जीवन को पलटाने वाली
एक अद्भुत जीवन कहानी
भाग - 2
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय
पाण्डव भवन, आबू पर्वत (राजस्थान)
अलौकिकता का दिग्दर्शन कराने वाली अद्भुत जीवन-कहानी
हमने 'जीवन को पलटाने वाली अद्भुत जीवन-कहानी' के भाग-१ में ब्रह्मा बाबा के सन् १९५७ तक के कुछ वृत्तान्तों का संग्रह छापा था। अब इस भाग-२ में सन् १९५७ के आगे से लेकर जनवरी १९६९ तक के कुछ वृत्तान्तों का उल्लेख किया गया है। साथ-साथ सन् १९३६-३७ से लेकर सन् १९६९ तक बाबा ने समय-समय पर विभिन्न व्यवसायों के लोगों को ईश्वरीय ज्ञान स्पष्ट करने के लिए जो-कुछ मार्ग-प्रदर्शना दी या लौकिक चीज़ों को देखते हुए भी उनमें अलौकिकता का दिग्दर्शन करने या उनसे गुण-ग्रहण करने की जो रीति-नीति बताई, उनका भी इस भाग में कुछ सार दिया गया है।
अन्यश्च, मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती ने अपने वर्तमान जीवन को सर्वोच्च ईश्वरीय सेवा में सफल करते हुए जो ब्रह्मा वत्सों के मन पर अलौकिक एवं प्रेरणादायक छाप लगा दी, उसका भी इसमें संक्षिप्त वर्णन है।
वास्तव में इस दूसरे भाग में भी ".......अद्भुत जीवन-कहानी" की समाप्ति नहीं हुई क्योंकि सन् १९६९ में अव्यक्त होने के बाद भी ब्रह्मा बाबा का जो पार्ट चल रहा है, वह भी पहले ही की तरह, बल्कि उससे भी अधिक जीवन को पलटाने वाला और अद्भुत बनाने वाला ही है। अब स्वयं इस प्रत्यक्ष सृष्टि-नाटक के पर्दे के पीछे छिपकर वे वत्सों को मंच पर उपस्थित कर एवं उनको निमित्त बनाकर जो कार्य कर रहे हैं, उसकी भी महत्ता अवर्णनीय है।
पुनश्च, उनके द्वारा दी गई शिक्षा और मार्ग-प्रदर्शना से ब्रह्मा-वत्सों के जीवन में व्यक्तिगत रूप से जो परिवर्तन आया अथवा उन्हें अलौकिक रूप से जो प्राप्ति हुई, न तो उसका उल्लेख इन दो भागों में हुआ है और न ही उन ब्रह्मा-वत्सों की जीवन-कहानी की कुछ झलकियाँ इसमें दी जा सकी हैं, जिन्होंने प्रारम्भ में, मध्यकाल में या बाद में ब्रह्मा बाबा के तन में परमपिता परमात्मा शिव की प्रवेशता का अनुभव करके अपने तन, मन, धन को ईश्वरीय सेवा में लगा दिया। उन ब्रह्मा-वत्सों के मुखारविन्द से मैंने उनके अनुभव के जो वृत्तान्त सुने हैं, वह निश्चय ही संसार के सत्साहित्य की एक अतुल और अद्वितीय निधि हैं जिन्हें सुनते-सुनते अथवा पढ़ते-पढ़ते मनुष्य के आध्यात्मिक पुरुषार्थ की गति बढ़ती है, मनोबल सुदृढ़ होता है। माया को परास्त करने की यथेष्ट शक्ति स्वयं में अनुभव होती है और निष्प्राण पुरुषार्थी में भी मानों प्राण-प्रतिष्ठा होती है। जिस समय से इस जीवन-कहानी का प्रारम्भ हुआ, उस काल में घर में बंदी की तरह रहने वाली एवं लौकिक शिक्षा से वंचित महिला वर्ग ने जिस अदम्य साहस, प्रबल प्रभु-प्रेम, दावानल की तरह न बुझने वाली लग्न, पवित्रता को प्राप्त करने की गहरी प्यास का जो परिचय दिया, उसका कोई उदाहरण संसार के इतिहास के पन्नों में ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। उनका संकलन करके उनका प्रकाशन अद्भुत जीवन-कहानी के भाग-३ के रूप में करने का मेरा विचार है।
तीसरे भाग में बाबा की बहुमुखी प्रतिभा तथा विश्व को उनकी देन, उनके चिन्तन के अनमोल मोती और उनके चरित्रों की छवि और उनके जीवन के कुछ गिने-चुने संदर्भ भी प्रकाशित करने की मेरी योजना है। साथ-साथ, लाल अक्षरों में लिखे हुए बाबा के कुछ पत्र या उनके कुछ अंश भी छाप ने का संकल्प है। क्योंकि वे पत्र भी अनेक आत्माओं के जीवन को पलटाने और अद्भुत बनाने वाले सिद्ध हुए। इसके लिए मैं इस भूमिका अथवा प्राक्कथन के द्वारा उन-उन ब्रह्मा-वत्सों से उन जनों से, जो कभी भी बाबा के सम्पर्क में आये हैं, से निवेदन करना चाहता हूँ कि उनके पास बाबा के कोई पत्र, कोई फ़ोटो या व्यक्तिगत रूप से उनके कोई संस्मरण हों तो वे उन्हें सबके लाभार्थ प्रकाशित कराने के निमित्त मेरे पास भेज दें। यदि वे मूल पत्र किसी कारण से न भेजना चाहें तो उसकी फोटो स्टेट कापी भेज दें। यदि प्रेषक चाहेंगे तो प्रयोग के बाद यह सामग्री उन्हें वापिस भेज दी जायेगी।
१८ जनवरी, १९८५
ब्र.कु. जगदीशचन्द्र हसीजा
पिता-श्री के लौकिक तथा अलौकिक जीवन के कुछ प्रेरणादायक प्रसंग
पिता-श्री ब्रह्मा, जिन्हें लोग स्नेह से 'दादा' कहते थे और जिनकी अद्भुत जीवन-कहानी के कुछ वृत्तान्त हम भाग-१ में लिख आये हैं, का वास्तव में सारा ही साकार जीवन एक प्रबल प्रेरणा का स्रोत था। परमपिता परमात्मा शिव का माध्यम बनने से काफी समय पहले, जब वे जवाहरात का व्यापार करते थे और गृहस्थ एवं सांसारिक सम्बन्धों के लेन-देन में लगे हुए थे, तब भी उनका व्यवहार और आचार लाखों-करोड़ों लोगों से श्रेष्ठ था। निस्सन्देह, दिव्य साक्षात्कारों तथा परमात्मा शिव के दिव्य प्रवेश के बाद तो उनके विचारों एवं संस्कारों में अनुपम परिवर्तन आया ही, परन्तु उससे पहले का, उनके भक्तिकाल का जीवन भी सामान्यजनों के जीवन से बहुत ही ऊँचा था। इसी प्रसंग में उनके जीवन से ऐसे बहुत-से उदाहरण दिये जा सकते हैं। परन्तु हम यहाँ उनके भक्तिकाल के पुरुषार्थ के बारे में दो-चार वृत्तान्त प्रस्तुत करेंगे:
दादा की लौकिक बहू, बृज इन्द्रा बहन जी, बताती है कि एक बार बाबा जब अपने जवाहरात के व्यापार-केन्द्र में अपनी गद्दी पर बैठे जवाहरात की एक पुड़िया का मूल्यांकन कर रहे थे तो उन्हें अचानक ही कहीं जाना पड़ गया। दादा अपनी गद्दी के सामने रखे शीशे के एक बक्स पर वह पुड़िया यूँ ही खुली छोड़कर अपने व्यापार-स्थान से चले गए क्योंकि उन्हें यह ख्याल था कि कोई चोरी की घटना तो घटेगी नहीं, कारण कि उनकी दुकान पर कार्य करने वाले सभी लोगों में उनका पूर्ण विश्वास था। परन्तु उस दिन अचानक ही एक सुनार, जो बाबा से श्रृंगार और जेवर बनाने के आर्डर (Order) लेकर जाता था, के छोटे बच्चे बाबा की अनुपस्थिति में वहाँ आये थे और वे उस पुड़िया में से कुछ जवाहरात उठा कर चम्पत हो गये थे। जब बाबा वापिस अपनी गद्दी पर लौटे और पुड़िया में पड़े जवाहरात से उनका काम पड़ा तो उनकी पैनी दृष्टि और अचूक स्मृति ने यह तुरन्त जान लिया कि उनमें से कुछ जवाहरात निकल गये हैं। उन्हें दुकान पर कार्य करने वाले सभी कार्यकर्ताओं में तो पूर्ण विश्वास था ही कि उन्होंने तो ये लिये ही नहीं होंगे। अतः उनमें से तो किसी को भी बाबा ने एक शब्द भी ऐसा नहीं कहा जो उनके विश्वास के भंग होने का सूचक हो। बाबा ने उनसे केवल इतना ही मालूम किया कि उनकी अनुपस्थिति में कौन आया था और कौन उनकी गद्दी वाले कमरे में गया था। जब उनको यह मालूम हो गया कि अमुक सुनार के बच्चे वहाँ आए थे तो वे तुरन्त ही अपनी गाड़ी में किसी को साथ लेकर उस सुनार के घर पहुँचे। सुनार तो अपनी दुकान पर था और उसका बड़ा बच्चा भी दुकान पर ही था। बाबा ने उसके घर पहुँचते ही सुनार के छोटे बच्चे को बुलवाया और उसे प्यार-पुचकार करते हुए कहा, "मीठे बच्चे, तुम्हारा बड़ा भाई, जो हमारी दुकान पर तुम्हारे साथ आया था कहता हैं कि हीरों की पुड़िया में से जो हीरे तुम दोनों ले आये थे, वह दे दो!'
यह सुनते ही वह बच्चा हक्का-बक्का रह गया और क्षण भर बाद बोला "वह मुझे तो कहता था कि बाबा को मत बताना और उसने खुद बता दिया!" ऐसा कह कर वह एक क्षण चुप रहा, फिर अन्दर जाकर पुड़िया ले आया। तब बाबा ने हीरे लेते हुए और प्यार करते हुए कहा, 'अच्छा यह तो बताओ कि यह किसलिए उठा लाये थे?'
उसने भोलेपन से कहा कि हमने सोचा कि इन्हें हलवाई के हवाले कर आज हम अच्छी तरह से मिठाई खायेंगे।
इन सारी वार्ता में बाबा ने एक बार भी न उसे डाँटा, न उससे क्रोध किया,न उस पर हाथ ही उठाया, बल्कि उसे खूब मिठाई खिलवाई और कहा "देखो, फिर कभी चोरी न करना वर्ना पुलिस पकड़ ले जायेगी और यदि तुम्हारे पिता जी को मालूम हो गया तो वह भी तुम्हारी पिटाई करेंगे। ऐसे अनेक वृत्तान्त इस बात को सूचित करते हैं कि शिव बाबा की प्रवेशता से पहले ही बाबा बहुत धीरज और शान्ति से व्यवहार करते थे।
हम शिवबाबा की प्रवेशता के पूर्वकाल में बाबा की मानसिक भूमिका की बात कर रहे थे और यह बता रहे थे कि उन दिनों भी बाबा अथवा दादा अपने मन, वचन,कर्म की शुद्धि पर ध्यान दिया करते थे। एक बार, जब इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का मुख्यालय कोटा हाउस में था तब की मुझे एक बात याद हो आई है। तब बाबा की लौकिक पत्नी जसोदा जी ने मुझे एक बात सुनाई थी। जसोदा जी बोलीं, "एक बार मेरे यहाँ मेरी स्टेप मदर (सौतेली माँ) आई थीं।मैं अन्दर थी। बाबा ने मुझे कहा "जसोदा, तुम्हारी स्टेप मदर आई हैं।" बाबा के मन में कोई ऐसा भाव नहीं था पर उनके मुख से अनजाने ही में ये शब्द निकल गए थे। खैर, कुछ समय वहाँ बैठकर, जब उसे जाना था तब वह चली गयीं। रात्रि को जब बाबा घर में आये तब मैंने कहा 'बाबा भोजन ले आयें?' बाबा ने कहा "नहीं।"
तब मैंने पूछा, "क्यों, अब खाने का समय तो हो गया है?"
तब वे बोले, "आज मैं भोजन नहीं करूँगा क्योंकि आज जब आपकी लौकिक माता जी (सौतेली) आई थीं तब मैंने आपसे कहा था कि आपकी 'स्टेप मदर' आई है। आपकी माता जी ने यह सुना होगा तो उन्हें दुःख अनुभव हुआ होगा। उनकी दुखानुभूति का स्पन्दन मेरे मन को स्पर्श कर रहा है। अब मैं जब तक उनसे क्षमा न माँग लूँ तब तक मैं भोजन नहीं करूँगा।"
कहने के बावजूद भी उस रात्रि को बाबा बिना भोजन किये ही सो गए। दूसरे दिन अमृतवेले मुझे साथ ले बाबा अपने ससुराल में गए। बाबा को देखकर उनके ससुराल के सभी लोग बहुत खुश भी हुए और कुछ सोचने लगे कि इस समय अनायास ही बाबा कैसे आये हैं! जब मेरी माता जी पास आईं तो बाबा बोले, 'कल आपके वहाँ आने पर मैंने ठीक शब्द नहीं बोले; अवश्य ही मेरी बात सुनकर आपको मानसिक कष्ट हुआ होगा उसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगने आया हूँ।"
मेरी स्टेप मदर घूँघट किये हुए थी और वे घूंघट में ही मुझसे कह रही थीं कि ‘ऐसी तो कोई बात नहीं है।’ इतना कहकर वे चुप हो गयीं। बाबा ने कहा, "नहीं, नहीं आपको मेरी बात बुरी अवश्य लगी है।"तब मैंने भी कहा, "माता जी आप स्पष्ट बता दीजिए न! कल रात को इन्होंने इसी बात के कारण न खाना खाया न ही दूध पीया। अब भी अगर आप नहीं बतायेंगी तो हो सकता है कि ये प्रायश्चित्त् के रूप में खाना ही न खायें।"
यह सुनकर उसने कहा, "और तो कोई बात नहीं परन्तु इन्होंने आपसे यह जो कहा था कि 'आपकी स्टेप मदर आई हैं' यह मुझे नहीं भाया। 'स्टेप मदर' यह नाम खराब है न! मैंने सोचा कि मैं आपसे व्यवहार तो ठीक ही करती हूँ, तब मालूम नहीं कि इन्होंने मुझे यह नाम क्यों दिया......!" उनका वाक्य पूरा होते ही बाबा ने झुक कर कहा, "मुझे मुआफ़ कर दीजिए! "इस प्रकार जसोदा जी ने मुझे बताया था कि अपने दामाद के ऐसे शब्द सुनकर मेरी माता और मेरे पिता, दोनों रोने लग गए (क्योंकि उन दिनों यह रिवाज था कि सास-ससुर ही दामाद का सम्मान करते थे) तब मैंने भी उनसे कहा कि ‘अब मुआफ़ कर दो।’
इस प्रकार जसोदा बहन जी ने मुझे बताया था कि यद्यपि सिन्ध के भाई-बन्धुओं में तो यह रिवाज था कि कई लोग बात-बात में कुशब्द कह दिया करते थे परन्तु बाबा की यह विशेषता थी कि अनजाने में भी उन्होंने 'स्टेप मदर' ये जो शब्द कहे थे वे भी उन्होंने नोट किये थे।
बाबा के निकटवर्ती सम्बन्धियों से जब हम बाबा के ऐसे जीवन-वृत्त सुनते हैं तो उससे यह स्पष्ट विदित होता है कि शिव बाबा की प्रवेशता से पहले दादा दिनोंदिन अधिकाधिक अन्तर्मुखी होते गये थे और कुछ गहरे स्वचिन्तन में लग गए थे। ब्रह्माकुमारी बृज इन्द्रा कहती थीं कि "एक बार की बात है कि बाबा के यहाँ काफी अतिथि आकर ठहरे हुए थे। तब बाबा रात्रि को सबका आतिथ्य कर चुकने के बाद अपने एक चाचा की कोठी पर जाकर रहा करते थे क्योंकि तब बाबा पिता-श्री के लौकिक तथा अलौकिक जीवन के कुछ प्रेरणादायक प्रसंग बहुत एकान्त-प्रिय हो गए थे। उस रात्रि को उनके चले जाने के बाद एक नौकर बाबा के लिए उस कोठी पर दूध लेकर गया। वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि बाबा वहाँ नहीं हैं। वह बेचारा लौट आया और उसने घर समाचार दिया। तब मुझे भी यह समाचार ज्ञात हुआ।"
ब्रह्माकुमारी बृज इन्द्रा जी कहती थीं "दादा ने मुझे बहुत स्नेह से पाला था। जब नौकर ने मुझे यह समाचार दिया तो मेरा मन स्नेह-वश कुछ घबरा-सा गया। तब बाबा के बड़े लौकिक भाई, नवलराय जी ने दूसरे भंडारी को बाबा को ढूँढने के लिए भेजा और एक ड्राइवर को लेकर स्वयं भी ढूँढने गये। उन्होंने देखा कि एक चर्च के निकट एक अच्छा, ऊँचा-सा स्थान था, जहाँ एकान्त और शान्तिपूर्ण वातावरण था। बाबा भी उन दिनों एकान्त और शान्ति ही पसन्द करते थे, अतः वहाँ ऐसा वातावरण देखकर वे वहीं एक बैंच पर बैठे गहरे चिन्तन में निमग्न हो गये थे। भाई ने पीछे आकर उनकी पीठ पर हाथ रखा। दादा ने पीछे मुड़ते हुए उन्हें देखकर कहा, “भाऊ, (बड़े भाई) अभी चलता हूँ' बाबा ने ख्याल नहीं किया था कि उन्हें कोई ढूँढने उनके पीछे चला आयेगा। उन दिनों वे मनन-चिन्तन में ही रहते थे।"
बृज इन्द्रा जी कहती थीं कि दूसरे दिन बाबा के चाचा की कोठी के महाराज को हमने कहा, "जब बाबा उस कोठी पर नहीं थे तो आपको चाहिए था कि आप हमें बताते।" वह बोला "राधा जी, क्या बताऊँ वह तो सारी-सारी रात तपस्या में बैठे रहते हैं! विशेष तौर पर चाँदनी रात को तो वे काफ़ी देर तक प्रभु-चिन्तन करते रहते हैं। अभी पिछले दिन भी ऐसा ही तो हुआ।"
देखा जाय तो साकार बाबा अपने भक्ति-काल में ही भगीरथ पुरुषार्थ में ही लग गये थे, तभी तो वे शिव बाबा के भाग्यशाली रथ बने और ज्ञान-गंगा को उतारने के निमित्त बने। कुछ वर्ष पूर्व बाबा के अपने ही हाथों से लिखी जो एक कापी मिली थी, थी, उससे यह स्पष्ट विदित होता था कि शिव बाबा की प्रवेशता से पहले उनकी भूमिका कैसी थी। नमूने के तौर पर यदि एक पन्ने को लिया जाए तो उस पर कुछ इस प्रकार से लिखा था कि "रे मन मन्त्री, आज मैंने तुमसे बात करनी है। जब मैं आत्मा ही राजा हूँ तब तू मुझ आत्मा की आज्ञानुसार क्यों नहीं चलता....। इस प्रकार अन्तर्मुखी होकर अपने को सुधारने और सँवारने की ही प्रबल चेष्टा उनमें स्पष्ट दीख पड़ती है।
हमने ऊपर बाबा की भक्ति-काल के अन्त की मानसिक भूमिका के चित्र-चित्रण के लिए कुछेक वृत्तान्तों का उल्लेख किया है जो कि किसी अंश में हमारे भाव को स्पष्ट करते हैं। इस भूमिका से पहले भी अपने सामान्य जीवन में बाबा बहुत व्यवहार-कुशल थे। वे किसी कार्य को सिद्ध करने के लिए क्रोध, रौब, रोष या हिंसा आदि की भावना का आधार लिये बिना, चातुर्य, युक्ति-बल और स्नेह आदि का ही प्रयोग करते थे। इस विषय में ब्रह्माकुमारी निर्मल शान्ता जी ने जो एक बात सुनाई थी, उसका यहाँ उल्लेख करना असामयिक नहीं होगा। ब्रह्माकुमारी निर्मल शान्ता जी, जो लौकिक नाते से दादा की सुपुत्री होती हैं, ने किस्सा यों सुनाया थाः
एक बार की बात है कि हम बच्चे बाबा की दुकान से कुछ हीरे उठाकर ले आये। हमारे लिये तो ये हीरे बच्चों के कंचों (Marble balls) के समान थे। इनकी बहुत आकर्षक चमक-दमक देखकर हम इन्हें खेलने के लिए लाये। खेल-खेल में तो हम से ही वे गुम ही हो जाते-ऐसा सम्भव था। जब बाबा को इस बात का पता चला कि हम बच्चे लोग बहुत कीमती हीरों में से कुछ हीरे उठाकर खेलने के लिए लाये हैं, तब भी बाबा ने न हमें डाँटा न डपटा और न ही वह मूल्यवान रत्न हमसे ज़बरदस्ती लेने की कोशिश की। बाबा हमारे पास आये और बड़े स्नेह से कहने लगे "बाबा ने ये हीरे तुम्हारे लिये ही तो रखे हुए थे। बाबा तुम सबको इनकी एक-एक अंगूठी बनवाकर देंगे जो तुम्हारे हाथों में बहुत सुन्दर लगेगी। बस, फिर क्या था; अंगूठी के प्रलोभन में हमने वे हीरे भी जल्दी से बाबा को दे दिये। फिर बाबा ने सचमुच ही हम सबको उन हीरों में और हीरे मिला कर अंगूठी बनवा कर दी। तो देख लीजिए, किस प्रकार बाबा स्नेह और युक्ति-बल से सहज ही काम निकाल लेते थे। वे न तो उत्तेजित होकर अपनी वाणी को उग्र बनाते थे न ही बच्चे उनसे डर कर सहमे हुए-से रहते थे।"
केवल यही नहीं, बाबा में और भी कई विशेषतायें थीं। ब्रह्माकुमारी निर्मल शान्ता जी कहती हैं कि बाबा में दान-वृत्ति बहुत प्रबल थी।सिन्ध में एक विशेष त्यौहार के अवसर पर कुछ-न-कुछ अवश्य दान दिया जाता था। मैंने देखा कि बाबा और हमारी लौकिक माता जी सोना, चाँदी इत्यादि सात प्रकार की धातुओं का तथा हीरों का दान कर रहे थे। हमारे पूछने पर उन्होंने बताया कि दान करने से पाप क्षीण होते हैं और भविष्य के लिए श्रेष्ठ भाग्य की प्राप्ति होती है। यह सुनकर मैंने कहा, "मैं भी दान करूंगी।" तब उन्होंने मुझे हँसी में कहा, “तुम तो अभी पवित्र बच्ची हो, हम गृहस्थी लोग तो फिर भी सीढ़ी उतरे हैं।" उनके सामने तो मैंने कुछ नहीं कहा लेकिन जब ब्राह्मणी दान लेकर जाने लगी तो सीढ़ियों में जाकर मैंने जो अपने हाथों में सोने की चूड़ियाँ पहन रखी थी, वे उसे दे दी और कहा कि चुपचाप इन्हें भी अपने साथ ले जाओ। वह बेचारी तो बहुत आना-कानी करने लगी लेकिन मेरी ज़िद्द के आगे उसकी एक न चली।खैर, तब तो वह चली गई लेकिन अगले दिन वह मेरी लौकिक माताजी के पास आई और कहने लगी कि "ये चूड़ियाँ आप रख लीजिये।ये आपकी बेटी ने लाख मना करनेपर भी मुझे कल ज़बरदस्ती दे दी थीं। अतः मैं इन्हें लौटाने आई हूँ।"
यह सुनकर बाबा ने कहा, "अब जो दे दिया सो दे दिया; दिया हुआ दान तो कभी वापस लिया नहीं जाता।"
ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् जिन्होंने साकार बाबा को नहीं देखा, वे शायद ही इस बात का अहसास करते होंगे कि बाबा अपने व्यापारी जीवन में काफी धन-दौलत के मालिक थे क्योंकि बाबा ने कभी भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि कितने लाखों की समपत्ति के वह मालिक थे।यद्यपि कभी-कभी वे यह बताया करते थे कि कलकत्ते के जवाहिरात के व्यापारी उनके बड़े व्यापार के कारण उन्हें 'खिदरपुर का नवाब' कहते थे। परन्तु बाबा की सम्पत्ति का कुछ संकेत एक वृत्तान्त से लगाया जा सकता है जो दादा की लौकिक बहू राधिका जी, अपने विवाह के प्रसंग में सुनाती है। वे कहती है कि "जब मैं अभी एक छोटी-सी बच्ची थी और एक मिठाई की दुकान पर मिठाई खरीद रही थी और मैंने एक सुन्दर-सी टोपी पहन रखी थी जो कि जड़ी हुई थी, तब रास्ते से गुजरते हुए दादा ने मुझे अपने घर वालों के साथ देखा था। तभी दादाँ ने अपने एक बड़े बच्चे के बारे में सोचते हुए यह संकल्प किया था कि वे मुझे ही अपने घर में वधु के रूप में ले आयेंगे। जब मैं बड़ी हुई तो दादा ने मेरे बड़े भाई से इस विषय में बात की। तब मेरे बड़े भाई ने कहा, "दादा, हमने मन में यह निश्चय किया हुआ है कि राधिका को हम उस घर में देंगे जहाँ ये तीन बातें पूरी हो: (१) उसका पाँव ग़लीचों पर पड़ेगा (२) वह खाना कभी भी अपने हाथ से नहीं बनायेगी बल्कि घर में काम करने के लिए सब प्रकार के नौकर होंगे और (३) उनके जाने-आने के लिए गाड़ी का प्रबन्ध होगा।" दादा ने कहा, "आपने यह कोई बड़ी बात तो नहीं बताई; यह सब तो हमें मंजूर है।”
राधिका जी के भाई ने अवश्य ही अपने किन्हीं विश्वसनीय लोगों से चर्चा की होगी और उन्होंने उसे दादा के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने का सुझाव दिया होगा। परन्तु दादा चूँकि उन दिनों अपने व्यापार के कारण अधिकतर कलकत्ता और बम्बई इत्यादि में रहते थे, और कराची में थोड़े-थोड़े समय के लिए ही अपने स्थान पर आकर रहते थे, इसलिए मेरे बड़े भाई कलकत्ते जाकर ठीक रीति से सब देख-रेख करना चाहते थे। अतः कुछ समय के पश्चात् वे दादा को सूचित करके कलकता पहुँचे।
दादा ने उनका आतिथ्य किया, और उनके रहने-सहने की व्यवस्था की, उससे तो वे बहुत प्रभावित हुए ही परन्तु जिन विशेष वृत्तान्तों ने मेरे भाई को मुझे बाबा के घर में देने का निर्णय करने के लिए निश्चयात्मक बनाया, वे कुछ इस प्रकार थे:
बाबा ने एक दिन मेरे भाई को वह सब अलमारियाँ खोल कर दिखायीं जिनमें अनेक प्रकार के, एक से एक कीमती हीरे, रत्न, माणिक, मोती आदि थे। यह देखकर मेरा भाई आश्चर्य चकित हो गया। दूसरे दिन बाबा ने उन्हें वह अलमारियाँ खोल कर दिखायीं जिनमें एक-से-एक सुन्दर डिजाइन के सोने के जेवर थे। इसको देखकर वे दंग रह गये क्योंकि ये बहुत ही मूल्य के थे। तीसरे दिन बाबा ने उन्हें चांदी के अनेक प्रकार के बर्तन और श्रृंगार दिखाये। इस प्रकार वे इतने खुश होकर आये और उन्होंने आकर इस बात की यहाँ चर्चा की कि दादा लखीराज तो बहुत ही धनाढ्य व्यक्ति हैं। मेरा अपना लौकिक परिवार भी धन-दौलत से सम्पन्न था; इसीलिए ही मेरा भाई देखने गया था कि दादा कितने धनवान हैं और वह खुश होकर लौटा था। बाबा ने स्वयं अपने बारे में पहले ही से उन्हें यह नहीं बताया था कि उनके जवाहरात का व्यापार इस कोटि का है। ज्ञान-काल में भी जब कोई बाबा के सम्मुख ऐसी चर्चा करता कि बाबा ने लाखों की सम्पत्ति ईश्वरीय सेवा में लगा दी तो बाबा सदा कहते, "बच्चे, शिव बाबा हमें जन्म-जन्मान्तर के लिए जितना दे रहे हैं, उसकी तुलना में तो बाबा ने कुछ भी नहीं किया। बच्चे, दादा के पास तो विनाशी रत्न थे; शिव बाबा तो हमें अविनाशी रत्नों से मालामाल कर रहा है और ये रत्न तो अन्य किसी के पास है ही नहीं।" या तो वे कहते, "वत्सो,हमने दिया क्या है? बाबा किसी से कुछ लेता थोड़े ही है? इस दुनियाका तो सब-कुछ डूब जाने वाला है; इसलिए हमने तो बाबा के पास इनश्योर (Insure, बीमा) करा दिया है। और, देखो तो शिव बाबा कैसा फ़राखदिल दाता है, हमें वह सारी सृष्टि की बादशाही देते हैं और उसमें रत्न सोना भी इतना दे देते हैं कि हम अपने महलों को सोने की चादरों से मढ़कर ऐसे-ऐसे हीरे उसमें जड़ देते हैं कि जिनकी गिनती भी नहीं! तो बच्चो! सोचो तो कि हमने बाबा को कुछ दिया थोड़े ही है.......!"
यों संसार में धनी लोग तो बहुत होते हैं परन्तु उनमें से कई लोग ऐसे भी हैं जो तंग-दिल होते हैं और अपनी सम्पत्ति को यों ही लॉकर्स (Lockers तिजोरियों) में बन्द किये रहते हैं परन्तु दादा के संस्कार शाही (Royal) थे। वे फ़राखदिल व्यक्ति थे। ब्रह्माकुमारी बृज इन्द्राजी अपना अनुभव सुनाते हुए कहती थीं कि शिव बाबा की प्रवेशतासे पहले जो कुछ वर्ष दादा की बहू के रूप में बिताये, उस अवधि में दादा ने उन्हें रानियों से भी अधिक ठाठ से रखा। वे कहती हैं कि ‘एक बार नेपाल के राजकुल में मालूम पड़ा कि दादा अपने घर बहू लाये हैं, तो उनके सदस्य, शहज़ादियाँ इत्यादि मुझसे मिलने आई थीं। जब उदयपुर के महाराजा को मालूम हुआ कि दादा कलकत्ता में बहू को ले गये हैं तो उन्होंने भी दादा को लिखा था कि वे सिन्ध जाते समय अपनी पत्नी और बहू सहित बीकानेर से होते जायें। दोनों राजाओं के राजकुल की महिलाओं ने जब मुझे देखा तो वे यह देखकर हैरान रह गयीं कि मैंने उनसे ज़्यादा जेवर पहन रखे थे। मैंने एक-एक अंगुली में दो-दो अंगूठियों पहन रखी थीं और वे भी कीमती हीरों की।मेरा हार भी हीरों का बना था। यह सब देखकर वे सब बाबा को बेताज राजा मानते थे और यह भी महसूस करते थे बाबा फ़राखदिल हैं।परन्तु जैसे-जैसे बाबा अधिकाधिक अन्तर्मुखी होते गये, उनका मन इन चीज़ों से हटता गया और उन्हें ये श्रृंगार फीके दिखाई देने लगे और आखिर सुनहरी शब्दों में लिखी जाने वाली इतिहास की वह घड़ी आई जब शिव बाबा ने फ़राखदिल और राजकुलोचित संस्कार वाले साधारण और साथ-साथ उच्च जीवन-प्रणाली वाले दादा के रथ को माध्यम रूप में अपनाया।’
दादा के तन में शिव बाबा की प्रवेशता होने पर जलवा ही और था। ब्रह्माकुमारी संतरी जी ने एक बार बताया था कि "बाबा के भवन के सामने ही विश्व किशोर जी का घर था। उनके निमन्त्रण पर बाबा एक बार वहाँ गीता सुनाने गये। जब बाबा प्रवचन कर रहे थे, तब वहाँ सभा में बैठे बहुत-से व्यक्तियों को बाबा के तन से श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ। शान्ति का अनुभव तो सभी को हुआ ही परन्तु अनेकानेक को दिव्य साक्षात्कार होने के कारण शहर में धूम मच गई कि बाबा के सत्संग में जाने पर सहज ही साक्षात्कार हो जाता है। कई लोग यह कहने लगे कि श्रीकृष्ण ने ही दादा का रूप लिया है। इस प्रकार सत्संग में काफ़ी लोग आने लगे। परन्तु उन्हें यह तो मालूम ही नहीं था कि दादा कृष्ण नहीं बल्कि परमपिता परमात्मा शिव ही दादा के माध्यम से उन्हें भविष्य में आने वाले श्रीकृष्ण का साक्षात्कार करा रहे हैं। हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि स्वयं दादा भी उन दिनों खूब रूहानी मस्ती में रहते थे।
उन दिनों बाबा की रूहानी मस्ती और शिव बाबा का पार्ट विचित्र ही था। लोगों को खूब साक्षात्कार होते थे। ब्रह्माकुमारी बृज इन्द्रा जी बाबा को अन्तर्मुखता तथा उनकी तपश्चर्या इत्यादि को देखकर बहुत प्रभावित हुई थीं। एक बार एक विशेष दृश्य उनके सामने आया जिसके बाद इस ईश्वरीय परिवार में उनका भी पार्ट शुरू हुआ। इस वार्ता को वे यों वर्णन करती है:
"एक बार बाबा भोजन करने बैठे थे। मैं उनके सामने भोजन की थाली लेकर गई। ज्योंहि मैं उनके सामने पहुँची और उनकी ओर मेरी दृष्टि गई तो मुझे बाबा के स्थान पर सजे-सजाये श्रीकृष्ण ही दिखाई दिये। मैं आश्चर्य चकित हो गई कि यहाँ कुर्सी पर श्रीकृष्ण कैसे बैठे हैं! थाली मेरे एक हाथ में थमी रही और मैं उधर देखती ही रह गई। पहले जब मैं बाबा के सामने जाया करती थी तो घूँघट किया करती थी परन्तु अब जब मैं घूँघट करने ही वाली थी तो सामने श्रीकृष्ण दिखाई दिये। मैं भी श्रीकृष्ण के सामने भला घूँघट क्यों कर निकालती ? मुझे लगा कि मेरे ससुर के रूप में साक्षात् भगवान मुझे स्वयं आ मिले हैं। तब मुझे रूहानी नशा-सा चढ़ गया और तब से घूँघट निकालना मुझसे छूट गया। उस समय यह ज्ञान तो नहीं था कि दादा को देखने से श्रीकृष्ण का साक्षात्कार क्यों होता है। यह ज्ञान तो धीरे-धीरे, बाद ही में मिला परन्तु इससे मेरे जीवन का नया अध्याय खुला। इसके थोड़े ही दिनों बाद मुझे विष्णु चतुर्भुज रूप का भी साक्षात्कार हुआ। सजा-सजाया, दिव्य, प्रकाशमान रूप था। इन सब अलौकिक वृत्तान्तों से मुझसे श्रृंगार, सज-धज सब सहज रीति से छूटते गये और मैं रूहानियत के रंग में पूरी तरह रंगती गई जिसकी एक लम्बी दास्तान है।"
शिव बाबा की प्रवेशता के बाद तो बाबा के चरित्र ऐसे अलौकिक दिखाई देते थे कि यह कहना भी मुश्किल होता था कि कौन-से कार्य शिव बाबा के थे और कौन-से ब्रह्मा बाबा के। धार्मिक ग्रन्थों में, विशेषकर शैव ग्रन्थों में, सायुज्य, सामीप्य और सारूप्य इन तीनों शब्दों का विशेष वर्णन मिलता है। आगामों में तीन प्रकार की मुक्ति के वर्णन में इन तीन शब्दों का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है परन्तु साकार बाबा के जीवन पर, एक नये अर्थ में, ये तीनों ही विशेषण चरितार्थ होते थे और उनकी अव्यक्त अवस्था पर तो ये और ही ज्यादा सार्थक रूप में अनुभव किये जाते हैं। ब्रह्मा बाबा का शिवबाबा से अनन्यतम योग था। दोनों में ऐसा सायुज्य था कि मानों एक-दूसरे की राय के बिना अथवा एक-दूसरे से अलग होकर वे कोई कार्य करते ही नहीं थे। उनमें सामीप्य भी इतना था कि वे दो न होकर एकही मालूम होते थे। मन से, बुद्धि से, गुणों से वे एक-दूसरे के ऐसे निकट जुड़े थे कि जुड़वाँ (Siamese twins) से भी ज्यादा। उनके कर्तव्य भी एक-रूप से ही हो गऐ थे और ब्रह्मा बाबा का साकार रूप ही तो शिव बाबा का भी साकार रूप था और ब्रह्मा बाबा की शब्दावली भी तो एक-रूप ही लेती गई थीं। जैसे दमयन्ती के स्वयंवरके बारे में प्रसिद्ध है कि वहाँ राजा नल के अतिरिक्त देवता भी नलसे मिलता-जुलता रूप धारण कर पधारे हुए थे परन्तु उनमें केवल अन्तर इतना ही था कि देवताओं के रूप की परछायी नहीं थी और राजा नल की परछाई थी इस संकेत से ही दमयन्ती ने राजा नल को पहचान लिया था वैसे ही उपरोक्त प्रसंग में भी शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा में भी गुण, कर्म, स्वभाव सारूप्य होता जा रहा था। ऐसा सारूप्य होता जा रहा था कि दोनों में भेद करने का यत्न करना असफलता के द्वार में प्रवेश करने के तुल्य था। इन तीन विशेषताओं के कारण ही तो आज भी अव्यक्त बाप-दादा का सम्मिलित रूप से कार्य चल रहा है।
अलौकिक जीवन की कुछ झलकियाँ जो मैंने शुरू में देखीं
साकार बाबा के साथ जीवन की जो घड़ियाँ बीतीं, वे सभी स्मरणीय है क्योंकि स्मृति पटल पर उनका पुनः उभर आना ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई रंग-बिरंगे प्रकाश का झरना मन को मुग्ध कर लेता है। उनसे जीवन में एक नई ताज़गी आती है, मनुष्य को एक नया संदेश मिलता है और मन उन सुनहरी यादगारों को देखकर अथवा संस्मृतियों के पन्नों को पलट कर हर बार नई खुशी महसूस करता है। उन्हीं पन्नों को जल्दी-जल्दी पलटते हुए जो चित्र लेखक के भीतर के नेत्र के सामने आते-जाते हैं, उनमें से दो-चार का चित्रण करने का प्रयास कर रहा हूँ:
बात सन् १९५३ की है। तब मैं पहली बार मधुबन गया था। उन दिनों इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालयका मुख्यालय वर्तमान स्थान पर न होकर बृज कोठी में था। मन की कुछ विचित्र स्थिति लेकर गया था।ब्रह्मा बाबा कैसे होंगे, उनका हाव-भाव, बैठना-उठना, बातचीत किस प्रकार की होगी, वह तो सृष्टि के पितामह हैं और सर्वोत्तम मानव हैं,उनका सब कार्य-कलाप तो निराला ही होगा यह सब देख पाने की उत्सुकता मन में हिलोरें ले रही थी। वहाँ जाने से पहले मैंने कल्प वृक्ष के मूल पर उनका चित्र तो देखा ही था और लाल अक्षरों में उनके कई पत्र भी पहले पा चुका था परन्तु अभी साक्षात् उनके सामने बैठने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ था। आखिर रेल और बस द्वारा यात्रा पूरी हुई और हम मधुबन पहुँचकर, नहा-धोकर, उत्सुकता को मन में बटोरे हुए पिताश्री से मिलने और उनके माध्यम से शिव बाबा से मिलने की तिरोहित इच्छा को लिए हुए उनके सामने जाकर बैठ गए। सच कहता हूँ कि इन नैनों ने ऐसी छवि कभी नहीं देखी। बाबा के चेहरे पर अनेक राज़ों से युक्त परन्तु स्वाभाविक और वात्सल्यपूर्ण कुछ हल्की, कुछ गहरी रेखाएँ उभर आई थीं। परन्तु ऐसा याद आता है कि शायद एक मिनट ही अभी मुझे वहाँ बैठे हुए होगा कि बाबा ने मुझे निहारते हुए मुझ पर ऐसी कृपा-दृष्टि की कि मैं अपने स्थान पर टिक नहीं पाया बल्कि जैसे कोई सुई बरबस ही एक शक्तिशाली चुम्बक की ओर स्वतः खिंची हुई-सी चली जाती है, वैसे ही मैं भी पंखों के बिना ही उड़ान भर कर उनकी गोद में जा समाया था। परन्तु मुझे इतना भी आभास नहीं हुआ कि मैं वहाँ से उठकर उनकी गोद में गया बल्कि यह चेतना तो मुझे बाद ही में आई कि मैं उनकी गोद में हूँ। उससे पहले के क्षणों में जब मैं बाबा की गोद में था, तब न तो मुझे अपनी देह का रंचक भी भान था न मुझे साकार माध्यम के स्पर्श का बोध था, न पास ही में बैठी हुई माता-श्री तथा बहनों का कुछ अहसास था, न मुझे यह ज्ञान ही रहा था कि मैं इस भौतिक लोक में हूँ। जैसे कोई बिछुड़ी हुई आत्मा पारमार्थिक प्यार की एक कसक के साथ अपने प्रियतम से मिलने की अनुभूति में डूबी हुई हो, एक ऐसी ही चेतना का आत्मा में संचार हुआ। ढूँढने से शब्द नहीं मिलते कि इसका वर्णन कर सकूँ। पूर्ण प्रत्याहार की अवस्था थी। प्रकृतित्व कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल मिट- सा गया था। आत्मा और परमात्मा के बीच अन्य कोई रेखा और रंच कुछ भी न था। एक अपूर्व अनुभव था जिसकी लालसा सदा बनी रहती है। उस ज्योतिस्वरूप परमात्मा के ब्रह्म तत्त्व (जो कि परमधाम में होता है) का भी भान नहीं था। मानो शिव बाबा और मेरे बीच का फासला भी समाप्त हो चुका था। काल भी वहाँ अनुपस्थित था। फिर अनायास ही कुछ ऐसे शब्द सुनाई पड़े "बच्चे, बच्चे, ओ मीठे बच्चे ? अब तो बाप के पास आ गए हो, अब तो आ मिले हो!" ऐसा लगता था कि ये शब्द मेरे भीतर के कान सुन रहे हैं यद्यपि ये शब्द साकार बाबा के माध्यम से उच्चारे गये थे। (ऐसा मुझे बाद में बताया गया)। अब धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि मैं उस पिता की शीतल गोद में हूँ और लगा कि जिस चीज़ की मुझे इस जीवन के बचपन से तलाश थी, जिससे मिलने के लिए मेरे मन में जन्म-जन्मान्तर से आशा थी, आज मेरा उससे मिलन हुआ है।
थोड़े ही समय में जब मेरे साथ ही आए हुए अन्य लोगों से भी बाबा मिल चुके तो वे अपने आसन से उठे और मेरी अंगुली को समर्थ हाथों में थाम कर जैसे एक पिता अपने छोटे बच्चे को कहीं ले जाता है, वे मुझे यज्ञ-समाचार सुनाते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे और एक-एक उपस्थित ब्रह्माकुमारी बहन का परिचय भी देते रहे और साथ-साथ उन्होंने मुझे सारा घर, यहाँ तक कि स्टाक के बन्द कमरे को भी खुलवाकर दिखा दिया जैसे कि चिरकाल के बाद आये किसी बच्चे को बाप अपने घर का सारा समाचार निस्संकोच होकर सुना देता है। और तो क्या, बाबा ने मुस्कराते हुए एक बात और भी इन शब्दों में बता दी "बच्चे, इस आवास स्थान के पीछे ही श्मशान है और वहाँ एक साधु ने कुटिया बना रखी है और वह रात-दिन ऊँचे-ऊँचे स्वर से बाबा पर गाली रूपी पुष्पों की वर्षा करता रहता है।" पहले ही दिन, प्रथम ही मुलाकात में इतनी निकटता का आभास बाबा ने मुझे दिया था।
सभी जानते हैं कि तब न तो मैं आयु में बड़ा था न ही मेरा सांसारिक पद कोई ऊँचा था, न ही किसी भी अन्य दृष्टिकोण से मैं कोई विशेष व्यक्ति था, तो भी बाबा ने इतने स्नेह से और इतने खुले दिल से जो मुझे सारा समाचार सुनाया और जिस प्रकार मैंने उनमें सहृदयता, आत्मीयता तथा वात्सल्य पाया उसने सदा के लिए मेरे हृदय को जीत लिया। विशेष बात यह है कि उन द्वारा मुझे शिव बाबा के मिलन का जो अनुभव हुआ था वह तो एक ऐसा अविस्मरणीय वृत्तान्त था जिसकी गणना मैं जीवन के सर्वोत्कृष्ट क्षणों में भी विशेष रूप से किया करूंगा।
पहली बार जब मैं मधुबन गया तब मुझे कितनी ही विचित्रताएँ देखने को मिली। यज्ञ-वत्सों में कितने ही वत्स ऐसे भी थे जिनकी लौकिक माता या मासी प्रभु-समर्पित थी, तथा अन्य सभी स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे को 'बहन' शब्द से ही सम्बोधित करते थे।ज्ञान-प्रवेश से पहले के जीवन के सम्बन्ध का भान उनके वर्तमान जीवन और कार्य-व्यवहार में रंचक भी देखने को नहीं मिलता था इसलिए मुझे यह देखकर प्रसन्नता-युक्त आश्चर्य हुआ कि मातेश्वरी जी की लौकिक माता उनके लिए 'ममा' (Mama) शब्द का प्रयोग करती थीं और पिता-श्री जी की लौकिक धर्म-पत्नी उन्हें 'बाबा' कहती थीं और भ्राता विश्व किशोर को उनकी धर्म-पत्नी 'भाउ'(बड़ा भाई) कहती थीं। मातेश्वरी जी और पिताश्री जी से भिन्न-भिन्न घरों और परिवारों से आए हुए सभी यज्ञ-वत्सों का अलौकिक माँ और बाप ही के सम्बन्ध का ऐसा पक्का नाता था जैसे शारीरिक जन्म लेने वाले बच्चों का अपने लौकिक माँ-बाप के साथ होता है। नहीं, नहीं, वह उससे भी लाख गुणा अधिक पैतृक स्नेह से युक्त नाता था। यह सर्वविदित्त है कि महात्मा गाँधीजी ने अपने जीवन में अपनी लौकिक धर्म-पत्नी को 'माँ' मान लिया था और ऐसा ही दृष्टिकोण स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भी अपनी पत्नी से प्रारम्भ से ही अपनाया था।परन्तु यहाँ तो हरेक यज्ञ वत्स में ही यही धारणा थी।संसार के कुछ देहाभिमानी लोगों के लिए यह बात आलोच्य हो सकती है परन्तु मेरे लिए तो यह इस बात का साक्ष्य था कि वे यज्ञ-वत्स दैहिक सम्बन्धोंसे एवं मोह-ममता से ऊँचे उठकर सबको आत्मा के नाते से देखते हुए अथवा सबके साथ अलौकिक ही सम्बन्ध मानते हुए योग मार्ग में दृढ़-प्रतिज्ञ व्यक्ति थे। बाबा के द्वारा गीता-ज्ञान प्राप्त कर यह उनके 'नष्टोमोहः स्मृतिर्लब्धा' बनने का प्रमाण था। यह उनकी 'विदेह अवस्था' की ओर उन्मुख होने का सूचक था और इस विषय में उन सभी के सामने आदर्श थे पिताश्री और माताश्री।
अतः एक ब्रह्माकुमार भाई ने निम्नलिखित छंदों में ठीक कहा है कि:
सत्य की पहचान थे तुम !
दिव्य-ज्योति पुँज थे, या राग नव की तान थे तुम,
मनुज चोले में निहित, नव सृष्टि का सम्मान थे तुम,
धारणा साकार थे, दैवी गुणों का दान थे तुम,
संगमयुग के दिवाकर की मधुर मुस्कान थे तुम,
चिर-पिपासे ज्ञान-चातक के लिए स्वाति बिन्दु समान थे तुम
सत्य की पहचान थे तुम।
परम ज्योति से दीप्त था, वह भाग्यशाली रथ तुम्हारा
शिव पिता ने था चुना जो, और लिया जिसका सहारा,
'ब्रह्मवासी' ने जिसे फिर नाम 'ब्रह्मा' से संवारा,
और अलौकिक 'पिता श्री' कह, जिसे वत्सों ने पुकारा,
लोक में भी पारलौकिक की अलौकिक शान थे तुम,
सत्य की पहचान थे तुम।
आज हो अव्यक्त, पर कर्त्तव्य धारा बह रही है,
ज्ञान-शिक्षा रत्न अब भी, वत्स सेना गह रही है,
इस विकारी सृष्टि की अब नींव जैसे ढह रही है,
स्वर्ग की स्थापना यह, देखती सारी मही है,
आज दैवी राज हो, कल दिव्यता वरदान थे तुम,
सत्य की पहचान थे तुम।
शिव बाबा के साकार माध्यम बनने के बाद तो पिता श्री का जीवन ऐसा दिव्य गुण युक्त, निरन्तर सेवा रत, करुणा एवं कल्याण भावना से भरपूर, स्नेह एवं सौहार्द से सम्पन्न, गम्भीर एवं रमणीक जीवन था।
कर्म-भोग भी सेवा का साधन
कदम-कदम में करामत
यह घटना जून १९५६ की है। तब बाबा की शारीरिक आयु लगभग ७८-७९ वर्ष की होगी। अनायास ही बाबा को एक शारीरिक व्याधि ने आ घेरा। आबू के स्थानीय डॉक्टर एवं सिविल सर्जन ने कहा कि पिताश्री को तुरन्त ही बम्बई ले जाया जाय क्योंकि वहाँ बड़े-बड़े अस्पताल हैं और इलाज की भी सुविधा आधुनिक तथा अच्छी है। गम्भीर मुख मुद्रा बनाकर और कुछ चिन्ता-सी प्रगट करते हुए डॉक्टर महोदय कहते, "इसके लिए बाबा को ऑपरेशन करना पड़ेगा और ७८-७९ वर्ष की इस अधेड़ आयु में ऐसा ऑपरेशन बहुत कम ही लोगों का सफलता से हुआ करता है....." डॉक्टर की ऐसी बातें सुन-सुन कर हम वत्सों के मन में कुछ सोच-विचार चल पड़ा।बाबा के प्रति अतीव अलौकिक स्नेह के कारण यज्ञ-वत्सों का मन कुछ भर आया था। परन्तु जब हम वत्स बाबा की ओर देखते थे तो आश्चर्यचकित रह जाते थे। बाबा के चमकते चेहरे पर अस्वस्थता अथवा कष्ट के कोई भी चिह्न न मिलते थे।
अचल स्थिति
जब कोई वत्स उत्सुकतावश बाबा के कमरे के पर्दे को हटा कर बाबा की ओर देखता तो बाबा नयनों में स्नेह भरकर मधुर मुस्कान से उसकी ओर निहारते। यदि कोई वत्स उनकी शय्या के पास जाकर खड़ा हो जाता और उसके चेहरे पर की रेखाएं गम्भीर स्थिति व चिन्ता की सूचक होती तो बाबा पहली जैसी ही मधुर आवाज़ में कहते, "हाँ ठीक हू। ये तो आप जानते ही हो कि यह पुराना शरीर है; पुरानी चीज़ को तो कई चत्तियाँ लगा कर ही चलाया जाता है। बाकी बाबा को तो कुछ भी नहीं है। फिक्र से फारिग़ रहो बच्चे!" जब बाबा ये शब्द कह रहे होते तब बाबा के चेहरे पर वैसा ही नूर होता और उनकी खुशी में तथा ताज़गी में भी कोई कमी न मालूम होती। भले ही बाबा रात-भर उस शारीरिक यातना के कारण जागते रहे थे तथापि बाबा के चेहरे पर थकावट का कोई भी चिह्न नहीं था। पहले जैसी ताज़गी थी और सदा की तरह ही उनके बोल प्यार भरे ही थे। बाबा की स्थिति सूक्ष्म रूप में सब वत्सों को यह प्रेरणा दे रही थी कि माया के अतिरिक्त काया भी यदि बड़ी कठिन परीक्षा की स्थिति सामने लाये तो देह से न्यारा होकर आत्मिक स्थिति में रहने तथा परमपिता परमात्मा की स्मृति में टिके रहने का अभ्यास ऐसा परिपक्व होना चाहिए कि वह रंच-मात्र भी हमारी स्थिति को बिगाड़ न पाये।
बम्बई जाने के लिए विदा
डॉक्टर की राय के अनुसार बम्बई में तार तो करा ही दी थी ताकि वहाँ उनकी चिकित्सा के लिये किसी अच्छे अस्पताल में उचित प्रबन्ध किया जाये। तार पा कर वहाँ के वत्सों के मन में भी यह ख्याल आया कि अवश्य ही स्थिति गम्भीर है। इधर कोटा हाऊस1 के हाल में एक शय्या पर लेटे हुए बाबा बम्बई जाने से पहले सबसे विदा ले रहे थे। बाबा हरेक वत्स को स्नेह से यज्ञ-प्रसाद (टोली) दे रहे थे; वे किसी से हाथ मिला रहे थे तो किसी के सिर पर अपना वरद् हाथ रख रहे थे और किसी को थप-थपाकर उसके प्रति कुछ उल्लास-प्रद वचन कहते जा रहे थे।
इस दृश्य का किन शब्दों में वर्णन किया जाए! सबके नैन स्नेह से गीले हुए-हुए थे और अपलक हो कर बाबा को निहार रहे थे। अवश्य ही सबका मन इस सोच में था कि न जाने अब विश्व-मंच पर कौन-सा नया दृश्य उपस्थित होगा। बाबा से पितृवत स्नेह पाकर, उनसे टोली लेकर और उनके मधुर बोल सुनकर सबको खुशी भी होती थी लेकिन आज इस खुशी में एक और प्रकार की लहर का भी समावेश था। सबका मन बेतार के तार से शिव बाबा से ये तो अनुनय-विनय अथवा अनुरोध और आग्रह कर ही रहा था कि बाबा अभी हम नन्हें और कोमल पौधे हैं और हम चेतन फूलों को इस साकार रूप द्वारा आप के लालन-पालन और देख-रेख की आवश्यकता है, ये तो आप जानते ही हैं बाबा; परन्तु हम, जिन्होंने कि सब इच्छाओं का त्याग किया है, इस एक शुभ इच्छा को तो अवश्य ही अपने मन में लिए हुए हैं कि ये नैन इस सुहावने पुरुषोत्तम युग के अन्त तक, इस सलोने साकार रूप में आपके अलौकिक चरित्रों को देखकर धन्य होते रहें। इस प्रकार की विचार-तरंगों से बने वातावरण में सबके चेहरों पर बाबा के विदा होने के कारण, जहाँ बाबा की वापसी की प्रतीक्षा के चिह्न अंकित थे, वहाँ उन पर एक मजबूरी भी झलकती थी कि शारीरिक अवस्था-लाभ के लिए बाबा को बम्बई तो जाना होगा ही। परन्तु बाबा ने वहाँ ऐसे वातावरण को क्षण-भर में ही बदल दिया क्योंकि उनके जीवन की तो हरेक कृति बच्चों को खुशी देने के ही निमित्त थी।
बीमारी भी ईश्वरीय सेवा के लिए निमित्त कारण
बाबा बोले, ‘वत्सो आप क्या सोच रहे हो? इसमें कोई सोचने की तो बात ही नहीं है। शिव बाबा तो अपने इस रथ द्वारा अब एक दूसरी भी सर्विस कराना चाहते हैं। इसलिए ही वह बाबा को बम्बई भेज रहे हैं। बच्चे, यह बीमारी कोई बीमारी नहीं। यह तो इस विश्व-ड्रामा में बाबा को बम्बई की सर्विस पर भेजने की एक युक्ति है। देखो बच्चे, अगर यह व्याधि सामने न आती तो आप लोग भला मुझे बम्बई कैसे जाने देते? परन्तु वहाँ के बच्चों की सेवा के लिए भी बाबा को जाना तो है न? बाबा के बच्चे तो जहाँ-तहाँ हैं और बाबा को उन सबकी सेवा करनी तो है न, या नहीं करनी? तो देखो, बम्बई-जैसे महानगर में, जहाँ पर माया का बड़ा भभका है, वैसे तो लोग ज्ञान सुनते ही नहीं और पास आते ही नहीं परन्तु अब जब बाबा इस स्थिति में वहाँ जायेंगे तो लोग बाबा से मिलने अवश्य आयेंगे ही। जो लोग बाबा से वैर-विरोध रखते हैं, वे भी बाबा की शारीरिक अवस्था का समाचार सुनकर लोकाचार के नाते ही सही, बाबा से मिलने आयेंगे क्योंकि यह तो साँसारिक रीति है कि कुशल-मंगल पूछने जरूर जाते हैं।’ इसलिए सिन्ध के पुराने मुखी लोग तथा उनके कुटुम्बी और बाबा के लौकिक सम्बन्धी, जिन्होंने प्रारम्भ में अनजाने ही, इस ईश्वरीय कार्य का विरोध किया, अब बाबा से मिलने तो आयेंगे ही। यदि यह कारण न बनता तो वे भला अन्य किस निमित्त कारण से आते? अतः बच्चे, बाबा तो अब उनकी सेवा करने जा रहा है। इसलिए आपको तो अब खुशी होनी चाहिये। ड्रामा में आप बच्चों का निश्चय तो अडिग ही है। अब तो हर हालत में आप बच्चों का कल्याण ही कल्याण है। अब ये संगमयुग का समय तो चढ़ती कला का समय है, इसमें तो किसी को संशय नहीं है न?’ सब बोले, 'नहीं'।
बाबा बोले "तब खुश रहो बच्चे। बाबा तो बस अभी आया कि आया।”
एक थे जिस्मानी सर्जन दूसरे थे रूहानी सर्जन
उधर बम्बई के नये अस्पताल में बाबा के लिये सब व्यवस्था पूरी कर दी गई थी। वहाँ का जो मुख्य डाक्टर था, जिसने ही इस रूहानी सर्जन, अर्थात् पिता-श्री का ऑपरेशन करना था, उसे ये बता दिया गया था कि उसके पास अब विश्व इतिहास के कितने बड़े व्यक्ति को लाया जा रहा है। वह डाक्टर चेनस्मोकर (Chain Smoker) था, एक सिगरेट को बुझाने से पहले ही उससे दूसरी जला लिया करता था। उसे भाई विश्व किशोर जी ने नम्रता पूर्वक ये सुझाव दे दिया था कि बाबा में तो वह रूहानी शक्ति है कि जिससे तो लोगों के इस प्रकार के व्यसनों को सहज ही छुड़ा दिया करते हैं। डाक्टर साहब बोले, "हाँ, ऐसा हो सकता है परन्तु मैं समझता हूँ कि मुझसे तो कोई सिगरेट छुड़ा नहीं सकेगा। मेरा अब तो कई वर्षों से इसे पीने का अटूट अभ्यास हो गया है। अब तो ये मेरी जीवन संगिनी हो गई है। इसलिए, मैं असम्भव समझता हूँ कि इसे छोड़ सकूँगा।" अस्पताल में स्टाफ़ के लोग बताते थे कि ऑपरेशन करने से पहले वे खूब जी-भर कर सिगरेट पी लिया करते थे और ऑपरेशन के तुरन्त बाद भी पहले सिगरेट को मुँह में लगाकर पीछे किसी से बात किया करते थे। कुछ लोगों का तो यहाँ तक भी कहना था कि ऑपरेशन थियेटर में भी डाक्टर साहब के निकट सिगरेट सुलगती रहती थी और वह बीच-बीच में कश लगा लिया करते थे। अब एक ओर ये भारत के नामीग्रामी शारीरिक व्याधियों के डाक्टर और दूसरी ओर ये विश्व के सबसे बड़े रूहानी साकार सर्जन; सोचिये तो अब क्या हुआ होगा।
डॉक्टर के प्रति बाबा के मुखारविन्द से
वास्तव में तो फ़ैसला उसी वक्त हो गया था जब डाक्टर की पहली निगाह अपने अद्भुत रोगी पर पड़ी थी। इतनी बड़ी आयु में भी, इतना कष्ट होते हुए भी, बाबा न तो कर्राहने की कुछ आवाज़ कर रहे थे और न ही उनके चेहरे पर व्याधि के द्वारा उत्पीड़न के कुछ चिह्न दिखाई दे रहे थे। पहली ही भेंट में जब बाबा ने डाक्टर को डाक्टर न कह कर "गुड मार्निंग बच्चे" इस प्रकार के शब्दों से सम्बोधित किया तो डाक्टर के शरीर में एक सिहरन-सी हो उठी। उसके जीवन में ये पहला ही पेशेंट था, जिसने अपनी तकलीफ़ बताने की बजाय मुस्कराते हुए डॉक्टर से 'गुड मार्निंग' कहा और डाक्टर को 'बच्चे' कह कर बुलाया। अवश्य ही डॉक्टर साहब को अजीब, सुहावनी अनुभूति हुई होगी कि ये कौन है जो मुझे 'बच्चे' 'बच्चे' इन स्नेह भरे शब्दों से पुकार रहा है? इतनी बड़ी आयु वाले डाक्टर साहब को बचपन के बाद अब कई वर्ष बीतने पर जब ये शब्द सुनने को मिले होंगे और उन्हें लगा होगा कि उनके लिए भी इस संसार में कोई ऐसा भी है जो उन्हें पिता-जैसा प्यार (प्यार ही नहीं, दैवी सम्पत्ति भी) देने को तैयार है। इस प्रकार, उस पहली ही मुलाकात में डाक्टर साहब के मन में यह तो निश्चय हुआ ही लगता था कि कम-से-कम उनके ऑपरेशन के समय अथवा उससे पूर्व तो वह जीवन में पहली बार सिगरेट नहीं पीयेंगे। फिर, ऑपरेशन के बाद तो फ़ीस देते ही हैं परन्तु डॉक्टर साहब को तो पहले ही बाबा से स्नेह-भरी टोली (प्रसाद) मिल गई जिसे पाकर उसे अवश्य लगा होगा कि इस दुनिया के बाज़ार में सौदाबाज़ी तो सब करते हैं लेकिन ये बाबा तो कोई ऐसे अलौकिक बाबा हैं कि जिनका हर कार्य-कलाप निःस्वार्थ स्नेह स्निग्ध है।
अस्पताल में ईश्वरीय सन्देश
अब बहुत-से लोग बाबा से मिलने आने लगे थे। गोया अस्पताल में भी ईश्वरीय संदेश की सेवा चालू हो गई थी। अस्पताल में अन्य सभी रोगियों के कानों में भी ये समाचार पहुँच चुका था कि फलाँ नम्बर कमरे में कोई महात्मा जी आए हुए हैं। उन रोगियों से मिलने के लिये जो उनके मित्र सम्बन्धी आते, ये सूचना उन्हें भी मिल जाती। कई लोग इस बात के लिए प्रार्थना करते कि उन्हें बाबा के दर्शन करने का सुअवसर दिया जाय। अस्पताल की नर्सों के मन में भी उत्सुकता बनी रहती कि कम-से-कम झाँक कर बाबा को देख तो लिया जाय। अलौकिक कान्ति से युक्त, श्वेत वस्त्राधारी बाबा के मुस्कराते चेहरे को देखकर सबके मन में ये संदेह हो जाता कि ये अस्वस्थ हैं भी? गोया उनके मन व उनके कान एक दूसरे की बात को न मानते। बाबा उन नर्सों को भी "बच्ची... मीठी बच्ची" अथवा कई बार तो 'बच्चे' - ऐसा कह कर बुलाते और उन्हें प्रसाद भी देते।सबका मन यही करता कि बाबा सदा यहीं रहें और इनसे किसी प्रकार बिछुड़ना न हो।परन्तु अवश्य ही उनकी अपनी बुद्धि अपने मन को डाँट देती होगी कि ऐसा तो सोचना भी अयुक्त है।
अपकारियों पर भी उपकार
बाबा से जो लोग मिलने आते, उनमें वो सिन्धी लोग भी थे जिन्होंने सिन्ध में ओम मण्डली के साथ स्नेह का नाता नहीं निभाया था और जो भारत आने के बाद भी इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालय के कार्य की महिमा सुनने के बावजूद भी कुछ संकोच वश और कुछ पूर्व मनोभाव के कारण बाबा से नहीं मिले थे। जब वो बाबा को देखते तो आश्चर्यचकित रह जाते। उसमें से प्रायः हर कोई सहसा यह कह उठता कि उन्होंने जैसे बाबा को २५-३० वर्ष पहले देखा था, बाबा तो वैसे ही स्वस्थ मालूम होते हैं। न उनके शरीर में वृद्ध-अवस्था के कारण से कमर में कोई झुकाव है और न ही अन्य कोई ऐसे चिह्न है। बाबा भी युक्ति-संगत रीति से उन्हें ज्ञान के कुछ अनमोल रहस्य तो बता ही देते।
इस प्रकार सम्पर्क में आने से उन्हें भी ईश्वरीय संदेश तो मिल ही गया। स्वयं बाबा ने भी उन्हें निमन्त्रण तो दे ही दिया। शिव बाबा का मधुर परिचय कुछ तो उनके कानों में भी पड़ गया। बाबा की आकृति-प्रकृति को ही देखकर उन्हें इतना तो विचार आया ही होगा कि इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालय में जीवन सतोगुणी बनाया जाता है। फिर यह भी देखने में आया कि बम्बई नगर की धरणी पर बाबा के चरण पड़ने के बाद ईश्वरीय सेवा का कार्य उन्नति को पाने लगा, गोया बाबा जिस सर्विस के अर्थ बम्बई आये थे, वह दिव्य प्रयोजन भी सफल ही रहा।
सभी को अविनाशी ज्ञान-रत्नों की सौगात
यों बाबा जैसे ही अस्पताल में पहुंचे थे तो बाबा ने यह निर्देश भी दे दिया था कि हिन्दी और इंगलिश में जल्दी से किताबें छपवा दी जायें ताकि बाबा अविनाशी ज्ञान-रत्नों की सौगात डॉक्टरों, नर्सों और रोगियों को दे सकें। बाबा के इस आदेशानुसार हिन्दी और अंग्रेज़ी में बड़ी शीघ्रता से दो पुस्तकें छपवा दी गई थीं और बाबा के संकल्प के अनुसार उनका नाम भी था 'अविनाशी ज्ञान-रत्न' और अंग्रेजी में, तदानुसार 'इम्पैरिशेबल ट्रेज़र ऑफ़ गाडली नालेज' (Imperishable treasure of Godly Knowledge)। बाबा ने सभी को विदा होने से पहले ये ज्ञान-खज़ाना और प्रसाद दिल खोलकर बाँटा था।
इसी प्रसंग में यह बता देना भी ज़रूरी होगा कि जब बाबा का ऑपरेशन होना था, तब डाक्टर ने यह कह दिया था कि ऑपरेशन के बाद बाबा को रक्त देना ज़रूरी होगा। परन्तु बाबा को जब यह मालूम हुआ तो बाबा ने इसके लिये मना कर दिया था क्योंकि बाबा अब इस प्रभु-अर्पित शरीर में किसी भी देह-अभिमानी व्यक्ति के रक्त का समावेश करवाना ठीक नहीं मानते थे। उन्हीं दिनों संतरी बहन भी बाबा के साथ ही गई हुई थीं और उन्होंने शिव बाबा को ध्यानावस्था में ये संदेश दिया। तब शिव बाबा ने उनके द्वारा ये संदेश भेजा कि मेरे साकार रथ को कहना कि मैं स्वयं ही उस रक्त का शुद्धिकरण करूंगा और, इस लिए, वह इस बात को स्वीकार कर ले। तब साकार बाबाने यह बात मान ली थी।
इधर बाबा का जब ऑपरेशन हो रहा था तब सारे ऑपरेशन के दौरान संतरी बहन एक अलग कमरे में बैठी हुई सारा ऑपरेशन देख रही थीं और शिव बाबा उस रक्त का किस प्रकार शुद्धिकरण कर रहे हैं, वह दृश्य भी उन्हें भासित हो रहा था। इसी प्रकार, ब्रह्माकुमारी पुष्प-शान्ता जी भी ध्यानावस्था में होकर ऑपरेशन-सम्बन्धी दृश्य देख रही थीं। उधर कानपुर में ब्रह्माकुमारी सती बहन भी तथा अन्यान्य स्थानों पर अन्य 'संदेश पुत्री' बहन भी ध्यान में मग्न होकर इस दृश्य का साक्षात्कार कर रही थी। ऐसे ही मधुबन में प्रतिदिन 'संदेश-पुत्री' ब्रह्माकुमारी बहन बाबा से संदेश ले आती और प्रतिदिन बम्बई से समाचार का पत्र भी आया करता था। साकार रूप में बाबा की अनुपस्थिति में यज्ञ माता सरस्वती सभी वत्सों को ज्ञान लोरी देती रहीं और हर प्रकार से सभी आध्यात्मिक उन्नति के कार्य को सुचारु रूप से चलाती रहीं। फिर, कुछ ही दिन के बाद अब तो स्वयं बाबा के हाथों से लिखे पत्र भी आते थे। इसलिए सभी ज्ञान-विज्ञान द्वारा आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ रहे थे और आखिर वह दिन भी आ पहुँचा जब बाबा स्वयं भी आ पधारे और फिर से यज्ञ में ज्ञान-सितारों की वही रिमझिम होने लगी।
पाण्डव भवन और बाबा का बगीचा
सन् १९५६ की बात है कि राजस्थान सरकार ने ईश्वरीय विश्व- विद्यालय के नाम एक नोटिस भेज दिया कि कोटा हाउस और धोलपुर हाऊस (जहाँ पर उन दिनों इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालय का मुख्यालय और मुख्यकेन्द्र था) को खाली कर दिया जाय। बात यह थी कि दोनों भवन पहले गुजरात प्रदेश की सरकार के पास थे। उनसे ही ये ईश्वरीय सेवा के लिये किराये पर लिए गए थे। परन्तु अब कुछ वर्षों से आबू पर्वत एवं नगर पर राजस्थान प्रादेशिक सरकार के प्रशासनिक-क्षेत्र (Administrative jurisdiction) में आ गया था अब राजस्थान सरकार ने यह निर्णय लिया था कि वह यहाँ पर अपना सर्किट हाऊस बनायेगी, जहाँ पर कि सरकारी अधिकारी आकर रहा करेंगे। नोटिस में यह लिखा था कि दोनों भवन सरकार को अपने प्रयोग के लिए चाहिये, इसलिए इन्हें खाली कर दिया जाय।
होगा वही जो होना होगा
अब इतने बड़े संस्थान के आवास-निवास, कार्यालय इत्यादि को स्थानान्तरित करने की समस्या सामने थी। कोई अनुकूल जगह मिलेगी भी या नहीं? यह दुविधा मन को दो टूक कर सकती थी परन्तु बाबा तो भगवान और भावी के भरोसे पर बिल्कुल ही निश्चिन्त थे। उन्होंने कोई योग्य स्थान ढूँढने के लिए भी आज्ञा दे दी थी, परन्तु "क्या होगा, अच्छी जगह मिलेगी या नहीं?" इस प्रकार का कोई विकल्प उनके मन को छू भी नहीं सका था। बाबा सदा कहा करते, "बच्चे, मेहनत से कार्य करते चलो। इस प्रश्न के पीछे मन को मत लगाओ कि क्या होगा? होगा वही जो होना होगा। आप अपना पार्ट बजाओ (कर्त्तव्य करो)।" पिता-श्री ने निर्देश दिया कि सरकार को इसका उत्तर दे दिया जाय और मंत्रीगण से मिलकर भी उन्हें बताया जाय कि समूचे भारत देश में ये एक ही ऐसा ईश्वरीय विश्व विद्यालय है, जहाँ इतनी संख्या में मातायें-बहनें लोगों के चारित्रिक सुधार के लिये ऐसा उच्च कार्य कर रही हैं। अतः इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालय का यहाँ होना तो राजस्थान सरकार के लिए एक गर्व की बात है। बाबा ने उन्हें यह भी समझाने के लिए कहा कि यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय तो सरकार का सहयोगी है। बापू गाँधी जी जो सत्य अहिंसा और ब्रह्मचर्य के द्वारा रामराज्य की स्थापना करना चाहते थे, यह तो उस ही शुभ लक्ष्य की पूर्ति में लगा हुआ है। इन माताओं-बहनों, अर्थात् ब्रह्माकुमारियों के पास जो कुछ भी था, इन्होंने वह सब स्वयं ही देश की इस उच्च सेवा में लगा दिया। अतः जो संस्था ऐसा उच्च कार्य कर रही हो, उससे ठिकाना भी छीन लेना, यह तो एक अनुचित, अन्यायकारी और अशोभनीय कार्य है। दूसरे प्रदेशों की सरकारें तो राजनीतिक बटवारे के बाद आये लोगों के पुनर्वास (Rehabilitation) के लिये सब सुविधाएं, साधन और सम्पत्ति भी देती है। परन्तु यह ईश्वरीय विश्व- विद्यालय तो इसके लिए भी माँग नहीं करता बल्कि यह सरकार पर कोई बोझ डालने की बजाय आत्म-निर्भर रहना चाहता है। बाबा ने यह भी लिखने के लिए आदेश दिया कि प्राचीन परम्परा के अनुसार तो राजा अपनी प्रजा का पिता होता है। वह अपनी प्रजा का अपनी सन्तान से भी ज़्यादा ध्यान रखता है। अतः सरकार को ये नोटिस वापस ले लेना चाहिए और अपने लिये कोई दूसरा प्रबन्ध करना चाहिए क्योंकि सरकार के पास तो सब साधन हैं। वह तो अपने लिए एक बड़े भवन का भी निर्माण कर सकती है और इस संस्था को यहाँ बने रहने देकर पुण्य लाभ भी ले सकती है......।
सरकारी अधिकारियों से भेंट
बाबा के निर्देशानुसार इस ईश्वरीय विश्व-विद्यालयके प्रतिनिधि तत्कालीन मुख्यमन्त्री महोदय से मिले और उन्हें ये सारी बात बतायी।उन्होंने सहानुभूति भी प्रदर्शित की परन्तु वे बोले "ये किस्सा अब ऐसी सीमा पर पहुँच चुका है कि जिससे पीछे हटना मुश्किल मालूम हो रहा है क्योंकि इस स्थान पर सर्किट हाऊस बनाने की बात विधान सभा में भी कही जा चुकी है। इंजीनियरों ने इसके लिए पूरी योजना तैयार कर ली है, नक्शे भी बना लिए हैं और इस कार्य के लिए बजट भी पास हो चुका है। अतः इस हद तक ये सब-कुछ हो चुकने के बाद, अब इस मामले को समाप्त कर देना सम्भव नहीं क्योंकि ऐसा करने पर विधान सभा में भी प्रश्न उठाये जायेंगे और ख्वामख्वाह गड़बड़ मचाने वाले लोग तथा यों ही आलोचना करने वाले समाचार-पत्र भी बात का बतंगड़ बना देंगे। अतः उन्होंने ये कहा कि इन भवनों को छोड़ना तो होगा ही; हाँ, खाली करने की अवधि को बढ़ाया जा सकता है।" अतः उन्होंने ठहरने के लिए अधिक समय दे दिया।
इस बीच भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी से भी कहा गया कि वे इस मामले में अपना हाथ डालें और उन्होंने इस विषय में राजस्थान सरकार को लिखा भी क्योंकि आबू एक छोटी-सी पहाड़ी जगह है और वहाँपर कोई और इतनी बड़ी जगह मिलना, जहाँ पर कि सैकड़ों की संख्या में भाई-बहन ठहर सकें, तुरन्त सम्भव नहीं था। राष्ट्रपति महोदय के पत्र के फलस्वरूप हमें उन भवनों को अपने पास रखने की और अवधि दे दी गई। परन्तु फिर भी खाली करने के लिये तो कहा ही गया।
इसके बाद इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रतिनिधि राजस्थान के कुछ कैबिनेट मंत्रियों से व्यक्तिगत रूप में मिले और उन्होंने भी अपनी सहानुभूति प्रकट की तथा इस मामले को उठाने का आश्वासन भी दिया परन्तु उसके परिणामस्वरूप भी केवल अवधि ही कुछ और बढ़ा दी गयी। बाबा तो सदा कहा ही करते थे कि प्रजातन्त्र में किसी बात का अन्तिम निर्णय लेने के लिए किसी एक व्यक्ति को पूर्ण अधिकार नहीं होता। देश के राष्ट्रपति तक को भी सन्तुष्ट कर देने के बाद अथवा किसी प्रदेश के मुख्य मंत्री को भी युक्ति-संगत नीति से मामले के बारे में सन्तुष्ट करने के बाद भी समस्या का हल नहीं होता है। एक व्यक्ति को यदि आप यह मनवा भी लें कि आप की बात ठीक है तो आगे जाकर दूसरा व्यक्ति अड़ जाता है और दूसरे को साथ ले लेने के बाद अन्य सरकारी अधिकारियों की पंक्ति खत्म ही नहीं होती और इस पंक्ति के अन्त तक पहुँचने से पहले वह व्यक्ति भी बदल जाते हैं जिनसे आपने पहले बात की थी और इसी लाल फीते में समय भी खप जाता है।" इसलिए बाबा कहते "वत्सो, यहाँ किसी एक राजा का राज्य तो है नहीं कि जो किसी बात का अन्तिम निर्णय कर सके और जिसकी बात मानने के लिए सभी अनुशासन-बद्ध हों। अब तो हालत ऐसी है कि आज लोग जिसको अपना प्रमुख चुनते हैं कल वे उस पर दोष लगाकर उसे अपमानित और दण्डित करने से भी नहीं चूकते और प्रायः उस प्रमुख में दोष होते भी हैं। यदि आज यहाँ किसी राजा का राज्य होता भी तो भी बात सधती नहीं क्योंकि आज राजा पर भी सच्चाई और पवित्रता का अंकुश तो है ही नहीं। आज राज्य-सत्ता अलग है और धर्म-सत्ता अलग है। अलग क्या, आज सही अर्थ में धर्म तो है ही नहीं।"
सुई की नोक के बराबर भी जगह नहीं
तो जब यह निश्चित हो गया कि इस स्थानको छोड़ना ही होगा तब एक दूसरे स्थान को लेने के लिए निर्णय करना ज़रूरी था। बाबा ने तो पहले से ही कह दिया था कि यह वृत्तान्त महाभारत में लिखित उस वृत्तान्त की पुनरावृत्ति है जिसमें बताया गया है कि कौरवों ने पाण्डवों को सुई की नोक के बराबर भी जगह देने से इन्कार कर दिया था। बाबा बोले, 'भारतवासी इस बात को तो भूल ही गये हैं कि परमपिता परमात्मा का स्वरूप क्या है और वह कैसे गुप्त (Incognito) रूप से लोक-कल्याण का कर्त्तव्य करते हैं? अतः वह यह तो पहचान ही नहीं सकते कि इस संस्था द्वारा स्वयं परमपिता परमात्मा ही भारत को पावन एवं सुख शान्ति सम्पन्न बनाने का कर्त्तव्य कर रहे है।"
तीन कदमों में तीन लोक ले लेंगे
बाबा बोले-यदि मंत्री हमसे इन भवनों को ले लेते हैं तो गोया वे अनजाने ही पाँच हजार वर्ष पहले हुए अपने पार्ट को अदा कर रहे हैं। परन्तु वत्सो, यदि वे हमें ईश्वरीय सेवा करने के लिए तीन पैर पृथ्वी भी नहीं देते तो घबराने की कोई बात नहीं। हम तो तीन पैर में ये सारी पृथ्वी ही माप लेंगे अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान, सहज राजयोग तथा दिव्य- गुणों की सेवा द्वारा सारे भू-मण्डल को ही स्वर्ग बना लेंगे।
अब दूसरा स्थान लेना तो था ही और बाबा के कथनानुसार उसमें भी कल्याण ही समाया हुआ था। अतः अब ढूँढे गये भवनों में से एक को चुनना था। कोटा हाऊस और धौलपुर हाऊस, जहाँ अभी हम रह रहे थे, के निकट ही 'पोकरान हाऊस' नाम वाला भवन मिल गया। उन दिनों यह भवन लगता तो अजीब-सा ही था परन्तु इसमें मैदान काफी था। कमरे भी बन्द-बन्द से लगते थे। परन्तु शिव बाबा के पास तो इसके लिए एक बड़ी योजना थी; अतः उनकी प्रेरणा से इसी भवन को किराए पर ले लिया गया और बाद में खरीद भी लिया गया।
पाण्डव भवन का निर्माण
अब भारत के कई नगरों एवं उप-नगरों में ईश्वरीय सेवाकेन्द्र खुल गए थे और वहाँ से मुधबन आने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही थी। दैव-वश इसी पोकरान हाऊस में खाली मैदान था। अतः अब बाबा ने अन्य सेवाकेन्द्रों से आने वाले वत्सों के आवास के लिए इसमें कमरे बनवाने शुरू कर दिये। सभी की वृहद् सभा के लिए एक काफ़ी बड़े हाल का भी निर्माण कराया गया। बाबा की ये योजना थी कि समूचे विश्व-भर में ईश्वरीय ज्ञान और संदेश देने के लिये यहाँ शिक्षिकाओं का प्रशिक्षण (Teachers training) होगा और सभी की योग अवस्था को परिपक्व करने के लिये भी उन्हें विशेष पुरुषार्थ कराया जायेगा। इस प्रयोजन से बाबा ने पोकरान हाऊस के एक खुले हिस्से में भावी शिक्षिकाओं के आवास तथा प्रशिक्षण के लिये कमरे भी निर्मित्त करवाये और कक्षायें भी बनवाई। पिता-श्री विश्व में पवित्रता की स्थापना के लिए नित्य नई-नई योजनायें बनाते और उन्हें कार्यान्वित करते रहते।
स्थापत्य-कला अथवा भवन कला में बाबा के विचार बहुत उच्च और अनूठे थे। बाबा इस कार्य में विशेष रुचि लेते थे। प्रेम प्लावित हृदय से, वे कागज़ पर अपने कोमल हस्तों से रेखाचित्र बनाते हुए कहते- "यहाँ हमारे बच्चे सुख से रहेंगे। यहाँ वे ईश्वरीय विद्या पढ़ेंगे..... मैं उनके सुख की पूरी व्यवस्था करूंगा। चीज़ ऐसी बनाई जायेगी जो कि 'कम खर्च और बालानशीन' होगी। यहाँ प्रबन्ध ऐसा होगा कि बच्चे जब दुनिया के धन्धों से और माया के तूफानों से थक कर यहाँ आयेंगे तो वे शिव बाबा के इस घर में ऐसा सुखपूर्वक विश्राम पायेंगे कि उन्हें छी-छी दुनिया तो भूल हो जायेगी।" वे प्रायः निर्माण स्थल पर स्वयं जाया करते और आने वाले वत्सों की याद में वे जिस प्रकार निर्देश दिया करते, वो देखते ही बनता।
राज-ऋषियों अथवा भावी राजकुमारों का शिक्षा-स्थल
अब बाहर सेवा केन्द्रों से प्रतिदिन काफी संख्या में वत्स वहाँ आते। बाबा उन्हें कहते, "बच्चे, बाबा आपके लिये जगह बनवा रहे हैं। जाओ, उसे देखकर तो आओ! इतना कहते ही वे उठ खड़े होते और अपनी अंगुली वत्सों के हाथ में दे देते और कहते-चलो बच्चे, बाबा स्वयं आपको दिखला लाते हैं।" रास्ते में वे उनसे पूछते, बच्चे किसके साथ चल रहे हो? ऐसा पूछते हुए मुस्कान भर कर योग-दृष्टि से उनके नेत्रों में उनको ऐसे अनुपम स्नेह से निहारते कि उन वत्सों के आत्मन् को बहुत सुख महसूस होता। बाबा कहते वत्सों, आप राजऋषि हैं और राजयोगी भी। इस पुरुषार्थ द्वारा आप भविष्य में राजाओं के भी राजा बनोगे। गोया आप भविष्य में दैवी राजकुमार और दैवी राजकुमारियाँ बनने वाले हैं। अतः आपके उठने-बैठने, पढ़ने इत्यादि की व्यवस्था, जैसे अंग्रेज़ों के ज़माने में राजकुमारों के लिए होती थी, उससे भी उच्च होनी चाहिए। परन्तु अभी तो आप पट पर बैठते हैं क्योंकि ये आपके त्याग और तपस्या की जीवन है। वर्तमान समय सब साधारण और पुरुषार्थी रूप में हैं। परन्तु इस पट पर बैठे हुए भी आप में ऐसी ईश्वरीय मस्ती है कि सतयुग में श्रीलक्ष्मी और श्रीनारायण को, रत्न जड़ित सिंहासन पर बैठने पर भी, नहीं होगी। अतएव इस समय तो आप पद्मापद्म दैवी-सम्पत्ति के मालिक बनते हैं।
बाबा के साथ कदम-कदम में पद्म-पद्म की कमाई
इस प्रकार, बाबा भवन भी दिखा देते और बातों ही बातों में ईश्वरीय खुशी के रूप खजाने से झोली भर देते। फर्श पर बैठने की बात करते हुए भी वो रूहानियत के अर्श पर ले जाते। त्याग और तपस्या का पाठ पढ़ाते हुए भी वे राजाई और रूहानी नशे से सराबोर कर देते। बाबा की अँगुली पकड़े हुए लगता कि कोई रूहानी बिजली- सी उनके जिस्म और आत्मा दोनों को एक नई शक्ति संचारित कर रही है। वे घड़ियाँ, वे दृश्य सभी की कल्प-कहानी के ऐसे स्वर्णिम संस्मरण बन जाते कि उन दृश्यों के स्वप्न जाग्रत अवस्था में भी आते रहते और स्वप्न में भी उनको देखकर आत्मा जाग्रत अवस्था का अनुभव करती। वे किसी कक्षा में बिठाकर औपचारिक (Formal) रीति से पढ़ाये गये ज्ञान-पाठ तो नहीं थे परन्तु वे प्रेम के पाठ थे जो मनुष्य के मन में रहे हुए कल्मष को धो डालते......
