ज्ञान सरिता | भाग 6

ज्ञान सरिता | भाग 6

ज्ञान सरिता
भाग - 6

राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी दादी प्रकाशमणि जी

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी, जो कि देश-विदेश में चल रहे ५००० से भी अधिक सेवाकेन्द्रों का संचालन कुशलतापूर्वक करते हुए सभी ब्रह्मा वत्सों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। अनेक सशक्त, गुह्य, आध्यात्मिक रहस्यों को मधुर व सरल शब्दों में स्पष्टतापूर्वक चित्रित करने का विशेष वरदान आपको प्राप्त है। अति व्यस्त रहते हुए भी ज्ञान सागर की तह में जाकर अनेक ज्ञान-रत्नों को निकाल ब्रह्मा वत्सों को सजाने संवारने को आप भूलती नहीं हैं। ईश्वरीय सेवा ही इनका वास है। परन्तु ज्ञान के अन्य विषयों में भी आप अग्रिम स्थान पर हैं। इनके मुखारविन्द से निकली ज्ञान धारा ने अनेकों के जीवन में उमंग-उत्साह भरा है। आपके प्रवचनों से तीव्र पुरुषार्थ करने का प्रोत्साहन मिलता है। आपके अनेक प्रेरणादायी प्रवचनों में से कुछेक को यहाँ प्रकाशित किया गया है। निश्चित ही इनके पठन से आप अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ में श्रीवृद्धि कर पायेंगे।

लव, युनिटी, फेथ और रिगार्ड का आपस में कंगन बांध संगठन को शक्तिशाली और एकमत बनाओ

हम सबका यह शुभ संकल्प है कि हमें सारे विश्व में साइलेन्स के वायब्रेशन फैलाने हैं। हमारे द्वारा सारे विश्व को शान्ति की किरणें मिलें। तो हम ब्राह्मण संगठित रूप में जितना मिलकर कोई भी कार्य करते हैं उतना पावरफुल वायब्रेशन फैलते हैं। इसके लिए हम सभी मिलकर ऐसा कंगन बांधे। ऐसा फाउण्डेशन मज़बूत करें जो सबको पीस का वायब्रेशन मिलता रहे और पीस के साथ-साथ हमारे लव और युनिटी का भी वायब्रेशन फैलता रहे।
२- जितना हम स्वयं को अन्तर्मुखी बनायेंगे जितना हम एक-दो के प्रति शुभभावना रखेंगे उतना ही हम एक-दो के सहयोगी साथी रहेंगे। कोई भी महान कार्य करने में हम सब का विशेष साथ है। तो अब क्यों, क्या के संकल्पों को समाप्त कर स्वयं को निमित्त समझो। जितना हम एक-दो को रिगार्ड देंगे और आपस में फेथ रखेंगे, उतना लव और युनिटी रहेगी।
३- अब तो हम सबको घर चलना है। हमें बाप समान सम्पन्न व कर्मातीत बनना है। अपनी कमाई जमा करने हम आये हैं। बाबा ने हमें जो भी शिक्षायें दी हैं उन्हें प्रैक्टिकल जीवन में लाना है। जब हम प्रैक्टिकल में लायेंगे तो हमें देख दूसरे भी करेंगे।
४- लोग कहते परमात्मा सर्वव्यापी है परन्तु हम ब्राह्मण अनुभव से कहते कि प्यारा बाबा हम सबके दिलों में व्यापी है। हमारे सामने निरन्तर सदा ही वह हजूर हाज़िर है। यह भी हम बच्चों की भावना है। जिसे उन्होंने 'सर्वव्यापी' कह दिया है। उठते-बैठते-चलते हम सब बाबा की सेवा पर हैं। हम खाते बाबा का, पीते बाबा का, बाबा के लिए कमाते। हमारा बाबा विचित्र, बाबा के हम बच्चे विचित्र... हमें दुनिया क्या जाने ! तो कितना न हम महान भाग्यशाली ब्राह्मण हैं जो मीठे बाबा ने हमें अलौकिक तख्त पर बिठाया है। हमें उड़ने का तख्त मीठे बाबा से मिला है। हमारे सामने कोई भी मेरा-पन नहीं। न मेरा कोई स्टूडैण्ट, न मेरी सर्विस। सोने की भी जंज़ीर नहीं। न कोई मेरी चार्ज है, न कोई मेरी डिपार्टमेन्ट है। हम सब बाबा के बच्चे, बाबा की भुजायें बाबा के मददगार हैं।
५- हम सब प्यारे बाबा की सेवा के निमित्त सर्वेन्ट हैं - हमारा सेठ, हमारा मालिक एक बापदादा है। हम सब उसके इशारे पर चलते हैं। तो क्या आज हम सभी मिलकर बाबा के सामने यह वायदा नहीं कर सकते कि बाबा, आपने जो कहा जिद्द और सिद्ध को छोड़ो, उसे हम सदा के लिए छोड़ते हैं। हम तो आपस में बहुत ही लव से, रिगार्ड से, युनिटी से और एक दो में फेथ रखते हुए चलेंगे। ऐसा कंगन आज हरेक को बाँधना है। इसके लिए बाबा ने कहा- तुम अपनी बुद्धि को समर्पण करो। यह सौगात मुझे दो।
तो हमारे दिल की आश है कि सभी ब्राह्मण कुल भूषण अपने आपसे इन ५ वायदों का सूत्र बाँधें -
१. हम सब एक-दूसरे में फेथ रख लव, युनिटी व रिगार्ड से चलेंगे। चाहे स्टूडेण्ट हो या सर्विस साथी।
२. सेवा में एक-दो के कनेक्शन में जो भी बातें आयेंगी उसे आपस में समाधान कर एक-दो को सैलवेशन देकर खुश करेंगे।
३. कभी भी किसी की निंदा व पर-चिन्तन की बात एक-दूसरे से नहीं करेंगे। स्व-उन्नति की बात से स्वयं को तथा दूसरों को आगे बढ़ाते रहेंगे।
४. बापदादा व निमित्त बनी हुई बड़ी बहनों से स्व-उन्नति व सेवा के प्रति जो भी डायरेक्शन मिलेंगे उसे प्रैक्टिकल कर फ़ालो करेंगे।
५. सरेण्डर बुद्धि होकर बेहद की दृष्टि से स्व व सेवा प्रति सदा सहयोगी रहेंगे।
हम सब मीठे बाबा के सखा सखी बन जायें तो आपस में भी एक ही स्नेह के सूत्र में रह सकते हैं। हम सबने बाबा को जीवन दान दी है। हम सब दान दिये हुए बच्चे हैं। तो हम शान्ति का भी दान दें। अगर हम एक-दो को डिस्टर्ब करते, बाह्यात बातें सुनते या सुनाते हैं तो बाबा ने कहा- ऐसी बाह्यात बातें सुनना व सुनाना माना पापात्मा बनना। वह दोस्त नहीं दुश्मन हैं। अगर मैं बाह्यात बातें करती तो मैंने श्रीमत का उल्लंघन कर विकर्म बनाया या सुकर्म ? तो हम सब मिलकर सबको शान्ति का दान दें। पीसफुल वातावरण बनाने का दृढ़ संकल्प लें।
हमें तो अब कई बार आता बाबा अब स्वीट होम ले चल। स्वयं को देखना है कि आज शरीर छूट जाये तो हमारी स्थिति क्या होगी ? हमें तो कर्मातीत होना है। हमें तो बाबा के स्वीट घर का गेट खोलना है। जब वतनवासी वतन में बैठा तो हमें इस दुनिया से क्या मतलब! हमें किसी के लिए नहीं रुकना है। हमें तो आकारी वतन में जाना है। हमें स्वयं को रेडी करना है। दूसरे से क्या लेना ? मुझे क्या करना है यह सोचो। हमें तो अब घर जाना है या छोटी-छोटी बातों में समय गंवाना है? आपस में सब स्नेह का सूत्र बांधे तो जो छोटी-छोटी बातों में बड़ों का समय जाता है वह खत्म हो जाये। खुद ही किचड़ा फेकते हो फिर खुद को ही मच्छर काटते हैं।

हर एक अपनी अलौकिक जन्मपत्री में देखो कि हमारी रेखायें व दशा कैसी है

त्रिकालदर्शी बाबा जो हमारी सारे कल्प की जन्मपत्री को जानता है। उस भूगुऋषि बाप ने हमारे सारे कल्प की जन्मपत्री को जानते हुए भी हिसाब पूछा है कि हरेक बताने मेरी जन्मपत्री क्या है?
बाबा हमारी वर्तमान जन्मपत्री का हिसाब पूछता है, जिसके आधार से पता चलता कि हमारा वर्तमान और संगम का भविष्य अर्थात् अन्तिम स्टेज और भविष्य में अगला जन्म क्या होगा ? वर्तमान के आधार पर अन्तिम है और अन्तिम के आधार पर ही भविष्य है।
हमारा पहला एक सवाल उठा कि भूगुऋषि इस ज्ञानी योगी बच्चों की जन्मपत्री जानना चाहता है, वह ज्योतिषि जन्मपत्री देखते, वह कर्मों का हिसाब-किताब बताने वाली होती, लेकिन हमारी जन्मपत्री कर्मों के खाते को समाप्त करने की है तो हम अपनी जन्मपत्री द्वारा देख सकते हैं कि हमारा हिसाब-कितना कहाँ तक चुक्तू होता जा रहा है? सही जन्मपत्री धर्मराज के आगे पेश होनी है। तो हर एक अपनी जन्मपत्री में देखे कि हमारे भाग्य की रेखायें कैसी है? हमारी दशा एकरस रहती है? ऐसे तो नहीं आज ऊँची कल नीची हो जाती? जैसे सीढ़ी के चित्र में दिखाया है कि हम संगम से सीधा ऊपर जाते है, ऐसे ही हमारी दशा इधर-उधर तो नहीं होती। कोई भी कारण से मेरी दशा बदलती तो नहीं है?
बाबा ने हम सबको अपनी रेखाओं को सीधा बनाने व दशा को एकरस रखने का साधन दिया है- योग। हम कर्मयोगी है, हम राज्य स्थापन करने वाले योगी है। हम ज्ञान सहित योगी हैं, हम पवित्र योगी है। लोग तो अपने कर्मों को पवित्र बनाने की मेहनत करते लेकिन बाबा ने हमें पहले ही भाई-भाई की दृष्टि पक्की कराई, हमारी बुद्धि में सदा बाबा है, हम लगन में मगन रहने वाले पवित्र योगी हैं क्योंकि हमारे सामने बापदादा है, हम शीतल योगी हैं।
हम योगी बनते नहीं है लेकिन जिस घड़ी बाबा के पास आये उस समय से योगी है। योग का अर्थ है दुनिया की हर चीज से बेहद के वैरागी। जब हमारी स्टेज योगी की है तो मेरे योग को माया तोड़ नहीं सकती। यह ईश्वरीय नशा है। यह विल पावर है जिससे दृढ़ता आती है।
आज बाबा ने कहा तुम सब युद्ध के मैदान में खड़े हो, तुम्हें मायाजीत, जगतजीत बनना है, उन योद्धों को तो खिला-पिलाकर ऐसा आराम से रखते हैं, सिर्फ उन्हें इतना ही आर्डर होता है कि तुम्हें बार्डर की रक्षा करनी है लेकिन हमें बाबा ने योद्धे तो कहा, साथ में कहा तुम योद्धों को वैरागी और त्यागी होकर रहना है। हम बाबा का सहारा लेकर अपने लिए ही मायाजीत बनते हैं, हमें पहले से ही मालूम है कि हम विजयी है।
अब सवाल उठता है कि हम योद्धे हैं या योगी? हम तो सहज सरल योगी हैं। योद्धे कहना भारी बात हो जाती, हम सहजयोगी है। सहजयोगी समझने से सब मुश्किलातें खत्म हो जाती हैं, भारीपन समाप्त हो जाता है।
योगी समझने से एक की लगन में रहते, क्योंकि नशा रहता कि हम विश्व पर राज्य स्थापन करने वाले, विश्व को परिवर्तन करने वाले योगी हैं। योगियों को एक है अतीन्द्रिय सुख में मगन रहने का सुख है। ऐसे अपने से बातें करो तो कोई मेहनत, मुश्किल नहीं दिखाई देगी। योग की मस्ती में रहने से कितना भी व्यस्त होंगे लेकिन व्यस्त नहीं लगेगे। पेपर हमारे सब पास हो गये हैं, पेपर देने हैं यह नहीं लगता। पेपर तो दे चुके अभी तो हम विश्व सेवा पर निमित्त बैठे हैं। सरल योगी समझने से कोई भी मुश्किलात सरल हो जाती है। हमारे ६३ जन्मों के खाते खत्म हुए ही पड़े है, बाकी नाम-मात्र के कुछ हैं जो पूरे हो जायेंगे।
योगी लाइफ बड़ी शीतल, बड़ी सरल रहती, कोई भारीपन नहीं। एक बाबा साथ है तो सब सरल हो जाता है। जो नालेज बाबा ने हमें दे दी उसके अन्दर सब कुछ समाया हुआ है, हमें सारी नालेज है, हमारी नालेज में साइन्सदानों की साइन्स भी समाई हुई है। हमें यह संकल्प आ नहीं सकता कि हमें यह नालेज नहीं है।
हम बच्चों की बुद्धि में बाबा की एक बात घड़ी घड़ी याद आती है कि बाबा ने कहा है बच्चे घर चलना है। कार्य व्यवहार करते भी घर चलने का अटेंशन हो। हम सबके आगे एक सैम्पल हैं। हमारा चलना, हमारा बोलना, हमारे हर कर्म की सब कॉपी करते हैं। इसलिए इतना अटेंशन रखना है।

विकारों पर विजय पाने के लिए गुप्त योगी बनो

बाबा ने हम बच्चों को ऐसी समज दी है जो हमें भटकने से छुड़ाती जाती है। मनुष्यों को भक्ति भी बहुत भटकाती है, तो विकार भी चटकाते हैं। विकारों के वशीभूत आत्मा विकारों से छुटकारा पाये यह बडा मुश्किल है। विकारों की कमजोरी परमात्मा बाप का बनने नहीं देती। कमजोरी सत्यानाश कर देती है। विकारों पर विजय पाने के लिए 'गुप्त योगी' बनना पड़े। शो करने वाला नहीं। शो करने वाला कभी भी भागन्ती हो सकता है। ऊपर से कहेंगे बाबा बाबा लेकिन अन्दर से जो सच्चा प्यार चाहिए, वह नहीं। बाबा के साथ भी बाबा को झूठा प्यार दिखायेंगे। अंदर होगी ठगी, चोरी दूसरे किसी को प्यार करते होंगे जरूर। कोई सम्बन्धियों को प्यार करते होंगे, कोई धन दौलत से करते होंगे. फिर पार्ट बाबा के साथ ऐसा बनायेंगे, बाबा यह सब तो आपका है। परन्तु एक भी चीज को हाथ लगाने नहीं देंगे। अगर तन-मन-धन सब तेरा कहा तो तेरा माना सदा उसकी सेवा में हाजिर। मन तेरा माना कहाँ भी भटक नहीं सकता। एक बाबा दूसरा न कोई। धन तेरा है माना मेरे पास धन नहीं, जो खिलाओ, जहां बिठाओ।
२. हम बाबा के बच्चे बेफिकर बादशाह है। फिकर नहीं है लेकिन मस्त फकीर है। जहाँ पाँव रखें वहाँ बाबा की सेवा। नहीं तो हमको जरूरत नहीं है धरती पर पाँव रखने की। अब हमारी अवस्था ऐसी हो धरती पर पाँव है तो सेवा अर्थ हैं, नहीं तो ऊपर भी हमारे लिए बहुत सर्विस है। चारों ओर सर्विस है। अगर बाबा सेकण्ड में आ जा सकता है तो हम भी तो बाबा के बच्चे सेकण्ड में आ जा सकते है। बाबा पतित तन में आया लेकिन भूमि ऐसी पावन बनाई जहाँ आत्मायें आकर पावन बने। सेन्टर्स फायर ब्रिगेड हैं, जहाँ आग लगे बचाने के लिए, दुनिया के हर कोने में फायर ब्रिगेड है। लेकिन बचकर कहाँ आयेंगे? बाबा का घर देख लिया है। विनाश के समय स्कूल में नहीं पहुँचेंगे तो बुद्धि से तो पहुँच ही जायेंगे। इतना हमारा अभ्यास हो, यहाँ आग लग रही है और हम ऊपर चले जाएँ। सेकण्ड में अशरीरी बनने की प्रैक्टिस हो, इसकी रिहर्सल करो। हमारे अन्दर बाबा की इतनी याद ही जो कोई भी आत्मा को हमारा यह शरीर दिखाई न पड़े। इसके लिए गुप्त याद।गुप्त बाबा से अपनी लगन लगाते जाना यह है सच्चा पुरुषार्थ।
३. आज इंटरनेशनल वर्ल्ड पीस डे है । आज के दिन अपनी जो विधि रहती वा शुभ संकल्प रहता कि आज हम सब ब्राह्मणों का वर्ल्ड पीस डे है, यह भी एक बहुत बड़ी अनायास ही ड्रामा अनुसार जो विधि फिक्स हुई है, इसका भी देश-विदेश में अच्छा ही प्रभाव है। यह भी अच्छा साधन है। विदेशों में इस दिन को बहुत महत्व देते हैं। आज के दिन क्लासेज के भी संगठित रूप में प्रोग्राम चलते, सभी का मिलन भी होता। यह समय करीब-करीब सभी को अनुकूल भी होता है। हम सभी का यही शुभ संकल्प हैं कि हमें विश्व में अपने साइलेन्स के वायब्रेशन चारों तरफ फैलाने है। तो सभी के अन्दर सबेरे से यह संकल्प रहता कि आज हम सारे विश्व में शान्ति की किरणें फैलायें।
४. हम जितना संगठित रूप में मिलकर हर एक कार्य करते हैं उतना पावरफुल वाइब्रेशन बनता है। तो हम सब एक साथ मिलकर ऐसा कंगन बांधे जो पीस के साथ-साथ लव और यूनिटी का भी वाइब्रेशन सबको मिले। जितना हम सभी स्वयं को अन्तर्मुखी बनायेंगे, जितना हम एक-दो के प्रति शुभ भावना रखेंगे उतना ही हम एक-दो के सहयोगी, साथी रहेंगे। कोई भी कार्य व्यवहार में हम सबका साथ है। अब क्यों, क्या के संकल्पों को समाप्त कर स्वयं, स्वयं को अचल बनाओं।

मर्यादा सम्पन्न जीवन बनाने के लिए ध्यान देने योग्य कुछ बातें

हमारे संगठन का सूत्र है एकमत। एक मत का आधार है 'फेथ'। जब आपस में एक दो में फेथ रखते हैं तो सहयोग अवश्य मिलता है। आपका कार्य सो मेरा कार्य। फेथ के पीछे मैं और तू, तेरा और मेरा सब समाप्त हो जाता है। फेथ रहे तो कभी भी अभिमान नहीं आयेगा। आपकी महिमा सो मेरी महिमा। आपकी बढ़ाई सो मेरी बढ़ाई। इसलिए हम अपने समान साथी को इतना रिगार्ड दें जो वह आपेही हमें दे, कहना न पड़े यह भी 'मर्यादा' है।
२. हरेक की विशेषताओं को देखना है। हरेक में बाबा ने कोई न कोई खूबी जरूर भर दी है। बड़ीं बढ़ाई बाबा की है, मेरी नहीं। सदैव अपने सामने लक्ष्य हो बाबा। बाबा ने हमें निमित्त बनाया है।
३. लॉ उठाना, टोन्ट कंसना, टोक देना, यह मेरा काम नहीं है। मैं कभी भी अपने हाथ में लॉ नहीं उठा सकती। हमें बाबा जो सेवा देता उसे प्राण देकर करनी है, यह हमारा लक्ष्य हो। फेथ को तोड़ने वाला कांटा है रीस'। तो मुझे आत्माओं से रीस नहीं करनी है रीस करनी तो बाबा से क्योंकि हमें बाप समान बनना है।
४. ईर्षा करना ‘ मंथरा ' का काम है। यह वायदा करो कि मैं मंथरा नहीं बनूंगी। ईर्ष्या अथवा विरोध भावना दूसरे की निंदा करायेगा। ईर्ष्या करना यह रावण की मत है। बाप की नहीं।
५. हरेक की बात का भाव समझना है, स्वभाव को नहीं देखना है। अगर किसी की गलती दिखाई भी देती है तो बाबा ने हमें समाने की शक्ति भी दी है। कभी एक की बात दूसरे से वर्णन नहीं करना है। भल सुनो, लेकिन उसे कहीं पर सुनी अनसुनी कर दो। भूल को अन्दर रखने से वाइब्रेशन खराब होता है। दूसरे की भूल को अपनी भूल समझो।
६. अपनी स्थिति को सदैव सुखमय रखो। कभी भी तंग दिल, उदास दिल नहीं बनना है। कोई झूठा अपमान करेगा कोई सच्चा। दुनिया की टक्करें अनेक आयेंगी लेकिन हमें उदास नहीं होना है। पत्थर भी पानी की लकीरें खा-खाकर पूज्यनीय बनता है। तो हमें भी सब कुछ सहन करके चलना है। हलचल को समाप्त करने का साधन है- बाबा से बाते करना। बाबा के पास जाओ तो बाबा आपेही कदमों में बल भर देगा।
७. मुझे किसी भी आत्मा पर डिपेन्ड नहीं करना है। आत्मा पर डिपेन्ड करने से बैलेन्स बिगड़ जाता है। बाबा पर डिपेन्ड करो। एक दो का आधार लेकर चलना बिल्कुल गलत है। मुझे तो साथी चाहिए, सहयोग चाहिए नहीं। मेरा साथी 'एक बाबा' है। मैं बाबा से ही सहयोग लूँ।
८. दूसरों को सन्तुष्ट करना यह बहुत बड़ा पुष्प है। इससे हमारी आत्मा को बल मिलता है। किसी के गुणों पर मोहित नहीं होना है। सदा बाबा को आगे रखो। बाबा को आधार बनाओ तो किसी में भी फसेंगे नहीं।
९. हमारा संसार बाबा है इसलिए कभी भी अन्दर में यह भावना नहीं आनी चाहिए, यह मेरा स्टूडेन्ट, यह तेरा। किसी भी प्रकार का स्वार्थ नही। स्वार्थ अधीन बना देता है। किसी देहधारी में स्नेह जाता है माना स्वार्थ है। इस स्वार्थ से ईश्वरीय मर्यादाओं का उल्लंघन होता है इसलिए साकार बाबा ने हमेशा हमें स्नेह दिया लेकिन स्वार्थ का स्नेह नहीं दिया तो जैसे हमारा बाबा नि:स्वार्थी था वैसे निस्वार्थी बनो। तो सबसे न्यारे और प्यारे बन जायेंगे।
१०. ऐसा कभी नहीं सोचना है कि मेरा कोई सहारा नहीं है। लेकिन विघ्नों से घबराओ नहीं। विघ्न भल कितना भी बड़ा हो लेकिन अपने संकल्प से कभी भी बडा नहीं करो।
११. माया से डोन्ट केयर करना ठीक है, आपस में नहीं। जो आपस में डोंट केयर करते उनको जबान पर लगाम नहीं रहता। जो आता वह बोल देते, वह स्वभाव भी डिससर्विस करता है।
१२. जिद्द का स्वभाव ही ज्ञान में बहुत विघ्न डालता है। जिद्द वाले अपना और दूसरों का नुकसान करते हैं। जहाँ जी हा' का स्वभाव है वहाँ सब फूल बरसाते, दुआयें देते, जहाँ जिद्द है वहाँ पानी के मटके भी सूख जाते हैं।
१३. हम निमित्त बनने वाले बच्चों का कभी मूड आफ नहीं होना चाहिए। अगर मूड आफ करके किसी को मुरली सुनाते, गद्दी पर बैठते तो बहुत बड़ा पाप चढ़ता है।
१४. अपने बड़े से कभी भी न उम्मीद नहीं बनना है। सदा स्वमान में रहना है। ऐसे कभी नहीं सोचो यह तो मेरे पुराने संस्कार हैं। यह सोचना भी उसकी पालना करना है। पुराना संस्कार झूठा भोजन है। फिर क्या उस झूठे भोजन का भोग बाबा के सामने रखेंगे? मेरा तो दिव्य संस्कार हो, ईश्वरीय संस्कार हो। बहुत समय से पाले हुए संस्कार हैं उन सब संस्कारों को जीरो देने का दृढ़ संकल्प करो। रियलाइज कर उन्हें खत्म करो। व्यर्थ संकल्प तभी खत्म होंगे जब व्यर्थ संस्कार खत्म होंगे। हमनें नई गोद ली, हमारा नया जन्म है। हम ब्राह्मकुमार है तो यह परिवर्तन करो।
-१५. कोई भी किसी में पुरानी आदत हो, प्लीज उसे समाप्त करो। बाबा की लगन, बाबा की मस्ती उसी धुन में रहो। अपने को दुआओं के आधार पर चलाओ। बाबा की दुआयें लेते चलो। मुझे हर आत्मा से दुआ जरूर मिलनी चाहिए। दुआयें हमारा प्यार हैं, प्यार ही हमारी दुआये हैं। जहाँ सर्व का मेरे से, मेरा सर्व से प्यार है वहाँ मेरे बाबा की दुआये हैं। इससे ही मुझ आत्मा की उन्नति है। वाह हमारा अन्तिम जन्म, अन्तिम घड़ी है, किसकी हमारे उपर दुआ नहीं है तो उससे किसी भी तरह दुआयें जरूर लेना है।
१६. हम बच्चे जो बाबा के पास स्वाहा हुए हैं उनमें अनुमान, मूड आफ, परचिन्तन, ईर्ष्या, द्वेष आदि की रस्सिया नहीं होनी चाहिए। इन रस्सियों को भी इस यज्ञ में स्वाहा करो। यही सच्चा मंगल मिलन है।
१७. जहां नियम है वहीं संयम है। जहाँ कायदा है वहीं फायदा है। ईश्वरीय मर्यादा ही हमारा स्वधर्म है। सबसे प्रेम करो लेकिन प्यार मत दो, बाबा से सम्बन्ध जूटाओ स्वयं से नहीं। हल्का व्यवहार मत करो। गम्भीर रहो। इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का नियम है- दूर बाज, खुश बाज रहो.. हंसी से बात न करो। काम से काम बस... ओम् ‌शान्ति।

नवरात्रि -

चैतन्य शिव शक्तियों का यादगार
ड्रामा अनुसार आज का दिन विशेष हम कल्प पहले वाली शक्तियों के आह्वान का दिन है। सर्वशक्तिवान बाप ने गुप्त रूप में हम शक्तियों को शक्ति दी है। असुर संहारिनी, भक्तों की रक्षा करने वाली हम सब 'शिव शक्तियाँ' है। शिव-शक्ति अर्थात् शिव परमात्मा से प्राप्त हुई शक्ति जिससे हम असुर संहारनी बने हैं। स्वयं से अथवा सारें विश्व से आसुरी वृत्तियों को समाप्त करने का काम हमारा है। शक्तियों का ही गायन है असुर संहारनी, दूसरे तरफ़ शीतला देवी का भी गायन है। तो क्या आज सुबह से भक्तों का आह्वान सुनाई नहीं दे रहा है? भक्त हमें पुकार रहे हैं, चिल्ला रहे हैं 'ओ माँ, ओ माँ'.... इन शक्तियों को ब्रह्मचारिणी कन्या ही दिखलाया है। आज जब मैं आपके सामने आई तो मैं भक्तों की आवाज सुनकर आई थी। प्यारे बाबा के गुण गा रही थी सर्वशक्तिवान बाबा, आपने हमें कितना गुप्त रूप में रखा है, जिनका आज भक्त गायन कर रहे हैं। स्वयं से पूछना है क्या हम वहीं पतित संस्कारों को संहार करने वाली शक्ति हूँ? शक्तियों को सहस्र भुजाधारी दिखलाते हैं, तो क्या हम ऐसी शक्तिया है?
सवेरे योग में यही महसूस हो रहा था कि हमारे हाथ में ज्ञान के अस्त्र-शस्त्र है, योग का स्वदर्शन चक्र है। दैवी गुण रूपी कमल फूल है, भिन्न-भिन्न भुजा में भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र है। ये हमारा यादगार है कि हम सदा शस्त्रधारी भुजायें है। कोई भुजा हिलती-डुलती तो नहीं है? बाबा ने हमें आष्ट शक्तिया दी हैं। क्या ऐसे कहेंगे कि 6 शक्तियाँ तो है, दो नहीं है?
हम असुर संहारिनी हैं तो स्वयं में देखो कि आसक्ति रूपी असुर तो नहीं है? मान-शान रूपी असुर तो नहीं है? मोह रूपी असूर तो नहीं है? शक्तियां कहे मेरे में छोटा मोटा असूर है तो क्या उन्हें 'असुर संहारिनी' कहेंगे? शक्तियाँ जितनी संहारी है उतनी कल्याणी हैं। निर्भय, निर्वैर है। हमारे में भय है? हमारा किसी से बैर है? शक्तियों की महिमा में ऐसा नहीं कहा जाता है कि भक्तों की वैरी हैं, नहीं। असुरों की संहारिनी भक्तों की रखवाली करने वाली है। हम सबका उद्धार करने चाली उद्धार-मूर्त शक्तियाँ हैं तो हमारे में सर्व के प्रति स्नेह, सहयोग की भावना रहती है या किसी के प्रति घृणा की, ईर्षा की, नफरत की भावना भी रहती है? हमें बाबा से सर्व शक्ति लेकर सबको जीयदान देना है, प्राणदान देना है। बाबा ने हमें कितना महान बनाया है, कितना हमारी भक्त महिमा करते, कितना हमारा-मान-शान-गायन आधाकल्प से भक्त गाते हैं। जब ऐसी ऊंची सीट पर बैठ अपना यादगार देखते तो बाबा के गुण गाते। जग मेरे मान-शान कर गायन करता, मेरे बाबा के साथ मेरा गायन है। हमें कहा ही गया है जगत की मातायें, जगत अम्बा, दुर्गा, काली, शक्ति। मैं जगत की माँ हूँ, सब मेरे लिए छोटे बच्चे हैं क्योंकि बाबा कहते कि बिचारों को यही ज्ञान नहीं है कि इसका बाप कौन है। बिचारे उनको कहा जाता है, जिनको ज्ञान नहीं। बाबा ने हमें त्रिकालदर्शी, महान से महान बनाया है, कितनी ऊंची सीट पर बाबा ने बिठाया है।
तो भाषण करने से पहले देखो मेरी स्टेज ठीक है, जो भक्त मेरा साक्षात्कार करें। जब तक हम स्वयं की सीट पर या स्टेज पर नहीं बैठे हैं तब तक हम दूसरों की क्या सेवा करेंगे। अगर सदा मेरी यह स्थिति नहीं तो भक्त मेरा क्या साक्षात्कार करेंगे? सबको सर्विस का बहुत शौक रहता है, जोश रहता है। सेवा के साथ-साथ स्वयं के स्थिति की सीट भी ठीक हैं? जैसे लॉ और लव का बैलेन्स, जीवन में बराबर रखते हैं, वैसे सेवा के साथ-साथ स्वयं की स्टेज है? प्लैन बनायेंगे, तन-मन-धन से सर्विस में लग जायेंगे, परन्तु कई बार अपनी स्टेज खो बैठेंगे। उसको भाषण करने के लिए कहा, मुझे नहीं कहा, इसे सब चान्स देते हैं. मुझे नहीं। बड़े का मान रखते हैं, छोटो का नहीं। पता नहीं कितने सवाल सर्विस की स्टेज के साथ उठाते हैं। गये स्टेज तैयार करने और अपनी स्टेज खराब कर दी। उस समय अपनी स्टेज को तैयार करने का नहीं रहता। अरे, तुम अपना रिकार्ड क्यों खराब करते हो? चले अनेकों का सुधार करने और अपना बिगाड़ कर लिया।
तो सदा यह नशा रहे कि हम वहीं शेरणी शक्ति है। हम ऐसे ऊँचे स्थान पर बैठे हैं। हमारा बावा कितना महान है, फिर भी कितना निर्मान है। सदा ये सोचो-हम गाडली स्टूडेंट हैं। सब सब्जेक्ट में हमारा बैलेन्स बराबर हो। हमारी चार सब्जेक्ट हैं- 1. ज्ञान 2. योग 3. देवीगुणों की धारणा और 4. सेवा। लेकिन दिखाई देता है पहले सेवा और ज्ञान फिर बाद में योग और धारणा। इसलिए कभी उदासी के दास बनेंगे, कभी मूड आफ के दास बनेंगे।
बाबा ने हमें बनाया है- 1. सहज-योगी, 2. ज्ञानी-योगी 3. शीतल-योगी।
योगी सदैव हर्षित मुख रहते हैं। हम संगम के देवी-देवतायें हैं, अगर हमारे में अभी धारणा है तो भविष्य में भी रहेगी। देवताई संस्कार अभी ही हम भर रहे हैं। हमारे अन्दर से आसूरी संस्कार खत्म हो गये हैं या कभी जोश आ जाता है?
हम 'पतित-पावन' बाप की सन्तान हैं। स्वयं से पूछो मैं पतित-पावन की सन्तान, कभी हमारे अन्दर पतित संकल्प तो नहीं उठते हैं? किसी पतित आत्मा का वायब्रेशन तो नहीं आता है? मैं असुर संहारिनी है, असुर कहीं मेरा तो संहार नहीं करते? आज की दुनिया में कीचक जैसे लोग घुमते रहते हैं, जिस बात के पीछे. लोग हैं हम उनसे ऊपर हैं?
दुनिया समझाती है इस पतित दुनिया में कोई बाल-ब्रह्मचारी बनके दिखावे, प्रवृत्ति में पावन रहकर दिखावे, यह तो बहुत मुश्किल है। इसलिए संन्यासी जंगल में चले जाते हैं। प्यारे बाबा ने हम नारियों को आगे बढ़ाया है। औरों ने तो ठूकराया है और बाबा कहते तुम शक्तियाँ स्वर्ग के द्वार खोलने के निमित्त हो। हमारा बहुत बड़ा गुलदस्ता है, अगर इस शक्ति के झुण्ड के बीच कोई भी एक गन्दे वायब्रेशन में बैठा हो तो इस झुण्ड के बीच वो क्या दिखाई देगा? एक के नाम के कारण सभी का नाम बदनाम होता है, इसलिए हे शक्तियाँ, अपने झुण्ड को सदा सेफ रखो। ऐसा न हो की नाम बदनाम हो। किचक के 20 मुख होते इसलिए उनसे बहुत सम्भाल करो। भोली-भाली बन कर नहीं रहना है। अच्छा।

अपने जीवन से अनेकों को प्रेरणा देना-यह भी वरदान प्राप्त करने का साधन है

हम एक तरफ राजऋषि हैं दूसरे तरफ संगम के सिंहासन पर बैठने वाली महारानियां। बाबा ने कहा है कि भविष्य के सिंहासन पर तो राजा-रानी बैठेंगे लेकिन मेरा दिलतख्त इतना विशाल है जो मेरे इस दिल तख्त पर सभी बच्चे बैठ सकते हैं, जिसने इस संगम का सिंहासन जीत लिया उसने विश्व का सिंहासन जीत लिया। तो हरेक अपने दिल से पूछे कि मैंने दिलाराम के दिल का सिंहासन जीत लिया है? दिखाते हैं लव-कुश ने राम को जीता। यह भी हमारे सामने एक दृष्टांत है। हम बच्चों ने दिलाराम के दिल-तख्त को जीता है। दिलाराम बाप की दी हुई सेवा पर दिल से तत्पर है। दिल भी हमारी बुद्धि के अन्दर आती। जैसे प्राण माना आत्मा वैसे दिल माना आत्मा।
गीता के महावाक्य है "नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप"। मेरा यह सवाल उठता-नष्टोमोहा बन सर्विस पर आये हैं या नष्टोमोहा बनने सर्विस पर आये हैं? स्मृति-स्वरूप बनकर मैंने सोचा ये पुरानी दुनिया क्या है, ये जीवन क्या है, इसमें मोह क्या रखें? ऐसा समझकर आये या मोह नष्ट करने के लिए आये?
अगर मैंने स्मृति स्वरूप होकर स्वयं को सेवा में लगाया है, माना ज्ञान स्वरूप होकर सेवा में लगे हैं। उनके साथ ही अपने सर्व सम्बन्ध, माता, पिता, बंधू... आदि सब है। बाबा कहने से बाबा के गुण, शक्ति, सारी महिमा सामने आ जाती है। बाप भगवान है माना नालेजफुल है, सर्वशक्तिवान है अर्थात् सर्वशक्तियों का वर्सा देने नाला है। ऐसे बाबा को सर्व सम्बन्धों से जानकर, सोच समझकर मैं समर्पित हुई हूँ या पांव इस तरफ रखा सिर दुनिया तरफ़ है? भक्ति मार्ग में सिर झुकाते हैं, दण्डवत् प्रणाम करते है, मानस पूरा ही समर्पण करते हैं। तो स्वयं से पूछे- मैं पूरी झुकी हूँ अर्थात् पूरी समर्पित हूं?
वरदान तब मिलता है जब पूरा दान करते हैं, बाबा ने ईश्वरीय अनादि नियम बनाया है, एक दो तो दस पाओ, धरती को एक दाना देते हैं तो 100 देती है, अब पूछो मैं पूरा दानी बना हूँ? भक्ति में भी ईश्वर-अर्पणम् या कृष्ण-अर्पणम् करते है, तुम किसी मनुष्य को दान नहीं देते, तुम सब मुझ शिवबाबा को दान करते हो तब मेरे से तुम्हें वरदान मिलता है। ज्ञान का शक्ति का गुणों का, यह खजाना तुम बाटते हो। जितना-कितना औरों को बाँटते उतना स्वयं भी भरपूर होते हैं। एक दिया 100 पाया। इतना जमा होता है, जिसे कहते हैं वरदान मिलता है। तो बाबा हमें दान देकर फिर हमसे दान कराता है। फिर वह और ही 100 गुणा भरतू होता है। तो जो भरतू होता है वह है 'वरदान'। जैसे किसी गरीब को दान दिया उसने सिगरेट पी लिया तो हमारे ऊपर बोझ रहा, इसी तरह बाबा ने मुझे दान दिया और अगर बाबा के मिले दान का उपयोग ठीक नहीं किया तो वरदान की बजाय श्राप हो जाता है। यह निर्णय शक्ति चाहिए। मान लो हमने किसको मुरली सुनाई, ज्ञान दिया, बाबा की याद का अनुभव कराया, जिससे आत्मा को बड़ी खुशी हुई, उसने हमें दुआ दी, यहाँ तक तो ठीक, लेकिन जब मैंने कहा ये मेरे से बहुत प्रभावित हुआ, बहुत खुश हो गया, तो यह जमा नहीं किया, स्वीकार कर गंवा दिया। अहम्-भाव आया तो बैलेन्स बराबर। जो जमा किया वह माइनस हो गया-खत्म। वह दान वरदान नहीं रहा। ऐसे ही में कोई की बहुत मीठी सेवा कर रही हूँ, बहुत अच्छी तरह समझाती हूँ, समझाते-समझाते आत्मा की स्थिति में स्थिति हो जाती हूँ उसे भी अनुभव कराया, शान्ति कर, लाइट अवस्था का साक्षात्कार कराया, परन्तु दूसरे क्षण उसने मेरे देह-अभिमान की अवस्था देखी तो एक तरफ हाइएस्ट स्टेज, दूसरे तरफ एक क्षण में लोएस्ट स्टेज। तो क्या सोचेगा? वरदान भी दिया फिर वापस भी ले लिया क्या हुआ? जमा तो नहीं हुआ ना!
तो हरेक अपने से पूछे कि मैंने अपनी जीवन 'त्यागी' बनाई है? त्याग की परिभाषा बहुत बड़ी है, जितना हम त्यागी बनेंगे उतना ही तपस्वी बनेंगे। बाबा ने कहा योग न लगने का कारण नाम-रूप में फंसते हैं, देही -अभिमानी नहीं बनते, यह हमारी चाभी है, देखना है हम कहाँ तक देही-अभिमानी बने हैं?
अगर मेरे में जिद्द का स्वभाव है, नाम तो है जिद्द, लेकिन छोटा जिद्द का स्वभाव क्या मुझे करदान प्राप्त करायेगा? जैसे मुझे कोई कहता- ये कार्य करना है, मैं जिद्द के स्वभाव के कारण कहती मैं नहीं कर सकती। लेकिन यह कार्य बाबा का है, वह मुझे करने के लिए कहता, उससे अनेक आत्माओं को हर्ष मिलता, उत्साह मिलता, कितना लाभ होगा, ना कर दिया तो उन सबका बोझ मेरे ऊपर चढ़ गया। नाम है जिद्द, परन्तु उसमें कितना नुकसान हुआ।
बाबा ने हमें अमृतवेले से रात तक हर कर्म करने के जिम्मेवार बनाया है, किसी कारण से अमृतवेले नहीं उठते। परन्तु ये भी सोचा कि मेरे उठने से कितनों को प्रेरणा मिलती है? ये प्रेरणा मिलना ही वरदान है। ऐसे ही अनासक्त-पन की जीवन देखकर सब सीखेंगे। थोड़ी घड़ी के लिए मेरे में सुस्ती है, तबियत के कारण या मेरी नेचर सुस्त है, क्या मेरी सुस्ती की नेचर औरों को प्रेरणा देगी या उसे बेमुख करेगी? सुस्ती के कारण मैं किसी को बेमुख करू या मैं अपना मूड आफ अर्थात् स्वीच आफ करके अन्धकार कर दूँ, तो उसका कितना बुरा प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा ? कई तो बड़े फलक से कहते हैं कि आज मेरी मूड आफ है। जैसे बाबा ने कहा 'ओम् शान्ति'। हम कहते 'मूड-शान्ति'। अगर कोई कारण से मूड आफ भी हुई तो उसे बाबा की याद से सेकंड में खत्म कर दो। आज साइन्स की शक्ति वाले सैकण्ड में अन्धकार से प्रकाश कर देते हैं, इस साइलेन्स की शक्ति से मूड शान्त नहीं कर सकते?
हम सब ओपेन थियेटर में बैठे हैं, हमें सारी दुनिया देख रही है,हम बाबा के बच्चे हैं, नूरे रत्न है, आँखों के तारे हैं. बाबा ने हमें नयनों पर बिठाया है, हम -आप साधारण नहीं है। लेकिन हम असाधारण अलौकिक हैं, हमारा बाबा निराला, हम भी निराले, बाबा हमेशा कहते बड़े तो बड़े छोटे शुभान अल्ला, आप सब बाबा की छत्रछाया, शक्ति के नीचे बैठे हो, नहीं तो आज का जमाना बहुत खराब है, आप सब एक दृढ़ संकल्प लेकर बाबा की गोद में आये हे। तो अपने से रूहरूहान करनी है कि हमें बाप के समान बनना है। सम्पन्न करना है, समीप रहना है।
जग को परिवर्तन करने वालों को पहले स्वयं को परिवर्तन करना है। मेरे जीवन का हमेशा लक्ष्य रहता जो बाबा की पहले दिन की श्रीमत है आज्ञाकारी, करमानबरदार, वफ़ादार। दूसरा है त्याग, तपस्या और सेवा इन सबका आधार है "श्रीमत"। श्रीमत में रहने से हमारी तथा सर्व की सेवा है, इसमें ही कल्याण है।
ईश्वरीय मर्यादा कहती है- तुम्हें अन्तर्मुख रहा है, मेरी पसन्दी है बाद्धमुखता, अगर मैं अन्तर्मुख न रहूँ तो दूसरों को कैसे कहेंगे? तो में कौन सी मैंने सर्विस की ? बाह्यमुखता को मेरी नेचर है, अन्तर्मुखता बाबा को श्रीमत है, तो मुझे आज्ञाकारी बनना है। अगर नहीं रहती हूँ तो क्या मैंने आज्ञा का पालन किया या उल्लंघन किया? आज्ञा पालन करने में चाप का आशीर्वाद मिला, न करने में श्राप।

मरजीवा बनना माना सब कुछ दान कर देना, विकल्प समाप्त हो जाना

बाबा आया है हम बच्चों को जीते जी मर जीवा बनाने। मरजीवा बनने की विधि बाबा ने सुनाई है 'दे दान तो छूटे ग्रहण'। तो आज इस बात पर सभी विचार करो कि हमारा मरजीवा जन्म है। मरजीवा अर्थात् सब कुछ बाप को दान दे दिया। दान किया माना ग्रहण छूटा। यज्ञ में हमेशा दान किया जाता, दान करते तो मन-इच्छित फल मिलता है। तो कौन-सा दान हमें इस यज्ञ में करना है? यह है अपने जीवन का दान। चाहे इसे 'जीवन' शब्द कहो, बाहे 'तन-मन-धन' कहो, चाहे 'स्वभाव-संस्कारों का दान कहो या 'देह सहित देह के सब संबंधों का दान कहो। पिछला जो कुछ है उसका दान। दान माना दान। दान की भाषा बहुत बड़ी है। शब्द सिर्फ दान है।
तो हरेक विचार करो कि क्या मेरी यह जीवन दान की हुई है या दान करना सोच रहे हैं ? दान का अर्थ क्या है, इस पर एक राज्य जनक की कहानी आती है, उनका दृष्टान्त देते हैं कि राजा ने अपना सब कुछ दान किया। लेकिन उनका वायदा था कि जब मैं घोड़े पर पाँव रखूं, उस समय ही सब दान माना जाय, तो जनक ने जब एक पैर घोड़े पर रखा तो कहा यह सब तुम्हारा हो गया, उसी समय जब दूसरा पैर उठाने लगा तो अष्टावक्र ने कहा रुको यह पाँव क्यों उठाया ? दूसरा पाँव उठाने का संकल्प क्यों आया? यह तो सब तुमने दान कर दिया इसी प्रकार या संकल्प के ऊपर कहानी है। तो हम सब बच्चे भी इस शिवबाबा के यज्ञ में मरजीवा बनने अथवा आहुति होने आये हैं, तो अपने से पूछे कि हम पूरी आहुति हुए है? या होने का सोच रहे हैं? यह बहुत गहरी बात है, क्योंकि सारे जीवन का यह पाठ है। मैं मरजीवा बना हूँ अथवा मै समर्पित हुआ हूँ? अगर मैं कहूँ मेरी जीवन मरजीवा तो है ही, मैं पुरानी दुनिया से मर गई, बाबा की बन गई, तो बाबा पूछते तुम पूरी दान हो गई हो? अगर दान हो गये तो उसकी निशानी ‘ग्रहण छूटा', यह भी कर्मों की गहन गति है।
जब आत्मा मरजीवा बन गई तो आत्मा किसी सम्बन्धी से, सम्पत्ति से, वस्तु से, वैभव से अपना ममत्व रख नहीं सकती, क्योंकि मरजीवा करना अर्थात् सब कुछ दान होना। अगर जरा भी किसी में ममत्व है, बुद्धियोग जाता है तो क्या उसे दान हुआ कहेंगे? मिसाल कई बार किसी को अपनी कोई बात का जिद्द होता, मेरी बात राइट हो या रांग हो, परन्तु यह मेरी बात माननी ही चाहिए, यह मेरी जिद्द है। तो जहाँ जिद्दी स्वभाव है क्या वहाँ आत्मिक स्थिति है? स्व की जिद्द है माना देह-अभिमान है। देह-अभिमान है तो सत्य, असत्य की तुलना कर नहीं सकते। अगर यह रियलाइज करते हैं कि मेरे में जिद्द का स्वभाव है तो दान क्यों नहीं करते। जिद्द के अगेंस्ट है सरल बनना। सरल बनो तो जिद्द खत्म हो जाता। जिद्द है तो श्रीमत का उल्लंघन होता। जब किसी बात का जिद्द आता तो सोचो यह श्रीमत है वा मनमत ? जब मैं दान हो गई तो किसी भी बात की जिद्द क्यों करती?
यह ज्ञान जितना ही सहज है उतना ही गुह्य है, अगर सदा श्रीमत को सामने रखो, बाबा को सामने रखो तो अपने स्वभाव का विस्तार समाप्त हो जाता है। जैसे भक्ति का विस्तार है। हम सबसे भक्ति का विस्तार दूर हो गया है, ऐसे पुराने सम्बन्ध का, स्वभाव का विस्तार दूर हुआ है? अगर हम श्रीमत को सामने लाते तो सब विस्तार दूर हो जाता, बिन्दु बन जाओ तो कोई विस्तार नहीं। जब मरजीवा बन गये तो माइन्ड सदा टावर आफ पीस में चाहिए। अगर अन्दर में कोई विकल्प है तो मन स्वीट होम में जा नहीं सकता। जब मरजीवा नहीं, मरजीवा बनने की पहली निशानी ही है- सब विकल्प समाप्त हों। अगर बुरे विकल्प हैं तो मरजीवा नहीं।
हमें बाबा की श्रीमत है तुम्हे किसी के अवगुणों को नहीं देखना है। तो मैं किसी के अवगुणों को देख अपना मन खराब क्यों करती? खराब माना बुरी दृष्टि गई, खराब माना जोश आया, खराब माना और भाव में आगये। क्या जहाँ खराब है, वहाँ मरजीवा हुई या श्रीमत का पालन किया? तो जब यह शब्द हरेक अपनी डायरी से निकाले कि मेरा यह खराब मिजाज है, क्या करूं विकल्प आते हैं? जब यह सब खत्म करो तब जय-जयकार होगी। जब तक बुरे संकल्प चालते हैं तब तक मैं मरजीवा नहीं। एक है परा स्थिति और दूसरा है अपरा स्थिति। अपरा माना ही देह-अभिमान के अन्दर की स्थिति। तो मैं किस स्थिति में रहती, परे स्थिति में या देह अभिमान की स्थिति में?
मरजीवा माना 'टावर आफ पीस'। पीस में रहने के लिए अन्दर में कई बातें डिस्टर्ब करती है। चाहते भी है कि देहभान से परे रहें। बाबा की याद में बैठे लेकिन कोई न कोई बुद्धि में आ जाते जिनसे बुद्धि डिस्टर्ब हो जाती। डिस्टर्ब माना डिस्ट्रेक्टिव। डिस्टर्ब माना बाप से डिस्टर्ब, जो डिस्टर्ब होते वह डिस्ट्रक्शन का काम करते। कन्ट्रेक्शन का नहीं।
कई बार कईयों करें यह संकल्प आते कि हम यहाँ आये, हमें कोई ने पूछा ही नहीं, हमारी खातिरी नहीं की। बहन जी तो फलाने को ही देखती हैं, मेरे को तो पूछती ही नहीं, मेरी उन्हें कोई परवाह ही नहीं। लेकिन मैं पूछती हूँ- क्या तुम मेरी परवाह के लिए आये हो? परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले की, बाकी और कोई क्या परवाह करेगा। तो अपने से पूछो मैं किसके परवाह में प्रेरित होती हूँ? किसी देहधारी की परवाह में प्रेरित तो नहीं हूँ? मैं बाप की परवाह रखके आई, बाबा मैं आपकी सदा शीतल छाया में रहूँ। बाकी किसी के परवाह में आना, स्वभाव में आना, क्या यही मेरी अवस्था है? यह तो अजब सा लगता जब कहते फलाने को मेरी कोई परवाह ही नहीं। जैसे छोटे बच्चे करें, वैसे सब बातें हैं, फिर पूछते है - विनाश कब होगा? आखिर भी कर्मातीत कब बनेंगे? बाबा पूछते हैं क्या तुम देह-अभिमान से अतीत हो गये हो? जब अतीत नहीं हुए तो कर्मातीत कैसे बनेंगे? हमें बाबा ने अपने प्रवाह में लिया है, उसके प्रवाह में रहो तो सेकेण्ड में मरजीवा बन जायेंगे।
समझो आज मेरे में एक फीलिंग की बीमारी है, छोटी-मोटी बात मुझे लग जाती, उदासी छा जाती, डिस्टर्ब कर देती, तो क्या मैं 'दान' हुई। दान हो गई तो फिर कैसे कहती मुझे फिलिंग आई, तुम कौन? तुम तो बाबा की ही ना फिर किसको फीलिग आई? मुझे फीलिंग आई माना मैंने दान की हुई वस्तु को वापस लिया। दान हुई वस्तु को वापस लेना महान पाप है। जब मैं दान हो गई तो मुझे किसी बात की फीलिंग क्यों? मैं दान हूँ माना बाबा की अमानत हूँ, तो मैं डिस्टर्ब क्यों हुई ? मैं बाबा की अमानत हूँ तो जब बाबा को फीलिंग नहीं आती तो मुझे क्यों आई? मैं दान हूँ तो मैंने दान वापस क्यों लिया ? यह है सूक्ष्म पाप।
मैं बाबा की अमानत हूँ, मेरे संकल्प भी अमानत हैं, मेरा चरित्र, मेरी सेवा भी अमानत है, तो मैं बाबा की अमानत में ख्यानत क्यों करती? डिस्टर्ब होना माना अमानत में खयानत। जब बाबा की बन गई तो बाबा ने जो लकीर लगा कर दी है, उस पर हमें चलना है, बाबा ने हमें कहा तुम अमृतवेले उठ मुझे याद करना है, कार्य तुम्हें मेरे ही कार्य में जीवन देनी है, तुम्हें बाबा के यज्ञ से खाना है, बाबा का कार्य करना है। तो फिर यह संकल्प भी क्यों आता कि मुझे फलानी सर्विस का शौक है, यह मुझे चान्स नहीं देते। यह भी कौन सी अवस्था है? कुछ न हुआ तो मैं डिस्टर्ब हो गई, यह भी अमानत में ख्यानत है। संकल्प में भी विचलित होना माना अमानत में खयानत।
बाबा ने कहा - एक है बृहस्पति की दशा और दूसरी है राहू की। तो बुद्धि जब टक्कर खाती तो समझो राहू का ग्रहण लगा, कमाई में घाटा आना माना कला कम हुई। बृहस्पति की दशा माना बाबा की याद में मेरी स्थिति ऊंची-ऊँची बढ़ती जा रही है। कई फिर बाबा के शब्दों को पकड़कर अपने ऊपर जैसे पालिस करते है, कहते हैं बाबा ने तो कहा है ना माया के विघ्न अन्त तक आयेंगे। लेकिन यह नहीं सोचते, बाबा ने यह तो कहा तूफान आयेगे, साथ में यह भी तो कहा है-बच्चे तुम्हें क्रॉस करना है, कभी भी रुकना नहीं है। रुकने का तो नहीं कहा ना। हमें तो माया से परे परे जाकर मायाजीत बनना है। अगर मैं माया के वश हूँ, तो क्या वश वाला दान हो चुका। न तुम इन नयनों के वश रहो, न मुख के.. वश होना माना बेवश हो जाना। वश कर लेना माना मालिक हो जाना। तो मैं बेवश हूँ या वश किया हुआ है? हरेक खुद को चेक करो मैंने अपने को इस यज्ञ में कहाँ तक दान कर लिया है? दान माना दान, दान को वापस लेना माना महापाप।
हमारी लगन बाबा से है, हमारा सब कुछ बाबा है, दुनिया में भले कितने भी पढ़े-लिखे विद्वान हों परन्तु उनकी इतनी छोटी बात भी समझ में नहीं आती कि हम आत्मा शिवबाबा की सन्तान है। हम पावन थे अब हमें पावन करना है, यह उनको समझ में नहीं आता। बाबा कहता उन बिचारों का दोष नहीं। तो क्या हम भी कहे कि हमारा भी क्या दोष। लेकिन हमें तो बाबा ने आपसमान मास्टर नालेजफुल बनाया है। हमें नालेज है, बाबा ने हमें पास्ट को भुलाकर भविष्य सामने दिखाया है. तुम्हें देवता बनना है। हमें तो अपनी देवताई क्वालिफिकेशन में जाना है। अगर कोई पिछली बातें माइण्ड में आती तो बाबा कहता माया से हारे हार है।
माया कई ऐसे खेल दिखाती है जो न मन हो, न चित। आज आप लोग बैठे हो, बहुत मस्ती चढी हुई है, कल बाहर गये, संकल्प आया विनाश हो न हो, चलो शादी कर लें। संकल्प आया माना मरा। जो दान हो गये, बाबा की सच्ची सजनी बन गये, उन्हें क्या यह संकल्प आ सकता। ऐसे संकल्प आना माना दान किया हुआ वापस लेना, यह भी महापाप है। इसलिए अब किसी बात की गफलत में नहीं आना है। मैंने सब कुछ बाबा को दे दिया तो सब खत्म। न मैं हूँ, न मेरा है। मैं बाबा का, मेरा सब बाबा का, फिर यह संस्कार, यह स्वभाव कुछ भी डिस्टर्ब नहीं करेंगे। इतना यह सहज है, इसी से निरन्तर योगी बन जायेंगे। बुद्धि को कुछ डिस्टर्ब नहीं करेगा, लाइन क्लियर हो जायेगी। बाबा की मुरली का सार है- मरजीवा बने, सब कुछ दान कर लो तो सब छूट जायेगा। यहीं बहुत बड़ी सब्जेक्ट है।

बाप, टीचर और सतगुरु के फ़रमानबरदार, वफ़ादार और आज्ञाकारी बनो

बापदादा हम बच्चों को रोज सवेरे सवेरे यादप्यार देते, नमस्कार करते हैं। इसमें ही बाबा हमें यह सिखाते कि तुम मेरे से भी डबल पूज्य हो, यह भी बाबा की बड़ी मीठी-मीठी विशेषता है। पूज्य बनाने वाला हम बच्चों को बनाने के लिए यह पाठ पढाता बनाने वाला कहता तुम्हें नमस्कार। इससे महान बनने का नशा चढ़ता है। मधुबन में सभी आते हैं डबल नशा चढ़ाने, डबल फोर्स भरने। बाबा कल की मुरली में कह रहे थे कोर्स तो सबने कर लिया है लेकिन फोर्स भरना बाकी है। तो सब आये हैं कोर्स करने, ऐसे नहीं कि कोर्स खत्म हो गया है, परन्तु कहा जाता कोर्स में भी फोर्स, जिससे बैटरी सदा चार्ज रहे। जैसे ड्राइवर बड़े सफर पर जाते हैं तो बैटरी अच्छी तरह चार्ज करके, मोटर की अच्छी रीति चेकिंग करके जाते हैं, जिससे रास्ते में मोटर टिक टिक न करे, ऐसे ही हमारी भी बहुत बड़ी लंबी यात्रा है हमें रोज सबेरे-सबेरे अपनी मोटर को चेक करना है, जिससे वह २४ घण्टे यात्रा पर ठीक रहे। ऐसा न हो रास्ते में कोई रोड़ा आवे या आमने-सामने कोई ट्रक आदि आ जाये, तो उससे मोटर का टकराव हो जाये। कोई ऐसा आँधी-तूफान आये, जिससे मोटर कहीं बैठ जाये, पंचर हो जाये। इसलिए बाबा ने कहा है सवेरे सवेरे हरेक अपनी चेकिंग करो। आज भी बाबा ने कहा हर एक अपनी खामी लिखो सबसे बड़ी खामी है- देह-अभिमान। इस खामी को रोज चेक करते रहो
२. बाबा के हम बच्चों को ३ फरमान हैं परम बाप के नाते फ़रमानबरदार रहना है, शिक्षक के नाते वफादार रहना है और सतगुरु के नाते आज्ञाकारी रहना है। तो बाप, टीचर सतगुरु तीनों के तीन फरमान और तीन आज्ञायें हमें मिली हैं। तो रोज चेक करना है हम तीनों फरमान पर कहाँ तक चलते हैं? बाबा ने फरमान किया-बच्चे, तुम्हें देह-अभिमान छोड़ देही-अभिमानी रहने का अभ्यास करना है। कोई भी खामी देह-अभिमान के कारण है, इसे निकालो यह फ़रमान है। तो मैं पूछती हूँ कि हर एक ने दिल से परम-बाप को माना है कि वह मेरा परम बाप है या शकय है? नहीं तो परम-बाप का जो फ़रमान मिला कि तुम्हें देह-अभिमान में नहीं आना है। इस फरमान को मैं कितने परसेन्ट में पालन करती हूँ?
३. सतगुरु ने हमें आज्ञा भी यही दी है कि तुम्हें देह-अभिमान में न आकर मुझे याद करना है और कोई को याद नहीं करना। इधर यह आज्ञा है और उधर यह फ़रमान है, दोनों भाई-बहन हैं, दोनों का अर्थ एक-दो के समीप है, परन्तु दोनों के बीच कुछ ग़हरा राज है। एक है श्रीमत के नियमों को पालन करना यह हुआ फ़रमान और एक है मामेकम याद करो यह है आज्ञा। तो मैं बाप के फरमान को डायरेक्शन को, ईश्वरीय नियमों को, मर्यादाओं को, श्रीमत को कदम-कदम में कहाँ तक पालन करती हूँ? श्रीमत के नियम एक नहीं १०० हम सुन रहे हैं। श्रीमत कहती है कि तुम्हें सदा स्व-चिन्तन में रहना है, परन्तु मेरी बुद्धि स्व-चिन्तन को छोड़ व्यर्थ चिन्तन में जाती तो मैं पूछती हूँ क्या यह फ़रमान पालन किया? अगर बुद्धि को अनेक चिन्तनों में चिन्तित रहने को छुट्टी दी है तो क्या मेरी बुद्धि परम-बाप के फ़रमान को पालती है? यह बहुत बड़ी जवाबदारी है, या तो हम कहते ही नहीं कि बाबा आप हमारे बाबा है। जिसने बाबा को जाना नहीं उनके लिए फरमान को पालन करने की बुद्धि नहीं है। कहा जाता अज्ञानी कोई गलती करता तो कोई दोष नहीं, ज्ञानी गलती करता तो बहुत दोष है। ज्ञानी अर्थात् मास्टर नालेनफुल, ज्ञानी अर्थात् जिसने कहा- हम परम-बाप, परम-शिक्षक परम सतगुरु के प्यारे हैं। ज्ञानी कोई वेद-शास्त्र पढ़ने वाले को नहीं कहा है। तो मैं ज्ञानी बनी, तू ज्ञानी बने, ब्राह्मण सब जानी है। ब्रह्माकुमार-कुमारी ज्ञानी हैं। यह संगमयुग है. इस पर ही हमारा बाबा आकर फ़रमान कर रहा है कि बच्चे तुम फरमानवरदार बनो। फरमान मिला स्व-स्मृति में रहो, दूसरी सब जातें विस्मृत करो। अब इस फरमान को मैंने कहाँ तक पालन किया? या इसकी अवज्ञा मैंने कहाँ तक की? हमें फरमान मिला है तुम्हें श्रेष्ठ बनना है। तो मेरा संकल्प श्रेष्ठ है? मेरी वृत्ति शुद्ध भावना भरी है? अगर मेरे संकल्प शुद्ध है तो जरूर मेरे को स्व की स्मृति है। अगर मेरे संकल्प स्व के लिए व सर्व के लिए शुद्ध नहीं तो क्या यह फरमान पालन हुआ? हमारी शुद्ध भावनायें है. शुद्ध कामनायें है, यह भी एक महादान है। तो क्या मैंने सवेरे से लेकर शुद्ध कामनाओं का दान दिया ? शुद्ध भावना भरके दान देती? या स्व के लिए ही शुद्ध संकल्प नहीं, स्व-स्मृति नहीं। अगर स्वयं के लिए ही शुद्ध वृत्ति नहीं तो मैं वायब्रेशन क्या फैलाऊंगी। तो पूछो क्या मैंने फ़रमान का पालन किया है?
कहते हैं हम फ़रमानबरदार हैं तो कितने फ़रमान पालन किया ? अगर नहीं तो ना-फ़रमानबरदार हुए। तो खुद ही खुद को जज़ करो। इसकी गहराई में जाओ।
४. बाबा ने कहा- अन्दर में कूट-कूट कर मसाले की तरह, महींनता में जाकर बाबा को याद करो। तो बाबा के फ़रमान को मैंने कहा तक कूट-कूट कर पालन किया है? यह अगर मेरी पालना है तो जो परम शिक्षक ने मुझे आज्ञा दी है, तो मैं अपने मास्टर से फेथफुल रहूँगी। मास्टर ने जो मुझे पढ़ाई, पढ़ाई है उसको खुद मैं भी पढूँगी और दूसरों को भी घोट घोट कर पिलाऊँगी। अगर फ़रमान पर ही नहीं तो वफ़ादारी कहाँ तक पालन कर सकती हूँ। वफ़ादारी का पहला फाउन्डेशन है फ़रमानबरदार। जो श्रीमत का फ़रमानबरदार नहीं वह फेथफुल नहीं। सच्चाई अलग चीज़ है, सफ़ाई अलग चीज़ है, वफ़ादारी भी अलग चीज़ है तो मेरी परम-शिक्षक से कहाँ तक वफ़ादारी है?
५. बाबा की आज्ञा है कि बच्चे तुम्हें एक मेरे सिवाए और कुछ याद न रहे। तो अपने से पूछो बाबा की पहली आज्ञा कोई मित्र-सम्बन्धी याद न रहे, यह पहली सीढ़ी है। यह तो पार कर ली, फिर बाबा ने यह आज्ञा दी कि तुम कोई भी देहधारी को याद नहीं करो तो पूछना है मुझे कोई याद आता ? अगर याद आता तो क्या मैंने आज्ञा का पालन किया? बाबा के महावाक्य हैं कोई भी याद न आये-तो मुझे कौन-कौन, क्या-क्या याद आता है? कोई वस्तु, व्यक्ति मेरी बुद्धि में घूमती, कोई वस्तु भी मुझे याद है? या हम सबसे डिटैच हैं? डिटैच का मतलब यह नहीं कि कोई सुन्न समाधी में जाना है। बाबा ने ऐसा तो कहा नहीं कि तुम निल होकर बैठ जाओ। कर्मयोगी बनने की श्रीमत दी है।
६. बाबा ने हमें कर्मयोगी, निरन्तर योगी, स्वतः योगी, सरलयोगी और सहजयोगी बनने के ५ टाइटिल दिये हैं। यह ५ रास्ते बाबा ने हमें बताये हैं। अब मैं इन फ़रमानों को कहाँ तक पालन कर रही हूँ? क्या सतगुरु ने ऐसे कहा कि कर्मयोगी बनो लेकिन निरन्तर योगी नहीं? सहज योगी बनने का तो सबने माना लेकिन निरन्तर योगी बनो, यह मानने के लिए अनेक कारण बताते हैं। जब अनेकानेक कारण बताते हो तो बाबा ने निवारण बताया है या नहीं? निवारण का रास्ता जो राम ने बताया- उसको भूल हम बच्चे रावण वाले कारण बताते हैं लेकिन यह बाबा को नहीं बताते कि हमने आपकी युक्ति से रावण को मार डाला है। फिर-फिर घूम-घूम कर कारण ज़रूर बताते। "हमने कारणों का निवारण कर लिया", यह नहीं बताते हैं।
७. हरेक अपने आगे यह डन्लप का तकिया रख लेता कि अभी तक हम सम्पूर्ण तो बने नहीं हैं। शायद यह तकिया बहुत अच्छा लगता है। कल मेरा प्राण छूट जाए - तो मेरी स्थिति कहाँ तक बनी है? यह क्यों नहीं पूछते ? फ़रमान माना स्व-चिन्तन करो, इसी तरह से अनेक आज्ञा की धारणायें आती, एक-एक धारणा को लो तो अनेक बातें आती परन्तु अगर हम इन ५ शब्दों को सामने रखें कि हमें निरन्तर योगी, सहज योगी, स्वतः योगी, सरलयोगी और कर्मयोगी बनना है तो सब बातें समाप्त हो जायेंगी। हमारा हर कर्म योगयुक्त हो, न कि देह-अभिमान युक्त। कर्मयोगी माना कर्म करते योगयुक्त। कर्म, योगयुक्त रहा या कर्म में योग टूट गया ? कर्म में मेरा चार्ट योग-युक्त रहे। यह हरेक पूछो कर्म में योग रहता है या योग भ्रष्ट हो जाता है? अगर योग भ्रष्ट हुआ और उसी समय श्वाँस चला जाए तो मेरी क्या कमाई हुई ? कमाई ही चली गई? किसी भी कारण वश मेरा योग भ्रष्ट हुआ या श्रेष्ठ ? बुद्धि अगर देह-अभिमानी है तो योग भ्रष्ट है। बुद्धि उससे ऊपर है तो योगयुक्त है। कर्म तो करना ही है, खेल को देखते रहना है। दूसरा - मैं योगी रही या मेरा योग अनेकों में घूमा ? मेरा स्वतः योग है या अनेकों में योग है? किसी का पढ़ाई में, किसी का दुकान में योग है, उन सबमें मैं योगी रहती या मेरा योग टूटता है? ऐसे ही योगयुक्त को सतगुरु की आज्ञा पर चलने वाला कहा जाता है। अगर वरदाता से वरदान चाहते हो तो बाबा कहते योगयुक्त रहो, युक्तियुक्त रहो। मेरी इन्हीं घड़ियों का भक्तों ने गायन किया है, एक घड़ी आधी घड़ी आधी की पुन आध... जितना योग में रह कर्म करते, सेवा करते, दूसरों को सुख देते वह घड़ियां मुझे वरदान रूप में मिलती हैं। इसका नाम है एक घड़ी, आधी घड़ी... यह पुण्य जमा होता। वह घड़ी मेरे लिए सफल होती जाती। तो एक तो मुझे उसका पुण्य बाबा दे रहा है, वरदान दे रहा है, फल दे रहा है, एक मैं जिसकी सेवा करती उसकी भी दुआ पुण्य के रूप में मिलती है। यह है आशीर्वाद, यह है वरदान। यह है अपने भोलानाथ बाबा से झोली भरने का दान। कहते हैं-झोली भर दे, मेरी बुद्धि रूपी झोली को बाबा भरता जाता, मैं दूसरे की झोली भरती तो मेरी भी भरती। अगर मेरी बुद्धि में बाबा बसता है और मैं बाबा को याद कर योगयुक्त हो दूसरे की सेवा करती तो मेरी बुद्धि रूपी झोली भरती जाती है। वह ऐसी भरती है जो २१ जन्मों के लिए खाली नहीं होती।
८. बाबा कहते हैं मेरे लवली बच्चे, लवली बाप को लवली बन याद करो, ऐसा लवली बोल, बाबा के सिवाए दुनिया में कोई बोल नहीं सकता। यह गीत भी हम गाते इतना प्यार करेगा कौन... प्यार का सागर हमें इतना प्यारा बनाता है। यह है सारी अपने दिल की उमंगों की बात, लेकिन चलते-चलते शायद पाँव थक जाते हैं। अगर बुद्धि रूपी पाव थक जाते तो मीठे भैया, मीठी बहना, मधुबन में आओ तो बाबा बहुत अच्छी तरह से पाँव दबा देगा तो थक उतर जायेगा। बाबा के पास आने से सारी दुनिया के थक खत्म हो जाते। बाबा ने हमारा कितना अच्छा पावं दबा दिया जो थक ही खत्म हो गया है। इस पर गायन है भगवान ने पाँव दबाये...। अपने को थकाओ मत। जब थक जाते तो बाबा के पास आ जाओ - तो बाबा बड़े प्यार से पाँव दबायेगा, जिससे सारा थक खत्म हो जायेगा, फोर्स आ जायेगा। फिर जाकर अपना कार्य करो। हमें खुद आश्चर्य लगता जो दो-दो, तीन-तीन वर्ष आते ही नहीं, शायद वह इतनी पावरफुल सोल हैं जो बुद्धि थकती ही नहीं या फिर बुद्धि थक के खत्म हो जाती है, बूढ़ी हो जाती है जो ख्याल ही नहीं आता कि जाकर फोर्स भरें? या थकावट की भासना ही नहीं आती, या थक उतारने की इच्छा नहीं होती। थक क्या होता है, यह भी माया में व्यस्त होने के कारण पता नहीं पड़ता जो विचार आये मैं जाकर थक उतारूं। मधुबन में आओ तो बाबा सब दुखड़ा दूर कर देगा।
९. शास्त्रों में कहानी आती है द्रौपदी ने दुर्योधन को कहा कि हे अन्धे की औलाद अन्धे ! तुम्हें दिखाई नहीं देता कि ये पानी है या दलदल है, इसी एक बात से लेकर महाभारत लगा। इसका भी अर्थ कोई सोचे तो सही। हम कहती महाभारत कोई एक के कारण से नहीं बना, ये भी दोनों के कारण बना जबकि द्रौपदी जगत माँ थी, फिर ये क्यों कहा कि अन्धे की औलाद अन्धे...। क्या उसे ये बोलना नहीं आया कि हे बेटा, उधर मत जाओ, उधर दलदल है, अगर प्यार से बोलती तो न उसे जोश आता और न महाभारत बनता। प्यारा बाबा हमें कहता, प्यारी माँ हमें कहती - प्यारे बच्चे ये रावण की प्यारी, मीठी-मीठी दुनिया है, उधर नहीं जाओ। बाबा ने कभी हमें अन्धा कहा है क्या? कहते हैं बच्चे, यह सब ज्ञान नेत्र-हीन हैं, तुम नेत्रवान बनो। कितना प्यार से बोला, माँ, प्यार से बोले तो कभी महाभारत नहीं बनें। ये बात अलग है कि उनको देह-अभिमान आया तो बोला कि दिखाऊंगा। यदि कोई कहता इसने ऐसा कहा तो मैं कहती, इसमें तू भी रांग, वह भी रांग। बिना दोनों की भूल के झगड़ा हो नहीं सकता। दोनों उस गलती को रियलाइज़ करो तो झगड़ा न हो। महाभारत होता ही तब है जब गलती को रियलाइज़ नहीं करते। इसलिए कोई भी बात होती, जहाँ भी कुछ होता तो दोनों तरफ़ की बात होती। हाँ, कहीं एक की बात ज़्यादा, दूसरे की कम होती उसका ही विस्तार कर देते। छोटी सी बात को विस्तार कर देते जैसे हम सब द्वापर से देह-अभिमान के तिनके से खिसके हैं, और आकर इस दुर्गति पर पहुँचे हैं। अगर वहाँ से न खिसकते तो दुर्गति पर नहीं पहुँचते। वैसे अगर अभी भी हम इतनी सी बात को सुधार लें तो हमारा कितना बड़ा सुधार हो जाये! छोटी बात भी बहुत बड़ा नुकसान करती है। हो गई, ड्रामा। लेकिन थी। वह थी ही बड़ा नुकसान करती है। उस 'थी' को ही हम न करें। छोटी कहकर हम अलबेले क्यों बनते हैं। हमें अभी किसी बात में अलबेला नहीं बनना है। फिर देखो हमारा कितना सुन्दर प्रेम का गुलदस्ता तैयार हो जाता है। -
१०. यह गुलदस्ता है ही हमारा प्रेम का, ज्ञान की महिमा आने वाले पीछे करते हैं, लेकिन सबके जिगर से पहले यहीं आवाज निकलता कि बाबा के घर में जो प्यार मिला वह दुनिया में मिल नहीं सकता। बाद में जब बुद्धि में ज्ञान बैठता तो रत्नों को देख हर्षित होते, लेकिन पहला तीर प्यार का लगता है। तो इतना मैं प्यारा या प्यारी बनी हूँ, यह देखना है। कैसी भी बात हो प्यार से दो तो अगर वह ४ बार नहीं मानेगा लेकिन पाँचवी बार तो मान ही लेगा। हम सब हैं सतगुरु के सयाने समझदार बच्चे, ग्रेट-ग्रेट ग्रैंडफ़ादर के ग्रेट और ग्रैंड बच्चे। हमारा नशा भी इतना ही ग्रेट रहना चाहिए। जितना हम नशे में रहते उतना हमारे से अवज्ञायें कम होती और हरेक कदम में हम देखते बाबा की आज्ञा को हम पालन करती जा रही है।
११. कई बार मेरे सामने एक फोटो आती एक चित्र दिखाते हैं- शंकर ने जटाओं में गंगा को धारण किया तो हम कहते बाबा हमें कहता तुम एक-एक पार्वती हो, शिवबाबा ने बाबा के रथ को धारण किया, भगीरथी वही है। हम भी बाबा के बच्चे उनकी जटाओं से निकले हुए हैं। ऐसा लगता है बाबा हमारे मस्तक में गंगा की धारायें सदा बरसाता है। मेरे मस्तक में प्यारे बाबा के प्यार की जटायें बह रहीं हैं, उस प्यारे बाबा के प्यार की जटायें सदैव दिल में रखो तो मस्तक कितना न शीतल रहेगा। अरे, यह गंगा की धारायें हमको मिल रही हैं, यह पानी की धारायें नहीं हैं। यह दुआओं की धारायें हैं, यह प्यार की, ज्ञान रत्नों की धारायें हैं, यह स्नेह की, शक्तियों की धारायें हैं। जो बाबा हमारे ऊपर वर्षा रहा है। आप यह अनुभव करेंगे कि शिव की जटाओं में मेरी धारायें बह रहीं हैं। ऐसा लगेगा कि बस यही गंगा मेरे से निकली है। हरेक समझेगा ऐसा तो मैं हूँ। दूसरा कोई नहीं। मैं अनुभव करती जैसे बाबा सागर मेरे मस्तक पर छलक रहा है, बरस रहा है, बाबा वर्षा बरसा रहा है। उन प्यार की, शक्तियों की, सब सुखों की, आनन्द की लहरों को लहराता रहता है। जब उन लहरों में आप मस्त रहेंगे तो दुनिया की बातें खुद ही भूल जायेंगे। क्यों नहीं भूलती? क्योंकि बाबा की लहरों में यह जिगर लहराता नहीं है। आप लहराओ वह भूल जायेंगी। कई पूछते कैसे लहरायें? मैं पूछती कैसे दुनिया की बातें याद करें - यह क्यों नहीं पूछते ? याद खुद आती है ना। वैसे यह लहरें याद आई तो वह भूल जायेंगी, यह आटोमेटिक मशीनरी है। यह याद करनी नहीं पड़ती स्वतः आती हैं। इसलिए बाबा के इन रसों में मस्त रहो तो वह खुद भूल जायेगी।
१२. बाबा बार-बार कहता तुम्हें सब कुछ भुलाना है कुछ याद न रहे, यह है फ़रमान। अगर अनेकों की याद रहती तो हम बाबा की याद में कैसे लहरायेंगे ? धारा आती इधर है, बुद्धि चली जाती है उधर तो मजा ही नहीं आता। धारा के नीचे रहो, धारा को उधर जाने न दो, यह है माया से खबरदारी। धारा घूम जाती तो रस नहीं आता। धारा को हम ऐसा बाँध कर रखें जो धारायें मेरे में रहें, मैं धारा में रहूँ, उस जैसा कोई दूसरा मजा नहीं। फिर अवस्था अपनी मस्ती में मस्त रहती और हम उसी मस्ती में झूमते रहते।
१३. यह बहुत ऊँची, मीठी, लवली, प्यारी, सुन्दर, शीतल रसों भरी अवस्था रहती है। ऐसी लहरों में रहने का बहुत-बहुत अटेन्शन में रखती हूँ। देखा जाता है इससे सब कुछ दुनिया की बातें भूल जाती। जैसे पानी पर लकीर आई और खत्म हुई। हम तो पानी के ऊपर हैं, पानी में जाओ नहीं, पानी में रहेंगे तो टकराव आयेगा, पानी के ऊपर रहो तो कुछ नहीं होगा, बहुत-बहुत पार रहेंगे। अच्छा-

सवेरे के समय बाबा से वरदान लो और शाम के समय सबको वरदान दो (अनुभव)

