जी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान रखती थी कि किसी का व्यर्थ संकल्प न चले, बाबा की याद में विघ्न न पड़े।

सादगी और सरलता

दादी जी में सादगी और सरलता बहुत ज्यादा थी। जब भी हम दादी जी से मिलने जाते थे, चाहे मधुबन या दिल्ली में, अगर दादी जी चाय पी रही होती तो हमें भी कहती थी कि 'आओ, सब चाय पी लो।' कई बार ऐसा सौभाग्य मिला, हमने दादी जी के साथ चाय पी। दादी जी को कभी भान नहीं होता था कि मैं बड़ी हूं, बाबा का रथ हूं। हां, दादी जी स्वमान में हमेशा रहती थी।

हर परिस्थिति में सहज

जब बहादुरगढ़ में सेक्टर 2 का सेंटर बन रहा था तब से ही हम दादी जी को बोलते थे कि दादी जी, आपको ही इसका उद्‌द्घाटन करना है। सुंदर तारीख 13 जुलाई, 2013 दादी जी ने हमें दी थी। नीचे हॉल में, जिसमें रोज मुरली चलती थी, वहां हमने दादी जी के बैठने की व्यवस्था की थी क्योंकि दादी जी ऊपर हॉल में जाने वाले नहीं थे। नील बहन को संकल्प आया कि मै दृष्टि देकर आऊ, देखू मिलू भाई-बहनों से। जब वह ऊपर हॉल में गई तो उनको अच्छा लगा, वाइब्रेशन पावरफुल थे। तब नीलूबहन ने कहा, दादी ऊपर जाएगी। सभी भाई-बहनों की खींच इतनी थी कि दादी ऊपर हॉल में पहुंच गई। वहां लिफ्ट नहीं थी। दादी जो को कुर्सी पर बिठाकर, भ्रातागण कुर्सी को उठाकर दादी जी को हॉल तक ले गए। दादी जी की खासियत यह थी कि हर परिस्थिति में सहज रहती थी और साक्षीद्रष्टा होकर हर कार्य में सहयोग देती थी। जहा बाबा के रथ का प्रोग्राम घंटे का था वहीं पर वह प्रोग्राम 4घंटे चला, हमारा दिल भी बाबा ने पूरा कर दिया।
दादी जी हमेशा कहती थी कि 'सहज रूप में विश्वास किसी पर भी नहीं करना क्योंकि हरेक का अपना पुरुषार्थ होता है। हम सोचते हैं कि जैसे हम हैं, और भी हमारे जैसे होंगे। सबको आगे जरूर बढ़ाना है परंतु साक्षीद्रष्टा बन करके।'

वरदानी हाथ

दिल्ली जोन में एक ऐसा सेंटर था जिसमें बहुत प्रॉब्लम थी। प्रॉब्लम का समाधान यह था कि कोई बहन वहीं रहकर समाधान निकाले। कुछ बहनें गई भी थी परंतु वहां के भाई-बहन बाहर के बहनों को टिकने नहीं देते थे। परेशान करके उनको वापस जाने पर मजबूर कर देते थे। दादी जी व आशा दीदी जी का कहना था कि आप वहां पर रहो। शुरू से ही मेरा संस्कार है, जो बड़ों ने कहा,वह मानना है। इससे जो असंभव कार्य था, वह संभव हुआ। भले कोर्ट का केस भी था परंतु बाबा ने हर जगह सहयोग दिया था। जब मैं आशा दीदी जी के साथ दादी जी से मिलने गई तो आशा दीदी जी ने दादी जी को पूरी बात बताई। तब दादी जी ने मेरे सर पर हाथ रखा और वरदान दिया कि 'हमेशा बाबा आपके अंग-संग है। वह वाइब्रेशन और दादी जी का वह वरदानी हाथ मुझे सदा महसूस होता ।

बाबा ने अपने रथ की सुरक्षा की

बहुत पुरानी बात है, दादी जी का एक सेंटर पर भट्टी में आना हुआ था। दादी जी को आदत थी भोजन के बाद पापड खाने की, तो रेडीमेड पापड़ का एक पैकेट लाया गया था। दादी के साथ जो टीम जाती है उसमें जो भोजन का ध्यान रखता है, उस भाई ने कहा, 'पापड़ का पैकेट दिखाना।' अभी पापड़ भुन ही रहे थे कि उस भाई ने देखा, पैकेट पर लहसुन लिखा हुआ था। उस समय बाबा ने अपने रथ की सुरक्षा की।सदा खुश रहने का उदाहरण दादी जी में साक्षात् देखा

ब्रह्माकुमारी सरिता बहन, फिरोजाबाद (उ.प्र.)

