ज्ञान वीणा

ज्ञान वीणा

11.12.58: सबको वापिस ले जाने वाला, सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानने वाला एक ही परमात्मा है

सारी दुनिया इस समय घोर अन्धियारे में है। इसलिए जहाँ से भी चलते हैं, उसमें दुःख की ठोकरें खाते रहते हैं। एक तो अन्धियारा यह है जो नॉलेज ही नहीं है कि हम कौन हैं, कहाँ से आये हैं ? उसमें फिर ठोकरें भी खाते हैं। जिससे उल्टी दुःख की ही रिजल्ट निकलती है। क्योंकि मार्ग का ही पता नहीं है। यह पता तो एक को ही है जिसके पास आदि-मध्य-अन्त की सारी रोशनी है। हरेक के आदि-मध्य-अन्त को जान भी वही सकता है जिसकी आदि-मध्य-अन्त नहीं है। जो खुद ही आदि-मध्य-अन्त में आने वाले हैं वह आदि-अन्त को कैसे जान सकते ? जो साक्षी दृष्टा परमात्मा है, वही जान सकता है। वह जन्म-मरण के चक्र में आने वाला नहीं है। उनको ही सारी नॉलेज है। जन्म-मरण में आने वाले के पास सारी रोशनी रह नहीं सकती है। और जो भी धर्म स्थापन करने आये हैं, वह भी इस समय जन्म - मरण के चक्र में हैं। तो अब रोशनी कौन दे ?
सभी धर्मों को जानने वाला अथवा वापस ले जाने वाला वह है दूर का मुसाफिर । वह तो इस दुनिया का नहीं है। जब कहते हैं कि यह दुनिया झूठी 1 है। झूठी काया, झूठी माया, झूठा सब संसार । सारा संसार ही झूठा है तो उनसे ले चलने वाला मुसाफिर तो इस दुनिया का नहीं चाहिए ना। इस देश में तो सब झूठे हैं। उनको तो इस झूठी दुनिया से पार ले जाना है। भल यह दुनिया ही नई बनती है परन्तु इस दुनिया में तो उसका भी अंश नहीं है ना। वह दुनिया एकदम इस दुनिया से पार है। तो जरुर पार ले जाने वाला उस दुनिया का ॥ मुसाफिर चाहिए। रोशनी तो उनके पास रह सकती जो इस चक्र में आने वाला न हो। यह चक्र भी जब तक अपनी आदि-मध्य-अन्त पूरी न करे तब तक वापिस कोई भी जा नहीं सकता। ऐसे भी नहीं कोई मुक्ति को पहुँचे हुए हैं जिन द्वारा रोशनी मिल सकती है। वहाँ कोई जा नहीं सकता। अब हमने रचयिता और रचना के भेद को पूरा जाना है। जबकि आदि को चक्र लगाए अन्त में आना है, अन्त को फिर आदि में आना है, तो फिर बीच में कोई वापस कैसे जायेंगे ? चक्र को भी नम्बरवार अपनी स्टेज में बदलना है। तो जब चक्र के अन्त का भी अन्त हो तब ही वापस जा सकेंगे। तो यह सारी नॉलेज एक के पास ही है। रचना की आदि-मध्य-अन्त कैसे होती है, वह तो रचता ही जानेगा ना । मनुष्य त्रिकालदर्शी हो नहीं सकता। जैसे मनुष्य की भी आदि-मध्य-अन्त होती है। नम्बरवार ही स्टेजेस आती हैं। बाल अवस्था के बाद वृद्ध अवस्था तो नहीं आयेगी। यह सब नियम बने बनाये हैं। तो अपनी बुद्धि में अब रोशनी आई है। चक्र को पूरा जानते हैं और जानते भी तब हैं जबकि अब आदि में जाने का समय है। अगर आदि के समय हम त्रिकालदर्शी बनें अथवा उस समय यह नालेज रहे कि हमें नीचे गिरना है तो फिर सुख की भासना ही न रहे। तो अब अन्त में ही हम जानते हैं। देवताओं को त्रिकालदर्शी बनने की आवश्यकता ही नहीं है और न द्वापर में आने वालों को ही आवश्यकता है। परमात्मा आते ही अन्त में हैं जबकि तीनों कालों का खेल पूरा होने पर होता है। जब खेल चल रहा है, तब उसे बीच में देखने से मजा ही नहीं आयेगा।

अब परमात्मा समझा रहे हैं कि अब कहानी पूरी हुई। अभी अन्त का भी अन्त है। फिर नई कहानी शुरु होती है। यह चक्र अथवा कहानी अनादि बनी बनाई है। एक ही वर्ल्ड हिस्ट्री है। यह सब नॉलेज बुद्धि में है, इसलिए अपने को खुशी है कि फिर से जो कहानी शुरु हुई है उसमें हमारा भी पार्ट है। हम उसमें पूरा सुख लेते हैं। अपने को मालूम है कि इस नॉलेज को पूरा जानने वाला वही दूर का मुसाफिर है। खुद ही फिर वापस ले जाने फिर आता है। मनुष्य यह काम कर नहीं सकता। अगर मनुष्य आत्मा करे तो वह आदि-मध्य-अन्त में नहीं आनी चाहिए। वह तो चक्र से अलग चीज चाहिए। वह है ही एक परमात्मा स्वयं मालिक । मनुष्य समझते हैं - बहुत अवतार होते हैं, युग-युग अवतार होते हैं। परन्तु युग-युग में तो आने की दरकार ही नहीं है। क्योंकि चक्र तो फिरना ही है। अब हम चक्र के नियम को समझते हैं। अब इसमें हमें क्या करना चाहिए जिससे हमारी प्रालब्ध बने ? वह स्टेज क्या है ? उसकी नॉलेज पूरी कोई भी सुना नहीं सकता है। कोई से भी यह नॉलेज मिली हुई नहीं है कि मनुष्य के लिए पूर्ण स्टेज क्या है और वह कैसे प्राप्त हो सकती है ? बाकी तो सब अपनी-अपनी शिक्षा के आधार से मनुष्यों को थोड़ा-बहुत बताते हैं। मनुष्य के लिए ऊंच स्टेज क्या है, वह तो रचता ही समझा सकते हैं।

अब हम अन्धियारे को भी समझते हैं जबकि रोशनी का पता पड़ा है। दुनिया थोड़ेही समझती है कि हम अन्धियारे में हैं। वह तो समझते हैं -- अब तरक्की करते जाते हैं, रोशनी में आते जाते हैं। परन्तु वह रोशनी तो गिरावट की है। वह तो चढ़ाने वाला जब समझाते हैं तब ही हम जानते हैं। दुनिया तो अब बिगड़ी हुई है। यह तो समझते भी हैं लेकिन उसको सुधारने की तरकीब ही क्या है - वह एक परमात्मा ही जानता है। जो खुद ही बिगड़े हुए हैं वह कैसे इस तरकीब को एक्ट में ला सकते हैं ! मामला सारी दुनिया का बिगड़ा हुआ है। पांच तत्व आदि सब बिगड़े हुए हैं। हर चीज़ का सुधार एक रचयिता परमात्मा के हाथ में ही है। अच्छा।

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12.12.58: पवित्रता का संबंध कर्मयोग से है, मुक्ति से श्रेष्ठ कर्मयोग है

सभी मनुष्यात्मायें धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, ज्ञान-अज्ञान, राईट-रांग - यह शब्द तो कहती हैं। परन्तु इसकी असली नॉलेज क्या है, इससे अनजान हैं। धर्म की स्थापना वा अधर्म का विनाश करने परमात्मा को आना पड़ता है। यह विनाश, स्थापना का कर्तव्य एक परमात्मा ही कर सकता है। जबकि यह काम परमात्मा ही करते हैं तो जरुर धर्म-अधर्म, ज्ञान-अज्ञान को जानने वाला भी वह होगा।

सृष्टि के नियम अनुसार हम जानते हैं कि कर्मों के आधार पर ही सृष्टि का चक्र बना हुआ है। आत्मा को कर्मों में आना ही है। कर्म अनादि हैं। इसलिए परमात्मा ने भी कर्म-योग को सिद्ध किया है। उनको जानना है। उस असली - श्रेष्ठ कर्म को न जानने के कारण ही वियोग हो गया है, गिर पड़े हैं। परमात्मा ने आकर के श्रेष्ठ कर्म करना सिखलाया है। सारी सृष्टि पर धर्म स्थापन कर अधर्म विनाश किया, वह भी कर्म से ना ! और वही कर्म स्थापन किये जिससे सारी सृष्टि पवित्र-सुख-शान्तिमय बनी। परमात्मा ने सिद्ध किया है कर्मयोग को, न कि कर्म सन्यास को।

राइट और रांग कर्म की नॉलेज होनी चाहिए। यह जो कहते हैं कि मुक्त हो जाना अच्छा है, फिर तो कर्म की बात ही नहीं है। भगवान ने तो कर्मयोग सिखलाया है कि इस पार्ट में होते इन कर्मों के आधार से मनुष्यों की ऐसी सर्वोत्तम अवस्था रह सकती है। सारी मनुष्य सृष्टि की ही बात है। अगर मुक्ति श्रेष्ठ होती तो परमात्मा कर्मयोग को श्रेष्ठ क्यों रखता ? फिर तो कहते - कर्म-अकर्म से जो न्यारी चीज है वही प्राप्त करनी चाहिए। परमात्मा ने तो राजयोग सिद्ध किया है। परमात्मा के सब महावाक्य प्रवृत्ति को ही सिद्ध करते हैं। इस रचना में वह प्रवृत्ति कैसी चाहिए जिसमें पवित्रता, सुख और शान्ति हो ? 'पवित्रता' शब्द ही इस कर्मयोग के साथ तैलुक रखता है। ऐसे नहीं कि मुक्त हो जाने को पवित्रता कहा जाता है। वहाँ तो न पवित्रता है, न अपवित्रता है। कर्म-योग, शुद्ध कर्म यह अक्षर मनुष्य के ऊपर है। आत्मा आई ही है इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने ।

कर्मयोग, प्रवृत्ति - ये मनुष्य सृष्टि की बात है। बाकी मुक्त तो सब होंगे ही। परमात्मा ने मनुष्यों को ही समझाया है कि कैसे पवित्र, अपवित्र बने हैं ? मनुष्य सृष्टि के खेल पर ही यह शब्द है। धर्म-अधर्म अक्षर भी पार्ट के साथ है। समझाते हैं - कैसे पार्ट में होते प्रवृत्ति को पवित्र रखो। कर्मों की ही बात है। आत्मा सदैव न्यारी भी नहीं रह सकती है। मनुष्य के लिए ही पुरुषार्थ है - अपनी प्रवृत्ति को पवित्र बनाना। मुक्त हो जाए तो फिर खेल की बात ही नहीं इसलिए परमात्मा ने भी कर्मयोग को श्रेष्ठ' किया है। श्रेष्ठ कर्मों से प्रालब्ध भी श्रेष्ठ बनती है। श्रेष्ठ कर्म इस सहज ज्ञान और सहज योग से ही बनते हैं। यह है अन्तिम जन्म। कर्मबन्धन की जो प्रवृत्ति है उससे हमको हिसाब-किताब चुक्तू करना है, बदलना है। इस जन्म के लिए ही कहते हैं -पवित्र बनो। फिर तो रहेंगे ही प्रैक्टिकल पवित्र जीवन में। दुनिया पवित्र चली है ना। उन्हों के यादगार कायम हैं। सब कुछ प्रवृत्ति चली हुई है। निर्विकारिता गाई हुई है। नहीं तो पवित्र-अपवित्र शब्द दें ही नहीं। अगर सृष्टि का नियम ही है विकार में जाना तो फिर अपवित्रता अक्षर क्यों कहा है? यह समझने की बात है। अब हम वह पुरुषार्थ करते हैं जिससे पवित्र प्रवृत्ति बने ।

अब कर्मातीत अवस्था धारण करनी है। वह दुनिया ही इस दुनिया से न्यारी है। वह न्यारी दुनिया परमात्मा द्वारा ही रची जाती है। मनुष्य समझते हैं -जैसे इस मनुष्य सृष्टि की वृद्धि होती आई है ऐसे ही होती रहेगी। परमात्मा कहते हैं - मैं जो पवित्र सृष्टि रचता हूँ, उसमें प्रालब्ध भी मैं अभी देता हूँ। निर्विकारीपने से ही सृष्टि की वृद्धि होती है। वहाँ विकार की बात ही नहीं रहती । पवित्रता के आधार से सृष्टि की वृद्धि चली है। परमात्मा अनादि प्रवृत्ति, अनादि कर्म को सिद्ध करते हैं। यह है ही कर्मक्षेत्र। अच्छे और बुरे कर्म को जानना है। पुराने कर्मबन्धन से छूटना है, इसलिए हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। फिर तो है ही प्रालब्ध। फिर यह प्रश्न नहीं उठेगा कि सृष्टि की वृद्धि कैसे होगी, सृष्टि पवित्र कैसे रहेगी ? वह तो रचयिता ही जानते हैं ना। परमात्मा ने कहा है - यह विकर्म है। विकर्म से सृष्टि की जो वृद्धि होती है उनका नतीजा तो देख रहे हैं। परमात्मा की तरकीब जरुर न्यारी होगी ना। दुनिया वालों की बुद्धि में यह संकल्प भी नहीं आ सकता कि ऐसी भी दुनिया बन सकती है।

बाप समझाते हैं - मेरी सृष्टि ही पवित्र है। वहाँ कर्म, अकर्म होते हैं। तमोगुणी बुद्धि तो यह महसूस नहीं कर सकती कि पवित्र प्रवृत्ति कैसे चली है। पार्ट से न्यारा होना, वह कोई स्टेज नहीं है। प्रवृत्ति की सृष्टि ही ऊंच गाई हुई है। यह समझना मनुष्यों के लिए मुश्किल हो गया है। तब तो गिरते आए हैं। दुःख का हिसाब-किताब दुःख तरफ़ खींचता है, सुख का हिसाब-किताब सुख तरफ़ खींचता है। यह कान्ट्रास्ट समझना है। सृष्टि के वृद्धि की तो अब बात ही नहीं है। अब तो वापस लौटना है। कर्मबन्धन से छूटने के लिए पूरी पवित्रता धारण करनी है।

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14.12.58: परमात्मा और धर्म-आत्माओं के कार्य में महान् अन्तर

ओम् शान्ति। हम आत्मायें बहुत पुरानी हैं। जरुर है कि हम आत्मायें कब नई भी थीं। भला आत्मा नई और पुरानी कैसे होती है? दुनिया तो समझती है कि "आत्मा न्यारी है, न कटती है, न जलती है। आत्मा का किसी भी तरह विनाश नहीं होता, क्योंकि इमार्टल है"। परन्तु अब हमने परम आत्मा से जाना है कि आत्मा इमार्टल बरोबर है। शरीर को जलाते हैं तो आत्मा निकल जाती है। आत्मा अपने कर्मों के हिसाब-किताब अनुसार दूसरा शरीर लेकर पार्ट बजाती है। भोगने वाली आत्मा है। ऐसे नहीं कि शरीर भोगने जाता है, शरीर में आत्मा भोगने जाती है। कर्मो का हिसाब-किताब आत्मा पर लगता है तब तो आत्मा भोगने जाती है। अगर आत्मा न्यारी होती तो भोगने क्यों जाती ? दुःख-सुख आत्मा ही भोगती है। तो जरुर मैल चढ़ी हुई है । अब आत्मा को दुःख फील होता है, तो जरुर आत्मा को पूर्ण सुख-शान्ति का भी अनुभव था। उसी समय आत्मायें भी नई थीं। अब पुरानी बन गई है। आत्मा के ऊपर मैल भी अनेक जन्मों की लगी हुई है, न कि एक जन्म की। मनुष्य जो कुछ विकर्म करते हैं उसकी भोगना बहुत है जो एक जन्म में पूरी नहीं हो सकती है। अनेक जन्मों की मैल चढ़ते-चढ़ते आत्मा अब अन्तिम स्टेज पर आकर पहुँची है। ऐसी तमोगुणी आत्माओं को फिर स्वच्छ बनाने परमात्मा को आना पड़ता है। 5 भूतों ने ही इस तमोगुणी अवस्था में लाया है। पहले-पहले आत्माओं की संख्या भी कम थी, फिर वृद्धि होती गई। पार्ट में आने से मैल चढ़ती गई। आत्मायें सभी इक्ट्ठी तो नहीं आती हैं। झाड़ तो धीरे-धीरे वृद्धि को पाता है। गीता में भी महावाक्य हैं कि मनुष्य सृष्टि उल्टा झाड़ है। उल्टा क्यों है ? क्योंकि इनकी जड़ ऊपर है।

सब आत्मायें निराकारी दुनिया से आती हैं तो जड़ वहाँ रही ना। अब सब आत्मायें तमोगुणी हैं। उन्हों को स्वच्छ बनाना - सो तो एक ही समर्थ का काम है, और उनकी गत-मत वही जाने। सद्‌गति करने की मत उनकी क्या है? किस तरकीब से करते हैं ? वह तो वही जाने। मनुष्य आत्मायें तो पार्ट बजाते-बजाते पुरानी हो गई हैं। वह कैसे किसको स्वच्छ बनायेगी ? वह बल कहाँ से आए ? सर्वशक्तिवान तो वह एक ही परमात्मा है। वह बाप भी आत्मा है परन्तु उनको परम कहते हैं क्योंकि पुनर्जन्म रहित है। उनको कोई लेप-छेप नहीं लगता। उनसे सतोगुणी संस्कार कब जाते नहीं हैं। आत्मायें जन्म-मरण में आती हैं तो वह संस्कार चले जाते हैं। जो भी स्वच्छ आत्मायें हैं वह आती हैं अपना धर्म स्थापन कर उनकी पालना करने। परमात्मा आते हैं सबको वापस ले जाने और साथ-साथ फिर नई दुनिया की स्थापना कराते हैं। तो उनके काम निराले हुए। परमात्मा का कर्तव्य ही अपना है। आत्मायें अपने संस्कारों सहित अनादि हैं। उन्हों को अनेक जन्मों का पार्ट भी कैसे बजाना होता है - वह भी समझना है। ऐसे नहीं कि आत्मा, परमात्मा से मिली हुई एक ही चीज है। हर एक आत्मा के भिन्न-भिन्न संस्कार हैं। क्राइस्ट, बौद्ध आदिं भल स्वच्छ आत्मायें हैं, परन्तु उन सबके भी भिन्न-भिन्न संस्कार हैं, अपना-अपना कर्तव्य है। तो स्वच्छ आत्माओं में भी भिन्नता हुई ना। यह सब नॉलेज परमात्मा ही दे सकते हैं जो अनादि काल से जानते हैं। अर्जुन को भी कहा है ना कि मुझ एक को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। हर चीज का नॉलेज मिल जाता है। तो परमात्मा सबमें मिला हुआ नहीं है, उनके कर्तव्य ही निराले हैं। आत्मा ही आत्मा में मिलकर एक नहीं हो सकती है तो परमात्मा में मिलकर एक कैसे हो सकती है ? सतयुग में आत्मायें पवित्र हैं, कर्म-बन्धन के हिसाब-किताब से उस स्टेज में जीवन्मुक्त हैं। उसी समय मैल नहीं रहती। फिर अपने-अपने पार्ट में आने से संस्कारों की मैल चढ़ती जाती है। मनुष्य के भिन्न-भिन्न संस्कार, भिन्न-भिन्न एक्टिविटी- यह किस आधार पर है? इस भिन्नता की भी स्टेज हैं। आत्मायें अपनी तमोगुणी स्टेज में भी अपने-अपने संस्कार वाली हैं। रजो में भी भिन्नता है तो तमो में भी भिन्नता है। सतयुग में जब जीवन्मुक्त हैं, यथा राजा-रानी तथा प्रजा। तो यह राजा-रानी-प्रजा सब थे ना। भिन्नता न होती तो सब राजायें होते। प्रजा है तो राजा अवश्य है। सब राजा हों तो फिर खेल ही न हो। इन सभी महीन बातों को बुद्धि से समझना है। विवेक को खोलना है। परमात्मा आकर अनुभव, विवेक के आधार पर समझाते हैं। राइट रांग क्या है ? - सो सोचना है जरुर ।

कहते हैं - भगवान ने ऐसा खेल क्यों रचा ? बच्चों को दुःखी करना -क्या यह बाप का खेल है? बाप कहते हैं कि मैंने जो खेल रचा है उसमें भिन्नता थी। मैंने सुख का खेल रचा। यह तो फिर मनुष्यों ने मुझको भूलकर अपने को भुलाया है और अपने लिए कर्मभोग बनाया है। मैंने तो ऐसे कर्म-भोग से छुड़ाया था, तब तो मुझे दुःख-हर्ता सुख-कर्ता कहा गया है। यह है समझने की बात। यह सुनने वाला भी रेग्युलर चाहिए क्योंकि गुह्य पढ़ाई होती जाती है। भल वही बात 10 बार सुनी होगी परन्तु कोई दिन वह बात पूरी रीति बुद्धि में बैठ जाएगी। रेग्युलर पढ़ने से ही पूरी धारणा होगी। विनाशी पद पाने में भी रेग्युलर पढ़ाई होती है ना। यह भी पढ़ाई है और इनका टाईम भी यह थोड़ा-सा है। ऐसे नहीं कि परम्परा गुरुओं की गद्दी चलती है। नहीं, परमात्मा तो कहते हैं सतगुरु हूँ ही मैं एक। मैं ही सद्‌गति देता हूँ। सद्गति को ही प्रालब्ध कहेंगे । दुर्गति को प्रालब्ध नहीं कहा जाता है। सिर्फ सत्य-सत्य कहने से न कल्याण हुआ है, न होने वाला है। हर बात को विवेक से समझना चाहिए ना। मंजिल बरोबर ऊंच है। विकारों को पूरा जीतना है तब तो सम्पूर्ण बनेंगे। विकारों से युद्ध करनी है। इसमें अगर खुद नहीं पहुँच सकते तो शान्त में रहें। औरों की शान्ति में विघ्न डालना, ऐसे को कल्प पहले भी परमात्मा ने कहा है राहू और भस्मासुर। अपने को ही भस्म कर देते हैं। असुर तो पहले ही हैं। ज्ञान अमृत पी फिर उल्टा बनते हैं तो उनको भस्मासुर कहा जाता है। तो ज्ञान अमृत पीकर और ही भस्मासुर तो नहीं बनना चाहिए। अपना काम है सूचना देना । बुरे बनो तो भी कितने तक बनो, अच्छा बनो तो भी कितने तक बनो ? बुराई में भी स्टेजेस हैं – सतो, रजो, तमो। ऐसे नहीं कि एकदम चकनाचूर हो जाओ। भल बुरे बनो यानी पद गँवाओ परन्तु एकदम भस्मासुर तो नहीं बनो ना। खुद नहीं चल सकते हो तो औरों को तो विघ्न नहीं डालो । करते तो सब अपने लिए हैं ना। सच्चे पुरुषार्थी को तो यह विघ्न आदि और ही फोर्स (जोश) दिलाएंगे। बाप का फर्ज है सपूत अथवा कपूत बच्चों को समझाना । कपूत प्रति भी सूचना दी जाती है - मुफ्त अपना पद भ्रष्ट करते हो । बनाने वाले तो अपना पद बना ही लेंगे। बिगाड़ेंगे फिर भी अपनी । इसलिए कुछ सोचना चाहिए। अच्छा ।

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16.12.58: परमात्मा को हाथ में हाथ देना अर्थात् स्वयं को उनके आगे सम्पूर्ण सुपुर्द कर उनके डायरेक्शन पर चलना

ओम् शान्ति । हमारे पास अब रोशनी है अर्थात् मनुष्य आत्मा सुख के वा दुःख के जो भी पुनर्जन्म धारण करती है उन सब की नॉलेज है। कैसे हम पार्ट बजाने आये, फिर कहाँ जाना है- इन सब बातों की रोशनी है। परमात्मा जो धर्मराज है वह तो सबके हिसाब-किताब को जानने वाला है ना। जो पक्के निश्चय बुद्धि हैं वह समझते हैं कि अब हम प्रैक्टिकल में उस परमात्मा के संबंध में हैं। वह धर्मराज भी है, आगे-पीछे का सब हिसाब-किताब उनके आगे चुक्तू करना है। उनको हाथ में हाथ पूरा देना है। कोई-कोई पूछते हैं कि 'हाथ में हाथ' देना किसको कहा जाता है ? जब हम जानते हैं वह हमारा बाप, टीचर और गुरु है। पास्ट विकर्मों का हिसाब किताब भी उनके आगे अब चुक्तू करना है और भविष्य प्रालब्ध भी उस द्वारा ही प्राप्त करनी है। इसलिए हम सब कुछ उनको सुपुर्द करते हैं। जितना सुपुर्द करेंगे और भविष्य प्रालब्ध बनाने के लिए जो उनका पूर्ण डायरेक्शन है, उस पर चलेंगे तो फिर हमसे सब कर्म कराने वाला वह रिस्पान्सिबल हो जायेगा। यह हुआ हाथ में हाथ देना। फिर भल कैसे भी वह चलावे । परन्तु हमको सब सुपुर्द करना है। इतनी समर्थी चाहिए। हरेक के हिसाब-किताब को देख चलाया जाता है। वह करनकरावनहार है। वह जो करायेगा वह पूर्ण कल्याण अर्थ। तो इतना निश्चय होना चाहिए कि उनके डायरेक्शन अनुसार हमारी अवस्था हो । अपनी अवस्था को पूरा बनाना है।

अपने को पूरा सुपुर्द करना है। जबकि हम जानते हैं अब पूरा हिसाब-किताब लेने वाला प्रैक्टिकल में आया है। वह हमारे सामने उपस्थित हुए हैं सब कुछ देखने, डायरेक्शन देने और कर्म कराने। तो हम जितना सुपुर्द करेंगे उतना हमारी रिस्पान्सिबिलिटी भी उनके ऊपर ऐसी रहेगी। कई समझते हैं कि बस कागज पर अपना पूरा पोतामेल लिखकर देना है, बस। परन्तु पोतामेल के रहस्य को भी समझना है। जैसे बाप बच्चे का संबंध होता है, तो वह सब कुछ पेश करेंगे ना राय लेने के लिए। यह भी उनके डायरेक्शन पर चलने की समर्थी चाहिए। यह तो प्रैक्टिकल की बात है। ऐसे नहीं हमने कागज पर लिख दिया तो बस, बच्चे हो गये। यहाँ तो प्रैक्टिकल उनका बनना है, फिर वह जैसे चलावे । परमात्मा कहते हैं ना -- मैं जो हूँ, जैसा हूँ उस रुप से जानना है। फिर वह जैसे चलावे। वैसे ही जो बच्चा बनने का दाँव लगाता है उनको समझना है - जैसा हूँ, वैसा हूँ, तुम्हारा हूँ। फिर तो उनका अपना कुछ रहा नहीं। इतनी हिम्मत है तो आगे बढ़ना है। अगर दोनों तरफ़ बुद्धि होगी तो काम नहीं चलेगा। सेकेण्ड-सेकेण्ड पूरा डायरेक्शन लेना है। नहीं तो उनको इतनी रेसपान्सिबिलिटी उठाने की क्या आवश्यकता है ? प्रैक्टिकल जीवन बनानी है। जैसे लौकिक रीति कोई किसका बच्चा बनता है तो कर्म के खाते से बनता है। अब वह बाप, टीचर, गुरु है। तो सब तरफ़ के कर्म उनको सुपुर्द करने हैं। बड़े साहस की बात है। परमात्मा के आगे स्पष्ट होना है। यह बातें उन्हों के लिए हैं जो पूर्ण विजय प्राप्त करने चाहते हैं। ऐसे पुरुषार्थी ही विजय को पा सकेंगे। पूरी हैन्डलिंग लेनी है जिससे अपने कर्म श्रेष्ठ भी होते जाएँ और विकर्मों का बोझ भी विनाश होता जाए। प्रैक्टिकल में जानना है, प्रैक्टिकल में बनना है।

भगवान भल भोलानाथ है परन्तु इतना तो भोला नहीं है। भोला इस बराबरी में है जो देखो, लेता क्या है और देने में कैसा पूरा दाता है ! तुम देते ऐसी चीज़ हो जो उनके काम की नहीं है, तुम्हारे काम में भी पूरी नहीं आती है। और देता कितना है ! इस हिसाब से भोलानाथ है। परन्तु वह पुराना भी पूरा लेगा। इतना तो भोला नहीं है जो सिर्फ कागज ले लेवे । परन्तु उनके आगे पूरा रखकर फिर पूरा लेना है। इसमें अपना कुछ भी नहीं समझना है। बेकार चीज उनके आगे रखनी है, इतनी हिम्मत हो तब है बात ।

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17.12.58: आत्मा परमात्मा में लीन नहीं होती, उनके समान बनती है

ओम् शान्ति । भगवान के महावाक्य हैं कि मैं बीजरुप हूँ और इस क्रियेशन का क्रियेटर हूँ। मनुष्य आत्मायें कहती हैं कि हम ज्योति ज्योत में समाते हैं। अब भगवान के कहने और आत्माओं के कहने में फर्क हो गया। जैसे बीज में झाड़ लय होता है फिर बीज से झाड़ उत्पन्न होता है। तो आत्मा स्वयं अपने आप ज्योति ज्योत में समावे यह नहीं हो सकता है। हम अपना पुराना हिसाब-किताब चुक्तू कर वापस जा रहे हैं। परमात्मा भी कहते हैं – मैं आया हूँ फिर से नई दुनिया की स्थापना करने। यह तो प्रैक्टिकल हम देख रहे हैं इस दुनिया का विनाश होना है। यह है दुःख की, आहों की दुनिया। हम जाते हैं सदा सुख की दुनिया में। उसके लिए अब पुरुषार्थ करना है। ज्योति में नहीं समाना है। आत्माओं को तो स्टेज पर पार्ट बजाने आना ही है। क्योंकि यह रचना अनादि है।

भगवान ने सुख की रचना ही रची है। जिसमें दुःख का नाम भी न हो तब तो सुख की दुनिया कहें। अगर दुःख का अंश भी हो तो उसको सुख नहीं कहेंगे। आजकल दुनिया में सुख है ही अल्पकाल क्षणभंगुर । तो सिद्ध है कि बाकी सब दुःखी हैं। हम अब सदाकाल सुख में जाते हैं। अगर अल्प दुःख भी वहाँ हो तो उनको सुख तो नहीं कहेंगे ना। परमात्मा जैसे अविनाशी है वैसे उनकी प्रापर्टी भी अविनाशी है। उसमें दुःख, अशान्ति हो नहीं सकती । अब हम इन सब दुःखों से छूटेंगे तब जब पुराना हिसाब किताब चुक्तू हो । तब ही सुख की दुनिया में आ सकते हैं। परमात्मा द्वारा हम जीते जी इस पुरुषार्थ में लगे हुए हैं। धर्मराज के पास सजा खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करने से कोई प्रालब्ध नहीं बनती है। अपने को तो पूरी प्रालब्ध बनानी है। जीते जी सुख लेना है तो जीते जी हिसाब-किताब भी चुक्तू करने हैं। फिर उनके द्वारा प्रालब्ध बनानी है। वह करनकरावनहार खुद आकर अपना कर्तव्य करा रहे हैं। कराते हैं आत्माओं द्वारा। अब हम जानते हैं कि उनका और हमारा संबंध क्या है।

जब सभी सहारे टूट जाते हैं तब परमात्मा ही सहायता देने आते हैं। सहायता देने की समर्थी उसी में है। इस समय सभी सहारे टूटते जा रहे हैं। दुःख-अशान्ति बढ़ती जाती है। न कोई ज्योति ज्योत में समाये हैं, न कोई यहाँ सदा सुखी हैं। परमात्मा के महावाक्य हैं- मैं आता ही कल्प के अन्त में हूँ, आकर सारे वृक्ष को नया बनाता हूँ, कलम लगाता हूँ। अब यह सब बातें बुद्धि में हैं तब ही उनका हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। जीते जी पुरुषार्थ कर अपनी प्रालब्ध बनानी है। हम जानते हैं हमारी – प्रालब्ध कौनसी हैं और उनके लिए पुरुषार्थ कौनसा है ? यह नॉलेज है। बाकी तो सब कहानियाँ सिर्फ सुनते और सुनाते आये हैं। बायोग्राफी को जानते नहीं हैं। उनके जीवन-चरित्र सिर्फ ऐसे ही गाने से भी कुछ बनता नहीं है। राधे-कृष्ण आदि वह सब सर्वगुण आत्मायें हैं। उनके चेहरे सदा मुस्कराते रहते हैं। अब हम वह संस्कार भर रहे हैं। पुराने हिसाब-किताब को चुक्तू कर रहे हैं। दुनिया समझती है कि मनुष्य मरा तो स्वर्गवासी हुआ और कोई साधू-संत मरता है तो कहते हैं ज्योति ज्योत समाया। अब हम जानते हैं कि यह संसार ही जो बहिश्त था, अभी दोजक है। अब फिर भगवान प्रैक्टिकल में वह बहिश्त बना रहे हैं। हम वहाँ जाने का अब पुरुषार्थ कर रहे हैं। यह काम कोई मनुष्य नहीं कर सकता। बाप और उनके कर्तव्य को भूलने से ही मनुष्य आत्मायें अपने कर्तव्य को भूल जाती हैं। हम आत्माओं को सद्गति देने वाला वही है। क्योंकि परमात्मा तो न्यारी चीज है ना। आत्माओं के साथ उनका ही संबंध है। अब मालूम पड़ता है कि हमारा तो बड़ा गहरा कनेक्शन है। परमात्मा सबसे न्यारा है तो उनके कर्तव्य भी न्यारे होंगे। जो मनुष्य आत्मा न कर सकती है, न कर सकेगी। तब ही उनके कत्त्व्य निराले गाये हुए हैं।

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20.12.58: अन्धियारे से रोशनी में आने के बाद विचारों का परिवर्तन

आज की दुनिया कितने अंधियारे में है वह भी अब हम जानते हैं, जबकि हमारे पास रोशनी है। मनुष्यों को पता ही नहीं है कि इसी दुनिया में ही मनुष्यों के लिए स्वर्ग था, सदा सुखमय जीवन थी। रिंचक भी उस सुख को नहीं जानते हैं। तरस पड़ता है कि बिचारे कितना अंधियारे में हैं ! समझते हैं- “बस, यही दुनिया है, इसमें ही बहिश्त, दोजक है। हमारे पास धन-दौलत है, घर में कोई खिटपिट नहीं है। फिर हम ख्याल ही क्यों करें कि कोई बहिश्त था जो हमने देखा नहीं है। हम जिस दुनिया को देखते हैं वही दुनिया है। इस समय तो हम बहिश्त में हैं। कल का भी हम सोच नहीं करते हैं। कल धन चला जाएगा, दुःख होगा – यह ख्याल ही क्यों करें ?” बिल्कुल विवेक मारा हुआ है। अच्छा, भल हमको अनुभव नहीं है कि शादी के बाद क्या दुःख होता है परन्तु बुद्धि से समझ तो सकते हैं। बड़ों को अथवा छोटों को जीवन को देखते हैं कि हमारे होते हमारे छोटे कैसे दुःखी हो रहे हैं। तो भी समझते – हम तो सुखी हैं ना। मनुष्य का विवेक इतने तक भी नहीं चलता। ऐसे थोड़े ही हमारे पास दुःख नहीं है तो समझें दुःख है ही नहीं। आज का संसार इतना तो गिरा हुआ है, जो इतना भी विवेक नहीं चलाते ।

मनुष्य जो कुछ काम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, ख्याल तो रहता है ना कि इस धंधे से इतना फायदा होगा, इनसे नुक्सान होगा, 12 मास के बाद फिर नुक्सान न पड़ जाए। पिछाड़ी में बच्चों के लिए इतना धन इक्ट्ठा करके जाएं जो वह सुखी रहें । आज एक बच्चा है, कल दो तीन होंगे, उन्हों के लिए भी धन इक्ट्ठा करें – यह सब ख्याल करते तो हैं ना। मनुष्यों की बुद्धि चलती है परन्तु समझते नहीं हैं। यह सब विचार पीछे के ही हैं ना। आज क्या है, कल क्या होगा ? यह नहीं समझते कि हमारी जीवन उल्टी भी हो सकती है। यह जो कर्म बनते आये हैं उनको सुधारना कैसे है? यह बुद्धि में ही नहीं आता है। इतने तो अन्धियारे में पड़े हैं – देखते हुए भी सोच नहीं करते हैं कि क्यों न पहले से ही हम ऐसे कर्म बनावें जो पीछे सुख भोगें। पीछे के सोच के सिवाए मनुष्य का कदम भी नहीं चल सकता है। समझते हैं- मेहनत करेंगे, इनसे इतने दिन पेट का गुजारा होगा, इस धन्धे से 24 घण्टे सुख से बीतेंगे। इन विचारों के सिवाए तो मनुष्य की चाल चलती नहीं है। यह मालूम ही नहीं कि वर्ल्ड की हिस्ट्री कहाँ से शुरु हुई ? कोई समय दुनिया ऐसी ऊंच स्टेज पर थी। समझते हैं - बस, इस दुनिया में ही सब कुछ है, दुनिया की यही चाल है। अगर ऐसी ही चाल है तो फिर दुःख भी नहीं होना चाहिए। मनुष्य मरता है, यह तो होगा ही फिर -- रोते क्यों हैं ? आजकल बुद्धि एकदम मारी गई है।