आज अमृतवेले आँख खुलते ही एक आवाज सुनी जैसे कोई ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है, पुकार रहा है, आवाज़ कर रहा है। इधर-उधर देखा कुछ नहीं नज़र आया, ऐसे भी लगा जैसे कोई मर गया हो, इतने में ही रिकार्ड बजा साढ़े तीन का, उठी। आकर बाबा के पास, बाबा की मीठी यादों में बैठी - ऐसी भासना आई बाबा बार-बार यह कह रहा है बच्ची, अब बहुत जल्दी वो दिन आना है, जब तुम्हारे विजय के नगाड़े बजने हैं। दुनिया देखती ही रह जायेगी, तुम उड़के चले जायेंगे। तुम शक्तियों की सिद्धि कहो, सफलता कहो, विजय कहो, अब बहुत जोर से सारी दुनिया में यह आवाज उठनी है, इसलिए सबको बोलो - कोई भी बीता हुआ कुछ भी न देखे, आगे-आगे बढ़ते जाओ, यह क्या होगा, कैसे होगा ? यह न सोच सब आगे-आगे बढ़ते जाओ। ऐसे ही सुबह के टाईम कई बार बाबा कुछ प्रेरणा दे देता।
जैसे कल की मुरली थी तुम्हें सिद्धि स्वरूप बनना है। मैं बाबा से पूछती हूँ क्या सिद्धियों को सामने लाना है, क्या सिद्धियों को आह्वान करना है, या सिद्धि स्वरूप बनना है? या सिद्धि स्वरूप हैं? उसी घड़ी आता मैं ये सूक्ष्म संकल्प भी क्यों उठाऊँ, मुझे सिद्धि स्वरूप बनना है। क्यों न समझें मैं हूँ ही सिद्धि स्वरूप। न हूँ तो संकल्प उठाऊँ। शक्य हो तो पुरुषार्थ करूं। हमारे मस्तक पर लिखा है चमकती हुई मणियाँ हो, मणी का अर्थ ही है चमकना। कल्प पहले भी चमक वाली मणी थी, आज भी हूँ, हमें नशा रहता हम हैं ही बाबा की चमकती हुई मणियां, सिद्धि स्वरूप मणियां, हम कोई झूठे पत्थर नहीं हैं, हम तो सच्चे पन्ना और माणिक हैं, तब तो हमारे ऊपर पुखराज परी, नीलमपरी का गायन है। हर बात में मैं अपने को सफलतामूर्त, विजयी देखती हूँ, मैं कभी दिलशिकस्त नहीं होती।
अमृतवेले ऐसी मीठी-मीठी रूह-रूहान बाबा से चलती है। बाबा हम बच्चों को रोज़ हर तरह से पुश करता। सवेरे का टाइम है वरदान लेने का और शाम का टाइम है वरदान देने का। यह कैसे? सवेरे जब मैं बैठती तो जैसे ऊपर से फोकस की तरह सारे वरदान बाबा मुझे दे रहा है, ऐसे लगता जैसे किसी बीज़ पर सर्व प्रकार के लाइट के फोकस दिये जाते वैसे सारे वरदानों का फोकस बाबा देता और मस्तक चमकता जाता - गोल्डन होता जाता। इन जटाओं पर जैसे स्नो फाल की तरह लाइट का फॉल बह रहा है। ऐसे मैं स्वयं के साथ-साथ सबको देखती हूँ। सवेरे-सवेरे बुद्धि दिव्य रहती, देह-भान से परे बाबा में रहती, सतोप्रधान होती, उस टाइम बाबा से सहज ही बुद्धि जुटी होती, वह घड़ियाँ ऐसे अनुभव होती जैसे सारे दिन के लिए बाबा सब कुछ कर देता है, तब कहा 'अमृतवेला' है वरदाता बाप से वरदान लेने का। कई बार बाबा गुह्य ज्ञान की लहरों में ले जाता, कई बार सर्विस की नई-नई प्रेरणायें देता, शक्तियां भरता फिर कहता बच्ची, मैंने छत्र रख दिया - अब जाओ सारा दिन राजधानी में सेवा करो, सिहासन पर तो छत्रधारी ही बैठेंगे ना। कई बार सुबह सुस्ती होती, इधर सुस्ती आती उधर चुस्त करने बाबा उठा ले जाता, फिर कहता देखा उठी तो क्या पाया? बाबा कहता बच्ची सुस्त नहीं बनो, उठो तो छत्र रखूँ, अमृतवेले बाबा छत्रछाया का छत्र रख देता है। माया से विजय पाने के लिए बाबा छत्र पहना देता है, कोई भी दुश्मन नहीं आता। दूर से ही भाग जाता, इसलिए कहते हैं सवेरे सवेरे बाबा की छत्रछाया के नीचे बैठो तो छाया में रहने से माया परे हो जायेगी।
मैं देखती हूँ अमृतवेले बाबा के सामने जैसे अनेक बच्चे बैठे हैं- बाबा सबके ऊपर हाथ फिराता जाता, यह कोई भक्ति नहीं, बाबा हम सबके ऊपर सिर से पाँव तक हाथ घुमा देता कि बच्चे तुम सदा छाया में रहना, माया का तुम्हारे ऊपर कोई वार न हो। इसको कहते हैं 'कदम में पद्म', बाबा अपनी लाइट-माइट से माया की नज़र उतार देता है। हम बाबा के कितने लक्की, भाग्यशाली बच्चे हैं, बाबा हमें इतनी लाइट देता, शक्ति देता, सेफ़्टी में रखता, इसको कहते हैं - माया तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकती। ऐसा हम सभी के लिए देखती, सब आकारी रूप में फरिश्ते होते। सबको बाबा रूहानी दृष्टि देता फिर कहता जाओ सारा दिन काम-काज करो, मैं अपना साकारी रूप नहीं देखती। मैं बाबा की परीज़ादी हूँ, बाबा और बाबा के हम बच्चे चमकती हुई मणियां हैं। बस। यह सब सुनाने का सूक्ष्म भाव यह है कि आप सब भी अपने को बहुत-बहुत महान आत्मा समझो, यह अण्डरलाइन -करो, हम कम नहीं, पता नहीं यह होशियार हैं, मैं ऐसी हूँ, यह ऐसी, मैं ऐसी, ऐसा कभी भी नहीं सोचो। छोटी भी सुभान अल्ला तो बड़ी भी। छोटी भी महान आत्मा तो बड़ी भी महान।
हम सबको निश्चय है हमें भगवान पढ़ाता है, हम ईश्वरीय परिवार के हैं, ब्रम्हा बाबा हमारी गुप्त माँ है, हम भगवान के प्यारे हैं, हम शेरनी शक्तियाँ हैं। हम सबका टाइटिल, निश्चय, सरनेम एक ही है, हम ब्राह्मण कुल भूषण हैं, इसलिए कभी भी अपने को नींच नहीं समझो। नम्रता गुण हैं, नीच दासपना है। भावना महान रखो, चलन नम्रता की रखो।
शाम का टाइम है- देने का, मैं समझती हूँ मैं योग में नहीं बैठती लेकिन जो हमारे शुद्ध संकल्प हैं, याद के संकल्प हैं, वह सारे विश्व में जा रहे हैं, दिखाते हैं देवतायें ऊपर में फेरी पहनते हैं। मैं अनुभव करती जैसे बहुत ऊपर-ऊपर सूर्य खड़ा है, वैसे हम भी खड़े हैं, हमारी योग की भावनायें ऊपर-ऊपर जाती हैं, ऊपर से हम दान दे रहे हैं, जिसको ही हम योगदान कहते हैं। सवेरे का समय हैं अपने में भरने का और शाम का है- देने का।
हमारे ज्ञान की सबसे पहली बात है कि किसी में भी अटैचमेन्ट न हो, अटैचमेन्ट का पहला काँटा है। अटैचमेन्ट अर्थात् किसी से विशेष प्यार.. इसी से चूँ चाँ होती, यही है माथा खपाने वाली बात, यह काँटा किसी में नहीं हो।

प्रवृत्ति में रहते पर-वृत्ति में रहो

(गीता पाठशाला चलाने के निमित्त बने हुए भाई-बहनों से)
आप सबको देख प्यारे बाबा का एक बोल याद आता। बाबा कहते तुम बच्चों को सच्ची-सच्ची गीता सबको सुनानी है, तुम घर-घर में सच्ची गीता पाठशाला खोलो। गीता के भगवान को सिद्ध करो, इसी पर ही तुम्हारी विजय होनी है। ईश्वरीय विश्व विद्यालय नाम से मनुष्यों का इतना ध्यान नहीं जाता लेकिन जब सुनते 'सच्ची गीता पाठशाला', तो नाम सुनने से ही अन्दर आता चलकर देखें यहाँ क्या सुनाते हैं।
१. आप सब सच्ची गीता पाठशाला के निमित्त बने हुए सच्चे सेवाधारी हो। जो निमित्त बनते उनकी बाबा अपरम-अपार महिमा गाता। ब्रह्माकुमारियों ने तो अपनी जीवन सेवा के लिए अर्पित की, उन्हों का महान भाग्य है लेकिन उनसे भी अधिक भाग्य आपका है। उन्होंने सब कुछ त्याग कर सेवाकेन्द्र बनाया है। परन्तु आपको तो बाबा ने दो घोड़े दिये हैं, जिन पर हाथ रखकर टप टप करके चलना है। दो घोड़े ब्रह्माकुमारियों को नहीं हैं। शोकेस के सैम्युल आप हैं। शो केस में हमेशा सैम्पुल को रखा जाता क्योंकि आप ही दूसरों के सामने बाबा के ज्ञान को प्रत्यक्ष करने वाले हो इसलिए आपकी बहुत वैल्यु है। तुम्हारे लिए यह पाठ है कि रहना है प्रवृत्ति में लेकिन पर-वृत्ति से रहना है। आपको सबके साथ में रहते 'नष्टोमोहा' का पाठ पढ़ना है। यह सैम्पुल आप लोगों का है। ब्रह्माकुमारियों के आगे कोई भी पेपर आये तो नो फ़िकर क्योंकि वह बाबा की सर्विस पर हैं, परन्तु आपके आगे चार पेपर सदा ही खड़े हैं। कहा जाता है ये ज्ञान इतनी ऊँची मंजिल है, चढ़े तो चाखे ज्ञान-रस, गिरे तो चकनाचूर.... यह है लम्बी खजूर। यह कहावत प्रवृत्ति में रहने वालों के लिए है। चढ़ना भी ज़रूर है, रस पीना भी ज़रूर है लेकिन चढ़े तो कैसे ? क्योंकि इधर है प्रवृत्ति, उधर है समाज, इधर है धन्धा और उधर है बाबा। यह सब पेपर आपके सामने हैं।
२. प्रवृत्ति वालों को अनेक चिंतायें रहती, आज बेटी बड़ी हुई है, शादी करनी होगी, यह करना होगा। इसके लिए धन्धा करें, पैसा इकट्ठे करें। चिन्ताओं की टोकरी सदैव सिर पर रहती। बहू-बेटी में ममता हो जाती। ऐसे सबके साथ रहते हुए, सब पेपर सामने होते हुए नष्टोमोहा रहें। यह सैम्पल आप सबका है। आपको बुद्धि में अगर रहता बाबा यह प्रवृत्ति तेरी है तो सदा बेफिकर रहते। ऐसे कमल फूल का प्रैक्टिकल मिसाल आप लोग हैं।
३. गृहस्थी है उसके लिए धन्धा भी ज़रूर करना पड़ता, आज धन्धा अच्छा चलता, कल नहीं चलता। कई प्रकार के पेपर आपके सामने आते, अज्ञान में तो मनुष्य को धन्धे में अगर घाटा हो जाये तो शॉक आ जाता परन्तु ज्ञानवान कहते यह तो ड्रामा है। फ़िकरातों के बीच रहते बेफ़िकर रहना। निरसंकल्प रहना, ये सैम्पुल आप हैं। जो कमाते हुए भी अनासक्त रहते वही सैम्पल बनते हैं। आज का धन्धा-थोरी भी क्या है? आज नौकरी कैसी है, कल कैसी है। यह अप-डाउन रोज़ होता। परन्तु यह सब होते भी नथिंग-न्यु। अज्ञानियों में टेन्शन रहता और हम कहते - नो टेन्शन बट अटेन्शन ।
४. समाज में रहते समाज को निभाना भी और समाज की गाली भी खाना, कभी समाज दुश्मन बनेगी, कभी कहेगी बहुत अच्छा। यह तो पेपर आयेंगे ही। इन सबको पार करते हुए चलना, यह है आप सबका सैम्पल। अब आओ ब्राह्मणों की दुनिया में यहाँ भी कई पेपर आते। जायेंगे सर्विस करने, सर्विस अच्छी हुई तो खुशी होगी। नहीं हुई तो दिलशिकश्त होंगे। कभी-कभी आपस में भी मित्र के बजाए परममित्र बन जाते। यह संस्कारों का भी बहुत कड़ा पेपर है। किसी को मित्र बनाना तो सहज है परन्तु परममित्र को मित्र बनाना यही मीठी-मीठी पढ़ाई है।
-५. सारी दुनिया को मित्र बनाना, उसकी सहज युक्ति है बाबा को अपना सच्चा सखा बना लो।

त्याग से भाग्य बनता, तपस्या कर्मातीत बनाती और सेवा से भविष्य ऊँच पद मिलता

(कुमारियों प्रति)
भगवान के घर में हम सब भगवान के बच्चे बैठे हैं, जो 63 जन्म के पुराने भक्त हैं। हमें भक्ति का फल स्वयं भगवान मिला है, इसलिए दिल से निकलता ओ सहारा देने वाले दिल कहे तेरा शुक्रिया... सदा यही खुशी का गीत गाते ओ बाबा, ओ मेरे भाग्य विधाता, तूने मुझे अपनी गोदी में बिठा लिया। हमें सब प्रकार के वरदान दे दिये, बिन मांगे हीरे मोती, माणिक सब दे दिये...। बाबा ने हमें अपना सर्वस्व दे दिया। हम ज्ञान सूर्य बाप और ज्ञान चन्द्रमा माँ के लक्की सितारे हैं। बच्चे हैं। उसने हमें चमकता हुआ कोहिनूर का हीरा बना दिया। हम वह शिव शक्ति पाण्डव सेना हैं जिनको स्वयं भगवान ने टाइटिल दिया है। बाबा ने हमें जहान का नूर बनाया है, जो सारी विश्व का जीवन सहारा है, जो सर्वशक्तिवान है उसने हमें प्यार के झूलों में झुलाया है। उसने हम अबलाओं को, कमज़ोरों को, दुर्बलों को आकर बलवान बनाया है। इसलिए हम यही गीत गाते -ओ बाबा, ओ मीठा बाबा, तूने हमें सब कुछ दे दिया। जीवन में अप्राप्त कोई वस्तु नहीं जो मैं आपसे माँगू।
२. जब मैं किसी के मुख से सुनती हूँ कहते हैं बाबा आप शक्ति देना... मैं कहती शक्ति भी क्यों मांगते। क्या मेरे मांगने से वह देगा ? हम मांगने वाले भक्त नहीं, हम तो अधिकारी बच्चे हैं। अधिकारी बच्चों के मुख से जब ऐसे बोल निकलते तो मैं यह बोल कानों से सुनना नहीं बाहती। अरे, लुटाने वाला कहता तू लूट.. जितना चाहे उतना लूट। जितना लूटेंगे-लुटायेंगे उतना भरतू होते जायेंगे। वह सागर है, कोई तालाब नहीं जो सूख जायेगा। ऐसा निरन्तर खुद को स्वमान में रखो, नशे में रहो तो स्थिति कभी डगमग नहीं होगी।
३. बाबा ने हम बच्चों पर चोटी से पाँव तक ऐसा वरदान का हाथ फेर दिया जो हमें कोई हिला नहीं सकता। सिर्फ दिल से गीत गाओ मुझे तो मिल गया !कौन ? प्यारा बाबा! जितने दिल से ज़िगर से रूह-रूहान कर सकते, खुशी में झूल सकते उतना झूलो - यही हमारे जीवन की लाटरी है। कोई कहते - मुझे यहाँ बहुत प्यार मिला, आनन्द मिला, अच्छा योग लगा... मैं कहती बस, हम उसकी दिल को सच्चा नहीं मानती। अरे दिल, ज़िगर से यह बोल निकले कि मेरा बाबा मुझे मिल गया। आप नये-नये फूलों को तो बाबा-बाबा कह उसके प्यार में डूब जाना चाहिए। एक भौंरा भी फूल के पीछे फ़िदा हो जाता, उसमें छिप जाता तो खुद से पूछो हमें फूल बनाने वाला बाप, उस पर मैं भौरे की तरह फ़िदा हूँ। दिवानी हूँ, मर गई हूँ, मिट गई हूँ या फ़िदा हूँ?
४. हमारा बाबा है जादूगर... हमें उस जादूगर की जादूगरी पर फ़िदा हो जाना है। सचमुच उसने हमें अपना जादू लगा दिया... मैं कहती - शल ऐसा जादू तो सबको लगे इससे कोई जुदा न रह जाए। यह जादू एक-एक पर लगे तो अहो भाग्य। भगवान का जादू लगे इनसे बड़ी दुनिया में कोई चीज़ नहीं।
५. आप सब अपने पास एक तराजू रखो उस तराजू में एक तरफ़ रखो बाबा, दूसरे तरफ़ अपने जन्मों का, कर्मों का बन्धन... हरेक के अनेक जन्मों के अनेक हिसाब-किताब हैं, अपने कर्मों को नहीं कूटो लेकिन एक तरफ रखो कर्म, एक तरफ बाबा फिर वर्णन करो भारी कौन? कर्म कर्म बड़े या कर्म के खाते को भस्म करने वाला बड़ा ! कर्मों से बचाने वाले ने हमारी जवाबदारी स्वयं के हाथ में ले ली। उसने कहा तू मेरी ऊंगली पकड़ो, मैं तुम्हारे सब पाप दग्ध कर दूँगा, यह ज़िम्मेवारी उसने ली। जब ज़िम्मेवार ने हमारी ज़िम्मेवारी ली तो हमारा दिल दिमाग, यह अंग सब शीतल हो गये। भगवान हम बच्चों से वायदा करता वह अपना वायदा निभा रहा है फिर हम अपनी फुल जवाबदारी उसके हाथ में देकर हल्के क्यों नहीं होते! हल्के बनो तो फ़रिश्ते बनो।
६. रोज सवेरे एक ही धुन लगाओ मुझे मेरा बाबा मिल गया। यह शिवबाबा की भांग पी लो, घोट घोट कर नशा चढ़ा दो, बस इसी मस्ती में रहो तो बाकी दुनिया की सब मस्तियां खत्म हो जाएं। मुझे तो कई बार हंसी भी आती तो तरस भी पड़ता - कहते हैं मैं सच कहती हूँ मुझे इतना निश्चय नहीं बैठता। मुझे वह भगवान, वह ईश्वर मिल गया है, यह अन्दर से नहीं आता। मुझे तरस पड़ता, कहती हूँ- बाबा आप कितने न प्यारे हो, लेकिन कितने गुप्त हो। बाबा इनके सामने तू बादल रख क्यों बैठे हो, जो बादलों के बीच आप सूर्य को यह नहीं जान सकते ! बाबा को कहती - बाबा इनके सामने से यह बादल हटा दो तो यह देख लें, तू है कौन। तेरी इतनी शक्तियों की किरणें क्यों नहीं यह देखते! क्या इन्हें यह दिव्य बुद्धि नहीं मिली है। वास्तव में यह है सूक्ष्म में अपने देह-अभिमान का नशा, इसलिए सूर्य की शक्ति को पहचान नहीं सकते।
७. कई बार मन में जो यह संकल्प चलता कि जीवन का सौदा है, मालूम नहीं जीवन चल पायेगी या नहीं, मालूम नहीं मेरा भविष्य उज्ज्वल रहेगा ! सोच समझ कर कदम लेना चाहिए। पता नहीं जीवन का कैसा मोड़ आये... वह शादी तो क्या करनी, शादी तो बरबादी है, बाबा का बनकर रहें तो ठीक है। परन्तु पता नहीं मेरे संस्कार किस तरह के हों, दूसरे के किस तरह के हो, सर्विस में कदम रखें सफलता न मिले तो... ऐसा न हो इस दुनिया से भी जावें उस दुनिया से भी जावें! दादियाँ तो कहेंगी तुम्हें ब्रह्माकुमारी बनना है। वह तो ठीक है। ब्रह्माकुमारी तो ठीक परन्तु अपने पांव पर तो खड़ा रहना चाहिए, कोई का बोझ नहीं बनना चाहिए, मैं सेन्टर पर रहूँ, कभी कुछ चाहिए फिर मांगू..... यह तो मेरे से नहीं होगा। किसी के दान से मैं खुद की जीवन कैसे पालूँगी? दूसरे के दान से मैं रोटी खाऊं यह तो मेरे से नहीं हो सकता! मैं कमाऊंगी तो धन तो लग जायेगा... पता नहीं सेन्टर पर रहूँ, फिर आपस में न बनें, बैठकर मन खराब करूँ, इससे तो दूरबाज खुशबाज रहना ही ठीक है, कम से कम परतन्त्र तो नहीं रहूँगी, स्वतन्त्र रहना ठीक है। बाबा को ही तो याद करना है। बाबा की मुरली ही तो सुननी है, बाकी यह सर्विस में रहना, झंझटों में आना, इससे तो अपने को न्यारा रखना ही ठीक है। बाबा कहते न्यारे रहेंगे तो प्यारे बनेंगे, इससे ही आपे ही प्यारी बन जाऊंगी। अपनी शान में रहना चाहिए। आज की दुनिया में तो पैसे के सिवाए कुछ भी नहीं है, लोग भी पैसे की इज्जत करते, मैं ब्रह्माकुमारी तो बनी लेकिन पैसा होगा तो इज्जत तो मिलेगी। इसलिए कमाना ठीक है। बहुत हैं जो ऐसी भाषा बोलती हैं। मैं भी कहती हूँ - बिल्कुल ठीक है, सही बात है... लेकिन प्रवृत्ति वालों के लिए तो बाबा ने कहा है तुम दोनों को निभाओ। कुमारियों को किस मुरली में कहा, वह मुरली तो मैंने कभी सुनी नहीं है।
८. बाबा हमें कहते बच्चे गाडली स्टूडेन्ट लाइफ इज दी बेस्ट.. इस लाइफ के चार सब्जेक्ट हैं। तो अपने आप से पूछो मेरी चारों ही सब्जेक्ट ठीक हैं! मेरी बुद्धि ज्ञान में रमण करती है? मेरे में नालेज की इतनी शक्ति है जो कोई कैसा भी प्रश्न करे मैं उसका उत्तर ठीक दे सकूँ, मैं किसी बात में स्वयं उलझी हुई तो नहीं हूँ? मुझे हर प्वाइंट को स्पष्ट करने की युक्ति आती है? फिर दूसरी सब्जेक्ट जो निरन्तर योगी की है, उस योग का आनन्द अनुभव किया है? बाबा की याद में उड़ने का, दिल, जिगर का अभ्यास है? दुनिया भूलने का अभ्यास है? अगर योग का अभ्यास हो तो अनेक प्रकार के प्रश्नों का जवाब मिल जायेगा। यह सब्जेक्ट जितनी जो पावरफुल बना सके, बनाओ। योग की मस्ती चढ़ी रहे तो कमाई ही कमाई है। जिसको मुरली से प्रीत नहीं, योग से लगन नहीं वह कोई सेवा भी लगन से नहीं कर सकते। कोई-कोई कहते हैं मैं रोज़ मुरली नहीं सुनती हूँ, नींद आ जाती है, नौकरी पर जाना होता है... मैं कहती यह मेरे बाबा की इनसल्ट है। बाबा सागर मुझे रत्न देने आता है और मैं कहती मैं रोज क्लास नहीं करती! बाकी तू जिंदा ही किसलिए हो। जो बाबा की मुरली का कदर नहीं करते वह ब्रह्माकुमार-कुमारी नहीं। क्लास न करना यह श्रीमत की पहली अवज्ञा है। १५ मिनट भोजन खाते और बाबा की मुरली नहीं सुनते - मैं उन्हें ब्रह्माकुमार-कुमारी नहीं समझती।
९. हमारी तीसरी सब्जेक्ट है दैवीगुण। कोई कहते हैं मेरे में यह कड़ा संस्कार है... मुझे यह शब्द सुनते ही शॉक लगता... यह भी कोई जवाब है! मेरे स्वभाव में मेरा मूड आफ का स्वभाव है, ईर्ष्या का संस्कार है, देह-अभिमान है, थोड़ा जोश है, थोड़ा मोह है, पता नहीं क्या-क्या बोलते, मैं पूछती हूँ क्या यहीं प्रसाद मैं भगवान को चढ़ाती हूँ। इन स्वभावों की भेंट चढ़ाई खत्म हुए, बार-बार यही भेंट चढ़ाते.. क्या इनको अपने पास रखने से सुख-शान्ति मिलेगी? तो देखना है हमारी तीसरी सब्जेक्ट दैवी संस्कारों वाली बनी है? इतना परिवर्तन आया है जो मैं उसमें भी अपनी सम्पन्न मार्क्स लूँ।
१०. चौथी सब्जेक्ट है सेवा तो हमें खुद के लिए जीना है या विश्व-कल्याण के लिए जीना है? कई सोशल वर्कर होते जो कितनी लगन से सेवा करते, अपना तन-मन-धन सब सेवा में लगा देते जब वह इतना सेवा में दे सकते तो क्या हम अपना श्वाँस-श्वाँस सेवा में सफल नहीं कर सकते! क्या खुद के लिए श्वाँस है या बाबा की सेवा के लिए, विश्व-कल्याण के लिए है? यह संकल्प, यह श्वाँस, यह समय,यह सम्पत्ति, यह जीना मेरा मेरे बाबा की सेवा के लिए है। जो इस सेवा में अपने आपका त्याग करता वही महान बनता। बाबा की सेवा में ही हमारी मौज है। मेरा भोजन है- बाबा की सेवा, मेरा सेकण्ड सेकण्ड संकल्प श्वाँस है 'सेवा'। हमारा स्लोगन है- 'त्याग, तपस्या और सेवा'। त्याग से हमारा भाग्य बनता, तपस्या हमें कर्मातीत बनायेगी और सेवा से भविष्य ऊँच पद मिलेगा। तो हे वरदानी आत्मायें, अब खूब अच्छी तरह से सोचो, मंथन करो और मधुबन वरदान भूमि में परिवर्तन होकर जाओ। ऐसा परिवर्तन हो जो लगे नई होली मना कर आये हैं। अच्छा।

हम खुद के लिए नहीं खुदा की खुदाई के लिए हैं

(कुमारियों प्रति)
भक्त खुद को जगाते या भगवान को ? वह हैं देश-भक्त और भगवान भक्त। हम हैं भगवान के बच्चे, विश्व-कल्याण के भक्त। हमारे मन में विश्व को पावन बनाने की, पवित्रता सुख शान्ति देने की शुभ कामना है। हम चाहते हैं सारी विश्व पावन बने, विश्व-कल्याण हो। अपना एक ईश्वरीय राज्य, एक धर्म, एक भाषा, एकमत हो जाए तो विश्व में शान्ति होगी। हम सभी की बुद्धि में विश्व-कल्याण की भावना है। हम विश्व-कल्याण की सेवा पर है।
२. हम सब बच्चों को, उसमें भी विशेष कन्याओं-माताओं को, जो कर्मबन्धनों से मुक्त हैं उन्हें बाबा ने बहुत बड़ी जिम्मेवारी दी है, सेवा दी है। वरदान दिया है। बख्तावर बाबा ने हमारी तकदीर बनाई है। हम सब यह जानते हैं कि हमारे जीवन की जो घड़ियाँ हैं वह स्वयं भगवान ने हमारी रेखायें बनाई हैं। हमारी रेखाओं में बाबा ने विश्व की सेवा के साथ महादानी, वरदानी मूर्त बनाया है। क्या सचमुच हरेक स्वयं को इतना भाग्यवान समझ अमृतवेले आँख खोलते ऐसा अनुभव करते हो ? जीवन दाता ने हमारे जीवन की एक-एक घड़ी स्वयं की और अन्य की जीवन बनाने के लिए दी है। हमारा जीना किसके लिए है? स्वयं के लिए या विश्व के लिए? लोग कहते - जीवन है खाना, पीना, मौज करना। दूसरे कहते देश भक्ति के लिए, तीसरे कहते हमारा जीवन भगवान के लिए है। लेकिन आप सबका जीना किसके लिए है? यह कुमारी जीवन इस संगम पर बहुत-बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस जीवन को इतना महत्त्वपूर्ण समझते ? एक-एक कन्या लाखों की माँ है। एक दुर्गा अनेकों की भावना पूर्ण करने वाली है। एक दुर्गा के ही लाखों भक्त हैं। संतोषी माँ, काली, सरस्वती, लक्ष्मी के अनेकानेक भक्त हैं... तो आप सब इतना पूज्य अपने को समझती हो? वह एक कन्या कौन है? वह एक कुमारी कौन है?
३. हम कई बार सोचती हूँ कि भोजन की जो एक ग्राही खाते वह किसलिए खाते ? टेस्ट के लिए या इस रथ से सेवा करने के लिए खाते ? हम खुद के लिए -हूँ या खुदा की खुदाई के लिए हूँ? मैं दुर्गा हूँ, गायत्री वा सन्तोषी माँ हूँ, क्या स्वयं को ऐसा समझते ? मैं भारत की माँ हूँ या विश्व की माँ हूँ? बाबा ने मुझे स्वयं ही भाग्य खींच कर दिया है। बाबा ने कहा है तू एक-एक शक्ति हो। क्या ऐसा स्वयं को समझते हो? मैं ५०० कमाने वाली नौकरानी हूँ या विश्व की सेवाधारी हूँ? मेरे प्राण, मेरे श्वाँस, मेरे संकल्प विश्व के लिए हैं या स्वयं के लिए हैं? बाबा के लिए हैं या स्वयं के लिए? बाबा के साथ विश्व है। यदि स्वयं को विश्व-सेवाधारी नहीं समझते तो मैं किसलिए जिंदा हूँ, मैं किसलिए हूँ ?
जीवन में सुख किस बात में है? शादी करूं, प्रवृत्ति बनाऊँ, गृहस्थी बनाऊँ या अनेक आत्माओं की दुआयें लूँ? कृपा की, भाग्य बनाने के सेवा की पात्र बनूँ ? यह निर्णय करो कि मैं स्वयं किसलिए हूँ? स्वयं को डाइमन्ड बनाकर औरों को डाइमन्ड बनाने लिए हूँ या ऐसे ही? खुद से पूछो कि मेरी तकदीर का सितारा किसने जगाया है? अपनी तकदीर पर मुझे नाज़ है। निश्चय के आधार पर स्वयं पर नाज़ है! मैं छोटी नहीं हूँ। पहले खुद से पूछो निर्बल हूँ या बलवान ? बकरी हूँ या शेरनी ? विश्व कल्याण की सेवा के लिए हूँ या हिलती हूँ? निर्भय हूँ या भयभीत ? हरेक ने अपना फैसला क्या किया है?
४. बाबा ने मुझे सेवा का ताज अभी दिया है। कल्प में फिर यह ताज नहीं मिलेगा। अभी ताज नहीं पहना तो कभी नहीं पहन सकेंगी। यदि ताज तख्त को छोड़ा तो तख्ते पर बैठना पड़ेगा। ऐसा तो खुद को नहीं बनाना है ना। कई कहते हैं पैरेन्ट्स हैं, सम्बन्धी हैं। लेकिन सितम तो सभी को सहन करना पड़ता है। प्यार किया तो डरना क्या! प्यार किया है, कोई चोरी तो नहीं की है ना। किसी लड़के से प्यार किया तो पाप है। जिसे दुनिया पुण्य कहती, उसे बाबा पाप कहता है। बाबा ने अजामिल जैसे हम पापियों का उद्धार किया। ज्ञान से पहले भी जो पाप हुए, उसे भी बाबा बख्श देता (खत्म कर देता) परन्तु बाबा यह भी कहता - अब अगर मेरे होकर नहीं रहेंगे तो पापों का बोझ भुगतना पड़ेगा। मेरा बनेंगे तो चौपड़ा साफ़ हो जायेगा। अब कोई पाप कर्म नहीं करो, यदि अब भी उधर बुद्धि जाती है तो एक का सौगुणा भोगना पड़ेगा।
५. बाप का बनना अर्थात् जीवन से मरना। इस जीवन में कोई भी आसक्ति, ममता है उससे भी मरना। पुराने स्वभाव, मूड आफ, जिद्द, क्रोध, छोटी-मोटी गलतियाँ सबसे मरना है। स्व-परिवर्तन करना है। परिवर्तन अर्थात् मरना। जितना परिवर्तन करेंगे उतना बाप से प्यार रहेगा। अगर दीपक बनना चाहती हूँ तो अंधकार मिटाना है। जो दीपक जगमगाता रहे, वही प्यारा है। अगर टिमटिमाता हुआ दीपक है तो उसे उठाकर रख देते। रोशनी वाला सम्भाल कर रखते। यदि दीपक हूँ तो सबको रोशन करना है। खुद अंधकार में हूँ तो कोई प्यार नहीं करेगा।
६. मुझे बाबा ने भाग्य दिया है विश्व कल्याण के लिए। मुझे अनेकों का उद्धार करना है। यदि यह फैसला है तो सब फैसला है फिर तो सेन्टर पर रहने के लिए अपनी तैयारी करो। अपने आप से खूब फैंसला करो, मनन करो। डिसकस करो। अभी अपने आप से पूछो मैं ज्ञान में बल सकूँगी? चलना है तो पूरा मरकर चलना है।
ब्रह्माकुमारी जीवन माना बाबा का नाम बाला करना है, ना कि बदनाम। हमें बाबा का नाम बाला करने का ही ठेका उठाना है। दुनिया में भी कई ऐसे होते जो कहते हैं कि हम सत्यता के पीछे मर मिटेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे। सत्य है तो प्राण हैं, सत्य नहीं तो मर जायेंगे। तो दुनिया क्या भी करे, मुझे सत्यता के पीछे जान देनी पड़े तो दे देंगे। नाम बदनाम नहीं करेंगे। एक की गलती हज़ारों को बदनाम करती है। सेन्टर का भी नाम बदनाम, शहर वा संस्था सबका नाम बदनाम.. तो नाम बाला करो या बदनाम - यह आपके हाथ में है, उंचा बनो तो नाम बाला है, नीचे जाओ तो नाम बदनाम है। तो देखो मेरे में नाम बाला करने की शक्ति कितनी आई है?
७. यह संकल्प ज़रूर है जब हमारे सेन्टर्स हर साल दुगुने होते जाते तो टीचर्स भी तो दुगनी होनी चाहिए। बोलने में भी लज्जा आती है कि हैन्ड्स नहीं है, इसलिए हिम्मत बढ़ाओ। कन्यायें हमारी हिम्मत को पीछे कर देती। क्वालीफाइड ब्रह्माकुमारी कम होने कारण दिल छोटी होती। आप दिल बड़ी करो। जीवन दान से ही दिल बड़ी होगी। एक बाप पर जीवन दान करते हो।

एक बाबा को अपनी ढाल बनाओ तो पुराने सब संस्कार परिवर्तन हो जायेंगे

बाबा की मुरली तो सब सुनते हैं लेकिन यह मुरली मेरे लिए है, यह बाबा दवाई का डोज़ बाबा ने मेरे लिए दिया है, वह तीर के समान समझ लें, ऐसा बहुत कम समझते हैं। इसलिए मुरली पर सबका अटेन्शन एक जैसा नहीं रहता। यह गोली जो शूट हुई यह मुझे ही मारने वाली है, ऐसा कोई मुश्किल ही समझते हैं, अपने प्रति पावरफुल घाव कोई नहीं समझता। बाबा हमारे ऊपर इतनी भिन्न-भिन्न युक्तियों का बाण रोज़ क्यों मारता ? क्या यह मुरली शास्त्र की तरह पढ़ने या सुनने तक है, क्या बाबा हमें बहलाने के लिए यह सब टोटके सुनाकर जाते, या यह एक-एक मुरली हमारे प्रति है, यह एक-एक लाखों रुपये का रत्न बाबा मेरे लिए खर्च कर रहा है, क्या मैं एक-एक रतन को इतनी कीमत देती हूँ? यह जो धारणा की मुरली हम सुन रहे हैं, इतना बाबा हमें डीप-से-डीप गुह्य बाण लगाता, फिर भी हमारे दिमाग में क्यों नहीं बैठती? पुराने संस्कार मिटते क्यों नहीं? बाबा ने कहा बापदादा से भेंट करो और कमियों की भेंट चढ़ाओ तो क्या मैं बाबा से कदम-कदम पर भेंट करती या आत्माओं के पीछे सारा दिन हमारी दृष्टि घूमती ? यह ऐसा क्यों बोलता, यह ऐसा क्यों करता.. बाबा से पल-पल भेंट करनी है, जैसे बाबा हमारा सम्पूर्ण बना हमें भी सम्पूर्ण बनना है आत्माओं से हमारी भेंट क्यों होती ? अगर बाबा से भेंट करते रहो तो यह सब भेंट खत्म हो जायेगी।
बुद्धि को बिज़ी रखो। यदि हमारी बीजरूप पावरफुल स्थिति बनती जावे तो यह सब पुराने संस्कार खत्म हो जायेंगे। बुद्धि को निरन्तर मनन-चिन्तन में बिज़ी नहीं करते इसलिए बुद्धि नीचे की बातें रमण करना शुरु करती। जैसे बाढ़ आती तो बाँध दिया जाता है या उसको दूसरी तरफ़ मोड़ दिया जाता, तो हमारी बुद्धि में संकल्पों की बाढ़ ही क्यों आवे? जो इधर-उधर भटके। बुद्धि ओवरफ्लो क्यों होती ? हमको बाबा ने जो ज्ञान दिया है वह आधार ही है सम्पूर्ण बनने का। हमारी बुद्धि निर्मल गंगा के पानी की तरह चलती रहे, ओवरफ्लो नहीं होनी चाहिए।
यह संगम का समय बहुत ही कीमती है, यही घड़ियाँ संस्कारों को परिवर्तन करने की मिली हैं, फिर अगर हम कहें क्या करू यह संस्कार मिटता ही नहीं, -क्या यह कहना शोभा देता? बाबा को ढाल बनाओ तो सब संस्कार मिट जायेंगे, जो अपने कड़े संस्कारों को बदल सकता वहीं दूसरों के भी बदल सकता, मायाजीत वाले ही तो दूसरों को भी मायाजीत बनने का साधन दे सकेंगे। बाबा भी इस पुरानी दुनिया में था, उसने भी अपनी सारी जीवन इस दुनिया में बिताई लेकिन क्या बाबा के मुख से कभी किसी ने सुना क्या करूं यह मेरा भी पुराना संस्कार मिटता नहीं? किसी ने बाबा की चलन से, बाबा के व्यवहार से कब ऐसा देखा ? जब साकार हमारे सामने सैम्पुल था, उसने कभी नहीं कहा तो फिर हमारे मुख से यह शब्द क्यों निकलते ? मैं बाबा का हूँ, मुझे बाबा समान बनना है यह है तीव्र पुरुषार्थ। ऐसा लक्ष्य रखो तो परिवर्तन करना मुश्किल नहीं। अगर वर्णन करते-मैं क्या करूँ तो यह भी कमी है। दूसरे का संस्कार तो फौरन नोट हो जाता, अपना नहीं। क्यों? स्वर्ग में तो परिवर्तन नहीं होना है, जब करना ही यहाँ है तो ढीलापन क्यों रहता ?
सदैव अटेन्शन रहे कि मेरे रजिस्टर में कोई भी नुक्स के मार्क्स नहीं होना चाहिए - अगर कोई नुक्स रह गई तो उसकी सजायें धर्मराज पुरी में तो मिलेंगे ही, लेकिन यहाँ भी बहुत कड़ी सज़ा मिलती हैं। यहाँ का तिरस्कार और सत्कार यही तो धर्मराज के डण्डे हैं, एक सत्कार करता, एक सत्कार लेता। मन की पीड़ायें, संकल्प, संस्कार, स्वभाव की पीड़ायें, दूसरे के वायब्रेशन की पीड़ायें जो आती, यही प्रैक्टिकल धर्मराज के डण्डे हैं। जो सतगुरु बाप की अवज्ञा करता उसे किसी-न-किसी रूप में यह पीड़ायें अभी ही भोगनी पड़ती। बुद्धि अगर इन सब पीड़ाओं से परे रहे तो बीजरूप स्थिति सहज ही बन जायेगी। अगर पीड़ाओं का घेराव होगा तो बीजरूप स्थिति कैसे बन सकेगी। ज्ञानी को यहाँ ही सब पीड़ायें भोगनी पड़ती। क्योंकि बाबा का जो इतना खजाना मिलता उसका मैंने रिटर्न नहीं किया, तो वह कर्ज हो जाता, उसका बहुत सूक्ष्म हिसाब-किताब बनता है, यह भी कर्मों की गुहा गति है। जैसे सतगुरु की आज्ञा है अपने आदि संस्कारों में रहना है, अगर मैं नहीं रहती, तो उसकी अवज्ञा हुई, जिसकी फिर बहुत सजा मिलती है।
हम हैं बापदादा के लाडले बच्चे, जो अपने को लाडला कहलाता उसके ऊपर बहुत बड़ी जवाबदारी आ जाती, जो लाडला है उसे इतना रिटर्न बराबर देना होता, इसका भी बहुत बड़ा हिसाब-किताब है। हमारी यह जीवन साधारण जीवन नहीं, यह सेवा करनी है, चल तो रहे हैं, क्लास में तो जाते हैं, योग तो करते हैं यह सब है साधारण बातें। अब हमारा पुरुषार्थ असाधारण चाहिए। हमारी धारणायें भी असाधारण हैं। हम अपने को कहलाते हैं 'साक्षात्कार मूर्त', अगर साक्षात्कार कराने समय हमारा मूड खराब हो तो भक्त हमारे से कौन-सा साक्षात्कार करेंगे ? हमारा यह मूड ही गायन योग्य है। हमारे इस मूड से ही वह मूडमति बन जायेंगे। जो मूडी हैं वह है मूडमति। हम कहते जो बाबा को नहीं पहचानते हैं वह मूडमति हैं लेकिन हम खुद ही मूडमति है, कब यह सोचा? अगर मनन नहीं चलता तो वह अपने संस्करों की पालना करता रहता, अपने ऊपर फुल अटेन्शन रहे तो अन्तर्मुखता में रह मनन भी चले। हमें अपने कैरेक्टर्स में कभी भी लूज़ नहीं रहना है, कभी बहुत जोश हो, कभी बचपन, कभी हठयोगी बन जायें, कभी खाओ पियो मौज करो - यह बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
हम सब युद्ध के मैदान में हैं, हमें हर समय अलर्ट रहना है, लूज नहीं होना है। हम सब मार्सल्स हैं। २४ घण्टा हमारे पीछे लश्कर है, दुश्मन हमारे मिनट-मिनट को चेक करता रहता। यह दुनिया, यह समाज, यह प्रकृति सब हमारी लश्कर है। सब मुझे सेकण्ड सेकण्ड देख रहे हैं। हम इस प्रकृति को भी परिवर्तन करने वाले हैं। इतना सर्विस का हमारे ऊपर बन्धन है। तो कितना न हमें अलर्ट रहना चाहिए। होशियार मार्सल कब पजिल नहीं होता।
हम सारी दुनिया की चोटी पर बैठे हैं, हमें योग की लाइट से सबको परिवर्तन करना है, सबको परिवर्तन करने के, सबकी बुद्धि को फेरने के हम जवाबदार हैं। पजिल तो मिनट-मिनट में आयेंगी, आती ही रहेंगी लेकिन हमें सब पजिल्स का हल सेकण्ड में देना है। अगर हम ही पूछें तो क्या होगा? तो फिर हम दूसरों को हल क्या देंगे ? नफ़रत करनी है अपने संस्कारों से, न कि दूसरों से। हमें सर्व की समस्यायें हल करनी हैं, न कि समस्या रूप बन जाना है। समस्या रूप बनना माना विघ्न रूप बनना, मैं विघ्न-हरता हूँ, करता नहीं। अच्छा।

प्रवृत्ति में रहते व्यवहार और परमार्थ दोनों का बैलेन्स रखो, तपस्वी बनो

इस घड़ी हम सभी सम्पूर्ण बनने की तपस्या कर रहे हैं। जैसे ऋषि एकान्त २ में बैठ तपस्या करते वैसे हम कर्मयोगी, राजयोगी, प्रवृत्ति में रहते एक बाबा के याद की तपस्या करते, घर जाने की, विकर्माजीत बनने की तपस्या करते। हम सब बेहद के संन्यासी हैं। यह सारी दुनिया जैसे जंगल है। यह जंगल जलने वाला है और हम जंगल के बीच अपनी तपस्या कर रहे हैं। हमें विकर्मों का बोझा समाप्त करना है। दिन-रात आँख खोलते, बन्द करते यही बुद्धि में फ़िकरात रहती कि जितना-जितना हम याद करें उतना विकर्म विनाश हों, अवस्था पावन बनें, कर्मों का खाता चुक्तू हो और हम घर जायें। यही है हमारा रोज का पुरुषार्थ अथवा अभ्यास।
२. हम सब तपस्वी कुमार-कुमारी हैं, जब यह अन्दर में पक्का होता तो सूक्ष्म में जो भावनायें रहतीं कि हम संसारी हैं, प्रवृत्ति वाले हैं, गृहस्थी हैं, वह सब मिट जाती। सदा यही चिन्तन रहता कि हमें तो तपस्या करनी है। तपस्वी बनने से प्रवृत्ति की अनेक समस्यायें मिट जाती क्योंकि बुद्धि में रहता यह तो पास्ट का बना हुआ खेल पूरा करना है। उड़ने का संकल्प, जाने का संकल्प आते ही निमित्त मुसाफिर समझते और अपना सब कुछ समेटने में लग जाते। बाबा कहते बच्चे, अब सब कुछ समेट लेना है, जितना समेट लो उतना हल्के होकर घर चलेंगे। यह जो सोचते कि हम गृहस्थी हैं, अब इस शब्द को बदल दो। गृहस्थी नहीं 'ट्रस्टी' हो। इससे बोझ खत्म हो जाता।
३. बाबा ने कहा- तुम सब सैम्पुल हो प्रवृत्ति में रहते पर-वृत्ति में रहने वाले। दुनिया आपको कई आँखों से देखती। पहला तो देखती कि कहाँ यह घरबार छोड़कर तो नहीं चले जाते ? स्त्री को भी सूक्ष्म में यह भय रहता, कहती इनको तो धुन लग गई है, सारा दिन योग में बैठे रहते हैं। सेन्टर पर बैठे रहते हैं। ऐसा तो नहीं यह मुझे छोड़ देंगे? यह सूक्ष्म भय एक दो को आगे बढ़ाने के बजाए अपनी-अपनी तरफ खींचने की कोशिश करता। हमारा पुरुषार्थ है एक-दो को आगे बढ़ाना लेकिन इस एक भय के कारण अनेक विघ्न पैदा हो जाते हैं। बाबा ने कभी नहीं कहा कि तुम्हें घरबार छोड़ संन्यासी बन जाना है। लेकिन यह ज़रूर कहा है कि प्रवृत्ति में रहते निवृत्ति में रहो। उसके लिए ध्यान रखना होता कि परमार्थ और व्यवहार दोनों का बैलेन्स रहे। प्रवृत्ति माना बैलेन्स। अगर बैलेन्स नीचे ऊपर होता तो समझो प्रवृत्ति राइट नहीं।
४. आप सब अपना चार्ट चेक करो कि हम पक्के ट्रस्टी हैं? बुद्धि में यह पक्का है कि यह प्रवृत्ति वा परिवार मेरा नहीं परन्तु बाबा का है, ऐसे बुद्धि सरेण्डर है? एक-दो में बुद्धि अटैच तो नहीं? कई बार माताओं की बच्चों में बहुत ममता होती। इसलिए पति को भी आँख दिखाती कि बाबा ने ऐसे थोड़े ही कहा है कि बच्चों का ध्यान न रखो। ऐसा ज्ञान थोड़े ही दिया है, इसके कारण आपस में दो मतें बन जाती। फिर मीठा-मीठा झगड़ा शुरु होता। प्रवृत्ति वालों को हमेशा बाबा कहते अगर तुम्हें अपना व्यवहार चलाना आता तो तुम बाबा का भी व्यवहार चला सकते। व्यवहार चलाना माना यह नहीं कि बाबा के व्यवहार से बुद्धि हटा लो। व्यवहार और परमार्थ दोनों का बैलेन्स हो।
५. बाबा ने हम सबको जो भी ईश्वरीय मर्यादायें बताई हैं। खुद से पूछो मैं उन सभी ईश्वरीय मर्यादाओं में बंधा हुआ हूँ? आप सब बहुत लकी हो। आपके पास डबल शक्ति है। कुमार, कुमारी तो अलग-अलग शक्ति है। आप दो इकट्ठी शक्ति हो। आप डबल काम कर सकते। आप सबके साथ में शक्ति ढाल है। शक्ति का केयर-टेकर फिर पाण्डव हैं। दोनों की शक्ति से कोई भी कार्य सहज हो सकता है। लेकिन जब अन्दर में आता यह मेरी है, यह मेरा है तो अटेचमेन्ट आ जाती। फिर दुनिया ही बदल जाती। लेकिन वह शिव-शक्ति जगत-माता है। तुम जगत-पिता हो। तुम्हें बाबा का मंत्र है- तूम अकेले आये, अकेले जाना है। इसलिए दो होते भी एक हो। तुम दोनों का वह एक है। जब ऐसी मर्यादा के अन्दर रहो तब कहेंगे तपस्वी कुमार-कुमारी का कंगन बाँधा है। हम एक बाप के बच्चे आत्मा रूप में भाई-भाई हैं, फिर भाई-बहन हैं। इस नाते से भी अगर वृत्ति नहीं बदलती तो सदैव देखो वन्दे मातरम्, हमारे घर में यह जगत-माता दुर्गा देवी है। जब वह अपने को अम्बा समझे तो बुद्धि में रहेगा मैंने अपने पाँव के नीचे असुर संघार किया। फिर कभी भी वृत्तियाँ उत्तेजित नहीं होंगी। अगर एक का संकल्प उठे तो दूसरा उसे योगदान दे। उसकी वृत्ति को खत्म करे। इसी का नाम है पर-वृत्ति। 'एक बाबा दूसरा न कोई', यह मंत्र सदैव याद रहे। हमारा पहला मंत्र है "बी होली बी योगी।" तो हरेक अपने से पूछो हम परिवार में ऐसे रहते हैं?
६. आप सब चतुर्भुज हो। चारों अलंकार शंख, चक्र, गदा, पदम साथ रहें। सदैव लाइट का चक्र चलता रहे। मुरलीधर की मुरली बजाते शंखध्वनि करते रहो। ज्ञान की गदा से विकारों को समाप्त करो तो पद्म समान जीवन बन जायेगी। आपकी प्रवृत्ति अलंकार वाली प्रवृत्ति हो, मेरी तेरी नहीं। ऐसे अलंकारधारी रहेंगे तो प्रेम और शान्ति से रहेंगे। प्रेम से रहो माना आपस में संस्कारों का टक्कर न हो। बाकी ऐसे नहीं कि प्रेम में अटैचमेन्ट हो जाए। यह भी सूक्ष्म माया है, इसे भी परखना है। कई बार समझते शान्ति से रहना है इसलिए इसने जो कहा वही श्रीमत है, उस पर चलते हैं। श्रीमती की मत को ही श्रीमत समझ लेते, वह फिर अपने पति देव की मत को ही श्रीमत समझ लेती। इससे भी बहुत नुकसान हो जाता। श्रीमत माना मुरली। मुरली में बाबा ने जो भी डायरेक्शन दिये हैं उसी अनुसार हमारा हर कदम हो।
७. आपस में कई बार एक दो की बातें सुनने, वर्णन करने से आपस में पर-चिन्तन का चक्र चलने लगता। बाबा ने आपको इसलिए प्रवृत्ति नहीं दी है कि दूसरों की बातों का चक्र रिपीट करो। अगर किसी की कमी का वर्णन आपस में किया तो उसके अन्दर भी वह कमी का भाव भर दिया। नफ़रत की भावना पैदा कर दी। जोड़ी इसलिए नहीं है कि तेरे मेरे का, वायुमण्डल का चिन्तन करो। इसलिए बाबा कहते शुभचिन्तन में रहो, शुभचिन्तक बनो। दिलवाला तो एक बाबा है उसे दिल दो। आपस में नहीं।
८. बाबा जानते हैं कि प्रवृत्ति में अनेक परेशानियाँ हैं। उसके लिए ही बाबा ने अष्ट शक्तियाँ दी हैं। शक्तियों को साथ रखो तो रांग राइट को परख सकेंगे। परेशानियों का हल कर सकेंगे। रावण का काम है हैरान करना। आपका काम है अपनी शक्तियों के स्वमान में रहना।
९. कर्मबन्धन को योग से तोड़ना है, न कि मुख के आवाज से। कोई प्रेम से रहे तो उसका हक है। नहीं तो हरेक का रास्ता अपना-अपना है। परन्तु फिर अन्दर में जो आता समाज क्या कहेगी? लोग क्या कहेंगे? ज्ञान में इस लोक लाज.. को तोड़ना ही पड़ता। अगर लोकलाज में चलेंगे, सिर पर चिन्ताओं की गठरी रखेंगे तो योग लग नहीं सकता। चिंता है चिता। इसलिए जहाँ तक हो सके प्रेम से बाबा की याद में रहकर प्रवृत्ति को चलाओ। जहाँ झगड़ा हो वहाँ शान्ति से नमस्कार। कई बार प्रापर्टी के पीछे झगड़ते, जहाँ झगड़ा है वहाँ शान्ति से फैसला कर किनारा करो। प्रापर्टी को छोड़ो नहीं, लेकिन उसे बाकायदे लिखा-पढ़ी कर सबका हिस्सा बाँट दो। धन जमीन, जेवर सबका हिसाब-किताब कर लाइन क्लीयर रखो। भविष्य के लिए भी जमा कर लो, ताकि बुद्धि निरसंकल्प रहे।
१०. आपका फर्ज है बच्चों को पढ़ा लिखाकर बड़ा करना। फिर उन्हें दोनों रास्ते दिखाओ। शुभ भावना रखो। बच्चों की जवाबदारी माँ-बाप पर है। उन्हें भी दोनों रास्ते दिखा दो, चिंता छोड़ दो। अपना काम है उनको उस एज तक पढ़ाना। उस कर्मबन्धन को निभाना। फिर जैसी उनकी तकदीर।
११. जब प्रवृत्ति में दोनों साथ-साथ चलते तो घर का वातावरण योगयुक्त जरूर बनाओ। पीसफुल रहो जो भी भोजन बने उसका नियम अनुसार बाबा को भोग लगाओ। अगर जाइंट फैमली है तो फल का भी भोग ज़रूर लगाओ।
१२. मुरली ज़रूर पढ़नी है, जब तक ज्ञान डांस नहीं की तब तक भोजन नहीं खा सकते। यह भी पक्का नियम है। लाचारी कारण वश सेन्टर पर नहीं जा सकते तो घर में मुरली पढ़ो। योग में कभी मूँझो नहीं। सच्ची दिल से बुद्धि को बाबा में लगाओ। जितना हो सके अशरीरी बनने का अभ्यास करो। रोज़ सवेरे सवेरे उठकर अपने भाग्य का गुण गाओ। वाह मेरा भाग्य! वाह बाबा और वाह ड्रामा! गुण गाते रहो तो सदा हषित रहेंगे। मन का, आँखों का रोना सब समाप्त हो जायेगा।

डर का त्याग कर निर्भय और निर्वैर बनो

(कुमारियों के प्रति)
आज बापदादा ने मुरली में हम बच्चों को कितना प्यार से धीरज दिया। और जब यह लाइन आई कि परवाह थी पार ब्रह्मा में रहने वाले परमेश्वर की, उसी को मैंने पा लिया। तो ऐसे बाप को जिसको हमने सम्मुख पाया, वह हमें कितना न प्यार से धीरज दे रहा है। वह हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप में है।
२. बाबा ने हम बच्चों को आज की मुरली में यह भी बहुत मीठी शिक्षा दी - बच्चे कहते बाबा रेस्ट चाहिए। बाबा कहे बच्चे रेस्ट शब्द ही रांग है। नेहरू ने भी कहा - 'आराम हराम' है, परन्तु बाबा उसी को और अर्थ से कहते कि आराम में याद की यात्रा नहीं। कमाई नहीं। नींद रात की बराबर होनी चाहिए। यह भी अपनी दिनचर्या का बैलेन्स हो। बाबा ने सन्देश में भी कहा रूहानियत, अलौकिकता, झलक, न्यारा और प्यारा। यह भी बहुत बड़ी स्थिति होती। परन्तु प्यारे और न्यारे-पन की स्थिति रखने में कईयों को बहुत मूँझ होती है। न्यारे बनते तो प्यारे नहीं, प्यारे बनते तो न्यारे नहीं। बैलेन्स न होने के कारण ही मूँझ होती। फिर घबरा जाते।
३. परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले की, वह मिल गया तो फिर घबराते क्यों? डर किसका ? पहले खुद से पूछो कि मुझे किसकी परवाह है? जिसकी परवाह होगी उसका डर ज़रूर होगा। माँ-बाप की परवाह होगी तो भी डर होगा। एक होता है मैनर्स रखना, दूसरा होता है डर रखना। तो अपने आप से पूछो मुझे किसका डर है? मामा, काका, चाचा, माँ-बाप.. किसका डर है? फिर पूछो क्या मैं भला अपनी टीचर से डरती हूँ। एक है डर, एक है मैनर्स। तो टीचर से डरती हो या बड़ी बहन समझ रिस्पेक्ट रखती हो? मैं किसी से भी डरती हूँ तो क्यों ? क्या कोई चोरी किया है? गुनाह किया है? गलती की है? डर किस बात का ? गलती करेंगे तो डर होगा। कोई भी किसी प्रकार का रांग कर्म करूंगी तो डर होगा। रांग कर्म नहीं तो डर नहीं। समझो कोई थोड़ा ठका करता तो डरती हूँ? छत गिरेगी, मर जायेंगे। बस इतना ही होगा ना। तुम तो जीते जी मरे हुए हो। एक होता है सम्भालना, दूसरा होता है डरना।४. डर पाप कर्म कराता है। डर झूठ बोलने की आदत डालेगा। मान लो मेरे से कोई चीज़ टूट गई। उसे हमने छिपाकर रफा-दफा कर दी, झूठ बोल दिया। फिर एक झूठ के पीछे सौ झूठ बोलने पड़ते। समझते हैं टीचर को बतायेंगे तो डांटेगी। एक होता है लौकिक डर, दूसरा होता है टीचर का डर। टीचर कोई धर्मराज तो नहीं है।
५. डर क्यों होता? ज़रूर कोई रांग कर्म करते हैं। मान लो टीचर ने कहा यह काम नहीं करना या यह नहीं कहना। परन्तु कह लेते हैं तो डरते हैं। पहली बात तुमने मना करने पर कही क्यों? तुम्हारे ३२ दांत से बात निकली तो दूसरे के ३२ दांत से भी निकलेगी। तो डांट तो पड़ेगी ना।
६. 'मैं निर्भय हूँ और निर्वैर हूँ।' यह दो शब्द ऐसे हैं जो स्वयं को बहादुर बना देते हैं। निर्भय रहेंगे तो बुद्धि हर कार्य में राइट रहेगी। नहीं तो राइट बुद्धि भी रांग हो जाती है। फिर हाथ भी कांपते तो बुद्धि भी कापती है। कुमारियों को डर बहुत होता, पता नहीं क्या होगा, पता नहीं, पता नहीं कहकर पत्ता ही कट जाता। सेन्टर पर रहना माना डर छोड़ना। डर छोड़ो तो हिम्मत-हुल्लास और शेरनी होकर रहोगी। मैं बाबा की सेवा पर सच्ची हूँ तो डरू क्यों? कई फिर सच्ची बात पर भी डरते हैं, समझते हैं मेरी सच्ची बात तो मानेंगे नहीं। डर कमजोर बनाता, भयभीत करता। टेन्शन पैदा करेगा, घुटन पैदा करेगा। बीमारी पैदा करेगा। खाना अच्छा नहीं लगेगा, नींद नहीं आयेगी। काम करते घबराते रहेंगे, चिंता पैदा होगी। फिर वह चिंता काम नहीं करने देगी।
७. परवाह होगी तो डर होगा। मैनर्स, रिस्पेक्ट और चीज़ है। बड़ों के सिर पर न चढ़ो। बड़ो से बड़ी बन जाती। निर्भय माना उल्टा नशा नहीं कि मैं ऊपर कहूँगी, मुझे सब पता है आदि। मैनर्स मुहब्बत और चीज़ है परन्तु निर्भय और चीज है। जिसमें सहन-शक्ति होती है उसमें समाने की भी शक्ति होगी। सहन शक्ति नहीं तो समाने की शक्ति नहीं। लौकिक में भी तीन-चार देवरानी, जेठानी के बीच जाते तो छोटी को झुक कर रहना पड़ता। सहन भी करेगी, चुप होकर चलेगी लेकिन अगर तीखी होती तो घर बरबाद कर देती। घर में रहना है तो निभाना है। निभाना माना सहन करना। अगर मुझे दूसरों की दिल को जीतना है तो सहन करना है। सन्तुष्ट करना है तो सहन करना है। वातावरण नहीं बनाना है तो सहन करना है। वायुमण्डल शान्ति का रखना है तो सहन करना है। निभाना अर्थात् सहन करना बहुत बड़ा गुण है। हरेक को सन्तुष्ट रखना और स्वयं से सन्तुष्ट रहना यह भी मेरा गुण है। ड्युटी है। हमारी नैचुरल नेचर ही सहनशीलता की होनी चाहिए। सहनशील होंगे तो डर नहीं रहेगा। सहन करना.. यह भी एक परिवार का प्रेम है। तुम मेरी बात मानों मैं तुम्हारी। जैसे दो दोस्त एक-दूसरे की बात को समा लेते, दुश्मन बात को उठाते हैं, फैलाते हैं। कोई को भी दिल से दुश्मन नहीं समझो। हरेक से सीखना है। थोड़ी घड़ी रांग भी हो, कोई बात नहीं। डर निकाल दो तो आगे चल सकेंगे। अगर ससुराल में जाते तो भी निभाना पड़ता है।
८. सन्तुष्ट रहना और दूसरों को करना यह हमारा कर्तव्य है। बीमारी आती है मुझे सहन करनी है। दूसरा तो नहीं सहन करेगा? हिसाब-किताब वाले को सहन करना पड़ेगा। दुनिया है ही दर्दी भरी। रोयेंगे, चिल्लायेंगे तो दर्द चला जायेगा क्या? नहीं। इसलिए मुझे ही सहन करना है। एक बाबा से भय और किसी से भी भय नहीं।

शक्तियों का स्टॉक कैसे जमा हो?

ज्ञान सागर बाप ने सबसे पहला ज्ञान दिया है कि तुम सब बच्चे मास्टर नालेजफुल हो और मास्टर सर्वशक्तिवान हो। मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् जो बाप की सर्वशक्तियाँ हैं, वही हम बच्चों की भी सर्वशक्तियाँ हैं। ज्यो-ज्यों हम याद में रहेंगे जितना रहेंगे उतना शक्तियों का स्टाक जमा करेंगे। खोई हुई सब शक्तियाँ स्वयं में धारण होंगी।
याद एक बाप को करते परन्तु उस याद से सारी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिसको कहा जाता है 'स्मृति से समर्थी' आती है। स्मृति अर्थात् शक्ति। तो सवाल है हमनें स्वयं में समर्थी, सर्वशक्ति धारण की हैं? ऐसे तो बाबा ने हमें अष्ट शक्तियाँ बताई हैं- यह शक्तियाँ तो हमारी धारणाओं की भुजायें हैं। परन्तु पहले-पहले जो बाप ने ज्ञान दिया उसको कहते हैं 'ज्ञान बल' नालेज इज़ पावर। फिर कहते हैं 'योग बल' इस योग बल से ही स्व-परिवर्तन द्वारा विश्व-परिवर्तन करते हैं। फिर कहते हैं 'पवित्रता का बल' जिस पवित्रता के बल से सारी सृष्टि को पावन बनाते हैं। फिर कहते हैं 'एक बल एक भरोसा' अर्थात् एक बाप के ऊपर भरोसा है तो हमें सर्व बल प्राप्त होते हैं।
'निश्चय' भी एक बड़ा बल है। एक बार जो निश्चय करता, जिसका दृढ़ संकल्प करते हैं, यह निश्चय, यह दृढ़ता हमारे ज्ञान की बड़ी शक्ति है। निश्चय बुद्धि विजयन्ती। बाप के ऊपर निश्चय से सारी माया के ऊपर विजय। 'स्नेह' भी बड़ी शक्ति है, स्नेह ऐसी शक्ति है जो सर्व को स्वयं के आगे झुका सकती है। स्नेह ऐसी शक्ति है जो पत्थर को पानी, दुश्मन को भी मित्र बना देती है। स्नेह एक ऐसी शक्ति है जो एक सेकण्ड में सबको अपना बना देती है। कहते हैं स्नेह के आकर्षण में सुधबुध भूल जाती है।
हम प्यार के सागर के बच्चे प्यार के पुतले हैं। अगर बाप में स्नेह हैं तो स्नेही आत्मा स्वयं को और सर्व को बाप पर निछावर कर देती है। 'त्याग' भी एक बड़ी शक्ति है जिसके अन्दर त्याग है, उसके अन्दर तपस्था की भी शक्ति है। कहते हैं समर्पणता से ही सम्पूर्णता आती है। जो समर्पण करता है, वही सम्पूर्ण बनता है। जब तक समर्पणता की शक्ति नहीं तब तक योग की शक्ति स्वयं में अनुभव नहीं होती। इसलिए देह-अभिमान का त्याग, देह के सम्बन्धों का त्याग, स्वयं के संस्कारों का त्याग, मान का, शान का त्याग, महिमा का त्याग, बुद्धि का त्याग, आदतों का त्याग, ऐसा त्यागी ही निरहंकारी, निर्मान, निर्मोही की शक्ति धारण करता है। ऐसा निर्मोही, सर्वशक्तिवान बाप के समान बन सकता है।
मास्टर सर्वशक्तिवान बाप समान माना ही सर्व को परिवर्तन करने वाला। कभी देह-अभिमान में है तो कहते हैं मेरे में सहन करने की शक्ति नहीं है। अगर बाबा की स्मृति में रहे तो कभी यह नहीं कहेगा कि मेरे में सहन करने की शक्ति नहीं। बाबा की याद में रहने से सर्वशक्तियाँ ऐसे आ जाती हैं जैसे बीज जब धरती में डालते हैं तो बीज की सर्वशक्तियाँ फूल, फल, खुशबू आदि का समय पर सबूत देता है। ऐसे ही जब बाबा को याद करते, बाबा को साथी बनाते तो साथी के साथ की शक्ति से सर्वशक्तियाँ स्वयं में इमर्ज हो जाती हैं।
मास्टर सर्वशक्तिवान ऐसे कभी नहीं कहेंगे कि मैं कमज़ोर हूँ- मेरे अन्दर अभी इतनी शक्ति नहीं आई है, ये मिट जायेगा लेकिन फल की तरह सबूत देगा। हम विश्व-परिवर्तन करने वाले हैं, मिटने की भी शक्ति है तो मिटाने की भी शक्ति है, बाप में समा जाने की भी शक्ति है। बाप समान बनने की शक्ति है तो बाप के समीप रहने की भी शक्ति है। एक बाप की याद से सर्व शक्तियों को स्टोर करना है। जब सर्वशक्तियों का स्टॉक जमा हो जायेगा तब घर चलेंगे। जिसके पास स्टॉक रहता है, उसे कभी समय की चिंता नहीं रहती। फिकरात नहीं होती वो समय का सामना कर सकता है। समय पर खर्च कर सकता है, दूसरों को सहयोग दे सकता है।
हम अष्टभुजी शक्तियाँ नहीं, बाप समान स्नेही, सहयोगी सहस्र भुजा वाली शक्तियाँ हैं। ये संगमयुग का ब्राह्मण कुल जो महान कुल है। जो हमको सहस्र शक्तियाँ हैं, उससे ही हम विश्व को परिवर्तन करते हैं। इसलिए स्वयं को स्मृति स्वरूप, समर्थी स्वरूप, सर्वशक्तिवान स्वरूप बनकर बाप की याद में रहना है।
हम सभी सागर के बच्चे हैं जैसे सागर में सर्वशक्तियाँ हैं, वैसे हमें भी अब फिर से प्राप्त करनी हैं। उस खोई हुई शक्तियों को प्राप्त करने का साधन है- मीठे बाबा की याद में रहो। याद में सर्वशक्तियाँ का स्टॉक जमा हो जायेगा। परे चलो-पार चलो अथवा शक्ति के सागर के तले में चले जाओ।

उपराम स्थिति अर्थात् बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा अपना पेपर तैयार करो

आज सवेरे की मुरली का दो शब्दों में सार था - हे बच्चे, तुम कितने खुशनशीब हो। हम बच्चे अपनी तकदीर को देख-देख हर्षित होते, अपनी तकदीर का गुणगान करते कि कितना न बच्चों के बीच का सम्बन्ध है। हम उस मीठे सम्बन्ध को जानते और बेहद सृष्टि का नाटक देख-देख हर्षाते। नेचुरल जब ज्ञान डान्स चलती तो आत्मा जैसे उड़ जाती, वह नशा चढ़ जाता है। आत्मा स्वयं ही स्वयं के अन्दर खुशी के गीत गाती, मस्त रहती है। और जब ऐसी ज्ञान की रूहानी मस्ती बढ़ जाती है तो दिल अन्दर कभी भी दूसरी आत्माओं के प्रति बुरी भली बातें उठती नहीं हैं। दूसरों की कमज़ोरियों पर दृष्टि जाना बन्द हो जाती है।
२. बाबा का एक मन्त्र सभी को याद होगा। बाबा कहते- 'बच्चे, सुख दो सुख लो। न दुःख दो न दुःख लो।' यह स्लोगन सुन मैं आप से पूछती - क्या मेरी मंसा वृत्ति भी सर्व के प्रति सदा शुभ भावनाओं से भरी हुई रहती है? या सूक्ष्म भी विरोध की भावना रहती है? कभी यह तो संकल्प में नहीं उठता कि यह ऐसा क्यों ?जिनके अन्दर किसी के प्रति क्यों, क्या उठता है वह सुख कैसे दे सकेंगे ?
३. हम सबके बीच एक बाबा है। हरेक बच्चा नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार बाबा से वर्सा ले रहा है। जब बुद्धि में यह बात याद आती तो दूसरे सब संकल्प स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। संकल्प व्यर्थ क्यों गंवायें? हम भी दाता के बच्चे दाता बनकर रहें। हम उस बड़े से बड़े सेठ के खज़ाने के मालिक बन कर रहें। अधिकार लेते जायें और सबको देते जायें। जब बुद्धि में यह लक्ष्य पक्का रहता तो स्थिति सदा ऊँची रहती। नीचे की बातों से बुद्धि उपराम हो जाती है।
४. हम सबका कोई हद का वैराग्य नहीं है, लेकिन बेहद का और सदाकाल का वैराग्य है। जितना-जितना हम उपराम रहेंगे उतना नैचुरल योग की आकर्षण रहेगी। उस आनन्द का अनुभव करते रहेंगे। फिर दूसरों की बातें सुनते, देखते हुए भी उसका असर नहीं आयेगा। आटोमेटिकली छोटी-छोटी बातों से किनारा हो जायेगा, दृष्टि बदल जायेगी।
५. यही समय है सारे ज्ञान के कोर्स को रिवाइज़ करने का। अपनी स्थिति बनाने का। पेपर तो नये-नये आते ही रहेंगे, आखिर तो हरेक को कर्मातीत बनने के लिए अपने को तैयार करना है। कर्म-बन्धनों से अतीत होकर ही हम सम्पन्न बनेंगे। इसलिए यह जो समय मिला है, इस समय में योग के बैलेन्स में जो कमी है, धारणाओं में जो कमी है उसे फुल करो। हर सब्जेक्ट को बैलेन्स में लाने के लिए रिवाइज करो, हरेक अपना पेपर देने के लिए तैयार रहो।
६. बाबा ने कहा बच्चे बैलेन्स रखो, ब्लिसफुल बनो और ब्लैसिंग देते रहो। जितना हम याद का और पढ़ाई का बैलेन्स रखेंगे, उतना हम स्वयं ब्लिसफुल बन सकेंगे और सर्व को ब्लैसिंग दे सकेंगे। तो खुद को भी ब्लैसिग देनी है। डोन्ट-केयर रहकर अपने इस समय को वेस्ट नहीं करना है। जीवन भर खाया, पिया, नाचा, कूदा.. लेकिन यह दिन फिर-फिर नहीं आयेंगे। इसलिए इन दिनों में ऐसा भर लो जो बैटरी फुल हो जाये। इस टाइम को वैल्युबुल समझकर सम्पन्न बनने के लिए तैयार होना है। अगर हम अपनी पढ़ाई से, धारणा से, सेवा से सन्तुष्ट हैं तो भल बाबा आज ही हमें क्यों न बुला ले, हम तैयार हैं। परन्तु अगर खुद के अन्दर ही खिट-खिट होगी तो आयेगा पता नहीं कल क्या होगा! मैं सन्तुष्ट हूँ, दूसरे सब मेरे से सन्तुष्ट हैं तो जैसे मैं हूँ ही कर्मातीत। अपनी प्रैक्टिकल स्थिति कर्मातीत हो। न मन का बन्धन, न कर्म का बन्धन। मैं सब बन्धनों से मुक्त बनूँ। यही पुरुषार्थ हो, इसका ही अनुभव करना है। जितना हम अपने को स्वीट, सन्तुष्ट, पीसफुल, शीतल रखते उतना आत्मा हल्केपन का अनुभव करती है। बाबा हमेशा कहते - शीतल काया वाले योगी बच्चे.. तो हमारी श्वाँस, संकल्प, वृत्ति अति शीतल, अति पावन हो, ज्वाला है तो याद, बाकी हम हैं ही शीतल। हम शीतल रहें तो दूसरे भी हमें उसी शीतल दृष्टि से देखें।
७. बाबा ने हम बच्चों को खुली आँखें रख जो योग में बैठना सिखाया है, इस बात में भी रहस्य है। आँखें खुली होंगी तो बाबा हमें रूहानी स्नेह की शीतल दृष्टि दे निहाल कर देगा। यह दृष्टि ही शीतल बनाती है। जब ऐसी शीतल दृष्टि स्वयं की हो तब हम भी दूसरों को अपनी दृष्टि से निहाल कर सकेंगे। ऐसी शीतल दृष्टि वाले को ही कहेंगे 'खुशनशीब'।
८. हम सबको अपनी इन अन्तिम श्वाँसों में उपराम रहकर इस थोड़े से समय में हमें फुल मार्क्स लेनी हैं। जितनी-जितनी हमारी वृत्ति उपराम रहेगी, उतना व्यक्त भावों की वृत्ति खत्म होती जायेगी। अरे, कहा भी जाता तुम्हें लेना क्या, देना क्या! तू साथ क्या ले जाओगे! हरेक जब जाता है तो अपने गुण ही छोड़ जाता है, जिन गुणों का ही फिर सब गायन करते हैं।
९. हम कोई वैरागी बाबा या हठयोगी बाबा नहीं हैं लेकिन हमारी स्थिति वानप्रस्थी, उपराम चाहिए। उपराम वृत्ति से व्यक्त वायब्रेशन खत्म हो जाते हैं। हम योग के वायब्रेशन से ही अपने किले को पावरफुल बना सकते हैं। कम-से-कम ८ घण्टे योग का चार्ट ज़रूर बनाना है, हरेक को यह पुरुषार्थ करना है। कभी भी किसी के पुरुषार्थ को देख टोन्ट नहीं कसना है। उसकी हंसी नहीं उड़ानी है। एक छोटी सी हंसी के आधार पर ही सारा महाभारत बना है। इसलिए कभी भी टोन्ट नहीं मारो। टोन्ट भी दुःख देता है। हमारे किसी भी शब्द से किसी को दुःख न हो। ऐसा कोई भी बोल न निकले जिससे नुकसान हो जाए।

निराकारी स्थिति में रहने का अभ्यास हो तो निर्विकारी और निरहंकारी सहज बन जायेंगे

प्यारा बाबा कहता कि आप सब गृहस्थी नहीं, ट्रस्टी हो। अगर इनसे भी परे देखो तो ट्रस्टी भी नहीं, हम तो सब छोटे बच्चे हैं। बच्चे को गृहस्थी नहीं कहेंगे। हम बच्चे हैं बस। हमारा संसार एक बाबा है। माँ भी वही है, पिता भी वही है, बंधु-सखा, बेटा, देवों का देव सब कुछ वही है। इसलिए हमारा सारा संसार एक में है। एक ही हमारा संसार है। एक में ही हमारा संसार है। जब हमारा एक ही संसार है, उस एक में सारा संसार है, तो हम संसारी नहीं हैं, माना हम दुनियावी नहीं, दुनिया के रीति-रिवाज़ों से परे हैं। दुनिया की रीति, रसम अपनी है, उनका बहुत बड़ा संसार है। हमारा संसार तो एक बिन्दु है। हम उस संसार से अलग हैं। हमारा संसार बाबा और बाबा का परिवार है। हमारी प्रीत भी नई है, रीति भी नई है क्योंकि हमारा मीत भी नया है, जिसका हम सदैव गीत गाते हैं।
२. हम संसारी नहीं माना गृहस्थी नहीं, गृहस्थी माना बहू, बेटे, पोता-धोता... कितनी बड़ी दुनिया होती। हमारा तो एक बाप, एक माँ है, हम सब बच्चे हैं। इसलिए एक मात-पिता के हम सब बच्चे हैं। हमारे को कोई सास, ससुर, देवर, जेठ नहीं, एक से सारे रिश्ते हैं। बाकी सब रिश्ते बाबा ने तोड़ डाले। बाकी निमित्त कर्मबन्धन के रिश्ते हैं। बाबा की पहली पहली श्रीमत व डायरेक्शन है- देह सहित देह के सब सम्बन्धों को भूल मामेकम् याद करो। उसी अनुसार हम अकेली आत्मा हो गई। इस देह का भी बहुत बड़ा अपना संसार है। इसको सम्भालना पड़ता, खिलाना, पिलाना पड़ता... परन्तु बाबा कहते इससे भी निवृत्त बनो, इसे भी भूलो - यही हमारी पढ़ाई है। इस देह के भान को भी मिटाना है। खुद का यह जो शरीर है, यह प्रवृत्ति भी हमें जो नींचे खींचती है, देह में ले आती है, हमें तो इसे भी परिवर्तन कर देही बनना है। यही हमारी पढ़ाई व रात दिन का अभ्यास हो। अशरीरी बनने का ही निरन्तर चिन्तन, मनन करना ही राजयोग है। राजयोग अर्थात् इस शरीर से परे अपने स्व-स्मृति में रहना है। एक मैं आत्मा और एक हमारा परमात्मा। इसी स्थिति में रहकर डेड साइलेन्स का अनुभव करना है। इसके लिए एकान्त की दरकार है। एकान्त में बैठ जितना-जितना हम आवाज़ से परे संकल्प विकल्पों से परे, निराकारी स्थिति में रहें यही आदि और अन्त 'मन्मनाभव' है। छोटे से बड़े सबको इस कर्मातीत स्टेज पर आने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है। यही मेहनत करनी है। इस पढ़ाई को जितना-जितना हम रात को सोते, सवेरे उठते दिन भर रटते रहें तो सारे जीवन की समस्यायें समाप्त हो जायेंगी। इसलिए बाबा ने हमें अनेक बार स्मृति में आने के साधन दिये हैं। हमारी दिनचर्या स्टार्ट ही ऐसे होती, आँख खुली - मैं आत्मा इस शरीर रूपी रथ पर विराजमान हूँ, पहली गुडमार्निंग है बाबा। और अपने को आत्मा जान, उसी बाबा से मीठी-मीठी रूह-रूहान करते अथवा इस शरीर, इस संसार से परे निकलकर अपने घर बैठ जाते। पहले रमण करते अपने घर में फिर पहुँच जाते खेल करने। खेल करते भी बाबा ने ट्रैफिक कण्ट्रोल की जो प्रेरणायें दी हैं, उसमें भी संकल्पों का कण्ट्रोल करना है। एक सेकण्ड में नीचे आ जाना, एक सेकण्ड में आवाज से परे जाना। मुरलीधर की मुरली भी रोज़ सुननी है। उस समय भी यही अभ्यास करना है कि मैं आत्मा कानों का आधार ले परमात्मा के महावाक्य सुन रही हूँ। बाबा मुख का आधार लेकर हमें सुना रहे हैं। ऐसे अभ्यास करते-करते जितना निराकारी स्थिति में रहेंगे उतना निर्विकारी स्थिति स्वतः बन जायेगी। निर्विकारी स्थिति बनाने का साधन है अपने को निराकारी बिन्दु आत्मा स्थिति में स्थित करना। जितना-जितना निराकारी रहेंगे तो निरहंकारी भी बनते जायेंगे। यह तीनों महावाक्य हम सबके प्रति मंत्र रूप में बाबा के अन्तिम महावाक्य हैं। इसे अपना मंत्र समझकर रखेंगे तो अन्दर में जो अनेक प्रश्न उठते कि निराकारी स्थिति कैसे बने, वह सब रोज़ के अभ्यास से समाप्त हो जायेंगे।
कई जो पूछते हैं- बाबा माया के तूफ़ान बहुत आते हैं। बाबा कई बार बच्चों को मीठी-मीठी बातों से बहलाता है बच्चे तुम योद्धा हो, तूफ़ान आयेंगे, ऐसा कहकर बच्चों की दिल ले लेता, जिससे बच्चों को चढ़ने के पहले ही श्वाँस न फूल जाए। यह युक्ति है। लेकिन दूसरे तरफ़ बाबा कहते हैं बच्चे, तुम सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण हो, ब्रह्माकुमार-कुमारी हो। तुम्हारी पढ़ाई है- हम आत्मा हैं, संसार एक बाबा है, लक्ष्य है देवता बनने का फिर यह प्रश्न पूछते हो कि माया आती है? माया के आने का गेट तभी खुलता जब अपने को देह समझते, फिर आता यह मेरी गृहस्थी है, यह समाज है, हम तो पुरानी दुनिया में रहने वाले, व्यवहार करने वाले हैं। परन्तु जब एक सेकण्ड में निकल जाते कि यह न तो मेरा संसार है, न मेरी गृहस्थी है, गृहस्थी बाबा की है, हमारी नहीं। हम तो छोटे बच्चे, स्टूडेण्ट हैं। जब बुद्धि में यह निर्णय कर लेते तो माया के कई प्रकार के चक्र समाप्त हो जाते।
३. कई कहते हैं बाबा ने तो कहा है ना तुम्हें प्रवृत्ति निभानी है। परन्तु बाबा ने ऐसे तो नहीं कहा कि तुम गृहस्थी हो। कई फिर बाबा का यह शब्द भी लेते कि गृहस्थी नहीं ट्रस्टी हैं। ट्रस्टी समझकर चलते फिर भी कभी-कभी अमानत में ख्यानत आ जाती। अब हमें इससे भी परे जाना है। न मेरा संसार है, न मैं संसारी हूँ। मैं बाबा का, यह संसार बाबा का, यह इतने मीठे बोल हैं जिससे सब घटनायें खत्म हो जाती हैं। मूँझने की सब बातें समाप्त हो जाती हैं। ऐसे भी नहीं प्रवृत्ति तो है लेकिन पवित्र प्रवृत्ति है। प्रवृत्ति समझना माना ही माया के आने का गेट खोलना। आप समझेंगे हम प्रवृत्ति वाले हैं तो माया ज़रूर आयेगी। कभी देह की आकर्षण में लायेगी, कभी तेरे-मेरे में लायेगी... फिर उसको जीतने में समय जायेगा। यह जो समझते हम तो योद्धे हैं, हाँ, हार नहीं खानी है, तूफ़ान तो आते हैं। कभी हार जाते, कभी जीत लेते, अब इसी खेल में समय नहीं गंवाना है। अगर इसी खेल में रहे तो संकल्पों-विकल्पों की दुनिया में नाचना पड़ेगा। उतरने चढ़ने में ही समय चला जायेगा। परन्तु जब निश्चय हो जाता कि हम बाबा के, बाबा हमारा तो न मैं गृहस्थी हूँ, न मेरी प्रवृत्ति है। इतना बड़ा संसार है, कितनों पर मैं आकर्षण हूँ। मुझे तो आकर्षण करने वाला, मुझे श्रृंगारने वाला एक मेरा बाबा है। तुम किसको भी न देखो। एक को देखो। मेरा कोई नहीं। प्रवृत्ति में रहना पड़ता, यह तो खेल है। जितना-जितना याद में रहेंगे उतना कर्म का खाता चुक्तू होगा। हमें इन बातों को मिटाना है, याद में रहना है। ऐसे नहीं एक घड़ी मिटाओ, एक घड़ी में फिर बनाओ। ऐसे करते रहेंगे तो कर्मातीत कब बनेंगे? जब कहते क्या करें- माया आती है, उसे जीतना पड़ता, तो बार-बार माया आयेगी, पिछाड़ेगी। फिर कभी हार होगी, कभी जीत होगी परन्तु सदैव रहे - मैं आत्मा निराकार हूँ। मेरा बाबा भी निराकार है। यह अभ्यास करना ही मेरी पढ़ाई है। हम भाई-बहन हैं, इससे भी बुद्धि नीचे आती, इसलिए सदैव देखो यह जगत-माता है, सब जगत-पितायें हैं। इससे मेरी स्त्री, मेरा पति यह भान खत्म हो जायेगा।
४. हमें बाबा ने ड्युटी दी है तुम हो विश्व कल्याणकारी, मैं कोई एक आत्मा की सेवा के निमित्त नहीं। विश्व में सब आ जाते। जब विश्व-कल्याण की सेवा पर स्वयं को देखते तो कल्याण की सेवा वाले ऐसे नहीं कहेंगे कि अभी तक मेरे संस्कार परिवर्तन नहीं होते। अगर मेरे ही संस्कार परिवर्तन नहीं तो मैं दूसरों को कैसे करूंगी ? हम सब गाडली सर्विस पर हैं। हमारी जिन्दगी केवल बाबा की सेवा के निमित्त है। हमें तो अब वापिस स्वीट साइलेन्स होम में जाना है। हम यहाँ खाने-पीने.. के लिए नहीं जिंदा हैं। यह अन्तिम समय है ही विश्व-कल्याण की सेवा के लिए। जो खुद के लिए खाता वह भी चोर बनता। खुद के लिए खायेंगे तो आसक्ति जायेगी। हम खुदा की सेवा के लिए इस घोड़े को घास देते हैं। जब बुद्धि में रहता कि मेरा संसार बाबा है, जो भी है सब बाबा के लिए है तो बुद्धि की लाइन क्लीयर हो जाती।
५. ज्ञान की मंजिल कहती है- अकेला हूँ, अकेला जाना है। अकेला समझो तो कभी भी देह की तरफ आकर्षण नहीं जा सकता है। हम बाबा की गोदी में चले गये, न मैं किसी की गोदी में हूँ, न कोई मेरी गोदी में आ सकता - यह ईश्वरीय लॉ कहता है। हमें तो देह के धर्मों से परे जाना है, बुद्धि में एक बाबा है तो सब विकारी वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। ज्ञान की ढाल को साथ रखो।
६. आपस में कभी भी खट-खट नहीं होनी चाहिए। जब अपने को मालिक समझते तो आँख दिखाते। बाबा ने कहा तुम्हें प्रवृत्ति में प्रेम और शान्ति से रहना है, एकमत हो रहना है। हरेक की बुद्धि अपनी है, हिसाब-किताब अपना है। परन्तु लक्ष्य रखने से लक्षण आ ही जाते हैं। श्रीमत को जज बनाओ। श्रीमत कहती है तुम्हें एकमत रहना ही है। इसमें कभी-कभी दूसरे की बात को रखना पड़ता.. ऐसे नहीं समझो बाबा ने तो कहा है- तुम अकेले हो, तुम्हें श्रीमत को ही मानना है। फिर साथी की बात को ठुकरा दो, ऐसा भी एडवान्टेज नहीं लेना है। हरेक को अपना-अपना एक्यूरेट खेल खेलना है। केयरफुल रहो तो चेयरफुल रहेंगे। अगर केयरफुल नहीं रहते तो खट-खट होती है। इसलिए होश भी रखना होता और फिर जोश (उमंग) भी रखना होता। बाबा कहते दोनों में बैलेन्स बनाकर चलो।
७. कभी भी थोड़ी-थोड़ी बातों में अपना मूड आफ मत करो। आफ माना आफ। अगर थोड़ी घड़ी के लिए किसी ने कुछ रांग भी बोला, आपने उसे समझा दिया यह रांग है, परन्तु वह नहीं मानता तो उसके कारण तुम अपनी स्थिति खराब क्यों करते ! तुम डिस्टर्ब क्यों होते? क्या उस टाइम में आपकी योगयुक्त स्थिति कही जायेगी ? फिर दूसरे के पीछे तुम अपना चार्ट क्यों खराब करते ? राइट रांग की राय देना - आपका कर्तव्य है। बाकी हरेक को चलना तो अपने पांव से है। अपना चार्ट खराब नहीं करो। स्व स्थिति से ही सेवा कर सकेंगे। स्व का चार्ट ठीक रखो, स्व आत्मा को शीतल बनाओ। सर्व शक्तियों को साथ रखो। जब टाइम समाने का हो तो उसे समा दो, जब राइट रांग से उसका सामना करना हो तो सामना करो। समय पर सहन करने की बात हो तो सहन कर लो। ऐसे नहीं मैं क्या करूँ, मेरे में तो सहन करने की शक्ति नहीं है। अगर योगयुक्त रहना है तो हर शक्ति को हमेशा अपने साथ रखो। सारा दिन पेपर तो हरेक के सामने आते। जैसे सौभाग्य हमारा बनता, वैसे माया उसे तोड़ने के सौ यत्न करती है। परन्तु अपनी स्व-स्थिति में, स्वमान में रहो तो उसके लिए हैरान नहीं होना पड़ेगा।
८. सच्ची दीपावली मनाना माना निरन्तर ज्योति जगी रहे। निरन्तर हम स्व की स्मृति में रहें ताकि अंधकार आये ही नहीं। जिसके पास जो भी कड़ा संस्कार हो वह लिखकर बाबा के पास छोड़ दो। जो भी गलतियाँ होती हैं उन्हें खत्म करो। कोई भी कड़े संस्कार हों, गुस्से का, रूसने का, ईर्ष्या का, रीस करने का तो आज उसे त्याग दो। अलबेलेपन की नींद को तलाक दो। दुनिया में तो ईर्ष्या की बहुत कड़ी बुरी आदत मनुष्यों में रहती। यह आदत ब्राह्मणों में नहीं होनी चाहिए। परन्तु देखा जाता ईर्ष्या के वश कई ब्राह्मण दूसरे को आगे बढ़ता भी देख नहीं सकते। कहेंगे हर बात में फलाने को ही आगे किया जाता, क्या यही सर्विस कर सकता? फिर पैदा हो जाती है जैलसी। लेकिन बाबा कहते हरेक को सेवा करने का हक है। जो ओटे सो अर्जुन। सबको सर्विस में अपनी अंगुली बढ़ानी है। कोई तन से, कोई मन से तो कोई धन से... सबको मिलकर करना है। ईर्ष्या नहीं रखनी है। जैसे सर्विस बढ़ती है वैसे ब्राह्मणों में 'मैं-तू' पैदा होती। इसलिए बाबा ने मंजिल तो सेकण्ड की सरल दी है परन्तु जितनी सरल दी है उतनी कठिन है। तो अब रुद्र यज्ञ में आये हो, रुद्र यज्ञ में आना माना कम्पलीट बैटरी चार्ज करना। पुराना चोपड़ा खलास करके जाना। जो भी हिसाब-किताब हो उसे साफ़ स्वच्छ बनाकर बाबा की सेवा में जाना। आज के नव युग की सबको मुबारक हो। नई दुनिया की स्थापना में जो मददगार बने हैं, उन सबको बहुत-बहुत मुबारक हो। अब अपनी सेवायें समाप्त, बाबा की सेवा में ही अपना सब कुछ सफल करना है। अच्छा।

