भाग्यविधाता

भाग्यविधाता

ब्रह्माकुमार जगदीश 'संजय'

भ्राता ‘जगदीश चन्द्र जी’ का जन्म 10 दिसंबर, 1929 को ऋषि-मुनियों के लिए विख्यात शहर मुल्तान (वर्तमान समय पाकिस्तान में) की पवित्र भूमि पर हुआ। आपकी आध्यात्मिकता में अनुपम रुचि थी तथा इसी अभिरुचि को तृप्त करने के लिए आपने भारतीय दर्शन, वैदिक संस्कृति एवं विश्व के विभिन्न धर्मो का गहन अध्ययन किया। जब शुरू में दादियों ने दिल्ली में सेवायें प्रारंभ की, उस समय आपने दिल्ली कमलानगर में ज्ञान लिया। आप लौकिक में प्रोफेसर थे, आपकी बुद्धि बहुत दूरांदेशी और प्रवीण थी। आपने कोर्स करते ही, गुप्त रूप में आये हुए भगवान को पहचान लिया और स्वयं को बेहद सेवाओं में समर्पित कर दिया। बाबा आपको ‘संजय’, ‘गणेश’ आदि उपनामों से पुकारते थे। आपकी बुद्धि के लिए कहते कि 7 फुट लंबी बुद्धि है। आपने राजयोग जैसी जटिल व गुह्य विद्या पर शोध कार्य किया तथा उसकी व्याख्या अत्यंत सरल, सुबोध एवं सुरुचिपूर्ण शब्दों में की। आपने विद्यालय का पूरा साहित्य तैयार किया। राजयोग, मानवीय मूल्यों, आध्यात्मिकता एवं समसामयिक विषयों पर 200 से भी अधिक हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में पुस्तकें लिखी। आप ज्ञानामृत, वर्ल्ड रिन्युअल तथा प्योरिटी के प्रधान संपादक रहे और 'भारतीय एडीटर्स गिल्ड' के सदस्य भी थे। आप सेवाओं के आदि रत्न थे। आपका यज्ञ में अग्रणीय स्थान रहा। आप मुख्य प्रवक्ता के रूप में रहे। आपने सेवा की अनेकानेक नई योजनायें तैयार की और उन्हें प्रैक्टिकल स्वरूप दिया। आपने विभिन्न वर्गों की सेवाओं हेतु अनेक विंग्स बनाई और उनका सुचारु रूप से संचालन किया। आप यज्ञ सेवाओं की नींव थे। दिल्ली शक्तिनगर सेवाकेन्द्र पर रहकर आप विश्व सेवा के निमित्त बने। रशिया में आपने सेवाओं की नींव डाली जहाँ आज हजारों बाबा के बच्चे ज्ञान-योग की शिक्षा ले रहे है। आपका व्यक्तित्व एवं कृतित्व सब कुछ जैसे संपूर्ण मानवता के लिए ही था। अक्सर कहा जाता है कि आप सच्चे ‘दधीचि’ थे। आपने 12 मई, 2001 को अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर संपूर्ण स्थिति को प्राप्त किया।

आदरणीय भ्राता जगदीश जी को बाल्यकाल से ही प्रभु-मिलन की गहन प्यास थी। माउंट आबू में एक कार्यक्रम के दौरान बाल्यकाल के अनुभवों को सुनाते हुए आपने कहा था कि "जब मैं छोटा था तो मेरे मन में उत्कट इच्छा थी कि मुझे परमात्मा से मिलना है, आत्मा के स्वरूप में स्थित होना है और आत्म-अनुभूति करनी है। मैंने निश्चित किया था कि मेरे जीवन का यही परम लक्ष्य है, इसे किये बिना मैं नहीं टलूँगा, मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए। तो उस भावना से जो भी कोई सत्संग या धार्मिक सम्मेलन होता था, मैं उसमें शामिल होता था। कुछ शास्त्रार्थों में भी शामिल होता रहा। उस समय के कई महात्माओं से, साधु-संतों से, योगियों से भी मिलता रहा ताकि प्रभु मिलन का सच्चा मार्ग मिल जाए।" सन् 1952 में आपने महसूस किया कि प्रभु मिलन हेतु और इंतजार नहीं किया जा सकता और आपको लगा कि ईश्वरानुभूति के बिना तो जीवन मानो निरर्थक ही हो गया है। जीवन के इसी मोड़ पर आप “प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय” के संपर्क में आये और इसके संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा के पवित्रता व सादगीयुक्त जीवन से विशेष रूप से प्रभावित हुए। इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा सिखाई जाने वाली सहज राजयोग की विधि तथा ईश्वरीय ज्ञान से आपको नई रोशनी मिली। यहाँ आपको गहन आध्यात्मिक अनुभव हुए और आपने लौकिक नौकरी छोड़ दी तथा मानव सेवा हेतु अपना जीवन इस संस्था को समर्पित कर दिया। आप इस संस्था में विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे। आपने संस्था के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों, परिचर्चाओं व आध्यात्मिक मेलों इत्यादि का आयोजन किया। जन-जन को आध्यात्मिक संदेश देने हेतु भारत के 6,000 एवं विश्व के 80 देशों के 300 सेवाकेन्द्रों की स्थापना एवं प्रगति में विशेष योगदान दिया। आप संस्था की केन्द्रीय समिति के जनरल सेक्रेटरी और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संबंधित संस्थाओं के उपाध्यक्ष भी थे।

विश्व भर में इस ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने हेतु आपने 50 देशों की यात्रा की और अपने दिव्य अनुभवों का अनेकों के साथ आदान-प्रदान किया। सभी देशों में समाचार-पत्रों, रेडियो, दूरदर्शन आदि के द्वारा आपके साक्षात्कारों व कार्यक्रमों का प्रसार हुआ। आपको विश्व के अति विशिष्ट व्यक्तियों-लार्ड माउण्टबेटन, दलाई लामा, पोप, अर्नाल्ड टायनबी, संयुक्त राष्ट्र संघ के उच्च पदाधिकारियों, अनेक देशो के राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों आदि से भेंट कर उन्हें ईश्वरीय संदेश देने व उनके साथ आध्यात्मिक चर्चा करने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रगति में आपका विशेष योगदान रहा और आपके विशेष प्रयासों के फलस्वरूप यह संस्था संयुक्त राष्ट्र के साथ अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थान के रूप में सम्बद्ध हुई व विश्व भर में फैली। बीमारी के दौरान भी अनेक सेवायोजनाओं का सफल संचालन कर आपने अपनी देहातीत स्थिति का प्रमाण प्रस्तुत किया। आप यही कहते रहे, 'मेरा शरीर बीमार है, मैं (आत्मा) नहीं।' दैवी-संस्कृति के गुह्य रहस्यों के ज्ञाता, नव विश्व निर्माण के आधारमूर्त, सबके उद्धारमूर्त, निःस्वार्थ स्नेही, निस्पृह, आप्तकाम भ्राता जगदीश जी को सर्व ब्राह्मण कुल भूषणों की तरफ से शत-शत स्नेह-सुमन अर्पण और नमन। आज शारीरिक रूप से हमारे मध्य न होकर भी आपकी बाप समान धारणाएँ और प्रेरणाएँ, आपकी अमूल्य लेखनी के उद्‌गार सदा हमें ज्ञान-प्रकाश देते रहेंगे। आपके प्रति और बापदादा के प्रति हमारे स्नेह का सही अर्थों में यही प्रमाण और प्रकटीकरण होगा कि हम आपकी आश 'बाबा की प्रत्यक्षता' को पूर्ण करें। महान विभूति, ब्राह्मण कुल के श्रृंगार, विजयी-रत्न भ्राता जगदीश जी को बार-बार हार्दिक प्रेम भावांजलि तथा श्रद्धा- सुमन अर्पण!

जगदीश भाईजी की कलम से : वो दिन कितने प्यारे थे

ब्रह्माकुमार जगदीश भाईजी लिखते हैं, मैं यह समझता हूँ कि मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ! कई दफ़ा गद्गद हो जाता है मन। रात को नींद टूट जाती है। वो मूरत मम्मा की और बाबा की सामने आ जाती है। सृष्टि के आदिपिता, प्रजापिता ब्रह्मा, सारी सृष्टि के प्रथम, जिनको सब धर्म वाले भी आदिपिता मानते हैं, उनके अंग-संग रहने का मौका मुझे मिला। उन्होंने अपने हाथों से प्यार और दुलार किया, अपने हाथों से मुझे भोजन खिलाया, बच्चों की तरह से प्यार किया, वो दिन कैसे थे! बाबा तो कहते हैं कि बच्चे, मैंने बाँहें पसार रखी हैं, अव्यक्त स्वरूप में मुझ से मिलो। अव्यक्त स्वरूप में मिलती हैं संदेश पुत्रियाँ, गुलजार बहन जैसी बहनों को दिव्य दृष्टि से साक्षात्कार होता है। सेमी ट्रांस में तो हम भी जाते हैं लेकिन वो नज़ारे कुछ और थे। आप से सच कहता हूँ, वो नज़ारे कुछ और थे। वो क्या देखा हमने! बार-बार याद आता है कि वो कैसे प्यारे नज़ारे थे! बाबा के ट्रांसलाइट तो हम देखते हैं, बाबा के चित्र हरेक कमरे में लगे रहते हैं और आजकल कला का विकास हुआ है, अच्छे-अच्छे चित्र बनते हैं। कैमरे भी अच्छे आ गये हैं। उनमें फोटो का रंग हल्का, तेज जैसा चाहे कर देते हैं लेकिन वो जो बाबा को हमने देखा, जो दृष्टि उनसे ली, वो भूलता नहीं है! योग में बाबा हमारे सामने बैठे हैं, हम बाबा के सामने बैठे हैं, बाबा हमको दृष्टि दे रहे हैं। सचमुच ऐसा लगता था कि हम सागर के नीचे उतर रहे हैं। ऐसा अनुभव कौन करायेगा? फिर कब होगा? क्या ड्रामा के वो दिन हमेशा के लिये चले गये? वो फिर नहीं आयेंगे क्या? फिर 5000 वर्ष के बाद ही आयेंगे क्या? मन कई दफ़ा रोने को आता है। आँखों से आँसू आने को होते हैं, संभाल लेते हैं, चुप हो जाते हैं हम । ऐसा नहीं, हम बाबा से बिछुड़ गये। बाबा तो हमारे साथ हैं। बाबा भी कहते हैं, मैं आपके साथ हूँ लेकिन वो जो दिन थे, वो तो बहुत ही प्यारे दिन थे। वो प्यार और दुलार जो बाबा ने दिया, उसके मुकाबले और कुछ भी नहीं है।

वो दिन भूल नहीं सकते

दो-ढाई फुट की एक छोटी-सी टेबल होगी जिस पर बाबा खाना खाते थे अपने कमरे में। उस कमरे में बाबा की कुर्सी होती थी। सामने हमें बिठा लेते। कहते थे, बच्चे, आओ, खाना खाओ। बाबा चावल खा रहे हैं, चावल में मूंग की दाल मिली हुई है। खिचड़ी बनी हुई है, उसमें पापड़ को तोड़कर मिलाके अपने हाथ से खिला रहे हैं। वो दिन, वो दिन भूल नहीं सकते। बाबा देख रहे हैं, दृष्टि दे रहे हैं। लोग मानते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि रची। इतना तो मालूम है लेकिन क्या सृष्टि रची, कैसी रची, रचना की विधि क्या थी- वो नहीं मालूम। लोग समझते हैं कि हमारे शरीर के कान, आँख, नाक जो हैं, इन्हें ब्रह्मा जी ने बनाया। कबीर यह कहता है कि हे प्रभु! हे ब्रह्मा! आपने हमारी आँखें ऐसी क्यों बनाई जो झपकती हैं? "अखियाँ तो छायी पड़ी पंथ निहार-निहार ..।" कहता है, "आँखें तो मेरी बिछी हुई हैं उस पिया के मार्ग में, उसकी याद में। उसको देखने में लगी हुई हैं। मन करता है कि आँखें झपकें नहीं, अपलक होकर देखती रहें।"

बाबा ने शरीर छोड़ा, बाबा अव्यक्त हुए। जहाँ शान्ति स्तम्भ है, वहाँ पर दाह संस्कार हो रहा था, शरीर को अग्नि-समर्पित किया जा रहा था। मैं खड़ा था। एक वो दिन था जब बाबा की गोद में जाता था। कम-से-कम 100-150 दफ़ा बाबा की गोद में गया हूँगा। बाबा ने गले से लगाया, गालों को थपथपाया, सिर पर हाथ फिराकर प्यार किया और इतना दुलार दिया। आज वो शरीर, जो एक चुंबक की तरह था, समाप्त हो जायेगा! क्या, उसके द्वारा फिर मिलन हो सकता है? जब बाबा हाथ लगाते, स्पर्श करते माथे पर, सिर पर तब ऐसा लगता था कि हम मालामाल हो गये। हमें और क्या चाहिए! वो अनुभव फिर कैसे होंगे! अभी उन हाथ, पाँव, पूरे शरीर को अग्नि को समर्पित कर दिया जायेगा, बस पूरा हो गया वह साकार का पार्ट! मैं आपको सच कहता हूँ, उस समय मन में संकल्प आया कि बाबा के साथ में मैं भी लेट जाऊँ। अब अपने इस शरीर को रखने का कोई उद्देश्य नहीं है। जब बाबा जा रहे हैं तो मैं भी उनके साथ जाऊँ, ऐसा मन करता था। फिर मन को ब्रेक लगाता था कि दुनिया कहेगी, क्या यह पागल है! यह क्या करता है! एक खेल में दूसरा खेल हो जायेगा।

ये सारे दृश्य कैसे भूल जायें?

कुछ स्थितियों में यह भी अनुभव किया कि बाबा ने अपने साथ भी लिटा लिया अपनी शैय्या पर, अपने कमरे में, जहाँ अब भी एक चारपाई है, उस चारपाई पर। मैं उसको कभी जाकर चूम लेता हूँ, यह वो चारपाई है जहाँ पर बाबा लेटे रहते थे। मुझे भी साथ में लिटाया हुआ है, कुछ सुना रहे हैं, कुछ पूछ रहे हैं, दृष्टि दे रहे हैं, प्यार कर रहे हैं। ये सारे दृश्य कैसे भूल जायें! वो जो दिन थे, वो जो लोग थे उनमें क्या बात थी! बाबा ने किसी को स्पर्श किया तो उसको ऐसा लगता था, ये विकार हमेशा के लिए मेरे मन को छोड़ गये। इतनी शीतलता थी। जैसे कहते हैं ना, "संत बड़े परमार्थी, शीतल जिनके अंग, औरों को शीतल कर दें, दे दे अपना रंग।"
ओहो! मम्मा की गोद में हम जाते थे, कितने लोग अपना अनुभव सुनाते हैं। सिर्फ यह मेरा ही अनुभव नहीं है कि जब मम्मा की गोद में हम गये, हमें सुधबुध नहीं रही। हम कहाँ थे उस समय! वो कौन मम्मा थी जो हमें इतना प्यार कर रही थी! वो जगत की अम्बा, सरस्वती मैया जिसको भक्त जन्म-जन्मान्तर याद करते हैं, जिसको विद्या की देवी मानकर उससे विद्या माँगते हैं, शीतलता के लिए शीतला देवी के रूप में उसका गायन करते हैं, उस संतोषी माता की गोद में हम थे, उसने हमारे सब पापों को हर लिया। हमें इतना शीतल कर दिया कि अब हमारे मन में कोई प्रश्न ही नहीं उठता। हमको बहुत सहज लगा पुरुषार्थ करना बाबा और मम्मा के संग से।

बाबा कितने गुप्त रहे! अपने को कभी प्रत्यक्ष नहीं कराया

हम भगवान के बच्चे हैं, उनके हाथों से पालना ली है लेकिन सच में मैं बताऊँ कि बाबा कितने गुप्त रहे! अपने को कभी प्रत्यक्ष नहीं कराया। हमेशा मम्मा को आगे रखा। कितना मम्मा का सम्मान किया! जिस मम्मा को स्वयं ज्ञान देने के निमित्त बने। जब मम्मा किसी और शहर में जाती, बाबा उनको स्टेशन पर छोड़ने जाते। क्या ज़रूरत थी? हम बच्चे तो जाते ही थे लेकिन बाबा स्वयं छोड़ने जाते। ईश्वरीय सेवा करके मम्मा जब वापस आती थी, उनका स्वागत करने जाते थे गेट के पास।

अपने से छोटे, जो अपनी ही रचना हैं उनको भी बाबा कितना रिगार्ड देते, आगे रखते! बाबा हरेक को पहचानते हैं, उनका ड्रामा में क्या पार्ट है, इस बात को समझते हैं। और कौन है जो इन बातों को समझता है? मुझे अपना स्वयं का अनुभव है, बाबा ने मुझे समझा और पहचाना। किसने मुझे समझा और पहचाना? मैं था ही क्या? दुनिया की निगाह में मैं क्या था? न कोई लेखक था, न कोई धनी था, न कोई गणमान्य व्यक्ति था, न कोई मशहूर आदमी था। कुछ भी नहीं था। लेकिन भविष्य बनाने वाले और सबके पार्ट को जानने वाले तो बाबा ही हैं। बाबा ने किन-किन बच्चों को पहचान कर, उनको क्या-क्या पार्ट दिया और क्या-क्या उनसे करवाया, आश्चर्य लगता है।

वो ऐसे संस्मरण हैं जो अनमोल हैं

जब कभी (साकार बाबा के साथ बिताए हुए) वो दिन याद आते हैं, रह- रहकर याद आते हैं तो फिर वो दृश्य, वो बातें सामने आती हैं। वो सारी फिल्म मन के सामने घूम जाती है। वो ऐसे संस्मरण हैं जो अनमोल हैं। उसके मुकाबले में और कुछ नहीं। जब हम वो सोचते हैं तो ऐसा लगता है कि अब हम कहाँ हैं? आपने देखा होगा कि बुजुर्ग लोगों के साथी शरीर छोड़-छोड़कर चले जाते हैं और वे बुजुर्ग युवाओं के बीच रहने लगते हैं। उनको यह तो अनुभव होता है कि ये जवान हैं, उत्साहशील हैं, उनको देखकर खुशी तो होती है लेकिन साथ-साथ ऐसा भी महसूस होता है कि हमारे ज़माने के लोग तो चले गये। वो अब नहीं रहे। ऐसे फ़रक तो पड़ता है। उन दिनों में पुराने लगभग वही बहनें भाई थे जो ओम मंडली में आये थे, परिवार के परिवार समर्पित हुए थे।

अजीब रिश्ते-नाते यज्ञ में

एक सौभाग्य मुझे मिला, उन सबसे मिलने का। बाबा की जो लौकिक पत्नी थी उनके साथ बैठके हमने बाबा की सारी बातें सुनीं। बाबा की जो लौकिक बहू बृजेन्द्रा दादी थीं उनसे भी सुनीं। बाबा की लौकिक बच्ची निर्मलशान्ता से भी सुनीं। बाबा की एक लौकिक बहन थी वो भी वहाँ रहती थी, मम्मा की लौकिक माँ भी थी। सब से मैं मिला। मम्मा की लौकिक माँ भोग लगाती थी। मुझे यही आश्चर्य हुआ, जब पहली बार मैं वहाँ गया कि मम्मा की माँ भी मम्मा को माँ कहती थी। माँ अपनी बेटी को माँ कहती थी। मुझे अजीब-सा लगा, आश्चर्य लगा कि यह क्या बात है! यहाँ तो सब आत्मिक नाते से, ज्ञान के नाते से रहते हैं और व्यवहार करते हैं। शरीर का नाता तो नहीं है। एक अजीब बात देखने में आई कि बाबा की जो धर्मपत्नी है, वो भी बाबा को बाबा कहती है। अज्ञान काल में जिसको पति के रूप में देखा करती थी, उसको बाबा कहती है। सिर्फ कहने में नहीं, उनके व्यवहार में, उनके चलन में यही अनुभव होता था कि बाबा को बाबा समझकर चलती है। यह सब देखने का था। धीरे-धीरे वो सब चले गये। नये-नये लोग आते रहे और काफिला बढ़ता गया, बढ़ता गया और कितना बड़ा काफिला अब हो गया! अब शान्तिवन में जायें, ज्ञान सरोवर में जायें, पाण्डव भवन में जायें, विश्वभर के सेवाकेन्द्रों पर जायें, कितना काफिला बढ़ गया है! बाबा के बच्चे कितने हो गये हैं! वो सब तो हो गये हैं लेकिन जो बाबा, मम्मा, दादियों और बड़े भाइयों के साथ दिन गुज़ारे वो तो फिर नहीं आयेंगे। हमें तो उनकी याद आती है।

पत्र पढ़कर मेरे पाँव के नीचे से जमीन खिसक गई

मुझे ज्ञान में चलते हुए थोड़े ही दिन हुए थे। दो-डेढ़ महीने ही हुए होंगे। बाबा का पत्र आया। लाल अक्षरों में सिंधी में लिखा हुआ। सिंधी मैं पढ़ लेता था क्योंकि उर्दू जानता था। उर्दू और सिंधी की लिपि एक ही होती है, थोड़ी मेहनत की जाये तो सिंधी भाषा को समझ सकते हैं। पत्र में बाबा ने लिखा हुआ था, "बच्चे, क्या इस बूढ़े बाप को मदद नहीं दोगे? इस नई सृष्टि की स्थापना में इस बूढ़े बाप को मदद नहीं दोगे?" पढ़कर ज़मीन मेरे पाँव के नीचे से खिसक गई। मुझे ऐसा लगा कि यह कौन कह रहा है! सृष्टि का आदिपिता जिसमें स्वयं सर्वशक्तिमान शिवबाबा आता है और दोनों करन-करावनहार हैं, हम मनुष्य क्या हैं उनके आगे? मैं आपको सही कहता हूँ कि अभी तो योग लगाना सीख रहा था। बाबा की वो चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते ही योग में था। लाइट में था, मैं खड़ा हूँ या बैठा हूँ, मेरे हाथ में चिट्ठी है या नहीं- यह पता ही नहीं था। मैं तो ऐसा महसूस कर रहा था कि मैं प्रकाश में हूँ। यह कौन कह रहा है! क्या कह रहा है! यह कितना नम्रचित्त है! सृष्टि स्थापना के लिए कैसे किसको निमित्त बनाता है! उस समय इतना अधिक सोचा ही नहीं होगा, शायद आज इतना सोच रहा हूँ या बाद में सोचा होगा लेकिन उसको पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा कि मैं लाइट स्वरूप हूँ और लाइट में हूँ। पहले इस तरह की योग की कॉमेन्ट्री नहीं होती थी। योग के लिए ऐसा नहीं था कि कुछ विधिपूर्वक एक हफ्ता, दस दिन, बारह दिन आपको अधिक स्पष्ट किया जाये। प्यार बाबा का ऐसा था, बाबा का परिचय ऐसा था, उससे स्वयं देह से न्यारे हो जाते और महसूस करते थे कि हम तो योग में ही हैं। आनन्द में, शान्ति में डूबे हैं। यह संसार हमसे ओझल हो गया है। हम किसी नई दुनिया में हैं जो प्रकाश की दुनिया है।

नारायण से बड़ा कौन?

एक बार बाबा आये क्लास कराने तो प्रश्न किया बच्चों से कि हमारा क्या लक्ष्य है? बाबा हमें कितना ऊँचा पद देता है? इससे और ऊंचा पद कोई होता है क्या? क्लास में एक भाई बैठा था। वह बाबा का दूर के संबंध का पोता लगता था। वो थोड़ा मज़ाकिया आदमी था। बाबा को लौकिक दादा समझकर प्यार करता था। उसने हाथ उठाया। बाबा ने पूछा, हाँ बच्चे, कुछ कहना है? उसने कहा, लक्ष्मी-नारायण से बड़े और भी होते हैं। बाबा ने कहा, अच्छा वो कौन हैं? उसने कहा, देखिये, जो नारायण है, वो बाल कटाता है तो सिर झुकाता होगा नाई के आगे। तो बड़ा नाई हुआ जिसके आगे नारायण भी सिर झुकाता है। कहता है, मैं हज्जाम बनूँगा। हज्जाम तो नारायण से भी बड़ा है क्योंकि नारायण को भी उसके सामने माथा टेकना पड़ता है। सब खूब हँस पड़े। बाबा भी हँसे। ऐसे समय प्रति समय बाबा हँसा भी देते थे और प्यार भी करते थे। बाबा हम बच्चों को हँसते-हँसाते ज्ञान देते थे। वो दिन कितने प्यारे थे और न्यारे थे!

किस डॉक्टर की बात सुनूँ

एक बार बाबा को शुगर की मात्रा बहुत बढ़ गई थी और ब्लड प्रैशर भी था। डॉक्टर ने कहा कि बाबा बहुत जल्दी उठते हैं, दिन में रेस्ट (विश्राम) भी करते नहीं, आप इनको रेस्ट दिया करो, इनको रेस्ट लेने के लिए कहो। मुझे याद है, उस समय मैं मधुबन में ही था। दीदी मनमोहिनी जी और दो-चार भाई-बहनों ने मिलकर बाबा से कहा कि "बाबा आप अमृतवेले योग में नहीं आइये। आप तो रात को देरी से सोते हैं और विश्व सेवा के बारे में सोचते रहते हैं। जब भी हम आपके कमरे में आते हैं, आप जागते रहते हैं। आप दिन-रात योग तो लगाते ही हैं। इसलिए थोड़े दिनों के लिए कृपया सुबह अमृतवेले योग में मत आइये। "बाबा ने कहा, "बच्ची, तुम क्या कहती हो? अमृतवेले न उठूँ? यह कैसे हो सकता है? उस आलमाइटी बाबा ने हमारे लिए समय दे रखा है, उसको कैसे छोडूॅं?" उन्होंने बाबा से फिर बहुत विनती की कि बाबा डॉक्टर कहते हैं, आपको विश्राम लेना बहुत जरूरी है। बाबा ने कहा, "बच्ची, मैं किस डॉक्टर की बात सुनूँ? यह डॉक्टर कहता है, अमृतवेले रेस्ट करो, वो सुप्रीम डॉक्टर कहता है, अमृतवेले उठकर मुझे याद करो। मैं किसकी बात मानूँ? मुझे सुप्रीम डॉक्टर की बात ही माननी पड़ेगी ना! इसलिए मैं अमृतवेले रेस्ट नहीं कर सकता", ऐसे कहकर बाबा ने उनकी बात को इंकार कर दिया। दीदी जी ने नहीं माना। उन्होंने कहा कि बाबा डॉक्टर ने बहुत कहा है इसलिए आप कम से कम दो-तीन दिन मत आओ। हमारी यह बात आपको माननी ही पड़ेगी। बहुत ज़िद करने के बाद बाबा ने कहा, "अच्छा बच्ची, सोचूँगा।" जब रोज़ के मुआफिक हम अमृतवेले जाकर योग में बैठे तो बाबा भी चुपके से आकर योग में बैठ गये। देखिये, बाबा ने अपनी ज़िन्दगी में एक दिन भी अमृतवेले का योग मिस नहीं किया। कैसी भी बीमारी हो, कितनी भी उम्र हो, उन्होंने ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन नहीं किया।
उन दिनों कितने सेवाकेन्द्र थे! मुश्किल से 10-15 होंगे। जब मैं ज्ञान में आया था, कोई भी सेन्टर नहीं था सिवाय दिल्ली, कमला नगर के। पहला जो सेन्टर खुला विश्व भर में वो कमला नगर सेन्टर था, जहाँ हम रहते थे। दादी जानकी वहीं रहती थी, मनोहर दादी भी रहती थीं, दीदी मनमोहिनी जी भी वहीं रहती थी। इकट्ठे हम रहते थे। छोटी-सी जगह थी लेकिन हम इकट्ठे रहते थे, इकट्ठे खाते-पीते थे, इकट्ठे सेवा करते थे। वो कितने अच्छे दिन थे! तब से इन दादियों के साथ हमारा संबंध है। सन् 1951 में ये सब सेवा में आ गये, सन् 1952 में हम भी आ गये। सेवा तो लगभग इकट्ठी शुरू की। उससे पहले ये करांची या हैदराबाद में रहे।

अगर अपनी कहानी सुनाऊँ, हैदराबाद भी मैं गया था

अगर मेरी सारी कहानी सुनाऊँ, वहाँ भी मैं गया। मैं पढ़ता था कॉलेज में और बहुत मन में आता था, "हे भगवान! आपसे मिलन कब होगा? मेरे जीवन की यही इच्छा है। मैं तो भटक रहा हूँ दुनिया में। जैसे किसी को कोई कमरे में बंद कर दिया जाये, मैं अपने को समझता हूँ कि इस संसार में किसी ने मुझे जेल में बन्द कर दिया है। मुझे निकालता क्यों नहीं? मिलता क्यों नहीं?" रोता था कई दफा। एक दफा जब बहुत तीव्रता में चला गया तो अंदर संकल्प आया कि हैदराबाद-सिन्ध की तरफ जाओ, करांची की तरफ जाओ। मैं हैदराबाद-सिन्ध की तरफ चल पड़ा। वहाँ पर सफेद कपड़ों वाली बहनों को देखा। वहाँ वैसे भी बहुत सारी सिन्धी बहनें; पजामा और कुर्ता जैसा कुछ सफेद पहनती थीं। उनको मैंने देखा। कुछ झलक जैसी लगी। लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। कुछ स्पष्ट बताया तो नहीं था। ये तो जैसे टचिंग हुई थी, उस टचिंग की वजह से मैं वहाँ गया था। तीन-चार दिन तक बिना बताये घर से मैं भाग गया इस ख्याल से कि मैं भगवान से मिलने जा रहा हूँ। घर वाले मुझे ढूँढ़ते रहे। वहाँ मुझे कुछ नहीं मिला। देखकर वापस आ गया। वापस आने के बाद राजनीति शास्त्र की कुछ किताबें पढ़ीं तो उनमें जानकारी मिली कि सिन्ध में ओम मण्डली थी, सरकार ने यह किया, वह किया। मैंने फिर लोगों से पूछना शुरू किया कि ओम मण्डली क्या थी? सरकार ने ऐसा क्यों किया इत्यादि इत्यादि। लोगों को पूरा पता नहीं था। खैर, जो कुछ भी है, बहुत लंबी दास्तान है। उसके बाद तो मैं ज्ञान में आ गया।

बाबा ने ज्ञान के बहुत साक्षात्कार कराए

जिगर से कहता हूँ, बाबा ने जो प्यार इस आत्मा को दिया, वो शायद ही किसी-किसी को प्राप्त हुआ हो। बाबा ने ज्ञान के बहुत साक्षात्कार कराए, ज्ञान के भी साक्षात्कार होते हैं। जैसे दिव्य दृष्टि में हम कई चीजें देखते हैं, वैसे ही दिव्य बुद्धि से भी बहुत-से साक्षात्कार होते हैं। इस आत्मा को कितनी ही बार वो साक्षात्कार समय-समय पर हुए हैं। बापदादा ने जो वरदान दिए और उनके साथ जो हमने क्षण, घंटे, दिन, वर्ष गुज़ारे वे अविस्मरणीय हैं। कई बार लगता है, उनका वर्णन करें तो उनसे बाप की ही प्रत्यक्षता है। कई बार ऐसा भी लगता है कि उनमें व्यक्तिगत बातें भी हैं, फिर मन में एक रुकावट आती है कि उनको लिखने का कोई लाभ नहीं है। लेकिन वो यादें तो आती ही हैं कि किस तरह बाबा ने हमें अकेले में बिठाकर काफी-काफी समय तक योग का अभ्यास कराया। साहित्य की वजह से उनसे ज्ञान के विषय में जब चर्चा होती थी तो ज्ञान की गहराई में जाने का भी मौका मिलता था। जब कोई बात लिखकर उनके सामने ले जाते थे, कई शब्दों पर किस प्रकार चर्चा होती थी, सर्विस के बारे में बाबा क्या इशारे देते थे, कौन-सी बातें मुख्य रूप से उनके सामने रहती थीं, जब हम खेलते थे, तब कैसा बाबा का रूप रहता था, ये सब विभिन्न चरित्र हैं बाबा के।

कुछ भाई लोगों ने एक प्रश्न पूछा, जो शरीर से पुरुष हैं, उन्हें कैसे भगवान के साथ सजनी के संबंध का अनुभव हो सकता है? हो सकता है, इस आत्मा को भगवान के साथ सर्व संबंध अनुभव करने का सौभाग्य मिला। माता के साथ, पिता के साथ, सखा के साथ जो उसके साथ सर्व संबंध गाए गए हैं, उन सबका आध्यात्मिक रूप से अनुभव करने का मौका मिला। एक दफा नहीं, कई दफा। गीता पढ़ते हैं तो अंत में आता है, इस ज्ञान को पुनः पुनः स्मरण करके मेरा मन गद्गद होता है। तो वो अनुभव भी जब पुनः पुनः हमारे सामने आते हैं तो मन गद्गद होता है।

वो मेरा सिकिलधा पिता है, सिकिलधी माँ है

मैंने, भक्तिमार्ग के माध्यम से परमात्मा को खोजने के लिए, जो मेरे से हो सकता था, किया। मैं हर दिन प्रातः दो बजे उठकर, नहा-धोकर भक्ति किया करता था। शायद ही किसी धर्म का कोई मुख्य शास्त्र हो जो मैंने ना पढ़ा हो। शायद ही किसी धर्म का कोई प्रमुख नेता हो, जिसके साथ मैंने वार्तालाप न किया हो। किसी भी प्रकार की कोई भी साधना किसी ने बताई हठयोग, तंत्र, मंत्र, यज्ञ, हवन, माला, जाप, तीर्थयात्रा, वेद, पुराण, शास्त्र, चर्च-मस्जिद कोई भी बात ऐसी नहीं जो हमने ना की हो। एक खोज थी, कसक थी कि इसी जीवन में परमात्मा को पाना है। मैंने ओममण्डली की चर्चा अपने बड़े भाई से करने की कोशिश की। ऐसे अनुभव बहुत हुए कि बाबा हमें खींच रहा है, हमारी तैयारी करा रहा है किसी विशेष सेवा के लिए पर स्पष्ट पता नहीं था। जैसे बाबा कहता है, मेरे सिकिलधे बच्चे, मेरे भी जिगर से निकलता है, सिकिलधा बाबा। मैंने भी उसको बहुत सिक से पाया है। कितनी मेहनत मुझे शिवबाबा को प्राप्त करने के लिए करनी पड़ी। मेरे जिगर से निकलता है, वो मेरा सिकिलधा पिता है, सिकिलधी माँ है, मुझ आत्मा के, उनके साथ सर्व संबंध हैं। जब मैं आया, बाबा का प्यार मुझसे कितना था! हालांकि कई पुराने भाई-बहनें थे परंतु वे भी जानते हैं कि बाबा का मुझ पर कितना स्नेह था।

बाबा का मुझमें जो विश्वास था या जो हमारा बाबा में था, मैं समझता हूँ वह अभिन्न प्रकार का था। जब मैं इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में आया तो यहाँ समर्पण की कोई परंपरा नहीं थी। सिन्ध में जो भाई-बहनें समर्पित हुए थे, उस समय परिस्थितियाँ और थीं। लोगों ने विरोध किया था, उन पर अत्याचार हुए थे, उन्हें ज्ञान सुनने की इजाज़त नहीं दी गई थी, उन पर बंधन डाले गए थे, इस वजह से कुछ भाई-बहनें समर्पित किये गये थे और बाबा ने कन्याओं को शिक्षा देने के लिए हॉस्टल बनाया था।

मेरे समर्पण से नया सिलसिला शुरू हुआ

जब पहले-पहले मैंने अपने को ऑफर किया कि जीवन का लक्ष्य मुझे मिल गया, मैं ईश्वरीय सेवा में समर्पित होना चाहता हूँ तो मुझे भी कहा गया कि किसलिए समर्पित होना चाहते हो। तो मेरे समर्पण से नया सिलसिला शुरू हुआ, इससे पहले बहनों भाइयों के समर्पण का कोई प्रावधान नहीं था। फिर बाबा ने भी बहुत प्यार से मुझे उठाया, सर्विस दी, दिशानिर्देश दिये।

हर पोस्ट में तीन-तीन पत्र आते थे

उन दिनों मैं देहली में था, वहाँ तीन पोस्ट आती थीं। हर पोस्ट में मुझे तीन- तीन पत्र आते थे। एक पत्र लिखकर बाबा जब लिफाफा बंद करा देते तो ईशू बहन को कहते, फिर चिट्ठी लिखनी है, इसके बाद तीसरी भी लिखाते। इस प्रकार, तीन बार की पोस्ट में आठ-आठ या नौ-नौ पत्र हमें आते। ऐसा प्यार मैंने बाबा का पाया है। बाबा के साथ महीनों बैठकर ज्ञान की चर्चा करने का, योग का अभ्यास करने का तथा सेवा के दिशानिर्देश लेने का भी मौका मिला है।

बाबा कहते, जब तुम आते हो, शिवबाबा इसमें आता है।

बहुतों को याद होगा, जब मैं बाबा के पास जाता था, बाबा सबको हटा देते थे, कहते थे, जगदीश बच्चा आया है। बाबा कहते, जब तुम आते हो, शिवबाबा इसमें आता है। जब बाबा ऐसे कहते, मेरा भी ध्यान जाता कि बापदादा दोनों हैं। बाबा कहते, आप डायरेक्शन लेने आते हो, ज्ञान की कोई चर्चा करने आते हो तो उसको बताने के लिए शिवबाबा ब्रह्मा तन में प्रवेश करता है। मैं भी उसी स्थिति में बाबा के सामने बैठता कि शिवबाबा, ब्रह्मा के तन में है और उस अव्यक्त स्थिति में, फ़रिश्ता स्थिति में बापदादा मेरे सामने बैठे हैं। हम दोनों लाइट से घिरे हुए हैं और मन की ऊँची स्टेज है। योग जैसी अवस्था में बैठकर हम बातें करते। कोई आता, जाता उसका कोई भान न रहता। मन बहुत गद्गद रहता। खुशी होती कि जो हमने मेहनत की है उसका बापदादा ने हमको फल दिया है। हमारे पर उनकी अतिरिक्त कृपा है।

निमित्त बनने से आत्मा का सौभाग्य बन जाता है।

मुझे भरतपुर तथा कोटा हाउस में रहने का भी मौका मिला। मैं अकेला रहता था, बाबा ने मुझे अकेली जगह दी हुई थी कि इसका मंथन का कार्य है और इसके साथ कोई और नहीं रहना चाहिए। इस बच्चे का कमरा अकेला हो, जगह भी अकेली हो। कई बार तो बाबा कहते, देखो, उधर पहाड़ियों में गुफा है, तुम वहाँ चले जाया करो। दोपहर, शाम को मैं कई बार चला भी जाता। मैंने पहाड़ी का भी बहुत अच्छा लाभ लिया है। बाबा ने ज्ञान-योग आदि सब तरह से बहुत कुछ दिया है। इस आत्मा पर बाबा की छाप लगी हुई है। कठिन से कठिन समस्या आती जैसे कि झगड़ा, विरोध, सामना तो बाबा का पत्र, फोन या आदेश आता कि जगदीश को भेज दो। बाबा का कितना विश्वास था! मदद तो बाबा की होती है पर करने वाले का नाम और कल्याण हो जाता है। करते तो बाबा हैं क्योंकि करन-करावनहार वे ही हैं पर निमित्त बनने से आत्मा का सौभाग्य बन जाता है।
बाबा के साथ रहने का मुझे जो मौका मिला वो कोई कम नहीं मिला। ये बहनें तो सेन्टर पर चली जाती थीं सेवा करने के लिए। मैं तो रहता ही बाबा के पास था। कहीं सेवा के लिए बाबा भेजते थे तो जाता था। उस समय बहुत थोड़ी-सी सेवा थी, थोड़ी-सी मुरलियाँ निकलती थीं, वो हाथ से सिन्धी में लिखी जाती थीं। उन दिनों सिन्धी जानने वाली ही टीचर्स थीं, वे ही सुनाती थीं।

उनका मेरे से अनन्य प्यार है, मेरा उनसे अनन्य प्यार है।

मेरे ख्याल में, शुरू-शुरू में 10-15 साल तक कोई एक भी मुरली ऐसी नहीं होगी जिसमें बाबा ने मुझे, जगदीश बच्चे को याद न किया हो। दस-पंद्रह साल तक लगातार। जो पुरानी बहनें हैं उनको मालूम है, जैसे गुलजार दादी हैं, मनोहर दादी हैं, जानकी दादी हैं। ये पढ़ते थे मुरली, कहते थे बाबा ने इसको याद किया है। बाबा से हम मिलने जाते थे, तब कोई बहनें बैठी हों, बाबा से बात कर रही हों तो बाबा बहनों को कहते थे, बच्चे, अब आप जाओ। सबको भेज देते थे, फिर मेरे से बात करते थे। कई दफा इनको एतराज़ होता था कि बाबा, यह क्या करते हो। हम बात कर रहे हैं, हमको बाहर भेज दिया, अब इससे बात कर रहे हो, हँसी में कहते थे। बाबा कहते थे, जब यह बच्चा आता है, शिवबाबा मेरे में प्रवेश करता है, उनको कुछ डायरेक्शन देने होते हैं इसको। अभी तुम जाओ बेशक, अभी इसको बात करने दो। ऐसा सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ, बाबा की ऐसी पालना मिली। रोम-रोम में बाबा के कितनी प्रीत थी! ऐसा महसूस होता था कि केवल मैं ही बाबा को याद नहीं करता, बाबा भी मुझे बहुत याद करते हैं, मेरे साथ उनकी बहुत घनिष्ठता है। उनका मेरे से अनन्य प्यार है, मेरा उनसे अनन्य प्यार है।

पुरानी बहनें हैं, बहुत पवित्र हैं

शुरू से मेरी यह इच्छा थी कि बाबा और मैं, तीसरा बीच में कोई नहीं ऐसा मिलन हो। ऐसा मिलन होता भी रहा। ऐसा अनुभव किया। बाबा ने मुझे इतना प्यार किया, इतना प्यार किया कि योग लगाने में क्या कठिनाई? ये जो पुरानी बहनें हैं, ये बहुत पवित्र हैं, इसलिए उनमें कुदरती प्यार है ही। ये रहमदिल हैं, हरेक के प्रति इनकी बहुत शुभ भावना है। जब मैं आया था, मैं तो कुछ भी नहीं था। इन्होंने ही पालना दी। इन्होंने ही मुझे आगे बढ़ाया, मार्गदर्शन किया। स्वाभाविक है, इनके उगाये हुए फूल हैं हम, तो ये हमारी रखवाली तो करेंगे, स्नेह तो देंगे। ऐसा हमारा जीवन प्यार का, मम्मा, बाबा और बड़े भाई-बहनों के साथ व्यतीत हुआ। बहुत-से लोग पूछते हैं कि योग कैसे लगायें, योग कैसे लगायें? एक ही सूत्र (फार्मूला) है योग का कि प्यार करो, प्यार करो; बाबा से तीव्रतम प्यार करो। बस, यही योग है।

निरक्षरी भट्टाचार्य

भारत में एक फिल्म आई थी, उन दिनों दीवार पर लिखा जाता था फिल्म का नाम। एक बहन जब देहली से मधुबन जाती थी तो उन फिल्मों का नाम बाबा को बताती थी, कहती थी बाबा, आजकल यह फिल्म आई हुई है। बाबा का फिल्म से क्या संबंध है? यह तो विरोधात्मक वस्तु है ना। लेकिन बाबा फिर उस पर समझाते थे। आपने देखा होगा कि दुनिया के जो गीत हैं उनका भी बाबा ने कितना अच्छा आध्यात्मिक अर्थ बताया है! तो एक फिल्म आई थी, 'अनपढ़', दूसरी थी, 'मैं चुप रहूंगी'। बाबा ने कहा, 'मैं अनपढ़ हूँ और मैं चुप रहूंगी' ये तुम्हारे ऊपर लागू होता है। ये फिल्में तुम्हारे कारण बनी हैं। बूढ़ी-बूढ़ी मातायें हैं, और कुछ पढ़ नहीं सकती हैं, गाँव से आती हैं, निरक्षर भट्टाचार्य हैं। भट्टाचार्य का अर्थ है बड़े विद्वान। बूढ़ी-बूढ़ी मातायें हैं निरक्षर भट्टाचार्य। अक्षर नहीं जानतीं लेकिन बड़ी विद्वान हैं क्योंकि ऊँचे-से-ऊँचे बाप को जानती हैं।
जब मैं ज्ञान में आया था तब बाबा ने कहा, बच्चे की बुद्धि में भूसा भरा हुआ है। मैं देखने लगा कि भूसा कहाँ भरा हुआ है, निकालूँ उसको। एक भूसा होता है जो गाय-भैंस को खिलाने के काम आता है, यह जो उल्टे ज्ञान वाला भूसा भरा है वो बिल्कुल फेंकने वाला भूसा है। यह गाय-भैंस के काम भी नहीं आता। यह सड़ा हुआ भूसा है। सड़ा हुआ भूसा गाय के आगे चारा बनाकर रख दो, वो सूँघके भूखा रहना मंजूर करती है लेकिन खाती नहीं है। हमारी बुद्धि में जो सारा उल्टा ज्ञान फँसा हुआ है, यह भूसा है, वो भी सड़ा हुआ। मैंने सोचा, यह तो मुश्किल काम हो गया सड़े हुए भूसे को निकालना। इस तरह, बाबा की बातें बहुत अजीब और अनोखी होती हैं।

प्रेम की भी पीड़ा होती है

विदेश में एक समर्पित ब्रह्माकुमारी बहन से मैंने पूछा, कि आपको प्रेम की पीड़ा, प्रेम के दर्द का अनुभव हुआ है? उसने पूछा, प्रेम से दर्द क्यों होता है? पास में जो बहन थी, उसने कहा, देखो, मीरा का गीत है 'मैं तो प्रेम-दीवानी, मेरा दर्द न जाने कोई।' है ना यह गीत मीरा का! प्रेम का दर्द होता है। प्रभु-प्रेम की यह आग बुझाये न बुझे। यह प्रेम की आग सताने वाली याद होती है। जिसको यह प्रेम की आग लग जाती है, फिर यह नहीं बुझती। प्रभु-प्रेम की आग सारी दुनियावी इच्छाओं को समाप्त कर देती है। एक गीत में भी है कि "हे प्रभु, आपका मुझसे जो प्यार है, आपसे मेरा जो प्यार है, उसको एक आप जानते हो और एक मैं जानता हूँ, और न जाने कोई।" आपको लगता है, बाबा से मेरा प्यार ऐसा है? बाबा भी हमसे इतना प्यार करता है, हमारे बिना बाबा भी रह नहीं सकता। बाबा को नींद नहीं आती। भगवान नींद नहीं करता। क्यों? क्योंकि बच्चों से उसका इतना प्यार है, उनको याद करता है तो सोयेगा कैसे? यह एक बात भी हमारे ध्यान में आ जाये: प्यार, प्रभु का प्यार। उसका मुझसे प्यार है, मेरा उससे प्यार है, तो भी कल्याण हो जाये।

जगदीश भाई जी के त्यागी, तपस्वी और सेवामय जीवन की लगभग 40 वर्षों तक साक्षी रही ब्र.कु.बहन चक्रधारी उनके बारे में इस प्रकार बताती हैं -

बचपन से ही आपके मन में वैराग्य की भावना थी और कहते थे कि मुझे ऋषिकेश में जाकर ही वास करना है। एक बार ऋषिकेश में स्थान भी देखने गए कि अगर वातावरण अच्छा हो तो कमरा लेकर वहीं रहकर साधना की जाये। जगदीश भाई का ऑफिशियल नाम तो जगदीश चंद्र ही था। घर में उनका नाम ऋषिकेश था और आलमाइटी बाबा ने उन्हें जो अव्यक्ति नाम दिया, वह था, 'मनोहर फूल'। इसके अलावा बाबा ने उन्हें 'गणेश' और 'संजय' (दिव्यदृष्टिधारी) नाम भी दिये थे।

ईश्वरीय ज्ञान सीखने में कठिनाइयों का सामना

एक बार बहनें थियोसॉफिकल सोसायटी में भाषण, करने के लिए गई थीं, जगदीश भाई भी भाषण सुन रहे थे। जब बहनें प्रोग्राम पूरा करके बाहर आईं तो आप भी ये जानने के लिए कि ये बहनें कहाँ रहती हैं, उनके पीछे-पीछे आये। आपने उनसे उनके सेवास्थान का पता पूछा और आने का समय पूछा। बहनों ने सुबह चार बजे का समय दिया। जगदीश भाई ने सोचा कि अब मैं अपने रहने के स्थान पर जाऊँ और सुबह ठीक चार बजे बहनों से ज्ञान लेने के लिए पहुँचूं, इतना समय तो नहीं है इसलिए वे वहीं एक पेड़ के नीचे साइकिल खड़ी करके समय व्यतीत करने लगे और सुबह चार बजे सेवाकेन्द्र पर पहुँच गये। उस समय बहनें दिल्ली मलकागंज में छोटे-से कमरे में रहती थीं। वहीं से आपने ज्ञान लिया। आपको ईश्वरीय ज्ञान की इतनी लगन थी कि आप कई बार तो सुबह चार बजे से पहले ही पहुँच जाते थे। शाम को भी क्लास करते थे। क्लास करके अपने निवास (सोनीपत में एक हॉस्टल) पहुँचने में इन्हें रात के 12 बज जाते थे तब तक हॉस्टल के दरवाजे बंद हो जाते थे। भाई साहब ने सुनाया था, एक बार मैं खिड़की से कूदकर अपने कमरे में जा रहा था, किसी ने खिड़की के अंदर मटका रख दिया था, मुझे मालूम नहीं था कि यहाँ मटका रखा हुआ है। ज्यों ही मैं कूदा, मटका गिरा, जोर से आवाज आई, सारे लोग खड़े हो गए और कहने लगे, क्या हो गया, क्या हो गया। मैं भी उनके साथ शोर मचाने लगा कि क्या हो गया.. ताकि यह ना पता चले कि मैं लेट आया हूँ। क्या हुआ.. क्या हुआ.. चोर आया.. ऐसा शोर मचाकर सब सो गये। फिर, रात को दो-अढाई बजे उठकर, नहा-धोकर मैं फिर खिड़की के रास्ते निकल गया ताकि सुबह की क्लास कर सकूँ। किसी को पता न पड़े इसलिए पीछे की खिड़की से कूदकर बाहर जाना पड़ता था।
एक बार रात के अंधेरे में एक शराबी ने पकड़कर पिटाई भी कर दी कि यह कौन है जो रोज आता है। फिर भी ज्ञान सुनना छोड़ा नहीं। आश्रम तक पहुँचने का रास्ता बड़ा ऊबड़-खाबड़ था, चोर लूट लेते थे इसलिए घड़ी पहनकर नहीं आते थे, टाइम का पता नहीं पड़ता था। अगर टाइम से पहले पहुँचकर दरवाजा खटखटाते थे तो बहनें दरवाजा भी नहीं खोलती थीं। एक बार ऐसा ही हुआ, बहनों ने कहा, इतना जल्दी क्यों आ गये हो, अभी दरवाजा नहीं खुलेगा तो पान वाले से जाकर समय पूछा। पता पड़ा कि अभी तो चार बजे हैं। भाई साहब का जीवन सादा होने के कारण बहनें समझती थी कि साधारण-सा है लेकिन कई बार साधारण दिखने वाला भी अंदर से कितना महान हो सकता है, यह भी सत्य है।

बाबा का डायरेक्शन सेवाकेन्द्र प्रति

बाबा ने कहा था, सेवाकेन्द्र ऐसे स्थान पर खोलो जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के सामने हो, जिसकी दीवार किसी गृहस्थी के घर की दीवार से ना मिले। सचमुच ऐसा एक भवन मिला जो बाबा की कंडीशन के अनुसार था। वह था, प्रथम सेवाकेन्द्र जहाँ आप समर्पित रूप से रहे, कमला नगर दिल्ली का। जगदीश भाई जी हमें सुनाया करते थे, उस समय सेवाकेन्द्र पर दो ही कमरे थे तथा एक छोटा-सा स्टोर था। एक कमरे में बहनें रहती थी, किचन बहुत छोटी थी। भाई साहब का जो कमरा था, उसी में क्लास होती थी। लिखने आदि का सारा काम वे वहीं करते थे। अलमारियाँ दीवार में ही पत्थर की स्लैब डालकर बनाई गई थी जिनका कोई दरवाजा नहीं होता था। जैसे ही हवा आती थी, सारे कागज उड़ने शुरू हो जाते थे। वे बताते थे कि मेरा काफी समय कागज़ समेटने में ही लग जाता था।

भगवान मिला, इससे बढ़कर और क्या चाहिए

मधुबन से नित्य बाबा किसी न किसी बहन को यहाँ भेजते ही रहते थे। भाई साहब यह भी सुनाते थे कि एक ही लैट्रिन बाथरूम था। स्नान करने वाले ज्यादा थे इसलिए हम लोटा लेकर दूर जमुना जी के घाट पर चले जाते थे। वहाँ पब्लिक लैट्रिन बनी हुई थी। वहीं स्नान-पानी करके फिर घर आते थे। लेकिन कभी भी मन में यह नहीं आया कि यह क्या, यहाँ तो स्नान के लिए भी जगह नहीं मिलती। अरे, भगवान मिल गया, इससे बढ़कर और क्या चीज़ चाहिए। भगवान मिल गया, स्नान का प्रबंध नहीं मिला, खटिया नहीं मिली तो क्या बड़ी बात है! इस प्रकार भाई साहब ने शुरू से जीवन बड़ा त्याग का जीया।

ईश्वरीय सेवा की लगन

सेवाकेन्द्र के पास एक आर्यसमाजी स्कूल था। भाई साहब पहले आर्यसमाज से संबंध रखते थे। एक बार उन्होंने उनसे बातचीत करके कार्यक्रम के लिए उनका हॉल ले लिया और बहनों का भाषण रख दिया। इतने पैसे नहीं होते थे कि पर्चे छपवाएं और बाँटे, इसलिए स्वयं ही दरियाँ बिछाई और बाहर सड़क पर खड़े हो गए। फिर पकड़-पकड़ कर लोगों को लाने लगे कि 'आओ, देवियों का भाषण सुनो, आबू पर्वत से उतरी हैं ये देवियाँ।' उनका लक्ष्य होता था कि देवियों के आने से पहले हॉल भर जाए और सबको बहनों द्वारा प्यारे बाबा का संदेश मिल जाए।
मुझे एक शिक्षा भाई साहब ने दी कि कोई भी ज्ञान सीखने आए तो उससे प्रभावित नहीं होना कि यह तो बहुत अच्छा है लेकिन किसी से नफरत भी नहीं करना। यह शिक्षा हमको बहुत काम आई।

सुविधायें कम, कार्य अति महान

सेन्टर पर कुर्सी और मेज नहीं थे, क्लासरूम में ही बैठकर लिखते रहते थे इसलिए कंधे निकल आए और कमर झुक गई। पेट भी थोड़ा बड़ा होता गया। उनके कमरे की एक खटिया ही उनका सब कुछ होती थी। उसी पर बैठकर खाना भी है, लिखना भी है और सोना भी है। एक छोटा-सा स्टूल होता था जिस पर उनके सारे पेन आदि रखे होते थे। पेट पर ही तकिया रखकर, उस पर तख्ती रख लिखते रहते थे। कई लोग कहते थे, जो यहाँ के संपादक हैं, उनका ऑफिस दिखाओ, हम उनके ऑफिस में उनसे मिलना चाहते हैं। ऑफिस हो तो दिखायें, इसलिए हम आने वालों को नीचे ही बिठा लेते थे और कहते थे कि आप बैठिए, हम भाई साहब को यहीं बुला लेते हैं, वो आपसे यहीं आकर मिल लेंगे। वे किसी मिलने वाले को अपने कमरे में नहीं बुलाते थे।

अति साधारण पहनावे में भी गुणों की झलक से सफलता

जब जगदीश भाई यज्ञ में आये तो बेगरी पार्ट चल रहा था। सिंध-हैदराबाद से आये हुए पुराने कपड़े कुछ स्टॉक में पड़े रहते थे, उनमें से ही इनको कोई पजामा-कुर्ता मिल जाता था, उसी से काम चलाते थे। कहते थे, कभी भी कोई कपड़ा फिट नहीं आता था। कभी किसी पजामे की टांग ऊपर चढ़ जाती तो कोई नीचे लटकता रहता था। ऐसे ही कपड़े पहनकर बड़े-बड़े लोगों से मिलने चले जाते थे लेकिन उनका बातचीत करने का तरीका ऐसा था कि किसी से भी अप्वाइंटमेंट ले आना उनके लिए बहुत सरल था। दृढ़ता इतनी थी, कहते थे, कोई काम करना है तो करना ही है और युक्ति से अपना काम कर ही लेते थे।
उन दिनों कार तो होती नहीं थी, बसों में ही आना-जाना होता था। रिक्शा के लिए भी पैसे खर्च नहीं कर सकते थे। भाई साहब प्रोग्राम देते, चलो, आज किसी से मिलने जाना है। मिलने का समय निश्चित होता था पर बस मिलना तो निश्चित नहीं होता था। दादी गुलजार भी साथ होती थी। हम सड़क पर पहुँचते थे, यदि सामने से कोई बस आ रही होती थी, तो कहते थे, गुलजार दादी, आप जल्दी-जल्दी बस के आगे खड़े हो जाओ और हाथ दो। सड़क के बीचों-बीच खड़े होकर हम हाथ देते थे। गुलजार दादी साड़ी उठाए जल्दी-जल्दी दौड़ती थी और जगदीश भाई कहते थे कि आप इस तरह बीचों-बीच खड़े हो जाओ जो बस आगे निकल ही न पाए। जैसे ही बस खड़ी होती थी, भाई साहब गेट पर खड़े होकर कहते थे, आइये बहन जी, बहनों को चढ़ाकर खुद भी चढ़ जाते थे क्योंकि टाइम पर पहुँचना होता था।

कड़ी परिस्थितियों में युक्ति से मुक्ति

एक बार बनारस में एक कांफ्रेंस थी, उसका निमंत्रण मिला, सारा दिन उसका मैटेरियल तैयार किया और प्रेस में छपवाया। उस समय प्रथम और द्वितीय श्रेणी की तो बात थी ही नहीं, तृतीय श्रेणी में ही सफर करते थे। ठंडी बहुत थी, अपने साथ एक रजाई ले गये थे, उस रजाई को लपेटकर ऊपर की बर्थ पर सो गये। दिन-भर काम करने के कारण थकान इतनी हो गई थी कि गहरी नींद में करवट ली और नीचे गिर गये। नीचे बैठे लोग चाय पी रहे थे, उन पर गिरे तो उनके कप-प्लेट भी टूट गये। भाई साहब ने बताया कि मेरे को चोट तो नहीं आई क्योंकि रजाई में लिपटा हुआ था लेकिन वो लोग चिल्लाने लगे कि हमारी चाय गिरा दी, प्लेटें तोड़ दी, बाबूजी पैसे निकालो। बाबू जी के पास तो पैसा एक भी नहीं। बहनों ने टिकट बनवाकर दे दी थी और एक रुपया दिया था, रिक्शा से आश्रम तक जाने का। पैसे कहाँ से दें, तो शोर मचाया कि मुझे बहुत चोट लगी है। यह सुनकर उन्हें तरस आ गया ओर बात खत्म हो गई। चोट लगी नहीं थी पर पैसे थे ही नहीं तो यह सब कहना पड़ा। ट्रेन से उतरकर एक रिक्शा वाले से पूछताछ की, वह पैसे ज्यादा मांग रहा था। तो रजाई को लपेटकर बगल में दबाया, थैला उठाया और पैदल ही चल पड़े ताकि कुछ आगे जाकर रिक्शा ले लेंगे, सस्ता मिलेगा। आगे जाकर ज्यों ही रिक्शा में बैठे, पजामा घुटनों से फट गया। बगल में रजाई, एक हाथ में थैला, दूसरे हाथ से पजामा पकड़ लिया ऐसी स्थिति में सेन्टर पहुँचे। भाई साहब हमेशा सूई-धागा साथ में रखते थे क्योंकि कभी कोई कपड़ा फट जाता था, कभी कोई, तो सफर में ही सिलाई कर लेते थे।

बहनों के प्रति सदा श्रद्धावान

कई बार बहनें दो आने देकर भाई साहब को बाहर भेजती थी और पर्चे छपवाने तथा खरीदारी के कार्य करने को कहती थी। भाई साहब किराया बचाने के लक्ष्य से पैदल जाते, पैदल आते और किसी को ज्ञान सुनाकर, किसी से स्नेहपूर्वक कहकर उन दो आनों को भी बचा लेते थे। यज्ञ की बड़ी बहनों के पास भले ही दुनियावी ज्ञान नहीं था पर उन्हें देखकर लगता था कि ये देवियाँ हैं इसलिए भाई साहब कोई भी सेवा करने के लिए हरदम तैयार रहते थे। जब प्रोग्राम होते थे तो वे हमेशा मंच सचिव बनते थे ताकि भाषण में कोई बात छूट जाये तो उसे स्पष्ट कर सकें।
बाबा ने भाई साहब को अधिकार दिया था कि बच्चे, तुम भक्ति आदि की या अन्य प्रकार की कोई भी किताब पढ़ सकते हो, फिर उसकी ईश्वरीय ज्ञान से तुलना कर सत्यता को लोगों के सामने रख सकते हो। कई बार हम भाई साहब को कहते थे कि आपके पास इतनी किताबें पड़ी हैं, कुछ हमको भी पढ़ने के लिए दे दो, तो कहते थे, यह ईश्वर की आज्ञा नहीं है, जो आपके काम की चीज होगी, वो आपको मैगजीन द्वारा या साहित्य द्वारा मिल जायेगी, इन्हें पढ़कर आप अपना टाइम खराब क्यों करती हो।

माताओं-बहनों से जिगरी स्नेह

कई बार सुनाते थे कि यज्ञ के कार्य अर्थ भी कई प्रकार के कष्ट सहन करने पड़े। ‘एक बार एक बहन धी, ज्ञान में चली तो पति पवित्रता के लिए झगड़ा करता था। फिर केस चला। उस बहन की रक्षा के लिए भाई साहब को मार भी खानी पड़ी। लेकिन कहते थे, इन माताओं-बहनों को बचाने के लिए ब्रह्मा बाबा ने कितना सहन किया, हमने चार थप्पड़ खा लिए तो क्या हुआ। माताओं-बहनों के लिए बहुत स्नेह था।' भाई साहब हर कार्य में बहनों को आगे रखते थे। किसी से मिलना हो, कार्यक्रम लेना हो तो बहनों को साथ जरूर लेते थे क्योंकि बाबा ने बहनों को आगे रखा है। हमें तो मूर्ति बनाकर साथ ले जाते थे। अधिकारी को कहते थे, बहन जी, आपके लिए टोली लाई हैं और हमें कहते थे, आप योगयुक्त होकर दृष्टि देते रहना, बात मैं खुद कर लूँगा।

विघ्न-विनाशक: विघ्नों के पूर्व आभास से विघ्नजीत

उनके कामों में विघ्न बहुत आते थे। हम कहते थे, आपका नाम इसलिए बाबा ने विघ्नविनाशक रखा है, विघ्न आयेंगे, फिर आपको उन्हें खत्म करना होगा। कितना भी बड़ा विघ्न आये, बड़ी से बड़ी बात आये पर उनके मन में यह नहीं आता था कि बाबा की सेवा नहीं होगी। कई बार ऐसा भी होता था, मान लो गाड़ी में हमें रिजर्वेशन नहीं मिली तो कहते थे, जब गाड़ी चलने लगे तो फौरन चढ़ जाना। मैं कहती थी, टी.सी. देख रहा है आँख टेढ़ी करके, मैं बिल्कुल नहीं चढूँगी तो कहते थे, मैं कहता हूँ, चढ़ जाना। हम चढ़ जाते थे। टी.सी. देखता रहता था फिर उस टी.सी. को पता नहीं कान में क्या फूंक मारते थे अर्थात् समझाते थे जो वह कहता था, चलो, एडजस्ट होकर बैठ जाओ।
एक बार रशियन लोगों को आबू जाना था। रिजर्वेशन हुई पड़ी थी। बस द्वारा रेलवे स्टेशन जाना था। इसी बीच ट्रैफिक की हड़ताल होने का समाचार आया। भाई साहब ने कहा, आप ट्रैफिक पुलिस में एक एप्लीकेशन लिखकर दे दो और बस की परमिशन ले लो। हमने परमिशन लेने के लिए भाइयों को भेजा। उन्होंने कहा कि दीदी, वो कहते हैं, वोट क्लब में यह हड़ताल होगी, आम एरिया में नहीं होगी इसलिए आप लोगों को परमिशन की कोई जरूरत नहीं है। मैंने कहा, ठीक है, मैं भाई साहब को बता देती हूँ। मैंने बताया तो कहने लगे, आप समझते नहीं हो, भाइयों को कहो, परमिशन लेकर ही आना है। मैंने कहा, जब हड़ताल होनी ही नहीं है तो फिर परमिशन लेने की क्या जरूरत है और परमिशन देते भी नहीं हैं। फिर स्वयं फोन करके कहा, छोटे ऑफिसर को छोड़ दो, बड़े ऑफिसर के पास जाओ और कहो, हमें लिखित में दे दो कि हमारी बस निकल सकती है। बड़े साहब ने कहा, परमिशन की कोई आवश्यकता नहीं है, हड़ताल दूसरे क्षेत्र में होगी। आपको तो पुरानी दिल्ली जाना है, आप भले जाना। लेकिन भाई साहब ने कहा, अगर जरूरत नहीं है तो भी परमिशन लेटर देने में जाता क्या है? इस प्रकार, बहुत पुरुषार्थ के बाद, बड़े साहब ने स्टेम्प लगाकर लैटर लिख दिया। अगले ही दिन पुलिस ने हर चौराहे को ट्रैफिक के लिए बंद घोषित कर दिया। किसी भी प्रकार का ट्रैफिक वहाँ से निकल नहीं सकता था। हमारे पास तो परमिशन थी और वो भी बड़े ऑफिसर की। किसी ने हमारी बस को नहीं रोका। सारी सड़क पर हमारी ही बस घूम रही थी और इस प्रकार सभी विदेशी भाई-बहनें ठीक समय पर रेलवे स्टेशन पर पहुँच गये। भाई साहब को बाबा ने 'गणेश' टाइटल दिया था तो उनकी बुद्धि इतनी तेज थी जो आने वाले विघ्नों को पहले से ही जान जाती थी। वे बहुत ही दूरांदेशी थे।

बहनों को सदा चैतन्य देवियाँ समझा

दिल्ली का अंबेडकर स्टेडियम खेलने का स्थान है, धार्मिक प्रोग्राम वहाँ न हुए और न हो सकते थे लेकिन भाई साहब ने अंबेडकर स्टेडियम में प्रोग्राम फाइनल कर दिया। शाम को प्रोग्राम होना है और सुबह कुश्ती के लिए आये हुए पहलवानों ने कह दिया कि हम तुम्हारी लगाई हुए स्टेज को तोड़ देंगे। भाई साहब ने कहा, तुम तोड़ो, मैं तुम्हारा सामना करने को तैयार हूँ, फिर उनके साथ दोस्ती भी कर ली। थोड़ी देर में उनके गले में हाथ डालकर चलने लगे। पता नहीं, क्या कहते थे कि लोग ठंडे हो जाते थे। मैं पूछती थी, भाई साहब, आपने उनको कहा क्या, कोई तो बात कही होगी? तो कहते थे, मैंने उनको कहा कि देखो, जो पहलवान होते हैं, वे देवियों के पुजारी होते हैं और यह देवियों का काम है। आपके प्लेग्राउंड होते हैं और यह देवियों का काम है। आपके प्लेग्राउंड में यह कार्यक्रम मैं भी नहीं करना चाहता क्योंकि मैं भी आपका भाई हूँ लेकिन अब तो पान का बीड़ा उठा लिया और देवियों का काम जहाँ हो, उसे अगर बीच में छोड़ दिया जाये तो विघ्न बहुत आते हैं, तो आपके स्टेडियम में विघ्न बहुत आयेंगे। आप पहलवान लोग देवियों के उपासक हो। मैं नहीं चाहता कि आगे चलकर आपको विघ्न आयें। आप जहाँ जाओ, आपकी जीत होनी चाहिए, नहीं तो आपकी जीत में कमी आ जायेगी इसलिए मैं आपको प्यार से बता रहा हूँ। आपके एक बार कहने से ही मैं स्टेज को उठा देता पर मैं मजबूर हूँ आपके कारण, बहनों के कारण नहीं। इन बहनों को आप नहीं पहचानते, मैं पहचानता हूँ। ये देवियां हैं और देवियों के काम में विघ्न नहीं आने चाहिए इसलिए आप मुझे सहयोग दो। जो और लोग आके खड़े हुए हैं, उन्हें भी कहो कि शान्ति का सहयोग दें। जो हो रहा है, होने दो। इस प्रकार उन लोगों को अपने में मिला लेते थे। अगर कुछ लोग फिर भी विरोधी रह जाते थे तो उनकी तरफ से कहते थे, हमारे अपने ही घर में फूट हो तो हम क्या करें। इस प्रकार सेवा हो जाती थी।

नाम, मान, शान, दिखावे से मुक्त

यज्ञ सेवा के कार्य करते कई बार बहुत मेहनत करते थे, अधिकारीगण किसी बात की स्वीकृति देने से ना भी कर देते थे, तो भी लास्ट घड़ी तक प्रयास करते रहते थे। मैं कहती थी, भाई साहब छोड़ दीजिए, इनका कानून नहीं है, तो कहते थे, भगवान के काम में लॉ (कानून) बीच में नहीं होता है। हम तो फिर शांत हो जाते थे। फिर हम देखते थे, स्वीकृति लेकर ही रहते थे। किसी को पता भी नहीं पड़ता था कि यह सब हो कैसे गया। कभी शो नहीं करते थे कि मैंने यह किया। कई बहन-भाई अपनी-अपनी सेवा का वर्णन उनके आगे करते थे तो सुनते थे पर कभी यह नहीं कहते थे, मैं भी कर रहा हूँ। कहते थे, बाबा की सेवा की है, बाबा ने तो जान ही लिया है।

बेहद सेवा में सदा अथक

एक बार प्रगति मैदान में मेला लगने वाला था, अधिकारियों ने केवल 8 छोटे स्टाल देने ही स्वीकृत किए पर भाई साहब ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया- प्रगति मैदान में तो सारे विश्व के लोग आयेंगे, कितनों का आशीर्वाद आप सबको मिलने वाला है और इस स्थान पर बहुत बड़ी सेवा होने वाली है, इसका अहसास शायद आपको नहीं है, आप भले ही छोटे स्टाल दो, पर दो पंद्रह ही। उन दिनों उनकी तबीयत बिल्कुल अच्छी नहीं थी फिर भी अथक होकर यह कार्य किया। किसी को पता नहीं पड़ता था कि जगदीश भाई इतने चक्कर क्यों काट रहे हैं। स्वीकृति मिल जाने के बाद भी खड़े होकर कार्य को करवाते थे। ना खाना खाते थे, ना पानी पीते थे, मान लो हम थोड़ा सूप लेके जाते थे, देते थे, तो कहते थे, ये पीछे की बातें हैं। हमको कहते थे, जाओ, खाओ। बहनों का बहुत ध्यान रखते थे। कई कामों में भाग-दौड़ और विघ्न बहुत होते थे, पर सब बातें सहन करते थे।

दृढ़ता से सफलता

दिल्ली में हमने मकान का नक्शा बनाया क्या था और वह बन क्या गया। मैं कहती थी, देखो, अखबार में आ गया है कि जो नक्शे के अनुकूल नहीं होगा, उसे तोड़ देंगे, मकान तो अब टूट जायेगा। उनका दिल बहुत बड़ा था, कहते थे, मैं सब कुछ आगा- पीछा देखकर करता हूँ, हम बाबा की सेवा कर रहे हैं, अपने सुख के लिए नहीं बना रहे, भगवान की छत्रछाया है, उसको नहीं मालूम है कि मेरे बच्चे किसलिए कर रहे हैं, आप नेगेटिव मत सोचो। इस प्रकार, जिस काम को उठा लेते थे, उसको पूरा करके ही छोड़ते थे।

हर प्रकार की बचत

मैं कई बार कहती थी कि आप अपना वारिस तो किसी को बनाओ तो सुनकर शांत हो जाते थे, कभी यह नहीं कहते थे कि फलां व्यक्ति मेरे पीछे देख लेगा। कहते थे, बाबा का कार्य है। उनको शुरू से यह संस्कार था कि काम भले ज्यादा हो पर करने वाले ढेर नहीं होने चाहिए। कई बार काम एक होता है और दस करने वाले साथी-सहयोगी हो जाते हैं-यह वे नहीं चाहते थे। अंत तक उन्होंने अकेले ही काम किया, कोई दूसरा साथ में नहीं लिया। कई बार स्वयं ही फोटोकॉपी कराने जाते थे क्योंकि काम भी बढ़िया होना चाहिए और जहाँ 50 पैसे लगते हैं वहाँ 40 पैसे में काम होना चाहिए। कहते थे, यज्ञ में हम धन से सेवा नहीं कर रहे पर यह जो बचत कर रहे हैं, यह भी धन की ही सेवा है। इसलिए हम लोगों को तन, मन, धन तीनों तरीकों से सेवा करनी चाहिए। हमें भी सिखाते थे, हर बात में बचत का ख्याल रखो, कपड़ा अगर फट रहा है तो ऐसे नहीं कि फटता ही चला जाये, उसको संभाल लो पर अपने पास कपड़ों का ढेर भी ना लगा लो। चीज़ उतनी ही होनी चाहिए जितनी से काम चल जाए। उनको यह होता था कि मेरे पास जो काम करने आए, उसे यह ना हो कि अब तो मेरा खाने का समय हो गया, अब मेरा सोने का समय हो गया। जिसका सोने का, खाने का टाइम निश्चित है, वह मेरे पास काम नहीं कर सकता। मुझे ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसे भूख और नींद ध्यान में ना आए। जब काम है तब काम। मान लीजिए, कोई उनके पास सेवारत है, खाने गया और खाने का आनन्द ले रहा है तो कहते थे, यह मेरे योग्य नहीं है क्योंकि इसमें त्याग नहीं है। काम की सफलता तब होगी जब त्याग और तपस्या होगी। मानो, कोई सोया हुआ है और उसको कहा, उठो, जल्दी से एक सेवा में जाना है और वो कह देता है, आधे घंटे बाद उठूंगा तो भाई साहब कह देते थे, यह सेवा नहीं करेगा। जिसको बाबा की सेवा की लगन है, वह यह नहीं देखेगा कि यह मेरा नींद का टाइम है। कई बार हम कहते थे, आप बहुत सख्त कार्य देते हो, तो कहते थे, मैं कहाँ कार्य दे रहा हूँ, आप उसे अपने काम में लगा लो। मुझे अपने काम में वो आदमी चाहिए जो वैसे ही चले, जैसे मैं चाहता हूँ। कई बार, कई आजकल की बुद्धि वाले ऐसा भी कह देते कि कल कर लेंगे, आज क्या पड़ी है तो कहते थे, यह अपनी बुद्धि चलाता है, इसको यह भी नहीं मालूम कि कल क्या होगा और कल कौन-सा काम करना होगा, कल के लिए मेरी कोई और योजना हो तो। यह बुद्धिवान सोचता है कि मेरी बुद्धि भी काम करे पर इस प्रकार बुद्धियों में टकराव आ जाता है।

शारीरिक नुकसान से रहे अनभिज्ञ

बाबा ने संदेश में कहा कि उन्होंने शरीर का ध्यान नहीं रखा। वास्तव में, डॉक्टर लोग यह तो कहते थे कि आपको रेस्ट करना चाहिए पर यह नहीं बताते थे कि रेस्ट नहीं करेंगे तो इससे स्वास्थ्य में क्या-क्या नुकसान होगा। भाई साहब यह भी कह रहे थे कि शारीरिक मेहनत से लीवर को क्या नुकसान होगा, डॉक्टर्स ने मुझे एक बार भी नहीं बताया। सिर्फ कह देते थे कि आपको ज्यादा श्रम नहीं करना है।

बहनों को हर बात में मान

हमें सहयोग पूरा देते थे पर जहाँ ऑफिशियल रहना होता था वहाँ पूरे ऑफिशियल थे। ऐसे नहीं कि उनका कोई कागज़ हम पढ़ लें। कई बार समाचार सुनाने हम उनके कमरे में चले भी जाते थे। यदि कोई समाचार नहीं सुनाते थे तो यह भी कह देते थे, आप लोगों ने मुझे कुछ नहीं सुनाया। कहीं भी जाते थे, कुछ भी मिलता था, सब लाकर हम निमित्त के सुपुर्द कर देते थे। हम कहते थे, आप भी बड़े हैं, आप रखिए, पर कहते थे, नहीं। कोई लिफाफा पकड़ाता था तो भी कहते थे, बहन जी को दीजिए। इस प्रकार, हर बात में मान देते थे।

तीक्ष्ण बुद्धि

कोई मिलने आता था, उसका सम्मान दिल से करते थे पर बिना बताए, बिना समय लिए आता था तो भाई साहब को वो अच्छा नहीं लगता था। कहते थे, कार्य के बीच में विघ्न पड़ता है और लिंक टूट जाता है। उनकी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण थी। भाषण लिखवाते समय यदि फोन आ गया तो दस मिनट फोन पर बात करके पुनः जब भाषण लिखवाते थे तो जहाँ से छोड़ा था, वहीं से आगे चालू कर देते थे। यह नहीं पूछते थे कि पहले क्या लिखवाया था, बताओ।

भोजन बाबा की याद में

खाना खाते समय, कोई उनके पास आकर बैठे, उन्हें अच्छा नहीं लगता था। कहते थे, खाना बाबा की याद में रुचि से खाया जाए। कोई बात करता है तो खाने का वो आनन्द नहीं आता। इसलिए हम कोशिश करते थे कि खाना खाएँ तो पर्दा कर दें, कोई अंदर ना जाए। इस संबंध में दादी जानकी जी भी सुनाती हैं कि मैं खिवड़ी के साथ आलू की सब्जी बनाती थी, जगदीश भाई को परोसती थी और देखती थी कि बहुत ही बाबा की याद में स्थित होकर खाना खाते थे। मैं भी भोजन बहुत ही बाबा की याद में बनाती थी।

कन्याओं को आगे बढ़ाने की कला

भाई साहब से कोई कन्या डरती नहीं थी। कन्याओं को यह निश्चय था कि दीदी हमारी बात यदि ना भी सुने तो भाई साहब जरूर सुनेंगे। मुझे यह निश्चय होता था, भाई साहब उनके दिल की बात सुन लेंगे और मेरे लिए भी कोई अप्रिय बात नहीं कहेंगे बल्कि समाधान ही करेंगे इसलिए मैं किसी भी कन्या को उनसे बात करने में कभी रोकती नहीं थी। भाई साहब सबसे प्रश्न पूछते थे, वाणी पढ़कर सुनाने को कहते थे, कोई बहन संकोच करती थी तो बहुत महिमा करके उसे प्रोत्साहित करते थे। सेवाकेन्द्र की ड्यूटी या बहनों को चलाने में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं था। यदि किसी बात में उनके सहयोग की आवश्यकता होती थी तो वो पूरा देते थे। हम 15 बहनें इकट्ठी रहती थी, मान लो, कोई बात हुई, किसी कारण से कोई थोड़ी नाराज हुई तो मैं कहती थी, रहने दो नाराज, थोड़ी देर में आपे ठीक हो जायेगी। लेकिन भाई साहब को पता पड़ जाता था तो जरूर आते थे। किसी को पता नहीं पड़ने देते थे पर बातों-बातों में पूछते थे, आज वो कहाँ गई। हम कहते थे, लेटी है थोड़ी। फिर उसको कहते थे, उठो, सोने का समय नहीं है, नाश्ता किया या नहीं। हम कहते थे, नाश्ता नहीं किया। तो कहते, अरे, प्रभु प्रसाद, भाग्य से प्राप्त प्रसाद, खाया नहीं, फिर किसी से नाश्ता मंगवाते। गिट्टियाँ तोड़-तोड़ थाली में रखते। मैं कहती, आप बिगाड़ रहे हो, नहीं खाया तो छोड़ दो, हमने कुछ कहा नहीं। फिर कहते थे, आओ, बहनजी खिलाओ, एक गिट्टी खिलाओ। उनको यह भाव होता था कि संगम का समय बड़ा कीमती है, इसका यूँ ही न चला जाये इसलिए स्नेह से उसके मन को ठीक कर देते थे। वे चाहते थे कि सभी बहनों को एक-एक सेन्टर की जिम्मेवारी मिल जाए क्योंकि अब ये बड़ी हो गई हैं।
तबीयत खराब होते भी मकान देखने जाते थे। कहते थे, मीटिंग में केवल इंचार्ज बहनें आती हैं। इनको आठ-आठ, दस-दस साल सेन्टर पर रहते हो गए पर इंचार्ज नहीं बनी हैं तो मीटिंग का चांस नहीं मिलता इसलिए सेन्टर संभालेंगी तो बहुत कुछ सीखेंगी। हम बहनें आपस में प्यार से मिलकर बैठती थीं तो उन्हें बड़ी खुशी होती थी।

सुव्यवस्था पसंद

उन्हें हर चीज़ एक्यूरेट पसंद आती थी। कोई चीज अव्यवस्थित नहीं होनी चाहिए। यदि कोई मिलने वाला साढ़े पाँच बजे आने वाला होता था तो उन्हें होता था, सवा पाँच बजे सब बत्तियाँ जल जाएं, अगरबत्ती जल जाए और सब व्यवस्था ठीक हो। बाबा के घर में जो आए, उसे लगे कि मेरा सम्मान हुआ। कोई साढ़े पाँच बजे कहकर पाँच बजे आ जाए, वो भी उन्हें पसंद नहीं था। यदि कोई भाई साहब से ही स्पेशल मिलने वाला होता था और मानो साढ़े पाँच बजे का समय दिया तो वे तैयार होकर 5.25 पर नीचे आके बैठ जाते थे। अपने सारे काम रोककर, वे उसके लिए टोली-पानी का पूरा प्रबंध करके बैठते थे। इस प्रकार समय के बड़े पाबंद थे। फिर कोई लेट आता था तो उन्हें अच्छा नहीं लगता था।

सिम्पल और सैम्पल

भाई साहब के कमरे में आखिर के दिनों में हमने एक सोफा रख दिया, उनको तो वो भी अच्छा नहीं लगा। हम कहते थे, कोई आयेगा, पूछेगा, भाई साहब कहाँ रहते हैं, तो क्या दिखायेंगे? एक बार पतला-सा कारपेट बिछा दिया तो कहा, उठाओ। हमने कहा, नहीं उठायेंगे। इतनी गर्मी में भी बिना ए.सी. के रहे। जब हमने ए.सी. लगवाया तो कहा, पहले बहनों के कमरे में लगेगा, तब फिर लगवाऊँगा। वो कहते थे, मुझे इतनी सुविधायें नहीं चाहिए। उनका सूत्र था, अपने पर खर्च कम से कम हो, सेवा ज्यादा से ज्यादा हो।

बीमारी में भी झेली कठिनाइयाँ

जब उन्हें पहली उल्टी आई तो हॉस्पिटल लेकर गए। वहाँ प्राइवेट रूम मिलना संभव नहीं था। उनको जनरल वार्ड में रखा गया। पर लैट्रिन, बाथरूम गंदे थे तो रात को घर आ गये। डॉक्टर ने कहा था, पूर्ण रेस्ट करना है पर वहाँ रेस्ट कैसे करें, बाथरूम आदि की सुविधायें थी नहीं। जब सेवाकेन्द्र पर आए तो हमने कहा, नीचे ही रेस्ट कर लीजिए। ऊपर मत चढ़िए। हम आपके लिए एक ही दिन में, नीचे ही सब सुविधायें निर्मित कर देंगे परंतु नहीं, तीसरी मंजिल पर अपने निश्चित स्थान पर जाकर ही रहे। फिर हॉस्पिटल गए। दो दिन ऐसे आना-जाना करते रहे। दो दिन बाद प्राइवेट रूम मिला। पर दो दिन में भी तकलीफ तो बहुत उठाई ना।

बाबा को पहचाना नहीं

जब वे ग्लोबल हॉस्पिटल में थे तो एक दिन हम सब उनके पास बैठे थे। गुलजार दादी बाद में आई थी। कहने लगे, सबने बाबा को पहचाना नहीं। हमने कहा, भाई साहब, आपने इतना लिखा है, सब पढ़ेंगे तो पहचान लेंगे। गुलजार दादी आई तो उनको भाई साहब की बात बताई। दादी ने कहा, जगदीश जी, आपने तो पहचाना ना, तो कहा, नहीं, मैंने भी कम पहचाना, जितना पहचानना था उतना नहीं पहचाना। उस बाप को जिसने हमें इतना प्रत्यक्ष किया, उसके लिए हमें क्या नहीं करना चाहिए, यह उनके अंदर बहुत भावना रहती थी। जब भी क्लास कराते थे तो यही कहते थे कि हमने तो अपना सब कुछ समेट लिया, अब आप ऐसा करना। वे कहते थे, जीवन हमारा त्यागी तपस्वी हो, ईश्वर का ज्ञान हमारे जीवन से टपके। हम केवल सेवा ही ना करें बल्कि स्वयं सेवा का स्वरूप भी बनें।

72 वर्ष में 100 वर्ष जितनी सेवा

जब हॉस्पिटल में आये तो अपनी पूर्ण हुई किताबों को अपने साथ ले आये थे और उन्हें जल्दी से छापने का आदेश भी दे दिया था। छपाई बहुत सुंदर ढंग से हो, इस पर भी उनका विशेष ध्यान रहता था। इसलिए निमित्त आत्म भाई को भी उन्होंने कहा था कि इकट्ठा कागज़ खरीदना ताकि किताब में एक ही प्रकार का कागज़ लगे, दो प्रकार का लगने से उसकी शोभा कम हो जाती है। कई बार कहते थे, बाबा तो बहुत साहूकार है पर मैं उनका गरीब बच्चा हूँ, अगर मेरे हाथ में पाँच-सात लाख रुपये होते तो मैं बढ़िया से बढ़िया किताबें छपवाता। भाई साहब कहते थे कि मेरी आयु अगर 72 वर्ष है तो मैंने 100 वर्ष की आयु जितना काम किया है।

अंतिम श्वास तक प्रत्यक्षता की योजना

सोनीपत की जमीन पर बाबा की प्रत्यक्षता के निमित्त कुछ विशेष बने, जगदीश भाई को इसकी बहुत लगन थी। बीमारी के दौरान भी उस जमीन के बारे में उनके मन में निरंतर योजनायें चलती रहती थी। उन्हें महसूस होता था कि मेरे पास समय कम है लेकिन इस कम समय में भी मैं बाबा के लिए कुछ विशेष करके जाऊँ। उनकी भावना थी कि कोई ऐसी चीज बननी चाहिए, जो भी देखे, उसे लगे, सत्यता हो तो ऐसी हो। दुनिया में भी प्लेनेटेरियम होता है जहाँ बैठे-बैठे तारामण्डल और रात देखने में आ जाती है, इसी प्रकार, ऐसी कोई चीज़ बने जिसमें साकार वतन में बैठे-बैठे सूक्ष्म वतन दिखाई दे। सूक्ष्म वतन का पूरा दृश्य इस रूप से सामने आ जाए जो सबको सूक्ष्म वतन का अनुभव हो जाये। सूक्ष्म वतन की लाइट की भी अनुभूति हो, फिर इस अनुभव से भी ऊपर उठकर, निराकारी दुनिया, एकदम सोल वर्ल्ड में पहुँच जाएँ, वहाँ का अनुभव हो। अमेरिका जैसा डिज्नी लैण्ड बने। दिल्ली में एयरपोर्ट के पास भी कई जगहें देखते रहे। फिर जब सोनीपत की जगह मिली तो कहा, मुझे इसके लिए कुछ प्लैन करने दो तो दादियों ने भी स्वीकृति दे दी। हमने कहा, आप इतनी जिम्मेवारी ले रहे हो, शरीर चल नहीं रहा है, तो कहा, मेरी फोल्डिंग खटिया और रजाई ले चलना, मैं सोनीपत की जमीन पर ही मीटिंग करूँगा। हमने कहा, आप भाई-बहनों को यहीं बुला लीजिए तो कहा, उसी स्थान पर मीटिंग करें तो आइडिया दिया जा सकता है। यह अलग बात है कि वो वहाँ जा नहीं सके पर बाबा की प्रत्यक्षता की लगन बहुत थी। वे चाहते थे कि ऐसा स्थान बने जो बहुत देखने वाले वहाँ आयें। कई आर्किटेक्टस से भिन्न-भिन्न नक्शों का निर्माण भी करवाया, कहते थे, वैसे तो मेरी आयु पूरी हो गई है, अगर बाबा इस सेवा का मौका देगा तो वो मेरे लिए ग्रेस में बाबा द्वारा दिये गये वर्ष होंगे।

अधूरे कार्य पूरे करने की लगन

ग्लोबल हॉस्पिटल में जब आई.सी.यू. में थे तो मैं रात को बारह बजे सोने के लिए चली गई और फिर एक बजे उन्हें देखने के लिए पुनः आई क्योंकि हालत तो नाजुक ही थी। देखकर आश्चर्यचकित हुई कि क्लीनर सुनील भाई तख्ती पर कागज़ लगाये बैठा है और भाई साहब कुछ लिखवा रहे हैं। मैंने पूछा, सुनील क्या कर रहे हो? तो कहा, भाई साहब ने कहा है, अगर थोड़ा भी लिखना जानता है तो लिख। मैंने फिर पूछा, भाई साहब, क्या लिखवा रहे हो? जगदीश भाई ने कहा, 'योगबल से सन्तान कैसे होगी' यह मेरी किताब अधूरी है, इसे पूरा करना है। उन्हें अपने अधूरे कार्य पूरे करने की अंतिम श्वास तक बड़ी लगन रही।

भ्राता जगदीश जी के साथ के अपने अनुभव ब्र.कु.रमेश भाई जी इस प्रकार बताते हैं -

हम सबके अति प्रिय भ्राता जगदीश जी बहुत ही अनुभवी, शास्त्रों एवं विविध धर्मग्रंथों के समर्थ विद्वान एवं ईश्वरीय ज्ञान के विविध तथ्यों की गहराई को जानने वाले थे। उनको समाज की विभिन्न व्यवस्थाओं और कारोबार का भी गहन अनुभव था। उनकी लेखनी ज्ञान के गूढ़ रहस्यों से युक्त और ज्ञान के गहन राजों को प्रत्यक्ष करने वाली थी।

प्रेमपूर्वक व्यवहार

मैं जब सन् 1952 में इस ईश्वरीय ज्ञान के संपर्क में आया तब से ही जगदीश भाई का नाम सुना। सन् 1957 में प्यारे बह्मा बाबा ने उनको मुंबई आने का निमंत्रण दिया। वे मुम्बई में आये और आते ही लौकिक गीता ज्ञान यज्ञ करने वालों की ईश्वरीय सेवा के कार्य में जुट गये। मैं उनकी लगन को देख रहा था। उन्होंने शास्त्र जानने वालों की सेवा में मुझे जुटा दिया और धर्मनेताओं की सेवा कैसे की जाये, वह भी मुझको सिखाया। जब मैंने उनसे पूछा कि आप मेरे साथ ऐसा प्रेमपूर्वक व्यवहार क्यों कर रहे हैं, तब उन्होंने बताया कि प्यारे ब्रह्मा बाबा ने आपके लिए मुझे कहा है कि ज्ञान-चर्चा करके उसे भी इस ईश्वरीय सेवा में लगा दो क्योंकि आगे चल कर उसका इस ईश्वरीय सेवा में बहुत बड़ा पार्ट है। इस प्रकार बापदादा के द्वारा, मेरे लिए दिये गये वरदान की जानकारी, भाता जगदीश जी के द्वारा मुझको मिली, इसलिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूँ। उन्होंने मुझको ईश्वरीय सेवा में आगे लाने का पुरुषार्थ किया और अन्त तक मेरे साथ बड़े भाई का संबंध निभाया। मैं उनको सदा ही कहता था कि भले ही ज्ञान के हिसाब से राम-लक्ष्मण का संबंध त्रेतायुगी है किन्तु फिर भी मुझे लक्ष्मण के रूप में आपकी सेवा करने और साथ निभाने का सदा ही गौरव अनुभव होता है।

सर्वव्यापी के ज्ञान की वास्तविकता

सन् 1961 में मैंने और ऊषा ने शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा को अपने पारलौकिक और अलौकिक पिता के रूप में अपनाया किन्तु ऊषा को सर्वव्यापी के सिद्धांत के विषय में लौकिक मान्यता थी। सन् 1961 में जब हम देहली गये तब जगदीश भाई ने विशेष समय निकाल कर सर्वव्यापी के ज्ञान की वास्तविकता समझाई, तब ऊषा ने इस ईश्वरीय ज्ञान में शत-प्रतिशत निश्चयात्मक बुद्धि बन कर आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प किया। इस प्रकार ब्र.कु.ऊषा भी उनकी आभारी हैं।

प्रदर्शनी की सेवा में योगदान

सन् 1964 में मुम्बई में पहली प्रदर्शनी का आयोजन हुआ तब जगदीश भाई भी ईश्वरीय सेवा में सहयोग करने आये। दिसंबर 29, सन् 1964 के दिन शाम को प्यारी मम्मा ने हम सभी को बिठा कर प्रदर्शनी की उपयोगिता बताई। उस समय के हृदय से निकले हुए उद्‌गार अभी भी मुझको याद हैं। जगदीश भाई ने मातेश्वरी जी को कहा अब तक मैं नहीं समझ सकता था कि बाबा जो मुरली में कहते हैं कि एक दिन आबू रोड से आबू पर्वत तक लंबी लाइन लगेगी किन्तु इस प्रदर्शनी को देखने के लिए जो लंबी लाइन लगती है, उससे मुझे विश्वास हो गया कि अवश्य ही आगे चलकर ऐसा होगा। फिर उन्होंने प्रदर्शनी की सेवा कैसे आगे बढ़े और देहली में भी प्रदर्शनी की जाये, इस पर अपने विचार प्रकट किये। उस समय प्रदर्शनी में गीता के भगवान के विषय में तीन चित्र थे। जगदीश भाई ने, इन चित्रों पर क्या और कैसे समझाया जाये, यह भी स्पष्ट किया। जगदीश भाई ने जो ढंग सिखाया, उससे सबको यथार्थ रूप में गीता का भगवान कौन है, यह बताना आसान हो गया।

पोप की सेवा

बाद में मुझे जगदीश भाई के साथ अनेक प्रकार की ईश्वरीय सेवा करने का अवसर मिला। मुम्बई में ईसाई धर्म की इक्राइस्ट कांफ्रेस (Euchrish Conference) हुई तो ईसाई धर्म के धर्मगुरु पोप, पहली बार भारत में आये। उस कांफ्रेंस में ईसाई धर्म के बड़े-बड़े आर्च बिशप आदि की सेवा करने की योजना भी उन्होंने बनाई और 30"x40" आकार के छपे हुए झाड़-त्रिमूर्ति-सृष्टि चक्र के चित्रों को कास्केट में रखकर पोप को उपहार दिया, जो चित्र आज भी रोम के वेटीकन म्यूजियम में लगे हुए हैं।

ईश्वरीय सेवार्थ पहली विदेश यात्रा

बाद में राजयोग की प्रदर्शनी मुम्बई में हुई और उसके बाद देहली में हुई। देहली में आयोजित उस प्रदर्शनी में, अमेरिका में होने वाली एवास्टिंग रिट्रीट (Awosting Retreat) में जो कांफ्रेंस होने वाली थी, उसका निमंत्रण मिला और उस निमंत्रण के आधार पर विदेश सेवा का शुभारंभ हुआ। विदेश सेवा के लिए जाने वाले ग्रुप में जिन छह डेलीगेट्स के नामों का चयन बापदादा ने किया, उनमें चार बहनों और दो भाइयों का अर्थात् मेरा और जगदीश भाई का नाम बापदादा ने लिया। जाने के दिन देहली से जगदीश भाई हवाई जहाज से मुम्बई आये और जगदीश भाई ने मुझे बताया कि पहली बार उन्होंने हवाई जहाज से यात्रा की है। उसी रात को हम सभी विदेश यात्रा को निकले। हवाई जहाज, बीच में ग्रीस की राजधानी एथेन्स में रुका और तब हम दोनों ने पहली बार विदेश की धरती पर कदम रखे और एक घंटे तक ग्रीक तत्वज्ञान (Philosophy) के विषय में चर्चा की। फिर हम लंदन पहुँचे और अपनी दैवी बहन जयन्ती के घर पर रहे। अंग्रेजी में प्रवचन करने का हम दोनों को ही अभ्यास था इसलिए इंग्लैण्ड में सभी स्थानों पर हम दोनों ने मिलजुल कर ईश्वरीय सेवा का कारोबार किया।

विदेश में पहला सेवाकेन्द्र

जगदीश भाई के मन में दृढ़ संकल्प था कि हमारी इस विदेश यात्रा का कुछ फल अवश्य निकलना चाहिए। हम लोगों को अवश्य ही पूर्व और पश्चिम में कम-से-कम एक-एक स्थान पर, ईश्वरीय सेवाकेन्द्र की स्थापना करके ही जाना चाहिए। उन्होंने इसी कारण मधुबन में फोन किया और लंदन और हांगकांग में सेवाकेन्द्र की स्थापना की स्वीकृति माँगी। उनके इस दृढ़ संकल्प के कारण लंदन में 23 सितंबर, 1971 में पहले-पहले राजयोग सेवाकेन्द्र की स्थापना हुई। उनकी यह एक विशेषता थी कि वे जो भी सेवा करते थे, उसको कार्यान्वित करने और सफल बनाने का बहुत दिल से पुरुषार्थ करते थे।

स्थूल सेवा

न्यूयार्क में जब हम रहते थे तब हम दोनों का स्थूल सेवा का भी विशेष पार्ट था। मेरी बर्तन साफ करने और कपड़े धुलाई की ड्यूटी थी और जगदीश भाई को रहने के स्थान की सफाई आदि की सेवा मिली। अपनी-अपनी सेवा को करते हुए हम लोग हँसी में गीत गाते थे 'किसी ने अपना बनाके हमको बर्तन साफ करना सिखा दिया और किसी ने अपना बनाके हमको झाड़ू लगाना सिखा दिया।' जिनके घर में हम रहते थे, वे भाई एक दिन हमारे पास आये और उन्होंने जगदीश भाई को झाड़ू लगाते देखा। तब उन्होंने कहा कि आप भारत में ऐसे झाड़ू लगाते हो तो कमर टेढ़ी होती है परन्तु हमारे पास होवर (Houver) मशीन से झाड़ू लगाया जाता है और उनके घर में जो होवर मशीन थी, उससे सफाई करना सिखाया। उस पर जगदीश भाई ने मुझको कहा कि अब हमारी कमर सीधी रहेगी और मैं अधिक सेवा कर सकूँगा। तब मैं उनको कहता था कि आप ज्ञान-योग की झाड़ू से सबके अंदर से माया का किचड़ा साफ कर ही रहे हैं।

हंसते-हंसते सेवा

विदेश यात्रा में हम सभी जगदीश भाई के साथ नाश्ता, भोजन करते थे। उनका नियम था कि वे तीन रोटी ही खाते थे परन्तु खाते समय ईश्वरीय सेवा के विषय में चर्चा करने में इतने मगन हो जाते थे कि वे भूल जाते थे कि उन्होंने कितनी रोटियाँ खाई हैं और बहनें उनको झूठी गिनती बताकर अधिक रोटियाँ खिला देती थीं। उस समय जगदीश भाई कहते थे कि बहनें उनके साथ रोटियों की गिनती में ठगी करती हैं परन्तु बड़े प्रेम से सबके साथ भोजन करते थे। जगदीश भाई हमको यह भी कहते थे कि जब मैं वापस जाऊँगा तब कमलानगर में सब मुझसे पूछेंगे कि आपने क्या किया? तो कुछ नवीनता करके दिखाई जाये और खुद पर हँसते थे कि मैं विग (Wig) पहन कर जाऊँगा और सबको बताऊँगा कि विदेश सेवा के कारण मेरे सिर पर चमत्कारिक रूप से बाल उग आये हैं। इस प्रकार हँसते-हँसते सेवा करते थे।

निर्भयता से ज्ञान-दान

हांगकांग में जब ईश्वरीय सेवायें प्रारंभ की, तब मैंने जगदीश भाई को कहा कि मुझे तो लौकिक कार्य अर्थ जल्दी भारत में जाना होगा। तो जगदीश भाई ने सहर्ष हमको छुट्टी दे दी और सारा कार्यभार स्वयं ही संभाल लिया। हांगकांग में प्रदर्शनी आदि करने के बाद जगदीश भाई सिंगापुर, वियतनाम आदि देशों में ईश्वरीय सेवा करने गये। इस प्रकार उन्होंने लगभग 12 मास तक दिल व जान से विदेश में ईश्वरीय सेवा की। उनके अंग-संग रहकर सेवा करने का जो सौभाग्य मिला, उससे मुझको बहुत-सी बातें सीखने को मिली, जो हमको ईश्वरीय सेवा में बहुत मददगार हैं। उनका एक लक्ष्य था कि जो भी प्रदर्शनी देखने आये, उसे ईश्वरीय ज्ञान के सभी पहलुओं का ज्ञान, सार रूप में अवश्य समझाना चाहिए। इसलिए वे पवित्रता, सत्यता, सर्वव्यापी, ड्रामा की पुनरावृत्ति के ज्ञान को निर्भय होकर सबको बताते थे।

लेखनी बाबा की मुरली जैसी

प्यारे बापदादा ने हमारे डेलीगेशन को एक श्रीमत दी थी कि हम विदेश में देवता अर्थात् देने वाले बन कर जा रहे हैं। इस बात को उन्होंने पूरा ही पालन किया। जगदीश भाई ने कहीं भी किसको भी यह आभास तक नहीं होने दिया कि हम उनसे कुछ लेना चाहते हैं। सदा देने का ही संकल्प रखा। हमारी इस विदेश यात्रा का एक बहुत सुन्दर फल भारत में निकला कि यहाँ एक विशिष्ट भाई ने हमको बताया कि वे जगदीश भाई को यज्ञ का बहुत ही अनुभवी भाई मानते थे और समझते थे कि गुलजार दादी के तन में शिव बाबा आकर मुरली नहीं चलाते हैं बल्कि साकार बाबा के बाद अपने जगदीश भाई मुरली लिखते हैं और गुलजार दादी उसको याद कर मुरली के रूप में सुनाती है। जब जगदीश भाई एक साल तक बाहर रहे फिर भी भारत में गुलजार दादी के तन द्वारा बाबा की मुरली चलती ही रही तो उस भाई को निश्चय हुआ कि प्यारे शिवबाबा ही आकर मुरली चलाते हैं। मैं समझता हूँ कि जगदीश भाई की महानता में यह श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ शिष्टाचार (Compliment) है कि उनकी लेखनी इतनी ओजस्वी, ज्ञान की गहराई से संपन्न और योग के अनुभवों से युक्त थी कि वह कुछ भाई-बहनों को शिवबाबा की मुरली के समान अनुभव प्रदान करती थी।

ईश्वरीय सेवा में अतुलनीय सहयोग

अंतिम दिनों में जब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, उस समय मैं मुम्बई से उनसे मिलने आया। मिलते समय मैं उनसे उनके स्वास्थ्य के विषय में पूछता, उससे पहले बड़े भाई के नाते वे मुझसे मेरे स्वास्थ्य के विषय में पूछने लगे। फिर जब मैं यज्ञ के ऑडिट के कारोबार के अर्थ मधुबन में आया तो अनेक बार उनसे हॉस्पिटल में मिला और उन्होंने बड़े भाई के नाते अनेक प्रकार की शिक्षायें दीं। एक विशेष बात उन्होंने मुझसे कही कि मुझे बहनों के हिसाब-किताब को तुरंत और सहज हो चेक करके बहनों की आशीर्वाद प्राप्त करनी चाहिए। जब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो रहा था, उसी बीच आदरणीया दादी प्रकाशमणि जी का अफ्रीका की सेवा पर जाने का कार्यक्रम था और उनको 13 मई, 2001 के बाद आना था। तो अव्यक्त बापदादा ने दादी जी को विदेश जाने की मना कर दी। मई 12, 2001 को मैंने ऊषा को सुखधाम में जगदीश भाई की तबीयत को देखने के लिए भेजा। पौने आठ बजे तक वह वहाँ थी, फिर हमको समाचार देने पाण्डव भवन आ रही थी, तभी समाचार आया कि जगदीश भाई ने प्यारे बापदादा की गोद में विश्रान्ति पाई। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि हम दोनों का जैसे ईश्वरीय सेवा में गहरा संबंध रहा वैसे ही सारे कल्प में भी भिन्न नाम-रूप, देश-काल में संबंध रहेगा और मुझे अवश्य ही किसी-न-किसी जन्म में लौकिक में छोटे भाई के रूप में उनकी सेवा करने का अवश्य ही सौभाग्य प्राप्त होगा। अब तो जगदीश भाई ने आगे एडवांस पार्टी में ईश्वरीय सेवा का पार्ट बजाने के लिए हम सबसे विदाई ले ली फिर भी उनके लिखे साहित्य और दी गई मार्गदर्शना के द्वारा, जब तक यज्ञ चलेगा तब तक ईश्वरीय सेवा में उनका सहयोग अमर रहेगा।
इस तरह, इस लेख के द्वारा मैं और ब्र.कु. ऊषा अपने अग्रज जगदीश भाई को अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं। उनकी तीव्र इच्छा थी कि सोनीपत में जो जमीन ली है, वह एक स्पिरिचुअल वण्डरलैण्ड बने, उनकी इस आश को पूर्ण करके, स्थूल रूप में भी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का पुरुषार्थ करूंगा। मैं अपने अग्रज को दिल से वन्दन करता हूँ।

ब्र.कु.आत्मप्रकाश, संपादक, ज्ञानामृत, जगदीश भाई जी के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं -

प्यार से गले लगाया

भ्राता जगदीश जी से इस कल्प में मेरा प्रथम मिलन सन् 1957 में हुआ। उस समय मम्मा-बाबा दिल्ली, राजौरी गार्डन में आये हुए थे और मैं भी बाबा से मिलने गया तो वहीं उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने बड़े प्यार से गले लगाया और मुझे महसूस हुआ कि जैसे लंबे समय से बिछुड़े अति स्नेही भाई ने मुझे स्नेह दिया है। विद्यालय की पहली हिन्दी पत्रिका 'त्रिमूर्ति' उस समय उनके संपादन में ही निकलती थी। पत्रिका के लेखों की गुह्यता और स्पष्टता से मैं बहुत प्रभावित था। इनके द्वारा लिखी 'सच्ची गीता' और 'Real Geeta' का भी हम अध्ययन कर चुके थे। इन दोनों पुस्तकों ने भी हमें बहुत प्रेरणाएँ प्रदान की थीं। इसलिए मन-ही-मन उनके प्रशंसक तो हम थे ही, फिर उनसे सम्मुख मिले तो हमारी प्रसन्नता और भी बढ़ गई।

त्यागमय जीवन से लाभान्वित

सन् 1962 में प्यारे साकार बाबा ने मुझे साहित्य की सेवा अर्थ इनके पास भेजा। उस समय लगभग दो वर्ष इनके अंग-संग रहकर विभिन्न प्रकार की ईश्वरीय सेवाओं के अनुभव प्राप्त किये और इनके त्यागमय, उच्च धारणाओं वाले जीवन से लाभान्वित भी बहुत हुए।

उच्च योगस्थ स्थिति का अनुभव

किसी भी व्यक्ति के साथ कार्यक्षेत्र में रहकर, उसके जीवन के व्यवहारिक पक्ष में जिन बातों को पल-पल साकार होते हम देखते हैं उनका अमिट प्रभाव हमारे मानस में गहराई से अंकित होता है। भ्राता जगदीश जी के जीवन की ऐसी विशेषताओं की एक लंबी कड़ी है। वे महान ज्ञानी, महान योगी, महान लेखक, महान प्रवक्ता और महान सेवाधारी थे। कहते हैं कि 'Writing makes a man perfect.' उनकी लेखनी से गहन राज़ उ‌द्भूत हुए और उनसे हमने पहली नजर में, अंजान व्यक्तियों को भी परमात्मा पिता की तरफ आकर्षित होते देखा। कई बार तो बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोग उनसे मिलते और ईश्वरीय ज्ञान-चर्चा में उनके आत्मिक गुणों से प्रभावित होकर यहाँ तक भी कह देते थे- 'हम आपमें साक्षात् ईश्वर को ही देख रहे हैं।' हमारा जब भी उनसे मिलना होता तो ज्ञान-चर्चा तो होती ही थी। एक बार उन्होंने कहा कि एकाग्रता किसे कहते हैं? फिर खुद ही स्पष्टीकरण दिया कि किसी भी एक ज्ञान बिन्दु पर निरंतर चिन्तन चलाते रहना ही ‘एकाग्रता’ है। यदि इस बीच बुद्धि में दूसरी बात आ जाती है तो उसे निकाल दो। वे ये भी कहते थे कि यदि आपको अच्छी अनुभूति हो रही है और बीच में किसी कारण से सफेद लाइट हो जाती है तो आप अपनी अनुभूति की स्थिति के आनन्द में मगन रहो, नीचे नहीं आओ। उनके पास बैठने से ही उनकी उच्च योगस्थ स्थिति का अनुभव हो जाता था क्योंकि हमारा भी योग लग जाता था। ऐसा नहीं कि कुछ विशेष घड़ियों में ऐसा होता था, हर समय स्वाभाविक ढंग से ही वे आत्म-स्मृति और परमात्म-स्मृति की स्थिति में रहते थे।

तीव्र लगन और उमंग से सेवा

मेरे प्रारंभकाल में जब देहली में अनेक स्थानों की जानकारी अर्थ मुझे साथ लेकर जाते और बताते कि यहाँ छपाई होती है, यहाँ ब्लाक बनते हैं तो बहुत जगह पैदल ही आना-जाना होता था। उस समय वे अपने लंबे-ऊँचे हृष्ट-पुष्ट शरीर से चलते थे और मुझे दौड़ना पड़ता था। हर सेवा तीव्र लगन और उमंग से संपन्न करते हुए इन्होंने ईश्वरीय जीवन के 50 वर्षों में अपना तन, मन, श्वास, संकल्प सब कुछ विश्व-सेवा में अर्पण कर दिया।

दृष्टि से ओझल होते भी मन से ओझल नहीं

संसार रंगमंच पर आने वाले हर पार्टधारी को शरीर तो छोड़ना पड़ता है, यह अटल सत्य है, परंतु शरीर छोड़कर भी महामानव अपनी कर्मठता, सच्चाई, कर्त्तव्यपरायणता, दूरदृष्टि, निर्भयता, अडोलता, सर्व के प्रति सच्चे रूहानी स्नेह, पवित्रता, विशालहृदयता, त्याग, अपनत्व इत्यादि गुणों की अपनी सूक्ष्म तस्वीर को रंगमंच पर छोड़ जाता है। वह सदा-सदा के लिए सर्व के लिए प्रेरणा स्त्रोत बना रहता है। दृष्टि से ओझल होने पर भी मन से ओझल नहीं होता है। छोटे अस्तित्व के लुप्त होने पर उसके गुण और विशेषताओं का विशाल अस्तित्व, उदधि की तरह ठांठे मारकर बार-बार मन रूपी किनारे को छू लेता है।

सादगी और मितव्ययता के अवतार

ईश्वरीय विश्व विद्यालय में बेगरी पार्ट में समर्पित होने वाले प्रथम समर्पित ब्रह्माकुमार जगदीश भाता जी का जीवन सादगी और मितव्ययता का मानो अवतार था। उनकी सदा यही इच्छा रहती थी कि जो भी कार्य किया जाये, वह बढ़िया से बढ़िया और सस्ते से सस्ता भी हो। वे समय के बहुत ही पाबंद थे। जब कोई कार्य पूर्ण करके उनके सामने जाते थे तो उनकी पारखी दृष्टि उसमें रही हुई खामी को तुरंत पकड़ लेती थी। वे हर कार्य में परफेक्शन चाहते थे। उनकी इस चाहना को पूर्ण करने के लिए अथक प्रयास करने पर भी, कई बार आरंभ काल में मुझे सफलता न भी मिलती रही हो परंतु उनके मार्गदर्शन में किये गये पिछले कई वर्षों के मेरे कार्य से वे बहुत प्रसन्न थे। उन्हें आभास हो गया था कि वे अब बहुत दिनों तक इस तन में नहीं रहेंगे। मैं भी उनकी इस आंतरिक भावना को समझ गया था। मैं अन्य सब कार्यों से पहले उनके द्वारा निर्देशित कार्य को संपन्न करता था। शरीर छोड़ने से लगभग एक मास पूर्व जब मैं उन्हें सुखधाम (मधुबन) में मिलने गया और भिन्न-भिन्न प्रकार की छपी हुई पुस्तकें दीं तथा मैंने कहा कि भाई साहब, हम तो भरत मुआफिक आपके कार्य को सरअंजाम दे रहे हैं। उन्होंने बड़े प्यार से कहा, 'आत्म, मुझे खुशी है कि तुम भी काफी अनुभवी हो गये हो, ज्ञानामृत की संख्या भी काफी बढ़ गई है और इसका स्तर भी काफी अच्छा हो गया है.. पुस्तकें भी ठीक छप रही हैं..।' इस प्रकार उनकी संतुष्टता से प्राप्त दुआओं से मैं गद्गद हो गया।

अन्त तक सेवारत

शरीर छोड़ने से एक सप्ताह पूर्व उन्होंने पूछा कि 'कार्टून और कहावतें' यह पुस्तक कहाँ तक छपी है? मैंने कहा कि अभी छपना जारी है। 'जल्दी करो' ऐसा आदेश मिलते ही मैंने उसे जल्दी तैयार करवा कर तीन दिन बाद ही उनके सामने पेश किया और उनके मुख से निकला, 'चलो, यह कार्य भी पूरा हुआ' और मुझे धन्यवाद दिया। इस प्रकार अंत तक वे सेवारत रहे। वे पुस्तकों, लेखों, अनुभवों के रूप में इतना ज्ञान खज़ाना हमें प्रदान करके गये हैं कि आगे के समय में हम उनसे लाभान्वित होते रहेंगे। उनके द्वारा निर्मित ईश्वरीय संविधान, उनका स्वयं का नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा स्वरूप, ईश्वरीय नियम, धारणाओं में वज्र के समान अडोल जीवन हमें सदा प्रेरित करता रहेगा। अंतिम श्वास तक उनको स्वयं से एक ही गिला रहा कि हम शिवबाबा को संपूर्ण जगत में प्रत्यक्ष नहीं कर पाये। सच्चे स्नेही के रूप में अब हम उनकी प्रत्यक्षता की इस शुभ आश की पूर्णता का दृढ़ संकल्प करें और उसमें जी-जान से जुट जाएँ।
दिल्ली, हस्तसाल से भावना बहन, जगदीश भाई के साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं-

हर बात की योजना

कोई भी कार्यक्रम होता तो भाई जी छोटी से छोटी बात का भी ध्यान रखते, कार की पार्किंग कहाँ करनी है, जूते-चप्पल कहाँ निकाले जायेंगे, स्टेज कहाँ पर बनेगी आदि-आदि। हर बात की पहले से ही पूरी प्लानिंग करते थे। प्रोग्राम की पूरी व्यवस्था कैसे करनी है, यह हमने भाई जी से सीखा। प्रोग्राम के बाद, एक- एक व्यक्ति द्वारा की गई सेवा की महिमा करते, इस प्रकार उन्हें आगे बढ़ाते।

ज्ञान की गहराई

जब वे ज्ञान सुनाते तो हम सोचते कि भाई जी का दिमाग है या कंप्यूटर? कभी सामने से आते दिखाई देते तो हम संकोचवश हल्का-सा मुसकराते लेकिन भाई जी फिर खुद ही ओमशान्ति बोलते और हाल-चाल पूछते। रोज रात को ब्राह्मणों की क्लास कराते, रिफ्रेश करते, हँसाते-बहलाते, ज्ञान की गहराई में ले जाते। जिसकी जो विशेषता होती, उसकी महिमा करते। एक बार मुझसे पूछा, आपको कौन-सी टोली अच्छे से बनानी आती है? मैंने बताया तो कहा कि यह बनाओ फिर हम गुलजार दादी के पास ले जायेंगे।

