ज्ञान सरिता
भाग-1
दैवीगणों की धारणा में कमी आने का मूल कारण इगो (अहंकार)
यह बेहद की यूनिवर्सिटी है, जिस यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाला प्रोफेसर सुप्रीय टीचर परमात्मा है। भले ये प्यारे सुप्रीम फादर का घर भी है परन्तु साथ-साथ युनिवर्सिटी भी है तो आप सभी इस समय गॉडली स्टूडेन्ट बन कर सुप्रीम टीचर द्वारा इस ज्ञान-योग की पढ़ाई पढ़ रहे हो। इस पढ़ाई से लाइफ के लिए सच्ची राह मिल जाती है, जिस राह से रुह को राहत मिलती है। ये नॉलेज हमे राईट और रांग की बुद्धि देती है। दिव्य बुद्धि अर्थात् जो राइट और रांग की जजमेन्ट करे। आज मनुष्य की बुद्धि राइट और रांग की ही जजमेन्ट करने में असमर्थ है। अपनी-अपनी मत से एक कहेगा ये राइट, दूसरा कहेगा कि ये राइट राइट को रांग कर देते, रांग को राइट कर देते हैं। लेकिन ये नॉलेज जो वास्तविक सत्य है, उसी सत्यता का फौरन जजमेन्ट देती है। कैसा भी कर्म करते हैं, कैसी भी चाल चलन कोई चले, राइट रांग की जजमेन्ट मिलती है। जैसे हंस खीर और नीर दोनों को अलग कर लेता। रत्न चुग लेता है, कंकड़ छोड़ देता है। तो यह नॉलेज हमको हंस बनाती है। राइट रांग की यथार्थ पहचान देती है। दृष्टि-वृत्ति में स्वयं को और औरों को फील होता है कि ये जिस दृष्टि से देखता है वह रुहानियत से देखता, प्रेम से देखता, सद्भावना से देखता या इसकी दृष्टि वृत्ति कैसी है? यदि अपवित्रता की दृष्टि होगी तो भी अन्दर रियलाइज होगा। यदि किसी के लिए नफरत होगी तो भी उसकी दृष्टि से मालूम हो जायेगा कि ये किस दृष्टि से मुझे देखता है। चाहे किसी के लिए दिल में अन्दर कोई फीलिंग होगी तो भी उसके चेहरे से दिखाई पड़ जायेगा तो ये नॉलेज वृत्ति को भी रियलाइज कराती और कौन किस दृष्टि से देखता उसे भी रियलाइज कराती है। हमको नॉलेज मिली है कि तुम आत्मा इस मस्तक पर मणी की तरह चमकती हई बिन्द हो। तुम उस मणी अर्थात बिन्दू को ही देखो और उस बिन्दू में कितने विशेष गुण हैं, कितनी उसमें रूहानियत की शक्ति है, वही देखो। क्योंकि कोई भी बात पहले बुद्धि में आती फिर वृत्ति में चली जाती है। तो वह वृत्ति फिर दृष्टि से काम करेगी। तो यह वृत्ति और दृष्टि दूसरों को कितना प्रेम देती, रिस्पेक्ट देती, दूसरों के प्रति कितनी सद्भावना है ! यह सब नालेज से रियलाइज हो जाता है। यदि अन्दर से कुछ और भावना हो और बाहर से दिखावटी भावना हो तो भी फील होगा। दिल से हम किसको कितना लव देते हैं या कॉमन रूप से लव रखते हैं- इन दोनों का अन्तर यह नालेज ही स्पष्ट करती है। इसीलिए ये नॉलेज हमको हरेक बात में निर्णय शक्ति देती है। तो आत्मिक स्मृति और परमात्म स्मृति का यही आधार है। क्योंकि बुद्धि के क्लीयर होने से ही स्मृति पावरफुल होती जाती है - ये दो सब्जेक्ट (ज्ञान और योग) जीवन के मूल आधार है। जितना-जितना इसकी गहराई में जाते हैं, स्टडी करते हैं, कांसेस में रहते हैं, उतना दैवी गुणों की धारणा होती है, सूक्ष्म संस्कार परिवर्तन होते हैं क्योंकि रियलाइजेशन की शक्ति आ जाती है। अतः सबसे पहले यह नॉलेज खुद को बहुत फायदा देती है।
आज प्रत्येक मनुष्य जीवन में अपनी-अपनी समस्याओं में उलझा रहता है। कभी तबियत ठीक नहीं होगी तो प्राब्लम, परिवार की समस्या आई तो प्राब्लम, आपसी कोई बात हुई तो भी प्राब्लम, जिसकी लाइफ में जितनी प्राब्लम आती, उतना वह मनुष्य मूँझा रहता है। कइयों की लाइफ ऐसी है - ठीक हैं चल रहे हैं, उदास हैं, मूंझे हुए हैं, उनको अपनी लाइफ की वैल्यू नहीं, लाइफ का कोई हल नहीं, कोई ऊंचा आदर्श नहीं, कोई उम्मीद नहीं। लेकिन यह ज्ञान हमें जीवन की हर प्राब्लम का हल देता है। इसलिए आप लोग जितना-जितना इस ज्ञान योग की स्टडी करते जायेंगे उतनी सफलता मिलती जायेगी। जैसे वैज्ञानिक खूब स्टडी करते, नई-नई खोजें करते, सफल होते जाते, अनेक साधन तैयार करते जाते, तो जितनी उसकी गहराई है उतनी इस साइलेन्स की शक्ति वा योग की शक्ति की भी गहराई है। यह बहुत बड़ी शक्ति है, इस शक्ति के आधार से हम अपनी जीवन को जैसा दिव्य बनाना चाहें वैसा बना सकते हैं।
२-श्रेष्ठ कर्म के लिए सबसे पहले चाहिए दैवी गुणों की धारणा। दैवी गुणां की धारणा में कमी आने का मूल कारण है इगो (अहंकार)। अनुभव कहता ज्ञान बहुत सुन लो, योग बहुत अच्छा लगाओ बाबा को प्यार करो परन्तु अगा अन्दर में इगो है तो वह सब बातों को ढक देगा, नुकसान कर देगा। सबसे पहले हमने देखा कि पिताश्री जिनके पास नालेज की इतनी बड़ी अथॉर्टी थी इतनी हम बच्चों से मेहनत करते, समझाते लेकिन मैने कभी उनके व्यवहार में इगो नहीं देखा। इगो अभिमान पैदा करता। ईर्ष्या भी पैदा करता क्योंकि देह अभिमान से इगो आता, नशा चढ़ता है। हमें कभी इगो न आये उसकी अनेक युक्तियां बाबा ने बताई हैं। पहले तो हमारी बुद्धि में रहता इस ज्ञान की पढ़ाई में मैं सदैव स्टूडेन्ट हूँ, जितना हम पढ़ाई करें उतनी थोड़ी है। दूसर सब समझते हम सब स्टूडेन्ट पढ़ाई पढ़ रहे हैं। मैं होशियार हूँ, यह मैं कभी नहीं सोचती। मेरे से बहुत होशियार हैं। जितना जो होशियार है मुझे उनसे सीखना है। हर एक कोई किसमें होशियार है, कोई किसी बात में होशियार है, मुझे हर एक से स्टूडेन्ट बन गुण ग्रहण करने हैं, स्टडी करनी है इतना होशियार होना है, चाहे कोई छोटा काम करता, चाहे बड़ा करता है। चाहे कोई भाषण करता, चाहे कोई कर्मणा सेवा करता लेकिन वह कितना उस बात में परफेक्ट है, मुझे उसकी परफेक्शन अपने में लानी है। जब में बुद्धि में रखती कि हा बात में मुझे परफेक्ट होना है तो कौन किस बात में परफेक्ट है, वह मुझे देखन है। तो हर एक से मैं विशेषता उठाती हूँ। ऐसा नहीं सोचती कि यह ऐसा है वैसा है। मैं होशियार हूँ या मैं यह नहीं सोचती दादी हूँ। हम सदैव स्टूडेच हैं। कोई का कैसा भी व्यवहार है, चलन है, दृष्टि-वृत्ति है, हमें उनसे सीखन है। बाप शिक्षक है पर हम हर एक से शिक्षा लें तो हमारी दृष्टि ऐसी रहती जिससे न खुद में इगो आता, न कभी किसी के लिए नफरत आती है। यह भी फाइन है, गुड है, इनसे यह अच्छाई लेनी है, बुराई नहीं लेनी है। इगो बुराई पैदा करती है। बाबा कहते कभी किसी को बुरे भाव से नहीं देखो। बुराई सबमें हैं तुम बुराई नहीं देखो, अच्छाई देखो। न बुराई को बुद्धि में लाओ। परन्तु यह ऐसी माया है जो किसी की अच्छाई बुद्धि में जल्दी नहीं आयेगी लेकिन बुराई जल्दी बुद्धि में आयेगी। बुद्धि में वह आने से चिंतन चलेगा। चिंतन चलने से दृष्टि जायेगी फिर वैसा व्यवहार होगा फिर अन्दर का प्यार टूट जायेगा। लेकिन यदि सबके लिए सद्भावना है तो उससे जो भी शुभ है, वह लेना है अशुभ नहीं। तो यह नालेज अथवा योग हमको श्रेष्ठता, अच्छाई वा ऊंचाई लेना सिखाता है। श्रेष्ठता लेना ही गाडली स्टूडेन्ट बनना है। सिर्फ कोर्स पूरा किया माना मैं स्टूडेन्ट हूँ। छोटे वा बड़े जिसमें जो विशेषता है वह लेना - इसका ही नाम है गॉडली स्टूडेन्ट।
बाबा गुणों का भण्डार है। परन्तु देवतायें भी सर्वगुण सम्पन्न हैं। हमें बाप समान बनना है तो हमें इतने गुण धारण करने हैं, सभ्यता से चलना - यह भी बहुत बड़ा गुण है। सभ्यता वाले मधुर बोलेंगे, धीरे चलेंगे। काम करेंगे तो बहुत प्यार से, देखेंगे तो भी सम्मान से। सभ्यता लॅव सिखाती, रिस्पेक्ट देना सिखाती, मधुरता सिखाती है। हर बात में सभ्यता की दरकार है। यह श्रेष्ठ मैनर्स हैं। सभ्यता वाले के पास इगो नहीं आता है।
इगो तब आता है जब दूसरे को बुरा देखते, छोटा देखते हैं। परन्तु जब हम सब स्टूडेन्ट हैं तो न कोई छोटा है, न मैं बड़ी हूँ, हम सब एक परिवार के हैं। परिवार के नाते प्यार है, स्टूडेन्ट के नाते हम सब पढ़ाई पढ़ते हैं, दूसरा बाबा ने हम सबको सेवाधारी बनाया है, हम सब सर्वेन्ट हैं। हमारी मन्सा में विश्व कल्याण की भावना है। हमें तत्वों को भी पावन बनाना है। तो खुद को भी पावन बनाना है। जब हमारी दृष्टि वृत्ति ऐसी पावन बन जाती तो अवगुण की दृष्टि वृत्ति समाप्त हो जाती है। अवगुणों को देखना भी वास्तव में अपवित्र भोजन खाना है। तो हमें मन्सा से भी सेवा करनी है, वाचा से भी सबकी सेवा करनी है तो कर्मणा से भी सेवा करनी है। तन से, मन से, धन से भी सेवा करनी है। गुणों को दान करने की भी सेवा करनी है। अपने-अपने अनुभवों से भी दूसरों की उन्नति के लिये सेवा करनी है। क्योंकि भगवानुवाच है - एक दूसरे को सावधान कर उन्नति को प्राप्त करो। हमे उन्नति की राह में जाना है। जितनी हम अपनी उन्नति करें, जितनी आध्यात्मिक शक्ति की ऊंचाई पर जायें उतना थोड़ा है। जितना हो सके अपने को निरहंकारी बनाओ। ये जीवन का एक बड़े से बड़ा गुण है। जितना निरहंकारी बनेंगे उतना सब बातों में सफल बनेंगे। अगर सब बातों में सफलता लानी है तो इगो को छोड़ना होगा। जहाँ तक जीना है वहाँ तक सीखना ही सीखना है। बाबा की मुरली से हम रोज सीखते हैं। भले कोई किसी भी भाव से हमें देखे लेकिन ज्ञान कहता है तुम सबका सत्कार करो। तिरस्कार क्यों करते हो। तुम जितना दूसरे को रिस्पेक्ट देंगे उतनी रिस्पेक्ट पायेंगे परन्तु यह एक सूक्ष्म भावना भी जो पैदा होती कि यह मेरा रिस्पेक्ट नहीं करता तो यह फीलिंग आना भी अपना नुकसान करना है। इसमें न तो ज्ञान होगा न योग। योग सिखाता है तुम सबका सम्मान करो, रिस्पेक्ट दो - Give respect take respect. कइयों को रहता यह मुझे रिस्पेक्ट दे तो मैं रिस्पेक्ट दूं - यह एकदम उल्टी गाड़ी है। सदैव पहले जितना दे सको उतना दो। रिस्पेक्ट देने से ही लॅव मिलेगा। सिर्फ लॅव देने से लॅव नहीं मिलता, रिस्पेक्ट देने से लॅव मिलता है। लॅव और रिस्पेक्ट जिसके पास यह दोनों विशेष गुण हैं, यह दो पंख हैं वह सदा उड़ती कला का अनुभव करते हैं। कई बार कहने में आता है - मेरा मन बहुत डिस्टर्ब है, मन डिस्टर्ब तब होता जब दूसरे की कमजोरी वा निचाई को देखते। वह न देख तुम उनकी अच्छाई देखो, रिस्पेक्ट दो, प्यार दो। सद्भावना दो तो कभी भी डिस्टर्ब नहीं होंगे। बाबा ने हम सबको देना सिखाया, लेना नहीं सिखलाया है। लेना बाप से है, शक्ति बाप से लो, लेकिन दूसरों को दो। दूसरे से लेना हो तो उनमें जो अच्छाई हो वह लो। फिर दूसरे से जो कर्मों का खाता बनता है, वह नहीं बनेगा। नहीं तो उल्टा कर्मों का खाता बनेगा। फिर कभी बहुत मौज रहेगी, खुशी रहेगी, कभी थोड़े में खुश हो जायेंगे, कभी थोड़े में दुःखी हो जायेंगे, तो खुशी हमारी प्रापर्टी हुई क्या ? यदि आप किसी कारण से अपनी खुशी गंवाते हैं तो यह मिलियन डॉलर गंवाते हैं। दुनिया में तो कई बातें आयेंगी, जायेंगी, यह तो सब होना ही है लेकिन हमें राजयोग सीखकर जीवन में बैलेन्स लाना है। कर्म भी करो तो उसके फल की जास्ती इच्छा नहीं रखो। करते चलो, करते चलो, दूसरों को भी मौज देते चलो, खुशी देते चलो। तो आप भी मौज़ में रहेंगे। खुशी देना कोई डॉलर खर्च करना नहीं है, लेकिन खुशी पैसे, डालर, रूपयों से बहुत बड़ा अमूल्य रत्न है। बाबा ने हमें खुशी दी है। जिसके पास थोड़ा भी इगो रहता, वह न खुद खुश रहता है, न दूसरों को खुश करता है। वो सदैव नाखुश रहेगा, किसी न किसी बात में डिस्टर्ब होता रहेगा। इगो से खुशी खत्म हो जाती है। तो यह राजयोग हमें बहुत बड़ी सूक्ष्म खुशी देता है। हम सिर्फ हैप्पी नहीं, वेरी वेरी हैप्पी हैं। ये है ज्ञान-योग का फल। आप वेरी वेरी हैप्पी रहो - हमारा दिल यही कहता है। एक-एक ऐसे समझे कि मैं आकाश में उड़ रहा हूँ। इतनी खुशी में रहो। क्यों? कौन मिला है हमें ! यह तो हमारे पास नॉलेज है। बाबा कहते मैं तुम्हें डबल वर्सा देने आता हूँ - ब्रह्माण्ड और विश्व दोनों का। और हमें क्या चाहिए ! कुछ नहीं। अगर थोड़ी भी किसी प्रकार की सूक्ष्म इच्छा होगी तो वह खुशी गायब करेगी।
कई समझते हैं लाइफ में अकेलापन लगता है। अरे, आये अकेले, जाना अकेले तो ये अकेलापन कैसा? इतनी सारी विश्व की आत्माओं की स्टेज पर रहते हैं तो अकेले कैसे? स्टेज कितनी बड़ी है, ये दुनिया के ड्रामा का खेल देखो। अकेला क्यों ? इतनी बड़ी दुनिया की फिल्म चल रही है वह देखो। दूसरी बात अकेले रहने में तो बहुत मजा है। एकान्तप्रिय हो जाओ।
कभी कभी पहाड़ों पर जाते हैं तो लगता है यहाँ बड़ी शान्ति है। शान्ति को तो सब प्यार करते हैं तो अकेले में ही तो शान्ति है। फिर अकेलापन क्यों फील होता ? जो समझता है मैं अकेला हूँ शायद उनको शान्ति चाहिए ही नहीं। क्योंकि जहाँ भी दो होंगे वहाँ कुछ न कुछ चूं चूं होगी। इसलिए अकेला ही तो प्रिय है। जब आत्मा और परमात्मा दो हैं तो अकेले तो हुए ही नहीं। बाकी तो अपना परिवार है, स्टूडेन्ट्स हैं, सब एक दूसरे के साथ हैं ही। इसलिए जैसे आत्मा लाइट है ऐसे व्यवहार में भी लाइट रहो तो डबल लाइट हो जायेंगे। डबल लाइट माना ही एवररेडी। जैसे खुशी में डांस करते हैं ऐसे सदा खुशी की डांस करते रहो। डांस एक-दूसरे को खुश करती है। डांस वा एक्टिंग इसीलिए करते हैं ताकि दूसरे भी खुशी में आवें। तो जीवन भी इतना सुन्दर प्रैक्टिकल डांस हो कि दूसरे भी देख खुशी में उड़ते रहें। तो जहाँ भी रहो खुश रहो। जीवन में खुशी सदैव अमर रहे। इस ज्ञान-योग का फल ही है एवर हैप्पी रहना। यह जीवन से कभी खत्म न हो। एवर हैप्पी रहने से एवर पीस में भी रहेंगे। हमें पीसफुल रहना है, क्योंकि बाप सुप्रीम फादर पीसफुल है। कभी भी चेहरे में अशान्ति के भाव न आयें और न ही टेन्शन, वरी, हरी के लिये कोई स्थान हो। इतना बड़ा यज्ञ चल रहा है, कान्फ्रेन्स होती, सेवाएं होती लोग पूछते दादी आपको कोई टेन्शन होता है? मैं कहती हूँ- नहीं, कोई टेन्शन नहीं होता। नो टेन्शन, नो वरी। एवर हैप्पी, एवर पीसफुल। बाबा ने इतनी बड़ी बुद्धि दी, इतना बड़ा परिवार दिया, इतनी बड़ी युनिवर्सिटी दी, इतना बड़ा विश्व दिया है, इतना सारी सृष्टि का खेल देखते। अब किस किस की वरी करूँ ? किस किस का टेन्शन करूँ ? किस बात का टेन्शन करूँ ? मुझे ये बताओ कि आप लोग किस बात का टेन्शन करते हैं? चलो कोई चीज़ रखी है, टूट गई, अब टूट गई तो टूट गई, टेन्शन क्यों करें? किसी का हार्ट फेल हो गया तो हो गया, उसका मैं क्यों टेन्शन करूँ? किसी का एक्सीडेन्ट हो गया तो किसी ने जानबूझ कर तो नहीं किया है, उसका भी टेन्शन क्यों करें? इसीलिए कोई छोट-मोटा नुकसान करेंगे तो कई इतना गुस्सा करेंगे, जैसे गुस्सा करने से नुकसान पूरा हो जायेगा। उस वृत्ति से, न आंख से देखना है, न मुख से बोलना है, न कर्म में आना है तो सदैव बहुत अच्छे उड़ते रहेंगे। बाबा ज्ञान-योग के पंख देकर हमें उड़ाते हैं। जो भी हैं, शरीर सबने लिया है। हर एक का शरीर भी अलग-अलग तरह का होगा, किसी का पूर्ण स्वस्थ शरीर तो होगा ही नहीं। इस दुनिया में किसी को कुछ न कुछ होता ही है। जैसे कोई को कोई बीमारी आती है, बीमारी माना ही दर्द। अगर हाय करूं तो भी दर्द होगा, क्या रोने से पेन निकल जायेगा? उसी से तो उसको समा लो। सहन कर लो। ऐसे किसी के दिल का पेन (दर्द) भले लो, लेकिन दिल को पेन न दो। सबसे बड़ा विकर्म है किसके दिल को पेन (दर्द) देना, दुःख देना। बाबा कहते हैं किसको दर्द नहीं दो। इसका इलाज है स्वीटनेस। किसी का दर्द लेना सच्ची सेवा है। डॉक्टर माना ही सर्वेन्ट। डॉक्टर का अर्थ ही है दूसरे के दर्द को मिटाना। तो हम भी डबल डॉक्टर हैं। किसी के दिल का दर्द लो तो उनके दिल का दर्द कम हो जायेगा। तो यह ज्ञान और योग हमें सभी बातों का प्रैक्टिकल अर्थ सिखाता है। इसीलिए हम कहेंगे कि सदैव समझो हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं, हमें सीखना ही है। न हम बड़े हैं, न कोई बड़ा है, बड़े से बड़ा तो बस बाबा है, हम सब उनके स्टूडेन्ट्स हैं।
दूसरी बात - प्योरिटी, रीयल्टी है। दिल हमेशा रीयल रखो। जिसको टूथ कहते हैं। जितना टूथफुल रहेंगे उतना ही लॅव, रिस्पेक्ट प्राप्त करेंगे। कहा ही जाता है गॉड इज टूथ, टूथ इज गॉड। जितना टूथफुल रहेंगे उतना सबके दिलों पर विजय प्राप्त करेंगे। सच्चाई ही एक साधन है सबके दिलों पर विजय प्राप्त करने का। और सच्चाई अपने दिल को बहुत आराम देती है। कहते हैं आज के जमाने में जो सच्चा रहता है उनको ही सुनना पड़ता है लेकिन मैं इस बात को नहीं मानती हूँ। हम सच्चे हैं तो डरें क्यों? सच्चाई के धर्म को क्यों छोड़े, सच्चाई माना ही धर्म। सच्चे हैं तो धर्म पर हैं। दूसरे के दिलों को जीतना हो तो टूथफुल, पीसफुल, लवफुल बनो। जितना टूथफुल बनेंगे, उतना निर्भय रहेंगे, किसी का डर नहीं रहेगा। नहीं तो मनुष्य एक दूसरे से डरता रहता है। जरूरत नहीं है डरने की। जितना हो सके सर्व के प्रति हारमनी अर्थात् सदभावना रखें। हमारी यह सद्भावना है कि विश्व स्वर्ग बने।
सहजयोगी वह जिसके संस्कार मीठे हों, जो निरहंकारी हों और सब चिंताओं से दूर बेफिकर बादशाह हों
वर्तमान समय सभी का पुरुषार्थ है, कि हम बाप समान फरिश्ता बनें, अव्यक बनें। एंजिल्स सभी को बहुत प्यारे लगते हैं। सभी अनुभव करते हैं कि साकारी से आकारी स्थिति बनने में, एंजिल्स बनने में, उस लक्ष्य को धारण करने में कितना सुन्दर अनुभव होता है ! एंजिल्स की स्थिति कितनी मीठी होती है ! साक्षात्कार में भी सभी को विशेष एंजिल्स का अनुभव होता है। लेकिन हमें आकारी स्थिति के साथ-साथ निराकारी स्थिति का भी विशेष अनुभव करना है। क्योंकि बाप निराकार है, आत्मा निराकार है और हम सबको जाना भी निराकारी दुनिया में है। स्वीट होम को साइलेन्स होम भी कहते हैं। वहाँ से ही विष्णुपुरी का गेट खुलना है। आकारी दुनिया से हम वाया होने वाले हैं। परन्तु वाया होंगे भी तब जब सम्पूर्ण पवित्र बनेंगे। तो एंजिल्स माना ही कम्पलीट प्योर। कम्पलीट प्योर बनकर ही शान्तिधाम जाना है और विद ऑनर जाना है, हम सबकी बुद्धि में यह लक्ष्य है कि हमें ऐसी स्थिति में जाना है जो कोई सज़ा न खानी पड़े। बाबा ने भी कहा कि लक्ष्य रखो तो लक्षण आयेंगे। लक्ष्य ही है हमें बाबा के समान बन, बाबा के पास बाबा के घर जाना है। हम सब आत्माओं का स्वीट होम वही है। कई बार कहते हैं कि शान्ति की गहरी अनुभूति हो। साइलेन्स इज पावर कहते हैं। तो यह साइलेन्स की अनुभूति, साइलेन्स की पावर तब अनुभव होगी जब हमारी यह प्रैक्टिस रहेगी कि हम आत्मा, बिन्दू हैं। जितना जितना हम अपने को निराकारी आत्मा समझेंगे उतना देह का भान मिटता जायेगा। यह देह का भान बहुत मोटा है। एक है देह का अभिमान रखना, एक है देह का भान रखना। तो न देह के अभिमान में रहना है, न देह के भान में आना है। इन दोनों से अपने को मुक्त कर लेना है। इसका नाम है राजयोग। न अहम् का अहंकार चाहिये, न अहम् का अभिमान चाहिये, न अहम् का नशा चाहिये। इस अभिमान से, इस अहंकार से खुद को बहुत-बहुत दूर निरहंकारी बनाना है। निरहंकारी बनने का साधन ही है खुद को निराकारी बनाओ। निराकारी स्थिति में जाने से निरहंकारी, निरहंकारी से निर्विकारी बनेंगे। यदि स्थिति नीचे ऊपर होती है तो इसका कारण ही है कि देह का कोई भान है, उस भान ने ही स्थिति को ऊपर नीचे किया। नीचे आना ही देह का भान है। स्थिति नीचे है माना कोई न कोई तेरे, मेरे, इम्प्योरिटी, लगाव, झुकाव, इच्छा, सूक्ष्म माया के संकल्प-विकल्प में, चिन्तन में, व्यर्थ की फीलिंग है। पहले बुद्धि देह-भान में जायेगी तब कोई बात की फीलिंग आयेगी। अगर रात-दिन बुद्धि में एक ही बात का लक्ष्य रहे कि मुझे अब देह के भान से परे आत्म अभिमानी बनना है तो किसी भी प्रकार की फीलिंग से परे रहेंगे।
बाप से प्यार सभी का है लेकिन बाप समान बनना माना जैसे शिव बाप निराकार है और ब्रह्मा बाप ने भी अपने को आकारी से निराकारी बनाया, ऐसे हम भी फालो कर समान बनें।
इसके लिए एकान्त में विशेष टाइम देकर निराकारी स्थिति में रहने का अभ्यास करने की जरूरत है। कई कहते हैं हम तो बाबा के हो गये, हमको तो बाबा सदा ही याद है। लेकिन यह कोई याद की यात्रा नहीं है। हो गये, यह नशा ठीक है पर याद की यात्रा में रहने के लिए हमें विशेष सूक्ष्म ते सूक्ष्म अपनी बीजरूप स्थिति में रहने की मेहनत करनी है। बीजरूप स्थिति माना जिसमें कोई दूसरे संकल्प विकल्प न हों। अशरीरी हो जायें। एकदम सूक्ष्म निराकारी बन जायें। बीज में सब समाया रहता है। योग में भिन्न-भिन्न पुरुषार्थ करते हैं कि बाबा से रुहरिहान करें, मनन-चिंतन करें, यह भी अच्छी बात है लेकिन साथ-साथ अपनी ऊंची स्थिति बनाने का लक्ष्य रखना है जो खुद को यह अनुभव हो कि बाबा के याद की इतनी मुझे शक्ति है जो इस याद में रहने से मेरे ६३ जन्मों के विकर्मों का खाता क्लीयर, क्लीन हो रहा है। अपना चार्ट देखो कि मैं कर्मातीत स्थिति के कितने समीप हूँ ? आज मैं इस चोले को बदलूँ तो मुझ आत्मा का कितना क्लीयर क्लीन हिसाब है, या अभी तक कोई दाग है? दाग होगा तो कर्मातीत कैसे बनेंगे ? हमें अपनी स्थिति का चार्ट चेक करना है कि कौन सा दाग अभी रहा हुआ है ? जब समय की गति इतनी तेज जा रही है तो समय की गति अनुसार हमारे पुरुषार्थ की गति भी इतनी तेज जा रही है? इस स्थिति में रहने से जो पुराने संस्कार हैं, कमियां है वह सहज परिवर्तन हो जाते हैं। एक है - संस्कार को मिटाने की मेहनत करना, एक है - नेचुरल ऐसी स्थिति बनाना जिससे कि ये संस्कार सहज परिवर्तन हो जायें। हम ओरीज्नल अपनी स्टेज पर आ जायें। मुझे अपनी स्थिति नेचुरल करनी है या मेहनत में ही गंवानी है? मेहनत है, पुरुषार्थ है कि मैं अपने को देखूँ। मैं बाबा समान कहाँ तक बनी हूँ ? ब्रह्मा बाबा, बाप समान फरिश्ता निराकारी बन गये। मुझे ब्रह्मा बाबा समान फरिश्ता कर्मातीत बनना है। एक स्थिति है कि मैं अपने को प्यारा और न्यारा बनाऊं। परन्तु एक है इससे भी परे की स्थिति। हम ऐसे अनुभव करें जो पिछले जन्मों का कड़ा हिसाब है यह हमारे चार्ट में न हो। यह भी रिमार्क कोई न दे कि क्या करें यह मेरा कड़ा हिसाब है, कड़ी आदत है, कड़ा स्वभाव है अगर हम ऐसा जवाब देते रहेंगे तो बाप समान कब बनेंगे? पुराने संस्कार हैं उसी अनुसार माया नीचे ले आती है, कभी फेल, कभी पास होते हैं। हरेक ऐसा दृढ़ संकल्प करे कि इस भाषा को परिवर्तन करेंगे। मेरे कड़े संस्कार हैं, नहीं, मेरे बहुत मीठे संस्कार है - यह भाषा हो। तब कहेंगे सहज योगी। बाबा की तरह हम एक तो बेफिकर बादशाह हैं, चिन्ताओं से दूर हैं, दूसरा इस दुनिया में रखा ही क्या है जो किसी भी वैभव, किसी भी वस्तु, किसी भी व्यक्ति की तरफ बुद्धि जाये। जब किसी में बुद्धि ही नहीं जायेगी तो हम हैं भी अकेले, थे भी अकेले, जाना भी है अकेले, रहना भी है अकेले। यह भी एक बहुत मीठी अपनी अनुभूति होती है। कम्बाइन्ड तो एक बाबा है।
बाबा ने लक्ष्य दिया कि तुम अपने चार्ट में देखो कि मैं निरहंकारी कहाँ तक हूँ ? वह तब होगा जब देह का भान न हो। निर्माणता से निरहंकारी बनते, दिलों को जीत लेते लेकिन इससे भी ऊपर है देह का भी भान न हो। हमें इन सबसे ऊपर जाना है। कई बार पूछते हैं दादी आपका पुरुषार्थ क्या है? मैं एक ही शब्द में कहती हूँ मैं खुद को चेक करती हूँ मेरे चार्ट में मैं कर्मातीत स्थिति के कितना समीप आई हूँ? कौन सा खाता है? अगर कोई भी सूक्ष्म खाता है तो तपस्या से, बाबा की याद में निराकारी स्थिति में रहकर अपने को इन सब बातों से परे ले जाकर खत्म करना है। क्योंकि हमें कर्मातीत होकर विजयी बनना है, नम्बरवन का वरदान लेकर जाना है। अपने चार्ट को देखने की बहुत अच्छी विधि होती। बाबा हमारे सामने है और बाबा ने हमें निराकारी स्थिति का आइना दे रखा है। अपने आइने में अपनी आत्मा को देखो कि इस प्योर आइने में मैं आत्मा कितनी प्योर मणि बन गई हूँ? इम्प्योरिटी का तो सवाल ही नहीं है। उन संकल्प विकल्पों को तो लाना ही नहीं है। अपने को उनसे बहुत ऊंचा ले जाना है। इम्प्योरिटी तो पिछला जन्म था, यह तो नया जन्म है। यह भी आलस्य है जो कहते हैं क्या करें पिछले जन्मों के संस्कार हैं, अभी यह भाषा राजयोगियों की नहीं है। बाबा के समीप रत्नों को यह भाषा नहीं बोलनी चाहिये। यह तो पिछले जन्म की भाषा है। हम तो हैं ही बाबा की मुख सन्तान, प्योर रत्न। बाबा भी कहते तुम ब्राह्मण कुल के हो, मुख वंशावली हो, हमारा जन्म नया है तो इतनी प्योर हमारी आत्मा हो जाये जो किसी भी प्रकार का हिसाब किताब पाप कर्म का नहीं हो तब कहेंगे कर्मातीत। तो यह बहुत सहज विधि होती अपने सामने आइना देखो। सूक्ष्म टी.वी. में अपने सारे चार्ट को इमर्ज करो। फिर क्या अनुभव होता कि मैं आत्मा कहाँ तक प्योर बनी हूँ ? न ममता है, न कोई प्रकार की इच्छा है। जब यह कुछ नहीं है तो न मान है, न अभिमान है। सिर्फ स्वमान है कि हम बाप के समान नम्बरवन आत्मायें हैं। और रुद्र माला की, अपने परमधाम की प्यारी सोल्स हैं, हमें घर जाना है। यह स्थिति एंजिल स्थिति से भी ऊंचा ले जायेगी इसके लिये योग के डीप में जाओ। बिल्कुल पार चले जाओ। सागर के तले में चले जाओ। चोटी में चले जाओ। जिसे बीजरूप कहते हैं। ऐसा लगेगा जैसे मैं आत्मा एकदम लाइट की दुनिया में हूँ। जब ऐसी फीलिंग योग में रहती तो कर्म में भी बहुत शक्ति मिलती है। और फिर दुनिया को भी साइलेन्स का वायब्रेशन मिलता है। तो ऐसा साइलेन्स का वायब्रेशन हमे सारे विश्व को देना है। इतनी साइलेन्स की मेरे पास स्वयं में शक्ति हो जो सामने वाला वह शक्ति ले कर जाये। इसकी ही दुनिया में मांग है। बाबा भी कहते तुम्हें ऐसी स्थिति बनानी है जो दूसरों को साइलेन्स का वाइब्रेशन मिले। हमें विश्व को साइलेन्स का वाइब्रेशन देने का कार्य करना है। प्योरिट के साथ पीस चाहिये। तो एक स्थिति है जैसे कि अतीन्द्रिय सुख में गोपियाँ रही, बाबा से प्यार हो। बाबा से प्यार तो सभी का है, पर बाबा समान हमे बनना है वह स्थिति बनाने की मेहनत करो। तो हमें अब खुद को देखना कि मैं विश्व में शान्ति की कितनी शक्ति फैला रही हूँ? यह फोर्स चाहिये यह संगठन चाहिये, यह सहयोग चाहिये। जब हम खुद डेड साइलेन्स में होंगे तब दूसरों को भी साइलेन्स की किरणें दे सकेंगे। यदि हम स्वयं साइलेंस में नहीं होंगे तो दूसरों को साइलेन्स की किरणें कैसे दे सकेंगे? लाइट माइट की किरणें सभी को देना है। यह मेहनत सबको करनी है। यह पुरुषार्थ करना है, यह लक्ष्य रखना है। बाबा सदा यही कहते हैं कि अपने को इतना देही अभिमानी बनाना है, दूसरों को साइलेन्स की शक्ति देना है जो ऐसे लगे कि मैं आत्मा अलग हूँ, यह शरीर इससे अलग है, मैं इससे अलग हो कार्य कर रही हूँ। आत्मा को प्योर डाइमन्ड बनाना है। यदि कोई कहता कि यह तो मेरा संस्कार है तो यह भी प्योर पेपर पर, प्योर डाइमन्ड पर दाग है। दाग को मिटाना है। कोई दाग नहीं रहे। डाइमन्ड में दाग आया तो डाइमन्ड की वैल्यु चली जाती है। क्योंकि बाबा कहते तुम्हें सच्चा सोना २४ कैरेट सोना बनना है, न कि १४ कैरेट वाला। उसको कहेंगे सतोप्रधान। तो ज्ञान की बातें बुद्धि में बहुत हैं। सेवा के भी प्लैन सभी बहुत अच्छे बनाते हैं, उमंग उत्साह के पंख भी लगाते हैं, खुशियों में भी रहते, बाबा से प्यार भी बहुत रखते, प्योरिटी का भी पुरुषार्थ करते, बाबा के समान बनने का भी लक्ष्य रखते लेकिन उस लक्षण में भी आना है और उनसे भी ऊंचा जाना है। बाबा जीरो, हम आत्मा जीरो और ड्रामा भी आकर जीरो पर पहुँचा है। ड्रामा को भी जीरो पर लाना है। जब चक्कर को जीरो में लायेंगे तब वन, टू थी शुरू होगा।
कई बार कई पूछते हैं - बाबा, विनाश कब होगा ? बाबा कहते तुम अपने से पूछो तुम तैयार हो ? लेकिन अभी तैयार कहाँ हैं। अभी तो छोटी-मोटी बातों में ही सब उलझे हुए हैं! यह छोटे मोटे रोड़े बहुत आते हैं। सागर की लहरें ऐसी हों जो इन सबको अपने पेट में डाल ले। इतना ऊंचा जम्प दो। इसलिये कहते जितना-जितना योग करो, भट्ठी करो उतना ये सब मिट जायें और कम्पलीट बनें।
तपस्या वर्ष में सभी ने तपस्या की और इस वर्ष के लिये सभी को ये विधी दी गई है कि कम से कम २५ मिनट रोज़ तपस्या करो। इस विधि से ही हम सिद्धि पायेंगे। लेकिन विधि को भी विधिपूर्वक करो, न कि अलबेले बनकर। बाबा भी कहते अलबेले नहीं, अलर्ट रहो। तो यह अलर्ट रहने की साधना है। यह साधना सबको अपने सच्चे दिल से, रुचि से करनी है तब हमारी अन्त में तपस्या सफल हो जायेगी। वास्तव में हम सब राजयोगी हैं।
लेकिन योग का अन्तिम चरण लाना है। इतना अपने को योगी बनाना है जो लगे कि योग भी हमारा कितना सुन्दर प्यारा सब्जेक्ट है। न तेरा, न मेरा न ये, न वो कुछ भी नहीं हो। ऐसा लगे सचमुच हम परमधाम घर में है। अब हमें जाना ही है उस घर में। घर जाना है यह आंखों में बसना चाहिये। यह याद रहे। मेरा वर्तमान वह पुरुषार्थ है, लक्ष्य है, इसी पर पूरा ध्यान है। हम सबको वर्तमान समय वह स्थिति बिल्कुल पावरफुल बनानी है। इसमें सब शक्तियां आ जायेंगी। रुहरिहान करो, प्वाइन्ट्स निकालो यह अच्छी बात है ? लेकिन प्वाइन्ट रूप बनने का बहुत ध्यान रखना है। तब ही स्वयं को स्वयं से सन्तुष्टता होती है। यह है योग की सिद्धि। इसका नाम है राजयोग। स्वयं हरेक दिल से यह कहे कि मैं कितना साइलेन्स के टॉवर पर रहता हूँ। जहां कुछ नहीं है। ऐसी भट्टियां, ऐसी तपस्या, ऐसा पुरुषार्थ हरेक अपने अपने सेंटर पर, घर में स्व-उन्नति के लिए करे। स्वयं की शक्ति का स्टोर करने के लिए यह मेहनत जरूर करनी है। ये है प्रेजेन्ट का लक्ष्य, पुरुषार्थ, अनुभव। यह गुप्त मेहनत हम सब गुप्त पुरुषार्थियों को करनी है।
दुआओं का हार ही फूलों का हार है इसलिये सर्व की दुआयें लो और सर्व को दुआयें दो
वर्तमान समय हम बच्चों की पढ़ाई मन्सा की है। सूक्ष्म संकल्प, सूक्ष्म दृष्टि व वृत्ति की पढ़ाई है। दृष्टि-वृत्ति इतनी महीन चीज़ है जिसको पवित्र बनाना है। जिससे ही वायुमण्डल बनता है। वाचा और कर्मणा तो मोटी चीज है हमारी कोई मन्त्र पढ़ने व जपने की पढ़ाई नहीं लेकिन निरन्तर मनमनाभव रहने की पढ़ाई है। अब निरन्तर योगी कैसे बनें ? सर्व बीमारियों की दवा है - निरन्तर योग। जितना-जितना अपनी स्थिति अशरीरी बनाते जायेग है-उतना हमें जीवन के सर्व पहलूओं का हल मिल जायेगा।
आज मैं आशा करती हूँ कि हरेक गॉडली स्टूडेन्ट यह दृढ़ संकल्प लेंगे कि बाबा हम आपका फुल कास्ट ब्राह्मण हूँ, योगी हूँ, आप सतगुरु की श्रीमत पर चलने वाला हूँ। मैं मन्सा-वाचा-कर्मणा सन शोज फादर, टीचर, सतगुरु बनूँगा। हम प्रवृत्ति में बाप का शो करेंगे। जैसे एक गीत है- लेके सहारा बाबा का तो हमारे साथ उस बाप की शक्ति है। उसी ने हमें सर्व शक्तियों का वरदान दिया है। तो ऐसे बाप के हम मास्टर सर्वशक्तिमान् बच्चे हैं - यह है हमारा पहला-पहला निश्चय। इसी निश्चय के साथ हमें विजय का वरदान है। हम हैं वरदानी बच्चे। वरदाता बाप है, उनसे हमें अनेक वरदान मिले हैं। हम वरदानी बच्चे हैं- यह है हमारा दूसरा निश्चय। हम महादानी, महान् दानी हैं - यह वरदान भी बाबा ने हम बच्चों को दिया है, यह भी हमें बड़ा निश्चय है। चौथा निश्चय है कि हम है कल्याणकारी बाप के विश्व कल्याणी बच्चे। जब हमारा कल्याण हो गया है तभी हम दूसरों के कल्याण की सेवा में तत्पर रह सकते हैं। मैं दूसरों के कल्याण में तत्पर रहूँ और मेरा कल्याण हुआ ही नहीं, यह वायदा नहीं है।
हम प्यार के सागर के पले हुए प्यारे बच्चे हैं। हम सब बाबा को कहते - बाबा, हमने इस बेहद की पुरानी दुनिया का सन्यास किया है, हम सन्यासी हैं, वैरागी हैं। हमें अब नई दुनिया में जाना है। हम देवता थे फिर हमें देवता बनना है, यह भी हमें निश्चय है। सफलता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, विजय हमारी हुई पड़ी है। भल कितने भी विघ्न पड़ें लेकिन सफलता हुई पड़ी है - यह भी हमें निश्चय है। अब सवाल है:-
* हम मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं, हमें बाबा ने कहा है प्योरिटी इज दी रॉयल्टी, रीयल्टी। हमारा बाबा एवर प्योर है। तो हम इस पहले वरदान में पक्के बाबा के पवित्र बच्चे हैं? यह है पहला पाठ। हम बाबा की ही आकर्षण में सदा रहते हैं? बाबा जैसा सुन्दर दुनिया में और कोई भी है जो मुझे आकर्षित करे ? बाबा को ही कहा जाता है सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्। आकर्षित करने वाला सुन्दर मेरा बाबा है, मैं उनकी आकर्षण में हँ ? मुझे कोई देहधारी आकर्षित नहीं कर सकता।
* हमारा प्यारा बाबा प्यार का सागर है, हम उनके अति प्यारे बच्चे हैं। प्यार के सागर ने हमें अनेक वरदान दे दिये हैं तो मुझे देखना है मैंने कितने वरदान प्राप्त किये हैं?
* हमें पहला वरदान दिया है कि तुम मेरे पुराने भक्त हो। तुम ही विश्व महाराजन्-महारानी थे अब फिर से बनो। इस वरदान में सब-कुछ आ जाता है। राज्य-भाग्य, राज तिलक सब-कुछ आ जाता है।
कई कहते हैं मेरे को खुशी होनी चाहिये वह नहीं है। मैं उनसे पूछती है बाबा मिला सब-कुछ मिला, बाबा मिला राज्य-भाग्य मिला, बाबा से सर्व वरदान मिले, फिर हमें कौन-सी ऐसी वस्तु चाहिये जिसके कारण खुशी नहीं होती ? फिर कई कहते हैं ग़मी भी नहीं है, खुशी भी नहीं है। तो जरूर बीच में कोई चोर है इसलिये खुशी नहीं। हमारा आधार है बाबा, हमने 'बाबा' अक्षर ही पढ़ा है, इसी बिन्दू में सब-कुछ आ जाता है फिर मुझे खुशी क्यों नहीं? खुशी न रहने के कुछ कारण है:-
१. या तो मंसा की वृत्तियां खराब हैं, २. पुराने संस्कारों पर विजय नहीं है ३. अपने आपको शक्तिशाली, शिवशक्ति नहीं समझते इसलिये सोचते है कि हम इतनी बड़ी मंज़िल पर कैसे चढ़ें? जहाँ हिम्मत है, वहाँ उल्लास है और जहाँ हिम्मत-उल्लास है वहाँ खुशी है।
हम शीतल योगी बाबा के शीतल बच्चे हैं। हम गर्म योगी नहीं हैं। कई हैं जो कर्मयोगी के बदले गर्म योगी बन जाते हैं। जो गर्म होता है वह खुद तो जलता है, दूसरों को भी जलाता है। उससे सेक आयेगा तो दर्द होगा। कई कहते हैं - बाबा, मेरे तो आप, दूसरा न कोई, परन्तु थोड़ा गुस्सा आ जाता है, करते नहीं आ जाता है। क्या बाबा ने इसकी छुट्टी दी है? जब गर्म होते तब निन्दा कराने के निमित्त बनते। कहते हैं बाबा, मैं हूँ तो मास्टर सर्वशक्तिमान् लेकिन मैं अपने को शीतल नहीं कर सकता। गर्म होने की शक्ति यूज़ करते हैं। शीतल नहीं बन सकते। कहेंगे गर्म होने के बिगर काम नहीं चलता। इसी को शायद शक्ति समझते हैं।
कमरे में रखा है शिव बाबा का चित्र और करते हैं आपस में झगड़ा। रुठ जाते हैं। होगा दिल में दर्द, कहेंगे पेट में दर्द है, सिर में दर्द है। देखने वाले देखते, डिस सर्विस के निमित्त बन जाते हैं। क्या ऐसे को हम सन शोज़ फादर, मास्टर सर्वशक्तिमान् या राजयोगी कहेंगे ?
हम गर्म योगी नहीं परन्तु हम शीतल योगी हैं। योगी की काया, दृष्टि, वृत्ति, बोल सब शीतल होगा। शीतलता ही हमारे जीवन का मीठा वरदान है। बच्चों को कन्ट्रोल करना यह हमारा फ़र्ज है लेकिन ताम्बे की तरह लाल-पीला होना यह हमारा फ़र्ज नहीं। अपनी ड्युटी का एडवान्टेज पुराने संस्कारों के अनुकूल नहीं करना है। कई बार कहते हैं जोश जाता नहीं, होश गँवाते हो तो जोश उठता है।
आप सभी से बड़ी गृहस्थी बाबा की है। बाबा के पास अनेकानेक समस्यायें आती है लेकिन बाबा जानते हैं यह ड्रामा है। जो कुछ होता है उसके निवारण का साधन बनाना हमारा फ़र्ज है। परेशान होना फ़र्ज नहीं है। न परेशान होना है, न करना है - यह पक्का कर लो।
कई हैं जो मुँह से कडुवे बोल भी निकालते हैं, गाली भी देते हैं। दूसरों को गाली देने के पहले १०० गाली अपने को दो तो पता पड़े कि कैसे नस-नस में दर्द पड़ता है। उस टाइम अपने को देखो मेरे को अगर कोई गाली दे तो कितना दर्द होगा ? अगर मुझे कोई गुस्सा करे, बुरा बोले तो कितना दर्द होगा? अगर मुझे दर्द होता है तो उसे भी कितना होगा ? हम सबके दुःख-दर्द मिटाने वाले हैं, अगर हम ही दुःख देंगे तो अपने को श्रापित कर रहे हैं। दर्द देना माना बददुआ लेना।
मैं जब सवेरे उठ बाबा की याद में बैठती हैं तो चेक करती है कि वरदाता बाप की वरदानी मूर्त आत्मा हूँ। हमें इन्हीं घड़ियों में बाबा से अनेक दुआयें ले अपने भण्डार को भरना है। बाबा दुआओं से मेरे भण्डार भरता है। मैं ऐसा कोई कर्म क्यों करूँ जो मेरी मिली हुई दुआयें बददुआ हो जायें। मुझे यह संकल्प सदा साथ रहता कि हमें दुआओं से अपनी झोली भरनी है। एक-एक मुझे दुआयें दे, मैं दुआओं को भरकर बाबा के घर जाऊं। आपकी दुआयें बाबा की दुआयें हैं। मुझे हर सेकण्ड आपसे दुआओं का भण्डार लेना है। मुझे दुआ लेनी है, दुआ देनी है, किसी को बददुआ नहीं देनी है। यही पुरुषार्थ का बहुत अच्छा साधन है। सदा यह संकल्प रहे कि हमें सर्व की दुआयें लेनी है तो संकल्प, वृत्ति, वाचा – सब सफल हो जायेंगे। मेरी एक घड़ी भी असफल हुई माना बददुआ। सफलता माना दुआ। यह बहुत ऊंचा पुरुषार्थ है।
आप सब देव हो, आपकी दया ही बाबा की दया है। आप देवों की हमें दया चाहिये। इन देवों की दया हो तो मैं राजाओं का राजा बनूँ। देव बना ही तब है जब सब देवों ने दया की है। हमें सर्व के स्नेह की, आशीर्वाद की दृष्टि मिलती रहे। यही मेरा पुरुषार्थ है।
अगर ज्ञान में आने से कोई रोकता है तो ऐसा रहमदिल नहीं बनो कि उसके कहने से रुक जाओ। लेकिन उसके प्रति भी शुभ भावना रहे कि यह आज नहीं तो कल बाबा का बन ही जायेगा। दया का मतलब है कि मुझे अपने पुराने संस्कारों के वश किसको दर्द नहीं देना है। हम सब दुःख-दर्द हरने वाली देवियां हैं, हमें हारना नहीं है लेकिन हरना है। यह पाठ पक्का हो तो सबके प्रति प्रेम की, दया की, स्नेह की भावना रहेगी। स्नेह के सागर में डूबे हुए हीरे-मोती रहेंगे। नफ़रत नहीं आयेगी। दया करने से उनका कल्याण होगा, नफ़रत से नहीं। हम रहमदिल बाप के रहमदिल बच्चे हैं इसलिये नफ़रत कर नहीं सकते।
बाबा कहता है परचिन्तन पतन की जड़ है। मुझे सदा स्व-चिन्तन में, स्वधर्म में रहना है। हम किसी की चिन्ताओं से चिन्तित क्यों हो ? चिन्ताओं की चिता क्यों बनायें ?
बाबा ने आपके सामने छोटी-छोटी बच्चियां सेवा के लिये रखी हैं। वह कोई सम्पूर्ण नहीं बन गई। आपका काम है उन्हें सहयोग देना। लेकिन कई बार इस अलौकिक परिवार में भी ईर्ष्या बढ़ जाती है – उसने ऐसा किया, इसकी खातिरी की, इसी की राय मानी जाती है, इसको ही बुलाया जाता है, मुझे नहीं। इन बातों के कारण रुस जाते हैं, मूड ऑफ कर लेते हैं। आपका काम है सहयोगी रहना, न कि वियोगी बनना। अगर कोई छोटी-मोटी बात होती है तो उसका वर्णन न करके उसे भी समाने की शक्ति से ख़त्म कर दो, समा लो।
हम ब्राह्मणों का आहार-विहार है सबका सुनना, सबका समाना, सबका सहन करना, सबको स्नेह देना। सबको सहन कराना - यह मेरा आहार नहीं। सहन करना सीखो, सहन कराना नहीं। दृढ़ संकल्प करो। ऐसे नहीं, क्या करें, धारणा होती नहीं..। हम निर्बल नहीं, हम तो महाबलवान बच्चे हैं।
हमें दुआओं का हार चाहिये- यही फूलों का हार है। जो यह हार पहनता है वही बाबा के गले का हार है। मुझे स्नेह की शक्ति सदा साथ रखनी है, वैर की नहीं। प्यार के सागर के प्यार में भरे हुए हम रत्न हैं। प्यार को छोड़कर हमें मटके नहीं सुखाने है। जहाँ प्यार है, वहाँ मटके भर जाते हैं। जहाँ वैर है वहाँ भरे हुए मटके भी सूख जाते हैं।
बाबा ने हम ब्राह्मणों के लिये जो विधान बनाये हैं उनको सदा कायम रखना है। दृढ़ संकल्प करो तो पुरानी बातें सब समाप्त हो जायेंगी। जहाँ संकल्प दृढ़ है वहाँ सब बातों में विजय है। हरेक अपनी प्रवृत्ति को मिनी मधुबन बनाओ। मधुबन जैसी दिनचर्या बनाओ। ऐसा अपना वातावरण बनाओ।
जितनी वानप्रस्थ स्थिति, उतनी स्वीट स्थिति। अगर अभी पुरानी दुनिया से वैराग्य नहीं तो फिर थोड़ेही कर सकेंगे। इसलिये सदा वानप्रस्थ स्थिति में रहो। अच्छा !
परखने की शक्ति से व्यर्थ संस्कारों को परिवर्तन करो
(प्रश्न-उत्तर)
प्रश्नः - संस्कारों को बदली किया जा सकता है या नहीं ? किस आधार से हम परख सकते हैं कि मेरे संस्कार ठीक हैं?
उत्तर:- ज्ञान का अर्थ ही है पुराने संस्कारों को बदलना। हम संस्कारों को ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाते हैं। जहाँ परखने की बात है वह तो सहज है। यूँ तो अपने संस्कारों को जान सकते हैं परन्तु फिर भी समझो नहीं पता पड़ता तो जैसे किसके गुण वर्णन करते हैं- फलाने में यह-यह गुण हैं, तो देखना है मेरे में वे गुण हैं? इसको कहा जाता है अपने को परखना। अगर मैंने अपने संस्कार को जान लिया तो फिर उसको ज्ञान से परिवर्तन करना है। परिवर्तन किया तो उसको कहा जायेगा रियलाइज़ किया। अगर परिवर्तन नहीं किया तो कहेंगे पूर्ण रूप से रियलाइज़ नहीं हुआ है। जिस संस्कार को मैंने रियलाइज़ किया कि यह ठीक है, वह देखना है सबको ठीक लगता है? यदि औरों को वह ठीक नहीं लगता तो उसे ठीक नहीं कहेंगे। हम देखते हैं यह मेरा संस्कार औरों को रुकावट डालता है तो समझना चाहिये इसको बदलना जरूरी है। अब उसको बदलने के लिये ज्ञान की शक्ति चाहिये। एक है अपने से रियलाइज़ करना, दूसरा है कि दूसरे हमको रिजल्ट में राइट नहीं समझते हैं तो रियलाइज़ माना मैं उसको चेन्ज करूँ।
यदि हमारा संस्कार सर्विस का सबूत नहीं देता है तो इसका मतलब कि वह संस्कार हमारा ठीक नहीं है उसको हमें बदलना है। नहीं बदलते तो ज्ञान से रियलाइज़ नहीं किया है। हमें संस्कार को उस दृष्टि व उस अन्तर से देखना है कि सर्विस करता है वा नुकसान करता है।
प्रश्न:- गीता में है इन्सान स्वभाव के वश.. इसका अर्थ क्या है?
उत्तर:- लेकिन वह इन्सान की बात है, हम तो इन्सान नहीं हैं। हम कौन है ? हम हैं ब्राह्मण। हम न इन्सान हैं, न देवता है। इन्सान में सहन करने की शक्ति नहीं है। निंदा-स्तुति, मान-अपमान सहन कर सकेंगे? नहीं। क्योंकि इन्सान अर्थात् देह अभिमान वाले और देवताओं के लिये यह बात है ही नहीं बात है अब हम ब्राह्मणों की। जैसे देखो हम कइयों को कहते हैं कि ज्ञान के बिना कोई यह नहीं सोचता कि काम विकार को वृत्ति से ही जीतना है। हम कहते हैं वृत्ति में भी यह संकल्प न उठे क्योंकि देवताओं में यह वृत्ति नहीं है। तो हम मनुष्य से देवता बनते हैं तो हमारा यह संस्कार पूर्ण रूप से परिवर्तन हुआ ना। बाबा ने युक्ति दी कि ज्ञान सहित भाई-भाई की दृष्टि से देखो तो वृत्ति बदल जायेगी। तो इन्सान के संस्कार को पलटाकर देवताई संस्कार बनायें ना। हम यह पुरुषार्थ करते हैं और ज्ञान सहित वृत्ति से भी इस संस्कार को बदल देते हैं ना। ऐसे देखो अब बाबा हम बच्चों को बहुत सूक्ष्म ले जाता है। बाबा कहते - बच्चे, किसी भी प्रकार की आपमें अटैचमेन्ट नहीं चाहिये। ब्रह्मा में भी न हो। तो जैसे बाबा एकदम देह की अटैचमेन्ट से हम बच्चों को परे ले जाते हैं। देहधारी का सहारा भी नहीं। हम कहते कारोबार में तो एक-दो का सहारा तो चाहिये ना, परन्तु नहीं। बाबा कहते- बच्चे, इनसे भी परे। क्योंकि बाबा जानते हैं आत्मा देह में है तो उनका यह संस्कार है। तो बाबा हमें उनसे भी ऊंचा ले जाते कि बच्चे सहारा एक शिवबाबा का। तो देखो बाबा हमारा यह संस्कार भी बदल देते हैं ना कि किसी भी प्रकार से कोई देहधारी की याद न आये। एक शिवबाबा के सिवाए और किसी की भी याद न रहे।
कभी बात करते-करते आपस में समझो कोई ऐसा शब्द निकल जाता है तो फौरन उस समय हम बोलेंगे, ऐसा भी यह हमारी भाषा क्यों निकली ? कभी कोई कहते हमें तो सहन करना पड़ता है, चलो सहन भी किया फिर कह देते आखिर भी हम कितना समय सहन करेंगे आदि...
परन्तु हम कहते हैं यह भी भाषा अब क्यों होनी चाहिये फिर भी तो हम सागर के बच्चे हैं। सागर में तो सब समा जाता है। तो हमारे में सब समा जाना चाहिये। आत्मा में यह जो फीलिंग आती है कि कब तक सहन करूँ - यह भी निकल जानी चाहिये। मैं सहन करती नहीं हूँ। भले ही रांग राइट क्या भी है, वह भले बताऊं। उसको समझकर मैं किनारा कर दूँ। बाकी यह जो समझते हैं मैं कितना सहन करूँगी, कब तक सहन करूँ ऐसा समझने से दिल भरती जायेगी। तो मैं ऐसे अपने दिल को क्यों भरूँ? हम तो सागर के बच्चे मास्टर सागर हैं, सब समाते जायें। ऐसा न समझें हम सहन करते हैं।
मैं तो समझती हूँ- अभी हमें यह भी नहीं समझना चाहिये कि मैं पुरुषार्थी हूँ, हम तो मास्टर सम्पूर्णता के सागर हैं, मैं तो अब समय के समीप पहुँची हूँ। फरिश्ता स्वरूप मेरे सामने खड़ा है। बाबा मुझे उस सीट पर देखना चाहता है तो मैं अब ऐसे न कहूँ कि ८०% हूँ, मुझे सर्टीफिकेट लेना है तो मैं अब ९०-९५% हूँ। बाबा कहते हैं अब तुम्हारी सम्पूर्णता की स्टेज चाहिये। बाबा कहते अब तुम एन्जिल हो और मैं कहूँ कि नहीं मैं पुरुषार्थी हूँ - ऐसा क्यों ? हाँ, मैं यह ध्यान रखूँ, बाबा जो एन्जिल के चिन्ह व गुण बताते हैं, मैं उसके ऊपर चलूँ।
प्रश्नः- कई बार ऐसे होता है कि अपने को परख भी लेते परन्तु फिर निर्णय नहीं कर सकते। उसको क्या कहा जाये ?
उत्तर- इसे ज्ञान की कमी ही कहेंगे। इस कमी को भरने के लिये रोज जो बाबा की मुरली, बाबा की शिक्षायें, समय-समय पर जो बाबा युक्तियां बतलाते हैं उन्हें स्वयं प्रति समझकर उसकी गहराई में जाओ। लक्ष्य हो कि यह बाबा का एक-एक रत्न मुझे प्रैक्टिकल में लाना है। इस प्रकार अटेन्शन रखने से भी कमी भर सकती है।
ज्ञान की कमी को भरने के लिये जो शक्ति चाहिये उसके लिये मैं समझती हूँ एक तो बाबा की मुरली बहुत जरूरी है और दूसरा जो ऐसा शक्तिशाली हो उसके संग से भी खुद में शक्ति भर सकते हैं। जितना जितना उसके संग में कर्तव्य करते जायेंगे तो अपने में शक्ति भरती जायेगी। हरेक कमजोरी को मिटाने के लिये मैं समझती हूँ रूहानी नशा जरूर चाहिये।
प्रश्न:- अपने में निर्बलता व कमजोरी उत्पन्न ही न हो उसके लिये क्या करना चाहिये ?
उत्तर- इसके लिए अमृतवेले के योग और मुरली पर पूरा-पूरा ध्यान दो। कभी भी किसी भी कारण से यह मिस न हो। दूसरा-कभी भी अपनी कमजोरी का वर्णन न करो, सदा अपनी हिम्मत को देखो। अपनी हिम्मत पर निश्चय। निश्चय और बाबा-बाबा की धुन लगी हुई हो तो निर्बलता का खात्मा होता जायेगा। मेरा बाबा बैठा है। हर बात में मुझे बाबा जरूर मदद करेगा। बस, बाबा बैठा है फिर क्या।
दृढ़ संकल्प कमजोरी को मिटा देता है। दृढ़ संकल्प करो कि मुझे करना है तो देखो कर लेंगे। दृढ़ संकल्प ही सब कमजोरियों को मिटा देता है। दृढ़ संकल्प करो मुझे करना है तो कर लेंगे। दृढ़ संकल्प किया कि हमें स्वराज्य लेना है तो ले ही लिया नाः। हम तो सर्वशक्तिमान् बाप के बच्चे हैं, हमारा दृढ़ संकल्प है हमें विश्व का कल्याण करना ही है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। है सारी दृढ़ संकल्प की बात।
बापदादा की प्रेरणाओं को कैच करने का साधन है प्योरिटी
बाबा हम बच्चों को याद की यात्रा में रहने की अनेक प्रेरणायें देते रहते हैं। अन्तःवाहक शरीर से सेवा करने के लिये स्वयं की भी ऐसी स्थिति तैयार करनी है। बाबा का रोज़ हम बच्चों के प्रति यही इशारा है, यही सूक्ष्म अभ्यास हरेक को बढ़ाना है। तो हरेक कौन-सा सूक्ष्म पुरुषार्थ करते हो ? प्योरिटी पर ही सारा मदार है। प्योरिटी है तो लाइन क्लीयर है। बाबा की जो भी प्रेरणायें हैं वह हम तभी कैच कर सकते हैं जब सूक्ष्म में भी प्योरिटी की धारणा है। अगर प्योरिटी नहीं तो हम अपनी प्रेरणा न तो वहाँ तक पहुँचा सकते हैं और न प्राप्त ही कर सकते हैं।
हरेक अपने से पूछे कि हम बाबा के पास किसलिए आये हैं? हम सब यहाँ आये हैं योग कमाने। योग ही हमारी पढ़ाई का सार है। जिसको बाबा कहते मनमनाभव। गीता के भी आदि और अन्तिम यही महावाक्य हैं। तो हमें प्रतिदिन यह चेक करना है कि मेरा घाटा और फायदा कहाँ तक है? कितना हमने योग बल जमा किया ? रोज अपने से पूछो कि मैं यहाँ किसलिये बैठा हूँ ?बरोबर मेरी यह कमाई हो रही है। वह शक्ति बढ़ती जा रही है या घटती जा रही है? योगी के लिये फर्स्ट है प्योरिटी। तो प्योरिटी की सब्जेक्ट में कितनी मार्क्स हमने जमा की है? चेक करना है कि योग के बीच कोई विघ्न तो नहीं आता है? जैसे बाबा ने कहा तुम बच्चे यहाँ आये हो अपनी झोली भरने लेकिन देखना झोली में छेद तो नहीं है? लीक तो नहीं होती ? अगर प्योरिटी की वृत्ति सूक्ष्म कम्पलीट होगी तो लीक हो नहीं सकती। इसके लिये सदैव भाई-भाई की स्नेह की वृत्ति चाहिये। अगर हम कहते हैं कि हम प्यार के सागर के बच्चे हैं तो अपने से पूछो कि हम कहाँ तक प्रेम स्वरूप बने हैं ? हम आत्मा स्नेह स्वरूप हैं। अगर स्नेह की सब्जेक्ट में जरा सी लीकेज़ होगी तो बाप से स्नेह की लाइन टूट जायेगी। स्नेह की लाइन आपस में भी टूटी तो अन्दर वह ठक-ठक करती रहेगी। फिर योग की वा स्नेह स्वरूप की अनुभूति हो नहीं सकती। इस बार बाबा का यही एक मीठा बोल था कि बच्चे, तुम्हें हर प्रकार से रिटर्न देना है और रिटर्न जर्नी पर चलना है। बाबा ने जो दिया है – ज्ञान, प्यार, शक्तियां... उन सबका रिटर्न दो और रिटर्न अर्थात् वापस चलने की तैयारी करो। इसके लिये मुख्य है समेटने की शक्ति। अब इस शक्ति की परसेन्टेज को बढ़ाओ। देखना है कि हम घर जाने के लिये कम्पलीट रेडी हैं? बाबा ने जो ऋण दिया है वह रिटर्न कर रहे हैं तथा रिटर्न जाने की तैयारी कर रहे हैं? यही चार्ट चेक करो। हम यहाँ आये हैं योग कमाने। योग का चार्ट बढ़ाते-बढ़ाते हमें कर्मातीत बनना है। तो अपने से पूछो – कर्मातीत बनने के लिये हमारे सारे हिसाब चुक्तू हो गये हैं?
कोई भी पंछी किसी भी घड़ी उड़ सकता है? इस श्वास का कोई भरोसा नहीं। इसलिये हमेशा अपना खाता कम्पलीट कर रखना है। बाबा हम बच्चों के तकदीर की जितनी महिमा करता, उतना हमें भी दिन-रात यही योग कमाने की फिक्र रहती है या अलबेले रहते हैं? अगर योग का अनुभव होगा तो अतीन्द्रिय सुख में मस्त रहेंगे। कर्म तो करना ही है, लौकिक में भी कर्म करते हैं और अलौकिक में भी कर्म करते हैं परन्तु अन्तर क्या है? कर्म में रहते मेरे योग का पोतामेल क्या है ? यह चेक करना है। हम यहाँ कर्म के लिये ही नहीं बैठे हैं। हम बाबा के बने हैं- भविष्य २१ जन्मों की प्रालब्ध जमा करने, योग का चार्ट बढ़ाने। अगर हमारे योग का चार्ट ठीक है तो हम अपने पुरुषार्थ से सदा सन्तुष्ट रहेंगे। नहीं तो कहेंगे चल तो रहे हैं, निभा तो रहे हैं... उस मस्ती से नहीं बोलेंगे। तो खुद से पूछना है कि मेरी चढ़ती कला कहाँ तक है ? उसमें कोई लीकेज़ तो नहीं है? अच्छा।
ओम् शान्ति।
दादी हृदयमोहिनी जी
स्नेह और शक्ति, सरलता और गम्भीरता की सजीव मूर्त दादी हृदयमोहिनी जी को बाल्यकाल से ही ईश्वरीय स्नेह में लवलीन रहने की विशेष अनुभूति प्राप्त हुई है। आपने ईश्वर पिता से दिव्य दृष्टि का विशेष वरदान पाया है। सदा निश्चित तथा ईश्वरीय रस में सदा मग्न आपका जीवन अनेक दिव्य विभूतियों से सम्पन्न है। प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के उपरान्त निराकार शिव परमात्मा ने आपके रथ (शरीर) को अपना साकार माध्यम बनाया है। देश-विदेश की रुहानी सेवा पर सदा तत्पर दादी हृदयमोहनी जी की कुछ क्लासेज का सार यहाँ पर लिख रहे हैं जिसमें आपने बहुत से गुह्य दिव्य रहस्यों को अपनी मधुर वाणी एवं सरल शब्दों से स्पष्ट किया है। पाठकगण इन्हें पढ़कर पुरुषार्थ की तीवता द्वारा अपने लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकेंगे।
विदेशी भाई बहिनों के कुछ प्रश्न - दादी हृदयमोहिनी जी के शब्दों में उत्तर
प्रश्नः- अशरीरी, फरिश्ता और बीजरूप अवस्था में क्या अन्तर है? इन अवस्थाओं का अनुभव कैसे कर सकते हैं?
उत्तर- सबसे पावरफुल और फर्स्ट स्टेज है बीजरूप बनना। बीजरूप अर्थात् जैसे वृक्ष का बीज होता है, सारे वृक्ष में टाल टालियां फल फूल की ताकत अपनी-अपनी होती लेकिन बीज में सब शक्तियां इक्ट्ठी और मर्ज रूप में होती हैं। ऐसे ही जब हमारी बीजरूप स्टेज होती है, उसमें दूसरी सब स्थितियां लाइट हाउस, माइट हाउस, सर्वशक्ति सम्पन्न स्टेज या फरिश्तापन वा रुहरिहान की स्टेज सब बीजरूप स्थिति में समाई हुई हैं। जिस समय हम बीजरूप स्थिति में स्थित होते हैं उस समय सर्व शक्तियां, सर्वगुण, सर्व सम्बन्ध सबका रस हमारे में भरा होता है। इमर्ज रूप में नहीं होता। इमर्ज रूप में तब हो जब कर्म या वाणी में आयें। रुहरिहान में संकल्प द्वारा बाबा से बातचीत करते हैं। बीजरूप स्टेज में सर्वशक्तियों का सार है। सर्व स्थितियों का सार रूप जो है वह बीजरूप है। बीजरूप स्थिति में हम यह नहीं कह सकते कि इस स्थिति की अनुभूति कम है। उस समय फीलिंग आयेगी जैसे सर्व प्राप्तियों का स्वरूप हैं। सब कुछ बीजरूप स्थिति में समाया है।
अशरीरी स्टेज अर्थात् शरीर के भान से परे। शरीर का भान अपने तरफ न खींचे। लेकिन अशरीरी स्थिति के बाद ही हम बीजरूप स्थिति वा फरिश्ता-पन की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं। अशरीरी बनें तो फरिश्ता बनकर काम-काज करते कर्मयोगी रहेंगे। कर्म का बन्धन है तो न चाहते भी वह अपनी तरफ खीचेंगा। तो बंधन माना फंसना, परवश हो जाना। लेकिन कर्मयोगी बनकर कर्म के सम्बन्ध में आना यह है ब्राह्मण जीवन। जब कर्मक्षेत्र पर हैं, कर्मेन्द्रियों का आधार लिया तो कर्म के बन्धन से अतीत होंगे, कर्म से नहीं। अशरीरी होकर हर कर्म में आयेंगे। फरिश्ता रूप में कर्म करते हर कर्म से न्यारे रहेंगे। फरिश्ता अर्थात् जिसका देह और देह के सम्बन्ध व पदार्थों से रिश्ता न हो। तो हम अशरीरी बनकर शरीर के आकर्षण से परे होकर जो कर्म करते हैं वही फरिश्ता स्टेज है। फरिश्ता माना बंधन से परे। फरिश्ते को लाइट की काया है। तो फरिश्ता स्टेज में हड्डी मास के शरीर का भान नहीं होता है। हम इससे न्यारे डबल लाइट होते हैं। अगर हम अशरीरी होकर बीजरूप स्थिति में स्थित होते हैं तो लगता है जैसे कि बाबा के बिल्कुल समीप परमधाम में ऊंची से ऊंची स्थिति, ऊंचे स्थान से बाबा के साथ लाइट माइट की किरणें सूर्य के माफिक चारों ओर फैला रहे हैं। बीजरूप स्टेज जैसे ऊंचे से ऊंची प्वाइन्ट है। बाबा के समीप समान है, उसमें सब रस भरे हुए हैं। बीजरूप स्टेज ज्यादा टाइम नहीं रहती है, थोड़ा टाइम रहती है फिर फरिश्ते रूप में या मनन में आ जायेंगे। बीजरूप स्टेज पावरफुल बाप समान स्टेज है उसमें इतनी लाइट माइट होती जो कि विकर्म भस्म हो जाते हैं। यह थोड़े समय की स्टेज भी बहुत मदद देने वाली है। एक दो घण्टे भी उस स्टेज का अभ्यास करो तो आटोमेटिक वह स्टेज अपनी तरफ खींचती रहेगी। उसकी मदद से जैसे उपराम होंते जायेंगे। कर्म करते भी करावनहार बाबा याद रहेगा। लेकिन बीजरूप वा फरिश्ता रूप स्टेज का अनुभव करने के लिए अशरीरी तो बनना ही पड़ेगा।
प्रश्नः- हमने सुना है कि आपको कभी अशुद्ध संकल्प नही आते हैं। अशुद्ध संकल्पों से हम कैसे फ्री हो सकते हैं?
उत्तर- अशुद्ध संकल्प तब आते हैं जब मार्जिन हो। हमने कभी अशुद्ध देखा ही नहीं है, अशुद्ध का अनुभव ही नहीं है और साथ-साथ बाबा का वरदान भी है। बचपन से हम बाबा के पास आ गये। शुद्ध का अनुभव ज्यादा है इसलिए वह खींचता है। बाकी ऐसे नहीं है कि कोई कमी ही नहीं है। पुरुषार्थ तो रहता ही है। बाकी अशुद्ध तब आता है जब बुद्धि फ्री होती है। जिन्होंने शुरू से लेकर बाबा की पढ़ाई पर, श्रीमत पर पूरा अटेन्शन दिया है, बुद्धि को बिजी रखा है उनके पास अशुद्ध संकल्प आ ही नहीं सकते। बिजी हैं तो दूसरी चीज़ आने की फुर्सत ही नहीं। बुद्धि को बिजी रखो तो माया वा व्यर्थ संकल्प विकल्प आ नहीं सकते। जो बाबा ने सुनाया है उसकी गहराई में जाओ, अन्तर्मुखी होकर उस पर मनन करो। इधर उधर की बातों में इन्ट्रेस्ट न हो, संग से सम्भाल करो। अपना टीचर स्वयं बनकर अपने आपको रोज़ होमवर्क दो। तो व्यर्थ वा अशुद्ध संकल्प से बचे रहेंगे। बाबा तो हमारा टीचर है ही लेकिन बाबा ने जो पढ़ाया है उसको अपने जीवन में उतारना अर्थात् अपना टीचर आप बनना, अपनी चेकिंग आप करना। जो अपने आपका टीचर बनता है वह सदा बिज़ी होने के कारण दूसरी सब बातों से फ्री हो जाता है।
प्रश्नः - बापदादा जब आपके तन में आते हैं तो बापदादा के आने के पहले का, बापदादा जब तन में होते हैं, उस समय का और जब चले जाते हैं उस समय का आपका अनुभव क्या है ?
उत्तर:- जब बापदादा को आना होता है तो प्रोग्राम अनुसार हम यहाँ आकर बैठते हैं, उस समय जैसे हम ट्रांस में जाते हैं, वैसे ही ट्रांस में जाते। उसमें अपनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। योग में तो हम अपने पुरुषार्थ से बुद्धि को एकाग्र करते हैं लेकिन ट्रांस में अपनी मेहनत नहीं होती। सिर्फ बुद्धि को निरसंकल्प बनाना पड़ता है। जब तक हमारी बुद्धि में कोई संकल्प होता तब तक गुम नहीं हो सकती। ट्रांस माना गुम हो जाना। इसलिए जब हम यहाँ बैठते हैं जिस समय बाबा को बुलाना होता है उस समय गुम हो जाती। जब ट्रांस में जाने लगती तो मालूम पड़ता है कि हम गुम हो रही हैं। गुम होते-होते जिस समय अपनी एकदम विस्मृति हो जाती, उस समय पता नहीं पड़ता। गुम होने के बाद कभी सीधा अपने को सूक्ष्मवतन में देखती हूँ, कभी-कभी रास्ते की फीलिंग आती है। ऐसे लगता है जैसे बादलों से पार होकर जा रहे हैं। यह साकार शरीर तो भूल जाता है लेकिन आकारी शरीर में अपने को देखती हूँ और आकार वतन में बाबा के सामने अपने को देखती हूँ। पहले थोड़ा बहुत मिलन होता है। बाबा को भी पता है- बच्चों से मिलने जाना है। फिर जिस समय बाबा प्रवेश होते हैं उस समय के बाद मुझे अपना पता नहीं होता है फिर मैं न अपने को सूक्ष्मवतन में देखती हूँ, न परमधाम में। अपने शरीर का कोई कानसेस भी नहीं होता। जितना टाइम बाबा होता है, उतना टाइम हमारी स्टेज जो होती है वह जैसे लौटने के बाद वर्णन कर सकती हूँ। जितना समय उस स्थिति में हूँ उतना टाइम पता नहीं पड़ता। मैं गुल्जार हूँ, या मेरे तन से बाबा काम करा रहा है, इससे बात कर रहा है, इससे मिल रहा है. यह कानसेस नहीं होती। उस समय जैसे स्मृति का स्विच ऑफ है। फिर लास्ट में जब बाबा वतन में जाते हैं तो फिर मिलन होता है, उस समय लगता है कि बीच का टाइम मेरे से मिस हुआ। जिस समय फिर से मिलन होता है उस समय ऐसी फीलिंग आती है जैसे नींद से उठने के बाद नींद का अनुभव होता है। ऐसे लगता है जैसे एकदम स्वीट साइलेन्स की स्टेज से बहुत मीठी स्टेज से नीचे आई हूँ। यह भी नहीं कोई घूम कर आई हूँ, सैर करके आई हूँ या कोई से बातचीत करके आई हूँ, नहीं। ऐसे लगता जैसे ऊपर से नीचे आई हूँ इसलिए मुझे कुछ थकावट नहीं होती है। जिस समय बाबा शरीर में है। शरीर सेवा करता है, आत्मा भी जरूर अन्दर ही होगी, बाहर तो इतना टाइम निकल नहीं सकती। लेकिन जैसे रेडियो टी.वी. का चैनल होता है। जिस चैनल का स्वीच खोलेंगे वही आयेगा। ऐसे ही मेरी समझ का चैनल आफ होता है, हमको स्मृति नहीं रहती, पता नहीं होता कि बाबा इतनों से मिला। टाइम का भी पता नहीं पड़ता है। लेकिन स्वीट साइलेन्स की स्टेज बहुत प्यारी लगती है इसलिए आप सबसे भी ज्यादा रिफ्रेश हम होते हैं।
प्रश्नः- बाबा के हर ईशारे को कैच करने के लिए हम क्या पुरुषार्थ करें ? वा बाबा से सम्बन्ध सदा कैसे बना रहे ?
उत्तर:- बाबा के इशारे कैच करने के लिए हमारी बुद्धि बहुत क्लीयर होनी चाहिए। अगर हमारी बुद्धि में और-और बातें होंगी तो हम इशारों को कैच नहीं कर सकेंगे। बाबा की प्रेरणायें वा संकल्प कैच करने के लिए पहले अपनी बुद्धि को बिल्कुल साफ स्वच्छ रखना है। जो शिक्षा बाबा हमको देता है या बाबा ने जो मर्यादायें बताई हैं। श्रीमत और मर्यादायें दोनों ही जीवन में आवश्यक हैं। श्रीमत अर्थात् डायरेक्शन और मर्यादायें हमारे जीवन का एक संयम-नियम हैं। मर्यादायें ही हमारे सेफ्टी की लकीर हैं। अगर हम सुबह से रात तक मर्यादा और श्रीमत के प्रमाण चलें तो बुद्धि क्लीयर रहेगी। खाली रहेगी। फिर हम स्पष्ट बाबा के श्रेष्ठ संकल्प कैच कर सकेंगे। अगर बुद्धि बिजी होगी या बुद्धि में व्यर्थ संकल्पों का किचड़ा होगा तो जहाँ व्यर्थ है वहाँ समर्थ कैच नहीं कर सकेंगे। भल बुद्धि में परचिंतन न भी हो लेकिन अपनी ही प्रवृत्ति में नहाने धोने आदि में ही बिजी रहते हैं-बाबा से बुद्धियोग लगाने की फुर्सत नहीं है तो भी हम बाबा की प्रेरणाओं को कैच नहीं कर सकेंगे। इसके लिए बुद्धि खाली और स्वच्छ चाहिए। बाकी संबंध के लिए तो बाबा ने बता ही दिया है कि हर समय बाबा से भिन्न-भिन्न संबंधों का अनुभव करते रहो।
प्रश्नः- हम किस आधार से समझें कि हमें बाबा की प्रेरणा मिल रही है या यह मेरी मनमत है।
उत्तर- यह संशय तब होता है जब हमारी बुद्धि पहले से ही संकल्पों में बिजी रहती है। समझो हमें कोई बात बाबा से रुहरिहान में पूछनी है तो पहले हमारे ही संकल्प चलते रहेंगे - हाँ बाबा यही कहेगा, बाबा का यही होगा-यह जो संकल्प होता तो बाबा का भी वही कैच करते हैं। अगर बुद्धि हमारी फ्री है, बाबा से ही रुहरिहान में जवाब लेना है तो पहले बुद्धि में अपने संकल्प मिक्स नहीं चाहिए। अपने मिक्स होंगे तो गड़बड़ हो सकती है। अपने संकल्पों को ही, बाबा का समझ लेंगे। अगर में बाबा की दी हई श्रीमत से,अपने संकल्प से किसी बात को हल कर सकती हूँ तो कोई हर्जा नहीं है। लेकिन जहाँ समझते बाबा से ही पूछकर करना है तो उसके लिए अपनी बुद्धि फ्री रखो। अगर अपनी मत मिक्स होगी तो करते समय भी संकल्प आयेगा कि यह मेरा है या बाबा का है। उस समय भी दुविधा होगी। बाबा की क्लीयर मत होगी तो दुविधा नहीं होगी। दूसरी बात – जो बाबा की टचिंग होगी उसमें सफलता होगी। बीज अच्छा है तो फल अवश्य निकलेगा। जिस समय उसे आप प्रैक्टिकल में लायेंगे उस समय हल्कापन और खुशी होगी। मूंझ नहीं होगी। जैसे बाबा की मुझे टचिंग हुई, हाँ यह करो। मैंने संकल्प किया बाबा मैं यह काम करूँ... या न करूँ. तो बाबा जो हाँ या ना का रेसपान्स देगा उससे हमारे बुद्धि की हलचल खत्म हो जायेगी। हां या ना की दुविधा तब तक है, जब तक मेरे संकल्प मिक्स हैं। तीसरी बात - जिस समय वह काम करेंगे, काम का फल यथार्थ निकलेगा उससे पता पड़ेगा यह बाबा की टचिंग थी, मेरी नहीं।
प्रश्न :- बाबा ने आप बहनों को जिस समय १४ वर्ष तक भट्ठी में रखा..उस समय का आप अपना कुछ अनुभव सुनायें और आपको अव्यक्त बापदादा का साक्षात्कार शुरू-शुरू में कैसे हुआ ?