कर्मों की गुह्य गति को जान देही-अभिमानी बनो और कर्म, अकर्म बनाओ

आप सब ब्रह्मा बाबा की भुजायें हो, शिवबाबा की मणियाँ हो। हम सबका बहुत बड़ा सेठ बाबा है, जैसे किसी सेठ की अनेक देशों में दुकानें चलती, कम्पनी एक होती, धन्धा चारों ओर चलता है। वैसे हम शिवबाबा की कम्पनी हैं, हमारा डायरेक्टर एक बाबा है। कम्पनी का नाम 'बापदादा' है। डायरेक्टर वह है, हम सब सेल्समैन हैं। सेठ ने हम सबको दुकानें खोलकर दी हैं कि इस दुकान को खूब अच्छी तरह से बढ़ाओ। हम सिर्फ मैनेजर नहीं लेकिन उसके वारिस भी हैं। कई ऐसे अच्छे बच्चे होते हैं जो इतना अच्छा दुकान चलाते जो बाप से भी अच्छा कमा लेते हैं। दूसरों को भी मदद करते हैं। हम सब बाबा की अनेक दुकानों को चलाने वाले मैनेजर हैं, वारिस हैं अथवा कहें सेवाधारी हैं। हम सबके अन्दर एक ही धुन है कि बाबा की दुकानें खूब बढ़ें। सबको अन्दर यही भावना है। हम सबको खबर है कि इन दुकानों से २१ जन्मों की कमाई जमा हो रही है।
२. अब सवाल है सभी अपनी-अपनी दुकानों पर सन्तुष्ट हो, राज़ी हो ? बाबा के ही गुण गाते रहते हो? यह सवाल भी पूछना वास्तव में अनुमान सिद्ध करता, खुश हो तब तो तन-मन-धन लगा रहे हो। खुश हो तब तो अपनी जीवन की बाजी लगाई है, हजारों मील दूर से आकर पहुँचे हो। भगवान को मैंने पाया, वह हमारा बाबा है, हम उसके बच्चे हैं, तो मैं क्यों पूँछु कि खुश हो? निश्चय बुद्धि विजयन्ती। बाबा ने वरदान देकर मस्तक पर लिख दिया है "ओ मेरे विजयी रत्नों।" यह स्टैम्प लगा हुआ है, फिर सवाल ही नहीं। यह सवाल तो स्वप्न में भी नहीं उठ सकता कि पता नहीं मैं इस मंजिल पर चल सकूँगी या नहीं? मैं पूछती आपने बाप को ढूँढा या बाप ने आपको ढूँढा है? मैं कहती बाबा ने आपको कान से पकड़ कर अपना बनाया है। बाबा ने टच किया है तब इधर आये हो। इसलिए थैंक्स उस बाबा को है। आया वह है, बनाया उसने है, लाटरी वह दे रहा है। तब तो कहते हैं बाबा हम आपके हैं। बाबा ने बोला ओ मेरे स्वीट चिल्ड्रेन, इस प्यार के बोल के पीछे हम सब आये हैं। आप सब अपने को सदा वेरी-वेरी लक्की समझो। तो न यह मंजिल भारी है और न भारी लगेगी। जब कोई कहता यह मंजिल तो बहुत भारी लगती। तो मैं कहती नॉलेजफुल बाप है या आप हो? नॉलेजफुल बाप जानता है यह मंजिल ऊँची है, उसने कहा है तुम्हें चढ़ना है, वह जानता है कि इस बच्चे में शक्ति है तब तो कहता है। यह शक्ति देने वाला है फिर हम कैसे कहते कि मंजिल ऊँची है! अगर उसने चढ़ने के लिए रास्ता दिखाया है तो वह शक्ति भी देगा। फिर नॉलेजफुल बाप को नॉलेज क्यों सुनाते। जैसे सर्जन आपरेशन करता वह जानता है हार्ट कैसे निकालना है, कैसे डालना है, दूसरा कहेगा अरे यह कैसे हो सकता है? गृहस्थ में रहकर, स्त्री पुरुष साथ रहकर पवित्र रहें यह तो असम्भव है। हम सबके सामने एक बाबा है, एक बाबा की श्रीमत है, हमें एक बाबा को फालो करना है। बाबा ने जो आज्ञा दी है उस पर हमें चलना ही है।
३. कर्मों की गुहा गति मीठे बाबा ने दो शब्दों में सुनाई। देह-अभिमान में आने से हर कर्म विकर्म बनता, देही-अभिमानी बन कर्म करने से कर्म अकर्म होता। बाबा ने हमें कर्मों की गुह्य गति सुना दी है फिर हम क्यों पूछते, बाबा हम यह करें या न करें ! बाबा कहता तुम्हें बेहद की दुनिया का त्याग करना है। त्याग माना त्याग। पहले देह फिर देह के सम्बन्ध फिर दुनिया। त्याग माना यह नहीं कि एक का त्याग करो दूसरे को भोग करो। जब त्याग शब्द आता तो फिर मैं एक ही हूँ, एक मेरा है। दूसरा कुछ नहीं। अगर दिल में किसी की भी स्मृति है तो माना मेरी अटैचमेन्ट है। लव रखना है तो सारे परिवार से, अगर किसी एक से लव है तो भी वही याद आयेगा। अगर मेरी बुद्धि किसी भी देहधारी में गई तो बाप तरफ़ बुद्धि जा नहीं सकती। बाप से अटैच माना दुनिया से ए-टू-जेड डिटैच। एक से अटैच रहो तो इस देह से भी डिटैच। रात को सोये तो बाबा की गोद में। ना किसी की भी चिन्ता है, ना किसी का फ़िकर। सदा ऐसी स्थिति में रहो। मैं उड़ता पंछी (आत्मा) सदा मूलवतन की हूँ। डेली रात को उड़ जाओ, सवेरे उठे कर्म किया फिर उड़ गये अपने वतन में। इस स्थिति में रहने से न कोई चिंता रहेगी न कोई फ़िकर होगा।
४. ज्ञानी माना अपने कर्मों के एकाउण्ट को जानने वाला। वह अपने सूक्ष्म संकल्पों के वायब्रेशन के एकाउण्ट को भी जानता है। हम सब मास्टर नालेजफुल हैं और हम सबकी पढ़ाई है संकल्पों को कण्ट्रोल करना। जिसको भक्ति में कहते हैं मन वश करना। हमें मन वश नहीं परन्तु व्यर्थ के संकल्पों को कण्ट्रोल करना है। ज्ञान के संकल्पों को मनन करना है, मंथन करना है। इतना परितर्वन करो तो कर्म का खाता अकर्म हो जायेगा। नहीं तो कर्म विकर्म हो जाते। यह भी कर्मों की गुह्य गति है।
५. कई सोचते हैं संस्कारों को मिलाकर चलना बड़ा कठिन है, अगर मैं किसी पर आर्डर करूँ, गुस्सा करूं, तो मेरी कौन सुनेगा? लौकिक में भी दुकान पर चार सर्वेन्ट रखते, वह भी भाग जायेंगे। उन्हें भी सम्भालना पड़ता, प्यार से चलाना पड़ता। फिर यह तो अलौकिक परिवार है, हम तो बाबा के बच्चे हैं। आज हमारा सम्पर्क ठीक है, कल नहीं तो हम हैं किसके, किसका नाम बदनाम हुआ? इसलिए मिल करके रहने की शुभ भावना बनाओ। ऐसे नहीं आपस में नहीं बनती तो गेट आउट। माँ बाप का फ़र्ज होता है बच्चों को गले से लगाकर रखना। गेट आउट करना, यह कोई ज्ञान नहीं है। मीठे बाबा ने बहुत अच्छी धारणा दी है- तू सबके लिए रहमदिल बनो। शुभ भावना रखो। बाकी सबकी तकदीर है। सब अपने पाँव पर चलेंगे।
६. बाबा ने हमें किसी बात में भी बाँधा नहीं है। कोई कहता हैं शादी करू, बाबा कहता भले करो। अगर पूछते श्रीमत क्या है? तो श्रीमत है मुरली। श्रीमत कहती है तुम्हें बंधन मुक्त बनना है। अब अपने को बंधन में बाँधो या खोलो - यह तुम्हारी मर्जी है। कहते हैं मैं धन्धा-धोरी छोड़कर बाबा का बन जाऊँ, मैं कहती क्यों? आप ८ घण्टा काम करेंगे १५-२० रुपया कमायेंगे, उसी से बाबा का कार्य होगा। अगर सब धन्धा छोड़कर बैठ जायेंगे तो बाबा की सेवा कैसे होगी? आप यह क्यों नहीं सोचते कि मैं अपने लिए कमाता हूँ, आप अपने आराम के लिए नहीं कमाते, बाबा की सेवा के लिए कमा रहे हो। मैं बाबा का, मेरा सब बाबा का। संगम की यह जीवन सिर्फ खाने पीने मौज करने के लिए नहीं। गायन उसका होता जिसने सितम सहन किये। जिसने मौज उड़ाया, खाया पिया उसका कोई गायन नहीं। सूली पर चढ़ना मुश्किल नहीं, जीवन भर के लिए गायन होना यह हमारा सत्कार है। मुझे दुनिया को सच्चा सोना बनाना है तो पहले मुझे सोना बनना पड़ेगा। सोना बनने के लिए ज़रूर आग में जलना पड़ेगा। आत्मा जो आयरन बन गई तो आयरन से गोल्ड बने। तो ज़रूर याद की अग्नि में पड़ना पड़ेगा।
७. जीवन में और कोई बड़ा त्याग नहीं, अगर त्याग करना पड़ा तो सिर्फ थोड़ा नींद का। सवेरे उठना पड़ता, क्योंकि बाबा की अपाइंटमेंट है। बाकी क्या त्याग किया ! यह सफ़ेद ड्रेस भी अपनी मर्जी से पहनते, सिर्फ आसुरी छी-छी भोजन को बदल देवताई भोजन खाते, यह कोई त्याग नहीं है। जो चीज मुझे प्रिय नहीं है वह मैं दूसरे के लिए भी नहीं कर सकती। जैसे मुझे दूसरे के कडुवे बोल पसन्द नहीं तो मैं भी किसी को कटुवचन क्यों बोलूँ ! मेरी खुद की चाहना है स्वीटनेस, तो मुझे भी मीठापन देना चाहिए। हरेक बात पहले खुद पर देखो फिर दूसरे के लिए करो तो नैचुरल जीवन बड़ी मीठी हो जायेगी।
८. बाबा ने हमें कार्य दिया है कि तुम्हें पीसफुल दुनिया स्थापन करनी है तो पहले मैं पीसफुल बनूँ फिर दूसरे को बनाऊँ। अगर मैं ही डिस्टर्ब हूँ तो दूसरे को कैसे बनाऊँगी। मेरा बाबा पीसफुल, ड्रामा एक्यूरेट, तो मैं डिस्टर्ब क्यों होती! इसलिए सदैव अपने शान्ति की शैय्या पर ड्रामा की सीट पर सेट रहो। सागर के तले में चले जाओ। लहरों में क्यों आते हो। रोज़ शान्ति के सागर में गोता खाओ तो सारी दुनिया की बातों का थक उतर जायेगा। रत्न लेकर आयेंगे। बाकी सब बातें खत्म हो जायेंगी।
९. कई कहते हैं मुझे इन्डिपेन्डेन्ट रहना है, बाबा कहता यह प्रकृति के पाँच तत्व भी एक दो पर डिपेन्ड करते फिर आप क्यों कहते मैं इन्डिपेन्डेन्ट रहूँ। हमारा तो संगठन है, संगठन की शक्ति से कलियुगी सृष्टि को परिवर्तन करना है। पहला बंधन तो मुझ आत्मा को इस शरीर का है, पहले इससे इन्डिपेन्डेड बनो। अगर कोई कहता है मेरे संस्कार ऐसे हैं, तो मैं कहती यह माया के संस्कार हैं, आपके नहीं। हर बात में मुझे मोल्ड होना है, दूसरा हो न हो।

ऊँची स्टेज पर बैठकर सब खेल देखो तो मेहनत नहीं करनी पड़ेगी

आप सब अपनी प्यारी गाडली युनिवर्सिटी में बैठे हो। सेन्टर्स हैं कालेज, मधुबन है युनिवर्सिटी। तो आप सब युनिवर्सिटी में पेपर देने आये हो व पेपर तैयार करने आये हो ? यह वण्डर फुल स्कूल है सभी स्टूडेंट हैं, सभी प्रोफेसर हैं। वाइसचान्सलर हम सबका एक ही शिवबाबा है। तो सभी प्रोफेसर्स ने 6 दिन में कौन-सा पेपर तैयार किया है?
मैं हमेशा सोचती हूँ मेरा बाबा नालेजफुल है, लवफुल है, आलमाइटी अथॉरिटी है। उसने हम सबको आप समान बनाया है। ऐसे नहीं खुद प्यार का सागर है और हम कोई उसकी एक बूँद के प्यासे हैं। बाबा ने हमें सदैव मास्टर की सीट पर रखा है। हमें स्मृति दिलाई है कि तुम अनादि आदि रत्न हो, तू आदि देवता हो। जो अनादि आत्मा में लक्षण थे, वह सब तुम्हारे हैं सिर्फ भूल गये हो। बाबा ने अज्ञान का पर्दा हटाया और वापिस उस सीट पर बिठाया। इसलिए ऐसा कभी नहीं सोचो कि मुझे यह सूत्र अपने में बांधने हैं, इस पर मुझे चलना है, पुरुषार्थ करना है, यह तो नये स्टूडेण्ट का काम है। अगर यह सोचेंगे कि हमें पुरुषार्थ करना है, हमें अटेन्शन रखना है तो थक जायेंगे। थक कर बैठ जायेंगे। पग यात्रा करेंगे तो ज़रूर थकावट होगी। रास्ता लम्बा होता जायेगा। समय की गिनती करते रहेंगे। मेहनत करनी है, यह सोचेंगे तो पहाड़ है, लेकिन मैं हूँ ही चोटी पर। वहाँ से मैं सतयुग को भी देखती हूँ तो कलियुग को भी देखती हूँ। ऊँची स्टेज पर बैठकर देखते तो सब बातें छोटी दिखाई देती। जब नीचे रहते हैं तब मेहनत करनी पड़ती। सदा टॉप पर बैठ जाओ। समानता की सीट पर बैठो तो साक्षी होकर नीचे का खेल देखते रहेंगे। जब बाबा मेरा प्यारा भी है, न्यारा भी है तो मैं न्यारी प्यारी अपनी स्व की फुल सीट पर बैठू। तो वह स्टेज बड़ी अचल-अडोल स्थिर रहेगी। कई इस निश्चय रूपी तख्ते को निकाल देते फिर लटक जाते हैं, फिर सांस लेते, रस्से का आधार लेते, रस्सा टूटा, आधार गिरा तो खुद भी उसके पीछे मरे। इसलिए सदैव बाबा को देखते चलो -बाबा को फ़ालो करो अथवा बाबा के समान चलते रहो तो स्थिति नीचे नहीं आयेगी। इसलिए बाबा ने ये जो सूत्र बाँधे हैं, उसमें यह भी सूत्र है कि हमें कर्मेन्द्रिय जीत,विकर्माजीत बनना है। लेकिन हमें तो बाबा का वरदान ही है 'सदा विजयी। जीत प्राप्त की हुई है। मुझे कोई हार का वरदान नहीं मिला है। मैं जीत वाली आत्मा बाबा के गले का हार हूँ। क्या कोई ऐसा समझते हैं कि मैं गले का हार नहीं हूँ। जो बाबा के गले के हार में हैं, वह विजयी हैं। तो सदा अपने को विजयी देखते चलो। इसी दृढ़ता पर रहो कि मैं हूँ ही विजयी। बाबा हम बच्चों को बहुत सिम्पल चार्ट देता कि बच्चे देखो, मेरी इस देह में कितनी ममता है? लौकिक व अलौकिक सम्बन्ध में कहाँ तक मेरी बुद्धि जाती है? मेरा किसके पीछे कदम है? मेरा कोई आधार का सम्बन्ध तो नहीं है? एक बाबा, एक मैं दूसरा न कोई।
२. मैं हूँ कर्मेन्द्रिय जीत। अगर मुझे कोई कर्मेन्द्रिय अपने वश में रखे तो मैं इसे अपनी बहुत बड़ी इनसल्ट समझती। कोई कहता यह मेरी इनसल्ट करता, लेकिन नहीं तेरा मुख तेरी इनसल्ट करता। तेरे नयन तेरी इनसल्ट करते। कोई कहते हैं मैं समझता हूँ- यह मेरा संस्कार है। अगर मैंने यह स्वीकार किया कि यह मेरा संस्कार है तो मैंने अपनी शान बढ़ाई या मैंने स्वयं ही स्वयं की इनसल्ट की ? कई कहते हैं मैं समझती हूँ यह मेरे में चंचलता है, तो यह समझ सिर्फ समझ तक है या उसको रियलाइज़ करके परिवर्तन करने तक है? रियलाइज़ करना माना परिवर्तन।
३. बाबा कहता है- बच्चे तुम्हें सम्पन्न होना है, तुम्हें अपने को सम्पन्न स्थिति पर खुद को लाना है। बाबा का हमें ईशारा मिला तुम्हें सम्पन्न होना है, तो देवताओं को ईशारा ही बहुत है। हमने उस ईशारे को पालन किया तो मैं देवता हुई। जब हम देवता बनें फिर क्यों कहते कि क्या करें, यह मेरी स्थिति नहीं बन सकती ? मैं ऐसा कहकर देवता से मनुष्य क्यों बनती ? उस देवता की स्थिति पर बैठो तो सब सरल होता जायेगा। मैं कर्मेन्द्रिय जीत हूँ या होना है? अगर कहें हमें होना है, अटेन्शन रखूँगी, तो आखिर भी विकर्माजीत कब बनूँगी? क्या मेरे सिवाए और कोई कर्मेन्द्रिय जीत बनेगा ? मैं हूँ विकर्माजीत बाबा की आदि अनादि रत्न। अब हमें अपने घर जाना है। मैं देखती हूँ कि मेरी आत्मा में कोई ज़रा भी डस्ट तो नहीं? अगर ज़रा भी कोई अन्दर संस्कार में सूक्ष्म विकल्प होगा तो डस्ट पड़ेगी। अगर मैं सदा ऊपर रहती तो मेरे में कोई डस्ट रह नहीं सकती।
४. कहावत है अपनी घोट तो नशा चढ़े। तो सदैव अपनी ही घोटते या दूसरों का चिंतन रहता? बाबा को सामने रखो। आलस्य, अलबेलापन, मान-अपमान... यह क्वेश्चन अब पूरे हुए। यह सब 'अल्फ और बे' के लैसन है। अभी हमारा अन्तिम पेपर है - विकर्माजीत बनने का। विकर्माजीत बनो तो उसमें सब कुछ स्वाहा हो जाता।
५. हम सबका रास्ता एक है, मंजिल एक है, पहुँचना भी एक ही स्थान पर है फिर आप यह क्यों सोचते ऐसा होगा ? कैसे होगा? आप लोगों को सेन्टर की गृहस्थी है लेकिन बाबा को तो सारे विश्व की गृहस्थी है। फिर बाबा कभी कहता है क्या, कि क्या करूं परिस्थितियाँ आती हैं? विश्व की गृहस्थी है तो ज़रूर विश्व की अनेक बातें रोज़ आयेंगी फिर मैं किसका चिंतन क्यों करूं? मैं चिंता करू या बीजरूप बन सारे झाड़ को शक्ति दूँ? मैं आत्मा भी इस देवता घराने का बीज हूँ, हमें सारे विश्व को शान्ति प्रदान करनी है। पहले स्व को देना है तो विश्व को मिल जायेगा। चिंता करो तो सारे सृष्टि की करो। नहीं करो तो कोई नहीं। मैं जीवनमुक्त हूँ, मुझे कोई बन्धन नहीं। मैं पंछी परदेशी हमारा इस दुनिया में क्या। जब बाबा ही जाकर वतन में बैठ गया फिर मैं क्यों किसकी चिंता करूं। कई कहते हैं स्व की तो चिंता करनी चाहिए। लेकिन मैं कमज़ोर हूँ क्या जो उसकी भी चिंता करू! जब मुझे बाबा कहता सेन्ट-परसेन्ट हो फिर मैं क्यों स्व की भी चिंता करूँ।
६. आप मुए मर गई दुनिया यह भी बचपन का कोर्स है। अब हमें तो मरी हुई दुनिया को जिंदा बनाना है। हमें तो नई दुनिया, शान्ति की दुनिया स्थापन करनी है। वह करके ही यहाँ से जाना है। पुराना तो मर ही गया ना। हमारी दिल है हम सारा ही गुलदस्ता बाबा के पास उड़कर चलें। अगर कोई एक आत्मा भी नीचे आती तो ज़रूर संकल्प आता यह नीचे न जाये। इसकी चिंता नहीं होती लेकिन सोचती हूँ यह गुलदस्ता एक हो जाए।
७. जब सभी यह कंगन बांधेंगे तब पुरानी दुनिया का पर्दा उठेगा। यह अकेली अँगुली से नहीं उठेगा, सबकी इकट्ठी अँगुली चाहिए। बाकी मैं किसकी चिंता, किसका चिंतन करूं। मैं न गृहस्थी हूँ, न ट्रस्टी। हम तो हैं ही फ़रिश्ता। गृहस्थी को ट्रान्सफर कर ट्रस्टी बनूँ - यह भी फ़र्स्ट स्टैप है।
८. हमें तो अनेक प्रकार की रोज़ डांस देखनी पड़ती। मेरे सामने अनेक पोज़ बदलने वाले खिलाड़ी आते। हमें तो उन पोज़ों को देख खुशी होती। फिर आप किसी का ऐसा वैसा पोज़ देख क्यों कहते कि इसका ऐसा पोज़ क्यों? रास में कोई कमर टेढ़ी करेगा, कोई कैसी करेगा। अगर सब सीधे खड़े रहें तो मजा ही न आवै। इसलिए रास देख-देख कर हर्षित होना है।
९. हम बाबा के तकदीरवान बच्चे, तकदीर जगाकर आये हैं। हम महान आत्मा अपनी तकदीर को ऐसा करें, क्या मेरी तकदीर? तो मुझे शॉक आता। परन्तु अन्दर से निकले वाह, क्या मेरी तकदीर! इससे हृदय खिल जाता।
१०. कई कहते हैं मैं समझती हूँ मेरे में जिद्द का संस्कार है। जब वह कहते हैं मेरे में यह संस्कार है फिर मैं उसे क्या समझाऊँ! ज्ञानी को मैं क्या समझाऊँ ! मैं तो कहती हूँ- ज्ञानी से योगी बन जाओ तो वह संस्कार निकल जाए। बाकी मैं क्या किसको बैठकर शिक्षा दूँ। अगर ज्ञानी कहता हूँ मैं समझता हूँ मेरे में थोड़ी पवित्र दृष्टि नहीं है, जब वह समझता है तो मैं क्या समझाऊँ, बाबा ने सब कुछ समझा दिया है। अब हर एक की अपनी-अपनी तकदीर। जो जैसा करेगा...।
११. हम हैं ही त्यागी, हमारा तो पूरा बेहद की दुनिया से त्याग है। एकदम फ़रिश्तों से भी ऊपर घर जाओ। तो यह सब बातें खत्म हो जायेंगी।
१२. प्रकृति के अनेक खेल हैं, अनेक झंझट हैं, सतयुग थोड़े ही है, यह है ही संगम। संगम पर सब खेल चलने हैं। बाबा ने कहा है माया बड़ी दुश्तर है, माया रुस्तम है तो हम डबल रुस्तम है। हार तो आधा-कल्प खाई अब तो हमें मायाजीत बनना ही है। अच्छा।

एक मत की स्थापना करने वाले ब्राह्मणों की संगम पर एक मत कैसे हो ?

आज बाबा ने कहा तुम बच्चों की एकमत होनी चाहिए क्योंकि यहाँ की एकमत के संस्कार आधाकल्प तक चलने हैं। बाबा ने कहा है कि एक श्रीमत के संस्कार जो अभी तुम भरते हो, उन्हीं संस्कारों के आधार पर २१ जन्म तक तुम्हें कोई भी मत व राय लेने की दरकार नहीं रहती। तो हम सब एक श्रीमत पर चलने वाले हैं। हमारी एक श्रीमत २१ पीढ़ी तक चलनी है। यह हमारा फाउण्डेशन है - तब बात निकली कि हम ब्राह्मण परिवार आपस में एकमत होकर रहते हैं?
आज हम सब एक मत का सूत्र बनायें। एक है कार्य व्यवहार में एकमत रहना और दूसरा है स्व-स्थिति। कई बार कार्य व्यवहार में ही भिन्न-भिन्न मतें हो जाती है फिर स्थिति बिगड़ती है। तो पहले अपने से पूछना है कि पहला सब्जेक्ट क्या है? स्व-स्थिति व सेवा ? कार्य में अगर स्व-स्थिति खत्म हो जाती तो क्या उसमें सफलता मिलेगी ? बाबा कहते तुम्हारे में अगर योग का जौहर नहीं तो तीर नहीं लग सकता। तो जब हम सेवा करने जाते हैं उस समय अगर हमारी ही स्व-स्थिति नहीं हो तो हम सेवा क्या करेंगे। उसमें शक्ति क्या मिलेगी? जब हम सबकी पहले एकमत होगी तो हर एक के शुद्ध वायब्रेशन का सहयोग मिलेगा। एक-एक की शक्ति मिलकर ११ हो जायेगी। अगर हम पहले ही आपस में डिस्टर्ब हो गये-फिर सेवा करने निकले तो उसकी सफलता क्या? अगर सेवा से स्व-स्थिति महान है तो पहले एकमत होनी चाहिए। इसके लिए जब भी कोई एक राय देता तो दूसरा फौरन अपने विवेक से उसकी राय को कट न करे। भल दोनों की बात राइट हो, परन्तु उस समय दो मत होकर डिस युनिटी नहीं होनी चाहिए, इससे बहुत नुकसान होता है, दो पार्टी हो जाती हैं। फिर सुनी सुनाई का वातावरण बनता है। जिससे सारा वायुमण्डल दूषित हो जाता है। तो जाते हैं सेवा करने लेकिन सेवा के पहले और ही नुकसान कर देते। इसलिए कभी भी अपने मन को खराब न करो। अगर मन खराब हुआ तो पार्टी बाजी होगी। दुश्मनी बनेगी। डिस्ट्रेक्टिव काम होगा। इसमें नम्रता का गुण चाहिए। जब भी कोई ऐसी बात हो तो सरेण्डर हो जाओ अर्थात् मोल्ड हो जाओ। एक ने कही दूसरे ने मानी उनका नाम है ज्ञानी, इसलिए अगर हम एक दो की बात मानकर चलेंगे तो मानना अर्थात् मोल्ड होना। हाँ जी करना। अगर राय है तो प्रेम से, शान्ति से सुनाई जाए, सुनाने में हर्जा नहीं लेकिन मालिक बनकर सुनाओ फिर बालक बन जाओ। मोल्ड होने की शक्ति जरूर हो। अगर उस समय उस प्रमाण कोई कार्य नहीं होता तो न हो। लेकिन उसमें अपनी स्थिति झगड़ा करके खराब नहीं करो। नहीं तो ब्लड प्रेसर हाई हो जायेगा। तन खराब, मन खराब।
बाबा कहता - बच्चे तुम अलंकारी बनो। अपनी बुद्धि का, मान-शान का अहंकार छोड़ो। अगर थोड़े समय के लिए कोई उस अहंकार में है तो आप निर्मान बन जाओ। बाबा हमेशा हम बच्चों को इसके ३ बिन्दू देता। उस समय ड्रामा बिन्दु लगाओ तो एकमत हो जायेगी। दो मतें बहुत नुकसान करती हैं। कार्य होगा एक गुना, मत बनी दो तो नुकसान होगा १०० गुणा।
हमारे सामने साकार में मम्मा बाबा साथ रहे, अगर वहीं दो मत होते तो बच्चे क्या सीखते ? अगर आज दीदी-दादी दो मत होती तो इतना प्यार से यह यज्ञ कैसे चलता ? फिर तो जैसे दूसरी संस्थायें चलती वैसे ही इसका भी तमाशा देखते। इसलिए जितना प्रेम से, प्यार से रहें, मुख से सुखदाई बोल बोलें - तो एकमत हो जायेगी।
जितना तक हो सके 'हाँ जी' का पाठ पक्का हो। यह जैसे आदत हो। अगर आपको कोई कार्य में नुकसान लगता तो क्या उसके पीछे लड़ेंगे? अगर किसकी बुद्धि में उस समय नहीं बैठता तो मेरे पास जादू की लकड़ी थोड़ेही है जो मैं बिठाऊं। अगर किसी भी बात में आपस में दो मतें होती, गुटबंदी होती तो मैं कहती - यह भी जैसे काँग्रेस आई एण्ड यू हो गई। बाबा हमें कहता- बच्चे, मैं-पन निकालो। हम मैं-मैं कर अपनी स्थिति बिगाड़ते। इसलिए न्युटरल होकर हर एक अपना-अपना विचार दो। जैसा हो वैसा ठीक। आप हल्के रहो। टोन्ट से नहीं बोलो, नहीं तो उसका भी वायब्रेशन पहुँचता है। जब लाइट में टाइटनेंस हो जाते तो यह भी सूक्ष्म बुद्धि का अहंकार है जो नुकसान पहुंचाता है।
हमारे अन्दर शुभ वृत्ति की शुभ भावना सदा आपेही रहनी चाहिए। कभी-कभी उसका भी उल्टा रियेक्शन हो जाता है। लेकिन उस उल्टे रियेक्शन में हमें अपने दिव्य गुणों के जेवरों को उतार कर नहीं फेंकना है। कई बार कोई-कोई अपना श्रृंगार ही उतार कर फेंक देते हैं। हमारी बात क्यों नहीं मानी गई? फिर रूठ जायेंगे, खाना नहीं खायेंगे। इतना स्टेज से नीचे आ जाते जो कहते अच्छा देखना बताऊँगी, दिखाऊँगी। अब यह भाषा किसने सिखलाई! क्या बाबा कभी ऐसी शिक्षा मुरली में देता है? फिर यह स्वभाव का मुरला क्यों चलता ? इन बातों पर हर एक को अटेन्शन रखना है। जितना हो सके हमें मरकर रहना है। हमारा मुख, हमारे नयन-चैन सब शीतल हों। कल बाबा ने कहा- तुम हो ब्राह्मण कुल के दीपक। ऐसे चैतन्य दीपकों के कमज़ोरियों की लीला बाबा नहीं देख सकता। हम दीपकों को तो सारे ब्राह्मण कुल का नाम रोशन करना है। ऐसा हम सबका सूक्ष्म पुरुषार्थ पर अटेन्शन हो।
जब कोई प्यार से 'हाँ जी' करता तो कितना प्यारा लगता। परन्तु सूक्ष्म का मैं-पन सर्विस में बहुत बड़ा दाग है, इसलिए सदा अपनी नेचर को लाइट रखना है।

संगम की एक-एक घड़ी वैल्युबुल है इसलिए हर सेकण्ड कमाई जमा करनी है

आज बाबा ने हम बच्चों से दो दान मांगे - पहला कभी कोई का अवगुण नहीं देखना, न सुनना, न वर्णन करना... और दूसरा किसी भी कारण से अपनी स्थिति डगमग नहीं करना। यह दो बातें हरेक को दान में देनी है और अपनी स्थिति अन्तर्मुखी, एकमती, अव्यक्त और एकरस बनानी है। रूहानी रॉयल्टी में रहना है। तो रूहानी रॉयल्टी क्या है?
एक छोटी-सी बात बाबा ने कही तुम्हारे बोल साधारण नहीं परन्तु "महावाक्य" हैं। तो हर एक ने अपने अन्दर जाकर अपना चार्ट गहराई से देखा होगा। भल शब्द तो एक था कि किसी की बुराई देखना अर्थात् शूद्रों की चीज़ लेना। अगर कोई ऐसे कहे तुम शूद्रों की चीज़ क्यों खाते, तो बुरा लगेगा परन्तु बाबा ने जो गुह्य राज़ से बोला, वह बोल उसी तरह स्वयं में कहाँ तक अन्दर गया ? यह बाबा की मीठी बात हर एक ने अपने अन्दर कैसे अनुभव की और अपना चार्ट क्या देखा?
मेरा कई बार एक विचार चलता जैसे आज कोई भी गवर्मेन्ट का नौकर होगा तो गवर्मेन्ट उसे पूरी पे देती और वह पे के अनुसार काम करता, अगर वह ड्युटी में अलबेला रहे तो गवर्मेन्ट भी उसे गेट-आउट कर दे। लौकिक में भी कोई किसका खाता है तो भी उसका उस पर कर्ज चढ़ता तो हमारा विचार चलता - हमारा बाबा हम आत्माओं की उन्नति के लिए कितना गहराई की शिक्षायें देता, हम आत्माओं के लिए बाबा को कितना फिकर है, ओना है तो क्या हम ऐसे बाबा के इतने फ़िकरात को दिल में लेते हैं? जितना बाबा हम बच्चों से आश रखता उतना ही हम रिटर्न देते हैं? या हम डन्लप के गदेलों पर सफ़ेद चद्दर ओढ़ कर सोये हुए हैं? ऐसे ही हम अलबेले बन ठाठ से बैठे हैं? बाबा ने कहा कई बच्चे सोचते हैं कि अभी कौन सम्पूर्ण बना है, हो ही जायेंगे... यही हैं डन्लप के गद्दे। हमें विचार आता - आज अगर कोई दुकान खोलता है तो उसे धन कमाने का कितना फ़िकर रहता है। अपनी दुकान को बढ़ाता जाता, कितनी फ़िकर से दिन-रात जागकर, एक से दो, दो से चार बढ़ाता जाता, परन्तु हम बच्चे अपनी-अपनी स्थिति की फ़िकरात करते हैं? क्या यह सोचते हम तो बाबा के बन गये, यही ठीक या अन्दर में चिन्ता है कि आज भी अगर मेरा यह शरीर किसी घड़ी छूट जाये तो मैं आत्मा किस गति को प्राप्त हूँगी ?
कई बार मुझे ऐसे लगता, बाबा मेरे कानों में यह आवाज देता - चाहे मुझ आत्मा के लिए चाहे अनेकों के लिए, यह आवाज़ रोज़ मेरे कानों में आता-बच्चे, तुम्हारी रीति है एक सेकण्ड में पंछी उड़ जा, हम सब पंछी एक सेकेण्ड में उड़ जायेंगे। मैं एक सेकण्ड का पंछी हूँ, यह सेकण्ड, यह मिनट, घण्टे, दिन बीता, रात सोये, सवेरे उठे, तो यह मेरे सेकण्ड मिनट घण्टे कितना कमाई में जमा ? हम जमा कर रहे हैं यह हर एक चेक करता है?
बाबा हमें यह भी स्लोगन देता कि तेरे भाने सर्व का भला, तेरी चढ़ती कला माना सर्व का भला। तो क्या हम एक-एक सेकण्ड इतना वैल्युबुल समझ दिनरात कमाई में बिताते हैं? या अलबेले होकर रात को सोया दिन को खाया, हसा बहला। दिन रात पूरा। यह तो अन्दर में नहीं सोचते कि जीवन के दिन अनेक हैं, हम बाबा के बन गये ? या अन्दर आता है कि यह संगम के थोड़े दिन कितने न महान हैं, यह गिनती के दिन है, यह कितने वैल्युबुल दिन हैं! ऐसा सोच अन्दर ही अन्दर मेहनत करते या ऐसे ही चल रहे हैं, ठीक है हम तो बाबा के सिकीलधे बच्चे हैं?
यहाँ तक ही हमारी दिनचर्या है या हम बहुत बड़ी गहरी चिंता के अन्दर हैं? यह हमारी चिंता नहीं परन्तु यह रूहानियत के अन्दर जाकर ऊँची कमाई का साधन है। अगर सभी यह सोचें कि मुझे अपनी घड़िया कमाई में देनी हैं, हम लौकिक दुनिया से अलौकिक दुनिया में आये हैं, हमें कमाई करनी है, हम बैठे-बैठे कितनी कमाई कर रहे हैं यह दुनिया नहीं जानती। हम यहाँ बैठे-बैठे सारी दुनिया को अपने शान्ति की, पवित्रता की किरणें, अपने लाइट की रेज़ दे रहे हैं। हमारी रेज़ेज कितनी दूर-दूर जाती है, हम कितने न ऊँचे कार्य के निमित्त हैं। हम ऐसा कार्य समझकर सदा ऐसे कार्य में रहते हैं? या ऐसे सोचते हैं बाबा ने मुरली तो चलाई लेकिन.. अरे, क्या हमारा बाबा! क्या हमारी पढ़ाई, क्या हमारा कार्य- उसी मस्ती में रहो, लहरों में लहराओ तो सदा ऊपर रहेंगे। अपनी मस्ती जैसी कोई चीज़ नहीं। अपनी मस्ती माना बाबा की मस्ती। मेरा बाबा, यह शब्द दिल के अन्दर कितना मीठा लगता। फिर छोटी-छोटी बातों में अपना मीठा-पन छोड़ कडुवेपन में क्यों आ जाते ? जब मैं कभी सुनती हूँ तो मुझे धक्का लगता है।
आज बाबा ने कहा- तुम्हारी अवस्था एकरस वाहिए। क्या इस शब्द पर सभी ने मनन किया ? मैं आत्मा अपनी स्थिति एकरस रखती या कभी रस, कभी नीरस ? सब रसों का भण्डार हमारा बाबा हमें मिला, जो किसी के पास नहीं वह बाबा ने दिया, आज कोहिनूर हीरे को कितने लोग देखने जाते, क्वीन के ताज के हीरे को कितनी वैल्यु देते हैं, परन्तु ऐसा हीरा (कोहिनूर) बनाने वाला कौन, किसने बनाया ? हमारे बाबा ने हमें ऐसा चैतन्य हीरा बनाया है। अगर हम ही अपनी वैल्यु नहीं करते तो हमारी वैल्यु दूसरा कैसे करेगा। मेरी वैल्यू मेरे हाथ में है, जितना मैं स्वयं की वैल्यु करूंगी, जितना अन्तर्मुख रहूँगी, वह छिप नहीं सकता। अगर मेरे में कोई डाट्स होंगे तो वह भी सबको स्पष्ट दिखाई देंगे। बाबा ने हमें सच्चा डाइमन्ड बनाया है, तो क्यों न हम अपनी वैल्यु स्वयं ही स्वयं जज करें? हम भाव-स्वभाव में आकर सच्चे ज्वेल से पत्थर क्यों बन जाते? मैं अगर कोई को कडुवा बोल बोलती - तो क्या अन्दर में यह नहीं आता कि मैंने पत्थर मारा... जो करता उसका भी हर एक का ड्रामा में हिसाब-किताब है।
बाबा कहते बच्चे अनेक पेपर आयेंगे, पेपर हैं अपनी पढ़ाई। मैं सच्चा ज्वेल हूँ। मैं ताज में आने वाली हूँ क्योंकि वैल्यु बाबा ने की है। मैं किन्हीं की छोटी-मोटी बातों से नीरस क्यों बनूँ ? कारण तो अनेक सुनाते लेकिन उसका निवारण एक है। हम निवारण जानने वाले अनेक कारणों को सोचकर रस नीरस क्यों करें? एकरस माना बाबा के अनेक रसों में खो जाओ, जो बाबा के सर्व रसों, सर्व गुणों में खोया हुआ रहता उसकी स्थिति एकरस रहती। बाबा के सर्व रसों को पियो, उन्हें अपने में भरते जाओ तो स्थिति एकरस बन जायेगी।
आज सभी ब्राह्मण अगर बाबा को दिल से यही दान दे दें। किसी के भी अवगुण आज से न देखेंगे, न सुनेंगे और अपनी स्थिति एकरस रखेंगे, तो यही हमारा नया जन्म है। हरेक यह प्रतिज्ञा करे तो देखो स्थिति कैसे सहज ही एकरस हो जायेगी।
हमारी स्थिति का वर्णन ही है 'अचल अडोल'। कई तरह की परस्थितियाँ क्यों न आयें लेकिन हम पहाड़ की तरह अचल रहें। हमें तो किसी को भी नहीं देखना है, देखो तो एक बाबा को देखो। मैं अपनी बुद्धि कोई की बात से हलचल में क्यों लाऊं! हम सब आज से यह दृढ़ संकल्प करें कि मैं अपना संकल्प हलचल में नहीं लाऊंगी। मेरा संकल्प किसी भी बात से हलचल में नहीं होगा। क्या बाबाको यह दान नहीं कर सकते ?
मुझे कोई कितना भी डुलायमान क्यों न करें, मैं सदा अडोल रहूँगी, डुलायमान माना चलायमान। मैं चलायमान क्यों हूँ। मेरी स्थिति इतनी अचल हो जो कितनी भी परिस्थितियाँ आयें लेकिन मैं अपनी स्थिति अचल अडोल रखूं। परिस्थितियाँ माना ही पराई स्थिति। माया की स्थिति। मैं पराई स्थिति के कारण अपनी स्वयं की स्थिति डगमग क्यों करूँ। मैं तो अपनी स्थिति सदा अडोल-अचल रखती हूँ।
मैं कहूँ मुझे आज विकल्प आया। बाबा कहता बच्चे, तुम्हें विकल्पों को जीतना है और हम उनका ही कारण सुनाते हैं। आज से हमें अपने ब्राह्मणों की दुनिया से विकल्पों का त्याग करना है। हमें प्रकृति भी डुलायमान कर न सके। हम हैं भगवान के बच्चे, ईश्वर के बच्चे, हम अपनी स्थिति माया चोर के हाथ में क्यों दे? चोर का गुण है चोरी करना तो मैं क्यों न खबरदार रहूँ। जो वह चोरी ही कर न सके।
यह संकल्प-विकल्प, किसी भी प्रकार के चिन्तन मुझे क्यों आते, जिससे मैं चलायमान हूँ। बाबा हमें इतना चढ़ाता कहता बच्चे, तुम देवों के भी देव, राजाओं के भी राजा हो, फिर हम दास क्यों बनते? क्या यह सब टाइटिल बाबा ने हमें झूठे दे दिये हैं। अगर हम माया के दास बनते तो बाबा को जैसेकि झूठा बनाते।
बाबा कहते- बच्चे, तुम इस देह के भान से निकल जाओ, क्यों खट-पट की बातों में अपना दिमाग खराब करते? जब साइन्स की इन्वेन्शन से पृथ्वी के परे स्पेस में चले जाते हैं तो क्या हम उससे भी पार नहीं जा सकते हैं? वह भी धरती के आकर्षण में आते तो फेल हो जाते, तो जब हम भी भाव-स्वभाव के आकर्षण में आयेंगे तो ज़रूर वह खींचेंगे। फिर हम क्यों न ऊपर घूमें, नीचे आते ही क्यों, जो फेल होते ?
कई कहते हैं हमें टाइम नहीं मिलता, मैं बिज़ी हूँ। मैं कहती मैं भी तो बिज़ी हूँ, जब सोते हो, चलते हो तो उस समय भी अपने आपको मनन में रख प्रकृति से परे रह सकते हो। अगर इस प्रकृति की आकर्षण से परे रहो तो जैसा गायन है-अतीन्द्रिय सुख... उसी सुख में सदा नाचते रहेंगे। भाव-स्वभाव के स्पेस में मत आओ।
साइंस वाले बहुत समय तक ऊपर में रह सकते हैं तो क्या हम एक दो घण्टे इस देह के भान से परे नहीं रह सकते? हमारा तो घर ही ऊपर है, अपने घर में चले जाओ तो सब व्यर्थ बातें स्टॉप हो जायेंगी। स्टॉप माना स्टॉप। हम इतने पावरफुल रहें जो प्रकृति की ताकत भी न हो हमारे बटन को हाथ लगाने की। उसके हाथ में अपना बटन देते ही क्यों हो! जब बटन उसके हाथ में देते तब चिड़चिड़ाते, गुस्सा आता है।
अगर कोई बैठकर किसी की बीती हुई सड़ी हुई, बातों का चिंतन करता, रिपीट करता तो वह जैसेकि सड़ी हुई राख से, उसी भभूत से अपने को शृंगारता है। क्या सड़ी हुई छी-छी राख को टच करना, उस भभूत को अपने में लगाना अच्छा लगता है? जब अच्छा नहीं लगता तो सड़ी हुई बातों को बार-बार क्यों दोहराते हो।
अगर कोई बात कोई से नहीं निकलती है, तो बाबा कहता कैसी भी बात हो उसे कागज पर लिख दो वह दास्तान निकाल दो। चाहे कोई काम की बात हो या बेकार हो, वह अपनी चौपड़ी में लिख दो लिखने से आधा पौना समाप्त हो जायेगा। बोलने में भी कई बार तेरा मेरा हो जाता लेकिन कागज़ में निकाला, बाबा के डिब्बे में डाला तो समाप्त हो जायेगा।
कई कहते हैं- हमें फलाने का प्यार नहीं मिलता, वह हमें पूछता भी नहीं, मैं कहती पूछने वाले ने हमें पूछ लिया, खातिरी करने वाले ने खातिरी की, प्यार देने वाले ने प्यार दिया, शक्ति देने वाले ने शक्ति दी, बाकी कौन है जो पूछेगा ? किसी का आधार लेना, सहारा लेना, यह जैसे कि अपने को शक्तिहीन बनाना है। हमारा सहारा, हमारा आधार एक बाबा है। जो दूसरे का सहारा ढूँढते, जीवन का साथी ढूँढते वह धोखा खाते हैं। हम उसके सहारे के नीचे बैठे हैं, हम उसके सहारे जीते हैं।
हम सबके दिल का यह आवाज है कि बाबा हमारे साथ है, बाबा ने हमें मदद की, भल कोई कहे यह भक्ति के बोल हैं, लेकिन यह बात कोई आर्टिफिशियल नहीं, रीयल है। हमें बाबा का सहारा है, बाबा की मदद है, बाकी कौन है? न कोई किसी का सहारा है, न आधार है, उसको ही सहारा बनाओ तो देखो स्थिति कितनी हल्की प्यारी एकरस बन जाती है।
कई बार कोई-कोई कहते हैं जितना मैं सन्तुष्ट रहना चाहती हूँ, उतना नहीं रहती। अरे, मुझे बाबा मिला फिर मैं कहूँ मैं सन्तुष्ट नहीं। तो यह दाग तो मैंने बाबा को लगाया। सन्तुष्ट-दाता ने हमें सन्तुष्ट रहने का सब ज्ञान दे दिया, अगर हम फिर भी सन्तुष्ट नहीं तो यह ज्ञान की टीका है, बाबा के लिए दाग है।
अगर मैं बाबा से सदा सन्तुष्ट हूँ तो मन सदा हेल्दी, सदा वेल्दी रहता ? संकल्प में भी नहीं आयेगा मैं असन्तुष्ट हूँ। मन से हेल्दी तब रह सकेंगे जब बाबा से सन्तुष्ट हैं। क्या बाबा मेरे लिए बुरा चाहता, जो सन्तुष्ट नहीं? बाबा तो हमें ऊँचे-ते-ऊँचा, श्रेष्ठ-ते-श्रेष्ठ, देवों का देव बनाता, हमें बाबा ने बड़ी मस्ती दी है। उसी में रहो, नीचे आओ ही नहीं। खिलाड़ी बनकर खेल देखो। सदा पृथ्वी की आकर्षण से ऊपर स्पेस में रहो। कछुए की तरह अंग निकाले फिर समेट लिए।
बाबा हमें सेकण्ड में स्वीट साइलेन्स में जाने की प्रैक्टिस कराता फिर भी हम अलबेले क्यों रहें! तेरे मेरे में क्यों जाएं?
कई बार आता बाबा कहते सब नम्बरवार हैं, मैं कहती बाबा नम्बरवार क्यों कहता! अभी तो सबका यही लक्ष्य है कि हमें नम्बरवन में जाना है। हमें विन प्राइज़ लेना है। जब रिज़ल्ट निकलेगी तब नम्बरवार कहेंगे। अभी हमें नम्बरवार कहकर अपने को डन्लप का तकिया नहीं देना है।
मैं चाहती हूँ सब उड़ जाये पंछी अपने वतन में, जब कोई नीचे आता तो मुझे दुःख होता, हम तो एक सेकण्ड में चली जाती अपने बाबा के डन्लप पर, गीत भी हैना- हम उड़के चले जायें। मुझे एक ही संकल्प रहता - सब ऊपर लटके रहें, हम रह सकती तो क्या सब नहीं रह सकते? बाबा कोई ऐसी जादू की छड़ी फिराये जो सब ऊपर चले जायें, मेरा तो यही संकल्प है। अच्छा।

नये वर्ष को प्रीत और पीस वर्ष के रूप में मनाओ तो प्रत्यक्षता सहज हो जायेगी

बाबा कहते मैं आया हूँ- तुम सब बच्चों को आप समान बनाने। जैसे मैं अपकार करने वालों पर उपकार करता हूँ, ऐसे तुम बच्चे भी अपकारियों पर उपकार करो। तो यह प्रश्न हर एक खुद से पूछो कि मैं अपकारियों का भी उपकारी हूँ? बाबा ने हम अपकारियों पर उपकार किया अर्थात् हम सब बच्चे जो कितने कड़े संस्कारों वाले बन गये थे, उन्हें अपना बनाया। जब कोई कहता है- यह हमारा अपकारी है, तो मैं कहती स्वयं का संस्कार ही स्वयं का अपकारी बनाता, जैसे आज बाबा ने कहा चलते-चलते कई बच्चों को माया की ग्रहचारी बैठती है, तो ग्रहचारी क्या है? क्या स्वयं के संस्कार ही मेरे ऊपर ग्रहचारी हैं या कोई मेरे पर ग्रहचारी बिठाता है? या जब स्वयं ही स्वयं में संशय उठता तो ग्रहचारी बैठ जाती है? ग्रहचारी क्यों बैठती? इसका उत्तर तो यही है कि जब कोई बाबा से प्रीत बुद्धि के बदले विपरीत बुद्धि बनते तभी ग्रहचारी बैठती है। ग्रहचारी की भी बहुत लम्बी लिस्ट है। लेकिन आज हर एक अपने से पूछे कि मैं सर्व का उपकारी हूँ? चाहे कोई कैसी भी मेरे लिए अपकारी है, कोई मेरी निंदा करता, ग्लानि करता, कोई आरोप रखता, कोई वैर करता, कोई विरोध करता, लेकिन ऐसे निंदक के लिए भी मेरी दिल में कितनी जगह है? जब दिल में विरोध उठता तभी अपकार होता है, अन्दर में आता है यह तो सदा मेरी ग्लानि ही करता है। यह तो ग्लानि के ही भाव से देखता है। तो हम आपस में एक-दो के लिए अपकारी हैं या उपकारी ?
२. जिस घड़ी सूक्ष्म में भी नींची ऊंची भावना पैदा होती, वह भावना मेरी उपकारी है या अपकारी है? जैसे कोई वैर की भावना रखता, यह मेरे से ऐसा करता, मैं इसे दिखाऊंगा। तो क्या उस घड़ी मैं उपकारी हूँ या अपकारी हूँ? किसी से मेरी ईर्ष्या पैदा होती है तो उस घड़ी मैं उपकारी हूँ? किसी के प्रति मेरे दिल में प्यार नहीं है तो क्या जब स‌द्भावना नहीं, सत्कार नहीं, प्यार नहीं तो उस समय मैं उपकारी हूँ या अपकारी हूँ? इसलिए खुद से पूछो कि मेरे दिल में उपकार कितना जन्म लेता है? जैसे चलते-चलते कभी-कभी कोई के प्रति अपशब्द निकल जाता। तो मैंने उस अपशब्द को दिल अन्दर कहाँ तक रियलाइज़ किया ? मैंने उस अपशब्द के बदले दिल के अन्दर शुभचिन्तन और शुभचिन्तक की भावना बनाई या उसके बदले और भी कई माया की हलचल के संकल्प पैदा हुए और ही नफ़रत पैदा हुई? अपकार का अर्थ है नफ़रत। नफ़रत से विरोध पैदा होता। तो हमें खुद से पूछना है कि मेरा संकल्प, मेरा संस्कार मेरे से ही विरोध तो नहीं कर रहा है। मेरा संस्कार मेरा ही अपकार तो नहीं करता है? मैं खुद ही खुद का अकल्याण तो नहीं करता हूँ? मेरा संस्कार मेरे लिए कल्याणकारी है या सोचते कि मेरा संस्कार तो मेरे लिए कल्याणकारी है लेकिन दूसरा मेरे लिए अकल्याणी है? अगर दूसरा अकल्याणी है तो मैं कितना शुभचिन्तक हूँ? अगर दिल में ऐसी जगह हो तो कभी भी आपस में टकराव नहीं हो सकता। दोस्त की नीची बात भी दिल में समा ली जाती है। लेकिन दोस्त जब छोटी मोटी बात में कभी दुश्मन बन जाता है तो वह सालों की बीती हुई बातें भी ऐसे निकालने लगता जैसे वह पाई का भी नहीं है। वह दोस्त ही उनके नज़र में दुश्मन बन जाता है। छोटी-मोटी बातों पर, काम-काज में, वस्तु लेने देने में, सहयोग लेने देने में, खाने पीने पर, छोटी-छोटी बातों पर टकराव हो जाता है। रोज़ कई प्रकार के टकरावों के समाचार सुनने को मिलते, क्या हमारे सारे ब्राह्मण कुल का ऐसा रिकार्ड हो सकता है जो आपसी टकराव यज्ञ में स्वाहा हो जाए? दिल को रिझाने का यह भी जवाब आता कि यह तो अन्त तक चलना है। क्या सभी ब्राह्मण आपसी टकराव को खत्म करने का दृढ़ संकल्प करें, प्रतिज्ञा करें तो यह खत्म नहीं हो सकता? हम सब पीस स्थापन करने वाले क्या पीस और प्रीत का वातावरण नहीं बना सकते हैं? प्रीत और पीस का रिकार्ड हमारे ब्राह्मणों के बीच हो सकता है? बापदादा की, दादी दीदी की यह आश है कि किसी भी प्रकार से एक-दूसरे में स्नेह भरा बर्ताव हो, शान्ति भरा बर्ताव हो। हम सभी अति स्वीट और अति लवली होकर रहें।
जैसे बाबा ने कहा- एक-दूसरे का चिन्तन मत करो। जहाँ जिस भी कार्य में रहो, कार्य करते कर्मयोगी रहो। कार्य करते हम प्रीत बुद्धि अर्थात् कर्मयोगी हैं। चाहे जितना बड़ा संगठन हो लेकिन हम सब एक-दूसरे का रिस्पेक्ट करें। स्वागत करें। जब एक-दो के प्रति रिगार्ड नहीं होता, तब ही कुवचन निकलते हैं। तो हरेक को पूछना है- क्या सचमुच मेरे दिल अन्दर हर एक के प्रति जगह है? या पाई पैसे की भी जगह नहीं? अगर हमारे अन्दर यह भावना रहे कि हम सब ब्राह्राण बाबा के त्यागी बच्चे हैं, दुनिया के वैरागी हैं, दुनिया के बीच रहते भी दुनिया से निराले हैं, तो कभी भी आपस में टकराव नहीं हो सकता है।
अगर हम पीसफुल रहें तो कभी भी किसी को अपकार की भावना से नहीं देखेंगे। प्रीत से रहेंगे। प्रीत हो तो ग्लानि, नफ़रत, वैर, विरोध की सब भावनायें समाप्त हो जायेंगी। तो आज यह संकल्प आया कि चारों ओर के सर्व ब्राह्मण कम से कम एक साल तक बहुत-बहुत शान्त, खुशी से, बहुत प्रेम से रहें, ऐसा प्रैक्टिकल व्यवहार से चलें, व्यवहार की शुद्धि से चलें तो बाबा की प्रत्यक्षता सहज हो जायेगी। यह आशा का दीप सदा जगा रहे। कई बार हंसी-मज़ाक की बात भी कोई-कोई को अच्छी नहीं लगती है, इसलिए संगठन में सभी प्रीत से रहें। प्रीत की रीत निभायें। बाबा से तो हरेक की प्रीत है लेकिन उसकी रीति निभानी है। हरेक खुद ही खुद से यह वायदा करे और अटेन्शन रखे। सेवा की जिम्मेवारी के साथ-साथ यह भी ज़िम्मेवारी है कि हमारा प्रीत का कंगन सदा बंधा रहे। हमारा कितना एक-दो में स्नेह और रिगार्ड है, यह सबको प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे। उपकारी बनना है, उपकार करना है, उपकार की भावना से देखना है। इसके लिए कहाँ मरना पड़ेगा, झुकना पड़ेगा, सहन करना पड़ेगा, सहयोग देना पड़ेगा। इसलिए अब किसी भी तरह 'प्रीत और पीस का वर्ष मनाओ।' अच्छा।

अपनी बुद्धि को ज्ञान की गहराई में ले जाने का तरीका

ज्ञान की गहराई में जाने के लिए मनन शक्ति की आवश्यकता है, मननशक्ति कैसे बढ़े उसका आधार क्या है? हम आप यह यह तो जानते हैं कि तालाब का थोड़ा पानी, हमें गहराई में नहीं ले जायेगा, उसमें कूदेंगे भी तो डीप नहीं जायेंगे, उसमें कीचड़ भी होगी, बाँस भी आयेगी। जैसे स्नान के लिए कोई तालाब बना देते हैं, उसमें सिर्फ स्नान तक मज़ा आता, उसमें नईया नहीं चलेगी, उस पानी में रत्न नहीं मिलेंगे, ऐसे फिर नदियों का बहता पानी होता, वह पानी मीठा भी होता, हमारे पीने के लिए लाभदायक होता परन्तु उसमें भी रत्न नहीं मिलते। अगर बड़ी-बड़ी नदियों की गहराई में जाते हैं तो कुछ मिलता है, लेकिन रत्न नहीं मिलते, कहते भी हैं सागर के तले में जाओ, यह नहीं कहते तालाब या नदियों के तले में जाओ। सागर जितना लम्बा, चौड़ा, उतना ही गहरा होता, उसकी गहराई का मज़ा उसकी लहरों से भी हम ले सकते हैं, वह लहरें हमें डुबोयेंगी नहीं। सागर में स्नान करने वालों को उस मज़े का अनुभव होता।
ऐसे ही यहाँ भी हम आत्मायें कोई नदियाँ, कोई तालाब हैं, कोई ने किनसे ज्ञान पाया, कोई ने किनसे, छोटी-बड़ी नदियाँ भल हैं परन्तु गहराई में जाने लिए हमारे सामने सदा सागर है, सागर को सदा सामने रखो तो बुद्धि कहेगी डीप जाओ। दिल को विशाल करना है, दिल में विशालता लानी है उसका साधन है सागर यानी बाप। बापदादा को सामने रखो तो हर बात गहरी विशाल नज़र आयेगी।
जैसे आज बाबा ने हम बच्चों को अनेक नशे चढ़ाये, मुरली तो सभी ने सुनी। अब खुद से पूछो मुझे स्वयं उसका कितना गहरा नशा है। जैसे बाबा ने कहा-बच्चे, जब तुम कहते हो बाबा, तो जज करो बाबा ने जो सुनाया वह राइट सुनाया ? जब राईट सुनाया तो तुम मुझे भूल दूसरों को क्यों याद करते हो? हियर नो ईविल अब विचार करो, बरोबर मेरी बुद्धि बाबा की हर एक बात जज करती रहती ? दूसरा बाबा कहते यह सृष्टि चक्र है, चक्र में बाबा ने आदि से अन्त तक कितनी गहरी ज्ञान की बातें सुना दी हैं। तुम इतना ऊँच पद वाले देवता थे, तुम्हें सब नमन करते हैं, चक्र में हमारा सारा स्टेट्स आ जाता। ८४ जन्मों का हिसाब आता, कर्म-अकर्म-विकर्म की गति आती, हम मालिक थे फिर कंगाल बने, फिर अब मालिक बन रहे हैं। इन्डीविज्युअल स्थिति के लिए ड्रामा सामने रखो तो एक सेकेण्ड में सब समाप्त। सदा स्थिर रहने का साधन है 'ड्रामा।' अब देखो इतना गहरा जाकर चक्र चलाते-चलाते इतना ऊँच अपनी स्थिति रखती हूँ? अपने को महान तकदीरवान, देवता समझती हूँ?
बाबा कहते - बच्चे सदा अचल-अडोल बनना है, अचल स्थिति बनाने का आधार है एक बाबा। बाबा ने अचल बनने का साक्षात्कार कराया। सतयुग में तुम इतने ऊँचे थे, अब फिर ऐसा ऊँचा बनना है। बाबा हमें नशा चढ़ाता, बच्चे तुम महान ते महान हो। फिर हम छोटी-छोटी बातों में क्यों आते? जब महानता की सीट पर बैठेंगे तो छोटी-छोटी बातें आयेंगी ही नहीं। जब मैं तालाब पर बैठती तो छोटी-छोटी बातें आती, क्योंकि तालाब में तो मेढ़कों की ट्रां-ट्रां होती, रत्न नहीं मिलते, तालाब का पानी तो जानवर ही पीते हैं। मैं छोटा-सा तालाब थोड़े ही हूँ। मैं तो सागर के रत्नों की खान हूँ। मैं महान हूँ। किसकी सन्तान हूँ। मेरा बाबा सागर, मैं भी सागर हूँ! जब यह सोचते तो यह दिल छोटे तालाब से निकल विशाल हो जाती। जब बुद्धि विशाल हो जाती तो सर्व शक्तियाँ आ जायेंगी। जैसे योग शिविर में सुनाते हैं कि अपने को आत्मा समझो तो आत्मा के गुण नैचुरल आ जायेंगे, बाप को याद करो तो शक्तियाँ आयेंगी। इतनी सिंपल बात है।
योग शिविर कराने वाली सेवाधारी प्रैक्टिकल में स्वयं को शिविर कराते हो ? सागर में सदैव अपने को देखो तो सहज और स्वतः ही सर्वशक्तियाँ आ जायेंगी। कोई कहता मेरे में आठ शक्तियों में सहन करने की शक्ति नहीं, कोई कहते सामना करने की शक्ति नहीं, कोई कहते मेरे में समाने की शक्ति नहीं, कोई फिर कहते मेरे से निर्णय नहीं होता।
खुद से पूछो हम सागर के बच्चे हैं या तालाब के ? सागर ने कहा है क्या कि मेरे में थोड़े रत्न हैं, बहुत नहीं हैं। सागर ने कहा है क्या कि मैं हूँ सागर लेकिन सब कुछ समाने वाला सागर नहीं? ऐसे ही एक-एक बात खुद से पूछो - मैं सागर हूँ? जैसा बाबा वैसा मैं। जैसे बाबा शान्ति का सागर, आनन्द का सागर, प्यार का सागर, ज्ञान रत्नों का सागर, ऐसे मैं भी मास्टर सागर हूँ? अपने को सागर की सन्तान सागर समझेंगे तो स्वतः ही समाने की शक्ति, सहनशक्ति, निर्णयशक्ति सर्व शक्तियाँ आ जायेंगी।
दुनिया का काम है आवाज़ करना, ये जितने भी मुख हैं उनका काम है सुनाना, मेरा काम है सुनना और सागर की तरह समाना। ऐसे नहीं मैं हूँ सागर की सन्तान लेकिन किसी ने खोटी बात कही तो बस मेरा सारा ज्ञान मिट गया। योग भी नहीं लगा, नींद भी नहीं आई। चिन्तन ही चलता रहा। चिन्तन से चिंता आई, चिंता से उदासी आई, मूड आफ हुआ, घर याद आया, बाबा भूलेगा, ईश्वरीय जीवन से तंग होंगे, दूसरी दुनिया के संकल्प उठेंगे। इन सबका कारण क्या हुआ ? चींटी जितनी छोटी बात अन्दर चली गई, जो महारथी को भी सुला देती है। फिर यह क्यों कहते हो कि मैं सर्वशक्तिवान बाप की संतान हूँ। हर छोटी बड़ी बात के लिए स्वयं में अष्ट शक्तियाँ चाहिए। किसी भी बात का पहले से निर्णय करना है फिर सामना करना है या समा लेना है। तो आधार है निर्णय शक्ति। निर्णय शक्ति होगी तब ही सामना करने की शक्ति, सहन करने की शक्ति, समाने की शक्ति स्वतः सहज आ जायेगी। निर्णय शक्ति नहीं तो अवस्था डगमग होती रहेगी।
हमारे निश्चय का आधार है 'बाबा', उस पर अटल रहें तो छोटी बात हिला नहीं सकती, इसलिए सदैव अपने को सागर में देखो। दुनिया तो है ही असार संसार। ईश्वरीय परिवार भी संसार है, सबके स्वभाव संस्कार अपने-अपने हैं। देवताओं के गुण वर्णन होते, संस्कार नहीं। संस्कारों की ठक-ठक होती रहेगी। फाउण्डेशन मज़बूत है तो हिलेंगे नहीं। फाउण्डेशन है बाबा। उसके तले में रहो तो असार संसार कुछ नहीं करेगा। जितनी मेरी स्थिति ऊँबी होगी, उतना याद की यात्रा का रस भी बड़ा स्वीट होगा। जैसे बरसात का पानी पहाड़ी से चलता, नदियों में मीठा हो जाता, सागर का पानी तो खारा है ना, यह भी कुदरत की नेचर ही कहेंगे। पीने का स्वीट पानी हो जाता।
जब हमारे बुद्धि की लगन बाबा से है, याद की हमें आकर्षण है तो बाबा से हमें लाइट मिलती, ये लाइट आत्मा से खारेपन के संस्कारों को मिटाकर मीठा दिव्यगुण सम्पन्न बनाती है। जितना-जितना मेरी मंसा बाबा में, सागर में होती उतना संस्कार खत्म, स्वभाव खत्म, कडुवापन खत्म। मैं आत्मा स्वीट होती जाती हूँ। कई बार मैं खुद को देखती हूँ, मेरी आत्मा मेरे सामने हैं। फिर बाबा कहता - बच्ची, जैसा मैं वैसी तू। तू मेरे समान हो, जैसे मैं सागर हूँ, वैसे तू भी सागर हो। जैसे मैं लाइट वैसे तू भी लाइट हो। जैसे मैं साफ़ स्वच्छ ऊँच वैसे तू हो। बाकी तो अन्तिम जन्म के हिसाब चुक्तू हो रहे हैं।
सदा ऊपर-ऊपर रहो तो ये बातें, वो बातें सब समाप्त हो जायेंगी, बातें माना ही ईविल, श्रीमत माना ही श्रेष्ठ ज्ञान। कभी-कभी बाबा कहता बच्चे, अलबेले न रहो, यह क्यों कहता ? अरे मैं अलबेला रहूँ तो मेरी लाटरी कोई जीत ले। जिनको पढ़ाई की लगन होती वो रात को लालटेन में भी पढ़ते हैं, बाबा कहते जिन सोया तिन खोया तो मैं अलबेला क्यों रहूँ ?
कई बार मैं सोचती हूँ, यह ज्ञान में क्यों आई? कहती ज्ञान अच्छा लगा, बहनें अच्छी लगी, यह जीवन अच्छी लगी, औरों को ज्ञान सुनाना अच्छा लगता, लेकिन मैं कहती बाबा मेरे ज़िगर में कहाँ तक अच्छा लगता? जितना बाबा को गहराई में अच्छा देखेंगे उतनी स्थिति अच्छी होगी। अगर अपनी स्थिति अचल बनानी है तो देखो बाबा मुझे कितना अच्छा लगता? बाबा से जिगर की लगन कितनी है, मैं कितना बाबा में मस्त रहती, कितना यादों में खोई रहती हूँ। जब स्वयं में योग का रस आयेगा तब औरों को अनुभव करा सकेंगे। कई कहते हैं आपको संसार का क्या अनुभव है, बाबा माना ही नॉलेज, बाबा मिला तो सारी नालेज मिल गई, बाबा कहते अपने अन्दर इतना ज्ञान होना चाहिए, जो किसी को अच्छी तरह समझा सको, सिर्फ सप्ताह कोर्स कराना या समझाना नहीं, ज्ञान माना निर्णय शक्ति हो, ज्ञान में योग की पावर हो, ज्ञान और योग की पावर से जवाब देंगी तो कोई ऐसा नहीं कहेगा कि इन्हों को बहकाया गया है।
अपनी स्थिति सुखमय होनी चाहिए, कभी भी तंग दिल, उदास दिल नहीं बनना है। कई कहते हैं मेरे में ताकत नहीं, बोर्ड में तो लिखा है हेल्थ-वेल्थ-हैप्पी बनने का दवाखाना और डाक्टर कहते मेरे में शक्ति नहीं है। न मैं किसको हेल्थ दे सकती हूँ, न हैपी कर सकती हूँ। तो बोर्ड उतार दो।
कोई मेरा झूठा अपमान, कोई सच्चा अपमान करेंगे। तो कई कहते हैं कि झूठी बात से मुझे चिढ़ आती है। अरे पत्थर भी टक्कर खा-खा कर गोल हो जाता है तब पूजने में आता है। ये जीवन माना ही सेकण्ड सेकण्ड टक्करों से टकराना। कई कहते हैं टक्कर आवे ही नहीं, बाबा कहते हैं टक्कर आयेगी ज़रूर, कभी भी हलचल हो तो उसका सहज साधन है बाबा से बातें करो। बाबा शक्ति देगा, हलचल खत्म हो जायेगी। आज के भक्त भी मूर्ति के आगे जाकर सच बोलेंगे यहाँ भी बाबा का कमरा है, कोई बात है, बाबा को सुना दो तो ३ मिनट में सब खत्म हो जायेगा। बुद्धि फ्रेश हो जायेगी। बाबा का कमरा जादू की नगरी है, हमारा डाक्टर कोई आत्मा नहीं, बाबा हमारा डाक्टर है, जजमेंट भी राइट देने वाला हमारा बाबा है। बाबा से जजमेन्ट लो। कभी कोई कहते, मैं क्या करूँ मेरी दिल कमजोर है, अपने कदम लेकर बाबा के पास जाओ, बाबा आपके कदमों में बल भरेगा। टीचर्स को यह साधन रखना चाहिए, बात आई और गई। दूसरा देखना चाहिए मेरे अन्दर जिगर में खुशी है? अगर बैलेन्स ऊपर नीचे है, बाबा के सामने बैठ जाओ तो फिर से खुशी आ जायेगी।
एक-दो का आधार लेकर चलना बिल्कुल गलत है। हमें साथी चाहिए, सहयोग चाहिए, मदद चाहिए, नहीं। मैं आत्मा इन्डीपिन्डेन्ट हूँ, बाबा के ऊपर डिपेन्ड करो, आत्मा पर डिपेन्ड करने से बैलेन्स बिगड़ जाता है।
योग माना कोई-न-कोई विशेष शक्ति भरके उठना। कभी आनंद का रस भर लो, कभी प्रेम का... कभी शान्ति का रस भर लो। तो हर एक को देखना है कि जब मैं याद में बैठती हूँ, तो याद के साथ-साथ ज्ञान, प्रेम, शान्ति, शक्ति का अनुभव लेकर उठती हूँ या झुटके आते रहते हैं? बाबा चुम्बक है, उसकी आकर्षण में बैठना है, मज़बूरी से नहीं बैठना है। कई कहते हैं सर्विस के लिए मेरी बड़ी दिल होती है, परन्तु अपने को पावन बनने का भी ज़िगर में आता है? सेवा और शक्ति दोनों का बैलेन्स बराबर हो। सर्विस के लिए उमंग है, हुल्लास है, प्लैन हैं तो मैं क्यों कहूँ कि नहीं करो। मैं कहती हूँ अपने अन्दर में शक्ति होनी चाहिए। दूसरों को सन्तुष्ट करना ही स्वयं सन्तुष्ट होना है। इससे हमारी आत्मा को भी बल और खुशी मिलती है। तो देखना है कि मैं कहाँ तक ऐसी सर्विस करती हूँ?
कहते हैं- खाली मन शैतान का डेरा, खाली रहेंगे तो व्यर्थ संकल्प चलेंगे,बिज़ी के साथ अपने में पावर भरने का संकल्प जरूर होना चाहिए। जब पावर होगी तब सब बातों का सामना करने की शक्ति आयेगी। हम उदार सागर के बच्चे हैं, हमें उदारता से काम करना है, बाबा कहते ऊपर से देखकर निर्णय करो तो स्थिति अचल बनेंगी। नीचे से ऊपर मत देखो, ऊपर से नीचे सब दिखाई देता है। सहज पुरुषार्थ है- अपने को सदा बाबा के आगे रखो, आधार बाबा है तो कभी फसेंगे नहीं। किसके गुणों पर मोहित नहीं होंगे। स्वयं सर्व शक्तियाँ आ जायेंगी। शिवबाबा तो है ही लेकिन ब्रह्मा बाबा को भी सामने रखो तो स्वयं के अन्दर उमंग-उल्लास आ जायेगा, सब बातें खत्म हो जायेंगी।
अपने को चुस्त बनाओ - सुस्त नहीं। दुनिया माना लहरों में लाना, संसार माना हलचल में लाना, मैं अपने बाबा के साथ हूँ, अभी भी कोई कुछ कहे, कोई प्रीति करे कोई डांट दे। मैं कहती हूँ, ठीक है, मैं हिलने वाली नहीं हूँ। दादी बनना माना सुनना, बड़ा बनना माना झुकना। सुनना और समाना ये है बड़े की बड़ाई। ब्रह्माकुमार माना सुनना और समाना न कि सुनाना। जितना समाना सीखेंगे उतना हीरा बनेंगे। पत्थर को भी घिसते हैं तब चमक आती है।