फिर, कमरे में आकर बाबा कहते "बच्चे, थक तो नहीं गये? लो ये 'टोली' खा लो! बाबा ने आप जैसे सिकीलधे बच्चों के लिये यह बनवाई है।" इस प्रकार हंसी-बहलाव में ही बाबा 'मन्मनाभव' का पाठ पढ़ा देते और हर कोई ऐसा महसूस करता कि हम तो वास्तव में थे ही शिव बाबा के परन्तु बीते कुछ समय से इस बात को जैसे-कैसे भूल गये थे और अब इसकी हमें स्मृति दिलाई जा रही है।
इसका नाम पाण्डव भवन
बाबा ने इस भवन का नाम रखा- 'पाण्डव भवन'। बाबा कहते कि लोगों को यह तो मालूम नहीं कि पाण्डवों और शिव शक्तियों की जो सेना थी,वो अहिंसक और आध्यात्मिक थी। उन्होंने बाहुबल अथवा शस्त्र-बल से राज्य नहीं लिया था बल्कि ज्ञान-बल, योग-बल एवं पवित्रता-बल के द्वारा ही मन में बैठे असुरों का मलियामेट किया था।वह आध्यात्मिक सेना आप ही तो हैं। यह बात लोक-प्रसिद्ध है कि पाण्डव स्वयं भगवान ही के निर्देशानुसार धर्म के पथ को ग्रहण करते थे। अब पाण्डव-पति परमात्मा की श्री-मत के अनुसार अपने गँवाये हुए दैवी स्वराज्य के लिये पुरुषार्थ करने वाला शक्ति-दल अथवा पाण्डव सेना आप ही तो हो, जिनका ही ये मुख्य कार्य-स्थल अथवा यह रूहानी किला 'पाण्डव-भवन' है जहाँ पर किसी भी देह-अभिमानी,विकारी दृष्टि-वृत्ति वाले, भोग-प्रिय व्यक्ति को रहने का अधिकार नहीं।बाबा सदा यही कहा करते कि यह पाण्डव भवन योग-बल एवं ब्रह्मचर्य का किला है। यहाँ पर शिव बाबा, ब्रह्मा बाबा के द्वारा ज्ञान-वर्षा करते हैं जिससे नर-नारी देवी-देवता बनते हैं। अतः इस अर्थ में,यहाँ इन्द्र की सभा लगती है जहाँ पर कि दैवी-वृत्ति को धारण करने वाले केवल पवित्र, योग-युक्त एवं निश्चय बुद्धि वत्स ही रह सकते हैं ताकि यहाँ के वातावरण में अशुद्ध संकल्पों-विकल्पों के प्रकम्पन (Vibrations) न हों। यही पाण्डव भवन 'मधुबन' भी है क्योंकि यह नगर और ग्राम से दूर एक प्रकार की वनस्थली तो है ही जहाँ पर परम मधुर शिव बाबा से आप वत्स ज्ञान-माधुर्य का रसास्वादन करते हैं अथवा विकारों के कड़वेपन को निकाल कर देवताओं के समान मधुर स्वभाव के बनते हैं। आज इसी पाण्डव-भवन अथवा मधुबन में विश्व के रावण राज्य को अथवा माया के विभिन्न रूपों को परास्त करने का ईश्वरीय कार्य बहुत तीव्र गति से हो रहा है। इस मधुबन तपोवन का वातावरण ऐसा तो अव्यक्त, शान्तिपूर्ण एवं शुद्ध आध्यात्मिक है कि जहाँ कुछ ही दिन रहने से मनुष्य को परम शान्ति मिलती है तथा उसके पुरुषार्थ में तीव्रता आती है।
इस भवन को बनाने के कार्य में जो मिस्त्री और मजूदर लोग लगे हुए थे, वे भी बाबा के सुमधुर, सुकोमल एवं पितृत व्यवहार से बहुत प्रभावित थे। बाबा उन्हें 'बच्चे', 'बच्चे' कह कर बुलाते थे। वे वहाँ को माली को भी 'माली बच्चे' कह कर पुकारते थे। वे उन्हें सर्दी प्रारम्भ होते ही गरम कपड़े दिया करते थे और उनकी मज़दूरी के अतिरिक्त उन्हें छाछ, चाय आदि भी दिया करते। वे उनके लिये कभी मीठे चावल बनवा देते और कभी खाने की और कोई चीज़ दिलाया करते। कई बार बाबा ने उनके लिये कम्बल भी मँगवाये और चप्पल अथवा जूते भी। जब कभी बाबा बाहर जाते तो पाण्डव-भवन के मिस्त्रियों, मालियों तथा सफाई कर्मचारियों को विशेष खर्ची भी दिया करते। अतः बाबा को देखते ही उन लोगों का मन रूप मोर नाच उठता। उन्हें लगता कि यह धरती के देवता हैं; अतः वे कर-बद्ध होकर भावनापूर्वक नमस्ते किया करते।
बाबा का बगीचा
बाबा को फूलों का भी बहुत शौक था। अतः बाबा ने 'पाण्डव भवन' के निर्माण में जहाँ अन्य आवश्यकताओं को स्थान दिया, वहाँ इसके एक बड़े हिस्से में फूलों का एक बगीचा भी बनवाया तथा उसमें कई प्रकार के फल भी लगवाये। बाबा कहते, "इस बगीचे में मैं सभी प्रकार के फूल और फल लगवाऊँगा। सेवा केन्द्रों से, पवित्र बनने अथवा सेवा करने वाले जो बच्चे यहाँ आयेंगे, उन्हें मैं अपने हाथों से ये फल खिलाऊँगा। इस बगीचे में अनेक प्रकार के जो फूल होंगे, वे जिस आध्यात्मिक रहस्य के परिचायक होंगे, उसका बोध भी बच्चों को कराऊँगा। मेरे ये ज्ञान-वत्स भी मानव रूप में फूल ही हैं और शिव बाबा रूहानी माली हैं, जो इन सभी को देखकर हर्षित होते हैं। इस ज्ञान के बगीचे में भी कोई तो अभी कली बना है, कोई फूल। इसमें कोई तो सूर्यमुखी है जिसका मन सदा ज्ञान-सूर्य परमात्मा ही की ओर रहता है। कोई 'रूहे-गुलाब' हैं, जिसकी रूह में दिव्य-गुणों की सुगन्धि है। कोई 'मोतिया' या 'चमेली' की तरह खुशबूदार और पवित्र है। किसी की कली गुलाब की तरह इस ईश्वरीय बगीचे की शोभा है। इसके अतिरिक्त कोई तो अब 'फल' बन चुका है जिसमें कि ज्ञान रस भर गया है, परिपक्व हो गया है और दूसरों की सेवा में लगा हुआ है। इस प्रकार, ये बगीचा भी सेवा केन्द्रों से आने वाले वत्सों को ज्ञान देने का एक निमित्त कारण बन जाता।”
आप कली हो, फूल हो या फल हो?
कई बार बाबा आगन्तुक व्यक्तियों को फूल भेंट करके पूछते, "बताओ बच्चे, अभी आप कली हो या फूल बने हो या अब फल बन चुके हो?" कोई तो बाबा की इस पहेली को समझ न पाता और किन्हीं-किन्हीं को तो उनके सेवा केन्द्रों की इन्चार्ज बहन पहले से ही ये पाठ पढ़ाकर ले आतीं कि बाबा ऐसे-ऐसे पूछा करते हैं। कभी बाबा यह भी पूछते कि बताओ बच्चे, अभी आप में माया का कोई काँटा तो नहीं रहा हुआ? कभी बाबा कहते कि "हरेक सेवा केन्द्र पर आने वाले ज्ञान-वत्स गोया एक मानवी गुलदस्ता ही हैं। बच्चे, आपस में गुलदस्ता बन कर रहना और अपनी-अपनी खुशबू शिव बाबा को देते रहना।" कई बार बाबा क्लास के अन्त में थाली में फूल लाने का निर्देश पहले से दे देते और वाणी के अन्त में मुस्कुराते हुए कहते कि अच्छा, जिस वत्स की जैसी अवस्था हो, कोई आकर वैसा ही फूल दे दे। इस पर सब हँस पड़ते और सबके मन में एक मीठी चिन्ता-सी हो जाती कि न जाने सबके सामने अब हमें कौन-सा और कैसा फूल मिलेगा। परंतु बाबा तो केवल हसी के भाव से ऐसा कहते थे ताकि सबके मन में गुदगुदी का अनुभव हो, वरना तो बाबा सबको सन्मान देते थे; वे भला भरी सभा में किसी को ऐसा सुगन्धि-हीन अथवा छोटा फूल कैसे दिला सकते थे कि जिसे पाकर किसी की खुशी ही कम हो जाय?
मधुबन के अंगूर
बाबा ने इस बगीचे में अंगूरों की बेल भी लगाई थी। ये इतनी नीची थी कि किसी ऊँचे कद वाले व्यक्ति के एड़ी उठाकर कोशिश करने से तो लटकते हुए गुच्छे का निचला सिरा उसके मुँह में भी आ सकता था। हर वर्ष जब अंगूरों के गुच्छे उतारे जाते तो बाबा इस अल्लाह के बगीचे के अंगूरों को बड़े चाव से प्रायः हरेक सेवा-केन्द्र पर भेजने का यत्न किया करते। अँगूर तो प्रायः भारत के सब शहरों में मिलते ही हैं और वे सारे खट्टे ही नहीं बल्कि माठ और रसीले भी होते हैं। परन्तु इन अंगूरों की विशेषता यह थी कि इनमें ईश्वरीय प्यार रूपी रस भी भरा होता था। बाबा इन्हें पार्सल करके नहीं भेजते बल्कि एक स्नेह-भरे पत्र के साथ पत्र-वाहक के हाथ वे अंगूरों का टोकरा भर-कर भेज देते और हरेक बच्चे का नाम लिखकर कहते कि इन सभीको अंगूर मिलने चाहिये। किसी मुख्य-केन्द्र पर जब यह टोकरा आस-पास के केन्द्रों पर वितरणार्थ आ पहुँचता तो उस टोकरे के आस-पास खड़े भाई-बहनो के चेहरे देखते ही बनते थे। उन पर स्नेह और मुस्कान की मिश्रित रेखाएँ आज बहुत ही गहरे रूप में उभर आतीं। उन्हें उन अंगूरों में प्रियतम प्रभु शिव बाबा का संदेश झलकता दिखाई देता और बाबा के प्रति अथाह स्नेह में वे उसे स्वीकार करते योग-युक्त से हो जाते। जो वत्स किन्हीं कारणों से उस दिन न आ पाते, उन्हें भी संदेश भेजा जाता कि बाबा ने आपके लिये मधुबन के बगीचे से अंगूर भेजे हैं। संदेश को सुनते ही वह सिर पर पाँव रखकर दौड़े आते। इस प्रकार से सबको रसानुभूति के साथ- साथ- "त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव” इस सिद्ध छन्द की पंक्तियों की रहस्यानुभूति भी प्राप्त होती।
बाबा की कुटिया
इस बगीचे में बाबा ने एक कुटिया भी बनवाई। देखने में बिल्कुल सादा और प्राचीन कला की परिचायक। परन्तु, इसमें बैठे बाबा के पास जब कोई अपने मन का हाल बताने जाता तो उसे लगता कि आज किसी ने मेरे आत्मन् पर से सारा बोझ हटा दिया है और उसके बदले में मुझे हर्ष और हल्कापन दे दिया है। क्षण-भर में उन्हें बड़ी-से-बड़ी समय का हल मिल जाता। वे बाबा के निकट बैठ कर ज्ञान के गहन रहस्यों तक पहुँच प्राप्त कर लेते और उन्हें ऐसा लगता कि अब इन शिक्षाओं को अपने जीवन में ढालना कठिन नहीं होगा। इसी कुटिया में बैठकर ही बाबा विभिन्न सेवा-केन्द्रों से आये अनेक वत्सों के पत्रों का भी उत्तर देते जिसे पाकर उन्हें बहुत उल्लास, उत्साह और आत्मीयता का अनुभव होता। गोया यह कुटिया, कुटिया नहीं थी बल्कि इस संसार सागर में, जहाँ पर मनुष्य माया के तूफानों से, तथा दुःख और अशान्ति की चट्टानों से घिरा हुआ है, उसमें उसके जीवन रूपी जहाज़ के लिये एक लाईट हाऊस का काम करती जहाँ से सभी को ज्ञान और योग की सर्च लाईट (Search Light) मिलती रहती।
बाबा ने केवल आवास और प्रशिक्षण के लिये सीधे-सादे कमरे ही नहीं बनवाये, बल्कि स्वास्थ्य और सौन्दर्य (Aesthetics) के नियमों का भी ध्यान रखा। बाबा ने बारह दरी वाले दो हवादार कमरे भी अच्छी खासी ऊँचाई पर बनवा दिये और राजस्थानी भवन निर्माण कला में दिव्यता का समावेश करते हुए बाबा ने इन पर बहुत सुन्दर गुम्बद बनवा दिये। ऐसा लगता है कि ये गुम्बद दूर से ही माया से थके-माँदे जिज्ञासुओं का आह्वान करते हुए मूक भाव में शिव बाबा का यह संदेश देते हैं कि "आओ, मेरी छत्र-छाया में आओ और अपने जीवन को कमल पुष्प के समान बनाओ। अपने जीवन में इस नये और ताज़ा ज्ञान के ताज़गी देने वाले झौंके खाओ और पुराने पोथ्ज्ञों एवं रूढ़ियों की घुटन से मुक्ति पाओ।" इन गुम्बदों के ऊपर रात्रि को सदा एक-एक बल्ब जगता रहता जो शिव बाबा के इस संदेश को किरणों की तरह फैलता कि "अज्ञान की इस अंधेरी रात में मुझ सदा जागती-ज्योति परमात्मा के पास आओ। जीवन-पथ पर भूले- भटके मुसाफ़िरो, आओ और सुख-शान्ति की विरासत पाओ।"
इस तपोवन में बाबा की तपस्या
इस प्रकार पाण्डव-भवन में सब सुख-सुविधायें सहज सुलभ कराकर भी बाबा स्वयं तो सदा एक छोटे-से पुराने कमरे में ही बने रहे। यह देखकर कई वत्स बाबा से कहते "बाबा, क्या ही अच्छा हो कि इतने कठिन परिश्रम से बनवाये गये इस बड़े भवन में आप भी किसी एक नये ही कमरे में आवास करें। बाबा, हम इस नये भवन को सुख-सुविधा को लेते हैं और आप इस पुराने ही कमरे में रहते हैं!! बाबा, इस बात को तो हमारा मन नहीं मानता....."।
तब बाबा कहते- "वत्सो, शिव बाबा तो आते ही पुरानी दुनिया में और पुराने शरीर रूपी रथ में है। नई सतयुगी दुनिया तो वो आप बच्चों के लिये ही बनाते हैं। अतः बाप तो आप बच्चों ही को नये भवन में देखकर खुश होता है।" बाबा कहते "मैं किन्हीं कर्म-संन्यासियों की तरह कोई गुरु या आचार्य नहीं हूँ कि स्वयं सुख लुटू और अपनी सेवा-पूजा आप बच्चों से कराऊँ बल्कि यह बाप तो सारी सृष्टि का रूहानी सेवक है जोकि सबको मानव से देवता बनाने की सेवा करने पर तत्पर है। अतः बच्चे, सेवक का तो ऐसे ही कमरे में रहना ठीक बनता है।" बाबा की ये बातें सुनकर सभी मूक होकर रह जाते क्योंकि वे जानते कि वे युक्ति अथवा दलील से तो कभी भी बाबा को मनवा नहीं सकते। वे हँसते-मुस्कुराते हुए इतना मात्र ही कह पाते कि "नहीं बाबा, ऐसा नहीं होगा।" परन्तु वे स्वयं अपने मन में जानते कि वे बाबा को अपनी बात जंचा नहीं पा रहे। देखो तो, कितनी थी बाबा की त्याग और तपस्या की भावना और उनका लोक सेवा का संकल्प। उनका हाथ सदा देने की मुद्रा में रहता था और वे सांसारिक सुख-सुविधाओं के प्रति बेपरवाह थे। वे इसी कमरे में ही तपस्या करते रहते, इसी स्थान पर ही वत्सों को योग-दृष्टि एवं व्यक्तिगत परामर्श देकर, उन्हें अनेक वरदान देते रहते। आज यह तपस्या का कमरा हो गया है क्योंकि उस त्याग, तपस्या और सादगी के आदर्श बाबा ने यहाँ तपस्या की थी। परन्तु हाय! जब ऐसे स्नेही, सहायक एवं साधारण रूप में मानव-मात्र के अलौकिक और पारलौकिक पिता इस धरा पर ऐसे महान् चरित्र कर रहे थे तो संसार के लोग आँखें मूँद कर विकारों से मुर्छित होकर बेसुध और बेखबर सोये पड़े थे और उनमें से कितने तो ऐसे थे जिनके कधे झंझोड़ने पर भी वे करवट तक नहीं लेते थे और कितने तो ऐसे भी थे जो सुनकर भी अनसुनी कर देते थे! और सबसे ज़्यादा दयनीय तो वे थे जो सुनने पर भी उस पिता के प्रति असहिष्णुता, मन-मुटाव और वैर-विरोध की भावना को अपने मन में पालते रहते।
इस कमरे, कुटिया और बगीचे के बनाने में तो समय लगा परन्तु बाबा ने तो यह भवन लेते ही बहुत तीव्र गति से ईश्वरीय सेवा का कार्य प्रारम्भ कर दिया। अब यह भवन गोया सर्वशक्तिवान शिव बाबा, शक्ति सेना तथा 'रामराज्य' स्थापित करने वाली पाण्डव सरकार का मुख्यालय बन गया जहाँ माया को परास्त करने के लिये खूब तैयारियाँ होने लगीं। अब जो ईश्वरीय सेवा हुई उसके सारांश का उल्लेख करेंगे।
ईश्वरीय सेवा की धूम
नवम्बर, १९५७ में देहली में लाल किले में एक 'विश्व-धर्म सम्मेलन' होने का जब समाचार मिला तो बाबा ने इस अवसर पर देश-विदेश से आये धार्मिक नेताओं को, इसमें सम्मिलित होने वाले सरकारी मन्त्रियों को तथा समस्त जनता को ईश्वरीय सन्देश देने के लिए कहा। बाबा के मन में सर्व आत्माओं के प्रति ऐसी शुभ भावना थी कि किसी भी प्रकार सभी का कल्याण हो जाए। बाबा कहा करते कि पिता तो सदा चाहता है कि "उनके सभी बच्चे चरित्रवान हों, योग्य हों एवं अच्छे-अच्छे पदों पर आसीन हों। इस प्रकार, बाबा की भी सदा यही इच्छा रहती है कि सभी मनुष्यात्माएँ जिनमें कई ज्ञानवान तथा बहुत-से ज्ञान-रहित हैं, किसी तरह और किसी प्रकार भी पवित्र बन देव-पद प्राप्त कर लें। अतः बाबा का रात-दिन ऐसी योजनाओं पर विचार चलता ही रहता है कि सारी सृष्टि में बसे मनुष्यों को परमपिता शिव के अवतरण की खुश खबरी कैसे मिले? यह तो हम मनुष्यात्माओं, जिन्हें कि उस परमपिता ने आकर जगाया है, का कर्तव्य है कि हम दूसरों को भी यह शुभ-सूचना दें कि सम्पूर्ण पवित्रता-सुख-शान्ति की विरासत देने वाला पिता आ चुका है और उसने हम मनुष्यात्माओं के लिए ज्ञान-यज्ञ रचा है जिसकी अग्नि में हमें अपने-अपने मनो-विकारों की आहुति डालती है।"
सभी को इस यज्ञ में पधारने का निमन्त्रण
बाबा कहते कि "जब पिता कोई यज्ञ रचता है अथवा कोई शुभ उत्सव मनाता है तो वह अपने सभी बच्चों को निमन्त्रण देता है ताकि वे भी उस उत्सव में सम्मिलित हों वरना अन्त में उलाहना देंगे कि हमारे पिता ने यह उत्सव किया और हमें बुलाया भी नहीं तथा उसकी सूचना भी नहीं दी। अतः अब सारी सृष्टि की मनुष्यात्माएँ जो कि पारलौकिक शिव बाबा की और मुझ अलौकिक पिता ब्रह्मा की सन्तान है, उनका भी तो अलौकिक कर्त्तव्य है कि वे सभी मनुष्यात्माओं को यह शुभ सन्देश दें कि अब ज्ञान-यज्ञ रचना है और परमपिता ज्ञानामृत बाँट रहे हैं; अतः सभी आयें और अपने परमपिता से अपना बपौती अधिकार (Inheritance) लें। अतः बाबा ने निर्देश दिया कि विश्व- धर्म-सम्मेलन के अवसर पर 'ईश्वरीय निमन्त्रण' तथा 'सदा शुभ बधाई' इस शीर्षक से पेम्फेलेट, फ़ोल्डर इत्यादि छपवाकर सभी आत्माओं को शिव बाबा की ओर से दिये जायें। बाबा ने यह भी कहा कि यह निमन्त्रण-पत्र इत्यादि बहुत ही सुन्दर रूप से छपे हों और हरेक को दिये जायें।
कापारी खुशी
सभी मनुष्यात्माओं को ईश्वरीय सन्देश देने का उत्साह बाबा में सदा इतना बना रहता कि उनके सम्पर्क में आने से हरेक को इस सेवा- कार्य में लगन लग जाती। पुनश्च, शिव बाबा के अवतरण एवं मिलन की खुशी भी बाबा को सदा इतनी पराकाष्ठा की रहती कि बाबा के मन, वचन एवं कर्मों में इस खुशी का इतना प्रभाव होता कि अशान्त आत्मा भी बाबा के निकट्य से अपार खुशी महसूस करती। बहुत बार बाबा यज्ञ वत्सों से पूछा भी करते 'बच्चे, खुशी का पारा तो चढ़ा हुआ है न? देखो हमें त्रिलोकी नाथ, त्रिकालदर्शी, त्रिमूर्ति, सर्वशक्तिवान शिव बाबा मिले हैं और वह हमें निरन्तर २५०० वर्षों के लिये स्वर्गिक राज्य-भाग्य का अधिकारी बना रहे हैं, अतः हमें एड़ी से चोटी तक खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए अथवा हमें कापारी खुशी होनी चाहिये। वत्सो, हमें सतयुग में दैवी राज्य-भाग्य पाकर भी ऐसी खुशी न होगी जो कि अभी शिव बाबा के मिलन से है। देखो तो भक्ति मार्ग में जिसे जन्म-जन्मान्तर ढूँढा जिसके लिये इतने व्रत, तप, उपवास,हठ क्रिया इत्यादि की परन्तु जो फिर भी नहीं मिला। अब कैसे अनायास ही उसने हमें अपना परिचय दिया है, हमें अपनाया है और अपनाकर हमें सहज रीति ही अपनी सम्पूर्ण दिव्य-विरासत दे रहा है। बच्चे, यदि सोचा जाय तो यह कोई कम बात नहीं है। कई बार सहज मिली वस्तु का मनुष्य के मन में उतना मूल्य नहीं होता जितना कि होना चाहिए। अतः इस अद्भुत गुप्त खज़ाने को सहज ही पाकर कहीं ऐसी ग़फ़लत न करना।
पाण्डव भवन में सदा खुशी के नगारे बजें
कई बार बाबा कहा करते, "वत्सो, जब किसी के घर शादी का मौका होता है तो उनके घर में ढोल या बैंड बजते हैं। अब बाबा तो कई बार सोचता है कि यहाँ २४ ही घण्टे खुशी के नगारे बजते रहें क्योंकि यहाँ तो आत्माओं की अमरनाथ परमात्मा शिव से सगाई (प्रेम) अथवा शादी (खुशी की मुलाकात) हो रही है। जब यहाँ प्रतिदिन २४ घण्टे नगारे बजेंगे तो लोग आश्चर्यान्वित होकर पूछेंगे कि क्या बात है, यहाँ रोज़ ही नगारे क्यों बजते हैं? यहाँ ऐसी कौन-सी खुशी का अवसर है? तब प्रश्न-कर्ताओं को बताया जाये कि यहाँ आत्माओं की परमात्मा से सगाई होती है; इससे बढ़कर तो अन्य कोई खुशी की बात नहीं हो सकती।" इस प्रकार बाबा खुशी और उत्साह के एक साकार पावर हाऊस थे। दूसरों में भी ईश्वरीय सेवा के लिये खूब उत्साह भरते रहते थे।
सम्मेलन के अवसर पर बाबा का देहली पधारना
अब देहली में जो बड़े पैमाने पर धर्म-सम्मेलन होने वाला था उस अवसर पर बाबा स्वयं उपस्थित होकर ईश्वरीय सेवा का ढंग सिखाना चाहते थे। अतः उन दिनों बाबा देहली में पधारे। बाबा के अपने निर्देश से और उनकी अपनी ही देख-रेख में सुनहरी और रूपहले रंग के कई हज़ारों की संख्या में फोल्डर्स (Folders) 'ईश्वरीय निमन्त्रण' तथा 'सदा शुभ बधाई' शीर्षक से छपवाये गये। वे फ़ोल्डर इतने आकर्षक थे कि उन्हें लेकर किसी को भी फैक देने का मन नहीं होता था बल्कि उसके सौन्दर्य के कारण भी वह उसको अपनी अमूल्य प्राप्ति मानकर सुरक्षित रखना चाहता था।
महादानी और कल्याणी
इसी अवसर पर बाबा ने बड़े आकार के रंगीन चित्र भी छपवाये थे जिसमें कि रचयिता (परमपिता शिव) और उनकी रचना (सृष्टि-चक्र) का चित्र भी छपा था। इसमें शिव बाबा को त्रिमूर्ति के रूप में दिखाया गया था। बाबा का निर्देश था कि हरेक को ये निमन्त्रण तथा चित्र परमपिता शिव से सौगात के रूप में (मूल्य लिये बिना) ही दिया जाय; विशेष कर विदेशियों को जो कि दूर-दूर से काफ़ी खर्च करके तथा भारत को एक प्राचीन एवं आध्यात्मिक देश मानकर यहाँ आये हैं और जिनका बार-बार यहाँ आना कठिन है, उन्हें तो अवश्य ही ये मिलने चाहिये। बाबा की इस सम्मति के अनुसार प्रायः सभी को ये दिये गये और इन्हें पाकर सभी बहुत ही खुश हुए। इस प्रकार पहली बार देहली सेवा-स्थल पर बाबा ने वरद् रूप से ईश्वरीय सेवा करना तथा महादानी और कल्याणकारी बनकर कर्त्तव्य करना सिखाया। बाबा जिस प्रकार ज्ञान-सेवा के तरीके बताते, सभी के प्रति करुणा एवं प्रेम-भरे मन से सभी को अनमोल ज्ञान-रत्नों की सौगात देने के लिए उत्साह भरते, वह देखते ही बनता था और उससे बहुत प्रेरणा मिलती थी।
प्रजापिता ब्रह्मा का कर्तव्य है सभी मूर्छित मनुष्यात्माओं को ज्ञान- गंगा-जल से पुनर्जीवित करना। बाबा ने वह कार्य कैसे शुरू किया, अब उसके आगे हम उसका वर्णन करेंगे।
जन-जन को ईश्वरीय सन्देश
अब बाबा की प्रेरणानुसार बड़े पैमाने पर ईश्वरीय सन्देश दिया जाने लगा। सेवा-केन्द्रों पर आने वाले जिज्ञासुओं को तो ईश्वरीय-ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा दी ही जाती थी। परन्तु उसके अतिरिक्त अब जहाँ किसी सम्बन्धित विषय पर कोई सार्वजनिक सभा होती, वहाँ भी निमन्त्रण मिलने पर भाषण में शिव बाबा का परिचय तथा सन्देश दिया जाता था तथा 'ईश्वरीय निमन्त्रण' भी काफ़ी संख्या में बाँटे जाते थे।
वर्तमान समय सन्देश की रूप-रेखा
अब वर्त्तमान परिस्थितियों के कारण बाबा ने निर्देश दिया कि राजनीतिक तथा धार्मिक नेताओं को विश्व-शान्ति के विषय में एक पत्र लिखा जाय। बात यह थी कि उन दिनों समाचार पत्रों में, सभाओं के मंचों पर तथा लोगों में भी 'विश्व शान्ति' के बारे में खूब चर्चा थी। अमेरिका और रूस के बीच आणविक अस्रो (Nuclear Weapons), उदजन बमों (Hydrogen Bombs), घातक विषैली गैसों इत्यादि के निर्माण के लिये होड़ (Race) चल रही थी। लोग इसे शीत युद्ध (Cold war) कहते थे। परन्तु कभी वीयतनाम, कभी लाओस, कभी क्यूबा, मध्य-पूर्व (Middle East) कभी अन्य किसी मामले के कारण लोगों में आशंका बनी हुई थी कि यह शीत युद्ध कभी भी गर्मागर्म लड़ाई (Hot War) में परिणित हो सकता है। उन दिनों समाचार-पत्रों में इन आणविक अस्रो के प्रलयंकारी प्रभाव का, इनकी बढ़ती हुई संख्या का तथा इनके निर्माण कार्य से पैदा हुए व्यर्थ मादा (Waste Matter) द्वारा वातावरण और समुद्र जल के विषैले होने की आशंका के बारे में भी स्वयं प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के लेख छप रहे थे। अतः कई प्रसिद्ध राजनीतिक नेता आपस में संगठित होकर अमेरिका के तत्कालीन प्रधान के पास एक प्रतिनिधि मण्डल (Deputation) ले जाते थे तो कई विश्व-धर्म सम्मेलन करके धार्मिक नेताओं से प्रार्थना करते थे कि वे अपने-अपने देश की सरकार पर नैतिक प्रभाव डालें कि आणविक शस्त्रास्रो को न बनायें। राजनीतिक नेता जहाँ-कहीं भाषण करते, इसी विषय में ही करते। यदि किसी को सम्मानित करना होता, तब भी वे कहते कि इस व्यक्ति ने विश्व में शान्ति स्थापित करने के लिए विशेष कार्य किया है। उसकी प्रशंसा करने की आतुरता में वे उसे 'विश्व-शान्ति का स्थापक' (World-Peace-Maker) इत्यादि जैसी उपाधियाँ भी देते थे।
इधर दूसरी ओर भारत में कहीं तो भाषा के आधार पर अलग- अलग प्रदेश (Linguistic States) बनाने के लिये भूख हड़ताल, आन्दोलन और तोड़-फोड़ के काम हो रहे थे और कहीं कांग्रेस के विरुद्ध नये-नये राजनीतिक दल बनाये जा रहे थे। लोग सरकार से रुष्ट थे। हर क्षेत्र में पर्मिट, लाइसैंस और भ्रष्टाचार को देखकर वे सरकार का विरोध कर रहे थे और कई तो यह भी कहने लगे थे कि इस राज्य की तुलना में तो अंग्रेज़ों के राज्य में अधिक सुख था।
ऐसी परिस्थिति में धार्मिक तथा राजनीतिक नेता इस चिन्ता और कोशिश में थे कि किसी तरह विश्व-युद्ध न हो। वे विश्व-युद्ध के न होने को ही विश्व-शान्ति का होना मानने लगे थे। भारत के नेता भारत में भ्रष्टाचार को हटाकर सुख-शान्ति सम्पन्न राज्य स्थापित करना चाहते थे।
विश्व शान्ति तथा राम राज्य का स्थापक कौन?
इन परिस्थितियों में बाबा ने यह निर्देश दिया कि राजनीतिक तथा धार्मिक नेताओं को जो पत्र भेजा जाय, उसमें उन्हें लिखा जाय कि "आप चिन्ता मत करो। विश्व में शान्ति तथा श्रेष्ठाचार तो स्थापन होना ही है परन्तु आप यह जो कोशिश कर रहे हैं कि ऐटम और हाइड्रोजिन बम न बनाये जायें अथवा विश्व-युद्ध हो ही न यह तो आप विश्व के आदि-मध्य-अन्त के ज्ञान को न जानने के कारण व्यर्थ ही नष्ट कर रहे हैं। विश्व में शान्ति के लिए आणविक अस्त्रों द्वारा विश्व-युद्ध का होना ज़रूरी है क्योंकि उस द्वारा ही भ्रष्टाचारी सम्प्रदाय, जिन्हें गीता में 'आसुरी सम्पदा वाले लोग' कहा गया है, का विनाश होगा और यह विनाश सतयुग अर्थात् सम्पूर्ण पवित्रता-सुख-शान्ति सम्पन्न रामराज्य की पुनः स्थापना के लिए ज़रूरी है। अतः ये तो गोया गुप्त रूप में वरदान है क्योंकि कल्पान्त में जो महाविनाश नामक ईश्वरीय कर्त्तव्य होता है, जिसके फलस्वरूप सभी आत्मायें इस देह और लोक से मुक्त होकर ब्रह्मलोक जाती हैं यह महाविनाश तो वही है। पवित्रता (धर्म) की स्थापना के लिए, उसके साथ-साथ अधर्म का महाविनाश भी ज़रूरी होता है; रामराज्य के पहले रावण राज्य आवश्यक होता है वरना तो सम्पूर्ण एवं, निरन्तर सुख-शान्ति की स्थापना, जो आप सभी का लक्ष्य है स्थापित हो ही नहीं सकता।"
दूसरे उस पत्र में बताया गया कि विश्व शान्ति का स्थापक तो विश्व का पिता, शान्ति का सागर एवं सर्वशक्तिवान एक परमात्मा ही है जिससे ही सभी लोग शान्ति की याचना करते हैं। मनुष्य तो स्वयं भी-किसी-न-किसी कारण से अशान्त रहते अथवा अशान्त हो जाते हैं; वे भला सारे विश्व में शान्ति कैसे स्थापित कर सकते हैं? अतः 'विश्व-शान्ति का स्थापक' यह जो उपाधि है, यह किसी मनुष्य को नहीं दी जा सकती है। उसमें यह भी लिखा गया कि शान्ति की जननी तो पवित्रता ही है। पवित्रता के बिना सच्चा सुख या सच्ची शान्ति असम्भव है।
बाबा के आदेशानुसार उसमें यह भी लिखा गया था कि रामराज्य की स्थापना भी परमपिता परमात्मा शिव, जो राम का भी ईश्वर (रामेश्वर) है, कर सकता है। उसी के लिये ही अब वह ईश्वरीय ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा दे रहा है। अब आप विश्व-शान्ति की चिन्ता छोड़ कर पहले स्वयं इस ईश्वरीय विद्या द्वारा पवित्र बनो और शान्ति प्राप्त करो; व्यक्तियों के शान्ति प्राप्त करने से ही विश्व में शान्ति होगी और विश्व शान्ति की स्थापना करना विश्व के मालिक परमात्मा का कार्य है, आप बच्चों का नहीं। आपका कर्तव्य तो स्वयं को पवित्र बनाना तथा अपने शान्ति रूप स्वधर्म में स्थित होना है।
आश्चर्यान्वित भी और खुश भी
इस प्रकार का पत्र छपवा कर जब राजनीतिक नेताओं तथा धर्माचार्यों को दिया गया तो वे आश्चर्यान्वित भी होते और खुश भी वे आश्चर्य तो इस बात पर प्रगट करते कि यह कौन है जो खुले रूप से कहता है कि महाविनाश अवश्यम्भावी है और इससे सतयुगी सुख- शान्तिमय सृष्टि के द्वार खुलेंगे और जो स्वयं को विश्व का परमपिता मानते हुए सभी को, चाहे उनका राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक पद कितना भी उच्च हो, तथा शारीरिक आयु कुछ भी हो, उन्हें "बच्चे-बच्चे" इस प्रकार के वात्सल्यपूर्ण शब्दों से सम्बोधित करता है तथा विश्व-शान्ति के कर्तव्य की, रामराज्य की पुनः स्थापना की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेता है; वह स्पष्ट रूप से कह रहा है कि बापू गाँधी जी रामराज्य चाहते थे, उसकी स्थापना में विश्व का बापू, भारत माताओं की ज्ञान-बल, योग-बल, अहिंसा-बल, पवित्रता-बल वाली सेना द्वारा स्थापित करा रहा हूँ; आप उसमें केवल यह सहयोग दो कि स्वयं पवित्र एवं योग-युक्त बनो।
उन्हें खुशी इस बात की होती थी कि माताएँ-बहनें भारत को श्रेष्ठाचारी बनाने का यह पुनीत कार्य कर रही हैं और वे वर्तमान राज्य को 'रावण' अथवा 'कौरव-राज्य' बताते हुए भविष्य घोषणा कर रही हैं कि अब शीघ्र ही इसका अन्त होने वाला है।
परन्तु देह-अभिमान के कारण, परमात्मा की पहचान न होने के कारण तथा संसार के धन्धों से अवकाश न होने के कारण वे समय निकाल कर इस बात को समझने की कोशिश ही न करते कि इतनी अधिकार-पूर्ण भाषा में यह कौन है जो सभी को 'बच्चे-बच्चे' कहता हुआ यह कार्य कर रहा है।
स्वतन्त्र पार्टी के कार्य-कर्ताओं तथा सदस्यों को पत्र
२२ अगस्त, १९५९ को स्वतन्त्र पार्टी के स्थापकों, मुख्य एवं सामान्य कार्यकर्त्ताओं तथा सदस्यों को भी एक पत्र छपवा कर भेजा गया। इस राजनीतिक दल के स्थापक मानते थे कि काँग्रेस सरकार जनता के जीवन में अधिकाधिक दखल दे रही है और व्यापार इत्यादि में भी हाथ डाल रही है तथा लाइसैंस, पर्मिट इत्यादि जारी करके देश में भ्रष्टाचारी तथा अनैतिकता को प्रोत्साहन दे रही है। वे ऐसा भी कहते थे कि देश राजनीतिक तौर से भले स्वतन्त्र हो गया है परन्तु आर्थिक तौर पर परतन्त्र है।
अतः इस दल के सदस्यों को लिखा गया कि वर्तमान समय का राज्य तो कौरव राज्य है; यह धर्म अर्थात् पवित्रता एवं दैवी मर्यादा पर आधारित नहीं है जैसे कि सतयुग में श्रीलक्ष्मी-श्रीनारायण का अथवा त्रेतायुग में भी श्रीसीता और श्रीराम का राज्य था। आज तो सभी मनुष्य काम, क्रोधादि विकारों के कारण परतंत्र हैं, सही अर्थ में स्वराज्य (आत्मा का इन्द्रियों पर शासन) तो है ही नहीं; अतः इस प्रकार के प्रजातंत्र (कर्मेन्द्रियों के मन पर शासन के प्रतीक राज्य) में सुख, शान्ति, अनुशासन तथा पवित्रता की आशा रखना तो गोया मृगतृष्णा (Mirage) से प्यास बुझाने की आशा करना है जो कि व्यर्थ ही है।इस प्रकार उन्हें बताया गया कि देश को सच्ची स्वतन्त्रता तो तभी मिलेगी, जब इस देश के वासी षट विकारों के पंजे से अथवा माया की गुलामी (परतन्त्रता) से छुटकारा पायेंगे और इस प्रकार की स्वतन्त्रता तो ज्ञान-बल एवं योग बल द्वारा ही हो सकती है।
यह पत्र जगदम्बा सरस्वती जी ने भेजा था और उस पत्र में यह स्पष्ट लिखा गया था कि यह पत्र निराकार परमपिता परमात्मा शिव (त्रिमूर्ति) की ओर से लिखा जा रहा है। उसमें सभी को यह निमन्त्रण दिया गया था कि वे कन्याओं-माताओं की अहिंसा बल वाली सेना में शामिल हो जायें और मनोविकारों के साथ युद्ध करके सच्ची स्वतन्त्रता प्राप्त करने के भागी बनें।
न्याय मूर्तियों तथा वकीलों को लिखा गया पत्र
उस वर्ष पटना में न्याय-मूर्तियों एवं वकीलों का एक सम्मेलन हुआ था। उस अवसर पर एक पत्र छपवा कर उन सभी को भी दिया गया था।
आजकल के न्याय के विषय में बाबा कहा करते कि नीचे की अदालत (Lower Court) यदि एक फैसला देती है तो, बहुत बार ऐसा भी होता है कि ऊपर की अदालत उसको पलट कर बिल्कुल ही विपरीत फैसला दे देती है और कई बार तो यह भी होता है कि सर्वोच्च न्यायालय उससे भी भिन्न फैसला देता है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई ग़रीब व्यक्ति नीचे की अदालत से मृत्यु-दण्ड की घोषणा होने पर ऊपर की अदालत में अपील (Appeal) न कर सके तब तो वह बेचारा मौत के घाट उतार दिया जायेगा जबकि दूसरा व्यक्ति सम्भवतः ऊपर की अदालत में उसके पक्ष में फैसला होने से मृत्यु दण्ड से छूट भी सकता है। इसका भाव यह हुआ कि कई बार न्याय की बजाय अन्याय भी हो सकता है। इस प्रकार बाबा न्याय व्यवस्था में और त्रुटियों की ओर भी इशारा किया करते।
अब इस कान्फ्रेन्स के अवसर पर शिव बाबा ने साकार प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा, अपने ही नाम से, जो पत्र भेजा, उसमें उन न्यायमूर्त्तियों को यह लिखा गया कि विधि ने आपके ऊपर आपके सामने बताये गये दूसरों के कर्मों के बारे में निर्णय करने का बहुत ही महत्त्वपूर्ण काम सौंपा है। परन्तु आप इस बात को मानेंगे कि यदि माप-तौल का पैमाना अथवा यन्त्र स्वयं भी ठीक न हो तो वह मापने का काम भी ठीक रीति से नहीं कर सकेगा। इसी प्रकार यह ज़रूरी है कि न्यायमूर्तियों का मन भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि विकारों से ऊपर उठा हो ताकि उन द्वारा किया गया निर्णय इनमें से किसी द्वारा प्रभावित न हो और वे इसके परिणामस्वरूप न्याय की बजाय अन्याय न कर बैठें।
इस प्रकार उन्हें बताया गया कि वे ध्यान दें कि अब जो समय चल रहा है, यह ऐसा समय है जबकि अनैतिकता और अनाचार फैल चुका है और सभी मनुष्यों का मन इन विकारों से कम या अधिक प्रभावित है और इनमें सम्भवतः वे स्वयं भी शामिल हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि विकारों के कारण मनुष्य समाज का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। अब वह समय है जिसे गीता में धर्म-ग्लानि का समय कहा गया है।
उस पत्र में उन्हें स्पष्ट रूप से बताया गया कि ५००० वर्ष पूर्व की तरह अब अधर्म के विनाश की तैयारियाँ हो रही हैं तथा दैवी सम्पदा वाले धर्म की पुनः स्थापना का ईश्वरीय कर्त्तव्य हो रहा है। उन्हें निमन्त्रण दिया गया कि वे भी अब परमपिता परमात्मा से १०० प्रतिशत पवित्रता-सुख-शान्ति का ईश्वरीय जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त करें।
बड़े आकार के रंगीन पोस्टर्स
इस प्रकार हर वर्ग के लोगों को स्पष्ट रूप से ईश्वरीय निमन्त्रण दिया गया। बड़े-बड़े पोस्टर भी छाप कर चिपकाये गये। वे रंगीन और बहुत ही आकर्षण होते थे। उनमें से एक पोस्टर पर बहुत ही मोटे अक्षरों में छापा था "सत्यता बाणों के समान है परन्तु सत्यता है कहाँ? क्या वर्तमान मत-भेद वाले अनेक धर्मों में या शास्त्रों में? नहीं, जैसे तीक्ष्ण बाण केवल तरकश से ही प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार सत्य ज्ञान भी अन्य कोई नहीं दे सकता सिवाय सत्य स्वरूप, ज्ञान सागर, सर्वशक्तिवान परमात्मा के।” उस पोस्टर में बहुत ही खुले शब्दों में परमात्मा और मनुष्यात्माओं के ज्ञान में अन्तर बतलाया गया था। इस तथा अन्यान्य कई प्रकार के फ़ोल्डर्स, पुस्तकों, पुस्तिकाओं इत्यादि के द्वारा कोटि-कोटि मनुष्यात्माओं को सन्देश दिया जाने लगा परन्तु जैसे कि गीता में कहा गया है इस ज्ञान को कोटि-कोटि मनुष्य आश्चर्य की न्यायीं सुनते, कई तो पढ़कर भड़क भी उठते और कोई विरला ही परमपिता का परिचय प्राप्त करके पूर्णतः पवित्र एवं योग-युक्त बनने के पुरुषार्थ में लग जाता।
अब एक ओर तो ब्रह्मा-वत्सों की संख्या बढ़ने लगी और उनमें पवित्रता शक्ति, ज्ञान शक्ति एवं योग शक्ति का विकास हुआ। दूसरी ओर अब हर वर्ग, हर पद (Status) और हर क्षेत्र के लोगों को ईश्वरीय सन्देश, आदेश, शिक्षा, सावधानी, मर्यादा इत्यादि का परिचय कराया जाने लगा। धार्मिक क्षेत्र में मची धांधली, अन्ध-श्रद्धा, कुरीतियों और मिथ्या अभिमान को ठीक करने की ओर मज़बूती से कदम बढ़ाये गये। अब इस विषय में कुछेक वार्ताओं का परिचय दिया जायेगा।
जगद्गुरुओं और महामण्डलेश्वरों के नाम भेजा गया अनोखा प्रपत्र
बाबा बहुत बार यह कहा करते कि भारत में 'श्री', 'गुरु' और 'मण्डलेश्वर' इन शब्दों के अर्थ का अनर्थ हो रहा है और इनका ऐसा ग़लत प्रयोग किया जा रहा है कि जिससे देश को अवर्णनीय हानि हो रही है। अतः बाबा ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम के साथ 'श्री श्री १०८ जगद्-गुरु' की उपाधि का प्रयोग होता है, विशेष तौर पर उन्हें 'कारण बताओ' (Show Cause) नोटिस (Notice) दिया जाय जिससे उन्हें बताया जाये कि वास्तव में तो यह उपाधि परमात्मा ही की है और इसलिए उनका यह कर्म जनता को धोखा देने और झूठी नकल उतारने के तुल्य है जोकि एक पाप है।
'श्री' शब्द किसी मनुष्य के नाम के पूर्व नहीं प्रयोग हो सकता
बाबा समझाया करते कि 'श्री' शब्द तो केवल देवियों और देवताओं ही के लिए प्रयोग हो सकता है जिनका भारत में गायन और पूजन है। देवी-देवता पूर्णतः पवित्र थे इसलिए ही उनके हरेक अंग के साथ 'कमल' शब्द का प्रयोग होता है। कमल नेत्र, कमल मुख, कमलहस्त इस प्रकार के शब्दों द्वारा हम उनके जीवन को निर्विकार होने के तथ्य की अभिव्यक्ति करते हैं। 'श्री' शब्द ऐसे ही पवित्र, देवी-देवताओं की उपाधि है। फिर, श्री-श्री इस प्रकार युगल रूप में जो यह शब्द हैं यह तो देवों के भी देव, एक परमपिता परमात्मा ही के लिये प्रयोग किया जा सकता है। परन्तु आज देवताओं और परमात्मा के नामोंके साथ प्रयुक्त की जाने वाली इस उपाधि को मनुष्यों के नाम के साथ प्रयोग किया जाने लगा है यद्यपि देवताओं के साथ इन मनुष्यों की कोई तुलना नहीं हो सकती क्योंकि न तो इनके शरीर ही देवताओं की तरह से योग-बल से उत्पन्न हुए-हुए हैं और न ही इनका जीवन सभी विकारों से पूर्णतः मुक्त है, न इनकी काया सदा निरोग और कंचन सम है और न ही ये देवताओं के समान अमर अर्थात् काल के पंजे से मुक्त हैं।
जगद्गुरु एक परमात्मा ही हैं
बाबा यह भी समझाया करते कि पिछले दो युगों से 'गुरु' शब्द का भी इसी प्रकार ही दुरुपयोग हुआ है। वास्तव में तो सभी का सद्गुरु एक ज्योतिस्वरूप परमात्मा शिव ही है क्योंकि गुरु का अर्थ ‘मुक्त करने वाला' अथवा ज्ञान देकर कल्याण करने वाला है और ऐसा कल्याण करने वाला, स्वयं सदा-मुक्त, सत्य-स्वरूप और ज्ञानका सागर तथा कल्याणकारी तो एक परमात्मा ही है जिसका नाम भी 'शिव' है। परन्तु, जैसे कि हम देख रहे हैं; यह उपाधि भी मनुष्यों के नाम के साथ प्रयुक्त हो रही है। आज बहुत-से पुराने पंथी तो यह कहते हैं कि शास्त्रों के मतानुसार 'पति ही पत्नी का गुरु है।' परन्तु पति तो स्वयं भी 'काम' भोग के द्वारा पतित होते हैं और उनमें शराब,सिगरेट, भ्रष्टाचार, क्रोध इत्यादि कितने ही ऐसे संस्कार हैं जिससे वे स्वयं भी बंधे हुए हैं तब वे दूसरों को क्या मुक्त कर सकेंगे? फिर,यदि ऐसा मान भी लिया जाये कि 'पति ही पत्नी का गुरु है' तब गोया हर घर में एक गुरु तो है ही। परन्तु इतने गुरु होने पर भी देखो तो आज हर घर का हाल क्या है? क्या घर-घर स्वर्ग-समान बन गया है; सभी की मुक्ति हो गयी है? आज तो पत्नी की एक मत है, पति का दूसरा, बच्चे का तीसरा, बच्ची का चौथा, सास का पाँचवाँ और ससुर का छठा। कमाल ही तो है!! घर में कोई किसी के कहने पर ही नहीं चल रहा और फिर भी कहा जा रहा है कि पति-पत्नी का गुरु है। यहाँतक कि शिष्य भगवे कपड़े पहनने वाले गुरु के मत पर भी नहीं चल रहे।
कहावत है कि 'गुरु के बिना गति (मुक्ति) नहीं।' भारत में तो 'गुरु' कहलाने वालों की संख्या तो लाखों में होगी लेकिन आज तो यह देश सद्गति की बजाय दुर्गति अर्थात् भ्रष्टाचार और पापाचार ही के रास्ते पर चल रहा है। स्पष्ट है कि सद्गति तो हो ही नहीं रही। जन-गणना बढ़ती ही जा रही है जिससे स्पष्ट है कि अधिकाधिक मनुष्यात्माएँ मुक्तिधाम से इस लोक में ही आ रही है, वे यहाँ से मुक्त होकर वापस नहीं जा रहीं। गोया उनकी गति या सद्गति तो हो ही नहीं रही।
इस पर भी यदि कोई मनुष्य अपने नाम के साथ 'जगद्गुरु' की उपाधि धारण करता है या अपने शिष्यगण को इस बात के लिये स्वीकृति देता है कि वे उनके नाम के साथ इस उपाधि का प्रयोग करें तब वह तो घोर अनर्थ करता है क्योंकि जगत का गुरु तो कोई भी मनुष्य नहीं हो सकता। आज तक इतिहास में न कोई ऐसा मनुष्य हुआ है न होगा जो सारे जगत का गुरु हो; तब भला कोई मनुष्य ऐसी उपाधि का प्रयोग करने का अधिकारी कैसे हो सकता है? कर्म-संन्यासी लोग जो 'जगद्-गुरु' कहला रहे हैं, वे तो अपनी पत्नी एवं पुत्रों को भी छोड़ आते हैं, कुटुम्ब के अन्य सदस्यों से भी मुख मोड़ आते हैं तो जबकि ये उनका भी उद्धार नहीं कर सके तब 'जगत के गुरु' किस अर्थ में हुए? फिर, ये लोग तो जगत को मिथ्या अथवा स्वप्न मात्र मानते हैं; तब भला ये गुरु किसके हुए?
इस प्रकार बाबा द्वारा समझाये ज्ञान-बिन्दुओं एवं विवेक सम्मत तथ्यों को लेकर एक परिपत्र २९ फरवरी, १९६० को जगदम्बा मातेश्वरी सरस्वती की ओर से सभी 'जगद्गुरु' अथवा 'मण्डलेश्वर' कहलाने वाले लोगों को भेजा गया। पत्र में उपरोक्त युक्तियों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से तर्क सम्मत वाक्य थे। इस परिपत्र का विषय लाल अक्षरों में इन शब्दों में था "बताएँ कि आपको 'श्री श्री १०८ जगद्गुरु अथवा मण्डलेश्वर' की उपाधि धारण करने का क्या अधिकार है? इसी पत्र में उन्हें यह समझाया गया था कि १०८ की संख्या का प्रयोग भी केवल परमात्मा शिव ही की उपाधि में प्रयुक्त हो सकता है क्योंकि वह ही १०८ नर-नारियों को पूर्णत मायाजीत (निर्विकार बनाता है जिसके स्मरण-चिह्न के तौर पर ही १०८ मणकों की माला का नाम 'वैजयन्ती माला' तथा 'रुद्राक्ष माला' है।
पत्र में यह भी बताया गया कि सारे जगत का गुरु तो वह कहला सकता है जो 'अदीक्षित हो अर्थात् जिसका अपना कोई गुरु न हो परन्तु मनुष्य- परम्परा में तो ऐसा कोई ही नहीं। ऐसा गुरु तो एक परमात्मा ही है जो तीनों देवों का रचयिता होते हुए उनके परिचय को जानता है, त्रिलोकी नाथ एवं अजन्मा होते हुए तीनों लोकों तथा तीनों कालों को जानता है। मनुष्य तो जगत-भर के मनुष्यों की मानसिक अवस्था को जान ही नहीं सकता, उसे कर्मों की गुह्य गति का भी पूर्ण ज्ञान नहीं है (तभी तो वह स्वयं भी कर्मों के बन्धन में है), वह स्वयं भी अजन्मा नहीं है (तब वह सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान कैसे दे सकेगा?) और स्वयं भी मायाजीत नहीं है। इसी प्रकार, वह तो इस जगत अथवा मण्डल में का ही एक प्राणी है जो ज़रा, व्याधि, काल, रोग इत्यादि के अधीन है; वह भला मण्डलेश्वर या महामण्डलेश्वर कैसे कहला सकता? जगत में अथवा इस भूमण्डल पर बौद्ध, जैन, ईसाई, मुसलमान इत्यादि अनेकानेक धर्मों के अनुयायी हैं और एक धर्म में भी कई आचार्य हैं, सभी तो किसी एक मनुष्य को अपना गुरु मानते भी नहीं हैं, तब कोई मनुष्य स्वयं को सारे जगत का गुरु कैसे मान सकता है।
यह उपाधि धारण करना गोया सद्गुरु परमात्मा से
परांगमुख करना है
इस प्रकार उन्हें बताया गया कि वे यह उपाधि धारण करके अथवा अपने नाम के प्रयोग किये जाने की अनुमति या स्वीकृति देकर जनता को एक सद्गुरु परमात्मा से विमुख करने के कारण घोर पाप कर रहे हैं। इस पर भी वे यह जो कहते हैं कि गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही साक्षात् महेश्वर अथवा पर-ब्रह्म है-ये तो अक्षम्य पाप है क्योंकि किसी भी मनुष्य की ब्रह्मा, विष्णु या महेश से तुलना करना अथवा उसे शिव या परमात्मा मानना तो गोया मनुष्य-मात्र को इन तीनों देवताओं तथा उनके रचयिता ज्योति-स्वरूप परमात्मा 'शिव' से परांगमुख करके उन्हें अपने-अपने जाल में फँसाना है! यह कैसा जघन्य पाप है कि भारत में तथा-कथित गुरु भोले-भाले जिज्ञासुओं को कहते है कि गुरु तो परमात्मा से भी बड़ा है क्योंकि परमात्मा तो मनुष्य को इस संसार रूप मायाजाल या दल-दल में धकेलता है और गुरु उससे निकालने का कर्त्तव्य करता है! क्या इस प्रकार के कथनोपकथन परमात्मा की घोर निन्दा करके लोगों को नास्तिक बनाने के तुल्य नहीं और क्या यह अमृत नहीं, क्योंकि वास्तव में तो एक परमात्मा ही पतित-पावन, दुःख हर्त्ता-सुख कर्त्ता, दयालु और कृपालु माना गया है; वही ही सतयुगी पावन सृष्टि का रचता है, वही मुक्ति तथा जीवनमुक्ति का दाता है। परन्तु क्या किया जाय, आज इस अभागे देश में इनको कोई निर्भय होकर कहता ही नहीं!
मातेश्वरी जी द्वारा भेजे गये परिपत्र में उपरोक्त सभी बातें स्पष्ट रूप से लिखी गयी थीं और सभी को यह सम्मति दी गयी थी कि वे इस उपाधि को छोड़ दें और उसकी हमें सूचना दे दें और कि यदि वे इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं तो कृपया हमें बतायें कि उन्हें यह उपाधि धारण करने का अधिकार किस प्रकार है?
इस पत्र का उत्तर किसी ने नहीं दिया
देखिये तो कैसी बात है कि किसी ने भी इस पत्र का उत्तर नहीं दिया। इससे स्पष्ट है कि उन्हें इस उपाधि से इतना मोह हो चुका है कि अब वे इसे छोड़ भी नहीं सकते। इस मिथ्या उपाधि को धारण करने में ही तो वे अपनी शान समझते हैं; इसे भला वे कैसे छोड़ सकते हैं? पुनश्च, उनके पास ऐसी भी कोई युक्ति नहीं जिसे पेश करके वह कह सकें कि इन-इन कारणों से उन्हें यह उपाधि धारण करने का अधिकार है।
इस परिपत्र अथवा सम्मति-पत्र के बाद जब कभी किसी मण्डलेश्वर इत्यादि से मिलने का अवसर हुआ भी तो उन्होंने इस बात पर अपना रोष प्रगट किया कि उन्हें ऐसा पत्र लिखा गया। किसी ने भी इस कटु सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं किया बल्कि मिथ्या अभिमान को छोड़ने से इन्कार ही किया।
बाबा ने तो पहले ही बता दिया था कि इनमें से कोई भी इस नकली उपाधि को छोड़ेगा नहीं। बाबा ने तो बहुत ही शिष्टट एवं मधुर भाषा में सभी को सत्यता का बोध कराने के लिये ही यह कर्त्तव्य कराया था परन्तु जिन्हें अपनी पण्डिताई का गर्व है, वे भला मिथ्या शान को छोड़ने की हिम्मत कहाँ रखते हैं?
अब एक ओर तो जन-जन को ईश्वरीय सन्देश दिया जा रहा था, दूसरी ओर ब्रह्मा-वत्सों को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त के इतिहास का तथा उसकी पुनरावृत्ति का, रचयिता एवं रचना का, दर्शन (Philosophy) एवं नीति (Ethics) का सच्चा ज्ञान दिया जा रहा था। बाबा कहते कि अन्य विश्व विद्यालयों में जो शिक्षा लेते अथवा 'डाक्टर ऑफ फिलोसोफी' (Ph.D.) की उपाधि लेते हैं, उनकी अपनी रूहानी बीमारी तो जाती ही नहीं, विश्व में शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक रोग तो बढ़ते ही जाते है। परन्तु इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की शिक्षा से जन्म-जन्मान्तर के लिए रोग-शोक मिट जाते हैं और सदा स्वास्थ्य, सदा सुख तथा सदा शान्ति की दुनिया में २१ जन्मों के लिये राज्य भाग्य प्राप्त होता है जो अन्य किसी से नहीं होता। अब आगे क्या हुआ, वह पढ़िये
-सम्पादक
यह सही अर्थ में यूनिवर्सिटी है
यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग को पत्र
भारत के संसद ने एक कानून पास किया जिसके अनुसार सरकार द्वारा कायम किये गये विश्व विद्यालयों के सिवाय अन्य कोई भी विश्व विद्यालय अपने नाम में 'यूनिवर्सिटी' (University) शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता था। ये कानून पास होने पर बाबा ने कहा कि 'यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग' (University Grants Commission) को एक पत्र लिखा जाये कि ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय तो सही अर्थ में एक यूनिवर्सिटी ही है। अतः इस विश्व विद्यालय को इस बारे में इस एक्ट का एक अपवाद (Exception) माना जाये। बाबा ने कहा कि उन्हें ये लिखा जाये कि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में तो यूनिवर्स (Universe; विश्व) के पिता, शिक्षक और सद्गुरु परमात्मा शिव स्वयं ही शिक्षा देते हैं। इस शिक्षा में वे यूनिवर्स के आदि, मध्य और अन्त का ज्ञान भी देते हैं तथा इस ज्ञान के फलस्वरूप जो पद प्राप्त होता है, वह भी विश्व-महाराजन श्रीनारायण और विश्व-महारानी श्रीलक्ष्मी के समान विश्व का अटल, अखण्ड एवं निर्विघ्न स्वराज्य पद प्राप्त होता है और इसके परिणामस्वरूप यूनिवर्स की सब समस्याओं का समाधान एक साथ हो जाता तथा इस यूनिवर्स में सतयुग आ जाता है।
बाबा के निर्देशानुसार इस आयोग के अध्यक्ष (Chairman) को ऐसा एक पत्र लिखा गया और इस पत्र की प्रतिलिपि देहली तथा अन्य शहरों के मुख्य व्यक्तियों (V.I.P.s) को भेजी गई। यह पत्र-व्यवहार काफ़ी दिन तक चलता रहा और आखिर आयोग से एक पत्र प्राप्त हुआ। उसमें ये कहा गया था कि संस्था 'विश्व विद्यालय' शब्द का प्रयोग करे तो उस पर कोई रोक नहीं होगी परन्तु ये 'यूनिवर्सिटी' शब्द का प्रयोग नहीं कर सकती। तब हमने उन्हें यह भी लिखा था कि जब हिन्दी में हम 'विश्व विद्यालय' शब्द का प्रयोग कर सकते हैं तो अंग्रेज़ी भाषा में उसका अनुवाद तो 'यूनिवर्सिटी' शब्द हो सकता है। अतः उसके प्रयोग में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। हमने उन्हें यह लिखा था कि ये ईश्वरीय विश्व विद्यालय तो विश्व भर के लोगों के लिए है और हमारा लक्ष्य भी यह ईश्वरीय ज्ञान-विज्ञान समस्त विश्व के लोगों तक पहुँचाना है। तब यदि विदेशों में भेजे हुए साहित्य में अथवा परिचय-पत्रों में 'यूनिवर्सिटी' शब्द का प्रयोग न होकर 'विश्व विद्यालय' शब्द का प्रयोग होगा तो उन देशों के लोग इस शब्द का अर्थ भला कैसे जानेंगे? फिर ऐसा भी सम्भव नहीं मालूम होता कि हम 'विश्व विद्यालय' और 'यूनिवर्सिटी' इन दोनों शब्दों को छोड़कर किसी और शब्द का प्रयोग करें क्योंकि यही शब्द यहाँ दी जाने वाली शिक्षा, इसके उद्देश्य इत्यादि को ध्यान में रखते हुए अति उपयुक्त मालूम होता है। फिर हम तो यूनिवर्सिटी शब्द से पहले 'गाडली' (Godly) शब्द का भी प्रयोग करते हैं जिसमें ये स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ किन्हीं लौकिक विषयों की शिक्षा नहीं दी जाती बल्कि ईश्वरीय अथवा आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही शिक्षा दी जाती है। इससे किसी प्रकार की भ्रांति की सम्भावना भी नहीं रहती। इस प्रकार के और भी बहुत-से तथ्य आयोग के ध्यान में लाये गये थे। अन्त में आयोग से यही उत्तर आया था कि यदि संसद इस विषय सम्बन्धी कानून में कुछ परिवर्तन करे तभी इसकी स्वीकृति दी जा सकती है।
जब कभी इस प्रकार के वृतान्त घटित होते थे, बाबा सदा यही समझाया करते थे कि इस विषय में सम्बन्धित अधिकारियों को मिलते रहना चाहिये। लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत पुरुषार्थ करते ही रहना चाहिये। क्योंकि एक व्यक्ति के स्थान पर जो दूसरा व्यक्ति आता है,सम्भव है कि वह आपकी बात के महत्त्व को मान ले और वांच्छित कार्यवाही करे। बाबा यह भी कहा करते कि प्रायः ऐसा तो होगा ही कि ये सरकार आपकी बातों को नहीं सुनेगी क्योंकि इन्हें धर्म का ज्ञान है ही नहीं और प्रजातन्त्र होने के कारण किसी एक व्यक्ति को भी सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है। परन्तु फिर भी आप वत्सों को चाहिए कि आप ऐसे-ऐसे मामलों में सरकारी अधिकारियों से मिलते रहें तथा उनसे लिखा-पढ़ी करते रहें और उन्हें ईश्वरीय विश्व विद्यालय का साहित्य तथा परिचय भी देते रहा करें क्योंकि इससे कम-से-कम उन-उन अधिकारियोंको तथा अन्य सरकारी कर्मचारियों को ईश्वरीय सन्देश तथा ईश्वरीय परिचय तो मिलेगा ही। ये मामले कई बार इन सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों तक ईश्वरीय सन्देश पहुँचाने के निमित्त बन जाते हैं।इनका बाह्य रूप तो साँसारिक मामले जैसा होता है परन्तु इनके अन्तर्गत कई आत्माओं का कल्याण समाया होता है। 'शिव बाबा के अवतरण' का तथा 'पवित्र भव और योगी भव' का सन्देश देने का जो कार्य है, उसमें ये बातें यदि किसी दृष्टिकोण से बाधक मालूम होती हैं जो दूसरे दृष्टिकोण से सहायक भी होती हैं क्योंकि अगर ऐसी-ऐसी बातें सामने न आयें तो शायद आप उन व्यक्तियों तक ईश्वरीय निमन्त्रण भी नहीं पहुँचा सकेंगे। और अपने-अपने धन्धों में व्यस्त वे व्यक्ति शायद आपके सम्पर्क में नहीं आ पायेंगे और इस प्रकार यदि आप उन तक ईश्वरीय सन्देश पहुँचानेमें चूक जायेंगे तो आने वाले अन्तकाल में वे आपको उलाहना देंगे।
अतः बाबा कहते कि चूंकि इस संसार के लोग शिव बाबा और उसके कार्य को नहीं पहचानते इसलिए बहुत बार आपको सहयोग नहीं मिलेगा और उनमें से अनेक लोग आपके काम में रुकावटें पैदा करने की भी कोशिश करेंगे। आपको चाहिए कि 'इसे ड्रामा की नूँध' (विश्व-नाटक की नियति) मानकर सफ़लता असफ़लता का ख्याल न करते हुए कार्य करते चलें। यह शिव बाबा का कार्य तो होकर ही रहना है और इसमें निमित्त बननेके कारण आपको खुशी और इसके फलस्वरूप सौभाग्य प्राप्त होगाही और एक समय ऐसा भी आयेगा कि आपकी ये सभी बातें अधिकाधिक लोगोंकी समझ में आने लगेंगी और वे इन ईश्वरीय कार्यों में सहयोग देने में अपना परम सौभाग्य मानेंगे।
इस संस्था के इतिहास में जब ऐसे-ऐसे किस्से होते थे, तब उन-उन विषयों को लेकर ईश्वरीय ज्ञान और भी अधिक स्पष्ट हो जाता था और बाबा से बहुत-से अनमोल ज्ञान-रत्न मिल जाते थे। गोया इन मामलों के सामने आने से ज्ञान का एक नया अध्याय शुरू हो जाता था और ईश्वरीय ज्ञान के अध्ययन में सदा उत्सुकता और दिलचस्पी बनी रहती थी। आज जब हम इनका सिंहावलोकन करते हैं तो ऐसा मालूम होता है कि ईश्वरीय ज्ञान के विधि-विधान में सैंकड़ों मुआमलों का भी विशेष स्थान रहा है और इनमें इस ईश्वरीय विश्व विद्यालयके स्वरूप में और निखार आता गया है तथा ज्ञान की रूप रेखा यहाँके विद्यार्थियों को भी खूब स्पष्ट होती गई। यदि हम इस 'यूनिवर्सिटी' शब्द के प्रयोग के उपरोक्त मामले को भी ले लें तो यह कहा जा सकता है कि इस बातको लेकर ये और भी अधिक स्पष्ट हो गया कि यहाँ के पाठ्य विषय (Subjects) क्या हैं?उनका पाठ्य-क्रम (Syllabus) क्या है, इससे प्राप्ति क्या होती है अर्थात् इसका लक्ष्य (Aim and Object ) क्या है, इत्यादि। फिर संयोगवश इसके नामके लिए जो 'ईश्वरीय विश्व विद्यालय' नाम से निश्चित हो गया, ये भी तो मधुर है और यद्यपि नाम में यूनिवर्सिटी शब्द प्रयोग करना निशिद्ध है तथापि उसकी व्याख्या करते हुए अथवा इसका अनुवाद करते हुए तो 'यूनिवर्सिटी' शब्द 'यूनिवर्सिटी' शब्द के प्रयोग पर भी किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। पुनश्च, इस निमित्त कारण के अनेकानेक लोगों को जो ईश्वरीय संदेश दिया गया वो भी तो इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सुनिश्चित कार्यों में सम्मिलित हैं। अतः वो भला कार्य तो हुआ ही।
हापुड़ में हंगामा
अब एक ओर तो ईश्वरीय सेवा का कार्य तेज़ी से बढ़ रहा था, जन-जन को शीघ्र ही प्रभु संदेश मिल रहा था और दूसरी ओर रूढ़िवादी लोग, जो पोथियों की काली पंक्तियों में अड़े हुए थे, विरोध करने लगे थे। विरोधियों में बहुत-से ऐसे गृहस्थी लोग भी सम्मिलित थे जो ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन नहीं करना चाहते थे और इस व्रत के लिये कृत-संकल्प अपनी-अपनी पत्नी पर दुर्वचनों, कठोर हाथों, डंडों अथवा लोहे की सीखों और खुरपी इत्यादि से भी प्रहार करते थे और जब शोर मचने पर पड़ोस के लोग इकट्ठे होते अथवा जब कभी कहीं इस संस्था के बारे में चर्चा होती तो वे अपनी वासना पर नियन्त्रण न पा सकने रूप कायरता का परिचय देने की बजाय इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की निन्दा करते थे। कोई कहता, "इस संस्था में तो जादू है, जो वहाँ जाता है, वो वहीं का हो जाता है। इसलिए अपने घर के किसी भी सदस्य को वहाँ जाने नहीं देना चाहिये।" अन्य कोई कहता, "अरे भाई, इनसे बचकर रहना। ये ब्रह्माकुमारियाँ तो पति- पत्नी को भाई-बहन बनकर रहने की शिक्षा देती है।" कुछ तो दोषारोपण करते हुए यहाँ तक भी कह देते "अजी, ये तो पथ-भ्रष्ट लोग है और यों बाहर से ही दिखावे के तौर पर लोगों को ब्रह्मचर्य- पालन के लिये कहते हैं।" कुछ ऐसे भी लोग होते जो कहते, "न जाने ये किस धर्म के लोग हैं, या ये किसी भी धर्म के नहीं हैं; ये तो अमेरिका की सरकार के एजेन्ट मालूम होते हैं। धर्म की आड़ लेकर ये उन्हीं के लिये मुखबिर का कार्य करते हैं। इन्हें खर्च के लिये पैसे तो अमेरिका ही से आते हैं।" इतना ही नहीं, कुछ लोग तो कड़ी धमकियाँ भी देते। वे कहते "हम आपके सेवाकेन्द्र को आग लगा देंगे और इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय को जड़ से उखेड़ देंगे।" जिन लोगों ने धर्म को अपना पेशा बना रखा था, वे ऐसे लोगों को खूब भड़काते।
अत्याचार और पाबंदी
लोगों की इस प्रकार की बातें सुनकर कितने ही लोग इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सम्पर्क में आने में संकोच करते और अन्य कई पुरुष-जन तो अपने परिवार की महिलाओं पर सेवाकेन्द्रों पर आने के बारे में कड़ी रोक लगा देते। और, यदि कोई ज्ञानामृत की पिपासा के वश उनकी स्वीकृति के बिना चली आती तो वे उस पर इतना अत्याचार करते कि जो इतना तो मालिक को अपने ढोर पर भी करने की कानूनी पाबन्दी है।
अफ़वाहें सुनने और सुनाने वाले इतना भी विचार नहीं करते थे कि एक ओर तो इन पर ये आरोप लगाया जा रहा है कि ये पति और पत्नी को भी भाई-बहन बनाते हैं और दूसरी ओर इनके चरित्र पर लाँछन भी लगाया जा रहा है इन दोनों बातों में तो परस्पर विरोध है। एक ओर तो यह कहा जाता है कि इन्हें अमेरिका की सरकार से पैसा मिलता है और दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि ये पैसा लेने के बारे में इतनी कड़ी हैं कि ये किसी से चन्दा या दान नहीं माँगती; तब पता नहीं कि इनके पास पैसा आता कहाँ से है-इन दोनों बातों में तो परस्पर मेल ही नहीं है क्योंकि जो अमेरिका से पैसा ले सकता है अर्थात् जो येन-केन-प्रकारेण पैसा ही ऐंठना चाहता है, तब वो स्थानीय लोगों से भेंट किये गये पैसे को अस्वीकार करने को आत्म नियंत्रण कैसे कर सकता है?