देने की भावना

सेन्टर पर कोई नया फल आता तो कहते, पहले सबको दो फिर जो बचता वो लेते थे। किसी बहन-भाई को कोई समस्या होती या कुछ पूछना होता तो वे समय लेकर भाई जी से मिलते और फिर बताते कि हमें जो चाहिए था, भाई जी से वो मिल गया। भाई जी के लिए जब नई गाड़ी आई तो बोले, क्लास में जिन भाई-बहनों के पास गाड़ी नहीं है, पहले उन्हें गाड़ी से छुड़वाओ, फिर मैं गाड़ी में बैठूंगा। इस प्रकार उनके हर कर्म में एक प्रेरणा, एक मार्गदर्शन और सर्व को देने की भावना रहती थी।

दादी प्रकाशमणि

आपका प्रकाश तो विश्व के चारों कोनों में फैला हुआ है। बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् 1969 से आपने जिस प्रकार यज्ञ की वृद्धि की, मातृ स्नेह से सबकी पालना की, यज्ञ का प्रशासन जिस कुशलता के साथ संभाला, उसे तो कोई भी ब्रह्मावत्स भुला नहीं सकता। आप बाबा की अति दुलारी, सच्चाई और पवित्रता की प्रतिमूर्ति, कुमारों की कुमारका थी। आप शुरू से ही यज्ञ के प्रशासन में सदा आगे रही। मम्मा के साथ-साथ आपको भी सब मुन्नी मम्मा के नाम से ही पुकारते थे। आपने शुरू में पटना, मुंबई तथा अन्य कई स्थानों पर अपनी सेवायें दी। बाबा के अव्यक्त होने के बाद देश-विदेश में अपनी अथक सेवायें देते हुए, सभी ब्रह्मा वत्सों को एकता के सूत्र में पिरोकर,हर एक की विशेषता को कार्य में लगाते हुए अनेकानेक यादगार कायम किये। आप सदा सबके दिलों में अमर हैं। आपने 25 अगस्त, 2007 को अपने भौतिक देह का त्याग कर नई दुनिया का प्रारंभ करने निमित्त एडवांस पार्टी में अपना पार्ट नूँध लिया।

दादी प्रकाशमणि जी, अपने लौकिक- अलौकिक जीवन का अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं-

श्रीकृष्ण की भक्ति

मैं सात-आठ वर्ष की थी तब से ही, कोई दिन ऐसा नहीं आया जो मैं श्रीकृष्ण की पूजा ना करूँ, भले ही स्कूल में भी जाती थी। मुझे छोटेपन से रहता था कि मैं मीरा बनूँगी। मीरा की कहानी मैं जानती थी। "मेरे घर के बिल्कुल पास में श्रीराधा-श्रीकृष्ण का मन्दिर था। उसमें मैं सुबह-शाम जरूर जाती थी, पूजा करती थी। रात के समय श्रीकृष्ण को झूले में झुलाती और फिर झूले से उठाकर पलंग पर सुलाना, यह मेरा नित नियम था। मेरे को श्रीकृष्ण से बहुत ही प्यार था। मुझे महसूस होता था, श्रीकृष्ण भी मुझे बहुत प्यार करता है। राधे भी मुझे बहुत प्रिय लगती थी। मैं रोज भागवतभी पढ़ती थीं जिसमें श्रीकृष्ण के चरित्र हैं। सिन्धी लोग गुरुनानक को मानते हैं इसलिए सुखमणि और ग्रंथसाहब भी पढ़ते हैं। उस समय स्कूल में रिलीजियस पीरियड होता था। छोटेपन में पहले जप साहेब पढ़ाया, फिर सुखमणि पढ़ाई, फिर गीता पढ़ाई। यह सब पढ़ने में मुझे बहुत मजा आता था। भागवत्, रामायण आदिभी ज्ञान में आने से पहले पढ़ लिया था।

कभी किसी से डांट नहीं खाई

स्कूल में रिलीजियस पीरियड में मैं हमेशा फर्स्ट आती थी, मुझे कम से कम 75% या 80% मार्क्स अवश्य मिलते थे। मुझे पढ़ाई से भी बहुत प्यार था। हमेशा पहला, दूसरा या तीसरा नंबर लेती थी इसलिए स्कूल में सभी टीचर्स का मुझसे बहुत प्यार था। खेल- कूद में इतना समय नहीं देती थी। लौकिक घर में माता-पिता और मैं - हम तीन ही थे। बहनें बड़ी थीं, वो अपनी ससुरालों में रहती थी। मैं ना कभी बाज़ार की कोई चीज़ खाती थी, ना कोई ऐसी सहेलियाँ थी। फैशन का शौक नहीं था। कोई बाहर का बुरा संग मुझे नहीं था। सहेलियाँ आती भी थी तो पढ़ाई के नाते से। एक बड़ा मैदान था, वहाँ गर्मी में शाम को थोड़ा खेलते थे, नहीं तो घर में ही रहते थे। घर में माता- पिता भी सत्संग में रुचि रखने वाले थे। मुझे स्मृति नहीं कि कभी माता-पिता की डांट खाई हो या कभी माँ ने थप्पड़ मारा हो या कभी घर में लड़ाई हुई हो, कभी नहीं। गुस्सा कभी घर में नहीं होता था। तीसरी कक्षा से छठी कक्षा तक हमने साल में दो-दो परीक्षायें दी। हर छह मास में मैं अगली कक्षा में चली जाती थी। जब ज्ञान में आई तो 14 साल की थी और मैट्रिक पढ़ ली थी। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी झूठ बोला हो या चोरी की हो। मुझे स्मृति नहीं कि मैंने मुख से कभी गाली बोली हो या किसी ने मुझे बोली हो, कभी नहीं। मैंने कभी सिनेमा नहीं देखा। इसलिए बुरी बातों का कभी असर नहीं रहा।

श्रीकृष्ण के दीदार की इच्छा

लौकिक बाप स्वामी गंगेश्वरानन्द के चेले थे।उनके अंदर पवित्रता का बहुत पहले से संस्कार था। वो ज्योतिषी भी थे। भले ही बिजनेसमैन थे पर शाम को घर आने पर शास्त्रों की कोई ना कोई बात अवश्य बताते थे। स्वामी जी के पास जाते थे तो हमें ज़रूर लेके जाते थे। ज्योतिषी होने के कारण उसको मालूम था कि यह बेटी शादी नहीं करेगी, मीरा बनेगी। भले ही उन्होंने हमें कारण नहीं बताया पर सबको कहते थे, यह बेटी शादी नहीं करने वाली है। लौकिक बहनों के ससुराल पक्ष के लोग फैशनेबल और खाने-पीने वाले थे। वे मुझे बुलाते थे क्योंकि घर में छोटी मैं ही थी। वे सोचते थे, घुमाने-फिराने के लिए यही एक है

पर मैं उनके संग में जाती नहीं थी। वे कहते थे, आज यहाँ चलो, वहाँ चलो, मैं कहती थी, मेरा तो मन्दिर में जाने का समय है। कभी कहते थे, आओ, हमारे घर रहो। मुश्किल से कभी आधा दिन जाती थी, फिर भाग आती थी। कहने का भाव है कि हम छोटेपन से ही ऐसे संस्कारों वाले थे जो बाद में उन संस्कारों की बहुत मदद मिली। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी माँ को कहा हो कि मुझे इस फ्राक की दिल है, लेके दो। मैंने कभी यह कहा हो कि यह खाने की दिल है, बनाके दो। छोटेपन से यह स्लोगन याद रहा - "माँगने से मरना भला", "इच्छा मात्रम् अविद्या" । ज्ञान क्या होता है, यह मैं नहीं जानती थी पर इच्छा रखना अज्ञान है, यह मैं जानती थी। मैं कहती थी, गोपियाँ थोड़े कभी इच्छा रखती थी, मीरा थोड़े इच्छा रखती थी, मम्मी को देना होगा, आपे दिलायेगी, खिलायेगी, मैं क्यों इच्छा रखूँ, मैं क्यों माँगूँ? कभी लोभ-लालच नहीं आया। छोटेपन से मेरे दिल में दो इच्छायें जरूर थीं कि या तो मैं विष्णु का दीदार करूँ या श्रीकृष्ण का दीदार करूँ। कब मुझे भगवान विष्णु का या भगवान कृष्ण का दर्शन होगा, यह मुझे बहुत लगन थी। उस समय तो कृष्ण को भगवान मानते थे।

श्रीकृष्ण का दीदार हुआ

जब मैट्रिक पढ़ रही थी, सारे सब्जेक्ट इंग्लिश में थे, वो स्कूल था ही इंग्लिश पढ़ने का, मैं एक साल उसमें पढ़ी। उसी स्कूल में मम्मा मेरे साथ थी। एक ही बैंच पर हम बैठते थे। मम्मा से क्लासफैलो जैसा स्नेह था। मम्मा बहुत मॉडर्न, फैशनेबल थी। बड़े-बड़े बाल थे, बहुत सुन्दर थी, बॉम्बे की इंग्लिश पढ़ी हुई थी। मम्मा बहुत स्वीट थी, हमें बहुत अच्छी लगती थी। सन् 1936 की बात है, दशहरे और दीवाली की छुट्टियाँ हुई थी। तीन सप्ताह की छुट्टियाँ होती थीं, इस कारण बहुत समय मिलता था। एक सुबह की बात है, हम सोई पड़ी थी अपने पलंग पर। दीवाली के समय थोड़ी ठण्डी शुरू हो जाती है। मैंने अपने सामने एक सुन्दर, बड़ा शाही बगीचा देखा। बगीचे में बहुत सुन्दर लाइट- लाइट चारों तरफ थी। दूर-दूर बड़े फूल-फल लगे थे। (एक बात बीच में सुनाती हूँ, मैं चाहती थी, ऐसा बगीचा मैं कभी इस दुनिया में देखूँ। एक बार मैं ऑस्ट्रेलिया में गई तो वहाँ एक बड़ा शाही बगीचा देखा, ऐसा मानो जिसमें ग्रीन गलीचा बिछा हो। मैंने कहा, ऐसा तो मैंने स्वर्ग का बगीचा देखा था) तो सुबह-सुबह जो बगीचा देखा था, उसके बीच में एक लाइट आई, उस लाइट के बीच छोटा-सा श्रीकृष्ण, बांसुरी लेकर, नाचता-कूदता, बहुत दूर से मेरे समीप आया। मुझे बहुत खुशी हुई। मैं नींद में थी। मैं खुशी से देखती रही। उसी के पीछे सफेद वेशधारी फरिश्ता खड़ा था। हम छोटेपन में सत्यनारायण का व्रत रखते थे और उस टाइम में सुनाते थे, भगवान बूढ़े वेश में आते हैं। जब श्रीकृष्ण के साथ सफेद वेशधारी फरिश्ता देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान सत्यनारायण को देख रही हूँ। मुझे श्रीकृष्ण भी प्यारा लग रहा था, उसे देखूँ फिर सत्यनारायण को भी देखूँ। मुझे दोनों बहुत प्यारे लगे। इतने में जाग पड़ी, दोनों गायब हो गये।

मुझे लगन लगी कि फिर दीदार हो

मैंने बचपन में सुना था, भगवान का दीदार हो तो किसी को बताना नहीं चाहिए, यह गूंगे की मिठाई अंदर खानी चाहिए। मैंने किसी को बताया नहीं पर अंदर बड़ी इच्छा थी कि फिर मैं कब देखूँ। फिर दिखा ही नहीं। फिर कोठे पर बैठ गई श्रीकृष्ण की माला लेकर, श्रीकृष्ण, तुम फिर आओ, फिर आओ, आये नहीं। बहुत माला फेरूँ, ध्यान करूँ मूर्ति का, मंदिर में जाऊँ, आये ही नहीं लेकिन मेरी दिल बहुत थी। मेरी एक क्लासफैलो थी, वह ओम मण्डली में जाती थी। दो-तीन दिन बाद, मैं उसके घर गई। वह ध्यान में ऐसी बैठी थी कि आँखें ही ना खोले। उसका नाम था लीला। मैं कहूँ, लीला, लीला, बस वह मुसकराए, यूँ हाथ उठाये पर जवाब ना देवे। आँसू बहाए पर मुझे जवाब ना दे। मुझे मालूम नहीं था, यह क्या है? मैंने उसकी मम्मी को कहा, मुझे तो लीला ने बुलाया है पर बात ही नहीं करती है, ठीक है, मैं चली जाती हूँ। मम्मी ने कहा, बेटी, मुझे भी पता नहीं है, जब देखो ध्यान में बैठी रहती है, क्या इसको हुआ है, पता नहीं है। दो- तीन दिन से इसकी यह हालत है। फिर उसने आँखें खोली, बोली, चलौ रामा (मेरा लौकिक नाम), तुमको श्रीकृष्ण का दीदार कराके लाती हूँ। मैंने कहा, लीला,क्या नशा चढ़ा है! श्रीकृष्ण का दीदार कोई मासी का घर है! कहती है, कृष्ण का दीदार कराऊँगी, मैं कितनी पूजा करती हूँ, होता ही नहीं है, अब तुम मुझे दीदार कराओगी! जैसे बच्चियाँ हँसी-मजाक करती हैं, ऐसे मैंने कहा। बोली, हाँ, कराऊँगी। मैंने कहा, चलो। बोली, आज तो शाम हो गई, कल कराऊँगी। बाबा ने पहले-पहले सत्संग किया भाऊ विश्व किशोर के घर,अपने घर नहीं। वो घर पाँच-सात मिनट की दूरी पर था। बाबा सुबह 10 बजे सत्संग करता था क्योंकि भाई लोग तो दुकानों आदि पर जाते थे, मातायें 10 से 11 बजे तक फ्री होती थी। थोड़ा बड़ा कमरा था, इधर पलंग, उधर पलंग, बीच में गद्दी थी, वहाँ सत्संग होता था। जैसे पाठशाला शुरू करते हैं ना, ऐसे यज्ञ की स्थापना गीता पाठशाला की तरह हुई है।

पिताजी ने ओम मण्डली में जाने की आज्ञा दी

हमारा नियम था, मम्मी-पापा की छुट्टी के बिना कभी दरवाजे से बाहर नहीं जाती थी। कभी मम्मी- पापा को सामने जवाब नहीं देती थी, आज्ञाकारी रहती थी। मम्मी-पापा का प्यार भी रहता था, कंट्रोल भी रहता था। रात को जब पापा घर पर आये तो बोले, बेटी, तुमको छुट्टी है। यहाँ एक दादा हैं, वे गीता पर सत्संग करते हैं, मातायें जाती हैं, सुना है, थोड़ी ओम की ध्वनि करते हैं, स्कूल तो तुम्हारा बंद है, क्यों नहीं सत्संग करने जाओ। मैंने कहा, वो दादा हैं कौन? फिर मुझे बताया। मैंने भी कहा, आज मैं लीला के पास गई थी, उसने भी कहा, चलो, वहाँ श्रीकृष्ण का दीदार भी होता है। पापा ने कहा, हाँ, ओम ध्वनि भी होती है, तुम जाओ बेटी, जाओ। तुम्हारा कृष्ण से प्यार है ना, जा बेटी। फिर मैं सुबह में गई।

मैं ध्यान में चली गई

जब मैं सत्संग में पहुँची, बाबा ओम की ध्वनि लगा रहे थे, वह ध्वनि बहुत अच्छी थी। मेरी दृष्टि बाबा के मस्तक पर पड़ी। मुझे लगा, मस्तक से लाइट निकल रही है। मैंने मन में कहा, यह तो सत्यनारायण भगवान जैसा ही है, जो सपने में आया था। यह सपने में क्यों आया, यह कौन है, यह सत्यनारायण भगवान है क्या? ऐसे सोचते-सोचते मैं ध्यान में चली गई। वो ही श्रीकृष्ण, वो ही बगीचा, वो ही लाइट, वो ही सत्यनारायण भगवान - बिल्कुल जो सपने में देखा, वही फिर देखा और कितनी ही देर ध्यान में बैठी रही। कब सत्संग पूरा हुआ, मुझे पता नहीं। सारे उठ गये। कोई ने मुझे उठाया होगा। फिर कुछ मैं जागी। मैं खो गई कि मैं कहाँ बैठी हूँ, सब तो चले गये, मुझे आई लज्जा, मैं लज्जा के मारे उठकर भागने लगी। बाबा दूसरे कमरे में बैठे थे, मुझे बुलाया। मुझे विचार आया,यह सत्यनारायण भगवान है, इनको देखूँ पर बाहर से मैं डरूं कि बाबा के पास कैसे जाऊँ। बाबा ने बुलाया, आओ बेटी, आओ। तब भी मैं ध्यान में ही थी। बाबा के पास गई तो भी सत्यनारायण भगवान को ही देख रही थी और घड़ी घड़ी श्रीकृष्ण भी सामने आ रहा था। ऐसा ही मैं देखती रही। घर आई तो भी ध्यान में। रात को नींद नहीं आई। फिर तो मैं छत पर अकेली बैठ जाती थी और घंटों ध्यान में चली जाती थी। मेरी माँ समझे, पता नहीं बेटी को क्या हुआ है। न खाती है, ना पीती है, ना बोलती है, बस, जब देखो, ऐसे समाधि लगाकर बैठी रहती है। वो मुझे उठाती थी पर मेरा मन होता था, मैं बाबा के पास जाऊँ पर सत्संग में तो 10 बजे से पहले कोई जाता ही नहीं था। वहाँ भी जाऊँ तो ध्यान में बैठी रहूँ। फिर घर में आऊँ तो भी ध्यान में बैठी रहूँ। ऐसे करते, कितने दिन तो मैं ध्यान में ही रही, बस, स्वर्ग को, श्रीकृष्ण को, सत्यनारायण को, बाबा को, गोप-गोपियों को, रास को देखती रहती थी। खूब मजा आता था। खूब मस्ती में रहती थी। लगन बढ़ती रही। पापा भी पूछता था, क्या हुआ है? मैं कहती थी, कुछ नहीं, कुछ नहीं। फिर इतने में दीवाली आई, ये बातें दीवाली से दो-तीन दिन पहले की हैं, इसलिए मैं कहती हूँ, मेरा अलौकिक जन्म दीवाली का है। फिर दीवाली की छुट्टियाँ पूरी हुई, मन ही ना करे स्कूल में जाने का पर स्कूल में तो जाना ही था। स्कूल में मम्मा भी आई। हमने मम्मा को बताया। उस समय मुझे मम्मा से भी ज्यादा लगन थी। मैंने घर आकर कहा, मैं स्कूल में नहीं पढ़ेंगी। पापा आँख दिखाने लगे। मैंने कहा, मैं तो बनूँगी गोपिका, मुझे तो राधा-कृष्ण के साथ रहना है, मुझे स्कूल जाना नहीं है। अब वो जानते तो थे, कहा, अच्छा बेटी, जैसी तुम्हारी इच्छा। मुझे तो खुशी हो गई, अच्छा हुआ, छुट्टी मिली। दीवाली के बाद छमाही पेपर होते हैं स्कूल में। मैंने कहा, मुझे पेपर देने नहीं हैं। मेरे लिए तो बाबा, ओममण्डली, बस, यही सब कुछ हो गया।

ज्ञान की मस्ती चढ़ी

बड़ी दीदी मेरी चाची लगती थी। उनका घर हमारे मोहल्ले में था। उनको मेरे से भी ज्यादा लगन थी। वो तो मेरे से भी पहले ज्ञान में आई थीं। क्वीन मदर अपने घर में थी, दीदी अपनी ससुराल में थी। हम और दीदी बहुत मस्ती में थी, ओम मण्डली में साथ- साथ आती-जाती थी। अर्जुन दादा की माँ भी मेरी चाची थी। आनन्द किशोर मेरा चचेरा भाई है। हम सब एक ही मोहल्ले में रहते थे। हम सब मिलकर बाबा की बातें करते थे, दूसरी कोई दुनिया नहीं। मम्मी- पापा को भी फेथ था कि चाची (दीदी) के साथ आती- जाती है। हमारी तो लगन बढ़ती गई। फिर तो बाबा ने भाषण, गीत सब सिखाया। ज्ञान की इतनी मस्ती थी जो दुनिया की अन्य कोई बात याद ही नहीं रही।

पेंट-कोट वाले से शादी करेगी या पीताम्बरधारी से

हम छोटे थे, रंगीन कपड़े पहनते थे। सिन्धियों की लड़कियाँ जेवर भी पहनती थी। बाबा का घर नीचे बहुत बड़ा था, ऊपर छत पर जैसे बरसाती कमरा होता है, ऐसे बाबा का एकांत का कमरा था, बाबा उस कमरे में ऊपर रहते थे। एक दिन बाबा वहाँ थे और हम तीन-चार सखियाँ उधर आ रही थी। लीला,किकनी और मैं थी। बाबा का घर बिल्कुल बाज़ार के बीच में था। दुकान वाले भी यूँ-यूँ देखते थे। हम नीचे पहुँचे तो बाबा ने कहा, बच्चियों को सीधा ऊपर भेज दो। हमें मन में आया, बाबा ने ऊपर क्यों बुलाया, हम तो डर गईं, पता नहीं क्या काम है बाबा को। बाबा के पास पहुँचे। बाबा ने पूछा, बेटी, तुमको पेंट-कोट वाले से शादी करनी है या पीतांबर वाले से? यह सीधा सवाल बाबा ने हमारे से शुरू किया। पहले तो हम समझे नहीं, पेंट-कोट क्या होता है, पीतांबर क्या होता है, शादी की बात क्यों बाबा पूछता है। फिर पूछा, मैं पूछता हूँ, तुमको किसी लड़के से शादी करनी है या श्रीकृष्ण से? मैंने कहा, मेरी तो गिरधर से शादी हो गई, मुझे किसी लड़के से थोड़े शादी करनी है। बाबा ने कहा, फिर यह जेवर क्यों पहना है, रंगीन कपड़ा क्यों पहना है? यह वो पहनते हैं जिनको लड़कों को पसंद करना होता है। वो दिन, यह दिन, ना हमने जेवर पहना, ना रंगीन कपड़ा पहना।

बोर्डिंग खोलने की योजना

शुरूआत हुई दीवाली पर, बाबा गये कश्मीर में अप्रैल या मई में। फिर बाबा तीन मास तक आये ही नहीं। बाबा ने ज्ञान में आने से पहले लौकिक स्कूल के लिए एक बिल्डिंग बनाई थी, उसे ही ओम निवास कहा गया। स्कूल तो थोड़ा दूर बनाया जाता है ना। उन दिनों ब्रिटिश राज था, फॉरेनर्स के बंगले थे, कलेक्टर आदि के, उस तरफ यह स्कूल की बिल्डिंग थी। बाबा जब कश्मीर गया तो मम्मा को ही हेड बनाकर गया था। मम्मा हम सबसे बहुत होशियार थी, बहुत मीठा बोलती थी। बहुत अच्छा भाषण करती थी, बाजा बजाती थी। गाने में, डांस में बहुत होशियार थी। बॉम्बे की सीखी हुई थी। तो बाबा ने कश्मीर से लिखा, ओम राधे, मैं तब आऊँगा हैदराबाद में जब सत्संग में आने वाली माताओं के बच्चे बच्चियों को, जो स्कूल बन रहा है, उसमें रहने-पढ़ने के लिए बोर्डिंग खोलने की पूरी तैयारी कर लेंगी आप। कान्ट्रेक्टर से बिल्डिंग हाथ में लो, मुझे समाचार दो, फिर मैं आऊँगा। बाबा एक मास के बदले तीन मास जाकर कश्मीर बैठ गया। हम इतने पागल कि रोएँ, हमारी रात क्या थी, दिन क्या था, बस बाबा, बाबा और बाबा। हमारे नयनों में बाबा कभी इस रूप में आप्ता ही नहीं था। बाबा को देखना माना कृष्ण को देखना। हमारी आँखों में कृष्ण ही बसता था तो जिनकी आँखों में कृष्ण बसे, वो मस्तानी नहीं होंगी तो क्या होंगी?

बाबा ने विल की

फिर मम्मा ने पुरुषार्थ किया, मीटिंग की, मीटिंग में हम, दीदी आदि सब थे। हम लोगों ने कहा, हम स्कूल को चलायेंगे। फिर बाबा को लिखा, बाबा आया। फिर स्कूल की चीजें जैसे बैंच, पुस्तकें, कुर्सी, मेज सब खरीद किया। सन् 1937 में दीवाली के दिन बाकायदे हमने बोर्डिंग का उद्घाटन किया। बिल्डिंग में तीन हिस्से थे। दो हमारे लिए थे, एक में बाबा रहता था। लगभग 50 बच्चे थे। पाँच से दस वर्ष तक के थे। बाबा का लौकिक बेटा नारायण भी उन बच्चों में था। हम 14 वर्ष की थी, पढ़ाते थे 9-10 वर्ष वालों को। हमारी डिग्री कुछ नहीं, पढ़ाया सब कुछ। फिर एक साल के बाद बाबा ने विल किया। आठ के नाम पर किया - दीदी, अर्जुन की माँ रूक्मिणी, रूपवन्ती (मम्मा की मामी), महेन्द्र, मम्मा, प्रकाशमणि...। उस - विल में जसोदा, बृजेन्द्रा, बाबा का बेटा आदि सबके - साइन थे। बाबा की यह विशेषता देखो, विल में लौकिक - वाले किसी को नहीं रखा।

हम सब कराची गये

बाबा एक चतुराई करते थे। हैदराबाद और कराची के बीच ट्रेन से तीन घंटे का सफर था। ओम निवास स्टेशन के बिल्कुल पास था। हैदराबाद से ट्रेन रात को दो बजे जाती थी। बाबा अपने पास पैसा नहीं रखते थे पर बाबा को पता तो होता था, पैसा कहाँ रखा है। उस समय दो रुपये टिकट के होते थे, बाबा दो रुपये उठाते थे, हम सोये पड़े रहते थे। बाबा चुपचाप दरवाजा खोलकर चले जाते थे कराची। हम नींद से उठते थे तो बाबा है ही नहीं। अरे, कहाँ गयो हमारो गिरधर। फिर सब रोने लग जाते थे। बाबा अकेले जाते थे। कराची में शान्तामणि दादी के पिता का घर था। वो समझो अपना ही बंगला था। वहाँ से जाके चिट्ठी लिखते थे, बेटी, मैं दो दिन में आता हूँ। फिर वहीं रहकर ही बाबा ने कराची में बोर्डिंग खोलने का प्रबंध किया। पूरे एक साल के बाद हम कराची गये। फिर हैदराबाद लौटे ही नहीं। यह थी हमारे बचपन की कहानी।

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राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि के प्रति राजयोगिनी दादी जानकी जी स्नेह और सम्मान भरे उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त करती हैं -

दादी जी बड़े विशाल दिल वाली, रहमदिल और स्नेह की सागर थीं। सदा सतगुरु बाबा की श्रीमत को सिरमाथे रख दादी जी संपन्न और संपूर्ण बन गई। प्यारे बाबा ने मातेश्वरी जगदंबा पर ज्ञान का कलश रखा। उन्हें पालना के निमित्त बनाया। जब बाबा अव्यक्त हुए तो दीदी मनमोहिनी और दादी जी को निमित्त बनाया। दीदी अव्यक्त हुईं तो दादी ने सब पार्ट बजाया। बाबा ने दादी को मीठा नाम दिया, 'कुमारका' । यह बाबा का प्यारा नाम था। आज दादी 'जय जगजननी, सब दुखहरनी' बन गई है। जैसे बाबा ने किया, वैसे दादी ने किया। कैसे किया, यह क्वेश्चन नहीं। हम भी कर सकते हैं। करना है तो अब करना है, कल पर नहीं रखना है। वाह दादी वाह! वाह बाबा वाह! वाह हम सबका भाग्य वाह! हम सबने दादी को आँखों से देखा है, बुद्धि से समझा है, दिल से अनुभव किया है। अब जी चाहता है कि हम भी दादी जैसा बन जायें।

दादी सदा ही सच्ची, मीठी कुमारी रही, अति पवित्र कुमारी। दादी को कुछ भी भूलना नहीं पड़ा। एक सेकंड में देह सहित सबसे नष्टोमोहा बन गई। हम बाबा के थे, हैं, फिर भी होंगे, यह निश्चय करने में कोई टाइम नहीं दिया जिस कारण फाउण्डेशन मजबूत रहा। दादी को 'मुन्नी मम्मा' कहते थे। उम्र में छोटी थी पर पालना सबकी बड़ी अच्छी करती थी। सन् 1977 में जब दादी लंदन आईं तो सबको ऐसे अनुभव हुआ जैसेकि बाबा आया है। उस समय 70-80 भाई-बहनें थे। दादी ने कहा, ये सब पूर्वजन्म में भारतवासी थे, सेवा अर्थ यहाँ जन्म लिया है।

मैंने आँखों से देखा, दादी का स्वयं में विश्वास बहुत था। कुछ भी बात हो गई, स्वयं में विश्वास कम नहीं हुआ। बाबा में अति विश्वास और एक-दो में भी विश्वास बहुत रखा। दादी ने सबको आगे रखा। 'पहले आप' करने में बड़ी दिल, सच्ची दिल थी। कराची में जो ऑफिस थी, उसमें मम्मा बैठती थी, उस समय बाबा विश्वसेवा का डायरेक्शन दादी को देता था। झाड़ और गोले का चित्र बना तो दादी को बाबा ने कहा, ये फलानी-फलानी यूनिवर्सिटी में जाने चाहिएँ। बाबा ने जो डायरेक्शन दिया, दादी ने उसे फौरन अमल में लाया। जो सेवा का इशारा मिला, उसमें दादी ने कुछ भी सोचा नहीं, तुरंत किया। दादी, दीदी, भाऊ- इन्होंने कभी अपना नाम नहीं लिया। सदा इन्हों के मुख से निकलता, बाबा ने करा लिया। ऐसे बहुत कुछ देखने, सीखने, अनुभव करने को मिला है। हमारे जो बड़े निमित्त रहे हैं, उनकी दुआ अभी तक काम कर रही है। हमारे पूर्वज जो जड़ों में बैठे हैं, उनसे सारे वृक्ष को शक्तियों का जल मिल रहा है।

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दादी हृदयमोहिनी जी दादी जी के बारे में इस प्रकार लिखती हैं -

साकार बाबा इस बात पर बहुत ध्यान देते थे कि हर बच्चा, मुरली (ईश्वरीय महावाक्य) बहुत ध्यान से सुने। यदि मुरली सुनते समय किसी बच्चे को उबासी आ जाती थी तो बाबा तुरंत कहते थे कि इसको उठाओ, नहीं तो वायुमण्डल पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। बाबा मिसाल देते थे कि जैसे सीप पर जल की बूँद गिरती है तो मोती बन जाती है, इसी प्रकार आपकी बुद्धि पर भी ये ज्ञानामृत की बूँदें पड़ रही हैं, एक-एक बूँद ज्ञान-मोती का रूप धारण करती जा रही है। अतः हमारे में इतने मोती बाबा डालते हैं, भरपूर करते हैं मोतियों से, तो हमारा इतना ध्यान होना चाहिये। बाबा के सामने मुरली सुनने बैठे बच्चों में से, यदि किसी ने बाबा की मधुर शिक्षाएँ सुनकर चेहरे द्वारा प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की तो बाबा कहते थे, यह कौन बुद्ध सामने बैठा है। इतना ध्यान बाबा बच्चों पर देते थे। बाबा का प्यार भी भरपूर था तो शिक्षायें भी भरपूर देते थे। मान लो, किसी बच्चे ने कोई ग़लती कर दी तो बाबा उसे व्यक्तिगत रूप से बुलाकर ग़लती नहीं सुनाते थे। मुरली में ही सब सुना देते थे कि महारथी बच्चे भी ऐसे-ऐसे करते हैं, बाबा के पास रिपोर्ट आती है। ग़लती करने वाला तो समझ

जाता था कि यह बात मुरली में मेरे लिए आई है। मुरली के बाद बाबा के कमरे में हम मुख्य-मुख्य भाई- बहनें जाते थे जिसे चैम्बर नाम से जाना जाता था। बाबा अपनी गद्दी पर विष्णु मुआफिक लेट-से जाते थे और हम सभी बच्चे पास-पास बैठ जाते थे। मान लो, बाबा ने मुरली जिस बच्चे के लिए चलाई, वह भी बाबा के सामने चैम्बर में आ गया तो उसका मन तो अंदर से खा रहा होता था कि बाबा अभी भी कुछ कह ना दें पर बाबा कभी नहीं कहते थे। जो कहना होता था, मुरली में ही कह देते थे। और यदि, वह हिम्मत करके बाबा के बहुत करीब भी चला जाये तो भी बाबा और ही प्यार करते थे। मुरली के बाद उस बात को कभी नहीं दोहराते थे कि बच्चे, तुमने अमुक ग़लती की है। फिर वह बच्चा भी भूल जाता था। इस प्रकार बाबा बहुत प्यार करते थे, ग़लती करने वाला बेधड़क होकर बाबा के सामने जा सकता था, पर उसको स्वयं ही इतना अहसास हो जाता था कि भविष्य में उस भूल को कभी नहीं दोहराता था। बाबा हँसा-बहला कर उस बात को समाप्त कर देते थे पर वह बच्चा पूरा बदल जाता था।

दादी जी दिल में कोई बात नहीं रखती थी

ऐसा ही दादी जी का स्वभाव था। यदि किसी छोटी बहन ने दादी जी को सुनाया कि आज मुझे बहुत रोना आया, फीलिंग आई आदि-आदि तो दादी कभी भी उसकी बात बड़ी बहन को सुनाकर उलाहना नहीं देती थी कि तुमने छोटी बहन के साथ ऐसा-वैसा क्यों किया। हाँ, दादी जी उस छोटी बहन को ऐसा प्यार देती थी जो उसके मन को पूरा ठीक कर देती थी। पर बड़ी बहन को बुलाए, फिर कहे, तुमसे छोटी बहन नाराज है, क्या करती हो, कभी नहीं। दादी क्लास कराती थी, सब कायदे-कानून समझाती थी पर व्यक्तिगत मिलन में सीधा नहीं कहती थी कि तुमने ऐसा किया है। इस प्रकार, दादी भी दिल में कुछ नहीं रखती थी। क्योंकि दिल में कोई भी बात घर कर जाए तो खुशी गुम हो जाती है। बाबा ने कहा, जीवन भले जाए पर खुशी न जाए।

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ब्रह्माकुमार रमेश शाह भाई जी, राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि के बारे में अपने उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त करते हैं - दादी प्रकाशमणि जी ने मुझे तथा मेरे लौकिक परिवार को अनेक रीति से संवारा और आज मैं तथा मेरा लौकिक परिवार जो भी ईश्वरीय सेवायें कर रहे हैं, उसके पीछे उनकी पालना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बातें तो अनेक हैं, समझ में नहीं आता, कहाँ से शुरू करें और कहाँ अन्त करें क्योंकि लेख के रूप में लिखने की एक मर्यादा होती है, फिर भी संक्षिप्त में दादी जी के साथ के संस्मरण लिखता हूँ।

पाण्डुरंग शास्त्री जी की सेवा

सन् 1952 में जब मेरा इस विश्व विद्यालय के साथ परिचय हुआ तब से इस के सभी अनन्य रत्नों का परिचय तो था ही और कइयों के परोक्ष व अपरोक्ष रूप से संपर्क में भी आया था। जब दादी जी और रतनमोहिनी दादी जी जापान गये, तब मुझे वह समाचार मिला और मैंने दादी जी को पत्र लिखा कि श्रीमद्भगवद् गीता पाठशाला के मुखिया पांडूरंग शास्त्री जी तथा उनके एक साथी जिनके साथ मेरा पहले बहुत घनिष्ठ संबंध था तथा जो बाहर के तत्वज्ञान के बहुत बड़े विद्वान हैं, भी जापान के विश्व धर्म सम्मेलन में आये हुए हैं, तो आप उनको भोजन के लिए रोज अपने पास बुलाना और उनकी ईश्वरीय सेवा करना। मैंने शास्त्री जी को भी मुंबई में कहा था कि आप और आपका साथी दोनों अकेले जापान जा रहे हैं, वहाँ आपको खाने की दिक्कत होगी और इसलिए मैंने ब्रह्माकुमारी बहनों को लिखा है। आप भी उनसे संपर्क करना। दोनों ने मेरी बात मानी और जापान की दस दिन की कांफ्रेंस में दादी जी ने और रतनमोहिनी दादी जी ने उन दोनों को अपने हाथ से पकाया हुआ पवित्र भोजन खिलाया और साथ ही यज्ञ का इतिहास भी बहुत विस्तार से सुनाया। परिणामरूप जब शास्त्री जी मुंबई आये तब

उन्होंने मुझे कहा कि रमेश भाई, ब्रह्माकुमारी संस्था का इतिहास सुनकर जब मैंने जाना कि पुरुष प्रधान समाज ने बहनों की आध्यात्मिक उन्नति में कितनी रुकावट डाली तो मेरी आँखों में पानी भर आया। बाद में हमेशा ही शास्त्री जी के साथ विश्व विद्यालय का स्नेह भरा संबंध रहा और शास्त्री जी प्यारे ब्रह्मा बाबा तथा प्यारी मातेश्वरी जी से मिलने भी आये। इस प्रकार से अपरोक्ष रूप से दादी जी के द्वारा सेवा हुई, उसका मैं साक्षी हूँ।

प्रदर्शनी की सेवा में दादी जी का सहयोग

बाद में दादी जी जब पटना में थे तो ब्रह्मा बाबा जब मुंबई आते थे तो दादी जी भी मुंबई का चक्कर लगाते थे परंतु इतना घनिष्ठ संबंध दादी जी के साथ नहीं था क्योंकि ब्रह्मा बाबा की उपस्थिति में ज्यादा कारोबार ब्रह्मा बाबा से ही होता था। परंतु जब सन् 1964 में हम सबने प्रदर्शनी के चित्र बनाने का कार्य शुरू किया तो पहला-पहला चित्र "सच्चा वैष्णव कौन" बनाया और ब्रह्मा बाबा के पास वह चित्र लिखत सहित प्रमाणित कराने के लिए भेजा। दो दिन में ही ब्रह्मा बाबा ने उस लिखत में सुधार कर दुबारा अच्छे अक्षरों में लिखवाकर भेजा तो मैंने ब्रह्मा बाबा को पत्र लिखा कि बाबा, ये आपके अक्षर नहीं हैं, ये किसने लिखा है? तो ब्रह्मा बाबा ने लिखा कि बच्चे, कुमारका बच्ची यहाँ है, उसी ने लिखत को सुधार करके भेजा है। तो हमने ब्रह्मा बाबा को लिखा कि जब हमारे चित्रों की लिखत कुमारका बहन को ही फाइनल करनी है तो क्यों नहीं आप कुमारका बहनजी को अपने प्रतिनिधि के रूप में मुंबई भेज दें। बाबा ने हमारी बात को मान लिया और टेलीग्राम किया कि कुमारका बच्ची को रिसीव करो। इस प्रकार प्रदर्शनी के पहले चित्र से ही दादी जी का पूर्ण सहयोग प्रदर्शनी की सेवा के लिए मिला और दादी जी ने ही प्रदर्शनी के सभी चित्रों की समझानी फाइनल की। जब पहली प्रदर्शनी का उ‌द्घाटन महाराष्ट्र के राज्यपाल मंगलदास पकवासा ने किया तब दादी जी और ऊषा ने उन्हें समझाया और उनसे ओपिनियन लिखवाया। गवर्नर ने लिखा, यह अद्भुत (Marvellous) प्रदर्शनी है। बाद में सभा में संबोधन के लिए भी गवर्नर गये। इस प्रकार से प्रदर्शनी सेवा में ओपिनियन लिखवाने की शुरूआत भी दादी जी ने की। बाद में मातेश्वरी जी का मुंबई आना हुआ और मातेश्वरी जी ने दादी जी तथा सभी महारथी भाई- बहनों को बुलाकर प्रदर्शनी की सेवा विहंग मार्ग की सेवा है, यह प्रस्तावित किया।

दादी जी का मेरे लौकिक परिवार से घरेलु सम्बन्ध

इतने में ही ब्रह्मा बाबा को ईस्टर्न जोन की सेवा के लिए अच्छे हैण्ड्स की जरूरत थी तो दादी निर्मलशान्ता ने कोलकाता जाने की ऑफर ब्रह्मा बाबा को की और ब्रह्मा बाबा ने फौरन उस बात को स्वीकार कर दादी निर्मलशान्ता को वहाँ भेजा और दादी प्रकाशमणि को गामदेवी सेन्टर (उस समय वाटरलू मेन्शन) का इंचार्ज बनाया। तब से दादी प्रकाशमणि जी के साथ हमारे लौकिक परिवार का संबंध जुटा और वह संबंध दादी के अव्यक्त होने तक इतना ही घनिष्ठ रहा। मेरी लौकिक माता को दादी जी "माताजी" कहकर बुलाते थे और मेरी माताजी भी उनके साथ अपनी बेटी का व्यवहार करते थे। उन दिनों दादी जी को माइग्रेन की बीमारी थी और कई बार दादी जी को माइग्रेन के कारण सिरदर्द का दौरा पड़ता था और उलटी होती थी। दादी जी को माइग्रेन के अटैक का पहले से ही आभास हो जाता था इसलिए दादी जी फौरन टैक्सी पकड़कर हमारे लौकिक घर आ जाती थी। हमारी लौकिक बड़ी बहन, माताजी और ऊषा, दादी जी की सेवा करते, दवाई आदि देते। इस प्रकार दादी जी हमारे लौकिक परिवार के घरेलू सदस्य बन गये थे।

गामदेवी के दारु-उल-मुलक भवन में सेवाकेन्द्र का स्थानान्तरण

वाटरलू मेन्शन में जब सेवाकेन्द्र था, तब वहाँ से उसको स्थानांतरित करने की बात चल रही थी। हम मकान ढूँढ़ रहे थे। दादी जी, मैं और ऊषा कार में गामदेवी सेन्टर के पास ही खड़े थे। मैंने दादी जी को पूछा, आपको कहाँ पर मकान लेना है, कहाँ पर मकान के लिए कोशिश करें? उस समय गामदेवी का दारु- उल-मुलक भवन नया बना ही था, उसके प्रति दादी जी ने इशारा किया कि ऐसे मकान में अगर सेन्टर खुल जाये तो बहुत अच्छी ईश्वरीय सेवायें हो सकती हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार उसी भवन में एक फ्लैट हमने बुक कराया था तो हमने अपने लौकिक परिवार से चर्चा करके दूसरे ही दिन दादी जी को वह फ्लैट ईश्वरीय सेवा में देने का ऑफर किया। दादी जी को वह फ्लैट बहुत ही पसंद आया और कहा कि हम आबू चलते हैं, बाबा से स्वीकृति लेकर इस फ्लैट में सेवा शुरू करेंगे। दो दिन पश्चात् हम आबू गये, ब्रह्मा बाबा से स्वीकृति ले वापिस आये और वाटरलू मेन्शन से सेवाकेन्द्र का स्थानांतरण गामदेवी में हो गया और उसी स्थान पर रहकर ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने तक दादी जी ने सेवायें की। इस प्रकार सन् 1964 से 1968 तक अर्थात् पाँच वर्षों तक दादी जी से निरंतर पालना लेने और आगे बढ़ने का सौभाग्य हमें मिला।

बाबा ने कमल हस्तों से लिखा नियुक्ति-पत्र

मातेश्वरी जी 24 जून, 1965 को अव्यक्त हुए तो हम सब मधुबन आये और थोड़े दिन रहकर दादी जी के साथ वापस मुंबई गये। तब मैंने ब्रह्मा बाबा को पत्र लिखा कि बाबा अब मातेश्वरी के स्थान पर यज्ञ की मुख्य संचालिका कौन होगी, इसका निर्णय आपको करना होगा और यह निर्णय लिखित में हो तो अच्छा रहेगा। ब्रह्मा बाबा ने दिनांक 01.04.1966 की साकार मुरली के अंतिम पेज पर अपने हाथों से सिंधी अक्षरों में दादी प्रकाशमणि को मुख्य प्रशासिका तथा दीदी मनमोहिनी को अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका के रूप में नियुक्त करने का नियुक्ति-पत्र लिखा। बाबा ने मुझे इसकी एक कॉपी भेजी और कहा कि बच्चे, आज मैंने यह नियुक्ति-पत्र लिखा है और मुरली के द्वारा सबको सूचना दे दी है। इस प्रकार 1 अप्रैल, 1966 से दादी जी की मुख्य प्रशासिका के रूप में नियुक्ति हुई और वह कार्यभार उन्होंने 25 अगस्त, 2007 तक बड़ी कुशलता से सभाला।

ट्रस्ट के प्रति दादी जी की वचनबद्धता

फिर नवंबर 1968 में मैंने ब्रह्मा बाबा को पत्र लिखा कि बाबा, आपने दादी जी को मुख्य प्रशासिका के रूप में नियुक्त तो कर दिया है परंतु वे तो मुंबई में हैं, उन्हें यज्ञ का कारोबार संभालने का अनुभव और आपका मार्गदर्शन कैसे मिलेगा? तब बाबा ने युक्ति से मुझे और कुमारका दादी को वर्ल्ड रिन्युअल स्पीच्युअल ट्रस्ट के निर्माण के संबंध में आबू बुलाया। दीदी मनमोहिनी तथा दादा आनन्द किशोर आबू में ही थे। ब्रह्मा बाबा ने ट्रस्ट के बारे में राय-सलाह करने के लिए हम चार लोगों (मैं, दादी, दीदी तथा दादा आनन्द किशोर) की कमेटी बनाई। चर्चा के अंतिम दिन प्रश्न निकला कि ट्रस्ट का मैनेजिंग ट्रस्टी कौन बने ? प्रकाशमणि दादी और दीदी मनमोहिनी ने आपस में राय करके रात्रि क्लास में ब्रह्मा बाबा से मुझे मैनेजिंग ट्रस्टी के रूप में नियुक्त करने की बात की। मैं मना कर रहा था क्योंकि मुझे उसका अनुभव नहीं था तो दादी जी ने कहा, रमेश जी, आप यह कारोबार संभालो, मैं आपकी पूरी मददगार बनूँगी। दादी जी ने अपना यह वचन अंत तक निभाया और मुझे हर बात में ट्रस्ट के कारोबार में सहयोग दिया। दूसरे दिन ब्रह्मा बाबा ने मुझे तो ट्रस्ट के निर्माण का कारोबार करने के लिए मुंबई भेज दिया और दादी जी को आबू में रखा। दिसंबर 1968 से 18 जनवरी तक ब्रह्मा बाबा ने दादी जी को मुख्य प्रशासिका के रूप में कारोबार करने का गहन प्रशिक्षण देना शुरू किया। बीच में मैं भी दो बार आबू आया था और ब्रह्मा बाबा से मिली हुई शिक्षाओं का थोड़ा-सा स्वाद मुझे भी दादी जी द्वारा मिला।

दादी जी का पहला फोन

16 जनवरी, 1969 को मैं आबू संग्रहालय का मकान खरीदने की बातचीत करने के लिए अहमदाबाद आया और 17 जनवरी, 69 को मकानमालिक के साथ 95% बातें निश्चित कर रात को मधुबन में ब्रह्मा बाबा को फोन पर सारा समाचार दिया और पूछा कि मकान मालिक तो एक हफ्ते में आबू आकर मकान का एग्रीमेंट साइन करेगा तब तक मैं कहाँ जाऊँ, मधुबन आऊँ या बड़ौदा में जो प्रदर्शनी चल रही है, वहाँ जाऊँ? ब्रह्मा बाबा ने मुझे बड़ौदा जाने की श्रीमत दी परंतु दादी जी ने ब्रह्मा बाबा के हाथ से फोन लेकर मुझे सूचना दी कि मैं मधुबन आ जाऊँ और बड़ौदा ना जाऊँ। मैंने 18 जनवरी को रात 11 बजे की ट्रेन से आबू पहुँचने का तय किया। बाद में ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने पर दादी जी ने पहला-पहला फोन मेरे लिए ही करवाया और उन्हें मालूम चला कि रमेश आबू आने के लिए निकल गया है।

दादी जी ने दी मुखाग्नि

19 जनवरी, 69 को मुझे आबू पर्वत पहुँचने पर, बस अड्डे से पांडव भवन जाने के रास्ते में ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने का समाचार मिला। जब मैं पांडव भवन पहुँचा तो दादी जी, संदेशी दादी और ईशू दादी मेरे इंतजार में ही बैठे थे। तीनों मिलकर मुझे बाबा के कमरे में ले गई और तीन मिनट हमने ब्रह्मा बाबा के पार्थिव शरीर के सामने खड़े होकर योग किया। बाद में मैंने दादी जी को कहा कि आपने ब्रह्मा बाबा के शरीर को सारी रात अच्छी रीति संभाला है, अब आगे का काम हम भाइयों का है, हमें करने की इजाजत दीजिए। दादी जी ने मुझे पूछा कि क्या आपको यह सब करने का अभ्यास है? मैंने "हाँ" कहा और दादी जी ने मुझे अंतिम संस्कार करने की जिम्मेवारी दी। बाकी सब बातों का निर्णय करना तो मेरे लिए सहज था परंतु मुखाग्नि कौन करे, यह प्रश्न सामने था क्योंकि सारा ही दैवी परिवार मौजूद था। ब्रह्मा बाबा का लौकिक परिवार भी मौजूद था इसलिए मैंने अव्यक्त बापदादा से संदेश पूछा कि मुखाग्नि कौन देगा तो बाबा ने यही संदेश दिया कि यह सारी मानव जाति के अलौकिक पिता का अग्निसंस्कार है और इस दैवी परिवार में तो सबसे बड़ा और मुरब्बी बच्चा दादी प्रकाशमणि ही है इसलिए दादी प्रकाशमणि ही ब्रह्मा बाबा के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देगी।

हमने भी दिया वचन दादी जी को

1 फरवरी 1969 को जब हमारे परिवार ने दादी जी से छुट्टी माँगी तब दादी जी की आँखों में पानी भर आया और उन्होंने हमारे परिवार को कहा कि क्या आप भी हमें यहाँ छोड़कर मुंबई जायेंगे? तब हम सबने दादी जी को वचन दिया कि हम सदैव हर समय, हर बात में दादी जी के पूर्ण मददगार रहेंगे। इस प्रकार दादी जी के साथ हमारे यज्ञ सेवा के पार्ट की शुरूआत भी दादी जी के मुखारविन्द द्वारा हुई। उसके बाद का इतिहास तो सबको मालूम ही है कि कैसे दादी जी ने गैलप करके अपनी सीट की जिम्मेवारी उठाई और अपने आप को मुख्य प्रशासिका के रूप में सबके दिलों में प्रस्थापित किया।

विदेश जाने की श्रीमत मिली

सन् 1977 में बड़ी दीदी मुंबई आये हुए थे, उस समय दादी प्रकाशमणि जी का विदेश यात्रा का कार्यक्रम बन रहा था। बड़ी दीदी ने मुझे कहा, रमेश, आप आबू चलो, दादी जी का विदेश यात्रा का कार्यक्रम बन रहा है, उसमें आपके मार्गदशर्न की जरूरत पड़ेगी।बड़ी दीदी के साथ मैं और ऊषा आबू आये। जब अव्यक्त बापदादा से दादी जी की विदेश यात्रा के बारे में संदेश लिया गया तो अव्यक्त बापदादा ने दादी जी के साथ मुझे भी विदेश जाने की श्रीमत दी। दादी जी के साथ चार मास से भी अधिक समय विदेश यात्रा पर जाने का सौभाग्य मिला। इस दौरान बहुत सी बातें दादी जी से सीखी और दादी जी से माँ-बेटे का स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस प्रकार दादी जी ने हमारे दिल में अलौकिक माता का स्थान पक्का किया।

दादी जी से सेवा के लिए मार्गदर्शन मिला

मुंबई से जब ईश्वरीय सेवा पर निकले तब दादी जी ने प्लेन में ही मुझसे पूछा, आप प्लेन में क्या करते हो। मैंने कहा, ऐसे ही बैठा रहता हूँ, बाबा को याद करता हूँ तो दादी ने कहा, क्यों नहीं आप पत्र लिखते और सबको यात्रा का समाचार भेजते। उस समय फैक्स या ई-मेल तो थे नहीं, टेलिफोन बहुत महंगे थे। हमने पत्र लिखना शुरू किया। कैरो से हमारे साथ अमेरिका की बहुत बड़ी कंपनी का डायरेक्टर साथ में था तो दादी जी ने हमें उनकी सेवा करने के लिए कहा। मैंने उन महानुभाव से पूछा, आप परमात्मा को मानते हो? उसने मना किया। मैं सोच में पड़ गया कि नास्तिक को अपना ज्ञान कैसे सुनाऊँ? मैं दादी जी के पास मार्गदर्शन के लिए गया और पूछा। दादी जी ने कहा, नैतिकता की बातें सबको पसंद आती हैं इसलिए साकार बाबा की मुरली से सिविल आई और क्रिमिनल आई की बातें करो। मैंने उस आत्मा को ये बातें बताई और फ्रैंकफर्ट पहुँचते-पहुँचते वह नास्तिक से आस्तिक बन गया।

दादी जी की दुरांदेशी बुद्धि

अमेरिका में हम चार दिन ही थे तभी ईश्वरीय सेवार्थ अमेरिका में संस्था को रजिस्टर्ड कराने का सोचा गया तब मैंने दादी जी से पूछा, क्या हम अमेरिका में संस्था को रजिस्टर्ड करायें, तब दादी ने कहा, मैं भारत में बड़ी दीदी से फोन करके पूछती हूँ। मैंने दादी को कहा कि मुख्य संचालिका तो आप हैं, आप निर्णय करें। दादी ने कहा, नहीं रमेश, जो मधुबन में है, वही मुख्य संचालिका है क्योंकि मधुबन ही यज्ञ का मुख्यालय है तो मैं मुख्य संचालिका होते भी मुख्यालय की स्वीकृति के बिना यहाँ पर संस्था को रजिस्टर्ड कराने की स्वीकृति नहीं दे सकती। फोन पर बड़ी दीदी से स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही बड़ी दादी ने मुझे रजिस्ट्रेशन के लिए कागज़ बनाने को कहा। मैंने कागज बनाये और उसमें वहाँ के भाई-बहनों के नाम ट्रस्टी के रूप में लिखे तब मुझे दादी की दूरंदेशी बुद्धि का विशेष अनुभव हुआ। दादी जी ने कहा कि इसमें अपना भी नाम डायरेक्टर के रूप में लिखो। मैंने कारण पूछा तो दादी जी ने कहा, यह ट्रस्ट भले ही अमेरिका में रजिस्टर्ड है परंतु भारत के साथ इसके संबंध को कानूनी रूप देने के लिए भारत के प्रतिनिधि के रूप में ट्रस्टी मण्डल में आपका नाम होना जरूरी है। दादी जी के इस सुझाव के आधार पर मैंने अपना नाम वहाँ के ट्रस्टी मण्डल में लिखवाया। इस प्रकार विश्व सेवा प्रति भी दादी जी का दृष्टिकोण सराहनीय था। बाद में दादी जी ने मुझे जर्मनी, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, हांगकांग आदि सभी स्थानों पर ईश्वरीय सेवा को कानूनी रूप देने के निमित्त बनाया।

दादी जी ने दिए सुअवसर

मैं तो इन्कम टैक्स का वकील था, कानून की बातों को नहीं जानता था पर बापदादा की श्रीमत के आधार से मुझे यज्ञ सेवार्थ मकान खरीदने और अन्य संस्थाओं का निर्माण करने का सुअवसर भी दादी जी ने ही दिया। बाद में विदेश से भारत आकर भारत के सभी मुख्य स्थानों पर भी दादी जी के साथ मेरा जाना हुआ। दादी जी ने हर जगह जाकर विदेश यात्रा के संस्मरण सुनाए।

देवता माना देने वाला

यहाँ एक विशिष्ट अनुभव लिख रहा हूँ। जब हम दिल्ली पहुँचे तो वहाँ करीब 2,000 भाई-बहनें आये हुए थे। कार्यक्रम के अंत में टोली बाँटने का प्रसंग आया। दादी जी ने कहा, मैं बहनों को और आप भाइयों को टोली बाँटो। वहाँ करीब 1200 बहनें और 800 भाई थे। मैं तो 800 भाइयों को टोली बाँटते थक गया, हाथ दर्द करने लगा। मैंने दादी को कहा, मुझे टोली बाँटने का अभ्यास नहीं है, मेरा तो हाथ थक गया, आपका क्या हाल है? दादी ने कहा, मुझे तो कुछ नहीं हुआ, मेरा तो टोली बाँटने का अभ्यास है। देवता माना देने वाला। आपको भी देने का अभ्यास करना चाहिए।

दादी जी की कुशल वकालत

दादी जी बहुत अच्छी वकील भी थे, इसका भी मुझे अनुभव है। एक बार मैं मधुबन में आया था तो एक भाई ने मुझे आकर कहा कि आप हमारी ग़लतियों के कारण दादी जी को क्यों डाँटते हो? मेरे लिए यह डाँटना शब्द वज्रघात जैसा था तो मैंने उस भाई को कहा कि मेरी शक्ल को देखो, क्या मेरी यह ताकत है कि मैं दादी जी को डाँदूँ, दादी जी तो कितनी महान हैं, मैं उन्हें कैसे डाँट सकता हूँ! भाई ने कहा, दादी ने खुद मुझसे कहा है कि रमेश बहुत डाँटता है इसलिए मैं आपकी बात स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे लगा कि इसमें दादी की ही कोई युक्ति है। इसलिए मैंने उस भाई को कहा कि ठीक है, इस बारे में मैं दादी से बात करता हूँ। दादी से जब इस बारे में पूछा तो दादी ने कहा कि वह भाई मेरे पास आया था, उसे ईश्वरीय सेवा के लिए कुछ खर्च करना था, मुझे उसे मना करना था पर मैं कैसे मना करूँ इसलिए आपका नाम बोल दिया और कहा कि रमेश मुझे डाँटता है, आपकी बात अच्छी होते भी मैं छुट्टी नहीं दे सकती। मैंने कहा, यज्ञ में इतने भाई-बहनें हैं, मेरा नाम ही क्यों लिया? तब दादी ने वकालत करते हुए कहा कि आपने शास्त्र पढ़े हैं, शास्त्रों में दधिचि की कहानी आती है कि इंद्र ने दधिचि की हड्डियों से अपना वज्र बनाया। मैंने कहा कि हाँ, मुझे मालूम है। दादी ने कहा, हम तो ईश्वरीय सेवार्थ आपकी हड्डी को हाथ नहीं लगाते, आपके नाम से ही हमारा काम हो जाता है। आप तो शुक्रिया मानो कि आपकी हड्डी सही-सलामत हैं। इस प्रकार से दादी ने मुझे रमणीक सांत्वना दी और मैं कुछ बोल नहीं सका। मैं जोश में दादी के पास गया था और हँसते- हँसते दादी के पास से आया। इस प्रकार दादी में वकालत करने की जन्मजात कुशलता थी।

इस प्रकार के कितने ही ईश्वरीय सेवा के अनुभव दादी जी के साथ के हैं जिनको अगर लिखें तो एक बड़ी किताब बन जाये। ईश्वरीय सेवा के कारोबार में सक्रिय भाग लेने का मुझे और मेरे परिवार को जो भी अवसर मिला, उसके लिए दादी जी का कुशल नेतृत्व और रूहानी पालना ही निमित्त है। 25 अगस्त, 2007 के दिन हम सब आबू में ही थे। हमें दादी कॉटेज से फोन आया और मैं और ऊषा दादी कॉटेज पहुँच गये और दादी जी को हम सबने अंतिम विदाई दी। अपने स्थूल नेत्रों से एक आत्मा को स्थूल शरीर छोड़ते देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। इस प्रकार से दादी जी ने अंतिम श्वास तक मुझे नये-नये अनुभव कराकर अनुभवीमूर्त बनाया। दादी जी का आभार मानने के लिए मेरे और मेरे परिवार के पास कोई शब्द नहीं हैं और इसलिए ही इस पुस्तिका के अंदर इस लेख द्वारा मैं अपनी श्रद्धांजली दादी जी को दे रहा हूँ।

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ब्रह्माकुमारी मोहिनी बहन दादी जी के बारे में सुनाती हैं -

डरना मत, यह परमात्मा पिता का अलौकिक इशारा है

यह मेरा परम सौभाग्य और पुण्य कर्मों का फल था जो प्यारे बाबा ने मुझे दिव्य दृष्टि का वरदान देकर अपने अव्यक्त स्वरूप का साक्षात्कार कराया और सूक्ष्म रूप में इशारा दिया कि बच्ची, मैं तुझे लेने के लिए आया हूँ। बार-बार यह साज भरी आवाज़ मेरे कानों में गूँजती थी परन्तु मुझे समझ में नहीं आता था कि यह कौन है, क्यों मुझे लेने आया है। ऐसे समय में, प्यारे बाबा की आज्ञानुसार जापान में होने वाले सम्मेलन में भाग लेने जाते समय, चन्द घंटों के लिए प्यारी दादी जी का लखनऊ आना हुआ और मैंने उनसे उस आवाज़ का रहस्य पूछ लिया। दादी जी ने कहा, डरना मत, यह परमात्मा पिता का अलौकिक इशारा है, वह आपको अपना बनाना चाहता है, आप बहुत भाग्यवान हो जो आपको इतनी छोटी आयु (12 वर्ष) में भगवान ने पसंद किया। दादी जी जापान चली गई परंतु मेरे दिल पर अमिट छाप छोड़ गईं। चंद घंटों की मुलाकात में उनके वात्सल्य, अपनत्व भरी आवाज, झील- सी गहरी आँखें जिनमें ममत्व का सागर लहरा रहा था – इन सबने मेरे दिल में सदा-सदा के लिए स्थान बना लिया। उनके ऐसे दिव्य व्यक्तित्व को मैं जीवन में कभी नहीं भूल सकी।

रूहानी नजर से निहाल किया

एक वर्ष बाद जब दादी जी जापान से लौटने वाली थी तो मैं मधुबन में ही थी। मैंने देखा कि प्यारे बाबा बहुत उमंग और प्यार से दादी जी के स्वागत की तैयारियाँ कर रहे थे। हर ब्रह्मा-वत्स के अंदर दादी जी के प्रति अथाह प्यार देखकर मैं बहुत खुश हो रही थी। उनके आगमन की घड़ियाँ नजदीक आती जा रही थी। बहुत ही हर्षितमुख, बेपरवाह बादशाह, सेवा की सफलता से संपन्न, प्यारे बाबा से मधुर मिलन मनाती हुई दादी ने हम सबको भी रूहानी नजर से निहाल किया। मुझे देखकर बोला, आप भी आई हो? मुझे बहुत खुशी हुई कि प्यारी दादी ने मुझे पहचान लिया। तब से उनसे मिलने और पालना लेने का सिलसिला जारी है।

हर प्रकार की सेवा करनी सिखाई

तीन वर्ष के बाद जब मैं पुनः में यज्ञ आई तो प्यारे बाबा ने मुझे दादी जी के साथ देहली की अलौकिक सेवार्थ भेजा। दादी जी ने मुझे अपने साथ रखकर छोटी- से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी सेवाकरनी सिखाई। उनके संग के रंग में मैं आलराउण्डर और हर सेवा में दक्ष बनती गई। मैंने देखा, दादी जी का मम्मा-बाबा के साथ निश्छल प्यार, अटूट भावना, सेवा में समर्पण, हाँ जी का पक्का पाठ, एक बाप दूसरा न कोई की दृढ़ धारणा से सदा एकव्रता स्थिति। सत्यता और दिव्यता की प्रतिमूर्ति दादी सदा बापदादा के दिलतख्त पर विराजमान रह, निश्चिन्त भाव से परोपकार में तत्पर रहती और अन्य आत्माओं को सेवा में साथी बनाकर, एकता के सूत्र में बाँधकर, व्यस्त भी रखती और आगे भी बढ़ाती ।

बाबा मदद करेंगे

जब हम दिल्ली में सेवारत थे तो कई बार दादी जी आवश्यक कार्य से, मुझे सेन्टर पर छोड़कर, दूसरे स्थान पर चली जाती थी और वहीं से संदेश देती थी कि आज आप क्लास करा लेना। मैं कहती थी, दादी इतने बड़े-बड़े भाई, मैं कैसे क्लास कराऊँ? पर दादी जी कहती थीं, बाबा मदद करेंगे। इस प्रकार क्लास कराने का उमंग और बल प्रदान करते-करते उन्होंने हमारा संकोच निकाल दिया। कई बार भाई-बहनें प्रश्न पूछते थे तो मैं कहती थी, सारी बातें एक ही दिन में थोड़े ही जान लेनी होती हैं। फिर मैं दादी से पूछकर अगले दिन, उन प्रश्नों के उत्तर दे देती थी। इस प्रकार दादी ने ज्ञान-योग में प्रवीण बना दिया। दादी जी मुझे बहुत प्यार करती थी। बच्चों की तरह प्यार करती थीं। प्यार से मोहनलाल कहकर बुलाती थीं।

दीदी ने बनाया दादी की सेवा-साथी

प्यारे बाबा के अव्यक्त होने के बाद जब दादी जी पर संपूर्ण यज्ञ की ज़िम्मेवारी आई तो बड़ी दीदी ने मुझे दादी जी का सेवा-साथी बनाया। दादी जी ने सारा प्रशासन सिखाया और सदा साथ में ले जाती थी। तब से दादी जी के अंग-संग रहना, उनके अव्यक्त होने तक बना रहा। अंत में भी इन नयनों ने, सब तरफ से उपराम हुई दादी को बाबा की गोद में समाते देखा। दादी जी के साथ रहते, उनके अनगिनत गुणों, विशेषताओं की साक्षी रही हूँ।

दादी जी का मुरली-प्रेम

मम्मा कई बार मुरली पढ़ती थी। वही बात मैंने दादी प्रकाशमणि जी में भी देखी। वे सुबह क्लास में जाने से पहले मुरली को बहुत अच्छी तरह पढ़ती थी। फिर शाम को चाय पीने के बाद मुरली पढ़ती थी। रात्रि को, कितनी भी देर से वे कमरे में आएँ पर मुरली पढ़े बिना सोती नहीं थीं। बाबा की मुरली से इतना जिगरी प्रेम था। कभी-कभी हम उनको कहते थे, दादी, आप मन-मन में पढ़ रही हैं, हमें भी सुनाइए, हम भी सुनेंगे। तब दादी जी बहुत प्यार से पढ़कर सुनाती थी, चाहे रात्रि के ग्यारह, साढ़े ग्यारह क्यों न बज जाएँ। दादी जी, क्लास में मुरली सुनाते समय अपनी कोई बात नहीं कहती थी। जो बाबा ने कहा, जैसे भी कहा, चाहे धारणा, चाहे सेवा के बारे में जैसे का तैसा सुनाती थीं इसलिए मुरली हम सबके अंदर छप जाती थी। जब दादी हॉस्पिटल में थीं, हम कहते थे, दादी जी, समाचार सुनोगे तो कहती थीं, नहीं। पर जब हम कहते थे,मुरली सुनोगे तो कहती थीं, हाँ। जब तक हम सुनाते थे, जागृत होकर सावधानी पूर्वक सुनती रहती थीं। मुरली सुनते समय दादी जी नींद नहीं करती थीं।

मुरली के बिना रह नहीं सकती थी

अव्यक्त होने के सप्ताह भर पहले भी दादी जी - काफी ठीक थी। मुरली में जैसे गीत की लाइन आती - थी, रात के राही..। हम पूछते थे, दादी, आगे क्या है, तो कहती थीं, थक मत जाना। जब कोई सिंधी अक्षर मुरली में आता था तो हम कहते थे, दादी, इसका अर्थ क्या है, तो बड़े प्यार से अच्छी तरह समझाती थीं। जितनी मुरली सुनती थीं दादी, बड़े ध्यानपूर्वक सुनती थीं, जब थक गई होती थीं तो स्वयं कह देती थीं, बाकी शाम को सुनेंगे। मैंने देखा, अन्त तक दादी को मुरली से इतना प्यार, जो उसके बिना रह नहीं सकती थी। मुरली पढ़ने के लिए पूछते थे तो तुरंत कहती थी, चश्मा लाओ, दादी मुरली पढ़ेगी।

दादी की समदृष्टि और बाबा से अतुलनीय प्यार

भ्राता निर्वैर जी, सुबह-दोपहर-शाम को आकर दादी जी को मुरली सुनाते थे। कभी नहीं आते थे तो हम सुनाते थे। मानो मैं सुना रही हूँ, भाता निर्वैर जी भी आ गए, तो मैं पूछती थी, दादी, निर्वैर भाई सुनाये? तो दादी कहती थीं, नहीं, आप सुना रही हो ना, आप ही सुनाओ। इस प्रकार दादी की समदृष्टि और बाबा से प्यार अतुलनीय था। दादी के दोनों तरफ बाबा के चित्र लगे हुए थे। उनका सारा ध्यान बाबा में ही रहा। बाबा के सिवाय कहीं भी नहीं, न किसी चीज़ में, न व्यक्ति में, न वैभव में लगाव-झुकाव था। उनके अंदर त्याग और वैराग्य की पराकाष्ठा थी। दादी जी हमेशा कहती थीं, सिम्पल रह, सैम्पल बनो। दादी कभी भी न तड़क-भड़क स्वयं पसंद करती थी, न हम लोगों को करने देती थीं। कभी ऐसा कुछ देखती थीं तो तुरंत कहती थी, जाओ, बदल कर आओ। मर्यादा पुरुषोत्तम बाबा की बच्ची होने के नाते दादी, स्वयं मर्यादा में रहती थी और सबको यही सिखाती थीं। वे कहती थीं, न बहुत ऊपर, न बहुत नीचे, साधारण रहो।

सहज अनुकरणीय कर्म

कई बार हम कहते थे, दादी, इतने वर्ष हो गये हैं, आपका बाथरूम इतना पुराना हो गया है। दादी कहती थीं, जैसा है, वैसा ही ठीक है। दादी का हमेशा लक्ष्य रहा कि जैसा कर्म मैं करूँगी, मुझे देखकर दूसरे भी करेंगे। इसलिए दादी ने आज तक ऐसा कोई कर्म नहीं किया जो दूसरों के लिए ठीक न हो। दादी ने वो कर्त्तव्य किए जिनका सब सहज अनुकरण कर सकें। दादी ऐसी परम पवित्र आत्मा, जो दुनिया में आज तक कोई दिखाई नहीं दी। दादी के संकल्प तक में नकारात्मक भाव नहीं था। पर ऐसा भी नहीं था कि किसी की ग़लती देखकर दादी बताती नहीं थीं, इशारा देती थीं कि इस पर ध्यान दो। पर ध्यान खिंचवाकर चली जाती थीं और भूल जाती थीं। लौटकर आने पर बहुत प्यार से कहती थीं, चलो यह करें, वह करें, अंगुली पकड़कर उसे घर, रसोई घुमाने लगती थीं। अंदर से आता था कि अभी तो दादी इशारा देकरगईं, अभी ऐसे प्यार कर रही हैं। फिर हम दादी को पूछते थे, तो कहती थीं, ऐसा? मुझे तो याद ही नहीं है। पहले-पहले मैं सोचती थी, दादी तो कह देती है कि मुझे याद नहीं पर मेरे अंदर तो यादें चलती थीं। तो दो-तीन बार के अनुभव के बाद मैंने समझा कि दादी के दिल में कुछ रहता ही नहीं था। संकल्प-मात्र भी किसी के लिए कोई ऐसी भावना न हो, यह बहुत ऊँची बात है, बहुत कमाल की बात है।

कभी नहीं कहा, मेरे पास समय नहीं है

कभी दादी ने किसी को उलाहना नहीं दिया, हमेशा प्यार की भासना दी। कभी यह नहीं कहा कि मेरे पास समय नहीं है। जब क्लास करा रही होती थीं, भोजन बनाने के निमित्त भाई आता और पूछता था, दादी, कढ़ी बनाई है, आप चखकर देखेंगी? तो क्लास में भी चखकर, उसे संतुष्ट करके भेजती थी। कहती थीं, इसको बनाना है ना, मैं अभी नहीं देखूँगी तो भोजन में देर हो जायेगी। दादी को सदा होता था कि कोई मेरे लिए इंतजार न करे। बाबा के नियम, धारणाओं पर पक्की होकर चलती थी।

करती भी थी और कराती भी थी

सारा दिन दादी योगयुक्त अवस्था में रहकर कारोबार में व्यस्त रहती थीं। दादी आदेश देकर चली जाए, ऐसा कभी नहीं हुआ। हम कहते थे, दादी, आप जाओ, हम कर लेंगे पर दादी कहती थीं, आप सेवा कर रहे हो, मुझे नींद ही नहीं आती है। बाबा मुझे सोने नहीं देता है। कहता है, जाओ, बच्चे सेवा कर रहे हैं। बैठेंगी, उमंग-उत्साह दिलायेंगी, टोली खिलायेंगी पर ऐसे ही छोड़कर नहीं जायेंगी। जब ओमशान्ति भवन बन रहा था तो सामने जंगल था, छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं। जब पत्थर तोड़े जाते थे तो रात में सभी भाई-बहनों को लेकर दादी स्वयं जाती थीं और पत्थर उठाती थीं। दादी स्वयं भी उठाती थीं। हम कहते थे, दादी, बैठ जाओ, पर वो बैठती नहीं थीं, दो-चार पत्थर जरूर उठाती थीं। सारी रात हमारे साथ बैठी रहती थीं।करती भी थीं और कराती भी थीं। ओमशान्ति भवन की एक-एक ईंट में दादी की भावनाएँ समाई हुई हैं।

दृष्टि करती थी निहालसम

दादी, अंत तक भी सेवा करती रहीं। दूर से भी उनकी दृष्टि निहाल कर देती थी। एक-एक अंग दादी का सेवा करता रहा। आज दादी साकार में हमारे बीच नहीं है पर दादी का जीवन एक ऐसा उदाहरण है जो हम कभी भी दादी को भूल नहीं सकते हैं। जो दादी ने सिखाया, उसे करके दिखाएँ, यही दादी के प्रति सच्चा स्नेह है। अंत में इतना ही कहूँगी - जो बात तुझमें थी वो तेरी तस्वीर में नहीं।

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सर्व स्नेही मुन्नी बहन व्यक्त कर रही हैं 40 साल के दादी जी के सान्निध्य के पलों में से कुछ चुने हुए अनुभव -

प्यार की मूरत

सन् 1967 में जब साकार बाबा से मिलन का पुनीत अवसर मुझे मिला तो उन्होंने वरदान दिया कि इस बच्ची को बाबा मधुबन में ही रखेगा और यह बाबा का भण्डारा (स्टॉक) संभालेगी। मई, 1969 में जब कन्याओं का प्रथम प्रशिक्षण कार्यक्रम चला तो उसमें मैं शामिल हुई और इस कार्यक्रम के बाद प्यारे बाबा के वरदान को साकार करते हुए, मीठी दादी जी ने मुझे यज्ञ का स्टॉक संभालने की जिम्मेवारी सौंप दी। दादी जी प्यार की मूरत थीं। मैंने जब उनको पहली बार देखा था तभी से दिल का स्नेह बड़ी गहराई तक उनसे जुट गया था। दादी जी मुझे "लवली बेबी" कहकर संबोधित करती थीं, उनका यह लाड़-प्यार भरा संबोधन मेरे दिल को छूता था। मैं उनके करीब आना चाहती थी। इसलिए रोज रात्रि को गुडनाइट करने जाती थी। वे मुझे बाँहों में समा कर मुरली पढ़ती रहती थी और फिर कहती थीं, लवली बेबी, गुडनाइट।

सेवा ही मेवा है

दादी जी का सान्निध्य पाने के लिए मैं उनसे कहा करती थी, दादी जी, मुझे सेवा बताइए। मुझे पहली-पहली सेवा उनके हिन्दी पत्र लिखने की मिली। वे स्वयं बोलती जाती थी और मैं वैसा-वैसा लिखती जाती थी। इस प्रकार मुझे उनके नजदीक रहने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ और मैं धीरे-धीरे उनकी व्यक्तिगत सेवा भी करने लगी। कहा जाता है, सेवा ही मेवा है। उनकी सेवा के बल ने मुझमें बहुत योग्यताएँ भर दीं। दादी जी ने मुझे अग्रलिखित मुख्य व श्रेष्ठ बातें सिखाई - आज्ञाकारी, वफादार, फ़रमाँबरदार, ईमानदार, फेथफुल, एक बाप दूसरा न कोई, सदा एक्यूरेट, एवररेडी और दिल की सच्चाई-सफाई। इन श्रेष्ठ धारणाओं को मैंने दिल की तिजोरी में संभाल कर रख लिया जिससे मुझमें विशेष सामर्थ्य आता गया।

रोम-रोम खिल उठता था

एक बार दादी जी ने मुझसे कहा, जाओ, म्यूज़ियम सजा कर आओ। मैंने मन में सोचा, मैं तो स्वयं भी ठीक से कपड़े नहीं पहन पाती हूँ, तो म्यूजियम में रखे मॉडल्स को कैसे श्रृंगारूंगी। मैंने दिल की यह शंका दादी के समक्ष प्रकट की तो उन्होंने कहा, तुम जाओ, दादी कहती है, तुम सज़ा सकती हो। दादी का ऐसा विश्वास पाकर मेरी बुद्धि विचार चलाने लगी। एक दर्जी भाई का सहयोग लेकर मैंने म्यूजियम सजाने की सेवा पूरी की और दादी जी को दिखाई। दादी जी ने मुझे बहुत प्यार दिया। इस प्रकार दादी जी आज्ञा भी देती थीं और कार्य करने की शक्ति भी प्रदान करती थीं। जैसे छोटे बच्चे को कहा जाता है, उसी प्रकार दादी जी कहती थीं, मुन्नी, अभी यह काम करके आओ। वे बहुत ही प्यार से कहती थीं और उनकी इसी प्यार की शक्ति ने यज्ञ-सेवा का छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कार्य भी हमको करना सिखा दिया। उनके नयनों से प्यार बरसता था, जब वे प्यार से "मुनड़ी" कहकर बुलाती थीं तो मेरा रोम-रोम खिल उठता था।

ये नजरें दादी की नहीं, स्वयं भगवान की हैं

दादी जी के अंग-संग रहने के कारण कोई भी योग्यता पैदा करने में मुझे कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ी। जैसे पारस के संग रहकर लोहा भी पारस बन जाता है, ऐसे दादी जी के संग रहकर मैं भी योग्य बन गई। सुबह से सायं तक की व्यस्त दिनचर्या में सैकड़ों बार उनके सम्मुख जाना होता, उनकी प्यार भरी दृष्टि पड़ती और मेरे अंदर उमंग-उत्साह लहरें मारने लगता। उनके सामीप्य में थकान किसे कहते हैं, मैंने नहीं जाना। मुझे महसूस होता रहा कि ये नज़रें दादी जी की नहीं, स्वयं भगवान की हैं, जो मुझे निहाल कर रही है।उनके स्पर्श मात्र से दिव्य शक्ति का मुझमें संचार होता था। मेरा दिल सदा ही ये लाइनें गुनगुनाता था -

तुमको अपना नसीब समझा है,
सबसे ज्यादा करीब समझा है।
तुमको पाकर स्वयं से दादी जी,
सारे जग को गरीब समझा है।

ओमशान्ति भवन, ज्ञान सरोवर, शान्तिवन आदि सभी यज्ञ के बड़े-बड़े भवनों को सजाने-संवारने का पूरा प्रबंधन दादी जी ने मुझे सिखाया। दादी जी खरीदारी की चीजें खुद बैठकर लिखवाती थीं। दादी जी की हर आज्ञा को साकार करने में मैं दिल से जुट जाती थी, मुझे बहुत खुशी मिलती थी।

क्षमा की सागरा

दादी जी बहुत ही रहमदिल और ममता की मूरत थीं। कभी कोई बात चित्त पर नहीं रखती थीं। मैं छोटी थी, तब कोई ग़लती कर देती थी तो बहुत प्रेम से समझाती थीं। क्षमा की सागर थीं, हर ग़लती को भुला कर प्रेम से आगे बढ़ाती थीं। दादी जी स्वयं सदा संतुष्ट रहती थीं और उनके बोल थे, “सभी यज्ञ-वत्स सदा खुश और संतुष्ट रहने चाहिएँ।" किसी को कुछ भी चाहिए तो बाबा के भण्डारे से उसे अवश्य मिलना चाहिए, यह उनकी भावना होती थी।

निद्राजीत और अथक सेवाधारी

दादी जी को सारे ब्राह्मण परिवार से बेहद प्यार था। जो सामने आता था, उसका मुसकराकर स्वागत करती थी। कहती थीं, आओ, आओ। वे निद्राजीत और अथक सेवाधारी थीं। जब कभी हम कहते थे, दादी, अमुक व्यक्ति आपसे मिलने आया है तो बिस्तर से उठकर भी मिलने को तैयार रहती थीं। वे तपस्वीमूर्त थीं। रात्रि को दो बजे उठकर तपस्या करती थीं। अमृतवेले का योग नियमित करती थीं। उस समय उन्हें बाबा से बहुत प्रेरणाएँ (टचिंग) मिलती थीं जिन्हें वे सुनाती भी थीं।

नजरों में अतीन्द्रिय आनन्द

यज्ञ में हज़ारों ब्राह्मण भाई-बहनें तथा अनेक वी. आई.पीज आते थे। वे हरेक से मिलती थीं। चाहे 30 हज़ार भाई-बहनें भी आ जाते थे, फिर भी लाइन में सभी उनकी नज़रों का अतीन्द्रिय आनन्द प्राप्त करते थे। हर कार्य करने में उनका उमंग-उत्साह सदा बना रहता था। वे त्याग और सादगी की भी मूरत थीं। प्यारे बाबा के स्लोगन - जो खिलाओ, जो पहनाओ, जहाँ बिठाओ, इसकी पूर्ण धारणा उनके जीवन में देखी। वे मास्टर पालनहार थीं। एक हज़ार यज्ञ-वत्सों और दस हज़ार निमित्त शिक्षिकाओं सहित सभी को बाप समान पालना देती थीं।

मेरे दिल की धड़कन

मुरली से उनका जिगरी प्यार था। दिन में तीन बार स्वयं मुरली पढ़ती थीं ही, क्लास में सुनाती थीं वो अलग। जब तक स्वस्थ रहीं, हमेशा स्वयं ही क्लास में मुरली सुनाती थीं। जब तबीयत नरम-गरम रहती थी तब भी वे देह में रहते हुए भी, देह से न्यारी फ़रिश्ता स्थिति में रहती थीं। कितनी भी तकलीफ हो, पूछने पर यही कहती थीं, मैं बहुत ठीक हूँ। एक दिन तो कहा, मैं बहुत सुखी हूँ। वे इस दुनिया में थीं ही नहीं, वो संपूर्णता की देवी बन चुकी थीं। सेवा करते महसूस होता था कि वतनवासी फ़रिश्ते की सेवा कर रही हूँ। उनके अंतिम दिनों में भाई-बहनें कॉटेज की खिड़की के शीशे में से उनके दर्शन करते थे। तब भी कहती थीं, सभी लाइन में आएँ, टोली लेकर जाएँ। हर बच्चे से उनका जिगरी प्यार था। दादी जी का मुस्कराता हुआ चेहरा और प्यार भरे नयन कभी भूलते नहीं हैं। दादी जी मेरे दिल की धड़कन हैं जो सदा मेरे साथ हैं और सदा मेरे साथ रहेंगी। अंत में इतना जरूर कहूँगी-

वो दिल कहाँ से लाऊँ

तेरी याद जो भुला दे।

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ब्रह्माकुमार आत्म प्रकाश, संपादक, ज्ञानामृत राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं -

मास्टर ज्ञान सागर

प्यारी दादी जी, बाबा की अनन्य रत्न, मुरब्बी बच्चा तो थीं ही परन्तु पुरुषार्थ करते-करते, हमारे देखते-देखते वे बाप समान बन गईं। आप कहेंगे, कैसे? देखिए, प्यारे बाबा गुणों के सागर हैं। वे ज्ञान के सागर हैं। दादी जी में भी ज्ञान कूट-कूट कर भरा हुआ था। बाबा ने उनको चुना जापान में शान्ति का संदेश देने के लिए। उनमें वो योग्यता थी कि आत्माओं के प्रश्नों के उत्तर दे सके, उन्हें संतुष्ट कर सके। सारा जीवन वे ज्ञान-रत्न बाँटती रहीं। अंत में भी उनके प्रश्न-उत्तर हम सभी ने पढ़े हैं। कितने सारगर्भित उत्तर वे अस्वस्थ शारीरिक हालत में भी देती रही हैं। उनमें ज्ञान की पराकाष्ठा थी। वे मास्टर ज्ञान सागर थीं। प्यारे बाबा पवित्रता के सागर हैं तो दादी जी ने भी सारे जीवन में कभी झूठ तक नहीं बोला। यह किसकी निशानी है? असीमित पवित्रता की। झूठ भी नहीं बोला, अन्य बातें तो दूर की रही। यह बहुत बड़ी आश्चर्यकारी धारणा है।

सबके लिए सुखदायिनी

पवित्रता के बल से त्वचा और चेहरा चमकता है। दादी जी का चेहरा अंत तक प्रकाश की किरणें विकीर्ण करता रहा। प्यारे बाबा शान्ति के सागर हैं, पचास वर्षों के सान्निध्य में हमने कभी दादी को अशान्त, उदास नहीं देखा। सदा मुस्कराते हुए देखा। बाबा प्रेम के सागर हैं तो दादी जी भी प्रेम की देवी थीं। भगवान सुख के सागर हैं तो दादी जी, सदा सबके लिए सुखदायिनी थीं। कभी स्वप्नमात्र, संकल्पमात्र भी न दुख लिया, न दिया। भगवान आनन्द के सागर हैं तो दादी जी को भी हमने सदा अतीन्द्रिय आनन्द में मगन देखा। भगवान सर्व शक्तियों के सागर हैं तो दादी जी सर्व शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी थीं। आध्यात्मिक शक्तियाँ उनके हर कर्म से झलकती थी। इन्हीं शक्तियों के बल से वे हर असंभव दिखने वाली बात को संभव बना लेती थी। इस प्रकार दादी जी गुणों की धारणा में बाप समान बन गईं।

तुम निश्चिन्त रहो

हमने मम्मा-बाबा की भी खूब पालना ली परन्तु कभी यह नहीं सोचा था कि साकार में इनसे अलग होना पड़ेगा। दादी जी निमित्त बनीं तो दादी जी से भी भरपूर पालना, प्यार, मार्गदर्शन मिलता रहा। दादी जी के संग बीते मधुर क्षण अब रह-रहकर याद आ रहे हैं। एक बार मैं दादी जी के साथ बैठा था। मैंने कहा, दादी, हम तो बाबा के बड़े भोले बच्चे हैं। बाबा के बड़े-बड़े महारथी बच्चे हैं, बड़े-बड़े भाषण करने वाले भी हैं, मैं तो नहीं कर सकता। दादी जी यह सुनकर आधा मिनट के लिए मौन-सी हो गई, फिर बोली, नहीं आत्म, नहीं। तुम बहुत समझू हो। इतना बड़ा कारोबार कैसे चलता है, समझ है तभी तो चला रहे हो ना! मैंने कहा, दादी, यह तो ऊपर वाला चला रहा है। दादी ने तुरन्त कहा, यही तो समझ है। यह समझना कि सब ऊपर वाला चला रहा है, वास्तविक समझ यही है। मैंने कहा, दादी जी, जब प्रेस प्रारंभ की थी तो कई लोग कहते थे, देखना, यह समस्या आयेगी, वह समस्या आयेगी और प्रेस के संबंध में कई बातें आती भी हैं परन्तु ऊपर वाला पता नहीं कैसे चाबी घुमाता है, सब कुछ स्वतः ही ठीक हो जाता है और छपाई का कार्य निर्विघ्न चलता रहता है। दादी ने कहा, तुम निश्चिन्त रहो। मैंने भी अपने को भाग्यशाली समझा कि इतनी महान दादी जी ने मेरे लिए ऐसा महावाक्य उच्चारण किया।

हिसाब चुक्ता होते हैं

एक बार किसी महारथी ने काफी तकलीफें अनुभव करने के बाद शरीर छोड़ा था। मैंने कहा, दादी, बाबा करे, हम ऐसी तकलीफ सहन करके न जायें, ऐसा पुरुषार्थ और सेवा करने के बाद भी तकलीफें आती हैं तो अच्छा नहीं लगता। दादी ने कहा, चुप। ये सब हिसाब-किताब यहाँ चुक्ता होते हैं। बाबा ने कहा है, पालिश होती है। जन्म-जन्म के हिसाब-किताब, लेन-देन अगर यहाँ चुक्ता हो जायेगा तो धर्मराज के सामने उसे सलाम भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, और ही धर्मराज उसको सलाम करेगा। मैंने कहा, दादी, हम तो बैठे-बैठे उड़ जाना चाहते हैं। दादी ने कहा, शरीर से न्यारे होने का पुरुषार्थ करो तो ऐसा भी हो सकता है अर्थात् यह भी संभव है।

बिन माँगे सब देने वाली

प्रेस में जो भी चीज़ें छपती थीं, उन्हें दिखाने मैं अक्सर दादी जी के पास जाता था। चित्र, पत्रिका, पुस्तकें छपती ही रहती थीं और इनके कारण बार- बार दादी जी के सम्मुख जाना होता ही था। जब पत्रिका (ज्ञानामृत) लेकर जाते थे तो चित्र, लेख आदि सब बहुत ध्यान से देखती थीं और हमेशा पूछती थी कि कितनी पत्रिकाएँ छपती हैं? उस समय संख्या एक लाख साठ हज़ार थी। जब मैं यह संख्या बताता था तो बहुत प्रसन्न होती थीं। फिर एक पत्रिका का खर्च और उस पर बचत का भी पूरा हिसाब पूछती थी। इस प्रकार, साहित्य के संबंध में उनकी अमूल्य मार्गदर्शना और प्रोत्साहन मिलता रहता था। कारोबार में उनकी दिलचस्पी देखकर हमारा उमंग द्विगुणित हो जाता था। बिन माँगे दादी जी, सभी सुविधाएँ प्रदान करती थीं। हमारे पास पहले बाइंडिंग के लिए अलग से स्थान नहीं था। एक ही जगह छपाई, बाइंडिंग आदि होती थी। दादी जी एक बार मशीन का उद्घाटन करने आईं। जब दादी ने देखा कि जगह कम है और कारोबार बहुत विस्तृत, तो स्वयं ही बाइंडिंग के लिए एक पूरा हॉल प्रदान कर दिया। हमारे बिना कहे, हर सुविधा प्रदान करने में दादी जी हमेशा पूरी मददगार बनकर रहती थीं। दादी जी के वरदानी बोल आज जीवन का आधार बनकर इसे निर्विघ्न आगे बढ़ा रहे हैं और आगे भी बढ़ाते रहेंगे। दादी जी की गुणमूर्त छवि अव्यक्त होते भी साकार की भाँति दिल में समाई हुई है और प्रेरित, उत्साहित कर रही है।

ओ.आर.सी., दिल्ली से ब्रह्माकुमारी आशा बहन दादी जी के साथ का अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं -

तुम किसकी "आशा" हो?

मैं स्वयं को पद्मापद्म भाग्यशाली समझती हूँ कि आदरणीया दादी जी की पालना, मार्ग प्रदर्शना एवं सान्निध्य मुझे बाल्यकाल से ही प्राप्त हुआ। दादी जी से प्रथम मुलाकात कानपुर में हुई जब दादी जी हमारे लौकिक घर आई थीं। उस समय मेरी आयु मात्र 9- 10 वर्ष की थी। दादी जी की दृष्टि बहुत अलौकिक, मधुर, रूहानियत से भरपूर और शक्तिशाली थी। दादी जी ने उस छोटी सी आयु में मेरे से एक प्रश्न पूछकर बाबा का बना दिया। दादी जी ने पूछा- तुम किसकी 'आशा' हो, निर्मला, पुरी (लौकिक माता-पिता का नाम) की या बाबा की? मेरे कानों में सदा ये शब्द गूँजते रहे, जिन्होंने मुझे बाबा का बना दिया। दादी जी में इतनी पारदर्शिता थी जो किसी भी आत्मा को अपनत्व की अनुभूति कराके अपना बना लेती थीं। उनमें आत्मीयता, मातृभाव और मैत्रीभाव भरपूर था।

वह दिन आज ही है

दादी जी में कुशल प्रशासन कला एवं नेतृत्व कला थी। वे किसी भी सेवा को असम्भव नहीं समझती थीं और न समझने देती थीं। कोलकाता में सन् 1974 में मेला हुआ था, तब दादी जी लगभग 15 दिन से अधिक वहाँ रही थीं। मेले में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई। उसकी प्रेस रिलीज़ बनानी थी। उस समय वहाँ कोई बड़े भाई नहीं थे। दादी जी ने मुझे आज्ञा दी कि प्रेस विज्ञप्ति बनाओ। मैंने कहा- दादी जी मैंने कभी नहीं बनाई है, तो दादी जी ने कहा- 'कोई तो दिन होगा जो तुम बनाओगी। ऐसा ही समझो कि वह दिन आज ही है।' दादी जी ने अपना उदाहरण देकर कहा- यज्ञ में शुरू में मैं ही लिटरेचर लिखती थी, भाई नहीं थे। अतः हमें सब कार्य करना आना चाहिए, आलराउण्डर बनना चाहिए। दादी जी ने मुझे उत्साह दिया, गाइडेन्स दी और दूसरे दिन वह विज्ञप्ति अखबारों में छपी।

नवीनता पसन्द

दादी जी की नेतृत्व कला की एक खूबी थी कि वे सदा नवीनता पसंद करती थीं। जब भी दादी जी से मिलते थे तो कहती थीं- क्या नया समाचार है? आपने क्या नया प्लान बनाया है, कौन से वी.आई.पी. से मिली, उन्होंने क्या प्रश्न पूछा, फिर आपने क्या उत्तर दिया? आदि-आदि। ऐसा अनुभव होता था कि दादी जी मुख्य प्रशासिका के नाते सब प्रकार की जानकारी रखना पसंद भी करती थी और ऐसा करके हमारा उमंग-उत्साह भी बढ़ाया करती थीं।

शुभ भावनाओं भरा स्नेह

दादी जी स्नेह स्वरूपा थीं। वे अपने दिव्य स्नेह से सबका मन जीत लेती थीं। अपनी कर्मातीत अवस्था की समीपता के समय एक विशेष महत्वपूर्ण बात दादी जी ने बताई। निश्चित रूप से लव और लॉ का बैलेन्स रखना प्रशासन में आवश्यक है परन्तु उनका कहना था कि अलौकिक, निःस्वार्थ, रूहानी स्नेह प्रशासन की सर्वोच्च विधि है। दादी जी इसका प्रमाण थीं। इतना शुभ भावनाओं भरा स्नेह देती थीं जो व्यक्ति अपनी भूल स्वतः स्वीकार कर स्वयं को परिवर्तित कर लेता था।

दादी जी स्वयं आदर्श शिक्षिका थीं। उन्होंने सिखाया कि आदर्श शिक्षिका वही है जो अव्यभिचारी बुद्धि वाली, निर्मोही, पढ़ाई में प्रवीण एवं आलराउण्डर हो। यज्ञ से प्रीतबुद्धि, आज्ञाकारी, वफादार, फरमानबरदार, ईमानदार और मर्यादाओं का पालन करने वाली बहन आदर्श शिक्षिका हो सकती है।

बात सन् 1969 की है। दादी जी के साथ मैं ईशु दादी के ऑफिस के सामने खड़ी थी। एक जीप आई, उसे गेटकीपर ने रोक लिया। वह जीप किसी ऑफिसर की थी। वे इस बात से बिगड़ गए कि जीप रोकी क्यों? दादी जी ने देखा, कुछ कहा-सुनी हो रही है, उस ओर चल पड़ी और ऑफिसर से हाथ जोड़कर कहने लगीं- आप ख्याल न करें, इसकी ओर से मैं आपसे माफी माँगती हूँ। ऑफिसर को जब मैंने बताया कि आप ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका हैं तो वे दादी जी के पाँव में पड़ गए। इस प्रकार दादी जी ने अपनी महानता का परिचय दिया। वे सच में निमित्त भाव, निर्मान भाव एवं निर्मल वाणी की प्रतिमूर्ति थीं।

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वाराणसी से ब्रह्माकुमारी सुरेंद्र बहन दादी जी के बारे में अपना अनुभव इस प्रकार सुना रही हैं कि परम आदरणीया दादी प्रकाशमणि जी के साथ के अनुभवों का प्रकाशपुंज सदा मेरे जीवन पथ को आलोकित करता रहता है। उनके साथ बिताये गये क्षण मेरे जीवन की सबसे कीमती धरोहर के रूप में मानस पटल पर अंकित हैं। उनकी स्मृतियों का सुखद झोंका मन को दिव्यता की अलौकिक खुशबू और ज्ञान-रत्नों से तरोताजा कर देता है।

नेत्र-मिलन से गहन अनुभव

जब दादी जी अस्वस्थ थे, उन दिनों जब कभी उनके सम्मुख जाती थी और अपना नाम बताकर मिलती थी, तो दादी जी आँखें खोल देती थीं। नेत्रों द्वारा यह अलौकिक मिलन मुझे गहन आध्यात्मिक अनुभवों की दुनिया में पहुँचा देता था।

शब्दों का आध्यात्मिक संयोजन

दादी जी चार बार ईश्वरीय सेवार्थ काशी की पवित्र भूमि में पधारी थीं। अंतिम बार वे सारनाथ में बनाए गए आध्यात्मिक संग्रहालय 'जीवन मूल्य आध्यात्मिक कला मंदिर' का उद्घाटन करने पधारी थीं। दादी जी ने उस समय बड़े स्नेह और प्यार से कहा था- 'तुम्हारा नाम सुरेंद्र है और यह म्यूज़ियम भी बड़ा सुंदर है।' इस प्रकार आदरणीया दादी जी को शब्दों को सहज ढंग से आध्यात्मिक रूप से संयोजित करने में महारत हासिल थी। प्रायः जब भी मैं दादी जी से मिलती, वे कहा करती थी कि जैसे बाबा ने कहा है- काशी से बाबा की प्रत्यक्षता होगी, वैसे ही यहाँ (म्यूज़ियम) से विशेष सेवा होगी। आज इसे हम प्रत्यक्ष रूप से देख और अनुभव कर रहे हैं। प्रशासन के क्षेत्र में उनका प्रसिद्ध वाक्य-'स्वयं को हेड समझने से हेडेक होता है और निमित्त समझने से हेडेक (मानसिक कष्ट) दूर होता है', आज प्रशासनिक और प्रबंधन के क्षेत्र में सफलता और कुशलता का महामंत्र बन गया है।

दादी जी वास्तव में यज्ञ माता मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती की वास्तविक उत्तराधिकारी थीं, जिन्होंने अंतिम श्वास तक बड़े ही प्यार और जिम्मेवारी के साथ सेवा करते हुए यज्ञ को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया।

बोझ हो जाता था छूमंतर

दादी जी ने प्रशासनिक क्षेत्र में आध्यात्मिक गुणों एवं शक्तियों का प्रयोग करके सम्पूर्ण विश्व को एक अनमोल उपहार दिया है। दादी जी ने अपने प्रशासनिक कौशल द्वारा ब्रह्माकुमारीज़ संस्था को एक वैश्विक संस्था बना दिया। वर्तमान समय में मानव-प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। दादी जी में प्रत्येक मनुष्यात्मा में छिपी हुई आंतरिक शक्तियों को पहचानने की अ‌द्भुत शक्ति थी। वे पत्थर को पारस में बदलने की दिव्य कला की साक्षात् अवतार थीं। दादी जी प्रत्येक मनुष्यात्मा में गहरा विश्वास करती थीं और हर कार्य व्यवहार को सहजता से सम्पन्न करती थीं। उन्होंने कभी प्रशासनिक शक्तियों का केंद्रीकरण नहीं किया। दादी जी के सान्निध्य में आने से जिम्मेवारियों का बोझ जैसे छू- मंतर हो जाता था। व्यस्तता के बीच सहज रहने की कला मैंने दादी जी से सीखी है।

कराया अपनेपन का अहसास

दादी जी के सम्पर्क में रहकर मैंने परिस्थितियों को बदलते हुए देखा है। उनकी उपस्थिति मात्र से आत्माओं में उमंग-उत्साह भर जाता था। हताश या निराश आत्माओं को भी उनके अंदर छिपी हुई विशेषताओं का बोध कराकर दादी जी उनमें नई ऊर्जा का संचार कर देती थीं। इतने बड़े संगठन के कुशल संचालन हेतु दादी जी ने हरेक के विचार और भावनाओं की कद्र करते हुए छोटे-बड़े सभी को अपनेपन का अहसास कराया। उनके सामने कोई भी बिना किसी संकोच और भय के अपनी भावनाओं, समस्याओं एवं पुरुषार्थ की गहराइयों की गुत्थी सुलझाने पहुँच जाता था। सचमुच, दादी प्रकाशमणि एक ऐसी पारसमणि थीं जिनके सम्पर्क में आने वाला हर कोई निश्छल प्रेम, आत्म-विश्वास एवं दिव्यता से निखर उठता था।

दादी की सूक्ष्म उपस्थिति देती प्रेरणा

दादी जी के सामने कोई भी जाता, दादी जी उसे निःस्वार्थ प्यार, अलौकिक खुशी और शक्ति से सम्पन्न कर देती थी। यज्ञ के बड़े-बड़े कार्यों और सेवाओं को विस्तार देने में दादी जी ने जो महत्वपूर्ण पार्ट बजाया है वह आज हम सभी के लिए अनुकरणीय बन गया है। दादी जी की दिव्य और सूक्ष्म उपस्थिति आज भी हमें प्रेरणा और नई शक्ति प्रदान करती रहती है। धन्य है हम सभी जिन्हें ऐसी दादी माँ का सान्निध्य मिला, प्यार और दुलार मिला।

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मुजफ्फरपुर सेवाकेन्द्र की निमित्त संचालिका ब्रह्माकुमारी रानी बहन, दादी जी के बारे में लिखती -

प्राण प्यारी, मनहरणी सम्माननीय मीठी-मीठी दादी जी की यादें कदम-कदम पर याद आती रहती हैं। दादी ने सभी के दिलों पर राज्य किया।

हर समय बाबा सम्मुख

सन् 1965 में, मुम्बई में एक वर्ष दादी के साथ रहने का मुझे मौका मिला जिसमें देखा कि दादी निरंतर बाबा को याद करती थी। एक दिन की बात है, दादी के सिर में दर्द हो रहा था, मैं बाम लगा रही थी, कमरे में और कोई नहीं था। अचानक दादी ने कहा, रानी, देखो, बाबा मेरे सामने खड़ा है। फिर कुछ समय के बाद दादी बोली, सारे दिन में कोई समय ऐसा नहीं होता जब बाबा मेरे सामने ना हो। मैंने पूछा, दादी, कौन-सा बाबा? दादी ने कहा, दोनों कंबाइंड हैं ना! दादी के ये अनुभव के बोल ऐसे मेरे अंदर समा गये कि मैं भी बाबा को हर समय सम्मुख अनुभव करने लगी, याद करने लगी।

दिलों को जानने वाली

एक बार की बात है, मुजफ्फरपुर में मकान बन रहा था। मैं अचानक ही मधुबन आ गई। सोचा था, बाबा के कमरे में बैठ बाबा को याद करके आऊँगी तो मकान सभी के सहयोग से सहज ही बन जायेगा। एक दिन नाश्ते के बाद मैं पाण्डव भवन में हिस्ट्री हॉल के बाहर बैठ गई। दादी पार्टियों से मिलती रही, जब भी बाहर आती थी, मुझे देखती थी। अचानक दादी ने मुझे बुलाया, अपने कमरे में ले गई और बोली, रानी, मैं जितनी बार बाहर आई, तुमको बैठे देखा। मैंने कहा, दादी, मैं अकेली आई हूँ, इसलिए यहाँ बैठी हूँ। दादी ने कहा, नहीं, नहीं, तुम्हारे पास मकान बन रहा है ना, तुम्हें चिन्ता हो गई है। मैंने कहा, नहीं दादी। दादी ने कहा, मैं समझ गई हूँ, अच्छा, बाबा का सहयोग तुम्हें मिलेगा, सब काम सहज पूरा होगा- ऐसे सिर पर हाथ फेरते दादी वरदानों से भरपूर करती गई और कहा, तुमने हिम्मत रखी है ना, तभी तो यह सेवास्थान बन रहा है। ऐसे दिलों को जानने वाली थी दिलाराम मीठी दादी।

शान्त रहो और आगे बढ़ो

एक बार मैंने दादी से पूछा कि सहनशक्ति कैसे आए? दादी ने कहा, जैसे एक राजा अपने ही चिन्तन में मगन रहता है, इधर-उधर नहीं देखता, ऐसे ही सदा अपने पुरुषार्थ में मगन रहो तो शक्ति बढ़ती जायेगी। इधर-उधर देखने से, परचिन्तन करने से सहनशक्ति कम हो जाती है। सदा राजा की तरह रहो। मानो, हम लाइन में खड़े हैं, अगर कोई लाइन तोड़कर पीछे से आगे चला जाये, तो आगे वाले उसे जाने से रोकेंगे, बोलेंगे। इसी प्रकार आप आगे बढ़ रहे हैं, कोई बोलते हैं, निंदा करते हैं तो सहन करो, शान्त रहो और आगे बढ़ते चलो। जब मकान बनकर पूरा हो गया तब दादी स्वयं प्रोग्राम बनाकर मुजफ्फरपुर में आई और उसे वरदानों से भरपूर कर वरदानी भवन बना दिया। महालक्ष्मी दादी के आगमन से सभी खज़ाने भरपूर हो गये। दादी की मीठी दृष्टि सदा अपने पर अनुभव होती रही है। दादी का हर बोल उमंग-उत्साह दिलाने वाला, हिम्मत की शक्ति भरने वाला तथा साथ का अनुभव कराने वाला रहा है।

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लुधियाना की निमित्त संचालिका राज बहन, राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि के प्रति अपने उद्‌गार इस प्रकार व्यक्त करती हैं-

दादी मुझे हमेशा राजी कहकर पुकारती थी। मैंने दादी की सबसे बड़ी विशेषता यह देखी कि दादी सबको बहुत रिगार्ड देती थी। बृजइन्द्रा दादी आती तो दादी-दादी कहकर बाजू में बिठा लेती। निर्मलशान्ता दादी आती तो भी, सभी दादियों को इतना रिगार्ड देती थी जो देखते ही बनता था।

संगठन बनाने का गुण

दादी के पास कोई प्लैन-प्रेरणा होती थी तो बहनों से, मधुबन निवासियों से चर्चा करने के बाद ही क्लास में सबके सामने रखती थी। ऐसा लगता था, दादी ने उस प्लैन में सबकी शुभभावना शामिल कर ली है। संगठन बनाने का उनका ये गुण मन को बड़ा भाया।

रमणीकता

दादी रमणीक थी, बहलाती थी। दादी लुधियाना में आई। एक माता ऊन की टोपी बनाकर लाई। एक बहन चांदी की सीटी लाई। दादी ने टोपी सिर पर रखी और सीटी हाथ में लेकर बजाने लगी, इस प्रकार सबको खूब बहलाया।

हलका रहना और करना

एक बार मेरा ऑप्रेशन हुआ था। मैं मीटिंग में नहीं आ सकी थी। दादी ने एक बड़ी बहन के हाथ बहुत सौगातें और विशेष याद-प्यार भेजी। कोई भी बात होती थी, दिल से सुनकर पूरा हल देती थी। एक बार मैंने एक समस्या के बारे में दादी से विस्तार से बात की। फिर दादी ने दो दिन बाद मुझे कहा, मैंने सारी पूछताछ की है, तुम इस बात को भूल जाओ। जैसे ही उन्होंने कहा, मैं उनके स्नेह में सब कुछ भूल गई। इस प्रकार वे खुद भी हलकी रहती थी, हमें भी हलका रखती थी।

जिस दिन दादी अव्यक्त हुई, उस दिन दादी के कमरे में योग का प्रोग्राम मिला। जैसे ही मैं कमरे में गई, एकदम अशरीरी हो गई। इतने हलकेपन का मैंने पहली बार अनुभव किया था।

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कटक सेवाकेन्द्र की निमित्त संचालिका ब्रह्माकुमारी कमलेश बहन, दादी जी के साथ के अनुभव इस प्रकार व्यक्त करती हैं -

सन् 1966 में मैंने प्यारी दादी की एक झलक देखी, उस झलक से ही मेरा दादी के प्रति झुकाव और आकर्षण बढ़ने लगा। मुझे अनुभव होने लगा मानो दादी ने मेरे मन को मोह लिया। मुझे लगने लगा कि ये सचमुच दिव्य मूर्ति हैं, देवी स्वरूपा हैं। सन् 1969 में मैं दादी जी के बहुत नज़दीक आ गई जब दादी जी मधुबन में ही रहने लगी थी। प्यारी दादी की ममता, सरलता, नम्रता, गंभीरता, बुद्धि की विशालता का मैंने बहुत गहराई से अनुभव किया। दादी जी प्यार की मूर्ति थी। एक बार हमने कहा, प्यारी दादी, जैसे हमने बाबा की गोद ली है वैसे हम आपकी गोद में जाना चाहते हैं। फौरन दादी जी ने मीठी मुस्कान के साथ कहा, आओ, आओ और गोदी में ले लिया तथा पीठ थपथपायी। हमारी सारी थकान दूर हो गई। हमें अनुभव हुआ जैसे हम बापदादा की गोद में हैं।

दिव्यगुणों की खान

दादी जी दिव्यगुणों की खान थी। एक बार मैं एक सेवाकेन्द्र से आई, वहाँ थोड़ा कुछ सहन नहीं हुआ था तो दादी ने बड़े प्रेम से कहा, मैं यहाँ साठ सेठों का सहन करती हूँ, क्या तुम दो-चार स्टूडेन्ट का सहन नहीं कर सकती हो? सहनशक्ति से ही हमारे अंदर और भी दिव्यगुण आ जायेंगे। ऐसी मीठी शिक्षा देकर दादी जी उमंग-उल्लास से भर देती थी।

सहनशीलता और सरलता दादी जी में कूट- कूट कर भरी थी। प्यारी दादी को रोना बिलकुल पसंद नहीं था। एक बार मैं बात करते-करते थोड़ा रो पड़ी तो तुरंत दादी ने एक बहन को कहा, इसे बाहर ले जाओ, जब रोना बंद करे तब मेरे पास आये, तब दादी मिलेगी। मुझे तुरंत हिम्मत दी और दस मिनट के बाद जब मैं दादी के पास एकदम हँसके आई तो दादी ने मुझे बहुत प्यार किया, गले लगाया और खुशी दी, कहा, रोता कौन है? जिसका पति नहीं। तुम्हारा पति तो सर्वशक्तिमान है और मुझे दादी जी से शक्ति प्राप्त होने जैसा अनुभव हुआ। फिर मुझे पंजाब सेवा में जाने के लिए राज़ी किया।

मन की बात जानने वाली

जब भी हमने कोई मन की बात प्रकट की, दादी उसे शीघ्र ही पूरा करती। बिना बताये ही दादी को मालूम पड़ जाता था कि हम क्या चाहते हैं। एक बार मेरे मन में आया कि दादी की सेवा करूँ तो दादी मेरे मन की बात जानकर अपनी सेवाधारी बहन को बोली कि आज कमलेश को यह सेवा दे दो। यह सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मन में सोचा कि दादी तो पूरी साकार बाबा हैं। बिना कहे मन की बात समझ लेना और हर खुशी दे देना दादी की विशेषता थी। दादी को देख हमारे अंदर अनेक गुण आने लगे। अनेक कमज़ोरियाँ दादी अपने स्नेह और शक्ति की दृष्टि से मिटा देतीं। दादी को देख कर हमेशा त्याग, तपस्या, वैराग्य वृत्ति जागृत होती। दादी सदा तपस्या और सेवा की तरफ ध्यान खिंचवाती थी।

पत्रों द्वारा प्रेरणा

दादी का जीवन ही शिक्षणीय था। सन् 1973 में मैं सेवार्थ कटक आई। दादी के अनेक पत्र हमारे पास आते। अनेक प्रेरणादायक, उमंग-उल्लास भरी शिक्षायें हम दादी के पत्रों से प्राप्त करते। हमारा जीवन आगे कैसे बढ़े, इस पर दादी हमेशा ध्यान खिंचवाती। छह- सात बार दादी जी का उड़ीसा आना हुआ। प्रत्येक बार कुछ न कुछ आगे बढ़ने की प्रेरणा दादी जी से प्राप्त होती रही। पहली बार दादी जी ने कहा, यहाँ बहनों के लिए एक बैंक एकाउन्ट होना चाहिए और तुरंत दादी जी ने अपने पास से पाँच सौ रुपया देकर एकाउंट खुलवाया। इतनी प्यारी दादी सभी प्रकार से हमारा ध्यान रखती। मधुबन में कभी कोई प्रोग्राम होता तो दादी कैसेट भेजती। एक बार दादी जब कटक से वापस जा रही थी तो स्टेशन पर तीस-चालीस बहनों और तीस-चालीस कुमारों का संगठन देखा। जाते- जाते दादी ने कहा कि कमलेश, इनको नज़र न लग जाये, अविनाशी टीका लगा देना।

वरदानी बोल

दादी जी हमेशा एकता का पाठ पढ़ाती। वे सत्यता और पवित्रता की देवी थी। जो बात कह देती थी वो एकदम सत्य हो जाती थी। एक बार जब कटक में ज़मीन ली, फाउण्डेशन डाला गया, प्यारी दादी जी आई, बहुत धूमधाम से कार्यक्रम हुआ। मैंने कहा, दादी जी आपने फाउण्डेशन डाला है तो आपको ही इसका उद्घाटन करना होगा। दादी जी ने कहा, दादी एक बार आयेगी, या तो फाउण्डेशन पर या उद्घाटन पर। मैंने कहा, दादी, यहाँ तो आपको दोनों में आना होगा तो दादी ने कहा, अच्छा देखेंगे। फिर अमृतवेले मैंने दादी से कहा, दादी यह मकान कैसे बनेगा, इसका बजट सिर्फ कागज़ में है, हाथ में कुछ भी नहीं। प्यारी दादी ने मुझे ऐसा वरदान दिया, सिर पर हाथ रखकर कहा, तुम यहाँ बीस साल से सेवा कर रही हो, देखना यह चुटकियों में सबसे जल्दी बनेगा। दादी के मुख में गुलाब। वही हुआ। दादी जी जो कहती वो वरदान के रूप में हमारे सामने प्रैक्टिकल होता। दादी यहाँ से गई और जाते ही फाउण्डेशन के लिए पच्चीस हज़ार रुपये का ड्राफ्ट भेजा और कहा, धीरज से करते चलो तो कार्य शीघ्र ही सफल हो जायेगा। ऐसे दादी जी में अपार धीरज था और सचमुच ही दो वर्ष में मकान बनकर पूरा हो गया।

ममतामयी माँ

दो साल के बाद दादी कोलकाता म्यूज़ियम के उद्घाटन कार्यक्रम में आई। उसी समय नये भवन के उद्घाटन अर्थ दादी जी हमारे पास भी आई। जून 8, 1992 को प्यारी दादी के करकमलों द्वारा उद्घाटन हुआ। प्यारी दादी ने कहा, यह कमलेश ऐसी ममतामयी है जो मुझे दो बार खींच लिया, फाउण्डेशन में भी और उ‌द्घाटन में भी। राजस्थान में ऐसी जगहें हैं जहाँ मैं एक बार भी नहीं गई और यहाँ चार-पाँच बार आ चुकी हूँ। ऐसी थी हमारी माँ स्वरूपा प्यारी दादी। आज भी दादी जी के साथ का अनुभव और दादी की यादों से अपना जीवन चला रही हूँ।