व्यर्थ संकल्प उठने के कारण तथा उनका निवारण

जबकि हम नई दुनिया की स्थापना के निमित्त हैं तो हमारा व्यर्थ संकल्प उठता ही क्यों है? जिन्होंने बाप को नहीं जाना उनका सब वेस्ट हो रहा है, हमारा सब कुछ बेस्ट बन रहा है। हम विश्व के सेवाधारी विश्व को महान बनाने वाले, विश्व का कल्याण करने वाले, सर्व का कल्याण करने वाले हैं, अगर हमारा ही संकल्प व्यर्थ जयेगा तो विश्व का क्या होगा? हम फाउण्डेशन हैं, जब इस नशे में रहेंगे तो व्यर्थ संकल्प उठ नहीं सकते। बाबा ने कहा है अपने अन्दर विल पावर और कण्ट्रोलिंग पावर चाहिए। दान दी हुई चीज़ वृत्ति से भी वापिस लेना पाप है।
१. व्यर्थ संकल्प चलने चलाने का कारण है ज्ञान में आने के बाद अनेकानेक आत्माओं के दिल में एक कमी है, वो है सूक्ष्म ईर्ष्या। ईर्ष्या वश कोई कुछ कहता है तो मन खराब होता, फालतू बातें पैदा करने से उसके ऊपर असर पड़ता है। रामायण सारा ईर्ष्या पर है, मंथरा ने धूतीपना किया, ईर्ष्या की भावना से एक को आगे बढ़ाते, दूसरे को पीछे करते। माँ बच्चे की लड़ाई, सास-बहू की लड़ाई की जड़ है 'ईर्ष्या'। अज्ञान में भी ईष्या तो ज्ञान में भी ईर्ष्या।
२. ईर्ष्या के कारण कोई किसी को चढ़ा हुआ अथवा बढ़ता हुआ देख सहन नहीं कर सकता, न किसी को दुःखी देख उसे सहयोग देता। ज्ञान में भी यह सूक्ष्म भावना पैदा होती है, इसको इन्चार्ज बनाया, इनको क्यों नहीं? इसकी खातिरी होती इसकी क्यों नहीं? यह बड़ा क्यों? यह सहन न होने के कारण एक-दो के प्रति ईर्ष्या पैदा होती है। एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या पैदा कराने का कारण भी 'अनुमान' है। अनुमान के आधार पर हम किसी का दिल खराब करते हैं। इस अनुमान की बीमारी की कोई दवा नहीं है। भक्ति के चित्र भी अनुमान से मनगढ़न्त बने हैं। किसी से स्नेह होगा तो मनगढ़न्त बातें सुना-सुना कर उसे ऊँचा चढ़ायेंगे, किसी से स्नेह नहीं तो उसे नीचे गिरायेंगे। ईर्ष्या की शक्ति ऐसी है जो सहन न होने के कारण स्नेह, सहयोग सेवा आदि से वंचित हो जाते हैं।
३. जैसे काम-क्रोध की माया है, वैसे ईर्ष्या की भी माया कम नहीं, जितना-जितना ज्ञान की मंजिल पर चढ़ते उतना यह माया वार करती, इसके वशीभूत होने वाला पद भ्रष्ट हो जाता है। ईर्ष्या उठने का कारण अपनी मस्ती में मस्त नहीं रहते। स्वयं पर फेथ नहीं है। अगर मैं अपने दृढ़ विश्वास पर अटल हूँ, दृढ़ हूँ तो मेरा कोई कुछ कर नहीं सकता। संस्कारों के टक्कर का कारण है- देह-अभिमान तथा अनुमान।
४. लौकिक का सहन करना सहज है, अलौकिक का सहन करना कठिन है, ज्ञान की मंजिल को कहा है लम्बी खजूर, हमें इसे पास करना है। चढ़ाव-उतराव को क्रास करना है, मंजिल पर पहुँचना है तो हमें कोई गिरा नहीं सकता। जब एक इन्सान सब बातों का सामना करता, मंजिल पर पहुँचता है तो हम क्यों नहीं कर सकते ? कोई हिलाता है तो तुम हिल जाते हो, अगर तुम अचल रहो तो वो फीका हो, थक कर हार कर बैठ जायेगा। इसमें चाहिए अपनी अडोलता। साथ-साथ स्वयं का चेकिंग मास्टर स्वयं बनो। चेकिंग मास्टर न होने कारण जिस प्यारी स्थिति के लिए बाबा कहता - अव्यक्त स्थिति में रहो, अपनी मस्ती में मस्त रहो वह नहीं रहती। मस्त स्थिति न होने कारण अगर कोई कुछ कहता है तो व्यर्थ संकल्प चलते हैं। नाराजगी आती है। कई बार मैं सोचती हूँ, खुदा मेरा बाबा है, मैं भी अपनी खुदा हूँ, हमें खुदा के समान अपनी स्थिति बनानी ही है। इसके लिए मेरे सामने सदा यही लक्ष्य रहता कि हमें सम्पूर्णता के समीप जाना है। बाबा कहते हैं तुम्हें कर्मातीत होना है। आखिर कब? कर्मभोग तो अन्त तक चलेगा। तो मुझे अपने को कर्मातीत बनाने के लिए क्या करना है? यह क्यों नहीं सोचते मैं कर्मातीत के नज़दीक हूँ, जब कर्मबन्धन टूटना होगा तो टूटा और पंछी उड़ा। बाबा कहे बच्चे तुम अपने को कर्मातीत स्थिति के समीप समझो, सेवा के पार्ट के निमित्त थोड़े समय के लिए यहाँ पार्ट बजाना है।
५. इन पुराने संस्कारों में रखा क्या है? इस पुरानी दुनिया में है क्या ? बस मेरा बाबा और मैं। हमें सदा ऊपर रहना है। हमें बाबा अपने साथ नयनों पर बिठाकर ले जाने वाला है। क्या चाहते हो? क्या इच्छा है, किस बात में ममता है? हमें कुछ नहीं चाहिए। हम अपनी जीरो की स्टेज पर बैठ जाते हैं। मैं क्यों कहूँ कि मेरे में सहन करने की शक्ति नहीं है, मैं कमज़ोर हूँ। मेरी शक्ति का तो गायन है। जब मेरे नाम का गायन है तो मेरे में सहन की शक्ति क्यों नहीं!
६. जब एक स्वयं के प्यारे नशे में मस्त हो जाते तो सब बातें खत्म हो जाती। मेरा, मेरा, मुझे, तुझे, मैं इन बातों में अपना टाइम वेस्ट क्यों करूँ ? मुझे अब घर चलना है, हम बाबा के साथी हैं, वतन के राही हैं, जब अपना सब स्व पर पहुँच जाता, स्व स्वरूप, स्व लक्ष्य, स्व स्थिति में टिक जाते तो स्थिति सदा अमर रहती।
७. कहने में आता है हमारा संस्कार है, अब यह संस्कार आदि देवताई संस्कार है। बाबा हमें दिव्यमूर्त कहता तो हम दिव्यता की स्टेज पर क्यों नहीं रहते ! जब मैं सुनती कोई कहता है मेरे यह संस्कार मिटते ही नहीं तो मुझे तरस आता, रहम भी आता, जब कहते हो यह हमारा नया जन्म है तो फिर पुराने संस्कार मिटते क्यों नहीं!
८. इंचार्ज बाबा है, हम तो निमित्त हूँ, यह निमित्त शब्द सेकण्ड में निर्मान बना देता है। यह ख्याल क्यों आता यह इंचार्ज है, मैं भी इंचार्ज रहूँ, यह भी भाषा क्यों ?
९. मैं बाबा का एक मन्त्र डेली यूज़ करती हूँ, सुबह से रात तक कि मुझे सदा डबल लाइट हाउस रहना है। यह मन्त्र मुझे जीवन में इतना बल देता, मैं अपनी स्व-स्थिति में स्थित रहती, दूसरे भी इससे लैसन लेते, बाबा ने कहा है- बच्ची, तुम्हें डबल लाइट हाउस रहना है, बुद्धि को लाइट रखो, सबको लाइट दो, सदा देही-अभिमानी रहो।
१०. व्यर्थ संकल्प हैं किचड़े का डिब्बा, मैं इस डिब्बे को अपने सिर पर क्यों रखूँ ! खुद लाइट होने से आत्मा लाइट स्वरूप बन औरों को भी निहाल करती, यह बड़ी गहरी स्थिति है परन्तु रखती हल्का और स्वीट है। इसी स्थिति से मैं अपने को आगे बढ़ता अनुभव करती हूँ। यहाँ आये हो मन को हल्का करने तो बिल्कुल लाइट अर्थात् फ़रिश्ते हो जाओ तो बुद्धि स्वच्छ हो जायेगी। और आगे का रास्ता भी क्लीयर हो जायेगा। फिर कर्मातीत के नज़दीक, ये पंछी उड़ा कि उड़ा। सब हिसाब-किताब चुक्तू। शरीर, संस्कार, पुराने खाते सहित सब हिसाब चुक्तू कर घर जाने के लिए तैयार हैं। देखो ऐसी स्थिति है?
११. बस बाबा अब तो हम अपनी कर्मातीत स्थिति के नज़दीक हूँ, संकल्प, संस्कार, आदत, भाव-स्वभाव सबसे मुक्त हो गये हैं। बाबा हमें मुक्ति का वरदान देते, अगर हम स्वयं ही मुक्त नहीं होंगे तो दूसरों को मुक्ति-जीवनमुक्ति का वरदान कैसे दे सकते हैं।
१२. बाबा ने हमें 'मुक्त भव' का वरदान दिया है। संकल्प में ही बन्धन है. संकल्प समेट लो तो मुक्त। क्या चाहिए? कोई ममता, आशा, इच्छा है, कुछ चाहिए तो आज मांगो, नहीं तो सदा स्वयं को मुक्त रखो। इस दुनिया की राजाई चाहिए, लौकिक से मुक्त हो गये और अलौकिक में सम्बन्ध रह गया है तो सोने की ज़ंजीर में फंसा है। बाबा के गले का हार अर्थात् मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा।
१३. अगर हमारे में कोई अवगुण है, मिटता नहीं तो यह भी कड़ा बन्धन है। इस बन्धन को तोड़ना है। इसके लिए अपने अन्दर रियलाइज़ करने की शक्ति चाहिए, स्वयं पर ध्यान रखो तो मुक्त हो सकते। अपने इस अवगुण के कारण बाप का नाम बदनाम, अवगुण डिससर्विस का कारण बनता है, अपनी इज्जत का ख्याल करते, बाबा की इज्जत का ख्याल नहीं करते। इस अवगुण के कारण मैंने बाबा का नाम बदनाम किया। बाबा की इज्जत प्यारी रखो तो कोई भी अवगुण आँख नहीं उठा सकता। बापदादा को सदा आँखों में समाया रखो तो सब मिट जायेगा।
१४. पुरुषार्थ में अलबेलापन होने का कारण है, मास्टर बन अपनी चेकिंग नहीं करते। अगर छोटी सी बात कोई कहता है तो एतराज होता, लेकिन है तब तो उसने कहा, तुम उसे छोड़ दो, तुम्हें क्यों एतराज हो? बाबा आया है मुक्ति-जीवनमुक्ति का वरदान देने। तो चेक करो मैं स्वयं से मुक्त हूँ? अगर मुक्त होंगे तो अवस्था शीतल होगी, शीतल सबको प्यारा लगता, छोटी-सी बात में अपने दिल-दिमाग को गर्म नहीं करो। अच्छा।

साइलेन्स की शक्ति जमा करो

बाबा हम बच्चों को किस निगाह से देखते हैं कि बच्चे इस देह से, इस पुरानी दुनिया से, इन ५ तत्वों से भी पार हो साइलेन्स में बैठे हैं? साइलेन्स एक बड़ी पावर है, इसमें सर्व शक्तियाँ समाई हुई हैं। जैसे साइन्स वालों ने साइन्स पावर से शक्तिशाली वस्तुयें बनाई हैं एटम बाम्ब आदि। तो हम आलमाइटी अथॉरिटी अर्थात् सर्व शक्तियों से सम्पन्न परमधाम निवासी हैं। हम आत्मायें पार्टधारी है, पार्ट बजाकर अपने घर चले जाने की तैयारी कर रहे हैं। वह आया है पण्डा बनकर हमको साथ ले जाने के लिए। सर्व सम्बन्धों से मुक्त कराकर अपने साथ कनेक्शन भी जुड़ाया है क्योंकि अब घर वापिस जाना है। तो अब यहाँ बैठे भी उस साइलेन्स का अनुभव करना है। जब वहाँ चले जायेंगे तब उस साइलेन्स का अनुभव वर्णन नहीं कर सकेंगे। तो अब शान्ति का अनुभव भी बाप इस ही जीवन में कराते हैं।
२. जितना-जितना हम मन-बुद्धि को ५ तत्वों से पार ले जायेंगे तो जो स्वीट साइलेन्स होम है, वहाँ जाकर निवास करेंगे। और लाइट-माइट का अनुभव करेंगे। जैसे सितारे आकाश तत्व के अन्दर अपने-अपने स्थान पर चमकते रहते हैं, वैसे हम भी ब्रह्म तत्व में जाकर बाप के साथ उस साइलेन्स की शक्ति का अनुभव कर सकते हैं। बाप को इन आँखों से नहीं देख सकते हैं लेकिन उसके कर्तव्य द्वारा, उनके गुणों द्वारा, शक्तियों द्वारा उसका अनुभव होता है। तो जितना हम उसमें स्थित रहेंगे उतना ही हम उस साइलेन्स पावर का अनुभव करेंगे। उस याद से हमारे अनेक जन्म के विकर्म विनाश होते हैं और मन के संकल्प-विकल्प भी मर्ज हो जाते हैं। मास्टर आलमाइटी की स्टेज का अनुभव होता है। जितना-जितना अभ्यास करते जायेंगे उतना बेहद विश्व की सेवा कर सकेंगे। जो वाचा द्वारा हम सर्विस नहीं कर पाते, वह हम समर्थ संकल्प द्वारा दूर वाली आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। बाबा कहते हैं आपके बहुत भक्त हैं, जो आपका आह्वान कर रहे हैं, प्यासे हैं। तो वे हमारी झलक को कब देख सकते हैं? जब हम एकाग्र अवस्था में रहेंगे। हमारा संकल्प उतना चले जो समर्थ हो, व्यर्थ न आवे। वाचा भी उतनी ही चले जो समर्थ हो, सेवा अर्थ हो - व्यर्थ न जावे। ऐसा गुप्त पुरुषार्थ चाहिए। बुद्धियोग की लाइन क्लीयर हो, बुद्धि पवित्र हो तो बाप की प्रेरणाओं को, बाप की पावर को कैच कर सकते हैं।
३. जब हम देह से निकल बाप को याद करते हैं तो बुद्धियोग जुट जाता है तब ही बाप से हम सर्वशक्तियों का अनुभव कर सकते हैं। जब हम इस ५ तत्वों से पार हो जाते हैं, पृथ्वी के आकर्षण से परे हो जाते हैं, जब ही हम रीयल शान्ति का अनुभव कर सकते हैं।
४. हम दुनिया की निगाहों से दूर, आवाज़ से परे परम शान्ति का अनुभव करते हैं, तो आवाज में आना पसन्द नहीं आता। हम सिर्फ पार्ट बजाने के लिए कर्मेन्दियों का आधार लेकर आते हैं- ऐसे अनुभव होगा।
५. इस साइलेन्स की शक्ति से क्विक सर्विस कर सकते हैं। साइलेन्स पावर दूर-दूर में जाकर काम करेगी। बाबा कहते थे बच्चे, तुम विश्व कल्याणी हो। तो हमारा विचार चलता कि हम सारे विश्व की सेवा कैसे करेंगे। जब साइलेन्स पावर कई जन्मों के विकर्मों को भस्म कर सकती है तो विश्व की आत्माओं की सेवा क्यों नहीं कर सकती। हम सूक्ष्म में किसी भी आत्मा को बुला सकते हैं, उनसे रूह-रूहान कर सकते हैं, उसको लाइट-माइट का दान दे सकते हैं। साइलेन्स पावर से ऐसा औरों को अनुभव होगा। सेन्टर पर पाँव रखेंगे तो जैसे उन्हों को सन्नाटा महसूस होगा। महसूस होगा तो कितनी शान्ति है।
६. यह बहुत मीठी अवस्था है। इससे बहुत शान्ति, अतीन्द्रिय सुख की महसूसता होती है। साइलेन्स पावर अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान की स्थिति। हमारी सिर्फ साइलेन्स नहीं हैं लेकिन हमारी ओरिजनल स्टेज जो बाप समान स्टेज है, उसमें स्थित होना है। ओरिजनल स्टेज है मास्टर सर्वशक्तिवान की स्थिति, जिसमें कोई भी संकल्प की उत्पत्ति नहीं होती है, जिसको दूसरे शब्दों में बीजरूप की स्थिति कहेंगे। हम भी बिन्दु हैं, बाबा भी बिन्दु है, हम बाबा के साथ कनेक्शन जोड़े, सर्व शक्तियों के स्टाक को जमा करें। जैसे बाप विश्व-कल्याणी है वैसे हम बच्चे हैं, उसको लाइट माइट अर्थात् शान्ति का पूँज कहें। वह माइट हाउस अर्थात् सर्व शक्तियों से भरपूर होगा। उसकी स्थिति द्वारा सेवा होती रहेगी। दृष्टि द्वारा निराकारी स्थिति का साक्षात्कार होता रहेगा। ओमशान्ति।

सेवाधारी माना त्यागी और तपस्वी

हम सबका पहला लक्ष्य है कि हमें कम्पलीट पवित्र राजऋषि बनना है। राजऋषि का अर्थ है पवित्र। योगी का अर्थ है निरन्तर एक बाप के साथ सर्व सम्बन्ध हों अथवा योग हो। जिस योग से विकर्म विनाश हों। तो एक लक्ष्य है हमें पावन बनना है, दूसरा लक्ष्य हुआ कि हमें राजयोगी बनके अपने पास्ट ६३ जन्मों के विकर्म विनाश करने हैं। तीसरा है हम तपस्वी हैं, हमें अपने संस्कारों को तपोबल से परिवर्तन करना है। तपस्या का अर्थ ही है हे आत्मा, तुम अपने को तप में रखो, जिस तप से आप अपनी कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करो। कर्मेन्द्रियों को शीतल बनाना - उसके लिए ही यह तपस्या है और तपस्या का फाउण्डेशन है- ज्ञान। यह नया ज्ञान है, जो हमें वेद शास्त्रों से नहीं मिला। अभी स्वयं सत् बाप ने अपनी सही पहचान दी है।
योग का आधार 'ज्ञान' है। जितना ज्ञान पर आधारित होंगे, उतना ही योग बल कमा सकेंगे। ज्ञान का फाउण्डेशन ही हमारी इस जीवन के इमारत का फाउण्डेशन है। ज्ञान का फाउण्डेशन नहीं तो समझो योग का भी फाउण्डेशन नहीं है। तो सबसे पहला फाउण्डेशन है- 'ज्ञान'। ज्ञान और योग का फाउण्डेशन, फिर है निश्चय। तो हर एक अपने आपसे पूछे कि हमें जो ज्ञान मिला है, उस पर कहाँ तक निश्चय है? ज्ञान की सब प्वॉइन्ट्स पर मेरा निश्चय है या कहीं दिल में प्रश्न है? दूसरा क्या मेरा निश्चय है कि हमें कौन पढ़ा रहा है? जिसको दुनिया ढूँढती है - वह बाप हमारे पर कुर्बान है अथवा जिसे दुनिया, ऋषि-मुनि, भक्त आदि सब पाने के लिए इतने जप, तप आदि करते हैं, वह हमने जीवन में पाया है। पाया है यह दिल से अनुभव होता है या कहते हैं भगवान पढ़ाता है हाँ, ठीक है! एक है हाँ ठीक है, एक है- मुझे भगवान पढ़ाता है- मैं कुर्बान हूँ, वह मेरे पर कुर्बान है। इतना भगवान के ऊपर निश्चय है? सबने भगवान को अपना जीवन सौंप दिया है या अभी ट्रायल कर रहे हो? गीत में कहते हैं प्यार करो, चाहे ठुकराओ... तो भगवान परीक्षायें भी लेता है, ऐसे ही स्वीकार नहीं करता है। उनकी परीक्षायें ऐसी वण्डरफुल आती जो न चाहते भी बुद्धि घूम जावे। जो मालूम भी नहीं पड़ता कि कैसे मैं पेपर में फेल हो गया ! उसका टेस्ट पेपर बड़ा वण्डरफुल होता, जिसको समझो तो समझ से परे, सोचो तो सोचने से परे, वर्णन करो तो वर्णन से परे होता, लेकिन होता टेस्ट की तरह है। अगर टेस्ट पेपर नहीं होता तो आज आश्चर्यवत सुनन्ती, पश्यन्ती, कथन्ती और आश्चर्यवत भागन्ती नहीं होते। तो यह टेस्ट पेपर हर एक का होता है जिसमें अनेक बातें आती हैं।
जैसे जौहरी भी पहले आई-ग्लास से टेस्ट करता कि हीरा कैसा है, सोने को भी घिसता है तो खबर होती कि सोना है या आर्टिफिशियल सोना है, दिखाऊ सोना है या सच्चा सोना है? आजकल अमेरिकन हीरे, अमेरिकन सोना बहुत निकल गया है। आज की दुनिया का आर्टिफिशियल भभका बहुत है लेकिन हम इस दुनिया के आर्टिफिशियल भभकों से बहुत परे हैं। तो सबसे पहले चेक करो कि प्राण भले जावे तो जावे लेकिन हे बाबा, तेरे साथ जो मेरा प्रण है वह नहीं छूटे, चाहे मारो चाहे ठुकराओ-हम आपके होकर रहेंगे। ऐसा वायदा पक्का है? बाबा कहता था, मैं आर्डर करूंगा कि तुम योगी नहीं हो, गेट आउट। और बरोबर तुम्हारी गलतियाँ साबित करके कहूँगा, गेट आउट.. तो क्या तुम गेट आउट होंगे या द्वार पर प्राण छोड़ेंगे? बाबा ऐसे एक हंसी से बोलता था। परन्तु बाबा देखता था कि कहाँ तक इसका प्रण और प्राण है? एक है प्रण, एक है प्राण। तो कहा जाता प्राण भले जावे परन्तु प्रण न जावे। तो यह है निश्चय की परख कि हमारा निश्चय कहाँ तक है?
बाबा के निश्चय की टेस्टिंग है सर्वन्श त्यागी। अगर सर्वन्श त्यागी हो तब तो निश्चय है। अगर सर्वन्श त्याग नहीं है तो निश्चय में कमी है, गडबड़ है। तो यह सब सोचो, विचारों कि मेरे में त्याग और तपस्या की शक्ति कितनी है? त्याग माना सब बातों का त्याग, नींद का त्याग, खाने-पीने का त्याग, आराम का त्याग, सुख-सुविधाओं का त्याग, इनसे भी बड़ा त्याग होता है बुद्धि का त्याग, मनमत का त्याग, संगदोष का त्याग, इगो का त्याग, देह-अभिमान का त्याग, मन की इच्छाओं का त्याग, तन की इच्छाओं का त्याग यह बहुत बड़े त्याग होते हैं। तो यह सब त्याग मैंने किये हैं या नहीं? मन की इच्छायें रही हुई तो नहीं हैं? जैसे भक्त लोग श्रावण मास में बहुत करके व्रत रखते हैं, कई तो ३१ दिन व्रत रखते हैं, अन्न-जल नहीं लेते हैं तो आप लोगों की भट्टी भी यह एक व्रत है। तो भट्ठी में चेक करो कि ऐसे त्यागी तपस्वी हैं? जब तक त्याग तपस्या नहीं है तब तक सेवाओं में भी सफलता नहीं होगी।
कई बार सेवा का भी हमें त्याग करना पड़ता है। कोई कोई करते सेवा हैं परन्तु सेवा करते भी मान की इच्छा रहती है तो वह सेवा सफल नहीं मानी जाती है। तो हमें सब कुछ त्याग रख करके चलना पड़ता है। संगठन के सहयोग से चलने की भी बहुत बड़ी शक्ति चाहिए। सेवा करने की शक्ति है परन्तु इन्डिपेन्डेन्ट की शक्ति है, सहयोग के संगठन की शक्ति नहीं है तो बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि आखिर चलना संगठन में है, इण्डीविज्युअल में नहीं रहना है, तो आप सभी को अपनी टेस्ट करनी चाहिए।
एक बाबा ही हमारा संसार है, एक बाबा के सिवाए कोई संसार नहीं। ऐसा कोई संसार न बने जो फिर रोना पड़े। इसलिए अपने आपसे पूछो कि नय्या की पतवार अपने हाथ में हैं या बाबा के हाथ में हैं? अगर पतवार खिवय्या को दिया तो खिवय्या जहाँ भी ले जावे, फिर पतवार अपने हाथ में तो नहीं है। तो यह जीवन नैया की पतवार तेरे हाथों में हैं। तो अपने आपको देखो कि मुझे कहाँ तक निश्चय है? अगर निश्चय है तो परिवर्तन है? अगर परिवर्तन नहीं तो फिर निश्चय भी नहीं है। इस परिवर्तन की विधि है निश्चय और फिर निश्चय की विधि है प्यार। अगर मेरा बाबा से प्यार है माना निश्चय है, अगर बाबा पर निश्चय है माना प्यार है। अगर निश्चय नहीं है, प्यार नहीं है तो फिर कुछ नहीं है। तो मेरा बाबा से कितना प्यार है? कितना बाबा से दुलार है? यह अपने-अपने अनुभव से पूछो।
हमें तो कई बार आप जैसे योगी भाईयों को देख ज़रूर दिल में आता कि यह सभी अपनी जीवन हथेली पर लेकर पहुँचे हैं। कोई ज्ञान से आकर्षित हो आये हैं, कोई बाबा के प्यार में आये हैं, या मधुबन का वायुमण्डल अच्छा लगता है इसलिए आये हैं, या सेवा से प्यार है इसलिए आये हैं..... परन्तु कई बार चलते-चलते थक जाते हैं क्योंकि ज्ञान-योग का फाउण्डेशन नहीं होता तो त्याग भी नहीं होता है। जैसे टांगे थक जावें तो आराम करना चाहेंगे, बैठना चाहेंगे। ऐसे ही फिर मन रूपी टांगे थक जाती हैं तो फिर किनारा करने को रास्ता ढूँढते हैं। आये थे तो बहुत अच्छा शौक था, परन्तु ऐसा नहीं समझा कि इतना त्याग करना पड़ेगा, इतना संगठन में रहना पड़ेगा, बहुत डिफीकल्ट है। फिर यह हलचल मन में पैदा होती है। भाव-स्वभाव, संगठन.. किसी एक बात का भी संशय आया तो फिर उनकी अन्त ही नहीं होती है फिर हर बात में सवाल, हर बात में संशय, हर बात में कमज़ोरी, हर बात में संस्कारों का टक्कर बढ़ता जाता है। फिर आखिर वह घड़ी आ जायेगी - कहाँ माया से हार खा लेंगे, फिर कहेंगे ठीक है, मेरे को मुश्किल लगता है फिर पुरानी दुनिया याद आयेगी, लौकिक याद आयेगा। तो अब यह पूछना है कि हम नष्टोमोहा हैं? या लौकिक में सम्बन्ध का आकर्षण या सूक्ष्म मोह तो नहीं है? आप मुये मर गयी दुनिया। बाबा ने शुरू में १४ साल की भट्टी में हम सबको यह पाठ ऐसा पक्का कराया जो कभी कोई संकल्प भी नहीं आवे। मैं समझती हूँ-कभी एक संकल्प भी नहीं आया होगा कि ऐसा भोजन बना है, जो मिला सो खाना है। बाबा जो खिलाये सो सही। चाहे दाल भात खिलाये, वाहे सूखा फुलका खिलाये, वाहे घी का हलवा खिलाये। हम हैं योगी लोग। हमारा मतलब योग से है और कोई बात से नहीं है। त्याग की भाषा वहाँ तक है।
जैसे एक गिरधर के पीछे मीरा ने राणा को छोड़ा, महल-माड़ी, सब कुछ छोड़ा। एक कफनी गेरू पहनी बस, गिरधर-गिरधर गाते मस्ती में नाचती थी। चाहे ज़हर का प्याला मिला, चाहे उनके गले में सांप पड़े लेकिन फिर भी उनको कुछ लगा ? तो क्या जब मीरा भक्तिन एक गिरधर के लिए प्राण देने को तैयार थी तो हमें तो 'प्राणों का प्राण बाबा' मिला। यहाँ कोई ज़हर का प्याला तो नहीं पिलाता है, अमृत का प्याला पिलाता है। यह तो भक्ति के अनेक उदाहरण हैं। तो यह जो थोड़ी परीक्षायें आती हैं उसमें अपनी स्थिति में निश्चयबुद्धि, विजयन्ति हो। मरना तो मरना फिर जीना नहीं, ऐसे सोच-समझ कर अपनी जीवन का फैसला करना है। अगर कोई समझता है- मेरे में इतनी शक्ति नहीं है तो वह अपना स्वयं जज करे। ऐसे नहीं फिर पीछे पछताना पड़े।
बाकी यह प्रतिज्ञा पक्की हो कि बाबा हम आपके पक्के योगी बच्चे हैं, पवित्र हैं, पवित्र ही रहेंगे इसी की प्रतिज्ञा सबको दिल से बहुत पक्की करनी है। जो इस प्रतिज्ञा में पक्के रहते हैं उन्हें बाबा की १०० गुणा दुआयें मिलती हैं। हाँ जी करने वाले को कहा जाता है आज्ञाकारी, उन पर माँ-बाप की दुआयें होती हैं क्योंकि आज्ञाकारी माना सपूत। तो सदैव आज्ञाकारी रहो। बाकी जो भी नियम-मर्यादा है, इन मर्यादाओं का जीवन में श्रृंगार करते अपनी उन्नति करते रहो। और नशा रखो हम वही कल्प पहले वाले पाण्डव हैं, गोप हैं। गोप का अर्थ ही है जिससे भगवान से प्यार हो और कोई नहीं हो। गोप और गोपियां। तो कल्प पहले वाले गोप हो, पाण्डव हो। पक्के योगी, तपस्वी, त्यागी-वैरागी हो? यह सब सवाल खुद से पूछो और अपने आपको पक्का करो। सेवाधारी हो, कोई ईर्ष्या तो नहीं, कोई दुनिया याद तो नहीं आती ? बुद्धि कहाँ बाहर तो नहीं जाती या भटकती ? अच्छा।

बाहर की बातों से अन्तर्मुख बनो तब बाबा की आकर्षण में अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति होगी

सेकण्ड में इस देह की स्मृति से परे जा सकते हो क्योंकि हम राजयोगियों का जो अपने इस योग का अनुभव है वह वास्तव में अनुभव है ही कि यहाँ बैठे-बैठे उड़कर जावें। बाबा के वतन में सन्देशियाँ उड़ सकती वह तो ट्रान्स है, हम लोग बुद्धि से अपने फ़रिश्तों की अव्यक्त दुनिया में बाबा से मिलन मनाने उड़ जाएं। इस शरीर से अशरीरी न्यारे बन, उसी फ़रिश्तों की दुनिया में, लाइट की दुनिया में अव्यक्त बाबा के सामने मिलन मनायें, तो इस जैसा अतीन्द्रिय सुख कोई नहीं है। यह दिल के अनुभव का गीत वहीं गा सकते जो इसकी प्रैक्टिस करते और बराबर उस परम-आनन्द का अनुभव करते। कहते हैं- गोपियों को अतीन्द्रिय सुख था, यह प्रैक्टिकल में हम राजयोगियों के सुख का ही गायन है। जितना इस देह से न्यारे बन आत्मा निश्चय कर और फिर बाबा से मिलन मनाओ तो इस मिलन से बाबा सर्व शक्तियाँ भर देता, जिसको ही 'तपस्या' कहा जाता है। यही 'राजयोग' है। इसका निरन्तर अभ्यास चाहिए, भट्ठी चाहिए।
हमने देखा है जिनको इस याद का, योग का अनुभव है, सहज ही दुनिया की सर्व बातों से उनकी बुद्धि हट जाती है और ऐसी प्रैक्टिस करने वालों की दृष्टि में शक्ति रहती है क्योंकि वृत्ति में एक बाबा ही रहता। स्वयं को बाबा के साथ कम्बाइन्ड देखते। जब तक इस योग की अनुभूति गहरी नहीं करेंगे तब तक शक्तियाँ नहीं मिलेंगी। जो भी पॉवर्स हैं वो इस योग साधना से मिलती हैं। इस साधना से माया पर विजयी बन सकते हैं। ज्ञान हमारी पढ़ाई है, जिस पढ़ाई को बुद्धि में धारण करना है। और जितनी ज्ञान की गहरी प्वाईन्टस् बुद्धि में धारण होंगी उतना ही बुद्धि फिर दिल से बाबा की शुक्रिया का गीत गायेगी। और जितना याद की यात्रा करेंगे उतना अपने को वरदानों से भरपूर अनुभव करेंगे क्योंकि यह याद ही हमें वरदाता बाप से वरदान दिलाती, इसी से समीप हो जाते हैं। फिर दिल से गीत निकलता - बाबा आपको पाकर हमने तो जहाँन पा लिया। ऐसी लगन वाले ही सच्चे आशिक बन माशुक की याद में रहते हैं।
मधुबन में आते हो तो यहाँ दो बातें ही हैं एक तो ज्ञान के गहरे धारणा के क्लासेस मिलते या रोज सुबह शाम योग में रहने की प्रैक्टिस करते, यही प्रैक्टिस दिन भर करते रहो तो बहुत मदद मिलती है। हर घण्टे पाँच मिनट भी साइलेन्स की अनुभूति करो तो अनेक बातों पर विजय पाने की शक्ति आयेगी, जो बाबा कहते माया पर विजय पहनो, वह विजय तब होगी जब ज्ञान सहित योग में रहो। फिर माया नहीं आयेगी, बुद्धि यहाँ वहाँ नहीं जायेगी। मुरली ज्ञान में पक्का कराती परन्तु सवेरे का योग अशरीरी बनने में बहुत बड़ा बल देता है। इसलिए योग में सचमुच यह अनुभव हो जैसे हम इस देह से उड़ जायें और लगता वतन में बाबा के पास पहुँच गये हैं।
निराकारी दुनिया तो परमधाम है लेकिन अव्यक्त वतन, सूक्ष्म वतन यह हमारे संगम की विशेषता है। उसका हमें हरेक को अनुभव चाहिए, जहाँ से बाबा हमें मिलने आते हैं। तो इसके लिए जितनी जितनी बुद्धि शुद्ध बनेंगी, बाहर की बातों से अन्तर्मुख होगी, उतना ही बाबा की आकर्षण रहेगी। सचमुच हमें भगवान की आकर्षण हो रही है- यह अनुभव चाहिए। जैसे कई बार बाबा कहते कि बांधेलियों को बाबा से मिलने की आकर्षण होती कि कहाँ छुट्टी मिले तो हम बाबा से, भगवान से मिलने के लिए भागूँ। जैसे दुःख में सिमरण सब करें वैसे बांधेलियों पर बन्धन है तो वह जास्ती याद करती हैं, आप लोग छुटेले हैं तो मस्त रहते हैं। अच्छा है मौज है, मस्त रहते यह भले अच्छा है लेकिन लगन एक अलग चीज़ है। वह ऐसी लगन होती जो रात को नींद भी उड़ जाती और मन कहता बाबा के पास जाके बाबा से रूह-रूहान करते रहें। कैसे बाबा लाइट के वतन में हमें लाइट रूप में ले जाता। खुद भी लाइट रूप बन जाओ तो बाबा लाइट रूप बन आप लोगों से मिलन मनावे। यही है रूहानियत की यात्रा। यह यहाँ से स्पेशल अण्डरलाइन करके जाना है कि हमें ऐसी रूहानी यात्रा की रूचि रख बाबा से मिलन की अनुभूति करनी और करानी है।
यह कईयों में रुचि होती, कईयों में नहीं होती। रुचि है तो सुख होगा, अगर इसकी रूचि कम है तो बाबा के मिलन का सुख अनुभव नहीं होगा। जैसे सेवाओं में रुचि रखते तो सेवा के साथ-साथ मेवा भी खाते रहते। इससे कितनी आत्माओं का कल्याण होता यह अनुभव करते रहते हो। दूसरों को कोर्स कराना माना खुद करना।
सदा बाबा की छत्रछाया के नीचे रहो तो रक्षक बाबा सदा रक्षा करता रहेगा। बाबा कहता - बच्चे, तुम मेरी नज़रों में छिप जाओ। बाबा की मुरली में है- वो मेरे मीठे-मीठे नूरे रत्नों, यह किसने बोला ? नूर माना आँखें। तो हम बाबा के नयनों के नूर हैं। उससे बड़ा भाग्य और क्या चाहिए। है कोई दुनिया में जो कहे कि हम भगवान के नयनों के नूर हैं? हमें भगवान कहता तुम मेरे नयनों के तारे हो। बाबा ने अपनी नज़रों में हमें छिपा दिया है। बाकी तो दुनिया के खेल हैं, चाहे बीमारी है, आना है- जाना है, सर्विस करो उसमें आँधी भी आती, तूफान भी आते - यह वह सब होता परन्तु अपनी स्थिति स्थिर वाहिए।
सबसे पहले अपनी हर प्रकार से स्थिर स्थिति चाहिए। कोई कितना भी मन खराब करे, संग में कभी नहीं आना। इस एज में सबसे बड़ा दुश्मन है- संग। संगदोष बुद्धि को बदल देता है। सबसे प्यार करो, सब फ्रैण्ड्स हैं, पर्सनल फैण्ड किसको नहीं बनाओ। यह एक अण्डरलाइन करो। हमारी प्यारी रूह-रूहान होती है- अपने रूहों को राहत देने की, ज्ञान की रूहरिहान करेंगे, सेवा की रूह-रूहान करेंगे, सर्विस के प्लान करेंगे, आपस में जो भी लेन-देन करेंगे, मीटिंग करेंगे इसीलिए कि उससे कोई भी यज्ञ की कारोबार है, जो भी कुछ है उनका हल करना है। बाकी दिल तो क्या होती है, दिल तो दिलबर को दी, बाकी क्या दिल है! कोई कहते दिल की लेन देन करते, हमारे दिल की बातें कौनसी होती हैं जो लेन-देन करें ? दिल की बातें यही हैं- वाह मेरा बाबा! उनके सिवाए कोई दिल की बातें नहीं हैं! पर्सनल किसी के साथ बैठकर बातें करना यह दोस्ती, नहीं दिल की बातें नहीं हैं लेकिन संगदोष है। एक दूसरे के प्रति मन खराब करना यह ऐसी है, वह वैसा है - यह गलत है।
अगर आपका कोई बात में मन है तो आप भले कहो। आपस में इतना हल्कापन जरूर हो जो एक दो को बात कह सको। अगर मैंने कोई गलती की, तो आप मुझे बड़ी दिल से बोल सकती हो, बहन आज तुमने यह बात गलत की, वह मैं दिल से स्वीकार करती हूँ लेकिन वह दूसरे को मत सुनाओ। उससे मन खराब होता है। जब दो के बीच तीसरा तेरा-मेरा करता तो तीन के बीच टकोरा पड़ता, माना डिसयुनिटी होती है। आपस में चाहे तीन हो या पाँच हो लेकिन रहना चाहिए सभी को मिलकर। रात को सोने से पहले दस मिनट भी आपस में मिलकर, ओमशान्ति करके रूह-रूहान करके फिर सो जाओ। कहने का भाव है कि आप लोग मन से भी खुश रहो, तन से भी खुश रहो। तुम भी खुश रहो तेरे से भी सब खुश रहें। सेन्टर में खुशनसीबी का वातावरण हो। आने वाले समझें, यहाँ हम आये तो कितना खुश होकर गये। किसके भी चेहरे से उदासी, घृणा, नफ़रत यह फील नहीं हो तब तो मज़ा है। फिर भी अगर कोई १९-२० बात हो तो आप लोग अपनी तपस्या से उनको मिटाओ। हमारी रूहानी आकर्षण भी एक तपस्या है जो सबको सकाश देगी। अच्छा।

सर्व ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करने वाले ही 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनते हैं

बाबा ने हमें मुक्ति वर्ष के लिए लास्ट सन्देश में चार गेट बताये हैं। उसमें बाबा ने कहा है कि अपने संस्कारों से, लौकिक-अलौकिक सम्बन्धों से, पुरानी दुनिया से, दुनिया के पदार्थों से मुक्त होना है। बाबा ने हमें सर्व श्रेष्ठताओं से भरपूर किया है। सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न, सन्तुष्ट बनाया है, जितना उसी स्वमान में रहते हैं उतना मन्सा सेवा स्वतः होती है।
हमारी सेल्फ मैनेजमेन्ट माना सर्व ईश्वरीय मर्यादाओं के अन्दर रहना। जो भी बी. के. सर्व मर्यादाओं का पालन करते वही 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनते हैं। और जब स्वयं करते तो हमें देख दूसरे भी करते हैं। तो बाबा ने हमें सर्व श्रेष्ठ मर्यादाओं के इशारे दे रखे हैं जिसको दूसरे शब्द में बाबा कदम-कदम पर 'श्रीमत' कहते हैं। हमारी ईश्वरीय मर्यादाओं में सबसे बड़ी मर्यादा आती है कदम-कदम पर श्रीमत का पालन। हम सभी को एक ही श्रीमत मिली है, न कि भिन्न-भिन्न। दुनिया में जाति-पांति के आधार पर अपनी-अपनी मर्यादायें होती हैं परन्तु हम सबकी मर्यादा एक ही है।
एक बाबा, एक बड़ी माँ और एक ईश्वरीय परिवार, एक की ही याद में रहना। 'एक बाबा दूसरा न कोई' यह है हमारी नम्बरवन मर्यादा, इसी को ही 'योग' कहते हैं। जिसकी गहरी अनुभूति जो जितनी करे उतनी थोड़ी है। इस योग में जितना-जितना सूक्ष्म जाओ उतना शक्तियों का, सुख का अनुभव होता है, उतना ही हमारे चेहरे पर लाइट माइट आती है। इसमें हम सबकी एक ही मत है। और उसके लिए बाबा हमें मन का मौन सिखाते हैं। मुख का मौन तो बाहरमुखता है लेकिन मन का मौन अन्तर्मुखता है। तो मन का मौन जितना स्वयं धारण करते हैं उतना अपने स्थान का वायुमण्डल लाइट और माइट वाला रहता है और उसका ही आने वालों पर प्रभाव पड़ता है और यह सूक्ष्म सकाश ही सेवा करती है।
यदि मन का मौन यानि अन्तर्मुखता नहीं है तो उसका कारण है मन के अन्दर मतभेद। कोई भी कारण वश मेरे-तेरे में आकर जो हमारा आपसी मतभेद रहता है, उसको ही मनमुटाव कहते हैं। वास्तव में यही सेवाओं के लिए वा स्वयं के लिए मुक्ति वर्ष में सबसे बड़ा विघ्न है। इसके लिए हमारा आपस में इतना स्नेह हो जो हमारे आपसी स्नेह को देख दूसरे भी उसी स्नेह में डूब जायें। परन्तु कभी-कभी जो आपस में दो मतें होती तो आने वाला भी देखकर संशय बुद्धि हो जाता है। इसलिए हम सभी पहले खुद सूक्ष्म 'मन का मौन' रखें अर्थात् मन में भी सबके लिए लाइट रहें। अगर मन का संकल्प लाइट है तो यह लाइट दूसरों की बहुत सेवा कर सकती है। बाबा हमेशा लाइट शब्द के दो अर्थ बताते हैं- एक लाइट माना हल्के रहो, एक लाइट माना अपनी योग की लाइट हो। तो डबल लाइट रहो अर्थात् आपस में भी हल्के रहो और जो भी है ऐसा लाइट का वातावरण रहे। यह बाबा की बहुत सूक्ष्म आश है कि हर सेन्टर पर अव्यक्त स्थिति का वायुमण्डल बनें अर्थात् हर सेन्टर जैसेकि अव्यक्त वतन बन जाये। इसमें जैसा मैं करूंगी मुझे देख दूसरे करेंगे। यह जो कभी-कभी क्वेश्चन उठता, संगठन है क्या करें! नहीं।
जितना मैं करूंगी उतना मुझे देख दूसरे करेंगे। आप लोग मधुबन में आते, भले मधुबन में अनेक भाई-बहनें रहते सबकी एक जैसी स्थिति तो नहीं है। लेकिन यहाँ जो बाबा की चरित्र भूमि, कर्तव्य भूमि, शक्ति की भूमि रही है और आज भी मधुबन में ऐसे बहुत अच्छे बाबा के समर्पित बुद्धि वाले बच्चे रहते हैं। उसी का वातावरण पर बहुत प्रभाव पड़ता। आप खुद अनुभव करते कि मधुबन में आने वालों को कितना दिल के अन्दर छाप लग जाती है क्योंकि वह ऐसी सेवाओं को देखते हैं, सभी बड़े प्यार से और निःस्वार्थ सेवा करते हैं। कोई कैसा भी आया प्यार से सेवा करते, यह उन्हों के दिलों में छाप हो जाती है। ऐसे अनेक अनुभव बताते। तो ऐसा वायुमण्डल हर स्थान का हो। हम सब ज्ञानी तू आत्मायें हैं, सभी त्यागी हैं, समर्पित बुद्धि हैं। राजयोगी हैं, सभी एक दो के साथी सहयोगी होकर रहते हैं। सबके साथ मिलकर सेवायें करते हैं। तो हर स्थान का वातावरण भी ऐसा मनभावन होना चाहिए।
तो मुक्ति वर्ष में जब बाबा कहते हैं कि पुरानी दुनिया के वैभव, वस्तु की आकर्षण न हो। पुराने संस्कारों का जो प्रभाव है वह भी खत्म हो जाए। तो सबसे पहले हमारी एक शुभ आशा है कि हम ब्राह्मणों का आपस में अति स्नेह हो। यह जो कई बार चाहे दो रहते हैं या दस रहते हैं यदि आपस में दो का प्यार होता, दो का नहीं तो यह थोड़ा मतभेद पैदा करता और उसी से फालतू के व्यर्थ संकल्प एक दूसरे के प्रति चलते या वर्णन भी होते या तो महिमा करते या फिर बदनाम भी करते। इसलिए इस संगठन से यह मन्त्र ले जाओ कि हमें आपस में अति स्नेह के साथ अलौकिकता के रूप में रहना है। जिसको बाबा ने कहा 'लाइट' रहो। ऐसी अलौकिकता अपने में भरकर जाओ।
तो हमारी मैनेजमेन्ट पहले चलती है संकल्पों से, हमारे शुभ संकल्प सदा रहें इसकी कण्ट्रोलिग सीखो ताकि सूक्ष्म व्यर्थ समाप्त हो जाये और उसी ही अलौकिकता हमारी आपस में दृष्टि और वृत्ति रहे जिससे शुभ भावनाओं की सकाश मिलती रहे। ऐसी शुभ सकाश एक-दो में दो भी, लो भी। तो इस मुक्ति वर्ष में संस्कारों से मुक्त हो, सम्पन्न बनने का चार्ट बनाओ। और वह चार्ट ऐसा नोट करो जो बाबा को १८ जनवरी पर सम्पन्न स्थिति की रिज़ल्ट हर एक दो। योग का बल सेवाओं को सफल करने में मदद करता है। तो चारों तरफ़ योगबल के साइलेन्स की शक्ति के वायब्रेशन फैलाओ जो अनेकों के अनेक उल्टे-सुल्टे फालतू के विघ्न होते, समाज के, पब्लिक के, गाँव के या शहरों में जो उल्टे वायब्रेशन हैं, वह सब इस सूक्ष्म योगबल से समाप्त हो जाएं। योगबल से ही हमारी विजय है। जैसे दिनोंदिन हम देखते हैं कि सर्विस में कितनी सहज सफलता है, प्रगति है या कितनी वृद्धि हो रही है, यह आप सब भी अनुभव करते हैं। तो इस मुक्ति वर्ष में मुक्त स्थिति का अनुभव करो। आपस में इतना मिलकर रहो जो सभी कहें कि दो शरीर हैं परन्तु आत्मा एक है।
बाबा का यह शब्द पक्का हो कि 'एवररेडी' बनना है। हमारे कारण कभी बाबा की बदनामी हो तो यह सहन नहीं होता। इसलिए हमें इतना ऊँचा बाबा मिला है तो ऊँचे बाबा के साथ स्थिति भी इतनी ऊँची बनाओ, जिसके लिए बाबा ने दो बातें कही हैं १- बेहद के वैरागी बनो। २- बेहद के त्यागी बनो। तो बाबा की आज्ञाओं को प्रैक्टिकल रूप भी तो देना है। तो याद करके जाओ एवररेडी बनना है, बेहद के वैरागी बनना है, बेहद के त्यागी बनना है और मुक्ति वर्ष है, सबमें मुक्त होना है और सन्तुष्टता की खान बनकर रहना है।
संगठन में रहते मतभेद न हो इसके लिए पहले एक दो के विचारों को सम्मान देकर सुनना चाहिए। तो दिल में चाहिए 'सम्मान'। सम्मान देकर निर्णय करेंगे तो उस निर्णय को दोनों मानेंगे। फिर भी वन टू होता है तो यह नालेज हमें सिखाती है- बड़ों का रिस्पेक्ट करो, छोटों को प्यार करो। अगर दो छोटे बड़े भी होंगे तो छोटों को प्यार से कहेंगे, बड़े को सम्मान से कहेंगे तो भी मान लेंगे अगर दोनों को सम्मान से बोलेंगे तो भी वह मान जायेंगे। अच्छा - ओमशान्ति ।

विजय माला में आना है तो अपना पेपर आपेही लो और अपनी सूक्ष्म चेकिंग कर परिवर्तन करो

हर एक अपने आपसे पूछो कि हम कौन हैं? हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं।हम राजयोगी हैं। हम विश्व सेवाधारी, वर्ल्ड सर्वेन्ट हैं। हम सो ब्राह्मण सो पूज्य देवता हैं। हम फ़ालो फ़ादर करने वाले हैं। हम बेहद के त्यागी, संन्यासी है। हम राजऋषि, तपस्वी हैं। तो हमारी ड्युटी क्या है अथवा हमारी ज़िम्मेवारी क्या है? स्व-परिवर्तन से विश्व परिवर्तन करना। इस समय बाबा का हमारे लिए क्या इशारा है? और हमारे पढ़ाई का अन्तिम पेपर क्या है? विद् ऑनर्स पास होना और कर्मातीत बनना। हमारे पेपर की रिज़ल्ट है विजय माला के 'विजयी रत्न' बनना। फिर भी आता है हम कौन हैं? हम है परमपिता परमात्मा की डायरेक्ट सन्तान। हमारा परिवार क्या है? भाई-भाई या बहन-भाई यह सारा हमारा ईश्वरीय परिवार है। तो इस तरह से हमारे पढ़ाई की क्या-क्या सब्जेक्ट्स हैं उन सब सब्जेक्ट्स को चेक करो कि हमारे बुद्धि में ज्ञान की सब प्वाइन्ट्स बराबर धारण हैं? जो कोई भी टाइम कोई भी बात का हम ज्ञान-युक्त जवाब दे सकें। अगर हम ज्ञानी तू आत्मा है तो जवाब दे सकेंगे।
हमारे योग की स्टेज क्या है?
हमारे पास सब शक्तियों की रिजल्ट क्या है?
हमारे में वैल्यूज़ कितनी हैं? और बाकी हमारे में कमजोरी किस चीज़ की है?
हम नष्टोमोहा कहाँ तक बने हैं?
हम मायाजीत, जगतजीत विजयी रत्न कहाँ तक बने हैं?
हमारा ड्रामा पर और खुद पर फेथ कहाँ तक है? ऐसे अनेक सवाल हम अपने आपसे पूछ सकते हैं और उसी से अपना चार्ट चेक कर सकते हैं। जैसे पेपर होता है वैसे हरेक बात का खुद ही खुद से क्वेश्चन निकाल उनका जवाब लिखो। तो अपने चार्ट का खुद ही जवाब आयेगा।
फिर देखो कि हम आलराउण्ड नम्बरवन हैं या नम्बर टू हैं? अगर अभी हमारा पेपर हो तो हम कहाँ तक उन सबमें पास हो सकते हैं। समझो निर्भयता का पेपर आता है तो हम निर्भय हैं या डरपोक हैं? ऐसा ही फिर कोई देह-अभिमान का पेपर आता है तो हम देही अभिमानी रह सकते हैं या नहीं? क्योंकि देह-अभिमान हमें नीचे ले आयेगा। तो ऐसा कोई समय आता जो सत्यता का जवाब देना पडता है परन्तु डर के कारण सत्य नहीं बोल सकते हैं, झूठ बोल देते हैं। तो कारण है डरना या कारण हुआ देह-अभिमान। बाबा ने कहा है- अब मुक्ति वर्ष मनाओ तो मुक्ति के लिए हमें इन सभी पेपर्स में पास होना है तब मुक्ति मिलेगी। तो यह है खुद ही खुद से मेहनत करना, चेक करना और विजयी बनना।
प्युरिटी की सबजेक्ट में मन्सा अर्थात् दृष्टि, वृत्ति और फिर वाचा, सम्पर्क-सम्बन्ध, संकल्प-विकल्प यह सब कहाँ तक यथार्थ हैं? इसमें पहले अपने आपको मार्क्स दो। वाचा और कर्मणा इन सबमें हम कहाँ तक फुल मार्क्स ले सकते हैं? और स्वयं ही साक्षी हो देखो कि हम कहाँ तक उसमें विजयी हैं? ऐसे अनेक प्वाइन्ट्स है।
जैसे ड्रामा पर हम सदा ही अडोल रहते हैं? जो होता सो अच्छा, जो होगा सो अच्छा, जो हो रहा है सो अच्छा... जिससे हमारी स्थिति हर परिस्थिति में अडोल रहती है? दूसरों को भी देखते तो लगता इसका भी ड्रामा में यह पार्ट है, खेल है। उन सब खेलों को देख खिलाडी बन हम साक्षी स्थिति में कहाँ तक रहते हैं? या मुझे नफ़रत, घृणा होती है या रहम, दया की भावना रहती है? कहते तो हैं शुभ भावना, सद्भावना तो ऐसी भावना है? जिसको दूसरे शब्दों में कहते हैं शुभ दुआयें हैं? शुभ भावना माना ही शुभ दुआयें। ऐसी कई प्वाइन्ट्स अपने आप में मनन करो और अपने आपको चेक करके अपना पेपर तैयार करो। फिर चेक करो कि विजयी माला की क्या विशेषतायें हैं और उन विशेषताओं को हमने कहाँ तक जीवन में लाया है?
क्योंकि हमें बाबा ने कहा है आप सब टीचर्स हो। टीचर्स बनना माना वरदानी बनना। एक है वरदानी बनना, एक है वरदानों से भरपूर होना। बाबा ने वरदान दिया कि तुम टीचर बनो, तुम सेवा पर रहो यह बाबा ने हमें अपनी ऊंची कमाई के लिए टाइम दिया है। तो इसका पूरा लाभ लो।
हमारी अवस्था अच्छी है तो दूसरे को तीर सहज लग सकता है। हमारी अवस्था का दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। जैसे दूध कितना स्वच्छ होता, उसमें जरा सा भी दही या निंबू का एक बूंद भी अगर डालो तो दूध फट जायेगा। तो वास्तव में हम आत्मायें भी इतनी ही स्वच्छ हैं उसमें थोड़ा भी कोई दोष होता तो उसका असर अच्छी स्थिति पर फौरन पड़ता है। इसलिए हम बहुत-बहुत स्वच्छ आत्मा हैं। हम दूध से भी प्युअर हैं। हमें किसी के संग के दोष में आना तो दूसरी बात है परन्तु संग का रंग टच भी नहीं हो। इसकी सबको बहुत सम्भाल रखनी है। बहुत करके अवस्थाओं पर अगर असर पड़ता है तो हमने देखा है मैजारिटी संगदोष के कारण। नाम ही है संग फिर दोष। एक संग ऊँचा भी बनाता और एक संग नीचे गिरा देता है। इसलिए संग की बहुत खबरदारी रखो क्योंकि उसका असर मन-बुद्धि पर बहुत पड़ता है। अच्छा।

सन्तुष्ट रहो और सन्तुष्टता का दान करो तो बाबा से वरदान मिलेगा

बाबा कहते आप बच्चे 'सन्तुष्टता की खान' हो क्योंकि बाबा ने हमें सर्व प्राप्तियाँ करा दी हैं ऐसी कोई प्राप्ति नहीं जो हम बाबा से कुछ मांगे।! अप्राप्त नहीं कोई वस्तु। तो फिर हम सन्तुष्टता की खान नहीं रहेंगे तो क्या रहेंगे ? हर एक समझे कि मुझे व्यक्तिगत यह वरदान बाबा से मिला है।
तो मैं हूँ सन्तुष्टता की खान और खान से जितना भी कोई माल निकाले, वह दूसरों को भी दे तो वह भी सन्तुष्टता की खान से माल भरकर सन्तुष्ट हो जाए। इतना हम सन्तुष्ट रहें और अपनी सन्तुष्टता से हम दूसरों को भी सन्तुष्ट रखें। लक्ष्य रखो कि मुझे हर एक को १०० परसेन्ट सन्तुष्ट करना ही है। निगेटिव कभी नहीं सोचो। जब मन में कोई बात निगेटिव आती है तो आगे वाले को सन्तुष्ट नहीं कर सकते। फिर वह नाराज होगा। जब कोई नाराज़ होता तो आपस में मतभेद होता। फिर आपस में शुभ भावना नहीं रहती। आज तुमने किसी को सन्तुष्ट नहीं किया तो कल वह भी नहीं करेगा। यह नेचुरल एक रिटर्न हो जाता है। फिर उससे मन भारी हो जाता फिर किसको सुनाऊँ, क्या करूँ, जैसेकि कोई को हल नहीं मिलता और परेशान होते, परेशान होने से फिर माया के दूसरे दूसरे संकल्प विकल्प चलते और जब दूसरे संकल्प विकल्प चलते तो कोई ना कोई संग लग जाता। और कुछ नहीं होगा तो लौकिक याद आयेगा। फिर पुरानी दुनिया याद आयेगी।
इसलिए हर एक लक्ष्य रखे कि 'मुझे सन्तुष्ट रहना है और सबको सन्तुष्ट करना है।' इसके लिए चाहिए त्याग। मुझे दूसरों को सन्तुष्ट करना है यह करो दान। जो दूसरों को करेगा दान, उनको बाबा देगा वरदान। और वह वरदान फिर बन जाता है सन्तुष्टता की खान। तो दूसरों को सन्तुष्ट करने के लिए स्वयं को अपना त्याग करना पड़ता है। बाबा ने जो कहा है बेहद के वैरागी बनो, तो त्याग करने में ही वैराग्य है। कुछ भी छोटी मोटी बातें होती हैं, उनका भी त्याग करो। नहीं तो आपस में जो स्नेह-सहयोग चाहिए वह सब टूटता जाता है, तो सन्तुष्टता भी टूटती है क्योंकि मन मैला तो स्नेह भी टूटा फिर सहयोग भी नहीं मिला, तो काम भी नहीं हुआ। तो सन्तुष्टता टूट गयी लेकिन अगर हमारा लक्ष्य सन्तुष्ट करने का हो, हमें हर हालत में सबको सन्तुष्ट करना ही है। दूसरे की सन्तुष्टी में ही मैं सन्तुष्ट हूँ। यह लक्ष्य हो तो फिर आप देखो स्थिति आपकी कितनी ऊँची बन जाती है। जिसको कहते हैं कि अनासक्त होने से निरसंकल्प होते हैं।
ज्ञान कहता है पहले मर्जी शब्द का त्याग करो। कई कहते हैं मेरी मर्जी नहीं है, यह शब्द ही रांग है। दूसरों को सन्तुष्ट करने में ही मैं सन्तुष्ट हूँ। मुझे हर हालत में सन्तुष्ट रहना है। बीमारी आदि में भी न किसी से तंग होना है, न किसी से नफ़रत करना है। सन्तुष्ट रहना है और सन्तुष्ट करना है। अच्छा।

'मैं-पन' के अभिमान को समाप्त कर, बेहद के त्यागी और वैरागी बनना यही है मुक्ति वर्ष मनाना

बाबा हमेशा कहते हैं कि पाण्डव मेरी हमजिन्स हैं। बाबा को पाण्डव-पिता अथवा पाण्डव-पति कहते हैं। पाण्डव सदैव बाबा के साथ रहे हैं तो आप पाण्डवों को यह विशेष नशा है कि हम वह पाण्डव हैं जिन्हों की डायरेक्ट भगवान से प्रीत है। कहा भी जाता है पाण्डव अर्थात् प्रीत बुद्धि। कौरव अर्थात् विपरीत बुद्धि। पाण्डवों को ही इशारा दिया कि हे पाण्डव, तुम उठो धर्म की रक्षा करो; कौरवों को मारो। तो जब यह उदाहरण सामने आता है तो सबसे पहले याद आता कि पाण्डव अर्थात् प्रीत बुद्धि विजयन्ती, जो अनुभव करते कि हमारा साथी स्वयं भगवान है अथवा भगवान ही मेरा सारथी है। मुझ आत्मा को चलाने वाला, सम्भालने वाला, इशारा देने वाला बाबा है।
तो अगर हमारे रथ का सारथी बाबा हुआ तो हम हो गये बेफिकर। सारथी जहाँ रथ को चलाये, जैसे चलाये ले जाये, खड़ा करे, इशारा करे उसी प्रमाण चलना है। दूसरा मैं हमेशा समझती हूँ कि पाण्डव माना 'हे अर्जुन'। आप हरेक हे अर्जुन हो। शिरोमणी गीता मशहूर ही है हे अर्जुन से। हे अर्जुन अर्थात् जिसको यह श्रीमत मिली। अर्जुन को जब साक्षात्कार हुआ तब निश्चय हुआ और बोला- हे भगवन ! जो आज्ञा। और आज्ञा पर चलते वह सदा आगे बढ़ते विजयी हुआ। तो आप पाण्डव हरेक वास्तव में हे अर्जुन हो। और अर्जुन की बुद्धि में एक भगवान है।
दूसरी स्टोरी यह बताते हैं कि दुर्योधन और अर्जुन जब दोनों भगवान के सामने आये तो दुर्योधन ने भगवान से उनकी पूरी सेना मांगी, माया मांगी और अर्जुन ने कहा- 'मुझे सिर्फ आप चाहिए।' आप मिले सब कुछ मिला। फिर बताते हैं कि दुर्योधन ने कहा कि पहले तो मैं आया था लेकिन आपने अर्जुन से पहले क्यों पूछा। तो इशारा मिला कि तुझे अभिमान है, जो सिर के पास खड़े हो और अर्जुन में नम्रता है जो चरणों के पास खड़ा है। तो एक अभिमान के कारण सब कुछ प्राप्त होते भी उसकी हार हुई। और नम्रता के कारण अर्जुन की जीत हुई यह है महाभारत का दो शब्दों में वास्तविक सार। तो पहले निश्चय हो कि बाबा मेरा साथी है और बाबा ही मेरा सारथी है और उनकी श्रीमत पर कदम-कदम चलने में ही मेरा कल्याण है। विजय है। चाहे दुनिया खत्म हो जाये, अर्जुन के देखते-देखते सब मारे गये लेकिन अर्जुन सदा अडोल रहा। दुर्योधन ने अपना अभिमान बहुत दिखाया, लेकिन उनकी सारी अक्षौहिणी सेना खत्म हो गयी। अर्जुन को था निश्चय इसी पर अडोल रहा तो उसकी जीत हुई। और दुर्योधन की माया के कारण, देह-अभिमान के कारण हार हुई।
तो जिसकी बुद्धि में माया आयी और वैर आया तो समझो कि एक ना एक दिन सर्वंश नाश हो ही जाता है जैसे कि दुर्योधन का हुआ। कहने का मतलब कि बाबा हमें कहते कि हे अर्जुन तुम सदा प्रीत बुद्धि रहकर श्रीमत पर चलो और अपनी स्थिति को ऐसा अचल-अडोल बनाओ जो कभी तुम्हें माया हिला नहीं सके। अभी यह वक्त है ही अपने देह-अभिमान को तोड़ने का। इस देह-अभिमान के नशे के कारण ही आपस में विरोध होता। इसलिए बाबा कहते कि कभी भी अपना नशा नहीं दिखाओ। नशा विरोध पैदा करता, एकता को तोड़ देता और अपनी स्थिति को नीचे गिराता है क्योंकि उल्टे नशे वालों की बुद्धि में रहता कि "मैं"। अब इस मुक्ति वर्ष में इस 'मैं' अर्थात् अहम् का त्याग करो। यही बहुत बड़ा त्याग है।
हम शुरू से देखते आये हैं कि जब भी किसी को माया आयी है तो वह है-'अहम् का अहंकार'। अहम् में सब आ जाता है। चाहे अपने बुद्धि का, अक्ल का, अपनी होशियारी का या कोई भी कार्य का, धन का नशा है, सर्विस का या जॉब का नशा है, प्राप्तियों का नशा है, लौकिक पढ़ाई का नशा है- यह सब नशे बड़े नुकसान-कारक हैं। तो यह जो देह-अभिमान के अनेक गुप्त नशे हैं, यह सब बाहर से दिखाई नहीं पड़ते हैं। इसीलिए कई बार आता है गोपी बनना अच्छा है क्योंकि गोपी बनने में नशा नहीं आता है और जब अपने को गोप समझते तो नशा चढ़ता है- इसकी भी गुह्य फिलासॉफी है। जैसे उधव माना नशा। गोपी माना बाबा के लव में लीन, बाबा के लव में प्रीत बुद्धि। तो आप कभी उधव नहीं बनना प्लीज। उद्धव बनेंगे तो ज़रूर कुछ नशा चढ़ेगा। हम सभी गोपियाँ हैं, भले आप लोगों को पाण्डव कहें परन्तु प्रैक्टिकल में हम सभी गोपियाँ है, चाहे भाई हो चाहे बहनें हो। गोपी बनने में बहुत आनन्द है, उद्धव बनेंगे तो आनन्द नहीं ले पायेंगे। हमें बाबा के सामने न उधव बनना है, न नशा दिखाना है।
दूसरा कहा जाता है- बड़े सो बड़े छोटे शुभान अल्ला। बड़ों को तो फिर भी फ़िकरात होगी, छोटे बेफ़िकर होते हैं। हमें कभी किसी के प्रभाव में नहीं आना है। सबसे सूक्ष्म माया है- प्रभाव। प्यारे भले रहो परन्तु उतना ही न्यारे रहो। पहले न्यारा रहकर फिर प्यारे रहो। प्यारे हो करके न्यारे नहीं बनो, नहीं तो माया के प्यारे बन जाते, क्योंकि उस प्यार में न्यारेपन की शक्ति नहीं होती है। इसलिए पहले न्यारा बनो फिर प्यारे बनो तब बैलेन्स बराबर रहेगा।
इस मुक्ति वर्ष के लिए बाबा ने दो लैसन दिये हैं एक बेहद के त्यागी बनो, दूसरा - बेहद के वैरागी बनो। बेहद के त्याग में सभी सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों का त्याग हो जाता है। त्याग माना त्याग, त्याग में प्रभावित होने की बात नहीं आती है। अगर आती है तो वह भी माया है। बाबा को जिसका जितना भाग्य बनाना है उतना बनायेगा तो हम क्यों किसी के पीछे प्रभावित हों?
और हम चाहे व्यक्ति पर, चाहे वैभव पर प्रभावित क्यों हों? कई फिर सेवा करके अपने को ही "वाह रे मैं" समझते हैं अर्थात् मिया मिट्ठू बनते हैं। मिया मिट्ठू माना - अपने को बहुत होशियार समझना। परन्तु बाबा ने हमें सिखाया है कि तुम कभी किसी बात में भी प्रभावित न हो। कैसी भी आकर्षण करने वाली बात तुम्हारे सामने आवे, अरे जिस पर दुनिया प्रभावित हो वह हमारे ऊपर कुर्बान है, हम क्यों किसी के ऊपर कुर्बान जायें। जिसको दुनिया पुकारे वह हमारे ऊपर कुर्बान है, इससे बड़ा भाग्य और क्या चाहिए! तो इसके लिए हमें किसी के गुणों पर प्रभावित नहीं होना है। गुणवान है, गुण लो अच्छी बात है क्योंकि हमें सबसे अच्छे गुण लेना है। कोई की बुद्धि अच्छी है, उसकी बुद्धि का उपयोग करो। कोई का व्यवहार अच्छा है, उनसे कुशल व्यवहार की कला सीखो। किसमें लिखने का आर्ट अच्छा है, उससे वह आर्ट अपनाओ। सीखना हमारा फ़र्ज होता है परन्तु उसी पर प्रभावित होना, यह श्रीमत नहीं है यह है माया।
अच्छे का गुण भले गाओ, कोई गुण सीखना है वह भी सीखो, गुण-चोर तो भले बनो परन्तु किसी के गुणों के ऊपर न्यौछावर नहीं हो जाओ। यह है ज्ञान की गहराई। इसीलिए हम आप सबको कहते ना कभी नशा रखो, ना कभी अपना अभिमान रखो, ना कभी किसी पर प्रभावित हो, ना कभी किसी की आकर्षण में आओ। एक बाबा से सच्चे दिल की प्रीत हो, यहीं याद की यात्रा है। अगर किसी के भी नाम रूप से प्रीत हुई तो बाबा की याद में विघ्न जरूर पड़ेगा।
कई कहते हैं सूक्ष्म में माया आती है, संकल्प विकल्प आते हैं लेकिन माया तब आती है जब बाबा से प्रीत थोड़ी भी दूर जाती। ज़रा भी बाबा से प्रीत बुद्धि की कमी हो गयी तो माया जरूर आयेगी। जब हमारा नया जन्म, नया बाप, नई माता, नई पढ़ाई, नया आक्यूपेशन सब नया, नया है फिर हम यह क्यों कहते हैं कि पुराना संस्कार है। क्यों, पुराने को मारा नहीं है क्या? पुराना माना साँप, साँप को जिन्दा रखेंगे तो फूँक तो मारेगा ही। हमें पुराना क्यों सोचना चाहिए, क्या करें यह मेरा पुराना स्वभाव है ना। हमने कभी ब्रह्या बाबा के मुख से यह शब्द नहीं सुना जो बाबा कहे मेरा पुराना संस्कार है। हमने कभी नहीं सुना व देखा कि बाबा में कोई पुराना संस्कार हो। रात-दिन बाबा के संग रहे, पुराना स्वभाव-संस्कार-संकल्प क्या होता यह कभी हमने नहीं देखा। इसीलिए आज पहले हम सब इस बात का संकल्प करें कि - पुराना संस्कार मर गया। हमारा संस्कार नये ब्राह्मण जन्म का है।
सवेरे उठते हैं तो उठते ही बाबा सामने आता है या पुराना संस्कार सामने आता है? पिछले जन्म को मार कर उसका श्वाँस भी निकाल दो। पुराना संस्कार कहते हो माना अभी तक श्वाँस रखकर पालना करते हो, साँप को दूध देते हो कि हे सांप तू दूध पी और फूंक मार। क्यों कहें पुराना संस्कार है? जन्म नया, परिवार नया, पढ़ाई नई, हमें जाना नई दुनिया में है, सेवा हमारी नई, फिर हम पुराना-पुराना क्यों पालकर बैठे हैं? इसलिए इस भट्ठी में पुराने संस्कार को मारकर जाओ तब मुक्ति वर्ष का आप सच्चा अनुभव कर सकेंगे। नहीं तो मुक्ति वर्ष में भी मुक्ति की शक्ति नहीं आयेगी। मुक्ति की शक्ति तब आयेगी जब पुराना मारकर जायेंगे।
कई पूछते हैं कि हम क्या पुरुषार्थ करें, हम कहती कि १. बाबा ने जो निराकारी, निविकारी, निरहंकारी का मन्त्र दिया है, वह सदा याद रहे। उसका ही पुरुषार्थ करो। २. जीवन में त्याग-तपस्या-सेवा यह है हमारा पुरूषार्थ। ३. हमें बाबा समान कर्मातीत, साक्षात्कारमूर्त बनना है। उसमें सब कुछ आ जाता। बुद्धि दिव्य हो जाती है। कई कहते हैं हम क्या करें हमारी तो पुरुषार्थी लाइफ है, वातावरण ऐसा है.. गलतियाँ हो जाती हैं, पुरुषार्थी हूँ। यह पुरुषार्थी हूँ, पुरूषार्थी हूँ.. कहकर उसकी भी पालना करते हैं। अब तक भी हम यही शब्द कहते रहेंगे तो यह भी जैसे उनकी पालना करते हैं। क्यों नहीं कहते कि हमारे एक्जाम के दिन हैं, पढ़ाई पूरी हुई। कोई नया लेसन मिल रहा है क्या? बाबा की मुरली नित्य नई है वह अलग बात है परन्तु महावाक्य तो पुराने ही हैं ना। पढ़ाई तो हमारी पुरातन से पुरातन चली आ रही है, आदि में मन्मनाभव, अन्त में भी मन्मनाभव। नया जन्म मिला, वर्सा बाबा ने दे दिया, अधिकारी बना दिया, बाकी क्या चाहिए! सिर्फ अशरीरी बनने की मेहनत करनी है। यह योग की गहरी अनुभूति जितनी हम करें उतनी थोड़ी है, कम है। ज्ञान सागर बाबा ने हमें जो गुणों का खज़ाना दिया है, बुद्धि में वह भरतू रखें, वह कमाई हमारे जमा के खाते में जमा होती है।
कई चलते-चलते थक जाते हैं लेकिन हमारा बाबा कभी थकता है? तो हम भी बाबा जैसे अथक क्यों नहीं बनते हैं। इसके लिए टाइम पर सोओ, टाइम पर उठो तो थकावट की बात ही नहीं। लेकिन थकावट तब होती है जब दिलशिकस्त होते हो, अलबेले होते हो। तो न हमें अलबेला होना है, न सुस्त होना है। सदा चुस्त रहने के लिए उमंग और हुल्लास के दो पंख सदा रखो। तीसरा अपनी मौज मस्ती में रहो। कभी कोई उल्टा कुछ कहता भी है तो एक कान से सुनो, दूसरे से निकाल दो। लेकिन दादी कहती एक कान से सुनकर दूसरे से नहीं निकालो, नहीं तो वह अन्दर घूमकर फिर बाहर निकलेगा। इसलिए अच्छा यही है, कि यहाँ से ही सुनो, यहाँ से ही निकाल दो। जैसे इस कान में पानी पड़ा है तो यहाँ से ही निकालेंगे ना, ऐसे ही यहाँ से ही सुनो, यहाँ से ही निकाल दो। यहाँ की बात फालतू यहाँ तक भी क्यों घुमायें। उसे निकालने के लिए क्यों टाइम वेस्ट करें, यह भी रांग है।
कहने का मतलब है, कि ऐसी कोई घड़ी न आवे जो हैरानी महसूस हो। मैं आज हैरान हूँ, परेशान हूँ अब इस भाषा को समाप्त कर दो। न ऐसी कोई बात सुनो, न हैरान हो। किसी की फालतू बातें न सुनो, न उसका चिंतन करो। हों, किसी का मन भरा हुआ है तो जिसकी ड्यूटी है उसके पास जाकर सुनाके मन को हल्का करो।
लेकिन ऐसे नहीं, आपने दिल हल्की की और मैंने वह बात सुनकर दिल भारी कर ली। नॉट एलाऊड। इसलिए हमें न भारी होना है, न किसी को भारी करना है। न कभी मन को भारी रखना है। बात आई सेकण्ड में समाप्त हुई। इसी को कहा है ड्रामा की बिन्दी लगाना सीखो इसकी विधि है ड्रामा, बिन्दु। बातें आयेंगी परन्तु आयी, गयी। इसीलिए हमें मुक्ति वर्ष में इन सभी बातों से मुक्त होना है। अच्छा।

कर्मों की गहन गति को जान श्रेष्ठ कर्म करो, कदम-कदम श्रीमत की मर्यादाओं पर चलो

प्यारा बाबा रोज़ हमें भिन्न-भिन्न मधुर महावाक्यों से इशारा करता है रहता और निरन्तर याद में रहो यह रोज़ की मुरली का मन्त्र है और भी भिन्न-भिन्न प्वॉइन्ट्स से बाबा हमें शिक्षायें देता। जैसेकि बाबा कहते तुम बच्चे एक ब्रह्मा बाप के कदम के पीछे कदम रखते हुए चलो। तो यह बातें सुनते, सूक्ष्म अन्दर जाकर सभी अपने आपको चेक करो कि मैं कितना बाप के ऊपर बलिहार हूँ?
बाबा ने हमें मुझ से गुह्य ज्ञान देकर, गुह्य ते गुह्य राज़ सुनाये हैं। कर्मों की गति अति गहन है। हमारे कर्मों को देख दूसरे भी हमारे कर्मों से प्रभावित होते हैं क्योंकि बाबा ने हमें कहनी नहीं सिखलाई, करनी सिखलाई है। तो अमृतवेले से लेकर रात तक यह अटेन्शन रहता है कि हमारा कर्म कितना श्रेष्ठ है? एक कर्म है जो हम प्यारे बाबा की याद से विकर्म विनाश करते हैं अथवा अकर्मी बनते हैं। दूसरा कर्म है, जिससे कर्म की लेन-देन हो सकती है। एक कर्म-'अकर्म' बनता, दूसरा कर्म 'सुकर्म' बनता, तीसरा कर्म 'विकर्म' बनता।
हम सभी दुनिया के लिए लाइट हाउस हैं अथवा सर्चलाइट देने के निमित्त हैं। सर्चलाइट के बीच अगर कोई डिफेक्ट हो जाये तो सामने आने वाला जो शिप है, उसे सही रास्ता नहीं मिलेगा। हमारी मन्सा के सूक्ष्म संकल्प ऐसे हैं जो चारों तरफ़ हमारे वायब्रेशन फैलें और दूसरों को प्रेरणा मिले। आकर्षण हो, साक्षात्कार हो। हम सभी ऐसे एक्ज़ाम्पल रहें, खुद को ऐसा समझें कि मैं जो कर्म करूँगा मुझे देख हरेक करेगा। तो इसके लिए हरेक जवाबदार है। जैसा मैं कर्म करूँगा मुझे देख सब करेंगे - यह सूक्ष्म की जवाबदारी हम सबके ऊपर है। हम जिस तरह भी अपनी स्थितियाँ रखेंगे ऐसी स्थिति का वायब्रेशन फैलेगा।
हम सबके हर संकल्प, हर कर्म में, हर वक्त बेहद ईश्वरीय परिवार की ज़िम्मेदारी है, सूक्ष्म वायब्रेशन से शक्ति देने की। तो हमारे कर्मों की गति बड़ी गहन है। प्यारे बाबा ने जो हमें श्रीमत दी है उसी श्रीमत पर हमें कदम-बाय-कदम चलना --है। श्रीमत में बाबा ने कहा है कि तुम्हें श्रीमत है मर्यादा पुरुषोत्तम रहो। जितना हम मर्यादा पुरुषोत्तम बनेंगे उतना हमें देख दूसरे भी मर्यादा में रहेंगे। इसलिए जैसे हमें मर्यादा में श्रीमत मिलती कि अमृतवेले उठकर बाबा की याद में रहना है, यह हम हरेक की ज़िम्मेदारी है। दूसरा हमारी मर्यादा में ज्ञान सागर बाबा जो ज्ञान रत्नों की मुरली नित्य सुनाता है, उसे सुनना है, मनन करना है, यह हमारी मूल ज़िम्मेदारी है। अगर इस श्रीमत का पालन किसी भी कारण से नहीं करते तो यह भी अलबेलापन है, इसमें सूक्ष्म अपनी सुस्ती है। हम ऐसा मानती कि बाबा की श्रीमत पर चलने वाले के ऊपर आशीर्वाद है, दुआयें हैं, वरदान है। परन्तु अगर हम कदम-कदम श्रीमत पर नहीं चलते तो भगवान की दुआयें और वरदानों से मिस होते, दूसरा श्रीमत की अवज्ञा बहुत बड़ा सूक्ष्म पाप का भागी बनाती हैं। यह भी बोझ हो जाता है, जो बोझ अवस्थाओं को ऊँचा चढ़ने में विघ्न बनता है।
तीसरा - श्रीमत है बच्चे मन-वचन-कर्म से सेवा करो। अगर हम मन-वचन-कर्मसे सेवा नहीं करते हैं तो यह भी एक इन्डायरेक्ट सेवा लेते हैं और उसका भी बहुत बोझ चढ़ता है। जैसे कहा जाता है आये हैं हम पुण्य कमाने लेकिन पुण्य कमाने के पीछे पुण्य की गंवाई हो जाती है। और फिर उसमें अपनी श्रीमत को धारणा नहीं रहती तो पुण्य के बदले पाप हो जाता है। फिर सूक्ष्म विकर्म विनाश नहीं होते तो मायाजीत भी नहीं बन सकते।
जैसे बाबा कहते तुम बच्चे किसी को दुःख न दो लेकिन यह मर्यादाओं का उल्लंघन करना भी सूक्ष्म दुःख देना है। इससे भी पुण्य के बदले पाप का बोझ चढ़ता है इसलिए हमारे कर्मों की गति बड़ी गहन है। जो भी कर्म हम करते हैं, सेवा करते, पालना करते, पालना लेते हरेक में बहुत बड़ी कर्मों की मिशनरी काम करती है। हमारे संग से दूसरे को भी श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा मिले। हमारा ऐसा संग न हो जो किसी को संगदोष लग जाए। और ही वह हमारे से ऊँच दृष्टि लेने के बदले नफरत, ईर्ष्या, द्वेष आदि.. में आये, उसमें रीस पैदा हो। करनी है रेस लेकिन हो जाती है रीस उसी से बोझ चढ़ता है। –
चलते-चलते बहुतों में देह-अभिमान बढ़ता जाता है। एक होता है देह-अभिमान, दूसरा होता है 'मैं-पन' का नशा। देह-अभिमान फिर भी मोटा है लेकिन 'मैं-पन' का नशा बहुत सूक्ष्म है। चाहे अपनी बुद्धि का, चाहे अपनी सेवाओं का, चाहे किसी भी प्रकार का अगर नशा चढ़ता है तो वह नशा भी नुकसान करता है। नारायणी नशे के बदले देह-अभिमान का नशा चढ़ गया तो बहुत नुकसान होता। कोई को भाषण का भी नशा चढ़ जाता, तो वह भी नशा नहीं चढ़ना चाहिए, उससे भी बड़ा नुकसान होता। नशे की निशानी है १. सूक्ष्म समझते हैं- वाह रे मैं। २. स्वयं को ही राइट समझते, दूसरों को नीचा समझते। वह कभी नम्रचित नहीं रह सकते। जो नम्रचित नहीं बनेगा वह निर्माण का काम भी नहीं कर सकेगा। इसलिए हम सभी 'निमित्त' हैं इस शब्द को कभी भूलो नहीं। हम निमित्त वालों को सदैव कदम-कदम पर सावधानी चाहिए। उठो, चलो, बैठो, खाओ, पिओ, पहनो सब कर्मों की गति अपनी है। इसलिए हर कदम में बहुत-बहुत ध्यान रखना ज़रूरी है।
बाबा के हम सभी बच्चे दर्शनीय मूर्त हैं। इस चेहरे से, सूरत से बाबा की सीरत दिखाने के निमित्त हैं। तो हम दर्शनीय मूर्त की धारणा कितनी श्रेष्ठ होनी चाहिए, कितनी महान होनी चाहिए यह हरेक खुद देख सोच सकते हैं। इसलिए जो भी कोई सूक्ष्म वृत्ति है उसको परिवर्तन करो। अन्तर्मुखी बनो, बाह्यमुखता की वृत्तियों का परिवर्तन करो। बाह्यमुखता की वृत्तियों को हमें कछुए की तरह समेटकर अन्तरमुखी बनना है।