'धार्मिक संस्थाओं' द्वारा भ्रांतियों का प्रचार
कुछेक स्वार्थी संस्थायें तो पुस्तिकाओं या पेम्प्लेट्स के रूप में ये निराधार बातें भी प्रकाशित करा के जगह-जगह हज़ारों की संख्या में बाँटते थीं कि ‘दादा लेखराज पहले एक साईकिल मरम्मत की दुकान किया करते थे। वह मेरठ में माया देवी नाम की एक स्त्री को लेकर भाग गए ताकि पुलिस उन्हें पकड़ न ले। बाद में उन्होंने कलकत्ता में जाकर जादू सीख लिया और तत्पश्चात् उन्होंने कितनी ही भोली माताओं को गुमराह करना शुरू कर दिया।’ उन पुस्तिकाओं में यह झूठी बात भी लिखी होती कि दादा लेखराज को सिन्ध में जेल मिली थी।
हाय हाय! देखो तो आज का इन्सान किस प्रकार अन्ध-विश्वास और मिथ्या-मान्यताओं की दलदल में फंसा है और किस प्रकार वह दूसरों को भी झूठे प्रचार का शिकार बनाता है। वो संस्थाएं और उनके सम्पर्क में आने वाले लोग कभी इस बात की पड़ताल करने का सद्प्रयत्न ही न करते थे कि आखिर सत्यता क्या है? यदि वे चाहते तो दादा लेखराज के परिवार के जीवित लोगों से भी मालूम कर सकते थे कि दादा लेखराज का सही परिचय क्या है। यदि उन पर उन्हें विश्वास न होता तो वे उनके कुछ जीवित विरोधी लोगों से भी इस बात का पता लगा सकते थे कि दादा लेखराज एक प्रतिष्ठित जौहरी थे या साईकिलों की दुकान करते थे; क्या उन्हें जेल मिली थी या उनके विरोधियों को गिरफ्तार किया गया था परन्तु उन स्वार्थी लोगों का तो लक्ष्य ही जनता को भड़काना था। इसलिए उन्होंने इस सहज सुलभ साधन को भी नहीं अपनाया।
वातावरण में भ्रांतियाँ और उत्तेजना
इस सबका परिणाम यह हुआ कि लोगों में भ्रांतियाँ बढ़ती गई। पण्डितों, पुजारियों, कट्टरपंथियों तथा अवसरवादियों ने इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की घोर निन्दा करनी शुरू की। यद्यपि उन्हें सोचना तो ये चाहिए था कि ये ईश्वरीय संस्था देश की माताओं, बहनों व कन्याओं में एक नयी जाग्रति, एक नयी चेतना लाकर फिर से भारत के भाल को उज्वल बनाने का महान कार्य कर रही हैं और कि ये ब्रह्मचर्य की पालना, आहार-विहार की शुद्धि तथा संयम-नियम और साधना एवं सदाचार और सात्विकता की प्रबल प्रेरणा देकर, ग्राम-ग्राम में शंख-ध्वनि करके ये भारत में एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण कर रही है। परन्तु वे उसे अपने लिये एक ईर्ष्या का विषय बना रहे थे और शताब्दियों से नारी का तिरस्कार सुनने-सुनाने की लत पड़ जाने के कारण वे पुराने पोथों से व्यामोह छोड़ना असम्भव मान बैठे थे और इसलिए वे खंडन-मंडन तथा जनता को भड़काने के धन्धे में लग गये। इसके परिणाम-स्वरूप नगरों में भड़काए और उकसाए हुए लोगों ने सेवाकेन्द्रों पर उत्पात मचाया, डराया और धमकाया भी।
ये तो संसार की रीति चली आई है कि जब कोई सत्यान्वेषी या सुधारक किसी कुरीति, कुप्रथा या मिथ्यावाद के विरुद्ध आवाज़ उठाता है तो लोग उसका डटकर विरोध करते हैं; उसकी खूब निन्दा करते हैं; और उस पर अत्याचार करने से भी नहीं हिचकिचाते। इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रायः हरेक धर्म-स्थापक के साथ उस जमाने के लोगों ने ऐसा ही व्यवहार किया। स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत के अध्ययन से भी ये स्पष्ट है कि ५००० वर्ष पूर्व जब भगवान का अपना अवतरण हुआ था, तब भी लोग उन्हें नहीं पहचान सके थे और तब कई ऋषिगण अपनी पत्नियों को अथवा कई गोपजन अपनी गोपिकाओं को प्रभु की ज्ञान मुरली सुनने से रोकने का अकृत्य करते रहे। भगवान तो आये ही है सर्वोच्च धर्म की स्थापना के लिये थे परन्तु उस समय के विपरीत बुद्धि लोग अपने कुसंस्कारों के वश उन्हें दुष्नाम भी देते रहे। उसी वृतान्त की पुनरावृत्ति ही तो अब हो रही थी।
हापुड़ में सेवा-केन्द्र के विरुद्ध आन्दोलन
इन्हीं वृत्तान्तों में से एक का उल्लेख यहाँ करना अस्थानीय नहीं होगा। ये किस्सा सन् १९६१ का है। घटना का मुख्य स्थल हापुड़ था। हापुड़ में इसी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का एक सेवा-केन्द्र था। अन्य- केन्द्रों की तरह वह भी स्थानीय लोगों के निमन्त्रण पर खुला था। निमन्त्रण देने वाले लोग स्वयं ही केन्द्र की आर्थिक ज़िम्मेदारी को स्वेच्छा से निभाते थे। केन्द्र पर आने वाले सभी लोग, चाहे वो बालक थे या प्रौढ़ अवस्था के थे, स्वयं को ईश्वरीय विद्या का विद्यार्थी और योगाभ्यासी मानते थे, अपने जीवन को पवित्र बनाने के लिए और योग की उच्च स्थिति का आनन्द रस लेने के लिए, वे स्वेच्छा से ब्रह्मचर्य- व्रत का तथा अन्य नियमों का भी पालन करते थे। फ़ैशन और दिखावे से दूर रहते थे। बाज़ार में बिकने वाले मिष्ठान अथवा विकारी लोगों द्वारा तमोगुणी स्थिति में बनाये गये भोजन का परहेज़ करते थे और षट् विकारों को अपने साधना पथ के शत्रु मानकर उन पर विजय पाने के श्रेष्ठ पुरुषार्थ में लगे हुए थे।
उन लोगों में कुछ कुछ ऐसे व्यक्ति थे जो अपनी पत्नी व अपने बच्चों सहित केन्द्र पर आते थे। और कुछ ऐसी महिलायें भी थीं जिनके पति अथवा कुटुम्ब के अन्य सदस्य या तो इस कारण नहीं आते थे कि वे अधिक व्यस्त थे और या इसलिए नहीं आते थे कि उन्हें इसमें रुचि न थी अथवा वे ब्रह्मचर्य के पालन को अपने लिए बहुत ही कठिन समझकर इस पथ पर चलने में स्वयं को असमर्थ मानते थे। आने वाली महिलाओं में ऐसी भी महिलायें थीं जिन्होंने किसी स्कूल या कालेज में कोई उच्च शिक्षा नहीं ली थी परन्तु निस्सन्देह उनमें व्यावहारिक बुद्धि तो थी ही और विशेष बात यह कि वर्षों तक अन्य स्थानों पर वे प्रवचन सुनती रही थीं और अन्य संस्थाओं तथा पूजा-स्थानों पर बताई गई साधना भी, जहाँ तक उनसे हो सकी, वे करती रही थीं यद्यपि इससे उनके जीवन में कोई उच्च आध्यात्मिक लाभ नहीं हुआ। अतः यह बात खुले तौर पर कही जा सकती है कि उन्हें धर्म के विषय में बड़ी रुचि थी, साधना के लिए बड़ी लगन थी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई चली आने वाली कथाओं, कीर्त्तनों से वे भली-भांति परिचित थीं। अब जब से वे यहाँ आने लगी थीं तो उनमें एक नयी जाग्रति आई थी और वे अपने जीवन को त्यागमय, तपस्यामय, सात्विक और ईश्वरीय नियमों के अनुकूल बनाकर चल रही थीं क्योंकि यहाँ ईश्वरीय सेवा केन्द्र पर व्यक्तिगत रूप से भी प्रेक्टिकल रीति जीवन को उच्च बनाने पर ध्यान दिया जाता था।
विरोधियों का संगठित होना
अब उन माताओं द्वारा ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने के कारण उनमें से कुछेक के पति, जिनके संस्कार विषयोन्मुख थे और जो सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में लगे हुए थे, वे उन पर कुद्ध थे। जहाँ कहीं उनका उठना-बैठना था, वहाँ वे अपना गम और गुस्सा प्रकट करते थे परन्तु अपनी कमज़ोरी को न बताकर सेवा केन्द्रों ही की निन्दा करते थे।
इधर उन दिनों विधान सभा और संसद के चुनाव के दिन भी नज़दीक थे। अतः जब चुनाव के प्रत्याशी लोगों से उनका मिलना होता तो वे उनसे भी यही कहते कि हम आपको वोट देंगे भी और दिलायेंगे भी परन्तु शर्त यह है कि आप हापुड़ से इस प्रजापिता ब्रह्माकुमारी संस्था के सेवा केन्द्र को हटवा दो।
इसी प्रकार वे लोग अन्य प्रचार-संस्थाओं में जाकर वहाँ के पण्डितों, पुरोहितों, पुजारियों अथवा प्रचारकों को भी कहते "देखो तो, ये ब्रह्माकुमारियाँ कैसा प्रचार कर रही हैं। ये कैसा नया पंथ चला रही हैं!! आप लोग अपने-अपने स्थानों पर उनके मत का खंडन करते हैं परन्तु उनके विरुद्ध आप कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाते? आप लोग इनके विरुद्ध कुछ करेंगे तो हम आपको पूरा-पूरा सहयोग देंगे।" वह पंडित और पुजारी वर्ग के लोग तो पहले ही से ये चाहते थे कि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के विरुद्ध बड़े पैमाने पर कुछ किया जाय क्योंकि उनके अपने शिष्य-वर्गों में से ही नर-नारी अब ब्रह्माकुमारी सेवा-केन्द्रों पर जाने लगे थे। उनके मन में तो इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के विरुद्ध ईर्ष्या भी थी और घृणा भी क्योंकि उनके कई शिष्य उनके पास जाकर कहते कि ब्रह्माकुमारियाँ प्रेक्टिकल जीवन के लिए कोई पुस्तक पढ़े बिना ही, अपने अनुभव के आधार पर बहुत सरलता एवं मधुरता से अच्छी शिक्षा देती हैं और योग भी सिखाती हैं, आप भी योग सिखाईये। अन्य कई शिष्य उन्हें कहते महाराज ब्रह्माकुमारियाँ तो कहती हैं कि आत्मा निर्लेप नहीं है और परमात्मा सर्वव्यापक भी नहीं है परन्तु आप तो ऐसा मानते ही नहीं; आखिर सत्य क्या है? इस प्रकार की बातें सुनकर उनके मन में क्रोध भर गया था। वे कहते ये कन्यायें-मातायें भला क्या ज्ञान दे सकती हैं? इस प्रकार सभी एक दूसरे को भड़काने लगे और बढ़ा-चढ़ाकर आग में घृत और इंधन डालने लगे।
आखिर पुजारी और पुरोहित-वर्ग, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेतागण तथा वासनाओं की आपूर्ति के कारण असन्तुष्ट लोग परस्पर मिल गये और उन्होंने एक समिति का गठन किया। राजनीतिक लोगों की आँख आने वाले चुनाव पर लगी थी और हरेक दल का नेता चाहता था कि उनका दल इस आन्दोलन में सबसे आगे रहे ताकि जनता ये मानने लगे कि ये पार्टी जो भी कार्य अपने हाथ में लेती है, उसमें पूरी तरह से सक्रिय हो जाती है और उसे सफलता तक ले जाती है। इधर कुछ 'धार्मिक संस्थायें' जिनके नियमों में खंडन-मंडन भी एक मुख्य नियम है, उनके मंत्री इस विरोध कार्य में खूब बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते ताकि वे लोकप्रिय भी हो जायें, यश लाभ भी कर लें और अगले वर्ष उनकी संस्था के सदस्य उन्हें फिर से मंत्री पद के लिए इस आधार पर निर्वाचन कर लें कि उन्होंने खंडन का खूब ज़ोरदार कार्य किया।
अतः अब नगर में खूब ही विरोध का कार्य होने लगा और शहर में वातावरण में उत्तेजना पैदा कर दी गई। सार्वजनिक सभायें होने लगीं। उसके लिए माइक्रोफ़ोन से चप्पे-चप्पे पर घोषणाएँ की गयीं। प्रस्ताव पास किये जाने लगे। सरकार को इस विषय में सख्त कार्यवाही करने के लिए सुझाव भेजे गये। जनता को साथ देने के लिए कहा गया। नगर के असामाजिक उपद्रवी और बदनाम व्यक्तियों को भी साथ मिला लिया गया। सेवा केन्द्र के द्वार पर धरना दे दिया गया, वहाँ जोशीले युवकों को बिठा दिया गया और उन्हें सारा दिन नारे लगाते रहने के लिए कह दिया गया।
अब हुआ यह कि उन लोगों ने सेवा केन्द्रों की बिजली काट दी, पानी को बन्द कर दिया, जमादार को वहाँ सफ़ाई पर जाने के लिए रोक दिया गया और उस मकान मालिक को यह कह कर डराया, धमकाया और पीटा भी गया कि अगर वह ब्रह्माकुमारी बहनों को मकान खाली करने के लिए नोटिस नहीं देगा तो सारे शहर के लोग उसका बहिष्कार कर देंगे और वे उसके मकान को आग भी लगा देंगे। जबकि स्वयं उस मकान मालिक की धर्मपत्नी भी नित्य प्रति इस सेवा- केन्द्र पर आकर धर्म लाभ लेती थी और खुद मकान मालिक को भी यह ज्ञान अच्छा लगता था परन्तु चूँकि वह शारीरिक रीति से दुर्बल और वृद्ध था और उसके जीवन को हर लेने तक की उसको धमकी दी गई थी तथा उसे मारा-पीटा भी गया था, इसलिए मजबूर होकर उसने मकान खाली करने का नोटिस भी दे दिया। उसको आतंकित करके विरोधियों ने सेवा-केन्द्रों के द्वार को बाहर से ताला भी लगा दिया।
बताइये कैसी राजनीति है, कैसा धर्म है, कैसा शिष्टाचार है और कैसी सभ्यता है? भारत के संविधान में तो यह लिख दिया गया है कि हरेक नागरिक को अपनी आस्था और अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अपनी साधना करने का और अपने विचार खुले आम बताने का पूरा-पूरा अधिकार है। परन्तु स्वयं राजनीतिक दलों के नेता, जो नगरपालिकाओं, विधान सभाओं अथवा संसद के सदस्य बनने के समय ये शपथ ग्रहण करते हैं कि वे संविधान में पूर्ण विश्वास रखते हैं और कि वे उसका पालन करेंगे तथा उसकी रक्षा करेंगे। अब उन्हीं के ही नेतृत्व में लोगों ने बहनों एवं माताओं के नागरिक अधिकारों पर इस प्रकार की चोट की।
अब प्रतिदिन, प्रातःकाल जो भी बहनें और भाई उस सेवा-केन्द्र पर क्लास करने के विचार से आते, उन्हें वे वहाँ जाने से रोक लेते और बाहर से ताला तो उन्होंने लगा ही रखा था जिससे कि किसी का प्रवेश करना वैसे भी सम्भव नहीं था। इस प्रकार कुछ दिन तक ये कशमकश चलती रही।
समाचार पत्रों ने भी इस समाचार को मोटे-मोटे शीर्षक देकर छापना शुरू किया। जो राजनीतिक दल इस उपद्रव में भाग ले रहे थे, उनके नेताओं ने भी उत्तर प्रदेश की सरकार से ये मांग की कि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय। जिस-जिस धार्मिक संस्था का इस आन्दोलन में सक्रिय भाग था. उसके नेताओं ने भी प्रादेशिक मंत्रीमण्डल में अपनी-अपनी संस्था से सम्बन्धित मंत्री महोदयों पर दबाव डाला कि वे प्रतिबन्ध लगा दें। स्थानीय नेताओं ने पुलिस अधिकारियों तथा ज़िला के कानून-अधिकारियों पर भी ज़ोर डाला कि वे ईश्वरीय विश्व विद्यालय के कार्यकर्ताओं को हापुड़ से बाहर निकालने के लिए आन्दोलनकारियों को सहयोग दें और सेवा- केन्द्र पर रहने वाली ब्रह्माकुमारियों व ब्रह्माकुमारों को सुरक्षा देने का प्रयत्न न करें। इस प्रकार हापुड़ में शोर-सा मचा हुआ था। सबकी ज़बान पर इस आन्दोलन की ही चर्चा थी। और उन दिनों प्रमुख समाचार पत्रों का भी यह एक प्रमुख समाचार बन गया।
सेवा-केन्द्रों के विद्यार्थियों द्वारा आवेदन-पत्र
इधर इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के हापुड़ केन्द्र पर आने वाले विद्यार्थियों ने भी संगठित रूप से उत्तर प्रदेश सरकार को एक आवेदन-पत्र (Memorandum) भेजा जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से यह बताया कि यह केन्द्र उन्हीं के निमन्त्रण पर खुला है और वे वहीं जाकर ईश्वरीय ज्ञान और योग की शिक्षा नित्य प्रति प्राप्त करते हैं। वे ही इसके आर्थिक पक्ष के जिम्मेवार हैं और कि उन पर किस प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि वो इस मामले की छानबीन करे और असामाजिक तत्त्वों के विरुद्ध उचित कार्यवाही करे। उन्होंने सरकार को खुले शब्दों में कहा कि वह भले ही इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की पड़ताल कराये और यदि इस पड़ताल से सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये संस्था किसी प्रकार से भी कोई अवैध, चरित्रहीन या देश के लिए हानिकारक काम करती है तो वह उसके विरुद्ध चाहे जो कदम उठाये। वरना वह उपद्रवकारियों के विरुद्ध यथोचित कदम उठाये। ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अन्य सेवा-केन्द्रों की ओर से भी प्रादेशिक तथा केन्द्रीय सरकार को तारें भेजी गई तथा पत्र भी लिखे गये और इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रतिनिधि, उत्तर प्रदेश के मंत्रीगण तथा भारत सरकार के गृह विभाग के उच्च अधिकारियों तथा सम्बन्धित जिला-अधिकारियों से भी मिलने गये।
प्रतिनिधियों की विरोधियों से भेंट
इन प्रतिनिधियों ने आन्दोलनकारियों के नेताओं से भी भेंट की और उनसे कहा कि उन्होंने इस संस्था के जो अवगुण देखे हों, जिनके कारण से ही उन्होंने आन्दोलन शुरू किया, उन्हें वे बतायें। उन्हें ये आश्वासन दिया गया कि ये संस्था उन दोषों को दूर करेगी तथा उन कमियों को मिटायेगी क्योंकि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का उद्देश्य ही कमियों व दोषों को मिटाकर सम्पूर्णता की ओर बढ़ना है। परन्तु इसके उत्तर में आन्दोलनकारियों ने यही कहा कि ईश्वरीय विश्व विद्यालय पूर्ण ब्रह्मचर्य की जो शिक्षा दे रहा है, वह परम्परा के विरुद्ध है और इस द्वारा पवित्र एवं योग-युक्त व्यक्तियों द्वारा भोजन बनाने पर जो बल दिया जाता है, वह भी छोटे शहरों और गाँवों के लोग जो शादियों इत्यादि के मौकों पर हलवाइयों आदि से खाना बनवाकर इकट्ठे खाते हैं, उनके लिए ग़लत है। इसके अतिरिक्त वे योगाभ्यास के समय कोई धुन या गीत बजाने को तथा युवा-अवस्था वालों के लिए ब्रह्मचर्य को भी ठीक नहीं मानते थे।
ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रतिनिधियों ने उन्हें बताया कि ब्रह्मचर्य का महत्त्व तो भारत की परम्परा में प्रायः सभी धर्मों ने माना तथा बताया है। काम विकार से छुड़ाने के लिए तो हरेक भक्त प्रतिदिन आरती करते समय भगवान से प्रार्थना करता है। हरेक भक्त यह भी जानता है कि गीता में स्वयं भगवान ने काम, क्रोध, लोभ को नरक के तीन द्वार बताये हैं। उन्हें यह समझाया गया कि सुनने वाले तो हज़ारों- लाखों होते हैं परन्तु कोई विरला ही व्यक्ति स्वेच्छा से इसका पालन करता है। इसके लिए यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय तो सभी को भगवान की आज्ञा ही सुनाता है। विशेषकर आज की सामाजिक परिस्थितियों की तथा इस युग की यही माँग है। पुनश्च, योगाभ्यासी को ब्रह्मचर्य के पालन तथा अन्न दोष से बचने के लिए तो सभी ने ज़ोर दिया है। हाँ, जो योग का अभ्यास नहीं करना चाहता उसकी तो जैसी इच्छा हो, वैसा करे। यह ईश्वरीय शिक्षा तो उनके लिए है जो पवित्र एवं योगी बनना चाहते हैं.....इस प्रकार उन्हें यह ईश्वरीय ज्ञान स्पष्ट करने की कोशिश की गयी। परन्तु क्रोध, घृणा और द्वेष की स्थिति में मनुष्य को कुछ भी नहीं सूझता।
अतः उपद्रवी तत्त्वों ने समझने और समझाने से काम लेने की बजाय तोड़-फोड़ का तरीका अपना लिया और शहर के कुछ दुष्कृत लोगों को भी साथ मिलाकर डराने, धमकाने, सेवा-केन्द्र के विद्यार्थियों और सहयोगियों पर हाथ उठाने, एक कार्यकर्ता के गले में जीवित साँप डालने, बाज़ार से राशन तक खरीदने के काम में रुकावट डालने इत्यादि जैसे घृणित कार्य भी किये। उन्होंने यह भी कोशिश की कि कुछेक कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया जाय। एक बार तो वे एक ट्रक सेवा केन्द्र पर ले आए और भीड़ इकठ्ठी करके सेवा-केन्द्र का सारा सामान भी उस ट्रक में डालने लगे ताकि उसे हापुड़ से निकाल देहली में पहुंचा दिया जाय। आखिर जब उनके अनैतिक-कृत्य अपनी चरम सीमा तक पहुँचे तो आम लोगों के मन में उनके प्रति घृणा पैदा हो गई और उन्होंने देखा कि किस प्रकार ईश्वरीय विश्व विद्यालय के विद्यार्थी तथा कार्यकर्ता सत्य, शान्ति और अहिंसा को सदा बनाये रखते हैं। जबकि आन्दोलनकारी समाज के भ्रष्ट तत्त्वों को साथ मिलाकर, बदकार लोगों को आगे-आगे कर कन्याओं-माताओं पर अत्याचार करने में तुले हुए हैं। उनकी सहानुभूति तो ईश्वरीय विश्व विद्यालय के साथ थी ही परन्तु ये ऐसे हिंसाकारी तत्त्वों के डर से कुछ और कर नहीं पाते थे।
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रतिनिधियों ने देहली में एक प्रैस कॉफ्रेंस की जिसमें लगभग सभी मुख्य समाचार पत्रों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। उसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि किस प्रकार उन पर अत्याचार हो रहे हैं और किस प्रकार इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के विरुद्ध स्वार्थी लोग भ्रान्तियाँ फैला रहे हैं। उन्होंने पत्रकार सम्मेलन में ये भी कहा कि ईश्वरीय विश्व विद्यालय स्वयं ही सरकार से कहता है कि वह भले ही इस कार्य-कलाप की पड़ताल कर ले और हापुड़ में हो रही गुंडागर्दी के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करे। सम्मेलन में संवाददाताओं ने जी भरकर प्रश्न किये जिनके उन्हें विस्तृत उत्तर दिये गये। अगले ही दिन सब समाचार पत्रों ने इस समाचार को अच्छा स्थान देकर छापा।
इधर दूसरी ओर ज़िला अधिकारियों ने भी आन्दोलनकारियों के विरुद्ध कार्यवाही शुरू कर दी थी जिसके परिणाम स्वरूप आन्दोलनकारी और भी बिगड़ गये थे। उन्होंने ये माँग पेश की कि जिलाधीश महोदय को इस ज़िले से स्थानान्तरित (Transfer) कर दिया जाये। उधर उत्तर प्रदेश विधान सभा में सदस्यों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में तत्कालीन मुख्यमन्त्री और गृहमन्त्री इत्यादि ने कहा कि ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की जाँच की गई है और सरकार इस नतीजे पर पहुँची है कि उनकी गतिविधियाँ कानून के विरुद्ध नहीं हैं। इसलिए सरकार उनके विरुद्ध कोई कदम उठाने नहीं जा रही। आन्दोलनकारी धार्मिक संस्थाओं से सम्बन्धित किन्हीं पाँच सदस्यों ने पंजाब की विधान सभा में भी ये माँग की कि सरकार ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की पड़ताल उठा दे और उनके विरुद्ध कार्यवाही करे। परन्तु वहाँ के तत्कालीन मुख्यमन्त्री ने कहा कि यह एक शान्तिप्रिय धार्मिक संस्था है और इसलिए सरकार इसके विरुद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं करना चाहती।
अब आन्दोलनकारियों के विरुद्ध सरकार ने कानूनी कार्यवाही करना शुरू कर दी। उन पर सरकारी तौर से मुकद्दमा चल गया। कुछेक की ज़मानतें भी हुई। परन्तु इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का ये दृष्टिकोण और व्यवहार रहा कि सरकार इनको छोड़ दे। अब इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय ने सेवा केन्द्र के लिए पहले से भी बड़ी जगह ले ली थी क्योंकि अब इस सेवा केन्द्र पर पहले से भी अधिक लोग लाभ लेने के लिए आने लगे थे।
इस सारी घटना को देखते हुए मन में यही विचार आता था कि एक ओर तो राजनीतिक दल और तथा कथित धार्मिक संस्थाएँ व असामाजिक तत्त्व संगठित हैं और दूसरी ओर कुछ इने-गिने, साधारण और असहाय ब्रह्माकुमार तथा ब्रह्माकुमारियाँ हैं। ये तो एक प्रकार से दीये और तूफ़ान की लड़ाई है। एक ओर तो ऐसे लोग हैं जिनके पास कई प्रकार के सहारे, साधन और साथी हैं और दूसरी ओर स्वयं परमात्मा है। इस बात का क्रियात्मक अनुभव होता रहा कि भगवान किस प्रकार रक्षा करते हैं, मार्ग-प्रदर्शना देते हैं और जो बाहरी रूप से विपत्ति मालूम होती है, उसको परमात्मा केवल हरते ही नहीं बल्कि उसमें से पास करके जीवन में क्रियात्मक रूप से कई शिक्षायें भी देते हैं।
इसके अतिरिक्त, यद्यपि यह बात असंदिग्ध है कि हापुड़ में आन्दोलनकारियों ने वातावरण में बहुत उत्तेजना पैदा कर दी थी और उनका वैर-विरोध एक भीषण रूप ले गया था तथा उनके साथ कुछ हिंसाकारी और बदनाम लोग भी आन्दोलन में आगे-आगे थे तथापि जब कभी इस विकराल परिस्थिति का पिता-श्री के सामने वर्णन किया जाता था, तो वो सदा यही कहते "बच्चे, ये तो कल्प पहले भी हुआ था। परमपिता परमात्मा जब अपना कार्य करते हैं अथवा ये ज्ञान-यज्ञ स्थापित करते हैं, उनमें विघ्न तो पड़ते ही हैं। ये जो-कुछ हो रहा है, यह कोई बड़ी बात नहीं है। 'सच की बेड़ी डोलती है परन्तु डूबती नहीं है।' इसलिए इसमें घबराने की कोई बात नहीं। अन्ते विजय सत्य की होती है। और ये छोटी-मोटी घटनाएँ तो इस ईश्वरीय यज्ञ की स्थापना के समय से लेकर होती ही चली आई हैं। आप सदा आत्म-स्थिति में स्थिर रहो और इस मस्ती में मस्त रहो कि ये तो स्वयं भगवान का कार्य है, हम तो इसमें केवल निमित्त मात्र हैं। उस सर्वशक्तिवान के कार्य को तो कोई भी रोक नहीं सकता। हाँ, केवल अनजान लोग परमात्मा और उसके कर्त्तव्यों से अपरिचित होने के कारण अपने उस परमपिता से ज्ञान एवं योग का वरदान लेकर सौभाग्य बनाने की बजाय ऐसे उल्टे कर्म करते हैं।"
बाबा की अचल अवस्था को देखते हुए वत्सों की हिम्मत बढ़ जाती। बाबा के मुखमंडल पर न विरोधियों के प्रति घृणा की भाव रेखायें थी; न चिन्ता के चिह्न और न ही उनसे कोई दुविधा, मनमुटाव या द्वेष के प्रकम्पन ही आते थे बल्कि वे मौलाई मस्ती में मस्त रहते थे। सदा हर्षित चेहरे से निश्चिन्त नेत्रों से निहारते हुए वे सदा यही कहते- "सदा खुश रहो, बच्चे। हरेक बात में हमारा कल्याण ही होना है। इन परीक्षाओं को हमने कल्प पहले भी पार किया था और अब भी पार्ट अदा करना है। भावी तो बन के ही रहनी है इसीलिए हर हालत में राजी रहो, फिक्र से फारिग रहो। अब तो हमें शिव बाबा मिले हैं; उस मिलन की खुशी के सामने तो ये छोटी-मोटी घटनाएँ कुछ भी नहीं हैं। जिसका हमने हाथ पकड़ा है, वह तो पार करने वाले प्रभु हैं। हमारा तो विद्यार्थी जीवन (Student Life) है, हमें फिर से नया बचपन मिला है। इस जीवन में तो किसी भी मामले की फिक्र नहीं है। बाबा बैठे हैं; आखिर ये सब ठीक तो हो ही जाना है; ये बादल बिखरने तो हैं ही।"
इस प्रकार जो बात वत्सों को कभी-कभी भारी मालूम होती थी, बाबा उसे बिल्कुल ही हल्का मानते और हुआ भी ऐसे ही। मक्खन से बाल निकलने के समान ये 'समस्या' सहज ही हल हो गई और इसका फल यह हुआ कि हापुड़ के प्रायः समझदार लोगों की जुबान पर ये वाक्य थे कि "अवश्य ही इन कन्याओं, माताओं में सच्चाई है, वरना शहर के सारे अग्रगण्य लोग जब इनके विरुद्ध ठने हुए थे तो ये कैसे यहाँ टिक पाती! देखो चोर तो सदा भागने ही की कोशिश करता है और इसके लिए वह मौके की ताड़ में रहता है। यदि इन माताओं-कन्याओं के मन में भी कुछ बुराई और उसके कारण ग्लानि होती तो ये भला डटी क्यों रहतीं? इनका तो यहाँ कोई सहारा व सहायक भी न था, तब अवश्य ही ये सत्य और प्रभु के आश्रय पर ही खड़ी है।"
जिन लोगों ने आन्दोलन में अपना तन, मन, धन और समय लगाया था और अपने जीवन में बड़े-बड़े मोर्चे मारे थे, अवश्य ही उनके मन में भी यह भाव तो आया ही होगा कि इतनी उत्तेजना दिलाए जाने पर भी इन्होंने कभी क्रोध नहीं किया, कभी हल्ला-गुल्ला नहीं किया और घृणा की दृष्टि से व्यवहार नहीं किया। ये सदा स्नेह पूर्ण शब्दों से और शांत स्थिति से "भाई, भाई" कहकर ही सम्बोधित करती रहीं और सदा सेवा केन्द्र पर आने तथा ज्ञान लाभ लेने के लिए आमन्त्रित करती रहीं। देखा जाय तो इस सबका श्रेय किसी मनुष्य को नहीं था बल्कि ये तो एक ईश्वरीय चमत्कार था। वहाँ के कुछ लोगों ने पानी के नल में ज़हर मिलाने की कोशिश की, जिन्दा साँप गले में डाला, पथराव किया, ट्रक के नीचे कुचलने की कोशिश की, शहर से निकालने का यत्न भी किया परन्तु परमपिता परमात्मा शिव का सदा सहयोग रहा इसलिये कुछ भी नहीं बिगड़ा। यह स्पष्ट ही है। परन्तु फिर भी यदि कोई ये न पहचाने कि इन कन्याओं-माताओं के पीछे स्वयं प्रभु ही का हाथ था तो क्या किया जाये? बाबा तो सदा यही कहा करते हैं कि "निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सो" और वे सदा ऐसे लोगों को निमन्त्रण देते; वे कहा करते कि उनका भी परमात्मा के ज्ञान और योग पर हक है क्योंकि परमात्मा तो सभी का पिता है।
विधि-आयोग को 'झूठी कसम' के बारे में ज्ञापन
३१ जुलाई, १९६२ को दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स में यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि भारत विधि-आयोग (Law Commission) सन् १८७३ से चले आ रहे न्यायालयों में शपथ लेने सम्बन्धी कानून (Indian Oath Act, 1873) में संशोधन करना चाहता है। इस समाचार में आयोग ने इस विषय में दिलचस्पी रखने वाले लोगों से प्रार्थना की थी कि यदि वे कोई सुझाव देना चाहें तो वे अमुक तिथि तक प्रेषित कर सकते हैं।
चूँकि उपरोक्त एक्ट के अन्तर्गत बहुत-से लोग भगवान के नाम पर भी कसम लेते हैं और ऐसी कसम लेते हुए भी वे झूठ बोल कर महापाप करते हैं, इसलिए उन्हें इस महापाप से बचाकर उनका कल्याण करने की ज़रूरत थी। इसके अतिरिक्त, उन्हें 'भगवान' जिसके नाम से वे कसम उठाते हैं, इसका भी परिचय देना ज़रूरी था, इसलिए बाबा ने इस विषय में आयोग को एक ज्ञापन भेजने का निर्देश दिया।
ईश्वरीय सेवा का साधन
बाबा तो ऐसे विषयों में बहुत दिलचस्पी लेते थे। बाबा किसी भी बात को निमित्त साधन मानकर विभिन्न वर्गों के लोगों को ईश्वरीय संदेश दिलाने का भरसक यत्न करते तथा कराते थे। ईश्वरीय संदेश देने के लिए यदि किसी सभा का आयोजन करने अथवा कुछ छपवाकर बाँटने पर काफी खर्च भी हो तो बाबा उसके लिए भी सदा तैयार थे। बाबा कहते- "ये तो शिव बाबा का कार्य है; उसने तो भवित मार्ग में सांवल शाह की हुण्डी सकारी थी" यह आख्यान प्रसिद्ध है; तब उसका अपना तो कोई कार्य आर्थिक कारणों से कभी भी नहीं रुक सकता। बाबा ने समस्त तन-मन-धन इस सेवा के लिए समर्पित किया था और वे कहते थे कि भोजन के खर्च में से निकालकर भी ईश्वरीय संदेश देने के कार्य पर खर्च करना पड़े तो भी करना चाहिए। अतः बाबा ने इस विषय को लेकर भी एक ज्ञापन भेजने तथा उसकी प्रतियाँ छपवाकर बाँटने के लिए कहा।
शपथ का पुराना कानून और उसे बदलने की ज़रूरत
न्यायालय की कार्यविधि में कसम को स्थान तो इसलिए दिया गया था कि इसे लेते समय मनुष्य का ध्यान परमात्मा की ओर जायेगा और उसे ये ध्यान रहेगा कि यदि वह झूठ बोलेगा तो मनुष्य से ऊपर जो ईश्वरीय शक्ति है, उस द्वारा दण्डित होना पड़ेगा। परन्तु ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का यह दृष्टिकोण था कि सन् १८७३ से शपथ-सम्बन्धी जो कानून चलता आ रहा है, उसमें किन्हीं सुनिश्चित एवं युक्ति-युक्त शब्दों में शपथका रूप निर्धारित नहीं किया हुआ क्योंकि उसमें यह बात उच्च न्यायालयों पर ही छोड़ दी गई थी कि शपथका रूप अर्थात् उसकी शब्द रचना,वे जैसा उचित समझें,निर्धारित कर लें। इसके परिणामस्वरूप कसम की प्रचलित शब्द-रचना ऐसी थी कि उस कसमके आधारभूत जो भाव था कि कसम लेने वाले भगवान द्वारा दण्डित होने के डर से झूठ न बोलें इनका प्रायः अभाव ही हो गया था। अब कसम केवल एक रस्म ही बन कर रह गई थी।शपथ लेते समय कसम उठाने वाले की अन्तरात्मा पर कोई ऐसा
प्रभाव नहीं पड़ता था जिसके फलस्वरूप वह झूठ बोलनेसे हटकर रह सके। अतः इससे कसम का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता था।
दूसरी बात यह कि न्यायालय में कसम उठाने का जो उपरोक्त उद्देश्य बताया गया है, उससे यह तो स्पष्ट है ही कि आत्माओं का अस्तित्व अलग है और परमात्माका अलग और कि परमात्मा सदा सत्य-स्वरूप है और सम्पूर्ण रीति से न्यायमूर्ति है। कसम के कानूनी रूप में यह भी माना गया है कि झूठ के लिए परमात्मा मनुष्य को दण्ड देने वाले और सत्य का फल देने वाले हैं, अर्थात् वह आत्माओं से भिन्न एवं उच्च है। परन्तु ये बात तो सर्व-ज्ञात है कि अद्वैतवादी लोग जो आत्मा और परमात्मा को एक ही सत्ता मानते हैं, कसम तो वे भी लेते हैं। स्पष्ट है कि ऐसे लोगों का कसम लेना तो निरर्थक है क्योंकि उन द्वारा कसम लेने का भाव तो यह निकलता है कि गोया वे स्वयं अपनी कसम खाते हैं। यदि कोई परमात्मा को निजात्मा से भिन्न ही नहीं मानता तो न तो उसे परमात्मा का डर हो सकता है, न उसके लिए प्यार ही। अतः उसे अनैतिकता और अन्त से बचाने के लिए (As Moral deterrant) प्रेरित करने के लिए कोई मानवेत्तर (Superhuman) शक्ति तो रही नहीं; तब भला उसके लिए कसम की, पवित्रता एवं सच्चाई (Sanctity) तो कोई रही ही नहीं। अतः इस कानून को इस दृष्टि से भी संशोधित (Amend) करने की आवश्यकता थी कि कसम लेने वाले का ध्यान अनिवार्य रूप से परमात्मा की ओर आकर्षित हो और उसके मन में यह बात आये कि झूठ बोलने वाला दंडित होता है।
संशोधन के लिए सुझाव
उपरोक्त आवश्यकताओं को तथा एक अन्य बात को जिसका उल्लेख आगे किया जायेगा, ध्यान में रखते हुए, बाबा ने अपने ज्ञापन में सुझाव दिया कि इस कानून के अन्तर्गत कसम में जहाँ 'गॉड' (God, भगवान) शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ-वहाँ इस शब्द (गॉड भगवान) के बाद "धर्मराज" (Supreme and Divine Justice) शब्द का भी प्रयोग किया जाये।
एक अन्य आवश्यक बात
विधि-आयोग को लिखा गया कि कसम के विषय में ध्यान देने के योग्य एक बात यह भी है कि जो लोग न्यायालयमें भगवान के नाम पर कसम लेते हैं, उन सभीके मनमें परमात्मा के बारे में एक ही मान्यता तो है नहीं। कई लोग मानते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान है। अन्य कई मानते हैं कि श्रीराम भगवान हैं। और लोगों की कुछ और ही मान्यताएँ हैं। इस भिन्नता से बहुत अन्तर पड़ जाता है और ईश्वर-विषयक मान्यता में अन्तर पड़ने से उनके व्यवहार और आचार में भी अन्तर पड़ जाता है। उदाहरण के तौर पर श्रीकृष्ण उपासकों को ही लीजिये उनमें से प्रायः लोगों को विश्वास है कि श्रीकृष्ण मक्खन चुराया करते थे और जब उनके पड़ौसी उन पर चोरी का आरोप लगाते थे तो वे उससे इन्कार कर देते थे। कृष्ण-प्रेमी यह भी मानते हैं कि उनकी १०८ पटरानियाँ थीं और कि वे रुक्मिणी का अपहरण करके ले गए थे। उन्होंने गोपियों के स्नान करते समय वस्र चुरा लिये थे। श्रीकृष्ण सम्बन्धी आख्यानों में तो ऐसा भी लिखा है कि अर्जुन की अन्तरात्मा (Conscience) के विरुद्ध श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कौरवों के विरुद्ध हिंसा-युक्त युद्ध करने के लिये राय दी थी और द्रोणाचार्यकी मृत्यु के निमित्त युधिष्ठिर को झूठ भी बोलने के लिए सुझाव दिया था। श्रीकृष्ण की जीवन-कहानी में इस प्रकार के और भी बहुत-से वृत्तान्त प्रायः बताये जाते हैं और लोग उन वृत्तान्तों को 'अलौकिक' तथा 'दिव्य' मानते हैं तथा उनसे प्रेरणा पाने की इच्छा रखते हैं। उन सबका उल्लेख किये बिना ही उपरोक्त से इतना तो स्पष्ट है ही कि इन आख्यानों में विश्वास करने वाले तथा इन्हें 'दिव्य-चरित्र' मानने वाले स्वयं भी तो झूठ बोल सकते हैं, दूसरों को किसी हिंसात्मक कार्य के लिए प्रोत्साहन या सहयोग (Abetment) भी दे सकते हैं, अनेक नारियों से अवैध सम्बन्ध (Illegitimate relationship) भी कायम कर सकते हैं तथा चोरी और अन्य असामाजिक आदतों में भी मन लगा सकते हैं क्योंकि उनके मन में यह विचार आ सकता है कि जबकि श्रीकृष्ण-जैसे महापुरुष ऐसा कर सकते थे तब, जबकि वे तो सामान्य एवं पतित मनुष्य है, उनसे तो ऐसे कार्य हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं। अब जो इस विचारधारा के लोग हैं, वे न्यायालय की रस्म के तौर पर अथवा लोगों पर अपनी सच्चाई का प्रभाव डालनेके लिए, भगवान के नाम पर कसम तो ले लेंगे परन्तु कसम लेते समय वे सत्य बोलने के लिए अपने ऊपर कोई नैतिक कर्त्तव्य (Moral obligation) नहीं मानेंगे।
दूसरा सुझाव
उपरोक्त बात का उल्लेख करते हुए विधि-आयोग को लिखा गया कि "जहाँ एक ओर इस बात की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण-सम्बन्धी ग्रन्थें में से ऐसे आख्यानों को निकालने का यत्न किया जाये जो कि पवित्र एवं सर्वगुण सम्पन्न देवता श्रीकृष्ण पर मिथ्या आरोप हैं, वहाँ यह भी किया जाये कि 'परमात्मा' शब्द के पहले 'निराकार' (Incorporeal) शब्द जोड़ दिया जाये क्योंकि पहले यह जो कहा जा चुका है कि भगवान झूठ के लिए दण्डित और सत्य के लिए सुख देने वाले (Avenger of falsehood and rewarder of truth) हैं- यह कथन तो निराकार (Incorporeal) परम-आत्मा पर, न कि किसी देवता पर चरितार्थ होता है और निराकार परमात्मा में सब धर्मावलम्बियों की आस्था भी है और, विशेष बात यह कि निराकार परमात्मा पर चरित्रहीनता का कोई भी आरोप नहीं लगाया जा सकता।
तीसरा सुझाव
कानून में सच्चे बयान (True Statement) के बारे में एक आधारभूत मान्यता यह है कि बयान देने वाले को उस बयान में प्रयुक्त शब्द और उनके भाव एवं परिणाम (Proper implication) मालूम होने चाहिये। अतः भगवानके नाम पर ली गई कसम तो अस्पष्ट(Vague) और निरर्थक (Meaningless) हो जाती है जब तक कि इसमें 'भगवान' शब्द की कोई सुस्पष्ट शब्दों से सुनिश्चित परिभाषा अथवा व्याख्या न हो। इस बातको सिद्ध किया जा सकता है जब तक कि किसी व्यक्तिको परमात्माके दिव्य-नाम, दिव्य-रूप, दिव्य-धाम,दिव्य-कर्त्तव्य का सही ज्ञान न हो, तब तक यह कसम,परमात्मा कीतरफ उसका ध्यान स्पष्ट रूप से आकर्षित नहीं कर सकती। अतः बाबाकी मार्ग प्रदर्शना के अनुसार विधि-आयोग को यह राय दी गई कि वे इस कसम में परमात्मा के बारे में इस प्रकार के कुछ शब्द भी जोड़ें, जिससे उसका परिचय मिले।
इस विषय पर आयोग को लिखे गये ज्ञापन में यह स्पष्ट करके बताया गया कि कैसे परमात्मा के ज्योति-बिन्दु रूप की पहले सभी धर्मों में मान्यता रही है। ये स्पष्टीकरण देने के बाद आयोग को निम्न प्रकार की कसम सुझाई गई।
कसम
"मैं, त्रिमूर्ति, गीता-ज्ञान दाता, धर्मराज, ज्योति-बिन्दु परमात्मा 'शिव' के नाम से कसम खाकर कहता हूँ कि मैं सच बोलूँगा और पूर्णतः सच बोलूँगा। जिसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं होगा।" इसके अतिरिक्त, विधि-आयोग को परमात्मा की निम्नलिखित परिभाषा जोड़ने के लिए कहा गया:-
परिभाषा
"इस कानून में जहाँ-कहीं भी 'परमात्मा' शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ यह शब्द ज्ञान के सागर, प्रेम के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द के सागर, सर्वशक्तिवान, निराकार, ज्योति-बिन्दु परमात्मा शिव का वाचक है, जो कि सर्व-आत्माओं का परमपिता है, परमधाम का वासी है, गीता-ज्ञानदाता है और झूठे को दण्ड तथा सच के लिये सुख देने वाला है।"
एक अन्य सुझाव
विधि-आयोग को यह भी सुझाव दिया गया कि अच्छा होगा यदि कसम लेते समय वह व्यक्ति (Deponent) अपने हाथ में ज्योति- बिन्दु परमात्मा शिव का चित्र ले या न्यायालय में ही उसके सामने उस प्रकार का एक चित्र लगा हुआ हो ताकि उस व्यक्ति को कसम लेते समय भगवान की याद आये और गम्भीरता से ही वह उन शब्दों को दोहराये। विधि-आयोग को उन्हीं दिनों में समाचार-पत्रों में छपे एक समाचार पत्र का हवाला भी दिया गया जिसमें यह बताया गया था कि एक सब-डिवीज़नएल मजिस्ट्रेट (Sub divisional Magistrate), वादी (Plaintiff), और प्रतिवादी (defendant) को उनके बयान लेने के लिये एक मन्दिर में ले गया और वहाँ उन्हें मूर्तियों के सामने खड़ा किया गया और उन्हें कहा गया कि वे उनकी कसम लेकर बयान दें। छपे समाचार पत्र में बताया गया था कि मुकद्दमे में अभियोग के पक्ष और विपक्ष दोनों ओर के व्यक्तियों ने सच-सच बोल दिया था, जबकि उससे पहले वे सच नहीं बोल रहे थे।
एक्ट के सैक्शन ८ संशोधन की जरूरत
विधि आयोग को यह भी लिखा गया कि इस एक्ट के सैक्शन ८ में बताया गया है कि न्यायालय मुद्दई तथा मुद्दई इलय, दोनों को ऐसी प्रकार की कसम लेने के लिये कहे जैसी कि दोनों के धर्म में या दोनों की जाति में प्रचलित हो परन्तु जो न्याय और श्रेष्ठाचार के विरुद्ध न हो। अब इस विषय में ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज एक इस प्रकार की कसम बहुत ही प्रचलित है जिसमें कहा जाता है कि "मैं परमात्मा को हाज़िर-नाज़िर मानते हुए कहता/कहती हूँ कि ...... मैं बिल्कुल ही सच बोलूँगा/बोलूँगी जिसमें कि ज़रा भी झूठ नहीं होगा।" इस कसम में यह जो कहा गया है कि ‘मैं परमात्मा को हाज़िर-नाज़िर मानते हुए कसम से कहता हूँ’ यह वाक्यांश तो सत्यता पर आधारित है ही नहीं क्योंकि परमात्मा तो ज्योति स्वरूप है और ब्रह्मलोक का वासी है; वह सर्वत्र तो 'हाज़िर' (Omnipresent) है ही नहीं। अतः जबकि कसम स्वयं ही झूठी मान्यता पर आधारित है तो कसम लेने वाला पूर्णतः सच बोलेगा इसका भी क्या विश्वास है? इस बात पर विचार के लिए ज्ञापन में विधि आयोग के ध्यान के लिए कुछ ज्ञान-बिन्दुओं का उल्लेख किया गया और उन्हें कहा गया कि इस बात को प्रमाणित किया जा सकता है कि 'परमात्मा' सर्वव्यापक (सब जगह हाज़िर) नहीं है।
सैक्शन ५ का संशोधन
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि इस एक्ट के सैक्शन ५ के अनुसार अभियोग करने वालों, उसका उत्तर देने वालों तथा गवाहों से तो शपथ ली जाती है परन्तु मुकद्दमे के दोनों ओर से वकील शपथ नहीं लेते और न ही मुकद्दमे की सुनवाई करने वाला मजिस्ट्रेट या जज ही कोई शपथ लेता है। वास्तव में कानून की दृष्टि में तो सभी बराबर हैं, अतः इन्हें भी शपथ लेनी चाहिए' ताकि इन्हें भी भगवान की याद आये और विशेषकर वकील लोग भी मुकद्दमे की पैरवी सत्यतापूर्वक करने को बाध्य हो जायें और कलिकाल में, जज लोगों का मन भी विकार से प्रभावित न हो। इस सुझाव का भाव जजों पर किसी प्रकार की आलोचना करना नहीं है परन्तु यह सुझाव तो इसलिए दिया गया कि परमात्मा की युक्ति-युक्त याद तो सभी के मन को पवित्र करती है और उससे सारा वातावरण भी न्याय कार्य के अनुकूल हो जाता है।
दो प्रकार की कसमों का एक-जैसा मूल्य नहीं
ज्ञापन में यह भी लिखा गया कि भगवान के नाम पर कसम लेने की बजाय जो लोग वैसे ही कसम (Affirmation) लेते हैं, उन दोनों की कसम (शपथ) को एक-जैसा मूल्य न दिया जाय क्योंकि प्रथम श्रेणी के लोग तो एक सर्वोत्तम नैतिक सत्ता को मानकर स्वयं को उसके नैतिक अंकुश में (Under Moral Obligation) मानते हैं जबकि द्वितीय श्रेणी के लोग स्पष्टतः ऐसे किसी नैतिक शासन को मानने के लिए स्वयं को बाध्य नहीं करते और इसका मनुष्य के जीवन में अन्तर पड़ता है यह बात भली भाँति स्पष्ट की जा सकती है।
ज्ञापन के प्रतियाँ बहुत संख्या में वितरित
उपरोक्त प्रकार की बातों पर आधारित ज्ञापन विधि-आयोग को तो भेजा ही गया, साथ-साथ उन्हें छपवाकर, इसकी प्रतियाँ नामी वकीलों को, न्याय-मूर्तियों को, धार्मिक संस्थाओं को, समाचार-पत्रों ने इस समाचार को प्रकाशित भी किया कि ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय ने विधि आयोग को इस विषय पर कुछ सुझाव भेजे हैं। श्रृंगेरी के शंकराचार्य के कार्यालय ने तो पत्र भी लिखा कि इस ज्ञापन की हमें कुछ और प्रतियाँ भेजिये। बहुत-से प्रसिद्ध वकीलों ने इस बात की सराहना की कि यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय इस प्रकार के विषयों के प्रति भी सतर्क रहता है तथा इसमें सक्रिय कार्य करता है। देहली में हुए लॉ कॉन्फ्रेन्स (Law Conference) में जब इसे काफी संख्या में वकीलों को दिया गया, तो उन्होंने इसे पसन्द किया।
इस पर विशेष महत्त्व की बात यह है कि बाबा ने वत्सों को किसी भी नुकते को लेकर ईश्वरीय सन्देश देने की सेवा का तरीका सिखाया और विचार सागर मंथन करते रहने की विधि भी बताई।
देहली छावनी में जिस्मानी मिलिट्री और रूहानी मिलिट्री का मेल
कुछ समय से देहली के सेवा केन्द्रों पर आने वाले ब्रह्मा-वत्स बाबा को मधुबन में पत्र लिखते रहते जिसमें वे बाबा से सप्रेम और सानुरोध कहते- "बाबा, हम सभी ब्रह्मा-वत्स आपकी राह में आँखें बिछाये बैठे हैं। अब हमसे और अधिक समय प्रतीक्षा नहीं की जा सकती;अब तो आप आ जाइये। आप शिव बाबा के रथ है- साकार माध्यम हैं आप यहाँ आयेंगे तो आपके द्वारा हम सम्मुख ही शिवबाबा के ज्ञान से अनमोल रत्न लेंगे। बाबा, आपके प्रैक्टिकल जीवन से प्रेरणा पाकर हम भी अपने जीवन को उच्च बनायेंगे और आपकी उपस्थिति से उल्लास और उत्साह पाकर हम दूसरी मनुष्यात्माओं की ज्ञान-सेवा में अथक होकर जुट जायेंगे।" उन्होंने शिव बाबा को ब्रह्माबाबा के द्वारा सम्बोधित करते हुए लिखा "जबकि हम यह सन्देह-रहित रीति से जान गये हैं कि सारी सृष्टि के परमपिता अब स्वयं मनुष्यात्माओं को ज्ञानामृत बाँट रहे हैं, तब भी हमें आपके निकट रहनेका सौभाग्य नहीं मिलता।" बाबा हमारे भीतर के नैन आपके लिए तरस रहे हैं और हमारा आत्मन् आपसे मधुर मिलन मनाने और ज्ञान-योग के मधुर स्वर सुनने को तड़प रहा है। अतः अब आप आयें और देर न लगायें। इस प्रकार,देहली के विभिन्न सेवा केन्द्रों से ब्रह्मा वत्सों द्वारा संगठित रूप में लिखित निमन्त्रण बाबा के पास जा चुके थे।
उन्हीं दिनों देहली में राजोरी गार्डन स्थित, सेवा केन्द्र पर भारतीय स्थल-सेना (Army) के मेजर (Major) भी आया करते थे; यह ईश्वरीय ज्ञान सुनने के बाद वे इससे पूरी तरह से सहमत हो गये थे।उनका इस बात में भी अटूट निश्चय हो गया था कि परमपिता स्वयं ब्रह्मा बाबा के माध्यम द्वारा यह ईश्वरीय ज्ञान दे रहे हैं। अतः उनके मन में बाबा से मिलने की तड़प-सी थी। अब उन्होंने भी बाबा को अपना निश्चय-पत्र, जीवन में हुए परिवर्तन के बारे में अनुभव-पत्र सहित बाबा को लिखा कि बाबा दिल्ली में आयें। उन्होंने बाबा को दो- तीन बार फोन भी किये और कहा कि बाबा के देहली में पधारने से बहुत-सी आत्माओं को ईश्वरीय संदेश मिलेगा।
शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा द्वारा निमन्त्रण स्वीकार
बाबा ने देहली में यज्ञ-वत्सों को लिखा कि मैं तो शिव बाबा का नन्दीगण हूँ। शिव बाबा मुझे जहाँ ले जाना चाहते है, वहाँ चला जाता हूँ। इसलिये शिव बाबा से पूछेंगा कि उनकी क्या मर्जी है। बच्चों की अर्जी उनके सामने रखूँगा। आखिर प्यार के सागर, शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा ने वत्सों के स्नेह निमन्त्रण को मान ही लिया। उन्होंने बच्चों के बीच पधारना स्वीकार कर लिया। शिव बाबा ने विशेष सन्देश भी दे दिया था कि ये निमन्त्रण बड़ा विचित्र प्रकार का है जिसका भेद आगे जाकर खुलेगा।
मेजर भाई का विशेष सौभाग्य
बाबा के पत्र के आते ही खूब तैयारियाँ शुरू हो गयीं। मेजर भाई ने यह अनुरोध किया कि यह सारी व्यवस्था उनकी कोठी पर की जाय क्योंकि उसमें एक बहुत बड़ा मैदान था जहाँ पर १५०० व्यक्तियों के साथ बैठने के लिए कनात और शामियाने लगाये जा सकते थे। इसके अतिरिक्त वहाँ आवास के लिये कमरे भी काफ़ी थे और वो कोठी देहली छावनी में एक खुले और हवादार इलाके में थी जहाँ का वायुमण्डल भी शुद्ध था। वास्तव में बाबा को भी सदा ऐसे खुले स्थान पसन्द आते थे; परन्तु सबसे विशेष बात यह कि मेजर भाई प्रेम- प्लावित होकर बाबा तथा सभी भाई-बहनों से कहते कि यह सेवा का अवसर मुझे दो; आप सभी वहाँ पधारो। वे भावना-विभोर होकर ही यह कहा करते। यद्यपि यह स्थान शहर से काफ़ी दूर था परन्तु इसमें काफ़ी खूबियाँ भी थीं, या यों कहें कि मेजर जी का यह सौभाग्य था कि उन्हीं के यहाँ शिव बाबा ब्रह्मा-तन में पधारे। अतः बाबा के ठहरने और प्रतिदिन क्लास कराने का सारा प्रबन्ध वहीं किया गया। प्रतिदिन वहाँ पहुँचने के लिये, सेवा-केन्द्र पर नियमित रूप से आने वाले बहन- भाईयों ने अपने लिए बसों का भी इन्तज़ाम कर लिया।
धुन के पक्के और लगन के सच्चे
प्रतिदिन प्रातः हर केन्द्र से निर्धारित बसों से बहन-भाई बड़े उल्लास और उत्साह से वहाँ पहुँच जाते। उन दिनों सर्दी इतनी पड़ रही थी कि आपस में दाँत भी बजते थे। कई बार तो लौटते समय इतनी धुन्ध होती थी कि बस से पाँच गज़ की दूरी पर खड़ा आदमी भी मुश्किल से ही दिखाई देता था परन्तु ये सभी बातें आने वाले वत्सोंके उत्साह में ज़रा भी कमी नहीं ला सकीं। सभी लोग नित्य प्रति, नागा किये बिना प्रातः ५.३० बजे तक पहुँच जाते। ऐसे लगता कि वे प्रातः जाने के लिए काफ़ी जल्दी उठकर, नहा-धोकर, तैयार हो जाते, मानो कि उन्हें रात-भर नींद ही न आती हो। इस मौसम में कभी-कभी वर्षा ने भी लगन की परीक्षा लेने की कोशिश की। परन्तु ये सब तो आँधी और तूफ़ानों से लड़ने वाले अपनी धुन के पक्के और लगन के सच्चे ब्रह्मा-वत्स थे, जो इन सब बातों से टलने वाले नहीं थे। एक तो हरेक में बाबा के आने की बहुत खुशी थी, दूसरे, निश्चय का बल था, तीसरे पवित्रता के कारण सहन करने की शक्ति (Endurance) थी और चौथे, आत्मिक स्थिति तथा संगठन के कारण सर्दी की तेज़ी का अनुभव भी न होता था। इस पर भी हरेक की बुद्धि में ज्ञान ऐसा बैठ गया था कि उसकी मस्ती और नशे में उन्हें कोई भी बाधा उलंघनीय नहीं मालूम होती थी और यदि कोई सर्दी एवं दूरी की चर्चा उनसे कर बैठता तो वे खूब ज्ञान-युक्त उत्तर देते।
ज्ञान-युक्त मस्ती के उत्तर
यदि कोई वत्स विनोद से किन्हीं वृद्ध माताओं के मन में सूक्ष्म रूप से कमज़ोरी ढूँढने के लिये सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए उनसे यों कह देता कि देखो जी, आप इतनी सर्दी में रोज़ मत आया करो। आपका शरीर काफी वृद्ध है, कहीं आपको सर्दी न लग जाये; तो वे बात को बीच में ही काटकर कहतीं "हम वृद्ध कहाँ हैं! हम तो बाबा की छोटी बच्चियाँ है। भला आप हमारे शरीर को क्यों देखते हो? शरीर तो हमारा रथ है; रथवान् तो आत्मा ही हैः क्या रथवान् जैसे शरीर को चलाये, शरीर वैसे ही चलेगा या रथ ही रथवान् को चलायेगा?" इस प्रकार, यदि कोई किसी छोटे बच्चे को कह देता कि तुम तो अभी छोटे बच्चे हो, तुम्हें रोज़ इतनी जल्दी उठने की क्या ज़रूरत, तुम्हें बाबा की सारी बातें समझ ही कहाँ आती होंगी? तुम तो अगर केवल इतवार को ही आ जाओ, तब भी काफ़ी है। तो वह झट से जवाब देता, ‘वाह, मैं बच्चा थोड़े ही हूँ, मैं तो वानप्रस्थी हूँ।’ अभी कल ही तो बाबा ने बताया था कि अब कलियुग का अन्तिम समय है और सभी आत्माएँ अपनी वानप्रस्थ अवस्था में है। बाबा ने यह भी तो कहा था कि अभी तो 'आराम हराम है'; कोई छोटा हो या बड़ा, सभी के लिए सौभाग्य बनाने का समय यह ही है। बाबा यह भी कहते कि ये तो अनमोल रत्न हैं; ज्ञान-धन का जो जितना संग्रह करेगा, वह भविष्य में भी उतना ही रत्नों का खज़ाना पायेगा। बाबा समझाते कि पढ़ाई में दुहराई भी ज़रूरी होती है। अतः प्रतिदिन ज्ञान-मुरली तो सुननी ही चाहिए क्योंकि हो सकता है कि किसी दिन ज्ञान का ऐसा नुक्ता निकल आये जो मन को लग जाने से कोई विकार जो पहले नहीं मिट रहा था, अब मिट जाये। इस प्रकार, हरेक में, अदम्य उमंग थी और वे बाबा के अनमोल वचनों को एक दिन भी सुने बिना नहीं रह सकता था।
ज्ञान-मुरली के प्रति ध्यान खिंचवाना
इधर मेजर भाई प्रतिदिन अमृतवेले मिलिट्री के ४००-५०० व्यक्तियों को आने के लिए पहले ही से प्रेरणा दे देते थे और इतवार के दिन तो यह संख्या और भी अधिक हुआ करती थी। सभी लोग निश्चित समय से पूर्व ही आकर बैठ जाया करते थे। क्योंकि बाबा ठीक समय पर ही आया करते थे। देहली से बाहर अन्य नगरों में जो सेवा-केन्द्र थे, वहाँ सभी ब्रह्मा-वत्स कुछ दिन के लिए बाबा की ज्ञान-मुरली सुनने तथा अपनी उन्नति के लिए उनके नये-नये साधन जाननेके लिए आकर ठहरा करते थे। यदि कुछ लोग किन्हीं कारणें के वश प्रातः अमृतवेले न आ सकते तो वे दिन में मौका पाकर आ जाते और वे प्रातः की ज्ञान-मुरली को पहले टेप (Tape) द्वारा सुन लेते और बाद में एकत्रित हुए भाई-बहनों के बीच बाबा भी पधारते। दिन-भर में मेजर जी भी सेना के मुख्य-मुख्य अधिकारियों को बाबा से ज्ञान-लाभ दिलाने के लिए लाया करते। इसप्रकार अथक रीति से बाबा दिन-रात ज्ञान-रत्न लुटाया करते। बाबा कहा करते कि संगमयुगी ब्राह्मण जब तक यह सत्यनारायण की अथवा अमरनाथ की सच्ची कथा कई आत्माओं को न सुना लें तब तक तो उन्हें खाना नहीं खाना चाहिए।बाबा हरेक का ज्ञान-अध्ययन पर भी विशेष ध्यान आकर्षित करते। वे प्रायः पूछा करते "क्या आप रोज़ मुरली सुनते हो?" बाबा से जब कोई मिलने आता, बाबा उससे पूछते- "क्या आज की मुरली सुनी है?" बाबा ने यह निर्देश दिया था कि जो कोई भी मिलने आये उसे पहले उस दिन की मुरली सुनाओ। बाबा कहते कि यदि किसी की ज्ञान-मुरली सुनने से प्रीति नहीं तो मानो कि उसकी बाबा से भी प्रीति नहीं है। बाबा कहते कि बुद्धि में ज्ञान के कोई प्वाइंट (नुक्ते) न होने से या ठीक रीति से न समझने से ही माया से हार होती है और इससे ठीक होने से ही जीत भी होती है। कभी बाबा कहते कि ये ज्ञान के प्वाइंटस माया से युद्ध करने के अस्त्र-शस्त्र हैं। जैसे मिलिट्री के लोग अस्त्र-शस्त्र को साफ़ करते रहते हैं, ऐसे ही प्रतिदिन ज्ञान सुनने से न केवल इन शस्त्रों को चलाने का अभ्यास होता है बल्कि ये साफ़ तथा तेज़ भी होते रहते हैं।
सांसारिक कर्तव्यों के प्रति भी ध्यान
प्रातः ज्ञान-मुरली चलाने के बाद, जब टोली बँट जाती तो बाबा अनौपचारिक (Unoffical) रीति से वत्सों को ज्ञान की विविध बातें बहुत ही विनोद और स्नेह पूर्ण रीति से बताया करते। फिर जैसे ही सभा का निश्चित समय पूरा होता तो बाबा कहते बाबा का यह ज्ञान तो इतना मधुर और सुखप्रद है कि "वत्सो शिव आपका मन करता होगा कि इसे अविराम रीति से सुनते ही चले जायें। इस ज्ञान को सुनते-सुनते न केवल आपको दिन या रात का पता नहीं रहता होगा बल्कि आप दुनिया को भी भूल जाते होंगे, यहाँ तक कि आपको अपनी देह की सुधि भी नहीं रहती होगी और आप आत्म-निश्चय होकर उस शिव बाबा के ज्ञान-मोती चुगते-चुगते प्रभु-मिलन के सुखमें विलीन हो जाते होंगे। परन्तु हे वत्सो, आप राजयोगी भी हैं और कर्मयोगी भी। अतः अब आप शीघ्रता करो ताकि समय पर वापिस अपने घर पहुँच जाओ और अपने-अपने कार्य में लग जाओ। कभी-कभी तो बाबा बस-व्यवस्था के इन्चार्ज भाई-बहनों से कह दिया करते- "बच्चे, जब सभा का समय हो जाय तो आप इस के हॉर्न (Horn) बजवाना शुरू कर दिया करो ताकि सभी को यह ख्याल हो कि यदि बस चली गई तो हम रह जावेंगे।" इस प्रकार बाबा जहाँ ईश्वरीय-ज्ञान और योग द्वारा आत्मा को तन्मयता की ओर ले जाते, वहाँ वे उसे अपने सामाजिक कर्त्तव्यों के प्रति सतर्क भी करते। बाबा यह भी कहा करते कि प्रातः अमृतवेले का समय सबका अपना समय है; इस सतोप्रधान समय में हरेक को ज्ञानामृत पीने का पूर्ण अधिकार है। दूसरी ओर जब क्लास का समय पूरा हो जाता तो वे सभी से यह भी कहते कि अब स्वः कर्त्तव्य के लिए घरको वापिस लौट जाओ। वे अपने कर्तव्य के प्रति इतना सतर्क करते कि बहुत-सी मातायें-बहनें अपने घर का चौका-बुहारी करके और नाश्ता बना करके ही प्रातः आती और वे वापस जाकर, उसे तैयार करके घर के सभी सदस्यों को बड़े स्नेह से परसतीं। गोया बाबा कछुए की न्यायीं कर्मेन्द्रियों को समेटना भी सिखाते, योगियों की तरह देह और देह के सम्बन्धियों को भूल कर केवल परमपिता परमात्मा की याद में मन को एक-टिक केन्द्रित करने का तरीका भी समझाते और साथ-साथ अपने कर्त्तव्य के भी कुशलता-पूर्वक करने की सीख देते हुए देह के सम्बन्धियों के साथ पवित्र नाता निभाने को भी कहते। जिस किसी पर कोई विशेष जिम्मेवारी नहीं थी, उसे बाबा यह भी सुझाव देते कि अब वह सारे विश्व कों कुटुम्ब मानते हुए जन-जन की ज्ञान-सेवा एवं गुण- सेवा में लग जायें और जिस पर काफ़ी जिम्मेवारियाँ होतीं, उसे बाबा कहते- "बच्चे, जबकि आपने यह रचना रची है तो उसे संभालना भी तो आपका कर्तव्य है। यह तो आपका कर्म खाता है, इसे तो आपको ही चुकता करना है। अब न्यासी (Trustee) बनकर, पवित्र रहते हुए अपने गृहस्थ और प्रवृत्ति को चलाओ।"
जिस्मानी मिलिट्री वालों का कल्याण कैसे हो?
उन दिनों बाबा की प्रातःकालीन सभा में मिलिट्री के नौजवान तो होते थे ही; अतः कई बार बाबा विशेष रूप से उन्हीं को लक्षित करके भी कुछ ज्ञान-बिन्दुओं पर ध्यान दिलाया करते। बाबा कहते- "ये बच्चे बाहू-बल और शस्त्र-बल वाली 'जिस्मानी सेना' में भर्ती हुए-हुए हैं। इनका मुख्य कार्य शत्रुओं से भारत की रक्षा करना है। परन्तु अब इन्हें जिस्मानी के अतिरिक्त रूहानी सेना में भी सम्मिलित होना है। यहाँ भरती होने का केवल इतना ही अर्थ है कि देह-अभिमान और काम- क्रोधादि से युद्ध करना है। आज स्वयं भारत की सरकार और यहाँ के लोग भी नहीं जानते कि वास्तव में भारत के शत्रु अथवा सारे विश्व के शत्रु कौन हैं? अब शिव बाबा ने आकर हम सभी को बताया है कि भारत और विश्व से सुख का स्वराज्य छीनने वाले शत्रु वास्तव में काम, क्रोध, लोभादि मनोविकार ही हैं। इन्होंने ही हरेक मनुष्य को अपना गुलाम बनाया हुआ है। परन्तु आज विश्व-भर के लोग इस बात से अनभिज्ञ है कि ज्ञान और योग रूपी अस्त्रों-शस्त्रों के बिना माया से लड़ाई नहीं जीती जा सकती और माया पर विजय प्राप्त किये बिना संसार में सुख-शान्ति नहीं हो सकती। फिर बाबा कहते- "देखो जो लोग मिलिट्री में भर्ती होते हैं, उनको अपनी ही सेना के पण्डित उनको गीता सुनाकर कहते हैं कि भगवान ने कहा, "हे अर्जुन, यदि तू युद्ध करते हुए प्राण छोड़ेगा तो तू स्वर्ग में जायेगा।" परन्तु सोचने की बात है कि पवित्र बने बिना, दैवी गुण धारण किये बिना, इस प्रकार गोली चलाकर मर जाने से तो कोई स्वर्ग में जा नहीं सकता। किन्तु अब ये जो मिलिट्री के लोग हैं, इन्हें युद्ध करना ही होता है, गोली भी चलानी ही होती है क्योंकि देश की रक्षा करना इनका काम है। मानो कि चीन या पाकिस्तान से लड़ाई छिड़ जाती है। तब सरकार इन्हें देश की सीमा पर रक्षा के लिये तो भेजेगी ही और यदि ये नहीं जायेंगे अथवा गोली चलाने से इन्कार कर देंगे तो स्वयं इन्हें ही इनके कप्तान अथवा मेजर गोली से मरवा देंगे तो ये बेचारे क्या करें? प्रश्न उठता है कि इनका कल्याण कैसे हो? शिव बाबा तो सभी का कल्याण करने आये हैं। ये बेचारे भारत की रक्षा के लिए जीवन देते हैं; इनका उद्धार कैसे हो?" तब बाबा ने कहा कि यदि ये शिव बाबा की याद में रहकर गोली चलायें, तब ये स्वर्ग में आ सकते हैं। क्योंकि कहावत है कि अन्त में जैसी मति होती है, वैसी ही गति होती है। अतः बाबा ने कहा कि यदि ये बच्चे शिव बाबा का परिचय प्राप्त कर लें और आहार-व्यवहार सम्बन्धी नियमोंका पालन करते हुए आत्माभिमानी बनें तथा शिव बाबाकी स्मृतिमें टिकें तो इनका भी कल्याण हो सकता
है।
मिलिट्री वालों में परिवर्तन सहज भी है
बाबा कहते कि- 'ये जो जिस्मानी मिलिट्री में भर्ती हुए-हुए बच्चे हैं, ये मरने-मारने के लिए तैयार ही होते हैं। जब ये युद्ध करने जाते हैं तो इनके मन में यही होता है कि पता नहीं हम वापिस आयेंगे भी या नहीं। लड़ाई के मैदान में तो ये देह और देह के सम्बन्धियों के मोह को छोड़े हुए ही होते हैं। गोया नष्टोमोहः होने, दैहिक स्मृतियों को भुलाने, युद्ध करने और शत्रु को मारने का अभ्यास तो इन्हें होता ही है। अतः यदि यह अपनी योग्यताओं को ऐसे रूपान्तरित कर लें कि देह के भान को भूलकर और नष्टोमोहः होकर, माया अर्थात् मनोविकारों से युद्ध करने में लग जायें तो ये बहुत ऊंचा पद प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार बाबा मिलिट्री के उन नौजवानों को भी ज्ञान-युक्त एवं गुण- युक्त बनने की युक्तियाँ बताते रहते। वे इस प्रकार उन्हें भी गीता-ज्ञान द्वारा स्वर्ग में आने का मार्ग सुझाते रहते।
गीता के बारे में गहन भेद बताओ
इन्हीं दिनों देहली में कुछ गीता-प्रेमी लोगों ने ताँबे और चाँदी के पात्रों पर सारी गीता अंकित कराई थी और उसे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय को भेंट करने का कार्यक्रम बनाया। इस आयोजन के एक मुख्य कार्यकर्ता बाबा से मिलने भी आये थे। बाबा इस सम्बन्ध में कहा करते कि "देखो भारत के लोग इतना खर्च करके ये सब कार्यक्रम तो कर रहे हैं परन्तु उन्हें यह नहीं मालूम कि गीता में परमात्मा के लिये जो 'भगवानुवाच' शब्द का प्रयोग हुआ है; वह भगवान कौन है अथवा परमपिता परमात्मा का क्या स्वरूप है। फिर,वे ये भी माने बैठे हैं कि अर्जुन घोड़ों से चलने वाले एक रथ पर सवार थे और श्रीकृष्ण उस रथ को चला रहे थे। उनके मन को यह भी नहीं सूझता कि त्रिलोकीनाथ भगवान किसी व्यक्ति के रथ को थोड़े ही हाँकते होंगे। अतः इन लोगों को जिन्हें कि गीता के प्रति इतनी श्रद्धा है, बताया जाना चाहिए कि गीता के भगवान तो सर्व आत्माओं के परमपिता थे। उन्होंने युद्ध के मैदान में नहीं, और केवल एक अर्जुन को ही नहीं बल्कि सारी सृष्टि के लिये ज्ञान दिया था और अब उसी वृत्तान्त की पुनरावृत्ति हो रही है।
उन्हीं दिनों मातेश्वरी जी भी अपने ऑपरेशन के बाद ईश्वरीय सर्विस पर फिर से पूर्ववत जुटी हुई थीं। सभी की अभिलाषा थी कि बाबा के यहाँ होते हुए मातेश्वरी जी भी देहली पधारें। सभी ने अपने हस्ताक्षर करके उन्हें बड़े स्नेह और चाव से निमन्त्रण भी भेजा था परन्तु मातेश्वरी जी को वहाँ चैक-अप (Check-up) के लिये रहना था।
शिवरात्रि की छुट्टी के बारे में ज्ञापन
उन्हीं दिनों समाचार-पत्रों में यह समाचार छपा था कि इस वर्ष केन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में शिवरात्रि की छुट्टी नहीं होगी। इस बात को उठाकर बाबा ने ज्ञान-मुरली में कहा कि देखो स्वयं भारत सरकार की ओर यहाँ के लोग, जहाँ पर कि शिव बाबा अवतरित होते हैं और जिसे वे नर्क से स्वर्ग बनाते हैं, वे भी शिव बाबा को नहीं पहचानते। वास्तव में होना तो यह चाहिये कि इस मौके पर लगातार तीन या सात दिन सरकारी तौर से खुशी (State Function) मनानी चाहिये क्योंकि यह तो परमपिता का दिन है। जो कि फिर से आकर सम्पूर्ण पवित्रता, सुख और शान्ति का वर्सा देता है। उस दिन तो सब घरोंपर रोशनी होनी चाहिए क्योंकि उस पिताने विश्वमें अज्ञान-अंधकार समाप्त कर फिर से सतयुग की स्थापना की। होना तो चाहिए कि जब बाहर से किसी देश का कोई प्रधानमन्त्री या पर्यटक आये तो उसे भी किसी मनुष्य की समाधि पर ले जाने की बजाय शिव बाबा की समाधि पर अर्थात् किसी शिव-मन्दिर में ले जाया जाये। देखो तो जो शिव बाबा हमें मनुष्य से देवता बनाता है उसके मन्दिर कितने साधारण होते हैं। देवी-देवताओं के मन्दिर तो बहुत ही भव्य बने हुए हैं और उनकी मूर्तियाँ भी सोने के जेवरों से सजी हुई होती हैं और शिव बाबा का मन्दिर तो ऐसा होता है कि जहाँ शिव की पिंडी रखी हो, न कोई वस्त्र, न आभूषण; न ताज, न तख्त; बस वो शिव का मन्दिर हो गया।जिसने मानव-मात्र को इतना ऊँचा उठाया, अटल, अखण्ड राज्य- भाग्य दिया उसका मन्दिर तो बहुत साधारण होता है। आज सभी उसे इतना तो भूल गये हैं कि वे मानव देहधारियों के जन्म-दिन तो मनाते हैं परन्तु वे इस निराकार परमपिता परमात्मा का दिव्य जन्मोत्सव भी यथोचित रीति से नहीं मनाते, तभी तो इस दिन की छुट्टी भी नहीं रहती। अतः आप वत्सों को चाहिए कि भारत की सरकार को इस विषय में एक ज्ञापन (Memorandum) भेजो जिस पर आप सबके हस्ताक्षर हुए-हुए हों। इसमें उन्हें ये भी लिखो कि हम सम्मुख मिलकर ये बात सिद्ध करके बता सकते हैं कि शिव निराकार परमात्मा ही का दिव्य नाम है और शिवरात्रि उन्हीं का ही दिव्य-जन्मोत्सव है।
बाबा ने क्लास में कहा कि जिस किसी भी वत्स को मालूम हो तथा लिखने का अभ्यास भी हो, वो एक ज्ञापन लिखकर ले आये। इस प्रकार बाबा ने गोया हरेक को बुद्धि से विचार करनेके लिये एक विषय दे दिया और जैसे कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पाठशाला के बाद घर में जाकर कोई प्रस्ताव या पत्र लिखने का कार्य दे देता है, उसी प्रकार बाबा ने भी सबको ये कार्य दे दिया। इस काम के मिलनेसे सबको ये तो याद रहता ही है कि हम विद्यार्थी जीवन में हैं, साथ-साथ सभी की बुद्धि एक प्रकार से ज्ञान की दोहराई में भी लग गई।क्योंकि उन्हें ये तथ्य उस ज्ञापन में संग्रहित करने थे कि शिव बाबा की महिमा कैसे सर्वोपरि है और शिव बाबा का कार्य कैसे सर्वश्रेष्ठ है? आखिर कई वत्स ज्ञापन लिख कर ले आये। एक ज्ञापन चुना गया और उसे ठीक-ठाक करके, सबके हस्ताक्षर कराके तथा जो पढ़े-लिखे नहीं थे उनका अंगूठा लगवा के ज्ञापन गृह मंत्रालय को भेज दिया गया तथा बाबा के निर्देशानुसार उसकी प्रतियाँ तत्कालीन प्रधानमन्त्री, अन्य मंत्रियों एवं संसद सदस्यों को भी भेज दी गई। अन्य सेवा केन्द्रोंसे भी ऐसे ही ज्ञापन गृह मंत्रालय के टिकट विभागको (Philatelic Department) भी ऐसाही एक पत्र जाना चाहिए जिसमें उन्हें कहा गया हो कि वे अन्यान्य विशेष पुरुषों से सम्बन्धित उत्सवों पर उन-उन की याद में तो टिकट छापते ही हैं परन्तु उन्हें चाहिए कि सबसे अधिक महान् कर्त्तव्य करनेवाले जो परमपिता शिव हैं, उनके दिव्य-जन्मोत्सव
शिवरात्रि पर भी टिकट छापें।
शिव बाबा की स्मृति में डाक टिकट
बाबा ने उन्हीं दिनों शिव-रात्रि के उत्सव पर एक सम्मेलन भी करने की प्रेरणा दी। बाबा ने कहा कि इनका नाम "शिव परिचय सम्मेलन" और इसमें चर्चा का विषय केवल शिव बाबा का परिचय ही हो। इसमें विभिन्न धर्माचार्यों को निमन्त्रण देकर बुलाया जाये। इस त्रिदिवसीय सम्मेलन के प्रधान हों भारत के उच्चतम न्यायालय के कोई न्यायाधीश ताकि कोई निष्पक्ष व्यक्ति इस सम्मेलन का साक्षी होकर ये कह सके कि उन्हें कौन-सी बात युक्ति-संगत (Rational) लगी। थोड़े ही दिनों के बाद शिव-रात्रि का उत्सव आ पहुँचा। तब देहली में बड़े धूमधाम से शिव-रात्रि का उत्सव मनाया गया।
मातेश्वरी जी की शारीरिक यात्रा और देह-मुक्ति
ब्रह्मा बाबा और मातेश्वरी सरस्वती जी द्वारा ज्ञान-मुरली तथा ज्ञान-सितार के सुखद साज़ सुनते हुए यज्ञ-वत्स, अतीन्द्रिय सुख में रमण करते हुए, अपने आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ रहे थे। अनायास ही मातेश्वरी जी को तन की एक विकट परीक्षा ने आ घेरा। डॉक्टरों के परामर्श से और बाबा के निर्देशानुसार उन्हें तुरन्त ही कानपुर से बम्बई के एक प्रसिद्ध अस्पताल में औषधि उपचार के लिए ले जाया गया। डॉक्टर लोगों ने कहा कि यह व्याधि विकट मालूम होती है परन्तु परीक्षण करने पर पूरा मालूम होगा कि वास्तव में यह क्या है? कुछ भी हो परन्तु तब भी माँ की आत्मिक स्थिति पूर्ववत् आनन्दमय और हर्ष-युक्त ही थी। वे बड़ी से बड़ी शारीरिक व्याधि को भी एक छोटी-मोटी परीक्षा मानते हुए, उसमें से शत-प्रतिशत सफलता सहित पारित (Pass) होने के लिये पूरी तरह तैयार थीं।
विकट रोग की परिस्थिति में स्थिति कैसी हो?
मातेश्वरी जी तो सदा अपनी ज्ञान-वीणा के द्वारा कहा भी करती थी कि "ज्ञान एवं योग के इस मार्ग पर चलते हुए, मंज़िल पर पहुँचने से पहले, कई परीक्षायें आयेंगी जिन्हें हमें पार करना होगा। हमें चाहिए कि उन्हें अपने ही पूर्व-कर्मों का हिसाब-किताब मानें और इस दृष्टिकोण के द्वारा हम हर्षोल्लास को कायम रखते हुए उन्हें पार कर डालें। परन्तु यह तभी सम्भव होगा जब हम इस ज्ञान-विन्दु को अपनी बुद्धि में धारण किये रहेंगे कि यह बीमारी एक प्रकार से हमारा पुराना कर्म-खाता चुकता करने का एक साधन मात्र है।" माँ कहतीं, ‘जबकिसी का ऋण चुकता है तब उसे तो खुशी ही होती है और हल्कापन भी महसूस होता है। इसी प्रकार आपको भी ऐसा अनुभव होना चाहिए कि हम उऋण हो रहे हैं।’ कभी वह समझाती कि ‘रोग के सामने घबराने की ज़रूरत नहीं बल्कि रुग्ण अवस्था में तो याद करना चाहिए कि अन्य सब कर्मों से फ़ारिग़ कराके हमें शिव बाबा की निरन्तर स्मृति में स्थित होकर आनन्द और शक्ति प्राप्त करने के लिये यह रोग तो एक निमित्त कारण बना है; वरना तो मनुष्य कभी फुर्सत पाता ही नहीं है। अतः इस रोग की बलिहारी है कि इसने हमें प्रभु-मिलन का सुख लूटने के लिए हमें फारिग करा दिया है। अतः इस अवस्था को योग द्वारा अविनाशी कमाई के लिए मिला सुअवसर मानकर ईश्वरीय लग्न में मग्न होने के पुरुषार्थ में लग जाना चाहिये। दुःख देने वाली परिस्थिति में तो प्रभु की याद स्वतः ही आती है।’
मातेश्वरी जी ये भी कहा करती थीं कि ‘हम यह तन तो अब प्रभु को दे चुके हैं; अतः अब इसमें हमारा ममत्व अथवा हमारी आसक्ति तो हो ही नहीं सकती। और अब जबकि हम जान चुके हैं कि शरीर हमारा रथ है और हम इस पर रथवान हैं, तो हमें साक्षी होकर ही इस रथ की देख-रेख अथवा संभाल करनी चाहिए। इसके कारण से कभी लेश-मात्र भी दुःख की लहर हमारे मन में अथवा हमारे चेहरे पर नहीं आनी चाहिए। मातेश्वरी जी ने कई बार समझाया था कि आध्यात्मिक पथ पर हर एक के सामने पहले या पीछे ये परीक्षा आती अवश्य है और, जितना-जितना हम आध्यात्मिक क्षेत्र में रुस्तम के समान बड़े योद्धा बनते हैं, उतनी-उतनी ये परीक्षायें भी रुस्तम जैसे ही बलवान रूप में हमारे सामने आती हैं। अतः ये तो हमारे पुरुषार्थ की तीव्रता को प्रतिबिम्बित करती हैं और इनसे हमें अपनी स्थिति का ज्ञान होता है। इसलिये इनमें घबराने की ज़रूरत नहीं......’
बाबा की वाणियों में अग्रिम शिक्षा
शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा द्वारा भी ज्ञान के ये गहन तत्त्व अनेक प्रकार से समझाए थे। माना कि वह हरेक को पहले ही से इस प्रकारकी परिस्थिति से भी पार होने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहे थे। बाबा ये कहा करते थे कि ‘अब आप लोग अपने इस उच्च आध्यात्मिक पुरुषार्थ के द्वारा मानव से देवता बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो जिसका अर्थ यह होता है कि अब आप सम्पूर्ण पवित्रताके द्वारा निरोग, सदा शान्त, सदा सुख-पूर्ण अवस्था को प्राप्त कर लेंगे। अतः ये रोग-शोक इत्यादि आपसे गोया अन्तिम विदाई लेने के लिए आते हैं। आप इसी दृष्टि से इन्हें देखिये, इन्हें सलाम करिये और इस हर्ष में रहिये कि इसके बाद तो हम इनसे मुक्त हो जायेंगे और फिर जब काया मिलेगी भी तो देवताओं के समान सदा निरोग, कंचन-सम काया मिलेगी जो सर्वांग सुन्दर होगी और जिसे काल, दुर्घटना, रोग इत्यादि आतंकित नहीं कर सकेंगे।’ अतः इस प्रकार के ज्ञान के अस्त्रों-शस्रो से सुसज्जित मातेश्वरी सरस्वती जी सदा प्रसन्न मुद्रा में दिखाई देतीं।उनका चेहरा सदा एक ताजे फूल की तरह खिला हुआ दिखाई देता।उनके मुख-मण्डल पर ऐसी आभा बनी रहती कि बिना बताए कोई भी न कह सकता कि उनका शरीर रोगी है। माँ तो इस परीक्षा-पत्र को हल्के रूप में लेते हुए इतना मानसिक सन्तुलन बनाये हुए थीं कि जो सब यज्ञ-वत्सों के सामने एक अनुकरणीय एवं उज्वल उदाहरण था और सामान्य लोगों के लिये तथा डॉक्टरों के लिये एक चमत्कार था।
यह ईश्वरीय संस्था क्या है?