सन् 1976 की बात है, उस समय मेरे पास नीलम बहन थी। दादी-दीदी हमेशा हमें नीलकमल की जोड़ी कहती थी। पत्र में भी नीलकमल कहकर संबोधित करती थी। दादी जी के सारे पत्र आज भी मेरे पास हैं। जहाँ भी रहें, बीच-बीच में पत्र पढ़ते हैं और हमेशा दादी जी को अपने पास अनुभव करते हैं। जब भी मधुबन में जाती तो प्रातः रोज़ दादी जी को गुडमार्निंग करने जाती, वह एक मिनट का मिलन, मीठे गुडमार्निंग के बोल, दादी से नैन मुलाकात हमारे जीवन में लाखों खुशियाँ भर देती जो सारा दिन खुशी में ही व्यतीत होता। हमें अनुभव होता, दादी का प्यार, दादी की छत्रछाया हमारे साथ है और सदा रहेगी। आज भी हम उसी अनुभव में रहते हैं। बाबा के साथ दादी जी का फोटो मेरे कमरे में है। मैं बाबा और दादी को याद करके कोई भी कार्य करती हूँ तो पूर्ण सफलता मिलती है। अनेक दिव्यगुणों का प्रकाश भी प्राप्त होता है। ऐसी प्रेरणा की स्त्रोत प्यारी दादी जी को हम कभी भूल नहीं सकते।

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ब्रह्माकुमारी उर्मिला बहन, संयुक्त संपादिका, ज्ञानामृत, दादी जी के साथ के अनुभव इस प्रकार व्यक्त करती हैं -

ब्रह्मा बाबा के बाद छोटी मम्मा के रूप में 40 वर्ष तक यज्ञ कारोबार, सर्व की दुआओं के साथ चलाने वाली आदरणीया दादी जी के जीवन के उत्कृष्ट गुणसागर में से कुछ बूंदें प्रस्तुत कर रही हूँ।

विशाल दिल और परखशक्ति

सन् 1978 में हमारे पास के शहर में एक बड़ा मेला लगा था। उस समय हमारी माताजी ही ज्ञान में चलती थी। वे उस मेले में सेवार्थ गई थी। मेले का उद्घाटन करने दादी प्रकाशमणि तथा बड़ी दीदी मनमोहिनी दोनों आई हुई थी। हमारी माताजी देखने में बड़ी साधारण, भोली, संकोची और बांधेली थी। लगन बहुत थी, बाबा की याद में खोई रहती थी। माता जी ने सोचा, सब लोग और-और सेवायें कर रहे हैं, बर्तनों वाली सेवा पर कोई नहीं है, मैं कर लेती हूँ। वे सुबह क्लास के बाद से सारा दिन, निसंकल्प, अथक हो यह सेवा कई दिन करती रही। दादी-दीदी के आने के बाद भी वे उसी प्रकार सेवा करती रही। जब दोपहर खाने का समय हुआ तो दादी जी और दीदी जी - दोनों भोजन पर आईं। सब लोग उनके आगे-पीछे सेवा में लग गए। दृष्टि और वरदान बड़ों से पाने की भावना तो हरेक के मन में रहती ही है। माताजी इन सब बातों से बेखबर अपनी सेवा में तत्पर थी। पर तभी क्या हुआ, दादी ने पहली गिट्टी तोड़ी और बोली, एक माता सुबह से बर्तन साफ कर रही है, वो नहीं दिख रही, उसे बुलाओ। मेले का चक्कर लगाते दादी-दीदी ने सब सेवाओं का अवलोकन कर लिया था। माताजी को भी देख लिया था। उनके बुलाने पर माताजी आए, सामने बैठे, दादी-दीदी ने बड़े प्यार से मुख में गिट्टी खिलाई, पास बिठाया, प्यार किया, महिमा की और माताजी की आँखों से तो ऐसी गंगा-यमुना बही कि उनके जन्मों के पाप धुल गए। वे घर लौटी तो उनके नेत्रों में, उनके मुखमण्डल पर उसी प्यार की चमक फैली थी। फिर तो वे सारा दिन दादी-दीदी की महिमा गाती और हमें भी उस महिमा के रस में भिगो लेती। मेरी आयु 13-14 वर्ष की थी। मन में धुंधली-सी तस्वीर बनी कि ऐसी कौन महान आत्मा (वो भी नारी) है जिसने मेरी भोली माँ के सच्चे दिल को पहचान कर उसमें सच्चा प्यार भर दिया,अवश्य ही वो दुनिया से न्यारी और कोई अति-अति अलौकिक आत्मा है। अदृश्य रूप में दादी के विशाल दिल, परखशक्ति, निःस्वार्थ प्यार की मेरे दिल पर यह पहली छाप थी।

प्रभु के प्रति अपनापन

इसके बाद साकार नेत्रों से, आदरणीया दादी जी को पहली बार सन् 1984 में देखा। मैं पहली बार बापदादा से मिलने माउंट आबू आई थी। दादी हिस्ट्री हॉल में थोड़ी-सी कन्याओं के साथ मिलन-मुलाकात कर रही थी। दादी के तनावमुक्त, निश्छल, हँसमुख, भोले चेहरे पर मेरी नज़रें गड़ी हुई थी। उन्होंने ठिठोली करते हुए हम कन्याओं को संबोधित किया, "कन्याओं, आज वो लरका (लड़का) आएगा, उसे अच्छे से देख लेना, पसंद कर लेना।" दादी का इशारा परमपिता परमात्मा की ओर था, जो गुलज़ार दादी के तन में अवतरित होने वाले थे। उनकी इस प्यारी ठिठोली ने दिल पर इस बात की अमिट छाप छोड़ी कि दादी भगवान के बारे में इस तरह बात कर रही है जैसे वो उनका अपना अति प्यारा, छोटा- सा लड़का हो। मन में आया, इतनी बड़ी सत्ता के साथ इतनी समीपता और अपनापन! इससे हमारे मन में भी भगवान के प्रति पहले से कई गुणा ज़्यादा जिगरी प्रेम उत्पन्न हो गया।

दादी और बाबा एक लगे

सन् 1987 में जब मेरा समर्पण समारोह हुआ और दादी जी ने मुझे गले लगाया तो मुझे लगा कि संसार का सबसे बड़ा सुख यदि है तो इन्हीं नेत्रों से मिलन मनाने में, इन्हीं हाथों को स्पर्श करने में और इसी गले में बाँहें डालने में है। मैंने उसी समय मन ही मन भगवान से कहा, बाबा, मेरा समर्पण तो हो गया, मैं सेन्टर पर भी रह रही हूँ पर मुझे इस महान आत्मा की पालना का, छत्रछाया का डायरेक्ट सुख अवश्य देना। उनके स्पर्श मात्र से मुझे लगा, मैं भगवान की ही गोद में हूँ, दादी और बाबा - दो नहीं, एक हैं। भगवान ने मेरी यह आश पूरी भी की। सन् 2000 से सन् 2007 तक मुझे दादी जी की डायरेक्ट पालना मिली।

अपनेपन की गहरी अनुभूति

सन् 2000 में शान्तिवन में सेवार्थ समर्पित होने के बाद भाता आत्म प्रकाश जी के साथ भी और अकेले भी दादी जी से कई-कई बार व्यक्तिगत रूप से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मिलने का अवसर आते ही रूह प्रफुल्लित हो उठती थी। कोई औपचारिकता नहीं। ऐसे लगता था, अपनी दादी, अपना सारा संसार। अपनेपन की ऐसी गहरी फीलिंग में मन को कहीं भी समेटना या सकुचाना नहीं पड़ता था। जो कहना होता था, दिल खोलकर बताते थे। दादी एक- एक बात ध्यान से सुनती थी, खुश होती थी, वरदानी हाथ उठा लेती थी। कई बार आत्म भाई जब मेरी सेवाओं का वर्णन करते थे तो सिर पर हाथ घुमा देती थी, गोद में ले लेती थी, माथा भी चूम लेती थी। मन में जो यह भाव था कि साकार बाबा से नहीं मिले, वो कमी दादी ने पूरी की।

नम्रता की मूर्ति

दादी कितनी निरहंकारी थी! जगदीश भाई के जाने के बाद, दादी जी के नाम से पुस्तकों के प्रारंभ के “दो शब्द" मैं आत्मा ही लिखती रही हूँ। दादी जब उन्हें पढ़ती थी तो खुश होकर कहती थी, जब तुम लिखती हो तो दादी बन जाती हो क्या? यह भी दादी का वरदान ही था कि इस छोटी-सी आत्मा को इतनी महान सेवा के लायक समझा गया। दादी जी ने एक बार लिखने के नाम पर मुझे इनाम भी दिया। मिलते समय मैं नीचे बैठना चाहती थी पर दादी हमेशा अपने साथ सोफे पर बिठाती थी।

एकानामी

जब आबू में चार साल लगातार बरसात नहीं हुई थी और पानी की बहुत कमी थी, उन दिनों की बात है। मैं दादी से मिलने कॉटेज गई थी। तभी मुन्नी बहन ने दवाई के लिए दादी को पानी दिया था। दादी ने गिलास उठाया, बोली, मुन्नी, यह पानी ज्यादा है, दवाई के लिए इससे आधे से भी कम पानी दो। दादी ने पानी कम करवाया ताकि बचा हुआ थोड़ा पानी भी फेंकना ना पड़े।

दादी की इसी बचत के संस्कार ने, करनी कथनी की एकता ने, सभी समर्पित भाई-बहनों में भी पानी की बचत का संस्कार डाला और सूखे के वो दिन भी आराम से गुज़र गए। इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली, आज भी वह प्रेरणा मेरे काम आ रही है।

दादी ऑलराउण्डर

आप दादी गुलजार (हृदयमोहिनी दादी) की लौकिक माँ थी। बहुत ही संपन्न परिवार से थीं पर सर्व भौतिक सुख-सुविधाओं को त्याग कर, अनेक लौकिक बंधनों को पार कर यज्ञ में समर्पित हुईं। बाबा के साथ प्रथम मिलन में आप बाबा की भृकुटि में चमकते सफेद प्रकाश के गोले को देख आकर्षित हुईं। जब हैदराबाद (सिन्ध) में बाल भवन बना तो आपने अपनी 9 वर्षीय लौकिक बच्ची शोभा (दादी हृदयमोहिनी) को बाल भवन के छात्रावास में दाखिल करवा बाबा-मम्मा की पालना में रखने का बहुत साहसी कदम उठाया। आप यज्ञ की हर छोटी-बड़ी सेवा बड़े प्यार से करती थी। आवश्यक चीजों की खरीदारी के लिए भी बाबा ने आपको ही नियुक्त किया। आप हर क्षेत्र में बहुत अनुभवी थी इसलिए बाबा ने ही आपको ऑलराउण्डर नाम दिया। आपका एक बहुत प्यारा शब्द था 'लाल'। हर एक को लाल कहकर पुकारती और दिल्ली, पाण्डव भवन में रहकर जोन इंचार्ज के रूप में अपनी सेवायें देते 23 नवंबर, 1993 में आप अव्यक्तवतनवासी बनी। आपकी छोटी बहन रुक्मिणी दादी अभी दिल्ली में रजौरी गार्डन सेवाकेन्द्र संभालती हैं।
लगभग 30 वर्षों तक दादी ऑलराउण्डर के साथ सेवा की साथी बनकर रहीं, दिल्ली जोन की प्रभारी ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन उनके बारे में इस प्रकार सुनाती हैं-
पहले दादी ऑलराउण्डर रजौरी गार्डन सेन्टर पर रहती थी, बाद में करोल बाग सेन्टर पर आई। दादी हम सबको 'लाल', 'लाल' कहकर संबोधित करती थी। दादी अथक होकर हमेशा सेवा में तत्पर रहती थी। दादी में रूहानी पालना देने का बहुत सुंदर गुण था। बाल्यकाल में 9-10 वर्ष की आयु में, मैं अपने माता-पिता के साथ बाबा से मिली, मम्मा से भी मिली, उनकी गोद भी प्राप्त की। माता-पिता के साथ सेन्टर में आते-जाते दादी ऑलराउण्डर के संपर्क में भी आई। हमारे परिवार की पालना, अधिकतर बड़ी दीदी मनमोहिनी तथा दादी ऑलराउंडर के द्वारा ही हुई।
दादी बहुत बहादुर थीं
दादी सुनाती थी कि जब यज्ञ में मैं बाबा के साथ थी तब बाबा ने मुझे 17 ड्यूटी दी हुई थी। दादी बहुत बहादुर थी। बाबा ने दादी को बाहर की सेवायें भी सौंपी हुई थी। दादी से ऐसी भासना आती थी कि वे केवल नारी ना होकर, एक शक्तिशाली पुरुष हैं जो कोई भी कार्य करने में प्रवीण हैं। जब दादी सेवार्थ, यज्ञ से बाहर जाने वाली थी तब बाबा ने क्लास में हाथ उठवाए कि दादी की सेवाओं की ड्यूटी लेने को कौन तैयार है? दो-तीन भाइयों ने हाथ खड़े किये और बाबा ने दादी की सेवाओं को बाँटा जबकि दादी अकेली ही उन सब सेवाओं को संपन्न करती थी। दादी का नाम ऑलराउण्डर ब्रह्मा बाबा ने इसलिए रखा था कि चाहे किसी भी प्रकार की सेवा हो, दादी उसे बहुत अच्छी तरह से पूरा करती थी।

मातृ रूप

कुमारियों को दादी ऐसी पालना देती थी कि कोई अपनी लौकिक कुमारी को भी शायद ऐसी पालना ना दे पाए। दादी कहती थी, यह बाबा का यज्ञ है, बाबा ही पालना देने वाला है। जो पालना हमने बाबा से ली है, वो हम तुमको दे रहे हैं। एक बार, जब मैं दिन में भोजन करने गई तो खिलाने वाली बहन दही देना भूल गई। मेरा तो ध्यान नहीं था पर दादी का ध्यान गया कि इस बहन की थाली में दही नहीं है। उन दिनों मैं नई-नई समर्पित हुई थी। दादी ने अपने भोजन की थाली में से दही की कटोरी मुझे भेज दी। बाद में एक बहन द्वारा मुझे पता चला कि आज दादी ने दही नहीं खाया, अपनी कटोरी आपको भेज दी। मैंने सुना तो दिल एकदम पिघल गया। सब्जी-अनाज की खरीदारी, नये सेवास्थान के लिए जगह देखना, किसी से विशेष मिलना, पहरा देना, भण्डारे में भोजन बनाना, टोली बनाना, अनाज साफ करवाना, सब्जी कटवानी, भोजन खिलाना आदि अनेक प्रकार की सेवाओं की जिम्मेवारी दादी पर थी। जब कोई विशेष नाश्ता बनता था तो अपने हाथों से सबको खिलाती थी ताकि सबको बराबर मिले और सभी संतुष्ट रहें। इस प्रकार उनका बहुत ही प्यारा मातृ रूप नजर आता था।

नष्टोमोहा

दादी नष्टोमोहा थी। गुलजार दादी उनकी लौकिक सुपुत्री हैं, दोनों साथ-साथ रहे पाण्डव भवन में लेकिन हमें कभी भी ऐसा आभास नहीं होता था कि गुलजार दादी इनकी लौकिक सुपुत्री हैं, और ही, हमको यह आभास होता था कि हम कुमारियाँ ही इनकी लौकिक-अलौकिक बच्चियाँ हैं क्योंकि वे हम सबका इतना ध्यान रखती थी। दादी कहती थी, हम देह के संबंधियों को और सारी पुरानी दुनिया को छोड़ आये हैं और अगर फिर से हमारा खिंचाव उनकी तरफ होता है तो यह ऐसे ही है जैसेकि कोई थूक फेंक देता है और फिर उसे चाटता है। दादी कहती थी, देह और देह के संबंधियों से तो हमारा उत्थान हुआ नहीं। जब दादी से हम पूछते थे, लौकिक परिवार के बारे में सुनाओ तो कहती थी, उनको याद नहीं करना। जब बाबा ने देह की दुनिया से निकाल लिया तो उन बातों का जिक्र करना माना आत्मा को नीचे लाना। दादी कहती थी, मैं उन बातों को भूल चुकी हूँ। बाबा के चरित्र खूब सुनाती थी। हम कहते थे, दादी आप सिन्धी भाषा में बात नहीं करते हो, तो कहती थी, जब से बाबा ने मना किया, मैने सिन्धी बोलना छोड़ दिया। सिन्धी बोलना भी लौकिक को याद करना है। बड़ी दीदी कहती थी, ऑलराउण्डर दादी सिन्धी नहीं बोलती इसलिए अच्छा भाषण कर लेती है। दादी भाषण करने में बहुत होशियार थी। गुलजार दादी के साथ भी हिन्दी में ही बात करती थी। जिन बातों के लिए बाबा की मना थी, दादी उनको कभी नहीं करती थी।

बोलत-बोलत भरे विकार

पाण्डव भवन में शुरू से काफी बड़ा संगठन रहा है। यदि कभी किसी भाई ने थोड़ा असंतुष्टता से कुछ बोल भी दिया तो दादी चुप करके बैठी रहती थी। कहती थी, बोलत-बोलत भरे विकार (ज्यादा बोलने से विकार भर जाते हैं)। यदि हम कहते थे, दादी, देखो, उसने ऐसा बोल दिया तो कहती थी, चुप। उस बात को रिपीट भी करने नहीं देती थी। जवाब देना, चेहरे पर कोई भाव लाना, यह तो दूर की बात रही। कभी कोई उनकी बात यदि किसी कारण से नहीं सुनता था तो शक्तिशाली रूप में स्थित होकर चुप बैठ जाती थी। दादी निर्भय थी। ना व्यक्ति से, ना परिस्थिति से डरती थी।

नष्टोमोहा बनने की ट्रेनिंग

लौकिक माता का मुझमें बहुत मोह था। मैं समर्पित हुई तो वो रोती रहती थी और दादी के पास आती थी। एक बार मुझे जोर से बुखार आया। लौकिक घर से फोन आया तो दादी ने ना मुझे फोन दिया, ना मुझे फोन के बारे में बताया और ना घरवालों को बताया कि आपकी लौकिक बच्ची को बुखार है। काफी दिनों के बाद उन्हें पता चला, वे मिलने आए तो कहने लगे, हमने तो फोन कई बार किया था लेकिन आपसे हमारी बात दादी ऑलराउण्डर ने कराई ही नहीं। मैंने बाद में समझा कि दादी ने यह कितना अच्छा किया जिससे ना तो मुझे ये ख्याल आया कि मैं घर जाऊँ और ना ही मेरे प्रति घरवालों का चिन्तन चला। इस प्रकार दादी ट्रेनिंग देती थी कि लौकिक की तरफ कभी मोह न जाए।

बड़ों का सम्मान

दादी अलर्ट और एक्टिव थी। दादी के कमरे के अंदर बाथरूम नहीं था, बरामदे में जाना पड़ता था। हम कई बार कहते थे, तो कहती थी, फिर क्या हुआ, हम तो शुरू से ऐसे ही यज्ञ में रहे हैं। दादी की आयु जब और बढ़ी और सभी इस बारे में कहने लगे तो दादी ने कहा, बड़ी दादी की आज्ञा होगी तो बनायेंगे। फिर एक बार जब दादी प्रकाशमणि पाण्डव भवन में आई थी, तब दादी ने उनको सब बात बताकर उनसे अनुमति ली। कोई भी बात होती थी तो बड़ी दादी से पूछकर करती थी। इस प्रकार खुद बड़ी होते भी, बड़ी दादी का इतना सम्मान करती थी। दादी पत्र द्वारा सारा समाचार मधुबन भेजती थी। मधुबन से कम्यूनिकेशन बहुत अच्छा रखती थी। क्या खरीदारी की, कौन मेहमान आया, क्या सेवा हुई आदि-आदि सब समाचार उस पत्र में विस्तार से लिखती थी। सीजन का कोई भी पहला फल आता तो पहले मधुबन भेजती, बाद में खुद स्वीकार करती। सेन्टर पर भोग लगाने के लिए खर्चा मिलता था तो उस पैसे में से भी मधुबन के लिए पैसा बचा लेती थी। हमको भी ऐसा ही सिखाती थी।

सादगी के साथ अथॉरिटी

दादी बहुत सादगी वाली थी। सफाई की कला, टोली, भोजन बनाने की कला भी सिखाती थी। बचत सिखाती थी। जब कभी फोटो खींचने के लिए हम कैमरा निकालते थे तो कहती थी, यह माया है, यह तुमको चक पहन रही है। सब्जी काटने के बाद, कई सारे पत्ते निकालकर दिखाती थी जो फेंक दिये होते थे। अनाज सफाई खुद बैठकर कराती थी, सिखाती थी। उनकी चाल साधारण नहीं थी, ऐसा लगता था, कोई महाराजा चल रहा है। दादी का अनुशासन बहुत शक्तिशाली था। किसी स्कूल, कॉलेज के प्रिंसिपल की तरह अनुशासन में रहती थी, एकदम सीधी चलती थी, झुककर नहीं। दादी की सबके प्रति समान दृष्टि थी। व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था। बड़े-बड़े लोग आकर मिलते थे, संतुष्ट होकर जाते थे, महसूस करते थे, एक माँ की पालना मिली है। उनका जगतमाता का रूप भी था तो रूहानी टीचर का भी। ज्ञान बड़ी अथॉरिटी से सुनाती थी। ज्ञान की गहराई में जाती थी। बेहद सेवा का बहुत शौक था। अजमल खां पार्क में जब मेला आयोजित किया तो कहती थी, ऐसा मेला करो जो सबसे सुन्दर हो। अच्छे से अच्छा मेला होना चाहिए। पहले तो सारी दिल्ली के सेवाकेन्द्रों को दादी ऑलराउंडर ही संभालती थी। सुबह मुरली क्लास दादी गुलजार करवाती थी, दादी ऑलराउंडर बाद में सभी भाई-बहनों से मिलती थी। सतगुरुवार और रविवार को आधा घंटा क्लास कराती थी, अमृत पिलाती थी। दादी अथक बहुत थी, हम जवान कन्यायें थक जाती थी, जाकर सो जाती थी पर दादी इतनी आयु में भी हर समय कमरे में बैठी मिलती थी, सोई हुई नहीं। सुबह चार बजे बाहर बरामदे में आ जाती थी, वहीं बैठकर बाबा को याद करती थी और सारा दिन हरेक आने-जाने वालों पर ध्यान रखती थी।

समय के साथ परिवर्तन

दादी खुद तकिये के नीचे दबाये हुए, बिना प्रेस वाले कपड़े पहनती थी पर समय के साथ-साथ भी चलती थी। बाबा की और यज्ञ की रीति-रस्म को ध्यान में रखती थी परंतु सेवा, समय और वर्तमान की कुमारियों को देखकर कई नियमों में छूट भी देती थी। ऐसे नहीं कि कोई कुमारी इतना त्याग ना कर सके तो जबरदस्ती उसे बोझिल किया जाये। जैसे मैं जब आई तो प्रेस वाले कपड़े पहनती थी, तकिये के नीचे रखे कपड़े मुझे पसंद नहीं थे। दादी ने युक्ति से कहा, तुम गठड़ी बाँधकर कपड़े नीचे दे जाओ, मैं बाहर से प्रेस करवाकर ऊपर भिजवा दूँगी। गुप्त पालना देकर भी कुमारियों को संतुष्ट रखती थी और साथ-साथ उनकी शक्ति के अनुसार त्याग का पाठ भी पढ़ाती थी।

नब्ज देखने में प्रवीण

दादी की स्टूडेन्ट लाइफ दिखाई देती थी। बरामदे में बैठी दादी मुरली, पत्रिका आदि पढ़ती रहती थी। कभी दादी को खाली बैठे नहीं देखा। वे या तो टोली देने में या पढ़ने में या ज्ञान सुनाने में ही व्यस्त नजर आती थी। दादी को सुस्ती पसंद नहीं थी। यदि कोई बहाना करके, अलबेलेपन में सोये तो पसंद नहीं था। तबीयत खराब होने पर हाल-चाल पूछती थी। दवाई-पानी, आराम का प्रबंध कर देती थी पर जब ठीक से भोजन खाना शुरू हो जाता था तो कहती थी, अब सेवा पर आना है। जब हम नये-नये आये थे, ज्ञान में इतने प्रवीण नहीं हुए थे तब दादी हमें मार्गदर्शन देती थी कि आज यह परिवार कोर्स करने आयेगा, इसको क्या-क्या सुनाना है। कोर्स करने आने वालों से भी पहले पाँच मिनट मिलती थी, फिर कहती थी, 'लाल', इसको परिवार में शान्ति की बातें विशेष सुनाना या आत्मा पर विशेष सुनाना, ऐसे उसकी जरूरत को परख लेती थी। हम तो आधे घंटे में पाठ पढ़ाकर आ जाते थे पर दादी उन कोर्स करने वालों से या म्यूजियम समझने वालों से भी, एक-एक से बैठकर बातचीत करती थी। उनके प्रश्नों के उत्तर भी देती थी।

जगदीश भाई देते थे जिगरी सम्मान

जगदीश भाई के मन में दादी के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे दादी के त्याग को देखकर बहुत प्रभावित थे। दादी ने कितने बड़े संपन्न परिवार को छोड़ा, गुलजार दादी जैसा रत्न यज्ञ को दिया, इतनी बड़ी दिल्ली की जिम्मेवारी उठाई और दिन-रात अथक रूप से सेवारत रही-इन बातों के कारण जगदीश भाई दिल से सम्मान देते थे। दादी को देखकर खुद खड़े हो जाते थे, नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर ओमशान्ति बोलते थे। दादी से बहुत अच्छी रूहरिहान करते थे और कहते थे, आपके मुख से सुनूँगा तो अच्छी तरह उसे लिख सकूँगा। दादी का भी जगदीश भाई के प्रति बहुत स्नेह और विश्वास था कि मैं कोई भी बात इसे सुनाऊँगी तो यह जल्दी समझेगा। दिल की बात दादी जगदीश भाई को बुलाकर कर लेती थी।

अन्तिम घड़ी

जब मधुबन में (1993 में) राजाओं का प्रोग्राम होने वाला था, दादी की तबीयत ठीक नहीं थी पर मधुबन जाने की दिल थी। तब जगदीश भाई ने अपने साथ प्लेन के द्वारा मधुबन ले जाने का साहस दिखाया। दादी ने कार्यक्रम भी देखा और बीमारी की हालत में बाबा से भी मिली। फिर एक मास ग्लोबल हॉस्पिटल में ट्रीटमेंट भी चली। फिर 23 नवंबर 1993 में 89 वर्ष की आयु में वहीं हॉस्पिटल में ही शरीर का त्याग कर बाप दादा की गोद में समा गई। मेरे जीवन का तो आधार थी दादी। भले ही आयु और तबीयत को देखते हुए उनका जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी परंतु फिर भी खालीपन महसूस हुआ। गुलजार दादी का साथ होने के कारण हमें बहुत अकेलापन तो नहीं लगा पर ऑलराउण्डर दादी के होते जो हम निश्चिन्त रहते थे, वो निश्चिंतता चली गई। दादी ऑलराउण्डर के होते हमें ऐसा लगता था कि हम बच्चे हैं और मौज में रह रहे हैं।

दादी गंगे

आपका अलौकिक नाम आत्मइन्द्रा दादी था। यज्ञ स्थापना के समय जब आप ज्ञान में आई तो बहुत कड़े बंधनों का सामना किया। लौकिक वालों ने आपको तालों में बंद रखा लेकिन एक प्रभु प्रीत में सब बंधनों को काटकर आप यज्ञ में समर्पित हो गई। सेवाओं के प्रारंभ में सन् 1952 में आप और दादी मनोहर इन्द्रा, दोनों ने ही विशेष गंगा और यमुना नदी के तट पर बैठकर सेवायें की। आपका निश्चय, त्याग और समर्पण भावना अद्भुत थी। आपका रूहानियत संपन्न चेहरा अनेक आत्माओं में रूहानियत का बीज अंकुरित करता था। आपमें प्रवचन देने की बहुत अच्छी कला थी। बाबा आपको पतित पावनी हरगंगे कहकर पुकारते थे। आपने उत्तर प्रदेश जोन की संचालिका के रूप में, कानपुर में रहकर अपनी सेवायें दी। आप धार्मिक प्रभाग की अध्यक्षा भी रही। आठ अक्टूबर, 2004 में आप अव्यक्त वतनवासी बनी।

गंगे दादी जी ने एक बार अपना अनुभव इस प्रकार सुनाया था -

मेरा जन्म सन् 1926 में हैदराबाद-सिन्ध के एक संपन्न, धार्मिक परिवार में हुआ। माता-पिता की भक्ति के प्रभाव से बचपन से ही मुझे भक्ति का शौक था। स्कूल में पढ़ते समय, जब भी समय मिलता था, मैं भागवत पढ़ती थी। जब श्रीकृष्ण और गोपियों के संबंध की बातें पढ़ती थी तो मन में संकल्प उठता था कि काश! मैं गोपी बनती तो कितनी भाग्यशाली होती ! जब मेरी उम्र 12 वर्ष की थी, तब पिताश्री ब्रह्मा बाबा के यहाँ सत्संग प्रारंभ हुआ। हमारे पड़ोस में एक कमलसुंदरी बहन रहती थी, उसने हमें कहा कि चलो सत्संग में, वहाँ बहुत अच्छी बातें बताई जाती हैं। उनके आग्रह पर मैं सत्संग में गई तो वहाँ ओम की ध्वनि चल रही थी। थोड़े ही समय में मैं गुम हो गई, ध्यान में चली गई तो मुझे बहुत सुन्दर श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ, जिससे दिन-प्रतिदिन मेरी लगन बढ़ती ही गई।

ओम मण्डली का शुद्ध वातावरण

"ओम मण्डली” में जाने से मेरी खुशी दिनों- दिन बढ़ती ही जाती थी। वहाँ का वातावरण ही ऐसा शुद्ध होता था कि आत्मा को शान्ति का अनुभव होता था। अंतरात्मा में ऐसा महसूस होता था कि जन्म- जन्मांतर की प्यास बुझ रही है। ओम मण्डली में जो ज्ञान दिया जाता था, उससे मन विषय-विकारों से हट जाता था और नेकी और पवित्रता के मार्ग पर लग जाता था। वहाँ ज्ञानामृत का प्याला पीने वाले स्वयं को देह रूपी मिट्टी का पुतला नहीं मानते थे बल्कि अविनाशी आत्मा मानते थे।

मित्र-सम्बन्धी रोक लगाने लगे

बाबा ने हम बच्चों के लिए एक स्कूल खोला था। माता-पिता की स्वीकृति लेकर मैं स्कूल में दाखिल हो गई। स्कूल में इंग्लिश, हिन्दी और गणित सिखाया जाता था। मैं पढ़ाई में बहुत होशियार थी जिससे सदा क्लास में नम्बर आगे रहता था। जैसे ही पवित्रता के व्रत की बात सामने आई तो माताओं पर रोक-टोक होने लगी। हमारे संबंधी भी सोचने लगे कि कल यह कन्या भी शादी के लिए मना करेगी, इसलिए इसको अभी से ही रोक लो लेकिन मैं उन्हों को प्यार से समझा कर स्कूल में चली जाती थी।

लगन बढ़ती गई

उसी दौरान हैदराबाद में एन्टी ओम मंडली बन गई थी। मुझे घर वाले बंधन डालने लगे। हम अपने माता-पिता को स्पष्ट शब्दों में कहती थीं कि भोजन न खाने के बिना तो हम रह सकती हैं परंतु ज्ञानामृत पिये बिना नहीं रह सकतीं इसलिए आप हमें सत्संग में जाने दिया करो। उन्होंने देखा कि यह टलती नहीं है अतः मेरे पिताजी ने एक सूरदास (जिसको आँखें नहीं थी) को बुलाकर कहा कि दादा ने बच्ची पर जादू किया है, झाड़-फूंक कर इसे उतार दो। उसने एक महीने तक झाड़-फूंक की, कई मंत्र पढ़े और घोलकर मुझे जबर्दस्ती पिलाये। परंतु ईश्वरीय जादू के आगे मनुष्य का जादू कहाँ काम कर सकता था? आखिर उसने अपने मन में हार मान ली क्योंकि वह समझ गया कि इसकी तो प्रभु से सच्ची प्रीति लगी है। पिताजी ने मुझे छह मास तक घर से बाहर जाने नहीं दिया। पिताजी मुझसे सख्त नाराज़ थे। लौकिक संबंधियों को हम पर बहुत गुस्सा था। हम ओम मण्डली से ईश्वरीय ज्ञान के जो लिखित पन्ने ले आती थी जिन्हें कि हम वाणी या मुरली कहती थी, मुझे न पढ़ने देते। मैं शान्त-समाधि में बैठती थी तो भी वे विघ्न डालते थे और नहीं बैठने देते थे। वे मुझ पर बहुत सितम ढाते थे। परन्तु वे हम पर जितना-जितना अत्याचार करते थे, उतना- उतना हमें ऐसा महसूस होता था कि ये सब स्वार्थ के सम्बन्ध हैं। हम सोचते थे कि पता नहीं ये किस प्रकार के लोग हैं? यह कैसा जमाना है? यह कैसा संसार है? क्या इनको ज्ञानामृत अच्छा ही नहीं लगता, इन्हें विषय-विकारों की मोहिनी-माया ने इतना मोह लिया है!

हम हैं ज्ञान-गोपिकाएँ

तब हमें श्रीमद्भागवत् में गोपियों के चरित्र याद आते जो कि हम बचपन से ही सुनती चली आ रही थी। उसमें हमने पढ़ा था कि भगवान की मुरली सुनकर गोपियाँ मस्त हो जाती थी और वे भाग कर वहाँ पहुँच जाती थीं। परन्तु उनके लौकिक संबंधी, पुरुष आदि उन्हें रोकते थे। तब हम ये वृत्तांत पढ़कर सोचा करती थी - "क्या गोपियों को भगवान की बंसी सुनाई देती थी, उनके संबंधियों, पुरुषों आदि को सुनाई नहीं देती थी या रसीली नहीं मालूम होती थी?" अब हमने अपने प्रैक्टिकल अनुभव से जाना कि हम तो ज्ञान-मुरली को सुनकर अतीन्द्रिय सुख से फूली नहीं समाती हैं परंतु हमारे लौकिक संबंधी, भाई-बान्धव आदि हमें मुरली सुनाने के लिए जाने से रोकते हैं। अतः हम स्वयं को बहुत ही भाग्यशाली समझती थी कि हम वही "ज्ञान-गोपिकाएँ" हैं। अतः स्वयं ज्ञानामृत न पीने के कारण, हमारे लौकिक संबंधी हम पर जो अत्याचार करते थे, उसे हम खुशी-खुशी सहन करती थी।

वे हममें कोई बुराई न बता पाते

हम उनको कहती थीं, "आप हमें सत्संग में जान से क्यों रोकते हैं? अगर हमारे जीवन में कोई बुराई आई हो तो आप बताइये। हम घर का सारा काम- काज करती हैं, फैशन नहीं करती हैं, सिनेमा नह जाती हैं, माँस-मदिरा का प्रयोग नहीं करती हैं, किस से लड़ती-झगड़ती या फालतू घूमती भी नहीं हैं। आपने हममें क्या बुराई देखी है कि आप सत्संग में जाने से हमें रोकते हैं?" वे हममें कोई बुराई तो बता न पाते। उनके मन में तो बस यही था कि यह निर्विकार बनने का पुरुषार्थ कर रही है और हमें इसका विवाह (विकारी विवाह) अवश्य कराना है।

एक दिन अचानक अफ्रीका से मेरा बड़ा भाई घर आया, जिसका मुझसे बहुत प्यार था। उसने देखा कि पिताजी ने बहन को बंधन में रखा है। उसने कहा कि सत्संग जाने में कोई बुराई तो नहीं। उसके आग्रह पर पिताजी ने मुझे थोड़ा स्वतंत्र किया जिससे मैं पुनः सत्संग में जाने लगी।

मुझे जंजीर से बाँधा गया

एक दिन मेरी लौकिक माताजी को विचार आया कि इस कन्या का विवाह कर दिया जाये ताकि इसका मन सत्संग से हटकर संसार की बातों की ओर, खाने- पीने, पहनने और भोगने की ओर लग जाये। परंतु मैं तो विकारी शादी को बर्बादी मानती थी। अतः मैंने उन्हें कहा, माता जी, मैं तो ज्ञान-मीरा हूँ, मेरा तो एक गिरिधर गोपाल ही है, दूसरा कोई नहीं है। मैं तो उसी की हो चुकी हूँ, मेरे मन की सगाई प्रभु से हो चुकी है, अब दूसरे किसी से कैसे होगी? मैंने तो मन में मोहन को बसा लिया है, अब दूसरे किसी के लिए स्थान ही कहाँ रहा है?

मेरी ये बातें सुनकर मेरे लौकिक संबंधियों को बहुत क्रोध आया। उन्होंने एक बार तो ऐसा मारा कि क्या कहूँ? वे बोले, "जब तक तुम शादी के लिए हाँ नहीं करोगी तब तक तुम्हें मारेंगे और मार-मार कर तुम्हें खत्म कर देंगे। बोलो अपने मुख से कि मैं शादी करूंगी।"

अंधेरी कोठरी भी रोशन थी

मैंने कहा, मैंने तो आपको अपने मन की सच्ची बात स्पष्ट रीति से बतला दी है कि मैं मीरा बन चुकी हूँ, मैं गिरिधर गोपाल की हो चुकी हूँ। अब मैं विकारी शादी नहीं करूँगी। परंतु हमारी पवित्रता की बातें उन्हें समझ नहीं आती थीं। अतः एक दिन उन्होंने मुझे अंधेरी कोठी में बंद कर दिया, जंजीरों में बाँध दिया और मेरे हाथों पर दस्ते (हावन वाले) मारे। परंतु मेरे लिए वह अंधेरी कोठरी भी रोशन थी। उन्होंने मुझे भोजन देना भी बंद कर दिया। दो-तीन दिन के बाद मुझे भूख तो अवश्य लगी परंतु उतनी ही प्रभु से मेरी लगन तीव्रतर हुई। अंदर ही अंदर प्रभु से कहने लगी, प्रभु, आप तो कन्हैया लाल हैं, हम कन्याओं की रक्षा करने में आपने देर क्यों लगाई? देखो तो, हम पर ये लोग कितना सितम ढाते हैं, प्रभु मेरी लाज बचा लो। प्रभु, हमें इन विकारी संबंधियों की जंजीरों से छुड़ाओ।

बंसी बजाते हुए श्रीकृष्ण दिखाई दिए

इसी बंधन में मैं एक विचित्र अनुभव करने लगी। विरह-वेदना में डूबी, मैं देह की सुध-बुध भूल गई थी। मुझे अपने सामने श्री कृष्ण बंसी बजाते हुए दिखाई दिये। बस, उस सुन्दर मूरत को देखते ही मैं तड़पती आत्मा तृप्त हो गई। मुझे मन में बहुत हर्ष हुआ। मुझे सूक्ष्म आवाज में वह कहते हुए मालूम हुए कि अब तुम्हारे बंधन जल्दी कट जायेंगे। घबराओ नहीं। अब मैं साकार हो चुका हूँ। इस अनुभव के साथ-साथ मुझे अंदर ऐसा भी अनुभव हुआ कि मुझे भूख-प्यास बिल्कुल नहीं है, मुझे तो सब कुछ मिला ही हुआ है। मेरा शरीर पहले भी कमजोर था और निर्बल-सा था, अब कई दिन भूख-प्यास के कारण और भी क्षीण हो चुका था परंतु इस साक्षात्कार के बाद अब मुझे आत्मिक शक्ति का विशेष अनुभव हो रहा था और देह की दुर्बलताएँ नहीं भास रही थी।

लगन की अग्नि बुझने वाली नहीं है

तीन दिनों के बाद द्वार खोलकर लौकिक संबंधियों ने फिर मुझसे पूछा, "अब बताओ, क्या सोचा है? (विकारी) शादी करोगी न? देखो, अपना हठ छोड़ो। एक बार अपने मुँह से कह दो कि मैं ओम मण्डली में नहीं जाया करूँगी और शादी भी करूँगी।"

मैंने कहा, "आप यह क्या कह रहे हैं? आपने अभी तक हमें नहीं पहचाना। देखो, मेरी बात सुन लो। यह लगन की अग्नि बुझने वाली नहीं है। यह दबाने से दबने वाली भी नहीं है। हाँ, अगर मैं इस लगन में शरीर छोड़ दूँ तो मैं आत्मा तो प्रभु की स्मृति में स्थित होकर स्वर्ग के द्वारे आऊँगी ही परंतु आप एक बात कर लेना। मेरी लाश को एक बार ओम मण्डली के सत्संग के द्वार के सामने से जरूर ले जाना।" वे आश्चर्यान्वित होकर तथा कुछ निराश, कुछ रुष्ट और कुछ क्रुद्ध होकर कहते, "तुम अभी तक भी नहीं बदली, क्या तुम नहीं मानोगी?"

हमारे रक्षक भगवान हैं

मैं कहती, “देखो, मैं इतनी कायर नहीं हूँ जितना आपने मुझे समझा है। हम सितम सहन करने वाली कन्यायें-मातायें हैं। अतः आप अत्याचार कर लो, हमें उसकी कोई चिन्ता नहीं है। हमने इस ज्ञान के बल पर, प्रभु के प्रेम के लिए धीरज करना तथा अत्याचार सहना खूब सीख लिया है। परन्तु, देखो, कहीं इन अत्याचारों का परिणाम आपको न भोगना पड़े क्योंकि हमारे रक्षक स्वयं भगवान हैं। हमें आप पर इसलिए दया आती है कि आप प्रभु को नहीं पहचानते और हमें भी नहीं समझते और यूँ ही हमें मार-मार कर पाप अपने सिर पर मोल लेते हो।"

आत्मा प्रभु के पास बिक चुकी है

उन्होंने मुझे फिर जंजीरों में बाँध दिया। लगभग दो मास मेरी ऐसी हालत रही। परंतु उसके बाद भी काफी समय तक वे मुझ पर अत्याचार करते रहे। मैं अपने लौकिक संबंधियों को कहा करती थी कि आप हमारे शरीर के मालिक हैं परंतु आत्मा का मालिक तो एक परमात्मा ही है। अतः आप जब तक चाहें हमारे शरीर को बाँध दीजिये परंतु आत्मा तो ईश्वर की पुत्री है और उनके पास बिक चुकी है।

बाबा का पत्र मिला

ये सब समाचार ओम मंडली में पहुँचते ही दादी प्रकाशमणि मुझसे मिलने आई। मेरी मौसी के मकान के ऊपर किरायेदार रहते थे, उनके मकान में जाकर ऊपर से (चिमनी से) खड़ी होकर मुझसे मिली, बाबा का भेजा हुआ पत्र भी दिया। लंबे समय तक मैं ऊपर नहीं देख सकती थी क्योंकि देखने वालों को संशय आ सकता था। मुझे स्मृति आई कि ऐसे ही अनुचर सीता के पास जाकर राम का संदेश पहुँचाते थे। ऐसे दो-तीन बार कोई-न-कोई बहन छिपकर मिलने आती रही। ऐसे लगातार दो मास तक जंजीर से बँधी रही। उसी समय मेरी बहन विदेश से आई थी। मेरी यह हालत देखकर उसे बहुत दुख हुआ। उसने पिताजी को मनाकर जंजीर छुड़वाई और मुझे अपने घर ले गई।

आखिर मैं बंधनों से मुक्त हुई

एन्टी ओम मण्डली वालों ने हम सभी के घर वालों को भड़काया और कहा कि अगर आपको अपनी लड़कियाँ वापस चाहिएँ तो भूख हड़ताल करो। सचमुच उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। ब्रिटिश गवर्मेन्ट समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है, ये लोग कन्याओं- माताओं पर इतना अत्याचार क्यों कर रहे हैं? इस बात का निर्णय करने के लिए उन्होंने एक बहुत बड़े लोहे के व्यापारी धनी शिवरतन मोटा को बीच में डाला। उनको कहा कि इन सबको बुलाकर पूछो कि ये वहाँ क्यों जाते हैं, इनको वहाँ क्या प्राप्त होता है आदि। तीन दिन हम बहनें और हमारे रिश्तेदार वहाँ रहे। मेरे साथ मनोहर बहन, कमल सुंदरी बहन थी। उन्होंने हमारे से सभी बातें पूछीं। हम सभी सवालों के जवाब देते गए कि हमें क्या शिक्षा मिलती है, परमात्मा स्वयं पिताश्री द्वारा ये महान कार्य कर रहे हैं आदि। ये सब बातें सुनने के बाद चौथे दिन उसका फैसला होना था। उन्होंने यह जजमेंट दी कि ये तो सच्ची देवियाँ हैं जो जन-जन का कल्याण करने के लिए निमित्त बनी हुई हैं, ऐसी देवियों की भारत को बहुत आवश्यकता है, इसलिए इन्हों को रोका न जाये। यह बात अखबारों में प्रकाशित हुई। हम सभी को हमारे माता-पिता ने दिल से छुट्टी दी ज्ञानामृत पीने और पिलाने के लिए। फिर तो हम यज्ञ में रहने लगे।

मुझे बाबा ने ज्ञान गंगा बनाया

बाबा की शुरू से ही मेरे ऊपर विशेष दृष्टि रही। बाबा हमेशा कहते थे कि कन्याओं ने भीष्म पितामह को बाण मारा, ऐसे आपको भी द्रोणाचार्य, आचार्य और पंडितों को ज्ञान-बाण मारना है। ऐसे वरदान देते हुए हमको शुरू से ही गाइड करते आये। बाबा भाषण लिखकर भेजते थे और कहते थे, आपको ये सभा में सुनाना है। मेरे शरीर का नाम गंगा था और मनोहर बहन का नाम हरि था तो बाबा कहते थे “हर गंगे, हर गंगे।" हर गंगे की जोड़ी को सेवा में जाना है, मुख से ज्ञान-गंगा बहाकर पतितों को पावन बनाना है, सबका कल्याण करना है, यही आपका विशेष पार्ट है।

बाबा ने हमें दिल्ली सेवार्थ भेजा

दिल्ली के कुछ ऑफिसर आबू घूमने आये थे, तब उन्होंने 26 जनवरी के दिन पब्लिक प्रोग्राम में प्रवचन करने के लिए निमंत्रण दिया था। बाबा की आज्ञानुसार मैं और मनोहर बहन दिल्ली गई। हम लोगों ने प्रोग्राम में जो प्रवचन किए, वो बहुतों को अच्छे लगे। बाद में चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर में प्रवचन का निमंत्रण मिला। वहाँ जो प्रवचन किया, उसका मंदिर के सेक्रेटरी पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उन्होंने हमें मंदिर में रहने के लिए अच्छा स्थान दिया। कुछ दिनों तक हम वहाँ सेवा करते रहे। उसी दौरान हमें बाबा का पत्र मिला कि ऋषिकेश में स्वामी शिवानन्द जी "वर्ल्ड पीस कांफ्रेंस” कर रहे हैं, वहाँ आपको प्रवचन करने जाना है। कांफ्रेंस में हमें उन्होंने आधा घंटा प्रवचन के लिए दिया, जिसमें हमने विश्व में अशान्ति के कारण, उनका निवारण, इन सभी बातों से संबंधित प्रवचन किया। प्रवचन स्वामी जी को बहुत अच्छा लगा। बाद में बाबा ने मुझे कोलकाता में दो मास के लिए भेजा। तत्पश्चात् सेवार्थ बनारस, इलाहाबाद और कानपुर जाना हुआ। कानपुर में सेवा का बहुत विस्तार होता रहा।

बाबा ने कदम-कदम पर हमारी रक्षा की

एक बार बाबा ने मुझे और मनोहर बहन को जोधपुर सेवार्थ भेजा था। एक सप्ताह सेवा करके हम आबू वापस आ रहे थे। जैसे ही हम ट्रेन में बैठे तो दो आदमी आए और कहने लगे कि आपने हमें तो ज्ञान सुनाया ही नहीं। हम चाहते हैं कि हमारा परिवार भी आपका ज्ञान सुने। आप हमारे घर दो दिन के लिए चलो। हमने कहा कि अब तो हम जा रहे हैं, फिर कभी आयेंगे। उन्होंने कहा कि नहीं, गाड़ी खड़ी है, हम टिकट कैन्सिल कराते हैं। जबर्दस्ती हमें ट्रेन से नीचे उतारा। हमने सोचा, चलो दो दिन सेवा करके वापस चले जायेंगे। वे हमें तांगे में बिठाकर अपने घर ले जा रहे थे। चलते-चलते हमें संशय आया, हमने प्रश्न किया कि यह तो साधारण रास्ता है, आखिर आपका घर कहाँ है? कहने लगे, बस अभी नजदीक है। हमने देखा कि यहाँ तो सन्नाटा छाया है, अंधेरी कोठी है। हमने तांगे को खड़ा कराया और शक्तिस्वरूप में स्थित होकर कहा कि कहाँ है आपका परिवार, ले आओ पहले अपने परिवार को। गुस्से से हमें पिस्तौल दिखाते हुए वे बोले, ज्यादा बोलना नहीं। हमने कहा कि हम पिस्तौल से डरने वाले नहीं। हमने बाबा को याद किया और तांगे वाले को कहा कि यहाँ से बिल्कुल जाना नहीं। उन्होंने हमारा सामान उतारा लेकिन हमने तुरंत तांगे में सामान रखा। इतने में वो दोनों वहाँ से भाग गये क्योंकि उनकी दृष्टि-वृत्ति साफ नहीं थी। ऐसी कठिन परिस्थिति में बाबा ने हमारी रक्षा की, वर्ना हम उन बदमाशों से छूट नहीं सकते थे। उसके बाद जब हम बाबा से मिले तो बाबा ने कहा कि यह भी माया का एक रूप था, सदा दूरंदेशी होकर किसी भी बात का निर्णय लो तो ऐसा धोखा खाने से बचे रहोगे। ऐसे, सेवाक्षेत्र में कई विघ्नों को पार करने के लिए सदा बाबा की मदद मिलती रही।

विदेश सेवा पर जाना हुआ

सन् 1991 में, मैं लंदन और अमेरिका ईश्वरीय सेवार्थ गई थी। उस दौरान बाबा ने बहुत सुन्दर अलौकिक अनुभव कराये। ऐसा लगता था कि ब्रह्मा बाबा अव्यक्त होने के बाद विदेश में सेवा कर रहे हैं। सभी के मुख से बाबा-बाबा निकलता था, सचमुच कमाल देखी विदेश में बाबा की सेवा की।

इस प्रकार हमारी जीवन की यात्रा ईश्वर की छत्रछाया में व्यतीत होती रही। हमें अपने भाग्य को निहार कर हर्ष होता है कि हमारे भक्तिकाल में किये गये पुण्य कर्मों का यही प्रत्यक्ष फल मिला है कि इस अंतिम जन्म में भगवान के साथ रहे।

दादी मनोहर इन्द्रा

आपका लौकिक नाम हरि था, आप गंगे दादी की पक्की सखी थी, इसलिए बाबा दोनों को जब याद करते तो कहते 'हरगंगे'। आप त्याग- तपस्या की मूर्ति थी। सदा एक बाबा, दूसरा न कोई, इसी महामंत्र से सेवा के हर कार्य में हाँ जी करते आगे बढ़ी। पहले दिल्ली फिर पंजाब में अपनी सेवायें दी, करनाल में रहकर अनेक विघ्नों को पार करते हुए एक बल एक भरोसे के आधार पर आपने अनेक सेवाकेन्द्रों की स्थापना की। अनेक कन्यायें आपकी पालना से आज कई सेवाकेन्द्र संभाल रही हैं। आपकी रूहानियत, हर एक को दिव्यता का पाठ पढ़ा देती। आपने देश-विदेश में अपनी खूब सेवायें दी। दादी चंद्रमणि के बाद आप ज्ञान-सरोवर परिसर की डायरेक्टर बनी। आप महिला प्रभाग की अध्यक्षा थी। आप यज्ञ का इतिहास इतना स्पष्ट शब्दों में सुनाती थी जो बाबा के हर चरित्र को साकार कर देती थी। आपने आज्ञाकारी बन हाँ जी, हाँ जी करके सबकी दिल को जीत लिया। आप देश-विदेश के भाई-बहनों की बहुत अच्छी पालना करते हुए 17 नवंबर, 2008 को अव्यक्त वतनवासी बन गई।

दादी मनोहर इन्द्रा जी अपने लौकिक, अलौकिक जीवन के बारे में इस प्रकार सुनाती थी -

मेरा जन्म सन् 1924 में हैदराबाद-सिन्ध में एक संपन्न परिवार में हुआ था। लौकिक नाम 'हरि' था। 'मनोहर इन्द्रा' बाबा द्वारा दिया हुआ अव्यक्त नाम है। मेरे ज्ञान में आने के 25 वर्षों तक हमारे परिवार में कोई ज्ञान में नहीं चला पर अभी बहुत सारे मित्र-संबंधी स्नेही-सहयोगी हैं। लौकिक बड़ी बहन तथा उनका पति भी ज्ञान में चले, बड़ी बहन ने अब शरीर छोड़ दिया है। मेरा घर दादा लेखराज (प्रजापिता ब्रह्मा) के घर के पास ही था। उस बाल्यावस्था में मेरा दादा के घर आना-जाना, पारिवारिक समारोहों में शामिल होना चलता रहता था। बाल्यकाल से ही मैं प्रभु प्राप्ति की - इच्छुक और बहुत ही सात्विक विचारों की थीं। इसी कारण मुझे दादा के घर का आश्रम जैसा सात्विक वातावरण बहुत ही आकर्षित करता था। जब दादा को दिव्य साक्षात्कार हुए और वे ईश्वरीय कर्त्तव्य के निमित्त बने तब हमको भी ओम मण्डली के बारे में जानकारी मिली। गली से गुजरते हुए एक दिन मुझे बाबा के मकान के अंदर से मन को मोहने वाली ओम की ध्वनि सुनाई दी। मैंने वहाँ प्रवेश किया तो मन भाव-विभोर हो उठा। मैंने देखा, अनेक स्त्री-पुरुष ओम की ध्वनि सुनकर प्रभु-प्रेम में मग्न हैं। बस यही दृश्य मेरे मन को इतना भाया कि मैं भी प्रभु-प्रेम में लीन हो गई।

आशाओं के दीप जगे

तब मेरी आयु 12 वर्ष की थी। मुझे सांसारिक जीवन से वैराग्य था। मैं प्रभु की होना चाहती थी। जन-सेवा करने की भावना मेरे मन में बैठी हुई थी परंतु ऐसा प्रेम कहीं से भी न मिलने के कारण मन बहुत ही निराश रहता था। ओम मण्डली से संपर्क होते ही मेरे जीवन में आशाओं के दीप जले। मुझे कोर्स कराया गया। मैं शांत समाधि में घंटों बैठी रहती थी। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगती थी कि मैं आत्मा हूँ और शान्त स्वरूप हूँ। इस स्थिति का मैंने खूब अभ्यास किया। मेरी लगन निशदिन बढ़ती गई। कुछ ही समय बाद मेरे लौकिक पिता का देहांत हो गया। चारों ओर हाहाकार मचा परंतु मेरा चित्त शान्त था। मैं सभी को सांत्वना देती थी कि देह विनाशी है, अविनाशी आत्मा तो शान्त है। शान्ति के इस अनुभव ने मुझे भी पूर्ण शान्त रखा और सभी को भी शान्ति दी। तब मेरी इस स्थिति का सभी पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।

सत्संग में जाने पर रोक

छह मास तक तो उन्होंने मुझे ज्ञान में जाने से मना नहीं किया क्योंकि मेरे जीवन में बहुत परिवर्तन आया। मेरी लौकिक माता को मेरा यह परिवर्तन अच्छा लगा परन्तु जैसे-जैसे हम बड़े होते गए, लौकिक संबंधियों ने माँ को भड़काना प्रारंभ कर दिया कि यदि इसी प्रकार यह ओम मण्डली के नियमों का पालन करती रहेगी तो संसार में कैसे चल सकेगी, धीरे-धीरे यह संन्यास कर लेगी। तब मुझ पर बंधन पड़ने लगे। उन्होंने मुझे सत्संग में जाने से रोका, तालों में बंद किया और कई बार मारा भी। उनको भ्रान्ति थी कि वहाँ हिप्नोटिज्म सिखाते हैं। माता जी भी भ्रांतिवश विघ्न डालती थी। आखिर एक दिन ऐसा आया जब हमारी माता ने पूछा, आपके जीवन का क्या लक्ष्य है? आपको समाज में रहना है तो शादी भी करनी पड़ेगी। शादी के लिए आप चाहो कि हमारे को ऐसा लड़का मिले, वो भी नहीं होगा इसलिए आप सत्संग में जाना बंद कर दो। हमने कहा, हमने तो भगवान से शादी कर ली है, अब हम किसी विकारी पुरुष से शादी नहीं करेंगी। आज के युग में अधिकतर खाने-पीने वाले लोग ही होते हैं इसलिए हमने भगवान को ही पति रूप में स्वीकार कर लिया है।

बाबा सितारों के बीच चन्द्रमा थे

यह सुन माताजी को थोड़ा महसूस हुआ और मुझे चारों ओर से बन्धन डाला कि अब हम आपको बिल्कुल जाने नहीं देंगी। परन्तु, जितना वो बंधन डालती थी, हमारी लगन उतनी ही बढ़ती जाती थी। इसी लगन की बदौलत हमें घर बैठे अनेक दिव्य अनुभव होते रहे। शरीर भले बंधन में था परन्तु आत्मा को अंदर से रूहानी खुराक मिलती रहती थी। कभी मौका मिलता था तो सत्संग में चले भी जाते थे। जहाँ सत्यता का अनुभव हो जाता है वहाँ विघ्न, विघ्न नहीं लगते। हमने भी अपनी माता, बहनों, भाई को शान्ति और प्रेम के बल से समझाकर, सब विघ्नों को पार कर लिया। उन्होंने फिर खुशी-खुशी स्वीकृति पत्र लिखकर मुझे इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में दाखिल कर दिया। मैं 1936 में आई, सन् 1937 में ओम मण्डली में समर्पित हो गई।

इसके बाद हमने बाबा को प्रैक्टिकल में देखा। पहले तो सत्संगी बहनों को ही देखा था, उन्का सच्चा गीता-ज्ञान सुना, उसके कारण मुझे जीवन को महान बनाने की प्रेरणा आ गई। जब मैंने बाबा को देखा तो मुझे उनसे अपनापन महसूस हुआ। बाबा के मस्तक का तेज मुझे बहुत आकर्षित करता था और सभी के बीच खड़ा हुआ बाबा मुझे ऐसा लगता था मानो सितारों के बीच पूर्ण चंद्रमा चमक रहा हो।

सत्य को ढकने वाली भ्रान्तियाँ

निर्मलशान्ता बहन का ससुर एन्टी ओम मण्डली का लीडर था। बाबा ने दो सुन्दर रिकार्ड बनवाये थे। एक गीत था - 'इस पाप की दुनिया से दूर कहीं ले चल' और दूसरा था – 'यह धन-माल छोड़कर कहाँ जा रही हो।' ये दोनों गीत जैसे हमारे दिल की आवाज़ थे। बाबा ने कहा था, इन गीतों का सेट बनाकर अपने पेरेन्टस को सौगात दो। निर्मलशान्ता बहन ने यह गिफ्ट अपने ससुर के पास भेजा। उस घर में उस समय एक जादूगर बैठा था। रिकार्ड को लाल रिबन बंधा था। उसे देख जादूगर बोला, खबरदार, इसको हाथ ना लगाओ, इसमें जरूर कुछ जादू है। उसने खुद अपनी जादूगरी दिखाई। एक तलवार उस रिकार्ड के सुराख के अंदर डाली और वहाँ से आग निकली। फिर बोला, देखा, तुम्हारे घर को जलाने के लिए, तुम्हारे परिवार को खत्म करने के लिए यह जादू वाली चीज़ भेजी गई है। वो डर गये परन्तु कुछ समय बाद जब सामने मुलाकात हुई और हम लोगों ने उन्हें समझाया तो वे मान गये। कहने लगे, वो जादूगर की चालाकी थी, हम भी नहीं समझते थे कि आप हमारे साथ ऐसा कर सकते हैं पर समाज में फैली भ्रान्तियों के कारण हम डर गए।

छोटे बच्चों की सहनशक्ति

एक दिन हम अपनी ही बस में बाबा की मुरली सुनने जा रहे थे। दादी बृजेन्द्रा जी बस चला रही थीं तो अचानक बस गड्ढे में जा गिरी। बड़ी भारी दुर्घटना हुई। परंतु दर्दनाक सीन में भी हम वत्सों के मन शान्त थे और चेहरों पर वही मुस्कराहट थी। देखने वाले हैरान थे, डॉक्टर सोचते कि इनके पास क्या शक्ति है। उन बेचारों को क्या पता कि स्वयं सर्वशक्तिवान इनके साथ है। वे पूछते थे तो उत्तर मिलता था, मैं तो ठीक हूँ, यह दुख तो इस देह को है। छोटे-छोटे बच्चों की यह महान सहनशक्ति देखकर डॉक्टर दाँतों तले अंगुली दबा लेते थे। ब्राह्मण बच्चों की इस मनोस्थिति की चर्चा अखबार द्वारा चारों ओर फैल गई और सभी जगह बाबा की महानताओं के गुणगान होने लगे।

बाबा कहते थे, यह ज्ञान-गंगा है

मुझे इस ईश्वरीय पढ़ाई का बहुत शौक था। बाबा निबंध लिखने को देते थे तो मैं सबसे पहले लिखकर ले जाती थी। इस प्रकार मेरा मनन का अभ्यास बढ़ता गया और साथ ही साथ बाबा ने हमें भाषण करना भी सिखाया। बाबा मुझे कहा करते थे, 'यह तो ज्ञान गंगा है, यह तो शेरनी है।' इस प्रकार उमंग-उत्साह बढ़ाते हुए अथाह प्यार देकर बाबा ने मुझे आगे बढ़ाया। यज्ञ में हम 10-12 बहनों की एक पार्टी बन गई थी जिसे बाबा प्यार से 'मनोहर पार्टी' कहते थे। हम सभी बहनें आपस में मनन करते थे, भाषण भी तैयार करते थे और हर प्रकार की यज्ञ-सेवा भी करते थे। जहाँ भी आवश्यकता पड़ती थी तो बाबा कहते थे कि मनोहर पार्टी को भेजो। तो यह हमारा परम सौभाग्य रहा कि बाबा ने हमें हर तरह से आगे बढ़ाया।

चौदह वर्ष का वनवास

शुरू में हमारे संबंधी पूछते थे कि तुम कब लौटोगी तो हमें बाबा ने कहा था कि उन्हें बताओ कि यह हमारा 14 वर्ष का वनवास है, हमारी 14 वर्ष की योग-तपस्या है। उसके बाद हम आपकी सेवा में आयेंगी। बस 14 वर्ष बाबा ने हमसे पूरी तपस्या कराई। हमें अबला नारी से शेरनी शक्तियाँ बनाया, हमारे मन का भय निकाला, हमारी लज्जा समाप्त की। हमें आत्मा का इतना अधिक अभ्यास कराया जो हमारा यह भान निकल गया कि हम नारी हैं। बाबा हमें विशेष योग के प्रोग्राम देते थे। हम रात-भर जागकर, कभी-कभी आठ घंटे बैठकर योग-अभ्यास करते थे। इस प्रकार बाबा ने हमारे जीवन में तप कराया और हमने देखा कि सचमुच जीवन तप कर ही निखरता है।

कोई दुश्मन नहीं

इसी मध्य, भारत स्वतंत्र हुआ और पाकिस्तान बना। वहाँ पर नर-संहार हुआ, विनाश का तांडव नृत्य हुआ परंतु हम सब पूर्ण सुरक्षित थे। हमें लगता था कि हम सद्‌गुरु की छत्रछाया में हैं। बाबा ने उस समय हमें अशरीरीपन का बहुत अभ्यास कराया। बाबा कहते थे, 'बच्ची, तुम सदा इस देह से उपराम होकर रहो ताकि यदि कोई तुम्हारे सामने आये तो उसे तुम्हारी देह दिखाई ही न दे।' तब बाबा हमसे रात-रात योगाभ्यास कराते थे। तब हमने महसूस किया कि उस समय 1947-50 तक, जो भी मुसलमान भाई हमारे पास आते थे, बड़ी ही रूहानी दृष्टि से मिलते थे। वे हमें बहुत सत्कार देते थे तथा हर तरह से सहयोग देते थे। उनकी भावना हो गई थी कि ये सब देवियाँ खुदाई खिदमतगार हैं। उसी समय बाबा ने हमें यह पाठ बहुत पक्का करा दिया था कि तुम्हारा संसार में कोई भी दुश्मन नहीं है, इसलिए तुम निर्भय होकर रहो। इस बात ने हमारे मन में सभी के प्रति आत्मीयता की भावना पैदा कर दी थी। परिणामस्वरूप सन् 1947-50 तक हम वहाँ पूर्ण शान्ति व सुरक्षा के साथ रहे। फिर माउंट आबू में आए 1950 में। यहाँ आते ही बेगरी पार्ट शुरू हो गया।

शिव बाबा बाबा ने भेजा भट्ठी का प्रोग्राम

बेगरी पार्ट में भी बाबा सदा एक बल एक भरोसे रहा। बाबा के चेहरे पर पूर्ण निश्चिन्तता थी। बाबा आलमाइटी बाबा (शिव बाबा) को सन्देश भेज देता था और पूछता था, बाबा, इन बच्चों का क्या करना है? बाबा ने संदेश भेजा, इनको एक मास भट्ठी में बिठाना है, भोजन बहुत हल्का देना है। सुबह थोड़ा दूध, शाम को थोड़ा दूध और दिन में एक चपाती देना, इस प्रकार बहुत हल्के भोजन का प्रोग्राम ऊपर से आया। हमारे शरीर भी हल्के हो गए और हमें बहुत ही अच्छे अलौकिक अनुभव हुए। आत्म-अनुभूति इतनी अच्छी हुई कि लगता था, हम परमधाम में, दुनिया से बहुत दूर वतन में बैठे हैं।

बाबा की गुप्त मदद

एक बार होली का दिन आया। बाबा का बच्चों से बहुत-बहुत प्यार था। होली पर लोग जलेबी और घेवर खाते हैं। बाबा ने मम्मा को कहा, तुम मेरे सिकीलधे बच्चों को जलेबी नहीं खिलाओगी। मम्मा ने कहा, जी बाबा, हाँ बाबा, जरूर खिलायेंगे परन्तु भण्डारे में ना मैदा, ना चीनी, ना घी था। यह मम्मा जानती थी तो भी कहा, जी बाबा, जरूर खिलायेंगे। अब देखो, कैसा चमत्कार होता है। एक माता माउंट आबू में ही रहती थी। वह श्रीकृष्ण की पक्की भक्त थी। उसका प्यार बाबा के यज्ञ से था। उसका पति भक्त था। वह कहता था, जो कुछ दान करना है, वह हरिद्वार जाकर करना है। माता चाहती थी कि मैं ब्रह्माकुमारी आश्रम में करूँ। खैर, दो-चार दिन के बाद जब एक बार पति सोया हुआ था, तब भगवान ने साक्षात्कार करवाया और उनको आवाज दी कि तुमको जो दान करना है, वह ब्रह्माकुमारी आश्रम में करो। उस व्यक्ति ने फिर अपनी पत्नी को बताया कि मुझे ऐसा अनुभव हुआ है, तुम ब्रह्माकुमारी आश्रम में जाओ, मैं तुमको यह पैसा देता हूँ, तुम यज्ञ-माता को देकर आओ। वह माता दौड़ी-दौड़ी आई और मम्मा को अपनी श्रद्धा भेंट दी और कहा, इससे आप सबको भोग खिलाओ। उसी समय बाबा ने सब सामान मँगवाया और बच्चों को जलेबी बनाकर खिलाई। बाबा ने मम्मा को कहा, देखो मम्मा, शिवबाबा ने कैसे हमारे लिए प्रबंध किया है। देखो बच्चों के लिए कैसे सब सामग्री भेज दी है। बच्चों को कहो, जी भर कर जलेबी खाओ। ब्रह्मा बाबा को सदा मन में रहता था कि जब बाबा बैठा है तो हम चिंता क्यों करें, स्कूल का मालिक वो है, स्कूल उसने खोला है; हम और मम्मा तो टीचर हैं। कई बार ऐसे अनुभव हुए। आलमाइटी बाबा कभी किसी को टच करते थे और कभी किसी को, फिर जैसे-जैसे हम बच्चे बाहर गए, सेवाकेन्द्र खुले। बाबा के बच्चे स्नेही बने, सहयोगी बने और फिर पक्के योगी भी बन गए, फिर बाबा की सेवा में बहुत वृद्धि हुई।

बाबा ने युक्ति से सेवा पर भेजा

बेगरी पार्ट के दौरान ही बाबा ने कहना शुरू किया, 'तुम तो हर गंगे हो' क्योंकि मेरा नाम पहले हरि था और मेरी सखी थी गंगा बहन। तो बाबा हमें प्यार से कहते थे, बच्ची, तुम हर हर गंगे हो, पतित- पावनी हो। क्या तुम्हें भक्तों की आवाज़ नहीं सुनाई देती है? हम कहते थे, बाबा, हमें तो भगवान की आवाज़ सुनाई देती है, भक्तों की नहीं। बाबा, हम आपकी मधुर मुरली को छोड़ बाहर जाकर क्या करेंगे? बाहर मुरली बिना मन नहीं लगेगा। बाबा कहते थे, मुरली तुम्हारा खज़ाना है। जहाँ जाओगी वहाँ तुम्हें मुरली मिल जायेगी। जो बाबा से अखुट खज़ाने प्राप्त किये हैं, क्या उन्हें नहीं बाँटोगे? क्या तुम दानी नहीं हो? क्या तुम ज्ञान-गंगा बनकर पतितों को पावन नहीं बनाओगी? बाबा ऐसे-ऐसे उमंग वाले बोल बोलकर हमें उत्साह के पंख लगाते थे और हम बाहर सेवा पर निकलते थे। सर्वप्रथम हम गये दिल्ली में।

शिवबाबा का चमत्कार

बाबा का फरमान था, 'चेरिटी बिगिन्स एट होम', तो पहले-पहले हमने लौकिक संबंधियों की सेवा की। निमित्त उनका निमंत्रण था परंतु सेवा हर प्रकार के लोगों की हुई। कई घरों से सत्संग करने के निमंत्रण मिले। मंदिरों, गुरुद्वारों और सभाओं से भाषण करने के निमंत्रण मिले। दिल्ली में हम चाँदनी चौक के एक मन्दिर (गौरी-शंकर मंदिर) में गए। वहाँ ज्ञान सुनाया तो ट्रस्टी लोग संतुष्ट हुए। उन्होंने वहाँ ही हमें एक कमरा दे दिया। शिव बाबा का चमत्कार था कि सत्संग में आने वाले अनेक नर-नारियों को साक्षात्कार होने लगे और लोगों का आकर्षण ईश्वरीय ज्ञान की ओर बढ़ने लगा। चारों ओर धूम मच गई कि ये देवियाँ प्रभु का दीदार कराती हैं। यह बात ट्रस्टियों के कानों में भी पहुँची। उन्होंने सोचा, आज दिन तक भगवान का साक्षात्कार किसी को नहीं हुआ, जरूर इन बच्चियों के पास कोई जादू है, तो जादू ही दिखाती हैं। एक-दो मास रहने के बाद उन्होंने कहा, आप अपना रहने का प्रबंध कहीं ओर कर लें क्योंकि यहाँ की जनता में भ्रान्तियाँ पैदा हो गई हैं।

दिव्यलोक से मृत्युलोक में आने जैसा अनुभव

इसके बाद हमें जमना के कण्ठे पर एक मकान मिला। मकान में केवल दो दीवारें थी, दरवाजा दोनों तरफ नहीं था। हम तो आबू में भी और दिल्ली में भी नये-नये आये थे। इससे पहले हम 14 साल कराची में रहे थे, दुनिया को हमने देखा नहीं था। हमें तो ऐसा लगा मानो हम दिव्य संसार को छोड़ मृत्युलोक में आए हैं। हम दो बहनें थी। जमना घाट के उस मकान में एक बहन सोती थी, एक पहरा देती थी। ऐसे करते- करते हमने दो-चार दिन काटे। वहाँ पास में ही एक पहलवान का प्रैक्टिस का स्थान था। उसने सोचा, ये देवियाँ कौन हैं, यहाँ घाट पर आकर बैठी हैं, इनको डर भी नहीं लगता है! उसको मानो परमात्मा ने टच किया कि तुम्हारे घाट पर जो देवियाँ हैं, तुम्हारा काम है इनकी संभाल करना। तो वो रात्रि को रोज हमारे पर पहरा लगाता था। हम सोचते थे, यह पहरा किस पर लगाता है, यह तो सोचा नहीं कि हमारे पर लगाता है। हमने सोचा, धन, माल आदि कुछ भी यहाँ चारों ओर कहीं नहीं है, फिर पहरा क्यों? फिर कुछ समय बाद पहलवानों की आपस में कुश्ती हुई। उस पहलवान को संकल्प आया कि मैं जिन देवियों की सेवा कर रहा हूँ, अगर ये सच्ची होंगी तो जरूर मेरी जीत होगी क्योंकि मैं निष्काम सेवा कर रहा हूँ। अगर मेरी हार होगी तो मैं समझ जाऊँगा कि इनमें कोई सत्यता की शक्ति नहीं है। ड्रामानुसार उनकी जीत हो गई। वे बहुत खुशी में आ गये। अपने साथ 10-12 पहलवानों को लेकर आये और दण्डवत् प्रणाम किया। वे दूध, चीनी, नारियल और 20 रुपये भी साथ में भेंट-भोग के रूप में लाए। हमने 14 साल किसी अन्य का अन्न खाया नहीं था। लौकिक घर में गए तो वहाँ भी अपना ही पकाया हुआ खाते थे। हमने कहा, भैया, आपकी मनोकामना बाबा ने पूरी की, यह सबसे अच्छी बात है पर आपकी ये सब चीजें तो हम स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, हमारी भावना को ठेस लगेगी, कैसे भी करके आप स्वीकार करो। फिर हमने उस सामान से खीर बनाई, उनको खिलाई और बाबा की याद में थोड़ी खुद भी स्वीकार की। इस प्रकार ईश्वरीय सेवा होने लगी।

नेहरू जी तक गई अच्छी रिपोर्ट

जैसे-जैसे लोगों को सेवा-समाचार मिलने लगे तो कई लोग जमना घाट पर आने लगे। काफी लोग हो गए। एक माता रोज जमना घाट पर स्नान करने आती थी। वह शहर की मानी हुई माता थी। उसकी एक बहुत बड़ी धर्मशाला थी। उसने जब हमें देखा कि दो देवियाँ यहाँ अकेली रहती हैं तो प्यार से शहर के बीच ले गई। वहाँ एक कमरे में हम रहने लगे। धर्मशाला पास में थी। वहाँ सत्संग बहुत बढ़ गया। जब हम योग कराते थे, बहुत सारी मातायें-बहनें ध्यान में चली जाती थी। भगवान के पास है दिव्य दृष्टि की चाबी तो हमें लगता, भगवान बाप से हमें बहुत मदद मिल रही है। घर-घर में पता लग गया साक्षात्कारों का। बात इन्दिरा गांधी के कानों तक पहुँची। फिर उसने हम पर सी.आई.डी. लगाई। चार माताओं को हमारे पास निरीक्षण के लिए भेजा। वे वहाँ आकर चारों ओर देखती रहती थी। उनको सत्यता का आभास हुआ कि ये बहनें कोई जादू या हिप्नोटिज्म आदि नहीं करती हैं। उन्होंने माताओं-बहनों से अनुभव भी पूछा। अनुभव सुनकर उनको निश्चय हुआ कि यहाँ भगवान का कार्य चल रहा है और ये बहनें छल-कपट नहीं जानती। ये निष्काम सेवा करती हैं। इसलिए इन्दिरा गांधी तथा नेहरू तक हमारी अच्छी रिपोर्ट गई। ऐसी सेवा करने के छह, आठ मास बाद हम पुनः लौटकर मधुबन आ गये। जिनके निमंत्रण पर गये थे, वो निमंत्रण पूरा हो चुका था और आगे का कोई विशेष निमंत्रण था नहीं इसलिए हम अपनी तपोभूमि में पहुँच गये।

108 से भी ज्यादा सेवाकेन्द्र खुलेंगे

बाबा ने जब हमें आते हुए देखा तो बहुत प्यार से बोले, बच्ची, सेवाक्षेत्र से वापस पहुँच गई, तुमने बेहद बाप के ज्ञान-रत्नों का एक भी दुकान नहीं जमाया, जरूर बच्चों में अभी योगबल की कमी है इसलिए दुकान समाप्त कर लौट आये हो। यह सुनकर मैंने बाबा को बोला, बाबा, धर्म की स्थापना में अनेक कठिनाइयाँ आईं, नया निराला ज्ञान सुन लोगों में बहुत भ्रांतियाँ फैल गई हैं, विघ्न बहुत पड़ते हैं, मकान देने वाले भी हिम्मत नहीं रखते हैं, आखिर वो हमसे मकान खाली करवा लेते हैं इसलिए हम लौट आये। बाबा बोले, बच्ची, धैर्य रखो, अभी तो लोग विघ्न डालते हैं, आगे चल तुम देखना अनेक सेन्टर खुलेंगे, 108 से भी ज्यादा खुलेंगे। गली-गली में, देश-विदेश में शिव बाबा का झण्डा लहरायेगा, वो दिन भी आने वाला है। बाबा के ये शब्द सुनकर एक ओर बेहद हर्ष हुआ लेकिन दूसरी ओर अद्भुत आश्चर्य भी कि कैसे देश-विदेश में सेन्टर खुलेंगे, कौन वहाँ सेवा करेगा? एक सेन्टर में इतने विघ्न, तो अनेकों में क्या हाल होगा? परंतु यह हमें अटल निश्चय भी था कि बाबा ने कहा है तो टल नहीं सकता, अवश्य ही होकर रहेगा इसलिये निमंत्रण मिलने पर उमंग-उल्लास के पंखों से हम पुनः देहली पहुँच गये और चारों ओर निश्चय के साथ सेवा की धूम मचाई। जहाँ-जहाँ मौका मिला, हम गये और बाबा का संदेश सुनाया।

लखनऊ में सेवा की धूम

देहली में फिर अन्य शहरों से निमंत्रण मिलने लगे और हम ज्ञान-योग से अनेक दुखी, अशांत, भिखारी, दीन-हीन आत्माओं की सेवा कर उन्हें बाप के पास ले आते रहे। इसी प्रकार जब हम लखनऊ में गई तो वहाँ भी एक धर्मशाला में प्रतिदिन सत्संग रखा गया। वहाँ भी लोगों को साक्षात्कार होने लगे। वही धूम वहाँ भी मची। तो धर्मशाला की मालकिन माता हमसे बहुत आग्रह करने लगी कि मुझे श्रीकृष्ण का दीदार कराओ। हमने उसे बहुत समझाया कि यह तो शिवबाबा की शक्ति है परंतु वह न मानी, आखिर उसने तीन दिन व्रत किया और शिवबाबा ने उसकी इच्छा पूर्ण की। वह ध्यानस्थित हुई और श्रीकृष्ण का साक्षात्कार किया।

रहमदिल और गरीब निवाज बाबा

एक बार जब हम लखनऊ में थे, तब एक वर्ष पूरा होने को आया तो भी एक भी आत्मा माउंट आबू आने को तैयार नहीं हुई। हमें तो अपने प्यारे मधुबन और बाबा के पास आने की बहुत कशिश हो रही थी। इसलिए सोचा, कोई तैयार नहीं है तो हम दोनों (गुलजार दादी और मैं.. मनोहर दादी) ही मधुबन चलें। जिस समय हम ट्रेन में बैठे तो एक गाँव की साधारण माता (उसने सुन लिया था कि ये माउंट आबू जा रहे है) भी हमारे साथ चल दी। हम माउंट आबू पहुँचे और बाबा से मिले। वह माता तैयार होने अपने कमरे में चली गई। बाबा ने हमसे पूछा, बच्ची, क्या अकेली आई हो, कोई को फूल बनाकर बाबा के सामने गुलदस्ता नहीं लाई? हम बोली, बाबा, इस समय ऐसी कोई आत्मा तैयार नहीं थी, इसलिए हम दोनों ही अपने बाप से मिलने आ गये हैं। फिर बाबा बोले, वह माता कहाँ है, उसे बुलाओ। वह माता बाबा के सामने आकर बैठी। वह बहुत ही स्नेह भरी रूहानी मुलाकात कर रही थी, बाबा ने उसको देख कहा, यह साधारण आत्मा नहीं है, यह कोई विशेष आत्मा है, बिछुड़ी हुई आत्मा है जिसने फट से बाप को पहचान लिया है। बाबा ने पूछा, बच्ची, तेरा नाम क्या है? माता ने धीरे से कहा, शान्ति देवी। बाबा ने कहा, बच्ची का जैसा नाम है, वैसा ही गुण है।

बाबा ने फिर पूछा, बच्ची, पहले तुम बाबा से मिली थी? माता ने कहा, हाँ बाबा। मैं आपसे पाँच हजार वर्ष पहले इसी स्थान पर मिली थी। फिर बाबा ने पूछा, बच्ची, तुमको कितने बच्चे हैं? वह बोली, बाबा, एक ही बच्चा है। बाबा बोले, बच्ची, वह क्या करता है? वह बोली, मेरा तो शिव बाबा ही बच्चा है जो विश्व का कल्याण करता है। तब बाबा ने कहा, बच्ची, यह बड़ी निश्चयबुद्धि आत्मा है, शांतमूर्त है, बाबा इसको डायरेक्शन देता है, हर रोज भंडारे में जाकर भोजन को योग की दृष्टि दो और सबको बाप की स्मृति दिलाओ। बाबा की ये बातें सुन प्यार के सागर, रहमदिल बाप की रहमदिली का अनुभव हुआ। बाबा कितना गरीबनिवाज है जो गरीब बच्चों को इतना ऊँचा उठाते हैं। इससे मुझे भी गरीब और साधारण आत्माओं की सेवा करने की प्रेरणा मिली।

विचित्र अलौकिक प्रश्न

एक बार पटना से कुछ नये-नये भाई-बहनों का ग्रुप बाबा से मिलने आया। सुबह की क्लास में सबके साथ वे भी बाबा की मुरली सुनने लगे। मुरली के अंत में बापदादा ने कहा कि आज सभा में टोली बाँटने के लिये वो बच्चे आवें जो कहें, हम नष्टोमोहा हैं, नष्टोमोहा बच्चे, हाथ उठाओ। किसी ने भी हाथ नहीं उठाया। पुराने बच्चे बाबा के राज़ को समझ गये थे कि बाबा का यह प्रश्न किन्हीं नये बच्चों के प्रति है। सभी एक-दो की तरफ देखने लगे। बाबा भी मुसकराते हुए सभी बच्चों की तरफ देखने लगे।

बाबा फिर बोले, क्यों बच्चे, क्या कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है? फिर बाबा ने आये हुए बच्चों में से एक नये बच्चे को अपने समीप बुलाया और कहा, क्यों बच्चे, तुम टोली नहीं बाँट सकते हो, नष्टोमोहा होना बड़ी बात है क्या? क्या तुम्हारा अपनी स्त्री में मोह है? अगर तुम्हारी स्त्री शरीर छोड़ दे तो क्या तुम रोओगे? भाई दो मिनट खामोशी में रहा, फिर बोला, नहीं, मैं नहीं रोऊँगा, मेरी पहली स्त्री ने जब शरीर छोड़ा था, तो भी मैं रोया नहीं था, अब भी नहीं रोऊँगा। फिर बाबा की दृष्टि उनकी स्त्री पर पड़ी। बाबा ने उनसे भी यह विचित्र प्रश्न पूछा, बच्ची, तेरा लौकिक पति अगर शरीर छोड़ दे, तो तुम रोयेंगी? स्त्री बाबा की ओर देखकर गंभीर रूप से मुसकराती रही, बाबा की रूहानी दृष्टि जैसे कि उसमें बल भरती जा रही थी। उसने धीमे स्वर में बोला, बाबा, बेहद का बाप मिला तो सब कुछ मिला, अब क्यों रोयेंगे? ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला अब अज्ञानवश क्या रोना? आपने हमें रोने से छुड़ा दिया। इतना सुन बाबा बोले, अच्छा, मेरे महावीर बच्चे जाओ, सभी को टोली बाँटो।

अपने सेवाकेन्द्र पर लौटकर उन दोनों ने क्लास में अपना अनुभव सुनाया कि हमें बाबा से मिलकर संपूर्ण निश्चय हो गया कि यह ज्ञान देने वाला स्वयं भगवान है, किसी मनुष्य की यह पढ़ाई नहीं है क्योंकि इस प्रकार के विचित्र अलौकिक प्रश्न कोई मनुष्य पूछ ही नहीं सकता। कोई साधु-महात्मा भी अपने शिष्यों से ऐसा नहीं कह सकता। अगर कोई गुरु किसी शिष्य से ऐसा पूछे तो वह संशयबुद्धि हो जाये। देहधारी गुरु तो और ही कहते हैं, आयुष्वान भव, पुत्रवान भव, संपत्तिवान भव। लेकिन यह तो कालों का काल स्वयं भगवान है जिसके लिए जन्म-मरण शब्द ही नहीं है, जो अजन्मा, अकालमूर्त है, वही पूछ सकता है।

एक बार बाबा ने पूछा, बच्ची, तुम अभी घर (परमधाम) चलना चाहती हो? मैंने कहा, बाबा, अभी हम नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि जो सुख, जो खजाना अब ले रहे हैं, वो वहाँ नहीं मिलेगा इसलिये मैं नहीं जाना चाहती हूँ। इस पर बाबा गंभीर रूप से मुसकराते रहे। उस समय तो बाबा ने कुछ नहीं कहा परंतु रात्रि क्लास में मुरली में कहा, बच्ची ने ठीक बोला क्योंकि यह जो समय है, बड़ी भारी कमाई का है, इस समय का सुख न परमधाम में है, न सुखधाम में। उस समय बाबा की पावरफुल स्टेज का साक्षात्कार करते हुए दिल में अत्यंत स्नेह भर आया और पुरुषार्थ का एक तीव्र उमंग आया कि बाबा कैसे उड़ते जा रहे हैं, बाबा कितना साक्षीपन का अनुभव कर रहे हैं, ड्रामा पर बाबा कितने अचल-अडोल हैं, जो पास्ट हो गया, उस पर फुलस्टॉप लगाने की कितनी शक्ति है! इससे हमको अपनी लाइफ में फुलस्टॉप लगाने और विस्तार को सार में लाने की विशेष प्रेरणा मिली।

बाबा का अथाह प्यार

बाबा हमें जहाँ भी भेजते थे, हम वहाँ निर्संकल्प होकर चली जाती थी। इसलिए बाबा मुझे 'बहुरूपी' और 'चक्रवर्ती' कहा करते थे। बाबा तो ज्ञान सागर है। उनके पास हरेक के संस्कार और भाग्य की पहचान है। बाबा कहते थे, बच्चे, मेरे इस उच्चतम ज्ञान को मेरे भक्तों को ही देना। मैं भक्तों का उद्धार करने आया हूँ, उन्हें भक्ति का फल अब संगम पर मिलने वाला है, तुम्हें भक्तों की पहचान रखनी है। भक्तों को पहचानने की बाबा ने निशानियाँ भी बताई कि जब वे बच्चे ज्ञान सुनेंगे तो उन्हें यह ज्ञान बहुत अच्छा लगेगा और वे महसूस करेंगे कि हम बेहद बाप के वर्से के अधिकारी हैं। इस प्रकार कई पार्टियाँ आती रही और बाबा से जन्मसिद्ध अधिकार ले वापस अपने स्थान पर जाती रही। हम हर साल पाँच-छह आत्माओं को कली से फूल बनाये बागवान के पास ले आते थे। सेवाकेन्द्रों पर रहते हुए मुझे ध्यान रहता था कि बाबा के वारिस बच्चे तैयार किये जायें। मैं आने वाली कन्याओं की पूर्णतया ज्ञान-योग से पालना करती थी, उन्हें बाबा के समीप लाती थी, उन्हें योग्य टीचर बनाने का संकल्प रखती थी तो बाबा के बहुत ही प्यार व उमंग भरे पत्र मुझे मिलते थे। बाबा के प्यार की याद आते ही मन की कलियाँ खिल उठती हैं और मन गाने लगता है इतना प्यार करेगा कौन ...!

छोटे बच्चों की ज्ञान द्वारा कमाल

एक बार मैं कोलकाता से भाई-बहनों का एक ग्रुप मधुबन लेकर आई थी, उस ग्रुप में एक माता और उसकी दो बच्चियाँ भी थीं। बच्चियों की आयु 10 और 12 वर्ष की थी और वे दोनों पांडिचेरी में आश्रम पर रहती थीं। उनको छोटा समझ मैंने उनके साथ ज्ञान-चर्चा नहीं की। जब वे बाबा के पास आईं तो बाबा ने पूछा, 'बच्ची, माँ से तो तुम्हारा बहुत प्यार है, लेकिन तुम्हें पता है आत्मा का बाप कौन है? यहाँ तुम्हें बाप का परिचय मिलेगा।' ऐसे दो-तीन दिन में बाबा ने उनको योग, त्रिमूर्ति तथा गोले के चित्र के बारे में समझाया। मैं रोज़ देखती थी कि बाबा इन छोटी बच्चियों पर बहुत मेहनत कर रहे हैं। बाबा ने उनको 'ज्ञानी तू आत्मा' बना दिया। अपने साथ उनको भोजन भी खिलाते थे। उनमें ज्ञान तथा स्नेह का संस्कार पड़ गया था। वापस जाते समय वो बच्चियाँ मेरे साथ ट्रेन में थीं, तो एक साधु 'परमात्मा सर्वव्यापी है'. - इस बात पर बहस कर रहा था। यह सुनकर बच्चियाँ उस साधु से पूछने लगीं, महात्मा जी, अगर आप में परमात्मा है और सर्व में परमात्मा है तो आप प्रश्न किससे पूछ रहे हैं? ऐसा वार्तालाप देर तक चलता रहा। अंत में उस साधु ने पूछा, आपको यह ज्ञान किसने सिखाया? उनका जवाब था, माउंट आबू में ईश्वरीय विश्व विद्यालय में यह ज्ञान सुना। उस समय मैंने सीखा कि छोटे बच्चों में ज्ञान का संस्कार डालने से वे बाबा की कितनी सेवा करते हैं।

बाबा धर्मराज भी है

दिल्ली में बाबा मेजर की कोठी में हम बच्चों से रूहरिहान कर रहे थे। तब बाबा ने पूछा, 'बच्चे, बाबा को किस-किस रूप में याद करते हो?' किसी ने कहा, बाप के रूप में; किसी ने कहा, टीचर के रूप में; किसी ने कहा, सतगुरु के रूप में। बाबा गंभीरता से सुन रहे थे। लगता था कि जो जवाब बाबा चाहते हैं वह किसी ने नहीं दिया। तो मैंने कहा, धर्मराज के रूप में। बाबा ने कहा, 'बच्ची ने ठीक उत्तर दिया है। बाबा के धर्मराज के रूप को कभी मत भूलना। मात-पिता के रूप से बच्चों को प्यार मिलता है, टीचर के रूप से पढ़ाई पढ़ाते हैं, सतगुरु रूप से पावन बनने के लिए महामंत्र मिलता है और धर्मराज के रूप से कर्मों में श्रेष्ठता आती है। धर्मराज के रूप को भूलने से बच्चे, भूलों के ऊपर भूलें करते रहेंगे।' इसी तरह बाबा हमारी बुद्धि चलाते थे और चेक करते थे कि बच्चों का योग कहाँ तक है, पढ़ाई पर ध्यान कहाँ तक है, बच्चे विचार- सागर मंथन कहाँ तक करते हैं?

अन्त मति सो गति

एक बार हमारी सखी 'हृदयमणि' गुड़गाँव में ईश्वरीय सेवार्थ गई हुई थी। वह बहुत गुणमूर्त बहन थी। वहाँ उसको बुखार आया तो उसे हॉस्पिटल में दाखिल किया गया। वहाँ वह हर रोज मुरली सुनकर योग करती थी। एक दिन अचानक उसने हॉस्पिटल में ही शरीर छोड़ा। समाचार बाबा के पास आते ही बाबा उसकी महिमा करने लगे, 'बच्ची, बहुत आज्ञाकारी, सच्ची सेवाधारी थी। अब वह एडवांस पार्टी में सेवार्थ चली गई है।' तो मैंने बाबा से कहा कि उसने तो शरीर हॉस्पिटल में छोड़ा जबकि आप हमेशा कहते हैं, 'हरि का द्वार हो, ज्ञानामृत मुख में हो, दैवी परिवार का साथ हो, मधुबन का तट हो तब तन से प्राण निकले।' तो बाबा ने समझाया, 'बच्ची, ज्ञान गंगा तो वह खुद ही थी। उसके मन में, मुख में ज्ञान ही था। वह दैवी परिवार के बीच में ही थी और सेवा पर उपस्थित थी अर्थात् सेवाकेन्द्र हरि का द्वार था और बाबा की याद में शरीर छोड़ा तो वह अवश्य सद्गति को प्राप्त करेगी, जरूर अच्छे घर में जन्म लेगी।' ऐसे जो बाबा ने राज़ बताया वो मेरी बुद्धि में बैठ गया।

बाबा उपराम स्थिति के प्रेरणास्त्रोत थे

एक बार बाबा मधुबन के आंगन में खड़े थे। छोटा हॉल बन चुका था। तो हमने बाबा से कहा, बाबा, आपका कमरा पुराना हो गया है, उसे तोड़कर नया बनाओ तो अच्छा होगा। बाबा ने मुसकराते हुए कहा, बच्ची, यह लॉ नहीं कहता कि बाबा नये मकान में रहे। शिवबाबा जो मालिक है, विश्व पिता है, वो ही पुराने तन में आया है तो उसका तन नये मकान में कैसे रह सकता है। नये तन के लिए नया मकान चाहिए। यह लॉ तुम बच्चों के लिए नहीं है। बाबा तो तुम्हें स्वर्ग का सुख यहाँ देता है।' बाबा को देखकर ऐसा लगता था कि संसार से बाबा का बुद्धियोग हट चुका है और एकदम उपराम हो चुके हैं।

ब्र.कु. अमीरचंद भाई जी, मनोहर दादी के साथ के अनुभव इस प्रकार बाँटते हैं -

सन् 1959 में मैं पहली बार करनाल सेवाकेन्द्र पर गया। उस समय मनोहर दादी ने ही मुझे पहले दिन का कोर्स कराया, उसके बाद दादी ने मुझे मेडिटेशन के लिए अपने सामने बिठाया। दादी से दृष्टि लेते-लेते मैं अशरीरी हो गया। मुझे गहन आत्मिक शांति की अनुभूति हुई। मैं वहीं लेट गया। दादी ने आसपास के सेवाकेन्द्रों के पाँच-छह भाई-बहनों को बुलाया यह दिखाने के लिए कि यहाँ सिर्फ बहनें ही नहीं, भाई भी ध्यान में जाते हैं। कुछ समय बाद जब मैं उठा तो देखा कि तकिया मेरे सिरहाने रखा है। दादी ने अनुभव पूछा तो मैंने कहा कि जब आप योग करा रही थी तो मेरी आँखें बंद हो गई और मुझे सफेद रोशनी दिखाई दी। कहीं दूर से धीमी आवाज भी सुनाई दे रही थी कि आप शरीर नहीं, आत्मा हो। आपने जो आज लेसन कराया, वही ऊपर भी सुनाई दे रहा था। इस प्रकार सात दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। दादी मुझे कोर्स का लेसन कराती, उसके बाद जब योग कराती तो मैं ट्रांस में चला जाता, वहाँ मुझे उस लेसन का प्रैक्टिकल अनुभव होता।

व्यक्ति-वैभव से लगावमुक्त

इस प्रकार मनोहर दादी हमारी पहली टीचर थी। दादी का किसी भी व्यक्ति, वैभव या पदार्थ में लगाव नहीं था। उन्होंने कई सेन्टर खोले पर किसी सेन्टर से लगाव नहीं। उस समय मनोहर दादी और गंगे दादी भाषण करने वाली बहनें थी। बाबा उन्हें भाषण के लिए इधर-उधर भेजते रहते थे। इसलिए दोनों हमेशा अपना बैग तैयार रखती थी। उनमें पालना के संस्कार विशेष थे। साकार बाबा से अति स्नेह था। किसी भी तरीके से दो-तीन आत्माओं को भी तैयार कर पंडा बनकर बाबा से मिलाने ले आती थी।

मनोहर दादी को फालो करो

मनोहर दादी सुनाती थी कि जब मैं मधुबन जाती तो बाबा मुझे दर्पण की तरह दिखाई देता। बाबा को देखते ही मुझे अपना चार्ट नजर आता। एक बार मैंने मम्मा से पूछा कि मम्मा, सच्चा ब्राह्मण किसको कहेंगे? उस समय मनोहर दादी भी पास में बैठी थी। मम्मा ने मनोहर दादी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मनोहर दादी को फालो करो। दादी श्रीमत का एक्यूरेट पालन करती थी। कभी भी अपनी मनमत मिक्स नहीं करती थी।

ब्रह्माकुमारी शशि बहन (माउंट आबू), मनोहर दादी के बारे में इस प्रकार सुनाती हैं -

जब दादी मनोहर करनाल में सेवार्थ आई, वहाँ एक परिवार ज्ञान में निकला, भाई का नाम था राजकुमार और उनकी युगल का नाम था राजकुमारी। वे टीचर थे, उन्हें सब मास्टरजी कहते थे। उन्होंने अभी नया मकान बनाया था। वे ईश्वरीय ज्ञान से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना मकान सेवाकेन्द्र के लिए दे दिया और स्वयं एक छोटे-से कमरे में रहे। उस मकान के सामने बहुत बड़ा ग्राउंड था, एक तरफ बगीचा था, नई कॉलोनी थी। उस मकान में तीन कमरे, तीन बरामदे, किचन आदि सब सुविधायें थी।

विरोध शांत होने लगे

जब भी बड़ा प्रोग्राम होता था, उस ग्राउंड में टेंट लगाते थे। शिवजयंती पर काफी संख्या में लोग वहाँ आते थे। आस-पास के बहुत सारे परिवार के परिवार ज्ञान में आने लगे। बहुत सारी कुमारियाँ भी क्लास में आती थी। लगभग 20-25 कुमारियाँ थीं। कुछ को बंधन थे। कुमारियों के कारण सारा समय सेन्टर पर रिमझिम लगी रहती थी। मनोहर दादी उन्हें बहुत हँसाती-बहलाती थी, उनकी पालना करती थी। जब भी वे आती थी, उन्हें कुछ न कुछ खिलाती थी। वे कहती थी, आज हमको कढ़ी-चावल खाना है या इस प्रकार की चपाती खानी है तो दादी कहती थी, खूब खाओ। बांधेली कुमारियाँ छिप-छिप कर गुप्त रीति से मधुबन, सेन्टर और दादी के लिए बहुत कुछ करती थी। जैसा दादी का बाबा से प्यार था, उन्हें देख कुमारियों का भी बाबा से वैसा ही प्यार हो गया। कैथल की पुष्पा बहन आर्यसमाजी परिवार की है। उस समय आर्यसमाजी, ब्रह्माकुमारियों के बिल्कुल विरोधी थे। इसका परिवार बहुत रॉयल था और इसे बहुत बंधन था। यह रात को आती थी, एक बार तो रात को एक बजे आई। दादी ने दरवाजा खोला और इसे रात को प्यार से अपने पास ही रखा। दादी की पालना का परिणाम यह निकला कि धीरे-धीरे सभी विरोध शांत होने लगे और लोग ज्ञान को भी थोड़ा समझने लगे।

जीवंत इतिहास वर्णन

जब दादी करनाल में थे, तब उनके पास मम्मा, बाबा, जानकी दादी, रमेश भाई, ऊषा बहन आदि सब महारथी आये। जब बाबा आये थे तो कन्याओं को इतना निश्चय था जो गोपियों की तरह से कहने लगी कि बाबा को हम जाने नहीं देंगी। सभी कन्यायें सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बहुत रुचि लेती थी। करनाल की कुमारियाँ गीत, ड्रामा, डांस आदि के प्रोग्राम देने अंबाला, जालंधर आदि शहरों के सेन्टरों पर जाती रहती थी। भारतमाता नाम से एक ड्रामा था। उसमें मैंने भी कई स्थानों पर भाग लिया था। दादी स्वयं भी कन्याओं को ज्ञान-योग से बहुत ऊँची पालना देती थी और दूसरे स्थानों की बहनों को बुला-बुलाकर पालना दिलवाती थी। मनोहर दादी घंटो-घंटो बैठकर यज्ञ का इतिहास सुनाती थी। गर्मी के दिनों में हम शाम को आ जाते थे और वे रात के 10-11 बजे तक यज्ञ का इतिहास सुनाती रहती थी। बाबा के प्यार की बातों में हम खो जाते थे। उस समय सुबह की क्लास में भी बाबा की ऐसी मदद होती थी कि योग के समय आधी क्लास सेमी ट्रांस में चली जाती थी और अव्यक्त रास करने लग जाती थी। क्लास के बाद अनुभवों की लेन-देन होती थी। हर एक से पूछा जाता था कि आज तुमको बाबा ने क्या दिखाया। ये अनुभव इतने गहन होते थे कि घर में जाकर भी उनका नशा चढ़ा रहता था। स्कूल में जाते थे तो भी मम्मा-बाबा सामने खड़े है, ऐसा महसूस होता था।

रहम भावना थी

राखी के त्योहार पर भी, बहनें ध्यान में चली जाती थी और ध्यान में ही एक-एक को पंद्रह-पंद्रह मिनट लगाकर राखी बाँधती थी। मनोहर दादी को देखते ही मातायें गोपियों की तरह नाचने लगती थी, उन्हें अलौकिक अनुभव होने लगते थे। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय कई परिवार अपने धन को खोकर या मित्र-संबंधियों को खोकर भारत में आये थे। किसी घर में कमाने वाला ही नहीं रहा था, मातायें-बहनें मेहनत करके अपना जीवन चलाती थी। उन परिवारों पर दादी को बहुत रहम आता था। उनको प्यार देकर दादी ने उठाया, कइयों को समर्पित कराया। नागपुर की पुष्पा बहन का पूरा परिवार ही समर्पित हुआ। कई ऐसे भी थे जो शारीरिक रूप से बीमार रहते थे, ज्ञान सुनकर उनमें शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक परिवर्तन आ जाता था।

दादी ने कभी 'ना' नहीं कहा

मैं सन् 1959 में ज्ञान में आई। मैं बहुत कम बोलती थी। दादी का पुरुषार्थ रहता था कि मैं कुछ बोलूँ, अपनी बातें शेयर करूँ। दादी ने मुझे बाबा से दिल्ली में मिलने के लिए भेजा। दादी सन् 1967 में मुझे अपने साथ आबू लेकर आई। सफर के दौरान, ट्रेन में भी मैंने देखा, दादी सबके साथ ऐसे बातें करने लगी जैसे सबको जानती हो। दादी कहती, आओ बैठो, खाओ और हमें महसूस होता कि हम सेन्टर में ही बैठे हैं। तब आबू में पहली प्रदर्शनी म्यूजियम के सामने विश्राम भवन में लगी थी। दादी मुझे रोज बाबा के पास लेकर जाती थी। दिन में हम तीन बार बाबा से मिलते थे। सुबह चेंबर में भी बाबा के साथ बैठने का मौका मिला। बाबा ने मेरी ड्यूटी लगाई प्रदर्शनी समझाने की। उन दिनों एक युगल बाबा से मिलने आया, बहुत भावना वाला था, कहता था, मुझे आपके गुरु से मिलना है। बाबा ने पहले मनोहर दादी को मिलने भेजा। दादी हर एक की भावना को देखती थी। दादी ने बाबा को बताया कि यह तो बहुत भावना वाला है। बाबा ने कहा कि उसे कोर्स कराओ। दादी ने कोर्स कराने की ड्यूटी मेरी लगाई। कोर्स करने के बाद वह गुरु के बजाय बाबा-बाबा कहने लगा। इससे मैंने यह सीखा कि मनोहर दादी हर एक के अंदर को जानती थी, केवल बाहरी रूप नहीं देखती थी। जब बाबा अव्यक्त हुए, दादी को कहा गया कि आप मधुबन में आकर रहो। दादी ने अपने जीवन में कभी भी, किसी भी बात के लिए ना नहीं कहा। मनोहर दादी ने यहाँ रहकर हर प्रकार की ट्रेनिंग देने में अपना अमूल्य सहयोग दिया। बड़ी दीदी, मनोहर दादी को कहती थी कि तुम यहाँ टीचर हो, सतयुग में भी कृष्ण की टीचर बनोगी।

मोल्ड होने की शक्ति

दादी का मन एकदम स्वच्छ था। कभी किसी की कमजोरी को चित्त पर नहीं रखा। दादी किसी में कोई कमी होती भी थी तो उसे अलग ले जाकर बता देती थी और उसी समय उससे घुलमिल जाती थी। सुनने वाले को भी कभी ऐसा नहीं लगता था कि दादी ने मुझसे मेरी कमजोरी की बात की है। दादी का यज्ञ से अटूट प्यार था। दादियों के प्रति बहुत रिगार्ड, एकमत और एकता का पाठ पक्का था तथा ज्ञान का अटूट निश्चय था। दादी में मोल्ड होने की शक्ति बहुत ज्यादा थी। हँसने-हँसाने का संस्कार बहुत था। दादी ने बहुत वारिस निकाले। अंत में दादी की कर्मातीत स्टेज भी देखी हमने। एकदम न्यारी और प्यारी अवस्था थी।

ब्रह्माकुमार रघुवीर, जालंधर दादी मनोहर के बारे में अपनी यादगारें इस तरह व्यक्त करते हैं –

चार वर्ष पूर्व की बात है। डायमण्ड हाल में टोली वितरण चल रहा था। एक तरफ मनोहर दादी जी टोली दे रहे थे, दूसरी तरफ एक वरिष्ठ बहन जी टोली दे रहे थे। मैं बहन जी से टोली लेने वाली पंक्ति में था। मेरा मन हुआ कि दादी जी से भी टोली ली जाए। जब दादी जी की तरफ गया तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि आपको टोली मिल चुकी है। मेरे मन में कुछ-कुछ हुआ कि दादी जी ने मुझे मना क्यों कर दिया। उसी दिन हमारी वापसी यात्रा थी। रास्ते भर विचार चलते रहे कि दादी जी ने टोली क्यों नहीं दी। लगभग आधी यात्रा पूरी होने को थी, मुझ से रहा नहीं गया। मैंने निमित्त (गाइड) बहन के सामने दिल खोला, देखो बहन जी, दादी जी से टोली माँगी थी ..। इतना ही कह पाया था कि बहन जी ने कहा, ओह रघुबीर भाई, आपकी टोली दादी जी ने मुझे दी है और टोली मेरे हाथ पर रख दी। मेरी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। मेरे से कुछ बोला नहीं गया। बहन जी ने कहा, बड़े समय तक अपने पास संभाल कर रखी है यह टोली। मुझे समझ में आ गया कि दादी जी ने उस समय इसलिए मना किया था ताकि नियम न टूटे और बहन जी के पास इसलिए टोली भेज दी कि भाई का दिल न टूटे। ऐसे स्टील की तरह नियम-मर्यादा के पक्के व मक्खन की तरह नर्म थे दादी जी। जब भी कभी इस घटना की याद आती है तो आँखें नम हो जाती हैं और दादी जी के आगे नतमस्तक हो जाता हूँ।

दादी मनोहर इन्द्रा की विशेषतायें

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के आदि स्थापना काल की आदि रत्न, यज्ञ की वफादार नेत्री, यज्ञ इतिहास को शब्दों द्वारा प्रत्यक्ष की न्यायीं दिखा देने वाली, स्नेही व्यवहार से सबके मन को हरकर उसे परमात्मा से जोड़ देने वाली, मिलनसारिता के गुण की धनी, राजयोग रूपी महातपस्या में रत रहते हुए देश-विदेश की लाखों आत्माओं को आध्यात्मिकता के मार्ग पर उड़ाने वाली राजयोगिनी दादी मनोहर इन्द्रा जी के गुणों और विशेषताओं का वर्णन करना जैसे सूर्य को दीपक दिखाना है। यज्ञ पिता, यज्ञ माता की सदा लाडली रहीं। ईश्वरीय महावाक्यों में जब भी कभी सर्विसएबुल बच्चों के नामों का वर्णन आता है आपका नाम पहले नम्बर पर होता है।

त्याग-तपस्या की जीवंत मिसाल

कम साधन होते हुए भी आप साधना की धनी थीं, त्याग और तपस्या की जीवंत मिसाल थीं। यमुना के कंठे पर बैठकर बिना किसी साधन-सुविधा के आपने ईश्वरीय सेवाओं का प्रारंभ किया। पतित-पावनी बन अनेक आत्माओं का उद्धार किया। ईश्वरीय नियम और मर्यादाओं के पालन में सदा तत्पर थीं। कड़ी से कड़ी परिस्थितियों को भी योगबल से जीत लेती थीं। चाहे यज्ञ का 'बेगरी पार्ट' (अभाव का समय) रहा, चाहे नए-नए स्थानों पर ईश्वरीय संदेश देने का चुनौतीपूर्ण कार्य, सभी में आप हिम्मत के साथ सफलता का परचम लहराती रहीं। आपके कदमों के निशां देख-देख चलने वालों का एक लंबा काफिला है।

अलौकिकता तथा रूहानियत से सदा संपन्न

पिताश्री के प्रति आपके मन में अटूट, अगाध श्रद्धा थी। उनके द्वारा उपदेशित हर अभियान के प्रति आपका सदा हाँ जी का पाठ रहा और उसे सफल बनाने में आप सदा सक्षम रहीं। आपकी दृष्टि में अलौकिक जादू था। योग कराते समय आपकी दृष्टि पड़ने पर भाई-बहनें ध्यान में चले जाते थे। ऐसी रूहानियत और अलौकिकता से संपन्न थीं आप। पंजाब और हरियाणा में विभिन्न स्थानों पर और विशेष करनाल में बहुत समय तक आपने सेवायें दीं। अनेक कुमारियाँ आपके स्नेह की पालना से खिंचकर ज्ञान में आई, आदर्श ब्रह्माकुमारियाँ बनीं और अब भारत के विभिन्न स्थानों पर ईश्वरीय सेवायें दे रही हैं।

नम्रता की मूर्त

आप सदा निमित्त और नम्रचित्त बन कर रहीं। अपने सरल स्वभाव की छाप हरेक के दिल पर डाली। आपसे मिलना बहुत सहज था। कोई भी सरल भाव से आपके पास पहुँच सकता था। आप हरेक पर स्नेह लुटाती और वरदानी दृष्टि, वरदानी बोल से भरपूर कर देती थीं। आप न कभी किसी से टकराव में आई और न ही प्रभाव में आईं। 'एक बाबा दूसरा न कोई' इस महामंत्र में सबका विश्वास बिठाया। आप बहुत ही रमणीकता से हरेक से बातचीत करती थीं। कभी भी आपको उदास, चिंतित या सोचने के मूड में नहीं देखा। आप यज्ञ के इतिहास का ऐसे वर्णन करती थीं जो सुनने वाले के मन के पर्दे पर सारे चित्र क्रमवार उभरने लगते थे। आपकी स्मृति इतनी अच्छी थी कि यज्ञ की स्थापना कैसे हुई, यज्ञ आगे कैसे बढ़ा, कौन कब यज्ञ में समर्पित हुआ, बाबा और मम्मा की क्या-क्या लीलाएँ चलीं – वे सब तिथि-तारीख सहित सुनाती थीं। आपके शब्द मानो नये-नये भाई-बहनों के लिए नेत्र बन जाते थे जिनसे वे बाबा और मम्मा का साकार अनुभव करते थे।

निश्चिन्त और निर्भय

आपके प्रवचन में सदा ही एक लय और मिठास रही जो सुनने वाले के हृदय पर छप जाता था। आप यज्ञ के पुराने गीत बहुत रमणीकता से गाती थीं। किसी भी परिस्थिति में आपके चेहरे पर कभी भी प्रश्नवाचक बिन्ह नहीं आया। 'बाबा बैठा है, सब ठीक होगा', इस अटूट विश्वास से सदा निश्चिन्त और निर्भय रहीं। आपने कभी किसी की बात को दिल पर नहीं रखा, कोई कुछ बोल भी जाता था तो भी आप उसे निर्दोष भावना से ही देखती थीं। कभी भी कटु और कठोर वचन आपने नहीं उच्चारे। आपकी निश्छल भावनाओं का प्रभाव चारों ओर वायुमण्डल में फैला रहता था इसलिए किसी को आपसे भय नहीं लगता था।

अपनेपन की भासना

आप जितनी बापदादा की, दादियों की प्रिय थीं उतनी ही सारे ब्राह्मण परिवार की भी प्रिय थीं। आपसे सभी को अपनेपन की भासना आती थी। हरेक को रूहानी प्यार की अनुभूति कराते भी आप सदा न्यारी रहती थीं। हरेक की विशेषताओं को देख उन्हें सेवा में लगाती थीं। उनकी प्रशंसा करके बाबा के कार्य में मददगार बना देती थीं। कोई में कोई कमी भी होती थी तो उसका वर्णन नहीं करती थी बल्कि और ही स्नेह देकर गुणवान बना देती थीं।

सदा हर्षितमूर्त

आप सदा सर्व के प्रति कल्याण भावना से भरपूर और हर्षितमूर्त थीं। आपके स्नेही बोल और सहयोग की भावना हर आत्मा को सदा निश्चिंत बना देती थी। आपने सर्व ब्रह्मावत्सों का तथा अन्य संपर्क वालों का दिल, अपने प्यार और सत्कार-भाव से जीता। सेवा में सदा अथक रहीं। निमित्त दादियों के साथ मिलकर यज्ञ-सेवा के हर कार्य में आपका सदा अमूल्य योगदान रहा। बाबा के नए-नए फूलों में उमंग भरकर उन्हें आगे बढ़ाने की कला में आप सिद्धहस्त थीं। एकनामी और इकानामी के पाठ में आप स्वयं भी बहुत पक्की थीं और दूसरों में भी यह धारणा भर देती थीं। भूलों को भुलाकर गले से लगाने वाली आप मास्टर क्षमा का सागर थीं। ईश्वरीय रत्नों को पालना देकर आध्यात्मिक मार्ग पर समर्थ बना देने की सेवा आप अहर्निश करती रहीं।

दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा भारत के विभिन्न अन्य भागों की सेवा कर, सन् 1970 में आप मुख्यालय निवासी बनीं। मुख्यालय में रह आपने अनेक जिम्मेवारियाँ संभालीं। आप महिला प्रभाग की राष्ट्रीय अध्यक्षा रही। राजयोग शिविरों की भी आप मुख्य निदेशिका रहीं। टीचर्स ट्रेनिंग में आपका सक्रिय योगदान रहा। आप ब्रह्माकुमारीज़ की मैनेजमेंट कमेटी की मेम्बर थीं। ब्रह्माकुमारीज़ एज्युकेशनल सोसायटी के गवर्निंग बोर्ड की मेम्बर थीं। राजयोग एज्युकेशन एंड रिसर्च फाउण्डेशन की मेम्बर ऑफ गवर्निंग बॉडी थीं। सन् 1997 से आप ज्ञान सरोवर अकादमी की निदेशिका रहीं। आपने अनेक विदेश यात्राएँ कर अनेक देशों के बहन-भाइयों को आध्यात्मिकता से सींचा।

जब भी कोई आपके समक्ष गया, आपकी ममता भरी मुस्कान के स्पर्श से तन-मन में उमंग भरकर ही लौटा। किन शब्दों में वर्णन करें आपकी महिमा का ! आप जीवंत मुस्कान और प्रभु का वरदान थीं।

यह श्रद्धानत लेखनी आपकी अनन्त महिमा के सागर में दो बूंद श्रद्धांजलि के भेंट करने की कोशिश में लगी है। भावनाओं का सागर थामे नहीं थम रहा। की यादों का ज्वार हिलोरें मार रहा है। आपने मन, वचन, कर्म से जो अमूल्य देन मानवता को दी है, वह स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। आपकी आभा पर पड़ा भौतिक आवरण हट चुका है। आप में समाहित सत्य, प्रेम, पवित्रता, दिव्यता का प्रकाश धरती और गगन को प्रकाशित करता हुआ तीनों लोकों में फैल रहा है। आप हमारी थीं, हमारी हैं और हमारी रहेंगी। आवरण को उतार आप ससीम से असीम हो गई हैं। अब अव्यक्त वतन में, अव्यक्त रूप में आपकी छवि निहारा करेंगे और आपकी अविस्मरणीय साकार यादों की अमूल्य धरोहर को हृदय से लगाए आपके चरण-चिन्हों का अनुकरण करते रहेंगे।

हे विश्ववंदनीय दादी माँ, आपको शत् शत् नमन !