उत्तरः- १४ साल का अनुभव दो शब्दों में कहें तो जैसे भगवान् भाग्य का भण्डार खोलकर हम लोगों के लिए आये थे। स्थूल में भी तन-मन-धन-जन जो होने चाहिए वह सब प्राप्तियां थी। बाबा हम सबको हर प्रकार की ट्रेनिंग देकर आलराउन्डर बनाते थे। पढ़ाई योग के तरफ सबका बहुत अटेन्शन था। आपस में इतने सब होते हुए भी अत्यन्त प्यार था। एक बार बाबा ने कहा कि प्रेरणा आ रही है कि सभी ८ दिन मौन में रहें, इस मौन से कुछ नवीनता निकलनी है। डायरेक्शन मिला और इतनी सब कारोबार होते भी मौन भट्ठी शुरू हुई। हम लोग वैसे भी साइलेन्स पसन्द तो थे ही। एक दिन शाम के समय हम दो बहनें साइलेन्स में बैठी थी। अचानक जब हम दोनों बहनें एक दो को दृष्टि दे रही थी तो मैं गुम हो गई। जब मैं ट्रांस में गई तो मैंने देखा - ऐसी चांदनी थी जो हजारों चन्द्रमा की चांदनी से भी तेज लग रही थी। उस दिव्य लाइट के बीच हमने पहले-पहले ब्रह्मा बाबा को लाइट रूप में देखा और ब्रह्मा बाबा हमें पहली बार गुल्ज़ार बेटी, गुल्ज़ार बेटी कह बुला रहे थे। पहले मेरा नाम गुल्ज़ार नहीं था। अव्यक्त नामों की लिस्ट भी पीछे आई है। लेकिन जब हमने सूक्ष्म ब्रह्मा देखा तो गुल्ज़ार नाम से बाबा ने हमें बुलाया। जब हम नीचे आई तो मम्मा ने पूछा तुमने क्या देखा। हमने सुनाया कि ब्रह्मा बाबा को देखा। तो मम्मा बोली तुमने उनसे बात नहीं की। तुम उनसे पूछती कि आप कौन हो ? जब साकार ब्रह्मा बाबा यहाँ है तो फिर तुम कौन हो। दूसरे दिन फिर उसी समय मैं अपने आप गुम हो गई। फिर मैंने लाइट में बाबा को देखा तो पूछा आप कौन हो ? तो उसने कहा मैं बहुरूपी हूँ। मैंने वापस आकर बाबा को सुनाया वह बहुरूपी है। तो बाबा ने कहा बहुरूपी क्या होता है? उससे पूछो यह वतन क्यों दिखाई देता है ? फिर बाबा ने हमें बृजइन्द्रा दादी के साथ रखा और रोज़ क्वेश्चन देता था, मैं पूछकर आती थी। ८-१० दिन में स्पष्ट हुआ – यह ब्रह्मा बाबा का सम्पूर्ण रूप है। यह सूक्ष्मवतन है। पीछे धीरे-धीरे परमधाम, तीन लोक का रहस्य भी स्पष्ट हुआ। फिर तीन मास तक मैं लगातार भिन्न-भिन्न दृश्य देखती रही। स्वर्ग की दिनचर्या देखी, भाषा क्या होगी, राजधानी कैसे होगी, स्वर्ग की सब बातें देखी। फिर बाबा हमसे हरेक की अवस्था अनुसार लिखाते थे। उस पत्र की भाषा भी बिल्कुल नई थी। जो बाबा वतन में सुनाता था वह लिख कर देती थी।
विनाश कल्याणकारी है, इसलिए भयभीत होने की बजाए त्रिकालदर्शी की सीट पर स्थित रहकर इसे साक्षी होकर देखना है
बाबा ने हमें त्रिकालदर्शी बनाया है इसलिए किसी भी दृश्य को देखते हमें भय नहीं हो सकता। वर्तमान में कोई रो रहा है, कोई चिल्ला रहा है, कोई मर रहा है, कोई भूख में तड़फ रहा है या अर्थ क्वेक हो रही है या कुछ भी हो रहा है, लेकिन हम सिर्फ उस वर्तमान नज़ारे को नहीं देखते हैं। हम इस वर्तमान में भविष्य क्या छिपा हुआ है उसे जानते हैं। हमें तीनों ही कालों की नॉलेज है। नॉलेज को कहते ही हैं- नॉलेज इज लाइट नॉलेज इज माइट, तो नॉलेज की लाइट होने के कारण हम तीनों कालों को देखते हैं, सोचते हैं और फिर माइट होने के कारण हमको कोई दुःख की फीलिंग नहीं आती। क्योंकि जहाँ नॉलेज की लाइट और माइट है वहाँ भय हो नहीं सकता। दुःख वा कमजोरी आ नहीं सकती। नहीं तो कभी भी ऐसा कोई दृश्य देखते हैं तो या तो घबरा जाते हैं या भय में कुछ अपना होश नहीं रहता, अनकांसेस हो जाते हैं, योग-ज्ञान सब भूल जाते हैं, लेकिन हमें ज्ञान-योग भूल नहीं सकता क्योंकि हमने ही तो कहा है कि हमारा राज्य आने वाला है और हम बापदादा के साथ पुरानी सृष्टि के विनाश और नई सृष्टि की स्थापना के निमित्त हैं। जब नया मकान हमको बनाना है तो पुराने का जरूर विनाश करना होगा। पुराने के बीच में नया तो नहीं बनायेंगे ना। तो हम लोगों ने संगम पर चैलेन्ज की है कि पुरानी सृष्टि जाने वाली है, नई सृष्टि आने वाली है। कलियुग जा रहा है, सतयुग आ रहा है। रात जायेगी तब तो दिन आयेगा ना। तो हम लोगों को यह पता है कि यह विनाश तो होना ही है, 'नथिंग न्यु'। हमको भयभीत होने की कोई बात नहीं। यह कल्याणकारी विनाश है।
तो विनाश देखने के लिए त्रिकालदर्शी स्थिति के तख्त पर बैठना अगर त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित नहीं होंगे तो भयभीत होंगे, घबराएंगे दूसरी बात यह विनाश कोई साधारण विनाश नहीं है, यह विनाश और कल्याणकारी है। अब कहेंगे नाम विनाश है, सबकी मृत्यु होगी तो कल्याणकारी कैसे हो सकता है ? मृत्यु तो खराब चीज़ होती है ! लेकिन विनाश क्यों कल्याणकारी है ? क्योंकि मैज़ारिटी आत्मायें चाहती हैं कि अब इस चक्कर से छूटें, हमको तो मोक्ष चाहिए। तो इस विनाश के बाद हमें जीवन्मुक्ति मिलेगी लेकिन दूसरी आत्मायें परमधाम में जाकर रेस्ट करें। दूसरी आत्माओं की जो शुभ इच्छा है, इस चक्र से निकलना चाहते हैं, रेस्ट में रहना चाहते हैं, वह तो इस विनाश के बाद ही पूरी होगी। हम लोगों के यह कल्याणकारी इसलिए है, कि हमको जीवन्मुक्ति का वर्सा मिल जायेगा स्वर्ग के फाटक यही विनाश खोलेगा। विनाश दरवाजा है। जब विनाश होगा, पुरानी दुनिया खत्म होगी, सभी आत्माओं की जनसंख्या कम जायेगी, परमधाम में जाकर बैठेंगी, तब हम राज्य करेंगे। तो विनाश में तो कल्याण हैं – हमारे लिए स्वर्ग के गेट खुलेंगे, दूसरों को मुक्ति मिलेगी इसीलिये यह नॉलेज होने के कारण ही हम घबराते वा भयभीत नहीं होते है
हम लोग योग करते हैं तो मन्सा से केवल व्यक्तियों के परिवर्तन की लक्ष्य नहीं रखते। लेकिन प्रकृति के पांच तत्वों के परिवर्तन का लक्ष्य भी होता है। हम योग से तत्वों को भी चेंज कर रहे हैं, सतोगुणी बना रहे हैं क्योंकि जब तमोगुण खत्म होगा तब सतोगुण स्वतः ही आयेगा। लेकिन तमोगुणा आत्माओं की जो इतनी संख्या है, वह सब सतोगुणी बनकर सतयुग में तो नहीं आयेगी। इसलिये इन आत्माओं को मुक्तिधाम जाना है। यह नॉलेज स्मृति में रखने से ही त्रिकालदर्शी स्थिति की अवस्था बहुत अच्छी रहेगी। तो इस प्वॉइन्ट को पक्का करो तैयारी करो। कोई भी चीज़ देखो तो अब से ही त्रिकालदर्शी होकर देखो। चाहे अच्छी हो या बुरी लेकिन उसको त्रिकालदर्शी होकर देखो। तो त्रिकालदर्शी स्थिति ऐसी शक्तिशाली स्थिति है, उसमें कभी हलचल नहीं होगी- यह क्यों हो रहा है, यह कैसे हो रहा है, ऐसे नहीं होना चाहिये, ऐसे होना चाहिये। तो 'कैसे' और 'ऐसे' नहीं होगा। बाबा ने ड्रामा का ज्ञान बहुत अच्छी तरह से दे दिया है। लेकिन आत्मा और परमात्मा के ज्ञान के साथ-साथ प्रैक्टिकल जीवन के लिए ड्रामा का ज्ञान भी जरूरी है। इसीलिये कुछ भी होता है तो बाबा कहता है – वाह ड्रामा वाह ! हाय, यह क्यों हुआ, हाय, यह कैसे हुआ – यह नहीं कहो। कोई बात उल्टी होती है तो भी उसमें हमारा कल्याण समाया हुआ है। लेकिन त्रिकालदर्शी होकर नहीं देखते हैं तो फिर थोड़ी-थोड़ी हाय होती है। मन के संकल्पों में भी हलचल हुई तो हाय-हाय हुई ना।
इसीलिए ड्रामा का ज्ञान भी बहुत जरूरी है। कोई भी माया की हलचल होती है तो बाबा ने हम लोगों को पक्का कर दिया है कि कोई भी बात हो जाये तो उससे पाठ पढ़ लो। बात को उस रीति से नहीं देखो – क्यों हुई, कैसे हुई, इसने यह बात क्यों की, इससे यह क्यों हुआ, मेरे से ही यह क्यों हुआ... ऐसे जो क्वेश्चन उठते हैं वो हलचल मचाते हैं। हाय-हाय का थोड़ा-सा भी असर होता है तो उसमें देखो कि इसमें हमको फायदा क्या हुआ, यह बात हमको कौन-सा पाठ पढ़ा रही है? यदि किसी ने आपकी ग्लानी कर दी, कोई गाली दे रहा है, इन्सल्ट कर रहा है तो बाहर से यह बुरी बात दिखाई देती है लेकिन कोई हमारी इन्सल्ट करता है, ग्लानी करता है, गाली देता है, मुझको नीचा करके खुद को ऊंचा उठाता है तो वास्तव में यह पेपर हमें सहन शक्ति का पाठ पक्का कराता है। अगर इस विधि से देखेंगे तो क्यों-क्या उठेगा ही नहीं। और उस रीति से देखेंगे क्यों, मेरे साथ ही क्यों होता है, मेरा भाग्य शायद है ही नहीं, मेरा ड्रामा में ऐसा ही पार्ट है, मेरे को शायद इतना ऊंचा बनना ही नहीं है.. तो ऐसे निगेटिव संकल्प को पॉजेटिव में चेंज करो। यदि हम उसे पॉजेटिव रूप से नहीं देखते हैं, सिर्फ निगैटिव को देख रहे हैं तो क्वेश्चन मार्क उठते हैं। बाबा ने एक बहुत अच्छा मिसाल दिया था जैसे गुलाब का फूल है, खुशबू कितनी अच्छी होती है, लेकिन पैदा कहाँ से होता है ? उसकी धरनी में कितनी गन्दी खाद होती है। गन्दी खाद से कितनी अच्छी खुशबू ले लेता है। खाद है तो खराब ना। जब खाद डालते हैं तो नाक बंद करके चलते हैं। और जब गुलाब का पुष्प खुशबू लेकर निकलता है तो हम नाक पर रखते हैं, सूधँते रहते हैं। तो हमारी रचना में भी इतना अक्ल है कि खाद से भी अपनी खुशबू ले ली। तो जब कोई बात हो जाती है तो क्या हम गुलाब के पुष्प के माफ़िक बुरी बात से भी अच्छाई नहीं ले सकते ? जब हमारी रचना में इतना अक्ल है तो हम तो मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं ना। जब वो कर सकता है तो हम क्यों नही कर सकते ? इसीलिए निगैटिव को छोड़कर पॉजेटिव के तरफ हमारी दृष्टि जानी चाहिए। यह अभी से हमको संस्कार डालने पड़ेंगे तब ही विनाश के समय हमारी बुद्धि निगैटिव के तरफ न जाकर पॉजेटिव के तरफ जायेगी। अगर अभी से हमारा बहुत काल का अभ्यास ही नहीं होगा, निगैटिव देखते हुए उससे पॉजेटिव उठाने की आदत नहीं होगी, संस्कार नहीं होंगे तो उस समय हमको धोखा मिल जायेगा।
इसीलिए विनाश के लिए तैयारी क्या करनी है? एक तो त्रिकालदर्शी स्टेज को पक्का करो, नथिंगन्यु के पाठ को पक्का करो और कोई भी ऐसी चीज़ देखो तो उसके निगैटिव को बदलकर पॉजेटिव की तरफ बुद्धि जाये – यह अभ्यास अभी से चाहिये। यह तब होगा जब ड्रामा की प्वॉइन्ट प्रैक्टिकल में पक्की होगी। यदि वैसे ही वर्णन करेंगे कि हाँ, ड्रामा का ज्ञान बहुत अच्छा है, ड्रामा की प्वाइंट बहुत फायदा करती है - ऐसे तो फायदे की बहुत सी बातें हैं लेकिन यह प्वाइन्ट ही हैं या प्रैक्टिकल है ? हर प्वाइन्ट को आप यन्त्र के रूप से यूज़ कर सकते हो।
ड्रामा माना फुल स्टॉप। ड्रामा का ज्ञान हमको फुलस्टॉप याद दिलाता है। जिस समय कोई बात होती है उस समय फुलस्टॉप याद आये। वैसे ड्रामा याद है लेकिन समय पर फुल स्टॉप नहीं लगा, फुल स्टॉप लगाना चाहते हैं और बन जाता है क्वेश्चन मार्क। तो टाइम पर तो काम में नहीं आया। जैसे कहानी है एक तोता था, उसको कहा नल पर नहीं बैठना लेकिन वह नल पर बैठकर बोल रहा था – “गंगाराम नल पर नहीं बैठना।” तो यह क्या हुआ ? हमें परिस्थिति के समय ड्रामा-ड्रामा कहना है या फुल स्टॉप लगाना है ? तो यन्त्र माना जो समय पर काम आये। ऐसे नहीं, यन्त्र रखा रहे और जंक लगती रहे। फिर समय पर काम ही न आये। तो ज्ञान तलवार में जंक न लगे। ज्ञान तलवार से पेपर में पास हो जाओ। तो अभी से चेक करो कि जिस समय कोई बात आती है उस समय फुल स्टॉप लगता है? ड्रामा की प्वाइन्ट प्रैक्टिकल में यूज़ होती है ? यदि नहीं तो उसका निवारण सोचो। अन्तिम सीन जो होगी, एक्स्ट्रीम चीज़ जो होगी वो ज्यादा समय नहीं चलेगी। आपका फाइनल पेपर जो होना है, वह एक सेकण्ड का होना है। क्वेश्चन भी बाबा ने सुना दिया है – “नष्टोमोहा, स्मृति-स्वरूप।” एक सेकण्ड में कोई भी मोह नहीं हो, अपने बॉडी कान्सेस में नहीं आ जायें- हाय ये क्या हुआ ! यह होता है तो यह बॉडी काँसेसनेस हुआ ना। एक सेकण्ड में बॉडी कान्सेस में आ गये तो सेकण्ड तो बीत गया। तो पास कैसे होंगे ? इसीलिये बाबा कहते हैं कि लास्ट समय की तैयारी के लिए आप अभी से अपनी तैयारी करो। जैसे स्कूल में पहले ३ मास में फिर ६ मास में पेपर होता है और फिर फाइनल पेपर होता है ताकि बच्चों को पता चले कि हम किस-किस बात में कमजोर हैं, उसको ठीक कर लें। इसी रीति से हमको अपना ही टीचर बनकर अपनी चेकिंग आपेही करनी चाहिए। पेपर तो ड्रामानुसार सबके पास आता ही है, कोई के पास पेपर न आये तो पास होकर सूक्ष्मवतनवासी हो जाये। हरेक को अपने-अपने ढंग का पेपर आता है और आना ही है। जितना आगे बढ़ेंगे उतना पेपर गुह्य होता जायेगा। छोटे के. जी. का पेपर और बड़े क्लास के पेपर में फर्क तो होगा ही। लेकिन हम कहाँ तक उस पेपर में प्रैक्टिकल में पास होते हैं – यह हमको चेक करना है। दूसरा चेक करेगा तो बॉडी कांसेस का संस्कार होने के कारण उसे टालने की कोशिश करेंगे, कहेंगे मेरी गलती है, इसने ऐसे किया तो मैंने ऐसे किया। दूसरे के ऊपर टालेंगे। यह कान्सेसनेस का बीज है। इसलिये दूसरा शिक्षा देता है तो पता नहीं चलता है। अपने आपको जो हैं, जैसे हैं - पता होता है, मन खाता है। भले उस समय पता नहीं भी पड़े कि मैं राइट हूँ या रांग हूँ ! लेकिन जब बात पूरी हो जाती तो मन में फील होता है कि यह ठीक नहीं है। अलबेलेपन में चला देते हैं कि यह ठीक है, ऐसे तो चलता ही है, सब ऐसे ही तो चल रहे हैं। फिर हम उसको टाल देते हैं लेकिन मन में आता जरूर है।
इसीलिये अभी से अपनी चेकिंग अच्छी तरह से करो। कोई भी बात में ऐसे नहीं अच्छी हो तो उसके अभिमान में आ जायें कि मेरे को सब अच्छा कहते हैं और नीचे की बात हो तो एकदम नीचे आ जायें। नहीं। प्रेशर। प्रेशर सदा नार्मल होना चाहिये। कभी एकदम हाई, कभी एकदम लो नहीं हो जाये। हाई होगा तो लो भी हो जायेगा। नार्मल होगा तो हाई और लो नहीं होगा। तो अपनी चेकिंग आपेही करो। फिर आपको पता भी पड़ेगा कि अन्त समय की सचमुच मेरी तैयारी है। नष्टोमोहा माना कोई में भी मेरा मोह न जाये, कोई दर्दनाक दृश्य मेरे सामने आते है तो मुझे पता हो कि यह होना ही है, नथिग न्यु क्योंकि ये होने के बाद अंधकार खत्म होगा तब ही सवेरा आयेगा। तो समझा तैयारी क्या करनी है ? एक सेकण्ड का पेपर आना है और फाइनल विनाश के पहले यह रिहर्सल चलती रहती है। कहीं अर्थक्वेक हुई, कहीं बाढ़ आई तो समझते हैं, यह तो होता रहता है। लेकिन फाइनल विनाश सभी पांच तत्व इकठ्ठे काम करंगे। पांच तत्व अपना विकराल रूप धारण करेंगे जल भी करेगा धरनी भी करेगी। जब विनाश होगा कोई सहारा नहीं होगा। एक तरफ धरनी का, एक तरफ पानी का, एक तरफ अग्नि का, एक तरफ तुफान का, सबका एक साथ वार होगा। फिर मनुष्य कहाँ जायेंगे।
अभी तो एक जगह पर होता है तो दूसरे तरफ जाकर सहारा ले लेते हैं। जब सभी तत्व इकट्ठा वार करेंगे तो कहाँ जायेंगे ! उस समय सोल कॉन्सेस स्थिति चाहिये, एकदम शरीर के भान से न्यारे हो जायें और भृकुटि के बीच में अकाल तख़्त पर बैठकर देखते रहें कि होना ही है। तो ऐसी सोल कॉन्सेसनेस की, अशरीरी स्थिति की, साक्षीपन की बहुत प्रैक्टिस चाहिये। फिर बाबा भी मदद देगा। घबरायें नहीं। सिर्फ आप हिम्मत रखो तो बाबा उस समय मदद जरूर करता है। बाबा की मदद से ऐसे आपको अनुभव होगा जैसे सचमुच दुनिया में ये हलचल है और हम अचल बाबा की छत्रछाया में हैं। क्योंकि बाबा की गैरन्टी है - एक कदम तुम्हारा, १०० कदम मदद बाबा की। उस समय ऐसे नहीं बोलना कि बाबा मदद करो ना, आपने तो कहा था कि मदद करेंगे। बाबा तो खुद ही जानता है कि मदद करनी है। इसीलिये ऐसी भी हलचल नहीं हो। उस समय सिर्फ निश्चय और हिम्मत हो। निश्चय एकदम पक्का हो। अगर मानो शरीर चला जाता है, सबको शरीर छोड़ना ही है इसलिए शरीर छोड़ने में भी भय नहीं हो। भगवान की गैरेन्टी है, अन्त में अगर सोल कॉन्सेस, नष्टोमोहा, स्मृतिलब्धा हैं, तो पुराना शरीर गया भी तो नया तैयार है ही, उसमें जाकर प्रवेश करेंगे। डर होता है कि पता नहीं क्या होगा लेकिन हमको निश्चय है कि हमारा भविष्य अच्छा है। बुरा हो ही नहीं सकता। फिर काहे का डर। पुराना वस्त्र कोई चेंज करके नया पहने तो कोई चिल्लायेगा क्या कि पुराना कैसे उतारूं, नया कैसे पहनें। अरे खुशी की बात है पुराना छोड़ नया लो।
साकार बाबा को यह एकदम पक्का था कि आज ब्रह्मा हूँ कल जाकर कृष्ण बनूँगा। जैसे ड्रेस सामने रखी ही उस पहनना हीं। तो आज हम ब्राह्मण है हमारे लिए देवता रूप की ड्रेस तैयार है। हमने यहाँ जो कर्म किया है तो हमारा फल तो तैयार है ही ना, इसमें डर काहे का है। अगर शरीर छूटना ही है तो इसमें घबराने की क्या बात है। जाकर नया लेंगे। इसीलिये हमको मृत्यु से भी भय नहीं है। मनुष्यों को मृत्यु का डर इसीलिये होता है कि उन्हों पता ही नहीं है कि मृत्यु होती क्या है? वो सोचते हैं कि पता नहीं कौन पशु बनेंगे। हमें तो पता है कि हमको तो देवता ही बनना है। इसीलिये हम निश्चित हैं। अगर स्थिति अच्छी नहीं होगी तो फिक्र होगा। फिर उस चिंता में शरीर छोड़ेंगे तो भविष्य क्या बनेगा ! बाबा हम लोगों को टाइटिल देता है बेफिक्र बादशाह। क्या फिक्र है ! बाबा सेवा करा रहा है, खिला रहा है शरीर को भी चला रहा है, आत्मा को भी भोजन देकर आगे बढ़ा रहा है, सेवा भी करा रहा है। हमारा कर्म अच्छा है, तो भविष्य अच्छा होना ही है। इसीलिये हम बिल्कुल बेफिक्र हैं। तो ये तैयारी हमको विनाश के पहले करनी है। हम शरीर के भान से न्यारे रहने का अभ्यास करते रहे हैं। चोला टाइट नहीं होना चाहिये, जो टाइट वस्त्र पहनता है वह समय पर उतार नहीं सकता। उसको उतारने के लिए टाइम चाहिये। जो लूज़ पहनता है तो सेकण्ड में बदल सकता है। अगर हिसाब-किताब का धागा टाइट बंधा है तो उस समय हम, अशरीरी नहीं बन सकते। स्वतन्त्र होंगे तो कोई भी बंधन खींचेगा नहीं। यदि रस्सी बंधी हुई होगी तो हम ऊपर जाना चाहेंगे लेकिन वह नीचे ले आयेगी। इसलिए पहले सूक्ष्म धागे तोड़ने हैं, मोटे-मोटे धागे नहीं। जैसे मोह नहीं है, लेकिन टाइम पर मोह अन्धा बना देता है। तो ऐसे नहीं समझो कि मेरे सारे विकार खत्म हो गये हैं लेकिन अन्दर देखो कि अंशमात्र भी कहाँ रह तो नहीं गये हैं ? यदि इच्छा नहीं हैं, अच्छा लगता है तो अच्छी चीज़ भी खींचेगी। अंशरूप में भी है तो उसे खत्म करना है।
कई बड़ी-बड़ी बातें सुनकर डर जाते हैं। कहते हैं इतना करना पड़ेगा ! मेरे से नहीं हो सकेगा। बाबा के पास आये हैं, दाता के पास आये हैं तो दो मुट्ठी भरकर खुश हो रहे हैं ! अरे, पूरी झोली भरो ना। दिलशिकस्त इसीलिये होते हैं कि बाबा का साथ अनुभव नहीं होता। कम्बाइन्ड नहीं हैं। हम कितने भी कमजोर हैं लेकिन बाबा कमजोर नहीं है, वह सर्वशक्तिमान् है। तो हम अपने को अकेला क्यों समझते हैं। दिलशिकस्त होने के कारण कई बार कह देते हैं आप समझ लो, मैं ऐसे ही चलूंगी, मेरा भाग्य इतना ही है, चाहे मैं लक्ष्मी-नारायण बनूं या नहीं, मैं तो ऐसे ही रहूँगी। लेकिन मैं कमजोर भी हूँ तो भी मेरा साथी सर्वशक्तिमान् है यह याद रहेगा तो मास्टर सर्वशक्तिमान् बन जायेंगे।
एक है नॉलेज की रीति से दिमाग से पहचानने वाले, दूसरे हैं दिल से पहचानने वाले। तो दिमाग की रीति से हमने अगर बाबा को पहचाना है कि हाँ, ठीक है, निराकार है, ज्योतिबिन्दु है, परमधाम में रहता है, ज्ञान का सागर है, प्यार का सागर है, ये शक्तियां है- यह हमने सिर्फ नॉलेज की रीति से, दिमाग से जान लिया कि बाबा ये है और दूसरा है जो मेरी दिल कहे कि हाँ, मेरा बाबा है। सिर्फ नॉलेज के आधार से प्यार नहीं पैदा होता। प्राप्ति के आधार से प्यार होता है। तो प्राप्ति को पहले सामने लाओ, सिर्फ बाबा-बाबा नहीं करो। प्राप्ति ऐसी चीज़ है जो किसी अन्जान से भी संबंध जुट जाता है। कहीं रास्ते में आपको ठोकर लग गई, वहाँ आपका कोई भी नहीं है, लेकिन किसी अन्जान ने आपको सहारा दिया तो आपके दिल का प्यार उससे हो जायेगा। क्योंकि प्राप्ति हुई। फौरन ही कहेंगे कि आपको हम जीवन भर नहीं भूलेंगे। कोई सम्बन्ध ही नहीं है और जीवन भर नहीं भूलेंगे ! क्योंकि प्राप्ति हुई। तो बाप और बच्चे के सम्बन्ध को प्राप्ति के आधार से याद करो। बाबा ने मुझे क्या दिया ! बाबा से क्या आनन्द की अनुभूति हुई, क्या शान्ति की अनुभूति हुई, क्या निःस्वार्थ प्यार की अनुभूति हुई- उस प्राप्ति में डूब जाओ, उस अनुभव में खो जाओ, फिर आपको दिल से बाबा के प्यार का ऐसा अनुभव होगा जैसे कम्बाइन्ड चीज़ है जिसको कोई अलग कर नहीं सकता है। यह है दिल से बाबा को याद करना। बाकी नॉलेज के आधार से, दिमाग से याद किया तो नज़दीक अनुभव नहीं कर सकेंगे। थोड़े टाइम के लिये शान्ति मिलेगी, थोड़े टाइम के लिये सोल कान्सेस हो जायेंगे। सदाकाल के लिए नहीं। बाबा कहते हैं अभी तो यह कहो कि याद करना मुश्किल लेकिन भूलना मुश्किल है। क्योंकि प्राप्ति के आधार पर दिल ने माना मेरा बाबा है। जब दिल में कोई बात आ जाती है तो बहुत मुश्किल निकलती ? दिमाग तक होती है तो चेन्ज हो जाती है। आशिक-माशूक होते हैं तो दो के प्यार में समा जाते हैं, कितना भी दुनिया चाहे उनको अलग कर नहीं सकती। ये तो हमारा बाबा है। तो दिल कहे बाबा तेरा शुक्रिया। 'बाबा’ कहना माना आत्मा रूप में स्थित होना। कभी-कभी हम बाबा को याद करते बैठते हैं लेकिन आत्मा रूप में स्थित होकर बाबा को याद नहीं करते इसलिए मेहनत होती है। रबर उतारे बिना कनेक्शन जोड़ने लग जाते हैं। बाबा है लेकिन किसका बाबा है ? शरीर का तो नहीं है। आत्मा का बाबा है ना, तो पहले आत्मा समझकर बाबा को याद किया? लेकिन यदि खुद बॉडी कान्सेस में हैं और बाबा के साथ का, बाबा के प्यार का, बीज-रूप स्थिति का अनुभव करना चाहते हैं तो यह कभी भी नहीं हो सकता। टाइम वेस्ट जायेगा, दिल शिकस्त हो जायेंगे। फिर कहेंगे मेरा माथा भारी हो गया। क्यों भारी हुआ ? क्योंकि रबर उतारा ही नहीं, कनेक्शन जोड़ा ही नहीं तो भारी होंगे ना। प्राप्ति होगी नहीं, करेंट आयेगी नहीं, रोशनी आयेगी नहीं तो जरूर माथा भारी होगा और नींद भी आयेगी ही। बुद्धि की, मन की थकावट नींद ले आती है, माथा भारी कर देती है। इसलिए प्राप्ति को पहले सामने लाओ। अनुभव में चले जाओ। ऐसे नहीं कि सुख का सागर है, शान्ति का सागर है। हैं नहीं। - हम तोते तो
कई कहते हैं बाबा जानी जाननहार है, पहले ही विनाश की डेट क्यों नहीं सुना देता ? लेकिन बाबा हमें सोल कान्सेस बनाने आया है। यदि मान लो आपको बता दे कि ९६ में विनाश होगा तो आप सोल कान्सेस होंगे या टाइम कान्सेस ? टाइम बताने का काम तो ज्योतिष का है। आप एवररेडी रहो, कल भी विनाश हो जाये तो कोई हर्जा नहीं है। और जितना भी टाइम लगे आपका अभ्यास ज्यादा अच्छा होगा। एक बार किसी ने बाबा से पूछा – बाबा, आज की दुनिया बहुत गन्दी हो गई है, अब जल्दी विनाश हो जाये। तो बाबा ने कहा कि बच्चे आप यह कह रहे हो कि बाबा, आप जल्दी जाओ। संगम की मौज कोई कम नहीं है ! सतयुग में तो बाबा मिलेगा नहीं। इसलिए कोई यह नहीं सोचे कि बाबा टाइम बतायेगा, सतयुग जल्दी आये। जब भी विनाश हो हम एवररेडी रहें। दिल से सदा "मेरा बाबा" निकले। मेरा बाबा कहकर बाबा से एकदम चिपक जाओ।
साकार मुरली का महत्व तथा सुनने की विधि
साकार और अव्यक्त दोनों ही मुरलियों का महत्व तो है ही लेकिन साकार ब्रह्मा द्वारा जो मुरलियां चली हैं और अभी जो अव्यक्त ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा की मुरलियां चल रही है, चलाने वाला तो वही शिवबाबा ही है, चाहे पहले साकार ब्रह्मा द्वारा चलाई, अभी अव्यक्त ब्रह्मा द्वारा चला रहे हैं, माध्यम चाहे कोई भी हो, लेकिन है तो शिवबाबा की ही मुरली। उसमें भी साकार ब्रह्मा द्वारा जो मुरलियां चली हैं उन मुरलियों में फुल नॉलेज है, फुल नॉलेज की हमारी चार सब्जेक्ट हैं - ज्ञान, योग, धारणा और सेवा। तो साकार ब्रह्मा द्वारा चली हुई मुरलियों में आपको ये चारों ही सब्जेक्ट मिलेंगे। ज्ञान की पाइन्ट्स भी मिलेंगी, योग के बारे में भी बाबा हर मुरली में कुछ न कुछ जरूर समझाते हैं। धारणा की भी बात होती है और सेवा की विधि भी सुनाते हैं। चारों ही सब्जेक्ट कव्हर करते हैं। बाबा ने ज्ञान की जो प्वाइन्ट दी है वो अमूल्य रत्न हैं। तो जो साकार ब्रह्मा बाबा द्वारा मुरलियां चली है उसका महत्व ही यह है कि एक मुरली में आपको चार सब्जेक्ट मिलेंगे। वेराइटी मिलेगी। साकार मुरली सुनने में बहुत मजा आता है। मुरली सुनने के टाइम आप यह लक्ष्य रखो कि जो प्वाइन्ट बाबा सुना रहा है, मानों बाबा ने ज्ञान की प्वाइन्ट शुरू की, ज्ञान की प्वाइन्ट सुनाते-सुनाते बाबा धारणा की प्वाइन्ट में चले जाते। फिर धारणा के प्वाइन्ट के बाद सेवा के प्लैन में चले जाते हैं। तो जैसे एक ही टाइम हम चक्कर लगा रहे हैं। तो सिर्फ मुरली सुनने के टाइम हमारे को मुरली सुनने की विधि आनी चाहिए। सिर्फ प्वाइन्ट्स सुन रहे हैं, यह नहीं सुनते-सुनते कभी थकावट हो सकती है, बोर भी हो सकते हैं, जैसे बच्चे को नींद में सुलाने के लिए माँ लोरी देती है तो नींद न भी आनी हो तो भी आ जाती है। तो यदि थकावट है और मुरली सिर्फ सुन रहे हैं तो यह मुरले कभी-कभी लोरी का काम कर देती है, नींद ले आती है। लेकिन वास्तव में मुरली सुनने की जो विधि है उसी प्रमाण सुनो। बाबा के एक एक बोल को सुनते उसमें अपनी बुद्धि को बिज़ी कर दो, अनुभव करते जाओ। मानो बाबा स्वर्ग की स्मृति दिला रहा है तो हम सुनते हैं- ठीक है, सतयुग में एकता थी एक धर्म था, एक राज्य था और वहाँ दुःख नहीं था, अशान्ति नहीं थी, सुन तो लिया। रिपीट भी कर लेंगे। लेकिन सिर्फ सुनो नहीं। बिल्कुल उस सतयुग के समय में आप पहुँच जाओ। अनुभव करो - हाँ, हमारा राज्य था। बाबा क्या याद दिला रहा है और हमारी आत्मा में यह संस्कार तो हैं ही, हम सतयुग में कितनी बार राज्य करके आये हैं ! बहुत बार राज्य किया है। हमारी आत्मा में राज्य के संस्कार भरे हुए हैं।
इमर्ज करना चाहा तो हो जाते हैं। आज टेप रिकार्ड में भी गीत भरा हुआ होता है तो हम जो भी लाइन सुनना चाहते हैं, सुन सकते हैं। हमारी आत्मा का टेपपरिकार्ड जो है उसमे आप जो बजाना चाहो वह बज सकता है ना ! इसीलिए जिस समय बाबा कोई ज्ञान की बात सुनाते हैं उस समय सिर्फ सुनो नहीं, वहाँ पहुंच जाओ। कभी बाबा कहते है परमधाम में शिवबाबा के साथ तुम आत्माएं निराकार थी, बिंदु थी, तो परमधाम पहुंच जाओ। बाबा कह रहा है परमधाम और आप वहाँ अनुभव कर रहे हो। आत्मा परमधाम में एकदम बिंदू स्टार माफिक थी, सूक्ष्म थी तो हो जाओ सूक्ष्म, अनुभव करो आत्मा का।बुद्धि रूपी विमान राकेट से भी तेज है। तो मुरली सुनते-सुनते सिर्फ सुनो नहीं, लेकिन अनुभव की सैर करो। परमधाम घूम कर आयेंगे, स्वर्ग घूम कर आयेंगे, संगमयुग घूम कर आयेंगे, तो कलियुग दुःखधाम भी घूम कर आयेंगे। सारा ही चक्र एक मुरली में बाबा हमको लगवाता है। तो उस अनुभव में चले जाओ। जैसे बाबा कहते हैं स्वदर्शन चक्रधारी बनो। तो स्वदर्शन चक्र माना क्या सिर्फ यह रिपीट करना कि सतयुग में हम ऐसे थे, हमारे ८ जन्म हुए, फिर १२ हुए, फिर द्वापर कलियुग में ६३ जन्म हुए। सतयुग में एक धर्म था फिर द्वापर में और धर्म आये? तो स्वदर्शन चक्र को रिपीट करने में कितना टाइम लगा? एक मिनट ! तो क्या यही स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। क्या यही रिपीट करते रहें? इसको स्वदर्शन चक्र थोड़ेही कहा जाता है, अनुभव करो - सतयुग में ८ जन्म थे तो सतयुग में क्या हमारी स्टेज थी, आत्मा की स्टेज क्या थी ? गोल्डन एज क्यों कहा जाता है? वहाँ एक धर्म, एक राज्य क्यों था, कारण क्या था उस अनुभूति में चले जाओ।
संगमयुग में हमने क्या किया जो वहाँ की प्रालब्ध हमें मिली। तो सतयुग के अनुभव में चले जाओ, राजा बनकर तख्त पर बैठ जाओ। विश्व महाराजा बनेंगे तो विश्व महाराजा की सीट पर बैठ जाओ, अनुभव करो कि हमारा राज्य है। फिर त्रेता में नीचे उतरे तो चलो स्टेज कम हुई लेकिन फिर भी त्रेता की स्टेज क्या थी ? द्वापर में भक्ति की विशेषता क्या रही ? कलियुग में भटकने की विशेषता क्या रही? फिर संगम पर प्रभू मिलन की विशेषता क्या रही ? तो ये भिन्न-भिन्न युग के भिन्न-भिन्न अनुभव हैं। तो जब हम मुरली सुनते हैं उस समय सिर्फ सुनने के कारण हम कहते हैं कि वही तो प्वाइन्ट्स हैं, भक्ति मार्ग के हनूमान गणेश से हमारा क्या मतलब। आप भक्त नहीं बने हो क्या ? कई फारेनर्स भक्ति, भक्ति शब्द सुनकर थक जाते हैं। लेकिन आप तो ब्राह्मण हो ना, ब्राह्मणों को ही मुरली सुनाई जाती है। ब्राह्मण हो तो भक्त तो बने ही थे। तो भक्ति का ज्ञान हम लोगों को जरूर चाहिए। ऐसे नहीं समझो कि ये इंडिया की फिलासॉफी है, ये फॉरेन की फिलासॉफी है। लेकिन हम तो ब्राह्मण हैं। हमारा ब्राह्मण कल्चर है। आपके भक्त आपकी भक्ति कर रहे हैं और आपको भक्ति का ज्ञान ही न हो ! इष्ट हो क्या आप ? आपको भी भक्ति का ज्ञान होना चाहिए। आपके भक आपको देवी या देवता के रूप में पुकार रहे होंगे। अगर आपको भक्तिर ज्ञान ही नहीं होगा तो आपके भक्त पुकारते-पुकारते थक जायेंगे, उनको रेसपान्स ही नहीं मिलेगा। इसीलिए भक्ति का ज्ञान भी हमको पूरा ही होना चाहिए। क्योंकि नॉलेजफुल बाप ने भक्ति और ज्ञान दोनों की नॉलेज दी है। आप कहो – नहीं, हमको दिन ही अच्छा लगता है ना तो सिर्फ दिन का ज्ञान हो, रोशनी ही रोशनी हो। लेकिन अन्धकार के बाद ही तो रोशनी का महत्व है। अगर अन्धकार ही न हो तो उसके कान्ट्रास्ट में रोशनी शब्द ही कहाँ से आया ? तो दोनों ही चाहिए ना। इसीलिए भगवान् ने भक्ति और ज्ञान – दोनों का ज्ञान दिया है। क्योंकि आधा कल्प भक्ति चलती है और हम ड्रामा के हीरो पार्टधारी एक्टर हैं तो हीरो पार्टधारी एक्टर को ड्रामा का पूरा ही ज्ञान होना चाहिए। इसीलिए भक्ति का ज्ञान भी जरूरी है। और भक्ति का ज्ञान बाबा इसीलिए देते हैं ताकि हमको पता चले कि क्या हमने लाइफ व्यतीत की और अभी हमारी लाइफ क्या बन गई है? कान्ट्रास्ट से ज्यादा खुशी होती है। यदि गर्मी हो और आपको बहुत हैरान कर रही हो और कोई आपके आगे पंखा चला दे तो कितना मजा आयेगा ! और यदि है ही ठण्डी, तो ठण्डी में पंखें का क्या महत्व। गर्मी से सर्दी में आ जाओ तो उसके कान्ट्रास्ट में आपको मजा आयेगा ! इसलिए बाबा की साकार मुरलियों में टोटल कल्प के ज्ञान की नॉलेज है, हर बात का स्पष्ट कान्ट्रास्ट है इसलिए सुनने में मजा आता है। साकार मुरलियों में चारों ही सब्जेक्ट का आप आनन्द ले सकते हो। और लेकर देखो, बहुत मजा आयेगा, नींद तो एकदम गायब हो जायेगी। क्योंकि घूमते-घूमते तो आप नींद नहीं करेंगे ना। आराम से बैठते हैं तो नींद आती है। यदि आप चल फिर रहे हैं तो नींद नहीं आयेगी। बुद्धि फ्री है तो नींद आयेगी।
लेकिन बुद्धि को चलाओ, चारों ही युगों का सैर करो, चारों ही सब्जेक्ट का बुद्धि द्वारा सैर करो। तो नींद कहाँ से आयेगी ? इन्ट्रेस्ट भी बढ़ेगा। ब्रह्मा बाबा द्वारा शिवबाबा को जो नालेज देनी थी वो दी। हम स्टूडेन्ट्स जो हैं, उनकी धारणा की सब्जेक्ट अभी भी कमजोर हैं। इसीलिए जैसे इम्तहान होता है, इम्तहान के दिन नज़दीक होते हैं तो टीचर जिस सब्जेक्ट में कोई कमजोर होता है तो उनको स्पेशल रिवाइज करता है और स्पेशल ट्युशन देता है। तो ये अव्यक्त वाणियां जो चल रही हैं वह विशेष धारणा की हैं। साकार मुरलियों में चारों ही सब्जेक्ट की फुल नॉलेज है और अव्यक्त मुरलियों में विशेष धारणा की बातें हैं। और कुछ कटाक्ष वगैरह नहीं है तो सभी कहते हैं अव्यक्त मुरली सुनने सुनाने में बड़ा मजा आता है क्योंकि और और बातें नहीं हैं, और साकार में कभी ऐसी बातें भी आ जाती हैं जो सुनाने में मुश्किल होती हैं। लेकिन अगर हमको क्लीयर हैं तो सुनाने में मज़ा क्यों नहीं आयेगा। और सुनाना भी ब्राह्मणों को है। मुरली किसी को पहले-पहले तो सुनाते ही नहीं हैं। जब तक कोर्स नहीं करते, शिवबाबा का परिचय नहीं आ जाता, शिवबाबा से योग नहीं लगता तब तक तो आप मुरली सुनाते ही नहीं हो। कोर्स कराने के बाद मुरली जब सुनाते हो तो जरूर उसको स्पष्ट करते होंगे। पहले सप्ताह कोर्स कराओ फिर योग की विशेष टॉपिक्स पर क्लीयर करो। फिर विशेष उनको योग की सब्जेक्ट के ऊपर भिन्न-भिन्न रीति से बताओ। धारणा पर भी विशेष अटेन्शन दो, तब मुरली सुनाना शुरू करो। लेकिन फॉरेन में क्विक सर्विस है। सप्ताह कोर्स के बाद ही मुरली शुरू कर देते हैं। अभी रिवाइज कोर्स की साकार मुरलियां दादी यहाँ सुनाती है और आप लोग अपनी क्लासेस में भी सुनते हो। मुरली तो वही होती है। ये नहीं होता कि मधुबन में मुरली और चलती है और आपके पास छपकर और आती है। होती तो एक ही है।
लेकिन दादी के पास मुरली का जो महत्व है, दादी जिस ढंग से सुनती है तो कहते हैं कि यह वही मुरली है या दादी दूसरी मुरली सुनाती है। सुनाने की विधि के ऊपर है। और सुनाने वाले को जितना इन्ट्रेस्ट होगा, खुद जितना मुरली की गुह्यता में गया हुआ होगा तभी सुनने वाले को रस बिठा सकता है। सुनाने वालों के ऊपर जिम्मेवारी है कि पहले वह स्वयं मुरली बहुत अटेन्शन से पढ़े। हमारी दादी जितना बिज़ी कोई नहीं है। चाहे आप जॉब भी करते हो लेकिन दादी की ड्युटी दिमाग की है। आपकी जॉब फिर भी हाथ-पांव की होगी, कोई की फिर भी दिमाग की हो सकती है लेकिन इतनी जिम्मेवारी होते हुए, इतना बिज़ी होते हुए दादी जब रात्रि को सोने के लिए जाती है तो आधा घण्टा मुरली पढ़कर पीछे सोती है और पढ़कर फिर बुद्धि में रखती है कि आज मुरली में क्या नवीनता है। कल क्लास में जाकर क्या क्वेश्चन पूछेंगी ? बाबा ने आज नया क्या कहा ? आज क्वेश्चन का रहस्य क्या था ? आज टोटली मुरली का सार क्या सुनाऊंगी ? तो पहले सुनाने वाले जो निमित्त हैं वो अगर अच्छी तरह से मुरली का अध्ययन करके अपने पास कोई नवीनता बुद्धि में रखेंगे फिर क्लास में आकर सुनायेंगे तो बहुत प्रभाव पड़ेगा। लेकिन कोई-कोई तोते माफिक पढ़ना शुरू कर देते हैं। जैसे एक किताब पढ़ी जाती है- बाबा ने ये कहा, बाबा ने ये कहा। लेकिन किस रहस्य से बाबा ने यह बात कही। वह स्पष्ट नहीं करते। नवीनता को कैच करके सुनाने वाले सुनायें तो मजा आयेगा। अगर हम भी ऐसे रट कर पढ़ लेते हैं तो सुनने वाले तो पहले ही थके हुए होते हैं तो वो मुरली सुनने के बजाये आराम कर लेते हैं। सोचते हैं कि चलो दफ्तर में तो जाना ही है, यहीं नींद करके आराम करके जायें। तो ये सुनाने वाले के ऊपर होता है। और सुनाने वाले को जरूर मुरली पढ़कर उसकी नवीनता खोजनी चाहिए और उस विधि से मुरली सुननी चाहिए और सुनानी भी चाहिए। फिर आपका मुरली से इतना प्यार हो जायेगा जो आप आधा पेज भी मिस करेंगे तो आपको बार-बार ये आता रहेगा जैसे कोई बहुत प्यारी चीज़ छूट गई। चाहे आप कहाँ चले भी जाओ लेकिन आपको वो प्यारी चीज़ याद आती रहेगी। जैसे छोटा बच्चा होता है तो माँ कहती है तुम क्लास में पढ़कर आओ फिर तुमको आम खिलाऊंगी। बच्चे को आम से प्यार होता है। वो पढ़ाई पढ़ने जायेगा लेकिन बार बार उसको ये याद आयेगा कि मैं पढ़ाई पढ़कर जाऊं और आम खाऊं। क्योंकि उसको आम प्यारा है। यदि मुरली का आधा पेज भी रह जायेगा तो अगर मुरली से प्यार हो जायेगा तो हम समझेंगे हमारी कोई प्यारी चीज़ खो गई है और उस खोई हुई चीज़ को हमको पूरा करना है। बार बार मन में आता रहेगा। नेचुरल आकर्षण होती रहेगी। तो मुरली का महत्व बहुत है।
दूसरा कहते भी हैं मुरली में एक जादू है, है तो सारा जादू लेकिन एक जादू विशेष मुरली में है - जैसे आपके सामने कोई समस्या आई, वैसे तो सारा संसार ही समस्याओं का सागर है और सागर में लहरें नहीं हो तो उसे सागर नहीं, नदी कहेंगे, सागर माना ही लहरें, वह तो होना ही है, तो समस्यायें भिन्न-भिन्न रूप से आती हैं, कभी तन की, कभी मन की, कभी धन की, फिर सम्बन्ध-सम्पर्क में भी कई बातें आती हैं, लौकिक परिवार में भी आती हैं तो ब्राह्मणों में भी आती हैं और ब्राह्मणों द्वारा माया और भी ज्यादा आती है। लौकिक द्वारा इतनी नहीं आयेगी। मानों किसी ब्राह्मण ने आपको एक शब्द बोल दिया। जो बोलना नहीं चाहिए लेकिन बोल दिया तो आपको उसका एक शब्द बार बार पिंच करता रहेगा। लौकिक ने आपको दस गालियां भी दे दी तो लगेगा कि ये तो है ही अज्ञानी। अज्ञानी को तो गालियां ही देनी हैं। लेकिन किसी ब्राह्मण ने कुछ बोल दिया तो कहेंगे यह ब्राह्मण ज्ञानी हो करके मेरे को ऐसे कहता है ! ऐसी माया सूक्ष्म रूप से दिल दिमाग दोनों में अन्दर चली जाती है। तो ऐसी समस्यायें आती है। क्योंकि सम्पूर्ण तो कोई हुआ ही नहीं है। अभी हो रहे हैं। तो किसी के भी द्वारा भी हमारा पेपर आ सकता है। क्योंकि बाबा ने कह दिया है कि आपके पेपर के लिए कोई पेपर हाल मुकरर नहीं है। आपको कोई क्वेश्चन की कॉपी पेन्सिल नहीं मिलेगी हमारी ब्राह्मण जीवन ही पेपर हाल है। ब्राह्मण जीवन में ही समस्याओं के क्वेश्चन आते हैं। इसलिए बाबा कहते हैं कि ये तो समस्यायें आनी ही हैं, और जितना-जितना आगे बढ़ेंगे उतने ही क्वेश्चन महीन होते जायेगें लेकिन मुरली ऐसी चीज़ है जो आपको किसी भी प्रकार की समस्यायें आये चाहे तन का रोग हो, चाहे मन में परेशानी हो, चाहे धन का कुछ नीचे उपर हो रहा हो, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में कोई भी समस्या हो तो आप मुरली खोलकर उससे उसकी दवाई ले लो, आपको जरूर मिलेगी। चाहे कोई भी मुरली हो, उस मुरली में समस्या का हल मिल जाता है। यह हम लोगों का अनुभव है। यही मुरली में विशेष जादू है जो हमारी हर समस्या को हल करने का साधन एक ही मुरली में मिल जाता है। उस विधि से आप मुरली के पढ़ो। आज मेरे को बाबा ने इसका उत्तर क्या दिया है। हे अर्जुन मैं हूँ भगवान ने मेरे लिये बोला है। हे अर्जुन माना हे आत्मा, तो मुझ अर्जुन अर्थात मुझ आत्मा के प्रति बाबा ने क्या महावाक्य उच्चारण किये हैं? तो आप देखेंगे कि बाबा का उत्तर मेरे को मिलेगा। करके देखो। किया भी होगा, अनुभवी भी होंगे।
तो मुरली का कितना महत्व है ! मुरली तो हमारे साथ होनी ही चाहिए। साकार में बाबा हम लोगों को मुरली के ऊपर बहुत अटेन्शन दिलाते थे। ब्रह्मा बाबा का प्यार सदा मुरली से रहा। बाबा मुरलीधर है और आपका मुरली से प्यार नहीं तो मुरलीधर से प्यार कैसे हुआ ? लेकिन सिर्फ अनुभूति न कर सकने के कारण हम मुरली को बिल्कुल ही साधारण समझ लेते हैं। या रिपीट समझते हैं या समझते हैं यह मेरे काम की बात नहीं हैं। लेकिन सब बातें मेरे काम की हैं।
बाबा के हर कर्तव्य से हमारा प्यार है। हम बाबा का चित्र इसीलिए रखते हैं क्योंकि इस चित्र द्वारा ही विचित्र हमको मिला। प्रवेश तो ब्रह्मा बाबा में ही होता है ना तो इसीलिए ब्रह्मा बाबा के चित्र से हमको वो प्रेरणा मिलती है। और ब्रह्मा बाबा का कभी भी हम चित्र देखते हैं तो हमारा अटेन्शन ब्रह्मा बाबा के शरीर में नहीं जाता लेकिन ये किसका माध्यम है- उस तरफ हमारी बुद्धि जाती है। कोई दूसरे लोगों के माफिक मूर्ति पूजा के रीति से हम ब्रह्मा बाबा का चित्र नहीं रखते हैं। लेकिन ब्रह्मा बाबा का चित्र बाबा के कमरे में इसीलिए रखते हैं कि हमको इस तन द्वारा शिवबाबा की नॉलेज मिली है तो उसकी स्मृति आती है। शिवबाबा ने हमको क्या से क्या बना दिया ! तो चित्र हम नहीं देखते लेकिन चित्र द्वारा विचित्र को देखते हैं। बाबा के चित्र के सामने भी कोई क्वेश्चन वा समस्या ले करके जाता है तो उसे उसका उत्तर मिलता है। तो ब्रह्मा बाबा के माध्यम द्वारा शिवबाबा आपको उत्तर देता है। और अनुभव होता है जैसे सचमुच बाबा हमारे से बोल रहा है। क्योंकि हमारी भावना ही वह है कि शिवबाबा हमसे ब्रह्मा बाबा द्वारा मिल रहा है। तो बाबा हमको भावना का फल ब्रह्मा बाबा द्वारा देता है। माध्यम को जानना तो पड़ेगा ना। इसीलिए हमारा ब्रह्मा बाबा से भी इतना ही प्यार है और शिवबाबा से भी इतना ही प्यार है। ब्रह्मा की आत्मा से हमारा कई जन्मों का कनेक्शन है।
स्वर्ग में राज्य भी ब्रह्मा बाबा के साथ करेंगे। तो आदि आत्मा होने के नाते से और जगतपिता होने के नाते से, साकार ब्रह्मा साकार सृष्टि का पिता है और इस आत्मा के साथ हमारे कई जन्मों का कनेक्शन है उस नॉलेज से हम ब्रह्मा बाबा को देखते हैं। बाकी शरीर की रीति से सोल कान्सेस हुए बिना बाबा के कमरे में आप बैठो तो आपको कुछ भी अनुभव नहीं होगा। जब हम अपनी ही बॉडी को भूलने की कोशिश करते हैं तो ब्रह्मा बाबा की बॉडी को क्यों देखें ! अपने को भी तो भूलते हैं ना। तो हमारा देह के साथ नहीं, लेकिन ब्रह्मा बाबा के कर्तव्य, विशेषता, गुण, शक्तियों के साथ सम्बन्ध है इसीलिए हमको अनुभव होता है। कोई कमजोरी होगी तो ऐसे अनुभव करेंगे जैसे लाइट माइट की किरणों से बाबा हमको शक्ति दे रहा है और हमार कमजोरी मिटती जा रही है। तो इस अनुभव के कारण हम बाबा के कमरे में बाबा के आगे बैठते हैं। और अनुभव होता है अव्यक्त रूप में ब्रह्मा बाबा बहुत पालना दे रहे हैं। पालना कम नहीं कर रहे हैं। बिल्कुल ऐसी फीलिंग दे रहे हैं, अनुभव करा रहे हैं जैसे साकार में पालना दे रहे हैं। तो इस अनुभव को बढ़ाओ और मुरली को मनन करो। कई कहते हैं हमको मनन करने का टाइम ही नहीं मिलता। लेकिन कई काम ऐसे होते हैं जैसे आप नहा रहे हो, कपड़े धुलाई कर रहे हो, खाना बना रहे हो उस समय उसमें फुल बुद्धि लगाने की तो बात ही नहीं है। ऐसे ऐसे टाइम पर आप मनन कर सकते हो। हाँ कोई कोई का काम होता है फुल दिमाग लगाने का तो वह भी कितना ८ घण्टा। कई बच्चे बाबा से कहते हैं बाबा हमको टाइम नहीं मिलता तो बाबा कहते हैं २४ घण्टे हैं ना। ८ घण्टा जॉब करो, ८ घण्टा आराम करो फिर जो समय बचता है उसमें सेवाकेन्द्र की सेवा करो, ज्ञान-योग सिखलाओ। उसमें भी आपकी कमाई है।
दाता, विधाता और वरदाता स्टेज
१. दाता
बाबा हम बच्चों को कहते हैं-बच्चे तुम दाता बनो। एक तो हमारा बाबा दाता है, उसके बच्चे हम मास्टर दाता हैं, बाबा ने जो दिया है वह औरों को देने के लिए हम निमित्त हैं इसलिए हम मास्टर दाता हैं। दूसरा-देवता बनने वाले हैं तो देवता का भी अर्थ है दाता। दातापन के संस्कार भरे होने कारण ही हम देवता कहलाते हैं। देवता कहा ही जाता है देने वाले को। तीसरा-जब हम ब्राह्मण सो फरिश्ता हैं, तो फरिश्ता कुछ लेता नहीं, देने के लिए ही आता है। अच्छी चीज देने आयेगा, मैसेज देने आयेगा या प्राब्लम मिटाने के लिए आयेगा। तो फरिश्ता जीवन जो हमारी है वह भी देने की है, लेने की नहीं है और चौथा-इस समय हम सेवा की स्टेज पर हैं, बाबा ने हमें जो गुण, ज्ञान, शक्तियां खजाने के रुप में दी हैं उनके भी हम मास्टर दाता हैं। सेवाधारी का अर्थ ही है देने वाला न कि लेने वाला। बाबा का भी पहला टाइटल है वर्ल्ड सर्वेन्ट। तो बाबा हमें भी कहता टीचर माना सेवाधारी। तो सेवाधारी माना सेवा करने वाले। सेवा करना माना अपने द्वारा दूसरों को कुछ देना। चाहे मन्सा से दो चाहे कर्मणा से, लेकिन जब सेवाधारी कुछ देता है तब ही वह सेवाधारी कहलाता है। तो इस रीति से भी हम दाता हैं। हमारी संगमयुग की यह जीवन ही दातापन की है। दाता माना देने वाला।
कई स्थानों पर हमसे चाहना रखते हैं कि इनसे कुछ प्राप्त हो, उस स्थान पर देना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन कई बार ऐसी परिस्थिति आती है जो चाहना भी नहीं रखते और ही क्रिटिशाइज करते हैं, उस समय भी ऐसे व्यक्ति के प्रति आप दाता बनकर देते जाओ इसको कहेंगे दाता की सूक्ष्म स्टेज। हम लोगों को जो ज्ञान मिला है, वह देने के बिना तो रह नहीं सकते। हमारे सामने कोई भी आयेगा तो हमारे मुख से ज्ञान अवश्य निकलेगा। क्योंकि हम ज्ञान स्वरूप हो गये हैं। बाबा से हमें बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ है। दूसरी रीति से भी हमारा कोई सहयोग चाहता है तो हम दाता के बच्चे हैं सहयोग देते हैं। लेकिन दाता की वास्तविक स्टेज यह है जो हमें कोई ठुकराए और मैं फिर भी दाता की स्टेज से देती रहूँ। जैसे साकार में बाबा को देखा। बाबा से कोई सहयोग की इच्छा रखे, महिमा करे, उनको तो दिया ही लेकिन बाबा ने कमजोर को भी अपनी शुभ भावना, शुभ कामना से हिम्मत दिलाकर बल दिया। कैसा भी बच्चा हो, भल ग्लानी करने वाला हो, उसके प्रति भी बाबा सदा दाता रहे बाबा ने दातापन की स्टेज से उन्हें और भी एक्स्ट्रा दिया। अपनी स्टेज से उसको खड़ा कर दिया। इतना सहयोग दिया जो उसमें भल हिम्मत नहीं थी लेकिन अपने सहयोग से उसे खड़ा कर दिया। तो सूक्ष्म दातापन के संस्कार हमारे अन्दर ऐसे हों जो ऐसी परिस्थिति में भी हम दाता बनकर देते रहें। कैसे भी संस्कार वाला हो, कैसी भी वृत्ति से हमारे सम्पर्क में आता हो लेकिन मैं उसके प्रति हमेशा देने की भावना रखूँ, लेने की नहीं। जैसे हमें कोई रिगार्ड देता है तो हम उसको रिगार्ड देते। लेकिन रिगार्ड लेकर रिगार्ड देना-यह कोई दातापन की स्टेज नहीं है। यह तो लेन-देन का हिसाब हो गया। उसने दिया आपने लिया। लेकिन दातापन की स्टेज वह है जो वह हमें भले न दे लेकिन हमारी भावना उसके प्रति सदा दातापन की हो। तो जितना हम देते जायेंगे उतना नेचुरल हमें रिटर्न मिलेगा। कई बार ऐसे कहते हैं- हमने तो दाता बनकर बहुत शुभ भावना, शुभ कामना इसको दी लेकिन यह तो स्वीकार ही नहीं करता है। मैंने तो बहुत दिया उसको पहुंचता ही नहीं है। लेकिन दातापन की स्टेज है कि वह देखेगा नहीं कि मुझे रेसपान्ड मिला, वह देता जायेगा। जो स्वयं भरपूर है, उसने दिया तो क्या बड़ी बात है, वह गिनती क्यों करे। अगर मैं भरपूर हूँ, मास्टर दाता हूँ तो देती जाऊं, जितना देती जाऊंगी उतना देने से बढ़ता है, कम नहीं होता। यह गुण यह शक्तियां जितना हम देते हैं उतना हमारे अन्दर बढ़ते हैं। मन्सा से हम शुभ भावना, शुभ कामना देते रहेंगे तो मन्सा का प्रभाव नेचुरल पड़ते-पड़ते उसका स्थूल व्यवहार ठीक हो जायेगा। हमारी कल्याण भावना कभी न छूटे दाता पन के संस्कार से उसकी हड्डी नर्म हो जाती है, वह फिर नजदीक आ जाते हैं। दातापन हमारा संबंध-सम्पर्क बनाकर रखता है।
प्रवृत्ति वाले हैं, भल गाली खाते हैं, हम कहते तुम छोड़ो नहीं, ट्रस्टी होकर रहो, अनासक्त वृत्ति रखो ताकि संबंध-सम्पर्क बना रहेगा, इससे उनका कल्याण होगा। तो यह दातापन के संस्कार हैं। दातापन में पात्र को तो देना ही है लेकिन हम कहें यह पात्र नहीं है, ऐसा कहकर छोड़ना भी नहीं है। कोई घड़ी आती है जो हमारी अन्दर की भावनायें समय अनुसार उनको पात्र बना भी देती हैं। तो हमारे दातापन के संस्कारों से बहुत सेवा होती है। हम किसी से मांगते नहीं हैं। सेवा है, सेवा करने का चांस देते हैं। हर एक जानता है यह स्वयं कहाँ से लायेंगे। श्वास, समय, संकल्प सब दे रहे हैं, एक भगवान से ले रहे हैं बाकी सबको दे रहे हैं। तो हम मांगते नहीं हैं लेकिन जो देना चाहता है, उसको हम चांस देते हैं। सम्बन्ध-सम्पर्क किसी से बिगाड़ना नहीं है, जो संबंध सम्पर्क बना हुआ है उससे वह आपेही मददगार बनते हैं।
२. विधाता स्टेज
भाग्य की लकीर खीचने वाले को भाग्य विधाता कहते हैं। जब हम विधाता की स्टेज पर स्थित रहते हैं तो हमारे सामने जो भी व्यक्ति आयेगा - उसके प्रति मन में रहेगा कि इसके भाग्य की लकीर हम खीचें जरुर। इसे हम भाग्य बनाने का तरीका बतायें। भाग्य की लकीर खीचनें का कलम है-श्रेष्ठ कर्म की नालेज। वही श्रेष्ठ कर्म की नालेज बाबा हमें देता है, जिससे हम अपने भाग्य की लकीर खींचते हैं। यह कलम हम बच्चों के हाथ में है। इससे जितना लम्बी लकीर खींचनी हो उतनी लम्बी खीचे। तो विधाता की स्टेज में यह स्मृति रहेगी जो भी मेरे पास आया है उसको मैं श्रेष्ठ भाग्य की ऐसी नालेज दूँ जो वह श्रेष्ठ भाग्य बनाने से वंचित न रह जाए। थोड़ा भी अंचली अवश्य लेकर जाये। भाग्य विधाता के सामने कोई आये और अंचली भी न लेकर जाये तो इसका दोष भी आपके ऊपर पड़ेगा। हम अपने अलबेलेपन के कारण, अपने मूड के कारण या अपने अन्य कई कारण से उस पर अटेन्शन नहीं देते हैं तो यह हमारा दोष है। कोई दो बजे आता। हम गहरी नींद में हैं, किसी ने नींद से उठाया तो हमारा मूड नींद के नशे का है और हम आने वाले को चला देते तो सामने वाली आत्मा तो भाग्य से वंचित रह गई। भाग्य विधाता की स्टेज में कभी भी किसी आत्मा को खाली भेज नहीं सकते। अंचली मात्र भी देंगे जरूर। हमारे भाग्य के भण्डारे भरपूर हैं, हम वह बांटते चलें। किसी का भी भाग्य कम न करें। कई हैं जो ज्ञान नह सुनते लेकिन जीवन अच्छी लगती है और इसी निमित्त वह सहयोगी बनते हैं, तो उसका भी हम भाग्य बनायें। हमें उसका भाग्य बनाने की टचिंग आये। भाग्य बनता है विश्वास और प्रेम से। हमारा बाबा से प्यार है, विश्वास है इसलिए हमारा भाग्य बनता जा रहा है। बाबा का स्नेह नहीं होता तो हमारा भाग्य नहीं बनता। तो बाबा से स्नेह और विश्वास का संस्कार हमारा भाग्य बना देता है। दाता बनते-बनते हम भाग्य विधाता की स्टेज पर पहुंच ही जाते हैं। जब तक हम दाता नहीं हैं तब तक विधाता भी नहीं हैं।
३. वरदाता
हमारे जीवन में कई ऐसी बातें हैं जो पर्सनल हमारी विशेषतायें नहीं हैं लेकिन वरदाता बाप का वरदान हैं। हमारी सारी लाइफ का आधार वरदान हैं। वरदान ही मुझे पुरूषार्थ करा रहा है। मैं बाबा के वरदान से चलती आ रही हूँ। जैसे सच्चे भक्त जो होते उनके अन्दर यही रहता बस तेरा ध्यान रहे, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। हम लोगों के अन्दर भी बाबा के लगन की ऐसी पक्की स्मृति बनी रहे बाबा आप सदा मेरे ध्यान पर रहो। यह हमने जैसे बाबा से वरदान लिया हुआ है। जो बाबा से प्रतिज्ञा की हुई है उस प्रतिज्ञा को वरदान का रूप दे दो तो बाबा तथास्तु कहता जाता। हमारा सूक्ष्म संकल्प है तो बाबा तथास्तु करेगा। बच्चे हुआ ही पड़ा है। भगवान, भाग्य और भावी तीनों को सामने रखो तो वरदाता की स्टेज आ जाती है। वरदाता ने ऐसी भावी बना दी है जो हमारा भाग्य बना पड़ा है।
भगवान साथी है, वरदाता है, भाग्य भी बना रहा है तो हम वरदाता बनते जाते हैं। भावी, भगवान और भाग्य तीनों का गहरा संबंध है। हमारा भाग्य वरदानों से बना है इसलिए आजकल यही कहते हैं-आप सिर्फ वरदान के दो शब्द बोल दो। तो हमारे अन्दर का ऐसा मीठा आवाज हो, जो वरदान का काम करे। जो हमारे मुख से बाबा कहलाये वह दूसरों के लिए वरदान हो जाए। इसके लिए पहले शुभ भावना, शुभ कामना रखो तो वरदानी स्टेज बन जायेगी । अच्छा।
राजयोगी ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र जी
अनेक ईश्वरीय वरदानों का साकार स्वरुप राजयोगी ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र जी को अपने शब्दों के माध्यम से ईश्वरीय महावाक्यों को विस्तृत रूप देने की विशेष कला प्राप्त है। आपकी लेखन शक्ति अनेक आत्माओं को दिव्य मार्ग दर्शन देने के निमित्त बनी है।
आपको राजयोग की विभिन्न स्थितियों की गहन अनुभूति प्राप्त हैं। इस दिशा में आपका अध्ययन भी उच्च कोटि का है। आपकी कुछ क्लासेज़ का संक्षिप्त रूप यहाँ भी लिखा जा रहा है ताकि इसे पढ़कर हर आत्मा सहज राजयोग के पथ पर दृढ़ता एवं तीव्रता से आगे बढ़ सके।
स्वाभाविक और निरन्तर योग कैसे हो ? योग की गहराई क्या है ?
जब हम योग के गहराई की बात करते हैं तो उसके साथ-साथ योग की लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई का भी संबंध है। योग की गहराई अर्थात् उसका डीप अनुभव। ऐसा अनुभव जिससे हम लाइट-माइट के स्वरूप बन जाएं या कम से कम हमारी फ़रिश्ता स्टेज हो। लेकिन लम्बाई का संबंध है निरन्तर योग से। कितने समय से लगातार निरन्तर योग चला आ रहा है, वह भी देखना है। अगर हमारा योग निरन्तर नहीं होगा, बीच में टूटता रहेगा या बीच-बीच में गैप होगा तो योग की गहराई का अनुभव, जो हमें करना चाहिए, वह नहीं हो सकेगा। इसलिए बाबा कहते हैं कि कम से कम ८ घण्टा योग हो। तो इसके लिए हमें योग की लम्बाई का ख्याल रखना चाहिए। योग की चौड़ाई अर्थात् सर्व संबंध हमारे एक बाप से हों। यह जैसे योग की विशालता है। योग का अर्थ ही है आत्मा का, पिता परमात्मा से कनेक्शन। वह कनेक्शन सर्व संबंधों का एक के साथ हो। यही योग की चौड़ाई है। अगर हमारी रग और कहीं भी जुटी हुई है तो हम योग के गहरे अनुभव नहीं कर सकते। हम योग के गहरे अनुभव तभी कर सकते हैं जब हमारे संकल्प ऊंचे हों, महान् हों। अगर हमें बार-बार नैगेटिव विचार आते हैं तो योग में विघ्न पड़ता रहेगा और योग की गहराई का अनुभव नहीं होगा। अभी-अभी अनुभव करेंगे, अभी-अभी विघ्न पड़ने से पहले वाली स्थिति में आ जायेंगे तो योग की ऊंचाई का अनुभव नहीं कर सकेंगे। इसलिए हमारे विचार विशाल, ऊंचे, दूरदेशी होने चाहिए। तो योग की स्थिति बनाने के लिए सर्व संबंध और सबसे तोड़कर एक से जोड़ें। विचार अच्छे चलते रहें, निरन्तर योग जुटा रहे।
योग अर्थात् हमारी कान्सेसनेस क्या है? एक है कान्सेसनेस अर्थात् चेतन, दूसरा है अभिचेतन अर्थात् सब-कान्सेसनेस। जिसको हम कह देते हैं कि हमारा यह भाव नहीं था। शब्दों से अगर कोई दूसरी बात समझ लेता तो हम कहते हैं हमारा यह भाव नहीं था। अन्दर से हमारे संस्कार हमारी एक्टिविटी को प्रभावित करते हैं. जिसका हमें भी ध्यान नहीं रहता है। हमारे संस्कार, हमारी दृष्टि-वृति, एक्टिविटी को प्रभावित करते हैं।
हमारा योग लगातार लगा रहे, टूटे नहीं, हमारे विचार भी अच्छे हो और सर्व संबंध भी हमारे शिवबाबा से हों यह हम सभी चाहते हैं लेकिन कारण क्या है जो यह स्थिति हमारी बन नहीं पाती है या थोड़ा टाइम बन पाती और बीच में ऐसा विघ्न पड़ जाता है जो डिग्री, दो डिग्री या अपने-अपने अनुसार हम नीचे आ जाते हैं। योग का सारा पुरुषार्थ इसी बात पर निर्भर कि हमारी जो चेतना है, वह क्या है? हमारी जो चेतना का स्तर है, जो हमारी अवेयरनेस है वह शिवबाबा की है या देहधारियों की है या वस्तुओं की है या पदार्थों की है। चेतना को हम दो भागों में बांट सकते हैं। एक - अभिचेतन, दूसरा – चेतन। अभिचेतन का अर्थ है- सूक्ष्म, जिसके लिए हम कह देते हैं - मेरा भाव ऐसे नहीं था, कई दफ़ा हम कहते हैं कि हमारे अन्दर में यह बात नहीं थी, शब्दों से आपने ग़लत ले लिया। इसे ही हम संस्कार भी कहते हैं। अन्दर में हमारे जो संस्कार हैं वह हमारी एक्टिविटी को, दृष्टि को, शब्दों को प्रभावित करते हैं। लेकिन हम उसके बारे में स्वयं सतर्क नहीं होते कि हमारा सूक्ष्म में भाव कुछ और था। तो संस्कार को हम अभिचेतन कहते हैं। जिसके बारे में हम पूरे जागृत नहीं होते। योग से उसका गहरा संबंध है। हमें योग के गहरे अनुभव तब तक नहीं होंगे जब तक हम उन सूक्ष्म छिपे हुए भावों को, जो जन्म-जन्मान्तर के संस्कार हमारी वृत्ति-दृष्टि को प्रभावित कर रहे हैं, जिनका हमारी स्मृति से बहुत गहरा कनेक्शन है, उनकी चेकिंग नहीं है तो वह हमें गहरे अनुभव नहीं करने देते। जो चेतन है, जिसकी कान्सेस है उसकी चेकिंग तो है ही, उसमें चेकिंग करने की वा अटेन्शन देने की बात ही नहीं लेकिन जो सूक्ष्म है, संस्कार रूप में है उसकी चेकिंग चाहिए। पुरुषार्थ में दो बातें कही जाती है - एक अटेन्शन दो, दूसरा चेकिंग करो। हम अटेन्शन उस बात पर दें, जो कान्सेसनेस है और जो सबकान्सेस माइन्ड है, संस्कार हैं, जो छिपे हुए हमारे भाव हैं, जो हमारी वृत्ति-दृष्टि को प्रभावित करते हैं उनकी चेकिंग करने की ज़रूरत है।
योग की गहराइयों का अनुभव करने के लिए कुछ मुख्य बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:-
(१) आसक्ति
अन्दर छिपी हुई जो आसक्तियां हैं, जो हमें प्रभावित करती हैं, अपनी ओर खींचती हैं- ऐसा खाने को चाहिए, ऐसा पहनने को चाहिए, यह सहूलियतें चाहिए.... वह चीजें जो हमें आकर्षित करती हैं, जिन डोरों से हम बंधे हुए हैं उस पर पहले अटेन्शन दें कि जो एक्टिविटी हम कर रहे हैं वह किसी आसक्ति के वशीभूत तो नहीं है। उसके लिए बाबा बार-बार कहते हैं - कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करो। हमारा योग यही सिखाता है कि यह जो पदार्थ वा व्यक्ति हैं या कर्मेन्द्रियों के जो विषय हैं, उसके प्रति आकर्षण न हो। यही आसक्तियां हैं। आसक्ति का परिणाम है परिग्रह। चीजों को इकट्ठा करने की हम कोशिश करेंगे। कोई चीज विशेष अच्छी लगी तो वह काफी मात्रा में अपने पास जमा कर लेंगे। सुनने की आसक्ति होगी तो कैसेट बजती ही रहे, उसमें फिर एकान्त का अनुभव खत्म हो जायेगा। जिस-जिस विषय की आसक्ति होगी उसमें और आगे ही बढ़ेंगे। चीजें इकट्ठी करते जायेंगे और कहेंगे – हमारा तो सहज योग है ना। परन्तु हमें जो आसक्ति खींच रही है उसकी चेकिंग हम नहीं करते। हम अपने व्यवहार पर अटेन्शन नहीं देते। लोगों को हम त्याग की बातें सुना देंगे लेकिन अपने पर वह लागू नहीं करेंगे। क्योंकि इससे विवेक पर पर्दा आ जाता है। हम साधना पर ध्यान न देकर साधनों को इकट्ठा करने लग जाते हैं तो योग की जो गहराई है या उसकी जो ऊंचाई या लम्बाई है उसका अनुभव नहीं होता। इसके लिए बाबा ने त्याग पर समझाया है। इसका इलाज ही है त्याग। जिसका त्याग महान होगा, उसका योग गहरा होगा। इसलिए त्याग के साथ तपस्या का संबंध है। जब तक त्याग की वृत्ति प्रबल नहीं है, तब तक तपस्या की स्टेज निखर कर नहीं आ सकती। अगर कहीं पर भी हमारा मन उलझा हुआ होगा तो वह अपनी तरफ खीचेंगा और गहरे अनुभव नहीं हो पायेंगे।
(२) तृष्णा
आसक्ति और तृष्णा में भेद है। तृष्णाओं का संबंध कर्मेन्द्रियों से नहीं होता। हम कई प्रकार से तृष्णायें रखते हैं। सोचते हैं केवल हमारा ही नामाचार हो, हमारा विशेष अधिकार हो, प्रभुत्व हो। सर्व अधिकार हमारे ही हों, दूसरा कोई उसमें प्रवेश ही न प्राप्त कर सके। हम चाहते हैं कि सब लोग कहें हम बड़े कुशल हैं, कार्य करने में सक्षम हैं। यह जो मनोवृत्तियां रहती हैं, यही तृष्णा का रूप है। इसका भवन इतना बड़ा है तो हमारा भवन इससे बड़ा होना चाहिए, इसकी डेकोरेशन ऐसी है तो हमारी डेकोरेशन इससे भी ज्यादा सुन्दर होनी चाहिए। तृष्णाओं की अभिव्यक्तियां अनेक प्रकार की हैं। जहाँ तृष्णा होती है, वहाँ सेवा-भाव कम होता है। हमारी कान्सेस शिवबाबा के बजाय यही होती है कि ब्राह्मण संसार में हमारी महिमा हो, बड़ों तक हमारी बात पहुँचे। इन विचारों के कारण न तो हम लाइट के कार्ब में रहते और न ज्वाला स्वरूप की स्थिति का अनुभव कर सकते। इसी स्थूल कार्ब में आ जाते हैं। तो हम चेक करें कि हमारी तृष्णायें तो नहीं हैं, जो हमें पकड़कर रखे हों और संगमयुग की जो प्राप्तियां हैं उससे हमें वंचित कर दें ? तृष्णाओं से अनेक संघर्ष पैदा होते हैं फिर उन्हीं संघर्षों में उलझ जाते हैं और नीचे आ जाते हैं फिर हम बाबा को बीच में ले आते हैं, अपने साथ बाबा का नाम जोड़ देते है। लेकिन सूक्ष्म में भावना यही रहती कि हमने यह किया और लोग कहें कि आपने यह बहुत बढ़िया किया। जब तक कोई ऐसा न कहे, तब तक खुशी नहीं होती। फिर तृष्णा का परिणाम होता है - असन्तुष्टता। तृष्णा पूरी नहीं होगी तो मन असन्तुष्ट होगा। किसी न किसी एक्टिविटी में नाराज़गी का हाव-भाव प्रगट होगा – चाहे वह सूक्ष्म में रहे, चाहे वह प्रबल रूप बन डिस-सर्विस का कारण बने। सन्तुष्टता के बिना योग ठीक नहीं रहता। फिर अन्दर ही अन्दर उबलते रहेंगे कि यह व्यक्ति अन्याय करता है, यह तो हमारे पीछे ही पड़ा है, यह स्नेह नहीं देता। तो जब हम किसी से असन्तुष्ट होते हैं तो वे भाव योग की परफेक्ट स्टेज बनने नहीं देते। योग का सन्तुष्टता के साथ बहुत गहरा कनेक्शन है। जिस दिन सन्तुष्टता का मूड होगा, उस दिन योग अच्छा लगेगा। जब मानसिक रूप से थके हुए होंगे तो कभी योग लगेगा नहीं। यह तृष्णा का परिणाम है। अगर हमारे अन्दर यह हो कि बाबा मिल गया, सब मिल गया, अभी हमें कुछ नहीं चाहिए। योगी जीवन ही सर्वश्रेष्ठ जीवन है। योग से सब सिद्धियां स्वतः मिल जायेंगी, प्रकृति दासी हो जायेगी। जब यह बुद्धि में रहता तो तृष्णायें खत्म हो जाती हैं। योग ठीक हो जाता तो न कोई हमारा अपमान करता, न विघ्न डालता, न दुव्यर्वहार करता। पराकाष्ठा की स्टेज जब प्राप्त हो जाती है तो सब तूफ़ान ख़त्म हो जाते हैं। लेकिन हम वह न करके पहले तृष्णाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं तो उसका परिणाम यह होता कि हम योग का गहरा अनुभव नहीं कर पाते।
(३) लगाव
लगाव और आसक्ति में भी फ़र्क है। जो हमारी कर्मेन्द्रियों के विषय हैं, स्थूल पदार्थ हैं उनके प्रति हमारी आसक्तियाँ होती हैं। लेकिन जिनके साथ हम रहते हैं, जिस स्थान पर बहुत समय रहते हैं उससे विशेष लगाव हो जाता है। जो चीजें हमें प्रयोग करने के लिए मिलती हैं, उनसे भी लगाव हो जाता हैं। जब कोई चीज के साथ लगातार सम्पर्क रहता तो उसका परिणाम स्वाभाविक रूप से यही होता है। इसलिए कहा गया है कि बहता पानी ठीक रहता है, खड़ा हुआ पानी गंदा हो जाता है। जब कोई अपना स्थान बनायेगा, साधन बनायेगा तो उसके परिणाम स्वरूप यही होगा जो न चाहते हुए न ध्यान देते हुए उसके लिए भावना हो जायेगी। कर्मणा में आते-आते उसमें सूक्ष्म लगाव पैदा हो जाता है। इसके परिणाम अनेक प्रकार से निकलते हैं। लगाव होने से बाबा की तरफ जो हमारा खिंचाव चाहिए वह कम हो जाता है। आसक्ति आकर्षणात्मक है लेकिन लगाव अभ्यासात्मक है। यही रहते-रहते हमें अभ्यास हो जाता है। आसक्ति होती है तो वह चीजे खींचती हैं- यह सुन्दर है। आंख का विषय है सौन्दर्य और जिव्हा का विम है स्वाद। तो हरेक कर्मेन्द्रिय को अगर कोई खींचता है तो वह हुआ आकर्षणात्मक। लेकिन लगाव का गुण अभ्यासात्मक है। जो चीज बार-प्रयोग करेंगे, जिसके साथ रहेंगे उससे आपका अभ्यास पड़ जाने से लगाव हो जायेगा। फिर इस लगाव का परिणाम निकलता है - पक्षपात। जब हम किसी के साथ रहते हैं तो रहते-रहते उनसे विशेष स्नेह हो जाता है, उनसे हमारी रगें जुट जाती हैं फिर पक्षपात शुरु हो जाता। पक्षपात का परिणाम है - अन्याय। फिर सत्य-असत्य का विवेक नहीं रहता। फिर अगर बड़े भी समझायेंगे कि तुम्हारी यह एक्टिविटी ग़लत है तो भी समझ में नहीं आयेगा क्योंकि विवेक पर पर्दा पड़ जाता है। जिससे सत्य-असत्य का बोध नहीं होता। कोई अगर राइट बात भी सुनायें कि तुम ठीक नहीं करते हो, तो उसे भी हम राइट न समझकर कहेंगे कि यह तो हमारे पर शक करते हैं, आपको किसी ने हमारी रिपोर्ट की है, विरोधियों ने आपके कान भर दिये हैं। अ हमारी बात नहीं सुनते, उनकी बात सुनकर हमारी बेइज्ज़ती करते हो। तो यह परिणाम है लगाव का।
इन सभी का टोटल परिणाम होता- निराशा। उमंग-उत्साह कम जाता है। यही योग में बहुत बड़ा विघ्न है। न सेवा कर पायेंगे, न योग लगेगा हर तरफ से मन वीरान हो जायेगा, उचाट हो जायेगा। कारण क्या ? अन्य बीमारी भरी हुई है। इसके लिए बाबा कहता है सेल्फ डॉक्टर बनो। अपने आपको आपेही चेक कर लो। जब हम इन सूक्ष्म बीमारियों से मुक्त होंगे तब अनुभव होगा कि हम बाबा के इंस्ट्रूमेंट हैं। हमारी चाबी उसके हाथ है। हमारे अंदर जो शक्ति काम करा रही है वह बाबा ही है। मेहनत कम करनी पड़ेगी, प्राप्ति ज्यादा होगी। विघ्न आयेंगे ही नहीं। अनुभव होगा जैसे हमें टोटल बाबा ने अपना बना लिया। हम बाबा के ही प्रभाव के नीचे हैं। जैसे उसके ही हम हो गये।
हम सर्व के सहयोग से सुखमय संसार बनाने का कार्यक्रम कर रहे हैं लेकिन हमारा यह जो दैवी संसार है इसमें हम एक-दूसरे को क्या सहयोग दें ? सबसे पहले हमारी जो कमजोरियां हैं, भाव-स्वभाव या पुरानेपन की बातें जो हमें खींचती हैं, उसमें हम एक-दूसरे के बीच संघर्ष पैदा न करके, किसको ज्यादा नीचे न उतारकर हम उसे ऊंची स्टेज पर रहने का सहयोग दें और स्वयं भी ऊंची स्टेज पर रहें। जैसे हम खुद आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं वैसे हम् दूसरों को भी आगे बढ़ाने का ऐम रखें। दूसरा, हम एक-दूसरे के बारे में अनुमान न लगायें। अनुमान उठे ही नहीं, अगर उठता है तो हम आपस में स्पष्ट कर लें। मिसअण्डरस्टैंडिंग में न आयें। प्रेम व स्नेह से बात कर लें। जो हम दूसरे के बारे में फाइनल ओपीनियन बना लेते हैं या जजमेंट बना लेते हैं, उसके बजाय उसे इतना तो अधिकार दें जो वह एक दफ़ा स्पष्टीकरण तो कर ले। उसके बाद हम अपने दृढ़ विचार बनायें। हम अपने मन में किसी के प्रति कोई धारणा बनाकर मन खराब न करें। हमारा आपसी रिलेशन अच्छा हो। हम एक-दूसरे की क्रिटिसाइज़ न करें। एक-दूसरे को सहयोग दें और आगे बढ़ाने का भाव रखें तो इन सब धारणाओं से हम योग की गहराई का अनुभव कर सकेंगे।
योग के गहरे अनुभव करने के लिए कुछ ध्यान देने योग्य बातें
(१) हमारे योग का फाउन्डेशन है आत्मा का डीप अनुभव, साथ- साथ परमात्मा के गुण व शक्तियों का डीप
अनुभव। आत्मा की जो शक्तियां हैं- मन, बुद्धि या स्मृति, इनका जन हम डीप प्रयोग करेंगे तब हमारा अनुभव भी डीप होगा। इन विभिन्न शक्तियों का डीप प्रयोग कैसे करें:-
(क) इच्छा शक्ति- आत्मा की जो सबसे बडी चेतना की अभिव्यक्ति है, वह है इच्छा। जिसको विल पॉवर कहा जाता है। कोई भी कार्य होता है तो उसके पहले हमारे मन में इच्छा उत्पन्न होती है फिर उसके लिए साधन जुटाते हैं। जब तक हमारी इच्छायें बटी हुई हैं, हमारे मन में आकर्षण है तब तक हम योग की डीप अनुभूति नहीं कर सकते। तो पहले यह इच्छा प्रबल चाहिए कि हमें योग की डीप अनुभूति करनी ही है, हमारा यह योगी जीवन ही सर्वश्रेष्ठ जीवन है। यही एकमात्र इच्छा हो और कोई इच्छा न हो। तो हम इच्छा शक्ति को देखें कि योग का गहरा अनुभव करने की श्रेष्ठ इच्छा है? और सब इच्छाओं को हटाकर इसी इच्छा को सामने रखना है।
(ख) संकल्प शक्ति - इसके गहराई की भी जरूरत है। संकल्प हमारा कितना पॉवरफुल है। विचार शक्ति या मनन शक्ति कितनी पॉवरफुल है। जितना संकल्प पॉवरफुल होगा उतना योग पॉवरफुल होगा। तो देखना है संकल्प हल्के हैं या पॉवरफुल हैं? इसमें सबसे पहले चाहिए - निश्चयात्मक संकल्प। किसी भी प्रकार का डाउट न हो। ज्ञान में भल डाउट्स नहीं होते लेकिन उसके सूक्ष्म रूप हमारे सामने आते हैं। हमारे थॉट्स बिखरे हुए न हो। मन यहाँ-वहाँ होगा या बिखर जायेगा तो उसमें शक्ति नहीं होगी। एक शिवबाबा के प्रति या आत्मा के प्रति ही संकल्प होगा तो वह संकल्प पॉवरफुल होगा। संकल्प की जो तरंगे हैं वह हमारे लक्ष्य पर जायें। हमारे थॉट एक टिक हों, सीधे केन्द्र-बिन्दु की तरफ जायें तो वह पॉवरफुल होंगे। संकल्पों की लहरें सीधी हों। तब योग की गहरी स्थिति का अनुभव कर सकेंगे।
(ग) निर्णय शक्ति - जब तक बुद्धि पॉवरफुल नहीं तब तक योग पॉवरफुल नहीं। बुद्धि पॉवरफुल का मतलब है कि हमें जो महसूस करना था, अनुभव करना था, वह कर लिया। हमारी निर्णय शक्ति यह निर्णय कर ले कि हमने देख लिया इस संसार को, इन पदार्थों को तब बुद्धि इससे उपराम हो जायेगी। उनसे बुद्धि सिमट जायेगी और फिर वह बुद्धि अच्छाई-बुराई, पाप-पुण्य का फैसला कर लेगी। जितना बुद्धि पक्का फैसला कर लेगी, वह भाव जितना दृढ़ होगा, जब सभी तरफ से बुद्धि सिमट जायेगी, तब वह शिवबाबा में जाकर जुटेगी क्योंकि हमारा है ही बुद्धियोग। जब तक मनुष्य फैसला नहीं करता, तब तक वह लंगर नहीं उठाता। क़िश्ती (नांव) दूसरे तरफ चलती नहीं। तो हमारे याद की यात्रा प्रारम्भ तब होगी जब सब आधार छोड़कर एक का आधार लेंगे। जब पक्का होगा कि हमें इस पार से उस पार ले जाने वाला हमारी नांव का खिवैया और कोई नहीं, यह हमने जान लिया, पहचान लिया - जब यह स्थिति होगी तब याद में पॉवर आयेगी। बुद्धि का एक प्रयोग है प्लैन बनाने का। जब भी कोई कार्य करते हैं जब तक वह योजना-बद्ध न हो तब तक वह कार्य ठीक नहीं होता। योगी की बुद्धि प्लैनिग वाली होती है। उसका हर कार्य सुव्यवस्थित रूप से होता है। योग न लगने का मूल कारण है - मन-बुद्धि एक-दो के विपरीत होते हैं। दोनों एकजुट होकर नहीं चलते। दोनों एकजुट हो जाएं तो हमारा योग पॉवरफुल हो जायेगा।
(घ) स्मृति की शक्तिः- हमारा योग है ही स्मृति का। स्मृति पॉवरफुल नहीं है तो कई विघ्न आते हैं। इसके लिए - (i) जो पास्ट की स्मृतियां हैं या जो उल्टे-सुल्टे कर्म किये हैं, उनकी स्मृतियां हैं, तो मन खायेगा और योग के गहरे अनुभव होने नहीं देगा। जब एक शिवबाबा की ही स्मृति होगी, पास्ट की या किसी घटना की स्मृति नहीं होगी तो एक स्मूथ स्मृति होने से योग का डीप अनुभव होगा।
(ii) स्मृति में यह क्लीयर हो कि शिवबाबा बिन्दू है, वह परमधाम निवासी है। स्मृति में मैलापन या धुंधलापन न हो, स्मृति ब्राइट हो।
(iii) जितना हम अपनी स्मृति को दूसरे तरफ से हटाकर एक तरफ लगायेंगे, उतना वह तीव्र ज्वाला जगेगी। ज्वाला स्वरूप तब बन सकेंगे, जब अटेन्शन क्लीयर हो। जहाँ हम लगाना चाहते हैं वहाँ वह फ़ोकस होकर जाये।
(iv) हमारे संकल्प बिखरते तब हैं जब कोई आकर्षण है। हमारी और कोई लगन ही न रहे, तृष्णा ही न रहे तब योग लगेगा। जितना हम उस पर न्योछावर जायेंगे, वारी जायेंगे, तब गले का हार बनेंगे। जब गहरा लॅव होगा, उत्कट प्यार होगा, तब योग की गहराई होगी। अगर हम गहराई से योग का अनुभव करना चाहते हैं तो पहला है लॅव।
(२) योग के डीप अनुभव के लिए डीप साइलेन्स की स्टेजः-
डीप साइलेन्स के लिए डीप नॉलेज चाहिए। साइलेन्स से बाहर ले जाने वाली चीज है डाउट्स। जितना डीप नॉलेज होगी, उतना मन में जो डिस्टर्बेन्श उठती हैं, वह समाप्त हो जायेगी। नॉलेज है विज़डम, उसमें हर बात स्पष्ट हो जाती है। नॉलेज की पॉवर होगी तो जो डाउट्स हैं वह साइलेन्स हो जायेंगे। 'क्यों' की क्यू समाप्त हो जायेगी। ड्रामा की ढाल से 'क्यों-क्यों' के क्वेश्चन हल हो जायेंगे। इससे साइलेन्स की स्टेज होगी। मन की साइलेन्स को तोड़ने वाली हैं इच्छायें। उनका अंत करने के लिए - एक बाबा को पा लिया तो सब पा लिया, इस स्मृति से मन की शांति आयेगी। यह कलियुग है, यह जो नॉलेज है इससे भी इच्छाओं का अंत हो जाता है। यह सब मरे पड़े हैं, विनाश सामने खड़ा है - इससे भी इच्छायें शांत हो जाती है। तो साइलेन्स की स्टेज योग की पहली भूमिका है। जब तक यह भूमिका नहीं बनी, तब तक योग की मंज़िल बनेगी नहीं। लक्ष्य हो हमें कर्मातीत अवस्था को प्राप्त करना है, जहाँ से आये थे वहाँ जाना है। इससे मन जो इधर-उधर जाता है, उसके सब रास्ते समाप्त हो जायेंगे। साइलेन्स की दुनिया को अपना लक्ष्य बना लेने से साइलेन्स आ जायेगी। साइलेन्स की परफेक्ट स्टेज है कर्मातीत, जहाँ डेड साइलेन्स है। उसे याद करने से मन की जो स्टेज बनेगी वह डीप साइलेन्स की होगी। जितना डीप साइलेन्स उतना योग का डीप अनुभव होगा।
(३) योग के डीप अनुभव के लिए और आवश्यक बातें:-
(क) अटेन्शनः- हमारा अटेन्शन एकाग्रता का हो। भल ढोल बजते रहें लेकिन योग न टूटे। कोई भी डिस्टर्बेन्श हमारे अटेन्शन को डाइवर्स न करे। तो अटेन्शन की कला बढ़ानी है। अभ्यास ऐसा परफेक्ट हो जो कोई बात अटेन्शन को तोड़ न सके। अटेन्शन के साथ रिटेन्शन (स्थाई) रखना भी जरूरी है। चलते-फिरते बाबा के साथ का हम अनुभव करें। चल रहे हैं, खा रहे हैं, बात कर रहे हैं, बाबा हमारे साथ है- जितना-जितना यह अनुभव करते हैं उतना वह स्थाई रह सकता है। इसमें दिव्य गुण सहायक होते हैं। जितना दिव्यगुण धारण किये होंगे उतना अटेन्शन का रिटेन्शन ज्यादा होगा और उससे स्थिति एकरस बनेगी। जब हम योग कर रहे हैं तो और सब संकल्पों से निवृत्त होकर बैठें। योग के प्रयोग से अगर हम और अनुभव करना चाहते हैं तो दूसरी कोई बातें याद न आयें, तभी नई-नई शक्तियों का विकास होगा। हर संकल्प से निवृत्त होकर योग में बैठने से नई-नई स्टेज का सहज ही अनुभव कर सकते हैं।
(ख) डीप इन्ट्रेस्टः- योग करने का डीप इन्ट्रेस्ट हो। अगर हमें और और बातों का इन्ट्रेस्ट है तो उसी अनुपात से योग डीप होगा। इसलिए इन्ट्रेस्ट बस नहीं चाहिए।
(ग) डीप डिटैचमेंट:- सब तरफ से स्वयं को डिटैच करना है। योग में बैठते समय देह और देह की और बातों से डिटैच हो जाओ। यह गीत वगैरह जो बजते हैं, यह हमें डिटैच करने में ही सहायक होते हैं। लाल लाइट होती है - यह भी शिवबाबा के धाम की स्मृति दिलाती है। तो यहाँ से जब हम डिटैच होंगे तो वहाँ से अटैच हो सकेंगे। देह सहित सबसे डिटैच होकर एक बाप की तरफ फुल अटेन्शन हो तब योग की परफेक्शन का अनुभव कर सकेंगे।
(४) योग के लिए डीप निगेटिव की जगह डीप पॉजिटि विचार हों:-
जैसे कोई कांटा चुभा हो तो उसे निकालने के लिए सुई को कांटे से भी अधिक गहरा चुभोकर उसे निकालते हैं। सारा कांटा तभी निकलता जब सुई उससे आगे जाए। ऐसे जितना गहरा लॅव होगा तो उस लॅव से नफ़रत की भावना समाप्त हो जायेगी। किसी से नफ़रत पैदा हो जाती है तो हम उससे इतना ही लॅव करने की कोशिश करें। कई बार मन में उसके प्रति लॅव जागता नहीं है, हम सोचते हैं इस व्यक्ति ने हमें इतना परेशान कर दिया। लॅव मन में आता ही नहीं। लेकिन वह पैदा करो। अगर डीप लव है तो घृणा निकल जायेगी। हमारा समर्पण भाव डीप हो तो इगो और अटैचमेंट समाप्त हो जायेगी। हम सरेन्डर इतना हों जिससे अहम् भाव निकल जाए। बाबा जो खिलाये, जैसे बिठाये, जैसे चलाये... इससे हल्कापन आ जायेगा और योग का गहरा अनुभव होगा। अहम् भाव योग में रुकावट है। कोई भी कार्य दत्तचित होकर करें। मेरे विचार, मेरी बुद्धि... यह जो अटैचमेंट रही हुई है, उस अटैचमेंट से डिटैचमेंट डीपर हो अर्थात् किसी भी प्रकार के जो लगाव है उनसे हमारी समर्पण भावना गहरी हो और मन जो इधर-उधर अनेक बातों में जाता है, अनेक बातें सोचता है, उसके बजाए डीप एकाग्रता का अभ्यास हो। हमारी जो कन्ट्रोल की शक्ति है, वह मन की चंचलता से डीपर हो। ऐसे नहीं, हंसने लगे तो हंसते ही रहें... उसमें दिव्यता का अभाव हो जाता है। यह ख्याल रखने की जरूरत है कि उस लहर में हम बह न जायें। प्योरिटी इतनी डीप हो जो इमप्योरिटी से अधिक हो। अगर कोई भी संस्कार में इमप्योरिटी रही हई होगी तो उतना गहराई में कमी रह जायेगी। तो प्योरिटी डीपर देन इमप्योरिटी। और जो हमारी गुडविल अर्थात् शुभ भावना, शुभ कामना है वह इतनी फोर्स-फुल हो जो दूसरे की दुर्भावना हमारे आगे टिक न सके। दुर्भावना से शुभ भावना डीपर होनी चाहिए। और शिवबाबा से हमारे सब संबंध गहरे हों। साथ-साथ दैवी परिवार से शुद्ध रीति से घनिष्ट प्यार हो। इससे संबंध में जो लूनपानी (खारा-पानी) होते वह निकल क्षीरखण्ड बन जायेंगे।
(५) विधि से सिद्धि, युक्ति से ही मुक्ति होती हैः-
योग का अभ्यास विधिपूर्वक हो। पहली विधि हम स्थूलता से निकलकर फ़रिश्तेपन का, लाइट के शरीर का अनुभव करें। साइलेन्स की स्टेज में लाइट के कार्ब में रहें या लाइट की दुनिया से उतरा हुआ हूँ, इस शरीर में प्रवेश होकर कार्य कर रहा हूँ- यह वृत्ति हो तो स्मृति उसके अनुकूल हो जायेगी। हमारा योग प्रभू चिंतन वा मनन है इसलिए जो भी विचार आयें वह उसके ही अनुकूल हों, प्रतिकूल न हों। इसके प्रतिकूल कोई भी विचार होंगे तो वह नीचे ले आयेंगे। जहाँ वातावरण प्रतिकूल हो, अनकूल न हो वहाँ हम उसके प्रभाव में न आयें बल्कि शान्ति के कार्ब में, लाइट के कार्ब में, आनन्द के कार्ब में, प्रेम के कार्ब में आ जायें। उसका प्रभाव मेरे ऊपर न पड़े। यही युक्ति है योग की गहरी अनुभूति करने की।
प्रश्न:- क्या आपस में प्रेम वा स्नेह की चाहना रखना भी रांग हैं?