अस्पताल में कानों-कान अन्य लोगों को यह खबर हो गई थी कि इस अस्पताल में एक अलौकिक शक्ति-सम्पन्न पेशेंट भी है। उनसे मिलने जब श्वेत वस्त्राधारी ब्रह्माकुमारियाँ तथा ब्रह्माकुमार आते थे तो अस्पताल में आने-जाने वाले तथा वहाँ रहने वाले लोग ये जानने के लिए सदा उत्सुक रहते थे कि आखिर यह ईश्वरीय संस्था क्या है? उन सफेद वस्त्रों को तथा हर्षित चेहरों को देखकर वे समझते थे कि ये अवश्य ही कोई ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में किसी अनुशासन और विधि-विधान को अपनाया है तथा जिन्होंने पवित्रता और शान्तिको पाया है। इसलिये ये बड़ी उत्कंठा से अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करते। उन्हें परिचय भी दिया जाता और सत्साहित्य भी। गोया माँ के वहाँ जाने से कितनों ही को ईश्वरीय संदेश मिल गया-माँ के कदम तो सदा सेवा की ही ओर बढ़ते थे और अब भी माँ ईश्वरीय सेवा के ही निमित्त बनी हुई थीं। कुछ दिन के बाद लोग माँ से मिलने आने लगे। वे माँ के ज्ञान-युक्त वचनों को सुनकर गद्गद् होते तथा उनके कमल-हस्तों से प्रसाद प्राप्त करते। इधर डाक्टरों ने भी जो औषधि-इलाज करना था सो कर लिया। लगा कि माँ स्वस्थ हो गई हैं वे स्व में स्थित सदा रहती ही थीं।
माँ से सभी प्रभावित, सभी सन्तुष्ट
अब माँ फिर से पूरी तरह ईश्वरीय सेवा में जुट गयीं। सेवा-कार्य में वे सदा अथक तो थी हीं। वे बम्बई से बैंगलौर गयीं, बैंगलौर से फिर बम्बई आयी तथा मधुबन एवं अन्य कई स्थानों पर भी उन्होंने ज्ञान का शंख-नाद किया। उनकी वाणी में बड़ा ओज और उतना ही,माधुर्य था। इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के विरोधी भी जब उनके सामने आते तो हत्तप्रभ रह जाते। वे उनके अपार वात्सल्य, उनकी अमिट हर्ष-मुद्रा, उनके पवित्रतापूर्ण व्यक्तित्व, उनके दिव्य-तेज, ज्ञान के समझनेके उनके अति सरल एवं सरल तरीके और माँ-बच्चे के सम्बन्ध की अनुभूति से इतने प्रभावित हो जाते कि सहसा ही उनके मुख से ये शब्द निकलते कि "हमने तो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के बारे में कई आक्षेप सुन रखे थे परन्तु अब मातेश्वरी जी के जीवन की झलक को देखकर तो हमें बहुत ही प्रसन्नता हुई है। इनका जीवन तो सचमुच महान है। हमें यहाँ आकर ऐसा लगता है कि सचमुच ये हमारे आत्मन् की माँ हैं। इनकी ज्ञान की वाणी माँ की मीठी लोरी है; नहीं-नहीं वो सुषुप्त आत्मा को जगा देने वाले, माँ के प्यारे- प्यारे स्वर हैं।" कोई कहता- "मुझे तो ऐसे लग रहा था कि जिस वैष्णो देवी का मैं पुजारी हूँ, आज मेरे नैनों ने साक्षात् उस देवी को इस धरा पर देखा है।" कोई-कोई तो भरी सभा में एक छोटे बच्चे की तरह - "माँ, माँ" कहने लगता और माँ के प्रति श्रद्धा एवं प्यार से उसके नैन भी गीले हो जाते। तब माँ कहतीं, हाँ, बच्चे! अब तो सभी आन मिले हैं। हम सभी उस देवी-देवता घराने के ही तो हैं जो स्वयं को भूल गये थे और अपने कर्म-खाते को साथ लिए हुए बिछुड़कर कोई कहीं और कोई कहीं चले गए थे। अब तो शिव बाबा ने आकर आत्मा की और जन्म-जन्मान्तर के पार्ट की पहचान दी है और हमारे लिए पुरुषार्थ का फल भी हमें प्रत्यक्ष कराया है। अतः अब तो अतीन्द्रिय सुख प्राप्त करने तथा ज्ञान एवं योग द्वारा प्रभु-मिलन मनाने एवं पवित्रता का सच्चा सुख पाने का मौसम है।"
माँ में सम्पूर्णता के चिह्न
सचमुच, उन दिनों माँ का व्यक्तित्व अध्यात्म की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ भासित होता था। उनकी ज्ञान की गहराई, योग की ज्वाला, दिव्य गुणों की शीतलता और ईश्वरीय सेवा की सूझ, स्फूर्ति और रीति, माँ की सम्पूर्णता की ओर संकेत कर रही थी परन्तु किसी के मन में ये न आया था कि वे सम्पूर्णता के चिह्न कुछ भावी वृतान्तों के संकेतक भी है।
चिकित्सकों की घोषणा
सभी वत्स माँ की उच्च स्थिति से प्रेरणा पाकर जीवन को दिव्य बनाने तथा दूसरों को भी ईश्वरीय संदेश देने के अलौकिक कार्य में,माँ को अपनी प्रमुख सेनानी मानकर, माया पर विजय पाते हुए,पवित्रता की स्थापना रूपी मंज़िल की ओर बढ़ रहे थे। अचानक मातेश्वरी जी के तन में फिर वह पुरानी व्याधि फिर से प्रगट हो गई और वो दिनों-दिन उग्र रूप धारण करने लगी। चिकित्सकों ने जब शरीरका निरीक्षण (Check-up) किया तो वे निराशा-भरे शब्दों में बोले कि अब तो यह व्याधि असाध्य हो गयी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मातेश्वरीजी अब कुछ ही दिनों की मेहमान हैं।
माँ की अभय एवं निश्चिन्त अवस्था
इधर स्वयं शिव बाबा से जब माँ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने भी कहा कि अब इस स्थूल शरीर में माँ का पार्ट शीघ्र ही पूरा होने वाला है। बाबा ने यह भी कह दिया कि भले ही ये बात माँ को बता दी जाय और कि माँ की स्थिति इतनी उच्च है कि इस बात को सुनकर भी उनकी स्थिति में रंच भी अन्तर नहीं आयेगा। हुआ भी ऐसे ही माँ को न किसी प्रकार का भय था और उनके मन में कोई आशा-तृष्णा तो थी ही नहीं और वे तो योग द्वारा सम्पूर्णतः की दहलीज़ पर पहुँच ही चुकी थीं। अन्तः वह तो हर हाल में खुश ही थीं।
विदेह अवस्था और प्रेरणादायक नियमित जीवन
अब बम्बई से प्रभु-प्रेरणा एवं डॉक्टरों के परामर्श के अनुसार मातेश्वरी जी को मधुबन में लाया गया था। माँ मधुबन में जिस कमरे में निवास कर रही थीं, उस कमरे में एक एम्पलीफायर (Amplifier) लगा हुआ था जिसके द्वारा वे नित्य-प्रति प्रजापिता ब्रह्मा के मुखारविन्द द्वारा शिव बाबा की मुरली सुना करती थीं। मातेश्वरी जी ने मुरली सुनने में एक भी दिन नागा नहीं किया होगा। वे अपने व्यावहारिक (Practical) जीवन में सदा ही दूसरों के लिए प्रेरणा और शिक्षा का स्रोत थी और इस प्रकार प्रतिदिन नियमित ज्ञान-श्रवण की उनकी अचूक टेर भी बड़ी प्रेरणादायक थी। डॉक्टर लोग जिसे असह्य कष्ट मानते थे, उसे वे शान्ति और खुशी से सहन कर रही थीं। यद्यपि व्याधि शरीर को अपने शिकंजे में लिये हुए थी तथापि मातेश्वरी जी साक्षी अवस्था में स्थित थीं जिससे ये स्पष्ट था कि वे विदेह अथवा अशरीरी स्थिति में थी। व्याधि का शरीर पर काबू होते हुए भी अपने मन पर तो मातेश्वरी जी का अपना ही अधिकार था।
बाबा की गम्भीरता और दिव्य कार्य-विधि
ब्रह्मा बाबा को भी शिव बाबा ने ये संदेश दे दिया था कि १५ दिन में मातेश्वरी जी कर्म-भोग से मुक्त होने वाली हैं। परन्तु यह पेशगी समाचार पाकर भी बाबा के चेहरे से किसी भी वत्स को कोई ऐसी सूचना नहीं मिलती थी। कर्तव्यपूर्ति के तौर पर बाबा जब सेवा-केन्द्रों पर उपस्थित ब्रह्माकुमारियों व ब्रह्माकुमारों को पत्र लिखते थे तो वे ये लिख भी दिया करते थे कि मधुबन में आकर बाबा से मिल जाओ और माँ का भी मुख देख जाओ परन्तु उनकी रीति एवं विधि ऐसी थी जिससे दिव्य-वातावरण में हलचल या चिन्ता की लहर व्याप्त नहीं थी। बाबा ने पूर्णता कर्त्तव्य भी निभाया परन्तु अन्तर्मुखता, गम्भीरता तथा उच्च आत्मिक स्थिति को कभी नहीं छोड़ा।
कुछेक संदेश-पुत्रियों ने भी ऐसे साक्षात्कार किये थे जिनसे वे समझ गयी थीं कि अब मातेश्वरी जी शीघ्र ही इस शरीर से विदा लेंगी। उदाहरण के तौर पर ब्रह्माकुमारी संदेशी जी ने संदेश दिया कि माँ तीन दिन में मुक्त हो जायेंगी। परन्तु सामान्यतः यज्ञ-वत्स यही समझते थे कि माँ ठीक हो रही हैं। और सम्भवतः थोड़े समय के बाद वे रोग-मुक्त अर्थात् स्वस्थ हो जायेंगी।
व्याधि और शारीरिक उपाधि से विदा की घड़ी निकट
आज बृहस्पतिवार था जिसे 'सद् गुरुवार' भी कहा जाता है। ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि जी ने बम्बई में अमृतवेले योगावस्था में देखा कि मातेश्वरी जी को अधिक तकलीफ़ है और वह जा रही हैं। यह देखकर उनका किंचित विचार चला और उन्होंने मधुबन में फ़ोन पर समाचार पूछा। तब उन्हें भ्राता विश्व किशोर जी ने कहा कि माँ तो कहती हैं कि मैं ठीक हूँ परन्तु मैं समझता हूँ कि व्याधि उग्र रूप ले गई है। आप आयें तो अपने साथ ऑक्सीज़न लेते आयें। इससे ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि जी ने समझा कि अवश्य ही स्थिति गम्भीर है।उससे एक दिन पहले, सायंकाल को बाबा भी मातेश्वरी जी को काफ़ी देर योग-दृष्टि देते रहे थे और आज भी बाबा बार-बार माँ के कमरे में जाते थे और योग द्वारा मातेश्वरी जी को एक प्रकार से मदद दे रहे थे। बाबा ब्रह्माकुमारी सन्तरी जी को भी बार-बार भेज रहे थे कि माँ को देखकर आओ। उस दिन ब्रह्माकुमारी पुष्प शान्ता जी ने भी बम्बई में ध्यानावस्था में माँ को एक सफ़ेद चादर में लिपटे हुए देखा था।
वत्सों - यज्ञ निवासियों से मुलाकात
आज बृहस्पतिवार तो था ही। बृहस्पतिवार को मातेश्वरी जी वत्सों से मिला करती थीं और उन्हें 'टोली' (प्रसाद) दिया करती थीं। इस बार भी सभी वत्स एक पंक्ति बाँधे, एक-दूसरे के बाद माँ के वरद् हाथों से स्नेह और पवित्रता-भरी टोली लेने आ रहे थे। उन्हीं दिनों मधुबन के बगीचे में अंगूरों के गुच्छे उतारे गये थे। बाबा मातेश्वरी जी के हाथ में अंगूर देते जा रहे थे और मातेश्वरी जी सबको योग-दृष्टि से देखते, मुस्कराते और प्यार करते अंगूर देती जा रही थीं। वत्सों के बाद, यज्ञ के माली, मिस्त्री इत्यादि ने भी आज माँ के हाथों से प्रसाद पाया। पहले तो सदा बाबा भी टोली दिया करते और माँ भी, परन्तु आज बाबा माँ के हाथ में दे रहे थे और माँ स्वयं वत्सों को टोली देती जा रही थी। अवश्य ही इसमें कोई रहस्य समाया हुआ था।
उस दिन मधुबन में सेवा केन्द्रों से काफी लोग आकर रहे हुए थे। अतः 'टोली' लेने वालों की पंक्ति भी बहुत बड़ी थी और सबको टोली-प्रसाद देने-देने में ही काफी समय लग गया। परन्तु माँ की आकृति-प्रकृति से और उनके कार्य-कलाप से ये बिल्कुल भी भासित नहीं होता था कि आज विश्व-इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना होने वाली है। बल्कि उनका मुख आज बहुत ही कान्ति-युक्त दिखाई देता था। सभी लोग माँ से मिल कर और उनसे प्रसाद लेकर ही अपने-अपने स्थान की ओर प्रस्थान करने लगे। माँ में आत्म-बल, मनोबल अथवा नियंत्रण शक्ति इतनी ज़बरदस्त थी कि शरीर के असह्य कष्ट को वह ऐसे छिपा लेती थी कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। घंटों तक वह योग- युक्त अवस्था में स्थिर रहकर सभी को योग-शक्ति का वरदान देती रहीं और मातृवत् मौन स्नेह भी व्यक्त करती रहीं।
अन्तिम विदा
अब मध्याह्नोत्तर काल (Afternoon) था। सब लोग अपना भोजन इत्यादि भी प्राप्त कर चुके थे। यज्ञ का दैनिक कार्य भी प्रायः हो चुका था। तब मातेश्वरी जी को ऐसा महसूस होने लगा कि अब अन्तिम विदा लेनेका समय आ पहुँचा है। इस विश्व-नाटक में ये कैसी अद्भुत व्यवस्था है कि माँ सबसे दिव्य एवं विधिवत् मुलाकात तो कर ही चुकी थी और अब उनका आत्मन् विश्व की व्यापक सेवाके लिए अशरीरी होने को आतुर हो रहा था। मातेश्वरी जी में कुछ इसप्रकार चिह्न प्रगट होते देखकर तुरन्त ही बाबा को सूचना दी गई और बाबा क्षण-भर में ही मातेश्वरी जी के पास पहुँचकर उन्हें अत्यन्त प्रबल योग-शक्ति देने लगे। आखिर भावी को जो मंजूर था, वही हुआ।मातेश्वरी जी अपनी काया-क्लेवर को त्यागकर देहमुक्त हो गयीं। इसप्रकार विश्व के इतिहास में २४ जून, १९६५ को एक अत्यन्त महान् आत्मा का 'जगदम्बा सरस्वती' नामसे सर्व-ज्ञात कर्त्तव्य साकार रूपमें समाप्त हो गया और माँ के मुखारविन्द से जो मधुर, गहन,अनमोल ज्ञान के स्वर निकलते रहे थे, वे यादगार रूप बन गये। और माँ इस सृष्टि-मंच पर अपने दिव्य-कर्त्तव्यों की एक ऐसी अमिट छाप डाल गयीं कि जिसके कारण वह अमर हो गयीं।
सभी यज्ञ-वत्सों को सूचना देने में बाबा की दिव्य-युक्ति
सभी यज्ञ-वत्सों को तो क्षणांश में ही यह समाचार मिल गया। अन्य सभी सेवा केन्द्रों पर भी तार, टेलीफोन इत्यादि द्वारा यह समाचार दे दिया गया परन्तु बाबा का तो हर एक कर्त्तव्य सदा अलौकिक ही होता था और उस द्वारा सबकी उन्नति ही होती थी। अतः जब यह समाचार सबको दिया गया तब साथ ही साथ सभी को यह भी कह दिया गया कि शिव बाबा ने मानो सभी के आगे यह एक प्रैक्टिकल परीक्षा का प्रश्न-पत्र रखा है, जिसमें सभी को उत्तीर्ण होनेका भरसक प्रयत्न करना है। बाबा ने ये भी कहलवा दिया कि यदि सभी बच्चे, अखण्ड योग-युक्त अवस्था में रहेंगे और मन में कोई भी साँसारिक या दुःखपूर्ण संकल्प-विकल्प नहीं लायेंगे तो हो सकता है कि शिव बाबा मातेश्वरी जी के आत्मन् को इस रथ में वापिस भेज दें।अब माँ के शरीर रूपी रथ को योग-हाल में लाया गया था।बाबा के उपरोक्त कथन को सुनकर सभी यज्ञ-वत्स उसी हाल में अचल योगावस्था में स्थित होने के संकल्प से योग-कक्ष में जाकर बैठ गये। माँ से सभी का अपार स्नेह तो था ही। अतः सभी का प्रयत्न यही था कि आज हमारे योग की सहज समाधि ऐसी शक्तिशाली और स्थितर हो कि शिव बाबा हमारी प्यारी माँ को हम नन्हें-मुन्ने बच्चों के बीच फिर से भेज दें। सभी केन्द्रों पर जब ये समाचार पहुँचा था तो वहाँ का वातावरण अव्यक्त हो गया था और सभी सामूहिक रूप से योग की उच्च अवस्था में स्थित होने में लग गये थे। कहीं भी ऐसी कोई हलचल, कोई शोक, कोई बोल, मृत्युलोक की इस घटना का कोई चिह्न, किसी अत्यन्त स्नेही के देहावसान के कारण कोई विलाप,मुख पर अपनी अतीव प्यारी माँ से बिछुड़ने की कोई रेखा, नैनों में कोई अनमोल चीज़ खो बैठने सम्बन्धी कोई मौन इशारे, कुछ भी तो नहीं था क्योंकि ये सभी उस योग की साधना में लीन हो गये थे अथवा योग ने इनका हरण कर लिया था और यही तो बाबा की युक्ति थी। इस युक्ति द्वारा ही तो बाबा बच्चों को इस परिस्थिति से पार ले जाना चाहते थे। देखिये तो, वातावरण में कोई भी ऐसी लहर नहीं थी, जो साँसारिक वृत्ति वाले लोगों के यहाँ ऐसी घटना घटने से होती। गोया निकट सम्बन्धी के शरीर छोड़ने पर हमारी अवस्था कैसी होनी चाहिए।
पहले ही से वत्सों को तैयार करना
वास्तव में, बाबा तो पिछले डेढ़-दो वर्षों से ही वत्सों को अप्रत्यक्ष रूप से तैयार करते चले आ रहे थे। बाबा कहते- "बच्चे, हम सब की माता और हमारे पिता तो शिव ही हैं। वह हमारी चमकीली माँ हैं।उस-जैसी तो दूसरी कोई माँ होती नहीं। इसलिए वत्सो, देहधारियों से बुद्धियोग हटाकर एक ही से लगाओ।" कभी बाबा कहते, "बच्चो, साकार रूप में आपकी माँ तो ये ब्रह्मा ही है, क्योंकि शिव बाबा, जो आत्माओं का पिता है, इसी के ही मुख से ज्ञान देकर आपको यह 'मरजीवा जन्म' देता है। अतः यद्यपि ब्रह्मा शारीरिक दृष्टिकोण से पुरुष-तनधारी है तथापि ज्ञान के इस सूक्ष्म दृष्टिकोण से वह आपकी 'माता' है और आप सभी उसके मुख-वंशज ब्राह्मण बच्चे हैं। चूंकि अब माता-गुरु का सिलसिला जारी होता है और अब माताओं ही को आगे रखना है तथा इस ज्ञान-यज्ञ में मातायें अधिक हैं, अतः उनको संभालने के लिए तथा यज्ञ के कार्य को सुचारू रूप से वहन करने के लिए सरस्वती जी को निमित्त बनाया गया है। इसीलिए ही वे यज्ञ की माता हैं, क्योंकि वे आपको ज्ञान की मीठी लोरी देती हैं और यज्ञ माता के तौर पर इसे चलाती है।"
कभी बाबा ये भी कहते, "वत्सो, अब जब आपको त्रिमूर्ति, त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ स्वर्गिक राज्य-भाग्य के देने वाले तथा दिव्य-बुद्धि और दिव्य-दृष्टि का वरदान देने वाले शिव बाबा मिल गये हैं तो आपको सदा ही खुश रहना चाहिए और अपने सौभाग्य को देखकर हर्ष से सराबोर रहना चाहिये। यहाँ तक कि, चाहे जैसी भी घटना घटे, आपकी खुशी का पारा नहीं उतरना चाहिए। बच्चे, इस ज्ञान और योग के फलस्वरूप आपको अतीन्द्रिय सुख से फूला नहीं समाना चाहिये। यहाँ तक कि यदि कुछ ऐसा हो जाय जो न आपके मन में था न चित्त में, तो भी आपके आनन्द की पराकाष्ठा बनी रहनी चाहिए... इसलिए याद रखो, बच्चे, कि अम्मा मरे तो भी हलवा खाओ और अब्बा मरे तो भी हलवा खाओ क्योंकि अब तो आपको शिव बाबा मिल गए हैं, जो अमर पिता है और जिनसे ही हमारे सर्व-सम्बन्ध हैं। यदि अन्य किसी भी देहधारी का देहावसान होने पर कोई ज़रा भी आँसू बहायेगा तो मानो कि अभी वो देह-अभिमानी है और ईश्वरीय पढ़ाई में फेल (Fail) है.. तब उस समय बाबा के ये महाबोल सुनते समय भला कोई क्या समझ सकता था कि आगे चलकर क्या होने वाला है और बाबा की ये वाणी किसलिए चलती है?
बाबा की ज्ञान-युक्त काव्यमयी वाणी
उधर सबके मन में ये उत्सुकता बनी रही कि अब इस विश्व- नाटक में आगे कौन-सा दृश्य आता है? योग के प्रोग्राम के समापन से पहले अमृतवेले ब्रह्मा बाबा ने ज्ञान के कई अनमोल रहस्य समझाये।बाबा बोले, "वत्सो, जो-कुछ भी होता है, उसे साक्षी होकर देखते चलो। अपनी बुद्धि की डोरी शिव बाबा के हाथ में दे दो। मैं जानता हूँ कि आप बच्चों को माँ से बहुत प्यार था परन्तु माँ मेरी भी तो माँ थी क्योंकि वे तो जगत की अम्बा थीं और जगत में तो मैं भी सम्मिलित हूँ। देखो, बाबा ने जब इस ज्ञान-यज्ञ की स्थापना के समय तन, मन, धन शिव बाबा को समर्पित किया था तब बाबा ने भी स्थूल रूप में इन माताओं के ही सामने तो अपना सब-कुछ रखा था और इनमें माँ तो अग्रगण्य थीं। अतः यदि माँ के शरीर के त्याग से किसी को कुछ क्षति का आभास होना चाहिए, तो वह तो सबसे पहले अधिक मुझे ही होना चाहिए; विशेषकर इसलिए भी कि वे तो यज्ञ के कार्य को सम्भालने में मुझे अनुपम सहयोग देती थीं। परन्तु बाबा तो यही सोचता है कि इस ज्ञान-यज्ञ का रचयिता तो शिव बाबा ही है और, इसलिये वह कल्याणकारी परमपिता हमें जैसे चलायेगा हम वैसे ही चलेंगे।"
फिर पिताश्री ने शिव बाबा को सम्बोधित करके अपने नैनों और मुख को ऊपर करते हुए, मानो सब वत्सों की ओर से कहा, "शिव बाबा, ओ मीठे शिव बाबा, हमारी माँ को वापस भेज दो न बाबा !! ये कैसा विचित्र ड्रामा है! कल्प के बाद मिली हमारी ये माँ भी हमसे छीन ली गई !! बाबा, अभी तो महाविनाश में कुछ समय पड़ा ही है। अतः इस संगमयुग में अभी तो माँ का पार्ट और कुछ समय तक चलना ही चाहिये।" बाबा इस प्रकार से बड़े अलौकिक स्वर से एवं आत्मिक स्मृति से शिव बाबा के दरबार में आवेदन-निवेदन कर रहे थे मानो उन द्वारा सब वत्सों के मन की पुकार अति उत्तम शब्दों में शिव बाबा के दरबार में सुनाई जा रही थी। अपने अत्यन्त निकटतम एवं अलौकिक साथी को, यज्ञ के अपरिमित कार्य में एक अथक सहयोगी को, अपनी इस आध्यात्मिक सेना की एक अत्यन्त कुशल सेनानी को, अपनी मुख-रचना ब्रह्माकुमारियों और ब्रह्माकुमारों में से एक अत्यन्त उत्तम कुमारी रत्न को इस ज्ञान-यज्ञ के इतिहास में आये बड़े-बड़े तूफानों के बीच में भी एक दृढ़ निश्चयवान, फर्मांबरदार, वफादार एवं कार्यकुशल, मुख्य कार्यकर्ता को, अपने परिश्रम और सेवा द्वारा तैयार किये गये एक सर्वश्रेष्ठ नमूने को साकार रूप में खोकर भी बाबा के नैन-बैन इत्यादि से ऐसा लेश-मात्र भी चिह्न नहीं मिलता था कि बाबा के मन पर दुःख की परछाई पड़ी है।
बाबा के न्यारे और प्यारेपन की स्पष्ट झलक
बाबा का समस्त व्यवहार एक आख्यान के प्रसिद्ध मोहजीत राजा के समान था। इस घटना से ये दो टूक स्पष्ट हो गया कि बाबा का प्यार सदा आत्माओं से रहा, शरीरों से नहीं। उनका स्नेह लौकिक माता-पिता से भी बढ़कर था परन्तु इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि वह प्यार निःस्वार्थ और निर्मल था। बाबा का प्यार सदा एक झर-झर करते झरने की अविरल धारा के समान होता था। परन्तु वह जितना ही उन्मुक्त था, उतना ही बाबा उसका संवरण करने में भी कमाल करते थे। विश्व-मंच पर एक दृश्य को देखते-देखते उस पर पर्दा पड़ जाने पर जब दूसरा दृश्य सामने आता था तो बाबा अपने मन में पिछले दृश्यों का चितवन छोड़कर अबके दृश्यों को साक्षी-द्रष्टा होकर देखते चलते थे। इसलिये वे सदा न्यारी और प्यारी अवस्था में रहते थे। उनमें एक उत्तरदायित्व, तथा बुजुर्गी होने के अतिरिक्त एक अजीब हल्कापन भी रहता था और इस घटना ने बाबा के अलौकिक जीवन के इस पहलू पर प्रकाश केन्द्रित किया था। इससे विदित होता था कि बाबा का शिव बाबा में अटल-निश्चय था और इस विश्व-नाटक की नियति (Predetermination) में भी अटूट निश्चय था; उनकी अवस्था हर परिस्थिति में स्थिर थी।
बाबा ने सर्वोत्कृष्ट प्रकार की रूहानियत से और एक उच्च कोटि के मनोवैज्ञानिक की सूझ से एक अलौकिक शिक्षक एवं मार्ग-प्रदर्शक के नाते से, बहुत ही निराले ढंग से यज्ञ-वत्सों को इस परीक्षा से पार करवाया और एक दीप्यमान एवं कान्तिमान सूर्य की तरह सामने आये बादलों को बिखेर कर हटा दिया।
मातेश्वरी जी के बारे में शिव बाबा द्वारा स्पष्टीकरण एवं सन्देश
इधर शिव बाबा ने भी सन्देश दिया कि इस कायिक रूप में मातेश्वरी जी का इतना ही पार्ट था, बाबा ने कहा "वत्सो, सरस्वती के चित्र सदा युवा अवस्था के ही प्राप्त होते हैं? उसकी मूर्तियाँ भी कभी वृद्धा अवस्था की नहीं बनाई जातीं। वत्सो, क्या आपने सोचा कि इसका कारण क्या है? इसका तो यही कारण है कि इस नाम एवं रूप से उनका कर्तव्य इस अवस्था तक ही चलता है। प्रजापिता ब्रह्मा के तो सदा वृद्धावस्था ही के चित्र मिलते हैं परन्तु जगदम्बा के सभी स्मरण- चिह्न ढलती आयु से पहले के ही हैं क्योंकि उन्होंने इस सृष्टि-मंच पर ज्ञान के राज़ों तथा साज़ों से मनुष्य-आत्माओं को पवित्र बनाने का कर्तव्य इसी आयु तक किया। परन्तु, वत्सो, सरस्वती तो जगत की अम्बा है; अर्थात् उन्होंने तो जगत-भर के नर-नारियों को ज्ञान देने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्य करना है, अतः अब वे प्रकाशमय, दिव्य एवं सूक्ष्म रूप से कुछ समय तक यह अलौकिक कार्य करेंगी और बाद में सतयुगी सृष्टि की स्थापना के ईश्वरीय कार्य में अन्य रीति से भी निमित्त बनेंगी।"
ये जगदम्बा की यात्रा है, ज़रा ध्यान से निकले
इस प्रकार त्रिकालदर्शी शिव बाबा ने तो मातेश्वरी जी के बारे में बता ही दिया था और सन्देश पुत्रियोंने भी ध्यानावस्था में माँ को सम्पूर्ण प्रकाशमान् अवस्थामें सूक्ष्म-दिव्य लोक में देखा था। पिता-श्री को तो यह ज्ञात था ही; वे तो वत्सोंकी अवस्थाको योग-युक्त बनाये रखने के लिए ही विभिन्न प्रकार की अलौकिक युक्तियों से उन्हें इस घड़ी तक ला रहे थे। अब बाबा ने शव यात्रा की तैयारी के लिए वत्सोंको आज्ञा देते हुए कहा-देखो बच्चे, यह एक ऐसी योगिन आत्मा थी जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है। इसने समुच्चय ईश्वरीय ज्ञान को अपने जीवन में युक्ति-युक्त रीति से ढाल लिया था। ये बाल-ब्रह्मचारिणी थी जिन्हें कभी अपवित्र वृत्ति से किसी ने स्पर्श भी नहीं किया। इनकी स्थिति इतनी महान थी कि इनके ओजस्वी भाषण से,इनकी रूहानी दृष्टि से, इनकी दिव्य-कृति से और इनके पवित्र आत्मिक प्रकम्पनों (Spiritual Vibrations) से कितने अपवित्र जनों के मन का मैल धुल जाता था। इनकी योग-साधना बहुत ही उच्च कोटि की थी और नियमों का पालन अभंग और अटूट था। अतः, हे वत्सो, देखना कि ये शव यात्रा का सारा कार्यक्रम बहुत योग-युक्त रीति से ही, इन अतिंम क्षणों में भी योगयुक्त वत्सों के हाथों द्वारा ही यह सारा कार्य सम्पन्न हो और यह जो अर्थी निकाली जाये, इसके साथ केवल वही जाये, जो हंस के समान मति और गति वाले हों। वत्सो यह याद रख लेना कि यदि आप शिव बाबा की याद में रहेंगे तो हो सकता है कि अंतिम संस्कार की तैयारी के सिरे पर पहुँच जानेपर भी शिव बाबा ममा को लौटा दें। यह तो आपने सुना भी होगा कि कई बार ऐसा होता है कि लोग शव को मरघट पर ले जाते हैं परन्तु वहाँ जाकर मृतत का शरीर फिर से चेतना सम्पन्न हो जाता है और लोग खुश होते-होते उसे वापिस ले आते हैं। अतः वत्सो अपने उत्तरदायित्व को समझाते हुए योग-युक्त रहना। सचमुच बाबा का 'भागीरथ' नाम सार्थक हो रहा था। बाबा का पुरुषार्थ अथक, अतुल और सर्वांगीण होता था। जब डॉक्टरों ने मातेश्वरी जी के रोग को असाध्य घोषित किया था और दवा-दारू को व्यर्थ बता दिया था तब भी बाबा लौकिक और अलौकिक दोनों रीति से औषधि उपचार कराने से पीछे नहीं हटे थे। तब भी उन्होंने सभी की उम्मीद बंधाये रखी थी और ये कहा था कि मनुष्य को कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और पुरुषार्थ कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इस विराट् विश्व-क्रीड़ा में बहुत बार 'न' की बजाय 'हाँ' हो जाती है और घोर निराशा का स्थान सफलता ले लेती है। अब भी हाल ये था कि बाबा सब लौकिक यत्न समाप्त होने पर भी अलौकिकता के प्रयोग को बनाये रखना चाहते थे और बच्चों को यहाँ तक जीवन में बनाना चाहते थे कि जहाँ तक आशा की रंच भी गुंजाइश हो। वे मायूसी एवं पुरुषार्थ-हीनता को सदा के लिए और सम्पूर्ण रीति से वत्सों के जीवन से समाप्त कर देना चाहते थे।
अब मातेश्वरी जी के शरीर को अन्तिम यात्रा के लिए तैयार कर लिया गया था। दिव्य गुणों की मूर्त माँ की देह को पवित्रता एवं गुणों के प्रतीक-पुष्प मालाओं से श्रृंगारा गया। कुछेक अन्य नगरों के सेवा- केन्द्रों से ब्रह्मा-वत्स भी आ पहुँचे थे। आखिर सभी योगीराज मातेश्वरी जी की काया यात्रा में सम्मिलित होकर चल पड़े। मंजिल पर पहुँचकर उन्होंने अपने स्थूल नेत्रों से उसकी छवि को अन्तिम बार निहारा। सबके मन रूपी नेत्र के सामने माँ के अलौकिक चरित्रों की एक फ़िल्म शीघ्रता से घूम गई। उनके चरित्रों द्वारा प्राप्त ज्ञान-सेवाओं के लिए मानो कोटि-कोटि बार श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे। उन्हें लगता था कि यदि मानव देह में मनुष्य का इस विश्व मंच पर पार्ट हो तो ऐसा हो।
आखिर चन्दन की सेज ने माँ की देह को अपनी गोद में ले लिया और मातेश्वरी जी का शक्तिशाली, पवित्र आत्मन् तो देह रूपी आशियाने से पहले उड़ान भर ही चुका था, अब कायिक तत्त्व भी तत्त्वों में मिल गए और सृष्टि के तत्त्वों को पावन करने की सेवा में लग गये। विश्व इतिहास का एक प्रमुख अध्याय समाप्त हुआ। विधि की लेखनी ने अग्नि की लपटों से ज्वलन्त शब्दों में अन्तिम पंक्तियां भी लिख डाली। परन्तु यद्यपि माँ स्थूल नेत्रों से अंतर्ध्यान हो चुकी थीं, वे विश्व के कल्याण का संकल्प साथ ले जाने के कारण कल्याणकारी शिव बाबा के पास अपने आगे के पार्ट के लिए तैयार होने गयी थीं। इस धरा के आँचल पर बैठी ध्यान-निमग्न, ब्रह्माकुमारियों, संदेश- पुत्रियों ने अपने दिव्य-चक्षुओं से अनेकों बार माँ को शिव बाबा के साथ अव्यक्त रूप में साक्षात् देखा था।
इधर एक ओर तो आह्वान करने पर शिव बाबा योग-युक्त वत्सों के बीच माँ को किसी संदेश पुत्री के रथ में भेजते थे और दूसरी ओर पिता-श्री ने अब माता-श्री के रूप में भी पार्ट अदा करना शुरू किया था। वे यज्ञ-वत्सों को मातृवत स्नेह, सुख, सुविधा, सुव्यवस्था और सहयोग देते थे और उन्होंने ये पार्ट ऐसा खूबी से निभाया कि यज्ञ- वत्सों को मातेश्वरी जी की अनुपरिस्थिति अखरती न थी।
इस सृष्टि रूपी लीला में मातेश्वरी जी का पार्ट भी अद्भुत और अलौकिक ही था। इनकी सौम्य मूर्ति, हर्षित चेहरा, अपार मातृवत स्नेह सामने आ जाता है। दिव्य गुणों की साक्षात्, अनुकरणीय, सन्तोषी मां थी वह जब कन्याओं और माताओं को विषय की गुड़िया माना जाता था और उनके साथ अनुचित व्यवहार होता था तथा जब समस्त मानव-संसार मनोविकारों से त्राहिमान-त्राहिमान कर रहा था, तब उस धवल वस्त्र धारिणी, कमल पुष्प-वासिनी, भव-भय-निवारिनी, सदा हर्षकारिनी, मनोविकार हारिनी मां ने आसुरी गुणों की पराजय तथा पवित्रता की दुदुंभी बजाई थी। वे इस पुनीत कार्य में शिव बाबा की सहयोगिनी शक्ति थी। कवि ने सच कहा है:
पग-पग पर जो थी अपमानित
नारी जाति शास्त्र-गुरु निन्दित
नर द्वारा बहु भाँति कलंकित
पतिता-परम, 'अहिल्या', घोषित
ऐसी मातृ जाति का फिर से
शिव ने आ सौभाग्य जगाया
माता गुरु को निखिल सृष्टि का
पुनरुद्वार-निमित्त बनाया
जगदम्बा माता सरस्वती
योग अग्नि मय ज्योति जगाती
ज्ञान-कलशमयी बुद्धि शोभति
दृष्टि स्नेह अविराम बरसाती
किया ज्ञान शिव का उच्चारण
और मिटाया मोह-आवरण
कर सारा अज्ञान निवारण
सरस्वती बन गई तपोधन
देश-काल से ऊपर उठकर
कर नर-नारी भेद निवारण
दोनों एक साथ ही आत्मा
यह अभिनव सिद्धान्त-निरूपण
तुमने ऐसे सत्य सुनाए
ज्ञान योग के मर्म बताए
कहती अब जागृत आत्माएँ
क्यों न सभी शिव-शक्ति कहायें
हाँ, मैंने देखा माँ तुमको
और शक्तियों के भी दल को
इनके ज्ञान योग के बल को
जीवन दिव्य और निश्छल को
शक्ति-सैन्य की ओ, सेनानी
जागृति-मन्त्र उचार रही हो।
उठो ! उठो ! हे भारतवासी
माँ कब से ललकार रही हो
ब्रह्मा मुख से हुई प्रकट तुम
आदि-शक्ति, शक्तियाँ अन्यतम
मिटने लगा सृष्टि से ही तम
जय, पावनतम यह युग संगम।
दैवी ब्रह्मा-वत्सों को सम्भालकर
स्नेह-छाँह में उन्हें पालकर
उनमें जीवन नया डालकर
माँ! तुमने डाला कमाल कर
शिव के ज्ञान-यज्ञ में जीवन
की ही आहूति दे डाली है।
पांच विकारों की बलि देकर
हुई शक्तियाँ बल शाली हैं।
यह शिव सेना परम अहिंसक
सत्य ज्ञानमय, सच्ची आस्तिक
इसके अस्त्र-शस्त्र हैं आत्मिक
इसका बल चरित्र है नैतिक।
कोई डरे न इससे, यह तो
दुःख के बन्धन काट रही है
यह तो मनुज मात्र को शिव का
शीतल अमृत बाँट रही है।
योग-युक्त भारत माताओं की
बढ़ रही नई सेना है।
निखिल विश्व में राज्य सत्य का
इसको कायम कर देना है।
सबसे गुण लेने की शिक्षा जो बाबा ने दी
मातेश्वरी जी के देहावसान के बाद बाबा मात-पिता रूप से वत्सों को सद्गुणों को खूब सजाने में तत्पर हुए। ब्रह्माकुमारी गुलज़ार मोहिनी जो वर्तमान समय दिल्ली ज़ोन की इंचार्ज हैं, कहती हैं कि बाबा ईश्वरीय ज्ञान और सद्गुणी भावना की बात अनेक विधियों से समझाते थे।
श्रीमद्भागवत् में दत्तात्रेय के बारे में यह लिखा है कि उसने चौबीस वस्तुओं अथवा जीवों से गुण लिया था। और उन गुणों के आधार पर उसने अपने जीवन को ज्ञान-निष्ठ, चित्त को शान्त और वृत्ति को उपराम बनाया था। आज भी लोग श्रीमद्भागवत्के ग्यारहवें स्कन्ध में जब यह पढ़ते हैं कि दत्तात्रेय ने अमुक अमुक वस्तु या जीव-प्राणी से अमुक गुण लिया था तो वे बहुत ही खुश होते है। अच्छे गुणों को धारण करने की युक्तियाँ सुनकर धर्म-परायण लोगों को खुशी होना एक स्वाभाविक बात है। हम भी स्वयं को बहुत सौभाग्यशाली मानते हैं कि बाबा ने हमें भी अनेकानेक वस्तुओं और जीव-प्राणियों से गुण लेने की सूझ दी। यों तो उन्होंने हमारी मनोवृत्ति ही ऐसी बना दी कि हम हरेक चीज़ अथवा व्यक्ति से गुण ही ग्रहण करें, परन्तु फिर भी हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख करेंगे कि बाबा ने किस-किस वस्तु, परिस्थिति, व्यक्ति अथवा जीव- प्राणी से क्या-क्या गुण लेने की बुद्धि हमें दी अथवा क्या-क्या अवगुण छोड़ने की शिक्षा दी।
सागर से गम्भीरता आदि गुण
जब हम कराची में थे तो बहुत बार बाबा के साथ हम सागर के किनारे पर जाकर बैठते थे। तब बाबा मधुर और स्नेहयुक्त शब्दों में कहते- "बच्चे, सागर की लहरें देख रहे हो? देखो, सागर की लहरें कैसे बच्चों के पाओं तक आती हैं और फिर वापिस चली जाती हैं। आप भी तो ज्ञान सागर (परमपिता परमात्मा) के बच्चे हैं, आप इस सागर से यह गुण ग्रहण करो कि अगर आपके मन में कभी माया की लहरें उठें तो आप भी उन्हें ऐसे ही वापिस लौटा दिया करो।
फिर बाबा कहते, "बच्चे, देखो लोग सागर में कचड़ा अथवा कूड़ा डालते हैं तो वह सागर के अन्दर नहीं जाता बल्कि ऊपर-ऊपर ही रह जाता है। इस सागर की तरह ही आप बच्चों का भी स्वभाव होना चाहिए। आप बच्चों के मन के अन्दर भी कोई कचड़ा नहीं ठहरना चाहिए।
कई बार बाबा गोताखोरों की ओर इशारा करते हुए कहते, "बच्चे, देखो, गोताखोर सागर में काफी नीचे (Deep) जाकर हीरे, मोती, रत्न, लाल आदि ले आते हैं। इनकी तरह आप भी विचार सागर का मंथन करो। आप भी ज्ञान-सागर शिव बाबा के ज्ञान की गहराई में जाओ तो आपको भी बहुत ही अनमोल रत्न, हीरे और मोती मिलेंगे। इस प्रकार बाबा हमें गुणग्राहक बनने की ट्रेनिंग देते रहते। फिर हमें कुछ समय आत्मा के स्वरूप में स्थित कराके वे कहते, "बच्चे, देखो, सागर कितना शान्त, गम्भीर मर्यादित और भीतर में धैर्यवत् भी है! भले ही इसके ऊपर लहरें हैं। परन्तु नीचे देखा जाय तो वह सदा शान्त होता है। आप भी ऐसे ही शान्त तथा धैर्यवत हो जाओ।"
सागर के किनारे पर पड़े शालिग्रामों की ओर इशारा करते हुए बाबा कहते, "यह देखो, पानी की लहरों और छींटों से पत्थर भी घिस-घिसकर पूजनीय शालिग्राम हो गये हैं, ऐसे ही आप भी कठिनाइयों को सहन करेंगे और ज्ञान सागर की लहरों में लहरायेंगे तो एक दिन आप भी ऐसे ही साफ़ और पूजनीय अर्थात् पावन बन जाओगे।
प्रकृति के तत्त्वों से गुण
अग्नि: वास्तव में बाबा हरेक तत्त्व से कोई-न-कोई गुण ग्रहण करने की शिक्षा देते। वे कहते "बच्चे, अग्नि में तपाने से ही सोने को शुद्ध किया जा सकता है। अग्नि सब कचड़े को जलाकर भस्म कर देती है। इसी प्रकार, आत्मा को पवित्र बनने के लिये योग ही अग्नि है। शिव बाबा की याद से आत्मा का जन्म-जन्मान्तर का मैल धुल सकता है।"
वायु: का दृष्टान्त देते हुए वे कहते, "मीठे बच्चे, योगाभ्यास करने से आत्मा में शरीर-भान नहीं रहता और उससे पापों का बोझ भी उतरता है। अतः योग-युक्त होने से मनुष्य स्वयं को वायु के समान हल्का अनुभव करता है; उसे थकावट महसूस नहीं होती, सुस्ती नहीं आती और शरीर की स्थूलता नहीं खीच सकती।" फिर कभी बाबा कहते, 'बच्चे, बाहर में बेहद में खुली हवा में जाने से दिल को फरहत (खुशी और ताज़गी) महसूस होती है, अन्दर बन्द कमरे में ऐसा लगता है, जैसे कि हम गर्भ जेल में बैठे हों। इसी प्रकार जो बच्चा अपनी बुद्धि को बेहद में टिकाता है, अर्थात् जो संकुचित विचार वाला न होकर विशाल बुद्धि वाला होता है. सभी से मिलता-जुलता और उच्च विचार करता है, वह भी सदा ताज़ा और खुश रहता है जो हद में बैठता है, अर्थात् छोटे ही दायरे में स्वयं को सीमित रखता है, वह भी मूँझा हुआ (उलझा हुआ) और उदास-सा लगता है।
जल: में वस्तुओं को धोने और शुद्ध करने का जो गुण है, उसकी चर्चा करते हुए बाबा कहते "बच्चे, जल की गंगा में स्नान करने से शरीर स्वच्छ होता है, परन्तु आत्मा को धोने के लिये तो ज्ञान गंगा में स्नान करने की आवश्यकता है। जो लोग सोचते हैं कि गंगा- जल में स्नान करने से पाप धुल सकते हैं, वे भूल में हैं। बच्चे, जैसे आप शरीर को प्रतिदिन स्नान कराते हो, वैसे ही आत्मा के लिये भी ज्ञान स्नान किया करो। देखो, जल एक जगह पर ठहरे रहने से दुर्गन्धिपूर्ण हो जाता है और सर्विसएबल (उपयोगी, Serviceable) नहीं रहता। इस बात को ध्यान में रखकर आप ज्ञान-गंगाओं को भी एक जगह बैठ नहीं जाना चाहिये बल्कि जगह-जगह जाकर दूसरों को ज्ञान- जल से पावन करने की सेवा करनी चाहिए।
चन्द्रमाँ: के शीतलता रूपी गुण की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बाबा कहते कि "आप भी इसके समान शीतल बनो और १६ कला पवित्र बनो। अब अपनी ज्ञान और पवित्रता की कलाओं को बढ़ाकर पूर्णमासी की स्टेज तक ले जाओ।"
बादलों: का उदाहरण देकर कहते, "बच्चे बादल सागर से जल-भर कर मैदानों में आते हैं और वर्षा करके फिर चले जाते हैं। इसी प्रकार, आप भी यहाँ ज्ञान-सागर के पास आकर स्वयं में ज्ञान-जल भर जाते हो। फिर यहाँ से जाकर आपको दूसरों पर ज्ञान-वर्षा करनी चाहिये ताकि वे भी हरे-भरे हों। जो बच्चे यहाँ से जाकर दूसरी-दूसरी जगह ज्ञान वर्षा नहीं करते उनके बारे में बाबा समझते हैं कि वह बादल भरे नहीं हैं, वे खाली-खाली है।"
इस प्रकार, एक-एक तत्त्व से गुण लेने का पाठ पढ़ाते हुए बाबा कहते "बच्चे, अब सभी तत्त्व भी तमोगुणी हो गये हैं क्योंकि सभी मनुष्य तमोप्रधान बन गये हैं। इसलिये अब ये तत्त्व भी नियम (Order) को छोड़कर मनुष्य को दुःख देने वाले बन गये हैं। ये बिगड़े हुए भी बाढ़, भूकम्प, तूफ़ान, अतिवृष्ट, अनावष्टि अकाल आदि-आदि के रूप में, भविष्य में सृष्टि के महाविनाश के निमित्त बनेंगे और मनुष्यात्माओं को घोर संकटों से घेरेंगे। अब अगर मनुष्य सुधर जायें तो ये भी सुधर जायेंगे। ये सभी मनुष्य के चरित्र पर निर्भर है अतः अब आप पहले अपनी कर्मन्द्रियों को वश करो और योग-बल द्वारा इनकी भी सेवा करो; योग से ही सारी सृष्टि सतोप्रधान बनती है। बच्चे, आज अज्ञानी लोग तो सूर्य नमस्कार, वृक्ष पूजा, भूमि पूजा, नक्षत्र पूजा आदि- आदि के रूप में तत्त्व पूजा अथवा भूमि पूजा करने लग गये हैं! अब आप इन सबको छोड़कर एक शिव बाबा को याद करो तो ये सभी तत्त्व भी वशीभूत हो जायेंगे और सुख देने वाले हो जायेंगे।
फूलों और फलों से गुण
बहुत बार बाबा फूलों के बगीचे में ले जाते। खड़े होकर बाबा उनको निहारते और उनकी सुगन्धि लेते। बाबा कहते, "देखो, फूल कितने पवित्र होते हैं। ये सबकी सेवा करते हैं। पवित्रता और सेवा ये इनके दो मुख्य गुण है, इसलिए ही ये देवताओं पर चढ़ाये जाते हैं। देखो इनकी तरह आप भी काँटों के बीच रहते हुए भी अपनी कोमलता, सुन्दरता और सुगन्धि को बनाये रखो। बच्चे! जो भी इनके पास आता है उसे यह सुगन्धि से खुश करते तथा उसके मस्तिष्क को ताज़ा करते हैं। बच्चे, आप भी चेतन फूल हो, आप भी इनकी तरह सदा खिले रहो। शिव बाबा इस बगीचे का माली है। उसने ही आपको काँटे से फूल बनाया है। पहले आप कांटे थे, आप में काम, क्रोध आदि विकार थे और उनके कारण आप दूसरों को दुःख देते थे। अब आप फूल की तरह पवित्र बनो और दिव्य गुण रूपी सुगन्धि धारण करो और 'काँटा' बनना छोड़ दो। अर्थात् दूसरों को दुःख देना छोड़ दो। सबसे बड़ा काँटा है काम का काँटा। यह जन्म-जन्मान्तर दुःख देता है। क्रोध का काँटा भी कम नहीं है। ये दो तो बहुत बड़े काँटे हैं। आज सभी मनुष्य काँटे हैं, एक-दूसरे को दुःख देने के निमित्त बने हुए हैं! यह कलियुगी दुनिया एक जंगल ही तो है; अब शिव बाबा आकर ज्ञान-वर्षा से जंगल में मंगल कर रहे हैं।” आप बच्चों की यह जो चेतन मानवी फुलवाड़ी है, इसमें शिव बाबा जब आते हैं तो हरेक फूल की सुगन्धि लेते हैं। हरेक बच्चे में अलग-अलग प्रकार की
सुगन्धि है।
बाबा हरेक फूल का गुण बताते। बाबा कहते, "देखो, गुलाब के फूल में यह गुण है कि उसकी सुगन्धि बहुत लुभाने वाली होती है।उसकी बनावट भी अच्छी होती है और रंग-ढंग भी। आप भी गुलाब की तरह खुशबूदार बनो और सदा खिले हुए अर्थात् हर्षितमुख रहो।कमल फूल में यह गुण है कि वह जल में अथवा दलदल में रहते हुए भी उनसे न्यारा और अलिप्त रहता है। उसका यह गुण आपको भी धारण करना चाहिए। सूर्यमुखी में यह गुण है कि जिधर-जिधर सूर्य होता है, उधर ही वह भी अपना मुख फेर लेता है। उसके इस गुण को आप भी जीवन में उतारो। आपका मन भी सदा ज्ञान-सूर्य परमपिता परमात्मा ही की ओर लगा रहना चाहिए। आपको चाहिए कि आप सदा सूर्यमुखी ही रहो, अर्थात् एक शिवबाबा से ही राय (निर्देश) लो और ब्रह्मा बाबा के ही आचरण को देखो (उसका ही अनुकरण करो)। रात की रानी में यह गुण है कि वह फूल रात को बहुत सुगन्धि देता है। आप भी इस कलियुग रूपी रात्रि में सबको दिव्य गुणों की सुगन्धि दो। इस प्रकार बाबा, चमेली, चम्पा, मोतिया आदि के भी गुण बताते। वे कहते थे कि भले ही ये फूल छोटे हैं परन्तु इनमें खुशबू अच्छी है। फिर बाबा आक के फूल का उदाहरण देते हुए कहते "आक की तरह कड़वे मत बनो। देखो लोग शिव बाबा पर आक के फूल चढ़ाते हैं! आपके स्वभाव में भी जो कड़वापन अथवा कटुता है, वह शिव बाबा के हवाले कर दो, उसे भेंट कर दो छूई-मुई (शर्म बूटी) अथवा लाजवन्ती का उदाहरण देते हुए बाबा कहते "छुई मुई को हाथ लगाते ही वह मुरझा जाती है अथवा सिकुड़ जाती है, आपको वैसा नहीं बनना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आपको कड़वी बात कहे और आपके चेहरे पर मुरझाहट आ जाय।" टूह के फूल से उपमा करते हुए बाबा बताते "टूह का फूल रंग-रूप और दिखावे की दृष्टि से तो अच्छा होता है परन्तु उसमें सुगन्धि ज़रा भी नहीं होती। टूह के फूल जैसा आप न बनना अर्थात आप ऐसा न बनना कि आप में दिव्य गुणों की सुगन्धि तो हो ही नहीं, केवल दिखावा मात्र हो।"
फिर बाबा कहते कि "मैं यहाँ (पाण्डव भवन में), बगीचे में सभी प्रकार के फूल लाऊँगा और, जो भी बच्चे बाहर से यहाँ आयेंगे, उनसे पूछूंगा कि बताओ, आप छुई मुई (Touch-me-not), आक या टूह का फूल तो नहीं हो? आप में कौन-से फूल का गुण है?" जिन बच्चों में दिव्य गुणों की सुगन्धि नहीं होगी अथवा जो कमल फूल के समान न्यारे और प्यारे बनकर नहीं रहते होंगे, उन्हें मेरे वचन सुनकर लज्जा आयेगी और वह गुण धारण करने का पुरुषार्थ करने लगेंगे।" कोई वत्स यदि बाबा को कभी फूलों की माला भेंट करते तो बाबा कहते- "नहीं बच्चे, मुझे तो आप चेतन फूल अथवा मानवी फूल (Human Flowers) चाहिये जिन्हें मैं सतयुगी सृष्टि रूपी बगीचे में लगा सकूँ। बच्चे, साधू और 'महात्मा' लोग ही जन्म-जन्मान्तर आप आत्माओं से फलों और पुष्प-मालाओं की भेंट लेते आये हैं, परन्तु मैं कोई 'साधु-सन्यासी' नहीं हूँ, मैं तो आप सभी आत्माओं का पिता हूँ, मैं आपसे फूल लेने नहीं आपको फूल बनाने आया हूँ। परन्तु मैं देखता हूँ कि कई बच्चे तो अभी तक काँटे से बदलकर 'कलियाँ' बने हैं, अभी वे खिले नहीं हैं और अभी उनमें सुगन्धि नहीं है जिससे कि वे दूसरों की सेवा कर सकें। अभी तो स्वयं उनकी भी देख-रेख और सेवा करने की ज़रूरत है। अभी उन पर माली को पूरा ध्यान देने की ज़रूरत है वर्ना कई बच्चों को तो माया रूपी चिड़िया बड़ा होने से भी पहले खा जाती है अथवा कइयों को माया का तूफ़ान लग जाता है और वे गिर जाते हैं। बच्चे, बाप को गुलदस्ता देना चाहते हो तो उसके लिये यह पुरुषार्थ करो कि अन्य जो कांटे-सम मनुष्य हैं, उनको फूल बनाओ। फिर उनकी ज्ञान-सेवा करके, हरेक में दिव्य-गुणों की सुगन्धि भर कर उन्हें इकट्ठा करके बाबा के पास ले आओ। उन्हें परस्पर प्रेम- सूत्र में बाँधकर लाना ही गोया बाबा के पास फूलों का गुलदस्ता लाना है, ऐसा गुलदस्ता बाबा स्वीकार कर सकता है और उनकी सुगन्धि से खुश हो सकता है। मैं जानता हूँ कि उसमें भी सब तरह के फूल होंगे। कई तो फूल भी नहीं, हरे पत्ते ही होंगे। गुलदस्ते की वे भी शोभा होंगे। 'हरे पत्ते' वे नर-नारी हैं जिनमें ज्ञान की सुगन्ध तो है परन्तु उनमें दिव्य गुणों की सुगन्धि नहीं है और वे इस दैवी गुलदस्ते के बाहर-बाहर, दूर-दूर रहते हैं। अब आप स्वयं से पूछो कि आप फूल हैं या पत्ते?"
इस प्रकार, बाबा फूलों का नाम ले-लेकर भी पवित्रता, दिव्य-गुण रूपी सुगन्ध, माया से अलिप्तता आदि-आदि गुण हम बच्चों में भरते रहते। जिसमें ज्ञान का रस भर जाता, जो योग से पक जाता, बाबा उसे 'फल' मानते। इसलिए बहुत बार बाबा पूछते, "बताओ, आप कली हो, फूल हो या फल हो? आप में कहाँ तक ज्ञान का रस, योग का मिठास अथवा परिपक्वता या पुष्प की-सी सुगन्धि भरी है?" फिर बाबा समझाते कि सभी बच्चों को नम्र स्वभाव का भी होना चाहिये जैसे कि फलों से लदा हुआ वृक्ष झुक जाता है ताकि लोग सहज ही फल को ले लेवें। यदि किसी में नम्रता नहीं है तो बाबा समझते कि उसे अभी फल और फूल नहीं लगे बल्कि वह सूखा हुआ वृक्ष है।
जीव-प्राणियों से गुण
बाबा जीव-प्राणियों से भी गुण ग्रहण करने तथा अवगुणें को छोड़ने की शिक्षा देते। बाबा मोर और डेल (मोरनी) के सम्बन्ध को पवित्र बताते और यह भी बताया करते कि श्रीकृष्ण के मुकुट में जो मोर-पंख है, वह वास्तव में पवित्रता का सूचक है। मोर ही वास्तव में राष्ट्र-पक्षी बनाये जाने के योग्य है क्योंकि वह सतयुगी पवित्रता का प्रतीक है। अतः बाबा कहते "बच्चे, आप भी मोर-मुकुटधारी बनने के लिए इस जन्म में योगी और निर्विकारी बनो तो फिर सतयुग में आपको ताऊसी तख्त मिलेगा। आज तक भी लोगों में यह रिवाज है कि वे पुस्तकों में मोर पंख रखते हैं। उनका विश्वास है कि इसके फलस्वरूप विद्या अध्ययन में सफलता मिलती है। वे धर्म-ग्रंथों पर अथवा महात्माओं पर भी मोर-पंखों का बना हुआ चंवर या पंखा झुलाते हैं। इसका कारण भी यह है कि मोर पवित्रता का संकेतक है और यह ठीक मन्तव्य है कि पवित्रता धारण करने से ही मनुष्य को विद्या की प्राप्ति में सफलता होती है और वह महात्मा भी बनता है।
भृंगी और कीड़े का उदाहरण देते हुए बाबा कहते "जैसे भृंगी कीड़े को अपनी बिंबी में ले जाकर उसे बंद कर देती है और "भू... भू" करके उसे भी अपने समान बना देती है, वैसे ही आप बच्चों, जिन्होंने कि ईश्वरीय ज्ञान लिया है, का भी यही कर्तव्य है कि आप कीड़ों की तरह विकारी मनुष्यों को ज्ञान सुना-सुनाकर अपने समान बना दें। भृंगी और 'ब्राह्मणी' लगभग एक जाति है अर्थात् शब्द मिलते-जुलते ही हैं। आप भी ईश्वरीय ज्ञान की गुंजार से शुद्रों को ब्राह्मण बनाने का उच्च कर्त्तव्य करो। यह गुण आप भृंगी से सीखो।
पतंगों की उपमा देकर बाबा समझाते कि पतंगों में भी कुछ ऐसे होते हैं जो कि शमां (दीपक) पर फ़िदा हो जाते हैं दूसरे जो कि शमां का चक्कर लगाकर लौट जाते हैं। इसी प्रकार कुछ मनुष्यात्माएँ ऐसी होती हैं जो कि जागती-ज्योति अथवा चेतन शमां (परमात्मा) पर फ़िदा हो जाती हैं, तन-मन-धन से न्योछावर हो जाती हैं और अन्य बहुत सी आत्माएँ तो शमां के पास आकर भी वापस चली जाती हैं। ऐसी बहुत- सी आत्माएँ हैं जिन्हें हम बताते हैं कि परमपिता परमात्मा शिव आकर अपना कर्तव्य कर रहे हैं परन्तु वे आकर और सुनकर लौट जाते हैं। अब आप वत्स सच्चे परवानों से यह गुण लो कि शिव बाबा पर कुर्बान हो जाओ।"
बाबा सर्प में यह गुण बताते कि वह अपनी पुरानी खाल सहज ही उतार कर फेंक देता है। इसी प्रकार जो योगाभ्यास द्वारा शरीर-भान को छोड़ना सीख जाता है, उसके फलस्वरूप सतयुग में जीवनमुक्त अवस्था में उसमें यह योग्यता होती है कि वह पुराने शरीर को कष्ट के बिना छोड़ सकता है अतः इस दृष्टिकोण से तो सर्प में भी एक ऐसा गुण है जो कि आज के मनुष्य में नहीं है। इस योग्यता को धारण करने के लिए मनुष्य को योगाभ्यास करना चाहिए।
बाबा कहते कि शंकराचार्य और दूसरे संन्यासी जोकि उसके अनुयायी हैं, स्त्री को 'सर्पणी' मानते हैं। उनका मन्तव्य है कि नारी नरक का द्वार है, वह माया का रूप अथवा नागिन है। बाबा समझाते कि वास्तव में ऐसा मानना गलत है क्योंकि, इस संसार में यदि स्त्री नागिन है तो पुरुष भी तो नाग है? दोनों ही एक-दूसरे को काम रूपी विष पिलाते हैं। दोनों ही एक-दूसरे को डसते हैं। अतः बाबा कहते कि आप लोगों को काम रूपी विष छोड़ देना चाहिए और विशेष तौर पर माताओं को चाहिए कि वे ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करके स्वर्ग का द्वार बनने का कर्त्तव्य करें और स्त्री-पुरुष दोनों ही घर में रहते हुए काम विकार पर विजय प्राप्त करें।
गधे की मिसाल देते हुए बाबा कहते कि "खोदरे के पुट" (गधे के पुत्र) का लाख श्रृंगार करो, फिर भी वह मिट्टी में लोटपोट हो जाता है और सारा श्रृंगार बिगाड़ देता हैः वह खोदरा (गधा) ही रहता है। इसी प्रकार, कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उन्हें आप ज्ञान रूपी आभूषणों से कितना भी सजाइए परन्तु वे फिर जाकर विकारों रूपी धूल से लतपत हो जाते हैं। बाबा कहते कि आप बच्चों को ऐसा नहीं करना चाहिए।
कछुए से गुण सीखने के विषय में बाबा कहते कि "बच्चे, जैसे कछुआ कार्य कर लेने के बाद कर्मेन्द्रियों को अपने अन्दर समेट लेता है, वैसे ही आप बच्चों को भी चाहिए कि आवश्यक कार्य-व्यवहार कर चुकने के बाद कर्मेन्द्रियों को समेट लें और देह से न्यारे होकर शिव बाबा (परमपिता परमात्मा) की स्मृति में स्थित हो जायें।"
मधुमक्खी सभी फूलों से रस को ले लेती है। यह गुण तो उसमें है ही, उसमें दूसरी विशेषता यह होती है कि सभी मधुमक्खियाँ अपनी रानी के पीछे जाती हैं। जब रानी एक छत्ते को छोड़कर जाती है तो वे भी सभी छोड़ जाती हैं। रानी के पीछे ही सदा वे सभी जाती है। इसका दृष्टान्त देते हुए बाबा कहते कि कल्प के अन्त में सभी मनुष्यात्माएं भी इसी प्रकार ही शिव बाबा के पीछे-पीछे परमधाम रूपी छत्ते की ओर चली जायेंगी।
हँस में जो मोती चुगने की विशेषता है, उसका हवाला देते हुए बाबा हमेशा कहते कि आप वत्स परम हँस और हँसनियाँ हो क्योंकि आप ज्ञान रूपी मोती चुगते हो और आप में विवेक भी है। आपको बगुलों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि हँस और बगुले का कोई मेल नहीं है।
माया की तुलना बाबा अजगर या ग्राह से किया करते और ज्ञानवान वत्सों की तुलना हाथी से अथवा गज से। बाबा कहते, "बच्चे, सदा सावधान होकर चलना, कहीं ऐसा न हो कि माया रूपी ग्राह आपको पकड़ ले। शिव बाबा को याद करते रहोगे तो माया रूपी ग्राह से छूट जाओगे वर्ना माया ऐसा अजगर है कि यह मनुष्य को सारा ही निगल जाता है, अर्थात् उसका सारा ज्ञान चट कर देती है।
ऊँट पक्षी (शुतुर मुर्ग) के बारे में बाबा बताया करते कि "इस पक्षी की गर्दन आदि ऊँट की तरह होती है और शरीर पक्षी-जैसा ! परन्तु यह काफी बड़े कद का होता है। इस पक्षी के बारे में एक बात प्रसिद्ध है। कहते हैं कि ऊँट-पक्षी से किसी ने कहा "उड़ो"। तो उस पक्षी ने जवाब दिया कि "मैं तो ऊँट (शुतर) हूँ, मैं उड़ कैसे सकता हूँ?" फिर उसे कहा गया कि 'अच्छा, अगर आप शुतर हैं और उड़ नहीं सकते तो चलो और यह सामान लाद कर ले चलो।" तब वह बोला कि "में सामान लाद कर चल कैसे सकता हूँ, मैं तो पक्षी (मुर्ग) हूँ।" कहने का भाव यह है कि वह करना कुछ भी नहीं चाहता, यों ही हरेक बात का कोई-न-कोई उत्तर दे देता है। यों ही बहाना-बाज़ी करता है। तो इस पक्षी का उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि जो ज्ञान- निष्ठ बच्चे हों, वे कभी भी किसी कार्य को करने के समय बहाना नहीं बनायेंगे और ऊँट-पक्षी की तरह इन्कार नहीं करेंगे। परन्तु जिनमें ज्ञान की पूरी धारणा नहीं होगी या जिनमें आलस्य का विकार होगा वे 'ऊँट-पक्षी' की तरह कोई-न-कोई जवाब देकर चल देंगे। बाबा कहते कि आप 'ऊँट-पक्षी' मत बनो।
ऊँट का उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि वह जहाँ पेशाब करता है वहीं उसका पाँव फिसल जाता है और वह गिर पड़ता है। इतना बड़ा कद-बुत होते हुए भी उसमें यह समझ नहीं है!! जिन लोगों का मन काम-विकार से पैदा हुए शरीरों को देखकर फिसल जाता है और उन्हें धर्म से गिरा देता है, उसके बारे में बाबा कहते कि "ये तो ऊँट के समान मूत में फिसल जाते है, (क्योंकि यह शरीर ऐसे ही तो पैदा हुआ है और उस पर इसका मन फिसल गया है), यह इतना गंदा है, इसे समझ नहीं है।"
चातक और मछली का बाबा यह गुण बताया करते कि चातक वर्षों के जल के लिए तड़पता है और मछली भी जल के बिना जीवित नहीं रह सकती। ऐसे ही मनुष्य को 'ज्ञान का चातक' होना चाहिये, अर्थात् ज्ञान-सागर शिव बाबा अब जो ज्ञान-वर्षा कर रहे हैं, उसके बिना उसे एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।"
बाबा कहते कि तोते भी दो प्रकार के होते हैं, एक तो कंठी वाले और दूसरे बिना कण्ठी के। इसी प्रकार ईश्वरीय ज्ञान सुनने वाले बच्चे भी दो प्रकार के होते हैं एक तो वे जो ज्ञान सुनने के बाद दूसरों को ज्ञान सुनाते भी हैं। और दूसरे वे जो सुनते तो हैं परन्तु सुना नहीं सकते। बाबा कहते "आप सभी को कण्ठी वाले तोते बनना चाहिये अर्थात् जो ज्ञान सुनते हो वह दूसरों को सुनाना भी चाहिए।"
ज्ञान लेने वाला जो मनुष्य शिव बाबा के कहने के अनुसार न चले, उसके लिये बाबा कहते कि वह बे-लगाम घोड़ी है। जैसे बेलगाम घोड़ी अपने मालिक से स्वयं को छुड़ाकर भाग जाती है और किसी वृक्ष या मोटर से टकराती या खड्ढे में गिर कर टांग तोड़ती अथवा सिर फोड़ती है, वैसे ही उस मनुष्य का हाल होता है जो अपने मन, वचन और कर्म की लगाम शिव बाबा के हाथ में न दे, अर्थात् उनकी श्रेष्ठ मत के अनुसार न चले। बाबा कहते कि ज्ञानवत्स को चाहिये कि वह बेलगाम घोड़ी न बने।
बाबा कहते कि "बन्दर में पाँचों विकार प्रधान होते हैं। उसमें मोह भी इतना होता है कि चाहे उसका बच्चा टुकड़े-टुकड़े हो जाये, बन्दरिया उसे अपनी छाती से लटकाये रहती है। उनमें क्रोध और अहंकार भी बहुत होता है इतना कि यदि हाथी गुज़रें तो वह उनसे कमज़ोर होते हुए भी हाथियों पर 'गुर्र-गुर्र' करते हैं। उनमें 'काम' भी बहुत होता है, तभी तो वे ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं। लोभ उनमें इतना होता है कि आप यदि उनके आगे चने डालें तो वे खाकर पेट भर लेने के बाद भी लपक लपक कर इतनी जल्दी से और भी चने उठाते जाते हैं जैसे कि जन्म से लेकर आज तक इन्होंने कुछ खाया ही न हो। इस प्रकार बन्दर या बन्दरिया का उदाहरण देकर बाबा कहते कि आज सभी मनुष्य बन्दर से भी तुच्छ हैं क्योंकि उनमें पाँचों विकार तो सब भरे हुए हैं ही, इसके अतिरिक्त वे परमपिता परमात्मा के बारे में भी कुछ नहीं जानते। बाबा कहते कि अब शिव बाबा बन्दर से मंदिर लायक बनाने आये हैं। आज सभी मनुष्य बन्दर अथवा लंगूर हैं। वे परस्पर लड़ते रहते हैं और विकारों में जकड़े हुए हैं। अब इन्हीं बन्दरोंको माया रूपी रावण से ज्ञान रूपी बाणों द्वारा लड़ना सिखाकर शिवबाबा लंका जलाने की तैयारी कर रहे हैं। अतः आप सभी को बन्दरपन छोड़कर, बन्दरिया-जैसी मोह-ममता त्याग कर, राम (शिव) की 'बानर-सेना' में भरती हो, माया रूपी रावण पर विजय प्राप्त करनी चाहिये।
शास्त्रों में लिखा है कि जब शिव मोहिनी पर कामातुर हो गया तो उसके 'बीज' से 'बिच्छू-टिंडन' पैदा हुए। बाबा कहा करते कि अज्ञानी पुरुषों ने यह शिव बाबा पर मिथ्या लांछन लगाया है क्योंकि वास्तव में यह शिव बाबा (परमात्मा) के बच्चों अर्थात् मनुष्यात्माओं पर घटता है। जब मनुष्यात्माएँ द्वापर युग में स्वरूप को भूलकर पतित हो जाती हैं तो वे 'काम' के वशीभूत हो जाती हैं। तब से लेकर उनकी जो सन्तति (काम विकार से) पैदा होती है, वह बिच्छु और टिंडन की तरह होती है, अर्थात् उसमें दूसरों को दुःख देने का स्वभाव होता है। अतः आजकल के मनुष्यों का जो बिच्छू और टिंडन-जैसा स्वभाव है, उसका कारण 'काम' विकार को ठहराते हुए बाबा कहते कि अब आप काम विकार को छोड़ो तो फिर सतयुग आ जायेगा और उसमें पवित्रता-बल से जो सृष्टि पैदा होगी वह बिच्छू-टिंडन की तरह म्लेच्छ नहीं होगी बल्कि पवित्र और देव-स्वभाव की होगी।
बिच्छू के बारे में बाबा एक बात और भी बताया करते। बाबा कहते कि बिच्छू पहले डंक से देखता है कि यह जगह नरम है या सख्त। जगह को नरम पाकर ही वह डंक मारता है। इस प्रकार इतनी समझ तो बिच्छू में भी है कि कहाँ डंक मारना है और कहाँ नहीं काटना। इससे ज्ञानवान् मनुष्य को यह गुण लेना चाहिये कि वे ईश्वरीय ज्ञान उसी को दें जो उसे कुछ सुनने का इच्छुक भी हो, अर्थात् जिसके मन में सुनाने वाले के प्रति कुछ नरमी भी हो, वर्ना सुनाना व्यर्थ है। इस प्रकार इस विषैले जीव से भी बाबा गुण लेने की शिक्षा देते।
जिन मनुष्यों की सदा 'काम' की दृष्टि-वृत्ति बनी रहती है, उनके बारे में बाबा कहते कि ये तो 'कामी कुत्ते' हैं। जैसे कुत्ते के कई बच्चे पैदा होते हैं, और उसमें वासना बहुत अधिक होती है, वैसा ही यह मनुष्य भी है। अतः बाबा कहते कि "देखो, आज मनुष्य कितना गिर गया है। अपने परमपिता परमात्मा को भूलने के कारण वह गॉड (GOD) से बदलकर डॉग (DOG) बन गया है। बाबा कहते कि अब यह कुत्ते-जैसा वासनापूर्ण स्वभाव छोड़ो और पवित्र बनो।"
इस प्रकार टिड्डी का उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि "टिड्डियों के झुण्ड अर्थात् टिड्डी दल सारे क्षेत्र को, दूसरों की मेहनत की कमाई को चट कर जाता है। बाबा कहते कि यह भी एक अवगुण है। ज्ञानवान् मनुष्य को चाहिये कि दूसरों की सेवा करे। वह बिना परिश्रम के दूसरों की कमाई न खाये। जो संन्यासी भी गृहस्थियों का भला किये बिना अथवा परिश्रम किये बिना उनकी मेहनत की कमाई खाते हैं वे भी टिड्डी दल के समान है।"
बाबा कहते कि जैसे उल्लू को दिन में कुछ दिखाई नहीं देता, यहाँ तक कि सूर्य भी दिखाई नहीं देता या जैसे चमगादड़ उल्टे लटके रहते है, वैसे ही आजकल के मनुष्य भी मानो उल्टे लटके हुए हैं और उन्हें 'ज्ञान-सूर्य' परमपिता परमात्मा जोकि अवतरित होकर कार्य कर रहे हैं, 'ज्ञान-प्रकाश' फैला रहे हैं दिखाई नहीं देता। वे शरीर को आत्मा माने बैठे हैं, कल्प की आयु करोड़ों वर्ष माने बैठे हैं और 'गीता का भगवान' अजन्मा परमात्मा की बजाय ८४ जन्मों के चक्र में आने वाले श्रीकृष्ण को माने बैठे हैं और, इस प्रकार उल्टे लटके हुए है, अर्थात् उल्लू के समान अन्धे बने हुए हैं। बाबा कहते कि अब मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वरीय ज्ञान ले, ताकि उसे 'ज्ञान-नेत्र' मिलें और वह उल्लू से बदलकर अल्लाह का बच्चा बन जाय।
ठाठारी बिल्ली
बाबा समझाते कि मनुष्य को ठाठारी बिल्ली (जिद्दी) नहीं बनना चाहिये। इस प्रकार बाबा हरेक से गुण लेने और उनमें जो अवगुण हमें बुरे लगते हैं उन अवगुणों को छोड़ने की शिक्षा देकर गुणवान् बनाते।
जस केले के पात-पात में पात, तस ज्ञानी की बात-बात में बात
अनेक विधि बाबा गुणों पर विशेष बल देते। वे स्वयं सभी के समक्ष आदर्श गुणमूर्त थे और दूसरों को भी यह शिक्षा देते कि वे सभी गुण धारण करें। ब्रह्माकुमारी हृदयमोहिनी जी, जो वर्तमान समय पाण्डव भवन, देहली में ईश्वरीय सेवा में तत्पर हैं कहती हैं।
"बाबा को हर बात का अनुभव भी खूब अच्छी तरह था, तभी तो शिव बाबा ने उन्हें साकार माध्यम बनाया। बाबा यहां के रस्म रिवाजों, प्रथाओं और तौर-तरीकों से भी भली-भाँति परिचित थे। अतः कई बार वे ईश्वरीय ज्ञान के मनोरम रहस्यों को उन रस्मों-रिवाजों के साथ सम्बद्ध करके बताते जिसके फलस्वरूप ज्ञान सुनने वाले को आंखों के सामने कई दृश्य आ उपस्थित होते और वे उस अनुभव-युक्त ज्ञान को एक सरस तरीके से सुनकर आनन्दित होते। नीचे हम बाबा द्वारा सुनाए गये कुछ ऐसे ही प्रसंग उद्धृत कर रहे हैं।
शादी की रस्म
शादी की रस्म का उल्लेख करते हुए बाबा कहते हैं "इस रस्म में यह भी होता है कि पति-पत्नी का पल्ला बांध देते हैं, और फिर पत्नी अपने पति के पीछे-पीछे कदम उठाती है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए बाबा कहते कि आत्माओं का पति जो परमात्मा है; उससे मन की लग्न जोड़ना ही गोया परमात्मा से पल्ला बांधना है और परमपिता परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना ही गोया कदम-ब-कदम उस परमेश्वर रूप पति के पीछे चलना है। जो आत्मा, परमात्मा रूप पति को वर लेती है वह निश्चय ही उसके पीछे-पीछे चलती है और उसकी वफ़ादार होकर रहने का प्रण लेती है।"
शादी के समय दूल्हा लोग जो तलवार लेकर चलते हैं, उसका बाबा आध्यात्मिक रहस्य बताया करते। बाबा कहते कि "पत्नी और पति के बीच तलवार होने का भाव यह है कि दोनों के दैहिक सम्बन्ध के बीच में ज्ञान की तलवार हो।" देखा जाय तो यह बात बिल्कुल ठीक है। गीता में कहा भी गया है कि "हे वत्स! तू 'काम रूपी महाशत्रु' को 'ज्ञान रूपी तलवार' से जीत। परन्तु आज लोग इस रस्म के पीछे जो 'धर्म-तत्व' है उसको न जानकर इसकी अन्यान्य व्याख्यायें करते हैं।
बारात के आगे दीपक
विवाह के समय की एक और प्रथा का भी ज़िक्र बाबा किया करते। पूर्व काल में यह भी एक रिवाज था कि बारात के आगे-आगे चलने वालों के सिर पर एक हांडी रखी रहती और उसमें एक दीपक जलता रहता जिसकी रोशनी उस हाँडी में से दिखाई देती रहती और बाकी बाराती खुशी के गीत गाते हुए उसके पीछे चलते रहते। बाबा बताते कि ‘वह जलता हुआ दीपक वास्तव में जागती ज्योति परमात्मा का प्रतीक है और उसके पीछे-पीछे चलने वाली हम सब आत्माएँ ही रूहानी बारात हैं।' बाबा कहते कि ‘मन-ही-मन शिव बाबा के मिलने के खुशी के गीत गाते हुए आप उस ज्योति अथवा दूल्हा के पीछे-पीछे चलते चलो।’
आत्माओं को किन गहनों से सजाएं?
बाबा समझाते कि ‘सभी आत्माएँ उस एक शिव परमात्मा की सजनियाँ है। सभी का साजन एक परमात्मा शिव ही है। जन्म-जन्मान्तर उसे वरने के लिए हम व्रत रखते आये हैं और उसकी आराधना में लगे रहे हैं। अब वह आये हैं हम सब सजनियों को अपने साथ ले चलने के लिए। जिसका विवाह होता है उस दुल्हन को बहुत से जेवरों और अलंकारों से सजाया जाता है। परन्तु शिव परमात्मा तो शारीरिक गहने नहीं बल्कि आत्मा की सजावट देखते हैं। अतः अब आप आत्मा को ज्ञान के विभिन्न आभूषणों से सजाओ। देखो, आज शारीरिक विवाह में भी यह देखा जाता है कि कन्या पढ़ी हुई कितनी है और गुणवान भी है या नहीं तथा उनका कुल कैसा है? अतः शिव परमात्मा भी देखते हैं कि जो आत्मा उन्हें वरना चाहती है वह किस पराकाष्ठा तक ईश्वरीय ज्ञान से युक्त है और वह दिव्य गुणों से युक्त कहाँ तक हुई है तथा वह आसुरी कुल की है या दैवी कुल की? अतः यदि आप आत्माएं शिव परमात्मा को वरना चाहती हैं तो ज्ञान-युक्त एवं दिव्य गुणों से सम्पन्न बनो।’ इस प्रकार की बातें सुना-सुना कर बाबा ज्ञान- निष्ठ और दिव्य गुण सम्पन्न बनाने के लिए प्रेरित करते।
शादी के बाद कुछ लोग आजकल के पाश्चात्य रिवाज के अनुसार हनीमून (Honeymoon) करने चलते हैं। बाबा कहते, "देखो तो ये हनीमून कैसा है? 'काम-चिता' पर जलने जाते हैं अथवा काम रूपी विष पीने और पिलाने की व्यवस्था करते हैं, पहाड़ी पर जाकर गोया 'विषय-विकार' के गर्त में एक-दूसरे को धकेलते हैं और कहते हैं कि 'हम हनीमून कर रहे हैं!' ओहो! आज मनुष्य उत्तम मर्यादा को, ईश्वरीय कायदे-कानूनों को, दैवी रीति-रस्मों को भूल ही गया है और एकदम देह-अभिमानी और निर्लज्ज हो गया है!"
काम विकार वाली शादी खाना आबादी नहीं
बाबा कहते, "काम" विकार वाली शादी खाना “आबादी" नहीं बल्कि खाना बर्बादी है। जिस्मानी प्यार, प्यार नहीं विकार है। 'काम' पर आधारित सम्बन्ध, सम्बन्ध नहीं कड़ा बन्धन है और एक प्रकार से कुठारघात (Criminal assault) है। बाबा समझाते कि 'काम' विकार ही पतन की जड़ है। उदाहरण देते हुए वे कहते कि कन्या हमारी भारतीय परम्परा में सौ ब्राह्मणों से भी उत्तम मानी गई है। भारत में जिस दिन 'कन्या-पूजन' होता है, बड़ी आयु के लोग भी उसे देवी अथवा शक्ति रूपा मानकर उसके आगे नतमस्तक होते हैं। कन्या को अपने से बड़ी आयु वाले लोगों के आगे भी झुकना नहीं पड़ता, परन्तु जब वही कन्या 'काम-सम्बन्ध' में बाँध दी जाती है अर्थात् उसका विवाह हो जाता है तो वह घूंघट निकाल कर चलती है, गोया अपना मुंह छिपा लेती है और सबके आगे झुक झुक कर चरण स्पर्श करती है। देखो तो 'काम' विकार उसे कितना गिरा और झुका देता है। एक छोटा ब्रह्मचारी बालक संन्यासी के समान, बल्कि उससे भी ऊँचा महात्मा माना जाता है, परन्तु बड़ा होकर जब वह 'काम-वासना' को लेकर विवाहित हो जाता है तो वह संन्यासियों के आगे झुकता रहता है। सतयुग में ऐसा विवाह नहीं होता था। वहाँ पति-पत्नी के बीच में वासना का सम्बन्ध नहीं था। वह संतान योग-बल से पैदा होती थी। अतः उस दुनिया के सभी लोग महात्मा थे जिन्हें कि 'देवता' कहा जाता है। इस प्रकार बाबा ज्ञान की पराकाष्ठा पर ले जाते हुए ब्रह्मचर्य की चरम-सीमा पर आसीन होने के लिए अत्यन्त ओजस्वी शब्दों में प्रेरित करते।
शिव की बारात
बाबा शिव की बारात का भी रहस्य खोलते। चित्रकार शिव की बारात में बहुत ही ऊट-पटांग, भयावह और टेढ़-बाँके चेहरे वालों को चित्रित करते हैं। उनमें से कई तो चुड़ैल, डायन, भूत, प्रेत, आदि भी मालूम होते हैं। इस बात की ओर इशारा करते हुए बाबा बताते कि "एक शिव ही की ऐसी बारात दिखाई जाती है क्योंकि परमात्मा शिव ऐसे समय सृष्टि में आत्माओं रूपी बारात में दूल्हा बनते हैं जब उन आत्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव भूतों, चुड़ेलों और डायनों जैसे अथवा असुरों जैसे हो जाते हैं। वर्ना सब देवताओं से भी ऊँच जो परमपिता शिव हैं उनकी भला ऐसी बारात क्यों कर होती?"
सतयुग में विवाह
सतयुग में विवाह की प्रथा के बारे में बाबा कहते, “उस समय के स्वयंवर का आज के विवाह से क्या मुकाबला? बाबा कहते कि उस समय तो लोगों के पास अतुल धन-धान्य था। उन दिनों जब विवाह होता तब राजा लोग दहेज के साथ हाथी, दास-दासियाँ और सोने-चाँदी तथा अन्यान्य वस्तुओं का इतना भण्डार दे देते कि जिसका हिसाब नहीं! परन्तु आज तो भारत कंगाल और मोहताज हो गया है और मनुष्य का अपना जीवन निर्वाह भी कठिनाई से होता है। सतयुग और त्रेतायुग में एक पत्नी का नियम था परन्तु आज तो मनुष्य की दृष्टि और वृत्ति वासनायुक्त (Criminal) हो गई है। इसलिए आज धर्मपति और धर्मपत्नी के बीच धर्म का नाता नहीं रहा। अब फिर शिव बाबा आकर दैवी धर्म का नाता स्थापित कर रहे हैं।"
सती की रस्म
बाबा बताते कि "पहले कई जातियों में यह रिवाज था कि पतिव्रता नारी अपने पति के देहान्त के बाद उसके शव के साथ अपना भी दाह कर लेती। इस प्रकार जीते-जी अग्नि समर्पण होने अथवा चिता पर चढ़ जाने की रस्म को वे 'सती' की रस्म कहते। रूढ़ीवादी लोग इस रस्म को अच्छा मानते और उस पत्नी को सती हुआ जानकर कहीं- कहीं तो ऐसा भी होता कि लोग ढोल बजाते और उस नारी के गले में फूल मालायें डालते और ढोल की आवाज़ में एक एक पग 'चिता' की ओर बढ़ते हुए वह नारी पति के शव के पास पहुँचकर अग्नि प्रवेश करती। इस भयावह दृश्य को लोग धर्मानुकूल मानते। बाबा कहते कि वास्तव में सती की रस्म कुछ और ही है। 'जीते-जी' अग्नि प्रवेश करना तो गोया अपनी हिंसा करना है, हिंसा को 'धर्मानुकूल' कैसे कहा जा सकता है? फिर देखिये तो समाज की यह कैसी प्रथा है कि पति के मर जाने पर पत्नी तो उसके साथ ही शरीर दाह कर लेती और यदि पत्नी पहले मर जाती तो पति ऐसा कभी भी नहीं करता ! बाबा कहते कि इस प्रकार अपने अनमोल जीवन का अन्त करने में मनुष्य का कल्याण ही क्या? यह तो एक प्रकार से मोह, लोक लाज, निन्दा का भय अथवा अज्ञान जनित प्रथा है। पति कैसे भी संस्कारों का रहा हो, उसका आचरण अथवा जीवन दूषित ही क्यों न रहा हो, उसके पीछे स्त्री के सती होने में भला तुक ही क्या है?"
लोग कहा करते कि इस प्रकार सती होने से पत्नि पति लोक को प्राप्त होती है। और उनका साथ इसी जन्म में अन्त न होकर आगे भी बना रहता है और ऐसा करने से नारी 'विधवा' कहलाने से तथा लोगों की कुदृष्टि से भी बच जाती है। सोचिये तो यह कैसा समाज है और इसका कैसा आलाप है! अबला नारी को 'जीते-जी' अग्नि पर बैठाकर ये ढोल बजाना और इसके लिये धर्म की आड़ लेना !