दादी सीतू

बाबा ने निर्मल कन्याओं को शिव-शक्तियाँ बना दिया

मेरे घर में श्री कृष्ण जी का मन्दिर था। माताजी, दादाजी श्रीकृष्ण की खूब भक्ति करते थे। मैं भी बचपन से ही श्रीकृष्ण की मस्त गोपी थी। सात भाइयों में इकलौती बहन होने के कारण सबकी लाडली थी पर मुझे श्रीकृष्ण बहुत लाडला था। जो भी 12 महीने के दौरान पैसे मिलते थे, सारे के सारे श्रीकृष्ण के जन्म-दिन अर्थात् जन्माष्टमी पर उनकी छठी मनाने में खर्च कर देती थी। एक पैसा भी अपनी किसी चाहत पर खर्च नहीं करती थी। जब कभी मैं माँ से कोई चीज़ माँगती थी तो वे कहती थी कि श्रीकृष्ण जी देंगे। मैं आँखें बन्द कर श्रीकृष्ण जी के ध्यान में बैठ जाती थी और माँ चुपके से उस चीज़ को मेरे सामने रख देती थी। मेरी बाल-बुद्धि उसे श्रीकृष्णजी द्वारा दिया हुआ ही स्वीकार कर लेती थी।

बाबा की दृष्टि पड़ते ही मैं ध्यान में चली गई

दादा लेखराज लौकिक रिश्ते में मेरी बुआ के देवर लगते थे और हैदराबाद- सिन्ध में 'दादा' नाम से बहुत मशहूर थे। दादा के एक चाचाजी बीमार रहते थे। दादा उनको रामायण सुनाते थे। हम सुनने जाया करते थे और दादा का सुनाने का तरीका इतना मनोहारी था जो दिल पर छाप लग जाती थी। मैंने 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की। केवल 7 वर्ष की आयु में ही पिताजी का साया सिर से उठ गया। जब मैं 13 साल की थी, तब ओम मण्डली की शुरूआत हुई और उसमें जाना शुरू कर दिया परन्तु अभी जाते हुए मात्र तीन दिन ही हुए थे कि मेरे से बड़े भाई ने शरीर छोड़ दिया। मुझे मोह तो बहुत था, मैं भाई की अर्थी के पीछे बैठ गई। मुझे बहुत समझाया गया पर दुःख कम नहीं हो रहा था। दुःख के मारे परमात्मा के प्रति भी संशय बुद्धि बन रही थी। ओम मण्डली में जाने वाली एक माता ने मुझे फिर से ओम मण्डली में बाबा के पास जाने की प्रेरणा दी, कहा कि वहीं तुमको शान्ति मिलेगी और बाबा दुःख दूर करेंगे। वहाँ गई तो प्यारे बाबा तपस्या में बैठे थे, मेरे पर ज्योंहि उनकी दृष्टि पड़ी, मैं ध्यान में चली गई और दोपहर 3 बजे से रात 10 बजे तक ध्यानावस्था में ही रही। बाद में घरवालों ने मुझे बहुत ढूँढ़ा तो मैं बाबा के कमरे में ध्यानमग्न मिली। बाबा ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फिराया और मैं ध्यानावस्था से नीचे आ गई। मैं तो निराकार प्रभु को ही साकार तन में देख रही थी। मेरे स्नेह भरे नयनों को देख प्यारे बाबा ने कहा, 'बच्ची, आया हूँ तो अब लेकर ही जाऊँगा।' बाबा ने मुझे एक सेब (Apple) दिया। मैं घर लौट गई। घरवालों ने जब पूछा कि वहाँ तुमको क्या मिला, तो मेरे मुख से सहज ही निकला कि 'भक्ति का फल ज्ञान मिला और बाप (पिता) मिला।' अगले दिन सुबह नौ बजे बाबा के पास पुनः गई। बाबा ने कागज, पैन लेकर शरीर, आत्मा, त्रिमूर्ति आदि चित्र बनाए और इन पर समझाया। प्यारे बाबा के इस दिल-जीत स्नेह ने मुझे भाई का वियोग भुला दिया। मेरा रोना बन्द हो गया और शान्त रहने लगी। घरवालों ने भी खुशी से मुझे ज्ञान सीखने की अनुमति प्रदान कर दी।

बाबा ने अपना मकान क्लास के लिए दिया

कुछ समय बाद बाबा बनारस चले गये। वहीं से बाबा पत्र लिखते थे कि मैं तो सिर्फ बैठकर 'ॐ' की ध्वनि उच्चारता हूँ। हम सभी ने भी, जो ओम मण्डली में जाते थे, यही कार्य किया। हम जैसे ही 'ॐ' की ध्वनि उच्चारते थे तो तीन या चार बहनें अवश्य ही ध्यान में चली जाती थीं और वहाँ श्रीकृष्ण को देखती थीं तथा रास करने लगती थीं। ऐसा करते-करते हमारा संगठन बड़ा होता गया। बाबा को पत्र द्वारा इसकी सूचना दी गई। प्यारे ब्रह्मा बाबा ने अपना मकान खाली करवाकर हमको क्लास के लिए दे दिया। एक बार बाबा ने पत्र में लिखा, "पाना था सो पा लिया, अब काम क्या बाकी रहा।" उस समय हम इसका अर्थ नहीं समझते थे पर बाबा के ये अनुभव अति-अति प्रिय लगते थे। ओम मण्डली के लिए यह मशहूर हो गया था कि जैसे एक पैसे में कुल्फी मिलती है, उतनी सहजता से यहाँ देवी-देवताओं तथा स्वर्ग आदि के साक्षात्कार होते हैं, भक्ति मार्ग में तो भक्त साक्षात्कार की इच्छा-पूर्ति के लिए बहुत कष्ट उठाते हैं परन्तु यहाँ तो अति सरलता से यह इच्छा पूरी होती है।

बाबा कराची लौट गए

कुछ समय बाद बाबा बनारस से लौट आये। बाबा के तप और तेज में ऐसा आकर्षण था कि उनके परिवार वाले तथा अन्य परिवारों वाले भी ज्ञान सुनने आने लगे। धीरे-धीरे पवित्रता, अन्न की शुद्धि आदि के बारे में सभी को पता पडता गया। भागवत में लिखा है कि भगवान से प्रीतबुद्धि आत्माओं पर असुरों ने अत्याचार किये, वही इतिहास पुनः दोहराया जाने लगा। हमारे घरवालों ने हमारे पर रोक लगानी शुरू कर दी। उस समय के सिन्धी समाज में कोई कन्या अपनी माँ की भी बात के विरोध में जरा-सा मुँह खोलने तक की हिम्मत नहीं कर पाती थी। मैं युक्ति से ईश्वरीय ज्ञान की धारणा में तत्पर थी। अमृतवेले जब सब सोए रहते थे तो चुपके से ओम मण्डली में पहुँच जाती थी और ज्ञानामृत का पान कर पुनः आकर सो जाती थी। हैदराबाद की परिस्थितियाँ दिनों-दिन अधिक बिगड़ती गई तो प्यारे बाबा बोर्डिंग के बच्चों तथा अपने परिवार सहित कराची चले गए। बाबा ने तीन दिन में तीन बंगले लेकर सभी के रहने की व्यवस्था कर दी। हम जो बाँधेले थे, बाबा के संग के लिए जल बिन मछली की तरह तड़पने लगे।

दादाजी ने लिखी चिट्ठी ओमराधे के नाम

मुझे पक्का निश्चय था कि बाबा के पास मुझे जाना ही है। मेरे लौकिक भाई ने मुझे आकर कहा, 'बाबा तो गये, अगर तुमको जाना है तो दो घण्टे के अन्दर निर्णय करो। अभी दो बजे हैं, चार बजे यदि घर में उपस्थित मिली तो तुम्हारी शादी कर देंगे, यदि चली गई तो समझो वहाँ (ओम मण्डली) की हो गई।' मेरे कपड़े, चप्पल ताले में रखकर तथा चाबी को अपने बिस्तर के नीचे रखकर भाई सो गया। बिना पैसे और कपड़े के मैं कैसे जाऊँ, यह प्रश्न मेरे सामने जहरीले सर्प की तरह फन फैलाए खड़ा था। प्रभु का कार्य हो और मन की सच्ची लगन हो तो चाह अनुसार राह निकल ही आती है। दादाजी की मुझ से विशेष प्रीत थी। मैंने बड़े प्यार से उनके पास जाकर, आँसू बहाकर कहा कि यदि आप मेरी शादी करेंगे और मैं किसी भी कारण से ससुराल में दुःखी हुई तो रोती हुई आपके पास ही तो आऊँगी। इससे तो अच्छा है कि आप मुझे ऐसे स्थान पर भेज दो, जहाँ दुःख का नाम-निशान भी न हो। दादाजी ने पूछा कि ऐसी कौन-सी जगह है? मैंने कहा, 'ओम-मण्डली, जहाँ मैं जाती थी। दादा कराची में गये हैं तो अब मैं भी वहाँ जाना चाहती हूँ।' दादा लेखराज जी के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी। वे उनके सात्विक जीवन और श्रेष्ठ आचार-विचार से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने कहा, 'दादा जैसा तो सृष्टि में कोई मिलेगा ही नहीं लेकिन यदि आप उनके पास जाएँगी तो सरकार उनको तकलीफ देगी इसलिए आप न जाओ।' मैने कहा, 'आप ओम राधे के नाम पर चिट्ठी लिख दो कि ओम राधे जी, हम अपनी पौत्री को ज्ञानामृत पीने और पिलाने के लिए खुशी से छुट्टी दे रहे हैं।' दादाजी ने ऐसा ही किया। घर में माँ के सिवाय किसी को इस बात का पता नहीं पड़ा। दादीजी मेरा अतिशय विरोध करती थी। उसके मन में था कि चाहे इसके हाथ-पाँव टूट जाएँ, तो भी शादी जरूर करूँगी। दादाजी और भाई की सहानुभूति मेरे प्रति थी इसलिए मार-पीट का कम सामना करना पड़ा।

बाबा कराची में कहाँ हैं, यह पूछा ही नहीं

पत्र लेकर बाहर निकली, प्यारे शिव बाबा की स्मृति तो मन में बसी ही थी, जमना दादी के घर जाकर चप्पल, कुछ कपड़े तथा सवा रुपया लिया और ईशु दादी के पिताजी से गाड़ी की टिकट बनवाकर देने को कहा। सवा रुपये में टिकट बन गई। परन्तु उन्होंने मुझसे पूछा ही नहीं कि तुमको कराची में किस स्थान पर जाना है और न ही मैंने पूछा कि कराची में बाबा किस स्थान पर हैं। स्टेशन पर पहुँचकर मैंने पूछना शुरू कर दिया कि परसों सुबह सफेद कपड़े वाले लोग आए थे, वे किधर गए। स्टेशन पर सभी मेरा मुँह देखने लगे। जानकार लोगों ने कहा कि बच्चे तथा कन्याएँ आदि आए तो थे पर अब कहाँ हैं हमें भी मालूम नहीं। मैं पूरा आधा घण्टा स्टेशन पर चक्कर लगाती रही परन्तु इतने में ही एक भाई दौड़ता हुआ मेरे पास आया। भले ही सीमित शक्ति वाले दो नेत्रों से मैं प्यारे शिव बाबा के कर्तव्य स्थान को न देख पा रही थी, न जान पा रही थी परन्तु अनन्त दृष्टि वाले, दिव्य-दृष्टि विधाता प्रभु को तो मेरी पल-पल की खबर थी। भागवत में गायन है कि प्रिय भक्त की सच्ची पुकार पर वे नंगे पैर, बिना चप्पल पहने ही दौड़ पड़े थे। मेरे लिए भी प्यारे शिव बाबा ने, ब्रह्मा बाबा के साकार माध्यम द्वारा इस भाई को स्टेशन पर दौड़ा दिया था।

बाबा ने कहा, कोई आया है, बुलावा कर रहा है

भाई ने कहा कि बाबा भोजन कर रहे थे, मैं भी बाबा के साथ ही भोजन कर रहा था कि अचानक बाबा ने कहा, आप भोजन बाद में करना, स्टेशन पर जाओ, कोई आया है और बुलावा कर रहा है। भाई की बात सुनकर मुझे विश्वास हो गया, मैं उसके साथ चल पड़ी। बाबा जितने प्रेम के स्वरूप थे उतने ही हमारे भविष्य की सुरक्षा के प्रति जागरूक भी थे। सामने जाते ही तुरन्त पूछा, 'पत्र लाई हो?' मैंने कहा, 'कभी बाप के पास पत्र लाया जाता है क्या, बाबा?' बाबा ने फिर मम्मा को कहा कि इनको नहला-धुला कर खाना खिलाओ। रात के भोजन के समय मैंने बाबा को पत्र दे दिया। पत्र देख बाबा निश्चित हो गए। बाबा ने कहा कि जब तुम दादाजी से पत्र ले आई हो तो दादा तो घर में बड़ा होता है, अब किसी के विरोध का डर नहीं है।

एक तीर में दो पंछी पकड़ो

इसके बाद दो-तीन मास तक के समय में दादाजी का घर से मिलने के लिए आना होता रहा, कपड़े तथा पैसे भी वे स्नेह-सौगात के रूप में देते रहे। बाबा के कराची आने पर मेरे जैसी लगभग 80 कन्याएँ हैदराबाद छोड़, ज्ञानामृत पान के लिए कराची की ओर रवाना हुईं। विरोधियों के गले यह बात नहीं उतरी। उन्होंने कई कन्याओं के घरवालों से मिलकर उनके नाम वारंट निकलवा दिए। दोष यह लगाया गया कि कन्याएँ नाबालिग हैं। मैं 24 वर्ष की थी, मेरे लिए भी वारंट निकला। मैं अदालत में गई और पूछा कि वारंट किसने निकलवाया है। मेरी दादी गंगा स्नान का बहाना करके कराची आई थी और वारंट उसी ने निकलवाया था। दादाजी को वारंट आदि की जानकारी नहीं दी गई थी। वारंट में झूठमूठ मेरी आयु 12 वर्ष बताई गई थी। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने जज से पूछा, "क्या आपको मैं 12 वर्ष की लगती हूँ?" बाबा ने मेरा वजन करके अदालत में भेजा था। मैं तन्दुरुस्त थी और 40 किलो वजन था मेरा। जज ने मुझे कहा कि तुम्हारी दादी कह रही है। जज के आदेश से मुझे घर जाना पड़ा। दादाजी ने मुझे देखते ही कहा, क्या तुमको ओम मण्डली ने नहीं रखा? मैंने बताया कि दादीजी वारंट निकालकर मुझे ले आई है। दादाजी ने तब दादीजी के प्रति कहा, 'इस पापिन को तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। मुझे तो कह रही थी कि मैं गंगाजी नहाने जा रही हूँ और गई है कन्या के ऊपर वारंट निकालने, अरे, कन्या पर भी ऐसा किया जाता है क्या?' फिर मुझे सांत्वना देते हुए कहा कि चलो, मैं तुमको वापिस ओम मण्डली में छोड़ आता हूँ। परन्तु अदालत में मामला विचाराधीन होने के कारण ब्रह्मा बाबा के पास वापस लौटना लगभग 6 मास बाद ही हुआ। परन्तु फिर तो मैं पूर्ण निर्बन्धन हो गई। इस सारे प्रकरण में हमने जो बहादुरी दिखाई, वास्तव में वह हमारी अपनी शक्ति न थी। यह सारी शक्ति और युक्ति कन्याओं के कन्हैया परमात्मा शिव की ही थी। बाबा के पत्र आते थे कि बच्चे, एक तीर में दो पंछी पकड़ो। इसका अर्थ यह था कि अपने को निर्बन्धन भी करो और परिवार वालों को राज़ी भी रखो। इस युक्ति से निर्बन्धन बन हम 14 वर्ष तक ज्ञान-योग की भट्ठी में रूहानी मौज करते रहे और ईश्वरीय चरित्रों से निहाल होते रहे।

योग-भट्ठियों से उड़ती कला तक पहुँचे

सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ। चारों ओर खूने-नाहक खेल का भयंकर दृश्य मचा पर प्यारे बाबा सदा याद की मस्ती में मगन रखने के लिए खूब भट्टियों के कार्यक्रम करते रहते थे। कराची में 25-25 बहनों के समूह में भट्ठी होती थी। उस समय नौकर न थे। ऐसी भट्ठी होती थी जो कोई किसी से भी बात नहीं करते थे। कोई किसी का चेहरा तक नहीं देखते थे। रात को नींद न करके बारी-बारी योग करते थे। उन भट्टियों की कमाल है जो हम उड़ती कला तक पहुँचे। मम्मा-बाबा भी हमारे साथ भट्ठी में आकर बैठते थे। भट्ठी 24 घण्टे चलती थी। भट्ठियों से भरी ताकत आज तक चल रही है, कराची में तो हम भट्ठियों में ही पले।

विभाजन के समय सभी मुस्लिम भाइयों से प्यारे बाबा ने बहुत प्रेम का व्यवहार रखा परन्तु हम कन्याओं के मित्र-सम्बन्धियों ने बाबा पर दबाव डाला कि आप भारत चलो, हम आपका सारा खर्च देंगे। उनके इस कथन पर हम कराची से रवाना हुए, रास्ते में काफी तकलीफें हुई परन्तु महसूस नहीं हुईं। आबू आने पर 12 मास तक लाल चाय, बिना दूध की पीनी पड़ी। बेगरी पार्ट (धनाभाव का समय) में भोजन आदि की तंगी रही क्योंकि सारा पैसा कराची से आबू तक के सफर में खर्च हो गया था। भले ही एक प्रकार का भोजन मिलता था परन्तु कभी स्वाद याद नहीं आता था। काम पूरा हुआ और बैठे योग में, अन्य कोई बात सोचते ही नहीं थे। बुखार हो जाता था तो प्यारे बाबा कहते थे, 'जाओ बच्चे, शीशे में चेहरा देखो फिर योग में बैठो, बुखार उतर जाएगा।' सचमुच बुखार उतर जाता था, कभी दवाई नहीं खाई।

उस समय बृज कोठी में सर्प होते थे पर हम मस्त रहते थे, एक बाबा की मस्ती में। दुनिया तो पूरी तरह भूली हुई थी। लौकिक की तो याद न तब आई, न अब आती है। मन में समझ पक्की धारण की हुई है कि जिस प्रभु के बने हैं उसी का खाएँगे, पीएँगे, उसी का बनकर रहेंगे। बाबा के बन गए तो जो कुछ है सब बाबा का। मैं बाबा की, बाबा मेरा, यह धारणा-मन्त्र जैसे शुरू से अपना हो गया था, यही जादू था। यह जन्म भी यज्ञकुण्ड से है, सेवा भी यज्ञकुण्ड में है और स्वाहा भी यज्ञकुण्ड में ही होगा, ऐसा निश्चय है। सिन्ध में ठण्डी न थी परन्तु आबू में ठण्डी बहुत पड़ती है तो हम अधिकतर बीमार हो जाते थे। डाक्टरों ने कहा, 'यहाँ चाय पीनी पड़ेगी और पैदल सैर भी करनी पड़ेगी।' पहले तो चाय को हम जानते भी नहीं थे। फिर हमने सुबह-सुबह चाय पीना और दो मील पैदल चलना प्रारम्भ किया।

अचानक गुप्त मदद

उन दिनों बाबा ही हमारे स्टॉक के सामान की देख-रेख करते थे। बाबा के साथ मैं भी स्टॉक की सम्भाल में मददगार थी। एक दिन भोली भंडारी ने मुझे कहा कि सायंकाल के भोजन के लिए पर्याप्त राशन नहीं है, खाना कैसे बनेगा? मैंने बाबा को बताया। बाबा ने कहा, बड़ी सहज बात है, बोर्ड पर लिख दो कि सायं चार बजे से नौ बजे तक योग है। कोई रसोई में जाएगा ही नहीं। प्यारे बाबा भी सायं चार बजे से योग में बैठ गये। अभी छह भी नहीं बजे थे कि डाकिया आया। एक बैरंग लिफाफा ले आया। भेजने वाले का नाम नहीं लिखा था। बाबा के कहने पर उसे खोला तो उसमें 200 रुपये निकले। बेगरी पार्ट में ऐसी गुप्त मदद अचानक मिलती थी।

साथ जीएंगे, साथ मरेंगे

एक दिन बाबा के साथ पहाड़ी पर घूमने गए थे तो देहली का एक नन्दकिशोर नाम का भाई भी वहीं था। उसने सोचा कि ये सफेद कपड़े पहने हुए कौन हैं, जो ऊपर चढ़ रही हैं। उत्सुकतावश वह भी हमारे साथ हो लिया। सफेद कपड़े, लम्बे- खुले बाल, हमारा यह वेश थोड़ा अलग तो लगता ही था। वह भाई इससे प्रभावित हुआ और पहाड़ी पर से वापस लौटते समय हमारे साथ ही पाण्डव भवन के अन्दर तक आ गया। उसका परिचय पूछा, तो कहने लगा कि आप इतनी शान्ति की शक्ति का फैलाव यहाँ कर रहे हो, ऐसे ही दिल्ली में आकर भी करो तो बहुत अच्छा होगा। बाबा ने उसको कहा कि आप प्रबन्ध करना, हम अवश्य देहली में भी आएँगे। फिर उसी भाई के निमन्त्रण पर हमारी चार-पाँच दादियाँ देहली सेवा पर गईं। इस घटना के बाद बाबा हम अन्य सभी को भी धीरे-धीरे बाहर सेवा पर भेजने लगे। एक दिन क्लास में प्यारे बाबा ने कहा कि आप सभी को जाना ही है सेवा पर। प्यारे बाबा ने प्रसिद्ध आख्यान महाभारत की उस घटना का उदाहरण दिया जब पाण्डवों ने गुप्तवेश में राजा विराट के यहाँ नौकरी की थी और कहा कि आप शिवशक्ति पाण्डव सेना को भी गुप्तवेश में सेवा का पार्ट बजाना ही है। हमने कहा, 'बाबा, हमारा तो आपके साथ एक ही वायदा है कि साथ जिएँगे, साथ मरेंगे, साथ रहेंगे, हम तो जाएँगे नही।'

युक्ति से सेवा पर भेजा

भगवान ज़ानीजाननहार हैं और हरेक आत्मा से सेवा करवाने की विधि तथा युक्ति सम्पूर्ण रूप से जानते हैं। हमारे प्रति उन्होंने एक आकर्षक युक्ति अपनाई। प्रातःकाल क्लास में कहा कि जिन बच्चियों ने हवाई जहाज तथा 26 जनवरी का उत्सव न देखा हो वे हाथ उठाएँ। हम छह बहनों ने हाथ उठाया। बाबा ने हमें देहली में भेज दिया। मुझे प्रवचन करने का सुअवसर मिला, लोगों ने ध्यान से सुना और अच्छी सेवा हुई, एक भाई ने बाबा को समाचार लिख भेजा। इस सेवा के परिणामस्वरूप मुझे वहीं देहली में सेवार्थ रख लिया गया।

जब दिल्ली में सेवा प्रारम्भ की तो आटे में नमक डालते थे, दो रोटी बनाते थे और सुबह चाय के साथ खाकर निकलते थे। कभी किसी के घर सत्संग करते थे, कभी किसी के घर। रात तक कई स्थानों पर सेवा करके, फिर लौटते थे। रात को आकर सस्ते आलू खरीद लाते थे, खूब पानी डालकर रस वाले बनाते थे। प्यार से भोग लगाकर सन्तुष्टता से खाते थे। यदि किसी ने पैसे, रुपये कभी दिये तो महायज्ञ में भेज देते थे। यज्ञ में इस प्रकार तन, मन, धन लगाने से शक्ति बहुत मिलती थी। प्यारे बाबा ने हम निर्बल कन्याओं को इसी युक्ति से शक्तियाँ बना दिया। मेरा लौकिक भाई, भाभी को कहता था कि हमारी यह बहन ऐसी थी, जो पुलिस वाले का नाम सुनते ही खटिया के नीचे छिप जाती थी परन्तु आज हज़ारों के सामने भाषण करती है निडरता से। लेकिन यह किसकी शक्ति है! महीन बुद्धि से विचार करने पर ही समझ में आता है कि यह साकार बाबा के तन में विराजमान शिव पिता की ही शक्ति कार्य कर रही थी, अब भी कर रही है।

रूहानी सर्जन का अनोखा इलाज

मैं आबू में आने पर एक वर्ष तक डायरिया से पीड़ित रही। यहाँ तो इतने डॉक्टर थे नहीं, प्यारे बाबा ने मुम्बई से डॉक्टर को बुलवाया। उसने कहा, 'इनकी शादी करा दो तो ये ठीक हो सकती हैं।' उसने यह भी कहा कि 'ये बच नहीं सकती'। उसने मुम्बई अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने की सलाह दी। मैंने कहा, शादी तो कराओ किसी और की, रही बात ठीक होने की, यदि मरना होगा तो मुम्बई में जाकर भी शरीर छूटेगा, इससे तो यहीं पवित्र स्थान पर शरीर छूटे तो अच्छा है। उन दिनों दादी जानकी जी यज्ञ में नर्स की सेवा करती थी। एक दिन मेरी बहुत गम्भीर हालत को देख उसने बाबा को कहा कि बाबा, सीतू तो आज रात भी नहीं निकालेगी, सुबह तक बचने की उम्मीद नहीं है। मेरा सारा शरीर और मुख सूज गया था। बाबा ने उत्तर दिया, बच्ची, तुम सो जाओ बाकि बाबा जाने यह जाने। रात को ढाई बजे बाबा मेरे पास आये और पूछा, बेटी, कितने दिनों से नींद नहीं की है? मैंने कहा, बाबा, खाना तो खाती नहीं हूँ, नींद कैसे आए। बाबा ने 10 मिनट शक्तिशाली दृष्टि दी और फिर दादा विश्वरतन जी से उसी समय अर्थात् रात के ढाई बजे गाय का दूध मँगवाया। उस कच्चे दूध को इन्जेक्शन में भरकर मेरी दोनों बाँहों में लगा दिया गया। इससे मुझे कई दिन बाद गहरी नींद आई। अगली सुबह से, बाबा के दिए कार्यक्रम के अनुसार कई प्रकार के फलों का रस मिलाकर पीती रही। फिर बाबा ने अपने साथ भोजन की एक-एक ग्राही खिलाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार पूर्ण स्वस्थ हो गई।

रुकमणी दादी

वडाला, मुंबई की ब्रह्माकुमारी रुकमणी दादी जी साकार बाबा के संग के अनुभव ऐसे सुनाती हैं कि सन् 1937 में मेरी माँ ने सुना कि बाबा अलौकिक ज्ञान देते हैं तो वह करांची से हैदराबाद बाबा के पास गयीं। बाबा ने मेरी माँ को एक नक्शा समझाया और कहा कि जाकर इसका मनन करना। जितना तुम मनन करोगी उतना स्वयं परम आनन्द का अनुभव करोगी और पूजनीय मूरत बनोगी। बाबा का यह वरदान पाकर माँ करांची आ गयी। फिर माँ ने नित्य का नियम बना लिया कि सुबह दो बजे उठकर योग तपस्या में बैठ जाना है और मनन-चिन्तन करना है।

आठों प्रहर समाधि

कुछ दिनों के बाद बाबा ने एक पत्र लिखा कि बच्ची गंगादेवी, करांची में आने का मेरा विचार है। तो माँ ने लिखा कि बाबा ज़रूर आओ और सुदामा की झोपड़ी को पावन करो। बाबा करांची आये। हमने मकान के ऊपर के सारे कमरे बाबा के लिए दे दिये। क्योंकि बाबा के साथ मम्मा, दीदी मनमोहिनी और अन्य बहनें भी आयी थीं। बाबा दिन में दो बार सत्संग कराते थे और काफ़ी लोग सत्संग करने आते थे। इस प्रकार बाबा कुछ दिन करांची में रहे। उस समय बाबा ने एक गीत बनाया और मम्मा को कहा कि यह गीत गंगादेवी को सितार पर सुनाओ। गीत सिन्धी भाषा में था। "सखीरो अठ्ठे पैहर समाधि" अर्थात् आठ पहर समाधि में रहो। बाबा ने उसकी विधि इस प्रकार बतायी कि

“स्वभाव निर्मल, सम गंगा जल,
रहणी रख तू साधी, सात्विक भोजन कंद मूल फल।
ज्ञान-अमृत जो पी तू पाणी, सदा चिन्तन कर आत्म कहाणी,
कर्मण जी दैवी करे पूजाणी, कर अमरनाथ सां शादी।।
धन जौबन जी थीण धयाणी, बार् बचा सब कर्म प्राणी।
त्रिलोकी जी तू महाराणी, चैतन्य शुद्ध अनादि,
बुध गंगा चवे राधे निमांणी, अमरनाथ जी अथ्थै कहाणी।
शिव सती चयो बुध ममः राणी तू चैतन्य शुद्ध अनादि।।”

यह गीत मम्मा ने सुनाया तो गीत सुनते-सुनते मेरी माँ की सहज समाधि लग गयी। मैंने भी बाबा को देखा तो ध्यान में चली गयी और श्रीकृष्ण को देखा, साथ-साथ स्वर्ग को देखा। उस समय मैं छह घण्टे ध्यान में रही जिसमें परमात्मा से सर्व सम्बन्धों का अनुभव किया। बलिहारी मेरे बाबा की है जो मुझे एक सेकेण्ड में नज़र से निहाल करके अशरीरी बनाया। बाबा ने मुझे यह भी बताया कि बच्ची, शरीर तुम्हारा मन्दिर है, आत्मदेव अन्दर है। अब स्वयं ही तुम निर्णय करो कि भोजन कैसा होना चाहिए। मेरे पिताजी ज्वैलर थे, बड़े ठाट-बाट से रहते थे। हमारे घर में मांस-मदिरा का बहुत बरताव था। लेकिन मैंने और माँ ने सेकेण्ड में तामसिक खान-पान, फैशनेबुल वेष-भूषा का त्याग कर दिया। यह बाबा की ही कृपा कहो, दया कहो, वरदान कहो, उसी वरदान ने 14 साल की आयु में ही त्याग कराया, आज तक वही त्यागी जीवन है।

भागवत में हम गोपियों का वर्णन पढ़ते थे लेकिन उसका अनुभव मैंने बाबा द्वारा किया। योग के गहरे अनुभव भी बाबा ने हमें कराये जो हम उसी रूहानी नशे और मस्ती में रहते थे। बाबा का यह गीत भी गाते थे -

“आत्म खुमारी, कैसी बीमारी।
जीते जी मर गयी, अहो आनन्द।
तुम मेरी, तुम मेरे।
इस सुखमय जीवन का क्या साधन।।
तुम मेरी, तुम मेरे।”

यह अनुभव होने के बाद बाबा ने कहा, तुम बेहद में आओ। बेहद में आने के लिए बाबा ने गीत लिखा:

“आज हमें सब बेहद भाता, क्या आनन्द है आता,
ज्ञान से सृष्टि देखी, अति सुन्दर।
ज्ञान से वस्तु देखी, अति सुन्दर।।”

शुरू हो गये तरह-तरह के बन्धन

इसके बाद मेरे पर बन्धन शुरू हुए क्योंकि मैं बहुत गहने पहनती थी। सदा गहनों से सजी रहती थी। लेकिन बाबा का ज्ञान मिला तो सारे गहने उतार दिये । पिता जी ने पूछा, गहने क्यों उतारे ? मैंने कहा, अभी हम ज्ञान के गहनों से सजे हैं। पिता जी को बहुत गुस्सा आया, मुझे और माँ को बहुत कुछ बोला। मेरे कान में ज़ेवर पड़े थे, वे निकल नहीं रहे थे तो एक दिन एसिड लगाकर वे भी निकाल दिये। दूसरे दिन पिता जी ने कान देखे जो काफ़ी ख़राब हो गये थे, तो पूछा, तुमने क्या किया है। मैंने कहा, कान में कुछ हो गया था। पिता जी ने कहा, तुमने खुद एसिड लगाया है और कहती है कि कान में कुछ हो गया था और कान के ज़ेवर भी निकाल दिये हैं। पिता जी को इतना गुस्सा आया कि उस गुस्से में पहली बार मेरी बहुत पिटाई की और कहा कि अगर अब उस दादा के पास गयी तो तुम्हें काट कर फेंक दूंगा। माँ और मेरे पर कड़ा पहरा बिठा दिया। लेकिन मैं बाबा को कभी भूली नहीं। बाबा से मेरा निरन्तर योग था। फिर एक दिन पिता जी ने कहा, यह त्यागी जीवन कैसे चलेगा और तुम्हें घर में ऐसे कैसे बिठायेंगे? शादी के लिए ज़बरदस्ती करने लगे। लेकिन मैं तो अपनी मस्ती में थी। पिताजी ने देखा कि यह तो मानने वाली नहीं है तो हमें हरिद्वार ले गये कि वहाँ किसी मंत्र-तंत्र वाले को दिखाकर ठीक करेंगे और इन पर जो (ज्ञान का) जादू लगा है वह निकालेंगे।

हरिद्वार में एक मंत्र पढ़ने वाले ब्राह्मण को बुलाया। ब्राह्मण ने पानी पर मंत्र पढ़कर और उसे बोतल में भरकर दिया। मेरी माँ से कहा कि यह पानी तुम भी पियो और बच्ची को रोज़ पिलाओ। जब माँ ने मुझे कहा कि यह पानी पिओ तो मैंने कहा कि जादू का पानी नहीं पिऊँगी। बाबा ने माँ की ज्ञान की नींव बहुत मज़बूत डाली थी। माँ ने कहा, डरती क्यों हो? परमात्म-जादू श्रेष्ठ है या मनुष्यों का श्रेष्ठ है? बाबा ने जो हमको ईश्वरीय जादू लगाया है उस पर मनुष्यों का जादू कुछ नहीं कर सकता और नहीं पिओगी तो तुम्हारे पिता जी गुस्सा करेंगे। माँ ने कहा कि पानी पिओ, डरो नहीं।

बाबा ने एक बड़ा मस्ती का गीत बनाया था वह याद आया-

“नेष्ठा का जादू है मुझ में भरा,
और सामने बैठ मुझे देख ज़रा।
यह देह क्या है, एक संकल्प सखी,
अहं-मम की बनी है मन से सखी।।
जब त्रिलोकीनाथ हमारा रक्षक है तो कौन क्या कर सकता है?”

जब हमारे पर नेष्ठा (योग) का जादू है, मनुष्य का जादू क्या करेगा ? हमारा जादू उस पर लगेगा। हमारा रक्षक त्रिलोकीनाथ है। मैंने पानी पी लिया। लेकिन उस जादू के पानी का हमारे पर कोई असर नहीं हुआ। उसके बाद हम वापस करांची आ गये। मेरी माँ ने अपनी दिनचर्या शुरू की जैसेकि सुबह उठना, योग करना और मुरली पढ़ना। बाबा के पास जाने की सख्त मना थी। लेकिन बाबा मुरली, विश्वरतन दादा के द्वारा भेज देते थे। विश्वरतन दादा सब्ज़ी लेने आते थे तो बाबा सप्ताह में तीन बार मुरली और टोली उन द्वारा भेजते थे। यह परमात्म चमत्कार ही था कि जब पिता जी घर से बाहर निकलते थे तो तुरन्त बाद विश्वरतन दादा आते थे। मुरली और टोली देकर, माँ को बाबा की बातें सुनाकर चले जाते थे। इस प्रकार बाबा ने घर में ही गुप्त पालना की।

आलराउण्डर दादी लौकिक में मेरी बुआ की लड़की हैं। जब वे हमारे घर पर आती थीं तो पिताजी बहुत हंगामा मचाते थे और बहुत गुस्सा करते थे। क्योंकि पिताजी समझते थे कि ये ही हैं जो इनको कैसे भी करके बाबा के पास ले जायेंगी। इनके संग से छुड़ाने के लिए दुबारा फिर छह मास के लिए हरिद्वार ले गये। वहाँ गंगाराम नाम के एक महात्मा जी रहते थे जो सिन्ध के जोही गाँव के महन्त थे। उनके पास मुझे और माँ को ले गये। महात्मा जी ने बहुत परीक्षा ली, कई उल्टे- सुल्टे प्रश्न पूछे लेकिन मेरी माँ की परख शक्ति बहुत अच्छी थी तो उनको बहुत सुन्दर उत्तर दिये। महात्मा जी बहुत खुश हुए। वे हाथ जोड़कर बोले, "तुम्हारे पति के कहने पर मैंने तुम्हारी इतनी परीक्षा ली। लेकिन मैं देखता हूँ कि तुम्हारा निश्चय, तुम्हारी ज्ञान-योग की निष्ठा मुझसे बढ़कर है और संन्यास के लिए मैंने गेरूवे वस्त्र पहने हैं फिर भी तुम्हारे जैसा त्याग, वैराग मुझ में नहीं है। तुम्हारा ज्ञान और योग बहुत ऊँचे हैं।" छह मास के बाद मैं और माँ वापस घर आये।

चित्तचोर की याद से परमानन्द की अनुभूति

सन् 1947 में भारत विभाजन के बाद हम सब परिवार सहित करांची से मुंबई आ गये। लेकिन बाबा ने जो परम आनन्द का अनुभव कराया था उसके आगे तो सारे संसार के रस हमें फीके लगते थे। मैं और मेरी माँ उसी मस्ती में रहती थीं। बाबा ने जो करांची में गीत लिखे थे वे याद आये। गीतों में इतना आनन्द था जो संसार को सेकेण्ड में भुला देते थे -

“बाहरमुखता छोड़, माला तोड़, किताब डाल पानी में,
पकड़कर हाथ वस्तों का निजानन्द को तू पाता जा।
प्रेम की मस्ती और, जगत में ज्ञान की मस्ती और, ज्ञान से मन की मस्ती और,
राझू सारथी रमझ बतावे, धीरे-धीरे पैर बढ़ावे।।
कदम-कदम पर राह दिखावे, देह-अभिमान से जान छुड़ावे,

निज में ही निज नैन अडावे, ऐसा यह चित्त चोर।
जगत में योगी का प्रेम ही और, प्रेम से मोही लिया चित्त चोर।।”

इस गीत के याद आते ही श्रीकृष्ण की बात याद आयी कि श्रीकृष्ण की काठ की मुरली के पीछे गोपियाँ भागीं। लेकिन भगवान ने ज्ञान की मुरली बजायी उसके पीछे हम भागे। करांची में बाबा कहते थे, बच्चे, ज्ञान मुरली के अर्थ में टिकना है, शब्दों को नहीं देखना है। जितना अर्थ में टिकती जायेंगी उतना स्वयं सहज समाधि में टिक जायेंगी और दूसरों को भी अनुभव करायेंगी। इसलिए मैं बाबा की मुरली को बार-बार पढ़ती थी और उसका आनन्द लेती थी।

बाबा ने कहा- तुम गुप्त गोपी हो

राखी का त्यौहार आया। मुझे संकल्प आया कि बाबा को राखी भेजूँ। राखी के दो दिन पहले एक साधारण राखी ख़रीद कर लायी और पोस्ट मास्टर से कहा कि यह पोस्ट, कैसे भी राखी के दिन आबू पहुँचनी चाहिए। उसने कहा कि थोड़ा पैसा ज़्यादा लगेगा। मैंने कहा कि जितने भी लगें लेकिन पहुँचनी चाहिए। मैंने राखी भेजी और वह सही समय पर मधुबन पहुँच गयी। जो भी राखियाँ बाबा के लिए आयी थीं उनको छोटे हाल (हिस्ट्री हाल) में सजा कर रखा था। उसमें मेरी भी राखी रखी हुई थी। मुझे किसी ने बाद में बताया कि बाबा हाल में आये और सब राखी देखते हुए मेरी राखी को देखकर कहा कि यह कहाँ से आयी है? पता पड़ने के बाद बाबा ने उस राखी को बड़े प्यार से उठाया और बोला यह मेरी बाँधेली बच्ची की राखी है। इसका ज़िक्र बाबा ने मुरली में किया था। मेरा मन खुशी से नाच उठा। जब बाबा मुंबई आये थे तो मैं घर से छिपकर बाबा से मिलने गयी। उस समय क्लास चल रहा था। बाबा ने मुझे देखा और कहा, तुम गुप्त गोपी हो, तुमने राखी भेजी थी। बस यह सुनते ही मेरी आँखों से स्नेह का जल बहने लगा। वाह मेरे जानीजाननहार बाबा! जो मुझ बाँधेली को भी आपने याद किया। कितनी ख़ुशी की बात है कि स्वयं भगवान मुझे याद करे! कुछ वर्ष के बाद पिता जी ने शरीर छोड़ा और मैं बन्धन से मुक्त हो गयी और बाबा की सेवा में तत्पर हो गयी। बाबा का सिन्धी में लिखा हुआ एक पुराना गीत याद आया जो वैराग्य दिलाता है -

“छड़ देह-अभिमान, वठ योगीन सा ज्ञान,
कर गंगा में स्नान, अर्थ ओम् सां।
अहं आत्मा सुठ्ठो, कर परदेश फिट्टो,
ओम् देश मिठो, हल गुरु कुलसां।।”

इसका हिन्दी अर्थ है- देह-अभिमान छोड़ो। गंगा में स्नान करो। ओम् एक औषधि है, अगर इस औषधि का पान किया तो तुम देह-अभिमान से मुक्त हो जाओगे। आत्मा श्रेष्ठ है, यह प्रकृति परदेश है, इससे उपराम हो जाओ। निज देश तुम्हारा ‘शान्तिधाम’ है। ओम् मंडली का नाम गुरुकुल है, इसके साथ रहो।

दादी रतनमोहिनी जी

ब्रह्माकुमारी दादी रतनमोहिनी जी कहती हैं कि हम बहनें तो बाबा के साथ ऐसे बैठते थे जैसे छोटे बच्चे माँ-बाप के साथ बैठते हैं। बाबा के साथ चिटचैट भी करते थे। कहाँ भी चलो, बाबा के हाथ में हाथ देकर चलो, कहाँ भी बैठो, बाबा के साथ बैठो। बाबा के साथ बोलते जाओ, देखते जाओ और चलते जाओ। क्योंकि बाबा के लिए हम लोगों की सदा ऊँची भावनायें थीं। हमें सदा स्मृति रहती थी कि हम भगवान के साथ हैं।

बाबा में भगवान की ही एक्टिविटी देखती थी

हमारे मन में सदा यह भावना बनी रहती थी कि भगवान के साथ चलते हैं, बैठते हैं, बातें करते हैं। हम बाबा को कभी साधारण रूप में नहीं देखते थे। जब बाबा क्लास के बाद चैंबर में बैठते थे तो हम सब उनके सामने बैठते थे। भले ही बाबा उस समय रमणीकता से बात करेंगे परन्तु हमारे अन्दर भावना होती थी कि देखो, भगवान कितनी रमणीकता से बातें कर रहे हैं! इस रीति हम बाबा को देखते और सुनते थे। साकार बाबा का हर बोल हम भगवान का महावाक्य समझकर ही स्वीकार करते थे। बाबा के हर बोल और क्रिया के प्रति हम आपस में रूहरिहान करते थे कि देखो भगवान साकार में कैसे कर्म कर रहा है और बोल रहा है! उनके बोल में क्या-क्या राज़ समाया हुआ है, यह भी हम निकालते थे। ब्रह्मा बाबा की चलन से हमें भगवान के चरित्र का अनुभव होता था। हर समय हमारा ध्यान बाबा के चेहरे पर, बाबा की दृष्टि पर और बाबा के बोल पर ही होता था कि भगवान कैसे करते हैं और क्या कहते हैं। साकार बाबा को देखने का हमारा उद्देश्य यही होता था कि भगवान उस रथ द्वारा कैसे देखते हैं, कैसे बोलते हैं, कैसे कर्म करते हैं, कैसे बच्चों के साथ खेलपाल करते हैं। उस समय हमारे अन्दर यह पक्का बैठ गया था कि बाबा, बाबा तो है साथ में इस बाबा में भगवान बैठा है। ब्रह्मा बाबा में शिव बाबा है, यह निश्चय करने के लिए हमें मेहनत नहीं करनी पड़ी। जैसे आजकल लोग पूछते हैं कि ब्रह्मा बाबा में ही परमात्मा आता है अथवा आया है, कैसे विश्वास करें? लेकिन कभी भी ऐसा प्रश्न हमें आया ही नहीं। हमें तो हर पल और क़दम में यही अनुभव होता था कि हम भगवान के साथ हैं और भगवान अपना यह काम कर रहा है और हमें भी वैसे ही करना है।

बाबा की दृष्टि इतनी मीठी और इतनी प्यारी होती थी कि हमें साकार रूप में दिखायी भी पड़ती थी और महसूस भी होती थी। इस कारण हमारे मन में कोई ऐसे-वैसे संकल्प उठें अथवा आपस में ऐसी बातचीत हो इसके लिए मार्जिन ही नहीं थी। हमारे लिए पुरुषार्थ बहुत सहज था।

साकार बाबा विदेशी बच्चों को बहुत याद करते थे और कहते थे कि यह ज्ञान विदेशी बच्चों को बहुत अच्छा लगेगा। ये चित्र वहाँ भी जायेंगे। वे भी आकर बाप से अपना जन्मसिद्ध अधिकार लेंगे। ऐसी-ऐसी बातें बाबा बहुत समय से सुनाते थे। हम भी समझते थे कि बाबा कहते हैं तो वह बात कभी-न-कभी साकार होगी ज़रूर । हम यह नहीं समझते थे कि हम विदेश में जायेंगे और सेवा करेंगे। हम समझते थे कि बाबा का ज्ञान लेने के लिए वे ही यहाँ आयेंगे। क्योंकि हम समझते थे कि भगवान के पास सबको आना है तो वे ही सब यहाँ आयेंगे।

कल सो आज, आज सो अभी

बाबा की यह बहुत बड़ी विशेषता थी कि बाबा ने जो भी कहा, हमें उसी समय उसको करना है। अगर उसी समय नहीं करेंगे तो बाबा कहते थे फेल। बाबा उस दिन की मुरली में जो काम अथवा सेवा देते थे हमें उसी दिन करना ही होता था क्योंकि अगले दिन फिर बाबा हमें पूछते थे कि कल जो बाबा ने होमवर्क दिया था, किसने किया हाथ उठाओ। इसलिए हम बच्चों को यही लक्ष्य होता था कि बाबा ने आज के दिन जो होमवर्क दिया है उसको आज करना ही है। जो बच्चा कोई भी सेवा करता था भले वह समझाने की हो अथवा लिखने की हो, उसको बाबा क्लास में सुनाने के लिए कहते थे और उस बच्चे को आगे बढ़ाने के लिए, उसमें उमंग-उत्साह भरने के लिए क्लास में उसकी महिमा करते थे। बाबा उससे कहते थे कि तुमने बाबा की आज्ञा का पालन किया है, तुम फरमानवरदार बच्चे हो।

बच्चों की खुशी सदा बनाये रखने के लिए, उनको आगे बढ़ाने के लिए सदा बाबा भिन्न-भिन्न तरीके अपनाते थे। हर बात बाबा को देखकर ही हमें सीखने को मिलती थी। किसी बच्ची अथवा बच्चे को शिक्षा देनी है तो आते ही उनको सीधा यह नहीं कहते थे अथवा ऐसा नहीं समझाते थे कि तुमने यह भूल की है अथवा यह नहीं पूछते थे कि तुमने भूल क्यों की। पहले बाबा उस बच्चे को प्यार से बुलाते थे, उससे बात करते थे और उसकी विशेषताओं का वर्णन करते थे फिर उसको शिक्षा देते थे कि दोबारा ऐसा नहीं करना चाहिए। यह भी बड़ी विशेषता थी कि अगर कोई बच्चा देहाभिमान में है तो उसको शिक्षा नहीं देते थे क्योंकि वह समझेगा नहीं। इसलिए बाबा जनरल क्लास में ही सबको शिक्षा देते थे कि ऐसे-ऐसे नहीं करना चाहिए। बीच-बीच में उसकी तरफ़ ध्यान भी रखते थे कि वह समझा या नहीं, समझ लिया तो ठीक है नहीं तो कुछ बहनें जो आगे रहती थीं उनसे कहलवाते थे। बाबा में यह विशेषता थी कि हर बच्चे की नब्ज़ देखकर, उसकी शक्ति और योग्यता जानकर उसको चलाते थे। ज्ञान एक होते हुए भी बाबा हर आत्मा की योग्यता अनुसार ही शिक्षा और धारणा की बातें सुनाते थे। इस तरह बाबा से हमें हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।

ब्रह्माकुमार निर्वैर भाई

मैंने मम्मा के साथ छह साल व बाबा के साथ दस साल व्यतीत किये। उस समय मैं भारतीय नौसेना में रेडियो इंजीनियर यानी इलेक्ट्रोनिक इंजीनियर था। मेरे नौसेना के मित्रों ने मुझे आश्रम पर जाने के लिए राजी किया था। वहाँ बहनजी ने बहुत ही विवेकपूर्ण और प्रभावशाली तरीके से हमें समझाया। चार दिन बाद हमें योग करवाया। योग का अनुभव बहुत ही शक्तिशाली व सुखद था क्योंकि हम तुरंत फरिश्ता स्टेज में पहुँच गये थे।

सेमी-ट्रांस का अनुभव

शुरू में हमें यह अद्भुत-सा लगा कि योग में आँखें खोलकर, भकुटि के बीच में कैसे देखें और मुझे काफी संकोच-सा हुआ परन्तु दो मिनट बाद जब जादुई मंत्र - "मैं एक पवित्र आत्मा हूँ, शान्त स्वरूप आत्मा हूँ व मेरा संबंध परमपिता परमात्मा से है", की पुनरावृत्ति हुई तो मेरा मन बहुत शांत हो चुका था और मेरे लिए यह एक बहुत मीठा अनुभव था। मुझे तो ऐसा लगा कि पूरा कमरा सफेद लाइट से भर गया है। कारपेट भी जो लाल रंग का था, सफेद नजर आने लगा। यह मेरे लिए एक सेमी-ट्रांस का अनुभव था। सेवाकेन्द्र में जाते लगभग चार सप्ताह ही हुए थे कि मम्मा के वहाँ आने का सौभाग्य हमें मिला। हमें उनकी मुम्बई की यात्रा का पूरा-पूरा लाभ मिल सके, उसके लिए उनके विशेष प्रवचनों का प्रबन्ध करवाया गया। प्रत्येक शाम 5 से 6 बजे तक मम्मा की क्लास हुआ करती थी। मम्मा के मुंबई में रहने से हमारी नींव बहुत मजबूत हो गयी। मम्मा क्लास सीधा नहीं शुरू करवाती थीं। मुरली के पहले योग हुआ करता था जो अपने आप में एक मधुर अनुभव था। हम लोग मम्मा से पूछा करते थे कि आप हमारे मन के प्रश्नों को कैसे जानती हैं। वे कहती थीं कि मैं तो सिर्फ योग में बैठती हूँ और जो भी मेरे मन में आता है उसे बोल देती हूँ। मुझे यह ज्ञान इतना रमणीक लगा कि मुझे जो कोई भी मिलता था, मैं उससे पूछा करता था कि आपको मन की शांति अनुभव करने की इच्छा है? आप आत्मा व परमात्मा के बारे में जानने के इच्छुक हैं? प्रायः जवाब 'हाँ' ही होता और चूंकि सेवाकेन्द्र पास में ही था, मैं उनको इन्चार्ज बहन जी से मिलवाता था। इस प्रकार एक मास में करीब 40 स्टूडेण्ट हो गये थे और 8 सीनियर स्टूडेण्ट हो गये थे।

बाबा के प्रेम-पत्र

ये सब समाचार बाबा को पत्र द्वारा भेजे जाते थे। उन दिनों डाक विभाग की सेवा बहुत अच्छी थी। प्रति शाम मुम्बई से पत्र लिखा जाता था और अगले दिन मधुबन में मिल जाता था। रोज़ कोई न कोई रेल में जाकर पत्र छोड़ आता था। दूसरी तरफ, बाबा का भी मुरलियों द्वारा पत्र-व्यवहार बहुत अच्छा चलता था। मैं बाबा को रोज़ पत्र लिखा करता था। हम दोनों ने आपस में ऐसे पत्र लिखना शुरू कर दिया जैसे कि प्यार होने पर कोई आपस में लिखते हैं। बाबा अपनी कहानियाँ लिख कर मुझे प्रेरित करते थे और मैं बाबा को लिखे बिना रह नहीं सकता था। यदि मैं दो पेज लिखता था तो बाबा मुझे चार पेज लिखा करते थे और मैं यदि चार पेज लिखता तो बाबा छह। बाबा के पत्रों में नई मुरलियों के प्वाइंट हुआ करते थे। इस तरह पिताश्री हम बच्चों की ज्ञान-रत्नों से पालना किया करते थे ताकि हमारा आध्यात्मिक पुरुषार्थ बढ़ सके।

बाबा से प्रथम मिलन

सन् 1959 में (ज्ञान में चलने के 6 मास बाद) मेरा पहली बार मधुबन आना हुआ। मुझे ब्रह्मा बाबा के द्वारा शिवबाबा से सम्मुख मिलन मनाना था। बाबा से यह मुलाकात इतनी प्रेरणादायक व प्रभावशाली थी कि मैंने अपने भविष्य का निर्णय उसी वक्त ले लिया था। जब हम बाबा के कमरे में गए तो हमने देखा कि बाबा एक गद्दी पर बैठे हैं और दूसरी तरफ मम्मा बैठी हुई हैं। वहाँ कोई बोलने की बात थी नहीं अतः गहन शांति और बाबा की शक्तिशाली दृष्टि ने मुझे एकदम अशरीरी बना दिया और मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मैं इस दुनिया से दूर कहीं जा रहा हूँ। बाबा के मुख-मण्डल से शांति के प्रकम्पन व लाल प्रकाश की किरणें निकलने का मुझे स्पष्ट अनुभव हो रहा था। यह शक्तिशाली अनुभव किसी भी दुनियावी अनुभव से अलग था। करीब छह-सात मिनट तक मेरा और बाबा का मन ही मन वार्तालाप चलता रहा। मुझे संकल्प आ रहे थे कि हाँ बाबा, आप अब इस दुनिया को परिवर्तित करने के लिए आ गये हैं। अब तो मैंने आपको साकार में सम्मुख देख लिया है और मेरा यह बाकी जीवन आपको ही समर्पित है। कुछेक क्षणों बाद मुझे ऐसी खींच हुई कि मैं बाबा की गोद में जाकर बैठ गया। बाबा मुरली में कहते भी हैं कि जब तक बच्चे बाबा की गोद नहीं लें, वर्सा प्राप्त नहीं कर सकते। वर्सा तो सभी ब्रह्मा-वत्सों को मिलता है परन्तु यह मेरे लिए साकार बाबा द्वारा संगम का वर्सा था।

मन लालायित था बाबा को सुनने के लिए

मैं बाबा से मिलकर बेहद खुश था। बाबा ने हमसे पूछा कि क्या यात्रा सकुशल व आरामदायक रही? वास्तव में बाबा क्या बोले, यह महत्वपूर्ण नहीं था परन्तु बाबा की आवाज सुनने को मन बेहद लालायित था। उन दिनों टेप द्वारा रिकार्डिंग व वीडियो जैसे साधन नहीं थे। अमृतवेले योग भी नहीं हुआ करता था। सुबह 5:45 पर योग होता था व 6 बजे मुरली शुरू होती थी। क्लास पूरा होने पर हम बाबा व मम्मा से, मम्मा के कमरे में मिलते थे। चूंकि हम बहुत ही कम स्टूडेण्ट थे, हमें रोज़ बाबा से बहुत ही शक्तिशाली दृष्टि मिल जाती थी। सोचना भी नहीं पड़ता था। सेकण्ड में नशा चढ़ जाता था और हम खुशी से नाच उठते थे। बाद में हम भोजन पर अथवा पिकनिक पर जाते थे। कभी-कभी बैडमिन्टन खेलते थे।
बाबा कहते थे कि ईश्वरीय जीवन का यह मतलब नहीं है कि हर समय पढ़ते ही रहो, इसका खेल के साथ संतुलन होना चाहिए। शाम को आठ बजे से पौने नौ बजे तक क्लास हुआ करती थी। शुरू में मम्मा वत्सों की रूहानी अवस्था के समाचार पूछती थीं और यह भी पूछती थीं कि आपसे कोई गलती तो नहीं हुई ? बाबा के आने के पहले करीब 10 मिनट तक मम्मा संबोधित करती थीं।

समय पर दिए सहयोग का बाबा को गहरा अहसास

सन् 1959 में ही बाबा का मुम्बई आना हुआ। एक सज्जन ने बाबा को एक सुंदर अपार्टमेण्ट, जो मुम्बई के अच्छे इलाके में स्थित था, जब तक चाहें रहने को दिया। इस अवसर पर मैंने नेवी से छुट्टी लेकर कुछ दिन मुम्बई में बाबा के साथ बिताने का निश्चय किया। छठे दशक के प्रथम वर्षों में यज्ञ आर्थिक रूप से बड़े ही कठिन दौर से गुज़र रहा था और एक दिन ऐसा भी आया कि भण्डारी में सिर्फ पच्चीस पैसे ही रह गए थे। भोजन खाने वाले काफी लोग थे। तो निमित्त बहन ने बची हुई धनराशि के बारे में बाबा को अवगत कराया। बाबा ने तुरंत कहा कि चिन्ता मत करो, केवल ग्यारह बजे तक इन्तजार करो। ग्यारह बजे डाक आया करती थी। बाबा का विश्वास इतना पक्का था कि वे हमेशा कहा करते थे कि यज्ञ शिवबाबा का है, ब्रह्मा बाबा का नहीं। शिवबाबा ने ही इसको बनाया है, उन्हीं को इसका संचालन करना है, हमको कोई चिन्ता नहीं है। जब डाक आयी तो उस दिन एक हजार रुपये मनीआर्डर से आये। बाबा ने दिल से शुक्रिया अदा किया उस आत्मा का जिसने ऐसे वक्त में अपने धन को सफल किया। मुझे याद है कि वह एक बाँधेली बहन थी जो कि मुम्बई में रहती थी। बाबा समय पर सहयोग देने का रिटर्न कई गुणा देते थे। जब उस माता का युगल सुबह घूमने जाता था तो वो बाबा को फोन लगाती थी और बाबा उसे फोन पर मुरली सुनाते थे। कभी-कभी तो 45 मिनट भी फोन पर लग जाते थे। कुछ भाई-बहनें नियमित रूप से इस टेलिफोन क्लास के नोट्स लेते थे। हम सभी भी नोट्स लेते थे। आवश्यकता के समय दिये सहयोग का बाबा को गहरा अहसास था।

बाबा ने ज्ञान-दान करना सिखाया

बाबा कहते थे कि बच्चे, जब तक कोई ईश्वरीय सेवा नहीं करो, तब तक आपको नाश्ता नहीं करना चाहिए। तो मैं मुरली खत्म होने के बाद पास के पार्क में सेवा के लिए जाया करता था। एक बार मैंने किसी आत्मा को त्रिमूर्ति के बारे में समझाया परन्तु जल्दबाज़ी में गोलमाल करके समझाया। जिसको ज्ञान समझाया, वो क्रिश्चियन थी। उसने ब्रह्मा बाबा की तरफ संकेत करके पूछा कि ये कौन व्यक्ति हैं। मैंने ब्रह्मा, विष्णु व शंकर का परिचय दिया और कहा कि ब्रह्मा के द्वारा परमात्मा नई दुनिया की रचना करते हैं परन्तु उस बहन की बुद्धि में यह स्पष्ट नहीं हुआ कि यह कार्य अभी ही हो रहा है। जब मैं वापस बाबा के पास आया, तो रोज़ की भाँति, ज्ञान-चर्चा के दौरान जो हुआ वो बाबा को बताया। बाबा सुनकर, ज्ञान कैसे देना चाहिए, यह हमें समझाते थे। इस बात को मैंने जब बताया तो बाबा ने कहा कि तुम्हें बोलना चाहिए था कि सर्वोच्च परमपिता परमात्मा अब ब्रह्मा बाबा के द्वारा ज्ञान दे रहे हैं और यदि तुम ऐसा कहते तो वह आत्मा बाबा से वर्से का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त कर लेती। मैंने बाबा से क्षमा चाही और अगले दिन एक अन्य बुजुर्ग भाई ने जब यही प्रश्न पूछा तो मैंने ब्रह्मा बाबा का स्पष्ट परिचय देते हुए कहा कि अब इन्हीं के द्वारा परमात्मा ज्ञान सुना रहे हैं। उसने पूछा कि बाबा अब कहाँ हैं? मैंने कहा कि मुम्बई में ही है, तो उस आत्मा ने बाबा से मिलने की इच्छा जाहिर की। मैंने कहा कि बाबा से समय लेकर अगले दिन आपको बता देंगे। अगले दिन शाम को वह बाबा से मिलने आया। बाबा ने उसको पास बिठाया और कहा कि आप भी बाबा की तरह ही हो, एकदम पिता की तरह। बाबा का तन भी पुराना है और आपका तन भी बाबा की तरह पुराना है। साधारणतया गुरु लोग अपने चेलों आदि को पास में नहीं बिठाते परन्तु बाबा ने उसे पास बिठा कर इस बात का अनुभव करवा दिया कि हम दोनों ही ईश्वर के बच्चे हैं। बाबा ने उसे ज्ञान समझाया और उस दिन से वह रोज़ क्लास करने लगा।

ईश्वरीय सेवा में पूर्ण समर्पण की इच्छा

एक बार मैंने बाबा को लिखा कि मैं दो मास के लिए खाली हूँ, आप मुझे सेवा के लिए कहीं भी भेज सकते हैं। साथ ही यह भी लिखा कि मैं एक सेवाकेन्द्र खोलना चाहता हूँ। बाबा जानते थे कि यदि यह कोई सेवाकेन्द्र खोल लेगा तो बंध जाएगा, तो बाबा ने लिखा कि सेवाकेन्द्र खोलने की चिन्ता मत करो। यह कार्य तो अन्य लोग भी कर लेंगे। तुम केवल उनकी संभाल करो जो पहले से खुले हुए हैं। मुझे अब यह अनुभव होता है कि बाबा मेरे भविष्य के बारे में जानते थे और मुझे बंधन-मुक्त रखना चाहते थे। मैने अपने लौकिक कार्य का इस तरह से प्रबन्धन किया कि मैं सप्ताह के बीच में एक दिन व सप्ताह के अंत में अलौकिक सेवा के लिए समय निकाल लेता। बाबा समाचार-पत्रों की सेवा करने की बहुत युक्तियाँ बताया करते थे इसलिए मैने छुट्टी के समय समाचार-पत्रों के दफ्तरों में जाकर वहां के लोगों से दोस्ती करना शुरू कर दिया। शनिवार को हम लोग पार्क व पर्यटन की विशेष जगहों पर पर्चे बाँटने जाते थे। रविवार को हमें भक्त आत्माओं की सेवा के लिए मन्दिरों में जाना होता था। बाबा कहते थे कि श्री श्री शिव, श्रीकृष्ण व श्रीलक्ष्मी श्रीनारायण के मन्दिर में हमें दैवी घराने की आत्माएँ मिल सकती हैं। धीरे-धीरे मुझे ऐसा लगने लगा कि मुझे इतना ही नहीं परन्तु पूरा ही समय ईश्वरीय सेवा में देना चाहिए। उन छुट्टियों में मेरा सेवा के निमित्त जयपुर जाना हुआ। यह अपने आप में एक श्रेष्ठ अनुभव था। लौटते वक्त मैं मम्मा व बाबा से मिला और मैंने लौकिक कार्य छोड़ने की इच्छा ज़ाहिर की जिससे कि मैं पूरा ही समय ईश्वरीय सेवा में दे सकूँ। मम्मा ने कहा कि यह बहुत अच्छा ख्याल है। एक व्यक्ति को जीवन में चाहिए ही क्या? दो कपड़ों के जोड़े व दो समय भोजन, जो यज्ञ से मिल सकता है।

कर्म-खाता चुक्ता करने के लिए 8 घन्टे योग

मैंने सन् 1963 में नेवी छोड़ने का आवेदन दिया। बाबा ने मुरली में कहा था कि यदि आप रोज़ाना आठ घण्टे योग करते हो तो आप अपने कर्मों के हिसाब- किताब को पूरा चुक्ता कर सकते हो। मैंने इसका प्रयोग शुरू किया और रोज़ सुबह आठ से बारह बजे तक व शाम को चार से आठ बजे तक योग लगाना शुरू कर दिया। दोपहर के समय मैं मुरली को अन्य भाषाओं में लिखकर बुजुर्ग माताओं को मदद करता था। इस प्रयोग का मुझे सुखद फल मिला और मुझे नेवी से छुट्टी मिल गई। नौकरी छोड़ने के बाद करीब तीन मास तक मुझे बाबा के अंग-संग रहने का अवसर मिला और साथ ही साथ दादा विश्वकिशोर से समय प्रति समय मार्गदर्शन मिलता रहा।

पवित्रता की सहज धारणा

बाबा विशेष अवसरों पर अक्सर सौगात दिया करते थे। यही वज़ह है कि आज भी मधुबन में कोई आता है तो सौगात अवश्य प्राप्त करता है। एक समय की बात है कि एक बहन अपने युगल के साथ बाबा से मिलने मधुबन आई। यद्यपि वो भाई उस बहन को विशेष सहयोग नहीं देता था फिर भी युक्ति से वह उस भाई को बाबा के पास मधुबन ले आई थी। बाबा उस भाई से मिले और लक्ष्मी-नारायण का चित्र जो सौगात के लिए बनाया गया था, उसे अपनी ठोड़ी के नीचे बड़े प्यार से पकड़कर समझाते हुए बोले, "मीठे बच्चे, बाबा आप साधारण बच्चों को लक्ष्मी- नारायण जैसा पूज्य बनाने आए हैं, क्या तुम ऐसा बनना चाहोगे?" उसने जवाब दिया, "हाँ बाबा, आप मदद करेंगे तो मैं अवश्य बन जाऊँगा।" बाबा ने कहा, "केवल इसी लिए बाबा आए हैं परन्तु इसके लिए आपको पवित्रता की शपथ लेनी पड़ेगी, क्या आप लेंगे?" उसने कहा, "हाँ बाबा, मैं अवश्य लूँगा।" बाबा ने तुरंत राखी मँगवाई और एक बहन ने उसको पवित्रता की राखी बाँध दी। उसके बाद बाबा ने लक्ष्मी-नारायण का चित्र सौगात में दिया। ये भाई और उनकी युगल अभी भी मधुबन में आते हैं और कहते हैं कि उसके बाद उनके जीवन में पवित्रता की धारणा सहज ही हो गयी। बाबा अब भी बच्चों की सेवा में उपस्थित
जब से मैं मधुबन में हूँ, मुझे यह करीब से देखने का सौभाग्य मिला है कि कैसे दादी जी ने बाबा से जिम्मेदारी ली और कदम-कदम बाबा से श्रीमत ली। जब पहली बार 21 जनवरी, 1969 को अव्यक्त बापदादा आए तो बाबा ने कहा कि शरीर को छोड़ना मात्र कमरा बदलने के बराबर है। बाबा ने कहा कि बाबा बच्चों की सेवा में अभी भी उपस्थित हैं जैसे पहले थे और यह कभी नहीं सोचना है कि बाबा चले गए हैं। बाबा ने हमें यह विश्वास दिलवाया कि जब तक संगमयुग है, बाबा साथ है, केवल बाबा के रूप का परिवर्तन हुआ है। जब भी आप बाबा के कमरे में बाबा की ट्रांसलाइट की तरफ देखेंगे तो अहसास होगा कि साकार बाबा हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

ब्रह्माकुमार रमेश भाई

मेरा परिचय प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के साथ विचित्र संयोगों में हुआ था। मेरे लौकिक पिता की अचानक मृत्यु के कारण लौकिक माता सदा उदास रहती थी। मैंने यथाशक्ति तीर्थ यात्राओं, गुरुओं के दर्शनों आदि के द्वारा उनकी उदासी दूर करने के प्रयास किये किन्तु सफलता नहीं मिली।

माताजी के मुख पर देखी सुख-शान्ति की छाया

सन् 1952 के जून मास में मैंने देखा कि माताजी के मुख पर फिर से सुख- शान्ति की छाया उमड़ी है, जो दीर्घकाल अर्थात् एक मास से भी ज्यादा समय रही है। मैंने उसका रहस्य पूछा। उन्होंने बताया कि ब्रह्माकुमारी बहनों के सत्संग में राजयोग का अभ्यास सीखा है जिसमें 'मैं एक आत्मा हूँ, परमपिता परमात्मा की संतान हूँ', यह अनुभव होता है और दुख, भय आदि दूर होते हैं। तब मेरे मन में भी उत्कंठा जागी कि मैं इन बहनों से और इनको ज्ञान देने वाले महात्मा (तब तो यही भावना थी) से मिलूँ।

सन्देशी को हो गया दिवंगत पिताजी की आदत का ज्ञान

सितम्बर मास आया, श्राद्ध के दिन थे। लौकिक पिता के श्राद्ध के निमित्त पहली बार मेरा सेवाकेन्द्र पर जाना हुआ। निश्चित समय पर बहन जी (जिन्हें दिव्य दृष्टि का वरदान प्राप्त था) संदली पर बैठी और बुद्धियोग बल से सूक्ष्मवतन में गई। केवल 5-7 मिनट में ही वे वापस आकर कहने लगीं कि बाबा कहते हैं, "जिस आत्मा के प्रति भोग लग रहा है, उसे पान-सुपारी खाने की आदत थी। एक छोटी थाली में, अलग से भोजन तथा पान-सुपारी रखकर लाया जाये।" संदेशी बहन ने मुझसे पूछा कि क्या आपके पिताजी को पान-सुपारी खाने की आदत थी। मैंने हाँ कहा और सोचने लगा कि इस बात का ज्ञान इन बहन जी को कैसे हुआ? इन्हें यह शक्ति किसने दी?

सन्देशी ने पहचाना पिताजी के फोटो को

दो दिन के बाद मैंने उन संदेशी बहन जी को घर पर आने का निमंत्रण दिया और दो-तीन हज़ार फोटोग्राफ्स के बीच लौकिक पिता जी का भी एक फोटो रख दिया। मैंने उनसे कहा कि आप इन फोटोज़ को देखिए। बहन जी फोटो देखने लगीं। मेरे लौकिक पिता जी के फोटो को पहचान कर उन्होंने मुझसे पूछा, "यही आपके लौकिक पिता जी का फोटो है ना?" मैने हाँ कहा और पूछा कि आपने कैसे पहचाना? उन्होंने उत्तर दिया, "क्यों नहीं पहचानूँगी, दो दिन पहले भोग के समय पर सूक्ष्मवतन में मैं उन्हें मिली थी और उनका संदेश भी आपको दिया था।"

पिताश्री से प्रथम मिलन

मैं सोच में पड़ गया कि यह सूक्ष्मवतन क्या है, वहाँ जाने की शक्ति इन्हें किसने दी और इस ज्ञान को देने वाले बाबा कौन हैं, मुझे उनके दर्शन ज़रूर करने ही है। दो वर्ष के बाद एक दिन अचानक लौकिक माता जी से समाचार मिला कि पिताश्री ब्रह्मा बाबा इलाज के लिए मुम्बई अस्पताल में पधारे हैं। उसी दिन शाम को मैं अस्पताल में पहुँच गया। जिज्ञासा और उत्सुकता से भरी मिलन की वह घड़ी थी। पिताश्री जी की शान्त मुद्रा, उन्नत भाल, तेजस्वी मुखारविंद, अनुपम स्नेहयुक्त नेत्र तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व मनमोहक था। वे बिस्तर पर लेटे हुए थे। एक सेकण्ड में अजंता-एलोरा की गुफाओं में अंकित, शिला पर सोये महात्मा बुद्ध की मूर्ति याद आई। दो मिनट तक मैंने मीठी दृष्टि ली। मैं उनको उनके स्वास्थ्य के बारे में कुछ पूछूँ, उससे पहले ही वे कहने लगे, "आओ मीठे बच्चे, देखो बाबा भी तुम्हें मिलने का इंतजार कर रहे थे और यह मिलन पहली बार नहीं, हर कल्प हुआ है और फिर भी होता रहेगा।" इस प्रकार उनके मुख से ज्ञान-गंगा बहती रही। बीमारी का कोई नाम-निशान नहीं, अस्पताल का कमरा भी सेवाकेन्द्र का कमरा लग रहा था। मैं भी शान्तचित्त, एकाग्रमन से उनकी अमृतवाणी सुन रहा था। बाद में उन्होंने टोली (प्रसाद) दी। प्रसाद स्वीकार करके मैने विदाई ली। पिताश्री के उस अप्रतिम शान्तियुक्त व्यक्तित्व की अविस्मरणीय छाप मेरे मन में अंकित हो गई।

पिताश्री के नेत्रों में सदा वात्सल्य भाव

पिताश्री जब अस्पताल से छुट्टी लेकर आ गये तब भी मेरी उनसे मुलाक़ात हुई और हर क्षण उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ती गई। पिताश्री की आँखों में सदा ही हम बच्चों के प्रति वात्सल्य भाव छलकता था। पवित्रता, विकारों पर विजय तथा तीव्र पुरुषार्थ की बातों पर वे बहुत ही स्पष्ट रूप से ज्ञान देते थे। लगता था कि उनकी अमृतवाणी हमारे पत्थर जैसे दिल को पिघला कर वहाँ देव-मूर्ति अंकित कर रही है। भक्ति मार्ग में मैंने सुना था कि सम्पूर्ण बन, मुक्ति को पाने के लिए कम-से-कम पाँच-सात जन्म का सतत् तीव्र पुरुषार्थ चाहिए परन्तु मुझे आश्चर्य होता था कि पिताश्री जी के ज्ञान में ऐसी कौन-सी शक्ति है जो एक ही जन्म में मनुष्य से देवता बना देती है! इस समय तक मुझे उनके तन में विराजमान परमात्मा शिव की पहचान नहीं हुई थी। बाद में पिताश्री जी आबू चले गये और मेरा इस विश्व विद्यालय के साथ कभी-कभी मिलने का और ज्ञान-चर्चा करने का सम्पर्क रहा।

पिताश्री के लिए निमंत्रण-पत्र

सन् 1957 में एक दिन प्रातः भोजन के समय लौकिक माता जी ने मुझसे कहा कि उनकी इच्छा है कि पिताश्री और मातेश्वरी जी को मुम्बई पधारने का निमंत्रण दिया जाये। तब फौरन मेरे मन में पिताश्री जी की मूर्ति साकार हो उठी और मुख से निकला, " क्यों नहीं, ज़रूर बुलाइये।" तब माता जी ने कहा कि निमंत्रण देने का अर्थ समझते हो? मैंने कहा, "हाँ, उनके आबू से आने-जाने का तथा रहने आदि का तमाम खर्च करना पड़ेगा। यह कोई बड़ी बात नहीं है।" पाँच-सात दिन के बाद लौकिक माता जी ने मुझे बताया कि पिताश्री, माता जी के निमन्त्रण पर नहीं आयेंगे किन्तु यदि रमेश बच्चा निमंत्रण देगा तो वे अवश्य आयेंगे। मैंने माता जी को कहा, "भले ही आप निमंत्रण पत्र लिख कर लाओ, मैं उस पर हस्ताक्षर करूँगा।" माता जी ने कहा कि निमंत्रण भी अपने ढंग से आप स्वयं लिखो। मैंने कहा, "पिताश्री एक बहुत बड़ी विभूति हैं इसलिए उन्हें यथासम्भव सुन्दर शब्दों और सुन्दर भाषा से सुसज्जित, अलंकृत, मनोहर कागज पर सुन्दर रीति से छपा हुआ निमंत्रण भेजना चाहिए। मेरे पास आपके ज्ञान के मीठे शब्दों का भण्डार नहीं है जो मैं ऐसी दिव्य विभूति को अपने हाथों लिखा निमंत्रण-पत्र भेज सकूँ।" तब माता जी ने सेवाकेन्द्र से एक बहुत ही सुन्दर निमंत्रण-पत्र बनवाया जिस पर मैंने हस्ताक्षर करके उसे पोस्ट कर दिया।

मुझे ईश्वरीय महावाक्य सुनाने की पिताश्री की युक्ति

थोड़े ही दिनों में पिताश्री और मातेश्वरी जी मुम्बई पहुँच गये। स्टेशन पर दोनों दिव्य विभूतियों के स्वागत सत्कार का सुअवसर मुझे मिला और फिर मोटर में बिठा कर निर्धारित निवास स्थान पर उन्हें ले गया। पिताश्री जी की अमृतवाणी भी उस समय सुनी और फिर मैंने समझा कि अब मेरा कार्य समाप्त हो गया है। अगले दिन से प्रातः क्लास में जाना बंद कर दिया। तीन-चार दिन के बाद मेरी लौकिक माता चिन्तित मुख से आश्रम से वापस लौटी और कहने लगी कि पिताश्री जी तो मधुबन वापस जा रहे हैं क्योंकि उन्हें निमंत्रण देने वाला (मैं रमेश) तो क्लास में आता नहीं है, बाबा मुरली किसको सुनाये। मुझे सुनकर हँसी आई और मन में सोचा कि पिताश्री बहुत चतुर हैं, मैं क्लास में रोज़ आऊँ और उनकी निर्मल वाणी सुनूँ इसलिए उनकी यह युक्ति है। दूसरे दिन से ही मैं सुबह पिताश्री जी से मिलने और मुरली सुनने जाने लगा। शाम को भी अपनी मोटर द्वारा उन्हें इधर-उधर घुमाने ले जाने लगा तथा चौपाटी की ठण्डी हवाओं में विचारों की लेन-देन करने का सुनहरा मौका भी मुझे मिला। तब तक पिताश्री जी को मैं लौकिक माता के गुरु के रूप में ही मानता था।

अनुभव सुनकर सच्चाई जानने का प्रयत्न

समय बीतता गया। पिताश्री जी और मातेश्वरी जी साढ़े चार मास तक मुम्बई में रहकर वापस गये। तब रोज़ उन्हों की मधुर शिक्षाएँ सुनने का अभ्यास हुआ। ज्ञान की बातें थोड़ी-थोड़ी दिल में उतरने भी लग गईं। पिताश्री जी को मिलने के लिए भारत के विभिन्न सेवाकेन्द्रों से अनेक भाई-बहनें आते थे, उन्हें मैं अपने लौकिक घर पर आने का निमंत्रण देता था और रात्रि को दो-ढाई बजे तक उनके अनुभव सुनता था। उनके अनुभवों की सच्चाई और गहराई जानने का ईमानदारीपूर्वक प्रयत्ल करता था जिससे मुझे अनुभव होता था कि वे सब भक्तिमार्ग के ज्ञान पण्डित नहीं थे परन्तु गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ के समान उनकी जीवन की धारणायें थीं। मुझे लगता था कि मैं पण्डितों की तरह बहस करने पर भी जीवन में स्थायी परिवर्तन, आनन्द, सुख-शान्ति की प्राप्ति की अनुभूति से वंचित ही हूँ।

आबू में प्रथम आगमन

थोड़े वर्षों के बाद पिताश्री जी फिर मुम्बई में आये। उस समय लौकिक रूप में विवाह सम्पन्न होने के कारण मेरी जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं थीं। लौकिक माता जी ने मेरी लौकिक युगल ऊषा को तीन-चार बार पिताश्री जी से मिलवाया था। बाबा ने उन्हें भी आबू पधारने का निमंत्रण दिया था। बाबा एक कुशल मनोवैज्ञानिक भी थे जिस कारण सामने वाले के मन के भावों को समझ करके अनुकूल शब्दों का प्रयोग करते थे। इस विश्व विद्यालय के संचालन की बहुत भारी जिम्मेवारी उनके सिर पर थी फिर भी कभी भी वे किसी प्रकार के तनाव में नहीं आते थे और न ही किसी प्रकार की उत्तेजना उनकी वाणी या व्यवहार में दिखाई पड़ती थी। उनका व्यवहार सबके मन पर छा जाता था और मिलने वाला व्यक्ति एक अमिट छाप लेकर ही वापस जाता था। जून, 1961 में हम सबका पहली बार माउण्ट आबू जाना हुआ। पहले मेरा लौकिक परिवार गया और उसके थोड़े समय बाद मैं भी आबू गया। करीब दो सप्ताह पिताश्री जी के साथ रहने और उनके जीवन को नज़दीक से समझने का मौका मिला। हमने पिताश्री जी के जीवन में आलस्य या अन्य कोई भी विकार कभी नहीं देखे। उम्र में छोटा हो या बड़ा, सबके साथ वे ईश्वरीय प्रेम के आधार पर व्यवहार करते थे।

सजल नेत्रों ने नया जन्म दिया

जिस दिन हम मधुबन से मुम्बई लौटने वाले थे उसी दिन बाबा ने मुरली में मोहजीत बनने की सुन्दर शिक्षा और धारणायें सिखाई। दोपहर बारह बजे विदाई के समय वरिष्ठ बहनों ने हमसे पूछा कि आप पिताश्री जी के बारे में क्या भाव रखते हो? "मैंने कहा, पिताश्री जी मेरी माता जी के गुरु हैं और उसी भाव से मैं उनके प्रति श्रद्धा रखता हूँ।” थोड़े क्षणों के बाद विदाई की वेला आई। पिताश्री जी हम बच्चों को विदाई देने के लिए पिछले रास्ते से वट वृक्ष के नीचे तक आये। वह दृश्य आज भी सामने आता है। ग्रन्थों में वर्णित शकुन्तला, ऋषि कण्व के आश्रम से विदाई लेती है तब सभी आश्रम निवासी उन्हें मुख्य द्वार पर विदाई देते हैं। कण्व ऋषि की आँखों में प्रेम के आँसू आये थे। उसी प्रकार यहाँ भी पिताश्री जी के नेत्र सजल बने और उन्होंने जेब से अपना हस्त रूमाल निकाल कर नेत्रों को स्वच्छ किया। हमारा भी दिल प्रेम-भाव से भर आया और मैंने तुरन्त ऊषा को कहा, "पिताश्री जी की महानता तो देखो। आज प्रातः मुरली में उन्होंने मोह को जीतने की बात कही और अभी-अभी हम पर इतने ही प्रेम और करुणा की वर्षा कर रहे हैं। उनके ये सजल नेत्र हमारे लिए पतित पावनी गंगा के समान हैं और उसी गंगा जल ने हमारे मन के श्रद्धा-बिन्दु को टटोला है। सागर के 60 हज़ार भस्मीभूत हुए पुत्रों को जैसे भागीरथ की जटाओं से निकली भागीरथी ने पुनर्जन्म दिया उसी प्रकार इस चैतन्य भागीरथ के कमल-नयन से निकली प्रेम-गंगा ने हमारे मन के अन्दर सोई हुई और खोई हुई ईश्वरीय स्मृति को पुनर्जीवित कर दिया है। पिताश्री जी के ज्ञान को क्यों नहीं हम जीवन में धारण करने का प्रयत्न करें। शक्कर और नमक के भेद को समझने के लिए अनुभव की जीभ ही काफी है। अन्य सब चर्चा व्यर्थ है। आज तक हमने व्यर्थ चर्चा में समय बिगाड़ा है। क्यों नहीं हम पिताश्री जी को जीवन की प्रयोगशाला में प्रयोग करके देखें।" घर पहुँच कर हमने ऐसा ही किया और हमें तुरन्त ही इस नवीन ज्ञान तथा ज्ञान-दाता परमपिता परमात्मा शिव के माध्यम पिताश्री जी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। हमने नवीन जन्म तथा श्रद्धा से प्रज्वलित अपनी मनोभावना पिताश्री के समक्ष पत्र द्वारा स्पष्ट की। पिताश्री जी के रोज़ पत्र आने लगे। नई कोमल कलियों को माया रूपी चिड़िया खा न जाये इसलिए एक अच्छे बागवान की तरह बाबा हमें रोज़ पत्रों द्वारा मजबूत करने लगे।

कर्तव्य के प्रति श्रद्धा सीखी

अक्टूबर, 1961 में पिताश्री जी का पुनः मुम्बई में आना हुआ। दो मास तक हमें रोज़ प्रातः पिताश्री जी को हैगिंग गार्डन घुमाने ले जाने का अवसर मिला। इस बगीचे में कई लोग घूमने आते थे। एक बार एक प्रसिद्ध मिल के मालिक सीढ़ी चढ़ रहे थे, हमने उनकी मुलाक़ात पिताश्री जी से करवाई। उस मिल मालिक ने पिताश्री जी से पूछा कि आप क्या करते हो? पिताश्री जी ने बहुत ही स्नेहपूर्ण शब्दों में कहा कि मुझे शिव परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा का नाम दिया है और इस पुरानी सृष्टि को नई सृष्टि में परिवर्तित करने की जिम्मेवारी दी है। वही मैं इन बच्चों के सहयोग से कर रहा हूँ। वह मिल मालिक तो आश्चर्यचकित हो गया और कुछ बोल नहीं पाया। हमने भी पिताश्री जी की मुखमुद्रा की तरफ निहारा तो वहाँ, मैं कौन हूँ, मुझे क्या करना है और मेरे द्वारा परमात्मा पिता को क्या कराना है, उसकी स्पष्ट चित्र-रेखा दिखाई पड़ी। पिताश्री जी को अपने बारे में आत्मविश्वास अप्रतिम था और तब से मैंने भी मन में निश्चय किया कि हम भी अपना आत्मविश्वास तथा कर्तव्य के प्रति अपनी श्रद्धा कभी भी कम नहीं करेंगे।

बाबा का त्रिकालदर्शी रूप

एक दिन प्रातः जब हम बगीचे में थे तब एक संन्यासी वहाँ घूम रहे थे। उन्हें ज्ञान-दान देने के लिये ऊषा और हमको पिताश्री जी ने भेजा। सफलतापूर्वक उस संन्यासी को बाबा का संदेश सुना कर हम आये तब कहा, "बच्चे, जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ, बाबा तुम्हें विदेश में भेजेंगे। विदेश की सेवा अभी बहुत करनी है।" मैंने अपनी निर्मानता प्रदर्शित करने के लिये श्रद्धा भाव से कहा कि हममें वो योग्यता कहाँ जो हम विदेश जा सकें। तब मैंने पहली बार बाबा को निज़ स्वरूप की अथॉरिटी के साथ बोलते देखा। उन्होंने कहा, "बच्चे त्रिकालदर्शी कौन है, आप या मैं?" मैंने बाबा को कहा कि बाबा, त्रिकालदर्शी तो आप ही हो। हम तो आपके आगे कुछ भी नहीं हैं। तब बाबा ने कहा, "इसीलिए तो बाबा कहते हैं कि बच्चे जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ, तो आपको विदेश भेजेंगे। आप बच्चों को विदेश जाकर बहुत कार्य करना है।"

आध्यात्मिक चित्र प्रदर्शनी का निर्माण

जून, 1964 में हमें प्रेरणा मिली कि हम मुम्बई में अपने ज्ञान के चित्रों के प्रदर्शन द्वारा ईश्वरीय सेवा करें। पिताश्री जी ने उन चित्रों के बारे में अनेक प्रकार से मार्ग-दर्शन दिया। चौबीस अक्टूबर, 1964 के दिन जब पहली प्रदर्शनी मुम्बई में हुई तो बाबा ने उसका विस्तृत समाचार जानने हेतु मधुबन से फोन किया। बाबा ने सारे भारत के सभी महारथी भाई-बहनों को सेवा अर्थ भेजा। इसके पांच दिन बाद मातेश्वरी जी मुम्बई में पधारों और सभी भाई-बहनों की मीटिंग में उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी तो विहंग मार्ग की सेवा का अच्छा साधन है। दिसम्बर, 1964 में मुम्बई में हुए ईसाई धर्म के बड़े सम्मेलन में रोम से पहली बार मुख्य पोप पधारे। उस समय बाबा ने फिर से प्रदर्शनी करवाई और हम सबने मिलकर उसी समय राजयोग प्रदर्शनी के चित्र भी बनवाये जिनको देख करके विदेश में भी प्रदर्शनी द्वारा सेवा करने का शुभ संकल्प सभी को उत्पन्न हुआ।

ब्रह्माकुमार अमीर चन्द भाई

चण्डीगढ़ से ब्रह्माकुमार भ्राता ‘अमीर चन्द जी’ अपना अनुभव लिखते हैं कि सर्वप्रिय साकार बह्या बाबा से मेरी पहली मुलाकात पाण्डव भवन (मधुबन) में वर्ष 1959 के जून मास के पहले सप्ताह में हुई। उससे पहले मैं करनाल (हरियाणा) में सन् 1958 के अन्त में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सम्पर्क में आया था। मुझे वहाँ की शिक्षाओं को समझकर तथा उन्हें अपने व्यवहारिक जीवन में अपनाकर यह दृढ़ निश्चय हो गया था कि यह ज्ञान स्वयं निराकार ज्योति स्वरूप परमात्मा शिव साकार प्रजापिता ब्रह्मा के तन का आधार लेकर इस नरकमय सृष्टि को पुनः श्रेष्ठाचारी तथा सतयुगी बनाने के लिए दे रहे हैं। अतः इस धरा पर पुनः शीघ्र सतयुगी पावन सृष्टि का निर्माण होगा। यह दृढ़ विश्वास हो जाने पर साकार बाबा को सन्मुख मिलने की चाहना बहुत बढ़ गयी थी परन्तु उन दिनों वर्ष में एक या दो बार ही बहनें मधुबन आती थीं इसलिए मुझे तीन-चार मास तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। पत्रों के माध्यम से तो मैं साकार बाबा से अपने दिल की लेन- देन करता रहा।

वे स्नेह और शक्ति का अद्भुत मिश्रण थे

जब मैं मधुबन के लिए अपने सेवा-स्थान से चला तो मन की स्थिति बहुत ही विचित्र थी। यात्रा के दौरान यही तड़प थी कि कब वह सुहावनी घड़ी आये, जब मैं बाबा के सन्मुख पहुँचूँ। आखिर वह घड़ी भी आ गयी। मधुबन में प्रवेश करते ही असीम शान्ति का सुखद अनुभव होने लगा। उन दिनों का मधुबन बहुत छोटा-सा भवन था। स्नान आदि करके हम सभी प्यारे बाबा के कमरे की ओर बढ़े। कमरे में प्रवेश करते ही हमने देखा कि बाबा दो-तीन बहन-भाइयों से मुलाक़ात कर रहे थे। स्नेह का सागर उमड़ रहा था। बहन-भाइयों के नयनों में तो स्नेह की धारा बह रही थी, बाबा के नयन भी गीले दिखायी दिये। हम उनके पीछे बैठ गये। उनसे मिलने के बाद जब बाबा की दृष्टि हम बच्चों पर पड़ी तो मुझे लगा कि मेरे शरीर में एक बहुत शक्तिशाली करंट का प्रवाह बहने लगा है। शक्तिशाली अनुभूति कराने के बाद बाबा के नयनों से असीम स्नेह का आभास होने लगा। कानों में जैसे कोई बहुत धीरे से, मधुरता से कह रहा हो-’मीठे बच्चे, आराम से पहुँच गये? आओ बच्चे! आओ बच्चे!!’ ऐसे लगा जैसेकि अनेक जन्मों की प्रभु-मिलन की प्यास तृप्त हो रही हो। पल बीतते जा रहे थे परन्तु मेरे लिए स्वयं को रोकना कठिन होता जा रहा था। मुझे पता ही नहीं चला कि मैं अपने स्थान से कब उठा और बाबा की गोद में समा गया। स्नेह और शक्ति का अद्भुत मिश्रण था। बाबा का शरीर अति कोमल लेकिन उसके चारों ओर लाइट ही लाइट दिखायी पड़ रही थी। देह का भान समाप्त हो गया था। कुछ समय के बाद बाबा ने बहुत ही दुलार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे सचेत किया। नयन गीले, शरीर हल्का, आत्मा आत्म-विश्वास रूपी शक्ति से ओत-प्रोत थी।

बाप का घर सो बच्चों का घर

पहली बार मुझे 6-7 दिन बाबा के संग मधुबन में रहने का सुअवसर मिला। बहुत ही छोटा परिवार था। सारा दिन मम्मा-बाबा के संग ही बीतता था। कई बार भोजन भी बाबा के साथ करते थे। मुरली के समय भी सदा बाबा के सामने और समीप बैठने से ऐसा लगता जैसेकि मुरली चलाते समय बाबा मुझे ही देख रहा हैं। रात्रि को सोने के समय भी बाबा के कमरे के साथ ही हमारा कमरा होने के कारण एक छोटे-से परिवार की भासना आती थी। आखिर लौटने का समय आ गया। मन की स्थिति बदलने लगी, मन लौटने को तैयार नहीं था। ईश्वरीय सुखों को त्याग कर कौन पुरानी दुनिया में जाना चाहेगा? बहुत ही कठिनाई से मन को समझाते, अश्रुधारा बहाते बाबा से तथा मधुबन से विदाई ले आबू रोड रेलवे स्टेशन पर आ पहुँचे। मन उदास था। प्लेटफार्म पर बैठे-बैठे ही प्यारे बाबा को एक पत्र लिखा, "मीठे बाबा, मुझे ऐसा लग रहा है जैसेकि एक फूल अपनी डाली से दूर हो गया हो। आप से अलग होकर मेरी शक्ति क्षीण होती दिखायी देती है, मन उदास है..."। अपने सेवा-स्थान पर लौटने के कुछ ही दिनों के बाद बाबा का पत्र आ गया। बहुत प्यार से बाबा ने लिखा, "नूरे रतन अमीरचन्द बच्चे का पत्र पाया। यह फूल डाली से नहीं टूटा है, इस फूल को अपनी खुशबू फैलाने की सेवा अर्थ भेजा गया है। बाप का घर सो आपका घर है, जब चाहो आ सकते हो..."। प्यारे बाबा के ये शब्द मेरे लिए आज भी वरदान साबित हो रहे हैं। मुझे आज भी यही आभास होता है कि मधुबन मेरा घर है और मैं हर मास वहाँ सेवा के निमित्त जाता हूँ और 15-20 दिन के बाद पुनः लौट आता हूँ। मेरा कार्य खुशबू फैलाना है, अन्य आत्माओं को पुनः दिव्यगुण सम्पन्न बनाना है, यह सदा स्मृति में रहता है। इस आयु में भी मधुबन इतना आना-जाना अति सहज और सुखद अनुभव होता है। मधुबन में बाबा के कमरे में जाते ही वही स्मृतियाँ आने लगती हैं। बाबा की आवाज़ कानों में धीमे-धीमे यही बार-बार कहती है, ‘आओ बच्चे ! आओ बच्चे !! मीठे बच्चे, आराम से पहुँच गये?’

साकार बाबा का व्यक्तित्व अति प्रभावशाली और अति स्नेही था। समीप आने से अपनेपन की भासना आती थी। जब मैं पहली बार मधुबन आया था तब मेरी आयु 19-20 वर्ष की थी। एक दिन प्यारे बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने साथ ले चले। पाण्डव भवन के प्रत्येक कमरे में लेकर गये और बताया कि यह स्टोर है, यह भण्डारा है। स्टोर में भी क्या रखा है, बाबा दिखा भी रहे थे और सुना भी रहे थे। उस समय मुझे यह समझ में नहीं आया था कि इसके पीछे राज़ क्या है। अब मैं समझता हूँ कि बाबा मुझे महसूस करा रहे थे कि बाबा का यह स्थान सो मेरा अपना स्थान है और यहाँ की पूरी जानकारी होना मेरे लिए आवश्यक है।

फ़िकर मत करो, बाबा बैठा है!

मेरी ट्रान्सफर फरवरी 1968 में चण्डीगढ़ हो गयी थी। मई 1968 में मैं बाबा से मिलने तथा कुछ आवश्यक दिशा-निर्देश लेने मधुबन आया था। “प्यारे बाबा झोपड़ी में लेटे-लेटे मुझ से बात कर रहे थे। मैंने चण्डीगढ़ की सेवाओं का सारा समाचार सुनाया। बाबा बोले, चण्डीगढ़ राजधानी है। नया शहर बस रहा है। वहाँ ईश्वरीय सेवा का बहुत चान्स है। आगे चलकर आबादी बढ़ेगी। वहाँ पर एक अच्छा-सा संग्रहालय बनाना है। उसके लिए एक अच्छी कोठी किराये पर लेनी है, बहुत ही सुन्दर संग्रहालय बनेगा। बहुत-बहुत सेवा होगी।" यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैं जानता था कि वहाँ पर तो सेवाकेन्द्र का खर्चा भी ठीक से नहीं निकल रहा है। भाई-बहनों की संख्या भी बहुत कम है और बाबा कह रहे हैं कि वहाँ एक अच्छी कोठी लेनी है, संग्रहालय बनाना है। आँखों में आँसू देखकर बाबा उठकर बैठ गये, मुझे अपनी छाती से लगा लिया। बहुत प्यार किया और कहा कि इसका फ़िकर आप मत करो, बाबा बैठा है, सब प्रबन्ध बाबा करेगा। बस आप एक कार्य करो, अच्छी-सी कोठी देखो, किराये पर लेंगे और संग्रहालय बनायेंगे। विचित्र बात यह देखी कि मेरे चण्डीगढ़ लौटने से पहले ही बाबा ने बृजमोहन भाई, जो उन दिनों नंगल में लौकिक सेवा करते थे, उन्हें फोन किया और चण्डीगढ़ में संग्रहालय बनाने के लिए आदेश दिया। 18 जनवरी 1969 को बाबा नश्वर देह त्यागकर अव्यक्त फ़रिश्ता बन गये और अक्टूबर 1969 में चण्डीगढ़ में एक भव्य संग्रहालय का उद्घाटन हो गया। आज चण्डीगढ़ में 4000 वर्ग गज़ ज़मीन पर दो भव्य भवनों का निर्माण हो चुका है। सैकड़ों भाई-बहनें नित्य प्रति सेवाकेन्द्र पर आकर अपने जीवन को दिव्य बना रहे हैं तथा अनकों कार्यक्रम स्थानीय, ज़ोनल तथा राष्ट्रीय स्तर के होते रहते हैं यह सब देखकर प्यारे बाबा के बोल कानों में गूंजते हैं, ‘चण्डीगढ़ में बहुत सेवा होगी’।

सदा कम्बाइण्ड स्वरूप ही सामने रहता था

साकार बाबा के दिनों में मुझे तो सदा स्मृति में यही रहता था कि साकार बाबा के तन का आधार लेकर निराकार शिव परमात्मा सतयुगी दुनिया का पुनर्निर्माण कर रहे हैं। सदा कम्बाइण्ड स्वरूप ही सामने रहता था। फिर भी प्रातः मुरली के समय जब बाबा सभी को दृष्टि देते थे तो उस समय बहुत ही शक्तिशाली स्वरूप का अनुभव होता था। मुरली के बीच-बीच में भी कई बार ऐसा लगता था कि स्वयं निराकार सर्वशक्तिवान, पतित-पावन अपनी वाणी के माध्यम से हम बच्चों में शक्ति भर रहे हैं तथा हमें पुनः सशक्त बना रहे हैं। प्यारे बाबा में बहुत-सी ऐसी विशेषतायें मैंने देखीं जो अन्य किसी में नहीं देखीं। बाबा बहुत ही दृढ़ एवं निर्भय थे। स्वभाव मधुर एवं सरल था, ऊँची हस्ती परन्तु असीम निर्मानता, अद्भुत परख शक्ति एवं निर्णय शक्ति । स्पष्ट परन्तु सरल, सदा निमित्त भाव बाबा में देखा। करावनहार शिव बाबा है, अतः ब्रह्मा बाबा सदा स्वयं को निमित्त करनहार ही समझते थे।

देह-अहंकार को त्यागकर, सबके सामने अपनी भूल महसूस करना ही सच्चा प्रायश्चित है

यज्ञ-वत्सों से जब कभी कोई भूल हो जाती तो उनका मार्गदर्शन करने वाले प्यारे बाबा को मैंने एक कुशल सर्जन के रूप में देखा। वे एक ही झटके से सफल ऑपरेशन करते थे अर्थात् उनका संकल्प यही रहता था कि भूल करने वाला वत्स अपनी भूल सभी के सामने स्वीकार कर उस भूल को पुनः न करने का दृढ़ संकल्प ले। अतः बाबा किसी की भी भूल को छिपाने नहीं देते थे। उनका संकल्प यही रहा कि देह-अभिमान को त्याग कर प्रत्येक वत्स अपनी भूल को महसूस करे। ऐसे वत्स को बाबा अपार स्नेह एवं शक्ति का आभास कराकर पुनः शक्तिशाली स्थिति में स्थित कराते थे।

प्यारे बाबा के संग से उनके कुछेक गुण स्वतः ही स्वयं में भी अनुभव होने लगते थे। मैं स्वयं भी अपने में निर्भयता एवं निर्मानता का गुण अनुभव करता हूँ। स्पष्टता का गुण भी मुझे अति प्रिय है। किसी बात पर निर्णय लेना भी सहज लगता है। भेदभाव की दृष्टि नहीं। ऐसा लगता है सभी बाबा के हैं और सभी अपने हैं। स्वयं की स्थिति की ओर विशेष ध्यान रहता है। एकान्त भी बहुत अच्छा लगता है। अपना संगठन शक्तिशाली बना रहे यह संकल्प भी सदा ही रहता है।

जयन्ती दीदी

लन्दन से ब्रह्माकुमारी ‘जयन्ती बहन जी’ अपना ईश्वरीय अनुभव इस प्रकार लिखती हैं कि सन् 1957 में मैं पहली बार बाबा से मिली, तब मेरी आयु 8 वर्ष थी। उस समय बाबा मुझे ग्रैंडफादर नज़र आये और उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। बाबा ने मुस्कराते हुए मीठी दृष्टि दी। वही झलक मेरी बुद्धि में रह गयी। उसके बाद हम लन्दन चले गये ।

बाबा छोटे बच्चों को बेहद प्यार करते थे

सन् 1966 में हम दादी जानकी के साथ, पूना से बाबा को मिलने मधुबन आये। मधुबन आते ही ऐसे लगा कि मैं अपने घर वापिस आयी है। जब हम मुरली क्लास में बैठे तो बाबा ने कहा, बच्ची विदेश में जाकर सेवा करेगी और टीचर बन ज्ञान सुनायेगी। जब वहाँ पूछेंगे कि यह ज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ तो आप कहेंगी कि यह ज्ञान ‘माउण्ट आबू: से प्राप्त हुआ है और परमात्मा शिव आकर सुना रहे हैं, तो वे बहुत आश्चर्य खायेंगे । जब हम भारत से लन्दन वापस गये तो कुछ लोगों ने भाषण का निमंत्रण दिया। जब भाषण समाप्त हुआ तो उन्होंने पूछा कि यह ज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ है आपको ? मैंने बताया कि माउण्ट आबू से प्राप्त हुआ है और वही दृश्य मेरे सामने आया जब बाबा ने ऐसा कहा था।

मैंने बाबा में माँ का रूप भी देखा

एक दिन मैं मधुबन में रात्रि क्लास में बैठी थी। बाबा ने क्लास के बीच में ही पूछा, बच्ची, कुछ चाहिए? अगर कोई भी चीज़ की ज़रूरत हो तो बाबा से ले सकती हो। बाबा के यज्ञ में सब कुछ है, जो चाहे बाबा से लेना। मुझे ऐसे ही लगा कि जैसे माँ छोटे बच्चों को सम्भालती है। ऐसे बाबा का माँ का रूप भी देखा। क्योंकि मम्मा ने कुछ समय पहले ही शरीर त्याग किया था और बाबा ने माँ का रूप धारण किया हुआ था। साथ-साथ सूक्ष्म रूप से बाबा ने हमें अपना बनाया, वह भी तो माँ का ही सुन्दर रूप था। बाप के रूप में, भविष्य किस तरह से श्रेष्ठ बनाना है, वह प्रेरणा देते थे। टीचर के रूप में बाबा के सम्मुख आयी तो बड़ा ही आकर्षण रहा कि मुरली सुननी है। मुरली की जो कुछ बातें समझ में आयीं वो दिल में समा लीं। सतगुरु बन बाबा ने दृष्टि दी तो मैं आत्मा वतन में उड़ गयी, नज़र से निहाल हो गयी। जानी-जाननहार बाबा को मेरा भविष्य मालूम था। इसलिए बाबा, अपनी अलौकिक गोद में बिठाकर ऊँच बनने की प्रेरणा दे हिम्मत भरते रहे। बाबा मुझे सदैव यही कहते ये कि बच्ची, तुमको बहुत सेवा करनी है। मैं भी बाबा को ऐसे देखती थी कि बाबा मुझे अन्दर-बाहर अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं आत्मा, ज्योति की दुनिया में पहुँच गयी

मैं जब सन् 1968 में बाबा से मिली तो बाबा ने पूछा, बच्ची, तुमको क्या करना है? मैंने कहा, बाबा, मुझे समर्पित होना है। बाबा ने बड़ी मीठी दृष्टि दी और कहा, आज रात्रि को बाबा से गुडनाइट करने आना। रात्रि को आँगन में ही बाबा खटिया पर बैठे थे, साथ में कई दादियाँ और भाई-बहनें भी थे। मैं और दादी जानकी भी पहुँचे। देखा वहाँ लाइट ही लाइट चमक रही थी। बाबा की खटिया के पास मोतिया के खुशबूदार फूल रखे थे और बाबा सबको दृष्टि दे रहे थे। जब मैं बाबा के सम्मुख गयी तो बाबा ने मुझे फूल दिये और दृष्टि दी तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि चुम्बक ने मुझ आत्मा को अपनी ओर खींच वतन में उड़ा दिया। मैं आत्मा, ज्योति की दुनिया में पहुंच गयी। बाबा ने मुझे पारलौकिक संसार में पहुँचा दिया। कुछ समय के बाद इस साकार दुनिया का आभास हुआ। देखा तो बाबा बड़े प्यार से दृष्टि दे रहे थे। बाबा ने पूछा, बच्ची, बाबा क्यों दृष्टि दे रहे हैं? दादी जानकी ने काँध हिलाते हुए इशारे से कहा, हम जानती हैं कि अब पुरानी दुनिया से मरना है और बाबा की गोद में अलौकिक जन्म लेना है।

मेरी बच्चियों पर मनुष्यों की दृष्टि बिल्कुल नहीं पड़नी चाहिए

बाबा की दृष्टि का महत्त्व मेरे लिए यादगार बन गया। सतगुरु की दृष्टि ने मुझे निहाल किया। बाबा की शक्तिशाली, मीठी, प्रेम सम्पन्न दृष्टि ने मुझ आत्मा को उड़ा दिया। इसके बाद बाबा ने दीदी के साथ ईश्वरीय सेवा पर भेजा। जब दिल्ली जा रहे थे तो बाबा ने कहा कि दिल्ली में कुमारियों की ट्रेनिंग होने वाली है। अगर पसन्द आये तो वहाँ ट्रेनिंग करना। हम दिल्ली, कमला नगर सेन्टर पर पहुंचे तो वहाँ सामने ही एक मकान लिया हुआ था जहाँ कुमारियों की ट्रेनिंग रखी हुई थी। जब बाबा को मालूम पड़ा कि बच्चियों को सड़क पार करके दूसरे मकान में ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ेगा तो तुरन्त बाबा ने कहा, वहाँ ट्रेनिंग कैन्सिल करो और मधुबन में ही ट्रेनिंग का प्रोग्राम रहेगा। बाबा सदा बच्चियों को सुरक्षित रखते थे और प्यार से पालना करते थे। यह बात मेरे दिल में लग गयी।

बाबा देवलोक के देव स्वरूप लगते थे

मैंने बाबा को कभी पुरुषार्थ करते नहीं देखा। बाबा सदैव सम्पूर्ण स्वरूप में मुझे दिखायी पड़ते थे। साकार में होते भी ऐसे लगता था कि बाबा यहाँ नहीं हैं। जैसे चलते-फिरते फ़रिश्ता ही दिखायी देते थे, बिल्कुल शिव बाबा के समीप। इस साकारी मनुष्य लोक में बाबा देवलोक के देव स्वरूप लगते थे। बाबा हर बच्चे के कल्याण का ही सोचते थे ताकि हर आत्मा की उन्नति होती रहे। बाबा निरन्तर आत्म-स्थिति में रहते थे और हर आत्मा को आत्मिक दृष्टि देते थे ताकि उस आत्मा का देहभान छूट जाये और वह आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाये। यह विशेषता बाबा की देखी। कई बार मुझे ऐसा लगता है कि हम और कोई पुरुषार्थ करें या न करें लेकिन आत्म-स्मृति में रहने का, आत्मिक स्थिति में रहने का पुरुषार्थ करते रहेंगे तो हम जल्दी से जल्दी बाबा के नज़दीक पहुँच सकते हैं।

बाबा साधारण होकर बच्चों के साथ खेलते थे

एक बार की बात है, मैं बाबा के साथ बैडमिंटन खेल रही थी तो खेलते- खेलते बाबा रुक गये और पूछा, बच्ची, किसके साथ खेल रही हो? तुरन्त याद आया कि बाबा के साथ सर्वशक्तिवान शिव भी है। यह तो दिल को छूने वाली बात है कि परमात्मा भी बच्चों के साथ बच्चा बनकर, साधारण रीति से खेलपाल करता है। उसी समय बाबा ने कहा, आज बच्चों के साथ बाबा भोजन करेंगे। टेबल लगवाया गया और 8-10 भाई-बहनों को बाबा ने अपने साथ भोजन करवाया। बाबा एक तरफ़ बैठे थे और हम सब बाबा के सामने बैठे थे, उतने में बाबा बोले, देखो बच्चे, ऐसा मौका सतयुग में भी नहीं मिलेगा। अभी सर्वशक्तिवान बाप के साथ भोजन करने का मौका मिला है। तो हम कितने भाग्यवान हैं जो ज्ञान सागर, प्यार के सागर बाप के संग इस समय भोजन कर रहे हैं!