यह अब हम जानते हैं कि कुछ तो अपनी जीवन बनानी चाहिए। कई मनुष्य ऐसे भी समझते हैं कि यह कोई जीवन नहीं है। परन्तु कैसे और किस द्वारा वह जीवन बने - सो जानते नहीं। सारी दुनिया गिरी हुई है। जब दुःख आता है, ठोकर लगती है, तो आवाज़ निकलता है इनसे छूटें। परन्तु रोशनी देने वाला भी चाहिए। वह है ही एक। उस द्वारा हमें सदाकाल के लिए अब रोशनी मिल गई है। अन्धियारे और रोशनी का हम अब साक्षात्कार करते जाते हैं। देखते हुए भी मनुष्यों की आंखें बन्द हैं। दुःख देखते भी हैं परन्तु समझते हैं हमारे लिए नहीं है। ऐसे भी मनुष्य हैं जो समझते हैं- "भगवान, जिसको हम देखते ही नहीं तो विचार ही क्यों करें ? सुख की दुनिया देखी ही नहीं है तो माने कैसे ?" अच्छा, दादे-परदादे को देखते नहीं हैं, तो थे ही नहीं क्या ? समझते तो हैं ना - हमारे पिता ने उनसे जन्म लिया होगा। समझ की बात है ना। इस अन्धियारे का भी साक्षात्कार तब होता है जब रोशनी में हैं। अब हमारी सुख की दुनिया बन रही है। आत्मा पूर्ण सन्तुष्ट तो परमात्मा द्वारा ही हो सकती है। अब हम अनुभव करते जाते हैं। अच्छा।

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22.12.58: मुक्ति अर्थात् दुःख के बन्धन से छूटना और जीवन्मुक्ति अर्थात् सुख के जन्मों में आना

ओम् शान्ति। अभी हमारा सतगुरु निराकार परमात्मा है जो पारलौकिक सर्व शक्तिवान समर्थ है। गुरु का सम्बन्ध होता ही है मुक्ति-जीवन्मुक्ति देने के लिए। वह चीज़ कोई लौकिक गुरु द्वारा मिलनी नहीं है क्योंकि वह सब हैं जन्म-मरण में आने वाले । मुक्ति-जीवन्मुक्ति तो अजन्मा ही देगा। वह एक ही सतगुरु है। बाकी तो सब गुरु हुए इस लोक के। वह भी पुनर्जन्म में आने वाले और हम भी पुनर्जन्म में आने वाले । पुनर्जन्म तो सतयुग में भी होते हैं। परन्तु वह कर्मबन्धन के दुःख का जन्म नहीं है। वहाँ कर्म, अकर्म हो जाते हैं। हम अभी के इस पुरुषार्थ से पूर्ण प्रालब्ध लेते हैं। ऐसे नहीं 21 जन्मों में पुरुषार्थ कर प्रालब्ध बनायेंगे। नहीं, अभी ही सब कुछ करना है। अब हम समझते हैं कि जीवन्मुक्ति है ही 21 जन्मों की और मिलती भी सतगुरु द्वारा है। जीवन्मुक्ति से मुक्ति को सिद्ध करते हैं। मुक्ति होती तब है जब जीवन्मुक्ति मिलती है। यह कर्तव्य एक सतगुरु ही कर सकता है। 21 जन्म जीवन्मुक्ति जो मिलती है वह अभी की ही प्राप्ति है। तो हमारा तैलुक (संबंध) उस एक के साथ है। और सब देह सहित देह के सम्बन्ध टूट जाते हैं। मुक्ति का मतलब है दुःख के बन्धन से छूटना। जीवन्मुक्ति अर्थात् सुख के जन्मों में आना। यह कार्य उनका ही है। तो देह के सब सम्बन्ध अभी नहीं छूटे हैं तो जरुर दुःख के कर्मबन्धन का नाता है। उसका हिसाब-किताब भोगना ही पड़ेगा। अगर परमात्मा बाप से पूरा वर्सा लेना है तो पूरा संबंध रहना चाहिए। इसको बहुत थोड़े समझते हैं। जैसे जीवन का संबंध अपने आप से है ना। मन्सा-वाचा-कर्मणा सब जीवन के नाते को जानते हैं। वैसे ही मन, वाणी, कर्म से सब उनके पास ट्रान्सफर करना है। सिर्फ बुद्धियोग द्वारा याद नहीं करना है, लेकिन मन-वाणी-कर्म – सबसे उनका हो जाना है। इसमें वाचा का भी संबंध है, बुद्धि का भी संबंध है। जबकि करनकरावनहार उपस्थित है तो हमारे कर्म भी उनके कर्म से संबंध रखने वाले होने चाहिएं। वाचा भी वही हो जो भगवानुवाच है और मन्सा भी वही हो अर्थात् उनको ही याद करना है। भगवान से पूरा संबंध रखना है, तब ही पूर्ण मुक्ति - जीवन्मुक्ति मिल सकती है। भगवान से वरदान तो पूरा लेना है ना। सर्व दुःखों से छूटना है। अगर सजाएं खाई तो वह भी दुःख हुआ। कर्मबन्धन से छूटने का मतलब है कर्मबन्धन की सजाओं के दुःख से भी छूटना। ऐसे नहीं सजा खाकर मुक्त होना है।

लेकिन सम्पूर्ण दुःख से छूट सम्पूर्ण सदाकाल के सुख को प्राप्त करना यह है हमारा पुरुषार्थ जो एक परमात्मा ही करा सकते हैं। हमारे इस पुरुषार्थ का फिर रिस्पॉन्सिबल वह हो गया। परन्तु जब तक पूरा संबंध नहीं है, तो समझना चाहिए हम अपने कर्मों के रिस्पॉन्सिबल हैं। हमारे कर्मों का रेसपान्सिबल वह तब होगा जब हम उनके पूरे बनें। उनके हाथ में हाथ देना अर्थात् पूरा सम्बन्ध जोड़ना। उनके ही कर्तव्य में लग जाना है। अगर कुछ कर्मबन्धन को सम्भालने में लगे तो उस परमात्मा की सेवा में ज़रुर कुछ कम हो जाएगा। इसलिए तन-मन-धन से उनकी सेवा में लगना है। उनका पूरा बनकर उनके कार्य में पूर्ण मददगार साथी बनेंगे तो उसका रिटर्न भी इतना मिलेगा। जैसे गवर्मेन्ट की जो जितनी सेवा करता है उसे उतना मिलता है ना । इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा बनने से ही पूरी प्राप्ति होगी। लेकिन पूरा मददगार भी बनना है। ना से तो फिर भी जो जितना करें उतना अच्छा ही है। फिर भी सतयुगी दुनिया में तो आएंगे ना, या तो सूर्यवंशी राजा बनेंगे या सूर्यवंशी प्रजा में आयेंगे। या फिर चन्द्रवंशी राजा-रानी बनेंगे या चन्द्रवंशी प्रजा में आएँगे। इसमें पूछने की भी बात नहीं रहती। प्रैक्टिकल चरित्र से मालूम पड़ता है।

तो हमको क्या करना है ? क्योंकि उनका सारा काम प्रैक्टिकल में है। वह चरित्र प्रैक्टिकल में चल रहे हैं। करनकरावनहार कर और करा रहे हैं। बुद्धि द्वारा हम समझते भी हैं। फिर करना क्या है. सो तो हर एक अपना साहस रखेगा। बाकी समझाया तो सब जाता है - हर एक को करना क्या चाहिए ? सो तो अपनी हिम्मत, अपना बल जितना होगा उतना कदम उठायेंगे। जिसको बनना है उनको करना है। पुरुषार्थ में कम जास्ती तो होंगे ही क्योंकि नम्बरवार सब बनते हैं। भल जानते हैं जो कल्प पहले बने थे वही बनेंगे । पुरुषार्थ करने के बाद रिजल्ट निकलेगी। इसमें यह कहना नहीं होता कि जैसा डायरेक्शन मिलेगा वैसे करेंगे । पुरुषार्थी की चाल ही सिद्ध करती है कि यह किस प्रालब्ध के लायक है। उसके लिए कोई डायरेक्शन नहीं मिल सकते। टोटल नॉलेज तो मिल ही रही है – राजा-रानी बनने का पुरुषार्थ क्या है ? प्रजा बनने का पुरुषार्थ क्या है। बाकी अपने को लायक बनाना, यह तो अपने ऊपर है। हमको सतगुरु का पूरा सहारा है। देने वाला वह है, लेने वाले हम हैं। हम भी पुरुषार्थी की चाल से समझते हैं, वह भी उनसे समझेंगे। जो करेगा, रिजल्ट निकलेगी, कहेंगे – यही कल्प पहले वाले थे। ऐसे तो नहीं कहते हैं- कल्प पहले यह बने थे, इनको ही पुरुषार्थ कराना है। भगवान भी ऐसा एडवान्टेज नहीं लेते हैं। बनना है अपने पुरुषार्थ से। पढ़ाई सबको सरीखी (समान) मिलती है। फिर जो जितना पढ़ते हैं उतना पद पाते हैं। जो करेंगे सो पायेंगे । अच्छा ।

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23.12.58: संस्कारों के आधार पर शरीर की बनावट

ओम् शान्ति । परमात्मा द्वारा हम मनुष्य आत्माओं को और परमात्मा को जान चुके हैं। परमात्मा का परिचय माना रचता को जानना और मनुष्य का परिचय माना रचना को जानना । मनुष्य ही मुख्य हैं। सारी क्रियेशन मनुष्य के पिछाड़ी आ जाती है। अब हम जानते हैं कि मनुष्य ही आसुरी और दैवी स्वभाव वाला बनता है। देवताएं भी मनुष्य हैं, असुर भी मनुष्य हैं। ऐसे नहीं कि असुर कोई भयानक शक्ल वाले होते हैं। अथवा देवताओं को तीन नेत्र दिखाते हैं। ऐसे कोई मनुष्य को ज्यादा अंग नहीं होते हैं। सारी स्वभाव की बात है। देवताओं के और असुरों के संस्कार अलग-अलग हैं। असुर कहा जाता है 5 भूतों को। यह 5 भूत मनुष्यों में हैं तो मनुष्य को असुर कहा जाता है। इससे ही मनुष्य दुःखी होते हैं। अभी इन संस्कारों को बदलना है जो पूर्ण ज्ञान से ही बदलेंगे। इन 5 भूतों से छूटने की शफा देने वाला एक ही समर्थ परमात्मा है। परमात्मा ही मनुष्य से देवता बनाते हैं।

अब हम आसुरी स्वभाव को पलट दैवी स्वभाव की धारणा कर रहे हैं। पहले तो आसुरी स्वभाव के कर्मबन्धन से पूरा छूटना है अर्थात् संस्कार बदलने हैं। देवताओं को सर्वगुण सम्पन्न कहा जाता है। उन्हों के शरीर भी सुन्दर हैं क्योंकि शरीर की बनावट भी संस्कार के आधार पर होती है। कोई अन्धा-लूला होता है तो कहते हैं कर्मों का हिसाब है। तो संस्कारों का आधार रहा ना। अब परमात्मा आत्माओं को पवित्र बनाते हैं, तो शरीर भी सुन्दर मिलते हैं। अब आत्माएँ इम्प्योर हैं तो शरीर भी इम्प्योर हैं। अब हम दैवी स्वभाव धारण कर देवता बनते हैं।

यह है संगम । देवताएँ और असुर अब हैं। असुरों के जमाने में देवताओं की बात ही नहीं है, देवताओं के ज़माने में असुरों की बात नहीं रहती है। यह है संगम, जहाँ हम एक तरफ़ आसुरी स्वभाव को छोड़ दूसरे तरफ़ शुद्ध संस्कार धारण करने के प्रयत्न में हैं। संस्कार बदलाना तो एक परमात्मा समर्थ का ही काम है। संस्कार भी बहुत जन्मों के कड़े हैं। बहुत जन्मों के संस्कार जो फोर्स से चलते आ रहे हैं, अब उस फोर्स को मिटाना परमात्मा का ही काम है। बहुत कहते हैं कि पुरुषार्थ भी करते हैं परन्तु संस्कार ऐसे कड़े हैं जो मिटते नहीं हैं। यह सारा संस्कारों के ऊपर अनेक जन्मों का बोझ है, उनको अब मिटाना है। जितना हम बाबा को याद करेंगे उतना विकर्मो का बोझ कम होगा। अब ही सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पन्न बनना है। कई पूछते हैं – 16 कला कौनसी हैं ? इसका मतलब है पूर्ण कलायें। मनुष्य के लिए और ज्यादा स्टेज ही नहीं है। जैसे कहा जाता है 100% । यही सम्पूर्णता है। उनके ऊपर कोई कलाएं नहीं हैं। बाकी कोई 16 गुण आदि नहीं हैं। सब कलाओं से सम्पन्न रहते हैं। रत्न जड़ित ताज और लाईट का ताज- दोनों रहते हैं। इनके ऊपर कोई ताकत नहीं रहती है। जिस्मानी और रुहानी- दोनों ताकत रहती हैं। तो हमारा पुरुषार्थ यह है। सब पॉवर्स परमात्मा द्वारा अपने हाथ में लेते हैं।

अभी हम 16 कला सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी बन रहे हैं। सन्यासियों को सम्पूर्ण निर्विकारी नहीं कहेंगे क्योंकि जन्म फिर भी विकारियों से लेते हैं। तो सम्पूर्ण निर्विकारी नहीं ठहरे। देवताएँ जन्मते भी निर्विकार से, रहते भी निर्विकारी और शरीर भी कर्मबन्धन-वश नहीं छोड़ते। यह स्टेज परमात्मा द्वारा मिलती है। वहाँ दुःख का नाम-निशान नहीं रहता है। मनुष्य समझते हैं देवताएं भी लड़ते थे। परन्तु हम जानते हैं कि देवताओं में लड़ने का स्वभाव ही नहीं है। उन्हों को सर्वगुण सम्पन्न कहा जाता है। उस समय का इतना प्रभाव है। अब फिर चक्र को फिरना है। सब कलाओं में मनुष्य सम्पूर्ण अब हो सकता है। परमात्मा इस समय आकर सम्पूर्ण आनन्द, सम्पूर्ण सुख देते हैं, तब ही सुखदाता, आनन्द-दाता कहा जाता है। सतयुग में जब 16 कला सम्पूर्ण है तो उस समय महिमा गाने की भी बात नहीं रहती है। जब वह नीचे आते हैं तब महिमा गाई जाती है कि ऐसे 16 कला सम्पूर्ण भी होकर गये हैं। उस समय गाये कौन ? दुनिया ही उस अवस्था में है।

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27.12.58: परमात्मा की नज़र और ईशारा सिर्फ, अभी ही प्रैक्टिकल में मिलता है

कहा जाता है -- "हिम्मते मर्दा, मददे खुदा ।" यह अक्षर किस समय के और किसके हैं, यह भी अभी हम जानते हैं। दुनिया वाले समझते हैं- जो कुछ चल रहा है वह परमात्मा के ही इशारे से चलता है क्योंकि वह सर्वत्र है, हाजिरा हजूर है। उनके इशारे अथवा हुक्म से ही अच्छा अथवा बुरा सब कुछ चल रहा है। हम जानते हैं कि प्रैक्टिकल में उनकी नज़र, उनका ईशारा और पुरुषार्थ करना-कराना, इस एक समय की ही बात है, जिस समय वह प्रैक्टिकल अपनी नज़र और डायरेक्शन से आकर काम कराते हैं। तीनों कर्त्तव्य अब करते हैं। स्थापना का काम भी चल रहा है, विनाश की भी तैयारी हो रही है और जो स्थापना करते हैं, उनकी प्रालब्ध चले- वह भी अब बनाई जाती है। एक ही टाइम पर सब काम करते हैं। ऐसे नहीं सारे चक्र का दुःख-सुख वह बनाते हैं। हम जानते हैं - वह तो अच्छी बात बनायेगा ना। आधाकल्प सुख की प्रालब्ध रहती है। उनके कर्तव्य से ही सिद्ध है कि एक चीज़ के विनाश और दूसरी चीज की स्थापना के लिए वह उपस्थित है। जिस चीज का विनाश कराते हैं तो ज़रुर वह बुरी चीज है। बुराई को विनाश ही करना है तो फिर उसको रच कैसे सकता ? वह बनाते हैं अच्छी चीज़ । तो उनका कर्त्तव्य ही सिद्ध करता है कि उसने अच्छे की स्थापना और बुरे का विनाश किया है। अभी हमें उनकी नज़र प्रैक्टिकल में मिलती है। प्रैक्टिकल में डायरेक्शन देते हैं। वह हमारे सामने खुद अपने ईशारे से काम करा रहे हैं। हम अपने पुरुषार्थ से अपनी प्रालब्ध बना रहे हैं। अब का ही प्रैक्टिकल पार्ट है। अगर सदा यह पार्ट होता तो फिर सदा विनाश, सदा स्थापना-पालना होती।

मनुष्य समझते भी ऐसे हैं कि "मनुष्य खाते-पीते हैं, मरते-जन्मते हैं - यह सब भगवान कराते हैं। भगवान की यह स्थापना-विनाश-पालना जैसे कि चलती ही रहती है।” परन्तु अब हम जानते हैं- उनकी विनाश-स्थापना-पालना का पार्ट ऐसे नहीं होता है। वह तो आधा कल्प के लिए ऐसी स्थापना कर देते हैं, जिसमें सदा सुख है। इन बातों को अब हम समझ कर अपनी भविष्य प्रालब्ध बना रहे हैं। पालना भी फिर हमारे द्वारा ही उनको करानी है। हिम्मत और मदद अभी की बात है। बाकी इतना जो करते आये उसमें प्रैक्टिकल मदद नहीं थी। हमारे ही पुरुषार्थ से हमको ऐसी प्रालब्ध मिलती है। इस हिसाब से आधा सुख, आधा दुःख रखा हुआ है। हम ही प्रैक्टिकल में चक्र में आते हैं । दुनिया इस समय की बातों को यादगार के रुप में सिमरण करती है। प्रैक्टिकल पार्ट बहुत थोड़ा टाइम है।

अब हमारी बुद्धि में नॉलेज है। ऐसे थोड़ेही, कोई दुःखी हो रहा है वह भी उनके इशारे से । नहीं । यह तो हर एक के कर्म हैं जिस कारण दुःख-सुख उठाते आते हैं। उनकी नज़र, उनका ईशारा ऊंच चढ़ाने वाला है क्योंकि वह खुद ऊंचे ते ऊंच है। उनके पार्ट में ऊंच ले जाने की ही बात है। यादगार सब हैं ही इस समय के । औरों के यादगार ऐसे नहीं गाये जाते हैं। उन्होंने भी परमात्मा के यादगार गाये हैं। महिमा सारी परमात्मा की है, न कि कोई मनुष्य हस्ती की । परमात्मा एक ही समय आकर सारा काम पूरा कर जाते हैं। फिर कुछ रहता नहीं, जिसके लिए आना पड़े। स्थापना भी आधा कल्प के लिए कर देते हैं। विनाश भी पूरा कर लेते हैं। यह भगवान का पार्ट और हमारा पार्ट बड़े कायदे से बना हुआ है, जिसका चक्र चलता रहता है। एक तरफ़ आदि और एक तरफ़ अन्त है। इस समय उनके द्वारा हमको रोशनी मिल रही है। उस रोशनी से हम चल रहे हैं। जो चलते हैं उनके लिए ही रोशनी है। जब तक उनकी नज़र में नहीं हैं तब तक जैसे कि अन्धियारे में हैं। हिम्मते मर्दा मददे खुदा, दोनों का कनेक्शन है। पुरुषार्थ करें तब मदद भी मिले। आधा कल्प सिर्फ सुनते आये हैं। अब प्रैक्टिकल उनके द्वारा प्राप्त करना है। इसलिए कोई भी बात से हमको घृणा नहीं आ सकती है। बना बनाया खेल है, इसमें ऊंचा, नीचा -- सब पार्ट है। हम अपने अभी के पुरुषार्थ की मंजिल को भी समझते हैं। इसे भी हमको तय करना है।

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28.12.58: पवित्र प्रवृत्ति से निवृति नहीं लेकिन माया से निवृति रखो

ओम् शान्ति। परमात्मा की नॉलेज सिद्ध करती है कि प्रवृत्ति मार्ग अनादि से ही चला आता है । रचता और रचना- यह दो अक्षर भी प्रवृत्ति को सिद्ध करते हैं। परमात्मा क्रियेटर है तो किसका ? क्रियेशन का। भगवान के संस्कार ही प्रवृत्ति के हैं। भल निराकार है परन्तु रचना का रचता तो है ना। परमात्मा अपने संस्कारों में ही प्रवृत्ति वाला है। तो इससे सिद्ध है अनादि प्रवृत्ति है। वह परमात्मा की अनादि पवित्र प्रवृत्ति कौनसी है, उसका नॉलेज खुद ही बताते हैं। ऐसे नहीं, प्रवृत्ति सुख और दुःख की है। परमात्मा की प्रवृत्ति ही सुख की है। जिस रचना के लिए उसको रचता कहा जाता है। सुख-दुःख, हार-जीत – दोनों को मिलाकर प्रवृत्ति नहीं कही गई है। परमात्मा की प्रवृत्ति है ही सुख की। दुनिया समझती है – यह दुःख सुख प्रवृत्ति में होता ही आया है, होता रहेगा। परन्तु नहीं, परमात्मा सुख की रचना रचते हैं। उसमें दुःख-सुख की बात नहीं, वह तो प्रालब्ध है। वहाँ जन्मना, मरना, शरीर में रहना सब पवित्रता के आधार से होता है। दुनिया जानती ही नहीं कि जन्मना पवित्रता से भी हो सकता है। इस बात को असम्भव समझती है। परन्तु परमात्मा कहते हैं – मेरी अनादि रचना थी ही पवित्र प्रवृत्ति । बाकी सब रचना है माया की। माया की रचना में आदि-मध्य-अन्त दुःख है। वह है अपवित्र रचना। इस खेल को समझना है। यह रचना है 5 भूतों की, इसमें दुःख-सुख दोनों मिला हुआ है। अल्पकाल का सुख तो दुःख की बराबरी में ही रखेंगे। परमात्मा की अनादि रचना में है ही पवित्रता । आदि-मध्य-अन्त सुख की प्राप्ति रहती है।

मनुष्य समझते हैं – निवृत्ति से ही पवित्रता होगी । परन्तु निवृत्ति रखनी है माया से। ऐसे नहीं, प्रवृत्ति से निवृत्ति रखनी है। प्रवृत्ति है तब तो पवित्रता शब्द आता है ना। पार्ट ही न हो तो प्रवृत्ति शब्द भी क्यों कहें ? अब हम जानते हैं – परमात्मा की पवित्र प्रवृत्ति की डिपार्टमेन्ट अलग है, माया की डिपार्टमेंट अलग है। पवित्र प्रवृत्ति में रहने की अब नॉलेज मिली है। पवित्रता को प्रवृत्ति कहेंगे, प्रवृत्ति को पवित्रता कहेंगे। अब हम माया की अपवित्र प्रवृत्ति से निकल रहे हैं। परमात्मा कहते हैं कि माया की प्रवृत्ति में अनेक जन्म बिताये, अब उनसे निवृत्त होना है। उल्टी-सुल्टी प्रवृत्ति से निवृत्त होना है और पवित्र प्रवृत्ति में आना है। दुनिया ने देखी ही यह माया की प्रवृत्ति है। परमात्मा की पवित्र प्रवृत्ति के संस्कार ही इन आत्माओं से गायब हैं। बहुत जन्मों से माया की मैल चढ़ी हुई है। इसलिए समझ नहीं सकते हैं कि प्रवृत्ति भी पवित्रता के आधार पर कभी चली है और चल सकती है। मनुष्य आत्मा के लिए पुनर्जन्म तो जरुर है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि पुनर्जन्म है ही दुःख देने वाला। आदि-मध्य-अन्त सुख देने वाले पुनर्जन्म हमारे होते हैं।

अब हम जानते हैं कि आत्मा की ओरीजनल स्टेज यह है। तो सदाकाल सुख भोगते हैं। परमात्मा जो रुहों का बाप है उनके ही संस्कार हैं स्थापना-विनाश-पालना करना। वह समझते हैं कि यह स्टेज भी नीचे की है। ऊपर वाली स्टेज में कुछ नहीं है। परन्तु हम जानते हैं कि परमात्मा है ही संस्कार वाला । स्थापना-पालना-विनाश- यह परमात्मा के संस्कार हैं, आत्मा के नहीं। आत्मा इस कार्य अर्थ निमित्त नहीं बन सकती है। इस विकारी प्रवृत्ति का विनाश और पवित्र प्रवृत्ति की स्थापना करना परमात्मा का ही काम है। यह संस्कार उस एक ही सुप्रीम रुह के हैं। वह रुह अब अपना कार्य कर रहे हैं। इसमें हाथ पाँव से कुछ करना नहीं है। परमात्मा कर्म भी यही सिखलाते हैं कि पवित्र बनो और बनाओ । यह समझ की बात है। कहा जाता है ना – समझ से काम लो। समझ होगी तो मालूम रहेगा- क्या कर्म करना है। पहले ज्ञान पीछे कर्म । समझ कर काम करना होता है। समझ से ही हम जानते हैं कि श्रेष्ठ कर्म क्या है ? तो रचता और रचना, बीज और झाड़ सिद्ध करते हैं प्रवृत्ति को । बीज में झाड़ है ना। बीज है ही प्रवृत्ति वाला। परमात्मा क्रियेटर है, उनकी रचना प्रवृत्ति की है। अब हम इस नॉलेज को जानते हैं कि यह है ही प्रवृत्ति का फाउन्डेशन । अपवित्र प्रवृत्ति की जड़ को निकाल पवित्र प्रवृत्ति की जड़ को लगाना परनात्मा का ही काम है, जो अब कर रहे हैं।

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29.12.58: कर्मयोग सन्यास करने का यथार्थ तरीका

ओम शान्ति । परमात्मा द्वारा इस समय जो 5 विकारों का सन्यास सिखाया जाता है, उसके भी अर्थ को समझना है। क्योंकि हमारा कोई कर्म-सन्यास नहीं है। हमारा है कर्मयोग - सन्यास। हम सन्यास करते हैं 5 भूतों का। वह कर्म-सन्यासी रचना को मानते नहीं हैं। वह तो ज्योति ज्योत में समाने अथवा मुक्ति पद को ही मुख्य मानते हैं। हम परमात्मा द्वारा जानते हैं कि मनुष्य का जीवन्मुक्ति ही स्टेटस है। उनको कैसे प्राप्त करें, सो परमात्मा ही आकर सिखलाते हैं।

कई बिचारे मूँझ पड़ते हैं। सुनते हैं ना - देह सहित देह के सब सम्बन्धों का सन्यास करना है। तो समझते हैं कि फिर सम्बन्धियों से हमारा कोई तैलुक नहीं। जैसे सन्यासी घृणा रख चले जाते हैं। यहाँ तो समझाया जाता है -चैरिटी बिगन्स एट होम । जैसे हम ज्ञान से मालामाल हो रहे हैं तो औरों को भी मालामाल करना है। यही हमारा कर्म है। जबकि हमारी नालेज, हमको लक्ष्य ही देती है कि कर्मयोग - सन्यास करो, तो इसमें सन्यासियों के माफिक सबसे तोड़ना नहीं है। सम्बन्ध जरुर रखना है। परन्तु विकारी सम्बन्ध का नाता बदलकर इस पवित्र सम्बन्ध में रहना कि हम उस बाप की सन्तान हैं, वह हमको मालामाल कर रहे हैं। तो पहले घर वाले जिनके साथ नाता था, जिन्हों से सेवा ली है, उन्हों के रिटर्न में यह ऊंची सर्विस करनी है। तोड़ने का मतलब यह नहीं कि घृणा करें। हमारा काम है सेवा करना। बाप भी कहते हैं - मैं वर्ल्ड की सर्विस पर उपस्थित हूँ।

आगे जो सम्बन्ध था उसमें दुःख देना, दुःख लेना होता था। अब सुख देना है, सुख लेना है। अल्पकाल का सुख तो अनेक जन्म लेते और देते आए, अब हमारी सेवा है सदाकाल सुख देने की। जबकि अनुभव कर रहे हैं तो अनुभवी दूसरों को देने के सिवाए रह नहीं सकते। वह समझेंगे कि और भी लाभ उठावें, पहले घर वालों को मालामाल बनावें । हमारा सम्बन्ध इतना रहेगा. इसमें कर्मबन्धन की बात नहीं है। यह सम्बन्ध तो जोडना है। यह भी तुम देख रहे हो कि इस नॉलेज में आने से फिर परीक्षायें भी आती हैं। क्योंकि यह नॉलेज भी नई है और उनके चरित्र भी नये हैं। उन्होंने शास्त्रों द्वारा कुछ और बातें सुनी हैं और परमात्मा जो प्रैक्टिकल पार्ट बजाते हैं, इन चरित्रों को तो हम ही जानते हैं। इसलिए इन बातों को समझाने में युक्तियाँ भी रखनी पड़ती हैं। सीधा ही किसको कहेंगे कि हमको परमात्मा ऐसे कहते हैं, तो समझेंगे - पता नहीं यह किस चक्र में पड़ा है। सबके विचार, संस्कार अपने-अपने हैं ना। तो देखकर चलना है। डॉक्टर सबको एक इलाज तो नहीं देंगे। तो यहाँ भी युक्ति से काम लेना पड़ता है। झट से जोश में नहीं आना है कि हमारा कोई से कनेक्शन नहीं है।

बाबा तो कहते हैं कि पुरानी दुनिया को नई दुनिया बनाना है। बाप ने भी आकर तमोगुणी आत्माओं से संबंध जोड़ा है। तमोगुणी आत्माओं का ही बाप-टीचर-गुरु बना है, उन्हों को सद्गति देने के लिए। दुर्गति वालों का ही तो गुरु बनेंगे ना, जिनको इस नॉलेज की आवश्यकता है। ऐसी आत्माओं से सम्बन्ध जोड़ उन्हों को वसें का हकदार बनाते हैं। हम भी इस कार्य में निमित्त रहेंगे। यही सर्वोत्तम सेवा है। हरेक लेने के लिए हकदार है, हम देने के लिए हकदार हैं। इन बातों को अच्छी रीति समझना है। न समझने के कारण घबरा जाते हैं। इसलिए बार-बार सावधानी मिलती है। जबकि हाथ में हाथ दिया है, तो वह बतलायेंगे कि कैसे कदम उठाओ। हमारे ईशारे पर चलने से ही तुम्हारा कल्याण होगा। हर एक का पोतामेल उनके पास है। जो पूरा हाथ देते हैं उन्हों का साकार में आकर सब पोतामेल लेते हैं।

यह नॉलेज है ही प्रैक्टिकल की। 5 भूतों का सन्यास करना है। मैली आत्मा को साफ करना है। कर्मबन्धन से छूटने का तरीका रुहानी बाप ही सिखलाते हैं। अटेन्शन देना पड़ता है, तब रोशनी मिलती जायेगी । सन्यास अक्षर पुराना है। परन्तु यह कर्मयोग - सन्यास कोई ने सिखलाया नहीं है। अब हम सीख रहे हैं। उनके डायरेक्शन में ही कल्याण है। इसमें घबराने की ज़रुरत नहीं है। बाकी मंजिल बड़ी है। जीते जी पूरा मरना है। बाप के पूर्ण ईशारों पर चलना बच्चों का काम है। प्रैक्टिकल की बात है। उनको जीवन दी है तो सब कुछ उनके सामने रखना चाहिए। समझाने वाला बैठा है, यह तो जीवन बनाने की बहुत ऊंची बात है। बाकी किसके भाग्य में नहीं है तो उसकी बात ही नहीं है। अपना काम है पुरुषार्थ करना और कराना ।

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30.12.58: पुराने कर्मबन्धन के हिसाब – किताब को मिटाकर पूरा बाप के हवाले हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है

भगवान को कालों का काल भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय उनका पार्ट ही है पूर्ण विनाश करने का। जबकि उनको पूर्ण विनाश करना है तो जरुर कालों का काल बनना पड़े । मरते तो आते हैं, परन्तु उस मरने और अभी के मरने में बड़ा फर्क है ! अब तो मानों अनेक जन्मों का मौत है। इसलिए अनेक जन्मों के हिसाब-किताब को भगवान के आगे रखना है। किस तरीके रखना है, वह भगवान खुद ही आकर समझाते हैं। कहते हैं चाहे अनेक जन्मों के डन्डे खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करो, चाहे मेरे द्वारा मेरे साथ संबंध जोड़कर जीते जी मरो । आप सब जीते जी मर रहे हो या मर भी चुके हो ? हम सब पुरुषार्थी हैं। दिन-रात हर सेकेण्ड पुरुषार्थ करते हैं। जबकि उनके साथ हमको चलना है तो इस पुराने कर्मबन्धन के हिसाब-किताब को पूरा चुक्तू कर देना है। भल गोद भी ली है, तो भी अपने हिसाब-किताब को तो जीते जी चुक्तू करना है ना। उसमें सक्सेसफुल कहाँ तक रहते हैं- वह बात और है परन्तु अटेन्शन दिन-रात जरुर होना चाहिए ।

तो पूर्ण विनाश का मतलब यह नहीं कि सिर्फ दुनिया का विनाश परन्तु उनको आत्माओं के पूर्ण हिसाब-किताब को भी चुक्तू करना है। आत्मायें उनके हवाले हों तब तो धर्मराज हिसाब-किताब चुक्तू करे । विनाश की भी फुल तैयारियां हो रही हैं और यहाँ परमात्मा जीते जी आत्माओं को देह से अलग कराके अपने हवाले करते हैं। देह और देह के सम्बन्धियों से निकल उनके हवाले होना है। उस तरफ परमात्मा ने वह तैयारियां भी कराई हैं, क्योंकि सबको ले जाना है। यह भी बतलाते हैं कि जीते जी हमारा होने से बहुत बड़ा पद प्राप्त होगा। ऐसे भी नहीं, सिर्फ गोद ली तो मर चुके । यह तो आत्माओं का पुरुषार्थ बहुत गहरा है। आत्माओं को अपने पूर्ण संस्कारों को मिटाए उनके हवाले करना है। हिसाब-किताब पूरा देना है। अपनी प्रालब्ध लेने का भी हिसाब उनके आगे रखना है क्योंकि परमात्मा को स्थापना, विनाश, पालना का कार्य अब ही पूरा कर जाना है। बाप हमें बतलाते हैं कि कल्प पहले इस पुरुषार्थ से तुम यह बने थे । परन्तु ऐसे तो नहीं बन गये। कहते हैं- मेरे द्वारा अपना पुरुषार्थ करने से बने थे। तो भविष्य का जोड़ और पास्ट का माइनस करना है। जीते जी यह काम करना – इसमें मुश्किलात आती है। बड़ी कठिन मंजिल है। माया ऐसी है जो बच्चे बनकर फिर बदल जाते हैं।

लक्ष्य तो बहुत ऊंचा है। सिर्फ वायदा करना है। भल यह बतलाया जाता है कि महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे के लिए क्या-क्या पुरुषार्थ है, लेकिन पुरुषार्थ को तो समझना है ना कि किस पुरुषार्थ से पूरी प्राप्ति करें ? भगवान द्वारा समझाया तो जाता है कि ज्ञान बहुत सहज है, पुरुषार्थ बहुत गम्भीर है। इसमें पूरा हिसाब-किताब देना होता है और लेना होता है। परन्तु इसमें भी रुकावटें आती हैं। हम तो ऐसे दांव लगाने वाले को धन्यवाद देंगे। बाकी मंजिल कड़े से कड़ी भी है, मीठे से मीठी भी है, अति सहज भी है, डिफीकल्ट भी है। सहज इसलिए है क्योंकि उनका तरीका बहुत सहज है, उनको जानना भी सहज है। परन्तु फिर भूलते भी झट हैं। यह सब विघ्न नूंधे हुए हैं। उनको जानकर अन्त तक निभाना है। ऐसे निभाने वाले ही पूरा लाभ ले सकते हैं। उस दुनिया में भी सब कुछ चाहिए । राजा-रानी में भी नम्बरवार, प्रजा में भी नम्बरवार । सब एक स्थिति में नहीं रह सकते। इसलिए जानकर, सम्भलकर चलना है।

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31.12.58: निरन्तर योग में स्थित रहने की सहज युक्ति

जिस चीज से स्नेह होता है उस चीज की याद आती है और स्नेह तब होता है जब उससे कुछ प्राप्ति होती है। यह अनादि कायदा है । अब हमारा भी परमात्मा के साथ स्नेह है। हम अनुभव से कह सकते हैं कि परमात्मा द्वारा हमें सब कुछ प्राप्त हुआ था और अब भी प्राप्त हो रहा है। जिस द्वारा प्राप्त होता है, उससे स्नेह रहता है और जिससे स्नेह है उनकी याद आती है। उसमें ज्ञान और योग दोनों आ जाता है। ज्ञान से स्नेह रहेगा, स्नेह से याद रहेगी । यह सब बातें समझने की हैं। जो चीज मिलने की है वह अनुभव होती है। मिलने की चीज है सुख-शान्ति । जितना जितना हम जानते जाते हैं, उतना अनुभव होता जाता है। अशान्ति से शान्ति, दुःख से सुख अब प्राप्त हो रहा है। पीछे तो होगी ही प्रालब्ध। अब दोनों चीज का कान्ट्रास्ट सामने रख सकते हैं। अनुभव के आधार से कह सकते हैं कि परमात्मा के साथ अब हमारा स्नेह बढ़ता जाता है।

योग के लिए कोई स्थूल साधना की बात नहीं है। नालेज से अनुभव में हैं, अनुभव से उनकी याद आपेही रहती है। याद नेचुरल चीज है। हम उनको कितना भी मिटायेंगे परन्तु वह चीज मिटेगी नहीं। याद की तरकीब बड़ी सहज है। संबंध से याद है ही है। यह भी हम जानते हैं कि वह सबको सुख देने वाला है । वह सब कुछ प्राप्त कराने वाला आकर उपस्थित हुआ है। अब प्राप्ति का अनुभव हो रहा है। तो उनका ही स्नेह रहता है, उनकी ही याद रहती है। यह अनुभव की बातें हैं। स्नेह का आधार अनुभव के ऊपर है । जितना अनुभव की प्राप्ति उतना स्नेह बढ़ता रहेगा। स्नेह से याद बढ़ेगी। अब इस दुनिया के दुःख के आसार प्रत्यक्ष होते जाते हैं, तो जरुर उनके पीछे सुख-शान्ति है। अनुभव से हम कह सकते हैं कि यह प्राप्ति हो रही है। तो जरुर हमारा बुद्धियोग और तरफ से हट उनके साथ ही रहेगा।