हम सबकी अति प्यारी, अव्यक्त पालना करने वाली, सबको आगे बढ़ाने वाली आदरणीय दादी गुलजार जी को जब भी मिलने जाते थे तब-तब दादी जो एक बात अवश्य ही कहती थी कि सदा खुश रहना। चाहे कुछ भी हो जाये लेकिन खुशी न जाये, ये बात मुझे सदा याद रहती है।
एक बार दादी जी का आगमन फ़िरोज़ाबाद में हुआ था। उस समय दादी जी को आगरा में टैफिक जाम में लगभग तीन घण्टे रुकना पड़ा। मुझ ऐसा लग रहा था कि पता नहीं दादी जी को क्या फिल हो रहा होगा, उनके साथ वाले कहीं नाराज़ न हो और मैं कैसे उनके सामने जाऊँगी, ऐसे बहुत सारे विचार चल रहे थे। लेकिन जब वे आये तो, जो दादी जी कहती थी कि सदा खुश रहना, कभी खुशी न जाये, यह उदाहरण साक्षात् देखा। दादी जी इतनी हल्की थी कि चेहरे पर एक भी थकावट का चिन्ह नहीं था। दादी इतनी खुश और फ्रेश थी जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो। उनके साथ वाले भी सब लाइट थे। तबसे मैने दादी जी से सीखा कि हर परिस्थिति में कैसे हल्के रहे। साथ-साथ दादी जी ने मुझे वरदान दिया कि तुम बहुत-बहुत स्नेही हो, स्नेह से सबको चलाते, आगे बढ़ाते रहना। प्यारी दादी का यह वरदान मेरे बहुत काम आ रहा है। सबको स्नेह से चलाने से, सबके तन-मन-धन का सहयोग मुझे बिना कुछ कहे ही मिलता रहता है।
दादी जानकी जी के अव्यक्त हो जाने के बाद, दादी जी के शक्ति स्तंभ के लिए मणि फिरोजाबाद से बनकर गई। उसके बाद जब बाबा का रथ गुलज़ार दादी जी अव्यक्त हुई तब अव्यक्त लोक बनना शुरू हुआ। हमारा संकल्प उठा कि अव्यक्त लोक के लिए भी मणि यहीं से जाये। फिर हमने संकल्प किया कि दादी जी, अर्जी हमारी और मर्जी आपकी। दादी जी ने हमारी अर्जी सुन ली और मणि फिरोजाबाद से बनकर गयी। ये हमारे लिए गौरव की बात है। हमें आज भी लगता है कि दादी जी हमारे साथ है। ऐसा ही अनुभव आपका भी होगा।

दादी का प्यार देखकर माताओं के नयन गीले हो गए

ब्रह्माकुमारी विनीता बहन, बहादुरगढ़ (हरियाणा)
मधुबन में सन् 1996 में डायमंड जुबली का प्रोग्राम चल रहा था। बहादुरगढ़ से 40 के करीब सेवाधारी भाई-बहनें मधुबन में आए थे और दादी से मिलने का टाइम लिया गया था। सेवाधारियों के इंचार्ज ने, सेवा होने के कारण दादी से मिलने के लिए मना किया। दादी जी सही टाइम पर शांतिवन में दादी मीटिंग हॉल में पधार गये। दादी जी को पता चला कि सब नहीं आए हैं क्योंकि सेवा का समय था। दादी जी ने कहा कि 'चलो भंडारे में चलते है।' मेरे हाथ में टोली का डिब्बा पकड़ाया, मुझे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठाया और खुद पीछे वाली सीट पर बैठे। दादी भंडारे में गई और सबको बड़े प्यार से टोली देकर आई। माताओं के तो नयन गीले हो गए थे। ऐसा सीन था वह कि आज दिन तक भूल नहीं पाती हूं। ऐसी थी हमारी प्यारी गुलज़ार दादी जी। सबका इतना ध्यान रखती थी।

दिल सदा हल्का रखो

बात 25 साल पहले की है, दादी शांतिवन में थे और मैने एक, दो बार फोन किया। उस समय लैंडलाइन फोन होते थे। काँटेज में किसी भाई ने फोन उठाया। दादी जी कहीं मीटिंग में गई हुई थी तो बात नहीं हो पा रही थी। दिन में 2:30 बजे दादी का फोन आया। मैं तो सो चुकी थी लेकिन दादी की आवाज सुनकर मुझे लगा कि दादी जी हमारा कितना ध्यान रखती है। फिर जो प्रॉब्लम थी वह मैने दादी जी को बताई, दादी जी ने बहुत प्यार से समझाया कि 'दिलशिकस्त नहीं होना है, खुश रहना है, बाबा बैठा है, बड़े बैठे हैं, दिल सदा हल्का रखो और जो भी बात हो, दादी को आकर बताओ।' तो दादी इतना ध्यान हर बात का रखते थे।