यह मेरे लिए सारे कल्प का भाग्य है

एक दिन हिस्ट्री हॉल के बाहर बैठकर मैं कुछ सेवा कर रही थी। बाबा कमरे से बाहर आये और एरोप्लेन (एक मकान का नाम) की ओर बढ़ने लगे, मुझे भी इशारा किया। मैं दौड़कर बाबा के पास पहुंची। बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा और चल दिये। वहाँ जाकर देखा तो दीदी, दादी और बड़े भाई-बहनों की मीटिंग चल रही थी। मैं संकोचवश अन्दर जाना नहीं चाहती थी मगर बाबा मुझे वहाँ ले गये। बाबा अपने स्थान पर जाकर बैठे और मुझे भी बैठने का इशारा किया। मैं पीछे बैठ गयी। मुझे इतना अच्छा मौका मिला जो बड़ी दादियों और भाई-बहनों की चिटचैट सुनी। ऐसी मीटिंग में बैठने का मौका बाबा ने दिया, उसे मैं अपना भाग्य समझती हूँ। बाबा भविष्य को जानते थे कि सेवा के निमित्त कैसे और कौन कारोबार चलायेगा? वह दिन मेरे लिए यादगार बन गया। कई बातें सीखने को मिलीं। आज भी कई परिस्थितियाँ आती हैं या खुद के संस्कार भी आते हैं परन्तु मुझ आत्मा को बाबा किसी भी युक्ति से सभी बातों से पार उड़ाकर सेवा के निमित्त बना देता है। यह बाबा की ही कमाल है जो उस समय शक्तिशाली दृष्टि देकर मुझ में शक्ति भर देते हैं। उस आधार से ही मेरा इतना ऊँचा और श्रेष्ठ जीवन बन गया। यह मेरे लिए सारे कल्प का भाग्य है। मुझे एक घटना याद आ रही है कि जब मेरी आयु 10 वर्ष की थी और हम लन्दन में रहते थे तब एक दिन एयर मेल (Air mail) आया। पार्सल खोला तो उसमें हाफुज आम थे। हमें बड़ा आश्चर्य लगा कि भारत से किसने ये आम भेजे होंगे! हमारे लौकिक सम्बन्धियों ने तो आज तक हमें याद नहीं किया। लेकिन पता चला कि साकार बाबा उस समय मुंबई में थे। आम खाते समय उन्हें हम छोटे बच्चे याद आये और बाबा ने बड़े प्यार से अच्छे-अच्छे आम चुनकर पार्सल द्वारा भेजे। मेरे मन ने भाव-विभोर होकर कहा, इतना प्यार करेगा कौन? उस समय लन्दन में आम का नाम-निशान भी नहीं था। परन्तु बाबा ने हमें प्यार से याद किया। वह दृश्य मुझे कभी भूल नहीं सकता।

वेदान्ती दीदी

नैरोबी, अफ्रीका से ब्रह्माकुमारी ‘वेदान्ती बहन जी’ कहती हैं कि मैं पहली बार नवम्बर 1965 में दादी जानकी जी के साथ मधुबन आयी थी। हमारे ग्रुप में आठ लोग थे। नुमाशाम के समय हम सभी बाबा से मिलने कमरे में गये। हम सभी बाबा के सम्मुख बैठे थे और बाबा एक-एक को दृष्टि दे रहे थे। जब बाबा की दृष्टि मुझ आत्मा पर पड़ी तो मुझे ऐसे लगा कि बाबा की जगह गुलाब के फूलों का ढेर था जिसमें से प्रकाश ही प्रकाश आ रहा था। वह बहुत पॉवरफुल दृश्य था। उसके बाद बाबा एक-एक को वरदान दे रहे थे। जब मैं बाबा के सामने गयी तो मेरी लौकिक माँ भी साथ थी। बाबा के बोलने से पहले ही मेरी माँ ने बाबा से कहा कि बाबा, आप मेरी बच्ची को कहो कि शादी करे। यह शादी के लिए मना कर रही है।

आखिरकार बाबा ने मुझे ब्रह्माकुमारी बना ही दिया

हमारी माता जी तो भक्तिमार्ग के गुरु की नज़र से बाबा को देखकर बात कर रही थी। बाबा ने कहा, "माता, तुम अब तक भक्ति में भगवान को, पतित-पावन आओ, कहकर पुकारती थी और आज तुम्हारी बेटी पावन बनना चाहती है तो उसको क्यों पतित बनाना चाहती हो? तुम्हारी यह बेटी कभी भी पतित नहीं बनेगी। यह पावन रहकर विश्व की सेवा करेगी।" उस समय बाबा के मुख से ये वरदान भरे बोल निकले जो बाद में साकार हो गये।

बच्ची, तुम ये कपड़े पहनकर रखना

जब मैं ज्ञान में आयी तब ज्ञान तो बहुत अच्छा लगता था लेकिन मैंने अन्दर ठान लिया था कि ब्रह्माकुमारियों की सफ़ेद पोशाक कभी नहीं पहनूंगी। यह बात मेरे मन में ही थी। मैंने कभी किसी को बतायी भी नहीं थी। मैं जब मधुबन में साकार बाबा से झोपड़ी में मिलने गयी तो बाबा ने अचानक सिलाई करने वाले को बुलाया और कहा कि बच्ची के लिए दो जोड़ी कपड़े सिलाई करके दो। मैं अन्दर ही अन्दर सोचने लगी कि ये कपड़े मिलेंगे तो रख दूँगी, कभी पहनूँगी नहीं। दो घण्टे के बाद बाबा ने बुलाया और सिलाई किये हुए कपड़े मुझे देकर कहा कि बच्ची, ये कपड़े ले जाओ और जल्दी पहनकर बाबा को दिखाओ। मैं आज्ञाकारी बनकर कमरे में गयी और पहनकर जब बाबा के सामने आयी तो बाबा देखकर कहने लगे, "बच्ची, तुम मम्मा की तरह दिखायी दे रही हो। ये कपड़े सदा पहनकर रखना।" उन्हीं कपड़ों में मैं अहमदाबाद गयी। यह घटना मुझे कभी नहीं भूल सकती। वाह बाबा वाह! कमाल है आपकी, जिन्होंने मुझे अपना बनाकर महान् बनने का रास्ता बता दिया।

बाबा ने ही मेरा नाम 'वेदान्ती' रखा

मधुबन वरदान भूमि की मेरी पहली यात्रा के समय, मेरे मन में कई प्रश्न थे लेकिन प्यार भरी बाबा की पहली मुलाक़ात में ही सारे प्रश्न जैसे हवा में उड़ गये। मेरा लौकिक नाम ‘रंजन’ था। बाबा ने मुझे कहा कि बच्ची तूमने वेद, शास्त्र आदि का अभ्यास बहुत किया है तो बाबा तुम्हें वेदों का अन्त दे रहा है। वेदों का अन्त 'भगवान' अब तुम्हें मिल गया। तो तुम्हें बाबा वेद का अन्त जानने वाली 'वेदान्ती' कहकर बुलायेगा। इस प्रकार, मेरी नामकरण-विधि बाबा ने की। फिर बाबा ने पूछा, बच्ची, तुम बादल बनकर बरसोगी या ऐसे ही चली जाओगी अर्थात् क्या ज्ञान की सेवा करोगी? अब हमारा वापस घर जाने का समय आ गया। मैं वापस लौकिक घर गयी। लेकिन मेरा पढ़ाई में दिल नहीं लग रहा था। बाबा के वरदानों भरे बोल कानों में गूँज रहे थे। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था। वही दिव्य अलौकिक बातें याद आ रही थीं। बस मन में यही संकल्प बार-बार आ रहा था कि अभी तो मुझे ईश्वरीय सेवा में लगना है। साथ-साथ शिव बाबा की याद भी बहुत आ रही थी। बहुत कशिश हो रही थी कि मैं उड़कर बाबा के पास चली जाऊँ। लौकिक पढ़ाई से भी जल्दी छूटने का मन कर रहा था कि बस अब समय को ईश्वरीय सेवा में सफल करना है। छह मास के अन्दर ही परिवार को समझा कर मैं ईश्वरीय सेवा में हाज़िर हो गयी। आज तक मुझे यह अनुभव हो रहा है कि बाबा के वरदानों ने ही मुझे जीने की सच्ची राह दिखायी, जिससे मेरा जीवन बहुत ही ऊँचा और श्रेष्ठ बन गया है।

बाबा ने कहा, अब शेरनी बनकर गर्जना करो

बाबा के अन्दर ज्ञान से पालना करने की अद्भुत शक्ति थी। मैंने सच्चे माँ-बाप का प्यार क्या होता है वह बाबा से पाया। मेरे लिए आश्चर्य की बात यह थी कि मेरे मन में जो विचार चलते थे वे बाबा को पहले से ही मालूम हो जाते थे। मेरे जीवन का भविष्य भी बाबा की नज़रों में पहले से ही स्पष्ट था।

बाबा ने कहा, बच्ची, तुम नौकरी कर धन से सेवा कर सतयुग में साहूकार बनना चाहती हो परन्तु बाबा को तो तुम्हारा धन नहीं चाहिए। बाबा को तो तुम्हारे जैसी बच्ची चाहिए। बाबा ने कहा, लौकिक बन्धनों की बातें सुनाना माना बकरी की तरह बे-बे करना। अब शेरनी बनकर गर्जना करो। इस प्रकार, बाबा ने मुझे निर्बन्धन बना दिया और मैं समर्पित होकर सेवा करने लगी।

राज दादी (नेपाल)

काठमाण्डु, नेपाल से ब्रह्माकुमारी “राज बहन” जी अपने अलौकिक अनुभव में लिखती हैं कि मेरा लौकिक जन्म सन् 1937 में एक धार्मिक आस्था वाले सम्पन्न परिवार में हुआ था। नित्य भगवान की पूजा-अर्चना से जीवन की दिनचर्या आरम्भ होती थी। भौतिक सुख-सुविधाओं से सम्पन्न जीवन होते हुए भी अन्तर्मन में प्रभु प्राप्ति की इच्छा सदा बनी ही रहती थी। सन् 1960 की बात है, एक दिन मैं अपनी लौकिक माँ से मिलने फगवाड़ा, पंजाब में गयी हुई थी। वहाँ पर मुझे अपनी लौकिक बड़ी बहन भागजी भी मिली। उन्होंने बताया कि यहाँ पर सिन्ध से कोई देवियाँ (दादियाँ) आयीं हैं जो बहुत ही अच्छा ज्ञान सुनाती हैं। मैं उन्हों का ज्ञान सुनने आश्रम पर नित्य जाती हूँ, मुझे बहुत ही आनन्द आता है। यह बात सुनकर मुझ में भी उन देवियों से मिलने की अभिलाषा जागी और मैं बड़ी बहन के साथ आश्रम पर गयी।

बाबा ने मुझे शक्तिस्वरूपा, नष्टोमोहा बना दिया

जब हम अमृतसर के आश्रम पर पहुंचे तो वहाँ हमें दीदी चन्द्रमणि जी मिलीं। उन्होंने हमें सम्मान के साथ अन्दर बुलाया और अपने साथ ही कुर्सी पर बिठाया। बड़े प्यार से हमें प्रसाद भी दिया। दीदी जी का निश्छल स्नेह, उनके हृदय की पवित्रता, सत्यता और निःस्वार्थ व्यवहार से मैं बहुत ही प्रभावित हुई। मुझे यह पता था कि भक्तिमार्ग में तो गुरु-गोसाईं आदि नव आगन्तुकों को अपने साथ में कभी भी नहीं बिठाते हैं। लेकिन मैंने यहाँ वैसा व्यवहार नहीं देखा। उसके बाद जब दीदी जी ने बड़े प्यार से हमें परमात्मा का परिचय सुनाया तो मुझे सुनकर अति हर्ष हुआ और अनुभव होने लगा कि परमात्मा शिव ही हम सर्व आत्माओं के पिता हैं। इससे पहले तो हमारे संकल्प और स्वप्न में भी यह नहीं था कि इस साकार लोक में हमें कभी प्रभु की प्राप्ति भी हो सकती है। आश्रम से घर लौटने के बाद जब मैंने घर वालों को अपना अनुभव सुनाया तो सभी सुनकर बहुत खुश हुए। इस प्रकार मैं ज्ञान-स्नान करने के लिए प्रतिदिन आश्रम में जाने लगी। नित्य ईश्वरीय ज्ञान का पठन-पाठन और सहज राजयोग के अभ्यास द्वारा मेरे जीवन में परिवर्तन आने लगा और खुशी से जीवन भरपूर होता गया। इस तरह से दिन प्रतिदिन लौकिक गृहस्थ जीवन में अलौकिकता आने लगी। निरन्तर दैवी गुणों की धारणा और आध्यात्मिक ज्ञान के मनन-चिन्तन के द्वारा जीवन में अमूल सुधार और परिवर्तन आता गया। सफलता की किरणें उदित होने लगीं।

बाबा की मदद से अद्भुत सफलता

मेरे जीवन में परीक्षा के तौर पर कुछ ऐसी घटनायें भी आयीं जिनके कारण मुझे अदालत में जाना पड़ा। जाने से पहले हमारे वकील ने मुझे कुछ बातें सिखाकर अदालत में बोलने के लिए भेजा था पर वे मेरे अन्तर्विवेक को नहीं भा रही थीं। जब मैं अदालत के कठघरे में गयी तो मुझे बाबा की बहुत गहरी याद आयी। मैं अपने को मम्मा का स्वरूप अनुभव करने लगी और अपनी देह को भी भूल गयी। मुझे अन्दर से ऐसी प्रेरणा आने लगी कि मैं जो कुछ भी कहूँगी वह एक सत्य परमात्मा की याद में सच ही कहूँगी ऐसा मनोबल मेरे में पैदा हुआ। इतने में ही मैंने अपना बयान देना शुरू किया। मेरे वचनों को सुनकर के न्यायाधीश बहुत ही प्रभावित हुआ। उन्होंने उस केस का मेरे पक्ष में फैसला देते हुए मुझे विजयी घोषित किया। बात इतनी सहज और सरल रीति से सुलझ जायेगी, यह किसी के भी मन में नहीं था परन्तु बाबा की टचिंग और योग की शक्ति ने मेरे कर्मबन्धन को सहज ही पार कर दिया।इससे मुझे बाबा के ऊपर और ही दृढ़ निश्चय हो गया। केस का सामना करना मेरे लिए एक कठिन चुनौती थी। फिर भी बाबा की मदद से तूफ़ान जैसी परिस्थिति भी मेरे लिए तोहफ़ा बन गयी। इससे मैं अपने लक्ष्य में सम्पूर्ण सफल हो गयी। बाबा ने मुझे इस प्रकार शेरनी शक्ति बनाया। मैं अबला से सबला, निर्बल से बलवान बन गयी। मुझ में उस प्रभु के प्रति अपने जीवन को न्योछावर कर देने की अभिलाषा पैदा हुई। आख़िर सन् 1962 में वह दिन आया जब मैंने जीवन को ईश्वरीय सेवार्थ समर्पित कर दिया।

साकार बाबा से प्रथम मिलन की अनुभूति

सन् 1962 में जब दीदी चन्द्रमणि जी अमृतसर की पार्टी को बाबा से मिलाने मधुबन ले गयी थी तो मैं भी उसमें शामिल थी। मेरे जीवन में प्रभु-मिलन का वह स्वर्णिम अवसर आया जिसकी वर्षों से मेरे अन्दर तीव्र इच्छा थी। जब मैंने बाबा की दिव्य छवि को देखा तो उनकी शीतल और शक्तिशाली दृष्टि ने मुझे आत्मविभोर कर दिया। बाबा ने मुझे, दिल को द्रवीभूत करने वाला अलौकिक प्यार दिया तथा वरदान देते हुए कहा कि बच्ची बहुत नष्टोमोहा है, बहुत योगयुक्त है। बच्ची ने जल्दी ही अपने कर्मबन्धनों को काटा है ऐसे कहते हुए बाबा ने दिल से मेरी बहुत प्रशंसा की और मेरा उमंग-उत्साह बढ़ाया।

बाबा के वो बोल मेरे लिए वरदान सिद्ध हुए

कुछ वर्ष अमृतसर सेवाकेन्द्र पर रहते हुए मुझे दीदी चन्द्रमणि जी की अलौकिक पालना मिलती रही और ईश्वरीय सेवा की कारोबार सम्भालने की कला भी प्राप्त हुई। उस पालना और प्रशिक्षण से मुझ में बहुत योग्यतायें भर गयीं। उनके जीवन का प्रभाव इतनी गहरी रीति से मेरे जीवन पर पड़ा कि मुझ में निर्भयता और दैवीगुणों की धारणायें प्रबल होती गयीं। आयी हुई नयी कन्याओं में ईश्वरीय धारणाओं के प्रति अभिरुचि बढ़ाने के कार्य की ज़िम्मेवारी भी दीदी जी मुझे देती थीं। उसमें भी मुझे अधिक सफलता दिन प्रति दिन मिलती गयी। इस प्रकार ब्राह्मण परिवार में रहते ईश्वरीय सेवा करना और श्रेष्ठ धारणाओं को अपने जीवन में अधिक से अधिक अपनाते जाना, यह मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया। बाद में जब हम मधुबन में आये और बाबा से मिले तो बाबा ने कहा कि "बच्ची, तुम मीरा हो, तुम गुणवान हो, तुम अपने को नहीं जानती, बाबा तुम्हें जानता है, तुम बहुत अच्छी सेवा कर सकती हो"। ऐसे वरदानी बोलों से बाबा ने मेरा उमंग-उत्साह बढ़ाया। बाबा ने उस समय मुझे और विश्वरतन दादा को आबू के मिनिस्टर कॉटेज में वी.आई.पी. सेवा के लिए भेजा था। मेरी सेवा की लगन को देखकर बाबा ने कहा, "बच्ची, तुम पटना में सेवा करने जाओ।" पटना में ईश्वरीय सेवा के लिए जाना हुआ और वहाँ पर भी सेवा में बाबा के दिये वरदान अनुसार बहुत अच्छी सफलता मिलती गयी। वहाँ पर बनाया गया म्यूज़ियम उन दिनों बहुत ही अच्छा था जिसको बाबा ने नम्बर वन में रखा था। पटना से जब मैं मधुबन पार्टी लायी तो साकार बाबा ने कहा, बच्ची ने देखो इतने बड़ों-बड़ों को लाया है, बच्ची सेवा करने में बहुत होशियार है, “सफलता इसका जन्मसिद्ध अधिकार है”। इस तरह अलौकिक जीवन में अनेक अलौकिक अनुभव हुए और होते ही रहते हैं। अभी सदा यही उमंग मन में रहता है कि जल्दी से जल्दी अपनी सम्पूर्ण स्थिति को प्राप्त करके इस वसुन्धरा पर आये हुए भगवान को प्रत्यक्ष करें ताकि अन्धकार में भटकती हुईं करोड़ों आत्मायें प्राण प्यारे बाप से मिलन मना सकें और उसके अविनाशी वर्से की अधिकारी बन सकें। हम भी अब जल्दी से जल्दी बाप समान बनें और बाबा की श्रेष्ठ आशाओं को पूरा करें यही हमारे जीवन का लक्ष्य रहता है।

सत्यवती दीदी

तिनसुकिया, असम से ‘ब्रह्माकुमारी सत्यवती बहन जी’ अपने अनुभव सुनाती हैं कि प्यारे, मीठे साकार बाबा से मेरा पहला मिलन सन् 1961 में मधुबन में हुआ। जैसे ही हम आये तो बाबा धोबीघाट पर खड़े थे। देखते ही बाबा ने हमें गले लगाया और कहा, “आ गयी मेरी मीठी, प्यारी बच्ची।" बाबा के ये बोल सुनते ही मुझे अनुभव हुआ कि जो कुछ है, सर्वस्व यही है। उसी क्षण मेरा बुद्धि का लगाव, झुकाव सब तरफ़ से खत्म हो गया।
एक बार मैं अपने गाँव में सवेरे क्लास में जा रही थी तो बीच में एक चोर मिला और उसने मेरे गले की चेन खींची, मैंने उसका सामना किया। जब बाबा को मैंने यह समाचार सुनाया तो बाबा ने मुझसे कहा, ‘यह मेरी शेरनी बच्ची है जो गुण्डे का सामना करके आयी है।’ उसी समय से डर बिल्कुल समाप्त हो गया। जब-जब कोई परिस्थिति आती है तो ऐसा महसूस होता है जैसेकि बाबा का वरदानी हाथ मेरे सिर पर है।

बाबा के मस्तक से जैसे कि किरणें निकल रही हैं

एक बार मैं क्लास में बाबा के सामने बैठी थी। मुझे ऐसा लग रहा था कि एक ज्योति बाबा में आकर समा रही है और बाबा के मस्तक से जैसे कि किरणें निकल रही हैं। इससे पहले मुझे ब्रह्मा बाबा से तो बहुत प्यार था लेकिन यह निश्चय नहीं था कि शिव बाबा इनमें आते हैं। परन्तु उस दिन से ऐसा अनुभव हुआ कि संसार की कोई हस्ती मेरे निश्चय को हिला नहीं सकती। एक बार बाबा से मिल रही थी तो बाबा ने मेरे सिर पर हाथ रख कर बोला, बच्ची, तुम्हारे जैसी एक दर्जन मातायें मिल जायें तो बाबा का कार्य जल्दी हो जाये। उसके बाद जब मैं कोलकाता गयी तो टिबरेवाल धर्मशाला में प्रदर्शनी की। उसी प्रदर्शनी से एक दर्जन मातायें निकलीं और निश्चय बुद्धि बनीं। इस प्रकार, बाबा का महावाक्य सिद्ध हो गया।

सन् 1965 में जब मम्मा अव्यक्त हुई तो बाबा को देखा कि बाबा ड्रामा की पटरी पर अटल, अडोल खड़ा था। बच्चों को धीरज दे रहा था कि ड्रामा में होगा तो तुम्हारी माँ वापस ज़रूर आयेगी। बाबा जैसे बिल्कुल निश्चिन्त थे। बाबा अशरीरी स्थिति का कैसे अभ्यास करते थे यह हमने प्रैक्टिकल देखा।
एक बार बाबा लेटे हुए अख़बार देख रहे थे। देखते-देखते बाबा एकदम साइलेन्स में चले गये। मैं सामने खड़ी देख रही थी कि बाबा को क्या हुआ। फिर थोड़ा समय के बाद जब बाबा की पलकें झपकीं तो लगा कि बाबा कैसे अशरीरी हो जाते हैं! हमने देखा, बाबा को बच्चों को अलौकिक पालना देने का, उन्हें ज्ञान-रत्नों से श्रृंगारने का, गुणों से सम्पन्न बनाने का, सेवा में बच्चों को आलराउण्डर बनाने का बहुत शौक था। बाबा की दृष्टि जैसे सर्च लाइट का अनुभव कराती थी। इतनी उम्र होते हुए भी बाबा ऐसे चलते थे जैसे कि फ़रिश्ता चल रहा है। बाबा के एक-एक बोल ऐसे होते थे जो दिल में जगह बना लेते थे। सर्व के प्रति बाबा की दृष्टि समान और सम्मानयुक्त रही।

बाबा के सिर से एक ज्योति बाहर निकल रही थी

एक बार बाबा के साथ झूले में झूल रही थी। बाबा ने पूछा, बच्ची, किसके साथ झूल रही हो ? मुझे ऐसे लग रहा था जैसेकि छोटे मिचनू श्री कृष्ण के साथ झूल रही हूँ। बाबा कितने निरहंकारी थे! मुरली क्लास पूरी होने के बाद जब बाबा उठते थे तो दरवाज़े के बाहर जाने तक बाबा बच्चों को नमस्ते नमस्ते कहते बच्चों की तरफ़ पीठ न करके ऐसे ही पीछे चलते थे और बाहर जाने के बाद मुड़कर जाते थे। उस समय मैंने देखा कि बाबा के सिर से एक ज्योति बाहर निकल रही थी।
एक बार मैं अमृतवेले 3.30 बजे बाबा के पास गयी। बाबा गद्दी पर बैठे थे। जैसे ही मैंने कमरे में प्रवेश किया, बाबा ने मुझे गले से लगाया तो ऐसा महसूस हुआ जैसेकि कोई शक्तिशाली फ़रिश्ता और रूई जैसा बहुत हल्का है। हड्डी-मांस का शरीर महसूस ही नहीं हुआ। बाबा मुझे 'फूल बच्ची' कह पुकारते थे।

कमलेश दीदी

कटक, उड़ीसा से ब्रह्माकुमारी ‘कमलेश बहन जी’ कहती हैं कि मुझे ईश्वरीय ज्ञान सन् 1962 में मिला और साकार बाबा से सन् 1965 में मिली, पर पत्रों द्वारा सम्पर्क पहले से ही था। बाबा से प्रथम मिलन में तो मुझे बहुत ही सुन्दर अनुभव हुए। मैं बहुत बाँधेली गोपिका थी। जिसको मैं खोज रही थी उस भगवान को मैंने पा लिया। बाबा को देखते ही लगा कि पाना था सो पा लिया, अब कुछ नहीं है पाने का।

मेरे बहुरूपी बाबा

जब मैं पहली बार बाबा की गोद में गयी तो मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव हुआ और नशा चढ़ा कि मैं स्वयं भगवान की गोद में हूँ। फिर बाबा ने मेरी परीक्षा ली। पूछा, बच्ची, मैं अपने बच्चों को कितना प्यार करता हूँ! क्या तुम्हें अपने बच्चे याद नहीं आते? क्या उनसे मोह नहीं है? मैंने कहा, नहीं बाबा। मैं तो आपकी बच्ची हूँ। मुझे बहुत सेवा करनी है। तो बाबा ने मुझे बहुत प्यार दिया, पीठ पर हाथ रख शाबाशी दी, गोद में लिया और कहा, "बाबा को ऐसी साहसी बच्चियाँ चाहिएं। शाबाश बेटी, तुम ऐसे ही सर्विस करते आगे बढ़ती रहना। तुम मेरे विजयी रत्न हो।" दादी निर्मलशान्ता जी की ओर देखकर बाबा ने कहा, इस बच्ची को यहाँ मधुबन में जी भरकर रखना। मैं प्रथम बार ही मधुबन में तीन मास साकार बाबा के पास रही। एक झलक में ही मुझे बाबा ने दो वरदान दिये-"विजयी भव" और "सेवा करते रहो।" आज भी ये वरदान प्रैक्टिकल हर पल अनुभव करती रहती हूँ। साकार बाबा का वो दृश्य आँखों के सामने आते ही मेरे पैर खुशी के मारे पृथ्वी पर नहीं रहते, अतीन्द्रिय सुख में खो जाती हूँ।

बाबा के अनेक रूप दिखायी पड़ते थे

बाबा के इन वरदानों के कारण ही, ईश्वरीय जीवन में जितनी भी अलौकिक और लौकिक परीक्षायें, परिस्थितियाँ आयीं, मैं उनमें सदा विजयी रही। साहस और सहनशीलता बहुत बढ़ गयी। कई बार मुझे ऐसा लगता कि बाबा मेरे सामने खड़े हैं। कई बार भाषण करते समय अनुभव होता है कि बाबा ने ही करवाया, मैंने कुछ नहीं किया। अनुभव होता है कि बाबा मेरे सिर पर हाथ रखते और शक्ति भरते हैं। जब बाबा मुरली सुनाते थे तब मैंने कई बार अनुभव किया कि बाबा के मस्तक में लाइट चमक रही है और उससे मुझे शक्ति मिल रही है। मैंने बाबा के कई रूपों का अनुभव किया है। जैसे कभी गोपियों के साथ श्रीकृष्ण का रूप, कभी सखा का स्वरूप, कभी शिक्षक का स्वरूप, कभी गुरु का वरदानी स्वरूप, कभी गिरे हुओं को ऊपर उठाने वाले पतितोद्धारक का स्वरूप, कभी निर्बलों को बल देने वाले बलवान का स्वरूप, कभी बेसहारों को सहारा देने वाले दीनबन्धु का स्वरूप ।

जिसके सिर पर भगवान का हाथ है, क्या करेंगे भाई और बन्धन?

जब मैं बन्धन में थी उस समय प्यारे बाबा के पत्रों को हमारे घर वाले पढ़ने नहीं देते थे। उनको मैं साड़ियों में छिपा कर रखती थी। जब घर वाले उनकी खोजबीन करते थे तो एक भी पत्र उन्हें नहीं मिलता था। साड़ी झाड़ने के बाद भी वे नीचे नहीं गिरते थे, मानो कोई ने अपनी जादूगरी से उन्हें साड़ी के अन्दर चिपका कर रखा हो। वे लोग चुप रह जाते। यह प्यारे बाबा का चमत्कार नहीं था तो और क्या था! एक बार मेरा लौकिक भाई आया और चेतावनी देकर गया कि तुम जहाँ भी होगी, तुम्हें मैं वापिस घर ले जाऊँगा। गुण्डों को लेकर पहुँचूँगा। तुम्हें रहना है तो ससुराल में रहो, या मेरे पास रहो। मैं थोड़ा डर गयी। यह बात मैंने बाबा को कमरे में सुनायी तो बाबा ने प्यार से सिर पर हाथ रखकर कहा, "बच्ची, तुम बिल्कुल नहीं डरो। तुम बाबा पर बलिहार हो गयी हो, अनुभवी हो, तुम्हें दुनिया की कोई शक्ति मुझसे दूर नहीं ले जा सकती। बलिहार होने वाले बाबा के गले के हार होते हैं। तुम बाबा के गले का हार हो। तुम्हें माया नहीं हरा सकती।" मुझे बहुत हिम्मत और साहस आ गया। मेरा भाई कुछ नहीं कर सका। वह हार गया, बाबा की जीत हो गयी। कैसा भी बड़ा बन्धन और भयभीत करने वाली बात मेरा कुछ नहीं कर सकी।

दिलाराम बाबा ने मेरे दिल की आश जान ली

सन् 1966 की बात है। उस समय मैं एक सेन्टर पर थी। मैं बहुत बीमार हो गयी। ऐसी परिस्थिति आयी कि कमज़ोरी के कारण चलना भी मुश्किल हो गया। पता नहीं जानी-जाननहार बाबा को कैसे पता पड़ा, दूसरे दिन ही साकार बाबा का टेलीग्राम आया कि बच्ची को फ़ौरन मधुबन भेजो। उस बीमार अवस्था में मेरे श्वास-श्वास में बाबा और मधुबन की ही याद थी। जब मधुबन पहुंची तो बड़ा विचित्र और रोमांचकारी दृश्य था। पहुँचते ही बाबा मेरा हाथ पकड़कर बगीचे में ले गये और एकदम पास में बिठाकर सारा समाचार पूछा। दिलाराम बाबा ने मेरे दिल की आश जान ली और साकार में सुन भी ली। उस समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मैं अपने प्यारे दिलबर के सामने सब दिल की बातें सुना रही हूँ। बाबा ने इतना प्यार किया जिसे कि मैं वर्णन नहीं कर सकती। मैं अपने सारे दुःख-दर्द को भूल गयी और बाबा की प्रीत में खो गयी। बच्चों को खुश रखना ही, बाबा का एकमेव उद्देश्य होता था। एक बार मधुबन में मैं और सत्यवती बहन झूले में झूल रहे थे। बाबा आकर बीच में बैठ गये। हमें ऐसा अनुभव हुआ कि बाबा एक छोटा, सुन्दर बच्चा है, वह हमारे साथ बैठा हुआ है। हमें बहुत खुशी हो रही थी। तब बाबा ने बोला, बच्ची, तुम ऐसे ही सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते रहना।

एक बार की घटना है, मुझे सब्ज़ी कटवाने की ड्यूटी मिली हुई थी। बाबा मेरे पास आकर बैठ गये। एक तरफ़ मैं थोड़ा डर गयी, दूसरी तरफ़ अपने भाग्य पर नाज़। बाबा ने कहा, बच्ची क्या कर रही हो ? मैंने कहा, बाबा कच्चे टिण्डों को पके हुओं से और पके हुओं को कच्चे टिण्डों से निकाल रही हूँ। बाबा ने कहा, बच्ची, देखो मैं तुम्हारे कच्चे टिण्डों से पके टिण्डों को निकाल दूँगा और पके हुए टिण्डों से कच्चे टिण्डों को निकाल दूँगा। सचमुच, बाबा ने टोकरियों में हाथ डाला और कच्चों में से पक्के को निकाल दिया जिन्हें कि हम अलग-अलग कर चुके थे। इस प्रकार बाबा बच्चों को हँसाते थे, बहलाते थे और आश्चर्यचकित कर देते थे। जब भी बाबा हमारे आस-पास होते तब हमारे में खुशी की लहरें प्रवाहित होती थीं, मन आनन्द से विभोर हो जाता था।

आँख मिचौली का खेल

एक बार बाबा ने मेरे साथ आँख मिचौली खेली। बाबा क्लास में जा रहे थे। छोटे हाल में क्लास होना था। मैंने सोचा कि बाबा जिस गेट से प्रवेश करते हैं मैं भी उधर से ही जाकर क्लास में बैठूंगी। जब मैंने देखा कि बाबा पीछे के गेट की तरफ़ जा रहे हैं तो मैं पीछे के गेट की तरफ़ गयी परन्तु फिर बाबा आगे के गेट की तरफ़ जाने लगे। मुझे लगा शायद मेरी आँखें ही मुझे धोखा दे रही हैं। फिर एक सेकण्ड चुप होकर बाबा से पूछना चाहा, उतने में बाबा ने मुझसे कहा, बच्ची, तुमने आज बाबा के साथ आँख मिचौली खेली ना? तुम जहाँ भी बैठोगी बाबा तुम्हारे साथ है।

हमेशा बाबा में सम्पूर्णता और सम्पन्नता दिखायी पड़ती थी। उनके सामने जाते ही मैं सब कुछ भूल जाती थी, एक तरह की अलौकिक मस्ती में डूब जाती थी। बाबा का पुरुषार्थ उच्च श्रेणी का था। अमृतवेले दो बजे जागकर बाबा योग साधना करते थे। चलते-फिरते बाबा खुद याद में रहते थे और जो भी मिले उनको भी बाबा की याद दिलाते थे। बाबा फ्राकदिल थे। शिव बाबा पर और शिव बाबा के सिद्धान्तों पर उनका अचल, अटल और अविनाशी निश्चय था। वे किसी भी परिस्थिति में हिले नहीं। जब समाज में इस ज्ञान को कोई मानता नहीं था, कई बड़े-बड़े परिवारों की मातायें, कन्यायें घर त्यागकर आयीं, उनको शरण देना, उनकी पालना करना कितनी हिम्मत की बात है! किसी की पत्नी, किसी की माँ, किसी की बच्ची, किसी की बहन एक बूढ़े व्यक्ति के साथ सब कुछ छोड़कर चली जाये तो कितने हंगामें मचे होंगे, कितने केस चले होंगे! फिर भी ब्रह्मा बाबा एकदम निश्चिन्त थे। दुनिया वाले भी कुछ नहीं कर पाये, आश्चर्य से देखते रहे। आख़िर जीत उन गोपियों की ही हुई जो मुरलीधर शिव बाबा पर न्यौछावर हुई थीं, उसकी मुरली पर मोहित हुई थीं। बाबा सर्व गुणों से सम्पन्न थे। उनमें से बाबा का एक गुण मुझे बहुत पसन्द आया, माताओं और कन्याओं को सम्मान देकर उनको ऊँचा उठाया और दुनिया के सामने दर्पण बनाया, सेम्पल बनाया। अपना सब कुछ उनको समर्पण कर सिर्फ आध्यात्मिक नेता नहीं, सफल एवं समर्थ प्रशासक भी बनाया। नारी समस्त विश्व के लिए मार्गदर्शक भी बन सकती है यह सिद्ध करके दिखाया।

भावनाप्रिय मेरे भोले बाबा

एक बार कर्नाटक की पार्टी मधुबन में बाबा से मिलने आयी थी। उसमें एक माता बाबा के लिए गुड़ की पोटली लेकर आयी थी जो उसने अपनी ब्राह्मणी को दी कि बाबा को दे दे। टीचर बहन ने सब सामान दे दिया था परन्तु गुड़ की पोटली नहीं दी थी। बाबा ने तुरन्त टीचर से पूछा, वो पोटली कहाँ है जो यह माता लायी थी। टीचर घबरा गयी कि यह बात बाबा को कैसे पता पड़ी! फिर बाबा ने कहा, जाओ, पहले पोटली ले आओ। उस बहन ने लाकर बाबा को दी। बाबा ने उसे खोलकर देखा और लच्छू बहन को बुलाकर कहा, आज ही इस गुड़ से मीठा चावल बनाओ, बाबा भी खायेगा और बच्चों को भी खिलायेगा।

एक बार मैं बाबा के पास बैठी थी। उस समय बाबा से एक पार्टी मिलने आयी। उनमें से एक भाई ने बाबा से कहा कि बाबा, हमारे यहाँ कोई बहन ठहरती नहीं है, सन्तुष्ट नहीं रहती। तुरन्त बाबा का रूप बदल गया। मुझे लगा कि बाबा ने धर्मराज का रूप धारण किया है। बाबा ने उस भाई से कहा, जिसमें बहुत देह-अहंकार होता है, उससे कोई सन्तुष्ट नहीं रह सकते और कोई वहाँ टिक भी नहीं सकता। इसलिए पहले अपने देह-अहंकार का त्याग करो, तब सन्तुष्ट होंगे। इस तरह प्यारे बाबा बहुरूपी बन बच्चों को प्यार भी करते थे और सब शिक्षा भी देते थे।

पुष्पा माता

अम्बाला कैंट से पुष्पा माता लिखती हैं कि मैंने सन् 1959 में ज्ञान प्राप्त किया और परिवार सहित ज्ञान में चली जिसमें चार बच्चे भी थे। बचपन से ही भक्ति आदि करती थी और परमात्मा से मिलने की बहुत इच्छा थी। अन्दर में बार-बार संकल्प आता था कि मैं कभी भगवान से मिली थी परन्तु कब, कहाँ, यह पता नहीं था। अन्दर इच्छा रहती थी कि कोई बताये कि कैसे भगवान मिल सकता है।

बाबा लोहे को सोना बनाने वाले चैतन्य पारसमणि थे

एक बार घर में एक महात्मा जी आये, उनसे पूछा कि भगवान से कैसे मिल सकते हैं? महात्मा जी ने कहा, अभी तुम छोटी हो। थोड़े दिनों के बाद मालूम हुआ कि आबू से सफ़ेद पोशधारी बहनें आयी हैं और बहुत अच्छा ज्ञान सुनाती हैं। मेरे युगल (पति) के मित्र ने आकर बताया और वह हमको भी आश्रम पर ले गया जहाँ हमको ध्यानी दादी और राधे बहन ने आत्मा, परमात्मा का ज्ञान सुनाया। बस, मुझे तो निश्चय हो गया कि मैं जो चाहती थी वह मिल गया। मुझसे ध्यानी दादी ने निश्चय पत्र लिखने को कहा। मैंने निश्चय पत्र लिखकर बाबा को मधुबन भेज दिया। बाबा का लाल अक्षरों वाला पत्र आया कि ये पक्के हैं, भले आयें। टेप द्वारा बाबा की आवाज़ सुनी तो दिल होती थी कि बाबा से मिलूँ। दिन बीतते गये दिल तड़पता रहा मिलने के लिए। कुछ समय के बाद समाचार मिला कि बाबा दिल्ली आ रहे हैं, यह सुनकर बहुत खुशी हुई। बाबा दिल्ली आये तो मैं और मेरे युगल बाबा से मिलने गये। बाबा से मिले तो ऐसा लगा कि जन्म-जन्म की आश पूरी हो गयी। जब बाबा की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो अनुभव हुआ कि बाबा के मस्तक पर शिव बाबा की प्रवेशता हुई और मैं चुम्बक की माफ़िक खिंचकर बाबा की गोद में चली गयी। मुझे यह अनुभव हुआ कि मैं अपने पिता से मिल रही हूँ।

बच्ची, किसके पास आयी हो?

दूसरी बार दिल्ली में प्यारे बाबा मेजर भाई की कोठी पर आये थे। उस समय मैं बाबा से मिलने गयी तो बाबा आँगन में खड़े थे। मैं वहीं बाबा से मिली। उसके बाद मैं अपने शहर आ गयी लेकिन मन में मधुबन जाने की इच्छा बनी रही। एक साल के बाद मधुबन जाना हुआ। मधुबन पहुँचकर सुबह की क्लास में बाबा ने प्रश्न पूछा, बच्ची, किसके पास आयी हो? मैंने कहा, पिता के घर। बाबा ने पूछा, निश्चय है? पहले कब मिली हो? मैंने कहा, हाँ बाबा, कल्प पहले भी ऐसे ही मिली थी। फिर बाबा कमरे में गये। हम भी वहाँ गये। वहाँ ध्यानी दादी ने परिचय दिया कि यह चार बच्चों और युगल सहित ज्ञान में चलती है। बाबा ने कहा, मैंने इसे अपनी एक बच्ची दी है। उस समय मुझे पता नहीं था लेकिन धीरे-धीरे बच्चे बड़े हुए, उनमें से एक बच्ची समर्पित होकर 32 साल से पाटन सेवाकेन्द्र पर सेवा कर रही है। यह मुझे बाद में पता पड़ा कि बाबा ने मुझे अपनी एक बच्ची दी है। बाबा का बनने से ऐसा अनुभव हुआ है कि 'पाना था सो पा लिया!' विकट परिस्थितियों में भी बाबा की मदद का अनुभव बहुत हुआ है। बीमारी आदि में भी बाबा की मदद मिली है। ठंडी, गर्मी, बारिश में कभी क्लास मिस नहीं की है। कुछ भी हो सवेरे की क्लास में 44 वर्षों से नित्य जाती हूँ। अब तो बस यही आशा है कि चलते-फिरते बाबा की याद में ही शरीर छूटे।

पुरी भाई

बेंगलूरु से ब्रह्माकुमार पुरी भाईजी (ओ.आर.सी. गुरूग्राम, आशा बहनजी के लौकिक पिताजी) अपने अलौकिक अनुभव सुनाते हैं कि 25 जनवरी, 1958 की शाम को मेरे लौकिक मामा का लड़का मेरे पास आया और कहने लगा कि चलो, यहाँ ब्रह्माकुमारी बहनें आयी हैं। हम दोनों चल दिये जहाँ बहनें ठहरी थीं लेकिन ज्ञान समझने के विचार से नहीं। तिलक नगर में हरविलास रायजी ने एक छोटा-सा कमरा बहनों को दिया था जहाँ क्लास होती थी। हम वहाँ पहुँचे तो आत्ममोहिनी (गंगे) दादीजी ने हमें बिठाया और संस्था का लक्ष्य बताया; मनुष्य से देवता बनने का, दैवी गुण धारण करने का और अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने का। मैंने पूछा कि आप मनुष्य से देवता बना सकते हो? उन्होंने कहा कि आपको जैसा हम कहें वैसा अपने को परिवर्तन करना पड़ेगा। हम दोनों भाई हँसी-मजाक करके वहाँ से अपने घर आ गये। भोजन आदि करके सो गये।

तुम्हारा नाम शिव बाबा के पास भेज दिया है

अचानक अमृतवेले मेरे कमरे में बहुत तेजोमय प्रकाश दिखायी देने लगा। मैं सपने में नहीं, जागृत अवस्था में था। लाइट के अन्दर बूढ़ा बाबा देखा। उनके हाथ में एक कवर था, उस पर गोल्डन शब्दों में कुछ लिखा हुआ था। उसने मुझे कहा, बच्चे, तुम्हारा नाम शिव बाबा के पास भेज दिया है। उस समय मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव हो रहा था। यह दृश्य समाप्त हुआ। मैं सोने की कोशिश करने लगा लेकिन नींद का नामो-निशान नहीं। मैं उठा, स्नान किया, उसके बाद सोचा कि आश्रम जाना चहिए। मैं आश्रम की ओर चल दिया। वहाँ पहुँचकर दरवाज़ा खटखटाया। बहनजी ने कहा, बाहर बैठो, अभी खोलते हैं। मन में उत्कण्ठा बहुत थी इसलिए मैं समय से पहले पहुँच गया था। कुछ समय के बाद दरवाज़ा खुला और मैंने बहनजी से पहली बात यही पूछी कि आपके गुरु कौन हैं? बहनजी ने कहा, हमारा गुरु कोई नहीं है, हमारे तो पिताश्री जी हैं। बात करते-करते मेरी नज़र दीवार पर टंगे चित्र पर पड़ी तो मेरी ख़ुशी का पारावार नहीं रहा। मैंने कहा, बहनजी, यही बाबा तो मुझे सुबह तीन बजे मिले और कहा कि तुम्हारा नाम शिव बाबा के पास भेज दिया है। बहनजी ने कहा, आप वही कल्प पहले वाले बाबा के बच्चे हैं, जो आपको बाबा ने अपना बना लिया। मेरे मन में बार-बार यही विचार आते रहे कि जिन्हें मैंने देखा नहीं, वे स्वयं मेरे पास आकर कह रहे हैं कि तुम्हारा नाम शिव बाबा के पास भेज दिया है। उसके बाद सुबह-शाम जाकर कोर्स पूरा किया और नित्य जाने लगा। एक दिन भी मिस नहीं करता था। जो पुरानी आदतें थीं वे सब सहज छूट गयीं। मेरे लौकिक परिवार वाले राधा स्वामी मठ में जाते थे। मुझे भी गुरुजी से मंत्र मिला था। उन्होंने पुरानी आदतें, बीड़ी, सिगरेट, शराब छोड़ने के लिए कहा था लेकिन मैं एक भी आदत छोड़ नहीं पाया था। घर में मांसाहार बनता था। मैंने घर वालों से कहा, मैं होम्योपैथिक दवाई ले रहा हूँ इसलिए इन सब चीज़ों का परहेज़ है। उसके बाद एक दिन भी मांसाहार घर में नहीं बना। लेकिन कुछ दिनों के बाद घर वालों को शक हुआ कि यह रोज़ सुबह ब्रह्माकुमारियों के पास जाता है, ज़रूर कोई जादू उन्होंने कर दिया है। क्योंकि गुरु के कहने पर तो कुछ भी नहीं छोड़ा था और वहाँ जाने पर पहले दिन से ही सब कुछ छोड़ दिया है।

आख़िरकार, वह दिन आया जब मेरी युगल भी साथ चलने लगी

यहाँ की पहली धारणा पवित्रता है, जो मुझे बहुत अच्छी लगी। अगर पवित्र नहीं रहूँगा तो धारणा भी नहीं होगी और प्रभु-मिलन भी नहीं होगा, योग भी नहीं लगेगा। मैं पवित्र रहने लगा लेकिन मेरी पत्नी को लौकिक सम्बन्धियों ने उल्टा-सुल्टा बोलकर भड़का दिया। वह मेरी एक भी बात नहीं मानती थी। इस कारण एक दिन घर में बहुत झगड़ा हो गया। लेकिन मेरा शुरू का नशा भी बहुत था कि पाना था सो पा लिया। मुझे जो चाह थी वह मिल गया। पत्नी क्या जाने कि मुझे क्या मिल गया। मैंने कहा, देखो निर्मला, रोज़-रोज़ का झगड़ा अच्छा नहीं। एक दिन आप भी चलकर तो देखो, अगर तुम्हें कोई बुराई दिखायी दे तो मैं वादा करता हूँ कि मैं भी जाना छोड़ दूंगा।

इस प्रकार एक साल बीत गया। आख़िर वह दिन आया जो मेरे साथ वह आश्रम आयी। उस समय गंगे दादीजी योग करा रही थीं। जैसे ही मेरी युगल की नज़र गंगे दादीजी पर गयी, उनसे दुर्गा का साक्षात्कार हो गया और वह मन ही मन अपने को दोषी मानने लगी। कहने लगी कि ये तो पवित्र देवियाँ हैं, मैं इनके बारे में ग़लत सोचती थी। उसके बाद निर्मला (मेरी युगल) भी रोज़ मेरे साथ क्लास में आने लगी और फिर सारा परिवार इस ज्ञान में चलने लगा। अब मन में यही चाह थी कि जिस बाबा ने इन बहनों को इतना श्रेष्ठ बनाया और हमारा जीवन बदल दिया तो क्यों ना ऐसे बाबा से जाकर मिलें।

नयनों से नूर बरस रहा था

सुबह क्लास में गंगे दादी ने बताया कि बाबा कानपुर आ रहे हैं। मैं मन ही मन बड़ा खुश हो गया कि बाबा ने हमारी सुन ली। हम बाबा से मिलने कानपुर पहुँच गये। हम क्लास में बैठे थे, बाबा ने क्लास हॉल में प्रवेश किया तो मैं देखता ही रह गया। लम्बा, सफ़ेद वस्त्रधारी, तेजोमय चेहरा, नयनों से नूर बरस रहा था। दिव्य शक्ति से भरपूर ऐसा व्यक्तित्व आज तक नहीं देखा था। बाबा सन्दली पर बैठे तो हॉल में गहरी शान्ति छा गयी। बाबा सबको दृष्टि देने लगे। जब मेरे पर दृष्टि पड़ी तो ऐसा लगा कि आँखों से प्रकाश ही प्रकाश निकल रहा है। जैसे ही बाबा ने पहला शब्द उच्चारण किया, "मीठे बच्चे", वह दिल को छू गया। फिर मुरली शुरू हुई। मुरली के बाद बाबा कमरे में गये। बहनजी ने कुछ भाई-बहनों को इशारा किया। मैं भी कमरे में गया। मैं बाबा की गोद में चला गया और देह को ही भूल गया। मैं कहाँ हूँ, यह भी भूल गया। बाबा से जो अलौकिक सुख मिला, उसका वर्णन शब्दों में नहीं कर सकता। साकार बाबा का प्यार दुलार कभी भूल नहीं सकता जिसने सर्व सम्बन्धों का दिव्य सुख दिया। मात, पिता, बन्धु, सखा के सम्बन्धों का सुख उस दिव्य शक्ति से प्राप्त हुआ और मेरा निश्चय एकदम दृढ़ हो गया। बाबा कहते थे, सोचो, दुनिया जिसके एक साक्षात्कार के लिए तरसती है, मैं उसकी गोदी में बैठा हूँ। बाबा की दृष्टि में सभी बच्चे समान थे। बाबा कहते थे कि बाबा तो ग़रीब निवाज़ है। दिल से यही निकलता था कि 'इतना प्यार करेगा कौन'!

आया था जान से मारने, आ गया शरण में

लौकिक में मैं मयूर मिल में लेबर ऑफ़िसर था। मैंने एक लेबर को बर्खास्त कर दिया तो उसको बहुत गुस्सा आया और कहा कि मैं पुरी को जान से मार दूंगा। जब मुझे मालूम पड़ा तो मैंने गंगे दादी को जाकर सुनाया कि आज मेरे साथ ऐसी घटना घटने वाली है। दादी ने तुरन्त बाबा को फोन किया कि बाबा पुरी भाई को आज एक लेबर जान से मारने के लिए कह रहा है। तब बाबा ने कहा, बच्चे को कहो कि उसको कुछ भी नहीं होगा, निश्चिन्त रहे। मैं जब मिल से बाहर आया तो वह दरवाज़े पर ही खड़ा था मारने के लिए। लेकिन बाबा का जादू देखो, वह तुरन्त मेरे पैरों में पड़ गया, माफ़ी माँगने लगा और कहा कि मेरा हिसाब कर दो। इस प्रकार साकार में दूर होते हुए भी बाबा बच्चों की रक्षा करते थे। बाबा के बारे में क्या वर्णन करें, क्या छोड़ें समझ में नहीं आता। इतना तो मैं कह सकता हूँ कि साकार बाबा एक ही हैं, उन जैसा और कोई इस संसार में न था, न है और न कभी होगा।

सुंदर लाल भाई

हरिनगर, दिल्ली से ब्रह्माकुमार सुन्दर लाल जी अपने अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं कि मैंने दिल्ली कमला नगर सेन्टर पर सन् 1956 में आना शुरू किया। सप्ताह कोर्स करने के बाद कोई-न-कोई सेवा में भी समय देने लगा परन्तु यहाँ की जो बुनियादी बात है कि यहाँ भगवान स्वयं पढ़ाते हैं, इस पर निश्चय नहीं था। थोड़े दिनों के बाद जब पता चला कि ब्रह्मा बाबा दिल्ली चान्ना मार्केट के इलाके में ठहरे हुए हैं तो वहाँ जाने का तथा पहली बार ब्रह्मा बाबा से मिलने का सुअवसर मिला। बाबा सन्दली पर बैठे थे और अन्य लोगों के साथ मैं थोड़ी दूर नीचे बैठा था। बाबा ने आत्मा के बारे में ही थोड़ा समझाया और फिर मेरी ओर देखा। जैसे ही बाबा की दृष्टि मुझ पर पड़ी, मेरे अन्दर रूहानियत से भरी कुछ ऐसी ईश्वरीय शक्ति की खींच हुई कि मैं अपने स्थान से उठकर बाबा की गोदी में चला गया। वहाँ कुछ समय के लिए मैं अपने शरीर की सुध-बुध भूल गया, अशरीरीपन तथा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने लगा। इसके बाद मुझे यह निश्चय हुआ कि यह ज्ञान स्वयं परमपिता परमात्मा शिव, साकार ब्रह्मा बाबा के तन में प्रवेश करके दे रहे हैं। बाबा ने बच्चे, बच्चे कहकर मेरे अन्दर जो बड़ेपन का भान था वह खत्म कर दिया और तब से मैं अपने को शिव बाबा का बच्चा ही समझने लगा।

समाज के सामने एक उच्च आदर्श स्थापित करना है

फिर तो कई बार मधुबन में जाना हुआ और बाबा से मिलना भी हुआ। एक बार मैं बाबा के पास गया तो बाबा ने कहा, "आओ मेरे महावीर बच्चे!" इस पर मैं सोचने लगा कि मैंने कोई ऐसा विशेष कार्य तो किया नहीं, फिर बाबा मुझे महावीर कैसे कह रहे हैं? साथ में यह भी विचार चला कि हो सकता है कि मुझे भविष्य में कोई ऐसा पार्ट बजाना हो जो विशेष कार्य कहा जा सके। कुछ समय के बाद सन् 1960 में जब मेरे दिव्य (गंधर्व) विवाह की बात हुई तो मैंने कहा कि यहाँ पवित्रता का ज्ञान है तो यहाँ शादी करने की कोई बात ही नहीं होनी चाहिए। फिर बाबा के आदेश पर मम्मा ने मुझे समझाया कि अमृतसर की शुक्ला कुमारी की शादी के लिए उसकी लौकिक माता जी बहुत कह रही हैं परन्तु वह कन्या पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहती है, इसलिए तुम्हें यह शादी करके पवित्र जीवन व्यतीत करना है और समाज के सामने एक उच्च आदर्श स्थापित करना है। तब मुझे बाबा के वो शब्द याद आये कि मुझे महावीर बनकर इस परीक्षा में पास होकर दिखाना है। इस प्रकार, बाबा के ये शब्द मेरे लिए वरदान सिद्ध हुए और क़दम-क़दम पर इन शब्दों की स्मृति से मुझे अपने लक्ष्य अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र जीवन की ओर अग्रसर होने में सफलता मिलती गयी और आज बड़े हर्ष के साथ मैं कह सकता हूँ कि अपने परम प्यारे बापदादा की असीम मदद और शक्ति से मैं इस परीक्षा में पास होकर आगे बढ़ रहा हूँ। दुनिया जिसको असम्भव समझती है वह न सिर्फ सम्भव हुआ है बल्कि बापदादा ने सहज कर दिया है।

एक बात और बाबा के बारे में मैं बताना चाहता हूँ कि मधुबन में प्रायः मकान निर्माण का कार्य चलता रहता था। हम जब भी वहाँ जाते और बाबा थोड़े खाली होते तो बाबा हमें अपने साथ ले जाकर दिखाते कि बच्चे, अभी यह-यह बना है और आगे ऐसा-ऐसा बनाना है। मैं सोचता था कि बाबा यह सब क्यों बता रहे हैं! तो विचार चला कि इससे भी बाबा मेरे अन्दर अपनेपन की भावना भर रहा है कि मैं यज्ञ का हूँ और यज्ञ मेरा है।

राजकृष्ण भाई

बरेली के ब्रह्माकुमार राजकृष्ण भाई कहते हैं; ब्रह्माकुमारी आश्रम में आने से पहले मैं गीता, हनुमान चालीसा, आदि पढ़ता था और महात्माओं के सत्संग में जाया करता था। एक दिन एक महात्मा के पास जा रहा था तो एक भाई ने रास्ते चलते आत्मा की चर्चा शुरू कर दी। चर्चा करते-करते हम दोनों महात्मा के पास पहुँच गये। महात्मा जी का प्रवचन सुनने के बाद मैं वापस आ रहा था तो वही भाई मेरे साथ पुनः ज्ञान चर्चा करने लगा और कहा, अगर ज्ञान को अच्छी तरह से समझना चाहते हो तो यहाँ गुरुद्वारे के पास मेरठ से कुछ देवियाँ आयी हैं जो परमात्मा का ज्ञान सुनाती हैं, उनके पास चलो। आप रविवार को दो बजे मिलना, मैं आपको साथ ले जाऊँगा। रविवार के दिन उस भाई के साथ आश्रम पर गया।

मेरी चोटी को एक लकड़ी से बाँध दिया

वहाँ के शान्त वातावरण ने मुझे बहुत आकर्षित किया। बाद में बहनों ने शिव परमात्मा का परिचय दिया और एक छोटी-सी पुस्तक दी। उसको मैंने पढ़ा। पढ़ने के बाद मन आनन्द से भर गया। दूसरे दिन गया तो शिवरात्रि का दिन था। बहनों ने रात को अखण्ड योग का कार्यक्रम रखा था। मुझे कहा कि रात्रि को योग करने आना। मैं भी रात्रि को योग करने पहुँच गया। योग में बैठे तो मेरी चोटी को एक लकड़ी से बाँध दिया और कहा कि अगर झुटका आया तो सारा झाड़ हिल जायेगा। इसलिए एक की लगन में जाग्रत होकर बैठना। मैं सारी रात योग में बैठा रहा। सुबह पाँच बजे प्रकाश इन्द्रा दीदी आयी और योग की दृष्टि देकर योग कराया। उस समय मैं एकदम हल्का हो गहन शान्ति में खो गया। उसके बाद नित्य क्लास में जाने लगा और सिन्धी मुरली पढ़ने लगा। मेरी लगन मुरली के प्रति इतनी बढ़ गयी कि बहनों से सन् 1948 तक की मुरलियाँ लेकर पढ़ने लगा। भगवान से मिलने की तीव्र इच्छा जाग्रत हो गयी कि मैं सम्मुख जाकर उनसे मिलूँ। मई 1956 में मधुबन पार्टी जा रही थी। मुझे नौकरी से छुट्टी नहीं मिली लेकिन लगन बहुत थी तो मैंने बहनों से कहा कि मैं ज़रूर आऊँगा। मैंने बाबा को बहुत याद किया। दूसरे दिन छुट्टी मिल गयी।

बाबा मुझे 'स्वराज्य कृष्ण' के नाम से ही बुलाते थे

मैं अकेले ही गाड़ी में बैठ आबू रोड स्टेशन पर पहुँच गया। विश्वकिशोर दादा दूसरी पार्टी को लेने आये थे तो मैं भी उनके साथ मधुबन पहुँच गया। स्नान आदि करके हम मम्मा-बाबा से मिलने गये। बाबा की मेरे पर दृष्टि पड़ते ही मैं बाबा की गोदी में चला गया। बाबा बोले, “बच्चे, जीते जी मरने के लिए आये हो?” एकदम मुझे समझ में आया कि भृगु ऋषि ने मेरी जन्मपत्री पढ़ ली। ऐसा ही महसूस हुआ कि मेरे असली माँ-बाप यही हैं। एक दिन मैंने बाबा को अपने दिल की बात कही कि मेरी सगाई हो चुकी है, क्या करूँ? तो बाबा ने कहा, बच्चे, हमारा प्रवृत्तिमार्ग है इसलिए उसको भी ज्ञान दो। जब मधुबन से वापस आया तो घर पर गुरु आये थे। माता-पिता ने कहा, गुरु कर लो। मैंने कहा, मुझे तो सतगुरु मिल गया है तो गुरु की क्या दरकार है? फिर माता-पिता को भी यह ज्ञान सुनाया। उनको भी बहुत अच्छा लगा और ज्ञान में चलने लगे।

सन् 1957 में बाबा से मिलने मधुबन गया तब काफ़ी समय वहाँ रहकर यज्ञ की भिन्न-भिन्न सेवा करता रहा। हमारे सामने मम्मा-बाबा त्याग, तपस्या और सेवा के सैम्पल थे। बाबा मुझे 'स्वराज्य कृष्ण' के नाम से ही बुलाते थे और कहते थे कि बच्चे, अपना फैसला कर लो। तो यहाँ से सीधा अम्बाला गया और सभी रिश्तेदारों को बुलाकर झाड़, त्रिमूर्ति पर पूरा ज्ञान समझाया और कहा, मैंने शिव बाबा से आजीवन ब्रह्मचर्य में रहने का वायदा किया है। यदि आपको मंज़ूर है तो मैं शादी करके भी आजीवन ब्रह्मचर्य में रहूँगा। उन्होंने मना कर दिया। फिर मैंने सारा समाचार मम्मा-बाबा को लिख दिया।

बच्चे, इस बच्ची को बन्धनों से छुड़ाना है

सन् 1958 में मम्मा-बाबा दिल्ली राजौरी गार्डन में आये। मैं मम्मा-बाबा से मिलने गया। उस दिन ब्रह्मा भोजन रखा था। वहाँ काफ़ी भाई-बहनें आये हुए थे। मैं जैसे ही भोजन पर बैठा, कुंज दादी आयी और कहा, आपको बाबा बुला रहे हैं। मैंने सोचा, इतने भाइयों में से मुझे ही क्यों बुलाया, ज़रूर मेरे से कोई भूल हुई होगी। मैं थाली छोड़कर तुरन्त बाबा के पास गया। बाबा ने बड़े प्यार से अपने पास बिठाया, दूसरी तरफ़ मम्मा बैठी। मुझे बीच में बिठा लिया। उसके बाद बाबा ने एक कन्या का लिखा हुआ निश्चय-पत्र दिखाया जिस पर उस कन्या का फोटो लगा था। बाबा ने कहा कि बच्चे, इस बच्ची को बन्धनों से छुड़ाना है। मैंने कहा, बाबा, अभी तो आपने मुझे स्वतन्त्र पंछी बनाया है। मैं अब शादी के चक्र में नहीं आऊँगा। मम्मा ने मुझ से कहा, कहो, बाबा आप जैसे कहेंगे। तो बाबा बोले कि शिव बाबा जैसे कहे। उसी समय सन्तरी दादी को ध्यान में भेजा। थोड़ी देर में सन्देशी वापस आयी और सन्देश सुनाया कि शिव बाबा ने कहा है कि बच्चे को दिव्य (गंधर्व) विवाह कर बच्ची को बन्धन से मुक्त करना है। मैंने कहा, जो आज्ञा। उसके बाद शादी करके हम बाबा के पास पहुँच गये। बाबा ने हम दोनों को बड़े प्यार से गोद में लिया और कहा कि ये दोनों बच्चे बाबा को कमाल करके दिखायेंगे। उसके बाद उस कन्या को बाबा ने दिल्ली सेन्टर पर भेज दिया और मैं लौकिक सर्विस पर सहारनपुर चला गया। वहाँ बाबा को निमन्त्रण दिया तो बाबा ने कहा, "ज़रूर आऊँगा, आप तैयारी करो क्योंकि बच्चों ने बाप का हुक्म माना है, बाप भी बच्चों का हुक्म मानेंगे।" बाबा-मम्मा सहारनपुर आये तो मेरी खुशी का पारावार न रहा। कुछ दिन मम्मा-बाबा सहारनपुर में रहकर मुंबई गये। फिर मुझे भी सेवा के लिए वहाँ बुलाया।

सन् 1968 में जब बाबा से मिलने मधुबन गया तो बाबा एकदम न्यारे और प्यारे लगते थे। चलते-फिरते फ़रिश्ता स्वरूप देखने में आता था। जब बाबा से मिलते थे तो मात-पिता दोनों का अनुभव होता था। लेकिन मुझे यह मालूम नहीं था कि बाबा से मैं अन्तिम बार मिल रहा हूँ। ऐसे थे मेरे निराले बाबा!

गुरुमुख दादा

मधुबन के गुरुमुख दादा अपना अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं कि मैं आज से 45 साल पहले 50 साल की उम्र में ज्ञान में आया। जहाँ मैं रहता था वहाँ उस समय ब्रह्माकुमारी बहनों को कोई जानता तक नहीं था। उन दिनों में सहारनपुर में था और रेलवे में नौकरी करता था। उस समय स्टीम इंजन होते थे, मैं असिस्टेण्ट लोको फोरमैन था। वहाँ मेरा एक मामा था, वह बहुत बड़ा आदमी था और कॉन्ट्रैक्टर था। उसका सम्बन्ध अंग्रेज़ों के साथ था। उसकी एक लड़की थी, शादी के छह मास के बाद उसका पति मर गया तो मामाजी ने सहारनपुर में एक मकान बनाकर वहाँ उसको रखा। वह बहन दुःखी बहुत थी। क्योंकि जब उसका पति मरा था उस समय उसके पेट में बच्चा था। इस कारण उस बच्चे के भविष्य का भी सवाल था। जब वह बहुत दुःखी थी तो उसने वहाँ के ब्रह्माकुमारी सेन्टर पर जाना शुरू किया। उस समय सेन्टर नया-नया खुला था। वहाँ जाने से उसको बहुत आनन्द मिला, दुःख दूर होता गया। उस बहन को इतना अच्छा लगा कि उसने अपने मकान का ऊपर वाला सारा हिस्सा ब्रह्माकुमारियों को दे दिया। मैं रेलवे कॉलोनी में रहता था। कभी-कभी मैं उसके घर जाया करता था। जब भी मैं उससे मिलने जाता था तब वह कहती थी कि भाई साहब, आप यह ज्ञान सुनो। सुनके तो देखो, बहुत अच्छा है। मैं सुना-अनसुना कर चला जाता था। इस प्रकार, दो साल तक वह मुझे कहती रही और मैं उसकी बात ऐसे ही टालता रहा।

जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि दिखायी पड़ती है

वहाँ आश्रम पर एक बार बाबा आये। सुबह 10 बजे का वक्त था, मैं दफ़्तर में काम कर रहा था। एक भाई मेरे पास आया और कहने लगा कि आपकी बहन आपको बुला रही है, बाबा से आपको मिलाना है। बाबा, बाबा शब्द तो मैं हर बार अपनी बहन के मुख द्वारा सुनता ही था। मुझे कुछ खास नहीं लगा, एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया और मैं अपने काम में लग गया। पौने घण्टे के बाद और एक भाई आया। मेरा पद ऐसा था कि मेरे दफ़्तर में मेरी अनुमति बगैर कोई अन्दर आ नहीं सकता था। लेकिन यह ब्रह्माकुमार भाई सीधा मेरे पास आया और कहने लगा, अरे साहब, आप यहाँ बैठे हो? आपकी बहन आपको बुला रही है। आपको बाबा से मिलाना है। उसकी बात सुनकर मैं हैरान हो गया कि यह क्या कह रहा है! मेरे आफ़िस में, मेरी इजाज़त के बिना अन्दर आकर इतना निडर होकर कह रहा है! मैंने कहा, ठीक है आऊँगा। उसने कहा, चलो, चलो, अभी उठो। मैंने सोचा, अरे यह तो कमाल का आदमी है, मुझे इतने अधिकार से कह रहा है। फिर मैं उठा और उसके साथ चल पड़ा। जब मैं वहाँ गया तब बाबा बच्चों से मिल रहा था। मैं खड़ा देख रहा था। हॉल में बाबा के चारों तरफ़ बहुत भाई-बहनें बैठे हुए थे। बाबा उनको ऐसे प्यार करता था जैसे बाप अपने सगे बच्चों से करता है। उनको गोद में भी लेता था। मैं ज्ञान में नहीं था ना इसलिए वह दृश्य देख मुझे बहुत गुस्सा आया, नफ़रत आयी कि यह बाबा क्या कर रहा है? मैं दूर दरवाज़े के पास ही खड़ा हुआ था। मुझे नज़दीक नहीं बुलाया गया।

बाबा के बोल ने मुझे अनमोल बना दिया

बाबा सबसे मिल चुके थे, फिर भी मुझे नहीं बुलाया गया। बाद में मेरी बहन बाबा का हाथ पकड़कर ले आयी और मेरे सामने खड़ा कर दिया। वह बाबा से मेरा परिचय कराने लगी कि बाबा, यह मेरी बुआ का लड़का है, वो करता है, यह करता है, आदि। उसके बाद बाबा ने मेरी तरफ़ देखा और आगे चला गया। मेरे से कुछ नहीं बोला। चार-पाँच फुट आगे चला गया और वहाँ जाकर रुक गया। फिर मुड़कर वापस आ गया। आकर मुझे देखने लगा। मैं भी बाबा को देखता रहा। जैसे सामान्य रूप में एक व्यक्ति दूसरे को देखता है तो दूसरा भी उसको देखता है। तीन-चार मिनट बाबा मुझे देखता रहा। मुझे ऐसे लग रहा था कि बाबा मुझे छह मास से देख रहा है। फिर बाबा मुड़कर मेरी बहन से कहने लगा, बच्ची, यह बच्चा बहुत अच्छा है। ऐसे कहकर चले गये। बहन भी चली गयी। वे दोनों चले गये तो मैं भी चला गया और दफ़्तर पहुँच गया। जब मैं दफ़्तर में गया तो मेरा मन एकदम बदला हुआ था। मतलब में बहुत अच्छी मनःस्थिति में, खुशी से भरपूर मनःस्थिति में था। उस दिन मैंने बहुत अच्छा काम किया, घर गया, खाना खाया। खाना खाने के बाद मैं एक-डेढ़ घण्टा विश्राम करके आता था। लेकिन उस दिन खाना खाकर सीधा फिर दफ़्तर आ गया और काम करना शुरू किया। बाबा से मिलकर, उनकी दृष्टि लेकर मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। फिर 4-5 दिन तक मैं सेवाकेन्द्र की तरफ़ गया नहीं। फिर मुझे बहन याद आयी तो बहन के पास चला गया। वह मुझे घर के ऊपर आश्रम पर ले गयी। वहाँ कोई अनुभवी बहन थी, वह मुझे ज्ञान समझाने लगी। उसकी बातें बहुत अच्छी लगने लगी। उसके बाद मेरी बहन ने कहा, आप चार-पाँच दिन एक-एक घण्टा यहाँ पर आना, बाद में इस ज्ञान में चलना या न चलना वह आपके ऊपर है। मैंने मान लिया और 5-6 दिन जाकर ज्ञान लिया। बहनों से ज्ञान सुनने से मेरे में परिवर्तन आने लगा और मैंने रोज़ जाना शुरू कर दिया।

लेकिन मैं ऐसा आदमी था जो खूब सिगरेट पीता था, क्लब जाकर गैम्बलिंग करता था, सब काम करता था और विकारी तो था ही, पाँच बच्चे थे। रेलवे में पोस्ट अच्छी होने के कारण तनख्वाह भी बड़ी अच्छी मिलती थी। जिस दिन से मैंने आश्रम जाना शुरू किया उस दिन से मैंने अपनी पत्नी को विकारी दृष्टि से न देखा। पवित्र रहने के लिए मुझे किसी ने कहा नहीं। यह अपने आप मन में शुद्ध भावना आने लगी। यह सब थी ज्ञान और उन बहनों के पवित्र वायब्रेशन्स की कमाल। कुछ मास के बाद मेरे भाई की लड़की की शादी थी। उस शादी में जाना ही पड़ा। वहाँ बहुत अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ आदि दे रहे थे परन्तु मैंने कुछ नहीं लिया, कुछ नहीं खाया। मुझे किसी ने नहीं बताया था कि बाहर की चीजें नहीं खानी चाहिएँ। उनको मैंने कहा, मुझे फल ला दो, बस। इस तरह आश्रम पर रोज़ जाने से मुझे ये सारी प्रेरणायें आती थीं।

मैं सम्पूर्ण बदल गया

कुछ दिनों के बाद सहारनपुर से एक पार्टी मधुबन आ रही थी। उसके साथ मुझे भी भेजा गया। मधुबन आकर मैं बाबा से मिला। बाबा ने तो मुझे पहले सहारनपुर में दृष्टि दी हुई थी और कहा भी था कि यह बहुत अच्छा बच्चा है। बाबा ने बहुत प्यार किया। पहले मम्मा से मिला, बाद में बाबा से। दोनों ने इतना प्यार किया कि मैं सम्पूर्ण बदल गया। मधुबन से जब मैं सहारनपुर आया तो मेरी बदली अम्बाला हो गयी और मेरा भोगी जीवन, योगी जीवन में परिवर्तित हो गया। मैंने यह देखा कि बाबा जब किसी को दृष्टि देता था तब हर कोई व्यक्ति ज्ञान में चलना शुरू कर देता था। क्योंकि बाबा में शिव बाबा बैठकर डायरेक्ट काम करता था ना! जो बाबा से दृष्टि लेता था उसको ही पता नहीं पड़ता था कि मैं कहाँ हूँ, क्या कर रहा हूँ, कैसे कर रहा हूँ? वह अपने आप बदल जाता था। उसके मन, वचन, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क में बदलाव आ जाता था, श्रेष्ठता आ जाती थी। उनके रिश्तदार भी ये सब देखकर आश्चर्य खाते थे। इस प्रकार साकार बाबा से मिलना माना जीवन परिवर्तन होना, भोगी से योगी बनना।

कृष्णा बहन

अम्बाला कैण्ट से ब्रह्माकुमारी कृष्णा बहन जी अपने अनुभव सुनाती हैं कि जब मैं ज्ञान में आयी उस समय स्कूल में पढ़ती थी। बहुत ही बन्धन होने के कारण लौकिक बाप बाहर नहीं निकलने देते थे। सन् 1950 में बाबा अमृतसर आये थे तो पेपर देने का बहाना बनाकर मैं अमृतसर जाकर बाबा से मिली। मैंने एक कविता लिखी थी जो खड़े होकर बाबा के सामने प्रस्तुत की:
"मुझे निश्चय है कि आप भगवान हैं,
करते सबका कल्याण हैं,
मेरी नैय्या डगमग डोले,
किश्ती भंवर में खाये हिंडोले,
गोद में ले लो पार करो...।"

बोलते-बोलते मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बह गयी। बाबा ने मेरा हाथ पकड़ कर गले लगाया। मुझे ऐसा लगा कि बाबा रूई जैसे कोमल-कोमल हाथों से अपने ही रूमाल से मेरे आँसू पोंछ रहा है और धैर्य दे रहा है कि धीरज धरो, धीरज धरो। मेरे साथ और भी बहुत-सी कुमारियाँ थीं। बाबा ने सबको देखते हुए चन्द्रमणि दीदी को कहा कि मैं तो सबको गाड़ी में भरकर ले जाऊँगा। यह मेरी बाबा के साथ पहली मुलाक़ात थी लेकिन घर वालों से छिप-छिपके।

इस मिलन के बाद ऐसा लगा कि किसी ने मेरा चित्त चुरा लिया और नींद ले ली। दूसरी बार बाबा ने मुझे पत्र भेजा कि अपनी फोटो भेजो। किसी दूसरे स्थान पर जाकर बाबा को फोटो भेजा। फोटो देखकर बाबा ने चन्द्रमणि दीदी को कहा कि यह तो मेरी कल्प पहले वाली बच्ची है। यह तुम्हारी मददगार बनेगी।

बाबा के बोल मेरे लिए वरदान बन गये

बाबा से मुझे दो वरदान मिले। एक 'शेरनी शक्ति' है। दूसरा 'यज्ञसेवा में मददगार बनेगी।' ये दोनों वरदान आज तक मेरे साथ चल रहे हैं। जहाँ भी मैंने क़दम रखा वहाँ मुझे बाबा के वरदान अनुसार पदम मिले। रूखे-सूखे सेन्टर, जहाँ थाली-कटोरी-गिलास की भी कमी थी, थोड़े ही दिनों में हरे-भरे हो जाते थे। खास कर पंजाब में तलवाड़ा, होशियारपुर एवं शिमला इत्यादि में यह देखा। आज तक अनेक विघ्न आते भी हैं लेकिन मुझे बाबा के वरदान अनुसार सफलता ही सफलता मिलती रहती है।

वे मुझे कहने लगे, ‘तुम देवी हो, हमें माफ़ कर दो’

विकट परिस्थिति का चमत्कार है कि जब सहन करते-करते चार साल बीत गये, कलह-क्लेश का वातावरण लौकिक घर में रोज़ बना रहता था तो बड़े भाई ने लास्ट फैसला यह लिया कि इसका गला दबाकर इसे मारकर खुद मैं भी खुदकुशी कर लूँगा या जेल में चला जाऊँगा। फिर एक दिन तंग आकर रात को मेरा गला दबाने लगा। मैं "बाबा-बाबा" करने लगी। पता नहीं अचानक मेरे अन्दर कौन-सी शक्ति आयी कि भाई मुझे मारने के बजाये खुद बड़ी दूर जा गिरा और बेहोश हो गया। मेरे माँ-बाप सब मेरे पैर छूने लगे। कहने लगे, ‘तुम देवी हो, देवी हो, हमें माफ़ करो। हमसे ग़लती हो गयी, माफ़ कर दो, माफ़ कर दो।’ उस दिन से मेरे सारे बन्धन छूट गये। मुझे नौकरी के बहाने किसी दूसरे शहर में जाने की छुट्टी मिल गयी। मैंने दो-तीन स्कूलों में लौकिक सर्विस की और वहाँ बाबा के लाल अक्षरों से लिखित पत्र मिलते रहे।

साधारण मानव-तन में बैठ, सामान्य कर्म करती हुई परम शक्ति को देखा

बाबा के चेहरे पर मैंने अनोखी चमक, आँखों में अति प्रेम का आकर्षण और हाथों में स्थूल तथा सूक्ष्म सब कुछ करने की अद्भुत शक्ति का अनुभव किया है। मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो बच्चों के साथ बैठकर सब्ज़ी काटते, धान साफ़ करते हुए भगवान को मैंने देखा। घरों में पुरुष लोग पानी का एक गिलास भी लेकर नहीं पीते, यहाँ निरहंकारी बाबा को अनेक स्थूल कार्य एक्यूरेट करते देखा। ब्रह्मा बाबा की आन्तरिक स्थिति का ज़्यादा अनुभव तब हुआ जब अव्यक्त होने से कुछ समय पहले मैं उनसे मिली थी। उस समय बाबा बहुत गंभीर लगने लगे। मुरली के पश्चात् खड़े होकर दृष्टि देना, अपने कमरे तक आकर भी पहले कई बार चैम्बर में जो दो शब्द बोलते थे उसमें भी गंभीर रहने लगे। सबको शान्ति में ले जाते थे। शान्ति की स्थिति में बहुत गहराई महसूस होने लगी। खड़े-खड़े बहुत देर तक योग करते लाइट स्वरूप बनते देखा ।

बाबा में सभी प्रकार के गुण थे। सबसे बड़ी बात, बाबा में परखने की अद्भुत शक्ति थी। पार्टी के भाई-बहनों को मधुबन में लाकर बाबा के सामने बिठाते थे। पार्टी से मिलने के बाद बाबा हमें अलग बिठाकर कहते थे कि यह भाई तुम्हें आगे चलकर धोखा दे सकता है। सचमुच वह ऐसा ही निकलता था। जिसके लिए हम कहते थे कि यह अच्छा नहीं है, लड़ता रहता है, उसके लिए बाबा कहते थे कि यह तुम्हें यज्ञ में बहुत सहायता देगा। ऐसे बाबा अनेक आत्माओं की जन्मपत्री पढ़ लेते थे। एक बार समझानी मिल गयी कि सब कुछ बाबा को सुनाना होता है, तब से लेकर मैं सब कुछ बाबा को सच-सच लिखती रही हूँ। इसलिए भी बाबा ने मुझे कई बार "सचली कौड़ी" का टाइटिल भी दिया हुआ है।

लॉफुल और लवफुल बाबा

बाबा का धर्मराज रूप मैंने तीन बार देखा है। ग़लती करने पर भी सच्चे दिल से सब कुछ बाबा को सुनाने पर बाबा माफ़ कर देते हैं और वे बच्चे बाबा के नज़दीक चले जाते हैं। इसके बारे में एक छोटा-सा प्रसंग सुनाती हूँ। एक बार लगभग एक मास में मधुबन में रही। मेरे ऊपर इंचार्ज रूप में बड़ी बहन थी। मैं छोटी थी। उस बड़ी बहन को कुछ दिमागी तकलीफ़ होने के कारण कई बार रात को कमरे से बाहर घूमती रहती थी। उसे नींद नहीं आती थी। तब पाण्डव भवन पूरा बना नहीं था, सिर्फ तीन-चार कमरे बने थे जिन्हें ट्रेनिंग रूम कहते थे। वह बहन पूरी रात बाहर घूमती रही। किसी बहन ने बाबा को यह सब बता दिया। दिन में बाबा ने उसे कुछ भी न कहकर मुझे अकेले में बुलाकर बहुत कुछ कह दिया कि तेरा योग नहीं, तेरा अपनी साथी से सम्बन्ध ठीक नहीं, तूने आये हुए परमात्मा बाप को पहचाना ही नहीं। रूप भी बाबा का बहुत सख्त, पूरा धर्मराज का था।

बाबा ने मुझे बहुत कुछ कह दिया। मेरी टांगें काँप रही थीं। डर के मारे मुँह लाल हो गया। फिर जब मैं वापिस कमरे में गयी तो उस बहन ने मुझसे पूछा कि तुझे क्या हुआ? बाबा ने तुझे क्या कहा? मैंने कुछ नहीं बताया और जाकर बिस्तर पर लेट गयी। मुझे बहुत ज़ोर का बुखार चढ़ गया। रात भर शरीर गरम रहा। सुबह अमृतवेले डरती-डरती उठी और क्लास में गयी। बाबा ने सारी मुरली मुझे ही देखकर चलायी। देखता भी रहा और मुस्कराता भी रहा। मुरली पूरी होते ही बाबा ने उंगली पकड़कर, प्यार का सागर बन गोद में समा लिया और कहा, ‘कभी भी किसी भी बात में मजबूर नहीं होना, मज़बूत हो रहना। सब कुछ बाबा को सुनाना।’ यह समझा कर फिर से गले से लगाकर टोली, बादाम, मिश्री खिलाकर छुट्टी दी।

बड़ी दीदी (मनमोहिनी जी) को बुलाकर कहा कि बहुत मज़बूत बच्ची है, इसका ख्याल रखना। ऐसे थे मेरे लॉफुल और लवफुल साकार बाबा! एक बार मैंने बाबा को कहा कि मुझे लौकिक बाप बार-बार याद आता है। कभी-कभी रोना भी आ जाता है। बाबा मुझे देखता रहा और मेरी पूरी बात सुनता रहा। बहुत मीठी दृष्टि देकर हँसते हुए कहा, फिर क्या हुआ? बाप है ना! वर्सा ज़्यादा बाप से ही मिलता है। बाबा ने मुझे तो यह कहा परन्तु उस दिन के बाद मोह का अंश भी समाप्त हो गया। ऐसा लगा कि बाबा ने इस मोह के विकार को ब्लॉटिंग पेपर बन मेरे से निकाल दिया।

युक्तियुक्त बोल से बन्धनों से मुक्त करने वाले बाबा

बाबा के होते पाण्डव भवन छोटा था। इसे और बड़ा करने के लिए बाबा प्लान बनाते रहते थे। उस समय में लौकिक सर्विस करती थी। बन्धन छुड़ाने के लिए बाबा को पत्र लिखती रहती थी। बाबा दयालु कृपालु बन लाल अक्षरों में उत्तर लिखते थे। एक बार बन्धनमुक्त बनाने हेतु बाबा की ओर से मुझे एक युक्तियुक्त पत्र आया। बाबा ने लिखा कि बच्ची, मैं एक बहुत बड़ा और बहुत सुन्दर भवन बना रहा हूँ। एक में फुलकास्ट ब्राह्मण रहेंगे और दूसरे में हाफकास्ट। मुझे तो इसका अर्थ समझ में नहीं आया कि फुलकास्ट ब्राह्मण क्या है और हाफकास्ट ब्राह्मण क्या है? मैंने फिर लिखा, बाबा, मुझे समझ में नहीं आया। तो बाबा ने लिखा, बुद्धू बच्ची हो क्या? फुल समर्पण होना माना फुलकास्ट ब्राह्मण। फिर दिन-रात बुद्धि चलने लगी कि क्या करूँ? पहले ही में बहुत सहन कर चुकी थी इसलिए मैंने दृढ़ संकल्प किया कि अब तो मुझे फुलकास्ट ब्राह्मण बनना ही है। मैं दो महीने में अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अमृतसर चन्द्रमणि दादी जी के पास चली गयी और समर्पित हो गयी। फिर तो साकार बाबा से ऐसा मनभावन मिलन मनाया कि सच्चे-सच्चे मात-पिता का अनुभव किया। बाबा ने ऐसा गले लगाया कि मैं दुनिया भूल गयी, पावन प्रेम-गंगा में डूब गयी। बस फिर तो वो मस्ती चढ़ी कि आज तक उस इलाही (ईश्वरीय) मस्ती में पल रही हूँ। फिर तो बाबा ने निश्चय बुद्धि का टाइटिल दिया।

सुन्दरी बहन

बाबा सर्व पर सदा प्यार की वर्षा करते थे
पूना, मीरा सोसाइटी से ब्रह्माकुमारी सुन्दरी बहन जी अनुभव सुनाती हैं कि मानव के जीवन में एक ऐसी दिव्य घड़ी आती है जब अनायास ही उसका भाग्योदय हो जाता है। ऐसे ही सन् 1960 में जब पहली बार मैं पाण्डव भवन में पहुँची तो पाँव रखते ही मुझे ऐसा लगा कि यह मेरा ही स्थान है। यह कोई नया स्थान नहीं है जैसेकि मेरा यहाँ अनेक बार आना हुआ है। मैं निःसंकल्प रहती थी, कहाँ भी मूँझती नहीं थी। बाबा से मुलाक़ात होने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा, बच्ची, किससे मिलने आयी हो? मैंने फलक से जवाब दिया, मैं अपने बापदादा से मिलन मनाने आयी हूँ। फिर पूछा, क्या लेने आयी हो? मेरे मुख से सहज रीति से निकला, मैं स्वर्ग का वर्सा लेने आयी हूँ। फिर बाबा ने पूछा, पहले कब लिया था? मेरे अन्तर्मन से अत्यन्त निश्चय से निकला, अनेक बार। उसी समय मुझे बाबा विष्णु के रूप में दिखायी पड़े। बाबा के सामने जाते ही मुझे एकदम अशरीरी स्थिति का, देहभान से न्यारेपन का अनुभव होता था। बाबा की पवित्र पालना से ही हम पक्के तथा खुशबूदार फूल बनते गये। ऐसे लगता था कि यही मेरा सच्चा खेवनहार है जिसके साथ संगम का सफ़र, जीवन की नैय्या का सफ़र निरन्तर चलता रहेगा।

जितना प्यारा और उतना न्यारा

जब भी बाबा के सामने पार्टियाँ आती थीं और आत्मायें अपने बाप से मिलन मनाती थीं तो उस समय मीठा बाबा उनके ऊपर प्यार की वर्षा करते थे। अन्तरात्मा शीतलता के सागर में डूब जाती थी। फिर बाबा उतने ही न्यारे, निःसंकल्प हो जाते थे। न्यारा भी उतना और प्यारा भी उतना यह सन्तुलन मैंने बाबा की स्थिति में सदैव देखा। जगत का प्यारा तथा जगत से न्यारा यह धारणा उनमें पहले से ही थी। बहुरूपी का पार्ट था उनका। बच्चों के साथ बच्चा, युवा के साथ युवा, बूढ़े के साथ बूढ़ा अर्थात् वानप्रस्थी बन जाता था। जैसा समय, स्थान और व्यक्ति वैसा बाबा का रूप होता था। तभी तो सब आयु वाले उनसे सन्तुष्ट होते थे।

एक बार सभी यज्ञवत्स क्लास के बाद घूमने चल पड़े। आगे शिव-शक्ति सेना के प्रमुख कमाण्डर बाबा भी थे। कमाण्डर के पीछे हम सभी शान्ति में चल रहे थे। जब बाबा गेट तक पहुँचे तो अचानक बाबा ऐसे मुड़ गये कि आगे वाले पीछे हो गये और पीछे वाले आगे हो गये। बाबा ने खड़े होकर सभी यज्ञ-वत्सों को ऐसी दृष्टि दी जो ज्ञानसूर्य से सर्चलाइट पाकर आत्मायें भरपूर होती गयीं। हम सब अर्ध चन्द्रमा के आकार में खड़े थे। बाबा की दृष्टि सबको खींचती रही। बाबा का रूप ऐसा था जैसे एक पॉवर हाउस का।

साकार बाबा से वरदानों की झोली भरने पर मैंने सेवा में सफलता ही सफलता पायी है। योगी जीवन का स्वरूप प्रैक्टिकल में देखा। न पुरुषार्थ में कठिनाई, न सेवा में कोई विघ्न। अनेक बड़े-बड़े सेवास्थान बनते गये, साधन भी मिलते ही रहे परन्तु साधना को मैं कभी नहीं भूली। बाबा से सर्व सम्बन्ध रखकर, योगयुक्त रहकर सदैव अपने में रूहानियत धारण करती रहती हूँ।

दमयन्ती बहन जी बाबा भव्य मूर्ति के साथ सौम्य मूर्ति भी थे

जूनागढ़, गुजरात से ब्रह्माकुमारी दमयन्ती बहन जी लिखती हैं कि आज से 40 साल पहले मेरी साकार बाबा के साथ पहली बार मुलाक़ात हुई। उस समय का अनुभव बड़ा ही सुहावना, अलौकिक और अवर्णनीय है। बाबा के स्नेह में हृदय गद्गद हो उठा। बाबा की उस अलौकिक प्रतिभा में जैसेकि मैं खो गयी। दिल बार-बार कहता, मेरा बाबा...। नज़र उससे हटती ही नहीं थी। जब बाबा की नज़र पड़ी तो, 'नज़र से निहाल' हो गयी, सुषुप्त आत्मा जाग उठी। बाबा की नज़रों से अपार प्यार और दुलार का अनुभव हुआ। बाबा की उस एक नज़र से शरीर का भान भूल गयी और मैं आत्मा स्वयं को एक प्रकाश के समुद्र में हिलोरें लेती अनुभव करती रही। उनसे नैन मुलाक़ात करने से आत्मा में यह भाव झंकृत हो उठा कि 'तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया।'

बाबा की मधुर मुस्कान देखकर मुझ आत्मा के मिलन की चाह पूरी हो जाती। यदि सायंकाल का समय होता तो मेरी दिन भर की थकान उतर जाती थी। यदि प्रातः का समय होता तो कम-से-कम दिनभर के लिए एक नयी उमंग, नयी तरंग, नया उत्साह उभर आता था। सेवामूर्ति बाबा ने ऐसे कितनी आत्माओं को नया जीवन प्रदान किया! कितनों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करके माया से जीतने के योग्य बनाया!

बाबा चैतन्य शिवालय थे

बाबा एक चैतन्य शिवालय थे जिसमें स्वयं शिव बाबा चलते, फिरते, बोलते, देखते, सुनते थे। बाबा ने अपकारी पर भी उपकार किया। ऐसा अटूट, निर्मल, सर्वोच्च प्यार- न कभी सुनने को, न पढ़ने को, न देखने को, न पाने को और न कल्पना करने को मिला है और न मिलेगा। एक बार बाबा ने मुझे एक अन्य सेवास्थान पर जाने के लिए कहा। बाबा ने मेरे सिर पर हाथ रखा। तब से लेकर आज दिन तक बाबा की छत्रछाया सदा ही मेरे ऊपर है। मैं उस छत्रछाया के नीचे ही चल रही हूँ- ऐसा अनुभव करती हूँ।

बाबा के जीवन में मैंने रमणीकता और गंभीरता का बैलेन्स देखा। बच्चों के साथ खेलकूद करते हुए भी देखा। बाबा के जीवन में बहुत से गुण देखने, अनुभव करने में आते थे। बाबा सच्चे पिता के समान व्यवहार करते थे। बाबा एक भव्य मूर्ति के साथ सौम्यमूर्ति भी थे। वे कहते थे, बच्चे, यही आपका असली घर है। जो कुछ बाबा का है सो आप बच्चों के लिए है। तब तो दिल से आवाज़ निकलती है, 'वाह मेरा बाबा वाह'।
पूर्णिमा बहन
नड़ियाद (गुजरात) से ब्रह्माकुमारी पूर्णिमा बहन जी कहती हैं कि बाबा के साथ बीते हुए बचपन के पल अनमोल और स्मरणीय हैं। वे कुछ दिन दुर्लभ हैं और कुछ ही घटनायें हैं जो आज कई वर्षों के बाद भी मुझे याद आ रही हैं। बचपन की ईश्वरीय अलौकिक खुशियाँ कुछ और ही थीं। साकार बाबा के साथ बीता बचपन याद करते ही मन नाच उठता है और दिल गाने लगता है। बाबा के संग मधुबन में रहना जीवन की बसन्त ही समझो। इस बसन्त में खिला हुआ खुशबूदार फूल-राजा कहो अथवा रूहे गुलाब कहो वह था, साकार बाबा।

अजीब तरीक़ा और अनोखा दृश्य

छह फुट से भी ज़्यादा ऊँचे कद वाले बाबा के मन की ऊँचाई को तो नापना भी कठिन था। आकाश की ऊँचाई को छू कर उसके भी पार परमधाम निवासी शिव पिता के पास पहुँच कर रूहरिहान करना और धरती पर पाँव रखकर बच्चों से बात करना, यह अजीब तरीक़ा था और अनोखा दृश्य था । बाबा मधुबन में बच्चों के आकर्षण का बिन्दु था। यह भी महसूस होता था कि शिव बाबा को भी साकार बाबा के प्रति और साकार बाबा को शिव बाबा के प्रति अति दिव्य आकर्षण था। शिव बाबा बार-बार साकार ब्रह्मा-तन में आते रहते। शिवबाबा की प्रवेशता साकार बाबा की पवित्रता, सौन्दर्य और दिव्यता की चरम सीमा थी। ऐसे बाप-दादा का साक्षात् दर्शन विनाशी शब्दों और दृष्टान्तों द्वारा कराना असम्भव है। परमपिता और महापिता के सान्निध्य के सुख, शान्ति, समृद्धि, शीतलता एवं पवित्र जीवन की महसूसता और दिव्य आनन्द के अनुभव के आगे स्वर्गिक सुख-समृद्धि भी नीरस और फीकी भासती थी। उस समय के वो महान पल देवताओं के लिए भी दुर्लभ थे।

बाबा के संग रहकर अनाज सफ़ाई करना, खाना बनाना और फिर बाबा के साथ ही ब्रह्मा भोजन करना भी तो देवताओं के लिए दुर्लभ है। बाबा साकार में होते हुए, बच्चों के साथ रहते हुए, बच्चों से मिलते हुए भी उपराम दिखायी देते थे। कमाल यह थी कि बाबा कभी बाप के रूप का, तो कभी जिगरी दोस्त के रूप का, तो कभी साजन के रूप का अनुभव कराते थे। बाबा द्वारा बच्चों का स्वागत करना, पालना करना, शिक्षा देना, खेल-पाल करना और विदाई देना, ये सभी पल अलौकिक और देखने लायक होते थे।

मैंने अनुभव किया कि मधुबन में पाँव रखते ही मुख्य द्वार पर खड़े बाबा द्वारा शीतल दृष्टि देना, मधुर शब्द बोलना, पिस्ता, बादाम, शक्कर की टोली का मुख में डालना और बच्चे का बाबा की बाँहों में समा जाना, इन सबसे जन्म-जन्म की थकावट दूर हो जाती। बाबा की छत्रछाया में ज्ञान-खुराक मिलती, ज्ञानामृत से आत्माओं में अखुट शक्ति भरती थी। वह क्षण सम्पूर्ण दिव्यता का एहसास कराता था।

यह बच्ची आपकी नहीं, भगवान की है

हमारा पूरा परिवार भक्तिमय था। परिवार में शिव जी की पूजा, गायत्री मंत्र और अम्बे माता की नित्य आरती होती थी। बचपन से ही मुझ में प्रभु की प्राप्ति की तीव्र इच्छा थी। प्रभु-प्राप्ति के लिए घर छोड़कर जंगल में जाने का संकल्प भी कभी-कभी तीव्र हो जाता था। इसी बीच अनायस ही घर में प्रभु-प्राप्ति का अनुभव हुआ। ईश्वरीय सन्देश देने के लिए ब्रह्माकुमारी बहनों ने सन् 1966 में, हमारे घर में गीता पाठशाला शुरू करने का संकल्प किया और अचानक ही दादी जानकी जी का घर आना हुआ। वे गीता पाठशाला के लिए लौकिक पिता जी से मिलने आयी थी। उसी समय दादीजी के सामने मैं बैठी थी। देखते ही दादीजी ने कहा कि "यह बच्ची आपकी नहीं, भगवान की है। आप इस बच्ची को भगवान को सौंप दो।" कुछ समय के बाद पिता जी मधुबन गये। बाबा ने मुझे देखा भी नहीं था और पिताजी से कहा कि जनक बच्ची बता रही थी कि आपकी लौकिक बच्ची आपकी नहीं, बाबा के यज्ञ की है। यज्ञ की सेवा में इसे लगाना है। दादीजी का संकल्प, बाबा का कहना और तीसरी बात यह हुई कि जब मम्मा अव्यक्त रूप में आयी थी तो मम्मा ने भी पिता जी से मेरे जीवन को यज्ञ में न्यौछावर करने के लिए कहा। यह भी जीवन का सौभाग्य है कि मैं खुद ईश्वर माता-पिता और महारथियों की पसन्द हूँ।

महापिता और परमपिता दोनों के प्यार की वर्षा इकट्ठी बरसती थी

आखिर प्रभु-मिलन का वह दिन आया जिसका मैं भक्ति में इन्तज़ार कर रही थी। हम सात कन्याओं को दमयन्ती बहन सन् 1966 में मधुबन बापदादा के पास ले गयी। मधुबन के आँगन में जाते ही खुद बाबा ने हमारा स्वागत किया। बाबा की प्यार भरी दृष्टि और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने हमें उसी क्षण चुम्बक की तरह खींच लिया था। बाबा ने 'आओ मेरे मीठे बच्चे' कहकर पुकारा और कहा ‘बच्चे, थके तो नहीं हो ना? अच्छा, स्नान, चाय, नाश्ता करके तैयार होकर आना, बाबा आपसे फिर मिलेंगे।’ बाबा से पहली ही मुलाक़ात का अलौकिक और अद्भुत क्षण आज भी चित्त पर अङ्कित है। बाबा से उसी शाम को मिलना हुआ। बाबा ने हम सबका परिचय लिया। उस क्षण हम महसूस कर रहे थे कि जैसे बरसों से खोये हुए माँ-बाप को पा लिया। मैं महसूस कर रही थी कि मैं पहली बार नहीं, कई बार यहाँ आयी हूँ। बाबा बच्ची, बच्ची कह पुकारते, बातें करते तो ऐसे लगता था जैसे साकार बाबा के तन में शिव बाबा भी आकर बातें करते हैं। उसी क्षण यह एहसास भी मुझे होता था कि बाबा के बोल भी जैसेकि बदल रहे हैं। बाबा के तन में जब शिव बाबा प्रवेश कर बातें करते थे तो उसी समय बाबा का मस्तक तेजोमय सूर्य जैसा दिखायी देता था और दृष्टि से शक्ति तथा स्नेह की किरणें हमारे में भर रही हों, ऐसा अनुभव होता था।

दूसरे दिन सुबह के क्लास में, बाबा के आने के बाद हम पहुँचे। हिस्ट्री हॉल में हम सात कन्यायें पीछे बैठी थीं। नज़र हमारे पर पड़ी और बाबा ने कहा, पीछे से आगे आ जाओ। फिर कहा, देखो, आज सात कन्यायें आयी हैं। एक कन्या 100 ब्राह्मणों के बराबर। आज तो मधुबन के क्लास में 700 ब्राह्मण बैठे हुए हैं। इस तरह बाबा हम कन्याओं की बहुत महिमा करते रहे और कहा कि ये सात शीतलायें हैं।

पूर्णिमा बहन जी

बच्ची, तुम पूर्ण-माँ हो
क्लास के बाद हम बाबा से कन्याओं का व्यक्तिगत मिलना हुआ तो बाबा ने मुझे कहा, ‘बच्ची, पढ़ाई पढ़कर क्या करेगी? पढ़ाई छोड़कर बाबा की सेवा में लग जाना है।’ बाक़ी कन्याओं को लौकिक पढ़ाई करने को कहा। स्वाभाविक था कि कन्याओं को प्रश्न उठा कि बाबा ने हमें ऐसा क्यों कहा! एक पढ़ाई छोड़े और बाक़ी नहीं। बाबा ने कहा कि बाबा तो हर एक बच्चे की जन्मपत्री जानता है। पूर्णिमा बच्ची का पढ़ाई छोड़ने में और बाक़ी तुम सभी का पढ़ाई में लगे रहने में ही कल्याण है। फिर बाबा ने मुझे कहा, बच्ची, तुमको यहाँ से जाकर सीधा सेन्टर पर ही ठहरना है। जाने से पहले बाबा से छुट्टी लेकर जाना। बाक़ी कन्याओं की दिल थी, कुछ दिन मधुबन में ठहरने की, तो बाबा ने उन्हें ठहरने के लिए छुट्टी दी और मुझे कहा, बच्ची, तुमको रुकना नहीं है। बादल सागर के पास भरने आते हैं तो तुमको अभी जाकर ज्ञान बरसात करनी है। फिर खाली हो तो बादल बन के सागर के पास भरपूर होने आ जाना। बाबा के पास जब मैं अहमदाबाद जाने के लिए छुट्टी लेने गयी तब बाबा अपने कमरे में कुर्सी पर बैठे थे। मैंने बाबा को कहा, ‘बाबा, मैं दमयन्ती बहन के साथ जा रही हूँ, आपसे छुट्टी लेने आयी हूँ।’ बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा, फिर सिर पर हाथ घुमाकर प्यार भरी दृष्टि देते हुए कहा, बच्ची, नाम क्या है? मैंने कहा, पूर्णिमा। बाबा ने कहा, बच्ची, तुम 'पूर्ण-माँ' हो। तुम छोटी कन्या नहीं हो, तुम तो जगत् माता हो। तुम्हें सभी की माँ बनकर सभी का कल्याण करना है इसलिए अब तुम्हें बाबा की सेवा में ही लगे रहना है। मैंने कहा, ‘जी बाबा।’ फिर बाबा ने पूछा, ‘बच्ची, दाल-रोटी बनाना आता है?’ मैंने कहा, ‘नहीं बाबा।’ बाबा ने कहा, ‘अच्छा बच्ची, दाल-रोटी बनाना सीखकर जाना।’

विचित्र बड़ी माँ की विचित्र ममता

फिर बाबा ने पूछा, ‘बच्ची, और कुछ चाहिए क्या? पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े और खाने के लिए दाल-रोटी चाहिए। बाबा के घर में तो ये मिल जायेंगे। और क्या चाहिए?’ मैंने कहा, ‘बाबा, जिनको पाने के लिए भक्ति की, उसकी ही गोद में बैठी हूँ तो उससे ज़्यादा मेरा कौन-सा सौभाग्य हो सकता है! मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो माँ-बाप के रूप में स्वयं भगवान को पाया है।’ उस समय मैं अनुभव कर रही थी कि मुझे बरसों से खोयी हुई अमूल्य वस्तु मिल गयी है। फिर बाबा ने लच्छु बहन को बुलाकर कहा, आज बाबा इस बच्ची को अपने ही हाथों से रोटी-मक्खन खिलायेंगे। तुम गरम-गरम फुलका बनाकर दो। उस समय लच्छु बहन ने गरम-गरम फुलके बनाकर उन पर शहद और मक्खन लगाकर बाबा के हाथों में दिये। बाबा ने अपने ही हाथों से मुझे रोटी खिलायी। बाबा जब खिला रहे थे तो बाबा का रूप वात्सल्यमयी माँ का था। ऐसा प्यार लौकिक माँ-बाप से भी नहीं पाया। इतनी अलौकिक और निःस्वार्थ पालना बाबा से मिली। वरदान के रूप में बाबा ने कहा, ‘बच्ची, जहाँ भी पाँव रखेगी वहाँ सफलता तुम्हारे चरणों में ही होगी।’ बाबा ने वरदान के बाद बादाम, मिश्री, ईलायची देते 'गो सून, कम सून' (Go soon, Come soon) कहते ऐसे गले लगाया जैसेकि माँ-बाप बच्ची को ससुराल के लिए विदाई देते हैं। आँखों में आँसू बहते थे। दिल नहीं चाहता था कि बाबा को छोड़कर जायें लेकिन बाबा सेवा पर भेज रहे थे तो फिर मैं अहमदाबाद सेवास्थान पर पहुंची, जहाँ जानकी दादी, दमयन्ती बहन और वनीता बहन भी थीं। बाबा से मिलने के बाद अलौकिक मस्ती में दिन बिता रही थी। बाबा से मिला प्यार और दुलार याद करते हुए, मैं बाबा के यज्ञ से जो भी सेवा मिलती थी उसे दिल लगाकर करती रहती थी। सेवाकेन्द्र पर रहने के लिए जब मैंने लौकिक परिवार और घर छोड़ा तब मेरी आयु केवल 16 वर्ष की थी।

बाबा, बाप-टीचर-धर्मराज के रूप में

मैं जब मधुबन दोबारा बाबा से मिलने सरला दीदी के साथ आयी तो उसी समय अपने जीवन में एक नया अनुभव पाया। पहली मुलाक़ात में बाबा से माँ-बाप के रूप में प्यार मिला था। जब दूसरी मुलाक़ात हुई तो बाबा बाप के साथ-साथ टीचर, सतगुरु और धर्मराज भी है यह भी अनुभव हुआ। सुबह की क्लास में बाबा की मुरली धर्मराज की शिक्षाओं से भरी थी। बाबा ने कहा कि यह इन्द्र की सभा है जहाँ परियाँ अर्थात् पवित्र आत्मायें ही बाबा के सामने बैठ सकती हैं। कोई भी अपवित्र आत्मा का इस सभा में स्थान नहीं है। अगर कोई आत्मा आती है तो उसको सज़ा मिल जाती है। इस बात पर मुझे उस समय की एक घटना याद आती है। क्लास के बाद हम नाश्ता कर अपने कमरे में गये तो मेरा छोटा भाई, भाइयों के कमरे की ओर से दौड़कर आ रहा था। उसने दीदी से कहा कि अपने साथ आया हुआ एक भाई खटिया पर लेटा हुआ है और हाथ-पाँव पटक-पटक कर चिल्ला रहा है और कह रहा है कि बाबा मुझे माफ़ करो, मेरे से सहन नहीं हो रहा है। हम अपने कमरे से बाहर आते ही विश्वकिशोर भाऊ से मिले, उनको लेकर उस भाई के कमरे में गये। सज़ा भोग रहे भाई ने बोला, बाबा को बुलाओ। जब हम सभी बाबा के पास गये तो बाबा कुछ भाई-बहनों के साथ बैठे थे। बाबा को जब समाचार सुनाया तो उन्होंने कहा कि बच्चे, उस पर पानी छिड़क दो और एक गिलास पानी पिला दो। भाऊ ने बाबा के दिये हुए पानी को उस भाई पर छिड़का और पिलाया। वह शान्त हो गया।
दूसरे दिन सबके साथ मिलते हुए बाबा ने उस भाई को कहा कि बच्चे, धर्मराज को किये हुए सारे पाप लिखकर दो तो बाप आधा माफ़ कर सकता है। शुरू-शुरू में मधुबन में धर्मराज की कचहरी होती थी। बाबा रात को कचहरी में, जिसने भूलें की हों, उसे सभा में सुनाने का आदेश देते थे और सभा में ही सबके सामने माफ़ी मँगवाते थे। उस समय बाबा का धर्मराज का रूप भी मैंने देखा था।

बच्चों के साथ बच्चा बनकर लीला दिखाने वाला ‘लीलाधर बाबा’

बाबा बच्चों के साथ खेल-पाल भी करते थे। बच्चों के साथ बच्चा, युवा के साथ युवा और बूढ़ों के साथ बूढ़ा बनकर रहता यह बाबा की अनोखी विशेषता थी। एक बार हम सब बच्चे बाबा के कमरे में गुड नाइट करने गये तो बाबा ने सब बच्चों को अपने पास बुलाया। हम सब छोटे-बड़े बाबा के पास बैठे। बाबा ने मेरे छोटे भाई को एक छोटा-सा डिब्बा दिया। बाबा ने कहा, बच्चे, इसमें ढेर सारी चाकलेट हैं, सभी को बाँटना। जैसे ही डिब्बा खोला तो उसके अन्दर से एक साँप उछलकर निकला। घबराहट में सभी बड़े बाहर निकल गये। जो छोटे थे उनमें से कइयों ने उस साँप का मुँह पकड़ा, कई उसकी पूंछ पकड़कर बाबा की गोद में बैठ हँसते-हँसते खेल रहे थे। बड़ों को आश्चर्य हुआ कि कमरे में बाबा और बच्चे खेल रहे हैं। बाबा ने कहा, बड़े बच्चे डर गये। देखो, छोटे बच्चे कितने निडर हैं क्योंकि निर्दोष हैं। वह साँप असली नहीं बल्कि नकली था। यह खेल देख सब बहुत हँस रहे थे। बाबा ने कहा, “खुशी जैसी खुराक नहीं।” बाबा ने यह भी बताया कि भविष्य में भयानक विनाश के दृश्य देखने में आयेंगे इसलिए अपनी अवस्था ऐसी पक्की बनाओ कि भयभीत न हों।
बाबा रस्सी खींच तथा बैडमिंटन जैसे खेल भी खेलते थे। बाबा जीतकर कहते थे, ‘देखो बच्चे, शिव बाबा मेरे साथ है तो मैं जीत गया।’ कभी बाबा कहते, ‘बच्चे किसके साथ खेल रहे हो?’ बच्चे कहते, ‘बाबा, आपके साथ।’ तो बाबा कहते, ‘बच्चे फेल हो गये। आपको तो शिव बाबा दिखायी देना चाहिए।’ इस प्रकार, बाबा का प्यार भरा रमणीक रूप भी देखने को मिलता था।

इंजिन और डिब्बे का खेल

बाबा की विदाई देने की विधि भी अलग ही थी। बाबा बादाम, मिश्री देकर लाइन में खड़े रखते थे। बाबा खुद आगे रहते फिर एक के बाद एक बच्चे और लास्ट में ब्राह्मणी (टीचर), इस तरह एक ट्रेन बना देते। बाबा कहते, ‘बच्चे, डबल इंजिन (शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा) आगे हैं, आप सभी डिब्बे हो, मेरे पीछे आते रहना।’ बाबा मधुबन के पीछे के गेट तक आते थे फिर बाबा खुद निकल अलग होकर खड़े-खड़े रूमाल हिलाते और बच्चे बाबा को देख-देखकर आगे चलते रहते थे, जब तक कि बाबा दिखायी पड़ता और बाबा भी जब तक बच्चे दिखायी पड़ते वहाँ ही खड़े रहते। उस समय मन कहता था इतना प्यार करेगा कौन!
बाबा ने मुझे अपने हाथों से गरम रोटी खिलायी थी। अजीब बात है कि आज भी मुझे मधुबन सेवा में या अन्य स्थान पर रोटी डिपार्टमेण्ट ही मिलता है। यह भी मेरा सौभाग्य है। शुरू-शुरू में मैं जिस भी सेवास्थान पर गयी वहाँ दाल-रोटी और दो जोड़ी कपड़ों से ही जीवन चलाया। यह भी बेगरी पार्ट का अनुभव बाबा के संग किया। कभी भी किसी तरह का संकल्प नहीं चला। बाबा के साथ का अनुभव करती रही। आज भी बाबा का हाथ सिर पर है और बाबा की छत्रछाया में पल रही हूँ, यह अनुभव मुझे सदा होता है।

बाबा ने मुझे अन्तिम यात्रा का पूरा दृश्य दिखाया

सरला दीदी ने मुझे सेवा के लिए दिसंबर 1968 में आनंद भेजा था। वहाँ से पहली जनवरी, 1969 को बड़ौदा भेजा जहाँ बहुत बड़ी प्रदर्शनी लगी थी। बाबा ने कुमारका दादी (दादी प्रकाशमणि जी) को भेजा था। दमयन्ती बहन ने दादी के साथ बाबा को पत्र भेजा कि यहाँ गुजराती बहन की ज़रूरत है। बाबा ने पत्र का उत्तर दिया, ‘बच्ची, पूर्णिमा बच्ची तुम्हारे साथ रहेगी, जो सयानी और समझू भी है। सेवा में भी बहुत अच्छी मदद करेगी। बड़ौदा में तुम्हारे पास ही रहेगी।’ बाबा के आदेश-पत्र के बाद मैं बड़ौदा ही रही। पत्र के बाद चार-पाँच दिन में ही बाबा ने शरीर त्यागा। अठारह जनवरी, 1969 में बाबा के शरीर छोड़ने का समाचार मिलते ही मुझे सेन्टर पर छोड़ सब बाबा की अन्तिम यात्रा के लिए मधुबन आ गये। मुझे संकल्प चला कि यह कैसा भाग्य है जो मैं अन्तिम समय बाप से मिल भी नहीं सकी! हमने तीन दिन अखण्ड योग रखा। आश्चर्य की बात है कि बाबा ने मुझे अन्तिम यात्रा का पूरा दृश्य दिखाया और अनुभव कराया कि बाबा का इतना सुन्दर रथ भी पाँच तत्वों में मिल गया तो हमारा शरीर तो कुछ भी नहीं है। यह शिक्षा और प्रेरणा मिली कि शरीर से मोह निकाल बाबा की तरह ही अव्यक्त कर्मातीत फ़रिश्ता बनने का हमें पुरुषार्थ करना है। मुझे लक्ष्य रहता है कि बाबा ने हमें जितनी प्यार से पालना दी है उसके रिटर्न में हमें भी यज्ञ में हड्डी-हड्डी सेवा करनी है और निर्विघ्न बन सबको सन्तुष्ट करना है।

कैलाश बहन जी

गाँधी नगर, गुजरात से ब्रह्माकुमारी कैलाश बहन जी अपने अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं कि मेरी जन्मपत्री में लिखा था कि यह बच्ची छोटेपन में सन्यासी बन जायेगी और जहाँ भी जायेगी वहाँ सभी सुख उपलब्ध होंगे लेकिन 25 वर्ष की आयु में ही मर जायेगी। घर वालों को इस बात का दुःख होता था और इसलिए स्कूल में भी नहीं जाने दिया। मेरा स्वभाव शान्त और एकान्त प्रिय था। मेरे पिता जी के कई गुरु थे। मैं लास्ट गुरु के पास जाया करती थी। गुरु जी और अन्य साधु-सन्त भी यही कहते थे कि यह लड़की 25 साल से ज़्यादा नहीं जीयेगी।

बाबा ने मेरी आयु बढ़ाकर जीवनदान दिया

जब मैं पहली बार सन् 1962 में बाबा के पास आयी तो बाबा ने भी यही कहा, बच्ची, तुम्हारी उम्र बहुत छोटी है। सभी यही कहते थे कि 25 साल के बाद एक दिन भी जिन्दा नहीं रह सकती। बाबा ने भी ऐसा ही कहा था। लेकिन बाबा के कहने में और दूसरे लोगों के कहने में काफ़ी अन्तर था; क्योंकि बाबा ने साथ में यह भी कहा कि हो सकता है योगबल से आयु बढ़ जाये। मैंने कभी उम्र बढ़ाने के लिए योग नहीं किया। लेकिन बाबा ने जो वरदान दिया था उसके कारण आज तक बाबा की सेवा में तत्पर हूँ। उन 25 सालों में मृत्यु के कई कारण बनते रहे लेकिन बाबा की मदद से सदा बचती रही। जब 25 साल पूरे होने को थे उसी दिन मैं ट्रेन से गिर गयी और ट्रेन में फँस गयी। लेकिन किसी ने दौड़कर मुझे बाहर निकाला और मैं बच गयी।

मन डोले, गोदी में साँप डोले

इस विषय में एक और घटना मुझे याद आ रही है। तब मैं होशियारपुर सेन्टर पर कृष्णा बहन (अम्बाला वाली) के साथ रहती थी। योग के समय कृष्णा बहन रिकार्ड नम्बरवार रख जाती थी और मैं नम्बरवार बजाती रहती थी क्योंकि मुझे पढ़ना नहीं आता था। एक दिन सभी योग में बैठे थे, मैंने रिकार्ड लगाया 'मेरा मन डोले, मेरा तन डोले...।' उसी समय क्लास हॉल में मेरे सिर पर साँप गिरा और फिर गोद में बैठ गया। सन्दली पर बैठी बहन योग करा रही थी, वह घबरा गयी। मैंने इशारे से कहा, आप बैठे रहो। क्लास में किसी को पता नहीं चला और मैं एक ही रिकार्ड बजाती रही। साँप मेरे को देखता था, मैं उसको देखती थी। एक ही रिकार्ड लगाती रही तो कृष्णा बहन सोचने लगी कि एक ही रिकार्ड क्यों बजा रही है। कुछ समय के बाद जैसे ही रिकार्ड बन्द किया तो साँप मेरे ऊपर चढ़ने लगा। मैंने उसे झटके से नीचे गिरा दिया और साथ ही वही रिकार्ड लगाकर कृष्णा बहन को बुलाने गयी। कृष्णा बहन ने बोला, अरे कैलाश, तुम आधे घण्टे से एक ही रिकार्ड क्यों लगा रही हो? मैंने कहा, क्लास में साँप गिरा है। मैं उन्हें क्लास हॉल में ले गयी और दरवाज़े से दिखाया, देखा तो वह बहुत मस्ती में नाच रहा था। कृष्णा बहन ने कहा, कमाल है, कब से पड़ा है! मैंने बताया, जब शुरू में गीत लगाया, मेरा मन डोले... तब से मेरी गोद में पड़ा था। कृष्णा बहन ने कहा, मेरा मन डोले, तेरी गोदी में साँप डोले। फिर सबको बाहर बुलाया गया। इस प्रकार उस समय भी बाबा ने ही मुझे साँप से बचा लिया।

मैंने ध्यान के लिए कोई पुरुषार्थ नहीं किया था। लेकिन जब योग में बैठती थी तो मुझे ऐसा अनुभव होता था कि कोई गले में रस्सा डालकर खींच रहा है। इस कारण मुझे बहुत डर लगता था और इसलिए मैं योग में बैठना पसन्द नहीं करती थी, सेवा करना पसन्द करती थी। एक दिन होशियारपुर सेन्टर पर एक बाँधेली माता, जो बाबा से मिलकर आयी थी, मधुबन का अनुभव सुना रही थी। उसका अनुभव सुनकर मुझे भी साकार बाबा से मिलने की तीव्र इच्छा हो गयी। लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण मधुबन आ नहीं पाती थी। अनुभव सुनते-सुनते मैं बाबा की याद में खो गयी और नैनों से अश्रु बहने लगे। फिर कृष्णा दीदी ने योग में बैठ दृष्टि दी तो मैं गुम हो गयी और तीन दिन के बाद मेरी चेतना वापस लौटी। सभी बहनें देख रही थीं कि मैं बहुत खुश हूँ। क्योंकि बाबा ने मुझे सुन्दर-सुन्दर फल-फूल आदि दिखाये थे। मैंने ऐसे फल इकट्ठे किये थे जो कभी नहीं देखे थे। बाबा ने कहा, बच्ची, ये फल किस लिए इकट्ठे किये हैं? मैंने कहा, बाबा ये फल नीचे सबको खिलाऊँगी। तो बाबा ने कहा, सबको खिलायेगी? पक्का? मैंने कहा, जी बाबा। बाबा मुस्कराने लगे।

बाबा ने ही मुझे पढ़ना सिखाया

सन् 1962 में बाबा से मिल रही थी, वहाँ दीदी भी बैठी थी। दीदी ने कहा, बाबा यह बच्ची हिमाचल की है, भोली है, अच्छी है और ध्यान में जाती है। एक दिन बाबा ने कहा, बच्ची, तुम्हारा इतना अच्छा ध्यान में जाने का पार्ट है तो तुम पंजाब क्यों जाती हो? बाबा जहाँ भेजे वहाँ जायेगी? मैंने कहा, ”जी बाबा, आप जहाँ भेजेंगे वहाँ जाऊँगी लेकिन घर के नज़दीक नहीं भेजना। वहाँ से दूर रखेंगे तो मैं अच्छी सेवा कर सकूँगी।” बाबा ने कहा, “अच्छा बच्ची, तुमको बाबा जयपुर भेज रहे हैं, तो वहाँ जाना और बाबा को रोज़ भोग लगाना क्योंकि तुमको ट्रान्स में जाने की लिफ्ट मिली हुई है। इस गिफ्ट से सेवा करना।” इस प्रकार बाबा ने कपड़े आदि डलवाकर पेटी तैयार करावायी और जयपुर सेवा पर भेजा। आठ मास के बाद बाबा ने मुझे मधुबन बुलाया और पूछा, “बच्ची, जयपुर अच्छा लगता है? खुश हो?” मैंने कहा, “जी बाबा।” फिर बाबा ने पूछा, “बच्ची, तुम रोज़ मुरली पढ़ती हो? मैंने कहा, बाबा मैं पढ़ी नहीं हूँ इसलिए मुरली नहीं पढ़ती हूँ, सुनती हूँ।” तुम्हें पढ़ना तो बहुत था क्यों नहीं पढ़ाई की? मैंने कहा, “ड्रामा में नूंध नहीं होगा।” बाबा बहुत हँसे और बोले, “बच्ची, बाबा का दिया ज्ञान बाबा को ही सुना रही हो?” फिर बाबा ने कहा, “बच्ची, चिन्ता नहीं करो तुम्हें बाबा पढ़ायेंगे। आज शाम को चार बजे ऑफ़िस में आना, बाबा तुम्हें सिन्धी पढ़ना सिखायेंगे।” मैं चार बजे ऑफ़िस में गयी और बाबा ने सिन्धी लिखना शुरू भी किया। इतने में जयपुर से फोन आया कि कैलाश को जल्दी भेज दें, यहाँ बहुत सेवा है। बाबा ने कहा, “बच्ची, तुमको जयपुर वाले बुला रहे हैं।” मुझे लगा कि मेरी पढ़ाई सचमुच ड्रामा में नहीं है। मुझे बहुत दुःख हुआ और रोना भी आया। बाबा बोले, “बच्ची, चुप रहो, सब दुःखों को हरने वाले और सुख देने वाले बाप के सामने रोती हो?” फिर बाबा ने बहुत प्यार करके शान्त किया और बोले, “बच्ची, जयपुर में तुम सारा दिन बिज़ी रहती हो लेकिन रात को सभी सो जायें तब तुम एकान्त में कॉपी-पेन लेकर बाबा की याद में बैठना तो बाबा तुमको पढ़ायेंगे।” मैं मूँझ गयी क्योंकि ब्रह्मा बाबा यहाँ, शिव बाबा ऊपर और मैं जयपुर में। तो बाबा मुझे कैसे पढ़ायेंगे? बाबा ने पूछा, “क्यों, मूँझ रही हो क्या? बाबा में निश्चय नहीं है? बच्ची, बाबा के बोल पर निश्चय रखो।” मैं जयपुर गयी। सारा दिन तो बहुत सेवा होती थी। रात हो गयी, सब सोये हुए थे। मैं उठी और आफ़िस में जाकर बाबा को याद करने लगी। थोड़े समय में ही मैं वतन में गयी। वहाँ देखा बाबा सामने से आ रहे थे और बहुत मुस्करा रहे थे। मैंने कहा, “बाबा, मैं तो चिन्ता कर रही हूँ और आप मुस्करा रहे हैं!” बाबा ने कहा, “बच्ची, रोज़ तुमको पढ़ाने के लिए बाबा मधुबन से आयेगा।” फिर बाबा ने मुझे पढ़ाना शुरू किया। बाबा का पढ़ाना अलग था जैसे यहाँ क, ख, ग, ऐसे नहीं पढ़ाया। लेकिन बाबा मेरे हाथ से ही जोड़ी अक्षर लिखवाता था। मधुबन में जब ब्रह्मा बाबा ने लिखना शुरू किया था तो वह सिन्धी भाषा लिखी थी, जब ऊपर वतन में पढ़ाया तो हिन्दी में ही पढ़ाया। मैं रोज़ वतन में जाती थी और बाबा से पढ़ती थी। पन्द्रह दिन में मैंने हिन्दी पढ़ना सीख लिया। बाबा ने कहा, बच्ची, जितनी लगन से मेहनत करेगी उतना आगे जा सकती है। फिर मैं एकान्त में आधा घण्टा धीरे-धीरे मुरली पढ़ती थी।

ऑपरेशन के समय बाबा आकारी रूप में मेरे पास ही खड़े थे

एक बार की बात है कि मेरी आँखों में बहुत तकलीफ़ थी। सभी ने कहा कि ऑपरेशन कराना पड़ेगा। लेकिन डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन के बाद देख सकेगी कि नहीं, यह नहीं कह सकते हैं। फिर बाबा से पूछा तो बाबा ने सन्देश में कहा, “बाबा ज्योति देने वाला है, लेने वाला नहीं। इसलिए बच्ची को निश्चिन्त होकर हॉस्पिटल ले जाओ।” हॉस्पिटल में ले गये। दो डॉक्टर ऑपरेशन करने वाले थे, साथ में एक ब्रह्माकुमार डॉक्टर चॉकसी भाई भी ऑपरेशन थियेटर में खड़े थे। जब ऑपरेशन शुरू हुआ तो जो डॉक्टर ऑपरेशन कर रहा था उसे ब्रह्मा बाबा दिखायी दिया और वह देख रहा था कि बाबा की आँखों से सर्चलाइट की किरणें निकल कर मेरी आँखों पर पड़ रही हैं और बाबा ने मेरे सिर पर हाथ रखा हुआ है। यह सब देखकर डॉक्टर को बड़ा आश्चर्य लगा और बोला कि वो कौन थे, उनको कौन अन्दर ले आया? इतने में डॉक्टर चॉकसी भाई ने भी बाबा को देखा। वे बाबा के पास गये तो बाबा वहाँ से गुम हो गये। फिर डॉ.चॉकसी जी ने बोला, “डॉक्टर, आप निश्चिन्त होकर ऑपरेशन कीजिये, बाबा शक्ति देकर गये हैं, इसकी आँखों को कुछ नहीं होगा।” ऑपरेशन सफल हुआ, आँखें ठीक हो गयीं। डॉक्टर को भी बहुत आश्चर्य हुआ। बाद में डॉक्टर ने कोर्स भी किया और क्लास में भी आने लगे।

इस प्रकार सर्वशक्तिवान बाबा ने कम उम्र वाली को जीवनदान दिया, अनपढ़ को पढ़ा-लिखा बनाया, भोली को तीनों लोकों में चक्कर लगाने वाली सन्देशी बनाया, आँखों की रोशनी दी। क्या महिमा करें, कितनी महिमा करें उस महिमापूर्ण बाबा की, सब कम ही रहेगी।

चन्द्रिका बहन जी

महादेव नगर, अहमदाबाद से ब्रह्माकुमारी चन्द्रिका बहन जी कहती हैं कि सन् 1965 की बात है कि एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में क़रीब 3.30 बजे मैं कुर्सी पर बैठी थी। ईश्वर-चिन्तन में ही मगन थी। तभी मैंने सफ़ेद प्रकाश की काया वाले व्यक्ति में लाल प्रकाश को प्रवेश करते देखा। कुछ ही सेकेण्ड के बाद वह आकर्षक स्वरूप मेरे निकट आया। मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, “बच्ची, मैं भारत में आया हूँ, तुम मुझे ढूंढ़ लो।” बहुत ही स्पष्ट रूप से दो बार यह आवाज़ मैंने सुनी और तभी से लेकर मैं कई सत्संगों में, धर्मगुरु, धर्म-उपदेशक और धर्म-प्रचारकों के पास जाने लगी कि जिन्हें ध्यानावस्था में देखा था वह मुझे ज़रूर कभी साकार में मिल जायेंगे। लेकिन काफी सत्संगों में जाने के बावजूद भी मुझे उस दिव्य पुरुष का दर्शन नहीं हुआ।

मेरे दिल से निकला कि यही है, यही है

कुछ मास के बाद हमारे नज़दीक ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की ओर से साप्ताहिक कोर्स का आयोजन हुआ। हमें भी उसमें जाने का निमंत्रण मिला। जो निमंत्रण देने आये थे उन्होंने कहा कि यहाँ आप जैसी छोटी-छोटी बहनें स्वयं भगवान से मिलाने का दावा करती हैं, आप ज़रूर आइये। हमारे आस-पास वाले सभी लोगों को यह मालूम था कि हम काफी भक्ति करते हैं। उन्हों का निमंत्रण सुनकर मेरे माता-पिता सहित पूरे परिवार ने तो सात दिन जाने का फैसला कर लिया लेकिन मैंने इन्कार कर दिया और कहा कि ऐसे भगवान के नाम पर आजकल बहुत निकल पड़े हैं। मेरा अभी किसी में विश्वास नहीं रहा, न ही मुझे भगवान की प्राप्ति के लिए अब और कोई कोशिश करनी है। परिवार से सभी रोज़ जाया करते थे लेकिन मुझे कुछ सुनाते नहीं थे। आखिरकार एक दिन पिताजी ने कहा, बेटी, तुम भी चलो, तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा। उस दिन मैं पिताजी के साथ गयी। तब कल्पवृक्ष का पाठ चल रहा था। मैंने चित्र में ब्रह्मा बाबा की तस्वीर देखी और सुना कि परमात्मा शिव इनके तन से गीता-ज्ञान दे रहे हैं। इस बात को सुनते ही मुझे कुछ महीने पहले ध्यानावस्था में देखा वो दृश्य याद आ गया और मेरे दिल से आवाज़ निकली कि यही है, यही है, यही है जिस छवि को मैं इतने दिनों से तलाश रही थी।

बाबा ने किया मुझसे वायदा

मैं सात दिन का कोर्स भी पूरा नहीं कर पायी। केवल कल्पवृक्ष और तीन लोक के बारे में ही सुना। इसी बीच में गुरुवार को अहमदाबाद के पालड़ी सेवाकेन्द्र पर मेरा जाना हुआ (तब अहमदाबाद में एक ही सेवाकेन्द्र था, वह मकान अभी बदली हो गया है)। मुझे खुली आँखों से योगाभ्यास करने के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था लेकिन मेरी लौकिक बड़ी बहन रंजन (वर्तमान समय अफ्रीका में ईश्वरीय सेवा कर रही वेदान्ती बहन) ने मुझे बताया कि योग में आँखें खुली रखना और सामने जो बहन बैठी है उनकी आँखों से आँख मिलाना और अन्दर से बोलना कि मैं आत्मा हूँ... मैं प्रकाश स्वरूप हूँ...। मैं तो उनको देखते-देखते कुछ ही क्षणों में ध्यान में चली गयी। मैंने ध्यानावस्था में फिर ब्रह्मा बाबा को देखा। मैं उनके गले लग गयी। बाबा ने भी कहा, ‘आ गयी बच्ची!’ मैंने कहा, ‘जी बाबा।’ फिर तो मुझे नयी सतयुगी दुनिया के स्वयंवर, रास-मण्डल, गोप-गोपियाँ आदि के साक्षात्कार हुए। काफी समय वतन में ही बहलती रही। फिर बाबा ने कहा, बच्ची, अब तुम जाओ। मैंने कहा, बाबा, मुझे तो यहाँ ही रहना है, और कहीं नहीं जाना है। बाबा ने कहा, बच्ची, यह तो सूक्ष्म वतन है, तुम यहाँ नहीं रह सकती। तुम्हें तो जाकर बाबा की बहुत सेवा करनी है। मैं बाबा की बातों से ज़्यादा अपनी बात को लिये बैठी थी कि नहीं बाबा, मुझे तो यहाँ ही रहना है। ध्यानावस्था में ही मेरा रोना शुरू हो गया। मैं बहुत रो रही थी। तब बाबा ने कहा, “बच्ची, बाबा तुमसे वायदा करता है कि जब भी तुम बाबा को दिल से याद करोगी, बाबा तुम्हें अपने पास वतन में बुला लेगा।” फिर तो रोज़ सुबह 5 बजे जैसेकि वतन में बाबा के पास जाने का नियम ही बन गया। मैंने वतन में बाबा के पास ही सप्ताहिक कोर्स किया। साकार में मुरली सुनने के पहले मैंने वतन में बाबा से कई मुरलियाँ सुनी। देखिये, जब बाबा साकार में थे तो भी आलमाइटी बाबा ने ब्रह्मा बाबा के आकारी स्वरूप से बच्चों की कितनी सेवा और पालना की!