कोई-कोई पूछते हैं – “हमारी कब-कब अवस्था नीचे-ऊपर क्यों होती है ? 4 दिन अच्छी रहती तो 6 दिन आनंद, खुशी, उल्लास नहीं रहता।“ जितना-जितना नॉलेज होगा उतना स्नेह बढ़ेगा, उतनी ही याद अटूट लगातार रहेगी। भल कोई और कार्य होगा तो भी बुद्धि में वह बात घूमती रहेगी। तो यह याद भी ऐसी चीज है जो हमारे भूलाने से भी नहीं भूलेगी । जितना-जितना हम नालेज को जानते अनुभव को पाते जायेंगे उतना याद बढ़ती जायेगी । इसमें हाथ-पांव से करने की बात नहीं। जितना नालेज का अनुभव होगा उतना स्नेह रहेगा और जितना स्नेह उतना अटूट याद अथवा निरन्तर याद रहेगी। यह है प्रैक्टिकल बात। जैसे उन बातों में प्रैक्टिकल जीवन चलती थी, अब उनको बदलकर यह प्रैक्टिकल जीवन बनानी है। जीवन को सिर्फ बदलना है। कितनी सहज बात है ! बाहर का कोई ठाठ नहीं। कहाँ जगंल आदि में जाना अथवा साधना करना, इसकी भी दरकार नहीं है। उठते-बैठते, बोलते-चलते, आहार-विहार, खान-पान आदि सबमें वह नेचुरल चेंज आ जाती है। कोई एक-एक बात के लिए साधन नहीं करना पड़ता। सब बातों में पल्टा (परिवर्तन) आटोमेटिकली आ जाता है। ऐसे नहीं कि योग के लिए कोई अलग साधना करनी पड़ेगी । इसमें तो आटोमेटिकली वृति बदल जाती है । सूक्ष्म, स्थूल आन्तरिक अवस्था आदि सब बातों में चेंज आ जाती है। स्थिति भी बदल जाती है। मन-वाणी-कर्म इक्ट्ठा-इक्ट्ठा बदल जाता है। फिर जब आत्मा प्योर हो जाती है तो शरीर भी प्योर मिलता है। शरीर के ऊपर भी आत्मा के संस्कारों का संबंध है। कोई समझते हैं- “हमारे में क्रोध है, मोह है उसका क्या उपाय करें ? न चाहते भी हो जाता है”। परन्तु उसके लिए कोई अलग उपाय नहीं है। उपाय एक ही है कि एक बाप को याद करो। याद से सब विकार समाप्त हो जायेंगे । परन्तु यह सब समझने की बातें हैं। अच्छा । ओम् शान्ति ।

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20.04.59: आत्मा के नेचुरल – ओरिजनल संस्कार सुख के हैं, दुःख के नहीं

परमात्मा द्वारा आत्माओं के परिचय को भी समझा है कि आत्मा में दुःख और सुख, पाप और पुण्य – दोनों ही संस्कार भरे हुए हैं। परन्तु आत्मा की अपनी ओरीजनल स्टेज प्योरीफाइड सुख की है। जब आत्मा पाप के कर्म में आती है तो दुःख भोगती है और दुःख के समय सुख को याद करती है। सुख के समय दुःख को याद नहीं करती है। जब आत्मा अपने ओरीजनल सुख की स्टेज में है, तो उसी समय उनको दुःख की खींच नहीं होती है। दुःख की नालेज ही नहीं है। परन्तु आत्मा जब दुःख में इमप्योरीफाइड है अथवा आत्मा के संस्कार जब दुःख की स्टेज से शुरु होते हैं तो उसी समय सुख याद आता है। प्योरीफाइड सुख की खैच होती है। तो सिद्ध होता है आत्मा की ओरीजनल स्टेज वह प्योरीफाइ सुख की है। आत्मा अपनी ओरीजनल स्टेज में प्योरीफाइड है, तो उस समय दुःख का नॉलेज ही नहीं रहता। भल दुःख के समय सुख का भी नालेज नहीं रहता है, परन्तु बुद्धि सुख की तरफ खैचती जरुर है कि इस दुःख से हम छूटें, सुख को पावें । सुख की चाहना रहती है। जब सुख में है, फिर तो कोई संकल्प अथवा चाहना ही नहीं है। जब दुःख शुरु होता है तब उनको अपनी ओरीजनल स्टेज की याद आती है जिसके लिए हर तरह की कोशिश करते हैं। अब हमको परमात्मा द्वारा आत्माओं के सारे पार्ट का नालेज मिलता है। यह नॉलेज भी जब पूर्ण धारण हो जाती है तब पूर्ण प्राप्ति होती है और आत्मा पूर्ण तृप्त हो जाती है।

कई लोग प्रश्न पूछते हैं कि प्योरीफाइड, इमप्योरीफाइड आत्मा के ही संस्कार हैं, फिर तो यह पार्ट हो गया ना ? परन्तु आत्मा के नेचुरल संस्कार भी देखेंगे तो दुःख के समय सुख की चाहना उठती ही है। आत्मा को अपनी ओरीजनल स्टेज चाहिए। उनके लिए ही दौड़ते-भागते हैं। इसलिए वही पुरुषार्थ अथवा संकल्प रहता है। इस नेचुरल चीज से मालूम पड़ता है कि आत्मा की ओरीजनल स्टेज सुख की है। भल दुःख-सुख दोनों संस्कार आत्मा में हैं, परन्तु उसमें भी सुख का ओरीजनल रुप कहेंगे ।

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21.04.59: आत्मा और शरीर – दोनों की खूबसूरती का आधार ‘कर्म’ है

ओम् शान्ति । सूरत और सीरत – सूरत कहा जाता है रुप को, सीरत कहा जाता है गुणों को। यह दोनों चीज बनती हैं संस्कारों के आधार से । आत्मा ज्ञान से खूबसूरत अथवा प्रकाशमय बनती है। जैसे परमात्मा सबसे तेजोमय है ना। तो यह तेज और गुण भी संस्कारों के आधार पर रहते हैं। जिस आधार पर फिर शरीर भी ऐसा प्योर मिलता है। शरीर का रुप भी संस्कारों के आधार पर बनता है। शरीर और आत्मा की खूबसूरती – दोनों का आधार है मनुष्य के कर्मों पर और कर्म से फिर जो संस्कार बनते हैं वह उस अनुसार ।

अब हमारा पुरुषार्थ है कि हम आत्मा को खूबसूरत बनायें । तो यह सब हो गया आत्मा के आधार पर। जितना जितना आत्मा को ऊंचा उठायेंगे उतना आत्मा खूबसूरत होगी और सीरत भी ऐसी होगी। आत्मा के साथ देह का संबंध है, देह के साथ सब संबंधों का कनेक्शन है। इन सबको आधार मिला है आत्मा के संस्कारों का । जितना-जितना उनको प्रकाशमय बनायेंगे तो फिर गुण भी ऐसे रहेंगे। आत्मा को ही शुद्ध बनाना है। आत्मा के प्योरीफाइड होने से यह सब कुछ प्योर बनेगा । सूरत और सीरत आत्मा की बनानी है। बनाने वाला वह है। आत्मा बदल जाती तो शरीर भी बदल जाता है। सारी सजावट बदल जाती है।

तो अपना अटेन्शन है आत्मा पर । सबसे खूबसूरत तो परमात्मा ही है जिस द्वारा ही सब आत्मायें प्योरीफाइड बनती हैं। परमात्मा इमार्टल है। आत्मा फिर भी बदलती है। तो अपना अटेन्शन है आत्मा की तरफ। इनसे सारी रचना खूबसूरत हो जायेगी, जिसको स्वर्ग कहा जाता है। स्वर्ग को ही सबसे खूबसूरत कहेंगे । सारी खूबसूरती का आधार आत्मा पर है। उनको भी इतना इमार्टल बनाना है जो इतना समय उनकी सूरत और सीरत दोनों कायम चलें । सूरत खूबसूरत है तो अवश्य सीरत भी ऐसी रहेगी। ओम् शान्ति ।

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22.04.59: मुक्ति और जीवन्मुक्ति का आपस में संबंध

ओमशान्ति । परमात्मा के द्वारा सारी रचना की नालेज अर्थात् इस मनुष्य सृष्टि और निराकारी दुनिया के सारे भेद को जानते जा रहे हैं। क्योंकि निराकारी दुनिया का इस साकारी दुनिया से संबंध है और साकारी दुनिया का निराकारी दुनिया से संबंध है। आत्मायें पार्ट बजाने आती हैं, फिर जाती हैं। मनुष्य समझते हैं कि “हम भी कोई पुरुषार्थ से कभी मुक्ति पद को पा सकते हैं। ऐसे बहुत मुक्ति को पाये हुए हैं ।” परन्तु हम जानते हैं कि मुक्ति और जीवन्मुक्ति दोनों का आपस में संबंध है। जैसे निराकारी दुनिया का साकारी दुनिया से संबंध है. ऐसे जब तक परमात्मा द्वारा जीवनमुक्त दुनिया न बने, तब तक मुक्त भी कोई नहीं बन सकता ।

दुनिया नहीं जानती कि मुक्ति अलग चीज है, जीवन्मुक्ति अलग चीज है। हम जानते हैं – जब दुनिया जीवन्मुक्त बने तब बाकी सब मुक्ति में जावें । तो मुक्ति-जीवन्मुक्ति इक्ट्ठी हो गई ना। मुक्त जीवनमुक्त सबको इक्ट्ठा एक ही टाइम पर होना है। इसमें हर चीज आ जाती है। तब ही आत्मा भी वह मुक्ति-जीवन्मुक्ति का सुख ले सकती है। सारी दुनिया से इसका संबंध है। तो यह सब बातें इक्ट्ठी हैं। ऐसे नहीं, कभी भी कोई मुक्त हो सकते हैं। मुक्ति-जीवन्मुक्ति इक्ट्ठी हैं। तो इस रचना के आदि-मध्य-अन्त को हम परमात्मा द्वारा जानते जा रहे हैं।

तो साकारी और निराकारी दुनिया का भी आपस में संबंध है जिससे यह चक्र चलता रहता है। दुनिया इस मुक्ति-जीवन्मुक्ति के अर्थ को न जानने के कारण समझती है – “कोई भी पुरुषार्थ से मुक्ति को पा सकते हैं, फलाने-फलाने ने पाई हुई है।” परन्तु कोई ने भी पाई नहीं है। इसका पुरुषार्थ एक ही टाइम होता है और एक के द्वारा ही यह पुरुषार्थ सीखते हैं। जीवन्मुक्त पद सारी दुनिया का पद है, एक मनुष्य का पद नहीं है। तो जब जीवन्मुक्त दुनिया बनती है तो अन्डरस्टुड है बाकी सब मुक्त हो जाते हैं ।

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28.04.59: यह खेल स्मृति-विस्मृति का बना हुआ है, आत्पा सदा ही मन-बुद्धि सहित है

ओम् शान्ति । परमात्मा और आत्मा - इसकी नॉलेज को अभी हम परमात्मा द्वारा जानते जा रहे हैं। आत्मा को मन-बुद्धि सहित कहा जाता है। आत्मा जन्म-मरण में आने वाली है। इसमें सारा जो पार्ट चल रहा है, उसकी स्मृति नहीं रह सकती है। भल आत्मा मन-बुद्धि सहित बेशक है, परन्तु अनेक जन्मों का जो कुछ हुआ वह स्मृति तो नहीं रह सकती है ना। एक जीवन का ही हम लें, तो भी सब बातें डिटेल सहित याद थोड़े ही रहती है। बुद्धि में स्मृति-विस्मृति होती है। परन्तु बुद्धि तो रहती है ना। ऐसे थोड़े ही कहेंगे कि बुद्धि चली जाती है। परन्तु जब वह ठीक कर्त्तव्य नहीं करती है तो इस पर कहा जाता है जैसे कि इनकी बुद्धि चली गई है। परन्तु ऐसे तो नहीं है ना कि बुद्धिहीन है। आत्मा सदा ही मन-बुद्धि सहित है। सतयुग में आत्मा है तो ऐसे नहीं, उसे 84 जन्मों की स्मृति है।

परमात्मा जो नॉलेजफुल है उसमें ही सबकी नॉलेज है । तो इस समय पर उनका पार्ट है। जब पार्ट में आते हैं तब आकर के नॉलेज सुनाते हैं। नॉलेज इमर्ज भी इतनी करते हैं जितना आत्मा की उन्नति के लायक है। भल वह जानी-जाननहार है परन्तु पार्ट में फिर भी अन्दाज है ना, उतना ही सुनाते हैं। तो ऐसे नहीं, आत्मा को सारी स्मृति इक्ट्ठी रह सकती है। स्मृति-विस्मृति तो चलती आती है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि आत्मा मन-बुद्धि सहित नहीं है। सिर्फ वह स्मृति चली जाती है। बॉडी कान्सेस, सोल - कान्सेस --यह भी खेल है ना। आत्मा, आत्मा ही है। सिर्फ विस्मृति हो जाती है। फिर परमात्मा द्वारा स्मृति मिलती है। जन्म-मरण में आते-आते आत्मा की कला घटती जाती है। यह भी परमात्मा आकर बतलाते हैं। सो भी अनेक जन्मों का डिटेल थोड़े ही बतलाते हैं। उनसे हमारा प्रयोजन नहीं। जानते हैं कि पहले दुःख की जीवन थी, उनको भूलना ही है। तो फिर उसके विस्तार को जानने की क्या जरुरत है ? ड्रामा का खेल और आत्मा का परिचय - यह परमात्मा बैठ समझाते हैं। बुद्धि तो है, फिर कई बातें ख्याल से हट जाती हैं। तो ऐसे थोडे ही कहेंगे बुद्धि ही नहीं है।

इस नॉलेज को समझने से ऐसी छोटी-छोटी बातें तो अपने विचार से भी हल हो जाती हैं। हम भी पास्ट-फ्युचर दोनों के अनुभवी हैं। बुद्धि द्वारा हम जान सकते हैं। ऐसे भी नहीं कि साक्षात्कार हो तब हम जान सकते। यह तो बुद्धि का काम है जानना । साक्षात्कार नहीं हुआ है तो भी हर्जा नहीं है। जानने का संबंध साक्षात्कार से नहीं है। ज्ञान का मतलब साक्षात्कार नहीं है। मनुष्य समझते हैं साक्षात्कार से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है। परन्तु ज्ञान तो नॉलेज को कहा जाता है। कहा भी जाता है ज्ञान बिगर गति नहीं। ऐसे नहीं कहा जाता है कि साक्षात्कार बिगर गति नहीं ।

परमात्मा को न्यारा भी कहा जाता है और प्यारा भी कहा जाता है। दुनिया वाले समझते हैं कि जैसे आत्मा जन्म-मरण में आती भी है और न्यारी निर्लेप भी है, ऐसे परमात्मा भी है। क्योंकि समझते हैं आत्मा ही परमात्मा है। परन्तु हम जानते हैं - परमात्मा न्यारा और प्यारा कैसे है। वह अजन्मा, दुःख-सुख से न्यारा भी है परन्तु उनके पार्ट बजाने के संस्कार भी हैं और पार्ट भी अति प्यारा बजाया है क्योंकि सबको सुखी बनाते हैं। परमात्मा तो बेहद का कार्य आकर करते हैं। सर्व आत्माओं को सुखी बनाते हैं। इसलिए सर्व आत्माओं को वह प्यारा लगता है। आत्माओं को प्यार मिला है, सुखी बनी है, तब रिटर्न में इतना प्यार करती है। परमात्मा ने हम आत्माओं के साथ यह पार्ट बजाया हुआ है। सुखी बनाया है, इसलिए अति प्यारा है। लेकिन वह हम आत्माओं से न्यारा है। भल खुद भी आत्मा बन पार्ट बजाते हैं परन्तु उनके कर्तव्य न्यारे हैं। जो आत्मा नहीं कर सकती वह काम करते हैं। सर्व आत्माओं को सन्तुष्ट करते हैं, सर्व आत्माओं को सुख शान्ति देते हैं। इसलिए प्यारे हैं। तो न्यारे का अर्थ यह नहीं कि लेप-छेप से न्यारा है। वह तो जो कुछ करता है उसका बनता जरुर है। सर्विस की है तब तो उनको सभी प्यार करते हैं। यह भी रिटर्न है ना। भल जानते नहीं हैं कि वह कौन है, हमारे साथ संबंध क्या है ? लेकिन प्यार तो करते हैं ना। याद भी करते हैं ।

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29.04.59: याद का आधार ज्ञान है, साक्षात्कार नहीं

अभी हम आत्माओं को परमात्मा के द्वारा परोक्ष और अपरोक्ष साक्षात्कार होता जा रहा है। अपनी आत्मा के स्वदर्शन चक्र का पता पड़ता जा रहा है। आत्मा के पते के साथ, परमात्मा का भी पता आ जाता है। इसको कहा जाता है आत्मा को स्व का साक्षात्कार । यह है चक्र । आत्मा आदि-मध्य-अन्त का चक्र कैसे लगाती है, वह नालेज से भी जानते और साक्षात्कार द्वारा भी । जो अनुभवी हैं वह कह सकते हैं - नालेज से जान सकते हैं कि आत्मा कैसे अपना चक्र लगाती है। भल साक्षात्कार हो भी परन्तु नालेज नहीं है तो साक्षात्कार कोई काम का नहीं है। मुख्य है नालेज पर । इसलिए यह आश भी नहीं रखना कि जब साक्षात्कार हो तब हम लक्ष्य को पकड़ सकें ।

याद का तैलुक ज्ञान से है। ज्ञान से ही हम उनके सारे कर्त्तव्य को जानते हैं। तो हम जानने से ही याद कर सकते हैं। ऐसे नहीं, सिर्फ साक्षात्कार में देखकर उस मूर्त का ध्यान करना है। उसकी बुद्धि में नॉलेज चाहिए । जितना आत्मा-परमात्मा की नालेज पूरा बुद्धि में बैठती जायेगी उतना याद स्वतः रहेगी । देखने का आधार याद से नहीं है। ध्यान लगाने की बात नहीं। जितना नालेज बुद्धि में घूमेगी उतना वह याद खींचेगी। ध्यान में जाने की बात ही नहीं। सारा स्वदर्शन - चक्र घुमाना है। आत्मा को अपना नालेज भी रहता है, परमात्मा का भी कर्त्तव्य, आक्यूपेशन बुद्धि में रहता है। तो यह है ही बुद्धियोग । जितनी नालेज की धारणा उतना याद की स्थिति कायम रहेगी। बिगर नॉलेज सिर्फ देखने से कुछ नहीं होगा ।

बहुतों को रहता है – हम ज्योतिर्बिन्दु परमात्मा का साक्षात्कार करें तो बुद्धियोग में सहज बैठेगा । हम जानते हैं- वह हमारा बाप, टीचर, गुरु है। उनके कत्तव्य सहित सारा आक्यूपेशन हमारी बुद्धि में है। यह नालेज नहीं होगी तो याद रहेगी नहीं। साक्षात्कार से कनेक्शन नहीं। मुख्य है ज्ञान । याद अथवा योग भी तब बढ़ता है जब नॉलेज बुद्धि में घूमती है। नॉलेज बुद्धि में है तो याद खींचती रहेगी। याद को खींचना है नालेज की ताकत से । सारा राज बुद्धि में घूमता रहेगा।

उसको ही स्वदर्शन चक्र कहा जाता है। नालेज से ही यह चक्र घूमेगा । तैलक इसका है ही नालेज से । तब आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो ही जाता है। तो सारा मदार है ज्ञान पर। भल साक्षात्कार होता है, ठीक है, परन्तु कोई जरुरी नहीं। हमारी उन्नति ज्ञान और योग से होती है। हमारे पास पूरी नॉलेज है। समझ न होने से वह चीज जैसे देखी न देखी। हमको सूरत पर ध्यान नहीं लगाना है। उनकी याद में नालेज की ही दरकार रहती है। बुद्धि उनके साथ जुटानी है जो ज्ञान का सागर है। कहा ही जाता है बुद्धियोग ।

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08.07.59: ज्ञान बिना योग यथार्थ नहीं हो सकता, ज्ञान-योग से ही दैवी गुण आ सकते हैं

हम सभी बाप की याद में बैठे हैं, क्योंकि हमें बाप से वर्सा पाना है। बाप और वसें को अच्छी रीति जानते हैं। याद भी तभी करते हैं। कोई समझते हैं- बुद्धि ने बाप को जान लिया, बस । लेकिन उनका फरमान है- "निरन्तर मुझे याद करो । जितना याद करेंगे उतना वर्सा पायेंगे।" तो यह टैम्पटेशन है। जानते है हर एक सब्जेक्ट से क्या लाभ होगा। जितना ज्ञान उठायेंगे उतना दान भी करेंगे तो पद भी ऊंचा पायेंगे और दैवीगुण धारण करेंगे तो कोई विकर्म नहीं होंगे योग से फिर विकर्म विनाश होंगे। तो हर एक बात जरुरी है। ज्ञान बिना यथाथ योग नहीं हो सकता है और ज्ञान-योग के बिना दैवीगुण नहीं आ सकते हैं। ते जब जानते हैं कि इससे यह फायदा है, तो हमारा पुरुषार्थ भी ऐसा तीव्र हो जात है। सारी पढ़ाई हमारे ध्यान पर है, सिर्फ एक सब्जेक्ट की बात नहीं है। सिर्फ ज्ञान-स्नान ही नहीं करना है लेकिन ज्ञान को धारण कर प्रैक्टिकल लाइफ बनान है। किसी भी बात में मूंझना नहीं है। तन-मन-धन से पूरा-पूरा लाभ उठान है।

अभी बाप सामने है तो सब प्राप्तियां हो जाती हैं। सुख, सम्पत्ति, तन्दरुस्ती- सबकी गैरन्टी है। शक की तो बात ही नहीं है। जब टैम्पटेशन है तो पुरुषार्थ करना चाहिए। बच्चे का फर्ज है बाप के हर डायरेक्शन पर चलना। स्टु‌डेन्ट को फिर पढ़ाई पर पूरा अटेन्शन देना पड़ता है। गुरु की आज्ञा पर भी चलना पड़े। तो बाप, टीचर, गुरु – तीनों के फरमान पर चलना है। और फिर प्राप्ति भी इतनी है, रास्ता भी सहज है। तो क्यों न पुरुषार्थ करना चाहिए। यह भी अभी चांस है। पुराने संस्कारों को भी भस्म करना है। तो जब सभी बातों को जानते हैं तो पुरुषार्थ को भी इतना तीव्र रखना है। हर एक बात को इतना ही फोर्स से उठाना है। कहते तो सभी हैं कि हम सूर्यवंशी बनें। तो पुरुषार्थ भी करना है। थकना नहीं है। अच्छा।

यह तो अच्छी तरह से पक्का है कि हम रुह हैं और हम रुहों का बाप रुहानी रुह है। अभी हमें उस रुहानी रुह के साथ वापस जाना है। इसलिए स्वयं को बदलना है। अभी रुहों के ऊपर ज्ञान की बरसात हो रही है जिससे रुह स्वच्छ बनें। यह ज्ञान – बरसात है जो आत्मा धारण करती है, शरीर धारण नहीं करता। शरीर को भी आत्मा धारण करती है। तो आत्मा को परिवर्तन करने वाला वो रुहानी बाप है।

आत्मा अभी महसूस करती है कि हमारे में कैसे परिवर्तन आ रहा है। दुनिया बाले तो समझते – विकारों को जीतना बहुत कठिन है। लेकिन हमें निश्चय है कि बाप द्वारा हमने अनेक बार विकारों को जीता है। पतित-पावन ने हम पतितों को पावन बनाया है। कहते भी हैं- अहिल्या-गणिका का उद्धार किया । ऐसे नाम भी तब हैं जब तमोप्रधान हैं। ऐसे नहीं पाप-आत्मायें, पुण्य-आत्मा बन ही नहीं सकती। लेकिन बाप द्वारा कैसी भी पाप आत्मा, पुण्य-आत्मा बन सकती है। बाप की याद से अनेक जन्मों के पाप खलास हो सकते हैं। अनेक जन्मों के पाप इस एक जन्म में खत्म कर सकते हैं। इसलिए कभी उलझन में नहीं आना चाहिए कि इतने पाप किये हैं। 63 जन्मों के पाप भी इस जन्म में भस्म हो सकते हैं।

अभी हमारे विकर्मी खाते को परमात्मा स्वच्छ बना रहे हैं। मनुष्यों द्वारा तो न अनेक जन्मों के पाप नाश हो सकते हैं, न प्रालब्ध बना सकते हैं। तो मनुष्य की बात नहीं है। वे तो मोक्ष मांगते रहते हैं। समझते हैं- स्वर्ग से भी मोक्ष उत्तम है। लेकिन मोक्ष के बाद भी पार्ट में तो आना ही है। वहाँ बैठ जाने से तो कोई प्राप्ति ही नहीं। आना है तो क्यों न ऐसी दुनिया में आयें । तो यह सब नॉलेज है। इसमें मूंझने की बात नहीं है ।

24.08.59: अवस्था अच्छी बनानी है तो जो सुनते हो उसे औरों को सुनाओ

अभी हम पुराने से नये बन रहे हैं। नई चीज सुख देने वाली होती है और पुरानी चीज दुःख देने वाली होती है। हम भी जब नये थे तो बहुत सुखी थे। अब फिर हम सुख की तरफ जा रहे हैं। इसके लिए हमको परमपिता परमात्मा ज्ञान और योगबल के सांचे में ढाल रहे हैं। भल आत्मा का स्वरुप तो वही है लेकिन संस्कारों में परिवर्तन आ जाता है। अब हम आत्माओं को परमात्मा काले से गोरा बना रहे हैं। तो शरीर भी ऐसे ही बनेंगे। आत्मा है तो अनादि लेकिन प्योर बना रहे हैं। इसलिए उनको रचयिता भी कह सकते हैं। सभी आत्माओं को मुक्ति-जीवन्मुक्ति देने वाले वह हैं। इसलिए क्यों न कहें कि वह रचयिता है। इसलिए उनको आत्माओं का पिता भी कहते हैं। कैसे हम आत्माओं को नया जन्म देते हैं ? जैसे पुराने जेवर से नया बनाते हैं तो भट्ठी में डाल खाद निकाल साफ करते हैं। वैसे भी हम महसूस करते हैं- जैसे ज्ञान-योग की भट्ठी में पड़े हैं, 5 विकारों की खाद निकलती जा रही है। यह सब बातें अपने अनुभव की हैं। अपने आगे तो स्पष्ट है कि हमको क्या बनना है। 5 विकारों का अंश भी नहीं रहता है। अपने ओरीजनल संस्कार तो प्योर हैं। यह तो माया के संस्कार हैं। खेल ही ऐसे बना है जो आधा कल्प ईश्वर के प्योर संस्कार हमारे में रहते हैं, आधा कल्प माया के विकारी संस्कार रहते हैं।

अब फिर हमें प्योर बनना है जिससे सर्वदा सुख-शान्ति मिलेगी। इसके लिए ही अनेक युक्तियां मिल रही हैं। जितना मन्सा-वाचा-कर्मणा इस अलौकिक सर्विस में तत्पर होंगे उतना अपना पुरुषार्थ भी तेज होगा। यह भी युक्ति है। औरों को समझायेंगे तो अपने को भी देखेंगे कि मेरे में कोई कमी तो नहीं है। जैसे कोई और को कहेंगे बीड़ी मत पियो, तो खुद कैसे पियेंगे ? इसलिए बाबा फरमान करते हैं – “जो सुनते हो वह औरों को सुनाओ तो तुम्हारी अवस्था भी अच्छी होगी ।” परिपूर्ण तो यहाँ ही बनना और बनाना है। ऐसे नहीं, दूसरे जन्म में बनेंगे। वहाँ तो है ही प्रालब्ध। अभी बाप पढ़ाने के लिए सामने है तो क्यों न सम्पूर्ण बनें, जो फिर वहाँ सजायें खानी न पड़ें। जब वह बाप-गुरु-टीचर बने हैं, तो फिर सजायें खाने उनके पास क्यों जावें ? इसलिए कहते हैं – अपने विकर्म मेरे सामने रखेंगे तो आधी सजा तो अभी ही क्षमा कर देंगे। वहाँ तो पूरी सजा खानी पड़ेगी। तो इसके लिए यह पुरुषार्थ है। बाकी कोई कहे हमने सब समझ लिए हैं, यह ड्रामा है, चक्र ऐसे फिरता है। लेकिन नहीं, इसकी घड़ी घड़ी स्मृति चाहिए। नहीं तो 2-3 रोज पढ़ने से ठण्डे पड़ जाते हैं । इसलिए जितना बुद्धि उसमें रहेगी उतना सदैव खुशी की अवस्था रहेगी। मार्ग भी बुद्धियोग का है। यहाँ हाथ-पांव की लड़ाई नहीं है, सब अन्दर की बात है। अन्दर ही अच्छे संस्कार धारण करने हैं।

हर एक को अपनी पढ़ाई का शो दिखाना है। कहते हैं ना बंधन से छुड़ाओ । लेकिन सर्विसएबल भी हो ना। वहाँ से भी छोड़ो और सर्विसएबल भी न हो तो क्या करेंगे ? माया बुद्धि को भटकाती रहेगी। इस सर्विस के लायक होंगे तो वह सर्विस आपेही छूट जायेगी। इस सर्विस पर तत्पर हो जायेंगे तो कर्मबन्धन का खेल खत्म हो जायेगा। ऐसे तो नहीं होना चाहिए – खुद पकड़कर बैठे और कहता रहे बंधन से छुड़ाओ। यह तो है बुद्धियोग की बात । छोड़कर छूटने की बात तो नहीं है। बुद्धि को कर्मातीत बनाना है। बाकी प्रवृत्ति को भी सिद्ध करना है। जो कुछ हम छोड़ते हैं अथवा बदली करते हैं – वह है इमप्योरीफाइड कर्मबन्धन । उन्हें छोड़ प्योर संबंध लेना है। कर्म-सन्यासी तो नहीं हैं। यह तो सब बुद्धि की सफाई है। इसके लिए यह युक्तियां हैं। यह तो गैरन्टी है कि विजय अवश्य होनी है। यह तो बीच में विघ्न पड़ते हैं। यह सम्बन्धियों के बन्धन न पड़ें तो बंधन टूटें कैसे ? अपना तो सबमें फायदा है। सच्चे पातशाह से अगर सच्चा प्यार है तो इन विघ्नों की परवाह नहीं रहती। यह कोई मनुष्य से तो प्यार नहीं। डायरेक्ट सर्व समर्थ से योग लगाते हैं। वही अब विनाश, स्थापना का कार्य कर रहे हैं। इस बात को सिद्ध होने में अब देरी नहीं। प्रैक्टिकल दृश्य ही सिद्ध करा देंगे। तब तक अपने निश्चय और हिम्मत से काम लेना है।

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25.08.59: डायरेक्ट परमात्म मुख-वंशावली ही सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति के अधिकारी हैं

गीतः- दुःखियों पर कुछ रहम करो.. ।

ओम् शान्ति । रहमदिल तो परमात्मा को ही कहेंगे और दुःखी ही उनसे रहम मांगते हैं। जो सदा सुखी हैं वह तो नहीं मांगेंगे। रहम का मतलब है कि उनसे सुख की मांग करते हैं। यह मांग परमात्मा से ही करते हैं क्योंकि सबका पिता वह है। सबको सुखी करने वाला भी वह है। इसलिए हर एक की नज़र उनके तरफ जाती है। उनको ही कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे । अब भल बच्चे तो सब उनके हैं लेकिन एक हैं सगे, दूसरे हैं लगे । सगे बच्चे वह हैं जो डायरेक्ट मुख-वंशावली हैं, जिन्हों का अविनाशी ज्ञान से यह प्योर संबंध जुटता है। यह हैं मुख-वंशावली । बाकी तो सारी दुनिया है लगे बच्चे । सगे और लगे के अर्थ को भी समझना है, तो मुक्ति और जीवन्मुक्ति को भी समझना है। जो उनकी मुख-वंशावली बनते हैं उन्हों को तो जीवनमुक्त बनाते हैं। बाकी सब बच्चों को पार्ट से मुक्त कर देते हैं। ऐसे तो जो भी आत्मायें नीचे उतरती हैं, तो पहले सब जीवन्मुक्त हैं क्योंकि कोई विकर्मों का हिसाब-किताब नहीं है। लेकिन जीवन्मुक्ति की भी स्टेजेस हैं – सतो-रजो-तमो ।

परमात्मा ने अपने मुख-वंशावली ब्राह्मणों को जो जीवन्मुक्ति दी, वह है सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति, सतोप्रधान जिसमें सम्पूर्ण सुख-शान्ति-पवित्रता कायम है। पीछे द्वापर से तो पवित्रता की बात रहती नहीं। लेकिन आत्मायें जो आती हैं उन्हों का कोई कर्मों का हिसाब-किताब नहीं, इसलिए आधा समय सुख-शान्ति में रहती हैं। उसको कहेंगे रजोगुणी जीवन्मुक्ति । जो एकदम कलियुग में उतरते हैं उन्हों की सुख-शान्ति भी इतनी रहती है, इसलिए वह है तमोगुणी जीवन्मुक्ति । क्योंकि आत्मायें नम्बरवार आती हैं, तो जितना देरी से आती हैं उतना कम स्टेज वाली होती । तो जब पहले आदि सनातन धर्म स्थापन होता है, तो उस समय सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति है। फिर नम्बरवार स्टेज अनुसार आत्मायें आती जाती हैं। हर चीज की स्टेज तो जरुर होती है। बाकी मुक्ति तो सबको मिलती है। लेकिन वहाँ भी नम्बरवार सेक्शन हैं। जितनी प्योर उतनी बाप के समीप निवास करती हैं। बाप तो सबसे ऊंच है। बाकी सब आत्माएं नम्बरवार हैं। उन्हों में भी पहले हैं अव्यक्त देवतायें ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर साकार लक्ष्मी-नारायण इत्यादि । मुख-वंशावली ब्राह्मण देवता धर्म, फिर नम्बरवार और धर्म । जैसे नम्बरवार ताकत अनुसार यहाँ पार्ट बजाने उतरते हैं, वैसे वहाँ भी नम्बरवार निवास करते हैं। यह भी बना बनाया ड्रामा है, इसमें कुछ चेंज हो नहीं सकती ।

कोई कहे – अब यह सम्पूर्ण सुख का पार्ट दूसरे धर्म को क्यों नहीं मिलता ? लेकिन नहीं, सबको अपना अनादि पार्ट मिला हुआ है। ऐसे भी नहीं हो सकता जो क्राइस्ट का पार्ट बुद्ध को मिले, बुद्ध का क्राइस्ट को मिले । सबको अपने धर्म की स्थापना कर फिर उनकी पालना भी उनको ही करनी है। क्योंकि जो धर्म स्थापन करते हैं वह जैसे अपने धर्म का पिता हो गया। तो उनको अपने बच्चों की पालना भी करनी है। इसलिए अपने धर्म के गुरु बनते आते हैं। पालना भी तो यहाँ ही करेंगे। इसलिए वापस तो कोई जा नहीं सकते । सब यहाँ ही आते रहते हैं। अन्त में सब आकर इक्ट्ठे होते हैं। जब सारा वृक्ष निकल अन्त में पहुँचता है तब बीज आकर सबको वापस ले जाते हैं। ऐसे नहीं, हर एक धर्म जैसे अलग-अलग आते हैं वैसे अलग-अलग टाइम पर जायेंगे । नहीं जाने का टाइम सबका एक है और एक ही बार परमात्मा आकर सबको वापस ले जाते हैं। वहाँ से ही फिर अपने समय पर आते हैं।

इब्राहिम, बुद्ध आदि को मैसेन्जर भी कहते हैं। लेकिन बाप अपना दैवी धर्म स्थापन करने के लिए कोई मैसेन्जर को नहीं भेजते। यह टाइम तो उनके आने का है। तो वही आकर यह दैवी धर्म स्थापन करते हैं। इसको आर्य धर्म भी कह सकते हैं क्योंकि सबसे सुधरे हुए तो देवतायें हैं। अभी तो अनेकानेक धर्म हैं। उन सबकी भी अन्तिम स्टेज आ गई है। इसलिए कोई में ताकत नहीं रही है। अब तो सब इतने दुःखी हुए हैं जो समझते हैं- इस पार्ट में आवें ही नहीं। तो उन्हों की भी आश पूर्ण करते हैं। भारतवासी फिर जीवन्मुक्ति मांगते हैं। कहते हैं हमको बैकुण्ठवासी बनाओ। कोई मरता है तो कहते हैं कि स्वर्गवास हुआ। तो उन्हों के लिए स्वर्ग स्थापन करते हैं। अब ही सचमुच स्वर्गवासी हो सकते हैं। बाकी तो जन्म – जन्मान्तर नर्कवासी होते आये हैं। हेल-हेवन यहाँ इसी स्टेज पर है।

अब अन्तिम समय बहुत दुःख का टाइम है। लेकिन दुःख बहुत समय तो नहीं चलेगा, इसका भी विनाश होगा। विनाश से थोड़ा समय पहले बाप आते हैं। विनाश तो होना ही है। यह जो बाम्बस बने हैं, वह सब काम में आयेंगे। यहाँ भारत में जब आपस में लड़ेंगे तब क्या हालत होगी ? जब पाकिस्तान हुआ तब कितने मनुष्य दुःखी हुए ! उसकी भेंट में जब इतनी विनाश की आग भड़केगी तो मनुष्य कितने दुःखी होंगे ! इसलिए इस दुःख से बचाने के लिए थोड़ा समय पहले आते हैं। जब परमात्मा द्वारा पवित्र बनें तब सुख-शान्तिमय राज्य भोगने की पॉवर भी मिले । सुख-शान्ति भोगना भल आत्माओं का काम है लेकिन देना तो उनका काम है। आत्मायें तो सब 5 विकारों के वश दुःखी हो आपस में लड़ती – झगड़ती रहती हैं। अब तो कैसे एक दो का विनाश करने को तैयार हो गये हैं ! तो बच्चों को शान्त कराना – यह बाप का काम है ना। इसकी युक्ति यही है जो सबको मुक्ति-जीवन्मुक्ति में ले जाते हैं। इस समय बाप खुद भी हाजिर है तब तो डायरेक्ट कहते हैं- बच्चे, मुझ एक को याद करो, बाकी सब भूलो ।