सेवाधारियों का ख्याल

एक बार मैं शांतिवन में थी और दिन में दादी की सेवा में जाती थी। पांव में तेल लगाना, सिर में तेल लगाना, बड़ों की ऐसी सेवा करना मुझे अच्छा लगता था। दादी रोज कहती थी, 'सोने का टाइम होता है। इस समय मत आया करो। मैंने बोला, दादी जी मै पहले सो लेती हूँ। आप निश्चिंत रहो। एक बार दादी जी ने बड़े प्यार से पूछा, 'किचन में अनार रखे हैं आपके सेवाधारी खा लेंगे ? मैने कहा, 'दादी खा क्या लेंगे वे तो गद्गद हो जाएगे आपके दिए हुए अनार लेकर दादी जी खुद उठकर किचन में गई, मुझे अनार डालकर दिए और बोला, सब सेवाधारियों को खिलाना। इतना दादी जी को सबका ख्याल रहता था।

दादी जी की पालना और प्यार

एक बार में दादी जी से मिलने दिल्ली, पांडव भवन गई। दादी जी ने पूछा, 'भोजन किया?' मैंने कहा, 'नहीं दादी जी, पेट गड़बड़ है।' दादी जी एक कटोरी में अनार लेकर के आई, बोली, 'ये खाओ, ये औषधि का काम करेंगे।' आज भी दादी जी की पालना और प्यार याद आता है। पहली बार जब मैं दादी जी से अपनी फाइल में हस्ताक्षर लेने गई तो दादी जी अपने बाल धुलाई करके, खोल करके बैठी हुई थी। मैंने कहा, दादी जी तेल लगा दूं? दादी जी ने कहा कि 'तुमको आता है तेल लगाना?' मैने कहा, हां दादी जी, आता है। बहुत प्यार से दादी जी ने तेल लगवाया। वे सब दिन आज भी याद आते हैं।
मैंने बचपन से ही दादी जी को देखा है। कहते हैं, फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन। दादी जी का वह इंप्रेशन दिमाग में रच-बस गया है। ऐसी प्यारी दादी को शत-शत नमन है।

आज भी दादी जी हर पल साथ हैं

ब्रह्माकुमारी मोनिका (मणि), मौजपुर, दिल्ली
'मुझे गम नहीं कि मैं गरीब हूँ, मुझे खुशी नहीं कि मैं अमीर हूँ। हर खुशी से बढ़ कर यह खुशी है मुझे कि मैं दादी जी के करीब हूँ। दादी जी मुझे अपने साथ कहीं घुमाने ले जा रहे थे, तब दादो जी ने कहा कि कुछ सुनाओ, तब मैंने ये पंक्तिया सुनाई थी।

दादी जी की शक्तियों से हुई पालना

सन् 1998 से दादी जी की मुझ पर नजर पड गई थी। दादो जी के लिए मैं जैसे एक राजकमारी की तरह थी। दादी जो का प्यार, दुलार, उनका सानिध्य मुझे भरपूर प्राप्त हुआ है। दादी जो की शक्तियों से मेरी पालना हई है। दादी जी को जब भी कहीं सवा के लिए जरूरत पड़ती थी, तुरंत मुझे भेज दिया करते थे। इसलिए दिल्ली पाण्डव भवन में सब कहते थे। इस चिडिया ने अब कहाँ के लिए उडान भरी है। सेवा पर भेजने के बाद दादी जी हर दिन फोन पर सब समाचार लिया करते थे। यहाँ तक कि हमारा पर्सनल भी बहुत ध्यान रखते थे। पूछते थे खाना समय पर खाया, मन लग रहा है, स्वास्थ्य का ध्यान रखना। दादी जी को मुझ पर बहुत विश्वास था।

दादी जी का विशाल दिल

एक बार मेरी तबियत खराब हो गई थी, लम्बे समय तक इलाज चलना था। किसी बहन ने दादी जी से कहा, दादी जी, इसे घर भेज दो। दादी जी को उस बहन की बात अच्छी नहीं लगी। दादीजी ने कहा कि जब यह सेवा के लिए यहां है तो इलाज भी यज्ञ से ही होगा, घर नहीं जाना है।

प्यार की देवी दादी माँ

दादी जी हर साल हम बहनों को बुलाकर और फिर एक-एक बहन को अलग बुलाकर बहुत प्यार दुलार देकर राखी बांधते थे, हर एक को यही महसूस कराते थे कि दादी सिर्फ आपकी है। दादी जी प्रेम से भरपूर गंगा थी। एक बार मेरी आँखों में दुख के आँसू आ गए थे, तो दादी जी ने खड़े होकर खुद अपने हाथों से मेरे आँसू पोंछते हुए कहा कि अब आपकी आँखों में कभी भी आँसू नहीं होने चाहिएँ। मैंने दादी जी का भरपूर प्यार प्राप्त किया है, जैसे कि मैं उनकी अपनी ही बेटी हूँ, यह मेरा परम सौभाग्य रहा है। आज भी दादी जी हर पल मेरे साथ हैं।