आख़िर वह दिन आया, साकारी फ़रिश्ते से मिलन मनाने का

साक्षात्कार के क़रीब छः मास के बाद मेरा माउण्ट आबू में आना हुआ। ब्रह्मा बाबा से साकार में मिलते हुए मैंने बहुत खुशी के साथ अपने अनुभव बाबा के सामने वर्णन किये। मैंने कहा, बाबा, आपने मुझे अपना साक्षात्कार कराया था। तब बाबा ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, बच्ची, हो सकता है शिव बाबा ने साक्षात्कार कराया होगा। इस बाबा को कुछ भी मालूम नहीं है। बाबा के उस उत्तर को सुनकर पहले तो मुझे ऐसा लगा कि ब्रह्मा बाबा जानते हुए भी अनजान बन रहे हैं और कहते हैं कि कराने वाला शिव बाबा ही है।

प्रथम बार जब मैं मधुबन में आयी तब मेरी उम्र केवल 18 साल ही थी और मैं स्नातक के अन्तिम वर्ष में पढ़ रही थी। बाबा ने मुझे कहा कि बच्ची, इस जन्म की सारी कर्म-कहानी बाप को बता दो। मैंने अपनी पूरी जीवन-कहानी बाबा को सुनायी। छोटे से छोटी ग़लती भी याद करके बाबा को अपना पूरा पोतामेल दिया। उसे सुनने के बाद बाबा ने मुझे वरदान दिया कि बच्ची, तुम्हारे द्वारा बहुत बड़े-बड़े लोगों की सेवा होगी। इस वरदान को मैंने अपने जीवन में साकार होते हुए देखा है और जब-जब ऐसे प्रसंग आते हैं तो बाबा के द्वारा मिला हुआ यह वरदान बार-बार मुझे याद आता है और मुझे महसूस होता है कि मैंने सच्चाई से बाबा के आगे अपने जीवन की हर बात सुनायी, उसी के फलस्वरूप बाबा से मुझे यह वरदान प्राप्त हुआ ।

बाबा के सामने ड्रिल की और सेल्यूट दी

जब से मैंने बाबा को देखा, मुझे पूरा निश्चय हुआ कि यह बाबा ही मेरा सर्वस्व है। तब से मैं हर कदम बाबा की आज्ञा से ही रखती थी। कॉलेज की पढ़ाई के समय एन.सी.सी. (N.C.C.) में मेरा चयन हुआ। देहली में होने वाली 26 जनवरी की परेड के लिए मुझे एक मास ट्रेनिंग के लिए देहली जाना था तो बाबा की राय लेने के लिए मैंने अहमदाबाद से आबू आकर बाबा से पूछा, बाबा, मुझे एक मास परेड के लिए देहली जाना है और एक मास वहाँ रहना होगा तो मेरे खाने-पीने आदि की धारणा का क्या होगा? इतना सुनते ही बाबा ने मेरे से पूछा, अच्छा बच्ची, तुमको ड्रिल करना आता है क्या? आज रात्रि क्लास में बाबा को दिखाना। ऐसा कहते हुए लच्छु बहन को बुलाया और कहा, बच्चियों को पहरे वाले की नयी ड्रेस निकाल कर देना। मैं तो बहुत खुश हो गयी क्योंकि शाम को बाबा को ड्रिल दिखानी थी। लच्छु बहन ने मुझे नयी तीन जोड़ी ड्रेस दी। मैं, वेदान्ती बहन और हमारी एक सखी हम तीन थे। रात्रि में बाबा की क्लास पूरी हुई और बाबा ने कहा कि अहमदाबाद से आयी हुईं बच्चियाँ आज ड्रिल करके दिखायेंगी। फिर तो हमने छोटे हाल में ड्रिल की और बाबा को सेल्यूट दी। बाबा ने भूरी-भूरी प्रशंसा की और कहा, तुम्हारे जैसी बच्चियाँ रूहानी ड्रिल कराना सीख जायें तो बाबा का नाम बाला हो जायेगा। हम तो बहुत खुश हुई। रात्रि को बाबा से गुड नाइट करके सो गये। परन्तु वो सवाल का जवाब तो बाक़ी रह गया। सुबह हुई फिर मुरली क्लास के बाद बाबा के पास गयी। बाबा से पूछा, बाबा मैं दिल्ली जाऊँगी तो कहाँ रहूँगी और मेरे खान-पान का क्या होगा? बाबा मुस्कराते हुए मुझे देख रहे थे, फिर कहा, बच्ची, तुम्हारे जैसी बच्ची और एक मास का टाइम वेस्ट करेगी? बाबा नहीं चाहता कि तुम्हारा टाइम वेस्ट हो। बाबा की इस बात को सुनते ही मैंने बाबा को कहा, ठीक है बाबा, आप नहीं चाहते हैं तो मैं नहीं जाऊँगी। दो दिन के बाद बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, देखो बच्ची, यह कुमारका बच्ची (दादी प्रकाशमणि) टूअर पर जा रही है, तुम उसके साथ जा सकती हो? तेरा बाप छुट्टी देगा? मैंने कहा, जी बाबा। तो बाबा ने मेरा और वेदान्ती बहन का दादी कुमारका जी के साथ 21 दिन का टूअर प्रोग्राम बनाया और उस समय जितने भी बड़े-बड़े सेवाकेन्द्र थे जैसे जयपुर, आगरा, देहली, लखनऊ, कानपुर, भोपाल आदि स्थानों पर दादी कुमारका जी के साथ सेवा करने का अवसर मिला। इस प्रसंग से मुझे महसूस हुआ कि हमारे भविष्य की जानकारी बाबा के पास कितनी स्पष्ट थी। दूसरा, अन्दर में यह खुशी हुई कि बाबा की आज्ञा के पालन से तथा एक छोटे-से त्याग के बदले में बाबा ने हमें कितना बड़ा सुअवसर देकर हमारे भाग्य में एक विशेष पार्ट की नूँध कर दी। मैंने दादी जी के साथ 21 दिन रहकर जो कुछ प्राप्तियाँ की वो अवर्णनीय हैं।

बाबा को बच्चियों की कमाई नहीं चाहिए

सन् 1967 में स्नातक पास होने के बाद मुझे एक जगह सर्विस के लिए इन्टरव्यू देने जाना था। मैं और वेदान्ती बहन राय लेने मधुबन गये और मैंने बाबा से पूछा कि बाबा मैं लौकिक सर्विस करूँ? इससे तन-मन-धन से यज्ञ की सेवा करूँगी। बाबा ने मेरे से पूछा, ‘बच्ची, नौकरी करोगी तो कितना कमाओगी? 500, 1000, 1500, 2,000? कितना कमाओगी? बाबा जानता है, यह कोई तुम्हारी वैल्यू नहीं है।’ बाबा के कहने से हम समझ गये कि बाबा नहीं चाहता कि हम नौकरी करें। उसी घड़ी मैंने और वेदान्ती बहन ने यह फैसला कर लिया कि हम जिस्मानी सर्विस नहीं करेंगी, रूहानी सेवा में ही अपना जीवन समर्पित करेंगी।

दिल की हर धड़कन को सुन लेते थे बाबा

एक बार दोपहर भोजन के बाद में अपने बिस्तर पर लेट गयी परन्तु मुझे नींद नहीं आयी। बार-बार एक संकल्प आने लगा कि यदि विश्व का मालिक भगवान ब्रह्मा बाबा के तन में बैठा हुआ है तो पाँच मिनट में मुझे बुलाये, तभी मैं समझूं कि शिव बाबा को मेरे दिल की बात पहुंचती है। सचमुच दो-तीन मिनट में ही पहरे वाले भाई ने आकर कहा कि चन्द्रिका बहन, बाबा आपको बुला रहे हैं। बाबा मुझे 'चन्द्रकला' कहकर पुकारते थे। मैं खुश होकर बाबा के पास झोपड़ी में पहुँच गयी। उस समय बाबा कुछ वत्सों के साथ बैठे थे।

साधनालीन भी और सेवाप्रिय भी

बाबा की साधना सर्वोच्च स्तर की थी। ब्रह्मा बाबा जब शिव बाबा को याद करते थे तो इतने मगन हो जाते थे कि बात मत पूछिये। एक बार अंगूर के बगीचे में कुर्सी पर बाबा बैठे हुए थे। बाबा की नज़र आसमान की ओर थी। मैं बाबा के पास आकर बैठ गयी। मैंने समझा, बाबा को मालूम पड़ जायेगा और बाबा मुझसे बात करेंगे। मैं काफी समय तक बैठी रही लेकिन बाबा अपनी मस्ती में मस्त थे। फिर मैं खड़ी होकर बाबा की ओर देखा लेकिन बाबा मुझे नहीं देख रहे थे। आखिर मुझ में धीरज न रहा और मैंने कहा, बाबा, मैं आपसे मिलने आयी हूँ। तब बाबा ने कहा, ‘अच्छा बच्ची, तुम कब आयी?’ मैंने कहा, ‘बाबा, मैं तो कब से यहाँ बैठी हूँ।’ तो बाबा ने कहा, ‘यह बाबा तो शिव बाबा को याद कर रहा था। अच्छा, बोलो बच्ची, क्या सेवा है?’ बाबा ने मुझे कॉलेज में जाकर सेवा करने को कहा था तो मैं भाषण तैयार करके आयी थी। मैंने बाबा को कहा, बाबा, योग के विषय पर मैंने भाषण तैयार किया है। सुनते ही बाबा ने कहा, अच्छा बच्ची, बाबा को सुनाओ। मैंने क़रीब 10 मिनट बाबा को अपना तैयार किया हुआ भाषण सुनाया। तब बाबा ने कहा, बच्ची, तुमने तो बहुत अच्छा भाषण तैयार किया है। ऐसे ही युक्तियुक्त समझाना चाहिए। इससे मैंने यह अनुभव किया कि बाबा अपनी साधना में लवलीन रहते हुए भी, समय पर बच्चों को योग्य सेवाधारी बनने का मार्गदर्शन देते रहे और बच्चों की सेवा में उपस्थित होते रहे। यज्ञपिता ब्रह्मा बाबा, यज्ञ के हरेक छोटे-बड़े कार्यों की देखभाल करते थे। एक बार मैं भण्डारे में बैठे-बैठे मूंगफली छील रही थी। हम कई जने थे। धीरे-धीरे करके सब चले गये। मैं अकेली सेवा कर रही थी। इतने में मैंने देखा कि मेरे पास कोई बैठा है और आवाज़ आयी कि बच्ची, चलो बाप तुमको मदद करने आया है। मना करने पर भी बाबा बैठ गये और मूंगफली छीलने लगे। कुछ ही मिनटों के बाद देखा कि सभी जने धीरे-धीरे वापस आकर बैठने लगे। बाबा को देखकर सभी ने सेवा में अपना हाथ बढ़ाया। बाबा ने किसी को कुछ कहा नहीं लेकिन स्वयं करके बच्चों को सिखलाया।

एक बार बाबा आँगन में खड़े थे। मैं बाबा के पास जाकर खड़ी हो गयी। बाबा का कद तो बहुत ऊँचा था और मैं बहुत छोटी थी। जब मैंने बाबा से कुछ कहा तो बाबा एकदम काफी झुक गये और कहा, ‘बच्ची बोलो, बाबा से क्या काम है?’ छोटों को भी बाबा बहुत सम्मान देते थे।

एक माह पहले ही बाबा ने मुझे एहसास कराया था

बाबा के अव्यक्त होने से एक मास पहले मैं पार्टी लेकर मधुबन गयी थी। जब बाबा से छुट्टी ले रही थी तो काफ़ी समय तक बाबा ने मुझे दृष्टि दी और 'गो सून, कम सून' की टोली दी। बाबा से जब विदाई लेकर मैं निकली तो मेरे मन में एक संकल्प बार-बार आने लगा कि मानो बाबा मुझसे कह रहे हैं, "बच्ची, इस बाबा को इस रूप में तुम फिर कभी नहीं मिलेंगी।" कितना रोकने के बाद भी वो संकल्प अधिक ज़ोर से आने लगा। मुझे बहुत रोना आया कि ऐसा व्यर्थ संकल्प पता नहीं मेरे मन में क्यों आ रहा है? मैं अहमदाबाद पहुंची। जब भाई-बहनें मुझसे मधुबन का अनुभव पूछते थे तो मेरे मुख से यह बात बार-बार निकल आती थी, जिसे सुनकर लोग मेरे से नाराज़ होते थे कि तुम यह क्या बोल रही हो! मुझे अन्दर आ रहा था कि कहीं बाबा हमें छोड़कर चले न जायें? ठीक एक मास के बाद 18 जनवरी 1969 को रात्रि 9-00 बजे हमें समाचार मिला कि ब्रह्मा बाबा साकार शरीर त्याग वतन में चले गये। एक मास पूर्व बाबा ने अपनी दृष्टि से ही एहसास करा दिया था कि बाबा अब साकार में अधिक समय नहीं रहेंगे।

प्रभा बहन

भरूच, गुजरात से ब्रह्माकुमारी प्रभा बहन जी अपने अनुभव सुनाती हैं कि सन् 1965 में मुझे मथुरा में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ। इस ज्ञान में हमारा पूरा ही परिवार चलता है, सबसे पहले मेरे लौकिक पिताजी ज्ञान में आये, उसके बाद सारा परिवार आया। हम सबके ज्ञान में आने के पीछे एक कारण निमित्त बना। मेरे लौकिक पिताजी सिगरेट बहुत पीते थे जिसके कारण उन्हें और मेरी माताजी के बीच बहुत झगड़ा चलता था। माताजी सिगरेट छोड़ने के लिए कहती थीं लेकिन पिताजी छोड़ते नहीं थे। परिवार बहुत धार्मिक भावना वाला था जिसके कारण बचपन से पूजा-पाठ करने के संस्कार हम भाई-बहनों में थे। पिताजी को जिस दिन ज्ञान मिला उसके दूसरे दिन से ही उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया। यह देखकर हम सब घर वालों को बहुत आश्चर्य हुआ। जिसको छोड़ने के लिए माँ कई वर्षों से कह रही थी, रोज़ झगड़ा भी करती थी वो एक दिन में छूट गयी! अवश्य ही इस संस्था में ज़रूर कुछ है, वहाँ ज़रूर कोई दैवी शक्ति है। मेरी माताजी, पिताजी से कहने लगी कि आप जहाँ जाते हो वहाँ मुझे भी ले चलो।

माँ सेन्टर पर गयी तो उनको भी ज्ञान बहुत अच्छा लगा। फिर हम बच्चे भी माता-पिता के साथ सेन्टर पर जाने लगे। जब मैं ज्ञान में आयी तब मेरी उम्र 13 साल की थी। उस दिन शिव जयन्ती थी। मुझे सिनेमा देखने की बहुत इच्छा होती थी। क्योंकि स्कूल में सहेलियाँ कहती थीं कि आज हम फलाना सिनेमा देखने गयी थीं, जो बहुत अच्छा है। मैं पिताजी से कहती थी तो वे कहते थे, ठीक है मैं ले जाऊँगा लेकिन तुम्हारी माँ भी चलनी चाहिए। माताजी बहुत धार्मिक भावना वाली होने के कारण न खुद सिनेमा देखने जाती थीं और न हम बच्चों को जाने देती थी।

शिव जयन्ती, हमारी अलौकिक जयन्ती है

शिव जयन्ती के दिन पिताजी हमारे पास आये और कहने लगे, चलो आज तुम सबको सिनेमा दिखाने ले चलूँगा। हम सबको बहुत खुशी हुई क्योंकि कई सालों से हम कहते थे लेकिन पिता जी नहीं ले जाते थे, आज उन्होंने ही कहा तो बहुत खुशी हुई। उस दिन मेरा शिवरात्रि का व्रत भी था। पिताजी एक बड़े हॉल में ले गये। वहाँ स्टेज पर सफ़ेद वस्त्रों वाली दो बहनें बैठी थीं। जैसे ही मैं उस हॉल में गयी और उन बहनों को देखा तो मुझे इतना आकर्षण हुआ कि मैंने यह निश्चय किया कि इन जैसी ही बनना है। मुझे इन जैसा ही जीवन बनाना है। उन्होंने शिव जयन्ती के बारे में भाषण किया और प्रोजेक्टर शो (जिसको मेरे पिताजी ने सिनेमा कहा था) भी दिखाया गया। उसी दिन से मुझे निश्चय हो गया कि यह परमात्मा का दिया हुआ ज्ञान है। परमात्मा इस धरती पर आया हुआ है। उसके बाद हम सब रोज़ क्लास में जाने लगे। मुझे बचपन से ही सफ़ेद वस्त्र बहुत प्रिय थे। मेरी स्कूल की यूनिफार्म भी सफ़ेद ही थी। हम सब रोज़ क्लास में जाते रहे, दो महीने के बाद बाबा से हमें मधुबन आने का निमंत्रण मिला तो हम मधुबन गये।

बाबा के लिए खाना बनाते-बनाते ही मैंने खाना बनाना सीखा

बाबा को देखते ही बाबा से स्नेह की वर्षा मेरे ऊपर होने लगी। ऐसा लगा कि स्नेह के सागर ने ही मुझे अपने में समा लिया है। बाबा का रूप इतना आकर्षक या कि मैं अपने आपको भूल गयी। मैंने बाबा से कहा, ‘बाबा, मुझे अभी यहाँ ही रहना है, कहीं नहीं जाना है, मुझे सेवा करनी है। मुझे पढ़ना भी नहीं है।’ उस समय मैं नौवीं क्लास में पढ़ती थी। बाबा ने कहा, ‘बच्ची, अभी तुम छोटी हो, पढ़ाई पूरी करना, बाद में तुम सेन्टर पर रहकर सेवा करना।’ जब बाबा ने ऐसा कहा तो मुझे धुन लग गयी कि कैसे भी करके पढ़ाई पूरी करनी है, दो साल ही तो हैं, उनको जल्दी-जल्दी पूरा करके सेवा में लगना है। नौवीं और दसवीं पूरी करके मैं बाबा से मिलने मधुबन गयी। जाते ही मैंने बाबा से कहा, बाबा, आपके कहे अनुसार मैंने पढ़ाई पूरी की, अभी मुझे यहाँ ही रहना है और सेवा करनी है। उसी समय बाबा ने मेरे से पूछा, ‘बच्ची, तुमको बाबा की ही सेवा करनी है तो क्या तुमको खाना बनाना आता है?’ मैंने कहा, ‘बाबा, मुझे खाना बनाना नहीं आता।’ तो बाबा ने कहा, ‘बच्ची, अगर तुमको खाना बनाना नहीं आता और सेन्टर पर रहोगी तो क्या भोग बनाओगी और क्या बाबा को और जिज्ञासुओं को खिलाओगी?’ मैंने कहा, ‘ठीक है बाबा, मैं खाना बनाना सीख लूँगी।’ फिर बाबा ने कहा, ‘बच्ची, तुम आज से बाबा के रथ के लिए खाना बनाना।’ वहीं लच्छु दादी थी, उनको बुलाकर कहा, ‘बच्ची, आज से यह बच्ची बाबा के लिए खाना बनायेगी, तुम उसको खाना बनाना सिखाना।’ उसी दिन से मैंने बाबा के लिए खाना बनाना शुरू किया। तीन मास तक मैं मधुबन में रहकर बाबा का खाना बनाती रही।

बाबा खाना बहुत प्यार से खाते थे

बाबा का भोजन बहुत साधारण था। बाबा सादी रोटी, मूंग की दाल खाते थे। बाबा ज़्यादातर उबली हुई सब्जियाँ और उबला हुआ करेला खाते थे। सींगी (सहजन की फली) को भी बाबा बहुत प्यार से खाते थे। बाबा का भोजन बनाते- बनाते ही मैं भोजन बनाना सीखी। मुझे लौकिक घर में खाना बनाना नहीं आता था। एक दिन जब मैं भण्डारे में खाना बना रही थी तो बाबा वहाँ आये। भण्डारे का दरवाज़ा छोटा था, बाबा की लम्बाई बहुत थी तो बाबा ने दरवाज़े के अन्दर झुक कर मुझसे पूछा, ‘बच्ची, किसका खाना बना रही हो?’ मैंने कहा, ‘बाबा आपका।’ फिर बाबा ने कहा, ‘नहीं बच्ची, तुम शिव बाबा के रथ के लिए खाना बना रही हो।’

इस प्रकार बाबा हर बात में शिक्षा देते थे और शिव बाबा की तरफ़ हमारी बुद्धि को ले जाते थे। बाबा भोजन को बहुत प्यार से स्वीकार करते थे। खाते-खाते बाबा कहते थे कि बच्ची, तुमने बहुत अच्छा खाना बनाया, खाना बहुत अच्छा है। ऐसे महिमा करते-करते बाबा ने मुझे खाना बनाना सिखाया। समझो बाबा ने मुझे यह खाना बनाने का वरदान ही दिया। जब बाबा खाना खाते थे और मैं बाबा को परोसने जाती थी तो बाबा मुझे भी रोज़ एक गिट्टी ज़रूर खिलाते थे।

बाबा को देखते ही लौकिक माँ-बाप का मोह नष्ट हो गया

तीन महीने के बाद मैं बाबा से छुट्टी लेकर मथुरा सेवाकेन्द्र पर गयी। एक विशेष बात मुझे याद आती है कि मुझे लौकिक माँ-बाप से बहुत मोह था। इतना मोह था कि उनको छोड़कर एक दिन भी नहीं रह सकती थी। जब मैं संसार की बातें सुनती थी कि एक दिन लड़की को माँ-बाप को छोड़कर ससुराल जाना पड़ता है तो मुझे बहुत दुःख होता था। मैं सोचती थी कि क्या लड़की को शादी करना, ससुराल जाना ज़रूरी है? मैं माँ से कहती थी कि मैं आप लोगों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी। संसार का यह क्या नियम है जो लड़‌कियाँ माँ-बाप को छोड़ दूसरों को माँ-बाप बनायें और लड़के अपने माँ-बाप के पास रहें? मैं तो कभी भी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।

माँ-बाप पर मेरा इतना मोह था कि उनको छोड़कर मैं रह नहीं सकती थी। ड्रामा इतना विचित्र है कि जब मैं पहली बार बाबा से मिली तो उसी क्षण से मेरा लौकिक माँ-बाप से मोह नष्ट हो गया। बाबा ने अपनी दृष्टि से इतना स्नेह और शक्ति दी कि मेरा सब कुछ बाबा ही हो गया। लौकिक मोह-ममता सब समाप्त हो गये। बाबा से मिलने से पहले मैं बहनों से कहती थी कि मैं ईश्वरीय सेवा करूँगी लेकिन सेन्टर पर रहकर नहीं, अपने माँ-बाप के साथ घर में रहकर। जब बाबा से मिली तो मुझे मन में यह पक्का हो गया कि अब मुझे बाबा से अलग नहीं होना है, बाबा को छोड़कर कहीं नहीं जाना है। तुरन्त मैंने बाबा से कहा कि बाबा, मैं वापस घर नहीं जाऊँगी, मैं यहीं आपके पास रहूंगी। इस तरह बाबा ने मुझे पहली नज़र में ही माँ-बाप का सम्पूर्ण स्नेह और सम्बन्ध दिया जो लौकिक सम्बन्ध का मोह टूट गया। साकार बाबा से मैं कुल तीन बार मिली हूँ। पढ़ाई पूरी होने से पहले दो बार और पूरी होने के बाद एक बार जो अन्तिम मिलन था।

बाबा बहुत उपराम दिखायी पड़ते थे

तीसरी बार जब मिली थी तब सन् 1968 का सितम्बर महीना था। उस समय बाबा की अवस्था बहुत ऊँच थी। मैंने देखा कि उन दिनों बाबा का रूप बहुत स्नेहमय और ज्योतिर्मय था। चेहरे पर प्यार झलकता था। बाबा बहुत उपराम दिखायी पड़ते थे। फ़रिश्ते का रूप दिखायी पड़ता था। बहुत कम बोलते थे। सितम्बर, 1968 से 26 दिसम्बर तक में मधुबन में रही। उस समय मैं बाबा को छोड़कर कहीं जाने के लिए तैयार नहीं थी। बृजमोहन भाईजी और उनकी लौकिक माँ जिनको चाची कहते थे, वे मुझे ज़बरदस्ती ले गये क्योंकि उस समय सेन्टर पर मेरी ज़रूरत थी। उस समय मैं बहुत रोयी तो बाबा ने बृजमोहन भाई से कहा कि जाने के लिए बच्ची की दिल नहीं है ना, उसको मत ले जाओ। लेकिन उन्होंने माना नहीं और बाबा से कहा, बाबा हमें हैण्ड्स की बहुत ज़रूरत है, सेवा के लिए चाहिए, हम इसको ले जायेंगे। उस समय मुझे अन्दर से महसूस हो रहा था कि मैं दोबारा शायद ही बाबा से मिल पाऊँगी। जाने के दिन मुझे बहुत रोना आया था, जाने के लिए बिल्कुल दिल ही नहीं हो रही थी। फिर भी ड्रामा ही कहें कि मुझे नांगल जाना ही पड़ा। उसके बाद 18 जनवरी के दिन बाबा अव्यक्त हुए।

बाबा मेरे सिर पर हाथ रखकर मेरे से बात कर रहे थे

सन् 1965 में मैं ज्ञान में आयी थी लेकिन तब तक मम्मा अव्यक्त हो गयी थी। मुझे मन में यह भी संकल्प चलता था कि मैं मम्मा को नहीं देख पायी। उसके बाद बाबा अव्यक्त हुए, मुझे अन्तिम संस्कार पर जाने का भाग्य भी नहीं मिला। यह बात मन में बहुत दुःख देती थी। जब बाबा ने शरीर छोड़ा था उस समय में नांगल सेवाकेन्द्र में थी। उस समय बृजमोहन भाई और चाची मुझे छोड़कर मधुबन में बाबा के अन्तिम संस्कार में भाग लेने आ गये। उस समय मुझे बहुत दुःख हुआ क्योंकि मैं पहले ही बाबा को छोड़कर इनके साथ आने के लिए तैयार नहीं थी और जब अभी बाबा ने शरीर छोड़ा है तो अन्तिम यात्रा में भी मुझे छोड़कर चले गये। मुझे बहुत फीलिंग आयी। बाबा कहते थे कि अन्त समय जिसका योग अच्छा रहेगा, जिसका बाबा से अटूट प्यार रहेगा वे बाबा के पास पहुंच जायेंगे। तो मैंने समझा कि शायद मेरा योग नहीं होगा, बाबा से मेरा प्यार नहीं होगा इसलिए मैं बाबा के अन्तिम समय पर नहीं जा सकी।

यह याद आते ही मुझे और दुःख होता था और साथ में मैं सेन्टर पर अकेली भी थी। बार-बार बाबा से पूछती थी कि बाबा, क्या आपसे मेरा प्यार नहीं है? इसीलिए आपने मुझे नहीं बुलाया? रात हुई, मैं पलंग पर लेटी हुई थी। नींद भी नहीं आयी थी, जाग रही थी। उतने में मेरे सिर के पास खड़े होकर बाबा बोलने लगे, ‘बच्ची, मैं तो तुम्हारे पास हूँ, मैं कहाँ गया हूँ। देखो, मैं तुम्हारे पास ही हूँ।’ यह कोई भावना या कल्पना नहीं थी। मैं आँखों से देख रही थी और अनुभव कर रही थी कि बाबा ने मेरे सिर पर हाथ रखा है, बगल में खड़े हुए हैं और मेरे से कह रहे हैं। आज तक भी मुझे एहसास होता है कि बाबा मेरे साथ हैं। कभी भी मुझे यह अनुभव नहीं होता कि बाबा नहीं है। बाबा सदा मेरे साथ हैं यही मुझे बार-बार अनुभव होता है। बाबा के अव्यक्त होने के बाद कुछ महीने में नांगल में रही, उसके बाद मधुबन आयी। मधुबन में दो साल रही। मुझे बड़ी दीदी ने बहुत पालना दी। उसके बाद मुझे सेवा के लिए छह मास नेपाल भेजा गया और फिर मधुबन आयी। उसके बाद मैं मुंबई गयी। मुंबई में कोलाबा, गामदेवी, उसके बाद तीन साल कांदिवली में रही; डेढ़ साल अन्धेरी में भी रही। कुल पाँच साल मैं मुंबई में रही। उस समय सूरत में कोई नहीं थे तो दादी जी ने मुझे मुंबई से सूरत भेजा। वहाँ छह महीने रहकर फिर सन् 1975 में मैं भरूच आयी। तब से लेकर आज तक भरूच में बाबा की सेवा में हूँ।

चन्द्रप्रभा से बनी सूर्यप्रभा

मेरा लौकिक नाम चन्द्रप्रभा था। जब बाबा ने मेरा नाम सुना तो कहा, बच्ची, तुम थोड़े ही चन्द्रवंश में आने वाली चन्द्रप्रभा हो? तुम तो सूर्यवंश में आने वाली प्रभा हो 'सूर्यप्रभा'। बाबा ने मुझे कभी चन्द्रप्रभा कहकर नहीं बुलाया, हमेशा मुझे 'प्रभा' ही कहते थे। इस प्रकार मेरा नाम 'प्रभा' पड़ा। जब मुझे बृज मोहन भाई और चाची के साथ नांगल जाना था तो बाबा ने ही खुद अपने हस्तों से मेरा समर्पण पत्र लिखकर, उस पर अपने हस्ताक्षर किये थे। अभी मेरे हाथ में जो अंगूठी है इसको भी 40 साल पहले बाबा ने ही मुझे पहनायी थी।

बाबा के लिए यज्ञसेवा का महत्त्व

बाबा ने किसी बच्चे से कहकर सेवा नहीं करायी। खुद करके दूसरों से करवाते थे। एक बार दोपहर में एक ट्रक सब्ज़ी भरकर आया। उसको खाली करना था। सब भोजन करके विश्राम करने जा रहे थे, कुछ भाई-बहनें जा भी चुके थे। उस समय भूरी दादी आयी और बाबा से कहने लगी, ‘बाबा, सब्ज़ी उतारनी है और सारी सब्ज़ी अलग भी करनी है।’ बाबा ने कहा, ‘ठीक है बच्ची, बाबा खुद आ जायेगा।’ बाबा खुद ट्रक से सब्ज़ी उतारने लगे तो वत्सों को एक-दूसरे से पता पड़ा कि बाबा खुद गाड़ी से सब्ज़ी उतार रहे हैं तो सब भाई-बहनें आये, सारी सब्ज़ी भी उतारी और अलग-अलग भी की। बाबा ने यह नहीं कहा कि अच्छा बच्ची, सबको बुलाओ अथवा घंटी बजाओ, सभी आ जायेंगे। परन्तु बाबा साधारण से साधारण सेवा खुद करते थे और बच्चों को यज्ञसेवा का महत्त्व समझाते थे। ऐसे थे मेरे साकार बाबा ।

विजया बहन जी

बाबा ने मुझे 'विद्धान विजय लक्ष्मी' कहा
जींद, हरियाणा से ब्रह्माकुमारी विजया बहन जी कहती हैं कि मैं बचपन से ही श्रीकृष्ण की भक्ति करती थी। घर में ही गीता, रामायण पढ़ते थे। मेरी पढ़ाई भी गुरु ने गीता से ही शुरू करवायी थी इसलिए गीतापाठ में बहुत श्रद्धा थी। श्रीकृष्ण जी से मिलने की मन में तीव्र इच्छा थी। प्रार्थना भी करती थी, "हे श्रीकृष्ण भगवान, मुझे अपने पास बुला लो। आपने मुझे अपनी दुनिया में क्यों नहीं बुलाया, जहाँ आपके अंग-संग रहने वाले गोप-गोपियों ने इतना अतीन्द्रिय सुख पाया।" मन में यही तीव्र इच्छा बनी रही। हमारे पड़ोस की एक बहन नांगल से यह ज्ञान सुनकर अपने घर आयी थी और साथ में त्रिमूर्ति का चित्र तथा मुरलियाँ लायी थी। एक दिन उस बहन ने त्रिमूर्ति के चित्र में ब्रह्मा बाबा का फोटो दिखाते हुए कहा कि इस ब्रह्मा-तन में शिव परमात्मा आकर यह ज्ञान सुनाते हैं, यह मुरली है।

ब्रह्मा बाबा का चित्र देखते ही ऐसा अनुभव हुआ कि मैं इस बाबा से कई बार पहले भी मिली हूँ और जैसे इन मुरलियों को पढ़ती रही हूँ। चित्र देखते-देखते मैं गुम हो गयी और इस देह की दुनिया को ही भूल किसी दूसरे लोक में पहुँच गयी। ऐसा अनुभव होने के बाद मैं रोज़ उन मुरलियों को पढ़ती रही। बाबा से मिलने की लगन बढ़ती गयी। कुछ समय के बाद लौकिक मात-पिता भी ज्ञान में चलने लगे । बाद में किसी कारण से लौकिक पिता जी विरोध करने लगे। उसी समय दिल्ली में मम्मा आयी थी। पिता जी को मम्मा से मिलने भेजा। मम्मा से मिलकर पिता जी बहुत खुश हो गये । सन् 1960 में गाँव में अपने घर पर ही मुरली पढ़ने लगे। जब बाबा दिल्ली में मेजर भाई की कोठी पर आये तब लौकिक पिता जी के साथ मैं भी बाबा से मिलने गयी। बाबा की दृष्टि पड़ते ही बहुत लाइट-माइट का अनुभव हुआ। सुबह की क्लास में बाबा के सामने ही बैठी थी और एकाग्रता से मुरली सुन रही थी। बाबा के एक-एक बोल अन्दर जा रहे थे और मुझ में शक्ति भर रहे थे। मन आनन्दित हो रहा था। वह दिन कभी नहीं भूलता है और आज भी याद आते ही मन उस आनन्द की दुनिया में खो जाता है। फिर हम बाबा से मिलने कमरे में गये। बाबा की गोद में अलौकिक, पारलौकिक बाबा के बेहद प्यार का अनुभव हुआ, फिर बाबा की दृष्टि ने वतन में उड़ा दिया। दो दिन तक बाबा के साथ मेजर की कोठी पर ही रहे। बाबा मुझे हमेशा मीठी बच्ची, मीठी बच्ची कहते थे। बाबा ने मीठी टोली खिलाते मुझे मीठा बना दिया। उस मीठे वरदान से बाबा सबको मीठेपन का ही अनुभव कराते थे। सन् 1963 में मैं पहली बार मधुबन बाबा से मिलने गयी। एक दिन सुबह की मुरली में बाबा ने कहा कि तुम बच्चे ही विद्वान भी हो, पंडित भी हो। उसी दिन रात्रि को बाबा के साथ भोजन कर रहे थे तो बाबा अपने हाथों से मुझे गिट्टी देते हुए बोले, “बच्ची, तुम पंडित, विद्वान विजय लक्ष्मी हो।” जैसेकि बाबा ने मेरे में विद्वता भर दी। बच्चों के साथ बाबा जब चलते थे तो कभी-कभी खड़े होकर दृष्टि देते थे, तब ऐसे लगता था कि बाबा जैसे दूर-दूर कुछ आत्माओं के जन्मों को परख रहे हैं।

शीला बहन जी

बाबा अत्यन्त विनम्र सेवाधारी थे
गुवाहाटी, असम से ब्रह्माकुमारी शीला बहन जी कहती हैं कि जब मैं मीठे मधुबन में बापदादा से मिलने के लिए आयी थी तब बाबा के कमरे की ओर बढ़ी तो एक विचित्र अनुभव पाया। जैसे ही मैं कमरे के दरवाज़े तक पहुँची तो दूर से ही बाबा ने मीठे-मीठे स्वर में मुझे बुलाया, “आओ मेरी शीला बच्ची, आओ।” ऐसा सुनते हुए मैं स्नेह के सागर में खो गयी और मन ही मन सोचने लगी कि मीठे बाबा ने मेरा नाम कैसे जाना कि मैं वही शीला हूँ। सचमुच ज्ञानसागर, जानीजाननहार का विचित्र अनुभव बाबा ने मुझे कराया। फिर कहा, बच्ची, जो भी तुम्हें ज़रूरत हो वह बाबा के घर से मिल सकता है। मैं तो बहुत देर तक बाबा को ही निहारती रही। फिर बाबा ने गद्दी पर बिठा कर गोद में लिया। वह गोद का अनुभव कितना सुखकारी था जो अवर्णनीय है जैसे कि बहुत समय से बिछुड़े हुए माँ-बाप का स्नेह होता है।

फिर एक बार बाबा ने मुझे अपने पास कुटिया में बुलाया और सभी स्थानों की सेवा का समाचार पूछा। बाप अपने बच्चों का हाल-चाल पूछकर आगे बढ़ने की राय देता है और उनको हल्का कर देता है, ऐसा ही अनुभव मुझे मीठे बाबा से हुआ। मैं जब भी बाबा को देखती थी बहुत ख़ुशी में खो जाती थी। फिर तो बाबा ने कहा, बच्ची, और भी सेन्टर देखने जाओगी? ऐसे कहते बाबा ने दिल्ली, मुज़फ्फरपुर, पटना आदि सेवास्थानों पर मेरा घूमने का प्रोग्राम बनाया।

सेवा पर भेजते समय मीठे बाबा ने हाथ हिलाते अन्तिम महावाक्य कहे कि बच्ची, जहाँ भी जाना वहाँ सदा ही सर्विस, सर्विस और सर्विस। सचमुच बाबा ने जैसे कि मुझे सर्विस का वरदान दिया और मैंने जीवन में यही पाया कि बाबा के वरदान को साथ रखते हुए जहाँ भी सर्विस करते हैं, जो भी संकल्प सेवा का किया, वो सफलता को प्राप्त होता रहा है। बाबा ने जैसे वरदान देकर, आशीर्वाद देकर मुझे आगे बढ़ाया है और सेवा में सफलता का जन्मसिद्ध अधिकार अनुभव कराया है। धन्य है मेरा जीवन जो कि ऐसे सर्वशक्तिवान बापदादा को इन नयनों से निहारने का, शक्ति प्राप्त करने का, उसकी गोद में जाने का परम सौभाग्य मिला। मैं अपने को सदा ही पदमापदम भाग्यवान समझती हूँ कि साकार में माँ-बाप दोनों की गोद मुझे मिली।

उत्तरा बहन

चण्डीगढ़ से ब्रह्माकुमारी उत्तरा बहन जी लिखती हैं कि बाबा से पहली मुलाक़ात सन् 1965 में हुई। जब मैं पहली बार प्यारे बाबा से मिलने चली तो मन में बहुत ख़ुशी थी और तड़प भी। सोच रही थी कि जिसमें स्वयं भगवान आकर पढ़ा रहे हैं, तक़दीर जगा रहे हैं, वो कैसा व्यक्तित्व होगा। परिवार वालों से काफ़ी संघर्ष करने के बाद यह सुअवसर मिला था। दिल चाहता था कि जल्दी मिलूँ। आँखें बेहद लालायित थीं उसे देखने को।

सुधबुध भूल गयी

जब आबू पहुँचे और पाण्डव भवन में प्रवेश किया तो अत्यन्त प्रसन्नता हुई। अब इन्तज़ार कि वो बाबा कैसा है, कहाँ मिलेगा? मैं अचल दीदी के साथ ही गयी थी तो कुछ देर में पता चला कि बाबा ग्यारह बजे कुटिया में मिलेंगे। बहुत मुश्किल से समय बीता मिलन के इन्तज़ार में। ठीक ग्यारह बजे झोपड़ी की ओर क़दम बढ़े और जैसे ही झोपड़ी के अन्दर प्रवेश किया तो साकार बाबा को सामने देखा। बाबा गद्दी पर बैठे थे। एक युगल और बैठा था। हमें देखते ही बाबा बोले, ‘आओ बच्ची आओ।’ हम चार बहनें थीं। सब सामने बैठ गयीं। वे सब तो पहले भी मिली हुई थी, मैं पहली बार मिल रही थी। सो मैं तो देखती ही रह गयी, आँखों से स्नेह-जल बह रहा था और इन्हीं नेत्रों से ब्रह्मा बाबा के मस्तक के ठीक बीच में ओजस्वी ज्योति पूँज शिव बाबा को निहारे जा रही थी। अपने तन की सुध भूल चुकी थी। बिल्कुल अशरीरी हो गहरे सागर में हिलोरें ले रही थी। प्रेम का सागर बाबा मुझ आत्मा को निहाल कर रहा था। मैं भी अपने आपको रूहानी स्नेह के सागर में गहराई तक समायी हुई अनुभव कर रही थी। देह और देह की दुनिया का रिन्चक् मात्र भी आभास नहीं था। कुछ पल के बाद बाबा ने रूहानी प्यार-दुलार भरा हाथ सिर पर फेरा और बोले, बच्ची कहाँ हो? लेकिन मैं गहरे अलौकिक प्रभु-मिलन के आनन्द में जैसे डूबी हुई थी। कुछ बोल नहीं पायी। बस आँखों से प्रभु-प्यार में आँसू बह रहे थे। उन सुखद क्षणों का अनुभव व्यक्त कर पाना मुश्किल है परन्तु असीम खुशी, अनोखे सुख का, अनन्त शक्ति का अनुभव हो रहा था।

बच्ची, तुम्हें सेवा करनी है

बाबा ने पहली ही मुलाक़ात में कहा था कि बच्ची, तुम्हें सेवा करनी है। जबकि मैं कभी भी किसी को ज्ञान नहीं सुना सकती थी। बहुत संकोच का संस्कार था। मैं मन ही मन सोच रही थी कि मैं कैसे सेवा करूँगी, मुझे तो बोलना ही नहीं आता। पहली बार जब मधुबन आयी थी तो काफ़ी समय रहने का अवसर मिला था। जब भी बाबा के सामने जाती तो बाबा यही कहते, ‘बच्ची, तुम्हें सेवा करनी है।’ ‘यह बच्ची बहुत सेवा करेगी।’ ‘बच्ची, भेज दूँ सेवा पर?’ मैं ऊपर से तो हाँ कह देती लेकिन मन में सोचती थी कि कैसे करूँगी सेवा? परन्तु बाबा के वरदान ने मुझे सेवा के लायक बना ही दिया।

उन्हीं दिनों मुंबई में प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। तब दादी प्रकाशमणि जी वहाँ रहती थीं। बाबा ने अचल दीदी और अन्य दो बहनों को वहाँ जाने का आदेश दिया, मुझे भी उनके साथ ही जाना था। बाबा ने फिर कहा, बच्ची, तुम्हें जाकर सेवा करनी है। मैं भी बहनों के साथ मुंबई गयी। वहाँ बिरला क्रीडाकेन्द्र में चौपाटी पर प्रदर्शनी लगायी गयी थी। जब मैं अन्य बहनों को प्रदर्शनी समझाते हुए देखती तो कानों में बाबा के मधुर बोल स्पष्ट सुनायी देते कि ‘बच्ची तुम्हें सेवा करनी है।’ अब मैं कैसे ज्ञान सुनाऊँ, समझ नहीं आ रहा था। लेकिन बाबा के मधुर बोल भी कानों में गूँजते। एक दिन फैसला कर लिया कि आज ज़रूर कुछ सेवा करनी है। तब अचल दीदी जी से मैंने कहा कि मैंने भी आज सेवा करनी है। साड़ी पहन कर तैयार हुई।

प्रदर्शनी के स्थान पर जाकर दो-तीन बार प्रदर्शनी समझी। फिर ग्रुप देने वाली बहन से कहा कि अब मुझे पार्टी देना, मैं भी समझाऊँगी। पार्टी देने वाली बहन जी दादी रत्नमोहिनी जी थी। बस फिर क्या था, सेवा की शुरूआत हो गयी और मेरे मन में असीम खुशी, उमंग, उत्साह का सागर हिलोरें मार रहा था। वहाँ परीक्षा सामने आयी। मेरे लौकिक मामा जी वहीं रहते थे, वो मिलने आये और मुझे सफ़ेद साड़ी में देख बड़े क्रोधित हुए। बहुत डाँटा, खूब समझाया। पर मैं बिल्कुल निश्चिन्त थी। ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे अब कोई रोक नहीं सकता। मेरा साथी स्वयं भगवान है और उस परीक्षा में मैं विजयी हो गयी। सेवा के प्रति कहे हुए बाबा के मधुर महावाक्य साकार हुए। सेवा का दृढ़ संस्कार बन गया, सेवा से प्यार हो गया।

बच्ची, अब तुम्हें कोई रोक नहीं सकता

पहली बार बाबा से मिलकर वापिस लौटने का समय भी आ गया और मैं सोचने लगी कि वापिस जाने पर क्या लौकिक पिताजी से सेवा की छुट्टी मिलेगी; क्योंकि पिताजी का मुझमें बहुत मोह था और मुश्किल से बन्धन कटे थे। इन्हीं विचारों को लिए बाबा के पास झोपड़ी में चली गयी। बाबा अकेले ही थे, पत्र लिख रहे थे। मैं भी जाकर चुपचाप बैठ गयी। कुछ ही देर में बाबा की नज़रें उठी और बोले, ‘आओ बच्ची।’ मैंने कहा, ‘बाबा, क्या अब मुझे सेवा के लिए छुट्टी मिल जायेगी? लौकिक पिता का बहुत मोह है।’ बाबा बोले, ‘बच्ची, अब तुम्हें कोई रोक नहीं सकता। अब तुम बिल्कुल फ्री हो, खूब सेवा करो।’ तो सेवा के वरदान ने मुझे निर्बन्धन बना दिया और जब वापिस आयी तो वरदान साकार होने लगा। सेवाकेन्द्र पर रहने की छुट्टी मिल गयी और मैं स्वतन्त्र पंछी की तरह सेवा में आगे बढ़ने लगी।

बाबा ने हमें सच्चे दिल से सेवा करना, त्याग की भावना रखना, किसी से बदले की वृत्ति नहीं रखना, सभी गुण और विशेषताओं को धारण करने का पुरुषार्थ करना आदि सिखाया। एक बाबा ही सम्पूर्ण बाप, सम्पूर्ण शिक्षक और सम्पूर्ण सतगुरु है।

सरोज बहन

अम्बाला से ब्रह्माकुमारी सरोज बहन जी अपना अनुभव सुनाती हैं कि मेरा सौभाग्य था जो अचानक समय ने करवट बदली और मैं ब्रह्माकुमारी आश्रम पर जा पहुँची। वहाँ बड़े-बड़े शब्दों में लिखा था कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है। एक बार तो मेरा दिमाग चकरा गया लेकिन जब मैं अन्दर गयी तो मेरी दृष्टि त्रिमूर्ति के चित्र पर अटक गयी और सफ़ेद पोशधारी बाबा को देखते ही ऐसा लगा कि जो पाना था सो पा लिया। एक अलौकिक खुमारी चढ़ गयी। उस समय गीत बज रहा था, "तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो..."। गीत सुनकर आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी और ऐसा ही लगा कि यही मेरे मात-पिता और परिवार हैं। उसी दिन से नित्य सेन्टर पर जाने लगी और मेरी लगन भी परमात्मा से मिलने के लिए बढ़ती गयी। मेरी लगन देखकर सारा समाज एक तरफ़ और मैं एक तरफ़। लेकिन बाबा सदैव मुझे दिखायी देते थे, साथ में छोटा कृष्ण भी। ऐसा लगता था कि बाबा मेरे में शक्ति भर रहे हैं और यही मन में था कि विजय सत्य की ही होगी।

कुछ भाई-बहनों की पार्टी मधुबन आ रही थी। मेरी भी तीव्र इच्छा थी कि मैं भी मधुबन में बाबा से मिलने जाऊँ लेकिन बन्धन बहुत होने के कारण छुट्टी नहीं मिली। मैंने बहुत योग लगाया तो योग में अनुभव किया कि साक्षात् बाबा सामने खड़े हैं और कह रहे हैं कि तुम्हें छुट्टी मिल जायेगी। बस मेरी खुशी का पारावार नहीं। सुबह उठी और बाबा को याद करके अपने लौकिक बाप के पास जाकर कहा, मुझे मधुबन, आबू जाना है। काफ़ी संघर्ष के बाद छुट्टी मिली और मैं बटाला की पार्टी के साथ मधुबन पहुंच गयी। फिर हम तैयार होकर बाबा के कमरे में बाबा से मिलने गये। जब बाबा को देखा तो बाबा के चारों ओर सुनहरी प्रकाश ही प्रकाश दिखायी दिया, और कुछ नज़र नहीं आता था। सारी पार्टी बाबा से मिली, फिर मेरी बारी आयी। बाबा ने कहा, 'बच्ची, माया तंग तो नहीं करती है?' मैंने तुरन्त बोला, 'बाबा, माया तो तंग नहीं करती परन्तु परिवार वाले बहुत तंग करते हैं।' बाबा समझ गये कि इसे पाँच विकारों का ज्ञान नहीं है लेकिन लगन और उमंग-उत्साह बहुत है।

बाबा कहते हैं, मैं कोई जानीजाननहार नहीं हूँ। लेकिन बाबा अपने बच्चों की जन्मपत्री ज़रूर जानते थे। बाबा ने मुझे नैनों से निहाल करते हुए कहा, ‘जब आप यहाँ पहुँच गयी हो तो कर्मबन्धन भी समझो माखन से बाल की तरह खत्म हो जायेगा और तुम्हें पता भी नहीं पड़ेगा।’ बाबा ने अचल बहन जी को कहा कि इस बच्ची को भाषण करना, प्रदर्शनी समझाना सिखाओ ।

बाबा ने मुझे वरदान दिया कि तुम्हारा काम है उड़ना और उड़ाना। बड़े आश्चर्य की बात है कि मैं 21 दिसम्बर 1968 को समर्पित हुई और बाबा ने 18 जनवरी 1969 को नश्वर शरीर त्याग दिया, व्यक्त से अव्यक्त हो गये। मुझे बहुत बड़ा झटका लगा कि यह क्या हो गया? भगवान का रथ ही चला गया तो अब क्या होगा? यह प्रश्न मन में बार-बार घूमता रहता था और मैं दुःखी हो जाती थी।

जब अव्यक्त बापदादा से मिलने मधुबन आयी तो अपने प्यारे बाबा को देखना चाहती थी। मुझे निश्चय नहीं था कि बाबा अव्यक्त में है। गुलज़ार दादी में बापदादा की पधरामणी हुई, मैं बहुत व्याकुल हो आँसू बहा रही थी। बाबा ने मुझे बुलाया और कहा, ‘बच्ची, कर्मबन्धन माखन से बाल की तरह टूट गया और प्रदर्शनी समझाना भी सीख लिया और भाषण भी करना सीख लिया।’ सच, एकदम साकार बाबा ने जो कहा था वही हूबहू अव्यक्त बाबा ने भी कहा, तो मेरे में नयी जान आ गयी और निश्चय भी हो गया कि दादी गुलज़ार नहीं लेकिन स्वयं भगवान ही है। वाह बाबा वाह! यह गीत दिल से निकलता है कि:
“किसने ये सब साज सजाये
अपने आप सभी कुछ करके
अपना आप छुपाया।”

महेश भाईजी

पाण्डव भवन, आबू से ब्रह्माकुमार महेश भाईजी साकार के संग के अपने अनुभव लिखते हैं कि बचपन से ही मुझे परमात्मा के प्रति श्रद्धा-भावना थी और आत्म-कल्याण की प्रबल इच्छा थी जो धीरे-धीरे बढ़ती गयी। बाद में, वैराग्य-वृत्ति संन्यास प्रवृत्ति में बदल गयी।

सत्य और सतगुरु की तलाश

अपनी संन्यास प्रवृत्ति और आत्म-कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हाई स्कूल पास करने के बाद मैं अधिकांश समय आध्यात्मिक पठन-पाठन, तीर्थ, व्रत, हठयोग साधना आदि में लगाता था और उसमें मन-वांछित सफलता प्राप्त करने के लिए सत्य की खोज और सतगुरु की तलाश में थियोसॉफिकल सोसायटी, डिवाइन लाइफ सोसायटी, निरंकारी सत्संग, आदि में भी जाता रहता था। इस सत्य की खोज में हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि की यात्रा भी की परन्तु अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई।

सब में मुझको अच्छा तो लगता था परन्तु अपने को समर्पित करने के लिए मेरी आत्मा गवाही नहीं देती थी। योगमार्ग में मेरी विशेष श्रद्धा थी इसलिए गीता, पतंजलि योगदर्शन का अध्ययन किया। गीता तो रोज़ पढ़ता था। संन्यास प्रवृत्ति और आत्म-कल्याण की प्यास बढ़ती गयी। मैंने घर से बाहर किसी आश्रम में जाने का निश्चय किया। उन दिनों मेरे स्कूल का एक साथी ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर जाता था। उसने 2-3 छोटी-छोटी किताबें मुझे दीं और कहा कि आप इन्हें पढ़कर देखो और यहाँ चलकर तो देखो, फिर ठीक नहीं लगा तो और चाहे कहीं भी जाना। मैंने उन किताबों को अच्छी रीति पढ़ा और सेवाकेन्द्र पर जाने का निश्चय किया।

जन्म-जन्म की प्यास बुझ गयी

सन् 1964 का जुलाई मास, मंगलवार का दिन था, उस दिन मेरा उपवास भी था। मैं अपने उस साथी के साथ शाम 7 बजे सेवाकेन्द्र पर गया। उन दिनों बनारस वाले गुप्ताजी की युगल कमला बहन सेवाकेन्द्र पर थीं। उन्होंने मुझे झाड़, त्रिमूर्ति तथा गोले के चित्रों पर समझाया और योग पर बताया। मैंने अनुभव किया कि मैं अपने मनोनीत लक्ष्य को प्राप्त करने के योग्य स्थान पर पहुँच गया हूँ। मैं उसी दिन से नित्य प्रति क्लास करने लगा। जब परमात्मा का ज्ञान समझ में आया और निश्चय हुआ तो परमात्मा से मिलने की इच्छा भी तीव्र हो गयी। चार-पाँच मास ही बीते होंगे कि बाबा का दिल्ली में माथुरजी की कोठी पर आने का समाचार मिला। मैं और मेरा दोस्त दिल्ली में जाकर बाबा से मिले। बाबा से कैसे मिलना है, कैसे बाबा की गोद में जाना है, वह सब हमको पता नहीं था। पहली बार मैं बाबा से माथुरजी की कोठी में मिला। बाबा की आनन्दमयी गोद में जाकर जो अतीन्द्रिय सुख का अनुभव किया, उससे जन्म-जन्म की प्यास बुझ गयी। बाबा ने पीठ पर हाथ फेरा और सिर पर हाथ रखते हुए कहा ‘बच्चे, बाबा के घर आना।’ बाबा का वह वरदानी हाथ आज भी मेरे सिर पर है।

मेरे लिए दिन लम्बे होते जा रहे थे

दिल्ली में बाबा से मिलने के बाद उसी रात को हम दोनों वापिस अपने लौकिक स्थान पर लौटे परन्तु मन बाबा की गोद में ही रह गया और बाबा के घर में जाकर बाबा से मिलने की लगन लग गयी। उन दिनों आबू में अधिकतर पार्टियाँ, बाबा से मिलने गर्मी के दिनों में ही आती थीं। मेरे लिए दिन लम्बे होते जा रहे थे। आखिर सेवाकेन्द्र के एक भाई से आबू आने की जानकारी ली और अकेले ही आबू आने का निश्चय किया। अप्रैल 18 तारीख 1965 को मैं मधुबन आ गया। बाबा सेवाकेन्द्रों पर आने वालों से एक फार्म भरने के लिए कहते थे। मैं जब आया तो मेरे साथ कोई टीचर नहीं थी। बाबा के कहने पर मुझ से वह फार्म, परीक्षा-पत्र के रूप में भराया गया और बाबा को दिखाया गया। बाबा ने उसे देखकर ठहरने की स्वीकृति दे दी। उन दिनों सन्तरी दादी बाबा की ब्राह्मणी के रूप में थीं। सन्तरी दादी और सन्देशी दादी मेरे लिए मार्गदर्शक बन गयीं। उन दोनों ने मुझे कैसे रहना है, कैसे और कब बाबा से मिलना है आदि के विषय में मार्गदर्शन दिया।

बाबा ने अपने साथ बिठाकर खाना खिलाया

जो भी पार्टी मधुबन में जाती थी, उनका बाबा के साथ भोजन भी होता था। मैं तो अकेला ही मधुबन आया था। वर्तमान पाण्डव भवन में बाबा के कमरे में जहाँ अगरबत्ती स्टैण्ड रखा है वहाँ ही बाबा कुर्सी पर बैठकर भोजन-पान करते थे। मुझे वहाँ ही बाबा ने अपने साथ बिठाकर खाना खिलाया, वहाँ ही बाबा के साथ मिले। वहीं अपने साथ अपनी चारपाई पर बिठाकर दिलाराम बाप ने दिल का हालचाल पूछा और अपने हाथों से अंगूठी भी पहनायी। मिलन के वो दृश्य बाबा के कमरे में जाते ही याद आ जाते हैं। उनके साथ मिलन को और पालना को याद करते हैं तो एक गीत के कुछ शब्द याद आते हैं ‘हम तो कहाँ थे तेरे क़ाबिल, तेरा कर्म है तू ने दिया दिल, तेरे हो गये हम।’ शिव बाबा तो है ही ग़रीब निवाज़ क्योंकि उनके लिए ग़रीब-अमीर की बात ही नहीं परन्तु साकार बाबा की दृष्टि में भी ग़रीब-अमीर का कोई भेद नहीं था। सभी को अपने ही बच्चे समझ प्यार करते थे और पालना देते थे।

बाबा मेरे से नहीं मिले

एक साल के बाद मैं अपने गाँव से कानपुर चला गया। अपनी संन्यास प्रवृत्ति के प्रवाह में एक बार मैं गंगे दादी जी की छुट्टी के बिना ही मधुबन चला आया और सोचा कि बाबा से मिलने के बाद जीवन का निर्णय करूँगा। परन्तु बाबा लवफुल भी हैं तो लॉफुल भी। इसलिए उस समय बाबा मेरे से नहीं मिले और मुझे दीदी मनमोहिनी जी के द्वारा वापस जाने को कहा। वह सुनकर मेरा मन एक बार तो कुछ भारी हुआ परन्तु आगे कुछ कह भी नहीं सका और वापस चला गया। वापस जाते समय भी मेरे दिल को लग रहा था कि बाबा का हाथ मेरे सिर पर है और शक्ति दे रहा है। वह दिन याद आता है तो मुझे कवि की ये पंक्तियाँ याद आती हैं, ‘गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है गढ़ि-गढ़ि कादै खोट, भीतर हाथ सहार दे बाहर वाहै चोट।’ अर्थात् परमात्मा जानी-जाननहार है, वही जानता है कि बच्चों का कल्याण किस में है। उसके बाद तो कई बार बाबा से मिला और देव-दुर्लभ परम आनन्द का अनुभव किया। उस मिलन की स्मृति अभी भी अलौकिक आनन्द की अनुभूति कराती रहती है।

जीवन में अद्वितीय सन्तुलन

मैंने साकार बाबा के जीवन में रमणीकता और गम्भीरता का, लव और लॉ का अद्वितीय सन्तुलन देखा। कई बार बाबा को देखा कि बाबा बच्चों की इच्छा को जानकर उनको सन्तुष्ट करने के लिए उनकी इच्छा पूर्ण भी करते थे और साथ में उनके हित की शिक्षा भी अवश्य देते थे। एक बार मैं पार्टी के साथ मधुबन आया तो हमारी पार्टी के एक भाई ने झूले पर बैठकर बाबा से फोटो निकलवाने का आग्रह किया। बाबा ने कहा, ‘बच्चे, फोटो तो इस तन का निकलेगा, शिव बाबा का तो फोटो निकाल नहीं सकते और याद तो शिव बाबा को करना है, इस तन को नहीं। पावन तो शिव बाबा की याद से ही बनेंगे, इस तन को याद करने से नहीं। चित्र स्मृति दिलाने का साधन अवश्य है परन्तु वैसा चरित्र बनाने के लिए, जीवन परिवर्तन के लिए उस विचित्र को अपने अन्तः पटल पर उतारने की आवश्यकता है।’

साकार बाबा की सम्पूर्ण बनने की लगन और पुरुषार्थ को देखकर वत्सों में भी सहज ही पुरुषार्थ की लगन जागृत होती थी। अभी भी उनके स्वरूप की स्मृति आने से पुरुषार्थ की लगन में तीव्रता आ जाती है कि कैसे वृद्ध तन होते हुए भी दृढ़ पुरुषार्थ के द्वारा उन्होंने अव्यक्त स्थिति को पाया। उनका वह पुरुषार्थ और लगन हमारे लिए प्रेरणा-स्रोत है।

मोहिनी बहन - मधुबन

बाबा असाधारण एवं आकर्षणमय व्यक्तित्व वाले थे
मधुबन की ब्रह्माकुमारी मोहिनी बहन जी कहती हैं कि पहले-पहले ये ब्रह्माकुमारी बहनें जो सेवा के लिए बाहर निकली थीं, कहती थीं कि सात दिन में भगवान के दर्शन कर लो। यह सुनकर मुझे भी जिज्ञासा जागी कि देख लेते हैं कि सात दिन में भगवान के दर्शन कैसे होते हैं। वो कैसा भगवान है, हम भी देख लें। मैं सेन्टर पर गयी। मैं समझी थी, कोई संन्यासी, महात्मा होंगे लेकिन देखा तो सफ़ेद वस्त्रों वाली बहनें थीं। मुझे देखकर एक बहन ने पूछा कि कैसे आना हुआ ? मैंने कहा, बोर्ड पर लिखा था कि सात दिन में भगवान का दर्शन, तो मैंने सोचा कि देख लें, सात दिन मैं कैसे भगवान के दर्शन होते हैं। मुझे जाना था और कहीं परन्तु आश्रम पर गयी थी थोड़ा टाइम पास करने। उन्होंने पूछा कि क्या गीता पढ़ी है ? मैंने कहा, मैंने न तो गीता पढ़ी है, न रामायण। मैं तो स्कूल में पढ़ रही हूँ, स्कूल की किताबें पढ़ रही हूँ, और कुछ पढ़ी नहीं हूँ। फिर पूछा, आपके घर में कोई भक्ति करते हैं ? मैंने कहा, मेरा बाप शिव की भक्ति करता है, मेरी माँ अम्बा की भक्ति करती है, मेरी दादी राधा-कृष्ण की भक्ति करती है। मैंने उन बहनों से पूछा, हमारे घर में इतने सब की भक्ति होती है लेकिन भगवान कौन है ? वो हँसने लगी और कहा, कोई बात नहीं, यहाँ आपको भगवान कौन है यह पता पड़ जायेगा।

बच्ची, तुमको लेने के लिए आया हूँ चलो, वापस घर जाना है

इस ज्ञानमार्ग में कोई का ज्ञान से जन्म होता है, कोई का योग से जन्म होत है। मेरा जन्म दिव्य दृष्टि से हुआ। पहले दिन ही मुझे साक्षात्कार हुआ। लौकिका हमारे घर में अरविन्द आश्रम जाते थे, वहाँ का योग घर में करते थे। मैं भी करत थी। मुझे कहा गया था कि आँखें बन्द करके योग लगाना है, अरविन्द जी तुमव एरोप्लेन में सैर करायेंगे आदि-आदि। रोज़ मैं वैसे ही करती थी लेकिन मेरी को सैर हुई नहीं थी। सबके साथ बैठ जाती थी। इस आश्रम पर भी मैं पालथी मारव आँखें बन्द कर बैठ गयी। फिर बहन जी ने कहा, ऐसे नहीं, आँखें खोल कर बैठर ते हैं जो की उसको मन में कहना है। वे जैसे कहते थे वैसे मैं मन में

संकल्प करती रही लेकिन उतने में मुझे लगा कि कोई मुझे खींच रहा है। मैं सिर हिलाकर

इधर-उधर देखने लगी। कुछ नहीं दिखायी पड़ा। फिर मैं मन में कहने लगी, मैं आत्मा हूँ... उतने में मैं गुम हो गयी। फिर जिस दुर्गा अम्बा की मेरी माँ पूजा करती थी वो सामने दिखायी पड़ी। वो मेरे से कहने लगी, तुम यहाँ आओ, तुमको ले जाने के लिए मैं आयी हूँ। मैंने कहा, मैं अभी जाना नहीं चाहती हूँ। उसके बाद एक बूढ़ा बाबा आ गया। उसने भी कहा, बच्ची, तुमको लेने के लिए आया हूँ, चलो, वापस घर जाना है। फ़रिश्ते जैसे उस बूढ़े को देख मुझे आकर्षण तो हुआ पर मैं कहती थी कि अभी जाना नहीं चाहती हूँ, अभी मुझे नहीं जाना है। अभी मरना नहीं चाहती हूँ, मेरी माँ रोयेगी। माँ का मेरे से बहुत मोह था। ऐसे कहते-कहते मैं खो गयी। बाद में नीचे उतर आयी। मुझे आश्चर्य होने लगा कि मैं कहाँ गयी थी, अभी कहाँ हूँ ? उतने में सामने मम्मा का चित्र देखा। मैंने बहन जी से पूछा, यह कौन हैं ! उन्होंने कहा, ये हमारी मम्मा है। मैंने कहा, ये आपकी मम्मा कैसे हो सकती हैं, इनको तो मैंने अम्बा के रूप में ऊपर देखा था। फिर पास में ही बाबा का चित्र था। मैंने पूछा, ये कौन हैं? ये हमारे बाबा हैं। मैंने कहा, इन दोनों को मैंने ऊपर देखा था, यहाँ कैसे आ गये? उन्होंने कहा, आज पहला दिन है, आप धीरे-धीरे सारी बातें समझ जाओगी। मैं कुछ घबरा गयी थी। मैंने कहा, ठीक है, चलो, कल आयेंगे, ऐसा कहकर वहाँ से चली गयी। घर जाकर माँ से ये बातें कही तो उन्होंने कहा, तुम वैसी जगह पर नहीं जाना, वो लोग तो जादू कर देते हैं। ठीक है, आगे नहीं जाऊँगी, ऐसे कहकर सो गयी। फिर सुबह चार बजे कोई आकर हिलाने लगे और कहने लगे कि उठो, यही समय है, वहाँ चलो, तुम्हें मैं लेने आया हूँ। मैं कहती थी, मुझे नहीं जाना है, मुझे नहीं मरना है। रोज़ मुझे यही होता रहा। तीन दिन के बाद मैं वहाँ गयी और उस बहन से कहने लगी कि मैं जैसी थी, वैसी बना दो। उन्होंने कहा, आपको क्या हुआ ? मैंने कहा, रोज़ ऐसा होता है, कोई कहता है मैं तुम्हें लेने आया हूँ, चलो। मैं जाना नहीं चाहती हूं। उन्होंने कहा, भगवान की कृपा है तुम्हारे ऊपर। मैंने कहा, यह कैसी कृपा है? रोज़ मैं आठ बजे उठने वाली, सुबह चार बजे आकर मुझे उठाना, मेरी नींद फिटाना, यह कौन-सी कृपा है ? फिर उन्होंने कहा, तुम सात दिन का कोर्स करो, सब ठीक हो जायेगा। मैंने कहा, एक दिन के कोर्स में ही मेरी हालत यह हुई तो सात दिन करूँगी तो क्या होगा ! कहीं मैं सच में ही यहाँ से चली ना जाऊँ। उन्होंने कहा, हम गैरन्टी देते हैं, कुछ नहीं होगा, तुम जाओगी नहीं, सात दिन आओ। फिर मैं सात दिन गयी।

चली तो बहुत ख़ुशी-ख़ुशी से पर जब गाड़ी चली तो रोना शुरू कर दिया

फिर उन्होंने कहा, तुम भगवान से मिलो, उनकी गोद लो तो स्वर्ग की मालिक बनोगी। स्वर्ग कहाँ है, स्वर्ग का मालिक कौन होता है - यह पता तो नहीं था परन्तु भगवान की गोद ज़रूर लेनी है यह मुझे इच्छा हुई। मैंने पूछा, भगवान कहाँ है जो उसकी गोद लूँ। उन्होंने कहा, माउण्ट आबू में। मुझे मन में लग गया कि माउण्ट आबू जाना है, माउण्ट आबू जाना है, भगवान की गोद लेनी है। वे बहनें यह भी कहती थीं कि विनाश होना है। मेरे मन में यही आता था कि विनाश होने से पहले मुझे भगवान की गोद लेनी है। उस समय मैं मैट्रिक में पढ़ रही थी। मैंने पिताजी से कहा, मुझे माउण्ट आबू जाना है। उन्होंने कहा, अभी तुम्हें पढ़ना है, पहले पढ़ो; माउण्ट आबू जाने की बात मत कहो। उन्होंने कहा, पहले पढ़ाई

पूरी करो, बाद में आबू जाने की बात। फिर पढ़ाई पूरी कर ली, परीक्षा भी दे दी।

उसके बाद मैं सबको बोलने लगी कि मैं माउण्ट आबू जाऊँगी। मैंने सफ़ेद कपड़े आदि सब तैयार करके रखे। मेरे रिश्तेदारों में जीजाजी थे, वो ज्ञान में चलते थे। उनको कहा, आप माउण्ट आबू चलो, आपके साथ मुझे भी छुट्टी मिलेगी। लेकिन वे तैयार न हो सके। मैं अकेली निकल पड़ी। यह मेरी ज़िन्दगी में पहली बार था जो मैं माँ-बाप को छोड़ अकेली जा रही थी। चली तो बहुत ख़ुशी-खुशी से पर जब गाड़ी चली तो रोना शुरू कर दिया। फिर दिल्ली आयी तो वहाँ से कुछ बहनें भी साथ में चलीं। हम आबू रोड पहुँच गये। उस समय अम्बाजी का मेला चल रहा था। सब बसें वहीं जा रही थीं, आबू के लिए बस नहीं थी। आख़िर आठ बजे एक बस आबू के लिए निकली। उस समय मुख्यालय कोटा हाउस में था।

मेरी नज़रें 'कोहिनूर हीरे' को ढूँढ़ रही थीं

आख़िर मेरा स्वप्न साकार हुआ। आबू पर्वत की गोद में बसा हुआ शान्त,मीठा, तपोवन, 'मधुबन स्वर्गाश्रम' मेरे सामने था। मैंने अन्दर क़दम रखा तो मुझे ऐसा लगा कि मैं यहाँ की हर चीज़ और हर व्यक्ति से पहले से ही परिचित हूँ। शुभ्र वस्त्रधारी बहनों एवं भाइयों के तपस्वी चेहरों ने मधुर मुस्कान से मेरा स्वागत किया। परन्तु मेरी नज़रें तो इस मधुबन रूपी सुन्दर डिब्बी के अन्दर रहने वाले उस 'कोहिनूर हीरे' को ढूँढ़ रही थीं जिससे मिलने को मैं व्याकुल थी। वह घड़ी भी आ पहुँची जब मुझे ब्रह्मा बाबा से मिलाने के लिए उनके कक्ष में ले जाया गया। मैंने सामने बाबा को देखा और अपलक देखती ही रह गयी। श्वेत वस्त्रधारी, लम्बा- ऊँचा, उन्नत ललाट, असाधारण एवं आकर्षणमय व्यक्तित्व- जिनके चेहरे से ज्योति की आभा फूट रही थी; आँखों से वात्सल्य, प्रेम, शक्ति, दया सब कुछ एक साथ ही छलक रहा था; जिनके होठों पर एक मधुर मुस्कान थी मेरे सामने था। - उस क्षण मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसेकि उन्होंने मेरी समस्त शक्तियों को अपने वश में कर लिया हो और मेरे मन-बुद्धि बिल्कुल शान्त होकर रह गये हों।

जानीजाननहार बाबा

बाबा, मनुष्य को देखते ही उसकी जन्मपत्री को जान लेते थे। मुझे याद है कि एक पार्टी जब मधुबन से बाबा का लाड़, प्यार, दुलार लेकर और ज्ञान-रत्नों से भरपूर होकर वापस जाने के लिए विदाई ले रही थी तो सबके नयन गीले थे और वे सभी एक अद्भुत चुम्बकीय शक्ति से खिंचे खड़े थे। दिल की पीर (पीड़ा) नयन से नीर (पानी) बनकर बह रही थी। बाबा बच्चों को सांत्वना दे रहे थे- "बच्चे ! तुम तो सर्विस पर जा रहे हो। पण्डा बनकर वापस आना...।" उस पार्टी में एक विदेशी भाई मिस्टर डॉन भी था। बाबा ने उसे दो बार कहा "मुझे याद रखना, मैं तुम्हें अब धर्मराजपुरी में मिलूँगा।" मैंने बाबा से पूछ लिया कि बाबा आप इस बेचारे को ऐसा क्यों कहते हैं। इसको भी कह दीजिये ना कि तुम्हें जल्दी यहाँ बुलाऊँगा । परन्तु बाबा को तो उसकी जन्मपत्री का पता था। कुछ समय बाद मुझे पता चला कि उस भाई डॉन का देहान्त हो गया है। तब वे वचन मुझे याद आने लगे। उस दिन से यह बात मेरी बुद्धि में अच्छी तरह से बैठ गयी कि बाबा के महावाक्य पत्थर पर लकीर हैं जो कभी निष्फल नहीं जाते । बाबा के चरित्र रमणीक भी थे और शिक्षाप्रद भी। बाबा का हरेक कर्म हम बच्चों के लिए आदर्श था। आज भी मुझे बहुत-सी समस्याओं का हल बाबा के चरित्रों के स्मरण से ही प्राप्त हो जाता है कि ऐसी हालत में बाबा ने क्या किया था।

अचल बहन

चण्डीगढ़ की ब्रह्माकुमारी अचल बहन जी अनुभव सुनाती हैं; साकार बाबा से मैं सन् 1956 में मुंबई में पहली बार मिली थी। जब बाबा से मिलन हुआ तो मुझे श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ। साथ में रूहानी आकर्षण भी मुझे बहुत खींच रहा था। बाबा ने मुझे देखते ही 'अचल भव' का वरदान दिया। मेरा लौकिक नाम चंचल था। प्यारे बाबा ने कहा, आप मेरी अचल बच्ची हो, बाबा का नाम बाला करने वाली हो। मैं स्कूल में टीचर थी, बाबा ने मुझे वरदान में कहा कि आप रूहानी टीचर बन बहुतों को बाप का परिचय दोगी। ईश्वरीय जीवन में वरदान प्राप्ति के नशे और ख़ुशी में रह मैं बाबा की समीपता का अनुभव करती रहती हूँ। मैंने बाबा में शिव बाबा को देखा। उस समय प्रेम विभोर हो मैंने खुशी से बाबा की याद में गीत गाया। बाबा मुझे देख रहे थे और मैं खोयी हुई, रूहानी नशे में रह गीत गा रही थी: "बाबा तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं, सेवा में बहुमूल्य वस्तुयें ला-लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं...।"

ऐसी होवनहार बच्चियों की गाड़ी भरकर ले जाऊँ

जब मैं ज्ञान में आयी थी तो बहुत थोड़े सेन्टर थे। उस समय बाबा अमृतसर में आये हुए थे। मेरी दिल हुई कि भगवान के रथ को मैं श्री हरगोविन्दपुर ले जाऊँ जहाँ मैं रहती थी। वहाँ बहुत बाँधेली कुमारियाँ थीं। उनकी आश पूर्ण करने के लिए प्यारे बाबा ने जाना स्वीकार कर लिया।

प्रातः क्लास में क़रीब 25 कुमारियाँ जो बाबा से मिलकर हर्षित हो रही थीं, उन्होंने खुशी में आकर एक गीत गाया: "निकलेंगी हम शक्तियाँ...।" उन कुमारियों के माता-पिता भी क्लास में आकर बैठे हुए थे। कल्याणकारी बाबा ने उन बच्चियों का उत्साह बढ़ाने के लिए महावाक्य उच्चारण किये कि ऐसी होवनहार बच्चियों की गाड़ी भरकर ले जाऊँगा और सेवा में लगाऊँगा। बाद में उन कुमारियों पर काफ़ी सितम आये परन्तु वे निश्चयबुद्धि, एक बल, एक भरोसे पर मैदान में डटी रहीं और आज उनमें से कई बहनें सेवा में लगी हुई हैं।

ऐसा अनुभव करो कि हम श्री नारायण के साथ घूम रहे हैं

प्यारे बाबा से मैं जब मिली तो चमत्कारी दृश्य था। चकमक मुझ सूई को जैसे खींच रहा था। वह दिव्य मुलाक़ात मेरे लिए अति कल्याणकारी थी। मैंने बाबा का कृष्ण के रूप में साक्षात्कार किया। शिव बाबा का विचित्र पार्ट साकार द्वारा अनुभव किया। बेहद के मालिक प्यारे बाबा सदा बेहद के संकल्पों में ही रहते थे और सारे विश्व की आत्माओं को सामने रख वाणी चलाते थे।

प्यारे बाबा बच्चों को खुश रखने के लिए अपने साथ सैर पर ले जाते थे। रास्ते में जब हम चल रहे होते थे तो हमें भविष्य की स्मृति दिलाते थे कि आप ऐसा अनुभव करो कि हम श्री नारायण के साथ घूम रहे हैं। हमारी आत्मा सतोप्रधान है। मैंने बाबा के निजी पुरुषार्थ को देखकर अग्रलिखित बातों में फालो किया है। अमृतवेले प्यार से बाबा को याद करना, मुरली सुनने के पश्चात् विचार सागर मंथन करना, कर्मणा सेवा प्यार और रुचि से करना, जीवन में निर्बन्धन होने के लिए नष्टोमोहा स्मृतिर्लब्धा की स्टेज का अनुभव करना, आज्ञाकारी बन चलना, गुणग्राही बनना, कभी किसी के अवगुण चित्त पर नहीं रखना, सर्व के हितकारी बन चलना, रहम-दृष्टि का संस्कार जीवन में लाना, परचिन्तन न करना तथा रूहानी नशे में रहना ...।

नलिनी बहन

घाटकोपर, मुंबई से ब्रह्माकुमारी नलिनी बहन जी लिखती हैं कि बाबा ने हरेक बच्चे को इतना स्नेह दिया, उसे इतना आगे बढ़ाया और योग्य बनाया कि हरेक बच्चा यही समझता है कि बाबा तो बस उसका ही बाबा है। हूबहू, हर एक गोपी द्वारा श्री कृष्ण को अपने संग देखने वाली बात पुनरावृत्त हुई। यदि एक-एक बच्चा बाबा के अनेकानेक चरित्रों का वर्णन करने लगे तो सैकड़ों भागवत, पुराण तैयार हो जायें।

बाबा 'दोनों तरफ से तोड़ निभाने' की श्रीमत देते थे

हमारा अनुभव है कि कैसे बाबा कर्म करते-करते बीच में गुम-से हो जाया करते थे और घड़ी घड़ी बच्चों का ध्यान भी याद की यात्रा की ओर खिंचवाते रहते थे। बाबा कहते-"बच्चे! याद में ही कमाई है, यही गुप्त मेहनत है। माया याद की यात्रा में ही विघ्न डालती है।" बाबा ने मधुबन एवं सेवाकेन्द्रों की दिनचर्या ऐसी बनायी कि बच्चों में ज्ञान, योग, दैवी गुणों एवं सेवा, इन चारों मुख्य बातों की धारणा सहज ही हो जाये और बड़े से बड़े संगठन में रहते हुए भी सदैव शान्ति, तपस्या, पवित्रता और स्नेह का वातावरण बना रहे। बाबा जानते थे कि सभी बच्चे एक साथ मधुबन में बाबा के सन्मुख नहीं रह सकते क्योंकि बच्चों को अपने लौकिक गृहस्थ-व्यवहार को भी संभालना है अथवा दूसरी मनुष्यात्माओं के कल्याणार्थ सेवाकेन्द्र भी संभालने हैं। बाबा बच्चों को 'दोनों तरफ से तोड़ निभाने' की श्रीमत देते थे । अतः बाबा ने बच्चों को एक ऐसी दिनचर्या सिखलायी जिस पर चलकर वे चाहे किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी रहें, अपने पुरुषार्थ को आगे बढ़ा सकें और यह अविनाशी कमाई करते रहें। बाबा के पत्र-व्यवहार के कारण बच्चों को कभी भी ऐसा महसूस नहीं होता था कि वे बाबा से दूर हैं। हम तो हैरान हो जाते थे कि नित्य ढेर सारी डाक आते हुए भी बाबा सभी बच्चों के पत्रों के उत्तर वापसी डाक से भेज देते थे। बच्चों को, बाबा से पत्रों द्वारा व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने की राय मिलती रहती थी। 'ब्रह्मा की राय' मशहूर है, उसका शास्त्रों में भी गायन है।

ऐसे स्नेही बाबा के हम बहुत-बहुत आभारी हैं

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह लगती थी कि इतनी वृद्ध अवस्था होते हुए भी कैसे बाबा अथक होकर बहुत सवेरे से लेकर रात्रि देर तक कार्य करते रहते थे। इतने बड़े मधुबन यज्ञ के सैंकड़ों सेवाकेन्द्रों तथा प्रवृत्ति में रहने वाले हज़ारों परिवारों की पूरी-पूरी ज़िम्मेदारी संभालते हुए भी बाबा को जब देखो तब बिल्कुल फारिग, निश्चिन्त और निर्संकल्प नज़र आते थे। इतने बड़े अलौकिक गृहस्थ और ईश्वरीय व्यवहार को संभालते हुए भी समय पूरा होने से पूर्व ही सम्पूर्ण अवस्था (अव्यक्त स्थिति) को प्राप्त कर लेने की समर्थता बाबा में ही थी। यह उन्हीं की कमाल थी। अज्ञान काल में जब कोई साधु-महात्मा शरीर छोड़ता था तो हम बिना अर्थ समझे ही कहते थे कि वह 'पूरा हो गया'। परन्तु इस 'पूरा होने' अथवा 'सम्पूर्ण अवस्था' को पाने का वास्तविक अर्थ अब ही समझ में आया है। अन्य धर्म-स्थापक जब शरीर त्यागते हैं तो जीवन-भर प्रयास के बाद भी मुश्किल से दो-चार व्यक्ति ही उनकी शिक्षाओं का पूरा अनुकरण करने वाले तैयार हो पाते हैं परन्तु हम देखते हैं कि जब ब्रह्मा बाबा सम्पूर्ण हुए तो उन्होंने 'आप समान' बच्चों का एक विशाल समूह अथवा एक पूरी शक्ति सेना तैयार कर दी थी, जो अब कुशलतापूर्वक इस अलौकिक ईश्वरीय कार्य को आगे बढ़ाते हुए पूरा करने में तत्पर हैं।

ब्रह्मा बाबा चाहे साकार रूप में हमारे बीच नहीं रहे हैं परन्तु हम जानते हैं कि अव्यक्त रूप से आज भी वही हमारे मार्गदर्शक हैं और हम उन्हीं की छत्रछाया में चल रहे हैं। वे हमें ऊपर उठाने के लिए ही ऊपर गये हैं, हमें सम्पूर्ण बनाने के लिए ही सम्पूर्ण हुए हैं और यदि देखें तो साकार बाबा का एक-एक चरित्र भी हम बच्चों को सही राह दिखाने में इतना सहयोगी है कि शब्दों द्वारा इस अनुभव का वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसे स्नेही बाबा के हम बहुत-बहुत आभारी हैं।

प्रेमलता बहन

देहरादून से ब्रह्माकुमारी प्रेमलता बहन जी अपना अनुभव सुनाती हैं कि 14 वर्ष की आयु में (1954) मैं हिन्दू नव संवत्सर पर पहली नवरात्रि के दिन लौकिक माँ के साथ शीतला देवी के दर्शन करने गयी थी, जहाँ नानीजी से भेंट हुई और उन्होंने बताया कि माउण्ट आबू से देवियाँ आयी हुई हैं। वे आपके घर के पास ही ठहरी हुई हैं। उनके भी दर्शन करने जाओ। अतः माताजी और मैं, नानी के साथ सेवाकेन्द्र पर गये। उस समय क्लास चल रहा था। मुरली तो कुछ समझ में नहीं आयी परन्तु वहाँ के शान्त और पवित्र वातावरण ने मन को आकर्षित अवश्य कर लिया। मेरी माताजी को तो वहाँ जाने पर बहुत ही साक्षात्कार होने लगे। इसलिए वह बहुत जल्दी ही निश्चयबुद्धि बन नित्य क्लास में जाने लगी। एक दिन दादी निर्मलशान्ताजी अमृतसर आयी तो लौकिक माँ ने बताया कि ब्रह्मा बाबा की बेटी आयी हैं, आप उनसे ज़रूर मिलो। उत्सुकतावश मैं सेन्टर पर गयी। दादी निर्मलशान्ताजी यथा नाम तथा गुणमूर्त देख मुझे बहुत ही खुशी हुई। ज्ञान चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जीवन का सच्चा सुख ईश्वर से ही प्राप्त हो सकता है।

प्रथम बार प्यारे साकार बाबा से दिल्ली राजौरी गार्डेन में मिलने का सौभाग्य मिला। मैंने जैसे ही बाबा को देखा, बहुत देर तक अपलक निहारती रही और मुझे इतनी स्पष्ट स्मृति आने लगी कि जैसे इसी जीवन में मैंने बाबा को कई बार देखा हुआ है, जबकि बाबा से मेरी यह प्रथम भेंट थी।

बाबा से मिले वरदान

बाबा बहुत स्नेह से बोले कि ये कल्प पूर्व की ही नहीं लेकिन इसी कल्प में यज्ञ से गयी हुई आत्मा है, फिर से यज्ञ में आ गयी है। उसी समय यह वरदान दिया कि “यह धार्मिक क्षेत्र के लोगों की सेवा कर बाप का नाम बाला करेगी।” उस समय तो मेरी अल्प बुद्धि ने इन बातों का रहस्य नहीं समझा परन्तु उसके बाद तो एक ही संकल्प, एक ही लगन मुझे ईश्वरीय सेवा के प्रति लग गयी। इसी लक्ष्य पर बुद्धि टिक गयी। शारीरिक दृष्टि से अस्वस्थ होने के कारण लौकिक-अलौकिक परिवार के सभी लोग कहते थे कि यज्ञ के त्याग और तपस्या के जीवन में चलना कठिन होगा परन्तु मुझे तो बस एक ही धुन थी कि बाबा के पास जाना है, सेवा में जीवन बिताना है।

इस बीच बाबा के बहुत रूहानी स्नेह भरे पत्र आते रहे और बाबा के वरदान याद दिलाते रहते कि तुम्हें क्या करना है! मेरी इस तीव्र लगन को देखते हुए मुझे लौकिक परिवार से छुट्टी मिल गयी और सन् 1956 में पहली बार मधुबन गयी और सदा के लिए भगवान ने मुझे अपनी शरण में ले लिया।

अस्वस्थता मेरे लिए वरदान बन गयी

मेरा यह परम सौभाग्य था कि मुझे कुछ समय बाबा के साथ मधुबन में रहने का अवसर मिला जिसमें प्यारे बाबा ने तन-मन की पालना कर एक नया जीवन दिया। अस्वस्थता मेरे लिए वरदान बन गयी। एक बार 18 घंटे बेहोश हो गयी। डॉक्टर के जवाब देकर चले जाने के बाद, बाबा ने स्वयं मुझे रात्रि 2 बजे तक योग-दान देकर नया जीवन दिया। जब मैं होश में आयी तो मैंने देखा कि बाबा मेरी पलंग के पास कुर्सी पर बैठे हुए मुझे दृष्टि दे रहे हैं। एक बार तो मुझे लगा कि मैं स्वप्न देख रही हूँ परन्तु जब बहुत देर तक बाबा से दृष्टि लेते हुए मैं पूर्ण होश में आयी तो देखा कि सचमुच साकार बाबा सामने बैठे थे और उनके पीछे सन्देशी दादीजी खड़ी थीं। बाबा ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ रखा और बोले, “बच्ची, पुराना हिसाब-किताब पूरा हुआ, अब नया जीवन आरम्भ हुआ।” उस समय तो मुझे इस बात का पूरा अर्थ समझ में नहीं आया परन्तु बाद में इस सारे घटनाक्रम की समझ आयी; प्यारे बाबा ने जब डॉक्टर की बात सुनी कि होश में आने की सम्भावना कम है और इसे मुंबई ले जाओ। तब बाबा ने कहा, बाबा आज बच्ची को आयु का वरदान देगा और बाबा ने मेरे कमरे में ही आकर योग-दान द्वारा नया जीवन दिया। यह कमाल है प्यारे बाबा की! क्या ये विचार कभी उठ सकता है कि कैसे ब्रह्मा-तन में स्वयं भगवान आया है? भगवान के चमत्कार क़दम-क़दम पर उन्हें दिखायी देते हैं जो उनके सान्निध्य में जीवन बिताते हैं।

बाबा ने माता बन अपने हाथों से खिलाया

लोग कहते हैं कि भगवान ज्ञान का सागर है परन्तु कभी किसी ने देखा नहीं जबकि हम ऐसी सौभाग्यशाली आत्मायें हैं जिन्होंने ब्रह्मा-तन से उस ज्ञान सागर की लहरों का स्पर्श पाया है। परमात्मा प्रेम के सागर हैं, सुना सबने है परन्तु भगवान के थोड़े-से बच्चों ने उस प्रेम सागर को ब्रह्मा-तन में बहते देखा है। प्रभु-पालना का अनुभव यह लेखनी लिखने में सक्षम नहीं है। बीमारी के बाद शारीरिक दृष्टि से मैं इतनी कमज़ोर हो गयी थी कि अपना कार्य भी स्वयं नहीं कर सकती थी। तब प्यारे बाबा ने माता बन अपने हाथों से खिलाया, पिलाया और दृष्टि देकर इतना शक्तिशाली बना दिया कि कोई कभी सोच भी न सके कि यह शरीर इतना अस्वस्थ रहा होगा। शान्ति के सागर बाबा के सामने जाते ही सब संकल्प शान्त हो जाते थे। बाबा नित्य अमृतवेले लगभग 2 बजे उठकर योग में बैठ जाते थे। उस समय ऐसा अनुभव होता था जैसे कोई ज्योति का पुँज हो। कमरे का वातावरण इतना अलौकिक और शक्तिशाली हो जाता था कि बिना किसी प्रयास के योग लग जाता था। बाबा उस समय लिखते भी थे और फिर बाद में सुनाते थे कि बच्ची, आज फलाने बच्चे को बाबा सकाश दे रहे थे। बाबा के चेहरे से दिव्य किरणें निकलकर सारे कमरे को अव्यक्त सुगन्ध से भरपूर कर देती थीं। वह कैसा प्यारा नज़ारा था जो इन आँखों ने देखा, उसका वर्णन मैं नहीं कर सकती।

सेवा के राज़

बाबा अपने पास बैठाकर सिखाते थे कि कैसे आत्माओं की सेवा करनी है, उनकी समस्याओं का समाधान करना है, धार्मिक लोगों के पास कितनी श्रद्धायुक्त स्थिति से जाना होता है। जिस कार्य को हम मुश्किल समझते थे, बाबा उसके लिए भी हमें प्रोत्साहित करते थे कि बच्चे मेहनत से कार्य करते चलो। ‘क्या होगा’, इस प्रश्न के पीछे अपनी बुद्धि मत लगाओ। आप अपना पार्ट बजाते चलो, जो होना होगा सो होगा। बाबा के चेहरे पर ऐसा रूहानी नूर था कि उनको देख लेने से ही सब ठीक हो जाते थे। बाबा को देखकर आँखें कभी तृप्त नहीं होती थीं, बस यही इच्छा रहती थी कि हर पल बाबा को देखते ही रहें।

मेरे तन-मन को शक्तिशाली बनाकर बाबा ने मुझे सेवा के लिए सन् 1958 में पूना में दादी जानकी जी के पास भेज दिया, जहाँ रहकर सेवा के साथ दादी जी का त्यागी, तपस्वी स्वरूप नज़दीक से अनुभव कर बहुत कुछ सीखने को मिला। दादीजी ने बहुत ही स्नेह से मुझे रूहानी सेवा के योग्य बनाया। उसके पश्चात् बाबा ने मुझे सन् 1960 में अम्बाला सेवाकेन्द्र में सेवार्थ भेज दिया। दो वर्ष वहाँ सेवा की। एक दिन प्यारे बाबा का पत्र आया। बाबा ने लिखा, ‘बच्ची, देहरादून जाकर सेन्टर खोलो।’ बाबा को देहरादून बहुत पसंद था। बाबा बताया करते थे कि मैं एक मास तक देहरादून में, एक संत जिनका नाम लक्ष्मणदास सोनी टोपीवाला था, के पास रहा था। बाबा की अलौकिक प्रेरणा को प्राप्त कर सन् 1962 में देहरादून सेवाकेन्द्र का आरम्भ किया गया। देहरादून में सेवाकेन्द्र खोलने के पीछे क्या राज़ समाया हुआ था, यह तो कुछ समय के बाद ही खुला। बाबा का वरद् हस्त मेरे सिर पर था। धीरे-धीरे बाबा ने जिस सेवा के लिए मुझे तैयार किया था, वहाँ पहुंचा दिया। वहाँ पर रहकर धार्मिक लोगों की सेवा करने का सुनहरा अवसर मुझे प्रदान किया।

बाबा बहुत उदारचित्त और शालीन थे

हम जो स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे, वह बाबा करा लेते थे। एक बार बाबा से मैंने पूछा, ‘बाबा, हम बहुत ही रूहानी स्नेह से, मेहनत से, सच्ची लगन से सब आत्माओं को परमात्मा का सन्देश देते हैं परन्तु लोग फिर भी हमें गालियाँ ही निकालते हैं।’ बाबा पहले तो मुस्कराते हुए मेरी बात सुनते रहे, बाद में बड़े प्यार से कहा, ‘बच्ची, तुम शान्ति से शान्ति स्थापना के कार्य में लगी रहो, समय आयेगा, लोग तुम्हें पहचानेंगे।’ कैसी भी परिस्थिति हो बाबा सदा निश्चिन्त, बेफिकर बादशाह बन चलते थे। हम समझते थे कि यह समस्या बहुत बड़ी है परन्तु बाबा सदैव साक्षी अवस्था में रह बड़ी से बड़ी समस्या का बहुत थोड़े शब्दों में समाधान कर देते थे। बाबा बहुत ही उदारचित्त और राजाओं जैसी शालीनता से व्यवहार करते थे।

एक बार यज्ञ के धोबी से बाबा ने पूछा, ‘बच्चे, किसी चीज़ की दरकार हो तो बताना, कपड़े आदि हैं?’ उसने बहुत ही संकोच से कहा, ‘हाँ बाबा, सिल रहे हैं।’ बाबा ने कहा, ‘बच्चे आओ, बाबा के बहुत सिले हुए कपड़े रखे हुए हैं।’ यह कहते हुए बाबा उसको अपने साथ कमरे में ले आये और अपनी कपड़ों की आलमारी खोलकर बोले, ‘बच्चे, जितने चाहिए इनमें से ले लो, बाबा का सो बच्चों का।’ वह बेचारा तो संकोच से कहे, ‘नहीं बाबा, मेरे कपड़े सिल रहे हैं, मिल जायेंगे।’ परन्तु बाबा ने अपने हाथ से कुछ कपड़े उठाकर उसको दे दिये। ऐसे थे ग़रीब निवाज़ बाबा! बाबा के हर कदम से शिक्षा मिलती थी।

सुदर्शन बहन

गुड़गाँव से ब्रह्माकुमारी सुदर्शन बहन जी लिखती हैं कि मैं पहली बार सन् 1960 में साकार बाबा से मिली थी। नुमाशाम का समय था, बाबा को साधारण रूप में देखा, शिव बाबा देखने में नहीं आया तो थोड़ा दिलशिकस्त हो गयी क्योंकि मुझे अभी थोड़ा समय ही ज्ञान में हुआ था। इसलिए ज्ञान की गहराई को भी नहीं समझा था परन्तु बाबा का व्यक्तित्व प्रभावशाली लगा। दूसरे दिन मैं सुबह क्लास में जाकर बैठी, थोड़े समय के बाद बाबा आकर गद्दी पर बैठे तो बाबा ने एक-एक को दृष्टि दे निहाल किया। जब मेरे पर दृष्टि पड़ी तो एक सेकेण्ड में बाबा के मस्तक पर लाइट का गोला दिखायी दिया और वहाँ से साकार बाबा गायब हो गये। वहाँ पर सिर्फ अति सुन्दर लाइट ही लाइट दिखायी दे रही थी। अब तो मेरे नैनों से प्रेम के आँसू बहने लगे, मन आनन्द से भर गया। एक सेकण्ड भी नैन झपकने को मन नहीं कर रहा था। यही इच्छा थी कि शिव बाबा को देखती रहूँ और उनके स्नेह का अनुभव करती रहूँ। थोड़े ही समय में यह दृश्य समाप्त हो गया और ऐसे लगा मानो मेरी जन्म-जन्म की परमात्मा को पाने की आश पूरी हो गयी; आज मुझे अपना जन्म-जन्म का बिछुड़ा पारलौकिक बाप मिल गया। जिसकी खोज में बचपन से भक्ति, व्रत, नियम किये, वह दिन आज आ गया, मेरा प्यारा शिव बाबा मुझे मिल गया। बाबा ने मुझे सारे सम्बन्धों का अनुभव कराया, मुझे सेकेण्ड में निश्चय हो गया कि सत्य ज्ञान है तो यही है। इससे ऊँचा ज्ञान और कोई है ही नहीं। जीवन है तो यही है, प्रभु-प्राप्ति का कोई और रास्ता है ही नहीं।

मैं बन गयी श्रीकृष्ण के साथ झूला झूलने वाली 'गोपी'

भक्ति में मैंने 'सुखसागर' पढ़ा था, जिसमें वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण के साथ गोप-गोपियाँ झूला झूलती थीं। तो मेरे मन में भी आता था कि काश, मैं भी गोपी होती। जानी-जाननहार बाबा ने मुझे यह भी अनुभव करा दिया। अचानक बाबा ने एक दिन कहा, ‘चलो बच्ची, बाबा-मम्मा के साथ झूला झूलो’। मैं तो बहुत खुश हो गयी और जाकर झूले में बाबा के साथ बैठ गयी, बस ऐसे लगा कि मैं श्रीकृष्ण के साथ झूला झूल रही हूँ और उसी में मगन हो गयी। तो बाबा ने वह भी आश पूरी कर दी।

एक बार की बात है, बरसात के दिनों में बारिश बहुत तेज़ हो रही थी, हम ट्रेनिंग सेक्शन में ठहरे थे। क्लास में जाने के लिए रूम से बाहर आये तो अभी जहाँ शान्ति स्तम्भ बना है वहाँ बहुत पानी भरा हुआ था, उसमें ईंटें रखी हुई थीं। मैं धीरे-धीरे ईंटों पर पैर रखकर आ रही थी। सामने से बाबा आ रहे थे, उनकी नज़र मेरे पर पड़ी। उनको लगा होगा कि बच्चों को बहुत तकलीफ़ हो रही है। साइड में लम्बे पत्थर रखे हुए थे, उसी वक्त बाबा खुद दो-दो ईंटें लगाकर ऊपर लम्बे-लम्बे पत्थर रखने लगे। बाबा को देखकर सभी बच्चे दौड़ कर आये और कुछ ही पल में पत्थरों का पुल बना दिया। सचमुच कितने निरहंकारी थे प्यारे बाबा !