बाबा बताते हैं कि "वास्तव में ज्ञान और योग की अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपने पुराने जंगली संस्कारों रूपी लकड़ियों को झोंक कर जो परमेश्वर रूप पति के प्रेम में अग्नि द्वारा दाह-जैसे कष्टों को भी झेलता है उसका ही 'ईश्वर प्रेम' वास्तव में सच्चा है। इस दृष्टिकोण से वही आत्मा 'सती' है जो कि उस परमेश्वर रूप पति के लोक (ब्रह्मलोक) को जाती है। इस प्रकार सती होने वाली आत्मा फिर बाद में स्वर्गिक सृष्टि में सदा के लिए विधवापन के अभिशाप से, लोक-निन्दा से और कुदृष्टि से बच जाती है। वास्तव में इस प्रकार सती होना ही 'जीते-जी मरना' है क्योंकि इसमें 'जीते-जी' मन से और सब नाते तोड़ करके एक 'परमेश्वर रूप पति' से अपना नाता जोड़ना होता है, उसके लिए ही सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है और योग रूपी अग्नि प्रज्वलित करके आत्म-दाह (न कि शरीर-दाह) करना पड़ता है। ऐसी सती के लिए ही खुशी के नगाड़े बजाना भी शोभा देता है और इस प्रकार सती होने वाले पर पुष्प वर्षा करना भी अनुचित नहीं और यह ऐसी सती की रस्म है जो नर और नारी दोनों अदा कर सकते हैं। यही 'धर्म' के अनुकूल भी है। इस प्रकार सती की रस्म की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए बाबा सभी आत्माओं का मन एक परमात्मा से जोड़ देते।
बाबा से जब कोई मिलता तब भी बाबा कहते "आप आत्माओं का पति तो एक परमात्मा ही है, अतः मिलना आपको उसी ही से है। वही आपका पुरुष है, दूसरे गोया सब पर पुरुष है। अतः आप पहले यह सोचो कि आप किससे मिल रहे हो? आप शिव परमात्मा की याद में रहकर उस ही से मिलो तो कुछ कल्याण भी होगा। उस एक ही का प्यार निःस्वार्थ है और कल्याणकारी भी है। शरीरों से प्यार करना तो देह-अभिमान का सूचक है और वह अन्ते अकल्याणकारी है।"
तिलक
बाबा बताते कि "मन्दिरों में ब्राह्मण अथवा पुजारी लोग भक्तों के मस्तक पर भृकुटि में जो तिलक देते हैं इस प्रथा का भी एक बहुत उच्च आध्यात्मिक रहस्य है जो कि अब प्रायः लुप्त हो गया है। इसी प्रकार मातायें भी अपने मस्तक पर जो बिन्दी लगाती हैं उसके पीछे भी एक आध्यात्मिक भाव हुआ करता था। वास्तव में ये तिलक अथवा बिन्दी स्वयं को आत्मा की याद दिलाने के लिए तथा दूसरों की दृष्टि को आत्मा की ओर आकर्षित करने का एक साधन है। परन्तु आज लोग यह भी भूल गये हैं कि आत्मा भृकुटि में निवास करती है और वे लकीर के फकीर ही बने हुए हैं। इस प्रकार तिलक की प्रथा का आध्यात्मिक रहस्य समझाते हुए बाबा कहते कि अब आप अविनाशी ज्ञान रूपी केसर अथवा चन्दन से स्वयं को भी तिलक दो और दूसरों को भी। ज्ञान के बिना जो भक्त लोग तिलक देते अथवा देते हैं वह तो एक दिन में ही मिट जाता है और उसको धारण करके भी वे आत्मा के स्वरूप में निष्ठ नहीं होते। अब आप इस निश्चय में स्थित हो जाओ अथवा इस स्मृति में टिक जाओ कि मैं एक अविनाशी ज्योतिबिन्दु रूप आत्मा हूँ जो कि भृकुटि में वास करती है। यह स्मृति ही गोया स्वयं को सच्चा तिलक लगाना है और स्वयं को ज्योति-बिन्दु निश्चय करना ही ज्ञानवान नर-नारियों के लिए बिन्दी लगाना है। दूसरों को भी ऐसा तिलक लगाना तथा उनकी भृकुटि में ही देखना आप सच्चे ब्राह्मणों का धर्म-कर्म है। आपके ये ईश्वरीय सेवा केन्द्र सच्चे ज्ञान-मन्दिर हैं। वहाँ जो भी जिज्ञासु आते हैं उन्हें आत्मिक रूपी तिलक आपको ज़रूर लगाना चाहिये।"
मरते समय मुख में गंगा-जल
भारत में चिर-अतीत से यह भी प्रथा चली आई है कि जब कोई मनुष्य मृत्यु-शैय्या पर पड़ा होता है तो ब्राह्मण अथवा सम्बन्धी उस मनुष्य के मुख में थोड़े-थोड़े समय के बाद गंगा-जल डालते हैं क्योंकि उनकी यह मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य पावन होकर स्वर्ग को जाता है। इस प्रथा का रहस्य बताते हुए बाबा कहते हैं कि वास्तव में ईश्वरीय ज्ञान ही ऐसा गंगा जल है, जो कि परमपिता शिव ने दिया है और इस ही से आत्मा पावन होकर स्वर्ग को जाती है।
बाबा कहते कि अब सारी सृष्टि मृत्यु-शैय्या पर है क्योंकि ऐटम बमों द्वारा अब इसका महाविनाश निकट भविष्य में होने ही वाला है। यों भी मनुष्य के श्वांस कब समाप्त हो जायें इस पर तो कोई भरोसा ही नहीं है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह प्रतिदिन ज्ञान रूपी गंगा जल का पान करता ही रहे।
मृत्यु से सम्बन्धित प्रथायें
बाबा बताया करते कि "चिर अतीत से यह भी एक रस्म चली आई है कि जब लोग अर्थी उठाकर श्मशान की ओर जाते हैं तो वे शहर से निकलकर अर्थी को घुमाकर शव के पांव नगर की ओर और उसका मुख श्मशान की ओर कर देते हैं। इस रस्म का उल्लेख करते हुए बाबा कहते कि अब जबकि कलियुगी सृष्टि का महाविनाश मानो हुआ ही पड़ा है और यह संसार एक वृहद् श्मशान बनने ही वाला है तो मनुष्य को चाहिए कि वह 'जीते-जी' अपने पाँव नगर अथवा संसार की ओर कर ले और मुख श्मशान अथवा विनाश की ओर कर ले। कहने का भाव यह है कि जीते जी संसार से बुद्धियोग तोड़कर, आने वाले समय का ध्यान करते हुए अनासक्त और उपराम-चित्त हो जाएँ। बाबा कहते कि मरने के बाद मुख मोड़ने से क्या लाभ? 'जीते-जी' संसार को देखते हुए उससे बुद्धि मोड़ लेना ही वास्तव में कल्याणकारी है।"
बाबा श्मशानी वैराग्य का भी जिक्र करते। जो लोग अर्थी को कन्धा देकर श्मशान पर जाते हैं उन्हें वहां जाकर कुछ समय के लिए वैराग्य आता है परन्तु जब वे वापिस लौटते हैं तो फिर वे सांसारिक बातों में उलझ जाते हैं अथवा लिप्त हो जाते हैं मानो कि वे वैराग्य को श्मशान में ही छोड़ आये हैं। उन्हें वहाँ श्मशान में मुर्दे को देखकर तो वैराग्य आता है क्योंकि मृत्यु को देखते हुए उनके मन में यह भाव पैदा होता है कि एक दिन हमें भी खाली हाथ जाना होगा, परन्तु यह वैराग्य उपयोगी तो शहर में ही हो सकता है जहाँ कि उनके सामने प्रलोभन,आसक्ति अथवा उत्तेजना की परिस्थितियाँ होती है किन्तु वहाँ आने तक उनका वैराग्य ही समाप्त हो जाता है। मनुष्य की इस अल्पन्नता की ओर इशारा करते हुए बाबा कहते कि ऐसी भूल नहीं करनी चाहिये। अब तो ऐसा समय आने वाला है जबकि कोई किसीके लिए पिण्ड दान करने वाला या क्रिया-कर्म करने वाला भी नहीं होगा क्योंकि अब महाविनाश की घड़ी आकर पहुँची है। अतः मनुष्य को चाहिए कि इस संसार को नष्ट प्रायः जान कर, उसको मुर्दा मानकर इससे दिल न लगाये।
बाबा बताते कि लोग मृतक के सिर की ओर दीपक भी जगाते हैं ताकि उसकी आत्मा भटक न जाय और अन्तिम श्वांस निकलने से पूर्व वे उसके हाथों से कुछ दान भी कराने का यत्न करते हैं परन्तु यदि मनुष्य ने अपने जीवन काल में आत्मा रूपी दीपक नहीं जलाया तो मरने के पश्चात् यह पार्थिव दीपक क्या कार्य करेगा और वह उसकी रूह को भटकने से कैसे बचा सकेगा? यदि उसने सचेत अवस्था में स्वेच्छा से, अपनी कमाई से किसी श्रेष्ठ कार्य के लिये सहयोग नहीं दिया अथवा दान नहीं किया तो अब अचेत अवस्था में अज्ञात रीति से उससे दान कराने से उसको विशेष रूप से कैसे श्रेय मिलेगा? इन सबको ध्यान में रखते हुए मनुष्य को चाहिये कि 'जीते-जी' ही ईश्वरीय ज्ञान और योग के द्वारा आत्मा रूपी दीपक जगा ले और अपना भाग्य बनाने के लिये जो चाहे सो कर ले।
बहुधा लोग किसी की मृत्यु के पश्चात् यही कहा करते हैं कि वह 'स्वर्ग सिधार गया है।' अंग्रेज़ी भाषा-भाषी भी किसी के देह-त्याग के बाद कहते हैं, ‘He has left for the Heavenly Abode’ अर्थात् 'वह स्वर्गवासी हो गया है।' समाचार पत्रों में भी लोग इस प्रकार की सूचनाएँ प्रकाशित कराते हैं। इस बारे में बाबा कहते कि देखिये तो संसार में कैसी विचित्र मान्यताएँ प्रचलित हैं! जो कोई भी शरीर छोड़ रहा है, क्या वह स्वर्ग जा रहा है? यह भला कैसे हो सकता है? स्वर्गवास का अधिकारी होने के लिए तो मनुष्य को पवित्र एवं दिव्य गुण सम्पन्न अर्थात् देवता बनने की आवश्यकता है क्योंकि स्वर्ग में तो 'देवी-देवतायें रहते हैं, तब सभी लोग मरने के बाद 'स्वर्गवासी' कैसे हो सकते हैं? फिर एक बात यह भी है कि स्वर्ग इस लोक से कहीं ऊपर थोड़े ही है? इन बातों का स्पष्टीकरण देते हुए बाबा कहते कि "अब इसी सृष्टि को स्वर्ग बनाना है, उसके लिए स्वयं को मनुष्य से देवता बनाने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना है।"
जन्म से सम्बन्धित प्रथायें
बाबा बताते, एक रिवाज यह भी चला आया है कि बहुत से लोग बच्चे का जन्म होने पर उसकी जीभ पर मधु से 'ऊँ' शब्द लिख देते। वास्तव में इसका भाव तो यही है कि इस संसार में शुरू से ही मनुष्य अपने स्वरूप को पहचाने और उसमें स्थित रहे। किन्तु लोग यद्यपि ऐसा लिख देते हैं, वे स्वयं भी 'ओम्' के अर्थ-स्वरूप में स्थित नहीं होते और बच्चे के बड़े एवं समझदार होने पर उसको भी स्वरूप का ज्ञान नहीं देते। तब फिर उस अनजान अवस्था में 'ओम्' लिखनेका क्या लाभ? बाबा विनोदपूर्ण रीति से कहते कि छोटा बच्चा जब रोता है तो वह वां....वां..... करता है इसके बारे में भी एक उक्ति प्रचलित है। कहते हैं जब बच्चा मां के गर्भ में होता है और वहां कष्ट, क्लेश तथा जेल और गंदगी का अनुभव करता है तो 'धर्मराज' से कहता है, 'अबकी बार मुझे बाहर निकाल दो तो मैं वचन देता हूँ कि मैं फिर कोई बुरा काम नहीं करूंगा।' परन्तु बाहर संसार में आकर वह वां, वां..... वां’ कहता है जिसका भाव यह होता है कि ‘मैंने वहाँ (गर्भ जेल में) जो वचन किया था वह वहां की बात वहीं रहा।’ गोया वह अपने वचन को भूल जाता है और फिर इस संसार की चाशनी चाट कर यहाँ का हो जाता है और विकर्म करने लग जाता है। वह वचन तो कर आया था कि अब मैं ईश्वर को याद करूँगा। लेकिन यहाँ आकर फिर वैसे-का-वैसा हो जाता है! इसका उल्लेख करते हुए बाबा कहते कि अब मनुष्यों को भूल नहीं करनी चाहिये।"
बाबा समझाया करते कि, "कुछ अपराधी ऐसे होते हैं जो जेल से छूटकर बाहर आते ही फिर अपराध करना शुरू कर देते हैं। ऐसे अपराधियों को 'जेल-बर्ड' (Jail-Bird) कहा जाता है। ठीक इसी प्रकार, आज प्रायः सभी मनुष्य एक दृष्टिकोण से 'जेल-बर्ड' ही हैं, क्योंकि वे 'गर्भ-जेल' से बाहर आते ही फिर पाप करना शुरू कर देते हैं। अतः बाबा कहते कि अब जबकि अन्तिम जन्म है और धर्मराज बाबा अर्थात् धर्म का राज्य स्थापित करने वाले शिव बाबा सृष्टि रूपी जेल की पीड़ाओं से मुक्त कराने आये हैं तब तो आप अपराध अथवा विकर्मो से बचकर रहें वर्ना ज्ञान अथवा सावधानी मिलने के बाद भी यदि कोई विकर्म करता है तो उसको सौ गुना दण्ड मिलता है।
बाबा ज्ञान के इस सूक्ष्म रहस्य की ओर भी ध्यान आकर्षित करते कि जिस क्षण बच्चा पैदा होता है, उसी क्षण से वह अपने पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकारी (वारिस) तो बन ही जाता है। हाँ, उस वर्से अथवा सम्पत्ति को संभालने के लिए उसकी आयु बड़ी होना तथा उसमें योग्यता का होना ज़रूरी है और उसके लिए समय लगता है। इसलिए इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि विरासत का अधिकारी तो वह जन्म के क्षण से ही हो जाता है। ठीक इसी प्रकार, परमात्मा भी हम सब आत्माओं का परमपिता है। वह अविनाशी पवित्रता, सुख और शान्ति रूपी सम्पत्ति का मालिक है। यदि हम इसी क्षण स्वयं को उसका पुत्र निश्चय करें और इस सम्बन्ध में स्थित होकर ही हम जीवन-निर्वाह करें तो हम परमात्मा की अविनाशी सम्पत्ति के अधिकारी तो इसी क्षण से हो जायेंगे। तब हमारी खुशी का पारा कितना चढ़ जायेगा! अहा हा!! हम ऐसे पिता के उत्तराधिकारी बच्चे!! परन्तु इस सहज-से किन्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान-बिन्दु को भी कोई विरला ही समझता है। यदि कोई समझ जाय तो वह बैकुण्ठ के स्वराज्य का मालिक बन सकता है लेकिन जैसे हथेली पर पारा मुश्किल से टिकता है वैसे ही ज्ञान का यह नुक्ता विकारों से फिसलती हुई-हुई बुद्धि पर मुश्किल ही टिकता है।
बाबा कहते कि जब किसी बच्चे को गोद ले लिया जाता है अथवा जब कोई धर्म का बच्चा बनता है तो जो उसे गोद लेता है - उसकी सम्पत्ति का वह उत्तराधिकारी हो जाता है और उसही का उपनाम (Surname) अब उस बच्चे के नाम के साथ भी प्रयुक्त होने लगता है और अब वह बच्चा गोद लेने वाले पिता को ही अपना पिता निश्चय करता है। ठीक इसी प्रकार यद्यपि सभी मानव देहधारियों का अपना-अपना, अलग-अलग दैहिक पिता है परन्तु अब शिव बाबा सबको कहते हैं "अब मेरे ईश्वरीय गोद के बच्चे अथवा मेरे धर्म के बच्चे बन जाओ तो मैं आपको स्वर्गिक राज्यभाग्य के रूप में उत्तराधिकार दूँगा।" ओहो कोटि-कोटि मनुष्यों को जब ये ईश्वरीय ऐलान सुनाया जाता है तब वे बहरे होकर सुनते रहते हैं और उत्तर देने के लिए गूँगे से खड़े रहते हैं और जो समझने की बात है उसके बारे में बुद्धू का सा व्यवहार करते हैं! सोचो तो, यदि आज करोड़पति साधु-स्वभाव का व्यक्ति किसी को कहे कि 'तुम मेरी गोद के बच्चे बन जाओ', तो वह बच्चा यदि समझदार होगा और कम्बख्त भी नहीं होगा तो क्या वह इन्कार करेगा? मुफ्त में यदि किसी को करोड़ों की सम्पत्ति मिले तो कौन आये भाग्य को लौटाकर मूर्खो की पक्ति में खड़ा होगा? तब ऐसे मनुष्य को आप क्या नाम देंगे जो ईश्वर की गोद का बच्चा नहीं बनना चाहता!"
इस प्रकार अन्य बहुत-सी प्रथाओं, रस्म-रिवाजों आदि-आदि के भी मनोरम अध्यात्म तत्त्व को दर्शाते हुए बाबा वास्तविकता में टिकाते और आध्यात्मिक एवं पवित्र जीवन के परम शिखर पर ले जाने के लिए सहायक शक्ति का कार्य करते। कहावत है, "जैसे केले के पात-पात में पात तस ज्ञानी की बात बात में बात" ठीक वही बात यहाँ घटती है।
शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा की अद्भुत कार्य विधि
सचमुच बाबा की कार्यविधि ही अद्भुत और अलौकिक थी। बाबा अनेक युक्तियाँ अपनाकर हर आत्मा का कल्याण करने का उपाय करते थे; ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि जी जोकि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका रह चुकी हैं, कहती हैं:-
इस कलियुगी सृष्टि में सभी मनुष्यों के संस्कार सतयुग के देवताओं के संस्कारों की तुलना में तो तमोप्रधान अथवा आसुरी बन चुके हैं। अब उन संस्कारों को पलटकर फिर से मनुष्य को देवता अथवा सतोगुणी बनाने का कार्य जो बापदादा2 ने किया और कर रहे हैं, वह बहुत ही अलौकिक, अद्भुत और उच्च है, जैसे एक श्रेष्ठ वैद्य रोगी की नब्ज़ को परख कर, उसकी अवस्था को जानकर उसके अनुसार ही उसे औषधि देता है, ठीक वैसा ही कार्य बापदादा ने किया और अब भी कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने जिन युक्तियों का प्रयोग किया, उन पर विचार करके मन में बहुत ही हर्ष होता है और हृदय बापदादा के स्नेह से भरपूर हो जाता है। उनमें से बाबा अनेक प्रकार की युक्तियों का वर्णन करते हैं:
हरेक में जो अच्छा गुण हो उसके अनुसार उसे व्यस्त कर देना
इस कलियुगी सृष्टि में हरेक मनुष्य में अवगुण तो भरे ही पड़े हैं परन्तु इस 'ज्ञान-यज्ञ' में आकर जो कोई भी ज्ञान लेकर आगे बढ़ना चाहता, बाबा उसके अवगुणों को न देख, उसके गुण का वर्णन कर उसमें उत्साह और खुशी भर देते और उस गुण से उसे जन-सेवा में लगाकर उसका भी कल्याण कर देते। अवगुणों को निकाल कर दिव्य गुण भरना तो बाबा का कार्य है ही परन्तु उस कार्य को शुरू करने से पहले तो मनुष्य को किसी आधार पर खड़ा करने की आवश्यकता होती है; उसे हैंडलिंग (Handling) देने के लिये किसी हैण्डल (Handle) की ज़रूरत होती है। तो बाबा हरेक के किसी गुण को उसका बना देते। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता तो बाबा कहते- "यह तो बहुत लोगों का कल्याण कर सकता है, लिट्रेचर लिखने और छपवाने में, समाचार पत्रों में ईश्वरीय संदेश प्रकाशित करने में, ईश्वरीय ज्ञान के भाषणों को तैयार कराने में जुटकर यह अपना भाग्य बहुत ऊँचा बना सकता है। बाबा की इस बच्चे में बहुत उम्मीद है। इस बच्चे का विश्व-ड्रामा में अच्छा ही पार्ट है। यह समझदार बच्चा है। झट से इस सहज ज्ञान को बुद्धि में धारण करके दूसरों को भी सहमत (Convince) कर सकता है।" ये सुनकर उस व्यक्ति का मन पुलकित हो उठता और वह ईश्वरीय सेवा में जुट जाता। इस प्रकार जब उसकी बुद्धि ज्ञान, विज्ञान (योग) और सेवा में जुट जाती तो उसके पुराने संस्कारों को कर्म (Play) में आने का समय ही न मिलता और ज्ञान-विरुद्ध एवं उल्टी बातों को सोचने का अवसर ही न रहता। इसके फलस्वरूप, उसके पुराने संस्कार मिटने लगते, खराब आदतें ढीली पड़ने लगती, जीवन में उत्साह और उल्लास भरने लगता और दिव्य वातावरण तथा ज्ञान के लेन-देन से उसका स्वभाव पलटने लगता।
कोई सिलाई का काम जानता तो बाबा कहते "यह तो ईश्वरीय यज्ञ के लिये बहुत ही सर्विसएबल (Serviceable, सेवाधारी) है।बाबा को ऐसे ही ज्ञानयुक्त, योगयुक्त, ब्राह्मण कुलभूषण और पवित्र बच्चों द्वारा शिव बाबा की याद में रहकर सिले हुए कपड़े मिलेंगे तो कितना अच्छा होगा! यह सुनकर उस व्यक्ति के रोमान्च खड़े हो जाते और वह सोचता कि ‘मैं भी किसी काम का व्यक्ति हूँ।’ वह समझता कि ‘मेरी भी कुछ उपयोगिता है जिससे कि मैं दूसरी आत्माओं को सुख दे सकता हूँ।" तब वह योग-युक्त होकर इसी ईश्वरीय सेवा में जुट जाता। कोई बूढ़ा और अनपढ़ होता तो वह सोचता कि "मैं तो अब किसी काम का नहीं रहा। घर से, बाहर वालों से, सब ओर से फालतू हूँ।’ परन्तु ऐसे मनुष्य जब बाबा के कमल मुख से ये शब्द सुनते तो उत्साहित हो जाते ‘जो लोग वृद्ध हैं, वे बहुत ही सर्विस (Service) कर सकते हैं क्योंकि वे अनुभवी है। वे यदि ईश्वरीय ज्ञान की बातें दूसरों को अपने अनुभव सहित सुनायेंगे तो सुनने वालों को वह बात जच जायेगी। बच्चे, आप पढ़े हुए नहीं हैं तो क्या हुआ? केवल 'अल्फ' (परमात्मा) और 'बे' (शिव परमात्मा से जो स्वर्ग की बादशाही मिलती है) ये दो ही तो बातें जाननी हैं और सभी को इतना ही तो बताना है कि परमपिता परमात्मा को याद करो और पवित्र बनो तो आपको दैवी राज्य-भाग्य मिलेगा इसमें क्या कठिनाई है? देखो शिव बाबा ने भी तो इस वृद्ध (ब्रह्मा) तन का आधार लिया है?’
इस तरह की बातें सुनकर और बुढ़ापे में भी अपने लिए बाबा के मुख से 'बच्चे' शब्द सुनकर वे भी फिर बालक की तरह यह ईश्वरीय विद्या पढ़ने लगते और अन्य मनुष्यों को ईश्वरीय ज्ञान देने की सेवा में जुट जाते। ठीक इसी तरह बाबा बच्चों को, निर्धनों को, हर वर्ग तथा हर आयु के व्यक्तियों को आत्मिक दृष्टि से देखते हुए उन्हें लोक-कल्याण के किसी न किसी कार्य में लगा देते। अतः जो जीवन पहले व्यर्थ जा रहा होता था, अब वह उससे अपने लिए तथा दूसरों के लिए बड़े महत्त्व का जीवन बन जाता। जिस में जो सर्विसएबल गुण (Serviceable Quality) होता, उसको उठाकर बाबा उसका यज्ञ सेवार्थ प्रयोग करते और इससे उस व्यक्ति को अपने संस्कारों को पलटाने के कार्य में भी ईश्वरीय बल मिलता।
सबको प्यार तथा सम्मान देकर आगे बढ़ाया
आजकल के ज़माने में कोई किसी को निःस्वार्थ प्यार नहीं देता; कोई सच्चे और शुद्ध प्यार से व्यवहार नहीं करता। बाबा सबको स्वभाविक, सर्वश्रेष्ठ, सम्पूर्ण और सच्चा प्यार देते। वे "मीठे-मीठे, सिकीलधे, नूरे-रत्न, सर्विसएबल रूहानी बच्चे"; इस प्रकार के विशेषण मन के अन्तर्तम स्नेह से और मधुर मुस्कान के साथ प्रयोग करते। "लाडले बच्चे!" ऐसा कहकर वे सदा पुकारते कि आत्मा बोल उठती कि ये किसी सांसारिक व्यक्ति का प्यार नहीं है। उसे महसूस होता कि यह तो प्यार के सागर 'परमपिता' ही मानव जाति के पिता "ब्रह्मा के द्वारा इस अलौकिक स्नेह की वर्षा कर रहे हैं। इस प्रकार सच्चे प्यार से सिक्त होकर वह (आत्मा) अभूतपूर्व शीतलता और उच्च सौभाग्य का अनुभव करती। जब मनुष्य को प्यार मिल जाय तो वह क्या करने को तैयार नहीं होता? प्यार पाकर तो मनुष्य अपनी जान भी न्यौछावर करने को तैयार हो जाता है।
इस प्रकार, आत्मा में ईश्वरीय स्नेह पैदा करके बाबा उससे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की 'बलि' ले लेते। बाबा कहते- 'देखो बच्चे ! क्या इस बाप के लिए इन दुखकारी चीज़ों को भी नहीं छोड़ सकते? देखो, जन्म-जन्मान्तर तो आप विकारों का धन्धा करते आये हो और मानव मत पर चलकर माया के मुरीद बने रहे हो, अब ये बाप इस अन्तिम जन्म में आपको सुख-शान्ति की विरासत देने आया है, तब क्या इस रहे हुए थोड़े से समय के लिए भी इस बाप की खातिर ये विकार नहीं छोड़ सकते ? आप जन्म-जन्मान्तर भक्ति करते थे- "हे पतित पावन पिता! आकर हमें विषय विकारों से छुड़ाओ! अब जब मैं आया हूँ तब तो आप पतित से पावन बनो। देखो, लाडले बच्चे! अब मुझे इस सृष्टि को पवित्र बनाना है, तो क्या इस कार्य में आप सिकीलधे बच्चे इस पिता को सहयोग नहीं दोगे?" बाबा के ऐसे करुणापूर्ण कल्याणकारी एवं मधुर वचनों को सुनकर और अपने सहयोग को भी महत्त्वपूर्ण मानकर हर कोई पवित्र बनने और बनाने के पुरुषार्थ में जुट जाता। बापदादा से उन्हें ऐसा तो प्यार और लालन-पालन मिलता कि वे साँसारिक 'विषैले सुखों' को भूलकर ईश्वरीय परिवार के सम्बन्ध में टिक जाते।
सच्चे पिता का सम्बन्ध
बाबा सच्चे पिता का सा व्यवहार करते। वे हरेक से कहते, “बच्चे, यह आपका असली घर है... जो कुछ बाबा का है, सो आपके लिए है... बच्चे, समाचार देते रहना... बच्चे खुशी खैरियत का पत्र लिखते रहना। बच्चे, राय लेते रहना....." वे सब ऐसे स्नेह और माधुर्य से 'बच्चे बच्चे' कहकर पुकारते कि हरेक का बुद्धियोग अन्य सभी से टूटकर उस एक ओर जुट जाता। वे देह के सम्बन्ध से उपराम होकर, उस अलौकिक नाते का सुख लेते। क्या आज के संसार में कोई किसी को कहता है कि यह आप सभी का घर है और यह सब कुछ आपका है? बाबा तो यज्ञ का समाचार भी बच्चों को सुनाने लग जाते, वे मन की बात भी सबको निसंकोच कह डालते। हर कोई यह समझता कि यह मेरा बाबा है, मुझसे इनका विशेष प्यार है, तब उनके मन और मुख से भी "बाबा! मीठे बाबा।" शब्द सहज ही निकल पड़ते। तब वे भला बाबा की बात, बाबा की आज्ञा को कैसे टाल सकते?
एक बार की बात है कि एक युगल (पति-पत्नी) बाबा से मिलने आये। उन्होंने पहले दो चार बार ही यह ईश्वरीय ज्ञान सुना था। बाबा ने उनसे पूछा "बच्चे! कैसे चल रहे हो? यह बच्ची तेज़ पुरुषार्थ कर रही है या यह बच्चा!" बाबा की भव्य, तेजोमय, वयोवृद्ध एवं स्नेहमयी मूर्ति को देखकर और उनके मुख से "बच्चे, बच्चे" ऐसे प्यार भरे शब्द सुनकर उन दोनों (पति-पत्नि) के मुख से भी सहज ही "बाबा" शब्द निकल पड़ा। 'बाबा' ऐसे सम्बोधित करते हुए वे बोले- "हमको यह ज्ञान बहुत अच्छा लगता है परन्तु बाबा, पवित्र रहना बहुत मुश्किल है।" ऐसा कहते हुए वे उत्तर की अभिलाषा लिये बाबा की ओर देख रहे थे। तब बाबा के चेहरे की रेखायें बदलीं। करुणा, शिक्षा और वात्सल्य की मिली-जुली रेखायें उभर आयीं और नेत्र खामोश वाणी में कुछ कहने लगे। एक क्षण निस्तब्धता रही होगी, जिसने कि उस दम्पति के मन की भूमि को तैयार कर दिया। तब बाबा बोले "बच्चे ! जब आप मुझे 'बाबा' कहते हो तब क्या यह छोटी सी बात भी मेरी नहीं मान सकते? लौकिक नाते से भी बच्चे जिसे अपना बाप मानते हैं उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, तब पावन बनाने वाले इस पिता का फरमान और वह भी अन्तिम जन्म में इस थोड़ी सी वेला के लिए जबकि महाविनाश सामने है, नहीं मानोगे?" बाबा ने श्रीलक्ष्मी-नारायण का फ्रेम किया हुआ एक चित्र मँगाया और उन्हें देते हुए कहा, "बाबा कहते हैं कि यह बच्ची और बच्चा ऐसे (श्रीलक्ष्मी और श्रीनारायण के समान) बनें। बच्चे बनोगे ना?" वे दोनों बोल उठे -"हां बाबा, अवश्य बनेंगे। जबकि बाबा ने हममें ये उम्मीद रखी है तो हम इसे पूर्ण करके दिखायेंगे।" बाबा बोले, "बच्चे! तब बाबा भी आपको आफरीन देंगे और शिव बाबा तो स्वर्ग का राज्य-भाग्य देंगे ही क्योंकि जो 'काम महाशत्रु' पर विजय प्राप्त करता है वह 'जगत-जीत' बनता है।"
बाबा के ये प्रेरणादायक शब्द सुनकर और उनकी ये आशायें भी देखकर उस दम्पति को ऐसा लगता कि वे शब्द, शब्द नहीं थे, शब्दबाण थे। नहीं, नहीं वह तो शुद्ध बिजली थी, एक अपार शक्ति थी जो उनके मन में सदा के लिए समा गयी। उनके नयन, ऐसे पावन बनाने वाले पिता के स्नेह में गीले हो उठे और वे बाबा को निहारते निहारते जाते समय ऐसे दिखाई दे रहे थे जैसे पान का बीड़ा उठाने के बाद कोई सपूत अथवा राजपूत दृढ़ मनसा से, विजय के मनसूबे बांधकर, रणभेरी की आवाज़ के पीछे पीछे लड़ाई के मैदान की ओर जाता है। ऐसा काम करते थे 'बच्चे, बच्चे' ये शब्द कि जो काम ऋषियों-मुनियों और शास्त्रों ने भी असम्भव बताया है।
हाथ उठाना और निश्चय-पत्र लिखवाना
ज्ञान के सूक्ष्म तत्वों का क्लास में दिग्दर्शन कराते कराते बाबा कहते, "जो बच्चे समझते हैं कि वे १६ कला सम्पूर्ण, सूर्यवंशी देवी-देवता बनेंगे वे हाथ खड़ा करें।" क्लास में उपस्थित सभी बहन-भाई हाथ खड़ा कर देते। कुछ लोग हाथ पूरी तरह खड़ा न करते, मानो आधा खड़ा किया हो। बाबा कहते, "किसी किसी ने अच्छी तरह से हाथ खड़ा नहीं किया है? क्या रूहानी मिलिटरी ऐसी होनी चाहिए? हाथ तो पूरा खड़ा करना चाहिये ना? शायद इन लोगों के मन में कुछ सन्देह है वर्ना ये हाथ बड़े फलक से खड़ा करते। देखो, कई बच्चे हाथ खड़ा करने में भी कितनी देर लगाते हैं? धीरे-धीरे, शर्म के मारे हाथ खड़ा करते हैं क्योंकि वे बच्चे संकल्पों-विकल्पों में पड़े हुए अपनी मंजिल की ओर धीरे-धीरे चल रहे हैं। यदि वे झटपट चल रहे होते तो झट से हाथ खड़ा करते। देखो यह बाबा भी तो आप बच्चों की तरह एक विद्यार्थी है ना? देखो तो बाबा कैसे हाथ खड़ा करते हैं।" तब बाबा बड़ी खुशी और फलक से ऊँचा-ऊँचा अपना हाथ खड़ा कर देते कि क्लास में उपस्थित. सभी लोग हंस पड़ते और जिन्होंने अपना हाथ कौली रीति से अथवा नीचे नीचे खड़ा किया होता वे भी तानकर ऊँचा कर देते। अब थके हुए चेहरों पर भी, माया से मुरझाये हुए मुखड़ों पर भी हिम्मत और खुशी की झलक दिखाई देती जैसे कि सैनिकों को अपने कमाण्डर की प्रसन्न सूरत देखकर खुशी होती है। तब बाबा कहते, "हाँ बच्चे मन में पूर्ण निश्चय होना चाहिए कि हम १६ कला सम्पूर्ण बनेंगे।" बाबा अब दूसरा प्रश्न करते। वे कहते, "अच्छा, जो बच्चे समझते हैं कि वे १४ कला सम्पूर्ण चन्द्रवंशी घराने में जायेंगे, अब वे हाथ खड़ा करें!" तो कोई भी हाथ खड़ा न करता। बाबा कहते, "क्या सभी १६ कला सम्पूर्ण बनेंगे? यह कहकर बाबा हँस पड़ते और कहते, "खबरदार, अगर ऐसी ही बात मन में ठान रखी है तो माया भी खूब युद्ध करेगी। बच्चे, घबराना नहीं है। सर्वशक्तिवान आपके साथ हैं। लक्ष्य तो सदा ऊँचा ही होना चाहिये न? १४ कला पूर्ण बनना यह तो असफलता (Failure) की निशानी है। शिव बाबा-जैसे परम शिक्षक और परम सद्गुरु के शिक्षार्थी (Students) बनकर तो उसे पूर्ण लाभ उठाना चाहिये न?
फिर बाबा कहते, "अच्छा, अगर आपको यह पूर्ण निश्चय है कि आपको शिव बाबा मिले हैं और आप ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्णरूप से पालन करते हुए 'मायाजीत' बनकर दिखाएँगे तो 'निश्चय-पत्र' लिख कर दो। बच्चे यह माया बड़ी दुस्तर है। मनुष्य को अभी-अभी निश्चय होता है परन्तु क्षण भर के बाद माया उसको संशयात्मा बना देती है और मनुष्य का सारा ज्ञान 'सोडा-वाटर' हो जाता है। आज हम देखते हैं कि कोई बच्चा बहुत तेज़ पुरुषार्थ कर रहा है परन्तु कल देखते हैं कि वह माया का मुरीद बन गया है। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता है। 'निश्चय-पत्र' लिख दोगे तो आपको याद रहेगा कि जब हम ज्ञानयुक्त अवस्था में थे तो हम मानते थे कि पवित्रता मनुष्य के लिये अच्छी है और कि अब हमें शिव बाबा मिले हैं। तो जब कभी आपको माया परेशान करेगी, तब यह 'निश्चय-पत्र' आपको थामे रखेगा।
इस प्रकार की विधियों से बाबा बच्चों के कल्याण के लिए कुछ न कुछ करते रहते। उन्हें इस तरह उल्लास में लाते रहते कि बच्चों के पुरुषार्थ में फिर से तीव्रता आ जाती और उच्च लक्ष्य सदा उनके सामने बना रहता।
दौड़ और होड़
बहुत बार बाबा कहते, "ये पवित्रता का जो पुरुषार्थ है, यह एक दौड़ प्रतियोगिता (Race Competition) है। इसमें सभी बच्चे नम्बरवार है, कई इस दौड़ में आगे हैं, कई बीच में हैं और कई पीछे।शिव बाबा का किसी से पक्षपात नहीं है, जो तेज़ भागेगा वही 'विन'(Win) करेगा वही बाजी ले जाएगा। कुछ बच्चे बहुत समय से इस दौड़ में भाग ले रहे हैं और कुछ ऐसे हैं जो बहुत बाद में आये हैं परन्तु फिर भी वे पहले वालों से आगे निकल गये हैं। इसलिये कोई यह न सोचे कि मुझसे बहुत से लोग पहले से ही ज्ञान ले रहे हैं,इसलिए मैं उनसे पीछेही रहूँगा बल्कि हरेकको यह कोशिश करनी चाहिए कि मैं तेज़ भाग कर आगे निकल जाऊँ। पवित्रता की दौड़ से होड़ लगाना- यह अच्छी बात है क्योंकि यह शुद्ध पुरुषार्थ है।"
बाबा कहते, "कोई निर्धन है तो क्या हुआ, बाबा को तो ज्ञानी आत्मा प्रिय है जो कि दूसरों को भी ज्ञान सुनाकर उच्च बनाता है, याद रूपी यात्रा पर रहता है और दैवी गुणों को धारण करके अच्छी अवस्था बनाये रखता है। इसलिए किसी बच्चे के संस्कार अज्ञान-काल में चाहे कैसे भी रहे हों परन्तु अब वह हिम्मत रखकर इस दौड़ में आगे होने का पुरुषार्थ करे।" बाबा कहते कि रुक नहीं जाना चाहिए। अगर कुछ समय व्यर्थ निकल गया है, तब भी कोई बात नहीं। अब उसके बारे में अधिक सोचकर समय व्यर्थ गँवाना ठीक नहीं। अब भी अवसर है, गैलप (gallop) कर सकते हो। इस प्रकार, बाबा इस ज्ञान-यज्ञ में पीछे आने वालों को भी आगे बढ़ाते रहते और आगे वालों को भी कहते कि "बच्चे, सावधानी से रहना। अगर इस पवित्रता के पथ पर कहीं गिर गये तो पीछे आने वाले भी आपसे आगे निकल जायेंगे।"
समय की पहचान
बाबा ज्ञान के गहन और रमणीक प्वाइन्टस (Points) तो बताते ही रहते और नित्य नई शिक्षाओं से सजाते भी रहते परन्तु साथ-साथ समय की भी पहचान देते रहते। कभी वे कहते "बच्चे, जब कोई इमरजेन्सी (Emergency) अर्थात् संकटकालीन परिस्थिति होती है तो वहाँ की सरकार आज्ञा (Ordinance) घोषित करती है जिसके अन्तर्गत देशवासियों को कुछ कार्य अनिवार्य रूप से करने पड़ते हैं अथवा कई बातों को अनिवार्य रूप से छोड़ना होता है। इसका उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि "बच्चे, अब तो इमरजेन्सी, अथवा धर्म-संकट है। सारे विश्व में एक बहुत बड़ा 'चारित्रिक संकट' (Moral Crisis) है। यह घोर कलियुग है। काम, क्रोधादि शत्रुओं ने मानव-जाति को घेराव में डाल रखा है, इसलिए अब सबके लिए यह ईश्वरीय आदेश (Ordinance) है कि 'अब पवित्र और योगी बनो' क्योंकि अब सतयुगी पावन सृष्टि की पुनर्स्थापना होनी ही है।" बाबा कहते "क्या आप जानते नहीं हैं कि जो व्यक्ति शत्रुओं से मिल जाता है वह 'देशद्रोही' (Traitor) कहलाता है? क्या आपको मालूम नहीं है कि 'देशद्रोही' को बड़ा कड़ा दण्ड मिलता है? तो बच्चे, अब इस परम-आज्ञा का उल्लंघन बिल्कुल न करना।"
एक बार की बात है कि एक व्यक्ति कुछ दिनों से यह ईश्वरीय ज्ञान सुन रहा था। परन्तु पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य व्रत की पालना का नियम उसे बहुत कठिन लगता था और अनावश्यक भी। एक दिन जब उसने बाबा के ये महावाक्य सुने कि 'अब इमरजेन्सी' है, इसलिए अब पवित्र बनना है तो उसकी अन्तरात्मा जाग उठी। उसने आलस्य और हीनता के भाव की ओढ़नी को उतार फेंका और वह देश प्रेम और आत्मोन्नतिको सामने रखकर स्वेच्छासे 'पवित्रता के व्रत' अर्थात् 'ब्रह्मचर्य के नियम'को स्वीकार कर पुरुषार्थ में तत्पर हुआ।
बाबा प्रायः ये भी कहा करते, "बच्चे, क्या मालूम, किस समय जीवन की अन्तिम घड़ी आ पहुँचे। उससे पहले यदि पवित्रता का व्रत धारण कर लोगे तो 'पवित्र-सृष्टि' में जाने के अधिकारी हो जाओगे। देखो, इन विकारों को जीतने में समय लगता है, यदि अभी से पवित्रता का व्रत लोगे तो 'स्वभाविक पवित्रता' आ पायेगी। अब विनाश में समय ही बाकी कितना रहा है? मुश्किल से अभी दो ढ़ाई वर्ष होंगे, क्या आप इतना समय भी पवित्र नहीं रह सकते? अब तो सतयुग आया कि आया। बाबा को तो सतयुगी पावन सृष्टि के झाड़ साफ दिखाई दे रहे हैं।" इस प्रकार जब कोई व्यक्ति सुनता कि केवल दो ही वर्ष के लिये ब्रह्मचर्य का पालन करना है तो वह इसको कठिन बात न मानकर इस व्रत को स्वीकार कर लेता। इसी अवधि में, इस व्रत के पालन से उसे अवर्णनीय लाभ होता और 'काम-वासना' से उसकी स्वभाविक घृणा हो जाती, तब तो वह इस व्रत को अपनाये ही रहता।
इन-इन युक्तियों से बाबा पवित्रता के मार्ग पर सबको अग्रसर करते। वे कहते कि यदि मैं शुरू से सबको कह देता कि सृष्टि के महाविनाश में अभी ४० वर्ष पड़े हैं तो कोई विरला ही घर-गृहस्थ में रहते हुए इसका पालन करने को तैयार होता। बहुत-से व्यक्ति तो सोचते कि ‘अच्छा ४० वर्ष तो पड़े ही हैं पाँच-दस वर्ष विषय-वासनाओं की हवा खाकर फिर हम इस व्रत को लेंगे।’ परन्तु अब इस युक्ति को अपनाने से बहुत जनों का कल्याण हो गया है और अब तो बहुत समय बीत गया है और विनाश में बहुत कम ही समय रहा है। बाबा कहते, "५००० वर्ष के इस सृष्टि-चक्र में ४० वर्ष की अवधि तो है भी वैसे ही जैसे मनुष्य के जीवनकाल में २ वर्ष का समय होता है।" इस प्रकार बाबा ने वह कार्य किया जिसे संन्यासी भी असम्भव मानते रहे है।
विकारों के लिये कड़े शब्दों का प्रयोग
बाबा विकारों के लिये ऐसे कड़े शब्दों का प्रयोग करते कि सुनने वालों का मन, विकारों से, स्वाभाविक रूप से हट जाता। उदाहरण के तौर पर बाबा कहते, "क्रोध एक भूत है। जैसे भूत किसी के सिर पर सवार होता है उससे उल्टा काम करा देता है और उसे भी परेशान करता है तथा वस्तुओं की भी तोड़-फोड़ कराता है, वैसे ही क्रोध को एक भूत समझकर उससे बचकर रहना चाहिये। क्रोध वाले मनुष्य के पास तो खड़ा भी नहीं होना चाहिये क्योंकि यह भूत बहुत उपद्रवी है। देखो तो जिसमें क्रोध रूपी भूत प्रवेश करता है, उसका चेहरा, उसके नेत्र, उसकी बातचीत कैसे बदल जाती है! अब ज्ञान की धूप-दीप जलाकर इस भूत को भगाना है।"
जिसमें बहुत 'मोह' हो, उसके लिये बाबा कहते कि मानो कि वह 'बन्दरिया' है। जैसे 'बन्दरिया' अपने बच्चों को छाती से लगाकर कूदती-भागती रहती है, वैसे ही जिनमें मोह है, वे भी व्यक्तियों और वस्तुओं से चिपके से रहते हैं। उस व्यक्ति या वस्तु छूटने की बात सुनकर उनकी अवस्था ऐसी हो जाती है जैसे कि उनका प्राण निकलने वाला हो। अतः बाबा कहते कि अब तो 'बन्दर' से 'मन्दिर-योग्य' बनना है; इसलिये 'नष्टोमोहा' हो जाओ यही भगवान की आज्ञा है। अब सब मोह छोड़ दो क्योंकि यह 'मोह' ही दुःख और यम की फाँसी को देने वाला है, अब एक प्रभु से ही मन का मोह अर्थात् प्यार जुटा दो।
बाबा कहते कि जो स्त्री 'काम-वासना' रूपी विष को लिये रहती है, वह 'पूतना' अथवा 'सूपनखौँ' है। जो पुरुष 'काम-वासना' के वशीभूत है वह 'रावण' अथवा दुःशासन है। अब आप ही सोचिये कि ऐसे कड़े अक्षर सुनकर कौन रावण, दुःशासन अथवा पूतना बनना चाहेगा?
बाबा कहते, 'अहंकार' करने वाला मनुष्य एक दिन ऐसा तो गिर पड़ता है कि उसकी हड्डी, उसका घुटना ऐसे टूट जाता है कि फिर उसके लिये खड़ा होना मुश्किल हो जाता है। अतः बाबा कहते-बच्चे! 'निरहंकारी' बनो वर्ना मंजिल पर नहीं पहुँच सकोगे ! कई बार तो बाबा ऐसा भी कहते कि 'वासना भोग' ऐसे है जैसे
एक-दूसरे को विष पिलाना, मूत पिलाना अथवा एक-दूसरे पर प्रहार या कुठारघात (Criminal assault) करना। ऐसे शब्द सुनने वाले के मन में यदि पूर्व-संस्कारों के वश वासना का संकल्प उठता भी तो वह उसे अत्यन्त घृणित काम मानकर तुरन्त ही इस अशुद्ध संकल्प से मुक्त हो जाता। जब बाबा साफ ही कह रहे हैं कि वासना भोग एक- दूसरे को नर्क में धकेलने के तुल्य, सर्प या सर्पिणी के डसने के तुल्य, परस्पर अपकार करने के तुल्य या एक-दूसरे का मुंह काला करने के तुल्य है तथा सिर पर 'कूड़ा' उठाने से भी निकृष्ट कार्य है" तो बताइये कि कौन ऐसा कार्य करने को तैयार होगा?
इसी प्रकार 'चुगली' करने वाले तथा दूसरों को भड़काने का काम करने वाले व्यक्ति को बाबा मंथरा (जिसका रामायण में वर्णन है) 'दूती' या 'दूता' नाम देते और निन्दा करने वाले को 'कौवे' की उपाधि प्रदान करते। सोचिए कि कौन इन उपाधियों को लेने के लिए तैयार हो सकता है? सभी लोग इन बुराइयों को छोड़ने ही का यत्न करते।
इसके विपरीत, जो युवावस्था में 'सपत्नीक' (युगल) जीवन व्यतीत करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता, बाबा कहते कि यह 'महावीर' है। इसके आगे एक दिन संन्यासी भी सिर झुकायेंगे। जो कन्यायें-मातायें क्रोध को छोड़ देतीं, बाबा कहते कि यह 'शीतला' है। जो मीठा बोलने वाला तथा ज्ञान का आलाप करने वाला होता-बाबा कहते यह ‘Godly nightingale’ (दैवी बुलबुल) है।
इसी प्रकार किसी को बाबा 'नष्टोमोह', किसी को 'निरंहकारी', इन सम्बोधनों से याद करते हुए, बुराई को छोड़ने तथा अच्छाई को अपनाने के पुरुषार्थ में लगाये रखते।
ज्ञान के कायदे समझाना और धर्मराजपुरी की सज़ायें बताना
बाबा उच्च दैवी मर्यादा में रहने और आसुरी मर्यादा को छोड़ने की भी सीख देते। ज्ञान युक्त 'कायदे में ही फायदा है'। कायदे को छोड़ने से कार्य बिगड़ जाता है। कायदे पर ही ये सृष्टि कायम है। इसलिये ईश्वरीय नियमों को कभी भी न छोड़ना, न तोड़ना।
बाबा कहते कि कानून को कभी अपने हाथ में मत लेना (Don't take law in your own hands) यदि किसी से आपका स्वभाव नहीं मिलता अथवा संस्कार टकराते हैं अथवा किसी के बारे में आपको कोई शिकायत है तो उसके विरुद्ध आप ही कोई कार्यवाही करने न लग जाओ। उस पर हाथ उठाना अथवा अन्य किसी प्रकार से उसे दण्ड देने का यत्न करना गोया कानून को अपने हाथ में लेना है। कानून को अपने हाथ में लेने वाला भी अपराधी ही माना जाता है। लौकिक सरकार का भी यह नियम है कि यदि किसी को किसी अन्य से शिकायत है तो वह न्यायालय में दावा कर सकता है। जज ही उसकी सुनवाई करके अपराधी को उचित दण्ड दे सकता है। जिसको शिकायत है, यदि वह अपराधी को मारता पीटता है तो न्याय की दृष्टि से यह स्वयं भी अपराधी ही ठहरता है। बाबा कहते "आप सब तो स्वयं ही किसी न किसी विकार के वशीभूत, अवगुणों से भरपूर अर्थात् अपराधी है। अतः अपनी शिकायत पर आप खुद ही जज बनकर या जेलर बनकर कुछ भी करने के अधिकारी नहीं है। यदि किसी का कोई अवगुण अथवा दोष आपको दुःख देता है तो आप इधर उधर किसीको न बताकर, वातावरण को दूषित न करके एक बाबा ही द्वारा शिव बाबा को बताओ तो शिवबाबा उसे स्वयं ही सावधानी दे देंगे।
इसी प्रकार, एक दूसरा कायदा बताते हुए बाबा कहते "बच्चे ! आप अपने निजी प्रयोग के लिए किसी से कोई चीज़ मत लेना। यदि कोई व्यक्ति कुछ भी चीज़ देनां चाहता है तो उसे कहो कि वह निजी प्रयोग के लिए देने का संकल्प न करके, शिव बाबा को सामने रखकर इसे ईश्वरीय यज्ञ में दे दे। फिर यज्ञ में व्यवस्था करने के लिये जो निमित्त हैं, वे जिसके लिये जो चीज़ आवश्यक समझेंगे उसे वह चीज़ दे देंगे। बाबा कहते कि यदि आप किसी से निजी प्रयोग के लिये कोई चीज़ लेंगे तो प्रयोग करते समय उस देहधारी की याद आयेगी, गोया कल्याणकारी शिव बाबा की याद भूल जायेगी। इससे देहधारियों के साथ आपका सम्बन्ध जुटेगा, उनसे आपकी लग्न लगेगी और ईश्वरीय स्मृति की कमाई में आपको घाटा पड़ जायेगा। फिर विशेष बात यह है कि बेचारे देने वाले का भाग्य ऊँचा नहीं बनेगा क्योंकि उसने भी आप मानव-तनधारी के प्रयोगार्थ वह वस्तु दी। यदि वह शिव परमात्मा को सामने रखकर, ईश्वरार्थ सेवा में वह वस्तु देता तो उसका सम्बन्ध ईश्वर से जुटता और वह वस्तु पवित्र हो जाती तथा ईश्वर से भविष्य में उसे कई गुना धन-धान्य प्राप्त होता। परन्तु व्यक्तिगत प्रयोग के लिए देना तो गोया मनुष्यों से कर्म खाता जोड़ना है।'
लेने वाला भी यदि इस ईश्वरीय यज्ञ से लेगा तो उसे मानव- तनधारी की याद न आकर यह शुद्ध नशा रहेगा कि "मुझे यह ईश्वर से मिली है!" उसका नाता और प्यार भी ईश्वर से जुटेगा और जिस व्यक्ति से उसको वस्तु मिली, उस मानव-तनधारी का वह आभारी अथवा ऋणी भी नहीं होगा। बाबा कहते "आप ईश्वरीय कुल की संतान हैं। ईश्वर तो दाता है, तब दाता के बच्चे होकर आप किसी से ले कैसे सकते हैं? जिसको कुछ देना है वह अपना भाग्य ऊँचा बनाने के लिए ईश्वर के पास जमा करा दे और आप भी उसी पिता से लो, न कि किसी मनुष्य से।" इस प्रकार, बाबा ज्ञान के अनेकानेक सूक्ष्म कायदे बताते जो कि अवस्था को बहुत उच्च करने वाले और कर्म बन्धन से मुक्त करने वाले होते।
एक कायदा बाबा यह भी बताया करते कि जिस स्थान पर, अथवा जिस कार्यार्थ किसी को नियुक्त किया गया हो, उस समय हरेक को चाहिए कि उसे सम्मान दे और सहयोग दे, चाहे उस ड्यूटी (Duty) पर नियुक्त किया हुआ व्यक्ति छोटी आयु का हो और कम अनुभवी हो। बाबा कहते कि ‘नियुक्त किये हुए को पूरा सहयोग देना ही दैवी मर्यादा है, उसकी त्रुटियाँ देखकर अथवा असमर्थता पर ध्यान देकर उसका विरोध करना, उससे रूठ जाना अथवा स्वयं को उस कार्य से अलग हटा लेना ये आसुरी मर्यादा है।’ बाबा कहते कि ‘यदि किसी में कोई त्रुटि है अथवा कमी है तो उस कमी को भरना आपका काम है। यदि किसी में किसी प्रकार की असमर्थता है तो आपको अपनी भी सामर्थ्य उस कार्य में लगा देना आपके लिए उचित है। उसकी कमियों का वर्णन करते रहना महानता नहीं है बल्कि उन्हें भरने में महानता है।’
बाबा बताते कि यदि किसी की कोई कमी अथवा असमर्थता आपको खटकती है तो बाद में आप बड़ों के ध्यान में वह बात ला सकते हैं। परन्तु जिस समय कार्य हो रहा है तब उसमें रुकावट डालना अथवा सहयोग न देना यह गोया अपनी कमी दिखाकर दोषी बनना अथवा वातावरण को बिगाड़ना है। यदि कोई आपसे आयु में छोटा भी हो तो भी जब वह अपनी ड्यूटी पर है तब आपको उसकी बात माननी पड़ेगी। मान लो, कोई ट्रैफिक पुलिस का आदमी अपनी ड्यूटी पर खड़ा है और वह एक ओर हाथ दिखाकर ट्रैफिक रोके हुए है उसी ओर से तब यदि कोई उसका बड़ा अफसर भी आ जाय, तो उस समय उसे भी हाथ का इशारा देखकर रुकना ही पड़ेगा ना? इसी प्रकार, इस ईश्वरीय कार्य में जिस कार्य पर जो नियुक्त है, उस समय उसे ये सन्मान और स्नेह देना सबका धर्म है।" इस प्रकार बाबा ऐसे-ऐसे दैवी कायदे बताते जिससे अवस्था भी ऊँची उठे, सबका भाग्य भी ऊँचा बने और सब कार्य सुगमता से भी होता चले।
कायदों के साथ-साथ बाबा कर्म-विधान का भी पूरा स्पष्टीकरण देते। उदाहरण के तौर पर वे कहते "सतयुगी स्वर्गिक सृष्टि में भी नौकर-चाकर, दास-दासियों, चण्डाल आदि-आदि होते तो हैं ही। जो व्यक्ति वर्तमान पुरुषोत्तम संगमयुग में माया के वशीभूत होकर कुछ न कुछ भूल कर बैठते हैं, पवित्रता के नियम को छोड़कर फिर आसुरी स्वभाव के बन जाते हैं, पहले निश्चय करके फिर संश्यात्मा हो जाते हैं, अथवा इस ईश्वरीय यज्ञ के कायदे कानूनों को तोड़ते हैं वे - लोग इन छोटे पदों को प्राप्त होते हैं। किस-किस भूल से हमारी ईश्वरीय कमाई में कितना घाटा होता है और उसके परिणामस्वरूप हमें कौन सा छोटा पद मिलता है, आदि-आदि बाबा इन सभी नियमों को स्पष्ट करते। स्वर्ग के दैवी स्वराज्य के पद को कौन प्राप्त करता है, किस उच्च पुरुषार्थ को करने से चक्रवर्ती राजा, रानी के निकट सम्बन्ध में कौन जन्म लेता है, अत्यन्त धनवान प्रजा के घर में किसका जन्म होता है, १०८ की माला का मणका बनने या अष्ट देवताओं में आने के लिए क्या पुरुषार्थ करना ज़रूरी है? इन सभी बातों का बाबा स्पष्टीकरण देते रहते कि जिससे उच्च पुरुषार्थ करने की प्रेरणा नित्य-निरन्तर मिलती रहती।
साथ-साथ बाबा ये भी कहते कि "अब तो आपको शिव बाबा, पिता, शिक्षक और सद्गुरु के रूप से शिक्षा और सावधानी दे रहे हैं। अतः अब तो कदम-कदम पर राय ले सकते हो। अब यदि कोई भूल, कोई अकर्त्तव्य अथवा विकर्म हो जाये तो उसे बता देने से उसका दण्ड आधा हो जायेगा। परन्तु यदि उसे छिपाते रहोगे तो शिक्षा और सावधानी भी नहीं मिल सकेगी और वह भूल बढ़ती ही जायेगी और भविष्यमें शिवबाबा फिर धर्मराज के रूप में उसका सौ गुना दण्ड देंगे। देखो, धर्मराज बाप के बच्चे बनकर अब अधर्म का काम न करना। धर्म भ्रष्ट होने वाला सतयुगी सृष्टि में ऊँचा पद नहीं पा सकेगा और पद-भ्रष्ट होने के साथ-साथ दण्ड का भी भागी बनेगा। आप तो कमाई करने के लिये आये हैं, कमाई के बदले सिर पर और ही बोझ चढ़ाना - यह समझदारों का काम नहीं।" इस प्रकार बाबा बहुत ही उपयोगी कायदे और नियम बताकर तथा प्रैक्टिकल रीति उन पर चलाकर कल्याण करने के निमित्त बनते।
स्वयं मेहनत करके दिखाया
बाबा ईश्वरीय सेवार्थ अथवा लोक-कल्याणार्थ तन-मन-धन समर्पण करने के बाद वृद्ध शरीर होते हुए भी निरन्तर सेवा में लगे रहते। सेवा- सेवा और सेवा, बस सेवा ही के लिए और मनुष्यात्माओं को सुख देने के लिए उनका विचार चलता रहता। दिन-भर में १८ घण्टे से भी अधिक वह कार्य करते। रातोंरात बहुत बार जागते और इसी संकल्प में अपने खान-पान, रहन-सहन और आराम की सुविधा का भी ख्याल न रखते। इतनी वृद्ध अवस्था में भी वे विभिन्न प्रकार की स्थूल सेवा में शारीरिक रीति से भी जुट जाया करते। उनके इस परिश्रम और सेवा को देख स्वभाविक है कि सुस्त से सुस्त व्यक्ति भी अपने आलस्य को परे फेंक यज्ञ सेवा में जुट जाते।" अरे! वह देखो, बाबा अमुक स्थूल कार्य में जुटे हुए हैं....." जैसे ही कोई बाबा को किसी सख्त काम में जुटा हुआ देख लेता वह जाकर सबको बोल देता और सभी लोग झट से वहां पहुँच जाते। वे कहते "बाबा! यह तो हमारा कार्य है। आपने हमें क्यों नहीं कहा? बाबा! अब तो इसे आप छोड़ दीजिये। हमारे होते हुए इसे आप करें, यह हमसे बर्दाश्त नहीं होता.....!"
बाबा कहते - "नहीं बच्चे। यह यज्ञ की सर्विस बड़ी मधुर और प्यारी लगती है। क्या करूँ, यह मन को बहुत भाती है! बच्चे, सारे कल्प में एक ही बार तो शिव बाबा यह सर्वोत्तम ज्ञान यज्ञ रचते हैं और उसके लिए वे इस वृद्ध तन में ही आते हैं। तो क्या इस वृद्ध तन को देखकर मैं कल्प-कल्पान्तर स्थूल सेवा ही न करूँ? मैं भी तो शिव बाबा का स्टूडैन्ट (Student) हूँ। यदि मैं शरीर से कोई कार्य नहीं करूंगा तो मुझे कैसे निरोगी और कंचन काया मिलेगी? बच्चे, सर्विस करने की तो हिर्ष (लालसा) होनी चाहिए। दधीचि ऋषि के समान इस यज्ञ में अपनी हड्डियाँ भी दे देनी चाहिए। तभी तो यह शरीर पावन बनेगा। इस यज्ञ की जितनी सेवा कोई करेगा, उतना उसको शिव बाबा से बल मिलेगा और उसकी आयु भी लम्बी होगी क्योंकि शिव बाबा अपने सर्विसएबल बच्चों की संभाल तो करते ही हैं न? बच्चे! जैसे शिव बाबा से प्यार होना चाहिए वैसे ही उसके इस यज्ञ की सेवा से भी, यहाँ के एक एक कण से भी प्यार होना चाहिये और उसकी संभाल करनी चाहिये। अहा! हम ब्राह्मणों का यह सेवा का जीवन कैसा सुहावना है! ऐसा अवसर तो सारे कल्प में फिर कभी मिलता ही नहीं। जबकि शिव बाबा ही कहते हैं कि "मैं आप बच्चों का फरमांबरदार सेवक हूँ (I am your most obedient servant) तो मैं भी आप बच्चों का सेवाधारी हूँ......" इस प्रकार के वचन जब बाबा बोलते और स्वयं भी सेवा में जुटे रहते तो सोचिये कि किसके मन में कार्यरत होने के लिये प्रेरणा नहीं मिलती होगी? रात्रि की क्लास में भी प्रायः बाबा पूछा करते लाडले बच्चो! बताओ और कोई सेवा है बाबा के लिये। ये बाप भले ही ऊँचा बनाने वाला है परन्तु फिर भी बच्चों का गुलाम है....." ओहो! जब ऐसे शब्द बाबा बोल देते तो बताइये कि मनुष्य के मन को कैसा लगता होगा? सारी सृष्टि का बाप यदि सेवार्थ स्वयं को गुलाम माने तो इन मनुष्यों की क्या हैसियत? बाबा के ऐसे शब्द सुनकर मनुष्य के मनमें लोक-कल्याणार्थ सेवा के लिए एक अदम्य जोश उठता और मन कहता कि अगर बाबा आज्ञा दें तो अभी पहाड़ भी हिला दिया जाय।
बाबा यहाँ तक भी कह दिया करते "जो शिव बाबा की सेवा के कार्य में मना करता है, वह नास्तिक है।" देखिये तो, नास्तिक शब्द की ये नई परिभाषा! यह कैसा स्पष्ट कर रही है कि बाबा ईश्वरीय सेवा को कितना महत्त्व देते। बाबा ने हम बच्चों को यह नारा दिया कि 'ईश्वरीय सेवा करना ही सौभाग्य बनाना है।' इस प्रकार बाबा को मन, वचन एवं कर्म से सेवा में लगा हुआ देखकर सबका सेवा में जुट जाना स्वभाविक था।
खुशी में लाना और हल्का करना
बाबा सदा खुशी में रहते और सदा ऐसी ही बातें सुनाते कि कोई मनुष्य कितना भी अशान्त क्यों न हो, चाहे कितनी ही उलझनों में पड़ा हुआ हो, बाबा की मधुर मुस्कान को देखते ही उसकी उदासी और चिंता भाग जाती, खुशी का पारा चढ़ जाता। किसी ने भी आज तक बाबा के चेहरे पर चिन्ता या उदासी की रेखा नहीं देखी। अतः बाबा के पास आस-पास वातावरण में सदा खुशी की लहरें अथवा खुशी की खूशबू फैली रहती। उस पवित्र खुशी के वातावरण में माया की बातें तथा साँसारिक उलझनें भूल जाना मनुष्य के लिए स्वभाविक ही है। वह वातावरण ही ऐसा हुआ करता है कि शायद ही किसी के मन में अशुद्ध संकल्प उठते होंगे। बाबा कहते "बच्चे आप ही पवित्र रहने वाले सच्चे ब्राह्मण कुलभूषण हो, राज ऋषि हो, राजयोगी और ईश्वरीय कुल के हो......." इस प्रकार बाबा बच्चों को सदा खुशी और उल्लास में लाते रहते और कहते "बच्चे! माया के विघ्न बहुत - आयेंगे, तूफान बहुत आयेंगे परन्तु घबराना मत और हिम्मत नहीं हारना। अब जबकि आपने शिव बाबा को हाथ दिया है तो आपका अकल्याण नहीं हो सकता। अब आपकी "चढ़ती कला" है इसलिये सदा यह सोचते हुए चलो कि सर्व समर्थ शिव बाबा हमारे साथ है। ऐसा निश्चय रखोगे तो निश्चयात्मा की विजय होती है। आप 'विजयी- रत्न' हो। विजय का तिलक तो आपके माथे पर मानो लगा है। बस, आप इतना करना कि घबराना नहीं, थकना नहीं और रुकना नहीं बल्कि जो राह अब शिव बाबा दिखा रहे हैं, उस पर चलते चलना।" इस प्रकार बाबा विघ्नों को 'ऊँचे पद की निशानी', परीक्षाओं को, उच्च पुरुषार्थ की प्रतिक्रिया', बड़े तूफानों को 'ऊँची मंजिल के नज़दीक पहुँचने का चिह्न' बताकर सदा यही कहते कि "बच्चे ! ये सब अन्तिम सलाम करने आये हैं। बस ईश्वर के सदके (प्रेम में) इनको पार करो तो आपके कदम-कदम में पद्म-पद्म की कमाई होगी।" इन युक्तियों से बाबा नित्य-प्रति सबको खुशी का प्याला पिलाते हुए, उनमें नया दम, नया जोश भरते हुए उन्हें ऐसे तो ले चलते रहते कि मनुष्य को अपने सब संकल्प भूल जाते, समस्याएँ हल्की मालूम होतीं और मनोविकार उनसे सहज ही छूटते जाते।
बाबा की जितनी भी युक्तियों का वर्णन करें, वह थोड़ा है। ऐसे अन्य अनेकानेक विधि-विधानों से, प्यार-दुलार की बातों से, हर्ष उल्लास की चर्चा से, स्नेह-सौहार्द से, ज्ञान-विज्ञान की वर्षा से, उच्च आचार-विचार के दिग्दर्शन से बाबा कितनी ऊँची मंजिल पर, कितनी सहज रीति से सबको सफलतापूर्वक ले आते रहे-यह अद्भुत, अलौकिक, अनुभव-पूर्ण और उल्लासप्रद कहानी है जिसका यहाँ कुछ अंश ही हमने ऊपर की पंक्तियों में दिया है।
विभिन्न व्यवसायों से भी गुण कैसे ग्रहण करें?
बाबा हरेक व्यवसाय की चर्चा करते हुए उनसे भी गुण धारण करने की बात कहते। ब्रह्माकुमारी रत्नमोहिनी जी वर्तमान समय माउण्ट आबू में सेवारत हैं, कहती हैं:-
बाबा के मुखारविन्द द्वारा हम तो ईश्वरीय ज्ञान वार्ता सुनते उनमें न केवल ज्ञान के गहरे रहस्य होते बल्कि हृदय को मोहने वाली रमणीकता भी होती और श्रेष्ठ आचार के लिए प्रेरित करने वाले प्रसंग भी होते। बाबा ईश्वरीय ज्ञान के कई नुक्तों को स्पष्ट करते समय, आज के युग में मनुष्य के जो व्यवसाय अथवा धन्धे हैं, उनका भी उल्लेख करते। इससे बात बहुत ही सरस तरीके से सुस्पष्ट हो जाती और ज्ञान सहज ही बुद्धि में धारण हो जाता। इसके कुछेक विशेष उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं:-
वकील अथवा बारिस्टर
बाबा समझाते कि जो 'फौजी' वकील (Lawyer For Criminal Cases) होते हैं, वे न्यायालय में ऐसे मुकद्दमें लड़ते हैं जिनकी सज़ा मनुष्य को आयु-भर कैद अथवा फांसी भी हो सकती है अतः वे उस मुकद्दमे के लिए पूरी तैयारी करते हैं कानूनी नुकतों (Law Points) को नोट करते हैं, ज़रूरी-ज़रूरी कानूनी बातों को रेखाकिंत (Underlined) करते हैं और कौन सी प्वाइंट (Point) पहले देनी है और कौन सी बाद में यह भी वे पहले से अपने मन में सोच लेते है। विरोधी वकील कौन से प्रश्न पूछ सकता है और हमें उनका क्या उत्तर देना है तथा जज को कैसे अपनी बात से सहमत (Convince) करना है इसकी योजना वे अपनी बुद्धि में स्पष्ट रूप से पहले से बना लेते हैं। जिस समय न्यायालय में तर्क अथवा कानूनी नुक्ते पेश किये जा रहे होते हैं, यदि उस समय वकील कोई आवश्यक और महत्त्वपूर्ण कानूनी बात जज के आगे रखना भूल जाय तो उस भूले के परिणामस्वरूप उसका मुविक्कल मुकद्दमा हारकर फांसी के दण्ड का भी भागी हो सकता है और यदि वकील प्वाइन्टस ठीक मौके पर दे दे तो उसके मुवक्किल की जान भी बच सकती है।
यह उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि 'आप बच्चे भी एक प्रकार के वकील हैं। शिव बाबा आपको जो ज्ञान दे रहे हैं, इससे आपको यह मालूम होता है कि मनुष्य को कौन से कर्म करने चाहिए और कौन से नहीं करने चाहिए तथा वर्जित अथवा निषिद्ध कर्म करने से मनुष्य को क्या दण्ड मिलता है। अतः यह ज्ञान भी एक प्रकार का कानूनी ज्ञान है और आप एक ऐसे वकील का काम करते हैं जो श्रेष्ठाचारी बनाकर धर्मराज के डण्डे से, गर्भ जेल से और यम की फाँसी से छुड़ा देते हैं।अतः आपको भी इसके प्वाइन्टस (Points) अच्छी तरह से नोट करने चाहिए और सदा यह लक्ष्य सामने रखना चाहिए कि मनुष्यात्माओंको हम इस ज्ञानके द्वारा ऐसा श्रेष्ठाचारी बनायें कि वे जन्म-जन्मान्तर मौत रूपी सज़ा से और गर्भ जेल से छूट जायें। आपको पहले से ही सोच रखना चाहिए कि कोई जिज्ञासु क्या प्रश्न पूछ सकता है और हम उसे कैसे सहमत बनाकर, उसे माया के जाल से निकालें।"
बाबा कहते कि "जो बारिस्टर अथवा वकील लोग हैं, वे तो एक जन्म के लिए ही मनुष्य को जेल से अथवा फांसी की सज़ा से छुड़ाते हैं परन्तु आप तो मनुष्य को २१ जन्मों के लिए न केवल मृत्यु रूपी दण्ड व गर्भ जेल से बल्कि सब प्रकार के दुःखों से और क्लेशों से छुड़ाते हैं। अतः यद्यपि अब आप यह सेवा निःशुल्क करते हैं,भविष्य में आपको इसके लिए इतना तो धन और सुख मिलेगा कि जिसका हिसाब नहीं हो सकता।'
इस प्रकार ज्ञान का और ज्ञान द्वारा दूसरे नर-नारियों को माया की जेल से छुड़ाने की सेवा का महत्त्व बनाते हुए बाबा सबको ऐसा प्रेरित करते कि कम पढ़ी-लिखी वृद्धा मातायें भी अपनी अपनी कापियों में ईश्वरीय महावाक्यों को नोट करतीं और दूसरी आत्माओं को काल के पंजे और दुःख रूपी दण्ड से छुड़ाने की सेवा में जुट जातीं। मनुष्य जब उनसे अध्यात्म-सम्बन्धी प्रश्न करते तो वे उन्हें ऐसे अच्छे-अच्छे उत्तर देती कि वे आश्चर्यचकित रह जाते कि इन अल्प पठित माताओं को तर्क-संगत एवं युक्ति-संगत ज्ञान देने वाला कौन है?" ईश्वरीय ज्ञान की क्लास को यदि कोई नया व्यक्ति देख लेता तो वह भी आश्चर्य में पड़ जाता कि यह कैसा अजीब सत्संग है जहाँ सभी लोग नोट बुक में नोट्स ले रहे है और वृद्ध-जन भी बालकों की तरह पढ़ रहे हैं। अच्छे खासे लॉ कॉलेज (Law College) का सा दृश्य दिखाई देता जहाँ छोटे-बड़े सभी 'आचार संहिता' और कर्म तथा दण्ड-विधान और जीवन-विधि को सीख रहे होते।
डाक्टर और कम्पाउण्डर
बाबा कहते कि "जो होशियार डाक्टर होता है उसे बहुत सी दवाइयाँ मालूम होती हैं और वह बड़ी शीघ्रता से रोगी को स्वस्थ कर देता है। यदि वह समय पर ठीक दवाई न दे तो रोगी मर भी सकता है।" यह उदाहरण देते हुए बाबा कहते कि "ये डाक्टर लोग तो शरीर सम्बन्धी रोगों का ही इलाज करते हैं। उन द्वारा दी गयी दवा मनुष्य को सभी रोगों से और सदा काल के लिए नहीं बचा सकती। आज लोग दवा भी लेते रहते हैं और फिर भी रोग का शिकार होते रहते हैं। परन्तु शिव बाबा जो आपको ईश्वरीय ज्ञान दे रहे हैं, यह वास्तव में अमृतधारा अथवा संजीवनी बूटी है। यह परमौषधि है। आत्मा को जन्म-जन्मान्तर से जो विकार रूपी रोग लगे हुए हैं वे इस अमृतधारा से ही छूट सकते हैं। जब मुष्यात्मा इस ज्ञानामृत का सेवन करती हैं अथवा यह ज्ञान रूपी संजीवनी सूंघती है तो मनुष्य के जीवन में इतना तो अन्तर आ जाता है कि जैसे मृतक में रूह वापिस लौट आयी हो अथवा निष्प्राण मनुष्य प्राण-युक्त हो गया हो। यह जो ईश्वरीय योग आप सीखते हैं, वह एक ऐसे इन्जेक्शन का काम करता है कि जिस द्वारा विकार रूपी कीटाणु मर जाते और आत्मा में शक्ति बढ़ती हुई मालूम होती है। यह योग ही आत्मा के लिए टॉनिक (Tonic) भी है और ज्ञान के विभिन्न प्वाइन्टस अनेक प्रकार के विटामिन (Vitamin) अथवा पोषक तत्व हैं।
इस प्रकार बाबा कहते कि "आप लोग भी डाक्टर हैं। आप आत्माओं के चिकित्सक हैं अथवा 'रूहानी सर्जन' हैं। आत्मा को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, भय, सुस्ती, आलस्य आदि आदि जो पुरानी बीमारियाँ लगी हुई हैं, आप उनसे मनुष्य को सदा काल के लिए छुड़ा सकते हैं और उसे २१ जन्मों के लिए सदा स्वस्थ (Everhealthy) बना सकते हैं। अतः आपके यह जो ज्ञानकेन्द्र है ये भी एक प्रकार के अस्पताल हैं। वास्तव में आज सारी सृष्टि - के मनुष्य इन विकारों रूपी रोगों से ग्रस्त हैं। तथाकथित गुरु और साधु भी रुग्ण अवस्था में हैं। सभी माया-मूर्छित हैं। इनको ज्ञान का छींटा लगाकर इनकी आँख खोलने, इनमें जागृति लाने और उन्हें प्राणापन्न करने के लिए एक शिव बाबा ही निमित्त हैं और वह आपको यह रूहानी डाक्टरी पढ़ा रहे हैं। इस द्वारा आप स्वयं भी स्वस्थ बनो और दूसरी आत्माओं को भी इन विकारों से छुड़ाने की निःशुल्क सेवा करो और अन्य जो धनी लोग मनुष्यों के शुभ चिन्तक हैं उन्हें कहो कि वे ऐसे रूहानीं अस्पताल खोलने अथवा खुलवाने के निमित्त बन कर अपना भाग्य ऊँचा बनायें। मनुष्य को तन के बहुत से रोग उसके मन के किसी रोग के कारण होते हैं। अतः रूह को राहत देने वाले इन आध्यात्मिक चिकित्सकों में ज्ञान-रूपी परमौषधि तथा योग रूपी इन्जेक्शन से वे सदा के लिए पूर्णतः स्वस्थ हो सकते हैं।"
बाबा 'कहते, "जब किसी मनुष्य को संक्रामक (Contagious or Infectious) रोग लगा होता है तो चिकित्सक लोग उसे अन्य लोगों से अलग एक कमरे में रखते हैं जिसका कि औषधियों से कीटाणु-रहित तथा एकान्तिक बना दिया गया होता है। आज वास्तव में सभी मनुष्य विकारों रूपी प्लेग से पीड़ित हैं अर्थात् काम, क्रोधादि संक्रामक रोगों में जकड़े हुए हैं। वे न केवल स्वयं काम, क्रोधादि से रुग्ण है बल्कि जिस किसी के सम्पर्क में वे आते हैं उसे भी वे अपने सम्पर्क से ये रोग लगा देते हैं। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को ज्ञान रूपी अमृत और योग रूपी इन्जेक्शन तो दिया ही जावे परन्तु उसे कुसंग से भी अलग 'क्वारनटाईन' (Quarantine) में रखा जाय ताकि वह अन्य विकारी लोगों के दूषित वातावरण से सुरक्षित रहकर आध्यात्मिक चिकित्सा से जल्दी लाभान्वित हो सके।"
बाबा कहते कि ‘अगर आप में से कोई भी अल्पबुद्धि अथवा कड़े संस्कारों के कारण अच्छा डाक्टर नहीं भी बन सकता तो कम से कम कम्पाउण्डर ही बन जाये। कम्पाउण्डर का कार्य स्पष्ट करते हुए बाबा बताते कि रोगी के घाव पर थोड़ा सा टिन्क्चर लगा देना, छोटे मोटे घाव की मरहम पट्टी कर लेना, जो इन्जेक्शन डाक्टर बताये अथवा जो दवाई डाक्टर नुसखे में लिख दे वह रोगी को दे देना और यदि किसी संकट की परिस्थिति में डाक्टर अनुपस्थित हो तो प्रथम सेवा (First Aid) का कार्य निपटा लेना इतना तो कम्पाउण्डर भी कर लेता है। खाँसी, जुकाम आदि छोटी एवं आम बीमारियों की दवाई तो वह भी जानता है और रोगी को तुरन्त राहत के लिए कोई छोटी मोटी दवाई तो वह भी दे लेता है। अतः जो सबसे बड़े रूहानी सर्जन परमपिता परमात्मा शिव हैं, उनके विद्यार्थी होकर इतना तो आप में से हरेक को इस अध्यात्म विद्या का प्रयोग आना ही चाहिए कि यदि 'काम वासना' ने किसी मनुष्य पर हल्का वार किया हो, क्रोध से यदि कोई मनुष्य अशान्त हो, मोह ने यदि किसी मनुष्य को घाव लगाया हो अथवा अहंकार का किसी मनुष्य को थोड़ा सा उल्टा नशा चढ़ गया हो, तो उसको तुरन्त राहत आप दिला सकें।’
जीवन बीमा (Life Insurance)
बीमे के धन्धे के बारे में समझाते हुए बाबा कहते कि "जो मनुष्य अपने जीवन का, घर का अथवा सामान का बीमा करा देते हैं, उन्हें बीमे की अवधि के अन्त में वह रकम मिल जाती है और यदि उससे पहले ही मनुष्य की किसी दुर्घटना या रोग आदि से मृत्यु हो जाय तो उसके वारिस को निश्चित धनराशि मिल जाती है। इसका उल्लेख करते हुए बाबा बताते कि ईश्वर के शरणागत होना भी इस प्रकार का बीमा कराना ही है। बीमा कम्पनियों में जो लोग बीमा कराते हैं वे तो हर मास, तीन मास, छः मास अथवा वर्ष के बाद बीमा- किश्त (Premium) भरते हैं और यदि वे अवधि के पहले मर जायें तो उनके पीछे दूसरों ही को वह अल्प धनराशि मिल जाती है। परन्तु जो लोग परमात्मा की शरण में जाते हैं, अर्थात् तन-मन-धन सहित उसी के हो जाते हैं, अपना सर्वस्व उसके हवाले कर देते हैं, वे गोया एक बार ही प्रीमियम (Premium) भर देते हैं। परन्तु इस के एवज़ में उन्हें 'स्वर्गिक सृष्टि में' (न कि इस नारकीय-सृष्टि मे) 'दैवी स्वराज्य में', जन्म-जन्मान्तर के लिए सतोप्रधान असीम धनधान्य और सुख सम्पत्ति और सुविधा सब चीज़ों की प्राप्ति होती है। अब आप ही बताओ कि कौन सा बीमा अच्छा है? दूसरी कोई बीमा कम्पनी तो फ़ेल भी हो सकती है परन्तु ईश्वर के पास जो अपना बीमा कराता है, उसे तो निश्चय ही कई गुना होकर जन्म-जन्मान्तर के लिए मिलता है। ईश्वर ही वास्तव में सबसे बड़ा इन्श्योरेन्स मैगनेट है। अपना 'कखपन' आप उसके पास बीमा करा दो तो उसके बदले में, सतोगुणी सृष्टि में आपको 'लखपन' मिलेगा क्योंकि उसे 'दाता' माना गया है। भविष्य के लिए अपना सब कुछ ट्रांसफर करने का मात्र यही तरीका है।
देखो! अब इस कलियुगी सृष्टि रूपी 'भंभोर' को आग तो लगने ही वाली है। उसी ही के लिए तो ऐटम और हाइड्रोजिन बम बने हैं! तो सब कुछ जलकर खाक तो हो जाना ही है। तब क्यों नहीं ईश्वर के पास इन्श्योर कराके अपने भविष्य को ऊँचा बना लेते हो? क्या इसमें कोई शक्य है कि विनाश निकट है? अगर शक्य नहीं है और पूर्ण निश्चय है तो फिर देर क्यों करते हो? देखो, यदि आज बीमा नहीं कराया और कल शरीर छूट गया तो मिलेगा कुछ भी नहीं परन्तु आज बीमा करा लिया तो फ़िक्र से फारिग हो जाओगे क्योंकि उसका कई लाख गुना होकर भविष्य में आपको मिलेगा। इस बात में तो निश्चय है या इसमें कोई संशय है? देखो, कहा भी गया है कि 'श्वांस पर कोई भरोसा नहीं है' और 'संश्यात्माः विनश्यन्ति'। इसलिए 'बहुत गयी थोड़ी रही, थोड़ा की भी अब थोड़ी रही' ऐसा समझकर अब भी अपना ईश्वरीय बीमा करा लो, इसमें ही आपका कल्याण है।"
जौहरी
बाबा कहते "बच्चे! जौहरी का धंधा बहुत ऊँचा होता है। उस धन्धे में मनुष्य को 'परख शक्ति' बहुत चाहिए क्योंकि झूठे हीरे भी ऐसे होते हैं कि देखने में बिल्कुल सच्चे मालूम होते हैं और अच्छे-अच्छे जौहरी भी परखते समय धोखा खा जाते हैं। जिनमें परख शक्ति होती है वे दृष्टि डालते ही झट समझ जाते हैं कि ये हीरा सच्चा है या झूठा। ये 'फ्लॉ ' (Flaw) वाला है या बिना 'फ्लॉ' के। ये ऊंची किसम का है या हल्का-सल्का इससे ही वे उसका दाम झट से बता देते हैं। आप बच्चे भी वास्तव में जवाहिरात का धंधा करते हो क्योंकि ज्ञान सागर में शिव बाबा से जो शिक्षायें आप ले रहे हो, उसका एक-एक वचन कई हीरों के बराबर है; उस ज्ञानकी धारणासे उसका जीवन 'कौड़ी-तुल्य' से 'हीरे-तुल्य' बन जाता है।"
बाबा समझाते कि 'ज्ञान की हर बात को 'अविनाशी रत्न' अथवा 'अनमोल हीरा' समझ कर जब आप धारण करोगे तो भविष्य में आप ऐसी सुखमय सृष्टि में जाओगे जहाँ आपके खज़ाने में अनगिनत हीरे होंगे। खज़ाने में ही नहीं, आपके महलों की छतें भी रत्न जड़ित होंगी और सोने की चादरों से मढ़ी हुई दीवारों में हीरे मोती आपके महलों में कान्ति फैलायेंगे।' इस प्रकार ईश्वरीय ज्ञान के महत्त्व और मूल्य को समझाते हुए बाबा साँसारिक श्रृंगारोंको छोड़कर इन ज्ञान-रत्नों से ही आत्मा को सजानेकी अनुमति देते हैं।
फिर बाबा कहते "बच्चे! सभी लोग सच्चे हीरे के खरीददार नहीं होते। कोई विरला ही हीरों का पारखी और खरीददार बनता है। बहुत-से लोग तो देखने वाले और पूछताछ करने वाले ही होते हैं। खरीदने वाला कोई विरला बख्तावर ही होता है। अतः आप जो इन अविनाशी हीरों का व्यापार (लेन-देन) करते हो, आपके पास पूछने तो बहुत लोग आयेंगे परन्तु इन्हें लेगा कोई विरला ही क्योंकि आप एक ऐसे संसार रूपी बाजार में बैठे हो जहाँ बनावटी परन्तु सस्ते हीरे मिलते हैं। बनावटी माल बेचने वालों में अगर कोई सच्चा माल बेचने वाला व्यापारी बैठा हो तो लोग उसके माल पर भी सन्देह करने लगते हैं।"
बाबा कहते कि "शिव बाबा को 'ज्ञान-सागर' भी कहा जाता है और 'रत्नागर' भी, क्योंकि वह ज्ञान रूपी रत्न देता है। वह कंकर- पत्थर लेकर उसके बदले में अनमोल और अपार रत्न दे देता है; देखो तो वह कितना भोला व्यापारी है! जवाहिरी लोग तो हरेक हीरे का दाम चुकाते हैं और अपना मुनाफा कर लेते हैं परन्तु ज्ञान सागर एवं रत्नागर परमपिता परमात्मा जो सबसे बड़ा जौहरी है, वह मनुष्यात्माओं रूपी बच्चों से क्या पैसे लेगा? आज मनुष्य के पास रक्खा ही क्या है? उसके पास तो पुराने संस्कारों के कंकड़ और काम, क्रोधादि रूपी पत्थर ही हैं जो यह कंकड़-पत्थर दे देता है उसकी बुद्धि रूपी झोली को वह ज्ञान-रत्नों से भर देता है और उसे रंक से राव अथवा कंगाल से मालामाल बना देता है। उसे ये कंकड़-पत्थर देने ज़रूर पड़ते हैं क्योंकि वह सौदागार है और सौदा करते समय मनुष्य को सौदे के लिये कुछ देना ज़रूर पड़ता है।"
बाबा कहते "देखो! भक्ति-मार्ग में आप भगवान से भीख मांगते रहे परन्तु वह आपको मिली नहीं और अब ज्ञान-मार्ग में बिन मांगे ही हीरे मोती मिल रहे हैं। इसलिये ही कहावत है ‘बिन माँगे मोती मिलें, मांगे मिले न भीख'। आपको ये हीरे-मोतियों का अतुल खज़ाना इसलिये मिल रहा है कि आप अपने कंकड़-पत्थर छोड़ते जा रहे हो जबकि भक्ति-मार्ग में आप 'विषय-विकार' रूपी पत्थर तो छोड़ते नहीं थे और यों ही भगवान से उत्तम वरदान पाना चाहते थे।"
बाबा समझाते कि "पुरुषोत्तम अथवा संगमयुग का यह जीवन, जबकि आप पतित से पावन अथवा भोगी से योगी बनने का पुरुषार्थ करते हैं वही वास्तव में 'हीरे-तुल्य' बनाती है।" बाबा कहते कि - "आज लोग कहते तो हैं कि मनुष्य का जीवन 'हीरे-जैसा अमोलक' है परन्तु वास्तव में आज मनुष्य कौड़ी तुल्य भी नहीं हैं। यों कई लोग, कई नेताओं को चाँदी या सोने से तौलते हैं। आगा खाँ को उसके अनुयायी प्लाटिनम से भी तौलते हैं परन्तु वास्तव में आज किसी का भी जीवन 'हीरे तुल्य' नहीं है क्योंकि न तो उसके पास ईश्वरीय ज्ञान- रत्न हैं और न पवित्रता ही का खज़ाना है वास्तव में जो ईश्वरीय ज्ञान लेने वाले और पवित्र तथा राजयोगी बनने वाले नर-नारी हैं, उन्हें यदि हीरों से तोला जाये तो उन हीरों के मूल्य से भी उनका जीवन अधिक मूल्यवान है क्योंकि वे अपने मुख से ज्ञान-रत्न निकालते हैं और उनकी बुद्धि रूपी तिजोरी में अविनाशी ज्ञान रूपी हीरे भरे हुए हैं, जो हीरे वे दूसरों को देकर उन्हें भी हीरे-तुल्य बनाते रहते हैं। ज्ञान रूपी हीरों से तो मनुष्य को भविष्य में विश्व का चक्रवर्ती दैवी स्वराज्य प्राप्त होता है, तब भला विनाशी रत्नों की ज्ञान रत्नों से क्या तुलना हो सकती है?"