धरती पर फ़रिश्ता थीं दादी गुलज़ार

ब्रह्माकुमार दिलीप राजकुले, ओमशान्ति मिडिया, शांतिवन

मधुबन पावन भूमि पर आने को ललक, उस महान सौभाग्यशाली रथ को देखने की चाहना और परमपिता परमात्मा मनुष्य तन में कैसे साकार होते हैं, इसका अनुभव करने के लिए मैं पहाड़ियों में बसे मधुबन में पहुँचा। यह लगभग 35 साल पुरानी बात है, इसे याद करने से मन प्रसत्र होकर उमंग से, सात्विक विचारों से भरपूर हो जाता है। मधुबन में मुरली क्लास खत्म हुए कुछ ही समय हआ था। सूरज को कोमल किरण मधुबन के आंगन को सुशोभित कर रही थी। आंगन में ही दादी गुलज़ार एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे थे, खुले बाल और धूप ले रहे थे। पहली नज़र पड़ते ही मैं गद्रद् हो गया। दादी जी की आँखें अलौकिक आभा लिए हुए थीं, चेहरा जैसे कि पूरा खिला हुआ गुलाब, ऐसा गुलाब तो कभी जिंदगी में देखा ही नहीं। एक चैतन्य आभास मंद-मंद अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था। मुझे आनंद की अनुभूति होने लगी और स्वयं को हल्का महसूस करने लगा जैसे कि मैं फरिश्ता हूँ। दादी जी को देखने के बाद ऐसा लगा कि एक निर्विकार, मासूम, सतोप्रधान सम्पूर्ण फरिश्ता बैठा हुआ है। यह समय कुछ ही पल का था लेकिन अनमोल था। यह अनुभव इतना गहरा और सात्विक था जिसे लिखना इतना आसान नहीं है परंतु फिर भी कोशिश करके लिख रहा हूँ। ऐसे महान अनुभव अगर थोड़े भी किसी को सुना देते हैं तो सुनने वाले भी खो जाते हैं। मेरे ये नैन उस दिन धन्य हो गये। साकार रथ को देखते ही परमपिता परमात्मा की छवि को निहारने का सौभाग्य मिला। यह थी मधुबन में पहली दृष्टि में ही दादी जी से अनमोल मुलाकात। दादी जी अधिकतर दृष्टि से ही मुलाकात कर सम्पूर्णता की झलक दिखा देती थीं।

लाइट का अनुभव

जब मधुबन आ रहे थे तब मुझे कहा गया था कि दादी, दिल्ली से आयेगी, फिर बाबा आयेगा लेकिन दादी जी तो मधुबन में ही बसती हैं। ऐसा सुंदर आभास मुझे हुआ। वे सुहाने पल याद करने मात्र से ही रोमाच खड़े हो जाते हैं। दादी जी को देखने से शरीर का नहीं परंतु लाइट का अनुभव होता था।

दादी जी के करकमलों से वरदान और टोली मिली

एक बार मुम्बई में, एक छोटी-सी गीता पाठशाला का उद्‌घाटन करने दादी जी आई थी, तब मुझे भी सौभाग्य मिला दादो जी को गुलाब का पुष्प देकर स्वागत करने का और स्वागत गीत गाने का। मैंने उनके बहुत ही नज़दीक बैठकर गीत गाया और उनके करकमलों से गुलाब का फूल पाया। दादी जी के नैनों में बाबा बसता था, दादी जी के करकमलों से वरदान और टोली मिली, जो साधारण नहीं थी। आज याद करने से महसूस होता है कि वो दिन कितने प्यारे थे, अनमोल व महान थे। शांतिवन में भी एक बार मीडिया कॉफ्रेंस के दौरान अलग-अलग स्टॉल बने हुए थे। मैं ओमशांति मीडिया पत्रिका के स्टॉल पर सेवा दे रहा था, तब उस स्टॉल पर दादी जी आई और मुझसे अच्छी तरह से जानकारी ली कि यह पत्रिका किस तरह से छपती है और लोगों तक इतने सुंदर लेख किस तरह पहुँचते हैं। दादी जी ने बहुत ही धीरज से सब कुछ सुना। तब भी मेरे मन में था कि मेरे साथ में जो भी खड़े हैं, नज़दीक आ जायें और दादी जी के सानिध्य का अनुभव करें। ऐसा अनमोल मौका मैने तो पाया ही परंतु दूसरों को भी इससे लाभान्वित होने का मौका दिया।

दादी जी के महावाक्य

दादी जी के कुछ महावाक्य मुझे बहुत ही काम आये है पहला, दादी कहा करती थीं कि बाबा कहते थे। तुम मेरे ठाकुर बच्चे हो तुम्हारी पूजा अब तक विधिपूर्वक चल रही है। दूसरा कोई क्रोध करता है तो आप फूल बरसाओ अर्थात् मुस्करा दो इसमें कोई खर्च नहीं लगता, तुम शांति में रहो। तीसरा, माया आई, अरे! माया आई नहीं, तुमने उसको बिठाया, नाश्ता दिया, तब तो आई, तुमने खातिरी की, तब तो बैठ गई। चौथी बात, जो चीज़ हमारी नहीं, उसे सुने ही क्यों अर्थात् जो मेरे काम की नहीं उसे अपने अंदर लें ही क्यों? पाँचवी बात, छोटे बच्चे जैसे गुल्लक में पैसे डालते हैं और बचत करते हैं वैसे अपने सूक्ष्म खज़ानों अर्थात् संकल्प, वाणी की भी बचत करो। ऐसे-ऐसे दादी जी के महावाक्य महान बनने में मुझे बहुत सहायक रहे।