याद आयी सुदामा की कहानी

एक बार, मैं मधुबन में बाबा से मिलने आयी थी और बाबा के रूम में बैठी थी। वहाँ और एक पार्टी बाबा से मिल रही थी। एक गाँव का बुज़ुर्ग भाई अपने साथ एक गठरी लाया था। उसमें और छोटी-छोटी गठरियाँ थीं, किसी में दाल थी, किसी में चावल, किसी में आटा था। वह ले तो आया लेकिन उन्हें देने में उसको लज्जा आ रही थी कि इतने बड़े बाबा को ये छोटी-सी वस्तु कैसे दूँ! वह गठरी को छुपाने लगा लेकिन बाबा तो बच्चों के दिल के भाव को जानने वाला है। बाबा की दृष्टि उस गठरी पर पड़ते ही बाबा ने कहा, ‘लाओ बच्चे लाओ, बाबा के लिए क्या लाये हो?’ बाबा ने अपना लम्बा हाथ करके उसकी गठरी ले ली और बाबा ने उसे खोला तो अलग-अलग छोटी-छोटी गठरियाँ बँधी हुई थीं। यह देखकर मुझे सुदामा की कहानी याद आ गयी। फिर तो एक भाई के द्वारा भोली भण्डारिन को सब गठरियाँ भेज दी गयी और कहा कि आज ही ये दाल और चावल डाल कर ब्रह्मा भोजन बनाना, बाबा स्वयं भी खायेंगे। ऐसे थे ग़रीब बच्चों के ग़रीब निवाज़ बाबा। आज भी जब मैं मधुबन आती हूँ तो यह दृश्य मेरे मन में तरोताज़ा हो जाता है।

एक विनम्र सेवाधारी

एक बार बाबा दिल्ली में मेजर की कोठी पर आये थे, मैं भी बाबा से मिलने गयी, जहाँ हज़ारों बच्चे आये थे। बाबा अपने हाथों से सभी को चाय पिला रहे थे। मैंने यह दृश्य देखा तो ऐसा लगा कि इतना बड़ा बाबा सेवाधारी बन सब बच्चों की सेवा कर रहे हैं और बच्चे चाय पीकर आनन्दित हो रहे हैं। ऐसे थे हमारे निर्मानचित्त अलौकिक बाबा ।

मैंने भी एक सेकेण्ड में अपने जीवन का फैसला कर लिया और बाबा के आगे समर्पित होकर ईश्वरीय सेवा में लग गयी। वो दिन और आज का दिन, कई विकट परिस्थितियाँ आयीं, कितनी ही लौकिक परीक्षायें आयीं लेकिन मेरा निश्चय अटूट रहा। जिस दिन बाबा के घर में क़दम रखा तो प्रण किया कि बाबा के घर से अर्थी ही निकलेगी।

एक बार मेरी परीक्षा लेने के लिए एक व्यक्ति आया जिसको कई सिद्धियाँ प्राप्त थीं। मैंने उसे म्यूज़ियम समझाया और ज्ञान सुनाया लेकिन उसने मेरे से कोई बात नहीं की। फिर उस भाई से कहा कि, मैं उस ज्ञान-योग की सीढ़ी पर चढ़ चुकी हूँ जो स्वयं भगवान ने दी है। इससे ऊँची सीढ़ी कोई और है ही नहीं। ऐसी दृढ़ता और निश्चय मेरे बाबा ने मुझे दी।

सुतीश बहन जी

गाजियाबाद से ब्रह्माकुमारी सुतीश बहन जी लिखती हैं कि मेरा जन्म सन् 1936 मे लायलपुर (पाकिस्तान) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। घर का वातावरण शुरू से ही पूजा-पाठ का था। घर में जब तक हर कोई, व्यक्ति या बच्चा पूजा आदि नहीं करता तब तक किसी को पानी भी नहीं मिलता था। शुरू से ही मेरे भी संस्कार कुछ ऐसे ही थे। हमेशा भगवान की प्राप्ति के लिए मन में एक तड़प थी कि भगवान कौन है? कहाँ मिलेगा? फिर भी शिवलिंग की प्रतिमा में मेरी विशेष श्रद्धा थी। जब भी कोई तकलीफ होती थी या बीमारी आती थी तो मैं मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल पी लेती थी जिससे बीमारी आदि ठीक हो जाती थी। इसी कारण मेरी शिव में बहुत आस्था थी। समझती थी कि यही सबसे बड़ी शक्ति है, यही कल्याणकारी है। समय बीतता गया, जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो हम भारत में दिल्ली में आकर रहने लगे। कुछ दिनों के बाद पिताजी का देहान्त हो गया। इसी घटना के कारण माताजी बहुत दुःखी रहा करती थी। कार्तिक मास में अन्य माताओं के साथ मेरी माताजी भी यमुना में स्नान करने जाती थी।

यमुना किनारे कुछ देवियाँ आयी हैं

सन् 1951 की बात है, एक दिन कुछ सफ़ेद वस्त्रधारी बहनें यमुना के किनारे तपस्या करती हुई दिखायी पड़ीं। जैसे ही मातायें, बहनों के सामने गयीं तो उनके नयनों से रूहानियत का साक्षात्कार हुआ। उनके मुख द्वारा ज्ञान के अनमोल वचन सुनते हुए माताओं को बहुत अच्छा लगा। ऐसा अनुभव हुआ कि ये कोई महान् शक्तियाँ हैं। माताजी ने घर में आकर मुझे बताया कि यमुना किनारे कुछ देवियाँ आयी हैं और वे भगवान के बारे में बहुत अच्छा ज्ञान देती हैं। उनकी बात सुनकर मैं भी दूसरे दिन घूमने के बहाने उनके प्रवचन सुनने गयी। बहनों (देवता दादी, बृजशान्ता दादी, मिट्ठू बहन) को देखकर ऐसा लगा कि यही मेरी बहनें हैं और यही मुझे परमात्मा से मिलने की राह बतायेंगी। इसी विश्वास के साथ मैं घर आ गयी। दूसरे दिन मातायें घर के नज़दीक जगन्नाथ की धर्मशाला में उन बहनों को ले आयीं। यह सुनकर मैं खुशी से झूम उठी और उसी समय मैं उन बहनों से मिलने के लिए धर्मशाला में पहुँच गयी। वहाँ जाकर देखा कि कुछ मातायें शान्त अवस्था में बैठी थीं, जिससे मुझे असीम शान्ति और खुशी की अनुभूति होने लगी। परन्तु भगवान को याद कैसे किया जाता है उसका ज्ञान नहीं था।

सामने विष्णु चतुर्भुज बाहें पसारे मुझे बुला रहे थे

मन ही मन में कहने लगी कि भगवान, मैं तुम्हारी पुत्री हूँ, तुम मुझे अपनी गोदी में ले लो। बस यह अन्दर ही अन्दर जपती रही। फिर देखा कि सामने विष्णु चतुर्भुज बाहें पसारे मुझे बुला रहे थे। यह दृश्य देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गये। थोड़ी देर में दृश्य देखा कि मैं चलती जा रही हूँ और प्यास से बहुत व्याकुल हूँ। इतने में देखा कि मेरे सामने ब्रह्मा बाबा साधारण रूप में खड़े हैं और बोले, ‘बच्ची, बहुत प्यास लगी है?’ तो मैं बाबा को देखकर बोली, ‘हाँ जी।’ बाबा ने बोला, ‘बच्ची, यह साधारण जल नहीं, ज्ञान-अमृत है। इसे सदा पीते ही रहना, पिओगी?’ मैं बोली, ‘जी पीयूँगी।’ तो बाबा ने मुझे जल पिलाया और जल पीते ही ऐसे महसूस हुआ मानो मेरी जन्म-जन्मान्तर की प्यास बुझ गयी। प्यास बुझते ही मैंने बाबा से पूछा, ‘बाबा आप कौन हैं?’ तो बाबा ने मुझे ज्यातिर्बिन्दु का साक्षात्कार कराया। तभी निश्चय हुआ कि यही परमात्मा हैं। बस उसी दिन से ही मेरे नये अलौकिक जीवन की शुरूआत हुई। फिर रोज़ क्लास करने जाने लगी।

बाबा ने मुझे आबू का पता साक्षात्कार में ही दिखा दिया

कुछ समय के पश्चात् बहनें हमें छोड़कर माउण्ट आबू चली गयीं तब सारी मातायें एक माता के घर में क्लास करने लगी। अब तक हमने बाबा को सम्मुख नहीं देखा था फिर भी आन्तरिक महसूसता होती थी कि बाबा को बहुत बार देखा है। लेकिन मैं बाबा से कैसे मिलूँ व कैसे पत्र-व्यवहार करूँ, यह समझ नहीं आ रहा था। अगले दिन बाबा ने मुझे बृजकोठी, माउण्ट आबू का पता साक्षात्कार में ही दिखा दिया। इसी निश्चय से मैंने बाबा को पत्र लिखा कि बाबा, आपने कहा कि मैं आया हूँ, सो आप मेरे पत्र का जवाब देना। पत्र मिलते ही बाबा ने मेरे पत्र का जवाब दिया और

लिखा, ‘मैं तुम्हारे लिए ही तो आया हूँ, तुम मेरी पुरानी बच्ची हो, बाबा की हो, बाबा की ही रहोगी। यह मेरे लिए वरदान था, यह वरदान बाबा ने मुझे पत्र के उत्तर में दिया।’

बस, फिर तो परीक्षा आनी शुरू हो गयी

इसके बाद हम सभी भाई-बहनों ने बाबा को निमन्त्रण-पत्र लिखा और बाबा ने सेवार्थ बहनों को भेजा। फिर तो मैं रोज़ क्लास करने लगी। इस प्रकार, मुझे ईश्वरीय ज्ञान लेते हुए तीन साल हो गये। मुझमें बहुत परिवर्तन आता गया और परिवार वाले देखने लगे कि यह तो बदलती जा रही है। बस, फिर तो परीक्षायें आनी शुरू हो गयीं। सेन्टर में आना-जाना बन्द कर दिया गया। सबने आपस में मिलकर मुझे रोकना शुरू किया और सोचा कि इसकी शादी कर दें तो अपने आप ठीक हो जायेगी। लेकिन बाबा से मुझे हर कदम पर मदद मिलती रहती थी।

एक बार सारी मातायें मधुबन बाबा से मिलने जा रही थीं तो मैंने भी निश्चय किया कि मुझे बाबा से मिलने ज़रूर जाना है। जबकि परिवार वाले नाराज़ थे, बन्धन भी डालते थे तो मुझे कैसे जाने देंगे? जाना भी है लेकिन झूठ बोल कर भी नहीं जाना। फिर मैंने तीन दिन लगातार दिन-रात बैठकर योग-तपस्या की, फिर बाबा ने मुझमें ऐसी शक्ति भर दी जो मैंने भाई से कहा कि एक बार मैं यह आश्रम देख आऊँ? इस प्रकार, मैं 1954 में मधुबन पहली बार बाबा से मिलने कोटा हाऊस में चली आयी। मैं बाबा से मिली तो मीठी दृष्टि देते हुए बाबा ने कहा, बच्ची, बहादुर हो। अब बाबा से मिल गयी तो मिलती ही रहोगी। बाबा दिल्ली आयेगा, तुम्हें सब बन्धनों से छुड़ाने। इस प्रकार मैं मम्मा-बाबा के साथ 15 दिन बिताकर वापस दिल्ली आ गयी।

बच्चे, बस इतनी सी बात है

दिल्ली आने के बाद वही परेशानी, वही बन्धन परन्तु मन में पक्का निश्चय था कि अब कुछ भी हो जाये बाबा का हाथ और साथ नहीं छोड़ना है। इसी प्रकार समय बीतता गया और सन् 1955 में बाबा दिल्ली, राजौरी गार्डेन में आये। परिवार वालों को मालूम पड़ा कि इनका बाबा आया है तो क्यों नहीं हम मिलकर बाबा के पास जायें क्योंकि सुतीश हमारा कहना तो मानती नहीं, बाबा का कहना ज़रूर मानेगी, ऐसा सोचकर भैया और जीजाजी साकार बाबा के पास गये। बाबा ने बहुत प्यार से पूछा, ‘बच्चे, क्या चाहते हो?’ तो भैया और जीजाजी ने कहा कि हम इसकी शादी करना चाहते हैं, कुछ भी हो जाये हम घर से ऐसे नहीं जाने देंगे। घर से लड़की जायेगी तो शादी करके ही जायेगी चाहे कोई ज्ञान में चलने वाला लड़का ही क्यों न हो, हम उसके लिए भी तैयार हैं। तो बाबा ने कहा, बच्चे, बस इतनी सी बात है! फिर बाबा ने कहा कि शादी करके यह ब्रह्माकुमारी बने।

बाबा, मैं पार्ट बजाऊँगी

बाबा ने मुझे बुलाया और कहा कि बच्ची, मैं तुम्हारा गन्धर्व विवाह करा दूंगा। मैं तुम्हें बिल्कुल निर्बन्धन बनाऊँगा।’ फिर मैंने कहा, ‘बाबा, आप गन्धर्व विवाह भल कराओ 'जो आपकी आज्ञा', वह मैं ज़रूर मानूँगी लेकिन मैं किसी के घर नहीं जाऊँगी।’ फिर बाबा ने कई कुमार देखे, उनमें से एक कुमार बाबा को ठीक लगा। ड्रामा अनुसार गन्धर्व विवाह की तारीख पक्की हो गयी। मम्मा-बाबा ने मुझे अपना-अपना एक-एक रूमाल दे दिया। मैं वहाँ गयी, जब पल्ले से पल्ला बाँधने की बात आयी तो मैं मम्मा-बाबा के दिये हुए रूमाल बाँधकर, लौकिक सम्बन्धियों से विदाई लेकर, शहज़ादी के वेष में पुरानी दुनिया को छोड़कर, राजौरी गार्डेन सेवाकेन्द्र पर अपने शहज़ादे प्यारे मम्मा-बाबा के पास आ गयी। इसके पश्चात् मैं मम्मा-बाबा के पास राजौरी गार्डेन में रही। बाद में पंजाब और यू.पी. में बाबा ने मुझे अपने साथ घुमाया। अमृतसर, सहारनपुर, अम्बाला इस तरह 6 मास घूमकर सबसे पहले मैं हापुड़ सेवाकेन्द्र पर गयी। सन् 1960 में हापुड़ का हंगामा हुआ तो बाबा ने कहा, छोटी बच्ची को वहाँ से बुलाओ। फिर बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया।

एक बार मैं मथुरा में बहुत बीमार पड़ी तो मुझे बाबा ने बुलाया और कहा कि मैं अपने आप तुम्हें ठीक करूँगा। बाबा ने मुझे मक्खन और बादाम खिलाया और सचमुच मैं ठीक हो गयी। इस प्रकार, मम्मा-बाबा ने मेरी स्थूल और सूक्ष्म पालना की। चार मास के बाद बाबा ने मुझे गाज़ियाबाद सेवा पर भेज दिया। इस प्रकार जानी-जाननहार बाप पर मेरा जितना निश्चय था उतना बाबा को भी मुझ पर विश्वास था कि यह मेरी बच्ची है और सदा रहेगी! ऐसे थे हमारे बाबा!!

राधा बहन

अजमेर से ब्रह्माकुमारी राधा बहन जी लिखती हैं कि 11 अक्टूबर, 1965 के दिन मैंने साप्ताहिक कोर्स शुरू किया और उसके बाद 18 अक्टूबर को बाबा को पत्र लिखा। तीन दिन बाद बाबा का प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ। बाबा ने लिखा, ‘बच्ची राधा कल्प पूर्व समान सच्ची 'अनुराधा' बनने पुनः आयी है। बच्ची डबल पढ़ाई पढ़कर अलौकिक 21 कुल तार कर 21 जन्म की राजाई लेगी…’ आदि। बापदादा के लाल अक्षरों वाला वह पहला पत्र अभी भी मेरी आँखों के सामने घूम रहा है। परन्तु वह मेरे ज्ञान का बचपन था, मैं उस पत्र के गूढ़ अर्थ को समझ न सकी। उस समय मैं एल.एल.बी. के अन्तिम वर्ष में पढ़ रही थी।

बाबा से प्रथम मिलन

हम 6 दिसम्बर, 1965 को मधुबन पहुँचे। सायंकाल 6 बजे बाबा के कमरे में पहुँचे। हम सभी बाबा के सामने बैठे थे और बाबा ने दृष्टि देना शुरू किया। बाबा की दृष्टि इतनी सात्विक, पवित्र और शक्तिशाली थी कि मैं एकदम अशरीरी, हल्की हो गयी और डबल लाइट अपने को अनुभव करने लगी। कमरे में जैसेकि एकदम दिव्य सन्नाटा, दिव्य शान्ति ही शान्ति हो गयी। मेरे बाद बाबा ने कइयों को दृष्टि दी और वे बाबा की गोद में चले गये। परन्तु मैं अचल स्थिति में ही बैठी रही। सब कुछ देख भी रही थी पर मैं वहाँ कुछ अलग-सी अपने को महसूस कर रही थी। बारी-बारी से सब बाबा से मिल चुके तब बाबा ने कहा, ‘बच्ची, कहाँ खो गयी हो? नीचे आओ।’ तब कहीं मेरी निन्द्रा भंग हुई और मैं शरीर के भान में आयी और उठकर बाबा की गोदी में चली गयी। बाबा की गोद में जाकर ऐसा लगा जैसेकि सच्चा मात-पिता मुझ आत्मा को अब मिला है। जैसेकि अनेक बार मिले थे अब फिर से मिल रहे हैं। फिर बाबा ने हाथ मिलाया और कहा, बच्ची एकदम पवित्र फूल है, बाबा की अथक सेवा करेगी, बाबा का नाम बाला करेगी।

दूसरे दिन क्लास के बाद नाश्ता करके सब्ज़ी काटने की सेवा में सभी बैठ गये। इतने में बाबा आये, मुझे देखा तो निर्मला दीदी (राजापार्क, जयपुर वाली) को बोले, बच्ची, इस बच्ची को भाषण करना सिखाओ, ज्ञान समझाना सिखाओ। फिर बाबा ने मुझे अपने साथ मधुबन का चक्कर लगवाया। जहाँ भी काम चल रहा था वहाँ मिस्त्रियों, कारीगरों को डायरेक्शन दिये और हम झोपड़ी में पहुँचे। बाबा गद्दी पर बैठ गये। मैं बाबा के सामने बैठ गयी। बाबा ने मुझे उस दिन संन्यासियों को कैसे समझाना चाहिए, मिनिस्टरों और सरकारी अफ़सरों को कैसे समझाना चाहिए आदि बताया। यह सब समझाते हुए बाबा ने कहा, ‘बच्ची, सामने वाले को आदर देते हुए निडर होकर अथॉरिटी से समझाओ। सोचो, तुम्हें कौन पढ़ा रहा है! तुम किसका परिचय दे रही हो! सदा अपनी रूहानी अथॉरिटी में रहकर बोलोगी, तो सफलता तुम्हारे गले का हार बन जायेगी।’

बच्ची को श्रीमत है-डबल पढ़ाई पढ़ना

मधुबन से वापस जयपुर आकर तो मैं लौकिक पढ़ाई के साथ-साथ सेवाओं में जुट गयी। मैंने मन ही मन एक्यूरेट श्रीमत पर चलने का निश्चय किया हुआ था, अतः मैं लॉ कॉलेज नहीं गयी। लगभग 15 दिन हो गये थे कॉलेज से अनुपस्थित रहते हुए। कॉलेज के प्रिन्सीपल ने घर पर शिकायत भेजी। शाम को जब मैं सेन्टर से घर पहुंची तो लौकिक पिताजी ने मुझ से पूछा कि कॉलेज क्यों नहीं जा रही हो? तो मैंने रूहानी नशे में कहा कि भगवान कहते हैं कि कन्याओं को लोक-कल्याण के लिए ईश्वरीय सेवा में लग जाना चाहिए। पिताजी ने बाबा को पत्र लिखा कि बच्ची ने पढ़ाई छोड़ दी है। बाबा का तुरन्त पत्र आया कि बच्ची को श्रीमत है कि तुम्हें डबल पढ़ाई पढ़नी है। डबल सर्विस करनी है। फिर मैंने कालेज जाना शुरू किया।

मैं लॉ फाइनल की परीक्षा देकर बाबा के पास पहुँच गयी और बाबा को कहा, ‘बाबा, मैं बिल्कुल फ्री होकर आयी हूँ, अब आप जो सेवा दें। बाबा ने कहा, बच्ची, तुम्हें डबल सर्विस करनी है। मैंने कहा, बाबा, आप मिले हो तो मैं लौकिक सर्विस में क्यों टाइम गंवाऊँ? मैं तो ईश्वरीय सेवा ही करूंगी।’ बाबा ने कहा, ‘बच्ची, तुम्हें यह वरदान है कि तुम लौकिक सर्विस करते भी ईश्वरीय सेवा अधिक करोगी।’ मैंने पूछा, ‘बाबा, वकालत करूँ? तो बाबा ने कहा, ‘भल करो।’ मैंने जयपुर आकर वकालत शुरू कर दी और कोर्ट जाने लगी। मैं तब लगभग हर माह मधुबन जाया करती थी। बाबा हर बार पूछते थे, बच्ची, वकालत तुम्हें कैसी लग रही है? मैं हर बार जवाब देती थी कि बाबा, मुझे वकालत अच्छी नहीं लगती क्योंकि झूठ बोलना पड़ता है। लगभग 10 महीने वकालत करते हो गये थे, फिर एक बार मधुबन आयी तो बाबा ने पूछा, बच्ची, अब वकालत कैसी लग रही है? तो मैंने कहा, ‘बाबा, अब तो ठीक है, इतनी बुरी नहीं है। अब मुझे भी वकालत में मज़ा आ रहा है।’ बाबा ने तुरन्त बोला, ‘बस बच्ची, अब आज से तुम्हें वकालत नहीं करनी है वरना तुम्हें झूठ बोलने की आदत पड़ जायेगी। बस बहुत हो गयी वकालत। तुम्हें अनुभवी बनाने के लिए बाबा ने वकालत करवायी। अब तुम बैंक में सर्विस करो। सुबह 10 से शाम 5 बजे तक लौकिक सेवा करो बाक़ी सुबह-शाम ईश्वरीय सेवा करो।’ मधुबन से जयपुर जाने के बाद बैंक में सर्विस ले ली। सचमुच बैंक सर्विस करते हुए बाबा ने ईश्वरीय सन्देश देने की मेरे से बहुत सेवा करवायी।

कहाँ इतना प्यार, कहाँ इतने नष्टोमोहा!

सन् 1968 में भाऊ विश्व किशोर जी बहुत बीमार हो गये थे। बाबा ने उन्हें ऑपरेशन कराने मुंबई भेजा। उस समय मैं भी मधुबन में ही थी। ऑपरेशन तो अच्छा हो गया परन्तु भाऊ को काफ़ी तकलीफ़ थी। अतः बाबा रात भर योग में बैठे रहे। मैंने रात को 12 बजे देखा, बाबा योग कर रहे थे। मैं वापस अपने कमरे में आकर योग करने लगी। फिर 2 बजे के लगभग मैंने बाबा के कमरे में देखा तो बाबा उसी प्रकार योग कर रहे थे। फिर 4 बजे बाबा के कमरे में गयी तो बाबा बोले, ‘बच्ची, विश्व किशोर बच्चे को बहुत तकलीफ़ है इसलिए आज रात भर बाबा बच्चे को सकाश देते रहे।’

फिर बाबा पुनः योग में बैठ गये और मुझे भी बिठा दिया तथा सकाश देने लगे। मुझे दृष्टि देकर योग कराया तो वह अनुभव भी एकदम निराला था, जैसे संकल्प-विकल्प से परे दिव्य ज्योति के प्रकाश ही प्रकाश का अनुभव किया। दिन में एक बजे के लगभग रमेश भाई का फोन आया कि बाबा, भाऊ विश्व किशोर ने पुरानी देह को त्याग दिया। जब तक यह फोन नहीं आया था बाबा बार-बार बहुत प्यार से भाऊ को याद कर रहे थे। किन्तु जैसे ही भाऊ के शरीर छोड़ने का समाचार आया, बाबा एकदम नष्टोमोहा बन गये।

रमेश भाई ने बाबा से पूछा कि भाऊ के शरीर को आबू ले आयें? बाबा ने कहा, नहीं, बच्चे का मुंबई में ही अन्तिम संस्कार कर दो। फिर बाबा ने भाऊ को बिल्कुल याद नहीं किया। बस, इतना ही कहा कि बच्चे का पार्ट पूरा हुआ, ड्रामा। दो-तीन दिन के बाद शील इन्द्रा दादी मुंबई से भाऊ के अन्तिम संस्कार के फोटो लेकर आयीं और बाबा के कमरे में जाकर बाबा को लिफाफा देकर बोली, ‘बाबा, भाऊ के अन्तिम संस्कार के फोटो लायी हूँ। बाबा एकदम गंभीर होकर बोले, बच्ची, ये क्यों खिंचवायी? विश्व किशोर बच्चे के मुरीद इन्हें देखकर रोयेंगे। आश्चर्य! बाबा के दोनों ही रूप एक-दूसरे से विपरीत देखकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। कहाँ इतना प्यार कि रात भर योगदान दिया और कहाँ भाऊ के देह त्यागते ही नष्टोमोहा दिखायी दिये!

एस.पी. साहब भी छोटे बच्चे की तरह गले लगकर रोने लगे

मेरे लौकिक पिताजी ज्ञान में चलकर भी मधुबन डेढ़ वर्ष तक नहीं गये। उन्हें दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी। लगभग 20-25 वर्ष पुराना दमा भी खत्म हो गया था और वे निरोगी बन गये थे। एक बार उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे बाबा से मिलना चाहते हैं। घर पर उनकी डायरी में मैंने बाबा से पूछने के लिए लगभग 100-150 प्रश्न लिखे देखे। मैंने मन में सोचा कि शायद इस आत्मा को भगवान पर बिल्कुल निश्चय नहीं है। उससे पहले उनका कोर्स भी बड़ा विचित्र ढंग से हुआ था। निर्मला दीदी ने उन्हें कोर्स करने को कहा। मेरी लौकिक माताजी और पिताजी ने कोर्स किया। आत्मा का चित्र देखते ही पिताजी शरीर से डिटैच हो ट्रान्स में चले जाते थे। जब बाबा को यह बात फोन पर मैंने बतायी तो बाबा ने कहा, ‘बच्ची, तुम उस बच्चे को रीयल गीता (Real Gita) पुस्तक दे दो। बाक़ी ध्यान में ही ऊपर (वतन में) बाबा कोर्स करा देंगे।’ सो उन्होंने ध्यान में बाबा द्वारा कोर्स किया।

मैं लौकिक पिताजी को लेकर आबू अब्बा के घर पहुंची। मैं नहा-धोकर बाबा के कमरे में गयी। मैंने पूछा, बाबा, लौकिक पिताजी को आपसे मिलवाने आपके कमरे में ले आऊँ? बाबा ने कहा, ‘बच्चे को क्लास रूम में बिठाओ, बाबा वही मिलेंगे।’ उस समय अन्य 40 भाई-बहनें भी आये हुए थे। जब उन्होंने सुना कि जयपुर से एस.पी. बाबा से मिलने आया है तो वे भी क्लास में आकर बैठ गये। बड़ी दीदी बाबा को क्लास हॉल में लेकर आयीं। बाबा को देखकर लौकिक पिताजी खड़े हो गये और झुककर बाबा के पाँव छूने लगे। किन्तु बाबा ने पाँव छूने से पहले ही उन्हें पकड़ लिया और कहा, ‘बच्चे बाबा के कन्धे पर बैठते हैं, न कि पाँव में।’ बाबा ने उन्हें बिठा दिया और वे भी नीचे ही बैठ गये। बाबा लौकिक पिताजी को दृष्टि देने लगे। लौकिक पिताजी दृष्टि लेते ही एकदम उठकर जल्दी से बाबा की गोद में समा गये और सिसक-सिसककर छोटे बच्चे की तरह रोने लगे। लगभग 20 मिनट तक बाबा की गोदी में रोते रहे। आखिर बाबा से अलग हुए और मैं उन्हें कमरे में लेकर आयी। मैंने उनसे पूछा, ‘आपको क्या हो गया था? अरे! आप ज़िले के एस.पी. हैं, बड़े आदमी हैं, आप हमारे बाबा के गले लगकर बच्चों की तरह रोयें...। आखिर आपको हुआ क्या था एस.पी. साहब?’

वे मुस्कराने लगे और बोले, ‘बाबा की दृष्टि में इतनी ममता और आत्मीयता थी कि मैं एकदम भूल गया कि मैं कौन हूँ। मैं तो अपने को एकदम छोटा बच्चा महसूस कर रहा था। बाबा के सामने अनुभव कर रहा था कि इतने समय के बाद मेरा बिछुड़ा हुआ असली पिता मुझे मिला है। मैं अपने को रोक नहीं सका और गोद में चला गया, प्यार में आँसू बहा रहा था। अब मुझे 100% निश्चय है कि परम पिता शिव बाबा ही इस ब्रह्मा बाबा में प्रवेश करके कार्य कर रहे हैं; और तो और मैं सारी दुनिया को बता सकता हूँ कि यह भगवान का ही कार्य है।’

शाम को 5 बजे बाबा के कमरे में पिताजी को ले गयी। बाबा ने प्यार से बिठाया और सारा समाचार पूछा, फिर लौकिक पिताजी से पूछा कि बच्चे, कुछ पूछना हो तो बाबा से पूछ सकते हो। इससे पहले जो भी बातचीत हुई वह साकार ब्रह्मा बाबा कर रहे थे। किन्तु एक सेकण्ड में निराकार शिव बाबा की प्रवेशता हो गयी और बाबा ने पूछा, बच्चे, कुछ पूछना हो तो बाबा से पूछ सकते हो। लौकिक पिताजी पर बाबा की दृष्टि पड़ते ही वे अशरीरी होने लगे और बाबा से बोले, बाबा, मुझे कुछ नहीं पूछना है। मेरे अब कोई प्रश्न नहीं है। तीन दिन वे मधुबन में रुके। उन तीन दिनों में बाबा ने मुरली में, लौकिक पिताजी के डायरी में लिखे हुए सभी प्रश्नों के तर्कसंगत और सटीक जवाब दिये। जयपुर वापस लौटकर तो पिताजी का जीवन ही बदल गया। ऐसी थीं बाबा की दृष्टि और वाणी।

सुधा बहन

बुरहानपुर से ब्रह्माकुमारी सुधा बहन जी कहती हैं कि सन् 1952 में मुझे यह ज्ञान मिला। उसके पहले भक्ति में भी यही कहते थे कि साक्षात् भगवान मिल जाये तो मैं भोग लगाऊँ। अब साक्षात् भगवान मिल गये और सन् 1953 में बाबा से मिलने मधुबन आये। बाबा को देखा तो उनमें शिव बाबा को प्रवेश होते देखा और मैं चुम्बक की माफ़िक बाबा की गोद में चली गयी और यही अनुभव हुआ कि मैं भगवान की गोद में बैठी हूँ। इस ईश्वरीय नशे में मगन हो सब कुछ भूल गयी। उस पहले मिलन में ही बाबा ने सर्व सम्बन्धों का अनुभव कराया, जिस कारण पुरानी दुनिया स्वतः भूल गयी। कभी स्वप्न में भी पुरानी दुनिया याद नहीं आयी।
बाबा को जब-जब देखती थी तो श्रीकृष्ण के साथ रास आदि करते हुए अनेकानेक अनुभव होते थे और साक्षात्कार भी बहुत होते थे। इस कारण दिन-प्रतिदिन परमात्मा से मेरी लगन बढ़ती गयी और परमात्म-प्यार में मगन रहने लगी। मेरी लगन देखकर बाबा ने कहा, ये मेरी कल्प पहले वाली और संगम की बहुत लगन वाली बच्चियाँ हैं (मैं और मेरी लौकिक छोटी बहन रानी जो मुज़फ्फरपुर में रहती है)। जो यज्ञ से गयी थीं और वापस यज्ञ में आ गयीं, ये बहुतों का कल्याण करेंगी। फिर बाबा ने बताया कि एक परिवार में दो बच्चियाँ बहुत लगन वाली थीं, उन्हें बहुत बन्धन था, खाना भी नहीं देते थे। परन्तु बच्चियों का संकल्प था कि जब तक बाबा की वाणी नहीं सुनेंगी, हम कुछ भी ग्रहण नहीं करेंगी। आखिर उन्होंने शरीर छोड़ दिया। बाबा ने कहा, ये वही बच्चियाँ हैं जो वापिस आकर बाबा से मिली हैं। एक बल, एक भरोसे, एक लगन में मगन रहने वाली हैं। इस प्रकार हमारे जीवन में 'एक बाबा दूसरा न कोई' और पवित्र जीवन ही हमारे लिए वरदान बन गया। हम बाबा के थे, बाबा के हैं और बाबा के ही रहेंगे।
प्रतिष्ठित परिवार होने के कारण बन्धन भी बहुत थे लेकिन प्यारे बाबा की दिव्य शक्तियों ने और ईश्वरीय मस्ती ने हमें बन्धन से मुक्त करा दिया। कितनी भी समस्यायें आयीं लेकिन साक्षात्कार के माध्यम से कठिन रास्तों को भी सहज युक्तियों से पार करा दिया। कोई भी परीक्षा आने से पहले बाबा हमें बताते थे कि ऐसे जवाब देना है। इस कारण सब ही बन्धन सहज खत्म हो गये। क़दम क़दम पर बाबा की पूरी मदद अनुभव होती थी जिसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती। कभी भी बाबा ने कष्टों का अनुभव नहीं होने दिया, सदा ही अद्भुत और अनोखा साथ निभाया।

खुश रहो, आबाद रहो

एक बार दिल्ली से दाताराम भाई मिठाई वाला, सर्दी के दिनों में मधुबन आया था। उसने स्वेटर नहीं पहना था और बाबा से मिल रहा था तो बाबा ने पूछा, बच्चे, स्वेटर नहीं पहना? उसने कहा, बाबा सफ़ेद स्वेटर नहीं था। उसी समय बाबा ने स्वयं का ही पहना हुआ स्वेटर उतारकर उस भाई को अपने हाथ से बड़े प्यार से पहना दिया और गले लगा लिया। तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा। ऐसे थे हमारे रहम दिल बाबा।
हम सभी मधुबन से विदाई लेकर जा रहे थे तो हम सभी ने बाबा से कहा, बाबा, आपको छोड़कर हमारा जाने का मन नहीं कर रहा है। प्यारे बाबा बोले, ‘आप एक बाबा को छोड़कर जाते हो, बाबा कितने बच्चों को भेजता है!’ तुरन्त हम सभी ने कहा, बाबा, हम जायेंगे परन्तु हमको भूलना नहीं। बाबा ने कहा, ‘बच्चे, अगर मैं आपको याद करूँगा तो मैं अपने शिव बाबा को भूल जाऊँगा। इसलिए बच्चे देखो, बाबा सदैव कहता है, खुश रहो, आबाद रहो। न बिसरो, न याद रहो।’
मैं एक बार मधुबन में थी। सन्तरी दादी जी कमरे में जाकर प्यारे बाबा के पुराने कपड़ों की गठरी लायी और खोली। उसमें से एक धोती और कुर्ता निकाला जो फटे हुए थे। मेरे से कहा कि इनकी सिलाई करके ले आओ। मैंने कहा कि यह बाबा नहीं पहनेंगे। मैं दिल्ली जाती हूँ और वहाँ से बनाकर भेज दूँगी। बाबा ने यह सुना तो कमरे में आये और कहा, बच्ची, जब सीज़न नहीं होता तो बाबा इनको ही पहनता है। इसलिए बच्ची, इनको ठीक करके ले आओ। बाबा के कहने पर मैंने उनकी सिलाई की, धुलाई की और बाबा के कमरे में रख आयी। बाबा ने शाम को वही धोती और कुर्ता पहना। हमारे प्यारे बाबा जितने दातादिल और खुले भण्डारी थे उतना ही उन्होंने बचत करना भी सिखाया।

पुष्पा बहन (नागपुर)

नागपुर, महाराष्ट्र से ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी कहतीं हैं; सन् 1956 में करनाल में सेवा आरम्भ हुई। मनोहर दादी जी के बारे में सुना था कि एक देवी जी भगवान के दर्शन कराती है। तो तीसरे ही दिन प्रभु मिलन की आश लिये सेवाकेन्द्र पर पहुंची। तब से मैं लौकिक माँ तथा लौकिक बहन सावित्री जी के साथ नियमित ज्ञान-अमृत का लाभ लेती रही।

बाबा से मिलने के पूर्व बाबा को मैंने पत्र लिखा कि सेवा में समर्पित होने की मेरी बहुत इच्छा है। मनोहर दादी जी को वो पत्र दिया। दादी जी ने भी बाबा को हमारे परिवार का समाचार तथा मेरे स्वास्थ्य के बारे में लिखा कि इसकी तबीयत बहुत नाज़ुक है। ठीक 7 दिन के बाद बाबा का लाल अक्षरों में हस्तलिखित पत्र पाया। बाबा ने लिखा था, ‘बच्ची का पत्र पाया। अगर यज्ञ में रहना चाहती है तो रह सकती है। अगर बच्ची बीमार है तो इसका इलाज देहली में कराया जा सकता है। बशर्ते पहले माँ (मम्मा) से मिले।’

लगभग 15 दिन के बाद मम्मा-बाबा का देहली में आगमन हुआ। मैं, मनोहर दादी जी तथा लौकिक माताजी के साथ देहली पहुंची। पहली मुलाक़ात में ही बाबा के अलौकिक व्यक्तित्व की छाप मेरे मानस पटल पर अंकित हो गयी। बाबा को फ़रिश्ते के रूप में देखकर अन्तरात्मा ने महसूस किया कि ‘जो पाना था सो पा लिया।’ प्यारे बाबा ने जो पत्र में लिखा था कि बच्ची का इलाज देहली में कराया जा सकता है, यही वाक्य मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ। देहली भूमि पर बाबा की दृष्टि मिलते ही मेरे स्वास्थ्य में परिवर्तन आना आरम्भ हुआ। जो दवाइयाँ और परहेज़ मैं करती थी, सब बन्द कर दिये। बाबा ने दृष्टि से ही मुझे निरोगी भव का वरदान दे दिया। पूर्व जीवन की हलचल के कारण जीवन बहुत दुःखी था लेकिन बाबा को पाकर गीत की ये पंक्तियाँ याद आ गयीं, ‘किसी ने मुझको बनाके अपना, मुस्कराना सिखा दिया...।’ यह प्रैक्टिकल वरदान सिद्ध हुआ। मेरे जीवन के परिवर्तन को देख लौकिक के कई सदस्य ज्ञान में चलने लगे और कई समर्पित रूप से सेवायें भी देने लगे।

एक बार मैं बाबा के पास बैठी थी। मनोहर दादी जी भी वहीं थी। कुछ ही क्षणों के लिए बाबा ने मुझे योग-दृष्टि दी तो ऐसे महसूस हुआ जैसेकि भृगु ऋषि मेरी जन्मपत्री देख रहा हो। तुरन्त बाबा ने मुड़कर दादी जी को कहा, ‘यह बच्ची बहुत भाग्यशाली है।’ इन वरदानी शब्दों को मैं आज भी महसूस करती हूँ कि कैसी भी परिस्थिति हो बाबा की शीतल छाया में सुरक्षित हूँ।

करनकरावनहार बाबा

बाबा सदा ही न्यारे-प्यारे रहते थे। बच्चों से स्नेह बहुत था इसलिए बच्चों की उन्नति का जितना ख्याल करते थे उतना ही उपराम भी रहते थे। बाबा में सदा आन्तरिक नशा था कि आज यह तन बूढ़ा है, कल बाबा मिचनू श्रीकृष्ण बनेगा । बाबा सदा ही हर कार्य स्वयं करके सिखाते थे। इसलिए बिना कहे सभी कार्यों में जुट जाते थे। एक बार आबू में पानी की बहुत दिक्कत थी। हैण्ड पम्प से पानी खींचना था। बाबा ने सभी से पूछा कि क्या ये छोटी नाज़ुक बच्चियाँ पानी खींचेंगी? फिर स्वयं हैण्ड पम्प चलाना शुरू किया तो तुरन्त पम्प के पास पानी खींचने वालों की लाइन लग गयी।

एक बार यज्ञ में सिन्धी मुरली लिखने वाली बहन बीमार हो गयी। मैं उस समय सिन्धी पढ़ना तो जानती थी लेकिन लिखना नहीं आता था। जब बाबा को पता चला तो कहा, ‘क्यों बच्ची, लिखना नहीं आता तो सीख नहीं सकती? अगर नहीं सीखती तो बाबा कहेगा या तो बच्ची को सीखने का शौक़ नहीं है या बुद्धू बुद्धि है।’ तो बाबा की ऐसी शक्तिशाली प्रेरणा से दो दिन में सिन्धी लिखना सीख गयी। बुज़ुर्ग होने पर भी बाबा को हर सेवा करने का शौक था। सब्ज़ी काटने से लेकर अनाज की सफाई तक हर सेवा शौक़ से करते थे और करवाते थे। कभी बच्चों को पहाड़ी पर घुमाने ले जाते थे, कभी पिकनिक कराते थे, कभी बच्चों के साथ खेल-पाल करते थे। बाबा को बगीचे का बहुत शौक़ था।

पार्टियाँ मधुबन आतीं तो सभी को ठीक प्रबन्ध मिला या नहीं, कमरे की खिड़कियाँ खुली हैं या नहीं... हर प्रकार से बाबा स्वयं ध्यान देते थे। बच्चों को मच्छर न काटें इसलिए हवन का धूप कमरों से घुमवाते थे। जिस दिन पार्टी मधुबन पहुँचती थी उसी रात्रि को बाबा स्वयं सब कमरों में चक्कर लगाकर देखते थे।

बाबा तो बेफ़िकर बादशाह था। रात को जागकर भी टाँग पर टाँग चढ़ाये योग में बैठ जाता था। बाबा से मैंने सदा हल्का रहना सीखा। शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा को सदा कम्बाइण्ड रूप में मैंने अनुभव किया। फिर भी शिव बाबा की प्रवेशता से शब्दों में अथॉर्टी महसूस होती थी और ब्रह्मा बाबा कहता था कि बाबा ऐसे कहता है। साकार में बाबा से मात-पिता, शिक्षक-सखा के रूप में पालना पाने का सौभाग्य मिला।

शिक्षा-दक्षता और कर्म की गहन गति के बारे में

बच्चों से कोई ग़लती हो जाये तो रियलाइज़ कराने का बाबा का तरीक़ा बड़ा अनोखा था। एक बार मैंने कपड़े धोकर सुखाये, लेकिन उतारना भूल गयी। रात को सोते समय याद आया लेकिन कड़ाके की ठण्ड थी तो सुस्ती कर गयी। सवेरे याद आया लेकिन सोचा कि क्लास के बाद उतार लूँगी लेकिन फिर भूल गयी। अमृतवेले बाबा ने देखा तो कपड़े उतरवा लिये। क्लास के बाद जब मैंने जाकर देखा तो पाया कि कपड़े हैं नहीं। पता चला कि बाबा के पास हैं। मैं बाबा के पास गयी। बाबा ने मेरी ग़लती का प्यार से एहसास कराया। कहा, ‘देखो बच्ची, कल कपड़े उतारे नहीं, कितनी मिट्टी चढ़ी होगी। मिट्टी वाले कपड़े तुम देवता बनने वाले बच्चे कैसे पहन सकते हो? कपड़े गिर जाते तो दुबारा धोने के लिए साबुन, पानी और समय भी दोबारा खर्च होता था ना! यह बोझ तुम्हारे ऊपर ही चढ़ जाता ना!’ इस प्रकार, बाबा ने कार्य के प्रति दक्षता और कर्म की गति का ज्ञान देकर प्यार से भूल का अनुभव कराया।

क्षमा कर, कमियों को निकालना

एक भाई ग़लती करके मधुबन में आया था। सभी सोच रहे थे कि बाबा ग़लती के लिए उसे ज़रूर कुछ कहेगा। दो-चार दिन बीत गये फिर भी बाबा ने कुछ नहीं कहा बल्कि और ही उसे विशेष प्यार की पालना देता रहा। कई दिनों तक बाबा ने कुछ कहा ही नहीं, आखिर उसके जाने का दिन आया। सबने सोचा कि आज तो बाबा ज़रूर कहेगा। लेकिन सबने देखा कि बाबा ने उसे प्यार से विदाई दी। आखिर जब बाबा से इसका कारण पूछा तो बाबा ने कहा, ‘देखो, बच्चा जानता है कि उसने ग़लती की है, बड़ी हिम्मत करके बाबा के पास आया था, यदि बाबा कुछ कहता तो बच्चा फंक हो जाता, दोबारा आने की हिम्मत नहीं करता। इसलिए बाबा ने उसे स्नेह देकर शक्ति भर दी। अब बाबा मुरली में ज़रा भी इशारा देगा तो बच्चा समझ जायेगा और स्नेह की शक्ति से अपने को चेंज कर लेगा।’
अक्सर मैंने देखा, बच्चों से ग़लती होने पर बाबा बच्चों की नब्ज़ देखकर शिक्षायें देता था। बच्चों में सुनने की हिम्मत है तो बाबा उन्हें बुलाकर प्यार से समझाता था अन्यथा कइयों को तो कहता था, इसे माँ (मम्मा) के पास भेजो।

एहसास कराकर दिलों को फिर जुड़ाना

एक भाई अपनी युगल की शिकायत लेकर बाबा के पास आया। युगल की कई ग़लतियाँ बाबा को एक के बाद एक सुनाता गया। बाबा ने देखा कि इसमें युगल के प्रति कितनी नफ़रत भरी है जो चेहरे से प्रत्यक्ष हो रही है। तो बाबा ने पूछा, ‘बच्चे, क्या उसमें कोई अच्छा गुण भी है? सोच-सोच के वह बताने लगा कि ये-ये गुण हैं। बाबा पूछता गया, और कोई अच्छा गुण है? वह सोच-सोचकर बताता गया और साथ-साथ उसके चेहरे पर जो नफ़रत के भाव थे वे स्नेह में बदलते गये। तब बाबा ने कहा, ‘देखो, आज से एक-दो की विशेषता देखो, कमियाँ नहीं क्योंकि कमियाँ देखने से आपसी सम्बन्धों में तनाव आता है। इसलिए सदा गुणों को ही देखो।’ बाबा की यही शिक्षा उस परिवार में खुशहाली ले आयी। ऐसा था हमारा प्यारा बाबा। ऐसा प्यार करेगा कौन!... करेगा कौन!

जनक बहन

सोनीपत, हरियाणा से ब्रह्माकुमारी जनक बहन जी कहती हैं कि मैट्रिक पास करके जब मैंने डिप्लोमा शुरू किया तो उस समय श्री हरगोविन्दपुर में चन्द्रमणि दादी जी पधारी थीं । मैं स्कूल से सीधी आश्रम पर उनसे मिलने गयी। जब उस दिव्य मूर्ति का दर्शन किया तो मेरा एक पैर अन्दर और दूसरा पैर बाहर ही रह गया। उसी क्षण मैंने फैसला किया कि मुझे भी अपना जीवन इन जैसा बनाना है। राजा जनक की भाँति मुझे भी बनना है। जीवन में काफी परिस्थितियाँ आयीं। उन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 दिनों के अन्दर ब्रह्मा बाबा की पध्रामणी श्री हरगोविन्दपुर में हुई। पहली बार दर्शन करते ही मुझे ब्रह्मा बाबा के मस्तक पर हीरे की तरह चमकती हुई लाइट दिखायी दी। पन्द्रह मिनट के बाद श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ। वो साक्षात्कार जीवन में एक नया मोड़ लाया।

ये बच्चियाँ बहुत सेवा करेंगी

साकार बाबा ने मुझे अति स्नेह भरी दृष्टि देते हुए इस दुनिया से उपराम कर दिया। मुझे ऐसे लग रहा था कि बाबा मुझे इस दुनिया से दूर ले जा रहे हैं। हम तो बहुत खुश हुईं और जाने के लिए अपनी रीति से तैयार होने लगीं। जैसे-जैसे ज्ञान में आगे बढ़ने लगे वैसे-वैसे परीक्षाओं ने भी अपनी रफ़्तार पकड़ ली। हमने उन परीक्षाओं को पीछे रखा। बाबा की शक्ति ने हमें ऐसे खींच लिया जैसे चुम्बक सूइयों को खींच लेती है। साकार बाबा को हमारे ऊपर इतनी उम्मीदें थीं जो कहते थे कि ये बच्चियाँ बहुत सेवा करेंगी। एक बार बाबा का पत्र आया कि बाबा की बड़ी-बड़ी दुकानें हैं, कोई ऐसा मैनेजर हो जो उन दुकानों को सम्भाल कर दिखाये।

शुरू में बाबा ने मुझे मुंबई में 20 दिन के लिए प्रदर्शनी में भेजा। फिर मैं सीधे मधुबन बाबा के पास पहुँची। तीसरे दिन बाबा ने मुझे पटना के लिए रवाना किया। मैंने फैसला किया कि जहाँ भी बाबा मुझे भेजे, मुझे ना नहीं करनी। आज्ञा का पालन करते हुए देखो बाबा ने मुझे वरदानों से शक्ति भरकर सेवा में भेजा। मुझे बाबा कहते थे कि यह मेरी बच्ची बहुत ईमानदार है। फिर बाबा ने शिक्षा दी कि बच्ची, संगदोष से बचकर रहना। बचपन से मुझे पवित्र जीवन बहुत पसन्द था। बापदादा ने मुझे इस कलियुगी दुनिया से बचा लिया। मेरी सब मनोकामनायें बापदादा ने पूरी की। कहावत है:
'चाह मिटी, चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वो है बादशाह।।’

कमलेश बहन

भटिण्डा, पंजाब से ब्रह्माकुमारी कमलेश बहन जी कहती हैं, सन् 1954 में प्रथम बार जैसे ही बाबा के सामने पहुंची और बाबा के नैनों से रूहानी शक्ति का अनुभव हुआ तो कितने समय तक तो यह मालूम नहीं पड़ा कि मैं कहाँ खो गयी हूँ। जैसे नदी सागर में समाकर अपना अस्तित्व खो देती है, बाबा के साथ पहली मुलाक़ात में मेरा ऐसा ही अनुभव रहा।

बाबा के वरदान ने मेरे जीवन की रूप-रेखा ही बदल डाली

पहली बार जब मैं बाबा से मिली तो बाबा ने मुझे ऐसा बरदान दिया जिसका पूर्ण होना असम्भव-सा लग रहा था। बाबा ने कहा, ‘बच्ची, अपने मैनेजर से भी आगे जाओगी।’ बाबा ने अपना उदाहरण देकर मुझे समझाया कि मैं कैसे एक सेल्समैन से हीरों का व्यापारी बन गया। बाबा के वरदानी बोल मेरे कानों में गूंजने लगे। परिस्थितियों ने कुछ ऐसी करवट ली कि मैंने जिस टीचर से पालना ली थी उससे भी आगे निकल गयी। इस प्रकार, बाबा का वरदान सिद्ध हो गया। बाबा के वरदान ने मेरे जीवन की रूप-रेखा ही बदल डाली। मैं जब भी बाबा से मिलने जाती थी तो बाबा के नैनों में न केवल मुझे मेरा आदि-मध्य-अन्त दिखायी देता था बल्कि सारा ब्रह्माण्ड ही प्रत्यक्ष में अनुभव होता था।

जब मैंने सेवाकेन्द्र पर रहना शुरू किया तो मेरे लौकिक माता-पिता ने संस्था के विरोध में चण्डीगढ़ की अदालत में केस कर दिया। लेकिन बाबा का अद्भुत चमत्कार ही कहें कि कुछ ही दिनों में लौकिक परिवार वालों ने अपनी हार मानकर केस वापिस ले लिया और मैं निर्बन्धन हो गयी। पहाड़ समान दिखायी देने वाला विघ्न कुछ ही दिनों में राई बन गया।

बाबा के एक शब्द ने मेरी खुशियों का बाँध तोड़ दिया

मेजर भाई की कोठी पर जब मैं और मेरी एक सहेली बाबा से मिलने गये तो हमने आपस में राय की कि हम अपना नाम नहीं बतायेंगे कि कौन कमलेश है, कौन शील है क्योंकि भगवान जब जानीजाननहार है तो क्या इतनी छोटी-सी बात भी नहीं बता सकेगा क्या? हमारे निश्चय की यह पहली सीढ़ी बन गयी जैसेकि हम बाबा का पेपर लेने का प्रयास कर रहे थे। जैसे ही हम बाबा के सामने पहुँचे, तो बाबा के एक शब्द ने मेरी खुशियों का बाँध तोड़ दिया। बाबा ने कहा, ‘आओ मेरी कमलेश बच्ची।’ बाबा के ये शब्द सुनते ही मैं बाबा की गोद में समा गयी।

युगल जोड़ी का युक्तियुक्त पार्ट

पहली बार जब मैं बाबा से मेजर भाई की कोठी में मिली तो उस समय वहाँ बाबा की क्लास चल रही थी। मन में एक संकल्प पहले से ही चल रहा था कि कौन-से बोल शिव बाबा के होंगे और कौन-से ब्रह्मा बाबा के? तभी अचानक एक अद्भुत नज़ारा प्रत्यक्ष में दिखायी दिया कि जब शिव बाबा की वाणी चलती थी तो एक चमकता हुआ सितारा बाबा की भृकुटि में दिखायी देता था और फिर कभी वह सितारा गुम हो जाता था। इससे यह प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा दोनों का संगम ही वाणी का सार है। इस युगल जोड़ी को अलग नहीं किया जा सकता ।

बच्चों की हर तमन्ना पूरी करने की कोशिश

बाबा के शौक़ बच्चों के शौक़ से मेल खाते थे। एक बार मैंने बाबा से कहा, बाबा, आज आपके साथ बैडमिंटन खेलने का मन कर रहा है। शाम का समय था, बाबा किसी कार्य में व्यस्त थे। बाबा एकदम उस कार्य को समाप्त कर मेरे साथ बैडमिंटन खेलने चल पड़े और मेरे नैनों में स्नेह भरे अश्रु की धारा बह निकली। ऐसे थे मेरे बाबा! बाबा चौसर का खेल भी बड़े प्यार से खेलते थे और खेल-खेल में अद्भुत ज्ञान के रहस्य भी खोल देते थे।

बाबा के अव्यक्त होने के अन्तिम दिनों में जब मैं बाबा से मिलने गयी तो मैं बाबा को समाचार सुना रही थी। मैंने देखा कि बाबा देख रहे हैं मेरी तरफ़ परन्तु कहीं दूर खोये हुए नज़र आ रहे थे। मैं चुप हो गयी परन्तु बाबा उसी रस में खोये हुए थे। मैंने बाबा को दो-तीन बार बुलाया तो पाया कि बाबा वहाँ होते हुए भी वहाँ नहीं थे, दूर कहीं सागर में समाये हुए दिखायी दे रहे थे। मैंने बाबा का हाथ पकड़ कर हिलाया तो बाबा को मैंने अपने सामने पाया और बाबा ने मुस्कान भरी दृष्टि से मेरे सब प्रश्नों का हल एक सेकेण्ड में नैनों की भाषा से दे दिया।

बच्ची, तुम परीक्षा में पास हो गयी

सन् 1968 में पहली बार जब पार्टी लेकर बठिण्डा से मधुबन आयी तो बाबा ने कहा कि बच्ची, तुम्हें ग्वालियर जाना है। मैंने कहा, जी बाबा। बाबा ने पार्टी को मेरे बिना ही वापिस भेज दिया और मैं इधर से ही ग्वालियर चली गयी। कुछ समय पश्चात् बठिण्डा के भाई-बहनों ने मेरी वापसी के लिए बाबा को पत्र लिखने आरम्भ कर दिये। बाबा का राज़युक्त राज़ समझ में आया जब 15 जनवरी, 1969 को बाबा ने अपने हस्तों से मुझे पत्र लिखा कि बच्ची, तुम परीक्षा में पास हो गयी हो, तुम्हें बठिण्डा वापिस जाना है। यह पत्र मुझे बाबा के अव्यक्त होने के बाद 19 जनवरी को मिला। एक तरफ़ बाबा के अव्यक्त होने का समाचार था और दूसरी तरफ़ मेरी सफलता का स्नेह भरा बाबा का पत्र! कितने राज़युक्त थे ये कुछ दिन! वह पत्र मेरे लिए जीवन का वरदान बन गया। तब से अब तक मैं बठिण्डा सेवाकेन्द्र पर बाबा की सेवाओं पर तत्पर हूँ। यह भी एक राज़ है कि एक भी विघ्न इस सेवास्थान पर नहीं आया और निर्विघ्न सेवायें चल रही हैं।

पुष्पा बहन (हरियाणा)

वरदानी मूर्त बाबा भविष्य के ज्ञाता थे
कैथल, हरियाणा से ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी कहती हैं कि परम सौभाग्य की बात है कि मुझ आत्मा का ब्रह्मा बाबा के माध्यम से शिव बाबा संग मिलन सन् 1958 में करनाल सेवाकेन्द्र पर हुआ। उस अवसर पर बाबा पंजाब के कुछ सेवाकेन्द्रों का चक्कर लगाने आये थे। करनाल में भी उनका थोड़े समय के लिए आने का कार्यक्रम बना हुआ था। बाबा मुरली चलाकर क्लास के भाई-बहनों से मिलकर बाहर जाने के लिए निकले तो मुझे ऐसा आभास हुआ कि जीवन की कोई बहुत प्यारी चीज़ मिली है और शीघ्र बिछुड़ कर जा भी रही है। मैं अपनी सुध-बुध खो चुकी थी, जैसेकि ध्यान में थी। मित्र-सम्बन्धी भी बाबा से मिलने आये हुए थे, मेरे को जुदाई का अनुभव कर खूब प्रेम के आँसू आ रहे थे। बाबा कार में जाकर बैठ गये। जाते ही देहली से बाबा ने मुझे पत्र लिखा कि बच्ची को मैं बिलखता, रोता छोड़कर आया हूँ। बच्ची को धीरज देना और कहना कि मैं जल्दी लेने आऊँगा। यूँ तो कड़े कर्मबन्धन थे। कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कभी बन्धन टूटेंगे लेकिन ये महावाक्य साकार हुए जो बाबा ने मुझे अपनी सूक्ष्म शक्तियाँ वरदान में देकर जल्दी बन्धनमुक्त कराया और ईश्वरीय सेवा करने का भाग्य प्राप्त कराया।

वरदानी मूर्त बाबा भविष्य के ज्ञाता थे। मस्तक को देखकर बाबा कुछ कहते थे तो वह वरदान ही बन जाता था। एक बार मैं बाबा के सम्मुख खड़ी थी तो बाबा कुछ समय मेरे मस्तक की ओर देखकर बोले, बच्ची को जल्दी अनुभवी बनाऊँगा। पहले इसको दूर-दूर भेजूंगा फिर नज़दीक ले आऊँगा। ड्रामानुसार फिर मेरा कोलकाता और नेपाल की सेवाओं पर जाना हुआ। वहाँ मुझे अनेक अनुभव प्राप्त करने के अवसर मिले।

बच्ची, मैं तेरे साथ हूँ

पाँच वर्ष कोलकाता में सेवा की। उन्हीं दिनों नेपाल की सेवा का निमंत्रण मिला। बाबा ने पत्र लिखा कि बच्ची, नेपाल में जाकर अगर सेवा करेगी तो विश्व की महारानी बना दूँगा। बाबा की श्रीमत के अनुसार वहाँ चली गयी। कुछ समय पश्चात् सेवा में रूखापन और अकेलापन महसूस होने लगा। एक दिन ऐसी महसूसता हुई कि मैं यहाँ अकेली कैसे सेवा करूँगी। तो मुझे अचानक बाबा सम्मुख खड़ा दिखायी दिया और कहा कि बच्ची, मैं तेरे साथ हूँ। वरदानी हाथ मेरे ऊपर था और ऐसे महसूस हुआ कि बाबा मुझे कह रहे हैं कि बच्ची तेरे जीवन में तन-मन-धन की कभी कमी नहीं रहेगी, सर्व का सहयोग मिलता रहेगा। सचमुच उस दिन से आज तक कभी भी कोई कमी महसूस नहीं हुई। ईश्वरीय सेवाओं में हर प्रकार से भाई-बहनों का सहयोग मिलता आया है।

दयाशील और क्षमाशील बाबा

रहमदिल बाप यज्ञ-वत्सों को मुरली द्वारा शिक्षा भी देते और प्यार भी करते। कई बार ऐसा भी देखा कि किसी बच्चे से कोई भूल हो गयी और वह बाबा को बता रहा था कि बाबा मेरे से यह भूल हो गयी, आप क्षमा करना। उस समय बाबा प्यार का सागर बन बिल्कुल अनजान हो जाते थे जबकि बाबा को पता भी रहता था। बाबा कहा करते थे, बच्चे, आगे से नहीं करना। बाबा किसी बच्चे की भूल दिल पर नहीं रखते थे, सदैव शिक्षक बन शिक्षा भी देते थे और बाप बन अभूल हो प्यार भी देते थे। उस बच्चे के साथ व्यवहार में कोई भी अन्तर नहीं होने देते थे। बाबा सदैव निर्मानचित्त थे। सभी प्रकार की सेवायें करते थे परन्तु मैं पन का ज़रा भी भान नहीं था। हमेशा कहते थे- ‘बाबा करन-करावनहार है, बाबा करा रहा है’; कभी 'मैं' शब्द इस्तेमाल नहीं करते थे। इतने निरहंकारी थे बाबा!

गीता बहन जी

साधारण-सी सेवा करके भी बच्चों को खुश करने वाले असाधारण बाबा
बटाला की ब्रह्माकुमारी गीता बहन जी लिखती हैं कि मैंने बाबा को पहले पत्र लिखा और बेसब्री से इन्तज़ार करने लगी कि बाबा का लाल पेंसिल से लिखा हुआ पत्र ज़रूर आयेगा। कुछ ही दिनों में बाबा का पत्र मेरे पास पहुँचा तो उस समय ऐसा नशा छा गया जैसे स्वयं बाबा मेरे पास आये हैं। बाबा तो जानी-जाननहार थे जो पत्र में ही सारी जीवन-कहानी सुना देते थे। साथ में लिखा कि कन्याओं का कन्हैया आ गया है। उन शब्दों में इतना जादू भरा था कि उसका वर्णन क्या करूँ, शब्द ही नहीं मिलते हैं। अभी भी जब मैं बाबा का पत्र निकाल कर पढ़ती हूँ तो आँखों से छम-छम आँसुओं की धारा बह जाती है, जैसे साक्षात् बाबा मेरे सन्मुख आ खड़े हुए हैं।

आओ बच्ची, आओ

मैं रोज़ मुरली सुनने क्लास में जाती थी। एक दिन क्लास पूरी हुई तो अचल बहन जी ने मुझे कहा कि हम मधुबन जा रहे हैं। बाबा से मिलने की तड़पन बहुत थी लेकिन लौकिक बन्धन थे। मैं अपने घर में आकर बहुत रोने लगी। इतना रोया कि मेरी माँ को तरस आ गया और कहा कि अच्छा जाओ लेकिन जल्दी आ जाना। बस मेरी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। एक ही धुन थी कि अब तो बाबा से मिलने मधुबन जाऊँगी। मैंने अचल बहन जी को जाकर सुनाया कि मुझे मधुबन की छुट्टी मिल गयी है। उन्हें भी आश्चर्य हुआ। फिर तो वह दिन भी आ गया जब हम मधुबन के लिए रवाना हो गये। भले रास्ता लम्बा था लेकिन मेरे को कुछ भी पता नहीं चला और मैं मधुबन पहुँच गयी। जब बाबा से मिलने गयी तो उस समय बाबा आँगन में चारपाई पर बैठे थे। बाबा ने कहा, आओ बच्ची आओ, मैंने बाबा को देखा तो बाबा के मस्तक पर तेज प्रकाश दिखायी दिया। मैं अपनी सुध-बुध ही भूल गयी और मैं बाबा की गोदी में समा गयी। बाबा ने इतना प्यार-दुलार दिया जो कभी लौकिक में किसी ने भी नहीं दिया। बाबा ने मुझे वरदान दिया कि यह बच्ची बहुत सहनशील है। उसी वरदान से मैं आगे बढ़ती जा रही हूँ और उसी वरदान से पल रही हूँ। रोज़ बाबा अमृतवेले योग कराते थे और बच्चों को सर्चलाइट देते थे। जब मेरे पर दृष्टि पड़ी तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि बाबा की आँखें नहीं हैं लेकिन दो बल्ब जल रहे हैं और मैं इस दुनिया से पार प्रकाश की दुनिया में चली गयी।

बाबा यहाँ बहुत बड़ा म्यूजियम बनायेंगे

आबू में जहाँ अभी म्यूजियम बना हुआ है उसके सामने एक कोठी है, उसमें प्रदर्शनी लगायी गयी थी। बाबा भी प्रदर्शनी देखने गये। देखने के बाद बाबा आँगन में आये और कहा कि यह जो होटल बना हुआ है यह मकान हमें मिल जाये तो बाबा यहाँ बहुत बड़ा म्यूजियम बनायेंगे और इस म्यूजियम से बहुत बच्चों की सेवा होगी। बाबा के वे बोल भी साकार हो गये।

सभी बड़ी बहनें तो प्रदर्शनी समझाने चली जाती थीं, मैं बाद में जाती थी क्योंकि मुझे बाबा के संग में अच्छा लगता था और बाबा मेरी अंगुली पकड़कर स्टॉक रूम दिखाते, तो कभी कुछ दिखाते थे। मैं सोचती थी कि मैं तो छोटी हूँ, बाबा मुझे यह सब क्यों दिखाते हैं ? बाबा में जितनी परखने की शक्ति थी, उतने ही वे निर्मानचित्त थे। मैं बाबा के कमरे में बार-बार जाती थी और बाबा से मीठी-मीठी बातें सुनती थीं। बाबा मुझसे पूछते थे कि यह रथ किसका है? मैं कहती थी, शिव बाबा का है।

बाबा नहीं लेकिन साक्षात् श्रीकृष्ण को देखा

बाबा की प्रातः मुरली चलती तो हमेशा मुझे भृकुटी में शिव बाबा की लाइट दिखायी देती थी, कभी श्रीकृष्ण वा श्रीनारायण का स्वरूप दिखायी देता था। बाबा के बोल अथार्टी के होते थे और ऐसा लगता था कि शिव बाबा बोल रहे हैं। साथ ही ब्रह्मा बाबा का सम्पूर्ण स्वरूप दिखायी देता था। सचमुच मेरे बाबा सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण फ़रिश्ता दिखायी देते थे। बाबा की यह आन्तरिक स्थिति मैंने स्वयं अनुभव की थी और देखी थी।

एक बार जब मैं बाबा के कमरे में गयी तो वहाँ बाबा नहीं लेकिन साक्षात् श्रीकृष्ण को देखा। मैं बार-बार आँखें मलती रही कि श्रीकृष्ण है या बाबा! लेकिन काफी समय तक वह दृश्य सामने रहा और मैं अपने आपको भूल गयी। ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं श्रीकृष्ण के साथ रास कर ही हूँ। यही नशा काफी दिन तक रहा। मुझे अधिकतर श्रीकृष्ण का और शिव बाबा का साक्षात्कार होता था। साथ ही मैंने बाबा से सर्व सम्बधों का भी अनुभव किया। कभी बाबा को सखा-सखी के रूप में तो कभी टीचर के रूप में और कभी माँ के रूप में अनुभव किया।

ऐसे थे मेरे शक्तिशाली बाबा

एक बार की बात है कि मैं बाबा के पास बैठी थी। एक भाई कहीं लकड़ी काट रहा था। वह बाबा के पास आया और कहने लगा, बाबा, लकड़ी नहीं कट रही है। तो बाबा ने कहा, दुबारा काट कर देखो। थोड़े समय के बाद फिर वह भाई आया और बोला, बाबा, लकड़ी नहीं कट रही है। ऐसे तीन-चार बार आया और गया। अब बाबा उठकर उसके साथ चल दिये। मैं भी बाबा की अंगुली पकड़ कर साथ में चल दी। वहाँ जाकर बाबा बोले, अच्छा बच्चे यह लकड़ी नहीं कटती है? लाओ कुल्हाड़ी, मैं एक सेकण्ड में काट देता हूँ। बाबा ने कुल्हाड़ी ली और एक ही बार में उसके टुकड़े कर दिये। भाई बहुत खुश हो गया। ऐसे थे मेरे शक्तिशाली बाबा, जो हर कार्य सहज कर देते थे।

कन्याओं का प्यारा कन्हैया

बाबा कन्याओं को देख बहुत खुश होते थे और कन्याओं को रूहानी स्नेह दे, शक्ति भर, उन्हें ईश्वरीय सेवा में लगा देते थे। मेरे को अपने पर बहुत नाज़ है क्योंकि मुझे बाबा से इतना प्यार-दुलार मिला जिसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती। बाबा सदैव कहते, कन्यायें ग़रीब हैं, इन्हों के पास कुछ भी नहीं है, न सम्पत्ति है, न ही अधिकार। कन्या तो जैसे संन्यास-बुद्धि होती है। बाबा कन्याओं को प्यार और पालना दे ऊपर उठाते थे। बाबा कहते थे, यह मेरी बच्ची शक्ति स्वरूपा है, शेरनी शक्ति है, यह अनेकों का कल्याण करने वाली कल्याणी है। ऐसे वरदानी बोल से कन्याओं में बल भर देते थे।

उमा बहन

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश से ब्रह्माकुमारी उमा बहन जी कहती हैं कि बाबा से मैं पहली बार मधुबन में सन् 1964 में मिली। बाबा की दृष्टि पड़ते ही मुझे लाइट ही लाइट नज़र आयी और इतना आकर्षण हुआ कि मैं चुम्बक की तरह खिंचकर गोदी में चली गयी। फिर बाबा मुझे कभी कृष्ण का रूप दिखायी देने लगे, कभी लाल-लाल लाइट में ज्योतिबिन्दु शिव बाबा। फिर बाबा बोले, ‘यह बच्ची सेवाधारी बच्ची है, बहुत सेवा करेगी, बहुतों का कल्याण करेगी।’ फिर बाबा ने पूछा, ‘बच्ची, तुम लक्ष्मी बनोगी या नारायण बनोगी?’ मैंने कहा, ‘लक्ष्मी-नारायण जैसा बनूँगी।’ बाबा ने कहा, ‘बच्ची, आपको पुरुषार्थ बहुत करना पड़ेगा।’ मैंने कहा, ‘जी बाबा।’ जब बाबा, 'बच्ची' शब्द बोलते थे तो वो आवाज़ ऐसी लगती थी जैसेकि आकाश के पार से आयी हो और मैं जैसे ऊपर उड़ जाती थी। बाबा भी दुनिया से निराले फ़रिश्ता रूप दिखायी देते थे। बाबा को देखते ही यह साकार दुनिया भूल जाती थी, जैसेकि फ़रिश्तों की दुनिया में घूम रहे हैं।

मुझे ऐसा लगता था- मैं श्रीकृष्ण के साथ चल रही हूँ

एक बार मैं बाबा के कमरे में गयी तो बाबा चारपाई पर लेटे हुए थे और शिव बाबा से बातें कर रहे थे। बाबा शिव बाबा की याद में मगन थे। मैं जाकर बैठ गयी। थोड़ी देर के बाद बाबा ने कहा, ‘बच्ची कब आयी? बाबा तो शिव बाबा से रूहरिहान कर रहा था।’ बाबा ने कहा, ‘बच्ची, शिव बाबा की याद में बहुत रहना, आगे बड़ा नाजुक समय आने वाला है। योग ही बहुत काम करेगा।’ यह सन् 1964 की बात है। उस समय हम 15 दिन मधुबन में रहे थे और रोज़ बाबा हम सभी भाई-बहनों को नक्की लेक (झील) घुमाने ले जाते थे। बाबा मेरी उँगली पकड़कर चलते थे तो मुझे ऐसा लगता था कि मैं श्रीकृष्ण के साथ चल रही हूँ।

सन् 1966 की बात है, मैं एक सेठ के परिवार को बाबा के सम्मुख लायी और बाबा को कहा, ‘यह बड़ा सेठ है।’ सेठ ने जब बाबा को देखा तो उसे शिव बाबा का साक्षात्कार हुआ और सेठ ने कहा, ‘जो पाना था सो पा लिया क्योंकि मैं तो भटका हुआ था।’ फिर बाबा ने मुझ से कहा, ‘बच्ची, इसकी यहाँ अच्छी खातिरी करना, जिससे यह वहाँ जाकर बहुत सेवा करेगा।’ यहाँ से जाने के बाद वह यज्ञ की तन-मन-धन से बहुत सेवा करने लगा।

बाबा के अन्दर परख शक्ति बहुत थी

सन् 1967 में एक पार्टी को लेकर आयी तो उसमें दो कुमार थे। बाबा पार्टी से मिल रहे थे। सबसे मिलने के बाद एक कुमार से बाबा ने पूछा, ‘बच्चे, एक कन्या बहुत सहन कर रही है, उसके माँ-बाप शादी करना चाहते हैं लेकिन वह पवित्र रहना चाहती है, तो क्या तुम उस कन्या से गंधर्व विवाह करोगे? उस कुमार ने 'ना' कहा। दूसरा कुमार यह सुन रहा था लेकिन बाबा ने उसे कुछ नहीं कहा। वह बाहर आकर उस कुमार से बोला अगर बाबा मेरे से पूछता तो मैं ज़रूर 'हाँ' कर लेता। तो उस कुमार ने कहा कि बाबा के अन्दर परख शक्ति बहुत है जो हर आत्मा को परख कर ही बोलते हैं। बाबा के अथाह रूहानी प्यार ने इतना खींचा जो वो दिन आज भी याद आते हैं। साकार पालना के दिन भूलाने से भी नहीं भूलते हैं, अन्दर रोम-रोम में बसे हुए हैं। ब्रह्मा बाबा तो शिव बाबा का साकार रूप ही थे। मुझे साकार बाबा चलते-फिरते शिव बाबा ही नज़र आते थे। ‘तुम्ही संग खाऊँ, तुम्ही संग बैठूं…’ ये सब खेल इन आँखों से देखे!

कमला बहन

पटियाला, पंजाब से ब्रह्माकुमारी कमला बहन जी कहती हैं कि सन् 1958 में करनाल सेवाकेन्द्र पर पहली बार मैं बाबा से मिली। बाबा सिर्फ एक घण्टे के लिए करनाल आये थे। उस समय मेरी उम्र 10 वर्ष की थी। बाबा क्लास में सभी भाई-बहनों से मिले। मैं भी बाबा को देखती रही लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। परन्तु देखते ही ऐसा लगा कि मन को खींचने वाली न्यारी और प्यारी हस्ती ज़रूर है। घर में बन्धन भी बहुत थे परन्तु बाबा की पहली ही झलक से इतना आकर्षण बढ़ गया कि नैनों में आँसू आ गये। बैठे-बैठे मुझे ऐसे लगा जैसेकि कोई फ़रिश्ता आया और गया। इससे और ही मिलन की तड़पन बढ़ गयी।

जब मैं मधुबन आयी तो झोपड़ी में बाबा से बहुत ही समीपता से मिलन हुआ। मुझे बाबा ने बहुत स्नेह और शक्ति भरी दृष्टि दी तो मैं बाबा की बाहों में समा गयी और मुझे ऐसे अनुभव हुआ कि 15 वर्षों के बन्धनों और संघर्षों से थकी हुई आत्मा तन-मन का विश्राम पाकर एकदम हल्की हो गयी। प्यारे बाबा ने अपनी अलौकिक शीतल गोदी में समाते हुए बोला, ‘आओ मेरी बहादुर बच्ची आओ’ आगे कहा, ‘तुम्हें बहती गंगा बनना है।’ मैं सोचने लगी कि यह कैसे होगा? तुरन्त बाबा ने कहा, ‘अगर तुम सोचती रहोगी तो मैं भी सोचकर वर्सा दूँगा।’

हिम्मते बच्चे, मददे बाप

मैं बहुत डरपोक थी। पिताजी से छुट्टी लेने की हिम्मत नहीं होती थी। उनका ही बन्धन बहुत कड़ा था। मेरा पूरा लक्ष्य सेवा में समर्पित होने का ही था परन्तु यह कैसे होगा, कब होगा यह सोचती रह जाती थी। दूसरी मेरी कमी यह थी कि अगर मैं रूहानी सर्विस में जीवन लगाऊँ तो मुझे किसी के आगे बोलना, भाषण करना बड़ा कठिन लगता था। लेकिन कुछ दिन बाबा के सान्निध्य में रहने से निर्भय और निश्चिन्त बाप ने मुझे निर्भय बना दिया और इन वरदानों ने मेरे स्वप्न को बहुत जल्दी साकार कर मुझे निश्चिन्त बना दिया।

मैंने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो, अपने को निर्बन्धन करना ही है। मधुबन से जाने के बाद लौकिक पिताजी ने बी.ए. करने को कहा और यह भी कहा कि तुम्हें आगे पढ़ना है। लेकिन अब मेरा लक्ष्य पढ़ने का नहीं था। एक दिन पिताजी एम.ए. का फार्म लेकर आये और कहा, ‘यह फार्म भरो।’ मैंने कहा, ‘अब मुझे नहीं पढ़ना है।’ इतना कहते ही पिताजी ने बड़े गुस्से से कहा, ‘यहाँ से जाओ, जहाँ मर्ज़ी धक्के खाओ’ और गुस्से से फार्म फाड़ दिया। मैंने बड़ी नम्रता और हिम्मत से कहा, ‘पिताजी, यह तो समय बतायेगा कि हम धक्के खायेंगे या धक्के खाने वालों को धक्कों से छुड़ायेंगे।’ उसके बाद पिताजी ने मुझसे बोलना छोड़ दिया लेकिन मैं उनसे हर बार प्यार से बोलती रहती थी। मैं छिपकर आश्रम में जाती रहती थी।

एक दिन पिताजी को पता चल गया तो गुस्से से बोले, ‘तुमने फिर आश्रम जाना शुरू कर दिया?’ मैंने कहा, ‘मैं तो आश्रम ज़रूर जाऊँगी’; क्योंकि मुझे बाबा ने कहा था कि 'मेरी बहादुर बच्ची आओ' यह वरदान याद आते ही मेरी हिम्मत बढ़ती गयी। ऐसी विकट परिस्थिति बन गयी कि पिताजी ने कहा, या तुम घर में रहो या मैं घर में रहूँगा। वे एक मास के लिए घर से निकल गये। एक मास के बाद वापिस घर पर आ गये लेकिन मुझे कोई घबराहट नहीं हुई। यह मन में आता रहा की कुछ भी नहीं होने वाला है और बाबा का वरदान बार-बार याद आता रहा। उसके बाद मैं रोज़ आश्रम जाती रही और ऐसा समय आया कि मैंने बन्धन को तोड़ अपने जीवन को बाबा की रूहानी सेवा में समर्पित कर दिया।

वे सब बिना कुछ कहे, शान्ति से चले गये

एक बार की बात है कि पटियाला में दंगे हो रहे थे। एक दिन कुछ उग्रवादी रात को 11 बजे सेन्टर पर आ गये। गेट खटखटाया और बोले, ‘गेट खोलो।’ हम पाँच बहनें थीं। हमने कहा, ‘नहीं खोलेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हम गेट तोड़ देंगे।’ वे अड़े रहे कि गेट खोलना ही पड़ेगा। मुझे बाबा का दिया हुआ वरदान याद आया 'बहादुर बच्ची आओ।' मैंने बहनों को कहा, लाल लाइट जला दो और सभी बाबा के कमरे में योग में बैठ जाओ। जैसे ही मैंने गेट खोला वैसे ही वे बड़ी तेज़ी से अन्दर आ गये और हॉल में चले गये। हॉल में सामने ही बाबा का चित्र लगा था। बाबा के चित्र के सामने जाते ही वे सभी एकदम शान्त खड़े रहे। उसके बाद बाबा के कमरे की ओर बढ़े। वहाँ उन्होंने देखा कि बहनें योग में बैठी हैं और वहाँ डेड साइलेन्स थी।

मुझे प्यारे बाबा का वरदान शक्तिशाली बना रहा था। वह 12 लोगों का ग्रुप था और उनकी बड़ी भयानक शक्लें थीं। वे वापिस लौटे तो मैंने उन्हें कहा, ‘यह आप सबके परमपिता परमात्मा शान्तिदाता का घर है।’ इतना सुनते ही वे सब बिना कुछ कहे शान्ति से चले गये।

हम सब आपके भाई हैं, कभी हमारी ज़रूरत हो तो ज़रूर हमें याद करना

एक बार फिर उग्रवादियों का दूसरा ग्रुप आया। वे अन्दर आये और काफी प्रश्न किये। हमने भी बड़े धैर्य से बाबा की याद में उनको उत्तर दिये। बाद में उनको बाबा का और आत्मा का परिचय दिया। अन्त में उन्होंने कहा, ‘हम आपके भाई हैं, आपको कोई कुछ कह नहीं सकता। कभी हमारी मदद की ज़रूरत हो तो अपने भाइयों को याद करना।’ मैंने उन्हें कहा हम सर्वशक्तिवान वाहे गुरु की छत्रछाया में हैं, हम सदा सुरक्षित हैं। सचमुच उनके जाने के बाद यही अनुभव रहा कि मीठे बाबा ने ही मुझे शक्तिशाली बनाया। ऐसी आत्माओं का भी बड़े धैर्य से सामना करने की युक्ति और शक्ति दी बाबा ने। वह वरदान याद करते हुए प्यारे बाबा के प्रति कृतज्ञता से आँखें भर आयीं, नैनों से मोती छलक पड़े। कहाँ निर्बल, डरपोक आत्मा को भी बाबा ने सहारा देकर शक्तिशाली बना दिया।

जब मैं मधुबन आयी थी तो उस समय मुझे बाबा ने एक बहुत सुन्दर सफ़ेद कमीज़ दी थी, जिस पर बड़ी सुन्दर कढ़ाई की हुई थी। वह शर्ट मैंने कई वर्षों तक पहनी। फटी हुई भी सम्भालकर रखी और बाबा के वे बोल याद आते रहे कि बच्ची मैंने तुम्हें यह सफ़ेद कढ़ाई वाली शर्ट क्यों दी? बाबा बोले सदा सजे-सजाये रहना। (यह राज़ बाद में समझ में आया।) हम मधुबन में आये थे। उस समय बाबा को कमर में दर्द हो गया था जिसे चुक पड़ना कहते हैं। मैंने बाबा से कहा, ‘बाबा, हमारी लौकिक माताजी चुक ठीक करती है।’ बाबा ने कहा, ‘बुलाओ बच्ची को।’ मैंने माताजी को बुलाया। फिर बाबा ने सबको कहा, ‘आज बच्ची बाबा की चुक निकालेगी।’ माताजी ने कहा कि चुक सूर्योदय होते ही और सूर्यास्त के समय ही निकाली जाती है। अभी जो शान्ति स्तम्भ बना है उस समय वहाँ टेनिस कोर्ट था, उसी ग्राउण्ड में बाबा को आगे-आगे दौड़ना था, पीछे मुड़कर नहीं देखना था। यह दृश्य भी बड़ा रमणीक और आनन्ददायक था। बाबा की चुक निकल गयी, दर्द ठीक हो गया। बाबा बोले, ‘बच्ची, तुमने बाबा के रथ को ठीक किया, बाबा सदा तुम्हारे दुःख हर लेगा।’ बाबा के वे बोल वरदान बन गये और हम सब बन्धनमुक्त हो गये। सब बन्धन सहज ही समाप्त हो गये। दर्द तो जैसे अलौकिक चरित्र था। सखा रूप में बाबा के संग अतीन्द्रिय सुख पाने के वे स्वर्णिम पल थे। बाबा जब दौड़ रहे थे तो ऐसा लगा जैसे कि श्रीकृष्ण अपनी बाल-लीलाओं से हम सबको रिझा रहा है। वे सुखद पल कभी नहीं भूलते।

बाबा के शरीर छोड़ने से 6 मास पहले मैं मधुबन आयी थी। मैं क्लास में बैठी थी, बाबा आये और सन्दली पर बैठ गये। बाबा एक-एक को दृष्टि देने लगे, मैं बाबा के मस्तक पर बड़ी सुन्दर ज़ोरदार सफ़ेद ज्योति चमकती देख रही थी। मैंने बार-बार कोशिश की कि यह क्या देख रही हूँ। आँखों को बार-बार हाथ से मला और सोचा कि यह मेरा संकल्प है या वास्तविकता! परन्तु मैंने अनुभव किया कि वह ज्योति इतनी बड़ी होती गयी कि बाबा का साकार रूप उस में छिप गया, दिखायी ही नहीं दिया। ऐसा लगा कि ब्रह्मा बाबा शिव बाबा के समान बन गये। वह स्वरूप आज भी याद आता है तो जैसेकि मैं अपने में शक्ति का अनुभव करती हूँ। बाबा का सबसे अच्छा गुण, जिसे मैं हमेशा ध्यान में रखकर चलती हूँ, यह लगा कि बाबा निराधार बनकर सबका आधार बना। बाबा का निश्चय अटूट, स्थिति अचल, अडोल और एकरस थी।

बाबा से मिले हुए वरदानों को अपना विशेष ख़ज़ाना, विशेष अधिकार, विशेष कृपा और सौभाग्य समझ अपने को धन्य मानती हूँ। डायरेक्ट भगवान के दिव्य चरित्रों को मैंने इन चर्म चक्षुओं से देखा है। यह मेरा परम सौभाग्य है और यह कल्प-कल्प की नूँध मुझे सदा ईश्वरीय नशे में मगन कर देती है।

साकार मिलन के वे सुनहरे पल अपार खुशी की लहरों में मस्त और व्यस्त कर देते हैं। मन आनन्द विभोर हो जाता है और इस फ़िकर की दुनिया से दूर बहुत दूर, उस बेहद की दुनिया में खो जाता है।

विद्यासागर भाईजी

दिल्ली से ब्रह्माकुमार विद्यासागर भाई जी कहते हैं कि प्राण प्यारे साकार बाबा से मेरा प्रथम मिलन मई 1964 में माउण्ट आबू में हुआ। मिलन के समय दिल्ली के अन्य भाई-बहनें भी मधुबन हिस्ट्री हॉल में मेरे साथ थे। एक-एक करके सभी भाई-बहनें जो मेरे साथ थे, बाबा से मिले। जब मैं बापदादा की गोद में गया तो आभास हुआ कि मैं विदेही और हल्का हो गया हूँ। ऐसा प्रतीत हुआ कि परमात्मा जो असंख्य मील दूर थे, वे मेरे सामने हैं और अपनी श्वेत किरणों से मुझ आत्मा को धो रहे हैं। वास्तविक रूप से साक्षात् पिता रूप का अपरम-अपार स्नेह व शक्तियों का वरदान प्राप्त हुआ जिसकी बदौलत आज 40 वर्षों से ज्ञान में हूँ। ज्ञानमार्ग में कभी भी निराशा का एहसास नहीं हुआ और पवन-पुत्र हनुमान की तरह हर कार्य में सफलता एवं उत्साह का अनुभव किया।

विकट परिस्थिति में बाप का साथ

सन् 1969 में मैं नेपाल में लौकिक सेवा पर उपस्थित था। वहाँ भी हर रोज़ प्रातः एवं रात्रि कार्य-स्थान पर ही नेपाली भाई-बहनों के साथ क्लास करता था। तब नेपाल में इस ज्ञान-प्रचार की शुरूआत थी। लौकिक सर्विस सिविल इंजीनियर की होने के नाते एक बहुत बड़ी सड़क (राजमार्ग) बनवाने हेतु मुख्य शहर विराट नगर से 75 किलोमीटर दूर जंगलों में मेरी पोस्टिंग (नियुक्ति) हुई।
उस समय नेपालवासियों में, कई पंडितों और रूढ़िवादियों ने इस ज्ञान के बारे में भ्रांतियाँ यहाँ तक फैला दीं कि वे लोग मुझे जान से मारने को तैयार हो गये थे। नेपाल में विश्वकर्मा पूजा-दिवस बड़े धूमधाम एवं उत्साह से मनाया जाता है। विश्वकर्मा पूजा के दिन भारतीय कॉलोनी में रात्रि को एक बड़ा रोचक कार्यक्रम रखा गया। इस कार्यक्रम का आनन्द लेने के लिए नेपाली लोग भी शामिल होते थे। जो नेपाली लोग मेरी हत्या करने की सोच रहे थे उनके लिए यह सुन्दर अवसर था। मैं बिल्कुल अनभिज्ञ था। जो नेपाली भाई नित्य रात्रि क्लास करते थे, वे उस दिन कुछ अन्य नये भाइयों को अपने साथ लाये और मुझे कहा कि पहले आप इन्हें ज्ञान सुनाइये, तत्पश्चात् यह विश्वकर्मा कार्यक्रम देखेंगे।

मैंने नये व्यक्तियों को आत्मा और बाबा का परिचय देकर योग की विधि बताना आरम्भ किया तो अचानक ही बहुत तेज़ हवा चली, बादल आये, मूसलाधार वर्षा हुई और विश्वकर्मा कार्यक्रम रद्द हो गया। अगले दिन मुझे वहाँ के विश्वसनीय व्यक्ति से मालूम पड़ा कि उस कार्यक्रम में मुझे प्यार से ले जाकर मारने की योजना 100% तय थी। उसने कहा कि बाबूजी, मुझे यह समाचार उस समय पता पड़ा जब मैं रात्रि विश्राम करने जा रहा था। यह परम सत्य है कि मैं बाबा का हूँ और बाबा मेरा है। वह मेरा पिता भी है और रक्षक भी और रहेगा भी।

बापदादा सदा इकट्ठे ही महसूस होते थे

ऐसे मैं कभी नहीं कहूँगा कि ब्रह्मा बाबा या शिव बाबा अलग होते थे। बापदादा सदा इकट्ठे ही महसूस होते थे। शायद जब बाबा अपने रथ को साफ़-सुथरा करते हों उस समय अलग हों तो मैं कह नहीं सकता। अन्यथा दोनों साथ थे। शिव बाबा नयी दुनिया की स्थापना का कार्य ब्रह्मा द्वारा ही करते हैं। कभी साकार ब्रह्मा द्वारा, कभी अव्यक्त ब्रह्मा द्वारा ये अद्भुत अनुभव हैं। हर योगी-आत्मा इसको अपने पुरुषार्थ अनुसार ही महसूस करती है। शिव बाबा बिना साकार रथ के तो कोई कार्य नहीं करते। अव्यक्त ब्रह्मा द्वारा भी कार्य करते थे जहाँ साकार नहीं पहुंच सके।
हर प्रकार से बाबा ने मेरी पालना की है और कर रहे हैं। मेरे मात, पिता, बन्धु, सखा, शिक्षक, स्वामी, सतगुरु, खिवैया, बच्चा सब कुछ वही हैं। मैं सन्तुष्ट हूँ, खुश हूँ। आखिर में यही कह सकता हूँ:
“तुझको पाकर बाबा मैंने सुख सारा पा लिया
पाने को अब कुछ ना रहा जब तुझको पा लिया।
बाबा आज भी तुम कर्म अपना कर रहे हो
आसमाँ से छत्रछाया हम पर कर रहे हो।
माता बनकर गोद देते, पिता बनकर वर्सा देते
इस तन में आकर दोनों मिले इक बाबा है, इक दादा।”

अवधेश नन्दन भाईजी

ऋषिकेश के ब्रह्माकुमार अवधेश नन्दन कुलश्रेष्ठ कहते हैं कि मैं सन् 1962 में ब्रह्माकुमारी संस्था के सम्पर्क में आया और इसका साप्ताहिक कोर्स पूरा करने के बाद यह महसूस हुआ कि यही सत्य ज्ञान है और सत्य मार्ग है। इस कारण मैं ईश्वरीय सेवा में लग गया। ज्ञान में आने के लगभग दो वर्ष बाद बाबा से मिलने के लिए बाबा की एक कल्पित छवि को संजोये मधुबन पहुँच गया। मिलन की प्रतीक्षा में हम सभी क्लास हॉल में बैठ गये। कुछ समय के बाद बाबा ने हॉल में प्रवेश किया और सन्दली पर बैठ गये। कुछ क्षणों में ही मैं तो हक्का-बक्का रह गया क्योंकि उस तन में निराकार, सर्वशक्तिमान शिव परमात्मा को प्रवेश करते हुए इन आँखों से देखा। मैंने अपने जीवन में इतना सुन्दर, आकर्षक, सलोना, दिव्य, अलौकिक व्यक्तित्व कभी नहीं देखा। उस व्यक्तित्व की दृष्टि का वर्णन करने के लिए तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं।

उन क्षणों की स्मृति मात्र से ही एक अनोखी भीनी-भीनी परम पवित्रता की महक से आज भी मन आनन्दित हो जाता है। उस गुप्त परमानन्द को अपने जीवन की परम पूँजी के रूप में मन में संजोकर रख लिया। उस प्यार के सागर की नज़र के लिए यह ज़रूर कहा जा सकता है कि तेरी एक नज़र पर कुर्बान जाऊँ। सचमुच मैं तो कुर्बान हो ही गया। जब बाबा दृष्टि दे रहा था, वह भाव-भंगिमा अवर्णनीय थी। उस दृष्टि में स्नेह, शक्ति और आत्मीयता भरी हुई थी। उसके बाद उस सलोने मुख से प्यार भरे 'मीठे-मीठे बच्चों' इन शब्दों का उच्चारण हुआ और हम प्यार के सागर में समा गये। हम आज तक सुनते तो हैं कि परमात्मा प्यार का सागर है किन्तु उसके प्यार का अनुभव और उसका जादुई प्रभाव क्या होता है, उसका सम्पूर्ण अनुभव किया और अपने भाग्य को सराहा कि "वाह मेरा भाग्य, वाह!"

एक दिन हमें कहा गया कि आज कब्रिस्तान का प्रोग्राम है तो मुझे बड़ा आश्चर्य लगा कि यह क्या प्रोग्राम है! फिर टीचर बहन ने कहा कि इस प्रोग्राम को कब्रिस्तान इसलिए कहते हैं कि यज्ञ के आदि में यज्ञ वत्सों को बाबा सागर किनारे ले जाते थे और सबको सीधा एक मुर्दे की तरह बिना हिले शिव बाबा की याद में सोने के लिए कहते थे और स्वयं खड़े होकर शक्तिशाली दृष्टि से सकाश दे एक-एक को ट्रान्स में भेज देते थे। ये अपने आप में एक चमत्कार था क्योंकि जो ट्रान्स में जाते थे उनके पैर ऐसे हिलते थे जैसे नृत्य कर रहे हों। उन्हें अंगुली का सहारा दे उठा देते थे तो बहुत सुन्दर रास करना शुरू कर देते थे। ऐसे धीरे-धीरे जो कब्रिस्तान था वह सुन्दर रासमण्डल में बदल जाता था, जैसेकि फ़रिश्तों की सुहानी छटा से सूक्ष्मलोक बन जाता था। इसी प्रकार हमें भी सीधा सुला दिया और बाबा शक्तिशाली दृष्टि देने लगे और धीरे-धीरे हम सभी ट्रान्स की अवस्था में चले गये और ऊपर की दुनिया के अलौकिक, अनोखे चरित्रों का अनुभव करने में मगन हो गये। यह भी मेरा सौभाग्य था। ऐसे कई दिव्य अनुभव बाबा के संग रहकर किये। इसलिए दिल से निकलता है कि वाह बाबा, वाह!

सुरेश पाल भाईजी

शिमला से ब्रह्माकुमार सुरेश पाल भाई जी लिखते हैं कि मैंने पहले अपनी लौकिक बड़ी बहन जी से ईश्वरीय ज्ञान सुना था। एक बार 27 मार्च, 1963 के दिन अचानक अपनी ही प्रेरणा से दिल्ली, विजय नगर सेवाकेन्द्र पर जाना हुआ। जैसे ही मैंने सेन्टर में प्रवेश किया बाबा का चित्र देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि जो पाना था सो आज पा लिया। फिर एक माताजी से परिचय हुआ। माताजी ने आत्मा, परमात्मा का सत्य परिचय दिया, उसके थोड़ी देर बाद जैसे ही वहाँ की इंचार्ज बहनजी आयीं तो उनके द्वारा मुझे देवी का साक्षात्कार हुआ और मेरी आश पूरी हो गयी। बस उसी दिन से मैं ईश्वरीय सेवा में तत्पर हूँ।

मधुबन जाकर बाबा से मधुर मिलन मनाने में एक अनोखा अनुभव प्राप्त किया।

2 अगस्त, 1965 को पहली बार मधुबन गया। मधुबन में जैसे ही प्रवेश किया गेट पर विश्वरतन दादा जी ने मुझे गले लगाया और बहुत प्यार किया। मैंने सोचा कि यही वह ब्रह्मा बाबा है जिनका चित्र मैंने देखा था परन्तु उसी दिन सायंकाल को बाबा साधारण वेष में मिले तब अच्छी तरह पहचान हुई। दूसरे दिन जैसे ही बाबा से मुरली सुनी, विश्वास हुआ कि परमपिता परमात्मा द्वारा जो ज्ञान सुनाया जा रहा है, यह वही सच्चा गीता ज्ञान है।

बाबा हर कार्य में अथक थे।

जब पहली बार बाबा से मुलाक़ात हुई तो ऐसे लगा जैसेकि बहुत दिनों के बाद मिला हूँ। मैं फिर बाबा के चरणों में झुका तो बाबा ने एकदम स्नेहपूर्वक उठाकर गले से लगाया और कहा ‘बच्चे, किसी के आगे झुकना नहीं। आप तो बालक सो आने वाली सृष्टि के मालिक हो।’ बाबा से बहुत स्नेह मिला और मन में ऐसे आया कि जो इच्छा थी वह आज पूर्ण हो गयी। सच्चा बाप इस धरती पर मिल गया। पन्द्रह दिन बाबा के संग रहा, बाबा से बहुत-बहुत प्यार पाया। बाबा कर्मयोगी थे। एक दिन बाबा मुझे अंगुली पकड़कर एक कमरे में ले गये जहाँ से कुछ सामान दूसरे कमरे में रखना था। बाबा और मैं सामान उठाने लगे, थोड़ी देर बाद मैं थक गया परन्तु बाबा फिर भी लगे रहे, वे थके नहीं। बाबा हर कार्य में अथक थे।

बच्चे, ऐसे बहुत लोग आयेंगे, इनके चक्कर में नहीं आना

बाबा से फिर शिमला सेन्टर के बारे में बात की। बाबा ने कहा, हाँ बच्चे, ज़रूर सेवाकेन्द्र भी खुलेगा। सन् 1969 में शिमला में सेवाकेन्द्र भी खुल गया। एक बार मैं दिल्ली से शिमला पहुंचा था। उतने में एक बुज़ुर्ग मेरे पास आकर बैठा और कहने लगा कि दिल्ली में मेरी बहुत जायदाद है, मैं आपको बेटा बनाना चाहता हूँ। वह दो-तीन दिन लगातार मेरे पास आता रहा। फिर मैंने बाबा को पत्र लिखा तो बाबा ने लिखा, ‘बच्चे, ऐसे बहुत लोग आयेंगे, इनके चक्कर में नहीं आना।’

मुझे बाबा ने इस ज्ञान-यज्ञ में सेवा करने का सौभाग्य दिया है। इससे बड़ा भाग्य और कौन-सा हो सकता है!

राज बहन (अमृतसर)

अमृतसर से ब्रह्माकुमारी राज बहन जी अपने ईश्वरीय अनुभव सुनाती हैं कि सन् 1954 की बात है। पवित्रता तथा खान-पान की धारणाओं के कारण लोगों के मन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रति भ्रान्तियाँ थीं। उन भ्रान्तियों का असर हमारे परिवार वालों पर भी बहुत था। मेरे लौकिक भाई (आत्मप्रकाश जी, जो वर्तमान समय शान्तिवन में ज्ञानामृत और साहित्य प्रकाशन का कारोबार सम्भालते हैं) को सबसे पहले ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति हुई लेकिन भ्रान्तियों का असर होने के कारण हमारे परिवार में कोई भी ज्ञान सुनने में रुचि नहीं रखता था। लेकिन आत्मप्रकाश भाई जी को बाबा ने वरदान दिया था कि यह बच्चा श्रवण कुमार बनकर अपने माता-पिता को ज्ञान की बैगी में बिठाकर सच्ची तीर्थयात्रा करायेगा। सो आत्मप्रकाश भाई जी के अथक परिश्रम तथा बाबा के वरदान ने ऐसा रंग लाया कि परिवार के सभी सदस्य ज्ञान में रुचि लेने लगे।

रूहानियत का पाठ पढ़ाकर बाबा ने मुझे शहंशाह बना दिया

मेरी आयु उस समय मात्र 13 वर्ष की थी। मुझे भी ज्ञान सुनाया गया लेकिन आयु छोटी होने के कारण ज्ञान की समझ उस समय नहीं आयी। हमारे घर में साकार बाबा और मम्मा के चित्र लगे हुए थे। उन चित्रों को देखकर मुझे इतना रुहानी आकर्षण होता था कि उसी ने मेरे जीवन को अलौकिक रंग में रंग दिया। लेकिन जब मैंने साक्षात्कारमूर्त बाबा को पहली बार मधुबन में देखा तो मन गा उठा- "इतना अतीन्द्रिय सुख देगा कौन, इतना प्यार करेगा कौन !" जब बाबा ने मुझसे पूछा, बच्ची, आपका क्या लक्ष्य है? तो मैंने अपने भोलेपन में कह दिया कि बाबा मैं तो पढ़कर डॉक्टर बनूँगी, नौकरी करूंगी। मेरा यह संकल्प था कि नौकरी करके तन-मन-धन से यज्ञ की सेवा करूंगी क्योंकि ज्ञान की धारणाओं के कारण घर में विपरीत वातावरण देखकर यज्ञ में समर्पित होकर रहने का मेरा कोई लक्ष्य नहीं था। लेकिन स्नेह के सागर बाबा ने बड़े ही स्नेह से मुझे समझाया, बच्ची, ब्रह्मा की बेटी, शिव की पौत्री को नौकरी करने की क्या दरकार है? बाबा आये हैं रूहानी डॉक्टर बनाने। सतयुग में तो यह जिस्मानी डॉक्टर होंगे ही नहीं। बाबा तो आये हैं विश्व की महारानी बनाने। बच्ची, रूहानी गवर्नमेण्ट की नौकरी करनी है, जिस्मानी गवर्नमेण्ट की नहीं। जब बाबा मेरे साथ ज्ञान की टिकलु-टिकलु कर रहे थे तो मेरा मन अन्दर ही अन्दर बड़ा गदगद हो रहा या कि बाबा छोटे बच्चों पर भी अपना कितना प्यार बरसाते हैं! बाबा को बच्चों से और बुजुर्गों से बहुत प्यार था। अलौकिक माली साकार बाबा को शिव बाबा के अलौकिक चेतन बगीचे के चेतन फूलों को ज्ञानजल से सींचते देखा।

मैं जब मम्मा-बाबा दोनों से मिल रही थी तो मम्मा ने पूछा, बच्ची, आपका यज्ञ में समर्पित होने का लक्ष्य क्यों नहीं है? मैंने मम्मा से कहा कि मम्मा, सहन करना पड़ता है। मम्मा-बाबा ने मुझे बहुत मीठी समझानी दी कि बच्ची, किस क्षेत्र में सहन नहीं करना पड़ता? शादी करके पति का सहन करना पड़ता है। नौकरी करते मालिक का सहन करना पड़ता है। अगर भगवान के यज्ञ में सहन कर लेंगे तो 21 जन्मों के लिए अर्थात् 2500 वर्षों के लिए विश्व की बादशाही मिलेगी। मम्मा-बाबा की इस मीठी शिक्षा ने पहली मुलाक़ात में ही मेरे मन को परिवर्तित कर दिया। मैंने यज्ञ में समर्पित होने का लक्ष्य ले लिया।

बाबा में परखने की शक्ति, निर्णय करने की शक्ति इतनी थी कि बाबा किसी बात को बिना बताये ही कैच कर लेते थे और बच्चों को आगे बढ़ने की शिक्षा देते ये। बाबा ने मुझे कहा कि आपको अमृतसर सेवाकेन्द्र पर जाना है। चतुर सुजान बाबा ने मेरा अमृतसर जाने का पक्का भी किया और साथ में यह भी कहा कि पत्र में बाबा आपको दिल्ली जाने के लिए लिखेगा क्योंकि मेरे लौकिक भाई जी उस समय दिल्ली में रहते थे। मेरे लौकिक पिता जी का भी यही विचार था कि मैं दिल्ली में रहूँ। जब बाबा का पत्र आया कि बच्ची दिल्ली जाये तो लौकिक पिता जी कहने लगे कि बाबा ने दिल्ली जाने के लिए पत्र में लिखा है। लेकिन चतुर सुजान बाबा ने तो मुझे पहले से ही अमृतसर जाने के लिए समझानी दे रखी थी। मैं अमृतसर सेवाकेन्द्र पर सेवा के लिए चली गयी। एक बार अमृतसर सेवाकेन्द्र पर शारीरिक कर्मभोग का पेपर आया। जब बाबा को पता चला तो स्नेह के सागर बाबा ने मुझे मधुबन बुला लिया और इतने प्यार से मेरी देखभाल की कि आज भी उन स्मृतियों को ताजा करते ही नैन स्नेह के मोतियों से भर जाते हैं। बाबा ने फलों की टोकरी मेरे कमरे में भिजवायी। इस तरह बाबा के वात्सल्य से रोग भी शूली से कांटा होकर खत्म हो गया। बाबा सेवा के क्षेत्र में भी हर प्रकार की समझानी देकर आगे बढ़ाते रहते थे। थोड़ी-सी सेवा करने पर बाबा बहुत महिमा करते थे कि बहुत सेवा की है। प्रदर्शनी के नये चित्र अभी बने ही थे तो बाबा ने मुझे चित्रों का सेट दिया। इस तरह बाबा ने तन-मन-धन से मुझ आत्मा की सेवा करके आगे बढ़ाया।

मधुबन में भोग लग रहा था। मम्मा-बाबा गद्दी पर बैठे थे। सन्देशी भोग लेकर जा रही थी। मेरे मन में भी संकल्प चलने शुरू हुए कि मैं भी ध्यान में जाऊँ। जानीजाननहार बाबा ने मेरे मन का संकल्प जानकर मुझे बुलाया और पूछा, बच्ची, ध्यान में जाती हो? मैंने कहा, नहीं बाबा। तो बाबा ने मुझे इतनी शक्तिशाली दृष्टि यी कि मैं सफ़ेद सफ़ेद वतन देखने लगी तथा काफ़ी समय तक मुझे यही अनुभव होता रहा था कि मैं इस दुनिया में नहीं बल्कि किसी और दुनिया में हूँ।

एक बार पार्टी लेकर मैं मधुबन गयी। उस पार्टी में एक युगल था। जब उस भाई ने बाबा को सब्जी काटते, अनाज साफ़ करते तथा यज्ञ के अन्य कार्यों में मदद करते देखा तो बाबा के साधारण रूप को देखकर उसे संशय आया कि भगवान ऐसे साधारण तन में कैसे आते हैं? संशय में आकर उस भाई का चेहरा उतरा-उतरा सा रहने लगा। मैंने समझा कि शायद पार्टी के किसी भाई ने इसको कुछ कह दिया होगा। उसने अपने मन की बात किसी को नहीं बतायी। लेकिन जब वह भाई सुबह क्लास में गया तो बाबा ने उसी भाई को देखकर मुरली चलायी कि कई ऐसे बच्चे बाबा के घर में आ जाते हैं जिनको भगवान के कार्य के प्रति विश्वास नहीं। ऐसे संशय बुद्धि बच्चे विनश्यन्ति हो जाते हैं। उसी भाई की तरफ इशारा करके पूछा कि बच्चे, ठीक है ना? उस भाई ने समझ लिया कि ऐसे संशय का संकल्प मेरे ही मन में था, कैसे बाबा ने जान लिया? इस बात का उस भाई पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसका संशय ही मिट गया। फिर वापसी के समय सौगात लेनी थी। सौगात दो प्रकार की थीं, लेकिन एक लेनी थी। बाबा ने मुझे कहा था कि पार्टी को खुश करके ले जाना है। किसी को कोई चीज़ चाहिए तो ले लेना। मैंने बाबा को कहा कि बाबा वो भाई दोनों ही सौगात लेना चाहता है। तो बाबा ने कहा, उस बच्चे को दोनों ही सौगातें दे दो। लेकिन भृगु ऋषि बाबा उस भाई की जन्मपत्री को भी जान गये थे और मुझे कहने लगे कि बच्ची, यह मुठा चलेगा नहीं। वह भाई पूरी धारणाओं पर चलता था लेकिन बाबा ने उसकी जन्मपत्री को जान लिया था। मधुबन से वापस आने के बाद उस भाई को ऐसी परिस्थितियां आयीं कि उसने ज्ञान में आना ही छोड़ दिया। मीठे बाबा हर बच्चे की आश को पूरी करते और उसका भविष्य भी जान लेते थे।

बाबा-मम्मा की पालना से हर क़दम में आगे बढ़ते हुए अब यही लक्ष्य है कि मीठे बाबा समान बनें और प्यारे बापदादा को विश्व के आगे प्रत्यक्ष करें।

प्रेम बहन

फरीदकोट, पंजाब से ब्रह्माकुमारी प्रेम बहन जी कहती हैं, जनवरी 1965 से मेरा सौभाग्य जगा जब ईश्वरीय ज्ञान मिला। मेरी खुशी का पारावार ना रहा कि बिना कोई कठिन तपस्या किये, बहुत सहज मुझे भगवान मिल गया। मेरा मन प्रभु-मिलन द्वारा जन्म-जन्मान्तर की पिपासा बुझाने को आतुर हो उठा। आख़िर वो मंगल घड़ी आयी 10 जून, 1965 को, जब हम प्यारे मधुबन स्वार्गाश्रम पहुँचे। अमृतसर से चन्द्रमणि दादी जी मेरे सहित 15 सदस्यों की पार्टी को मधुबन लेकर आयी। मन में बस एक ही लगन थी कि अभी बाबा से मिलें। दादी जी ने कहा, अभी नहा-धोकर आराम करो, बाबा शाम को 5 बजे हॉल में मिलेंगे। इन्तज़ार की घड़ियाँ बहुत लम्बी होती हैं। बाबा से मिलने को मन तड़प रहा था। शाम के 5 बजे हम हिस्ट्री हॉल में पहुँचे। बाबा हॉल में सामने बैठ, सभी को नम्बरवार दृष्टि दे रहे थे। मेरे नैन भी दृष्टि के लिए बेचैन थे और मन में यही गूंज रहा था,
“जो सपने में ना देखा, वो साकार हो गया
धन्य हुए ये नैन जिन्हें प्रभु का दीदार हो गया।”

जब बाबा ने मुझे दृष्टि दी तो ऐसा महसूस हुआ कि जन्म-जन्मान्तर की प्यासी आत्मा को भगवान खुद साकार में अपने नैनों से निहाल कर रहे हैं, खुशियाँ दे रहे हैं। इतनी अपार खुशी समायी नहीं गयी और आँखों से अश्रुधारा बह निकली। बाबा साकार में सामने दिखायी ना देकर बस लाइट ही लाइट दिखायी दी। पास में बैठे भाई-बहनें भी लाइट के फ़रिश्ते दिखायी देने लगे, मैं फ़रिश्तों की दुनिया में खो गयी। जन्म-जन्मान्तर की प्रभु-मिलन की प्यासी आत्मा उठकर साकार में प्यारे बाबा की गोद में समा गयी। दिल गाने लगा:
"सतयुग से उतरते-उतरते कलियुग में आकर,
मेरी आत्म-ज्योति उझ गयी।
आज तेरी मीठी गोद में समाकर,
बाबा जन्म-जन्मान्तर की प्यास बुझ गयी।

आत्म-परमात्म मिलन से उझाई ज्योति फिर से जग गयी।।"

बाबा ने इतना प्यार दिया कि आत्मा तृप्त हो गयी, "पाना था जो पा लिया" बस अलौकिक सुख, शान्ति, खुशी की जन्म-जन्मान्तर से जो आश थी वह पूर्ण हुई, आत्मा भरपूर हुई। फिर बाबा से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने बाप, टीचर, सतगुरु, साजन आदि सर्व सम्बन्धों का अनुभव किया। बाबा की गोद में बहुत समय से बिछड़ी आत्मा को असीम प्यार मिला, फिर टीचर रूप में बाबा ने पूछा, ‘बच्ची, आगे कब मिली हो?’ मैंने कहा, ‘जी बाबा, 5000 वर्ष पहले मिले थे।’ बाबा ने पूछा, ‘कौन-सा पद पाया था?’ मैंने कहा, ‘महारानी का।’ फिर बाबा ने चन्द्रमणि दादी को कहा, ‘बच्ची, बाबा इसको दूसरे स्थान पर सेवा में भेजेगा। यह बच्ची होशियार है, बाबा की बहुत सेवा करेगी।’ यह सतगुरु के रूप में बाबा की आज्ञा थी। मैंने कहा, ‘जी बाबा, जहाँ आप कहेंगे वहाँ चली जाऊँगी।’ फिर चन्द्रमणि दादी जी ने कहा, अभी इसको घर से छुट्टी नहीं है, अगली बार आयेगी तो आप जहाँ कहेंगे वहाँ चली जायेगी। पहली बार मुझे 15 दिन बाबा के संग मधुबन में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर समय यही दिल में रहता था कि बाबा के संग में रहें, बाबा को ही देखते रहें।

क्या व्यक्तित्व था बाबा का!

क्या रूहानी आकर्षण था बाबा में! चलते-फिरते बाबा लाइट हाउस, माइट हाउस नज़र आते थे। बाबा सदा बेफ़िकर बादशाह दिखायी देते थे। बाबा को कहीं दूर से देख लेते तो ऐसे महसूस होता था जैसे चुम्बक सुई को खींच रही है। मन कहता था कि बाबा आपने हमें ऐसे अद्भुत नज़ारे दिखाये कि आपके प्यार में हम खिंचे चले आये। बाबा रोज़ सुबह 4.45 बजे हिस्ट्री हॉल में आकर बच्चों को दृष्टि देकर योग कराते थे। योग के बाद हम बाहर आँगन में खड़े हो जाते थे। एक तरफ़ बहनों की, एक तरफ़ भाइयों की लाइन होती थी। बाबा खड़े-खड़े दृष्टि देते थे फिर कहते थे, ‘देखो बच्चे, तुम्हारी कार में एक बत्ती है, मेरी कार में दो बत्तियाँ हैं! तो बच्चो, आपको महसूस होता है, अभी डबल बत्ती से आपको लाइट मिल रही है? आत्मा को अनुभव होता है कि स्वयं आलमाइटी बाप, ब्रह्मा-तन द्वारा हमारे में लाइट-माइट भर रहे हैं?’

इतना वृद्ध तन होते हुए भी इतना चुस्त!

एक बार भोली दादी ने कहा, सुबह तीन बजे बाबा के लिए भोग बनाना है, सतगुरुवार है, आप सेवा करने आना। हमारी पूरी पार्टी नहा-धोकर सेवा करने भंडारे में गयी। हम पूरी बेल रहे थे, बाबा पौने चार बजे भंडारे में आ गये और सभी बच्चों को प्यार भरी दृष्टि देते हुए कहा, ‘देखो बच्चे, भोलानाथ का भंडारा है, बाबा की याद में पूरी बेलने से खाने वाली आत्मा को भी बाबा की याद आयेगी, शक्ति मिलेगी। उसका कितना फल तुमको मिलेगा!’ ऐसे, बाबा हम सबका ध्यान शिव बाबा में खिंचवाते थे। कमाल थी प्यारे बाबा की कि इतना वृद्ध तन होते हुए भी इतना चुस्त! कर्मयोगी बनने का अभ्यास बाबा ने बच्चों को कराया।

इतना प्यार भूलेगा कौन?