प्यारे सबके बनो, प्रिय एक बाबा को बनाओ तो सब तुम्हारे प्यारे रहेंगे

प्यारे बाबा ने हमें योगी भव का सहज स्वतः ही वरदान दिया है। बाबा कहते अब तुम सब मेरे बच्चे हो, मैं तुम सब बच्चों का प्यारा बाबा हूँ, तुम मेरी सजनियाँ हो मैं तुम्हारा साजन हूँ। तुम मेरे हो, मैं तेरा हूँ, तुम सब बच्चों को मैं अपने साथ ले चलने आया हूँ, और मैं देख रहा हूँ कि कैसे तुम मेरे बच्चे मेरे साथ घर की ओर दौड़ रहे हो। प्यारा बाबा आज आप सभी के बीच है और एक-एक बच्चे को मीठी-मीठी रूहानी दृष्टि दे रहा है। आप सबसे प्यारा बाबा बहुत मीठी-मीठी रूह-रूहान कर रहा है। आपके पुरुषार्थ को, हिम्मत को, दिल को देख बाबा आप सबको बहुत-बहुत प्यार से गले लगा रहा है। अपनी गोदी में छिपा रहा है। क्यों ? क्योंकि आपने कहा है 'हमारा एक बाबा दूसरा न कोई।'
बाबा आप सबको अपने लाइट की किरणें पाँव से चोटी तक दे रहा है। आपको अपनी शीतल दृष्टि से, शीतल बना रहा है। यह अनुभव होगा कि माया ने गर्म बनाया, बाबा अति शीतल बना रहा है। योगी की वाणी, काया, स्वभाव, संस्कार सब शीतल होते इसलिए इस ज्ञान-अमृत को पीने से शीतल बन जाते क्योंकि बाबा हमारा बहुत-बहुत मीठा, प्यारा, शीतल है।
बाबा को तरस के साथ, रहम के साथ बड़ी करुणा के भाव आ रहे हैं, आप सब इस कलियुगी दुनिया से बचकर, दौड़कर बाबा के पास आये, आप सबने अपने दिल में सच्चा बाबा बिठाया है। कई बच्चे हैं जो बाबा के ऊपर अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार हैं, सच्चे पुरुषार्थी हैं, कई हैं जो यह नहीं समझते कि हम इस इन्द्रप्रस्थ के सच्चे देवतायें हैं इसलिए अपनी वृत्तियों में लापरवाह हैं।
जिन्हें देह-अभिमान है, रावण की तरफ़ बुद्धि है वह और ही अपनी बुद्धि में बुराईयों को लाते, कई तो अपना किचड़ा बाबा को देकर शीतल हो रहे हैं, कई फिर बुरे वायब्रेशन रखते हैं। जो आपके साथ छोटी या बड़ी बहनें हैं वह आपकी माँ हैं। भले वह छोटी बच्चियां हैं लेकिन आपकी माँ के समान हैं। वृत्ति में रहे कि हम सब एक बाप के बच्चे हैं, हम छोटे बच्चे हैं, छोटे लाल हैं, वह हमारी माँ हैं। चाहे छोटी हैं चाहे बड़ी हैं। आप सबको माँ देखो। माँ देखेंगे तो आपके अशुद्ध संस्कार समाप्त हो जायेंगे। वृत्ति-दृष्टि शुद्ध हो जायेगी।
बाबा हमारा प्राणेश्वर है, एक बाबा सभी सम्बन्धों का दाता है। यह जो सवाल है कि हमारी पुरानी आदतें नहीं मिटती तुम इन सब बातों को सोचना छोड़ दो। माया भल तूफ़ान लाये, तुम्हें उसके बस नहीं होना है, तुम बाबा के सर्व सम्बन्धों के रस में लीन रहो। बाबा "हमारा मीठा बाबा है" कभी इस सम्बन्ध का रस लो, कभी उसे प्यारा सखा बनाओ, दिल की बातें उससे करते रहो तो देखो वह कितना बहलाता है। कभी उसे साजन के रूप में देखो, कभी उसे बेटा बना लो, उस पर सारा तन-मन-धन स्वाहा कर दो। कोई दिन धर्मराज के रूप से देखो... ऐसे एक-एक दिन एक-एक सम्बन्ध का रस लो, उसी सम्बन्ध से उससे रूह-रूहान करो तो दैहिक सम्बन्धों की आकर्षण खत्म हो जायेगी। पुराने सब संस्कारों को समाप्त करने का साधन ही है- सर्व सम्बन्धों का रस एक बाबा से लो।
बाबा ने हम बच्चों को कोई हठयोग नहीं सिखाया है लेकिन अमृतवेले उठ बाबा से शक्ति ज़रूर लो। शक्ति प्राप्त हुई तो पिछले सब संस्कार खत्म हो जायेंगे। अकेले बन, अकेले में, अकेले बाबा को याद करो। अपनी पढ़ाई में मस्त रहो। यह मुरली, यह ज्ञान रत्न आपको बहुत-बहुत मदद करेंगे। पढ़ाई से बहुत-बहुत प्यार रखो।
योगी का अर्थ ही है नियम और संयम, जितना अपने को मर्यादाओं में रखेंगे उतना अपनी मस्ती में मस्त रहेंगे। दूसरा क्या खाता, कैसे रहता वह नहीं देखो। अपनी मौलाई मस्ती में मस्त रहो तो अश्लीलता पर नज़र जायेगी ही नहीं। 'सत्यम्-शिवम् सुन्दरम्' को देखो। हमारे वह नयन बाबा ने निकाल दिये - मेरे तो दिव्य नयनों में अपना प्यारा बाबा बसता, स्वर्ग बसता।
जैसे एग्जाम (परीक्षा) के समय पर पढ़ाई पर ध्यान रहता ऐसे समझो अब हमें बाबा के घर जाना है, सम्पन्न होना है। हमारे अब परीक्षा के दिन चल रहे हैं। यह हमारा एक्जामिनेशन है कि हमें बाप के समान सम्पन्न बनना है। हमें अपने सभी पिछले खाते योग से खत्म करने हैं। हमें बाबा से नई दुनिया के लिए नम्बरवन प्राइज़ लेनी है। हमें विनर बनना है, उसके लिए पेपर है मायाजीत जगतजीत बनने का।
बाबा ने कहा "चिरंजीवी बच्चे, मायाजीत बच्चे" अब हमें वरदान मिल गया तो माया वार कर नहीं सकती। हमारी आँखों में बाबा बैठा है, हम तो कल जाकर शाहजादे बनेंगे। हम कल जाकर मिचनू (छोटा बच्चा) बनेंगे। हमें तो नई दुनिया में जाना है, हमें तो ऐसा सुन्दर देवता बनना है, हम तो वह मूर्तियाँ हैं जिनका मन्दिर में गायन, पूजन होता। हमें यह देह देखनी ही नहीं है, हमें तो यह बाबा की दरबार दिखाई देती, यह लाइट का क्राउन सब पर दिखाई देता।
हम देख रही हूँ कि सबके मस्तक पर लाइट की थाली घूम रही है, क्योंकि अब हमें लाइट के घर जाना है। लाइट की थाली घूमती हुई देखो तो यह देह दिखाई ही नहीं देगी। हम बाबा के बच्चे आत्मा हैं, आत्मा लाइट है, उस लाइट के क्राउन को छोड़ देह-अभिमान में क्यों आते? लाइट के क्राउन को देखो तो देह-भान छूट जायेगा। देह का क्राउन कांटों का क्राउन है, लाइट का क्राउन हल्का शीतल कर देता।
हम लाइट हाउस हैं हमें सबको राह दिखानी है, सभी रूहों को राहत देनी है। राहत देने वाले ने हमें राहत दी है, मैं कैसे कहूँ कि मुझे राहत नहीं। हम तो रूहानी राहत देने वाले राही हैं, सबको लाइट देनी है, ऐसी स्थिति में रहो तो बाकी सब स्थितियां खत्म हो जायेंगी।
काम महाशत्रु के संकल्पों को डोन्ट केयर करो, तूफ़ानों में नहीं आओ। विकल्पों पर अटेन्शन ही क्यों देते, अगर अटेन्शन देंगे तो और ज़्यादा आयेंगे। मैं ज्ञान सूर्य का बेटा, किचड़े को खत्म करने वाला हूँ, मेरे पास माया का किचड़ा आ नहीं सकता। अगर उसको देखेंगे, हाथ लगायेंगे तो आ जायेगा। अगर संकल्प आये तो किनारा कर लो, अगर वह नींद फिटाये तो आप योग में बैठ जाओ, लेख लिखो, विचार सागर मंथन करो।
आप बाबा को कमज़ोरी की बातें मत सुनाओ, निर्बलता खत्म हुई क्योंकि हम मास्टर सर्वशक्तिवान हैं। अगर आप सोचेंगे कि माया हैरान करती तो करेगी लेकिन संकल्प में दृढ़ता रखो कि माया आ नहीं सकती तो भाग जायेगी। आप अपनी मस्ती में रहो तो सब पुरानी बातें खत्म हो जायेंगी। बाबा से सर्व सम्बन्ध जोड़ो। बाबा की मस्ती में मस्त रहो, बिज़ी लाइफ इज दी गुड लाइफ, बिज़ी रहेंगे तो सब इजी हो जायेगा। पढ़ाई और सर्विस में बिज़ी रहो, भाव-स्वभाव के नाज़-नखरे छोड़ दो। वह भी आपकी वृत्तियों को खराब करते है। प्यार करना है एक बाबा को, शक्ति लेनी है एक बाबा से। बाकी किसी से प्यार लेने की इच्छा नहीं रखनी है। बाबा से प्यार लो, किसी देहधारी के प्यार की इच्छा मत रखो। हमें तो लेके सहारा बाबा का, विश्व का कल्याण करना है। ऐसे विश्व का निर्माण करने वाले क्या खुद का निर्माण नहीं कर सकते ! यह है ही तमोप्रधान दुनिया इसकी शिकायत मत करो। हमें कोई सड़ा हुआ चोला पहनना ही नहीं है। यह सड़ा हुआ, मरा हुआ वस्त्र है, आप उसकी शिकायत क्यों करते। यह है ही निर्बल, निर्बल की शिकायत थोड़े ही की जाती।
मैं हूँ मास्टर सर्वशक्तिवान और कहूँ कि यह छोटी-सी माया वार करती है। चींटी महारथी को सुला दे तो क्या कहेंगे। उससे अपनी सम्भाल रखो। इस पुरानी दुनिया को देखो ही नहीं, सुनो ही नहीं। संगदोष एक दो को बहुत गिराता है। मेरा संगी एक बाबा है। उसको साथ रखो तो दोस्तों का साथ नहीं खींचेगा। प्यारे सबके बनो, प्रिय किसको नहीं बनाओ। प्रिय एक बाबा को बनाओ तो सब तुम्हारे प्यारे रहेंगे। प्यार सबको करना है लेकिन किसके लिए प्यारे नहीं बनना है। किसके लिए प्यारे बनेंगे तो हद आ जायेगी। प्यारा बनना है एक का, बाकी सबसे न्यारा रहो। किसी के प्यार की आश नहीं रखनी है। सदा एक साथी के साथ रहो तो और किसी के संग का रंग नहीं लगेगा। बाबा का संग मुझे सबको लगाना है, मुझे किसी का संग आकर्षण नहीं कर सकता। यह दावा करो।
मुझे बाबा ने कर्मयोगी, शीतल योगी बनाया है, लेकिन गर्मयोगी नहीं बनो। हमारे मस्तक पर बाबा का हाथ है, हमारा मस्तक शीतल हो गया फिर गर्मी कौन सी? मीठे बाबा ने कहा ओ मेरे मीठे, सिकीलधे बच्चे, ऐसा कहते ही उसने हमें शीतल बना दिया, फिर गर्मी किस बात की। न काम की, न क्रोध की। माया पर भल गुस्से हो लेकिन किसी के ऊपर गुस्से मत हो। गुस्सा तो एक ऐसी चीज़ है जैसे गुम्बद में बैठ आवाज़ करो तो खुद को सुनाई देती। गुस्सा करके खुद को हैरान करते हो, दूसरा हो न हो। किसी ने कुछ रांग किया, तो उसने तो किया लेकिन मैं कहूँ - इसने क्यों किया, उसमें मैं क्यों हैरान हूँ! हरेक का कर्म, हरेक की निवाई-ऊँचाई उसे खुद ही नींचा दिखायेगी, मैं क्यों उसे कहूँ कि मैं नींचा करके ही इसको दिखाऊँगी। मैं कल्याणकारी बाबा की बच्ची, मैं किसको नींचा दिखाने की क्यों सोचूं।
गुस्से की आग खुद को जलाती, "जो बनता निर्मान वह सबका पाता मान" जो निर्मान नहीं वह जग में मान पा नहीं सकता। दोनों हाथ जोड़कर सिर झुकाना यह भी नम्रता है। दो हाथ बाँधते माना आवाज़ नहीं करना, शान्ति से रहना है। सिर झुकाना नम्रता की निशानी है। हरेक की दुआ लेने का साधन है निर्मान बनो। जो निर्मान होते हैं उनके लिए दिल से सबकी दुआयें निकलती हैं। जब कोई दुआ देता तो सिर पर हाथ होता है, अगर आप विश्व की दुआयें लेने चाहते हो तो अपने को निर्मान बनाओ। फिर बाबा की भी अथाह दुआयें मिलेंगी। रूहानी दृष्टि से देखो, देह की दृष्टि से नहीं तो दुआ मिलेगी। मैं कहती हूँ ओ मेरे चैतन्य देवतायें - अगर मेरी कोई भूल है तो "सॉरी! अगर मैंने "सॉरी" की तो दुआयें मिल जायेंगी। जिसके सिर पर दुआ नहीं उसके सिर पर रावण है। एक-एक की दुआ लो तो बाबा की दुआयें रहेंगी, रावण भाग जायेगा।
मेरा सदैव हँसता हुआ मूड़ रहे मैं बाबा को देखूँ तो मुस्कराऊँ। श्रीकृष्ण को देखो मुस्कराता है तो प्यारा लगता है। अगर जोश वाला होता तो क्या प्यारा लगता ? मुस्कराते हुए चेहरे वालों के चित्रों को हरेक गले से लगाते। परन्तु अगर मूडी होते, मूड़ आफ करते तो सीता का मुँह रावण की तरफ़ हो जाता, मूड आफ माना रावण। मूड़ आफ माना मूढ़मती। मूड़ आफ माना बाबा से मुख मोड़ना। यह सब चिह्न हैं अपने को निर्बल बनाने के।
बाबा को कहते हैं- परमपिता, परम अर्थात् ऊँचा परमधाम निवासी, तो हम परमधाम के निवासी, परमपिता के प्यारे बच्चे हैं इसलिए इस दुनिया से परे रहो। हरेक बात हमारी दुनिया से न्यारी है। हमें तो पवित्रता का झण्डा लहराना है, जिसको दुनिया असम्भव कहे, न माने, उसे सम्भव कर दिखाना है। तुम कुमार नहीं, सजनियाँ हो। क्या मैं शिव साजन को पसन्द नहीं, या वह मुझे पसन्द नहीं जो दूसरे को पसन्द कराते। बाबा कहे जैसे हो वैसे हो, मेरे हो। जब उसने मेरा कहा फिर हम दूसरे का क्यों बनें।
हम योग द्वारा वायब्रेशन, वायुमण्डल को परिवर्तन करने वाले हैं। बाबा से जितनी शक्ति लेना चाहो लो, रावण को मुट्ठी में बाँध दो, अगर उसे फ्रीडम दी तो वह घर में घुस जायेगा। टेस्ट करो प्यारे बाबा को, उनके रसों को, दुनिया को टेस्ट करने की इच्छा नहीं रखो।
हम बाबा के योगी बच्चे हैं योगी का देखना, योगी का व्यवहार सब सिम्पल और शीतल होता, ऐसे शीतल बनो तो अन्तर्मुखी बन जायेंगे। योगी की नींद नार्मल होती, शरीर को ५-६ घण्टे आराम देना ज़रूरी है, उससे ज्यादा नींद सुस्ती की निशानी है।
अपने पुरुषार्थ से कभी हार्टफल नहीं होना, नाउम्मीद भी नहीं होना। अगर हम सच्ची दिल से मेहनत कर रहे हैं तो मेरी सफलता की मार्क्स नोट हैं। अगर मेरे दिल की सच्ची भावनायें हैं तो सफलता जरूर होगी। बाबा की याद में चलते जाओ, पुरुषार्थ की नींव पक्की रखो तो सब बातें समाप्त हो जायेंगी। अपने को वानप्रस्थी समझो तो सब संस्कार निर्बल हो जायेंगे। बाबा से शक्ति लेकर बलवान बनो।
ईश्वरीय मर्यादाओं की रक्षा करो यही है ब्राह्मणों की राखी। जितना हम ईश्वरीय मर्यादाओं की रक्षा करते उतना रक्षक हमारी रक्षा करता है।
लड़ना, झगड़ना, रोना, रूसना, चोरी करना, झूठ बोलना, जिद्द करना, अपनी मत चलाना.. यह सब भोगियों की चाल है, योगियों की नहीं। कोई जिद्द करता है तो वह ब्राह्मण नहीं शूद्र है। अच्छा.... ओमशान्ति ।

ईश्वरीय कार्यो में वृद्धि व कार्य-कुशलता का आधार क्या?

देश-विदेश में जो चारों तरफ़ सेवायें बढ़ती जाती हैं, इतना विस्तार देख सबके मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर भी इतनी जो वृद्धि हो रही है और हर कार्य बहुत कुशलता पूर्वक चल रहा है, इसका आधार क्या है? तो मैं कहती कि इसका मूल आधार है-
१. इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय को अथवा सारी संस्था को चलाने वाला कोई देहधारी मनुष्य नहीं है। यह दादा जिसे हम ब्रह्मा बाबा कहते, वह भी कहते मैं चलाने वाला नहीं। इसको चलाने वाला तो हम आप सबका परम बाप, परम शिक्षक और परम सद्‌गुरु है जिसे हम 'शिवबाबा' कहते हैं।
२. इसका आधार ज्ञान और योग है। इसी आधार पर हम पहले अपनी जीवन वैल्यु बेस्ट बनाते, दिव्यगुण धारण करते फिर उन्हीं धारणाओं के आधार पर सेवा करते। जो हम कहते हैं वह पहले खुद करते हैं। हमें प्रैक्टिकल जीवन में पहले करनी सिखाई जाती है। फिर है कथनी।
३. सबसे बड़ी बात इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में न कोई गुरु की गद्दी है, न किसी को अपनी सम्पत्ति है, दुनिया में एक तो झगड़ा होता है कुर्सी का, दूसरी गद्दी का और तीसरा सम्पत्ति का। यहाँ कोई गुरु नहीं, कुर्सी नहीं। किसी की पर्सनल सम्पत्ति नहीं। यह सब जो भी देख रहे हो या जो भी सेन्टर्स हैं, भवन बने हुए हैं यह सब शिवबाबा के हैं, कोई भी ऐसे नहीं कहता कि यह मेरी सम्पत्ति है। यहाँ मेरे-पन का नाम नहीं। सब बाबा को सरेण्डर हैं इसलिए कोई आपसी मतभेद नहीं। झगड़ा नहीं।
४. हम सब एक परिवार के हैं। लेकिन हमें पर्सनल कोई अपनी फैमिली नहीं। दुनिया में तो मेरे बच्चे, तेरे बच्चे.. होते, उसमें मोह ममता होती। यहाँ हम सब एक फैमिली के होते भी किसी की किसी में मोह ममता नहीं, सबसे निःस्वार्थ सच्चे दिल का स्नेह है, सब एक-दो के सहयोगी हैं, सबके प्यारे हैं लेकिन सबसे न्यारे हैं। सब एक शिवबाबा की फैमिली के मेम्बर हैं।
५. हम सबका टाइटिल है- बी. के., बाकी कोई की अपनी पर्सनल डिग्री नहीं।कोई को कोई पोस्ट नहीं। कोई का कोई स्वार्थ नहीं। दुनिया में जिसे भ्रष्टाचार कहते, उसका यहाँ कोई नाम नहीं क्योंकि सब सेवाधारी निःस्वार्थ, निष्काम सेवा करते। सेवा भी मेरी नहीं, बाबा की है, इस भावना से सब सरेन्डर बुद्धि होकर कार्य करते इसलिए सहज सफलता मिलती है। कोई अपना अहंकार नहीं दिखाता।
६. हमारे लिए सर्व धर्म वाले वी. आर. वन फैमिली। सब धर्म वाले, सब भाषाओं वाले, सब एक ही फैमिली हैं। यह इस धर्म का है, यह इस धर्म का है-हमारे पास ऐसा कोई धर्म, भाषा, रंग आदि का भेद नहीं। हम सभी का प्यार शिवबाबा से है, शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा हमें बहुत-बहुत प्यार की पालना दी है। और यह सिखाया है कि सभी के साथ प्रेम से, मधुरता से व्यवहार करो तो कहा जाता जहाँ स्नेह है वहाँ सब कुछ सहज है तो यहाँ की मूल धारणा है 'सरेण्डर बुद्धि', सबके साथ समान स्नेह और शान्ति से व्यवहार करना।
७. हम सबको परमात्मा पिता का डायरेक्शन है कि तुम्हें पवित्र रहना है।खान-पान शुद्ध और सात्विक रखना है। हम सबकी पढ़ाई एक है, पढ़ाने वाला एक है, सेवायें भी एक के निमित्त हैं। मर्यादायें भी सबके लिए एक जैसी हैं। इसलिए सब एकमत हो कार्य करते तो उसमें सफलता मिलती है, और कार्य स्वतः आगे बढ़ता है।
८. यहाँ मुख्य रूप में सब कार्य माताओं के हाथ में हैं। परमात्मा स्वयं आकर 'बन्दे मातरम्' करता। वैसे भी गायन में आता कि माँ की मीठी लोरी होती। बाबा ने सेवा के निमित्त विशेष बहिनों को आगे रखा है। भारत को भी 'भारत माता' कहा है इसलिए जो बिल्कुल पिछड़े हुए थे, बाबा ने उन्हों को आगे रखा है। और देखा जाता उसी से बहुत-बहुत शान्ति से सब कुछ चलता है। वैसे हमारे पास भाई-बहनों का भेद नहीं है, हम कोई हठयोगी संन्यासी नहीं हैं, हम कोई घरबार नहीं छोड़ते हैं। न छुड़ाते हैं। प्रवृत्ति में रहते प्यारे और न्यारे रहते। हम भाईयों को पाण्डव कहते, बहिनों को शक्तियाँ दोनों मिलकर सब कार्य करते इसलिए हर कार्य सहज सम्पन्न होता है। रुकावट नहीं आती।
९. हमारी साधना का मूल आधार 'ज्ञान' है। पहले-पहले सबको यही पाठ पढ़ाया जाता कि आप एक चैतन्य आत्मा हैं, और आप सब आत्मायें एक पिता के बच्चे आपस में भाई-भाई हैं। कोई देहधारी मनुष्य भगवान नहीं है। यह ब्रह्मा भी भगवान नहीं, यह खुद भी कहता मैं भी तुम्हारे जैसा स्टूडेंट हूँ। मैं कोई भगवान नहीं। हाँ, शिवबाबा (भगवान) ने इनके माध्यम से हमें पढ़ाया है, सिखाया है, इतना आगे बढ़ाया है। मर्यादाओं पर चलना सिखाया है। इसलिए हम इन्हें प्यार से 'बाबा' कहते हैं। बाकी यह कोई हमारा गुरु व भगवान नहीं है।
१०. सारे वर्ल्ड की हेड आफिस हमारी एक मधुबन है, विदेश सेवाओं के निमित्त लंदन है। उसमें भी अलग-अलग खण्ड हैं, जिनमें निमित्त इंचार्ज बहनें हैं। यहाँ भी देश की जो स्टेट्स हैं उनके ज़ोन बने हुए हैं, उनमें मुख्य एक ज़ोन हेड है, उनके अण्डर सबज़ोन्स अथवा सेवाकेन्द्र चलते हैं। सेवाओं की वृद्धि के निमित्त समय प्रति समय हमारी मीटिंग होती हैं, सबकी राय से एकमत होकर हर कार्य करते। पूरे वर्ष की सेवाओं के प्लैन पहले से ही बनाये जाते हैं, सभी मिलकर वह कार्य सम्पन्न करते हैं।
११. हम सभी स्टूडेंट हैं, तो हम सब सेवाधारी भी हैं। यहाँ कोई छोटा-बड़ा नहीं। निमित्त मात्र हमें दादी कहते, दादी भी सिन्धी में बड़ी बहन को कहा जाता। बाकी यहाँ कोई हेड नहीं। हम सबके पुरुषार्थ का लक्ष्य है कि हमें ऐसा सम्पन्न लक्ष्मी-नारायण जैसा दिव्यगुणों की मूर्त बनना है और सेवा का लक्ष्य है कि हमें विश्व का कल्याण करना है। उसके लिए हमारा समय-श्वास सम्पत्ति सब अर्पण है। हम सबको यह विश्वास है कि भविष्य में विश्व ऐसी सुन्दर स्वर्ग बनेगी। परमात्मा आया ही है नई विश्व की रचना करने। इसी विश्वास के आधार पर सब चलते हैं। सेवायें करते हैं।
१२. सारे विश्व में जो भी इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेवाकेन्द्र चलते हैं - सभी स्थानों पर एक जैसी दिनचर्या है, हर स्थान पर अमृतवेले क्लास चलती है, हर क्लास में एक ही डिस्कोर्स चलता जिसको हम 'मुरली' कहते हैं। वह भगवान के उच्चारे हुए महावाक्य ही सभी स्थानों पर सुनाये जाते हैं, कोई भी अपना लेक्चर नहीं देता। कोई अपना डिस्कोर्स नहीं देता। बाकी यदि कहीं से कोई निमन्त्रण मिलता है तो इस ज्ञान के आधार पर ही सब्जेक्ट अनुसार भाषण करते, क्लास कराते। लेकिन बी. के. माना एक ही शिवबाबा की पढ़ाई पढ़ने वाले। एकमत पर चलने वाले। इसलिए न कोई का लेक्चर चलता, न कोई शास्त्र पढ़कर सुनाता।
१३. मनुष्यों की मोह-ममता या तो अपनी श्वांसों में होती या सम्पत्ति में होती या सम्बन्धियों में। लेकिन हम तो मानते हैं कि न तो श्वांस पर भरोसा है, न समय पर भरोसा है, न सम्पत्ति व सम्बन्धों पर भरोसा है। यह सब विनाशी है। यह सब विश्वास-रहित हैं, किसी घड़ी कुछ भी हो सकता। इसलिए हमारी किसी में मोह ममता नहीं है। हम सब उपराम रहते हैं। बाबा ने हमें जीते जी 'मरजीवा' बना दिया है। बस हमारा एक शिवबाबा ही सर्व सम्बन्धी है, उसी एक से सब सम्बन्ध हैं। वही सच्चे मात-पिता, बन्धु-सखा.... हैं। यही पाठ हम रोज़ पढ़ते और सबको पढ़ाते हैं। तो यही मूल बातें हैं जो सब कार्य कुशलतापूर्वक चलते हैं और दिन-प्रतिदिन वृद्धि होली जाती है। अच्छा ओमशान्ति। -

पॉजिटिव सोचने का अभ्यास हो तो संकल्प शुद्ध और एकाग्र होते जायेंगे

आज बाबा ने कहा कि मैं आता हूँ तुम बच्चों को अपने समान विदेही बनाने। दूसरा अण्डरलाइन था बच्चे, मैं-पन को त्यागो। जहाँ मैं है उसे छोड़ 'बाबा-बाबा' करो। हम निमित्त हैं। तीसरा अपने कैरेक्टर्स पर ध्यान दो क्योंकि तुम्हें देवता बन स्वर्ग का मालिक बनना है। तो इस भट्टी में अन्तर्मुख हो, हर एक स्व की चेकिंग करो। यह मौन-भट्टी है ही विशेष मन का मौन करके अपना मनोबल बढ़ाने के लिए। इसके लिए हरेक को गहराई से अपने आपमें चेक करना है कि हमारे मन में कहाँ तक शुद्ध संकल्प चलते हैं? कहाँ तक हम मन का मालिक राजा बन, मन वजीर को बाकायदे शुद्ध संकल्पों में, मनन-चिंतन में रखते हैं? या मैं-मैं के देह-अभिमान में व्यर्थ संकल्प चलते हैं? स्व के बदले पर को (दूसरे को) देखते-सोचते, संकल्प करते या ज्ञान सागर बाप के ज्ञान के खज़ाने का मनन करते हैं? मन के संकल्प सर्व प्राप्तियों में मगन रहते हैं? सर्व प्राप्तियों के खज़ानों को पाकर अपार खुशियों में रहते हैं?
मन के संकल्प पॉजिटिव चलते या निगेटिव चलते? तो विशेष यह भट्टी है खास इसी बात की चेकिंग करने की। हर प्रकार के निगेटिव थॉटस् को परिवर्तन कर पॉजिटिव सोचो। जितना-जितना पॉजिटिव सोचेंगे उतना मन की शुद्धि होती जायेगी, एकाग्रता बढ़ती जायेगी। पॉजिटिव में भी स्व का चिंतन विशेष करना है। पर को देखने के बदली स्व को देखो क्योंकि यह भट्टी बाबा ने इस समय हम हर बच्चे को विशेष अण्डरलाइन कराके दी है कि आप यह कभी नहीं सोचो कि मैं सेवाधारी हूँ परन्तु आप ईश्वरीय सेवाधारी हैं। तो हमारा हर संकल्प, हर बोल, हर कदम सेवा में है या ईश्वरीय सेवा में है? यदि मैं सेवा में हूँ तो भी कहीं देह-अभिमान या 'मैं-पन' आ जाता है। लेकिन मैं हूँ ही ईश्वरीय सेवा पर तो मेरा जो भी खाता है वह बाबा की दरबार में जमा है। तो हर एक अपना ईश्वरीय खाता चेक करो।
इस भट्टी का लक्ष्य ही है कि हमें बाप को प्रत्यक्ष करना है। तो बाप को प्रत्यक्ष करने के लिए हमें स्वयं में क्या धारणा करनी है? कई बार बाबा ने मुरली में कहा है- तुम्हारा संकल्प, बोल, तुम्हारा चेहरा ही बाप का साक्षात्कार करायेगा। यह -बहुत बड़ी जिम्मेदारी बाबा ने हम सबको दी है कि तुम्हें बाप को प्रत्यक्ष करना है, उसके लिए खुद को देखो कि मैं बाप समान सम्पन्न बना हूँ? बाप समान सम्पन्न बनना माना ही सर्व विघ्नों से ऊपर निर्विघ्न अवस्था बनाना। सम्पन्न बनने का अर्थ है कि सर्व कमियों-कमज़ोरियों को समाप्त करना है। जैसे पढ़ाई में परीक्षा के दिन होते तो होशियार स्टूडेन्ट का लक्ष्य होता कि मुझे फ़र्स्ट डिवीज़न में पास होना है। पास विद् आनर बनना है। जब हम पास विद ऑनर्स हों तब तो धर्मराज की सजाओं से मुक्त हैं। धर्मराज बाबा हमारा स्वागत करे। बाबा हमें अपनी भुजाओं में वेलकम करे। बाबा कहे ओ मेरे समान बच्चे! आओ! बाबा के समान की हमें मार्क्स मिलें, यह है इस भट्टी का पुरुषार्थ। भट्टी में कमज़ोरी का चिंतन नहीं करो। यह-यह कमज़ोरी है, उसे सोचकर एक बार बुद्धि से निकाल दो। चाहे उसे लिखकर निकालो, चाहे बुद्धि में दृढ़ संकल्प करके निकालो लेकिन यह चिंतन करो कि हमें ऐसी ऊँची स्थिति बनानी है। अपने आपको इतनी ऊँची दृष्टि से देखो कि बरोबर हम ऊपर में बाबा के साथ फ़रिश्तों की दुनिया में उड़ रहे हैं। नीचे में आकर, व्यक्तियों को देख व्यक्तित्व में अपना समय, शक्ति खर्च कर नहीं करो। यह बहुत बड़ी सूक्ष्म स्थिति बनाने की चैलेंज बाबा ने हमें दी है। कोई भी बात व्यक्त में आकर करेंगे तो जैसे पत्थर तोड़ेंगे लेकिन ऊपर से उड़ जाओ तो सभी बातें सहज ही क्रॉस हो जायेंगी माना निवारण हो जायेंगी। तो जितना भी टाइम साइलेन्स में बैठो उतना समय गहराई से अनुभव करो कि हम इस देह से परे उड गये हैं। उड़ना माना 'विदेही' बन फ़रिश्तों की दुनिया में पहुँच जाना। जितना लाइट बन लाइट की दुनिया में, फ़रिश्ते स्थिति में रहने का अभ्यास करेंगे उतना आटोमेटिक मैं-पन निकल जायेगा। और जितना यह अभ्यास करेंगे उतना जो भी कोई कमज़ोरी होगी, अपवित्रता के संस्कार आदि जो भी कुछ है वह सब खत्म हो जायेंगे। तो यही शुभसंकल्प करना है कि १. मुझे बाबा के समान सम्पन्न फरिश्ता बनना है। २. हमें इस विश्व की स्टेज पर अपने चलन चेहरे, संकल्प, बोल से बाबा को प्रत्यक्ष करना है। हमारे वायब्रेशन ऐसे हों जो आगे वाले कहें कि आप धन्य हैं। आप लोगों को भगवान ने ही पढ़ाया है और पढ़ा भी रहा है। यह संस्था देहधारियों की नहीं है, यह संस्था गुरु-चेलों की नहीं है परन्तु सभी ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियाँ परमात्मा से पढ़ाई पढ़‌के परमात्म-प्यार में लवलीन होने वाले हैं।
हमें यह बहुत नशा है कि हम इस संगम पर कितने लक्की हैं, कितने महान भाग्यवान हैं जो वरदाता बाप ने हमें सर्व वरदानों से भरपूर किया है। लोग कृपा मांगते, हमें तो पल-पल, कदम-कदम पर बाबा वरदानों से भरपूर कर रहा है। तो क्या यह दिल में नहीं आता कि हम ऐसा भरपूर बन, परम-आनन्द का अनुभव करें। हम प्रभु को अर्पण हैं। कोई पूछे तो हम छाती पर हाथ रखकर कहते हैं कि हमने परमात्मा को पाया है। हमें अटल निश्चय है या हमारे को कोई हिलावे तो हिल जाने वाले हैं? हम पाण्डव हैं, महावीर हैं तो माया को अपने चरणों में झुकाओ तब तो पाण्डव नाम है।
माया की शक्ति रावण का राज्य अब पूरा हुआ। अब तुम जाओ, विदाई तुम्हारी। तुम्हें अन्त में मुँह झुका के ही जाना है। अभी तुम्हें जितना सामना करना है, कर ले, मैं तुम्हें पांव में झुकाने वाला हूँ। ऐसी नज़रे तेज हो, इन नयनों में बाबा की इतनी शक्ति भरकर रखो जो मज़ाल है यह नयन कहाँ नीचें देखें। कोई कभी कहता जरा दृष्टि चंचल होती है, तो हम कहती हूँ याद करो भगवानुवाच - हे मेरे नज़रों से निहाल होने वाले बच्चे! तो बोलो हे पाण्डव, इतनी शक्ति से भरपूर हो ? हम निहाल हो गये। बाबा की नज़रों में हम हैं, हमारी नज़रों में तुम हो। चाहे कहाँ भी रहें, किधर भी रहें, कुछ भी मिले, कुछ भी खायें। ऐसी अपनी निहाल स्थिति को इस भट्टी में पक्का करके जाना है।
बाबा कहते हैं तुम मौलाई मस्ती में रहो, हम हैं योगी, हमें कौन पहचानें! ऐसी मस्ती अपने में जमा करके जाओ। इस बात को अच्छी तरह से समझो, सोचो। ऐसी अपनी मस्ती का अनुभव करके और पक्का चार्ट बनाके जाओ। हम हैं परमात्म-तख्त पर बैठे हुए रत्न। प्रभु के दिलतख्त के रत्न हैं, हम कोई तख्ते वाले नहीं हैं। खुद से पूछो कि सचमुच मुझे यह नशा है? हम दिलतख्त के मालिक हैं, हम बाबा के दिलतख्त पर बैठे हैं। मेरे दिलतख्त में बाबा, बाबा के दिलतख्त में हम बच्चे हैं इससे बड़ा वरदान हमें और क्या मिलेगा? ऐसा इतना नशा चढता है? इतनी अन्दर से खुशी और अतीन्द्रिय सुख की मस्ती रहती है? ऐसे परमात्म-प्यार में लवलीन रहते हैं? यह नशा अमृतवेले योग में सबको निरन्तर बढ़ाते रहना चाहिए।
इस भट्टी में निगेटिव को पूरा स्वाहा करके जाओ। जिसको कहा जाता है मर जाओ, मिट जाओ ऐसी स्थिति बनाके जाना है। बाबा कहते हैं तुम्हें बेहद का वैराग्य चाहिए। हमारे लिए पुरानी दुनिया मर गई है तो और हमें क्या चाहिए? क्योंकि बाबा ने तो हमको बेहद का बादशाह बनाया, बाकी हमें क्या चाहिए। यह तो सेवायें हैं। आप जो हमें सेवायें देंगे वह हम करते हैं, करते रहेंगे बाकी दिल में निरन्तर तू ही तू, तेरे बिना कोई दिल में नहीं है। ऐसी अपनी पॉवरफुल स्थिति बनाओ। हमारे को बाबा ने ऐसे वरदान देकर रखा है, जो बाबा के वरदानों में ही सदा रात-दिन पलते, अपार खुशी आनन्द मौज में रहते हैं। हम हैं योगी लोग, तो हमें क्या चाहिए! कोई लोभ नहीं, कोई मोह नहीं... फिर यह देह-अभिमान किसलिए! जब देह भी तुम्हारी नहीं है तो उसका अभिमान कौन-सा है? बाबा ने इतना अथाह मान-शान दिया है जो इससे बड़ा और कोई मान शान हो नहीं सकता है। तो अपने ऊँचे शान में रहो और कोई मान शान में नहीं रहो। इसलिए सबसे पहला चाहिए स्वयं के संकल्पों का मौन। यह अभ्यास करना है मन का मौन माना संकल्पों का मौन। बन जाओ - 'विदेही'।
हर एक समझे कि हम महारथी से महारथी मायाजीत हैं। हारे हुए नहीं हैं, हम मायाजीत हैं। रावण को चरणों में रखो। रावण को हुक्म नहीं है कि आंख उठाकर हमें देख ले। ऐसा मन को मायाजीत बनाके जाओ।
हम हैं अवतरित हुई आत्मा क्योंकि पुराना वह चोला सब कुछ भूल गया है। इसलिए शिवबाबा ने जैसे प्रवेश किया है वैसे हमें भी बाबा ने अवतरित कराके वह नशा दिया है। अवतार माना ही शुद्ध। तो पास्ट का जन्म मर गया, उसका नाम है 'समर्पण'। अगर पास्ट का जन्म अभी भी खींचता है तो समर्पण नहीं कहेंगे।
आज्ञाकारी बच्चे का अर्थ ही है कि बाबा की श्रीमत के विपरीत संकल्प भी न चलें। हम बाबा के कदम पर कदम रख चलने वाले आज्ञाकारी बच्चे हैं। आज्ञाकारी हो, श्रीमत पर चलने वाले ही सभी से दुआयें प्राप्त करेंगे। हमारा तो अनुभव यही है कि हम निरन्तर बाबा के संकल्प से भी, बोल से भी आज्ञाकारी रहें हैं। कभी बाबा की श्रीमत के खिलाफ मनमत का संकल्प भी कभी नहीं आया। यह बाबा की अपार दुआओं से रिकार्ड रहा है। तो जितना आज्ञाकारी रहेंगे उतना दुआओं के पात्र बनेंगे। आज्ञाकारी बच्चों को बाप लौकिक में भी नयनों पर बिठाता है। हम आज्ञाकारी बच्चों को भी बाबा ने नयनों पर बिठाया है। तो दृढ़ता का संकल्प इस मन के मौन में पक्का करो - यही सच्ची राखी है। बाबा ने कहा- यह मेरी आशाओं के दीपक हैं, तो हे दीपको ! आशायें सम्पन्न करो - यही बाबा की हम बच्चों लिए आश है। अच्छा।

राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी दादी हृदयमोहनी जी

स्नेह और शक्ति, सरलता और गम्भीरता की सजीव मूर्त दादी हृदयमोहिनी जी को बाल्यकाल से ही ईश्वरीय स्नेह में लवलीन रहने की विशेष अनुभूति प्राप्त हुई है। आपने ईश्वर पिता से दिव्य दृष्टि का विशेष वरदान पाया है। सदा निश्चित तथा ईश्वरीय रस में सदा मग्न आपका जीवन अनेक दिव्य विभूतियों से सम्पन्न है। प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के उपरान्त निराकार शिव परमात्मा ने आपके रथ (शरीर) को अपना साकार माध्यम बनाया है। देश-विदेश की रूहानी सेवा पर सदा तत्पर दादी हृदयमोहिनी जी के कुछ एक प्रवचनों का सार यहाँ पर प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें आपने बहुत से गुह्य दिव्य रहस्यों को अपनी मधुर वाणी एवं सरल शब्दों से स्पष्ट किया है। पाठकगण इन्हें पढ़कर पुरुषार्थ की तीव्रता द्वारा अपने लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकेंगे।

अपनी सब ज़िम्मेवारियाँ बाबा को देकर डबल लाइट रहो तो खुशी में नाचते रहेंगे

हम सबने जीवन की नय्या शिवबाबा के हवाले कर दी है और जब जीवन की नय्या की ज़िम्मेवारी बाबा को दे देते हैं तो हम डबल लाइट बन जाते हैं। हमने अपनी ज़िम्मेवारी बाबा को दे दी और बाबा ने फिर हमको जो ज़िम्मेवारी दी है वह ज़िम्मेवारी बोझ नहीं है, उसमें खुशी है। बाबा ने ज़िम्मेवारी दी कि बच्चे आप विश्व-कल्याणकारी बन अपने मन्सा द्वारा, वाणी द्वारा अपने सम्बन्ध-सम्पर्क अथवा कर्म द्वारा विश्व-सेवा करते रहो। इस ज़िम्मेवारी को निभाने से खुशी होती है क्योंकि जब विश्व की आत्माओं का कल्याण हो जाता है, तो जिसका अकल्याण से कल्याण हो जाये, उसके दिल से दुआयें निकलती हैं और वह दुआयें हमको मिलती हैं तो दुआओं का खज़ाना जमा होने से हमको भी खुशी होती है, हिम्मत आती है, उमंग-उत्साह आता है कि सेवा में और आगे बढ़ते जायें, इसीलिए बाबा की ज़िम्मेवारी बहुत हल्की है और प्राप्ति कराने वाली है; क्योंकि दुआयें मिलना, दुआयें जमा होना यह एक बहुत सूक्ष्म प्राप्ति है। हमको बाहर से पता नहीं पड़ता है मानो आपने किसी को परिचय दिया और वह बाबा का बन गया तो उसके मन से बार-बार निकलता है कि आपने हमको सही रास्ते पर लगा दिया, तो यही उनके दिल की दुआयें मिलती हैं।
यह भी सबको अनुभव होगा कि जब भी हम किसी की सेवा करते हैं, चाहे भाषण करें, चाहे इन्डीविज्युअल किसी को बाबा का परिचय दें तो उसी समय प्रत्यक्षफल मिलता है। अन्दर-ही-अन्दर बहुत खुशी होती है, यह बाबा का बन गया। तो खुशी भी होती और दुआयें भी जमा होती तो जब इतनी प्राप्ति है तो बोझ नहीं लगता। कहाँ से छोटी-सी भी प्राप्ति हो जाती है तो अल्पकाल की खुशी कितनी होती है, एक लाख की लॉटरी आ गई तो कितनी खुशी में नाचते रहते हैं, पागल भी हो जाते हैं। और हमको परमात्मा द्वारा खुशी का खज़ाना मिलता है, हमारी खुशी अविनाशी है, उन्हों को विनाशी चीज़ों के कारण मिलती है इसलिए विनाशी है। और हमको अविनाशी पिता द्वारा मिलती है इसलिए हमारी खुशी अविनाशी खुशी है तो बोझ हट जाता है, डबल लाइट बन जाते हैं और जो डबल लाइट होगा, वह नाच सकता है। हम कोई पाँव से नहीं नाचते लेकिन हमारा मन खुशी में नाचता है और खुशी में तो सभी नाच सकते हैं, चाहे कोई बेड पर भी है तो भी खुशी में नाच सकता है क्योंकि यह मन की बात है, टाँग बाँह चलाने की बात नहीं है। तो सभी इस प्रकार से खुशी में नाचते रहते हो?
अभी तो मधुबन में एक्स्ट्रा खुशी मिल गयी, सबके चेहरे खुशी में मुस्कराते हैं। लेकिन घर-परिवार में कभी कोई बात आ गई तो चेहरा बदल जाता है। कभी सोच में, कभी फ़िकर में, कभी चिंताओं के सागर में डूब जाते, एक दिन चेहरा बहुत खुश और दूसरे दिन देखेंगे थोड़ा-सा उदास.. पूछो भाई क्या हो गया? कल तो तुम नाच रहे थे, आज तुम्हारा चेहरा ऐसा क्यों हो गया ? तो क्या कहते-आपको क्या पता हमारी प्रवृत्ति की बातें, आप तो अलग रहते हैं। लेकिन हम लोग भी आप सब प्रवृत्ति वालों का अनुभव सुनते-सुनते अनुभवी हो गये हैं। भल हमारे सामने आप जैसी कोई बातें नहीं आती हैं लेकिन अनुभव सुनने से भी तो अनुभव हो जाता है ना। ऐसे थोड़े ही कहेंगे कि यह कुएं में गिरा तो हम भी गिरके देखें। उनके अनुभव से हमको अनुभव हो जाता है कि कुएं में गिरना अच्छा नहीं है। तो आप इतने सभी का अनुभव सुन-सुन करके हम और ही ज़्यादा अनुभवी हो जाते हैं क्योंकि हमारे पास हज़ारों के अनुभव होते हैं। तो सभी बातों की एक ही दवा है कि अपनी सब ज़िम्मेवारियाँ बाबा को दे दो। अपने ऊपर नहीं उठाओ।
जब भी मैं-पन आता है - मेरी ज़िम्मेवारी है, मेरा परिवार है, सोचना पड़ता है, करना पडता है लेकिन.. और फिर क्या कहते क्या करें, बाबा ने कहा है सम्भालो, छोड़के नहीं आना है यह तो ठीक है लेकिन आधा लाइन तो पकड़ ली - बाबा ने कहा है ज़िम्मेवारी निभानी है, लेकिन कैसे निभानी है? ट्रस्टी होकर निभानी है, गृहस्थी होकर नहीं। गृहस्थी माना मेरा-पन और ट्रस्टी माना तेरा.. तो आधी लाइन तो बाबा की पकड़ लेते हैं कि ज़िम्मेवारी निभानी है, बाबा ने कहा है छोड़ना नहीं। ठीक है छोड़ना क्यों, उसी को ही श्रेष्ठ बनाओ, यह तो अच्छी बात है। जब दूसरों को श्रेष्ठ बनाते हो तो घर वालों को क्यों नहीं बनाते ? बनाओ, रहो, सेवा करो, सम्भालो लेकिन ट्रस्टी होकर। वह ट्रस्टी शब्द भूल जाते हैं और सम्भालने लगते हैं तो बोझ हो जाता है। ट्रस्टी हो तो जिसने ट्रस्टी बनाया है सब ज़िम्मेवारी उनकी हैं। मैं इन्स्ट्रुवमेन्ट हूँ, निमित्त हूँ, ज़िम्मेवार नहीं हूँ, ज़िम्मेवार बाबा है। यह थोड़ा-सा अन्तर होने के कारण बोझ महसूस होने लगता है। तो कभी चेहरा बहुत खुशी में नाचने वाला और फिर कभी भिन्न-भिन्न फेस होते हैं। और बाबा भी कहते हैं कि मैं भी बच्चों के भिन्न-भिन्न पोज़ देख करके हँसता रहता हूँ, अगर हम एक दिन भी चेक करें तो अमृतवेले से लेकर रात तक हमारे कितने पोज़ चेन्ज होते हैं।
अमृतवेले तो बहुत पोज़ होते हैं, अगर निद्रा लोक में गये तो वह भी पोज़ वण्डरफुल होता है। नींद भी शान्ति है, शान्तिधाम के बजाए नींद के शान्तिधाम में चले जाते हैं, वह भी पोज़ वण्डरफुल होता है और अगर ठीक है तो बहुत अच्छा होता है। तो सारे दिन में चेक करो कि हमारी स्थिति बदलती है तो पोज़ बदलता है? कितने पोज़ हमारे सारे दिन में बदलते हैं? या एकरस रहते हैं? एकरस माना बस, बाबा मैं तेरा-तू मेरा इसी खुशी में नाचते रहो, ऐसी अवस्था बाबा हम सब बच्चों की चाहते हैं। यह नहीं बाबा चाहता है कभी कैसे, कभी कैसे.... कभी कभी शब्द तो बाबा को अच्छा ही नहीं लगता है। बाबा कहते हैं जब मैं अविनाशी हूँ तो आपको प्राप्ति भी अविनाशी कराता हूँ, कभी कभी क्यों? कभी-कभी को अविनाशी नहीं कहेंगे। तो मैं देता अविनाशी हूँ और तुम लेते हो विनाशी, क्यों? अविनाशी बाप से अविनाशी प्राप्ति लेने वाले बनो और सदा अविनाशी खुशी में नाचते रहो।
सब तरफ़ का यह संगठन कितना प्यारा लग रहा है, आपस में भी मिलते हैं, बाबा से भी मिलते हैं, दादियों से भी मिलते हैं, कितने भरपूर हो जाते हैं। यह जन्म तो छोड़ो, हमारी तो २१ जन्म की गैरण्टी है कि हम २१ जन्म ही भरपूर रहेंगे, खाली नहीं होंगे। यह पक्का है ना। बाबा कहते हर बात में पक्का, थोड़ा-थोड़ा कच्चा बाबा को पसन्द नहीं है। तो जब बाबा से हम सबका प्यार है तो बाबा को जो पसन्द है, वही हमारी पसन्द हो।

आत्मा के जो ओरीजनल गुण हैं उनका स्वरूप बनो, जो सुनते हो उसे स्वरूप में लाओ

बाबा हम सबको एक बात बार-बार याद दिलाता है कि सुनना अर्थात् बनना। हम ज्ञान की जो भी बातें सुनते हैं वह एक-एक बात हमारे अन्दर धारण होती जाए। धारण होना माना स्वरूप में लाना। हम आत्मा के गुणों का जब वर्णन करते हैं तो कहते हैं आनन्द-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप, प्रेम-स्वरूप, शक्ति-स्वरूप... सबमें स्वरूप शब्द आता है। बाबा तो सागर है लेकिन आत्मा इन गुणों का स्वरूप है। तो सुनना बहुत सहज है, वह तो द्वापर से लेके बहुत ही कथायें सुनते आये हैं, सुनने की तो आदत पक्की हो गई है। लेकिन अभी बाबा ने एडीशन किया कि सुनना अर्थात् बनना।
ज्ञान और भक्ति में यही अन्तर है वहाँ सुनते रहते हैं लेकिन देवता समान बनते नहीं हैं, देवता देवता ही रहता है, भगत भगत ही रहता है लेकिन यहाँ बाबा हमको कहता है कि आपको बाप समान बनना है। यह कितनी बड़ी बात है। तो हम अपने आपको देखें कि सचमुच हमने जितने वर्ष सुना है, जो बातें सुनी हैं वह स्वरूप में आई हैं? कि सिर्फ सुनने और सुनाने तक हैं? क्योंकि सुनाने के बिना भी हम रह नहीं सकते हैं, नैचुरल है जो मिला है वह दूसरे को देने की दिल होती ही है। और कहाँ ना कहाँ सुनाते ही रहते हैं लेकिन स्वरूप कहाँ तक बने हैं?
जैसे हम कहते ज्ञान-स्वरूप तो स्वरूप में ज्ञान आया है? ज्ञान का अर्थ क्या है? समझ और समझ होने के कारण जो समझ से काम किया जाता है उसमें सफलता मिलती है और बेसमझी से काम करो तो सफलता नहीं होती है। तो ज्ञान-स्वरूप हम कहाँ तक बने हैं? स्वरूप का अर्थ क्या है? मानो यह आँखें देखने का काम करती हैं, मुख बोलने का काम करता है, कान सुनने का काम करते हैं, हरेक कर्मेन्द्रिय अपना-अपना कर्म करती ही है लेकिन जो भी हम शब्द बोलते हैं, वह ज्ञान-स्वरूप यानि ज्ञान के अर्थ सहित बोलते हैं? हम देखते हैं, तो ज्ञान-स्वरूप होकर देखते हैं। ज्ञान कहता है भाई-भाई की दृष्टि से देखो या आत्मा की दृष्टि से देखो। अगर हम आत्मिक दृष्टि से एक दो को देखते हैं माना मेरे नयन ज्ञान स्वरूप बनें हैं। अगर हम बॉडी कान्सेस रूप से देखते हैं तो हमारे नयन उस समय ज्ञान-स्वरूप नहीं हैं।
ऐसे ही प्रेम-स्वरूप कहाँ तक बने हैं? मानो किसी के साथ कुछ नीचे ऊपर चल रहा है, तो कभी जोश में तो नहीं आते। उस समय मेरे नयन, मेरा मुख प्रेम स्वरूप यानि ज्ञान-स्वरूप है। मैं उससे प्रेम की दृष्टि से बोल रही हूँ? या क्रोध के रूप में बोल रही हूँ? तो स्वरूप तो हमारा क्रोध का हुआ ना! प्रेम-स्वरूप कैसे हुआ। अगर प्रेम स्वरूप हम होते तो हम प्रेम से देखते, ओम् शान्ति कहते। तो यह चेक करना चाहिए कि जो आत्मा के ओरीजनल गुण हैं वा जो बाबा ने हमको शिक्षायें दी हैं - उस अनुसार मैंने ज्ञान को स्वरूप में कहाँ तक लाया है?
अगर मानो मैं कहती हूँ कि मैं तो बाबा के श्रीमत पर चलती हूँ, तो श्रीमत कहती है- हर गुण को, ज्ञान को स्वरूप में लाओ। श्रीमत ऐसा नहीं कहती कि भले कभी-कभी क्रोध करो। मैं समझती हूँ कि क्रोध करने का अनुभव तो सभी को होगा, चाहे थोड़ा कम करे, चाहे कोई तेज़ करे लेकिन क्रोध करने का अनुभव सभी को है। ऐसा कोई है जिसने कभी जीवन में क्रोध किया ही नहीं हो? अगर है तो हाथ उठाओ। कई क्रोध भी करते हैं और यह भी कहते हैं कि बाबा ने कहा है क्रोध नहीं करो। जैसे कहानी सुनाते हैं कि तोते को कहा गंगाराम नलके पर नहीं बैठना और वह नलके पर बैठकर ही कह रहा है "गंगाराम नलके पर नहीं बैठना"। तो हमारी भी ऐसी ही स्थिति हो गई है, क्रोध भी कर रहे हैं, याद भी आ रहा है, बार-बार दिल को लग रहा है कि यह ठीक नहीं कर रहे हैं, फिर भी कर लेते हैं फिर पश्चाताप भी बहुत होता है। मजे की बात तो यह है कि एक वार पश्चाताप किया कि क्रोध करना बहुत खराब है, यह आग है। इसमें खुद भी जलते हैं, दूसरे भी जलते हैं, अनुभव कर लेते हैं और उसके बाद फौरन पश्चाताप हो जाता है लेकिन जब फिर कोई ऐसी परिस्थिति आती है तो फिर कर लेते हैं। फिर पूछो क्यों किया ? जब एक बार पश्चाताप कर लिया फिर क्यों किया ? तो कहते हैं आपको क्या पता, वह बात ही बहुत बड़ी थी! अब देखो बात बड़ी या भगवान का बच्चा बड़ा ? बात तो मनुष्यों द्वारा ही हुई ना, हमने की या दूसरे ने की लेकिन बात भी बनाई तो हम लोगों ने ही है और भगवान के बच्चे मास्टर सर्वशक्तिवान कहें कि बात बड़ी हो गई ना। तो क्या आपको बड़ी बात को छोटा करना नहीं आता है? दुनिया के हिसाब से, कमज़ोरी के हिसाब से आपको वह बात बहुत बड़ी लगती है। यह तो होता ही है वैसे जब कोई शरीर से कमज़ोर हो, उसको कहो कि मटका उठाओ तो बिचारा मटका तो क्या, एक लोटा भी नहीं उठा सकेगा! कहेगा बहुत भारी है। बहादुर को कहेंगे लोटा उठाओ तो कहेगा मेरे को तो गागर दे दो। तो कमज़ोरी के कारण वह बात बड़ी लगती है। है तो बड़ी नहीं ना। तो बाबा इसकी युक्ति बताते हैं- जब भी आपको बात बड़ी लगे तो आप ऊपर, ऊँचे चले जाओ। ऊँचे कहाँ ? ऊँचे-से-ऊँचा हमारा घर परमधाम है, बाबा का भी धर वही है, तो वहाँ चले जाओ। तो बात क्या लगेगी? जैसे प्लेन में बैठके या ऊँचे स्थान से नीचे की चीजें देखो तो नीचे की बड़ी चीज़ भी छोटी-सी लगती है। तो ऊँचे चले जाओ तो बात छोटी लगेगी लेकिन जब नीचे ठहरके देखते हो तो छोटी-सी चीज़ भी बड़ी लगती है। तो बाबा कहते हैं कि क्या तुमको बुद्धि द्वारा ऊँचा जाना नहीं आता है? हम योग में क्या सीखते हैं? योग माना अपने मन, बुद्धि को ऊपर बाबा के पास ले जाना। चाहे सूक्ष्मवतन में जाओ, चाहे मूलवतन में। सूक्ष्मवतन भी इस साकारी दुनिया से ऊँचा है। लेकिन किसी को सूक्ष्मवतन या मूलवतन में जाना नहीं आता है तो कम-से-कम संगमयुग पर जो ऊंचा भाग्य मिला है, वह तो याद आ सकता है। हमारा कितना ऊँचा भाग्य है, वह बाबा सुनाता रहता है। रोज़ ऊँचे-से-ऊँचे भाग्य का वर्णन मुरली में सुनते हैं। चलो और कुछ नहीं आये - मन-बुद्धि को दूर ले जाना नहीं आता है, शरीर में फंसे रहते हैं, मानो बॉडी कान्सेस है लेकिन बुद्धि से यह तो सोच सकते हैं कि भगवान जो भाग्यविधाता है वह मेरा बाबा है। ब्राह्मण हूँ, ब्रह्माकुमार हूँ तो किसका बच्चा हूँ! ब्रह्मा बाबा को भाग्यविधाता कहा जाता है, शिवबाबा तो भाग्य विधाता है ही लेकिन ब्रह्मा बाबा का गायन है कि 'भाग्यविधाता ब्रह्मा' है क्योंकि शिवबाबा भाग्य बांटता तो ब्रह्मा द्वारा ही है, इसीलिए ब्रह्मा को भाग्यविधाता कहा जाता है। तो कम से कम इस नशे में तो ऊपर चले जाओ कि 'भगवान मेरा बाप' है। दुनिया वाले बिचारे सोचते हैं भगवान तो ऊँचे-से-ऊँचा है, हज़ारों सूर्यों से तेजोमय है, उसे तो देख ही नहीं सकते हैं और हम कहते हैं हमारा तो बाप है। ब्रह्माकुमार-कुमारी माना भाग्यविधाता का बच्चा। तो सिर्फ अपने भाग्य को ही याद करो कि मैं हूँ कौन ? भाग्यविधाता का मैं बच्चा हूँ। जो सारे कल्प में लक्ष्मी-नारायण का भी इतना भाग्य नहीं है, जितना हम ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों का है! जब लक्ष्मी-नारायण के रूप में हैं तो कोई यह ज्ञान इमर्ज नहीं होगा। सतयुग में ऐसे कोई नहीं कहेंगे कि मैं भगवान का बच्चा हूँ, भगवान मेरा शिक्षक है। भले ज्ञान की प्रालब्ध लक्ष्मी-नारायण पद है परन्तु उनमें यह ज्ञान इमर्ज नहीं होगा। ज्ञान संगम पर ही स्मृति में है, दुःखी से सुखी बन गये हैं तो दोनों का कान्ट्रास्ट मालूम है। वहाँ तो दुःख शब्द ही नहीं होगा।
हमने देखा है- जब ट्रान्स द्वारा सतयुग की आत्मा प्रवेश होती है, तो उसको सुनाओ कि यह दुःखी है, तो वह कहेगी कि यह दुःख क्या होता है? कई शब्द ऐसे है जैसे विकार, काम, क्रोध, लोभ वह कहेंगी यह क्या बोलते हैं, यह क्या होता है, यह क्या चीज़ है? खाने की चीज़ है या पहनने की है? उन्हों को पत्ता ही नहीं है और यहाँ तो हमको डबल नालेज है दुःख क्या, सुख क्या। दुःख से सुख में आओ तो वह टेस्ट अलग होती है। सुख ही सुख है उसमें क्या बड़ी बात है। तो अभी संगमयुग इतना अच्छा श्रेष्ठ समय है जो इस समय के भाग्य को सारे कल्प में कोई ले ही नहीं सकता है, इतना नशा और स्मृति रहनी चाहिए। यह संगमयुग कोई साधारण युग नहीं है। यह धर्माऊ युग, पुरुषोत्तम युग है और बाबा तो कहता है संगमयुग मौजों का युग है। मूँझने की बात ही नहीं है, जो मूझता है वह मौज नहीं मना सकता है, वह तो घुटके ही खाता रहेगा। एक बात जायेगी दूसरी आ जायेगी। क्यों, क्या, कैसे का सवाल आ जायेगा। कुत्ता गया तो बिल्ली, बिल्ली गई तो चूहा। तो ऐसे यह संगमयुग बीत न जाये, संगमयुग है ही मौजों का युग।
दूसरी बात - बाबा कहते आप बच्चे रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड हो। रिचेस्ट माना साहूकार से साहूकार, सारे विश्व में सबसे साहूकार आप हो। दुनिया में कोई कितना भी मिल्यूनर हो, पदमापदमपति हो, बहुत बड़ा इण्डस्ट्रियालिस्ट हो लेकिन वह सारे दिन में कितना कमायेगा? उसकी कितनी कमाई जमा होगी? बाबा ने कहा-तुम्हारे तो हर कदम में पद्म हैं। चलो कभी अवस्था नीचे ऊपर होती है, कभी अच्छी होती है कभी कैसी, चलो दो-चार घण्टे भी अच्छी अवस्था रही तो उस समय कितने कदम में पद्म जमा हो गये? मैजारिटी क्लास के टाइम दो-तीन घण्टा तो आपकी अच्छी अवस्था रहती ही है, उसमें कितने पद्म बने ? कदम में पद्म के हिसाब से। तो यह भी अगर स्मृति में रखो तो भी नशा रहेगा। कई फिर कहते हैं-हम तो बूढ़े हो गये हैं, हमें कुछ याद नहीं रहता, भूल जाता है, इससे तो पहले बाबा मिल जाता तो अच्छा होता। बाबा पर ही दोष रख देते हैं। कईयों को फिर ईस्ट-वेस्ट सबकी याद रहती है लेकिन मुरली की एक प्वाइंट याद नहीं रहती। कहेंगे आज मुरली बहुत अच्छी थी। और दो घण्टे के बाद पूछो तो सब गायब। कहेंगे आज की मुरली थी तो अच्छी लेकिन याद नहीं आ रही है। तो बाबा कहता है मैं फिर भी रहमदिल हूँ, भूल गया तो कोई हर्जा नहीं लेकिन एक शब्द तो याद रख सकते हो या वह भी नहीं। ऐसा है कोई जो एक शब्द भी याद नहीं कर सके ? वह हाथ उठा लो फिर उसको यादास्त की दवाई देंगे। सब भूल जाओ लेकिन एक बाबा शब्द नहीं भूलो, एक शब्द "बाबा" तो याद कर सकते हो या नहीं। इतना बुद्धू तो कोई नहीं होंगे ना। बाबा ने हमको चुना है तो ऐसा बुद्धू थोड़ेही कोई होगा जो 'बाबा' शब्द भी याद नहीं कर सके। बाबा शब्द तो दिल में समा गया है ना। तो दिल में समाई हुई बात भूलती है क्या ?कभी भी नहीं भूलती है, कितनी कोशिश करते हैं- वह बात भूल जाए फिर भी नहीं भूलती है। कोई को दुःख की बात लग जाती है तो वह रोता ही रहता है। पागल हो जाता है। कितना भी समझाओ तो भी दुःख की लहर आती रहती है।
तो हमारे दिल में 'बाबा' लग गया है। तो एक बाबा शब्द भी याद आया तो बाबा से जो ज्ञान मिला है वह सारा ही याद आ जायेगा। बाप से कुछ मिलता है तब तो बच्चा मानता है- मेरा बाप है। अगर बाप लखपति हो लेकिन बच्चे को कुछ भी नहीं दे तो बच्चा क्या कहेगा? कहेगा मेरा बाप ही नहीं है तो बाबा शब्द कहने से हमको बाबा का वर्सा तो याद आता है ना, प्राप्ति तो याद आयेगी ना। प्राप्ति याद आई तो सारा ज्ञान उसमें है ही। तो एक 'बाबा' शब्द कभी नहीं भूलना, स्वप्न में भी कोई भुलाने की कोशिश करे तो भी नहीं भूलना, इतना पक्का हो। तो सारे दिन की कमाई आपकी कितनी है, बहुत बड़ी कमाई है। लेकिन अगर बार-बार भूल जाते तो कितना गंवा देते। दो मिनट भी गंवाया तो कितने पदम गंवाये। हम लोग समझते हैं चलो अभी हम सम्पूर्ण नहीं हुए हैं, अभी पुरुषार्थी हैं तो थोड़ा बहुत तो भूलेंगे ना - यह भी अलबेलापन है। कई फिर सोचते हैं अभी इतने महारथी हैं, वह कोई सब सम्पूर्ण थोड़े ही बन गये हैं, इतने महारथी तो हम बने ही नहीं है। इसलिए अलबेलेपन के कारण भूलने को फ्री छोड़ देते, यह भी माया का रूप है। रीयल नहीं है, यह माया आती है अलेबेलेपन के रूप में। कहते हैं अभी विनाश थोडा ही आ गया है, विनाश तक ठीक हो जायेंगे। लेकिन बाबा कहते हैं सृष्टि के विनाश का तो सोचो ही नहीं, पहले अपने विनाश का सोचो। यह नहीं कि ज्योतिषी ने मेरे को कहा है ना, मेरी मौत तो अभी जल्दी आने वाली नहीं है लेकिन ब्राह्मण बनने के बाद सब रेखायें बदल गई हैं, गलती में नहीं रहना इसीलिए किसी का कुछ पता नहीं है।
कई सोचते हैं ९९ वे में कुछ होगा, पूछते रहते हैं। बाबा ने लास्ट मुरली में कहा ९९वें का चक्कर छोड़, अभी का सोचो। किसका भी मृत्यु कभी भी हो सकता है, वह विनाश तो सोचो ही नहीं। एवररेडी बनो। इसलिए बाबा ने कहा कि विदेही बनो माना देह में रहते जो विदेही आत्मा है उस स्वरूप में स्थित हो करके कर्म करो। काम तो करना ही है, खाली बुद्धि होगी तो व्यर्थ आयेगा, इसलिए काम को छोड़ना नहीं है। कई कहते हैं हम पुरुषार्थ तो बहुत करना चाहते हैं लेकिन यह काम जब छोड़ देंगे फिर देखना हमारी अवस्था बहुत अच्छी होगी। अरे वह काम छोड़ेंगे तो कोई काम तो करेंगे ना, काम के बिना थोड़े ही रहेंगे, लेकिन कर्म करते हुए अपनी स्थिति विदेही हो। देह को चलाने वाली मैं आत्मा हूँ, मालिक हो करके चलाओ जो भी कार्य आता है, ठीक है। ट्रस्टी बनकर चला रहे हैं लेकिन स्थिति विदेहीपन की हो। विदेही माना आत्मिक स्मृति की स्थिति में स्थित रहना, जरा भी बॉडी कान्सेस नहीं हो।
इसलिए बाबा कहता है अगर और कुछ याद नहीं आता है तो मैं ब्रह्या बाबा का बच्चा ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी हूँ- भाग्यविधाता का बच्चा हूँ - यह तो याद करो ना। बाबा याद आने से यह याद आ जायेगा, बाबा भूलता है तो सब बातें भूल जाती हैं। बस एक शब्द याद करो कि 'बाबा मेरे से करा रहा है, बाबा मेरे को चला रहा है, बाबा के साथ मैं चल रही हूँ।' जिसका साथी है भगवान उसको क्या रोकेगा आँधी और तूफ़ान। समस्या अपने आप खत्म हो जायेगी। वैसे सूली से काँटा कहते हैं लेकिन हमारे लिए वह काँटा भी खत्म हो जायेगा। बाबा कहते हैं राई भी सख्त है, रुई हल्की होती है, फूंक दो उड़ जायेगी, तो ऐसी अवस्था अभी बनानी है। इसमें आगे बढ़ो। मधुबन से कुछ न कुछ उन्नति करके जाना। मन्सा में, वाचा में, कर्मणा में सबमें कुछ ना कुछ उन्नति करके ही जाना।
आपके सम्बन्धी, आपके क्लास वाले यह अन्तर देखें कि यह मधुबन होकर आये तो इनमें कुछ फर्क दिखाई देता है। ऐसे होगा, करेंगे ऐसे या वैसे का वैसा जायेंगे? चलो यहाँ कहा, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा वहाँ गये वैसे के वैसे। ऐसे नहीं गंगा में गये तो गंगाराम, जमुना में गये तो जमुनाराम... ऐसे नहीं करना। एकदम परिवर्तन करके जाना। सभी का बाबा से प्यार तो है ना तभी तो आये हो। बाबा से प्यार है तो प्यार में न्यौछावर होना है। जो हमारी कमी बाबा को अच्छी नहीं लगती है वह मुझे नहीं करनी है। जिससे प्यार होता है उसको जो चीज़ अच्छी नहीं लगती है, वह अपने को भी नहीं लगती है। जिस समय कुछ भी बात आये उस समय यह सोचो कि बाबा को यह अच्छा लगता है? अगर बाबा को अच्छा नहीं लगता है तो मुझे क्यों अच्छा लगे ? बाबा को जो अच्छा लगता है वह मुझे अच्छा लगे, वही मुझे चाहिए, वही मुझे करना है। यह तो सहज बात है ना। बस, वही करना है। अच्छा ओमशान्ति।

श्रीमत और मुरली का महत्त्व

हम सभी ने अपने जीवन की नय्या को बाबा के हवाले कर दिया है? जब बाबा के हवाले कर दिया तो हमारा हर कदम बाबा के श्रीमत पर ही चलता है? श्रीमत पर चलने से सफलता अवश्य होगी। अगर मानों किसी भी कार्य में सफलता कम होती है या नहीं होती है तो उसका कारण है कि श्रीमत पर चलने में कुछ ना कुछ रह गया है जिसके कारण सफलता नहीं मिलती है। कई भाई बहन कहते हैं मेहनत तो बहुत करते हैं, सोचते भी बहुत हैं परन्तु जितनी सफलता होनी चाहिए उतनी नहीं होती है। उसका कारण ही है कि श्रीमत पर चलने में कोई कमी रह गई होगी। चाहे मन्सा शक्तिशाली नहीं होगी, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में आने में जो बाबा के डायरेक्शन हैं वह पूरे धारण नहीं हैं या सेवा जो करते हैं, उसमें निःस्वार्थ भाव नहीं है। बाबा कहते हैं बच्चे, निःस्वार्थ सेवा करो तो सफलता तुम्हारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। तो हमारे जन्म-सिद्ध अधिकार को हमारे से कोई छीन नहीं सकता है। बाबा कहते हैं बच्चे सफलता तुम्हारे गले का हार है, तो वह हमारे से कैसे अलग हो सकती है। इसलिए कारण सोचना चाहिए कि ऐसी कौनसी कमी है जो सफलता नहीं मिलती है? -
कभी-कभी हम समझते हैं कि हम जो कहते हैं वह बहुत राइट है लेकिन अगर राइट है तो सफलता जरूर होगी। बोल के लिए भी बाबा ने कहा है कि बोल में जरा भी व्यर्थ नहीं हो। हमारा स्लोगन है "कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो"। तो जब योगयुक्त होते हैं तो कम भी बोलते हैं, धीरे भी बोलते हैं लेकिन जब ज्यादा बोलते हैं तो जरूर योगयुक्त नहीं हैं। उस समय चाहे अभिमान के वश हैं या चाहे और किसी के वश हैं। मैं कहता हूँ फिर भी यह क्यों नहीं समझते हैं, क्यों नहीं होता है? मैंने जो कहा अथवा मैं जो समझता हूँ, वह क्यों नहीं हुआ ? वो और ज्यादा स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं।
कोई अभिमान में आकर अगर अपनी बात को ज़्यादा सिद्ध करने की कोशिश करते हैं तो जहाँ सिद्ध करते हैं वहाँ जिद्द हो ही जाता है। और जब भी कोई जिद्द करता है तो ज़रूर वह ज़्यादा बोलेगा। अपनी बात बार-बार रिपीट करता रहेगा। इसलिए बाबा कहते हैं वाणी में भी मधुरता हो। हमको लोक-संग्रह के प्रति कोई बात देनी भी है तो देने का भी ढंग चाहिए। इसमें जिद्द करने की ज़रूरत नहीं है। समझो, आप समझते हो यह रांग हो रहा है तो रांग को राइट करना तो हमारा फ़र्ज है, यह तो ठीक है। परन्तु फर्ज के स्वरूप में स्थित होकर बोल रहे हो ? मानो आपको राँग लगता है और आप उसको ठीक नहीं कर सकते हो, तो क्या करेंगे? बड़ों को देंगे अच्छा, बड़ों के आगे बात रखी फिर आपको निश्चिंत हो जाना चाहिए क्योंकि फिर आपका दोष नहीं है। अगर बात ऊपर देने के बाद फिर संकल्प चलाते, कि हमने बात तो दी लेकिन हमारी मानी नहीं, दूसरे की मान ली। इसमें दो ग्रुप हो जाते। फिर बड़ों के प्रति और व्यर्थ संकल्प चलने लग जाते है। अब वह रांग है, इसको मधुर वाणी नहीं कहा जायेगा। जो बाबा कहते हैं मीठा बोलो, कम बोलो... मधुर माना जिसमें ज्ञान की रूहानियत भरी मिठास हो। वह नहीं होती है। तो चेक करो, अज्ञानकाल में कहते हैं- पहले तौलो फिर बोलो, सोच समझकर बोलो। ऐसे नहीं जो भी आया वह मुख से बोलते रहो, पत्थर हो या कंकड़ हो कुछ भी बोलते रहो। नहीं। हम जो हैं वह अभी सोच-समझकर बोलने वाले हैं। समझ माना ही हम ज्ञानी तू आत्मा हैं। तो ज्ञान माना समझ। जो भी हमारा कदम है, चाहे बोलने का, चाहे देखने का वह ज्ञान-स्वरूप हो।
बाबा कहते हैं- बच्चे, तुम छोटे-बडे सबको सम्मान दो। सम्मान क्या देंगे? क्या उनके पांव पड़ेंगे या बार-बार हाथ जोड़ते रहेंगे? यही सम्मान है क्या? सम्मान देना माना रिगार्ड से देखना, रिगार्ड से बोलना और रिगार्ड से चलना। बाकी कई ऐसे हैं जो पहले गुस्सा करेंगे फिर हाथ जोड़ते रहेंगे तो क्या यही सम्मान है? इसलिए बाबा ने अमृतवेले से लेकर रात्रि सोने तक हर कर्म के लिए श्रीमत दी है।
कोई भी सेवा करते हो तो डबल लाक साथ में हो एक याद का लॉक दूसरा निःस्वार्थ सेवा का लॉक। सेवा में अपनापन नहीं हो, हम समझदार हैं.... यह नहीं। बाबा ने दिव्य बुद्धि बनाकर यह समझ दी है। तो जो भी कर्म करो पहले चेक करो कि यह श्रीमत है? अगर श्रीमत है तो वह करो, अगर श्रीमत नहीं है तो वह काम नहीं करना है। जैसे श्रीमत है, वैसे करना है। अगर श्रीमत के प्रमाण नहीं करते हैं तो नुकसान भी होता है और फिर दिलशिकस्त हो जाते हैं। शायद मेरा भाग्य नहीं, मेरे को पता नहीं क्या हो गया है, मेरा पार्ट ही नहीं है... ऐसे भिन्न-भिन्न फालतू संकल्प आयेंगे। इसलिए बाबा कहते हैं बच्चे, कोई भी कर्म करना है तो वह श्रीमत के आधार पर ही करो। और श्रीमत कहाँ से मिलती है? मुरली से। मुरली के लिए भी बाबा की श्रीमत क्या है? बाबा कहता है क्लास में जाना, वायुमण्डल बनाना, एक दो को सहयोग देना- यह भी आपकी सेवा है। संगठन में ही मुरली सुनना है। कोई सोचे कि यह भी तो क्लास में नहीं आता, मैं भी नहीं आऊं.. तो हमें देखकर और भी ऐसे करने लग जायेंगे। इससे कितनों के अकल्याण के निमित्त बनेंगे। अगर क्लास में जायेंगे तो उस बहन का भी उमंग बढ़ेगा, तो यह भी एक सेवा है। कोई कितना भी पढ़ा लिखा हो, वह चाहे छोटा हो या बड़ा लेकिन बहन छोटी है, लेकिन उस छोटी बहन में आपसे ज़्यादा विशेषता कौन-सी है? वह बहन भले छोटी है लेकिन सरेन्डर है, तो यह विशेष विशेषता उस बहन में है ना। बड़ों को कहो कि आप सरेण्डर होकर रहो, तो रहेंगे? छोटे-पन में ही उस बहन ने सारे संसार के जो भी सुख हैं। हैं तो दुःख ही लेकिन बाहर में तो सुख ही कहते हैं, फिर भी उसने त्याग तो किया। तो त्याग का भाग्य तो मिलेगा। आपने वह त्याग तो नहीं किया जितना इसने किया है, तो आपसे बड़ी तो हुई ना!
आप यह क्यों कहते हो यह तो छोटी है मैं तो बड़ा समझदार हूँ। समझदार कितना भी है लेकिन यह मुरली बाबा की है या उस छोटी बहन की है? क्या वह अपनी मुरली चलाती है? बाबा की मुरली पढ़कर सुनाती है ना! आप लोगों को आना चाहिए कि अगर बहन जी में कोई कमी है, तो मैं और ही उनको अलग में बैठकर सुनाऊँ, बहन जी यह ऐसा नहीं, ऐसा है। यह सेवा करो। अभिमान में क्यों आते हो ? मैं तो बहुत पढ़ा-लिखा हूँ, यह तो कुछ भी नहीं है। यह क्या है? तुम उनकी विशेषता तो देखो। तुम तो भोग-भोग करके फिर त्याग करोगे। उसने तो पहले ही त्याग कर दिया तो तुम्हारे से विशेष है या नहीं है? तो यह भी अभिमान काहे का। मुरली शिवबाबा की है, समझो दादी मुरली सुनाती है तो अपनी सुनाती है क्या ? तो कोई भी बहन जो निमित्त है चाहे छोटी है, चाहे बड़ी है लेकिन बाबा के तख्त पर बैठी है। तो बाबा ने तख्त दिया है, बाबा की मुरली सुना रही है, इसलिए तुम बाबा को ही देखो।
मुरली सुनने का भी ढंग चाहिए। मुरली ऐसे सुनो जो लगे कि बाबा मेरे से बात कर रहा है। मुरली माना क्या ? बाबा बच्चों से बातें ही तो करता है। याद-प्यार देता है, बातें सुनाता है तो मेरे से पर्सनल बाबा बात कर रहा है। ऐसे नहीं क्लास में मुरली चल रही है, थोड़ा-सा झुटका खाया, थोड़ा सा मन यहाँ वहाँ भटका और मुरली पूरी हो गई। फिर कई भाई बहनें बहुत मज़ाक करते हैं, कोई पूछे अगर कि तुमने क्या सुना तो कहेंगे - सोल कान्सेस बनना है, याद में रहना है। यह प्वाइंट तो रोज़ होती ही है।
तो मुरली को महत्त्व दो- बाबा मेरे से बोल रहा है, यह प्रैक्टिकल में अनुभव करो। यह युद्ध का मैदान क्या है? यह सृष्टि कुरुक्षेत्र नहीं, कर्मक्षेत्र है। और इसमें भगवान मुझ अर्जुन से बात कर रहा है। उस रूप से आप मुरली सुनो। बाबा पर्सनल मेरे लिए मेरे से बात करने के लिए परमधाम से आया है। अगर मैं पर्सनल किसी बहन भाई से बात कर रही हूँ तो क्या वह झुटका खायेगा ? यहाँ वहाँ बुद्धि जायेगी क्या ? अगर जाती है तो पता पड़ता है कि इसका अटेन्शन नहीं है इसलिए बात ही पूरा कर देंगे। तो मेरे लिए बाबा खास परमधाम से आया है। उस विधि से अगर आप मुरली सुनो तो बहुत मज़ा आयेगा। आज मेरे को बाबा ने क्या कहा ? अभी मेरे को बाबा क्या कह रहा है? अभी यह कहा, आज यह कहा, यह कहा... तो मुरली सुनने में बहुत मज़ा आयेगा। तो बहुत रिगार्ड से, प्यार से और मेरे लिए ही यह बाबा बोल रहा है, उस विधि से अगर आप मुरली सुनेंगे तो आपको बहुत-बहुत मज़ा आयेगा। एक लाइन भी आप मिस नहीं करेंगे। एक एक अक्षर कहते हैं भगवान के महावाक्य हैं, तो एक एक महावाक्य कितना श्रेष्ठ है और हमने एक प्वाइन्ट मिस कर ली, उसमें कितने अक्षर हुए, कितने लाखों के आपने मिस किया, एक एक महावाक्य लाखों रत्नों के हैं और हम नींद के नशे में बुद्धि यहाँ वहाँ भटकने में प्वाइन्ट ही पूरी कर दें। फिर कहेंगे, हाँ, थी तो बहुत अच्छी मुरली लेकिन बुद्धि यहाँ वहाँ होगी तो याद रहेगी क्या! इसलिए बहुत प्यार से मुरली सुनो। यह दिन आगे चलकर बहुत याद आयेंगे कि भगवान ने जो मुरली सुनाई, भगवान ने मेरे से बात की लेकिन मैंने धारण नहीं किया। तो पीछे पश्चाताप की लाइन में नहीं आये, प्राप्ति की लाइन में रहे। कोई भी अपने ऊपर उल्हना न आये, हाय मैंने यह नहीं किया, यह नहीं किया... बाबा ने तो कहा था, मैंने नहीं किया। तो यह पश्चाताप हुआ ना। इसलिए जो बाबा ने कहा है कि योग को, लगन को अग्नि रूप बनाओ यानी पावरफुल बनाओ। जीरो बल्ब भी जलता है और ५ सौ पावर का भी जलता है। दोनों की लाइट में फर्क तो होगा ना। तो बाबा की याद भूल नहीं सकती। -'बाबा और मैं' यह तो बड़े नशे से कहते हैं लेकिन 0 का बल्ब है, १०० का बल्ब है, या ५०० का बल्ब है? कितनी पावर है? तो बाबा आजकल पावरफुल बनाना चाहता है। ऐसे नहीं साधारण योग है, बस, बाबा बाबा करते रहें। बाबा कहते हैं- मेरे को क्यों दिलखुश मिठाई खिलाते हो? अपने को धोखा देते हो। बाबा को दिलखुश मिठाई खिलाते हो, तो यह नहीं करना चाहिए। अच्छी तरह से अटेन्शन रखो एक एक शब्द धारण करते चलो यह है बाबा की 'श्रीमत'। कई तो मुरली सुनते रहेंगे, घड़ी देखते रहेंगे। अभी ७.३० नहीं बजे हैं, अभी तक मुरली चल रही है.... तो यह क्या हुआ? रुचि से सुन रहे हैं कि मज़बूरी से सुन रहे हैं? यह भी क्यों होता है? क्योंकि हम सबको बहुत सहज भगवान मिल गया है। हमारा बाप बन गया है। कभी-कभी सीजन में सस्ता माल मिलता है ना। होता बढ़िया है लेकिन बहुत सस्ता मिलता है, तो भूल हो जाती है। कहते हैं इतना सस्ता होता नहीं है, यह अन्दर से खराब होगा। तो भगवान भी हमको बहुत सहज मिल गया, कोई मेहनत नहीं की है इसलिए कभी कभी साधारण समझ करके गफलत कर लेते हैं। लेकिन भले वह मेरा बाबा है, लेकिन है कौन? परम-आत्मा है। तो परम-आत्मा की वह स्मृति, वह रूहाब तो होना चाहिए ना। इसी में ही हम सबका फ़ायदा है। नहीं तो टाइम तो जा ही रहा है, टाइम तो रुकता नहीं है और हम रुक जायेंगे तो फिर किस लाइन में आयेंगे ?
बाबा ने कहा कि अभी टाइम फ़ास्ट जा रहा है, तो जब टाइम फ़ास्ट जा रहा है तो हमको भी फ़ास्ट जाना चाहिए या हमको ढीला जाना है? तो अटेन्शन प्लीज ! एक श्रीमत और दूसरा मुरली का महत्त्व। श्रीमत के बिना कदम उठाना ही नहीं है। इसमें कोई अपना रास्ता नहीं निकालना है, बस फालो करना है। अच्छा।