उत्तर:- यदि मुझे किसी से स्नेह की, रिस्पेक्ट की, सहयोग की चाहना हो लेकिन वह चाहना पूरी नहीं होती तो संबंध खराब होते हैं, संघर्ष उत्पन्न होन है। इन चाहनाओं का हमारे योगी जीवन के साथ बहुत महत्व है। अगर हम चाहना रखते हैं कि फलां व्यक्ति मझे सारी उम्र स्नेह ही देता रहे तो हम मजबूर तो नहीं कर सकते। तो यह दार्शनिक सिद्धान्त है कि जो चीज आपक वश नहीं है, अगर आप उसकी इच्छा रखते हैं तो एक-न-एक दिन आपक उसका सदमा अवश्य पहुंचेगा, धक्का लगेगा। क्योंकि आपका उस पर प्रभुत्व नहीं है। आप उसको चाह रहे हैं लेकिन वह आपके मुट्ठी में तो नहीं? जो आप उसे प्राप्त कर लेंगे। जिससे आप इन चीजों की चाहना रखते उसमें भी तो कमजोरियाँ, कमियाँ हैं, अपने भी उसके संस्कार हैं, और आज वह ऐसे मूड में है कि वह आपको स्नेह नहीं देता, उसे किसी ने तंग कर रखा है वह परेशान है, अच्छे मूड में नहीं है, उसने आपको डांट दिया, चाहे वह अंदर से प्रेम भी करता हो लेकिन आज उसने मेरे से प्रेम नहीं किया, वह भी किसी और के वश है, तो उसका नतीजा यही होगा कि एक-न-एक दिन मुझे इस बात का सदमा पहुँचेगा कि इसने मेरे साथ ऐसा किया। इसलिए अगर निरन्तर हैप्पी रहना है तो यह सिद्धान्त सदा सामने रखो - कोई से भी प्रेम वा रिस्पेक्ट लेने की चाहना न हो। वैसे संसार का यह नियम है बड़े छोटों को प्रेम दें, छोटे बड़ों को रिस्पेक्ट दें, यह तो मर्यादा है। इस पर तो सारा संसार टिका हुआ है लेकिन अगर मैं मानकर चलता रहूँ कि यह सदा ही मुझे रिस्पेक्ट दे, मुझे इनसे प्रेम मिलता ही रहे तो किसी न किसी दिन धक्का जरूर आयेगा। इसलिए हम इस पर डिपेन्ड न करें। सदा हमें समझना चाहिए कि यह कोई प्रेम के सागर तो हैं नहीं। वह तो परमात्मा ही है जो शाश्वत है। आत्मा भी अगर महान् बनी है तो किसी विशेष कोटि की महान् बनी है, वह कोई सम्पूर्ण स्टेज को तो प्राप्त नहीं हो गई। तो जहाँ मुझे प्रेम की चाहना है वहाँ यदि कोई प्रेम नहीं भी दे तो भी हमें समान रहना चाहिए। हमें अपने कर्मों को निःस्वार्थ भाव, सेवा भाव से करना है, हमने इसकी सेवा की तो यह ठीक व्यवहार करे-यह चाहना रखना भी रांग है।
त्याग, तपस्या और सेवा
योग भट्ठी का मुख्य प्रयोजन है - आत्मा के स्वरूप में स्थित होना, सीट पर सेट होना, लग्न में मग्न होने का विशेष अभ्यास करना। जब हम हरेक बात की गहराई में जाते हैं तो उसका विशेष लाभ ले पाते हैं। कई बार ज्ञान की चर्चा करते हैं कि ज्ञान की गहराई क्या है, योग की गहराई क्या है ! ऐसे हरेक बात की गहराई में जाने की जरूरत होती है। भट्ठी की भी गहराई में जाने की जरूरत होती हैं। जब हम गहराई में गोते लगाते हैं तो रत्न प्राप्त कर पाते हैं। तो इसमें जैसे हमारी चार सबजेक्ट हैं ज्ञान, योग, धारणा और सेवा ऐसे ही हम एक बात और कहते हैं - त्याग, तपस्या और सेवा। यदि हमारा जीवन तपस्वी न रहकर सोशल वर्कर की तरह हो जाता है तो भी सेवा में वह रस, वह मधुरता, वह मिठास, सफलता, वह रुहानियत, वह दिव्यता, वह अलौकिकता नहीं रहती। वह बल, जिसे बाबा कहते हैं योग का जौहर वह उसमें से निकल जाता है। ये तीनों चीजें इकट्ठी साथ-साथ रहनी चाहिये – त्याग, तपस्या और सेवा, ये बहुत ही प्रेरणादायक शब्द हैं। इसे सुनकर किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति का मन लालायित हो उठता है कि सचमुच मेरा जीवन ऐसा ही होना चाहिये। मेरे जीवन में भी त्याग, तपस्या और सेवा – ये तीनों भाव हों। ये सर्वोत्तम भाव है। कौन व्यक्ति है जो प्रेरित नहीं होता होगा अपने जीवन को महान् बनाने के लिये। लेकिन इनका बैलेन्स कई बार हम लूज़ कर बैठते हैं। बाबा कहते हैं सब पापों का मूल देह अभिमान है। जितनी भी भूलें हमने की उसकी जो बुनियाद है, एकज भूल, जिससे भूलों का वटवृक्ष पैदा हुआ, भूलों का भी बीज है यह देह अभिमान और उसको मिटाने के लिये बाबा कहते हैं योगाभ्यास की जरूरत है, सोल कान्सेस की जरूरत है, आत्मा के स्वरूप में स्थित होने की जरूरत है। तो ये जो तीन विषय हैं- त्याग, तपस्या और सेवा, इन पर हम ध्यान दें और एक-दूसरे के अनुभव से लाभ उठायें।
एक है त्याग, दूसरा है त्याग वृत्ति। इसमें भी थोड़ा अन्तर है। कई बार हम ऐसी लहर में होते हैं, योग अभ्यास करते हैं उसके बाद स्थिति अच्छी रहती है। बाबा किसी विशेष बात का त्याग करने के लिये कहते हैं तो हम कर देते हैं। जैसे ज्ञान से हम अच्छी तरह से समझ जाते हैं कि हम देह नहीं। देही हैं; हम ये रथ नहीं, रथवान हैं, हम ये शरीर नहीं, आत्मा हैं; हम क्षेत्र नहीं क्षेत्रज्ञ हैं – इन बातों को हम भली-भांति समझने के बाद पुरुषार्थ शुरु कर देते हैं। बाबा हमेशा कहते हैं – त्याग से भाग्य होता है। आमतौर पर लोग कहते हैं कि कर्म से भाग्य बनता है। कोई व्यक्ति लक्की है तो हम कहते हैं कि इसके पूर्व कर्म अच्छे हैं। यह तो ठीक है- कर्मों की गति हमें बताई जाती है, लेकिन एक मुरली में बाबा ने कहा था कि जो संकल्प, मन, वचन, कर्म और स्वप्न में भी न हो और वह हमें प्राप्त हो जाये, उसको भाग्य कहते हैं। हमने कोई कर्म किया, उसका फल हमें मिला, वह कर्म का फल है। ऐसे तो भाग्य भी कर्म का ही फल है। त्याग भी एक कर्म ही है। विशेष प्रकार के त्याग को भी हम कर्म कहते हैं। लेकिन फिर बाबा यह ख़ासतौर पर क्यों कहते हैं कि त्याग से भाग्य मिलता है ? अवश्य ही त्याग भी बाकी सब कर्मों से अलग एक विशेष प्रकार का कर्म है, जिससे विशेष भाग्य बनता है। कई बार हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति ज्यादा मेहनत तो करता नहीं, फल उसको मिलता है। आगे बढ़ता है, उसकी उन्नति होती जाती है और उसको चान्सेस मिलते जाते हैं, सफलता प्राप्त होती जाती है तो हम क्या कहते हैं कि यह बड़ा लक्की है, भाग्यशाली है। तो उसके पीछे कभी-न-कभी, किसी-न-किसी रूप में त्याग जरूर रहा होता है। हम जो कर्म करते हैं, हमारे हरेक कर्म के पीछे त्याग की भावना समाई हुई हो, कर्म को हमने त्याग का पुट दिया हुआ हो तो वही कर्म कई गुना फलदायक हो जाता है। यह तो एक सिद्धान्त है कि जैसा बीज बोयेंगे वैसा फल काटेंगे। कर्म का फल शाश्वत है, अटल है, जिसको कर्म का सिद्धान्त कहते हैं। लेकिन जिस कर्म में त्याग की भावना होगी, दूसरे को सुख देने की भावना होगी, दातापन की क्वालिटी होगी, अपने स्वार्थ से नहीं किया गया होगा, अपने समय को, शक्ति को, धन को, शरीर को लगाकर दूसरे को सुख देने का, उसके जीवन को बनाने की भावना, शुभ चिन्तन, शुभ भावना, शुभ कामना समाई हुई होगी वह कर्म त्यागमय कर्म होगा। तो कर्म करो, पुरुषार्थ करो लेकिन कर्म के साथ त्याग वृत्ति हो। यह नहीं कि मैंने इतना कर्म किया है, मेरी कोई प्रशंसा ही नहीं करता, मुझे कोई एवार्ड ही नहीं देता, मैंने इतना कुछ किया है उसके लिये मुझे कोई पद ही प्राप्त नहीं होता, लोग समझते ही नहीं कि मैंने इतना कुछ आज तक किया है - यह सकंल्प करने से कर्म का श्रेष्ठ फल नहीं होता। तो जहाँ हम कर्म के सिद्धान्त को समझते हैं, कर्म की गति को समझते हैं कि कर्म, अकर्म, विकर्म, सुकर्म क्या है, वहाँ चलते-चलते हमारी इस समझ में कमी आ जाती है कि त्याग से भाग्य बनता है। हमारे कर्म का फल मल्टीप्लाई हो जाता है हमारे त्याग की भावना से। लेकिन हम त्याग केवल इसी भावना से नहीं करते। त्याग तो एक वृत्ति विशेष का नाम है। दूसरे को सुखी देखकर सुख महसूस करना ये मनुष्य की लाइफ की क्वालिटी है। कहीं तो ऐसा होता है कि मनुष्य किसी को आगे बढ़ता हुआ देखता है तो ईर्ष्या आती है, कहीं पर ऐसा होता है कि दूसरे को आगे बढ़ता देखकर लोग उसका विरोध भी करते हैं। हमारे इन्स्टीट्युशन के इतिहास में भी यही हुआ – जब हमारी संस्था बढ़ने लगी तो लोग सोचने लगे कि ये हमारे फालोअर्स को अपनी संस्था में ले जा रहे हैं तो उन्होंने नुक्स ढूंढना शुरु कर दिया और प्रोपोगन्डा करना शुरु कर दिया, उनके मन में खुशी नहीं हुई हमको बढ़ता हुआ देखकर। तो यह ईर्ष्या है। लेकिन दूसरे को सुखी होता हुआ, बढ़ता हुआ, उन्नति को प्राप्त करता हुआ देखकर मनुष्य सुखी बने, शुभ भावना, शुभ कामना उसके प्रति रखे - यह त्याग की वृत्ति है।
कोई भी ठीक तरह से योगी तब तक नहीं बन सकता जब तक कि उसमें त्याग की वृत्ति न हो। आपने जीवन में इस बात को अनुभव किया होगा कि बहुत से भाई-बहन चलते-चलते यह कहते हैं कि हमारा योग नहीं लगता हमारे योग की स्टेज ऊंची नहीं उठती, उसका विशेष अनुभव नहीं होता। तो इसका कारण है कि वे किसी न किसी प्रकार की दलदल में फंस गये हैं। वह दलदल क्या होती है ? त्याग के बजाय जो अल्पकाल, क्षणभंगुर प्राप्ति है जो इन आंखों से अभी दिखाई देती है, स्थूल प्राप्ति कलियुगी दुनिया के नर्कमय संसार की, नाशवान संसार की, जिसे बाबा कहते हैं इस संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है वह थोड़े समय में सब समाप्त होने वाला है, इस भंभोर को आग लगने वाली है, वह देखते हुए भी नहीं देखना है। लेकिन जब इसे देखने की भावना उनमें आ जाती है तो वह उस त्याग की वृत्ति को खो बैठते हैं। इस त्याग, तपस्या और सेवा का आपस में गहरा सम्बन्ध है। तो जो हम योग की भट्ठी करते हैं या सेवा करते हैं या जो कुछ पुरुषार्थ हम कर रहे हैं उसमें इस बात की चेकिंग अवश्य करनी है कि कहीं हम सुखों की ही तो रसना नहीं लेने लगे हैं ? जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे, लोग आपको सेवा देंगे सेवा के साथ आपकी भी सेवा करने लगेंगे – यह समझकर कि ये हमारे से बड़े हैं, वरिष्ठ हैं। पुराने हैं तो आपको भी अनेक प्रकार की सुविधायें प्राप्र होने लगेगी, सुख-साधन प्राप्त होने लगेंगे। अगर उन उम्मीदों में उनके भोग में, उनको इकट्ठा करने में चले गये तो जीवन में आलस्य और वैभव के कारण विलासी जीवन हो जायेगा, जीवन में अलबेलापन आ जायेगा फिर 'सेम्पल और सिम्पल' जीवन नहीं रहेगा। त्याग समाप्त हो जायेगा। इसकी हम चेकिंग कैसे करें ? बाबा के जीवन का आदर्श हमारे सामने है। सबसे पहली प्रतिभा है बाबा के जीवन की 'त्यागमय जीवन'। कहाँ जवाहरी जीवन जिसमें सब बातें प्राप्त थी और कहाँ उसके बाद एकदम सिम्पल जीवन। बाबा का कमरा अभी बढ़ाया हुआ है, बाबा का पहले जो कमरा था अगर उसको आप देखते तो सृष्टि के आदि पिता इस कमरे में रहते थे ! उनके योग्य यह कमरा है - आपको देखकर आश्चर्य होता ! बाबा की कैसी कुर्सी थी, कैसी मेज थी, किस जगह वो बैठते थे, बहुत वर्षों तक पंखा भी नहीं था।
इसका मतलब यह नहीं कि हमको जानबूझ कर हठयोग करना है लेकिन ऐसा भी नहीं कि हम ये सब सुविधायें एक के बाद एक प्राप्त करते जायें आजकल साइन्स यह कोशिश कर रही है कि और ज्यादा इन्वेन्शन होती जाये। मॉडल ही चेंज होते जा रहे हैं। तो जब यह बात जीवन में आ जाती है तो वह उसको यहीं भोग लेता है, उसको कुछ भी प्राप्त नहीं होता। तो योगी जीवन में जो एक बहुत बड़ी परीक्षा आती है चलते-चलते औरों को भी देखकर हम कॉपी करने लग जाते हैं - यह खाता क्या है, सोता कैसे है, पहनता क्या है, इसके आने-जाने के साधन क्या हैं, जब हम इसको कॉपी करने लग जाते हैं तो हमारा योग समाप्त हो जाता है, सेवा का भाव समाप्त हो जाता है, हम सब-कुछ यहीं भोग लेते हैं। यहीं कमाया, यहीं खाया, खाली झोली झाड़कर चल पड़े। योग का अपना सुख है, पवित्रता का अपना सुख है, सबसे अपने-अपने सुख हैं। लेकिन जो त्याग से सेवा की जाती है उसकी लज्ज़त भी अलग प्रकार की है। स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन, अच्छे से अच्छे वैभव भी आपको इतना सुख नहीं दे सकते जो उत्सर्ग और त्याग में हैं। यह तो स्थूल हैं। लेकिन बाबा ने कितने प्रकार के सूक्ष्म त्याग बताये हुए हैं।
सबसे बड़ा त्याग है - देह अभिमान का त्याग। जब देह अभिमान का त्याग हो गया तो सब त्याग उसमें समा गये। जैसे कहते हैं हाथी के पांव में सबका पांव शामिल हो जाता है। अगर यह एक त्याग हमसे हो गया तो सब त्याग हो जायेंगे। बाबा रोज मुरली में कहते हैं- बच्चे, देही अभिमानी बनो, देह अभिमान छोड़ो। लेकिन हम इस पर अभी तक सफलता नहीं प्राप्त कर पाये हैं। यह हमारा आलस्य है, ग़फ़लत है। ऊंचे से ऊंचा पढ़ाने वाला हमे मिला है लेकिन हम इस पर अभी तक सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे इसलिये बाबा ने इस पर महत्व देते हुए कहा है कि सबसे बड़ा त्याग है देह अभिमान का त्याग। अभिमान तो सब बुराइयों का मूल है। चाह वह देह अभिमान हो, चाहे ज्ञान का अभिमान हो, चाहे अपने योगीपन का अभिमान हो कि मैं एक बहुत बड़ा योगी हूँ। अभिमान कई तरह का हो सकता है लेकिन सेवा का भी एक अभिमान होता है। सेवा अर्थात् जिसमें दूसरों का भला करने का भाव समाया होता है, अपना त्याग करके दूसरों का लाभ करें, लेकिन उसमें भी माया का अभिमान आ जाता है। देह अभिमान एक प्रकार का अभिमान है, सेवा-अभिमान दूसरे प्रकार का अभिमान है। इसीलिये सेवा करने के बाद कहते हैं कि अभी भट्ठी कर लो। जैसे मेला मलाखड़ा करने के बाद काफी कूड़ा-करकट जमा हो जाता है, सफाई की जरूरत होती है, ऐसे ही सेवा के बाद स्वउन्नति के प्रोग्राम रखते हैं। हमें दत्तचित्त् होकर, अटेन्शन से, सबको साथ में मिलाकर कोई भी सेवा करनी है। इससे सफलता होनी हो है। उसमें बहुत से लोगों ने दान का पैसा लगाया है, उन्होंने बाबा को सामने रखकर दिया है। तो बाबा उसको सफल तो करेंगे ही। जब उन्होंने शुभभावना, शुभ कामना से दिया है तो वह फलीभूत तो होगा ही। जब वह फलीभूत होता है, सेवा का फल निकलता है, तब जो विशेष निमित्त बनते हैं उनकी लोग प्रशंसा करते हैं। उस प्रशंसा को सुनते-सुनते सेवा की भावना गौण होने लगती है और “मैं भी कुछ हूँ" - यह भावना बढ़ने लगती है। क्योंकि आत्मा देह में रहती है, देह के नाम से लोग हमें पुकारते हैं, देह के सम्बन्धों की चर्चा होती है, देह से बर्ताव करते हैं तो फल यह होता है कि देह अभिमानी बन जाते हैं।
इसी प्रकार सेवा में आते-आते जब प्रशंसा की बजाय कोई उसका उल्टा शब्द बोल देते हैं तो हम उसको अपना शत्रु समझ लेते हैं। हम समझते हैं कि यह हमारा विरोधी है। उससे हमारी अनबन हो जाती है, मन-मुटाव हो जाता है। त्याग भावना और तपस्या भावना को छोड़कर यदि कोई सेवा करता है तो बाकी क्या रह जाता है ? इसलिये जब देह अभिमान के बजाय सेवा अभिमान हो जाता है, चाहे प्रशंसा से या और किसी कारण से तेरा-मेरा, मान-शान। और जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है, ड्रामा का अन्तिम समय नज़दीक आता जाता है, यह चीजें बढ़ती जा रही है। इसलिये हम जमकर सेवा करें। बाबा कहते हैं जो यहाँ सेवा का ताज पहनेगा, वहाँ राज्य का ताज पहनेगा। लेकिन सेवा के ताज के साथ अगर लाइट का ताज नहीं होगा, तपस्या का ताज नहीं होगा, त्याग का ताज नहीं होगा तो वहाँ राज्य का ताज नहीं मिलेगा। इसलिये त्याग पर ध्यान देने की बहुत जरूरत है।
इसी प्रकार से तपस्या भी चाहिए। चलते-चलते हमारा जीवन ऐसा न हो जाये, जो हम समझें कि हमने तो बहुत योग लगा लिया है। कलियुग में मनुष्य का स्वभाव बन गया है कि कोई भी काम बहुत कर लेने के बाद वह ऊब से जाते हैं, बोर हो जाते हैं। जो व्यक्ति मस्ती में झूम रहा होता है उसकी चलन से, नैनों से, उसकी वाचा से लगता है कि वह व्यक्ति किस मस्ती में है और जो तपस्वी होगा उसके चेहरे से, नयनों से लगेगा। बाबा की याद नयनों में समाई होगी तो जो नयन होंगे, उसकी जो मुस्कराहट होगी, उसके चेहरे पर जो झलक होगी, उसके मुख से जो वचन निकलेंगे, जिस प्रकार वे रॉयल-वे में चलेंगे, उससे शिवबाबा की प्रत्यक्षता होगी। प्रत्यक्षता केवल कल्प वृक्ष या त्रिमूर्ति समझाने से नहीं होगी। यह तो पहला लेसन है- शिवबाबा का परिचय देने का। लेकिन दूसरे को यह महसूस हो कि हमने जो योग सीखा है उससे हमारी लाइफ में क्या परिवर्तन आया है ? जैसे किसी को विजिटिंग कार्ड देते हैं, उसमें लिखा होता है कि क्या डिग्री प्राप्त की है, क्या ऑक्यूपेशन है, वैसे आपका चेहरा या पर्सनॉलिटी ही विजिटिंग कार्ड हो। आप बोलें, न बोलें, आपका चेहरा बोले। जैसे बाबा की बायोग्राफी में हम बताते हैं कि
Page 90 of book content will be added here………Pending
कामना, शुभ भावना से द्रवित हो जायेगा, ऐसी स्थिति से आप उस आत्मा को निहारते हुए बात करेंगे तो वह भी कुछ अनुभव करेगा। यदि आप किसी बात से किसी को कन्विन्स नहीं कर पाये तो बिचारा वह टूट जायेगा। उसको कहो कि हमसे बड़े और हैं जो आपको समझायेंगे। कोई बात नहीं, अगर हमने ठीक प्रकार से नहीं समझाया तो बड़े भाई-बहिनों से समझ सकते हो। बाबा कहते हैं हट्टी तो एक ही है, दूसरी हट्टी इस तरह की, इस सौदे की दुनिया में है ही नहीं। अगर बाबा के घर में आकर खाली हाथ लौट गया यह तो एक बहुत बड़ा नुकसान हो जायेगा। तो सेवा के साथ त्याग और तपस्या की जो बात है इस पर पूरा ध्यान देंगे तो बैलेन्स भी ठीक चलेगा और हमारी स्व-उन्नति भी ठीक तरह से होगी। इसलिये बाबा हमेशा कहते हैं – बच्चे, जब भी कहाँ सेवा में जाओ तो बाबा को याद करके जाना।
ऐसे जीवन में हमने कई बार देखा है, याद करके कोई काम शुरु करते हैं और यह समझते हैं कि बाबा ही करनकरावनहार है, हम तो इन्स्ट्रुमेन्ट्स हैं, इस आत्मा का भक्ति का पार्ट पूरा हो गया है, अब इसके ज्ञान में आने का टाइम आ गया है, बाबा इसको ढूंढकर कहीं से लाया है, इसके निमित्त ही बाबा ने यह सेवा-स्थान यहाँ खोला है, बाबा ने तो हमको केवल निमित्त बनाया है, बोलने वाला तो बाबा ही है, इसके भाग्य बनने का समय आ गया है, भाग्य विधाता तो बाबा ही है – जब ये बात हम समझते हैं तो सफलता फटाफट होती है। जब हम यह समझते हैं कि हम तो समझाने में बड़े कुशल हैं। सब यही कहते हैं कि यह तो बड़ा अच्छा समझाता है। मुझे खास इसको समझाने के लिये कहा गया है। हम ही इनको समझाने वाले हैं, अपने बारे में हम बहुत कुछ समझ लेते हैं। शिवबाबा को एक तरफ रख देते हैं और स्वयं ही सामने आ जाते हैं तो उसके सामने से भी शिवबाबा हट जाते हैं, हम ही सामने रह जाते हैं, हड्डी-मांस का पिंजर ही सामने रह जाता है। उसका नतीजा हम देखते हैं - हम पत्थर के साथ सिर मारते हैं, पत्थर तो फूटता नहीं, सिर ही फोड़ते हैं। वह आदमी बिना कुछ कहे चले जाता है। हम ही कहते हैं यह आदमी कई दिनों तक आया, कोर्स किया, यह आदमी अब आता क्यों नहीं? बाबा ने कितनी मेहनत से हमारे पास उस आत्मा को प्रेरित करके भेजा। यदि प्राइम मिनिस्टर किसी को रिकमन्ड करके भेजे और हम अनदेखा कर दें ! बाबा हमें भेजा सेवा करने के लिये, हमारा भाग्य बनाने के लिये, उसका भी भाग्य जगाने के लिये और हम त्यागमूर्त नहीं, तपस्यामूर्त नहीं, मान और शान में आकर अपनी इच्छा और तृष्णा में आ गये और अपने ही पन में 'मैं हूँ कुछ' इस अभिमान में आ गये, सेवा-अभिमान में आ गये तो बाबा कहते हैं मेरे बच्चे ज्ञानी होने के बावजूद, योगी होने के बावजूद देह अभिमानी हैं। अभी तक उनमें जो रुहानियत आनी चाहिये, वह है नहीं। इसलिए सेवा के साथ-साथ केवल त्याग ही नहीं, त्याग वृत्ति हो, हमें कुछ नहीं चाहिये। बाबा मिल गया, सब-कुछ मिल गया। हमें तो केवल योगी जीवन चाहिये, बाबा ने वह दे दिया। बस।
अव्यक्त बापदादा की वाणियों का सार
बाबा ने हमारे पुरुषार्थ को तीव्र करने के लिये हरेक वाणी में बहुत-सी बातें समझायी हैं। हमारे पुरुषार्थ में सबसे बड़ी बात है हमारी वृत्ति। कहा भी गया है चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। बाबा कहते हैं यह प्रवृत्ति मार्ग है। द्वापर से जो प्रवृत्ति चली आई है वह अशुद्ध थी। अब सतयुग से जो प्रवृत्ति शुरु होगी, वह शुद्ध होगी। वह दैवी प्रवृत्ति होगी। अभी हमारी प्रवृत्ति आसुरी बन गई थी। तो सारा परिवर्तन वृत्तियों का होना है। सतयुग तब ही आयेगा जब हमारी वृत्ति बदलेगी। इसका मतलब यह है कि अब हमारा पुरुषार्थ वृत्ति परिवर्तन का है। जिसको हम कहते हैं सेल्फ ट्रांसफॉरमेशन। तो यह परिवर्तन हुआ या नहीं हुआ, हो रहा है या नहीं हो रहा है- इसका पता कैसे चलेगा ? जैसे डॉक्टर्स लोग थर्मामीटर लगाकर देखते हैं कि इसका टेम्प्रेचर कितना है? या किसी को देखना हो यह जिन्दा है या मर गया है तो उसकी कुछ ख़ास जगह ठोक कर या उसकी आंखों में लाइट देकर या उसकी नब्ज को देखकर, उसके हार्ट को देखकर कुछ चिन्ह देखते हैं, जो जीवित की निशानी है या नहीं। ऐसे ही हमारा पुरुषार्थ जो परिवर्तन के लिये, सतोप्रधान बनने के लिये, मनुष्य से देवता बनने के लिये है, वह वास्तव में वृत्ति परिवर्तन है और मन की वृत्तियों को शिवबाबा में लगाकर उसको आत्म विभोर कर देना – इसी का नाम योग है। जो दिव्य गुण धारण करने का हम पुरुषार्थ करते हैं, वह वृत्तियों को दैवी बनाने के लिये है। जो ज्ञान हम सीखते हैं वह यही बताता है कि हमारी वृत्ति पतित हो गई थी, प्रदूषित हो गई थी, अब उसे ठीक करना है। उसका साधन है- आत्मा के स्वरूप में स्थित होना। तो लक्ष्य हमारा है वृत्तियों का परिवर्तन। बाबा की बहुत-सी वाणियों में वृत्ति के परिवर्तन के लिये जोर दिया गया है।
(१) वृत्ति को पवित्र, दैवी, शुद्ध बनाने के लिये विशेष रूप से ६ बातें हैं जो हमें चेक करनी हैं:-
१. वृत्ति में रुहानियत और रुहाब होना चाहिये।
२. हमारी वृत्ति रहमदिल हो। शिवबाबा रहमदिल है। मनुष्य सब पर रहम नहीं कर सकता। वह किसी से गुस्सा, किसी से नफ़रत भी करता है। लेकिन परमात्मा सब पर रहम करता है। हम सब अपराधी हैं जन्म-जन्मान्तर के। बहुत से अपराध किये हैं, नियम तोडे हैं. मर्यादायें तोडी हैं। हमने सारी सष्टि खराब कर दी है, बरबाद कर दी है। अपना जीवन भी बिगाड़ दिया है। परमात्मा के दिये गये वरदान भी हमने बिगाड़ दिये हैं। फिर भी वह रहम करने के लिये फिर आया है। चलो, अब तुम्हें ले चलूँ, अब तुम बहुत दुखी हुए हो। किसी मनुष्य का बेटा यदि बरबाद होता है तो वह कहता है गेट आऊट, तुम मेरे लिये मर चुके हो, अब शक्ल मत दिखाना। लेकिन परमात्मा पिता कहते है – “मीठे बच्चे, प्यारे बच्चे ! मैं तुम्हें ले जाऊंगा। नहीं भी जाओगे तो भी ले चलूँगा।" तो यह है रहम। हमें भी ऐसा रहमदिल बनना है।
३. हरेक के प्रति स्नेह। जिसको बाबा कहते हैं मीठा बोलो, शुभ बोलो। जब तक स्नेह नहीं होगा, तब तक मीठा नहीं बोल सकते। गुस्से वाला आदमी, नफ़रत वाला आदमी मीठा नहीं बोल सकता। मीठा वह बोलेगा जिसके मन में स्नेह होगा। मां बच्चे को कहती है- 'राजा बेटा इधर आ जा, खाना खा ले'। प्यार है तब ऐसा कहती है। तो वृत्ति में स्नेह हो। कभी भी नफ़रत या बदले की भावना न हो। एक स्नेह रखने से बहुत-सी बुराइयाँ समाप्त हो जाती है।
४. सेवा-भाव हो। हम वर्ल्ड सर्वेन्ट हैं। जन्म-जन्मान्तर भक्ति मार्ग में गाते आये कि हम सेवक तेरे। अब जब बाबा ने सेवा करने का तरीका बताया है, फील्ड दिया है, क्या सेवा करो वह लक्ष्य दिया है। तो यदि अभी सेवा भाव से नहीं किया तो कब करेगे। तो हमारी वृत्ति में सेवा भाव हो।
५. कल्याणकारी वृत्ति हो। हमें हरेक का कल्याण करना है। शिवबाबा को कल्याणकारी कहते हैं क्योंकि उनकी वृत्ति सदा कल्याणकारी है, सदा शुभ है। कभी किसी के अकल्याण की सोचते ही नहीं। तो कल्याणकारी वृत्ति हो।
६. वृत्ति में निमित्त भाव हो। मैं निमित्त हूँ, कराने वाला बाबा है, करनकरावनहार स्वामी वो है। तो हमारी वृत्तियों में उपरोक्त ६ बातें हो।
(२) विदेही अवस्था
बाबा की बहुत सारी वाणियां अव्यक्त अवस्था या विदेही अवस्था पर हैं। देह में रहते हुए देह से न्यारे रहेंगे तब ही अव्यक्त स्थिति को प्राप्त कर सकेंगे। ये हमारा पुरुषार्थ हो। विदेही अवस्था के लिए हमेशा उड़ती कला में रहो। गिरती कला के दिन खत्म हो गये। अपने मन में यह निश्चय करके चलो अब मेरे गिरावट के दिन समाप्त हो गये। शिवबाबा जो कल्याणकारी है वह मिल गया, अब मेरी उड़ती कला है, चढ़ती कला है। पहले-पहले मन में यह भाव हो। विश्वास हो। विश्वास मन का गाइड होता है। जैसे पब्लिक को गाइड करने वाले नेता होते हैं, फालोअर्स को गाइड करने वाले गुरु होते हैं। ऐसे मनुष्य को गाइड करने वाला, मनुष्य को आगे चलाने वाला मनुष्य का विश्वास होता है। जैसा आपका विश्वास होता है वैसा ही आपका कर्म होता है। मनुष्य के कर्मों का नेता उसका विश्वास है, उसका निश्चय है। इसलिये बाबा कहते हैं – निश्चयात्मा विजयते। जो निश्चय करता है तो निश्चय सफलता तक ले ही जाता है। जिसने सोचा कि पता नहीं जीतूंगा या हारूँगा तो यह आधा-आधा हो गया, और जिसने यह सोच लिया कि जीतूंगा ही, हारने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, वह जीतेगा। तो यह विश्वास ही हमारे कर्मों का नेता है। जो सोचेंगे परमात्मा है तो वह परमात्मा की तरफ जायेंगे, जो सोचेंगे कि परमात्मा है ही नहीं, पैसा ही सब-कुछ है तो वह पैसे की तरफ जायेंगे। तो सबसे पहले जिसने यह समझ लिया कि अब हमारी उड़ती कला है, अब हमारे अच्छे दिन आ गये हैं, खुश नसीब बन गया, मायुषी, उदासी, डिप्रेशन के दिन ख़त्म हो गये। क्योंकि डिप्रेस्ड आदमी कुछ नहीं कर सकता। वह मरने से पहले ही मर जाता है।
डिप्रेस्ड आदमी किसी काम का नहीं। लोग उसको कहेंगे- उठो, कुछ काम करो तो वह कहेगा मैं क्या करूँगा, मेरी तो तकदीर ही ठीक नहीं है। मैं जो भी करता हूँ सब उल्टा ही होता है। क्योंकि उसमें उत्साह, उमंग, हिम्मत कुछ भी नहीं है। हिम्मत से सोया हुआ आदमी भी खड़ा हो जाता है। कहेगा कि मैं इस पहाड़ को बारुद से फाड़कर इसमें से रेल को लेकर जाऊंगा। देखना मैं भी करके दिखाऊंगा, मैं भी उस बाप का बेटा हूँ। तो हिम्मत ऐसी चीज है। लेकिन हिम्मत आयेगी कहाँ से ? मैं यह कर सकता हूँ। क्यों नहीं कर सकता ! यदि सोच लें कि हम नहीं कर सकते तो बात खत्म हो गई। फिर हमसे कौन करा सकता है। हम स्वयं ही अपने आपको गिरा दें तो कौन उठा सकेगा ? तो हमारी उड़ती कला है, यह हमेशा याद रखो। दूसरा, सदा याद रखो कि मैं फ़रिश्ता हूँ। अगर यह सोचेंगे कि पता नहीं, मैं फ़रिश्ता बनूँगा या नहीं बनूँगा, तो नहीं बन सकते। चलते-फिरते, उठते-बैठते शेर कैसी चाल चलता है और बिल्ली कैसी चाल चलती है, सियार कैसी चाल चलता है। हरेक पशु की चाल उसके निश्चय के मुताबिक है। सियार एकदम डर और सहमकर चलता है, उसको पता है आदमी आयेगा, मुझे पकड़ लेगा। तो एकदम डर-डर कर चलता है। हाथी की चाल एकदम मस्त है। समझता है कि मैं बड़ा शक्तिशाली पशु हूँ, मुझे कोई क्या कर सकता है। हरेक की चाल अलग है। किसी ने कहा है कि यदि किसी मनुष्य को पहचानना हो तो उसकी गुफ्तार, रफ्तार और दफ्तार (पगड़ी) तीन चीजों से आदमी पहचान मे आता है। पगड़ी बांधने की स्टाइल भी अलग-अलग है। जो शान से पगड़ी बांधता है उसके बात करने का तरीका भी बड़ा अथॉरिटी वाला होगा। जो ऐसे-वैसे रफढफ पगड़ी बांध लेता है, उसके बात करने का तरीका भी कुछ और होगा। गुफ्तार माना बात करने का तरीका।
कोई प्रेम से बात करेगा, कोई आदर से बात करेगा। बात करने का तरीका हरेक का अलग-अलग है। इसी प्रकार रफ्तार कोई आदमी ऐसे चलेगा जैसे भागा-भागा, कोई एकदम आराम से चलता है कि जल्दी क्या पड़ी है, पहुँच जायेंगे। तो रफ्तार, गुफ्तार, दफ्तार से व्यक्ति पहचाना जाता है। तो हरेक व्यक्ति का निश्चय कि मैं फ़रिश्ता हूँ, मैं फ़रिश्ता हूँ, मैं फ़रिश्ता हूँ यह सोचते रहो तो आप उड़ने लगेंगे। यदि आप यह सोचेंगे मैं तो मोटी तोंद वाला हूँ, भारी भरकम, जमीन दबी जा रही है, मेरे पांव दबे जा रहे हैं इस प्रकार से फील करेंगे तो फुल बॉडी कान्सेसनेस होगी। तो ये कांसेसनेस, अवेयरनेस हो कि मैं फ़रिश्ता हूँ, मैं फ़रिश्ता हूँ। जिसको बाबा कहते हैं लाइट के कार्ब में अपने को समझो या अपने को इस स्वरूप में देखो कि मैं कमल पुष्प पर आसीन हूँ, योग में मग्न हूँ, लगन में मग्न हूँ, उस परमात्मा की याद का आनन्द ले रहा हूँ तो जो आपका अपने बारे में विज़न होगा, जैसा आप देखोगे, वही आपका दर्शन है। तो आप अपने आपको किस स्वरूप में देखते हैं? कोई योगी के रूप में देखते हैं, कोई राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, वकील के रूप में देखते हैं - आप किस रूप में देखते हैं ? तो बाबा कहते हैं अपने को फ़रिश्ता रूप में देखो - मैं लाइट के कार्ब में हूँ, फ़रिश्ता उड़ने वाला हूँ, दूसरा - अपने आपको बार-बार ये रिमाइन्ड करो कि मैं लाइट हूँ, लाइट हूँ, माइट हूँ, माइट हूँ। जब पहले-पहले बाबा ने विज़न देखा तो कोई तारे ऊपर से आते थे, कोई देवता, कोई देवी, कोई शहज़ादा, कोई शहज़ादी बन जाते थे और बाबा कहते हैं - "वह एक लाइट थी, माइट थी।” इससे ही विदेही अवस्था का अनुभव किया। तो बहुत-सी अव्यक्त वाणियां हमें यह प्रेरणा देती है कि विदेही अवस्था में रहो। इसके लिये मैं लाइट हूँ, माइट हूँ, मेरी विदेही अवस्था है, उड़ती कला है - उसमें अपने को देखो।
(३) विकर्म-विनाशक अवस्था
इसके लिये बाबा ने एक तो कहा है - तपस्या करो। जन्म-जन्मान्तर के, ६३ जन्म के विकर्मों का बोझ है। इसक विनाश के लिये तपस्या करो। तपस्वी कुमार बनो। दूसरा साधना करो, साधन इकट्ठे नहीं करो। साधना पर ज्यादा अटेन्शन हो। तीसरा- इस अवस्था के लिये लगाव झुकाव नहीं हो। लगाव और झुकाव योगी के लिये फ़रिश्ता बनने के लिये बाधा है। यह उड़ने नहीं देगा। चौथा मैं पॉवर -हाउस हूँ। इस विश्व को लाइट और माइट देता हूँ। सिर्फ लाइट हाउस, माइट हाउस नहीं हूँ लेकिन पॉवर हाउस हूँ। जो मेरे नेत्र देखे, मेरी वाणी सुने, जो मेरे साथ अपना स्विच लगाये, तार लगा दें, उनको वह करेन्ट मिलनी शुरु हो जाये। जो कान लगाये मेरी वाणी के साथ, दृष्टि लगाये मेरी दृष्टि के साथ, जो मेरे नज़दीक बैठे उनको करेन्ट मिलना शुरु हो जाये। तो यह समझो कि मैं पॉवर हाउस हूँ, मेरा काम होते रहना चाहिये। पांचवा - सत्यता की शक्ति हो। एक बाप जो सत्य स्वरूप है, उस सच्चे बाप के साथ सच्चे रहो। एक बाप दूसरा न कोई। इससे हमारी विकर्म-विनाशक अवस्था होगी। जब तक हमारी लाइफ इस पर न टिकी हो, तब तक विकर्म विनाश नहीं होंगे। हल्का योग जरूर होगा। लेकिन वह पॉवरफुल स्टेज, जिसमें विकर्म दग्ध हो, वह नहीं होंगे। और अव्यभिचारी याद हो। देहधारियों के बीच एक बाप की याद हो। बाबा की बताई हुई यह बात जब हम अपने जीवन में लायेंगे तब विकर्म विनाश होंगे। बाबा कहते हैं- पतिव्रता बनो। भारत की जो पतिव्रता नारी है वह सिवाय पति के दूसरे किसी को याद नहीं करती। जिस ब्राह्मण ने शादी कराई, उसको भी नहीं। जिससे शादी कराई, उसके बिना अगर दूसरा मन में संकल्प में भी आता है तो उसका पति व्रत नष्ट हो जाता है। अंग, अंग से स्पर्श भी नहीं करे। तो हमारे मन की शुद्धि, मन की पवित्रता इतनी हो कि किसी देहधारी की याद हमें स्पर्श न करे। उसके प्रति हमारा लगाव झुकाव न हो।
(४) विलीन अवस्था
इसे बाबा लवलीन अवस्था भी कहते हैं। इस पर बाबा की बहुत सी मुरलियां हैं। लोग समझते हैं कि आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। बाबा कहते हैं बच्चे, ऐसा नहीं है। आत्मा तो अनादि-अविनाशी है। शिवबाबा भी बिंदु हैं। तो आत्मा लीन कैसे होगी। लॅव में लीन हो जाती है। तो जब लवलीन बनोगे तो ऐसी स्टेज आयेगी। इसके लिये बाबा ने कहा है- बच्चे, लवलीन बनो। विलीन भाव हो। इसको मग्न अवस्था भी कहते हैं। तो यह अवस्था कैसे आयेगी ? इसके लिये एक तो बेफिक्र बादशाह बनो। कोई चिन्ता नहीं, कोई फिक्र नहीं, बाबा जो सर्वशक्तिमान् है, उसकी छत्रछाया में हैं, हम उसके बच्चे हैं, करने वाला करेगा, उसने जिम्मेवारी ले ली है। मनुष्य को उसका वर्क (काम) नहीं मारता, उसकी वरी (चिन्ता) उसको मार डालती है। तो यह चिन्ता घुन की तरह से खा जाती है। या तो चिन्ता होगी या चिन्तन होगा। योग चिन्तन से लगेगा। यदि चिन्ता होगी तो योग नहीं लगेगा। यदि बेटा समय पर घर नहीं लौटता तो माँ को चिन्ता लग जाती है कि पता नहीं, बच्चे को क्या हुआ होगा, कभी बस के नीचे आता हुआ देखेगी, कभी नदी में डूबते हुए देखेगी...। फिर न तो शिवबाबा याद आयेगा, न परमधाम याद आयेगा। तो यह है चिन्ता। चिन्तन क्या है? जिसको हम कहते हैं आत्म-चिन्तन, प्रभू-चिन्तन। वह है – “मैं ज्योति बिन्दु आत्मा हूँ।” इसको बाबा कहते हैं – “बेग़मपुर के बादशाह बनो।" और मोहब्बत वाले को मेहनत नहीं करनी पड़ती। काम करो, मेहनत करो, दिल लगाकर करो। कोई भी काम हो उसको अच्छाई से करो। लेकिन जितना आपकी शक्ति हो उतना करो। कोई भी कर्म से पूरा फल तब ही निकलेगा जब शिवबाबा की याद होगी। शिवबाबा की शक्ति यदि थोड़ी भी मिल गई तो आपकी कई गुना हो जायेगी। और अपनी शक्ति से ही करते रहोगे तो क्या कर लोगे। डबल कर सकते हो, ट्रिपल कर सकते हो। लेकिन सर्वशक्तिमान की शक्ति आपको मिल गई तो वह तो हज़ार गुना लाख गुना हो जायेगी। सर्वशक्तिमान् बाप की मदद चाहिये तो उसे याद करो, उससे प्यार करो। तो फिर काम हुआ पड़ा है। इसलिये ये विलीन 'भाव तब ही होगा जब बेफिक्र बादशाह बनोगे, बेगमपर के बादशाह बनोगे और शिवबाबा से मोहब्बत होगी।
विलीन भाव के साथ दूसरा है विरक्त भाव, बेहद का वैराग्य। बाबा कहते हैं- सन्यासी जो हैं उनका हद का वैराग्य होता है लेकिन हमें यहाँ बेहत का वैराग्य सिखाया जाता है। वैराग्य करना यह कोई प्रेक्टिस करने वाली चीज नहीं है। वैराग्य तो मन की एक टेन्डेन्सी है, वृत्ति है, स्वभाव है, झुकाव है। जब तक वैराग्य न हो तब योग लग नहीं सकता। योगी हम बन ही नहीं सकते, जब तक दुनिया से मन थका न हो, देहधारियों से मन थका न हो। इधर से हटेगा तो उधर लगेगा। उनसे हमारा मन टूटेगा नहीं तो शिवबाबा से जुड़ेगा कैसे ? रस्सी बंधी हुई होगी तो नाव आगे कैसे बढ़ेगी ? मंज़िल तक जायेगी कैसे ? इसलिये बेहद का वैराग्य हो। इसके लिये बाबा ने युक्तियां बताई है - एक तो निवृत्त स्थिति चाहिये, कुछ नहीं चाहिये। बहुत बार लोग कहते हैं मुझे 'कुछ' नहीं चाहिये, 'कुछ' शब्द पर जोर डालते हैं। तो हम अपने मन को ठोक बजा कर सोच लें कि मुझे कुछ नहीं चाहिये। जब बाप मिल गया तो सब कुछ मिल गया। जब तक इतनी बेहद की वैराग्य वृत्ति नहीं होगी, नाम-मान-शान चाहिये या कोई सैलवेशन चाहिये, कई क़िस्म की चीजें चाहिये – इच्छाओं का तो अन्त नहीं है। जब अन्दर से यह वृत्ति होगी कि मुझे कुछ नहीं चाहिये। जो मुझे मिलना था वह मिल गया – जब तक यह हमारी वृत्ति न हो तब तक हम उस अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकते। दूसरा, बाबा कहते हैं- मेरे-तेरे की बात नहीं। जब मन उसका हो गया, सब कुछ उसका हो गया तो 'मेरा' कहाँ से आया ! अगर 'मेरा' शब्द कहीं लगाते हो तो मेरा बाबा, बाकी तो सब तेरे हैं। जिसको बाबा कहते हैं सर्वंश त्यागी कोई अंश भी रहा हुआ होगा, एक एटम (अणु) भी रहा हुआ होगा तो पनप जायेगा। क्योंकि अंश से ही वंश की उत्पत्ति होती है। जैसे यदि इच्छा होगी कि हमारा एक भवन हो। देखने में तो आ रहा है कि एक ही भवन हो लेकिन भवन बनाने के लिये पैसे चाहिये। फिर भवन को कोई झाडू लगायेगा, कोई पोछा लगायेगा, भवन में बहुत से साधन चाहिये। कितना मैन्टेनेन्स चाहिये ! एक व्यक्ति को दूध चाहिये था तो किसी ने सुझाव दिया कि आप गाय रख लो। अब गाय को चारा कौन खिलायेगा, उसकी सम्भाल कौन करेगा, पानी कौन देगा, घुमाकर कौन लायेगा ? उसके लिये नौकर रख लें, माता रख लें। फिर माता से उसकी शादी हो गई। वह दूध पीने चला था और बच्चे पैदा हो गये। इच्छा उसकी यही थी। तो इच्छा मात्रम् अविद्या जब तक नहीं, तब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती। सर्वश त्यागी अर्थात् अंश मात्र भी इच्छा नहीं हो।
(५) विधि से सिद्धि
विधि से सिद्धि होती है, युक्ति से मुक्ति होती है। लेकिन वह कौन-सी युक्ति है? उसके लिए एक ही फ़ार्मूला वा नीति वचन है, विधि है कि जो भी कार्य करो बाबा की याद में रहकर करो। बाबा के प्रति समर्पण कर दो। अपने को ट्रस्टी समझ कर कि बाबा आपने आज्ञा दी है, मैं निमित्त हूँ, मैं करूँगा लेकिन कराने वाले आप हो। जब वह कार्य हो जाता है, सफलता हो जाती है तो जैसे माली मालिक के सामने फूल लेकर आ जाता है, ऐसे मालिक शिवबाबा है जो भी उनके कहने से किया है वह उनके पास पेश करो, उनको समर्पित करो। यह विधि है। अगर उस अमानत में कोई भी ख्यानत की, विधि को अगर तोड़ा तो सिद्धि नहीं होगी। देखने में बाहर से भभका लगेगा, आपने ये किया वो किया लेकिन अन्दर से खोखला होगा। अन्दर से आप भरपूर नहीं होंगे। वह जो अतीन्द्रिय सुख हो, वह खुशी हो, वह नहीं होगी। क्योंकि आपने दिखावा किया। समझा यह मैंने किया है, यह योग्यता मेरी ही थी, और कोई इसको नहीं कर सका, यह करने वाला मैं हूँ- अगर आपने यह सोचा तो वह आनन्द नहीं आ सकता। जैसे दूध में यदि बकरी मेंगनी डाल दे तो दूध किस काम का रहा ! पीने जैसा तो नही रहा। तो विधि से कार्य करो। बाबा ने कहा हुआ है।
जैसे त्रिमूर्ति के चित्र में है ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना, शंकर द्वारा विनाश। लेकिन ब्रह्मा द्वारा स्थापना किससे ? पवित्रता के बल से, योग के बल से, ज्ञान के बल से। यह तो दुनिया भी जानती है कि ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की स्थापना होती है। ब्रह्मा ने नई सृष्टि रची यह तो उनको भी पता है। भक्ति में भी कहते हैं, शास्त्रों में भी लिखा है। लेकिन यह उनको नहीं मालूम कि ब्रह्मा ने पवित्रता, ज्ञान, योग से सतयुगी सृष्टि रची। वो समझते हैं ब्रह्मा ने सूरज, चाँद, पृथ्वी बनाये, सृष्टि रची, हाथी-घोड़े यह सब ब्रह्मा ने बनाया - उसका यह अर्थ लेते हैं। वो कहते हैं शिव ने अपनी जटाओं से भस्म निकाली और ब्रह्मा ने उस भस्म से हाथी, घोड़े, पहाड़, नदियां, पृथ्वी, शास्त्र सब बना डाले। लेकिन बाबा ने हमें बताया कि ज्ञान बल से, पवित्रता के बल से, योग के बल से सृष्टि रची। अगर हमारे कार्य करने में ज्ञान, योग, पवित्रता नहीं है तो वह काम सतयुगी सृष्टि रचने के काम नहीं आ सकता। वह आपको मान-शान दे सकता है लेकिन सतयुगी सृष्टि की स्थापना करने में सहयोग नहीं दे सकता। आपने कोई भी चीज बना ली, मेला कर लिया, कान्फ्रेन्स कर लिया, मीटिंग कर ली लेकिन अगर उसमें आपकी बुद्धि में ज्ञान नहीं है, योगयुक्त होकर कार्य नहीं किया, एकता पूर्वक कार्य नहीं किया, आपस में घमसान करके, लूनपानी बनकर और कुछ एक-दूसरे से मनमुटाव करके काम किया तो उससे सतयुगी सृष्टि की स्थापना नहीं हो सकती। जितनी पवित्रता होगी, उतना ही कार्य होगा। यदि १००% पवित्रता है तो १००% सतयुगी काम होता। और आपने पवित्रता का पालन किया लेकिन २०% किया, योग ५% रहा, बुद्धि में ज्ञान ३०% रहा तो इतना ही परसेन्ट सतयुगी सृष्टि की तरफ कदम बढ़ाया। तो हम सतयुगी सृष्टि की स्थापना का कार्य कर रहे हैं इसलिए योगयुक्त होकर, ज्ञानयुक्त होकर, पूर्ण पवित्रता की राखी बांधकर नियमपूर्वक चलते हए करें, जिसको बाबा कहते हैं विधि से सिद्धि होगी। दूसरा फ़रमाबरदार, तीसरा वफ़ादार, नियम मर्यादाओं का पालन करने वाला बनो।
(६) विधायक
बाबा कहते हैं आप विधायक हो, लॉ मेकर हो। लॉ बनाने वाले हो। तो लॉ को अपने हाथ में मत लो। ईश्वरीय लॉ हैं- मीठा बोलो, हरेक से सच्चाई से रहो, हरेक से मिलकर रहो, उनके प्रति कल्याणकारी भावना रखो। इसके आप लॉ मेकर हो। लोगों को यह लॉ बताते हो। इन लॉज पर सृष्टि थमी हुई है। तो इन लॉज को अगर तोड़ोगे तो लॉ मेकर की बजाए लॉ ब्रेकर हो जाओगे। आप लॉ को अपने हाथ में ले नहीं सकते। यदि आप यह बोलते कि इससे मेरी जान को खतरा है, यह मुझे मारता है तब लॉ उसके खिलाफ़ काम करता। लेकिन यदि उसने थप्पड़ मारा और आपने बदले में डन्डा मार दिया तो लॉ दोनों के खिलाफ़ काम करेगा। क्योंकि दोनों क्रिमिनल हैं। तो लॉ को अपने हाथ में नहीं लेना है। इसलिये बाबा कहते हैं विधिपूर्वक काम करो।
(७) विनम्रता
जो भी कार्य करो विनम्रता से, निरहंकारी बनकर करो। जिसको कहा जाता है - निरहंकारी, निर्विकारी, निराकारी। हमारी विजय का सबसे बड़ा शस्त्र है - झुक कर चलना। हमारी दैवी शक्ति, ईश्वरीय शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति का जो अमोघ शस्त्र है, जिसको कोई जीत नहीं सकता, जिसके आगे बड़े से बड़ा विरोधी भी झुक जायेगा वह है नम्रता। नम्रता कोई कम पॉवरफुल नहीं है। यह एटम बम है, हाइड्रोजन बम है। लोग तो न्युक्लीयर शक्ति, आणविक शक्ति को बहुत पॉवरफुल समझते हैं। लेकिन हमारे पास सबसे बड़ी शक्ति है नम्रता। यह हमारे सिद्धि का सबसे बड़ा स्वरूप है। मनुष्य के अहंकार को इस नम्रता के शस्त्र से जीतो। सबसे पहले यह सोचो कि मैं वर्ल्ड सर्वेन्ट हूँ। आमतौर से कहते हैं कि क्या में इसके बाप का नौकर हूँ, यह समझता क्या है? लेकिन मैं हूँ ही नौकर, इसका भी नौकर हूँ, इसके बाप का भी नौकर हूँ, सारी दुनिया का नौकर हैं। बाबा कहते हैं मैं तो ट्रस्टी हूँ। मैंने तो सब शिवबाबा को दे दिया। मेरा तो कुछ रहा ही नही बेगर टू प्रिन्स। तो जितना बेगर बनोगे, उतना प्रिन्स बनोगे। बेगर का यह मतलब नहीं कि कमन्डल लेकर गली-गली जाकर भीख मांगो। इसके लिए तो बाबा कहते हैं मांगने से मरना भला। हमारा जीवन है विश्व की सेवा के लिये। इससे आपका जीवन बहुत ऊंचा बन जायेगा। अपनी भी विशेषता देखो। अपने में कमी भी है तो कमजोरी भी है। अपनी कमी ही देखते रहोगे तो हीन भाव आयेगा - मैं तो नीच हूँ, दास हूँ। लेकिन अपनी विशेषता देखो कि मैं जैसा भी हूँ, बाबा का हूँ। मेरे में यह विशेषता है इसको मैं काम में लाऊं। अपनी भी विशेषता देखो तो दूसरों की भी विशेषता देखो। दूसरो की कमी और कमजोरियों को मत देखो। क्योंकि आपका जीवन किस पर आधारित है। जैसा आप देखोगे वैसा आप बनोगे। जैसा कहते हैं कि अगर किसी आदमी के दिल तक पहुँचना हो तो उसके मुंह के रास्ते से पहुँच सकते हो। इसका मतलब हुआ कि उसे खिलाओ-पिलाओ, खुश होगा तो आप उसके दिल तक पहुँच जाओगे। यह लोगों का कहना है। लेकिन अगर आप दूसरों की कमजोरियां देखते हो तो आपको भी महसूस होगा कि आपमें वह कमजोरी आना शुरु हो गयी। जब दूसरों की बुराइयाँ देखना शुरु कर देंगे तो उसका नतीजा यह होगा कि आंखों के द्वार से वह बुराइयाँ हमारे में घुसना शुरु कर देंगी। इसको बाबा कहते हैं सी नो इविल, दूसरों की बुराई मत देखो। उनकी विशेषता देखो। दूसरा- किसी की विशेषता से ईर्ष्या मत करो। यदि सब विशेषतायें आपमें ही होती तो दूसरों को लाने की जरूरत ही नहीं होती। आपमें कुछ विशेषतायें हैं इसलिये आपको लाया गया है। दूसरे भी अपनी-अपनी विशेषता से ही आये हैं- कोई धन से सहयोगी हो सकता है कोई बिल्डिंग बना सकता है, कोई ज्ञान सुना सकता है। यदि आप सोचोगे कि इसमें ये विशेषता क्यों है, यह तो मेरे में होना चाहिये तो जल जाओगे। ईर्ष्या ऐसी चीज है जिससे आदमी जल-भुन जाता है। जैसे बैगन का भुर्ता बन जाता है, ऐसे ईर्ष्या से जलने वाले आदमी का भी भुर्ता बन जाता है।
(८) विकास योजना
बाबा कहते हैं अपने विकास की योजना बनाओ। सेवाओं की योजना तो बनाते हो लेकिन अपना विकास कैसे हो, सेल्फ डेवलपमेन्ट कैसे हो, स्वयं आगे कैसे बढ़ना है, स्व-उन्नति कैसे हो – उसकी भी योजना बनाओ। कोई भी कार्य योजना-बद्ध तरीके से, प्लैन्ड-वे में हो, ऐसे अपनी स्व-उन्नति की प्लैनिंग करो। अभी तक काम विकार मेरे से गया नहीं है... मैं इतने समय से योगाभ्यास करता हूँ, पुरुषार्थ करता हूँ.. मेरे में इतना क्रोध रहा हुआ है, क्रोध से बोलता तो नहीं लेकिन मन में गुस्सा तो आता है... इसलिये अपने आपको टटोलकर प्लैन बनाओ। लोगों से पूछो, जिन लोगों ने इन पर विजय प्राप्त की है उनसे सम्पर्क करो। यदि आज शरीर छूट जायेगा तो सतयुग में कैसे जायेंगे ! शुद्ध पवित्र देवी-देवताओं के सम्बन्ध में कैसे आ सकता हूँ? मेरे तो यह मलेच्छपन के संस्कार अभी तक है। अच्छी चीज कोई देखता हूँ तो खाने को मन करता है। इस ढाई इंच की जबान को ५ फुट के इंसान ने अभी तक जीता नहीं है। और बाबा कहते हैं टाइम कम बचा है। तो कोई प्लैन, कोई टाइम टेबल, कोई कैलेन्डर आर्गनाइज-वे में (सुव्यवस्थित ढंग से) नहीं होगा तो उसका नतीजा क्या होगा ? तो इसको कहते हैं विकास योजना। बहुत-सी मुरलियों में बाबा ने कहा है कि अलबेलापन न हो। विकास-योजना बनाने के लिये और उसको सफल करने के लिये अलबेलापन नहीं होना चाहिये। टाल-मटोल करने की नेचर न हो। पहले अलबेलापन आयेगा, फिर आलस्य और फिर आलस्य क्लास से छुड़ा देगा, क्लास छूटा तो संगठन से जो बल मिलता था, वह बल मिलना ख़त्म हो जायेगा। जैसे दुश्मन जो होता है वह पहले ग्रुप से अलग ले जायेगा। माया भी पहले अलबेला करती है- हो जायेगा, कर लेंगे, अभी तो देर है, जल्दी क्या है, क्लास में नहीं गये तो क्या हुआ, कल डबल मुरली पढ़ लेंगे, जब हम करने लगेंगे तो हमारे लिये कुछ नहीं है, योग भी लगा लेंगे हम तो पुराने है.. तो धीरे-धीरे अलबेलापन संगठन से छुड़ा देगा। मुरली तो आप कहीं भी पढ़ सकते हैं लेकिन संगठन का बल कम नहीं है। ब्राह्मण परिवार का संगठन बहुत-बहुत महत्वपूर्ण है। संगठन से छटे तो ज्ञान-योग से छुट जायेंगे, ख़त्म हो जायेंगे। तो ये जो अलबेलापन है इसको छोड़ो आलस्य को छोड़ो, विकास योजना बनाओ।
(९) व्यवस्था
बाबा कहता है हरेक चीज व्यवस्थित ढंग से करो। हमारे जो संकल्प हों, वह व्यवस्थित हों। ज्ञानी और योगी का यह लक्षण है। जीवन व्यवस्थित होगा। टाइम मैनेजमेन्ट होगा। दिनचर्या माना ही मैनेजमेन्ट ऑफ टाइम। हम अपने टाइम को किस चीज में कितना लगायें, योग पर कितना, ज्ञान पर कितना, सेवा पर कितना, रेस्ट पर कितना, भोजन पर कितना। दूसरा – धन का भी मैनेजमेन्ट हो। बाबा तो कहते हैं धन है तो उसे पेट से भी बचाकर सेवा में लगाओ। खर्च करो लेकिन उचित खर्च करो। कम खर्च बाला-नशीन करो। एनर्जी की मैनेजमेन्ट - आप काम करते जा रहे हो, काम करते जा रहे हो, एक टाइम ऐसा आयेगा जो आपका ब्रेक डाउन हो जायेगा। फिर डॉक्टर आपसे कहेगा तीन दिन आराम करो। तो आपको यही नहीं मालूम कि आपकी कितनी एनर्जी है। बाबा कहते - "आप महान् हो। आप जितना वैल्युएबुल तो कोई नहीं है।" तो आपको अपनी एनर्जी वेस्ट नहीं करना चाहिये। सतयुगी सृष्टि की स्थापना करने की जिम्मेवारी आपको मिली है। अपनी शक्ति योग में लगाने की बजाय, बढ़ाने की बजाय, उसको खत्म करना और उसको ब्रेकिंग प्वाइन्ट तक ले जाना यह ग़लत है। बाबा ने कहा था १० बजे सो जाओ। हम लोग १२ बजे तक जगते रहते फिर दूसरे दिन जब अमृतवेले योग में आते हैं तो न स्वयं योग करते हैं न पास वाले को करने देते हैं। योग क्या लगाते हैं नमाज़ पढ़ते हैं। क्योंकि १२ बजे तक हम जग रहे थे। ये अरेन्ज करो, आर्गनाइज़ करो। बाबा ने फर्स्ट प्रिफरेन्स अमृतवेले के योग को दिया है। यदि आप १२ बजे तक जाग कर अमृतवेले का योग कर सकते तो भले जागो। लेकिन ९९% की यह कैपेसिटी नहीं है। इसलिये डिसीप्लीन रखो। अपने को एडजेस्ट करो। यदि एक बार अमृतवेले ठीक से नहीं बैठने की आदत पड़ गई तो सदा के लिये आदत बन जायेगी। कहावत भी है- "आदत हो गई पक्की, उसका छूटना मुश्किल; धागों का बना रस्सा, उसका टूटना मुश्किल।” अमृतवेले का योग हमारे जीवन का फाउन्डेशन है। हम पहले योगी हैं – इसे नहीं भूलें। अमृतवेले का योग ऐसा हो जो अन्दर से निकले कि "अहा ! मज़ा आ गया, आनन्द आ गया, हमको शक्ति मिल गई।” तब हमारा सारा दिन ठीक गुजरेगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए हम अपनी सारी दिनचर्या को एडजेस्ट करे।
आपकी चीजें भी व्यवस्थित हों। जो प्रोग्राम आप करते हैं वह भी व्यवस्थित चाहिये। आप कोई प्रोग्राम करते हैं तो कितने आदमी बिठाने हैं, किसको-किसको बिठाना है, कितने माइक चाहिये, गीत कौन-सा बजेगा – यह सब पहले से निश्चित हो। इसका प्लैन अवश्य करें। तो टोटल नेचर बनाने की जरूरत है। सतयुग में हर चीज मर्यादा में चलती है। एक आर्गनाइज़ सिस्टम में चलती है। तो एक अपना सिस्टम बना लीजिये। व्यवस्था बिना टेन्शन के हो। केयरफुल भी हो और चियरफुल भी हो। आपकी जो व्यवस्था हो सावधानी से हरेक चीज को करो, लेकिन खुश रहकर करो। बैलेन्स रखो – केयरफुल और चियरफुल का।
(१०) विभिन्नता
लाइफ में विभिन्नता हो। एक ही चीज करते रहने से मनुष्य बोर हो जाता है। नये-नये तरीके से करो, प्रयोग करो। जैसे कोई गीत किसी को अच्छा लगता है यदि उसे वह गीत एक महीने तक सुना दिया जाये तो वह कहेगा - तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या, तुम्हारे पास कोई दूसरा गीत नहीं है ?
(११) विशालता (Global Thinking)
हरेक चीज हमारी विशाल हो। हरेक चीज ग्लोबल हो। लोग कहते हैं एक्ट लोकली, थिंक ग्लोबली। मैं कहता है थिंक ग्लोबली, एक्ट आउट ऑफ ग्लोबली। आप जो भी करेंगे उसमें दुनिया का भला हो। आपका जो कर्म हो वह सारी दुनिया को इफेक्ट करता हो। दुनिया इतनी इन्टर कनेक्टेड है आप जो भी करते हैं उसका प्रभाव सारे विश्व पर पड़ता है, सारे ग्लोब पर पड़ता है। तो विशाल बुद्धि से करो। 'मेरा-मेरा' के हद से पार जाकर करो। बेहद की विशालता से करो। विशाल बुद्धि से, विशाल दिल से, उदारता से करो। यज्ञ में जो सहयोग देना हो, उसमें भी हृदय विशाल हो। तो विशालता बुद्धि की भी, विशाल हृदय की भी और विशालता दृष्टि की भी हो। हमारा जो देखने का तरीका हो, वह भी विशाल हो। कोई व्यक्ति कोई काम करता है उसका उत्साह बढ़ाओ। हर कोई आगे बढ़े, हर किसी का भला हो, हर किसी को हिम्मत दिलाओ, मौका दो। तो दृष्टि में भी विशालता, बुद्धि में भी विशालता, हृदय में भी विशालता हो।
(१२) विश्व सेवा
मैं विश्व सेवा पर उपस्थित हूँ। मैं वर्ल्ड सर्वेन्ट हूँ। बाबा मुरली चलाते थे तो कहते थे – “मैं केवल सामने बैठे बच्चों को नहीं देख रहा हूँ, सभी सेन्टर्स के, सारे विश्व के बच्चे मेरे सामने बैठे हैं।"
(१३) विजयी रत्न हूँ
विजय हमारी हुई पड़ी है, विजय हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, विजय का तिलक लगा हुआ है।
तो ये 'व' अक्षर से शुरु होने वाली जो बातें बताई वो अव्यक्त मुरलियों का सार हैं। लेकिन इन सबका जो फाउन्डेशन है वह है हमारा संकल्प। बहुत से शास्त्रों में बार-बार आता है – शिव संकल्पमस्तु। सारा मन्त्र पढ़ कर शिव संकल्पमस्तु। यह हमारा कल्याणकारी संकल्प है। दुनिया को संकल्प का महत्व नहीं मालूम। इस संस्थान की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण चीज है संकल्पों का महत्व। आपके संकल्पों की वैल्यू क्या है, उसकी विशेषता क्या है. उसकी पॉवर क्या है। बाबा ने ये जो बातें बताई हैं वह कहीं भी नहीं बताई गई हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण चीज है। सारे फिलॉसफी के, रिलिजन के हिस्ट्री और ग्रंथ पढ़ डालो - संकल्प का यह जो महत्व बाबा ने बताया है वह किसी ने नहीं बताया है। पहला महत्व है- बाबा कहते हैं संकल्प से सृष्टि रची जाती है।ओह संकल्प इतना बड़ा है जो सृष्टि रची जाती है ! संकल्प कहाँ और सृष्टि कहाँ ! लेकिन बाबा कहते हैं संकल्प से सृष्टि रची जाती है, संकल्प में वो शक्ति है। तो ये जो संकल्प है आपका उससे सृष्टि रची जाती है। यदि आप अशुद्ध संकल्प करेंगे तो उससे अशुद्ध सृष्टि रची जायेगी। अगर आप शुद्ध संकल्प करेंगे तो शुद्ध सृष्टि रची जायेगी। तो नैगेटिव थॉट्स को छोड़ोगे या नहीं, यदि आपको यह पता हो कि मेरे संकल्प से सृष्टि रची जायेगी - सुखमय या दुःखमय। अब हमें निर्णय कर लेना चाहिये कि मेरा संकल्प कैसा हो ? तो पहली चीज बाबा यह कहते हैं – बच्चे, यह याद रखो संकल्प से सृष्टि रची जाती है। इस चीज के महत्व को कभी मत भूलो। यह नहीं सोचो कि मेरे मन में ग़लत ख्याल आया था, मैंने उसको खत्म कर दिया, कोई खराब बात नहीं है। बाबा ने यह नहीं कहा है कि वचन से सृष्टि रची जाती है, कर्म से सृष्टि रची जाती है। वे तो बाद में हैं। इन सबका भी फाउन्डेशन संकल्प है। तो संकल्प से सृष्टि रची जाती है - जब यह याद रखेंगे तब ही परिवर्तन आयेगा। यह सारी उपरोक्त बातें तब ही आयेगी जब संकल्प की इन बातों का महत्व समझेंगे। इसलिये आपका ऐसा पॉवरफुल संकल्प हो जो पॉवरफुल सृष्टि रची जाये।
हम एक नई शक्तिशाली सृष्टि रचेंगे। पॉवर किस चीज की ? पवित्रता की, ज्ञान की, योग की शक्ति हो। अष्ट शक्तियां हों। हम मास्टर ऑलमाइटी हैं। हमें अपने संकल्प से एक सृष्टि रचनी है। बाबा कहते हैं वो जो एक लाइट थी, माइट थी, उसने कहा कि तुम्हें ऐसी सृष्टि बनानी है लेकिन उसने यह तो बताया ही नहीं कि कैसे बनानी है ? लेकिन धीरे-धीरे बाबा ने बताया कि संकल्प से सृष्टि रचना है। तो पहले-पहले यह सोचो कि मैं मास्टर रचयिता हूँ। अपनी पोजीशन को समझो, अपने रोल को समझो। अपना रोल ही नहीं समझे तो करेंगे कैसे ? अपना रोल भी नहीं समझे, गोल (उद्देश्य) भी नहीं समझे तो फिर आप क्या करेंगे। तो हमें सृष्टि रचनी है - यह है हमारा गोल, मैं मास्टर क्रियेटर हूँ - यह है हमारा रोल। इस रोल को पूरा करने का तरीक है पावरफुल संकल्प। जिस संकल्प में पॉवर भरी हई होगी उस संकल्प से सृष्टि रची जायेगी। तो यह याद रखो कि मेरा संकल्प ऐसा हो जो मेरे पर विकर्म दग्ध हों। आपका लक्ष्य तो बहुत ऊंचा है, लक्षण तो है नहीं। तो लक्ष्य और लक्षण का जो गैप है उस गैप को भरने का पुल वा ब्रिज है - संकल्प मुझे बाप समान बनना है - यह एक संकल्प है जो आपके उद्देश्य और वर्तमान स्थिति के बीच के गैप में ब्रिज का काम करेगा। अपने संकल्प बाप-दादा के संकल्पों से मिलाओ। जो कर्म करो, उसमें सोचो कि बाप ने ऐसा किया था? तब उसको करो। यदि यह संकल्प है – “मैं ब्राह्मण हूँ" तो शूद्रों के संस्कार आ नहीं सकते। ब्राह्मण कभी मलेच्छों जैसा आहार, मलेच्छों जैसे काम नहीं करेगा। कहेगा – “मैं तो ब्राह्मण हूँ, मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ?' दूसरा – बाबा कहते है लग्न से अग्नि पैदा होगी। कोई भी लग्न का संकल्प जब अग्नि का रूप से लेता है तो उससे ही सारे विकर्म दग्ध होते हैं। बाबा के प्रेम में लवलीन हो जाओ, लग्न में मग्न हो जाओ तो वही संकल्प आपकी अग्नि बन जायेगा। बाबा ने कई मुरली में कहा है कि ये संकल्प फरिश्ता बनने की टिकट है, यह टिकट कटा लो। आपने संकल्प किया और फरिश्ता रूप बन गये। "मैं फ़रिश्ता हूँ" यह संकल्प ही फरिश्ता बनने की टिकट है। अच्छा।
ब्रह्मा बाबा के जीवन की १६ कलायें
बाबा ने जो चार सब्जेक्ट्स बताई हैं उन चारों का केन्द्र बिन्दु बाबा का जीवन वृत है। इसलिए बाबा कहते हैं फालो फादर अर्थात् बाबा की जीवन कहानी हमें अपनी जीवन में उतारना है। ऐसे तो हम कहेंगे कि बाबा हर बात में सम्पूर्ण थे लेकिन हम उसको निम्नलिखित १६ कलाओं में बांटेंगे:-
(१) सीखने की कला (Art of learning)
सीखना अर्थात् जीवन में परिवर्तन। शिवबाबा सभी को एक जैसा पढ़ाते हैं लेकिन सभी अपनी शक्ति अनुसार उसको धारण करते हैं। जैसे ब्रह्मा बाबा ने उसी ज्ञान से इतनी प्राप्ति कर ली, जो कर्मातीत बन गये। लेकिन कई भाई-बहनें बहुत सालों से ज्ञान में चल रहे हैं फिर भी उनमें कोई प्रगति नहीं हुई। इसका कारण क्या है? उनकी मनोवृत्ति बन जाती है कि हमने तो सब सीख लिया। बस, यही माया का वार हो जाता है जो सीखने नहीं देता है। ब्रह्मा बाबा इतनी आयु होने के बावजूद भी अपने को समझते थे – “मैं विद्यार्थी हूँ।” इसी मनोवृत्ति ने उनको उच्चता के शिखर पर पहुँचा दिया। तो इस प्रकार सीखने के लिए सतर्कता ज़रूरी है। सीखना माना मान्यता में परिवर्तन करना और यह तब होता है जब सीखने वाली बात का महत्व मालूम हो। जैसे बाबा कहते हैं। जब यह मालूम पड़ जाता है तो पढाई में और अटेन्शन बढ़ जाता है। है- "बच्चे, यह जीवन हीरे तुल्य है” माना इस पढ़ाई से हम इतने ऊंचे बने सीखने के लिए प्रलोभन और प्रेरणा की जरूरत है। तब बाबा कहते हैं जो नये आते हैं उनको तुम पहले-पहले यहाँ का लक्ष्य बताओ। जबकि हमें पता है कि विनाश सामने खड़ा है तो जल्दी पुरुषार्थ करना है। सीखने के लिए जरूरी है दो मान्याताओं में तुलना। पहले उस बात का मूल्यांकन करना, फिर है धारण करना। यदि किसी के जीवन में परिवर्तन नहीं होता है माना उसने सुनी हई बातों में तुलना नहीं की फिर उससे लाभ है या हानि- यह नहीं देखा इसलिए धारणा भी नहीं हई। बाबा हमें रोज कहते हैं - "बच्चे, जो सुना है उसको रिपीट करो उससे क्या लाभ है उसका मंथन करो तो धारणा होगी माना हज़म हो जायेगा।" सीखने के लिए जिज्ञासा चाहिए। बाबा पढ़ाई के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि "बच्चे, जिसको मुरली से प्यार है माना मुरलीधर से प्यार है। तुम्हारी पढ़ाई मुरली है इसलिए पढ़ाई मत छोड़ो।” इसी तरह बाबा बूढ़ों को जब 'बच्चे-बच्चे' कहते तो उनमें पढ़ाई के प्रति अलर्टनेस (सतर्कता) आ जाती और जो जवान होते हुए भी कहते कि हमने तो सब सीख लिया तो बाबा कहते यह बूढ़े हैं।
(२) व्यवहार करने की कला (Art of dealing or behavior)
कहा जाता है कि Handsome is that who handsome does (सुन्दर वह है जो सुन्दर कार्य करता है) तो हमारा व्यवहार ऐसा हो जिसमें निःस्वार्थ स्नेह, मिठास और सुधार हो। बाबा का व्यवहार ऐसा था जिससे उनको देखकर दूसरों के जीवन में, व्यवहार में सुधार आता था। हमारे हर कर्म में सेवा समाई हो तो सेवा अर्थ किया हुआ कार्य ही श्रेष्ठ है।
(३) विश्राम या निश्चिन्त रहने की कला (Art of Relaxation)
विश्राम तब होता है जब इस देह से न्यारे होते हैं। जैसे जब हम सोते हैं तब आत्मा देह से न्यारी हो जाती है - यह भी आत्मा को आराम मिलता है। लेकिन राजयोग द्वारा आत्मा जब शरीर से न्यारी होती है तो वह है सतोगुणी आराम। असोचता स्थिति से हम न्यारा-प्यारा भी बनते हैं और आराम भी अनुभव करते हैं। यह स्थिति बाबा के अन्दर थी। जैसे मुरली में बाबा कहते हैं – “बनी-बनाई बन रही, अब कुछ बननी नाहि।” लेकिन फिर भी अलर्ट रहते। कोई भी विघ्न पड़ता तो बाबा कहते 'नथिंग न्यू'। बाबा के स्वरूप मे मुस्कराहट होती और हमारे चेहरे पर ह्रास होता। इसलिए ऐसा समझना है कि करन-करावनहार बाबा है, हम तो निमित्त हैं, इसे ही ज्ञान में निश्चय कहते हैं। "बाबा ही सब कुछ कराता है - इस निश्चय से हम सदा निश्चिन्त रह सकते हैं। यही निश्चिन्त रहने की कला बाबा में थी। जो उनके जीवन में हम सबने देखी।। बाबा कहते – पास्ट इज़ पास्ट सीन समाप्त हो गई फिर यह चिन्तन मत करो। बाबा यह भी बताते कि किसको भूलना है और किसको याद करना है। किसी भी आत्मा को याद नहीं करना है क्योंकि वो तो दुःख का ही सागर है। तो अब उसे भूलना है और जो सुख का सागर बाबा है उसे याद करना है। बीमारी में भी बस "कर्मों का हिसाब किताब है” यह सोचकर सिर्फ भूलते ही नहीं बल्कि उसको सेवा का भी साधन बना देते। जैसे एक बार बीमारी में डॉक्टर आया तो बाबा ने डॉक्टर से पूछा – “हाउ आर यू डॉक्टर ?" डॉक्टर को पेशेन्ट की इस बात से बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर बाबा ने सेवा शुरु की। स्वस्थ रहने का अर्थ बताया - स्व + अस्थ। स्व माना सोल कानसेस और अस्थ माना स्थिति। तो जब आत्मिक स्थिति में हैं माना ही स्वस्थ हैं। बीमारी में कोई हालचाल पूछने आये तो हम रो करके नहीं कहें कि हिसाब-किताब पूरा कर रहे हैं। नहीं, हिसाब-किताब की बात अन्दर में समझकर सन्तुष्ट रहें, खुश रहें। निश्चय से निश्चिन्तता आती है। बाबा ड्रामा की पॉइन्ट से हर स्थिति में एकरस रहते माना निश्चिन्त रहते, आराम में रहते। बाबा कहते – बेग़मपुर के बादशाह हो, कापारी खुशी में रहो। जिसको कोई देखकर पूछे कि आपको इतनी खुशी कहाँ से आई ?
(४) जीने की कला (Art of living)
ज्ञान में आने से पहले बाबा राजाओं से मिलते थे, उनका जीवन पहले क्या था ? परन्तु ज्ञान में आने से ही सादगी आ गई। बाबा कहते 'सादा जीवन उच्च विचार'। खर्च कम करो लेकिन चीज ज्यादा समय चले। खाने, पहनने और रहने के सम्बन्ध में यह नहीं कि हमारे कारण दूसरे को परेशानी हो। बाबा यहाँ तक कहते थे कि- बच्चे, स्टेशन पर ज्यादा भाई-बहिनों का आना ज़रूरी नहीं। फूल वगैरह भी लाकर शो नहीं करना है। वह पैसा सर्विस में लगाओ। तो बाबा की वह सिम्पलसिटी ही शो करती थी। पैसा खर्च करके शो नहीं करना। बाबा इतने सिम्पल थे, जब मधुबन में बच्चे ज्यादा आ जाते तो बाबा कहते- बच्चे, मेरे पास भी आकर सो सकते हो। जबकि बाबा का कमरा कितना छोटा था। बाबा की लाइफ बच्चों के लिए थी। अपने खाने में से निकालकर दूसरों को देना - कितनी बड़ी सेवा बाबा ने की ! यही कारण है कि आज कोई नये आते हैं तो वे ज्ञान तो देरी से समझते परन्तु यहाँ का त्याग, सेवा-भाव देखकर ही प्रभावित हो जाते हैं। बाबा को देखकर लोग सन्तुष्ट ही नहीं होते बल्कि अपना जीवन ही न्यौछावर कर देते थे। तो हमें भी देखना है कि हमारे से कितने लोग सन्तुष्ट हैं, खुश हैं? फिर आती है स्वच्छता। बाबा कहते - Cleanliness is next to Godliness. यह भी बाबा के जीवन में देखा कि 'खर्च कम, स्वच्छता ज्यादा'। जो आज भी मधुबन में सबको प्रभावित कर रही है। फिर बाबा कहते – अपना जीवन ऐसा चलाओ जिससे किसी को दुःख न हो। कर्म नियमपूर्वक हो लेकिन कष्ट देने वाले न हों। अपना काम स्वयं करो तो दूसरों को कष्ट नहीं होगा और मतभेद भी नहीं होगा। फिर आता है – मांगने की आदत। कई समझते हैं हम तो यज्ञ के लिए मांग रहे हैं, इससे तो देने वाले का कल्याण ही होगा। लेकिन बाबा कहते – मांगने से मरना भला। बाबा तो यहाँ तक कहते कि कोई सम्बन्धी अगर शिवबाबा को पहचानने बिगर लौकिक सम्बन्ध से दे रहा है तो भी लेना नहीं है क्योंकि अभी का लेना भविष्य में २१ जन्म तक मल्टीप्लाई करके देना है। तो हम ले कैसे सकते हैं। फिर बाबा के सामने बेगरी पार्ट के रूप से परिस्थितियाँ भी बहुत आई लेकिन बाबा ने खुशी-खुशी से पार किया, मांगा नहीं। हम देखते हैं – संसार में श्रेष्ठ व्यक्ति उसको कहते है जो कोई नई आविष्कार करते हैं या कोई अद्भुत कार्य करते हैं जैसे किसी ने हिमालय की सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट पर चढ़ने में विजय प्राप्त की, किसी ने बिजली आदि का अविष्कार किया या एटम बॉम्ब का आविष्कार किया तो उसका नाम होता है। लेकिन बाबा ने तो नई दुनिया ही बना दी। ऐसा संसार में कोई भी व्यक्ति नहीं होगा। तो अब हमें ऐसा ही जीवन बनाना है।
(५) परिवर्तन करने की कला (Art of transformation or
moulding)
बाबा कहते - धरत परिये, धर्म न छोडिये। एक बार समझ लिया कि स्वधर्म क्या है, स्वलक्ष्य क्या है तो मोल्ड होना है। यह भी ब्रह्मा बाबा के जीवन में देखा। पहले दिन ही साक्षात्कार हुआ- "अहम् चतुर्भुज तत्त्वम्”। यह तुम हो। बस, उसी दिन से परिवर्तन हो गया। जो बार-बार कहलवाते हैं वे मनुष्य होते हैं। तीव्र पुरुषार्थ का मतलब ही है – तीव्र परिवर्तन। बाबा कहते आप ही आधारमूर्त और उद्धारमूर्त हो। जैसे कोई काम किसी एक व्यक्ति के कारण रुका हुआ हो तो वह व्यक्ति कितनी जल्दी से रियलाइज करके पूरा करता है। उसी तरह हम बच्चे बाबा से पूछते हैं कि बाबा सतयुग कब आयेगा ? तो बाबा कहते तुम्हारे कारण ही रुका हुआ है। तो विनाश के लिए बाबा से पूछो नहीं कि विनाश कब होगा ? इससे अच्छा है कि हम जल्दी-जल्दी पुरुषार्थ में लग जाएं।
(६) अपना बनाने की कला
बाबा के सामने कैसा भी बच्चा आता था, बाबा कहते थे तुम तो बहुत बड़ा कार्य कर सकते हो। बाबा निराश आत्माओं में भी आशा उत्पन्न कर देते थे। कैसा भी कोई गांव का हो, अनपढ़ हो, बाबा उससे ऐसे मिलते जैसे यह भी कोई बहुत बड़ा वी.आई.पी. है। मधुबन में जो भी आते - बाबा उसे रिसीव करते तथा सीऑफ करते। गो सून, कम सून की टोली भी यहाँ से ही शुरु हुई। भेजने के समय बाबा गीत बजवाते – भगवान् तेरे घर का श्रृंगार जा रहा है... जिससे सभी अपने को महान् अनुभव करते। इसके साथ-साथ बाबा मार्ग प्रशस्त भी करते थे जिससे सभी को 'यह अपना घर है' ऐसी अनुभूति होती थी। मधुबन आकर बाबा से मिलकर सभी अपने घर को ही भूल जाते। छोटे-छोटे बच्चों तक का दिल बाबा ऐसा जीत लेते जो वे घर जाने के समय मधुबन में छिप जाते। दुनिया में गुरु और शिष्य होते हैं, छोटे बड़े का भेद होता है। लेकिन यहाँ बाबा से मिलकर सभी हल्का फील करते थे, डर नहीं लगता था लेकिन ऐसा महसूस होता था कि पहले भी बहुत बार मिले हैं। बाबा सिर्फ ज्ञान और योग ही नहीं सिखाते थे बल्कि पारिवारिक फीलिंग देते थे। जैसे अंगूर तो सब शहरों में मिलता है फिर भी बाबा सभी के लिए भेजते थे। किसी को बर्थ डे की टेलीग्राम भी कर देते। जैसे जब कोई फाउन्डेशन डालते हैं तो तांबा, पीतल आदि सब-कुछ डालते हैं वैसे ही ज्ञान और योग के साथ यह सब भी चाहिए नहीं तो सेन्टर फलीभूत नहीं होता। बाबा बच्चों की महिमा इतनी करते थे जो उनके गुणों का और विकास हो जाता था और वही कमाल करके दिखाता था। बाबा बच्चों को अंगुली पकड़कर घर दिखाते, स्टॉक दिखाते, साथ में खाना खिलाते। बच्चा सर्विस पर जाता तो उसकी जेब में बाबा ड्राईफ्रूट भर देते। बाबा राझू-रमज़बाज था, बच्चों को अपना बनाने का तरीका बाबा जैसा कोई नहीं जानता।
(७) स्वस्थ रहने की कला (Art of keeping healthy)
बाबा कहते – शरीर ठीक है तो सेवा कर सकते हो। पहली बात - हेल्थ को बनाने के लिए खुशी चाहिए जो कि ज्ञान से मिलती है। दूसरा भोजन फ्रेश। रात का बचा हुआ बासी भोजन खाने की बाबा मना करते, क्योंकि उसमें रात्रि के अशुद्ध वायब्रेशन आ जाते हैं। बाबा बच्चों को पहाड़ियों पर घुमाने के लिए भी ले जाते, जिससे फ्रैश हवा मिलती। इस तरह हेल्थ बनाने का ज्ञान भी बाबा देते थे। जैसे फैक्ट्री में एक मेन चीज का उत्पादन होता, साथ-साथ एक्स्ट्रा चीजें भी बन जाती। वैसे ही बाबा ज्ञान और योग के साथ-साथ यह सब भी सिखाते थे। बाबा कहते स्वस्थ रहने के लिए दवा के साथ-साथ सबकी दुआयें भी लेते रहो।
(८) पत्र लिखने की कला (Art of letter writing)
पत्रों से मन की मनोवृत्ति का पता चलता है। बाबा के पत्र जीवन में उत्साह पैदा करने वाले होते थे। बाबा कोई का भी किसी कमी की ओर ध्यान खिंचवाते तो पहले उसकी प्रशंसा करते फिर अच्छे ढंग से सुनाते, जिससे दर्द न हो। बाबा पत्र ऐसे लिखते जो बार-बार पढने की इच्छा होती। बाबा पत्रों से ही अपना बना लेते थे। पत्र पढ़कर आत्मा न्यौछावर हो जाती थी।
(९) प्रकाशन वा नामाचार करने की कला (Art of Publicity)
बाबा कहते - जैसे बिजनेस में सैम्पल दिखाया जाता है, वैसे ही ज्ञान में लोगों को स्वरूप बनकर, सैम्पल बनकर दिखाओ तो जिज्ञासु खुश होंगे और ऑफिस में, परिवार में प्रशंसा करेंगे और सभी को लेकर आयेंगे। इस तरह बिना खर्च पब्लिसिटी हो जायेगी। बाबा बताते - सभी को बाप का परिचय दो। घरों पर, गाड़ियों पर बोर्ड लिखकर लगा दो। ऐसे-ऐसे पब्लिसिटी करने की भी शिक्षा बाबा देते जिससे शिवबाबा का नाम बाला हो।
(१०) हास्यकला या विनोद कला (Art of Entertainment)
ज्ञान के बीच-बीच में बाबा हंसाते-बहलाते भी थे। हंसी-हंसी में आटे की गोली को ताजी टोली कहकर बच्चों को खिला देते। लकड़ी के पिस्ते बादाम बनवाकर हंसी-हंसी में खिलाते। एक बार बाबा कुछ बच्चों के साथ पहाड़ों से सूखी लकड़ी और चेरी आदि लेकर आये और मम्मा की पूजा करने लगे, इस तरह बाबा खूब हंसाते-बहलाते भी रहते। यह भी उनमें विशेष कला थी।
(११) नेतृत्व कला (Art of Leadership)
नेता का कार्य होता है जन-समुदाय को जागृत करके आगे बढ़ाना। बाबा ने ऐसा काम किया जो हर एक लीडर या टीचर बन गया। बाबा के इतने सब बच्चे टीचर हैं। बाबा सभी को बिजी कर देते। बुद्धि जब रचनात्मक कार्य में लग जाती है तो संहारात्मक कार्य समाप्त हो जाते हैं। जैसे पत्थर पानी की लहरों से पूजने योग्य हो जाता है वैसे ही यहाँ सेवा दूसरों की करते-करते लायक बन जाते है। हरेक को बाबा ने काम देकर उसे आगे बढ़ा दिया।
(१२) पालना करने की कला
बाबा बताते प्रदर्शनी लगाओ फिर थक कर सो नहीं जाओ, उसकी पीठ करो तब फल निकलेगा। यदि कोई जिज्ञास किसी कारण से नहीं आता है तो दूसरे जिज्ञासू की ड्यूटी लगा दो, मुरली भेजो, पत्र भेजो, टोली भेजो या कोई न कोई कार्य दे दो तो सम्पर्क में आता रहेगा।
(१३) समाने की कला
बाबा के जीवन में देखा कि यदि बाबा को विश्वास से कोई बच्चा अपनी बात सुनाता तो बाबा उसको सागर की तरह समा लेते। दूसरों तक नहीं पहुँचने देते। इससे सभी खुले मन से अपनी बात बाबा को सुना देते थे। यह भी कला बाबा में थी।
(१४) बेकार को अच्छा बनाने की कला (Art of making waste into Best)
लोग वेस्ट लोहे को, सोने को गलाकर नया रूप दे देते थे। वैसे ही बाबा पुराने संस्कार, पुरानी आदतों को परिवर्तन कर अच्छी आदत बना देते। सारी पतित दुनिया को पावन बनाने का शुभ संकल्प रहता। घर की कोई स्थूल बेकार चीज हो उसे भी बाबा नया रूप दे, काम लायक बना देते थे।
(१५) पढ़ाने की कला (Art of Teaching):-
पढ़ाई के सम्बन्ध में पहली बात स्थान तथा वातावरण की होती है। साफ-सफाई और शान्त वातावरण मधुबन को बाबा ने पढ़ाई का स्थान चुना। समय भी अमृतवेला, जिसमें मन बिल्कुल फ्री रहता है। पढ़ाने से पहले योग करवाते और गीत बजता। अगरबत्ती भी जलती, इससे मन की प्रॉपर सेटिंग हो जाती। भगवान् का इतना ऊंचा ज्ञान बाबा एकदम सरल करके सुनाते जो गांव के अनपढ़े भी समझ लेते। बाबा के शब्दों में शक्ति भी होती तो मिठास भी। और वे शब्द ठिकाने पर जाकर लग जाते। बाबा को कोई बात सुनानी होती तो जनरल क्लास में सुनाते जिससे जिसकी बात होती वह स्वयं को बदल लेता। बाबा अपनी चलन से, दृष्टि-वृत्ति, व्यवहार से पढ़ा लेते। बाबा की भाषा में रस भी है, अथॉर्टी भी है और शब्दों में पॉवर भी है।
(१६) प्रशासन करने की कला
नई दुनिया की स्थापना करना, एक-एक के संस्कार को बदलना कितना कठिन कार्य है। बड़े से बड़ा कलाकार वह जो थोड़े से साधन से बड़ा कार्य करे। बाबा के जीवन में था – कार्य शुरु करो, साधन स्वतः जुट जायेंगे। बाबा हरेक को चांस देते। यहाँ काम सभी मांगते हैं क्योंकि यहाँ काम को सेवा और सेवा को भविष्य प्राप्ति कहते हैं। यहाँ कोई बॉस या मैनेजर नहीं, रोब नहीं। लोग वर्क को लेबर समझते हैं। यहाँ वर्क को गुड लक समझते। बाबा के प्रशासन में स्ट्राइक वा हॉलीडे नहीं। अच्छा। ओम् शान्ति।
राजयोगिनी दादी जानकी जी
त्याग एवं तपस्या की मूर्ति राजयोगिनी दादी जानकी जी प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संयुक्त मुख्य प्रशासिका हैं। अनेक वर्षों से आपने राजयोग का गहन अभ्यास किया है तथा ईश्वरीय ज्ञान पर सतत् मनन करने का आपको विशेष ईश्वरीय वरदान प्राप्त है। आपके महान् जीवन से असंख्य आत्माओं ने आध्यात्मिक जीवन अपनाने की तथा दृढ़ता से अग्रसर होने की प्रेरणा प्राप्त की है। आपकी वृत्ति तथा वाणी आपके सम्पर्क-सम्बन्ध में आने वाली हर आत्मा में उमंग-उत्साह का संचार करती है। विभिन्न देशों/प्रदेशों में रहने वाली हर आत्मा बाप समान शक्तिशाली बनें - इस संकल्प का आप सच्चा स्वरूप हैं। आपने परमात्मा शिव के महावाक्य सुनकर उसी समय जो मनन-चिंतन करके उसका स्पष्टीकरण अपने क्लासेज में किया है, उनका सारांश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इसे पढ़कर हर आत्मा को एक नई जीवन दिशा मिले तथा वह आत्मा स्वयं शक्तिशाली बन अन्य को शक्तिशाली बनाने के निमित्त बनें।
दुःख महसूस करना पुरानी आदत है, इस आदत को छोड़ अतीन्द्रिय सुख के आदती बन जाओ
हम बच्चों ने अपने आपको परमात्मा बाप के आगे समर्पण कर लिया है, दिल से निकलता यह तन भी तेरा, मन भी तेरा मन ने बाबा को समझ लिया तो समर्पण हो गये। देह सम्बन्ध सब विनाशी हैं। मनुष्य आत्मायें अनेक हैं, परमात्मा एक है - यह बाबा ने इतना अच्छा समझाया, जो दूसरों को समझाने की कला आ गई। कुदरत के नियम अनुसार बच्चा पैदा होता है, बड़ा होता है, पढ़ता है। बाबा ने हमको बच्चा बनाया है। शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा को जैसे अपना बना लिया तो हम बच्चों को भी अपना बनाने में देर नहीं लगाई। फिर कहता है बच्चे अच्छी तरह से पढ़ो तो पढ़ाने लायक बन जायेंगे और अन्दर वो गुण वा शक्ति आती जायेगी। तन भी तेरा कह दो तो मन भी तेरा। जब मन कहता है बाबा मैं तेरा हूँ तो मन किसका हुआ ! इस तन में आत्मा कहती है बाबा मैं तेरा हूँ। मन तभी कहता है बाबा मैं तेरा हूँ जब बुद्धि मान लेती है। फिर बुद्धियोग भटकता नहीं है। मन बड़े प्यार से बाबा को अच्छी तरह से पहचानता है। ऐसा नहीं मन दुःखी हो गया, रोगी हो गया फिर कहता है मैं तेरा हूँ। मन महसूस करता है। बुद्धि में समझ आई है कि मन को बाप की तरफ लगाने से ही मैलापन जायेगा। मेरा-मेरा मैला बनाता है, तेरा-तेरा स्वच्छ बनाता है। तेरा कहा, स्वच्छ हो गये। मेरा कहा, तो फंस गये। तेरा कहा, तो छूट गये। ऐसे ही कार्य-व्यवहार में भी तेरा।
बाबा के पास आने से समझ आ जाती है हम कौन हैं? भागवत में जो चरित्र पढ़ते थे वही रिपीट हो रहे हैं। जो ज्ञान लोप हो गया था वही रिपीट हो रहा है। हम वही गोप-गोपियां हैं। सामने जो बात आ रही है वही हो रहा है। 'नथिंग न्यू'। विघ्न आना भी बड़ी बात नहीं है। हम ब्रह्मामुख वंशावली ब्राह्मण कहलाते हैं तो अपने अलौकिक जन्म को देख दिव्यता ला रहे हैं। जब तक अलौकिक महसूस नहीं होता तो दिव्यता नहीं आ सकती। ये हमारा जन्म ही अलौकिक है। कभी यह शब्द मुख से न निकले कि मैंने सहन किया है या मुझे सहन करना पड़ता है। ये शब्द मुख से बोलना अपने स्वमान से नीचे उतर जाना है। बाबा ने कभी भी यह शब्द नहीं बोला है। कितनी बातें बाबा के सामने आई और गई, बाबा के मुख से ऐसे शब्द कभी नहीं सुने। चेहरे पर वह चिन्ह कभी नहीं देखा। तन को भी नहीं कह सकते कि तकलीफ देता है। जैसे भगवान् के चरित्रों का गायन है ऐसे हम बाबा के बच्चे हैं तो हमारे भी चरित्र ऊंचे हों। तब ही तो पास विद् ऑनर होंगे।
बाबा ने हम बच्चों को समझ दी है कि जितना तुम्हारी आत्मा पावन होती जायेगी उतना भविष्य स्पष्ट दिखाई देगा। जैसे बाबा का भविष्य हमको दिखाई पड़ता आ रहा है। लेकिन इसके लिए गुप्त अभ्यास हो और सब बातों में न जाकर सिर्फ अपने आपको जान कर पहचान कर साक्षात् बाप के समान बनो। बाप का यही आदेश है। इस बात को सारे दिन में एक मिनट भी न भूलो। बाबा कहता है मेरे समान बनो। तो अलौकिकता, दिव्यता, हमारे चेहरे, चलन, संस्कार-स्वभाव में आ जायें, साक्षी होकर अपने को भी और औरों को भी देखें। मन को बिल्कुल सद्भावना युक्त बना लो। उसका सही अर्थ हमारे स्वरूप से प्रकट हो। आन्तरिक भावना अंग संग रहने वालों के प्रति बड़ी शुद्ध हो। दूर रहने वालों के लिए तो शुद्ध रह सकती है। लेकिन जो साथ में रहता है उनके लिए भी शुद्ध हो। किसी का हमारे प्रति रिस्पेक्ट हो या न हो, हमारी भावना उनके प्रति शुद्ध हो। हम अपने भाव को अन्दर से स्पष्ट, साफ, दिव्य बनाते जायें, अपने आप समय आयेगा, लोग पहचानेंगे। इसमें अपने आपको धैर्यवत, गम्भीर और सयाना बनाना होगा।
बाबा ने अव्यक्त होते यह मीठे शब्द कहे जो भूलते नहीं हैं – बच्चे, ज्ञान दान के साथ-साथ गुण दान करो। इसमें दिल बड़ी रखनी चाहिए। पहले हमारे में अवगुण ही थे, गुण आये कहाँ से ? सीखने की भावना ने बड़ी कमाल की है। सिखाना आसान है। सीखना भी आसान है। सिखाना है तो अपने स्वरूप से सिखाना है। सीखने की भावना गुणवान बनाती है।
भगवान् की यह इच्छा है हरेक भाग्यवान बन जाये। हम अन्दर से चाहते हैं हम नहीं बनेंगे तो कौन बनेंगे ? बाबा भी कहता है, समय भी कहता है बनना ही होगा। दोनों कान से दोनों आवाज़ सुनाई पड़ रही हैं। तीसरा कोई आवाज़ सुनाई नहीं पड़ता। घड़ी-घड़ी यह ख्याल आता है। बाबा ने यह स्लोगन दे दिया है समय, श्वास सब कुछ सफल करो। सफल करते हैं तो हमें देख और करते हैं तो हमारा भाग्य बन जाता है। फिर सफलता देख खुश रहते हैं। हरेक को खुश देख सब खुश होते हैं। खुश रहने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती है। दुःख महसूस करो तो टाइम वेस्ट जाता है। दुःख की छोटी सी घड़ी भी बहुत लम्बी लगती है। ऐसी घटना आने ही नहीं दो। कभी भी किसी बात का दुःख महसूस न हो। वह हमारे लिए बहुत बड़ी भोगना महसूस होती है। इससे हमें अपने आपको जल्दी से सम्भाल कर, खबरदार रहना है। अतीन्द्रिय सुख के आदती बन जाओ। दुःख महसूस करना यह पुरानी आदत है। उस घड़ी अपने को ऑर्डनरी लगता है। हम जितना आगे बढ़ते जा रहे हैं, तो यह हमारे मुख पर शोभता नहीं है। जरा सी लैस भी नहीं आ सकती। निमित्त मात्र बाहर हैं, बाकी अन्दर हैं। अन्दर की दुनिया कितनी अच्छी है ! ब्राह्मणों की दुनिया भी भिन्न है। मैं उस चक्कर में क्यों आऊं ? अन्दर की दुनिया रचने की ड्युटी बाबा ने दी है। अन्दर की दुनिया में अति प्रभु लीला है। स्वदर्शन चक्र फिराना पहले मेहनत का काम था। अब कितना सहज है, हमारे अन्दर जो होगा वह बाहर साक्षात्कार होगा। मेरे अन्दर में क्या है ? एक बाबा है, दूसरा हम हैं, तीसरा बाहर से किसी को आने नहीं देते हैं। सेवा अर्थ पार्ट बजा रहे हैं। सब नेचुरल होता जाये। कभी न कभी कोई न कोई ऐसी बात अपनी स्व-उन्नति के लिए मिल जाती है जिसे धारण कर लो तो छोटी-छोटी बातें स्वतः खत्म हो जाती हैं।
सुस्ती ठण्डा ठाकुर बना देती है, इसलिए खबरदार रहो, न बहुत बिजी दिखाई दो न लेजी
ओम शान्ति। ऋषि-मुनियों के लिए सुनते थे वो त्रिकालदर्शी थे। आज हम बाबा के बच्चे विचार करते हैं इस समय हम त्रिकालदर्शी हैं तो स्थिति कितनी ऊंची है। तीसरा नेत्र खुला है तो त्रिकालदर्शी हैं। तीसरा नेत्र त्रिकालदर्शी बनाता है। त्रिकालदर्शी बनने से बहुत हल्के होते हैं। तभी तीन लोकों की सैर करते हैं। ऐसा फील होता है जैसे यहीं कहीं एक स्थान से दूसर स्थान पर जा रहे हैं। नेचुरल हो गया है। ऐसे ही तीनों लोकों में आना जान नेचुरल हो गया है। यहाँ संगम पर खुशी मना रहे हैं। ब्राह्मण जीवन है, सफल कर रहे हैं। सफल करेंगे तो सफलता मिलेगी। सफल करने के लिए दिल खुली रखेंगे, मन भी खुला रखेंगे तो सफलता मिलेगी। कर्म भी ऐसा हो जो दूसरे को प्रेरणा मिले। इसमें हमारी एक्यूरेसी हो। संकल्प एक्यूरेट होता है। तो लक्की हैं। यदि संकल्प श्रेष्ठ नहीं होंगे तो आप समान नहीं बना सकते आप समान बनाने की सेवा ऑर्डनरी सेवा नहीं है। मैसेज देना भी बड़ी सेवा है। परन्तु उससे भी बड़ी आप समान बनाने की सेवा है। आप समान माना अपने समान नहीं, क्योंकि हमारे में भी जो कमी होगी वह भी आ जायेगी। कमी जल्दी आ जायेगी, अच्छाई बाद में आयेगी। बाबा समान बनाना माना बाबा के नज़दीक आना। उसकी बुद्धि अच्छा काम करेगी। बाबा का अच्छा सर्विसएबुल बनेंगे। सर्वशक्तिमान् से जुटे रहेंगे तो शक्ति आ जायेगी। अन्दर ध्यान रखना है कि हमारे सर्व सम्बन्ध भगवान् से हों। और सम्बन्ध नहीं चला जाये।
बाबा से सर्व सम्बन्ध हैं तो यह शक्ति सर्व कमजोरियों को खत्म कर देती है। बाबा सर्वशक्तिमान है, ज्ञान का सागर प्रेम, आनन्द शान्ति का सागर है लेकिन वह गुण मेरे में कैसे आयें, साथी में कैसे आयें ? जब सर्व सम्बन्ध एक बाप से होंगे तभी वह गुण आयेंगे।
तो सूक्ष्म में हमारी भावना आप समान बनाने की क्या है? थोड़ा सेवा में मदद करे, क्लास करा ले, लिखाई छपाई कर ले, वह तो जिसमें जो गुण कला होगी वह करेगा। कर्मयोगी बनना है तो कर्म तो करना ही है। शरीर निर्वाह अर्थ भी करना है। लेकिन शरीर में जो आत्मा है उसकी सम्भाल भी करनी है। कर्मेन्द्रियों के द्वारा मेरी क्या सेवा है। कर्मेन्द्रियों के द्वारा आत्मा पतित से पावन बनती है। पतित भी बनी है तो कर्मेन्द्रियों के द्वारा बनी है। ऐसे पावन नहीं बनेगी। कर्मेन्द्रियों सहित जब इतने जन्म लिये हैं तो कर्मेन्द्रियों द्वारा जो कर्म किये हैं वो आत्मा के संस्कार बने हैं। फिर सम्बन्ध में, देह में आकर जो कर्म किये हैं वो कर्म भी पावन बनाना पड़ेगा। सम्बन्ध में भी हमारा कर्म बहुत अच्छा हो। खुद के साथ, औरों के साथ भी। अलौकिकता में लौकिकता न आ जाये यह खबरदारी हमेशा रहे। लौकिकता में अलौकिकता हो। अगर इस तरह से कर्मों की गुह्य गति को समझकर निमित्त कर्म के सम्बन्ध में आकर भी खबरदार सावधान नहीं रहेंगे तो बाबा की याद इतनी नहीं रहेगी।
याद भूलती क्यों है ? आत्मा परमात्मा का ज्ञान भी मिला लेकिन भूलते क्यों हैं? कारण है नीति मर्यादा। पुरुषोत्तम बनने में मदद करते हैं – गुण और बाबा से पाई हुई शक्ति। फिर उसमें लगता है कि ये बाबा की सिखाई हुई, मिली हुई श्रीमत है। इसमें चलने में मज़ा आता है, सेफ्टी है। हर कर्म में बाबा की शिक्षाएं याद हैं। अच्छा स्टूडेन्ट जो होता है उसको जो शिक्षायें टीचर से मिली हुई होती हैं, वह काम में आती हैं। शिक्षायें याद करनी पड़ती हैं या काम में आती हैं ?
रात में सोते हो तो बीच में जागना भी अच्छा है। बीच में बाबा की याद आती है। जैसे ८ घण्टा कर्म करो और बीच-बीच में बाबा को याद करो। कितना भी बिजी रहो लेकिन दिखाई न पड़े। बाबा ने साकार में रहकर अव्यक्त होना सिखाया है। ऐसे इस साल में हम यह अन्दर से गहरी लगन रखें। कोई हमको कहे कि आप बिज़ी हो यह हमको अच्छा नहीं लगता। कोई यह भी न कहे कि सुस्त है। बाबा हमको भाग्य बनाने का चांस दे रहा है। न कभी बिज़ी दिखाई पड़ें, न कभी लेज़ी दिखाई पड़े। कुछ धारणाएं अव्यक्त वर्ष में मज़बूत रखनी हैं। सुस्ती छठा विकार सबसे बड़ा विकार है। सुस्ती बहाना बनाने में बड़ी होशियार है। सुस्ती बहाना बनाना सिखाती है, झूठ सिखाती है। बीती को चेतो नहीं, आगे बढ़ जाओ। सुस्ती ठण्डा ठाकुर बनाती है, मोटा महादेव बना देती है। यह हमारी नेचर न बन जाये, बड़ा खबरदार रहना है। उठना, बैठना, सोना, जागना, चलना इसमें फुर्ती नहीं है तो नेचर में सुस्ती आ जाती है। ऐसा सुस्ती वाला अनलकी है। किसी कारण से भी, किसके भाव स्वभाव को देखा, किसने कुछ कहा, फीलिंग आ गई तो सुस्ती आ गई। जैसे शरीर कमज़ोर होता है तो बीमारी आ जाती है। वैसे सुस्ती को भी कुछ कारण चाहिए। कुछ निमित्त कारण बना तो बैठ जायेगी। फिर पुरुषार्थ में हिम्मत उमंग उल्लास खत्म हो जाता है। फिर मंथन नहीं चलेगा। सुस्ती विचार सागर मंथन करने नहीं देगी। लगेगा सब तो सुना हुआ है। किसी को सुनाना हो या न सुनाना हो, लेकिन मंथन तो चलता रहना चाहिये। ज्ञान मंथन नहीं करेंगे, उसी चिन्तन में नहीं रहेंगे तो फ्रेश नहीं रहेंगे, इतना खुश मिज़ाज़ नहीं बनेंगे। अपने आपको हर्षित रखकर दूसरों को हर्षित रखने की मदद नहीं कर सकेंगे, बस काम चलाऊ गाड़ी चलेगी। हर्षित रहने का वातावरण तो बना सकें, हर्षित रहने की कम्पनी मिले, गपशप की कम्पनी नहीं, यह नुकसानदायक है। ज्ञान से हर्षित रहने की कम्पनी मिलेगी। जो सदा ज्ञान का मनन-चिन्तन करता है उसी से ही हर्षित रहने की कम्पनी मिलेगी। जो मोटी बुद्धि वाले हैं वो कहेंगे कोई नई पाइंट तो मुरली में थी नहीं। ये है सुस्ती। यदि दिल से मुरली पढ़ो तो नई-नई पांइट मिलेगी। जो मंथन करना नहीं जानता, चिन्तन करना नहीं जानता उसको पता नहीं मुरली में कितना रस, कितनी शक्ति भरी है। वह अपने साथियों में वह शक्ति नहीं भर सकता। उड़ने नहीं देगा। ज्ञान का कायदा ही ऐसा है। बाबा ने गुप्त अपनी भावना, स्नेह की शक्ति से पढ़ाया है, पालना दी है।
कभी भूल हुई हो तो बाबा कहते हैं सच बतायेंगे तो हल्के हो जायेंगे। हम किसी को उलहना नहीं दे सकते हैं। बाबा ने सिखाया है सबको आत्म दृष्टि से देखो। बाबा ने हमारी आत्मा को जागृत करने के लिए हमें तीनों कालों की दृष्टि से देखा है। न सिर्फ यह कहा कि तुम आत्मा शरीर से न्यारी हो लेकिन तुम कल्प पहले वाली हो और सम्पूर्ण बनने वाली आत्मा हो, सतयुग में आने वाली आत्मा हो। बाबा आज की दृष्टि से नहीं देखता। बाबा ऐसे देखता है जो हमको डर नहीं रहता। हमारे में उम्मीद पैदा होती है। इसलिए कहता है अच्छा पुरुषार्थ करना है तो बीती को भूलो। बीती को भूलो तो आगे पुरुषार्थ करने की शक्ति आती है। ज्ञान भूलना, शिक्षा को भूलना, अच्छी बात को भूलना इससे कमजोरी आती है। बीती बातों को भूलने से शक्ति आती है। तो किसको भूलना है किसको याद रखना है – यह है अक्लमन्द की निशानी। कोई बात हो गई तो एक बार सुनाकर खत्म कर दो। बार-बार भी नहीं सुनाओ। बार-बार सुनाने से वह पक्की हो जाती है। एक बार सुनाने से बाबा शक्ति देकर खत्म करता है। हमें हमारी भूल याद नहीं दिलाता। हम अपनी भूल याद न करें, दूसरों की भी याद न करें। हमारे अन्दर से स्नेह और रहम सूख न जाये। चलते-चलते स्नेह और रहम जैसे सूख जाता है। नदी सूख जाती है तो नहाने कौन जायेगा ? नज़दीक कौन जायेगा। अच्छी बहती हुई होगी, क्लीन होगी तो नहाने, जल पीने को दिल करेगा। तो स्नेह और रहम सूख न जाये। हम कोई ऐसी बातें न कर दें जो हमारे लिए नुकसानदायक हो। अगर स्नेह और रहम मेरे पास होगा तो हम बाबा के कार्य अर्थ सेवा अर्थ सच्ची दिल से लगा सकते हैं। बाबा ने स्नेह और रहम भावना से हमको जैसे पानी दिया है। अभी भी दे रहा है। अगर बाबा थोड़ा स्नेह से न देखे तो हम मुरझा जायें। मुर्दा बन जायें। अक्ल न होम, सयाने न हों फिर भी बाबा रहम करता है। बाबा ने हम आइरन एजड आत्माओं को पिघलाया है। तो इस अव्यक्त वर्ष में हमको अन्दर ही अन्दर बहुत पुरुषार्थ करना है। खाद निकल जानी चाहिये। बाबा के और भी जो लाडले सिकीलघे बच्चे हैं, उनको देवें। ऐसा वायुमण्डल इतना श्रेष्ठ फुर्ती वाला हल्का हो।
कान्फ्रेन्स की इतनी अच्छी रिजल्ट कैसे निकली ? सब हल्के हैं। वातावरण लाईट है। बाबा की शक्ति काम कर रही है। सुस्ती को कभी न आने दें। समझ जायें सुस्ती आ रही है। बीती को भूलना बड़ी बात नहीं है। बीती को याद करना माना बहुत नुकसान है। अपनी कमाई में घाटा पड़ जाता है। दूसरों को कमाई करने का चांस नहीं देते हैं। हमको आगे बढ़ते जाना है। घर पहुँचना है जल्दी। तीसरी बात मंथन जरूर करना है। बाबा का मुझ पर इतना रहम है, बाबा इतना देता है, दूसरों को भी दो। देते रहो, देते रहो गंगा बहती रहे। कैसे भी संस्कार वाला हो, उसका चिन्तन न करो। अपने पहले वाले संस्कार भी यूज़ न करो। बाबा ने जो मुझे दिया है वह मेरे पास सदा कायम रहे। जिससे मेरे में भी अन्दर ही अन्दर शक्ति आये। कुछ यूजलेस संस्कार हमारे भी हैं। सारे ईश्वरीय संस्कार मेरे में नहीं आये हैं। तो जो आये हैं उनको ही यूज़ करें। दूसरा किसी को हम १० साल से, २० साल से जानते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका हम रिकॉर्ड रखें। हर आत्मा बदल रही है, बदलना ही है। कभी भी यह भूल न हो। हम कहेंगे हम २५ साल से जानते हैं इसको, वही है यह। तो हम भी तो वही हैं। मुझे बदलना है। सब परिवार है। सबके साथ प्यार है। यह भी बदल जायेंगे। शुभ भावना रखें। धीरज ने बड़ा अच्छा काम किया है। उतावले न हों। कोई कैसा भी हो बाबा का बनकर रहे। किसको स्नेह में बाबा से जोड़ने में, गुप्त मदद करते रहना चाहिए। ऐसे गुप्त पुण्य कर्म का खाता जमा करें तो हमारे भी पाप के खाते कट होते जायेंगे। गुप्त पुण्य का खाता जमा करें। फ़ालतू कर्म करके कर्मबन्धन नहीं जोड़ें। फिर अटैचमेन्ट में आ जायेंगे। यह भी खबरदारी बाबा देता है। बाबा ने सीढ़ी दी है, उसमें चढ़ो, उतरो। बहुत लम्बी सीढ़ी नहीं है। एक जगह बैठ नहीं जाना है। जब तक संगमयुग है चढ़ाई उतराई तो है ही।
जिम्मेवारियां सम्भालते हुए पीसफुल रहो तो दुआयें मिलती रहेंगी
ओम् शान्ति शान्ति। बाबा कहते बच्चे तुम शान्ति स्थापक हो इसलिए तुम्हें शान्त रहना है। जो पीसफुल रहता है वही नॉलेजफुल रहता है, वही ब्लिसफुल रहता है। जो काम बाबा ने दिया भले स्थूल में ईश्वरीय सेवा है, जिम्मेवारी है। लेकिन उसके साथ-साथ पीसफुल हैं तो जैसे नॉलेजफुल हैं। उसी आधार से ब्लैसिंग्स मिलती हैं। एक तरफ बाबा की, दूसरी तरफ सर्व ब्राह्मण आत्माओं की, जिस भी आत्मा के सम्पर्क में आओ दुआएं मिलती हैं। बाबा ने सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज दी है। जो काम हम करते हैं त्रिकालदर्शी बनकर करते हैं। कर्मों की गुह्य गति का ज्ञान यूज़ करने के लिए त्रिकालदर्शी का ज्ञान जरूरी है। पास्ट की बातों को बुद्धि में रखकर अच्छा काम नहीं कर सकते। यह पुराने शरीर, जड़जड़ीभूत होते भी संगम पर हमारे बहुत काम का है। इस अन्तिम जन्म के अन्त की घड़ी में भी बहुत कमाई होने वाली है। सतयुग में अच्छा शरीर होते हुए भी आत्मा ऐसा काम नहीं करेगी। भविष्य के लिये पुराने शरीर में यह आत्मा अच्छा काम कर रही है। इसलिए इस अन्तिम जन्म की महिमा अपरम्पार है। जैसे ब्रह्मा बाबा को बाबा ने बताया कि तुम अपने जन्मों को नहीं जानते मैं तुम्हें आकर बताता हूँ। बाबा ने हम बच्चों को अपना बनाने के लिए ब्रह्मा तन में प्रवेश किया। हमको याद दिलाया कि तुम्हारा भी यह अन्तिम जन्म है। अन्त याद होगी तो आदि भी याद होगी। आदि याद होगी तो मध्य भी अच्छा होगा। भक्ति मार्ग में बहलने बहलाने के लिए टाइम पास हुआ। जब भक्त थे तो भी खुशी थी लेकिन अब की खुशी न्यारी है। अब की खुशी में भविष्य बहुत ऊंचा है। उस खुशी में भविष्य ऊंचा नहीं था। अभी खुशी है कि हमारी चढ़ती कला है। हमारा भविष्य पद ऊंचा हो रहा है। सदैव पुरुषार्थ में जुटे रहना चाहिए। कभी भी पर्सनल पुरुषार्थ में फ़र्क न पड़े। समस्याएं तो दिन-प्रतिदिन जोर से आयेंगी ही। जितना आगे बढ़ेंगे समस्याएं कम नहीं होंगी, लेकिन हम पुरुषार्थ में जुटे होंगे तो उनका सामना कर सकेंगे। बाबा ने बहुत काल से सिखलाया है समस्याओं का समाधान कैसे करना चाहिए।
बाबा ने कहा कि बच्चे मनमनाभव रहो। बेफिक्र बादशाह रहने के लिए चार पिल्लर मजबूत हों। समय सफल होता रहे। जैसे बाबा को देख खुश होते हैं ऐसे परिवार को और स्वयं को देख कर भी खुश हों। खुशी की मजबूती बेफिक्र बना देती है। दुःख-हर्ता बाबा हमें मिला है तो कभी भी दुःख इमर्ज न हो।
अच्छे कर्म करने से दुआयें मिलती हैं, गुणवान बनो तो इज्ज़त के पात्र बन जायेंगे
आज बाबा ने कहा कि भगत और ज्ञानी में कितना अन्तर है जब भक्त हैं तो मांगते रहते हैं, जब ज्ञानी है तो मांगना बन्द हो जाता है। भक्ति में कई हैं जो बहुत मांगते हैं धन चाहिए, पुत्र चाहिए ये चाहिए, पर कोई सच्चे भक्त हैं जो मांगते नहीं हैं। जो यहाँ वर्से के अधिकारी बने हैं वो भक्ति में भी मांगते नहीं है। भक्ति में तलाश थी, जब बाप की पहचान आई तो बाप से क्या लेना है, वह समझ आ गई। जीवनबन्ध में थे तो मुक्ति की इच्छा थी। लेकिन बाबा का बनने से समझ मिली है। जीवनबंध से छूटे। घर के रास्ते का पता चलने से आत्मा पावन बनकर घर चले, यह समझ आ गई। सच्चे भक्त जो होते हैं उनमें मांगने के संस्कार नहीं होते। धन, पुत्र आदि मांगे – यह नहीं। जितने पावन थे उसकी भेंट में पतित बने हैं। एक़दम पतित नहीं बने है जो संबंध में, धन में दुःख हो या उसकी प्राप्ति के इच्छुक हों। ऐसे पुजारी फिर भूत पुजारी हो जाते हैं। सिर्फ मांगने की कामना से भक्ति करने वाले। बाबा जिस तन में आया वो भक्त कैसा। हम फिर अपने से भेंट करें कि हम कैसे भक्त थे ?
कई मुरलियों में जब स्वर्ग के सुखों की वा अशर्फियों आदि की बात सुनते हैं तो समझते हैं कि हम उसके लिए ही पुरुषार्थ कर रहे हैं। लेकिन हमें सच्ची समझ मिली है कि सतयुग में आज के जमानेनुसार कागज़ के नोट नहीं होंगे, मिलावट नहीं होगी, आज के समान अनाज नहीं होगा। जब १०० वर्ष पहले भी ऐसा नहीं था तो ५००० वर्ष पहले कैसा रहा होगा ?