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30.08.59: 21 जन्मों की प्रालब्ध का आधार – इस अन्तिम एक जन्म का पुरुषार्थ

गीत:- बचपन के दिन भुला न देना ।

परमात्मा के साथ यह हमारे बचपन के दिन हैं जिसका ही गायन है। जीवन की छोटी आयु – वह बचपन तो कॉमन बात है। महिमा तो कोई उत्तम चीज की गाई जाती है ना। जब परमात्मा प्रैक्टिकल में आते हैं तब हम उनके बच्चे बन जन्मसिद्ध अधिकार लेते हैं। इन बचपन के दिनों में ही देखो, हम 21 जन्मों की कमाई कर लेते हैं! ऐसे बचपन के दिनों का गायन है, जिस पर ही सारे चक्र का मदार है। उनका होकर जितना अब हक लेने का पुरुषार्थ करेंगे तो वह हमारी प्रालब्ध कई जन्मों तक चलती रहेगी। यह है परमात्मा से डायरेक्ट वर्सा लेना, उनकी पालना लेना। हक लेकर फिर उनकी पालना से खाते रहेंगे। 21 जन्म – 2500 वर्ष हम उस बाप का वर्सा खाते हैं। लौकिक बाप का तो खाते आये हैं, अब पारलौकिक बाप का वर्सा हम लेते हैं। अभी के पुरुषार्थ से ही 21 जन्मों की प्रालब्ध बनती है। लक्ष्मी-नारायण को भी इस पुरुषार्थ की प्रालब्ध मिली है। सारी वंशावली तो अब बनती है ना। तो सारा हक अभी हम जमाते हैं। इतने जन्मों का वर्सा पारलौकिक बाप से अभी हमको इस जन्म में मिलता है। उस पालना में दुःख-अशान्ति हो नहीं सकती। अभी तो कर्म-बंधायमानी के हिसाब से चलते हैं। फिर हम पारलौकिक बाप का खाते हैं। 21 जन्मों तक उनका वर्सा पाते हैं। यह है हमारा बचपन। अभी उनका बन हक लेने का दांव लगा रहे हैं। यह है सबसे श्रेष्ठ प्रालब्ध । ऐसे बाप की गोद लेना ही श्रेष्ठ है। उनकी ही बलिहारी है ना। अभी यह बचपन उस बाप के साथ हम बिता रहे हैं। अभी उनका नहीं बनेंगे तो दांव लगेगा ही नहीं। इसकी ही बलिहारी है। इसके आधार पर हम अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाते हैं। वह है हमारा पारलौकिक बाप। ऐसे बाप की पालना भी तो ऊंची होगी ना जिसमें कोई अप्राप्त वस्तु नहीं। तो इतना नशा रखना है ! इतनी ऊंच प्राप्ति के लिए अपना दांव पूरा लगाते रहना, इसमें ही फायदा है।

इस सारी रचना की नालेज को जानकर अभी समझ सकते हैं कि ज्ञान अथवा अज्ञान – यह बातें ही इस समय की हैं जबकि इस सारे खेल के अन्त का समय है। परमात्मा द्वारा ही यह नालेज मिलती है जिससे फिर नई दुनिया स्थापन होती है। नॉलेज देने का समय अन्त का ही हो सकता है। क्योंकि सतयुग में भी देवतायें हैं, उस समय ज्ञान की आवश्यकता नहीं। पीछे तो दुनिया को पूरा नीचे आना ही है, तो ज्ञान की दरकार ही नहीं है। मनुष्य आत्मायें जब अज्ञान में हों तब ज्ञान देने के लिए फिर परमात्मा की आवश्यकता है। देवताओं के लिए कहते हैं कि वह इस धरनी पर पांव नहीं रखते । तो फिर ज्ञान कैसे देंगे ? हाँ, परमात्मा आते हैं। नॉलेजफुल भी वह हैं। कहते हैं – जब-जब धर्म ग्लानि होती है तब मैं आता हूँ। परमात्मा का कर्त्तव्य गाया हुआ है। देवतायें भी मनुष्य थे। वह इस पृथ्वी पर आकर ज्ञान नहीं देते हैं। तो हम जानते हैं एक ही समय पर एक परमात्मा ही आकर ज्ञान देते हैं। दुर्गति हो तब सद्गति के लिए ज्ञान की आवश्यकता रहे । सद्गति-दाता भी परमात्मा को कहा जाता है। परमात्मा द्वारा ही हम सारी नालेज जानते जा रहे हैं। जिनको त्रिकालदर्शी ऋषि-मुनि कहा जाता है, वह भी परमात्मा के बारे में बेअन्त कहते थे। आज की दुनिया फिर कहती कि परमात्मा सर्वव्यापी है अथवा अहम् शिवोहम् । तो फिर बेअन्त की बात ही नहीं रहती। जरुर कुछ भूल है। तब तो ऐसी ऊंच बुद्धि वालों ने भी बेअन्त कहा है। यह नालेज मिल ही उनसे सकती है जिसके पास सबका नालेज है। जब मनुष्य की पूरी दुर्गति होती है तब परमात्मा आकर ज्ञान देते है जो खुद सदा समर्थ हैं।

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05.09.59: पांच विकारों ने लाज खोई, अब पवित्र ब्राह्मण बन एक परमात्मा से नाता रखो

गीत:- हे महादेव मेरी लाज रहे…

ओम् शान्ति । मनुष्य महादेव की महिमा गाते हैं। परन्तु महादेव हम शिव को कहें वा शंकर को ? शिव को। महिमा सारी शिव की करेंगे। देवों का देव महादेव । उन्होंने साँप, त्रिशूल दिया है आकारी देवता को । हम तो नहीं देंगे। महादेव तो वह शिव ठहरा जो तीनों द्वारा कार्य कराते हैं। यह गीत भी पुरानी याद दिलाते हैं कि फिर से वह राज्य स्थापन करो। इस समय इन 5 विकारों ने लाज खो दिया है। सारी दुनिया की लाज खोई हुई है। न पिता का पता है, न उनकी प्रॉपर्टी का पता है। तो कहते हैं मेरी लाज, तेरा राज्य कायम रहे जहाँ एक राजा-रानी थे, जिसमें मेरी लाज थी। अब वह तेरा राज्य कायम हो तो मेरी लाज कायम रहे। गीत की एक लाइन से कितनी बातें सिद्ध होती हैं। हम ही दोपदियाँ हैं, जिन्हों को बाप ने नग्न होने से बचाया है। आना भी उस टाईम है जब लाज खोई हुई हो। कलियुग के अन्त में ही तो उनको आना पड़े । परन्तु मनुष्य कहते हैं- कलियुग अभी बच्चा है। इस ख्याल से तो अभी अधर्म और बढ़ेगा। यही सिद्ध करते हैं कि जब बिल्कुल बूढ़ा होगा तब आएगा। ऐसे तो नहीं कहते कि कलियुग जब छोटा हो तब आकर विनाश करे। तो उन्हों के हिसाब अनुसार भी कलियुग के अन्त में अति धर्म ग्लानि होती है तब आते हैं। द्वापर में तो रजोप्रधान था। अगर पहले से ही आकर ब्रेक देवे तो अधर्म बढ़े नहीं। तो फिर यह चक्र पूरा कैसे हो ? चक्र को अन्त तक चलना है। तो उसको आकर रोक कैसे सकता ? तो कब आया है ? कुछ बुद्धि में ठहरता नहीं। शास्त्रों में तो मनुष्यों की मत है। अब हमें मिलती है परमात्मा की मत। भल सुनने वाले हम मनुष्य हैं लेकिन बुद्धि तो परमात्मा की मिली है। तो परमात्मा को बरोबर आना ही अन्त में चाहिए जो आकर अन्तिम संस्कार करे, नई दुनिया की आदि करे। तो महादेव उनको कहते ।

वह खुद राजा-महाराजा नहीं बनते, लेकिन स्थापन करते हैं। नाम उनका होता है। यह बातें अब हमारे पास हैं। इसकी भेंट में कहते कि दुनिया वाले बिचारे जानते नहीं कि कौनसे राज्य में हमारी लाज रहेगी ? शंकर के लिए भी लिखा है - शंकर पार्वती का स्वयंवर हुआ। तो समझते उनका राज्य चला है। लेकिन वह तो हैं आकारी देवतायें। राज्य तो साकार देवताओं का चला है। वह साकार में तो आते नहीं ।

दुनिया तो समझती – जब से नर-नारी बने हैं, तो यह विकार भी चलते आये हैं, इस बिगर दुनिया नहीं चल सकती। लेकिन देवताओं को कहते हैं सम्पूर्ण निर्विकारी । निर्विकारी प्रवृत्ति भी चली है ना। उन्होंने तो बहुत कहानियाँ बना दी हैं। सत्य नारायण की कथा, अमरनाथ की कथा.. बनाई हैं। अनेक कथायें अथवा कहानियाँ ! वास्तव में तो कहानी उनकी एक ही है। सत्य नारायण भी वही परमात्मा है, अमरनाथ भी परमात्मा को कहते हैं। वह एवर अमर है। नाथ उसको कहेंगे। सत्य नारायण भी वह है जो सत्य बताते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का भी भेद बताने वाला परमात्मा है। वह मूल एक क्रियेटर है, बाकी सब क्रियेशन हैं। ब्रह्मा-विष्णु का भी क्रियेटर वह है। यह तो हरेक अपना-अपना कार्य करते हैं। स्थापना वाला विनाश नहीं कर सकता, विनाश वाला स्थापना नहीं कर सकता। तीनों कार्य कराने वाला एक परमात्मा है। वह भी कार्य इस सृष्टि पर करता है, सूक्ष्मवतन में तो कुछ चलता नहीं। तो यह कहानी परमात्मा बैठ सुनाते हैं। एक ही कहानी में सब आ जाता है। चारों युग, वर्ण, सब धर्म उसमें आ जाते हैं। ऐसे नहीं सतयुग की अलग कहानी, त्रेता की अलग कहानी है। यह भी अभी यहाँ की ही बातें हैं। चार युग भी यहाँ भारत में कहते हैं। और धर्म तो आते ही द्वापर से हैं। तो उन्हों को इस वर्ण, युग का पता नहीं। मुख्य कहानी यहाँ की है और सब हैं बाईप्लॉट्स । बाईप्लाट में तो सारी कहानी नहीं होगी ।

यहाँ ब्राहमण, क्षत्रिय हैं..। भल विकारी हैं परन्तु ब्राह्मण कहलाते हैं तो उन्हों का कितना मान करते हैं ? इतना मान क्यों होता है ? इस समय सच्चे ब्राह्मण पवित्र बने हैं। अपवित्र से नाता ही नहीं है। नाता एक परमात्मा से है, दूसरा अव्यक्त देवताओं से है। साकार में भी माँ-बाप, भाई-बहिन । दूसरा नाता है ही नहीं। इसलिए इतना मान है। जो सिर्फ नाम लगाते उन्हों का भी मान होता है। ऐसा कुल देवताओं का भी नहीं है। उन्हों की भी कलाएं नीचे होती जाती हैं। यह तो एकदम ऊपर चढ़ते हैं। तो कहाँ की बातें कहाँ ले गये हैं !

यह गीत दूसरे जब सुनेंगे तो साँप, त्रिशूल वाले शंकर को याद करेंगे । तुम उसका भी अर्थ करेंगे कि माया रुपी साँप को जीता है ज्ञान त्रिशूल से । बाकी ऐसे तीन आँखों वाले, 10 शीश वाले, 4 भुजा वाले मनुष्य होते नहीं। आगे तो समझते थे – ऊपर ऐसी कोई दुनिया है। लेकिन बाबा समझाते हैं ऊपर-नीचे कोई दुनिया नहीं है। यही मनुष्य सृष्टि है। लोग तो मूँझ गये हैं। ऊपर एरोप्लेन भेजते हैं देखने के लिए कि कोई दुनिया है क्या ? लेकिन है तो यही दुनिया। सूक्ष्मवतन में भी जाकर साक्षात्कार कर वापस आते हैं, वहाँ बैठ नहीं जाते हैं। ब्रह्मा-विष्णु भी अभी पार्ट बजाते हैं। बाकी भक्ति मार्ग में परमात्मा ही साक्षात्कार कराते हैं। ऐसे नहीं कि उस समय सूक्ष्मवतन है। यह तो अभी पार्ट है। बाकी साकार और निराकार दुनिया का कनेक्शन चलता आता है। आत्मायें आती रहती हैं, संख्या बढ़ती रहती है। सतयुग से कलियुग तक संख्या बढ़ती रहती है।

अब तक तुम जो नालेज सुनते आये हो उस नॉलेज के चिन्तन के आधार से तो चिंतायें और ही बढ़ती गई। लेकिन इस नॉलेज के चिंतन से सतयुग स्थापन होता है, तो सब चिंताओं से छूट जाते हैं। अब स्वयं परमात्मा बाप, टीचर और गुरु बन गोद में लेते हैं अथवा शरण में लेते हैं। कहते हैं – अब इस चिंतन में रहो । लेकिन जितनी भक्ति की पूँजी होगी उतनी नॉलेज उठायेगा और सूर्यवंशी में आयेगा|

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06.09.59: हमारा साथी स्वयं भगवान है, इसलिए तूफानों से डरना नहीं

ओम् शान्ति। वास्तव में सर्वशास्त्र शिरोमणी गीता ही गाई हुई है। परन्तु भारतवासियों को मालूम न होने के कारण किसने गाई है, उसका कदर कम कर दिया है। भल भगवानुवाच है लेकिन भगवान ने डायरेक्ट गाई है। ऐसे समझते तो सारी दुनिया मानती। सारी दुनिया कृष्ण को तो नहीं मानेगी। लेकिन भारतवासियों को ही पता नहीं तो और कैसे जानें ? भारत में ही कोर्ट में गीता उठाए कसम लेते हैं। जैसे मुसलमानों का कुरान है, क्रिश्चियन का बाईबल है, वैसे भारत की गीता है।

परमात्मा कहते हैं – “जो गीता कल्प पहले गाई थी वही अब फिर से उच्चारण कर रहा हूँ।” क्राइस्ट ने ऐसे नहीं कहा कि मेरा कल्प पहले वाला बाईबल है। क्योंकि वह जब आए तो उन्हों का धर्म तथा शास्त्र तो था नहीं। लेकिन परमात्मा आते हैं तो दिखाते हैं कि देखो, मैं तुमको सो देवता बनाता हूँ, जिन्हों के चित्र सामने हैं। भल देवताओं की बायोग्राफी, चित्रों को बहुत नीचे-ऊपर किया है लेकिन यादगार तो कायम है। अब प्रैक्टिकल नहीं है लेकिन यादगार हैं। तो अपने धर्म का ही सारे चक्र में पार्ट है। गीता तो हाजिर है लेकिन वह होते भी कहते हैं – “मेरा ज्ञान प्रायःलोप है। इन शास्त्रों से मैं नहीं मिलता।“ क्योंकि परमात्मा आते ही हैं अन्त में। कहते हैं – “मेरा ज्ञान उस गीता में भी नहीं है। तो जब ज्ञान रहा ही नहीं तो मेरी प्राप्ति कैसे होगी ? जब तक मैं न आऊं मेरे यादगारों से तो नहीं बनेंगे।“ यहाँ तो प्रैक्टिकल चाहिए। कहते हैं – जब जड़जड़ीभूत वृक्ष हो जाता है तब मैं आता हूँ।

कोई साधू-सन्यासी तो कह नहीं सकते – मैंने कल्प पहले देवता बनाया था। मन्मनाभव-मामेकम्, मुझ एक में ही बुद्धि लगाओ। अक्षर ही परमात्मा के डायरेक्ट हैं। कोई महात्मा गीता सुनायेगा तो भी कहेगा – परमात्मा से योग लगाओ। ऐसे नहीं कहेगा मेरे में लगाओ। तो जरुर परमात्मा ने खुद डायरेक्ट कहा है। तब कहा है – मुझ एक में बुद्धि लगाओ। यह भी खुद परमात्मा ने समझाया है। तब समझते हैं कि वह डायरेक्ट आकर कह रहे हैं। शास्त्रों में तो कितनी कहानियाँ लिखी हैं लश्कर थे, बाणों से लड़ाई हुई। लेकिन हम तो पक्के अहिंसक हैं। न अस्त्र-शस्त्र की लड़ाई है, न काम कटारी चलाते हैं। असुल तो पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था जिसको गृहस्थ आश्रम माना पवित्र स्थान कहते हैं। वह तो मैं स्थापन करता हूँ। मुक्ति भी मैं आकर देता हूँ। अब विनाश तो सामने है और स्थापना भी हो रही है। पुरानी दुनिया के मरने की चीजें निकली हैं, तो नई दुनिया के जन्मने की भी चीजें निकली हैं।

कहते हैं - मैं अपने बच्चों के आगे प्रत्यक्ष होता हूँ। तो वही पहचानते हैं। बाकी अन्त में दुनिया को पता पड़ेगा। लेकिन जो कार्य कराना था, कमाई करानी थी वह काम तो पूरा हो चुकेगा। फिर तो 'अहो प्रभु !' ही कहेंगे। हम प्रैक्टिकल गीता सुन रहे हैं और वह शास्त्र सुना रहे हैं। इतना कान्ट्रास्ट है। इस बात को अच्छी रीति धारण कर दुनिया की स्टेज पर रखना है। इसमें सब सामना करेंगे। लेकिन हम जानते हैं हमको पढ़ाने वाला कौन है ! ऐसे निश्चयवान स्टेज पर आयेंगे। कई फिर संशय में आकर टूटते भी रहेंगे। यह तो कल्प पहले माफिक होता रहेगा, इससे डरना नहीं है। जिसका साथी परमात्मा है, उसको डर क्या ? जैसे दिखाते हैं पाण्डवों ने भगवान का साथ लिया। तो हमने ईश्वर का साथ लिया है। अन्त में विजय तो है ही। बीच में बहुत तूफान आयेंगे लेकिन रिजल्ट का पता है तो डरेंगे नहीं।

परमात्मा कहते – जब मैं आता हूँ तो बहुत भगवान बन बैठते हैं। अब सिद्ध कैसे हो ? तो अन्त में निर्णय हो जाता है। भगवान का कार्य क्या है वह तो वही जानते । परमात्मा की समर्थी पुरानी दुनिया का विनाश, नई दुनिया की स्थापना। वह भी टाईम पर हिसाब से कराता है। दुनिया वालों ने तो शास्त्रों में यही पढ़ा है कि भगवान मरे हुए को जिन्दा करता, धरती से पानी निकाल देता ..। अब यह तो काम उनका है नहीं। हाँ, हम सागर के बच्चे जो मरे पड़े थे उन्हों को जिंदा करते हैं ज्ञान अमृत से। मनुष्य फिर उल्टा अर्थ निकाल समझ बैठे हैं। भगवान की ऐसी समर्थी है। हम तो जब आकारी देवताओं ब्रहमा, विष्णु को ही भगवान नहीं कहते तो मनुष्य तो हो नहीं सकता । वह तो परमात्मा एक है जो बैठ अपनी नालेज देते हैं।

अपने में जो अनेक जन्मों के संस्कार पड़े हैं उन्हों को निकाल इसको धारण करने में मेहनत लगती है। बुद्धि से जज करना है- यह राईट है। तो औरों को देना है। बाबा यही मदद माँगते हैं। बाकी डरने की बात नहीं है जब खेवनहार साथ है। राम, कृष्ण कोई खेवनहार नहीं। उन्हों को भी परमात्मा ने पार किया है, असार संसार से पार कर सार वाली दुनिया में ले गये हैं। दुनिया इसको नहीं जानती। तब मैं आकर बताता हूँ और ले चलता हूँ। ऐसी है भगवान की बातें। कहते हैं- सिर्फ यह अन्तिम जन्म पुरुषार्थ कर पवित्रता को धारण करो। फिर तो जन्म-जन्मान्तर बिगर पुरुषार्थ पवित्र रहते आयेंगे। जहाँ मूल एम ऑब्जेक्ट ही पवित्रता की है, वहाँ अपवित्रता की बात कैसे हो सकती ।

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07.09.59: पांच विकारों के कर्मबन्धन से छूटना ही सच्ची स्वतन्त्रता है

ओम् शान्ति। हम जिसकी याद में बैठे हैं उसको हम जानते हैं कि वह समर्थ है ! उसकी समर्थी का भी कब कर्त्तव्य चला है। निराकारपने की समर्थी नहीं। जरुर साकार में समर्थी का कर्त्तव्य चला है तब गायन हुआ है। निराकार होते साकार में गायन है तो जरुर कुछ खास बात होगी। बाकी यह तो समझते हैं कि किसको धन देना, खाना देना, सुख देना- यह उस करनकरावनहार का काम नही है, उसकी यह समर्थी नहीं है। अगर ऐसा हो तो फिर सबको सुख देवे । फिर कोई सुखी और कोई दुःखी क्यों ? सुख होते भी मनुष्य सन्तुष्ट नहीं है तो क्या यह परमात्मा का कर्त्तव्य है ? अब हमारी बुद्धि का ताला खुला है, तो हम जानते हैं कि परमात्मा की समर्थी क्या है ? परमात्मा ने जो सुख दिया है वह कुछ भिन्न है, तब ही परमात्मा के कर्त्तव्य का गायन है। बाकी इस जीवन से परमात्मा का कर्त्तव्य सिद्ध नहीं होता है। परमात्मा ने यह जीवन नहीं बनाई है। वह कुछ और ऊंच जीवन थी जिसका गायन है। वह ऊंच सुख की दुनिया थी। मनुष्य नहीं जानते। उसको सर्व सुख-दाता, समर्थ तब कहा जाता है जबकि मुक्ति और जीवन्मुक्ति दोनों ही आकर देते हैं। और सभी धर्म वालों को मुक्ति में भेज देते हैं। बाकी जो लायक बनते हैं उन्हों को राज्य-भाग्य दे खुद वापस चले जाते हैं। क्योंकि प्रालब्ध तो आत्माओं को भोगनी पड़ती है। हमको वह नॉलेज मिली है, सुख मिला है, तब ही गायन करते हैं और उनसे योग लगाते हैं।

परमात्मा कहते हैं – इस सृष्टि में मेरी याद का तो अंश ही नहीं है। माया ने एकदम बुद्धि का ताला लगा दिया है। बाकी परमात्मा बाप कभी किसको दुःख नहीं देते हैं। उसको कहा जाता है सुख- दाता, न कि दुःख-दाता । सुख दिया है, तब तो इतने यादगार बने हैं और गायन होता है। अब माया ने अपवित्र बनाया जिस कारण ही मनुष्य दुःखी बने हैं। मनुष्य यह जो स्वतन्त्रता कहते हैं, लेकिन जब तक 5 विकारों के कर्मबन्धन से न छूटे हैं, तब तक स्वतन्त्रता हो नहीं सकती है। अपवित्र आत्मायें न सुख देख सकती है, न सृष्टि पर राज्य चला सकतीं । इसलिए परमात्मा का प्लैन ही कुछ और है। वह राज्य कारोबार न कौरवों को देते हैं, न यादवों को देते हैं। परन्तु पवित्र देवताओं को देते हैं, जिन्हों को अब खुद बना रहे हैं। बनना तो हरेक को अपने पुरुषार्थ से ही है। अपनी मेहनत से लक्ष्मी-नारायण ने सम्पूर्ण पुरुषार्थ से सम्पूर्ण प्रालब्ध पाई है, तब ही गायन है। हीरो-हीरोइन कहा जाता है। ब्रहमा को भी हीरो-हीरोइन कहा जाता है क्योंकि ऊंच कर्त्तव्य किया है।

मनुष्य की ऊंचाई है देवता बनना । बाकी मनुष्य परमात्मा नहीं बन सकता । तो पुरुषार्थ करना है। ड्रामा पर अथवा भाग्य पर नहीं ठहरना है। भल हम जानते हैं कि यह बना बनाया है लेकिन बनना तो पुरुषार्थ से है ना। पता पड़ने से पुरुषार्थ नहीं छूट सकता। चाहे पता लगे, चाहे न लगे, पुरुषार्थ में जरुर लगना है। अर्जुन को भी कहा है ना सब मरे पड़े हैं, सिर्फ निमित्त तुमको मारना है। तो पुरुषार्थ कराया ना। पुरुषार्थ बिगर, हठ पर ठहरने से काम नहीं चलता है। नहीं तो फिर हाथ मसलना पड़ेगा। श्वाँस पर तो भरोसा नहीं है। शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए। जैसे और लौकिक कार्य को निभाते हो, तो इसको भी निभाना है। गफलत नहीं करनी है। नहीं तो धर्मराज के मोचरे भी खाने पड़ेंगे, रोटी भी नहीं मिलेगी। अगर मोचरों से छूटेंगे तो फिर आराम से बैठ खाते रहेंगे। कोई कहते हैं – अच्छा, पीछे धर्मराज से समझ लेंगे। तो अब भला समझ लो । अपने कर्मों से छुटो । देखो, कहते हैं ना हाय मेरे कर्म ! इसमें कोई अपना घात भी कर लेते हैं। दुःख से छूटने का वश नहीं चलता है तो फिर दूसरे – तीसरे जन्म में दुःख भोगते हैं। कहते हैं – पीछे भगवान से समझेंगे । तो अभी ही समझ लो। कुछ सोचो, बाकी गफलत मत करो। गफलत करने वाले दुःख भोगते हैं, छूट नहीं सकते हैं। इसलिए चेतावनी दी जाती है कि इन दुःख के कर्मबन्धन से छूटो, नहीं तो पछताना पड़ेगा। अच्छा । ओम् शान्ति ।

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10.09.59: परमात्मा का कर्त्तव्य और उसकी रचना का भेद

हम परमात्मा की मुख-वंशावली अच्छी तरह से जान चुके हैं कि हमारी मंजिल कहाँ है और किस ठिकाने से आकर पार्ट बजाना है। अब इस पुरानी दुनिया से लौटने का टाइम है क्योंकि यह पुरानी दुनिया विनाश होनी ही है। खुद-ब-खुद किनारे हो जाने वाले हैं। तो क्यों न पहले से हम किनारा कर लें जिससे हमारी प्रालब्ध बने ? परमात्मा अब इस सूखी दुनिया से लौटा रहे हैं और नया घर बना रहे हैं। पुराने घर में रहकर नया बनाना होगा ना । बेघर होकर तो नहीं बनायेंगे । हाँ, वह प्रालब्ध सम्पूर्ण बना देंगे तो यह पुराना घर विनाश हो जायेगा। यह पुरानी दुनिया ऐसे ही नज़र में है- यह बस, छोड़ना ही है। बाकी इसमें थोड़े समय के लिए हैं जब तक अपना घर बना लें। तो हम जान सकते हैं कि हमारी मंजिल, ठिकाना कहाँ हैं ? उसके लिए तैयारी कर रहे हैं। हर एक को अपनी इन्डीविज्युअल तैयारी करनी है। बाकी सारी दुनिया के लिए परमात्मा कार्य करा रहे हैं।

यह तो समझते हैं – जो चीज स्थापन होती है उसकी पालना भी होती है। बाप घर बनाते हैं तो पालना के लिए भी रेसपान्सिबल रहते हैं। बेहद का बाप भी रेसपान्सिबल है। लेकिन यह पुरानी दुनिया तो परमात्मा ने स्थापन नहीं की है, न इसकी पालना के लिए रेसपान्सिबल है। यह 5 भूतों ने स्थापन की है, वही पालना कर रहे हैं। अगर परमात्मा पालना करते तो दुःख-अशान्ति नहीं होती । परमात्मा जो स्थापना हमारे द्वारा कराते हैं उसकी पालना भी कराते हैं। ऐसी पॉवर दे देते हैं कि सुखमय पालना करते रहो, जो 21 जन्मों तक यह पालना चलती है, जिसमें फिर परमात्मा की आवश्यकता ही नहीं रहती । परमात्मा जो रचता, पालन-कर्त्ता गाया हुआ है वह नई दुनिया का है। बाकी पुरानी दुनिया की पालना नहीं करते। हाँ, पुरानी दुनिया के विनाश के लिए परमात्मा निमित्त बनते हैं। परमात्मा की रचना का भेद जो है वह समझाते हैं। दुनिया तो समझती कि सब कुछ परमात्मा करा रहे हैं। लेकिन उनको भूल हम जो विकर्म करते आये हैं उनकी भोगना हमको भोगनी पड़ती है। अब हमारी बुद्धि को ठिकाना मिल गया है। दुनिया तो भटकती रहती है। हम मूंझे हुए नहीं हैं। कहाँ मंजिल है, क्या करना है- हमको पता है। तो शौक होता है औरों को भी बतावें ।

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12.09.59: अशरीरी अवस्था ही सर्वोत्तम अवस्था है

आत्मा पहले अशरीरी है जिसको निराकार कहते हैं। शरीर को पीछे धारण करती है। यह है अपना लक्ष्य । लेकिन कहने में यह भी कामन है। प्रैक्टिकल अशरीरी होकर रहने का अभ्यास कोई को भी नहीं है। जैसे बाबा अशरीरी है वैसे हम भी बाबा के साथ वहाँ बैठे हैं। तो उठते-बैठते यह अवस्था रखनी है। जैसे बाबा आते हैं, बोलते हैं अथवा कर्मेन्द्रियों का आधार लेते हैं, फिर अशरीरी हो जाते हैं – वैसे हम आत्माओं को भी अभ्यास करना है। यह है सर्वोत्तम अवस्था । कछुए मिसल शरीर में आकर काम करके फिर अशरीरी होना है। ऐसे भी काम होते हैं जो शरीर में आने की दरकार नहीं रहती है। जितना हम बाबा की याद में बाबा के साथ रहेंगे उतनी बाबा की ताकत मिलती रहेगी । तो यही अवस्था धारण करने का पुरुषार्थ करना है। जैसे बाबा अभी-अभी शरीर में, अभी-अभी अशरीरी – वैसे हम भी क्वीक उड़ना सीखेंगे तो पंख निकल आयेंगे। यह नयों के लिए बात नहीं है। उनके लिए जैसे फ्रेंच भाषा है। पुरानों के लिए यह धारणा है।

याद के भी तरीके हैं ना। अपनी अवस्था को ऐसा हल्का बनाना है। यही बहुत सरल मीठी अवस्था है। ड्यूटी में रहते अथवा घर में रहते जो अनेक बातें विस्मृति कराती हैं, जिससे छोटे-छोटे विकर्म बनते हैं, उससे सेफ्टी के लिए ही यह अभ्यास कवच है। फिर माया की गोली नहीं लगेगी। जैसे बाबा समझते यह शरीर लोन पर लिया है, वैसे हमने भी सर्विस अर्थ यह शरीर लिया है तो जितना उस अवस्था में रहेंगे उतना 5 भूतों से सेफ रहेंगे। यह है अति सूक्ष्म। बाहर से तो कोई तपस्या या ध्यान में नहीं जाते। वह ध्यान की डिपार्टमेंट अलग है। उसको हम अशरीरी अवस्था नहीं कहेंगे। यह प्वाइंट बड़ी सूक्ष्म है। इसका अभ्यास करना है। अपनी सेफ्टी का स्थान ही है कि बाप के पास चुप कर अशरीरी हो बैठ जाना । जैसे बच्चे जब किसी बात से डरते हैं तो माँ-बाप की गोद में चुप कर बैठ जाते हैं। हमें तो सारी नॉलेज है, सब एक्टर्स हैं। कोई उल्टी रीति चलता है यह भी उनका पार्ट है- उसमें हर्ष वा शोक नहीं आता। इसकी धारणा बहुत अच्छी चाहिए । जितना जरुरी है उतना समय ध्यान देकर के फिर अपनी स्मृति में रहो। ऐसे अभ्यास करते बाबा के पास बैठ जायेंगे। फिर तो 21 जन्म - 2500 वर्ष सेफ हो जाते हैं। कर्म भी श्रेष्ठ रहते हैं। पांच भूत तो रहते नहीं। तो जितना वहाँ रहेंगे तो देही के शुद्ध स्वभाव-संस्कार जागेंगे। यह है अपने को ऊपर उठाने के लिए। इस पृथ्वी से ऊंचा जा रहे हैं। कहते हैं ना – देवताओं के पैर पृथ्वी पर नहीं रहते हैं। यानी विकारी पृथ्वी पर नहीं आते । बाकी पृथ्वी तो वहाँ भी है। तो अब हमको यहाँ से पांव उठाना है, लौटना है।

गुरु का काम है वापस ले जाना । प्योरीफाइ कर लौटाते हैं अर्थात् दुर्गति से सद्गति में ले जाते हैं। यह है पुरुषार्थ कर अपने को उड़ाना । जैसे छोटे पंछी को उड़ना सिखाते हैं, ऐसे बाबा हमको भी उड़ना सिखाते हैं। न साकारी दुनिया, न आकारी लेकिन निराकारी दुनिया में अशरीरी होकर रहना है। है सारी बुद्धि की सफाई। कहा ही जाता है बुद्धियोग। हाथ-पांव के योग-आसन तो बहुत सिखाते हैं। लेकिन यह है बुद्धि की सफाई जिससे आत्मा साफ हो जाती है। यह है अभी का पुरुषार्थ, फिर कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है। दैवी संबंध अभी बनाते हैं 21 जन्म 2500 वर्ष के लिए। तो सारे अनेक जन्मों के शुद्ध पोतामेल को अभी बनाना है और सारे अनेक जन्मों के अशुद्ध खाते को खत्म करना है।

लोग समझते हैं कोई को दुःख न देना, झूठ न बोलना, गुस्सा न करना-यही पुरुषार्थ करना है। लेकिन हम कहते- बॉडी कानसेस में आना ही एक दो को दुःख देना है। इसलिए अशरीरी होकर रहना है। बाहर से तो कुछ करना नहीं है। देखो, देवतायें कितने फैशनेबल हैं, जड़ चित्रों को कितना सजाते हैं । तो जब वह होंगे उन्हों के महल कितने सजे-सजाये होंगे ! विष्णु कितना सजा सजाया है ! यहाँ तो अन-नेचुरल सजावट है। वहाँ लिपिस्टिक, पाउडर लगाने की दरकार नहीं रहती। वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं रहती है। दूध की नदियां बहती हैं। ऐसे नहीं, नदियों में कोई दूध बहता है, लेकिन अथाह रहता है। कोई कमी नहीं । पूर्ण सम्पत्ति है। ऐसे तो नहीं यह कोई कल्पना है। यह नालेज तो कोई मनुष्य दे भी नहीं सकते । परमात्मा ही समझाते हैं। तो ऐसा पुरुषार्थ करना है जिससे सब प्राप्ति हो जायें। तब कहा है सभी यज्ञों में सर्वोत्तम, क्योंकि इसमें सब यज्ञ स्वाहा हो जाते हैं। सब बातों में अपने को सर्वोत्तम रखा है। तब कहते हैं -- जहाँ जीत, वहाँ मैं । हार तो माया कराती है। ऐसे तो नहीं कहते जहाँ हार वहाँ मैं। यह है श्रेष्ठ यज्ञ परमात्मा का। हम देख रहे हैं कि विनाश के आसार आते जाते हैं। हम भी उन्नति को पाते जाते हैं।

अशरीरी भी तब कहते हैं जब शरीर में हैं। अशरीरीपन की अवस्था को भूल गये हैं, इसलिए पक्का कराते हैं। वह भी कैसा सरल मीठा तरीका है ! परमात्मा बाप के साथ बैठ जाओ, बस । बाकी भगवान को सर्वव्यापी होने की दरकार नहीं। अगर उनके हाजिर होते दुःखी होवें तो परमात्मा की बदनामी हो जाती है। 'बाबा' कहने से ही कितना लव आ जाता है ! उनसे सब कुछ लेना है। तो अपना योग कितना सरल सहज है ! नष्टोमोहा होना कठिन नहीं है। मुश्किल है अनेक जन्मों के विकर्मों को योगबल से भस्म करना। इसमें ही टाइम लगता है। बाकी नष्टोमोहा तो झट से हो सकते हैं। उसका पहला एक्जैम्पल ब्रह्मा का सामने खड़ा है. जिसमें बाप ने प्रवेश किया। उसको देरी नहीं लगी और मातायें भी कैसे आ गई ! मस्ती आ गई – हमको मिलना है। उस समय इतना ज्ञान भी नहीं था। मस्ती थी- बस, अब बैकुण्ठ जाना है। इस दुनिया में क्या सुख है ? जैसे सूखा काना (गन्ना) चूसना है। बाबा कहते – “इसमें क्या रस है? खाओ तो माल खाओ।“ बाप तो ऐसा बनाते हैं, तब तो उनको याद करते हैं। कैसा भी नास्तिक हो, यह जरुर कहेंगे – कोई पॉवर है, कोई नेचर है। लेकिन वह क्या है, उसमें कितनी शक्ति है – वह हम जानते हैं। वह तो कह देते हैं – हे राम जी, जगत बना नहीं है। फिर तो राम जी भी बना नहीं है। लेकिन हम जानते हैं—कैसे बाबा पुराने जगत से एकदम नया बनाते हैं।

तो उस बाप से कितना लव होना चाहिए ! जो प्रेम टुकड़ा-टुकड़ा हो सब तरफ चला गया था वह अब एक से जुटाते हैं। सब कुछ वही है। इससे यहाँ हमारी कमाई हो रही है। वह कमाई तो अल्पकाल झणभंगुर की है। इसमें सच्ची कमाई करना चाहो तो उस अवस्था में रहो। बाबा का होकर रहना है। परमात्मा को समर्थ तो सब गाते हैं। अब वह हमारा बाबा प्रैक्टिकल बने हैं। फाउन्डेशन में ताकत है पूरे झाड़ को धारण करने की। परमात्मा इतना सर्वशक्तिवान होते भी इतना साधारण पार्ट बजाते हैं। इसको कहते हैं इन्कागनिटो पार्ट। यह भी कल्याणकारी है। नहीं तो, भीड़ हो जाए, उसको कहाँ सम्भालेंगे ? अभी ही नहीं पहुँच सकते। कितने निमन्त्रण देते हैं ! हैन्ड्स नहीं हैं। तैयार हो तो कर्मबन्धन भी छूटे । तुम कहो – कर्मबन्धन से छुड़ाओ तो हम लायक बनें, लेकिन बाबा कहते- इन सरकमस्टांस में ही बनकर दिखाओ तब कहेंगे लायक है। बाबा आते हैं सद्‌गति के लिए। लेकिन उसके लिए पहले गति करेंगे ना । गति कहा जाता है प्योर कर ले जाना। ले जायेगा तब तो नई दुनिया में आयेंगे ।