मन-बुद्धि को एक बाप में लगाना, एकाग्र करना ही सच्ची साधना है

हम सभी जब से बाबा के बने हैं तब से ही साधना तो कर ही रहे हैं क्योंकि हम सबके अनुभव में है कि एक ही बाबा हमारा सर्व सम्बन्धी है और एक ही बाबा से हमको सर्व प्राप्तियाँ होती हैं। तो याद अर्थात् योग व साधना क्या है? जहाँ जितना समीप का सम्बन्ध होता है उतना ही याद स्वतः आती है और दूसरा जहाँ कोई प्राप्ति होती है तो प्राप्ति के आधार पर याद सदा और सहज ही आती है यह तो सबको अनुभव है ही। तो बाबा सर्व संबंध निभाने वाला है, न सिर्फ बाबा निभाता है लेकिन बाबा कैसे निभाता है और हर संबंध से क्या-क्या अनुभव वा प्राप्ति होती है वह हम सबको अनुभव है तब तो बाबा के बनें हैं। तो साधना अर्थात् एक बाबा की याद और उस साधना में एकाग्रता हो।
भक्ति मार्ग में भी भक्त लोग भिन्न-भिन्न रूप से साधना करते हैं। जब तक वो अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, दर्शन नहीं हो जाते तब तक एक टांग पर ही खड़े रहेंगे व हठयोग की साधना करते रहेंगे। यहाँ तो ऐसे हठयोग की, एक टांग पर खड़े होने की बात नहीं, हम तो अपने मन-बुद्धि को एक में लगाते हैं- यही हमारी साधना है। तो साधना शब्द जो बाबा ने अभी कहा है, यह है तो याद की ही बात लेकिन साधना शब्द का अर्थ है उसमें एकदम हलचल न हो, एकाग्रता हो। और जहाँ एकाग्रता होती है वहाँ आप जिस स्थिति का अनुभव करना चाहते हैं वह चाहना एकाग्रता के बल से पूर्ण हो जाती है। जैसे परमधाम में हम मन बुद्धि द्वारा एक सेकण्ड में पहुँच तो जाते हैं परन्तु उसमें सदैव एकाग्रता हो अर्थात् एकरस अवस्था हो और हमेशा उसी का अनुभव होता रहे, उसके लिए फिर-फिर घड़ी-घड़ी वही पुरुषार्थ करना ना पड़े। समझो अभी आत्मा अशरीरी बनके परमधाम में बाबा के साथ पहुँच गई, स्थिति वह हो गई और फिर कोई ना कोई व्यर्थ संकल्प या कोई भी काम का संकल्प या कोई भी बाहर की हलचल भी आकर्षण करती है, कुछ भी हुआ तो हमारी जो साधना है, एकाग्रता है वह हिल जाती है। नीचे ऊपर हो जाती है तो वह साधना नहीं है। साधना का अर्थ ही है कि बस, उस स्थिति में एकाग्र होकर टिक जाना। जितना समय चाहें उतना समय हम उस स्थिति में स्थित हो जाएँ।
एक होता है पुरुषार्थ करना जैसे हमने याद किया बाबा, मैं अशरीरी आत्मा हूँ। बाबा, जैसे आप हो वैसे मैं भी आत्मा ज्योति हूँ, मैं भी परमधाम निवासी हूँ, अपने घर में बाबा आपसे मिलने आ रही हूँ... जो भी संकल्प से पुरुषार्थ करते हैं लेकिन जब साधना की स्थिति होती है तो उसमें पुरुषार्थ खत्म हो जाता है। और उसी स्थिति में स्थित हो जाते हैं यानि टिक जाते हैं, हिलते-जुलते नहीं हैं और जितना समय हम चाहें मानो हमारी रुचि है हम आधा घण्टा बाबा की याद में ही खो जाएँ। एकदम पावरफुल साधना हो तो उतना समय हम अपने मन को एकाग्र करके उसमें टिक सकें। हाँ, अपना कोई काम है हमको १५ मिनट का समय है तो वह हमारे हाथ में होना चाहिए। ऐसे नहीं कि मन हमारा चंचल हो जाए और कोई कारण से हम नीचे आ जाएँ, वह अपने वश में तो मन नहीं हुआ ना। मन के वश होकर हम नीचे न आये बल्कि मन को अपने वश में करके जहाँ चाहे, जितना समय चाहे और जिस स्थिति में चाहें स्थित हो जाएँ। कभी-कभी हमारी रुचि होती है सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा बाबा, शिवबाबा से अव्यक्त रूप में अव्यक्त मुलाकात करें, तो वहाँ भी हलचल नहीं हो, एकाग्रता हो। एकाग्रता में मन को एकदम ऐसा स्थित करो जो मन हलचल में न आ जावे।
ऐसी साधना ही जैसे 'कर्मातीत अवस्था' की निशानी है। कर्मातीत का भी अर्थ है - कर्म करते हुए कर्म के बन्धन में नहीं लेकिन कर्म को अपने बन्धन में चलाने वाले, करने वाले। जैसे कहाँ कोई बहुत सेवा किया, मेला किया, प्रदर्शनी की या नई सेवा करके आये फिर योग में बैठे तो और कोई संकल्प नहीं आयेगा लेकिन बार-बार वह सेवा का संकल्प ऐसे हुआ, बहुत अच्छा, यह भी होता तो बहुत अच्छा होता, हाँ, यह करते तो बहुत अच्छा होता... व्यर्थ संकल्प नहीं आयेगा लेकिन सेवा का संकल्प चलता रहेगा। अभी उस समय वह सेवा का संकल्प भी वास्तव में व्यर्थ है क्योंकि जिस लक्ष्य से हम योग करने के लिए बैठे, उस समय अगर हमको सेवा का संकल्प भी नीचे लाता है, जिस स्थिति में मैं टिकने चाहती हूँ उस स्थिति से नीचे आ गये तो वास्तव में ज्ञान के हिसाब से मन के ऊपर जो हमारी कण्ट्रोलिंग पावर चाहिए वह तो नहीं हुई ना! इसीलिए साधना का अर्थ है एकाग्रता से उस श्रेष्ठ स्थिति में रहना।
तो अभी से साधना का अभ्यास करो, साधन हमको खींचे नहीं। साधन, साधना को हिलावें नहीं। ऐसे नहीं कि साधन यूज़ नहीं करो, यूज़ तो करना भी पड़ता है लेकिन हमारा मन खींचे नहीं। जैसे हम दूसरों को मिसाल देते हैं कि कमल पुष्प के समान रहो। जैसे कमल पुष्प कीचड़ में रहता है, पानी में रहता है लेकिन पानी की एक बूंद भी उसको स्पर्श नहीं करती है, मिट्टी में होते हुए भी वह न्यारा रहता है। ऐसे साधनों को यूज़ करने के लिए कोई मना नहीं है लेकिन साधनों का हमारे मन पर ऐसा प्रभाव नहीं होना चाहिए जो साधन नहीं हो तो हमारी स्थिति भी नीचे ऊपर हो जाए। मानो अन्त के समय यह सब साधन जो है वह खुद ही हिलेंगे, परिस्थितियाँ ही बदली हुई होंगी, प्रकृति ही ऐसा पेपर लेगी जो साधन होते हुए भी यूज़ नहीं कर पायेंगे। तो ऐसे साधन भी धोखा दे सकते हैं। इसलिए साधन होते हुए भी हमारे मन के स्थिति को हिलावें नहीं, बिल्कुल जैसे कमल पुष्प समान रहें। यूज़ किया, आनन्द लिया और अगर नहीं हैं तो उसमें हलचल में नहीं आवे ऐसी स्थिति को कहा जाता है 'साधना'।
अभी बाबा ने कहा कि वर्तमान समय साधनों के विस्तार में बहुत चले गये हैं और सार जो 'साधना' है उसमें थोड़ी कमी पड़ जाती है तो इससे सिद्ध है कि बाबा देखता है कि बच्चे साधनों के वश हलचल में आ जाते हैं, वही बाबा हमसे चाहता है कि साधना ऐसी पक्की हो जो साधन हमको हिला न सकें। समझो हम चाहें अभी शान्त में बैठें परन्तु लाइट नहीं है, तो यही संकल्प चलता रहे कि लाइट क्यों गई ? लाइट के दफ्तर वाले अच्छे नहीं हैं, काम करते ही नहीं, आजकल के हैं ही ऐसे..... परन्तु मेरा काम यह नहीं है कि हम उनका सोचें, ऐसे फालतू कॉमन संकल्प हमारे चल गये तो साधन ने मेरे मन की स्थिति को खींचा ना! तो मन की स्थिति हमारी एकाग्र तो नहीं हुई! तो बाबा जो कहता है वह साधना पावरफुल नहीं रही, हल्की रही। साधना हम सब करते हैं और साधना चलते-फिरते भी हो सकती है लेकिन अगर साधन के वश नहीं हैं और बिल्कुल कमल पुष्प के समान हमारी स्थिति है तो चलते-फिरते भी हम मन को एक जगह पर लगाकर साधना कर सकते हैं क्योंकि कई काम ऐसे होते हैं जो बहुत हल्के होते हैं, कई काम ऐसे होते हैं जिसमें फुल बुद्धि लगानी पड़ती है, उसमें स्थिति का कुछ फ़र्क पड़ सकता है क्योंकि दो तरफ़ बुद्धि लगानी पड़ती है।
तो हम जो भी काम करते हैं उसमें बुद्धि यहाँ वहाँ नहीं है लेकिन कर्म कान्सेस हो जाते हैं, बॉडी कान्सेस भी नहीं होते या सोल कान्सेस भी नहीं हैं, कर्म कान्सेस हो जाते हैं जैसेकि यह काम ऐसे करना है, यह किया, यह ठीक हुआ, यह नहीं हुआ... ऐसे नेचरल कर्म कान्सेस का संकल्प चलता है। लेकिन जिस कर्म का अभ्यास है वह कर्म करते हुए हम साधना में रहें। हाथ-पांव का जो काम है, वह बहुत हल्का है तो उसमें बुद्धि को शिवबाबा के तरफ़ एकाग्र होके लगा सकते हैं। तो हमारा अगर अभ्यास है और थोड़ा भी टाइम हमको मिला तो हम अपनी साधना में गुम हो सकते हैं। गुम होना माना ऐसे नहीं कि सिर्फ अशरीरी हो जाएं, लेकिन इसके साथ कण्ट्रोलिंग पावर भी चाहिए। अगर हमारी साधना अच्छी है तो फिर हमारे से ऐसा कोई उल्टा काम नहीं हो सकता है।
अच्छे कर्म का प्रैक्टिकल में प्रत्यक्ष फल अच्छा ही होगा ना। अगर हमारा योग अच्छा था और रिज़ल्ट हुई कि मुरली मिस हो गयी, उल्टे रास्ते में चली गई तो सब हमारे ऊपर हँसेंगे ना। इसीलिए इसका अभ्यास चलते-फिरते भी बहुत चाहिए। जैसे बाबा ने बीच में भी कहा विदेही अवस्था का अभ्यास करो तो भले आप कितना भी बिजी रहते हो लेकिन क्या बीच-बीच में आप थोड़ा सा टाइम नहीं निकाल सकते हो ! २ मिनट, ४ मिनट नहीं निकल सकता है। जैसे ट्राफिक कण्ट्रोल के समय हम टाइम निकालते हैं ना। ऐसे अगर हम साधना का भी अभ्यास करें बीच-बीच में थोड़ा समय भी निकालें तो हम साधना का अनुभव कर सकते हैं लेकिन इसमें अटेन्शन चाहिए, इतना अभ्यास चाहिए। मन पर कण्ट्रोलिंग पावर चाहिए, मानो हमको २ मिनट मिला तो हम कन्ट्रोलिंग पावर से मन को जहाँ चाहे वहाँ उसी स्थिति में स्थित कर सकें - यह कण्ट्रोलिंग पावर बहुत चाहिए और कष्ट्रोंलिग पावर आयेगी तब जब मुझे यह निश्चय हो कि मैं मालिक हूँ, आत्मा हूँ। उस मालिकपने के नशे से आप स्वयं को कण्ट्रोल कर सकते हो।
तो हमारी यह कर्मेन्द्रियाँ जो हैं वह हमारे कर्मचारी हैं, मन-बुद्धि सूक्ष्म हैं लेकिन सूक्ष्म शक्तियाँ तो आत्मा की हैं ना। तो आत्मा की यह शक्तियाँ हमारे कण्ट्रोल में होनी चाहिए। लेकिन इन पर कण्ट्रोल उन्हीं का होगा जिनका बाबा से बहुत-बहुत एकदम दिल का स्नेह हो। एक तो होता है बाबा, आप तो हो ही मेरा, बाबा आपके बिना कौन है, हैं ही आप... एक होता है- रूह-रूहान करके मन को उस स्थिति में स्थित करना। दूसरा है जिसमें दिल का प्यार है उसको फिर वह मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बस, बाबा कहा और बाबा में समा गये, यानि लव में लीन हो गये। आत्मा परमात्मा में लीन तो नहीं होगी लेकिन लव में लीन तो होगी। और यह लवलीन अवस्था ऐसी है जो दो अलग-अलग होते भी एक हैं, उस समय आपको ऐसा आयेगा ही नहीं कि मैं अलग हूँ, बाबा अलग है। ऐसे ही लगेगा जैसे दोनों एक-दो में समा गये हैं। तो लव करने वाले नहीं बाबा आप बहुत मीठे हो, बाबा आप बहुत प्यारे हो... यह नहीं लेकिन लवलीन माना लव में एकदम समा जायें और कुछ नज़र नहीं आये, उसी अनुभव में खोया हुआ हो। जैसे सागर में खो गये तो वह लवलीन अवस्था जो है वह प्यारी और ऊँची है लेकिन इसके लिए बाबा ने हमको विदेही, कर्मातीत अवस्था का अभ्यास करने के लिए समय प्रति समय जो इशारा दिया है, वह करना पड़ेगा। जैसे बाबा ने कहा है कि कर्मातीत बन जाओ, क्योंकि कर्म का बन्धन ६३ जन्म का रहा हुआ है, वह कर्म का बन्धन चाहे पास्ट का, चाहे वर्तमान का खींचे नहीं। वर्तमान का भी तो कर्म का बन्धन होता है ना। समझो, किसका किस आत्मा से समीप का बहुत संबंध है तो वह भी कर्म का बन्धन हो गया ना। वह कर्म का बन्धन बीच में ज़रूर विघ्न डालेगा। तो कर्मातीत का अर्थ ही है कर्म का बन्धन नहीं खींचे, कर्म करें लेकिन न्यारे होकर कर्म भी पूरा करें और जिसके साथ कर्म में आते हैं उससे भी प्यारे बनें और बाबा के भी प्यारे बनें। तो कर्मातीत अवस्था का भी अभ्यास चाहिए। इसी को बाबा ने दूसरे शब्दों में कहा-'विदेही' बन जाओ यानि देह की आकर्षण न हो। ६३ जन्म हम देह की आकर्षण में ही रहे और बॉडी कान्सेस नेचुरल हो गया। बॉडी कान्सेस तो न चाहते हुए चलते-फिरते भी हो जाते हैं क्योंकि ६३ जन्म का अभ्यास बॉडी कान्सेस का है। अभी बाबा कहते हैं बॉडी कान्सेस न होके, सोल कान्सेस बनो। मैं मालिक हूँ इस बॉडी की कर्मेन्द्रियों को चलाने वाली हूँ।
पहले तो बॉडी के वश थे, उसी कान्सेस में रहते थे, अभी बाबा कहते हैं नहीं, सोल कान्सेस और सुप्रीम सोल कान्सेस बनो और जब तक सोल कान्सेस नहीं होंगे तो सुप्रीम सोल कान्सेस नहीं होंगे। इसलिए हर मुरली में आपने नोट किया होगा कि बाबा बार-बार कहते हैं कि अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। आत्म-अभिमानी बनो, देह भान छोड़ो, बच्चे बॉडी कान्सेस में नहीं आओ। भिन्न-भिन्न रूप से हर मुरली में यह पाठ ज़रूर होगा, वह भी ४-६ बारी से भी ज़्यादा ही होगा। तो यह क्यों होता है? क्योंकि फाउण्डेशन ही यह है। जब तक हमारा यह फाउण्डेशन पक्का नहीं है, हम आत्म-अभिमानी नहीं हैं तो हमको बाप की याद कैसे आयेगी। कनेक्शन ही नहीं जुटेगा ना। रबर उतरा ही नहीं तो करेन्ट कैसे आयेगी। जैसे यह तार है इससे रबर नहीं उतरा हुआ हो तो आप सारा दिन उसको जोड़ने की कोशिश करो, जुटेगी नहीं। तो यह बॉडी कान्सेस का रबर जो है वह उतरा नहीं और हम सोचते हैं- आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध हो जाए तो वह कैसे होगा ? होता ही नहीं। फिर कोई-न-कोई बात में आ जायेंगे, कोई-न-कोई संकल्प में आ जायेंगे, चाहे निगेटिव में जाओ, चाहे वेस्ट में जाओ, चाहे कोई भी साधारण संकल्पों में जाओ तो जो एम है वह पूरी नहीं हो सकती है। इसीलिए आत्मा का निश्चय, आत्मा का नशा यह बहुत जरूरी है अगर वह नशा नहीं है तो बाबा को इतनी याद नहीं रह सकती है जितना आप चाहते हो।
बाबा क्यों कहते कि बच्चे नशे में रहो, नशे में क्या होता है? सारी सुधबुध भूल जाती है। ऐसे हम आत्मा बन जाएँ यानि उस स्थिति में स्थित हो जाएँ तो आत्मिक नशा ऐसा है जो और सब बॉडी कान्सेस या बॉडी कान्सेस के दुनिया के जो भी साधन हैं उसको भूल जायेंगे। एक ही तरफ मन-बुद्धि लग जायेगी तो ऐसी साधना बाबा चाहता है लेकिन इसके लिए अभ्यास बहुत चाहिए। बुद्धि की आदत जो है, बुद्धि में संस्कार पड़ गये हैं निगेटिव और वेस्ट के। वह तो ६३ जन्म का अभ्यास है, न चाहते समझो कोई बात हो गई, किसकी सुनी, किसकी देखी जो रांग है, है रांग लेकिन उसकी गलती को देख करके हमको उसके प्रति निगेटिव संकल्प चलता है, आदत हो गई है, ६३ जन्म का संस्कार है। लेकिन जिसके प्रति निगेटिव चलेगा तो उसके प्रति थोड़ी ईर्ष्या या घृणा भाव ज़रूर आयेगा। शुभ भावना के बजाए उससे किनारा करने का सोचेंगे। अच्छा मानो १०० परसेन्ट वह रांग है। परन्तु वह रांग है, ठीक है लेकिन मेरे को उसकी फीलिंग आ गई तभी तो निगेटिव संकल्प चला ना। कोई क्रोध करता, ग्लानि करता या इनसल्ट करता है तो बहुत करके इसमें ही निगेटिव संकल्प चलते हैं। अच्छा उसने रांग किया और मैंने उसके निगेटिव की फीलिंग अपने अन्दर धारण की तभी मेरा निगेटिव संकल्प चला, तो वह रांग है और मेरे को जो फीलिंग आ गई और निगेटिव संकल्प चला तो क्या यह मैं राइट हूँ? बाबा ने कहा है कि वह क्रोध करता है, इनसल्ट करता है वह तो रांग है लेकिन आपने उसके प्रति सोच लिया, आपके अन्दर ईर्ष्या भाव या निगेटिव संकल्प उस आत्मा के प्रति आया तो रिज़ल्ट क्या हुई? आप राइट हुए ? उसका रांग आपको फील होता है और अपना रांग जो है, वह फील ही नहीं होता है तो अपने आपकी फीलिंग होनी चाहिए ना, कि दूसरे की गलती जल्दी में कैच हो गई और अपनी गलती कैच ही नहीं होती है। हम कहेंगे मेरा कोई दोष नहीं था, मैंने कुछ नहीं किया, इसने ही किया लेकिन फीलिंग तो उसकी आपको आई ना !
तो जब दूसरे की फीलिंग आती है तो जरूर अपने अन्दर भी कुछ है, इसीलिए ऐसी स्थिति अगर हमारी है बिल्कुल ही वेस्ट नहीं चले, फीलिंग नहीं आवे, चलो बात हुई, फुलस्टॉप। रांग को रांग समझना रांग नहीं है क्योंकि हम नालेजफुल हैं ना। तो नालेजफुल होने के कारण रांग को रांग तो समझेंगे हीं लेकिन उसके पीछे हमारी भावना बदल जाये, सोचने लगें कि यह तो है ही ऐसी, यह फालतू है, इससे बात ही नहीं करनी चाहिए भिन्न-भिन्न रूप से जो मन में एक किनारा हो जाता है, वह रांग है। तो ऐसी अपनी करेक्शन करके अपनी बुद्धि खाली करनी चाहिए, हमारी बुद्धि बिल्कुल क्लीन, क्लीयर हो, उसमें कुछ भी भरा हुआ न हो। तो तपस्या का अर्थ ही है कि हम अपने मन का मालिक बनके और अपने मन को जिस स्थिति में जितना समय चाहें, वैसे अपने को एकाग्र करके टिका सके-उसको कहते हैं तपस्या।
बाबा ने जो हमें शुरू में साधना सिखाई उसका प्रभाव इतना था जो साधन न होते भी कुछ फीलिंग नहीं आती थी। तो जो साधना को है उसका बल उसकी ताकत अभी भी है जिससे अवस्था हलचल में नहीं आती है। तो मन को 'साधना' में ऐसा बिजी रखो जो बुद्धि और कहीं जाये ही नहीं। ऐसे साधन कोई खराब चीज़ नहीं हैं, बाबा तो कहते हैं यह साइन्स के साधन भी तुम्हारे इस ज्ञान को स्पष्ट करने के लिए निकले हैं। तो वह साधन सेवा के प्रति भले यूज़ हो और आवश्यकता के अनुसार यूज़ करना रांग नहीं है। लेकिन साधनों की आकर्षण वश नहीं होना चाहिए। इसके लिए साधन छोड़ो और साधना में ही रहो, ऐसे भी नहीं करना है। टू मच साधनों के अधीन न हो।
देखा-देखी में यह भी होना चाहिए, यह भी होना चाहिए... वह जैसे साधन के वश हो गये। कई बार आवश्यकता भी नहीं होती है लेकिन एक शौक होता है या आकर्षण होती है उस साधन के तरफ, तो मैं सोचूँगी कि यह भी होना चाहिए.... यह हुआ साधन के वशीभूत होना। बाकी आवश्यकता है सेवा के प्रति या स्वयं के प्रति जरूरी है तो उसको बाबा रांग नहीं कहता है। तो साधन अलग चीज हैं, साधना अलग चीज है। साधन को यूज़ करना है लेकिन कमल पुष्प समान।
तो आप सब भाग्यवान हैं जो टाइम पर बाबा के पास पहुँच गये, अभी भी साधना करने का समय है। लेकिन जब हलचल शुरू हो जायेगी तो उस हलचल का सामना करने में भी टाइम देना पड़ेगा। उस समय अभ्यास नहीं होगा तो साधना नहीं कर सकेंगे और हलचल में टिक नहीं सकेंगे इसीलिए बाबा बार-बार भिन्न-भिन्न रूप से इशारा दे रहा है। एक तो कर्म के बन्धनों को चेक करो, एकदम मैं क्लीन हूँ? किसी भी तरफ़ लगाव तो नहीं है? लगाव की निशानी ही है हमारी उस तरफ बीच-बीच में बुद्धि झुकाव में आयेगी, किसी भी रूप से इसको यह करना है इसके लिए यह करना है, इसको यह मदद करनी है... ड्युटी आपकी है तो वह भले करो लेकिन हमारी ड्‌युटी भी नहीं है, वैसे ही हमारा मन आकर्षित होता है, तो यह रांग है, इसको कहते हैं 'लगाव'। और यह लगाव ऐसी चीज़ होती है जो जरूरत भी नहीं है, हमारी कोई जिम्मेवारी भी नहीं है लेकिन कोई गुण या कोई स्वभाव के प्रति उनसे आकर्षण हो जाती है, गुण के उपर भी आकर्षण होती है-यह बहुत अच्छा योग कराती है ऐसे-ऐसे...। यह गुण भी उसको बाबा ने ही दिया है तो जब बाबा ने उसको गुण दिया तो बाबा का गुण हुआ ना! उसका कोई स्पेशल है क्या! तो बाबा को याद करो आकर्षण बाबा में होनी चाहिए। एक दो से टचिंग आनी चाहिए कि इसका भाव क्या है, इसकी भावना क्या है? तो सच्ची और पावरफुल साधना के लिए हमारे मन का लगाव कहाँ भी आत्माओं के प्रति नहीं होना बाहिए। कभी कभी कोई कहते हैं मुझे यह सहयोग देते हैं ना। सहयोग देना तो बहुत अच्छी चीज़ है लेकिन उस सहयोग से आत्मा का आत्मा से कनेक्शन वा लगाव तो मन का नहीं हो गया। यह भी चेक करना चाहिए कि मेरे मन का झुकाव तो उसमें नहीं हो गया है? तो मन को क्लीयर रखना, बुद्धि को क्लीयर रखना - यह साधना के लिए बहुत ज़रूरी है। कर्म अच्छा किया, सहयोग दिया या उसके गुण को देखा - यह तो अच्छा कर्म है, परन्तु उसके बन्धन में आ जाना वह कर्मातीत बनने नहीं देगा क्योंकि बन्धन कोई भी हो वह अपने तरफ खींचता तो है ना, अभी देखो तबियत खराब होती है तो कर्म का बन्धन है ना। यह भी पिछला खाता है, लेकिन तबियत खींचती तो है ना, और खींचे नहीं इसको कहते हैं 'कर्मातीत'। तो लगाव को भी सूक्ष्म रीति से चेक करना चाहिए क्योंकि लगाव बहुत प्रकार का होता है, हम समझते बहुत राइट हैं, मेरे मन में तो हमेशा शिवबाबा ही रहता है। लेकिन यदि कोई आत्मा का आधार, कोई आत्मा का गुण, कोई आत्मा का सहयोग... मुझे उस आत्मा की याद दिलाता है तो यह भी कुछ ना कुछ लगाव हुआ। तो बुद्धि के लगाव को चेक करना चाहिए और जब तक यह सूक्ष्म डिफेक्ट होगा तब तक साधना नहीं हो सकती। ऐसे तो हम ज्ञानी, योगी तू आत्मा हैं, योग लगेगा, लेकिन एकाग्रता वाली साधना नहीं होगी। इसीलिए सब प्रकार से एकदम बुद्धि क्लीयर और क्लीन हो, मन एकाग्र हो इसको कहा जाता है 'पावरफुल साधना'।
तो अभी जो बाबा चाहता है वह लक्ष्य पक्का रख करके हम उसी लक्षणों को अपने में प्रैक्टिकल में लायेंगे तो बाबा भी हम लोगों को देखकर खुश होगा। बाबा खुश तो रहता ही है लेकिन हमारी खुशी देखके बाबा एक्स्ट्रा खुश होता है -वाह मेरे बच्चे, वाह! अच्छा ओमशान्ति।

आत्म-अभिमानी, अशरीरी, विदेही और कर्मातीत अवस्था में अन्तर

मैं समझती हूँ कि यह चारों शब्द जो हैं वह है तो कुछ लगभग, नज़दीक ही हैं परन्तु मैं समझती हूँ जो विदेही अवस्था है या कर्मातीत अवस्था वह वह अशरीरी वा आत्म-अभिमानी अवस्था से ऊँची है।
आत्म-अभिमानी स्थिति के लिए मैं ऐसा समझती हूँ कि आत्मा अपने भान में रहें। आत्म-अभिमानी माना आत्मा मालिक होकर इस शरीर की कर्मेन्द्रियों को चलाये, आत्मा अपने पोजीशन में रहे। शरीर तो साथ में है ही जब छूटेगा तब देखेंगे, बाकी आत्मा मालिक होके अपने पोज़ीशन में रहे और सब कर्म भी हो और स्थिति भी अच्छी हो। मैं समझती हूँ यह 'आत्म-अभिमानी' की स्टेज है। बाबा हमेशा कहते हैं- बच्चे, अपने को आत्मा समझकर परमात्मा से योग लगाओ। तो पहली स्टेज है आत्म-अभिमानी बनना। फिर जो आत्म-अभिमानी की स्टेज में रहते-रहते, साइलेन्स की ऊँची स्टेज में एक परमात्मा की याद में खोये हुए रहते, आत्मा-परमात्मा का जैसे मिलन हो, समानता हो, जिसमें शरीर का भान एकदम जैसे ना के बराबर हो, उस स्थिति को 'अशरीरी अवस्था' कहेंगे। तो अशरीरी बनना माना मैं और बाबा दोनों ही साथ में, मिलन में मगन हैं या समाये हुए हैं। शरीर में होते हुए भी शरीर के भान से जैसे मुक्त हैं। शरीर का भान खीचें नहीं।
बाकी विदेही और कर्मातीत अवस्था इसमें मैं समझती हूँ कि विदेही अवस्था जो है वो बिल्कुल जैसे देह से परे एकदम परमधाम में बाबा के साथ हैं, जिसमें इस इस देह की दुनिया का, साधनों का कुछ भी भान न हो। बिल्कुल परमधाम में आत्मा, परमात्मा के साथ बैठी है बस, उसी में खोई हुई है। तो विदही अवस्था और कर्मातीत अवस्था में थोड़ी समानता है। कर्मातीत अवस्था विदेही के बहुत नजदीक है, विदेही अवस्था का अभ्यास होगा तो हम कर्मातीत हो जायेंगे, हमारा यह विचार है। अच्छा ओमशान्ति।

परमात्म-प्यार ही निःस्वार्थ प्यार है, इसके रिटर्न में सिर्फ समान बनो

शिवबाबा व ब्रह्मा बाबा से हम सबका कितना प्यार है? वर्णन कर सकते हैं, कितना प्यार है? इस दुनिया में कोई दृष्टान्त ही नहीं है। एक गीत है- सागर से गहरा, गगन से ऊँचा तेरा प्यार है... लेकिन यह भी जैचता नहीं है क्योंकि इस दुनिया का दृष्टान्त बाबा से लगता ही नहीं है। वह बहुत ऊँचा है लेकिन प्यार सबका है और उसी प्यार ने ही यहाँ तक लाया है। तो हम सभी से बाबा क्या चाहता है? हम सब बच्चों में बाबा की एक ही आश है, वह क्या है? बाबा की हम सब बच्चों में यही आश है कि मेरा एक-एक बच्चा मेरे समान बन जाए। तो इतना प्यार कोई बाप कर सकता है!
तो परमात्म-प्यार की कितनी विशेषतायें हैं- निःस्वार्थ प्यार है। वैसे आत्माओं का आत्माओं के साथ प्यार तो होता है लेकिन उसमें स्वार्थ भरा हुआ होता है। चलो, वर्तमान नहीं हो तो भविष्य। आगे चल करके यह करेगा, वह करेगा... कोई ना कोई स्वार्थ होता है। और आजकल के दुनिया में तो प्यार नहीं है, है ही स्वार्थ। लेकिन परमात्म प्यार निःस्वार्थ है क्योंकि बाबा को स्वार्थ किस चीज़ का हो, वह खुद ही दाता है तो दाता देने वाला होता है। उसको हमसे चाहिए क्या! और हमारे पास ऐसा है भी क्या जो वह हमसे स्वार्थ रखे। हाँ, कल्याण की भावना ज़रूर रखता है कि मेरे बच्चों में जो अवगुण है, जो कमियाँ हैं वह मेरे को दे दें। कोई ऐसा बाप देखा! जो और कोई स्वार्थ नहीं रखे लेकिन कल्याण की भावना रखे कि इसकी कमज़ोरी मैं ले लूँ, तो यह श्रेष्ठ बन जाएँ और उसके लिए देखो, बाबा रोज महावाक्य उच्चारण करते हैं। ऐसा कोई पिता देखा होगा जो बच्चों को रोज़ पत्र लिखे, लक्ष्मी-नारायण भी नहीं लिखेगा लेकिन एक ही परमात्मा पिता है जो रोज़ तीन पेज का पत्र भेजता है। मुरली क्या है? पत्र। इतना प्यार से और इतना बड़ा पत्र बैठके बाबा रोज़ लिखे, यह कोई कम है! ऐसा बाप देखा कभी, सारे कल्प में मिला कोई ऐसा! तो हमारा बाबा ऐसा है, इसको कहा जाता है 'परमात्म-प्यार'।
और ऐसा वरदाता भी कोई नहीं देखा होगा, चाहे गुरु लोग वरदान देते हैं लेकिन रोज़ वरदान देंवे, ऐसा गुरु कोई देखा है किसने ! और ऐसा टीचर देखा जो इतनी दूर से पढ़ाने आये। परमधाम कितना माइल है? गिनती कर सकते हैं? लेकिन हमारा टीचर रोज़ परमधाम से हमारे लिए आता है। हरेक कहेगा हमारे लिए, यह नहीं कि फलानी दादियों के लिए आता है, इसके लिए आता है... हमारे लिए आता है। हम कभी कारणे-अकारणे मिस कर भी लेवें लेकिन बाबा कभी मिस नहीं करता। तो कितने समय से और कितना एक्यूरेट हमारा टीचर हमको शिक्षा दे रहे हैं। किसी का भी टीचर इतना दूर से रोज़ आवे, ऐसा टीचर भी कभी नहीं देखा ! तो बाबा का बच्चों से इतना प्यार है जो पत्र में शुरू से लेके अन्त तक कितनी बार मीठे बच्चे, मीठे बच्चे, मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चे, लाडले बच्चे... कहता है। मीठे बच्चे ऐसे नहीं करो, मीठे बच्चे ऐसे चलो। तो ऐसा बाप कोई और हो सकता है! वह तो दूर से ही कहेगा हाँ, ठीक है। बच्चे भी आजकल ऐसे ही हैं, दूर से ही गुडमार्निंग किया और चल पड़े लेकिन हम लोग ऐसे बच्चे भी नहीं हैं।
बाबा अगर यादप्यार देता है तो हम रिटर्न में बाबा को भी रोज यादप्यार देते हैं ना, मुरली सुनते हैं तो बाबा जब यादप्यार देता है तो हम भी रिटर्न में देते हैं। इसलिए हमारा एक गीत है इतना प्यार करेगा कौन...। लक्ष्मी-नारायण के बच्चे या बच्ची को भी इतना प्यार नहीं मिलेगा जितना हमको अभी बाबा दे रहा है, और बाबा की विशेषता देखो ! बाबा के लिए हमारे अन्दर इतना प्यार क्यों आता है? हम लास्ट जन्म में किस अवस्था में आये। सब पुराना संस्कार भी पुराना, स्वभाव भी पुराना, शरीर भी पुराना (चत्तियाँ लगा हुआ, ऑपरेशन किया हुआ)... तो ऐसे हम आये और बाबा ने हमारा कोई अवगुण नहीं देखा। बाबा भले कभी-कभी मुरली में मीठा-मीठा उल्हना भी देता है कि मैंने तुमको क्या दिया और तुमने मुझे सर्वव्यापी कहके गालियाँ ही दी, वह भी कितने मीठे रूप में बोलता है। फिर भी बाबा ने यह देखा क्या? यह मेरी ग्लानि करने वाले हैं, गिराने वाले हैं और गिरे हुए हैं, पतित हैं, अवगुणी हैं, स्वभाव-संस्कार बहुत खराब हो गया है... यह सब बाबा ने नहीं देखा। तो बाबा ने अवगुण न देख करके, कोई की बुराई न देख करके यहीं कहा बच्चे, तुम मेरे और मैं तेरा। हमने कहा 'बाबा' और बाबा ने कहा-'बच्चे'। तो यह सेकण्ड में सौदा हो गया ना! अगर कोई दिल से कहता है- बाबा मेरा। तो बाबा से ज़रूर रेसपाण्ड मिलता है। बाबा भी कहते हैं- बच्चे तुम मेरे। और सेकण्ड में अगर किससे पहचान हो जाती है और पहचान से हम कहते हैं- आप तो मेरे हो और वह भी कहें हाँ, आप मेरे हो। तो मेहनत क्या लगती है? सेकण्ड की बात है।
तो बाबा ने किसका भी कुछ अवगुण नहीं देखा, जो भी है बाबा हमेशा कहता है- जो हो, जैसे हो मेरे हो। हम भी कहते हैं बाबा आप जो हो, निराकार हो, परमधाम निवासी हो हमारे हो। तो बाबा से कितना अच्छा सौदा हो गया। कोई मेहनत लगी क्या ? ऐसे ही बाबा कहते हैं आप भी ब्राह्मण परिवार के हो आप भी किसके अवगुणों को नहीं देखो। मानो किसी भी आत्मा में कोई बुराई है, ६३ जन्म के संस्कार हैं तो कुछ ना कुछ बुराई है ही तब तो बाबा के बने। बाबा ने इस बारी हम सबको एक शिक्षा पावरफुल रूप से दी है कि 'किसका भी निगेटिव नहीं देखो'। निगेटिव माना जो खराब चीज़ है, हरेक में कोई एक विशेषता वा गुण भी है और एक वह पास्ट का संस्कार भी पक्का है, जिसको हम कहते हैं यह मेरी नेचर है। कई भाई-बहन कहते हैं कि हमारे में और कुछ नहीं है लेकिन पता नहीं हमें क्रोध क्यों आ जाता है। मैं चाहता नहीं हूँ, समझता भी हूँ कि नहीं करना चाहिए लेकिन आ जाता है। कोई कहता है मेरे में अभिमान या अहंकार आ जाता है, उसको कहते है- 'मेरी नेवर' है। वाहता नहीं हूँ मेरी नेचर है, न चाहते हुए भी हो जाता है। तो ऐसी नेचर भी हरेक की कोई ना कोई उल्टी-सुल्टी होती है। और एक विशेषता भी सभी में है। बाबा कहते हैं ९ लाख की माला में जो लास्ट वाला होगा, उसमें भी विशेषता ज़रूर होगी, नहीं तो भगवान ने आपको अपनाया ! भगवान की परख राँग नहीं हो सकती है। बाबा ने आपको अपना बनाया और आपने कहा मैं बाबा का हूँ, मैं ब्रह्माकुमार हूँ। तो आपको बाबा ने अपनाया तो ज़रूर आपमें विशेषता है तभी बाबा ने आपको विशेष आत्मा बनाया। यह हो ही नहीं सकता है कोई भी ब्राह्मण आत्मा कहे कि मेरे में तो कोई विशेषता नहीं है। अपनी विशेषता आप खुद नहीं जानते हो यह हो सकता है। अवगुण तो प्रसिद्ध हो जाता है, आप भले नहीं जानो लेकिन दूसरे को फील होता है फिर वह कहता है तो पता पड़ जाता है।
बाबा ने हरेक की विशेषता को देख उस विशेषता को कार्य में लगवाया और उस विशेषता को कार्य में लगाने से वह और ही आगे बढ़ गया। तो अपने में जो विशेषता है उसको कार्य में लगाओ। बाबा ने हर एक को कोई न कोई विशेषता दी है। बाबा की दी हुई विशेषता को मेरी विशेषता समझ करके अभिमान में नहीं आना है। कई कहते हैं मेरे में यह विशेषता है, मेरी विशेषता को क्यों नहीं जानते हैं, मेरी विशेषता को यूज़ करना चाहिए, मेरे मेरे में आते हैं तो फिर वह विशेषता दब जाती है। ऊपर से मिट्टी आ जाती है। मेरापन आ गया तो वह काम में नहीं आती है। मेरी नहीं, यह प्रभु की देन है। प्रभु की देन को कभी भी अपना नहीं माना जाता है। तो बाबा की दी हुई विशेषता को जितना कार्य में लगायेंगे उतना खुशी होगी और शक्ति बढ़ती जायेगी।
दूसरी बात - बाबा कहता है कि निगेटिव नहीं देखो। लेकिन है ही निगेटिव तो निगेटिव दिखाई तो देगा, है ही बुरी बीज़। बुरी चीज़ को अच्छा कैसे करें! लेकिन फिर भी बाबा कहता है कि निगेटिव को भी पॉजीटिव में चेंज करो। यह हो सकता है? जैसे गुलाब के फूल की पैदाइस खाद से होती है ऐसे बुराई से भी अच्छाई ले लो। जब हमारी क्रियेशन में इतनी शक्ति है तो हम गुलाब के फूल तो क्या लेकिन सारे प्रकृति के रचयिता हैं, तो हमारे में यह ताकत नहीं है! कोई कहते हैं वह गाली दे रहा है तो मैं कैसे समझें कि यह महिमा कर रहा है लेकिन बाबा कहता है निगेटिव को पॉजीटिव में चेंज करो। वह क्रोध कर रहा है, सारा ही झूठ बोल रहा है, तो कैसे चेंज करेंगे? कई कहते हैं वैसे मुझे क्रोध नहीं आता है लेकिन जब कोई झूठ बोलता है तो फिर मेरे को बहुत क्रोध आता है। फिर नहीं सहन हो सकता है। तो बाबा कहता है कोई झूठ बोलता है वह आपको बुरा लगता है क्योंकि वह रांग है लेकिन उसके प्रति आपको क्रोध आया तो क्या यह किसी मुरली में श्रीमत है कि अगर कोई आपकी ग्लानि करे तो आप क्रोध करो! क्या यह राइट है? उसको अगर हम राइट करने चाहते भी हैं तो मैंने भी गलती की, उसने भी गलती की, तो गलत वाला गलत को ठीक कैसे कर सकता है, बंधा हुआ बंधे वाले को छुड़ा सकता है? तो यह क्या हुआ, इससे फ़ायदा कुछ नहीं। अच्छा वह क्रोध करता है, झूठ बोलता है और मैं अगर सहन कर लूँ, सहनशक्ति अपने में धारण कर लूँ तो सहनशक्ति अच्छी या उसने झूठ बोला मैंने क्रोध किया वह अच्छा है, क्या अच्छा है? अगर सहन कर लिया तो अपने लिए ही किया। और बाबा की श्रीमत है कि सहनशक्ति धारण करो, उसके कारण सहन किया। मैंने ४० बारी सहन किया, ४१ वीं वारी मैंने थोड़ा बोल दिया। लेकिन हमने कोई उस आत्मा के लिए सहन नहीं किया। मैंने श्रीमत -मानी है, बाबा कहता है 'सहनशील बनो'। भगवान की श्रीमत मैंने मानी तो उसका पुण्य कितना होता है!
भगवान की श्रीमत मानना, बाप को खुश करना और जिस बच्चे पर बाप खुश होता है, उसको कितनी अन्दरूनी ताकत मिलती है। लेकिन ४० वारी सहन किया और ४१ वां वारी आग में जलते हुए में एक मिट्टी के तेल का बूँद डालके सारा खत्म कर दिया। सहन अगर हम करते भी हैं तो बाबा के श्रीमत को देख करके सहन करते हैं। तो निगेटिव को पॉजीटिव में चेंज करो। चलो अगर कोई झूठ बोलता है लेकिन मैं अगर सच्ची हूँ, तो सच कभी छिपता नहीं है। और सच्चे बाप के साथ में मैं सच्ची हूँ तो बाबा से ही सारा काम है कि आत्मा से है? बाबा तो हमको देख रहा है। बाबा को सामने रखो तो कभी भी निगेटिव, निगेटिव रूप से नहीं दिखाई देगा, पॉजीटिव दिखाई देगा। अगर व्यर्थ सोचते हैं तो व्यर्थ सोचने से एनर्जी बहुत वेस्ट जाती है क्योंकि जो संकल्प व्यर्थ होता है, वह बहुत फ़ास्ट जाता है। एक सेकण्ड में पता नहीं कहाँ-कहाँ पहुँच जायेंगे। ज्ञान का मनन करेंगे, शुभ चिंतन करेंगे तो उसकी स्पीड स्लो होती है। तो बाबा कहते हैं अभी अपने श्वांस की, संकल्प की बचत करो... जो खज़ाने बाबा ने दिये हैं, यह वेस्ट क्यों करते हो? व्यर्थ माना ही वेस्ट, जो कोई काम के नहीं। तो व्यर्थ नहीं करो, शुद्ध संकल्प से संकल्पों के खज़ाने को बचाओ। तो यह बाबा की जो आज्ञा है, उसके ऊपर खास अण्डरलाइन करो तो जो बाबा चाहता है 'हर बच्चा मेरे समान बनें', वह बन जायेंगे। अच्छा।

डबल विदेशी भाई-बहनों के प्रश्न -दादी गुल्जार के उत्तर

प्रश्न- जब हम आप दादियों का स्नेह देखते हैं उसके आधार पर हम सबको बाबा के नज़दीक आने का भाग्य मिलता है तो हम आपस में कैसे तरीका अपनायें ताकि हम आपस में यह प्यार एक-दूसरे को दे सकें, ले सकें ?
उत्तर - हम लोगों का आपस में भी प्यार है और आपसे भी बहुत प्यार है। बाबा प्यार का सागर है, हम लोगों ने प्रैक्टिकल में शिवबाबा और ब्रह्माबाबा के प्यार का अनुभव किया है और हम आपस में भी शुरू से ही प्यार में रहें हैं क्योंकि हम सबको बापदादा ने यही शिक्षा दी कि बच्चे आप लोगों के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है। विश्व में यह जो भिन्नता है भिन्न-भिन्न धर्म, जाति, रंग हैं, संस्कार भिन्न-भिन्न हैं, इस भिन्नता को मिटाने की ज़िम्मेवारी बाबा ने हम सब पर रखी। यह लक्ष्य बाबा ने हमको शुरू से ही दिया, भिन्न-भिन्न हैं और रहेंगे लेकिन तुम्हारी ज़िम्मेवारी है सबको मिलाके एक जैसा बाप समान बनाना।
तो जो बच्चा आज्ञाकारी होता है उसको अन्दर ही अन्दर बाप की दुआयें मिलती रहती हैं और वही सूक्ष्म दुआयें उनकी पालना का आधार बन जाती हैं। बाबा ने आते ही हम सबको यह कहा कि तुम सब बच्चे भिन्न-भिन्न वृक्ष की, भिन्न-भिन्न टालियों की शाखायें आई हो लेकिन मेरे को ही तुम बच्चों को एक चन्दन का वृक्ष बनाना है। तो हमको बाबा ने पहले ही यह एकता का पाठ पक्का कराया है कि तुम सब एक हो, एक बाबा के हो और यह एकता ही विश्व का परिवर्तन करेगी। तो यह बाबा के जो शब्द हैं वह बचपन से ही हम लोगों के कानों में सदा गूंजते हैं कि एक के हैं, एक होके रहना है और एकता हमारा स्वधर्म है।
तो शुरू से ही हम दादियों का आपस में बहुत स्नेह रहा है। और बाबा के दिल की दुआयें जो हैं वह जैसे एक लिफ्ट मिलती है। अपने पुरुषार्थ की मेहनत नहीं लेकिन एक लिफ्ट के रूप में मदद मिलती रहीं है। और उसी आधार से हम आगे बढ़े हैं। सेवा में अलग होते हुए भी हम यह पाठ कभी भी नहीं भूले हैं। और हमने देखा है कि संस्कार तो सबके एक जैसे नहीं हो सकते हैं। थोड़ा फर्क तो रहता ही है और विचार भी एक जैसे नहीं होते लेकिन हम उस भिन्नता में नहीं जाते, ऐसे कोई भी नहीं कहते कि मेरा विचार ही ठीक है। हम देखते हैं कि सर्विस में किस विचार से सफलता है? तो हमारे सामने बाबा और बाबा की सेवा है। बाबा ने हमको क्या पाठ पढ़ाया है और सेवा में सफलता किन विचारों के आधार पर होती है? तो बाबा सामने आने से विचार भिन्न होते भी कभी हम लोगों की आपस में डिस्कसन नहीं चलेगी, जिस कारण से टाइम वेस्ट नहीं होता। एक-दो के विचारों की आपस में लेन-देन करते, रिगार्ड देके जो मैज़ारिटी फाइनल हो जाता है उसमें हम फिर हाँ जी, हाँ जी करते हैं। डिस्कस नहीं करते हैं कि मैं समझती हूँ मेरा ही विचार अच्छा है, यही होना चाहिए... इसमें हम नहीं जाते हैं। बाबा सामने आने से डिस्कसन खत्म हो जाती है और जो मैज़ारिटी का संकल्प है, उसको प्रैक्टिकल करने में सब एक-दो के सहयोगी बन जाते हैं और सर्व के सहयोग से जो भी यज्ञ में कारोबार चलते हैं, हर कार्य में सफलता बहुत सहज होती है क्योंकि हम बाबा को सामने रखते हैं। तो आपस में विचारों की, संस्कारों की भिन्नता होते भी हम सब मन-बुद्धि से एक हैं। बाबा को सामने रखने से एक हो जाते हैं और जहाँ एकता है, संगठन है वहाँ सफलता है ही है।
प्रश्न - बाबा को हम प्रत्यक्ष करें उसके लिए क्या प्रेरणायें हैं? उसके लिए हमारी क्या तैयारी हो और वातावरण कैसे बनायें। ?
उत्तर - हर एक बच्चे का बाबा से प्यार तो है ही। बाबा के प्यार में तो सभी काफी परसेन्ट तक पास हो। विशेषकर आजकल हम देखते हैं कि जो नये जिज्ञासू आते हैं उनका बाबा से प्यार बहुत जल्दी हो जाता है और दिल से होता है बाकी और बातों में भले थोड़ा टाइम लगता हो। बाबा से प्यार है तब तो ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी बने हैं और चल रहे हैं। तो जब बाबा से प्यार है तो जिससे भी प्यार होता है उसके प्रति हम अपने आपको न्यौछावर करने के लिए तैयार हो ही जाते हैं। तो बाबा को प्रत्यक्ष करने का ख्याल तो हम सभी को है ही क्योंकि बाबा से सबका जिगरी प्यार है। अब बाबा को दो प्रकार से प्रत्यक्ष करना है-
१. सेवा द्वारा २. अपने चेहरे और चलन द्वारा। चलन और चेहरा प्राप्ति का हो। हम कहे नहीं कि हमें खुशी मिली है लेकिन हमारा चेहरा दिखावे कि इन्हों को कोई अलौकिक प्राप्ति है। इनके चेहरे में खुशी की झलक है या शान्ति की रेखायें हैं या यह शक्ति-रूप हैं। यह डगमग होने वाले नहीं हैं, एकरस रहने वाले हैं। लोगों को अन्दर से ऐसा महसूस हो। हमारा चेहरा ही चैतन्य म्युजियम का काम करे। तो बाबा कहते कि आपकी चलन और चेहरे से ऐसा सबूत दिखाई दे जो अनुभव करें, और पूछे। उनके दिल में यह शुभ संकल्प उठे कि यह इन्हों को कहाँ से मिला है, कैसे मिला है?
सेवा द्वारा बाबा को प्रत्यक्ष करने के लिए पहले हर एक की नब्ज जरूर देखनी चाहिए। अगर उसकी इच्छा नहीं है, जिज्ञासा नहीं है और आप उसको सारा ज्ञान दे दो, सप्ताह कोर्स एक ही दिन में दो लेकिन उनके पल्ले तो कुछ नहीं पड़ेगा। तो नब्ज देख करके पहले उनकी धरनी बनाओ। उनको खुद इच्छा हो कि हाँ, इन्हों को जो मिला है वह हमको भी प्राप्त करना चाहिए और जहाँ से हुआ है वहाँ का परिचय हमको लेना चाहिए।
इसके लिए हमें अपनी बुद्धि को बिल्कुल साफ रखना है। बुद्धि में कोई किचड़ा न हो माना बुद्धि में इधर उधर की बातें नहीं हों। बुद्धि सदा क्लीन, क्लीयर और केयरफुल हो। उसी धारणा से हम जिज्ञासूओं को समझाते, कोर्स कराते तो उसको तीर लगता है। तो हम अपनी धारणाओं से बाबा को सहज प्रत्यक्ष कर सकते हैं।
प्रश्न- हम अपना विचार सागर मंथन आप जैसा कैसे बनायें ? किस बात का अटेन्शन रखें ?
उत्तर- हम विचार सागर मंथन या मनन किस बात पर करेंगे? जो बाबा ने दिया है, उसी पर ही मनन करेंगे, मन की बातों पर तो मनन नहीं करेंगे। हम मनन करके कोई बाहर की स्टोरीज़ आदि भी नहीं सुना सकते। वह तो भक्तिमार्ग वाले हमसे अच्छी स्टोरीज़ जानते हैं, सुनाते हैं। जैसे हम बाबा की प्वाइंटस को प्रैक्टिकल में स्वयं अनुभव करके, विस्तारपूर्वक बुद्धि में स्पष्ट करके दूसरों को सुनाते हैं। उसमें अपनी मिक्स नहीं करते। मिक्स करने से आत्माओं को इतना फ़ायदा नहीं होता। अगर कोई स्टोरी रूप में सुनाता है तो वह अपने में फँसाता है और अपने में फँसाना यह बहुत बड़ी गलती है। कहेंगे यह बहन बहुत अच्छी है, यह बहुत अच्छा सुनाती है। अच्छी तरह से स्पष्ट करके सुनाती है। अरे, बहन ने लाया कहाँ से? बाप से लाया। मानो कोई मेरे गुण को देख करके मेरे तरफ़ आकर्षित होते हैं, दादी बहुत अच्छी है, दादी से बहुत कुछ मिलता है, लेकिन दादी ने लाया कहाँ से? बाबा से लाया ना! मेरे तरफ़ अगर कोई आकर्षित होता है तो यह वास्तव में हमारी गलती है। ऐसे नहीं मैं बहुत होशियार हूँ इसलिए सब मेरे पीछे पड़ते हैं। यह खुशी की बात नहीं है, यह सेवा की सफलता नहीं है, यह आत्माओं को अपने में फसाके बाबा से बेमुख करना है, बिचारा वंचित रह जायेगा क्योंकि आत्मा को, आत्मा से वर्सा नहीं मिल सकता। वर्सा बाप से ही मिलता है। तो अगर बाप से उसका कनेक्शन नहीं जोड़ा, तो उस आत्मा के कल्याण के निमित्त बनें या अकल्याण के ? क्योंकि आजकल की दुनिया बॉडी कान्सेस बहुत है, वह विदेही बाप को बहुत मुश्किल से पहचान सकते हैं, इसलिए देह में फसना तो उन्हों को आदत है, चाहे अलौकिक देह में, चाहे लौकिक में फैसे-वह तो उन्हों का ६३ जन्म का संस्कार है, वह तो जल्दी फँस जाते हैं लेकिन हमको अटेन्शन रखना है कि कोई भी आत्मा मुझ देहधारी की आकर्षण में नहीं आवे। गुणों की आकर्षण में भी आते हैं तो भी रांग है, गुण दिया किसने ? अच्छा, सेवा में बहुत अच्छी है, सेवा सिखाई किसने ? तो फाउन्डेशन यह होना चाहिए कि जिज्ञासु का बुद्धियोग बाप से जुटे। परमात्मा से उसे कुछ प्राप्ति हो। मेरा भाषण सुनकर सिर्फ अच्छा-अच्छा नहीं कहे। इस बात का बहुत अटेन्शन चाहिए। इसके लिए पहले हमारा कनेक्शन शिवबाबा से ठीक जुटा रहे। इसलिए कभी भी अपना मनन नहीं करना। बाबा की प्वाइन्ट्स का मनन करना और मनन करके बाबा की स्टोरी, बाबा के यज्ञ की कोई स्टोरी है वह भले सुनाओ लेकिन बाहर की स्टोरीज़ नहीं सुनाओ। उसे सुनने में तो मजा आयेगा लेकिन प्राप्ति कुछ नहीं होगी इसीलिए इसका अटेन्शन रखना है।
प्रश्न - दादी जी, अशरीरी, विदेही और आत्म-अभिमानी स्थिति का अनुभव क्या है?
उत्तर - विदेही माना देह का भान अपने तरफ खीचें नहीं। हम आत्मा इस देह में हैं, आत्मा बनके शरीर से कर्म करा रहे हैं। आत्मा बनके और उस आत्मिक स्थिति में स्थित होके कर्म भी कर रहे हैं, चल भी रहे हैं, सब कुछ कर रहे हैं-वह आत्म-अभिमानी स्थिति है। शरीर में रहते हुए भी आत्मा जैसे मालिक बनकर कर्म करा रही है। और अशरीरी माना शरीर में हैं लेकिन शरीर के भान में नहीं आवें, बिल्कुल ही जैसे न्यारे हैं। शरीर का भान हमको नीचे नहीं खींचता है। और जो विदेही अवस्था है वह है परधाम की स्टेज। एकदम देह रहित आत्मा, जैसे बाबा देह से मुक्त है! जैसे कि देह है ही नहीं! वैसे हम आत्मायें भी असली रूप में तो देह में थे ही नहीं, पीछे आये पार्ट बजाया फिर हम देहधारी बनें तो विदेही अवस्था जो है वह है परमधाम की स्टेज। जो बिल्कुल ही हम परमधाम में विदेही बाबा के साथ एकदम विदेही स्थिति में स्थित हो जायें। तो इन तीनों स्टेज़ेस का लगभग साथ-साथ का कनेक्शन है। तो आत्म-अभिमानी अर्थात् आत्मा कर्मेइन्द्रियों का मालिक है, अशरीरी माना कर्म करते शरीर और कर्म के भान से न्यारा हो जाए। और विदेही अवस्था है बिल्कुल देह एमएमके भान से परे परमधाम निवासी आत्मा बन जायें। बाकी विस्तार तो बहुत है। अच्छा।

बाबा के साथ का अनुभव करने के लिए मन-बुद्धि को क्लीन और क्लीयर रखो

हम सब कहते हैं कि बाबा आप हमारे साथ हो। तो बाबा के साथ का अनुभव होता है? बाबा साथ है तो हम चाहे जितने भी कमज़ोर हैं लेकिन हमारा साथी सर्वशक्तिवान है, तो सर्वशक्तिवान के साथ की शक्ति कमज़ोर में भी आ जाती है। जैसे साथ में कोई बहुत ताकत वाला होशियार होता है तो दिल में यह पक्का होता है कि मेरे साथ जो है वह बहुत होशियार ताकत वाला है। साथ की हिम्मत आ जाती है, डर नहीं रहता। ऐसे ही बाबा कहते हैं अगर आपको यह निश्चय है, अनुभव करते हैं कि बाबा मेरे साथ है तो फिर जो भी बातें सामने आती हैं, चाहे व्यक्ति द्वारा चाहे प्रकृति द्वारा, वैभवों द्वारा उसमें हमको साथ का बल निर्भय बना देता है। तो यह चेक करना है कि हम कहते तो हैं बाबा हमारे साथ है। बाबा ने कहा है कि दो बांहों वाले का साथ याद रहता है लेकिन हज़ार भुजा वाला बाबा क्यों भूल जाता है! साकार में अगर कोई बहादुर हमारे साथ होता तो हम निर्भय हो जाते और हज़ार भुजाओं वाला बाबा हमारे साथ है तो फिर हम घबरायें क्यों! साथ का अनुभव तो कई करते हैं लेकिन कहते हैं मदद का अनुभव नहीं होता है। मदद का अनुभव क्यों नहीं होता? बाबा साकार में तो है नहीं। ब्रह्मा बाबा भी अव्यक्त रूप में है, शिवबाबा तो है ही निराकार। तो वह अव्यक्त व निराकार सूक्ष्म रूप में है। सूक्ष्म रूप का अनुभव अगर हम सूक्ष्म रूप से करें, मन बुद्धि सूक्ष्म हैं, हाथ पांव या और कोई कर्मेन्द्रियाँ दिखाई देती हैं, उनको जैसे चाहें घुमाते हैं। मोटी बीज़ हैं। लेकिन निराकार शिवबाबा और ब्रह्या बाबा दोनों ही सूक्ष्म हैं तो सूक्ष्म का अनुभव जब तक हम सूक्ष्म द्वारा नहीं करेंगे तब तक नहीं होगा। सूक्ष्म मन और बुद्धि हमारी क्लीयर होनी चाहिए। जैसे कोई भी चीज़ अगर क्लीयर नहीं है, कुछ मैल लगी है या कुछ ढका हुआ है, बीच में कुछ आ गया तो वह चीज़ काम नहीं करेगी। ऐसे शिवबाबा वा ब्रह्मा बाबा के साथ का अनुभव करने के लिए मन और बुद्धि बहुत क्लीयर चाहिए। मन, बुद्धि द्वारा शिवबाबा के साथ बहुत गहरा सम्बन्ध चाहिए। ऐसे नहीं वह परमात्मा सर्वशक्तिवान है, सबसे ऊँचा है.. यह दिमाग के रूप में नहीं जानना लेकिन मन और बुद्धि से दिल का सम्बन्ध पहले जुटा हुआ हो। अगर मन बुद्धि द्वारा शिवबाबा ब्रह्मा बाबा से गहरा सम्बन्ध नहीं है, दूर का सम्बन्ध है, तो साथ का अनुभव नहीं होगा। तो पहले हम यह सोचें कि बाबा के साथ का अनुभव करने के लिए दिल का, मन बुद्धि का पहले जिगरी सम्बन्ध है। जैसे स्थूल में कोई भी सम्बन्ध हमारा बहुत समीप का है, प्यार का है तो कहाँ भी होंगे, मन द्वारा एक सेकण्ड में वहाँ पहुँच जायेंगे। जैसे कोई की माँ है, छोटा बच्चा है वह अमेरिका में है और माँ लंदन में है। लेकिन माँ का सम्बन्ध प्यार का गहरा है। तो एक सेकण्ड में उसके पास पहुँच जायेंगे। टिकिट की भी ज़रूरत नहीं है। इसी रीति से अगर बाबा के साथ का अनुभव करना है तो पहले यह क्वेश्चन उठता है कि मैंने नालेज के आधार से बाबा को जाना है या दिल के अति स्नेह के सम्बन्ध से माना है? कहने में तो आता है बाबा मेरा सब कुछ है, माता भी है, बंधु भी है, बच्चा भी है... लेकिन अगर दिल के समीप का सम्बन्ध है तो जैसे स्थूल में बात आती तो उस समय जो सहयोग दे सकता है, वह याद आयेगा। चाहे वह कहाँ भी हो लेकिन याद आयेगा कि यह मेरे को मदद कर सकता है, यह मेरा साथी बनकर समस्या का हल कर सकता है, इसी रीति से अगर हमारे दिल के स्नेह का सम्बन्ध बाबा से है तो कैसी भी परिस्थिति हो बड़ी हो, छोटी हो कामकाज की हो या शरीर की हो, किसी भी प्रकार की कठिन बात सामने आये तो बाबा ही याद आयेगा क्योंकि वही हमारा सब कुछ है। लौकिक सम्बन्ध में तो कोई फिर भी यथाशक्ति मदद कर सकता है लेकिन सर्वशक्तिवान बाबा हमको सर्व रूप से, सर्व सम्बन्ध से मदद कर सकता है।
तो बाबा के साथ का अनुभव करने के लिए पहले चेक करो कि हमारे मन में और कोई संबंध का आधार तो नहीं है? जिससे गहरा सम्बन्ध होगा वही ऐसे टाइम पर मदद के लिए याद आयेगा। तो मेरे मन का सम्बन्ध, आत्मा का सम्बन्ध इतना गहरा है? अगर गहरा सम्बन्ध है तो बाबा के सिवाए और कोई याद नहीं आयेगा। पहले मन को चेक करो और देखो कि मन बिल्कुल क्लीयर है और मेरा सम्बन्ध स्नेह का गहरा है या नहीं? अगर गहरा नहीं है, याद करना पड़ता है तो समझो कोई परिस्थिति आई, हम फौरन याद करेंगे बाबा तो मेरा रक्षक है, बाबा ने कहा तो है मैं तुम्हारे साथ हूँ, उस समय योग लगाने लगूं... लेकिन मन क्लीयर है ही नहीं तो योग लगेगा ही नहीं। उस समय पुरुषार्थ करने से कुछ नहीं होगा। लेकिन नेचुरल आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से है तो वह स्वतः याद आयेगा। जिससे सम्बन्ध है वही याद आयेगा मानो माँ से इतना नहीं है, फैण्ड से है, तो फ्रैण्ड ही याद आयेगा। तो बाबा के साथ का अनुभव करने के लिए पहले यह चेकिंग करो कोई भी व्यक्ति से सम्बन्ध अगर गहरा होगा तो बाबा से नहीं होगा क्योंकि जहाँ बाबा है वहाँ और कोई दिल में बैठ ही नहीं सकता है। और अगर बाबा के साथ का अनुभव होता है, संबंध की फीलिंग आती है तो उस समय की अवस्था क्या होती है? हम लोगों को साकार में भी साथ का अनुभव है और अव्यक्त व निराकार के साथ के सम्बन्ध का भी अनुभव है इसलिए कभी अपने ऊपर बोझ महसूस नहीं होता। लेकिन जिन्हें इसका अनुभव नहीं है तो सोचते हैं बाबा बैठा है ना, बाबा है तो सही ना। ज़िम्मेवार तो वह है ना। ऐसे-ऐसे क्वेश्चन उठते हैं लेकिन अनुभव नहीं होता। अनुभव हो तो कभी अपने को कमज़ोर नहीं समझेंगे। हज़ार भुजा वाला बाबा साथ है ऐसी रीयल फीलिंग प्रैक्टिकल में आती है तो उस समय इतना बल आ जाता है जो परिस्थिति उसके आगे बहुत छोटी-सी लगती है क्योंकि साथ का अनुभव होगा। तो बाबा ऊँचे-से-ऊँचा है और साथ के अनुभव से हमारी स्थिति भी ऊंची हो जाती है। हम ऊँचे हो गये तो परिस्थिति कितनी भी बड़ी हो, वह छोटी ही दिखाई देगी। जैसे प्लेन में ऊपर जाते हैं तो सारी दिल्ली एक मॉडल लगती है। वैसे आप एक एरिया भी नहीं घूम सकते। तो ऊंचा जाने से वह परिस्थिति वा हालतें सब छोटी दिखाई देती हैं। दुनिया वाले कहते हैं पहाड़ राई के समान दिखाई देता है, बाबा ने कहा राई भी नहीं रुई। राई फिर भी सख्त होती है, रूई को ऐसे फूंक दो तो उड़ जायेगी। ऐसे ही बाबा साथ है तो उसी समय कोई बड़े-से-बड़ी परिस्थिति भी जैसे कुछ नहीं है। तूफ़ान भी एक मनोरंजन खेल लगेगा फिर माया वार नहीं कर सकती, वह खुद ही भाग जायेगी। लेकिन इसके लिए पहले हमारा संबंध गहरा है? और बाबा से अटूट प्यार है? कई बार जिस समय कोई बात होती है उस समय प्यार पैदा होता है, बाबा आप तो सर्वशक्तिवान हो, आप तो क्षमा के सागर हो.... उस समय याद आता लेकिन साधारण रीति से वह स्मृति इमर्ज नहीं रहती, मर्ज रहती है। कई फिर साथ रहते भी हैं लेकिन समय अनुसार उस साथ को प्रयोग में नहीं लाते।
हम लोगों को तो बाबा के साथ का ऐसा अनुभव है, जो सब तरफ़ ना होते भी बाबा के साथ का जब हम प्रयोग करते तो बाबा के साथ का बल इतना मिलता है, बाबा तो बुद्धिवानों की बुद्धि है, वह किसी की भी बुद्धि को टच कर लेता है। और जो असम्भव है वह इतना सहज सम्भव हो जाता है जो समझ भी नहीं सकते कि यह ना से हाँ हुई कैसे! लेकिन यह है बाबा के साथ की मदद। कई कहते हैं बाबा साथ तो है लेकिन कोई को बाबा बहुत मदद देता है, हमें मदद कम देता है, पता नहीं क्यों ? बाबा से रूह-रूहान तो करते हैं लेकिन क्लीयर जवाब नहीं मिलता है? हम तो बाबा के पास सब रखते हैं, बाबा यह है, यह है... बाबा के आगे क्वेश्चन भी रखते हैं लेकिन उत्तर नहीं मिलता है। कोई को मिलता है, कोई को नहीं मिलता है कारण ? क्या जिसको उत्तर मिलता है उससे बाबा का विशेष प्यार है, जिसको नहीं मिलता है उससे कम है? बाबा का तो गीत है मुझे काँटों से भी प्यार है, फूलों से भी प्यार है। फिर कारण क्या होता है? हमारी बुद्धि कैच नहीं कर पाती है क्योंकि सूक्ष्म है ना। कोई स्थूल आवाज़ तो आयेगा नहीं। बाबा कोई आवाज़ से तो कहता नहीं है कि बच्ची ऐसे करो, ऐसे नहीं। यह तो सूक्ष्म टच करता है, परन्तु हमारी बुद्धि सूक्ष्म है ही नहीं, युद्ध में है, बाबा को याद करते हैं फिर थोड़ा बाड़ीकान्सेस में आ जाते हैं। फिर कहते अभी तो बाबा को याद करना है, अभी सेवा भी याद नहीं करनी है। तो युद्ध की स्थिति जो होती है उसमें मन बुद्धि क्लीयर नहीं होता है, उसमें लगा हुआ बिज़ी है, खाली नहीं है। जैसे फोन मिलाते हैं और लाइन बिजी है तो हमको रेसपाण्ड कैसे मिलेगा। तो पहले हम देखें कि हमारा मन-बुद्धि कहाँ इंगेज़ तो नहीं है? युद्ध कर रहे हैं तो इंगेज़ हुआ ना। फिर बाबा का रेसपाण्ड कैसे मिलेगा। अगर वह कर भी रहा है तो हमको कैसे सुनने में आयेगा, कैसे होगा। इन्स्ट्रुमेंट ठीक होना चाहिए। फोन एक तरफ़ बहुत अच्छा पावरफुल है, दूसरे तरफ़ नहीं है तो रेसपाण्ड मिलेगा क्या! तो पहले अपने मन-बुद्धि को क्लीयर करना चाहिए, बिल्कुल क्लीन जिसको बाबा कहते हैं "साफ़ दिल मुराद हाँसिल।" साफ़ दिल नहीं है तो जो हमारी आशायें या संकल्प हैं वह पूरे नहीं होते हैं, इसमें बाबा का दोष नहीं है, पता नहीं क्यों... फिर दिलशिकस्त हो जाते हैं। बाबा मेरे से बात ही नहीं करता, रेसपाण्ड ही नहीं देता। फिर कोई न कोई व्यक्ति को अपना साथी बना देते हैं। लेकिन बाबा क्यों नहीं उत्तर देगा, बाबा बंधा हुआ है, हमको बाबा ने अपना बनाया है, बाबा ने हमको ढूँढा है, हमको तो परिचय ही नहीं था। तो बाबा बंधा हुआ है, जैसे माँ बाप छोटे बच्चे के लिए ज़िम्मेवार हैं। यह तो बाबा है, यह तो धोखा देगा ही नहीं। बाबा तो क्षमा का, प्यार का सागर है, हमको भीख नहीं मांगनी चाहिए, हमारा तो अधिकार है। कई तो रॉयल भिखारी बन जाते हैं। बाबा आप करो ना, बाबा आपको करना चाहिए ना। बाबा आज मेरे फलाने सम्बन्धी की बुद्धि का ताला खोलना, बाबा आज मेरा यह काम ज़रूर कराना... ऐसे जैसे भिखारी। हमारा अधिकार है, बाबा ने हमको ढूंढकर अपना बच्चा बनाया है। क्या आप बाबा को पहचानते थे? हमने बाबा को नहीं ढूँढा, बाबा ने हमें ढूंढकर अपना बनाया है तो हमारा अधिकार है, अधिकार से बाबा को याद करो, रूह-रूहान करो तो क्यों नहीं बाबा रेसपाण्ड देगा। रेसपाण्ड माना कोई आवाज़ नहीं देगा। लेकिन बाबा से जो आपने बात कही, समझो आपने बाबा पर अधिकार रखा, दिल से बाबा पर कोई कार्य छोड़ा तो बाबा खुद ज़िम्मेवार होकर उस कार्य को पूरा करता है-यह रेसपाण्ड हुआ। तो आपको यह अनुभव होगा, कई बार बातों की उलझन में होते हैं, उधेड़बुन में लग जाते हैं तो बाबा के रेसपाण्ड का अनुभव नहीं होता है। लेकिन बाबा का रेसपाण्ड चाहिए, बाबा की मदद का अनुभव चाहिए तो उसका आधार बुद्धि एकदम क्लीन और क्लीयर चाहिए। यहाँ वहाँ फैसी हुई बिज़ी नहीं बाहिए। अगर हम बाबा की सेवा में बिजी हैं, तो बाबा की सेवा में बुद्धि क्लीयर रहेगी। अगर बाबा की सेवा है यह याद नहीं है, मेरी ज़िम्मेवारी है, मैं कर रही हूँ... यह अगर आ गया तो सेवा करते वह सफलता की मदद नहीं मिलेगी क्योंकि 'मैं-पन' आ गया ना।
बाबा ने सुनाया है कि माया के आने के दो दरवाज़े हैं- 'एक मैं और दूसरा मेरा'। अभी यह हद का मैं और मेरा इन दोनों दरवाजों को बंद कर दो। मैं और मेरे करने की आदत पड़ी हुई है तो जब मैं शब्द बोलो तो यह सोचो कि मैं कौन, असली स्वमान से मैं कहो और जब मेरा कहते हो तो कहो 'मेरा बाबा'। सारे दिन में मेरे-मेरे का कितना विस्तार होता है और एक "मेरा बाबा" इसमें सब समाया हुआ रहता है। मेरा-पन क्यों होता है? मेरे से कोई प्राप्ति होती है, सुख मिलेगा, शान्ति मिलेगी, जो ज़रूरत है वह पूरी हो जायेगी इसीलिए तो मेरा मेरा आता है और बाबा से तो सब कुछ मिलता है। हद के मेरे से आपको अल्पकाल की प्राप्ति होगी और बाबा तो अविनाशी है उससे अविनाशी प्राप्ति होगी। सब प्राप्ति -होगी। तो अनेक मेरे के बजाए अगर मेरा कहना है तो कहो 'मेरा बाबा'। मैं वह श्रेष्ठ आत्मा हूँ, परमात्मा की बच्ची हूँ। मैं अनादि बाबा के साथ थी, आदि में मैं दिव्यगुणधारी आत्मा थी, वह याद करो... अज्ञान के वश जो 'मैं-मैं' करते हैं, वह कितने बाडी-कान्सेस होते कभी अभिमान आयेगा, कभी क्रोध आयेगा। इसलिए इन दोनों दरवाज़ों को बंद रखना चाहिए। उसके लिए बाबा ने सबको डबल लॉक दिया है। एक पावरफुल याद और दूसरी निःस्वार्थ रूहानी सेवा। यह डबल लाक है। अगर यह डबल लॉक लगा लो, इसी में ही मन-बुद्धि को बिज़ी रखो तो समझो आपने माया के आने का दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर माया वापस चली जायेगी। इसलिए बाबा कहते सदा मैं और मेरा जो ओरीजनल स्वरूप है। आत्मा का बाप तो कोई बन ही नहीं सकता, बॉडी का बाप है... मैं ओरीजनल आत्मा हूँ.. तो इस नालेज को स्मृति में रखो। वैसे जो भी कोई याद आता है, व्यक्ति या वस्तु याद आती है तो ज़रूर उससे कोई न कोई प्राप्ति होती है। तो बाबा से क्या-क्या प्राप्ति होती है, वह हमारे सामने इमर्ज होनी चाहिए। कोई किसको लायक बनाता है, तो भी उसकी याद आती है। मैं बेसमझ था लेकिन इसने मेहनत करके ऐसा योग्य बना दिया। कमाने के योग्य, रॉयल्टी से चलने के योग्य बना दिया। तो बाबा ने हमको क्या-क्या प्राप्ति कराई है और बाबा ने हमको क्या-क्या बनाया है, यह दोनों ही बातें अगर सदा इमर्ज रहें तो बाबा के साथ का अनुभव अवश्य होगा। अधिकार रखो। बाबा आया किसलिए है! बाबा कहता मैं आफर करता हूँ, तुम मेरे साथ को प्रयोग करो। मेरे को यूज़ करो। यह कोई कम बात नहीं है? तो क्यों नहीं हम अधिकार रखें। बाबा बंधा हुआ है। ऐसे नहीं बाबा आपने कहा था ना, आप करेंगे ना ? आप करो ना... ऐसे चिल्लाओ नहीं। हमारा अधिकार है, बाबा बंधा हुआ है। भगवान कभी अपनी प्रतिज्ञा से बदल नहीं सकता, हम बदल सकते हैं, भगवान नहीं बदल सकता। तो अधिकार से बाबा को कहो, बाबा आप जानो।
हम सबका बाबा से प्यार है, याद भी है लेकिन इमर्ज रूप में नहीं रहती है। कोई जज है, लेकिन इमर्ज रूप में स्मृति नहीं है कि मैं जज हूँ, घर में घरू बन जायेगा, बाप बन जायेगा, भाई बन जायेगा तो वह नशा नहीं होता है। कुर्सी पर बैठने से वह इमर्ज होता है, तो वह नशा रहता है। इसी रीति से बाबा भी कहता है- निश्चय है, नशा है लेकिन मर्ज रहता है, काम में नहीं लाते हैं। कोई भी चीज बढ़िया है लेकिन काम में नहीं लायें तो वह चीज़ पड़े-पड़े पुरानी हो जायेगी। काम में नहीं लाया तो उसका फ़ायदा तो लिया ही नहीं। तो बाबा कहते हैं आप सभी बच्चों में शक्तियाँ, गुण सब कुछ है, नशा भी है प्यार भी है लेकिन टाइम पर यूज़ नहीं करते हो। किसकी आदत होती है चीज़ बहुत अच्छी सम्भाल कर रखेंगे लेकिन टाइम पर वह याद नहीं आयेगी। सामने होते भी नहीं मिलती। परेशान होते रहते। फिर जब समय पूरा हो जायेगा तब याद आयेगी। भटकती हुई बुद्धि होती है तो जजमेंट ठीक नहीं होती है, तो जो बाबा ने पाठ पक्का कराया है कि टाइम पर यूज़ करो। जब बाबा की आफर है कि मैं तुम्हारे साथ हूँ तो बाबा की आफर आप क्यों नहीं यूज़ करते। बाबा से प्यार तो है ना ऐसा कोई नहीं जो कहे मैंने सुना है, लेकिन दिल से प्यार नहीं है। बाबा से सबका दिल से प्यार है... जब प्यार है तो प्यार के साथ प्राप्ति को भी इमर्ज करो। इसलिए बाबा बार-बार कहते - यूज़ करो अर्थात् स्मृति में लाओ। अनुभव में खो जाओ यह है यूज़ करना। यह सहज है या मुश्किल है? सहज करेंगे तो सहज हो जायेगा। मुश्किल कहेंगे तो छोटी चीज़ मुश्किल हो जाती है।
बाबा हमें कितने नशे की बातें सुनाते हैं, अगर वह इमर्ज हों, बाबा क्या देता है, क्या बनाता है, बाबा सागर है तो मैं मास्टर हूँ, ऐसे अगर स्मृति आयेगी तो स्मृति के नशे से आप असम्भव से सम्भव कर सकते हैं। हम मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, यह स्मृति में लाओ तो स्मृति से समर्थी आती है। कर्म कान्सेस नहीं बनो, इमर्ज करो मैं कौन हूँ, किसका बच्चा हूँ, बाबा क्या है, मैं कौन हूँ, इस स्मृति से साथ का भी अनुभव करेंगे, नशा भी अनुभव करेंगे और जो आपका संकल्प है उसमें सफलता आ जायेगी।
अव्यक्त बापदादा की पालना कोई कम नहीं है, सूक्ष्म रूप से बाबा बहुत मदद करता है तो उसका फायदा उठाओ। फायदा उठाने आता है ना? बाबा ने जो स्मृतियाँ दी हैं, रोज बाबा टाइटल देता है उसे ही याद रखो तो नशा चढ़ेगा। जैसे बाबा कहता है- आप मेरी आँखों के तारे हो, तारा आँखों में समाया होता है। तुम मेरे बच्चे कल्प कल्प के सिकीलधे हो.... कभी कहेगा विश्व के मालिक हो, कभी कहेगा दिव्यगुणधारी हो, कितने टाइटिल, कितने वरदान बाबा देता है उसमें भी कितना बल होता है। मुरली को अगर मन में रिवाइज़ नहीं किया तो याद नहीं रहेगा। हमारी आयु बड़ी है या बुद्धि बिज़ी रहती है, चलो ३ पेज़ भूल जाएँ, वरदान तो याद रख सकते हैं, वरदान भी मानो भूल गया, एक अक्षर तो याद रख सकते हैं, मेरा बाबा, बस। वह तो याद आ सकता है। बाबा याद आया तो वर्सा आयेगा ही। बीज में झाड़ समाया हुआ है लेकिन दिल से कहो "मेरा बाबा", मुख से वर्णन करना उच्चारण करना वह अलग चीज़ है। तो इमर्ज करो, स्मृति में लाओ। समझो कोई विघ्न आता है, बाबा ने हमको कहा तुम मेरे निर्विघ्न बच्चे हो। बाबा ने मेरे को क्या बनाया। मैं निर्विघ्न आत्मा हूँ, अगर यह स्मृति आई तो विघ्न को सामना करने की शक्ति आ जायेगी। इसलिए अपने अन्दर रिवाइज़ करो, स्मृति में लाओ, बस। अच्छा ओमशान्ति।