बाबा कोई प्रेरणा नहीं देता। शिवबाबा डायरेक्ट मुख द्वारा बैठकर शिक्षा देता है जिससे हम सुधरते हैं। कई समझते हैं भगवान् मुझे टच करता है। परन्तु इससे कोई हम आत्म-अभिमानी नहीं बनेंगे। भगवान् सामने बैठकर आत्म-अभिमानी बना रहा है, देह अभिमान छुड़ा रहा है। जब ब्रह्मा बाबा भी कहता है कि मुझे बाबा पढ़ा रहा है, मैं कानों से सुन रहा है, जिस तरह से पढ़ा रहा है, तो हम भी अटेन्शन से पढ़ रहे हैं। यदि बुद्धि इधर उधर होगी तो पढ़ेंगे कैसे ? अटेन्शन से मुरली सुनना भी योग है। यदि बुद्धि इधर उधर गई तो योग नहीं है। इतना तो करें जब बाबा पढ़ा रहा है तो एकाग्र होकर पढ़ें। यदि मुरली सुनते किसी और के लिए नोट्स ले रहे हैं तो वह याद होगा। बाबा याद नहीं होगा। पढ़ाई अच्छी पढ़ने वाला इतने अटेन्शन से पढ़ता है। वह सारा दिन सिमरण करता है। यदि अटेन्शन नहीं होगा, सिमरण नहीं चलेगा तो सेवा भले करें लेकिन बुद्धि का अभिमान आ जा जायेगा। पुरानी देह सम्बन्ध, दुनिया में रहते हुए सेवा अर्थ बैठे हैं। लगाव नहीं है।
पढ़ाई कहती है तुम चेक करो - लगाव है क्या ? लगाव नहीं है, सेवा अर्थ देह, संबंध दुनिया मदद कर रही है। सतयुग में अपने आप शरीर, संबंध, सब अच्छा होगा। लौकिक दुनिया वाले सारा दिन धन, संबंध का ख्याल करते हैं। अब हम ज्ञानी हैं तो धन, संबंध का ख्याल न चले। हम सेवाधारी हैं। मेरा-मेरा कुछ नही है, संबंध सबके साथ है। किसी के संबंध के अधीन नहीं हैं। यदि मैं बालक हूँ तो भी बाबा संभाल करने वाला बैठा है। बूढ़े हैं तो भी बाबा बैठा है। जवान को संभाल की जरूरत नहीं। संबंधों की अधीनता भी दुःखदायी बना देती है। अटैचमेंट दुःखदायी बना देती है। अच्छे गुण, अच्छे कर्म – धन-सम्बन्ध में कमी नहीं होने देंगे। ऐसे नहीं जिसके पास धन है, वह गुणवान है। जिसके पास गुण हैं वो जहाँ भी बैठेगा उसको मान मिलेगा, इज्ज़त मिलेगी। धनवान इज्ज़त के लिए धन दान करता है। गुणवान को अपने आप इज्ज़त मिलती है। अच्छे कर्म करने से अपने आप दुआएं मिलती है। धन दान करने वाला यदि नाम का भिखारी है तो दुआएं नहीं मिलती। दुआएं तब मिलती है जब नाम का इच्छुक नहीं है। सब सफल हो जाये, निष्फल न जाये यह भावना हो। बाबा कहता है संकल्प, धन, श्वास निष्फल न जाये। समय भी सफल करते हैं तो इज्ज़त मिलती है। समय जो निष्फल करता है वो इज्ज़त नहीं पाता है। सवेरे से रात्रि तक का समय सफल करो। समय, श्वास, संकल्प जो भी मेरा है, उसे सफल करो। मेरा श्वास चल रहा है, तो यह मेरा श्वास बाबा की याद में हो। और कोई बात के लगाव झुकाव में न हो। संकल्पों में भी इतनी शुद्धता और श्रेष्ठता हो जो भी है सब सफल हो रहा है।
हमें ज्ञान मिला है सब कुछ सफल करने के लिए, अन्त तक सफल होता जाये। मुक्ति-जीवनमुक्ति के वर्से पर हमारा अधिकार है। सफल करने से वर्सा मिलेगा। जैसे समझदार बनते हैं तो वर्सा मिलता है। लौकिक में तो चाहे गुण हो या न हो तो भी वर्सा मिलता है। बाबा का बनते हैं तो लायक बनने से वर्सा मिलता है। बाबा का बच्चा वह जो जरा भी निष्फल न करे। वह है समझदार बच्चा। कई कहते हैं क्या करें इनको खुश करने के लिए टी.वी.देखनी पड़ती है, तो ऐसी अधीनता भी न हो जो समय निष्फल जाये। हमारा समय, श्वास, संकल्प व्यर्थ किसको खुश करने के लिए न हो। जीवन को ऊंच बनाने के लिए किसी को सहयोग चाहिए तो दो। किसी को सहयोग मिला, ऊंचा उठने के लिए पंख मिलें, तो यह अच्छे वायब्रेशन से ही हो सकता है। हमारी आत्म अभिमानी स्थिति औरों को उड़ने में मदद करेगी। तो और बातों के चिन्तन में जाने के बजाय हमारे पुरुषार्थ का तरीका बहुत एक्यूरेट हो। जिससे हमारी प्रालब्ध तो बनेगी, लेकिन औरों को भी प्रालब्ध बनाने में मदद मिलेगी। जैसे बाबा को देख हमको प्रालब्ध बनाने की प्रेरणा मिली है। किसी को देख कर सीखना माना प्रेरणा मिलती है। काम ऐसा करें जो दूसरों को प्रेरणा मिले। बापदादा के साथ जितना मेरा प्यार होगा उतना उसका भी जोड़ेंगे।
जैसे लोहे को पिघलाया जाता है, ऐसे दूसरों को स्नेह से पिघला दो। जितना हमारा प्यार बाबा से होगा उतना दूसरों को हमारे चेहरे से मिलेगा। उनका लगाव किसी भी संबंध वा धन से नहीं होगा और वे किसी मनोकामना के वश में भी नहीं होंगे।
देवता बनना है तो किसी भी समस्या में मुरझाओ नहीं, ज्ञान और योग से हर हालत में सदा हर्षित रहो
हर दिन मुरली से कई बातें सीखने को मिलती हैं, कई प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है, कई कमजोरियों को ख़त्म करने की शक्ति मिल जाती, कई समस्याओं का समाधान मिल जाता है। मुरली ब्राह्मण जीवन में खुराक भी है तो मेडिसिन भी है। सिर्फ दवाई मिले, खुराक न मिले तो हेल्दी नहीं बन सकते, खुराक मिलती है तो दवाई भी मिलती है। ये कमाल है बाबा की, जो हर बच्चे की नब्ज़ अनुसार हर रोज़ खुराक वा दवाई दे देता है। जब हम साकार में बाबा की मुरली सुनते थे, तो मुरली सुनने के बाद बाबा से कहते थे – बाबा, आपने ये मुरली मेरे लिए चलाई। ऐसी भासना आती थी कि बाबा न सिर्फ सामने बैठने वालों के लिए मुरली चला रहा है लेकिन सारे विश्व भर की आत्माओ को याद करता है। कईयों को बाबा का साक्षात्कार हुआ है। जब बाबा का साक्षात्कार होता है तो खुशी होती है यह तो मेरा बाबा है। आत्मा में जान आ जाती है। बिन्दू को मेरा कहना थोड़ा कठिन है। जब ये सामने आता है तो लगता है- ये मेरा है, ये मेरा अच्छा गाइड बन सकता है, फीलिंग आती है। कई हैं जिनको कोर्स नहीं कराया है, पहले दिन से ही मुरली सुनते ब्राह्मण बन गये हैं। हमको किसी ने कोर्स नहीं कराया है। एक सखी ने पूछा कि लक्ष्मी बनोगी ? हमने कहा- हाँ, हमने सोचा कि ये ऑफर तो अच्छी है, ये ऑफर मन ने स्वीकार कर ली। जो कल्प पहले वाली आत्मा है, उनसे कहो देवता बनेंगे ? तो फौरन उनका विचार चलेगा कि कैसे बनेंगे? परमात्मा का वारिस बनने से देवता बन जायेंगे। वारिस बनने में एक तरफ मेहनत है, दूसरे तरफ कोई मेहनत नहीं है। मेहनत तब लगती है जब श्रीमत का पालन नहीं करते हैं। श्रीमत का पालन करते-करते मेहनत से छूट जाते हैं। प्रीत बुद्धि से विजयन्ती हो जाते हैं। श्रीमत को पालन करने से कन्फ्युजन खत्म हो जाती है। अनेकों की मत पर बुद्धि को भटकाने की आदत से छूट जाने हैं। श्रीमत पर चल बोझ बाबा को दे देते हैं। वर्सा बाबा से लेना है, तो कोई बोझ नहीं है। वह वर्से का अधिकारी है। वारिस वह बनेगा जो अपने को बच्चा समझेगा। उसको सम्भालने वाला कौन ? एक ही बाप। वही बाप टीचर है, सतगुरु है। गोद में एक ने लिया, पढ़ाये दूसरा, गुरु बने तीसरा, नहीं, यह बड़ा सहज हो गया जिसने अपना बनाया, रावण की दुनिया से छुड़ाया। खींचा। रावण के वर्से ने दुःखी-अशान्त बना दिया था। उससे निकालने के लिए, बचाने के लिए बाबा ने फट से बांहे पसार कर गोद में ले लिया – आओ मेरे बच्चों, और हमको भी खींच होने लगी। हर एक अपने अनुभव को देखें – कैसे खींच से बाबा के बने हैं। उस समय जाति, धर्म, देहभान छूट जाता है। रुहानी बाप रुहों को खींचता है, जैसे चुम्बक सुई को खींचती है। खींचता है तो दिल चाहता है- तुम्हीं से बोलूं, तुम्हीं से सुनूं, तुम्हीं को देखूं।
बाबा को पत्र लिखते ही मन हल्का हो जाता है। जवाब मुरली में मिल जाता है। रुह-रिहान बाबा से करो तो जवाब मिल जाता है। पत्र लिखते-लिखते जवाब मिल जाता है। तुम्हीं को पत्र लिखूं तुम्हीं से ही बोलूं। तो जिसकी बाबा से रुहरिहान करने की आदत पड़ जाती है वो कभी मुरझाते नहीं। वारिस वो बनेगा जो कभी मुरझायेगा नही। जो मुरझाता है वह वारिस नहीं बन सकता है। कोई भी समस्या आई तो मुरझाने की क्या बात है। बाबा सम्भाल लेता है। हर हालत में हर्षित रहने के लिए बाबा ने ज्ञान और योग दोनों सिखा दिया है। यदि ज्ञान काम नहीं कर रहा है या बुद्धि तक काम कर रहा है तो योग लगा लो योग हर्षित बना देगा, उदासी खत्म कर देगा। उदास होना माना पद कम कर लेना। पद की कमी हो जाती है। कोई कैसी पो हालत में उदास नहीं हो सकते। दुःख भरी बात है तो भी उदासी नहीं आ सकती, उदासी आई माना उस समय बाबा हमको कैसे देखेगा। बाबा के जो वारिस हैं, सपूत हैं, उनके आगे समस्यायें आयेंगी, चली जायेंगी। बाबा बच्चे को उदास नहीं होने देता। समस्या बड़ी या बाबा की मिलकियत बड़ी ? बाबा कहता है मेरी सारी मिलकियत के तुम वारिस हो। उसको क्यों भूलें। कभी न भूलें।
दूसरा बाबा ने कहा दे दान तो छूटे ग्रहण। योगी, ज्ञानी ब्राह्मण बनना है तो ब्राह्मण बनकर बाबा का सच्चा वारिस बनो। जो बात ग्रहचारी बिठा दे, जो बात टाइम वेस्ट करे – उसका दान कर दो। दान देकर वापस नहीं लेना है। वापस लेते हो तो उदास हो जाते हो। चलते-चलते ग्रहचारी बैठ जाती है। ग्रहचारी क्यों बैठती है ? तन से सेवा न कर सके, मन भी ऊपर-नीचे होता रहे, धन से भी सेवा न कर सके – क्यों ? श्रीमत पर नहीं चलते हो। काम, क्रोध के वश हो गये हो। अब वह ग्रहचारी उतारने के लिए फिर से ज्ञान दान दो, सच्ची सेवा करो। तो दान से पुण्य आत्मा बनते जायेंगे, सपूत बनते जायेंगे, वर्से के अधिकारी बनते जायेंगे।विदेही बनने का पुरुषार्थ और बाबा के साथ का अनुभव नेचर को स्ट्रांग बना देता है नाजुक नेचर समाप्त हो जाती है।
संगमयुग पर बाबा के दिल तख्त-नशीन बनने के लिए बुद्धि में और कुछ भी न हो। सिर्फ जिस बाबा को जीवन दी है वो मेरे जीवन का साथी हो। बाबा ने तो अपना बनाया लेकिन हमने भी जीवन दिया। मेरा पालनहार वही है, इससे नेचुरल ही हम निश्चिन्त हो जाते हैं। कइयों को निश्चिन्त रहना मुश्किल लगता है। जितना बाबा चाहता है क्या हम उतने बेफिक्र हैं? बेफिक्र रहने से खुशी होती है, खुश रहने से बेफिक्र रहते हैं। ऐसे नहीं - सेवा में सफलता हुई तो खुशी, कम सफलता हुई तो कम खुशी। एक तो अपने को सदा खुश रहने का आदती बनाना है। यदि सेवा से खुशी होती है तो सेवा को ही जीवन का आधार बना लेने से सदा खुश नहीं रह सकेंगे। अपने को सदा खुश रखने के लिए किसके बच्चे हैं, मुझे कैसा बनना है, सपूत बनकर सबूत दिखाना है, उसमें खुशी होगी। सपूत बनने से अन्दर की खुशी होगी, बाबा की तरफ से प्रवाह मिलेगा, औरों की तरफ से निमित्त बन जायेंगे। सपूत बनना माना श्रीमत पर चलना। श्रीमत पर चलते-चलते सपूत बनने के संस्कार बन जाते हैं। और कुछ आता ही नहीं। बाबा जो कहता है वह करना बड़ा अच्छा लगता है। लाइफ का आधार है आज्ञाकारी सपूत बनना। सदा हां जी करना ही आता है, ना जी करना नहीं आना चाहिये। ना करना सपूत की निशानी नहीं है। अन्दर से धीरज और शान्त चित्त रहने का स्वभाव बनाना पड़ता है तभी सपूत बन सकते हैं। बाबा का डायरेक्शन है देही अभिमानी भव। देही अभिमानी बने बिना बाबा के साथ का अनुभव नहीं हो सकता।
सदा हमारी वृत्ति ऊपर रहे तो यहाँ से नष्टोमोहा बनें। वृत्ति उपराम तब बनेगी जब हम आत्म अभिमानी बनेंगे। देह अभिमानी बुद्धि हमको उपराम होने नहीं देगी। बाबा इतना कार्य व्यवहार करते हुए भी सदा उपराम रहते। कोई कहते हैं मेरा किसी में भी मोह नहीं है, लेकिन सबूत क्या ? देखा जाता है सब विकारों में सूक्ष्म मोह है। तब अन्त में कहा है नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा। लौकिक से तो मोह छूटा लेकिन अलौकिक में भी रिंचक मात्र भी मोह है तो स्मृतिलब्धा बनने नहीं देगा। इसके लिए गुप्त मेहनत करनी पड़ेगी। बुद्धि से गुप्त मेहनत क्या करेंगे ? अपने को आत्मा समझकर देह अभिमान को छोड़ दें। अहंकार को, अभिमान को छोड़ भान से भी परे होते जाओ। अहंकार तो नहीं है, पर देह अभिमान है इसलिए मान-शान, दुःख-सुख की फीलिंग आ जाती है। नाजुक नेचर बन जाती है। स्ट्रांग नेचर नहीं बनती जो सहन कर सकें, सामना कर सके, बाबा से मिली हुई शक्तियों को यूज़ कर सकें। नाजुक नेचर भी देह भान है। कोई बात सहन नहीं होती, देह अभिमान है। कभी कोई बात सुनकर घबराहट आ जाती है, देह भान है। इसका इलाज है, अन्दर से अभिमान छोड़कर विदेही बनने का पुरुषार्थ करो। बाबा के साथ का अनुभव करो। बाबा से मिली हुई शक्तियों को यूज़ करो। देह अभिमान बाबा से मिली हुई शक्तियों को यूज़ करने नहीं देता है।
साक्षी होकर देखा जाता है इतनी सेवा की वृद्धि कोई एक ने नहीं की है। कोई न कोई विशेषता वाला छिपा हुआ था, समय पर मैदान में आ गया। बाबा के अनेक बच्चे कोने-कोने में हैं, जो आ जायेंगे, स्थापना के कार्य में मददगार बन जायेंगे। हमको अपनी स्थिति सपूत बनाकर रखने में आनन्द आता है। आनन्दमय स्थिति हो और स्मृति का तिलक हो तो बाबा के दिलतख्तनशीन हो जायेंगे। बाबा का दिल सदा बेहद का है, बेफिक्र है, कभी कोई फिक्र नहीं है। गुप्त सपूत बनने वाले उनके समान बेफिक्र बन जाते हैं।
हम बाप के आज्ञाकारी बनेंगे तो दुआएं मिलेंगी। मनमत वाला कभी भगवान् के दिल पर बैठ ही नहीं सकता। दूसरे की मत के प्रभाव वाला न कभी भगवान के दिल पर बैठ सकता, न ही मौज मना सकता है। मनमत पर चलना माना भगवान के द्वारा पाये हुए सुख से अपने को वंचित करना। दूसरे की मत के प्रभाव में आना माना गुलाम बनना। फिर भगवान से मागेंगे तो भी नहीं मिलेगा। बाबा ने संगमयुग पर बाप का, टीचर का, सतगुरु का पार्ट क्यों बजाया है, तीनों हमको इसलिए मिले हैं ताकि हम श्रेष्ठ बन जायें, एक़दम बेफिक्र बादशाह। न हमको किसी का फिक्र न किसी को हमारा फिक्र।
परीक्षा में घबराने, मूंझने वा दिलशिकस्त होने की बजाए ड्रामा में विश्वास रखो तो शक्तिशाली बन जायेंगे
संगमयुगी जीवन परमानन्द का अनुभव करने के लिए है। परमानन्द का अनुभव तब करेंगे जब बाबा से मिलन मनायेंगे। मिलन कैसे मनायें ? देह अभिमान को छोड़ें, देही अभिमानी स्थिति से मन-कर्मेन्द्रियों को वश में रख अतीन्द्रिय सुख महसूस करते हुए मिलन मना सकते हैं। गोप गोपियों के अतीन्द्रिय सुख का गायन है। परन्तु यह सावधानी की सीढ़ी है, सावधान रहकर, एक-दो को सावधान करके उन्नति को पाने में अतीन्द्रिय सुख है। बाबा शिक्षा भी देता है, समझानी भी देता है, तो सावधानी भी देता है। बच्चे-बच्चे कहकर प्यार से शिक्षा देता, जिससे हम मनमनाभव होकर स्वदर्शन चक्रधारी बन सकते हैं। परदर्शन-परचिन्तन बन्द हो जाता है। स्वदर्शन चक्र फिराने से पास्ट की सब बातें भूलती जाती हैं। स्वदर्शन चक्र फिराने से हम अपने आपको पहचानते हैं, अपने असली स्वरूप को जानते हैं। असली स्वरूप का दर्शन होता है। जिसमें सुख-शान्ति-प्रेम-आनन्द समाया हुआ है। भगवान ने हमको स्वदर्शन चक्र फिराने का ज्ञान दिया है उससे समझ आ गई है- मैं कौन है। शुरु में हम एक़दम एकान्त में, सागर के किनारे चले जाते थे इस गहराई में जाने के लिए कि मैं आत्मा कौन है। जब गहराई में चले जाते हैं, रस बैठता है तो नींद नहीं आती है। दिल कहता है इसको अच्छी तरह से जानू। एक ही आत्मा है, जो सदा एक जैसी है, रूप छोटा सा बिन्दू है। जैसे एरोप्लेन में जाओ तो नीचे की चीज़ छोटी दिखाई पड़ती है। आत्मा परमधाम में भी छोटी है, यहाँ साकारी तन में भी छोटी है, सूक्ष्मवतन में भी इतनी छोटी ही है। उसमें हर जन्म का भिन्न-भिन्न पार्ट भरा हुआ है। जब इसकी गहराई में चले जाते हैं तो पर-दर्शन, पर-चिन्तन बन्द हो जाता है।
स्वदर्शन चक्र फिराना माना फिर से वो बनना जो थे, जो आदि में थे, वो अन्त में बनेंगे। फिर आदि में वैसे ही आयेंगे। स्व को जानने से ही स्वदर्शन चक्र घूमता है। परदर्शन शान्ति, प्रेम का अनुभव खत्म कर देता है। इसलिए बाबा कहता है एक-दो को सावधान कर उन्नति को पाओ। ऐसी स्मृति में रहो जो हमारी स्मृति में रहने की शक्ति का वातावरण, वायब्रेशन्स, दूसरों को सावधान करने के साथ-साथ शक्ति भी दे। वाचा में आने की इतनी आवश्यकता नहीं है। वो वायब्रेशन ही काम करेंगे। मधुबन के वातावरण से हरेक को सहज प्राप्ति हो जाती है। अन्दर से बाबा-बाबा शब्द का उच्चारण होने लगता है। अनुभव होने लगता है, मेरा बाबा है। बी. के.न भी बनना चाहे तो भी बाबा कहा तो बी. के. बन गये। बच्चे बी. के. बनने में आनाकानी करते हैं, लेकिन बाबा कहता है – बच्चे, तुम तो मेरे हो। वन्डर है बच्चे बाबा से डरते हैं। समझते हैं दुनिया की रसम-रिवाज छोड़ना न पड़े। लेकिन जब प्राप्ति होती है तो सब-कुछ स्वतः ही छूट जाता है। रत्न मिलें तो पत्थर से कौन खेलेगा। बाबा इतनी अच्छी समझ देता है, शिक्षा देता है जो शिक्षा कहती है तुम सावधान रहो। भटको मत। भटकने से बहुत दुःख पाया है। अब समझ मिली है तो समझ को यूज़ करो। सिर्फ समझ दिमाग तक नहीं है। जो बात दिमाग के साथ दिल को अच्छी लगती है वो कभी दिल से जा नहीं सकती है। दिल ने, विवेक ने माना है ये सत्य है तो झूठ से कौन प्रीत रखेगा। सच की नइया का, खिवैया को हाथ दिया है, पार ले जा रहा है। इस निश्चय के आधार से, सावधानी से चलते आ रहे हैं। अभी बहुत नज़दीक आकर पहुँचे है। शान्तिधाम और सुखधाम बहुत नज़दीक है। दुःखधाम तो बहुत दूर है। अभी भी मार्जिन है, टू लेट नहीं है। बाबा ने जैसे ऊपर से हमको इशारा किया। तो बाबा के इशारे को देखकर सावधान होकर चल रहे हैं। दूसरों को भी इशारे से, शुभ भावना व श्रेष्ठ भाव से इशारा करते चलो। अपनी भावना एकदम अच्छी हो। अपने को इस बात में सावधान करना है किसी भी बात में न तो घबराऊं न ही दिलशिकस्त हो जाऊं। दिलशिकस्त, घबराना और मूझना - ये तीन बातें मेरे में न हो। परीक्षा आती है सोल कान्सेस बनाने के लिए। क्यों आती है, क्या होगा, ये क्वेश्चन न हो। अगर हम घबरा जायेंगे, मूँझ जायेंगे या दिलशिकस्त हो जायेंगे तो दूसरे को क्या उमंग दिलायेंगे। विश्वास है ड्रामा में, बाप में। तो विश्वास हिम्मत वाला बना देता है। स्वदर्शन चक्र फिराते हिम्मतवान बन जाते हैं। हमको तो अपने स्वरूप को और बाप को देखना है, लक्ष्य याद रहे तो जितना याद में रहेंगे, याद दिलायेंगे तो बाबा के दिल पर चढ़ते जायेंगे। मेहनत नहीं है, पर गुप्त, महीन, सच्चे और लगातार पुरुषार्थ की आवश्यकता है। कभी पुरुषार्थ में हीनता न आये इसलिए सदा सावधान, खबरदार रहना है।
अपना नेचर ज्ञान-योग से मज़बूत बनाओ, मोम जैसा दिल न हो
बाबा की हर मुरली से मजा तभी आता है जब मनन-चिंतन करते हैं। मनन-चिंतन तभी करते हैं जब उसे अमल में लाने का पक्का ख्याल मन में आता है। अमल में लाने से खुद में शक्ति भी आती है और सिखाने वाले के लिए अन्दर से प्यार भी पैदा होता है, अपना भविष्य अच्छा उज्जवल दिखाई पड़ता है। क्योंकि संगमयुग की घड़ियां बड़ी जल्दी-जल्दी पास हो रही हैं। और यह भी महसूस होता है कि ऐसी अमूल्य घड़ी फिर वापस आने वाली नहीं है। इसलिए इस समय का कदर करना पड़ता है। हर पल बाबा की याद और ज्ञान हमारे जीवन को अमूल्य बना रहा है। कौड़ी मिसल जीवन जो थी अभी हीरे जैसी लगती है।
काम, क्रोध ने बिल्कुल कंगाल बना दिया है। जब कोई कंगाल बन जाता है तो उस पर बड़ा तरस पड़ता है। गरीब को कंगाल नहीं कहेंगे उसके पास सिर्फ धन कम है इसलिए गरीब है। शरीर से कोई बीमार है तो उसको भी कंगाल नहीं कहेंगे। संबंध में माता-पिता नहीं है अनाथ या विधवा है तो उसे भी कंगाल नहीं कहेंगे। यूं तो कई बातें आती हैं परन्तु जब कंगाल कहा जाता है तो न सिर्फ निर्धन हैं परन्तु उसके पास कुछ भी नहीं है, उसकी तो सूरत भी देखकर तरस आयेगा। भगवान् ऐसी गति किसी की न हो। क्योंकि अपने गुणों-अवगुणों से, अपने लक्षणों से अपनी स्थिति ऐसी बना दी। जैसे आज बाबा ने कहा जहाँ क्रोध है वहाँ पानी के भरे हुए मटके भी सूख जाते हैं। क्रोधी खुद भी तपता है, औरों को भी तपाता है। उसका चित्त कभी शान्त नहीं हो सकता है, वह दूसरे की शान्ति को भंग करता है, विघ्न डालता है खिटपिट करता है, ऐसे कर्म बड़े खराब हैं। गरीब होगा तो स्वभाव का मीठा होगा। गरीब किसी को तंग वा दुःखी नहीं करता है। वह साहूकारों से अच्छा है। धनवान तो किसी न किसी को दुःखी करते रहते, गरीब किसी को दुःखी नहीं करते हैं। धनवान वेस्ट गंवायेंगे, गरीब अपने पेट से भी दूसरे को खिलायेंगे। ऐसे गरीब भगवान के प्यारे बनते हैं। धनवान यदि अपने परिवार वालों को भी कुछ देगा तो भी गिनती करता रहेगा। उसके ऊपर किसी को तरस नहीं आयेगा।
जिसमें दैवीगुण हैं वह सबका प्यारा बन जाता है। कुछ भी न हो पर ईश्वर का प्यारा गुणवान तो बनें। यह तो जानते हैं हर एक इंसान का दिल मोम के बराबर है। देखने में भल बड़ा मजबूत हो लेकिन है मोम के बराबर। हमारा आसुरी स्वभाव किसी को दुःख देता है, पर जब खुद को दुःख मिलता है तो अन्दर क्या हाल होता है, यह भी देखें। अपनी फीलिंग कैसी होती है ? दुःख सहा नहीं जाता है। तो हम अपनी नेचर ज्ञान-योग से मजबूत बनायें, मोम जैसी न हो।
ऐसी कोई बात हमारे से न हो जो हमको अपने कर्म कूटना पड़े। कोई कहते इस जन्म में तो हमने कुछ नहीं किया। ज्ञान के पहले किया था बाद में तो किया नहीं। इस जन्म के हैं या ज्ञान के बाद के किये हुए कर्म हैं, कुछ भी हैं, ज्ञान-योग दो ऐसी चीजें बाबा देता है जिससे रियलाइज़ेशन की शक्ति हम सबको खबरदार कर देती है। अबकी खबरदारी, सच्चाई-सफाई, रहमदिली हमारे अन्दर परिवर्तन कर देती है। हमारे अन्दर कोई हिंसक विचार भी न आये। किसी से बदला लेने का ख्याल भी न आये। मुझे ज्ञान-योग की बड़ी अच्छी मदद है, योग बाबा से है, कोई देहधारी से नहीं है, अगर देहधारी की याद आई तो जब तक उनसे मिलन नहीं हुआ तब तक शान्ति नहीं होगी। यह काम की तृष्णा भी महान् शत्रु है जो योगी बनने नहीं देती। कोई कहते हम संबंध में नहीं आये हैं, परन्तु यह मिलन की, देखने की तृष्णा है तो यह भी बड़ा विघ्न रूप बन जाती है योगी बनने नहीं देती है। इसलिए सदा यही याद रहे कि हम इस देह में मेहमान है, घर जाना है, पावन बनना है, यह बाबा की अमानत है इसको कोई टच नहीं कर सकता, खराब दृष्टि से देख भी नहीं सकता है। मैं बाबा की नज़रों में रहूँ मेरी नज़रों में बाबा हो, ऐसे निहाल रहने की जो बाबा से गिफ्ट मिलती है, वह सदा मेरे पास हो, तो कभी बेहाल होने की घड़ी नहीं आयेगी। हमने अपनी नज़रों में बाबा को रखा, बाबा ने हमें अपनी नज़रों में रखा – इतना बाबा के ऊपर कुर्बान जाना है। जरा भी किसी देहधारी के ऊपर प्रभावित नहीं होना है। ऐसे नहीं एक से बनती दूसरे से नहीं बनती, इसमें ज्ञान-योग को यूज़ करो तो यह संस्कार भी बदल जाएं। ज्ञान कहता है तुम्हारे सदा श्रेष्ठ विचार श्रेष्ठ वचन हों, अगर कॉमन रीति से चलते रहेंगे तो सहज योगी बनने से जो सुख मिलता है, ताकत मिलती है। उससे वंचित रह जायेंगे। जो आज तक पुरुषार्थ किया है वह काम में आ रहा है, इसलिए अगर अभी कर लो तो भविष्य में काम आयेगा। ऐसे नहीं बाद में करेंगें, जो किया हुआ है वह भी आगे बढ़ा रहा है। चलो किसी समय किसी ने गफ़लत की उसको रियलाइज़ करके अब गफ़लत न करें तो भी आगे बढ़ सकते हैं। बाबा की पढ़ाई में पूरा निश्चय होना चाहिये। निश्चय की कमी है तो भी पूरा योगी नहीं बन सकते।
निश्चय के आधार से विजयी बनते हैं तो यह हमारी अविनाशी जीत हो जाती है। फिर हमसे कोई जीत नहीं सकता, हम भगवान् से ऐसा ही राज्य-भाग्य पाते हैं। निश्चय से विकर्म विनाश करते हुए विकर्माजीत बनते हैं। पढ़ाने वाले में इतना निश्चय है जितना भक्ति काल में भगवान् में भावना रखते हैं। हमारी भावना भी है और निश्चय भी। पहले जो पढ़ा उस सबको भूल गये, जैसे मरने के बाद इंसान भूल जाता। ऐसे मरजीवा बनें तो सब कुछ भूला। अभी जो बाबा पढ़ाता है उसको अच्छी तरह पढ़कर मुझे प्रालब्ध बनानी है पढ़ाई हमको मायाजीत बनने में मदद करती है, नहीं तो माया आधाकल्प का कड़ा दुश्मन है। भले कोटो में कोई पढ़ेंगे, ऊंच पद पायेंगे, परन्तु हमें ऊंच पद पाना ही है। ऐसे नहीं चलो प्रजा में ही आ जायेंगे। सूर्यवंशी में नहीं तो चन्द्रवंशी में ही सही। सब थोड़ेही राजा रानी बनेंगे। ऐसे ख्यालात ही हमको सहज योगी बनने नहीं देते हैं। अपनी कमियों को खत्म करने का तीव्र पुरुषार्थ करने नहीं देते। देखते हैं बड़ों में भी तो कमियां हैं। किसी की भी कमी को न देखें, मेरी कमी निकल जाए मैं फ्री हो जाऊं बस यही पुरुषार्थ करना है।
संगम पर यह सबसे बड़ा सुख है जो मैं बाबा के नयनों में रहूँ, बाबा मेरे नयनो में हो। आखिर में तो हमें घर जाना है। थोड़े समय के लिए यहाँ हैं। हमें अपना यादगार देकर जाना है। फिर वही यादगार मन्दिरों में, शास्त्रों में होगा। अभी हम भगवान् के साथ पार्ट बजा रहे हैं, हमारी जीत है ही, गैरन्टी है। शिव शक्ति सेना हैं तो कभी घबराना नहीं है, विजयी बनना है। इसलिए बाबा की शिक्षाओं को योग की शक्ति से धारण करो। अन्तर्मुखी बनो, बाहरमुखता में नहीं आओ। बाहरमुखता में आने से बुद्धि भटकती रहती है। अन्तर्मुखी बनो तो व्यर्थ भटकने से छूट जायेंगे।
ड्रामा की भावी हमें निश्चिन्त रहना और निश्चित भावी पर अटल रहना सिखाती है
जो बाबा के बच्चे परमानंद में रहने के इच्छुक हैं उन्हें यही धुन लगी रहती है कि एक ही बाबा को याद करते अपना जीवन धन्य बना लें। हम राजयोगी बेहद के सन्यासी अपने आपको देखें कि हमारा भविष्य क्या है? विनाश काल है, हमें प्रीत बुद्धि रहना है। मनमनाभव भी रहना है और स्वदर्शन चक्र भी फिराना है। पहले मनमनाभव रहें या स्वदर्शन चक्र फिरायें ? मनमनाभव माना एकाग्रचित्त होकर एक बाबा को याद करना है। जब एक बाबा की याद में रहते हैं तो स्वदर्शन चक्र फिराना आसान होता है। स्वदर्शन चक्र फिराते हैं तो 'नथिंग न्यू' लगता है। यह विघ्नों को विनाश करने वा अपनी स्थिति को अचल-अडोल बनाने का अच्छा साधन है। नथिंग न्यू हमको कम बोलने की ट्रेनिंग देता है। इससे हमारा टेम्पर हाई नहीं होगा, नाराज़ नहीं होंगे, गुस्सा भी नहीं होंगे। यह पाठ स्वदर्शन चक्र फिराने में मदद करता है, स्वदर्शन चक्र फिराने से जानते हैं जो हुआ अच्छा हुआ, जो होगा अच्छा होगा। क्यों क्या का क्वेश्चन नहीं उठता। क्यों उठाते तो कोई उसका उत्तर नहीं है अन्दर से यही हमारे प्रश्न का उत्तर है जो ड्रामा में हुआ सो ठीक हुआ। ड्रामा की नॉलेज ने हमको निश्चिन्त रहना और निश्चित भावी पर अटल रहना सिखाया है। अगर क्वेश्चन को समाप्त करना है, गुलाब का फूल बनना है। तो कांटों में रहते हमें न्यारा-प्यारा रहना है, सुगन्ध फैलानी है, अच्छाई धारण करनी है, मोती चुगना है, दूध और पानी को अलग कर देना है। मिक्स करना बड़ी बात नहीं है। लोभ वश, मोह वश मिक्स कर लेते हैं। परन्तु हंस में इतनी शक्ति होती है जो अपने काम की चीज़ ले लेता है, काम की नहीं है तो छोड़ देता है। ऐसे जब तक हम हंस मिसल नहीं बने हैं तब तक परखने वा निर्णय करने की शक्ति नहीं आ सकती है।
स्वदर्शन चक्र फिराना हम राजयोगियों के लिए बहुत जरूरी है। हंस वही बनेगा जिसका ज्ञान खज़ाने से प्यार होगा। ज्ञान हमको अमृत जैसा मीठा लगता है। जितना अमृत पियेंगे शीतल बनते जायेंगे। ज्ञान की वैल्यु का पता चलता जायेगा, ज्ञान हमें कौड़ी से बदलकर हीरे जैसा बनाता है। बाबा ने हम सबके सिर पर ज्ञान का कलश रखा है तो हम अमृत पियें और पिलायें। ऐसे हम रॉयल योगी राजयोगी हैं। हमारे अन्दर कितनी खुशी है जो हम परमात्मा को अपना मात-पिता, सखा-स्वामी समझते हैं। साथ-साथ अमृत पीकर हम पावन बनते और पावन बनाने की सेवा भी करते हैं।
बाबा ने हमारी सब मनोकामनायें पूरी की हैं। अभी हम जगदम्बा माँ के साथ कल्प वृक्ष के नीचे बैठ तपस्या कर रहे हैं। तो सबकी मनोकामनायें पूरी करनी हैं। लेकिन सर्व की मनोकामनायें पूर्ण करने के लिए बुद्धि बेहद की चाहिए। जैसा बाप वैसे बच्चे तो यह भी खुशी की बात है।
दूसरों को समझने के लिए अपना दिल सदा खुला रखो, किसी के प्रभाव में न आकर राइट बात को समझ लो
जब सुख इलाही कहते हैं तो एक इलाही माना अनगिनत, दूसरा अल्लाह के तरफ से मिलने वाला सुख। अल्लाह जितना सुख देता है उतना कोई दे नहीं सकता है। हम उसका वर्णन नहीं कर सकते हैं। बाबा का बनने से कितना सुख मिला है, कभी बैठ कर गिनती करें तो दुःख की बातें सहज ही भूल जाती हैं।
बाबा कहते हैं - जब माया की हलचल मचाने वाली बात आये तो अंगद को याद करो। अंगद से अचल रहना सीखते हैं। माया का काम ही है हलचल में लाना। किसी न किसी के जरिये माया हलचल में ले आयेगी। दोष उसको नहीं दे सकते। माया किसी को भी निमित्त बनाकर हमें परखती है। उसके लिए बाबा हमेशा कहते – बच्चे, हनुमान की तरह महावीर बनो। महावीर हैं तो माया कितना भी पांव हिलाने की कोशिश करे लेकिन हिला नहीं सकती। हमारी स्थिति हिल नहीं सकती। तो सदा ही संगमयुगी पुरुषार्थी जीवन में हमें महावीर बनकर रहना है। जैसे वो डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ते हैं, तो जब तक पास न हो जायें, छोड़ते नहीं। हम भी नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने के लिए पढ़ रहे हैं। जब तक वह लक्षण नहीं आयेंगे तब तक पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे। सदा लक्ष्य की स्मृति लक्ष्यदाता की स्मृति को मजबूत बनाती है। इसलिए बाबा ने कहा कि इस पुरानी दुनिया में हमारी कोई आसक्ति न हो। जब पहले-पहले हम लोग ज्ञान में आये थे तो 'आसक्ति' और 'अनासक्ति' - यह दो शब्द बहुत अच्छे लगते थे। हम चेक करते थे हमारी वृत्ति कहाँ तक अनासक्त है? जिसको बाबा दूसरे शब्दों में कहते हैं - इच्छा मात्रम अविद्या। इच्छा की कोई विद्या ही नहीं है। इच्छा की इतनी अविद्या हो जाये नहीं तो तो इंसान कहेंगे - इच्छा के के बिना कैसे चल सकते हैं ? लेकिन सांसारिक पदार्थों की, व्यक्तियों के द्वारा प्राप्तियों की अविद्या हो जाये। जब दुनिया पराई है तो उनके द्वारा प्राप्ति की इच्छा रखना माना कम समझ है। जिस कारण ज्ञान को धारण नहीं कर सकते हैं। पुरानी दुनिया में आसक्ति है तो इन आंखों के द्वारा कुछ देख लेंगे, कानों द्वारा कुछ सुन लेंगे, मुख के द्वारा कोई ऐसी बात बोल देंगे या खा लेंगे। खाने-पीने की इच्छा होती है तो परहेज़ वा मर्यादा तोड़ देते हैं। बोलने में भी कभी न कभी नाराज़गी से उल्टा-सुल्टा किसी को बोल देंगे। जैसे खाने की परहेज़ है, वैसे बोलने की परहेज़ है। सम्भलकर बोलो। ऐसे ही दृष्टि का आधार वृत्ति पर है। हमारी वृत्ति साफ है तो दृष्टि से पता चलता है। जो शब्दों द्वारा हम किसी को नहीं कह सकते, कोई हमारे भाव को नहीं समझता लेकिन वृत्ति साफ है तो जो हमारा भाव है सेवा में किसी का भला करने की भावना है, वो काम करेगी। शुभ भावना से सेवा की हॉबी को बढ़ाओ। बोल के बजाए अपनी भावना को श्रेष्ठ बनाओ, अच्छा बनाओ। इससे हमारी वृत्ति-दृष्टि साफ होती जायेगी। अपने आपको अच्छा लगेगा।
ईश्वरीय परिवार से भी निभाने का तरीका चाहिए। जल्दी अपसेट न हो। प्रवृत्ति वालों को भी अपने परिवार को सम्भालना पड़ता है। निभाना कोई लाचारी नहीं है। सच्चाई से निभाना है, अच्छी भावना से निभाना है। ताकि दूसरों की दिल भी अपने आप भावना से बदल जाये। बाबा कहते हैं- किसी का कितना भी कड़ा कर्मबन्धन हो, अपने आप टूट जायेगा। कर्मबन्धनों को जबरदस्ती नहीं तोड़ सकते। प्रेम की शक्ति कर्मबन्धनों को पिघलाती जायेगी। बाबा के याद की, सेवा की और निश्चय की कमाल ऐसी भी घड़ी आयेगी जो कोई भी कर्मबन्धन नहीं रहेगा। बाबा से सम्बन्ध इतना अच्छा बनाते जायें, फिर अन्दर से आवाज़ ही नहीं निकलेगी कि मेरा कोई कर्मबन्धन है। कर्मबन्धन दुखी नहीं कर सकता है। हम निभाने मात्र बैठे हैं। अन्दर से बाबा के सम्बन्ध की शक्ति है, जो चला रही है, निभाने में मदद कर रही है। जिसके साथ निभा रहे हैं वो भी हमारे से सन्तुष्ट हैं। एक बाबा के सम्बन्ध की शक्ति से, दूसरा अपने फाउन्डेशन को ड्रामा के आधार से मजबूत बना लें। हमारे सामने सतयुगी दुनिया के नजारे आ रहे हैं। कलियुगी दुनिया से कोई लगाव नहीं है। ये चेकिंग करो कि पुरानी दुनिया की कोई भी आकर्षण न हो। समय अनुसार कैसी भी बात आ जाये परन्तु अपनी नींव मजबूत रखनी है। तो उस समय वह बहुतकाल का फाउन्डेशन जो मजबूत किया है, वह साथ देगा। बड़ी बात नहीं है। इसलिए एक तो बाबा से मेरा सम्बन्ध ऐसा हो जो और कोई सम्बन्ध की जरूरत ही न पड़े, खींच न हो। माता, पिता, सखा... सब संबंधों का सुख बाबा से मिलता है। दूसरा अपना फाउन्डेशन मजबूत बनाने की भी हॉबी है। बाबा भी तब ही मदद करता है जब हम भी अपनी स्थिति को अचल-अडोल बनाते हैं। आप समान नहीं बनाते तो खुशी कहाँ से होगी। आप समान बनाने के लिए भी धीरज चाहिए। किसी को अच्छी तरह से समझाना है। जब तक पूरी समझ नहीं है तो सहयोग नहीं दे सकते हैं। हरेक को पूरा समझने की कोशिश करनी है। खुद को समझाने की कोशिश करनी है। दूसरों को मैं समझूं उसके लिए धीरज चाहिए। दूसरों को समझने के लिए अपने दिल को खुला रखें ताकि दूसरे के भाव को अच्छी तरह समझ सकें। प्रभाव में न आयें, अधूरा समझकर घृणा में न आयें। सुनी-सुनाई बात भी बुद्धि को बन्द कर देती है। इसके प्रभाव में भी न आयें। पूरी समझ सहयोग देने के लिये तैयार रहती है। मनहूस नहीं बनना चाहिए। बाबा ने इतनी पालना दी है, छोटी बुद्धि और मोटी बुद्धि वालों को भी बाबा ने महीन बुद्धि विशाल बुद्धि बनाया है। तो हम भी दूसरी आत्माओं को ऐसा बनायें। रहम और स्नेह, दानी बनाता है। दानी शब्द 'भी क्यों कहें। हमारा परिवार है। अटूट स्नेह जैसे हम बाबा से ले रहे हैं वैसे सबको मिलता रहे – यह भावना नेचुरल हो।
इस बार हमारा आप सबके प्रति यह शुभ संकल्प है - अव्यक्त वर्ष ऐसी गहरी इन्वेन्शन निकालो जो स्वयं की और अपने हमजिन्स बहन भाइयों की ये सेवा करो जिससे मित्रता भाव दिखाई दे। कभी मित्रता में न कमी पड़े। एक से मित्रता, दूसरे से नहीं - यह भी कमी है। अपने साथ भी अच्छी मित्रता हो। कई तो अपने पर नाराज़ होकर सच्चा पुरुषार्थ करना छोड़ देते हैं। छोड़कर जायेंगे कहाँ ? पुरुषार्थ ढीला होगा तो स्थिति ढीली होती जायेगी। तो किसी भी हालत में अपने को नीचे नहीं उतारना है। अपने से प्यार करके अपने को ऊंचा उठाने का ध्यान रखना है। देही अभिमानी स्थिति से बाबा के नज़दीक जाकर बाबा से स्नेह की शक्ति खींचनी है। बाबा से इतनी शक्ति लो जो मास्टर सर्वशक्तिमान् बन जाओ। ज्ञान मार्ग में अपने निजी अनुभवों से दूसरों की सेवा करो। आजकल सर्विस की कमाल के दृश्य सुनाई पड़ रहे हैं। हरेक के मुख से बाबा बाबा निकलता है। हर आत्मा के अन्दर से 'ओम् शान्ति' और 'बाबा' – ये दो शब्द निकलने लगे हैं। ओम् शान्ति से शान्त हो जाते हैं। ज़िगर से बाबा निकले, जब इस गहराई में कोई जाता है तो उनको भी सुख मिलता है। बाबा ने मेरे अन्दर में जो दिया वह औरों के अन्दर चला जाए। दूसरों को अन्दर के सुख की बात सुनायेंगे तो उनके दिल से दुआयें निकलेंगी, जिसको बाबा जीयदान कहता है। उनको नई जीवन मिल जायेगी। जब कोई चिंता-फिक्र में होता है उस समय कोई उनको शान्ति देता है तो उसके मुख से निकलता है - इसने मुझे जीयदान दिया। दिन-रात हमारा दर खुला रहे। कंजूस न बनें। हम दुःखियों का दुःख अपने अच्छे वायब्रेशन से, वृत्ति से दूर करने वाले हैं। किसी हलचल से हम हिलें नहीं। रावण की दुनिया है। अनेक प्रकार के नजारे दिखाई पड़ेंगे। लेकिन हमारी नज़र में एक बाबा है। ऐसे सदा खुशी में नाचते रहो।
नम्रता और सहनशीलता का गुण धारण करो तो चित्त हर्षित और निर्मल हो जायेगा
मुरली सुनने के बाद अगर मुरली रिवाइज करते हैं तो हंस बनने की क्वालिटी वाली बुद्धि बन जाती है। जिसने अमृतवेले योग का रस पिया होगा उसका ही योग चलते-फिरते भी लग सकता है। उसे दिन भर याद रहेगा कि मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ। अभी हम जानते हैं कि भगवान् ने हमको कैसे पैदा किया, हम उसकी डायरेक्ट रचना हैं, हमको कितनी खुशी है। सिकीलधे हैं, लाडले हैं, कल्प पहले वाले हैं, बाबा ने कोने-कोने से ढूंढ कर हम बच्चों को अपना बनाया है। करोड़ों में कोई, लाखों में से एक। किसी भी खण्ड में, किसी भी जाति में चले गये थे। बाबा ने चुन कर निकाल लिया है। भारत वा विदेश में यह रिवाज है कि किसी का बच्चा गुम हो जाता है तो अखबार में देंगे। जो ढूंढ कर लायेगा उसको प्राइज़ देंगे। दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं रहा है जहां बाबा का बच्चा नहीं हो। निमित्त कोई भी बन जाता है। पहले इतने सारे देशों के नाम सुने थे लेकिन पता नहीं था कि हम इतने देशों में जायेंगे। जो बाबा के बच्चे गुम हो गये थे उनको ढूंढने के निमित्त गये। बाबा कहते हैं - और कुछ नहीं करो, सिर्फ बैठकर अच्छी तरह परिचय दो, पहचान दो। ब्राह्मण बनेंगे तो वर्से के अधिकारी स्वतः बनेंगे। ब्रह्मा का बच्चा बना माना ब्राह्मण बना। जो ब्राह्मण बना वो वर्से का अधिकारी बना। स्नेह सच्चाई सूक्ष्म है। भाई-भाई को क्या देगा ? देगा तो गिनती करके देगा, हद का देगा। बाबा क्या देगा ? बेहद का। हम भी बेहद बाबा से बेहद का वर्सा लेने के लिए बाबा के बने हैं। पूरा वर्सा लेंगे। अन्त तक ३३ करोड़ बच्चे चाहिए। वो कैसे बनेंगे ?
हम अंगुली से इशारा करके बाबा का परिचय देते चलें। और कोई बातों के झंझट में नहीं जायें। कोई पूछे सेवा कैसे करें बाबा एक्ट करके दिखाता था, अंधा भी सेवा कर सकता है, गूंगा भी सेवा कर सकता है। सिर्फ बुद्धियोग बाबा से हो और कुछ न बोलो, बुद्धि और बातों की उलझनों में न जाये। सिर्फ याद की मेहनत करो। उसमें सुस्ती या अलबेलापन नहीं चाहिए। थोड़ी भी सुस्ती, अलबेलापन या कोई भी प्रकार की उलझन बाबा को याद करने नही देगी। याद मुश्किल लगती है, समझदारी से याद को सहज कैसे बनायें ? याद को सहज बनाने के लिए अपने पर थोड़ा अटेन्शन रखो। 'मुश्किल' शब्द ब्राह्मणों की डिक्शनरी से निकल जाये। अन्दर से थोड़ा भी ऐसा न लगे कि यह मुश्किल है। नथिंग न्यू। जब नथिंग न्यू तो मुश्किल क्या है ? बाबा बैठा है, बाबा की याद मुश्किलों को हल करने की शक्ति दे रही है। एक छलांग मारकर पार हो जाओ। पत्थर तोड़ने की जरूरत नहीं है। तन-मन में किसी भी प्रकार की मेहनत है, मेहनत करने में दर्द होता है, सहज राजयोगी बनो। प्रवृत्ति में रहते न्यारे-प्यारे बनो। प्रवृत्ति सबके पास है। त्रिनेत्री-त्रिकालदर्शी हैं, तीनो लोकों को जानते हैं, घर जाने की तैयारी है, ब्राह्मण कुल में श्रेष्ठ बना है, ऐसा गुप्त पुरुषार्थ करो। देही अभिमानी स्थिति से श्रेष्ठ आत्मा बनो। देह अभिमान वा दिखावे से श्रेष्ठ नहीं बनेंगे। टाइटल मिलने से, इन्चार्ज बनने से श्रेष्ठ नहीं बनेंगे। फिर श्रेष्ठ कैसे बनेंगे ? बाबा का मीठा बच्चा बनने से, स्वदर्शन चक्रधारी बनने से, ब्राह्मण कुल मर्यादा पर चलने से श्रेष्ठ बनेंगे।
मर्यादा क्या कहती है? मर्यादा कहती है – तुम काम-क्रोध पर जीत प्राप्त करो। तीन प्रकार का गुस्सा होता है, एक सतोगुणी, एक रजोगुणी, एक तमोगुणी। गुस्से की तीन स्टेज है। कोई कहेगा – मैंने कुछ कहा थोड़ेही है मुख से नहीं कहा लेकिन मन से तो कहा। देहभान में आकर अपनी आंखों से तो कहा। चेहरा वा आंखें गुस्से को प्रत्यक्ष कर देती हैं। यह चेहरा आंखे और कान योगयुक्त होने से एक़दम प्यारे हो जाते हैं। शक्ल अच्छी हो जाती है। कमज़ोरी कोई भी होती है वह चेहरे पर आती है, चली जाती है तो चेहरा चमक जाता है। दिल से बाबा कहते ही चेहरा लाल हो जाता है। एक होता हैं योग से लाल, दूसरा होता है गुस्से से लाल। पता पड़ता है- योग से लाल है या गुस्से से लाल है। योग वाला लाल चेहरा प्यारा लगता है, गुस्से वाला लाल चेहरा डरा देता है। कई कहते हैं- मैंने कुछ इसको कहा नहीं परन्तु ये ऐसा क्यों हुआ। जरूर अन्दर से सूक्ष्म वायब्रेशन हैं। मन की बात नयनों पर आती है। दूसरा, गुस्सा वाचा में आ जाता है, न चाहते भी बहुत समय के बाद इकट्ठा होते-होते मन में, वाचा में आ जाता है। तीसरा गुस्सा होता है, हाथ चलाना। यदि हाथ नहीं चलायेंगे तो दरवाजा तोड़ देंगे, प्लेट तोड़ देंगे.. किसी पर हाथ नहीं चला सकेंगे तो जड़ वस्तुओं पर चलायेंगे। ऐसा गुस्सा करने बाले बहुत होते हैं। कई हैं जो पत्नि पर गुस्सा आयेगा तो बच्चे को थप्पड़ मार देंगे। गुस्सा आता है तो किसी पर भी निकाल देते हैं। किसके पास दो परसेन्ट भी गुस्सा है, तो उसे गुस्सा ही कहेंगे। दो से १० परसेन्ट, १० से १०० परसेन्ट होता चला जायेगा। थोड़ा भी किसी से नाराज होना, दुःखी होना, फ़ालतू सोचना, मुख चलाना गुस्सा है। ऐसे नहीं मैं बोलती थोड़ेही हूँ। नहीं, दिल से, प्यार से बोलो। खुद गुस्से में नहीं आओ, लेकिन दूसरों के गुस्से को भी अन्दर की शान्ति से निकालो। नम्रता का गुण, सहनशीलता का गुण हमारे अन्दर आयेगा तो हमारा चित्त भी निर्मल हो जायेगा।
हमको बाबा की या ड्रामा की स्मृति रखनी है, न कि बातों की ? बातों की स्मृति रखने से एकाग्रचित्त, हर्षितचित्त नहीं हो सकेंगे, हर्षितमुख नहीं हो सकेंगे। हर्षितमुख होने से हर्षित चित्त होंगे। जब नम्रता और सहनशीलता होगी तो हर्षितचित्त होंगे। जरा भी अभिमान होगा, सेन्सेटिव नेचर होगी तो निर्माणचित्त बन नहीं सकेंगे। इसलिए अच्छी तरह से बैठकर विचार सागर मंथन करो। जो बाबा सुनाता है, बैठ कर विचार सागर मंथन करो। नहीं तो फालतू पत्थर तोड़ेंगे जब फ़ालतू चिन्तन चलता है तो जैसे सिर को पत्थर मार रहा है। फिर आठ गोली लेने से भी सिरदर्द नहीं जाता, नींद की गोलियां लेकर सो जाओ दर्द जायेगा ही नहीं। अपने से पूछो दर्द क्यों बढ़ा -फ़ालतू सोचने से, पत्थर तोड़ने से। फिर समीपता का सुख नहीं भासता।
अपने आपसे पूछो – ब्राहमण बने हैं, तो क्या चाहिए? सच्चा ब्राह्मण बनकर बाबा के समीप, बड़ों के समीप आओ। मन में कोई भी खिटपिट न हो, शान्तचित्त और सरलचित्त बनने का प्रयत्न करो। चित्त माना स्मृति या याददाश्त। चित्त शान्त और सरल बनाने वाले बन जाओ। मुख को हर्षित बनाने की ट्रेनिंग दो। ईर्ष्या वश आवेश में आने वाला कभी सरल चित्त, शान्त चित्त, निर्माण चित्त नहीं बन सकता। अंश मात्र भी किसी के प्रति ईर्ष्या न रखो।
बाबा से बेहद का वर्सा लेना है तो सबसे गुण धारण करना सीखो। सबके गुण देखो, अवगुण मत देखो। फिर देखो सारा दिन कितना अच्छा जाता है, यह आंखें अवगुण देखने के लिए नहीं मिली हैं।
मधुबन से जाने के बाद यहां की स्थिति कैसे कायम रखें ? मधुबन माना मुरली, संगठन की शक्ति, वायुमण्डल की शक्ति - जहाँ भी हम रहें यह सदा ही हमारे साथ रहे, तो शक्ति बढ़ती जायेगी। मधुबन से पाई हुई शक्ति को यूज़ नहीं करेंगे, दूसरी बातों में चले जायेंगे तो जैसे थे वैसे ही हो जायेंगे, पुराने संस्कारों वाले बन जायेंगे। क्या वही रहना है? नहीं, अन्दर ही अन्दर प्रतिज्ञा करना है, जो १० दिन पहले थे या १० साल पहले थे वो नहीं रहना है, कल्प पहले वाले बनना है। बाबा जैसा बनाना चाहता है वैसा सदा के लिए बनकर जाना है। ऐसी अपने से बातें करो, अपने से रुहरिहान करो, बाबा हमको सदा ऐसा मीठा बनाकर रखना, बाबा कितनी शिक्षा देता है, रक्षा भी करता है। ऐसा लगता है जैसे बाप की छत्रछाया में बैठे हैं। हमको कुछ नहीं हो सकता है। भय भी नहीं है, कई डरते हैं – पता नहीं क्या होगा !
हमें ब्राह्मण कुल भूषण स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। बाबा कहता है - यह पहेली है, पहेली जो हल करता है उसको बड़ी अच्छी मार्क्स मिलती हैं। जो इसकी गहराई में जायेगा, पहेली का हल निकालेगा उसको मार्क्स मिलेगी। कई समझते हैं कि इसका हल ही नहीं है। बाबा से वर्सा लेने वाली, स्वदर्शन चक्रधारी मैं ऑर्डनरी आत्मा नहीं हूँ। बाबा ने कहाँ-कहाँ से चुनकर मुझको अपना बनाया है। किस विशेषता से मैं विशेष बन सकती हूँ - यह -विचार करो। जो विशेषता न हो वह कैसे अपने में लायें, जो बाबा के दिल पर बैठ जायें, ऐसे बैठें जो कोई उतार ही न सके। इसके लिए गुप्त, सहज, सच्चा, निरन्तर पुरुषार्थ करो। आज अच्छा, कल ढीला ऐसा नहीं।
हम कितने भाग्यवान हैं, हमारे ऊपर बापदादा, मात-पिता, टीचर सब राज़ी हैं। सब सम्बन्ध से राज़ी हैं। जब हम नाराज़ नहीं होते हैं तब राज़ी रहते हैं। नाराज़ होने वाली क्वालिटी पर बाबा कभी राज़ी नहीं होते हैं। हम नाराज़ शक्ल लेकर बाबा के पास नहीं जायें। कई सोचते हैं हम रोते हैं तो कोई आंसू पोंछने वाला नहीं है, बाबा भी नहीं पोंछेगा। हम भगवान् की सजनी हैं। कोई आंसू गिराता हुआ बाबा के पास आयेगा तो बाबा कभी आंसू नहीं पोंछेगा। बाबा मुंह फेर लेगा। तुम किसके बच्चे हो ? बाबा हमको रॉयल बनाता है। हमारे में ऐसी कोई क्वालिटी न हो जो शान से बाहर हो जायें। रॉयल्टी हो, हम राजयोगी राजऋषि हैं। शान्त, शीतल, हर्षितचित्त रहने वाले सर्वोत्तम ब्राहमण कुल भूषण हैं। बाबा को क्या रिटर्न दें? सदा हल्के-फुल्के हो नाचते रहें, यही रिटर्न है।
सच्चे बाबा के साथ सच्चे होकर रहो तो बाबा रक्षा करता रहेगा, दुआओं से भण्डारा भरपूर होता जायेगा
ओम शान्ति। अनुभव कहता है कि 'बाबा' शब्द हर एक दिल से कहता है। हम बाबा का बालक बनने से मालिक हो गये हैं। जन्मते ही बच्चा बाप की प्रॉपर्टी का मालिक माना जाता है, भले प्रापर्टी हाथों में तब आती है जन लायक बनता है। परन्तु जन्मते ही अधिकारी माना जाता है। ऐसे ही हम ईश्वर के बच्चे हैं, तो सुख-शान्ति पर हमारा अधिकार है। लोग तो सुख-शान्ति के लिए भटकते हैं लेकिन हमारा अधिकार है इसलिए सदा के लिए भटकना बंद हो गया है। अभी बुद्धि कहीं भी भटकनी नहीं चाहिए एक तो जिसके माँ-बाप न हों उसे अनाथ कहा जाता है और जिसे अपना घर न हो उसे बेघर कहा जाता है। उन्हें देखकर तरस आता है। लेकिन हमें तो अन्दर से अपरमअपार खुशी है क्योंकि पारलौकिक बाप ने हमारा अलौकिक जीवन इस अलौकिक बाप द्वारा बना दिया है। तो अपने जीवन को देख खुशी का पारा चढ़ जाता है।
विवेक कहता है – ब्राह्मण की आंखों से कभी आंसू नहीं आने चाहिए। क्षत्रिय रो सकते हैं क्योंकि ख्याल चलता है कहीं हार न जाऊं, वैश्य चिंता के कारण रोते हैं, शूद्रों के तो कर्म ही ऐसे हैं। लेकिन ब्रह्मा मुख वंशावली का मुख तो सदा हर्षित रहना चाहिए। प्रेम के भी आंसू नहीं आने चाहिये प्रेम-स्वरूप, आनंद-स्वरूप बन जाओ, आंसू क्यों आयें। बाप मिला, सब-कुछ मिला तो वह स्वरूप आ जाये। जब स्वरूप में आ जाते तो नयन देवताओं जैसे होते हैं। हमारा पुरुषार्थ बताता है- हम सतयुगी सचखण्ड के मालिक बनने वाले हैं। हमारे सत-कर्म ही हमको सुखी बना रहे हैं। किये हुए पाप नष्ट होने से अन्दर से विजयी बनने के संस्कार हमको सुखी बना रहे हैं, दुःख तो आ नहीं सकता है।
वर्तमान समय ब्राह्मणों को और कोई दुःख नहीं होता है। शरीर का दुःख भी सहन कर लेते हैं, पुरानी दुनिया की आकर्षण भी नहीं होती है। कोई व्यक्ति की तरफ भी आकर्षण नहीं होता क्योंकि देख लिया है सब धोखेबाज हैं। बाकी दुःख होता है संस्कारों के टक्कर का। लोभ-मोह वश पाप करने से या किसी भी पुरानी आदत वश जो दुःखी होते थे उस दुःख से तो छूट गये, तो वर्तमान समय और कोई दुःख नहीं लेकिन संस्कारों की जो आपसी टक्कर होती है, उसका बहुत दुःख है। इस दुःख से कैसे छूटें? इसके लिए बाबा ने समझ दी है - बच्चे, ड्रामा में हर आत्मा का अपना पार्ट है यह ज्ञान बुद्धि से मिस न हो। जैसे नाटक में एक्टर फिक्स होते हैं, एक भी एक्टर मिस नहीं हो सकता है, हर एक को आना ही है - ऐसे यह अनादि बना बनाया ड्रामा है, हर आत्मा का अपना पार्ट है, एक का दूसरे से नहीं मिल सकता। यह समझ आई है। तो हम किसी से किसी की तुलना नहीं कर सकते क्योंकि एक का दूसरे जैसा पार्ट हो नहीं सकता तो फिर टक्कर किस बात की ? विचार करो। आज से हमारे अन्दर कभी दुःख अंशमात्र भी न आये। उसकी अच्छी तरह से इन्वेन्शन निकालो। अपना तो क्या, दूसरों के दुःखी होने की नेचर को भी खत्म कर दो। क्यों-क्या का क्वेश्चन दुःखी करता है। ड्रामा को जानने वाला कभी दुःखी हो नहीं सकता है। लोग तो किसी भी दर्दनाक सीन को देखकर दुःखी होते हैं। हम दुःखी नहीं होते हैं, हमें दया आती है कि उन्हें योगदान, शान्ति का दान दें। दुःखी होंगे तो नहीं दे सकेंगे। संसार में रोज नई-नई बातें होती हैं। हमारी ड्यूटी है सबको योगदान, शान्तिदान देना। अगर हम खुद ही रोयेंगे, पीटेंगे तो अपनी इस डयूटी को सम्भाल नहीं सकेंगे। हमारी उदासी को देख दूसरे कहेंगे तुम उदास क्यों हुई हो ? यह अच्छी बात नहीं है। तो किसी प्रकार से भी हमारी कोई निंदा करता, हमारे पर कॉमेन्ट करता, कोई कुछ करता है-ओके कोई बात नहीं।
कोई वीकनेस है तो उसे अच्छी तरह से ध्यान देकर प्यार से खत्म कर दो। दूसरे की कोई बात सीरियस होकर नहीं उठाओ, नहीं तो स्नेह छूट जायेगा। स्नेह छूटता है तो बात पक्की हो जाती है। आज के जमाने अनुसार अपना गुप्त पुरुषार्थ ऐसा हो जो कितनी भी बड़ी बात हो, वह बदल जाये। ज्ञान मार्ग कहता है - बाबा की मिली हुई नॉलेज को यूज़ करके गम्भीर सयाने बनो। बचपन वा जवानी के संस्कार न हो। बचपन वा जवानी में फीलिंग जल्दी आ जाती है। देही अभिमानी स्थिति बैड फीलिंग लाने नहीं देती है। देह अभिमान है तो कोई भी बात दिल वा दिमाग को लग जाती है। देही अभिमानी रहो तो बाबा की याद रहेगी। बाबा कहेगा - बच्ची, ड्रामा नथिंगन्यू। बच्ची, बाप के समान हर बात में पास होकर पास विद ऑनर बनो। कोई भी बात है देही अभिमानी होने की प्रैक्टिस करो। क्यों-क्या का प्रश्न नहीं उठाओ। हमारा अटेन्शन खिंचवाने के लिए यह बातें आनी ही है।
जैसे विष्णु कम्बाइन्ड है ऐसे हम बाबा के साथ कम्बाइन्ड रहें तब हमारे में चारों अलंकार आते हैं। शंख भी, स्वदर्शन चक्र भी, गदा (ज्ञान की पराकाष्ठा) भी, कमल फूल समान न्यारा-प्यारा भी। यह बाबा के साथ कम्बाइन्ड रहने से ही होगा। ज्ञान की गदा साथ है तो उसके सामने कोई कमजोरी ठहर नहीं सकती है। राजाओं को गदा हाथ में देते हैं। हम राजयोगी हैं, ब्राह्मण कुल भूषण हैं। तो सब अलंकार यूज़ करने हैं। कोई भी अलंकार कम है तो भय लगता है। अलंकार के बिना जैसे दूसरा हमारे ऊपर अटैक करता है, डर लगता है। साथ-साथ बाबा ने शंखध्वनि बजाने का इतना काम दिया है, कि सेवा में बिजी रहो तो और कोई टाइम ही नहीं है। पहले अपने को भँ-भू करो, अपने को सजाओ।
कइयों को श्रृंगार का बहुत शौक होता है। बड़ी अच्छी तरह से श्रृंगार करेंगे। अब वह टाइम बच गया है, बैठकर अपना यह श्रृंगार करो, कितने बड़े बाबा के हम बच्चे हैं तो कितना अच्छा श्रृंगार चाहिए। हमारे श्रंगार में कोई भी कमी न हो। कई होते हैं कंघा आइना साथ रखते हैं ऐसे उठाया देख लिया। तो कभी अपना श्रृंगार बिगड़ा हुआ न हो। अगर बाबा कम्बाइन्ड है तो चेहरे से बाबा दिखाई देगा। हम भी शोभनिक दिखाई देंगे। अगर हमारा चेहरा बिगड़ा होगा तो बाबा अलग हो जायेगा, कहेगा - पहले तू अपना मुंह ठीक कर। बाबा हमें नम्बरवार सब अलंकार देता है। बाबा ने हमको रास्ता दिखाया है तब बी.के. बने हैं। देवता बनने के लिए ब्राह्मण बने हैं। बाबा के साथ जाने के लिए विकर्माजीत, कर्मातीत बनने के लिए बी. के. बने हैं। अब इच्छा क्या रही है ? बस, सम्पूर्ण बन जायें, कोई कमी हमारे में न रहे। हमको पता है सतयुग में सुख-शान्ति-सम्पत्ति सब कुछ होगा, गैरन्टी है। सच्चे दिल से बाप के बने हैं, सच्चा रास्ता मिला है इसलिए वहाँ की बादशाही के हम मालिक हैं। झूठ को छोड़ दिया इसलिए फ्री हो गये।
सच्चे बाबा के साथ सच्चा रहो। सच्चा रहने में बहुत सुख है। और कोई भी अक्ल भले न हो लेकिन एक बाबा के साथ सिर्फ सच्चा रहो तो सदा सुखी रहेंगे। दुआओं का भण्डार बाबा खोलकर दे देता है। सदा सच्चे रहो तो खुशी में नाचते रहेंगे। अच्छे सुन्दर-सुन्दर दृश्य दिखाई पड़ेंगे। सतयुगी नज़ारे हमारे सामने आयेंगे। बाबा हमेशा रक्षक महसूस होगा। हम सच्चे हैं तो बाबा रक्षा करता है। तो चाहे और कुछ भी नहीं जानते हों, बाबा से सिर्फ सच्चे रहो। लम्बी-चौड़ी बातें नहीं करो। जो बात जितनी है बस उतनी सुना दो।
तो सदा नशा रहे कि शान्तिधाम और सुखधाम - दोनों ही घरों की चाबी हमारे हाथ में है। सबको वहाँ चलने की ऑफर करते रहो। और कुछ बुद्धि मैं न आये। ऐसी स्थिति बनाने वाला कभी रो नहीं सकता। मधुबन में सदा के लिए रोने का त्याग कर दो। अपने आपको सेकण्ड में समझाकर मुस्करात हुए चेहरे से बात को हल्का कर दो, कुछ नहीं है। किसी को देखते हैं कि यह गुस्सा कर रहा है, तो उसके सामने मुस्कराने के बजाए किनारा कर लो। अन्दर से दुःख न करके जब वह ठण्डा हो जाये तब सामने आओ।डरो नहीं, बेबी थोड़ेही हो।
हमारे ही चरित्रों का गायन है। भागवत है ही चरित्रों का, सदा उसी खुशी मस्ती में रहने का ही चरित्रों के रूप में गायन है। महावीर बनते हैं तो हर बात में पास हो सकते हैं, सीता समान बनते हैं तो सीता माना रोना। महावीर माना एवररेडी, हल्का औरों को मैसेज देकर रास्ता दिखाने वाला। कभी हम राम से अलग नहीं हो सकते। कभी किसी चीज़ का आकर्षण खींच नहीं सकता जो रोना पड़े। व्यक्ति, वैभव की आकर्षण रुलाती है। जो अनासक्त है, जो परमात्मा के प्यार में खोया हुआ है, उसके सुख की महसूसता दूसरों को भी सुख देती है। सुख, शान्ति, प्रेम, शक्ति – चारों से आनंद-स्वरूप की स्थिति स्वतः बन जाती है, तो हमको अभी आनंदमय स्थिति में रहना है - उससे बड़ा मज़ा आयेगा। वह स्थिति सब बातों में हल्का वा सहज कर देती है। सदा अपनी स्थिति जमाने की हॉबी रखो। अच्छा !
साक्षात्कार मूर्ति बनना है तो कथनी कम, करनी ज्यादा हो, पहले करनी फिर कथनी
मुरली सुनते हम बाबा को याद करते हैं या प्यार करते हैं। बाबा का कितना हम बच्चों के साथ प्यार है समय पर जो जरूरत है वह बाबा देता है। जब अपने आप हमें जिस चीज़ की जरूरत है वह देता है तो कितना थैंक्स मानें। थैंक्स कैसे मानें ? जो बाबा कहता है वह करके दिखायें। शुक्रिया बोलने के बजाए करके दिखाने में बहुत आनंद अनुभव होता है। बाबा हमको ऐसी लगन में देख गुप्त मदद बहुत करेगा। क्योंकि आदि से लेकर बाबा ने हम बच्चों को ऐसी पालना दी है। जन्म तो दिया ही है पर पालना भी दी है। पालना का महावाक्य सुनते वह घड़ी याद आने लगी जब बाबा अव्यक्त हुआ तो मेरी दिल छोटी हो गई थी। क्योंकि साकार में बाबा के सामने जब आती थी तो बाबा हमको नई बात सुनाता था। मुझे खुशी होती थी। बाबा मेरे ऊपर अधिकार रखता था। कहता था बच्ची यह करेंगी ! तो हमें खुशी होती थी. हां बाबा करेंगी। बाबा का मेरे ऊपर राइट (अधिकार) है। तो उसमें कान पकड़े चाहे दिमाग पकड़े परन्तु बाबा का राइट है। बाबा ने कान पकड़कर कान खोल दिया है। कई कहते हैं मैं तुमसे डरती हूँ, लेकिन डरना क्यों ? डरता कमज़ोर है। बाबा से मैं कभी डरी नहीं। इंसान से डरी हैं। इंसान से डर रहता कि यह नाराज न हो जाए। परन्तु उसमें भी अभी निडर है क्योंकि सच्ची बात करो, न डरो न किसको डराओ। न कोई मेरे से डरे, न मैं किससे डरूं इतनी युक्ति से बाबा ने पालना दी है। तो हमें क्वेश्चन उठा था ऐसे कौन कहेगा जनक... ऐसे सोचते दिल छोटी होती थी। तो अव्यक्त बाबा अपने कमरे में बैठा था, बाबा ने कहा बच्ची जो पालना ली है वह देनी होगी। पढ़ाई के साथ पालना मिली है। तभी पढ़ाई दिमाग में बैठी है। तभी धारणा करने की शक्ति आई है। तो यह ध्यान पर रखना होगा, अलौकिक दिव्य जन्म बाप ने दे करके शिक्षा के साथ पालना दी है। शिक्षा में पालना, पालना में शिक्षा। पालना ने शिक्षा दी है ऐसे ऐसे चल, ऐसे ऐसे बोल। जिससे सबको लगे मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, ईश्वर ऐसे पालनहार हैं। पालना की शक्ति से मम्मा जगदम्बा बन गई। शिव बाप है उसने हमको पालना की शक्ति दी है। ज्ञान से, प्रेम से शक्ति दी है। समझदार बनाकर शक्ति दी है। सदा अपने को ईश्वरीय पालना में रखो। मैं किसी को पालना देने वाली हूँ यह ख्याल आया तो मैं-पन का अभिमान हो जायेगा। मुझे पालना देनी है तो भारीपन हो जायेगा। पालना है ही लाइट बनाकर माइट देने की।
पालना कैसे मिली है ? हमको लाइट बनाया है। लाइट बनते तो माइट मिलती है। लाइट तब बनते हैं जब अन्दर बिल्कुल साफ हैं। पालना कहती है, माफ रहो। नियत साफ तो मुराद हासिल इस शब्द का अर्थ बहुत बड़ा है। नियत साफ माना वृत्ति में बिल्कुल सफाई। तो जो संकल्प करेंगे, सफलता होगी। यह प्रैक्टिकली जीवन यात्रा में बहुत अच्छा अनुभव होता। यदि जीवन में ईश्वरीय पालना का अनुभव करना हो तो जरा भी नियत में खोटापन न हो। नियत साफ रखो तो परुषार्थ वा सेवा में सफलता मिलेगी। भगवान का कारोबार काम चलाऊ नहीं है। ऐसे नहीं किसने देखा ! छोटी-छोटी बात क्यों उठाते हो। बाबा ने कहा है बच्चे यह ईश्वरीय कारोबार है। उसमें ऐसे नहीं चल सकता। ऊपर चढ़ने के लिए सावधानी की सीढ़ी है। क़दम-क़दम पर बाप का हाथ भी है, साथ भी है। हाथ में हाथ है तो आराम से जा रहे हैं। साथ भी है। कभी यह अभिमान न आये मैं आपेही जा सकती हूँ। नहीं। बाबा लिये जा रहा है। बिगर पूछे आगे नहीं जा सकती हूँ। ऐसे नहीं क्या जरूरत है पूछने की। अभिमान अन्दर घुस जाता है तो मज़ा निकल जाता है। फिर ऊपर चढ़ने के बजाए या तो रुक जाता है या नीचे उतर जाता है उसको पता नहीं चलता है। पता चलना चाहिए मैं आगे बढ़ रहीं हूँ या रुकी हुई हूँ या उतर रही हूँ ? बाबा के साथ गहरा संबंध है। समीपता आगे बढ़ाती है। सदा अन्दर से महसूस हो। इतनी दूरी भी बाबा से न हो। नहीं तो पांव फिसलने में देरी नहीं होगी। ऊपर ले जाने वाला एक है, नीचे उतारने वाली अनेक बाते हैं। बाबा जो कहता है वह स्थिति बनाओ तो उसमें बाबा मदद देगा। बाबा की इच्छा है बच्चे साक्षात् मेरे समान बनें तब साक्षात्कार मूर्त बनेंगे।
बाबा ने आज स्पष्ट समझाया है सिर्फ भाषण करने से थोड़े समय के लिए खुश होंगे परन्तु अन्दर का अनुभव कभी भूलेगा नहीं, वह अनुभव सुख का, शान्ति का, सच्चे प्रेम का, ऐसा हो जो मीठी दृष्टि के द्वारा अन्दर की वृत्ति के द्वारा, भावना के द्वारा उनके अन्दर आये कि इनकी भावना कितनी अच्छी है। ऐसे नहीं अब तो सब सहज है। आराम से सेन्टर पर रहते हैं अभी कोई विघ्न नहीं, इसमें खुश हो जायें। सिर्फ सहज हो गया नहीं, श्रेष्ठ हो। श्रेष्ठ योगी किसको कहा जाता है यह ध्यान रखो। जब तक महातपस्वी नहीं बने हैं तब तक साक्षात्कार मूर्त नहीं बन सकते हैं। इतना ऊंचे ते ऊंचा बाप, उसने हमको इतना ऊंचा उठाया है।
आज बाबा ने अनन्य का अर्थ बताया- अनन्य माना जो अन्य काम न करें वह तुम करो। आगे बाबा कहता था यह मेरा अनन्य बच्चा है माना इसका अन्य कोई नहीं। आज कहा काम ऐसा करो जो कोई न करे। किसी को न देखो। तो साक्षात्कार मूर्त बनने के लिए बाप-दादा और आप तीनों इकट्ठे रहो। साक्षात् बाप समान बनना है तो आप में बापदादा सदैव दिखाई पड़े। हर कर्म में, हर संकल्प में, हर श्वास में और हमारे संस्कारों में जो बापदादा के संस्कार हैं वह दिखाई दें। क्योंकि दोनों से ही हम वर्सा ले रहे हैं। भले ब्रह्मा बाबा कहता वर्सा शिवबाबा से मिलता है, मैं नहीं देता। यदि आपके बच्चे न बनते तो क्या वह देता ? बाबा हमसे ठगी करता है ना। उनसे वर्सा कैसे लेंगे? अगर ब्रह्मा के बच्चे सच्चे ब्राह्मण न बनें तो शिवबाबा वर्सा देगा क्या ? इनसे पूछेगा ना इसको वर्सा दूं ? जिसने एडाप्ट किया है मां की तरह बाप की तरह से पालना दी है। बाप टीचर सतगुरु तीनों रूप इसमें देखा है। तो लायक कहाँ से बनेंगे ? लायक बनने का वर्सा कहाँ से मिला है ? बाबा पालना देकर लायक बना रहा है। आजकल की माँ के माफिक नहीं, जन्म एक मां देती है, पालना दूसरी देती है। हमारी वही मां जन्म देती, वही पालना देती। ऐसी पालना जो हमको मिल रही है वह पालना ही हमको पढ़ाई से समझदार बना रही है, साथ-साथ धारणा की मूर्ति बना रही है। मूर्ति बनने के लिए कथनी कम करनी ज्यादा। पहले करनी फिर कथनी। कथनी की आवश्यकता नहीं है, करनी की आवश्यकता है। जो पहले नहीं किया है वह अब करेंगे। अभी बाबा क्या चाहता है, वह करके दिखायें। क्योंकि संगमयुग की घड़ी बहुत फास्ट जा रही हैं, नेचुरल कैलेमिटीज़, एटॉमिक वार, सिविलवार तीनों इकट्ठे चल रहे हैं और हम क्या कर रहे हैं? हम साक्षात्कार मूर्ति बनने की सेवा करें। अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? सतयुग में तो नहीं करेंगे। बाबा ने हाथ-साथ दिया है तो उसका स्वरूप हम बनेंगे। हम बनेंगे तो अनेक आत्माओं का भला होगा।
समीप आयेंगे तो सुखी रहेंगे। हर आत्मा बाबा के समीप आये, ईश्वर का प्यार पालना लेकर करेन्ट ले करके आत्मा कंचन बन जाये। जल्दी समीप आये संग में आये यही उमंग रहे, ऐसे अपने संग से पालना देनी है।
समय गँवाने की आदत छोड़ अच्छा पुरुषार्थ करना ही अपने ऊपर कृपा करना है
अन्दर मन में बाबा के शुक्रिया का गीत सदा बजता रहे। मुख से गीत गाना डिफीकल्ट है। उसमें साज़ चाहिए तर्ज़ चाहिए। वह भी किसको अच्छा लगेगा, किसको नहीं। लेकिन मन का गीत सच्ची भावना से गाते हैं, तो बाबा को यह गीत बहुत अच्छे लगते हैं। बाबा कहते हैं तुम बच्चे बाबा के मददगार बाबा तुम्हारा मददगार है। बाबा की मदद के बिना हम चल नहीं सकते, क़दम भी आगे उठा नहीं सकते। बाबा के साथ घर जाने के लिए मदद चाहिए। पुरानी दुनिया से, दुबन से निकालने के लिए भी बाबा ने मदद दी, गिरे हुओं को उठाया, हम निकलना नहीं चाहते थे, जबरदस्ती निकाला। बाबा ने जितनी मदद की है वह हम गिनती नहीं कर सकते हैं। लेकिन जितना हम याद में रहते हैं उतना बाबा के मददगार बन जाते हैं। याद से हम वायुमण्डल अच्छा बना सकते हैं तो दूसरों को मदद नेचुरल मिलती है। बाबा हमको घड़ी-घड़ी याद दिलाता है हम याद में रहकर औरों को याद दिलाने के निमित्त बन जायें। अभी हम ब्राह्मण बने हैं, देवता बनने के लिए। जब यह याद आता है हम परमधाम के निवासी थे, घर की याद पहले आई फिर स्वर्ग की याद आई देवता वर्ण की याद आई। घर जाने के लिए पावन बनना है क्योंकि पतित पावन बाबा आया है। पतित-पावन बाप का काम ही है पतितों को पावन बनाना। एक तो बाबा घर ले जाने के लिए पावन बना रहा है, फिर सर्वगुण सम्पन्न बना रहा है। जितना पावन बनते जा रहे है उतना बाबा के साथ जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। पतित बने तो पंख टूट गये, पावन बने तो उड़ने के लिए पंख आ गये। आत्मा हल्की हो गई। आत्मा जितनी पावन बनी उतनी लाइट बन रही है। पतित बनने से भारी हो गये थे। पतित पावन बाप की कमाल है जो हम आत्माओं को देही अभिमानी बना रहा है। देही अभिमानी बनने से लाइट बनेंगे। कूड़ा-कचरा निकल जायेगा। पावन बनेंगे तो सर्वगुण सम्पन्न बनेंगे। देवा गुण आयेंगे तो देवता कुल में जायेंगे। बाबा डबल काम कर रहा है। पावन भी बना रहा है तो गुण भी सिखा रहा है और इन कर्मन्द्रियों के द्वारा अच्छे कर्म भी करा रहा है। ये कर्मेन्द्रियां अच्छे कर्म करके पावन बनेंगी। कर्मेन्द्रियों ने भी बहुत पतित काम किये हैं, पाप किये हैं। अभी बाबा अपनी याद दिलाकर पावन बना रहा है। याद दिला रहा है तुम देवता कुल के थे। हर आत्मा अपने कर्मों के लिये जिम्मेवार है। हर आत्मा को योग भी खुद लगाना है, कर्म भी खुद करना है। अच्छे कर्म करेंगे तो अपने लिए अच्छे बीज बोयेंगे। बीज इसलिए बो रहे हैं पता है इसका फल अच्छा निकलेगा। हमको फल की इच्छा है लेकिन यहाँ के लिए नहीं, भविष्य २१ जन्मों के लिए। एक बीजरूप को याद करो और मास्टर बीजरूप बनो। सर्व बातों को समेटने की शक्ति हो। सिर्फ पास्ट इज़ पास्ट लेकिन सेकण्ड में समेटने की शक्ति बीजरूप बनायेगी। कइयों को पास्ट इज़ पास्ट करना मुश्किल लगता है। पास्ट इज़ पास्ट करना ही सहज पुरुषार्थ है। कई हैं जो विस्तार फैला लेते हैं, समेट नहीं सकते। अक्ल ऐसी हो जो विस्तार न हो। नहीं तो लगता है बहुत हो गया। अन्त में भी हमको सब बातें समेटकर घर जाना है। कार्य करते भी समेटने की शक्ति चाहिए। ज्ञान सागर बाप है, हम ज्ञान गंगायें कैसे बनी ? जब शिवबाबा से शक्ति ली। जब तक शिवबाबा की शक्ति नहीं तब तक ज्ञान गंगा नहीं बन सकते हैं। हम ज्ञान सागर से निकले हैं। हमारे मुख से गंगा तब ही निकलेगी जब अन्दर शिवबाबा की शक्ति हो। बाबा ने पावर बनाया ही है ज्ञान गंगा बनाने के लिए। पतित पावन ज्ञान का सागर है। हम महसूस करते हैं कि हम पावन बन रहे हैं। ज्ञान से रियलाइज़ेशन आई है। पवित्रता क्या है- समझ आ गई है। समझ ने पवित्रता को पालन करने की भी शक्ति दी है। पवित्रता अच्छी लगती है. अपवित्रता के लिए ग्लानि आ गई है। पवित्रता हमारे काम की चीज़ है। यह ब्राह्मण लाइफ के लिये ही नहीं भविष्य २१ जन्मों के लिए काम की चीज़ है। इसलिए अपवित्र संकल्पों को भी हम एलाउ नहीं कर सकते। ज्ञान कहता है अपने आपको सोल कॉन्सेस बनाओ। सोल कॉन्सेस से आत्मा पावरफुल, पावन बनती है, नज़दीक आती है। पतित पावन बाप के संग के रंग से पावन बनती है। ज्ञान को यूज़ करने से ही पावन बनेंगे। ज्ञान ने मुझे पावन बनाया है। कैसे बनें ? ज्ञान सागर के ज्ञान ने पावन बनाया, पुरानी बातों को समेट कर पावन बनने की तीव्र इच्छा ज्ञान ने पावन बनाया है। ड्रामा में पार्ट पूरा हो गया। पावन बनने का पार्ट, फिर पावन बनकर औरों को पावन बनाने का पार्ट। ज्ञान धारण करके औरों को धारण कराने से शिवबाबा की शक्ति मिलती है। धारण तब होता है जब मनन-चिन्तन चलता है, मनन-चिन्तन तब चलता है जब इसी बात की लगन हो कि मुझे यही करना है। सेवा भी निमित्त मात्र है। लौकिक प्रवृत्ति भी सम्भालनी है। शरीर में बैठें हैं तो भी निमित्त मात्र। अहंकार, अभिमान से छूटे हुए हैं। अन्दर से अभ्यास ऐसा हो जो शरीर के भान से भी दूर रहें। ब्रह्मा बाबा की आत्मा भी इस शरीर में निमित्त है। ब्रह्मा बाबा को शिवबाबा भी निमित्त बनाता है। गीता में भी अक्षर है निमित्त मात्र। निर्माण-चित्त तब बनेंगे जब अपने को निमित्त समझेंगे। हम निमित्त हैं, कराने वाला बाबा है काम भी उसका है। निमित्त बनने से प्रालब्ध भी ऊंची बन गई है। निमित्त बनने से भविष्य प्रालब्ध बन गई। काम तो निमित्त-मात्र है। हज़ारगुणा मदद तो बाबा कर ही रहा है और सर्व के सहयोग से हो रहा है। हम तो सिर्फ निमित्त हैं उसमें खुशी बहुत है। सफलता देख खुशी है। अन्दर की मनोवृत्ति शुद्ध हो। याद में रहो, याद दिलाओ। यही याद का सहज तरीका है। अनन्य वो है जो ऐसा काम करे जिसे अन्य कोई भी न कर सके। तो हमें बाबा का साक्षात रूप बनकर औरों को बापदादा का साक्षात्कार कराना है। बापदादा साथ होगा तो औरों को साक्षात्कार होगा।
बातों के मनन-चिन्तन में जाने की बजाये अपनी मनन शक्ति को बढ़ाओ। कौन सी बात मन में रखने से शक्ति आती है और कौन सी बात मन में रखने से शक्ति खत्म होती है- यह चेक करो। बीती बात मन में है तो मन कमज़ोर है, समेटने की शक्ति नहीं है। तीसरा सहन शक्ति नहीं है तो फालतू चिन्तन चलता है। सहनशक्ति हो तो कर्म सम्बन्ध में चाहे हजारों के बीच में हो, चाहे पांच के बीच में हो – अच्छा लगता है। हमारे पुरुषार्थ का - तरीका ऐसा अच्छा हो जो सबके साथ अच्छे रहें। एकान्त में हों, अकेले हों, चाहे संग में हों पुरुषार्थ अच्छा हो। फ़ालतू टाइम न गंवायें। फ़ालतू बातों में टाइम गंवाने की आदत छोड़नी हैं - यह है अपने ऊपर कृपा करना। फ़ालतू बातों में क्यों जायें ? बाबा कहते हैं मैं तुम्हारी मदद करता हूँ तुम मेरे मददगार बनो। मददगार सपूत बनेंगे तो सबूत बनेंगे। सबूत अच्छे होंगे तो औरों को देखकर खुशी होगी। बाबा की दुआयें मिलेंगी। सब समझेंगे इसकी हॉबी अच्छे पुरुषार्थ करने की है। जितना स्वभाव सात्विक होता जायेगा उतने दैवीगुण आते जायेंगे। अपने पुरुषार्थ को चेक करो सतोगुणी है, रजो गुणी है या तमोगुणी है? तमोगणी पुरुषार्थ अर्थात् ईर्ष्या-द्वेष में आना, कभी कैसा, कभी कैसा।
जाते हैं, मधुबन को हॉलीडे होम समझते हैं, मधुबन हॉलीडे होम नहीं है। इसमें मधुबन से कई अच्छी झोली भरकर जाते हैं, कई केवल हॉलीडे मनाकर श्वास और संकल्प की अच्छी कमाई कर ली तो जो आने जाने में खर्च हुआ वह सफल हुआ। ब्राह्मणों का ५०० पौंड या डालर बहुत बड़ी चीज है। सफल होता है तो इससे बहुत कमाई है। हमारा श्वास, संकल्प, सम्पत्ति सब सफल होता रहे, जो हमारे भविष्य की कमाई के लिए है। सतयुग में पैसा गिनती नहीं करेंगे। लेकिन यहाँ कागज़ के डालरों ने हमारी पदमों की कमाई करा दी है। यहाँ की एक ईंट भी वहाँ सोने की बन जाती है। हमारे संकल्प-श्वास बहुत कीमती हैं। खराब संकल्प बहुत नुकसान करते हैं। संकल्प, श्वास सफल करने से सब सफल हो जायेगा। मधुबन से बहुत कुछ मिलता है, रास्ते में कहीं गुम नहीं कर देना है। जिनके पास बहुत खज़ाना होता है उनके पीछे चोर पड़ जाते हैं। जो दान करता है उनको चोर नहीं लूटते हैं।
मेरा-मेरा मैला बनाता है इसलिए मेरे-मेरे का अभिमान छोड़ सेवा में सब-कुछ सफल करो
बाबा कहते तन-मन-धन सब स्वाहा कर दो फिर साथ साथ सफल भी कर दो। एक है समर्पण कर देना, दूसरा है स्वाहा कर देना, तीसरा है सफल करना। समर्पण क्या करते हैं बाबा जो मेरा सो तेरा। मेरा मेरा छूट जाए, कितना भी हम कोशिश करें 'मैं-मेरा' को छोड़ दूँ परन्तु जब तक समर्पण नहीं किया है तब तक मेरा-मेरा छूटता नहीं है इसलिए जनक की कहानी शास्त्रों में गाई हुई है। उन्हें अष्टावक्र ने क्या ज्ञान दिया ? यह कह दो कि तन-मन-धन मेरा नहीं है, यह मेरा मेरा को छोड़ने का तरीका बहुत अच्छा है। रीयल यह मेरा नहीं है। आत्मा ने मेरा मेरा समझ करके अपने को पिंजड़े का पंछी बना दिया है। मेरा मेरा छोड़ते तो पिजड़े का दरवाजा खुल जाता है। पंछी उड़ने लग पड़ता है। नेचुरल अपने आप सोल कॉन्सेस होने लग पड़ते हैं। उड़कर बाबा के पास जाने चाहते हैं। फिर बाबा भी खींचता है, जो पिंजड़े में हैं उनको बाबा कैसे खींचें कोई डाली पकड़कर बैठा है तो कैसे उड़े ? जब समझ में आ जाता है मैं पकड़ कर बैठा हूँ, छोड़ दें तो उड़ने लगें। जो पाइंट सुनते हो उसके लिए कहो ऐसे करेंगे। कैसे करूँ, यह नहीं कहो। समझ मिली है करने के लिए। बाबा बहुत कुछ समझाता है फिर भी क्वेश्चन उठता है कैसे ? कैसे के बजाए कहो ऐसे। करने से ही अभ्यास बढ़ता है। अपने में विश्वास बैठता है और खुशी होती है। परन्तु वह करने की हिम्मत, उमंग उल्लास तब आता है जब जिसे पकड़कर बैठे हैं उसे छोड़ें। तन मन धन तो मेरा नहीं है। मेरा क्या है ? स्वभाव संस्कार कोई प्रकार की आदत जो आगे बढ़ने नहीं देती। मेरी इच्छा ममता आगे बढ़ने नहीं देती। कहीं पर इच्छा है और कहीं पर ममता है, यह बात अच्छी लगती है अथवा यह मुझे चाहिए, यह इच्छा ममता हमें इतना ऊंचा पुरुषार्थ करने नहीं देती। उसको छोड़ो तो छूटो, छोड़े बिना दोनों लड्डू हाथ में नहीं ले सकते। जैसे भक्ति में कहते तेरा मेरा हो जाए पर मेरे को हाथ नहीं लगाना। मुझे चाहिए पर मेरा जो हो गया उसको हाथ नहीं लगाना। मेरे में बहुत ममता है। मेरे को छोड़ने से कितना मिलता है ? अखुट अनगिनत मिलता है। गिनती भी नहीं कर सकते हैं। फिर दान करो तो खुटता नहीं है, बढ़ता है। परन्तु पहले मेरा छोड़ो। इसलिए फिर बाबा ने कहा है कि तिल-जौ ज्ञान-योग की अग्नि में छोटी-छोटी बातों को स्वाहा कर दो। तिल बहुत छोटा होता। जौ बड़ा होता है। जब स्वाहा करते हैं तो तिल जौ के साथ घी होता है। जो चीज़ अच्छी ममता वाली हो वह भी स्वाहा करो। कुछ भी अन्दर नहीं रखो। सब स्वाहा। स्वाहा करने के समय मन्त्र मुख में देते हैं। मन्त्र के बिना स्वाहा नहीं करेंगे। स्वाहा करने के समय चेहरा बहुत अच्छा होता है, दिल से करते हैं, भावना होती है, भावना के बिना नहीं करते हैं। भावना से प्राप्ति होती है, तो मनमनाभव के मन्त्र के साथ दिल से अगर हम स्वाहा कर लेंगे तो प्राप्ति बहुत होगी। मन्त्र मन में हो तो हड्डी सेवा अपने आप होगी। जब तक मनमनाभव नहीं, स्वाहा नहीं किया तब तक हड्डी सेवा नहीं होगी। अपने आप बाबा की याद नहीं आयेगी। स्वाहा करने से सफल कर सकते हैं। जो करेंगे वह सफल होगा। मन से करेंगे तन से करेंगे सफल ही सफल। यह भी नम्बरवार स्टेजेस हैं पहले मेरा-मेरा छोड़ो फिर तिल जौ स्वाहा कर दो।
हम जब से यज्ञ में आये हैं तो यह महावाक्य बड़े प्यार से सुने हैं – किसकी दबी रहेगी धूल में किसकी राजा खाए, सफली होगी साई जो खर्चे नाम धनी के। प्रैक्टिकल दुनिया में देख रहे हो। अर्थ क्वेक होगी तो क्या होगा ? किसकी राजा खाये। टैक्स ही आधा पौना खा जाता है। राजा खाने के लिए मुंह फाड़ कर बैठा है, राजा को मिलेट्री के लिए, लड़ाई के लिए चाहिए। किसकी चोर ले जायेंगे, चोर ठहरे हुए हैं। किसकी जलायेगी आग, बाम्ब फटेगा तो क्या होगा ? और सफली उसकी होगी जिसने धनी के नाम से खर्च किया। नाम उसका, सफल हमारा हो गया, प्रालब्ध हमारी बन गई। हमारा कुछ निष्फल नहीं हुआ। न तन, न मन, न श्वास, न संकल्प। सब सफल हुआ पड़ा है। सम्पत्ति सफल की है, कराई है। भाग्य विधाता के बच्चे हैं। अर्थक्वेक भी हो जाए लोगों को डर है ? हमारे लिए क्या बड़ी बात है। लोगों को डर है।
बाबा बच्चों के लिए ज्ञान सरोवर क्यों बना रहा है ? बाबा को अपने बच्चों के लिए घर चाहिए। बाबा के बच्चे तो एशलम लेकर बैठें ना। बच्चों के लिए हॉस्पिटल भी चाहिए। भगवान् का अपने बच्चों में बहुत प्यार है। उसको अपने बच्चों के लिए चाहिए। अभी जो बच्चे पैदा किये हैं उसमें मोह बहुत है। जितना भगवान् को मोह है बच्चों के लिए उतना इंसान को हो ही नहीं सकता है। देवता मोह करना जानते ही नहीं। मनुष्य तो बिचारे मोह में फटकते हैं। मोह वश बच्चों के लिये लोभ करते, चोरी करते, ठगी करते हैं। अपने लिए नहीं करते हैं। बाबा चोरी ठगी नहीं करता, लोभ नहीं रखता। परन्तु हम बच्चों के और विश्व के कल्याण के लिए पहले हमको कहता तुम मेरा मेरा छोड़ो मैं तुम्हारा भाग्य बनाकर तुम्हारे हाथों में दूंगा। बाबा कहता बच्चे तुम चिंता मत करो, तुम्हारा भाग्य मेरे हाथों में है। गैरन्टी दे दी फिर हमको क्या करने का है। मास्टर भाग्य विधाता बनना है। भगवान् जो मेरा बाप है वह है भाग्य विधाता। वह हर बात में कहता तुम मास्टर बनो। मास्टर कैसे बनेंगे ? जिसको बाबा कहते बालक सो मालिक। तो मालिक कैसे बनेंगे। विश्व की बादशाही पीछे मिलेगी। बेफिक्र रहने की बादशाही अभी बाबा दे रहा है। सदा बेफिक्र रहो, चेहरे से मस्ती दिखाई दे। बिगर कौड़ी बादशाह हैं। मिट्टी को सोना बनाने वाला बाबा मिला है। यह तो मिट्टी है, हाथों की मैल है। यह क्या है ? लोग तो पकड़कर बैठते हैं। भगवान् के बच्चों के लिए क्या है ? मैल है। सफल हो गया तो खुशी हो गई। किसी का भला हो गया तो अच्छा हो गया। बैंक में होगा तो बैंक वाले लेकर जायेंगे। तो अन्दर से हमको इतना सफल करने का शौक हो। निष्फल एक पेनी न जाये। सब सफल हुआ है यह ताकत है। जैसे पवित्रता का, योग का बल है ऐसे सफलता का भी बल है। अगर किसी का निष्फल हुआ है तो उसको रोना आयेगा। निष्फल होने से रोना आता है। सफल होने से खुशी होती है। सफल कहाँ किया, उस अग्नि में सफल नहीं होगा। इस सेवा में नहीं सफल होगा। समझ से इच्छा ममता को छोड़ सफल करो। सफल करने का अभिमान नहीं रखो। दुआयें मिलती हैं इसलिए अभिमान नहीं रह सकता। तो कभी भी यह शब्द नहीं कहो हमने दान दिया या डोनेशन दिया हमारे पास यह डोनेशन शब्द ही नहीं है। यहाँ तो सफल करना है अपनी प्रालब्ध बनाने के लिए जमा किया। जमा हो गया भविष्य के लिए। इसलिए भविष्य की खुशी वा विश्वास है। अगर सफल नहीं किया तो विश्वास ही नहीं होगा। ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ किया होगा तो यह क्वेश्चन ही नहीं होगा – पता नहीं ऊंच पद होगा या नहीं। वेल नोन पीछे होंगे, अननोन तो रहो। अभी नाम बाला हो नहीं सकता है। अभी गुप्त पुरुषार्थ हो। बाबा कहते तुम अननोन वारियर्स हो। समय पर उसकी विजय होगी जो अन्दर रिहर्सल करते रहते हैं। भगवान् की उन आत्माओं से नहीं बनती जो नाम बाला करने के लिए काम करते हैं। भगवान् होशियार है कहता है नाम मेरा हो काम तुम करो। काम करेंगे तो तुम्हारी कर्मेन्द्रियां पावन बनेंगी। यह भी नहीं कहो मैंने किया। नाम तेरा होगा तो मैं बीच से निकल जाऊंगा। बाबा दिन-प्रतिदिन हमारी बुद्धि को साफ करता जाता है। तुम कोई ऐसी बात बुद्धि में लाकर अपनी बुद्धि को मैला न करो। मेरा नाम हो, मेरा शान हो यह आदत पड़ी हुई है। मेरे में ईर्ष्या द्वेष मिक्स हो जाता है। हद के बंधन में फंस जाते हैं। हदों से पार बाबा ले जाता है। जैसे बाबा बेहद में रहने वाला बेहद का बाप है। बेहद का ज्ञान, बेहद की बादशाही, बेहद का सुख दे रहा है फिर तुम हद की बाते क्यों करते हो। मेरा-मेरा हद मे ले जाता है। मेरा सेन्टर मेरा स्टुडेन्ट यह भी बड़ा भारी बंधन है। यह अच्छा नहीं लगता है। मैंने इसको ज्ञान दिया मेरा स्टुडेन्ट – यह जैसे अपनी जबान खराब करते। अव्यक्त वर्ष में मैं-मेरे -में जो व्यक्त भाव है उसे खत्म कर दो। जिस घड़ी जो संकल्प आये, वचन निकले, पूछो अपने आप से यह जो संकल्प आया उसमें मिक्स तो नहीं है। मिक्स बात ताकत लेने नहीं देगी। बाबा एक सेकण्ड में खिसक जाता है। फिर कम्बाइन्ड कैसे रहेंगे ? जब तक यह बातें ध्यान पर नहीं होंगी तो वह स्वरूप कैसे बनेगा। व्यक्ति या वैभव को हमने साथी बना दिया उसके बिना मेरा काम नहीं चलता है, सूक्ष्म है। यह 'मैं-मेरा' मूर्छित कर देता है। अपने वश से बाहर हो जाते हो, फिर बाबा की याद में चेहरा नहीं चमकेगा। माया पहले मुर्छित बनाती फिर खत्म कर देती। बुद्धि ठीक काम नहीं करती। महावीर के चरित्रों में गायन है मूर्छित को सुरजीत बनाया। मम्मा की मुरली सुनते-सुनते सुरजीत हो जाते हैं। तो हमारे अन्दर इतना ज्ञान योग का बल हो जो हम कभी मुर्छित न बनें, दूसरे को भी सुरजीत करने के लिए मनमनाभव की बूटी सूक्ष्म वायब्रेशन से सुंघा ले। एक पवित्रता का बल, दूसरा योग का बल, तीसरा बाबा की मदद का बल, चौथा सफल करने का बल, पांचवा है संगठन का बल। एक दो के प्रति बहुत अच्छी भावना हो उसका भी बल कम नहीं है। एक-दो के प्रति शुभ भावना स्नेह रखो तो वह भी बल बहत मिलता है। औरों को आगे बढ़ाने में खुशी होती है। भावना काम करती है, मैं मेरे से फ्री हैं। यहाँ आते ही हल्के हो जाते। यहाँ 'मैं-मेरा' नहीं है इसलिए हल्कापन है। बाबा ही नहीं कहता मैं मेरा तो और कौन कहेगा। बाबा कहे बच्चों का, बच्चे कहें बाबा का, तो अव्यक्त साल में ऐसी स्थिति बनी हुई हो जिसको शक्ति जमा होती जाए।
पवित्रता के लिए जब पूरा वैल्यु का पता चलता है तो अपवित्रता खत्म हो जाती और पवित्रता का बल आ जाता है। योगबल काम करता है। योग में फिर बाबा की मदद बहुत है। बुद्धिवानों की बुद्धि औरों को भी टच करके काम कराती है। बाबा न सिर्फ मेरे को मदद कर रहा है परन्तु बाबा काम बहुत कर लेता है। हमको कहता तुम सिर्फ योग लगाओ, कैसे होगा, कब होगा - यह ख्याल नहीं करो। तुम सिर्फ पवित्र रहो, योगी रहो और सफल करो। संगठन में सबके साथ प्यार से चलो। किसी के साथ ईर्ष्या-द्वेष, वैर-भाव नहीं रखो। सबसे प्यार रखो। जरा भी फैमिलियरिटी न हो। बाबा बड़ा होशियार है। कहेगा क्या कर रहे हो ? अव्यभिचारी याद हो, एक की याद हो। सपूत बच्चा पिताव्रत रहता। मातृ-स्नेही, पितृ-स्नेही होता है।
हम बाबा के मददगार हैं। अव्यभिचारी याद होगी तो मददगार हैं। फिर अनेक विघ्नों को खत्म करने वाले बन जायेंगे। ऐसी याद वाले के पास विघ्न आ नहीं सकते। हमारी याद ऐसी हो जैसे सत्यवान की सती सावित्री। सच सिखलाने वाला बाबा कहता सच्चे रहो, ईमानदार रहो, वफ़ादार रहो। बाबा का जो फरमान मिले फरमानबरदार बन उस फरमान का पालन करो तो बाबा उसे याद करने के साथ प्यार भी करता है प्यार के साथ अन्दर से आशीर्वाद देता है।
बाबा की याद के साथ हमको प्यार भी मिलता रहे। तो इससे हम आपेही अव्यक्त बनते जायेंगे। बाबा को फालो करना सहज हो जायेगा।
बाप का स्नेह और श्रीमत को पालन करने की शक्ति उपकार करना सिखाती है
जो रोज़ मुरली सुनते हैं उन्हें होमवर्क मिल जाता है। जैसे स्कूल में होमवर्क मिलता है और जो होमवर्क अच्छा करते हैं उनका चेहरा खिला हुआ होता है जो ठीक नहीं करते उनका चेहरा सुस्त लगता है। तो अभी बाबा ने हाल दिया है अपना और दूसरों का उपकार करो। परोपकार करने के लिए सच्चा और खुला दिल हो। पर-उपकार हम मन-वचन-कर्म तीनों से कर सक हैं। उपकार शब्द के कई अर्थ है। बहुत अच्छा अर्थ निकल सकता है। भगवान ने आकर हम पर बड़ा उपकार किया है। भूल नहीं सकते। बाबा ने कहा आप लोगों को वन्डर लगता होगा क्या थे, क्या बन गये ! कीचड की दुनिया में पड़े थे, निकल आये कितना लोभ मोह अहंकार वश थे, छूट गये। अँधेरी रात में पड़े थे। कैसे जाग गये, सवेरा हो गया, आंख खुली है, तीसरा नेत्र खुला है तो सवेरा भी हो गया है। सवेरा हो जाये और आंख न खुल तो ? हमारे लिए सवेरा भी आ गया और आंख भी खुल गई। लोगों के लिए रात है हमारे लिये सवेरा है। वो नयनहीन है, हम त्रिनेत्री हैं। बाबा ने कितना उपकार किया है। मेरे ख्याल में दुनिया भर में नेत्रदान महादान मानते हैं। एक है नेत्र दान, दूसरा है ब्लड दान। दूसरों का भला सोचने वाला दानी तो क्या महादानी वरदानी भी बन जाता है। पहले दानी स्वभाव हो। दे दान तो छूटें ग्रहण। कभी हमारे से अपकार न हो। इसके लिए कभी हमारे में क्रोध न आन आये जाता है यह कहकर एलाउ न करो। क्रोध प्रवेश ही क्यों हो? इसक मतलब हमने बैठकर अपने आपको शीतल-शान्त नहीं बनाया है तभी क्रोध आ जाता है। राजयोगी वह हैं जो आग कपास इकट्ठे रह सकते हैं। कहाँ आग कहाँ कपास और कहाँ कपास। कौन सी ऐसी शक्ति है जो आग और कपास को इक्ट्ठा रखती है ? सन्यासी कहाँ जंगल में चले जाते हैं, पहाड़ पर चले जाते हैं, घर छोड़ देते हैं क्योंकि इकट्ठा रहना मुश्किल है। हमारा इकट्ठा रहना, प्रवृत्ति में रहना, संबंध में रहना सहज है। बाबा ने मंत्र दिया है देह तथा देह के संबंधों को भूल, संबंध में रहते भी न्यारे रहने की आदत डालो, तो सब विकार भाग जायेंगे। विकारों को भगाने के लिए अन्दर से विकारों का दान दे दो, फिर दूसरों का उपकार कर सकेंगे। अपना उपकार करने के लिए अपने को विकारों से छुड़ाओ। महसूस हो यह विकारी बन्धन हैं। कोई विकर्म न हो, विकल्प भी न आयें उसके लिए सदा शान्त रहो, घर भी याद रहे, बाप भी याद रहे। घर शान्तिधाम, शान्ति में पवित्रता, शीतलता, स्नेह आ जाता है। शान्ति में शक्ति आती है। शक्तियां अन्दर की कमजोरियों को खत्म करती हैं। तो स्वधर्म में टिकने से, बाप का बनने से, घर की याद आने से, स्वर्ग का मालिक बनने की इच्छा अन्दर पैदा होने से कमजोरियां भाग जाती हैं। पहले सम्पूर्ण निर्विकारी बन जायें, तो सर्वगुण सम्पन्न बन जायेंगे कोई कला कम न हो। स्वधर्म में टिकने से स्वमान में रहते हैं। फिर कभी हमारी हार नहीं हो सकती। किस बाप के बच्चे हैं, यह नशा रहता है, तो घर की स्मृति रहती है। घर का वातावरण बड़ा शान्त है। स्वर्ग की राजाई बाबा ने हमारे हाथों में दी है, बच्चों तुम्हारी तकदीर में है सिर्फ अभी उपकार करो, उपकार करते रहेंगे तो भला होता जायेगा। बच्चों की हिम्मत के क़दम पर पद्मगुणा बाप की मदद है। उपकार करने के लिए क्या चाहिए? हिम्मत। कभी निराश न हो। मैं कैसे करूँ। करेंगे तो करना सीखेंगे। दिनचर्या सुबह से रात्रि तक बाबा ने उपकार करने की बनाकर दी है। सुबह से रात्रि तक जितनी चाहे उतनी करो। अटेन्शन रखो अपकार न हो, किसी का दिल खराब न हो, किसी की निन्दा न हो। हर आत्मा का खास ब्राह्मण आत्मा का बाप से स्नेह जुटा रहे। श्रीमत पर चल कर बाप से स्नेह पाने का अधिकारी बनना है। बाबा को सुनाकर हल्के हो जायें। अपनी जो भी पर्सनल बातें हो वह बाबा को सुनाओ। बाबा के नज़दीक जाने में कितनी शक्ति है, कितना हल्कापन है, यह अपने पर उपकार है। कोई काम ऐसा हमारे से न हो जो बाबा से दूर कर दे। वह अपकार है। हमारे से कोई ऐसा उल्टा कर्म न हो जिससे देह अभिमानी दृष्टि-वृत्ति हो। कोई ऐसी बात न हो जो बाप से बेमुख करने के निमित्त बन जाऊं। मैं निमिन बनूं बाबा के नज़दीक लाने के। उसमें सूक्ष्म जितना बाप से स्नेह होगा, जितना श्रीमत को पालन करने की शक्ति जमा होगी वह दूसरों का उपकार करने में मदद करेगी। एक सम्बन्ध, दूसरा श्रीमत पर चलने की शक्ति बहुतकाल की जमा की हुई हो। वह हमारे से अपकार नहीं होने देगी। सदा ही उपकार हो यह भावना भी काम करेगी।
बाबा सदा कहता था बच्चे हो जायेगा कैसे होगा यह प्रश्न ही नहीं है। हुआ ही पड़ा है। भगवान ने जो उपकार किया है वह भूल ही नहीं सकता। सबका उपकार हो यह भला करने वाले सोचते हैं। कल्प पहले भी हुआ था। तुम निमित्त हो। भाग्य विधाता को किसी का भाग्य बनाने के लिए कोई कारण चाहिए। विनाश तो होने ही वाला है। सोना हीरा सब खत्म हो जायेगा। बैंक मे रखेंगे वो भी खलास हो जायेगा। यहाँ सोना रखेंगे तो कोई सतयुग में काम नहीं आयेगा। तो अपने आपको देखो मैंने कितना उपकार किया है, कितने विकर्म विनाश हुए हैं, जो रहे हुए हैं उनका खात्मा करना है। अभी दूसरे विकर्म न बनें उसका ध्यान रखना है।
बाबा करनकरावनहार है, हम उनके बच्चे हैं। कम बुद्धि वाले सोचते हैं कि मेरे पास नहीं है। बुद्धि रिफाइन चाहिए। कई बोलते हैं कि मेरे पास पैसा हो तो दूँ ना। हमारी गरीबी की शक्ल देखकर अमीर भी कंजूस हो जाते हैं। अपनी स्थिति ऐसी अच्छी हो, उपकार करने की भावना हो। प्रभु की लीला न्यारी प्यारी है जो देखने जानने के लिए प्रभु ने भाग्य दिया है तो भाग्य बनाते चलो।
अपने आपको शान्त वा शीतल बनाने का गुप्त अभ्यास करो फिर अपने संग का रंग दूसरों को लगाओ
बाबा नित्य नई बातें सुनाते हैं। ज्ञान की गहराई में ले जाने के लिए ध्यान खिंचवाते हैं। नई बात तब लगती है जब ज्ञान की गहराई में जाते हैं। बाबा कहते हैं शीतल बनो, छींटे डालो। सारे ज्ञान का सार है मीठा बनना। मीठा बने तो जैसे सम्पूर्ण बने। सम्पूर्णता का प्रेक्टिकल स्वरूप सामने रखो। सम्पूर्ण स्वरूप कितना मीठा लगता है। मीठा बनने के लिए पहले शीतल और शान्त बनें। तो पहले शान्त बनो, फिर शीतल बनो तब मीठा बन सकेंगे। गर्म दूध में गर्म पानी में मीठा डालो, अच्छा लगेगा क्या? मीठा है परन्तु गर्म, तो अच्छा लगेगा क्या ? कहेंगे गर्म मुझे अच्छा नहीं लगता। तो दुनिया का वातावरण बड़ा गर्म है, किसी का स्वभाव संस्कार बड़ा गर्म है। पहले ठण्डा बनो फिर मीठा। शीतल वो है जो शान्त है। शान्त वो है जो धीरज में है। भारत में रिवाज है जब माता (चेचक) निकलती है तो शीतला देवी के नाम से छींटा डालते हैं। बाबा ने कहा ठण्डे छींटे डालो, तो कैसे डालें ? जो खुद ठण्डा होगा वही डालेगा तो अपने स्वभाव को पहले शीतल बनाना है। शीतल बनाने के पहले शान्त बनो। उसमें प्रेम, स्नेह, रहम हो। शान्ति में रहम भी होगा तो स्नेह भी होगा तब वचन मीठे निकलेंगे। अन्दर रहम भाव नहीं है, धीरज नहीं है, रुहानियत की शक्ति नहीं है, स्वमान में रहते नहीं हैं, जल्दी से अपमान की फीलिंग में आ जाते हैं तो शीतल बनाने के लिए छींटे डाल नहीं सकते हैं। थोड़ा सूक्ष्म विचार करें जिस घड़ी अपमान की फीलिंग है, कोई अपमान करता है तो क्या हम उसे ठण्डा बना सकते हैं? उसको देखते, उसके लिए सोचते मेरे अन्दर से क्या संकल्प उठेगा ? परन्तु विवेक कहता है, ज्ञान वा समझ कहती है- किसी का स्वभाव कैसा भी हो, लेकिन मुझे क्या करना है ? आग का काम अपना है पानी का काम अपना है। पानी बुझाने का काम करेगा। हमारा काम है शीतलता के छींटे डालना, हम तो परमात्मा के बच्चे हैं। बाबा कहता है पोत्रों का हक लगता ह,. पौत्र किसके हैं? शान्ति, आनन्द, प्रेम के सागर के। ब्रह्मा बाबा के बच्चे हैं, ब्राह्मण कुल मर्यादा को जानते हैं। ब्राह्मण कुल मर्यादा को जब जानते हैं तो उस मर्यादा प्रमाण चलने के लिए हम हक ले लें। आज्ञाकारी बनकर गुण शक्तियों का वर्सा बाप से ले लो। आज्ञाकारी बनने से वर्से के अधिकारी बनते हैं।