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17.09.59: आत्मा अपना ही मित्र, अपना ही शत्रु है, जो करेगा वह पायेगा

गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी ।

ओम् शान्ति। नॉलेज को दर्पण कहा जाता है। यह परमात्मा की अविनाशी नॉलेज दर्पण है ! इससे सारा पता लगता है कि मनुष्य आत्मा की कहानी अथवा कर्म – कहानी क्या है ? अब ज्ञान के दर्पण में क्या देखेंगे ? अन्दर तो बहुत काली, मैली आत्मा बैठी है। वह समझते परमात्मा बैठा है। लेकिन परमात्मा तो अन्दर नहीं बैठा है। परमात्मा को आना पड़ता है। इसलिए अवतरण गाया हुआ है। कहते हैं – जब-जब धर्म ग्लानि होती है, तब-तब मैं आता हूँ। बैठा हो तो यह कह नहीं सकते । जब आते हैं तो आकर रोशनी देते हैं कि तुम कितने स्वच्छ थे, अब कितने काले बने हो ! कहानी भी इसकी है। इसमें आदि-मध्य-अन्त आ जाता है। यह एक जीवन की बात नहीं है लेकिन जब से इस स्टेज पर पार्ट शुरु हुआ है तब से अब तक की कहानी चली आई है। बीच में वापस तो गए नहीं हैं। तो समझाते हैं कि शुरु से आत्मा कैसे पार्ट बजाती आई है। यह है अब हमारे सामने दर्पण अथवा नॉलेज । इस दर्पण में निराकारी दुनिया से लेकर आकार-साकार सृष्टि की सारी समझानी है। मनुष्य भल वेद – शास्त्र अध्ययन करते हैं लेकिन दर्पण तो मिलता नहीं जिससे देखें कि आत्मा कहाँ से मैली हुई है तो साफ़ करें। यदि उससे आत्मा साफ होती तो दुनिया की यह रिजल्ट नहीं होती ।

दुनिया वाले तो कहते हैं कि कलियुग अभी बच्चा है। और बड़ा होगा तो क्या हाल होगा? दर्पण होता तो क्यों मैली होने देते, साफ कर देते । तो अपने को दर्पण मिला है। इसलिए जानते हैं कि परमात्मा का अब आना ज़रुरी है। आते हैं तो जरुर उनका निवास स्थान कोई है। वह दूर देश निवासी है। उनका कत्तव्य भी है लेकिन ऐसे नहीं, यह विनाश-स्थापना का कार्य सदैव चलता रहता है। यह जन्म-मरण तो अपने कर्मों से होता है। इससे तो दुःखी हो रहे हैं। अगर परमात्मा का यह कर्तव्य है तो परमात्मा दुःख देने वाला ठहरा। लेकिन परमात्मा की महिमा है सुखदाता । दुःख देने वाले को थोड़े ही याद किया जाता है। तो ज़रुर विनाश, स्थापना का कोई और तरीका है। तो परमात्मा समझाते हैं – “जिससे दुःखी हुए हो उनका विनाश करने आता हूँ। पापों का विनाश करने वाला और पापात्माओं का उद्धार करने वाला हूँ।” अब तो पापात्माओं की खूब वृद्धि हो रही है। अब बाप उन्हों का उद्धार कर दैवी सृष्टि की स्थापना करते हैं। फिर उनकी पालना के लिए हमारी भी प्रालब्ध बनाते हैं। फिर तो यह कार्य करने की दरकार नहीं है।

परमात्मा का आना भी एक टाईम पर होना चाहिए। जब झाड़ बिल्कुल पुराना हो जाता है तब बाप कलम लगाते हैं। तो उसका भी टाईम है ना। जब वृद्धि हो रही है तब तो कलम नहीं लगायेंगे। तो परमात्मा के कर्त्तव्य का भी टाईम है । अब आवे तो वह भी एक जगह आएगा। कहाँ आकर स्थापना करे – वह भी हिसाब-किताब समझाते हैं। भारत ही है जो सतोप्रधान था, दूसरे धर्म पीछे वृद्धि हुए हैं। शुरु से यह भारत था जहाँ दैवी धर्म और राज्य था। अब वह नहीं है। इसलिए परमात्मा को उसी की स्थापना के लिए आना पड़ता है। आने का टाईम भी एक ही बार है। अच्छा, आवे तो किसमें आवे ? मनुष्य-तन का आधार लेना पड़े। मनुष्य आत्माओं से पुरुषार्थ कराए प्रालब्ध बनानी पड़े।

मनुष्य आत्माएं गिरी कहाँ से हैं? कर्मों से गिरी हैं। तो कर्मों को सुधारने, समझाने लिए मनुष्य-तन का आधार लेना पड़े। आना भी उस मनुष्य-तन में पड़े जिसकी प्रालब्ध शुरु से पहला नम्बर हो, जिसको एडम कहो, आदम कहो । यह तो उनको बनायेगा ना जो पहले देवता हैं, जो फिर पहले ही मैले बने हैं, उसमें ही आकर बताता हूँ। तो परमात्मा के आने के भी सरकमस्टाँस हैं। हिसाब-किताब से आएगा ना। खुद तो हुआ अकर्ता, अभोक्ता। वह आत्माओं से करायेगा ना- जो शुरु वाली आत्मायें हैं, जिन्हों का 84वाँ जन्म हो। सबके तो 84 जन्म नहीं हैं। पीछे वालों के कम जन्म हैं। उन्हों में तो नहीं आ सकता। नया कलम तो शुरु से लगेगा ना ।

तो परमात्मा बैठ सारे प्लैन को समझाते हैं। ऐसे कार्य करना पड़ता है। नहीं तो कैसे करें? कोई राय देवे। कराना तो मनुष्यों से है। ऐसे तो नहीं खुद ही करता है। फिर तो भोगना भी उसको पड़े। लेकिन कहते हैं- “आत्मा अपना ही मित्र है, अपना ही शत्रु है। जो करेगा वह पाएगा।“ तो परमात्मा तो नहीं करता है ना। आत्माओं से ही कराते हैं। और कोई तरीका नहीं। सब कायदे से करना है। विकर्मों की सजाएं भी भोगनी पड़ती हैं। पुरुषार्थियों को प्रालब्ध देनी पड़ती है। इसलिए कैसे अपना कार्य करते हैं- वह समझाते हैं। आकारी देवताओं से भी मदद लेते हैं। रचना द्वारा ही नई रचना रचनी पड़ती है। मैं तो न्यारा हूँ। मुझे इन बातों में जाना नहीं है। कराना है स्वच्छ आत्माओं से और सृष्टि फिर एकदम पापात्मा है। तो कितनी डिफीकल्टी है ! तो ऐसी युक्ति से करना पड़ता है। नहीं तो कैसे करें जो सभी कायदे में कायम रहें ? कहते – मेरे कर्त्तव्य को भी वह जान सकते जो मेरे साथ इस कार्य में मददगार हैं। बाकी तो सबको वापस मुक्तिधाम में जाना है। उन्हों का भी अपने-अपने समय पर गोल्डन एज है। यह बातें समझने, समझाने की बुद्धि चाहिए। बाकी यदि भगवान ही करनकरावनहार है तो फिर हम पुरुषार्थ का क्यों सोचें ? लेकिन कर्मों की रिस्पॉन्सिबिलिटी हमारे ऊपर ही है। अच्छे-बुरे कर्मों का फल भी हमको मिलना है। बाप आकर अच्छे कर्मों का ज्ञान देते हैं। बाबा से जैसे यह वर्सा लेते हैं। लेकिन जब उनसे योग लगायें ।

हम कहते हैं – बाबा है, दादा है, वर्सा देते हैं। उनसे सम्बन्ध जोड़ेंगे तब तो मिलेगा ना । हम भी निराकार आत्मायें, वह भी निराकार परम आत्मा । परम है क्योंकि अजन्मा है। यह जो मूँझते हैं कि परमात्मा एक तन में हद में कैसे आते, वह तो बेहद में रहने वाला सर्वव्यापी, सर्व तन में विराजमान है ? लेकिन इसको भी समझना है। उनका कैसा प्लैन है ? जैसे गवर्मेन्ट के भी प्लैन बनते हैं, परमात्मा का भी प्लैन है। तब तो कहते हैं सद्गति करने की मत तुम जानो। तो जो जानते हैं वही बताते हैं। सच्चा मित्र तो वह ठहरा ना जो हमारे विकों को मिटाए सर्वदा सुखी बनाते हैं। तो क्यों न उनसे सम्बन्ध जोड़ें और सब दुःख के सम्बन्ध तोड़ें। कहते हैं – तुम्हारा सम्बन्ध फिर भो आत्माओं के साथ जुड़ेगा लेकिन वह है सुख का सम्बन्ध । यह है दुःख का सम्बन्ध, इसे तोड़ो।

भगवानुवाच – यह काम महाशत्रु है। मनुष्य समझते हैं – पति-पत्नी का संबंध है ही विकार के लिए। लेकिन ऐसी विकानी प्रवृत्ति परमात्मा ने नहीं रची। बुद्धि नहीं मानती कि ऐसी गन्दगी से उत्पत्ति परमात्मा ने बनाई हो । इसलिए सन्यासी ब्रह्मचर्य में रहते हैं। ज़रुर अच्छा है ना। अगर शास्त्रों अनुसार यह विकार करना हक है तो फिर शास्त्र सुनाने वाले सन्यासी क्यों ब्रह्मचर्य में रहते हैं ? यह विचार नहीं आता क्योंकि मन-बुद्धि सहित आत्मा भ्रष्ट हो गयी है। अब बाबा समझाते हैं – मेरी रचना में यह बात अंश मात्र नहीं थी। इसलिए ऐसे कभी नहीं समझना है कि यह अनादि चीज़ है, शुरु से चली आती है। नहीं । बाप ने सृष्टि की वृद्धि का तरीका भी बड़ा रॉयल रखा है। आधा कल्प पतित होने से बचा देते हैं। इन बातों पर बुद्धि काम नहीं करती है तो मूँझते हैं। इतनी बुद्धि नहीं है तब तो बुद्धिवानों की बुद्धि बाप कहते हैं – अब चलो गन्दी छीः – छीः दुनिया से नई दुनिया में ।

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21.09.59: मन्सा में भी कोई विकल्प न आये – यही है सूक्ष्म पुरुषार्थ

ओम् शान्ति । हम जब ओम् शान्ति कहते हैं तो हमारी बुद्धि में क्या आता है ? ओम् शान्ति कहने से अब हमारी बुद्धि में यही आता है कि हम आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। अभी जो पक्के ब्राह्मण है, ऐसे तो नहीं कह सकते कि आत्मा सो परमात्मा है। अब यही आयेगा कि हम आत्मा उस परमात्मा की सन्तान हैं। उस परमात्मा का सारा सिजरा सामने आता है अथवा ऐसे कहेंगे कि अपना सारा खानदान, सर्वोत्तम ब्राह्मणों का सारा परिवार सामने आता है। हमारे ब्राह्मण कुल के जो भी हैं सब सामने आते हैं। मूल बीजरुप परमात्मा, फिर उनकी रचना ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, फिर हमारा दादा, फिर उनके बड़े बच्चे – यह है हमारा कुल। यह हुआ निराकार और साकार कुल ।

देखो, ओम् शान्ति का कितना अच्छा अर्थ है ! हम निराकार, आकार और साकार तीनों का अर्थ जानते हैं। ब्राह्मणों को साकार द्वारा परमात्मा ने रचा है। वही ब्राह्मण कुल वालों को निराकार परमात्मा देवी- देवता, लक्ष्मी-नारायण का पद दिलाते हैं। जिसकी हम सन्तान हैं, उनको ऑक्यूपेशन सहित जानते हैं। हमको शूद्रों से ब्राह्मण बनाया है, अब ब्राह्मण से देवता बना रहे हैं – ऐसा सौभाग्य पा रहे हैं। वह भी अभी संगम पर। जिससे जन्म-जन्मान्तर सुख को पाते आते हैं।

हम ऐसे नहीं कहेंगे – चाहे गम दो, चाहे खुशी दो। चढ़ती कला है, अब तो खुशी ही है। ऐसे नहीं सोचेंगे – फिर गिरना है। भल ड्रामा में है लेकिन अब इससे छूटे हैं। अब चलने का समय है। तो उसका नशा भी रहेगा, खुशी भी रहेगी। जैसे लौकिक सम्बन्ध में भी लौकिक कुटुम्ब का नशा रहता है। लेकिन इससे भी कोई ऊंचे होंगे। अपना है सबसे ऊंचा कुटुम्ब । इससे ऊंचा और कोई है नहीं। जब तक यह नशा, खुशी प्रैक्टिकल नहीं है तब तक समझो भविष्य इतना पद नहीं बनेगा। यह है अभी की अवस्था से भविष्य पद को जानना । मीटर चेक करना चाहिए। कभी नशा, खुशी नहीं रहती – क्यों ? देह के सम्बन्ध में आने से खुशी नहीं रहती। भल प्रवृत्ति में रहते हो लेकिन वहाँ रहते भी देह सहित देह के सम्बन्ध से न्यारा होना है। यह है अन्दर की बात । बाहर से न कुछ छोड़ना है, न कोई स्थूल साधना करनी है। अपना बहुत सूक्ष्म गहरा पुरुषार्थ है। बुद्धियोग की ही मेहनत है। बुद्धि कहाँ लटकी तो वह खुशी, नशा कायम नहीं रहता। ऐसे नहीं, छोड़ने से छूट जाता । तुमको तो और ही ऑफरीन है जो साथ रहते भी बुद्धियोग न जाये ।

ऐसे नहीं समझना – बस, सुना-सुनाया, यही पुरुषार्थ है। लेकिन सब कुछ बुद्धि से भुलाकर सम्पूर्ण कर्मातीत अवस्था में जाना, मन्सा तक भी कोई विकल्प नहीं आवे – यह है मेहनत । कर्मणा में छोड़ने से मन्सा भी छूट जानी है। यह अभी-अभी अवस्था बनानी है। इससे भविष्य बनेगा। तो अपने पास सब जैसे मरे पड़े हैं। इन्हों से बुद्धि निकाल एक के साथ जोड़ना है। दैवी सम्बन्ध से भी देह का सम्बन्ध नहीं लगाते। परमात्मा की सन्तान हैं, इस सम्बन्ध से भाई-भाई हैं। तो सबसे निकल कहते मुझ एक में लटको । अव्यक्त देवताओं में भी लटकना नहीं है, तो स्थूल की तो बात ही नहीं है। तो कितना ऊंच अपने पुरुषार्थ में रहना है। इसको ही पुरुषार्थ कहा जाता है।

अब तक तो क्रोध, लोभ.. यह मोटी भूलें होती रहती हैं। लेकिन इन्हों को संस्कारों सहित मिटाना है। बाहर से तो चलन बहुत साधारण है, सूक्ष्म बुद्धि को क्लीयर करते हैं। तो बाहर से दिखाई नहीं पड़ेगा। बुद्धि को ठीक ठिकाना देना है। बाकी शरीर से कैसे भी बैठें। हमारी बुद्धि में एक ही घूमता है। बाप, टीचर, गुरु एक ही है। हद के बाप, गुरु, टीचर से कुछ कुछ मिलता है, लेकिन उसको मिलाकर भी पूरा नहीं मिलता है। लेकिन अब हमें एक से कम्पलिट मिल जाता है। सिर्फ पुरुषार्थ कर उनसे खींचना है। खींचने का काम है बुद्धि का । बुद्धि की ही कमाल है। मनुष्य तो मनुष्य है। वह बुद्धि से इतना विनाश कर सकते हैं, तो क्या हम बुद्धि-बल से नई दुनिया नहीं बना सकते हैं ? वह समझते हैं - यह इन्हों की कल्पना है, दुनिया तो बहुत चलनी है। हम कहाँ कहते नहीं चलनी है ? लेकिन बदल-सदल होने वाली है। हम पुराने कर्मों के खेत को उखेड़ नया खेत लगाते हैं। अपना है सूक्ष्म पुरुषार्थ ।

बुद्धि सबसे सूक्ष्म है। आत्मा का भी साक्षात्कार हो सकता है। लेकिन बुद्धि उससे भी सूक्षम है। कर्म बनाने-बिगाड़ने वाली भी बुद्धि है। तो बुद्धिवानों का बुद्धि इसको बना रहे हैं। इसलिए इतनी गहराई, गम्भीरता से धारण करो। ईश्वरीय ताकत है ना। दुनिया स्थूल ताकत के पीछे पड़ी है। लेकिन रुहानी ताकत को तो जानती नहीं है। सूक्ष्म योग लगाने से आत्मा प्योर होती है, तो उसका प्रभाव कर्म पर पड़ता है। इतना थोड़े में खुश नहीं होना है। पूर्ण साफ होना है। दुनिया इतनी बदलती है तो हमको भी इतना बदलना है। परमात्मा बैठ इतना कार्य कराते हैं। स्थूल विनाश स्थूल द्वारा कराएंगे, सूक्ष्म फिर वहाँ चुक्तू कराएंगे। मनुष्यों को समझाओ तो कह देते - परमात्मा को कराना होगा तो करायेंगे। हद की कमाई के लिए तो खूब पुरुषार्थ करते हैं। लेकिन इस बेहद की कमाई के लिए परमात्मा पर रख देते हैं। यह तो कमाई है, इसके लिए पुरुषार्थ करना है, वह भी एक बार । घडी घडी तो पुरुषार्थ नहीं करना पड़ेगा। जैसे वह शरीर निर्वाह अर्थ, थोड़े सुख के लिए कमाई करते हैं। फिर भी शारीरिक रोग आदि झंझट चलते आते हैं। लेकिन हमारी कमाई से सब प्रालब्ध मिल जाती है।

बुद्धि को और कोई खलल (विघ्न) पड़ने से शरीर से भोगना जास्ती अच्छा है। बुद्धि सालिम है तो समझते हैं – यह भी हिसाब-किताब भोग कर छूटते हैं। दुःख नहीं भासेगा। बुद्धि में खलल पड़े तो कड़ी भोगना चलती है। हिसाब-किताब तो सबको भोगना है। लेकिन इसमें भी सतो, रजो, तमो स्टेज हैं। जैसे जेल में भी ए, बी, सी क्लास है। तो इस शारीरिक भोगना में भी स्टेज़ेस हैं। उसे हम परमात्मा की याद से सूली से काँटा बनाए खलास कर देते हैं। इससे नुक्सान नहीं होता है। बुद्धि का खलल तो बहुत नुक्सान करता है। ऐसे नहीं, परमात्मा की सन्तान हैं, फिर भोगते क्यों ? नहीं, विकर्मों का बहुत बड़ा स्टॉक है। इसको खलास कर जाएँगे तो बाबा खुश होगा। कुछ रह गया तो डंडा भी मिलेगा, पद भी नहीं देगा। ऐसे तो नहीं, डंडे लगाकर पद बड़ा देगा ? इसलिए यहाँ खुशी से चुक्तू करते हैं। वह चुक्तू हो गया फिर तो चले जाएंगे। फिर नम्बरवार आएंगे ।

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07.12.59: बाप के गोल्डन वर्शन्स ही आत्मा को सच्चा सोना बनाते हैं

गीत:- यह कौन आज आया सवेरे-सवेरे. ।

सवेरा एक तो है हद का, दूसरा है बेहद के चक्र की रात-दिन का सवेरा। अब सवेरा आरम्भ हो रहा है। आगे फिर दिन होता जाएगा। जब रात के अन्त और दिन के आदि का संगम होता है, तब ही परमात्मा का आना होता है। भक्ति वाले भी जो मस्त होते हैं, एक बजे उठते हैं। वह सतोप्रधान समय है। समय का प्रभाव रहता है। तो बाबा ने समय भी संगम का पकड़ा है। अन्त से फिर आदि करना उसका काम है। तो अब सवेरे के टाईम बाबा आए हैं, जिनकी आँखों में जादू, बातों में सोना है। बाबा के गोल्डन वर्शन्स हैं ना। जो डायरेक्ट महावाक्य उच्चारण करते हैं—मामेकम्। और कोई भी नहीं कहेंगे- मुझे याद करो। मनुष्य कहेंगे – उनको याद करो। बाबा तो डायरेक्ट सिखाते हैं – मुझे याद करो । तो उनकी बातों में सोना है जो हम भी गोल्डन अथवा पत्थर से पारस बन जाते हैं। जैसे अर्जन को परमात्मा का साक्षात्कार हुआ तो कहा-हज़ारों सूर्यों से तेज है। वह तो एवर-गोल्ड है। इसलिए बाबा का नाम है पारसनाथ ।

सोमनाथ ज्ञान सोमरस पिलाते हैं। बाकी मीठा पानी पिलाने की बात नहीं। उनसे आत्मा मीठी वा स्वच्छ नहीं बनेगी। गंगा नहाने की बात भी यह ज्ञान की है। कहते हैं – मैं ज्ञान सागर हूँ, मेरे से यह ज्ञान गंगाएँ निकली हैं। उन्होंने फिर नदियों पर नाम रखे हैं। कहते हैं ना – ज्ञानामृत पिलाना। तो उन्होंने फिर यह स्थूल अमृत पिलाना, गंगा नहाना. अनेक बातें निकाली हैं। समझते हैं – इससे पाप नाश होंगे। अब गंगा नहाना तो बहुत सहज है। फिर शास्त्र, संस्कृत आदि पढ़ने की क्या दरकार है ? गंगा नहाने से पाप नाश हो जाएं फिर तो मुक्त हो गये। लेकिन अब हम जानते हैं कि यह भी भक्ति मार्ग है। इसका भी बड़ा वृक्ष है। वृद्धि होती रहती है। अभी फिर जड़जड़ीभूत अवस्था है। पहले भक्ति सतोप्रधान थी। अब तमोप्रधान है तो चींटी, मकोड़े, मिट्टी आदि सबको पूजते रहते हैं। हम किसी बात को खण्डन नहीं करते। यह सब ड्रामा में है और अब इसका भी अन्त होना है। फिर अब नया चक्र चलेगा। अब बाबा ने सवेरा शुरु किया है। ज्ञान-अमृत अथवा ज्ञान-अंजन सब यह है। जादू का सुर्मा भी मशहूर है, वह भी यह है। बड़ा जादूगर तो बाबा है जो मनुष्य को देवता बनाते हैं। कितना ट्रान्सफर कर देते हैं ! तो बड़ा जादूगर हुआ ना । तमोप्रधान आत्मा को सतोप्रधान बना देते हैं। सौदागर भी कैसा है ? कहते हैं – सब दे दो। जैसे सत्य नारायण की कथा है। कहा मेरे पास कुछ नहीं है तो कुछ नहीं हो गया। यह वही पार्ट चल रहा है। सौदा भी देखो कैसा करते हैं ! हम अपना तन-मन-धन देते हैं तो उसका 100 गुणा जास्ती बाप से मिलता है। तो बाप से सौदा करने में कितने फायदे हैं ! यह खुदा दोस्त है। त्वमेव माताश्च पिता.. सब संबंध उनके साथ हैं। विद्या देने वाला टीचर भी बनते हैं। कहते हैं – मैं वह विद्या पढ़ाता हूँ जिससे राजाओं का राजा बनते हो। कहा है – सबसे उत्तम मेरा यही रुद्र-यज्ञ है। रुद्र कहो, पारसनाथ कहो, सोमनाथ कहो – एक बाबा के ही सब नाम हैं। बाबा का काम है तमोप्रधान का विनाश कर सतोप्रधान की स्थापना करना। सर्वशक्तिवान का यही मतलब है ना। बाकी व्यापक है, तब सर्वशक्तिवान है -ऐसे तो नहीं कहेंगे। इस समय तमोप्रधान हैं, 5 भूत प्रवेश हैं। बाबा आकर इन 5 भूतों का विनाश कर सतोप्रधान बनाते हैं। यह बाबा की शक्ति है। बाकी मुर्दे को जिन्दा बनाना या जिन्दे को मारना यह बाबा की शक्ति नहीं है। हाँ, हम माया से मरे पड़े थे और बाबा ने आकर सुरजीत किया है ज्ञान-संजीवनी-बूटी से। तो यह है बाबा का जादू। आंखों में, बातों में सोना है जिससे आत्मा को सोना बनाते हैं। स्टार्स भी कोई चमक वाला, कोई कम चमक वाला होता है। तो अपने को चमकदार बनाना है। फिर शरीर भी ऐसा सुन्दर मिलेगा। इसलिए देवतायें बड़े सुन्दर होते हैं। नेचुरल ब्युटी रहती है, तन्दरुस्ती भी रहती है। तो शरीर ब्युटीफुल रहते हैं – चेहरे पर मुस्कराहट, सरल, शान्त यह संस्कार हैं आत्मा में तो चेहरा भी ऐसा रहता है। जितना सोल में पॉवर है उतना नज़दीक संबंध में आते हैं। यह है हमारे पुरुषार्थ की सिद्धि । ज्ञान-योग बल से जितना प्योर होंगे उतना संबंध में समीप आयेंगे। बाकी अभी यहाँ ही संबंध नहीं जोड़ने हैं। योग तो एक के साथ लगाना है।

पुरुषार्थ का सिर्फ यही टाईम है। कहते हैं- इस समय यह अन्तिम जीवन मेरे हवाले करने से बड़ा फायदा है। जिसको सरेन्डर कहते हैं, हैण्ड्स-अप। फिर जैसे चलावे । अब कुछ रहा नहीं है। उनके हवाले करने से हल्के हो जायेंगे। इसलिए कहते हैं – सारा बोझा मुझे दे दो तो रेसपान्सिबल मैं हूँ। कहते हैं – सब भूलो, जो कुछ पढ़ा है उनको भूलो। अर्जुन को भी कहा है ना – यह जो पुराने संस्कार भरे हैं, उन सबको भूल जो मैं सुनाता हूँ वह सुनो। अब वह सब प्रैक्टिकल चल रहा है। जो पढे-लिखे हैं तो बुद्धि भटकती है, मूँझ पडते हैं। इसलिए वही फरमान हो रहा है। कोई माने, न माने ।

विनाश तो सामने खड़ा है। ऐसी चीजें इसके आगे और क्या बनाएंगे। इसको ही तो महाभारत महाभारी लड़ाई कहेंगे बनी हैं जो पूरा विनाश करेंगी। ना। आगे तो छोटी लडाइयाँ लगती थीं। अब तो पूरा विनाश सामने है। महाभारी महाभारत लडाई सामने है। तो गीता का भगवान भी ज़रुर होगा। सब यादव भी सामने खडे हैं मरने-मारने के लिए कौरव भी खड़े हैं और पाण्डव भी खडे हैं। तब बाबा कहते हैं – यह लास्ट वार है। फिर तो न लड़ाइयाँ होंगी, न यह कोर्ट आदि चोरी-चकारी होंगे। आधा कल्प के लिए लडाई का नाम-निशान नहीं होगा। यह अकासुर, बकासुर, सूर्पनखा, पूतना सब इस समय हैं। यह सब कर्त्तव्यों पर नाम हैं। बाकी कोई सिर पर सींग नहीं होते। यह सब क्रोध के चिह्न दिखाते हैं। जैसे सोल के संस्कार हैं। यहाँ ही कई औरतें पुरुषों को तंग करती हैं, मार भी देती हैं। बड़े मजे के खेल चलते हैं। जो वन्डर्स बाबा की स्थापना में चलते हैं, आगे कभी नहीं चले हैं।

गोपियों को बंधन होना दिखाते हैं। जब कृष्ण परमात्मा था तो उनके पास जाने से क्यों रोकते थे ? अगर खराब आदमी था तो उनको पूजते क्यों है ? जिस कृष्ण के दीदार के लिए मीरा ने राणा को तज दिया, वह (कृष्ण) जब स्वयं था तब औरतों को जाने से रोकते क्यों थे ? जरुर कुछ गड़बड़ है। साधारण तन में आते हैं, तब तुच्छ समझ गाली देते हैं। तो इसलिए बाँध होती है। इसलिए वकील लोगों को अपनी वकालत को भी प्योरीफाइ करना है। ऐसे कानून को पकड़ो, जो इन्हों का कुछ प्रबंध हो। इस सर्विस से वकालत भी प्योर हो जायेगी। समझावें तो एक समझेगा, लेकिन एक तो कुछ कर नहीं सकता। एक का राज्य तो है ही नहीं। परमात्मा सर्वव्यापी है तो सब परमात्मा हो गए, सब अथॉरिटी हो गए। ऐसे समय बाबा आकर डिफीकल्ट काम करते हैं, जो कोई मनुष्य कर नहीं सकता। मनुष्य को तो घर का ही कुछ झंझट होता है तो हैरान हो जाते हैं। यह कितना भारी झंझट है ! यह तो उस समर्थ का काम है जो सारी रेस्पॉन्सिबिलिटी उठाते हैं। वह अथॉर्टी सब काम कर रही है, यह भूलना मत । ‘कार्य’ ही सिद्ध करता है यह मनुष्य की ताकत नहीं। यह बाबा भी कहते – चलते-चलते हमको पकड़ लिया। ब्रह्मा भी नाम बाबा ने रखा है। वह तन भी तो मरजीवा बना जो ब्रह्मा नाम पड़ गया। तो दादा का काम नहीं, डाडे (मैन्ड फादर) का काम है जो कर रहे हैं, जो हमको भी हिम्मत दे रहे हैं। सहनशील बनने से शक्ति आती है। सहन करने का भी बाबा बल दे रहा है। इसमें डरना नहीं है। भल इस लोक में नाम बदनाम हो, लेकिन उस लोक में नाम बाला होगा। ब्बाकी यह तो लड़ेंगे, कहेंगे – काम, क्रोध बिगर कैसे काम चलेगा ? यह सब सुनाकर फिर बाबा कहते हैं – मन्मनाभव ।

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11.09.62: सृष्टि की कहानी – दो युग हैं पवित्र प्रवृत्ति के और दो युग हैं अपवित्र प्रवृत्ति के

ओमशान्ति । इस मनुष्य सृष्टि को ही कहने में आता है कि यह वैरायटी मनुष्य सृष्टि है। अनेक धर्म हैं। लेकिन इनके होते भी इस सृष्टि की कहानी एक ही कहेंगे जो है ही प्रवृत्ति मार्ग की। पहले पवित्र प्रवृत्ति मार्ग कहा जाता, फिर अपवित्र प्रवृत्ति होती है। जब पहले-पहले सृष्टि की रचना रची तो पवित्र प्रवृत्ति की रचना रची थी। वही पवित्र प्रवृत्ति वाले वाम – मार्ग में आये तो फिर माया का विकारी राज्य शुरु हुआ। वही पवित्र प्रवृत्ति वाले अपवित्र प्रवृत्ति में आ गये। फिर परमात्मा आकर पतित से पावन बनाते हैं। सबको लिबरेट करने वाला वह है। माया के बंधन से छुड़ाते हैं। फिर पावन प्रवृत्ति शुरु होती है। प्रवृत्ति अनादि है। पहले-पहले आधा कल्प पवित्र प्रवृत्ति थी, अपवित्रता की बात नहीं थी ।

तो परमात्मा आकर जब माया के बंधन से छुड़ावे तब तो पवित्र दुनिया स्थापन हो। सबको माया के बंधन से छुड़ाए पवित्र दुनिया स्थापन करते हैं। तो जो पवित्र प्रवृत्ति वाले थे उनको ही फिर चारों वर्णों में आना है। देवताओं के ही यह वर्ण कहे जायेंगे। कहते हैं- मैं आता हूँ अपने बच्चों का उद्धार करने। सारी दुनिया को माया के बंधन से छुड़ाते हैं। तो इस सारे खेल की एक ही कहानी है। आदि से लेकर अन्त तक चारों वर्णों में किसका क्या पार्ट चला – सो अब जानते हैं। पवित्रता के भी पूरे दो युग हैं और फिर अपवित्रता के भी दो युग हैं। उसमें भी फिर स्टेजेस हैं – सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो । फिर अन्त में बाप को आकर नई दुनिया बनानी पड़ती है। जब माया का राज्य आता है तो फिर देवताओं की प्रालब्ध पूरी हो जाती है। वह जब वाम-मार्ग में आये तब फिर दूसरे धर्म वालों का आना आरम्भ हुआ। उन्होंने तो देखी ही विकारी दुनिया है। बैकुण्ठ में पवित्र प्रवृत्ति की प्रालब्ध तो जिन्होंने पाई उन्होंने ही देखी, उन्होंने ही भोगी। पवित्र प्रवृत्ति वालों ने अपनी प्रालब्ध भोग पूरी की तो फिर वाम-मार्ग शुरु हुआ। तो अब जानते हैं – हम ही पवित्र देवता थे, फिर सतो, रजो, तमो में आये। अब फिर पवित्र प्रवृत्ति को धारण कर रहे हैं। सन्यासियों का निवृति मार्ग पीछे होता है। इन चीजों को जान वही सकते हैं जिन्होंने प्रालब्ध पाई । बाप समझाते हैं – अब मैं फिर आया हूँ तुमको वही प्राप्ति कराने। तो यह खेल भी एक ही कहानी में है। जो पावन थे वही पतित बने । पावन बनाने वाला अलग है। जो पावन बने उन्हों की हिस्ट्री अलग है, बनाने वाले की हिस्ट्री अलग है।

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13.09.62: आत्मा, परमात्मा – दोनों अनादि हैं, अन्तर सिर्फ पवित्रता की लाइट का है

कहावत है – आत्मा, परमात्मा अलग रहे बहुकाल, सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरु मिला दलाल । अब दलाल जो संबंध जुड़ावे वह भी तो परमात्मा ही चाहिए। तो अब सतगुरु ने ही अपने साथ योग लगाना सिखाया है और समझाया है कि ‘मैं कौन’ और ‘तुम कौन’। बहुत लोगों की मत है कि सबकी आत्मायें एक हैं। परन्तु त्रेता के अन्त तक भी 33 करोड़ आत्मायें गाई जाती हैं। उनको कहा ही जाता है निराकार आत्मायें। यानी आत्मा और शरीर अलग चीजें हैं। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। तो लेने और छोड़ने वाली आत्मा है। पहले भले शारीरिक संबंध से आत्मा को दुःख-सुख भोगना है हिसाब-किताब अनुसार, परन्तु प्योर बनना है। प्योर बनना है सुप्रीम सोल से। तो जैसे परमात्मा के लिए प्रश्न नहीं है कि किसने उनको पैदा किया, वैसे आत्माओं के लिए भी प्रश्न नहीं उठता है। दोनों अनादि हैं। परन्तु सिर्फ परमात्मा एक ही सोल है जो एवर प्योर है। सब चीजों में वह एवर है। बाकी आत्मा को इनकारपोरियल से कारपोरियल में आना है और स्टेजेस से पास होना है। एक ही सुप्रीम सोल बदलता नहीं है।

गीता में भी है कि हजारों सूर्यो से जास्ती तेज है। तो जितनी प्योर उतनी प्रकाशमय है। परन्तु साइज जैसी आत्मा की है, वैसी परमात्मा की है, सिर्फ लाइट का अन्तर है। जब तमोप्रधान आत्मायें होती हैं तो काली हो जाती हैं। शुरु में देखते थे कि इसकी आत्मा में इतनी लाइट है ! तो अब यह कालापन आदि सब पवित्रता पर है। तो तरस तो आता ही है कि क्यों नहीं सब अपनी जीवन बना लें ! बाप के पास हमारी जायदाद है, वह लेने का जोश आना चाहिए । जैसे बाप से लड़ाई करके भी वर्सा लेना होता है ना। भल कोई गुरुनानक को मानता हो, तो उसमें भी बड़ा पद पा सकता है। अब नहीं किया तो धर्मराज के पास आना ही पड़ेगा ।

जिस टाइम जिस सर्विस की दरकार है उसमें ही कमाई है। जैसे जिस समय गवर्मेन्ट को मजदूरों की दरकार पड़ती है तो जास्ती पैसा देकर भी काम कराते हैं। तो जिस समय जिस सर्विस की दरकार है उस समय वही सर्विस करने से उसकी कमाई जास्ती है। जिस समय तगारी उठाने की दरकार है उस समय वाचा सर्विस करेंगे, जिसकी उस समय दरकार नहीं, तो वह फालतू हो जायेगी । हमको तो बेहद में खड़ा रहना है। हमारी बेहद की सर्विस है। दुनिया की सर्विस में खड़े हैं। यह है डिटेल पुरुषार्थ की वा प्रालब्ध की नॉलेज जिससे आगे बढ़ते रहना है। छोटों को भी आगे बढ़ना है, उनके आरगन्स छोटे हैं, इतनी बुद्धि नहीं है। तो जितनी सर्विस कर सकते हैं उसमें ही कमाई है। पहले तो खुद धारण करना है, फिर औरों को धारण कराना है। बाबा हमको बहुत ऊंच ले जाते हैं। आत्माओं से नम्बरवार प्रेम-प्यार भी रखना है। ऐसा (देवता) बनना टैम्पटेशन है। अपना काम है अच्छा काम करना।“ लेकिन वह भी तो जीवन है तो काम भी ऐसा करना है। कई कहते- “यह पद आदि भी क्या है होगी ना पवित्रता, सुख, शान्ति की। तो उसका साक्षात्कार कराते हैं। अच्छा ।

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14.09.62: अब वृक्ष को बीज में समाना है, इसलिए देह सहित सबसे छुटकारा पाने का पुरुषार्थ करो