तुम्हारी याद बहुत आती है

मेरी तमन्ना थी कि कलश स्थापना के दिन दादी जी को पुष्प अर्पित करूं। सच में उस दिन सात-आठ फुट गहरे कलश स्थल पर, कलश स्थापित हुआ और कलश को लपेटे हुए गुलाब के हार के बीचों-बीच मेरा फूल कलश के ऊपर अर्पित हुआ। अब इस शब्दांजलि से कि तुम 'बाबा वाली दादी' हो, जब भी बाबा मिलन का दिन आता है, तुम्हारी याद बहुत आती है। ऐसे साक्षी भाव लिए हुए, दादी को दिल की गहराई से कोटि-कोटि श्रद्धांजलि, पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ।

दादी को हमेशा शिव-शक्ति कम्बाइण्ड स्वरूप में देखा

ब्रह्माकुमार जयप्रकाश, साइटसीन विभाग, शांतिवन
फरवरी, 2010 में बाबा का ज्ञान मिलने के बाद फरवरी, 2011 में में पहली बार बाबा-मिलन के लिए शान्तिवन आया और बाबा-मिलन करके शान्तिवन में सेवार्थ रुक गया। मेरे साथ और भी दो भाई सेवा में रुके हुए थे। हम तीन में से मेरी और श्याम भाई की टोली कीचन में सेवा थी तथा प्रवीण भाई की ट्रांसलेशन डिपार्टमेंट में। ट्रांसलेशन डिपार्टमेंट की सेवा होने की वजह से प्रवीण भाई को क्लास कराने आती दादियों से हमेशा मिलने का मौका मिलता ।दादियों के हाथ की टोली तथा दादियों की दृष्टि से तृप्त होकर अपना अनुभव सुनाया करते थे। मेरे साथ जो भाई टोली कीचन में सेवा करता था वो बाबा मिलन के दिन ज्ञान में पुराना होने से आगे की पंक्तियों में जाकर बैठ जाता था। उसका भी दादी से तथा बापदादा से बड़े नजदीक से मिलना हो जाता था। ये प्रक्रिया कुछ दिन तो है जम हो गई लेकिन कुछ दिनों बाद मुझे ईर्ष्या-सी होने लगी कि मैं ही क्यों नही मिल पा रहा? मैं ज्ञान में नया था तो वो दोनों भाई मुझे कुछ - कुल अनुभव सुनाते रहते थे जिससे कि भगवान पर मेरा विश्वास पक्का हो जाए। लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये संकल्प मुझे अन्दर ही अन्दर खाये जा रहा है कि मैं ही क्यों नहीं मिल पा रहा। खासकर गुलजार दादी जिससे हमेशा मुझे माँ जैसी भासना आती थी लेकिन कभी सामने से मुलाकात नहीं हो पा रही थी।

बाबा के साथ बातचीत

एक रात में कॉन्फ्रेंस हॉल के पार्क में एकान्त में बैठकर योग कर रहा था। तभी मेरे और बाबा के साथ बातचीत के दौरान मैने कहा कि बाबा, अनुभव तो हमने बहुत सुने और मुझे आप पर निश्चय भी अटूट है लेकिन मैं एक बार दादी से सामने से मिलना चाहता हूँ, उस बाप समान स्थिति को मैं समीप से अनुभव करना चाहता हूँ। दादी को दूर से देखकर जिस ममत्व की अनुभूति होती है, उस ममतामयी माँ की ममता को मैं करीब से अनुभव करना चाहता हूँ। बड़े भाव-विभोर होकर ये वार्ता बाबा के साथ हो रही थी। उस दिन दिल की आवाज सुनकर बाबा ने जैसे तथास्तु कह दिया।

दादी का दृष्टि-दुलार

रात के 10 बजे और मै उठकर कमरे की ओर चल दिया। डायमण्ड हॉल के आगे से गुजर रहा था तभी सामने से गुलजार दादी आ गई। मुझे बडा आश्चर्य हुआ। दादी 4 से 5 मिनट तक मेरे सामने और मेरे समीप खड़ी रही और अपनी पॉवरफुल दृष्टि से निहाल करती रही। उस समय ऐसे लग रहा था जैसे सबकुछ थम गया हो, केवल मैं और सामने दादी। मुझे अपने अन्दर एक अजीब-सी की अनुभूति हो रही थी। मैं भाव-विभोर हो रहा था, मेरी आँखों से प्यार के अश्रु निकल आए। इतने समय तक दादी को किसी ने नहीं टोका कि दादी चलो। दृष्टि-दुलार के बाद दादी ने ओम शान्ति कहा और मुझे देखते हुए आगे बढ़ गई। ये मिलन केवल मिलन नहीं था बल्कि ये वो यादगार पल थे जिन्होंने कई संशयों को मिटाकर एक नया उत्साह भर दिया।