शुरु शुरु में बाबा के ये मीठे महावाक्य सुनते थे- योगी शीतल काया वाले, योगी का अंग-अंग शीतल होता है। भोगी का, क्रोधी का अंग कैसा होगा, आंखे कैसी होंगी, बोल-चाल कैसा होगा ? योगी की काया ही शीतल है, जो उसके संग में रहेगा वह भी शीतल हो जायेगा। तो सदा अपने आपको अन्दर ही अन्दर शान्त शीतल बनाने का गुप्त अभ्यास करो। मेरे संग का रंग दूसरों को भी लगे, गर्म ठण्डा हो जाये। मेरा असर उसको हो, उसका असर मेरे पर न हो, इतनी अन्दर शान्ति, शीतलता हो। इसमें सुख बहुत है। इसमें रहम, प्रेम, आनन्द अपनी निजी स्थिति का समाया हुआ है। बहुत काल से शीतल-शान्त रहने वाले, अपनी स्थिति को एकरस बनाने वाले कहेंगे मैं बाबा की ब्लैसिंग से मस्त हूँ। एकरस स्थिति, आनन्द स्वरूप बनाने में मदद करती है। बाबा की मदद कब मिलती है ? जब खुद को शान्त-शीतल बनाने की हॉबी है। शान्त-शीतल तब होते हैं जब सब बातों को समेट कर एक सेकण्ड में स्वधर्म में स्थित हो जाते हैं। फिर किसी के मुख से हमारे लिए कडुवे बोल नहीं निकलेंगे, निकलेंगे तो हमारे अन्दर जायेंगे नहीं। हमारा बोल-चाल शीतल हो, मीठा हो, इतना अच्छा बनता जाये जो लगे दैवी बन गया। भक्ति में कहते थे, बाबा ने भी सिखलाया – चलने में धरती को भी दुःख न दो। आराम से धीरे-धीरे चलो। चलने-फिरने में नशा रहे हम देवी घराने की आत्मायें हैं। आवाज़ से बात न करें शान्ति से बात करें। कई कहते हैं भाषण करना नहीं आता, वैसे बोलना बहुत आता है लेकिन विचार सागर मंथन करके बोलना नहीं आता। जो रुहानी यात्रा के शौकीन होंगे, बाबा जो सुना रहा है उस पर मनन करते होंगे वो शीतल-शान्त रहने के आदती बन जायेंगे। जब कोई ठण्डा शीतल बन जाता है तो सबके मुख से दुआयें निकलती हैं।
रुहानी यात्रा करते-करते परमधाम के नज़दीक जाते-जाते शीतलता, शान्ति आ जायेगी। उसे यही धन लगी रहेगी कि शान्ति धाम जाना है, पावन बनना है। वह जल्दी-जल्दी शान्तिधाम के नज़दीक जाने के लिए अपनी स्पीड को तेज बनायेंगे, किसी बात में रुकेंगे नहीं। दुःख कलेश वाली बातों को सामने रखके बैठ नहीं जायेंगे। यदि दो की ओपीनियन नहीं मिलती है, तो उस समय हमारा संकल्प कैसा है ? बाबा हमको विश्व की बादशाही देने वाला है, सारी दुनिया को पावन बनाना, नर्क को स्वर्ग बनाना, प्रकृति को पावन बनाना बाबा को काम कितना है ? बाबा इतनी मुरली चलाता है फिर बाबा के रुम में जाओ तो जैसे शान्ति की किरणें फैल रही है। अभी भी बाबा की अनुभूति होती है। बाबा से पूछने के लिए बहुत प्रश्न निकालते थे, सामने जाते थे तो भूल जाते थे। शान्त-शीतल वायुमण्डल बनाने का बाबा ने अनुभव कराया। जब बाबा हम बच्चों को इतना शान्त कर सकता है तो हम दूसरों को भी कर सकते हैं। शीतल-शान्त बन सकते हैं। कैसे बनेंगे ? ज्ञान का मंथन करने से, योगयुक्त बनने से, बाबा को नजरों में रखने से। नज़रों में बाबा होगा तो दूसरे शान्त-शीतल हो जायेंगे। बाबा इतना देता है तो हम भी विचार सागर मंथन करके अपने जीवन में ले आयें तो हमारी भी अशान्त होने की आदत छुट जायेगी और दूसरों का भी भला हो जायेगा।
अव्यक्त वर्ष में एक बल एक भरोसे के आधार से निर्भय बनो
बाबा को सदा यह ओना है कि हम सदा खुश रहें। इतना खुश रहें जो असीम हो। देवताओं को भी इतनी खुशी नहीं है जितनी हमको हैं। यहाँ जब खुशी बहुत खुश रहते हैं तब देवता बनते हैं। देवता पद की प्राप्ति यहाँ की खुशी के आधार से ही है। सुस्ती को छोड़ बहुत कमाई कर रहे हैं इसलिए खुशी बहुत है। हमारी कमाई भी है तो माया से लडाई भी है। कमाई में बड़ा अलर्ट रहना पड़ता है। जो जरा भी केयरलेस रहता है वह घाटे में चला जाता है। जो खबरदार होशियार रहता है वह घाटे में नहीं जाता, कमाई जोर पर रहे यह ध्यान रखता है। ध्यान रखने से खुशी बहुत होती है। खुशी कहाँ से आयेगी। लापरवाह बने तो खुशी नहीं आयेगी। नुकसान हो सकता है। सुस्त के पास खुशी नहीं होती। इसलिए बाबा ने सुस्ती को भगाने के लिए कहा दो बार स्नान करो। बाबा सुबह मुरली में नशा चढ़ाते, शाम को भी खुश खैराफत पूछते, दृष्टि देते, गुडनाइट करते। सवेरे बाबा की गुडमार्निंग और रात की गुडनाइट। रात को बाबा से मुरली नहीं सुनी, गुडनाइट नहीं की तो मधुबन आना किसी काम का नहीं। बाबा से कोई दूरी न हो। रोज़ रात को बाबा के कमरे में जाकर गुडनाइट करके सोओ। जब रोज़ रात को सोते समय गुडनाइट करेंगे तो दूसरे दिन गुड डे स्वतः ही होगा। सोते समय भी जैसे बाबा आपके पास आ रहे हैं।
बाबा कहते हैं निद्रा को जीतने वाले मेरे बच्चे। निद्रा को जीतना माना ऐसे नहीं कि नींद नहीं करना, लेकिन नींद को वश में रखना। नींद नहीं आये तो भी अच्छा नही, बहुत आये तो भी अच्छा नहीं। जैसे जैसे सतोप्रधानता आती जायेगी तो नींद भी वश में होगी। वह होगी बाबा से गुडमार्निंग और गुडनाइट करने से। हमारा कोर्स शुरु होता ही है सवेरे उठने से और अपने को आत्मा समझकर बाप को याद करने की प्रैक्टिस करने से। कोर्स करने के बाद आहार शुद्ध हो जायेगा। यदि आहार शुद्ध नहीं हुआ तो कोर्स नहीं हुआ। कोर्स माना चार बातें ध्यान पर रहे - रोजाना ज्ञान स्नान, सवेरे उठना, ब्रह्मचर्य, आहार शुद्धि। तब ही दैवी गुण आयेंगे। अगर ब्रह्मचर्य पालन करना यह कोर्स से नहीं सीखा तो ईश्वरीय सन्तानपने के संस्कार नहीं आ सकते। पवित्रता बताती है कि तुम ईश्वर की सन्तान हो। ईश्वरीय सन्तान में वह शक्ति आती है। पवित्रता का पालन करने में कोई भी मुश्किल नहीं आ सकती। अन्दर से समझ आ गई मैं ईश्वर की सन्तान हूँ। अमृतवेले से ही खींच होने लगती है।
बाबा कहते जाग सजनियां जाग नवयुग आया। जो बात बीती वह याद आयेगी तो नवयुग में जाने की तैयारी कैसे करेंगे। किसी को बीती बात याद भी नहीं दिलानी है। ब्राह्मण बनने से और सब मर्यादायें पालन करने से खाने की, पीने की, पहनने की, बोलने की, चलने की सब बातों की रॉयल्टी आ जाती है। सब बदल जाता है। हमें साइलेन्स में टॉक करना है। बाबा यह सब चेक करते थे ये साइलेन्स में वाक करते हैं ? ताकि कमाई हो, नशा चढ़े। कभी किसी को उलहना नहीं देना है। उलहना देना भी दुःख देना है। जो बात बीती उस बात को फिर से रिमाइन्ड कराना माना दुःख देना। खुद को भी भूल जाना चाहिए, दूसरों को भी भूलने की शक्ति देनी है। ब्राह्मण कुल में यह भी एक अच्छा श्रेष्ठ पुरुषार्थ करने और दूसरों को कराने का तरीका है। किसी को पास्ट भूल याद नहीं दिलानी है। पता है कल्प के बाद देखा जायेगा, अब तो मिट गई भूल, खत्म हो गई। भूल कोई भी होती है थोड़ा बहुत देह भान है तो बाबा हम सजनियों को जगाकर यह स्मृति दिलाता है बच्चे वह बीत चुकी। कोई भी बात हम मन में न रखें। तब ही पुण्यात्मा, महान आत्मा बनने का चिन्ह पैदा होगा। टोन्ट करना भी दुःख देना है। यह रांग है। यदि खुद न कहकर किसी से कहलाते हैं तो यह भी रांग है। यह सब बातें बाबा को अच्छी नहीं लगती हैं। जो बात बाबा को अच्छी नहीं लगती वह हम कभी नही करेंगे। अपने पास लिस्ट रखनी चाहिए कि बाबा को कौन-सी बात अच्छी नहीं नहीं लगती हैं। अगर हम सपूत बच्चे हैं, लायक बनना चाहते हैं, सदा खुशनसीब रहना चाहते हैं तो खुशनसीब बच्चे निडर हैं, सदा हर्षित हैं। भले अर्थक्वेक आ जाये, कुछ भी हो जाये, सदा हर्षित रहने वाले को सदा बाबा की याद रहेगी। तुम्हारे अन्दर इतनी बाबा की याद हो जो सदा निडर रहा हर्षित रहो जो किसी भी घटना में हमारी स्थिति, किसी को बाबा की याद दिला सके।
निडर कैसे बनें ? यह भी बड़ा सब्जेक्ट है। निर्भय रहना भी अव्यक्त स्थिति बनाने में मदद करता है। निर्भय वह बनता है जिसकी किसी के साथ रिंचक मात्र भी वैर भावना नहीं है। वैर में द्वेष भावना हो जाती है। कभी बैठकर अपने आपसे पूछना चाहिये - मैं निर्भय हूँ ? किसी बात का भय तो नहीं हैं ? अगर हमारा चार्ट अच्छा होगा, हमारा अटेन्शन दैवीगुणों पर होगा, अन्तर्मुखी होंगे, किसी को दुःख नहीं देंगे, लापरवाह नहीं होंगे, ऐसी भूलों से बचे रहेंगे तो हमारी सच्चाई-सफाई हमको निर्भय बना देगी। ईमानदारी, वफादारी, निर्भय बनाती है। कार्य व्यवहार में ईमानदारी, बाबा से सम्बन्ध में वफादारी, ऊपर से बाबा बाबा करें, अन्दर से किसी और को याद करें ऐसे बेवफा निडर नहीं बन सकते हैं। वफादार वो जो दिल से बाबा बाबा करे, बाहर से निमित्त पार्ट बजाये, जो दिल से बाबा का है बाबा उसकी बहुत रक्षा करता है। निमित्त पार्ट बजाने वाले को बाबा अक्ल देता है। जैसे बाबा निमित्त पार्ट बजा रहा है। बापदादा दोनों इकट्ठे हैं एक सेकण्ड भी अलग नहीं हो सकते ऐसे ही हमारी एक आंख में शिवबाबा, दूसरी में ब्रह्मा बाबा है। कई पूछते हैं आप शिव बाबा को याद करते हो या ब्रह्मा बाबा को ? तो एक आंख बन्द करके तो याद नहीं करेंगे ? क्योंकि दोनों नयनों में दो हैं। हमारे दोनों नयन दोनों के लिए हैं। इतना हमारे सम्बन्ध में बाबा के साथ वफादारी हो। हमारे नयनों में, दिल में दूसरा काइ न हो। फिर हर कार्य में ट्रस्टी रहो, इमानदार रहो। वफादारी और इमानदारी में जब पास होंगे तभी आज्ञाकारी बनेंगे। आज्ञाकारी सदा निरसंकल्प रहता है। जो बाबा की आज्ञा होगी। आदि-मध्य-अन्त बाबा जानता है। हम तो कभी लिमिट बुद्धि वाले हो सकते हैं। बाबा जो आज्ञा करता है उसमें बहुत भला है। यह अडोलता हमको निर्भय बनाती है। किस आधार से हम निर्भय बनते हैं? जब अडोल है, अचल हैं, किसी भी व्यक्ति वैभव की तरफ चलायमान नहीं होते, बहुत काल से, किसके अधीन नहीं हैं, एक के ही सहारे चलते आ रहे हैं, एक बल एक भरोसा सदा प्रैक्टिकल लाइफ के अन्दर हो। भरोसे से बल मिलता आ रहा है इसलिए निर्भय हैं। लाइफ का आधार क्या है ? भरोसा है, विश्वास है वह मिलता रहा है। जिसके पास बल जमा होता है वह कभी डरता नहीं है। बल काम करता है तो निर्भय रहने की स्थिति तब बनेगी जब बहुतकाल से मायाजीत बनने के लक्षण हमारे में होंगे, महावीरपन के लक्षण होंगे तो माया का वार तो क्या माया की छाया भी नहीं पड़।वार में तो माया दबा देती। छाया से पता पड़ता है, थोड़ा दिमाग भारी होता है। कुछ होने वाला है, टचिंग आती है, फट से खबरदार हो जाते हैं। छाया भी न पड़े। जरा भी बुद्धियोग इधर उधर जाये तो तुरन्त बुद्धियोग लगाने की कोशिश करो, अच्छी कम्पनी में आ जाओ, तुरन्त मुरली हाथ में ले लो। माया ऐसी है जो मुरली हाथ में लेने नहीं देगी, इसलिए बाबा कहते हैं मुरली दो बार रिवाइज़ करो। कोई संशय न हो। अकेले भी मुरली पढ़ो, आपस में मुरली रिपीट करो। कम्युनिकेशन में हल्कापन हो। अपने पुरुषार्थ में ऐसी नवीनता हो, देहभान न हो, किसी के स्वभाव संस्कार के वश न हों, तो एक-दूसरे से प्राप्ति बहुत होती है, सीखने को मिलता है, जानने को मिलता है।
जो भी भय अन्दर में हो उसको इस अव्यक्त वर्ष में निकाल कर खत्म करना है। थोड़ा भय भी भयभीत बना देता है। सोच सोच कर छोटी सी बात भी भूत का रूप ले लेती है। कई बातें भूत का रूप लेकर डराती हैं। इसलिए ऐसी कोई बातें न सुननी है, न सुनानी है। कई बार यह होता है कोई सरेन्डर होना चाहता है तो उसको डरा देते हैं कि सरेन्डर नहीं होना है ऐसे होगा, वैसे होगा, वो डर जाते हैं, घर बैठ जाते हैं। कई हिम्मत दिलाते हैं, रुहानी शक्ति देने की मदद करते हैं। समझदार, योगयुक्त कभी डरता नहीं। अपनी भूल महसूस किया तो डर नहीं। जिसमें महसूसता की कमी हो वह डरता है। जो भूल छिपाता है वह डरता है। जो भूल नहीं छिपाता है वह निडर रहता है। डर काहे का ? 'सच तो बिठो नच'। सच बोलने वाला सदा नाचता है, डरता नहीं है। झूठ बोलने वाला और बातों को मिक्सचर करके सुनाने वाला, जिसको कहते हैं रस्सी को सांप बनाने वाला, बात कुछ भी नहीं है, इतनी सी बात बड़ी कर दी तो हमें ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करना है। इमेजीनेशन (अनुमान) से कोई भी बात सुनाना पाप है। जो हमने आंख से देखी नहीं, या दो महीने पहले देखी थी तो आज क्यों बोलते हैं। बड़ी सावधानी की सीढ़ी है। खबरदार, होशियार रहना है। इसलिए बीती बातों को लेकर उन बातों पर विश्वास करके चलना, जैसे रेत के ढेर पर चलना है। कई पूछते हैं सोल कान्सेस होते हैं तो स्थिति ठीक हो जाती है फिर दो मिनट बाद पता नहीं क्या हो जाता है, नीचे उतर जाते हैं, बातों ने उतार दिया। आदत है नीचे उतरने की। बातों को समाप्त करने की, समेटने की प्रैक्टिस सोल कॉन्सेस बनने में मदद करती है। पुराने अलबेलेपन के संस्कार, परचिन्तन करने के संस्कार न हों। सदा बाबा के साथ का अनुभव करते रहें। बाबा के साथ का अनुभव निर्भय बनाता है। विश्वास है, निश्चय है, बाबा कहते हैं बच्चों से भूलें तो हो जाती है लेकिन जो बच्चे बहुतकाल से श्रीमत पर चलने वाले हैं उनसे यदि इत्तफाक कोई भूल हो गई तो बाबा ठीक कर देते हैं। मनमत पर चलने वाले की भूल बाबा ठीक नहीं करते हैं। बाबा बच्चे की लाज रखते हैं। आखिर बाबा भी जानता है ना कि मेरा यह बच्चा बहुतकाल से श्रीमत पर चलता है। जिन बच्चों के अन्दर है कि मुझे तो बाबा का नाम बाला करना है, मुझे गलती नहीं करनी है- जो बहुतकाल से इस लगन में रहता है उससे इत्तफाक कुछ हुआ तो बाबा मदद करता है। तो सम्बन्ध में वफादारी और इमानदारी बहुत काम करती है। इमानदारी-वफादारी की शक्ति और बहुतकाल में बाबा का नाम बाला करने के लगन की शक्ति हमको निर्भय बनाती है। जिस कारण अपने को खुशनसीब समझकर गुप्त खुशी में नाच सकते हैं। तो अन्त समय ऐसी स्थिति हो जो 'मिरुआ मौत मलूका शिकार'। सबके रक्षक बनकर मेवामें हाज़िर रहें।
अव्यक्त वर्ष में रुहानी स्नेह और रुहानी दृष्टि से अपनी साक्षी स्थिति बनाते हुए चार प्रकार की सेवा में तत्पर रहा
एक मुरली के अन्दर बाबा कितनी प्वाइन्ट्स समझाता है ! जब पुरानी दुनिया और नई दुनिया का कान्ट्रास्ट पूरा समझ में आ जाता है तब जीवन परिवर्तन हो जाता है। जब तक ये दुनिया पुरानी नहीं लगती तब तक नई दुनिया में जाने के लिए पुरुषार्थ नहीं कर सकते। यह दुनिया न केवल पुरानी है लेकिन पराई है। वैसे भी विनाशी है, सब मरे पड़े हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग में ये शब्द नहीं कहेंगे, भले पता है शरीर विनाशी है, आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अब संगम पर कहते हैं सब मरे पड़े हैं। इसलिए जीते जी हम भी मरते हैं उनको भी मरा हुआ समझते हैं। अभी जीते जी मरना अच्छा लग रहा है। मरने से इन्सान डरता है। जीते जी मरने से मरने का डर निकल जाता है। सारा जीवन बदल जाता है। तभी तो बाबा के एडाप्टेड बच्चे बनते हैं। मरेंगे नहीं तो सुख कैसे महसूस होगा ? मरने के बिना यह खुशी नहीं आयेगी कि हम पारलौकिक मात-पिता के बच्चे हैं। पुरानी दुनिया से मरे तो लगाव टूट जाता है। बाबा के हम हो गये, बाबा हमारा हो गया। पहले हम बाबा के हैं, बाबा हमारा है इसमें अपरम्पार खुशी होती है। दुनिया से हम मर गये, उनके पालना के नीचे हम आ गये। न सिर्फ मरे हैं लेकिन जन्म भी लिया है। फिर जन्म जहाँ लिया है वहाँ पढ़ाई भी शुरु हो गई। जब तक अपने को बाबा के बच्चे नहीं समझते तब तक स्टूडेन्ट लाइफ का मज़ा नहीं आता है। पहले बच्चा छोटा होता है तो पढ़ता नहीं, बड़ा होकर पढ़ता है। किसी भी जन्म में ऐसे पढ़ाई नहीं पढ़ी है। भले स्कूल में हिस्ट्री, जाग्राफी पढ़ते हैं, लेकिन यहाँ वन्डरफुल हिस्ट्री, जाग्राफी पढ़ते हैं। झाड़ और गोले का चित्र अन्धों की आंख खोलने वाली हिस्ट्री, जाग्राफी है।
झाड़ को जितना अच्छी तरह देखो उतना बुद्धि फ्रेश हो जाती है। झाड़ को देखते ही नीचे बैठ जाओ लगेगा हम कल्प वृक्ष के नीचे तपस्या में बैठे हैं। आदि देव, मम्मा बाबा के साथ बैठे हैं। बाबा आता है हमको स्वर्ग में ले जाने के लिए। जो स्वर्ग में होगा वो नर्क में नहीं होगा। जब झाड़ पुराना हो जाता है वृद्धि होते होते जड़जड़ीभूत हो जाता है। जब झाड़ नया होता है तो इतनी टाल टालियां नहीं होती हैं। अब पुराने झाड़ का अन्त है। हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। बुद्धि में यह चिन्तन चले सतयुग में एक धर्म होगा, एक राज्य, एक भाषा होगी। जब हम अभी एक मात पिता के बच्चे बनेंगे तब सतयुग में देवता बनकर राज्य करेंगे। हम सीधा कलियुग से सतयुग में नहीं जा सकते हैं। पहले संगम में जाते हैं, फिर संगम से ऊपर जाते हैं फिर नीचे आते हैं। अभी हम सतयुग, त्रेता, द्वापर पार करके कलियुग के अन्त में हैं। हमको सतयुग के आदि का पता है, वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होगी, जो दुःख हो। यहाँ तो बच्चा मर जाता, पति मर जाता है तो कितने दुःखी होते हैं। बाबा कहते ऐसी दुःख की दुनिया में देह के सम्बन्धियों को भूलना है। एक तो सबको भूलो, दूसरा आत्म अभिमानी बनो, तीसरा तन-मन-धन समर्पण करो। जब सबको मरे हुए समझेंगे तभी आत्म अभिमानी बनेंगे।
महादानी बनना है तो तन-मन-धन समर्पण कर दो। भारत को स्वर्ग बनाने के लिए सब समर्पण करना है। बाबा बैठकर देखता है किसने किसको आप समान बनाया है। किसने भाषण किया है, किसने कोर्स कराया है - यह अलग है। लेकिन आप समान कितनों को बनाया है ? आप समान क्या बनाना है, आप समान कैसा बनाना है? ब्राह्मण हैं तो ब्राह्मणों का काम है आप समान बनाना।भूँ-भूँ करने में बड़ी मेहनत है। एक दूसरे के प्रति शुभचिन्तक रहना पड़ता है। आप समान बनाते बनाते एक-दूसरे के मोह में न आ जायें। भूँ-भूँ करते-करते और सब बातें भूल कर भी मोह में न आ जायें। जिस आत्मा के निमित्त बनते हैं उसे बाबा की याद दिलाने के निमित्त बनना है।
साक्षी होकर पार्ट बजाने से दूसरों को सीखने को मिलता है। पार्ट बजाते बुद्धि को बेहद में रखना है। किसी के भाव-स्वभाव में नहीं आना है। न किसी के प्रति घृणा रखनी है, न किसी के प्रभाव में आना है। न्यारे होकर, रुहानी स्नेह और रुहानी दृष्टि से अपनी स्थिति को ऐसा बनाकर आप समान बनाना है। मेरे ऊपर प्रभाव न पड़े, कोई मेरे पर प्रभावित न हो जाये इसमें खबरदार रहना है। बाबा के साथ सम्बन्ध जुड़ता जाये यह अन्दर से शुभ इच्छा रखनी है।
बाबा ने चार प्रकार की सेवा दी है। हमको चारों प्रकार की सेवा में अलर्ट और एक्यूरेट बनना है। पहली सेवा है स्वयं की, स्वयं की अगर सेवा ठीक करेंगे तो हम तन-मन से मजबूत रहेंगे। ब्राह्मण हैं ही सेवाधारी। नॉलेज मिली है सेवा करने के लिए तो ज्ञान और योग से अपने तन-मन को स्ट्रांग बना लेना है। ज्ञान-योग के आधार से उस सेवा में कहाँ तक सफल होते हैं यह चेक करो ? सदा अपनी सम्भाल करनी है। कई समझते हैं हमको किसी के अधीन नहीं रहना है, हमको निराधार होकर रहना है। किसी के अधीन रहना माना इसके बिगर हम कैसे चल सकेंगे ? व्यक्ति या कोई साधन या कोई सेवास्थान के अधीन नहीं बनना है। ऐसे नहीं कि इस शहर में मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहता है. इसके साथ अच्छा रहता है। लेकिन हम कहीं भी हैं अन्दर की स्थिति अच्छी हो। हमें किसी को अपने अन्डर नहीं रखना है। हम सब बाबा के बच्चे है कोई छोटा-बड़ा नहीं है। एक-दूसरे के प्रति रिगार्ड है। रिगार्ड देना हमारी सभ्यता है। यह नहीं हो कि मैं रिगार्ड क्यों दें, मैं छोटी तो नहीं है। स्नेह प्रेम से सबको रिगार्ड देना है। अपने आपको सिखाना यह अपनी सेवा है। फिर जिस स्थान पर रहते हैं, यज्ञ में रहते हैं, जो सेन्टर है वो हमारा यज्ञ है। उसकी जितनी सेवा हो सकती है उतनी सेवा करें। दधीचि ऋषि मिसल हड्डी सेवा करनी है। अगर मन से करेंगे तो हड्डी सेवा होगी। जो भी सेवा कर रहे हैं चाहे ज्ञान देने की या झाडू लगाने की सेवा हो, मन से करें, किसी को दिखाने के लिए नहीं। धन से करो या तन से करो लेकिन मन से करो। कई हैं जो तन से करते हैं, धन से करते हैं और मन कुछ और सोचता है यह सच्ची सेवा नहीं है। जहाँ भी सेवा करें मन से करें, यज्ञ सेवा है। जो भी बाबा के सेन्टर हैं वहाँ का वायुमण्डल ऐसा बनाना है जैसे बाबा का यज्ञ हो। जहाँ ज्ञान हो, योग हो, ब्रह्मा भोजन हो, अमृतवेले का वातावरण अच्छा हो, बाबा की याद हो छोटा हो या बड़ा सेन्टर हो लेकिन वातावरण हो। वह कैसे बनेगा ? मन से। तीसरी सेवा है आप समान बनाने की सेवा। जो स्वयं की अच्छी सेवा करता है, स्थान अच्छा बनाता है तो कइयों की इच्छा होगी हम भी यहाँ रहें। दो भी रहें तो ऐसे रहें जो दस भी कहें हम ऐसी लाइफ बनायें, फिर १०० को इच्छा होगी। हर सेवा स्थान पर बाबा का फोटो हो। जो समझते हैं कि बाबा का फोटो गुरु का फोटो है, वह बुद्धू है। वह बेटा किस काम का जो बाप का फोटो न रखे। ऐसे बुद्धू क्या सेवा करेंगे? बाबा और कोई गाली नहीं देता, जिसकी बुद्धि ठीक काम नहीं करेगी बाबा कहेगा यह बुद्धू है, माना कम बुद्धि वाला है। जो कहेगा मुरली तो वही रिपीट हो रही है, वह बुद्धू है। जो अंगूर तक नहीं पहुँच सकता वह कहेगा खट्टे हैं। जो मुरली की गहराई में नहीं जा सकते वो दूसरा को क्या सुनायेंगे। सेवाधारी बनना माना बुद्धिवान बनना, गहराई में जाना, अतीन्द्रिय सुख में रमण करना, मन कर्मन्द्रियों को अपने वश में रखना। सवेरे से रात्रि तक बाबा ने जो सिखाया है वह करना है तो आप समान राइट तरीके से बना सकेंगे, अधूरी सेवा नहीं करनी है। हम माया ही से युद्ध करते रहेंगे, संशय में रहेंगे तो दूसरों को आप समान कैसे बनायेंगे। यदि मेरे पास अशुद्ध संकल्प होगा, संशय होगा तो जो साथ में होंगे उनको वायब्रेशन जायेंगे। मेरे पास ब्रह्माभोजन के लिए रिगार्ड नहीं होगा तो दूसरों को क्या सिखायेंगे? ब्रह्माभोजन बड़े प्यार से बनाओ। एक मिनट भी बाबा को नहीं भूलो। क्योंकि जो खाये उसको बाबा याद आये। भोग लगाते समय बाबा की याद हो। याद में रहकर बनाया हुआ होगा तो बाबा बड़े प्यार से स्वीकार करेगा। जिसने प्यार से, रिगार्ड से बनाया होगा, उसको बाबा के प्यार का प्रवाह आयेगा। बाबा भोजन शुरु करता था तो पूछता था किसने बनाया है ? उसको बुलाकर प्यार से खिलाता था। फिर स्वयं स्वीकार करता था। जैसे अव्यक्त बाबा हमको खिलाता है हम उनको खिलाते हैं। हरेक का दिल होता है बाबा मेरे को खिलाये, मैं भी यह सुख लूँ। बाबा मेरे को भी दृष्टि दे।क्योंकि उनकी दृष्टि में अपरम्पार सुख है। बाबा दृष्टि देता है तो विदेही बन जाते हैं। बहुत अच्छा लगता है। किसी को ब्रह्मा भोजन खिलाओ उसे बताओ कौन-सा भोजन खा रहे हैं। उसके भी मन में भोजन के लिए रिगार्ड होना चाहिये।
चौथी सेवा है विश्व सेवा। वह भी मन्सा से है। खुद की करो, यज्ञ की करो, विश्व की करो, मन से करो। विश्व की बादशाही हम बच्चों को मिलती है। यह चारों सेवा एक समय एक साथ कर सकते हैं। अगर चारों प्रकार की सेवा मुझसे नहीं हो रही है तो हम बाबा के बच्चे किस काम के ? हमने बाबा को सदा एक जगह बैठे हुए देखा है। प्लेन में चढ़ते हुए नहीं देखा है। खुद विश्व का मालिक बन रहा है, हमको भी बना रहा है। एक ही कमरे के अन्दर बाबा तीन साल रहे। बस कमरे में थोड़ा बाहर घूमना। चारों सेवा एक साथ करते बाबा को देखा है। तन मन धन से तो की है लेकिन श्वास संकल्प से भी की है। कितना हम बच्चों को ऊंचा उठाने के लिए उम्मीद रखकर सेवा की है। बाबा उम्मीद रखता है बच्चे सब कुछ कर सकते हैं। तो हम भी अपने में नाउम्मीद न रहें। ग्रहचारी हटे तो आगे जा सकते हैं। रियलाइजेशन है तो परिवर्तन आ जायेगा। इसलिए बीती बात, कल की बात, न अपनी, न किसी की, दृष्टि-वृत्ति से खत्म। दृष्टि-वृत्ति में किसी की बात होगी तो सच्चे सेवाधारी नहीं। सच्चे दिल से सेवा करना माना दिल साफ। मम्मा-बाबा के दिल पर कुछ नहीं है। हम दिल पर कुछ रखेंगे लेकिन मम्मा-बाबा नहीं रखेंगे तभी तो प्यारे लगते हैं। फ्यूचर कैसा होगा, क्या होगा यह फिक्र नहीं है, बाबा बैठा है। अभी हमको क्या करना है। सेवा माना प्रेजेन्ट टाइम सफल होता रहे। तो यह अपना चार्ट अव्यक्त साल में देखना है। चारों प्रकार की सेवा हमारी स्थिति बनायेगी। स्थिति से सेवा होगी। सबूत से पता चलता है। अन्दर की स्थिति नीचे-ऊपर रहेगी तो सेवा की रिजल्ट नहीं निकलेगी। फिर सोचेंगे इतना माथा मारते हैं कोई रिजल्ट नहीं निकलती। स्टूडेन्ट नहीं आते हैं। मेरा अमृतवेला कैसा है, मेरा मुरली सुनने सुनाने का तरीका कैसा है? सुबह उठकर योग करो। सब भाग्यविधाता के घर आपेही आयेंगे। जैसा कर्म मैं करूंगी मुझे देख और भी करेंगे। बाबा ने यह बंधन दिया है। जो और करता है वह हम करेंगे, नहीं। हम जो करेंगे हमें देख और करेंगे। बाबा ने हमको करके सिखलाया है। हम करेंगे तो और सीखेंगे। बोलेंगे तो नहीं सीखेंगे लेकिन देखकर सीखेंगे, वायुमण्डल से सीखेंगे, स्नेह से सीखेंगे। बाबा ने सिखाने का तरीका भी हमको सिखाया है। बड़े प्यार से सिखाया है। दिल चाहता है बाबा को रिटर्न दूँ। बाबा इतनी हिम्मत के साथ मदद देता है तो करते हैं। पहले अपने को अपनी सेवा करके खुशनसीब बनाओ। कभी यह न हो मेरे भाग्य में क्या है ? ऐसा ख्याल आना भी अच्छा नहीं है। कमियां हो तो उसे निकालते जाओ। स्वयं की, यज्ञ की, ब्राह्मण परिवार की, विश्व की चारों सेवाओं में हमको एक्यूरेट रहना है। हम करेंगे तो हमको देखकर और करेंगे।
पवित्रता, सुख, शान्ति को कायम रखने के लिए ज्ञान की गहराई में जाना है, पवित्रता से ही रॉयल्टी आती है
शान्ति के अन्दर खुशी और पवित्रता हो। पवित्रता से शान्ति स्वधर्म में टिकना आसान हो जाता है। पवित्रता है तो शान्ति है। शान्ति और पवित्रता दोनों हैं तो खुशी अवश्य होगी। एक स्वधर्म की, दूसरी पवित्रता को पालन करने की। पवित्रता को पालन करो दूसरा स्वधर्म में टिको तो खुशी स्थाई रहेगी। पवित्रता है तो स्वधर्म में रहने के आदती बन जाते हैं, तो कुछ भी हो जाये कैसी भी बात आ जाये स्वधर्म में टिकते ही बात खत्म हो जाती है। स्वधर्म को छोड़ते हैं तो बात लम्बी - चौड़ी हो जाती है। स्वधर्म में टिकते हैं तो बात बड़ी सहज और हल्की हो जाती है। तो पवित्रता और शान्ति दोनों की गहराई में जाओ। ज्ञान तो लिया बाप का, आप कौन बाप कौन यह ज्ञान मिला, अब ज्ञान की गहराई में जाना है। ज्ञान के गहराई में चले जायेंगे तो पवित्रता, शान्ति और सुख सदा हमारे पास कायम रहेंगे। अभी कायम नहीं रहता है, परसेन्टेज रहती है उसका कारण है कि गहराई में नहीं गये हैं, उसकी वैल्यु का पता नहीं है।
ब्राह्मण कुल की आत्मायें जो देवता बनने वाली हैं, उनके लिए कुल की शोभा है पवित्रता। मन-वचन-कर्म से पवित्रता, अन्दर-बाहर पवित्रता। पवित्रता में ब्रह्मचर्य तो आता ही है, यह बड़ी बात नहीं है। बहन-भाई बन गये, एक परिवार के हो गये परन्तु आहार-विहार की शुद्धि भी पवित्रता की शक्ति को जमा करती है। रहन-सहन, सच्चाई-सफाई यह भी पवित्रता में मानी जाती है। अन्दर की सच्चाई और बाहर में सफाई यह खींचती है। यदि अन्दर में सच्चाई न हो, बाहर में सफाई न हो तो कैसा लगता है? पवित्रता वा सच्चाई-सफाई से रॉयल्टी आती है। रॉयल्टी कहाँ से आयेगी। हीरा-मोती, महल-माड़ी, अच्छे कपड़े हों- क्या इससे रॉयल्टी आयेगी या सिम्पल रहने में अच्छा सेम्पल बनने मे, सात्विक बनने में रॉयल्टी आयेगी। पवित्रता से लगता है अभी हम सर्वोत्तम ब्राह्मण है कल देवता बनेंगे। ऑर्डनगरी ब्राह्मण नहीं। पवित्रता हमारा श्रृंगार है। स्वधर्म में टिकने से स्वमान में रहते हैं। खुशी, गमी को खत्म कर देती है। बिगर कौड़ी बेगमपुर में रहने वाले बादशाह बन जाते हैं। सिन्धी में कहते हैं सफेद कपड़े खीसा खाली, हम है मुल्क के मालिक। प्रैक्टिकली बी. के. अपने को क्या समझते हैं ? कितना नशा है ! पहले लोग सफेद कपड़े से डरते थे, अब कितना मान हो गया है ! दूर से ही अच्छा लगता है। पहले प्रश्न पूछते थे सफेद कपड़े क्यों पहनते हैं? अब खुद ही बोलते हैं, अच्छे लगते हैं। बाबा ने सफेद कपड़े पहना कर, सात्विक भोजन खिलाकर कितना श्रेष्ठ बना दिया है। सभी को भाई-भाई की दृष्टि से देखें। सब एक परिवार है।
पहले समझते थे परमात्मा से मिलन की खुशी है लेकिन अब मधुबन में आते हैं तो एक-दो को देख खुश होते हैं। मधुबन में आते हैं तो लगता है सारे विश्व के बच्चे एक-दूसरे से मिलेंगे, संगठन की खुशी मिलती है। दुनिया के कोने-कोने से बाबा ने अपने बच्चों को चुन लिया है। भारत और विदेश को एक कर दिया है। किसी को यह कहना भी अच्छा नहीं लगता – मैं आस्ट्रेलिया का हूँ या वहाँ का हूँ। सब बाबा के बच्चे हैं, निमित्त वहाँ रहते हैं। आजकल सबका फेस एक जैसा हो गया है। सब असली भारतवासी हैं। असली देवता धर्म वाली आत्मा हैं तभी तो यहाँ बैठे हैं। जो बाबा सुना रहा है वह दिल को लग रहा है तभी तो बैठे हैं।
परसेन्टेज़ में पवित्रता, शान्ति, खुशी न हो, १०० परसेन्ट हो, एक परसेन्ट भी कम न हो। तीनों बातों पर हमारा अधिकार है तीनों इकट्ठी हों। कोई कहे शान्ति है, खुशी है लेकिन पवित्रता थोड़ी कम है, इम्प्योर संकल्प हैं, तो वह खुशी को कम कर देंगे खुशी को छीन लेंगे। दोनों इकट्ठे रह नहीं सकते, तीनों का आपस में बहुत गहरा कनेक्शन है। जब पवित्रता है तो बहुत खुशी आती है, हिम्मत वाले हैं, बाबा की मदद महसूस होती है, जब स्वधर्म में टिकते हैं तो भी बहुत अच्छा लगता है। बॉडी कॉन्सेस को छोड़ दिया। अब देह भान खींचे नहीं। मास्टर होकर चला रहे हैं। पर्सनैलिटी में मालिकपन हो जाता है। मालिक को खुशी है। जब गुलाम हैं तो खुशी हो नहीं सकती है। भले बड़े से बड़ा जॉब हो लेकिन फिर भी गुलाम हैं। मालिक, मालिक है। पर्सनालिटी में प्योरिटी, रॉयल्टी ले आती है। स्वधर्म में टिकने से धर्म की शक्ति आती है। गुलामी के, अधीनता के संस्कार चले जाते हैं। कोई भी परिस्थिति हमारी खुशी को मिटा नहीं सकती है। जैसे शुरु में गीत था बदल जाये दुनिया न बदलेंगे हम, दुनिया बदल जाये, हम नहीं बदलेंगे। आदि से यज्ञ के हिस्ट्री के अन्दर स्थापना के कार्य में कई विघ्न आये लेकिन विजय हुई शान्ति, पवित्रता, खुशी की। लोग कहते हैं इनको इतनी ख़ुशी कैसे मिलती है ! लोगों की खुशी आर्टीफिशियल है। हम गंभीरता को ले आते हैं। यह सूक्ष्म खुशी है।
अपने को चेक करना है मेरे पास सूक्ष्म खुशी इतनी है जो स्थूल खुशी के आधार पर लाइफ न हो। ऐसे नहीं शरीर, सम्बन्ध, सम्पत्ति किसी की कमी पड़े तो खुशी कम हो जायेगी। शरीर, सम्बन्ध, सम्पत्ति - तीन बातों पर खुशी का आधार है। यदि शरीर अस्वस्थ होगा तो चेहरे से नज़र आता है। सोचते हैं पहले बहुत काम कर सकते थे, अब नहीं कर सकते हैं। लेकिन मन से तो कर सकते हैं, मन तो ढीला नहीं हुआ है। तन भले ढीला हो जाये लेकिन मन मरने तक भी ढीला न हो। धन पहले था बहुत सेवा करते थे लेकिन अब धन नहीं है, लेकिन मन तो है ना, मन से सेवा करें। जिस पर हमारा हक लगता है वह सफल कर लिया। जो है वह बाबा का है, सिर्फ मुख से नहीं, मन से नहीं, लेकिन सेवा में लग गया है। सोचेंगे एक, करेंगे दूसरा तो हो जायेगा तीसरा। जो बाबा कराये वह करो। अभी बड़ा सहज तरीका है सामने जो सेवा आये, तुरन्त कर लेनी चाहिए। ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। सामने सेवा होते हुए सोचे नहीं। अभी टाइम वेस्ट करते बुद्धि इधर-उधर दौड़ाते हैं तो अन्त में बाबा कैसे याद आयेगा ? अभी जो कुछ करेंगे तो अन्त में काम में आयेगा। तो इसके लिए तीन बातें ख्याल में रहें अगर पवित्रता, शान्ति, खुशी सदा के लिए कायम रखनी है तो एक जो करेगा सो पायेगा। मेरे लिए और कोई नहीं करेगा। कोई मुझे वास्तव में रोक भी नहीं सकता है। जो करेंगे सो पायेंगे। अभी भी जो पास्ट में किया है वह पा रहे हैं। अभी जितना करेंगे, जो करेंगे उसी पर भविष्य प्रालब्ध आधारित है। ज्ञान-योग ऐसी चीज़ है जो प्रत्यक्ष फल देता है। ज्ञान-योग का प्रत्यक्ष फल खुशी है। प्रत्यक्ष पवित्रता, प्रत्यक्ष शान्ति, बड़ी प्यारी लगती है। करने से, सोचने से नहीं, करेंगे तो पायेंगे। पीछे पाने की बात अलग रही। करने से पाते हैं। जिस समय भी करते हैं उस समय सुख महसूस होता है, शान्ति महसूस होती है, पवित्रता क्या होती है, वह अनुभव होता है। दूसरा अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे ? तीसरा बाबा करा रहा है, ऐसे नहीं कि हम अपनी मत से कर रहे हैं। भगवान् स्वयं हमें सुमति देकर हमारे हाथों से करवा रहा है। स्वयं भगवान, भाग्य विधाता करवा रहा है। वह भी हमको भगवान भगवती बनाने के लिये करवा रहा है। तो यह सोचना चाहिए कि भगवान करवा रहा है और हम अपने लिये कर रहे हैं, यदि अभी नहीं करेंगे तो कब करेंगे ? यदि ये तीनों बातें बुद्धि में नहीं रहेंगी तो पवित्रता, शान्ति, खुशी जिस पर हमारा अधिकार है, वह कैसे आयेगी? भगवान के बच्चे बने हैं तो नम्बरवन में जाने के लिए विन करें। कभी यह ख्याल न आये कि सभी नम्बरवन तो नहीं होंगे। लेकिन यह बहुतकाल का ख्यालात हो कि मुझे नम्बरवन में जाना है। कभी भी यह ख्याल कमज़ोर न बने। बाबा लायक बना रहा है। जिन मणकों को बाबा ने दुनिया के कोने-कोने से चुन कर इकट्ठा किया उन्हें अब सिर्फ स्नेह के सूत्र से माला में पिरोने के लायक बनना है। स्नेह का सूत्र मजबूत होगा और मणका अच्छी क्वालिटी वाला होगा तो वैजयन्ती माला में आयेगा। कभी हार, कभी जीत वाली माला में नहीं आना है। मुझे ऐसी क्वालिटी वाला बनना है जो वैजयन्ती माला में आ जायें, उसमें भी पहले नम्बर में आना है।
फर्स्ट में कैसे आयेंगे ? फर्स्ट में आने वाले हर बात राइट करेंगे। उनसे कुछ रांग नहीं हो सकता है। मुझे माला में आना है तो हर संकल्प, वचन, कर्म सब राइट हों इसलिए बाबा कहते हैं अभी तक माला तैयार नहीं हुई है।
बाबा को हमेशा अच्छा लगता है देर से आया हुआ नज़दीक आ जाये। पुराने थोड़े अलबेले हो जाते हैं, देर से आने वाले को चिन्ता रहती है-जल्दी-जल्दी पुरुषार्थ करके आगे चला जाऊं। युद्ध में टाइम नहीं गंवाना है, निश्चय से विजयी बनना है। ज्ञान की गहराई में जाओ, निश्चय बुद्धि से प्रीत बुद्धि बनो। जितनी ज्ञान की गहराई में जायेंगे, निश्चय मजबूत हो जायेगा। जितना निश्चय मजबूत है उतनी प्रीत अटूट है। कभी बाबा के साथ प्रीत कम न हो। कभी यह नहीं सोचना है कि शायद बाबा से प्यार कम है। करने से आगे बढ़ते हैं, हिम्मत से आगे बढ़ते है, तो कभी भी हिम्मत से हार नहीं खानी है। हिम्मत से बाबा की बहुत मदद मिलती है। बाबा के मीठे-मीठे बोल वरदानों से भरे हुए अपने प्रति सुनते तो दिल से निकलता है वाह बाबा वाह, वाह ड्रामा वाह, जो बाबा ने इतना अच्छा अपने दिल पर बिठाने का भाग्य दिया है। ऐसे भाग्यवान बनने का अटेन्शन रखो तो बाबा दिल में समा लेता है। और कुछ नहीं करो, बाबा के दिल में समा जाओ। दिल में, मस्तक में, पवित्रता, शान्ति, खुशी के अलावा कुछ नहीं रहे। जिसको बाबा ने नज़रों से निहाल कर लिया उसकी नजरों में पवित्रता, शान्ति, खुशी के अलावा कुछ नहीं होगा।
अपने से पूछो सुबह से रात्रि तक हमारे श्वास-श्वास में बाबा कितने बारी निकलता है। ओम् शान्ति तो कई बार निकलता है। स्वधर्म में टिको तो ओम शान्ति। अन्त में कुछ नहीं होगा सिर्फ बाबा सामने होगा। जिस बाबा ने लवफुल, ब्लिसफुल, पीसपुल बनाया है वह बाबा ही सामने दिखाई पड़ेगा। औरों को भी कुछ दिखाई नहीं पड़ेगा। इतना जो खज़ाना मिल रहा है उसकी चाबी है बाबा। चाबी गुम हो गई तो टाइम चला जायेगा। कई हैं जो बार-बार चाबी गुम कर देते हैं। सम्भाल कर नहीं रख सकते हैं। चाबी गुम कर दी तो जैसे खुशी चली जायेगी, खोया-खोया लगेगा। बाबा है माना हाथों में चाबी है। तो पवित्रता, शान्ति, खुशी को बांटते रहो। बाप को कॉपी करना इज़ी है। कॉपी करने के लिए कुछ अपना करो, कुछ दूसरे का, तो भी एक्यूरेट कॉपी नहीं होगी। कॉपी भी करे तो एक्यूरेट करे जो पास विद ऑनर में आ जाये।
बाप समान बच्चों का काम क्या है ? हर कर्म बाप समान दिखाई पड़े, हर सोच विचार बाप समान हो। तो समय कहता है उसी अनुसार अटेन्शन रखो। जितना अटेन्शन रखते हैं उतना सहज आगे बढ़ते जा रहे हैं।
जो भी मधुबन में आये हैं वो ज्ञान की गहराई में जायें, अच्छी तरह से अपने को चेक करें, तीनों लकीरें ठीक लगी हैं। हमारी तकदीर में बाबा ने ऐसी लकीर खींच दी है। गहराई में जायेंगे तो पता चलेगा, जो कुछ कमो है उसे ज्ञान की शक्ति और योगबल से ठीक कर देंगे। जो बाबा समझा रहा है, समझ को काम में लगाने का तरीका मधुबन में सीख लेना है। गुप्त परिवर्तन की शक्ति आ गई, कमियों से फ्री हो गये। मधुबन में बहुत अच्छा चांस मिलता है। कई सुनते-सुनते थक जाते हैं लेकिन थको नहीं, हज़म भी करना है। मधुबन में जो सुना है वह बुद्धि में रखो, समय पर काम में आयेगा। थकने की आदत मधुबन में छोड़कर जानी है। कहाँ से भी थका हुआ हो, शरीर से, मन से, स्वभाव-संस्कार से कोई भी थकने की आदत छोड़कर जाना है। थकने वाले के पास खुशी नहीं होती है। उसको चिड़चिड़ापन आ जाता है। थकावट पवित्रता, शान्ति खुशी को भंग कर देती है।
श्रेष्ठ चरित्र स्वमान में रहने का साधन है, जिनका चरित्र अच्छा है उन्हें भगवान भी मदद वा प्यार करता है
बाबा हर बात बहुत स्पष्ट समझाता है ताकि हम अच्छी तरह से अपने आपको और बाप को पहचाने और ड्रामा को भी अच्छी तरह से जानें। बाबा रोज समझाता रहता है, बाबा के बनते हैं तो वह टीचर रूप में समझाता है। जब टीचर रूप में समझाता है तो एक दिन में नहीं समझायेगा, जब तक पूरे समझदार नहीं बने हैं तब तक बाबा समझाता रहता है। समझाता ऐसे है जो हम सेन्सेटिव भी न रहें, बेसमझी का काम भी न करें। कभी किसी की मत पर चलकर धोखे में आ जाते हैं। कभी भगवान जो समझाता है वह यूज़ नहीं करते हैं। कभी नाजुक होने के कारण बाबा जो समझा रहा है उस पर नहीं चल सकते हैं। इसलिए बाबा अपना समझकर रोज़-रोज़ समझाता रहता है। बाबा हमें अपना समझकर बड़े प्यार से समझने के लिये बड़ी अच्छी बुद्धि भी दे रहा है। पहले हमारी बुद्धि बाबा की बातों को समझने के लायक नहीं थी। पहले सोचते थे हमको इन बातों को समझने का इन्ट्रेस्ट नहीं है, टाइम नहीं है, अभी हमारी उम्र नहीं है। बाबा कहता है उम्र चाहे कुछ भी हो, इस ज्ञान की जरूरत है। बाबा इतनी समझ देता है। ऐसे नहीं कि बड़ी उम्र वालों को जरूरत है, छोटों को नहीं है। छोटों को भी जरूरत है। अच्छा जीवन जीने के लिए इस समझ की जरूरत है जो बाबा समझा रहा है। बाहर की बातों को जानने के लिए तो सारी उम्र दी है। अभी मेरे अन्दर क्या है, आत्मा को जानना या परमात्मा को जानना या सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जानना कितना आवश्यक है, उसके बिगर हम कैसे चलते थे- यह दिमाग को राइट सोचने का तरीका बाबा सिखला रहा है। दुनियावी बातें इंसान जितना जानता है, उसमें इगो आता जाता है। यहाँ जितना जानते जा रहे हैं उतना इगो खत्म होता जा रहा है। वहाँ समझदारी की निशानी है इगो। यहाँ इगो नहीं है। हम समझदार होकर अपना जीवन अच्छा बनायें यही लक्ष्य है। फिर हर बात में बाबा गुणवान व अच्छा चरित्र बनाने के लिये बाबा शिक्षा देता है। समझ जो मिली है वह जीवन में कैसे आये, उसके लिए बाबा शिक्षा देता है
हमारा चरित्र कैसे ऊंचा हो, उसके लिए बाबा ने कौन सी शिक्षा दी है? जितना इंसान का चरित्र ऊंचा बनता है उतना वह अनेकों का कल्याण करने के निमित्त बनता है। उनको भी अच्छा लगता है इनकी शिक्षाओं ने हमारे चरित्र को अच्छा बनाया है, तो एक तो समझारी मिलती है, दूसरा शिक्षा मिलती है, तीसरा बाबा एडवांस में समझ दे देते हैं- खबरदार होशियार।
बाबा कहते हैं एक्यूरेट बनने के लिए अलर्ट बनो। कभी सुस्त नहीं बनना, कभी व्यर्थ बातों में टाइम नहीं गंवाना है। कभी खराब संग में नहीं जाना है। कभी कोई परचिन्तन नहीं करना है। कभी अन्दर में कोई संशय नहीं ले आना है। संशय लायेंगे तो प्रीत बुद्धि नहीं बनेंगे। मधुबन में सुनने, देखने, जानने के लिए बहुत अच्छी बातें मिलती हैं। जब गंगा घाट पर जाते हैं तो कहीं आरती, कहीं कीर्तन, कहीं कोई माला लेकर बैठा रहता है, हरेक साधना करता रहता है। हम भी यहाँ सारा दिन कमाई कर रहे हैं।
हर एक इतना अपना भण्डारा भर लें, जो वहाँ जाकर बांटे। बाबा कहते हैं सागर से बादल भरकर जाते हैं, वर्षा करते हैं। छोटे-छोटे बादल कम वर्षा करते हैं। दुनिया के वायुमण्डल अनुसार हमको क्या करना है? ज्ञान सागर के कण्ठे पर आकर इतना भरपूर हो जाना है जो जाकर सबको शीतल कर दें। नीचे है सागर, ऊपर है सूर्य। बादल कैसे बनता है? सूर्य की सकाश चाहिए सागर से खींचने का तरीका चाहिए। ज्ञान सूर्य की सकाश लेते रहो, ज्ञान की गहराई में जाओ तो बादल बन जायेंगे। जहाँ जरूरत होगी वहाँ वर्षा करेंगे, तो कनेक्शन दोनों से हो। बाप हमारा ज्ञान सूर्य भी है, ज्ञान का सागर भी है। जितना गहराई में जाओ, पावन होते जायेंगे। गंगा टुबकी लगाते समय कान भी बन्द करते हैं, नाक भी बन्द करते हैं फिर अन्दर चले जाते हैं, तो अब अंतर्मुखी हो बाहर की बातें देखना व सुनना बन्द कर दो। खुद ज्ञान की गहराई में चले जाओ। तो न हम बाहर वालों को देख सकते, न बाहर वाले हमको देख सकते। टुबकी सच्ची तब लगाते हैं जब कान नाक बन्द कर देते है। फ़ालतू बातें सुनेंगे तो टुबकी नहीं लगा सकेंगे। टुबकी लगाने बिगर शान्ति प्रेम का अनुभव नहीं कर सकेंगे। इसलिए ज्ञान की गहराई में जाओ।
बाहर की दुनिया कितनी बड़ी है यह हरेक बुद्धि द्वारा देख सकता है, जान सकता है। जितना समझदार होता जाता है, बाहर की दुनिया को जानता जाता है। जो बातें कभी नहीं देखते थे, जानते थे वह अब टी.वी. द्वारा देख लेते हैं। जान लेते हैं। अन्दर भी एक बड़ी दुनिया है। जो दुनिया अन्दर है उसको अच्छी तरह से देखो। जिस दुनिया की अब हम स्थापना कर रहे हैं वह दुनिया बड़ी न्यारी और अति प्यारी दुनिया है। सुख शान्ति प्रेम वाली दुनिया की स्थापना कर रहे हैं। कैसे कर रहे हैं? जब परमात्मा बाप से ज्ञान-प्रेम वाली बुद्धि मिली है। हम अन्दर की दुनिया के मालिक हैं। जितनी नॉलेज आती जा रही है, नशा चढ़ रहा है हम सतयुग के प्रिन्स-प्रिन्सेस बन रहे हैं। अन्दर की दुनिया में कमाई है, बाहर की दुनिया में गंवाना है। बाहर की दुनिया में उल्टे कर्म हो जाते हैं। संग दोष में, लोभ लालच में कर लेते हैं। करने के समय सोचते नहीं है कि रांग कर्म कर रहे हैं। फिर जब उसकी भोगना होती है तब किसी को दोषी नहीं बना सकते हैं। भले किसी संग दोष में किया हो लेकिन भोगना के समय तो हम दोषी हैं, हम ही उल्टे संग में गये हैं।
अन्दर की श्रेष्ठ दुनिया बनाने के लिए हमको जो शिक्षाएं, समझानी मिल रही है, उसी अनुसार हम अपने अन्दर में देखें, अपने को मनमनाभव बनायें। अपनी प्रालब्ध बनाने के लिए अन्तरमन चाहता है मैं पुरुषार्थ करूँ। बिल्कुल पॉज़िटिव सोचने का तरीका बाबा ने सिखाया है। चिन्ता से फ्री होकर, श्रेष्ठ विचारों में रमण करना बाबा ने सिखाया है, जिससे हमारी मनन शक्ति बढ़े। इसलिए बाबा कहता है विचार सागर मंथन करो। मंथन करने का तरीका चाहिए इससे मक्खन मिलेगा, शक्ति मिलेगी। फिर शिक्षाओं पर ध्यान देना है। इससे लाइफ में सेफ्टी है। कइयों का अटेन्शन है मेरा चरित्र अच्छा है।चरित्र बाबा का नाम बाला करेगा। चरित्र हमको भी स्वमान में रहने देगा। स्वमान में नहीं रहते, कारण क्या है ? चरित्र पर ध्यान नहीं है। बहुतकाल से चरित्र अच्छा है तो कोई अंगुली नहीं उठा सकता है। जिनका चरित्र अच्छा है भगवान् भी उनको मदद करता है, प्यार करता है। अनेकों को प्रेरणा देने के कारण अनेकों से दुआयें मिलती हैं। यह भी एक लगन है। एक तो मुझे सर्वशक्तिमान् बाप को अच्छी तरह याद करते करते बुद्धियोग द्वारा शक्ति जमा करनी है जिससे मेरे सर्व विकार खत्म हो जायें। यह भी लगन हो जो मेरा चरित्र अच्छा बने। अभी यह फीलिंग आये कि मैं देवता बनने वाली आत्मा हूँ, भले प्रैक्टिकल में सतयुगी दुनिया बाद में आयेगी लेकिन अभी चरित्र के द्वारा, योग के द्वारा आत्मा से आवाज़ आये। बुद्धि में कोई बात टिकती नहीं है। कोई भी बात काम लायक हुई तो समेट कर सेकण्ड में साइलेन्स में चले जायें। कइयों को जब तक अभ्यास पड़े, पहले आधा घण्टा लगेगा, १० मिनट लगेंगे फिर सेकण्ड में साइलेन्स का अभ्यास हो जायेगा। लेकिन ऐसा अभ्यास करने की अन्दर से इच्छा हो। बाबा ने कहा है सेकण्ड में साइलेन्स में चले जाओ। जैसे टीचर कहता है हैन्ड्स अप तो बच्चे हैन्ड्स अप करते हैं। ऐसे एक सेकण्ड में घर में चले जाओ। घर का हमको पूरा पता चल गया है। निर्वाणधाम मेरा घर है। आत्मा निराकारी दुनिया में रहती है जहाँ ये सूर्य चन्द्रमा की रोशनी नहीं है। वन्डरफुल रोशनी है। वहाँ अंधकार नहीं होता। यहाँ अंधकार होता है। गाते हैं तुम्हें पा के हमने जहां पा लिया। लेकिन जहाँ तो क्या परमधाम भी पा लिया है। हमारा घर कैसा है ? हमारा शान्ति का सागर परमात्मा कैसा है, तो हम भी शान्ति में चले जायें डीप में चले जायें, परन्तु यह तब होगा जब अन्तर्मुखता में रहने की, निमित्त मात्र बाहर आने की समझ काम में लायें। जितनी समझ काम में ले आयेंगे उतना ही लगेगा कि मेरा भटकना छूट गया है। एकाग्रता अच्छी लगती है, फिर एकान्तप्रिय हो जाते हैं। बहुतों के बीच में होते हुए भी मैं आत्मा ईश्वर की सन्तान हूँ - यह स्मृति भूलती नहीं, और बातें एक सेकण्ड में भूल जायें। श्रेष्ठ स्मृति पुरानी बातों को भूलने की शक्ति देती है।
फ़रिश्ता बनने के लिए इगो लेस (निरहंकारी) बनो, इगोलेस बनने के पहले वाइसलेस (पवित्र) और बॉडीलेस (अशरीरी) बनो
भरली रुह को राहत देने वाली है। इस बात का वन्डर लगता है बाबा हम आत्माओं के सदृश्य चक्र में आता भी नहीं लेकिन हम आत्माओं के दिलों को कैसे जानता है ? हम फुल चक्र में आने वाली आत्माओं के दिल में क्या है. सब बातें हम आत्माओं को बताता है। वो चक्कर में नहीं आता, उसका पार्ट बहुत थोड़ा है, मुसाफिर बनकर आता है, दूरदेश से आता है, इस देश में रहता भी नहीं तो हमारे दिल को कैसे जानता है ? हम एक दूसरे के दिल को नहीं जानते हैं। अपने दिल को भी नहीं जानते हैं। हमारे दिल में क्या है यह हम भी गहराई से नहीं समझ सकते हैं।
१- सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है इगोलेस बनने में। इगो छोड़ता नहीं है। हमारे सफर में साथ-साथ इगो भी चलता है। नष्टोमोहा बनना है या इगो लेस बनना है ? नष्टोमोहा और स्मृतिलब्धा का आपस में गहरा सम्बन्ध है। अपने संस्कारों के साथ हमारा अटैचमेन्ट हैं। देह से अटैचमेन्ट छूट गई। सम्बन्धों से भी छूट गई परन्तु अन्दर संस्कार में जो भरी हुई है, तो इगो अटैचमेन्ट छोड़ने नहीं देता है पकड़कर बैठता है, जिसका हमको पता नहीं पड़ता, बाबा को पता है सो निकालकर सूक्ष्म कर देता है। हम सबको यह तो पता है कि देह सम्बन्ध से जिसका रिश्ता नहीं है, वही फ़रिश्ता बनेगा। मोटे रूप में यह बात समझते थे। लेकिन अभी जब फ़रिश्ता बनने का लक्ष्य रखा है, उन लक्षणों को सामने रखते हैं तो फ़रिश्ता बनना कठिन लगता है। अभी संस्कारों के साथ सूक्ष्म गहरा कनेक्शन है, जो हमारे कर्मों के अनुसार पूर्व जन्मों के संस्कार बने हैं ज्ञान में चलते-चलते जो संस्कार बनते हैं तो संस्कार के लिए बाबा ने बताया कि जैसे तुम्हारे संस्कार होंगे वैसे संस्कार प्रजा में भी आयेंगे।
जैसे मैं ईश्वरीय सन्तान हूँ, जैसे माता-पिता के संस्कार उसकी रचना में आते हैं। ऐसे हम जिनके निमित्त बनते हैं उनमें हमारे संस्कार आ जायेंगे। जैसे कर्म हम करेंगे हमें देख और करेंगे, जितने ईश्वरीय संस्कार हमारे में पड़ेंगे वैसे औरों में पड़ेंगे। पहले कर्म पर अटेन्शन था, हमारे से कोई ऐसा रांग कर्म न हो, जो हो मर्यादा के अनुकुल हो। मंज़िल पर चलना है, मुसाफ़िर आया है लेने उसके साथ जाना है तो श्रीमत पर चलना होगा, मनमत पर नहीं या किसी और के मत पर चले तो मुसाफिर के साथ नहीं जा सकेंगे। वह आया है पावन बनाने, पावन बना रहा है, ले जा रहा है। हमारे संकल्प से, वचन से, कर्म से जो संस्कार बनता है वह मज़बूत हो जाता है, पक्का हो जाता है। तो संकल्प में पहले अन्दर यह लक्ष्य हो कि हमको इगो लेस बनने के पहले वाइसलेस बनना है। वाइसलेस बनने के लिए अन्दर धुन लगी रहे मुझे बॉडीलेस बनना है, अशरीरी बनना है। विकारी काम देह से, सम्बन्ध से किया है वो संस्कार अन्दर चले गये हैं। देह वही है, संबंध वही हैं, दुनिया वही है, जिसमें हम विशश बने, बाबा वाइसलेस बना रहा है। बुद्धि से विकारों को निकालने कीसमझ मिली है। हमें अपने मन-बुद्धि पर अटेन्शन देना है। मन को शुद्ध बनाना है। बुद्धि को बाबा समझ दे रहा है, ज्ञान दे रहा है, तो मन से इच्छा-ममता मर जाये ऐसा पुरुषार्थ करो।
जीते जी मरना किसको कहा जाता है? जो इच्छा-ममता अन्दर में है उसको ज्ञान योग की शक्ति से मारें, तो बुद्धि में ज्ञान भी है और योग भी लगा सकती है। बुद्धि अच्छी है, मन वृत्ति को साफ करके बुद्धि काम कर सकती है, योग भी लगा सकती है। फिर संस्कार इन्टरफियर करेंगे तो बुद्धि उनको रोकती है तुम चुप हो जाओ, शान्त हो जाओ। लक्ष्य जो मिला हुआ है उस लक्षण को लाना चाहती है। यह बुद्धि दृढ़ संकल्प कर रही है। तुम मूंझो नहीं, घबराओ नहीं, डिप्रेशन में नहीं आओ। घड़ी घड़ी ऊपर चढ़ते हैं, नीचे उतरते हैं। बुद्धि के दृढ़ संकल्प से, लक्ष्य को पक्का रखकर लक्षण को लाने की धुन ज्ञान में लगे रहें। पास्ट के कोई संस्कार आते हैं तो उन्हें अवाइड करो, सुनी-अनसुनी करो। जैसे बाबा हमेशा मिसाल देता है सीता के सामने रावण आता था तो वह राम की तरफ मुख कर देती थी। माया यहाँ वहाँ कई तरीके से कभी नाक से, कभी कान से पकड़ेगी लेकिन उसमें घबराना नहीं है। मुख्य बात है माया उसके ऊपर ज्यादा अटैक करती है जो घबराता है। यदि वह देखती है कि यह मजबूत है तो वह घबराती है, छोड़ेगी नहीं जब तक हम पूरे मज़बूत नहीं बने हैं। महावीर बनना है तो दिल में बाप को बिठाना है, उसके चरणों में रहना है, माना हाँ जी का पाठ पक्का करना है। बेहोश को होश में लाना, बिछुड़े हुए को मिलाना - यह महावीर का काम है। एक बाप मेरा साथी है, उसको सखा भी समझना है तो स्वामी भी समझना है। इतना ऊंचे से ऊंचा भगवान् मेरा फ्रेन्ड है, सखा है, कम बात है क्या ! इतना ऊंचे ते ऊंचे परमात्मा बाप हमें हाथ से पकड़कर साथ ले जा रहे हैं, साथी बनाकर कार्य करा रहे हैं। कितना भी ऊंचा काम है बाबा जो कराये उसमें खुशी होती है। हनुमान के हाथ में पहाड़ दिखाते हैं, कृष्ण के हाथ में ग्लोब है। छोटी-छोटी बात को पहाड़ मत बनाओ। जो छोटी-छोटी बात को पहाड़ बनाता है वह भारी हो जाता है। वह फिर बैठकर रोता है। यह प्यादे की क्वालिटी है।
हमें अपने पुरुषार्थ की प्वाइन्ट भूलनी नहीं चाहिए। बाबा कहते हैं महावीर वो है जो पहाड़ को राई बना दे। घुड़सवार को छोटी बात बड़ी लगती है, वह राई नहीं बना सकता। प्यादा राई को पहाड़ बना देता है। महारथी पहाड़ को राई बना देता है। घुड़सवार बीच में रह जाता है – क्या करूँ, कैसे करूं ? तो हम अपने में यह लक्षण लायें जो पहाड़ को राई बना दें, नथिंग न्यु, सब अच्छा हो जायेगा, बाबा बैठा है। हर बात में हमारा शुभ, दृढ़ संकल्प काम करता है। माया आये तब हम अच्छे विचार करने का ख्याल करेंगे तो थकावट हो जायेगी, खुशी नहीं होगी। सदा खुशी की खुराक खाने की आदत हो। जो रॉयल लोग होते हैं वो थोड़ा खाते हैं लेकिन शक्तिशाली खाते हैं वो लोभ वश जीभ तृष्णा वश नहीं खाते। तो हमारे अन्दर इच्छा-तृष्णा नहीं होनी चाहिये। मन को, बुद्धि को अच्छी खुराक दें जिससे हमारे में महारथीपन के लक्षण आयें। लक्ष्य है लेकिन लक्षण कम हैं वो लक्षण हमारे में आयें, पहला लक्षण तो यह है - सदा बाप का संग हो। कोई भी देहधारी के तरफ जरा भी झुकाव नहीं हो। वह झुकाव ऊंच विचारों में रमण नहीं करने देगा। वह झुकाव बुद्धि को डेमेज कर देगा। जब डेमेज है तो हजम नहीं होता है। मुरली अच्छी नहीं लगेगी, कहेंगे, हम तो थक जाते हैं। योग नहीं लगेगा। योग के समय दिल में कुछ होता रहेगा, सिर में कुछ होता रहेगा। ज्ञान से प्रीत नहीं होगी, बुद्धि में समथिंग रांग है। तो ये आइना मिलता है – रोज़ अपने आपको देखने के लिये। ज्ञान-योग धारणा जरा भी कठिन लगे तो समथिंग रांग है। उस गाड़ी को चलाना नहीं है, नहीं तो एक्सीडेंट हो जायेगा। इसलिए बाबा श्रीमत समझाकर हमको चलने की शक्ति दे रहा है।
ज्ञान योग को अन्दर से धारण करने की लगन हो। फिर जो संस्कार दुःख देते हैं, राइट नहीं लगते हैं। उनको भी चेंज करना है। समथिंग रांग है तो भी उन्हें खत्म करना है। यह नहीं सोचना है कि मेरे से और भी खराब हैं। लूज़ नहीं छोड़ देना है। यदि अंश भी होगा तो बहुत बड़ा रूप ले लेगा। हमारा पद कम कर देगा। तो बाबा हमारे अन्दर की सारी मुश्किलातों को जानते हैं। हमारे अन्तर को जानकर हमको बताकर हमारी आंख खोल देते हैं। दिल कहता है सदा ही हमारी आंख खुली रहे। ये बातें हमारे कानों में गूंजती रहें।जब बाबा की बातें हमारे कानों में गूंजती रहे तब पता चले बाबा से हमारी कितनी प्रीत है ! बाबा के सिवाए कोई बात बुद्धि में नहीं आये। बुद्धि हमको बहुत मदद कर सकती है। अपने मन की बातों को स्वीकार न करो। तब बुद्धि योग लगा सकती है। योग से शक्ति मिलती है। तो फरिश्ता बनने के पहले वाइसलेस बनो, वाइसलेस बनने के लिए इगो लेस बनो, इगो लेस बनने से अशरीरी निराकारी बनेंगे।
हम आत्मायें वहाँ से आती हैं। आने जाने में सेकण्ड लगता है। परन्तु अभी सेकण्ड-सेकण्ड जो बीत रहा है, उसमें हम पावन बनेंगे तो जाने में सेकण्ड लगेगा। हम कम्पलीट पावन बनकर जाये, लक्ष्य भूले नहीं। कोई लक्षण नही है तो अभी उन्हें लाओ। समझ और रियलाइज़ेशन से लक्षण आयेंगे।
सूक्ष्म वृत्ति में रहम, स्नेह और क्षमा भरी हो तो सबको अच्छे वायब्रेशन आयेंगे, यह भी गुप्त पुण्य है
हम सबने रत्नागर बाबा से सौदा किया है। वो हमको ज्ञान रत्नों से खेलना कमाई करना सिखलाते हैं। दुनिया में जिसके पास हीरे-जवाहरात होंगे उनको कितना अभिमान होगा परन्तु वो जायेंगे खाली हाथ।
हम सब बाबा के बच्चे हैं बाबा हमको जो ज्ञान रत्न देता है वह हमने अपने दिल, मन में समा लिया है तो साथ लेकर जायेंगे। बाबा ने जो दिया है वह जन्म-जन्मान्तर साथ रहेगा। इसलिए बाबा से बहुत प्यार है, अति प्यार है। पहले दो आंखे होते हुए भी जैसे नयनहीन थे अब तीसरी आंख खुलने से दो आंखों से भी क्या देखना है, वह समझ आ गई है। इन आंखों से जो कुछ देखते आ रहे हैं उसका मन पर, दिल पर क्या इफेक्ट आता है? बहुत काल का दुःख और अल्पकाल का सुख। अभी तीसरा नेत्र मिला है तो इन आंखों से देखने की रुहानी दृष्टि हो गई है। सृष्टि को बदलने के लिए वृति भी बड़ी शुद्ध साफ हो गई है। दृष्टि, वृत्ति, वाणी, वायब्रेशन चारों में से एक भी कमज़ोर न हो। अब इन आंखों से दुनिया को बदलने के लिये देखते हैं। कान सुनते वो हैं जिससे दृष्टि-वृत्ति श्रेष्ठ बने। बाकी बातें नहीं सुनते हैं। यदि बाहर से प्योरिटी दिखायें और अन्दर कुछ और हो तो क्या होगा ? बड़ा रूप ले लेगा। अन्दर बाहर साफ। प्योरिटी माना अन्दर भी एकदम साफ। बाबा सब जानता है। बाबा से कुछ छिपा हुआ नहीं है। अन्दर बाहर साफ है तो सबको वायब्रेशन आयेंगे कि यह साफ दिल है, इसके मन में खोट नहीं है, किसी के लिए द्वेष भाव नहीं है। मन की सच्चाई-सफाई पर विचार करो, सच्चाई पहले या सफाई पहले ? पहले सफाई फिर पता चलता है सच्चाई क्या है। सच्चे बाप को हाथ दिया है, सच ज्ञान सुन रहे हैं, सच मार्ग पर चल रहे हैं, सच खण्ड के मालिक बन रहे हैं। अन्दर सच्चाई हो तो सच की वैल्यु का पता चलता है। फिर झूठ खत्म हो जाता। जहाँ सच है वहाँ झूठ रह नहीं सकता, जहाँ झूठ है वहाँ सच रह नहीं सकता है। झूठ में तो ताकत ही नहीं है। सच, सच है। सच्चा खुशी में नाचता है।
एंजिल को धरती की अट्रेक्शन नहीं है। धरती खींच नहीं सकती। हम पहले धरती पर बोझ थे। अब हम धरती का बोझ हल्का कर रहे हैं। वृत्ति से वायब्रेशन बनेंगे। अच्छे वायब्रेशन में रहने वाले, अच्छे वायब्रेशन फैलाने वाले बनो। किसी के भी प्रति बुरे वायब्रेशन नहीं हों। वायब्रेशन कहाँ से बनते हैं ? मन और वृत्ति से। मन वा वृत्ति में कोई भी बात का वायब्रेशन बैठा हुआ न हो। अपने कल्याण अर्थ अपनी मन-बुद्धि साफ रखनी है। मेरे से औरों को अच्छा वायब्रेशन आये। यह गुप्त पुण्य कर्म करना है। ऐसे गुप्त पुण्य कर्म करने के संकल्प उसको आयेंगे जो समझते कि मैं ईश्वर की सन्तान हूँ। यह सारा मेरा परिवार है। अन्दर सूक्ष्म वृत्ति में रहम, स्नेह, क्षमा भरी हुई हो तो सबको अच्छे वायब्रेशन अपने आप आयेंगे। यह गुप्त पुण्य कर्म है।
मन के संकल्प से पता चलता है वृत्ति में क्या है। यदि सबका भला हम करेंगे तो हमारा भला भगवान करेगा। जो औरों का दुःख दूर करने वाले हैं उनके दुःख भगवान दूर कर देता है। मददगारों को मदद करेगा। मददगार वह जो दूसरों का दुःख दूर करते रहते हैं। यह भी सोच नहीं हो कि उसने दुःख लिया क्यों, या दिया क्यों ? नम्बरवन में वह आयेंगे जो क्यों क्या के क्वेश्चन में टाइम नहीं गंवाते। हमारे अन्दर रहम, स्नेह की भावना काम करे। मंज़िल ऊंची है। हम अकेले जाकर क्या करेंगे। साथ में जाना है। हम जा रहे हैं, बाबा ले जा रहा है, बाबा साथ है। इतने वायब्रेशन पावरफुल हो जो औरों को भी साथ चलने की प्रेरणा मिले। बाबा ने जो भी गुप्त सेवा वृत्ति, वायब्रेशन, वाणी, दृष्टि से दी है कभी अपने को बैठकर देखो हमारी आंखे कैसी हैं ? बाप को, खुद को, परिवार को कैसे देखती हैं ? जो बाप को नहीं जानते हैं उनको भी किस दृष्टि से देखते हैं ? अपनी आंखों से पूछो, दृष्टि से पूछो तुम कैसे देखती हो ? दृष्टि से पूछेंगे फिर वृत्ति से पूछेंगे। दृष्टि-वृत्ति एक-दूसरे के नज़दीक हैं। वृत्ति में सच्चाई-सफाई नहीं है तो नहीं देख सकते हैं। किचरा है तो नहीं देख सकते। यदि आंख में किचरा पड़ जाता है तो कितना दुःख होता है। यदि वृत्ति में कुछ चला जाता है तो दुःख हर्ता बाप के बच्चे नहीं बन सकते हैं। तो वृत्ति में कुछ चला नहीं जाये। जैसे शरीर के सब अंगों में ज्यादा रक्षा आंखों की करते हैं। नूर है तो जहान है, नूर नहीं तो जहान काम का नहीं। ऐसे वृत्ति साफ है, सबका भला सोचने वाली है तो सच्चे सेवाधारी हैं, नहीं तो बाबा के काम के नहीं है। काम कर रहे हैं, बाबा करा भी रहा है। बाबा के जितने काम के बच्चे हम होने चाहिए उतने ही काम के बनें। जैसे माली अपने फूलों को देखता है, वायब्रेशन भरता है ऐसे बाबा भी हमको दृष्टि देकर फूल बना रहा है। जंगल में रहने वालों को फूल बनाता है। ऐसे फूल बनो जो हरेक देख खुश हो जाये। अपने आपसे पूछो मैं कौन-सा फूल हूँ ? बाबा के साथ अच्छा बगीचा बनाने में मददगार हूँ ? बाकी ऐसा नहीं सोचो कि मैं तो काम की ही नहीं हूँ, योग्य नहीं हूँ, ऐसे सोचकर डिप्रेशन में नहीं आना है। दिलशिकस्त होते हैं तो डाउन हो जाते हैं। औरों से भेंट करते तो या तो इगो आता है या तो स्वमान से नीचे उतर आते हैं तो किसी से भेंट नहीं करना हैं। बाबा को मुझसे क्या चाहिए? उमंग-उल्लास में रहने से बाबा के सामने जब जायेंगे तो बाबा कोई न कोई अच्छी प्रेरणा दे देगा। हमारे में करने की शक्ति भी भर देगा। मैं नहीं कर सकती यह क्वेश्चन ही नहीं उठे।
बाबा जब सेवा देता है तो सर्व शक्ति भी देता है, न कि सिर्फ डायरेक्शन देता है। अनुभव होता है बाबा शक्ति भी देता है। तो एक योग लगाने से शक्ति मिलती है, दूसरा सदा मर्यादाओं को पालन करने से शक्ति जमा होती है, तीसरा निष्काम सेवा, सच्ची दिल से सेवा करने में शक्ति मिलती है, चौथा ईश्वरीय परिवार के स्नेह के सूत्र में बंधने से शक्ति मिलती है, पांचवा निरन्तर हिम्मत, उमंग-उल्लास में रहने से शक्ति मिलती है, छठा खुद को, ईश्वरीय परिवार को, बाप को सदा अपना मित्र जानने से शक्ति मिलती है। मेरा कोई शत्रु है ही नहीं। कभी भी कोई ख्याल न आए मेरा कोई शत्रु है। हम अपना मित्र आप हैं। न किसी के चढ़ाने से हम चढ़ते हैं, न किसी के गिराने से हम गिरते हैं। यदि हम सोचें कि कोई मुझको सपोर्ट दे, इस प्रकार के ख्यालात श्रेष्ठ विचारों की शक्ति जमा नहीं करने देते। श्रेष्ठ पुरुषार्थ के लक्षण धारण करने नहीं देते।
श्रेष्ठ पुरुषार्थ के लक्षण क्या हैं यह लिस्ट बनाओ। वो अन्दर से अचल-अडोल रहता है। छोटी-मोटी बातों की हलचल में नहीं आता है।कोई हिलाता है तो हिलता नहीं। हिलते वो नहीं जो अन्दर से बैठकर अपना फाउन्डेशन मज़बूत करते हैं। श्रेष्ठ पुरुषार्थी वो जो गुप्त योगी बनकर अपना फाउन्डेशन मज़बूत रखे। कोई भी बिल्डिंग बनती है, आधार है फाउन्डेशन। खूब डीप खोदते हैं। जो ज्ञान के गहराई में जाता है, फाउन्डेशन मज़बूत करता है, उसका किया हुआ पुरुषार्थ सदा काम में आता है। तो पहले फाउन्डेशन को मज़बूत बनाने से अच्छी इमारत बन जायेगी। फाउन्डेशन मज़बूत है तो किसी भी कारण से हिलेंगे नहीं। यह मेहनत स्वयं को करनी है। निमित्त संगठन का आधार, परिवार का आधार है। नाम के भिखारी मत बनो। मेरा नाम नहीं आता, मेरा रोल नहीं है। ऐसा सोचने वाला सोल कान्सेस नहीं बन सकता है। रोल कान्सेस टाइम वेस्ट करता है। मुझे पता होना चाहिए - मेरा रोल क्या है ? इस तरीके से पुरुषार्थ करने वाला श्रेष्ठ पुरुषार्थी नहीं माना जा सकता है। वह श्रेष्ठ पुरुषार्थ के लक्षण अपने में नहीं ला सकता है। ऐसा फील करो जो बाबा दे रहा है वह साथ लेकर जा रहे हैं। जो वहाँ सेवा में काम में आता रहेगा। मुख्य चेक करना है संकल्प और वृत्ति को जिससे दृष्टि भो श्रेष्ठ बने।
बाबा को हम कितने अच्छे दिखाई पड़ते हैं ? बाबा कभी नहीं कहेगा तुम अच्छे नहीं हो। बहुत अच्छे-अच्छे कहकर फिर कान पकड़ेगा। चतुरसुजान बड़े प्यार से समझाता है। डांटता नहीं है। अपना बनाकर समझाता है। बाबा की यही इच्छा है, सब मेरे बनकर रहें। बाप से नहीं डरें। तभी तो मात-पिता, सखा-साजन का रूप धारण किया है। बाबा कहता है डरो मत। सखा के संग में आयेंगे तो सुधर जायेंगे।
बाबा होशियार धोबी है हमको अच्छी तरह से साफ करता है। जैसे बाबा करता है वैसा हमको करना है। और क्या करते हैं यह नहीं देखना है। सुबह से रात्रि तक मेरी दृष्टि क्या-क्या काम करती है- यह भी चेक करना है। अच्छा।
ज्ञानी माना सुखदेव, जो किसी के अवगुण न देखता, न सुनता न वर्णन करता, न दिल में रखता
संगमयुग है खुद को महिमा योग्य बनाने के लिए। बाबा की महिमा का गीत गाने का युग। महिमा माना क्या ? इतनी योग्यता हो जो हरेक के दिल से दुआओं भरी महिमा निकले और महिमा योग्य बनाने वाले की याद आने लगे। हमारी महिमा न करे लेकिन जिसने ऐसा बनाया उनकी महिमा करने लग पड़े। मधुबन में क्या छोड़ कर जाना है, क्या लेकर जाना है ? जो छोड़ने वाली चीज़ है वह कोई भी वापस लेकर नहीं जाना। ज्ञान दान कैसे करना चाहिए, गुणदान कैसे करना चाहिए - यह सीख कर जाओ। ज्ञानी तू आत्मा भी बनो, गुण दान भी करो। मधुबन में क्या दान करना है ? जो भी बहुतकाल की अन्दर की कमजोरियां हैं, इच्छायें हैं, ममता है, वह दे दान तो छूटे ग्रहण। वह हरेक अच्छी तरह से दान कर दो। उसमें कंजूसी न करो। कुछ भी छोटी चीज़ भी वापस लेकर न जाओ। यह हमारी सबके प्रति शुभ भावना है। जो न करने की चीज़ है वह मधुबन मे स्वाहा कर दो। वापस कोई लेकर न जाये। हरेक को अपना पता है। हरेक जानता है मेरे में कौन सी कमी है, कौन-सा अवगुण है, जो धोखा देता है, अतीन्द्रिय सुख में रहने नहीं देता है, सर्वोत्तम पुरुषार्थ में सदा चलने नहीं देता है। इसके लिए गुप्त दान करने से पुण्यात्मा बनने की शक्ति मिलेगी। पुण्य कर्म करने की शक्ति आयेगी। दिल कहेगी मैं करती रहूँ, करता रहूँ। नहीं तो कहेंगे कि दिल कहता है लेकिन खुशी नहीं है, उमंग नहीं है, हिम्मत नहीं है। अगर अन्दर आत्मा में हिम्मत नहीं है तो शरीर में भी हिम्मत नहीं होती जिस कारण से भी हमारा उमंग-उल्लास कम होता है। वह हरेक अपना सोचे। हिम्मत नहीं होती है या बाप की मदद नहीं खींच सकते हैं या औरों का सहयोग नहीं ले सकते हैं- क्योंकि हर कार्य में सफलता तब होती है जब हमारी हिम्मत, बाप की मदद, सर्व का सहयोग है।यदि हमारी हिम्मत नहीं तो बाबा की मदद नहीं मिल सकती। बाबा की मदद के बिना किसी का सहयोग भी मिल नहीं सकता। कोई कहे हमको हिम्मत है लेकिन बाबा की मदद क्यों नहीं मिलती, सबका सहयोग क्यों नहीं मिलता ? तो इसका भी कारण है। हिम्मत है लेकिन बाप से सच्चा प्यार नही है जो मदद मिले। मददगार बाबा का होने के लिए इतनी योग्यता अपने में नहीं ला रहे हैं जो बाबा भी मदद करे। बाबा भी मदद उसको करेगा जिसमें योग्यतायें दिखाई पड़ रही हैं। योग्यतायें हैं तो बाबा की मदद लेने के अधिकारी बन जाते हैं। हिम्मत के साथ-साथ अन्दर यह सच्ची इच्छा हो मैं बाबा की मददगार बनूं, लायक बनूं। यह इच्छा हमारी हिम्मत में उमंग उत्साह बढ़ाती है, सच्चाई में संबंध जोड़ती है। परिवार से भी सहयोगी बनाने में मदद करती है। क्यों क्या के क्वेश्चन में नहीं जाते हैं। यह भी एक बहुत बड़ा भारी अवगुण है। ज्ञान की कमी है। विचार करो। जब 'क्यों-क्या' का क्वेश्चन है तो इसको क्या कहा जायेगा ? क्या यह ज्ञान है ? क्या ज्ञानी तू आत्मा का यह लक्षण है ? ज्ञान सागर बाप हम बच्चों को ज्ञाना तू आत्मा बनाता है। ज्ञान सागर ज्ञान दे देकर आत्मा को ज्ञान स्वरूप बनाता है। जब ज्ञान स्वरूप आत्मा है तो 'क्यों-क्या' का क्वेश्चन नहीं उठेगा। ज्ञान कहता है शान्ति से सोचो, प्रेम से सोचो, राइट क्या है, रांग क्या है- धीरज से सोचो। क्यों, क्या में टाइम नहीं गंवाओ।
आजकल हर बात में क्यू में खड़े हो जाते हैं। रॉयल व्यक्ति को क्यू में नहीं खड़े होने देते। उनको हर चीज़ आपेही मिलती है। अगर हमारे अन्दर सिम्पल और रॉयल बनने का संस्कार आयेगा तो 'क्यों-क्या' का क्वेश्चन नहीं आयेगा। रॉयल माना चलन में बोल में, चिन्तन में रॉयल्टी। देहभान का अंश न हो। पर्सनैलिटी में प्योरिटी, सच्चाई, दिव्यता हो। मधुबन से यह सब अपने अन्दर भरकर जाओ। रॉयल बनने के लिए क्या करना है? एक भी दिव्यगण की कमी न हो। अवगुण तो एक भी न हो। यह तब होगा जब हम किसी के अवगुण नहीं देखेंगे। अवगुण देखना भी अवगुण है। सबसे बड़ा अवगुण है अवगुण देखना, दिल में रखना, वर्णन करना। वर्णन किया तो चिन्तन पहले किया। यह भी ज्ञानी तू आत्मा का लक्षण नहीं है। ज्ञानी माना सुखदेव। सुख देते-देते देवता बन गया। व्यास है कथा करने वाला। सुखदेव है सुख देने वाला। कोई दुःख भी देता है तो कोई बात नहीं। अन्दर नहीं लेना है। अन्दर लिया तो भी ज्ञान नहीं है। किसने दुःख दिया मैंने लिया तो क्या यह ज्ञानी का लक्षण है ? बाबा हमको ज्ञानी तू आत्मा बनाता है- अपना प्रिय बच्चा बनाने के लिए। तो मैं बाबा का प्रिय बच्चा बनूं। संगमयुग की घड़ी है ही भगवान का प्रिय बच्चा बनने के लिए। कैसे बनेंगे ? फालतू सोचने से ? या सेन्सीटिव बनने से ? कोई दुःख देवे तो दुःख लेने से ? या मास्टर दुःखहर्ता बनने से ? बड़ा समझदारी से हमको ज्ञान रॉयल बना देता है। ज्ञान को यूज करो तो बड़े सिम्पल और रॉयल बन जायेंगे। अन्दर की कोई कमी को सिम्पल समझ कर चला नहीं लेना। छोटी समझकर चलाना नहीं। यह तो सिम्पल बात है ऐसे करके नहीं चलाना। यह हमको बहुत नीचे गिरा देगी। आगे चलकर बहुत बड़ी होती जायेगी। अभी सिम्पल समझकर छोड़ दिया तो आगे सेम्पल नहीं बन सकेंगे। मैं कुछ न करूं, एक अच्छा सेम्पल हूँ। देवता बनाने की भगवान् ने फैक्टरी खोल दी है तो एक अच्छा देवता तो बनें। फैक्टरी का नाम सेम्पुल से बाला होता है। यह भगवान का घर है, भगवान की नॉलेज है, भगवान के घर में वो हो सकता है जो कभी हुआ ही नहीं है। पहले हम भी सोचते थे मनुष्य कभी देव बन सकता है क्या, पतित पुजारी कभी देव बन सकता है क्या ? लेकिन ऐसे मनुष्यों को बाबा देव बनाता है। जब किसी फैक्ट्री में मोटर बनी होगी तो कितना टाइम लगा होगा लेकिन बाद में मिनट मोटर बनने लगी। तो आगे चलकर मिनट में देवता बने। पहले करांची में कितने थोड़े थे, भारत में आये तो अच्छी वृद्धि हुई, फिर विदेश में गये तो और अच्छी वृद्धि हई। आगे और ज्यादा वृद्धि होगी। सिर्फ आप कमियों को छोड़ो, ज्ञान दान, गुण दान दो। अपनी निकम्मी चीज़ यज्ञ में स्वाहा कर दो। जो हमारे पास फिर से न होवे। दिल से खत्म। यह भी ख्याल न आये कि मैंने कई बार प्रतिज्ञा की है, वही बात फिर से आ जाती है। शुद्ध दृढ़ संकल्प में कमाल है। जो बात एक बार अपने परिवर्तन के लिए संकल्प में आती है वह एक़दम दृढ़ हो। बाबा से मांगो नहीं, मदद का अनुभव करो। सच्ची लगन से मदद मिलेगी। समय का बड़ा कद्र है तब बाबा मदद करेगा। गफ़लत में रहने वालों को बाबा मदद नहीं करता। जिसको समय का कद्र है, जो समय वेस्ट नहीं करता, समय वेस्ट जाते देख धक्का लगता है उसको बाबा मदद करता है। तो समय अनुसार भी सोचना है - अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे। अभी करना है बड़े प्यार से। अपने को डांट नहीं लगानी है। प्रेशर नहीं, बड़े प्यार से। बाबा मदद देकर कहता थोड़ेही है मैंने तुमको इतनी मदद की। इन्सानों से मदद लेंगे तो वह गिनती करेगा। बाबा सौ गुना हजार गुना देकर गिनती नहीं करेगा। देने वाला देता रहे, लेने वाला अपनी हजार गुना देकर गिनती नहीं करेगा। देने वाला देता रहे, लेने वाला अपनी झोली खोल कर रखे। अपनी बुद्धि को सिर्फ भटकने से छुड़ाकर बाबा में लगानी है।
पतित देह से दिल नहीं लगानी है। यह पुरानी, पतित देह है इनसे दिल नहीं लगानी है। किसी देहधारी के तरफ मुझे ध्यान नहीं देना है। या रहेगा देहधारी या रहेगा विदेही। दोनो इकट्ठे दिल के अन्दर नहीं रह सकते। देहधारी हजारों को बिठाओ, देही बिन्दू को बिठाओ। वो हजार धोखा देने वाले, एक बिन्दू सहयोग देने वाला। खबरदार रहना है। किसी भी देहधारी के तरफ ध्यान जायेगा तो योग ही नहीं लगेगा। सूक्ष्म है। यह आंखे बड़ी तेज हैं, बैठी हैं यहां देखती हैं वहां। जहाँ बुद्धि होगी तो आंखों के सामने वो ही होगा। जहाँ भी हैं हमारी बुद्धि एक ही बाबा की तरफ हो। अपनी आंखों से पूछो मेरी आखों में कौन है ? आंखों मे और कोई है तो दिल में और कोई होगा। योग कोई बैठने से नहीं लगता। दिल में दिलवाला को बिठाने से योग लगेगा। उसके साथ झाड़ के नीचे, कल्प वृक्ष के नीचे दिलवाला बाप और मां के साथ बैठकर तपस्या कर रहे हैं। स्वर्ग सिर पर खड़ा है। और कुछ नहीं है। चल भी रहे हैं तो बैठे भी हैं। मूलवतन जब बहुत याद आयेगा तो सूक्ष्म वतन को सम्पूर्ण रूप से अव्यक्त रूप से क्रास करेंगे। यदि हिसाब-किताब रहा होगा तो कैसे क्रास करेंगे ? अभी इस बात को सोचना है। परमधाम जाने के पहले सूक्ष्मवतन में जब बुलावा होगा तो क्या होगा ? अभी भी जब याद में बैठो तो चेक करो कि सूक्ष्म भी किसी बात में मन खाता तो नहीं है। कोई भी बात है तो उसे क्लीयर कर दो। अभी ही एंजिलिक स्टेज का अनुभव करो। मधुबन से यह सौगात साथ लेकर जाना है। पास्ट की कोई बात याद न आये। अच्छी बात हुई, कमाई हुई फीनिश। जब ऐसी स्थिति बनाने की लगन सदा है तो देखो सदा बाबा की मदद है। एक सेकण्ड बाबा अलग नहीं होता। यह कभी न कहना पड़े कि बाबा मेरा योग नहीं लगता। योग नहीं लगना माना कोई सज़ा है। सज़ा टीचर या गुरु तब ही देता है जब देखता है कि यह सुधरते नहीं। एक ज्ञानी तू आत्मा दूसरा योगयुक्त रहने की तीव्र इच्छा हो। ज्ञानी तू आत्मा बनने से सिम्पल और रॉयल बनने के लक्षण हमारे में आयेंगे। अच्छा सेम्पल बनेंगे। मधुबन से जाने के बाद लोग बोल कि ये क्या बनकर आये हैं, वन्डर लगे। मधुबन की महिमा करायेंगे तो कितनी दुआयें पायेंगे। जहाँ का खाते हैं वहां के इतना गुण भी तो गाना चाहिए। मधुबन की पालना के रिटर्न में क्या देना है? कुछ करके दिखायें, कुछ बन कर दिखायें। तो ऐसा रिटर्न देना है। यज्ञ से सेवा ली है और सेवा की है तो सारा साल सेवा में मदद मिलती है। रिटर्न देने की भी एक रॉयल्टी है। भाग्यवान वह जो इस तरह से भी भाग्य बनाये, हमको देख और अपना भाग्य बनाये। सिम्पल रहना, रॉयल रहना है। ज्ञानी तू आत्मा के लक्षण बताते हैं तुम्हारा फेस कैसा होना चाहिए, बोल कैसे होने चाहिए, चेहरा हर्षित हो। कैसी भी समस्या आये अडोल, अचल हो। किसके साथ भी इतना भी वैर भाव मन में अन्दर न हो। अपकारी पर भी उपकार करो। भले तुम्हारा किसन अपकार किया है, तुम उपकार करो। तब ही हम पुण्यात्मा बनकर महान आत्मा बनेंगे। पुण्य कर्म करना है। महान् तब बनते हैं जब पुण्य कर्म करते हैं या जो कर्म सिखला रहा है उसको सामने रखते है। तो और बातों में टाइम वेस्ट न करके हिम्मत, उमंग-उल्लास से बाबा का प्रिय बच्चा बनकर बाबा के दिल्ल तख्त में विराजमान होना है। बाबा के दिलतख्त पर बैठने वाला कभी दिलशिकस्त नहीं होता है। दिल खुली भी हो, दिल सच्ची भी हो, दिल बड़ी भी हो। दिल में कुछ न हो, दिल साफ हो, सच्ची हो, खुली हो। तो दिलवाला बाबा के साथ तपस्या करने वाला कभी यह नहीं कहेगा कि योग नहीं लगता दिल में और कुछ है तब कहेंगे योग नहीं लगता। दिल साफ है तो योगी हैं। हम हैं ही राजयोगी। राजाओं का राजा बनने वाले ही तो योग लगा रहे हैं। राजाई पाने के लिए ही संगमयुग पर तपस्या में बैठे हैं। उसके लिये ही तो त्याग हो गया है। फ्री हैं तब ही तो योगी बने हैं। सब कल्चर से, जाति पाति से फ्री हो गये हैं। जो फ्री नहीं वह योगी नहीं। राजयोगी माना फ्री। हमको कोई भी बन्धन नहीं है। ब्राह्मण माना कोई बन्धन नहीं। बन्धन से फ्री है तो योग अच्छा लगा रहे हैं। कोई भी बन्धन हो, जो खींचता हो उसे ज्ञान योग से मुक्त कर देना है। तब ही रिटर्न अच्छा दे सकेंगे।
तपस्या अच्छी तब होगी जब बुद्धि व्यर्थ बातों से, लगाव-झुकाव से फ्री होगी
योग और तपस्या दोनों शब्दों के अन्तर को समझना है। योग माना बाबा से सम्बन्ध, और तपस्या माना अपने ऊपर फुल अटेन्शन। सर्व टेन्शन से फ्री। हमें ऐसी तपस्या करनी होगी जैसी बाबा ने की है। तपस्या हमको ज्ञानयुक्त, योगयुक्त, युक्तियुक्त बनने में मदद करती है। योग लगाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। योगयुक्त बन जाते हैं। तपस्या हमें अव्यक्त सम्पूर्ण फ़रिश्ता बनने में मदद करती है। तो एक तो योगयुक्त, ज्ञान युक्त, युक्ति युक्त तपस्या के आधार से बन सकते हैं, दूसरा बाबा जो ज्ञान का सागर, प्रेम का सागर, आनन्द का सागर, सर्वशक्तिमान् है उसमें मास्टर बन सकते हैं। पहले बुद्धियोग एक बाप से हो तो हमारी तपस्या अच्छी हो सकती है। बुद्धि व्यर्थ चिन्तन, व्यर्थ बातों से फ्री हो, लगाव-झुकाव से फ्री हो तो तपस्या अच्छी हो सकेगी। योग की सब्जेक्ट में इतनी अच्छी रूहरिहान करो जो योग करने से तपस्वी मूर्त के लक्षण आ जायें। तपस्या से विघ्न विनाश होते हैं, विकर्म विनाश होते जाते हैं। आत्मा पवित्र होती जाती है।
लक्ष्य रखना है कि शिवबाबा के आगे आते एक़दम पवित्र आत्मा बन जाऊं, शक्तिशाली बन जाऊं। ब्रह्मा बाबा के आगे आते आत्मा श्रीमत को पूरा पालन करने वाली बन जायें। श्रीमत को पालन करने वालों के लिए तपस्वीमूर्त बनना सहज है। रॉयल्टी माना काम क्रोध लोभ नहीं होगा। दिखाते हैं ऋषि-मुनि तपस्वी के सामने परीक्षा आई तो फेल हो गये। ऐसे बहुत से काम के लिए, क्रोध के लिए, लोभ के लिए दृष्टान्त हैं। अहंकार तो उन्होंने छोड़ा ही नहीं। हमारी तपस्या काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के अंश को भी खत्म करने वाली है। सतयुग में यह कुछ होगा ही नहीं। विनाश होने के पहले हमारे अन्दर से यह बातें विनाश हो जायें। विनाश के नजारे तो आने ही हैं। बाबा ने जो कहा है वह सब होने वाला है। दुनिया एक मुलम्मा है। कोई चीज़ ऐसी बनी हुई होती है जो अन्दर कचरा भरा होता है। बाहर से कव्हर किया हुआ होता है। जेवर के अन्दर भी सारा कचरा (लाख) भरा होता है। जेवर बेचने जाओ तो खोलकर दिखाते हैं अन्दर क्या भरा है? बेचने से कुछ भी मिलता नहीं। ये नहीं कहते कि अलाए मिक्स है, लेकिन कचरा मिक्स है। यह दुनिया तिलस्मी है। चमकीली दुनिया है। जैसे सीता को रावण ने हिरण दिखाया। देखने में सुन्दर बुद्धि खींच जाये। फिर कहेंगे पता नहीं मेरे दिमाग को क्या हो गया। तिलस्मेबाजी दिमाग को खींच लेती फिर लकीर से बाहर निकल जाते हैं। भगवान् ने जो लकीर डाल कर दी है इससे बाहर नहीं निकलना है। तकदीर बनाने के लिए मर्यादाओं की लकीर बहुत अच्छी पड़ी हुई है।
यह पांचवा युग छोटा सा युग पुरुषोत्तम बनने का संगमयुग है। तमोप्रधान कनिष्ट आत्मा सतोप्रधान पुरुषोत्तम बन रही है। है शरीर वही लेकिन उत्तम बन रहे हैं। पुरुषोत्तम बनते हैं सर्वोत्तम पुरुषार्थ करने से। सर्वोत्तम पुरुषार्थ करने के लक्षण तब आते हैं जब हम अपने को अच्छा ब्राह्मण पुरुषार्थ समझते हैं। ब्राह्मण आहार, विहार, विचार में पवित्र हैं। आहार – खाना, विहार – पहनना और विचार - संकल्प शक्ति। हम दुनिया वालों की तरह फैशन नहीं कर सकते। जब ब्राह्मण बनते हैं तो अच्छा ही नहीं लगता। खराब लगेगा। बाबा के पास आते ही खाना शुद्ध, पहनना शुद्ध, विचार शुद्ध शुरू हुआ माना ब्राह्मण बने। हमारी कम्पनी भी ऐसी हो जिसमें आत्मिक उन्नति हो। बोल-चाल शुद्ध हो। ब्राह्मण माना पक्का। ब्राह्मण माना कथा करने वाले। यही लगन हो जो सबकी परमात्मा से सगाई हो जाये, सबको रास्ता दिखायें। पण्डे का काम है मंजिल पर ले जाना। सिर्फ कथा सुनाकर पूरी नहीं करना। सबके प्रति कल्याण भावना रखना। इसलिए ब्राह्मण सेवाधारी माने जाते हैं। देवताओं का केवल पूजन है लेकिन कोई भी कार्य अर्थ जन्म से लेकर मरने तक हर कार्य में ब्राह्मण को सामने रखते हैं। ब्राह्मण वो जिसमें गृहस्थी संस्कार न हो, चिन्ता फिक्र करने के संस्कार न हो। उपराम वृत्ति हो। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र उपराम नहीं रह सकते। शूद्र माना गन्दगी से प्यार, वैश्य माना चिन्ता। क्षत्रिय माना विश्वास की कमी या विश्वास पक्का करने की मेहनत करने वाला।
हम सभी तपस्या ऐसी करें जो कोई भी लगाव खत्म हो जाये। उपराम वृत्ति ऊपर खींचती है। लगाव नीचे उतारता है। एक महाजाल में फंसाता है। पिंजरे का पंछी बना देता है। उड़ना चाहता है लेकिन उड़ नहीं सकता। पंछी डाली को पकड़ कर बैठा है और कहता है मैं कैसे उडूं। एक है पिंजरे का पंछी जिसने जानबूझ कर अपने को पिंजरे में फंसाया है, दूसरा है जो डाल को पकड़ कर बैठा है। इसलिए नष्टोमोहा और अनासक्त। पदार्थों में अनासक्त कोई इच्छा नहीं, सम्बन्धों में कोई अटैचमेन्ट नहीं। फिर देखो कितनी सुन्दर तपस्या होती है। शंकर के सामने शिव दिखाते हैं। इसलिए भक्ति मार्ग में शंकर शिव को एक साथ दिखा दिया है। अशरीरी भव की स्थिति सम्पूर्णता ले आयेगी। त्रिमूर्ति में विष्णु को खड़ा हुआ क्यों दिखाते हैं ? ब्रह्मा और शंकर बैठे हुए हैं। झाड़ के नीचे मम्मा, बाबा, बच्चे बैठे हैं। त्रिमूर्ति में सम्पूर्ण ब्रह्मा और शंकर बैठे हैं। अशरीरी बनना है तो सम्पूर्ण भी बनना है तो विष्णु सामने है। गदा भी हाथ में है ज्ञान की पराकाष्ठा है। कोई भी बात आई उसका हल है। राजाओं के हाथ में गदा दिखाते हैं। राजाई मिलती है गदा से। शंख ध्वनि ऐसी हो जो आकाशवाणी की तरह से हर आत्मा को कहाँ भी पहुंचे। कमल पुष्प समान न्यारे रहो। जितने अशरीरी होंगे उतनी सम्पूर्णता और ये चार अलंकार अनुभव होते रहेंगे।
जीवन सदा अच्छी बनाने के लिये और जीवन की रक्षा करने के लिये हरेक सोचे। एक अपने शरीर निर्वाह अर्थ खुद को अपना जिम्मेवार रहना चाहिए। इतना हो जो औरों की सेवा भी कर सके। जब हम पूरे सर्विस लायक हो जायेंगे, इतने हमारे में गुण हो जायेंगे फिर बाबा आपेही कहे वह अलग बात है। तब तक हम शरीर निर्वाह अर्थ अपने को जिम्मेवार रखूं, न किसी पर बोझा रहें, न किसी पर बोझा रखें। साथ-साथ अपनी स्थिति जमाने के लिए जिम्मेवार रहें। किसी को दोषी न बनाऊं। ज्ञान बाबा ने अथाह दिया है। संग मिला है, साथ मिला है।
स्थिति इतनी अच्छी बनाओ जो बाबा अन्दर गुप्त मदद करता रहे। स्थिति अच्छी बनी होगी तो और मदद भी करेंगे, शुभ कामना भी देंगे। स्थिति खराब होगी तो कहेंगे तुमने ज्ञान योग कहाँ किया। किसकी भी कम्पलेन्ट करते रहेंगे तो हमारी स्थिति खराब होती जायेगी। जब हम किसी की कम्पलेन्ट करते हैं तो स्थिति कैसी होगी। उस समय अपनी मनःस्थिति खराब होती है। तो मैं किसी की कम्पलेन्ट न करूं। बाबा ने समझ दी है। किसी की कम्पलेन्ट करना रांग बात है। गुस्सा कभी न आये लोभ वा आसक्ति न रखें, मोह नहीं रखें, ब्राह्मण लाइफ है, एंजिल बनना है तो टाइम टेबल अच्छा रखना होगा। टाइम को सफल करना होगा। तब स्थिति अच्छी बनेगी। मन को अच्छी खुराक खिलाऊं, बुद्धि को फ़ालतू बातों में नहीं ले जाऊं, संस्कारों के वश न रहूँ, किसी के संस्कारों के असर में न आऊं, अपने संस्कार अन्दर बदलते रहें। तीसरा सदा मैं सबको अच्छा संग दूँ, खुद अच्छे संग मे रहूँ। चौथा है स्थान भी ऐसा हो जिसका वातावरण अच्छा हो। नहीं है तो वातावरण अच्छा बनाओ। ज्ञान है, समझ है हमारी जीवन बाबा ने अच्छी बनाई है, औरों की जीवन अच्छी बनाने में हम मदद करे। पांचवी है सेवा। सिम्पल रहना जानते हैं, खर्चा कम करते हैं, जरूरी नहीं है किसी को देखकर कहें कि हम अपना सेन्टर अच्छा बनाये, कर्टन अच्छा डालें। एक दरी हो और घड़ी हो। बस। राजयोगी माना सिम्पल। हम बहुत सिम्पल रहकर सेवा कर सकते हैं। चाहिये चाहिये से सेवा नहीं कर सकते। साधन साधना नहीं करने देंगे। यह भी चाहिये, यह भी चाहिये तो साधनों को सम्भालने में टाइम चला जायेगा। साधना हमारी अच्छी हो, यह चिन्तन करना है। घड़ी तो हमको हथकड़ी लगती है। एक्यूरेट हैं, लेट नहीं होंगे। स्थान बहुत शुद्ध हो। मच्छर मक्खी न हो। किचन छोटा सा भी हो लेकिन बाबा की यादों में बनाया, भोग लगाया, खाया। जितना अपने हाथ से काम करो उतना अच्छा लगता है। वातावरण अच्छा बनाना ब्राह्मण को बाबा अच्छा सिखाता है। महल माडियों में इतनी सफाई नहीं होगी बाबा के छोटे-छोटे घर साफ सुथरे होंगे। पहले तो एक ही रूम में हम सब-कुछ करते थे। क्लास करते थे, सोते थे। अन्त मते हमारी अच्छी हो। हमारी लाइफ औरों को प्रेरणा देने वाली हो। जो करना है आज करो। कोई पूछे तो यह बोल निकले कि हमारा कोई लगाव नहीं है। बाबा की मदद से लगाव-झुकाव को खत्म करना है, उपराम, न्यारा-प्यारा रहना है।
बाप कराकरावनहार है लेकिन हमारी जवाबदारी है अपनी बुद्धि को एकाग्र रखना, अचल-अडोल रहना
सेवाओं की सफलता के अच्छे-अच्छे सुन्दर समाचार देखने सुनने को मिलते तो अन्दर से यही आवाज़ निकलता कि बाबा की कमाल है। लेकिन बाबा चाहता है कि हम बच्चों के पुरुषार्थ में भी ऐसी कमाल की बात हो। जो हरेक एक दो को देख बाबा के गुण गाये, कमाल बाबा आपकी, इस साल में आपने हम सबको परिवर्तन की शक्ति दी है। परिवर्तन की शक्ति कमाल का काम कर सकती है। परिवर्तन की शक्ति आती है रियलाइजेशन से। जिस समय भी जिसको जो बात अन्दर से महसूस हो कि यह रांग है, नहीं होनी चाहिए, तो वह परिवर्तन हो जानी चाहिए। मीठा बाबा हमें परिवर्तन की शक्ति देकर, मदद करके कमाल के नजारे दिखायेगा। सहज है। अजामिल जैसे पापी भी सुधर सकते हैं। शास्त्रों में तो गायन है लेकिन संगमयुग पर प्रैक्टिकल हमने ऐसे दृश्य बहुत देखे हैं। अहिल्या, कुब्जा, गणिका, अजामिल जैसे पापियों का उद्धार हुआ है।
सदा यह सलोगन के रूप में याद रखो कि कल्प पहले भी हम थे, हम ही होंगे। बाबा ने यह धोबीघाट, अस्पताल कल्प पहले भी खोली थी। यह स्मृति हमारा कल्याण कर देती है। यह स्मृति याद दिलाती है हम बाबा के थे, बिछुड़ गये थे, अब मिले हैं, मिलन मना रहे हैं। बाबा कहते थे जब भी कोई लिटरेचर लिखो तो “फिर से” शब्द जरूर लिखो। इस "फिर से" अक्षर में भी कमाल है। हिम्मत और उमंग-उल्लास आ जाता है। तो कल्प पहले की स्मृति बीच की बातें भुलवा देती है। कल्प पहले की बात याद करो। फिर भी हम ही होंगे। फिर बाबा पूछते हैं कितना बार यह पुरुषार्थ किया है बाप से राज्य भाग्य लेने का ? तो हम कहेंगे अनगिनत बार। अनादि बना बनाया ड्रामा है। ड्रामा को जान गये हैं। ड्रामा के ज्ञान का सिमरण करके बड़े हर्षित हो जाते हैं। थे, हैं और होंगे - जैसे गैरेन्टी से आवाज़ निकलता है। किसके थे, किसके होंगे ? हम ही होंगे। कइयों के दिमाग में चक्कर का ज्ञान थोड़ा लेट बैठता है, किसको जल्दी बैठता है। लेकिन इस पढ़ाई में हिस्ट्री, जाग्राफी का ज्ञान दिमाग खोल देती है। यह बेहद की हिस्ट्री, जाग्राफी है। यह समझने से हमको लगता है वर्ल्ड ड्रामा के अन्दर एक आदि सनातन धर्म स्थापन करने का बाप के संग हमारा पार्ट है। तो एक तो स्वधर्म की स्मृति मैं आत्मा हूँ, दूसरा सत्य धर्म एक ही धर्म सतयुग में होगा वह धर्म और राज्य स्थापन करने वाली मैं आत्मा बाप के साथ मददगार हूँ। जितना यहां मददगार बनेंगे उतना वहां सतयुगी दुनिया में नज़दीक आ जायेंगे। सतयुगी राज्य-भाग्य में हमारा अधिकार हो जायेगा। रॉयल्टी माना रीयल्टी। दृष्टि, वृत्ति, बोल-चाल में सत्यता अर्थात् रीयल्टी हो। जब याद आया कि हम थे तो याद आया कि किस तरह हम रॉयल थे, रीयल थे। सत्य शब्द के भी कई अर्थ होते हैं। एक सच्चा सोना कहते हैं। सच्चा सोना माना जिसमें अलाए कुछ न हो। प्योर गोल्ड। वह हम बन रहे हैं। ज्ञान योग के आधार से अलाए को निकाल रहे हैं। ज्ञान दिखाता है कितनी अलाए मिक्स है। योग से फिर निकाल रहे हैं, प्योर गोल्ड बनने के लिए। आत्मा धुलाई होकर प्योर गोल्ड बन रही है। इतना भी अलाए मिक्स न हो। दूसरा परमात्मा सत्य है। हम आत्मा चक्कर में आने वाली हैं। वह चक्कर में नहीं आता। सतो-रजो-तमो स्टेजेज से हम पास होते हैं वह नहीं होता। उसके पास सत्य ज्ञान है, उसका स्वरूप सत्य है जिस कारण उसके पास प्रेम है। तो हम उस सत्य के संग से, सत्य का बनने से सत्यता ले रहे हैं। हम उसके बच्चे हैं। भले सतयुग में हम दैवी सन्तान होंगे, योगबल से पैदाइस होगी, द्वापर कलियुग की तरह से जन्म नहीं होगा परन्तु अभी हम ईश्वर की सन्तान हैं। शिव बाबा की दृष्टि से ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं। हमें बाबा की दृष्टि क्यों प्यारी लगती है ? क्योंकि बाबा की दृष्टि से नया जन्म मिला है। परमात्मा बाप की दृष्टि से हम आत्मा इस देह को भूलती हैं। पतित से पावन बनती हैं।