ओम् शान्ति । रात और दिन को भी समझना है । रात-दिन हद के भी हैं और दूसरे बेहद के भी हैं जिसको ब्रहमा का दिन-रात कहते हैं। तो सारा कल्प जैसे कि ब्रह्मा का हो गया। यानी सारे कल्प में ब्रहमा का पार्ट हो गया। जरुर रात भी ब्रह्मा ने गुजारी, दिन भी गुजारा। अब यह सारा चक्र है। एक जन्म की बात नहीं है। अभी इतने 5000 वर्ष में रात-दिन पूरा होता है। तो एक मनुष्य की इतनी बड़ी आयु नहीं हो सकती है। फिर वह तो लाखों वर्ष कहते हैं ! परन्तु 5000 वर्ष भी एक की आयु हो सकती है क्या ? बाल, युवा, वृद्ध – तो 100 वर्ष में ही क्या से क्या हो जाते हैं ! तो समझना चाहिए कि यह अनेक जन्म की बात है जो बाबा बैठ कहानी सुनाते हैं। बाबा जो ब्रह्मा का भी रचयिता है। मुख्य बच्चे के साथ सभी बच्चों की कहानी आ जाती है। तो हमारा बड़ा बाबा रात और दिन की कहानी सुना रहे हैं।

परमात्मा खुद आकर इस (ब्रह्मा) तन से कहानी सुनाते हैं। तो इनसे ही कहानी शुरु करेंगे – इनकी आत्मा कैसे चक्र लगाती है, कैसे रात पूरी होकर दिन शुरु होता है ? दिन के हैं 21 जन्म क्योंकि यह जन्म भी गिनती होता है। 20 जन्म वह और एक जन्म यह जो दिव्य और अलौकिक है। ब्रह्मा का भी यह दिव्य और अलौकिक जन्म गिना जायेगा। बाद में 63 जन्म कब और कैसे होते हैं, उसका भी विस्तार समझाते हैं । तो इसमें सबकी कहानी आ जाती है। सबका पता बाप ही दे सकते हैं।

हम बाप द्वारा जान गये हैं कि अब हमारे भक्ति के अनेक जन्म पूरे हुए। भक्ति भी हम सबने बहुत जन्म की है। तो लक्ष्मी-नारायण की भक्ति की पूंजी भी बहुत बड़ी है। यह है सारी कहानी । सतयुगी देवी देवता धर्म और राज्य दोनों की स्थापना बाप द्वारा अभी ही होती है। नयी दुनिया फिर प्रानी होती है। पहले था ही देवता धर्म । जैसे पहले जड़ फिर पत्ते आदि निकलते हैं।दूसरे धर्म पहले नहीं थे। हिन्दू धर्म भी पहले नहीं था। पहले देवी-देवता थे, फिर जब गिरे तब हिन्दू बने । कहने में भी पहले सतयुग आता है, ऐसे नहीं कि पहले द्वापर, कलियुग फिर सतयुग। सब बातों का नियम (लॉ) बना हुआ है। हर चीज में नम्बर जरुर हैं। रात-दिन में भी पहले दिन कहेंगे, न कि रात। भले चक्र चलता है परन्तु उसमें भी नम्बरवार हैं। इस चक्र के हिसाब में जितना सुख उतना दुःख । मनुष्य इन बातों को न जानने के कारण कह देते हैं – यह सुख काग विष्टा के समान है। परन्तु हम जानते हैं आधा कल्प है ज्ञान, आधा कल्प है भक्ति। यह वैराग्य मार्ग है बाईप्लाट । देखो, देवताओं के चित्रों द्वारा भी सिद्ध होता है कि अनादि पवित्र प्रवृति थी। वहाँ पवित्रता से ही वृद्धि होती है।

अभी तो हमें देह सहित देह के सब संबंधों से मुक्त होना है। अभी कोई वह वृद्धि नहीं करनी है। अभी तो इसे खत्म करना है। वहाँ की रिहर्सल यहाँ नहीं करनी है। ऐसे नहीं सोचें कि देखें, देवतायें कैसे बच्चे पैदा करते थे ? परमात्मा कहते हैं – अब तो कोई भी हालत में मुझे याद करो, बाकी सबको भूलना है। अभी तो आत्मा ही पवित्र नहीं है तो देह कैसे पवित्र होगी ? तो अब अपनी बुद्धि को एक तरफ लगाना है। देह सहित छुटकारा पाना है क्योंकि देह सहित देह के सब संबंध से निकल वापस जाना है। बाकी वहाँ कैसे वृद्धि होगी ? वह बात वहाँ की है। अभी तो वृक्ष को वापस बीज में जाना है। फिर जब बीज बोयेंगे तब की बात है। अभी तो करवट को बदलना है। अब यह रोशनी परमात्मा द्वारा मिलती है। अभी स्वधर्म का पता लगा है। अभी हम स्वधर्म में रहकर बाप से अपना वर्सा लेते हैं। वहाँ है ही एक देवी-देवताओं का धर्म । वहाँ कोई दैत्य आदि होते नहीं। आसुरी सम्प्रदाय ही नहीं है। वहाँ देवताओं को नॉलेज ही नहीं है कि अपवित्रता क्या होती है? इस समय की तमोप्रधान बुद्धि वाले इन बातों को नहीं समझ सकते हैं। इसलिए कहते हैं कि क्या सभी पवित्र बनेंगे ? परन्तु यह परमात्मा का काम है, वही जानते हैं।

मनुष्य न जानने के कारण कह देते हैं कि जहाँ सारी दुनिया वहाँ हम । वह तो समझते कि परमात्मा का जन्म है ही नहीं, वह तो सर्वव्यापी है। अगर सर्वव्यापी कहते हैं तो अवतरण कहना भी निषेध हो जाता है। कहते हैं- कण-कण में है। तो फिर उतरा कैसे ? फिर तो न उतरने वाला रहा, न उतरने की जगह ही है। अभी तो सब अवतार बन गये हैं। पहले से ही सब अवतार बैठे हैं, तो फिर और अवतार किसका होगा ? तुम जानते हो कि हम सब आत्मायें हैं। आत्मा है ही सत्-चित् । शरीर से आत्मा ही निकलती है, अकेला मन-बुद्धि नहीं निकलता। यही तो आत्मा की चैतन्यता है। हर एक आत्मा के संस्कार अलग-अलग हैं। ऐसे नहीं कि वह कोई जड़ हो जाती है। जैसे आकाश तत्व है, ऐसे कोई आत्मा भी एक तत्व है – नहीं, वह चीज ही अलग है। यह है परमात्मा की नॉलेज जो अभी हम जानते जाते हैं। अच्छा ।

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15.09.62: आत्मा, परमात्मा के कर्त्तव्यों को यथार्थ जानना ही अच्छे कर्मों का आधार है

गीत :- दुःखियों पर कुछ रहम करो.. ।

ओम् शान्ति। परमात्मा एक है और वह निराकार है। कई मनुष्य ऐसे मानते हुए भी इस बात में मूंझे हुए हैं। क्योंकि परमात्मा के बारे में ही अनेकानेक विचार हैं। निराकार को मानने वालों के भी अनेक विचार हैं। कोई भी चीज को एक कहा जाए तो उनका वृतान्त भी एक होना चाहिए ना। अनेक बातें तो नहीं होनी चाहिएं। परन्तु इस एक चीज में ही दुनिया मूंझी हुई है। कहते भी हैं – गॉड इज वन । लेकिन कहने और समझने में कितना फर्क है! समझो, यह आकाश तत्व है, उनको हर एक अपनी-अपनी भाषा में भल कुछ भी कहे लेकिन चीज तो एक है ना। इस रीति परमात्मा भी एक ही है, तो सबके पास वृतान्त भी एक होना चाहिए। भाषायें भल अनेक हों लेकिन विचार तो अनेक नहीं होने चाहिएं ना । तो एक ही बात में दुनिया कितना मूंझी हुई है ! इसलिए यह भी नहीं जानते हैं कि हम आये कहाँ से हैं, करना क्या है ? सिर्फ कहते हैं अच्छे कर्म करने चाहिएं।

कई ऐसे भी मनुष्य कह देते हैं कि परमात्मा क्या है, हम क्या हैं, कहाँ से आये, कहाँ जाना है - इन बातों से हमारा क्या मतलब ? बाकी हाँ, अच्छे काम करने चाहिएं। अच्छा, वह अच्छा काम कौनसा है ? तो बतायेंगे – झूठ न बोलो, चोरी न करो, किसको कष्ट न दो। परन्तु हम जानते हैं कि एक दो को कष्ट तो देते ही आये हैं। अपने आपको भी धोखा देना – यह भी आत्मा को कष्ट दे रहे हैं ना। यह भी समझने की बात है। पहले तो अपने को जानना चाहिए कि "मैं हूँ कौन ? मेरा पोजीशन क्या है ? कर्त्तव्य क्या है ?" अपने पोजीशन को जानने से ही कर्त्तव्य कर सकेंगे। जैसे डॉक्टर जब जाने- मैं डॉक्टर हूँ, पेशेन्ट को सफा देनी है, तब ही पूरी सफा दे सकेंगे। अगर कहे कि इनकी आवश्यकता ही क्या है, तो कर्त्तव्य कैसे चले ? अगर डॉक्टर का कर्त्तव्य करे परन्तु यह पता न हो कि हम डॉक्टर हैं- तो क्या करेंगे ? तो यह भी ऐसी बातें हैं। कहते तो हैं – हम अच्छे कर्म कर रहे हैं, हम देश की सेवा कर रहे हैं। लेकिन सेवा भी सच्ची कौनसी होती है? दुनिया जो कुछ भी कर रही है उसकी रिजल्ट तो सामने प्रत्यक्ष होती जा रही है।

परमात्मा क्या, हम क्या, हमारा कर्त्तव्य क्या है ? वह यथार्थ रीति जानना है। वह समझते हैं हम वेदों-शास्त्रों के आधार पर जानते हैं। लेकिन शास्त्र की पढ़ी हुई बात को जानना थोड़ेही कहेंगे। जानने की तो प्रैक्टिकल बातें हैं। हम प्रैक्टिकल में अपने अनुभवों के आधार पर सुनाते हैं। ऐसे नहीं, जो होना होगा सो देखा जायेगाः। नहीं। हम अपने अनुभव, विवेक, अथॉरिटी के आधार पर कहते हैं। हमारी कहनी और करनी दुनिया से निराली हो गई है। दुनिया जो कहती है, करती है - उसमें कोई एम आबजेक्ट नहीं है। हर एक के अपने-अपने ख्यालात हैं। इसलिए कोई भी बात में स्थिर नहीं हैं। अपनी बुद्धि तो स्थिर है। बुद्धि में एक ही यथार्थ बात है। हमारी कहनी और करनी समान है।

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18.09.62: निश्चय के अटलता के बल से नई दुनिया की स्थापना

फकीरी में अमीरी याद है ना ? तो यह है फकीरी में, याद करते हैं अमीरी को। हम जो पूज्य थे वह फिर पुजारी बने। सबका यह अन्तिम जन्म है। एक हैं भक्त जो भक्ति-मार्ग वाले हैं और हम फिर वह भक्त हैं जो पुजारी से पूज्य बन रहे हैं। आत्मा भी पुरानी हो गई है तो शरीर भी पुराने हैं। अब फिर परिवर्तन आ रहा है । सतयुग में महाराजा-महारानी, प्रजा आदि सब होंगे। अब अपने को निर्णय करना है कि हमें क्या बनना है ? गुप्त वेष में राजधानी बन रही है। दुनिया नहीं जानती है कि लक्ष्मी-नारायण की राजधानी कैसे बनती है ? एक तो पूर्व में विनाशी धन दान करने से अल्पकाल की राजाई मिलती है, दूसरा लड़ाई से मिलती है। लेकिन यह फिर है सदाकाल के लिए सुख की राजधानी । इसमें न है विनाशी धन का बल, न लड़ाई का बल है, परन्तु सहज राजयोग के बल से राजधानी स्थापन होती है। तो कितनी ऊंच बात है ! अब यह कार्य हो रहा है। यहाँ कई आते हैं लेकिन जो अपने घराने के हैं वह तो चटक जाते हैं, बाकी तो आते-जाते रहते हैं।

अब भारत पर लक्ष्मी-नारायण के राजधानी पाने का समय आकर पहुँचा है। सौभाग्यशाली की बुद्धि में ही यह बात बैठती है। कई तो फिर कह देते हैं कि यह कल्पना का संसार बना बैठे हैं। परन्तु हम फिर समझते हैं कि यह जो सूर्य-चांद में अपना घर बनाने की सोच रहे हैं, वह अभी-अभी कल्पना हो जायेगी। यह दुनिया तो बदलनी है। अपने निश्चय के अटलता के बल से ही स्थापना हो रही है। इस बात को दुनिया नहीं जानती। हम ही सर्व समर्थ बाप द्वारा यह जानते हैं। क्या अकाले मृत्यु, दुःख-रोग आदि ऐसी ही मनुष्य की लाइफ होती है ? काल को जीतने वाला भी मनुष्य होता है ना। अभी तो अकाले मृत्यु होती रहती है। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होती है, समय पर ही सब होता है। क्या मनुष्य की लाइफ ऐसी होती है? लोग तो कहते हैं- ऐसा होता ही आया है। लेकिन उन्होंने देखा ही यही है। परन्तु हमको तो बाबा ने दिखलाया है कि दुःख-अशान्ति का वहाँ नाम-निशान नहीं है। अब तो आत्माओं का खेल ही बिगड़ गया है। यह बाप, टीचर, पति आदि तो सब सम्बन्ध चलते आये हैं। अभी फिर बेहद का बाप कहते हैं कि सब सम्बन्ध मेरे से जोड़ो। नई दुनिया की रचना अब फिर से भगवान रच रहे हैं।

मनुष्य तो कहते हैं – यह सृष्टि अनादि है, सब दुःख आदि भी अनादि हैं। लेकिन भगवान ने नई दुनिया भी कैसे रची ? वह भी समझाते हैं। वह तो कहते हैं – पहले-पहले मिट्टी का पुतला था, फिर ऐसे हुआ, फिर सृष्टि बनी । लेकिन अब बाप समझाते हैं कि नई दुनिया कैसे तुम्हारे द्वारा बनाते हैं। बाप कहते हैं कि “यह कर्मक्षेत्र तुम्हारा है। तुम्हारी ही खेती है। भल लगवाने वाला मैं हूँ, परन्तु तुम अपना करो, मैं अपना करूँ।“ अभी तो हद का सब समेटना है। ऐसे नहीं कि छोड़ो, परन्तु बुद्धियोग निकालो। अब तो बुद्धि में ऐसे ही सोचना है कि यह पुरानी दुनिया है, ऊपर जाना है और फिर वापस नई दुनिया में आना है। अब वह पुराना नाता न हो। अब अपने ठिकाने को याद करना है जो अपना निवास-स्थान था । अब वहाँ जाकर विश्राम पाना है। मूलवतन से चक्र लगाए फिर आकर स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अब बनना यहाँ है, सतयुग में तो होकर रहेंगे। लाइफ का मजा कुछ और है। मनुष्य कहते – ईश्वर का भाणा (मर्जी को) मीठा कर भोगना है। लेकिन यह और बात है। जो ईश्वर का भाना था वह तो अब बन रहा है। अब उसको पाना है। बाकी तो दिल खुश कर रहे हैं। यह ईश्वर ने नहीं दिया है, यह अपने कर्मभोग हैं। ईश्वर दुःख थोड़ेही देता है। अब उससे निकल और जो ईश्वर द्वारा मिल रहा है उसको अच्छी तरह लेना है। अच्छा। गुडमार्निन्नग ।

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19.09.62: प्रवृत्ति में रहते विकारों को तजना ही श्रेष्ठ कर्म है

इस दुनिया में जो ऊंच कर्त्तव्य करके गये हैं उनका इतिहास में नाम गाया जाता है। जिनके कर्त्तव्य ऊंच हैं उन्हें मन्दिरों में पूजा जाता है। जरुर उन्होंने कभी राज्य भी चलाया है। परन्तु उन्होंने कौनसा कर्म किया जो इतनी ऊंच प्रालब्ध बनाई ? उन्हों का संसार जिसे ‘स्वर्ग’ कहा जाता है – यह है मनुष्यों की ऊंच ते ऊंच प्रालब्ध । इतनी ऊंच प्राप्ति के लिए कोई पठन-पाठन की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई कर्म-श्रेष्ठ नहीं कहा जाता है। प्रवृत्ति में पवित्र रहना ही कर्म-श्रेष्ठ है।

सिर्फ विकारों को तजना है। विकार अपनी चीज नहीं हैं, प्रवृत्ति अपनी चीज है। तो प्रवृत्ति का सन्यास नहीं करना है। प्रवृत्ति को ही पवित्र बनाना है। आसुरी को दैवी बनाना है। असुर भयानक नहीं है परन्तु विचार भयानक हैं। सिर्फ कोई का गला काटना आदि विकर्म नहीं परन्तु आज मनुष्य का हर एक कर्म ही विकर्म है। ऐसा नहीं कि परमात्मा ही विकर्म आदि कराता है। नहीं। परमात्मा ने सिखाया था कि शरीर-निर्वाह करते कर्म से विकारों को निकालो । परन्तु मनुष्य समझते हैं कि पाप के बिगर कर्म हो नहीं सकते हैं।

अब तो है झूठ-खण्ड, तो सब झूठ है। साधू, सन्त, महात्मा कहलाने वाले भी झूठे संसार में हैं। अब परमात्मा ही आकर सच्चा साधन अर्थात् पुरुषार्थ सिखाते हैं। सब आत्माओं के चक्र की कहानी सुनाते हैं जिसको कहते हैं स्वदर्शन-चक्र। बाकी कोई रावण, कंस आदि का गला काटने की बात नहीं है। अब वही समय है जबकि परमात्मा समझाने फिर से आया है। अब मनुष्य दुःख से निकलने चाहते हैं। परन्तु कह देते हैं – परमात्मा ही दुःख-सुख देता है। यह कहना परमात्मा पर दोष धरना है। तो अब परमात्मा बाप कहते कि पुरुषार्थ करो। अब आसार नजदीक दिखाई दे रहे हैं। अब जगाने वाला आया है तो भी सोते रहेंगे तो क्या मिलेगा?

वृद्धि तो होनी ही है परन्तु विघ्न भी जरुर पडने हैं। सत्संग माना जहाँ विकारों से झगड़ा चले। इसमें इस ज्ञान का दोष ही क्या है ? और सत्संगों में तो लड़ाई सिखाते नहीं हैं। यहाँ सिखाने वाले सिखाते हैं और जीतने वाले जीतने के लिए युद्ध करते हैं। तो यहाँ तो झगड़ा ही सौभाग्य है। सहनशील तो बनना है। भल पुरानी दुनिया इन आंखों से देखते रहो। नई नहीं देखते हो परन्तु वह होकर ही रहेगी और यह विनाश हो ही जायेगी। इसलिए उस संसार के लिए सब कुछ करना है। अच्छा । ओम् शान्ति ।

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21.09.62: हमारी बातों का आधार कोई वेद-शास्त्र नहीं, स्वयं जानी-जाननहार बीजरुप परमात्मा है

इस समय सभी इंसान अन्धेरे में हैं। भगवान ही कहते हैं – सबका उद्धार करने मैं आता हूँ। साधू-सन्त सबका उद्धार करने वाला एक ही है। सबकी गति और सद्गति कब और कैसे आकर करते हैं – यह अब हमारी बुद्धि में है जो हम उनके द्वारा जानते हैं। यह भी जानते हैं कि गति, सद्गति अलग-अलग हैं। जब पार्ट में नहीं हैं तो उनको मुक्ति अथवा गति कहते हैं। ऐसे हो नहीं सकता कि पार्ट में आयें ही नहीं। फिर तो खेल की बात ही नहीं रही। कई तो ऐसे मानते हैं। परन्तु ऐसे हुआ नहीं है। धर्म स्थापन करने वालों को भी फिर पालना करनी है। अगर वे न होते तो उन्हों के धर्म ही न होते ।

अब सबकी कयामत होगी। यह भी पहले ज्ञान चाहिए कि मनुष्य के लिए प्राप्ति क्या है ? वह भी परमात्मा जानी-जाननहार बतलाते हैं कि अब हम उसी धाम में जाते हैं, जो फिर इस कलियुग में लौटते नहीं। बाकी ऐसे नहीं कि ज्योति में जाकर लीन होते हैं, फिर लौटते नहीं। यह संगम की बात है कि इस समय जो मेरे धाम में चलने का पुरुषार्थ करेंगे वह इस दुनिया में नहीं लौटेंगे। अब हम यह पुरुषार्थ कर रहे हैं कि फिर इस तमोप्रधान कलियुगी दुनिया में न लौटें । ऐसे नहीं, कारपोरियल दुनिया नहीं होगी। दुनिया तो रहती है परन्तु तमोप्रधान दुनिया नहीं होगी। तो हमारा इस अन्तिम जन्म में यही पुरुषार्थ है कि इस दुनिया में फिर जन्म न लें, जन्म लें तो नई दुनिया में लें। अब यह बुद्धि में नॉलेज है कि मनुष्य के लिए वास्तविकता क्या है?

परमात्मा संगम पर आकर यह नॉलेज दे रहा है। इस संगम को कोई जानते नहीं, इसलिए मूंझते हैं। परमात्मा ने कहाँ से बात की कलियुग से या सतयुग से? यह नहीं जानते हैं। इसलिए वही आकर बतलाते हैं कि मैंने संगम पर आकर बात की है ताकि फिर से तमोप्रधान दुनिया में नहीं लौटें। अब हमारे लिए यह सब बातें प्रैक्टिकल हैं। बाबा भी प्रैक्टिकल कहते हैं कि बच्चे, अब मेरे धाम चलेंगे तो इस दुनिया में लौटेंगे नहीं। लोग यह भी नहीं जानते कि यही दुनिया सतोप्रधान थी, अब यही दुनिया तमोप्रधान है। न जानने के कारण कहते हैं – दुनिया में आना ही नहीं है। अब जिस धाम जाना है उस धाम जैसा बनना है। इसलिए वह तैयारी कर रहे हैं। इस दुनिया के संस्कार मिटा रहे हैं। अब हम नहीं कह सकते कि हम अंधकार में हैं। अपने पास रोशनी है। कहाँ से आये हैं, क्या करना है, किसको जीतना है, कैसे जीत पानी है – सब रोशनी है। ऊंचे ते ऊंचे बाप का आधार है। बाकी वेद-शास्त्रों का आधार नहीं है। क्योंकि सबको जानने वाला जानी-जाननहार मिल गया तो फिर आधार किसका ? पूछते हैं ना कि किसके आधार से बोलते हो ? जानी-जाननहार के आधार से । फिर विवेक वा अनुभव में आया हुआ है। मानो न मानो, यह सब सच्ची बातें हैं। जो सृष्टि का बीजरुप निराकार परमात्मा है उसके आधार से बोलते हैं। जिसके पास मनुष्य सृष्टि की नालेज है, वही आकर प्युरीफाइ बनाते हैं। अब सब बातें अपनी बुद्धि में हैं। फिर कोई माने तो जीवन्मुक्त, न माने तो मौत भी सामने है।

अब कोई मुंझने की बात नहीं है। हाँ, कोई बंधन आते हैं तो फिर चिल्लाते हैं। परन्तु यह भी जानते हैं कि अपने कर्मों से बंधन हैं। उसको काटना कैसे है ? यह भी समझकर चलना है। ‘बंधन-बंधन’ कहते तो अनेक जन्म बिताये। शक्तियों का बल दिखाया है. तो बंधन काटे थे ना। असुरों का विनाश किया था। असुर कोई ऐसे मनुष्य नहीं होते । भंयकर यह विकार भूत हैं जो दुःखी करते हैं। दुःख का रुप ऐसे दे दिया है- एक तरफ देवी कहना, दूसरे तरफ इतना भंयकर बनाना। फिर असुरों को भंयकर बनाया है। यह है गुड़ियों का खेल। गुड़ियां बनाकर क्या खेल रच रहे हैं? बाप आकर बतलाते हैं। बाप को तो कहने का हक है कि बच्चे क्या कर रहे हैं ? अब नवरात्रि में देवियों के चित्र बहुत बनाते हैं। रचता भी बनते, पालना भी करते और फिर डुबो भी देते है। खर्चे बहुत करते हैं। इसका नतीजा क्या है? कहते हैं – परम्परा से चला आता है। तो इन बातों को सुधारना है। कोटों में कोई आकर सुधरते हैं। बाकी सबका विनाश हो जाता है। यह सारा ड्रामा का कैसा हिसाब-किताब बना हुआ है – इसको हम जानते हैं। यह कॉमन सत्संग नहीं है, स्कूल है। स्कूल में हर एक स्टूडेन्ट का परिचय रहता कि कहाँ तक पढ़ता और पढ़ाता है, कहाँ तक बुद्धि में धारणा है ? सब रेख-देख रखनी पड़ती है।

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25.09.62: बाप की आज्ञा है – अपवित्रता के खाते को समाप्त कर पवित्र बनो और बनाओ

ओम् शान्ति । भक्त भगवान की शुक्रिया गाते हैं। परन्तु शुक्रिया कहने की तो बात ही नहीं है। हमको तो अब भगवान बाप प्रैक्टिकल में मिला है, उनकी हम सन्तान बने हैं। तो वर्सा पाने का यत्न (पुरुषार्थ) करना है। हमको जो उनका फरमान और आज्ञा है, उस पर कदम-कदम चलना है। जैसे सपूत बच्चे बाप की आज्ञा का पालन करते हैं। आज्ञा भी कौनसी है ? पवित्र रहकर पवित्र बनाओ। पवित्रता को भी हम जानते हैं कि पवित्रता कितने तक है ? जैसे अपवित्रता हमको गहराई में ले गई है जिससे कर्म का खाता भी ऐसे ही बन गया है। अब फिर उस अपवित्रता के खाते को काटना है। पांच विकार जो कर्मों में चले गये हैं उनको निकालना है। विकारों को सिर्फ छोड़ना नहीं है, परन्तु उनसे जो खाता बन चुका है उनको भी साफ करना है। विकारों ने सारा अपना बना लिया है। विकारों का राज्य है। उसको पलटाना है। सिर्फ ब्रह्मचर्य का पालन करना- यह कोई बड़ी बात नहीं । परन्तु उन विकारों से जो खाता बना है उनको खत्म करना है। सन्यासी भल छोडकर गये लेकिन पिछला विकर्मों का खाता उनको छोडता नहीं । भल जो करते हैं उनका उजूरा मिलता है- जो जन्म लेकर फिर भी सन्यासियों के संग में चले जाते हैं। परन्तु नाते को काटते नहीं हैं। वह तो फिर भी विकारियों के पास जन्म लेते रहते हैं।

परन्तु अब तो हम बाप द्वारा कर्मों की गति को जानते हैं। हमको डबल काम करना है। भविष्य का भी ऐसा खाता बनाना है जो पिछले कर्म का कुछ रहे नहीं। एक तरफ बनाना भी है और फिर पिछले बने हुए को भी साफ भी करना है। हमारी प्रालब्ध इसीलिए ऊंची है। इसलिए इस पुरुषार्थ में समय लगता है। परन्तु सर्व समर्थ बाप मिला है तो सब सहज कर देता है। बाप कहते हैं कि मेरी याद में रहो। याद से भी बल मिलता है, पवित्रता से भी बल मिलता है। फिर जो कुछ मिलता है वह दान भी करना है। तो दान से भी बल मिलता है। इस प्रकार बल को जमा करना है। और फिर जितना हम प्रैक्टिकल में इन सब बातों को लायेंगे तो यह हुई उनकी शुक्रिया। बाकी महिमा की तो कोई बात नहीं है। महिमा भी कर्त्तव्य के ऊपर है। उसने ऐसा ऊंचा पार्ट बजाया है। वह अपना कर्त्तव्य करते हुए बाप, बाप है। ऐसे नहीं कि हम भी वह कर्तव्य करते हैं तो हम भी बाप हो गये। नहीं। भल अपने कर्म से हम ऊंचे बनते हैं। बाकी मनुष्य तो इन बातों में मूंझे हैं। उनके गुण और कर्त्तव्य को ही मिला दिया है। ऐसे नहीं कि वह कब बिगड़ता है और फिर बनता है। लेकिन हम ही बिगड़ते और बनते हैं। वह तो सदा बना हुआ है। उनके बिगड़ने की क्या बात है ? अब इन बातों में मूंझना नहीं है।

माया के कभी विघ्न आते हैं – यह भी पिछला खाता है। उसे या तो चुक्त करना है या तो सहज ज्ञान-बल से काटना है। इसके लिए तो हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। जब तक यह शरीर है. इस शरीर का होना माना हिसाब-किताब है। फिर यह शरीर नहीं रहेगा। हम कर्म की गति को बहुत विस्तार से जानते हैं कि किस कर्म से अकर्म और विकर्म बनता है। यह हमारा दैवी ब्राह्मणपन का संबंध है। वह हमारा पिछले खाते का संबंध है। ब्राह्मणों का महत्व भी कर्म के ऊपर है कि ऐसे कर्म करने हैं और ऐसी धारणा रखने से पुरुषार्थ अच्छा होता है। यह भी ख्याल रखना है कि वही धर्मराज है जिसके पास सारे हिसाब-किताब का खाता है। अच्छे कर्म कराकर ऊंची प्रालब्ध बनाना उनका काम है। अच्छे का अच्छा फल देने वाला – चाहे अल्पकाल के लिए, चाहे सदाकाल के लिए – देने वाला वह हो गया। वह चैतन्य रुप में अब उपस्थित है। अभी पिछला खाता माइनस और भविष्य का खाता प्लस हो सकता है। अब कुछ रियायत हो सकती है। लेकिन बाप की हैसियत में भी तो सपूत बनकर अपना फर्ज पालन करना है। अब हम जो भी मन-वचन-कर्म से कदम उठा रहे हैं, तो हम जानते हैं इस कर्म से क्या होगा और उससे क्या होगा ? विस्तार सहित बाप ने हिसाब-किताब बताया है। 5 विकार भी क्या है ? पहला-पहला विकार है देह-अभिमान । वही सर्व शत्रुओं का हेड है। इसलिए कहते हैं देही-अभिमानी होने से और शत्रु नहीं आयेंगे। देही-अभिमानी में विकार हैं नहीं। फिर स्मृति रहेगी कि हम उनकी सन्तान हैं, तो विकार नहीं आयेंगे । शुद्ध अहंकार रहेगा। मनुष्य तो सिर्फ कहते हैं- जैसा कर्म वैसा फल । लेकिन करते नहीं हैं। अब शरीर को कुछ होता है तो हम जानते हैं कि यह देह-अभिमान-वश है। तो हम फिर बॉडी-कॉन्सेस में आकर ऐसे न करें।

हमारी बुद्धि में है कि यह ड्रामा है। भले गाली देते हैं लेकिन उनका भी यह गाली देने का पार्ट है। हमको फिर उन्हें सही रास्ते पर लाने का पुरुषार्थ करना है। कोई उपद्रव आता है तो भी हम जानते हैं कि यह उपद्रव आना ही है। इसमें ‘हाय-हाय !’ में आवें, दुःख में आवें- तो विकर्म हो जायेगा। इसलिए हम सदा खुश और सदा हर्षित रहते हैं। तो ऐसी धारणा को बुद्धि में रखना है। यह है कर्म की गति का ज्ञान । एक बात को उठाने से सब बातें आ जाती हैं। किसी व्यक्ति में मोह है तो वह भी पिछले कर्मबन्धन का खाता हो गया । बाप द्वारा कर्मों की गति को जान कर अभी सम्भलते रहना है। अच्छा ।

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28.09.62: ज्ञान की रोशनी मिली है तो दिन-रात अवस्था का मीटर चढ़ता रहे

कहा जाता है- हथ कार डे, दिल यार डे। परमात्मा को यार भी कहते है यार अथवा खुदा-दोस्त । इस पर एक कहानी है कि खुदा-दोस्त पुल पर बैठा था। जो उनके पास पहले आएगा उनको बादशाही देगा। पुल होती है एक तरफ़ से दूसरे तरफ़ क्रॉस करने की। तो हम भी संगम पर खड़े हैं। पुरानी दुनिया से पार हो नयी दुनिया में जाएंगे। अब चक्र लगाए पूरा किया है। अब हम सबका, बल्कि सारी दुनिया का यह अन्तिम जन्म है। हमें यहाँ से कनेक्शन करना है नई दुनिया में। अब नई दुनिया का कलम लगता है। जहाँ कलम लगता है वहाँ फिर प्रलय की बात नहीं। यह मनुष्य सृष्टि-वृक्ष का कलम लगने वाला है जिसका फाउन्डेशन परमात्मा आकर लगाते हैं। बड़े-बड़े मनुष्यों से कोई जगह आदि का फाउन्डेशन डलवाते हैं। लेकिन परमात्मा तो आकर नई दुनिया का फाउन्डेशन लगाते हैं और हम प्रैक्टिकल में उस पार्ट में चल रहे हैं।

हम जानते हैं कि अर्जुन के रथ में भगवान सवारी कर आया है इस युद्ध के मैदान पर और युद्ध करने का तरीका सिखला रहे हैं। धर्म स्थापन करने की बात में पवित्र बनने और विकारों को काटने की बात है। कितने मनुष्य तो स्वर्ग के सुख को भी कम समझते हैं। समझते हैं – “वह सुख भोग कर भी तो नीचे उतरना है। इसलिए ऐसा पुरुषार्थ करें ही क्यों ?” लेकिन हमारी तो चढ़ती कला है। अब तो सुख के दिन देखने हैं। जब नया मकान बनाया जाता है तो पुराना होने के लिए थोड़ेही सोचा जाता है। खुशी तो होती है ना कि हम नया मकान बनायेंगे, उसमें बच्चे होंगे, फिर पोत्रे होंगे, आदि-आदि ! लेकिन ऐसा थोडे ही सोचते हैं कि यह मकान तो फिर खत्म होना है। फिर यह सब ख्याल क्यों करें ? इस अल्पकाल के सुख को समझते भी हैं कि जो चीज़ आज है वह कल नहीं रहेगी। लेकिन फिर भी उनके लिए सोच नहीं करते हैं। यह बात और ही लम्बी है। यह तो जन्म-जन्मान्तर की प्राप्ति है। इसमें तो गैरन्टी है और स्वयं देने वाला भी ऐसा है जो कभी धोखा भी नहीं देगा। इस सुख की टेस्ट ही निराली है।

कई फिर कहते हैं – “आत्मा को उस परमात्मा में लीन होना है। बस, आनन्द उसमें है।” लेकिन हम तो जानते हैं कि आत्मा कब परमात्मा में लीन हो नहीं सकती। लीन हो जाने का भी अगर किसने अनुभव पाया हो तो वह चिह्न मिलना चाहिए। वह वहाँ से आकर बतावे कि ऐसा हमने सुख पाया है। लेकिन लीन ही हो गया तो फिर बतावे कौन ? देवताओं के तो चिह्न मिलते हैं। उन्हों के यादगार हैं, हिस्ट्री है। सबको दुःख के बंधन से छुड़ाना, प्योरीफाइड धाम में ले जाना – यह परमात्मा का काम है। बुद्ध, क्राईस्ट आदि सबकी आत्मायें इस समय बंधन में हैं। सबका मुक्ति-जीवन्मुक्ति दाता वह है।

अब हम सबकी मत एक है। हुसैन एक है। उसमें ही बुद्धि जाती है। वहाँ तो सत्संग में जाओ तो किसकी बुद्धि किसमें, तो किसकी बुद्धि किसमें होगी। खुद गुरु भी छुट्टी देंगे कि किसको भी याद करो । लेकिन हम तो ‘जो है, जैसा है,’ – उसी तरफ़ बुद्धि को स्थित रखते हैं। हमारे इस संगठन में बहुत ताकत है। भल दुनिया में बहुतों की महिमा होती है लेकिन उनकी महिमा विकारी मनुष्य ही करते हैं। और हम जब बैकुण्ठ में हैं तो स्वयं महिमा सम्पन्न है ही। साधू-सन्यासियों की विकारी मनुष्य महिमा करते हैं। फिर वह जिन्हों से महिमा पाते हैं उनके पास ही जन्म लेते हैं। आप तो कोई विकारियों से महिमा नहीं पाते, न विकारियों से सम्बन्ध ही रखते। हमारी बात ही अलग है। हम तो विकारी को निर्विकारी बनाए ले चल रहे हैं। तो हमको कितना फखुर होना चाहिए ! इसमें अशुद्ध नशा या अहंकार की बात नहीं। अशुद्ध नशा भी क्यों हो ? अशुद्ध वालों से जब महिमा मिलती है तो अशुद्ध अहंकार बैठ जाता है। लेकिन हमारी तो किसी से भेंट ही नहीं है। वहाँ तो है ही शुद्ध प्रजा और सम्बन्ध ही बाप-बेटे का रहता है। तो बाप-बेटे में थोड़ेही अहंकार रहेगा। घर में भी बाप-बच्चे होते हैं, सब बाप तो नहीं होते। वहाँ भी राजा-प्रजा होते हैं। परन्तु प्रजा को भी सब प्राप्ति रहती है। तो हमको प्रालब्ध वहाँ लेना है। इस ज्ञान को भी जैसा है वैसा समझना है।बाप ने हर एक चीज की रोशनी दी है। तो इसमें रात-दिन अवस्था का मीटर चढ़ा रहना चाहिए। हम कौन हैं किसकी सन्तान हैं। वो नशा रहना चाहिए। कहते हैं ना खुशी जैसी खुराक नहीं। हमें अब मौत का भी डर नहीं। सदैव हर्षित रहना है। -हर्षित-चित होंगे तो हर्षित-मुख भी रहेंगे। अभी हम हैं बेफिक्र बादशाह । सच्ची खुशी तो अब है। वहाँ तो प्रालब्ध में होंगे। अच्छा।

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08.10.62: बाप से पूरा हक लेने के लिए आज्ञाकारी, सपूत बनो