सर्वशक्तिवान बाप साथ है तो सदा मौज में रहो, न मूंझो न घबराओ, न कभी दिलशिकस्त हो

सभी बाबा की छत्रछाया में बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव कर रहे हैं और सदा यह अनुभव हमें उड़ती कला में ले जाते हैं। तो हम सभी सिर्फ सुनने वाले नहीं है लेकिन अनुभव करने वाली विशेष आत्मायें हैं।
आजकल बाबा की जो हम बच्चों में शुभ आशायें हैं वह बाबा हर मुरली में सुनाते ही रहते हैं। और हम सबके अन्दर भी शुभ आशा क्या है? बाबा जो कहता है वह हमें करना ही है। हमें बाप समान बनना ही है। बनेंगे, नहीं बनेंगे, पता नहीं... यह नहीं है। लेकिन हम सभी ने यह दृढ़ संकल्प ले लिया है कि हमें बनना ही है क्योंकि बाबा ने हमें त्रिकालदर्शी बना दिया है, हम तीन लोकों को, तीन कालों को जानते हैं इसलिए क्वेश्चन उठने की तो बात ही नहीं है।
ब्रह्मा बाबा तो बहुत उमंग-उत्साह से हम बच्चों को देखते हुए कहते थे - तुम्हीं वह बच्चे हो ना, तुम्हीं बने थे, याद है या भूल गये हो! कितने बार हम बने हैं? अनगिनत बार! जो अनगिनत बार काम किया जाता है उसमें कोई मुश्किल नहीं होती। तो आत्मा में जो ८४ जन्मों का रिकार्ड भरा हुआ है उसको इमर्ज करो। इमर्ज करने से वह स्मृति रिफ्रेश हो जाती है।
हम ही तो थे, कल थे और फिर कल बनना है यह पक्का है ना! बाबा कहते हैं कि कभी भी अपने में संशय नहीं लाओ। बाबा में तो निश्चय है लेकिन बाबा के साथ-साथ चार प्रकार का पक्का निश्चय चाहिए। बाबा को तो भूल नहीं सकते हैं, क्योंकि बाबा तो बहुत मीठा, बहुत प्यारा है... ऐसे-ऐसे सबके दिल की आवाज़ निकलती है। एक - बाबा में निश्चय है। दूसरा स्वयं माना अपने में भी निश्चय हो कि मैं वहीं हूँ और तीसरा ड्रामा में निश्चय जो हुआ वह अच्छा, जो होना है वह और बहुत अच्छा। और फिर चौथा परिवार में निश्चय चाहिए। तो चारों ही तरफ़ का निश्चय पक्का हो। हिले नहीं टाइट रहे।
जब कभी माया का वार होता है तो अपने में ही दिलशिकस्त हो जाते हैं, योग तो हमारा लगता ही नहीं, अभी एक साल हो गया लेकिन जैसे बाबा कहते हैं पावरफुल योग हो, देहभान न हो, आत्म-अभिमानी बनो... लेकिन एक सेकण्ड आत्मा होकर ठहरते हैं फिर बॉडी में आ जाते हैं, तो अपने में भी कभी संशय आ जाता है। पता नहीं, हम बाबा समान बन सकेंगे या नहीं, पता नहीं हमारा पार्ट क्या है? हो सकेंगे, बन सकेंगे ऐसे अपने से ही क्वेश्चन पूछते रहते हैं और दूसरों से भी पूछेंगे। अगर दादियों से मिलेंगे तो भी कहेंगे कि हमें दिखाई नहीं देता है कि हम ऐसे बनेंगे, छोटी-सी बात में भी दिलशिकस्त हो जायेंगे। उस छोटी-सी बात को बात न समझकर उस बात को पेपर समझेंगे तो हम उसमें कमज़ोर नहीं होंगे, कन्फ्यूज़ नहीं होंगे और दिलशिकस्त भी नहीं होंगे। तो बात नहीं है लेकिन पेपर है और पेपर तो खुशी-खुशी से देना होता है। अगर कोई पढ़ाई में ठीक हो तो पेपर देने में तो उसको खुशी होती है क्योंकि इस पेपर में पास होने के बाद ही हम आगे बढ़ेंगे यह उसको पता होता है। अगर पढ़ाई में कमज़ोर है तो पेपर से घबरायेंगे और घबराना माना फेल होना। तो पेपर से घबराओ नहीं, यह सोचो कि यह पेपर मेरे को अनुभवी बना रहा है।
तो बात में मुझाने वा घबराने की अक्ल है लेकिन बाबा कहते कि मेरे मास्टर सर्वशक्तिवान बच्चों में वह भी अक्ल नहीं और ना ही वह ताकत है, वह दम नहीं तो यह कितनी शर्म की बात है- बाबा ऐसे कहे। जो बात आज आई है, वह फिर ५ हजार वर्ष के बाद ही रिपीट होगी। तो बाबा ने कहा कि बात में अक्ल है कि वह ५ हज़ार वर्ष के पहले रिपीट नहीं होगी और मेरे बच्चे जो मास्टर सर्वशक्तिवान हैं, वह बात को भूलते ही नहीं। जैसे कहावत है कि साँप तो चला गया और लकीर पीटते रहते हैं। अभी लकीर को पीटने से मिलेगा क्या? वेस्ट ! इसीलिए बाबा कहता है कि ड्रामा में अगर हमारा निश्चय होगा तो हम फौरन ही फुलस्टॉप लगायेंगे, अच्छा ठीक है, इसने हमारी इनसल्ट की ठीक है। मैंने सुन लिया यह राइट है यह राँग है इसकी समझ हमें है। अगर मानो उसने इनसल्ट की या क्रोध किया और हमने फील किया कि यह देखो कैसी है, तो हमारे फीलिंग की बीमारी और उसके क्रोध या इनसल्ट करने की बीमारी दोनों ही समान तो हो गये। हम कहते हैं इसने यह किया, हमने कुछ नहीं बोला हम तो बिल्कुल शान्त रहे लेकिन फीलिंग किया कि इसने यह क्यों किया, तो यह भी रांग है ना। अब राँग-सँग को क्या दवाई देगा ? पेंशेट-पेंशेट को दवाई देगा क्या! डाक्टर चाहिए जो बीमारी से बचा हुआ हो। जो खुद बंधा हुआ है वह किसी दूसरे बंधे हुए को कैसे छुड़ा सकता है! इसलिए बाबा कहते हैं जो हो जाता है उसको ड्रामा की बिन्दी लगाकर उससे पाठ पढ़ लो कि अच्छा, उसने राँग किया लेकिन हम तो राइट रहें, एकरस रहें, साक्षी होकर उसके ड्रामा को देखो। साक्षी स्थिति में स्थित हो सीट पर सेट हो ड्रामा को देखो तो सब अच्छा लगेगा। जब हमारे मन की सीट अच्छी तरह से सेट होती है तो कोई कहाँ भी बैठा हुआ हो लेकिन बाबा से वह दृष्टि खींच सकते हैं। लेकिन सीट पर सेट नहीं होते हैं और सेट न होने के कारण ही अपसेट होते हैं। तो इस ड्रामा की सीट पर सेट हो जाओ। हम आत्मा है और यह हमारा अकाल तख्त है इस सीट पर बैठ जाओ। सीट माना स्थिति। इस स्थिति में बैठकर ड्रामा देख रहे हैं- ऐसे समझने से क्या भी हो जाये लेकिन कुछ नहीं लगेगा, क्योंकि सब कुछ अच्छा-बुरा, सुख-दुःख ड्रामा में ही होता है और वह भी यहाँ ही होना है। यह सब वैराइ‌ट्टी खेल ड्रामा में होता रहता है इसलिए ही यह ड्रामा अच्छा लगता है। नहीं तो बोर हो जायेंगे, एक ही सीन माना सिर्फ दुःख ही दुःख या सिर्फ सुख ही सुख हो व सारे ही ड्रामा में हँसना ही हँसना हो तो उस ड्रामा में क्या अच्छा लगेगा। दोनों ही होना चाहिए।
तो बाबा कहते हैं अपसेट होते क्यों हो? अपसेट माना सीट पर सेट नहीं हो, इसीलिए अपसेट हो। तो इससे पाठ क्या पढ़े? अच्छा समझो हो गया, हम समझते हैं कि यह आत्मा परवश है इसलिए इसने ऐसा किया है या ऐसा करते हैं। क्रोध का अनुभव तो छोटा मोटा सभी को होगा। तो जब खुद को क्रोध आता है या दूसरा कोई क्रोध करता है तो उस घड़ी समझते तो हैं ना कि यह बुरी बात है। हमें पता है कि बिचारा बुराई के वश हो गया तो उस परवश पर और ही तरस होना चाहिए या लड़ाई होनी चाहिए? तुम एक दो हम दस देंगे, ऐसा थोड़े ही करना चाहिए इसीलिए बाबा कहते हैं कि अपने से या दूसरे से जो भी हो जाता है उससे एक-दो को पाठ पढ़ना चाहिए कि देखो, यह कितना राँग काम है। बाबा कहता है नहीं करो फिर भी कर रहे हैं लेकिन हम अपने को शिक्षा दें कि हम ऐसे कभी राँग काम नहीं करू या क्रोध नहीं करूँ।
पहले हम अपने लिए सोचें कि हमें दूसरे का क्रोध बुरा लगता है और जब हम क्रोध करते हैं तो कितना बुरा है। आगे के लिए शिक्षा ले लो कि यह क्रोध कितना खराब है इसलिए इसमें हम कभी नहीं आयेंगे। इस प्रकार से एक-दो के निगेटिव को पॉजिटिव करते रहने से जो वेस्ट थॉटस् हैं वह नहीं चलेंगे क्योंकि बाबा ने लास्ट मुरली में कहा है कि माया जो है वह अभी रॉयल रूप में वार कर रही है। जो उस समय रीयल महसूस होता है, कहेंगे यह तो सच्ची बात है। महसूसता ऐसे होती है जैसे हम रीयल हैं। हम तो राइट ही हैं, हम राँग ही नहीं हैं। तो यह माया का रीयल रूप हुआ ना। इसीलिए बाबा कहते हैं कि माया से बहुत सम्भाल करो। माया को पहचानो क्योंकि माया भिन्न-भिन्न रूप में आयेगी।
माया नहीं आवे उसके लिए बाबा ने कष्ट्रोलिंग पावर के ऊपर जोर दिया है। यह क्यों धोखा खाते हैं? मन नहीं मानता है ना। मन के ऊपर कण्ट्रोल नहीं है तभी तो ऐसे होता है। आत्मा अगर मालिक बनकर रहे तो मन कण्ट्रोल में आवे ना। आत्मा मालिक ही नहीं बनती है तो क्या होगा! कई ऐसे भाई-बहनें हैं जिन्हें हैण्डलिंग करना आता ही नहीं है। तो जो नौकर होगा वह मालिक बन जाता है, मालिक जो है वह नौकर के अण्डर हो जाता है। तो आज मन हमको धोखा दे रहा है, क्रोध के वश कर रहा है, लगाव के वश कर रहा है तो यह क्या है? मन धोखा नहीं दे रहा है? इसलिए तो कहते हैं कि मेरा मन आज ठीक नहीं है, मेरा मन है और मुझे ही धोखा दे रहा है ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि मालिक अपने मालिकपन में स्थित नहीं है। इसलिए बाबा कहता है मालिक बनकर मन को चलाओ। मन मेरे को नहीं चलावे। मालिक कभी ऐसे थोड़े ही कहेगा कि यह मानता नहीं है। मालिक तो मालिक होता है, वह परवश नहीं होता है। -
इसलिए बाबा आजकल थोड़ा स्ट्रीक होकर शिक्षा दे रहे हैं। यह भी बाबा का प्यार है। जिससे प्यार होता है, उस प्यार की निशानी है कि उसकी छोटी-सी बुराई भी अच्छी नहीं लगती है। इसलिए तो वह बार-बार उसी के प्रति शिक्षा देते रहते हैं कि वह छोटी सी बुराई भी निकल जाये, ठीक हो जाये। तो यह भी बाबा का प्यार है क्योंकि बाबा समझता है कि मेरा एक-एक बच्चा राजा बनने वाला है। और समय को भी हम देख ही रहे हैं, समय के लिए पहले लोगों को समझाना पड़ता था, समय बहुत नाजुक आने वाला है, तो सभी हमारे ऊपर हँसते थे। अभी तो खुद ही कहते हैं। अब हमको बाबा कहते हैं कि बच्चे तुम्हें डेट-कान्सेस नहीं बनना है। इसलिए हमको डेट नहीं सोचनी है, अभी मैं यहाँ बैठी हूँ, इसके बाद क्या होना है, कोई भरोसा है? विश्व-विनाश की तो बात छोड़ो, पहले अपने विनाश की डेट है क्या! किसके पास भी नहीं है। इसलिए बाबा कहते हैं कैसे भी करके मुझे आपको साथ लेकर ही जाना है फिर भले धर्मराज की सज़ा खिलाकर भी ले ही जाऊंगा। बाबा ने इतना तो वायदा किया हुआ है, तो साथ में कौन जायेंगे ? समान वाले जायेंगे या दूसरे जायेंगे। तो अभी बाबा का जो लक्ष्य है वह बुद्धि में रखो। कोई समझते हैं कि विनाश तक तो हम सम्पूर्ण हो जायेंगे। लेकिन बहुतकाल के पुरुषार्थ से बहुतकाल की प्रालब्ध है। यदि देह अभिमान के कारण भगवान के डायरेक्शन को हम नहीं मान सकते हैं तो हमारा कल्याण कैसे होगा? अब नहीं तो कब नहीं। इसीलिए बाबा कहते हैं वेस्ट सोचो ही नहीं। अलबेले नहीं हो जाओ। ऐसे नहीं कहो कि चलो लास्ट में ठीक हो जायेंगे, यह अलबेलापन है।
कई कहते हैं शुरू-शुरू में जब ज्ञान में आये तब बहुत अच्छा था, माया-वाया कुछ भी नहीं थी, इतना नशा था बात मत पूछो। तब न दिन याद आता था, न रात याद आती थी बस, बाबा और सेवा में मस्त। अभी तो और ही माया आ गई है, तो आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं? पीछे तो कैसे हटेंगे, बाबा का हाथ पकड़ा हुआ है। जैसे छोटे बच्चे होते हैं तो जब माँ-बाप चलना सिखाते हैं तो अपनी अँगुली से पकड़ कर चलाते हैं, और अगर अपने पाँव पर चलना शुरू कर देता है तो भी अँगुली पकड़ेगा क्या? तो समय-समय की बात है। जब शुरू में हम आते हैं तो बाबा अँगुली से पकड़कर चलाते हैं और जब थोड़े अनुभवी, ज्ञानी समझदार हो जाते हैं तो अँगुली से ही पकड़ कर चलायेगा क्या? कहता है- अभी अपने पाँव पर ठहरो, अपने पाँव पक्के करो तो ऐसे तो नहीं बार-बार धक्का ही खाते रहेंगे। पहले जब शुरू में आये तो माया का तो ज्ञान ही पीछे मिलता है। माया आती ही पीछे है, जब ताकत होगी तभी तो वार करेगी ना। है ही बेसमझ उसको क्या वार करेगी ? तो हम कोई पीछे नहीं हटते हैं। पीछे नहीं हटे हैं ऐसे तो अनुभवी बने हैं। समझ के पाँव के आधार पर अभी चल रहे हैं। हर बात को समझने की ताकत आई है और माया भी वार तब करेगी जब कोई ताकत वाला होता है। माया शक्ति वाली है तो हम भी सर्वशक्तिवान शक्तिशाली हैं इसलिए घबराओ नहीं, दिलशिकस्त तो कभी नहीं हो जाओ।
कोई कहते हैं हम बाबा के साथ का अनुभव कैसे करें, वह तो निराकार है। हम ६ फुट शरीर वाले हैं। बिन्दी को याद करते हैं तो बिन्दी तो सेकण्ड में खिसक जाती है। क्या करें, क्यों बिन्दी खिसकती है? क्योंकि अपने को बिन्दी नहीं समझते हैं। आप भी बिन्दी बनों तो बिन्दी, बिन्दी को पकड़ लेगी। इसलिए बाबा बार-बार मुरलियों में कहते हैं कि 'अपने को आत्मा समझ कर बापको याद करो'। ब्रह्मा बाबा भी अव्यक्त है, आप भी जब तक अव्यक्त नहीं बनेंगे तब तक मिलन कैसे होगा। सुनेगा कैसे !
कोई कहते हैं कि बाबा आप बहुत प्यारे हो, बहुत मीठे हो, फिर भी बाबा आप क्यों नहीं याद आते हो? अरे, मैं तुम्हारे शरीर का बाप ही नहीं हूँ तो याद कैसे आऊँगा। पहले तुम अपने को आत्मा समझो तब तो बाप रेसपाण्ड देवे। तो पहले आत्मा का पाठ पक्का करो, इसी को बाबा रोज भिन्न-भिन्न शब्दों में कहता है कभी कहता है कि विदेही बनो, कभी कहता है कर्मातीत बनो, कभी कहता है आत्म-अभिमानी बनो... ऐसे भिन्न-भिन्न शब्दों में बाबा हमको पाठ पक्का कराते हैं।
विदेही माना क्या देह से न्यारा, देह से न्यारा क्या है? आत्मा। तो जब आत्मा रूप में टिकेंगे तभी तो कर्मातीत बनेंगे। आत्म-अभिमानी माना आत्मा मालिक बन जाए और कर्मेन्द्रियों से कर्त्तव्य करावे। आत्मा अपने पोज़ीशन पर मालिकपन में स्थित हो तब तो कर्मेन्द्रियाँ आर्डर में चलेंगी। देह भान हमें खींचे नहीं, हम मुख से बाबा-बाबा.. बोल रहे हैं और याद आ रही हैं देह की बातें, पुरानी बातें, वेस्ट बातें... तो कैसे होगा ? इसीलिए बाबा कहते बच्चे, आत्मा का पाठ पक्का करो। ऐसे नहीं अमृतवेले योग लगाया बहुत अच्छा आनन्द आया, फिर सारा दिन गुम। सारा दिन रहा देह-भान। डेढ़ घण्टा रहा आत्म-अभिमान वह भी पूरा नहीं तो कैसे होगा, इसलिए बाबा कहते हैं बीच-बीच में नोट करो मैं आत्मा मालिक होकर यह कार्य कर रही हूँ। पाँव चला रही हूँ या मुख चला रही हूँ लेकिन आत्मा बनकर कर रही हूँ?
यह जो भी भिन्न-भिन्न लगाव हैं वह बॉडी-कान्सेस के हैं चाहे व्यक्ति से हैं, चाहे वस्तुओं से हैं लेकिन दोनों ही प्रकार के लगाव बॉडी-कान्सेस के आधार पर है। जब अपने को आत्मा समझेंगे तो लगाव स्वतः खत्म हो जायेगा। जब किसी से कोई विशेष प्राप्ति होती है तो आपका लगाव उससे लग जायेगा। अच्छा तो सब लगना ही चाहिए। बाबा कहता है जो हुआ सो अच्छा हुआ, होगा वह भी अच्छा होगा, लेकिन एक्स्ट्रा अच्छा लगता है तो वह ठीक नहीं है। तो मोटा रूप है 'इच्छा'। कहते हैं बाबा मुझे कोई इच्छा नहीं है। लेकिन थोड़ा यह अच्छा लगता है, यह चीज़ अच्छी लगती है, यह आत्मा अच्छी लगती है..... यह एक्स्ट्रा क्यों! अच्छा तो सब अच्छा लगना चाहिए, बुरा भी अच्छा लगना चाहिए। हमारे लिए तो सब अच्छा होना चाहिए। एक्स्ट्रा अच्छा है माना इच्छा है ना! और वह याद आयेगा तो बीच-बीच में समय निकालकर अपनी अवस्था को चेक करो और सीट पर सेट रहो। कोई भी काम करते हो तो पहले परिणाम को देखो, परिणाम इसका क्या होगा! नुकसान या फ़ायदा? परिणाम को सोचकर कर्म करो। अगर कर्म के बाद सोचते हाय, करना नहीं था, हो गया, अभी क्या होगा... उसमें वेस्ट चलता है। तो कर्म के पहले परिणाम का सोच करके पहले से ही सावधान हो जाओ। कोई बुरा काम है तो उसे टालना अच्छा है। सोचेंगे, देखेंगे..... लेकिन अच्छा काम है तो कल भी नहीं, आज भी नहीं अभी कर लो। आलस्य को मिटाने के लिए यही स्लोगन याद रखो कि 'अब नहीं तो कब नहीं'। और व्यर्थ संकल्प खत्म करने के लिए यह सोचो कि और आत्माओं की जिम्मेवार मैं नहीं हूँ। अपने आत्मा की मैं मालिक हूँ, मुझे पहले अपने को बनाना है, दूसरों का सोचेंगे कि यह क्यों हुआ ? कैसे हुआ ? उससे मेरे को और ही नुकसान है। इसीलिए मेरे को अपने को सोचना है, अपने को देखना है। पहले स्व-परिवर्तन फिर दूसरे का परिवर्तन। तो माया को इस रीति से भगाओ, क्यों, क्या और कैसे होगा... यह दरवाजे बन्द करो।
मैं और मेरा यह दरवाज़ा टाइट करो। मैं-मैं के बदले में मैं आत्मा अनादि और अविनाशी हूँ, वह याद करो और मेरा मेरा के बदले में मेरा बाबा याद करो। भले मैं और मेरा बोलो लेकिन मैं क्या और मेरा क्या यह याद रखो। चेंज करो मैं और मेरा को। अनेक मेरा के बजाए एक मेरा बाबा और मैं यह बॉडी कान्सेस वाली नहीं, लेकिन मेरा अनादि रूप मैं कौन हूँ, आदि रूप मेरा क्या है-वह याद करो। अभी संगम पर बाबा ने मुझे विशेष आत्मा बना दिया, हीरो पार्टधारी बना दिया, कौड़ी से हीरे तुल्य बना दिया.. वह याद करो।
जब कहते हो कि हमारा सर्वशक्तिवान बाबा हमारे साथ है फिर दिलशिकस्त क्यों होते हैं? यह तो ऐसे हुआ जैसे कोई कहे मैं राजा की लड़की हूँ लेकिन मेरे पास एक रोटी खाने का भी इंतजाम नहीं है। हूँ मैं मास्टर सर्वशक्तिवान और दिलशकस्त हो रहे हैं तो कौन मानेगा? इसलिए बाबा के साथ को यूज़ करो। कोई भी बात आवे तो कहो - बाबा आप जानो, मैं तो इन्स्ट्रुवमेन्ट हूँ, मैं निमित्त हूँ। फिर मेरापन नहीं लाओ। दिलशकस्त तो कभी नहीं हो। हमेशा यह सोचो बाबा ने मुझे विशेष आत्मा बनाया है, बाबा को परखने में राँग नहीं हो सकता है। आप में ज़रूर विशेषता है तभी बाबा ने आपको अपना बनाया है। चलो मैं कैसी भी हूँ लेकिन भगवान ने मुझे पसन्द तो किया ना। अपना तो बनाया ना, तो जरूर कुछ तो मेरे में विशेषता है तब बनाया है। ऐसे ही बना दिया तो वह भी खुशी रखो, वह भी नशा रखो, बाबा मेरे साथ है तो मैं क्यों दिलशिकस्त हो जाऊँ। बाबा आप मेरे साथी हो, आपको मदद करनी ही है। हक रखो। बाबा अभी माया आ गई, बाबा आपने कहा है ना मैं तुम्हारा साथ निभाऊँगा, बाबा अभी साथ निभाओ ना। बाबा कहते हैं फ़रियाद क्यों करते हो, ऐसे भिखारी क्यों बनते हो! बाबा आओ ना, बाबा मदद करो ना, बाबा मेरी बुद्धि को चेंज करो ना... इस तरह से भिखारी क्यों बनते हो। अधिकारी बनो, बाबा हम हैं ही आपके, आप हमारे लिए आये हो। हमको अपना बनाया है, अधिकार रखो, अधिकार से क्या नहीं हो सकता है।
तो अभी साथ को यूज़ करो बस, बाबा और मैं तीसरा न कोई और क्या करना है? न अलबेला बनना, न वेस्ट सोचना, न साथ छोड़ना, माया से नहीं घबराना, माया को पेपर समझके पास होना, शार्ट में यह याद रखो, बस। फिर तो बाबा समान बन जायेंगे। हम नहीं बनेंगे तो कौन बनेंगा। बनना ही है यह नशा रखो, बॉडी-कान्सेस का नशा नहीं, आत्म-अभिमानी का नशा हो बस और क्या चाहिए। बाबा भी हमारे से यही चाहता है। मौज में रहो, न मूँझना, न दिलशिकस्त होना। अच्छा। ओमशान्ति।

बाप की आज्ञा समझ 'सहनशीलता' को धारण करो तो प्रत्यक्षफल की प्राप्ति होगी

भगवान हमको डायरेक्ट साकार सृष्टि पर आकर, साकार रूप में आकर वरदान देगा - ऐसा कभी सोचा था। लेकिन हमारे भाग्य में सबके मस्तक में यह तकदीर की लकीर थी तो देखो डायरेक्ट बाबा आता है, इतना दूर परमधाम से वरदान देने। वह इतना दूर है जिसकी माप कोई कर नहीं सकता। ऐसा यन्त्र निकला ही नहीं है जो स्थूल वतन से परमधाम की माइल को माप सके। वहाँ से रोज़ बाबा आता है!
बाबा हमारा टीचर बनकर रोज़ हमको पाठ पढ़ाने के लिए परमधाम से आता है। भगवान हमारे लिए आता है। कभी सोच में था? इतना बड़ा हमारा भाग्य नूंधा हुआ है, यह संकल्प स्वप्न में भी नहीं था और फिर रोज़ बाबा वरदान देता है। भक्ति मार्ग में बहुत प्रयत्न के बाद कोई महात्मा वरदान देगा। लेकिन यहाँ डायरेक्ट भगवान आकर वरदान देता है यह कितनी खुशी वा नशे की बात है। तो नशा रहता है? कितना नशा है? धरनी से आकाश जितना नशा है? कोई अक्षर ही नहीं है जो इससे मिला सकें। बाबा है हमारी दूसरी दुनिया का। इसलिए इस दुनिया में कोई दृष्टान्त है ही नहीं जिसकी हम भेंट कर सकें। जब बाबा पूछता है खुश हो, नशा है? तो सब कहते हैं हाँ। और जब दूसरा क्वेश्चन पूछता है कि सदा रहता है? तो फिर चुप हो जाते हैं। तो अवस्था में और पुरुषार्थ में अन्तर है। रहता है लेकिन सदा नहीं रहता है और हम चाहते हैं सदा रहे। यह ऐसी चीज़ है, जो सदा काम में लगने वाली है। इसलिए यह लक्ष्य रखो कि अभी सदा रहना है, कभी-कभी नहीं। समटाइम, समथिंग यह दो शब्द बहुत बोलते हैं। अभी इन दोनों शब्दों को जीवन की डिक्शनरी से निकाल देना है। आपकी जीवन एक डिक्शनरी है। तो ब्राह्मण जीवन की डिक्शनरी से यह दोनों शब्द कट करो, ऐसे कट करो जो एकदम दिखाई नहीं दे। ऐसे मिटाओ जो नाम निशान ही गुम हो जाए।
सतयुग में तुमको इस समय के कर्म का फल मिलेगा। लेकिन संगम पर विशेषता है जो प्रत्यक्ष-फल मिलता है। हमको पिछले कर्मों का हिसाब नहीं मिल रहा है। संगम पर हमको प्रत्यक्ष फल मिल रहा है। कभी किसी की सेवा करो सिर्फ अपना अनुभव ही सुनाओ भले। ज़्यादा बातें नहीं सुना सकते हो लेकिन अपना अनुभव तो सुना सकते हो, अनुभव भी सुनाओ तो उसी समय खुशी आपको होती है। तो यह है प्रत्यक्ष-फल। प्रत्यक्ष-फल ऐसा मिलता है जो उसी समय मन नाचता है, वाह मैने बाबा की सेवा की, उसका कल्याण हो न हो, हमारा तो हो ही जाता है, हमको खुशी मिल जाती है। तो पिछले कर्मों का हिसाब नहीं है, अभी के कर्म का फल मिलता है। सतयुग में अभी के कर्मों का फल मिलेगा। और कोई युग में प्रत्यक्ष-फल नहीं है। अभी यहाँ करो, अभी लो। सिवाए परमात्मा के डायरेक्ट फल और कोई दे ही नहीं सकता। जो दृढ़ संकल्प करते हैं उसको प्रत्यक्ष-फल ज़रूर मिलता है। सिर्फ निश्चय पक्का होना चाहिए, दृढ़ता होनी चाहिए। तो कौन समझता है कि यह दो शब्द अपने जीवन से निकाल देंगे? बाबा सामने देख रहा है। पक्का है? अपने में संशय नहीं रखो। हिम्मत रखी तो बाबा की मदद ज़रूर मिलेगी।
सेवा में अपने पुरुषार्थ में सबमें हमने देखा है जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता है ही। हो ही नहीं सकता कि दृढ़ता का फल सफलता नहीं मिले। असम्भव। लेकिन होता क्या है, कहते हैं दृढ़ संकल्प तो किया था लेकिन फल नहीं मिला। बाबा आपने कहा था ना - एक कदम हिम्मत का आप रखो और मैं हजार कदम रखूँगा। अगर सोचते हैं कि बाबा आप हज़ार कदम रखेंगे ना! तो यह भी संशय हुआ। अपने में ही थोड़ा-सा संशय है- पता नहीं सफलता होगी या नहीं, चलो करके देखती हूँ, करके देखती हूँ- यह बाबा का सौदा नहीं है, करना ही है, होना ही है। सोचेंगे, देखेंगे, होना तो है, होना चाहिए.. यह दृढ़ निश्चय के शब्द नहीं है। करना ही है, होना ही है.. यह है दृढ़ संकल्प। असम्भव है कि हमारी विजय नहीं हो, विजय का वरदाता मेरे साथ है। जहाँ विजय का वरदाता मेरे साथ है वहाँ हमारी विजय नहीं होगी तो किसकी होगी! होनी ही है। गे गे नहीं, देखेंगे, सोचेंगे... कोशिश कर रहे हैं - यह नहीं। इसमें समथिंग हो जायेगा। इसलिए जो भी काम करो चाहे स्व के प्रति, चाहे औरों की सेवा के प्रति लेकिन सोचो होना ही है, सफलता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है, सफलता हमारे गले की माला है। इतना निश्चय हो।
आज बाबा ने कहा कि कोई इनसल्ट करता है, गाली देता है यह भी खाद पड़ रही है। कितनी बढ़िया बात है, वह गाली दे रहा है और हम समझ रहे हैं- खाद पड़ रही है। किसी ने गाली दी इनसल्ट की, मेरी सहनशीलता बढ़ाई, हमको पता पड़ता है वैसे मैं कहूँ मेरे में सहनशीलता बहुत है, कोई ने इनसल्ट की... तो पता पड़ता है मेरे में सहनशीलता है या नहीं। तो हमें सहनशीलता का पाठ पढ़ाया ना तो यह खाद पड़ी और सहनशीलता का फूल निकला ना। लेकिन कई कहते हैं सहनशीलता भी कब तक ? एक दो बार १०० बार सहन कर लिया, आखिर भी पत्थर की मूर्ति थोड़े ही हूँ? १०० बार सहन कर लिया लेकिन एक बार तो होगा ना। यह तब आता है जब समझते हैं दूसरे ने किया, हमने उसके कारण सहन किया। लेकिन मैंने शिवबाबा की आज्ञा मानी, शिवबाबा ने कहा है- बच्ची, कुछ भी हो जाए सहनशीलता धारण करो। यह परमात्मा की श्रीमत है, तो उसके कारण से मैंने सहन नहीं किया लेकिन अपने कारण से किया। हम उस व्यक्ति को देखते हैं, समझते हैं उसने १०० बारी इनसल्ट की, इसलिए उसके कारण मैं सहनशीलता नहीं धारण कर सकी। लेकिन उसके कारण मैं सहनशीलता नहीं धारण करती, सहनशीलता आत्मा का निजी गुण है, आप गुणों की लिस्ट में देखो, वह हमारा गुण है। दूसरा श्रीमत है बच्चे सहनशील बनो। तो यह परमात्मा की आज्ञा मैंने मानी तो फिर खुशी होगी ना। भगवान की मत मान ली माना आज्ञाकारी बन गई, तो आज्ञाकारी के ऊपर बाबा की कितनी दुआयें होंगी। ऐसे समझकर सहनशीलता मैंने धारण की। फिर देखो आपको सहनशीलता धारण करना मुश्किल नहीं लगेगी।

('विश्वामित्र' अखबार के बारे में)

एक अखबार जिसका नाम 'विश्वामित्र' अखबार था, उसमें बाबा के प्रति कुछ गलत छपा था तो बाबा ने कहा बच्चे निंदा हमारी जो करे मित्र हमारा सोई... यह अखबार तो विश्वामित्र है। मैं ब्रह्मा सृष्टि का पिता हूँ, चाहे कैसा भी बच्चा हो, मैं बाप हूँ, क्या बाप कभी बच्चे पर केस कर सकता है? तो यह ला नहीं है। बाप बच्चे पर केस नहीं कर सकता, उसको अपना मित्र समझो। तो ब्रह्मा बाबा को कितनी गालियाँ दी, ब्रह्मा बाबा ने यही कहा, मेरा बच्चा है। हमारी तो इतनी निंदा होती नहीं है, फिर भी हम खिले हुए गलाब के पुष्प से मुरझा जाते हैं। वह और ही पक्का कर रहे हैं, सोना भी रीयल तब पड़ता है जब आग में पड़कर उसका अलाए निकल जाता है। आग में पड़ने के बाद ही सच्चा सोना बनता है। गोल्डन संकल्प करो। गोल्ड को तो आग में पड़ना ही पड़ता है, इसमें क्या बड़ी बात है। गोल्डन थॉटस क्या हैं? नगेटिव को पाजिटिव करना यह है गोल्डन थॉटस। उसने गाली दी और हमने सहनशीलता के फूल खिला दिये यह हैं गोल्डन थॉटस। थोड़ा तो होगा ना.... ऐसे नहीं। बाबा के बने तो जैसे योद्धे होते हैं तो कवच पहन लेते हैं, बाबा ने भी हमको 'सहनशीलता का कवच' पहना दिया है। तुम संगठन में सहनशीलता का कवच पहनकर चलो। संगठन ही हमारा युद्ध का मैदान है। कवच सहनशीलता का पड़ा है तो कोई का इफेक्ट नहीं हो सकता इसलिए बाबा जो बार-बार गोल्डन शब्द बोलता उसे कभी नहीं भूलना। गोल्डन वर्ल्ड में जाने के लिए गोल्डन बनना है। अभी तो हम डायमण्ड हैं, गोल्डन दुनिया में जाना है, तो गोल्डन बनकर चमकना है, सबको सकाश देनी है, लाइट माइट देनी है। वह बिचारा जो गाली देने वाला है, उनको भी शुभ भावना की सकाश देकर परिवर्तन करो। इसको बाबा कहते हैं निगेटिव को पॉजिटिव में चेंज करो। कोई गाली दे, आप मुस्कराते रहो, हँसना नहीं। मन दुःखी नहीं हो। अपनी मुस्कराहट में खुशी में रहो, उसको भी सकाश दो, वह परवश हो गया है, उसे और ही सकाश देकर पाजिटिव संकल्प दो, सकाश दो, सहयोग दो। इसको बाबा कहते हैं गोल्डन थॉट्स करो। तो सोने में कुछ मिक्स नहीं करना। मिक्स सोना होगा तो सतयुग का सुख नहीं देखेंगे। त्रेता में आयेंगे, इसलिए कुछ मिक्स नहीं करना। रीयल सोना माना निगेटिव को पाजिटिव में चेंज करने वाले और गोल्डन थॉट्स में रहने वाले। तो आप त्रेता में आयेंगे या सतयुग में ? गोल्डन थॉटस होंगे तभी सतयुग में आयेंगे। त्रेता है सिल्वर एज। इसलिए आज की मुरली की यह बात सदा याद रखना कि मेरे को गोल्डन थॉट्सस करने हैं। फिर गोल्डन दुनिया में जाने का पासपोर्ट मिल जायेगा। अच्छा - ओमशान्ति।

अन्तःवाहक शरीर द्वारा सेवा करने के लिए डबल लाइट बनो

इस अंतः वाहक शरीर का भक्तिमार्ग में भी वर्णन है कि जहाँ भी आवश्यकता होती थी तो अंतः वाहक शरीर से वहाँ पर पहुंच जाते थे। लेकिन वास्तव में यह हमारा ही वर्णन है कि हम अंतः वाहक शरीर द्वारा जहाँ चाहे, जहाँ जरूरी है वहाँ सेवा के अर्थ पहुँच सकते हैं। अंत: वाहक माना अन्त में जो हमारा सम्पूर्ण स्वरूप होगा, उससे स्वतः सेवा होगी। अभी हर एक का पुरुषार्थी स्वरूप है लेकिन अन्त में पुरुषार्थ के प्रमाण नम्बरवार सभी सम्पूर्ण तो होंगे ही।
तो अंत: वाहक शरीर यानि सम्पूर्ण स्टेज पर जब हम पहुँचते हैं तो हमारा फरिश्ता रूप हो जाता है। फरिश्ता माना जिसका पुरानी दुनिया से, पुराने संस्कारों से, पुराने सम्बन्धों से नाता नहीं। तो यहीं है हमारा अंत: वाहक शरीर। और वाहक शब्द का अर्थ एक होता है वाहन और दूसरा होता है वाहक यानि वाहन को भी चलाने वाला। तो अंतः वाहक शरीर यानि उस समय हमारी स्थिति ऐसी होंगी जो कर्मेन्द्रियों को चलाने वाली मैं 'वाहक' आत्मा हूँ, उस स्वरूप में हम स्थित होंगे -उसको कहा जाता है- अंतः वाहक शरीर, जो हमारा फरिश्ता रूप ही होगा।
अभी तो आप देखो सब पुरुषार्थी हैं और पुरुषार्थ करते-करते अपने पुराने सम्बन्ध, संस्कार सबको परिवर्तन तो कर ही रहे हैं। लेकिन फिर भी देखा जाता कि मैजारिटी के जो कड़े संस्कार हैं जिसको हम कहते हैं- क्या करें मेरी नेचर है, मैं चाहता नहीं हूँ कि यह हो लेकिन मेरा कोई कड़ा हिसाब-किताब है जो फिर मुझे वह खींच लेता है। कोई कड़े संस्कार हैं जो नेचर की रीति से नैचुरल अपना काम कर लेते हैं। जैसे कईयों की दिल छोटी होती है तो कोई भी बात होगी वह फौरन महसूस होगी और मूड़ चेंज हो जायेगी। मूड़ चेंज होना माना ही महसूस होना, अगर महसूस नहीं होता तो कभी भी आपका मूड़ ऑफ नहीं होता। मानो किसी ने कुछ कहा, मैंने सुन लिया, गहराई से अन्दर धारण नहीं किया। सुना, थोड़ा-सा हुआ कि यह ठीक नहीं लेकिन उसको वहीं बिन्दी लगाकर खत्म किया तो आपकी मूड़ आफ नहीं होगी। लेकिन अगर कोई बात ऐसी किसी ने की है या हुई और वह अन्दर धारण हो जाती है कि यह कैसा? यह अच्छा नहीं किया, यह चाहिए, ऐसे थोड़ेही होता है.. समझो अन्दर में यह भाव आ गया तो उसमें आपका पहले ही मूड़ ऑफ होगा। और मूड़ ऑफ के कई प्रकार हैं, कई ऐसे होते जिनकी अन्दर से मूड़ आफ होगी लेकिन कहेंगे कि आज मेरी तबियत ठीक नहीं है। सिरदर्द है। अभी इसका कोई थर्मामीटर तो है ही नहीं। पता तो कोई कर ही नहीं सकता, सिर-दर्द है या पेट-दर्द है। चलो बुखार हो तो पता पड़ जाता है लेकिन इसका पता नहीं पड़ता है। तो जो संस्कार पुराने हैं, वह हमारी नेचर बनकर समय प्रति समय हमको नीचे ले आते हैं। तो अंतः वाहक शरीर का मतलब यह है कि हमारी जो नेचर है, मूल संस्कार हैं वह भी खत्म हों माना वह चेंज हो। अगर हमारी कोई नेचर संस्कार रूप में है, काम में आती है। उसे परिवर्तन नहीं किया है तो फ़रिश्तेपन की स्थिति में स्थित होने में बहुत मेहनत लगेगी। यानि मैं अंत: वाहक शरीर द्वारा सेवा करूँ यह मुश्किल होगा। अपनी सेवा में ही लग जायेंगे, अपने ही पुरुषार्थ में व अपने को ही बनाने में बिज़ी हो जायेंगे तो औरों की सेवा नहीं कर सकेंगे।
बाबा कहता है कि बच्चे अब अंतः वाहक शरीर द्वारा यानि फ़रिश्ते रूप द्वारा सेवा करो। जैसे यज्ञ की स्थापना जब हुई तो कईयों को घर बैठे ब्रह्मा बाबा का साक्षात्कार लाइट फ़रिश्ते रूप में हुआ। जैसे अभी वतन में बाबा लाइट रूप में है वहाँ कोई शरीर तो नहीं है। तो अंत: वाहक शरीर द्वारा आप हम सेवा तब कर सकेंगे जब संस्कारों को परिवर्तन करेंगे। स्व को परिवर्तन करेंगे। जिसको दूसरे शब्दों में कॉमन रूप में कहते हैं स्वभाव, संस्कार। उसका परिवर्तन हो। फ़रिश्ते का स्वभाव या संस्कार है ही एक, किसी से भी नाता नहीं, अपने शरीर से भी नाता नहीं।
कोई कहते हैं मेरे में और कोई आकर्षण नहीं है लेकिन अपने शरीर में भी अगर लगाव है तो भी फ़रिश्ते स्थिति का अनुभव नहीं कर सकते। कहाँ भी लगाव होगा तो चलते-चलते देह अभिमान में आ जायेंगे। योग में बैठे बैठे कई अनुभव करते हैं कि शिवबाबा तो याद है लेकिन फिर बीच-बीच में बॉडी-कान्सेस में आ जाते हैं। काम-काज करते भी कई सोचते हैं कि हम बाबा को याद करते हुए काम करें, लेकिन फिर भी कोई-न-कोई बॉडी-कान्सेस की बातों में आ जाते हैं। बॉडी-कान्सेस का यह मतलब नहीं है कि अपने बॉडी की याद आये कि मैं ऐसी हूँ, मैं यह हूँ, मैं करने वाला हूँ... यह नहीं। बाँडी-कान्सेस माना अपने बॉडी के सम्बन्ध से जो भी बातें होती हैं वह बातें याद आ जाना। समझो अमृतवेला है उस समय सभी यह कोशिश करते हैं कि सबसे पॉवरफुल यह समय है तो इस समय हमारी अवस्था भी ऐसी होनी चाहिए। लेकिन अगर अमृतवेले हमको थोड़ा आलस्य आता है, वैसे सब कारोबार समेटा हुआ होता है तो और फालतू बातें नहीं लेकिन आलस्य भी आता है तो यह भी बॉडी कान्सेसनेस है ना! क्योंकि लगाव की निशानी होती है बार-बार मन-बुद्धि का उसी तरफ़ झुकाव होना। तो जब झुकाव होता है तो रूह-रूहान भी करेंगे, कोशिश भी करेंगे कि नींद न आये लेकिन उस समय जो नींद का प्रभाव होता है उससे आलस्य आ जाता है। तो यह भी बॉडी-कान्सेसनेस की निशानी है जो हमको फ़रिश्ता बनने नहीं देती।
फ़रिश्ता माना जहाँ कोई पुरानी दुनिया, पुराना शरीर, पुराने वैभव, पुराने सम्बन्ध, पुरानी दुनिया की कोई भी चीज़ से लगाव नहीं, नाता नहीं, कनेक्शन नहीं। तो पहले यह कोशिश करो कि सचमुच मैं फ़रिश्ते स्थिति में स्थित हूँ? फ़रिश्ते की दूसरी निशानी है- डबल लाइट। यानि आत्मा प्रकाश रूप है ही और जब कर्मणा में, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में हम आते हैं तो उसमें हल्के हों। अगर उसमें कोई भी प्रकार का बोझ महसूस होता है, कई बार ऐसे होता है, समझो सेवा मुझे बहुत अच्छी लगती है और सेवा में मैं आगे बढ़ना वाहती हूँ लेकिन जब सेवा का मौका आयेगा तो उस समय सेवा का बोझ महसूस होगा। जैसेकि बहुत काम है, योग लगाने के लिए टाइम ही नहीं मिलता है, ऐसे बोझ महसूस होगा। लेकिन फ़रिश्ते को कभी भी किसी बात में भी बोझ नहीं लगेगा। तो एक हुआ कर्मणा में बोझ महसूस होना और दूसरा है भाव-स्वभाव संगठन में चलना उसमें बोझ महूसस होना। कई कहते भी हैं कि मुझे ज्ञान बहुत अच्छा लगता है, बाबा से प्यार भी बहुत है लेकिन यह संगठन में, परिवार के साथ चलना बहुत मुश्किल है। तो यह भी बोझ हुआ ना! फरिश्ता कभी भी किसी भी प्रकार का बोझ नहीं महसूस करेगा, उसको कहा जाता है - 'डबल लाइट'।
डबल लाइट यह शब्द तो हम बोल देते हैं, लेकिन डबल लाइट सभी बातों में हैं? समझो कोई सेवा में भी हल्के होते हैं लेकिन चलने में हल्के नहीं होते हैं। कोई अपनी आदत के बोझ से मज़बूर होते हैं, मेरी आदत है ना, मेरा स्वभाव, मेरा संस्कार है ना... तो यह बोझ भी हमें सोल-कान्सेस होने नहीं देता है। आत्मा बिन्दी में जरा भी बोझ नहीं है। अगर मैं बॉडी-कान्सेस में आती हूँ, बोझ में आती हूँ तो आत्मिक स्थिति में जो लाइट रूप है, उसमें कैसे स्थित हो सकेंगे। इसलिए अंत: वाहक शरीर की स्थिति बनाने के लिए दो बातें चेक करनी हैं एक तो स्वभाव-संस्कार, व्यक्तियाँ, वैभव जो भी पुरानी दुनिया की आकर्षण है... उससे मेरा कोई नाता है? किसी एक से भी महीन धागा लटका हुआ होगा तो वह अपने तरफ़ खींच लेगा। कितना भी आप कोशिश करी बंधे हुए उड़ ही नहीं सकते हैं। इसलिए एक तो किसी से भी नाता नहीं हो और दूसरा डबल लाइट हो।
तो फ़रिश्ता जीवन बनाने के लिए हमें इन दो बातों की चेकिंग करना ज़रूरी है। और बार-बार चेकिंग चाहिए। ऐसा नहीं कि आज चेक कर लिया या एक बार चेक कर लिया बस, दूसरे दिन कोई भी विघ्न कुछ आवे उसका प्रभाव मेरे ऊपर पडता है, नहीं पड़ता है वह भी तो चेक करना पड़ेगा ना। तो सदैव अपनी चेकिंग करो कि मैं डबल लाइट हूँ? संबंध में, व्यवहार में, सेवा में, योग लगाने में. योग भी तब लगेगा जब आप हर तरह से हल्के होंगे। लेकिन अगर आपके पास कोई भी बात का बोझ होगा तो जब आप योग में बैठेंगे तब वह अपने तरफ खींचेगा। वह ऊँचा जाने नहीं देगा। इसीलिए बाबा कहते हैं बहुत सूक्ष्म धागे हैं जो पता नहीं पड़ता है कि कोई बन्धन या कोई धागा बंधा हुआ है। हम समझते हैं कि हम तो बिल्कुल मुक्त हो चुके हैं लेकिन यह सब सूक्ष्म धागे चेक करो तब ही फिर हमारा भी ब्रह्मा बाप के समान वह लाइट का साक्षात्कार होगा।
अन्त के टाइम तो बहुत आफतें होंगी, हरेक आत्मा कितनी दुःखी होगी, कितना चिल्लाने वाली होगी, ऐसे टाइम पर अगर हम फ़रिश्ते रूप में हैं, ती अंत: वाहक शरीर द्वारा उन्हों को हम शक्ति दे सकते हैं। जैसे भक्तों को हमारे से देवियों का साक्षात्कार होता है, वैसे फ़रिश्ते रूप से उन्हों के सामने इमर्ज हो जायेंगे। समझो किसको शान्ति की शक्ति चाहिए तो हमारे अंतः वाहक शरीर द्वारा उनको शान्ति के वायब्रेशन मिलेंगे, किसको आनन्द चाहिए, किसको प्रेम चाहिए तो वह उनकी मनोकामनायें पूर्ण होती जायेंगी। अन्त में हमारे सामने इस प्रकार की भीख मांगने वालों की क्यू लगेगी। और हम अंतः वाहक शरीर द्वारा यानि फ़रिश्ते रूप द्वारा कैच कर सकेंगे कि उनको क्या चाहिए? एक सेकेण्ड भी आपने अंतः वाहक शरीर द्वारा उनको शान्ति का अनुभव करा दिया तो वह प्रसन्न हो जायेगा। जैसे भक्ति में देवी-देवताओं की मूर्ति के आगे प्रसन्न होते हैं।
अभी यहाँ मधुबन में आते हैं तो सब यही कहते हैं कि यहाँ बहुत शान्ति और सुख मिला, निःस्वार्थ प्यार मिला। तो यहाँ के वायुमण्डल के कारण सब यह अनुभूति करते हैं, हरेक को यह अनुभव यहाँ होता है। ऐसे हमारी स्थिति जो अंतः वाहक शरीर, फ़रिश्ते रूप की होगी उससे अनेक आत्माओं को अनुभूति होगी, जिसको जो चाहिए वह उसे मिल जायेगा। जिसको बाबा कहते हैं कि 'मन्सा सेवा करो'। उस समय हमारी मन्सा इतनी पॉवरफुल होगी, यानि फ़रिश्ते लाइट की स्टेज इतनी पॉवरफुल होगी जो उनके संकल्प को कैच करके हम भी अपने शुभसंकल्प द्वारा उनको शान्ति, शक्ति, प्रेम, आनन्द की फीलिंग देंगे। वह तो बिचारे कमज़ोर होंगे, अन्त में पावर क्या होगी, लेकिन हम अपने पॉवरफुल संकल्प के आधार पर उनको अनुभूति करा सकते हैं। तो इतनी पॉवरफुल सेवा करनी है क्योंकि वाचा द्वारा सारे विश्व का कल्याण करना बहुत मुश्किल है, तब तो बाबा कहते हैं कि मन्सा द्वारा ऐसी शक्तिशाली सेवा करने के लिए अपने 'मनोबल' को बढ़ाओ। पहले यह तो देखे कि जहाँ हम रहते हैं, वहाँ उस गली वालों को हमने समझाया है? नज़दीक रहने वालों को वाणी द्वारा समझाया है।
अन्त समय जब चारों ओर दुःख और अशान्ति होगी तो सभी में बेहद का वैराग्य होगा। जैसे धरनी होती है तो धरनी में पहले हल चलाते हैं फिर उसमें बीज डालते हैं, तब वह बीज बहुत अच्छा फल देता है। हल नहीं चलावे और बीज डाल देवें तो धरनी फल नहीं दे सकती। ऐसे ही जो अन्त का समय होगा, उसमें वैराग्य वृत्ति जो है, वह हल चला हुआ होगा। उसके कारण जो हम बीज डालेंगे सुख का, शान्ति का, शक्ति का... उसका फल उन्हों को मिल जायेगा। उस समय सारा वायुमण्डल ही वैराग्य का होगा लेकिन हम सबको तो बहुतकाल का वैराग्य चाहिए। उस समय तो हमारे में भी वैराग्य आ ही जायेगा। लेकिन दुनिया वालों के सरकमस्टांश अनुसार हमको भी वैराग्य आया तो हमारा टीचर समय हुआ या शिवबाबा हुआ ? समय ने हमको सिखाया न कि शिवबाबा ने।
तो आप विश्व का राजा बनने के लिए प्रजा कैसे बनायेंगे ? वो अंतः वाहक शरीर द्वारा जब इतनी पॉवरफुल स्टेज बहुतकाल की होगी। बहुतकाल का पुरुषार्थ, बहुतकाल की मेहनत जो होगी उसका फल भी बहुतकाल तक मिलेगा। नहीं तो राज्य भाग्य कट हो जायेगा। तो आपने बाबा का बनकर भी क्या फायदा लिया, बाबा के बच्चे भी बने, टीचर भी बनें, इतना संसार का त्याग भी किया। और थोड़े समय का राज्य भाग्य लिया तो उससे क्या फायदा! सारा गंवा कर अगर आधा मिला तो आधे से क्या होगा। इसीलिए यह बहुतकाल का पुरुषार्थ चाहिए। बहुतकाल क्यों बाबा कहते हैं? क्योंकि बहुतकाल के पुरुषार्थ से बहुतकाल की प्रालब्ध का कनेक्शन है।
इसके लिए कभी भी यह नहीं सोचना कि अभी तो विनाश दिखाई नहीं देता है, फिर भी अभी टाइम है, थोड़ा कर लूंगी, हो जायेगा, ऐसे कई हैं जो बहुत अच्छे-अच्छे जवाब से अपने आपको और बापदादा एवं दादी को दिलासा देते रहते हैं। हो जायेंगे, यह तो ठीक है लेकिन अगर बहुतकाल नहीं होगा तो प्रालब्ध आपकी क्या होंगी ?
बाबा तो देता है सागर से गहरा और आकाश से भी ऊंचा और हम इतना लेके बस खुश हो जायें, ठीक है मेरी प्रजा थोड़ी तो बन गई। थोड़ा दो साल तो मैंने पुरुषार्थ किया, यह क्या? यह अच्छा नहीं लगता है। क्योंकि शोभता नहीं। इसीलिए बाबा बार-बार हर मुरली में बाबा कहते हैं बच्चे - फालो फ़ादर। बाबा ने बार-बार कहा है कि बच्चे कहते हैं कि बाबा से हमारा बहुत प्यार है। कुछ भी हो, चलो ज्ञान नहीं, मेरा योग नहीं लेकिन बाबा से तो मेरा बहुत प्यार है। बाबा कहता है- मैं नहीं मानता प्यार है क्योंकि जिससे प्यार होता है उसी समान बनने का होता ही है। और उसके कहने को कभी आप टाल नहीं सकते हो यह निशानी है प्यार की। तो बाबा कहता है कि बच्चे श्रीमत पर चलो, मैं कहता हूँ ज्ञानी योगी बनो। और बच्चे कहते हैं हाँ नम्बरवार चल रहे हैं, तो प्यार कैसे हुआ? इससे मैं मानता ही नहीं हूँ कि प्यार है। इसीलिए अंतः वाहक शरीर द्वारा सेवा करने की तैयारी पहले करो।
पहले फ़रिश्तेपन की स्टेज को पक्का करो, कोशिश करके देखो, अच्छा मैं अपना वायब्रेशन फैला सकती हूँ? समझो किसी से भी हम मिलते हैं, कोई जिज्ञासू आता है या कोई अपना ब्राह्मण परिवार भी आता है तो मेरे से कुछ ले जाता है, उसको कुछ मेरे से मिला? तो मेरे से निःस्वार्थ प्यार की फीलिंग आई? जो भी मेरे सामने आया, उसको कुछ ना कुछ मैंने दिया, खाली हाथ तो नहीं गया? देवियों के हाथ भी देखो वरदान देता हुआ दिखाते हैं। तो वह देवियाँ कौन हैं वा वह फ़रिश्ते कौन हैं? वह आप ही तो हो ना। तो यह अभी से अभ्यास करो। कोई भी मेरे सम्बन्ध-सम्पर्क में आये, चाहे ब्राह्मण परिवार वाले, वाहे सेन्टर में एक दो में साथी, जब भी हमारा सम्पर्क हो तो कुछ-न-कुछ मेरे से लेकर जावें। कम से कम वायब्रेशन तो शुद्ध ले सकते हैं। हमारे से कोई और वायब्रेशन नहीं आये, प्यार का वायब्रेशन आये, साथीपन का वायब्रेशन आये यह तो दे सकते हो। तो अंतः वाहक शरीर फ़रिश्ता जो है उसकी सेवा तब होगी, जब अब से यह अभ्यास करेंगे। हम दाता के बच्चे हैं। अंतः वाहक शरीर की स्थिति दातापन की होगी, वह देने वाला होगा।
अनुभव भी एक प्रमाण है, एक आँख है। जैसे हमने साकार में इन दो आँखों से ब्रह्मा बाबा को देखा, वैसे आपने अगर अनुभव की आँख से देखा तो इन दो आँखों वाले, कई भाग गये लेकिन अनुभव की आँख से देखने वाले, जानने वाले कभी भागन्ती नहीं हो सकते हैं। इसलिए ऐसे नहीं है कि साकार में ब्रह्मा बाबा को नहीं देखा लेकिन अनुभव के आधार पर देखा, प्राप्ति के आधार पर देखा इसीलिए आप यह नहीं कहेंगे हमने बाबा को देखा नहीं। अनुभव की आँख से तो देखा है। कभी कुछ चीज़ देखने में शक आ सकता है लेकिन अनुभव करके देखी हुई चीज़ में शक नहीं होता। जैसे सारी दुनिया आपको कहे कि नमक मीठा होता है, तो आप मानेंगे ? क्योंकि चखकर देखा है। तो अनुभव की अथॉरिटी सबसे बड़ी होती है। और उस अनुभव के आधार पर, प्राप्ति के आधार पर आपने पहचाना है इसीलिए आप बहुत अच्छे भाग्यवान हो। भले हम कहेंगे हम लोगों का डबल भाग्य है लेकिन फिर भी आप भाग्य में कम नहीं हो क्योंकि अनुभव की आँख से आपने देखा है। इसलिए कभी भी अपने को कम नहीं समझना। आप उस उमंग-उल्लास से कहो हमने देखा है। हमने अनुभव किया है।
तो अपने अंतः वाहक शरीर से सेवा करने के लिए अभी से तैयारी करो। अभ्यास करो कि मैं शान्ति के वायब्रेशन देने वाली हूँ, मैं शक्ति का वायब्रेशन देने वाली हूँ, मैं निःस्वार्थ आत्मिक प्यार देने वाली देवी हूँ या फ़रिश्ता हूँ... बस ! यह सेवा करो। अभी से दातापन की सेवा करो। कभी कैसा मूड़, कभी कैसा मूड़ ऐसा न हो, बदली-सदली नहीं करो। एकरस रहो, शान्ति का दान देना है, आनन्द का,प्रेम का दान दो, बस आपका मूड़ सदा दातापन का रहे। तभी आप लास्ट टाइम भी यह सेवा निर्विघ्न कर सकेंगे। लास्ट समय तो आपके सामने बड़ी लम्बी लाइन लगेगी कि हे माँ! दे देवी! हमें कुछ दो शान्ति दो सुख दो... अपने पास स्टॉक होगा तो देंगे। नहीं तो अपने को ठीक करते रहेंगे तो फिर देंगे कैसे। इसलिए अभी से ही तैयारी करो। देवी या देवता का अर्थ ही है देने वाला। इसी सेवा में बिज़ी रहो तो और कोई बातें होंगी ही नहीं। एकदम निर्विघ्न हो जायेंगे। कभी कोई बात किसी से हो भी गई तो अभी उन्हें छोड़ो। क्या यही साथ ले जाना है। छोड़ना तो पड़ेगा, शरीर छूटेगा तो यह बातें यहाँ ही छूट जायेंगे। तो बाकी इतना टाइम साथ में रखने का मतलब क्या है। जो साथ में जाने वाली चीज़ हो उसको भले पकड़ो। जो साथ में जानी ही नहीं है उसको पकड़ने से फायदा क्या? जैसे बाबा ने हमको कितना प्यार से बच्चे, मीठे बच्चे करके उठाया है। कोई के भी अवगुण नहीं देखे। ऐसे फालो फ़ादर करो। कोई भी आपके सामने आये तो कुछ लेकर जाये, ऐसे खाली हाथ किसको नहीं भेजना। उन्हें कम से कम प्यार की दृष्टि से तो देख लो। यह भी सेवा है और इससे हमारी स्थिति भी पक्की होगी। अच्छा ओमशान्ति।

बाबा को दिल का हाल सुनाओ, नयनों में बसाओ तो किसी में आँख नहीं डूबेगी

भट्टी में हरेक को हिम्मत और उमंग-उत्साह के पंख तो लग ही जाते हैं। परन्तु कभी भी अपना उमंग-उत्साह कम नहीं करना। चाहे कोई कितना भी आपको कहे आप तो ऐसी हो, वैसी हो, आप तो सेवा के लायक नहीं हो, आपको पता नहीं किसने सरेण्डर कर दिया। ऐसे कितना भी आपको दिलशिकस्त करे लेकिन आपको चुना किसने ? तो जब पहले से ही सावधान रहेंगे तो कभी माया नहीं आयेगी। कभी कहाँ बुद्धि जायेगी नहीं। अरे इतना बढ़िया-से-बढ़िया, सब कुछ देने वाला बाबा मिला उसके आगे यह आत्मायें क्या हैं, कुछ भी नहीं हैं। बाबा को सामने रखेंगे तो आत्माओं की तरफ़ कभी बुद्धि नहीं जायेगी। हमेशा बाबा, बाबा, बाबा करते रहो तो कोई भी बात आयेगी, वह बात भी बाबा ने ले ली ऐसे अनुभव होगा।
अगर कोई भी बात आपके मन में आये तो आप चिटकी लिखकर बाबा के आगे रख दो। आपका बाबा इतना अच्छा है जो किसी को नहीं सुनायेगा। और आत्मायें तो किसी ना किसी को, कभी-न-कभी सुना ही देंगी। बाबा के अलावा अन्य किसी को सुनाने से उससे उस बात का कुछ हल भी नहीं मिलेगा और वह अन्य लोगों को सुनायेंगे भी, सुनने सुनाने में एक का एक तो होता ही है। कितना भी आप सोचो यह मेरी बात किसको नहीं सुनायेंगी। लेकिन बातें ऐसे ही फैलती हैं। इसलिए जब भी आपके मन में कोई ऐसा भारीपन आये तो बाबा के कमरे में जाओ, चाहे रूहरिहान में बाबा को सुना दो और हल्के हो जाओ। अगर उससे भी नहीं होता है तो चिटकी लिखकर थोड़ा टाइम बाबा के आगे रखकर फिर फाड़ दो। बाबा को अपना बनाओ। बाबा से रूह-रूहान करो। बाबा को दिल का हाल बताओ। बाबा से प्राप्ति करो। जो बाबा देता है वही यूज़ करो। और किसी के तरफ हमारी आँख नहीं डूबनी चाहिए क्योंकि हमारी आँख में बाबा है। जहाँ बाबा आँख में बैठा है, ऐसी हमारी आँख कोई आत्मा में डूबेगी क्या? कभी नहीं हो सकता है।
तो बहुत-बहुत अटेन्शन प्लीज। बाबा भी कहते हैं ना अटेन्शन प्लीज। और इसमें अपना ही फायदा है। अच्छा, आपको कोई शिक्षा देता है और आप समझते हो कि इस वक्त उसका कोई यूज़ नहीं है तो स्टॉक में रख दो, कोई टाइम शायद काम में आ जाये बाकी शिक्षा देने वाले से हैरान, परेशान नहीं होना है। तो बाबा ने जो 'अमर भव' का वरदान दिया है, इस अटेन्शन से सदा अमर रहेंगे। आशाओं का दीपक सदा एकरस जगता रहे, कितना भी तूफान लगे तो भी हिले नहीं। एक गीत भी है- यह कहानी है दिये की और तूफान की...। एक छोटा-सा दीपक भी तूफ़ान का सामना कर लेता है। तो कितना भी बड़ा विघ्न हो, तूफ़ान हो लेकिन हम तो बाबा के जगाये हुए दीपक हैं। हमें तो बाबा की मदद है। कितना भी तूफ़ान आये हम एकरस रहे।

कर्म में मालिकपन की स्मृति रहे तो 'विदेही' स्थिति का अनुभव सहज कर सकेंगे

बाबा ने कहा है बच्चे, लाइट हाउस बनो। तो लाइट हाउस का काम क्या होता है? चारों ओर रोशनी देना। इस समय दुनिया के आत्माओं की यही इच्छा है कि सदा सुखी रहें, सदा शान्त रहें। साधारण अशान्ति से शान्ति तो सब लोग समझते हैं लेकिन हम लोगों की चाहना ऐसी है जो मन निगेटिव या व्यर्थ संकल्पों में भी नहीं जायें। इससे किनारा होगा तो हमारे बेस्ट, शुभ संकल्प होंगे। फिर उन समर्थ संकल्पों का वायब्रेशन स्वतः जाता है।
बाबा जब आते हैं तो वायब्रेशन अच्छे लगते हैं, क्यों? क्योंकि वह सागर है। ज्ञान का, सब शक्तियों का सागर है, उसका वायुमण्डल चारों ओर फैल जाता है। तो ऐसे हम सबको भी लाइट हाउस होकर वायुमण्डल फैलाना है। वह हद की रोशनी फैलाने वाला लाइट हाउस तो कॉमन है। लेकिन हम हैं रूहानी लाइट हाउस। शक्ति, शान्ति और खुशी की लाइट देने वाले लाइट हाउस हैं। लेकिन रूहानी लाइट हाउस वही बन सकता है जिसमें सब शक्तियों का स्टॉक हो। अगर खुद में ही नहीं होगा तो दूसरों को कैसे देगा? और लाइट हाउस की लाइट तो पावरफुल होती है। तो इतनी शक्तियाँ जमा करके लाइट हाउस बनके वायुमण्डल को परिवर्तन करना है। विश्व-परिवर्तन की बहुत बड़ी ज़िम्मेवारी है। तो बाबा ने यह जो ज़िम्मेवारी दी है, वह हमको अवश्य निभानी चाहिए। कई समझते हैं हम तो बहुत बिज़ी रहते हैं इसलिए पावरफुल योग नहीं हो सकता है। विदेही बनना, अशरीरी बनना या कर्मातीत बनना यह तो बहुत ऊँची मंज़िल है। इसके लिए अगर हम अभी से तैयारी करें तो लास्ट में हमको यह तैयारी मदद देगी।
विदेही माना यह नहीं कि देह से एकदम न्यारे हो जायें फिर तो शरीर छूट जायेगा। विदेही का अर्थ ही है कि कोई भी देह की कर्मेन्द्रियाँ चाहे सुनने वाली, चाहे देखने वाली, चाहे सोचने वाली यह कोई भी मुख्य कर्मेन्द्रियाँ हमको देह-भान में नहीं लाये अर्थात देह की कोई भी कर्मेन्द्रियाँ हमको अपनी तरफ आकर्षित नहीं करे। कई बार कोई-कोई बात से कनेक्शन नहीं होता तो भी आदत होती है देखेंगे, सुनेंगे...। तो यह समझो हमारी देखने की कर्मेन्द्रियाँ जो हैं वह लूज़ हैं। वश में नहीं हैं क्योंकि देखेंगे तो सोच भी चलेगा कि कौन आया, देखने की आँख भी धोखा दे रही है और सोच भी चल रहा है कि इस समय क्यों आया, कैसे आया तो हमारी कितनी शक्तियाँ व्यर्थ गई। ऐसे हर एक में कोई-न-कोई नेचर होती है। कोई को सुनने की, कोई को देखने की इच्छा बहुत होगी। कोई को कोई मतलब ही नहीं होगा तो भी सोचने की आदत होगी। छोटी-सी बात पर भी सोच बहुत चलेगा, यानि सोचने की शक्ति, मन पर कण्ट्रोल नहीं है। आँख के ऊपर कण्ट्रोल नहीं है। कान के ऊपर कण्ट्रोल नहीं है और किसकी फिर बोलने की आदत होती। दो की बात चल रही होगी, वह वहाँ भी ज़रूर बीच में बोलेगा। रह नहीं सकेगा कोई कनेक्शन ही नहीं है फिर भी वह बोलेगा ज़रूर। लेकिन कोई-न-कोई विशेष कर्मेन्द्रियाँ जो होती हैं वह खींचती हैं, तो हर एक को अपनी चेकिंग करना चाहिए कि बहुत करके कौन-सी कर्मेन्द्रियाँ मेरे कण्ट्रोल में नहीं हैं? जो अपने कण्ट्रोल में नहीं हैं वही अन्त में धोखा देंगी क्योंकि अन्त में सभी बातें देखने, सुनने, सोचने की होंगी। बोलने के लिए तो उस ही समय ही नहीं होगा, लेकिन अन्दर बोलेंगे ज़रूर।
तो विदेही तब बन सकेंगे जब यह सब कर्मेन्द्रियां कन्ट्रोल में हों। इस देह की कर्मेन्द्रियाँ मेरे को क्यों खीचंती है? क्योंकि कण्ट्रोलिंग पावर नहीं है तो फिर विदेही कैसे बनेंगे ? देह से न्यारा माना देह से कोई अलग तो नहीं हो जायेंगे। लेकिन कोई भी देह की कर्मेन्द्रियाँ हमको अपने तरफ़ खींचे नहीं, यह प्रैक्टिस ज़रूर चाहिए। नहीं तो अन्त में जब हालते बहुत खराब होंगी, उस समय कण्ट्रोलिंग पावर अगर नहीं होगी तो कभी भी पास विद् ऑनर नहीं हो सकते हैं। और बाबा तो कहते हैं कि अन्त में तो एक सेकेण्ड का पेपर होगा स्मृतिर्लब्धः नष्टोमोहः। कर्मेन्द्रियों से सुनने, देखने, बोलने और सोचने का भी तो मोह होता है। उसे भी तो बॉडी-कान्सेस का ही एक हिस्सा कहेंगे। नष्टोमोहा माना सम्बन्धियों या वैभवों से नहीं, चीज़ों से नहीं। अपने शरीर की कोई भी कर्मेन्द्रियाँ अगर खींचती है माना मोह है, उससे प्यार है। तो नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप कैसे होंगे? तो इसके लिए एक सहज अभ्यास है कि हम चाहे कितने भी बिज़ी रहते हैं लेकिन मैं आत्मा मालिक इन कर्मेन्द्रियों से यह काम करा रही हूँ। जैसे कोई डायरेक्टर, बॉस होता है- वह अपने ही कमरे में एक कुर्सी पर बैठा रहता है। परन्तु उसको यह नैचुरल याद रहता है कि मैं डायरेक्टर हूँ, यह कर्मचारी जो भी मेरे साथी हैं उनसे कराने वाला हूँ। मैं ज़िम्मेवार हूँ। यह तो याद रहता है ना! ऐसे यह भी याद रहे कि मैं आत्मा करावनहार हूँ और यह कर्मेन्द्रियाँ जो हैं, मेरी कर्मचारी हैं यानि साथी हैं। मददगार तो यह कर्मेन्द्रियाँ ही हैं। लेकिन मैं मालिक हूँ, कराने वाला हूँ। मालिक कहने से आत्मा अलग हो जाती है, शरीर अलग हो जाता है। यह प्रैक्टिस हम बीच-बीच में काम करते भी करें, यह नशा रखें कि 'मैं आत्मा करावनहार हूँ या मैं आत्मा मालिक हूँ।' मालिकपन आयेगा तो न्यारापन आटोमेटिक होगा। कराने वाला मैं हूँ और यह करने वाली हैं तो डायरेक्शन से ज़रूर चलेंगे। अगर कोई डायरेक्शन प्रमाण नहीं चलते हैं तो समझेंगे कि यह तो नहीं चल सकेगा। तो कर्म छोड़कर नहीं लेकिन कर्म करते हुए यह याद करना है कि मैं कराने वाली आत्मा मालिक हूँ यह कर्मेन्द्रियां अलग हैं, फिर कण्ट्रोल करना सहज है। यदि मालिक को मालिकपन ही याद नहीं होगा तो सर्वेन्ट मानेगा कैसे? कम्पनी के डायरेक्टर जो होते हैं वह अपने वर्कर्स को कितना बिजी रखने की कोशिश करते हैं, तो मैं भी मालिक हूँ तो इन कर्मेन्द्रियों को क्यों नहीं बिज़ी रखूँ ! दूसरा मैं मालिक हूँ तो विदेही यानि देह से न्यारे का अभ्यास नैचुरल होता जाता है। कर्म करते हुए यह अभ्यास करते रहो तो आपका लिंक जुटा रहेगा। और लिंक जुटा हुआ होने के कारण फिर जब आपको फुर्सत मिलती है उस समय आप विदेही बन जाओ। लेकिन विदेहीं का मतलब यह नहीं है कि चींटी ऊपर चढ़े तो पता ही नहीं पड़े। लेकिन जैसे कोई बहुत डीप विचार में होते हैं, कोई बात में बहुत रुचि होती है, सुनने की, देखने की तो उस समय बाहर कुछ भी होता रहे फिर भी हमारा अटेन्शन नहीं जाता है। समझो मैं खाना खा रही हूँ और मेरा कुछ विचार चल रहा है, जिसमें मेरा पूरा ध्यान उसी विचार में है तो खाना तो मैं मुख में ही डाल रही हूँ, लेकिन अगर कोई मेरे से पूछे कि आज नमक ठीक है? तो आप जवाब नहीं दे सकेंगे क्योंकि आपका विचार जो है वह दूसरे तरफ इतना डीप था जो आपने खाया भी लेकिन खाते हुए भी आप न्यारे रहे। तो जब देह में होते आपको पता ही नहीं पड़ा कि मीठा है, खट्टा है। ऐसे ही अगर हम देह में होते हुए अपने ही मनन-चिंतन में हैं, मालिकपने के नशे में हैं तो मुझे यह कर्मेन्द्रियाँ क्यों आकर्षित करेंगी? नहीं कर सकती हैं। यह अभ्यास बहुत सहज है क्योंकि इसमें काम को छोड़ने की बात नहीं है। काम करते हुए मालिकपन चाहिए।तो कर्म भी अच्छा होगा और विदेहीपन का अभ्यास भी पक्का होता जायेगा।
एकान्त में इसका अभ्यास और अच्छी तरह कर सकते हैं। एकान्त में मालिकपने के नशे का मज़ा तो कुछ और ही होता है। भिन्न-भिन्न स्वमान का नशा और खुशी रहे तो भी मालिकपने की स्मृति और पक्की होती जायेगी। और इससे याद आटोमेटिकली आ जायेगी क्योंकि जितना आप मालिकपन में रहेंगे तो कर्मेन्द्रियाँ धोखा नहीं देंगी। और मैं आत्मा हूँ, यह पक्का होता जायेगा। मालिक हूँ, आत्मा हूँ। तो शिवबाबा की याद बहुत सहज हो जायेगी क्योंकि मैं भी अशरीरी वह भी अशरीरी। बीच में पर्दा है यह शरीर का इसलिए योग नहीं लगता है। और जब मैं आत्मा मालिक अशरीरी हूँ और बाबा भी अशरीरी है तो एक जैसे हो गये। तो कनेक्शन बहुत जल्दी हो जायेगा यानि योग जल्दी लग जायेगा। तो यह अभ्यास ज़रूर करो। जब देह से अलग होते जायेंगे, होते जायेंगे तो वैराग्य क्या बड़ी बात है! मालिकपने के नशे और खुशी के रस के आगे यह जो भी लगाव की चीजें हैं वह ऐसे लगेंगी जैसे बिल्कुल फीकी हैं, कुछ भी नहीं हैं। और अलग-अलग मेहनत करने से बच जायेंगे।
आत्मा के निजी संस्कार क्या हैं? ज्ञान-स्वरूप, प्रेम-स्वरूप, शान्त-स्वरूप, पवित्र-स्वरूप... यही है। और बॉडी-कान्सेस के संस्कार किसके जोश के हैं, किसके बहुत टू मच रमणीकता के हैं.. यह सब जो भी संस्कार हैं यह तो बॉडी-कान्सेस के हैं। बाकी वास्तव में आत्मा के संस्कार तो वह हैं।
इस समय आप सब देखते, अनुभव करते हो कि अव्यक्त बाबा के अव्यक्त रूप की बहुत बडी लीला चल रही है। कम नहीं है। बाबा को जो काम जिससे कराना होता है, जब कराना होता है तब ऐसी आत्माओं में ऐसी भावनायें भर देता है, शक्तियां भर देता है। सिर्फ इसमें हमको निमित्त बनना है। बाकी कमाल तो बाबा की ही है, व्यक्त में तो कमाल दिखाई स्थापना की। लेकिन अव्यक्त में भी बाबा कमाल कर रहा है जो सबको सम्पूर्ण बनाकर साथ ले ही जायेगा। तो क्यों नहीं हम प्यार से तैयार हो जायें, सजायें खाकर क्यों जायें! पुरुषार्थ भी बहुत सहज है क्योंकि इस समय हमको दो बाप हैं। एक शिवबाबा समान विदेही बनना है, न्यारा बनना है, आत्मा बनना है। और कर्म में ब्रह्मा बाबा को फालो करना है। कोई भी काम शुरू करने से पहले ब्रह्मा बाबा को सामने लाओ। ब्रह्मा बाबा ने कैसे किया ? बाबा की वृत्ति क्या ? बाबा की दृष्टि क्या? बाबा कैसे कर्म करता है? यह सब मुरलियों में स्पष्ट बताता है। तो ब्रह्मा बाबा को सामने रखो उसको फालो करो। जैसे बाबा ने किया है, मुझे भी वैसा ही करना है। नई कोई मत नहीं चलानी है, नया कोई काम नहीं करना है। बस। फ़ालो ही करना है। कदम-पर-कदम रखना है और कोई रास्ता नहीं ढूँढना है, यह तो बहुत इजी है। बाबा मंज़िल पर पहुँच गया, अव्यक्त हो गया माना रास्ता राइट है तभी तो मंज़िल पर पहुँचा। तो हम भी पहुँचेंगे ज़रूर लेकिन फ़ालो फ़ादर करेंगे तब। उनके कदम-पर-कदम उठा रहे हैं तो जरूर पहुँचेंगे, सहज पुरुषार्थ है। बाकी इतना बैठकर मेहनत करना, माया क्यों आयी, कैसे आयी.. ऐसे सोचना यह भी उसको और ही चाय पानी पिलाना है। और जिसको चाय पानी पिलायेंगे वह बैठेगी या जायेंगी? फिर मेहनत करो, योद्धे बनो। इसलिए उसको बिठाओ ही नहीं, तो मायाजीत सहज हो जायेंगे। अब सहज पुरुषार्थ में रहो, संस्कार में भी इज़ी रहो। संस्कार और पुरुषार्थ में इज़ी माना हँसी-मज़ाक वाला नहीं। इजी माना जैसा समय वैसे हम अपने को मोल्ड कर सकें, इसको कहते हैं इजी नेचर। इजी नेचर माना हर परिस्थिति में एडजेस्ट करने की ताकत होनी चाहिए और वैसा उसी अनुसार अपने को मोल्ड कर दें। एडजेस्ट करके अपने को न्यारा करके चलो। उस बात को पकड़ करके रुको नहीं, यह क्यों हुआ ? यह क्या हुआ ? ऐसा होना थोड़े ही चाहिए! यह मर्यादा नहीं है। यह बड़े क्यों करते हैं, छोटे क्यों करते हैं? अरे आप उसके ज़िम्मेवार हो क्या? इसमें फायदा कुछ भी नहीं। पानी बिलोर करके बैठ जायेंगे फिर भी अपने को ही ठीक करना पड़ेगा। इसलिए ऐसा पानी बिलोरते ही क्यों? दर्द तो हमारे ही हाथों में होगा। दूसरे को थोड़े ही दर्द होगा ? तो ऐसी अवस्था इज़ी हो माना अपने को मोल्ड कर लो। अगर कोई बात है तो ऊपर दे दिया बस, खत्म। बाकी सोच नहीं चलाओ। नहीं तो ऐसी व्यर्थ संकल्पों की आदत पड़ जायेगी जो उससे छूटना बहुत मुश्किल हो जायेगा। फिर टाइम वेस्ट, एनर्जी वेस्ट, सब वेस्ट इसलिए अभी समय को बचाओ, संकल्पों को बचाओ। और शक्तियों तथा गुणों को बचाओ, जमा करो।
अमृतवेले एकदम ऐसे फुर्त अच्छे होकर बैठो तो दो चार दिन में भी आपको इतने अच्छे अनुभव होंगे जो ट्रान्स तो उसके आगे कुछ भी नहीं है क्योंकि हमको तो दोनों अनुभव हैं। ट्रान्स टेम्प्रेरी टाइम का होता है और अनुभव सदाकाल का होता है। उस अनुभव को कभी भी याद करेंगे तो उसमें ही खो जायेंगे। ट्रान्स का संकल्प नहीं करो क्योंकि संकल्प करने वाला तो ट्रांन्स में जा ही नहीं सकता है, नीचे आ जायेगा क्योंकि इस संकल्प का भी बोझ तो है। इसमें तो न्यारा होना पड़ता है।
आपको कोई भी टाइम कैसी भी माया आवे वह सेकण्ड का किया हुआ अनुभव जो होता है वह इतना पावर फुल होता है, कोई भी बात आपके सामने आये, उस अनुभव को याद करो तो वह बात खत्म हो जायेगी। सबसे बड़ी अथॉरिटी 'अनुभव' की है। सबसे बड़ा प्रमाण भी अनुभव का ही होता है। तो अनुभव करके देखो। इसके लिए पहले सारा दिन मालिक होकर कर्म कराने का अभ्यास करो फिर योग में बैठो तो ट्रान्स से भी ऊपर चले आयेंगे। ट्रान्स में अपनी मेहनत नहीं होती है, यह तो वरदान होता है। हम समझे हम ट्रान्स में जाते हैं। अन्त समय में भी ट्रान्स में चले जायेंगे, लेकिन अन्त में बाबा कभी नहीं बुलायेगा। कहेगा योग का प्रमाण दो क्योंकि ट्रान्स तो बाबा की मदद है और यह अपना अनुभव है, अपनी ताकत है। अच्छा- ओमशान्ति ।