इस प्रकार, बाबा अपना उदाहरण देते हुए कहते "देखो बच्चे ! मैं भी एक बड़ा नामीग्रामी जौहरी था। मुझे हीरों की परख बहुत अच्छी थी। लोग मेरे पास हीरे परखवाने के लिए ले आते थे। वे मेरे पास जवाहिरात के पैकेट ले आते और उनका इकट्ठा ही मूल्य चुकाने को कहते। मैं झट से मूल्य आंक लेता कि एजेन्ट लोग दंग रह जाते। परन्तु जब से ईश्वरीय ज्ञान रूपी हीरे मुझे मिलने लगे तो उनकी तुलना में ये साँसारिक हीरे मुझे कोयले अथवा कंकड़-पत्थर के समान मालूम होने लगे। तब मैंने अपने मन में कहा, 'अहा हा! शिव बाबा तो मुझे मालामाल कर रहे हैं।' तब अनायास ही मेरी दृष्टि उन हीरों से हट गयी और शिव बाबा पर जा लगी और मैं मन ही मन में कहने लगा कि "शिव बाबा! आप कितने भोले व्यापारी हो, आप कखपन लेकर लखपन दे देते हो।" मैं भी जौहरी तो था ही। ये फ़ायदे वाला सौदा देखकर झट मैंने सौदा पटा लिया। अपने पास जो कौड़ियाँ थीं वह शिव बाबा को देकर उसके अविनाशी खज़ाने का मालिक बन गया। भले ही पहले मैं 'खिदरपुर का नबाव माना जाता था, राजाओं और वाइसरायों से मेरी मुलाकात थी और ठाठ से रहता था परन्तु अविनाशी ज्ञान का खज़ाना पाकर और स्वर्ग का स्वराज्य मिलता देखकर मैंने उन सबसे मुंह मोड़ लिया। एक मिनट भी तो सोचने में नहीं लगा क्योंकि इसमें सोचने की बात ही क्या थी? देना कुछ नहीं पड़ रहा था और मिल ही मिल रहा था, तब सोचता क्या? मैं झट से शिव बाबा का हो गया और शिव बाबा का सब कुछ मेरा हो गया। जो इस ईश्वरीय सौदे के बारे में भी सोचता है वह अच्छा जौहरी, अच्छा व्यापारी नहीं। वह तो अन्त तक सोचता ही रह जाता है और यह सच्चा सौदा करने से चूक जाता है।
फिर बाबा कहते, "बच्चे, हीरों को रखने के लिये उनका बॉक्स (Box) भी बहुत सुन्दर और ऊँची किस्म का बनवाया जाता है। जितना मूल्यवान हीरा हो, उसके अनुसार ही मूल्यवान उसका डिब्बा होता है। तो अब, जबकि आपको शिव बाबा से अनमोल ज्ञान-रत्न मिल रहे हैं तब आपकी बुद्धि रूपी तिजोरी अथवा बक्स भी रायल (Royal) होना चाहिए। हीरों से स्वयं को सजाने वाले लोगों का उठना-बैठना सब रॉयल होता है। अतः अब जबकि आपको शाहों के शाह परमपिता परमात्मा से ज्ञान-रत्न मिल रहे हैं अथवा अविनाशी हीरे मिल रहे है तो आपकी चाल-ढाल, मन-वचन और कर्म भी ईश्वरीय कुल की मर्यादा के अनुकूल होने चाहिये वर्ना आपकी बुद्धि रूपी तिजोरी को ताला लग जायेगा और उन ज्ञान-रत्नों से आपको खुशी भी नहीं मिल सकती।"
बाबा कहते कि "हरेक हीरे का मूल्य भी अलग-अलग होता है। हीरे और रत्न की अलग-अलग किस्में और उनके अलग-अलग नाम होते हैं। जिन हीरों में 'फ़्लो' होता है उनका दाम कम होता है। और जो फ्लॉलेस (Flawless) होते हैं, उनका ऊँचा माना जाता है। इस ज्ञान मार्ग में जिन बच्चों में कोई न कोई खामी, त्रुटि, आसुरी लक्षण हैं वे फ़्लो (Flaw) वाले अर्थात् कम मूल्य वाले हीरे हैं और जो पवित्र एवं साफ दिल हैं वे फ़्लॉलेस (Flawless) हीरे ही विष्णु के गले की माला के रत्न बनेंगे। देखो, नौ रत्नों का विशेष गायन है क्योंकि यों तो शिव बाबा से ज्ञान प्राप्त करने वाले सभी बच्चे 'रूहानी रत्न' हैं परन्तु जिन्होंने 'ईश्वरीय ज्ञान योग' में पड़ने वाले विघ्नों का डटकर सामना किया है, लोक कल्याणार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है और लोगों को अविनाशी सुख देने की सेवा में जी-जान अच्छी तरह से लगाया है, वे ही 'नौ-रत्न' मुख्य है, जिनका गायन आज तक चला आता है। आज भी लोग विघ्नों को टालने के लिये और सुख प्राप्त करने के लिए उन 'नव-रत्नों' की यादगार, विनाशी 'नौ-रत्नों' की अँगूठी पहनते हैं।"
इस प्रकार रत्नों और जवाहिरात के धन्धे का उल्लेख करते हुए बाबा कहते कि "अब आप में से हरेक बच्चे को देखना चाहिये कि मुझ 'ईश्वरीय रत्न' में कोई फ्लॉ अर्थात् दुर्गुण या कोई त्रुटि तो नहीं है, यदि है तो फिर मैं विष्णु के गले की माला का मणका कैसे बन सकूँगा? क्या मैं यज्ञ के कार्य में विघ्नों का सामना करता हूँ, उसमें कोई विघ्न डालता तो नहीं हूँ। यदि इस प्रकार आप सब परिस्थितियों का सामना करते हुए, कठिनाइयों को सहन करते हुए, जी-जान लगाकर मनुष्यात्माओं की अलौकिक सेवा में अपने शरीर को चूर-चूर कर दोगे तो सुख-शान्ति से भरपूर सृष्टि में नौ-रत्नों में आपको स्थान मिलेगा।"
सुनार
सुनार के धन्धे की चर्चा करते हुए बाबा कहते कि "हरेक सुनार जानता है कि सोने को शुद्ध कैसे करना है। बाबा बताते कि जब सोने के जेवर बनाये जाते हैं तो उसमें थोड़े-थोड़े कुछ और धातु भी मिलाये जाते हैं परन्तु फिर जब सुनार उन्हें अपनी भट्टी में तपाता और पिघलाता है तो उस रीति से वह सोने से अन्य धातुओं को अलग कर देता है। इस दृष्टि से देखा जाय तो परमपिता परमात्मा ही सबसे बड़ा सुनार है क्योंकि वह योग रूपी भट्टी में आत्माओं को तपाकर उन्हें बुरे संस्कारों रूपी कचड़े से अलग कर देता है। बाबा बताते कि, सतयुग अथवा स्वर्ण युग में यह आत्मा सच्चे सोने के समान शुद्ध थी। वहां यह १६ कला सम्पूर्ण पवित्र थी। मानो कि ये २४ कैरेट वाले सोने की तरह शुद्ध थी। त्रेतायुग, जिसे कि रजत युग (Silver Age) भी कहा जाता है, में इस सच्चे सोने में चांदी की मिलावट (Alloy) की तरह हो जाती है और ये आत्मा १४ कला पवित्र अर्थात् १४ कैरेट के सोने जैसी बन गई। फिर द्वापर युग अर्थात् ताम्र युग में इसमें काम, क्रोधादि विकारों रूपी तांबे की खाद पड़ी और इस आत्मा पर विकारों का मुलम्मा चढ़ गया और इसमें पवित्रता ८ कला ही रह गई, गोया यह ८ कैरेट वाले सोने की तरह अशुद्ध बन गई। फिर कलियुग अर्थात् लौह युग में इसमें तमोगुण की मिलावट हुई और अब तो ये सोने की बजाय मानो मुलम्मा ही हो गया है।" चारों युगों की इस प्रकार कहानी सुनाते हुए बाबा कहते "मीठे बच्चे! विकारी संस्कारों की खाद मिलते-मिलते रजोगुण तथा तमोगुण की मिलावट होते होते देखो आज तो आप लौह प्रधान हो गये हो। इसलिये ही आज आप मनुष्यों का कोई मूल्य नहीं रहा। सतयुग में जब मनुष्य २४ कैरेट वाले सोने के समान थे तब मनुष्यों को कंचन-सम पवित्र काया प्राप्त थी। सतोप्रधान होने के कारण वे 'देवी-देवता' कहलाते थे। उनका इतना मूल्य था कि आज तक भी लोग उनकी जड़ मूर्तियों के मन्दिर बनाने के लिये लाखों रुपये खर्च कर देते हैं जबकि आज के लौह सम मनुष्यों को रहने के लिये एक झोपड़ी भी नहीं मिलती बल्कि वे पशुओं के समान पटरियों पर सोये रहते हैं। देखो तो कैसी दयनीय अवस्था हो गई है आज मनुष्यों की। साथ में बीमार कुत्ता सोया पड़ा है और पास में ही मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए मनुष्य अस्वच्छ जगह पर लेटा पड़ा है! ओहो! जो भारत मालामाल था, खुशहाल था और 'सोने का हिन्दुस्तान' कहलाता था आज उसकी ये हालत ! क्यों हुई भारत की ऐसी दशा ? देखो, इन विकारों ने ही भारत का राज्य और ताज छीना है और मनुष्य की ऐसी दुर्दशा कर दी है।"
इस प्रकार सोना और सोने के मिश्रण (Alloy or Amalgam) की अवस्था का उल्लेख करते हुए बाबा कहते "बच्चे ! जैसे सुनार ही सोने से अन्य धातुओं को अलग करने की विद्या जानता है, वैसे ही शिव बाबा ही एक मात्र ऐसा सच्चा सुनार है जो मनुष्यात्माओं को विकारों की खाद से अलग कर उन्हें सच्चे सोने की तरह शुद्ध बना सकता है। वह सहज ज्ञान-योग की भट्टी तपाता है। उस भट्ठी में मनुष्यात्माओं को डालता है। अब यदि कोई सोना भट्टी में पड़े ही न तो वह पिघलेगा कैसे और उसकी खाद निकलेगी कैसे? सुनार के हाथ में सोना आये ही न और आग से बाहर पड़ा रहे तो उसमें से मिलावट निकलेगी कैसे? परन्तु आज देखो तो यह कैसी अद्भुत बात है कि मनुष्य परमात्मा को कहते हैं कि 'हमारे विषय-विकार मिटा दो और हमारे पाप हरो' परन्तु वे अपने आपको न परमात्मा के हाथों में देते हैं,न ही वे योग रूपी भट्टी में पड़ते हैं।
इस रीति से समझाकर बाबा कहते "बच्चे! अब तो आप स्वयं को अच्छी तरह से योग रूपी भट्टी में डालो क्योंकि जन्म-जन्मान्तर से विकर्मों की खाद आत्मा रूपी सोने में मिलती आई है और अब काली हुइ-सी आत्मा को फिर से स्वच्छ करने के लिए खूब तपाने की ज़रूरत है।
मट्टा-सट्टा
कई बार बाबा मट्टा सट्टा कर धन्धा करने वाले लोगों का भी उदाहरण देते। वे कहते कि "इस धन्धे के लोग फटे-पुराने कपड़े लेकर अथवा घिसे-टूटे बर्तन लेकर उनके बदले में हिसाब अनुसार नये बर्तन दे देते हैं। यह कैसा विचित्र धन्धा है! पुराने कपड़े देने वाला भी खुश हो जाता है कि घर से कबाड़ निकल गया और दैनिक प्रयोग में आने वाले नये बर्तन मिल गये और मट्टा सट्टा वाला भी प्रसन्न हो जाता कि चलो अच्छा सौदा हो गया, अब मैं इन पुराने कपड़ों को ज़्यादा दामों में बेचकर कुछ पैसा बना लूँगा।" इस प्रकार बाबा समझाते कि परमपिता परमात्मा भी मट्टा सट्टा करते हैं। हमारा यह शरीर रूपी पुराना वस्त्र अथवा पुराना बर्तन लेकर वो हमें सतयुगी दैवी शरीर और सब कुछ उच्च दे देते हैं। परन्तु ऐसा मट्टा सट्टा जैसे कि परमपिता शिव करते हैं, अन्य काई भी नहीं कर सकता। वह हमारे खोटे पैसे लेकर हमें उसकी जगह नये पैसे दे देते हैं। यों ऐसा व्यापार करने वाले भी लोग होते हैं जो फटे पुराने नोट लेकर अपने कमीशन के कुछ पैसे काटकर, नये नोट अथवा नये सिक्के दे देते हैं। परन्तु परमपिता परमात्मा जो मट्टा-सट्टा करते हैं उसमें तो उन द्वारा कमीशन लिये जाने का प्रश्न ही नहीं होता। शिव बाबा को जो अपना कबाड़ खाना अथवा चौरासी जन्मों से जड़जड़ीभूत हुई चीजें दे देता है, उसके बदले में वह उनसे नई सतयुगी दुनिया में सतोप्रधान और सुखदायक अतुल सामग्री प्राप्त कर लेता है।" यह उदाहरण देते हुए बाबा कहते, "सारे कल्प में आत्माओं के साथ इस प्रकार का मट्टा-सट्टा शिव बाबा एक ही बार करते हैं। इसीलिये अब ही ऐसा अवसर है कि आपके मन में जो कबाड़ खाना है अथवा जो भी कुछ पुराना-सुराना माल असबाब आपके पास है वह उसको देकर उससे सब कुछ नया लेने के हकदार बन जाओ।"
मेहतर तथा भंगी
बाबा कहते कि "संसार में जो सबसे खराब धन्धे हैं, उनमें से मेहतर का धन्धा तथा सिर पर कूड़ा उठाने वाले भंगी का धंधा सबसे ज़्यादा खराब है। भंगी का काम बड़ा अस्वच्छ है परन्तु जो मनुष्य 'कामातुर' हैं वह भी कूड़ा ढोने वाले भंगी से किसी प्रकार कम नहीं हैं क्योंकि उनका ध्यान मनुष्य के निकृष्ट अंगों पर लगा रहता है और इस कलियुगी, गन्दगी से भरे हुए शरीर पर वे लट्टू हुए रहते हैं।" बाबा समझाते कि "भंगी तो सिर पर कूड़ा उठाता है किन्तु कामी मनुष्य तो विष का सेवन करते हैं। अतः कामी मनुष्यों का धंधा सबसे खराब है। उनसे तो मेहतर भी बेहतर है क्योंकि फिर भी वे तो सफाई करके मनुष्य की सेवा करते हैं। इस प्रकार बाबा 'ब्रह्मचर्य-व्रत' के पालन के लिए प्रेरित करते।"
बाबा कहते "लोग भंगी और मेहतर को अछूत समझते हैं वे उन्हें छूना भी निषिद्ध मानते हैं परन्तु यदि गहरी निगाह से देखा जाय तो भंगी तो फिर भी नहा-धोकर और वस्त्र बदलकर स्वच्छ और स्पर्श- योग्य हो सकता है किन्तु कामी मनुष्य की तो दृष्टि, मनोवृत्ति, बुद्धि और उसका सर्व देह ही म्लेच्छ है क्योंकि उस पर काम का भूत सवार है। परन्तु आज लोग असली म्लेच्छों को नहीं पहचानते। योगी को चाहिये कि वह 'कामी-मनुष्य' से दूर रहे क्योंकि उस कामी मनुष्य का संग बहुत ही हानिकारक है।"
बाबा कहते कि "कामी मनुष्य के हाथ से बना हुआ भोजन करना भी योगियों के लिए निषिद्ध है क्योंकि जिसका मन स्वच्छ नहीं, उसके मन और तन से ऐसे प्रकम्पन्न (Vibrations) निकलते हैं जो सारे वातावरण को दूषित और विषैला कर देते हैं। 'कामी' मनुष्य की चारपाई, उसके वस्त्र आदि-आदि भी वास्तव में अस्पृश्य हैं क्योंकि उनमें महा दुर्गन्ध रूपी दुर्गन्ध भरी रहती है और वह योगियों के लिए एक स्वच्छ स्थान अथवा स्वच्छ साधन का काम नहीं करते।
यदि मेहतर भी 'ब्रह्मचर्य व्रत' का पालन करता है तो वह काम विकार के 'विषय-वैतरणी' में गोता खाने वाले तथा कथित ब्राह्मण से ऊँचा है।" बाबा समझाते कि ‘जब कोई मनुष्य दीर्घ शंकासे निवृत्त होने जाता है अथवा नित्य-कर्म करता है तो जब तक वह स्नानादि से शुद्ध न हो जाय तब तक वह भी भंगी के समान है। अतः जो लोग ईश्वरीय ज्ञान लेते और योग का अभ्यास करते हैं उन्हें चाहिए कि वे ऐसे कर्मों के बाद स्नानादि से स्वयं को स्वच्छ करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करके अपने दैनिक कार्यों में प्रवृत्त हों और दीर्घ शंका से निवृत्त होने के बाद रसोई अथवा पाकशाला में, स्नान करने के पहले प्रवेश न करें क्योंकि उस अस्वच्छ अवस्था में वे भंगी अथवा मेहतर के समान है।’
इस विधि से बाबा पवित्रता का महत्त्व दर्शन कराकर तथा कामी मनुष्य को निकृष्ट बताकर ब्रह्मचर्य व्रत बताकर ब्रह्मचर्य व्रत की पालना के लिए उत्साहित करते और मानसिक पवित्रता के साथ साथ शारीरिक स्वच्छता के प्रशंसनीय गुणों की भो धारणा कराते। आज जबकि मनुष्यों का आहार-विहार तथा आचार सही माने में शूद्रों के समान है तथा बाबा 'शूद्र' और 'ब्राह्मण' की सच्ची व्याख्या देकर, म्लेच्छ और अस्पृश्य की युक्ति-संगत परिभाषा समझाकर, मनुष्य को शूद्र से सच्चा ब्राह्मण बना देते।
कथा वाचक अथवा पंडित
बाबा कहते "आज कुछ लोगों का धन्धा केवल कथा वाचना ही रह गया है। किसी शास्त्र अथवा पुराण को लेकर नर-नारियों को इकट्ठा करके वे उनको बढ़ा-चढ़ाकर कथाओं की व्याख्या देते हैं और इस प्रकार अपनी आजीविका के लिए सामग्री जुटाते हैं। शब्द-जाल फैलाकर, वाक्य-चातुर्य अपना कर, दन्त कथायें कहकर, रोचकता पैदा करके अथवा लच्छेदार भाषण सुनाकर वे लोगों को तथाकथित 'शिष्य' बना लेते हैं और उन द्वारा दिये गये दान से अपनी उदरपूर्ति करते हैं। वे केवल कथा कहने का ही धन्धा करते हैं, जीवन में पवित्रता और उच्च गुणों की धारणा करने कराने पर ध्यान नहीं देते। न वे स्वयं निर्विकारी बनते हैं नहीं वे 'सत्यवचन महाराज' कहने वाले - अंधश्रद्धालु श्रोताओं के आचरण को 'षट् विकार' से रहित बनाने के कार्य में परिश्रम करते हैं।"
इस प्रकार का धन्धा करने वाले लोगों की ओर संकेत करते हुए बाबा कहते कि "आप बच्चों को कोरा कथावाचक नहीं बनना है बल्कि उच्च गुणों की धारणा करनी है। मुख से दूसरों को ही केवल ज्ञान नहीं सुनाना बल्कि उस ज्ञान के अनुरूप ही अपना भी जीवन बनाना है।" बाबा समझाते कि "जो मनुष्य, मनुष्यात्माओं को पावन बनाने की सेवा किये बिना, उनसे कोई तन, धन आदि की सेवा लेता है गोया वह उनका ऋणी हो जाता है और स्वयं को उनके कर्म-बन्धन में जकड़ लेता है, उन्हीं के घर में फिर उसे जन्म लेकर उस सेवा का ऋण चुकाना पड़ता है। इस प्रकार का स्पष्टीकरण देकर बाबा मन, वचन एवं कर्म को एक समान बनाने, अपने आचार की श्रेष्ठता पर ध्यान देने तथा दूसरों की ठोस सेवा करने एवं विनम्र बनने की कल्याणकारी शिक्षा देते ताकि ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य का ध्यान लम्बी लम्बी बातें करने, रोचक-रोचक कथाएं सुनाने, अपनी विद्वता के अभिमान में इठलाने और स्वयं को बड़ा वक्ता समझने में न अटक जाय बल्कि वे ज्ञान को जन-सेवार्थ मिला हुआ एक ईश्वरीय वरदान मानकर नम्रता-पूर्वक दूसरों की सेवा में दिन-रात लगा रहे।"
माली
बाबा माली के कार्य की बड़ी प्रशंसा करते और बाबा को फूल बड़े अच्छे लगते। बाबा कहते "माली अपने फूलों की बड़ी सम्भाल रखता है। वह समय पर पौधों को पानी देता है और चिड़िया तथा पक्षी, नन्हें-नन्हें पौधों को चट न कर जाये, इस संकट से फूलों की रखवाली करता है। कोमल-कोमल पौधे, बिन खिली कलियां, कहीं पानी की परवरिश के बिना मुर्झा न जाये, कोई जंगली पशु घुस आकर बगीचे को लताड़ और उजाड़ न जाय इस बात की वह चौकसी करता है और फिर वह लगती हुई कलियों और खिलते हुए फूलों को देख-देखकर खुश होता है। कभी कोई माली से जाकर पूछे कि जब बहुत परिश्रम, संभाल और सुरक्षा के बाद उसकी फुलवारी खिल उठती है तो उसका मन कितना खुश होता है!" इस उदाहरण से बाबा स्पष्ट करते कि ‘आज सभी मनुष्य भी ज्ञान रूपी जल के बिना मानो सूखे अथवा मुरझाये पड़े हैं। अब शिव बाबा जो कि वास्तविक ज्ञान की वर्षा करने वाला इन्द्र भी है और सर्वश्रेष्ठ माली भी है, आकर 'ज्ञान-जल' देकर मनुष्य रूपी पौधों को फिर हरा-भरा कर रहा है। वह माया रूपी चिड़िया से अथवा विकल्पों की तेज आंधी से, 'ज्ञान-जल' से उगे इन मानवी फूलों की, एक कुशल माली की तरह संभाल करता है, देख-रेख भी और रखवाली भी। बहुत परिश्रम के बाद ही विकारों के ताप से सूखा हुआ मनुष्य रूपी कांटा फूल का रूप लेता है और विरले ही फूल माया की तेज आँधियों के सामने अपनी कोमल पंखुड़ियों- सहित सुरक्षित रहते हैं।’
इस तरह माली और बगीचे के काम का चरित्र-चित्रण करते हुए बाबा कहते कि ‘ईश्वर के हाथों से लगाये गये मानवी पुष्पों के बगीचे के आप भी एक फूल हैं। इस बात का आपको स्वाभिमान होना चाहिये और खुशी भी, और अपने आसपास उगे हुए फूलों को देखकर, उन द्वारा अपनी भी शोभा बढ़ती हुई महसूस करनी चाहिये क्योंकि बगीचा एक नहीं अनेक फूलों से बनता है तथा माला और गुलदस्ता भी एक धागे में पिरोये जाने, एक मुड्ढे में बँधने अथवा एक धरनी पर उगने से ही बनते हैं।’
बाबा कहते, "सर्वश्रेष्ठ शिव बाबा ने आपको भी एक छोटा माली बनाया है। आप भी ज्ञान रूपी बीज लेकर मनुष्यों के मन में दिव्य गुण रूपी पुष्प लगाओ। उन्हें योग तथा ज्ञान द्वारा, पुष्प के समान निर्मल, मनोहर, आकर्षक और गुणों रूपी सुगन्धि से युक्त बना, माया रूपी चिड़िया से अथवा विकल्पों की आँधी से उनकी सुरक्षा करो और सारे संसार को एक फूलों का बगीचा बना दो।"
बाबा कहते "सतयुग में यह सारी सृष्टि फूलों का बगीचा थी। लोग उसे 'अल्लाह का बगीचा' अथवा गार्डन आफ एडन (Garden of Eden) भी कहते हैं परन्तु अल्लाह ने अर्थात् परमात्मा ने वह बगीचा कैसे लगाया, कब लगाया और यह सृष्टि कांटों का जंगल कैसे बन गयी? इस पहेली को वे नहीं जानते। अतः अब यह सभी को बताने की जरूरत है कि कलियुग के अन्त में ही परमपिता परमात्मा आकर 'ईश्वरीय-ज्ञान' द्वारा मनुष्यात्माओं को फूलों के समान पवित्र बनाते हैं और इस सृष्टि रूपी जंगल में मंगल करते हैं।"
ब्राह्मण
ब्राह्मणों का उल्लेख करते हुए बाबा कहते कि 'ब्राह्मणों के भी कई वर्ग होते हैं। ब्राह्मणों में एक 'करनीगोर' जाति भी होती है। जब कोई मनुष्य मर जाता है तो वे उसका पिण्ड दान आदि कराते हैं तथा उसको मृतक के रहे कपड़े, उसकी चारपाई आदि-आदि दान दे दी जाती है। वास्तव में ये प्रथा पूर्व कल्प के अन्त काल से चली आ रही है। कल्प की अन्तिम वेला में जब, परमात्मा अवतरित होते हैं तब इस संसार की महामृत्यु तो भविष्य में होने ही वाली होती है। इस रहस्य को समझने वाले लोग तब परमात्मा शिव द्वारा रचे हुए सच्चे ब्राह्मणों को अपनी मृत्यु से पहले ही, अपनी वस्तुएँ देते हैं। उस समय के मनुष्यों के पास टूटी फूटी चारपाई और जीर्ण क्षीर्ण वस्त्रों के सिवाय होता ही क्या है? वे ब्राह्मण भी उनसे ये वस्तुएँ लेकर क्या करेंगे? वे तो उनकी अपनी आवश्यकताओं के अतिरिक्त दान की हुई इन वस्तुओं को जन-कल्याण की सेवा में ही लगा देते हैं।"
बाबा कहते, "पुरातन प्रथा यह भी चली आयी है कि ब्राह्मण लोग सगाई कराने का धन्धा भी करते रहे हैं। वे होवनहार वर और वधुके घर वालों के बीच बात कराकर सगाई कराने के एवज में अपनी दक्षिणा अर्थात् दलाली ले लेते हैं। ब्राह्मणों के इस धन्धे का हवाला देते हुए बाबा कहते कि वे देह-अभिमानी ब्राह्मण तो शारीरिक सगाई कराकर नर-नारी को 'काम' के गर्त में धकेलने के निमित्त बनते आये हैं। गोया वे उपकार की बजाय अपकार करते आये हैं और विषय-वासना की अग्नि में धकेलते आये हैं। अब आप सच्चे ब्राह्मण, आत्माकी सगाई परमात्मा से कराने का ऊँचा धन्धा करो तो शिव बाबा आपको इसके लिये बहुत ही बड़ी दक्षिणा देंगे। जैसे वे लोग कन्या को
होवनहार वर के गुण बताकर उसकी सगाई करा देते हैं वैसे ही आप भी मनुष्यात्माओं को पतियों के भी पति परमपिता परमात्मा की यथार्थ महिमा सुना-सुनाकर आत्माओं की सगाई परमात्मा के साथ कराने के निमित्त बनो अर्थात् उनकी बुद्धि की लग्न परमात्मा के साथ जोड़ने का श्रेय लो। सच्चा ब्राह्मण वह है जो आत्मा की सगाई परमात्मा से कराता है क्योंकि देह के सम्बन्ध जुटाकर मनुष्यों को 'देह-बुद्धि' बनाना और उनका नया दैहिक कर्म-खाता चालू कराना तो गोया उन्हें कर्मों के बन्धन में जकड़नेका साधन रचना है जबकि आत्मा की सगाई परमात्मा से कराना गोया उसके लिये मुक्ति का उपाय करना है। वास्तव में ऐसा विवाह ही शुभ विवाह है क्योंकि इस नाते से ही भविष्य में मनुष्य का सब शुभ-ही-शुभ होता है।"
बाबा कहते, "ब्राह्मणों में से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जगह- जगह लोगों के निमंत्रण पर जाकर कथा सुनाते हैं। कभी वे सत्यनारायण की कथा करते हैं तो कभी शिव पार्वती की अमर कथा करते हैं। कभी वे तीजरी की कथा थी का व्याख्यान करते हैं तो कभी गरुड़ पुराण में से कोई प्रसंग लेकर चर्चा करते हैं। पिछले दो युगों में वे लोग लिखी अथवा सुनी हुई कथायें बिना अनुभव किये हुए ही सुनाते रहे हैं परन्तु अब जबकि आपने शिव से सन्मुख (Direct) ही ये 'अमरकथा', 'राम कथा' अथवा 'भागवत् कथा' सुनी है और आप स्वयं उस कथा के एक पार्टधारी हैं तो आप ये आप-बीती अथवा आत्मानुभूत कथा जगह-जगह नर-नारियों को सुनाओ। जो अच्छे ब्राह्मण होते हैं वे कथा सुनाये बिना भोजन करना भी हराम समझते हैं। कथा करने के बाद उन्हें जो भोजन अथवा भोग मिल जाय, उसी में ही वे सन्तुष्ट रहते हैं। अब जबकि आपको यथार्थ कथा का बोध हुआ है तो आपको भी चाहिए कि जहाँ भी आपका उठना बैठना हो, जहाँ से भी आपको निमन्त्रण मिले, जहाँ कहीं भी जाकर आप से हो सके, मनुष्यात्माओं को ८४ जन्मों की कथा सुनाकर उनमें आत्म-जागृति लाने के निमित्त बनो। आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों का यह अलौकिक जन्म सेवार्थ ही हुआ है। अहा!! देखो तो आप 'सृष्टि-ड्रामा' में कितने सौभाग्यशाली है कि आप मनुष्यात्माओं के कल्याणार्थ यही श्रेष्ठ कर्म करने के निमित्त बने हुए है जो कर्म कि स्वयं शिव बाबा करते हैं। आप सारी सृष्टि के शुभचिन्तक बनकर न केवल मनुष्यात्माओं को पवित्र बनाने की सेवा करते हैं बल्कि तत्वों को भी सतोगुणी बनाने का उद्यम करते हैं।"
बाबा बताते कि "कई ब्राह्मण यज्ञ कराने का कर्त्तव्य करते हैं। वे मन्त्र पढ़ते जाते और 'यज्ञकुण्ड' में सामिगी घृत की आहुतियाँ देते हुए 'स्वाहा, स्वाहा' कहते जाते हैं। वे समझते हैं कि इस प्रकार से वातावरण शुद्ध होगा, देवता प्रसन्न होंगे, हममें परोपकार की भावना दृढ़ होगी और लोक सेवार्थ त्याग, का गुण आयेगा परन्तु आप देखते हैं कि शताब्दियों से घर-घर में ये यज्ञ होते आये फिर भी आज भारत की क्या हालत हो गई है? अतः अब शिव बाबा ने आपको श्रेष्ठ यज्ञ करना सिखाया है। आप योगाग्नि प्रज्वलित करके उसमें ज्ञान घृत डालते हुए काम, क्रोधादि आदि षट विकारों की सामग्री अथवा लकड़ियों की आहुति देते हैं। निश्चय ही यह 'रुद्र यज्ञ' अथवा 'राजसूय अश्वमेघ अविनाशी ज्ञान यज्ञ' है, जो ही विश्व शान्ति स्थापित कराने वाला और विश्व में चक्रवर्ती दैवी स्वराज्य की पुनः स्थापना कराने वाला है। अब आप यही यज्ञ करते और कराते हुए 'विश्व में सच्ची शान्ति' स्थापित करने के निमित्त बनो।"
चमार
बाबा कहते, "लोग यही समझते हैं कि जो मनुष्य चमड़ा से सम्बन्धित कोई भी कार्य करता है जूते बनाता है, चमड़े के बक्से - बनाता है, चमड़ों को धोकर सुखाता है और उन्हें रंगता है वह चमार है, वह निकृष्ट अथवा अशुद्ध काम करने वाला, निम्न जाति अथवा शूद्र जाति का पुरुष है। परन्तु यदि ज्ञान चक्षु से देखा जाय तो वास्तव में आज सभी लोग 'चमार' हैं क्योंकि सभी एक दूसरे को चमड़ी की दृष्टि से देखते हैं अर्थात् काला है या गोरा, सुन्दर है या कुरूप, युवा है या वृद्ध, नर है या नारी इस दृष्टि से व्यवहार करते हैं। भृकुटि में बैठी हुई जो आत्मा है उसकी ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता। अतः देह रूपी चमड़े को ध्यान में रखते हुए जो कार्य व्यापार कर रहे हैं उन्हें आप क्या कहेंगे? वे भी तो एक प्रकार से शूद्र ही ठहरे ! वे चमड़े के ही भोग विलास में लगे हुए हैं, सच्चा ब्राह्मण अथवा सवर्ण वह है जोकि चमड़े की दृष्टि (देह अभिमान) से ऊपर उठकर सबको आत्मिक दृष्टि से देखता है।
कसाई अथवा जल्लाद
बाबा कहते "कसाई का धन्धा बहुत बेरहमी (निर्दयता) का धन्धा है। कसाई और जल्लाद दोनों ही जीव हत्या के दोषी हैं। परन्तु यदि 'ज्ञान-चक्षु' से देखा जाय तो जो 'काम कटारी' चलाता है, वह भी कसाई अथवा जल्लाद से कम नहीं बल्कि वह तो और भी अधिक पापी और दोषी है क्योंकि जल्लाद अथवा कसाई तो जीव प्राणी को मार कर उनके एक जन्म में उन्हें दुःख देते हैं परन्तु कामी मनुष्य तो जीते जी काम कटारी मार कर गोया आत्मा का हनन करता है। इसे तो नर्क का द्वार कहा गया है। यह काम कटारी खाने वाला तो नर्कगामी होता है अर्थात् अधोपतन की ओर जाता है। काम कटारी से तो मनुष्य को जन्म-जन्मान्तर के लिए आदि-मध्य-अन्त, तीनों कालों के लिये दुःख की प्राप्ति होती है।
बाबा कहते, "केवल जीव को मारने और उसका मांस बेचने वाला ही पाप का भागी नहीं होता बल्कि जो व्यक्ति घर में माँस लाता है, जो उसे पकाता है, जो उसे खाता है सभी दोषी होते हैं। इसी प्रकार, काम वासना के धन्धे में भी जो सहयोग देकर आत्माओं के पतन के निमित्त बनते हैं, वे भी पाप के भागी होते हैं। उनकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वे विवेक शून्य हो जाते हैं।"
इसी प्रकार बाबा क्रोध के बारे में भी कहते कि "यह भी एक प्रकार की हिंसा करना अथवा कसाई का काम करना है। कामी और क्रोधी ऐसे जल्लाद अथवा कसाई हैं जो न केवल दूसरे की हिंसा करते हैं बल्कि अपनी भी मानसिक अथवा आत्मिक दृष्टिकोण से हत्या करते हैं। देह अभिमानी मनुष्य जो कि आत्मा की शुद्ध आवाज़ को दबाते अथवा मारते हैं वे नित्य प्रति कसाई ही का काम करते हैं।"
इस प्रकार, बाबा व्यवसायों से सम्बन्ध करके भी ज्ञान और गुण सिखाते और रूहानी वकील तथा रूहानी डाक्टर बनाते।
बाबा ने साकार रूप में कर्त्तव्य समेटना शुरू किया
पिछले पृष्ठों में हम यह बता आये है कि किस प्रकार शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा ईश्वरीय ज्ञान द्वारा और सहज राजयोग रूपी 'विज्ञान' द्वारा ब्रह्मा-वत्सों की उन्नति एवं कल्याण के पथ पर निरन्तर आगे ले जा रहे थे। अब तक उनकी दिव्य मार्ग-प्रदर्शना के द्वारा भारत के अनेकानेक नगरों, उपनगरों, महानगरों एवं ग्रामों में ईश्वरीय सेवा- केन्द्र खुल चुके थे। वे एक कुशल खेवट की न्यायीं शिव बाबा के संरक्षण तथा मार्ग दर्शन से, इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय रूपी नाव को अनेक तूफानों, समुद्री चट्टानों और रुकावटों में से पार करके इतनी दूर तक, सुरक्षित यात्रा-भाग में ले आये थे। साथ-साथ एक बुद्धिमान नावक की न्यायीं उन्होंने अन्य अनेकों को भी इस आध्यात्मिक क्रान्ति की नाव को खेवना सिखा दिया था।
बाबा ने सेवा-केन्द्र खोलने और ईश्वरीय ज्ञान देने के विधि-विधान समझा दिये थे
इसी दौरान में बापदादा ने ज्ञानाभिलाषी तथा योग-प्रेमी लोगों के निमन्त्रण पर सेवा केन्द्र की रीति-नीति भी ब्रह्मा-वत्सों को भली-भांति समझा दी थी। सेवा केन्द्रों पर जन-जन को इस शिक्षा से लाभान्वित करने की विधि और कृति भी उन्होंने ब्रह्माकुमारियों को, जोकि ईश्वरीय ज्ञान के शिक्षा कार्य में निमित्त हैं, भली प्रकार सिखा दी थी। सेवा-केन्द्र पर आये जिज्ञासु से प्रथम बार क्या बातचीत की जाए, उससे किस प्रकार प्रश्न-पत्र (Introductory-Form) भरवाया जाए, किस प्रकार उसे तीन पिताओं3 की बात सुनाते हुए परमपिता का परिचय दिया जाए और शिव बाबा से मिलने वाली दिव्य विरासत (Inheritance) की खुशखबरी उसे दी जाये, किस प्रकार उस व्यक्ति की आत्म-चेतना (Soul Consciousness) को जगाया जाये, कैसे उसे देह से न्यारेपन और शान्ति का अनुभव कराया जाए और परमपिता से उसका सम्बन्ध जोड़ दिया जाए ये सब विधि- विधान भी बाबा ने भली-भांति सिखा दिये थे। कल्याण कार्य में प्रवृत्त रहते हुए भी किस प्रकार दिव्य मर्यादा का पालन किया जाए - यह रूहानी पाठ भी बाबा ने पढ़ा दिया था। बाबा ने जिज्ञासुओं के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना की रीति-नीति भी समझा दी थी।
बाबा कहते "किसी भी जिज्ञासु को ईश्वरीय ज्ञान को सुनाना शुरू करने से पहले स्वयं मधुर ईश्वरीय स्मृति में स्थित हो जाओ और फिर उसे आत्मिक दृष्टि से देखते हुए ज्ञान दो। उसे शिव बाबा द्वारा भेजा हुआ मानकर तथा उसे भी परमपिता का एक वत्स जानकर उसे देहाभिमान रूपी दलदल से निकालने की कोशिश करो।" बाबा समझाते "उस आत्मा को ईश्वरीय ज्ञान देते-देते ईश्वरीय स्मृति में स्थित करने का प्रयत्न करो। रूहानी मस्ती में मस्त होकर एक ज्योति-स्वरूप शिव बाबा ही की महिमा उसके सामने करो और यह एक बात उसकी बुद्धि में भली-भांति विठा दो कि एक शिव बाबा ही पतित-पावन, दुःखहर्ता एवं सुख-कर्त्ता हैं और उस एक ही की याद अथवा योग से हमारे जन्म-जन्मान्तर के विकर्मों का बोझ दग्ध हो सकता है। उसे ऐसे समझाने के दौरान स्वयं अपने मन में प्रेम-पूर्वक रीति से शिव बाबा से कहो "बाबा, इसकी भी बुद्धि का ताला खोलो, किसी तरह यह भी माया के पंजे से निकलकर आपका बन जाये और सुख एवं शान्ति का अविनाशी खज़ाना प्राप्त कर ले।" गोया उसके प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखो और अपने आराम की भी परवाह न करके हर आत्मा की उन्नति के लिए अपना समय और अपने साधन लगा दो। इस प्रकार बाबा ने ईश्वरीय सेवा की रूह तो हर वत्स में फूँक ही दी थी।
बाबा ने परिस्थितियों का और उनको पार करने के तरीके का भी परिचय करा दिया था
ईश्वरीय सेवा में क्या-क्या परिस्थितियाँ सामने आती हैं, और उन्हें कैसे-कैसे पार किया जाए अथवा उन द्वारा कैसे संस्कार-परिवर्तन किया जाए, जिज्ञासु-जन क्या-क्या जानना चाहते हैं और उन्हें कौन-सी बात कैसे समझाई जाय,आजकल के लोग कैसे-कैसे स्वभाव के हैं और उनके स्वभाव को किस प्रकार से बदलकर दिव्य बनाया जाय, इन क्रान्तिकारी एवं गहन तथ्यों का दिग्दर्शन भी बाबा ने अच्छी तरह से करा दिया था।
बाबा ने ईश्वरीय ज्ञान के महत्त्वपूर्ण विषयों का भी बोध करा दिया था
ईश्वरीय ज्ञान के कौन से विषय ऐसे हैं जो क्रान्तिकारी चिन्तन पैदा करने वाले हैं और विश्व-भर के लिए आश्चर्यजनक हैं तथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होने पर भी संसार-भर में या तो उनके लिए भ्रांतियां है या वे अज्ञात हैं इस पर भी बाबा ने एक बार नहीं, कई बार मुरलियों में भिन्न-भिन्न रीति से प्रकाश डाला था। 'गीता-ज्ञान किसने दिया था?', 'परमात्मा परमधाम का वासी है या सर्वव्यापक है?; परमात्मा का अवतरण हर युग में होता है या कल्प में केवल एक ही बार पुरुषोत्तम संगमयुग में?; संसार में आदिकाल में देवी-देवताओंका समाज था या लोग असभ्य थे और कला, संस्कृति, विज्ञान कुछ भी नहीं थे; 'मन' और 'बुद्धि' आत्मा से अलग हैं या आत्मा ही की अविच्छिन योग्यताएँ है?; आत्मा ही अपने वास्तविक रूप में परमात्मा है किंवा उसका अंश है या आत्मा और परमात्मा दो भिन्न-भिन्न अनादि और अविनाशी सत्ताएं है?'; ऐसे अनेक युग-प्रवर्तक सिद्धान्त बाबा ने बुद्धिगम्य करा दिए थे। बाबा ने बड़ी ओजस्वी एवं प्रेरणादायक भाषा में बारम्बार वत्सों के मन में यह लक्ष्य भी दे दिया था कि किस प्रकार निर्भय एवं योग-युक्त होकर विद्वतजनों और सामान्य व्यक्तियों के सामने इन सिद्धान्तों को आध्यात्मिक रीति से एवं कल्याण-भावना से स्पष्ट करना है। विशेष बात यह कि बाबा ने यह धुन तो सबको लगा दी थी कि यह ईश्वरीय ज्ञान रूपी अमृत विश्वके हर व्यक्ति को, संसार के हर कोने में, भूमण्डल की हर दिशा में, जाति-पांति, रूप-रंग, भाषा और धर्म के भेद से रहित होकर हर नर-नारी और बालक-बालिका को पिलाना ही है। पुनश्च, बाबा ने यह भी समझा दिया था कि विश्व का एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं छोड़ना है जो इससे बिल्कुल अपरिचित रह जाय अथवा जिसको इस ईश्वरीय यज्ञ में पधारने का सस्नेह निमन्त्रण न मिला हो।
बाबा ने ब्रह्मा-वत्सों का भी परिचय दे दिया था
किस-किस ब्रह्मा-वत्स में क्या-क्या विशेषताएँ हैं अथवा किन- किन कमियों को जीवन-मार्ग से दूर करने के लिए क्या-क्या पुरुषार्थ करना चाहिए? इस सब का परिचय भी बापदादा ने दे दिया था। हरेक वत्स को बेहद की सेवा4 करने और बेहद की बात सोचने की टेर भी बाबा ने डाल दी थी। किसी भी परिस्थिति को लेकर मनुष्यात्मा का कैसे कल्याण किया जाए, उसे तन, मन, धन द्वारा ईश्वरीय सेवा करने के कैसे निमित्त बनाया जाये, हर मनुष्यात्मा को किस प्रकार सम्मान, स्नेह और सद्भावना से चलाया जाये। शिक्षण, प्रशिक्षण और प्रशासन का कार्य तथा अपनी उन्नति के लिए क्या अभ्यास या पुरुषार्थ किया जाये इसका भी विस्तृत बोध बाबा ने करा दिया था। व्यवहार एवं सहयोग सम्बन्धी संहिताएँ समझा दी और बाबा ने उन्हें व्यावहारिक (Practical) रूप से पालन करने का अच्छा-खासा अभ्यास भी करा दिया। अब तक ब्रह्मा-वत्सों ने बाबा की निगरानी में शिक्षण एवं प्रशिक्षण में रमणीकता-पूर्वक चर्चा-परिचर्चा प्रश्नोत्तर, संवाद, वाद- विवाद, परिसंवाद, गीत-संगीत, शिष्टतापूर्वक हास्य-विनोद, ज्ञान- गोष्ठी के लिए स्नेह-मिलन,अल्पाहार या ब्रह्मा भोजन, खेल-पर्यटन के दौरान भी आत्मा-निश्चय में स्थित रहना इन सभी का स्थान और महत्त्व प्रेक्टिकल रूप से समझ लिया था।
बाबा ने प्रचार और प्रसार के साधनों का भी बोध करा दिया था
समाचार पत्र, रेडियो, टी वी इत्यादि प्रसार साधनों के द्वारा किस प्रकार यह ईश्वरीय संदेश जन-जन तक शीघ्रातिशीघ्र पहुँच सकता है और चित्रों इत्यादि के माध्यम से लोग किस प्रकार गूढ़ विषयों को भी भली-भांति समझ सकते हैं इस पर भी बाबा ने काफी बल दिया था और इसका कुछ प्रेक्टिकल कार्य कराया था। बाबा द्वारा आध्यात्मिक शिक्षिकाओं के प्रशिक्षण के लिए शिक्षा स्थान का निर्माण भी सम्पन्न हो चला था।
उन दिनों मधुबन में एक अभूतपूर्व वातावरण था। थोड़े ही बहन-भाई मधुबन में निवास करते थे। उन दिनों बाबा ब्रह्माकुमारी कन्याओं के लिए जो प्रभु-समर्पित होकर ईश्वरीय ज्ञान प्रदान करने की सेवा में तत्पर होना चाहती थीं, के प्रशिक्षण कार्य के लिए, पाण्डव भवन के उत्तर-पश्चिमी भाग में आवास एवं प्रशिक्षण भवन बनवा रहे थे; उस भवन का निर्माण-कार्य काफी हद तक समाप्त हो चुका था। बाबा सेवाकेन्द्रों से आने वाले वत्सों को बड़े स्नेह से वहाँ ले जाते और दिखाते कि ये शिक्षिका-प्रशिक्षण (Teachers training) के लिए बनवाया जा रहा है। बाबा पाण्डव भवन में नव-निर्मित स्थानों के नाम भी ऐसे रखते जिससे कि वहाँ रहने वालों को जीवन-निर्माण के कार्य में प्रेरणा मिलती। बाबा ने अपने निवास स्थान के सामने वाले स्थान को नाम दिया 'हवाई महल' अथवा (Aeroplane) (एयरोप्लेन) उसमें रहने वाले इसी चेतना में रहते थे कि वे इस कलियुगी धरा पर न होकर फ़रिश्तों के समान रूहानियतमें उड़ान भरते रहते हैं। प्रशिक्षण स्थल के एक भाग को बाबा ने नाम दिया था 'इन्द्रप्रस्थ'। इसमें रहने वालों के मन में यह भावना बनी रहती थी कि वे पाण्डव हैं, अर्थात् धर्म एवं नैतिकता का ध्वज फहराने वाले तथा आसुरीयता का साम्राज्य समाप्त करने वाले हैं।
अब बाबा कार्य-विभाग सौंपते जा रहे थे
अब ऐसा लगता था कि बाबा सभी वत्सों को उन-उन की योग्यता के अनुसार कार्य-विभाग सौंपते जा रहे थे। नई सतयुगी सृष्टि की स्थापना के लिए मानो बाबा ने अपनी आध्यात्मिक ज्ञान-वाटिका और पवित्र बीज तैयार कर ही लिये थे। पिछले लगभग ३०-३२ वर्ष ज्ञानाध्ययन, योगाभ्यास, सेवा-साधना और दिव्यता के उत्कर्ष में लगे रहने के सुमधुर फलस्वरूप ब्रह्माकुमारी बहनों का एक सबल संगठन भी बन ही चुका था जिसमें हर ब्रह्मा-वत्स की अपनी-अपनी कलाएँ निखर आई थी और इस ईश्वरीय परिवार के सम्मुख हर वत्स थोड़ा- बहुत प्रत्यक्ष था। अब इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का विरोध भी ठंडा पड़ चुका था और जन-समुदाय ब्रह्माकुमारी बहनों की पवित्रता, प्रभु-निष्ठा, सेवा में तत्परता, स्नेहदान की उत्तमता, संगठन की सुदृढ़ता और इनकी लग्न, त्याग और तपस्या से तीव्र गति से प्रभावित होता जा रहा था।
साकार रूप में बाबा द्वारा कार्य समेटने की निराली युक्ति
इस प्रकार अव बाबा इस सृष्टि रूपी साकार कार्य-क्षेत्र से अपने साकार कर्त्तव्य को समेटते जा रहे थे। बाबा के निकट बैठने से ही ऐसा आभास मिलता था कि व्यक्त देह में होने पर भी वे अव्यक्त स्थिति में हैं। उनके मुखमण्डल पर कभी चाँदनी जैसी छटा और कभी सूर्य की सी प्रभा का एक गोलाकार मण्डल ऐसा प्रदीप्त रहता था जो उनकी पार्थिव देह के स्थूलत्व को ओझल कर उन्हें प्रकाशमय प्रतिभासित करता था। इतना ही नहीं उनके निकटस्थ व्यक्ति स्वयं में शान्ति और शक्ति का संचार अनुभव करते-करते स्वयं को एक दिव्य आलोक से घिरा हुआ पाता और उसे ऐसा लगता मानो कि बाबा एक प्रकाश पुंज है और वह दिव्य आभा से बनी एक चेतन मूर्तिके सामने एक सुखद स्थिति में बैठे हैं।
उन्हीं दिनों बाबा ने ब्रह्माकुमारी मनमोहिनी, जो उस समय सेवा- स्थानों की नियंत्रिका (Controller) को विभिन्न प्रदेशों में ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेवा केन्द्रों के भ्रमण के लिए भेज दिया था ताकि उन्हें हरेक सेवा-केन्द्र की गति-विधि का और वहाँ आने वाले विद्यार्थियों का निकटता से परिचय हो जाय। इधर दूसरी ओर उन्होंने ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि जी, जोकि उन दिनों मुम्बई में ईश्वरीय सेवाकेन्द्रों की इन्चार्ज थी, को पहली बार लगातार कई सप्ताह मधुबन में अलौकिक सेवा में कार्यरत किया। इसके दौरान उन्होंने ईश्वरीय सेवा के प्रशासन कार्य की उन्हें विशेषतया सूझ-बूझ दी और समर्पित वत्सों तथा सेवा- केन्द्रों पर आने वाले जिज्ञासुजन के पुरुषार्थी जीवन का भी यत्-किंचित परिचय देते गये। इन्हीं दिनों बाबा को सेवाकेन्द्रों से जो पत्र प्राप्त होते, बाबा उन्हें भी दिव्य गुणों की धारणा के लिए उनके सामने उच्चतम आदर्श रखते और हर परिस्थिति में उन्हें एक-रस रहने की तथा शिव बाबा की याद में लवलीन रहने की ताकीद करते।
जैसे कि पहले कहा जा चुका है, उन्हीं दिनों ब्रह्माकुमारी दादी मनमोहिनी जी इलाहाबाद गई थी और दादी प्रकाशमणि जी, ब्रह्माकुमारी संतरी जी, ब्रह्माकुमारी इशू, ब्रह्माकुमारी सन्देशी, ब्रह्माकुमारी लच्छू, भोली दादी, ब्रह्माकुमारी जवाहर, ब्रह्माकुमार आनन्द किशोर, ब्रह्माकुमार विश्व रत्न, ब्रह्माकुमार चन्द्रहास तथा अन्य भी कुछ भाई-बहन, पाण्डव भवन में अपने-अपने कार्य को संभाले हुए थे। नित्य की न्याई प्रातः और सांयकाल बाबा ज्ञान-मुरली द्वारा सबको आध्यात्मिक लाभ देते रहते।
विश्व के इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दिन
परन्तु १८ जनवरी, सन् १९६९ का दिन प्रातः बाबा का शरीर रूपी रथ कार्य-क्षमता के यथा-पूर्व स्तर पर नहीं था। रक्त शर्करा में आधिक्य तथः हृदय को प्रभावित करने वाले अन्य कुछ शारीरिक लक्षण प्रकट हो गये थे। तथापि बाबा की आध्यात्मिक स्थिति योगयुक्त,आलोकयुक्त और मधुर थी। उनके चेहरे से ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि उनकी शारीरिक अस्वस्थता अधिक उग्र है। अतः यद्यपि डाक्टरको बुलाया गया था तथापि बाबा का मन पूर्ववत् प्रफुल्लित और तन स्वशासित था जिसको देखकर बाबा के निकटस्थ वत्सों को बाबा के शारीरिक स्वास्थ्यकी समस्या बहुत ज़्यादा चिन्ताजनक प्रतीत नहीं होती थी। तथापि बाबा के अनेक वर्षों से चले आते प्रतिदिन के कायक्रम में कुछ अन्तर देखकर उन्होंने यह भाँप लिया था कि बाबा का शरीर रूपी रथ नित्य की न्यायीं सहयोग नहीं दे रहा। उन्हें यह आभास हो गया था कि बाबा की दिनचर्या में जो थोड़ा अन्तर है, वह इसी बात का प्रतीक है कि प्रकृति प्रतिकूल है और बाबा के मुखमण्डल या बोल द्वारा उसका स्पष्ट प्रदर्शन न होने का कारण तो यह है कि बाबा की आध्यात्मिक शक्ति प्रकृति को अधीन किये हुए है। अतः वे बाबा के विश्राम तथा औषधि उपचार की ओर पूरा ध्यान दे रहे थे।परन्तु जब उन्होंने अन्य ब्रह्मा वत्सों को सूचना देने का संकल्प किया तो स्वयं बाबा ने ही उन्हें रोक दिया और मुस्कुराते हुए कहा, "बच्चे, बाबा तो ठीक-ठाक है, कोई फिक्र की ज़रूरत नहीं। ड्रामा पर स्थिर रहो।" तो भी ब्रह्मा-वत्सों ने अनुनय-विनय करके उस दिन बाबा को यह स्वीकार करा ही लिया कि प्रातः क्लास बच्चे स्वयं कर लेंगे।
फिर भी अथक सेवाधारी, विश्व-कल्याणकारी, महादानी, वरदानी, रहमदिल बाबा ने उस दिन क्लास के समय के बाद कुछ समय लगाकर सेवा-केन्द्रों से आये हुए सभी पत्रों का उत्तर लिख दिया और यथार्थ-पूर्व के पाण्डव-भवन में निर्माण कार्य के निरीक्षण पर भी गये और मुख्य मिस्त्री तथा निमित्त वत्स ब्रह्माकुमार चन्द्रहास को निर्माण कार्य-सम्बन्धी आदेश-निर्देश भी दिये।
फिर बाबा ने सांयकाल नित्य क्लास के समय से पहले ही क्लास कराने की प्रेरणा प्रकट की। तदानुसार सभी ब्रह्मा-वत्स जल्दी-जल्दी भोजन करके मधुबन के इस छोटे हाल में एकत्रित हुए जिसे बाबा ने बड़े चाव से बनवाया था। तब मधुर मुस्कान लिए हुए बाबा ने उस हाल में प्रवेश किया। क्लास में आने की प्रेरणा के पीछे बाबा का अवश्य ही कुछ रहस्य रहा होगा। कम-से-कम वत्सों ने यह तो सोचा ही होगा कि अब बाबा का शरीर रूपी रथ ठीक है, तभी तो बाबा क्लास में आए हैं। बाबा का भी तो यही प्रयत्न था कि बच्चे उनके शरीर के बारे में निसंकल्प हो जायें और ईश्वरीय स्मृति में ही टिके रहें। संसार में कई लोग तो ऐसे होते हैं जो अपनी शारीरिक व्याधि का बखान हर सम्मुख मिलने वाले व्यक्ति से करते रहते हैं और असुविधा, कष्ट, क्लेश की धुन छेड़ देते हैं; और यहाँ बाबा के पुरुषार्थ की यह पराकाष्ठा थी कि इतनी वृद्ध आयु में भी शरीर पर कान्ति तथा बाबा की सीधी बैठक को देखकर, उनके मुख द्वारा ज्ञान चर्चा सुनकर, कोई उनसे पूछने की हिम्मत ही नहीं कर सकता था कि उनका स्वास्थ्य कैसा है। बल्कि, उनकी बोलचाल और मधुर चितवन को देखकर अच्छे स्वस्थवान व्यक्ति भी मन्द-मन्द से लगते थे। फिर, यह भला कैसे हो सकता था कि बाबा दिन-भर में एक बार भी क्लास न करायें? मनुष्यात्माओं के कल्याण के लिए बाबा कुछ-न-कुछ महावाक्य रूपी रत्न नित्य प्रति दिया करते थे तब आज भला शारीरिक अस्वस्थता उनके दातापन के कर्त्तव्य को कैसे रोक सकती थी?
साकार रूप द्वारा बाबा की अन्तिम वाणी
उस दिन बाबा के मुख से जो वचन निकले, वे कई प्रकार की उच्च एवं परिवर्तनकारी शिक्षाओं से युक्त थे। बाबा की वह वाणी मन को दिव्यता के शिखर पर ले जाने वाली थी। उनमें से दो बातें तो विशेष रूप से थीं जिन पर आचरण करने से मनुष्य के लिए सुख और शान्ति के खज़ाने खुल जाते हैं। बाबा ने बहुत ओजस्वी शब्दों में समझया था कि निन्दा करने वाले के प्रति भी कभी घृणा नहीं करनी चाहिए,5 बल्कि जो आलोचना करके हमारी कमियों की ओर हमारा ध्यान खिंचवाता है, उसे हमें इस ज्ञान-पथ पर अपना एक मित्र मानना चाहिए क्योंकि ध्यान देने पर ही तो हम उन कमियों को समाप्त कर अपने उच्च लक्ष्य तक पहुँच सकेंगे। बाबा ने उस वाणी में यह भी समझाया था कि "परचिन्तन पतन की जड़ है और आत्म-चिन्तन उन्नति की सीढ़ी है।" इस प्रकार, बाबा की महान शिक्षाओं को सुनकर सब उन्हें अपने मन से कोटि-कोटि धन्यवाद दे रहे थे।
परन्तु उस समय किसी को क्या मालूम था कि साकार ब्रह्मा के मुख द्वारा शिव बाबा के इस कल्प में वे अन्तिम बोल थे। किसी ने सोचा तक भी नहीं था कि चतुर सुजान बाबा साकार रूप में अपने सब कार्यों को पूर्ण करते जा रहे हैं! अन्त तक किसी को भी बाबा ने ऐसा आभास नहीं होने दिया कि अभी थोड़े ही समय में विश्व के इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वृत्तान्त पटाक्षेप होने वाला है और अनायास ही एक विचित्र घटना घटने वाली है।
साकार रूप से विदा
हुआ यह कि रात्रि के लगभग पौने नौ बजे थे; तब बाबा क्लास कराके अपने कमरे में लौटे। (यह वही कमरा है जहाँ आजकल बाबा का ट्रॉसलाइट (Translight) का चित्र रखा हुआ है, चारपाई बिछी हुई थी तथा गद्दी बनी हुई है) बाबा के साथ-साथ दादी प्रकाशमणि जी, ब्रह्माकुमारी संदेशी और ब्रह्माकुमार विश्व रत्न आदि भी लौटे थे। बाबा आकर अपनी चारपाई के बाजू पर बैठे ही थे कि वे कुछ लम्बी- लम्बी साँस लेने लगे। उन्होंने अपना एक हाथ छाती पर रखा था जिससे लगता था कि हृदय की गति में कुछ शिथिलता आ रही है और दूसरा हाथ दादी प्रकाशमणि जी के हाथ में दिया। ब्रह्माकुमारी संदेशी ने कहा, "बाबा, बाबा क्या हो रहा है?" संदेशी जी ने अभी एक- दो बार ऐसा पूछा ही था कि बाबा का शरीर स्थायित्व को छोड़ ढीला पड़ने लगा जिसे ब्रह्माकुमारी संदेशी और ब्रह्माकुमार विश्व रत्न ने अपनी भुजाओं में संभाल लिया। अब बाबा को लिटा दिया गया था। डाक्टर को तो पहले ही बुलावा भेजा गया था। आक्सीजन के लिए भी प्रबन्ध करने का प्रयत्न किया गया था।
परन्तु मालूम पड़ता था कि ब्रह्मा बाबा जिस शिव बाबा को मात-पिता, सखा-स्वामी अथवा सर्वस्व रूप से श्वांसों श्वांस याद करते थे, उसने उन्हें अपने पास बुला लिया था। दोनों की प्रीति तो पहले ही से ऐसी अविछिन्न थी कि वे एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे। और, अब शायद वह क्षणिक विछोह भी ब्रह्मा बाबा के लिए असहा होगा कि वे जो दीर्घ श्वांस उन्होंने लिये थे, उसमें उन्होंने दिलवर को ऐसा दिल भरकर याद किया होगा कि अब शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा अव्यक्त रूप में अंग-संग 'बापदादा' के रूप में एक धाम के धामी हो गये।
परन्तु यहाँ जो ब्रह्मा-वत्स अपने नेत्रों के सामने यह विचित्र ड्रामा होते देख रहे थे, वे तो असमंजस में पड़ गये थे कि यह सब क्या हो रहा है- मानों उनके हाथों के तोते उड़ गये हों। "हमारे प्रिय बाबा को क्या हो रहा है?" वे यह समझ नहीं पा रहे थे। 'यह ड्रामा में कैसी घड़ी आ पहुँची है?'- विश्व नाटक का ज्ञान होने पर भी वे यह जान नहीं पा रहे थे कि अब क्या करना चाहिए? उन्हें इसका कुछ उत्तर सूझ नहीं रहा था। वे कर भी क्या सकते थे? आत्मा के सर्जन तो शिव बाबा ही हैं जिनका ही वह रथ था। शरीर के डाक्टर को बुलाया ही गया था; परन्तु वह भी 'होनी' को 'अनहोनी' कैसे कर सकता? वह भावी को कैसे मिटा सकता? शायद इसी अवसर अथवा इसी वृत्तान्त विशेष के लिये कहा गया है कि "होता है वही जो मंजूरे खुदा होता है", क्योंकि ब्रह्मा बाबा तो शिव बाबा ही के रथ अथवा वाहन थे।
विचित्र घड़ी
अब डाक्टर पहुँच चुका था और शरीर के विशेष स्थलों की जाँच करने के बाद अवाक् था और भीगी आँखों से सबकी ओर देख रहा था। सब लोग भी हक्का बक्का रह गये। क्षण-भर के लिए तो जो जहाँ खड़ा था, वह वहाँ पर वैसा ही निष्क्रिय और निस्पन्दन था, मानो पत्थर की गढ़ी हुई कोई मूर्तियाँ खड़ी हों। हरेक के अपने हृदय की धड़कन भी आज कुछ अजीब-सी थी। चेहरे पर न उदासी थी, न खुशी। शायद आश्चर्य, जिज्ञासा, अचम्भा और प्रश्न की मुद्राएँ उभरती थीं, परन्तु दूसरे ही क्षण जब बाबा के ये वचन याद आते कि "बनी बनाई बन रही अब कुछ बननी नाहीं", अथवा 'चिन्ता ताकी कीजिए जो अनहोनी होय', तब वो मुद्राएँ अथवा वो रेखाएँ भी चेहरे में विलीन हो जातीं और सबके नेत्र ऊपर शिव बाबा की ओर उठ जाते और मन में इस विचार का टेप बल पड़ता कि क्या सचमुच शिवबाबा ने हमारे प्रिय बाबा को अपने पास बुला लिया होगा? एक उत्तर तो यह मिलता कि ऐसा नहीं हो सकता; अभी तो हमें उनसे बहुत प्यार लूटना है, उनके द्वारा अभी बहुत-सा खजाना पाना है। परन्तु यह भी विचार उभरता था कि बाबा की 'गत-मत न्यारी है', अर्थात् उसे बाबा स्वयं ही जानता है। परन्तु बाबा की फ़रिश्ता-सम जो अव्यक्त स्थिति ब्रह्मा-वत्स देखते चले आ रहे थे और बाबा की अन्तर्मुखता की पराकाष्ठा उनकी देहातीत अवस्था, उनकी न्यून बोलचाल आदि की दिनचर्या कुछ समय से उनके सामने थे, उससे कुछ ऐसा लगता भी था कि अब साकार रूप का कर्त्तव्य समेटते जा रहे हैं; अब वे सभी को यथा-स्थान और यथा-योग्य नियुक्त करते जा रहे हैं और स्वयं उपराम होते जा रहे हैं।
इस विषय में दादी प्रकाशमणि जी का अनुभव
इस विषय में ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि जी, जिन्हें बाबा दुलार से कुमारिका भी कहा करते और जिन्हें ब्रह्मा-वत्स स्नेह से 'दादी जी' ऐसे भी सम्बोधित करते हैं, कहती हैं "मैं दिसम्बर, १९६८ में मुम्बई - से कुछ बहन-भाईयों का एक ग्रुप लेकर मधुबन आई थी। उसी समय दीदी जी सेवा केन्द्रों पर चक्कर लगाने दिल्ली की ओर जाने वाली थी। इसलिए बाबा की आज्ञानुसार मैं वहीं मधुबन में बाबा के पास रह गई। बाबा के साथ जब मैं थोड़े से दिन रही, तब बाबा ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया।
उदाहरण के तौर पर मैंने देखा कि बाबा जब किसी भी बच्चे से मिलते हैं तो वे थोड़े से ही शब्दों में उसकी समस्याओंको हल करके, उसके मन को हल्का कर देते हैं। मैंने उनसे यह कला सीखने की कोशिश की।
उन्हीं दिनों बहुत निकटता से मैंने यह भी देखा कि बाबा यज्ञ के कार्य करते हुए भी सदा उपराम नज़र आते थे। ऐसा लगता था कि निराकार शिव बाबा सदा ही उनके तन में विराजमान हैं। परन्तु अव मैं समझती हूँ कि ऐसा इसलिए महसूस होता था कि वास्तव में साकार बाबा ही अव्यक्त हो चुके थे। वे सम्पूर्ण फ़रिश्ता बन चुके थे। मैंने यह सीखने का यत्न किया कि कार्य करते हुए भी मैं उपराम रहूँ।
बाबा ने मुझे एक हफ्ते में ही बहुत कुछ सिखा दिया। पार्टियों को बाबा की भासना कैसे देनी है; यज्ञ को पूर्णतया कैसे सम्भालना है; हर बच्चे की स्थिति पर कैसे ध्यान रखना है, सब यज्ञ-वत्सों को कैसे सन्तुष्ट करना है, आदि-आदि बातों पर बाबा ने मेरा ध्यान आकर्षित कराया।
बाबा के साथ रहते हुए मैंने बाबा के जीवन से अत्यधिक उदारता और राजाओं-जैसी शालीनता सीखी। मैंने बाबा से कार्य-व्यवहार में रहते हुए उपराम रहने की कला सीखी, बाबाने मुझे क्या नहीं सिखाया ? सिखाया ही नहीं, उन्होंने वरदानोंसे मुझे इतना सजाया
कि आज भी बाबा के वे चरित्र मेरे नयनों में बस रहे हैं।
एक दिन बाबा ने मुझसे कहा, " कुमारिका, अगर बाबा एक तरफ़ बैठ जाए तो तुम यज्ञ को सम्भाल सकती हो?" मैंने बड़े ही फखर से उत्तर दिया -"हाँ बाबा, क्यों नहीं?" मैं तो बाबा की हम पर हुई मेहनत का फल बताना चाह रही थी। मुझे क्या पता था कि बाबा जल्दी ही आने वाले समय के लिए हमें पहले ही से सूक्ष्म अथवा गुप्त रूप से सावधानी दे रहे थे और तैयार कर रहे थे और वे गम्भीरतापूर्वक यह प्रश्न पूछ रहे थे। मुझे क्या मालूम था कि सचमुच यह, सत्य होगा और हमारे प्यारे बाबा देह से पूर्णतः न्यारे होकर सूक्ष्म लोक में बैठने जा रहे हैं। परन्तु तब बाबा को तो अपने सम्पूर्ण फ़रिश्ता बनने का स्पष्ट अनुभव था और बाद में मेरी समझ
में आया कि बाबा गम्भीरतापूर्वक यह प्रश्न पूछ रहे थे।
वैसे भी कई बार मेरे बारे में बाबा कहा करते, "ये बच्ची वत्स- माला में नम्बर वन (No.1) है। यह वफ़ादार बच्ची है।" वे यह भी कहते, "यह बाबा की सम्पूर्ण पवित्र कन्या है। यह सच्ची आज्ञाकारी बच्ची है। यह बड़ी नदी है।" मेरे मन में भी बाबा के प्रति अथाह प्यार रहता। मैं सदा ऐसे ही सोचती थी कि मुझे बाबा की श्रीमत पर पूर्ण रीति से चलना है, उनसे कुछ भी छिपाना नहीं है। और, मुझे सदा यह भी उमंग रहती थी कि मैं बाबा की आशाओं का चिराग़ बन कर रहूँ। अतः मैंने उसी भावना से बाबा के प्रश्न का उत्तर दे दिया था।
स्पष्ट है कि चतुर सुजान बाबा गुप्त रूप से सब तैयारी करते रहे थे। शिव बाबा की युक्तियाँ भी तो निराली ही होती हैं। अतः वे दोनों इस प्रकार से कार्य करते रहे कि कार्य भी वांछित स्तर तक पहुँच जाय और बाबा की अव्यक्त धाम जाने की तैयारी का अधिक पता भी न चले ताकि कोई हलचल न हो। बाबा की इस युक्ति की चर्चा हम १८ जनवरी के वृत्तान्त के बाद करेंगे। पहले यह सुन लेते हैं कि दादी प्रकाशमणि जी, जो इस संक्रान्ति काल में उपस्थित थीं, वे इसके विषय में आँखों देखा क्या वृत्तान्त सुनाती हैं।
१८ जनवरी के बारे में दादी प्रकाशमणि जी के बोल
इस विषय में दादी प्रकाशमणि जी कहती हैं "उस १८ जनवरी की स्मृति मेरे मन पर अमिट रूप से अंकित है। उस दिन सबेरेसे ही बाबा का स्वास्थ्य पूर्ववत् नहीं था। यज्ञ के इतिहास में और बाबा के तपस्वी जीवन में केवल यह एक ही समय था जबकि बाबा ने प्रातः को मुरली नहीं चलाई थी;परन्तु उस दिन वे सर्वोच्च स्थिति में और ईश्वरीय खुशी में स्थित थे।
जब हमने डाक्टर को मंगाने को कहा तो बाबा ने उसी मस्ती में कहा, "बच्ची, डाक्टर क्या करेगा, मैं तो सुप्रीम सर्जन (Supreme Surgeon) से बातें कर रहा हूँ।"
उसी दिन बाबा ने कहा, "आओ, आज बच्चों को पत्र लिखूँ।" और फिर बाबा के हाथ में वह लाल कलम थी जिसके सुन्दर अक्षर सभी के दिलों को खींच लेते थे, और बाबा ने सभी पत्रों के उत्तर लिख दिये। बाबा ने लिखा था, "बच्चे सदा एक मत होकर, एक की याद में रहना है और सदा शक्तियों को आगे रखना है। तब ही सेवा में सफलता होगी।" ये अन्तिम पत्र कई बच्चों ने अपने दिल में छुपा कर रख लिए थे। कितनी सौभाग्यशाली थी वे आत्माएँ जिन्हें स्वयं सृष्टि रचना के निमित्त ब्रह्मा ने अपने हस्तों से पत्र लिखे थे!"
फिर शाम को जल्दी ही क्लास प्रारम्भ हुई। मैंने कहा, "बाबा, सभी इन्तज़ार कर रहे होंगे, आज जल्दी ही क्लास में चलें।" उस दिन बाबा ८.०० बजे ही क्लास में चले और साकार रूप में वे अन्तिम महावाक्य तो सम्पूर्ण गीता-ज्ञान का सार हैं। वे उन्नति का अचूक साधन हैं। बाबा ने कहा था, "बच्चे, सिमिर, सिमिर, सिमिर सुख पाओ, कलह क्लेश मिटें सब तन के और जीवन मुक्ति पाओ।" "बच्चे, निन्दा हमारी जो करे, मित्र हमारा सोई। तुम्हें किसी की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए और किसी से वैर-विरोध भी नहीं रखना चाहिए।"
इस प्रकार याद की यात्रा पर बल देते हुए बाबा खड़े होकर हाल के दरवाज़े की ओर चले और फिर द्वार पर ही रुक गये। वे बोले, "बच्चे, निर्विकारी, निराकारी और निरंहकारी बनो। जैसे बेहद का बाप सम्पूर्ण व सदा निर्विकारी है, सदा सदा निराकार है निरहंकारी है, वैसे ही बच्चों को भी बनना है।" और फिर उस अन्तिम घड़ी के पूर्व परछाईं फेंकते हुए बाबा के मुख से ये शब्द निकले "अच्छा बच्चे विदाई।" ये शब्द बाबा ने केवल उसी ही रात बोले थे, जब बाबा साकार तन से बच्चों से सदा के लिए विदा होने जा रहे थे। वरना बाबा, सदा बच्चों को रात्रि को गुड नाईट (Good Night) ही कहा करते थे।
मुरली सुनाने के बाद बाबा अपने कमरे में गये। हम चार बहनें भी बाबा के साथ गई। तब बाबा के चेहरे पर सम्पूर्ण शान्ति व दिव्यता झलक रही थी। बाबा चारपाई पर नीचे पैर करके बैठे थे, तब उस अन्तिम घड़ी में, मेरा हाथ बाबा के हाथ में था। बाबा मुझे दृष्टि दे रहे थे। दृष्टि देते ही बाबा शरीर से उड़ चले और मेरे हाथ में बाबा का हाथ ढीला पड़ गया। मुझे ऐसा आभास हुआ था कि बाबा मुझे हाथ में हाथ देकर अपनी सम्पूर्ण शक्तियाँ व उत्तरदायित्व दे गये।
हमारी समझ में कुछ नहीं आया। हमने बाबा को लिटा दिया, इतने में ही डाक्टर आ गया और उसने चैक (Check) करके कहा कि बाबा अब नहीं रहे..... परन्तु मुझे यह आभास नहीं हुआ था कि बाबा चला गया। मैं यही कह रही थी कि बाबा हैं.... सबके प्यारे बाबा हैं....बाबा सदा हमारे साथ रहेगा......।
बाबा ने मुझ में अथाह शक्ति भर दी थी। अब मैं सब जगह फोन करने लगी। मैं सभी को कहती थी "ड्रामा की भावी! ड्रामा6 याद है? बाबा अव्यक्त हो गये हैं। जो भी आना चाहे, भले आए। परन्तु कोई भी आँसू न बहाये, बाबा तो अभी भी हमारे साथ हैं।'
बाबा ने हाथ में हाथ देकर मेरी हिम्मत बढ़ा दी थी। मैं अडोल(अचल) थी। मुझे यह संकल्प मात्र भी नहीं आ रहा था कि "क्या हो गया", या "अब क्या होगा।" मुझे पूर्ण विश्वास था कि हमारी पढ़ाई तो अन्त तक चलती रहेगी।" इस प्रकार दादी प्रकाशमणि जी को बाबा निमित्त निश्चित कर गये और साथ में दीदी मनमोहिनी जी को।
अब ब्रह्मा बाबा तो अव्यक्त धाम को चले गये। वहाँसे ही वे सब-कुछ देखने लगे। अब आगे क्या हुआ?
रथ-यात्रा की तैयारी
और उसमें सम्मिलित होने के लिये मधुबन में ब्रह्मा-वत्सों का समूह
जब होनी हो चुकी तो दादी ने तार द्वारा अथवा टेलीफोन द्वारा सबको सूचना भेजनी शुरू कर दी परन्तु जिस सेवाकेन्द्र पर भी तार पहुँचता, उन्हें यह सूचना इतनी अप्रिय लगती कि उनके लिए इस पर विश्वास करना अति दुरूह हो जाता। किसी को टेलाफोन द्वारा दादीजी जब यह सूचना दे रही होतीं तो सुनने वाली बहन आवाज़ स्पष्ट होने पर भी फिर से पूछतीं 'क्या कहा?' 'आप कौन बोल रही हैं?' उनके इस प्रकार के प्रश्न इस बात के सूचक होते कि उनकी अन्तरात्मा भी इस सूचना को सहज रीति से तुरन्त स्वीकार नहीं कर रही। किसी-किसी के मन में तो यह भी विचार चल रहा होता कि शायद बाबा ने ही परीक्षा लेने के लिए यह तार न भिजवा दिया हो। परन्तु फिर वे दूसरे ही क्षण यह सोचते कि प्यारे बाबा ने हमारे मन को मसोसने वाला यह कार्य हरगिज़ नहीं कराया होगा। कुछेक ब्रह्मा वत्स अन्य कहीं से टेलीफोन अथवा तार द्वारा सूचना मिलने के बाद भी दूसरे-दूसरे केन्द्रों पर फ़ोन करके पूछने लगे कि क्या उनको भी यह समाचार आया है और कि क्या यह समाचार सत्य है? परन्तु इधर समय हाथ से निकलता जा रहा था और सभी के मन में यह सोच चल रहा था कि वे किसी भी तरह जल्दी से जल्दी मधुबन पहुँचें ताकि जिस रथ में शिव बाबा प्रवेश होते थे और जिस रथ का गीता आदि शिरोमणि शास्त्रों में गायन है, उस रथ रूपी विभूति का वे अन्तिम दर्शन कर सकें।
अतः यद्यपि गाड़ी में सोने या बैठने की जगह पहले ही से सुरक्षित नहीं कराई गई थी तथापि भारत के हर महानगर, नगर और उपनगर से ब्रह्मा-वत्स सूचना पाते ही अपने सुख-सुविधा का ख्याल छोड़कर, चाय-नाश्ते की व्यवस्था को भूलकर, जल्दी-से-जल्दी मधुबन पहुँचाने वाले साधनों के द्वारा पहुँचने की कोशिश करने लगे।
परन्तु पहले जब-कभी वे मधुबन के लिए रवाना होते, उस यात्रा में और आज की यात्रा में दिन-रात का अन्तर था। पहले तो सदा साकार ब्रह्मा बाबा और उन द्वारा शिव बाबा से मिलने के सुनहरी संकल्पों रूपी झूलों में उनका मन झूल रहा होता परन्तु आज उनके मन में प्रश्नों की लड़ी लगी थी। वे सोच रहे होते, ‘अब हम शिव बाबा की मधुर मुरली किस द्वारा सुना करेंगे? अब हमें वो मातृ-तुल्य, पितृ- तुल्य प्यार, परम शिक्षक के जैसी आत्मिक आह्लाद देने वाली शिक्षाएँ, सद्गुरु के जैसे ज्ञान-रत्न रूप वरदान कौन दिया करेगा?’ 'प्यारे बच्चे', 'मीठे बच्चे', 'सिकीलधे बच्चे', 'लाडले बच्चे' ऐसे दुलार भरे शब्दों से कौन पुकारा करेगा? अब हम नन्हें पौधों को ईश्वरीय स्नेह से कौन सींचा करेगा? बाबा द्वारा मिलने वाला ज्ञान तो गुप्त आत्मा को गुप्त पुरुषार्थ (योग) के द्वारा, गुप्त ही लक्ष्य (मुक्ति और जीवनमुक्ति) को प्राप्त कराने वाला था; परन्तु अब बाबा साकार तन छोड़कर स्वयं कहाँ गुप्त हो गए हैं? पहले तो ब्रह्मा बाबा के तन में शिव बाबा गुप्त थे और उनकी कार्य-विधि भी सांसारिक दृष्टिकोण से गुप्त ही थी, परन्तु अब जब साकार बाबा भी गुप्त हो गए हैं तो अब विश्व-ड्रामा में कौन-सा दृश्य उपस्थित होगा?" कभी उनके मन में ये प्रश्न उठ रहे होते और कभी अतीत की यादें और बाबा के चरित्र चित्र रूप लेकर उनके मन की आँख के सामने से एक रील की न्याई उभरते हुए उन्हें उन-उन भावों में रंग देते।
आज सबको सफर भी लम्बा लग रहा था। सभी के मन में यह भाव था कि किसी प्रकार जल्दी-से-जल्दी बाबा के धरा-धाम, अर्थात् मधुबन में पहुँचें। आखिर कोई किसी गाड़ी में और कोई किसी गाड़ी में वहाँ पहुँचने लगे और मधुबन में एक मेला-सा लगने लगा। मधुबन में पहुँचते ही सब वहीं जाने की कोशिश करते जहाँ बाबा का पार्थिव रथ अभी भी अनुपम तेजस्विता और ताज़गी को लिये हुए मानो वत्सों का आह्वान कर रहा था। वह मधुबन के उस छोटे हाल में, जो बाबा ने बड़े चाव से बनवाया था, अन्तिम विदा के लिए ऐसे दीख रहा था जैसे कि बाबा किसी अनोखी सुषुप्ति में विलीन हों। उनके मुख मण्डल पर शान्ति और सन्तोष और प्राप्ति के चिह्न तथा अह्लाद के चिह्न दीख पड़ते थे और उन सबसे लगता था कि वे शिव बाबा की गहरी याद में ऐसे तो खो गये हैं कि उनका स्थूल तन यहाँ है परन्तु उनका मन स्वयं शिवबाबा के पास है।
जो भी आगन्तुक बाबा के पास आकर खड़े होते, वे बोलना चाहते हुए भी कुछ बोल न पाते, स्थिर नेत्रों से वे बाबा के चितवन को निहारते रहते और उन्हें ऐसा आभास होता कि अव्यक्त रूप में बाबा ऊपर से कह रहे हैं: "मीठे बच्चे, आ गये! बच्चे, सब ठीक-ठाक तो है? देखो, मैं आपको छोड़ नहीं गया हूँ, बल्कि आपके आगे-आगे तैयारी करने व कराने के लिए केवल इस देह से न्यारा हुआ हूँ वर्ना वैसे तो मैं आपके साथ ही हूँ और आपका साथ नहीं छोडूंगा।" इस प्रकार की कोई मूक आकाश-वाणियाँ वत्सों के मन में सुनाई देतीं और किसी-किसी को बाबा के हस्त-कमल अथवा कमल-पाद कभी हिलते हुए भी प्रतीत होते....."
मधुबन में सब श्वेत वस्त्राधारी फ़रिश्ते ही मौन भाव में देखने में आते। विशेष बात यह कि जिसने सबके हृदयों को जीत लिया था और जिससे सबका अमिट स्नेह था, उसके स्थूल कलेवर छोड़ने पर भी कहीं किसी कोने में कोई भी शोक का आलाप नहीं था। मधुबन एक अव्यक्त धाम की न्यायी प्रतीत होता था जहाँ सब विचार मुद्रा में अवश्य थे। परन्तु बाबा ने पहले ही से श्रेष्ठतम शिक्षा देकर सबको आत्मिक स्थिति में इतना तो स्थित कर दिया था कि कहीं भी कोई रुदन या विलाप सुनने या देखने में नहीं आता था। ऐसे वातावरण में बाबा की काया को ढाई दिन से भी अधिक समय तक रखा गया था क्योंकि दूर-दूर से टेलीफोन और तार आ रहे थे कि वहाँ-वहाँ से ब्रह्मा- वत्स पहुँच रहे हैं। स्वयं दीदी (मनमोहिनी जी) जो ईश्वरीय सेवाकेन्द्रों के परिभ्रमण के लिए गई हुई थीं, भी इलाहाबद से विमान द्वारा अहमदाबाद होते हुए २० जनवरी को मधुबन पहुँची थी और उस दिन तक आने वाले अधिकांश लोग पहुँच चुके थे।
अब संदेश-पुत्री द्वारा शिव बाबा से सारे निर्देश ले लिये गए थे।उनके अनुसार बाबा के रथ को फूलों से सजाया गया। हरेक केन्द्र से आये हुए बहन-भाई सामूहिक रूप से उस रथ के पास आये। साथ-साथ अखण्ड योग का प्रोग्राम भी चलता रहा। इन्हीं दिनों केवल चाय और प्रसाद ही वितरित होता रहा। सभी लोगों की इस मौन वातावरण में अवस्था योगारूढ़ ही प्रतीत होती थी। ऐसा भी लगता था कि जैसे कई-एक वत्स यह भी सोचते हों कि शरीर तो नाशवान है; यह चोला तो हमें भी बदलना होगा; क्या मालूम हमारी किस क्षण बारी आ जाए !यह चला-चली का मेला है। अब हमें भी याद की रफ्तार को तेज़ करना चाहिए समय की रफ्तार अब हमें यही संदेश देती है...."