परमात्मा को साजन भी कहते हैं। वह सारा हाल बैठ बताते हैं कि हे आत्मायें, तुम कैसे मेरे से बिछुड़ी, फिर तुम कैसे आकर मिली हो, फिर मिलकर क्या प्राप्ति होगी। तो वह खुद अपना परिचय दे रहा है। ऐसे नहीं कि अब भक्तिमार्ग की तरह कोई अपनी भावना अनुसार मिलेगा। लेकिन कहते हैं कि मेरा जो कुछ है सब बच्चों को ही देता हूँ।

हमारी पहले यह भावना थोड़ेही थी कि हम परमात्मा के होकर के उनके वर्से के हकदार बनें। लेकिन भक्ति-मार्ग में तो हम किसको भी परमात्मा का रुप बनाकर पूजते हैं, तो भावना का रिटर्न मिलता था । यह पता नहीं था कि हम ऐसे वारिस बन जायेंगे । भल भक्ति-मार्ग में कहते थे कि सब तू ही है, लेकिन यह दिमाग में नहीं था कि मैं ऐसा ऊंच भी बन सकता हूँ, ऐसी भी कोई प्राप्ति होती है। अब यथार्थ दिमाग में आया है कि हम ऐसा क्यों न बनें। तो वह खुद कहता है कि मेरे को जानकर मेरे पर दांव लगाओ, मेरे हो जाओ। जैसे बच्चा गोद का हो जाता है लौकिक में, तो बच्चे का हक लग जाता है। लेकिन इसमें तो बच्चा बनकर फिर भी पुरुषार्थ है। धारणा कर लायक बनना है। बच्चे बनने के बाद भी फिर बच्चा आज्ञाकारी, सपूत, फरमानबरदार हो। उस लौकिक में तो कैसा भी बच्चा हो- हक ले लेगा। लेकिन यहाँ तो बच्चा बनकर भी फिर उनके फरमान पर पूरा चलेंगे तो पूरी-पूरी मार्क्स मिलेगी। कहते हैं- सब तुम्हारे लिए है। उस बाप को तो कुछ अपनी लालसा रहती है लेकिन यहाँ तो जो करेगा सो पायेगा।

अभी के पुरुषार्थ से सब पदार्थ जन्म-जन्मान्तर के लिए मिल जायेंगे । मृत्यु होते भी जन्म-जन्मान्तर हमारा सुख लगातार चलता रहेगा। इसलिए वहाँ हमारा मरना, मरना नहीं है। यहाँ तो अकाले मृत्यु होती है। बाबा कहते हैं – पदार्थ हैं तो उनका सुख भी प्रैक्टिकल में चाहिए। मनुष्यों के पास धन है तो भी दुःख है। तो फिर कह देते हैं कि इच्छा ही न हो क्योंकि देखते हैं कि इच्छा ही खराब चीज है। तो फिर हठ से इच्छाओं को मारने की कोशिश करते हैं। लेकिन इसमें हठ आदि की बात ही नहीं है। अब मनुष्यों के पास सुख रहता ही नहीं है, तब कहते हैं कि संसार काग विष्टा के समान है। यह संसार बना ही नहीं है। लेकिन अपने पास नॉलेज है कि सम्पत्ति ही सुख देने वाली है। लेकिन सम्पत्ति भी पवित्र हो । पवित्र शरीर, पवित्र संसार हो । हमारे पास पवित्रता का वह बल चाहिए जिससे हर चीज पवित्र हो जाए। इस विकारी दुनिया की पवित्रता में कोई बल नहीं है, इसमें विकारी खाता मिक्स है। पवित्र, तो जन्म और मरण में भी पवित्र हो । पवित्रता की डिग्री वह जिसमें सब पवित्र हो । इस पुरानी दुनिया की पवित्रता में कोई सार नहीं है- न इसके मर्तबे में, न इसके धन में. । सब तमोप्रधान हैं।

अभी हमको अपना देश, अपना वतन बुद्धि में घूमता है। भल आंखों से यह दुनिया देखते हैं लेकिन इनसे बहुत दूर हैं। अब आंखों में गति और सद्गति वाली दुनिया घूमती है। दुर्गति की दुनिया से किनारा कर बुद्धि उसमें लगा दी है। ऐसे न समझो कि यह कल्पना है, आंखों से नहीं देखते हैं। लेकिन इसमें संशय नहीं होना चाहिए। जब होगा तब तो प्रैक्टिकल हो ही जायेगा। यह बतलाने वाला कोई मनुष्य या कोई ठगने वाला थोड़ेही है जिसमें कुछ नीचे-ऊपर हो। हमारा गुरु निराकार है – यह कब भूलो मत। जब भूलते हैं तब छोटे-छोटे संश य आते हैं । अगर इन आंखों से देखने की चीज हो फिर तो कोटों में कोई क्यों हो, सब जान जायें। यही गुंजाइस है, इसमें भूलो मत । जो कुछ होना है वह तो होना ही है। बनाने का समय अब है। अब इतना समय नहीं है जो कोई मर जाए फिर दसरे जन्म में आकर यह ज्ञान लेवे । छोटा बच्चा तो ज्ञान ले नहीं सकता । इसलिए ही कहते हैं कि यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। ऐसे भी नहीं कि कोई अब मरे तो जन्म नहीं लेगा। लेकिन पढाई का समय यह है। बाप कहते हैं- मैं वृद्ध तन में आता हूँ । उसके ही अनेक जन्मों की कहानी सुनाई है। अगर ड्रामा के राज़ को समझें तो सब बातें बुद्धि में आ जाएं।

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14.10.62: सबको माया के बंधनों से मुक्त करना – यह परमात्मा का ही निराला पार्ट है

गीत- आखिर वह दिन आया आज ।

ओम् शान्ति । बेहद के बाप ने अब अपनी बुद्धि को बेहद में अथवा बेहद की नालेज में फैला दिया है क्योंकि अपनी बुद्धि अब बेहद में स्थित है। भल हम देखते शरीरों की तरफ हैं लेकिन इस शरीर में देखते हैं आत्मा को, जो आत्मा फिर उस बेहद बाप की सन्तान है। तो हमारी बुद्धि में धारणा क्या रही ? सुनने वाली, देखने वाली आत्मा है। इसको कहा जाता है सोल-कॉन्सेस । हमारी बुद्धि में है कि हम आत्मा इन कानों के आधार से सुनती हैं और आत्मा जो सुनाती है, वह परम-आत्मा से जो सुना है वही सुनाती है। बुद्धि में याद है कि हम परम-आत्मा की सन्तान हैं। तो यह एक ही सत्संग वा स्कूल है जिसमें हम सुनने और सुनाने के समय परमात्मा को ही याद करते हैं। बाकी जो भी हैं वह शास्त्रों को या शास्त्र सुनाने वालों को याद करते हैं। परन्तु हमारी बुद्धि बेहद के बाप में रहती है क्योंकि हमको सुनाने वाला वही है। फिर चाहे किसी द्वारा सुनें, चाहे वह सुनावे ।

हमको पढ़ाने वाला स्वयं गॉड है जो नॉलेजफुल है । इस नॉलेज को पढ़ा भी वही सकता है जो इस चक्र के आदि-मध्य-अन्त को जानता है। नॉलेजफुल वही है और हम भी मास्टर नॉलेजफल हैं। हम उनका सुनकर सुनाते हैं। वही जागती ज्योत है जो कब बुझता नहीं है। गति-सद्गति-दाता, पतित को पावन करने वाला – यह महिमा उनकी है। बाबा के गुण वा शिफ्तें कोई मनुष्य अपने ऊपर रखा नहीं सकते। यह महिमा एक की है, लेकिन यह महिमा मनुष्य अपने पर ले आये हैं। इसलिए अब कहते हैं कि हम, तुम, सब में परमात्मा है। लेकिन परमात्मा की शिफतें ही अलग हैं और मनुष्य की शिफ्तें भी अलग हैं। फिर मनुष्य के कर्तव्य भी भिन्न-भिन्न हैं, एक न मिले दूसरे से। सब धर्म-स्थापकों का भी पार्ट अलग-अलग है। सबकी रस्म-रिवाज अलग-अलग है। मैसेन्जर्स तो सब कहते हैं लेकिन सबका मैसेज एक नहीं हो सकता है।

जैसे हम आत्मायें पार्ट बजाने आती हैं, वैसे परमात्मा भी इस स्टेज पर एक बार पार्ट बजाने आता है। गॉड को मुफ्त में ऊंचे ते ऊंचा नहीं कहा जाता लेकिन उसने एक्ट की है। सर्व आत्माओं को वापस ले जाना, गति-सद्गति करना, नई दुनिया को क्रियेट करना – यह उनका स्पेशल कार्य है। जैसे हम आत्मायें यदि ऊंचे कर्म करती हैं तो बाप के पास भी ऊंची हैं और कारपोरियल दुनिया में भी इतना ऊंचा बनते हैं। जैसे गांधी की भी कर्तव्य पर महिमा चलती है। परमात्मा ने भी जबरदस्त पार्ट बजाया है जिसमें सबका संबंध आ जाता है। सभी आत्माओं को भेजने वाला और फिर वापस ले जाने वाला वही है। माया के बंधनों से छुड़ाने वाला लिबरेटर – यह काम कोई मनुष्य नहीं कर सकता।

इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक जी आदि सबको धर्म के बंधन में जरुर आना है। नहीं तो, वृद्धि कैसे हो ? परमात्मा आता है हमको बंधन-मुक्त करने । तो उनका पार्ट निराला हो गया। हम जाते हैं तो फिर वापस भी आते हैं। सबके आने का टाइम अपना-अपना है जिससे फिर वृद्धि होती रहती है। तो क्या वृद्धि ही होती जायेगी या कभी एन्ड भी होगी ? एन्ड करने वाला तो वही परमात्मा है जिसका हर एक आत्मा के साथ संबंध है। वही आकर माया के बंधन से छुड़ाते हैं। एक तो है यह ज्ञान-योग की तरकीब, दूसरी हैं सजायें। सजाओं से पूर्ण जीवन्मुक्ति का सुख नहीं पायेंगे। सबको माया से बंधनमुक्त तो करते ही हैं. फिर सबको वर्सा वा प्रापर्टी भी देते हैं। सबसे श्रेष्ठ पार्ट वह है जिसमें सदा सुख है । जो स्पेशल चीज बाप से मिलती है, जो एक ही तरीके से मिलती है। बाकी ऐसे नहीं कि अनेक योगी, अनेक ज्ञानी हैं। योग उनको नहीं कहेंगे जो टांगे-बांहे उठाकर योग करें। योग करके जिस्म को बीमारियों से सफा देते हैं। वह तो और बात है। लेकिन रुहानी सफा देने वाला एक है। उनका रास्ता भी एक है। भल किसकी भावना पूर्ण करने के लिए कोई का भी साक्षात्कार करा देते हैं।

लेकिन बाप जो है, जैसा है – उसे ओरीजनल समझना है। तो यथार्थ जानने से यथार्थ रिजल्ट पायेंगे । हम योग और ज्ञान उनसे ही सीख रहे हैं और उनको जानना भी जरुरी है। यह है सारा रचता और रचना का ज्ञान जो नटशेल में बुद्धि में रहना चाहिए, जिसको स्वदर्शन-चक्र कहा जाता है, जो चलता ही रहे। यह स्वदर्शन-चक्र चलता रहेगा तो विकारों के सिर कटते रहेंगे। बात तो इतनी है लेकिन विस्तार बहुत है। परन्तु सार बुद्धि में बिठाने के लिए विस्तार समझाना पड़े । जब तक यह पढ़ाई है तो पढ़ते रहना है। फिर यह कोर्स पूरा हो जायेगा। जहाँ जी, वहाँ पी। बाप आकर टाइम ही ऐसा लेते हैं। छोटे बच्चे को भी कहेंगे – जहाँ जी, तहाँ पी। क्योंकि इस समय बड़े-छोटे सब एक जैसे हैं।

अब तो दुनिया की एन्ड है। अगर कोई की बुद्धि में आ जाए कि अब एन्ड है और आदि क्या होने वाली है – तो कितना तकदीरवान बन जाए ! अब दुनिया की आयरन एज है। आयरन एज के बाद फिर मृत्यु होगी । मृत्यु माना ही डिस्ट्रक्शन । फिर मृत्यु के बाद नये होंगे। अब इस दुनिया में अकाले मृत्यु होती है । इसलिए छोटा बच्चा भी मर जाता है। ईश्वरीय कानून है बाल-युवा-वृद्ध होना है। परन्तु अभी सब डिस-आर्डर में चल रहे हैं। तो इस स्कूल में यह सब पढ़ाइयां हैं। इससे हमारे कर्मों में बल आता है जिससे हम कर्मक्षेत्र पर डबल क्राउन बनते हैं। लाइट और रत्न-जड़ित दोनों पॉवर आती हैं। वह पॉवर बाप दे रहे हैं जो आत्मा धारण कर रही है। फिर आत्मा आकर शरीर के साथ सुख पाती है। अब बाप से विल ले रहे हैं। जो जितना स्त्रीचुअल फादर से संबंध जोड़ेंगे उतना विल-पॉवर मिलेगी। जब बुद्धि में यह बातें हों तब बेहद की खुशी रहे । इनसे ऊंची पढ़ाई और कोई नहीं ।

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15.10.62: अहिंसक बनना है तो पांच विकारों को जीतो, स्व पर और कर्म पर राज्य करो

ओम् शान्ति । अभी हम सबकी बुद्धि परमात्मा की तरफ है। उनको ही दिल में बसाना है। परन्तु बसाने का अर्थ यह नहीं है कि परमात्मा सर्वव्यापी है। लेकिन परमात्मा ने समझाया है कि “जहाँ माया 5 विकार हैं, जहाँ दुःख-अशान्ति है – ऐसे अपवित्र स्थान पर मैं कैसे बैठूंगा ? मेरे बैठने की जगह तो स्वच्छ चाहिए। मैं तो अपने ठांव (घर) वाला हूँ।“ गुरुनानक ने भी महिमा की है कि तेरा ऊंचा ठांव है। ऐसे नहीं कि मैं सर्वव्यापी हूँ, मेरा कोई नीचे ठांव है। लेकिन मेरा नाम ही शिव है, मैं अपने नाम, ठांव और कर्तव्य वाला हूँ। अगर परमात्मा की बैठक सबके पास हो, तो उनका रुप ही बदल जाए। इसलिए परमात्मा को फरटाइल रुप समझ लिया है। जैसे यह आकाश है। अन्दर बाहर फरटाइल आकाश है। लेकिन परमात्मा कोई ऐसी चीज थोड़ेही है।

कई कहते हैं कि परमात्मा अखण्ड ज्योति तत्व है। लेकिन परमात्मा कोई यह तत्व नहीं है। परमात्मा तो ज्योति-स्वरुप आकार वाला है, उसमें ही चैतन्यता है। बाकी फरटाइल लाइट में कोई चैतन्यता नहीं है। जैसे यह आकाश तत्व जड़ है ना। इसमें हम जब आत्मायें शरीर के साथ हैं, तब यहाँ रह सकती हैं। परन्तु आत्मा जब शरीर बिगर है, तो उनको रहने का स्थान भी ऐसा चाहिए, जो हुआ छठा तत्व । तो रहने का स्थान और रहने वाला अलग-अलग हैं। हम और यह आकाश एक ही थोड़ेही कहेंगे। भगवान कहते हैं कि मेरा भी रुप है। जैसे हम अब बोलते हैं तो उस बोलने का भी रुप है। जैसे तरंगे बनती हैं, तो उनको फिर औजारों के जरिये कैच करते हैं। वैसे तो आवाज बहुत हो रहे हैं लेकिन किसके पर्टीकुलर आवाज को पकड़ते हैं। सूक्ष्म इन्स्ट्रुमेंट होता है जो उसको पकड़ता है। तो परमात्मा को भी दिव्य-दृष्टि वा दिव्य-नेत्र से देख सकते हैं।

परमात्मा ने तीन रुपों (ब्रह्मा, विष्णु, शंकर) द्वारा स्थापना, विनाश और पालना कराई है। बाकी यह कोई 3 सिर नहीं हैं। त्रिमूर्ति भी निराकार परमात्मा को कहा जाता है। लेकिन निराकार को 3 सिर कैसे देंगे ? इसलिए ब्रह्मा को 3 सिर दे दिये हैं । देवतायें भी दो आंख, दो भुजा वाले होते हैं। और कोई चेंज आदि नहीं होती है। बाकी कोई लूले-लंगड़े होते हैं, वह तो है कर्मों की बात। भगवान ने भी अहिंसा की युक्ति सिखलाई है। अहिंसा माना 5 विकारों को जीतना है। हम विकारों के वश हैं तो जैसे हमारी रोज हिंसा हो रही है। पाप होने से आत्मा के घातक बनते हैं। इसको ही जीव-हिंसा कहेंगे । इसलिए परमात्मा ने कहा कि यह शत्रु तुम्हारी हिंसा कर रहे हैं, इन्हों को जीतो तो अहिंसक बनोगे । फिर स्व का राज्य मिलेगा। सेल्फ के ऊपर, कर्म के ऊपर अपना राज्य चाहिए। तो बाप कहते हैं – मैं ऐसा कॉलेज खोलता हूँ जिसमें यह लक्ष्मी-नारायण, सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजधानी तैयार हो रही है। लक्ष्मी-नारायण भी अपनी राजधानी सहित ऊंचा पद प्राप्त करने यहाँ पढ़ रहे हैं। इस रीति क्राइस्ट आदि भी यहाँ ही अपना पार्ट बजा रहे हैं। हम तो सब धर्म वालों से मिलते हैं। उन्हों के कॉन्टेक्ट में आते हैं। हमारा धन्धा ही यह है। यह धन्धा सबसे श्रेष्ठ है। इससे कर्म श्रेष्ठ बनते हैं। कर्म जो हमारा सामना करते हैं, क्यों न उन पर जीत पायें। कर्म से स्वतन्त्र होना या जीत पाना एक ही बात है। तो अब मुख्य चीज यह है।

परमात्मा आते हैं पुरानी से नई दुनिया बनाने। भगवान के कर्तव्य करने-कराने में नई-नवाई है। नॉलेजफुल ज्ञान का सागर वह है। भगवान ने ही आकर गीता सुनाई है। अगर पहले से ही वह काम हो रहा होता तो भगवान को आने की क्या जरुरत है ? जरुर कुछ उल्टे काम हो रहे हैं, तब कहा है कि “इन साधुओं आदि का भी उद्धार करने मैं आता हूँ, मेरा जन्म दिव्य अलौकिक है। मैं क्या हूँ, कृष्ण क्या है ? गीता में गॉड के बदले कृष्ण का नाम होने के कारण गीता भी हद में आ गई है।“ बाइबल में क्राइस्ट के वर्शन्स हैं। वह गॉड नहीं था लेकिन सन आफ गॉड था। परन्तु गीता में तो परमात्मा के वर्शन्स हैं। कुरान आदि में भी गॉड के वर्शन्स नहीं हैं। भगवान के जो वर्शन्स हैं वह तो सब धर्म वालों को मानने चाहिएं। गॉड है ही एक परन्तु यह जानते नहीं हैं। बाप कहते हैं – “मनुष्यों ने सब उल्ट-पुल्ट कर दिया है। संसार को ही झूठा बना दिया है।“ गीता-पाठी भल गीता आदि सुनाते हैं, फल आदि रखते हैं और पित्रों को पानी देते हैं लेकिन भगवान ने जो ओरीजनल सुनाया था वह तो उनके द्वारा ही अब सुन रहे हैं।

बाप कहते हैं कि “अब स्वर्ग आने वाला है। इसलिए चलने की तैयारी करो ।” अब धन्धे-धोरी, देश आदि सब नष्ट होने वाले हैं, तब बाप बच्चों को कहते हैं कि “अब बहुत खराब हालतें आनी हैं, बेहतर है कि जितनी पूंजी है सफल कर लो।” ऐसे नहीं कि इतना कमावें जो हमारी वंशावली भी खाती रहे। बाप कहते हैं – “अब यह सब कुछ चलना नहीं है। फिर भी भारत ही कुछ सेफ रहेगा।” कोई फिर कहते हैं कि बाहर में इतने मन्दिर आदि भी नहीं हैं और रहते भी आराम से हैं, और भारत में जितनी यह सब बातें हैं उतना ही भारत दुःखी हुआ है। लेकिन यह भी तो समझने की बात है कि वह सब आये ही पीछे हैं। तो उसी हिसाब से ही सुख-दुःख देखेंगे ना। ज्ञान से फिर भी सेफ्टी है। तो पहले से ही तैयार हो जाना चाहिए। यह है बाप की भविष्यवाणी । ऐसा कोई मनुष्य अथॉरिटी से नहीं बोल सकता। लेकिन जो जानी-जाननहार है वह बतला रहे हैं। समझते हैं – दादा ने यह संस्था रची है। परन्तु दादा से भी कौन करा रहे हैं – यह भी तो समझने की बात है। सबका पार्ट अपना-अपना चल रहा है। सब पार्ट एक जैसा नहीं बजा सकते। अच्छा ।

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19.10.62: ज्ञान और योगबल से कर्मातीत अवस्था को पाने वाले ही इज्जत से जाते हैं

ओम् शान्ति । अपनी बुद्धि अभी बहुत दूर निकलती जा रही है। दूर का मतलब है इस पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जहाँ इस पुरानी दुनिया का अंश-मात्र भी नहीं है। ऐसे नहीं कि वहाँ भी माया का थोड़ा अंश रहता है। नहीं। बाप समझाते हैं कि वहाँ माया का अंश भी नहीं है। प्रकृति है लेकिन माया नहीं है। माया का फिर अपना समय है। इसलिए इस बुद्धि को 5 विकारों से दूर हटाना है। बाप कहते हैं कि अब तुम्हारा काम मेरे से है। इसलिए कर्मातीत अवस्था में आना है। जैसे घर से आत्मा अशरीरी आई ऐसे बनना है। आत्मा ने यह चोला पीछे धारण किया है। आई तो भी अशरीरी, जाना है तो भी अशरीरी । इसलिए देह और देह सहित सब संबंध तोड़ो क्योंकि अब वापस जाना है। तो ज्ञान-योगबल से अशरीरी होने में फायदा है। जाना तो सबको है परन्तु इज्जत से जाने का इजाफा मिलेगा और ऐसे ही जाने से फिर दण्ड के भागी बनेंगे। बाकी उनका इजाफा इतना है जो कहते हैं कि तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे, फिर शरीर स्वर्ग में मिलेगा। अब तो एक-एक प्वाइन्ट की टैम्पटेशन का पता है। हर एक सब्जेक्ट से फायदा अलग-अलग है – ज्ञान से अलग, योग से अलग। और इस करने से टैम्पटेशन यह है कि क्यों न इज्जत से बाप के साथ जायें ? इस शरीर के साथ संस्कार या कर्मबन्धन का खाता लगा हुआ है, उनको काटना है और जैसे कर्मातीत थे वैसे होकर जाना है।

अभी हम सारे ड्रामा को जानते हैं। कहा जाता है कि आत्मा, परमात्मा अलग रहे बहुकाल...। तो जो आत्मा बहुतकाल से अलग रही है उनका मेल और जो थोड़ा समय रही है उनके मेल में भी तो फर्क रहता है। तो अब टोटल रचना और उसमें भी जो मुख्य-मुख्य हैं उनकी बायोग्राफी को जानते हैं। बाकी डिटेल जानने से, हर एक की जन्म-पत्री क्या है- उसकी क्या जरुरत है ? वह कहते हैं कि परमात्मा है तो सब बतावे ना । लेकिन वह सब बताने से क्या फायदा ? पहले सतो, रजो, फिर तमो स्टेज है। माया का भी पहले सुख है। माया आने से कोई झट से दुःख शुरु नहीं होता है। पहले 16 कला, फिर 14, फिर 12, फिर 8, आखिर अब तो कला ही निकल गई है। अब न आत्मा सतो है, न शरीर सतो है। अब बाप आकर फिर सब कलाओं में भरपूर करते हैं। तो आत्मा को शरीर अर्थात् काया भी ऐसी मिलती है।

अभी हमारी चढ़ती कला है। यहाँ तो गैरन्टी है कि इतने जन्म बाप द्वारा राजधानी मिलनी है और फिर माया के पहले भाग में अर्थात् द्वापर में भी तुम सुख देखेंगे। तो टोटल सुख बहुत हो गया। तो क्यों न ऐसी नूंध बना दें ? मनुष्य फिर कहते हैं कि अभी कलियुग तो बच्चा है, घोर कलियुग तो पीछे आने वाला है। लेकिन यह नहीं समझते कि अति पीड़ा का थोड़ा टाइम चलता है। अगर बहुत समय चले तो पता नहीं लाइफ क्या हो जाए ! आगे पाकिस्तान, हिन्दुस्तान के बीच में जो झगड़ा चला वह बहुत समय तो नहीं चल सका ना। अब घोर कलियुग भी पीछे ही आना है जो थोड़ा समय ही चलेगा । अब सोचना चाहिए कि हमको तो बाबा मिला है ! दुःखी वह होंगे जिन्हों को कोई सहारा नहीं मिलेगा। यह जन्म अति दुर्लभ है क्योंकि बाबा आकर मिला है। जब दुनिया हाहाकार में होगी तो उस समय हम सुख में होंगे। तो अन्दाजा सुख का लगाया जाता है। तो क्यों न उस लाइफ का सोचें जिसमें गैरन्टी है कि हम तो सुखी रहेंगे लेकिन हमारे बच्चों के बच्चे अर्थात् 21 पीढ़ी सुख पायेंगे ।

हमारा अभी से ही परमात्मा की पालना का खाता शुरु होता है। हमको तो अभी बाबा ही खिला रहे हैं। हम ब्राह्मण तो ईश्वर का ही खाते हैं। फिर जन्म-जन्मान्तर भी उस बाप द्वारा ही पाया हुआ खायेंगे । श्री नारायण का बच्चा भी तो अभी की कमाई का खाते हैं। जन्म-जन्मान्तर माया के राज्य में हम कर्मों के हिसाब से मनुष्यों का खाते हैं। यह ज्ञान भी इस समय है। बाकी सतयुग में थोड़ेही यह ज्ञान रहता है। त्रिकालदर्शी अब हैं। भक्ति मार्ग में तो कहते हैं कि हम परमात्मा के बच्चे हैं, हमको परमात्मा खिलाता है। लेकिन वह तो ठगी है। अब तो हमने परमात्मा से डायरेक्ट संबंध जोड़ा है। वह हमको खिला रहे हैं। कोई पूछते हैं कि तुम्हारे यज्ञ का खर्चा कैसे चलता है? बोलो – हमारा गुरु तो निराकार परमात्मा है, हमको खिलाने वाला वह है। लेकिन खिलायेंगे तो कोई के थू ना। देखो, हमारा बाबा कैसा है ! वह सर्वशक्तिवान है। हमको वह रुहाब वह नशा रहता है कि हमारा बाबा हर्ता-कर्ता है ? पुरानी दुनिया का हुर्ता, नई दुनिया का कर्ता है। हमारे बाप को कोई बाप नहीं, वह सबका बाबा है।

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25.10.62: ज्ञान ही रोशनी है जिससे अज्ञान का अंधकार नाश होता है

आत्मा, परमात्मा और सृष्टि-चक्र को यथार्थ रीति जानना – यह है अविनाशी ज्ञान जो अविनाशी पिता द्वारा ही मिलता है। आत्माओं द्वारा नहीं मिल सकता है क्योंकि आत्मा जन्म-मरण के चक्र में आती है। तो यह नॉलेज जो अजन्मा है वही जान सकता है। जो कर्मों के चक्र में चलने वाले हैं उन्हों की नालेज जरुर उनके पास ही रहेगी जो चक्र से न्यारा है। तो यह अविनाशी ज्ञान अविनाशी पिता द्वारा मिलता है। इसको ही रोशनी कहेंगे जिससे अन्धियारा मिट जाता है, रोशनी में आ जाते हैं। कहा भी जाता है- ज्ञान-अंजन सतगुरु दिया, अज्ञान अन्धेरा विनाश । सो परमात्मा के ज्ञान से ही अज्ञान अन्धेरा विनाश होता है। भल अनेक प्रकार का ज्ञान है, परन्तु उनसे अज्ञान अन्धेरा विनाश हो जाए और रोशनी आ जाए – यह नहीं हो सकता। यह तैलुक परमात्मा से ही है। परमात्मा की नॉलेज से ही आत्मा का अज्ञान अन्धेरा विनाश होता है और रोशनी भी आती है। रोशनी अर्थात् जन्म-जन्मान्तर के लिए फिर हम वह प्रालब्ध प्राप्त करें जिससे सदा सुख हो। यह ज्ञान सिर्फ बुद्धि में रखने की बात नहीं। यह तो प्रैक्टिकल अनेक जन्मों के विकर्मों का विनाश करना है जो फिर वह प्रालब्ध मिले । यह परमात्मा ही करा सकता है। इसको ही ज्ञान कहा जाता है। यह नालेज अथवा यह प्राप्ति मनुष्य नहीं करा सकते । मनुष्य को तो प्राप्त करना है। सर्व मनुष्य आत्माओं के लिए बात है ना। तो देने वाला जरुर और है जिससे सर्व आत्मायें वह प्रालब्ध प्राप्त करती हैं। कोई भी मनुष्य आत्मा चक्र से अलग नहीं है । सबको रोशनी चाहिए जिससे वह ऐसी स्टेज को प्राप्त करें।

यह ज्ञान ही रोशनी है जिससे पास्ट अनेक जन्मों के विकर्मों का विनाश करते हैं। अनेक जन्म प्रालब्ध प्राप्त करने के लिए अनेक जन्मों का हिसाब खत्म करना है। अब हम कितना पुरुषार्थ करते हैं, उसको ही नॉलेज अथवा रोशनी कहा जाता है। बाकी तो अनेक प्रकार के पुरुषार्थ हैं, उनसे फिर उस प्रकार की सिद्धि मिलती है। हमको फिर इस पुरुषार्थ से सर्व सिद्धियां मिल जाती हैं, अज्ञान का अंधकार मिट जाता है।

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29.10.62: हम डायरेक्ट परमात्मा की गोद के बच्चे वर्से के हकदार हैं

गीत:- ले लो दुआयें माँ-बाप की...।

ओम् शान्ति । अभी यह तो समझा है कि दुआ, दया, कृपा, आशीर्वाद .. यह भक्ति-मार्ग के शब्द हैं। यह ज्ञान-मार्ग में नहीं काम आ सकते हैं क्योंकि यहाँ संबंध ही निराला है। भक्ति-मार्ग में तो गुरु-शिष्य आदि-आदि हैं। लेकिन यहाँ यह संबंध नहीं हैं । भल परमात्मा को सतगुरु भी कहते हैं लेकिन हम जानते हैं कि वह हमारा बाप है, टीचर भी है तो गुरु भी है। हमारे सभी संबंध एक से ही हो गये हैं। वह टीचर, गुरु, धर्मराज सब है, परन्तु है हमारा बाप । इसलिए कोई बाप से दया-कृपा नहीं माँगते हैं। बाप पर हमारा हक है, हम अपना हक जमाते हैं। हम उनके प्रैक्टिकल गोद के, धर्म के बच्चे आकर बने हैं। वह हमको गोद में लेने आया है। भले भक्ति-मार्ग में भी कहते हैं कि हम तुम्हारी सन्तान हैं परन्तु वह हक नहीं जमाते हैं। हमने तो प्रैक्टिकल में चैतन्य में उनको अपना बाप बनाया है। गोद का बच्चा भी तो हक रखता है। मैं उस बाप की मिलकियत का वारिस हूँ। तो यहाँ कृपा की बात नहीं। परन्तु हमको लेना ही है, तो उनको देना ही है।

बाप खुद बैठ पढ़ाते हैं, जिससे जन्म-जन्मान्तर के लिए हमारी आजीविका सदाकाल सुख की बनती आती है। तो उसको हमने बाप बनाया है। ऐसा अपने पास नशा होना चाहिए कि एक हम ही बाप के प्रैक्टिकल में बने हैं ! फिर ऐसा टीचर भी किसके पास होगा ! उनकी पढ़ाई से हम मनुष्य से देवता बनते हैं। ‘देवता’ शब्द सुन समझते हैं कि देवता भी क्या हैं ? लेकिन देवता माना सर्व प्राप्ति । गुरु नानक ने भी उनकी ही महिमा की है। उनकी अंगुली एक तरफ दिखाते हैं कि एक को याद करो । लेकिन अब तो बाप आया है, डायरेक्ट कहता है कि “मुझे याद करो। मेरा परिचय मैं ही देता हूँ। मेरी बात मैं ही जानता हूँ। तुम्हारी बातें भी मैं ही जानता हूँ कि तुम्हारा किसमें कल्याण और किसमें अकल्याण है।“ धर्म के पिताएं भी जो आते हैं वह भी अपने बच्चों के पिता हैं। लेकिन यह तो उन्हों का भी पिता है। क्राइस्ट ने भी ऐसे नहीं कहा कि मैं परमात्मा हूँ। सबने कहा है- मैं उनका बच्चा हूँ। सब अथॉरिटी का मालिक वह है और हम उनके डायरेक्ट बने हैं ! हमारा धर्म बहुत ऊंचा है, जिसके लिए स्वयं परमात्मा को ही आना पड़ता है। और धर्म स्थापन करने में परमात्मा को आने की जरुरत नहीं।

एक देवी-देवता धर्म ही है जिसको गॉड-गाँडेज कहते हैं। और धर्म वालों को गॉड-गाँडेज नहीं कहेंगे। उन्हों का अपना-अपना नाम है – क्रिश्चियन, बौद्धी, आदि-आदि। लेकिन परमात्मा द्वारा जो धर्म स्थापन हुआ उन पर नाम पड़ा है गॉड-गॉडेज क्योंकि सभी मनुष्यों में बड़े हो गए। हमारा धर्म स्थापन भी वह आकर करता है जो खुद जन्म-मरण में नहीं आता है। तो पालना भी दूसरों से कराते हैं। उनको पालनहार, विनाश, स्थापन-कर्ता कहते हैं। अब खुद उपस्थित हो कार्य कर रहे हैं। हमको ऐसा लायक बनाते हैं। यह जो अभी की पालना चलती है वह कोई परमात्मा की नहीं है। इसमें तो कर्मों अनुसार किसको अच्छी रोटी मिलती, किसको नहीं भी मिलती है। यह कोई परमात्मा की पालना नहीं है। हम जानते हैं कि सतयुग में जो हमको पालना मिलती है वह परमात्मा की ही मिलती है। अभी के पुरुषार्थ का वह फल है। सच-सच तो वही परमात्मा की पालना है। अभी सुख की पालना नहीं है – कभी दुःख तो कभी सुख । हम अभी ही अपना पूरा एकाउन्ट भर लेते हैं, फिर आधा कल्प खाते रहते हैं। इसमें दया, कृपा की कोई बात नहीं ।

कोई आते हैं, मिलते हैं तो कहते हैं- हमारे प्रति शुभ भावना रखना । अब ऐसे तो है ही नहीं कि हमारी अशुभ भावना है। हम तो सबके शुभचिंतक हैं – क्यों न यह भी अपनी जीवन बनाये, आबाद करे। हमारी बुद्धि में किसके लिए भी डिफरेन्ट भावना नहीं है। यह सिर्फ कहने की रस्म चली आती है जो गुरु लोगों के आगे जाकर कहते हैं। फिर उन्हों की अल्प भावना पूरी भी होती है, तब यह रस्म चली आती है। अब हम तो इन बातों में जाते नहीं। हमको तो बाबा से सारा हक, सारा वर्सा लेना है जो फिर वहाँ ऐसी इच्छा नहीं रहती । यहाँ तो इच्छाएं लगी रहती हैं। लेकिन यह जो बातें सुनी हैं कि इच्छा की अविद्या, तो कहते हैं कि इच्छाओं को मारो। तो हठ से मन को मारते हैं। परन्तु जिसकी अप्राप्ति है, तो जरुर इच्छा उठती है। धन न हो, तो जरुर इच्छा होती है। इच्छा घटती नहीं है। हमारे में अप्राप्ति क्यों होती है ? उसके लिए पुरुषार्थ करना है। तो यह भी ज्ञान है। इच्छा दुःख नहीं देती, लेकिन अप्राप्ति दुःख देती है। हमारे पास अप्राप्ति न हो उनका साधन चाहिए। इच्छाओं के लिए कहते हैं कि मन को मारो । लेकिन माया को मारना है। वैसे संकल्प तो भगवान में भी हैं जिसने इतना ज्ञान दिया है। लेकिन भगवान के संकल्प ऊंचे हैं। इतनी नॉलेज देकर इतना ऊंचा बनाया है ! देवताओं को भी राजधानी चलाने के लिए मन-बुद्धि है। जड़ थोड़ेही बनना है। अब जप-तप-योग के लिए यह नहीं कि मन को मारो लेकिन हम तो चलते-फिरते उनकी याद में रहते हैं अर्थात् तप कर रहे हैं।

हम ही राजऋषि हैं, राजाई के लिए तप करते हैं। इस तप के बल से हमको राजाई मिलती है। हमने यह राजाई किससे छीनकर नहीं ली है। अगर छीन कर ली हो तो पहले जिसके पास थी उनकी भी महिमा होनी चाहिए। तो इसका मतलब राजाई लक्ष्मी-नारायण से ही शुरु होती है। कलियुग में इस योगबल की तरकीब से इतनी बड़ी राजाई लेते हैं। फिर कहते हैं कि योगबल से बच्चे कैसे पैदा होते हैं ? लेकिन योगबल की ताकत से जब राजाई ली है तो वह ताकत वहाँ भी चलती है। यह संसार है भोग बल का और वह है योगबल का। यह डबल ताज भी योगबल से पाया है। अभी हम ब्राह्मण बने, फिर देवता बनते हैं। शूद्र से देवता नहीं बन सकते हैं लेकिन पहले शूद्र से मरकर पवित्र ब्राह्मण बनना है। अब हरेक अपने से पूछे कि मैं ब्रह्मण बना हूँ ? ब्राह्मण बनना कम बात नहीं है। ब्रह्मा की मुख-वंशावली बनना है।

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28.06.63: बाप की मत पर आचरण करने वाले सच्चे-सच्चे ब्राह्मण बनो