एक दिन बाबा ने कहा, बच्चों, आज बाबा बच्चों को गिट्टी खिलायेंगे। इस समय जहाँ रत्नमोहिनी दादी का ऑफिस है वहाँ क्लास के बाद बाबा-मम्मा कुर्सियों पर बैठे। आगे पत्थर के कोयले की अंगीठी थी। भोली दादी व दो बहनें, पूरी की तरह रोटी बना रही थीं, रोटी पर मक्खन व बूरा डालकर मम्मा के हाथ में पकड़ाती, मम्मा बाबा को देतीं, फिर बाबा अपने हस्तों से बच्चों के मुख में डालते। उस लाइन में मैं भाग्यशाली आत्मा भी खड़ी थी जिसने साकार में आये हुए भगवान से दृष्टि ली और मुँह में गिट्टी ले अपने को धन्य-धन्य माना। इस बात को 39 वर्ष बीत गये लेकिन आज भी वह दृष्टि और गिट्टी स्मृति में आते ही मन में अपार खुशी की लहरें उठती हैं और मैं अपने सौभाग्य पर नाज़ करती हूँ।

जितनी बार मिलते उतनी बार शिक्षा मिलती

एक दिन चन्द्रमणि दादी जी बाबा के कमरे में बाबा से बातचीत कर रही थी, मैं वहाँ चली गयी। दरवाज़े की तरफ़ बाबा की पीठ थी, मैं देखकर वापिस आने लगी, आहट से बाबा को मालूम हुआ कि कोई आया है। बाबा ने झट आवाज़ दी, ‘बच्ची, तुम वापिस क्यों जाने लगी? बच्चों का हक़ है बाबा से मिलने का। बच्ची, जब चाहो बाबा से मिलने आ सकती हो।’ बाबा ने मुझे टोली दी। हम तो गिनती करते रहते, आज बाबा से कितनी बार मिले। वह ज्ञान सागर बाप जितनी बार मिलते उतनी बार ये शिक्षा देते कि बच्चे, बाप याद है? स्वर्ग का वर्सा याद है? बच्चे, आत्मा को देवताओं के सब गुणों से भरपूर करना है। बाबा प्यार भरी दृष्टि देकर मुँह में टोली खिलाते थे। उस समय ट्रेनिंग क्लास के कमरे बन रहे थे। हम देखते रहते कि 10-11 बजे बाबा मिस्त्रियों से मिलने जायेंगे, बाबा जब अपने कमरे से बाहर आते तो हम भी हाथ पकड़कर ट्रेनिंग क्लास की तरफ़ चल पड़ते। बाबा कहते थे, देखो बच्चे, ऐसे ही मज़बूत पकड़ना है, कभी बाबा का हाथ और साथ नहीं छोड़ना। मैंने भी प्यार से कहा, ‘बाबा हम आपका हाथ और साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।’ बाबा ने फिर कहा, ‘पक्का?’ मैंने कहा, ‘जी बाबा। इतनी मेहनत यानि 63 जन्मों की भक्ति करने के बाद आप बड़ी मुश्किल से मिले हैं, कैसे छोड़ेंगे?’ इस प्रकार, क़दम-क़दम पर बाबा हमें मज़बूत करते थे।

बाबा से विदाई लेने को दिल नहीं करता था

बाबा का कितना प्यार है! यह विदाई की घड़ी आयी ही क्यों? सभी बच्चों को बाबा ने “गो सून, कम सून” (Go soon, come soon) की टोली मिश्री, इलायची, बादाम खिलाया, साथ में ज्ञान-रत्नों से भी सजाया। बाबा ने कहा, ‘देखो बच्चे, मिश्री कितनी मीठी है, तुम भी मीठे बाप के मीठे बच्चे हो, मुख से कभी दुःख देने वाले बोल ना निकलें। बच्चे, बादाम खाने से दिमाग को ताक़त मिलती है, बाप तुम्हें इतना बुद्धिवान बनाते हैं जो 21 जन्म वज़ीर की आवश्यकता नहीं होती। इलायची खुशबू का प्रतीक है। बच्चे, तुम्हारे में दैवीगुणों की खुशबू होनी चाहिए।’

इस प्रकार, बाबा हमें हर एक से गुण ग्रहण करने की शिक्षा देते थे। बाबा का इतना बेहद प्यार था! जहाँ इस समय भंडारा है पहले वहाँ वृक्ष झाड़ियाँ थीं, मधुबन से विदाई के समय बाबा बच्चों को छोड़ने बाहर आये, हाथ मिलाते, दृष्टि देते विदाई दी। हम पीछे मुड़कर देखते रहे, बाबा भी तब तक बच्चों को निहारते रहे जब तक कि वे आँखों से ओझल नहीं हुए। प्यारे बाबा से विदाई लेने को हमारा दिल नहीं करता था, बेमन से विदाई ली, अश्रुधारा बहती चली गयी। ऐसा महसूस हुआ कि जन्म-जन्मान्तर की प्यासी आत्मा भरपूर हो रही है। आज भी वो दिन भुलाये नहीं भूलते।

ज्ञानी बहन जी

बाबा ने मेरी जन्मपत्री पढ़ ली
दसुआ, पंजाब की ब्रह्माकुमारी ज्ञानी बहन जी लिखती हैं कि मैं जब पहली बार सन् 1963 में बाबा से मिली तो मुझे श्रीकृष्ण का छोटा-सा रूप दिखायी दिया। मैं तो देखने में मगन हो गयी और जैसे ही बाबा की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो मैं आत्मा देह से न्यारी होकर उड़ने लगी और लाइट की दुनिया में पहुँच गयी। थोड़े ही समय के बाद बाबा ने कहा- यह मेरी त्यागी, तपस्वी और बेफ़िकर बच्ची है। तो ऐसे लगा कि मुझे मेरा सहारा मिल गया। इसी वरदान ने मुझे सदा आगे बढ़ाया है और बाबा का हाथ और साथ अभी भी अनुभव करती हूँ।

उसी समय बाबा ने जालन्धर की इंचार्ज बहन से पूछा कि यह बच्ची क्या काम करती है तो उन्होंने कहा कि सिलाई का काम करती है। बाबा ने मुझसे पूछा कि बच्ची, तुमको ईश्वरीय सेवा करना अच्छा लगता है? मैंने कहा, जी बाबा, अच्छा तो लगता है लेकिन मैं तो सारा दिन सिलाई में ही व्यस्त रहती हूँ इसलिए ईश्वरीय सेवा नहीं कर पाती हूँ। बाबा ने कहा, बच्ची, आज के बाद तुझे कोई नौकरी नहीं करनी है। बाबा की रूहानी सेवा में लग जाना है। बाबा ने मेरी जन्मपत्री पढ़ ली और मुझे रूहानी सेवा में लगा दिया। ऐसे थे मेरे दुरांदेशी मीठे बाबा, जो मुझे परख लिया। बाबा की परख शक्ति बड़ी तीव्र थी, जो दूर से ही बच्चों को परख लेते थे। मुझे बाबा से ध्यान में जाने का वरदान मिला। मैं हर कर्म बाबा से पूछकर करती थी।

मैंने बाबा के अन्दर बहुत गुण देखे। बाबा अपकारियों पर भी उपकार करते थे। बाबा के आगे कोई भी आ जाता था तो उसे यह अनुभव होता था की बाबा मेरा है। बाबा इतना स्नेह देते थे जो पत्थर जैसे हृदय वाला भी पानी हो जाता था क्योंकि जानीजाननहार बाबा बच्चों के अन्दर के भावों को स्पष्ट जानते थे।

बाबा आकारी रूप में आकर भी बच्चों की सेवा करते थे

एक बार मेरे शरीर का बहुत बड़ा पेपर आया। बाबा ने मुझे पहले ही बता दिया था कि बच्ची, तुम्हारे ऊपर पेपर आने वाला है लेकिन तुम घबराना नहीं, बाबा को अपने साथ रखना तो सहज ही पेपर को पार कर लोगी। शरीर का बहुत कड़ा पेपर आया परन्तु मेरे साथ बाबा था तो शरीर का कर्मभोग भी सहज चुक्तु हो गया। कभी-कभी मैं उदास हो जाती थी तो ऐसा लगता था कि बाबा मेरे सम्मुख आकर खड़े हो गये हैं, मेरी अंगुली पकड़ कर मुझे चला रहे हैं और उमंग-उत्साह बढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार बाबा से मैंने अनेक सम्बन्धों का अनुभव किया, कभी माँ के रूप में तो कभी बाप के रूप में अंगुली पकड़ कर चलाते, कभी सखा बनकर हमारे साथ हँसते खेलते थे। जब कभी बच्चों से भूल हो जाती थी तो बड़े प्यार से बाबा कहते थे कि बच्चे शिव बाबा को सच-सच सुनाने से आप हलके हो जायेंगे और आगे से फिर कभी भूल न करना। इस प्रकार, रहम दिल बाबा सबके ऊपर रहम कर क्षमा कर देते थे।

तृप्ता बहन

जानी-जाननहार मेरे बाबा
फिरोजपुर सिटी, पंजाब से ब्रह्माकुमारी तृप्ता बहन जी साकार बाबा के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं कि मैं बचपन से ही श्रीकृष्ण की भक्ति करती थी। श्रीकृष्ण जी के साक्षात्कार प्रतिदिन होते थे और उनसे सन्मुख बातचीत भी होती रहती थी। मुझे एकान्त बहुत प्रिय था। एक दिन एकान्त में श्रीकृष्ण जी को याद कर रही थी, मुझे अचानक सफ़ेद पोशधारी का साक्षात्कार हुआ। फिर मेरे सन्मुख आकर बोले- बच्ची, ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य।’ फिर कहा कि सर्व को छोड़ मुझे याद करो। इतने में बहुत सुन्दर सुनहरी सफ़ेद लाइट दिखायी दी तथा साथ में श्रीकृष्ण जी का भी साक्षात्कार हुआ। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह सफ़ेद पोशधारी मेरे सामने कौन आया मैंने तो कभी इन्हें देखा ही नहीं।

साक्षात्कार में ही बाबा ने मुझे कोर्स कराया

मैं रोज़ शाम को ठीक 4 बजे तपस्या में बैठ जाती थी कि अभी श्रीकृष्ण जी आयेंगे परन्तु श्रीकृष्ण जी की जगह सफ़ेद पोशधारी सामने आया और साक्षात्कार में मुझ से पहले पूछा, बच्ची आप कौन हो? मैं चुप रही। बाबा बोले, आप शरीर नहीं हो, आप एक शुद्ध आत्मा हो, आत्मा अमर-अविनाशी है। इस प्रकार बाबा मुझे घण्टा भर पढ़ाते थे, फिर मैं उठकर कॉपी में नोट कर लेती थी। ऐसा लगता था कि यह पढ़ाई कभी पढ़ी हुई है। जैसे मुझे मेरा खोया भाग्य मिल रहा है।

जैसे टीचर रोज़ पढ़ाने आते हैं, उसी प्रकार मैं समय पर जाकर आँखें बन्द करके बैठ जाती थी। फिर दूसरे दिन बाबा ने पूछा- बच्ची, आप का बाप कौन है ? मुझे दूसरा लेसन (lesson) दिया। इस प्रकार बाबा मुझे रोज़ पढ़ाने आते थे। जब तपस्या से उठी तो मेरी छोटी बहन शर्मिष्ठा ने पूछा कि आप क्या आत्मा- परमात्मा शब्द बोलती थी? क्योंकि वह मेरे पास बैठकर सुन रही थी मगर छोटी थी तो कुछ समझ में नहीं आता था। बाबा जो पढ़ाते थे वह मैं अपनी डायरी में लिख लेती थी। पूरा एक सप्ताह बाबा ने मुझे पढ़ाया। बाबा जो पढ़ाते थे उसी के आधार से मैं गीत बना लेती थी। जब अन्तिम पाठ में बाबा ने कहा, बच्ची योग करने से सर्व सिद्धियाँ मिलती हैं तो मैंने गीत बनाया -
‘योग करें सभी देवी-देवा, योग बिना नहीं पावत मेवा।’

रोज़ अमृतवेले बाबा आकर मुझे मुरली सुनाते थे

रोज़ अमृतवेले बाबा ने आकर वाणी सुनाना शुरू किया। रात्रि 2 बजे बाबा मुझे उठा देते थे और वाणी सुनाकर चले जाते थे। दिन-रात सितारों की लाइट दिखायी देती थी। मैं सारा दिन खुदाई मस्ती में रहती थी। परिवार वाले भी मुझे देवी समझकर फूल आदि चढ़ाकर पूजा करते थे। परन्तु हमारे घर में सख्ती इतनी थी कि कहीं भी बाहर जाने नहीं देते थे। मुझे प्रजापिता बह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का कुछ भी पता नहीं था। श्रीहरगोविन्दपुर में दीदी चन्द्रमणि जी आयी थी। सबने कहा कि एक देवी आयी है, जो ब्रह्माकुमारी नाम से प्रसिद्ध है। मैंने सुना तो मेरा दिल भी उस देवी से मिलने के लिए तड़पने लगा। एक दिन अपनी सखियों के साथ छिपकर चन्द्रमणि दीदी से मिलने पहुँच गयी। दीदी एक छोटे से कमरे में बैठी थीं। वहाँ त्रिमूर्ति का बड़ा चित्र लगा हुआ था। मैंने जाते ही दीदी से पूछ लिया कि यह (बाबा) कौन है? दीदी ने कहा- आप क्यों पूछ रही हो ? मैंने कहा कि यह तो रोज़ाना मुझे पढ़ाने आते हैं। दीदी ने मुझे चित्र पर समझाया कि यह ब्रह्मा है, यह विष्णु है और यह शंकर है जिनके ये-ये कर्तव्य हैं। मैंने कहा, दीदी जी, मैं रोज़ इनका साक्षात्कार करती हूँ। दीदी जी ने यह सुनकर मुझे बहुत प्यार किया, टोली खिलायी। फिर दीदी ने मेरे से पूछा बताओ तो सही वह कैसे आते हैं? मैंने कहा - मुझे रोज़ मुरली सुनाते हैं और वे मुरलियाँ मैं रोज़ लिख लेती हूँ। दीदी ने कहा, अच्छा, जो मुरली आप लिखती हो, वह हमें भेजना। अब बाबा जो मुरली सुनाते थे, वह मैं लिखकर आश्रम पर दीदी के पास भेज देती थी। उन मुरलियों को देख दीदी ने कहा, यह बहुत पक्की और सतोप्रधान आत्मा है। अब मेरी लगन भी दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। यह देख लौकिक घर वालों ने मेरी पूजा आदि करना छोड़ दिया। उन्हें यही चिन्ता लग गयी कि कहीं बह्माकुमारी न बन जाये।

अब घर वालों ने मुझे भक्ति करने से भी मना करना शुरू किया, ध्यान में नहीं बैठने देते थे। लेकिन मेरी लगन दिन-प्रतिदिन बढ़ रही थी। मैं सदा सन्तुष्ट और प्रसन्न रहती थी क्योंकि मैं सारे नियमों का पूर्ण पालन करती थी। मैं घर में सत्गुरुवार को बाबा को भोग भी लगाती थी। सेन्टर पर भोग लगाने वालों को वतन में जो अनुभव होता था, वही अनुभव मुझे भी होता था। मैं प्रभु-प्यार में झूमती रहती थी।

जिसने बहुत बन्धन डाले थे, वही बाबा से मिलाने के लिए सहयोगी बना

यह सब देख लौकिक भाइयों ने और माता-पिता ने बाज़ार की मिठाई और प्याज खिलाने का भरसक प्रयास किया। लेकिन मैं धारणा की पक्की थी। आश्रम से सम्बन्ध न रहे उसके लिए भाइयों ने काफी प्रयास किया। लेकिन मैंने उनकी एक न मानी। अगले दिन जो परिस्थिति आने वाली होती थी, पिछली रात्रि को बाबा मुझे समझा देते थे कि बच्ची, आपको यह उत्तर देना है। ये सब काग़ज़ के शेर हैं। तुम तो शेरनी शक्ति हो, ये तुमको सिर्फ डराते हैं लेकिन तुम्हें डरना नहीं है। दूसरे दिन लौकिक माताजी को मुझसे देवी का साक्षात्कार हुआ और माताजी ने कहा कि सचमुच यह देवी है। उन्होंने मुझे कहा कि मुझे माफ़ कर दो, मैं अब कुछ नहीं कहूँगी परन्तु आश्रम पर नहीं जाना।

एक बार श्रीहरगोविन्दपुर में दीदी चन्द्रमणि के साथ कानपुर के वकीलों की पार्टी आयी हुई थी। मुझे मालूम पड़ा तो मैं जाने के लिए सोचने लगी। घर वालों का चारों तरफ पहरा था और मेन गेट के अन्दर माताजी बैठी थी। पिताजी किसी से बातचीत करने में व्यस्त थे। अचानक माताजी की आँख लग गयी। मैं चुपके से ऊपर से उतर कर सेन्टर पर पहुँच गयी। दीदी से और सारी पार्टी से मिलकर वापस आ गयी। घर में सभी ने पूछा, तुम आश्रम पर तो नहीं गयी थी? मैंने कहा, आप जाने ही नहीं देते, मैं तो बाजू में अपनी सखी से मिलने गयी थी।

मुझे पता चला कि मधुबन पार्टी जाने वाली है। मैंने लौकिक माताजी से कहा - मुझे मधुबन जाना है। माताजी बोली कि तुम्हारे पिताजी तो यहाँ के शहर के सेन्टर पर भी नहीं जाने देते हैं, मधुबन जाने की छुट्टी कैसे देंगे? तुम मधुबन कैसे जायेंगी? मैंने सारी रात योग किया। बाबा ने अमृतवेले कहा- बच्ची, तुम अपनी तैयारी करके रखना, तुम अवश्य मधुबन जाओगी। माँ द्वारा ही पेपर आये हैं- तो माँ ही तुम्हारी सहयोगी बनेगी।

सुबह मैं शान्ति में बैठी थी, माताजी ने कहा उदास क्यों हो? अमृतसर सम्बन्धी के पास जाने के लिए मैं तुम्हारे पिताजी से तुम्हारी छुट्टी ले लूँगी। माताजी ने छुट्टी ली, मुझे मधुबन जाने का किराया भी दिया और कहा कि खुश रहना। मैं सारी बात सम्भाल लूँगी। मैं अमृतसर गयी और चन्द्रमणि दीदी से जाकर कहा, मैं भी मधुबन चलूँगी। दीदी को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहा, तुमको छुट्टी कैसे मिल गयी?

बच्ची, तुम गुप्त तृप्ता हो

मैं चन्द्रमणि दीदी के साथ मधुबन पहुँच गयी। यहाँ पहुँचते ही मुझे ऐसे लगा जैसेकि भगवान मेरे लिए ही आये हैं। जब पार्टी के साथ बाबा से मेरा मिलने का टर्न आया और मैं बाबा के पास गयी तो मुझे लाइट ही लाइट दिखायी दी, मेरे में जैसे करेन्ट (शक्ति) आ गयी हो और मैं बाबा की गोद में चली गयी। फिर बाबा ने कहा, बच्ची, तुम सूर्यवंशी कुल में श्रीकृष्ण के बहुत नज़दीक वाली आत्मा हो। बच्ची, तुमको टीचर बनना है। चन्द्रमणि दीदी ने कहा- बाबा, इसको बहुत बन्धन है। बाबा बोले- बच्ची, तुम गुप्त तृप्ता हो। अब तुम्हारे सारे बन्धन समाप्त हो जायेंगे। तुम एक आदर्श टीचर बनकर बाप का नाम बाला करोगी। फिर बाबा ने मेरा हाथ पकड़कर पाण्डव भवन दिखाया और बगीचे में ले गये। फिर कहा- बच्ची, अंगूर की बेलों के नीचे और कोई पौधा नहीं होता क्योंकि अंगूर बहुत शक्ति खींचते हैं। आपका साथी स्वयं भगवान है। आपका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। आपके बन्धन सब समाप्त हुए कि हुए।

कमाल बाबा की थी कि जो मैं मधुबन से घर गयी तो मुझे किसी ने कुछ भी नहीं कहा। जो भाई मुझे बहुत डाँटता था, उसने भी कुछ नहीं बोला। मैंने मधुबन की सौगात (कम्बल) और टोली (प्रसाद) भाई को दीं। फिर मैंने मधुबन भूमि का वर्णन किया कि मैं साक्षात् भगवान की कर्मभूमि देखकर आयी हूँ और साक्षात् भगवान से मिलकर आयी हूँ, मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ। किसी ने कुछ भी नहीं कहा। धीरे-धीरे मेरे बन्धन भी खलास होते गये और फिर मैं कभी 15 दिन, कभी दो मास आश्रम पर रहने लगी। फिर एक दिन तो मैं पूरा बन्धनमुक्त हो गयी। ऐसे जानी-जाननहार बाबा के महावाक्य सिद्ध हो गये।

संतोष बहन

सायन, मुंबई से ब्रह्माकुमारी सन्तोष बहनजी अपने अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं कि ब्रह्मा बाबा से मैं पहली बार सन् 1965 में मिली। उसी समय हिस्ट्री हाल बना था, उसमें ही मैं साकार बाबा से मिली थी। बाबा से पहली मुलाक़ात मैं कभी भी भूल नहीं सकती। मैं तो मधुबन यह देखने आयी थी कि ये लोग कहते हैं कि निराकार परमात्मा ब्रह्मा तन में आते हैं, वो कैसे आते हैं अथवा आते भी हैं या नहीं आते हैं। इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ही मैं बाबा से मिलने आयी थी। पहली ही नज़र में मुझे यह विश्वास हो गया कि परमात्मा शिव इसी तन में आ सकता है और कोई तन में नहीं; क्योंकि बाबा का दिव्य व्यक्तित्व और फ़रिश्ता रूप था। ऐसा रूप मैंने ज़िन्दगी में कहीं नहीं देखा था। बाबा के व्यक्तित्व और रूहानी स्नेह ने मुझे आकर्षित कर लिया। बाबा से पहली मुलाक़ात में ही मैंने यह फैसला ले लिया कि मुझे जीवन बनाना है तो ऐसा ही श्रेष्ठ बनाना है और बाबा की आज्ञाओं पर चलकर दूसरों का भी जीवन ऊँचा बनाना है।

मैं बाबा के निमंत्रण पर ही मधुबन गयी थी

शुरू-शुरू में बाबा किसी बच्चे को जब पहली बार मिलते थे तब गोद लेते थे। जब मेरी बारी आयी तो मैं खड़ी हो गयी। बाबा मुझे देखकर कहने लगे कि जब बच्चे मेरे से मिलने आते हैं तो मैं भी परमधाम से इस तन में आता हूँ। ये बोल मेरे को पक्के हो गये कि ये शब्द ब्रह्मा बाबा नहीं बोल रहे हैं परन्तु शिव बाबा जो निराकार हैं, परमधाम में रहते हैं, वो बोल रहे हैं।

जब मैं मुंबई में ज्ञान में आयी थी तो बाबा को पत्र लिखा था कि बाबा मैं आपसे मिलना चाहती हूँ। बाबा ने तुरन्त मुझे पत्र लिखा था कि बच्ची, बाबा के पास बहुत सन्तोष हैं, बाबा भी देखना चाहता है कि यह कौन-सी सन्तोष है? तुरन्त आ जाओ बाबा के पास। इस प्रकार मैं मधुबन बाबा के निमंत्रण से आयी थी। बाबा ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं एक पल में सारी पुरानी दुनिया भूल गयी।

दूरान्देशी बाबा

मुरली सुनाते-सुनाते जब बाबा मेरी तरफ देखते थे तब मुझे यह भी अनुभव होता था कि बाबा मेरे मस्तक से मेरा भविष्य अथवा जन्म-पत्री पढ़ रहे हैं। उस समय मेरी आयु 18-19 वर्ष की होगी। मुझे देखकर बाबा ने कहा, मुझे ऐसे मैनेजर चाहिए जो सभी सेन्टरों पर चक्कर लगायें और बाबा को समाचार सुनायें। बाबा की यह बात तो मुझे समझ में नहीं आयी क्योंकि मैं तो उस समय ज्ञान में नयी थी और उस समय उतने सेवाकेन्द्र भी नहीं थे जो बाबा कह रहा है कि मुझे चक्कर लगाने वाली बच्चियाँ चाहिए। जब मैं सायन सेन्टर पर रहती थी तब बाबा ने जो भी पत्र लिखे, बाबा उनमें ज़रूर लिखते थे कि बच्ची, तुम मुरली चलाने के लिए अपने जैसे और कोई को तैयार करो और तुम अन्य सेन्टरों पर चक्कर लगाकर आओ। उस समय मुझे यह बात उतनी समझ में नहीं आयी परन्तु उसका अर्थ अभी मुझे समझ में आता है। देखिये, बाबा कितने दूरान्देशी और बच्चों की जन्मपत्री जानने वाले थे।

जब मैं पहली बार बाबा के सामने आयी थी तो उस समय मैंने साप्ताहिक कोर्स भी नहीं किया था। वैसे रोज़ क्लास में जाती थी। मधुबन में ही बाबा ने एक टीचर बहन से मेरा साप्ताहिक कोर्स कराया। रोज़ रात को बाबा मुझसे पूछते थे कि बच्ची, तुमने आज क्या समझा, उसको क्लास में बताओ। मैं बाबा के सामने ही सबको उस दिन का पाठ सुनाती थी। उस समय मैं मधुबन में एक सप्ताह रही। बृजेन्द्रा दादी के साथ मैं आयी थी। जब भी बाबा मुझे देखते थे तो कहते थे कि बच्ची, तुम बड़ी हो गयी हो, तुम्हें सेवा पर जाना चाहिए। मैं सोच में पड़ती थी कि बाबा ऐसे क्यों कह रहे हैं कि सेवा पर जाना चाहिए। मैं अपने लौकिक पिताजी को भी बताकर नहीं आयी थी कि मैं आबू जा रही हूँ क्योंकि वह चाहते नहीं थे कि मैं आश्रम पर जाऊँ। आखिर मैंने बाबा से कहा, ‘ठीक है बाबा, आप कहते हैं तो मैं सेवा पर जाने के लिए तैयार हूँ, जहाँ चाहें वहाँ भेज दीजिये।’ फिर बाबा ने कहा, बच्ची, तुम्हारे लौकिक बाप से चिट्ठी चाहिए। मेरे भाई और माँ ज्ञान में चलने के कारण उनको पता था कि मैं मधुबन आयी हूँ, बाप को पता नहीं था। मैंने पूछा, क्या माँ की चिट्ठी ले आऊँ? बाबा ने कहा, नहीं बच्ची, जब लौकिक बाप ज़िन्दा है तो उसकी ही चिट्ठी चाहिए।

बच्ची, अभी तो तुम छोटी हो

उस रात शिव बाबा को बहुत याद करके लौकिक बाप को चिट्ठी लिखी कि पिताजी, मैं अभी बड़ी हो गयी हूं और अपने बारे में सोच सकती हूँ। मैं सोचती हूँ कि ईश्वरीय सेवा करने में ही मुझे सुख-शान्ति है इसलिए आप खुशीपूर्वक इसके लिए छुट्टी दें। पत्र भेज दिया था परन्तु पिताजी से उसका उत्तर नहीं आया। बाबा तो चिट्ठी बगैर रखने वाले नहीं थे। मैं वापस मुंबई जाने के लिए तैयार हो गयी। उस समय यज्ञ में यातायात की उतनी सुविधायें नहीं थीं। बृजेन्द्रा दादी के लिए आबू रोड से टैक्सी मंगायी गयी थी। उसमें दादी का और मेरा सामान रख दिया गया। हमें विदाई देने के लिए बाबा भी छोटे हाल में आने वाले थे। उसी समय ईशू दादी ने आकर मेरे हाथ में लौकिक पिताजी का पत्र दिया। उस पत्र में पिताजी ने लिखा था कि अगर तुमको उसी में खुशी है तो मैं तुमको ईश्वरीय सेवा करने के लिए छुट्टी देता हूँ। इसको पढ़कर मुझे इतनी खुशी हुई कि उस पत्र को लेकर भागते हुए बाबा के कमरे में गयी और कहने लगी, ‘बाबा, लौकिक पिता की चिट्ठी आयी है, उन्होंने छुट्टी दी है, मैं यहाँ से जाने वाली नहीं हूँ।’

बाबा ने कहा, ‘चलो बच्ची, बाबा हाल में आने वाले हैं।’ मैंने फिर कहा, ‘बाबा अभी मैं अपना सारा सामान उतारती हूँ, मैं नहीं जाने वाली हूँ।’ मैं आगे-आगे जा रही थी, बाबा पीछे-पीछे आ रहे थे। जब क्लास में आकर बाबा बैठे तो मुझे देख बाबा कहने लगे, ‘बच्ची, अभी तो तुम छोटी हो।’ मैंने तुरन्त कहा, ‘बाबा आप रोज़ मुझे कहते थे, तुम बड़ी हो गयी हो, सेवा में जाना चाहिए और अभी बोलते हो कि तुम छोटी हो।’ फिर बाबा ने कहा, ‘बच्ची, तुम वहीं सायन सेन्टर पर रहो, वहाँ तुम्हारे माँ, बाप, भाई, बहनें सब हैं, वहीं सेवा करो।’ मैंने कहा, ‘नहीं बाबा, मैं वहाँ नहीं जाऊँगी। मुझे तो आत्मा की उन्नति करनी है, जहाँ लौकिक सम्बन्धी हैं वहाँ आत्मा की उन्नति हो नहीं सकती। इसलिए मुझे दूसरी जगह भेजो।’ फिर बाबा ने कहा, ठीक है, तुम पूना में जनक बच्ची के पास जाओ। फिर बाबा ने बृजेन्द्रा दादी से कहा, इसको पूना भेज दो। मुंबई से नज़दीक भी रहेगी। जब भी इसके रिश्तेदार मिलना चाहेंगे तब बुला सकेंगे। जाते समय मैंने बाबा से कहा, ‘बाबा, जब दूसरी बार मैं आऊँगी तो पार्टी लेकर आऊँगी। बाबा ने कहा, ठीक है बच्ची, बहुत अच्छा।’ जब दूसरी बार बाबा से मिलने आयी तो 40 भाई-बहनों की पार्टी लेकर आयी। बाबा बच्चों को देख बहुत खुश हुए और मेरी बहुत महिमा की कि बच्ची ने बहुत मेहनत की है, क्वालिटी वाली आत्मायें लायी है। मैंने अनुभव किया कि बाबा सदा बच्चों की विशेषता देख, उन विशेषताओं की महसूसता कराकर उन्हें आगे बढ़ाते थे। पत्रों द्वारा, बोल द्वारा और टेप में भरकर सम्बन्धित बच्चों को भेजकर उनका उमंग, उत्साह, हिम्मत बढ़ाते थे।

बाबा व्यर्थ संकल्प चलने ही नहीं देते थे

बाबा बच्चों के मन को भी पढ़ लेते थे। बच्चों के मन में कोई हलचल भी हो तो उस आत्मा को देखते ही उसको राय सांत्वना आदि देते थे। एक बार बाबा कुटिया में बैठे थे, मैं वहाँ गयी। किसी कारण से मन में हलचल हो रही थी। मुझे देखते ही बाबा तुरन्त बोले, ‘बच्ची, तुम्हें ड्रामा याद नहीं है ? ड्रामा कल्याणकारी है, सदा ड्रामा की पटरी पर चलो तो अचल और अडोल रहोगी।’ बाबा व्यर्थ संकल्प चलने ही नहीं देते थे। बच्चों को ज्ञान और शक्ति द्वारा मज़बूत बनाते थे ।

बच्चों के हर पत्र का उत्तर बाबा ख़ुद देते थे

एक बार हमारे गाँव से शादी का निमंत्रण आया। मेरी बचपन की खास सहेली की शादी थी। हमें जो भी काम करना होता था तो हम बाबा से पूछे बगैर नहीं करते थे। मैंने बाबा से पूछा, बाबा, गाँव से सहेली की शादी का निमंत्रण आया है, क्या करूँ? बाबा ने तुरन्त उत्तर भेजा कि जब तुम्हें शादी नहीं करनी है तो दूसरों की शादी में क्यों जायेगी? इस प्रकार बाबा हम बच्चों को हर कदम क़ायदे पर चलाते थे। बच्चों के हर पत्र का उत्तर बाबा खुद देते थे। बाबा हरेक ब्राह्मणी (टीचर) को कहते थे कि कम से कम हर 15 दिन में एक पत्र ज़रूर लिखो। उसमें सिर्फ़ सेवा समाचार ही नहीं लिखना होता था बल्कि ज्ञान कैसे समझाया, वह भी लिखना पड़ता था। एक बार मैंने पत्र में लिखा, बाबा मैंने फलाने व्यक्ति को कहा कि इस ज्ञान को हम फ्री (मुफ़्त) में देते हैं, यह हम आत्माओं के परमपिता परमात्मा का ज्ञान है, बाप बच्चों से थोड़े ही फीस (शुल्क) लेता है! लेकिन इस ज्ञान की धारणा के लिए पाँच खोटे पैसे ज़रूर देने हैं। इसके उत्तर में बाबा का लम्बा-चौड़ा पत्र आया कि तुमने पाँच खोटे 'पैसे' क्यों बोला? वो लोग समझेंगे कि ये पैसा माँगते हैं। इस तरह बाबा हम बच्चों की हर बात पर ध्यान देते थे और सुधारते थे।

बच्ची, ऐसी कोई कीमती चीज़ इस्तेमाल नहीं करनी है जिसको देखकर किसी का ध्यान उस तरफ जाये

एक बार हम बाबा के कमरे में गये। बाबा किसी से बात कर रहे थे। हम जाकर वहाँ बैठे। बाबा हमें बिठाकर कमरे से बाहर चक्कर लगाने गये। बाबा कभी किचन में, कभी आँगन में, कभी बगीचे में थोड़े समय के लिए जाते थे। जब बाहर जाकर वापस आये तो बाबा की नज़र कमरे के बाहर निकाली हुई, किसी बहन की चप्पल पर पड़ी। तब बाबा ने अन्दर आकर हम लोगों से पूछा कि बाहर जो चप्पल हैं वे किसकी हैं। बहुत अच्छी चप्पल हैं, किसकी हैं, आओ बच्ची, इधर आओ। जिसकी थीं उसने कहा, मेरी हैं। बाबा जाकर गद्दी पर बैठे और प्यार से उस बहन से कहा, देखो बच्ची, कभी तुम भाषण करने जाओगी ना तब लोग तुम्हारा भाषण नहीं सुनेंगे, तुम्हारी चप्पल ही देखते रहेंगे। फिर बाबा ने कहा, ‘बच्चे तुमको साधारण रहना है। तुम्हें ऐसी कोई कीमती चीज़ इस्तेमाल नहीं करनी है जिसको देखकर किसी का ध्यान उस तरफ जाये अथवा बाबा के बजाय उस वस्तु की याद आये क्योंकि तुम बच्चों का कर्त्तव्य है सबका कनेक्शन बाबा के साथ जोड़ना।’ इस तरह, बाबा बच्चों को हर कर्म की गुह्य गति भी समझाते थे।

मैं सदा यह ध्यान देती हूँ कि मैं कोई ऐसी चीज़ इस्तेमाल न करूँ जो दूसरों का ध्यान खींचे। भले ही देखा दूसरे व्यक्ति ने और वो बाबा की याद भूला, हिसाब भी उसका बन गया परन्तु इन सबके निमित्त तो मैं बनी ना! इसलिए मैं कोशिश यही करती रहती हूँ कि मैं जो भी वस्तु इस्तेमाल करूँ उससे किसी का व्यर्थ संकल्प न चले। किसी वस्तु और वैभव की तरफ़ हमारा ध्यान भी न जाये और किसी का भी खींचने के निमित्त न बनें यह भी बहुत बड़ी सेवा है। इसमें अपनी भी और दूसरों की भी अवस्था अच्छी रहती है। सादा जीवन कितना ऊँचा है और कितना श्रेष्ठ है, हमने यह बाबा में प्रैक्टिकल देखा है और उनसे सीखा है। बाबा कहते थे कि बच्चे तुम जितना सिम्पल रहते हो उतना अच्छा है, उससे तुम्हारी स्थिति भी हल्की रहेगी और मन भी साफ़ रहेगा। ऐसी छोटी-छोटी बातों की भी सावधानी बाबा देते थे।

बच्ची, कभी अकेली नहीं रहना

एक बार बाबा मुंबई आये हुए थे। उस समय सायन सेन्टर पर बृजेन्द्रा दादी अकेली थी। तो बाबा ने पूना से मुझे वापस सायन सेन्टर पर बुला लिया। तब तक मेरी अवस्था भी पक्की हो गयी थी, लौकिक वालों से मोह-ममता टूट गयी थी। जब सायन सेन्टर से बाबा से मिलने आयी तो बाबा ने पूछा कि वहाँ कौन-कौन रहते हैं? मैंने कहा, बृजेन्द्रा दादी और मैं। मैंने अपनी हिम्मत और अच्छी स्थिति का अभास बाबा को कराने के हिसाब से कहा कि बाबा, मैं कहीं अकेली भी रहूंगी तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तुरन्त बाबा ने कहा, ‘बच्ची, कभी अकेली नहीं रहना। तुम बच्चों में बहुत रूहानी आकर्षण होता है इसलिए कभी अकेली नहीं रहना।’ यह बात मुझे इतनी पक्की हो गयी है कि मैं न कभी अकेली रहती हूँ और न ही अन्य बहनों को अकेली रहने देती हूँ। हर सेवाकेन्द्र पर कम से कम दो बहनें ज़रूर होती हैं। इस तरह हर छोटी-से-छोटी बात पर भी बाबा बहुत ध्यान खिंचवाते थे ।

बच्ची, तुम अकेली कहाँ हो? बाबा तुम्हारे साथ है

अलौकिक पिता ब्रह्मा बाबा ने हम बच्चों को इतनी पालना दी है कि यह पालना न लौकिक से मिल सकती है, न देवताओं से मिल सकती है। इतनी सुन्दर, पवित्र, सुखमय, अलौकिक परवरिश बाबा ने की है! बाबा साकार में होते भी आकारी रूप में आ-जाकर सेवा करते थे, ऐसे कईयों के अनुभव हैं। एक बार मैं किसी सेन्टर पर किसी समस्या का समाधान करने गयी थी। मैं जो भी करती थी बृजेन्द्रा दादी अथवा बाबा से पूछकर ही करती थी। मैंने उस स्थान से मुंबई फोन लगाया, बहुत कोशिश की, तो भी नहीं लगा। फिर मधुबन में बाबा को फोन करने की कोशिश की। वहाँ भी नहीं लगा। मैं बहुत परेशान हो गयी। क्या करूँ, परिस्थिति ऐसी थी कि मुझे दादी या बाबा से पूछना ही था। मुझे उस समय ऐसा अनुभव हुआ कि मैं इस दुनिया में अकेली हूँ, मुझे मदद करने वाला कोई नहीं है। मन बहुत भारी हो गया था, क्या करूँ समझ में नहीं आ रहा था। उतने में मुझे लगा कि मेरी बाजू में कोई आकर खड़े हुए हैं। देखा तो बाबा मुस्कराते हुए खड़े थे। मैं आश्चर्य और खुशी से दंग रहकर बाबा को ही देख रही थी। बाबा ने कहा, बच्ची, तुम अकेली कहाँ हो? बाबा तुम्हारे साथ है, सदा रहेगा। उस दिन से लेकर आज तक मुझे अकेलेपन की महसूसता कभी हुई ही नहीं।

वो श्रीकृष्ण की आँखें थीं

बाबा के अव्यक्त होने से एक महीने पहले मैं बाबा से मिलने पार्टी लेकर गयी थी। उस समय जो बाबा से मिली और मुरली सुनी वो दृश्य और इससे पहले जब बाबा से मिली और मुरली सुनी थी उनमें रात-दिन का अन्तर था। आँखों में बहुत फ़र्क था। ब्रह्मा की वो आँखें नहीं थीं, वो श्रीकृष्ण की थीं। मैं घड़ी-घड़ी आँखें मलकर देखती थी कि ये किसकी आँखें हैं? कोई ने ध्यान में देखा होगा कि बाबा की आँखों में और कृष्ण की आँखों में क्या अन्तर होता है। मुझे यही लग रहा था कि ये आँखें बाबा की नहीं हैं, श्रीकृष्ण की हैं। श्रीकृष्ण के वो नेत्र मैं बाबा के नेत्रों में देख रही थी। यह बात मैंने मुंबई आने के बाद क्लास में भी बतायी कि इस बार बाबा के नेत्र बाबा के नहीं थे, श्रीकृष्ण के थे। बाबा इतने नज़दीक पहुँच गये थे उस स्टेज के। बाबा के हर अंग में चमक और एक विशेष अलौकिक कशिश थी।

बाबा जब किसी बच्चे को गोद में लेते थे तब उसे पहले ही बोलते थे कि शिव बाबा को याद करके आओ, ऐसा समझो कि मैं शिव बाबा की गोद में जा रही हूँ/जा रहा हूँ, नहीं तो तुम्हारे ऊपर पाप चढ़ेगा। ब्रह्मा बाबा बोलते थे कि “बच्चे तुम ईश्वरीय सन्तान हो, तुम देहधारी की गोद में नहीं जा सकते हो।”

लक्ष्मण भाई

दिल्ली, मालवीय नगर से भ्राता ब्रह्माकुमार लक्ष्मण जी कहते हैं कि मेरा जन्म सन् 1933 में करांची (सिन्ध) में हुआ। मेरी 9 वर्ष की आयु में ही लौकिक पिता ने शरीर छोड़ दिया था। मेरी तीन बहनें हैं। एक मेरे से बड़ी, दो छोटी। हमें जीवन में काफी मानसिक तथा आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। हमारा परिवार भारत का विभाजन होने के पश्चात्, नवम्बर 1947 में दिल्ली में आ गया। फिर भी भाग्य अनुसार हम सभी भाई-बहनें अच्छी पढ़ाई कर पाये। मैंने बचपन से ही जीवन में निराशा, दुःख तथा वैराग्य का अनुभव किया। परन्तु माता-पिता द्वारा प्राप्त भक्ति के प्रबल संस्कार, व्रत, गीता के अध्ययन और कॉलेज में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी तथा महात्मा गाँधी जी की जीवन कहानियों को पढ़ने का मेरे जीवन पर पूरा प्रभाव रहा जिससे जीवन में सहनशक्ति, धैर्य, प्रभु-प्रेम, आध्यात्मिकता तथा पवित्रता की तरफ़ झुकाव हो गया। मेरे अन्दर भगवान को पिता के रूप में मिलने की तीव्र इच्छा बढ़ती ही गयी।

परमात्मा बाप ने अपनी बाहों में मुझे समा लिया

उस समय जीवन में निराशा ज़्यादा, आशा कम थी। सन् 1958 में, 25 वर्ष की आयु में परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे मुझ आत्मा का टिमटिमाता हुआ दीपक, परमात्मा के प्यार तथा ज्ञान की रोशनी से जग गया। ज्ञान और राजयोग के अभ्यास से मुझे ज़बरदस्त सहारा मिला। कुछ ही समय के बाद आबू आने का अवसर प्राप्त हुआ। जब साकार में शिव बाबा से ब्रह्मा बाबा के तन में मिला तो सचमुच उनका बन गया। वो मिलना ऐसे था जैसे बच्चे और बाप का। परमात्मा बाप ने अपनी बाँहों में मुझे समा लिया। प्यार व ख़ुशी का ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ था और बाप से फिर-फिर मिलने का आकर्षण बढ़ता ही गया। जैसे एक बच्चा अपने बाप से एक ही बार मिलकर तृप्त नहीं होता है वैसे ही मेरे साथ हुआ। बाप से अनेक बार मिलन मनाते उसका सुख लेता रहा। ऐसा अनुभव हुआ कि मुझे स्वयं परमात्मा आकर मिले हैं।

बाबा ने मुझे पवित्र गृहस्थाश्रमी बनाया

आदि से लेकर मुझे भगवान ने दिव्य दृष्टि का वरदान भी दिया। जब भी प्रभु-स्मृति में बैठता था तो सूक्ष्म शरीर द्वारा ब्रह्माण्ड की सैर करने के साथ-साथ स्वर्ग के अनेक अद्भुत और सुन्दर दृश्य भी देखता था। ऐसे अनुभव होते थे कि मैं भगवान के साथ एक रथ वा उड़न खटोले में बैठकर सैर कर रहा हूँ। दिन-प्रतिदिन बाप की ओर आकर्षण तथा उनके प्रति प्रेम बढ़ता ही गया और ज्ञान पर भी पूरा निश्चय हो गया। मेरे परिवार के सभी सदस्य इस ज्ञान-योग के मार्ग पर साथ-साथ चल पड़े जिससे मुझे इस आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में बहुत सहयोग मिला।

सन् 1962 में 29 वर्ष की आयु में मेरा दिव्य (गंधर्व) विवाह ब्रह्मा बाबा ने करवाया, जिसका लक्ष्य पवित्र और योगी जीवन में रहकर परमात्मा के कार्य में सहयोगी बनना था। ऐसे जीवन में रहते हुए पवित्रता की शक्ति तथा प्रभु की विशेष पालना का अनुभव किया। हम जो भी शुभ संकल्प रखते थे उन्हें बाबा अवश्य ही पूरा करते थे। साकार बाबा ने हमें महावीर तथा महावीरनी कहकर इस मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया और परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने रूहानी शक्ति देकर सफलता दी। परमात्मा अपने बच्चों को ड्रामा में विशेष पार्ट देकर सारे विश्व तथा ईश्वरीय परिवार में महिमा योग्य बनाना चाहते थे और यह साबित करना चाहते थे कि प्रवृत्ति में रहते हुए मन एवं तन से सम्पूर्ण पावन रहना इस संगमयुग पर अति सहज सम्भव है। क्योंकि परमात्मा स्वयं गाइड बनते हैं तथा आने वाली सतयुगी सृष्टि को पवित्र और सतोप्रधान बनाकर श्री लक्ष्मी, श्री नारायण का राज्य स्थापन करते हैं। इस सफलता का पूर्ण श्रेय बापदादा को है। बापदादा ने ही हमें पवित्रता और सत्यता की राह पर चलाकर स्वर्ग का ऊँच मालिक बनने की मंज़िल स्पष्ट दिखायी है।

साकार बाबा के साथ जो घड़ियाँ बितायी हैं वा उनके साथ की मुलाक़ातों में जो सम्मुख बातचीत हुई है, उसकी स्मृति से ही रोमांच हो जाता है तथा प्यार से आँखें गीली हो जाती हैं। साकार बाबा ने हमारे प्रति जो भी महावाक्य बोले, वे सभी हमारे लिए वरदान बन गये हैं। बाबा ने एक बार सभा में कहा कि ये बच्चे बहुत लक्की हैं। यही अनुभव हमें जीवन के हर क़दम-क़दम में हो रहा है। बाबा ने हमारे जीवन को हल्का, अनासक्त तथा अति सुखमय बना दिया है। साथ में जीवन का लक्ष्य दिया है कि बाप को फॉलो करके उन समान बनना है। सर्व आत्माओं को अपनी वाणी तथा कर्म द्वारा परमपिता का सन्देश देकर मुक्ति और जीवनमुक्ति की दुनिया में पवित्रता, सुख, शान्ति का वर्सा दिलाना है।

मेरा जीवन सब प्राप्तियों से भरपूर हो गया

भगवान आकर न केवल अलौकिक जीवन का उत्थान करते हैं लेकिन वे लौकिक जीवन की प्राप्तियों से भी हमें हर प्रकार से सम्पन्न कर देते हैं। ऐसा ही मेरे जीवन में हुआ है। एक क्लर्क की नौकरी से आगे बढ़ाकर मुझे सरकारी कंपनी के मुख्य प्रबन्धक के पद पर पहुंचाया। जीवन में सुख के सभी साधनों एवं सुविधाओं से भलीभाँति भरपूर किया। लौकिक कार्यार्थ देश और विदेश में ले जाकर ईश्वरीय सेवाओं द्वारा मेरी अविनाशी कमाई करायी। जीवन में सन्तुष्टता, सुख तथा यश की प्राप्ति हुई। मेरा यह निश्चय है कि भगवान आये हैं, उन्हें अपना जीवन अर्पण करने से ही मुझे आध्यात्मिक उन्नति तथा सफलता प्राप्त हुई है। परिवार तथा समाज के प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा करने में समर्थ तथा सफल बनाकर उन्होंने मुझे सुखमय तथा सन्तुष्ट बना दिया है।

बाबा का बनने पर अनेकानेक अनुभव तथा प्राप्तियाँ हुई हैं जिनसे मैं समझता हूँ कि निराकार शिव परमात्मा इस धरती पर मेरे ही कल्याण के लिए आये हैं। इसलिए ही उनका गायन है, 'पतित पावन', 'नैनहीन को राह दिखाने वाला' तथा 'गरीब निवाज़'...। वाह बाबा, वाह!! आपने मुझ नैनहीन आत्मा को ज्ञान का नैन दिया और पावन बनाया! ग़रीब निवाज़ बनकर आपने मुझे सम्पन्न बना दिया और मुझ भूले-भटके राही का हाथ पकड़ कर कहा "ओ मेरे लाडले बच्चे, अभी चलो मेरे साथ सत्यता और पवित्रता के मार्ग पर, मैं तुम्हें सतयुग (स्वर्ग) की मंजिल तक पहुंचा दूँ।"

पुष्पाल दीदी

ब्रह्माकुमारी ‘पुष्पाल बहनजी’ अपने अलौकिक अनुभव ऐसे सुनाती हैं कि भारत विभाजन के बाद हम पाकिस्तान से दिल्ली आ गये। दिल्ली में आने के बाद मैं हर दीपावली को बीमार हो जाती थी। इस कारण दुःखी रहती थी और भगवान को कहती थी कि हे भगवान, मैंने कौनसा पाप किया है जो दीपावाली पर बीमार हो जाती हूँ। एक दिन मैंने भगवान के नाम पर पाँच पेज का पत्र लिखा और पोस्ट में डाल दिया। तीन दिन के बाद लौकिक चाची ने मुझे अपने घर पर बुलाया, पर जब मैं उनके घर गयी तो चाची जी घर पर नहीं थीं। मैंने पूछा, कहाँ गयी है? तो कहा गया कि वो सत्संग में गयी है। मैं उसके इन्तजार में बैठी रही। वह दोपहर दो बजे आयी तो मैंने आते ही सुना दिया कि मैं कब से बैठी हूँ। वह इतनी ख़ुशी में थी कि मेरे बोलने का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था। मुझे महसूस हुआ कि इसको अजीब-सा सुख मिला है जो अपनी मस्ती में है। चाची ने मुझे कहा कि एक दिन तुम मेरे साथ आश्रम चलकर देखो। तुमने तो बहुत साधु-महात्माओं को देखा है, शास्त्र भी पढ़े हैं। लेकिन आबू से देवियाँ आयीं हैं उनको भी चलकर देखो। उन देवियों ने 14 साल तपस्या की है। चाची के इतना कहने के बाद मेरे मन में उत्सुकता हुई कि जाकर देखें।

पहले ही प्रश्न में फेल हो गयी

दूसरे दिन उनके साथ दिल्ली, कमला नगर आश्रम पर गयी। देखा कि एक छोटा-सा कमरा, उसमें तीन बहनें योग में बैठीं थीं। उनको देखते ही मन में बहुत खुशी हुई। क्योंकि उनके चेहरे की अलौकिक आभा से और वहाँ के शुद्ध तथा शान्त वातावरण से मन प्रफुल्लित हो गया। वहाँ जाने से पहले मन में था कि मैंने तो बहुत शास्त्र आदि पढ़े हैं, संस्कृत भी सीखी है, वे लोग मुझे क्या बतायेंगी। उनमें से एक बहन ने मेरे से प्रश्न पूछा कि क्या आप जानती हो कि आप कौन हो? मैंने कहा, हाँ, मैं जानती हूँ, मैं परमात्मा का अंश हूँ। बहन ने कहा, परमात्मा तो अजर, अमर, अविनाशी है। वह टुकड़ा हो नहीं सकता। आप परमात्मा का अंश नहीं हो परन्तु परमात्मा का वंश हो। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं पहले प्रश्न में ही फेल हो गयी। इसका अर्थ हुआ कि बहनें मेरे से ज़्यादा जानती हैं। फिर मैंने पूछा कि यह ज्ञान आपको किसने सुनाया? बहन ने कहा, यह ज्ञान हमें बाबा ने दिया। 'बाबा' शब्द सुनते ही ऐसा लगा कि यह मेरा ही बाबा है। बाबा शब्द मुझे बहुत ‘प्यारा और मीठा’ लगने लगा। क्योंकि मैं परमात्मा को बाप के रूप में याद करती थी। मैंने उनसे पूछा कि बाबा कहाँ रहते हैं? बहन ने कहा, आबू में। 'बाबा' और 'आबू' शब्दों ने ही मुझे बहुत आकर्षित किया। मैंने उनको बार-बार कहा, आप मुझे बाबा के पास ले चलोगी? लेकिन बहनों ने जवाब नहीं दिया। मैंने उनसे कहा कि आप वायदा करो। लेकिन तीनों बहनें मुस्कराने लगीं। मैं फिर दोहराने लगी तो मेरी चाची घबराने लगी कि पहले तो आश्रम पर आने को तैयार नहीं थी और अभी यहाँ से जाने को तैयार नहीं है। बार-बार बहनों से कह रही है कि मुझे आबू ले जाने के लिए वायदा करो। चाची ने मेरे से कहा, चलो घर चलते हैं। लेकिन मैंने फिर बहनों से पूछा, वहाँ जाने के लिए खास शर्तें हैं तो बताइये। तब बहनों ने कहा कि बाबा से मिलना है तो पवित्र जीवन बिताना पड़ेगा। मुझे यह बड़ी बात नहीं लगी क्योंकि भगवान के लिए सिर भी कट जाये तो कोई बड़ी बात नहीं। अगर सिर्फ पवित्र जीवन बिताने से भगवान मिलता है तो यह बहुत सस्ता सौदा है। मैंने उनसे वायदा किया कि मैं पवित्र रहूँगी। बहनों ने भी वायदा किया कि हम आपको आबू ले चलेंगी।

क्यों नहीं बच्ची, बाबा तो आप माताओं के लिए ही आया है

खुशी-खुशी से बाबा को पत्र लिखना शुरू किया। पहले पत्र में मैंने बाबा को लिखा कि "बाबा आपने इन बहनों को 14 साल अपने पास रखकर पालना की, तपस्या करायी। मैंने आपकी भक्ति की, पूजा, पाठ, व्रत, उपवास किये लेकिन आप मुझे नहीं मिले। अभी आपका परिचय मिला है, मैं आप से मिलना चाहती हूँ। आप ज़रूर अपने पास बुलाना।" लाल अक्षरों में बाबा का उत्तर आया कि "क्यों नहीं बच्ची, बाबा तो आप माताओं के लिए ही आया है, जब चाहो बाबा के पास आ जाना।" लेकिन परिवार बहुत बड़े खानदान का होने के कारण अकेली घर से आ नहीं सकती थी। सेन्टर पर जाकर बहनों को कहा कि मैं आबू अकेली जा नहीं सकती इसलिए सास को साथ में ले चलती हूँ। बहनों ने मना कर दिया क्योंकि सास ने ज्ञान नहीं समझा था। मैंने कहा, मेरे साथ घर का कोई-न-कोई व्यक्ति चाहिए, नहीं तो मैं बाबा के पास जा नहीं सकती इसलिए आप बाबा से पूछ लो। बाबा से छुट्टी मिली कि भले सास को साथ ले आओ। सन् 1955 में जब आबू पहुँची तो उस समय आश्रम धौलपुर हाउस में था। मैं तैयार होकर बाबा से मिलने गयी तो बाबा को देखते ही दिव्यता और अलौकिकता नज़र आयी। मुझे ऐसा लगा कि ऐसा दिव्य व्यक्तित्व दुनिया में कहीं है ही नहीं। ऐसा दिव्य रूप मैंने ज़िन्दगी में कभी देखा ही नहीं था। विचित्र रूहानी कशिश थी। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि यह ऊपर से उतरकर आये हैं। इस दुनिया के नहीं हैं। साथ-साथ मैं बाबा को देखते-देखते किसी दूसरी दुनिया में चली गयी जहाँ आनन्द ही आनन्द था। मेरी तन्द्रा टूटी तो बाबा ने कहा कि यह कल्प पहले वाली बच्ची है, बाप को पहचाना है। मुझे भी यही अनुभव हुआ कि यही मेरा जन्म-जन्म का पिता है, जो मैं बहुत समय से बिछड़ गयी थी, अभी मेरा बाबा मुझे मिल गया। मैं इतनी मस्त हो गयी थी कि मुझे यह भी याद नहीं था कि मुझे वापस लौकिक घर जाना है। मैंने समझा कि अब मुझे यहीं रहना है। एक सप्ताह बीतने के बाद जाने की तैयारी होने लगी। मुझे आश्चर्य लगा कि जब बाप मिल गया तो वापस जाने की क्या दरकार है ? मैं बाबा के पास जाकर कहने लगी कि बाबा, मुझे कहीं नहीं जाना है। तब बाबा ने बड़े स्नेह से कहा, हाँ बच्ची, तुमको कहीं नहीं जाना है। तुम्हें यहीं रहना है। बाबा ने इतना कहा तो मैं शान्त हो गयी। जब मैं शान्त हो गयी तो बाबा ने कहा, बच्ची तुम्हें जाना नहीं है, तुम्हें तो सेवा करके अन्य आत्माओं को लाने जाना है। अगर यह बहनें सेवा पर नहीं जाती तो तुम यहाँ कैसे आती? इसलिए बाबा तुम्हें सेवा पर भेज रहा है। तुम जाकर सेवा करेंगी तो और बच्चे बाबा से मिलने आयेंगे। जब बाबा ने ऐसा कहा तो मैंने सेवा पर जाना स्वीकार कर लिया। हमने बैलगाड़ी पर सामान रखा और बाबा से विदाई ले पैदल बस स्टैण्ड गये। उस समय साधन कम थे लेकिन साधना बहुत थी। मधुबन में आते ही हरेक आत्मा अलौकिकता का अनुभव करती थी। मम्मा-बाबा के सामने आते ही हर आत्मा अलौकिक अनुभूतियों में डूब जाती थी, शरीर से परे हो जाती थी। दिल करता था कि सदा हम इसी अलौकिक दुनिया में रहें।

निश्चय की परीक्षा आरम्भ हो गयी

बाबा के मिलने से पहले ही मेरी पवित्र रहने की इच्छा हो रही थी। जब मधुबन में बाबा से मिलकर वापस घर आयी तो पति, पति के रूप में दिखायी नहीं पड़ता था। ऐसा लगता था कि आत्मा भाई है। इतनी आत्मिक दृष्टि पक्की हो गयी थी। लौकिक पति ने भी तीन वर्ष सहयोग दिया, हमारे जीवन में सुख-शान्ति रही। सभी कहते थे कि ईश्वरीय जीवन बड़ा कठिन है लेकिन मैं कहती थी कि यह बहुत सहज है। तीन वर्ष के बाद पति को लोगों ने भड़काया तो उसकी भावना भी बदल गयी और मुझे आश्रम जाने से रोकने लगा, तंग करना शुरू किया, उल्टा-सुल्टा बोलने लगा। मैं जब आश्रम जाने के लिए सुबह-सुबह तैयार होती थी तो बच्चियाँ (सुधा और रानी) भी तैयार हो जाती थीं। पति गुस्से से बोलता था कि तुम जाती हो और बच्चियों को भी ले जाती हो। इसलिए वह मुझे आश्रम जाने से रोकता था और कहता था कि सुबह चार बजे आश्रम नहीं जाया करो। तुम्हें रात भर सिर में दर्द रहता है और उल्टी होती है इसलिए तुम विश्राम करो। मुझे सिरदर्द कड़ी धूप में बाहर जाने की वजह से होता था क्योंकि लौकिक में कभी धूप में वा बस में जाने की आदत नहीं थी। इस कारण पति सुबह आश्रम जाने से मना करता था। मैं कहती थी कि ठीक है, मैं नहीं जाऊँगी, आप सो जाइये। जब वह सो जाता था तो मैं आश्रम चली जाती थी।

मैं विमान में बैठकर क्लास करने जाती थी

हमारा घर कमला नगर सेन्टर के नज़दीक था तो घर वालों ने सोचा कि यहाँ रहने से यह आश्रम जाना नहीं छोड़ेगी, घर बदली कर देंगे। उन्होंने शाहदरा में घर ले लिया। शाहदरा से कमला नगर दूर पड़ता था और उस समय सुबह-सुबह चार बजे बसें तो चलती नहीं थीं। लेकिन मैंने आश्रम जाना छोड़ा नहीं। मैं क्या करती थी, सुबह-सुबह सब्ज़ी के ठेले पर बैठकर सेन्टर पर जाया करती थी। ठेले वाले पूछते थे कि आप इस समय कहाँ जाती हो? कभी कहती थी कि गॉडली युनिवर्सिटी में जाती हूँ, कभी कहती थी कि सत्संग में जाती हूँ। एक बार मम्मा साउथ एक्सटेंशन में आयी थी और सुबह उनसे मिलने जाना था। रेलवे स्टेशन से बस पकड़नी थी। मैं चार बजे ठेले में बैठकर स्टेशन पर आयी तो वहाँ कमला नगर से जगदीश भाई और गुलज़ार बहन भी आये। शाहदरा से नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच में जंगल पड़ता था। कोई मकान आदि भी नहीं थे। मैं सब्ज़ी के ठेले पर बैठ जाती थी। मुझे कोई डर नहीं था। बाबा की याद में मस्त रहकर निकल पड़ती थी। जब जगदीश भाई और गुलज़ार बहन ने मुझे उस दिन स्टेशन पर देखा तो पूछा कि तुम किस में आती हो? इस समय न कोई बस, न कोई टैक्सी मिलती है। मैंने हँसते हुए कहा कि बाबा मेरे लिए विमान भेजता है, उसमें आती हूँ। एक दिन बहुत बारिश पड़ रही थी। उस दिन मैं सुबह ठेले में बैठकर आ रही थी। जब ठेला जमुना का पुल पार कर रहा था, पुल के ऊपर से ट्रेन निकली और ट्रेन से कोयले मेरे ऊपर गिरे, शाल काली हो गयी। जब दिल्ली स्टेशन पर पहुंची तो जगदीश भाई ने देखा और कहने लगे कि तुम रोज़ विमान में आती हो, आज तुम्हारे विमान को क्या हुआ जो शाल काली हो गयी? तब मैंने सारी बात बतायी। ऐसे रोज़ मेरे साथ कोई-न-कोई घटना घटती थी।

बाबा न्यायनिधि भी और दयानिधि भी

मैंने सदा बाबा का बहुत प्यारा रूप ही देखा था। बाबा की दृष्टि सदा मेरे लिए रूहानी स्नेह की होती थी। परन्तु बाबा जितने लवफुल थे उतने ही लॉफुल भी थे। यह अनुभव मुझे एक बार हुआ। सन् 1963 की बात है। बड़ी दीदी कमला नगर में हर बुधवार को माताओं का क्लास कराती थी। मैं क्लास करके शाम को घर लौट जाती थी। मुझे पता पड़ा कि कल सुबह राजौरी गार्डेन में बाबा सभी से मिलेंगे। मुझे संकल्प आया कि अभी घर जाकर सुबह राजौरी गार्डेन जा नहीं सकूँगी। बाबा दिल्ली में आये और मैं बाबा से नहीं मिलूँ यह कैसे हो सकता है? मेरा मन था कि बाबा को देखकर जाऊं। दीदी का क्लास पूरा हुआ, सभी मातायें चली गयीं। मैं भी घर जाने के लिए रेलवे स्टेशन तक गयी। लेकिन मुझे संकल्प आया कि एक रात की ही तो बात है। आज रात आश्रम पर रुककर कल सुबह बाबा से मिलकर ही क्यों नहीं घर जाऊँ? फिर उसी बस में कमला नगर सेन्टर पर आ गयी। सेन्टर पर गयी तो रूक्मणी बहन ने कहा, तुम वापस आ गयी? मैंने कहा, आज रात यहीं रहूँगी और कल बाबा का क्लास करके जाऊँगी। रूक्मणी बहन ने कहा, अगर रात को तुम्हारा पति आया तो? मैंने कहा, आप कहना कि वह यहाँ से क्लास करके चली गयी। मैं रात को रूक्मणी बहन के बिस्तर पर सो गयी और अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर दिया। थोड़े ही समय के बाद पति सेन्टर पर आया और पूछा, पुष्पाल कहाँ है? मुझे उसकी आवाज़ सुनायी पड़ी। उसको कहा गया कि वह यहाँ से चली गयी। पति को पता था कि बाबा आये हैं। वह उसी समय राजौरी गार्डेन सेन्टर पर गया और बहनों को कहा कि पुष्पाल अभी तक घर नहीं आयी है। यह कहकर वह चला गया। सुबह होते ही मैं, रुकमणी बहन और जगदीश भाई एक टैक्सी लेकर राजौरी गार्डेन गये। बाबा ऊपर वाले कमरे में ठहरे थे और आलराउण्डर दादी बाबा के पास थी और बाबा को कह रही थी कि रात को पुष्पाल का पति आया था, वह कह रहा था कि पुष्पाल घर पर नहीं पहुंची है, तो वह कहाँ गयी है? बाबा ने कहा, बच्ची, बाबा से मिलने यहाँ आ गयी होगी, देखो। और क्या वह बच्चा रात को 12 बजे तक भटकता रहा? तो वह रात को कहाँ रही होगी? मैं पीछे से सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। मैंने कहा, बाबा मैं यहाँ हूँ। रात को कमला नगर में थी। बाबा ने कहा, वहाँ होते हुए भी उस बच्चे को तुमने भटकाया? बेचारे को इतना तंग किया? उस समय बाबा के चेहरे पर उस बच्चे (लौकिक पति) के प्रति बेहद दया भावना स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ रही थी। बाबा एक क्षण गहरी शान्ति में चले गये। बाबा को मालूम था कि वह बच्ची को परेशान करता है, तो भी उसके प्रति बाबा का करुणा भाव उमड़ रहा था। बाबा ने कहा, तुमने बच्चे को रात भर भटका कर उसको परेशान क्यों किया? मैंने कहा, बाबा क्लास पूरा होते ही में यहाँ से चली जाऊँगी। बाबा ने अपने हाथ पीछे बाँधकर कहा, आज बाबा क्लास में जायेंगे ही नहीं। बाबा बैठ गये और कहा, तुमने उस बच्चे को परेशान किया है इसलिए बाबा क्लास में नहीं जायेंगे, पहले तुम घर जाओ। मुझ से भी रहा नहीं गया। मैंने जाकर बाबा का हाथ पकड़ा और कहा, बाबा दुनिया मुझे ठुकराती है, आप भी मुझे ठुकराते हैं? ठीक है, मैं जा रही हूँ। मेरे ये शब्द सुनते ही बाबा की आँखें भर आयीं परन्तु आँसू बाहर नहीं निकले। जब भी बाबा का प्यार उमड़ता था तब नयन भर आते थे। मैंने बाबा को कहा, मैं जाती हूँ। इतना कहकर, बाहर निकल गयी। तुरन्त बाबा ने जगदीश भाई और अन्य भाइयों को भेजा कि जाओ, बच्ची ने रात को कुछ खाया नहीं होगा, सुबह-सुबह इतनी सर्दी में आयी है, चाय भी नहीं पी होगी। उसको चाय पिलाकर भेजो। बाबा ने रूक्मणी बहन को कहा, वह रात को तुम्हारे पास थी इसलिए तुम उसको घर छोड़कर आओ। जब मैं गेट पर पहुँची तो कोई टोली लेकर, कोई चाय लेकर दौड़े आ रहे थे। मैंने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं खाऊँगी। लेकिन रूक्मणी बहन साथ चल दी। मैंने उसे आने के लिए मना किया और कहा, यह मेरा विषय है, जो होगा मैं देखूँगी, तुम वापस जाओ, मैं अकेली जाऊँगी। जब मैं घर पहुँची तो सभी अपने जोश में बैठे हुए थे। कहने लगे कि आ गयी? चलो, आज तुम्हारा फैसला हो जाये। रोज़-रोज़ के झगड़े हमसे देखे नहीं जाते। मैंने भी कहा, चलो, फैसला हो जाये तो बहुत अच्छा है। पति मुझे लौकिक रिश्तेदारों के पास लेकर गया और बोला कि यह ब्रह्माकुमारियों के पंजे में आ गयी है और उन्होंने इसको भटका दिया है। पति बहुत बोलता रहा लेकिन मैं चुप रही, कुछ नहीं बोली। पति बार-बार कहने लगा कि ब्रह्माकुमारियों ने इसका दिमाग ख़राब कर दिया है। तो सभी ने फैसला किया कि इसके दिमाग (ब्रेन) का टेस्ट किया जाये।

दो बार ब्रेन-टेस्ट हुआ

सन् 1965 में मेरे दिमाग का टेस्ट रामतीर्थ हॉस्पिटल में कराया गया, उस समय पीठ से एक बोतल पानी निकाला गया जिस कारण मेरी पीठ कमज़ोर हो गयी। रिपोर्ट मिली कि इसका दिमाग ठीक है। आराम के बाद भी मैं बैठ नहीं सकती थी, खड़ी नहीं हो सकती थी। दिन-प्रतिदिन दर्द बढ़ता गया। उसी समय मम्मा अव्यक्त हुईं। आख़िर मेरी चाची ने कहा कि तुम मुंबई आ जाओ। मुंबई में डॉक्टर को दिखायेंगे। मैं जैसे-तैसे मुंबई पहुँच गयी। मेरी चाची का लड़का बहुत बद्धिमान था, वह समझ गया कि इसको क्लास में जाने नहीं दे रहे हैं, तंग कर रहे हैं इसलिए दिमाग में तनाव रहता है। तो वह रोज़ मुझे और चाची को सुबह टैक्सी में सेन्टर पर छोड़ आता था।

मैं छह महीने मुंबई में रही। फिर उसने कहा कि एक बार ब्रेन का टेस्ट कराना चाहिए। वह एक पारसी डॉक्टर के पास ले गया। वह डॉक्टर मुझे देखकर अवाक् रह गया। वह सोचने लगा कि यह महिला इतने साधारण वस्त्रों में! वह कहने लगा कि हमारी किताबों में लिखा हुआ है कि जब महिलायें इतने साधारण वस्त्र पहनेंगी तब दुनिया बदलेगी। मैंने कहा, अब तो दुनिया बदलने वाली ही है। वह मेरी बात बहुत उत्सुकता से सुनने लगा। लेकिन दूसरा डॉक्टर उसको कहने लगा कि ब्रह्माकुमारियाँ भाई-बहन बनाती हैं, घर-बार छुड़ाती हैं और कई उल्टी बातें सुनाने लगा तो पारसी डॉक्टर ने उसकी बातें नहीं सुनीं और मेरे से कहा, मैं समझता हूँ कि आपका दिमाग खराब नहीं है। फिर भी आपके परिवार वालों को सर्टिफिकेट देना है इसलिए टेस्ट करना ज़रूरी है। मेरा टेस्ट पूरा हुआ और वह पारसी डॉक्टर फूल माला लेकर आया और मेरे गले में डालकर कहा, यू आर आल ओके, ब्रेन इज़ वेरी ओके (आप बिल्कुल ठीक है, आपका दिमाग बहुत अच्छा है)। इस प्रकार मैं मुंबई में एक साल रही, उसके बाद वापस दिल्ली आयी।

आख़िर लौकिक बन्धन टूट गया

आख़िर मेरे बन्धन टूटने का समय भी आ गया। मैंने दोनों बच्चियों को टिकट देकर ट्रेन में बिठा दिया और कहा कि स्टेशन से रिक्शा लेकर चन्द्रमणि दादी के पास आश्रम पर चले जाना। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं दिया था। सिर्फ एक बैग में कपड़े डालकर भेज दिया था। दादी चन्द्रमणि को आश्चर्य लगा कि ये दिल्ली से अकेली आयी हैं। दो बेटों को भी अपनी लौकिक माँ के पास अमृतसर भेज दिया। बच्चों को भेजने के बाद मैं फ्री हो गयी और मुझे प्रबल संकल्प आने लगा कि यहाँ से जाऊं। मैंने पटना जाने की योजना बनायी। मैंने जगदीश भाई को कहा कि मेरे पटना जाने की टिकट बना दे। जगदीश भाई ने कहा, तुम स्टेशन पर आ जाना, मैं टिकट लेकर स्टेशन पर इन्तजार करूँगा। पता नहीं उस दिन पति घर से बाहर गया ही नहीं। इसलिए मैं घर से बाहर जा नहीं सकी। फिर दूसरे दिन जगदीश भाई को फोन किया कि कल ज़रूर टिकट करा देना, मैं ज़रूर आ जाऊँगी। दूसरे दिन मैं छोटी-सी अटैची लेकर दोपहर 12 बजे घर से निकल गयी। पति को पता पड़ा तो वह ढूँढ़ता हुआ मेरे पीछे आया। लेकिन गलियों में होती हुई, बस स्टैण्ड पर पहुँची। बस पकड़कर कमला नगर न जाकर, दूसरे सेन्टर पर गयी। उसी रात को पटना मेल में बैठकर पटना पहुँच गयी। उसी दिन से पति और घर वालों के बन्धन से मुक्ति मिल गयी। कुछ वर्षों के बाद बच्चे मुझे वापस आने के लिए ज़बरदस्ती करने लगे क्योंकि मकान, पैसे, ज़ेवर, लॉकर्स आदि सभी मेरे नाम पर ही थे। रिश्तेदारों ने समझा कि इसने सब कुछ ब्रह्माकुमारियों को दे दिया होगा। इसलिए बच्चे बार-बार मेरे पास आकर तंग करने लगे। एक बार बड़ा बेटा आया क्योंकि उसकी शादी थी। शादी में ज़ेवर चाहिएं थे। बेटा बड़ी दीदी के पास जाकर दीदी से पत्र लिखवाकर आया। उस समय मैं विराट नगर, नेपाल में थी। वह वहाँ आया और दीदी का पत्र दिखाया। बड़ी दीदी ने पत्र में लिखा था कि बच्चे की शादी है तो उसको कुछ ज़ेवर आदि दे दो। मैं बाबा के कमरे में गयी और बाबा से पूछा कि मैं जाऊँ या न जाऊँ। मुझे बाबा की टचिंग हुई कि मुझे जाना चाहिए। मैं बेटे के साथ दिल्ली आयी। मैं सेन्टर पर ठहरी, बच्चा घर गया। अगले दिन बेटे को लेकर बैंक गयी। मेरे लॉकर्स में जो कुछ था सब उसको दिखाया। वह देखकर हैरान हो गया क्योंकि हीरे, मोती, सोना, ज़ेवर सब उसमें थे। बेटे ने सुना था कि माँ ने सब कुछ ब्रह्माकुमारियों को दे दिया है। मैंने कहा, तुमको जो चाहिए, जितना चाहिए उठा लो। वह उठाने में संकोच करने लगा। थोड़े समय तक उसको समझ में नहीं आया कि क्या करे, क्या ले और कितना ले। फिर उसने आधा लिया और कहा कि हम दोनों भाइयों के लिए लिया है। मैंने कहा, ठीक है। फिर उसने एक क्षण सोचा और कहा, मम्मी आप तो तीन लोग हैं। फिर उसने जो लिया था उसमें से निकाल कर मेरे में डाल दिया। वह अपना लेकर चला गया। मकान भी लड़कों के नाम लिख दिया और काग़ज़ात भी उन्हें दे दिये। वे सब खुश हो गये। मैंने अपना हिस्सा जो मिला था उसको लेकर लॉकर्स खत्म करके हमेशा के लिए लौकिक सम्बन्ध और बन्धन दोनों तोड़ दिये और निश्चिन्त होकर बाबा की सेवा में व्यस्त हो गयी।

बाबा के अन्तिम दिनों की स्थिति का अनुभव

सन् 1968 में मैं बाबा से मिलने आयी। उस समय मुझे बाबा अलग दिखायी पड़ते थे। मुझे लगता था कि बाबा बदल गये हैं, पहले वाले बाबा नहीं हैं। एक दिन मैं और न्यूयार्क वाली मोहिनी बहन बाबा के कमरे में गये। बाबा एकदम मगन अवस्था में थे। पहले कभी बाबा के कमरे में जाते थे तो बाबा कहते थे, आओ, बच्चे आओ। उस दिन हम दोनों बहुत देर तक खड़ी रहीं परन्तु बाबा ने कुछ नहीं कहा। हमें महसूस हुआ कि बाबा का शिव बाबा के साथ बहुत गहरा कनेक्शन जुड़ा हुआ है। बहुत तल्लीन अवस्था में हैं इसलिए हम बाबा को डिस्टर्ब नहीं करेंगे। हम जाने की सोच ही रहे थे कि बाबा की नज़र हम पर पड़ी तो बाबा ने कहा, बच्ची आयी हो? इतना कहकर फिर शिव बाबा की याद में मगन हो गये। हमें लगा कि बाबा उपराम हो गये हैं। फिर एक दिन बाबा क्लास कराकर बाहर आ रहे थे और बाबा के साथ लच्छू बहन और ईशू बहन थी। उस समय मुझे एक अनोखा दृश्य दिखायी दिया। बाबा के पाँव धरती से बहुत ऊपर दिखायी पड़ रहे थे और इन दोनों बहनों के पाँव बहुत नीचे धरती पर दिखायी पड़े। मैं यह दृश्य बहुत ध्यान से देखने लगी और ऐसा लगा कि बाबा सम्पूर्ण फ़रिश्ता बन गये हैं। एकदम इस दुनिया से उपराम हो गये हैं। बाद में मैंने बहुत भाई-बहनों को भी बताया कि बाबा की अवस्था बहुत ऊँची हो गयी है, बाबा सम्पूर्ण फ़रिश्ता दिखायी दे रहे हैं। इस प्रकार बाबा के अन्तिम दिनों की स्थिति को भी मैंने देखा। यह मेरा सौभाग्य है।

ब्रह्माकुमार बृजमोहन भाई

साकार नेत्रों से निहारे गए ईश्वरीय चरित्र
सन् 1955 में हम परिवार सहित पहली बार बाबा से मिले। हम दिल्ली में रहते थे। सबसे पहले हमारे पिता जी (जगदीश आनन्द जी) ईश्वरीय ज्ञान में आए। जब उन्हें ईश्वरीय ज्ञान की धारणाओं पर चलते 6 मास हो गए, तो उन्हें मधुबन (आबू पर्वत स्थित मुख्यालय) जाने और बाबा से मिलने की अनुमति मिली। मुझे और मेरे छोटे भाई को यह अनुमति नहीं मिली क्योंकि हम दोनों के 6 मास अभी पूरे नहीं हुए थे। हमने बाबा को टेलिग्राम भेजा कि हम बच्चे तो इसी परिवार के सदस्य हैं इसलिए हमें भी साथ आने की अनुमति दी जाए। फिर हमें भी 'विशेष केस' में अनुमति मिली। इस प्रकार, हम चार सदस्यों का परिवार सन् 1955 में बाबा-मम्मा से मिलने मधुबन पहुँचा। उस समय यज्ञ कोटा हाउस में चलता था। आजकल वह राजस्थान सरकार का सर्किट हाउस बना हुआ है। हम बाबा से मिलने के लिए बड़ी उत्सुकता के साथ हिस्ट्री हॉल से भी छोटे हॉल में बैठे थे। मन में जिज्ञासा की लहरें उठ रही थीं कि वह तन कैसा होगा जिसमें भगवान आते हैं।

शरीर का अहसास समाप्त हो गया

थोड़ी देर बाद सामने रखी दो संदलियों पर एक तरफ बाबा और दूसरी तरफ मम्मा आकर बैठे। दोनों में बहुत ही आकर्षण था। मैं एक बार बाबा को और दूसरी बार मम्मा को देखता था। दोनों ही मेरे मन और निगाहों को समान रूप से आकर्षित कर रहे थे। मिलने वाले सभी बच्चों को बारी-बारी मम्मा और बाबा की गोद में जाने का सौभाग्य मिलता था। पहले मेरे माता-पिता ने मम्मा-बाबा की गोद ली। फिर मेरी बारी आई, उस समय ऐसा महसूस हुआ जैसे शरीर है ही नहीं, थोड़ी चेतनता है पर अहसास नहीं है कि शरीर कहाँ है, इतना हल्कापन महसूस हुआ। फिर मम्मा की गोद में गया। वह तो और भी प्यार भरी थी। उसमें बहुत शक्ति थी। गोद में थोड़ा समय रहते थे, समय पूरा होने पर बाबा या मम्मा पीठ पर थपकी देते थे कि तुम्हारा समय पूरा हो गया। मुझे भी मम्मा ने थपकी दी, मैं थोड़ा उठा और फिर दूसरी बार गोद में चला गया। मुझे इतना अच्छा लग रहा था कि अब उठना नहीं है। बहुत ही प्यारा अनुभव था। जीवन में पहली बार ऐसा प्यारा अनुभव हुआ।

लौकिक, अलौकिक दोनों सेवा करो

इसके बाद दूसरे कमरे में जाकर हमारे परिवार को बाबा से मिलना था। मिलते समय मेरे लौकिक पिता जी ने, जिन्हें ईश्वरीय पढ़ाई और ईश्वरीय सेवा में आगे बढ़ते जाने का बहुत उमंग था, बाबा को कहा, बाबा मैं लौकिक कार्य छोड़कर ईश्वरीय सेवा में लगना चाहता हूँ। बाबा के तन में तो शिवबाबा थे। बापदादा दोनों एक ही तन में थे। बापदादा ने बहुत मुसकराते हुए कहा, तुम्हारा तो परिवार है, तुम्हें निमित्त बनकर परिवार को भी सम्भालना है। लौकिक, अलौकिक दोनों सेवा करो। इसके बाद लौकिक माता जी की बारी आई, बाबा ने कहा, वैसे तो तुम नष्टोमोहा हो लेकिन मैं जगदीश आनन्द बच्चे को (मेरे पिता जी को) कहूँगा कि किसी तीर्थस्थान पर आपको सेवाकेन्द्र खोलकर दे, वहाँ आप रहो। इससे आप और अधिक नष्टोमोहा हो जाएंगी और तीर्थ पर बाबा की सेवा भी हो जाएगी। मथुरा दिल्ली के पास है, पिता जी ने वहाँ सेवाकेन्द्र खोल दिया। माताजी वहाँ अन्तिम घड़ी तक रहीं। हम उनको कहते थे, अब उम्र बड़ी हो गई है, हमारे पास आ जाओ। कहती थी, बाबा ने मुझे यहीं बिठाया है, यहीं बैठूंगी। किसी भी जिज्ञासु को वे ईश्वरीय ज्ञान इतनी तल्लीनता से सुनाती थी कि शरीर के दुख-दर्द का अहसास ही नहीं होता था। ईश्वरीय शक्ति उनको चलाती रही।

जन्मपत्री जानकर दी राय

मैं उस समय लॉ कालेज में पढ़ता था और चार्टर्ड अकाउंटेंसी की ट्रेनिंग ले रहा था। बाबा ने मुझे कहा, तुम अपनी पढ़ाई पूरी कर लो। मेरे से दो साल छोटा मेरा भाई भी कालेज में पढ़ता था, उसको बाबा ने पढ़ाई छोड़ने के लिए कहा। भले ही बाबा ने सबको अलग-अलग श्रीमत दी पर इसी में कल्याण था। छोटे भाई ने तीन साल बाद शरीर छोड़ दिया। पढ़ाई छोड़कर उसने इन तीन वर्षों में बहुत ईश्वरीय सेवा की। बाबा ने मुझको पढ़ने के लिए कहा, उनको मालूम था कि इसको अभी इस शरीर में रहना है। इस प्रकार बाबा ने हरेक को उसकी जन्मपत्री जानकर राय दी।

घर में खुल गया सेन्टर

बाबा से मिलकर हम अपने लौकिक घर आ गए और हमें समयानुसार बाबा से मार्गदर्शन मिलता रहा। दिल्ली में पहले, हमारे संयुक्त परिवार में सेन्टर खुला। फिर पिताजी ने सेवाकेन्द्र को संयुक्त परिवार से थोड़े अलग स्थान पर कर दिया। यह दिल्ली का दूसरे नम्बर का सेन्टर था। पहले सेन्टर (कमला नगर) पर हमने ज्ञान लिया था, दूसरा सेन्टर हमारे घर में चलने लगा, उसमें दादी प्रकाशमणि एक शिक्षिका के रूप में नियुक्त हुईं, हम साथ ही खाते, रहते थे, जैसे सेन्टर और घर आपस में मिल गए थे। जिन दिनों चार्टर्ड अकाउंटेंट की परीक्षा थी, मैं प्रतिदिन दादी प्रकाशमणि जी से दृष्टि लेकर ही जाता था। उन दिनों यह पढ़ाई काफी मुश्किल होती थी, पहले प्रयास में कोई मुश्किल ही पास होता था पर मेरे परीक्षा परिणाम में मैं सफल हो गया। मैं बहुत खुश हो गया कि बाबा ने ज्ञान, योग की शक्ति से आसानी से पास करा दिया।

क्यों झूठ-सच का धन्धा करते हो?

पास होने के बाद मैंने दिल्ली के सदर बाजार में अपना चार्टर्ड अकाउंटेंट का कार्यालय खोला, प्रैक्टिस शुरू कर दी। इसके आठ मास बाद हम फिर आबू में बाबा से मिले। वैसे तो बाबा कहते हैं, मैं लौकिक बातों में रुचि नहीं लेता पर बाबा ने मुझे बुलाया और पूछा, क्या तुमने इम्तिहान पास कर लिया? मैने बड़े फ़खुर से कहा, हाँ बाबा, कर लिया, पहले प्रयास में ही कर लिया और दिल्ली के बहुत अच्छे स्थान पर प्रैक्टिस भी शुरू कर दी है। ब्रह्मा बाबा ने कहा, ज़रा नज़दीक आओ। मैं बाबा के और नज़दीक चला गया, क्या बाबा का व्यक्तित्व था, क्या चेहरे की रूहानियत थी, बुजुर्ग तो थे ही, तांबे जैसा दहकता हुआ तपस्वी शरीर था। मुझे बोले, तुमको दो रोटी ही तो खानी हैं ना, तो तुम काहे को यह झूठ-सच का धन्धा करते हो, तुम जाकर कोई सरकारी नौकरी कर लो। मैंने उसी समय फैसला कर लिया कि मैं जाते ही प्रैक्टिस बन्द करके नौकरी शुरू करूँगा। हमारे खानदान में किसी ने नौकरी नहीं की थी। दिल्ली जाकर मैंने अपने भाई से कहा, आफिस के सभी चेअर्स, क्लाइंट की अकाउंट बुक्स वापस कर दो, फर्नीचर सेवाकेन्द्र पर भेज दो, फिर मैंने उस आफिस में कदम नहीं रखा और अखबार में चार्टर्ड अकाउंटेंट की नौकरी की वेकेन्सी (रिक्ति) देखकर हाथ से ही अर्जी लिखकर भेज दी।

आज्ञाकारी को सदा मदद

बाबा की शक्ति कार्य कर रही थी। भाखड़ा नंगल में फर्टिलाईजर (उर्वरक) की नई कंपनी खुल रही थी, अभी ग्राउंड में केवल आफिस बनाया था, उसमें इन्टरव्यू (साक्षात्कार) के लिए मुझे बुला लिया गया। मैं चल पड़ा। ट्रेन में मेरे साथ आठ लड़के और थे, वे भी उसी इन्टरव्यू के लिए जा रहे थे। कंपनी बड़ी थी, उन्हें आठ-दस चार्टर्ड अकाउंटेंट चाहिएं थे। मैं कोने में दुबककर बैठा हुआ इनकी बातें सुन रहा था। वे सभी मेरे से अधिक स्मार्ट लग रहे थे। मुझे नौकरी मिलने की उम्मीद लग नहीं रही थी। पहुँचने पर मेरा इन्टरव्यू चालू हुआ, मुझसे पाँच-छह सवाल पूछे गए। वे सारे सवाल थे चार्टर्ड अकाउंटेंट की किताबों के जिन्हें मैं भूल चुका था क्योंकि अब तो प्रैक्टिस कर रहा था। मुझे उत्तर आ नहीं रहे थे इसलिए उन्होंने भी गर्दन हिलाकर इशारा दिया कि उत्तर ठीक नहीं हैं। अन्तिम सवाल पूछा, तनख्वाह क्या लेंगे। मैंने कहा, जो आप दे देंगे। इसके बाद मैं चुन लिया गया, बाकी सब नहीं लिए गए। वह सरकारी कंपनी नई-नई थी। उनका नियम था, कम से कम तनख्वाह में रखना है। उन लड़कों ने ज्यादा तनख्वाह मांगी थी। बाबा ने कहा हुआ है कि कोई भी बच्चा किसी विशेष बात में मेरी आज्ञा मान ले तो सारी ज़िन्दगी उसकी मदद करता हूँ, इसका सबूत मैं हूँ। कंपनी ने एक महीने बाद डेढ़ गुणा तनख्वाह बढ़ाकर पुनः विज्ञापन दिया। फिर और लोग आए और मेरी तनख्वाह भी स्वतः डेढ़ गुणा हो गई।

हमारी कंपनी की जब भी कहीं नई शाखा खुलती थी तो वह ज़्यादा तनख्वाह देकर पुराने अनुभवी आफिसर्स को वहाँ भेजने की कोशिश करती थी। जब आसाम में कंपनी की शाखा खुली और मुझे वहाँ जाने की ऑफर आई तो मैंने बाबा से पूछा, बाबा ने कहा, नहीं, बाबा आबू से कहीं जाता है क्या, तुम काहे को जाते हो। इस प्रकार मैं 17 साल नंगल में ही रहा।

सतयुग में विमान मिलेगा

एक बार मैंने सोचा, मैं कार खरीद लूँ तो मर्जी अनुसार सेवार्थ आना-जाना कर सकूँगा, समय बच जाएगा। मैंने बाबा से पूछा, बाबा ने हाँ कर दी। मैंने कार खरीद ली। चण्डीगढ़ में प्रदर्शनी आयोजित हुई थी। मैं कार से वहाँ पहुँचा। कार को बाहर पार्क कर अन्दर प्रदर्शनी में गया। हर 15 मिनट बाद मुझे ख्याल आता था, बाहर जाकर कार को देख आऊँ, उस पर कोई बच्चा खरोंच तो नहीं डाल रहा। मैंने कहा, यह तो मैं बन्धन में आ गया। भाई-बहनों ने भी दूरी बना ली कि यह तो कार वाला है। उन दिनों की स्थिति ऐसी थी, आज तो कार रखना साधारण बात हो गई है, कार वाले को देखकर सब्जी वाला भी ज्यादा पैसे मांगता था। एक साल रखा, फायदा तो था पर कष्ट भी ज़्यादा था। इसलिए बाबा से पूछा, बाबा, मैं कार बेचना चाहता हूँ। बाबा ने कहा, बेच दो, तुमको सतयुग में विमान मिलेगा।

बाबा ने तनख्वाह वापस भेज दी

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा? मैंने कहा, मुरली में श्रीमत मिलती है, आप ही कहते हो कि मेरे हाथ में है किसका भाग्य बनाऊँ, किसका ना बनाऊँ। आपकी श्रीमत से ही मैंने नौकरी की है, यह उसी नौकरी की ईमानदारी की कमाई है, तो क्या आप मेरा भाग्य नहीं बनाना चाहते, ऐसे कई मुरली के प्वाइंट्स (ज्ञान बिंदु) मैंने लिखकर भेज दिए। बाबा ने लिखा, बच्चे, पत्र पाया, हर्षाया, इस बारी रख लेता है बाबा, आगे से नहीं भेजना, अपने आप ही इसे सेवा में लगाओ। मेरी आयु उस समय 21 साल थी। ऐसी कोई धार्मिक संस्था इस दुनिया में नहीं होगी जिसे आप पैसे दें और वह वापिस कर दे। मेरे दिल पर बहुत असर पड़ा कि क्या ऐसी संस्था भी हो सकती है, इससे मुझे बहुत शक्ति मिली।

उन दिनों परिवार के परिवार ज्ञान में चलने वाले थोड़े थे। कुछ सिन्धी परिवार थे बाकी बहुत कम । एक बार बाबा ने हमारे पूरे परिवार को पूना भेजा और कहा, वहाँ सबसे मिलो ताकि कोई यह न समझे कि भगवान केवल सिन्धियों के पास ही आता है। सिन्धियों के अलावा दूसरे परिवार भी ज्ञान में चलते हैं, आपके जाने से उन्हें मालूम पड़ेगा।

बाबा-मम्मा के साथ सैर

मुरली क्लास के बाद चेम्बर में हम सब बच्चे परिवार के तौर पर बाबा के साथ बैठते थे। बाबा हम से बात करते हुए कहते थे कि देखो, शिवबाबा यह कह गया, यह कह गया अर्थात् मुरली पर चर्चा करते थे। फिर मम्मा सीटी बजाती थी, सब इकट्ठे हो जाते थे। कपड़े के बूट पहनकर भाई और बहनें फिर सैर करने जाते थे बाबा-मम्मा के साथ। बीच-बीच में बाबा खड़े होकर पूछते थे, शिवबाबा याद है? कुछ ईसाई पादरी और नन्स भी घूम रहे होते थे। उन्हें देख बाबा कहते थे, देखो, ये शान्ति में घूमते हैं, एक को याद करते हैं, नन बट वन। हमें बारी-बारी बाबा का हाथ पकड़कर चलने का सुअवसर मिलता था। हाथ पकड़ने में बहुत खुशी होती थी, कोई-कोई मातायें गीत भी गा लेती थी।

ज्ञान की ही बातें करते थे

शाम को चाय पिलाने के लिए बाबा कभी किसी पहाड़ी पर, कभी किसी पहाड़ी पर ले जाते थे और टेढ़े रास्ते से ले जाते थे, फिर कहते थे, शिवबाबा को याद करते-करते आओ, कुछ नहीं होगा। फिर खुली जगह में बैठकर हम चाय पीते थे। बाबा ज्ञान तो देते ही रहते थे, ज्ञान के बिना और कोई बात नहीं करते थे। कई बार बाबा नक्की झील पर ले जाते थे। वहाँ राम मन्दिर के पुजारी को भी बुला लेते थे, पास बिठाते थे, वह बड़ा खुश होता था। कोई भाई-बहन गीत गाते थे, तो कभी बाबा गीत-कविता सुन लेता था, कभी यह भी कहता था, इनमें कोई कमाई नहीं है। बाबा को याद करो, इसमें कमाई है।

सम्पादक भव का वरदान

बाबा त्रिकालदर्शी हैं, उनके मुख से जो बात निकल जाती है, वह पूरी जरूर होती है। चाहे 10 साल बाद पूरी हो या 20 साल बाद। पहली बार बाबा ने जब पत्रिका निकालने के लिए कहा, तो मेरी ड्यूटी लगाई कि पत्रिका को छपवाना है और वरिष्ठ भ्राता जगदीश जी को लेख लिखने हैं। मैं भी कभी-कभी कुछ लिख देता था। पहली पत्रिका तैयार हुई। उसका कागज़ खरीदना, छपवाना, प्रूफ पढ़ना, फोटो बनवाना यह मेरी ड्यूटी थी। मैं चार्टर्ड अकाउंटेंसी भी करता था इसलिए मेरा नाम संपादक या सहसंपादक नहीं लिखा जा सकता था। बाबा दिल्ली में आए और कमला नगर सेन्टर की खुली छत पर बच्चों से मिले। जगदीश जी ने कहा, चलो बाबा को पत्रिका दिखाते हैं। उस वक्त उसका नाम होता था त्रिमूर्ति मासिक, जिसका नाम बाद में ज्ञानामृत पड़ा। जगदीश जी ने बाबा को पत्रिका दिखायी। बाबा ने कहा, यह मेरा संपादक बच्चा है। जगदीश भाई ने मेरी तरफ इशारा किया कि बाबा, इन्होंने छपवाया और बनवाया है। बाबा ने कहा, यह भी मेरा संपादक बच्चा है। बाबा ने कह दिया, मैंने सोचा, मैं संपादक तो हूँ नहीं। फिर सवा साल के लिए जगदीश जी विदेश गये। तब मैंने नौकरी करते-करते पत्रिका अपने स्टेनो से लिखवायी, टाइप करवाई और लगातार सबको भिजवाता रहा। मैंने सोचा, मैं संपादक बन गया, भले ही मेरा नाम संपादक के रूप में नहीं आया। मेरे नौकरी छोड़ने पर बाबा ने प्युरिटी पत्रिका निकलवाई जिसका मैं सम्पादक बना। इस प्रकार बाबा ने अपने वरदान को साकार किया।

बाबा का असीम स्नेह

जब हम मधुबन आते थे तो सप्ताह भर ठहरते थे और एक बार बाबा, मम्मा के साथ भोजन भी करते थे। मुझे आम खाने का शौक है। उन दिनों आम का सीज़न था। हमें भोजन में आम खाने को मिला था। मेरी लौकिक माँ ने अपना आम टेबल के नीचे से धीरे से मुझे दे दिया। भोजन के बाद बाबा ने सेवा करने वाली लच्छू बहन को कहा, टोकरी में आम डालकर लाओ। बाबा ने मुझे आम देकर कहा, बच्चे खाओ। मैं समझ गया, बाबा ने माता को मुझे आम देते हुए देख लिया था। इतना बाबा प्यार करता था।

माँ के दिल में श्रद्धा बढ़ गई

एक दिन मेरी माता बाबा के पास गई और बताया कि हम परसों जा रहे हैं। बाबा ने पूछा, कैसे जा रहे हो? माताजी ने बताया, बेटे ने बस की सीटें एडवांस बुक कराई हैं। उन दिनों चार आने में बस सीटों की एडवांस बुकिंग हो जाती थी और बस थोड़े से किराये में माउंट आबू से आबू रोड तक ले आती थी। बाबा ने कहा, तुम्हें बस में ले जा रहा है, बुलाओ उस (बृजमोहन) को। मैं गया। बाबा ने पूछा, तुम माताजी को बस में ले जाओगे? नहीं, इसे टैक्सी में ले जाओ। हमने टैक्सी कर ली। बाबा के इस प्यार से मेरी माँ की श्रद्धा बाबा में और भी बढ़ गई।

शरीर के आराम का भी त्याग

दोपहर भोजन के बाद बाबा हम तीन-चार जनों को अपने पास बुला लेते थे और चौपड़ खेलते थे। हमें बड़ी खुशी होती थी इसलिए दोपहर भोजन बाद हम कमरे के बाहर खड़े रहते थे कि बाबा बुलाएगा। हमारे ग्रुप में बाबा का लौकिक बेटा नारायण भी शामिल रहता था। वह छुट्टियों में मुम्बई से आ जाता था। बाबा खेलते समय हमें अपने साथ अपनी गद्दी पर बिठाता था और नारायण को सामने बिठाता था। एक दिन हम इन्तज़ार करते रहे, बाबा का बुलावा नहीं आया। हमने लच्छू बहन से पूछा, तो बोली, मैं बाबा से पूछकर आती हूँ। फिर आई और बोली, अपने साथियों को ले आओ, बाबा खेलेगा। फिर खेल शुरू हुआ और बाबा हार गए। मुझे आश्चर्य हुआ कि बाबा तो कभी हारते नहीं, आज हार कैसे गए। शाम को भी बैडमिंटन खेलते थे तो 10 जने दूसरी तरफ, बाबा अकेले एक तरफ तो भी नहीं हारते थे, आज कैसे हार गए। बाद में लच्छू बहन ने बताया, बाबा को 102 बुखार है, तुमने कहा, इसलिए बाबा ने खेलने के लिए बुला लिया। साकार बाबा बच्चों का दिल पूरा करने के लिए अपने शरीर की तकलीफ का अहसास भी त्याग कर देते थे।

हर चरित्र में ज्ञान और अनुभव का समावेश

मेरे लौकिक पिता ने जब शरीर छोड़ा तो उनकी 30 ड्रेस मैंने अपने प्रयोग के लिए यह सोचकर रख ली कि ये मुझे फिट आती हैं और कुछ बचत हो जाएगी। आमतौर पर तो हम ऐसे कपड़ों को दान में किसी को दे देते हैं पर मैंने नहीं दिये। मधुबन में एक बार जब बाबा से छुट्टी लेने गया तो मैंने वो ड्रेस पहन रखी थी। बाबा के पास कई सम्पर्क वाले ऐसे बच्चे आते थे जो विदेश में रहते थे और वहाँ की रेडिमेड ड्रेस बाबा के पास छोड़ जाते थे। बाबा भी उन्हें रख लेते थे और जरूरत अनुसार बच्चों को देते रहते थे। बाबा ने पहले भी मुझे ऐसी ड्रेस दी थी, इस बार भी बाबा ने मुझे ऐसी एक और ड्रेस देनी चाही। मैंने अपनी एकानामी का वर्णन करते हुए कहा, लौकिक पिता जी के शरीर छोड़ने पर मैंने उनकी सभी ड्रेस रख ली हैं बाबा, देखो मुझे पूरी फिट आई हैं। बाबा मुसकराए फिर बोले, बाबा का दिया पहनोगे तो बाबा याद आएगा, लौकिक पिता का दिया पहनोगे तो लौकिक पिता याद आएगा। बाबा की इस गुह्य धारणा की बात सुनकर मैंने बाबा द्वारा दी गई ड्रेस ले ली।

कोई कुछ देता है तो उसे यज्ञ में समर्पित कर दो

सचमुच लौकिक पिता की ड्रेस पहनते ही लौकिक पिता का संकल्प आता था। बाबा तो यहाँ तक कहता है, किसी आत्मा से सौगात न लो । कोई कुछ देता है तो उसे यज्ञ में समर्पित कर दो। अगली बार मधुबन आया तो मैंने वे सारे ड्रेस यज्ञ में दे दिये। फिर अगली बार देखा, एक सेवाधारी भाई मेरे पिता की शर्ट पहने धोबीघाट पर कपड़े धो रहा था। शर्ट देखते ही मेरे मन में आया, मेरे पिता जी की शर्ट! यज्ञ में देने के बाद भी देखते ही वही मेरेपन की स्मृति आ गई। यदि पहनता रहता तो कितनी लौकिक स्मृतियाँ आती। एक शिवबाबा को याद करने के लिए अन्यों को भूलना जरूरी है, उसके लिए इस प्रकार की धारणा जरूरी है। बाबा सिखाते हैं, तुम्हारा ध्यान कहीं ना जाए। प्यारे बाबा पत्र के नीचे लिखते थे, अच्छा, सब बच्चों को याद-प्यार। फिर लिखते थे, खुश रहो, आबाद रहो, ना बिसरो, ना याद रहो। बाबा कहते थे, मैं बच्चों को याद करूँ या शिवबाबा को याद करूँ।

शिव भगवानुवाच :

मीठे बच्चे, “ईश्वरीय गवर्मेन्ट आत्माओं को पावन बनाकर देवता बनाती है, यह है बहुत गुप्त कर्तव्य जिसे मनुष्य नहीं समझ सकते। जब मनुष्य देवता बनें तब तो नर्कवासी से स्वर्गवासी बन सकें।

ब्रह्माकुमार आत्म प्रकाश भाई

बाबा ने कहा, बाबा की गद्दी सो बच्चों की गद्दी
मैं अपने को पद्मापद्म भाग्यशाली समझता हूँ कि विश्व की कोटों में कोऊ आत्माओं में मुझे भी सृष्टि के आदि पिता, साकार रचयिता, आदि देव, प्रजापिता ब्रह्मा के सानिध्य में रहने का परम श्रेष्ठ सुअवसर मिला। उस तेजोमय रूहानी आभा वाले चुम्बकीय व्यक्तित्व, परमपिता परमात्मा शिव के भाग्यशाली रथ पिताश्री जी के अंग-संग बिताए गए दिन, उनसे श्रीमत लेकर की गई सेवाएँ और कदम-कदम पर मिली उनकी अमूल्य शिक्षाएँ, मानस पटल पर स्मृतियों के माध्यम से साकार हो उठे हैं।

बाबा को लिखा पत्र

बात सन् 1957 की है। बाबा देहली के रजौरी गार्डन सेवाकेन्द्र पर ठहरे हुए थे। इक्कीस वर्ष की आयु में, इंजीनियरिंग के विद्यार्थी के रूप में बाबा से वहाँ पहली बार मेरा मिलना हुआ। प्रात:कालीन ईश्वरीय महावाक्य सुने, मीठे बाबा की गोद में गए और फिर बाबा ने कहा, बच्चे, यह पढ़ाई काम में आने वाली नहीं है, किसी न किसी धन्धे में लग जाओ। प्यारे बाबा का अनमोल मार्ग-दर्शन पाकर हम खुशी-खुशी वापस आ गए और घर आकर हमने मीठे बाबा को पत्र लिखा, (मूल पत्र अंग्रेजी में था और उसका उत्तर भी अंग्रेजी में ही बाबा ने दिया था) बाबा, मैं इंजीनियर बनकर भवन निर्माण करना नहीं चाहता परन्तु आपकी विश्व नव निर्माण की प्रक्रिया का नींव पत्थर बनना चाहता हूँ। मैं मशीनरी नहीं बनाना चाहता परन्तु किंग और क्वीन बनाने की आपकी मशीनरी का एक पुर्जा बनना चाहता हूँ। मैं हाइवे और रोड बनाना नहीं चाहता वरन् परमधाम और सुखधाम का जो रास्ता आपने दिखाया है उस पर तीव्र गति से दौड़ना चाहता हूँ।

शिवबाबा का फोटो तो आएगा नहीं

बाबा का जवाब आया, बच्चे ! यह सब ठीक है परन्तु अभी अपने परिवार वालों को और साथी इंजीनियर्स को भी यह सन्देश दो। फिर हमने प्यारे बापदादा की श्रीमत प्रमाण लौकिक परिवार को ज्ञान देना प्रारम्भ किया। माता-पिता, भाई-बहनों समेत सारा परिवार बाबा के ज्ञान में चलने लगा। थापर इन्स्टीट्यूट पटियाला में भी साथी इंजीनियर्स की ज्ञान-सेवा प्रारम्भ की। वहाँ होस्टल की कई आत्माएँ सम्पर्क में आने लगीं और कुछ ने अच्छा ज्ञान उठाया भी। सन् 1957 में ही पहली बार मधुबन में आए। एक बार जब बाबा टेनिस खेल रहे थे, मेरे पास कैमरा था। मैंने बाबा का फोटो खींचना चाहा तो बापदादा खेलते-खेलते रुक गए और कहा, बच्चे ! (शिव बाबा का) फोटो तो आएगा नहीं और यह शरीर पावन नहीं है। फोटो खींचने से क्या फायदा ? मैं रुक गया। बाबा ने कहा, बच्चे, फिर भी आपका दिल है तो खींच लो। इस प्रकार हमारा दिल रखने के लिए बाबा ने आज्ञा दे दी परन्तु देह के भान में लाने वाली हर बात से पार ले जाना ही उनका लक्ष्य रहता था।

चित्रों और साहित्य की सेवा

सन् 1961 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके परिवार सहित जब बाबा से मधुबन में मिलने गए तो प्यारे बापदादा ने हमें दिल्ली में भ्राता जगदीश जी के पास साहित्य विभाग में सेवा के लिए भेज दिया। त्रिकालदर्शी बाबा मुझ आत्मा के पार्ट के आदि-मध्य-अन्त को जानते थे इसलिए मानो बाबा मुझे इस कार्य की ट्रेनिंग दिलाना चाहते थे। कुछ समय बाद मुम्बई में विश्व नव-निर्माण आध्यात्मिक प्रदर्शनी का बनना प्रारम्भ हुआ तो हमने 6×4 का सीढ़ी का एक चित्र बनाकर बाबा के पास भेजा। बाबा को बहुत पसन्द आया और तभी बाबा ने मुझे अपने हाथों से पत्र लिखने शुरू किये कि बच्चे, प्रदर्शनी के चित्रों की सेवा में लग जाओ। बाबा ने सीढ़ी के चित्र के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न सुझाव, आदेश, निर्देश समय-समय पर दिये जिनसे यह चित्र अधिक सुग्राह्य हो गया। उदाहरण के लिए देवियों की पूजा कर उनको पानी में डालना अर्थात् अन्धश्रद्धा की पूजा, काँटों की शैय्या पर लेटा हुआ गरीब भारत आदि-आदि । इस प्रकार दिल्ली, कृष्णानगर में चित्रशाला की स्थापना हो गई और कई कलाकारों को लगाकर जोर-शोर से यज्ञ के ज्ञान के चित्र बनने शुरू हो गये।

बाबा ने अपने साथ गद्दी पर बिठाया

जब आयल पेन्ट की पहली प्रदर्शनी बनाकर हम मधुबन में बाबा के पास लाए तो उन चित्रों को छोटे हाल में रखवाया गया, बाबा उन चित्रों को देखने आये, वे एक-एक चित्र को बड़े ध्यान से देखते रहे और मैं साथ-साथ व्याख्या करता रहा। सारे चित्रों का अवलोकन करने के बाद बाबा ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। मैं गया तो देखा, बाबा गद्दी पर बैठे थे। मैं नीचे बैठने लगा तो प्यार के सागर बाबा ने इशारा करके कहा, बच्चे! आओ, गद्दी पर बैठो। मैं गद्दी पर ही बैठ गया। फिर बाबा ने महावाक्य उच्चारण किए, मीठे बच्चे, जो बाप की गद्दी सो बच्चों की गद्दी। ये प्यार और अधिकार भरे बोल सुन आत्मन् गद्गद् हो उठा। आज भी बाबा के कमरे में जाते हैं तो यह सीन मन की आँखों के सामने आ जाता है, रोमाँच खड़े हो जाते हैं और नेत्रों से प्यार के सागर के प्रेम में अश्रूधारा बहने लगती है।

बेबी बुद्धि का टाइटल

बाबा हमेशा कहते थे, फलाँ म्यूजियम बहुत सुन्दर बनाओ तो बाबा खुद आकर देखेगा। जब कोई नया चित्र बनता था तो बाबा चाहते थे कि बच्चे बाबा को दिखाएँ। जब पहले-पहले शिव बाबा का किरणों वाला चित्र बना और मथुरा में लगी प्रदर्शनी में दिखाया गया तो बाबा के पास भी समाचार पहुँचा कि नया चित्र बना है। पहले तो बाबा ने मुरली में खूब महिमा की कि बच्चों ने अच्छा विचार सागर मन्थन किया है परन्तु बाद में यह भी कह दिया कि बच्चे बेबी बुद्धि हैं, जो बाबा को दिखाया भी नहीं। फिर तो हमने शीघ्र ही एक सैम्पल प्राण प्यारे बापदादा के पास भेज दिया। कार्य में देरी होने पर या मन पसन्द कार्य न होने पर जब बाबा के मुख से हमारे लिए बेबी या बेबी बुद्धि बच्चे शब्द निकलता तो यह शब्द भी हमारी खुशी का पारा चढ़ा देता क्योंकि इसमें मीठी शिक्षा के साथ-साथ बाबा का अपार प्यार भी समाया रहता।

शब्दों की सही लिखत पर ध्यान

बाबा हर कार्य को बिल्कुल ठीक रीति से करते और कराते थे। जब पहली बार परमात्मा के परिचय की किताब पर चार रंग में 'सर्वात्माओं का पिता' यह टाइटल और दूसरी तरफ 'सतयुगी दैवी स्वराज्य आपका जन्म सिद्व अधिकार है' यह छपा तो बाबा को रंगीन टाइटल बहुत पसन्द आया। लेकिन स्लोगन की लाइन को देखकर तुरन्त पत्र लिखा कि इसमे 'ईश्वरीय' शब्द मिस है। ईश्वर के घर का बच्चा बने बिना यह जन्म-सिद्व अधिकार नहीं मिल सकता। इस प्रकार शब्दों को सही-सही लिखा जाए इस बात पर बाबा बहुत-बहुत ध्यान देते थे।

भविष्य स्वरूप का नशा

सेवाओं में सब प्रकार से व्यस्त रहते हुए भी बाबा सदा अपने भविष्य स्वरूप के नशे में रहते थे। मैं कल क्या बनने वाला हूँ, यह जैसे बाबा के सामने हर क्षण प्रत्यक्ष रहता था। एक बार गीता का भगवान कौन, शिव या श्रीकृष्ण (इस चित्र में श्रीकृष्ण के बचपन के पालना और पढ़ाई के चित्र भी है)? यह चित्र लेकर हम बाबा के पास गए तो बाबा ने उसे छोटे हाल के प्रवेश द्वार पर लगवाया और मुरली सुनाकर जब हाल से बाहर जाते तो उसको देखकर अपने भविष्य के स्वरूप के नशे में कहते, देखो! मैं कल यह मिचनू बनूँगा, मैं ऐसे पदूँगा। बाबा के नारायणी नशे में डूबे हाव-भाव देखकर हम भी देह की सुध-बुध भूल जाते और बाबा के साथ-साथ नई सतयुगी दुनिया के नज़ारों में रमण करने लगते।

कदम-कदम पर शिवबाबा की याद

बाबा सिखाते थे कि चित्र बड़े-बड़े होने चाहिएँ ताकि अन्धों के आगे आइने का काम करें। बाबा सदा अपने को छिपाना चाहते थे और हर बात में शिव बाबा की महिमा को प्रत्यक्ष करना चाहते थे और अपने इस पुरुषार्थ में वो एक सेकण्ड के लिए भी प्यारे शिव बाबा की स्मृति को ओझल नहीं होने देते थे। एक बार जब हम छोटे हाल में फुल साइज का त्रिमूर्ति का चित्र फिट कर रहे थे तो बाबा ने ब्रह्मा का चित्र देखकर कहा, यह मेरा चित्र इतना बड़ा क्यों बनाया है? हमने कहा, बाबा जब विष्णु फुल साइज का है तो ब्रह्मा भी तो फुल साइज का बनाना पड़ेगा। बाबा कभी भी अपनी महिमा सुनना पसन्द नहीं करते थे। यदि मुरली पूरी होने के बाद क्लास में कोई भी कविता आदि सुनाता और उसमें साकार बाबा की महिमा होती तो बाबा झट चुप करा देते। वे सदैव कहते कि यदि महिमा है तो एक शिव बाबा की। जब कोई उन्हें फूल भेंट करता तो कहते, मम्मा को दो क्योंकि वह कुमारी है। इस प्रकार हमने देखा, कदम-कदम पर बाबा शिव बाबा की याद दिलाते और सभी को अपने से आगे रख, आगे बढ़ाते। उनके जीवन में सद्गुणों के अमूल्य रत्न छिपे हुए थे, वे सभी के थे और सभी उनके थे। परन्तु प्यार के सागर होते भी पल में न्यारे होने की कला में भी निपुण थे। कितनी महिमा करें, कितने गुण बखान करें ? ऐसे सर्वोच्च बापदादा के सानिध्य में ज्ञान-रत्नों से सजकर हमारा भी जीवन धन्य हो गया।

शिव भगवानुवाच :

मीठे बच्चे, याद से ही तुम्हें बहुत बड़ी आयु मिलती है, निरोगी बनते हो, तुम्हारे पाप कटते हैं, तुम सच्चा सोना बन जाते हो, आत्मा से रजो-तमो की खाद निकल जाती है, कंचन बन जाती है। याद से ही तुम पावन दुनिया के मालिक बन जायेंगे, तुम्हारा श्रृंगार होगा। तुम बहुत धनवान बन जायेंगे, याद ही तुम्हें पद्मापद्म भाग्यशाली बनाती है।

मीठे बच्चे, बाप ने तुम्हें समझ दी है कि तुम आत्मायें सब भाई-भाई हो। तुम्हें एक बाप की याद में रहना है। यही बात तुम सभी को सुनाओ क्योंकि तुम्हें सारे विश्व के भाइयों का कल्याण करना है। तुम ही सेवा के निमित्त हो।

ब्रह्माकुमारी दादी गुलजार

पिताश्री का निःस्वार्थ प्यार
जब हम यज्ञ (प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय) में आये थे तो छोटे-छोटे थे। ब्रह्मा बाबा ने हमारे जीवन की ज़िम्मेवारी शिव बाबा के डायरेक्शन से उठाई। आमतौर पर बड़े को छोटे के ऊपर अधिकार रखने की भावना होती है लेकिन ब्रह्मा बाबा की विशेषता यह देखी कि उनमें यह भावना बिल्कुल नहीं थी कि मैं बाप हूँ और यह बच्चा है, मैं बड़ा हूँ और यह छोटा है। यदि हमारे में से किसी से नुकसान हो जाता था तो वो थोड़ा मन में डरता था पर पिताश्री प्यार से बुलाकर कहते थे, बच्ची, पता है नुकसान क्यों हुआ? ज़रूर आपकी बुद्धि उस समय यहाँ-वहाँ होगी। बच्ची, जिस समय जो काम करती हो उस समय बुद्धि उस काम की तरफ होनी चाहिए, दूसरी बातें नहीं सोचना। इस प्रकार बाबा प्यार से समझाते थे, पिताश्री ने कभी डांटा नहीं, प्यार से शिक्षा दी। पिताश्री शिक्षा देने से पहले हम बच्चों की अच्छाई का वर्णन करते थे। कहते थे, बच्ची, तुम बड़ी अच्छी हो, बड़ी योगी हो, बड़ी ज्ञानी हो, अच्छा तुमसे यह गलती हो गई, कोई बात नहीं लेकिन आगे से अटेन्शन देना। बाबा की ऐसी शिक्षा से उस बच्ची में उमंग आता था कि मैं भी कुछ कर सकती हूँ, बाबा की हमारे में उम्मीद है और मैं बाबा को कुछ करके दिखाऊँ। उमंग-उत्साह बढ़ाना, यह सबसे अच्छी विधि है किसी को आगे बढ़ाने की।

अपने को चतुर्भुज समझो

हमारी पालना ब्रह्मा बाबा ने बचपन से ऐसी की जो मैं फलक से कह सकती हूँ कि ऐसी किसी राजकुमारी की भी पालना नहीं हुई होगी। एक बार बाबा ने हमको कहा, आप लोगों को अपने हाथ से नये जूते भी सिलाई करने हैं। हम बहनें तो छोटी आयु वाली थीं, हमारे हाथ कोमल थे। हमने कहा, बाबा, हम तो छोटे हैं और जूते का तला तो बड़ा सख्त होता है, उसमें सूआ लगाना पड़ता है, हमारे हाथ में लग जायेगा, बहुत नुकसान हो जायेगा, हम कैसे यह करेंगे? हमने कहा, बाबा, यह भाइयों का काम है, हमारा नहीं है। पिताश्री ने कहा, क्या तुमने सारे ही जन्म नारी रूप में लिए हैं? हमने कहा, नहीं बाबा, कभी हम नर भी बने होंगे, कभी नारी भी बने होंगे। बाबा ने कहा, आत्मा में नर, नारी दोनों प्रकार के संस्कार हैं, तभी तो कभी नर बने, कभी नारी बने। तो तुम क्यों समझती हो कि मेरे में सिर्फ नारी के ही संस्कार हैं? ऐसा समझोगी तो कोमलता आयेगी। तुम क्यों नहीं समझो कि मैं चतुर्भुज हूँ। चतुर्भुज समझकर काम करो, देखो, तुम्हारा काम कितना अच्छा होता है। सचमुच, बाबा की इस शिक्षा को समझ लेने के बाद कभी भी हमारे में नारीपन की कोमलता, निर्बलता नहीं आई। फिर हम समझने लगे कि जो काम भाई कर सकते हैं, वो हम भी कर सकते हैं। हम छोटी-छोटी बच्चियाँ मिलकर यज्ञ के सभी कार्य कर लेते थे।

उमंग कम नहीं होने दिया

हम सभी जो भी ओम मण्डली में आये थे, दुनिया के हिसाब से साहूकार घरों से आये थे और अपने घरों में हम लोगों ने कभी पानी का गिलास भी अपने हाथों से नहीं पीया था, वहाँ नौकर बहुत सस्ते थे। एक-एक बच्चे को, एक-एक नौकर तो मुकर्रर होता ही था। परन्तु जैसे पौधे को पानी मिलने से वह खिल जाता है इसी रीति से हम लोगों को ब्रह्मा बाबा ने नि:स्वार्थ प्यार के पानी से अपना बना लिया। फिर जो भी सेवा कराना चाहते थे वह इतनी अच्छी होती थी जो आज आप उसका परिणाम देख रहे हैं। ब्रह्मा बाबा के प्रशासन की विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी किसी बच्चे के उमंग को कम नहीं होने दिया।

अगरबत्ती से शिक्षा

एक बार एक भाई ने पिताश्री से शिकायत की, "बाबा, वैसे तो मुझे योग में बहुत सुख मिलता है, चाहे घर में योग लगाऊँ, चाहे क्लास में आकर योग लगाऊँ लेकिन जब कार्य-धंधे पर जाता हूँ तो वहाँ के वातावरण के प्रभाव में आ जाता हूँ। वहाँ योग न लगाने वालों की संख्या ज़्यादा होती है इस कारण उनका प्रभाव मेरे पर आ जाता है। जब वायुमण्डल का असर आता है, मैं बहुत सोचता हूँ, 'मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ', पर यह भी थोड़ी देर याद रहता है, फिर भूल जाता हूँ।" बाबा ने कहा, “बच्चे, बहुत सहज तरीका है, अपनी पॉकेट में एक अगरबत्ती का पैकेट रखो।" वह सोचने लगा, अगरबत्ती के पैकेट का मैं क्या करूँगा? बाबा ने कहा, "जिस समय तुम वायुमण्डल के प्रभाव में आ जाओ तो एक अगरबत्ती अपने सामने जलाकर रखो और फिर सोचो, अगरबत्ती बनाने वाला कौन? आप मानव आत्मा ने ही तो इसे बनाया है ना ! आप रचयिता हो और अगरबत्ती आपकी रचना है। फिर सोचो, क्या अगरबत्ती कभी कहती है, बदबू है, मैं कैसे खुशबू फैलाऊँ? फिर बाबा ने कहा, यह अगरबत्ती दुबली-पतली, तुम इससे भी गए गुजरे हो क्या?” बाबा की इस बात से वह भाई बहुत प्रेरित हुआ। उसने सोचा, जब हमारी रचना में यह गुण है कि वह बदबू को खुशबू में बदल सकती है तो मैं तो मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ, मेरा प्रभाव सर्व पर होना चाहिए, न कि सर्व का प्रभाव मुझ पर हावी हो जाए। इस प्रकार बाबा की स्नेह भरी शिक्षा से उसे विजयी बनने का मार्ग मिल गया।

शिव भगवानुवाच :

मीठे बच्चे, जिनका बुद्धियोग एक बाप के साथ है, पवित्र बने हैं, उन्हें ज्ञान-रत्नों की धारणा अच्छी होगी। ईश्वरीय ज्ञान के लिए शुद्ध बर्तन चाहिए। उल्टे-सुल्टे संकल्प भी बन्द हो जाने चाहिएँ। बाप के साथ योग लगाते-लगाते बर्तन सोना बने तब ज्ञान- रत्न ठहर सकें।