बाबा कहते – बच्चे, श्रीमत है एक बाप की। बाकी सब है भूतों की मत। वो सत्य है। हमको श्रेष्ठ बनाने वाली है। भूतों की मत से छुड़ाने वाली है। कभी कोई पूछते हैं ज्ञान में क्यों आई? क्या अच्छा लगा ? तो अन्दर से निकलता है पहले तो बाबा को देखा, बड़ा अच्छा लगा, सच्चा बाबा है। लौकिक बाप से कभी यह सच्चा बाप है यह नहीं आया, भले मोह हो। लेकिन यह सच्चा है जो प्यार दे रहा है। और कोई दे नहीं सकता। जो रास्ता दिखा रहा है मंजिल पर ले जाने के लिये, वह सच्चा है। हम रास्ता कभी चेंज नहीं करेंगे। यह भूल नहीं करेंगे। सच्चा गाइड है हमारा। न सिर्फ कहता है ऐसे चले जाओ, लेकिन अंगुली से पकड़कर ले जाता है। कहता है अंगुली छोड़ना मत। बच्चे छोटे होते हैं तो मां बाप का ध्यान रहता है बच्चा अंगुली छोड़े नहीं। यह मां का मोह वा प्यार होता है। कहीं एक्सीडेन्ट नहीं हो जाये। बच्चे को कंधे पर उठाकर चलते हैं। बच्चे को अलग नहीं करेंगे। इतना बाप का हमारे साथ प्यार है। हम बड़े भी हो जाते हैं, समझदार हो जाते हैं तो भी अकेला नहीं छोड़ता है। या तो साथ चलेगा, या पीछे पीछे चलेगा। छोड़ता नहीं है। हम कहाँ भी होंगे तो या तो पीछे आयेगा या साथ लेकर चलता है। रास्ता क्लीयर कर देता है इसलिए बहुत प्यारा लगता है। देह के संबंध धोखा देने वाले हैं। यह बचाने वाला है। पुरानी दुनिया से ठोकर मिली है, वैराग्य आ गया है। ठोकर खाने से वैराग्य आया है। ठोकर खाने के बाद फिर कद्र पड़ता है। जो समझदार होता है वह ठोकर खाकर नहीं सुधरता है, परन्तु ठोकर खाऊं ही क्यों ? तो कई कहते हैं थोड़ा अनुभव करके फिर ज्ञान में आना चाहिए। लेकिन जिन्होंने अनुभव किया है उनका क्या हाल है ! कई कहते हैं इतनी छोटी उम्र में क्यों ज्ञान में जाते हो, थोड़ा अनुभव करके देखो। हम कहते हैं ऐसा अनुभव क्यों करें जो धोखे में ले जाने वाला हो। ऐसा अनुभव करो जो दुःखियों का दुःख दूर करने वाला हो।
हम पेशेन्ट्स ने सर्जन बाप से कितनी सफ़ा पाई है, रोग दूर किये हैं, भूतों से छुड़ाया है, श्रीमत से हमारी संभाल की है। ग्लोबल कोआपरेशन में यह बात भी आई थी कि पेशेन्ट्स, पेशेन्ट्स को सहयोग दें। केवल डॉक्टर्स पर ही आधारित न रहें। पेशेन्ट्स माना यह नहीं कि सदा रोगी हैं। हम पेशेन्ट्स में इतना धीरज आ गया है, साहस आ गया है, शान्ति सुख आ गया है जो हम औरों को देते रहते हैं। जो भी बाबा के घर आये, धीरज शान्ति प्रेम से उसके आधे रोग स्वतः ही दूर हो जायें। ऐसा वातावरण बनाकर रखना, दूसरों को मदद करना है। बाबा ने कितनी हमारी रक्षा की है ! तो हम बाबा की कमाल गाते हैं। शुक्रिया बाबा का करते हैं। जो कई कार्यों में निमित्त हाथ बच्चों का, पर काम तो बाप करते हैं। क्योंकि बाप ही करनकरावनहार है। परन्तु मुझे भी कुछ करना है, हमारी भी कोई जवाबदारी है। हमारी जवाबदारी क्या है? बुद्धि को एकाग्र, अचल, अडोल रखेंगे तो सदा हर्षित रखने की जवाबदारी मेरी है। पहले बुद्धि एकाग्र हो, कहाँ भटके नहीं। हम पेशेन्ट्स को बड़ी दवाई यहां मिलती है। जिससे अचल अडोल रहें। मजबूत रहें। घबरायें नहीं। बाप को याद करें। फिर बाबा बचा लेगा, सम्भाल लेगा। यह भी देखा है कोई-कोई बच्चे बाबा के पास आकर कहते बाबा माया के तूफान बहुत आते हैं, सपने आते हैं तो बाबा इतनी मीठी बात करके माया को भगा देता है। सिर्फ बाबा के पास आओ। ऐसे नहीं माया के मुरीद बन जाओ। कोई कोई ऐसे भोले हैं जो माया के मुरीद हो जाते हैं, वश हो जाते हैं, कोई झट से भागकर माया के पास चले आते हैं, डरते हैं माया से, कोई बाप से डरते हैं कि कहीं बाबा शिक्षा न देवे, सावधानी न देवे। नहीं, बाबा से कभी नहीं डरना चाहिए। भले कान पकड़े, नाक पकड़े। भले पकड़े लेकिन साथ लेकर जायेगा। बाबा कहते हैं बच्चे कुछ नहीं करो सिर्फ अपने को बाप के याद की फांसी पर लटका दो तो जीते जी मरजीवा बन जायेंगे अर्थात् अनेक जन्मों के विकर्म विनाश हो जायेंगे, संस्कार हमारे बदल जायेंगे।
हमारी किस किस बात में अटैचमेन्ट हैं? सूक्ष्म अटैचमेन्ट कीड़ा है जो देह से डिटैच नहीं होने देती। अपने संस्कारों के साथ भी अटैचमेन्ट है, अपनी आइडिया के साथ भी अटैचमेन्ट है, सब मेरी आइडिया माने। बड़ों की आइडिया, बाबा की आइडिया मानना मुश्किल लगता है। अपनी आइडिया छोड़ने का जी नहीं चाहता। बाबा जो चाहता है वह करने के लिए अपने को तैयार रखना चाहिए। बाबा जो चाहे, जहाँ बैठाये। जैसे बाबा कहता है बच्चे योग में नींद आती है तो आंखों में तेल डाल दो। निद्राजीत बनने के और अच्छे-अच्छे तरीके हैं। यदि नींद आती है तो घूमो। एक जगह बैठकर झुटके नहीं खाओ। आंखों पर ठण्डा पानी डालो। कोई प्वाइन्ट्स लिखो, पढ़ो। लेकिन नींद आये तो सो नहीं जाओ। वास्तव में हर इंसान को जितना सोना जरूरी है उतना सोना चाहिए, जितना खाना जरूरी है उतना खाना चाहिए। जितना खाना बढ़ाओ, बढ़ सकता है लेकिन उसे कहेंगे लोभी, तमोगुणी जितना ज्यादा सोयेंगे तो उतनी ज्यादा नींद आयेगी। कई हैं जिन्हें सोने के 1 टाइम नींद नहीं आती, उठने के टाइम नींद आती है। वह ज्ञानी योगी नहीं। ज्ञानी-योगी वह जो ठीक टाइम पर सोने जाये, ठीक टाइम पर उठे। जो सवरे उठे नहीं वह योगी-ज्ञानी नहीं बन सकता। रात को सोने की किसी को मना नहीं है। याद में रहकर सो जायेंगे तो नींद अच्छी आ जायेगी। सवेरे उठने की आदत डालनी चाहिए तो हमारी ब्राह्मण लाइफ अच्छी बन सकती है। ज्ञान का मनन-चिन्तन सवेरे जितना कर सकते हैं दिन भर में नहीं कर सकते शाम का योग साढ़े छह से साढ़े सात जो करता है वह एंजिल बन सकता है। जिसको शाम के योग का कद्र नहीं, वह एंजिल नहीं बन सकता। न सवेरे हमको काम धन्धा है, न शाम को काम धन्धा है। भले काम करना है परन्तु उसमें भी स्थिति अच्छी तब रहेगी जब हम ज्ञान योग से अपनी स्थिति बनाने के लिए अपना उद्धार करने के लिये सदा ध्यान रखेंगे। कभी रखा, कभी न रखा, गफ़लत में टाइम वेस्ट किया तो स्थिति नहीं बन सकेगी। तो एक है – योग का चार्ट अच्छा रखना, दूसरा - अपने चरित्र का रजिस्टर भी अच्छा रखना, तीसरा – जब से बाबा के बने है अपना रिकॉर्ड अच्छा रखना। समझदार अपना रिकॉर्ड खराब नहीं करेगा। बीती को बीती करके अपना रिकॉर्ड अच्छा रखो। बीती बातों को याद करके सीखो। रजिस्टर अच्छा हो, योग का चार्ट अच्छा हो। हर एक अपना कल्याण करे तो उनको देखकर अनेकों की सेवा होगी। फिर देखो अपने आप हमारी सूरत सीरत सेवा करती है।
चित सदा हर्षित हो तो नैन-चैन में न्यारे-प्यारेपन की रौनक आयेगी
बाबा ने मायाजीत बनने के लिए कितनी सहज युक्ति बताई है। जब मास्टर नॉलेजफुल बन जाते हैं तो ज्ञान की लाइट और योग की माइट मायाजीत सहज बना देती है। हमारे हर संकल्प, वचन और कर्म में ज्ञान की लाइट हो। तो दूर से ही वायब्रेशन आयेंगे। फिर खबरदार होशियार हो जायेंगे। जो खबरदार रहते हैं वो होशियार होते हैं। नहीं तो माया शब्द का पता ही नहीं था। जब बाबा का पता चला तो माया का भी पता चला है। अभी समझ आई कि यह माया है, जिसके हम अधीन थे। अभी बाबा के बने हैं, बाबा को जाना है, तो माया छोड़ती नहीं है लेकिन हम अपने आपको छुड़ा लेते हैं। हम ज्ञान और योग के आधार से अपने को छुड़ाते हैं। हम छोड़ते हैं तो पीछा करती है। हमारे पीछे पीछे आती है। हम उसकी सुनी अनसुनी कर देते हैं। पीछे देखते भी नहीं हैं। अपने नशे में रहते हैं। निश्चय, नशा और निशाना – हमें अचल बना देता है। निश्चय पक्का है, नशे में रहते हैं। सिर्फ निश्चय है, नशा नहीं है तो माया हमारे निश्चय को हिलाने के लिये, कमजोर करने के लिये भिन्न-भिन्न रूप धारण करती है। निश्चय के साथ नशा है। नशा तब है जब निशाना सामने हैं। टाइम पर पहुँचना है तो टाइम के पहले तैयारी करनी है। इसलिए आज बाबा ने कहा सदा साक्षी होकर प्ले करो और सदा बाबा को साथी बनाकर रखो। तो जब स्वयं भगवान साथी बन गया तो आंधी और तूफान क्या करेगा।
आंधी में मिट्टी, धूल बहुत होती है वह आंखों में पड़ती है तो आंखों को दुःखी कर देती है, मैला कर देती है। आंधी में मिट्टी है, मैलापन है। तूफान में जोर से संकल्प आते हैं, कन्ट्रोल नहीं होते। आंधी में इम्प्योरिटी होती है। परन्तु जिसका साथी स्वयं भगवान हो उसका आंधी और तूफान कुछ नहीं कर सकते। वह खबरदार रहता है, साक्षी होकर डिटैच होकर कर्म करता है। तेरे मेरे में नहीं फंसता है। न कार्य में, न सम्बन्ध में । साक्षी होकर पार्ट बजाने से हम अनेक आत्माओं के साथ सहयोगी बन सकते हैं । साक्षी होकर देखो मेरा पार्ट क्या है औरों का पार्ट क्या है और दुनिया भर में हर आत्मा का क्या पार्ट है। हरेक की विशेषता अच्छी है। जैसे बाबा ने हर बच्चों की विशेषता को देख उसमें लाइट और माइट भरी है तब विशेषता ने एक सुन्दर कला का रूप लिया है। कहेंगे ईश्वर ने इसको कला दी ।
बाबा कहते बच्चे सम्पूर्ण बनने का ख्याल रखो तो सर्व गुण भी आयेंगे। सम्पूर्ण बनो, कोई कमी न रहे । सम्पूर्ण बनने का ख्याल तब आयेगा जब एक़दम पावन बन जायेंगे। पावन ही सम्पूर्ण बन सकते हैं। तो हरेक की विशेषता को अच्छी तरह से जानकर, साक्षी होकर, बाबा को साथी बनाकर हर पार्ट प्ले करो तब सम्पूर्ण बनेंगे। बीच-बीच में अगर ऊपर-नीचे हुआ तो नहीं बन सकते हैं । जैसे सिलाई करने वाले सोचते हैं धागा अच्छा हो। धागा बार बार टूटता है तो थक जाते हैं। घड़ी घड़ी जो टूटता है तो उसे जोड़ने में टाइम वेस्ट जाता है। हमें टाइम वेस्ट नहीं करना है । इसलिये कहा जाता है अटूट निश्चय बुद्धि । निश्चय टूटे नहीं। साथ कभी न छूटे । सम्बन्ध में स्नेह और निश्चय मजबूत हो । दिल का स्नेह भी हो। सच्चा स्नेह मजबूत बना देता है। घड़ी-घड़ी टूटता जुटता नहीं है। तोड़-जोड़ में थक जाते हैं, टाइम वेस्ट होता है। विश्वास नहीं होता। अभी कारण और निवारण में टाइम नहीं गवाँओ । जो बात बीती उसे भूल अभी समझदार बनो। अभी जितना समझदार बनेंगे उतना आगे चल कर कोई भी बात बड़ी नहीं लगेगी । माया को बड़ा रूप देकर भूत नहीं बनायेंगे। पहले भूतों के वश थे, अभी उससे छुटकारा पाया है अभी कोई न कोई बातें भूत का रूप लेने के लिये तैयार बैठी हैं। कई कोई कारण से बात को भूत बना देते हैं । बात को बढ़ाओ, सोचो, वर्णन करो, चिन्तन करो। तो वह भूत का रूप ले लेती हैं। इसलिए बाबा कहते बच्चे तुम्हारा चित, नैन-चैन हर्षित हो । चित में माया की कोई बात ही न हो । चित अर्थात् स्मृति याददास्त । कइयों के चित्त में पुरानी बातें प्रिंट हुई पड़ी हैं। कहेंगे मेरे बुद्धि में नहीं थी पता नहीं कहाँ से आई, मैने ख्याल भी नहीं किया बैठे-बैठे आ गई । चित्त में जो बातें अनेक पास्ट जन्मों से प्रिन्ट हई हैं वह मिटी नहीं हैं तो एकाग्र चित्त नहीं हो सकते । चित्त में अन्दर चैन नहीं है आराम नहीं है। जिस कारण मुख भी हर्षित नहीं हो सकता। नैन हर्षित नहीं हो सकते । तो नैन-चैन में न्यारेपन और प्यारेपन की रौनक चित के आधार से आयेगी । नैन-चैन हमारे बताते हैं अन्दर मेरा चित्त कैसा है। चित्त में किसी का अवगुण न हो, किसी के लिये निन्दा न हो, चित्त साफ हो । चित की सफाई करनी पड़ती है। पास्ट का कुछ भी न हो। तब ही तो हम सर्वगुण सम्पन्न, १६ कला सम्पूर्ण बनेंगे । फिर एकाग्र चित्त से बाप को याद करने की, बुद्धि को निश्चय बुद्धि बनाने की आदत पड़ जायेगी। कई पूछते हैं याद सदा कैसे रहे? तो बाबा कहते हैं याद करने की आदत डालो । जैसे दूसरी आदतें पड़ जाती हैं तो कहते यह इंसान की नेचर है। हैबिट है। चेक करना होता है और बातों की भी आदत तो नहीं है ! और आदतें मिटती जा रही हैं ! जैसे याद में रहने की आदत पड़ती जा रही है। पहले चंचल रहने की, व्यर्थ सोचने की, बेड फीलिंग आने की आदत थी । अब वह आदतें बदलती जाती हैं। अभी बाबा की याद में रहने की, सदा सन्तुष्ट रहने की, पवित्रता और सत्यता की मूर्ति बनने की आदत पड़ जाये । अच्छा पुरुषार्थ करने की आदत हो जाए। वह कहते हैं हम क्या करें हम आदत के मजबूर है, हम कहते हैं भगवान ने मजबूरी से छुड़ा दिया यह अच्छी आदत डाली है। जिसमें हम अपने को सेवाधारी समझते हैं। किसकी सेवा में है ? इसलिये हमेशा हम लोग साइन करते हैं तो ऊपर लिखते हैं ईश्वरीय सेवा में। तो अन्दर से समझना है हम ईश्वरीय सेवा पर हैं। इसलिए हमें ईश्वर की सेवा में आनेस्ट रहना है, ट्रस्टी रहना है । सेवाधारी माना निरहंकारी, निर्विकारी । सेवा में त्याग अपने आप हो जाता है, तपस्या अच्छी हो जाती है। सच्चे सेवाधारी तपस्वी लगते हैं। नेचरल त्यागी होते हैं । उनको अच्छा लगता है. त्याग से भाग्य बने तो और सेवा करूँ । त्याग, त्याग नहीं लगता । त्याग को भाग्य समझते हैं। मैं मेरा अर्थात अभिमान और लगाव के बंधन से छूटे हुए हैं । तो सच्चे सेवाधारी की नेचर बन जाती है। लगता है कि यह त्यागी और तपस्वी मूर्त है।
तो हरेक सेवाधारी अपने से पूछे कि मैं मैं-मेरा से फ्री हूँ ? सदा याद है कि मैं ईश्वरीय सेवा में हूँ ? मन वचन कर्म से जो सेवा बाबा करा है, मैं उसमें अपना भाग्य समझती हूँ। एक तो त्याग से भाग्य, दूसरा सेवा से भाग्य, तीसरा सबकी दुआयें मिलें वह भी हमारा भाग्य है। तो कितना बड़ा भाग्य है। ऐसे अपने को सदा सेवाधारी समझना । अहम भाव से छुट जाना । तब ही तो विश्व निर्माण का काम करेंगे । नम्रता, मुख पर सरलता और सहनशीलता यह गुण नेचरल हर कर्म में साथ देंगे। सेवाधारी कौन? जो आज्ञाकारी वफादार, इमानदार है। जो फरमान मिले । ऐसे सेवाधारियों की बाबा को जरूरत भी है । बाबा उनको देख अन्दर से हर्षित होता है । जब याद-प्यार मिलता है तो किसने याद दी ! किसको दी ! क्यों दी ! उसमें मैं हूँ? आगे भगवान को याद करते थे, अब भगवान याद करके प्यार देता है। कम बात है क्या ! जिन्होंने अपनी स्थिति अच्छी बनाई है, अपना जान जिगर दिया है तो बाबा ऐसे बच्चों को ज़िगरी याद-प्यार देता है। तो हम सब भी अभी अभी निराकारी अभी अभी आकारी स्थिति बनायें । याद-प्यार के अधिकारी बने। बाबा जो सौगात याद-प्यार के साथ देता है वह सदा हमारे साथ रहे।
दूसरों की चिंता छोड अपने पुरुषार्थ में कोई बहाना नहीं बनाओ, ईमानदार रहो तो बाबा भी मदद करेगा
अभी हम सबको गुणवान भी बनना है तो १६ कला सम्पूर्ण भी बनना है। सम्पूर्ण और सम्पन्न में क्या फ़र्क है ? सर्वगुण सम्पन्न कहते हैं और १६ कला सम्पूर्ण कहते हैं। तो जब सर्व गुण हमारे में सम्पन्न आ जायेंगे तो सम्पूर्णता आयेगी। जिसको बाबा कहते हैं जब हम अपने आपको भरपूर महसूस हैं तो कोई इच्छा ही नहीं होती कि कुछ चाहिये। तो यह भी अन्दर अपनी जांच करके पूछना है कि क्या मुझे कुछ चाहिये, कोई कमी है? बाबा ने हमको अपने आपको चेक करने के लिये कितनी बातें दी हुई है। एक तो देही अभिमानी स्थिति कितनी है, बाबा से प्यार कितना है। देही अभिमानी हैं तो वावा से प्यार है। बाबा से प्यार नहीं महसूस होता है तो मेहनत होती है। सिन्धी में कहावत है मिठरा घुर त घुराये। बाबा तू मुझे बहुत मीठा लगता है। तेरे सिवाए और कोई मीठा लगता ही नहीं। जितना तू मीठा उतना और कोई नहीं।
बाबा मीठे बच्चे, मीठे बच्चे कहता है। केवल बच्चे-बच्चे नहीं कहता। मीठे ही प्यारे लगते हैं, प्यारे ही मीठे लगते हैं। उसके सिवाए और कुछ अच्छा नहीं लगता। मीठे इसलिये लगते हैं कि बाप को कल्याण करने की भावना है। बाबा हमको आप समान बनाना चाहता है। न केवल इसलिये कि बिचारे दुःखी हैं, अशान्त हैं इनका भला हो जाये लेकिन ये भी सर्व के कल्याणकारी बनें, हितकारी बनें इसालिये बाबा बैठकर धारणा कराते हैं।
टाइम पर मंजिल पर पहुँचने के लिए हमें स्वयं को कई कड़े बंधनों में बांधना पड़ता है। एक जो करता है अपने लिए करता है। भगवान के लिये नहीं करता। भगवान् कहता है ऊंच पद पाने के लिये पुरुषार्थ करो। कई दूसरों के लिये बहुत सोचते हैं, दूसरों की चिन्ता बहुत करते हैं कि ये ऐसा पुरुषार्थ करे। नहीं करते हैं तो उनको अच्छा नहीं लगता । तो खुद के लिये भी पुरुषार्थ करने की कितनी चिंता लगी हुई है - यह अपने से पूछो । हमें अपने को बाबा का बहुत मीठा ईमानदार बच्चा बनाने के लिये पुरुषार्थ करना है। ऐसा पुरुषार्थ करेंगे तो बाबा मदद करेगा। मदद मांगने की जरूरत नहीं है। सिर्फ अपने साथ पुरुषार्थ में ईमानदार रहो। अपने साथ ठगी नहीं करो। अपने पुरुषार्थ में कोई बहाना नहीं बनाओ। पुरुषार्थ में कोई बहाना बनाने से स्वयं को नुकसान होगा। व्यापारी वह जो अपना पोतामेल देखे । नहीं तो अचानक घाटा पड़ेगा तो दुःखी हो जायेंगे । देवाला लगने से दुःखी हो जाते हैं क्योंकि इज्जत चली जाती है। सबसे बड़ा दुःख होता है देवाले का। हम भी पुरुषार्थ में कभी गफ़लत करते हैं, अवस्था एक़दम नीचे आ जाती है, गिर जाती है तो जैसे देवाला मार देते हैं। फिर समझते हैं ब्राह्मण परिवार को क्या मुहँ दिखायेंगे । ब्राह्मण कभी मुख नहीं फेरते । लेकिन अन्दर ही मन खाता है। तो कभी भी ऐसी गफ़लत न करे । परचिन्तन में नहीं जाये । देह अभिमान के घेराव में नहीं आये । कभी कभी देह अभिमान घेराव कर लेता है, सोचने नही देता । सोचो देह अभिमान का घेराव कैसे होता है ? यदि स्वयं की दृष्टि देह अभिमान वाली है तो सब ऐसे दिखाई पड़ते हैं। जब हम स्वयं देही अभिमानी हैं, अन्तर्मुखी हैं तो सब ऐसे दिखाई पड़ते हैं। पुरुषार्थ क्या है? देही अभिमानी बनो । देही अभिमानी बनने से बाबा से सम्बन्ध अच्छा रहेगा और बाबा के नॉलेज की धारणा अच्छी होगी, बाबा का प्यार खिंचवा लेंगे। बाबा का प्यार पावन बनने में मदद करता है। बाबा के प्यार में खो जाते हैं। प्यार पाने के पात्र तब ही है जब देही अभिमानी स्थिति है । देही अभिमानी वह जिसे अन्तमुखता अच्छी लगती है । बाहर देखना, बोलना, चलना सब निमित्त मात्र काम चलाने के लिये । काम पूरा हुआ समेट लिया ।
मधुबन दर्पण है। यहां पता चल जाता है हमारे में क्या-क्या रहा हुआ था, छिपा हुआ था। मधुबन में किसका छिप नहीं सकता । कोई छिपाता है तो मन खाता है। कई सोचते हैं मधुबन के वातावरण में हम ठीक हो जायेंगे। लेकिन यहां आते ही और ज्यादा विकल्प आने लगते हैं। फिर पत्र लिखकर बाबा की गद्दी के नीचे रख देते लेकिन फिर भी ठीक नहीं होते । सच बताने के बिगर ठीक नहीं हो सकते । ज्ञान के पहले इतना मन नहीं खाता था जितना ज्ञानी बनने के बाद खाता है। ज्ञान के पहले ऑर्डनरी थे । जहाँ दुनिया है वहां हम हैं। हम कोई ऋषि वा सन्यासी तो नहीं बनने वाले हैं। साधू सन्यासी भी अपने आपको चला सकते हैं । ब्राह्मण नहीं चला सकते । एक बार बाबा कहा, बाबा माना भगवान । बाबा हमारा सतगुरु, टीचर है तो धर्मराज भी है। मीठे बच्चे, मीठे बच्चे कहता है लेकिन कान भी पकड़ता है। बुरी बात सोचने नहीं देता, बुरे संग में जाने नहीं देता। क्योंकि लायक बनाना है। तो जो हम करते हैं, सोचते हैं अपने लिये । इसलिये अपने कर्म ऐसे करें, ऐसी श्रेष्ठ संकल्प की सृष्टि बनायें, जिसको देख देखकर हम सुन्दर बनते जायें। अन्दर की सृष्टि बड़ी सुन्दर बनाने के लिये हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। इस शरीर में होते हुए भी आत्मा पावन बन रही है लेकिन तत्वों को भी पावन बनायेंगे तो शरीर भी सतोप्रधान मिलेगा । तन-मन-धन भी इसलिये देते हैं क्योंकि तन से भी खूब सेवा करेंगे तो तन अच्छा मिलेगा। ऐसे नहीं कि धन दे दिया तो तन अच्छा मिलेगा। धन सफल करने से दुआयें मिलेगी। अनेकों की सेवा हुई धन से। तन से सेवा नहीं की तो अशरीरी स्थिति नहीं बन सकती है। कइयों को बाबा के घर में तन से सेवा करते करते फील होता है कि जैसे मैं आत्मा शरीर द्वारा कर रही थी, बाबा करा था। बैठने से जैसी अशरीरी स्थिति का अनुभव नहीं हुआ वह कर्म करते हुए हुआ। क्योंकि पावन कर्म किया, बुद्धि ने सोचा तो योग अच्छा लग गया। अगर तन से पावन कर्म नहीं होता तो बुद्धि इतना अच्छा सोचने के पात्र नहीं बनती। तन से कोई उल्टा कर्म नहीं हो श्रेष्ठ कर्म हो । ऑर्डनरी भी नहीं। इतने सुन्दर श्रेष्ठ कर्म हों जो दूसरों को प्रेरणा मिले । ऊंच प्रालब्ध का आधार है हमारे कर्मों को देख और करें । तब ही बाबा कहता है कितनी प्रजा बनाई है? कितने वारिस बनाये हैं ? वारिस कैसे बनायेंगे? वारिस देखेंगे कि तुमने प्रैक्टिकल कितना किया है ? हम बाबा के वारिस बनते हैं बाबा को देखकर । हम जिनके निमित्त बनते हैं वो क्या देखेंगे ? तन से, मन से, धन से सेवा से अलग अलग कमाई है। मन में कभी भी खोटापन न हो । मन सच्चाई और सफाई का जैसे पुतला हो । आकारी रूप क्या है? जब पांच तत्वों से पार अलग होते हैं बुद्धियोग बाबा से अच्छा लग जाता है। मन साफ हो जाता है। सच्चे बाबा से सच्चा ज्ञान लेकर सच्चे बन गये तो आकारी एंजिल बन जाते हैं। यह मनमनाभव होने से बनते हैं।
सर्वगुण वा १६ कला आयेंगी सच्चाई के आधार से । विचार करके देखें। बाबा के कोई कोई बच्चे सच्चे पुरुषार्थ की लगन में है। अन्दर दिन रात ख्याल है ऐसा बनना है। ख्याल है लेकिन रूप में नहीं आता है तो क्या कारण है? अन्दर ख्याल है लेकिन जब प्रैक्टिकल देखते हैं तो लगता है कि चेहरे पर नैन-चैन में क्यों नहीं आता ? अन्दर से जिगरी यह इच्छा हो कि मुझे ही बनना है। जैसे बाबा को यह था तब तो बाबा से सम्पूर्णता का साक्षात्कार होता रहा । विनाश काल सदा याद रहा। जब विनाश काल याद है तो डिटैच हो जाते हैं। पुरानी बातें जो हैं अन्दर से समाप्त नहीं हुई है। अन्दर बाहर एक हो जायें। तो यह चेक करना है पुरानी सब बातें समाप्त । तब ही सम्पन्न सम्पूर्ण बनेंगे । जो भी पुरानी बाते हैं, पुराने संस्कार हैं, इसको ज्ञान-योग से समाप्त करना है। समाप्त करने के लिये अन्दर बड़ी लगन हो। कभी-कभी समाप्त करने का ख्याल आता है। कभी ख्याल आता है कि टाइम पर हो जायेगा। लेकिन नहीं, तुरत दान महापुण्य । मधुबन के इतने अच्छे वायुमण्डल में सब समाप्त करना है। यह भी एक संकल्प दृढ़ हो । सम्पूर्ण बनना है इसके लिये पहले समाप्त करना है। जबकि ड्रामा पूरा हो रहा है। अनेक जन्मों का अन्त है। तो बहुत काल से स्थिति निर्विघ्न बने। अगर सम्पूर्ण बनना है तो अपने अटेन्शन से हमारी स्थिति निर्विघ्न हो । कोई भी पुरानी बातें चाहे छोटी हो, चाहे मोटी हो, समाप्त करना है। ऐसा मधुबन के संगठन की शक्ति से, अपनी लगन से, बाबा की मदद से करना है। पुरानी बातों की समाप्ति होती है तो अन्दर से बड़ी खुशी होती है। जो सम्पूर्ण बनने में खुशी नहीं आयेगी वह समाप्ति में आयेगी । समाप्ति होने से लगेगा कि अब सम्पूर्णता आई कि आई। यह भी क्वेश्चन न उठायें कि कैसे होगी ? देही अभिमानी स्थिति से होगी । देहभान के घेराव में न आयें और सच्चाई के अवतार बनें । सच्चा बाबा हमको सच्चा बनाता है। अपने आपसे पूछो कि हम सच्चे बाबा के बच्चे सच्चे हैं? सच्चाई हमारे अन्दर के मन के मैल को धुलाई कर देती है। कितनी भी बड़ी ग्रहचारी हो उसको हटा देते हैं। मन फ्री हो जाये फिर विकल्प नहीं आ सकता। देहभान विकल्प, फ़ालतू संकल्प ले आता है। व्यर्थ संकल्पों के तूफान मचा देता है । इन बातों से हम फ्री हो जायें । जो होने वाली बात है वही संकल्प आये । जो होने वाली नहीं है वह संकल्प नहीं आये । ड्रामा की नूंध है, बाबा की मदद भी है तो संकल्प अवश्य ही आयेगा।
उन्नति किस बात में होती है ? उन्नति तो हमारी हर सेकण्ड होना चाहिए। लेकिन किस आधार से होगी ? कोई भाव-स्वभाव वाला साथी मिलता है तो क्या वह हमारी उन्नति कम कर सकता है ? दूसरे का साथ मिले तो उन्नति हो या इस स्थान पर उन्नति नहीं है, दूसरे स्थान पर जाने से उन्नति होगी – ये ख्यालात उन्नति करने नहीं देते। जब तक वो होगा नहीं तब तक उन्नति नहीं है। फिर वह स्थान भी चेंज करे, साथी भी चेंज करे तो भी उन्नति नहीं होगी । जिस तरीके से उन्नति करनी है वह बात बाबा की सुनता ही नहीं। बाबा को साथी बनाकर, साक्षी होकर, निरसंकल्प होकर, तुम्हीं से खांऊं, बैठूं, बोलूं.. इस नियम को पालन करने वाले की उन्नति है। बाबा जो आप खिलाओ, जहाँ बिठाओ, यह अतीन्द्रिय सुख बाबा जो आपके द्वारा मिल रहा है उसमें ही मेरी उन्नति है। हमको पूछना न पड़े कि तुम्हारी उन्नति हुई है ? हमारा मन, वचन, कर्म दिखावे कि कितनी उन्नति हो रही है। ऐसी जीवन जो बाबा ने सेम्पल बनने के लिये दी है ऐसे सेम्पल बनकर बाबा के आगे आयें । जहाँ भी रहें सेम्पल रहें ।
कई बार बुद्धिवान दिखाई पड़ते हैं लेकिन अन्दर से बाबा बाबा नहीं निकलता । लेकिन अन्दर से बाबा बाबा निकलता रहे । सबको बाबा बाबा ही याद दिलाने के निमित्त बने । हरेक की बुद्धि अच्छा सोचे, श्रेष्ठ सोचे। वातावरण को हल्का बनायें, भारी नहीं। हम बाबा के सच्चे बच्चे मिलकर यात्रा पर जा रहे हैं, यात्रा के साथी हैं। जहाँ हम जायें हमको अच्छा लगे। जहाँ हम रहें हमको और औरों को भी अच्छा लगे । रूहानियत की राहत देने में हम खुली दिल रखें । उसमें बाबा ने अन्डर लाइन करके कहा है जो धारणा करता है वही पुण्य कर्म करता है। तो चारों सब्जेक्ट में मुख्य आ जाती है धारणा । ज्ञान भी धारण करो, योगयुक्त रहो, सेवा भी अच्छी धारणा से होगी। पवित्रता से धारणा अच्छी हो जाती है। धारणा से एक़दम सहजयोगी, सहयोगी बन जाते हैं तो सफलता छम छम करके साथ देती रहती है । तो एक तो जो करते हैं अपने लिये करते हैं, दूसरा जैसा कर्म हम करते हैं, जैसा हम सोचते हैं ऐसा वायब्रेशन दूसरों को पहुँचता है। इसलिए संकल्प शुद्ध, राइट और श्रेष्ठ हों।
मधुबन में आना माना अथक बनना, थकावट आने का कारण और उसका निवारण
जब बाबा की शिक्षाओं भरी मुरली सुनते हैं तो दिल में क्या आता है ? बाबा हमको सुधारने के लिए कितना प्रेम से शिक्षायें देता है ! बाबा की इच्छा है बच्चों में काम, क्रोध का अंश न रहे। लोभ, मोह भी कोई कम नहीं है। काम दृष्टि को खराब करता है, क्रोध वृत्ति को खराब करता है। वृत्ति में आवेश, द्वेष भाव के कारण आत्मा क्रोध वश हो जाती है। जब अन्तर्मुखी बनते हैं तो पता चलता है क्रोध के भी तीन प्रकार होते हैं - हाथों से (कर्म से), आंखों से, मुख से । ज्ञान में आने से, अच्छा संग वा समझानी मिलने से वह गुस्सा नहीं जो हाथों से किसी को चमाट मारें, वह नहीं कर सकते । मुख से भी नहीं कर सकते । लेकिन आंखे कभी नाराजगी दिखा देती हैं। क्योंकि अन्दर सूक्ष्म वृत्ति में किसके प्रति भी गुस्सा है तो कैसे भी निकल आता है। वह खत्म तब होगा जब सोल कॉन्सेस स्थिति होगी और अपने को चेक करेंगे। अपने को शीतल बनाने की आदत डालनी पड़ेगी। कई कहते हैं मैं चाहता नहीं हूँ पर मेरा स्वभाव है। स्वभाव में शीतलता तभी आयेगी जब सहनशीलता होगी और एक-दो के प्रति मीठी मित्रता भावना होगी । बैठकर चेक करना है मेरे अन्दर हर आत्मा के प्रति मित्रता की भावना है। अगर किससे कम है तो उसकी कोई बात अच्छी नहीं लगेगी तो कभी न कभी निकल आयेगी ।
तो सद्भावना वर्ष में अपनी उन्नति का बहुत ध्यान रखना है। औरों के प्रति सद्भावना तब होगी जब अपने प्रति अच्छी श्रेष्ठ भावना रखेंगे। जो अपने लिए अच्छी भावना रखता उनकी औरों के लिए भी अच्छी भावना होगी। हमारे पुरुषार्थ में स्वार्थ नहीं है, अच्छे पुरुषार्थ का लक्ष्य अच्छा बनाता है।
अपनी वृत्ति को अनासक्त रखो और नष्टोमोहा बनो । नष्टोमोहा एक है - देह से, संबंध से, दुनिया से वह ब्राह्मणों के लिए बड़ी बात नहीं है। देह, संबंध, दुनिया से नष्टोमोहा होना बड़ी बात नहीं क्योंकि घर जाना है, पावन बनना है। नाटक में पार्ट पूरा हुआ है। परन्तु देखा गया है मोह सूक्ष्म और और बातों में है। जैसे-जैसे डीप जाते हैं तो पता चलता है। कौन-सा ऐसा मोह है जिसको मुझे नष्ट करना है? वह है अपने संस्कारों में और अपनी आइडियाज़ के साथ अटैचमेंट जिसको हम छोड़ते नहीं हैं। जब हमारी आइडिया कोई नहीं मानता तो दुःख होता है। कहते हैं यह मेरा विचार, मेरी आइडिया है। यह भी अटैचमेंट है। इसलिए अपने विचार दो लेकिन उसे किसने स्वीकार किया तो बहुत अच्छा, नहीं किया तो उसकी फीलिंग नहीं आये । अन्दर दुःख की कोई भी कारण से फीलिंग आ जाती है – यह है अटैचमेंट । जैसे बाबा बड़े प्यार से मीठे शब्दों में शिक्षा देते हैं हम स्वीकार करें तो हमारा भला है, नहीं करते तो फीलिंग तो नहीं आती । रिलाइज कराता है बच्चे इतने अच्छे बाबा को पढ़ाई को छोड़ देते हो, यह बता देता है। दूसरा सेवा में अनासक्त रहना है। सेवा में कहाँ-कहाँ आसक्ति है, छूट न जाये। इसलिए बाबा कहता बाबा जैसा निष्कामी कोई नहीं है । बाबा बेहद सेवा करता पर निष्कामी है। सूक्ष्म हम विचार करें हमारी सेवा में भी आसक्ति है ? आसक्ति में लोभ भी होता है। सारा दिन बुद्धि वही चिंतन करती है। बाबा जैसा बिजी, बाबा जैसा फ्री कोई नहीं । जितना बाबा हर प्रकार से ध्यान रखता है ऐसी हमारी बुद्धि इतना ध्यान नहीं रखती । खुद में भी रखता विश्व में भी रखता बच्चों पर भी रखता। साकार में देखा है- योगी के सब लक्षण बाबा में देखे । बाबा हर बच्चे का ध्यान पूरा रखता, हमारी पढ़ाई पालना पर ध्यान रखता, हमारी ठण्डी गर्मी पर भी ध्यान रखता। बाबा के घर बच्चे आये हैं तो खुश होकर जायें। इतना बिजी होते भी बाबा कहता में सदा फ्री हूँ, ऐसे महावाक्य जब कानों द्वारा सुनते हैं तो दिल कहता है बाबा हम आप जैसे बनें। बाबा शक्ति और वरदान भी देता है तुम भी बन जायेंगे। वास्तव में थकाता कौन है ? बोझ क्यों महसूस होता है ? बाबा कहता सारा बोझ हमको देकर हल्के हो जाओ। फिर भी बोझा उठाने की आदत है । जिसको आदत है वह फ्री रह नहीं सकता । उसको बोझा उठाना अच्छा लगता है। हल्के हैं तो पढ़ाई पर अपनी उन्नति पर ध्यान रहता । बोझा है तो यह बातें ध्यान पर नहीं रहती । बोझ सुनने ही नहीं देता है। इसलिए बाबा कहता जो भी तुम्हारे सिर पर बोझा है मेरे हवाले कर दो और तुम हल्के होकर उड़ना सीखो। परन्तु मैनर्स नहीं है तो उड़ नहीं सकते। कोई अवगुण होता है तो उड़ नहीं सकते, मन खाता है। अवगुण नीचे उतार देते हैं। गुण उड़ने में मदद करते हैं।
"आना और जाना" इस राज को कोई नहीं जानता। ऊपर से आना फिर अब है वापस जाना - इस राज़ को कोई भी धर्म जाति वाला नहीं जानता । किसी ने यह ज्ञान समझ दी ही नहीं। इसलिए हमको पता है आये अपने घर से, अब जाने का टाइम हो गया है। बीच में कोई जा नहीं सकता। चक्र में आये चक्र पूरा हुआ अब जाने का टाइम है। इसलिए बाबा कहता मुझे अपने घर में याद करो । बाबा बैठा यहां है शिवबाबा ब्रह्मा बाबा में बैठकर पढ़ा रहा है, हम यहां सुन रहे हैं फिर उसको ऊपर कैसे याद करेंगे? हम देख रहे हैं आप हमको पढ़ा रहे हैं फिर ऊपर कैसे याद करेंगे? इस पर बाबा कहते बच्चे यही तो मंजिल है इसी को तो समझना है इसको ही यथार्थ याद कहा जाता है। तुम्हारी बुद्धि में समझ है - कौन कहाँ का रहने वाला पढ़ा रहा है। जिस घर का रहने वाला है तुमको वहां आना है इसलिए मुझे अपने बाप को घर में याद करना है। जो बाप का घर वह मेरा घर- यह बुद्धि में सदा याद रहे। जब यथार्थ याद का ज्ञान बुद्धि में आ जाता है तो गुणों का ज्ञान सेवा का ज्ञान आ जाता तो योग स्वतः लग जाता है। ज्ञान बड़ा या योग बड़ा ? जरूर हम कहेंगे योग । परन्तु बाबा कहता ज्ञान / क्योंकि योग का भी ज्ञान मिला। ज्ञान यथार्थ नहीं है, पूरा अच्छा समझा नहीं है, आत्मा ज्ञानी बनी नहीं है तो योगी कैसे बने । आत्मा में परमात्मा का गुह्य रहस्य-युक्त ज्ञान हो उसे समझे तब योग लगाये ।
आज से मधुबन हॉस्पिटल से थकने की बीमारी छोड़कर जाना। कभी मुझे थकना नहीं है। थकाता है देह अभिमान । अगर याद की यात्रा अच्छी है, मुरली रोज़ सुनता है, खुराक अच्छी खाई तो थक नहीं सकता । खुराक कम होने के कारण, रेस्ट कम होने के कारण थकावट होती है। योगयुक्त रहना माना रेस्ट में रहना । मुरली सुनना माना अच्छी खुराक खाना तो थकेंगे क्यों । तो जिसको भी थोड़ा थकावट हो तो छोड़कर जाना । थकावट क्यों होती ? क्योंकि बैलेन्स रखना नहीं आता। सेवा खुद की और औरों की दोनों इकट्ठी हो । खुद को भूल औरों की सेवा में लग जाते तो थक जाते हैं। औरों का चिंतन करते हैं। सेवा भले करो परन्तु दूसरों की सेवा के साथ स्व की सेवा भी करो। अगर एक की करते, एक पर बड़ा अटेन्शन है। परन्तु वह नहीं बनता है तो हम थक जाते हैं। हम कहें एक, वह करे दूसरा । भूँ-भूँ करके लायक बनाना चाहते परन्तु उसने दूसरा नाटक दिखा दिया तो उसमें थक जाते हैं। पर हम थके क्यों ? जो बाप को फालो नहीं करते वह थकते हैं। तो कारण निकालना चाहिए। मंजिल ऊंची है, जाना जरूर है। थकेंगे तो रह जायेंगे। इसके लिए हम दो तीन बातें पक्की कर लें। जब हम ज्ञान में आये – तो जब भी कोई बात आती थी तो कहते थे बड़ी बात थोड़ेही है। यह जवाब सदा ही था। जिस घड़ी बाबा के पास पांव रखा आज दिन तक जवाब आयेगा बड़ी बात नहीं है। क्योंकि कल्प पहले का पार्ट है, भगवान के संग हैं तो विघ्न आयेंगे ही। पुराने हिसाब-किताब चुक्तू होंगे। सब बातों का जवाब है। यह बात बड़ी मदद करती है। थकावट नहीं होती। ऐसे नहीं, यह क्यों? नहीं, एक बात आती है, चली जाती है। हमने मम्मा से पूछा- मम्मा सभी बीमारियां मेरे पास ही क्यों आती हैं ? एक जाती है, दूसरी आती है । ऐसा क्यों? तो मम्मा ने कहा- तुमको अनुभवी बनाने के लिए आती है। दूसरों के दर्द का तुमको पता रहेगा। इसलिए हमें बीमारी में कभी दुःख नहीं होता है। बीमारी आई कोई हर्जा नहीं । योगयुक्त बनने के लिए अशरीरी भव का मंत्र पक्का करने के लिए मन से अपनी और औरों की अच्छी सेवा करने के लिए आई है। तो हम थकें क्यों ! ऐसे कई बातों में अपने आपको समझाकर चलते चलो, थको नहीं, आराम से चलते रहो । हमारे मुख से कभी यह आवाज़ ही नहीं निकलता कि हम थक गये हैं। यह भाषा बोलनी ही नहीं आती है। सदा स्वमान में रहने वाले कभी यह शब्द नहीं कह सकते कि हम इस बात से थक गये हैं। भाव-स्वभाव आयेंगे, कुछ भी होगा हमको असर नहीं होता है। ड्रामा के ज्ञान ने इतना अच्छा बना दिया है। ड्रामा का ज्ञान बाबा ने दिया है। थकना शब्द हमारे मुख से निकल नहीं सकता है। कभी कोई यह नहीं कहे हम थक गये हैं। मधुबन में पांव रखना माना थकावट दूर हो जाना, टायरलेस, फियरलेस ।
नम्रता का गहना धारण करो तो सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण बन जायेंगे
थोड़े समय के लिए भी संकल्प और वाणी दोनों जब शान्त हो जाते हैं कितना अच्छा लगता है। वाणी में आना आसान है, वाणी में आने के लिए संकल्प चलते हैं, ऊपर जाने के लिए संकल्प शान्त हो जाते हैं। हमें इस अभ्यास की खींच होनी चाहिए। जैसे बाबा कहते तुम्हारी अवस्था चुम्बक जैसी ऐसी हो जो बाबा तरफ खिचें, उसके पहले हमारे अन्दर बाबा की इतनी खींच हो जो याद न करना पड़े, पर याद सताती रहे । जैसे कोई बात छोड़नी मुश्किल हो जाती है ऐसे याद इतनी अच्छी प्यारी लगे जो हमारे से छूट ही न सके । वह तब होगी जब घर जाना अच्छा लगेगा, संकल्प को शान्त कर देंगे। जितना वाणी पर कन्ट्रोल है उतना एकान्तप्रिय, शान्तप्रिय बन सकते हैं। टाइम निकाल कर भी एकान्तवासी बनो। बाबा ने हमें काम ही दिया है शान्ति स्थापन करने का, सत धर्म स्थापन करने का ।
बाबा ऊपर से आया, हम यहां वहां से भाग कर बाबा के पास आ गये। इसलिए बाबा हमको प्यार करता है। वह परमधाम से, अपने घर से आया है। हम तो दुनिया के कई कोनों में अपना धर्म-कर्म छोड़ कहाँ-कहाँ चले गये थे। वहाँ से बाबा के पास आये। भले हमारे कई मित्र संबंधी हैं जो ज्ञान में नहीं चलते तो बाबा कहते उनके लिए समझो यह हमारे कुल के नहीं हैं ज्यादा माथा क्यों मारते हो जिसे हमारा पीछा करना हो करे, हम किसी का पीछा नहीं करते हैं। यह भी अपने आपको नष्टोमोहा बनाने की सहज विधि है। हम किसी के पीछे न पड़ें जिनको पड़ना होगा वह आयेंगे । सन्देश दो, भूँ-भूँ करो जब उनकी हड्डियां नर्म हो जायेंगी तो ठीक हो जायेंगे । चिंतन करने वा चिंता करने से नहीं आयेंगे ।
बाबा ने आज कहा बच्चे साक्षी होकर हर बात को देखो। हर एक के शरीर का अपना-अपना हिसाब-किताब है। दुःख तो क्या, अफसोस भी न हो। दुःख होता है अटैचमेंट से । दुःख नहीं हुआ पर थोड़ा अफसोस हुआ तो यह अफसोस होना भी अब शोभता नहीं है। परन्तु इसके लिए प्रैक्टिस बहुत काल की चाहिए। जब कोई बात सामने आती है तो जरा सी भी फीलिंग से छूट जाते हैं। किसी के चेहरे से पता चल जाता है इसको थोड़ा ख्याल आया । हमारा यह अभ्यास पहले से ही हो, आने वाली बात से हमारी स्थिति पर फ़र्क पड़े, स्थिति फिर बनानी पड़े, रांग है। अन्दर के अभ्यास की कमी है तभी तो ऐसी फीलिंग आई । अभ्यास की बहुत आवश्यकता है। बाहर में डाक्टर, सर्जन कितनी पढ़ाई करते परन्तु जिसकी प्रैक्टिस ज्यादा है उसकी कमाई ज्यादा होती है। हमारी पढ़ाई है ही विश्व को पढ़ाने के लिए। यह पता नहीं था विश्व में जाकर पढ़ायेंगे । लेकिन अभी महसूस करते हैं सारे विश्व की आत्माओं को पढ़ाने के लिए ही बाबा ने पढ़ाया है। इतनी ऊंची पढ़ाई है । उस पढ़ाई के लिए बाबा ने हमारी पालना भी ऐसी की है तब यह पढ़ाई किसी को अच्छी लगती है। अगर धारणा नहीं देखते तो कोई का अटेन्शन नहीं जाता। कोई भी बाहर वाले पूछेंगे ऐसी वृद्धि तुम लोगों की कैसे हो रही है। जहाँ भी जितने सेन्टर खुले हैं कोई न कोई निमित्त सैम्पुल होगा, उसे देखकर सेन्टर खुले हैं। सारे भारत की हिस्ट्री को जानती हूँ, कोई सेन्टर ऐसे नहीं खुला है। कोई ने लाइफ देखी है कि इनकी न्यारी लाइफ है। यही जीवन काम का है। उनसे सेन्टर खुले हैं। सारे विदेश की सेवा के २० वर्ष में ऐसे ही वृद्धि हुई है। तो अभी ९ लाख बनना कोई बड़ी बात नहीं है। बी.के. का नाम कोई ऐसे ही सबके कानों में नहीं जा रहा है। आंखों को देखने से ही पता चलता है कि बी. के. क्या हैं। इनको पढ़ाने वाला कौन है ! ऐसा जीवन बनाने के लिए साकार वा अव्यक्त रूप से पालना देने वाला कौन है ! लोगों को प्रूफ चाहिये । प्रूफ देखकर मानने लगते हैं। हमारी जीवन मिसाल हो, लाखों को प्रेरणा देने वाली हो। हमको माइक बनने की जरूरत नहीं है। माइक अनेक निकलेंगे। अनुभव करके अपने अनुभव से बापदादा को प्रत्यक्ष करने वाले माइक, बहुत निकलेंगे । अब हमको क्या करना है ?
जब कोई सात दिन का कोर्स करता है तो हम उन्हें सामने बुलाती हूँ। कोर्स किया माना उसको यह पता चला कि अमृतवेले उठना है ? उसको यह पता चला कि आहार-विहार शुद्ध रखना है, रोज़ क्लास में आना है, अच्छा संग रखना है। यह पता नहीं चला तो कोर्स किया ही नहीं । कराने वाले ने क्या कराया। अगर इतना भी पता न चला तो क्या हुआ । पुरानी आदतें न छोड़ी तो क्या हुआ । यही तो जादू है। परिवर्तन आ जाए। जो मोटी-मोटी बातें है वह जल्दी बदल जायें तो आगे बढ़ें। हमारे लिए तो यह बातें है नहीं। अमृतवेले तो उठते हैं लेकिन पावरफुल स्थिति कैसे रहे – हम यह सोचेंगे। किसके संस्कार के टक्कर में हम न आयें। हमारे पुराने संस्कार कैसे भी हों वह खत्म हो जाएं। आदतें तो गई। लगाव झुकाव का टाइम गया। अभी हमारी क्या स्थिति है ? दर्शनीय मूर्त बनना है तो हमारी दृष्टि, वृत्ति, कृति कैसी है ? वृत्ति का आधार है संकल्प । वृत्ति से वायब्रेशन हो जाता है। अशुभभावना वाले को चेंज करने में हमारी शुभ भावना वाली वृत्ति ही काम करती है। जिसकी वृत्ति खराब है उसकी वृत्ति सुधर जायेगी। उसका असर हमको नहीं होगा । वृत्ति वायुमण्डल को शुद्ध पावरफुल बनायेगी । वह काम हम कर रहे हैं ? दूसरा सब कारोबार तो करते आ रहे हैं अभी हमारा क्या रोल है ? नहीं तो अन्दर से आता है जो मुझे करना चाहिए वह मैं नहीं कर रहा हूँ। जैसे बाबा ने कहा तुम्हारा श्रेष्ठ भाव हो। श्रेष्ठ भाव तब बनेगा जब निस्वार्थ भाव होगा। वह तब होगा जब हमारे अन्दर बहुत काल से मान-अपमान, निंदा-स्तुति, हार-जीत, जो भी सामने आ रही है, साक्षी होकर देखने का पार्ट बजाने की ऐसी आदत हो जो उसके असर में न आयें। अपमान कितना भी हो रहा हो पर अन्तर्मुखी होकर साइलेन्स की शक्ति से अपमान की फीलिंग न आये। जब मान की इच्छा है तब अपमान की फीलिंग आती है। मान की इच्छा से फ्री रहो तो अपमान से दुःख नहीं होगा। किसी का दोष नहीं है। किसी को भी दोषी नहीं बनाओ । ड्रामा बना हुआ है, हर आत्मा का अपना पार्ट है। अभिमान खुद को निर्दोषी दूसरे को दोषी बनाने में बड़ी मदद करता है, उस घड़ी साथ देता है। मैं निर्दोषी हो जाऊं दूसरा दोषी हो जाए। देही अभिमानी से जो सरल मीठी सहज स्थिति होनी चाहिए वह बनने नहीं देगा। देही अभिमानी स्थिति सहज सरल योगी बना देती है। नम्रता का गुण हमारा साथ देता है। नम्रता हमारी सखी है। नम्रता को सखी बनाओ तो सर्वशक्तियाँ, सर्वगुण आ जायेंगे । नम्रता वाला सबको प्यारा लगता है। जरा सा जिसमें देह अभिमान है, वह प्यार रिगार्ड खिंचवा नहीं सकता है। नम्रता बहुत अच्छा गहना है। सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण बनना है, श्रेष्ठ आत्मा बनना है तो नम्रता बहुत अच्छा मदद करती है। अन्तर्मुखी बना देती है। महीन पुरुषार्थी बना देती है। फिर अपने मन की सफाई करना अच्छा लगेगा। जरा सा खोटापन, मैलापन अच्छा नहीं लगता है। हम ऊंच ब्राह्मण हैं, फिर देवता बनेंगे । हमारी अभी की स्टेज भविष्य का साक्षात्कार करायेगी । अभी के गुण बतायेंगे चलन बतायेगी कि क्या बनने वाले हैं। हम किसी के अधीन नहीं हैं तो लगता है हम देवता बनने वाले हैं। सूर्यवंशी में वह रॉयल्टी आयेगी ।
हमारे में झूठ नहीं होगा तो हमारे सामने कोई झूठ बोल नहीं सकता । जैसे सतयुग में झूठ की रत्ती नहीं है। हम इतना बदल गये हैं! दुनिया में सच की रत्ती नहीं, हम लोगों से औरों को साक्षात्कार हो । सच कितना प्यारा लगता है, खींचता है। भगवान् को भी खींचता है। भगवान् के सामने जाओ, चाहे भगवान् के बच्चों के सामने जाओ - प्यार लेने के अधिकारी हैं ।बाबा के सामने जाओ बाबा के पास प्यार का भण्डार, प्यार की दुआयें हैं जो हमको पार कर देती हैं। साथ-साथ परिवार से भी चारों तरफ से मीठी शुभ कामनायें मिल रही हैं जो ऊंचा उठने में पंख दे रही हैं।
अन्दर सूक्ष्म में हम इतने साफ हों जो लगे यह एंजिल लाइफ है। बाबा हमारा रक्षक है क्योंकि बाबा ने बहुत शिक्षायें देकर हमारी सम्भाल की है। और हम भी शिक्षाओं द्वारा रक्षा करते रहें - यह हमारा फर्ज़ कहता है। ऐसा किला मज़बूत हो जो हमारी भावना सदा शुभ, सबके लिए कल्याण वाली हो । अपनी भावना को चेक करना है। मेरी भावना सबके लिए कल्याणकारी है ? गुप्त सहयोग देने वाली है? कोई भले हमें अपना शत्रु समझे लेकिन मैं अपनी मित्रता भावना को बढ़ाती चलूँ । चेक करना है हमारी भावना कितनी शुभ, श्रेष्ठ काम कर रही है ? अगर नहीं कर रही है तो क्या कमी है ? आजकल के बोल इतना काम नहीं करते जितना भावना काम करती है। बोल में भाव समझने में टाइम लगता है, भावना अच्छा सहज काम करती है। भावना दूर बैठे भी पहुँच जाती है। साक्षी होकर देखने के आदती तब बनेंगे जब अपने आपको किसी भी प्रकार की थोड़ी बहुत खराब फीलिंग से फ्री रखेंगे। निंदा-स्तुति, हार-जीत में समान रहने के आदती बनेंगे। जो सामने आया उसमें समानता रही या कुछ फ़र्क रहा। नैन-चैन बताते हैं - समान हैं या थोड़ा बहुत घबरा जाते हैं। फीलिंग में आकर चिंतन चल जाता है ।
अपनी स्थिति से दूसरों की सेवा करना ही सच्ची सेवा है
ओम शान्ति । मधुबन में बाहर वाले आते हैं तो पवित्रता, शान्ति, प्रेम का अनुभव कर लेते हैं। बाबा के बच्चे यहां आते हैं तो रिफ्रेश हो जाते हैं, बैटरी चार्ज कर लेते हैं, संगठन की शक्ति पाते हैं, ज्ञान के गुह्य राज़ों को समझते हैं। हमारा अनुभव फिर उनसे भी निराला है क्योंकि निमित्त टीचर का पार्ट है लेकिन मधुबन में स्टूडेन्ट लाइफ है। यह बहुत प्यारी लगती है, बचपन याद आ जाता है। बाबा कहते हैं हदों से पार चले जाओ, जैसे बेहद का बाबा बेहद में रहता है, रहने का स्थान याद है, बेहद स्थान है, सेवा भी बेहद की है। वह फीलिंग मधुबन में हम सबको आती है। मधुबन अपना घर लगता है। सेन्टर में वातावरण बनाना पड़ता है। जो हमारा सेन्टर न लगे, बाबा का घर लगे । वातावरण ऐसा हो जैसे मधुबन के वातावरण में लगता है, हमको सम्भालने वाला ज्ञान देने वाला बाबा है। यहां हर क़दम में बाबा दिखाई पड़ता है। दुनिया में भगवान् को सर्वव्यापी कहते हैं, यहाँ बाबा हमारे साथ प्रैक्टिकल है, कार्य में भी साथ है। स्व-स्थिति बनाने में भी हमारे साथ है । तो सारा दिन यह बात पक्की करनी है कि जिनके साथ सेवा करते हैं, जिनकी सेवा करते हैं, सम्बन्ध में आना पड़ता है उसमें दिव्यता और अलौकिकता हो । सेवा में, सम्बन्ध में, जो आये चाहे साथी हैं या जिन्हों के साथ सम्बन्ध में आते हैं उसमें दिव्यता, अलौकिकता रूहानियत का रूहाब, सम्बन्ध में निस्वार्थ भाव हो । सेवा में मस्त हो जाने से स्थिति पर ध्यान न रहे तो वह सच्ची सेवा नहीं है। अनुभव, विवेक कहता है सच्ची सेवा वह है जो अपनी स्थिति से दूसरों की सेवा करे। बाबा ने अपनी स्थिति से हमारी सेवा की है।
कोई प्रेम के आधार से, कोई ज्ञान के आधार से आये हैं। यदि प्रेम, ज्ञान सहित है, तो हमको निराधार बना देता है और बाबा की छत्रछाया के नीचे भी रखता है। सदा बाबा की छत्रछाया है, ज्ञान-योग के आधार से चल रहे हैं। प्रेम का संबंध है। बाबा की छत्रछाया नहीं हो तो दुःख-सुख, मान-अपमान हार जात की फीलिंग में आ जायेंगे । छत्रछाया हमारी रक्षा कर रही है। बाबा कहते हैं चलते चलो, कहाँ भी रुको नहीं । रुकावटें आयेंगी, रुकना नहीं है। हमेशा यह भी अनुभव करो कि सिर पर बाबा का हाथ है। दिलाराम बाबा बैठा है। दिल कभी छोटा नहीं हो सकता है। पीठ पर भी आशीर्वाद का हाथ है । जैसे बाबा चला रहा है, चलते चलो । ज्ञान कहता है आगे बढ़ते चलो, प्रेम कहता है बाबा के साथ सम्बन्ध सच्चा रखो ।
एक में सब कुछ है। इन्सान को दो चीजें चाहिए - एक सम्बन्ध और दूसरी सम्पत्ति । एक बाबा में सम्बन्ध और सम्पत्ति दोनों हैं। सर्व सम्बन्ध एक बाबा के साथ हों। जितनी सम्पत्ति चाहिए, सारे वर्से के अधिकारी बनते हैं। इस आधार पर सहज एकाग्रचित हो सकते हैं। यदि अपनी स्थिति को बनाने के लिये विशेष अभ्यास नहीं किया हुआ होगा तो लाइफ में मज़ा नहीं रहेगा। सदा अतीन्द्रिय सुख में नहीं झूल सकेंगे। कोई लहर आयेगी तो मुरझा जायेंगे । बुद्धि जिस समय चाहे अचल अडोल स्थिति से एकाग्र बना लो । यदि यह अभ्यास नहीं है या कम है तो सर्विस में अब यह स्थिति बनानी है। ऐसा उमंग हो । हमारा यह संकल्प अपने प्रति पक्का हो तो बाबा की अच्छी मदद मिलेगी । बाबा कहते हैं हिम्मत वाले बच्चों को बाबा की पद्मगुणा मदद है । हम सबके ऊपर बाबा का इतना प्यार है तो उस प्यार का, पद्मगुणा मदद का फायदा लें । बाबा को फालो करना सहज तब ही लगेगा जब और बातों के चिन्तन, वर्णन में न आकर के श्रीमत को पालन करने के लिये मैं उन्हीं बातों का मनन-चिन्तन करूं । बाबा के महावाक्यों पर खूब मनन-चिन्तन चले, अच्छी तरह से चले, तो और कोई भी फिक्र वाली बात में फिक्र नहीं होगा।
कोई भी विघ्न आते हैं तो घबराना नहीं है। यदि विघ्न आतें हैं तो ऐसे समझो कि पंखा चलाने के लिये आये हैं। जब आग धीमी है तो उसे तेज़ करने के लिये पंखा चलाते हैं। योगयुक्त बनने के लिये कोई बात आती है उसमें कुछ नवीनता लाने, अटेन्शन रखने के लिये बात आती है।
कई पूछते हैं आपके आगे इस मंजिल पर चलने में मुश्किलें तो बहुत आई होंगी। लेकिन हम सोचते हैं कि कोई मुश्किलें नहीं आई हैं, आई और चली गई। आई हैं तो आगे बढ़ाने के लिये आई हैं। रोकने के लिये नहीं आई है। न किसी ने रोका है, न रुके हैं। कोई रोक ही नहीं सकता है। कोई रुकावट आयेगी तो जम्प लगाना भी आता है ।
जब बाबा के पास आये तो बाबा ने कहा तुम मेरे महारथी बच्चे हो । हम कोई प्यादे तो नहीं हैं। घोड़ेसवार नहीं है। हम पैदल के लक्षण क्यों रखें, क्यों हिलते रहें ? भगवानुवाच – “तुम मेरे महावीर बच्चे हो, अनन्य बच्चे हो ।” तुम मेरे हो। भगवानुवाच – “मेरी कारोबार अपने बच्चों के साथ है।” भगवान् की कारोबार को उसके बच्चे ही जान सकते हैं। हमारा कारोबार कैसे चलता है – सुनकर दुनिया वाले हैरान हो जायेंगे । किसी का और कोई प्रश्न नहीं होगा लेकिन खर्चा कैसे चलता है - यह प्रश्न जरूर उठता है। वो लोग कोई प्रोग्राम बनाते हैं तो किसी का सहयोग नहीं मिलता है। यदि कोई उसमें सेवा करना चाहे तो कुर्सी चाहिए, कोई प्रेजीडेन्ट, कोई चेयरमेन, पैसा भिखारी की तरह मांगते हैं। हमारे पास यह मुसीबत ही नहीं है। बड़े खुशनसीब हैं हम । भगवान् के घर बैठे, भगवान् का कार्य कर रहे हैं, एक-दो को भाग्यवान देख खुश हो रहे हैं। सेवा तो हो रही है लेकिन हमारे आपसी सम्बन्ध में रूहानियत कहाँ तक है, जिसे देख बाबा खुश हो । नेचुरली हमारा यह स्वभाव हो जाये । हम रूहानियत को जानते हैं, ईश्वरीय सन्तान हैं, हमारी एक ही प्रकार की धारणायें हैं, नियम हैं जिन पर हम सब चल रहे हैं। हमारी यात्रा एक ही है, यात्रा के हम साथी है, बाबा ने चुन-चुन कर इतना बड़ा संगठन बनाया है। बाबा ने कितनी मेहनत करके कांटों के जंगल से चुन-चुन कर इतनी अच्छी माला बनाई है। बाबा के हर बच्चे के लिये मुझ आत्मा को सच्चा प्यार हो, किसी एक से भी कम है तो रांग है। बाबा हर आत्मा को जानकर उसको अपना बना लेता है कि ये मेरे बनकर रहें, इनकी बुद्धि बाहर न जाये। अपनेपन की भासना देता है। देह से नहीं, रूहानियत से अपनेपन की भासना हर एक को गुप्त मिलती रहे कि हम परिवार को गुप्त मदद दे रहे हैं। बाबा को मददगार बच्चे चाहिए। कैसे मदद करें ? कौन सी मदद करें ? एक तो अच्छा सैम्पल बनें। यह तो मुझे ही बनना होगा। मैं बाबा की आशायें पूर्ण करने के लिये सदा तैयार रहूँ । संग साथ रहने वालों का एक-दो के प्रति रिगार्ड-प्यार हो । गहराई में जाकर खुद के, बाप के, परिवार की एक-एक आत्मा के गुणों को देखो। जो भी बाबा के बच्चे बनें हैं वह सब त्याग, तपस्वीमूर्त हैं। नम्रता, सत्यता और दिव्यता इन तीनों का हमको जैसे पुतला बन जाना है। सत्यता को सिद्ध करने के लिये नम्रता अपने आप काम करती है। वह हमारा रूप दिव्य बना सकती है। ये अन्दर से चेक करो कि नम्रता से, कितने प्रकार से सुख मिलता है, औरों को सुख देने के लिये खुला दिल होता है।
नम्रता दिल को खुला रखती है, सत्यता शक्ति दे देती है । दातापन का गुण हमको दिव्य बनाता है। ऐसे तो देवता नहीं बनेंगे । मंगता बनने से देवता नहीं बन सकते । जिसके संग में आयें, ज्ञान दें उनको गुण भी साथ-साथ देते रहें तो हम फील करेंगे कि सच्ची सेवा क्या है। सम्बन्ध में इतना अच्छा प्यार हो । ज्ञान के साथ गुण भी मिलें । जहाँ भी, जितना समय भी, जिसके साथ रहते हैं, सदा एक जगह तो नहीं रहेंगे, गंगा कभी एक जगह नहीं टिकती है, जहाँ भी हम हैं मेहमान हैं, कभी भी हम नहीं समझेंगे कि यह हमारा स्थान है। जहाँ भी हैं सबके दिलों में हमारी यादगार हो। यह होता है नम्रता और सत्यता से । इससे लगता है कि हम देवता घराने की आत्मा हैं। जरा भी अपने में या दूसरों में शक न रखें । शक्की विचार, शकी दृष्टि से एक-दो के प्रति फेथ नहीं रहता । बाबा ने हमारे में कितना फेथ रखा है। भले हम कभी हिम्मत हारेंगे, ना उम्मीद होंगे लेकिन बाबा कभी हमारे से नाउम्मीद नहीं होंगे तो सदा अपने को चेक करो, स्वयं नाउम्मीद ना हों। हम इतने साल में बदले नहीं हैं, ऐसी भाषा हम न बोलें । हमारी भाषा में सबके लिये शुभ भावना हो। कोई हमारे लिये शुभ बोल बोले तो खुशी हो । हम भी किसी के लिये शुभ बोल बोलेंगे तो उसको भी खुशी होगी। अगर कहेंगे कि तुम तो सुधरने वाले नहीं हो तो उनका दिल टूट जायेगा। यह तो ऑर्डनरी टीचर या ऑर्डनरी मां-बाप बोलते हैं। हम देवता बनने वाली आत्माओं की भाषा सदा रॉयल हो ।
हम सेवा भी बड़ों की दुआओं के आधार से कर रहे हैं। जो आने वाली आत्मायें हैं वो भी दुआओं के आधार से आगे बढ़ेंगी। उनमें हिम्मत आयेगी । तो हमको सदा स्टूडेन्ट लाइफ में रहने में आनन्द आता है। जिसका स्टूडेन्ट लाइफ से शौक है उसे बाबा जो कहता है वह करके दिखाता है।
देवता बनने के लिए धैर्यता का गुण धारण करो, धैर्यता से हर कार्य अच्छा होगा
सर्वशक्तिमान् बाप की याद सर्व गुणों वा सर्व शक्तियों के भण्डार से हमको भरपूर करने वाली है। बाबा हम बच्चों को आवाज़ से परे जाने की प्रैक्टिस कराते रहते हैं। हर पल बाबा इशारा देते हैं - बच्चे, व्यर्थ चिन्तन नहीं करो । बाबा ने यह चेतावनी कई बार दी है परचिन्तन से बहुत नुकसान है। बाबा के दिल तख्त पर बैठना है तो क्या करना है ? वह लिस्ट अपने पास सदा तैयार रखनी चाहिए। बाबा के दिल तख्त पर बैठना माना दिल में पहले कुछ न हो । दिल सदा खुश भी हो, मजबूत भी हो, हर बात का सामना करने की दिल में शक्ति हो। दिल में बाप के साथ-साथ सर्व आत्माओं के लिये इतना ही प्यार और रिगार्ड हो। उसमें भी खास बाबा कहते हैं मेरा बच्चों के साथ बहुत प्यार है मैं भक्ति में भी बहुत प्यार करता हूँ । सम्मुख आकर तो बहुत प्यार करता ही है। हम भी उसके प्यार में देह, सम्बन्ध, दुनिया को छोड़ बाप के गले का हार बनने के लिये भागते-भागते आये हैं। "एक बाबा दूसरा न कोई" यह हमारे दिल ने मान लिया है। दिल में कोई आशा, ममता, तृष्णा नहीं है। बाबा के दिल में बैठने के लिये हमको कोई संसारिक पदार्थ या कोई चीज़ पाने की इच्छा नहीं है। जो बाबा से मिला है वह औरों को देना है लेकिन उनसे कुछ नहीं चाहिये । बाबा मिला सब कुछ मिला। ऐसी तृप्त आत्मा ही बाबा के दिल पर बैठती है। सदा सच्चे दिल से बाबा को तो राजी करना ही है लेकिन हर एक आत्मा हमारे से राज़ी रहे, न मैं किससे नाराज रहूँ, न मेरे से कोई नाराज रहे । इसके लिए धीरज, शान्ति और प्रेम मेरे पास सदा ही कायम रहे। अधीर्यता नाराज कर देती है। देखा जाता है देवता बनने के लिए धैर्यता का गुण बहुत अच्छा है। धैर्यता का गुण है तो कोई भी समस्या तकलीफ नहीं देगी। देर लगेगी पर हर काम अच्छा होगा। धीरज रखने से गंभीरता भी आ जाती है। देखने वाले को, सम्बन्ध में आने वाले को, सीखने को मिलेगा कि इसने हर काम धीरज से करके सफलता पाई है, यह रिकॉर्ड हो जायेगा। उतावलेपन में कई बार नुकसान हो जाते हैं। उतावलापन सोल कॉन्सेस नहीं होने देता, बाबा को फालो नहीं करने देता। धीरज से सोल कान्सेस होते हैं तो बाबा की बातें भी टच होती हैं। उतावले में टच नहीं हो सकती हैं। हर एक बात पर हम अभ्यास करते हैं, ध्यान देते हैं तो एक गुण अनेक गुणों में सम्पन्न बनने में मदद करता है। धीरज से हम अन्तरमुखी बन सकते हैं।
एक ही समय पर चार प्रकार की सेवा करो, स्व की, यज्ञ की, ईश्वरीय परिवार की और विश्व की यह चारों सेवायें साथ-साथ हों। स्व की सेवा में अटेन्शन है तो यज्ञ की बेहद सेवा मिस नहीं होगी। उसे यह ख्याल नहीं आयेगा कि ये कोई और करे, मेरा काम नहीं है। सदा ही ख्याल रहता यज्ञ बाप का सो मेरा है। जैसे बाबा मेरा है, वर्सा मेरा है। बाबा ने यज्ञ रचा है। यज्ञ से मुझे पालना, पढ़ाई मिली है। तो नेचुरली सेवा अपने आप होती है। जैसे अपने स्वधर्म में रहने की स्मृति रहती है, ऐसे परिवार के साथ सम्बन्ध में हमारी एकता और स्नेह हो । सम्बन्ध में अपनापन हो । जैसे बाबा ने हम बिछड़ों को मिलाया है। अब इच्छा है बाबा के समीप रहें । ऐसे बाबा का हर बच्चा बाबा के समीप रहे। यह इच्छा कभी कम न हो, छूटे नहीं। ऐसी मन्सा के वायब्रेशन विश्व के किसी भी कोने में सेवा दे सकते हैं। सूक्ष्म मन्सा अपनी शुद्ध और श्रेष्ठ हो । कोई हद के बन्धन में अपनी मन्सा को फंसाया हुआ नहीं हो । सदा चेक करो नष्टोमोहा और अनासक्त वृत्ति है। यदि वृत्ति अनासक्त और नष्टोमोहा है, कहीं भी अटैचमेन्ट वा मेरेपन का भान नहीं है तो नेचुरली बाबा हमको गुप्त ट्रेनिंग देता है। टाइम थोड़ा है, काम बहुत करना है। कई नये होते हैं तो उनको रियलाइज़ कराते हैं तुम काम थोड़ा करते हो, सोचते बहुत हो । कोई बात हो गई, अच्छी हुई। उसके बारे में सोचना, ऐसे नहीं होना चाहिये था, ऐसे होता तो अच्छा होता इस तरह से अपने बुद्धि को इंगेज नहीं करना है, बिज़ी नहीं करना है। कभी भी यह ख्याल नहीं आये कि मुझे यह अच्छा लगता है, यह अच्छा नहीं लगता है। इस प्रकार के संकल्प, बोल, एक्शन भी हमको रूहानियत के रूहाब में रहने नहीं देते। इसलिए बाबा ने यह ध्यान खिंचवाया है – जो हुआ अच्छा, जो हो रहा है वह भी अच्छा । साक्षी रहकर देखने का अभ्यास करना है।
जैसे तपस्वी होते हैं उनको देखकर लगता है ये उपराम कैसे हैं? उनकी महानता का प्रैक्टिकल स्वरूप है उपराम। करते हुए देखते हुए अपनी स्थिति ऊपर है। हर्षित चेहरे से, दुआओं भरी निगाहों से सबको अचछी भासना दे रहे हैं। परन्तु वह तब होगा जब संकल्प शक्तिशाली चलते होंगे। दिलशिकस्त होने वाले संकल्प नहीं चलाने है। संकल्पों की चेकिंग से ही बुद्धि सतोप्रधान बनेगी। सच्चे दिल से बाबा ने जो दिया है वह दान करेंगे तो शक्ति बढ़ेगी। यदि आपस में कोई लेन-देन करते हैं तो क्या हिसाब-किताब बनता है ? जो अन्दर से अपने को कर्मातीत स्थिति में लाने के लिये पुराने हिसाब-किताब को चुक्त करने की लगन में है वह बड़ा ध्यान रखते हैं। पहले वाला चुक्तु करना है। फ्री हो जाना है। अब कहीं जुटे नहीं यह ध्यान रखना है। पुराना ज्ञान-योग की शक्ति से चुक्त करना है। पुरानी दुनिया, सम्बन्ध की तरफ ध्यान नहीं जाये। यहां श्रेष्ठ कर्म, योग, बाबा से सम्बन्ध हो तो चुक्तु होगा। कर्म श्रीमत अनुसार मर्यादा के अनुसार हों तब ही सर्वशक्तिमान् की शक्ति पुराने हिसाब-किताब को चुक्तु करेगी । श्रेष्ठ कर्म के लिये हिम्मत के साथ बाबा की मदद मिलेगी। यज्ञ से मेरी पालना हो रही है, मैं यज्ञ से किसी को छिपा कर दे नहीं सकती। यदि किसी को छिपाकर देंगे तो बुद्धि का लिंक टूट जायेगा। फिर बहुत बोझा चढ़ जायेगा। इसलिये खबरदार, होशियार रहना है।
यज्ञ सेवा माना ऑनेस्टी, इमानदारी । यज्ञ में दान दो अनेकों को खाने को मिले । ५ रूपये यज्ञ में डाले तो सफल हुए वैसे ५ रूपये किसी को दो तो निष्फल हैं। बाबा के भण्डारे में गया तो सफल हुआ। जिसे देना है वह भण्डारी में डाले । यदि किसी को पर्सनल दिया तो हिसाब जुटेगा। यह भी ख्याल न आये कि मैंने जो दिया वह कैसे यूज़ हुआ। सच्ची दिल से सब-कुछ ईश्वर अर्थ करना है। दूसरी आत्माओं की सेवा इसलिये करते हैं कि उसका भी ईश्वर से योग लग जाये, इसलिए नहीं करते कि यह बाबा को कितना पैसा देता है। कोई देता है तो करते हैं। इस प्रकार के सोच हमको ऊंच पद नहीं पाने देंगे । हमारी लेन-देन ईश्वर अर्थ है। हमको दे रहा है ईश्वर । यज्ञ से जो मिलता है बांट कर खाते हैं। तो सूक्ष्म अटेन्शन देना है कि मैं अपना हिसाब-किताब किसी के साथ न जोडूं। अन्त समय में मुझे किसी की याद न आये। किसी को बाबा की याद के बदले अपनी याद नहीं दिलानी है, नहीं तो बोझा चढ़ेगा। कई हैं प्रवृत्ति में रहते भी ट्रस्टी हैं तो यह संस्कार उनको मदद करते हैं। बाबा से कुछ छिपा हुआ नहीं है । बाबा के डायरेक्शन से चलते हैं अपने लोभ, मोह वश नहीं । बाबा हम बच्चों को सिम्पल और रॉयल रहना सिखलाता है । कोई काम छिपकर करो तो मन खाता है । हिसाब-किताब बनता है तो वह योगयुक्त बनने नहीं देता है। कई पूछते हैं हमारा पता नहीं क्या हिसाब-किताब है, चुक्तु नहीं होता ? कितना भी कड़ा हिसाब-किताब हो, लेकिन कई बार ऐसी रियलाइज़ेशन आती है जो खेल लगने लगता है। तो कभी दिलशिकस्त नहीं होना है। किसी चीज़ को कठिन न कर लें। अन्दर विश्वास के बल से सहज कर लें। कुछ ग़लती की हुई हो, तो वह रियलाइज़ हो । फिर भविष्य में वह ग़लती न हो ।
हमारा स्वभाव-संस्कार किसी को टच भी न करें। ऐसे हम हिसाब-किताब से फ्री होकर बाबा के घर जा रहे हैं, औरों को भी चलने का सन्देश दे रहे हैं।
टाइम का पूरा कद्र रखना माना श्वास, संकल्प, सब-कुछ सफल करना
ओम् शान्ति । एम और ऑब्जेक्ट हमारे पास क्लीयर है तभी पवित्रता की शक्ति आती है। देवता धर्म सबसे ज्यादा सुख देने वाला है, उस धर्म की स्थापना अर्थ मैं आत्मा अभी परमात्मा से योग लगा रही हूँ। मेरा एम ऑब्जेक्ट ही देवता है, देवता माना सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी, १६ कला सम्पूर्ण । उसके लिये बाप से योग लगा रही हूँ। जहाँ का वो रहने वाला है, वहां की मैं रहने वाली हूँ। यहाँ मेरा किसी से ममत्व वा मोह नहीं है। कितना भी अच्छा नज़दीक वाला सम्बन्धी शरीर त्याग करे तो भी मोह न आये । अच्छा हुआ पुरानी खाल छोड़ी। न अपनी देह में मोह, न दूसरों की, भले कितना भी अनन्य हो । बाबा का हमसे इतना प्यार है लेकिन मोह नहीं है। बाबा हमको मोहजीत बना रहा है। बाबा का प्यार है हमको मोहजीत बनाने के लिये । निराकार, साकार के द्वारा कह रहा है कि मोहजीत बनो। भक्ति-मार्ग में समझते थे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह को जीत ही नहीं सकते हैं। बाबा कहते हैं यही करना है। काम को भी छोड़ो, मोह को भी छोड़ो, लोभ को भी छोड़ो । लोभी रॉयल नहीं लगता। वह चाहिये-चाहिये कभी नहीं छोड़ता। लोभी को यह होता है कि आये, लेकिन जाये नहीं । तेरा सो मेरा हो जाये, लेकिन मेरे को कोई हाथ न लगाये । लोभ को छोड़ो तो कितने रॉयल हो जाते हैं । दिन-प्रतिदिन समझ में आता है सिम्पल बनने से रॉयल बनते हैं। मोह को छोड़ो तो रॉयल बनते हैं। मोह वाले की आंखे नीचे होती हैं। मोह रुलाता है। जिसमें भी मोह होगा उसकी याद आयेगी । बाबा को याद करने के लिय मेहनत नहीं करनी पड़ती है। देहधारी की याद दुःखदायी है। वह विदेही बनने नहीं देती । जब कोई शरीर छोड़ता है तो लोग रोते हैं। और शरीर छोड़ने वाला भी दुःखी होता है, देखने वाले भी रोते हैं। बाबा कहते हैं तुम शरीर छोड़ते हो तो न तुम्हें दुःख हो, न देखने वाले को । यदि तुम्हारा देह से मोह है तो औरों को भी होगा।
अपने से पूछो कि योग क्या है? क्या करते हैं हम, आंखे खुली हैं। योग में हम क्या करते हैं? एक तो हम चेक करेंगे हमारी सोल कान्सेस स्थिति कहाँ तक है। बॉडी कान्सेस और सोल कान्सेस के संस्कार को अच्छी तरह से समझा है तो सोल कान्सेस होंगे। केवल मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ- रटने से सोल कान्सेस नहीं होंगे। मैं देह हूँ, मैं देह हूँ.. कहकर देह अभिमानी नहीं बने हैं। लेकिन देह, सम्बन्ध, दुनिया सबने अभिमानी बना दिया है, कर्म ने अभिमानी बना दिया है, मान की भूख ने अभिमानी बना दिया है। अभी देही अभिमानी बनते हैं, देखते हैं देह, सम्बन्ध, दुनिया से मैं न्यारी हूँ। अभी देखना होता है मैं प्रैक्टिकली न्यारी हूँ। न सिर्फ योग में बैठकर लेकिन हर समय मैं ट्रस्टी हूँ? ट्रस्टी हूँ तो योग अच्छा लगेगा। मैं देह, सम्बन्ध, दुनिया से न्यारी हूँ। यह देह मेरी नहीं, यह अमानत है। सदा ही अमानत समझो फिर ट्रस्टी होकर कार्य व्यवहार में आओ । ट्रस्टी नहीं बनते तो योग का अनुभव नहीं हो सकता । औरों को वह फीलिंग नहीं आ सकती ।
बाबा की फोटो में बाबा के हाथ पीछे हैं तो लगता है बाबा कह रहा हो कि मैं कुछ नहीं करता हूँ। ट्रस्टी हूँ। बाबा के हाथ सामने हैं तो हम गोद में हैं। तो तपस्वीमूर्त बनने के लिये एक तो भ्रकुटी के बीच में आत्मा सितारा चमकता हुआ अनुभव हो । जैसे आत्मा के अन्दर की मैल निकलती जा रही है तो आत्मा फील करेगी कि मैं चमकती जा रही हूँ। प्योर होने से आत्मा चमकती है। फिर बाबा को याद करते हैं तो सर्वशक्तिमान् बाबा के सम्बन्ध से आत्मा प्रेम का अनुभव करती है। ज्ञान को यूज करती है तो आत्मा नॉलेजफुल लगती है । बुद्धि ने ज्ञान को समझा है, लेकिन यूज़ नहीं किया है तो आत्मा नॉलेजफुल नहीं लगती है । जितना ज्ञान को यूज़ करो, परमात्मा बाप से योग लगाओ फिर देखो मैं आत्मा कैसी हूँ? सोल कान्सेस स्थिति में देखो मैं आत्मा कैसी हूँ ? इसीलिये परमात्मा कहता है मैं जो हूँ, जैसा हूँ अच्छी तरह से पहचानों । फिर हम आत्माओं से भी कहता है कि तुम जो हो, जैसी हो, मेरी हो । आदि सनातन धर्म वाली आत्मा हो । अब तुम चक्र लगाकर वापस खड़ी हो । हिसाब-किताब चुक्तु करना है। हिसाब-किताब निरन्तर बहुतकाल योग लगाने से चुक्तु होंगे। फिर देखो आत्मा के हिसाब-किताब जब चुक्तु होते हैं तो आत्मा कितनी हल्की है। फीलिंग आयेगी कि मैं त्रिनेत्री हूँ त्रिकालदर्शी हूँ। योग में भिन्न-भिन्न प्रकार के हमारे अनुभव होने चाहिये । मैं योग कैसे लगाऊं, योग नहीं लगता, यह शोभा नहीं देता। योग क्यों नही लगता? और उलझनों में चले जाते हैं । उलझनों का कारण है देह अभिमान । देह अभिमान ईर्ष्या में ले आता है । जैलसी व्यर्थ चिन्तन शुरू कर देती है । व्यर्थ चिन्तन से योग नहीं लगता । यदि सही रास्ते को भूल और रास्ते में चले जाते हैं तो आत्मा दुःखी हो जाती है । भल ज्ञान है लेकिन अतीन्द्रिय सुख नहीं है।
मैं सदा खुश रहूँ और खुशी बांटती रहूँ, अपने को खुशनसीब समझें, वह कैसे होगा ? जब बुद्धि फ़ालतू बातों के चिन्तन, वर्णन से फ्री होगी। जब भी कोई किसी बात का चिन्तन वर्णन करता है, पहले चिन्तन चलता है, फिर प्लैन चलता है, फिर टाइम ढूंढते हैं बोलने के लिये, फिर जितना चिन्तन चला उतना मुख से नहीं निकला तो मन भारी है। भारी मन है तो योग कैसे लगायें ? इसलिये बाबा ने दिल और मन का गहरा सम्बन्ध बताया है। भले दिल शरीर में है, आत्मा में मन है । लेकिन दिल में कोई बात है तो मन बाबा को याद नहीं कर सकता। दिल में कुछ और मन में कुछ और। जो बात दिल में खटकती है वह मन में बैठ जाती है। अच्छा सोचते हैं तो पहले नयन बताते हैं। पहले दिल को पता चलता है। तो मन में छोटी-छोटी बातें बैठ जायें इसलिये दिल को सदा हल्का रखना है, साफ रखना है। मन सदा अच्छा सोचे । मन अच्छा सोचे तो दिल खुश हो जाता है। कोई अच्छी बात सुनाता है तो दिल हल्का हो जाता है। हमेशा अपने को योगयुक्त बनाने के लिये, सच्चा योगी बनाने के लिये, एकाग्रचित्त स्थिति की लगन में रहने के लिये कभी अपने को दुःखी नहीं होने देना चाहिये । दुःख के पहाड़ भी आ जायें तो भी दुःखी नहीं होना चाहिये । बात छोटी होती है लेकिन उसको सोच-सोच कर बड़ा बनाकर दुःखी हो जाते हैं। कई अनुभव सुनाते हैं बाबा के आगे आने से बात निकलती ही नहीं । फिर लगता है बात तो कुछ थी ही नहीं, मैंने यूं ही सोच-सोच कर अपना टाइम वेस्ट किया। तो टाइम की भी कद्र होनी चाहिये । मेरा समय वेस्ट न जाये, संकल्प श्वास सफल हो । यह आदत हमको सच्चा योगी, सफल योगी बनने में मदद करेगी ।
मीठा बाबा रोज़ इतनी मीठी-मीठी बातें सुनाता है तो दिल कहता है कि हमारे दिल में यही बातें हों । बाबा की याद तब ही है जब दिल में और कुछ बात नहीं है। मन कुछ फ़ालतू सोचने के लिये फ्री नहीं है। किसकी सुनते भी हैं तो दिल कहता है इसको समाने की, सहन करने की शक्ति आ जाये । बात को सुनकर हम दिल में रखेंगे नहीं लेकिन दिल से निकलेगा कि इसे जो शक्ति की जरूरत है वह मिल जाये । हमारे अन्दर वह शक्तियां हों जो गुप्त शक्ति बांटते रहें । एक - एम ऑब्जेक्ट से शक्ति मिलती है, दूसरा - बाप से शक्ति मिलती है। हमारा धर्म पवित्रता है। पवित्रता के सागर बाबा ने पवित्र बनने की शक्ति दी है। जिस शक्ति से हम देवता बनने वाली आत्मा सतयुग में आने लायक बन रही हैं। योग में क्या करते हैं – यह अपने से -पूछना चाहिये । दिन भर कार्य व्यवहार करके कछुवे मिसल समेट लिया । हर घण्टे चेक करो कि फ़ालतू तो नहीं सोचा। ऐसे हमारा एक घण्टा भी खराब नहीं होना चाहिये । इतना ज्ञान-योग, समझ है जो एक घण्टा तो क्या आधा घण्टा भी व्यर्थ न जाये । सच्चे योगी बनने की लगन वेस्ट टाइम होने से बचायेगी । दूसरा हमारे आपसी व्यवहार में इतना प्यार हो । साक्षी होकर अपने को देखो कि हमारे मन में सबके लिये रिगार्ड है? कई कहते हैं कि उसका व्यवहार हमारे साथ ऐसा है तो हम कैसे रिगार्ड दें ? उसका व्यवहार देखकर हम रिगार्ड नहीं दे रहे हैं लेकिन रिगार्ड देना, स्नेह देना मेरा फर्ज है। यदि गुण दिखाई नहीं पड़ते तो दृष्टि हमारी है। तो नुकसान किसको होगा ? वृत्ति, दृष्टि गुणग्राही नहीं रहेगी। बड़े दिल और साफ दिल वाले में रिगार्ड देने का गुण आ सकता है। यदि किसी का भी अवगुण नोट करेंगे तो बड़ा नुकसान होगा। फिर कहीं से रिगार्ड पाने के भी अधिकारी नहीं रहेंगे । हरेक में अनेक गुण है, अवगुण एक है। लेकिन हमारी पुरानी तमोगुणी रजोगुणी आदत है जो अवगुण देखते हैं। सतोगुणी हंस की तरह से गुण देखता है। रजोगुणी कुछ डाउट, कुछ इमैजीनेशन (अनुमान), तमोगुणी अच्छी चीज़ उठाता ही नहीं, कचरा उठाता है। अगर हम भी अवगुण उठाते हैं तो समझें कि यह पुराने संस्कार हैं। अपनी आंखों को, वृत्ति को अच्छी तरह से चेक करो कि किसी का अवगुण सुना हुआ हो, देखा हुआ हो तो भी थोड़ा भी चित्त पर न हो। ज्ञान दान के साथ गुण दान करो। ज्ञान कहता है गुणदान करो । गुणदान तब करेंगे जब हमारे पास गुण होंगे। सबके गुण देखे हुए होंगे। इनसे तो मैं अच्छी हूँ, यह भी अभिमान है। भेंट करते रहना मैं अच्छी हूँ, ये अच्छा नहीं है, ये खराब है - यह फ़ालतू चिन्तन भी गुणग्राही नहीं बनने देगा। अच्छा ग्राहक सभी अच्छी चीज़ ले लेगा। तो गुण ग्रहण करना माना भगवान् का अच्छा ग्राहक बनना। बाबा से, परिवार से गुण लेते जाओ। जो अपने पास गुण, कला है उसमें ज्ञान भरते जाओ । गुण में ज्ञान है तो अच्छा गुण माना जाता है। सच्चा स्नेह और रिगार्ड हमारे अन्दर हर आत्मा के लिये तब आता है जब सच्चे गुण ग्राही बनते हैं। अपने आपसे पूछो कि मेरे में कितने गुण हैं, किसमें कितने गुण हैं, विशेषता है। हमारा दृष्टिकोण बड़ा अच्छा होना चाहिये । हमको देखकर और भी खुश हों, हम औरों को देखकर खुश हों । हमसे किसी को कुछ चाहिये नहीं । सिर्फ प्यार भरी दृष्टी हो । बाहर से अच्छा देखूं और अन्दर से ग्लानी हो तो वह भी उन तक पहुँचता है। अन्दर की जितनी सच्चाई-सफाई होगी, उतना अच्छा लगेगा ।
योगी जीवन का आधार - कर्मों में दिव्यता
१- बाबा कहते हैं बच्चे स्व-दर्शन चक्र फिराते रहो । स्वदर्शन चक्र फिराना माना स्व का पूरा दर्शन हो जाये, स्व का पूरा साक्षात्कार हो जाये । आत्मा जैसे घर से आई थी वह स्वरूप मेरा हो। चक्कर लगाते-लगाते स्वरूप को भूल गये थे। फिर से वह स्वरूप आ जाये, आत्मा की मैल उतर जाये । देहभान के वश होने से जो पांच विकारों के वश हो गये अब उन विकारों को अन्दर से खत्म करें। स्वदर्शन माना मैं आत्मा, परमात्मा की सन्तान, परमधाम की वासी तो हूँ लेकिन देवता घराने वाली भी हूँ। अपने आप बच्चे को बाप की याद आती है । जो कपूत होता है उसे बाप की याद नहीं आती है । वह तो बाप का नाम भी लेना नहीं चाहता है। भले उसको बाप कितना प्यार करे,बच्चा बाप के प्यार को ठुकराता है। वह संगदोष में खराब हो गया है, इसलिये बाप को याद नहीं करना चाहता। हम जो बाबा के बच्चे है, सपूत बनना चाहते हैं तो हम यह इच्छा रखते हैं कि बाबा जो कहता है वह करें। बाबा की श्रीमत पालन करने में कल्याण है। ये ख्याल बाबा की याद दिलाता है। कर्म कर रहे हैं पर कर्म करते बाबा याद रहे, अच्छी लगन हो। कर्म में लिप्त न हो जायें, फंस न जायें, कर्म में अनासक्त रहें, नष्टोमोहा रहें। कर्म करूँ, सम्बन्ध में आऊं । लौकिक अलौकिक से डिटेच रहूँ। पहले की अटैचमेन्ट को छोड़ दूँ। धन्धे व्यापार में लोभ न रहे । धन्धा न छोड़े दें लेकिन ठगी चोरी छोड़ दें। किसी को धोखा न दें और न किसी के धोखे में आयें ।
२- कर्म में रहें, सम्बन्ध में रहें। लेकिन चोरी, ठगी, झूठ, निन्दा ये चारों बिल्कुल न रहें तभी योग अच्छा रहेगा और स्वदर्शन चक्र फिराने में मजा आयेगा। किसी में थोड़ी ठगी करने की, झूठ बोलने की, निन्दा करने की आदत होती है तो वह योगी नही बन सकता। विचार करो । बार-बार डर के मारे झूठ बोलेंगे तो सच्चे बाबा से योग कैसे लगेगा। बाबा कहता है स्वदर्शन चक्र फिराना है। अगर सतयुग वाली आत्मा हैं तो झूठ नहीं बोल सकते, ईर्ष्या में नहीं आ सकते । नहीं तो त्रेतायुगी बन जायेंगे। अगर मेरे संस्कारों में ईर्ष्या है, गुस्सा है, आवेश है, झूठ है, चोरी है... सोचते हैं कि कोई देखता तो नहीं, तो यह लापरवाही योगी बनने नहीं देती। कर्मयोगी बनना है तो कर्म में देखना है कि यह सत्कर्म है ? भले कर्म देखने में साधारण हों लेकिन उसमें दिव्यता हो। कर्म देखने में बहुत बड़ा है लेकिन सच्चाई नहीं है तो योग नहीं लगेगा। इसलिये बाबा ने कर्म फिलॉसफी का ज्ञान दिया है- सुबह से रात तक हमारी जो दिनचर्या है उसमें ८ घण्टे शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करो, ८ घण्टा बाबा को याद करो अर्थात् स्वदर्शन चक्र फिराओ ।
३- चलते-चलते कई बार हम अपने संस्कार यूज़ कर लेते हैं या दूसरे के संस्कारों को देख लेते हैं। पहले मन बिल्कुल शान्त था लेकिन दूसरे का संस्कार देख लिया, हमारी बुद्धि उसमें चली गई, तो मन भटकने लगता है फिर योग नहीं लगता । इसके लिए जैसे छोटे बच्चों को सिखाते हैं, अगर दो बात कर रहे हैं तो तुम्हें बीच में नहीं बोलना है। अगर बच्चा बीच में बोल देता है तो उसे थप्पड़ मार देते हैं कि बीच में क्यों बोलता है। दो के बीच में तुम क्यों आये ? वो जानते हैं कि इसकी बीच में बात करने की आदत पड़ जायेगी तो यह अच्छा नहीं है। वैसे हिसाब-किताब दूसरे का होता और बीच में हम संकल्प चलाते रहते हैं – इसको ऐसे नहीं करना चाहिये, इसने रांग -किया है, मैं इसको पहले से जानती हूँ। यह सब फ़ालतू संकल्प हैं, आदत है फ़ालतू संकल्प करने की । फ़ालतू माना अपने या दूसरों के लिये फ़ालतू ख्याल । जैसे फ्री बैठे हैं, योग लगाना नहीं है, योगी बनना ही नहीं है, देवता बनना ही नहीं है जो फ़ालतू संकल्प कर रहे हैं। जिसको बड़ा काम करना होता है वो फ़ालतू काम नहीं करता । जिसको फ़ालतू बोलने, सोचने, फ़ालतू धन्धा करने की आदत है वह फ़ालतू सोचते हैं, संकल्प चलाते हैं, फिर उनके संस्कारों के प्रभाव में आ जाते हैं। जो समझदार होते हैं वो सदा सोचते हैं कि मेरा कार्य सफल कैसे हो । जो ड्युटी मिली है, वह अच्छी तरह से करूं । हमें देखकर दूसरे भी योगी बन जायें, खुश हो जायें। जो सम्बन्ध में आये उसके मन में रिगार्ड हो जाये, हमारे मन में भी उसके लिये रिगार्ड हो । कभी शान्ति से बैठकर अपने से पूछना चाहिये मैं फ़ालतू बातें कितनी करती हूँ। जिसको काम लायक बातें करने की आदत होती है उसका फ़ालतू छूट ही जाता है। अगर समय सफल करते जायें तो कमाई है। जो समय की कद्र करता है भगवान् भी उसकी कद्र करता है। संगमयुग पर बाबा को प्यारे वह लगते हैं जिसने समय सफल किया है, धन सफल किया है, मन को ढीला नहीं छोड़ा है, मन को कभी दुनिया की तरफ नहीं ले गये हैं।
४- निश्चय किसमें रखा है ? बाबा में, खुद में। बाबा का बनकर तभी रह सकते हैं जब पहले खुद को अच्छी तरह से जानते हों, मैं देवता घराने वाली आत्मा हूं बाबा के सिवाए मेरा कोई नहीं है। कितने बन्धन आये पता नहीं कैसे चले गये । सतयुग में कर्म में थे तो सम्बन्ध में भी थे। कर्म में विकार आ गया तो बन्धन बन गया। अपने को बन्धन से मुक्त करना है तो आत्मा सूक्ष्म संकल्प की शक्ति से बंधन से मुक्त होगी। बस एक ही संकल्प करो - बाबा के बने हैं तो बाबा जैसा बनना है। उस स्कूल में कॉपी करेंगे तो सज़ा मिलेगी और यहाँ अगर बाबा को नकल करेंगे तो सज़ाओं से छूट जायेंगे । बाबा क्षमा, दया, स्नेह की मूर्ति है। कैसा भी कोई है - पापी है, कपटी है, कामी है बाबा के पास आया तो क्षमा कर दिया, दया की दृष्टि से देख लिया, बच्चा कहकर स्नेह दिया। बाबा कितना क्षमा का सागर है, कितना दया और स्नेह की मूर्ति है, तो जो बाबा से मिलते हैं उनको कितनी खुशी होती है। अजामिल जैसे पापियों का भी बाबा उद्धार करता है। बाबा को लिखकर दे दो । जब लिखकर देते हैं मैं उनको नहीं पढ़ती। बाबा भी नहीं पढ़ते थे, मीठी दृष्टि देकर जला देते थे । बाबा हम पर कितनी मेहनत करता है, अब भी अव्यक्त होकर भी कर रहा है। हमको तो मुख से पैदा किया है लेकिन इतनी सारी रचना को कैसे पैदा किया ? अपने संकल्प से पैदा किया । आज इतने ब्राह्मण सब बाबा के संकल्प की रचना हैं। अव्यक्त बाबा की दृष्टि ही जीवन को बदल देती है। बाबा साकारी, आकारी, निराकारी तीनों की भासना दे देता है। जब बाबा का संकल्प ऐसा है तो हम बच्चों का संकल्प कैसा होना चाहिये ? कल्याणकारी बाप के संकल्प में है कि पाप की दुनिया में, दुःख की दुनिया में सबका भला हो, सब घर चलें । सब शान्तिधाम चलने के लिये पहले से ही बाप की नज़रों से निहाल हो जायें ऐसा पॉवरफुल योगयुक्त होकर सन्देश भी देते जाये और फ़ालतू चिन्ताओं-ममताओं से अपने आपको मुक्त भी कर दें। संकल्प होता है कोई चिन्ता होती है, कोई ममता होती है।
अपने संकल्प से पूछो कि कोई ममता है, कोई चिन्ता है ? अगर अपने आपको समझकर कि यह चिन्ता-ममता रखने से कितना नुकसान होता है चिन्ता ताकी कीजिये जो अनहोनी होये । ड्रामा बना पड़ा है, भावी बनी पड़ी है। हर आत्मा का अपना हिसाब-किताब है तुम कितनी भी चिन्ता करो. तुम्हारी चिन्ता का किसी को भी ख्याल ही नहीं है। हम चिन्ता करने वाले से पूछते हैं तुम जिसकी चिन्ता करते हो उसको तुम्हारी चिन्ता की परवाह है । आप बाल-बच्चों की चिन्ता करो, पति की चिन्ता करो, पत्नी की चिन्ता करो, फलाने की चिन्ता करो, क्या उसको तुम्हारे चिन्ता की परवाह है । चिन्ता करते-करते ईश्वर के चिन्तन में रहना भूल जाता है फिर बाबा को याद करना मुश्किल लगता है। चिन्ता और गुस्सा, जिस आत्मा में थोड़ा भी गुस्सा होता है, आदत है, ज्ञान में आने से गुस्सा तो कर ही नहीं सकता । पति-पत्नी का झगड़ा होगा तो बच्चे कहेंगे मैं दीदी को जाकर बताता हूँ - तुम झगड़ा करते हो । डर लगता है – बच्चे जाकर सुनायेंगे। बच्चों की चिन्ता करेंगे तो बच्चे -कहेंगे क्या आपको ड्रामा भूल गया है ? ज्ञान को यूज़ करो । सिर्फ दवाई का नाम लेते-लेते बीमारी नहीं जायेगी यूज़ करने से बीमारी जायेगी । हमको अपनी बीमारी खत्म करनी है। ज्ञान कहता है कि किसी की चिन्ता नहीं करनी चाहिये । मेरी चिन्ता भी कोई न करे । अपनी ऐसी कन्डीशन न रखें जो सबको चिन्ता हो । अगर तन बीमार है तो ऐसी शक्ल क्यों बनाते हैं जो किसी को चिन्ता हो । यदि खाना नहीं खा सकते तो ऐसी शक्ल बनाकर क्यों खाते हैं जो खिलाने वाले या देखने वाले की शक्ल भी ऐसी हो जाये । प्यार से बोल तो सकते हो कि हम अभी नहीं थोड़ी देर से खायेंगे। समझदार वह है जो न किसी की चिन्ता करे, न किसी को चिन्ता दे। हमारी चिन्ता में कोई शरीर न छोड़े। जो फिक्र करे उसके लिये ज्ञान की एक अच्छी प्वाइन्ट है- कर्म, भावी और भगवान् । भगवान् से सम्बन्ध नहीं होगा तो हम क्या कर सकते हैं, फिर आपके कर्म । हम इतना कर सकते हैं भगवान के साथ सम्बन्ध रखकर खुद का भी सम्बन्ध अच्छा जोड़े जिससे हमको गुप्त मदद मिले। पहले खुद का ज्ञान सम्बन्ध जोड़, खुद अच्छे कर्म करें। खुद जो भावी बन जाती है उसमें राजी रहें। खुद मुझे क्या करना है ? कर्म, भावी, भगवान् के लिये मैं क्या कर रही हूँ? हम जानते हैं अच्छे कर्म करेंगे तो मदद मिलेगी। कर्म हम करें और मदद दूसरों को मिले - यह हो नहीं सकता। देखकर सीखना पड़ेगा। सीखने की भावना रखनी पड़ेगी। जिसमें सीखने की भावना नहीं है, कर्म सुधारने का ख्याल ही नहीं है उसके लिये हम क्यों सोचें ? अपने को फ़ालतू सोचने की आदत से छुड़ाना - यह है जीवनमुक्ति पद पाना । मुक्तिधाम में भी पता नहीं होगा कि मुक्तिधाम का सुख क्या है। वह यहां अनुभव कर सकते हो । शान्तिधाम की शान्ति का भी अनुभव यहां कर सकते हो । सतयुग में जीवनमुक्त कैसे होंगे वह अनुभव भी यहां कर सकते हैं। वहाँ जीवनमुक्ति का अनुभव वर्णन नहीं करेंगे। द्वापर युग में भी अनुभव वर्णन नहीं करेंगे। मुक्तिधाम में जाना है तो बन्धन से फ्री होने का सुख अभी अनुभव करना है।
जो बातें हमारी स्थिति को नीचे गिराने वाली हैं, उस तरफ हम देखें भी नहीं। जो ऊंच बनाने वाली चीजें हैं वहीं हम देखें। धोखे में लाने वाली पुरुषार्थ में रुकावट डालने वाली है चिन्ता और ममता। कहते हैं योग में बैठते हैं तो खराब संकल्प आते हैं। यह तो ऐसे हुआ जैसे योग में बैठे ही नहीं । यदि खराब संकल्पों को खत्म ही नहीं किया तो योग में बैठकर क्या करते हो। चलते-फिरते, खाते-पीते खराब संकल्प क्यों आते हैं? जैसे बुरे संग से अपने को बचा लिया है। अन्न से बचा लिया है। ऐसे संकल्प शुद्ध भी आ सकते हैं। भोजन योगयुक्त होकर खाने की आदत हो। ऐसे नहीं यह अच्छा नहीं है, वह अच्छा नहीं है। दिल को दुःखाने की आदत भी छोड़ना है। दिल को दुःखी क्यों करें। बाबा ने हमें ज्ञान, योग, समझ दी है। हम कभी अन्दर दुःखी न रहें । कोमल दिल, दिल को दुःखी बना देता है। हम कभी भी दुःखी नहीं बनेंगे । जब तक दुःख लेना नहीं छोड़ा है तो देने वाले क्यों छोड़ेंगे। हम लेना छोड़ देते हैं तो देने वाले छोड़ देते हैं। ऐसा नहीं कहेंगे ये दुःख देते क्यों हैं ? नहीं, तुम लेते क्यों हो ? दुःख लेने की आदत होगी तो कोई न कोई दुःख दे देगा। जैसे माया किसी न किसी में प्रवेश होती है। माया देखने आती है कैसा है तुम्हारा ज्ञान योग, कैसा है तुम्हारा चिन्तन, कैसी है तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारे में कोई ईर्ष्या तो नहीं है, तुम शान्त-शुद्ध आत्मा बनी हो या नहीं ? धीरज का फल मीठा होता है। धीरज, प्रेम, शान्ति – तीन गोली खाकर सारा दिन कर्मयोगी बनो । सवेरे-सवेरे तीन गोली खाओ । आजकल गोली के बिना शरीर तो चलता ही नहीं, तो मन भी नहीं चलता। मन को चाहिये धीरज, शान्ति और प्रेम । फिर किसी के साथ भी सम्बन्ध में आयेंगे तो सम्बन्ध बिगड़ेगा नहीं। फिर किसी के साथ १० दिन रहो, १० साल रहो या १० घण्टे रहो, सम्बन्ध अच्छा रहेगा। कभी सम्बन्ध में तू-मैं नहीं होगी, तेरा-मेरा नहीं होगा, तुम रांग हो, मैं राइट हूँ। इन धन्धों में जाने की क्या जरूरत है। मैं रांग हूँ – ठीक है, सॉरी । झुकना सीखो । झुकने में दर्द होता है क्या ? फ़ालतू संकल्पों से छूटना है, वायुमण्डल अच्छा बनाना है, अव्यक्त स्थिति बनानी है, निश्चय में कितना बल है, सत्यता में कितनी शक्ति है - ऐसी अपनी लाइफ -बनानी है, जो हमारी लाइफ को देख औरों को प्रेरणा मिलती रहे । आराम से चलते चलो, सुस्ती से नहीं चलना है। आराम माना सुस्ती नहीं, लेकिन कोई खटपट नहीं। इसलिये स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है, बाबा मूर्ति बना रहा है। हरेक शुद्ध संकल्प का पिन्ड बनकर मधुबन से जाये। आत्मा शुद्ध संकल्पों से युक्त हो। अशुद्ध संकल्प क्यों आते हैं? हम छुट्टी देते हैं तो आते हैं। यदि बाबा से बहुत प्यार है, जो लक्ष्य बाबा ने दिया है, ऐसा बनने की लगन है तो और सब बातों से अपने को फ्री रखकर बार-बार हर काम करते चेक करते रहो कि मुझे बाबा याद है ? हाथ से काम कर रहे हो, बुद्धि कहीं और नहीं जाये तो दो घण्टे का काम एक घण्टे में पूरा हो जायेगा। सब काम एक्यूरेट करना है, बहाना नहीं बनाना है, परन्तु घड़ी-घड़ी सोचना भी नहीं है ।चेक करो कि हर कर्म में सफलता अच्छी हो रही है? यह भी योग का प्रैक्टिकल सबूत है । हम कहें कर्म में योग भूल गया, यह बात अच्छी नहीं है। बाबा ने कहा है पानी पियो तो भी योग में। तीनों समय साइलेन्स में योगयुक्त होकर खाना खाओ । तो खाना भी खाया और योग भी हुआ । एक बार बाबा से हमने पूछा- बाबा, यथार्थ योग क्या है? कहा- आओ बच्ची, क्लास में सुनाता हूँ बाबा को हम देखती रही, बाबा भी देखता रहा। लास्ट में बाबा ने कहा बच्ची यही तो योग है। बाप सुना रहा है, समझा रहा है, मुझ आत्मा को समझा रहा है, यह अटेन्शन है तो यह योग है। यदि इधर उधर बुद्धि गई तो योग नहीं हुआ। हमारे मन, वचन, कर्म से पता चले कि यह ईश्वर का बच्चा है। हम आत्म अभिमानी होकर रहें । कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करा रहे हैं, कर्मेन्द्रियों के वश नहीं हैं। कर्मेन्द्रियों की बातें मन सुनता है। कर्मेन्द्रियां इच्छा नहीं दिखायेंगी कि ये करो, ये करो । इच्छा तो मन से पैदा होगी। कर्मेन्द्रियों की बातें मन सुनता है। मन शान्त और बाबा की याद में रहता है तो कर्मेन्द्रियां उसके आर्डर में रहती हैं। मन को टाइम ही नहीं है जो कर्मेन्द्रियों की इच्छाओं को सुने। मन को अन्दर ट्रेनिंग देते-देते होशियार हो जाते हैं। अपने आपको सिखाने की आदत हो। योग लगाते-लगाते शरीर छूट जाये तो अच्छी कमाई हो जायेगी। मरने तक योग लगाना है, बीच में छोड़ना नहीं है। बाबा के बने हैं तो मरने तक बाबा याद रहे। जिन बातों का त्याग किया है उन पर हमारा ध्यान ही नहीं है। उन चीज़ों से प्रयोजन ही नहीं है ।
५- हम भाग्यशाली हैं जो पवित्र रहते हैं। ब्राह्मण हैं ही सेवाधारी । ब्राह्मण सेवा न करे तो गृहस्थी हैं। कोई कर्मबन्धन नहीं करने देता। सेवा की लगन वाले कहीं न कहीं से सेवा कर लेते हैं। किसी ने बाबा से पूछा- बाबा सेवा कैसे करें कर्मबन्धन है। बाबा ने कहा कि सेवा करो तो कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेंगे। यदि सोचें कि कर्मबन्धन से मुक्त होकर सेवा करेंगे तो उम्र बीत जायेगी, सेवा नहीं कर पायेंगे, तो कैसे का क्वेश्चन न हो। एक तो व्यर्थ संकल्प समाप्त करना है, दूसरा शुद्ध संकल्प का पिन्ड बन जायें सत्यता-पवित्रता के सिवाए कुछ हो ही नहीं । पवित्रता बाबा की तरफ खींच रही है, सत्यता झूठ को खत्म कर रही है। सत्यता की शक्ति की कमाल है, हमारे पास उसके सिवाए कुछ और है ही नहीं। कमाल बाबा तेरी । तो हर एक अपने पुरुषार्थ की कमाल देखो । तीसरी बात – चिन्ता-ममता किसी की न हो, न कोई हमारी फिक्र करें ।
६- बाबा ने एक बार बताया था कि गुल्ज़ार बहन का रथ क्यों लिया ? एक तो इसमें एडजस्ट होने की पॉवर है, दूसरा निरसंकल्प रहने की । हम बाबा के सभी बच्चे यदि ये दो पॉवर रखें, जहाँ भी रहें अपने को एडजस्ट कर लें। निरसंकल्प माना ऐसे नहीं कि संकल्प नहीं चलता है, लेकिन बिना काम का संकल्प नहीं हो । जिस संकल्प में स्व-उन्नति है, जिस संकल्प में सेवा समाई हुई हो वही संकल्प हो बाकी संकल्प नहीं। जिन कारणों से संकल्प आते हैं, वह समझ कर संकल्पों से फ्री होना है। बाबा ने समझ दी है । अब खुद का सर्जन खुद को ही बनना है। संगम पर बाबा जो मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा दे रहा है वो अभी नहीं लेंगे तो कब लेंगे तो मधुबन से सदा के लिये ऐसे सुख की छाप लगाकर जायें । अच्छा !