गीत- जाग सजनियां जाग... ।

ओम शान्ति । बाप ने हम बच्चों को अर्थात् हम सजनियों को आकर जगाया है। माया की निद्रा में सोये पड़े थे, अब जागे हैं। तो जागकर प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करना है। अभी बुद्धि में है कि यह पुरानी दुनिया बीती । हम उसे देखकर नहीं जीते हैं। अब हमारा पुरानी दुनिया से संबंध नहीं रहा है। बाप हमें स्वदर्शन-चक्र देता है कि माया के गले को काटो यानी रावण के 10 शीश काटो । चक्र बुद्धि में घुमाने से चक्रवर्ती राजा बनेंगे। अभी हम सभी जन्मों का चक्र जानते हैं। पहले हम अशरीरी (नंगे) थे, फिर नाटक हुआ तो नाटक कां वेष पहना। फिर अपने धाम जाना है तो फिर बुद्धि-बल से अशरीरी बनना है। देह का सब कुछ यहाँ खत्म करना है। कीचड़ को साफ करना है। अब वापस जाने का ख्याल रखो। घर में जाना है, तो दुनिया की कोई भी चीज अथवा पदार्थ में मोह न रखो ।

अब पुराने खाते को बंद करना है और नया बनाना है। पुराने को आगे बढ़ायेंगे तो सजाओं से चुक्तू करना पड़ेगा क्योंकि यहाँ अब विकर्म ही बनेगा। तो मुसीबत क्यों बढ़ायें ? अभी तुम जान चुके हो कि दुःख का कारण यह है। तो पुरुषार्थ है सारा बुद्धि-बल का। शरीर निर्वाह करते भी ईश्वर का होकर रहेंगे तो जवाबदारी उनकी है। परमात्मा का बनने से सेफ रहेंगे । परमात्मा की मत पर ही रहना है। मनुष्य बहुत हैं तो मतें भी बहुत हैं। बाबा तो है एक, तो मत भी एक है। तो ऐसी मत पर चलने वाले चाहिएं। परन्तु कोटों में कोई ही चलते हैं। क्योंकि सब एक जैसा पुरुषार्थ नहीं करते हैं। तो तुम्हें अपने को बहुत सम्भालना है। सब बातों में परहेज चाहिए। पूजा आदि में ब्राह्मणों को ही मंगाते हैं। तो उन्होंने हमारा नाम अपने ऊपर रख दिया है।

अब हमको वल्लभाचारी बनना है। वल्लभ माना बाप। उसकी मत पर आचरण करने वाला । हमारा कुल कितना ऊंचा है ? कहते हैं – देवता भी इच्छा रखते हैं कि इस जन्म में आयें। तो ब्राह्मण हो गये देवताओं से भी ऊंचे। बलिहारी ब्राह्मणों की है। तो अब अपना आक्यूपेशन समझकर चलना है। हम ऊंचे कुल के हैं, पहली रचना हैं। तो चाल-चलन भी ऐसी ही चलनी चाहिए। कोई देखे तो समझे कि यह साधारण लोग नहीं हैं, फरिश्ते हैं। यह एक ही जन्म है ब्राह्मणों का, सो भी छोटा-सा है। इसमें खानदान का नाम बाला करना है। तो ब्राह्मण कुल की खुशबू भी आयेगी। तो यह है अपनी परहेज । कोई भी विकारी के हाथ का नहीं खाना है। ब्राह्मणों को और ही ज्यादा परहेज रखनी है। फिर हठ भी नहीं करना है। अपना है जीतना, हठ से नहीं मारना है। बलिहारी जीतने की है। हमको बाप रॉयल तरीका सिखाते हैं। खाना अपने हाथ से बनाना है। लाचारी हालत में कोई विधवा वा कन्या से बनवा सकते हैं। फिर भी योगयुक्त की बात अलग है। लाचारी में दूध है, फल आदि हैं, वह ले सकते हो। एक दिन व्रत भी रखा तो क्या हुआ। बाकी चने आदि खा लेने से कोई पेट तो खराब नहीं हो जायेगा ।

मुख्य है क्रोध, लोभ, मोह की परहेज । उसे कहते हैं वल्लभाचारी । ब्रह्मचर्य का भी अर्थ है। ब्रह्मा द्वारा सिखाया हुआ आचरण – यह है सतोगुणी पवित्रता । सन्यासियों की पवित्रता रजोगुणी है। परहेज रखने से मुरझाइस आदि नहीं आयेगी। नहीं तो, एक दिन कैसा, दूसरे दिन कैसा ! तुम सांवधान नहीं होंगे तो माया थप्पड़ मारेगी। बाकी ऐसे नहीं – थोड़ा पुरुषार्थ किया वह भी अच्छा । यह कोई बाप पर मेहरबानी थोड़ेही करनी है। कोई को ऐसे भी नहीं कहो कि पूजा-पाठ छोड़ दो। न से तो यह भक्ति भी अच्छी है। पहले तो विकारों को छोड़ने की बात है। नहीं तो उल्टा गिर जायेगा। ज्ञान समझाने की भी युक्ति हैं तो भुल होने से मरीज मर जाते हैं। तो बडी जवाबदारी का काम है। धारणा चाहिए। पहले नब्ज देखनी है। कभी डॉक्टर भी नब्ज ठीक नहीं पकड़ पाते भी बहुत अच्छी चाहिए। अच्छा । गुडमानिन्ना ।

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18.07.63: परमात्मा की शक्ति उनके कर्तव्य पर ही गाई जाती है, उनका कर्तव्य है पतितों को पावन बनाना

ओम् शान्ति । परमपिता परमात्मा को याद तो सब करते हैं, परन्तु हम अभी उनको जानकर के याद करते हैं। भक्ति-मार्ग में भी परमात्मा को इतना तो समझते हैं कि वह जानी-जाननहार, सर्वशक्तिवान है। परन्तु वह कैसे सर्वशक्तिवान, जानी-जाननहार है- यह उनके द्वारा अब हमने समझा है। भक्ति-मार्ग में तो सिर्फ परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते आये हैं। समझते हैं –“परमात्मा ने उठाया, परमात्मा ने बिठाया, परमात्मा ने खिलाया, परमात्मा ने यह सब दिया है। परमात्मा बिगर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। जो भी कुछ चलता है, वह परमात्मा चला रहे हैं।“ क्या उनका कर्तव्य, उनकी विशालता, उनकी शक्ति यही है ? परन्तु यह कोई यथार्थ ज्ञान नहीं है। अपने पास तो अब रोशनी है। यह कोई परमात्मा के महानता की बातें नहीं हैं। अगर पत्ता भी उनके हुक्म से हिलता है, तो फिर चोर-चोरी भी उनकी शक्ति से करता है ? परमात्मा की शक्ति वा महानता इससे तैलुक नहीं रखती है। ऐसे नहीं कि जो कुछ चल रहा है, यह परमात्मा की शक्ति है। शक्ति में तो फिर कई बुरे काम भी हो रहे हैं, न होने वाली बातें भी हो रही हैं। तो क्यों समझें कि यही परमात्मा की शक्ति है ? परमात्मा की सिर्फ यह शक्ति नहीं है। यह अपनी आत्मा की भी तो शक्ति है ना। जो भी मनुष्य कर्म करता है, तो आत्मा को अपनी समझ है, वह भी तो चैतन्य है। परमात्मा की शक्ति परमात्मा के कर्तव्य से गाई जाती है।

कई समझते हैं – वृक्ष बढ़ता है तो यह भी परमात्मा की शक्ति है। परन्तु नहीं, वह तो हर चीज को बढ़ना-घटना है। हर चीज की चैतन्यता अपनी है। मनुष्य की शक्ति भी तो गाई जाती है ना। कहते हैं – गांधी में शक्ति थी जो इतना बड़ा काम किया। भूख हड़ताल आदि द्वारा यह सब किया, जिसको वह अहिंसा समझते हैं। परन्तु अहिंसा यह नहीं है। गांधी ने भारत को स्वतन्त्र बनाया। कर्तव्य पर शक्तिवान समझा गया ना। तो परमात्मा की शक्ति क्या है? क्या यह सब जो चल रहा है, इसे परमात्मा जानता है ? फिर तो वह सब जानता रहे और वह बातें होती भी रहें। खूनी के अन्दर खून करने का संकल्प है – फिर बाकी परमात्मा के शक्ति की महानता क्या रही ? सब कुछ परमात्मा जानता है – सिर्फ इस जानने से क्या फायदा हुआ ? उनके जानते हुए भी उल्टा काम हो जाता है तो बाकी परमात्मा की महानता क्या हुई ? परन्तु उनकी महिमा कर्तव्य पर है।

हमारे सारे कर्मो की गति को वह जानता है। ऐसे नहीं, जब हम कर्म करते हैं तब जानते हैं, वह तो पहले से ही जानते हैं। परन्तु परमात्मा के कर्तव्य की महिमा तब है जब आकर हमको अपने जानने का फायदा देते हैं। कैसे हम इस चक्र में आते हैं, उनकी नालेज देते हैं। वह डायरेक्टर-क्रियेटर है, सब उनके पास नॉलेज है। परन्तु उनकी महिमा कर्तव्य पर है। परमात्मा तो सब जानता ही है। हम आत्मायें अनेक जन्मों में आती हैं तो हम ही भूल जाती हैं। उनके फोकस में तो सारा ड्रामा है। आगे क्या हो चुका है- वह भी जानते हैं। परन्तु उससे क्या फायदा ? हमको गिरी हुई स्टेज से उठाते हैं, पतित से पावन बनाते हैं – यह उनकी शक्ति है। बाकी सिर्फ जानता है- पतित हुए तो भी उनकी शक्ति, पावन हुए तो भी उनकी शक्ति। उनकी शक्ति में हम पतित भी हो जाते हैं तो इससे क्या फायदा ? यह सब बातें अब बुद्धि में हैं।

परमात्मा की शक्ति उनके कर्तव्य पर गाई जाती है। हमें सारी रोशनी देते हैं कि तुम कितने पावन थे, फिर कैसे पतित बने। फिर पावन बनने के लिए क्या करो – वह भी समझाते हैं। वह सुख-दाता है। ऐसे नहीं कि सिर्फ सुख-दुःख को जानता है। दाता का कर्तव्य है, अगर सुख-दाता है, तो हम सदा सुखी होने चाहिएं। परन्तु हम दुःखी भी होते हैं, उसका क्या कारण है ? यह सब बातें हम जानते हैं। परमात्मा की महानता अथवा उनकी श्रेष्ठता कर्तव्य से गाई जाती है। सृष्टि पर उनका कर्तव्य सबसे महान् और मनुष्यों प्रति हुआ है, तब उनका गायन है। बाकी सब कुछ परमात्मा कराता है- यह कोई बड़ापन नहीं है। सबमें उनका श्रेष्ठ कर्तव्य हुआ है, उसे ही बड़ापन कहेंगे। मनुष्य सृष्टि को सूखी बनाया है। सारी सुष्टि, तत्व आदि जो भी रचना है उनको सतोप्रधान बनाया है, तब ही महिमा है। बाकी सिर्फ हमारे संकल्पों को रीड करे तब शक्ति समझें, वह तो 10 वर्ष के पहले के संकल्पों को भी जानता है, फिर क्या हुआ? यह कोई महानता नहीं हुई। तो बाप की महिमा को भी समझना है।

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20.07.63: कल्याणकारी बाप की मत भी कल्याणकारी है, उसमें अकल्याण हो नहीं सकता

ओम् शान्ति। हम जो सुनते अथवा सुनाते हैं- यह कोई अपनी मनुष्य-मत वा शास्त्र-मत नहीं है। शास्त्र-मत भी मनुष्य-मत ही है। परमात्मा के डायरेक्ट वर्शन्स का तो कोई शास्त्र रहा ही नहीं है। शास्त्र हैं ही मनुष्यों के । भल भगवान ने जो वर्शन्स उच्चारे उसका नाम गीता रखा है। परन्तु वह भी गीता मनुष्यों की हो गई। परमात्मा तो अभी खुद ओरीजनल वर्शन्स सुनाकर वह कर्तव्य करके स्वर्ग बना रहे हैं। परमात्मा ने कोई शास्त्र नहीं बनाये हैं। शास्त्र कोई परम्परा से नहीं चले हैं। परमात्मा का कोई शास्त्र है ही नहीं। गीता भी परमात्मा की नहीं है। परमात्मा ने तो ज्ञान से स्वर्ग बनाया। वहाँ शास्त्रों की दरकार नहीं रहती है। बाकी हम जो सुनते हैं, यह है परमपिता परमात्मा की श्रीमत । पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए। इसमें तो कोई मनुष्य-मत है ही नहीं। तो फिर वह जो सुनाये, जैसे कराये – उसमें संशय की बात नहीं हो सकती ।

पहले यह निश्चय होना चाहिए कि हम किसके द्वारा सुनते हैं ? पहला फाउन्डेशन यह है। सुनाने वाला वह समर्थ है। उनके सुनाने में कोई संशय हो नहीं सकता । माँ-बाप बच्चों को युक्तियों से भल उठा सकते हैं। बाकी उल्टी-सुल्टी बातें थोडेही करेंगे जिससे हमारा अकल्याण हो जाये। बाप तो है ही कल्याणकारी । लौकिक रीति भी अपने कर्मों के हिसाब से कहां अकल्याण हो भी जाए, परन्तु बाप बच्चों का कब अकल्याण नहीं चाहेगा। फिर यह तो है ही कल्याणकारी बाप । हमारी कर्मों की गति को साफ करने वाला है। अपने को यह समझ है – हमको सुनाने वाला वह समर्थ है। इसलिए किसी बात में हम अपनी मत चला नहीं सकते हैं। परन्तु यह तब हो सकता है जब निश्चय हो कि हमें सुनाने वाला कौन है ? बहुतकाल से मनुष्य-मत की बातें बुद्धि में बैठी हुई हैं। इसलिए कई संशय उठाते हैं। अब हमें जबकि ‘बुद्धिवानों की बुद्धि’ मिला है तो उसमें हम कोई संशय उठा नहीं सकते हैं। उसने तो जो सुनाया, जो कर्तव्य किया – फिर उनके कर्तव्य की प्रालब्ध चली। बाद में मनुष्य मत चली है। देवताओं को तो किसके मत की आवश्यकता ही नहीं रही। उस समय को कहा जाता है सतयुग की आदि।

अब इन बातों की रोशनी परमात्मा ने दी है। मनुष्य तो यह समझ नहीं सकते । इसलिए आपस में टक्कर खाते हैं क्योंकि अनेकानेक धर्म हैं। कोई किस चीज को मानते हैं, कोई नहीं मानते हैं। है ही खण्डन की हुई दुनिया । अनेकानेक मत हैं। एक बात पर एक मत हो, तो भी समझें कि यह परम्परा चली आई है। अभी तो हैं अनेक मत । अब वह एक बाप ही सभी मनुष्यों की गति को जानते हैं। वही बाप, टीचर, सतगुरु है। गति-सद्गति-दाता भी वही है। वह अपना कार्य कर रहे हैं। यह बात निश्चय में आ जाए फिर कोई हलचल नहीं हो सकती है। परमात्मा ही जानी-जाननहार है। यथार्थ बातें उनसे ही मिल सकती हैं। जब वह बातें अनुभव में आती हैं तब प्रैक्टिकल जीवन बनती है। परम्परा से जो सुनते आये उनसे क्या बने ? सिद्धि तो कुछ प्राप्त हुई नहीं । अभी हम यथार्थ बातें सुन रहे हैं जो हमारे जीवन के लिए हैं। जीवन बनाना तो अच्छा है ना। अनुभव में जो चीज आती है वह छिप नहीं सकती है। जब जीवन सुधरती है, तो फिर क्यों न अपनी जीवन बनायें ? परमात्मा श्रेष्ठ मत देकर सुधार रहे हैं तो उनकी माननी चाहिए ना। अच्छा।

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26.07.63: यह असार संसार है, आसक्ति छोड़ नई सार वाली दुनिया को याद करो

ओम् शान्ति । जैसे हद के दिन और रात रोज़ होते हैं, ऐसे इस सृष्टि-चक्र में बेहद का भी दिन और रात है जिसको गीता में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष कहा हुआ है। रात पूरी हो दिन होने का भी अभी समय है। रात पूरी होगी तो दिन आयेगा। ऐसे नहीं कि रात और दिन इक्ट्ठे होंगे। हद की रात और दिन भी इक्ट्ठे नहीं होते हैं। सृष्टि-चक्र में भी ऐसे है। ऐसे नहीं कि सुख-दुःख इक्ट्ठा है। अन्धियारे को दुःख, रोशनी को सुख कहेंगे। दुःख का समय अलग, सुख का समय अलग हो गया ।

कई समझते हैं – “सुख-दुःख चले आये हैं भल आगे दुःख कम था, अभी जास्ती है।“ परन्तु यह नहीं समझते कि दुःख था ही नहीं। वह सुख की दुनिया थी, यह दुःख की दुनिया है। कम जास्ती पर कान्ट्रास्ट नहीं है, कान्ट्रास्ट है -हाँ और ना पर । दुःख था ही नहीं। याद उस चीज को किया जाता है जो है ही नहीं। अगर सुख होता तो फिर उनकी चाहना क्यों होती ? भल धनवान हैं, मर्तबे वाले हैं, वह भी सुख को याद करते हैं। तो जरुर वह चीज अभी नहीं है जिसको सब चाहते हैं। प्रेजेन्ट वह होती तो चाहना क्यों रखते ? अब अपना पुरुषार्थ उस चीज के लिए है जो चीज इस दुनिया में है नहीं। इस दुनिया से किनारा कर लिया है क्योंकि यह है ही पुरानी तमोप्रधान नर्क की दुनिया । वह सुख की दुनिया ही और है।

अब है रात । दिन और रात की तो रौनक ही अपनी-अपनी है। तो हम उसके पीछे लगे हुए हैं – ऐसी दुनिया के सुख को प्राप्त करें। इसलिए पुरानी दुनिया से किनारा किया है। यह तो है ही असार संसार । सार वाला संसार ही दूसरा है। इस दुनिया में जो कुछ है उसकी आसक्ति छोड़नी है। मान, मर्तबा, धन आदि कोई भी चीज में इच्छा नहीं रखनी है। पहले तो यह कान्ट्रास्ट बुद्धि में रहना चाहिए । मनुष्य समझते हैं- यह दुःख-सुख सब परम्परा से चला आया है। परन्तु परम्परा से जो चला आया है वह पुरानी दुनिया की चाल चली आई है। नई दुनिया की तो चाल ही निराली है। बाप कहते हैं- “इस दुनिया में जो कुछ करते आये हो, उनका फल भी यहाँ ही पाया है। इस दुनिया की पवित्रता भी तमोगुणी है। मैं तुमको सतोप्रधान पवित्रता सिखलाता हूँ।“ तो तुम रजो, तमोगुणी पवित्रता से भेंट क्यों करते हो। पुरानी दुनिया की अब एन्ड है। अब नई दुनिया के लिए पुरुषार्थ करेंगे तो उसका फल नई दुनिया में मिल जायेगा। विनाश तो होना ही है। परन्तु तुम पहले से ही करेंगे तो वह करने का फायदा तुमको मिलेगा । अच्छा ।

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31.07.63: पुरानी दुनिया से वापस चलना है, इसलिए इससे दिल हटा लो

ओम् शान्ति । परमात्मा है परमधाम निवासी। हम आत्मायें भी असुल परमधाम की निवासी हैं। अभी यहाँ आये हैं पार्ट बजाने के लिए । पार्ट बजाते-बजाते पार्ट ही बिगड़ गया है। अब फिर बाप आया है ले चलने के लिए। फिर वहाँ जो अपना असली पार्ट था, सुख का संबंध था, उसमें आयेंगे । बिगड़ी को संवारने वाला परमात्मा ही है। दूरदेश का मुसाफिर – यह भी परमात्मा की महिमा है। वह परे ते परे देश के निवासी हैं, अब मुसाफिर बनकर आये हैं थोड़ी देर के लिए। ले चलने के लिए उनको आना है। सर्व समर्थ चाहिए ना जो आकर माया के बंधन से छुड़ावे। हम कर्म के बंधायमानी में बंध गये हैं। अब उनसे निकालते हैं। विकर्म के खाते को दग्ध करना – यह है उस सर्वशक्तिवान का काम । उनकी पॉवर के सिवाए हम माया के बंधन से छूट नहीं सकते । मनुष्य, मनुष्य को बंधनमुक्त कर न सके। कर्मों को ऊंच बनाने वाला, बंधनों को काटने वाला वही है। अथॉरिटी वह है जो हमारे कर्मों को ऊंच बनाने का तरीका बताते हैं । वह ताकत देते हैं। इस चीज की अथॉरिटी एक के ही पास है।

मनुष्य तो कर्म के चक्र में आने वाले हुए। इस चक्र से अलग वह है, इसलिए बंधनमुक्त बनाने की पॉवर भी उनके पास है। वह भी कराते हमसे ही हैं। तो अब हम वहाँ से आये हैं, वहाँ ही फिर जाना है। फिर बंधनमुक्त हो सुख के संबंध में आना है। अब वापस चलने का ही ख्याल करना है। वापस कहाँ से होना है ? पुरानी दुनिया से। नई दुनिया जब है तब वापस जाने की बात नहीं, तब तो दुनिया को चलना है। पुरानी दुनिया के अन्त समय वापस होना पड़ता है। पुरानी दुनिया से वापस जाना है तो उससे दिल हटाई जाती है। अब खेल ही पूरा होता है। सर्व आत्माओं को वापस जाना है। जबरदस्ती भी जाना है, धर्मराज के डन्डे खाकर भी जाना है। तो क्यों न इज्जत से जायें। अब दुनिया बदलनी है तो पुरुषार्थ कर स्वर्ग में भी आगे नम्बर में आना है, सतोप्रधान का पूर्ण सुख पाना है। तो अपने खाते को भी सम्भालना है। अनेक जन्मों का खाता जो बना है उसको सुधारना है। अच्छा ।

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29.08.63: सबको बल देने वाले समर्थ बाप को सर्व संबंधों से याद करो

गीतः- तुम्हीं हो माता-पिता ।

ओम् शान्ति । अपनी बुद्धि में एक परमात्मा की ही याद है, दूसरे कोई को याद करने की दरकार नहीं है। उनका फरमान है कि मैं ही सर्व-संबंधों का तुम्हें साथ देता हूँ। वह है सर्वशक्तिवान, इसलिए और किसके याद की आवश्यकता ही नहीं रहती है। मनुष्य आत्माओं की याद में तो ऐसे नहीं हो सकता। वह तो सर्व समर्थ है फिर और किसकी याद का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है। सर्व सहारे देने वाला समर्थ वह है, वह खुद अपनी एक्ट कर रहे हैं। अपना संबंध है ही उनसे, जिससे और कोई सहारा लेने की फिर बात ही नहीं रहती । सभी का सहारा वह एक ही है, करनकरावनहार भी वह है। स्थापना, पालना, विनाश कराने वाला भी वह एक हुआ ना । उससे सर्व प्राप्तियां हो जाती हैं, इसलिए उनको बाप, टीचर, सतगुरु कहते हैं । वही सब कुछ कर और करा सकते हैं। अब अपना संबंध ही उनके साथ है। और तरफ बुद्धि जाती ही नहीं है। वही नॉलेजफुल ज्ञान का सागर है। उनका अब फरमान है कि मुझे याद करने से तुमको बल की प्राप्ति होगी जिससे पुराना खाता विनाश करना और नया जोड़ना है। तुम मात-पिता.. भी उनको कहते हो। सर्व संबंधों का सहारा, सबको बल देने वाला वह एक ही है। और किसी देवता आदि को यह महिमा नहीं दे सकते। वह समर्थ ही इस महिमा अथवा इस कर्तव्य के लायक है। मनुष्य तो जानते नहीं हैं। वह तो हो गई भावना। यह तो प्रैक्टिकल बात है। ऐसा कर्तव्य उस समर्थ सर्व शक्तिवान से ही हो सकता है। ऐसे नहीं कि हम कोई को भी परमात्मा कह दें। परमात्मा तो अपने नाम, रुप, कर्तव्य वाला अलग होगा ना। जो जिसके लायक है उनको ही कहने में आता है। प्रैक्टिकल बात चाहिए ना। ऐसे ही सिर्फ महिमा नहीं करनी है। भावना से प्राप्ति होती है। वह हुई भावना । बाकी प्रैक्टिकल जिसने कर्तव्य किया, वह तो बात ही अलग है। तो अपनी बुद्धि में एक की ही याद है। अच्छा।

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03.09.63: पांच विकारों से निवृत्त होकर रहना ही सच्चा महात्मा बनना है

अब तो हमें दर्पण मिला है जिसमें हम देख सकते हैं कि पाप क्या है पुण्य क्या है। रूहों का बाप यह दर्पण देते हैं कि बच्चे देखो यह आत्मा जो पुण्य आत्मा थी वह पाप आत्मा कैसे बनती है। पाप कराते हैं यह पांच विकार उनसे छुड़ाकर पुण्य आत्मा बनाना यह परमात्मा का ही काम है। तो आत्मा ही पुण्यात्मा, पापात्मा बनती है। ऐसे नहीं कि आत्मा निर्लेप है। यह तो जो खाने पीने वाले हैं उन्होंने अपना रास्ता खोला है कि शरीर ही सब कुछ करता है । अगर ऐसा होता तो जब आत्मा चली जाती है फिर शरीर कुछ कर्मभोग भोगे । नहीं। आत्मा में ही अच्छे बुरे संस्कार हैं तो भोगती आत्मा है परन्तु शरीर द्वारा । इसलिए आत्मा परमात्मा एक नहीं कहेंगे अगर आत्मा परमात्मा एक कहें तो परमात्मा ही पुण्यात्मा और पापात्मा हो गया। परन्तु परमात्मा तो पाप, पुण्य से न्यारा है। आत्मा ही पुण्यात्मा, धर्मात्मा बनती है। कई समझते हैं जो वेद शास्त्र पढ़ा हुआ है वो धर्मात्मा है परन्तु धर्मात्मा बनना तो बड़ी स्टेज है। उसमें तो पूरा 5 विकारों से निवृत्त हो चलना है। हमारी आत्मा के ऊपर जो अनेक जन्मों के पाप की मैल है उनको छुड़ाना है और अनेक जन्म के लिए स्वच्छता धारण करनी है। यहाँ कोई घर छोड़ने की बात नहीं हैं परन्तु विकर्मों से छुटकारा करना है। अनेक जन्मों के पापों को दग्ध करना है एक जड़ निकाल दूसरी जड़ लगानी है। इसके लिए रोज अपने आपको देखना है कि हमारे में कौन-कौन से दाग हैं जो मिटाने हैं। 5 भूतों का दाग निकल जाये तो खूब सूरत बन जायें। वह तो है शरीर की सुन्दरता। यह पवित्रता है रुह की सुन्दरता। देखों देवताओं की रूह पवित्र है तो शरीर भी कितने सुन्दर हैं। तो शरीर और रूह को हम सुन्दर बना रहे हैं। जिसका मदार सारी दिनचर्या पर है। अच्छे कर्म का फायदा भी 10 गुणा है तो बुरे कर्म की सजा भी 10 गुणा है। तो सारे दिन की दिनचर्या में अपने मन-वचन-कर्म को देखना है। अपने ऊपर ध्यान रखना है कि हमारे में कोई विकार तो नहीं है ? बाप का फरमान है कि कोई भी बापदादा की अवज्ञा न करो। अवज्ञा का भागी बनने से बहुत भारी चोट लगती है। जो बच्चे पुरुषार्थी हैं उनको मास मास की रेग्यूलर दिनचर्या लिख माँ बाप के पास भेजनी चाहिए कि हम सारे दिन में, 24 घण्टों में कितना याद करते हैं। याद की भी परसेन्टेज लिख भेजनी चाहिए। रात्रि सोने के पहले 10 मिनट उनकी याद में बैठ सोना चाहिए तो स्वप्न भी ऐसे अच्छे आयेंगे और नींद भी उस स्थिति में गिनी जायेगी । घड़ी-घड़ी अपने दर्पण को देखते रहना है। विवेक से रांग, राइट को जज कर चलते चलो। विवेक को मारकर चलना कोई जीवन नहीं। कोई भी बात अपने कन्ट्रोल से बाहर नहीं होनी चाहिए। देखो अपना मरना, जीना सब कन्ट्रोल में है तो कोई भी कर्मइन्द्रिय लूज नहीं होनी चाहिए। अपने ऊपर कन्ट्रोल रखना ही अपना उपकार करना है। समझा।

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08.09.63: धर्मराज का रूप आफीशल है, उसमें कोई रियायत नहीं

ज्ञनिश्वर बाबा और योगेश्वर बाबा अब खुद ज्ञान योग सिखाने आये हैं। अपना और अपनी सारी रचना का परिचय देने आये हैं। कहते हैं मैं ही तुम्हारा बाप, टीचर, गुरु हूँ। मैं तुम्हारा मात-पिता बन्धु-सखा हूँ। तो एक बार तुम मेरे हो जाओ। कई कहते हैं – सब कुछ तो शिवबाबा का है ना। परन्तु ऐसा सिर्फ दिल में नहीं समझना है, एक्ट में भी लाना है। उनके डायरेक्शन पर चलना है। बाप खुद कहते हैं अब जो कुछ तुम्हारे पास है सो पूरा पोतामेल मेरे आगे रखो फिर मेरे डायरेक्शन पर हर कर्म करो तब तुम्हारी जिम्मेवारी हट जायेगी, क्योंकि मैं तो धर्मराज भी हूँ। याद रखना मैं रांग कर्म नहीं करा सकता। यह है जीते जी मरना अर्थात् मरजीवा बनना जिससे सतयुग में अमर पद पाना। जो कुछ करना है, मेरे प्रति करो। एक बार तुमको मेरे प्रति मरना है और मेरे संग अपनी जीवन बितानी है। कर्मों का लेखा ठीक रखो, बिगड़े को सुधारना है। फिर तो जो हिसाब-किताब है वो साथ में जायेगा। अब बाप हूँ तो कुछ रियायत कर दूंगा बाकी जब धर्मराज हूँ तब तो आफीशल रूप में हूँ। अगर ज्ञान में आकर कुछ विकर्म किया होगा तो 10 गुणा सजा दूंगा। वहाँ रियायत चल नहीं सकती। बाप कहते हैं- अभी तो मैं बाप, टीचर और गुरु के रूप में उपस्थित हैं। जो मेरी गोद का बच्चा बनेगे उनकी जिम्मेवारी भी मैं उठाऊंगा। अब जीते जी मरना है अर्थात् देह सहित देह के सब सम्बन्धों से बुद्धियोग तोड़ मन-वचन-कर्म से मेरे से संबंध जोड़ना है। पूरा नष्टोमोहा बनना है। बाकी यहाँ लोक-लाज रखने का ख्याल किया तो खलास । इस सृष्टि की सब मर्यादायें विकारी हैं वहाँ तो निर्विकारिता का संबंध था। भल बच्चे आदि पैदा होते थे परन्तु योगबल से। कोई कहे हम यहाँ ही पवित्र पति-पत्नी बन बैठ जाते हैं। नहीं, वो ताकत योगबल की तो प्रालब्ध में है जबकि पवित्र प्रवृत्ति है। निर्विकारी मर्यादा प्रधान है। बाकी यहाँ नाता जोड़कर नहीं बैठना है। यहाँ तो एकदम पुराना खाता खत्म करके ही चलना है । अच्छा ।

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12.10.63: सच्चा रूहानी वैष्णव वह, जिसकी बुद्धि को कोई भी विकार न छुएं

ओम् शान्ति । जब हम ओम् शान्ति कहते हैं तो एक दो को बाप की याद दिलाते हैं। जैसे टीचर ड्रिल कराते हैं तो कहते हैं अटेन्शन । यहाँ भी पहले ओम् शान्ति कहने से अपनी बुद्धि को स्थिर करना होता है कि मैं आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। ओम् का अर्थ शास्त्रवादी तो बहुत लम्बा करके बतलाते हैं परन्तु इसका अर्थ बड़ा सिम्पल है कि सोल कानसेस होकर रहो। चलो, फिरो तो बुद्धि में अपना बाप याद आये। बाप कहते हैं कि बच्चे सर्वशक्तिवान मै एक ही हूँ। तो पूरा राज्य-भाग्य सुख, शान्ति, शक्ति, पवित्रता सब पदार्थ मुझ एक से ही लो। सिर्फ शान्ति लेना कोई पदार्थ नहीं है। कई समझते हैं पदार्थों ने ही दुःख दिया है तब कहते हैं हमें देवता भी नहीं बनना । कहते है -हम तो मुक्तिधाम में ही बैठना चाहते हैं। अरे, मुक्ति में बैठ जाना कोई स्टेज नहीं है। वो तो एकदम जड़ अवस्था हई। उसमें कोई सुख, चैन, आराम नहीं। वह तो शान्ति-अशान्ति से परे अवस्था है। ऐसे नहीं कि वही आरामदायक है। कइयों ने मोक्ष को ही ऊंच समझ लिया है। अनेक जन्मों से जो सुनते आये हैं तो उनका वह संस्कार पक्का हो गया है। यहाँ भी कई आते हैं कहते हैं हमको तो योग ही अच्छा लगता है. आपका ज्ञान तो हमको समझ में नहीं आता। तो हम समझ जाते हैं कि यह बेचारा ज्यादा पद पाने वाला नहीं है। शायद यह मुक्ति में बैठने वाला है। यूं तो अविनाशी ज्ञान-योग का विनाश नहीं होता है, उनका मिलेगा जरूर । परन्तु पूर्ण चीज तो पूर्ण पढ़ाई से मिलेगी ना। हमारी एक-एक मिनट में कितनी कमाई है। मुख्य है मन, वचन और कर्म पर अटेन्शन । क्योंकि मन में भी अगर व्यर्थ आता है तो वह भी समय वेस्ट होता है। तो अपने समय की भी सेफ्टी करनी है। उसे भी जितना हम सेफ करें उतना फायदा है। तो अपने मन-वाणी और कर्म पर सेकेण्ड सेकेण्ड ध्यान देना है कि हम आत्मा से कोई अयोग्य कार्य न हो। इसलिए अपने को पूरा रूहानी वैष्णव बनना है जो कोई विकार हमारी आत्मा को न छुएं। पहले रोग हैं यह पांच विकार, इन रोगों से छुटकारा पाना है। कहते हैं ना संग तारे कुसंग बोरे। तो विकारियों का संग ही कुसंग है जिससे बचना है। ऐसे नहीं कि सन्यासियों माफिक भाग जाना है। नहीं, हमको तो उसी के बीच में रह अपने को बचाना है। हमको भी औरों के कल्याण अर्थ विकारियों के संग में आना पड़ता है। जैसे देखो, कहाँ प्लेग की बीमारी फैलती है तो सब कहते हैं – इससे दूर रहो, इनके साथ नहीं बैठो। परन्तु डॉक्टर को तो उन जीवाणुओं को निकालने अर्थ जीवाणुओं में हाथ भी डालना पड़ेगा। डॉक्टर को तो पेशेन्ट के पास जाना ही पड़े। तो हम रूहानी सर्जन है हमें रूहों के रोगों को दूर करने अर्थ उनके संग में रहना भी पड़ता है। अगर हम भी उनसे हटे तो उनको निरोगी कौन बनायेगा ? जैसे आग बुझाने वालों को कवच पड़ा रहता है तो असर नहीं होता है, वैसे ही हमको ज्ञान-योग का कवच पड़ा हुआ है तो माया का वार हो नहीं सकता । अच्छा

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20.10.63: अशरीरीपन की ड्रेस पहन इज्जत से घर जाना है, फिर इज्जत से आना है

यह सृष्टि चक्र कुछ नियमों से ही चलने वाला है। जैसे दिन-रात, गर्मी-सी भी सभी अपने समय पर चलती है. वैसे यह सृष्टि ड्रामा भी कायदे से चल रहा है। अब है रात के अन्त और दिन के आरम्भ का संगमयुग। यह है – परिवर्तन का समय । मनुष्य संख्या की वृद्धि भी दिखाती है कि अब अन्त है। लास्ट जन्म है। यानी इस जन्म में नई कलम लगाने का कार्य कर सकते हैं। बाप भी फिर ऐसे समय पर आते हैं। तो समय अनुसार सब काम करना चाहिए। दुनिया बदलती है तो अपने को भी बदलना चाहिए। नये से पुराना आहिस्ते-आहिस्ते होता है, अब फिर नया बनना है। नया खाता चाहिए पवित्रता का, तो पुराना पापों का खाता बदलना है। ये है सब बुद्धिबल से। तो बाप कहते हैं मुझे और शान्तिधाम को याद करो जहाँ तुमको जाना है। जैसे एक्टर एक्ट कर फिर घर के कपड़े पहन वापस जाते हैं। अब हमारे घर की ड्रेस है – अशरीरी । देह का संबंध यहाँ मिला। अब अशरीरी होकर चलना है। फिर जब नई दुनिया में आयेंगे तो इस बल से आयेंगे जिसमें सदा काल का सुख होगा। अब सिर्फ ख्याल रखना है वापस जाने का। तो अब पुराने खाते को योगबल से दग्ध करना है। नहीं तो जाने में दिक्कत पड़ेगी। हम जायेंगे भी इज्जत से, तो आयेंगे भी इज्जत से। तो अब श्रेष्ठ कर्मों का बीज डालना है। सब बातों का अलग-अलग समय है। जैसे खेत में भी बीज डालने का, उसकी सम्भाल करने का, फिर फल प्राप्त करने का सबका समय अलग-अलग है। अभी का यह जन्म दुर्लभ है। अभी ही नई केलम लगानी है। बाकी सजा खाकर इनसल्ट से जायेंगे, तो आयेंगे भी इनसल्ट से। यह ज्ञान-योग मशहूर है। इसका फल हे 16 कला सम्पन्न बनना । तो इस जन्म को और समय को बहत सम्भालना है। फिर तो बीज बोने का समय नहीं है। यह एक जन्म का पुरुषार्थ हैं, फिर अनेक जन्मों की प्रालब्ध है। अच्छा ।

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