माँ भवानी निकली शेर पर सवार होकर

मैने जाकर भाइयों को बताया कि मेरे साथ ऐसा हुआ तो उन्होंने कहा कि दादी रात्रि सैर पर निकली होगी। मैंने कहा, दादी रात्रि सैर पर नहीं बल्कि माँ भवानी अपने शेर पर सवार होकर निकली थी अपने बच्चे से मिलने और मुझमें असीम शक्ति भरने और अब दुनिया की कोई ऐसी शक्ति नहीं जो भगवान पर से मेरे निश्चय को डगमगा सके। दादी से हमेशा ऐसे लगता था कि वो दादी नहीं बल्कि बाबा ही है। दादी हमेशा शिव-शक्ति कम्बाइण्ड स्वरूप में स्थित रहती थी।

दादी ने कहा, मुरली मेरा भोजन, मेरी सुरक्षा, मेरी जान है

ब्रह्माकुमार मुरुगन भाई, शांतिवन
दादी गुलज़ार जी के पास मैने सन् 1994 से सन् 2021 तक गाड़ी चलाने की सेवा की। दादी गुलज़ार जी की दूरदृष्टि थी, जो उन्होंने मुझे अपने पास सेवा के योग्य समझा। मैं पांडव भवन में सन् 1984 से साहित्य के स्टाल पर सेवा में मदुरई (तमिलनाडु) से हर साल आता था। सन् 1992 में एक बार दादी जी को अहमदाबाद जाना था, तब उनकी गाड़ी चलाने के लिए मुझे बुलाया गया। मै दादी जी के साथ चल पड़ा। अहमदाबाद से दादी जी दिल्ली चली गई। फिर जब वापस मधुबन आई तब दादों जी ने मुझसे पूछा, 'हम दिल्ली से मधुबन में गाडी ले आएंगे, तो क्या आप उसे संभालेंगे ?' उस समय मैने हा या ना कुछ नहीं कहा क्योंकि तब मैं तमिलनाडु के एक सेंटर के निमित्त था। फिर दादी दिल्ली चली गई। वापस मधुबन आने के बाद दादी ने फिर से मुझसे पूछा, 'क्या विचार है, दादी चाहती है कि तुम दादी की गाड़ी चलाओ।' उस समय भी मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि अपनी निमित्त बहन से स्वीकृति नहीं ली थी। फिर एक महीने के बाद दादी जी ने कहा, 'तुम्हारे मन में जो विचार चल रहा है, वह दादी जानती है। कुछ भी बात है तो दादी जी के कान में डाल दो, दादी संभाल लेगी, ज्यादा सोचो नहीं।' इसके बाद 1994 से मैंने स्वीकृति दे दी क्योंकि मेरी निमित्त बहन से मुझे छुट्टी मिल गई थी।

मुरली से बहुत प्यार

दादी जी को मुरली से बहुत प्यार था। एक बार हम दादी जी को लेकर अहमदाबाद जा रहे थे, दादी जी गाड़ी में बैठ गई थी। उस समय दादी जी ने मुझे कहा, 'मेरे कमरे में मुरली है, ले आना।' मैने बोला, 'दादी जी, आप रोज पांच बार तो मुरली पढ़ते हैं, बाबा तो आपके तन में आते हैं, ब्रह्माबाबा के समय से ज्ञान आपकी बुद्धि में भरा हुआ है, अभी चलती गाड़ी में मुरली पढ़ने की क्या जरूरत है?' तब दादी जी ने कहा, 'मुरली मेरी जान है, मुरली मेरा भोजन है, वह मेरी सुरक्षा का साधन है, उसके बिना मैं चल नहीं सकती

श्रीमत पर, बाबा पर अटल निश्चय

दादी जी का श्रीमत पर बाबा पर अटल निश्चय था। पांडव भवन से दिलवाडा मंदिर जाने के रास्ते में बाएं हाथ की तरफ एक छोटा मंदिर है। वहां एक छोटा सरोवर भी है। एक शाम हम वहा पर दादी जी के साथ पिकनिक पर गए। साथ में दिल्ली का एक कारोबारी भी था, जो यज्ञ में और दिल्ली पांडव भवन में बहत सहयोग देता था। उसने दादी जी से पूछा, 'दादी मै एक नया कारोबार शुरू कर रहा हूं, उसमें दो भागीदार है, उनके साथ यह कारोबार शुरू करूं या नहीं, बाबा से पूछकर बताओ।' तब दादो जी ने कुछ नहीं कहा लेकिन दादी जी की साथी बहनों ने फिर दादीजी को बोला, 'दादी, इनकी आशा है, बाबा से पूछकर आओ।' दादी जी ने सुंदर जवाब दिया कि 'रामायण में सीता, मर्यादा की लकीर से बाहर गई तो रामायण बन गई। बाबा से क्या पूछना है, क्या नहीं पूछना है, मेरी भी मर्यादा की लकीर है, उससे बाहर मैं नहीं जा सकती हूं।' साथी बहन बोली, 'दादी, आप बाबा से पूछेंगे तो बाबा आपको मना नहीं करेंगे।' तब दादी ने कहा, 'ऐसे आप जबरदस्ती नहीं करो, मेरी जान भी ले लो लेकिन मैं बाबा से यह बात पूछ नहीं सकती हूं।' ऐसी थी हमारी दादी जी।