अचल-अडोल बनने के लिए निश्चयबुद्धि बनना है, जहाँ जीना है, अपनी सम्भाल करनी है
ओम् शान्ति । सूर्यवंशी में आने के लिये रॉयल बनना ज़रूरी है। सिम्पल और रॉयल बनने के पहले तन-मन से पूरा समर्पण होना होगा। धन से समर्पण होने के लिये निश्चय और निश्चिन्त बुद्धि चाहिये । चलाने वाला बाबा बैठा है, कभी चिन्ता हो नहीं सकती है। जिसके निमित्त बने हैं उनके प्रति भी कल्याण भावना है कि लौकिक, अलौकिक बन जायें। जिस कारण चिन्ता से फ्री हो जाते हैं, निश्चिन्त रहते हैं। अगर सूर्यवंशी में आना है तो पहले चाहिए – निश्चय । अपने से पूछो कोई संशय तो नहीं है ? अचल-अडोल बनने के लिये बुद्धि पहले स्थिर है। हिलने वाली बुद्धि अचल-अडोल नहीं रह सकती । समझदार क्या करता है ? अपनी बुद्धि को कल्याण अर्थ लगाता है, बुद्धि को समर्पण करता है। एक बार हिम्मत रखी कि सब-कुछ बाप का है, मैं ही बाप का हूँ तो बाप मेरा है। बाप मेरा है तो बाप के पास जो खज़ाना है वो मेरा है। बाप को अपना बनाने से निश्चय पक्का हो गया। बाप के खजाने के मालिक खजाने को देख खुश होते हैं। ज्ञान का खज़ाना, गुणों का खज़ाना बाबा ने दिया है। हर क़दम में शक्ति भी देता है। कुछ भी हो जाये बुद्धि जरा भी डोलायमान वा चलायमान न हो। किसी भी व्यक्ति वा वैभव में आंख न डूबे । जो कभी चलायमान नहीं होते वह मजबूत हैं। उसके आगे परीक्षा आती है तो डोलायमान भी नहीं होते। क्या होगा, कैसे होगा क्वेशचन ही नहीं है। हाथ बाप का, साथ बाप का, बाप की गोद में। बाप बच्चों की अगली पकड़कर ले जाता है । बाप जानता है हाथ भी देना है, साथ भी देना है । बाबा को अपनी गोद के बच्चों का इतना ध्यान रखना पड़ता है। हम कहीं भी हैं बाबा सदा ध्यान रखता है मेरे बच्चे सदा सुखी रहें। माया कहीं मुंह न मोड़ दे । माया भी कभी मीठा कभी तेज रूप धारण कर अपना बना लेती है। निश्चयबुद्धि अचल-अडोल रहने वाले अपने को बड़ा सम्भाल कर चलते हैं। और कुछ बात नहीं करो लेकिन जहाँ जीना है वहां अपनी सम्भाल करनी है। अन्त काल में यह देखना पड़ेगा कि मुझे बाबा की स्मृति कितनी है ? औरों का ख्याल करेंगे या अपना ख्याल करेंगे? अपने आपसे पूछो – हम बाबा के साथ कैसे जायेंगे ! हम ऐसे नहीं मरेंगे, जैसे दुनिया मरेगी । हमारा मरना अनोखा हो । इसलिये हम जीते जी मर गये, देही अभिमानी रहने की प्रैक्टिस हो । मन को समर्पण करना माना इस विधि से सिद्धि को पाना । सदा चेक करना है मनमनाभव हैं? गीता के ही शब्द हैं मनमनाभव मध्याजीभव । मनमनाभव अच्छी तरह से वह रहेगा जिसे मध्याजीभव अर्थात् सतयुगी ऊंच पद पाने का ख्याल रहेगा। जितना मनमनाभव रहेंगे उतना चारों अलंकार आयेंगे । घूमते-फिरते यह अभ्यास करना चाहिए कि मैं चार भुजाधारी अर्थात् चारों अलंकारधारी हूँ। अन्दर से ऐसा अभ्यास करते-करते भान आता जाता है, मैं वो हूँ ? देहभान छूटता जा रहा है? हमको साक्षात् ऐसा बनना है। साक्षात्कार तो होता है थोड़े समय के लिये लेकिन सदा के लिये ऐसा बनना है । बाबा आपने सब-कुछ दिया है, दाता बना दिया है। परिस्थिति हमारा स्थिति बनाने, ऊंच उठाने, कान पकड़ने, खबरदार करने के लिये आती है। पुरानी बात जो हो गई है वह फिर से न आये। अपनी स्थिति को जमाने के लिये मौज में रहें। जब स्थिति अच्छी होगी तब मौज में रहेंगे। स्थिति अच्छी तब होगी जब पर की स्थिति से अपने को फ्री करेंगे। परिस्थिति आई है जाने के लिये, बैठने के लिये नहीं। हम रुकने वाले नहीं हैं, औरों का भी उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले हैं।
अव्यक्त स्थिति बनाने के लिये व्यक्त भाव के झंझटों से अपने को फ्री करना है। गोरखधन्धे से हम फ्री होना चाहते हैं। एक होता है गृहस्थी के गोरखधन्धे, दूसरा है मन के गोरखधन्धे। गृहस्थी के गोरखधन्धे से फ्री हो गये हैं, मन के गोरखधन्धे स्थिति को खराब करते हैं। कई बार रात में नींद नहीं आती तो मन के संकल्पों के कारण इतनी तकलीफ होती है जितनी खटमल और मच्छर के काटने से भी नहीं होती । हम मन के संकल्पों को एक़दम रॉयल रखें। रॉयल घर में मच्छर मक्खी नहीं होते हैं। जो कोने-कोने में कचरा रखते हैं, उनके पास मच्छर होते हैं। हम भी मन की सफाई नहीं रखते तो वो संकल्प काटते हैं, तो हमारे संस्कार रॉयल हो जायें। हम सदा यात्रा पर हैं, हमको ऑर्डनरी क्लास में ट्रेवलिंग नहीं करनी है। शान्तिधाम में जाना हो तो एयरकंडीशन में जाओ, बाहर के वातावरण का असर न हो। रॉयल्टी से घर जाना है। याद की यात्रा में रहकर अपना पुराना सब हिसाब चुक्तु करना है। अपने से पूछो मन को बीमारी तो नहीं है ! तन भी अच्छा न हो, धन भी न हो लेकिन मन अच्छा होना चाहिए। रुखी रोटी खाते भी चेहरा हर्षित रहे । सूखी रोटी खाओ और ठण्डा पानी पियो । जरूरी नहीं है लिमका हो, ३६ प्रकार का भोजन हो । बाबा के घर से मिलता है तो खाओ लेकिन मांगो नहीं । अपनी स्थिति बनाने के लिये रुखी रोटी खाकर, ठण्डा पानी पीकर, दो ड्रेस रखकर भी खुश रह सकते हैं। सिन्धी में कहावत है "सफेद कपड़े, जेब खाली, मैं हूँ मुल्क का मालिक" । जेब खाली है तो कोई चोर भी नहीं लूट सकता । अन्दर से नशा है हम बाबा के बालक सो मालिक हैं। इस नशे में रहने से स्थिति अव्यक्त बनेगी । सदा निशाने पर जाना है, घर जाना है, सम्पूर्ण बनकर जाना है। बातों में जायेंगे तो कभी भी स्थिति नहीं बनेंगी । देहभान झूठ बुलवाता है, परचिन्तन कराता है, ईर्ष्या में ले आता है, व्यर्थ भाव पैदा करता है। इनसे अपने को फ्री करना है। चेक करो मैं इनसे फ्री हूँ? अव्यक्त स्थिति तब बनेगी जब हमारे में कोई भी अवगुण न रहे। एंजिल बनना है तो पेशेंस सीखो । पेशेंश (धीरज) खुद को भी दो, दूसरों को भी दो। चिन्तन कोई काम करने नहीं देता। फ़ालतू चिन्तन हमारा दुश्मन है। अपने में या औरों में संशय, बाप में संशय, ऐसी आत्मा किसी काम की नहीं है। क्या ऐसी आत्मा भगवान् के काम की है ? हम और किसी काम के न रहें, लेकिन भगवान् के काम के तो रहें । भगवान् हमसे कुछ कार्य लेवे । देही अभिमानी स्थिति वाले बनें । भगवान् को कैसे बच्चे चाहिये ? शान्तचित्त हों, धीरज वाले हों, आज्ञाकारी हों, वफादार हों। सूर्यवंशी की टिकट लेना कोई बड़ी बात नहीं है। सिर्फ आज्ञाकारी बनो । मन-बुद्धि से समर्पण हो जाओ। शान्त रहना सीखो ।
हम कितने भी नॉलेजफुल बनें लेकिन जो बाबा बुद्धिवानों की बुद्धि कर सकता है, वह इंसान नहीं कर सकता। मैं तो बाबा के कार्यों में मददगार बनूँ । हाँ जी, जी हाँ बाबा । फिर सहजयोगी बन जायेंगे, योग के लिये मेहनत नहीं करनी पड़ेगी । कई बाबा के बच्चे हैं जो सहयोगी से योगी बन गये हैं। उनके पास न स्वयं के लिये प्राब्लम आई, न किसी के लिये वो प्राब्लम बने । सच्चे दिल से सबके भले के लिये सेवा करनी है। तो रिटर्न में बाबा सहजयोगी बनाता है। कई बातों में भगवान् से फल कैसे मिलता है वह अनुभव करना चाहिए। और बातों को छोड़ जो ईश्वर के महावाक्य हैं – “बच्चे, यह -ज्ञान-योग तुमको प्रत्यक्ष फल देने वाला है।" और फल की इच्छा नहीं है। ज्ञान, निश्चय बुद्धि बनाता है, योग, बाबा से मिलन मनाना सिखाता है। ज्ञान कहता है और बातें नहीं सोचो, दिल दर्पण में अपने आपको देखो – मैंने कितने पाप पुण्य किये हैं। कोई पाप करता तो आप उसका चिन्तन नहीं करो । दूसरे के लिये अंगुली उठाना आसान है लेकिन अपने को देखना है। समय बहुत अमूल्य है, समय को पहचानो, सफल करो। जैसे भगवान् मेरा है वैसे समय मेरा है। समय को जितना सफल करेंगे उतनी कमाई है। समय के साथ श्वांस और संकल्प मेरे हैं और कोई चीज़ मेरे पास नहीं है उसे जितना सफल करें उतनी खुशी है। ऐसे समय, श्वांस और संकल्प सफल करने से दूसरे को भी खुशी बांटते हैं। बाबा से प्रत्यक्ष मीठा फल खाते रहते हैं। अन्दर बाबा दुआयें देता है, प्यार देता है, शक्ति देता है। अव्यक्त स्थिति बनाने के लिये रोज़ सुबह से शाम तक कितनी दुआयें, प्यार और शक्ति मिलती है ? इनसे हम वंचित न रहें। यह अब नहीं लेंगे तो कब लेंगे। यह मिलती रहें, मिलती रहें और श्वांस छूटे तो महान् भाग्यशाली हैं। और बातों के फ़ालतू गोरख धन्धों से अपने को छुड़ाकर अपने पर कृपा करें। कोई मेरा शत्रु नहीं है, शत्रु है तो फ़ालतू चिन्तन । सारी दुनिया में, पास्ट में, लौकिक अलौकिक दुनिया में देखो कोई शत्रु है ? यदि कोई हो तो उसे मित्र समझो। हमारे चिन्तन में राम हो, बाप हो, सबके लिये भला सोचने की भावना हो – इससे स्थिति अच्छी बनेगी । समय अनुसार तो बनना है लेकिन समय से पहले ही बनना है। श्रेष्ठ कार्य में बुद्धि को आगे लेकर जाना है। बुद्धि क्यों मिली है? भगवान् से योग लगाने के लिये, अच्छी धारणा करने के लिये या औरों के अवगुण वा पाप देखने के लिये? तो हमारे पाप कैसे कटेंगे? छिपाने से! या औरों के पाप देखने से? तो अपने को अन्दर से ठीक तरह से समझाना है। ज्ञान बड़ा निर्मल और शीतल बनाने वाला है। अगर हम अभी निर्मल-शीतल स्वभाव नहीं बनायेंगे तो कब बनायेंगे ? कोई भी कार्य करना है तो खुशी से करना है, मज़बूरी से नहीं। खुशी से करो तो आसान लगता है। देखेंगे, करेंगे, तो यह भी टाइम वेस्ट है। अभी का प्रैक्टिकल जीवन बताये, अभी का रिकॉर्ड बताये कि अन्तकाल में परमात्मा की याद होगी या नहीं ? सेवा कैसी है यह वर्णन नहीं करें। अवस्था कैसी है यह चेक करना है, ध्यान रखना है। किसी भी हालत में आवेश में आ जाना हमारी कमजोरी है। कोई हमारी निंदा करे तो हम सहन न कर सकें, यह सहनशीलता की कमी है। ऐसी कमियों पर ध्यान नहीं देंगे तो बाबा से बहुत दूर हो जायेंगे, बाबा के पास रहने का अनुभव नहीं करेंगे। समय अमूल्य है, अमूल्य लाइफ बनानी हो तो समय को सफल करो ।
निर्भय, निर्वैर बनना है तो सच्चे बनो, किसी से भी वैर नहीं रखो, न किसी से डरो न किसी को डराओ
हम बाबा के बच्चे किसकी महिमा करें बाप की, समय की या भाग्य की ? तीनों की साथ-साथ अन्दर से महिमा निकलती है । समय ऐसा आया है जो भाग्य विधाता भाग्य बांट रहा है, हमको भाग्यवान बनना है। जो भाग्यवान बनते हैं वह अन्दर से भाग्य बनाने वाले की महिमा दिल से गाते हैं। जब तक खुद भाग्यवान नहीं बनते तब तक तीनों की महिमा नहीं निकलती है। यह विनाश का समय है, हम देख रहे हैं। विनाशकाल देख हम डरते नहीं क्योंकि हम समझते हमारे लिए मुक्ति, जीवनमुक्ति का गेट खुल रहा है। सारी दुनिया डरती है। विनाश का नाम सुनने से ही उनकी दिल धड़कती है। हर मनुष्य को चिंता लगी है दुनिया का क्या होगा ? हमको कोई चिंता नहीं है, कितने भाग्यवान हैं। दुनिया का क्या हाल होगा, हमारा क्या हाल होगा, परिवार का क्या हाल होगा ? चिंता नहीं है। जहाँ भी हैं मधुबन वासी हैं। परमधाम में जाने के पहले सूक्ष्मवतन वासी बनने के लिए यहां बैठे हैं। यहां विनाश होगा हम उड़ जायेंगे । उड़ने की कला आ गई है। हमको आग तूफान लगेगा नहीं, हम सूक्ष्मवतन वासी बनेंगे । हम तैयार बैठे हैं, यह देह छूटेगी, हम बाबा के पास चले जायेंगे । इसलिये पहले से देह छोड़ने के आदती बन गये हैं। मनुष्य को देह छोड़ने में डर क्यों लगता है ? क्योंकि इस देह मे रहते आत्मा अधीन है । सम्बन्ध और साधन के अधीन है। साधना करना नहीं जानते हैं।
हम सबके साथ रहते हुए भी अकेले हैं। फिर बाबा कहता अपने को अकेला नहीं समझो हमको सब देख रहे हैं। सारी दुनिया देख रही है हम कौन हैं। एक तरफ हम अकेली आत्मा हैं, अकेला न समझें तो देह से न्यारे नहीं बन सकते । बुद्धियोग बाबा के साथ है इसलिए डरते नहीं हैं । जिसे डर हो वह आज से ही खत्म करे । कइयों में डरने की कमजोरी होती है / अकेले घर में नहीं रह सकते हैं। रात अंधेरी होती तो डर लगता है, कोई कुछ कहता है तो डर लगता है। बड़ी नाजुक नेचर है। काल का तो डर लगता ही है, तो चोरों का, कुत्ते, बिल्ली, काकरोच का, चूहे का डर लगता है । छोटी-छोटी बातों में डरते हैं। डर बड़ा नुकसानदायक है। डर सोल कॉन्सेस होने नहीं देगा, बाबा को साथी बनाने नहीं देगा। अभी विनाश काल के समय अगर निर्भय निडर नहीं होंगे तो विनाश कैसे देख सकेंगे। अभी तो थोड़ी रिहर्सल होती है। भय काहे का और किसका, क्यों भय हो ? किसी के भाव-स्वभाव से भी डर लगता है। अन्दर ऐसी स्थिति बनायें जो ना तो हम किसी से डरें, न ही किसी को डरायें। डरते नाजुक नेचर वाले हैं। डराते रोब की नेचर वाले हैं। रोब वाले ख्याल नहीं करते । तेज़ बोलने की नेचर है। आवाज़ से बोलते हैं तो कई डरते हैं। वह आवाज़ से बोलते मैं क्यों डरुं । कुछ भी बोला तेज़ बोला मैं अगर डरती हूँ तो मेरी नेचर नाजुक बन गई है यह मेरे लिए नुकसान हो गया। कोई तेज़ बोलता तो मैं क्यों डरूँ, वह हमें सहनशीलता सिखाता, समझदार बनाता है, बेबी बुद्धि छुड़ाता है। बदला लेने की भावना हमारे में पैदा न हो, यह चैलेन्ज मिलती है। यह ऐसे करता मैं भी करूं, नहीं । हम बदलेंगे, बदला कभी नहीं लेंगे ।
अगर दुनिया को चेंज करना हो तो हमारे में बदला लेने की भावना नहीं होनी चाहिये। यह अपना रिकॉर्ड हो। इस बात का रजिस्टर रखो। कोई कैसा भी हमारे से करे, खराब शब्द बोले, निंदा करे हमें बदला लेने का ख्याल भी न आये । बहुतकाल से किसी से बदला न लेने का रिकॉर्ड होगा तो हम निर्भय होंगे। एक तो किसी से रांग करते हैं तो भय लगता है। मैंने इनके साथ रांग किया है। बहुतों से जिसने बुरा किया होगा, हालांकि करते समय बहादुरी से किया होगा, बुरा करने में अच्छा लगा होगा, लेकिन फिर डरता है। कोई समय आता है जो उसने बहादुरी दिखाई वह डराती है, तूने किया है तो देख । परन्तु और कोई भी करे, मुझे नहीं करना है। मुझे तो बाप जैसा बनना है उन जैसा नहीं । बहुतकाल से बाप जैसा बनने का लक्ष्य रखने से वह लक्षण हमारे में आयेंगे, हम निर्भय बन जायेंगे, मदद मिलती रहेगी। अच्छा करने की अच्छी भावना रखने से अन्दर शक्ति आती है, नहीं तो अन्दर शक्ति खत्म हो जाती है।
पुरुषार्थ क्या करना है ? सिर्फ अपने संकल्प बोल पर ध्यान दो । सोचो भी समझकर । तुरन्त जवाब नहीं दो। कई सोच कर जवाब देंगे । ख्याल आते कर नहीं लेंगे। नहीं जंचेगा तो कभी नहीं करेंगे। सोचना माना ऐसे नहीं सोच में पड़ जाना । सोचना माना थोड़ा समझदारी से, ठीक है तो करना चाहिए, नहीं तो अवाइड करो । जो रांग है वह नहीं करना है।
जो ग़लती नहीं करता वह डरता नहीं है। जो ग़लती करता है वह डर के मारे झूठ बोलता है। बहुत थोड़े हैं जो एक़दम सच बोलते हैं। बाबा सच नहीं बुलवाये, हम अपने आप सच बोलें । सच बोलने वाला कभी डरता नहीं है। झूठ बोलने वाला डर के मारे झूठ बोलता है। उसे सच बोलने में डर लगता है। यह नहीं समझता है – आगे चलकर जब झूठ क्लीयर हो जायेगा तो मुंह पीला हो जायेगा, कांध नीचे हो जायेगा। फिर कभी सिद्ध नहीं कर सकेंगे । पहले झूठ बोलकर सिद्ध करेंगे फिर सच बोलकर भी सिद्ध नहीं कर सकेंगे। इसलिए झूठ क्यों बोलें ? झूठ बोलने का सोचें भी क्यों ? कई झूठ भी नहीं बोलते, बहाना बनाते हैं। झूठ से बहाना और खराब है। वह भी डर के मारे बहाना बनाकर बोलते हैं। झूठ मुंह से बोलते हैं, बहाना अन्दर बनाते हैं। जो बहाना बनाने वाला है उसका मन चित कैसा होगा ? वह अतीन्द्रिय सुख में रह सकेगा ? वह कहेगा अतिन्द्रिय सुख मेरे से पूछो ? वह तो कहेगा मेरे अन्दर क्या चल रहा है, किसको बताऊं। कोई पूछेगा तो भी डर लगेगा पता नहीं रांग न निकल जाये तो मन कैसा खराब होता है। अन्दर से शक्ति नहीं है इसलिए डरते हैं। डरने वाले में शक्ति नहीं आती है। वह स्वधर्म में टिक नहीं सकते है। भगवान को अपना साथी नहीं समझ सकते हैं।
बाबा कहते - बच्चे, बाप को सदा कम्बाइन्ड बनाकर रखो। क्यों कम्बाइन्ड बनायें ? अपने चरित्र को ऊंचा बनाने के लिए। जैसा वह है वैसा बनने के लिए साथी बनाकर रखना होता है। पहले कौन मेरा साथी है उसको देखते-देखते रंग लगता जाता है। अगर बाबा मेरे साथ है, मैं स्वधर्म में टिकी हूँ, मन में बदला लेने की भावना नहीं है तो मेरे पास कोई भय नहीं है। मैं अपने भाग्य से खुश हूँ, बाबा ने सिखाया है कर्म करके अपना भाग्य बनाओ । कर्मों की गुह्य गति समझाई है। बाबा ऐसे भाग्य नहीं देता है। समय ऐसा है, अपने कर्मों से, अपने वचन से, अपने श्रेष्ठ संकल्पों से अपना भाग्य बनाओ। तुम्हारा भाग्य तुम्हारे हाथों में है। जैसे श्रीकृष्ण का चित्र है पुरानी दुनिया को लात मार रहा है, स्वर्ग हाथों में है। एक हाथ में मुरली है दूसरे हाथ में स्वर्ग है और पुरानी दुनिया की तरफ पीठ है। स्वर्ग की बादशाही हमारे हाथों में है। एक हाथ में मुरली दूसरे हाथ में स्वर्ग, बुद्धि में सदा मुरली है। बाबा ने सभी वेद शास्त्रों का सार सुनाया, हमारी भगवत गीता माँ वही है। सब धर्म स्थापक देहधारी हैं, हमारा धर्म स्थापक विदेही है। सारे चक्र का ज्ञान बुद्धि में ऐसा क्लीयर है। चक्र पूरा हुआ है हम संगम पर खड़े हैं, ऊपर जा रहे हैं। फिर स्वर्ग में आना है। चक्र का ज्ञान माना घड़ी का ज्ञान है। घड़ी कहती है अभी टाइम क्या है। स्वदर्शन चक्र फिराओ या समय को देखो। समय कहता बुद्धि ऊपर खिंची हुई हो । जरा भी कर्मेन्द्रियों के साथ लगाव न हो ।
हमने कोई फ़ालतू किताबें पढ़ी ही नहीं हैं। कई तो फ़ालतू किताबें अभी तक पढ़ते हैं। जो बात रांग है, वह करते हैं, तो डरते हैं। किसी को फ़ालतू चिट्ठी लिखी, पत्र लिखा तो डर लगता है। कागज़ पेंसिल द्वारा भी पाप कर्म किया, लम्बी-चौड़ी बातें लिखते हैं। यह भी तो टाइम वेस्ट है। डर क्यों नहीं लगेगा। कर्म ऐसे करेंगे तो डरेंगे जरूर । कोई काम भी छिपकर करना माना अपनी जान को खतरे में रखना । अपनी लाइफ को खतरे मे रखते, कभी पकड़े न जायें। तो हम ऐसा क्यों करें ? 'सच तो बिठो नच' । सच बोलने वाला अन्दर से नाचता है। बाबा ने सच बोलना सिखाया है। फिर कोई कारण बनता है तो डर लगता है पता नहीं कुछ हो न जाये। अगर किया है तो माफी ले लो। जिससे सबको दया आ जाए, सब सहयोगी मददगार बन जायें। फिर भी अभी ईश्वरीय परिवार के स्नेह, संगठन की शक्ति बहुत आगे बढ़ाती है। ज्ञान जो मिला है उससे अच्छी तरह महसूस करके, योगयुक्त बनकर, मन कर्मेन्द्रियों पर कन्ट्रोल करके निडर बनो। किसी पर भी फ़ालतू दया नहीं करो। कई हैं जो कहीं-कहीं दया करके अपने को फंसा लेते हैं फिर डरते हैं। हमें बाबा तो मिला है पर बाबा ने ज्ञान इतना अच्छा स्पष्ट दिया है जिससे हम निर्भय, निर्वैर बन सकते हैं। जिसका किसी के साथ वैर नहीं है वह सदा निर्भय है। निर्भय, निर्वैर अवस्था तभी आ सकती जब मैं अकालमूर्त आत्मा हूँ। अकाल तख्त बाबा ने दिया है उस पर विराजमान रहो । बाबा के दिल तख्त पर मुझे बैठना है। बाबा ने चुन-चुन कर माला का मणका बनाने के लिए मुझे अपना बनाया है तो बाबा के दिल तख्त पर बैठना मेरा हक है। वह डरेगा क्यों ? बाबा के दिलतख्त पर बैठने का हक तब मिलता है जब मैं पुण्य कर्म करूँ । किये हुए पाप खत्म होते जायें, पुण्य कर्म बढ़ते जायें । पुण्य कर्म जिसमें सबका भला समाया हो । कोई खराब तो करते नहीं, पर अच्छा कितना करते । बाबा वह कर्म करता है जिससे अनेक आत्माओं का कल्याण हो। हमारा कर्म वचन, सोच-विचार ऐसा हो, तो हम डरेंगे नहीं। अभी कलियुग की अन्त में निर्भय बनना होगा ।
अभी संगदोष से बचकर रहना है। किसी के प्रभाव में आकर कभी उल्टा कर्म नहीं करना है । कोई कुछ भी उल्टा करता है उसके साथ अगर हम मिक्स हुए सुना 'हाँ जी' कहा तो पाप है। हम क्यों करें। अपने को पुण्य आत्मा बनाने की धुन लगी हो तो संग से बच जाते हैं, उसकी चपेट में नहीं आ सकते हैं। हमको कोई खींच नहीं सकता है। इधर उधर खड़े होकर बात करने का टाइम ही नहीं है। हमारी योगी लाइफ है। योगी लाइफ वाला अपनी योगयुक्त स्थिति बनाने में बिज़ी रहता है। यह मिनिट-मिनिट अमूल्य है।
ऐसा अमूल्य समय हम फ़ालतू बातों मे नहीं गंवा सकते हैं। जरूरी सेवा होगी तो सामने आयेगी । सेवा, स्थान वा व्यक्ति के पीछे हम नहीं पड़ते हैं। सेवा न छूट जाये, स्थान न छूट जाये व्यक्ति न छूट जाये। मेरा साथी बाबा है। कभी यह ख्याल नहीं आया कि यह साथी न छूट जाये। कोई थोड़ा समय साथ देकर काम करता है वह अपना भाग्य बनाता है। हम अन्दर से लगाव में आकर अपना कर्म का बंधन बढ़ाकर फिर हैरान हों, कर्म का बंधन हैरान करेगा। कर्म करते संबंध मे रहते कर्मबंधन में न आ जाओ। बंधन डराता है। हमारी निर्बन्धन स्थिति हो तो डरेंगे नहीं। निडर बनेंगे – निर्बन्धन बनने से। इसलिए जितना न्यारा रहेंगे। न्यारे रहने वाले, सच्चे प्यारे हैं। नहीं तो वह प्यार झूठा है, दिखावे का है। धोखा देने वाला है। हम दिखावे के प्यार में फंस न जायें । न किसी को कभी फंसायें। ऐसे छोटे-छोटे बहुत पाप कर्म बन जाते हैं फिर हैरान होते हैं, फिर डर लगता है। अपने को समझदार बनाकर छुड़ायें तो बंधनमुक्त स्थिति खुशनसीब महसूस करायेगी। नाखुश होने की कोई बात नहीं । नाखुश होते हैं तो कमजोर हो जाते हैं फिर डर लगता है। तो किसी बात में भी कमजोर न हों। कमजोर जरूर डरता है। शरीर भी कमजोर होता तो डर लगता है इसलिए कमजोर नहीं बनो। सर्वशक्तिमान् के बच्चे हैं। कर्मों की गुह्य गति को समझा है। समझदार बनने से बाबा शक्ति देता है। तो निर्भय, निर्वैर, अकाल मूर्त बनना है। मैं आत्मा हूँ, बाबा के साथ हूँ।
आवश्यकतायें पूरी होंगी, इच्छायें नहीं, पहले अपने आपको इच्छाओं, तृष्णाओं से मुक्त करो
बाबा को याद करने का यह भी एक बहुत अच्छा तरीका है कि बाबा से बहुत अच्छी-अच्छी रूह-रिहान करें। मन की बातें बाबा को बहुत प्यार से सुनाते रहें । यह भी साथ-साथ अनुभव होता है कि बाबा रेसपान्ड कैसे करता है। बाबा से रेसपान्ड कई बार शब्दों में मिलता है, कई बार प्रैक्टिकल में मिलता है। बाबा हम बच्चों को अच्छी तरह से जानता है। मन की बातें बाबा सुनता भी है। फिर कौन सी बात बाबा मदद करने के लिये मानता है। कई बातें बाबा हमको छोटे बच्चे समझकर नहीं भी मानता है। समझदार बनाता है। जिस बात की आवश्यकता होगी वह बाबा अवश्य पूरी करेगा। जो इच्छा होगी वह पूरी नहीं करेगा। इच्छा और आवश्यकता। बच्चे कोई इच्छा रखते हैं तो मां बाप समझते हैं कि इसकी यह इच्छा पूरी करने में कल्याण नहीं है। उसकी छोटी-छोटी इच्छायें पैदा होती जायेंगी। फिर समझदार सयाने कब बनेंगे ? तो हम इच्छा वश न हो जायें। कोई इच्छा होगी तो बाबा पूरी नहीं करेगा। इच्छा थी तब प्राप्ति हुई, वह नहीं होगी। कभी यह ख्याल नहीं करना पड़े कि ये क्यों हुआ ? मेरी इच्छा तो कुछ और थी और हुआ कुछ और। बाबा से बात करते-करते हमारी बड़ी राइट इच्छा पैदा होती है और काम लायक इच्छा पैदा होती है। जिसको इच्छा नहीं कहा जायेगा। जब हम इच्छा शब्द कहते हैं तो यह बात स्पष्ट है - आशा, इच्छा और तृष्णा में फ़र्क है, तृष्णा तमोगुणी है। मरने तक तृष्णा छोड़ेगी नहीं, आशा रजोगुणी है और इच्छा सतोगुणी । जो इच्छा काम लायक होगी बाबा अवश्य पूरी करेगा। कोई न कोई बात आयेगी जरूर जो स्वउन्नति में मदद करेगी। पहले अपने को इच्छा आशाओं से मुक्त करें। हमको एक ही इच्छा रखनी है कि सदैव मैं स्वधर्म में टिक कर स्वमान में कैसे रहूँ। ड्रामा की नॉलेज से अचल-अडोल रहना सीखें तभी स्वधर्म में रह सकते हैं।
ड्रामानुसार कल्याणकारी समय है, कल्याणकारी युग है। हर समय हमारा कल्याण ही हो रहा है। संगमयुग को कल्याणकारी समझकर हम आत्मायें इस संगमयुग पर खड़ी हो गई हैं। मेरा बाबा कल्याणकारी है। एक परमात्मा बाप से सर्व सम्बन्ध हो गये हैं। हमने यह नहीं सोचा था कि भगवान् से सर्व सम्बन्ध जुट जायेंगे । सर्व सम्बन्ध एक के साथ होंगे तो देह के अनेक सम्बन्धों से छूटना आसान हो जायेगा। बाबा ने यह कमाल की है अनेक देह के सम्बन्धों से छुड़ा दिया है। आत्मा, परमात्मा की सन्तान है बाकी सब बहन-भाई हैं। कितना वन्डरफुल ड्रामा है, कितना अच्छा है ! मोह की रग चली गई है। माँ, बेटी को बहन समझे या बेटी, मां को बहन समझे तो पुराने मोह की रग छूट जाती है । सम्बन्ध में मेरापन छुट जाये, बाबा मेरा है। अपने आप माता, पिता, सखा, सतगुरु का सम्बन्ध बाबा से जुड़ता जाता है। बाबा तो करनकरावनहार है। माया भी अपना पार्ट बजाना शुरू कर देती है। एक तरफ बाबा मिला करनकरावनहार, सर्व का सद्गति दाता । फिर माया भी देखती है इनको करनकरावनहार मिला है, जो क्षमा करता है, पाप नाश कराता है, छोटे-बड़े, भक्त, साधू सबका उद्धार कर रहा है तो माया को ईर्ष्या होती है। पहले वो करनकरावनहार का पार्ट नहीं बजाती थी, अब माया भी करनकरावनहार का पार्ट बजा रही है। बाबा जो करनकरावनहार है, हमसे कराता है वह लीला देखना छूट जाती है और माया की उलझन में फंस जाते हैं। माया कभी मोहिनी रूप से, कभी विकराल रूप से, कभी निन्दा कराकर डिस्टर्ब करती है, फिर बोलते हैं मुझे छोड़ दो, मैं डिस्टर्ब हूँ। छोड़कर कहाँ जायेंगे? करनकरावनहार बाबा भी वन्डरफुल है। बाबा कोई न कोई युक्ति बताकर अपने तरफ मुख कर लेता है। किसी के जरिये या स्वप्न में भी अपना स्वरूप दिखाकर नयनों से खींच लेता है। जितना बाबा का परिचय मिला उतना ही माया का भी मिला है। माया में कोई सोल या बॉडी नहीं है। माया आई कहाँ से ? माया का फ़ोर्स बहुत है। अपनी मत देकर माया ने हमारा सारा राज्य भाग्य छीन लिया है। पहले देहभान में लाया, फिर पांच विकारों के वशीभूत हुए, बुद्धि आसुरी बन गई फिर उनको बोलो दुनिया नर्क है तो बोलेंगे नहीं-नहीं मेरे लिये तो स्वर्ग है। भगवान ने इतना बड़ा यज्ञ रचा है जिसमें स्वाहा-स्वाहा करते रहो । वहां बाह्मण स्वाहा कराते हैं यहां स्वाहा करने से ब्राह्मण बनते हैं। वो गृहस्थी कोई ब्राह्मण नहीं बनते हैं । हमें सफल भी करना है तो स्वाहा भी करना है। स्वाहा क्या करना है, सफल क्या करना है? जो भो अन्दर में है उसे स्वाहा करना है। जब तक स्वाहा नहीं कर देते तो वायुमण्डल इतना श्रेष्ठ शुद्ध नहीं बनता। जो कुछ हमारे पास है वह सफल करो। दे दान तो छूटे ग्रहण । ज्ञान दान भी करो गुणदान भी करो ।
कौन सी ग्रहचारी है जो हटती नहीं ? यह भी बैठकर विचार करना चाहिये । बृहस्पति की दशा बैठे तो सब कुछ ठीक हो जायेगा। बृहस्पति की दशा है तो बाबा की तरफ से, परिवार की तरफ से, सब तरफ से, अच्छा ही होगा। कई बार सब तरफ से अच्छा नहीं होता है। तपस्या करने से गृहचारी हटती है। समझदार वह जो गृहचारी को समझे, दान करके खलास करे । बाबा को अपने बच्चों पर गृहचारी देखकर तरस आता है। अपने आपको बड़ा सम्भालना है। छोड़ करके जाने वालों में भी दो-तीन प्रकार हैं, कोई अजामिल जैसे बनते हैं। कोई मोहवश हो जाते हैं, मोहजीत बनने वा श्रीमत पर चलने की इतनी ताकत नहीं है। वह अजामिल जैसे पापी नहीं बनेंगे। कई हैं जो पतित विकारी बनकर भागन्ती होते हैं, उन पर बहुत पाप चढ़ता है क्योंकि ब्राह्मण बनकर, बाबा का बच्चा बनकर अगर कोई पतित बनता है तो माया उसको छोड़ती नहीं है, बड़ा पीछा करती है, पूरा विकारी बना देती है । बाबा कहते हैं कभी ऐसे संग में नहीं जाओ । अन्न और संग की सम्भाल करो । यदि आहार शुद्ध हो तो हमारे विचार शुद्ध रहेंगे । माया क्यों खींचती है? आहार शुद्ध नहीं है या विचार शुद्ध नहीं हैं या तो कुछ दुनियावी फैशन की आकर्षण है या तो दिल की किसी से लेन-देन है। दिल की बात दिलाराम के सिवाए और किसी को भी सुनाई, दिल दे दिया तो दिल लग जायेगी फिर दिल तोड़ना मुश्किल है। भगवान् से दिल लगाने में टाइम लगा, इंसान से दिल लगाने में टाइम नहीं लगता। फिर कहते हैं हमारी दिल भरी थी, हमने उसको सुनाया, उसने दिल ले लिया। जानते हुए दिल नहीं देना है। दिल की बात एक दिलवर को सुनाओ या फिर जहाँ से दवाई मिले, वहां सुनानी है। जहाँ दवा मिले, बल मिले, समझ मिले, शक्ति मिले ऐसा स्थान चाहिये । वहां न सुनाकर दूसरी जगह सुनाया तो माया आ जायेगी । माया शुरू कहाँ से होती है ? जब बाबा के बन गये, सेवा मिल गई, परहेज़ का पता चल गया तो फिर न हमें किसकी दिल लेनी है, न किसको दिल देनी है। यदि किसी का दिल हमारे से लग गया तो हमारे लिये ही परेशानी होगी। सेवा भी करो, सेफ भी रहो । इसमें दिल कठोर नहीं, मजबूत हो । कोमल दिल भी न हो, लेकिन कमल फूल समान न्यारा-प्यारा हो । माया कोमल दिल या कठोर दिल वाले के पास आती है। जिसका दिल साफ नहीं रहता है उसके पास माया आती है। जो सच्चे दिल से साहब को राज़ी रखते हैं, उनके पास माया नहीं आती । बाबा अव्यक्त है, अभी साकार में नहीं है फिर भी हमारा दिल ले लेगा । बाबा को सुनायेंगे तो बाबा याद आयेगा । इंसान को सुनायेंगे तो इंसान याद आयेगा । बाबा करनकरावनहार सब कुछ करता है, कराता है - यह बात कभी नहीं भूले । कितना भी सहन करना पड़े। हमको सहन करता देख बाबा को तरस पड़ेगा। सहन करना बड़ी बात नहीं है। पास हो जायेंगे । अन्दर से प्रतिज्ञा करो – बाबा, हम पास होकर रहेंगे। तो बाबा पास कर देगा, मदद -करेगा। परमात्मा बुद्धिवानों की बुद्धि है। सबको बुद्धि बाबा ने दी है। सबकी बुद्धि को तमोप्रधान से सतोप्रधान बना रहा है। ज्ञान देकर, अपने से सम्बन्ध जोड़कर सतोप्रधान बना रहा है। इस तरह से बाबा को हम अच्छी तरह से जानते जायें तो समझदार हो जायेंगे, फिर माया हमारे लिये कैसा भी रूप धारण करे हम डरने वाले नहीं हैं। जैसे कहते हैं गज को भी ग्राह ने खा लिया।जो महारथी बनेगा उसके पीछे माया आयेगी लेकिन भगवान् छुड़ा लेगा। माया तो अन्त तक नहीं छोड़ेगी । परन्तु गायन हमारा है, हमने जीता है। हार खाने वालों में मैं नहीं हूँ। यह भी प्रश्न नहीं फलाने ने हार क्यों खायी। लोभ, मोह, काम, क्रोध, ईर्ष्या भोलेपन के वश होने से माया खा लेती है। तेज़ मिज़ाज़ वालों की दूसरों से नहीं बनती है, वह दूसरों का दोष निकालते हैं तो माया आ जाती है। कोई किसी के कारण चले गये, कोई किसी के कारण चले गये। भूल जाता है हरेक का रक्षक स्वयं भगवान् है। कितना भी आंधी तूफान आये, हमें हिलना नहीं है। पंछी भी किसी के लिये रुकता नहीं है। कहा जाता है पंछी और परदेशी दोनों किसी के मीत नहीं होते। पंछी भी जब उड़ता है तो उसके पीछे अनेक उड़ते हैं। जो नहीं उड़ता तो समझते हैं यह बीमार होगा या ताकत नहीं है। तो उड़ने वाला पंछी उसके लिये बैठ नहीं जायेगा, भले उसकाबेटा हो, उसकी रचना हो। तो सदैव हमारी उड़ती कला हो। ध्यान रखना है – एक तो चढ़ती कला हो । जितनी चढ़ती कला होगी उतना ही भला होगा। समझदार वह है जो किसी के लिये रुकता नहीं है। हम 'क्यों-क्या' के क्वेश्चन में न आयें । रास्ता पता चल गया है, चलते जाओ । हम किसी के लिये रुक नहीं सकते, न कोई हमको रोक सकता। दूसरी बात माया से सदा फ्री होकर रहना है। युद्धिष्ठिर ने भी पीछे मुंह करके नहीं देखा था। कोई पीछे आ रहा है तो आ जायेगा। हमें तो उन राहों पर चलना है जहाँ गिरना और सम्भलना है। चलते जाना है। हमको कोई रोक नहीं सकता। कहाँ जाना है? पीछे या सामने । बाबा सामने ले जा रहा है इसलिए पीछे से कोई खींच नहीं सकता। माया के वश हो नहीं सकते ।
विचार सागर मंथन करने के लिए अन्तर्मुखी बनो, चित्त को साफ रखो, अधैर्यता को छोड़ दो
बाबा कहते बच्चे सदा खुश रहने के लिये विचार सागर मंथन करो । विचार सागर मंथन करने से तकदीर अच्छी बनेगी। विचार सागर मंथन करने की जब बात आती है तो हमारे सामने सवेरे-सवेरे मक्खन बिलोने की बात याद आती है। मक्खन हर एक नहीं बिलो सकता। मक्खन निकालने के लिए धीरज चाहिये, ढंग चाहिये। कहीं ऐसा न हो कि न रहे छाछ और न रहे मक्खन । इधर उधर अटेन्शन होगा तो और ही बिगड़ जायेगा। विचार सागर मंथन करना माना पहले अन्तर्मुखी होना, अपना चित्त साफ रखना, अधैर्यता को छोड़ना, कल्याणकारी बाबा की याद तब आती है जब हर बात में सदा कल्याण समझने के आदती बन जाते हैं। हर बात में कल्याण है तो अच्छा विचार सागर मंथन होगा। अगर ये आया कि यह क्या हो रहा है- तो विचार सागर मंथन नहीं होगा। ड्रामा की नॉलेज में पूरा निश्चय नहीं होगा तो विचार सागर मंथन नहीं होगा। पहले-पहले अन्तर्मुखता से अपने को निश्चयबुद्धि बनाना है। आत्म अभिमानी स्थिति नेचुरल हो जाये। जैसे ब्लड कनेक्शन में नेचुरली रग जाती है। ऐसे हमारी रग बाबा में जाये। वो तो दो, चार दस बहन-भाई होते हैं, यहां तो इतने सारे बहन-भाई हैं। किसी को बहन नहीं होती या भाई नहीं होता तो रोते हैं। यहां इतने बहन-भाइयों को देखकर खुशी होती है। जब कोई नया व्यक्ति ज्ञान में चलने लगता है तो उसे देखकर खुशी होती है कि हमारा भाई आया है या बहन आई है। लाखों में एक पुरुषार्थ करने लग पड़ता है तो खुशी होती है। जब कोई कम निश्चयबुद्धि होता है तो दुःख भी होता है। तो रग जाती है कि सब पक्के निश्चयबुद्धि बनें। योगबल से सब मायाजीत बनें । माया का कभी बलि न बनें। ऐसा बलवान बनें जो सर्वशक्तिमान् बाबा के ऊपर बलि चढ़ जायें। जैसे काली पर बलि चढ़ते हैं ऐसे शिव बाबा पर बलि चढ़ जायें तो माया कुछ नहीं कर सकेगी। अपनी सेफ्टी के लिये, अपने को निश्चयबुद्धि बनाने के लिये, निश्चिन्त रहने के लिये विचार सागर मंथन करना है। सदा निश्चिन्त रहें, निश्चित भावी पर अटल अडोल रहें।
बाबा सदा कहते हैं बच्चे विनाश के पहले बाबा से पूरा वर्सा ले लो। क्योंकि विनाश काले यादवों की है साइंस में बुद्धि, कौरवों की है मान शान में बुद्धि, पैसा चाहिये, मान चाहिये, कुर्सी चाहिये और पाण्डवों को क्या चाहिये ? एक बाप है तो सब-कुछ है। साइन्स के घमण्ड से छूट गये । साइन्स की इन्वेन्शन करने वालों को अहंकार होगा। कौरव दूसरों को कुर्सी पर बैठा नहीं देख सकते हैं। भगवान् ने हमको कितनी अच्छी बुद्धि दी है। अभी इस सृष्टि पर तीनों सेनायें हैं- यादव, कौरव और पाण्डव । अपने से पूछो हम कौन हैं ? उनको भगवान् से प्रीत लगाने के लिये, जानने के लिये टाइम नहीं है। भगवान् भी उनको कहेगा कि मेरे पास भी टाइम नहीं है। हमारे पास टाइम है सफल करने के लिये, बाबा को याद करने और औरों को याद कराने के लिये। यह विचार सागर मंथन करो कि मैं कैसे बाबा को अच्छा पावरफुल याद करूँ और सदा दूसरों को याद दिलाऊं, जिससे यदि किसी के ऊपर माया की छाया हो तो उतर जाये । एक दूसरे के प्रति शुभ भावना कैसे रहे, इस चिन्तन के सिवाय कोई और चिन्तन न हो। विचार सागर मंथन होगा तो और कोई चिन्तन नहीं होगा, बीती बातों का वर्णन नहीं होगा। कल की बात भी भूल जायें। भविष्य का कोई फिक्र नहीं, अन्त मते अच्छा हो यही फिक्र हो। अन्त मते मेरी अच्छी हो उसके लिये अभी पुरुषार्थ करना होगा। यथार्थ याद किसको कहा जाता है उसी प्रयत्न में रहें, ऐसे महसूस हो कि आत्मा बिल्कुल प्योर होती जा रही है, शरीर का हिसाब-किताब खुशी से चुक्त करती जा रही हैं। कितनी भी बड़ी बीमारी आये बड़ी बात नहीं। यही विचार सागर चलता है अन्तिम जन्म है, अन्तिम घडियाँ है. हिसाब-किताब चुक्त हो रहे हैं। विचार सागर मंथन करने वाले अन्दर से तृप्त आत्मा रहते हैं क्योंकि शक्तिशाली मक्खन मिलता है। कभी कोई चीज मांगने की आवश्यकता नहीं होती । रॉयल बनते जा रहे हैं। गायन है विष्णु ने विचार सागर मंथन किया था, लेकिन हम जानते हैं ब्रह्मा ने विष्णु बनने के लिये विचार सागर मंथन किया और कलष माताओं के सिर पर रखा है । विचार सागर मंथन करने वाले कलष की सम्भाल करते हैं । ज्ञान देने वाला है ज्ञान सागर । जिसके तन में आया उसने विचार सागर मंथन किया फिर उसमें से अमृत निकला जो औरों को पिलाया । विचार सागर मंथन करने से समझेंगे बाबा ने जो दिया है वह औरों को दें। यदि विचार सागर मंथन नहीं करेंगे तो किसी को समझाने का दिल नहीं होगा। फिर ज्ञान सुनाने के लिए कहो तो कहेंगे और किसी से कह दो कि वह सुनाये ।
रोज़ अच्छी-अच्छी बातें विचार करने के लिये मिलती हैं। जब कोई फ़ालतू विचार करता है तो हमको बड़ा तरस आता है। बाबा जो सुनाता है क्या वह विचार नहीं कर सकते ? हनुमान का गायन क्यों है ? लक्ष्मण मूर्छित हो गया, हनुमान ने संजीवनी बुटी लाकर सुंघा दी तो खड़ा हो गया। तो कभी कोई लोभ, मोह वश मूर्छित हो जाता है, खुशी गुम हो जाती है। न इधर का. न उधर का, न ब्राह्मण, न शूद्र। समझ चली जाती है। तो अच्छा विचार सागर मंथन कर उसे ऐसी संजीवनी बूटी सुंघाओ कि वह खड़ा हो जाए। विचार सागर मंथन करो कि मैं लाखों ब्राह्मणों में सर्वोत्तम कैसे बनूँ । यदि सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण बनना है, परिवार की शोभा बढ़ानी है तो दैवी गुण अभी धारण करने पड़ेंगे। अभी दैवी गुण धारण करेंगे तो सतयुग में देवता बनेगे । यदि याद रहे कि मैं ईश्वरीय कुल की हूँ, यह अन्तिम जन्म है। अभी हर एक का अन्त है तो कर्मबन्धन कट जायेंगे। ऐसे नहीं कि बूढ़ों का अन्त है, जवानों का नहीं। लेकिन में आत्मा क्या कर रही है ? क्या मुझे बाप, घर स्वर्ग याद है? यहां के देह, सम्बन्ध, दुनिया मेरे लिये मरे पड़े हैं। गीता में महावाक्य है 'हे अर्जुन दुनिया को जान' । हमने दुनिया को बुद्धि से मारा है। भगवान् अर्जुन को बार-बार कहते थे मामा, चाचा सबको मारो, मन, कर्मेन्द्रियों को जीतो। जब देह सम्बन्धियों को मारते हैं तब कर्मेन्द्रिय जीत बनते हैं। हमारे कर्म ऐसे हों जो और देखें कि ये योग में रहते कैसे कर्म करता है। ये कर्म भी कर रहा है लेकिन हमको सिखला भी रहा है। परमात्मा ने इस द्वारा हमको कर्म करना सिखलाया है, योग सिखलाया है। अब हमारे लिये बड़ा सहज हो गया है योग शिवबाबा से लगाओ परन्तु फालो ब्रह्मा को करो। ब्रह्मा बाबा ने कभी नहीं कहा मैं करता हूँ, मैंने किया। 'मैं' शब्द बाबा के मुख से कभी सुना ही नहीं है। 'मैंने किया', 'मुझे करना है' यह शब्द कभी नहीं सुना। 'बाबा करा रहा है', 'बाबा का भण्डारा है', 'बाबा का यज्ञ है', 'बाबा के बच्चे हैं – सदा यही सुना। बाकी सब बातें सोचने का टाइम ही नहीं है। भाग्यविधाता ने भाग्य बनाने का भण्डारा खोलकर रखा है। जिसको जितना भाग्य बनाना है, छुट्टी है। धन से नहीं बना सकते लेकिन मन तो है। मन से, सच्चे दिल से भाग्य बना सकते हैं।
ब्रह्मा बाबा का रथ, भागीरथ है। हमारे लिये बाबा कहता है तुम पद्मापद्म भाग्यशाली हो । इस रथ द्वारा बाबा ने कहा तुम कमल पुष्प समान रहकर पद्मों की कमाई करो, हर श्वास, संकल्प में बाबा को याद रखो तो हर क़दम में कमाई ही कमाई है। कमाई में ही खुशी है। कमाई करो फिर दान करो । दान करके शो नहीं करो। सच्चा दानी कभी शो नहीं करता। भगवान् ने दिया है, उसका भण्डारा सदा भरपूर है, जो खाये काल कंटक दूर है। इतना बड़ा दिल हो जाता है। विचार सागर मंथन करने से दिल साफ, बड़ा और खुला हो जाता है। विचार सागर मंथन नहीं करते तो राजाई संस्कार नहीं आते । सच्चा दिल है तो त्याग भी स्वतः होता है। अपने आपसे पूछो मुझे क्या चाहिये ? बाबा के भण्डारे से दाल रोटी मिलती है, बड़ी खुशी से खाते हैं। संग बड़ा अच्छा चाहिये। अच्छी कम्पन्नी में रहो, सबको अच्छी कम्पन्नी दो। अच्छा विचार सागर मंथन करने से, अच्छा सोचने से जो हमारे कल्याण की बात है वह स्वतः हो जाती है ।
मुरली के पीछे मस्ताने बनो, एक दिन भी मुरली मिस न हो तो रक्षा होती रहेगी
ओम् शान्ति । सवेरे-सवेरे बाबा कितनी अच्छी खुराक खिला देता है। खुराक सवेरे खाई जाती है। दिन में खायेंगे तो हज़म नहीं कर सकेंगे। खुराक माना जिसमें दवा भी हो तो दुआ भी हो और जो जरूरत हो वह सब शक्ति मिलती रहे । बाबा सबके मन की आशा पूर्ण करता है। सिर्फ हमारे मन में बाबा से मिलन के सिवाए और कोई आश न रहे तो सदा मिलन मनाते रहेंगे । यह अव्यक्त वर्ष है ही मिलन मनाने का वर्ष । बाबा मुरली भी चलाते हैं तो सब कहते हैं बाबा ने मेरे लिये मुरली चलाई। इसलिये मुरली से बहुत प्यार है। जिसने कभी भी मुरली मिस नहीं की हो उसको स्पेशल इनाम दिया जाये ।जिसने पहले कभी भी मुरली मिस की हो वे यह दृढ़ संकल्प कर ले कि मरन तक मुरली मिस नहीं करेंगे। मुरली सुनते-सुनते शरीर छूटे तो महान् भाग्यशाली हैं। जहाँ जीना है वहां अमृत पीना है। संगमयुग में केवल बाबा, मुरली और मधुबन चाहिये । बाबा है तो मुरली है, मुरली है तो मधुबन है। भगवानुवाच – 'बाबा मधुबन में है'। मधुबन में बैठकर बाबा कह रहा है मुझे परमधाम में याद करो जो ऐसे मुरली सुनते हैं उनको कभी झुटका नहीं आयेगा। झुटका उनको आयेगा जो कमाई महसूस नहीं करते। ज्ञान मार्ग के एक-एक अनुभव के गीतों में ईश्वर के प्यार के राज़ हैं। बाबा हम सबको एक जैसा बेहद प्यार करता है। क्योंकि बेहद का बाबा है। बाबा से इतना प्यार हो जो किसी इन्सान से तो क्या देव आत्मा से भी प्यार न हो। हमको पता है हम स्वर्ग में जाने वाले हैं, लक्ष्मी-नारायण के राज्य में जाने वाले हैं। हम त्रेतायुगी नहीं है जो ईर्ष्या, द्वेष, लड़ाई, झगड़ा, द्वेष भाव रखें ।
हमने कभी यह सोचा भी नहीं कि यह ब्रह्मा की मत है या शिवबाबा की मत है? सदा ही हमारे मन से निकला भगवान् भाग्यविधाता है। इसमें शिवबाबा न होता तो हम कैसे खिंचे चले आते, ब्रह्मा बाबा न होता तो हम किसके पास आते । यज्ञ कौन रचता ? यज्ञ न होता तो हम समर्पण कैसे होते?
बाबा ने अपने आप सभी कुछ करके अपने आपको छिपाया है। आज भी बाबा ही सब-कुछ कर रहा है, लेकिन अपने आपको छिपाये हुए हैं। गुरु है शिवबाबा और गोविन्द है यह ब्रह्मा बाबा, जिसने गऊओं को सम्भाला। गुरु ने गोविन्द मिलाया, गऊ शाला खोली। अभी तक कन्याओं माताओं की कैसे सम्भाल कर रहा है। उन्हें लायक बनाया है, शेरनी शक्ति बनाया है। गऊ रक्षा की है। बाबा हमारा कितना रक्षक रहा है। मुरली के आधार से हमारी रक्षा हुई है। तो सदा मुरली के पीछे मस्ताना बनना है। मस्ती तभी चढ़ती है जब मुरली सुनते हैं। बाबा कहते हैं किसकी दबी रहेगी धूल में, किसकी राजा खाये हमको खुशी है तन, मन, धन और समय सफल हो गया। जैसे बाबा ने कहा वैसे हमने फालो किया। श्रीमत को पालन करके बाबा नारायण बन गये । अभी हमको श्रीमत मिलती है सब सफल करो । जो कुछ कर्म करो ईश्वर अर्थ, मन, मनमनाभव हो, तो धन भी वहां ही लगेगा जहाँ मन होगा। जहाँ लगाव होता है, लगन होती है वहां ही धन जाता है। तो हमको तन मन धन और समय सफल करना है। सबसे ज्यादा कीमती समय है। उसके पीछे कीचक पड़ते हैं जो समय बरबाद करते हैं। माया हमारे पास आये ही क्यों, हम खबरदार होशियार रहें, महावीर शिवशक्ति होकर रहें। माया कमजोर के पीछे आती है। बहादुर के पीछे माया आ नहीं सकती । बाबा हमारा साथी है। यदि इंसान मदद करता है तो रिटर्न करना पड़ेगा। बाबा रिटर्न नहीं मांगता । अच्छी मिसाल बनकर रहें, हमारा सब-कुछ सफल हो जाये - बाबा यही चाहता है।
मन का भटकना नुकसानदायक है, तन-मन-धन सब
सफल करते रहो तो खुशी बढ़ती रहेगी
निश्चय से विजय पाने वाले बाबा के विजयी रत्नों को देख मीठा बाबा कितना याद आता है ! जिन्हों के दिल में कभी भी कोई संशय नहीं उठा है, न उठ सकता है। जीवन यात्रा सफल करते आ रहे हैं। बाप ही हमारा टीचर, सतगुरु बन पालना और पढ़ाई पढ़ाकर साथ ले जाने का वायदा निभाता है तो हम भी अपना वायदा निभाते आ रहे हैं। इसलिये अपना भाग्य का सितारा चमकता हुआ देख अन्दर गुप्त खुशी के नगाड़े बज रहे हैं अपार खुशी है। हर एक अपनी खुशी का माप करे, तौल कर देखे - कितनी खुशी है ? यह खुशी साथ लेकर जायेगी जो खर्चने से खुटती नहीं, चोर लूटता नहीं । बाकी जो अल्पकाल की खुशी है, चोर लूट ले जाते, खर्चने से खर्च हो जाती । लेकिन यह खुशी अपनी कमाई से हमारे पास जमा है, वह हमें सच्ची राजाई का अनुभव अभी ही कराती है। आत्मा शरीर को कह रही है तू मेरा नहीं है। जब देह ही मेरी नहीं तो और सम्बन्धी कहाँ से आये । आत्मा ने यह पक्का कर लिया है। कइयों ने बाबा को देखते ही यह समझा कि यही मेरा है। किसी ने ज्ञान सुनते समझा यही सच्ची शिक्षा देने वाला है। कइयों ने बाबा को पहले पहचाना, ज्ञान बाद में समझा है। कइयों को लगा कि यही सच्ची राह बताने वाला है । कइयों ने पहले बाप के रूप में, कइयों ने टीचर के रूप में, कइयों ने गुरु के रूप में पहले पहचाना। बाद में समझा तीनों एक है। दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जिसमें तीनों एक साथ हो । गुरु के लिये भटकते रह,. अनेक गुरु देखे। स्कूल में टीचर बदलते रहे। सदा एक समान टीचर नहीं रहा। हम बाबा के कैसे बने, कुछ छोड़ना पड़ा? बाप को देख सेकण्ड में दिल ने मान लिया। जो सौदा करने में टाइम लगाते हैं वह प्रजा क्वालिटी हैं। बाबा ने कुछ भी सोचा नहीं । समझा, समय अनुसार यह करना ही होगा।
समय, भगवान् और विवेक कहता है कि यह करना ही होगा। चारों तरफ दुनिया दुःखी है, धोखे में है, धोखा दे रही है। हम सब इतनी छोटी उम्र में ज्ञान में आ गये, समझ ने काम किया। बुजुर्ग कई प्रकार के दुःख दर्द देखते हुए भी विचार करेंगे। हमने कोई दुःख दर्द देखा ही नहीं। हमने यही सोचा कि केवल यही राइट है, दूसरा कल किसने देखा है। भगवान् के पहले महावाक्य थे – बच्चे, दूसरी दीवाली नहीं आयेगी। बस, रात दिन यही चिन्ता थी कि पुरुषार्थ करना है। लोग पूछते हैं विनाश कब होगा? हम कहते हैं पहले तैयारी कर लो, कल भी हो सकता है। हमारी तैयारी हो । बाबा ने इतनी अच्छी तैयारी करा दी है। मन को, तन को और धन को भी काम मिल गया। तन से भी जितनी सेवा करना हो कर लो। जिन कर्मेन्द्रियों से पाप कर्म हुए हैं उनसे अच्छे कर्म हो । गिनती करो कितने पाप कर्म किये हैं? पूर्व जन्म को छोड़ो, इस जन्म के ही गिनो। लोग दान करते हैं तो एनाउन्स होता है कि फलाने ने इतना दान किया। लोग माला लेकर बैठ जाते हैं, मुख में मन्त्र होता है लेकिन मन दुकान में, नौकरों में होता है। मन को चेक करो मन भटक क्यों रहा है, धक्के क्यों खा रहा है ? मां बाप समझदार होते हैं तो बच्चे को कहते हैं धक्का मत खाओ । भगवान् हमारा मां बाप है, मन को सिखाता है। मन का भटकना हमारे लिये नुकसानदायक है। धक्का खाते रहेंगे तो भविष्य अच्छा नहीं होगा। बीती बातों को याद करते-करते मन पास्ट में चला जाता है। अब बातें तो बीत चुकी । भगवानुवाच मनमनाभव। मन को समझाने के लिये बाबा कहता है रोज़ मुरली सुनो। धन के लिये बाबा कहते हैं डायरेक्शन लो । बाल बच्चों को देकर, काम उतार कर जीवन सफल करो। जीवन की बाकी घड़ियां सफल करो । बाबा को हम बच्चों से प्यार है। बाबा चाहते हैं बच्चे अपना जीवन सफल करें।
अपना तन, मन, धन, समय, संकल्प, श्वांस सब सफल करो अच्छी तरफ लगाओ तो खुशी होगी। सदा खुश रहो। बाबा यही चाहता है, टीचर यही चाहता है कि बच्चा अच्छी तरह से पढ़े, पास हो जाये। यह पढ़ाई हर बात में पास होने के लिये मदद देती है। समय पर कोई न कोई प्वाइन्ट याद आ जायेगी। कई बुढ़ी-बुढ़ी माताओं को, जिन्होंने कभी पढ़ाई नहीं की लेकिन बाबा की मुरली इतना अच्छा याद कर लेती हैं जो फटाफट प्वाइन्ट सुनाती हैं। तो मन हमारा है जो चाहे वह चिन्तन करे। फ़ालतू चिन्तन करें या ईश्वर चिन्तन करे, स्वचिन्तन करे या अच्छा चिन्तन करें ।
सारा दिन बाप के गुण गाओ। बाप की महिमा करो तो बाबा हमको महिमा योग्य बनाता जायेगा। हमको देख बाप हमारे गुण गायेगा। जो बाबा का समर्पित बच्चा है उसकी बुद्धि में गुण, कर्तव्य और सम्बन्ध तीनों हैं। समर्पित होना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके साथ सम्बन्ध होगा तो हमारे कर्म भी वैसे ही होंगे। बाप से सम्बन्ध रखो तो बाप समान कर्तव्य हो जायेंगे और बाप समान गुण आ जायेंगे। यह है अन्दर के लगन की बात । कल पर कभी भरोसा नहीं है जो पुरुषार्थ अभी करेंगे तो वह पुरुषार्थ अन्त तक काम में आयेगा। आज करेंगे तो कल काम में आयेगा। हम अपना जीवन देखते हैं किया हुआ पुरुषार्थ काम में आ रहा है। पुरुषार्थ करने की आदत है। हम कभी सो नहीं सकते, आराम से बैठ नहीं सकते। कोई कहे क्लास मिस करो तो हम नहीं कर सकते । सुस्ती आ ही नहीं सकती। भगवान् ने ऐसे संस्कार बना दिये हैं। ऐसे नहीं बहुत थक गये हैं अभी थोड़ा रेस्ट करें यह ख्याल आ ही नहीं सकता है। अन्त तक हम जवान रहें, बूढ़े नहीं बन सकते । विदेशों में किसी से उसकी आयु नहीं पूछते । हमको यह अच्छा नहीं लगता कि कोई कहे कि तुम बुड्ढ़े हो गये । नहीं, हम सदा जवान हैं। हमारी स्टूडेन्ट लाइफ है। यही बाबा के आगे संकल्प है। बाबा की जब ९३ वर्ष उम्र हो गई तो भी बाबा सदा सीधा चलता था। कभी पैर में दर्द भी हो तो सीधा चलो। नहीं तो टेढ़ा चलने की आदत पड़ जायेगी। हमारे में योगी के लक्षण आयें, हल्कापन रहे, सतयुग याद रहे। हमारे जैसा सुखी संसार में कोई नहीं है। हम संसार को सुखी बनाने वाले हैं। हम संसार के दुःख खत्म करने वाले हैं। कितना भी कोई अशान्ति फैलाने वाला, आवाज़ से बोलने वाला हो, हम अशान्त हो नहीं सकते। कोई आवाज़ से बोलता है तो हमारे अन्दर की शान्ति उसको शान्त बोलना सिखाये । हम इफेक्ट में नहीं आयें, हम दुःखी नहीं हों। वो स्वयं मीठा बोलना सीख जायेंगे। कई बार कईयों को हमारा मुस्कराना भी अच्छा नहीं लगता। हम सदा मन से मुस्कराते रहें। किसी के चिन्तन में अपना हिसाब-किताब नहीं बनायें । सदा सबके प्रति अन्त तक शुभ भावना, श्रेष्ठ भावना रखो, मरने तक रखो । आज नहीं तो कल हड्डी नरम हो ही जायेगी। यह भी देखा है कई बोलते हैं कि हमने इनकी बहुत परीक्षा ली लेकिन ये हिले नहीं। हमको कोई अफसोस नहीं हो ।
दुःख और अफसोस में क्या फ़र्क है ? दुःख बड़ा होता है, अफसोस गहरा होता है। हमको कोई अफसोस नहीं करना है। हमको अपने आपको सदा शान्त और सरल चित्त बनाने की आवश्यकता है। सरलता में शान्ति है। पहले शान्त हैं फिर सरलचित्त बनते हैं। फिर हमारे में योगी के चिन्ह आते जाते हैं। योगी अपने मस्ती में मस्त हैं। अन्तरमन से कई काम कर रहा है योगी । बाप को भी याद कर रहा है, कई कार्य भी देख रहा है। मुख कम चलाता है। योगी अन्तरमन से साक्षी होकर हर दृश्य देखता है। सफलता देख बाबा के गुण गाता है। हम हठयोगी नहीं, राजयोगी हैं। सतयुगी राजाई हमारे हाथों में पीछे आयेगी, मन की राजाई अभी आ रही है। बाबा राज्य दे रहा है, बच्चे, तुम मेरे राजा बच्चे हो । तुम किसी के गुलाम मत बनो। गुलाम दुःखी होता है। जब दुःख हो तो समझो मैं गुलाम हूँ। गुलाम का मन स्वतः दुःखी होता है। बाबा हमारी गुलामी छुड़ाता है। मन, कर्मेन्द्रियाँ, भाव-स्वभाव के गुलाम मत बनो। गुलाम हैरान होता है। हम गुलाम नहीं हैं। बाबा के राजा बच्चे बने हैं। राजयोगी हैं। फिर लगेगा सतयुगी राजाई में आये कि आये ।
हमारी पर्सनैलिटी में इतनी प्योरिटी और आनेस्टी हो जा सबको लाइट और माइट का अनुभव होता रहे
ओम शान्ति । देही अभिमानी स्थिति से लगता है कि हम योगी भी हैं तो ब्राह्मण भी हैं। एंजिल बनने का लक्ष्य रखकर बैठे हैं क्योंकि देवता बनना है। पहले ऐसी बातें कभी स्वप्न में भी नहीं थी कि हम ब्राह्मण, योगी वा देवता बनने वाली आत्मा हैं। बाबा ने स्मृति दिलाई है। जो हम भूल गये थे, ऐसी स्मृति बाबा बार-बार दिलाता है। जितना हम भूले थे उतना ही स्मृति स्वरूप बने हैं। जो काम की बातें नहीं हैं वह याद न आयें। जब पांच विकार छोड़ते हैं तो ऐसे नहीं छूटते । दूसरे गुण उनकी जगह भरते हैं। काम, क्रोध लोभ, मोह, अहंकार की जगह भरने के लिये अब एक ही इच्छा है सच्चा योगी बनने की। जो दृष्टि-वृत्ति पहले काम वश थी अब इस इच्छा वश हो गई है। काम शत्रु हो गया और यह कामना अब मित्र हो गई। वह शत्रु है जो देहभान में लाता है। जो दृष्टि-वृत्ति को सदा देहभानवश गिराता रहता है। क्रोध के बदले में अच्छा बनने का जोश है। जरा भी कम न बनूँ। बनूँ तो ऐसा। शक्तियों के हाथ में अस्त्र-शस्त्र हैं, चैलेन्ज करती हैं, ललकार करती हैं। पहले अपने अन्दर विल पावर भरती हैं। विल पावर तब आती है जब अन्दर से सब कुछ विल कर लेते हैं। साथ में क्या लेकर जाना है? बांट कर खत्म करो। अभी मरना है। अन्त में श्रृंगारी हुई आत्मा बनकर बाप के साथ घर जाऊं, बाबा के नयनों में बैठकर जाऊं। जो करना हो अब कर लो। मुझे ही करना है, इसमें सब कर सकते हैं। बूढ़े भी तो बच्चे भी कर सकते हैं। करने की इच्छा शक्ति देती है। लोभ है तो और चाहिये और चाहिये लगा रहता है। इसको बदल ज्ञान धन में साहूकार बन जाओ ।
विश्व सेवा के इन्चार्ज कैसे बनेंगे? विश्व सेवा की ड्यूटी कैसे उठाएंगे ज्ञान रत्नों से भरपूर होंगे तो उठायेंगे ना। बुद्धि दिव्य श्रेष्ठ होगी तो इतना काम करेंगे। निर्वाण अवस्था बनाने का अभ्यास होगा तो विश्व सेवा कर सकेंगे। अहंकार का अंश नहीं होगा तो निर्विघ्न अवस्था रहेगी। अहंकार विघ्न ले जाता है। निर्विघ्न स्थिति बनने नहीं देता है। नम्रता सदा ही जीत पहनाती है। बाबा के दिल पर भी जीत और ईश्वरीय परिवार के दिल पर भी जीत । अन्दर से कई कमियों पर नम्रता से जीत होती है।
आवाज़ में आये, फिर सेकण्ड में शान्त हो जायें। तो आवाज़ में भी पॉवर होगी। आत्माओं के दिल को बात लगेगी, सही वचन मुख से निकलेंगे, जो किसी के काम लायक होंगे। वह अवस्था तब होगी जब घड़ी-घड़ी निर्वाण स्थिति का अभ्यास होगा। गिनती वाले वचन निकलेंगे। हमारी ऐसी स्थिति बनें । ऐसी अवस्था हो जो बोलो तो लगे कि आकाशवाणी निकल रही है। जब लाइन गड़बड़ होती है तो रेडियो में आवाज़ ठीक नहीं आती। यदि बुद्धि की लाइन एक्यूरेट नहीं होगी तो लोगों को समझ में नहीं आयेगा। बुद्धि की लाइन इतनी क्लीयर हो जो भाषा न समझने वाला भी वायब्रेशन से समझ जाये। यह तब होगा जब बुद्धि अचल बन जाये। चंचल को बाबा बेबी बुद्धि कहते हैं। बेबी के हाथ में कोई भी चीज़ आयेगी तो तोड़े फोड़े बिना उसको मज़ा नहीं आयेगा। उसको यह पता नहीं कि यह कीमती चीज़ है। फिर है जवानी, वह भी नहीं चाहिये। शक्तिशाली स्थिति चाहिये पर जवानी का जोश नहीं चाहिये। बुजुर्गपन, सयानापन चाहिये। भले एज में छोटा हो लेकिन बुद्धिवान हो। गम्भीर और सयाने बनो। वह तब होगा जब अन्तर्मुख होकर किसी बात की गहराई में जायेंगे। इसीलिये बाबा ने त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बनाया है, हद की बुद्धि वाला नहीं, दूरांदेशी, विशालबुद्धि बनाया है। एक बात में अनेकों का भला समाया हुआ हो। इसकी रिजल्ट क्या होगी ? पहले से पता हो। इसीलिये बाबा ने ध्यान खिंचवाया है कि जैसे यह सलोगन याद रखते हो कि जैसा कर्म मैं करूंगा, मुझे देख और करेंगे - ऐसे जैसी मेरी वृत्ति होगी वैसा वायुमंडल बनेगा । वृत्ति से वायुमंडल बनता है। शुद्ध है या अशुद्ध है, वायुमण्डल वैसा बन जाता है। अगर सम्बन्ध में आते वृत्ति शुद्ध है, सबके लिये भला सोचने वाली बुद्धि है, अपकारी पर भी उपकार करने की भावना है, दुश्मन को भी मित्रता की दृष्टि से देखने की भावना है तो वायुमण्डल में वह पहुँचेगा। मुझे क्या करना है? शुद्ध संकल्प के आधार से जैसा बाबा है वैसी अपनी वृत्ति बनाओ। इसलिये पहला लक्ष्य यही हो कि मुझे ऐसा बनना है। पवित्रता की गहराई में जाना है। कभी भी सुस्त नहीं बनना है। अन्दर से शीतल बनना है। ज्ञान-रत्नों का बाबा ने इतना खज़ाना दिया है जो अखुट है, अविनाशी है, जितना देते जाओ, बढ़ता जाता है। अटैचमेन्ट है तो एक बाबा के साथ है। अन्दर चेक करो - बुद्धि कहाँ जाती है? जहाँ से अथाह प्राप्ति होती है वहां न जाकर और कहीं जाती है तो घाटा है। रूप प्राप्ति का होगा लेकिन घाटा होगा। बाबा से बुद्धि लगाने में टाइम लगता है, यहां बुद्धि खींच रही हो। भले कितनी भी अच्छी आत्मा हो वहां बुद्धि खींचती है तो घाटा है। देहधारी की तरफ बुद्धि जाने की आदत पड़ जायेगी। बुरी आदत पड़ जायेगी। शक्ति नहीं आयेगी, कमजोर होती जायेगी। आलमाइटी से शक्ति लेने की लाइन कट हो जायेगी। फिर सदा अन्दर कमजोरी आयेगी। ऐसी भूल नहीं करना है। यह भूल बुद्धि को भटकायेगी। फिर बाबा से जोड़ने नहीं देगी। हिम्मते बच्चे मददे बाप का अनुभव नहीं होगा। आधार हो जायेगा। हिम्मत नहीं रहेगी। बाबा ने जो मेरे से उम्मीदें रखी थी, मुझे इतना उंच बनाने की, तो मैं बाबा की उम्मीद पूरी करने वाली पात्र आत्मा नहीं बनूंगी। बड़े गहराई से अपने को चेक करो । मोह बड़ा खराब है। अटैचमेन्ट कहाँ जुड़ी, तो अन्दर में आयेगा कैसे छोडू मुश्किल है, टाइम बरबाद होगा। खुशी चेहरे पर नहीं आयेगी। ऊपर से खुशी दिखायेंगे, अन्दर खुशी नहीं होगी। ऐसे ही अहंकार को सम्भालना होता है। थोड़े में अहंकार आ जायेगा। अरे अहंकार किस बात का ? क्या किया है ?