शिव बाबा ने यह संदेश दिया था कि इस रथ की अन्तिम क्रिया शिक्षिका-प्रशिक्षण के लिए बनाये गए हॉस्टल वाले प्रांगण (जहाँ आज शान्ति स्तम्भ बना हुआ है) के मध्य में की जाए। परन्तु इसके लिए सम्बन्धित जिलाधीश तथा पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) की आज्ञा लेने की आवश्यकता होती है। अतः ये लेखक २१ जनवरी १९६९ की प्रातः को बाबा के लौकिक सुपुत्र तथा आबू नगर के एक व्यक्ति को साथ लेकर सिरोही में इसके लिए विधिवत स्वीकृति लेने के लिए गया और इसी बीच निश्चित स्थान पर एक ऊँचा स्थल (Raised Platform) निर्मित किया जाने लगा और चन्दन, कपूर, कलश इत्यादि-इत्यादि की व्यवस्था हो चली थी। साथ- साथ बाबा के रथ को भी नगर यात्रा के लिए पुष्पों से सजाया जा रहा था।
रथ यात्रा
चयनित, दोपहर बाद एक सुसज्जित जीप पर रथ यात्रा निकाली गई। बाबा की देह विश्राम मुद्रा में फूलों के बीच में एक पद्म पुष्प की तरह दीख रही थी। कुछ आगे और काफी दूर तक पीछे-पीछे श्वेत वस्त्रधारी, योगाभ्यासी ब्रह्माकुमारियों और ब्रह्माकुमारों का समूह हंसों की पंक्तियों की तरह दिखाई दे रहा था। नगर के लोग घरों और दुकानों से बाहर निकल-निकल कर नतमस्तक और कर-बद्ध होकर बाबा को भाव-भीनी विदाई दे रहे थे। कुछ मन में और कुछ वाणी से यह कह रहे थे कि बाबा अपार प्यार की मूर्ति थे और उन्होंने जो कार्य किया, उसकी जितनी सराहना की जाये उतनी कम है। अन्य कई लोग होंठों पर अँगुली रखकर पूछते "उस दिन तक तो बाबा स्वस्थ थे. वे हमसे भी अधिक स्वस्थ थे; फिर उन्हें अनायास ही क्या हुआ?" अन्य कई कहते हुए सुने जाते कि बाबा एक अत्यन्त महान व्यक्ति थे। वे बहुत ही शान्तचित्त और सदा प्रसन्न वदन थे। दूसरे यह कह रहे होते, "बाबा के चेहरे पर कान्ति कितनी होती थी! इतनी बड़ी आयु में भी वे पराक्रमी, क्रियाशील और युवकों की तरह उत्साही थे।" अन्य कुछ लोग मूक भाव ही से किसी प्रकार यह भाव व्यक्त करते कि उनके नगर के देवता की साकार छवि वे फिर इन नैनों से नहीं देख सकेंगे !!....
बाबा की प्रकृतिकृत देह के तत्त्वों का भी विश्व-सेवा के लिये प्रस्थान
रथ यात्रा पूरी होने के बाद अब इस कलेवर को निश्चित स्थान पर विश्रामी कराके अब अन्तिम विदा की तैयारियाँ शुरू हो गईं और लगभग सायं ४ बजे अलग-अलग केन्द्रों से आये बहन-भाई इस स्थल के चहुँ ओर पंक्ति-बद्ध रूप में खड़े हो गये। बहनें एक ओर थी और भाई दूसरी ओर। कुछ विशेष बहन-भाई क्रिया स्थान के निकटतम खड़े हुए थे। तब पहले सब शिव बाबा की अनन्य स्मृति में खड़े हुए थे। तब बाबा की स्मृति का एक गीत भी बज रहा था।
अब दादी जी आगे बढ़ीं और उन्होंने अपने पवित्र हाथों में अग्नि- शिखा लेकर क्रिया प्रारम्भ की। और सब लोगों के देखते ही देखते, उस शरीर, जिसके द्वारा हम बाबा से प्यार और दुलार पाया करते और जिसके द्वारा रोज़ प्रातः अमृतवेले अतीन्द्रिय सुख देने वाली तथा मन के किवाड़ खोलने वाली, मधुर वाणी हम सुना करते, ने अग्नि को आत्मसात कर लिया। फिर वायु को साथी बनाकर उसके तत्त्व ऊपर की ओर प्रस्थान करते हुए, चहुँ ओर वातावरण को पवित्र बनाते हुए आगे बढ़ते गये। आज हमने अपने उस प्रियतम की पवित्र प्रकृति, जिसे उसने तपोबल से, पवित्रता के बल से और सेवा के बल से सात्त्विक बनाया था, को अपने ही हाथों से वृहद जगत के अर्पण कर दिया क्योंकि उस प्रियतम की सदा यही भावना बनी रहती थी कि उस शरीर के कण-कण के द्वारा बेहद की सेवा हो। निश्चय ही उस देह के रूप विभूति के कण-कण ने सूक्ष्म रूप से प्रकृति में प्रवेश कर उसे परिवर्तित करने की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया होगा और वे प्रकृति को सात्त्विक बनाने के पुण्य कार्य में प्रवृत्त हुए होंगे।
इसके बाद जब सभी यज्ञ-वत्स स्नान आदि से निवृत्त होकर हॉलमें एकत्रित हुए, तब शिव बाबा ने गुलज़ार बहन के तन में सन्नविष्ट होकर अव्यक्त वाणी द्वारा इस सारे वृत्तान्त के पीछे छिपे रहस्य का बोध कराया और साथ-साथ उन्होंने इस विषय में भी निर्देश दिये कि अब यज्ञ के कार्य को मुख्य रूप से कौन संभालेगा, आगे के लिए आध्यात्मिक शिक्षा का कार्य कैसे चला करेगा और साकार बाबा अब किस सेवा पर अव्यक्त रूप से उपस्थित होंगे। बाबा ने मधुबन भवन के निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों को तथा अन्य निर्धन लोगों को मीठे चावल, चाय और वस्त्र आदि दान करने का भी आदेश दिया और सात या आठ अनन्य वत्सों द्वारा अस्थियाँ चुनने के बाद उन्हें कलशों में भर-कर पंक्ति-वद्ध तथा योग-युक्त होकर विधिपूर्वक निश्चित स्थान पर लाकर रखने का निर्देश दिया। बाबा की वह २१ जनवरी की अव्यक्त वाणी बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसका सार यहाँ लिपिबद्ध करने से पहले हम यहाँ वो संदेश प्रस्तुत करना चाहेंगे जिसमें साकार बाबा के शरीर छोड़ने की अवस्था का वर्णन किया गया था।
नये तन में प्रवेश होने पर शिव बाबा की पहली अव्यक्त वाणी
२१ जनवरी को जब क्रिया हो चुकी तो सभी ब्रह्मा-वत्स नहा- धोकर, तैयार हो छोटे हाल में शिव बाबा के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। उन्हें यह उत्सुकता थी कि अव्यक्त लोक से ब्रह्माकुमारी गुल्ज़ार के तन में आज जो महावाक्य उच्चारण होंगे वे इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के संचालन तथा प्रशासन कार्य को नई दिशा देने वाले होने के कारण बहुत ही ध्यान से सुनने योग्य होंगे। वे सोच रहे थे कि उनके मन में जिन बातों को स्पष्ट रूप से जानने की अभिलाशा है, उस पर भी तो बाबा प्रकाश डालेंगे ही; अतः उन्हें भी वे सुनेंगे। इस प्रकार उनके मन में कौतुक था, जिज्ञासा थी और सुनने की ओर पूरा ध्यान था।
सायंकाल सारा हॉल भर गया था और बाहर तक बहन-भाई बैठे थे। निश्चित समय पर ब्रह्माकुमारी हृदयमोहिनी जी, जिन्हें बाबा 'गुल्ज़ार' नाम से पुकारते रहते हैं, ने स्थान ग्रहण किया। सभी योगाभ्यास रूपी पुरुषार्थ में लग गये। कुछ समय के पश्चात् शिव बाबा उनके तन में पधारे और उन्होंने हल्की-हल्की, धीमी-धीमी ध्वनि में महावाक्य उच्चारण करना शुरू किये। सभी ने दत्तचित्त होकर पहली अव्यक्त वाणी सुनी।
बाबा बोले:
"सभी अव्यक्त-मूर्त्त हो बैठे हैं? व्यक्त रूप में रहते अव्यक्त स्थिति में रहना है। जब अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाओगे तब उस स्थिति में कोई उलझन नहीं होगी। अव्यक्त और व्यक्त दोनों स्थितियाँ संगमयुग में आप वत्सों की ही हैं। वर्तमान समय के सभी पार्ट इस सृष्टि ड्रामा के अनुसार आप सभी को और भी शीघ्र अव्यक्त बनाने के साधन हैं? डगमग होने की ज़रूरत नहीं। शुरू में यज्ञ की स्थापना भी अनायास ही हुई थी? जब आप शुरू में यज्ञ की स्थापना में आये थे तो आप सभी से 'निश्चय-पत्र' लिखाते थे। यही निश्चय लिखाते थे कि अगर ब्रह्मा भी चला जाये तब भी हमारा निश्चय अटल और हमारी अवस्था अडोल रहेगी। क्या आपको यह निश्चय पत्र याद है? 'निश्चय' उसको कहा जाता है जिसमें किसी भी प्रकार का, किसी भी स्थिति में, किसी भी विघ्न के समय संशय नहीं आता। परिस्थितियाँ तो बदलती ही हैं और बदलती ही रहेंगीं। लेकिन आप जैसे पहले गीत गाते थे कि "बदल जाये दुनिया न बदलेंगे हम...." वैसे ही आप सभी निश्चयात्मक बुद्धि वाले वत्स आज के संगठन में बैठे हुए हैं? आपकी मातेश्वरी जो भी आप वत्सों को कहा करती थी कि निश्चय के जो भी आधार अब तक खड़े हैं, वे सभी आधार निकलने ही हैं। उनके निकलने पर भी आपकी नींव मज़बूत रहनी चाहिए। अगर नींव मज़बूत नहीं तो आधार की आवश्यकता है। आधार कौन सा? बाबा का आधार, संगठन का आधार आदि। परन्तु दैवी परिवार के नियमों का आधार नहीं छोड़ना है। न ही परीक्षा के समय किन्हीं बातों के कारण निश्चय टूटना है।
निश्चयात्मक वत्स की अवस्था और बाबा द्वारा दी हुई पेशगी सावधानी
'निश्चय' अटूट होता है। उसको तोड़ने से भी वह टूटता नहीं है। ऐसे ही निश्चय बुद्धि वत्स गले के हार हैं। क्या ब्रह्मा आपका बहुत प्यारा है? ("था" नहीं परन्तु "है") तो क्या वह यह बात नहीं कहते रहे कि निश्चय की नींव इतनी मज़बूत चाहिए? बातें तो सभी बोली हुई हैं, समय पर उन बातों का याद आना ही तीव्र पुरुषार्थ है। याद करो, वह (ब्रह्मा बाबा) क्या कहा करते थे। वह भी आप बच्चों को मज़बूत बनाने के लिए यह कहते थे कि “बापदादा (परमपिता शिव और प्रजापिता ब्रह्मा) बच्चों को इतना ज्ञान-श्रृंगार करते हैं तो भी बच्चे इतना श्रृंगारधारी (ज्ञान की धारणा वाले) नहीं बनते। तो एक दिन ऐसा आयेगा कि वे बापदादा द्वारा किये ज्ञान-श्रृंगार को याद करेंगे।" तो अभी वही समय है। पहले तो साधारण तन को देख खुद वह निरंहकारी और नम्रचित्त स्वभाव से कई बच्चों को यह सुनाते थे कि ‘मैं भी अभी सम्पूर्ण नहीं बना हूँ। मैं भी अभी निरन्तर देही-अभिमानी (Soul-conscious) नहीं बना हूँ।’ लेकिन आप में से जिन्होंने ध्यान दिया होगा, उन्होंने अथवा जिनको इन तीन-चार मास के अन्दर उनसे सम्मुख मिलने का सौभाग्य मिला होगा उन्होंने अनुभव किया होगा कि यह ब्रह्मा अब साकारी नहीं लेकिन अव्यक्त और सूक्ष्माकारी रूपधारी हैं। कुछ वर्ष पहले ब्रह्मा आप बच्चों की छोटी-छोटी बातें भी सुनते थे और समय भी देते थे लेकिन क्या आपने सोचा कि अब इन छोटी-मोटी बातों को न सुनने का क्या कारण था? कारण यही था कि वह निरन्तर याद में अव्यक्त हो रहते थे, यही याद की निशानी है। क्या आप बच्चों ने उनके तन द्वारा कभी नोट नहीं किया कि उनके मस्तक में सितारा चमकता हुआ नज़र आता था? अव्यक्त स्थिति में जो होंगे उन्होंने उस अव्यक्त मूर्त को जाना पहचाना। जो स्वयं अव्यक्त अवस्था में नहीं रहते थे उन्होंने उस अमूल्य रत्न को पूरी रीति से नहीं पहचाना। अभी भी स्थापना का कार्य ब्रह्मा का है।अभी भी आप बच्चों की पालना ब्रह्मा द्वारा ही होगी। स्थापना के अन्त तक ब्रह्मा का पार्ट है ही।
अब पढ़ाई कैसे होगी?
अभी आप सभी बच्चे सोचते होंगे कि ब्रह्मा द्वारा पढ़ाई कैसे होगी? कैसे और क्यों का प्रश्न उठना नहीं चाहिये। लेकिन कुछेक बच्चों में प्रश्न उठते होंगे यों तो वास्तव में ज्ञान की अवस्था के अनुसार कैसे के अन्दर प्रश्न है। कुछ धीरज रखो। जब अविनाशी पढ़ाई है तो फिर यह प्रश्नों की हलचल क्यों? फिर भी उसी हलचल को शान्त करने के लिए समझा रहे हैं।
क्लास जो आपकी जैसे चलती है, वैसे ही चलेगी। (क्लास में) "क्या सुनायेंगे?" यह भी प्रश्न उठता है। जो ब्रह्मा का तन मुकर्रर है; 'मुरली' तो उस ही तन द्वारा दिये ज्ञान का नाम है और सन्देशियों द्वारा थोड़े समय के लिये बाबा जो सर्विस करते हैं, उसको 'मुरली' नहीं कहा जाता है। इसलिये जो भी मुरलियाँ चल चुकी है वह सभी मुरलियाँ आपको रिवाईज़ (Revise) करनी (दोहरानी) हैं। जैसे पहले सबको पोस्ट (Post) (डाक) आती थी, वैसे ही मुख्य सेवाकेन्द्र आबू से नियमानुसार आती रहेगी। एक वर्ष पहले, एक तारीख को जो मुरली चली थी, क्या वह आपको याद है? कल जो मुरली पढ़ी होगी, वह भी पूरी याद नहीं होगी। कई प्वाइन्ट्स (Points) (ज्ञान-बिन्दु) ऐसे हैं जो कई बार पढ़ने के बाद भी बुद्धि में पूरी तरह नहीं ठहरते। तो मुरली जिस प्रकार से चलती है, वैसे ही चलेगी। इसीलिये मुरली और पत्र का जैसे कनेक्शन (Connection) होता है, वैसे ही होगा।
जैसे आप मधुबन में रिफ्रैश होने आते हो वैसे ही आओगे। "क्या करने और किससे मिलने?" अब फिर यह प्रश्न उठता है?" किससे रिफ्रेश (Refresh) होवोगे?' जो आप में लक्की सितारे (Lucky Stars) हैं, उन सितारों का आकाश में क्या नक्शा है? देखा है, क्या नक्शा है? हिलमिल कर रहते हैं सितारे। तो अभी जो निमित्त मुख्य वत्स हैं, उनके साथ पूरा सम्बन्ध जोड़कर जो भी आपके सेवाकेन्द्र की रिज़ल्ट (result; परिणाम) है, अथवा जो भी समस्याएँ हैं, जो भी सेवाकेन्द्रों की उन्नति है, जो भी नये-नये (ज्ञान-निष्ठ जिज्ञासु-रूपी) फूल उस फुलवारी से खिलते हैं, उनको भी संगठन का साक्षात्कार कराने मधुबन में आना है। साथ-साथ ऐसे संगठन के बीच बापदादा किसी भी संदेशी द्वारा नहीं, बल्कि आज जिसको मुकर्रर करूँगा और बताऊँगा उसके द्वारा, जिस सन्देशी को निमित्त बनाऊँगा, उस निमित्त बने हुए रथ में आकर पूरी सेवा करेंगे। अभी और भी कोई प्रश्न रहा है?
अब आगे आने वाले पेपर के बारे में बाबा पहले से ही बता रहे हैं
अब आगे आने वाली परीक्षा का पेपर (Paper); परीक्षण क्या है? आने वाला जो पेपर है, वह पहले ही बता देते हैं। आपस में एक- मत, एकरस, अन्तर्मुख और अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर सम्बन्ध में आओ। यही बापदादा (परमपिता शिव और प्रजापिता ब्रह्मा) जो पेपर बता रहे हैं, अब उसकी रिज़ल्ट (Result) देखेंगे। अन्त के समय ब्रह्मा के तन द्वारा वत्सों को जो शिक्षा दी है, वह तो सभी ने सुनी ही होंगी और याद भी होंगी। और आज के दिन इस संगठन के बीच कुछ देने भी आये हो तो कुछ लेने भी आये हो। तो आप से जो लें, क्या आप वह देने को तैयार है? किसी के दिल में अगर ऐसा संकल्प आता हो कि न मालूम क्या होगा, तो वह हाथ उठावे। (किसी ने भी हाथ नहीं उठाया)। अगर सभी सन्तुष्ट हैं तो क्या जो भी हम आपसे लेंगे उनको देने में भी आप सभी सन्तुष्ट रहेंगे? दो बातों का अब इस संगठन के बीच दान देना है। कौन-सी दो बातें?
एक मुख्य बात है कि आज से आपस में एक-दूसरे का अवगुण न देखना, न सुनना, न चित्त पर रखना। अगर किसी भी बहन या भाई की कोई भी बात देखने में आवे तो भी बड़े निमित्त बने हुए हैं, उनके द्वारा उनको इशारा दिला सकते हो। एक बात तो बता दी।
दूसरी बात यह भी ध्यान में रखना कि कोई भी हिलाने की कोशिश करे तो जैसे आप वत्सों का कल्प पहले का गायन है, अंगद के समान पाँव को ऐसा मज़बूत रखना है कि कोई हिला न सके। ऐसे निश्चयात्मक बुद्धि वाले अडोल और एक-रस अवस्था वाले ही आने वाले पेपर में पास होंगे।
हाथ से हाथ नहीं छूटा, न ही साथ से साथ छूटा है
ब्रह्मा द्वारा जो इतने ब्राह्मण रचे तो क्या जब बाप के बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब बाप रिटायर (Retire); अवकाश प्राप्त नहीं होता? अब ऐसे ही समझो कि बाप रिटायर्ड अवस्था में भी आपके साथ हैं। आप बच्चों को कार्य देकर देखते रहेंगे। शरीर छूटा परन्तु हाथ और साथ नहीं छूटा। बुद्धि का साथ-हाथ नहीं छूटा है। वह तो अविनाशी कायम रहेगा। यह दो बातें जो सुनाई है एक तो यह कि डगमग अवस्था का दान देना है और दूसरा अवगुण-दृष्टि का दान देना है अगर सभी वत्स यह ध्यान दें कि संकल्प कर चुके अर्थात् दे चुके हैं और संकल्प की हुई चीज़ कभी वापिस नहीं ली जाती है। अगर माया वापस लेने की कोशिश करावे तो अपने ऊपर जाँच होगी तो पास हो जाओगे।
प्रजापिता ब्रह्मा के स्नेही वत्सों को आगे क्या करना है?
अब तो निरन्तर याद की यात्रा करनी है और जो शिक्षा मिली है, उसे प्रैक्टिकल (Practical व्यावहारिक) जीवन में धारण करने का सबूत देना है। अगर ब्रह्मा बाबा के साथ स्नेह है, तो स्नेह की निशानी क्या है? स्नेह यह नहीं कि दो आँसू बहा दिये। हाँ, यह भी स्नेह का सूचक तो है, परन्तु 'स्नेह' उसको कहा जाता है कि जिस चीज़ से उसका (ब्रह्मा बाबा का) स्नेह था और है, उस चीज़ से आपका भी हो। उसका स्नेह था सर्विस (Service लोक-सेवा) से। अन्त में भी उसने सर्विस (जनता की ज्ञान-सेवा) का सबूत दिया था। यह अन्तिम निशानी शरीर द्वारा दी। तो स्नेह कहा ही जाता है सर्विस से प्यार, बाबा की आज्ञाओं से प्यार और उसके फर्मान से प्यार। इसको स्नेह कहा जाता है।
बाबा ने छुट्टी क्यों न ली?
कोई भी ऐसा न समझे कि न मालूम बिना हम बच्चों की छुट्टी के शिव बाबा ने साकार बाबा को सूक्ष्म वतन में बुलाया। लेकिन बताइये कि अगर छुट्टी दिलाते तो क्या आप वत्स उन्हें जाने की छुट्टी देते ? नहीं। इस सृष्टि ड्रामा में आपने यह भी पहले दो बातें देख ली थी कि कोई भी गये तो छुट्टी लेकर नहीं गये। इसलिये यह समझो कि इस ब्राह्मण-कुल के ड्रामा में यही रस्म है। जो ड्रामा में नूँधी हुई है, वही रस्म अब भी चली। यूँ तो समझते हैं कि आप सभी का बहुत प्यार साकार बाबा के साथ था और है। प्यार न होता तो इस सभा में कैसे बैठे होते? साकार बाबा को तो फ़ालो (Follow अनुकरण) करने का प्रयत्न था तो स्नेह क्यों नहीं होगा? स्नेह था और है। यह स्नेह बाप और बच्चों के सम्बन्ध की निशानी है। इसको देख साकार भी वतन में मुस्करा रहे हैं। वह कहते हैं कि "बच्चों का स्नेह है, तो क्या मेरा स्नेह नहीं है? लेकिन वह जानते हैं कि सृष्टि-ड्रामा में जो भी पार्ट होता है वह कल्याणकारी है। वह (ब्रह्मा बाबा) विचलित नहीं होता। वह तो सम्पूर्ण अडोल और स्थिर था और है ही। परन्तु आप बच्चों से हज़ार-लाख गुना स्नेह उनमें अधिक है। लेकिन उनमें स्नेह का अब आप बच्चों को सबूत देना है। अभी यह एक खेल है। छोटेपन में एक खेल होता है; वह छिप कर देखते हैं। तो यह भी एक छिपने का खेल है। इस खेल में वह (ब्रह्मा बाबा) भी अब छिपकर देख रहे हैं। जो भी कोई परिस्थितियाँ हों, कोई प्रश्न हो तो हल करते रहेंगे। अब तो प्रसन्न-चित्त होवो। फिर भी यह रहस्य बता देते हैं कि विचार सागर का मन्थन करो; हलचल का मन्थन न करो। अगर विचार सागर मन्थन की बजाए हलचल का सागर चलता है तो ठीक नहीं। हम वतन से देख मुस्करा रहे थे। यह जो सब बैठे हैं, ये हाथ किसके है? शक्तियों के ही तो हैं। ये सब शक्तियों के हाथ आपके हाथ हैं। जो शक्ति ली है, उसको अब प्रत्यक्ष लाना है, "भारत माता शक्ति अवतार" अन्त का यही नारा है। सन शोज़ फादर (Son shows father) - यह हर वक्त साकार ब्रह्मा भी आपको कहते थे कि "बच्चे ही पिता की प्रत्यक्षता करते हैं।" इसलिए अब वह समय आया है। अब आप बच्चों को नाम ऊँचा करना है। सृष्टि-ड्रामा की नूँध (भावी) करावेगी ही। साकार बाबा ने कहा है, "बच्चों से मुलाकात करने आऊँगा।"
अब प्यारे बापदादा की अव्यक्त वाणी द्वारा वत्सों के कई प्रश्न तो हल हो गये थे; उन्हें भविष्य में इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के संचालन तथा प्रशासन की रूप-रेखा तो मालूम हो गयी थी परन्तु उनके मन में यह प्रश्न तो रह ही गया था कि अब वे अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा से, जिन्होंने उन्हें इतना प्यार, दुलार और ज्ञान का भण्डार दिया था, उनसे वे कैसे मिला करेंगे। बच्चों के इस भाव को जानते हुए शिव बाबा ने अगली बार जो महावाक्य उच्चारण किये वे इसी बात पर प्रकाश डालते थे शिव बाबा ने वत्सों की इस उत्सुकता को निमित्त बनाकर उन्हें भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होने की मनोरम युक्तियाँ बतायीं।
श्रद्धा-सुमन वत्सों के मन में, प्रश्न लोगों के मन में
ब्रह्मा बाबा तो अव्यक्त हो गए; उन्होंने व्यक्त देह को त्याग दिया परन्तु जैसे कई सांसारिक लोगों के मन में उनके व्यक्त जीवन-काल में 'क्यों?' कैसे?' इत्यादि से प्रारम्भ होने वाले प्रश्न बने रहते थे वैसे अब उनके अव्यक्त होने पर भी ऐसे ही कुछ प्रश्न उनकी टेर अनुसार उत्पन्न होने लगे। कुछेक सोचते कि ब्रह्मा बाबा के तन में प्रविष्ट शिव बाबा तो त्रिकालदर्शी हैं; तब उन्होंने पहले ही से यह क्यों नहीं बता दिया कि अमुक दिन और अमुक समय ब्रह्मा बाबा अपनी देह रूप कलेवर को छोड़कर अव्यक्त लोक को प्रस्थान करेंगे?
ऐसे लोग यह नहीं सोचते कि यदि त्रिकालदर्शी शिव बाबा पहले ही से बता देते तब फिर यह प्रश्न उठता कि शिव बाबा ने बता तो दिया परन्तु सर्व-समर्थ होते हुए भी उन्होंने ब्रम्हा बाबा को बचा क्यों नहीं लिया? अगर वे उन्हें बचा भी लेते तब वे लोग सोचते कि शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा को तो बचा लिया वे दूसरों को क्यों नहीं बचाते; वे पक्षपात क्यों करते हैं? अगर वे न बचाते तब वे कहते कि ये तो सर्व-समर्थ का काम नहीं है। उनका यह संशय फिर भी बना रहता कि अगर सर्व-समर्थ शिव बाबा ब्रह्मा-तन में आते होते तो वे अपने शरीर रूप रथ को अवश्य बचा लेते।
फिर मान लो कि शिव बाबा ब्रह्मा बाबा को एक बार बचा भी लेते, तब भी आखिर इस प्रकृतिकृत नाशवान देह को एक-न-एक दिन छोड़ना ही होता और उस छोड़ने के लिए देह को अस्त-व्यस्त करने वाला कोई तो निमित्त कारण बनता ही और उस कारण के उपस्थित होने पर उन लोगों के मन में फिर यही प्रश्न उठता कि जैसे शिव बाबाने पहले बचाया था, अब वे इन्हें फिर क्यों नहीं बचा लेते? ऐसे संशय-बुद्धि लोग तो कभी भी किसी भी परिस्थिति में ऐसे प्रश्नों से मुक्त नहीं होते। वे यह नहीं सोच सकते कि शिव बाबा केवल 'त्रिकालदर्शी' और 'सर्व-समर्थ' ही नहीं हैं बल्कि 'ज्ञान के सागर' होने के नाते वे यह भी जानते हैं कि कलियुगी प्रकृति का बना हुआ यह शरीर कब तक सेवा-योग्य बने रहने की शक्ति रखता है और 'कल्याणकारी' होने के नाते वे वही होने देते जिसमें कि ब्रह्मा बाबा व अन्य सभी का कल्याण समाया हो। सबसे बड़ी बात तो यह है कि संशय-बुद्धि लोग यह नहीं सोचते कि जब ब्रह्मा बाबा का कर्म-बन्धन, देह-बन्धन और भव-बन्धन ही समाप्त हो चुका था तब उन्हें कर्मेन्द्रियाँ, देह और व्यक्त लोक त्यागने ही थे; तब उन्हें बचाने व बनाये रखने का अर्थ क्या है? क्या 'देह बन्धन से छुड़ाने वाले' शिव बाबा उनके देह के बन्धन को बनाये रखते?; 'मुक्तेश्वर' शिव बाबा ब्रह्मा बाबा को मुक्ति की ओर कदम बढ़ाने से रोकते? ब्रह्मा बाबा तो सतयुग की स्थापना के कार्य के लिए निमित्त हैं और 'प्रजापिता' अथवा 'जगत-पिता' के नाम से गाये गये है और इस कार्य के लिए अव्यक्त देह अधिक उपयोगी है और अव्यक्त अवस्था में ही ब्रह्मा बाबा संसार की सभी प्रजाओं अथवा आत्मा रूप सभी वत्सों के कल्याण के कार्य में प्रवृत्त हो सकते हैं; तब क्या शिव बाबा इस श्रेष्ठ कार्य को उन्हें न करने देते? ब्रम्हा बाबा की व्यक्त देह तो तब तक बनी हुई थी जब तक योग तपस्या के द्वारा वे अव्यक्त अवस्था को पा लें। अथवा जब तक वे पूर्ण त्याग, लोक-सेवा द्वारा और कर्मभोग द्वारा सब ऋणों से मुक्त हो जाएँ तथा महादानी एवं वरदानी बनते हुए वे विश्व-कल्याणी के स्तर तक पहुँच जाएँ। अब जब वे इस स्टेज पर पहुँच चुके थे तब तो उन्होंने आध्यात्मिकता की सीढ़ी पर अगला कदम लेना ही था। ये भावी बननी ही थी ऐसे इसमें सब रहस्य समाए हुए थे।
सोचने की बात है कि अगर शिव बाबा पहले ही से बता देते कि अब ब्रह्मा बाबा अमुक दिन देह से प्रस्थान करने वाले हैं तब शायद अधिकांश ब्रह्मा-वत्सों का ध्यान ब्रह्मा के शरीर की ओर प्रवृत्त हो जाता और वे 'बीज रूप अवस्था' में स्थित होने की बजाय देह-स्मृति रूप वृत्ति वाले हो जांते। परन्तु शिव बाबा तो आत्मा के स्वरूप में स्थित करने और बिन्दु रूप से युक्त होने का अभ्यास कराने आते हैं; तब वे भला यह क्यों बताते कि ब्रह्मा बाबा इस देह से विदा लेने वाले हैं! अन्यश्च, शायद कुछ थोड़े वत्स यह सोचकर कि अब ब्रह्मा बाबा का शरीर तो छूटना ही है (क्योंकि त्रिकालदर्शी शिव बाबा ने ऐसा बता ही दिया है), वे उतनी अर्थात् शत प्रतिशत तत्परता से ब्रह्मा बाबा के शरीर के स्वास्थ्य के प्रति ध्यान न देते और इस प्रकार, उच्च मर्यादा और बड़ों के सन्मान व प्रीत की रीत को तोड़ने के दोषी बन जाते; शिव बाबा भला ऐसा क्यों कराते?
कुछ लोग यह सोचते कि भले ही शिव बाबा सब लोगों को पहले से न बताते, कम-से-कम एक वत्स को तो बता देते। यदि वे एक को बता देते और वह दूसरों को इसकी सूचना न देता तो बाद में सब उसे उलाहना देते और कहते "भला ऐसी बात भी छिपा कर रखने की होती है! बाबा का कहना तो ठीक था कि किसी को न बताना परन्तु कम से कम आप तो सोचते! अगर आप हमें बता देते तो हम और कुछ थोड़े ही करते? हम कम-से-कम उनसे अच्छी तरह मिल तो लेते।" और फिर वह व्यक्ति जिसे बाबा ने बताया होता, बाबा के अव्यक्त होने के बाद दूसरों को कहता कि उसे बाबा ने पहले ही बता दिया था तो उनमें से कुछ उस पर विश्वास करते और कुछ शायद न भी करते और अन्य कुछ कहते कि बाबा ने हमें क्यों नहीं बताया।
अच्छा, अगर बाबा पहले से बता भी देते तब कई लोग तो ब्रह्मा बाबा के पास अपने कुछ मामले ले आकर बैठ जाते और उनका ऐसा करना कुछ ठीक थोड़े ही होता। और अगर उन्हें मना किया जाता तो शायद रोका जाना उन्हें ठीक भी न लगता। फिर पहले से तो यज्ञ का वातावरण ही बदल जाता, सारी दिनचर्या ही परिवर्तित हो जाती। यदि बाबा पहले से ही बता देते तो कुछ लोग कहते कि ऐसे तो कई ऋषि-मुनि, साधु-सन्त और सिद्ध पुरुष भी बता दिया करते हैं।गोया उसमें वे कोई विशेषता न समझते। और, अगर बाबा बताते तो कितना पहले बताते ? जिनके मन में प्रश्न उठते हैं वे तो इसी प्रश्न को लेकर कई प्रश्नों की झड़ी लगा देते। कुछ लोग शायद अपने मन में सोच रहे होते कि अगर बाबा पहले से यह बता देते और वो बात ठीक निकलती तो आगे के लिए बाहर के सभी लोगों को भी यह विश्वास हो जाता कि ब्रह्मा के तन में शिव बाबा आकर पढ़ाते हैं। परन्तु ऐसा भी तो हो सकता कि वे यह सोचते कि ऐसा तो कई महान लोग भी पहले ही से बता देते हैं और अन्य कुछ सोचते कि परमात्मा इस प्रकार से अपने बारे में विश्वास दिलाने का यत्न क्यों करते हैं, ये तो सामान्य (Cheap) विधि है।" और वैसे देखा जाए कि परमात्मा स्वयं में यह विश्वास बिठाने के लिए ऐसी घटिया विधि अपनाते भी नहीं।
यदि देखा जाए तो शिव बाबा ने ऐसे कई संकते दिये और ब्रह्मा बाबा के जीवन में ऐसे कई अलौकिक चिह्न प्रगट हो गए कि जिनको देखकर बुद्धि योग बल के द्वारा समझने वाले पहले ही से समझ सकते थे कि मानो अब बाबा अव्यक्त स्थिति को प्राप्त हुए कि हुए। जो कोई भी बाबा के निकट जाकर बैठता, बाबा व्यक्त में भी अव्यक्त मालूम होते। वे स्थूल लोक में होते हुए भी न होते। वे अब केन्द्रों के अधिक समाचार के लेन-देन के विस्तार में न जाते बल्कि उनका सार ही सुनते और सार रूप में ही वात करते। वे प्यार और दुलार तो अब भी देते परन्तु अब उसकी रीति नीति मानो अव्यक्त हो ही गई थी। उनसे दृष्टि लेते ही अब वत्स ऐसा अनुभव करने लगते मानो वे स्वयं भी अव्यक्त स्थिति में एक टिक हो गए हों।
अब बाबा ने ईश्वरीय स्मृति के समय में भी वृद्धि कर दी थी और अपनी अवस्था का चार्ट रखने के लिए भी बाबा बहुत समझाते। पहले एक समय था जब बाबा कहा करते कि "अगर मन में कोई उल्टा संकल्प आता है तो उसकी अधिक चिन्ता मत करो क्योंकि वह तो विदा लेने आएगा ही परन्तु कर्मेन्द्रियों द्वारा कोई उल्टा कर्म न करो। उससे कर्म विकर्म बन जाता है।" परन्तु अब बाबा कहते "बच्चे, मन में भी कोई व्यर्थ संकल्प नहीं आना चाहिये क्योंकि इससे भी कमाई में घाटा पड़ता है, समय व्यर्थ जाता है, अवस्था परिपक्व बन नहीं पाती।"
विशेष बात तो यह कि अब ब्रह्मा बाबा ने हरेक को अलग-अलग कार्य का प्रशिक्षण दे दिया था और वे अब कार्य समेटते जा रहे थे। संक्षेप में यह कहना होगा कि उनके जीवन में अब ऐसे अनेकानेक चिह्न झलकते थे जिससे ऐसा लगता था कि वे अव्यक्त मंज़िल के अति निकट है।
इस विराट विश्व-नाटक की अनादि-निश्चित भावी के अनुसार ब्रह्मा बाबा तो अव्यक्त हो गये। सांसारिक लोगों के मन में चाहे जो भी प्रश्न उठे हों, योग-युक्त ब्रह्मा-वत्स तो इसी निश्चय में टिके हुए थे कि अब जबकि हमारा हाथ शिव बाबा के 'हाथ' में है, हर परिस्थिति में हमारा कल्याण ही है। जैसे मनुष्यकृत नाटकों में हरेक वृत्तान्त 'अनायास' ही होता है और दर्शकों को उसका पहले से पता नहीं होता, वैसे ही इस वृहद मनुष्य-सृष्टि-नाटक में भी हरेक वृत्तान्त अनायास ही होता है, तभी तो इसमें नाटक-के-जैसी उत्सुकता बनी रहती है।
परन्तु चाहे इसकी व्याख्या कुछ भी हो, विश्व-नाटक में यह वृत्तान्त अपनी प्रकार का अद्वितीय था। इसकी तुलना अन्य किसी देह-धारी के देह-त्याग के वृत्तान्त से नहीं की जा सकती। यह कोई शोक की परिस्थिति तो थी ही नहीं क्योंकि ब्रह्मा बाबा का अव्यक्त स्थिति को प्राप्त होना न केवल उनके लिये उच्च स्थिति की प्राप्ति का शुभ अवसर था बल्कि चूंकि वे ब्रह्मा-वत्सों के और वृहद संसार की तीव्रतर आध्यात्मिक उन्नति के कार्य के लिये अव्यक्त हुए थे,इसलिये ब्रह्मा-वत्सों के लिये भी वह कल्याण ही का अवसर था। परन्तु फिर भी चूँकि यह अपने अति प्रिय से व्यक्त रूपमें बिछुड़ने अर्थात् 'दैहिक विछोह' ही का वृत्तान्त था, अतः उस दृष्टिकोण से यह कोई खुशियाँ मनाने की घड़ी भी नहीं थी। न यह खुशी का अवसर था न ग़मी का। बाबा ने तो पहले ही से यह शिक्षा अच्छी तरह दी हुई थी कि किसी के भी शरीर छोड़ने पर आँसू नहीं बहाने और रोना नहीं है, और सभी को शान्ति देने वाले इस धर्म पिता के लिये तो शान्ति- प्रार्थना की आवश्यकता ही नहीं थी।
परन्तु सबसे बड़ी बात तो यह है कि ब्रह्मा बाबा से वत्सों का यद्यपि दैहिक दृष्टिकोण से अलगाव हो रहा था, अव्यक्त रूप से तो वह सम्बन्ध, और आदेश-निर्देश तथा शिक्षा-रक्षा की प्राप्ति बनी ही रहती थी। अतः यह एक विचित्र प्रकार का अवसर था जब सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का इतिहास जानने वाले ब्रह्मा-वत्सों के लिये योगावस्था की शान्ति की स्थिति ही एकमात्र रस्म, रीति और श्रद्धांजलि कोई साधारण श्रद्धांजलि नहीं थी बल्कि जीवन-पुष्प जो पहले ही अर्पित हो चुका था, उसमें इस प्रिय द्वारा भरी गयी सुगंधि का वर्णन था। अतः जिन ब्रह्मा-वत्सों ने बाद में अपने भाव-सुमन अर्पित किये उसी को किसी अन्य ने इस तान द्वारा गुंजारित किया -
हे नवयुग के निर्माता।
हे जग के भाग्य विधाता।
प्यार से तुमने जिसको देखा,
बदली उसकी जीवन-रेखा।
बच्चे-बच्चे कह दुलारा,
प्रीति-प्यार से हमें संवारा।
जीवन आपका खुली किताब
हर सवाल का था जबाव
सोयी मानव जाति में,
लाया आपने इन्कलाब
अव्यक्त लोक तथा अव्यक्त स्थिति का अनुभव
अव्यक्त लोक से आकर शिव बाबा द्वारा रहस्योद्घाटन और शिव बाबा द्वारा शिक्षा
बहुत-से वत्स चाहते थे कि कोई ऐसी युक्ति हो जिस द्वारा वे अव्यक्त धाम का तथा अव्यक्त स्थिति का अनुभव करें तथा ब्रह्मा बाबा से अव्यक्त मिलन मनाएँ। कुछेक के मन में यहभी प्रश्न था कि क्या अव्यक्त लोक है? शिव बाबा की अव्यक्त वाणी द्वारा दोनों को प्रश्नों का समाधान मिल गया:
शिव बाबा बोले:
"सभी वत्सों के मन में एक आशा दिखाई दे रही है। वह कौन- सी? कई बच्चों ने संदेश भेजा है कि अब हमें भी अव्यक्त लोक का अनुभव कराओ। वत्सों की यह सभी आशाएँ पूर्ण होने का समय अब आ ही गया है। आप पूछेंगे कि क्या सभी 'संदेशी' (ध्यानावस्था और साक्षात्कारावस्था में जाने वाले) बन जायेंगे? नहीं। अव्यक्त लोक का अनुभव तो सभी वत्स करेंगे परन्तु ऐसा अनुभव वे दिव्य बुद्धि के आधार पर करेंगे। वह अनुभव दिव्य दृष्टि द्वारा होने वाले अनुभव से भी अधिक लाभदायक, अलौकिक और अनोखा है। इसलिए जो भी वत्स चाहते हैं कि अव्यक्त ब्रह्मा बाबा से मुलाकात करें, उनके लिये तरीका यह है कि वे अमृतवेला याद में बैठें। अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर रूह-रूहान (आध्यात्मिक वार्तालाप) करो; आपको अनुभव होगा कि बातचीत कर रहे हैं और संदेशियों (दिव्य दृष्टि बालों) को जो अनुभव होता है, वैसे ही आपको भी बहुत-से गुह्य और गोपनीय रहस्य बुद्धियोग से अनुभव होंगे।परन्तु ऐसे अनुभव के लिए
एक बात आवश्यक है; वह यह कि अमृतवेले भी अव्यक्त स्थिति में वही स्थित हो सकेंगे जो सारा दिन अव्यक्त और अन्तर्मुखी स्थिति में होंगे।
अब अव्यक्त लोक को व्यक्त में ले आओ!
सूक्ष्म लोक में वत्सों के मन के कई प्रकार के संकल्प पहुँचते रहते हैं। कई सोचते हैं कि शिव बाबा बहुत कठोर रहा। परन्तु नहीं, जो होता है उसमें रहस्य और कल्याण है। इसलिए जो आवाज़ होती है, उसे सुनकर हर्षाता रहता हूँ।... अब सब के मन में यह भी संकल्प है कि अब यह सृष्टि-ड्रामा जल्दी खत्म हो। परन्तु क्या यह जल्दी खत्म होगा? क्या जल्दी हो सकती है? भावी तो बनी हुई है; वह तो बनती ही रहेगी। परन्तु बनी हुई भावी में इतना तो अवश्य ही सभी को स्पष्ट मालूम होना चाहिये कि जबकि कल्प पहले की तरह 'जल्दी' का संकल्प आता है तो संकल्प के साथ-साथ अवश्य ही पहले भी तीव्र पुरुषार्थ किया होगा। तभी तो यह संकल्प आता है कि अब जल्दी ही यह समय पूरा हो और सभी अव्यक्त लोक के वासी हो जायें। अव्यक्त बनना तो है ही परन्तु क्या आप वत्सों में अभी इतनी शक्ति है कि अव्यक्त लोक को खींचकर व्यक्त लोक में ला सकें?
सूक्ष्म लोक है; उसका अनुभव करो !
कई वत्सों के मन में लोक-संग्रहार्थ कुछ प्रश्न भी सूक्ष्म लोक में पहुँचते हैं। कुछेक वत्सों का यह भी प्रश्न है कि 'सूक्ष्म लोक है या नहीं?' कई बच्चे इस उलझन में हैं कि साकार बाबा द्वारा तो यह कहा था कि सूक्ष्म लोक नहीं है, तो फिर साकार बाबा अब कहाँ गये हैं? अब अव्यक्त ब्रह्मा कहाँ से मिलने आते हैं? सन्देशी कहाँ जातीं हैं, कहाँ का दृश्य देखती हैं? क्यों भोग लगाते हो? इसका भी ज्ञान समझो।
साकार ब्रह्मा द्वारा क्यों कहा गया था, इसका कारण है। आप लोगों ने देखा होगा कि कई छोटे-छोटे बच्चे जब किसी चीज़ के पीछे लग जाते हैं और वह चीज़ भले ही अच्छी भी होती है परन्तु यदि वे हद से ज़्यादा उस चीज़ के पीछे पड़ जाते हैं तो क्या किया जाता है।वह चीज़ उनकी आँखों से छिपाकर यही कहा जाता है कि ‘है ही नहीं।’ ऐसा इसीलिये कहा जाता है कि उनकी जो बहुत ज़्यादा लग्न लग गयी है7, वह कुछ ठीक हो जावे। इसी रीति, वर्तमान समय कई वत्स इन्हीं बातों में बहुत कुछ चटक गये थे। अतः उनकी बुद्धि को इस बात से हटाने के लिये यह कहा जाता था कि सूक्ष्म वतन है ही नहीं। परन्तु बच्चों से यदि कोई चीज़ छिपाई जाती है तो वह चीज़ खत्म तो नहीं हो जाती? ऐसा तो उस चीज़ से छुड़ाने के लिये ही कहा जाता है जिस चीज़ को बच्चे बहुत चटके होते हैं। परन्तु कई वत्स इस युक्ति को समझ न सके। भला सोचो कि अगर कहने का यह भाव होता कि सूक्ष्म लोक, वास्तव में है ही नहीं तो भोग क्यों लगाते ? तब क्या वे भोग लगाने की रस्म को कायम रखते? और, जब कोई भी ऐसा कार्य होता था तो साकार ब्रह्मा स्वयं भी ऊपर से (सूक्ष्म वतनसे) पुछवाते क्यों थे? तो ऐसी बात नहीं है कि सूक्ष्म वतन है ही नहीं बल्कि सूक्ष्म वतन का वासी बनना है। आना-जाना अधिक नहीं होना चाहिये बल्कि यही पुरुषार्थ रहे कि आने-जाने की बजाय स्वयं सूक्ष्म वतन वासी होने का अनुभव कायम रहे क्योंकि इसमें ही कमाई है!"
प्यारे शिव बाबा की वाणी सुनकर ब्रह्मा-वत्सों के मन में यह भाव और भी उत्कट हो गया कि अव्यक्त अवस्था में स्थित होना है। परन्तु सूक्ष्म रूप में उनके मन में यह भी भाव समाया था कि अगर इस समय हम ब्रह्मा बाबा से अव्यक्त लोक में मुलाकात नहीं कर सकते तो ब्रह्मा बाबा की साकार माध्यम द्वारा हमसे किसी प्रकार मुलाकात हो जाय। ऐसा तो प्यार के सागर शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा ने भी संकल्प किया ही होगा। अतः ब्रह्मा बाबा ने ब्रह्माकुमारी गुल्ज़ार के माध्यम से वत्सों से मुलाकात की और सम्बोधन भी किया। प्रस्तुत होने वाली वाणी में पहले ब्रह्मा बाबा के महावाक्य हैं और बाद में उनके प्रस्थान करने के बाद ब्रह्माकुमारी गुल्ज़ार से ध्यानावस्था में उनकी जो बातचीत हुई थी, वह लिपिबद्ध है।
अव्यक्त ब्रह्मा बाबा की साकार माध्यम द्वारा वत्सों से मुलाकात और उनके प्रति महावाक्य
स्नेहमूर्त अव्यक्त ब्रह्मा बाबा अव्यक्त लोक से ब्रह्माकुमारी गुल्ज़ार बहन के साकार माध्यम द्वारा वत्सों से मुलाकात करने के लिये पधारे। प्यारे बाबा ने मुलाकात भी की और साथ-साथ ज्ञान-रत्न भी दिये:
"आज मैं आप सभी बच्चों से अव्यक्त रूप से मिलने आया हूँ। मेरे जो बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित होंगे, वही इसको समझ सकेंगे। आप सभी वत्स अव्यक्त रूप में स्थित हो किसको देख रहे हो। व्यक्त रूप में देख रहे हो या अव्यक्त रूप में? आप अव्यक्त हो या व्यक्त? अगर आप व्यक्त रूप में देखोगे तो आप (ब्रह्मा बाबा) को नहीं देख सकेंगे। आज अव्यक्त वतन से मुलाकात करने आया हूँ। अव्यक्त वतन में आवाज़ नहीं परन्तु यहाँ आवाज़ में आया हूँ। आप सभी बच्चों के अन्दर कौन-सा संकल्प चल रहा है? अभी यह अव्यक्त मुलाकात है। कल्प पहले की तरह बच्चों से रूह-रूहान (आत्मिक चर्चा) चल रही है। रूह-रूहान करने मीठे-मीठे बाबा (शिव बाबा) ने आप सभी बच्चों से मिलने भेजा है।”
दो दिन पहले मीठे बाबा से रूह-रूहान (बातचीत) चल रही थी। बाबा (शिव बाबा) ने बोला अव्यक्त वतन का अनुभव करने के लिए तैयार हो? जानते हो क्या जबाव दिया होगा? यही कहा कि "जो बाबा की आज्ञा।" बाबा जैसे चलायेंगे, जहाँ बिठायेंगे, जिस रूप में बिठायेंगे वैसे ही बैठूंगा-उठूंगा। बच्चों के अन्दर यही संकल्प होगा कि बाप-दादा (शिव बाबा और प्रजापिता ब्रह्मा) ने छुट्टी क्यों नहीं ली? मैंने भी बाबा को यह कहा। तब शिव बाबा ने कहा, "अगर मैं सभी बच्चों को बिठाकर छुट्टी दिलाता तो क्या वे छुट्टी देते? इसलिए, जो बाप (शिव बाबा) ने कराया, वही 'भावी' कहेंगे। व्यक्त रूप में नहीं, तो अव्यक्त रूप से तो मुलाकात कर ही रहे हैं। सर्विस की वृद्धि वैसे ही है, बच्चों की याद भी वैसे ही है, लेकिन अन्तर यह है कि पहले मैं व्यक्त (स्थूल शरीर) में अव्यक्त (अवस्था में) था और अब मैं अव्यक्त शरीर वाला और अव्यक्त ही अवस्था वाला हूँ। जो नयनों की मुलाकात जानते होंगे, वे नयनों से इस थोड़ी-सी मुलाकात में अपने प्रति शिक्षा और डायरेक्शन ले लेंगे। आप सभी को अव्यक्त वतन (सूक्ष्म लोक) में तो आना ही है। बाबा बच्चों से मुलाकात करने के लिए हर वक्त, हर समय तैयार ही रहते हैं। अब बच्चों की बुद्धि जितनी साफ होगी, उसी अनुसार ही वे अव्यक्त मिलन का अनुभव कर सकेंगे।"
दूसरों को भी शक्तिवान बनाने की आज्ञा
बाबा ने एक से पूछा- "क्या आप शक्ति-स्वरूप में स्थित हैं?अभी शक्ति-स्वरूप का पार्ट प्रत्यक्ष में दिखाना है। जो बाप (शिवबाबा) की शिक्षा मिली है, उसको प्रेक्टिकल धारण करके दिखाना है।शक्ति सेना बहुत है; अभी पूरा शक्ति स्वरूप बन जाना है। अभी तक बच्चे और बाप के स्नेह में चल रहे थे, अब बाप से जो शक्ति मिली है, उस शक्ति से औरों को भी ऐसा शक्तिवान बनाना है। वही स्नेही ही बाप के साथ अन्त तक रहेंगे।
अस्थियों में भी स्थिति देखो
अभी मीठे-मीठे बाबा ने आप बच्चों को यह दृश्य दिखलाया कि आप बच्चे अस्थियाँ उठा रहे थे। अस्थियों को नहीं देखना, स्थिति को देखना है। यह अस्थियाँ स्थिति को बताती हैं, एक-एक रग में स्थिति थी। तो बाहर से तो अस्थियोंको रखा है परन्तु इसका अर्थ भक्ति-मार्ग का न उठाना, बल्कि इन अस्थियों में जो स्थिति भरी हुई है उसको देखना है। साधारण मनुष्य को यह बातें इतनी समझ में नहीं आवेंगी।बच्चों का स्नेह है और सदा रहेगा। २१ जन्म तक यह रहेगा। आप सभी सतयुगी दुनियामें साथ ही चलेंगे, राज्य साथ ही पावेंगे। साथ ही हैं, और जन्म-जन्मान्तर साथ ही रहेंगे। अभी भी ऐसा न समझना कि बाप (शिव बाबा) है दादा, (ब्रह्मा बाबा) नहीं, या दादा है तो बाप नहीं। हम दोनों एक-दूसरे से एक पल भी अलग नहीं हो सकते। ऐसेही आप भी अपने को 'त्रिमूर्ति' ही समझो। इसलिये कहते हैं कि त्रिमूर्ति का बैज हमेशा साथ रखो। जब ब्रह्मा, विष्णु और शंकर तीनको देखते हो तो आपको अपने भी त्रिमूर्ति की याद अर्थात् अपना स्वरूप और बाप (शिव बाबा) तथा दादा (ब्रह्मा बाबा) की याद आनी चाहिये। त्रिमूर्तिकी स्थिति मशहूर है। इसमें ही आप सभी बच्चों का कल्याण है।कल्याणकारी बाप (शिवबाबा) जो कहते हैं, जो कराते हैं, उसमें ही कल्याण है। इस एक-एक महावाक्य में, एक-एक नज़रमें बहुत कल्याण है। लेकिन सूक्ष्मको परखने वाले कोई-कोई अनन्य और महारथी बच्चे है। अब आप भी इतना ही शीघ्र कर्मातीत स्थितिमें स्थित रहने का पुरुषार्थ करो। जैसे यहाँ हर समय बापदादा के साथ व्यतीत करते थे वैसे ही हर कर्म में, हर समय अपने को साथ ही रखा करो। बच्चे, यही शिक्षा याद रखना; यह कभी नहीं भूलना। सम्बन्ध,स्नेह, स्मृति-स्वरूप साथ-साथ सरलता-स्वरूप,समर्पण और एक-दूसरे के सहयोगी बन सफलता को पाते रहना। सफ़लता आप सभी बच्चों के मस्तक के बीच चमक रही है। सूक्ष्म वतन में बैठे भी हर बच्चे की दिनचर्या और हर बच्चे का चार्ट सामने रहता है। जब व्यक्त था, उसकी तुलना में अभी तो मैं सभी की अवस्था को स्पष्ट रूप से देखता हूँ। इसलिए सभी की रिज़ल्ट देखते रहते हैं। जो बात कही, उसके ऊपर सभी बच्चों को ध्यान देना है।
यह तो आप बच्चे जानते हैं कि इस सृष्टि-ड्रामा का जो भी पार्ट है, उसमें कोई-न-कोई गुप्त रहस्य छिपा हुआ है। क्या रहस्य भरा हुआ है,वह समय-प्रति-समय आपको सुनाते जावेंगे। अब तो आपका वही यादगार जो आकाश में है, दुनिया वाले इन आँखों से देखेंगे कि यह धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं। अब तक जो बच्चोंको शिक्षा दी,उस शिक्षा का पालन करना यही बाप के साथ स्नेहका सूचक है।
"आज मैं सूक्ष्म वतन में गई तो बाबा पहले मिला नहीं। मेरा संकल्प चला कि आज दोनों बाबा कहाँ गये? इस संकल्प के बाद दोनों बाबा नज़र आये। शिव बाबा बोले, "मालूम है कि आज हम कहाँ गये थे? देखो, जो साकार ब्रह्मा की आत्मा है, उसमें आदि से अन्त तक ८४ जन्मों के चक्र के संस्कार हैं। तो यहाँ भी चक्र लगाने गये थे। जैसे वह लोग राकेट से चन्द्रमा के नज़दीक तक गये हैं, वैसे हम भी वहाँ चक्र लगाने गए थे कि वह लोग कहाँ तक पहुँचे हैं। फिर बाबा सुना रहे थे कि जैसे-जैसे चन्द्रमा के नज़दीक जाते हैं तो वहाँ पृथ्वी का खिंचाव खत्म-सा हो जाता है और बहुत हल्कापन महसूस होता है। जैसे तुम लोग सूक्ष्म वतन में आती हो तो स्थूल लोक का खिंचाव खत्म हो जाता है, वैसे यहाँ चन्द्रमा में भी धरती का आकर्षण नहीं रहता है। तुम्हारा जाना होता है ध्यान द्वारा और लोगों का जाना होता है साइंस द्वारा और बाबा ने यह अन्तर सुनाया कि वो लोग जब राकेट में चलते हैं तो उनके लौटने का कनेक्शन नीचे वालों से होता है। परन्तु यहाँ जो जब चाहें, जैसे चाहें अपने हाथ में है।
अन्त के समय की अवस्था का साक्षात्कार
इसके बाद बाबा ने एक दृश्य दिखाया। देखा कि लाईट की एक बहुत ऊँची पहाड़ी थी। उस पहाड़ी के नीचे शक्ति सेना और पाण्डव दल थे। ऊपर में बापदादा खड़े थे। इसके बाद देखा कि बहुत भीड़ हो गई है। हम सभी शक्तियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे कि साकारी नहीं बल्कि मन्दिर की साक्षात्कार-मूर्तियाँ खड़ी हैं। सभी लोग ऊपर देखने की कोशिश कर रहे हैं, परन्तु वे ऊपर तक देख न सके। सभी बहुत तरस रहे थे। फिर देखा कि आकाशवाणी की तरह एक आवाज़ आई कि शक्तियों और पांडवों द्वारा ही कल्याण होना है। बस! फिर तो आवाज़ सुनने के लिए सभी तरस रहे थे कि यह किसकी आवाज़ है। उस समय हम लोगों के चेहरे पर भी बिल्कुल ही 'रहम दिल' का गुण देखने में आ रहा था। उसके बाद फिर क्या हुआ कि कई लोगों को शक्तियों और पांडवों से अव्यक्त ब्रह्मा का साक्षात्कार और शिव बाबा का साक्षात्कार हो रहा था। फिर तो वह दृश्य देखने-जैसा था। कोई हस रहा है, कोई पकड़ने की कोशिश कर रहा है, कोई प्रेम में आँसू बहा रहा है। लेकिन सारी शक्तियाँ बिल्कुल आग के गोले के समान तेजस्वी रूप में स्थित थीं। इस पर बाबा ने सुनाया कि अन्त समय तुम्हारा यह अव्यक्त शरीर भी बिल्कुल स्थिर हो जायेगा। अभी तो शरीर के हिसाब-किताब के कारण शरीर अपनी ओर खींचता है परन्तु तब वह बिल्कुल शान्त और सरल हो जायेगा। कोई भी हलचल न मन में न तन में रहेगी। जिसको बाबा 'देही-अभिमानी' अवस्था कहते हैं, वह अवस्था हो जावेगी। बाबा ने कहा कि सभी बच्चों को कहना कि अभी देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो। जितना सर्विस पर ध्यान देना है, उतना ही इस मुख्य बात पर भी ध्यान देना है कि देही- अभिमानी बनना है।"
....फिर बाबा ने कहा कि "बच्चों को जाकर कहना कि जो आज की शिक्षा मिली, वही सूक्ष्म वतन की सौगात है। यही सौगात बुद्धि में धारण करते चलेंगे, तो जो बाबा का या बच्चों का कार्य है उसमें सफलता जल्दी देखने में आवेगी। सफलता तो होनी ही है, यह शक्य की बात नहीं है। एक है समय अनुसार सफलता होना, दूसरा है तीव्र पुरुषार्थ से जल्दी करना। तो जो बाबा का कर्तव्य है वही बच्चों का कर्तव्य है। उसमें सफलता लाना यही बाप के साथ स्नेह है।
इस प्रकार प्यारे बाबा वत्सों से मिले और उन्होंने ज्ञान-खज़ाना भी दिया परन्तु ब्रह्मा-वत्सों के मन में तो उस ज्ञान-मूर्ति, गुण-मूर्ति और प्रेम-मूर्ति की याद बनी ही रही। अब सभी बातें उनके मन में स्पष्ट थीं और मार्ग तो पहले ही से स्पष्ट था ही।
परमपिता परमात्मा शिव द्वारा २५ जनवरी को उच्चारे हुए महावाक्य
ब्रह्मा-वत्सों के मन में यह संकल्प था कि क्यों न वे स्वयं ही ब्रह्मा बाबा के साथ अव्यक्त होते। वे जानना चाह रहे थे कि अव्यक्त अवस्था को प्राप्त करने की युक्तियाँ क्या हैं। वे ब्रह्मा बाबा के जैसी स्थिति को प्राप्त करने के विधि-विधान जानने चाहते थे। अतः शिवबाबा ने उन्हें इस वाणी द्वारा इसका बोध कराया।
अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर अव्यक्त को व्यक्त में देखो। आज एक प्रश्न पूछ रहे हैं- क्या आप सर्व समर्पण बने हैं? (एक वत्स ने उत्तर दिया कि हम तो सर्व-समर्पण हैं ही) बाबा बोले- "यही सभी का विचार है या और किसी का कुछ और विचार है?"
(एक वत्स ने कहा, “जैसे बाबा सर्व समर्पण थे, वैसे हम नहीं बने हैं।”)
तब बाबा बोले "भला 'सर्व-समर्पण' किसको कहा जाता है? 'सर्व'में यह 'देह-का-भान' भी तो शामिल है, तो क्या देह-भान से मरे हो?"
(एक वत्स ने कहा, "रोज़ मरते ही रहते हैं।”)
बाबा बोले, "इसका मतलब यह है कि अभी पूरी तरह 'मरे' नहीं हो। गोया अभी सर्व-समर्पण नहीं हो।"
उसी वत्स ने कहा कि वह तो तब होगा जब देह ही न रहे।
तब बाबा ने कहा, "देह छोड़ेंगे तो लेनी भी पड़ेगी। लेकिन देह का भान तोड़कर समर्पण बनना है; तो आप क्या समझते हैं, क्या आप देह के अभिमान को छोड़, सम्पूर्ण समर्पण बने हैं? जीते-जी मर गये हैं वा मरते रहते हैं? देह के सम्बन्ध से और मन के संकल्पों से भी तुम देही-निश्चय हो? यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाये, तव कहा जायेगा कि जीवन सर्व-समर्पणमय है। जो सर्व-त्यागी, सर्व समर्पण जीवन वाला होगा उसकी ही अवस्था 'सम्पूर्ण' मानी जावेगी और जब सम्पूर्ण बन जायेंगे तो बाबा के साथ जावेंगे, शरीर से नहीं आत्मा से। तो जबकि आपने यह सोचा था फिर ऐसा क्यों नहीं किया?
बाबा के साथ जाने का संकल्प पूरा क्यों नहीं हुआ?
आपने शुरू में संकल्प किया था कि बाबा जावेंगे तो हम भी साथ जावेंगे। फिर ऐसा क्यों नहीं किया? आपने जो संकल्प किया था वह भी एक स्नेह का सूचक था। और संग तोड़, एक संग जोड़ने का यह चिह्न था। यह अन्त समय की अवस्था की निशानी है। परन्तु जबकि आपने कहा था तो क्यों नहीं शरीर छोड़ा? क्या इस प्रकार शरीर छोड़ सकते हैं? नहीं, अभी छूट भी नहीं सकता क्योंकि जब तक अपने शरीर के साथ हिसाब-किताब है, तब तक यह शरीर छूट नहीं सकता-योग से या भोग से। हिसाब-किताब रहा हुआ है, तो यह शरीर रहेगा ही; यह छूट नहीं सकता। वैसे तो समर्पण हो ही लेकिन अब 'समर्पण'की स्टेज ऊँची होगयी है।
'समर्पण' किसको कहा जा सकता है?
'समर्पण' किसको कहा जाता है? जो श्वांसों-श्वांस में अर्थात् निरन्तर (ईश्वरीय) स्मृति में रहे। एक भी श्वांस विस्मृति का न हो। हर श्वांस में स्मृति रहे। जो ऐसे होंगे उनकी निशानी क्या है? उनके चेहरे पर क्या नज़र आवेगा? जानते हो कि उनके मुख पर क्या होगा?" (एक वत्स ने कहा- 'हर्षितमुखता')
बाबा बोले, 'हर्षितमुखता के सिवाय और कुछ भी होगा? हर्षितमुख भी वह हो सकता है जो सहनशील हो। जो जितना सहनशील होगा, उसमें उतनी शक्ति बढ़ेगी। तो जो श्वांस-श्वांस स्मृति में रहता होगा, उसमें सहनशीलता का गुण भी ज़रूर होगा। और सहनशील होने के कारण एक तो हर्षित और शक्तिवान और गम्भीर होगा। उसके चेहरे पर निर्बलता नहीं होगी। यह जो कभी-कभी किसी वत्स के मुख से निकलता है कि "कैसे करें, क्या होगा; यह निर्बलता के शब्द नहीं निकलेंगे। जब मन में निर्बलता आती है तब यह बात मुख पर आती है। परन्तु मन में निर्बलता आनी नहीं चाहिये।
'मनमनाभव' का गुह्य अर्थ
आप वत्सों को तो 'मनमनाभव, मध्याजीभव' का मन्त्र मिला हुआ है न 'मनमनाभव' का अर्थ बहुत गुह्य है। विराट सृष्टि-ड्रामा सेकण्ड- सेकण्ड जिस रीति से और जैसे चलता है, उसी को देखते हुए मन की स्थिति ऐसे ही निश्चय और साक्षीपन की पटरी पर सीधी चलती रहे; ज़रा भी हिले नहीं, तब उस स्थिति को 'मन्मनाभव' रूप आज्ञा के अनुसार स्थिति मानेंगे। तो क्या आप संकल्प से और वाणी से ऐसी अवस्था में ड्रामा की पटरी8 पर चल रहे हो या कभी-कभी रुक जाते हो? क्या मुख कभी हिल जाता है? क्या मन की स्थिति हिलती है और फिर आप उसे फिर से काबू करते हो? मन की स्थिति के ऐसे हिलने से भी दाग़ हो जाता है। अच्छा, फिर भी एक बात अच्छी है। अब तक आप वत्स कुछ वाणी तक तो आये हो, अर्थात् मुख से तो तुरन्त कहते हो "भावी अर्थात् ड्रामा"। परन्तु अभी तक पूरी तरह प्रेक्टिकल रीति इस स्थिति में नहीं आये हो।
अव्यक्त और अन्तर्मुख स्थिति के लिए शिक्षा
अच्छा, एक बात और भी धारण होनी चाहिये। वह यह है कि जैसे अब समय नज़दीक है, तो समय के अनुसार अन्तर्मुखता की अवस्था, अर्थात् वाणी से परे, अन्तर्मुख होकर, अव्यक्त स्थिति में टिक कर कर्म करने की जो अवस्था दिखाई देनी चाहिए, वह कुछ अभी भी कम है। अवस्था ऐसी होनी चाहिए कि कारोबार भी चले और कर्मातीत स्थिति अथवा अव्यक्त स्थिति भी बनी रहे। यह दोनों ही इकट्ठा समान रूप में रहें। परन्तु अभी इस बात की कमी है। अब साकार तो अव्यक्त स्थिति स्वरूप में स्थित है परन्तु आप वत्स भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे तो उनसे अव्यक्त मुलाकात का अलौकिक अनुभव प्राप्त कर सकोगे।
मुख्य बात और भी है वह सबके ध्यान में देते हैं। इस बात पर भी आपका ध्यान बहुत होना चाहिए। वह कौन-सी बात है? यह बात साकार बाबा द्वारा भी आपको कहते थे। वह है अमृतवेले उठना। अमृतवेले का वायु-मण्डल ही ऐसा अच्छा होता है। साकार बाबा अमृतवेला में कैसे वत्सों से दूर होते हुए भी मुलाकात करते थे। तो अब जब अमृतवेले बाबा चक्कर लगाने जाते हैं, उस समय वायुमण्डल योग अर्थात् याद का ही होना चाहिए। हो सकता है कि कोई कहे कि मैं थका होता हूँ परन्तु वास्तव में अमृतवेले के अलौकिक अनुभव से थकावट भी दूर हो जाती है। बाप और दादा (परमपिता परमात्मा और प्रजापिता ब्रह्मा) की यह शुभ इच्छा है कि जल्दी से जल्दी हर-एक वत्स अव्यक्त अनुभव करे! वैसे तो आप जब साकार बाबा से साकार रीति से मिलते थे, तो आपकी अव्यक्त स्थिति बन जाती थी। परन्तु अब तो अव्यक्त हो गये हैं; इसीलिए अब आप जितना-जितना अव्यक्त स्थिति में होंगे, उतना ही आप अलौकिक अनुभव करोगे।
क्या हम लोहे के फूल हैं या वास्तविक गुलाब के?
बाबा ने कहा, "बच्ची बापदादा ने (परमपिता शिव और प्रजापिता ब्रह्मा ने) स्नेह और शक्ति तो वत्सों को दी ही है। साथ-साथ दिव्य गुणों रूपी फूलों की वर्षा भी शिक्षा के रूप में बहुत की है। लेकिन दिव्य गुणों की शिक्षा को भी हरेक वत्स ने यथा-शक्ति ही धारण किया है। इसके बाद बाबा ने दृश्य दिखाया जिसमें तीन प्रकार के गुलाब के फूल थे। एक लोहे का, दूसरा हल्के पीतल का, तीसरा वास्तविक गुलाब का था। तो बाबा ने कहा, बच्चों की रिज़ल्ट भी इसी प्रकार है। कोई तो मानो लोहे का फूल है। लोहे को बहुत ठोकना पड़ता है। जब तक उसको गरम न करो,बहुत हथौड़ी न लगाओ तब तक मुड़ नहीं सकता। इसी तरह कई बच्चों के संस्कार लोहे की तरह हैं। वे कितना भी ज्ञानयोग की भट्टी में रहें तो भी बदलते ही नहीं हैं। पीतल के फूल के समान वे हैं जो मोड़ने से वा मेहनत से कुछ बदलते हैं। तीसरा, वह जो वास्तविक गुलाब है, वह वही बच्चे हैं जिन्होंने अपने को गुलाब के समान बनाने में कोई मेहनत नहीं ली है।
गुण-मूर्ति, ज्ञान-मूर्ति, स्नेह-मूर्ति प्यारे बाबा का अनोखा जीवन
अब शिव बाबा और ब्रह्मा बाबा, अर्थात् बापदादा अव्यक्त रूप से विश्व-परिवर्तन का कार्य करने लगे। वे ब्रह्माकुमारी हृदय मोहिनी जी के माध्यम से भी सस्नेह ईश्वरीय शिक्षा देने लगे। ब्रह्मा बाबा ने साकार रूप में अपने व्यक्तित्व और कर्मों की छाप ब्रह्मा वत्सों पर छोड़ी थी, वह भी अमिट और अविस्मरणीय बनी रही।
शिव बाबा तो सर्व-कल्याणकारी, सर्व समर्थ, सर्व गुणों के भण्डार और परिपूर्ण है ही परन्तु साकार ब्रह्मा बाबा के जीवन में भी इतने महान गुण हम अनुभव करते कि वे सबसे न्यारे, प्यारे और अद्भुत् व्यक्तित्व के मालिक मालूम होते ही परन्तु इतना ही नहीं, साथ-साथ ऐसा भी होता था कि जो लोग उनके सम्पर्क में आते उन्हें भी उनके गुणों से इतनी प्रेरणा मिलती कि वे भी वैसे ही पावन बनना शुरू हो जाते, जैसे कि पारस के साथ लगने से पत्थर भी सोना हो जाता है अथवा सच्चे चन्दन के वृक्ष के निकट के वृक्ष भी अपने में सुगन्धि लेकर सुगन्धि देने लगते हैं। वे अपार गुण-रत्नों के भण्डार थे जिनमें से कुछेक ये हैं:
आत्मिक दृष्टि
उन अनेकानेक गुणों में से साकार बाबा में एक मुख्य गुण, जोकि उनके व्यक्तित्व में सदा झलकता रहता, उनके चारों ओर पवित्रता बिखेरता रहता, वायुमण्डल को शुद्ध करता रहता और लोगों के जीवन को पलट देता; वह था आत्मिक दृष्टिकोण। बाबा सदा आत्म-स्थिति में रहते हुए, सब देहों में आत्मा ही को देखते। बाबा की क्लास (ज्ञान-सभा) में छोटे बच्चे भी बैठे होते, बूढ़े भी उपस्थित होते, ग्रामीण भी होते और बड़े-बड़े नगरों में ठाठ-बाठ से रहने वाले व्यक्ति भी विराजमान होते, परन्तु बाबा सबको आत्मिक दृष्टि से देखते। यदि किसी अन्य उच्च वक्ता की सभा में छोटी आयु वाले बच्चे बैठे हों तो वह अपने मन में सोचेगा कि ये बच्चे भला मेरी गहरी बातों को क्या समझेंगे अथवा ये अत्यन्त वृद्ध आयु वाले शक्तिहीन व्यक्ति मेरी इन अनमोल बातों को सुनकर क्या बदलेंगे? परन्तु बाबा तो यही देखते कि यह भी आत्माएँ हैं। किसी की कर्मेन्द्रियाँ रूपी उपकरण अविकसित हैं और किसी के जर्जरीभूत परन्तु इन आत्माओं का भी येन-केन- प्रकारेण कल्याण तो करना ही है। अतः वे ऐसे सरल, स्पष्ट, सुबोध और सरस तरीके से अत्यन्त उच्च अध्यात्म तत्त्वों को दर्शाते ताकि बालक, वृद्ध सभी उसको भली-भाँति समझकर कल्याण के भागी बनें, तभी तो वे सभा के बाद छोटे या बड़े, हरेक शरीरधारी-आत्मा से अलग बैठ करके उसे ज्ञान-धन से लाभान्वित करते, उसे पितृवत स्नेह देते, उसके मन की उलझनों को दूर करते और उसे आदि-मध्य-अन्त का हाल सुनाते और उसे यथा-योग्य ईश्वरीय सेवा में लगाकर आत्मिक स्थिति में स्थित कर देते।
बाबा की आत्मिक-स्थिति इतनी तो उच्च और प्रभावशाली होती कि उनके पास बैठे हुए लोग प्रायः ऐसा महसूस करते कि वे अपनी देह से न्यारे हो रहे हैं। वे भार-शून्यता अथवा हल्कापन अनुभव करते और उनके मन के अशुद्ध संकल्प शान्त हो जाते। उस समय उनका मन शुद्ध पुरुषार्थ एवं आध्यत्मिक जीवन के लिए प्रेरित होता और उन्हें अपने पतन की अवस्था खटकने लगती तथा पावन बनने की अन्तःप्रेरणा मिलती। बहुत लोगों को कुछ समय के लिए इस संसार का अनुभव न रहता। बल्कि उनके नेत्र मानो दिव्य-दृष्टि से युक्त से होकर बाबा के चारों ओर दिव्य आभा अथवा श्वेत अव्यक्त प्रकाश को देखते और उस समय का अलौकिक अनुभव उन्हें इतना भाता कि उनका मन चाहता कि, बस, इस अवस्था का हम रस लेते ही रहें। उन्हें बाबा की भृकुटि में एक दिव्य ज्योति प्रकाशमान दिखाई देती और वे एक ऐसे आत्मिक सुख तथा सच्ची शान्ति का अनुभव करते कि, बस, उसी में टिके रहना चाहते। वे वातावरण में एक अभूतपूर्व मौन तथा पवित्रता के प्रकम्पन अनुभव करते और उसमें बाबा जब उन्हें यह कहते "बच्चे, आप आत्मा हो, यह शरीर तो पाँच तत्त्वों का नश्वर पुतला है" तो उस वचन की उन्हें साक्षात् अनुभूति होती। ऐसा भी कई बार हुआ कि जिस धर्म का व्यक्ति उनके सामने आया उसे बाबा के द्वारा अपने-अपने धर्म-पिता का साक्षात्कार हुआ।
यह बाबा की आत्मिक दृष्टि ही का फल था कि वे विभिन्न धर्मावलम्बियों को भी आत्मा ही मानकर उनसे व्यवहार करते। एक बार की बात है कि बाबा के पास उत्तर-प्रदेश के सेवा केन्द्र से आये हुए एक ग्रुप में खान-वंश का एक मुसलमान भी था। उस दिन यज्ञ-भोजन तैयार करने का कार्य उस ग्रुप ने स्वेच्छा से अपने जिम्मे लिया था। परन्तु वह ब्रह्मचारी बालक खान थोड़ा संकोच वश भण्डारे से बाहर खड़ा था। उसके मन में यह संकल्प था कि वह भी यज्ञ-भोजन बनाने के कार्य में भागीदार बने, परन्तु साथ-साथ उसके मन में यह विचार भी उठता था कि यहाँ भोजन की पवित्रता के नियम का पालन होता है, अतः शायद पठान होने के कारण उसे भोजन बनाने के कार्य में सम्मिलित होने की इजाज़त नहीं मिलेगी और यहाँ के पवित्र भण्डारे में उसका हाथ लगाना अनुचित माना जायेगा। इसी बीच क्या हुआ कि बाबा स्वयं वहाँ देख-रेख करने आ पहुँचे। बाबा ने खुद ही तो उसको दुलारते हुए कहा- "मीठे बच्चे! आप बाहर क्यों खड़े हो? तुम बह्मचारी तो हो ही, चलो शिव बाबा को याद करके आटा गूँथो।" अहा! वह बहुत खुश हुआ और उसने यह अनुभव किया कि यहाँ दैहिक जन्म पर आधारित धर्मों को लेकर कोई भेद नहीं किया जाता बल्कि बाबा सबको आत्मा की दृष्टि से देखते हैं तथा मन में प्रभु-प्रेम और आचरण में ब्रह्मचर्य आदि की धारणा को प्रमुखता देते हैं।
इसी प्रकार, जैसा कि हम पिछले पृष्ठों में बता आये हैं। जब कैथोलिक ईसाईयों के धर्म-गुरु पोप भारत में आये थे तब सभी लोग उसको इस दृष्टिकोण से देखते कि यह ईसाई धर्म का सर्वोच्च अधिकारी भारत में आया हुआ है, परन्तु बाबा फिर भी उसे तथा उसके साथ आये हुए पादरियों को आत्मिक दृष्टिकोण से देखते हुए उनके हितैषी बन भारत के सर्वप्रथम सहज राजयोग और ईश्वरीय ज्ञान से उन्हें परिचित कराने, अर्थात् निराकार पिता परमात्मा का परिचय दिलाने की योजना बनाने में लगे रहे। उन्होंने बम्बई के ईश्वरीय सेवा- केन्द्र पर यह विशेष निर्देश भेजा कि वे पोप तथा पादरियों से मिलकर उन्हें ईश्वरीय ज्ञान की सौगात शिव बाबा की ओर से भेंट करें और निराकार परमपिता शिव का परिचय दें और उन सबका भी कल्याण करें।
जिस प्रकार विभिन्न धर्म वालों को बाबा आत्मिक नाते से देखते, उसी तरह बाबा अपने लौकिक सम्बन्धियों, अर्थात् दैहिक कुटुम्बियोंको भी आत्मिक सम्बन्ध से देखते और उन सभी को "बच्चे, बच्चे" ऐसा कहकर पुकारते। इन तथा अन्य परिस्थितियों में भी सभी को यह स्पष्ट देखने को मिलता कि बाबा दैहिक सम्बन्धों और दैहिक जन्म पर आधारित धर्मों से ऊँचे उठकर आत्मा के स्वरूप में स्थित हैं और एक शिव बाबा के साथ अटूट सम्बन्ध जोड़कर "सर्वधर्मान परित्यज, मामेकं शरणं ब्रज" के ईश्वरीय महावाक्यानुसार आत्मनिष्ठ स्थिति में चल रहे हैं।
बाबा के सभी हाव-भाव दिव्य चरित्र के चित्र थे
और उनमें प्यार भरा था
बाबा के जो चरित्र एक चल चित्र के रूप में अब मानस-पटल पर एक के बाद एक आते-जाते हैं, वे सभी-के-सभी किसी-न-किसी दिव्य गुण का ही आलेख हैं। बाबा का कोई हाव-भाव, उनका कोई शब्द- आलाप, उनकी कोई भाव-भंगिमा, उनके मुख-मण्डल की मुस्कान, दिव्य-चरित्र की परिगणना से बाहर नहीं होते थे बल्कि वे किसी-न-किसी ईश्वरीय कर्त्तव्य की पूर्ति या किसी-न-किसी सेवा के निमित्त ही होते थे। वे नेत्रों से निहारते थे तो भी आत्माओं को कल्याण की दृष्टि से देखते हुए उन्हें ईश्वरीय प्यार से सींच देते। जिस पर बाबा की दृष्टि पड़ती, वह उनकी नज़र से निहाल हो जाता। उसकी सुषुप्त आत्मा जाग उठती। बाबा की दृष्टि ऐसी होती कि जैसे वे आत्मा को साथ लेकर, योग के अनुभव की गहराइयों में डुबकी लगवाकर, उसे अभूतपूर्व शान्ति, आनन्द और प्रकाश का अनुभव करा रही हों। बाबा के नेत्रों के कोनों में, कभी किसी को देखते समय जो कुछ रेखायें उभर आतीं, उनसे लगता कि बाबा अपार प्यार और दुलार दे रहे हैं। बाबा की उस पर एक नज़र से शरीर का भान मिट जाता और आत्मा स्वयं को एक प्रकाश के समुद्र में हिलोरें लेती हुई अनुभव करती और उसके सभी मोह नष्ट हो जाते तथा उसे ऐसे मालूम होता कि उसे सब- कुछ मिल गया है। उस नैन-मुलाकात में आत्मा में यह भाव झंकृत हो उठते कि "तुम्हें पा के हमने जहाँ पा लिया है, ज़मीं तो ज़मी आसमां पा लिया है...."