संदेश में कुछ मिक्स न हो

यज्ञ के बारे में, बड़ी दादी जी की पर्सनल बातों के बारे में, सेवा के बारे में दादी जी बाबा के पास संदेश लेने जाती थी और आकर तुरंत सिंधी भाषा में लिखती थी ताकि भूल न जाएं। बाबा ने
जो बोला, वह सही-सही बताए, उसमें कुछ मिक्स न हो, इस बात का दादी जी बहुत ध्यान रखती थी। कभी-कभी यदि संदेश की कोई बात भूल जाती थी तो दुबारा बाबा के पास जाकर संदेश लाती थी। फिर एक्यूरेट लिखती थी। जब तक यह सेवा ठीक से पूरी न हो जाए, तब तक खाना, पीना कुछ नहीं करती थी।
एक बार जानकी दादी जी अहमदाबाद स्टर्लिंग हॉस्पिटल में सीरियस कंडीशन में थी। तब जानकी दादी जी ने कहा, 'दादी, बाबा को बोलो, शरीर साथ नहीं दे रहा है, बाबा मेरे को बुला ले।' हॉस्पिटल के कमरे में यज्ञ के आठ-दस लोग थे। कमरा बंद करके सब योग में बैठ गए। दादी जी बाबा के पास गई, संदेश लाया और दादी जानकी जी को बताया कि 'बाबा ने बोला है, इस शरीर से और सेवा करनी है, अभी बच्ची (दादी जानकी) को भोग का अमृत पिलाओ, शाम तक ठीक हो जाएगी।' ऐसे ही हुआ। दादी जी ठीक होकर शांतिवन आ गई। दादी जानकी जी में शक्ति आ गई कि बाबा ने ऐसे बोला है।

दूसरों के संकल्पों को जानने की शक्ति

दादी जी दूसरों के संकल्पों को जान लेती थी। बाबा मिलन के एक दिन पहले डायमंड हॉल में शाम को क्लास दादी जी कराती थी। शक्ति भवन से हॉल में जाते समय रास्ते में बहुत से लोग खड़े होते थे। कई बार दादी जी बोलती थी कि 'भाई, गाड़ी को रोको!' दादी जी स्वयं कांच खोल के हाथ हिलाती थी। एक बार एक माता जी को देखकर दादी ने हाथ हिलाया। उस माताजी ने सोने की अंगूठी दादी जी के हाथ में दे दी और बोली, 'दादी जी, कई सालों से मेरा संकल्प था। वह आज बाबा ने पूरा कर दिया। ऐसे बोल के आसू बहाने लगी। वह देखने जैसा दृश्य था।
कईयों को गाड़ी में बैठे-बैठे बुलाकर दादी टोली देती थी। मैंने एक बार पूछा दादी जी इतने लोग खड़े थे उनमें से उसी माता जी को बुलाकर क्यों टोली दी?' तब दादी जी का जवाब था उस माता जी को स्टेज पर जाकर बाबा से मिलने का बहुत मन था लेकिन वह स्टेज पर नहीं आ सकती थी इसलिए ऐसा किया। दादों जी का गाड़ी में बैठते ही हमको बहुत हल्कापन अनुभव होता था। कभी थकावट अनुभव नहीं होती थी। एक बार अहमदाबाद से पोरबंदर फिर सोमनाथ तक आराम से पहुंच गए। इतने लंबे सफर में भी थकावट नहीं हुई। रास्ते में टोल टैक्स पर गाड़ी रोकते थे, सभी लोग दादी मां, दादी मां कह करके सिर झुकाते थे, टोली और आशीर्वाद लेते थे, टैक्स नहीं लेते थे, वंडर था।