पर्सनैलिटी में प्योरिटी नहीं आई है। इम्प्योर पर्सनैलिटी तो चाहिये नहीं। पर्सनैलिटी में जितनी सिम्पलसिटी, रॉयल्टी, ऑनेस्टी होगी वह देही अभिमानी स्थिति से आयेगी। हमें वह लानी है। पर्सनैलिटी से कई आत्माओं को बाबा दिखाई पड़े। पर्सनैलिटी में मनुष्य दिखाई न पडूं। ऑर्डनरी न दिखाई पडूं। मेरी पर्सनैलिटी में प्योरिटी, ऑनेस्टी हो, ट्रस्टीपन के संस्कार हों। कोई भी वस्तु, चाहे वैभव की आकर्षण पर्सनैलिटी में न हो। दाग़ लग जायेगा। मैं आत्मा बेदाग़ हीरा होकर बाबा के दिल पर चढ़ जाऊं या मस्तक पर मणि की तरह चमकती रहूँ। बाबा की पर्सनैलिटी में इतनी लाइट और माइट नज़र आती थी, उसने खींचा। अभी गुल्जार बहन में बापदादा आते हैं, तो उस समय बापदादा की लाइट, माइट हम सबको खींच लेती है। तो हमारी पर्सनैलिटी से भी सबको लाइट और माइट मिले ।
अन्त में एंजिल का स्वरूप कैसा होगा ? उन्हें पांच तत्वों का शरीर नहीं है। लेकिन आकार है दिखाई देता है। वन्डरफुल लाइट है। जैसे सूर्य और चन्द्रमा की रोशनी परमधाम वा सूक्ष्म वतन में नहीं है। इस दुनिया को चाहिये सूर्य चांद की रोशनी । दिन-रात यहां है। मूलवतन या सूक्ष्मवतन में दिन रात नहीं हैं तो उसका अनुभव हम पांच तत्वों से पार जाकर कर सकते हैं। तीनो लोकों का न सिर्फ ज्ञान है लेकिन मालिक बन रहे हैं। जैसे घर बनाते हैं, ग्राउन्ड फर्स्ट, सेकण्ड फ्लोर। खाना खाया, कार्य व्यवहार किया चले जाओ अपने घर। वह हमारे रेस्ट का घर है। ऊपर नहीं जायेंगे तो रेस्ट कैसे होगा ? बुद्धि की चंचलता साइलेन्स में जाने की आदत से बन्द हो जाती है। बुद्धि का भटकना बन्द हो जाता है। रॉयल्टी आती है तो ऑर्डनरी तरीके से अपने संकल्पों, विकल्पों को चलाना अच्छा नहीं लगता है। देहभान वश ये बोल चाल, इधर उधर जाना खिंचाव होना अच्छा नहीं लगेगा। एक बाप की याद में रहना है, एंजिल बनना है। एंजिल बनने के लिये सम्पूर्ण बनना है। सूक्ष्म कमजोरी भी न हो। है तो फट से दिखाई पड़ी और खत्म हुई। बाबा की पॉइंट मिलती है, प्रतिज्ञा कर लो बाबा ने कहा है इनसे बहार नहीं जाना है। योगी के चार पिल्लर है। कुर्सी का एक भी भी पिल्लर ढीला हो जाये तो आराम से नहीं बैठ सकेंगे। सबका अटेन्शन जायेगा कि कहीं गिर नहीं जाये । दूसरों को भी लगेगा कहीं गिर न जायें। तो चारों पक्के हो। ब्रह्मचर्य पक्का हो- मन से भी। ऐसे नहीं मन जाता है, उसे भी फेल कहेंगे, टांग कच्ची है। देहधारी का स्वरूप सामने आया तो फेल । बाबा के बदले वो आया तो बुद्धि व्यभिचारी हुई। पतिव्रता नारी के सामने कोई का नाम रूप नहीं आता । बाबा के बदले कोई भी याद आया, कहीं भी बुद्धि गई तो फेल हुए। दूसरा, संग अच्छा हो, दैवी गुण हों। कोई भी अवगुण न हो। चौथा आहार शुद्ध हो। विजयी बनेंगे आहार शुद्धि से । कैसी भी परीक्षा आये, तकलीफ आये लेकिन हाथ से पकाकर बाबा को भोग लगाकर खाना है। यदि मोह वा गुस्सा नहीं है, लेकिन गुस्से वाले के हाथ का भोजन खा लिया तो गुस्सा, मोह आ जायेगा। इसमें चाहिये अन्दर की लगन । लगन है कि मुझे ऐसा योगी बनना है तो अवश्य बनेंगे । बनाने वाला भी तब ही बनायेगा। उसके सिवाए कोई ऐसे बना ही नहीं सकता । जब बनाने वाला बना रहा है, टाइम कहता है बनना है तो सिर्फ मेरी इच्छा वा लगन की आवश्कता है। यह इच्छा ऐसी हो जो बाकी सब इच्छायें मर जायें। इच्छाओं को कैसे मारना है, यह अभी समझ में आ गया। एक इच्छा पक्की हो गई। बाबा सर्व कामनायें पूरी करता है। इच्छा वृत्ति को शुद्ध पावरफुल बनाती है। फिर वायुमण्डल बनाने की इच्छा से गुप्त सेवा कर सकते हैं। यह गुप्त पुरुषार्थ तब तक करते रहना है – जब तक -सम्पूर्ण नहीं बने हैं। बीच में अधूरा छोड़ेंगे तो मेहनत करनी पड़ेगी, करते रहेंगे तो अन्त में पहुंच ही जायेंगे। किसी-किसी के दिल से निकलता है बाबा की बहुत मदद है। मदद बाप की हिम्मत हमारी तो अन्त में विजय हुई ही पड़ी है।
श्रेष्ठ वा पुण्य कर्म करके पहले विकर्माजीत बनो तब सम्पूर्ण वा कर्मातीत बनेंगे
बाबा के प्यार से भरे गीत बाबा की याद में मदद करते हैं। स्मृति-स्वरूप बनाते हैं। जब स्थिति ऊपर-नीचे हो तो अच्छे-अच्छे गीत सुनने चाहिए। अपनी स्थिति को ऊंचा बनाने के लिये अच्छे-अच्छे गीतों की लिस्ट रखो। स्थिति अच्छी और ऊंची तब कहेंगे जब स्थिति एकरस हो, कभी भी डांवाडोल न हो, नीचे-ऊपर न हो। कभी नीचे, कभी ऊपर स्थिति होती है तो खुशी नहीं होती। फिर घबरा जाते हैं और घबराहट आने से अपने में विश्वास कम हो जाता है।
अपनी सम्पूर्ण स्थिति बनाने के लिए ड्रामा के पट्टे पर चलते जाना है। गाड़ी जरा-सा पट्टे से खिसक गई तो गाड़ी तो गई, पैसेन्जर भी गये । पट्टे से खिसके तो खतरा है। इसीलिये सदा ही पट्टे को चेक करते रहते हैं। किसी की दुश्मनी होती है तो पट्टे को हिला देते हैं। तो खतरे से बचने के लिये सदा अपने को चेक करते रहो। बाबा गाड़ी का इन्जन है, हम डिब्बे हैं, हमारा आपस में एक-दो से आधार है अगर एक डिब्बा भी खिसक गया तो दूसरे डिब्बे का क्या हाल होगा ! अगर हम खिसके तो औरों का क्या हाल होगा ! इसलिये खबरदार, होशियार । ड्रामा के पट्टे पर अच्छी तरह से चलते चलो । स्पीड भले फास्ट हो लेकिन खबरदारी हो। स्मृति में रहने के लिये अन्दर से हॉबी हो। जैसे कोई हॉबी होती है तो छूटती नहीं है। जो श्वांस उठता है उसमें स्मृति रहे तो नेचुरल संकल्प अच्छे होंगे। संकल्प और श्वांस का गहरा सम्बन्ध है। संकल्प मन में है, श्वांस शरीर में। श्वांस रुक जाये तो खेल खत्म । श्वांस फास्ट भी नहीं तो स्लो भी नहीं। फास्ट श्वांस भी रुक सकता है तो स्लो भी रुक सकता है। हर श्वांस में जब साक्षी होकर पार्ट बजाते हैं तो बाबा की स्मृति रहती है। श्वांस पर ध्यान है माना संकल्प पर ध्यान है।
अव्यक्त साल है इसमें अच्छे-अच्छे विचार करने हैं ताकि सम्पूर्ण, कर्मातीत, अव्यक्त वा फरिश्ता बन सकें । परन्तु इसके पहले हमें विकर्माजीत बनना होगा। इतना अटेन्शन चाहिये। बाबा ने कर्मा की गुह्य गति समझाई है। पहले हमें कर्म, अकर्म, विकर्म और सुकर्म का ज्ञान नहीं था, करते थे पर ज्ञान नहीं था। अच्छा करने से अभिमान था। भगवान् का डर नहीं था। अगर शमशान में जाते थे तो वैराग आता था वापस आये तो फिर वही। अभी बाबा ने अच्छी तरह से कर्मों की गुह्य गति का ज्ञान समझाया है। पहले हम पास्ट के हिसाब-किताब खत्म करें, अच्छे कर्म, श्रेष्ठ कर्म करें। एक हैं अच्छे कर्म, दूसरे हैं श्रेष्ठ कर्म, तीसरे हैं पुण्य कर्म। किसी को समय पर सुख मिले, अन्दर से दुआ निकले । ऐसा समझ से, अच्छे कर्म करने से विकर्मों पर हमारी जीत हो जायेगी । कभी विकल्प का ख्याल नहीं आयेगा। भले वो फ्रेन्ड्स मिलें, घर वाले मिलें, जिनके साथ विकर्म किया है, यदि वही फिर मिलें तो ख्याल भी नहीं आ सकता है। ख्याल अब यह आयेगा कि अब वो भी बदलें । कमजोर को फिर से वही संग मिलने से लहर आ जायेगी। लेकिन नहीं, हमें तो विकर्माजीत बनना है।
ज्ञान है अमृत, योग है अग्नि। ज्ञान अमृत पीते रहो, पीते रहो। ज्ञानामृत पावन बनाता रहता है, शीतल बनाता रहता है। अमृतधारा अनेक बीमारियों का एक इलाज । तो ज्ञान है अनेक प्रकार के मन के, तन के संसार की समस्याओं के रोग को दूर करने की दवा । बाबा ने क्या समझाया, श्रीमत क्या कहती है चिन्तन करने से रोग खत्म हो जाता। योग अग्नि सारा चेंज कर देती हे। कोयला काला है लेकिन आग सबको चेंज कर देती है। कोई कमजोरी है तो योग अग्नि में सब स्वाहा कर दो। अन्दर से निकले मुझे क्या करना है।
सहनशीलता का गुण बाबा की याद दिलाता है। बाबा की याद से सहनशीलता आती है। मुख से बोलना नहीं है, अन्दर से शान्त हो जाओ, चिन्तन नहीं करो। फिर किसी की बात चुभेगी नहीं। हम किनारा करके चल रहे हैं। कांटों को फूल बना रहे हैं। कांटा कभी फूल बनता है क्या ? यह तो भगवान् की कमाल है। हम पहले कांटा लगाने वाले थे, सब एक-दूसरे को कांटा लगाते रहते हैं, ऐसे जंगल के हम रहने वाले थे। बाबा ने कर्मों की गहन गति का ज्ञान देकर फूल बना दिया। माली क्या करता है? मालिक के आगे फूल लाकर प्रसन्न होता है। माली एक फूल नहीं, पूरा गुलदस्ता बनाकर ले आते हैं। ऐसे हम भी बाबा के आगे गुलदस्ता बनाकर ले आयें। बाबा तो पूरा बगीचा देखना चाहता था। विदेशों में भी बाबा पहुँचता है यह हमारा अनुभव है। जहाँ एकता है, प्यार है, अव्यक्त वातावरण है वहां बाबा है। क्योंकि बाबा की यादों से ही ऐसा वातावरण बनता है। बाबा के प्यार में सेवा करते रहो, तो बाबा बल देता है। और तो कोई भावना नहीं है। अच्छे कर्म करो, बाबा को याद करो। आपस में ऐसे स्नेह से चलो जो बाबा वहां हाज़िर हो जाए। दिल से बाबा की महिमा करो। धरती को खोद कर बीज डालो फल अपने आप निकलेगा। सेवा तो बाबा करेगा, हम क्या करेंगे। ऊपर-ऊपर से बीज डालेंगे तो फल नहीं निकलेगा। धूप छांव का, मिट्टी का, पक्षियों से सम्भाल का ध्यान रखना पड़ता है। बाबा के सामने जाने के अनुभव बड़े न्यारे थे। बैठे बैठे हम हैं ही नहीं। बाबा का वन्डर है। बाबा हम सबको देह अभिमान से छुड़ाने के लिये करेन्ट देता है तो हम अपने देहभान को छोड़ दें। कहते हैं आत्मा भूत होकर भटकती है। तो भूत बनने के पहले ही हम क्यों नहीं एंजिल होकर घूमें। लोभ वश, अहंकार वश क्यों रहे ? क्यों न लाइट माइट होकर रहें। ज्ञान है रोशनी, रोशनी में कर्म करो। अज्ञान अंधकार है। अभी ज्ञान की रोशनी है, करना क्या है- यह समझ है। अच्छी कमाई करने की समझ है। अच्छी कमाई सदा खुश रखती है। इतनी खुशी हो जो कांटे जितना भी दुःख न हो। कइयों के अन्दर दुःख चला गया है, जो जाता नहीं है। जल्दी उदास चेहरा हो जाता है, रोना आ जाता है। फिर कहते हैं पता नहीं, बात तो कुछ भी नहीं है। क्योंकि पुराना पाया हुआ दुःख गया नहीं है। ज्ञान की समझ से दुःख को खत्म नहीं किया है तो रोना आ जाता है। वह सुख-चैन से रहने नहीं देता है। इसलिए बाबा ने जो खज़ाना दिया है वह सदा मेरे पास हो। चेक करो कभी कहीं से भी कोई दुःख दे तो हमें फील तो नहीं होता है। हमारी फीलिंग सदा ही प्योर हो। फीलिंग को अन्दर चेक करो - बिल्कुल प्योर है ? ईश्वर ने जो दिया है वही महसूसता है? जो बाबा ने दिया है उसी की फीलिंग रहे, तभी योगयुक्त रह सकेंगे और सम्पूर्ण कर्मातीत स्थिति का आह्वान कर सकेंगे। दोनों बातें इकट्ठी नहीं रह सकती कर्मातीत स्थिति का आह्वान कर सकेंगे। दोनों बातें इकट्ठी नहीं रह सकती हैं। हम कहें सम्पूर्ण भी बनें और व्यक्त भाव भी न छोड़ें तो यह हो नहीं सकता है। त्याग, वैराग ऐसा हो जो निकम्मी चीज़ चली जाये। अगर सोचते हैं कि कैसे छोडू, मुश्किल है, टाइम चाहिये तो होगा नहीं। अभी भी बैलगाड़ी में चलने की आदत होगी तो कैसे होगा, जबकि विमान में चलने के दिन आ गये हैं। बैलगाड़ी में जाने वाले सो जाते हैं। बैल चलता रहता है। सोचते हैं मंज़िल तो आ ही जायेगी। लेकिन वह समय पूरा हो गया। मोह माया वाले यह शब्द बोलते हैं कि पहुँच ही जायेंगे। अभी ठहरने का समय नहीं है। कोई बोलेगा – ठहरो, तो भी रुकेंगे नहीं, सुनेंगे नहीं। बाबा की सुनेंगे, लोगों की नहीं सुनेंगे। बाबा जो कहता है वही करेंगे।
जो एक बार कर्मक्षेत्र पर आया वह बीच में वापस कैसे जायेगा । सतो से रजो तमो में आना ही पड़ेगा। बीच से कोई निर्वाण में जा नहीं सकता । एक बार कर्म सम्बन्ध में आये, फिर बन्धन में आये। यह घड़ी जो सारे कल्प के अन्दर चल रही है यह घड़ी है ही पास्ट के सम्बन्धों से फ्री हो बाबा के घर जाने की तैयारी करने की। कहीं जाना होता है तो समेटना होता है, क्या ले जाना है वह सोचना होता है। कौन-सी काम लायक चीज़ होगी जो यात्रा में काम आयेगी, वह लेकर जाना है। बाकी सब छोड़ना है। अकेला जाना है। हमारे पीछे कोई लटक नहीं जाये। अपने पैर से चले। सेकण्ड में समेटना है। परमधाम से कुछ लेकर नहीं आये थे। सतयुगी शरीर भी नहीं था। यहां आये तो सतयुगी सम्बन्ध मिले। कलियुग में आये तो कलियुगी सम्बन्ध हो गये। अब भगवान् के बने हैं। बाबा का शुक्रिया जिसने हमारा पल-पल सफल कर दिया।
तन-मन-धन जो सब कुछ सफल करता वह है सतोगुणी, जो निष्फल करता वह है तमोगुणी और जो वेस्ट करता वह है रजोगुणी
सतोप्रधान पुरुषार्थी अथक होकर सदा रेस में दौड़ता रहेगा । सतोप्रधान पुरुषार्थी के सामने व्यर्थ संकल्पों के विघ्न नहीं आयेंगे। व्यर्थ संकल्प पुरुषार्थ को रजो, तमो गुणी बना देते हैं। व्यर्थ संकल्प विघ्न रूप बनते हैं। सतोप्रधान पुरुषार्थी गहराई में जाकर डीप जायेंगे। संकल्पों में निश्चय, दृढ़ता, सत्यता हो । उसमें जरा भी डाउट नहीं हो। डाउट आया माना रजोगुणी बन गये । अशुद्धता, अपवित्रता तमोगुणी बना देती है। कभी बाप में या स्वयं में डाउट नहीं आता तो श्रीमत का पालन करना सहज होता है। तमोगुणी परमत के आधार से चलता है, वह राइट रांग सोचता नहीं, रजोगुणी राइट रांग तो सोचता है लेकिन श्रीमत का पालन नहीं करता जो सतोप्रधान बने । सतोप्रधान बनने वाली क्वालिटी में बाबा को, स्वयं को, चक्र के राज को समझने वा इस स्मृति में रहने की आदत होगी। बाकी सब बातों को भूल जायेगा।
फाउन्डेशन में तीन बातें हैं- आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म । तीनों बातें स्पष्ट हो गई तो ज्ञान सहज हो गया। मैं आत्मा हूँ, परमात्मा बाप को याद करना है, घर जाना है। कोई कोर्स करे तो यह बात समझ में आ जाती है। ब्रह्म घर हो गया, परमात्मा बाप है, मैं आत्मा हूँ। हर आत्मा का संस्कार अपना अपना है। एक का न मिले दूसरे से। कोई आत्मा आदि में आती है, कोई मध्य में, कोई अन्त में। आदि मध्य अन्त तीनों को जानना, तीनों में पार्ट बजाना। सारे चक्र का राज़ जिसकी बद्धि में है वह सतोप्रधान बन जाता है। अपने पार्ट का पता चल जाता है। परमात्मा जन्म-मरण में नहीं आता लेकिन परमात्मा कैसे यहां आता जाता है- हम अपनी आंखों से देखते हैं। हमारे सामने प्रत्यक्ष होता है। इन आंखों द्वारा भी देखते हैं। लोग कहते हैं इन आंखों द्वारा भगवान् को नहीं देखा जा सकता। लेकिन समझ मिली है तो देखते हैं, जानते हैं। सतोप्रधान पुरुषार्थी की बुद्धि में क्या क्या रहता है उसकी लिस्ट तैयार हो । दूसरी बातों में जाता है तो रजोगुणी तमोगुणी बन जाता है। मन-वचन-कर्म बताता है कि यह सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी है।
समर्पण माना किसी का भी अधिकार न रहे। न मेरा, न किसी का। जब तक किसी का मेरे पर अधिकार है या मेरा मेरे पर अधिकार है तो समर्पण नहीं है। तो हमारा मन बताता है- हम क्या सोचते हैं। एक तो आत्मा परमात्मा घर को याद करते हैं, मुसाफिरी पूरी होती है तो घर याद आता है। ड्रामानुसार जब नीचे आये तो घर को भूल गये। मुसाफिरी पूरी हुई तो घर याद आ गया। कैसे दौड़े यह क्वेश्चन नहीं है। चलते आ रहे हैं, चलते-चलते बाकी इतने तक पहुँचे हैं। खिवैया ऐसा मिला है जो अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। किनारा तो छोड़ा लेकिन अनेक बातें पार करते करते पहुँचे हैं, अब देर नहीं है। मन की फीलिंग बताती है। कइयों को पुरानी दुनिया खींचती है, सतोप्रधान पुरुषार्थी पुरानी दुनिया से बहुत दूर चले गये हैं। जब से बाबा के बने हैं प्रकृति, माया, सम्पत्ति को समझ गये हैं। पहले सबको मिक्स कर दिया था। प्रकृति तमोप्रधान बन गई है अब उसको भी सतोप्रधान बना रहे हैं। माया ने बाबा से अलग कर दिया, अब देही अभिमानी स्थिति से, बाबा से शक्ति लेकर प्रकृति को जीत कर प्रकृति को सतोप्रधान बना रहे हैं। प्रकृति को अधीन बना रहे हैं। सम्पत्ति को सफल करने से सम्पत्ति के कभी भिखारी नहीं बनते । मांगना नहीं पड़ता। सफल करने वाला दाता बन जाता है। सुदामा को सफल करने से महल मिल गये। सफल करने वाले का हाथ सारे कल्प में खाली नहीं होगा। वह सारे कल्प के लिये दाता बन जायेगा। सतोप्रधान पुरुषार्थी सफल करता है। उसको रहता है थोड़ा भी निष्फल क्यों जाये । सफल कितना भी हो, निष्फल एक कौड़ी भी न हो। रजोप्रधान कुछ सफल करेगा, कुछ नहीं। तमोप्रधान पुरुषार्थी सोचता रहेगा कि करें या न करें । सतोप्रधान पुरुषार्थी धन और तन तो क्या मन भी सफल करेगा। सम्पत्ति मिलती है दैवीगुण सम्पन्न बनने के लिये। जहाँ धन हो, दया न हो, हमदर्दी न हो, गुणवान न हो तो वह धनवान भी अच्छा नहीं लगता। भल धन थोड़ा हो लेकिन दया, रहम हो, गुणवान हो। ज्ञान दान करने के लिये टाइम नहीं है लेकिन गुणदान तो कर सकते हैं। गुणदान करने का बहुत चांस है। गुणवान बनने का लक्ष्य हो । गुण हमको नैचुरल दानी महादानी बना देते हैं। जैसे धन का अहंकार नही है तो सफल होता है, ऐसे गुण का भी अभिमान न हो तो महादानी बन सकता है। उसको बाबा वरदान देता है।
दानी, महादानी, वरदानी कैसे बनना है? दानी बोलते नहीं । सवेरे सवेरे पूजा पाठ करके दरवाजा खुला रखते हैं जो अतिथि आये लेकर जाये। जो चाहिये लेकर जाये । भण्डारा भरपूर है। कोई दानी ऐसे हैं जो देते भी हैं, डांटते भी हैं। कोई ऐसे है जो चेहरे से भी दान देते हैं मिठास से, नम्रता से, लेकर जाओ, गिनती नहीं करेंगे। मैंने तुमको दिया, यह भी नहीं बोलेंगे। उनका भण्डारा भरपूर होता ही है। वो खुद त्यागी हैं पर महादानी हैं। त्यागी न हो उसको महादानी नहीं कहा जा सकता। महादानी ही वरदानी बनते हैं। सतोप्रधान बनकर रेस करके आगे बढ़ो। रजोगुणी टाइम वेस्ट करता है, तमोगुणी निष्फल करता है, सतोगुणी सफल करता है। टाइम एनर्जी वेस्ट गई तो उसकी सज़ा है विघ्न । विघ्न हटेंगे कैसे? जब सफल करेंगे। दे दान तो छुटे ग्रहण । सफल करेंगे तो विघ्न हटेंगे। जो करना हो अभी कर लो। करने में खुशी होगी। बाबा करने के लिये भी शक्ति दे रहा है।
सच्चे सेवाधारी सोशल वर्कर वह जो मन से सबकी सेवा करे, नम्रता की मूर्ति हो
मुरली सुनते मन के सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं। कोई भी अपने प्रति या किसी के प्रति क्वेश्चन उठता है तो सवेरे की मुरली हर रोज़ हर बात का आंसर देती है। समस्या का समाधान मिल जाता है। फिर गीत भी ड्रामानुसार ऐसा बजता है जो यह ज्ञानयुक्त गीत भी शिक्षा देता है। पवित्रता के राह पर चलते जाओ, जो मिले उसे रास्ता बताते जाओ। जिसने प्योरिटी को दिल से पालन कर लिया है उसके आगे सब पतित आत्मायें झुकती हैं। हमारे ब्राह्मण जीवन का आधार है पवित्रता । पवित्रता इतनी अच्छी है, इतना श्रेष्ठ बनाती है जो परिवर्तन की शक्ति आ जाती है। अपवित्र ख्यालात कमजोर कर देते हैं। मनमनाभव का किसी को पता न भी हो लेकिन मुझे पावन बनना है यह ख्याल हो तो पावन बन सकते हैं। फिर साथ-साथ स्वदर्शन चक्र फिराओ । मनमनाभव होना माना बाबा को याद करना, स्वदर्शन चक्र फिराना माना विकारों के गले काट देना । स्वदर्शन चक्र माना मन, वचन, कर्म से हम सो थे, अब बन रहे हैं। स्वदर्शन चक्र वह फिराता है जो जानता है कि यह मेरा पार्ट है। बाबा की पहचान मिली तो अपने पार्ट का पता चल गया। जब तक यह स्मृति नहीं आती कि हम ही देवता थे तो देवता बनने में मुश्किल लगती है। कभी पुरुषार्थ करना अच्छा लगता है, कभी थक जाते हैं। अगर यह पक्का याद है हम देवता थे. हम ही बने थे. अब मुझे बनना है, मेरा पार्ट है। जो काम किसी ने अनेक बार किया है उसको वह कठिन नहीं लगता। वह आदती है। जिसने नहीं किया है उसको कठिन लगता है। तो हमको याद आता है कि हमने अनेकों बार यह पार्ट बजाया था। कोई बड़ी बात है क्या ? अनेक बार हम सो देवता थे, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र बने। अब ब्राह्मण बन गये। इस लाइफ का बड़ा कद्र है। ब्राह्मण ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारी हैं। जिसने पवित्रता को सच्चाई से धारण किया हो वह अपने को ब्रह्माकुमार कुमारी कहला सकता है। उसको फिर नशा है कि हम शिवबाबा के पोत्रे हैं। ब्रह्मा कहता है मैं वर्सा नहीं देता, शिवबाबा देता है। ब्रह्मा पवित्र कुमार कुमारी बना देता है। पवित्र बनाने वाला कौन ? जिसकी मुख सन्तान हैं। जो याद दिलाता है तुम आदि सनातन देवता धर्म के हो । जब परमात्मा का डायरेक्ट आवाज़ आत्माओं के कानों में पहुँच जाता है तो दिल को लग जाता है, फिर भटकना बन्द हो जाता है। फिर अन्दर से आवाज़ निकलता है मेरे लिये राइट टाइम आ गया। हम मंजिल पर जा रहे हैं पर बीच बीच में अनेकों को रास्ता बताते जा रहे हैं। तो सदा शान्तिधाम और सुखधाम याद रहे। एक स्वदर्शन चक्र फिराओ दूसरा शान्तिधाम सुखधाम याद है तो कोई भी भारीपन नहीं आयेगा। यहां बैठे भी किसी को अपना देश याद आता है तो वहाँ की सीन याद आते ही चेहरे की चमक समाप्त हो जाती है। घर याद आता है, जॉब याद आता है, साथी याद आते हैं तो दिलशिकस्त हो जाते हैं। बाबा कहते सदा उमंग उत्साह में रहो, दिलशिकस्त नहीं बनों। हमें ऐसे बन्धनों में अपने को नहीं फंसाना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना और कराना है। कहाँ भी हो, जॉब पर जाओ लेकिन अन्दर का ये काम नहीं भूलना चाहिए। जब इन बातों को भूल, दुनिया की बातें सामने आती हैं तो जैसे वो छाया पड़ जाती है, खुशी गुम हो जाती है। सदा मैं खुश रहूँ इसके लिये यहां से अच्छी तैयारी करके जाओ । गुप्त अपनी दवाई अपने पास रखो। अपनी स्थिति ऊंची बनाने के लिए जरूरी चीज़ अपने पास हो। जो सदा अलर्ट एक्यूरेट बनने में मदद करे। एक्यूरेट रहने के लिये अलर्ट बनना पड़ेगा। बाबा कहता है तुम्हें दुनिया देख रही है। कभी अपने को अकेला नहीं समझो। सारी दुनिया से चुन चुन कर बाबा ने मुझे अपना बनाया है। जिस स्थान पर रहो, जहाँ भी रहो उसे सेवास्थान समझो ।
समय पर किसको भी सिम्पथी देना पुण्य कर्म है। सेवायें अनेक प्रकार की हैं। सिर्फ सेवा के लक्षण हमारे में आते जायें। लिमिट वाली सेवा को सेवा नहीं समझें। हर घड़ी, हर सेकण्ड याद करना ही अपने को ऊंच बनाना है। क्वेश्चन मार्क में टाइम वेस्ट न जाये। सेवाधारी के सामने सदा सेवा हाजिर रहनी चाहिए। जो जी हजूर करने का पार्ट बजाने वाले हैं उनके सामने सेवा सदा हाजिर होती है। सच्ची दिल से किसको रास्ता बताना, प्रैक्टिकल अपने मिसाल से किसको प्रेरणा देना। ऐसा कोई न कहे कि तुम ये करती हो ! किसका क्वेश्चन ही न उठे। सेवा मधुर भाषा से और नम्रता से बहुत होती है। नम्रता के बिना हमारी भाषा मधुर नहीं हो सकती। हम करते रहें, करते रहें, कितने भी हमारे सामने विघ्न आयें लेकिन हमारी स्थिति नीचे-ऊपर नहीं हो। विघ्न हट जायेंगे। सेवा स्थिति बनाती है। संबंध सम्पर्क स्थिति बनाने में मदद करता है। नम्रता, सहनशीलता बढ़ती है। अपना पता चलता है कि मेरे में किस बात की कमी है। उस कमी को खत्म कर देते हैं, जो जरूरत है वह ले लेते हैं। इसके लिए बाबा ने कहा उमंग उल्लास को सदा दिल में रखो। उमंग उल्लास होता है लेकिन किसी कारण से भी अगर किसी ने कमेन्ट्स किया तो उमंग उल्लास कम हो जाता है। तो किसी भी कारण से उमंग उल्लास कम न हो। हम सेवा करते रहें। करने से हम एक्यूरेट बनते हैं। सीखते हैं। हम हर बात यहां भगवान् की युनिवर्सिटी मे सीखें हैं। भले बाहर के कॉलेज में नहीं पढ़े हैं लेकिन बाबा ने सब सिखाया है। सीखने की भावना से सीखे है। मैं सीखा हुआ हूँ, मैं जानता हूँ तो देहअभिमान है। देहभान से सीखने की भावना नहीं रहती। सीखने की भावना सदा रखना । जहाँ जीना है वहां सीखना है। हमको सदा पवित्रता की राह पर चलते जाना है अन्त तक हम सम्पूर्ण पावन बन जायेंगे। ऐसी फीलिंग आये। बस घर आंखों के सामने हो । शान्तिधाम आंखों के सामने हो। जम्प लगाकर पहुँच जायें। तो अन्दर कोई खराब फीलिंग आ नहीं सकती है। किसी भी कारण से कोई उल्टी फीलिंग मेरे से किसी को आ नही सकती ।
बाबा ने ध्यान खिंचवाया है वृत्ति वायब्रेशन अच्छा हो, सेवा अच्छी हो । बाबा कहता है जल्दी-जल्दी नौ लाख तैयार करो। तो कैसे तैयार होंगें ? हम लोगों के द्वारा ही होंगें। जो राजयोगी बने हैं उनके द्वारा ही ये सेवा होगी। इतनी प्रजा सारी बनाना राजयोगियों का काम है। मैं राजयोगी है तो प्रजा वाले संकल्प कभी न आयें। प्रजा के कमजोर संकल्प होते हैं। तब तो प्रजा में आते हैं। राजाई पद पाने वाले का संकल्प श्रेष्ठ महान् होगा। सर्व से गुण उठाने वाले बनो । ईर्ष्या द्वेष से दूर रहो। सदा शीतल-शान्त स्वभाव हो। शान्त और शीतल स्वभाव शक्ति पैदा करता है। जरा सा अशान्ति फैलाने वाला दूसरों की शक्ति को भी खत्म कर देता है। तो वो सेवा कैसे करेंगे ! और कोई सेवा नहीं, शान्ति फैलाने का काम अवश्य करो। अन्दर ये रिहर्सल करते रहो। इसमें एक्सपर्ट बन जाओ। इतनी शान्ति फैलाने का काम गुप्त करते रहो जो जिसके साथ रहो वहां भी शान्ति फैलती जाये । शान्ति में प्रेम आनन्द समाया हुआ हो । इसके लिए कोई पब्लीसिटी नहीं करनी है। पब्लिक के पास अपने आप पहुँचेगी। जितनी बड़ी सेवा मिली है, जिम्मेवारी बाबा ने दी है उतना ही बाबा कहते हैं हल्के रहो तो काम अच्छा करेंगे। भारी रहने वाला काम अच्छा नहीं कर सकता। बिगाड़ देता है। बिगड़ी को भी बनाने वाले कौन ? बिगड़ जाये तो आवाज़ में नहीं आओ। अच्छा कैसे हो उसके लिये पॉजेटिव सोचो। उसमें बाबा के मददगार बनो। शान्ति योगबल कई बातें ठीक कर सकता है।
सच्चे सेवाधारी सोशल वर्कर वह जो मन से सबकी सेवा करें। सेवाधारी होते ही हैं नम्रता की मूति । वो मान की इच्छा नहीं रखते । मिलता है तो भी स्वीकार नहीं करते। सेवाधारी को अन्दर से ये है कि ये मेरा भाग्य है। भगवान् ने भाग्य दिया है। जमा अपने लिये करते हैं और किसके लिए नहीं करते।
प्रालब्ध अपनी बनती है। अच्छा है जितनी सेवा हमारे से हो सकती है उतना करने से सुस्त रहने की आदत नहीं पड़ती। सुस्ती भी एक बड़ा भारी विकार है जो झूठ बोलना, बहाना बनाना सिखाती है। सुस्ती उमंग उल्लास कम कर देती है। सुस्ती खुश होने नहीं देती। सुस्ती उदास बना देती है। तो मेरे लिये जो नुकसानदायक बातें हैं उनको सदा के लिये छोड़ दो। इगो को खत्म करके नम्रता की मूर्ति बन जाओ । शीतलादेवी बन जाओ । नम्रता से शीतल बन जाते हैं। विघ्न के प्रभाव में न आयें, विघ्न विनाशक बन जायें। इतनी शक्ति बाबा से लेते रहें। बाबा से शक्ति भर लेंगे तो विघ्नों को विनाश करेगी। तो पवित्रता की मंजिल पर चलते जाना है। पीछे नही आना है। आगे बढ़ते जाना है। अगर कहीं रुक जायेंगे तो पीछे वालों का क्या होगा ? कन्फ्यूज होने की, अपसेट होने की आदत न हो। न मेरे से कोई डिस्टर्ब हो, न मैं किसी से डिस्टर्ब हूँ। यह भी नेचरल नेचर बन जाये तब अच्छी महान् आत्मा बनने की क्वालिफिकेशन आ जायेंगी।
भाई बहिनों द्वारा पूछे गये प्रश्न-दादियों के उत्तर
प्रश्नः- अव्यक्त वर्ष में हम अपनी अव्यक्त स्थिति बनाने के लिए विशेष कौन-सा पुरुषार्थ करें ?
उत्तर- अव्यक्त वर्ष हम बच्चों के लिए बाबा की गिफ्ट है। तो इस साल में जो करना है वो कर लो, जैसे बाबा अव्यक्त होकर भी २५ वर्षों से हमारी पालना कर रहे हैं ऐसे क्यों नहीं हम अव्यक्त वर्ष में साकार में रहते हुए अव्यक्ति भासना में रहें, उसके लिए चार बातें ध्यान में रहें। जैसे हमारे सब्जेक्ट हैं, वैसे अव्यक्त बनने के लिये भी चार बातें बहुत जरूरी हैं।
१- पहली बात है हमारे अन्दर कभी भी व्यक्त भाव पैदा न हो, न अपने लिए न दूसरो के लिए। जिसको बाबा कहते हैं देह अभिमान की फीलिंग न हो। तो विशेष ध्यान देकर अभी से ही देही अभिमानी स्थिति बनानी है। जितनी देही अभिमानी स्थिति होगी और बाबा से सर्व संबंध की शक्ति खींचेंगे उतनी अव्यक्त स्थिति बनेगी। सर्व संबंध अव्यक्त बनने में मदद करेंगे। देही अभिमानी स्थिति देह के बंधन से हल्का कर देगी, कोई भी कर्म बन्धन खींचेगा नहीं। बाबा के साथ सर्व संबंध हमको अव्यक्त बनने में शक्ति देंगे ।
२- दूसरा बाबा से बिल्कुल सच्चा रहें। बाबा से सच्चा रहने, खुद से सच्चा रहने, औरों के साथ सच्चा रहने से हम अव्यक्त बन सकेंगे, अपने आपको देखो सच्चाई में कुछ मिक्सचर तो नहीं है। जैसे बाबा को देखते हैं सर्व आत्माओं के लिए प्यार है, ऐसे मुझ आत्मा में भी सबके लिए प्यार हो ?
३- तीसरा व्यक्त भान से परे रहो। चेक करो कितना व्यक्त भान छूटा है ? अव्यक्ति स्थिति कितनी आई है इस पर अच्छी तरह से मनन करो। पहले कहते थे प्रतिज्ञा करो लेकिन अब हम कहते हैं तीव्र इच्छा रखो। किसी को भी न देखो, मुझे करना है, कुछ भी हो जाये, कितने भी विघ्न आयें हम उसको पार करके दिखायेंगे, कारण बिल्कुल भी नहीं देना है। जब कोई कारण सुनाता है तो आश्चर्य होता है ये किसको कारण सुना रहे हैं, जब कोई कारण सामने आये तो अपने से पूछो हम किसको कारण सुना रहे हैं।
४- हर बात की बाबा ने जो समझ दी है तथा समझ के साथ जो शक्ति दी है उसे यूज़ करो। सिर्फ बुद्धि नहीं चलाओ लेकिन बुद्धि योग बाप से लगाकर बुद्धि को राइट काम में लगाओ।
प्रश्न:- लौकिक वालों को समझाने का प्रयत्न करते हैं लेकिन समझते नहीं हैं, वो कैसे समझेंगे ?
उत्तर- लौकिक को समझाने की बजाये हम अपनी स्थिति बनाये तो लौकिक वाले सहज ही समझते जायेंगे। स्थिति देखकर उनको अन्दर से इच्छा पैदा होगी कि ये इतने अच्छे कैसे बनें हैं ! हमारी स्टेज ऊंची होती जाये। यदि हमारी स्टेज नीचे-ऊपर होती है तो वे भी मूंझ जाते हैं। लौकिक सम्बन्धी भी हमारे निश्चय की परख करते हैं कि इनका निश्चय कितना है? ब्राह्मण लाइफ में इसकी कितनी कद्र है यह लौकिक सम्बन्धी टेस्ट करते हैं। हमारी स्थिति नीचे-ऊपर देखते हैं तो वो हमको खींच लेते हैं, यदि हमारी स्थिति ऊंची है तो वो भी हमारी ओर खिंचे चले आते हैं।
प्रश्नः- सब-कान्सेस माइन्ड को क्लीन करने के लिये क्या स्पेशल अटेन्शन दें ?
उत्तर- अपने आपको क्लीन रखने के लिए जरा भी निगैटिव नहीं सोचो । कोई यदि हमारे लिए निगैटिव सोचता भी है तो हमारे ऊपर उसका छींटा न लगे। कैसा भी वातावरण हो हम साक्षी होकर देखें। युद्ध के मैदान में कई बातें आयेंगी लेकिन अन्दर कोई भी बात नहीं लेनी है। यदि अन्दर लिया तो अपने मन को गन्दा किया। ज्ञान के चिन्तन की बजाये कोई भी चिन्तन चला तो छींटा लग जायेगा। वर्णन किया तो पक्का कर लिया, फिर मिटाना मुश्किल हो जायेगा। अपने माइन्ड को क्लीन रखने के लिए व्यर्थ वर्णन चिन्तन से अपने को फ्री रखना है। कोई भी बात होती है उसे एक सेकण्ड में भूल जाना है। फिर ज्ञान योग अच्छी तरह से धारण कर सकते हैं।
प्रश्नः- विघ्नों को रोकने अथवा परिवर्तन करने की युक्ति क्या है?
उत्तर- विघ्नों का बैठकर चिन्तन नहीं करो, पार करने के लिए योगयुक्त रहो । यदि सोचेंगे यह विघ्न क्यों आया, यह मेरी भूल है जितना बैठकर सोचेंगे उतना रोते रहेंगे। कई कहते हैं मेरी सारी लाइफ ऐसी है जो विघ्न ही आते रहते हैं, एक विघ्न जाता है तो दूसरा आ जाता है, क्या मेरी लाइफ इसी के लिए है। वह कभी विघ्न विनाशक बनने का पुरुषार्थ नहीं करता, विघ्न आता है स्थिति को टेस्ट करने के लिए। कई हैं जो सदा ही विघ्न रूप बनते हैं, दूसरे हैं जो विघ्नों के इफेक्ट में आ जाते हैं, तीसरे हैं विघ्नों को पार करने वाले, तो चेक करो मैं कौन सी आत्मा हूँ? कई हैं जो विघ्न डालते नहीं लेकिन विघ्न से डर जाते हैं। विघ्नों से कभी डरना नहीं है। विघ्नों से पार होने के लिए अपनी स्थिति निर्विघ्न बनाकर रखो, अगर सेवा में केयरलेस होते हैं, लेज़ी होते हैं, मर्यादा के अनुकूल नहीं चलते हैं तो विघ्न आते हैं। मर्यादा पर न चलने के कारण विघ्न आता है तो कान पकड़ने के लिए आता है। भोग नहीं लगायेंगे, अमृतवेले योग नहीं करेंगे, क्लास में मुरली ध्यान से नहीं सुनेंगे, परचिन्तन में टाइम गंवायेंगे तो विघ्न तो आयेंगे ही। स्व चिन्तन में रहकर बाबा को याद करेंगे तो विघ्न नहीं आयेंगे। विघ्न शान्ति, अन्तर्मुखता, योगबल से हट जाते हैं। आजकल के पुरुषार्थ अनुसार विघ्नों का पता पहले ही चल जाये और खबरदार हो जायें या सहारा पकड़ लें। ऐसे नहीं विघ्नों में ही महीना, दो महीना बीत जायें, खबरदार रहना चाहिए, छिपाना नहीं है, फट से बताकर खत्म कर देना है, विघ्नों से सेफ रहने के लिए, एक तो योगयुक्त रहो दूसरा अच्छे संग में रहो।
प्रश्नः- क्षमा, दया और रहम में क्या अन्तर है?
उत्तर- क्षमा, दया और रहम तीनों शब्दों की बहुत गहराई है। पहले अपने पर दया करनी है, रहम करना है फिर क्षमा करना है। पुरानी बातें याद आती रहती हैं तो वो संस्कार डिस्टर्ब करते रहते हैं। इसलिए अपने को क्षमा करने के लिए सबसे पहले दया करो, रहम करो। दया और रहम में थोड़ा अन्तर है, जैसे किसी को कमज़ोर देखकर दया आती है, तरस भी आता है ऐसे अपने पर तरस खाओ, तरस खाकर रोओ नहीं लेकिन सोचो कि इसके लिए मैं क्या पुरुषार्थ करूँ। अपने जो कर्म किये हुए हैं रियलाइज़ेशन होती है तो अपने आपको क्षमा करो, जैसे भगवान् क्षमा करता है, ऐसे पहले अपने को क्षमा करो । स्वयं को क्षमा करके अपने आपको सुधारेंगे तो बाबा के नज़दीक आयेंगे। दूसरों को दोषी ठहराकर डांटों नहीं, दूसरों को महसूस कराना कि आपने गलत किया है, यह हमारी ड्यूटी नहीं है, उसको हम क्षमा की शक्ति नहीं दे सकते हैं, स्नेह की शक्ति से उनको राइट बात समझने की शक्ति मिले, "महसूस करने की शक्ति मिले, हमारा प्यार सच्चा हो। उसकी भूल को छिपाने लिये प्यार न हो, उसकी बुद्धि स्वच्छ काम करे, महसूस करे जिससे अपने आपको समझकर अपनी भूल से अपने को बचायें, तो यह पुरुषार्थ का तरीका जैसा अपने लिये होगा तो वह गुण कुदरती मदद करेंगे। सहन शक्ति का गुण आये, ऐसे नहीं कि सहन करना पड़ता है। सहन शक्ति से दया, रहम और क्षमा ये तीनों गुण आयेंगे । यदि सहन शक्ति नहीं है तो ये तीनों भी नहीं आ सकते हैं। थोड़ा सहन करो तो ये तीनों आ जायेंगे।
वास्तव में दुःख महसूस नहीं करना चाहिये लेकिन कमी महसूस करनी चाहिये। दूसरे की कमी दिखाई देती है तो दुःख महसूस होता है। कमी न दिखाई पड़े, भाव दिखाई पड़े कि इसका भाव मेरे प्रति अच्छा है। अच्छा न भी हो तो सोचो मेरे भले के लिये है तो दुःख नहीं महसूस होगा। महसूसता आगे बढ़ायेगी और सबके नज़दीक लायेगी। दुःख महसूस करने से सेन्सेटिव हो जायेंगे, अपनी कमी महसूस करके दूसरों की कमी न देखने से सेन्सीबुल हो जायेंगे। कई बार ऐसे होता है कोई बात फील हुई तो सोचते सोचते और दुःख महसूस करते हैं, दूर होते जाते हैं। कई बार सामने सुनाने से हल्के भी हो जाते हैं, दुःख भी चला जाता है।
अपना धीरज और शान्ति अपने आप समय पर काम करती है। समझो मेरे लिए आप दस जगह निन्दा करते हो तो मैं एक बार भी न बोलूं, धीरज रखूं। ऐसा न सोचूँ कि आपने दस बार किया तो मैं भी एक बार करूँ। धीरज शान्ति से काम लो। आपेही दूसरे को महसूस होगा, अपने स्वभाव को ऐसा बनाना है। मैं राइट हूँ, वो रांग है यह सिद्ध करने का प्रयास कभी नहीं करना है। दूसरा कुछ भी करे लेकिन आप अपनी शान्ति भंग न करें, धीरज को न छोड़े, रायल्टी को न छोड़े। अभी तो हम ज्ञान मार्ग में हैं, भक्ति में भी कहते हैं भगवान् जाने । हम झूठ और सच को सिद्ध करने के धन्धे में क्यों जाये। सिद्ध करते थे तो साकार बाबा कहते थे तुम वकील क्यों बनते हो । हम दूसरो का चिन्तन क्यों करें, हमको तो अपना चिन्तन करके परमधाम में जाना है। अव्यक्त वर्ष में औरों का चिन्तन छोड़ दो ।
प्रश्नः- कई बार अमृतवेले बहुत सुस्ती आती है, उसे हम कैसे परिवर्तन करें ?
उत्तर- बाबा से गहरा सम्बन्ध हो तो सुस्ती स्वतः भाग जायेगी। जिसके साथ प्यार होता है उससे मिलन मनाने में सुस्ती नहीं आती। बाबा के मिलन से कितनी शक्ति मिलती है, उसका अनुभव हो तो अनुभव की खींच सुस्ती भगा देगी। यह भी ध्यान रहे जैसा कर्म हम करेंगे हमको देख अन्य भी करेंगे, इसलिए हमें अलर्ट रहना है। वायुमण्डल में सुस्ती नहीं फैलानी है। सुस्ती आती तब है जब सारे दिन की दिनचर्या पर ध्यान नहीं है, परचिंतन चलता है, या कनफ्युज़ रहते हैं तो अमृतवेले जब याद में बैठते हैं तो सुस्ती आती है। सुस्ती भगाने के लिए नियम पक्का रखो, उमंग-उत्साह में रहो। विजयी बनने का लक्ष्य पक्का हो ।
प्रश्नः- सदा श्रेष्ठ व शक्तिशाली संकल्प किस विधि से रह सकते हैं?
उत्तर- पहले अपने संकल्पों को चेक करो एक होते हैं नैगेटिव संकल्प, दूसरे- पाजेटिव संकल्प, ३- व्यर्थ संकल्प, ४- साधारण संकल्प । जो पाज़ेटिव शुद्ध संकल्प हो उन संकल्पों में दृढ़ता हो तो संकल्प श्रेष्ठ होते जायेंगे। पहले अपने मन में शुद्ध संकल्पों को जगह दो। दूसरे सब संकल्पों को छुट्टी देते जाओ । नगेटिव थॉट्स तब तक रहते जब तक प्युरिटी इमप्युरिटी का पता नहीं है। वेस्ट थॉट्स तब तक हैं जब तक अवगुणरत दृष्टि है, परचिंतन करने की आदत है। वेस्ट थॉट्स वाले का दिमाग सदा गर्म रहता, प्रेशर हाई होता..आवेश में आने का ने चर होता। वह खुद दुखी तो दूसरा को दुखी करता। व्यर्थ चिन्तन उसे कमजोर बना देता है। बाबा, परिवार सबसे दूर कर देता है। इसके लिए पहले रियलाइज़ करो यह कौन से थॉटस हैं। आत्म विश्वाम से स्वधर्म में रहने का अभ्यास करो। स्वधर्म में रहने से बाबा और ड्रामा में पूरा विश्वास रखने से संकल्प श्रेष्ठ और शक्तिशाली होते जाते हैं।
प्रश्न:- बड़ों से हमारा व्यवहार सदा श्रेष्ठ रहे उसके लिए कौन सी वृत्ति होनी चाहिए ?
उत्तर- बड़ों से सच्चे दिल का व्यवहार हो। उनसे डरो या बात करने में हिचको नहीं। हल्के रहो । बड़ा माना निमित्त, कोई उम्र या पोजीशन की बात नहीं है। बाबा ने किसी को किसी कार्य के लिए निमित्त बनाया है। हम उसकी नुक्स (कमी) न देखते रहें। बड़ों की करेक्शन करते रहते हैं तो रिलेशन में मज़ा नहीं आता है। उनकी बात रिगार्ड, प्रेम से सुनने की भावना हो। अंध-विश्वासी नहीं बनो लेकिन रिगार्ड जरूर दो। कुछ समझकर कहते होंगे। ऐसे नहीं सोचो यह तो फ़ालतू हमारे पर आरोप लगाते रहते हैं। कई हैं जो बड़ों के प्रति मन खराब करने वाली बातें सुनायेंगे। संगदोष में आने से, कामेन्ट सुनकर, सम्बन्ध बिगाड़ने से दूरी आ जाती है। कोई बात बड़ों के प्रति क्लीयर नहीं है तो क्लीयर करनी चाहिए पूछना चाहिए। कई बार बड़े अच्छी भावना से देते हैं लेकिन अपने अन्दर सच्चाई-सफाई नहीं होती तो उनकी भावना को भी कैच नहीं कर सकते हैं। बड़ों से हम सदा हल्के रहें, ऐसा व्यवहार हो जो वह हमें कभी भी कुछ भी कह सकें, नेचर भारी न हो। विश्वास हो कि जो बड़े कहते हैं उसमें कल्याण है। कोई बीच में हमारी बुद्धि खराब करने की कोशिश करे तो हम उसकी न सुनें। जो आज्ञाकारी होते उन्हें बहुत दुआयें मिलती है। दूसरा कोई गुण न हो, एक आज्ञाकारी होकर रहो तो यह गुण बहुत ऊंचा उठाता है। निश्चित भाग्य बना ही पड़ा है।
प्रश्न: अवस्था सदा एकरस कैसे रहे? कभी-कभी लगता में बाबा के बिल्कुल समीप है कभी-कभी उमंग उत्साह सब खत्म हो जाता, इसका कारण क्या ?
उत्तर- यह अवस्था भी आती है। इसमें निश्चय की परख होती है। अवस्था एकरस न रहने के कई कारण होते हैं या तो किसी के नाम-रूप की छाया पड़ जाती है या बुद्धि कहाँ अटकी लटकी है, कहीं झुकी है या अहंकार वश अपने ही नाम-रूप में फंसी है या दूसरे का प्रभाव पड़ा है। दाल में कुछ काला जरूर होता है इसलिए अवस्था एकरस नहीं रहती है। उसमें खुशी गुम हो जाती है। दिल कहता है रोती रहूँ। इसलिए हमेशा अटेन्शन रखो - बाबा से सर्व संबंध जुड़े रहें। किसी भी हालत में सम्बन्ध की लिंक ढीली न हो। कारण को समझकर निवारण कर लेना चाहिए। जब सम्बन्ध बाबा के साथ होता तो दिल कहता और पुरुषार्थ करूँ, उमंग उत्साह आता और जब थोड़ी सी लिंक टूटती है, किसी देहधारी तरफ बुद्धि जाती है तो जानबूझकर अपने को बाबा से दूर करने की कोशिश करते हैं। बाबा किसी तरह से टच भी करना चाहे तो भी वह नज़दीक नहीं आते है। निश्चयबुद्धि होकर बाबा को सामने रखो, घबराओ नहीं, जो बात सामने आई उसको पास करना ही है। जितना हो सके ऐसी आत्माओं को स्नेह सहयोग देते रहना चाहिए। इसमें थकना नहीं चाहिए।
प्रश्नः- कभी-कभी महसूस होता है कि ब्राह्मण जीवन में ठहरती कला आ गई है, किस विधि से हम ठहरती कला से उड़ती कला में जायें ?
उत्तर- ठहरती कला का कारण हर एक का अपना-अपना होता है। वह बड़ों को सुनाकर हल्के हो जाओ। जब तक हल्के न हो तब तक ठहरती कला जाती नहीं। जैसे कोई कांटा होता है, चुभता रहे, हम निकालने की कोशिश न करें तो दर्द होता रहेगा। वह दर्द वाली लाइफ पुरुषार्थ में मदद नहीं करती। तो कांटा या तो खुद निकालो या दूसरों से निकलवाओ। जो कारण है उसे स्पष्ट कराओ। बात स्पष्ट होने से रियलाइजेशन से रुकावट समाप्त हो जाती है।
प्रश्नः- कई बार हमारे संकल्पों के हवाई किले होते या काल्पनिक होते, उसमें सत्यता है या नहीं कैसे पता चले ?
उत्तरः- कइयों के पास्ट के, चाहे इस समय के, यह कड़े संस्कार होते हैं जो अपने को समझदार वा राइट सिद्ध करते रहते। कोई भी बात होगी, उसमें अपनी बात जरूर डालेंगे। यह बहुत बुरी बीमारी है। जो बोलो वह सच बोलो। बोल में अपना भाव मिक्स न करो। ब्राह्मणों में यह बीमारी है जो मनगढ़न्त बातें (काल्पनिक बाते) अपने मन के भाव किसी भी बात में एड कर लेते हैं। इससे बहुत नुकसान होते हैं। परमात्मा से जो सच्ची प्राप्ति होनी चाहिए उनसे वंचित हो जाते। मनगढ़न्त बातें देह अभिमान की निशानी है। इसमें दूसरों प्रति रहम भावना नहीं रहती। तो जिसके प्रति बोलूँ समझकर बोलूँ उसमें अपना भाव एड न करूँ। जितना अन्तर्मुखी बनते तो महसूस होता है कि इसमें हमने इतना मिक्स किया। जिससे प्यार कम होगा उसकी बात बढ़ाकर बतायेंगे । प्यार होगा तो कम बतायेंगे। किसी के प्रति बुरा सोचते तो उसमें मिक्स जरूर होता। कोई फिर हवाई किले बहुत बनाते, में यह करूँगा अरे जो करना है वह अब कर ले। ऐसा न हो नशा चढ़ जाए। कई अकड़ भी बहुत दिखाते हैं, अफसोस भी बहुत करते हैं। सच बोलने वाला सच सुनाने वाला, सच को जानने वाला, सच्चे सांई को सामने रखने वाला न मनगढ़न्त बातें करता है, न उसमें विश्वास रख हवाई किले बनाता है।
प्रश्नः - साक्षात्कार में भी क्या मनगढ़न्त बातें मिक्स हो सकती है?
उत्तर:- हाँ, कई बार जिनमें मिक्स करने के संस्कार होते हैं वह साक्षात्कार में भी अपनी बातें मिक्स कर देते हैं। इसलिए बाबा कहते ध्यान से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञानी तू आत्मा तो सत्य का शौकीन होता वह योगयुक्त रहने का पुरुषार्थ करता है। अपना काम है ट्रांस के भी सही रहस्यों को समझ लेना ।
प्रश्न: ब्राह्मण कभी कोई भूल करते हैं तो करेक्शन करनी पड़ती है। किस बात में हम करेक्शन करें किस बात में नहीं ?
उत्तर- वास्तव में करेक्शन कोई कर नहीं सकता है। छोटी-छोटी बातों में करेक्शन करते रहना ठीक नहीं, कोई हैं जो करके सिखाते हैं तो अपने आप दूसरों को सीखने को मिलता है। संग से भी सीखना होता। जो करेक्शन करने वाली बातें हैं वह बाबा मुरली में देता रहता है, समझने वाले समझ जाते हैं। घड़ी-घड़ी करेक्शन करते रहो, कोई सुनता नहीं। कोई बॉस होकर करेक्शन करते तो भी दूसरा सुनता नहीं। अगर आर्डर चलाते तो भी नहीं सुनता । बाबा की याद में अच्छी तरह से रहने वाले की हर बात सभी प्यार से सुनते हैं। उनसे पूछते भी हैं मेरे लिए कोई बात हो तो ध्यान पर दो । समय अनुसार शब्दों से करेक्शन देने की आवश्यकता नहीं है। इशारे से या रुहरिहान के रूप में ध्यान खिंचवा सकते, सावधानी के रूप से नहीं। ऐसा कोई शब्द न हो जिससे किसी के दिल को ठेस पहुँचे। ऐसा मैं बोल न बोलूं जो दूसरा मुंह पर बोलना शुरू कर दे। बोलने का ढंग मर्यादापूर्ण हो। रूहानियत है, सच्चाई है तो बोलने का ढंग बहुत अच्छा होता । सम्बन्ध ऐसा रखो जो दूसरा सुनने के लिए तैयार रहे। अगर मुझे कोई करेकशन दे रहा है तो हमारी स्थिति रूहानी हो, जिद्दी न हो। ऐसे नहीं बोलो तुम हमें क्यों कहते हो । कोई शिक्षा मिली, अच्छी है। शिक्षा तो ग्रहण करने लायक है। भले आज मेरे में वह कमी व बुराई नहीं है, शिक्षा को तो सत्कार दो। भले देने वाले का भाव अच्छा न हो, हम अच्छे भाव से लेवें। उसका तिरस्कार न करें भले छोटा है या समान आयु वाला है, शिक्षा या अच्छी राय दे रहा है तो सत्कार देना चाहिए। इससे हमारा आपका रिलेशन अच्छा रहता है। रिगार्ड देना अपना फ़र्ज़ है।
प्रश्न:- बाबा को जो भोग ऑफर करते हैं उसका सही महत्व क्या है?
उत्तर- यह भोग लगाना ब्राह्मण कुल की मर्यादा है, भक्ति नहीं है। बाबा के लिए प्यार है, बाबा की याद में बनाया उसको आफर कराना अपना फ़र्ज है। इससे सम्बन्ध में शुद्धता आती है। बाबा को हम आफर करते हैं, बाबा हमारी सत्यता को देखता है। जितनी सच्चाई से सम्बन्ध रखो सत्य बोलो तो स्नेह पक्का हो जाता है, उससे मदद मिलती है। सच्चाई के व्यवहार की आदत पड़नी चाहिए। कोई भी कार्य काम चलाऊ न करो। प्यार से विधिपूर्वक भोग लगाओ। बाबा देखता है- कितनी शुद्धि है, कितना प्यार है। भोग के स्पेशल बर्तन हों, अच्छा रुमाल हो, अच्छा भोग हो बाबा को ऐसे शुद्धि से ऑफर करो फिर खाओ तो बहुत शक्ति मिलती है।
प्रश्नः - अनुभूति. और महसूसता में क्या अन्तर है ?
उत्तर- ज्ञान, योग, धारणा की शक्ति को अनुभव में लाओ, जितना जो अनुभव में लाते हैं उन्हें अन्दर सच्चे सुख की महसूसता होती है। वह दूसरों को अनुभव करा लेते हैं। जिसमें महसूस करने की शक्ति होती है वह हर बात का मनन करके महसूस करता, अलबेला या सुस्त नहीं होता। जो महसूस नहीं करता उसमें परिवर्तन नहीं आता है। कोई भी बात महसूस की तो प्रतिज्ञा करो, उसे दृढ़ संकल्प से पालन करो तो वह अनुभव सदा के लिए हो जाता है। महसूसता के बाद अनुभव की शक्ति आती है।
प्रश्नः- कई बार योग में खुशी के आंसू आते हैं, आने चाहिए या नहीं ?
उत्तर- जितना ज्ञान बढ़ता जाता उतना प्रेम नेचुरल होता जाता है। ज्ञान कहता है बैलेन्स रखो। ज्ञान-योग से हर बात को नेचुरल रूप दो। योग माना बाबा से नेचुरल सम्बन्ध हो । प्रेम से सम्पन्न बनो, प्रेम दिखावे में न आये ।सदा बाबा के प्रेम को लूटते पावन बनते जाओ। बाबा के प्रेम के साथ पवित्रता का बहुत सम्बन्ध है। बाबा का प्रेम हमको पावन बनाता है। तो जो गुप्त पुरुषार्थी हैं उनका किसी प्रकार से भी दिखावा नहीं होता। उसमें सम्पन्नता आती जाती है। प्रेम को अन्दर समा लो, दिखावा नहीं करो। प्रेम का स्वरूप बन जाओ। बाबा प्रेम दे रहा है, फिर मेरा प्रेम सबके लिए हो। प्रेम का रिटर्न है पावन बनना। सेवा में व्यवहार प्रेम का हो। बाबा से सम्बन्ध अटूट हो, यह है प्रेम का रिटर्न । ज्ञान को गम्भीरता से हर्षित चेहरे से दिखाओ। आंसू बहा देना यह भी बचपना है।
प्रश्नः- शक्तिहीन आत्मा को योग द्वारा शक्ति देने की विधि क्या है ?
उत्तर- योग में जब बैठते हैं तो यह ख्याल लेकर न बैठो कि हमें योग-दान देना है। जिस घड़ी यह ख्याल होता कि यह शक्ति-हीन है, मुझे इसे योगदान देना है तो यह भी देहभान है। हमारी शक्तिशाली स्टेज हो, वह स्टेज आपे ही काम करती है। यह गुप्त सेवा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसे दान दूँ, मेरे दान से इसमें शक्ति आई यह रांग है। हर एक को बाबा से शक्ति लेनी है। मुझे भी बाबा से लेनी है मैं कैसे कहूँ कि मेरे देने से इसमें शक्ति आई ? विधि यही है कि मैं योगयुक्त रहूं। कमज़ोर कोई एक आत्मा नहीं है, लाखों करोड़ो आत्मायें कमज़ोर हैं। मुझे बाबा से इतनी शक्ति खींचनी है जो मैं मास्टर सर्वशक्तिमान् बन कर पार्ट प्ले करूँ। तो हम मास्टर सर्वशक्तिमान् बनेंगे तो नेचुरल है जो भी स्नेह सम्पर्क वाले हैं उनको वह शक्ति पहुँचेगी। कोई बीमार है, तो हम उसे पावर दे रहे हैं यह ख्याल नहीं करते, बल्कि अपनी याद पावरफुल कर देते हैं। हमारा यह अटेन्शन सारे विश्व पर प्रभाव डालता है, दुःखियों को सहारा अनुभव होता है। जितनी हम आत्मायें श्रेष्ठ बनती जाती हैं उतना दुःखियों पर रहम होता जाता है। दुःखी आत्माओं को अनुभव होगा कि प्रैक्टिकल में हम पर कोई रहम करने वाला रक्षक है। साक्षात्कार होगा तो हमे रक्षक के रूप में पार्ट बजाना है। रक्षक के रूप में हम तभी पार्ट बजा सकते हैं जब हम बहुत काल से बाबा की मिली हई शिक्षाओं को पालन करके अपनी रक्षा करते आ रहे हैं। हमें अपने स्वधर्म में स्थित रहना है, सर्वगुण सम्पन्न मर्यादा पुरुषोत्तम बनना है। हम बनेंगे तो हमें देख स्वतः ही दूसरों को प्रेरणा मिलेगी। एक दो को देखकर यह कलम लगती है। एक नष्टोमोहा बनता है, तो दूसरे को प्रेरणा मिलती है। एक अपनी पर्सनैल्टी में रॉयल्टी लाना है तो दूसरा भी वैसा बनना चाहता है। ऐसे ही सेवा की वृद्धि होती जा रही है।
प्रश्नः- मानसिक वा शारीरिक थकावट का कारण क्या है, उसे कैसे दूर करें ?
उत्तर- मानसिक थकावट का कारण व्यर्थ संकल्प, खाना व आराम ठीक न मिलने से और शरीर की थकावट होती है। कभी वेस्ट थॉट पैदा न करो तो कभी थकेंगे नहीं। तन को चाहिए पूरा रेस्ट, ठीक भोजन। नींद आती है तो नींद करो, लेकिन सिर्फ नींद करो, खाना नहीं खाओ तो भी ठीक नहीं। खाना ऐसी चीज़ है जितना खाओ उतनी आदत पड़ जायेगी। नींद जितनी करो उतनी आदत पड़ जायेगी। इसलिए खाना और नींद सतोगुणी हो। एक निर-संकल्पता की रेस्ट दूसरा टेन्शन न हो तो रेस्ट ही है।
प्रश्नः- सदा याद और सेवा का बैलेन्स कैसे रखें ?
उत्तर- सदा ही पहले याद को महत्व दो तो सेवा आटोमेटिक होगी। सेवा एक्यूरेट हो, याद में कोई कमी न हो। योगयुक्त होकर सेवा करने से सफलता अच्छी होती है। सेवा मुख से या भागदौड़ की करते लेकिन मन्सा तो मेरे साथ है। मन को एक बाबा के साथ लगा दो। एक के साथ सर्व संबंध हों तो मन भटकने से छूट जायेगा। सेवा भी बाबा की है, जितनी भी सेवा करो खुशी-खुशी से करो। गिनती नहीं कर सकते कि इतने घण्टे सेवा की। कमाई का शौक हो। अगर वाणी या कर्मणा की सेवा नहीं है तो मन्सा सेवा बहुत है। फ्री नहीं रहो। सेवा से भी कमाई, याद से भी कमाई, दोनों काम इकट्ठे करो तो बैलेन्स अच्छा रहेगा ।
प्रश्नः- कभी-कभी यह महसूसता होती कि हम दादियों से दूर है, नज़दीक कैसे आयें?
उत्तर- इसमें अपने आपको भारी नहीं करना चाहिए। नज़दीक आना यह नहीं है कि हम कोई आगे जाकर बैठ जायें। कोई भी बात मन में नहीं रखो। बजाए सोचने के वा अन्य स्थान पर सुनाने के, निमित्त बने हुए को सुना दो। सुनाकर हल्के हो जाओ। जहाँ तहाँ उल्टी करने से नुकसान होता है दूसरों को भी तकलीफ होती है। जो बात मन की है बड़ों को सुना दो, हल्के हो जाओ। बनाकर बात करने की आदत न हो। इसने ऐसे किया, उसने ऐसे किया-ऐसी बातें इकट्ठी करके मत सुनाओ। जो उन्नति की बात है वह बाबा के पास पहुँच जाती है, जवाब मिल जाता है। कई बार हम अपने आपको निगेटिव थिंकिंग से दूर करते हैं। कमज़ोरी वा परचिन्तन से दूर करते हैं। अपने में ना-उम्मीदी न हो। हिम्मत हो तो नज़दीक आ जायेंगे। सदा स्व-उन्नति में रहने वाला स्वतः नज़दीक आ जाता है।
प्रश्नः- संकल्प वा स्वप्न को भी पवित्र कैसे बनायें, उसकी विधि क्या है?
उत्तरः- इसके लिए पवित्रता के महत्व को बुद्धि में रखो। अपने आपको कभी भी लूज़ न छोड़ो। कई बार वाणी रमणीकता का रूप लेकर हंसी-मज़ाक में बदल जाती है जिसका असर संकल्प वा स्वप्न पर पड़ता है। अपवित्रता मिक्स हो जाती है। रूहानियत और पवित्रता का आपस में बहुत गहरा संबंध है। जितना रूहानियत में रहो उतना पवित्रता का फाउन्डेशन मजबूत होता है। बॉडीकॉन्सेस में रहने से अपवित्रता का घेराव होता है। बॉडीकॉन्सेस और अपवित्रता का बहुत गहरा सम्बन्ध है। इससे ही हम पतित बने हैं। १ मिनट एकान्त में बैठकर पवित्रता की वैल्यू को सोचो । पवित्रता कितनी अच्छी है, उसमें कितनी शान्ति है। पवित्र दृष्टि-वृत्ति कितनी सुखदायी महसूस होती है। दूसरों के लिए रूहानियत और रिगार्ड पैदा होता है। अपवित्रता रूहानियत को खत्म कर देती है। रूहानियत खत्म होने से डिसरिगार्ड महसूस होता है। पवित्रता का रिगार्ड मिलता है । देवतायें पवित्र हैं तभी उन्हें पूजा जाता है। तो मन-वचन-कर्म श्रेष्ठ हो और उसकी चेकिंग हो । अगर मन में कोई अपवित्र ख्याल आता तो उसको समाप्त करो। उसके लिए काली बनो। क्या करें आता है, ऐसे नहीं सोचो । उसी घड़ी पवित्र श्रेष्ठ संकल्प से अपवित्र संकल्प, वचन वा कोई भी कर्म है तो उसे समाप्त करो। मन-वचन-कर्म संकल्प शुद्ध होने से नींद सतोगुणी हो जायेगी। दिन भर अटेन्शन रखो फिर रात को अपना चार्ट देखकर सोओ ! दिन में जो मन-वचन-कर्म होता वही स्वप्न में आता है। अगर दिन में मन-वचन-कर्म पवित्र है, दूसरे का प्रभाव नहीं पड़ा है, तो वह शक्ति हमें पावन बनाने में मदद करती है। हमारा खान-पान ब्राह्मण मर्यादा के अनुसार हो । अपवित्रता से छुटकारा पाना है तो संग, कपड़ा और खाना, इसकी जो मर्यादायें हैं - उसमें पक्के रहो। अमृतवेले से जो नियम बाबा ने बताये हैं उसी अनुसार चलो तो आप भी सुखी और आपको देख जग भी सुखी ।
प्रश्नः- सेवा में आत्म-विश्वास कम हो जाता है - इसका कारण क्या है?
उत्तरः- सेवा करते-करते जब आत्म-स्थिति भूल जाती है तो सेवा में सफलता नहीं मिलती। सफलता न मिलने के कारण आत्म विश्वास कम हो जाता है। सेवा में जब कोई अच्छी कामेन्ट देता तो खुशी होती है, कोई कुछ उल्टा बोल देता है तो आवाज़ सुनते ही आत्म-विश्वास निकल जाता है। धीरज, शान्ति, प्रेम से व्यवहार करने वाला आत्म-विश्वासी बन जाता है। जो अपने में विश्वास छोड़ देता उसमें विश्वास बिठाना बहुत मुश्किल हो जाता । यही सिरदर्द वाली बात है। आत्म-विश्वास कभी छोड़ना नहीं चाहिए। भगवान् के इशारे से, हिम्मते बच्चे मददे बाप, सच्ची दिल पर साहेब राजी। नेकी कर दरिया में डाल यह सब याद रहे तो आत्म विश्वास पक्का हो जाता है।
प्रश्नः- बाप से प्यार खिंचवाने का तरीका क्या है? बाबा का प्यार किन बच्चों को स्वतःप्राप्त होता है?
उत्तर- (१) जो एकान्तप्रिय होते हैं वह बाबा का प्यार खिंचवा लेते हैं। बाबा को उन्नति करने वाले एकान्तप्रिय बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं। (२) जो किसी के संग के रंग में नहीं आते ! (३) बाबा की उम्मीदें पूरी करते हैं। औरों को ईश्वरीय स्नेह में जोड़ते हैं तो उन्हें बाबा की तरफ से प्यार स्वतः मिलता है। (४) जो ज्ञान को अपनी लाइफ में यूज़ करते हैं, ऐसे ज्ञानी तू आत्मा बच्चे भी प्यार खिंचवा लेते हैं। (५) ऐसे कर्म हों जिससे दूसरों को प्रेरणा मिलती रहे।
(६) प्यार खिंचवाने के लिए आज्ञाकारी, वफादार बनो। (७) विस्तार को समेट सार में स्थित होने का अभ्यास करो। (८) अन्तर्मुखी बनो। (९)" एक बाबा दूसरा न कोई" सदा इस व्रत में रहो। कभी इस रिकॉर्ड को खराब नहीं करो। (१०) अगर बाबा का प्यार लेना है तो कभी कोई बात में डिस्टर्ब न हो। (११) बाबा के नॉलेज की शक्ति अगर मैं अपने पास जमा करती हूँ, बाबा की मददगार हूँ तो बाबा का प्यार हमें कुदरती मिलता है। (१२) बाबा का प्यार खिंचवाना है तो दूसरे किसी से भी प्यार पाने की इच्छा मत रखो । पात्र बनने की इच्छा रखो, प्यार पाने की इच्छा न रखो। बाबा इसे प्यार करता, मेरे को क्यों नहीं करता, यह ख्याल आने से अपने को पात्र महसूस नहीं करते। इससे अपने को दुःखी महसूस करते हैं। लेकिन ख्याल करें कि इसमें क्या ऐसे गुण हैं जो यह बाबा का प्यार पाते हैं, वह गुण मेरे में आयें, गुणवान् बने तो बाबा दिल से दुआओं भरा प्यार करता है। (१३) जो बच्चा हर हालत में, हर बात में सन्तुष्ट रहता है, निष्कामी है, निर्लोभी, निरहंकारी है वह अपने आप प्यार पाता है। उसे वर्से में जैसे प्यार मिल रहा है। ऐसा प्यार पाते रहो तो वह प्यार ही हमें परफेक्ट बनाता है। डिफेक्ट निकाल देता है। अगर हम किसी के डिफेक्ट देखेंगे तो बाबा का प्यार नहीं पा सकेंगे। लिंक टूट जायेगी। (१४) सदा अटेन्शन रहे - लिंक जुटी हो, श्वास, संकल्प, सम्पत्ति सब सफल होता रहे तो बाबा का प्यार स्वतः मिलता है। नकल किसी की न करो, अपनी अक्ल से बाबा का सच्चा प्यार पाने के पात्र बनते जाओ। बाबा जब नज़र फिराये तो बाबा की वह स्नेह भरी, दुआओं भरी दृष्टि हमारे पर पड़े। वह दृष्टि ही महासुखकारी महसूस होती है। अगर अन्दर होल है या बुद्धि ब्लाक है तो बाबा दे रहा है लेकिन हमें फील नहीं होता। (१५) तो बाबा का प्यार पाने के लिए बुद्धि रूपी झोली में कोई होल न हो, बुद्धि ब्लाक न हो। (१६) धैर्यता से, मधुरता से, बाप के क़दम पर क़दम उठाने से, सच्ची पतिव्रता याद से, सदा सुख शान्ति सम्पन्न रहने से हम बाबा का प्यार खिंचवा सकते हैं।
प्रश्नः- हमारा आपस में एक-दो से रूहानी प्रेम है, वह प्रेम हम व्यक्त कैसे करें?
उत्तर- जो बाबा से रूहानी प्यार पाता है, वह कोई स्थूल तरीके से दूसरे को नहीं देता। वह सच्चा प्यार जैसे पा रहा है वैसे दूसरे भी बाबा से प्यार पाने का पात्र बनें, यह उसकी भावना रहती है। उसके लिए हेल्प करता। स्थूल कोई भी रूप धारण करके प्यार देकर उसको अधीन नहीं बनाता । निमित्त मात्र मधुर जबान से, बॉडीकान्सेस की आकर्षण से नहीं, अव्यक्त बोल, अव्यक्त दृष्टि से, रूहानी प्यार हो। फैमिलियरटी से या हंसी-मज़ाक का प्यार हम नहीं दे सकते । स्त्रीचुअल्टी में इतनी रमणीकता है, रूहानियत है जिससे आत्मा सच्चे प्यार का अनुभव कर सकती है। तो हम किसी को मिक्सचर प्यार न दें। न किसी को अधीन बनायें। ऐसे नहीं कहेंगे हम टीचर हैं ना, हम मां हैं ना-ऐसे करना पड़ता है ना। योगयुक्त होकर व्यवहार में आओ, लेन-देन करो। स्थूल में इज्जत नहीं मांगो। स्थूल प्यार देकर रिश्ता नहीं रखना है, रीयल रिश्ते से, देही अभिमानी स्थिति से, मधुर बोल से जिस आत्मा को जिन शब्दों की जरूरत है, वही हम दें, जिससे वह नज़दीक आये ।
प्रश्न:- ईश्वर के दिल को जीतने की विधि क्या है?
उत्तर- सच्चा दिल । ईश्वर के दिल से दूर करने वाली दो बातें हैं (१) किसी के नाम-रूप की आकर्षण (२) झूठ बोलने की आदत । यह दो बातें जिसमें नहीं हैं वह ईश्वर की दिल को जीत लेता है। सच बोले और किसी के नाम-रूप पर आकर्षित न हो। व्यक्ति चाहे वैभव में बुद्धि चलायमान न हो, कितने भी पदार्थ हों पर उसमें आंख न डूबे। ऐसी तृप्त आत्मा ही भगवान् को अपना बना सकती है। भल कोई तन से सुन्दर हो, धनवान हो, पदार्थ अच्छे हों हमारी आंख न जाये...तब बाबा का प्यार पाने के अधिकारी बन सकते हैं।
प्रश्नः- लीडरशिप (नेतृत्व करने) का गुण और साथ-साथ नम्रता का गुण - दोनों का बैलेन्स कैसे रखें?
उत्तर- जो भी स्टैप (क़दम) उठाओ वह ब्रह्मा बाबा के समान हो। अपने को लीडर के बजाए निमित्त समझो । निमित्त समझने से नम्रता का गुण आ जाता है। निमित्त माना रेसपान्सिबुल-ऐसे भी नहीं मैं निमित्त हूँ, मुझे तो सोचना ही पड़ेगा यह रांग है। निमित्त माना निश्चिन्त । निमित्त हूँ माना एक्यूरेट बनूँ । निमित्त हूँ तो बाबा के समान निर्माणचित रहूँ। नम्रता के बिना कोई काम एक्यूरेट नहीं हो सकता। सारा काम बिगड़ जायेगा। जरा सा आवेश आया तो काम बिगड़ा । बिगड़ी हुई बात बनानी हो तो नम्रता रखो।
प्रश्नः- आज्ञाकारी वृत्ति किसे कहा जाता है?
उत्तरः- आज्ञाकारी माना अन्दर ही अन्दर ज्ञान सहित आज्ञा पर चले । मजबूरी से नहीं । बाबा कोई काम के लिए मजबूर नहीं करता। हमारे दिल से निकलता जो आपकी आज्ञा । क्योंकि हम जानते हैं आप जो कहेंगे उसमें हमारा कल्याण है। बाबा आज्ञा करता तो साथ में शक्ति भी देता, इसलिए सदा हाँ जी करो। भल तन ठीक न हो, धन भी न हो, बाबा ने कहा तो सब ठीक हो जायेगा। निश्चित भावी बनी हुई है, हमें निश्चिन्त रहना है, निश्चयबुद्धि के आधार से। आज्ञाकारी माना निश्चित, मन नहीं चलता – कैसे होगा, क्या होगा नहीं। आज्ञाकारी महासुखकारी हो जाता, अपनी डोरी बाबा के हाथ में दे देता है। वह ऐसे नाचता है जैसे कठपुतली । भगवान् नचा रहा है मैं नाच रही हूँ। हमारी चलन ऐसी हो जो सबका ध्यान जाए कि इनको सिखलाने वाला कौन है। सिखलाने वाले पर सबका ध्यान चला जाए - यही है आज्ञाकारी बनना ।
प्रश्नः- उन्नति सदा होती रहे उसके लिए मन में कौन से विचार लाने चाहिए ?
उत्तर- आत्मा की उन्नति के लिए परचिंतन से अपने आपको फ्री रखो। अगर हम स्वचिंतन में रहते हैं, तो वह हमारे लिए भी फायदे मंद है और बाबा को भी अच्छा लगता है। बाहरमुखता परचिंतन में ले आती है। जिस कारण निंदा-स्तुति, मान-अपमान की फीलिंग आती है। चेक करना होता है कि किन-किन बातों में हमको अच्छी फीलिंग नहीं आती है। अपने आपको उन बातों से फ्री रखो। सदा श्रेष्ठ ख्यालात हों तो वह हमारे में शक्ति पैदा करते हैं। मध्यम ख्यालात कभी कैसा, कभी कैसा कर देते। कनिष्ट ख्यालात नीचे फेंक देते। जिसके पास यह नॉलेज है, उसके पास शक्ति होने के कारण वह हर बात जल्दी जज कर सकते हैं, परख भी सकते हैं। मूंझने की कोई बात नहीं होती । श्रेष्ठ ख्यालात की शक्ति कई काम करती है। मध्यम ख्यालात कभी-कभी मुंझा देते हैं। इसलिए हमारे ख्यालात ऊंचे हों, श्रेष्ठ हों। दूसरों के लिए सदा शुभ संकल्प हों। जैसे बाबा की हम बच्चों प्रति सदा कल्याण की भावना है ऐसे हम भी एक-दो के प्रति कल्याण भावना रखें, अपना वा किसी का भी पास्ट बुद्धि में न लायें। यह ख्याल मन में कभी न आये कि क्या करूँ, मेरा संस्कार ऐसा है ना। किसी का संस्कार चेंज थोड़ेही हुआ है जो मेरा होगा। अगर हम कल की बात भी याद करेंगे तो हमारे विचारों में शुद्धि वा पॉवर नहीं होगी। कहेंगे हम जानते हैं यह तो जैसा था वैसा ही है। यह अगर बुद्धि में है तो हम मदद नहीं कर सकते। हमारी दृष्टि-वृत्ति में स्नेह और शुभ भावना, कल्याण भावना हो। दूसरा बदला है या नहीं, उसकी जिम्मेवारी हमारे ऊपर नहीं है, उसके पुरुषार्थ पर है। परन्तु मुझे नॉलेज है कि किसी का किसी भी घड़ी परिवर्तन होना सम्भव है। कोई के लिए कैसी भी घड़ी आ सकती है। अहिल्या, गणिका जैसे भी बदल सकते हैं तो क्या ज्ञान में आने वाले नहीं बदल सकते । हम किसी के लिए ऐसा कमजोर ख्याल क्यों लायें, उस दृष्टि से व्यवहार कयों करें। हम अपनी दृष्टि को, संकल्पों को, शब्दों को इतना शुद्ध कल्याण भावना वाला बनायें जो सबको मदद कर सकें। यह पुण्य का काम करने से हम पुण्यात्मा बनेंगे। समझो कोई ६-८ वर्ष समझाने के बाद भी नहीं बदलता है तो हम उससे घृणा नहीं कर सकते। वह की हुई मेहनत कभी न कभी काम में आयेगी। इसके लिए याद रहे "नेकी कर दरिया में डाल, गिनती नहीं करो।" जो बीज पड़ा है वह निकलेगा जरूर । यह भी पता है - अविनाशी ज्ञान की एक बूंद भी विनाश नहीं हो सकती । जागृति आ जायेगी। इसलिए सदा ही बड़े प्यार से, स्नेह से अविनाशी ज्ञान की वर्षा करना है। प्यासे को बूंद मिल जाए यह भी अच्छा है। ऐसी भावना अपने अन्दर रखनी है। ऐसे संकल्प रखने हैं जो संकल्प अनेक आत्माओं का कल्याण करते हैं। ऐसे कल्याणकारी विचार अपनी और दूसरों की उन्नति कर सकते हैं।
प्रश्नः- एक-दो को दृष्टि देते समय बुद्धि में क्या ख्यालात होने चाहिए?
उत्तर- दृष्टि देते समय कोई हमें संकल्पों को चेक नहीं करना है। जैसे हमारे संकल्प होंगे वैसी दृष्टि बन जायेगी। सदा अच्छी दृष्टि रहे, सबके प्रति सुखकारी हो। हमारी दृष्टि में दोष न हो। ऐसी दृष्टि सदा हमारी बनी हुई हो। जैसे देवतायें किसको देख करके दृष्टि नहीं देते, लेकिन उनकी दृष्टि से सब को सुख मिलता है। तो सदा के लिए हमारी दृष्टि ऐसी हो क्योंकि हम देवता वा एंजिल बन रहे हैं। बाबा की दृष्टि सब बच्चों के लिए स्नेह भरी है, कल्याण भावना वाली है। हम दृष्टि देते नहीं लेकिन दृष्टि से जो कुछ कहना होता वह कह देते हैं। उसको जो खींचना था वह खींच लेता। शब्दों में आने की जरूरत नहीं। बाबा के कमरे में कई बातों का दृष्टि से उत्तर मिल जाता है। ऐसे हमारी दृष्टि से भी सबको महसूस हो । बाबा ने कभी ३-४ मिनट बैठकर किसी को दृष्टि नहीं दी, सभा में आयेगा एक सेकण्ड में सबको करेन्ट दे देगा। खींचने वाला खींचे। मैं बाबा की दृष्टि में हूँ, मेरी दृष्टि में बाबा है। ऐसी दृष्टि हमारी सदा बनी रहे ।
प्रश्नः- अपनी शुभ भावनायें दूसरों तक पहुंचाने के लिए हम बाबा के संग में ही रहें या उसके लिए विशेष कोई संकल्प करें?
उत्तर- बाबा के साथ साक्षी होकर पार्ट प्ले करने से बहुत मदद मिलती है। जैसे बाबा करता है वैसे हम करें। ऐसा करने के योग्य हम तब बनते जब सबके लिए शुभ भावना है। जैसे बाबा न्यारा होकर काम करता है, ऐसे मैं भी करूँ और एक्यूरेट करूँ। कमल फूल समान रहकर करूँ। बाबा के हर कार्य में कभी कोई ग़लती हो नहीं सकती। बाबा के संग से हमें यह विश्वास हो गया है कि जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह एक्यूरेट होगा। तो शुभ भावना पहुंचाने के लिए हम कोई बैठकर ऐसे ख्यालात नहीं पैदा करते । नेचुरल बाबा के संग से ऐसी धारणा हो जाती है। बाबा के संग से कोई ग़लती नहीं होती। क्योंकि कराने वाला वह है, हम निमित्त हैं। निमित्त मात्र वह हमको आगे रखता है। कहाँ बाबा खुद आगे रहता हमको पीछे करता, कहाँ खुद पीछे रहता हमको आगे करता, यह खेल है। इसे जो पूरा समझता है वह बाबा के साथ का सदा अनुभव करता है। यादगार में भी बाण मारने वाली निमित्त कन्या थी लेकिन जिसको वाण लगा उसको महसूस हुआ इनके पीछे कोई खड़ा है। तो बाबा जहाँ देखता बच्चा योग्य नहीं है तो खुद आगे चला जाता। कहाँ बच्चे को आगे कर देता। यह प्रभू की विचित्र लीला है। इसको जो समझता है वह अपने अन्दर ऐसी धारणा करता और बाबा को साथी बनाकर सर्व को अपनी शुभ भावनायें पहुँचाता है। वह बाबा के साथ बिना एक क़दम भी चलने वाला नहीं। अकेला काम करने वाला नहीं।
प्रश्नः - कइयों के मन में बुरा भाव होता है, बाहर से मीठी-मीठी बातें करते, यदि हमने उन्हें परख लिया तो क्या यह हमारी कमजोरी है?
उत्तर:- परखने का अभिमान न हो। ऐसे नहीं, मुझे तो पहले ही वायब्रेशन आता था, मैं तो पहले ही कहता था कि यह अन्दर का साफ नहीं है। ऐसे अन्दर अपनी रिमार्क न दो। कोई भी आत्मा मुझे बाहर के प्रभाव से प्रभावित न कर सके। इसमें फेल न हो। इसके लिए खबरदार रहो। यह कमज़ोरी नहीं है। समझदारी है। जल्दी समझ लेना चाहिए इसकी दृष्टि-वृत्ति कैसी है। बाबा पतित पावन है, हम शक्तियां हैं। अगर हम अपने को जवान समझते, लड़की समझते तो हमारे अन्दर वीकनेस है। उसका फिर दूसरे फायदा लेते हैं। अगर मजबूत हैं तो दूसरे को सुधार सकते हैं। यह वीकनेस नहीं खबरदारी है। ज्ञान की पराकाष्ठा है। इतना पक्का व्रत हो, जो कोई इंसान टच करने की हिम्मत भी न रखे। कितना भी दर्द हो, कुछ भी हो बाबा आपेही मसाज करेगा, इंसान हाथ नहीं लगा सकता। कईयों के मन में बुरे विचार होते हैं, बाहर से मीठी-मीठी बातें करके, आपस में एक दो के संबंध में आ जाते हैं। फिर ज्ञान और योग छूट जाता है। फिर बुद्धियोग इधर उधर लटक जाता है, यह कमजोरी है। बहादुर का काम है जल्दी समझकर अपने को महावीर बना देना, दूसरों को भी अपनी कम्पन्नी से महावीर बना देना। कई बार सर्विस के बहाने से आपस में कनेक्शन में आते, बातचीत करते तो ज्ञान ध्यान चला जाता। यह वीकनेस है। हम मर्यादा में ऐसे रहें जो हमारा आपस में एक दो की उन्नति के लिए कल्याण के लिए व्यवहार हो। हम औरों की सेवा करते अपनी स्थिति खलास न कर दें। मर्यादा में पक्के रहो, कभी आपस में बैठो तो सम्भलकर बैठो, इसमें सेवा है। हम सही रास्ते पर, मर्यादा में रहने वाले हैं तो हमारी ड्रेस, हमारा भोजन, रहन-सहन दूसरों को भी मायाजीत बनने की शक्ति देता है। स्वयं भी मायाजीत बन जाते हैं।
प्रश्नः- सर्विस में रहते सर्विस साथियों को क्या सीधा ज्ञान दे सकते हैं?
उत्तर- सीधा ज्ञान भले न दो, लेकिन आपकी चलन को देख ज्ञान में आ जायें। अच्छी नौकरी हो, पैसा अच्छा कमा लो जिससे रहन-सहन अच्छा हो । कर्जा न लो। ब्राह्मण माना सेवाधारी, कंगाल गरीब नहीं। ब्राह्मण माना दाता । ऐसे रॉयल्टी से रहो तो आपके साथ काम करने वाले आपके धीरज, प्रेम और शान्ति को देख आपेही पूछेंगे । आपका रहन सहन आपेही सेवा करेगा। ऐसे नहीं इसके कारण ड्रेस चेन्ज करनी पड़ती, बाल बनाने पड़ते...। अपने चेहरे और चलन से सर्विस करो। रहन-सहन खान पान से करो। अन्दर आत्म विश्वास हो तो सेवा आपेही होगी। हम निमित्त मात्र कहाँ काम करते हैं, उनके भले के लिए करते हैं। हम पैसा भी कोई लोभ के वश नहीं कमा रहे हैं। फ़ालतू खर्च करने के लिए नहीं कमा रहे हैं। सफल करने के लिए कमा रहे हैं। इसलिए हमें ज्ञान देना सहज है।
प्रश्नः- बाबा के प्यार में लीन होना और दिल तख्त पर बैठना - इसमें क्या अन्तर है?
उत्तर- पहले दिलतख्त पर बैठने के लायक बनो। दिलतख्त पर बैठना माना बाबा जो चाहता है हम वह करें। अपने संस्कारों वश, अपनी मत वा दूसरे की मत के वश न करें। अगर दूसरे के प्रभाव में आकर करते हैं या संस्कारों के वश करते हैं तो बाबा के दिल को हम जीत नहीं सकते। साफ स्वच्छ दिल वाला ही बाबा की दिल को जीत सकता है। कैसा भी है, आनेस्ट है, बाबा जो कहता वह करके दिखाता है तो वह दिल जीत लेता है। बाबा का जैसे उस बच्चे पर हक हो जाता। बाबा ने कहा यह करना है, उसने कहा हाँ जी बाबा हो जायेगा। तो बाबा का उसमें फेथ बैठ जाता है। बाबा ने कहा और खेल की तरह कर दिया। तो अनहोनी बात भी हो जाती है। वह कभी कह नहीं सकता कि यह इम्पासिबुल है। अन्दर विश्वास होता कि किसने कहा है। भगवान् कह रहा है, हुआ ही पड़ा है। निमित्त मुझ आत्मा का भाग्य बनाने के लिए कह रहा है। वह भाग्य विधाता है, वह किसी न किसी से करा लेता है। तो जब हम अनासक्त वृत्ति से, अपनी इच्छा छोड़, चिंता वा दुःख से दूर रहकर काम करते हैं तो बाबा की दिल को जीत लेते हैं। ड्रामा के ज्ञान को जानने वाले न चिंता करते, न दुःख करते। बाबा की दिल पर चढ़ना हो तो चिंता छोड़ दो। कोई भी बात का दुःख करना छोड़ दो, दुःख हर्ता बाप के बच्चे हैं मुझे दुःख नहीं करना है। सदा बेफिक्र रहना है। ऐसी स्थिति में रहने वाले बाबा की दिल पर चढ़ते हैं। वह बाबा का प्यार ऐसा पाते हैं, जो सदा उसी प्यार में लीन रहते हैं। तो पहले बाबा की दिल पर चढ़ो तो बाबा के प्यार का पात्र बनकर प्यार में लीन हो जायेंगे। परफेक्ट पावन बन जायेंगे। फिर बाबा अपने नयनों पर बिठाकर वतन में ले जायेगा। वहाँ से वैकुण्ठ में भेज देगा।
प्रश्नः- हम बाप समान कैसे बनें ? क्या हमारा आदि स्वरूप बाप समान नहीं है ?
उत्तर- आदि स्वरूप को पहले याद करो। आदि में मेरा स्वरूप कैसा था। अन्त में बाबा वही आदि वाला स्वरूप बनाने के लिए कहते तुम मेरे समान बनो। जैसे शिवबाबा अशरीरी है, ऐसे आत्मा जब नीचे उतरी थी तो इतनी ही डिटैच थी, तो अन्त में इतना डिटैच बनना है। और साथ-साथ जैसे साकार ब्रह्मा परफेक्ट बना, ऐसे हम भी बाप समान सम्पूर्ण बनें। तो बाबा अपने स्वरूप को सामने रखकर हमारे लिए सहज कर देता है। एक अशरीरी बनाता,
दूसरा सम्पूर्ण बनाता । बनेंगे अपने पुरुषार्थ से। लेकिन सही पुरुषार्थ तब होगा जब उनको सामने रखेंगे। बाबा समान बनने के लिए सदा शक्तिशाली बनो, अपनी बुद्धि को अनेक व्यर्थ बातों में न लगाकर किसी के डिफेक्ट को न देख स्वयं के डिफेक्ट को निकालते जाओ। सम्पूर्णता को सामने रखो, कोई बात में नीचे-ऊपर न हो तो बाप समान बन जायेंगे ।
प्रश्नः- कोई-कोई आत्मा हमसे वा किसी से भी अच्छी तरह बातचीत नहीं करती है तो उसके प्रति हमारी वृत्ति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर- कोई युक्ति निकालकर उसे नज़दीक लाना चाहिए। खुली और सच्ची दिल से बात करने में कितना फायदा होता है, वह सिखाना चाहिए। उसे छोड़ नहीं देना है। हमारे से बातचीत नहीं करता कोई से नहीं करता, तो खुद से करता रहेगा, गूंगा भी है तो भी अन्दर से बातें करता है, अच्छा संग नहीं होगा तो किससे बात करेगा। कोई किसी से भी बात नहीं करता तो डेन्जर (खतरा) है। कोई जैसे वैसे से करता तो भी उसकी लाइफ नहीं बनती । मुख्य बात है - दूसरों के साथ हम कैसे वार्तालाप में आयें और वह हमारे साथ कैसे आये। हम एक-दो की उन्नति अर्थ व्यवहार रखते हैं। स्थूल कम्युनिकेशन के आधार से आज दुनिया में अच्छा व्यवहार है। हमारा भी आपस में कम्युनिकेशन (संबंध) अच्छा है तो हम एक-दो को किसी ढंग से भी मदद कर सकते हैं। एक-दो से कइ बातें सीखने को मिलती हैं। कोई रुखे सूखे होते तो इसकी इतनी जरूरत नहीं समझते या कोई अभिमानी होते हैं । अगर मेरे में कोई कला है तो ऐसे नहीं मैं एक तरफ बैठ जाऊं, मेरे द्वारा किसी है, अगर को मदद मिल सकती है तो मुझे खुशी होती है। ज्ञान मार्ग की मंजिल ऊंची हम एक यात्रा पर चल रहे हैं तो हमें एक दो को मदद करनी चाहिए। बाबा से हमारा कम्युनिकेशन अच्छा होगा तो हम बाबा से भी सखा भाव से अच्छी बात कर सकेंगे। आपस में बातचीत करने से हल्कापन रहता, स्नेह भावना वा रिगार्ड रहता है।
प्रश्नः- अभी जो थोड़ा सा समय रहा हुआ है - उसमें हम अपने आपको कैसे परिवर्तन करें और ब्राह्मण जीवन का आनंद कैसे लूटें?
उत्तर- समय थोड़ा है या बहुत लेकिन ब्राह्मण लाइफ की वैल्यू का जिसे पता चल जाता है वह थोड़े समय में ही स्वयं को परिवर्तन कर लेता है। जिसे यह ब्राह्मण लाइफ अच्छी लगी, उसे बुराईयां त्याग करने में देरी नहीं लगी। बुद्धि में आया – यह सब पुराना है, पुराने से क्या प्रीत। सेकण्ड में उससे -प्रीत छूट जाती है। कुछ खींचता नहीं। यह सब अल्पकाल सुख देने वाले हैं। यह बात लग गई तो सेकण्ड में त्याग हो जाता है। तपस्या शुरू हो जाती है। और जिसे तपस्या का रस बैठा वह सोल कॉन्सेस बन बाबा से लिंक जोड़ शक्तिशाली बन जाता है। उसे ब्राह्मण जीवन कठिन नहीं लगता है। कोई ब्राह्मण जीवन बनाने में टाइम लगाते हैं, कोई ब्राह्मण बनकर फिर पास्ट लाइफ में वापस चले जाते, उन्हें ब्राह्मण जीवन कठिन लगी क्यों ? क्योंकि कोई न कोई चीज़ खींचती रहती है। जिसे पुरानी बातें अच्छी लगती हैं वह तपस्वी नहीं बन सकता। अगर सेवा भी करता तो अपने को खुश करने के लिए करता, सच्ची सेवा नहीं है। आज का आया हुआ भी ब्राह्मण जीवन में बड़ा आनंद ले सकता है। इसके लिए पूरे त्यागी बनो। छोड़ो तो छूटो । पूंछ लटकाते न रहो। कोई मेरे पीछे आता रहे, मेरे को खींचता रहे और घड़ी-घड़ी पीछे देखूं, तो दर्द पड़ता है। आगे बढ़ना हो तो पीछे मत देखो। यह भी अपशगुन है। जो पीछे देखता वह पीसफुल नहीं बनता। जो बात बीती बीत गई मेरा पार्ट तुम्हारे से पूरा हुआ, फिनिश। फिर कोई खींच नहीं सकता । बाबा मैं तेरी हो गई, तू मेरा हो गया। ऐसे पावरफुल संकल्प वाला निश्चयबुद्धि ब्राह्मण जीवन का पूरा आनंद ले सकता है। सेवा भी करता तो अपना भाग्य बनाने के लिए जीवन सफल करने के लिए करता ।
प्रश्नः- लक्ष्य रखने का महत्व क्या है? हमें कौन-सा लक्ष्य रखना चाहिए?
उत्तर- लक्ष्य का महत्व बहुत बड़ा है। लक्ष्य जैसे हमारे आगे आइना है। आइने में देखने से पता चला है मेरे में क्या कमी है और क्या बनना है। पहला लक्ष्य हो कि हमें बाबा के समीप आना है इसके लिए दिल साफ हो। अच्छी पढ़ाई पढ़ने वाला समीप रहता है, वह अलबेला वा आलसी नहीं होता है। जो आलसी वा अलबेले नहीं वह बाबा के नज़दीक आ जाते हैं। आलस्य ही दूर ले जाता है। भगवान् का बच्चा आलसी हो, शोभा नहीं देता। उसकी शक्ल मुरझाई हुई रहती है। वह न तो ठीक पढ़ सकता है, न पालना ले सकता है, न ही लक्ष्य का सिमरण करके लक्ष्य की स्मृति में रह सकता है। जो करना है सो अब कर ले – यह जोश चाहिए। पुरुषार्थ में ठण्डाई नहीं चाहिए। अवस्था शीतल हो, स्वभाव शीतल हो लेकिन पुरुषार्थ शीतल न हो। जो अलबेलापन और आलस्य छोड़ता है वह बाबा के समीप आ जाता है, वह किसी को भी नहीं देखता । प्राबलम आई बाबा से शक्ति मिल गई, कहाँ पर भी मूंझने की जरूरत नहीं। बाबा कुछ भी न बोले- उसके सामने आ जाओ तो भी बहुत शक्ति मिलती है। बाबा के सामने आने से ही करेन्ट आती है। बाबा की आकर्षण समीप आने से महसूस होती है। अटेन्शन रहे - कोई भी कमी के कारण मैं बाबा से दूर न हो जाऊं। पुरानी बातें वा पुराने संस्कार स्वभाव बहुत कड़े हैं। उनसे हमें छूटना है। बाबा से समीपता सदा के लिए पुरानी दुनिया से दूर कर देती है। लगता है यह पुरानी और पराई है। मेरी नहीं है, पक्का हो जाता है। परमात्मा बाप से सम्बन्ध है तो वह अति सुख की महसूसता देता है जिससे अन्दर के दुःख कलेष खत्म हो जाते हैं। तो पहला लक्ष्य हो मैं बाबा के समीप आऊं। समीप आने का लक्ष्य वही रख सकता है जिसे ज्ञानी योगी आत्मा बनने की अन्दर में लग्न है। सर्विस कैसे करूं - यह ख्याल नहीं रहता लेकिन ज्ञानी योगी आत्मा कैसे बनूँ जिससे बाप की प्रिय बनूँ – यह लक्ष्य रहता है। समीप वही आना चाहते हैं जो सम्पन्न बनने के इच्छुक हैं। जो सम्पन्न बनने की इच्छा रखता वह कर्मातीत भी बन जाता है। बाबा उसे कर्मबन्धनों से फ्री करके कहता है आओ मेरे पास। बाबा सब-कुछ करके अपने आपको छिपा लेता है, मैं कुछ नहीं करता। तो सम्पन्न बनने के लिए यह गुण सीखना होगा कि मैं कुछ नहीं करता। बाबा करता है। इससे मैं-पन का अभिमान छूट जाता है। गुणों में सम्पन्न बनना है और कर्मबन्धनों से फ्री हो कर्मातीत बनना है। लक्ष्य बदलता नहीं है, लक्ष्य स्वरूप बनने के लिए लक्ष्य दाता को याद रखना है। कभी भी पुरुषार्थ में हल्कापन न आये यह ध्यान रखना है।
प्रश्नः- किस डीप रियलाइज़ेशन से हम पास्ट को पास्ट कर सकते हैं?
उत्तर- राइट-रांग की दिल से महसूसता हो तो हम बदल सकते हैं वा पास्ट को पास्ट कर सकते हैं। ऐसे नहीं महसूस अलग करो और बदलने में टाइम लगाओ, दिल से महसूस कर आगे के लिए उमंग-उल्लास से कमियों को आने की मार्जिन न दो। रियलाइज़ेशन हो कि इस कमी में कितना नुकसान है। यह कमी निकल जाए तो कितना फायदा है। जो भी मुझ आत्मा में कमी है उसे निकालने की विधि है- एकान्त में बैठ पांच मिनट भी सोचो। इसके लिए एकान्त की बहुत जरूरत है। जो एकान्तवासी नहीं बनता, जिसे एकाग्रचित होने की आदत नहीं है, उसमें गहरी महसूसता की शक्ति नहीं होती । मोटे रूप से कोई बात महसूस भी की लेकिन चेन्ज नहीं हो सकते । एकान्तवासी होकर अपनी कमी को देखो तो साफ-साफ दिखाई पड़ता इससे इतने नुकसान हैं। भल होती छोटी सी कमी है लेकिन वह ऐसे है जैसे घड़े के अन्दर सुराख । कितना भी अच्छा घड़ा हो, अच्छा पानी हो लेकिन सुराख हुआ तो सब बह जाता। ऐसे रियलाइजेशन नहीं होती तो बुद्धि को ताला लग जाता है, राइट रांग को समझने की बुद्धि कम हो जाती है। दूसरों की भूलों को देखना इजी हो जाता है, अपनी भूल, भूल जाती है। ऐसी घटना आती है जो कुछ अच्छा नहीं लगता सब बुरे लगते हैं। जब बुद्धि को ताला लगता है तो सबके अवगुण दिखाई पड़ते हैं। यह राहू का ग्रहण है। इसलिए भगवान् ने जो समझ दी है उसकी रक्षा करो। बुद्धि को फ़ालतू बातों में यूज़ न करो। अपना बोझ उतारा ही नहीं दूसरे का बोझ सिर पर क्यों चढ़ायें। जो दूसरों का बोझ सिर पर रखता है उसकी बुद्धि में ज्ञान नहीं बैठता। उसे सुनते-सुनते भी नींद आ जाती । कुछ पल्ले नहीं पड़ता। महसूसता शक्ति उसे आती जो समझता भगवान् ने मुझे बुद्धि दी है मैं बुद्धि को फ़ालतू बातों में वेस्ट न करूं। अगर बुद्धि क्लीयर नहीं तो योग नहीं लगता। योग लगाना हो तो पहले बुद्धि को स्वच्छ बनाओ। हिम्मत और उमंग के आधार से जो पास्ट हुआ उसे पास्ट कर दो।
प्रश्नः- आत्माओं के सम्बन्ध में आते कैसे पता चले कि हम अपना भाग्य बना रहे हैं या कर्मभोग चुक्तू कर रहे हैं?
उत्तर- एक है भाग्य बनाना, दूसरा है हिसाब-किताब चुक्तू करना और तीसरा है हिसाब-किताब बना लेना। इसके लिए बहुत महीन बुद्धि से चेकिंग चाहिए। इसमें दो बातें हैं एक हम लौकिक सम्बन्धियों के साथ रहते - उनसे न्यारे रहें। साथ रहते उनका भी भाग्य बने यह लक्ष्य हो। अन्दर से बाबा की याद से पूर्व जन्म वाला जो हिसाब-किताब का सम्बन्ध है वो चुक्तू करना है। रहते भले किसके भी साथ हैं, बेटा है, पति है, बहू है, कोई भी है। अन्दर से मुझे पक्का हो कि मैं पूर्वजन्म का हिसाब-किताब चुक्तू कर रही हूँ। उनमें मोह न हो, इनका भाग्य बने। चैरिटी बिगेन्स एट होम सारा दिन यह भी चिंता न लगी रहे कि इनकी सेवा करें। वह आत्मा भाग्यवान होगी तो नज़दीक आ जायेगी। अपनी स्थिति ऐसी रखो जो पहले वह तुम्हारी स्व स्थिति बनाने में मदद करें। उनको बनाने की चिंता तुम नहीं करो, हमको बनना है। इसमें हम कोई स्वार्थी नहीं हुए। अपने को बनाना ही दूसरे के आगे मिसाल बनना है। फिर दूसरे को बनाना सहज हो जायेगा। सेवा के अर्थ जिसके भी सम्बन्ध में आते हैं तो खबरदार रहें ऐसे न हो पुराने लौकिक को छोड़ा और ईश्वरीय परिवार के साथ संबंध जुड़ जाए। ईश्वरीय सेवार्थ सम्पर्क में आओ। चेक करो सेवा के बहाने माया मुझे फंसा तो नहीं रही है। कई ऐसे सोचते हैं पिछले जन्म का हिसाब-किताब होगा इसलिए मुझे इसकी सेवा करनी है, यह फ़ालतू ख्यालात हैं। यदि पूर्व का हो भी तो उसे चुक्तू करना है। व्यर्थ ख्यालात नहीं चलाने हैं। इसमें चाहिए महीन बुद्धि, विशाल बुद्धि। मोटी बुद्धि वाले ऐसी-ऐसी बातें सोचकर अपने आपको फंसा लेते हैं। कहते हैं क्या करूँ मुझे पता थोड़ेही था । रोज़ मुरली सुनने वाले को सब पता होता है। मुरली और योग कभी मिस न करो। यह मेरी पर्सनल खुराक है। ऐसे न हो हम काम करते रहें सेवा करते रहें और अपनी जो खुराक है, योग और मुरली वह न लें। कई ऐसे होते हैं मुरली सुनी न सुनी ऐसे ही क्लास में आये बैठे और चले गये, बुद्धि में काम की लिस्ट घूमती रहती । कहेंगे आपको क्या पता हमको कितना काम करना है। तो यह जो अलबेलापन है, मुरली मिस करने की आदत है वह भी कर्मबन्धन है। भाग्यवान वह जो सदा ही अपना और दूसरों का भाग्य बनाये । भाग्य तब बनेगा जब मुरलीधर बाप याद रहे और मुरली पर पूरा अटेन्शन हो । भले किसी भी आत्मा के सम्पर्क में आओ, किसी के भी अन्डर रहो, लेकिन ऐसा योग करो, ऐसा पढ़ाई पर ध्यान रखो – जो वह भी उसकी ओर खींचकर आ जाए। सेवा भले छोड़ दो लेकिन अमृतवेले योग जरूर करो। अगर योग और पढ़ाई पर ध्यान नहीं है तो विघ्न जरूर आयेंगे । मुरली और योग ही बन्धनों से मुक्त करता है। यदि मुरली और योग मिस करते तो बन्धन आते हैं। जो योग और ज्ञान को साथी बनाकर रखता है वह सदा बन्धनों से फ्री रहता है।
प्रश्नः- पुरुषार्थ में उन्नति सदा होती रहे उसकी विधि क्या है?
उत्तर:- ज्ञान और योग साथ रखेंगे तो उन्नति होती रहेगी। जो अच्छी तरह से अपनी उन्नति करना चाहे, वह कैसी भी परिस्थिति में एक बाबा को फालो करता चले। पुरुषार्थ की स्पीड बढ़ानी हो तो मात-पिता को सामने रखो उनको फालो करो। यह उल्हना न दो कि हम देर से आये हैं, अब हम क्या करें हमने तो मात पिता को देखा ही नहीं। अभी भी बाबा सारी-सारी रात हम बच्चों को मात-पिता के रूप से पालना दे रहा है। अभी जैसे मिलता वैसे साकार में भी नहीं मिलता था। बाबा अभी एक-एक को समीपता का अनुभव कराता है। बाबा की दृष्टि पड़ते ही हर एक का चेहरा चमक जाता है, नयन चमकने लगते हैं। तो यह कोई बोल नहीं सकता कि मैंने बाबा को नहीं देखा है। तो पुरूषार्थ में उन्नति के लिए बाबा को फालो करते रहो, दूसरे भी महसूस करें कि हां यह बाबा को फालो करता है। कोई बात ऐसे न लगे कि यह त्याग है। भाग्यवान की बुद्धि अपने आप सर्व त्यागी होती है। तो बाबा को फालो करने की फर्स्ट स्टेज है – सर्व त्यागी बनो। भाग्यवान वह है जो त्याग से भाग्य बनाये । जैसे बाबा की बुद्धि बेहद की है, बाबा अनासक्त वृत्ति वाला है – तो ऐसे फालो करो । फालो करने से लगता है कि मेरे में शक्ति आई है। बाबा को फालो करने वाले बच्चों की आशायें तृष्णायें खत्म हो जाती हैं। वह इच्छा मात्रम् अविद्या होते हैं। सदा सन्तुष्ट, भरपूर तृप्त आत्मा होते हैं। उनमें दाता का गुण होता है। बाबा को फालो करने वाला अन्तर्मुखी सदा सुखी रहता । एकान्तवासी रहता, वह सदा मुस्कराता रहता, किसी बात में नाराज नहीं हो सकता। हर आत्मा का अपना पार्ट है, उसके पार्ट को देख नाराज न हों। कभी नाराज़ होते तो माना हम बाबा को फालो नहीं करते । किसी से भूल होती है तो उसे बार-बार उल्हना न दो, बातों को रिपीट नहीं करो, वातावरण में नहीं लाओ, आवाज़ में नहीं आओ, कृपालू-दयालु बनो, अन्दर गुप्त स्नेह देते रहो। किसी की कमी देखकर उससे स्नेह न छूट जाए । कभी यह ख्याल न चले कि यह तो ज्ञानी होकर भी ऐसे करता, अपने को बुद्धिवान समझने से यह ख्याल आता है । भगवान के घर में ज्यादा सयानप दिखाना भी अच्छा नहीं है । बुद्धू बनना अच्छा है। बुद्धू भले बनो पर मोटी बुद्धि नहीं बनो । जहाँ बाबा का काम है, ज्ञान योग है वहाँ बुद्धि को लगाओ, नहीं तो बुद्धि को कहो कि तुम शान्ति में रहो। बुद्धि को शांत, शीतल रखने की आदत पड़ जाए तो उन्नति होती रहेगी।