इस प्रकार, बाबा का प्यार केवल "प्यार" ही नहीं होता बल्कि वह ज्ञान, योग और सेवा को भी साथ लिये होता, क्योंकि जैसे ज्ञान मनुष्य के मोह को नष्ट करता है, जैसे योग मनुष्य को देह से न्यारा बनाता है, जैसे सेवा करने वाले के प्रति किसी का स्नेह जागता है, वैसे ही बाबा के प्यार की एक नजर भी सभी काम एक साथ कर देती। तभी तो किसी ने कहा है कि "तू प्यार का सागर है, तेरी इक बूंद के प्यासे हम....।" संसार में अन्य कोई हमें कभी प्यार से देखता है तो हम उसके प्यार का अनुभव तो करते हैं परन्तु उस नज़र से "नष्टोमोह" "स्मृर्तिलब्धः" "गत संदेह" और "कृषिस्येवचनमतव" (जैसे आप कहेंगे, वैसे ही करूँगा) के भाव पैदा नहीं होते। अतः कहना होगा कि बाबा जब प्यार करते, वे केवल प्रेम मूर्त नहीं बल्कि उसके साथ-साथ ज्ञान-मूर्ति, योग-मूर्ति, सेवा-मूर्त्ति और कल्याण-मूर्ति भी होते और वे अपनी सूरत से भी मनुष्यों की सीरत बनाने का कमाल करते।
वे हाथ उठाकर अपनी उंगुलियों को आगे से थोड़ा-सा मोड़कर, किसी दूरस्थ वत्स को अपनी ओर जब बुलाते तो वो चेहरे पर खुशी की झलक लिये ऐसी तेज रफ्तार से भागा आता कि कहीं देर हो जाने पर खज़ाना लुट न जाए। समीप आकर बाबा की आँखों में देखता, बाबा का हाथ अपने हाथ में ले लेता और अपना सिर बाबा के सीने पर रख देता और बाबा उसे अपनी बाँहों में भर कर दुलार देते जिस बात के लिये बाबा ने बुलाया था, वह बात तो बाद में शुरू होती। गोया वह बाद में बाबा से पूछता कि "बाबा, क्या सेवा है?" परन्तु पहले तो वह बाबा की मधुर मुस्कान देखकर आत्मा के मिलन की चाह पूरी करता। यदि वह सांय का समय होता तो उसके दिन-भर की थकावट उतर जाती। यदि वह प्रातः का समय होता तो उसमें कम- से-कम दिन-भर के लिए एक नई उमंग, नई तरंग, नया उत्साह एक ज्वार-भाटे की तरह उभर आता कि वह उस दिन पहाड़ उठाने में भी अपने-आपको सक्षम और समर्थ समझता। जैसे सुराही मिट्टी की बनी होती है, परन्तु फिर भी सुराही का डिजाईन और उस पर बने फूल-वेल, कमरे की शोभा को बढ़ाते हैं और वह सुराही गर्मी से तपे हुए दिन में प्यास बुझाती और ठंडक लाती है, वैसे ही यद्यपि बाबा का शरीर पाँच तत्त्वों से ही गढ़ा हुआ था तथापि वह एक चुम्बकीय प्रभाव से आत्मा को अपनी ओर खींचता था और अपने स्पर्श से उनके अंगों में भी शीतलता भर देता और उनके अंग-अंग में भी मुस्कान पैदा कर देता।
ज्ञान और प्रेम का अद्भुत मेल
यह ठीक है कि बाबा में ज्ञान की एक अथाह गहराई थी, तभी तो उनके जीवन में ज्ञान की एक अजीब मस्ती झलकती थी और तभी तो वे सदा यही कहते कि यह ज्ञान अनमोल टौर अविनाशी रत्नों का खज़ाना है। परन्तु वह ज्ञान कोई शुष्क ज्ञान न था। ऐसा भी नहीं कि वे ज्ञान को प्रेम की केवल पुट (Coating) देते थे बल्कि यों कहना ज़्यादा ठीक होगा कि वे जिस ज्ञान की बात कहते, वह प्रेम-पूर्ण ज्ञान था और जिस प्रेम का झरना सदा उनके जीवन में बहता, वह ज्ञान प्रेम पूर्ण था। ज्ञान और प्रेम का उनके जीवन में ऐसा तालमेल था कि दोनों को अलग-अलग बताना असम्भव-सा था। जो उनके सम्पर्क में आये हैं, उनमें से कोई तो कहेगा कि उनके जीवन में प्रेम अधिक था और अन्य कोई कहेगा कि वे प्रारम्भ में प्रेम का आश्रय देकर ज्ञान की सुदृढ़ भित्ति पर टिकाने की कोशिश करते। वास्तव में यह देखने वाले की दृष्टि का अन्तर है और अपनी-अपनी जगह दोनों ठीक भी है। वास्तव में बाबा के ज्ञान के बोल प्रेम के बिना होते ही न थे और उनके प्रेम के बोलों में सदा ज्ञान भरा रहता था और प्रेम तथा ज्ञान दोनों का लक्ष्य मनुष्यात्मा को पवित्र और योगी बनाना ही था।
ज्ञान और प्रेम साहित्य-वितरण के रूप में
बाबा ईश्वरीय ज्ञान को इतना मूल्यवान समझते थे कि उन्होंने निर्देश दिया हुआ था कि ईश्वरीय ज्ञान के साहित्य को बेचा न जाये क्योंकि बेचने का अर्थ इसका मूल्य चुकाना है जबकि वास्तव में यह अनमोल है इसका मूल्य कोई चुका नहीं सकता। पुनश्च, वे यह भी कहते कि इस ज्ञान को सुन्दर से सुन्दर रूप में, अच्छे से अच्छे कागज पर छपवाया जाये क्योंकि इतने उच्च ज्ञान को रद्दी कागज पर छपवाना और इसकी घटिया-सी छपाई कराना गोया इसके मूल्य को न समझना है। वे कला और सौन्दर्य को भी महत्त्व देते तथा सुपठनीयता को भी। इस रीति से साहित्य सांसारिक दृष्टि से महंगा हो जाता है। इस पर भी बाबा कहते कि इसे बेचना नहीं है क्योंकि सभी मेरे बच्चे ही तो हैं, उन्हें साहित्य दाम पर थोड़े ही दिया जायेगा। गोया ज्ञानके साथ-साथ मनुष्यात्माओं के प्रति उनका प्रेम भी उतना ही था कि वे कहते कि इसका मूल्य न लो। परन्तु हुआ यह कि मनुष्य आत्मायें रूप बच्चे अपने अलौकिक पिता के इस प्रेम के पात्र न बन सकें। कहीं भी हम मेज पर साहित्य रखते तो लोग उस पर छीना-झपटी करने लगते और कई-कई प्रतियाँ उठा ले जाते। तब भी बाबा के प्रेम में कमी नहीं आई। बाबा ने इसे आय का साधन नहीं बनाया बल्कि प्रेम-वश इसे जन-जन को वितरित करने की सीख दी ताकि कोई आत्मा इससे वंचित न रह जाये। इसके अतिरिक्त बाबा ने कई अन्य अलौकिक तरीके बताये। जब अंग्रेज़ी भाषा में रीयल गीता (Real Gita) छपवाई गई तब बाबा ने उसके प्रारम्भ में एक सूचना संलग्न करने का निर्देश दिया। उसमें लिखा था कि इसमें ज्ञान का अनमोल खज़ाना है। इस पुस्तक का केवल उतना ही दाम रखा गया है जितना इसके कागज और छपाई पर आया है। यदि पढ़ने पर किसी को पसन्द न आये वह ठीक हालत में इसे वापस लौटाकर अपने दाम वापस ले जाये। वह इतनी बड़ी पुस्तक थी और उसके दाम इतने कम थे कि उसे लेने वाले आश्चर्यान्वित होते थे। आज तक भी लोग उसकी प्रतियां माँगते हैं।
हर परिस्थिति में शिव बाबा की याद
बाबा के जीवन की एक मुख्य विशेषता तो यह थी कि वे स्वरूप-निष्ठ थे। उन्हें शिव बाबा के अंग-संग रहने का इतना अभ्यास था कि वे दोनों शायद अलग ही न होते थे। वे जब खाना खाते तो अपने साथ भोजन करते वत्सों को कहते "यह देखो, यह हाथ तो इसका है परन्तु शिव बाबा इस हाथ द्वारा इस बच्चे (ब्रह्मा) को कितने प्यार से भोजन करा रहा है, यह (ब्रह्मा) बाबा (शिव) का मुरब्बी बच्चा है न!" जब वे स्नान कर रहे होते और कोई उन्हें आकर कहता कि "बाबा, ट्रंक काल (Trunk Call;) आया है", तो बाबा कहते, "बच्चे, उन्हें कह दो कि बाबा शिव पर लोटी चढ़ा कर अभी आता है" कभी तो वे ऐसा महसूस करते कि वे नहा नहीं रहे बल्कि उनके तन में जो शिव बाबा आया, उस पर वे जल की लोटी चढ़ा रहे हैं और कभी उन्हें ऐसा लगता कि जैसे मात-पिता किसी बच्चे को नहलाते हैं, शिव बाबा भी अब उन्हें नहला रहे हैं। इस प्रकार उन्हें देह की सुधि न रहती और देह से सम्बन्धित कर्मों में भी वे शिवबाबा को न भूलते।
इस प्रकार बाबा का शिव बाबा से ऐसा तो ज्ञान-युक्त प्यार था कि वे हर परिस्थिति को निमित्त बनाकर उनकी याद में रहते। वे कोई 'टोली' (प्रसाद) बाँटते तो भी पूछते "क्या शिव बाबा को याद किया है और यदि कोई समस्या सामने आती तो भी कहते कि शिव बाबा को याद करो तभी पुरुषार्थ में पूर्णता आयेगी। "जैसे किसी छोटे बच्चे को प्रातः जागते ही माँ की याद आ जाती है और उसके मुख से "माँ-माँ" शब्द ध्वनित हो जाते हैं और जैसे किसी प्रौढ़ व्यक्ति को अपने परिवार की सुधि बनी ही रहती हैं, वैसे ब्रह्या बाबा को शिव बाबा की प्रेम-विभोर स्मृति बनी ही रहती। इसलिये वे सदा उसी की चर्चा करते। एक बार बाबा शरद ऋतु में वत्सों सहित पहाड़ी पर घूमने गये तो लौटने के समय तक धुन्ध इतनी बढ़ गयी कि दो फुट आगे का मार्ग भी दिखाई नहीं देता था। सभी थोड़ी देर रुके रहे ताकि धुन्ध कम हो जाये। परन्तु धुन्ध और कोहरा (Fog) कम हुए ही नहीं। तब बाबा ने मुस्कराते हुए सन्देशी को कहा "ध्यानावस्था में जाकर बाबा से कहो कि वापस जाना है, वहाँ सभी हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे,परन्तु रास्ता ही स्पष्ट दिखाई नहीं देता......" सन्देशी अव्यक्त स्थिति में, ध्यानावस्था में गयी और उसने बाबा की यह बात कह सुनाई......."
खैर, वह एक अलग ही किस्सा है परन्तु प्रस्तुत प्रसंग में इसका उल्लेख करने का भाव यह है कि लौकिक, स्थूल परिस्थितियों को भी बाबा शिव बाबा की याद के निमित्त बना लेते। बस, बाबा, बाबा, मीठे बाबा ही की याद उसके मन में बनी रहती। जैसे रात्रि को दो घनिष्ठ दोस्त, छोटे बालक, सोने के लिए अपने-अपने घर चले जाते हैं और प्रातः होते ही फिर एक-दूसरे को उसके घर से बुलाकर पढ़ना-खेलना आदि शुरू कर देते हैं, ऐसे ही बाबा शिव बाबा के बिना रह ही न सकते। वे तो पूरी रात्रि भी एक-दूसरे से विदा न होते। प्रातः दो-ढाई बजे तो बाबा उठ जाते ही परन्तु वे तो कहा करते कि मैं बाबा ही के साथ सोता हूँ। यह प्यार और यादका कैसा ताँता और नाता है।
हम ब्रह्मा बाबा द्वारा शिव स्मृति की बात कह रहे थे। जिस प्रातः को भोग लगना होता, उससे पहले की रात्रि को विश्राम करने से पूर्व बाबा संदेशी को बुलाते और कहते "बाबा को दिल व जान, सिक व प्रेम से निमन्त्रण देना और कहना कि कल भोग स्वीकार करें।" जिस समय बाबा ऐसा कह रहे होते, उस समय बाबा के नेत्र बाबा का मुख- मण्डल और उनके हाव-भाव देखते ही बनते! बाबा केवल औपचारिकता के नाते से "दिल व जान, सिक व प्रेम" आदि शब्द प्रयोग न कर रहे होते बल्कि इन्हीं भावों का स्वरूप होकर शिव बाबा की ओर आँखें करते हुए पूरे हृदय से कहते। बाबा जब यह सन्देश दे रहे होते तो कई बार जब यह लेखक भी वहाँ मौजूद होता और उसका भी मन करने लगता कि सन्देशी मेरी भी याद बाबा को दे दे। तब बाबा मन के भावों को जानकर सन्देशी को कहते "बाबा को कहना, जगदीश बच्चा भी बहुत-बहुत याद दे रहा था!" ऐसा कहकर वे मुसकराते हुए प्रेम-भरी आँखों से हमारी ओर देख लेते कि हम उछलकर बाबा को अपनी बाँहों में ले लेते और बाबा हमें अपनी बाँहों में ले लेते। फिर जब हम बाबा की ओर देखते तब भी हम यही पाते कि हमें स्नेह का स्पर्श देते हुए भी बाबा स्वयं शिव बाबा ही की याद में हैं क्योंकि उनके मुखारविन्द से ये शब्द प्रवाहित होते "बच्चे, तुम बाबा को ज़्यादा याद करते हो या बाबा तुम्हें ज़्यादा याद करते हैं? देखो बच्चे, बाबा कितना मीठा है। उसे याद करते ही कितना खुशी का पारा चढ़ जाता है। ऐसे बाबा को भला भुलाया जा सकता है?...."
फिर जब भोग लगता तब भी कभी बाबा कहते "देखो तो, यह संगम का समय कितना सुहावना है! डायरेक्ट शिव बाबा के यज्ञ से यह भोग प्राप्त करने वाले आप बच्चे कितने सौभाग्यशाली हो! भले ही देवताओं को सब पदार्थ प्राप्त होंगे परन्तु शिव बाबा का यह भोग तो उन्हें भी नसीब नहीं होगा। ओहो हो बच्चे, कोई सोचे तो उसके कपाट खुल जायें। शिव बाबा का यज्ञ-प्रसाद अथवा भोग, और बाबा के साथ भोजन करने का अवसर यह कोई कम बात थोड़े ही है!"
बाबा की एक-एक बात से ऐसा लगता कि शिव बाबा से उनका इतना घनिष्ठ प्यार है, उनके आत्मन में शिव बाबा की प्रीति ऐसे तो रम गई है कि वो उनके हर बोल एवं हर कर्त्तव्य में स्वाभाविक रूप से झर-झर होकर प्रवाहित होती है और दूसरों को भी उसकी रौ में बहा देती हैं। उस रौ में कभी बाबा कहते "मैं उसकी सजनी हूँ।" फिर कभी वे यह भी कहते कि 'वो मेरी बहन है।' कभी वे कहते "मैं उसका मुरब्बी बच्चा हूँ; शिव बाबा मुझसे बहुत प्यार करता है।" जब वे ऐसा कह रहे होते तब उनकी मुख-मुद्रा और उनके नैन-बैन देखने वाले होते। अपना अनुभव सुनाते हुए वे कहते कि स्नान करते समय मुझे ऐसा लगता है कि बाबा ही इन हाथों से लोटे भर-भर कर मुझे नहला रहे हैं। इसी प्रकार, भोजन करते हुए बाबा के हाथों की गति इस प्रकार की लगती जैसे कि वे ऐसा अनुभव कर रहे हों कि मानो शिव बाबा ही उन्हें एक बालक की न्यायीं खिला रहे हों। सचमुच, उनका इतना प्यार था, इतना प्यार था कि दोनों बाबा अंग-संग रहते! संसार में ऐसी कई प्रसिद्ध प्रेम-कहानियाँ सुनी गई हैं जिनके अनुवाद देश- देशान्तरों में विविध भाषों में हुए-हुए हैं परन्तु ऐसा अटूट, एक-रस, निर्मल, सर्वांगीण सर्वोच्च प्यार न कभी सुनने को, न पढ़ने को और न कल्पना करने को मिला है और न मिलेगा।
बाबा की याद और प्यार की लम्बी दास्तान कहाँ तक सुनायें, कैसे सुनायें? बाबा की सारी अलौकिक जीवन कहानी ही एक सर्वोच्च प्रेम- कहानी है। जैसे कोई प्रेमिका अथवा प्रेमी अपने स्नेह-भोजन के लिए अपना सर्वस्व लुटा देता है, ऐसा तो बाबा ने इस प्रेम-द्वार में प्रवेश करते ही पहले ही क्षण-पल में कर दिया। हम मीरा के गीत सुनते हैं कि वह प्रेम-दीवानी हुई और उसने लोक-लाज खोई, परन्तु बाबा की जीवन-गाथा में तो प्रेम का वह रूप सर्वांगीण रूप में पनपा है। बाबा ने उस प्रभु-प्रेम में न केवल लोक-लाज खोई बल्कि संसार में जितने भी रूपों में अथवा जितने भी सम्बन्धों में प्रेम की अभिव्यक्ति होती है, उन सभी सम्बन्धों में शुद्ध प्रेम की एक तीव्र धारा बाबा के जीवन में देखने को मिलती और बाबा का प्रेम एक ऐसे प्रभु के प्रति प्रेम नहीं था जिसका कोई दैहिक रूप हो और जिसके बारे में आत्मा को केवल धुँधली ही पहचान हो बल्कि बाबा का प्यार उस प्रियतम के पूर्ण परिचय को लेकर उससे वैसे ही ताल-मेल बनाये हुए था जिसमें बिछोह का नाम नहीं था, विरह-अग्नि नहीं थी, व्यथा और पीड़ा को स्थान नहीं था बल्कि माधुर्य, लालित्य और आत्मीयता का परम उत्कर्ष था।
सारा दिन अशरीरी शिव बाबा का मनन-चिन्तन, स्मरण, गुणानुवाद, गायन आदि करते-करते वे काया के आभास और माया के प्रहार से परे होते गये थे और उनकी स्थिति ऐसी होती गई थी कि जैसे देह में होते हुए भी वे न हों। उनकी निद्रा भी नहीं रही थी बल्कि उसमें सुषुप्ति का अंश तो आटे में नमक के समान ही रह गया था, या शायद इतना भी न था क्योंकि शायद उसमें भी वे विश्व-सेवा के स्वप्न देखते और शिव बाबा से बातें करते। उनकी इस योगारूढ, सदा जागती ज्योति के समान अवस्था का सुफल यह था कि जब कोई भी उनके निकट आकर बैठता तो उनकी योग-दीप-शिखा उस व्यक्ति की ज्योति को भी जगा देती। कोई उनकी आँखों में देख लेता तो वह इस दुनिया से कहीं दूर एक सूक्ष्म सुखमय लोक में पहुँच जाता। कोई भी पुरुषार्थ किये बिना वह एक पंख के समान हल्कापन अनुभव करता, कम-से-कम उतने समय के लिए तो उसमें देह और संदेह का भाव मिट जाता। उसका पुराने-से-पुराना मनो-विकार भी शान्त हो जाता और उसे एक अचिन्त्य, अवर्णनीय शान्ति का अनुभव होता। किसी को तो बाबा के मुखमण्डल पर और उसके आस-पास प्रभा-मण्डल दिखाई देता जिसे वह देखता ही रहता। गोया बाबा की निकटता मात्र से बिना बताये - मूक स्थिति में भी यह परिचय मिल जाता कि वह बाबा क्या कर्त्तव्य करते हैं और कैसी सृष्टि स्थापना कर रहे हैं और यह भी मन में विचार आता कि ऐसी आत्म-स्थिति की अवस्था किंवा देह से न्यारेपन की स्थिति बड़ी मधुर है और सहज ही हो सकती है।
सादगी बचत और सदव्यवहार
बाबा सादगी का एक उत्तम नमूना थे। वे एक छोटे-से कमरे में रहते थे जो पुराने ढंग का था और जिसकी छत भी पक्की नहीं बनी हुई थी बल्कि टीन की चादरों से बनी हुई थी और है। उसी कमरे में वे आगन्तुक लोगों से, अतिथियों से और वत्सों से मिलते भी और उसी में पत्र भी लिखते। वहीं आकर उन्हें कोई अपने मन का हाल भी बताता, परामर्श भी करता तथा मार्ग-प्रदर्शना भी लेता। वही कमरा उनका शयनागार भी था, उनका भोजन-गृह (Dining Room) भी, उनका छोटा कार्यालय भी और मिलन-मुलाकात का कमरा (Drawing Room) भी। वहाँ न कोई आधुनिक प्रकार का फर्नीचर रखा रहता, न उसमें कोई गलीचा बिछा था, न वह वातानुकूलित (Air Conditioned) था और न ही वहाँ कोई डबल फोम (Double Foam) पड़ा था, बल्कि एक बड़ी-सी गद्दी थी जिस पर वे स्वयं भी बैठते और कई बार वत्सों को भी बिठाकर प्यार, पुचकार और दुलार देते तथा अपने हाथों से मितष्ठान (टोली) देते। परन्तु स्वच्छता में वह कमरा अनुपम था। बिस्तर पर सफ़ेद चादर बिछी हुई, दीवारों पर सफ़ेद चूना हुआ- हुआ, गद्दी भी सफ़ेद वस्त्र से ढकी हुई और यहाँ तक कि कमरे की अल्मारी भी सफ़ेद रोगन से शोभायमान थी। उसमें जब श्वेत वस्त्राधारी बाबा के सामने बैठते और उनकी पावनकारी वार्ता सुनते तो मन की कालिमा भी मिट जाती और वह भी निर्मल तथा उज्जवल हो जाता।न कमरे की कोई विशेष साज-सज्जा थी और न कोई बनाव-ठनाव, परन्तु उस कमरे में बैठकर सेवा-मूर्ति बाबा ने कितनी आत्माओं को एक नया जीवन प्रदान किया होगा, कितनों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करके माया से युद्ध जीतने के योग्य बनाया होगा! कितनों ने वहाँ बैठकर प्रभु-मिलन का सुख पाया होगा और ईश्वरार्पित होने का संकल्प लिया होगा! न बाबा के तन पर कोई बनावटी श्रृंगार था, न बाबा के कमरे में !!
बाबा कहते, "बच्चे, इस ईश्वरीय सेवा में जिस-किसी ने एक पैसा भी अर्पित किया है, उसका वह पैसा भी एक लाख रुपये से अधिक मूल्यवान है और वह मनुष्यात्माओं को पावन बनाने तथा उनको शान्ति देने की सेवा के लिये है, उसे हम अपने सुख-भोग के लिये खर्च नहीं कर सकते वरना वह "अमानत में ख्यानत होगी।" उन दिनों पाण्डव भवन में एक नव-भवन भी बना था। जिसमें अनेकानेक कमरे थे।, कई वत्स बाबा से कहते, "बाबा, अब आप उनमें से किसी कमरे में क्यों नहीं आ जाते?" तब कभी तो बाबा कहते, "बच्चे, अब तो इस दुनिया को भी छोड़ना है, इस कमरे की क्या बात करते हो? अब तो फर्श से अर्श में जाना है।" दूसरे किसी अवसर पर वे कहते "बच्चे, इस दुनिया में कुछ भी नया नहीं, नया तो अव सतयुग में जाकर बनायेंगे, यह तो सारी दुनिया ही पुरानी है। बाबा ने पुराना तन लिया है, अपना योग भी पुरातन से है तो कमरा भी पुराना ही ठीक है।" ऐसा कहते हुए वे मुस्करा देते और प्यार से कहते कि "नया मकान तो आप सर्विसएबल (Serviceable) सिकीलघे बच्चों के लिए प्यार से बनाया है। बाबा प्यारे बच्चों को वहाँ रहा कर खुश होते हैं।" कभी बाबा यह भी कहते "बाप तो बच्चों को सुख देने आया है; बाप बच्चों का सदा सर्वेन्ट (Servant सेवाधारी) होता है तभी तो लौकिक बाप भी बच्चों को पैदा कर उनके लिए जीवन भर कमाता है और उन्हें विरासत (Inheritance) देता है। बाप का जो कुछ भी होता है, वह बच्चों के लिये होता है। अतः यह भी आप बच्चों ही के लिये है, यह बाप तो विश्व-सेवक (World servant) है न। सेवक तो सर्वेन्ट्स क्वार्टर (Servants quarters) में रहते हैं। नये मकान में तो मालिक रहता है और आप तो "बालक सो मालिक है।" इस प्रकार, बाबा के त्याग, सेवा और उनकी सादगी की क्या दासतान सुनायें!!
उनका आहार अल्प, खर्च अल्पतम और उनकी सेवा अथक तथा उनके स्नेह की छाप अमिट थी। वे भद्रता, सज्जनता,आतिथ्य और सत्कार के आदर्श देवता रहे। मधुबन में आकर जो कोई भी कहता,वह चाहे किसी कारखाने का दैनिक वेतन (Daily Wages) पर कार्य करने वाला अशिक्षित व्यक्ति हो और चाहे शिक्षित एवं बुद्धिजीवी, समाज का कोई विशिष्ट एवं मान्य व्यक्ति हो, बाबा का प्यार सभी के लिये पितृवत था। वे सभी को विशेष आत्मा (V.I.P.) मानकर उनसे संभाषण करते। उन्होंने कभी किसी को व्यक्तिगत रूप से फटकार,ललकार (Challenge) या डांट-डपट नहीं दी बल्कि वे सदा सभीसे सुकोमल, सुमधुर, सद्भावनापूर्ण और सम्मान सहित शब्दों से वार्ता करते। सदा उच्च स्थिति में रहते हुए, महानता के शिखर पर बैठे हुए वे सभी को महान बनाने की चेष्टा करते और उनके साथ मर्यादित व्यवहार, श्रेष्ठ बर्ताव, शालीन रीति-नीति और सत्कारपूर्ण विधि से बर्ताव करते। उनके मीठे बोलों, उनकी मीठी दृष्टि, उनके मधुर व्यवहार, ज्ञान की मीठी बातों और उनकी मीठी मुस्कान और "मीठे बच्चे" कहकर पुकारने के कारण ही तो उनके निवास का नाम पड़ा,"मधुबन-तपोवन"
आज भी बाबा का वह कमरा सेवा के निमित्त है। उस कमरे में वही चारपाई मौजूद है, वही गद्दी बिछी है, वहाँ वही सफेद अल्मारी भी है, परन्तु बीचकी एक दीवार निकाल दी गई है जिससे वह कमराअब बड़ा हो गया है। बाबा ने उस कमरे में रात-दिन जो सेवा की, वह अविनाशी हो गई। उस वायु-मण्डल में त्याग, तपस्या, सेवा, सादगी, स्नेह, माधुर्य, वात्सल्य, दुलार के प्रकम्पन-स्पन्दन और सुगन्धित तरंगें अभी भी वहाँ बैठने वाली आत्माओं को प्रभावित करती हैं। बाबा का वहाँ रखा ट्रांसलाईट (Translight) आज भी संदेश और निर्देश देता हुआ तथा स्नेह और वात्सल्य की भाव-तरंगों से तरंगित करता हुआ तथा दृष्टि लेना चाहने वालों को दृष्टि देता हुआ, पूछने वालोंको प्रश्नों का उत्तर और मिलना चाहने वालों से मिलन-मुलाकात करता हुआ प्रतीत होता है। बाबा फर्श से अर्श पर चले जाने के बाद भी, अथवा व्यक्त से अव्यक्त होने के बाद भी, उस कमरे में आने वालोंसे मिलते हैं, उनको सूक्ष्म वरदान देते हैं, उन्हें कमियाँ दूर करने की विधि बताते हैं और उन्हें वहाँ से खाली नहीं भेजते वे उन्हें कोई-न-कोई सूक्ष्म सौगात देते हैं। कोई पृथ्वी पर स्थित निकट स्थान से आता है और कोई दूर से परन्तु बाबा सूक्ष्म लोक से आकर स्नेही वत्सों से स्नेह पूर्वक मिलते हैं।
आओ, आज हम उस ऐसे मीठे बाप को जान व जिगर से, तन और मन से, अपनी हर तार, हर नस से, दिल की तह से शुक्रिया अदा करें कि जिसने रूहानी प्यार से हमें 'मीठे बच्चे' कहा। हमारे लिए अपनी सर्व-सम्पत्ति और सर्वस्व लगा दिया, हमारे लिये अपने सम्पत्तिमय जीवन को समाप्त कर, अपनी नींद व अपने आराम को छोड़कर, लोगों की निन्दा, कटु आलोचना, विरोध और हंगामों को सहन कर हमें मनुष्य से देवता बनाने के लिए अपनी हड्डी-हड्डी भी दे दीं कि जिन अस्थियों पर भी बना हुआ शान्ति स्तम्भ आज हमें विश्व को शान्ति देने की प्रेरणा देता है और हम में सेवा, त्याग तपस्या तथा एकता के नये प्राण फूंकता है।
सादगी, बचत और सद्व्यवहार
बाबा का अपना जीवन तो अत्यन्त सादा और मन अत्यन्त सरल था और उनका अपना कमरा, लिबास और खान-पान भी कम खर्चीला तथा बहुत सादा था ही, और वह सफेदपोश और अल्पाहारी भी थे ही, परन्तु विशेष बात यह है कि उन्होंने अपने प्रेक्टिकल जीवन से हज़ारों लोगों को प्रेरित किया। उन द्वारा नियत किया गया यूनिफार्म ये सफ़ेद वस्त्र स्वच्छता और सादगी का प्रतीक है। रंगीन लिबास में तो बहुत विविधता (वैरायटी) होती हैं, अतः वे तो अनेक प्रकार के और मूल्यवान तथा खर्चीले भी हो सकते हैं। अतः श्वेत वस्त्र यूनिफार्म के रूप में पसन्द करके बाबा ने इस निर्धन भारत के हज़ारों-लाखों नर-नारियों को सादगी तथा स्वच्छता का पाठ पढ़ाया। ज्ञान रूपी आभूषणों से आत्मा को सजाने की शिक्षा देकर उन्होंने हज़ारों को स्वेच्छा से फैशन को तिलांजलि देने के लिए प्रेरित किया। न केवल बहुत लोगों ने जेवरों तथा फैशन को छोड़ दिया बल्कि कईयों ने घड़ी लगाना भी इस विचार से छोड़ दिया कि आज तो स्थान-स्थान पर घड़ी लगी हुई है तथा हरेक के पास घड़ी है, तब घड़ी पर भी खर्च करने से क्या लाभ, इसे श्रृंगार अथवा दिखावे के लिए पहनने का क्या अर्थ ?
बाबा ने ऐसा उच्च बनाया कि स्वतः ही हज़ारों नर-नारियों ने सिनेमा जाना, होटलों में खाना, व्यर्थ के रस्म-रिवाजों पर रुपये गँवाना भी छोड़ दिया। इस प्रकार कर्मेन्द्रियों पर कन्ट्रोल होने से तथा सादगी से, न केवल उनकी आत्मिक उन्नति हुई बल्कि आर्थिक बचत भी हुई। जो लोग आर्थिक रूप से पहले सदा तंग रहते थे, अब उनके जीवन में कुछ सहूलियत हुई तथा वे अपने धन को व्यर्थ ही गँवाने की बजाय लोक- कल्याणार्थ प्रयोग करके अपनी खुशी में वृद्धि करने लगे। बाबा केवल धन की बचत ही नहीं बल्कि संकल्पों की बचत भी सिखाते तथा व्यर्थ वचनों द्वारा भी शक्ति गँवाने से बचने का आदेश देते।
सबके शुभचिन्तक
बाबा कभी भी किसी का अशुभ अथवा अमंगल नहीं सोचते। दूसरों को भी वे सदा यही शिक्षा देते कि न किसी के अकल्याण की बात सोचो और न कभी मुख से अशुभ बोलो। हम पहले बता आये है कि बाबा यह कहा करते कि जिस-किसी जिज्ञासु को आप ईश्वरीय ज्ञान सुनाने लगते हैं, उसके लिए भी पहले मन-ही-मन शिव बाबा को याद करके कहो "शिव बाबा! यह भी किसी तरह ज्ञान समझ जाय, इसकी भी अन्तरात्मा के कपाट खुल जायें और इसका कल्याण हो जाय" और फिर जब आप योग में बैठें तो उस अवस्था में उस व्यक्ति को भी अपनी अन्तरदृष्टि के सामने लाकर उसे योग का दान दें ताकि उसका मन निर्मल हो जाय और ईश्वरीय ज्ञान का बीज उसमें भी अंकुरित हो।" देखिये तो साकार ब्रह्मा बाबा किस पराकाष्ठा तक सभी के शुभ-चिन्तक थे!
बाबा केवल नये आये जिज्ञासुओं ही के लिए शुभ-चिन्तक होकर उन पर परिश्रम करने का निर्देश नहीं देते बल्कि जो लोग कुछ समय तक ज्ञान लेते रहने के बाद किसी-न-किसी परिस्थिति अथवा मन की चंचलता के कारण ज्ञान छोड़कर चले जाते, उनके बारे में भी बाबा कहते कि
"बच्चे, फिर-फिर उन लोगों के पास जाकर उन्हें आलस्य अथवा अज्ञान की निद्रा से कोई जगाता रहे।" बाबा कहते कि - "ईश्वरीय ज्ञान को छोड़कर वे बेचारे कहाँ जायेंगे, उनका कल्याण कैसे होगा? यद्यपि आज वे माया से आच्छादित होकर अथवा अपने किसी पूर्व संस्कार-वश, इस अनमोल ईश्वरीय खज़ाने से लाभान्वित नहीं होते परन्तु आप द्वारा सन्देश, स्मृति, चेतावनी, निमन्त्रण आदि मिलते रहने पर कभी-न-कभी वे इस कलियुगी, दुःखमय संसार से ठोकर खाकर जाग ही जायेंगे।" इसलिए बाबा कहते कि आप बच्चे अपना कर्तव्य करते चलो।
बाबा इतने विशाल हृदय वाले तथा शुभ-चिन्तक थे कि जिन माताओं-कन्याओं को उनके लौकिक सम्बन्धी ज्ञान से लाभान्वित होने से रोकते अथवा उन पर सितम ढाते, उनको भी बाबा कहते कि - "यद्यपि उन लोगों ने आपके साथ अपकार, अनर्थ, अन्याय और अत्याचार का व्यवहार किया है तथापि आप उनकी ज्ञान-सेवा करके तथा उन्हें योग का दान देते हुए उनका कल्याण करने का पुरुषार्थ करते रहो। बच्चे, आप उनसे भी घृणा न करो। वे बेचारे परमपिता को पहचानते नहीं हैं और ब्रह्मचर्य आदि के महत्त्व को जानते नहीं हैं।इसलिए अज्ञानतावश आप पर अत्याचार करते हैं परन्तु आप सदा उनका शुभ सोचो; अन्ते, एक दिन, उनका भी आत्मन जाग जायेगा!" देखिये तो, बाबा उनके प्रति भी शुभचिन्तक बने रहने की शिक्षा देते जिनसे कि दुःख मिलता रहा हो!
सभी के शुभचिन्तक बन बाबा रात-रात भर नींद त्याग कर भी मनुष्यात्माओं को पावन बनाने तथा योग-युक्त करने के लिए, उन्हें प्रभु-परिचय देने की योजनाएँ बनाते रहते और हर आये दिन वे लोगों की ज्ञान-सेवा की कोई-न-कोई नई विधि और नई योजना बनाते रहते। कभी वे कहते कि शिव बाबा के मन्दिर में जाकर शिव-भक्तों को यह बताओ कि शिव बाबा का क्या परिचय है? कभी वे श्रीकृष्ण-भक्तों को श्रीकृष्ण के पुनरागमन का संदेश देने के लिए प्रेरित करते, कभी वे अन्य मतावलम्बियों को अन्य रीति से प्रभु-परिचय देने के लिए साधन और विधि बताते। दीपावली, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, दशहरा, होली आदि-आदि सभी त्यौहारों पर विशाल उत्सव का आयोजन करके, लोगों को आमंत्रित करके, उन्हें इस अवसर पर जगाने का प्रोग्राम भी बनाते तथा कराते रहते। हर व्यवसाय तथा हर मत वाले मनुष्य को समझाने की विधि वे सिखाते। जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं होगा और समाज की ऐसी कोई भी समस्या नहीं रही होगी जिस पर उन्होंने ज्ञान-प्रकाश न डाला हो। यह सब वे इसलिए करते ताकि किसी भी बात पर चर्चा हो रही हो अथवा कोई भी अवसर हो उससे सम्बद्ध करके लोगों को ईश्वरीय ज्ञान दिया जा सके।
बाबा को लोक-कल्याण का इतना विचार रहता कि वे सबको यही कहते "बच्चे ! कोई भी ऐसा कर्म न करो अथवा ऐसा वचन न बोलो जिसका अनुकरण करने से किसी की गिरावट हो।" वे स्वयं तो सदा शुभचिन्तक होकर सेवा में लगे रहते ही और अन्य वत्सों को भी कहते - "देखो बच्चे ! भक्त उस प्रभु को पुकार रहे हैं जब कि वह इस धरा पर आकर कर्त्तव्य कर रहे हैं। क्या उन भक्तों की पुकार आपको सुनाई नहीं देती? तनिक एकान्त में बैठकर देखो तो आपको ऐसा मालूम होगा कि वे बेचारे उस प्रभु अथवा परमात्मा के मिलन के प्यासे हो उसे पुकार रहे हैं। तो क्या आप उन्हें शिव बाबा का सन्देश, आदेश और परिचय सुनाकर तृप्त नहीं करोगे?" इस प्रकार वे स्वयं सर्व के, प्रेक्टिकल रीति शुभचिन्तक हो दूसरों को भी शुभ चिन्तक बनने और शुभचिन्तन करने की शिक्षा देते रहते।
अपार उत्साह और अदम्य हिम्मत
बहुत कोशिश करने पर भी यदि कोई कार्य सम्पन्न न होता तो वे भी अन्तिम क्षण तक बाबा उसके लिए पूरा प्रयत्न करते तथा कराते रहते। पुरुषार्थ की चरम सीमा देखनी हो और हिम्मत तथा हौसले की पराकाष्ठा जाननी हो तो ये दोनों साकार ब्रह्मा बाबा के जीवन में सदा स्पष्ट मिल सकते। कभी भी किसी ने उनमें उत्साह की कमी, पुरुषार्थ के प्रति उदासीनता या हारी हुई हिम्मत या आलस्य को नहीं देखा होगा। उन्हें कोई भी कार्य अधूरा छोड़ना, अपूर्ण रीति से करना अथवा बिना कोई परिणाम निकाले उसे छोड़ देना अच्छा न लगता। अतः वे बार-बार किसी कार्य के पीछे वत्सों को लगाकर भी उन्हें हिम्मतवान बनाते हुए सफलता तक लाने में तत्पर रहते। हम पिछले पृष्ठों में, नई देहली में राजौरी गार्डन में ली गयी ज़मीन के बारे में जो बात लिख - आये हैं वह बाबा के मनोबल और उत्साह का एक ज्वलंत प्रमाण है।उसका फल है कि आखिर वह ज़मीन सरकार ने छोड़ दी और आज उस पर भवन बना हुआ है।
ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने कुछ व्यक्ति ऐसे भी आते जो कि उच्च नियमों में अथवा ब्रह्मचर्य व्रत की धारणा में अटूट व्रती होकर न रह पाते। वे बाबा से कहते "बाबा! हमारी धारणा कच्ची है; हम कोशिश करने पर भी धर्म से गिर जाते हैं....।" बाबा कहते "बच्चे, तुम्हारा योग पूरा नहीं है, संग ठीक नहीं है अथवा संस्कार बहुत खराब हैं। चलो, फिर पुरुषार्थ करो। हिम्मत मत हारो। माया के साथ युद्ध करना न छोड़ो। यदि हिम्मत हार जाओगे तो "कायर" कहलाओगे और दैवी राज्यभाग्य भी गँवाओगे! अतः फिर उठो और मन में दृढ़ प्रतिज्ञा लो तथा शिव बाबा से बातें करो तो आपको शक्ति मिलेगी, वर्ना पुरुषार्थ ही छोड़ दोगे तो सद्गति कैसे होगी....?"
इसी प्रकार, कई माताएँ बाबा से कहती "बाबा, हम ब्रह्मचर्य व्रत की धारणा करती हैं तो हमें पति द्वारा मार मिलती है...! बाबा, बहुत सितम होता है...!" बाबा कहते "बच्ची, हिम्मत मत हारो ! प्रतिदिन प्रातः उठकर शिव बाबा को याद करो और कहो बाबा, मैं पवित्र बनती हूँ और मुझे मार मिलती है, इस प्रकार मेरा पति पाप का भागी बनता है! बाबा उसको सद्बुद्धि दो और मेरा यह बन्धन छुड़ाओ...." इस प्रकार आप प्रतिदिन उस परमपिता के पास आवेदन (एप्लीकेशन Application) डालती जाओ। जब उन सूक्ष्म आवेदन पत्रों की फाईल बड़ी हो जायेगी तो शिव बाबा ज़रूर कुछ करेंगे ही। बच्ची हिम्मत मत हारो! इतनी उच्च प्राप्ति के लिये यह सहन करना कोई बड़ी बात नहीं......!"
इसी तरह कई बार जब कई अज्ञानी लोग किन्हीं सेवा-केन्द्रों पर ब्रह्माकुमारी बहनों का कड़ा विरोध करते तथा अत्याचार करते तो वे बाबा को समाचार लिखतीं कि "बाबा, परिस्थिति बहुत विकट है....!" पिछले पृष्ठों में हापुड़ का जो किस्सा हम लिख आये हैं, वह इस प्रकार का उदाहरण है। तब बाबा कहते "बच्ची, हिम्मत करो। ईश्वर की ओर आगे बढ़ने वालों पर सितम तो होते ही हैं। ये कल्प पहले भी हुए थे; इसलिए यह कोई नई बात नहीं है। (Nothing new, नथिंग न्यू)। यह पार्ट तो आपने असंख्य बार बजाया है....." इस प्रकार जिसे मानव-हृदय भयावह और "विकट स्थिति" मानता, उसके बारे में भी बाबा हिम्मत बंधाते और कहते कि इस सृष्टि रूपी ड्रामा को साक्षी होकर देखो यह सभी दृश्य बदलते जायेंगे......"
माताओं का सम्मान
बाबा कन्याओं-माताओं का सदा सम्मान करना सिखाते। कभी वे कहते कि इन कन्याओं-माताओं को ही ज्ञान-कलश देने तथा इनका मर्तबा (स्थान) उच्च बनाने के लिए ही शिव बाबा आए हैं क्योंकि बहुत काल से इन पर बहुत सितम होते रहे हैं और समाज में इनका अपमान तथा तिरस्कार भी होता आया है, परन्तु अब इनके कारण मुझे भी बीच में यह ज्ञान सुनने का अवसर मिल जाता। "देखिए तो,बाबा कितनी नम्रतापूर्वक, स्वयं को गुप्त करके माताओं बहनों को प्रत्यक्ष करने की कोशिश करते! कभी वे कहते कि मातायें-कन्यायें तो मुझसे भी अधिक ज्ञान में प्रवीण हैं क्योंकि ये भिन्न-भिन्न संस्कारों और योग्यताओं वाले मनुष्यों को ज्ञान देती हैं और भाषण भी करती हैं। यही वास्तव में पतित-पावनी गंगायें हैं। इन माताओं को "वन्दे मातरम्"कहना चाहिए। इस प्रकार वे माताओं का मान करते वे उन्हें सहारा देने के निमित्त बने और उनका स्थान ऊँचा करनेके लिए उन्होंने स्वयंको अप्रत्यक्ष किया। वे सदा कहते "मैं तो उनका सेवक हूँ।" माताओं को सहारा देने के कारण उन्हें लोगों की इतनी आलोचनायें सुननी पड़ी,इतने कष्ट भी सहन करने पड़े, परन्तु इसके लिए उन्होंने सब कुछ किया। और अन्य जो लोग हुए, उन द्वारा स्थापित संस्थाओं का नाम प्रायः उनके अपने व्यक्तिगत नाम के आधार पर रखा गया। उदाहरणके तौर पर ईसा द्वारा स्थापित धर्म "ईसाई धर्म" कहलाया, और उनकी संस्था ईसाईयोंकी संस्था कहलायी यही बात बुद्ध, अरविन्द आदि के बारे में भी कही जा सकती है। उन संस्थाओं के नाम पुरुषोंको प्रधानता देने वाले मालूम होते हैं परन्तु बाबा ने कन्याओं-माताओंको आगे रखते हुए इसका नाम "प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय" रखा। आज संस्थाओं के नाम पुरुष-प्रधान होने के कारण ही कई लोग इस विश्व विद्यालय का ऐसा नाम देखकर पूछते हैं कि शायद यह केवल माताओं के लिए है। यह कितनी उच्च बात है कि स्वयं इसकी स्थापना के निमित्त बनकर भी बाबा सदा इसका मुख्य (हेड) ब्रह्माकुमारी मातेश्वरी सरस्वती ही को बताते। बाबा ने अपना तन-मन-धन, सभी कुछ इन माताओं-कन्याओं की सेवा में लगा दिया और मातेश्वरी सरस्वतीको निमित्त मानकर हवाले कर दिया।आज भारत तथा विश्व के ७२ देशों से भी अधिक स्थानों पर ४५०० सेवाकेन्द्र हैं। इसके अतिरिक्त प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित गीता पाठशालाओं व उपसेवा केन्द्रों द्वारा भी यह ईश्वरीय कार्य निर्विघ्न रूप से चल रहा है। यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय पिछले ६२ वर्षों से निरन्तर मानव मात्रकी सच्ची सेवा करता आ रहा है और वर्तमान में भी बड़े ही धूमधाम से यह ईश्वरीय विश्व विद्यालय विश्व के सभी मनुष्यात्माओं को परमात्मा पिता का पैगाम देने का ईश्वरीय कार्य कर रहा है। इन केन्द्रों को कन्यायें-मातायें ही चला रही हैं। माताओं के लिए इतना उच्च कार्य आज तक किसीने भी नहीं किया। इतनी अधिक संख्या में किसी ने भी उन्हें पवित्रताके पथ पर चलाकर ऐसा महान नहीं बनाया।
साधनों की पवित्रता पर ध्यान
कार्य को सम्पन्न करने के लिए बाबा सदा साधन भी उच्च अपनाते। वे कभी ज्ञान-विरुद्ध अथवा निम्न कोटि का साधन न अपनाते और न अपनाने देते। यदि वे चाहते तो इस अच्छे कार्य के लिए अतुल धन मिल सकता था परन्तु उन्होंने सदा यह नियम अपने सामने रखा कि इस ईश्वरीय कार्य में ऐसे मनुष्यों से धन नहीं लिया जा सकता जिनके जीवन में ब्रह्मचर्य की धारणा न हो तथा जो ईश्वरीय योग युक्त न हों। ऐसे कई अवसर सामने आये जबकि ब्रह्माकुमारी बहनोंको उनके लौकिक सम्बन्धियों से चैक (Cheque धनादेश) भेजे या इस संस्था के प्रशंसक लोगों ने धन दान देने की इच्छा प्रकट की। परन्तु बाबा ने उन लोगों से पैसा लेने से इन्कार कर दिया जो कि अपने जीवनको पवित्र और योग-युक्त बनाने का पुरुषार्थ न करते हों।
इस नियम के कारण बहुत-से लोग प्रायः यह भी प्रश्न करते रहते कि यज्ञ का खर्च कैसे चलता है अथवा पैसा कहाँ से आता है? परन्तु बाबा ने सदा इन सबका सामना किया किन्तु साधन की उच्चता के असूल को नहीं छोड़ा। वे चाहते तो सबसे दान स्वीकार कर सकते थे और धर्म-प्रेमी लोगों से चन्दा भी इकट्ठा किया जा सकता था परन्तु बाबा ने सदा इसके लिए मना ही किया। बाबा कहते कि ईश्वरीय कुल की सन्तान होकर चन्दा माँगना योग्य नहीं। दूसरे की सेवा कर उन्हें पवित्र बनाये बिना उनसे आर्थिक सेवा लेना ज्ञानोचित्त नहीं। अतः आप केवल उन्हीं से आर्थिक सहयोग लो जो कि ज्ञान के नियमों के अनुकूल अपने जीवन को ढालते हैं।
इसी प्रकार, बाबा किसी भी कार्य को करने के लिए कोई निकृष्ट अथवा भ्रष्ट आचरण अपनाने का या हिंसात्मक रीति अथवा अशुद्ध वचनों का सहारा लेने का निषेध करते। बाबा कहते "जैसे आपका - लक्ष्य उच्च है और ज्ञान उच्च है, वैसे ही आपको साधन भी सदा उच्च ही अपनाना चाहिए। बाबा कहते कि वीणा की मधुर तान सुनकर साँप भी वशीभूत हो जाता है तो ईश्वरीय ज्ञानके मधुर आलाप से क्या लोक-कल्याणार्थ काम भी नहीं करा सकते? बच्चे, यदि आप योग- युक्त अवस्था में टिक कर आत्मिक दृष्टि देते हुए, पवित्रता के नियमों में रहते हुए इस सर्वोच्च ईश्वरीय ज्ञान को कहीं भी मधुरतापूर्वक कहेंगे तो आपकी वाणी में वह जौहर होगा तथा आपकी अव्यक्त शक्ति ऐसा कार्य करेगी तथा शिव बाबा की आपको ऐसी मदद मिलेगी कि यदि वह कार्य होने में कल्याण होगा तो वह हो ही जायेगा...... परन्तु आप निकृष्ट साधन कभी न अपनाओ।"
सदा स्नेही और सदा सहयोगी
बाबा सबको इतना तो स्नेह और सहयोग देते कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता। बाबा कहते "बच्चे, जैसे किसीका कोई खानदानी हकीम (Family doctor; फैमिली डॉक्टर) होता है तो परिवार में किसी भी सदस्य को कोई तकलीफ होने पर वे निःसंकोच होकर उसका (डॉक्टर) का दरवाज़ा खटखटाते हैं, इसी प्रकार, मैं भी आपका रूहानी फेमिली डॉक्टर हूँ। आपको कोई आत्मिक रोग हो, कोई भी समस्या हो, आप मेरे पास आ सकते हैं। इस प्रकार, बाबा सभी से मन का हाल पूछकर उन्हें हर प्रकार की राहत देते। वे प्रतिदिन क्लास में पूछते "बच्चे, स्थूल या सूक्ष्म कोई भी सेवा हो तो लज्जा न करना। अपने इस पिता को बता देना.....।" वे प्रेक्टिकल रीति से सभी को इतना तो स्नेह, मार्ग दर्शन तथा हल (Salvation सेल्वेशन) देते कि सभी यह अनुभव करते कि यही हमारा सच्चा बाप एवं मित्र है।
एक बार की बात है कि किसी ग्राम से कुछ व्यक्तियों का एक ग्रुप आबू में बाबा के यहाँ आकर ठहरा हुआ था। अचानक से एक रात्रि को वर्षा हुई और सर्दी भी अधिक पड़ने लगी। वे लोग सभी एक टैन्ट में सोये हुए थे। नींद में ही बाबा को उठने का संकल्प आया। बाबा उठे और तुरन्त उस टैन्ट में चले गये। वे सभी देखकर आश्चर्यचकित हुए कि इस समय वृद्ध शरीरधारी बाबा सर्दी में क्यों आये हैं। बाबा बोले - "बच्चे, सभी चलो, बाबा के कमरे में चलकर सोओ! भले ही जगह थोड़ी है परन्तु रात्रि निकल जायेगी। बाबा सभी को कमरे में ले आये। सभी ने मन में सोचा कि देखो बाबा सबका कितना ध्यान रखते हैं। अनेकों के जीवन में न जाने कितने संकट आये होंगे परन्तु अपने लौकिक तथा पारमार्थिक सभी विघ्नों को हरने के लिए, वे बाबा से ही दिल खोलकर राय लेते। उनका स्नेह बाबा से इतना तो जुट जाता कि आबू से विदा लेते समय उनकी आँखें तर हो जातीं।
निर्भयता तथा सभी को सम्मान देने का गुण
बाबा सदा सभी को सम्मान देते, हालाँकि हर दृष्टि से ये सभी उनसे बहुत छोटे होते। जब कभी बाहर से कोई उनके यहाँ आते तो वे उनका आतिथ्य, अथवा उनकी खूब "खातिर-तवाज़ोह" करते और उनकी महिमा भी करते। कई बच्चे स्वयं ही कह देते "बाबा हममें जो कमियों हों वह आप हमें सम्मुख ही बता दीजिये।" बाबा कहते, "नहीं बच्चे, बाबा तो सभी का सम्मान करता है; आप सर्विसएबल बच्चे हैं, लोगों के कल्याण के निमित्त बने हुए हैं; शिव बाबा तो प्रतिदिन शिक्षा देते ही रहते हैं, उनको सुनकर हरेक को मालूम तो हो ही जाता है कि उसमें क्या कमी है। मीठे बच्चे, जो खामी (त्रुटि) स्वयं में समझो, उसे निकाल दो।"
अन्य सभी को भी बाबा उचित सम्मान देते। एक बार की बात है कि एक संन्यासी वहाँ आया। एक ब्रह्माकुमारी बहन ने उससे ज्ञान-चर्चा की। तब उसने बाबा से मिलने की इच्छा प्रगट की। बाबा उससे मिलने आये तो उस संन्यासी को नीचे दरी पर बैठे देखा। बाबा बोले, "बच्ची, एक गद्दी लाओ।" गद्दी लाई गई। वह संन्यासी बहुत मना करता रहा परन्तु बाबा बोले "बच्चे, आप संन्यासियों ने ही तो ब्रह्मचर्य का पालन करके भारत को गरम तवे की तरह कामाग्नि से तृप्त होने से बचाया है। अतः बाबा संन्यासियों की महिमा करता है।" संन्यासी को गद्दी देकर बाबा स्वयं नीचे दरी पर ही बैठे। वह संन्यासी बहुत अनुनय-विनय करने लगा कि बाबा भी एक गद्दी पर बैठे, परन्तु बाबा बोले, "बच्चे, मैं तो सारी सृष्टि का सेवक हूँ, मैं यहीं बैठूंगा।" संन्यासी अवाक हो गया।
इस प्रकार बाबा ने स्नेह, सम्मान और नम्रतापूर्वक व्यवहार किया। परन्तु जब बाबा ईश्वरीय ज्ञान देने लगे तब उन्होंने कोई संकोच नहीं किया बल्कि अद्वैतवादियों तथा कर्म-संन्यासियों के मत से संसार को जो हानि हुई है, किस प्रकार लोग एक परमात्मा से विमुख होकर मिध्या-रीति से स्वयं को ही 'शिव' मानने लगे हैं, उसका स्पष्टीकरण बाबा ने निर्भय होकर दिया।
इस प्रकार यदि किसी को स्वभाव में नम्रता देखनी हो तो बाबा के जीवन में उसका खूब दिग्दर्शन होता परन्तु बाबा निर्भय भी उतने ही थे। यज्ञ-कार्य में लोगों ने कितना विरोध किया परन्तु बाबा कभी भी भयान्वित नहीं हुए।
आत्म-निर्भरता
बाबा आत्म-निर्भरता के गुण की भी खूब धारणा कराते। वह उनके प्रैक्टिकल जीवन तथा शिक्षा ही का फल है, कि यहाँ प्रायः सभी स्वयं ही अपने वस्त्र धोते, अपने बर्तन साफ़ करते तथा अन्यान्य निजी कार्य करते हैं। बाबा कहते कि "हम तो स्वयं ही सेवक हैं, तब दूसरों से सेवा हम कैसे ले सकते हैं? बच्चे, अपने लिए किसी से सेवा लेना गोया अपने सिर पर बोझ चढ़ाना है। जो दूसरों से सेवा लेता है उसमें अपने बड़े होने का अभिमान आ जाता है....।" इस प्रकार की शिक्षा देकर बाबा हरेक में अपना कार्य आप कर,आत्म-निर्भर बनने तथा लोगों की ज्ञान-सेवार्थ लगे रहने की भावना भरते।
शिष्टता
बाबा दिव्य गुणों से युक्त थे और उनका व्यवहार अत्यन्त शिष्ट था, इसलिए वे दूसरों को भी शिष्ट व्यवहार के लिए प्रेरित करते। हमारा उठना-बैठना, बोलना-चलना कैसे होना चाहिये- इसके बारे में वे प्रायः प्रकाश डालते हुए कहा करते "बच्चे, फ़रिश्तों के समान बनो। जब आप चलो तब आपके पाँवों की आवाज़ नहीं आनी चाहिए। जब आप बोलो तो मधुर मुस्कान से, धैर्यवत् अवस्था में टिक कर, धीमे-स्वर से बोलो। जब आप हँसो तो कहकहों की आवाज़ नहीं आनी चाहिए बल्कि हँसी होठों तक ही रहनी चाहिये। आप सब कार्य मूवी (Movie मूवी) में करो, टॉकी (Talkie टॉकी) में नहीं.....। फ़जीलत (शिष्टता, सभ्यता) तथा उच्चता (Royalty रॉयल्टी) से बात करो क्योंकि आप सभी सर्वोत्तम ईश्वरीय कुल के तथा होवनहार देवकुल के हो!" यदि कभी क्लास में कोई जमाई देता तो बाबा उस व्यवहार को भी अशिष्ट तथा सभा के नियमों के विरुद्ध बताते और यदि कोई सभा के बीच में से उठकर चला जाता तो उसे भी बाबा समझाते कि - "इससे कइयों का ध्यान अपनी ओर खिंचवाकर आप उनका बुद्धियोग तुड़वाने के निमित्त बने.... यह तो बहुत बड़ा अकर्त्तव्य है.......?" इस प्रकार बाबा फरिश्तों जैसा शिष्ट बनने के लिए शिक्षा देते रहते और अपने जीवन से भी ऐसी प्रबल प्रेरणा देते थे।
विनोद
साकार बाबा के जीवन में अनगिनत दिव्यगुण तो थे ही, साथ-ही- साथ वे विनोदी और विनोदप्रिय भी थे। वे केवल नियमों और सिद्धान्तों ही की शुष्क चर्चा करने वाले न थे बल्कि उनकी बात सदा सरल होती और सुनने वाले ताज़गी (Refreshment
रिफ्रेशमेन्ट) महसूस करते।
एक बार की बात है कि बाबा के पास कमरे में कुछ बच्चे बैठे थे। बाबा बोले "बच्चे, मेरे कमरे में आप सभी बच्चों की अवस्था को देखने का मीटर लगा हुआ है।" सभी बच्चे कमरे में इधर-उधर देखने लगे और सोच में पड़ गए कि मानसिक अवस्थाओं को देखने के लिए कोई स्थूल मीटर कैसे हो सकता है! जब उन्हें किसी तरफ़ कुछ दिखाई नहीं दिया तो बाबा बोले" बच्चे, वह मीटर इस रेडियो में लगा हुआ है।" (बाबा के कमरे में एक रेडियो था, बाबा प्रतिदिन उस पर खबरें सुना करते थे) सभी रेडियो की ओर देखने लगे। तब सबको आश्चर्यचकित और मुस्कराता हुआ देख बाबा ने कहा - "बच्चे, जब मैं प्रतिदिन खबरें सुना करता हूँ तो उन द्वारा बच्चों की अवस्था को भी जान जाता हूँ। अगर लड़ाई तेज़ हो गई हो अथवा उसकी तैयारी जोरों पर हो, साईन्स का चमत्कार हो रहा हो तो मैं समझ जाता हूँ कि बच्चों का आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी तेज़ हो रहा है, परन्तु अगर ठण्डा समाचार हो तो समझ जाता हूँ कि आजकल बच्चों की अवस्था भी ढीली चल रही है क्योंकि साईन्स (Science) और साईलेन्स (Silence) का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध है।" बाबा की इस यथार्थ बात को सुनकर सभी हँस पड़े। देखिये तो, बाबा बात को कैसा सरल और विनोदपूर्ण रीति से कहते !
इसी प्रकार एक बार बाबा ने कहा "बच्चे, मुझसे कई लोग पूछते हैं कि यज्ञ का जो इतना खर्च चलता है उसके लिए पैसा कहाँ से आता है? उन बेचारों को यह तो मालूम नहीं कि बाबा के पास एक कुआँ है जहाँ से बाबा (धन) निकलवाता रहता है। बाबा जब उससे निकलवाता है, तब नीचे से और निकल आता है।" सुनने वाले व्यक्तियों ने सोचा कि सचमुच बाबा के पास कोई ऐसा गुप्त कुआँ है। वे बोले "बाबा, वह कुआँ कहाँ है?" बाबा बोले "बच्चे, जैसे हमारा यह पानी का कुआँ है, इसका पानी चढ़ जाता है, वैसे ही वह धन का कुआँ है, परन्तु वह गुप्त है।" उनके आश्चर्यान्वित होने पर बाबा बोले- "वह कुआँ शिव बाबा ही है। दुनिया वाले नहीं जानते कि परमात्मा, जो कि "दाता" है, उसी का यह सारा कार्य चल रहा है।
इस प्रकार बाबा के जीवन में यदि हम गुणों का वर्णन करने बैठे तो बहुत ही स्थान चाहिये। उनका वर्णन करते-करते वर्ष बीत जायेंगे परन्तु वह वर्णन समाप्त नहीं होगा?
शिव बाबा के यज्ञ की संभाल
उन दिनों बाबा प्रातः क्लास के बाद विश्राम कक्ष (Chamber) में भी वत्सों से अनौपचारिक रूप से ज्ञान-चर्चा किया करते। यह वही कमरा था जहाँ कभी दीदी जी का कार्य स्थान रहा। एक बार बाबा वहाँ वत्सों के समक्ष ज्ञान-चर्चा कर रहे थे। वत्सों ने देखा कि बाबा के एक पाँव के अँगूठे को छोटी-सी पट्टी बंधी हुई थी। एक वत्स ने पूछा - "बाबा, यह क्या हुआ है" बाबा ने कहा "बच्ची, रात्रि को जब सोया हुआ था तो स्वप्न में देखा कि इस कमरे के सामने वाली पहाड़ी पर वत्सों के वस्र सूख रहे हैं। (आजकल जहाँ आॉफिस और जिज्ञासु कक्ष है, पहले वहाँ पहाड़ी थी) तब यह भी देखा कि कुछ पशु अन्दर घुस आये हैं और वे कपड़ों को उठाकर चबाना चाहते हैं। तो बाबा ने सोचा कि उठकर इन्हें हटाना चाहिए और शिव बाबा के यज्ञ की चीज़ों को हानि पहुँचाने से बचाना चाहिए।" बाबा बोले- "मैंने जल्दी से जाने की कोशिश की तो स्वप्न अवस्था में ही जैसे ही पाँव को आगे बढ़ाया वैसे यह दरवाजा पाँव से थोड़ा-सा लगा। उससे बहुत मामूली- सी खरोंच आई है। बच्चे, थोड़ा-बहुत जो हिसाब-किताब है, वह तो सामने आता ही है और चुकता होता जा रहा है। हम ब्राह्मणों को इस यज्ञ की हरेक चीज़ की संभाल तो करनी ही है न! बच्चे, बाबा हर बात का ध्यान रखता है कि कहीं बच्चों की गफलत से शिव बाबा के यज्ञ की कोई चीज़ का नुकसान न हो। इसलिए बाबा यहाँ समय निकाल कर एक-आध चक्कर लगाकर भी देखते हैं कि कहीं कोई वस्तु व्यर्थ तो नहीं जा रही।" इस प्रकार, बाबा न केवल प्रीति-पूर्वक याद ही करते और न केवल ज्ञान में रमण ही करते बल्कि कर्त्तव्य करने में भी किसी से पीछे नहीं रहते बल्कि सभी से अधिक उन्हें ही सेवा तथा यज्ञ-कार्य का ख्याल रहता। गोया शिव बाबा के प्रति उनका जो घनिष्ठ प्यार था वह उन्हें कर्म में भी प्रवृत्त करता था।
अद्भुत सन्तुलन
जैसे बाबा के जीवन में ज्ञान और प्रेस का अद्भुत ताल-मेल था वैसे ही बाबा के जीवन में हर प्रकार से सन्तुलन था। वे देही-अभिमानी (Soul-Conscious) बनने पर तो पूरा जोर देते ही थे परन्तु देह के स्वास्थ्य और उसकी संभाल की अवहेलना करने को नहीं कहते थे। हाँ, वे यह तो कहते थे कि बार-बार शारीरिक अस्वस्थता की चर्चा करके हमें अपने श्वांस व्यर्थ नहीं गंवाने चाहिये। क्योंकि आज जबकि प्रकृति तमोप्रधान है और हमने अज्ञान काल में विकर्म भी किये हैं, तो रोग और व्याधियाँ तो शायद आयेंगी ही, अतः उन्हीं में मन-बुद्धि लगाये रखने से तो हम शिव बाबा की याद के लिए समय निकाल ही नहीं पायेंगे। अतः वे कहते "बच्चे, दवा और दुआ दोनों से काम लो और रोग की अवस्था में भी योग को न भूलो वरना देह अभिमान का संस्कार पक्का होता जायेगा।" इस पर भी वे यह कहते कि यह शरीर मूल्यवान है, अतः इसे कोशिश करके ठीक रखो ताकि इस द्वारा ईश्वरीय सेवा भी कर सको और आपके योग-रूप पुरुषार्थ में विघ्न भी न पड़ें।
बाबा की आत्म-निश्चय में जो स्थिति थी और उनका जो स्नेह था, वह उनके हर बोल और हर कर्म में झलकता था, यहाँ तक कि बाबा ने शरीर छोड़ने के समय का जो अनुभव अव्यक्त होने के बाद सुनाया था, उससे भी उनके जीवन में इसकी पराकाष्ठा स्पष्ट झलकती है। अब हम उनके उस अनुभव का तथा उनके स्नेह का उल्लेख करेंगे।
प्रीति भरी यादें
ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद और उनके पार्थिव शरीर के तत्व सेवा पर उपस्थित हो जाने के पश्चात् मधुबन के छोटे हॉल में जब सबकी स्नेह-भरी याद और प्रेम-भरे संस्मरण, मन में समाई जिज्ञासाएँ और भाव-भरे उद्गार लेकर जब ब्रह्माकुमारी गुलज़ार बहन ने संदेशी के रूप में ध्यानावस्था में उड़ान भरी थी, तब ब्रह्मा बाबा ने पार्थिव शरीर में अपने अन्तिम क्षणों का संक्षिप्त समाचार भी सुनाया था।
ब्रह्मा बाबा ने बताया था कि क्लास समाप्त होने के बाद जब वे सभी वत्सों को "अच्छा बच्चे, अब छुट्टी!" ऐसा कहकर कमरे में वापिस लौटे तो उन्हें हृदय-क्षेत्र में असामान्य अवस्था का अनुभव हुआ जिसे कि लौकिक भाव में लोग 'दर्द' कहते हैं। वे शैय्या के बाजू पर बैठे ही थे कि उसकी मात्रा तेज़ी से बढ़ती गई। कुछ क्षणों के लिए शरीर और आत्मा में एक संग्राम की-सी अन्तिम स्थिति थी। मानों कि कर्मों का रहा हुआ थोड़ा-सा हिसाब अब स्थाई रूप से विदा लेना चाहता था। दोनों में मल्ल-युद्ध हो रहा था परन्तु फिर भी साक्षी-स्थिति बनी हुई थी। आत्मा पर देहाभिमान की परछाई नहीं पड़ी। आत्मा देह की अस्वस्थता को और हृदय में उत्पन्न होने वाली पीड़ा को अपने नियन्त्रण में रखे हुए थी। कुछ ही क्षणों बाद ऐसा आभास हुआ कि चेतन आत्मा ने शरीर का अहसास छोड़ना शुरू किया है मानो पाँव के पंजे से शुरू लेकर चेतनता बड़ी तीव्र गति से स्वयं को समेट रही थी और भृकुटि की ओर लपक रही थी। होते-होते वह आत्मा जो उड़ता पंक्षी है, शरीर छोड़ कर अव्यक्त धाम की वासी हुई। जैसे मक्खन से सहज ही बाल निकल जाता है, वैसे ही आत्मा देह रूपी कलेवर को छोड़ शिव बाबा के पास आ पहुँची। इस प्रकार देहकी अन्तिम परीक्षा जो इस दुनियामें हरेक को पार करनी होती है,वह भी पार हुई और इस प्रकार कर्म-बन्धन तथा देह-बन्धन समाप्त हुआ।
बाबा ने कहा, "वत्सो, मैं कोई आपसे दूर नहीं हुआ बल्कि पहले शरीर होने के कारण जो आप सबसे मिलने की बाधा थी, वह समाप्त हो गई। अब तो आप जब भी चाहें, जहाँ भी चाहें और जितने समय के लिए चाहें, बुद्धियोग बल द्वारा मुझसे मिल सकते हैं। मैं तो बेहद (वृहद्) विश्व की सेवा पर उपस्थित हुआ हूँ। और, आप लोगों के लिए सतयुग की स्थापना की रफ़्तार तेज़ करने गया हूँ। पहले भी जब मैं शरीर में था तब आप बच्चे देह में होते हुए भी मिलते तो बुद्धियोग के बल ही से थे और अब भी उसी रीति से मिलकर उससे भी अधिक अनुभव कर सकते हैं। कुछ वत्स सोचते हैं कि हम तो बाबा से अधिक मिल ही नहीं पाये और समय हाथ से निकल गया। परन्तु वास्तव में अभी भी विशेष कुछ बिगड़ा नहीं है परन्तु अगर अब भी ध्यान न दिया। बुद्धि की लाईन (Line) क्लीयर (Clear) रख मिलन न मनाया तो यह समय भी हाथ से निकल जायेगा। फिर तो पछताने से कुछ भी नहीं होगा। अभी तो विश्व ड्रामा प्लैन (Plan) अनुसार आप वत्सों की अवस्था को अधिक सूक्ष्म बनाने के लिए बाबा सूक्ष्म लोक के वासी हुए है। सूक्ष्म तो होना है न या व्यक्त ही बने रहना अधिक पसन्द है? तो अब अव्यक्त को व्यक्त में लाने की बजाय आप भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर अव्यक्त मिलन मनाने का अभ्यास करो। बाबा आपके साथ है। साथ कोई छूटा नहीं है बल्कि बाबा परमधाम का दरवाजा खोलने की तैयारी करने गये हैं....."
इस प्रकार बाबा ने इस सारे वृत्तान्त के पीछे के रहस्य को स्पष्ट भी किया और साथ-साथ स्नेह की अभिव्यक्ति भी की जिससे कि सबके मन को बाबा ने दिव्य रूप से केवल ढाढस ही नहीं दी बल्कि उनकी योग की स्थिति को ऊँचा उठाया और उन्हें अव्यक्त स्थिति में स्थित होने की प्रबल प्रेरणा दी। सभी के मन पर इस अनुभूति की छाप लग गई कि अव्यक्त रूप में बाबा हम सबके साथ हैं। आज भी यज्ञका हरेक वत्स यह अनुभव करता है कि बाबा उसके साथ हैं यह कथन-मात्र नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से प्रायः हरेक की अनुभूति है।
परन्तु अव्यक्त मिलन मनाने के साथ-साथ बाबा के व्यक्त काल के चरित्रों का भी गायन हर वत्स करता रहता। बाबा ने हरेक वत्स में एक ऐसी तो नई रूह फूंक दी थी कि उस नई उमंग और नये उत्साह में और इस नये मिले जीवन में हर वत्स के मुख से "वाह बाबा वाह" ये बोल निकलते रहते। जिसके द्वारा परमपिता परमात्मा शिव से मिलन हुआ और जिसने ही मरुस्थल की तपी हुई मरु के जैसे जीवन को ज्ञान की बरसात से शीतल बनाया, उसे भला भुलाया ही कैसे जा सकता है! किसी ने ये मनोरम शब्द गुनगुना दिये।
बाबा तेरा बनने में सुख मिलता इलाही है
खुशियों से भरा जीवन हर पल में कमाई है
बाबा तेरा बनने में....
तेरी छत्रछाया में, माया की धूप नहीं
जो तेरा बन जाए, उसे कोई भी भूख नहीं
इक तेरे ही मिलने से, मिली सारी खुदाई है
बाबा तेरा बनने में......
अन्य किसी ने यह गा दिया:
बनाया हमें जिसने ज्ञान सितारे
वो बाबा है प्यारे, दिलों के सहारे
बनाया हमें जिसने.....
जिसने चलाई अमृत वाणी
चढ़ जाती सुन कर मस्ती रूहानी
भूल जाते माया के दुःख दर्द सारे
वो बाबा है प्यारे दिलों के सहारे
बनाया हमें....
तीसरे किसी ने यह गाकर अपने उद्गार प्रगट किये
एक बाबा मिले मधुबन में,
शिव बाबा मिले उनके तन में।
दोनों बाबा मिले एक आंगन में,
वो आँगन है मधुबन में।॥
इस प्रकार सबके मन में बाबा की याद बनी ही हुई थी। भले ही बाबा ने यह कह दिया था 'न बिसरो न याद रहो' परन्तु बाबा के कर्तव्य इतने महान थे और बाबा ने हरेक आत्मा को ऐसा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झुलाया था कि बाबा की वह याद भूले नहीं भूलती थी। इसलिए एक वत्स ने तो अपने इस अनुभव को इस आलाप में कह ही दिया -
संगम युग में बाबा महिमा तुम्हारी गाऊँ
तूने बनाया जीवन कैसे भला भुलाऊँ
संगम युग में बाबा.......
दूसरे एक ब्रह्मा वत्स ने अव्यक्त अनुभव करते हुए इन छन्दों में अपने भाव व्यक्त किये हैं। यद्यपि उन्होंने साकार रूप में बाबा को नहीं देखा तथापि अन्तर्वक्षु से तथा योग-युक्त स्थिति से उन्होंने भी उस अलौकिक प्यार का अनुभव किया:
बाप-दादा मुझे तेरी याद आये
जब आऊँ मैं मधुबन में तू दिल के अंगनवा उतर आये
आज बाबा मुझे तेरी याद आये
देख के तेरी दिव्य सूरत
मिट गई मेरी सारी हसरत
झर-झर मुख अमृत बरसाए
जन्म-जन्म की प्यास बुझाए
मेरा हर अंग शीतल हो जाए
बाप-दादा.....
न केवल वे वत्स ही बाबा की इस प्रकार की यादों में रमे रहते. बल्कि जिन्होंने उनके द्वारा कोई अधिक ईश्वरीय ज्ञान नहीं लिया था और वे यज्ञ के वेतनधारी कर्मचारी थे, वे भी भाव-विभोर होकर बाबा के गुण वर्णन करते। जो माली बाबा के बगीचे को सींचता, संवारता व उसकी देखभाल करता था, एक दिन इस लेखक से यह कहते हुए उसके दोनों नेत्रों से प्यार के मोती प्रगट हुए "जगदीश भाई, बाबा में इतना प्यार था, इतना प्यार था कि आपसे कैसे कहूँ। मैं पढ़ा-लिखा तो वैसे भी नहीं, इसलिए किन शब्दों में वर्णन करूँ! देखो न, मैं तो एक छोटे कुल का अदना-सा माली हूँ। मेरे से भी बड़े-बड़े माली और इस संसार में बहुत हैं। परन्तु फिर भी बाबा मुझे कहते 'माली बच्चे'। उन्होंने कभी भी मुझे माली कहकर नहीं पुकारा। कभी भी नौकर समझकर मुझसे व्यवहार नहीं किया। कभी भी घटिया समझकर मुझे नहीं देखा। जैसे और वत्सों को देखते समय उनके चेहरे पर मुस्कराहट होती थी, और उनके आँखों के कोने सिकुड़ जाते थे, मैं देखता था कि मुझे भी वे वैसी ही निगाह से देखते थे। उनके उस चेहरे व नेत्रों से प्रवाहित होकर वह प्रेम का प्रवाह मेरे मन में सीधा ही उतर आता था। इसलिए वो प्रेम की सूरत मैं कभी भी नहीं भूल सकता।" ऐसा कहते- कहते तब उसकी आँखों में रुके हुए प्रेम के आँसू फूट पड़े थे और वो बुजुर्ग एक मासूम बच्चे की तरह प्रेम की कसक से चिल्ला पड़ा था।मुझमें भी तब उसे ढाढस बंधाने की हिम्मत नहीं रही थी। सोचने पर भी मेरे लबों पर कोई ऐसे शब्द नहीं आये बल्कि उसके बरसते नैनों ने मेरे नैनों को भी प्रभावित किया यद्यपि मुझ में कोई विछोह का भाव नहीं था। परन्तु दो प्रेम के दीप शिखा उस समय तेज़ी से जल उठे थे और कुछ समय के लिए मन तो भावों के बहाव में बह रहे थे परन्तु होंठ मूक मुद्रा में और शरीर वृक्षों के तनों की तरह खड़े थे।
कुछ ही देर में स्वयं को संभालते हुए उस माली ने बाबा की कुटिया की ओर इशारा करते हुए फिर कहा "जगदीश भाई, इस कुटिया में बाबा बच्चों से मिला करते। जगह-जगह से लोग उन्हें अपने दिल का हाल बताने यहाँ आते। अवश्य ही वे कुछ ऐसी बातें भी कहते होंगे जो उनकी निजी होती और जिसे वे बाबा के सिवाय किसी और को बताना न चाहते हों। मैं उस कुटिया के निकट ही पौधों की क्यारियों के गुड़ाई कर रहा होता या उन्हें पानी से सीच रहा होता परन्तु कभी बाबा ने मुझे वहाँ से हट जाने के लिए नहीं कहा। यह सोचकर मेरे शरीर में कोई अजीब-सी रौ-सी दौड़ जाती है कि बाबा मुझ पर इतना विश्वास रखते थे। कभी-कभी तो वे कह भी देते- 'यह तो घर का बच्चा है' और ऐसा कहते हुए उनके चेहरे को देखते ही बनता। तब इस मधुबन के देवता को देखते हुए मेरा सिर झुक जाता और हृदय प्यार से भर जाता।"
मैं चुप खड़ा सुनता रहा। परन्तु मेरा मन चुप नहीं था। वो बोल भी रहा था कि इन्सान
बिल्कुल ठीक कह रहा है। बाबा ने अपना रंग इस पर भी छोड़ा है। परन्तु मैं चुप ही रहना चाहता था क्योंकि मन को यह तान अच्छी लग रही थी।
माली से भी रहा नहीं गया। वो फिर बोला "जगदीश भाई, मैंने माली का काम और कई जगह भी किया है। मेरे बुजुर्ग भी यही काम किया करते थे। लेकिन बाबा की फूलों से बेहद मोहब्बत थी। जिस प्रेम से वे फूलों को देखते, मुझे केवल यही नहीं महसूस होता कि वे मेरे काम की कद्र करते है बल्कि ऐसा लगता कि वे मेरे बच्चों से प्रेम कर रहे हैं, गोया मुझसे प्रेम कर रहे है। शायद सच तो यह है कि बाबा को इन फूलों में सब बच्चे दिखाई देते। जगदीश भाई, जब मैं बाबा के पास रोज़ प्रातः फूल ले जाता तब वे मेरे दिन-भर के सबसे बढ़िया क्षण होते। बाबा जिस तरह से उन फूलों को अपने हाथ में लेते और उनकी सुगन्धि सेवन करते और फिर मेरी ओर देखते, वह दृश्य देखते ही बनता....." इस प्रकार कहते-कहते, वह फिर रुक गया जैसे कि उसके मानस पट पर वह चित्र उभर आया हो और फिर सिसक-सिसक कर बोला- "अब मुझे 'माली बच्चे' कहकर कौन पुकारा करेगा!" बाबा की उस कुटी और बगीचे के साथ तो बहुतों की याद जुड़ी हुई हैं। न जाने कितनी आत्माओं को बाबा ने नेकी की राह दिखाई थी। रूह को राहत दी थी और बगीचे के फल और फूल देते हुए उनको प्यार और दुलार दी थी और कुटिया के सामने लगे हुए झूले में बिठाकर उन्हें ज्ञान और योग में एवं शान्ति और आनन्द में झुलाया था। इसलिए तो किसी ने मन की वीणा इन सुरों को बजाया था-
मैं जब भी अकेली होती हूँ, चुपके से बाबा आते हो।
और बोल के 'मीठे बच्चे' तुम बीते दिन याद दिलाते हो।।
बीते दिन याद दिलाते हो।
मधुबन की गलियों में आकर हर बच्चे का खुश हो जाना,
बाबा को मिलने की धुन में बाबा के कमरे की ओर बढ़ना,
बाबा का सामने आ जाना, नैनों में रूहानियत छा जाना।
बच्चों का बगिया में जाना और बाबा की कुटिया का दिखना,
तब बच्चों का आगे बढ़ना बाबा को पत्र लिखते देखना,
बाबा का बच्चों को देखते ही कहना मीठे प्यारे बच्चे।
बीते दिन याद दिलाते हो.....
इसी प्रकार जो राज (Mason) उन दिनों शिक्षिकाओं के हॉस्टलके निर्माण-कार्य में लगा हुआ था, वो भी अपने संस्मरण सुनाते हुए उन यादों में खो जाता था। जिन हाथों से उसने उस हॉस्टल की दीवारोंकी चिनाई की थी, उन्हीं से जब वह बाबा के भव-देह की अन्तिम क्रिया के लिए स्थल निर्मित कर रहा था तब उसके मन का अजीब हाल था। बाबा के अव्यक्त होने पर सब जगह-जगह से वहाँ बहुत-से भाई-बहन पधारे तब वह भी उनके बीच खड़ा हुआ अलग नहीं लग रहा था। उसके चेहरे से लगता था कि वह इस सोच में है कि ये क्या हो गया! एक दिन जब उससे रहा नहीं गया तब वह इस लेखक से बोला "जगदीश भाई, बाबा मुझे अब भी मिला करते हैं। आज सुबह जब मेरी जाग खुली, तब भी मैं उनसे मिला था। जैसे पहले वे मेरे साथ चलकर निर्देश देते हुए कहते 'गल्बा बच्चे, इस जगह यह बनाना है। इस स्थान को ऐसे ठीक करना है।' और ऐसा कहते हुए उनके शब्दों में अपनापन, प्यार और विश्वास झलकता था कि बस, उन्होंने जो कहा है मानो कि अब वो हुआ ही पड़ा है। वे इस प्रकार सदा मुझे गल्बा बच्चे कहकर पुकारते और उनसे मुझे सदा ऐसा अनुभव होता कि जैसे वे मेरे पिता हैं और मैं उनका एक छोटा बच्चा हूँ। बस, मन में एक ही चाह रहती कि बाबा जो कहें, मैं वो करके दिखाऊँ। उनको देखने से मेरी सारी थकान उतर जाती और ऐसे लगता कि उनके संरक्षण का हाथ मेरे सिर पर है।" अपनी राजस्थानी बोली में अधिकतर हिन्दी के शब्द प्रयोग करते हुए वह जब बाबा के बारे में कुछ कहता तो ऐसा मालूम होता कि अब भी उसके हृदय के फ्रेम मे बाबा का चित्र जड़ा हुआ है। और वह उस देवता को प्रसन्न करने के लिए सदा तैयार है।
किस-किस के मन के वृत्तान्त सुनाएँ। मानवों के हृदय की बात तो एक ओर रही, जो अन्य प्राणी बाबा के सामने आए, वे भी उनके प्यार से प्लावित हुए बिना न रह सके। इस विषय में बाबा के अव्यक्त होने के बाद एकत्रित हुए भाई-बहनों को सम्बोधित करते हुए पर्वतराज आबू की एक चिड़िया की ये दास्तान सुनाई थी:
दादी जी ने किस्सा इस प्रकार सुनाया "प्रतिदिन प्रातः जब बाबा क्लास करा लेते और उसके बाद सभी वत्सोंको स्नेह से अपने कोमल व कमल हस्तोंसे मुस्कराते-हँसाते टोली दे देते तब कुछ दिनोंसे लगातार निश्चित समय पर एक चिड़िया आ जाती। तब बाबा कहते देखो, "यह बच्ची भी आ गई।" फिर वे उसे मुखातिब करके कहते, "आओ बच्ची"। वह उड़कर इधर-उधर अपना नाच दिखाते और राग अलापते बाबा के हाथ से टोली लेकर उड़ जाती। जिस दिन बाबा ने प्रातः क्लास नहीं कराई, बेचारी वह चिड़िया आकर इधर-उधर मायूसी में देखती ही रही माने उससे कोई अनमोल चीज़ खो गई हो जिसे वह ढूँढना चाहती हो। बाबा के अव्यक्त होने के बाद भी जब बाबा की स्थूल देह उस छोटे हॉल में धरा को अपनी शैय्या बनाए हुए थी, तब भी वह चिड़िया पूर्व की न्याईं वहाँ आती और मानों बाबा के मुखारविन्द को निहार कर चली जाती। उन दिनों उसकी चहचहाहट से ऐसा लगता कि जैसे वह कह रही हो कि अब मुझे ऐसा प्यार कौन करेगा; वो स्नेह-भरी टोली कौन देगा; अब मैं अपने नाज़ किसको दिखाऊँगी और साज़ किसके आगे बजाऊँगी और परवाज़ करके किस हाथ पर मधुर मिष्ठान पाऊँगी! तीन दिन तक 'अब मैं क्या करूँ,'अब मैं क्या करूँ, मैं कहाँ जाऊँ, मैं कहाँ जाऊँ, मेरा तो संसार लुट गया' मानो वो ऐसा कहती रही थी...."
इस प्रकार अब ये दृश्य भी समय का पर्दा गिरने से अतीत में विलीन हो गया और अब जगह-जगह से आये हुए बहन-भाई वापिस अपने-अपने स्थान पर जाने लगे। परन्तु सबके मन की एक ही आवाज़ थी, उन्हें एक ही लग्न थी, उनकी एक ही धुन थी कि अब हम जाकर जन-जन को शिव बाबा का संदेश सुनायेंगे। वे सब जा तो रहे थे परन्तु मन ही मन वे यह गा रहे थे-
बाबा तुम्हारी शिक्षाएँ सदा हैं संग हमारे
चलते रहेंगे जीवन-भर तेरी श्रीमत के सहारे
बाबा तुम्हारी शिक्षाएँ....
न दुःख देना न दुःख लेना तूने हमें सिखाया है
शुभचिन्तक बन रहना सबका तूने पाठ पढ़ाया है
अपकारी पर कर उपकार यही हैं शब्द तुम्हारे
बाबा तुम्हारी शिक्षाएँ....
निन्दक को भी स्नेह देना कहती तेरी वाणी है
काँटों को जो फूल बनाये तेरी वो दिव्य कहानी है
तू रचयिता है इन गुणों के जो सबसे हैं न्यारे
बाबा तुम्हारी शिक्षाएँ....
सबके गुणों को तुम्हें उठाना अवगुण किसी के न अपनाना
गिरते हुए को गले लगाना सबको ज्ञान की राह दिखाना
बजते रहेंगे इन कानों में तेरे ज्ञान नगारे
बाबा तुम्हारी शिक्षाएँ.....
Footnotes
-
उन दिनों इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का मुख्यालय वहाँ था। ↩
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यहाँ 'बाप' शब्द 'परमात्मा शिव' का और 'दादा' शब्द ब्रह्मा का वाचक है। बाबा शब्द यथा-स्थान, प्रसंगानुसार, ब्रह्मा बाबा के लिए प्रयुक्त हुआ है, शिव बाबा के लिए भी और दोनों के लिए भी। ↩
-
लौकिक पिता, धर्मपिता और परमपिता ↩
-
अपने लौकिक परिवार, अपने धर्म-सम्प्रदाय और अपने देश की हदों से ऊँचे उठकर समस्त संसार की सेवा। ↩
-
बाबा ने इन शब्दों की पुनरावृत्ति की निन्दा हमारी जो करे, मित्र हमारा सोई"। ↩
-
विश्व-लीला अथवा विश्व-नाटक की भावी। दूसरे शब्दों में नियति'। ↩
-
उन दिनों कई-एक बहन-भाईयों की यह तीव्र इच्छा बनी रहती थी कि वे भी ध्यानावस्था में साक्षात्कार करें। यह उत्कट इच्छा उनके आध्यात्मिक पुरुषार्थ में बाधा-सी बन गयी थी। बाबा उन्हें निरिच्छुक बनाने के लिये यह युक्ति रचते थे, वह कहते थे कि 'सूक्ष्मलोक कहाँ है?' परन्तु दूसरी ओर कुछेक निरिच्छुक ब्रह्माकुमारी बहनें ध्यानावस्था में साक्षात्कार करती थीं, भोग भी लगाती थी और सन्देश भी ले जाती तथा ले आती थीं।तब बाबा की उसमें स्वीकृति और सम्मति भी रहती थी। अतः स्पष्ट है कि वस्तुतः वे सूक्ष्म लोक का अस्तित्व मानते तो थे परन्तु परिस्थिति देखकर छिपाते भी थे। ↩
-
१. विश्व-नाटक की 'नियति' अर्थात् 'भावी' में अटल विश्वास बने रहना ही 'ड्रामा की पटरी' पर चलना है। ↩