शांत रहना पसंद था

मैं कई बार शांतिवन से माउंट आबू दादी जी को लेकर जाता था। दादी के साथ का इतना प्रभाव था कि सुरक्षा के लिए हमको जैसे टचिंग आती थी कि अब हॉर्न बजाना है, ब्रेक लगाना है या गाड़ी को धीमा करना है। ऐसी टचिंग से कई बार दुर्घटना से बचाव हुआ है। कई बार तो गंभीर परिस्थितियों में भी बाबा ने गाड़ी को बचाया है। कई बार टचिंग में गली में जाने का संकल्प आता था, मेन रोड से गली की तरफ गाड़ी मोड़ लेता था और ट्रैफिक से बच कर, समय पर पहुंच जाता था। दादी जी को शांत रहना पसंद था। गाड़ी में तीन-चार घंटे एकदम शांति में बैठी रहती थी। हम बात करेंगे तभी बात करेगी। हम कुछ पूछते थे तो ही सार रूप में जबाब देती थी।
एक बार कॉन्फ्रेंस हॉल में शांतिवन वालो से बाबा मिलन की तारीख फाइनल हो गई थी, पर ओपन नहीं हुई थी। उस समय गुलजार दादी जी, बड़ी दादी जी के कॉटेज में दिन में भोजन करके यज्ञ कारोबार की सलाह-मशवरा करके लगभग 4.00 बजे वापस शक्तिभवन आती थी। साथ में जो बहने होती थी, सब पहले ही शक्तिभवन चली जाती थी। उस समय मै और दादी जी अकेले होते थे। भोजन के बाद गाड़ी से आते वक्त मैंने दादी जी से पूछा, दादी शांतिवन वालों से बाबा कौन-सी तारीख में मिलने आएगे? दादों जी ने कोई जवाब नहीं दिया। मैने गाड़ी को थोड़ा धीरे किया और फिर पूछा, 'दादी जी, आपसे ही पूछ रहा हूं।' दादी जी बोली, 'हा भाई सुन रही हूं लेकिन डेट नहीं बतानी है।' मैने पूछा, 'दादी, आपको डेट पता है ना?' बोली, 'हां लेकिन कई बातें सब को बतानी नहीं होती, भाई। ऐसे जवाब दिया। दादी जानती थी कि इसको बताएगे। तो सबको पता पड़ जाएगा और डेट गुप्त रखनी थी।
दादी जी से कई प्रश्न पूछते थे, उनका उत्तर दादी ऐसा देतो थो जो हर तरह से सही होता था। जवाब भी दादी तुरंत नहीं, थोड़ा समय सोच कर देती थी। कई बार टीचर बहने समस्या लेकर आती थी, घंटे घंटे बैठ के बातें करती थी। दादी जी दो मिनट में जवाब देती थी और बहने खुश होकर, दादी जी का थैक्स करके जाती थी। कई बार ऐसे अनुभव होता था, ये दादी जी नहीं है, बाबा इस समय आ गया है।

दादी जी की दृष्टि ने मुझे फरिश्ता बनाकर उड़ा दिया

ब्रह्माकुमार गुणराज भाई, वीरगन्ज, नेपाल
भगवान का रथ, वैश्विक प्रेम की धरोहर दादी हृदयमोहिनी जी, नेपाल को आर्थिक महानगरी वीरगन्ज में पहली बार शिव बाबा के विशाल भवन 'विश्व दर्शन भवन' के उ‌द्घाटन के लिए पदार्पण हुए थे। मुझे वहुत खुशी है कि जब हम दादी जी को एयरपोर्ट लेने के लिए पहुंचे तब नेपाल भर के करीब 100 से ज्यादा भाई-बहने मेरे साथ थे। वीरगन्ज क्षेत्र का जिम्मेवार सेवाधारी सदस्य होने के रूप में मैं जब उनको गुलदस्ता देने सामने पहुंचा तो करीब पांच मिनट तक वे मुझे दृष्टि देते रहे। उस समय मुझे महसूस हुआ कि जो पाना था सो पा लिया। मैं सबकुछ भूल, एक फरिश्ता होकर उड़ने लगा। मैं बहुत ही भावविभोर हो रहा था।

ओ कोहिनूर, ओ दादी गुलज़ार

बह्माकुमारी सुषमा, मुक्ताईनगर, महाराष्ट्र
आप में हमने खुदा को पाया,
स्नेहांचल तले सब सुख पाया,
न भूल पाएंगे आपके उपकार,
चाहे बीते साल हजार।
ओ कोहिनूर, ओ दादी गुलज़ार ।।
दृष्टि में आपकी जादू खुदाई था,
जो देखे, भूलता दुनिया दुखदाई था,
दिल चाहता है पर कैसे करूं इजहार,
काश! आपको लग जाती उम्र हमार।
ओ कोहिनूर, ओ दादी गुलज़ार ।।
न था, न होगा कोई खुशनसीब ऐसा,
नहीं मुकद्दर किसी का भी हम-सा,
पाई झलक आपकी हजारों बार,
क्या गाएं हम गाथा ऐसी अपार।
ओ कोहिनूर, ओ दादी गुलज़ार ।।
बेहोशी से आ गये होश में,
शब्द नहीं थे हमारे शब्दकोश में,
याद किया तो लगी शब्दों की कतार,
कलम भिगो रही है असुवन की धार।
ओ कोहिनूर, ओ दादी गुलज़ार ।।