एकाग्रता की शक्ति ही मनोबल बढ़ाने का साधन है

मौन में रहना सबके लिए ज़रूरी है क्योंकि मौन से दिमाग की एनर्जी बढ़ती है। जो ज़्यादा बोलते हैं उनका दिमाग कमज़ोर होता है क्योंकि शरीर की एनर्जी वेस्ट जाती है। इसलिए बाबा हम लोगों को सिखाते थे कि जो काम दो शब्दों में हो सकता है उसके लिए दस शब्द नहीं बोलो। क्योंकि हम जितना बोलेंगे, जैसा बोलेंगे, उतना वैसा ही आदत पड़ती जायेगी। और जो ज्यादा बोलता है वह अपनी बात को ज़्यादा सिद्ध करता है। बात को सिद्ध करने के लिए उसको ज़्यादा बोलना ही पड़ता है। ऐसा नहीं वैसा, वैसा नहीं ऐसा... सिद्ध करने के लिए जिद्द भी करेगा। तो सिद्ध करने के लिए बहुत प्वाइन्ट्स की आवश्यकता है जैसेकि वकील को केस जीतने के लिए कितना बोलना पड़ता है। लेकिन जितना कम बोलो उतना अच्छा है। अपनी एनर्जी को हर तरह से बचाओ। अगर हम इन बातों में लगे रहेंगे तो जो बाबा कहता है वह हम नहीं कर सकेंगे। जो बाबा कहते हैं कि शुभ चिंतन करो, मनन करो वह शक्ति नहीं बढ़ेगी क्योंकि उन व्यर्थ बातों में लगे रहने से फुर्सत नहीं मिलेगी और वह बातें ऐसी होती हैं जो एक बात जाती है तो दस बातें पहले ही खड़ी होती हैं। इस बात के तो सब अनुभवी होंगे ही क्योंकि सेवाओं के क्षेत्र में हर स्थान पर यह बातें तो होती ही हैं। दूसरा विघ्न भी ऐसे ही होते हैं एक विघ्न हटेगा, दूसरा पहले ही तैयार होगा। इसीलिए अभी बाबा कहते हैं कि- 'मनोबल बढ़ाओ'।
'मनोबल' शब्द बहुत अच्छा है। इसमें मन को एक ही संकल्प में एकाग्र करने का अभ्यास करना होता है। बहुतकाल के अभ्यास से हमारा मनोबल बढ़ने लगता है। योग में भी मन को कोई भी एक स्थिति में एकाग्र करना होता है। तो मन में बल तब आ सकता है जब आपका मन एकाग्र हो। 'एकाग्रता की शक्ति बहुत ज़रूरी है।' अगर आपके पास एकाग्रता की शक्ति होगी तो इस पुरुषार्थी जीवन में अगर कोई विघ्न भी आता है तो आप एक सेकण्ड में उसको बिन्दी लगा सकेंगे। बाबा कहते हैं कोई भी बात हो, आप आत्मा बिन्दु बन, बिन्दु बाप को याद करते हुए उस बीती को बिन्दी लगाओ। इन तीन बिन्दियों का अमृतवेले ही तिलक लगा लो तो फिर कोई विघ्न नहीं आयेगा और अगर आता भी है तो उसमें आप विजयी होंगे क्योंकि जो भी कुछ होता है, ड्रामा से फुलस्टॉप आ जाता है और फिर बाबा की याद से शक्तियाँ आती हैं, उन शक्तियों से जो चाहो वह हो सकता है।
तो मनोबल माना मन की एकाग्रता। अगर बीती हुई बातों के ऊपर सोचेंगे तो एक तो टाइम वेस्ट, दूसरा एनर्जी वेस्ट तो बीती हुई बातों को याद करना भी फालतू है क्योंकि इससे अपनी अवस्था में जो प्रोग्रेस होनी चाहिए उसमें बाधा आ जाती है। तो बीती हुई बातों को एकदम फुलस्टॉप लगा दो। नहीं तो मन में बहुत परेशानी होगी। कन्ट्रोलिंग पावर होगी तो एक धक से फुलस्टॉप लगा सकेंगे। जैसेकि कोई गाड़ी का ब्रेक जहाँ चाहो वहाँ लगा सकते हैं और अगर ब्रेक नहीं लगी या नही लगाई तो एक्सीडेन्ट हो जाता है। ऐसे ही मेडीटेशन भी वही कर सकता है जो मन को कण्ट्रोल करना जानता है। नहीं तो मन सदा ही किसी-न-किसी बातों में झूमता रहेगा या मूंझा हुआ रहेगा। इसलिए मन की कण्ट्रोलिंग पावर अगर नहीं है तो आपके व्यर्थ संकल्प, निगेटिव संकल्प पता नहीं कौन-कौन से संकल्प वह सब आकर आपको घेर लेंगे। इसलिए मनोबल को बढ़ाने के लिए एक तो एकाग्रता चाहिए दूसरा कष्ट्रोलिंग पावर। मन की एकाग्रता माना मैं जो चाहूँ, जहाँ चाहूँ, जैसे चाहूँ, जिस समय चाहूँ कण्ट्रोल कर लूँ।
इस मन की एकाग्रता से ही निर्णय शक्ति बढ़ेगी। इसके लिए चाहिए मन की बहुत स्वच्छता। अव्यक्त बापदादा के पास, बाबा के कमरे में जाकर सच्चे सम्बन्ध से अपने दिल की बात करके, अपने मन को एकदम खाली करो तो आपकी दिल हल्की हो जायेगी। बाकी जो बीती हुई बातें हैं उसको फिर-फिर सोचो नहीं, बिल्कुल नहीं याद करो क्योंकि सोचने से कुछ होता नहीं है। इससे और ही बहुत नुकसान होता है। सबसे बड़ा खज़ाना है 'संकल्प'। इसलिए अपना मन कभी ऐसी बातों में आकर खराब नहीं करो और ना ही व्यर्थ गँवाओ। एक सेकण्ड भी संकल्प शक्ति को आपने गँवाया तो वह एक सेकण्ड नहीं है लेकिन आपने अनेक जन्मों के लिए अपना गँवाया। संगमयुग है कितना छोटा ? पाँच हज़ार वर्ष की प्रालब्ध इसमें जमा करना है। आधाकल्प आप राज्य करेंगे और आधाकल्प पूज्य बनेंगे। ऐसा बनने के लिए कितनी मेहनत करना चाहिए? तो अभी आप जितना जमा करेंगे उतना खायेंगे। अगर नहीं जमा होगा तो त्रेता में अर्थात् सेमी-स्वर्ग में जायेंगे।
तो संगम का एक सेकण्ड भी वर्षों के समान है। तो एक सेकण्ड नहीं गंवाया लेकिन कई वर्ष गँवाया। तो चेक करो कि जो भी कर्म हमने किया उससे फायदा हुआ? अगर समझो कोई कर्म का परिणाम न बुरा हुआ, न अच्छा हुआ तो यह भी वेस्ट ही है। और जो वेस्ट होता है उसका बोझ होता है। और जब बोझ होगा तो ऊपर कभी नहीं जा सकते हैं क्योंकि कोई भारी चीज़ ऊपर नहीं जाती है। तो अगर हमारे में किसी भी प्रकार की वेस्टेज़ है तो यह बोझ है जो किसी भी बात का अनुभव करने नहीं देगा। बीजरूप अवस्था का अनुभव तो छोड़ो परन्तु बाबा से रूह-रूहान भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि बोझ है। इसलिए मनोबल बढ़ाने के लिए यह सब बातें अटेन्शन में रहना चाहिए। इसके लिए मम्मा एक बात बार-बार कहती थी कि - "हर घड़ी अपनी अन्तिम घड़ी समझो।" और हम लोगों को भी यही याद रहता था कि अभी पता नहीं क्या हो जाए। बस मुझे पुरुषार्थ करना है। आजकल तो प्रैक्टिकल में हम अन्तिम घड़ियों के सीन सामने देख रहे हैं, सुन रहे हैं तो कितना सोच-विचार चलता रहता है। इसलिए अब तो अन्तिम धड़ी समझना चाहिए क्योंकि किस घड़ी कहाँ और किसका क्या होगा, इसका कोई भरोसा नहीं है। किसी समय भी कुछ भी हो सकता है और हो रहा है। इसलिए यह स्लोगन पक्का याद रखना चाहिए।
हमेशा पाँच हजार वर्ष को सामने रखते हुए अपना पुरुषार्थ करो। ऐसे नहीं जितना कर सकें उतना किया, अभी क्या करना है? खाओ, पिओ, मौज करो... यह तो आधाकल्प किया और इसकी रिज़ल्ट क्या हुई? वह भी हमारे सामने है। खाओ, पिओ, मौज करो का सच्चा मौज तो सतयुग में ही होता है। इसलिए अभी तो उसके लिए वह कमाई जमा करनी है। अभी नुकसान नहीं करना है तो बहुत अपनी सम्भाल होनी चाहिए। मनोबल, मनोबल हम यह शब्द तो बोलते हैं लेकिन मनोबल बढ़ाने की युक्तियाँ बहुत जरूरी हैं। और अन्त के टाइम बाबा ने कह दिया है कि मनोबल की सेवा के बिना न खुद बच सकेंगे, न ही औरों को बचाने की सेवा कर सकेंगे। जब सेवा ही नहीं करेंगे तो राजा कैसे बनेंगे? बिना प्रजा के किस पर राज्य करेंगे?
वाणी द्वारा सेवा करने का चान्स नहीं मिलता है तो मन्सा सेवा में तो कोई बहाना नहीं बन सकता है। तो वृत्ति द्वारा शुद्ध वायुमण्डल बनाने की सेवा करना -यही तो मनोबल है। आपने मनोबल द्वारा, वृत्ति द्वारा सेन्टर का वायुमण्डल बनाया तो शेयर तो आपको ज़रूर मिलेगा। जैसे बहनों ने वाणी द्वारा कोर्स कराया और आपने वृत्ति द्वारा वायुमण्डल बनाया तो बराबर मार्क्स जमा हो गई क्योंकि बाबा ने समझाया है कि संकल्प, वाणी तथा कर्म इन तीनों की १०० मार्क्स है। चारों ही सब्जेक्ट में १०० मार्क्स है। अगर आप कोई भी काम मन्सा से करते हो तो उसकी १०० मार्क्स आपकी जमा हो ही गई। इसलिए कोई कम नहीं। और मनोबल की मार्क्स तो और ही ज़्यादा होंगी क्योंकि इसमें आपको कोई विघ्न नहीं आयेगा।
विघ्न मुख्य चार कर्मेन्द्रियों द्वारा होता है। और वह चार ही विशेष शक्तियाँ फेस में है- १. सोचना २. देखना ३. बोलना और ४. सुनना। यह चार मुख्य शक्तियाँ हैं और यह चारों ही चेहरे में हैं। इसलिए कहते हैं- अन्तर्मुखी बनो। एक स्लोगन भी है कि "अन्तर्मुखी सदा सुखी" क्योंकि चारों ही शक्तियाँ यही नुकसान करती है। जो धोखा देती हैं तो चार ही शक्तियाँ देती हैं। हर एक में कोई-न-कोई इन चार शक्तियों में से एक कमज़ोरी होती है। समझो किसमें सुनने की बहुत होती है, कोई अर्थ ही नहीं है, दो आपस में बोल रहे हैं तुम्हारा क्या काम है उसमें, लेकिन सुनने की आदत होंगी तो वहाँ ठहर जायेंगे। खड़े हो करके हाँ में हाँ मिलाते रहेंगे। फालतू बोलने की आदत वाला बोलने के बिना रह ही नहीं सकता। ऐसे ही देखने की आदत भी बहुत बुरी होती है, व्यर्थ में अनुमान से देखेगा फिर कहेगा हाँ, मैंने देखा है यह होता है, इतना ही नहीं बल्कि यह भी कहेगा कि मैंने अपनी आँखों से देखा है अरे तुम्हारा क्या काम था, जो आँखों से देखा है? तो एक आँख धोखा देती है- देखने की आदत, सुनने की आदत, बोलने की आदत और सोचने की आदत जिसको बाबा कहते हैं निगेटिव नहीं सोचो यह चार आदतें बहुत नुकसान करती हैं, भले आपस में रिवाज़ी बोलते हैं परन्तु एनर्जी तो जाती ही है फिर मनोबल बढ़ेगा कैसे ?
शक्तियाँ जा रही हैं तो मन शक्तिशाली कैसे होगा क्योंकि जो तीन सूक्ष्म शक्तियाँ हैं - मन-बुद्धि-संस्कार इन्हों को ही बचाना है। यह है आत्मा की ही शक्तियाँ लेकिन यह सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। इन सूक्ष्म शक्तियों के ऊपर हमारी विजय होनी चाहिए। इन चार आदतों में से कोई भी आदत हो आप में, उसको मेहरबानी करके बचाओ। नहीं तो मनोबल कभी भी नहीं आ सकता है। कितनी भी कोशिश करो कितना भी शिवबाबा, शिवबाबा करते रहो या कितना भी बिन्दु, बिन्दु करते
रहो पर बिन्दु खिसक जायेगी। किचड़ा भरा हुआ है तो बिन्दु बैठेगी कैसे ? इसलिए मनोबल के लिए हमारा मन बिल्कुल क्लीन भी होना चाहिए, क्लीयर भी होना चाहिए। ऐसे नहीं मन में शुद्ध भी चले, अशुद्ध भी चले... जैसे एक बूंद भी अगर किसी चीज़ में जहर डाल दिया जाये तो वह पूरा-का-पूरा ही विष हो जाता है। तो हमारे मन के अन्दर अगर व्यर्थ है, बुराई की बात छोड़ दो वह तो होना नहीं चाहिए लेकिन वेस्ट भी है। तो मनोबल जमा नहीं हो सकता है। तो चेक करो कि-मन के ऊपर कण्ट्रोल होता है या नहीं? हमारा लक्ष्य नम्बरवन में आने का है। तो नम्बरवन तब होंगे जब पहले मन-बुद्धि-संस्कार के ऊपर कण्ट्रोल हो? इसके लिए सहज युक्ति है- बाप को फ़ालो करो। हर कर्म करने के पहले यह सोचो ब्रह्माबाबा ने क्या किया, कैसे किया? बस। फालो करना तो मुश्किल नहीं होता है क्योंकि कदम-पर-कदम रखना होता है। ब्रह्मा बाबा के पास भी समस्या आती थी, ज़िम्मेवारी भी बहुत थी। विदेही अवस्था या कर्मातीत अवस्था या अशरीरी अवस्था के लिए फ़ालो करना है शिवबाबा को और ब्रह्मा बाबा को फालो कर्म में करो। कोई भी काम शुरू करना है तो सामने ब्रह्मा बाबा को रखो। योग लगाना है तो शिवबाबा को सामने रखो फिर देखो ज़रा भी मेहनत नहीं लगेगी। बाबा ने जो और जैसे किया है वही मुझे करना है, बस। मैं ब्रह्माकुमार हूँ तो मुझे ब्रह्मा बाबा को फ़ालो करना है,इसमें क्या मुश्किल है? इससे मनोबल आपेही बढ़ेगा। कोई बोल, कर्म फालतू होगा ही नहीं, कोई फालतू सोच चलेगा ही नहीं तो मनोबल बढ़ेगा ही।
तो मनोबल के लिए एक तो एकाग्रता की शक्ति चाहिए और फिर निर्णय शक्ति भी चाहिए। इसके लिए भी एकाग्रता और स्वच्छता चाहिए। स्वच्छता नहीं होगी तो एकाग्रता भी नहीं आयेगी, क्योंकि बुद्धि कभी इधर लुढ़केगी कभी उधर लुढ़केगी। कभी अच्छे तरफ़, कभी व्यर्थ तरफ़, कभी फालतू बुरे तरफ़ बुद्धि लुढ़कती रहेगी। मन की भी एकाग्रता चाहिए, क्लीन और क्लीयर चाहिए और चार जो विशेष कर्मेन्द्रियाँ हैं उनके ऊपर अटेन्शन चाहिए। कोई भी चार में से आपके पास अगर थोड़ा भी संस्कार हो तो उसको कट करो तो मनोबल आने लगेगा। नहीं तो बुद्धि का जहाँ लगाव होगा वहाँ झुकाव होता रहेगा। आपका लगाव समझो सुनने, देखने में है तो इन चार विशेष कर्मेन्द्रियों के ऊपर, संस्कार के ऊपर अटेन्शन हो। जब आप संस्कार परिवर्तन करेंगे तो आपका संसार परिवर्तन हो ही जायेगा। वायुमण्डल बनाने के लिए अपनी वृत्ति को अच्छी रखो। हमारी वृत्ति में किसी के लिए भी शुभ भावना और शुभ कामना हो। कोई मुझे अशुभ भी बोल रहा है तो उसके प्रति भी शुभ भावना रखना, अशुभ से उसका ही नुकसान होगा। बदले में उसने अशुभ किया तो मैंने भी अशुभ किया तो उनमें और हमारे में फर्क क्या हुआ? तो इस प्रकार की वेस्टेज़ और निगेटिव को खत्म करो। यही विघ्न रूप बनते हैं और यही मनोबल बढ़ाने देते।
आपने देखा होगा हरी सब्जियों में हरा कीड़ा होता है, लाल मिर्ची में लाल कोड़ा होता है तो जिसमें जो कमज़ोरी होगी उसी रूप में उसके पास वह माया आयेगी। वही कमज़ोरी आपको बार-बार खीचेंगी, फेल भी वही करेगी। इसलिए यह नहीं सोचना कि हमारे पास इतनी शक्तियाँ तो हैं... सब शक्तियों का स्टॉक जमा चाहिए। दूसरी शक्ति है स्टॉप की। तो एक है 'स्टॉक' और दूसरा 'स्टॉप' - इन दो बातों में अपने को चेक करो। स्टॉक भी है और स्टॉप लगाने की शक्ति भी है फिर आप मनोबल की सेवा अर्थात सकाश देने की सेवा कर सकेंगे। अच्छा।

अन्तिम समय में मन्सा-सेवा करने के लिए सर्व शक्तियों का स्टॉक जमा करो

बाबा से हमारे सर्व सम्बन्ध हैं- यह अनुभव बहुत गहरा होना चाहिए। सखा चाहिए तो बाबा को सखा बना दो, कम्पैनियन की रीति से कम्पनी और कम्पैनियन बाबा को बना दो। ऐसे नहीं कि बाबा, बाबा ही है लेकिन बाबा सब कुछ है। कोई समय उदास हो जाते हैं, अकेले अकेले महसूस करते हैं तो बाबा को अपने कम्पैनियन रूप में जीवन का साथी बना दो। वैसे साथी तो साथ में रहते हैं लेकिन बाबा हमारा जीवन का साथी है जिस रूप में बाबा को याद करेंगे, बाबा आपको साथ देने के लिए बंधा हुआ है इसलिए अधिकार से बाबा को याद करो। यह नहीं बाबा आपने कहा था ना, तो आप करो ना। आप बंधे हुए हो ना, ऐसे नहीं। अधिकार से कहो सब कुछ हमारा है। बाबा ने कहा है तो उसका फायदा उठाओ।
ऐसे नहीं योग लगा, नहीं लगा..... अरे क्यों नहीं योग लगता। मेरा बाबा है, तो 'मेरा' कभी भूलता है क्या। जैसे अपना शरीर व शरीर का नाम कभी भूलता है? आपके नाम से अन्य दूसरे किसी को बुलायेंगे तो भी आप ऐसे करेंगे ज़रूर। तो बाबा मेरा है, मैं बाबा की हूँ तो मेरे का अधिकार है। और मन्सा भी तभी ठीक होगी। सेवा के लिए पहले हमारी मन्सा बहुत क्लीयर होनी चाहिए। और कुछ उसमें नहीं होना चाहिए, अगर कोई किचड़ा होगा तो ऐसों के साथ बाबा नहीं बैठ सकता है। बाबा की याद नहीं आ सकती है क्योंकि बाबा अति स्वच्छ है। और अन्त के समय तो आपको पता ही है कि क्या हालतें होंगी! ऐसे वायुमण्डल में आप मन्सा सेवा करने के लिए अगर सोचते हो कि करना तो है ही, लेकिन पहले देखो कि मन और बुद्धि क्लीयर है?
जैसे सेन्टर में अगर सफाई नहीं होगी तो वह सेन्टर गृहस्थी घर लगता है। तो जैसे सेन्टर या स्थान जहाँ हम बैठते हैं उसकी सफाई ज़रूरी है, ऐसे अगर मन्सा-सेवा करनी है तो पहले मन हमारा क्लीयर हो। चेक करो कि मन में और-और बातें तो नहीं हैं? अगर और बातें नहीं होगी तो मन्सा-सेवा कर सकते हैं। और सेवा के टाइम मन्सा में सर्व शक्तियों का स्टॉक इकट्ठा होना चाहिए। सर्व -छोड़ो, कम से कम ८ शक्तियों का मेरे मन में स्टॉक हो। अगर स्टॉक ही नहीं होगा तो आप देंगे क्या? पहले एक-एक शक्ति को सामने लाओ मेरे में सहनशक्ति है, समाने की शक्ति है? कितने परसेन्ट में है? और समय पर यूज़ होती है? यह दो बातें चेक करो। यह अभ्यास अभी से शुरू करो कि कौन-सी शक्ति किस समय यूज़ करने का क्या अनुभव है? नहीं तो उस समय धोखा मिल सकता है। और स्टॉक जमा करने के लिए सिर्फ स्टॉप करने की विधि को अपनाओ माना बिन्दी लगाने की विधि को अपनाओ।
अभी लास्ट समय में प्रकृति और माया दोनों ही अपना बहुरूप धारण करके हमारे सामने आयेंगी, तो उस समय अगर हम आत्मा पावरफुल नहीं होगी तो और आत्माओं का प्रभाव भी हमारे ऊपर पड़ सकता है। इसीलिए आत्मा बहुत पावरफुल चाहिए। इसके लिए अभ्यास करो कि एकदम स्टॉप। कईयों को किसी का रोना देख करके भी रोना आ जाता है। और अन्त समय में तो चिल्लायेंगे, खून की नदियां बहीं हुई होंगी फिर क्या करेंगे? अगर हमारे पास इतनी शक्ति नहीं है, तो कभी भी कोई प्रभाव पड़ सकता है, चाहे माया का, चाहे प्रकृति की हलचल का, चाहे व्यक्तियों का, कोई भी प्रभाव पड़ सकता है। तो कोई भी प्रभाव हमारे ऊपर नहीं पड़े इसके लिए हमारी शक्तिशाली स्थिति होनी चाहिए और मन पर पूरा कन्ट्रोल होना चाहिए। कुछ भी हो रहा है परन्तु हमें साक्षी दृष्टा बनकर, सीट पर बैठकर देखना है। यह बेहद का ड्रामा है, इसमें यह सब होना ही है और हमने ही कहा है यानि हमने प्रकृति को आर्डर दिया है। और आर्डर देने वाले ही हलचल में आ जावे तो प्रकृति बिचारी क्या करेगी? जैसे हद के ड्रामा को देखते समय कभी कन्फ्यूज़ नहीं होते, ऐसे ही हम साक्षीपन की सीट पर बैठ करके यह सब खेल देखते रहें, हलचल में नहीं आ जायें। हाय, हाय नहीं करें वाह ड्रामा वाह... तो इतनी स्थिति पहले पक्की है?
विनाश के समय कोई अगर अपने को ही नहीं बचा सकें तो वे मन्सा-सेवा क्या करेंगे! पहले तो अपने को पक्का होना चाहिए। पक्के होंगे तो पास विद् ऑनर हो जायेंगे। अगर हलचल में आ जायेंगे तो पास विद् ऑनर तो नहीं कहेंगे। इसलिए मन्सा को बिल्कुल ही क्लीयर रखो क्योंकि उस समय हमारे को बाबा की टचिंग आनी चाहिए। उसके लिए मन-बुद्धि वाइसलेस होनी चाहिए। यही वायरलेस का काम करेगी। पवित्र मन-बुद्धि को ही वाइसलेस कहा जाता है, जिसमें बाबा की टचिंग होगी क्योंकि विनाश के समय तो कोई साधन ही नहीं होंगे। उस समय एक ही साधन होगा - वाइसलेस मन और बुद्धि, फिर बाबा की टचिंग आयेगी। समझो बाढ़ आती है तो पहले ही बाबा की टचिंग आती है कि यहाँ से निकल जाओ। वहाँ जाके बैठ जाओ, यह नहीं करो - वह करो।
तो मन्सा सेवा करने के लिए अभी से तैयारी क्या चाहिए? एक फुलस्टॉप लगाने का अभ्यास और दूसरा सर्व शक्तियों का स्टॉक चाहिए। और तीसरी बात बुद्धि की लाइन क्लीयर होनी चाहिए। अभी इसका अभ्यास करो। जहाँ आप रहते हो वहाँ ही आपके पेपर आयेंगे तो यूज़ करके देखो। जहाँ हम रहते हैं वही हमारे लिए पेपर हाल बन जाता है, वहाँ हमें कोई जिज्ञासू से, कोई बहन से, कनेक्शन के कोई भाई के द्वारा पेपर आयेंगे और वहाँ आपको पास होना है। कोई सोचते हैं कि यह स्थान चेंज करने से हमारी स्थिति में चेंज आयेगी। कभी नहीं आयेंगी क्योंकि बदली करने से बदनामी है। जहाँ आप जाओगे वहाँ भी पेपर आयेगा क्योंकि बिना पेपर के कोई पास होना नहीं है, यह आप समझ लो कि यह माया के विघ्न यह पेपर हैं। पेपर कहाँ भी आपको भिन्न-भिन्न रूप में आयेगा। इसलिए हमेशा यह सोचो कि हम जहाँ हैं वहाँ ही पास विद ऑनर होकर दिखावें। कैसा भी स्थान हो, परन्तु हमें अपनी स्थिति को ठीक रखना है। इसलिए पेपर से डरना नहीं है। उखली में मुँह डाला है तो मूसल से क्या डरना है! जब मरना ही है फिर मरने से डर क्या। और यह तो मीठा मौत है माना परिवर्तन होना है।
एक कहावत भी है कि जो मरता है वह स्वर्ग जाता है। तो यह कभी नहीं सोचो कि हमें ही पेपर देना पड़ता है, हमको ही सहन करना है। हैरान या परेशान नहीं हो जाओ, कमजोर हो तो यह संकल्प आता है, बहादुर बनेंगे तो कुछ नहीं होगा। इसलिए घबराओ नहीं, अपने में यह शक्तियाँ धारण कर लो तो कुछ भी नहीं होगा। अभी से आदत डालो। बहुतकाल का पुरुषार्थ आपको काम में आयेगा और मन्सा सेवा तब कर सकेंगे जब आपको टचिंग ठीक होगी, मानो किसको शान्ति चाहिए और आप स्वर्ग के सुख की बातें करते रहो तो क्या वह सन्तुष्ट होगा! नहीं। वह कहेगा पहले शान्ति तो दो। तो नब्ज चेक करने की भी आदत होनी चाहिए यानि परख शक्ति होनी चाहिए। अन्त समय में तो ज्ञान की बातें सुनने के लिए भी टाइम नहीं मिलेगा या कामेन्ट्री देकर योग कराओ इसके लिए भी टाइम नहीं होगा। वह तो एक सेकण्ड में आपने वरदान दिया, उसकी आशा पूर्ण की और वह खुश हो जाये, बिचारा मुक्ति में चला जायें क्योंकि मुक्ति तो सभी को चाहिए ही। इसलिए अब वरदानी बन वरदान देते जाओ। मुक्ति की टिकट देते जाओ तो कितनी पावर होनी चाहिए !
तो देखो पहले कि इसको क्या चाहिए, वह परखो फिर अपने पास जो शक्तियों का स्टॉक है, उससे सेकण्ड में अपनी दृष्टि द्वारा, अपने संकल्प द्वारा, अपने चेहरे द्वारा देकर उनकी सेवा करो। अभी भी यहाँ देखो तो आपको लगेगा कि किसी के फीचर्स से पवित्रता की फीलिंग आती तो किसी के फीचर्स से खुशी की...। यह हरेक की एक्टिविटी से फ़र्क देखने में आता है। तो ऐसे अपने फीचर्स द्वारा, दृष्टि द्वारा, संकल्प द्वारा यह सेवा आप करो। आपकी सूरत से ही पवित्रता की देवी लगे। और ऐसी स्थिति में अगर किसी को आपने दृष्टि दी तो एक सेकण्ड में ठप्पा लग जायेगा। उन्हें मुक्तिधाम की टिकेट मिल जायेगी। ऐसे मन्सा-सेवा लास्ट में हम सबको करनी पड़ेगी।
विनाश के समय तो अनेक प्रकार से हरेक को भय, चिंता आदि होगी। लेकिन हम तो हैं ही अशरीरी, तो हमें काहे का भय वा किसकी चिंता। उस समय तो विदेही वा कर्मातीत अवस्था होगी ही। शरीर ही अपना नहीं है। बेगर माना बाबा कहते हैं कि यह शरीर रूपी घर भी मेरा नहीं। तो जब शरीर का भान ही नहीं होगा फिर तो कोई भी चीज़ नहीं होगी। तो ऐसे सेवा आप संकल्प से अपने अव्यक्त-मूर्त से भिन्न-भिन्न जो आत्मा के गुण हैं, बाबा ने दिये हैं उन गुणों की मूर्त से आप सेवा कर सकते हैं। तो बाबा ने जो हमको गुण, शक्तियाँ दी हैं और इसके बारे में जो हम रोज़ सुनते हैं वह मनन करते रहें और उसको अनुभव में लाते रहें, यह है यूज़ होना।
अगर हम ज्ञानी तू आत्मा हैं तो मानो कोई झगड़ा हो रहा है या कुछ भी हो रहा है, हिसाब चुक्तू हो रहा है तो आप यह सोचो कि यह पेपर मेरे पास आया, आगे के लिए हमको इशारा देता है, यह कमी है इसको भरो। निगेटिव नहीं सोचो, हाय मेरी तकदीर ऐसी है, भाग्य ऐसा है उसको पॉजिटिव में परिवर्तन करो, उससे लेसन लो, पाठ पढ़ो। जो कमी तुम्हारे में है वह भर दो। ऐसे नहीं उसी बात के पीछे पड़ जाओ हाय, यह क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ? नहीं। उससे लैसन पढ़कर आगे बढ़ो। बुराई में भी अच्छाई तो है, लेकिन हम सिर्फ वर्तमान देखते हैं, भविष्य को आगे नहीं रखते हैं, त्रिकालदर्शी नहीं बनते हैं इसलिए यह होता है। लेकिन कोई भी बुराई में अच्छाई समाई हुई होती है, सिर्फ उसको उस पॉजिटिव रूप से देखो तो बुराई में आपको अच्छाई दिखाई देगी। लेकिन अगर हमारा मन बुद्धि ही निगेटिव है तो हमें बुराई ही बुराई लगती है। लेकिन है हमारे बुराई में भी छुपी हुई अच्छाई क्योंकि एक तो बाबा कल्याणकारी है, २. समय कल्याणकारी है। ३. हमारा आक्यूपेशन ही है विश्व-कल्याणकारी का। ४. जो भी हमारा परिवार है वह कितना कल्याणकारी है। ऐसा परिवार कभी मिलेगा ? सतयुग में भी नहीं मिलेगा। बाप-दादा और हम ब्राह्मण बच्चे ऐसा कल्याणकारी परिवार कहाँ मिलेगा क्या ? तो चार ही बातों में से कोई एक बात भी आपकी कमज़ोर होगी तो हिलेंगे, हलचल में आयेंगे। फिर कहेंगे बाबा तो बहुत अच्छा है, ज्ञान बहुत अच्छा है लेकिन परिवार में चलना बहुत मुश्किल है। अभी हम अगर परिवार में खुश नहीं होंगे तो हम राज्य किस पर करेंगे? परिवार ही राजधानी बनेंगी। अगर परिवार में सन्तुष्टता नहीं होगी तो राजधानी में कैसे आयेंगे फिर तो परमधाम में जाकर बैठ जाओ। वहाँ तो बैठना चाहो तो भी नहीं बैठ सकते हैं। आना तो है ही इसलिए हमारा सबमें कल्याण है, हमारा अच्छा ही अच्छा है। बुरा हमारा है ही नहीं क्योंकि हम अच्छे बन गये तो बुराई तो खत्म हो गयी। उस दृष्टि से देखो, कोई भी बुरी बात होती है उसको अच्छाई की नज़र से देखो तो आपको अच्छाई ही नज़र आयेगी। जिस दृष्टि से देखेंगे, जैसे कोई लाल रंग का चश्मा पहन कर देखेंगे तो उसको हरा रंग दिखाई दे, यह हो ही नहीं सकता है। लाल शीशे से सब लाल दिखाई देगा। अगर निगेटिव दृष्टि से आप देख रहे हैं तो निगेटिव बुराई दिखाई देगी और अच्छाई का दृष्टिकोण रखकर देखेंगे तो अच्छा ही दिखाई देगा। पॉजिटिव दृष्टिकोण है तो पॉजिटिव दिखाई पड़ेगा। इसलिए अपनी दृष्टि, वृत्ति, स्मृति और कृति यह चारों ही चीज़े ठीक करो। फिर आपकी मन्सा सेवा अभी से ही चालू हो जायेगी क्योंकि लाइट हाउस हो गये।
लाइट हाउस माना एक स्थान पर बैठे हुए भी वह लाइट दे सकता है। अगर अभी से आप लाइट हाउस रूप हो जायेंगे तो अभी से ही आप मन्सा सेवा कर सकेंगे। और मन्सा सेवा करने का आधार ही है अपने मन में शक्तियों का स्टॉक हो और पावरफुल लाइट हाउस की स्थिति हो तो आप मन्सा-सेवा कर सकते हैं। अभी से शुरू करो तो अन्त में आप सफल हो जायेंगे। डबल लाइट माना ही है-लाइट हाउस। इसमें पहले अपनी अवस्था इतनी लाइट हो जो हम दूसरों को लाइट दे सकें। अपने को ही नहीं दे सकते हैं तो दूसरे को क्या देंगे? तो इसके लिए शक्तियों का स्टॉक इक्ट्ठा करो और फिर लाइट हाउस बनकर सारी आत्माओं के ऊपर रहमदिल बन रहम करो। जैसे बाबा रहमदिल है, देखो हमारे पर कितना रहम किया है, हमारी कोई बुराई नहीं देखी। कहा तुम मेरे हो बस। बाबा ने आते ही कहा- 'मेरे बच्चे' और हमने भी कहा 'मेरा बाबा'। ऐसे ही सौदा हुआ है। ऐसे ही अभी हमको सभी को बाबा का बनाना है, मेरा नहीं बनाना। मेरे जिज्ञासु नहीं, बाबा के बच्चे हैं। बाबा-बाबा कहने से बच जायेंगे। वैसे भी कहावत है जहाँ बाप है वहाँ पाप नहीं होता है इसलिए बाबा-बाबा कहते रहो क्योंकि जहाँ बाप है वहाँ कोई भी पाप रुक नहीं सकता है। इसलिए 'मैं-पन' छोड़ कर बाबा-बाबा करते रहो तो बचे रहेंगे। अच्छा ओमशान्ति।

राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी दादी जानकी जी

त्याग एवं तपस्या की मूर्ति राजयोगिनी दादी जानकी जी, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय को अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका हैं। अनेक वर्षों से आपने राजयोग का गहन अभ्यास किया है तथा ईश्वरीय ज्ञान पर सतत् मनन करने का आपको विशेष ईश्वरीय वरदान प्राप्त है। आपके महान जीवन से असंख्य आत्माओं ने आध्यात्मिक जीवन अपनाने की तथा दृढ़ता से अग्रसर होने की प्रेरणा प्राप्त की है। आपकी वृत्ति तथा वाणी आपके सम्पर्क-सम्बन्ध में आने वाली हर आत्मा में उमंग-उत्साह का संचार करती है। विभिन्न देशों प्रदेशों में रहने वाली हर आत्मा बाप समान शक्तिशाली बनें इस संकल्प का आप सच्चा स्वरूप हैं। आपने परमात्मा शिव के महावाक्य सुनकर उसी समय जो मनन-चिंतन करके उसका स्पष्टीकरण अपने प्रवचनों में किया है, उसका सार संग्रह यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इसे पढ़कर हर आत्मा को एक नई जीवन दिशा मिले तथा वह आत्मा स्वयं शक्तिशाली बन अन्य को शक्तिशाली बनाने के निमित्त बने।

सूक्ष्म अभिमान को परख कर उसे जल्दी से खत्म करना ही अपने ऊपर आशीर्वाद करना है

आज बाबा ने कहा कि अभी तुम्हारे पास इतना खज़ाना है जो तुम भी राजाओं-महाराजाओं जैसा अशरफियों का दान दो। लेकिन जितना खज़ाना होगा उतना ही देंगे। पहले ज़माने में जो राजायें थे उनके पास जो भी जाते थे तो उनको बड़े शान से गिफ्ट के रूप में अशरफियाँ देते थे। जैसे व्यक्ति, जैसा प्रसंग उसी अनुसार उनको ऐसी गिफ़्ट देते थे, उसमें वह अपना शान समझते थे। बाबा भी राजा-महाराजाओं के पास जाते थे तो दान के रूप में नहीं लेकिन बड़े ही सम्मान से उन्हें अशरफियाँ देते थे। तो अभी हम भी आपस में मिलते हैं तो क्या देते हैं? जो बाबा ने दिया है वह आपस में शेयर करते हैं। इससे हमारी उन्नति होती है। यह देना, देना नहीं है परन्तु आगे बढ़ना और बढ़ाना है।
अपना व्यक्तिगत पुरुषार्थ ऐसा रहे जो स्वयं के साथ सर्व को भी बहुत अच्छा लगे। इसके लिए जैसे बाबा कहते साहस को अपना साथी बना लो तो सफलता सदा साथ देती रहेगी। दूसरी बात किसी भी प्रकार से मन का रोग न हो तो कभी कर्मभोग महसूस नहीं होगा। इसके लिए बाबा कहते कि कर्म भी श्रेष्ठ हो, योग भी ऐसा हो जो यथार्थ और निरन्तर हो।
कैसे समझें कि हमारा सर्व-सम्बन्ध बाबा के साथ है? इसका क्या प्रुफ है? विचार सागर मंथन करने वाले दूसरों को ज्ञान अच्छा सुना देते हैं, परन्तु बाबा से सम्बन्ध कितना है, सच्चाई कितनी है, वह सहज पता नहीं चल सकता है। परमात्मा के साथ योग है तो उसकी निशानी है उसका भटकना छूट जायेगा, देहधारियों से लगाव छूट जायेगा। सर्व सम्बन्ध बाबा के साथ हैं तो उसे सर्व प्राप्तियाँ होंगी, उसकी वृत्तियाँ अनासक्त होंगी, वह नष्टोमोहा होगा। तो जो नष्टोमोहा होगा वह स्मृति-स्वरूप भी होगा।
वृत्ति एकदम अनासक्त हो क्योंकि ईश्वर के साथ सर्व सम्बन्ध जोड़ लिया, क्यों जोड़ा ? देह में जो अनेक सम्बन्धों से अल्पकाल सुख की आकर्षण थी, हर सम्बन्ध में कोई-न-कोई अल्पकाल के सुख की अधीनता थी, प्राप्ति की इच्छा थी इसलिए उसका सहारा लिया हुआ था। तो बाबा ने हमें अपना बना करके सब रूप, सब सम्बन्ध हमारे लिए धारण किये हैं ताकि कहाँ पर भी हमारी इच्छा न हो, आसक्ति या लगाव न हो। जिसको जहाँ से कुछ मिलता है वो वहाँ झुकता है। कोई बहुत अच्छी सर्विस करते परन्तु अन्दर में थोड़ा भी देह-अभिमान है, इसलिए वह विहंग मार्ग की सर्विस नहीं कर सकते हैं।
बाबा हमको हदों से पार ले जाता है, हम सब धर्म की आत्माओं को बाबा का परिचय तब दे सकेंगे जब हमारे अन्दर यह स्मृति होगी कि 'मेरा बाबा सर्व का बाबा है।' जिसको मैंने अपनाया है वह सर्व का बाबा है। हर आत्मा आज क्यों नहीं मानती, बिचारों का दोष नहीं है। धर्म के नाम पर खराब काम देख करके धर्म से विश्वास ही चला गया है। भगवान का नाम लेने वाले ही खराब काम करते हैं तो बाकी क्या? तो वह यह सब देख करके कहते कि इनसे तो हम अच्छे हैं। लेकिन हमारी सच्चाई और पवित्रता को प्रैक्टिकल देख, स्व-धर्म को पहचान करके बाप को पहचानते हैं। उन्हें ऐसा समझाओ जो ध्यान जाये कि हम अपने आपको पहचानें।
हम तो भाग्यशाली हैं जो हमको डायरेक्ट बाप ने कहा है आत्मा! तो तीसरा नेत्र खुला, जिससे बाबा को भी जान लिया। अपने को जानने से बाबा को जाना, बाबा के पास आने से अपने को जाना, बाप को जाना। इतनी हमारे अन्दर स्मृति बनी रहे कि मैं कौन हूँ ? बाप कौन है? और सब बातों को ऐसा खत्म करो जो हमारे में अभिमान का अंश भी न रहे। अभिमान अति सूक्ष्म इतना मज़बूत है, उसको जल्दी से खत्म करना माना अपने लिए पुण्य आत्मा बनना या अपने ऊपर कृपा करना।
हम तो कहते हैं सेवा को भी याद न करो। इसकी करें, उसकी करें, वह तो हो ही रही है। हम तो सिर्फ बाबा का बनकर रहें, वही अच्छा है। मैं ऐसा रहूँ जो किसी को मेरे से कुछ प्रेरणा मिले। बाबा कहते हैं तुम विदेही को याद करो तो चेक करो कि हमारी ऐसी स्थिति है? बाबा सबको एक जैसा वर्सा देता है लेकिन लेने वाले सब नम्बरवार हैं। बाबा ने नम्बरवार नहीं दिया है। बाबा ने तो सबके बीच में बैठ करके पढ़ाया है और पढ़ा भी रहे हैं लेकिन पढ़ने वाले नम्बरवार हैं। तो वर्से का हकदार बनने के लिए हमको अन्दर से देह-अभिमान को खत्म करना है। हमारे में अभिमान है या नहीं है, इसको समझने के लिए भी बड़ी सूक्ष्म बुद्धि चाहिए।
जैसे साकार बाबा ने निन्दा करने वाले को भी मित्र बनाया है और महिमा करने वाले को देख बाबा कहते यह भक्त है, तो कितना अन्तर है बाबा और हम बच्चों में? महिमा सुनें ही क्यों? अगर सुन लिया तो सिद्ध है कि उसको अपना मित्र जाना। इतनी जब तक विशाल बुद्धि नहीं हुई है तब तक हम बाबा और बच्चों के अन्तर को समझ नहीं सकेंगे। जितना निज़ी स्वरूप की स्मृत्ति रहती है उतना बाप की समीपता का अनुभव होता है। और समीपता से जो बाबा से अखुट खज़ानों की प्राप्ति हो रही है, वह अनुभव की शक्ति खुद में सदा काम करती रहेगी। जो आत्मायें सम्बन्ध-सम्पर्क में आयेंगी या जो साथ में रहेंगी, तो वह शक्ति अन्दर ही अन्दर काम करेगी अर्थात् उस प्राप्ति का उन्हें अनुभव होता रहेगा। आवाज़ में आने की, बहुत सुनने सुनाने की अभी समय अनुसार आवश्यकता नहीं है।
हम लोग हदों में न रहें, न कहाँ पर भी अपना प्रभाव डालें। हमें बाबा को प्रत्यक्ष करना है। वह होगा हमारी मनोवृत्ति से, श्रेष्ठ भावना से। हमारी विश्व-कल्याण की भावना हो, बाबा मेरा विश्व-कल्याणकारी है। तो विश्व का कल्याण किसमें समाया हुआ है, विश्व का ध्यान कैसे जायेगा। उनको यह न दिखाई पड़े कि यह एक अच्छी महिला है या यह अच्छा भाषण करने वाली है। इससे आत्मा को जागृति तो नहीं आयी, परमात्मा के पीछे पूँछ जैसा लटकना तो नहीं आया। जैसे बाबा हमारा परम शिक्षक है तो सर्व शिक्षायें मन-वचन-कर्म में ऐसी हों जिनसे उन्हें भी सम्बन्ध जोड़ने की शक्ति मिले। जब हमने उसे मात-पिता कहा है तो सपूत बनकर, सबूत दें। सखा है तो उसकी कम्पनी में रहें। सद्‌गुरु है तो उनके साथ जाना है। घर की स्मृति कोई घड़ी भूले नहीं। साजन है तो सजनी बन कदम-पर-कदम रखें। यही हमारा जीवन है- तुम्हीं से सुनूँ, तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से खाऊँ, तुम्हीं से बोलू.. यह व्रत भी बहुत अच्छा है। और बातें सुनने, बोलने वाले वह कोई सतीव्रता नहीं हुए। इसमें अर्जुन मिसल लगातार पुरुषार्थ करने की लगन लगी हुई हो। बाबा की पहचान आते तीसरा नेत्र खुला तो त्रिकालदर्शी बन गये। जो बाबा के मीठे बोल हैं वह हमारी लाइफ में हों। सारा चक्र बुद्धि में घूमता रहे। न सिर्फ ज्ञान मन में घूमता रहे परन्तु उसके स्मृति स्वरूप हो जाएँ क्योंकि अभी स्वरूप बनने के दिन आ गये हैं, पहले सुनने के दिन, फिर मनन-चिंतन करने के दिन, फिर वर्णन करने के दिन - यह सब दिन अच्छे थे।
अभी समय अनुसार सेवा का स्वरूप पहले वाला ही लेकर बैठेंगे या और जो करते वह मैं भी कर लूँ, तो वह नैचुरल नहीं होगा। किसी को देखकर करने के बजाए बाबा ने जो कहा है, उसी पर चलना है। श्वांस, संकल्प और स्मृति में बाबा सामने हो। जिसके द्वारा इतनी प्राप्तियाँ हुई हैं उसका ही नाम बार-बार मुख पर आता रहे। बुद्धि की लाइन क्लीयर हो तो हमारे से औरों को प्राप्ति होती रहेगी। बाबा कहते हैं- बच्चे, पास्ट को भूल जाओ, हम भी समझते हैं बीती को चितवो नहीं। प्रेजन्ट में रहो तो फ्युचर अच्छा बनेगा। अपनी व दूसरों की कोई भी पास्ट की बातें स्मृति में न आयें। उन्हें याद रखने व याद दिलाने से नुकसान ही है, फायदा कुछ नहीं है। अगर किसी को याद भी दिलाते हैं तो हमारी आत्म-अभिमानी स्थिति नहीं रहेगी। न दूसरे को मदद कर सकेंगे। हमें तो हर एक का सच्चा मददगार साथी सहयोगी हो करके रहना है। घर की, बाप की याद एक-दो को दिलानी है। तो इसी याद से आत्मा कंचन हो जायेगी।
बाबा कहते अन्त में हरेक को साक्षात्कार होगा, उस घड़ी कोई और बात देख ही नहीं सकेगा, वहीं साक्षात्कार होगा। अच्छा पुरुषार्थ किया, नहीं किया, पास्ट में मैंने जो गफलत की, जो अलबेलापन हुआ जो मेरी सुनी-अनसुनी बातें हुई, जो मैंने छिपाया - वह सब इमर्ज हो जायेगा। तो पहले बाबा ने कहा भूल जाओ फिर अन्त में बाबा कहेगा अभी तुम देखो। इसलिए अभी हमको क्या करने का है? हम किसको क्यों कहें तुमने क्या-क्या किया है, यह सोचने का या किसी को कुछ कहने का हमको हक नहीं है क्योंकि हमको अपना बहुत ख्याल रखना है, इसमें स्वार्थ नहीं है परन्तु अपना ख्याल ज़रूर करने का है। अन्त मते मेरी कैसी होगी ? उसके लिए बहुतकाल श्रीमत पर चलूँ, अभिमान वश मनमत या किसी की मत के प्रभाव या किसी की मत का सहारा ले करके मैं न चलूँ। अच्छा- ओमशान्ति

सच्चा पुरुषार्थी वह है जिसकी अवस्था अचल अडोल हो, समय-संकल्प ज़रा भी व्यर्थ न जाये

बाबा ने हमें संगम के हर दिन, हर घड़ी का पूरा फायदा लेने की, समय को अमल में लाने की विधि सिखायी है। सवेरे से ले करके रात्रि तक, उसमें भी सवेरे सवेरे जो स्टडी करने का शौक है वह सारे दिन की कारोबार में बहुत काम आता है। भागीरथ के द्वारा सवेरे सवेरे यह साधना करने का भाग्य मिला है।
इस समय बापदादा दोनों हमारे सामने बैठे हैं, एक ही शरीर में दोनों हैं। सामने भी हैं, साथ भी हैं, दोनों को देखा है। क्या देखा है? तपस्या में कैसे रहो, हर श्रीमत को पालन करके प‌द्मापद्म भाग्यशाली कैसे बनो! यह भागीरथ तो बहुत सौभाग्यशाली है, लेकिन हम भी प‌द्मापद्द्म सौभाग्यशाली बन सकते हैं। अगर प‌द्मापद्म भाग्यशाली बनना है तो साकार बाप को फ़ालो करो। कदम-कदम श्रीमत पर चलो। इसलिए सवेरे सवेरे मीठा बाबा कितने अच्छे मीठे बोल से अथाह श्रीमत दे देते हैं। ऐसे मीठे मात-पिता, बापदादा हमें सवेरे सवेरे कहते कि हे मेरे नूरे रत्नों, हे ब्राह्मण कुल भूषण... तो हमको क्या करना चाहिए? वह कहे नूरे रत्न, इतना ही नहीं सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण, सारे ब्राह्मण कुल की शोभा बढ़ाने वाले, सब मर्यादाओं का पालन करते चलो। एक बाप दूसरा न कोई। बाबा हर मुरली में धारणा के लिए ध्यान खिंचवाता है, उन धारणाओं की माला हमारे पास बनी हुई हो।
दिखाते हैं भागीरथ के मस्तक से गंगा निकली, गंगा पतित-पावनी जो बाबा के मस्तक से निकली। पवित्रता ही हमारे जीवन की मुख्य धारणा है। पवित्रता में हम सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं कहते, शुरू तो वहाँ से होता है फिर पवित्रता में मन वृत्ति साफ हो, दृष्टि देही-अभिमानी हो। धारणा अच्छी तब होगी जब देही-अभिमानी स्थिति होगी। ऐसे नहीं कि कभी तो पुरुषार्थ का जोश हो, कभी ठण्डा पुरुषार्थ हो, इससे विकर्म विनाश नहीं होंगे। अन्दर से किसी-न-किसी प्रकार के संस्कार देह-अभिमान वश छिपे हुए बैठे रहेंगे। एक ही टाइम में (संगमयुग में) इतने जन्मों के सब संस्कार एकदम खत्म हो सकते हैं क्योंकि ये हमारे असली संस्कार नहीं हैं और हमें कारण का पता चल गया है। देह-अभिमान के कारण बाबा से दूर हुए तब आसुरी संस्कार पैदा हो गये। आत्मा असली ईश्वर की सन्तान है, इसलिए हमें उसी स्वरूप में रहना है।
सतयुग में भले योगबल से सन्तान होगी लेकिन वह योगबल पैदा यहाँ से ही होगा। तो सतयुगी दुनिया स्थापन करने वाले बाबा के बच्चे ही हैं। जानते हैं बाप ने हमको ब्रह्मा मुख से पैदा किया है, अडॉप्ट किया, इतनी पवित्र पालना दी, पवित्र दुनिया स्थापन करने के लिए। हम इसी कार्य में बाबा के मददगार बच्चे हैं- यह कहने में तो आता है लेकिन मदद तो हमें सारी लाइफ में मिली है। जबसे कोई बाबा का बनता है, गिनती करें कि बाबा से मुझे क्या-क्या मिला है? अथाह ज्ञान मिला, उसका जितना मनन-चिंतन करो उतना थोड़ा है लेकिन वर्णन तो इतना नहीं कर सकेंगे। जब कोई कहता है कि हमको व्यर्थ संकल्प आते हैं तो हम कहते हैं तुमको फालतू व्यर्थ संकल्प क्यों आते हैं? इतना अथाह ज्ञान मिला है वह मनन नहीं कर सकते हो क्या ? उसको छोड़ फालतू बातें मनन या वर्णन करते हो तो चेहरा सूख जाता है। खाली हो जाते हैं, फट से रोने लग पडते हैं। आँखों से भले ही न रोयें, परन्तु मन से रोते रहेंगे, दुःखी, अशान्त हो जायेंगे। फिर सेवा करते भी परिवार के साथ किससे नहीं बनेगी।
जबसे बाबा के बने, ईश्वरीय परिवार सारा मेरा अलौकिक परिवार है - ऐसा समझना है। लौकिक में थोड़ा तू-मैं हो सकता था, अलौकिक में हो नहीं सकता। अगर ज्ञान का मनन चिंतन है, आपस में ईश्वरीय अलौकिक सम्बन्ध की समझ है तो सबके साथ, बाबा के साथ निभाना आता है। बाबा के साथ नहीं निभायेंगे तो कहाँ जायेंगे? माया खींच लेगी। बाबा के घर में जो आये वह बाबा के घर का बच्चा बन जाये इतना हमारा आपस में प्यार हो, वह तब होगा जब व्यर्थ ख्यालात किसी के प्रति भी न आती हो। अगर आयें तो उसको एकदम खत्म कर दो, बढ़ाओ नहीं। कहाँ ना कहाँ वह ख्याल आना शुरु होगा, कोई खिड़की से, कोई दरवाज़े से, ज़रा-सा भी अलाउ किया बस, व्यर्थ ख्यालात का अम्बार लग जायेगा। जो अथाह ज्ञान मिला हुआ है वह उसी घड़ी भूल जाता है। हम ब्रह्मा मुख की सन्तान हैं, आत्मा अनादि ईश्वर की सन्तान है यह भूल सकता है। परन्तु ब्रह्मा मुख की श्रेष्ठ सन्तान उस ब्राह्मण आत्मा को माना जायेगा जो बाबा के मुख से उच्चारे हुए महावाक्यों को मन्त्र के रूप में ले, वह अन्दर से सिमरण करता रहे और स्मृति में रखने का लक्ष्य रखे।
जो बाबा ने कहा सिर्फ लेक्चर नहीं करो परन्तु तुम्हारे फीचर्स भी सबको अच्छी समझ दें। लेक्वर तो कान से सुनेंगे, अच्छा लगेगा परन्तु मन में नहीं लगेगा जिससे वह जीते जी मरजीवा बने। जो बाबा ने सुनाया वह इतना अन्दर से धारण किया हुआ हो, पण्डिताई वाला नहीं हो। उसको लगे ऐसा ज्ञान सिवाए परमात्मा के कोई नहीं सिखा सकता। हमारे अन्दर हो हमारे बाप जैसा कोई सिखा नहीं सकता और हम सचमुच जानते हैं, वह भी समझे कि परमात्मा के बिगर इनको कोई आर्डनरी मनुष्य सिखाने वाला नहीं है। कोई विद्वान, पण्डित नहीं है या जिन्होंने पी. एच.डी. आदि की डिग्री पास की है, वह नहीं हैं। यह अलग हैं। उसने हमारे दिल की चोरी कर ली, जो दिल अनेक जगह भटकी, लटकी और चटकी हुई, टुकडा-टुकड़ा हुई पड़ी थी, वह एक में जुट गई है।
कुछ भी थोड़ी-सी भी कोई बात छिपाना माना देह-अभिमान। देह-अभिमान वाले को धारणा नहीं हो सकती है। कई महसूस करके फिर बताते हैं कि मैंने बहुत समय से अपना पुरुषार्थ औरों को अच्छा दिखाने के लिए ही किया है। अब समझते हैं सच्चे पुरुषार्थ की प्राप्ति क्या है! उनकी अवस्था कभी ऊपर-नीचे हो नहीं सकती है, सदा अचल-अडोल, कुछ भी हो जाये, विनाश भी सामने आ जाये तो मिरूआ मौत मलूका शिकार वाली स्थिति हो, अगर ऐसी स्थिति नहीं बनाई तो क्या किया ! जरा सी बात में हिलने लग पड़े, बुद्धि हलचल में आयी, मूँझ गये या घबरा करके डर गये, ऐसे समय पर कोई सहारा नज़र नहीं आता। हर कदम में बाबा के साथ रहने का अनुभव नहीं है तो उस घड़ी कोई नज़र नहीं आता - कहाँ जाऊँ, किधर जाऊँ, न रहा किनारा, न रहा सहारा.. ऐसी स्थिति हमारी कभी न बनें। ऐसा गुप्त अभ्यास करने वाला वह सदा ही मम्मा बाबा को देखेगा।
साधारण रहते-रहते फिर हर बात में साधारणता की टेव पड़ जाती है। जैसे बोलने की, चलने की, कहाँ भी बैठने, सुनने की..। हमने मम्मा के चेहरे पर कभी फ़िकर नहीं देखा, कोई शरीर भी छोड़ दे या अपने ही शरीर में कुछ हुआ तो भी ज़्यादा सोच नहीं, मम्मा साधारणता से नहीं रहती थी। तो जो सच्ची दिल से पुरुषार्थ करने वाले हैं उसके अन्दर गीता और भागवत के चरित्र दिखाई पड़ने लगेंगे। जो कहावत है कि - अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो, तो वह मैं हूँ क्योंकि बाबा ने हमको अभी इतना सुख दिया, इतनी शान्ति दिया है जो दुःख का नाम-निशान नहीं है। तो करना क्या है? सदा ही अपनी अवस्था ऊँची ऐसी हो जो बाबा हमारे समीप औरों को भी दिखाई दे।
जिसको अन्दर से सच्चा हो करके रहने की और सफलता पाने की लगन है वह अपना एक सेकण्ड भी व्यर्थ नहीं गँवाता। एक व्यर्थ संकल्प भी उसके पास आ नहीं सकता। वह बहुत खुशनसीब है। जो खुशी में रहता और दूसरों को खुशी देता है वह सारे कल्प के लिए खुशी जमा कर लेता है। उनके मन्दिरों में देवताओं की मूर्तियों के आगे कोई कैसा भी आता, खुशी और प्रेम लेकर जाता है। तो इतना ही यहाँ हमारे पास खुशी जमा हो। जो भी हमारी नज़रों के सामने आये, तो जैसे हम बाबा की नज़रों के सामने आते ही निहाल हो जाते हैं, ऐसे हमारी नज़रों के सामने आते ही अनुभव करे, यह तब ही होगा जब दिमाग में, दिल में कुछ नहीं होगा। फिर नज़रों से अनेक आत्माओं को पार ले जाने के लिए निमित्त बन सकते है। बाबा ने कहा यह प्रैक्टिस करो कोई भी बात आये तो पार चले जाओ। पार जाने और ले जाने की आदत पड़ जाए तो जो सामने आये वह भी पार चला जाये।

दुनिया के दुःख-दर्द दूर करने के लिए बिल्कुल इनोसेंट और मीठे बनो, माँ समान पालना दो

भगवान मेरा बाप है, ऐसा समझने से बचपन के सुख का अनुभव होने लगता है। छोटे बच्चे को जो माँ-बाप के सुख का अनुभव है वह सारी लाइफ में शक्तिशाली बना देता है। तो अभी परमात्मा बाप हमारी माँ भी है। किसकी भी माँ होगी राजा की होगी या गरीब की होगी परन्तु माँ सबको प्यारी होती है। हर माँ को बच्चा प्यारा है। और माँ जैसा प्यार कोई कर नहीं सकता है। भल अनेक सम्बन्धी हो परन्तु माँ की गोद, माँ का प्यार दुःख दूर कर देता है, शान्ति दे देता है। माँ जानती है बच्चे के दुःख-दर्द को। तो परमात्मा माँ है हमारी, उसने हम सबके दिल के अन्दर को जान लिया है। आत्मा क्यों रो रही है, क्यों भटक रही है, क्यों अशान्त है? हम सिर्फ प्रार्थना करते पुकारते थे कि हम दुःखी-अशान्त हैं लेकिन क्यों हैं? तो परमात्मा माँ ने हमारे इस दुःख को समझ लिया और कहा-अभी तुम शान्त हो करके बैठ जाओ।
बच्चे की बुद्धि कैसी होती है? बहुत इनोसेन्ट, बहुत मीठा। इस संसार में हम बाबा के बच्चों जैसा इनोसेन्ट और कोई नहीं है। हमारे जैसे भोले कहीं नहीं मिलेंगे क्योंकि हम तो कोई दुनियावी बातों को जानते ही नहीं हैं। इसलिए परमात्मा का प्यार खींचने में बड़ा आसान हो गया है। अभी दुनिया के दुःख-अशान्ति को दूर करने वाले इनोसेन्ट माना बहुत मीठे बनो। और इनोसेन्ट वह बनता है जो इतना ही समझे कि परमात्मा मुझे माँ के रूप में मिला है। जैसा भी हूँ, पापी हूँ या साधू हूँ, नास्तिक हूँ, कैसा भी हूँ लेकिन फिर भी जैसे बाबा कहते हैं 'तू मेरी हो' या 'तू मेरा है' बस वैसे ही बाबा मेरा है।
जब हमनें ब्रह्मा बाबा को पहली बार देखा तो हम सेकण्ड में लाइट हो गये, जैसे देह से न्यारा। इतना अच्छा अनुभव हुआ जो हम आज दिन तक भी वह भूल नहीं सकते हैं और वही हमारा आधार है जो भगवान को मान करके और जान करके उसको याद करते हैं। उस सेकेण्ड के अनुभव में बाबा ने कहा 'तू मेरी' -जिसे शब्द नहीं परन्तु अन्दर की फीलिंग, फिर मैंने कहा 'मैं तेरी' - यह है सेकेण्ड -का सौदा। लौकिक, लौकिक है और पारलौकिक, पारलौकिक है यह तो पहले से ही जानते थे। परन्तु यह अलौकिक है जिसने इशारा दिया देख तेरा बाप कौन है? तो हम ब्रह्मा बाबा को बाबा कहते हैं क्योंकि निमित्त है। ब्रह्मा बाबा द्वारा ही तो उस बाप का अनुभव कर सकते हैं! ब्रह्मा बाबा के द्वारा शिवबाबा पढ़ाते हैं, यह थोड़ा डिफीकल्ट है। परन्तु आप थोड़ा बुद्धि नहीं चलाओ, अनुभव करके देखो। माँ के प्यार का अनुभव बच्चे को ही होता है। कोई आँन्टी होगी तो उनसे थोड़े ही माँ के प्यार का अनुभव होगा ! और अंकल से कोई बाप का अनुभव थोड़े ही होगा! भले आँन्टी, अंकल है। लेकिन बाप, बाप होता है क्योंकि ऑन्टी या अंकल वर्सा नहीं देते हैं।
भारत में ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को बहुत मानते हैं। बाप, बाप है फिर तीन उनके बच्चे हैं। कृष्ण, क्राइस्ट भी परमात्मा का बच्चा है। तो ब्रह्या निमित्त माँ के रूप में इशारा करता है तुम्हारा बाप देखो यह है। तब तो हमें हिम्मत आई इनके नज़दीक आने की। परमात्मा के आगे जाना है तो हमारा कर्म, सम्बन्ध कैसा होना चाहिए? आज के ज़माने में बहुत कई अन्दर में झूठ, पाप या कई प्रकार की बातें होंगी। अपने को कहेंगे मैं भी परमात्मा का रूप हूँ, और भक्त लोग बिचारे उन्हीं को ही भगवान मानने लगेंगे। और भगवान कहता बच्चे, तीसरा नेत्र खोल। इससे देह-अभिमान छूटता है।
जिसने यह पढ़ाई नहीं पढ़ा तो वह कुछ नहीं पढ़ा। यह धन नहीं कमाया तो कुछ नहीं कमाया, वह तो कागज़ के नोट हैं, सेकण्ड में खत्म हो जाने वाले है। बड़े-बड़े बिल्डिग्स, महल-माड़ी भले कितने भी बना कर रखो पर अन्दर से आत्मा में जो गुण और शक्तियों का धन है उसके बिगर आत्मा गरीब है। परमात्मा माँ के रूप में प्यार करके अच्छी अपनी रूहानी पालना दे करके कहते हैं- बाप तुम्हें वह सुख-शान्ति, प्रेम, आनन्द की शक्ति का वर्सा दे रहा है, ले लो यह आपका हक लगता है। बाबा हमेशा कहते थे बच्ची यह तुम्हारा बर्थ-राइट है इसलिए तुम्हें भगवान से सुख-शान्ति-प्रेम मांगने की आवश्यकता नहीं है। तो यह हमारा बर्थ-राइट है। जन्म लिया बस, हक है हमारा। गंवाया है, था हमारा लेकिन झूठ, पाप, ठगी से व्यक्ति-वैभवों के पीछे आकर्षण हो करके सब कुछ गंवा दिया है। अब फिर बाप समझ देते हैं। जब परमात्मा की पहचान हुई तो बुद्धि का भटकना छूट गया। जो शास्त्र-ग्रंथ सब कुछ बहुत पढ़े थे, वह सब पढ़ना बन्द हो गया। तीर्थों पर जाना बन्द हो गया, कोई गुरु व महात्मा का लेक्चर सुनना भी बन्द हो गया। तो बाबा कहते कि - हे आत्मा, तू अविनाशी है इन सबको जान, इन आँखों से देखने वाली तू अविनाशी है, तेरा पिता अविनाशी है उनके द्वारा जो सुख-शान्ति मिलता है वह अविनाशी है। बाकी यह शरीर विनाशी है, दुनिया भी विनाशी है उनके द्वारा जो प्राप्ति होती है वह भी विनाशी है। विनाशी समझने से अटैचमेन्ट आदि सब खत्म हो गया।
आत्मा में अन्दर जो सत्यता और पवित्रता है वह वैल्युबुल लाइफ बनाने वाली है, यह हमको अच्छी समझ मिली है। विष और अमृत यह दोनों इकट्ठे नहीं रह सकते हैं। काम है विष, ज्ञान है अमृत। जिसकी बुद्धि ज़रा भी काम विकार में है वह योगी बन नहीं सकता है। ऐसे ठग योगी बहुत हैं लेकिन सच्चा योगी कहेगा कि मैंने समझ लिया कि मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। यह शरीर भी पहले पतित बना हुआ है, इस शरीर से पाप कर्म बहुत किये हुए हैं। मुझे अभी पावन बनना है, बस ! यह लगन लग गई। जब रियलाइज़ेशन होती है तो क्वेश्चन उठता है कि इतने जो पाप किये हैं वह कैसे खत्म होंगे? दिखाई पड़ता है मैंने खुद से किया अनेकों के साथ किया।
सच्ची दिल से अपना खाता देखें कि मैंने कितने पाप और कितने पुण्य किये हैं? पुण्य थोड़ा किया होगा परन्तु दुनिया को बताया होगा और पाप अनेक किये होंगे लेकिन छिपाया होगा। जब यह तीसरा नेत्र खुलता है तो रियलाइज़ेशन से उसकी पहले सवेरे-सवेरे धुलाई करते हैं। पापों को नाश करने के लिए योग पावरफुल हो, लगन ऐसी हो जो अग्नि का काम करे। किये हुए पाप नाश हो जायें। फीलिंग आये कि आत्मा भी शुद्ध हो रही है, संस्कारों में जो पाप भर गये थे, उससे बुद्धि भी ऐसे चलती थी, मन भी ऐसे ही भटकता था, जब तक वह प्राप्ति नहीं होगी तब तक हैरान होते रहेंगे। एक छोड़ा दूसरा पकड़ा यह क्या लाइफ है? पैसा, ठगी-चोरी से इधर उधर से न लिया तो चैन नहीं आयेगी। तो यह जो सब किया, वह अभी मुझे खत्म करना है। जो दुनिया कर रही है, मुझे अभी वैसे नहीं करना है। भले एज कितनी भी हो, अन्दर से रियलाइज़ हुआ जीवन बदली, आहार शुद्ध हो गया और सम्बन्ध में पवित्रता आ गयी। बोल-चाल अच्छा होने लगा क्योंकि अन्न का मन पर असर होता है।
हिंसा करके अशुद्ध आहार जो खाते हैं उनका रहम खत्म हो जाता है। कोई शराब पीता है, कोई जुआ खेलता है, कोई कुछ करता है, यह सब बचपन से नहीं करता था। दूसरे को सिगरेट पीता हुआ देख खुद भी पीना शुरु कर दिया। पता भी नहीं था, सिगरेट क्या चीज़ होती है। ऐसे ही शराब भी पीता हुआ देख पी लिया, कोई पानी है क्या पीने के लिए। जो देखा सो किया, समझ नहीं चलाई, नुकसान कितना है। तो शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा इतनी समझ दी है, देने वाला वह है। तो एक अच्छी लगन से हमारे किये हुए पाप नाश हो जायें, दूसरा अभी समझदारी से हमारे से कोई गलत काम नहीं हो।
हमको बदलने का समय यही है। भाग्य मिला है, समझ मिली है, संग मिला है, यह घड़ी फिर से वापिस नहीं आयेगी। अभी इस बात को अलबेलेपन के कारण या आलस्य से छोड़ देंगे तो फिर यह घड़ी वापस नहीं आयेगी। यह घड़ी है खुद को बदलने की। हम बदलेंगे तो गैरन्टी है दुनिया बदलेगी। परन्तु हम हर सेकण्ड, हर संकल्प गुण और शक्तियों के साथ काम करें। गुण धारण करने के लिए बाबा हमें शक्ति देता है। हम सबके गुण देखें और ईश्वर जो सिखाता है वह मेरे जीवन में हो तो हर सेकेण्ड हर श्वांस दान भी होता रहेगा। जहाँ जिसको जिस बात की आवश्यकता हो, फौरन उसको दे दो। देना हमारा काम है, हम कहाँ से देंगे, वह दे रहा है और संकल्प वा इच्छा यह है कि यह भी उनसे ले लेवे। हक लगता है भले लो परन्तु तब ही मिलेगा जब सब तरफ से जो पढ़ा है, जो अनुभव है, उसको पहले एक बाजू रखो। मिक्स करेंगे तो क्वेश्चन, डाउट उठेंगे।
वास्तव में सब क्वेश्चन का आन्सर मिल जाता है परन्तु पहले धीरज, शान्ति और प्रेम से जो अच्छा लग रहा है, जिसे बुद्धि स्वीकार करती है, वह तो ले लो। उसमें क्वेश्चन नहीं पूछो। जो अच्छे बड़े व्यापारी होते हैं, उनसे कोई भी चौज़ लो तो कहेंगे अच्छा लगे तो रखना नहीं तो वापस दे देना। उल्हनें की कोई बात ही नहीं है। बाबा भी कहते - तुमको अच्छा नहीं लगा ना तो दूसरे किसी को अच्छा लग जायेगा। डॉक्टर हर प्रकार की दवाईयों की जानकारी रखता है, ज़रूरी नहीं कि अपने को ही कोई बीमारी लगे तो मैं दवाई पीके देखें, परन्तु जानकारी सब रखता है। तो कभी यह नहीं कहो कि यह बात तो मेरे काम की नहीं है, यह मुझे समझ में नहीं आता है। यह आवाज़ पढ़ाई के अभिमान वालों का निकलता है।
आजकल ऐसे स्पीचुअल्टी के लिए बड़ा कदर है, पहले से बहुत चेन्ज है। समय के अनुसार अभी आत्मा के अन्दर जागृति आई है। कई अच्छी तरह से खोज करके बहुत तैयार हो करके बैठे हैं। भल हम और कोई पुरूषार्थ न करें सिर्फ संकल्प को शान्त और शुद्ध बना लें। व्यर्थ डाउट-फुल क्वेश्चन वाले संकल्प नहीं रखें। फिर देखो सब बातों का उत्तर अपने आप आयेगा। भगवान की तरफ से भी आयेगा, दोनों तरफ़ से आयेगा। बुद्धि में ग्रहण शक्ति अच्छी है, जैसे भोजन खाकर हज़म करने की शक्ति अच्छी है तो ताकत आती है। परन्तु भोजन कितना भी अच्छा हो, चबाने के बिगर हज़म नहीं होगा। ऐसे ही जो सुनते हैं उसको अच्छी तरह से मन में मंथन करने से उसका जो रस है वह शक्ति देता है। तो ज्ञान माना अपने आपको समझना, परमात्मा को अपना बनाना। फिर मुझ आत्मा ने पहले जो किया है रियलाज़ेशन से अपने आपको उनसे छुड़ाना। अपने को पुरानी आदतों के बन्धन से छुड़ाना है। जिन आदतों से मज़बूर हैं, उस मज़बूरी से अपने को छुड़ाना है।
समय को सफल करना है। अभी कईयों को अनुभव है जिनको सवेरे उठने की आदत नहीं थी लेकिन चार बजे खटिया हिलने लग पडती है, उठो-उठो करके कोई उठा रहा है। पुरुषार्थ करने की यह वेला है, घड़ी है फिर अपने आप सहज हो जाता है। कितना भी कार्य व्यवहार की ज़िम्मेवारी है वह भले करो परन्तु सवेरे जो शक्ति मिलती है, वह ले लो तो सारे दिन में कार्य भी अच्छा, जिसके साथ कार्य करेंगे वह कहेंगे यह इतना बदल कैसे गया है।
मधुबन में त्याग और मिठास दोनों हैं। त्यागी बनने से मीठा बनते हैं। मीठा तब बनते हैं जब अपसेट नहीं होते हैं। जो अपसेट होता और अपसेट करता है उसकी जुबान मीठी नहीं हो सकती है। इसलिए कभी अपसेट नहीं होना।

अधिक सोचने, बोलने और चिंता करने से शक्ति खर्च होती है, साइलेन्स में रहो तो शक्ति जमा हो

बाबा ने जो नियम बनाकर दिये हैं इससे जीवन यात्रा सफल करने में मदद मिली है। इसलिए यह नियम बन्धन नहीं लेकिन प्यारे लगते हैं। इन नियमों की कमाल है। नियम ने बलवान बनाया है। कायदे में ही फायदा है, जो कायदे में नियम अनुसार चलता है, चलने वाला बलवान है, हिम्मत वाला है। वह सदा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करता है। अतीन्द्रिय सुख माना सेकण्ड में मन कर्मेन्द्रियों को शान्त कर ईश्वरीय सुख के झूले में झूलते रहना। बच्चा झूले में अच्छा लगता है। पहले तो बच्चे को माँ की गोद जैसे झूले के समान सुख देती है। बच्चा अपनी सेक्युरिटी समझता है क्योंकि माँ के पास है। ऐसे ही मन कर्मेन्द्रियाँ जब शान्त हैं तो अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति होती है। मन में जब तक चाहिए-चाहिए है माना इच्छा है, कर्मेन्द्रियों कण्ट्रोल में नहीं हैं तब तक सच्चे सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। इच्छाओं के भी कई प्रकार हैं। रॉयल इच्छायें बहुत होती हैं। जब तक वह पूर्ण न हों तब तक इन्तज़ार रहता है। फिर वह घड़ी, वह सेकण्ड साइलेन्स में रहने का मिस हो जायेगा। हमारी इच्छा है कि हर सेकण्ड हमारा सफल हो। हर सेकण्ड हम साइलेन्स में रहकर शक्ति जमा करें। बहुत ख्याल करने से, बोलने से शक्ति खर्च होती है। जितना आप सोचेंगे, बोलेंगे, जितना चिन्ता फिकर से काम करेंगे उतना अन्दर शक्ति खर्च होती है तो कमज़ोरी महसूस होती है, जिससे थकावट आती है। बोझ महसूस होता है। अन्दर खुशी, उमंग-उत्साह नहीं होता। कर रहे हैं लेकिन करने का भी जैसे एक बन्धन है इसलिए करना ही पड़ेगा।
बाबा हम बच्चों से क्या चाहते हैं? इन कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करो, परन्तु समझकर बोलो, सोचो भी समझकर, जरूरत जितना सोचो वह भी समझकर। पहले तोलो फिर बोलो। बोलने का क्या रहस्य है, उसमें क्या फायदा होगा यह सोचकर फिर बोलो। सोचो भी वह जो अभी करना है। ऐसे नहीं बहुत सोचने से इनर्जी पैदा होगी। जरा-सा भी किससे भेंट करेंगे तो वह भी वेस्ट ऑफ टाइम। सबको आत्मिक दृष्टि से देखो तो सब प्यारे लगते हैं। हम सब बातों से न्यारे रहें तो हमें सब प्यारे लगने लगेंगे। सिर्फ इसमें देह का भान न हो। बहुत समय हम आकारी रूप में रहें। हम इस शरीर में निमित्त मात्र हैं, शरीर से कोई लगाव नहीं है। परन्तु बाबा ने हमें जो सुनाया, समझाया है वह विश्व भर की आत्माओं को सुनाना है। जो आत्मा भगवान के घर आये उसे ज्ञान का सार ऐसा सुना दें जो उसे रोशनी मिल जाए।
दुनिया में जितनी भी मनुष्य आत्मायें हैं उनसे हमारा पार्ट न्यारा हो। जैसे हीरो पार्टधारी का पार्ट सबसे न्यारा है। हीरो पार्टधारी आदि से अन्त तक पार्ट प्ले करता है, परन्तु वह सबसे न्यारा है। सारे ड्रामा का आधार उस पर है। ऐसे हम भी हीरो पार्टधारी हैं। इस ड्रामा में जब हम बाप को भूले तो भटके, देह-अभिमान में आये तो विकारों ने वार किया। दुःख-अशान्ति के सिवाए कुछ मन में रहा ही नहीं, अब वह पार्ट पूरा हो गया। यह सब अपने आपसे पूछें कि अब सुख-शान्ति सदा मेरे पास सम्पन्न रूप में है, यह पार्ट शुरु हुआ? आत्मा को परमात्मा का परिचय मिलने से, तीसरा नेत्र खुलने से अपने आपको देखने की रोशनी मिली ? जब अपने को देखने की आँख खुली है तो पीस, लव, हैपीनेस पॉवर जो अन्दर से गुम हो गयी थी वह वापस आ रही है, ऐसा अनुभव होता है?
देह-अभिमान - सोल-कान्सेस नहीं होने देता, देह की दुनिया खींचती है, अब इसको छोड़। इसे छोड़ने व इस देह के बन्धन को तोड़ने की शक्ति बाबा से ले करके, इस देह में होते हुए बाप से सम्बन्ध जोड़, मास्टर होकर इन कर्मेन्द्रियों से कर्म करके सेकेण्ड में शान्त हो जायें। कछुए के मिसल सेकण्ड में कर्म किया फिर शान्त हो जायें। मैं मास्टर हूँ तो मेरे में शान्ति की शक्ति हो तो पहले वाली कमजोरियाँ चली जायें। मुरझाई हुई आत्मा मुस्कराये, यह परिवर्तन अनेक आत्माओं को अन्दर सुख देने वाला है। परमात्म-स्नेह के तरफ़ खींचने वाला है। मैं कौन हूँ, किसकी हूँ, जब यह स्मृति रहती है तो देखना, बोलना, सुनना, सोचना, चलना, खाना-पीना.. सब बदल जाता है। अभी मेरे योग्य यही है क्योंकि यह मेरे अन्तर मन को सुख देने वाला है।
इस विधि से अनुभव करके पुरानों से भी आगे जा सकते हैं। परन्तु जो करेगा सो अनुभव पायेगा। जो ऐसा शुद्ध श्रेष्ठ दृढ़ संकल्प करते हैं, तो उसमें भगवान अपनी शक्ति भरता है। हम जानते हैं भगवान क्या करता है और कब करता है। कोई जैलसी में आकर भगवान को कम्पलेन करे कि वह ऐसा करता है, यह ऐसा करता है.. तो कम्पलेन करने वाले को वह मदद नहीं करता। भगवान भी बड़ा होशियार है। अगर कोई कहता हम यह करेंगे, हम यह करेंगे तो भगवान कहता है- हाँ बच्चे, मैं मदद करूंगा फिर आज से जिसमें हमारा और सर्व का कल्याण समाया हुआ है, वह कार्य करने के लिए हमारे जो नियम बने हुए हैं सिर्फ उसी पर चलना है बस, और कुछ नहीं। तो आज से वही करें जिसमें अपनी उन्नति हो। जिन बातों से हमको अभ्यास करने का, कुछ सुनने-समझने का चान्स मिलता है, वह कभी मिस नहीं करना है। जिसके अन्दर लगन होती है कि मुझे मिस नहीं करना है तो कितने भी कारण हो उनका मिस नहीं होता है। अपने टाइम पर अपना सब कार्य करते हुए वहाँ पहुँचेगा ज़रूर।
तो कभी भी स्व-उन्नति के लिए या सेवा अर्थ बहाना नहीं देना। जैसे बट, ट्राय, डिफीकल्ट शब्द पक्के हो गये हैं। वैसे कभी भी सुस्ती, अलबेलापन और बहाना देना - यह तीन बातें कभी नहीं करना। श्रेष्ठ आत्मा बनने के लिए सुस्ती और अलबेलापन कभी न हो। बहाना तो कभी नहीं देना क्योंकि बहाने देने वाले के आगे फिर बहाने आते हैं। तो यह तीन बातें याद रखेंगे तो विशेष आत्माओं की माला में जल्दी-जल्दी आ जायेंगे।

पर-चिंतन व नफ़रत की निगाह को खत्म कर स्व-चिंतन और प्रभु-चिंतन करो

अपने जीवन में उन्नति लाने के लिए, संगठन की शक्ति को बढ़ाने के लिए, साथ-साथ बीती बातों को भुला करके भविष्य ऊँची प्रालब्ध बनाने अर्थ सदा स्व-चिन्तन और प्रभु-चिन्तन में रहेंगे तो व्यर्थ समाप्त हो जायेगा क्योंकि स्व-विन्तन के बिगर प्रभु-चिन्तन नहीं रह सकता है। पर-चिन्तन और प्रभु चिन्तन कितना फर्क है? कहाँ पर-चिन्तन, कहाँ प्रभु-चिन्तन तो बीच में क्या चाहिए? 'स्व-चिन्तन'। स्व-विन्तन में रहने से योगयुक्त भी रहेंगे क्योंकि बुद्धि प्रभु-चिन्तन में चली जायेगी। बुद्धि पर-चिन्तन से फ्री हो गयी। बाबा ने कहा बच्चों में योगबल चाहिए तो हर बात सहज हो जायेगी। अगर बातों का चिन्तन होगा तो बात कठिन होती जायेगी, बाप से मदद मांगते रहेंगे। मदद खींच नहीं सकेंगे। मदद नहीं मिल रही है इसी फीलिंग से उमंग-उत्साह कम हो जायेगा। यह अपने ऊपर थोड़ा तो क्या, पूरा अटेन्शन बहुत आवश्यक है, इसलिए अपने को पर-चिन्तन से फ्री करो।
पर-चिन्तन वैरी है। चाहते हैं याद में रहें लेकिन वह अपने तरफ़ खींचता है, उन्हें बाद में मेहनत लगती है। इसलिए पर-चिंतन छोड़ स्व-चिंतन में रहो, स्व-चिन्तन माना ही 'स्वदर्शन चक्र' फिराना। स्व को अच्छी तरह समझना और स्वरूप में आना फिर बाबा भी देखता है यह बच्चा स्व-में रहता है तो मदद देता है। परन्तु चलते-चलते यदि ईर्ष्या, द्वेष आ जाता है तो रेस के बजाए रीस हो जाती है। फिर एक दो को देखते रहेंगे। जहाँ पहुँचना है वहाँ पहुँचने की रेस नहीं कर सकेंगे। रेस के घोड़े एक-दो को नहीं देखते हैं। और रीस वाले एक-दो को देखते हैं। जो एक-दो को देखते हैं वह बाप को नहीं देख सकते हैं। रेस में दौडने वाले बाप को देखते हैं क्योंकि बाप ने हमें दौड़ने के लिए रेस में खड़ा किया है। बाप का नाम बाला हो जाये, यह धुन लगी हुई है, मालिक बाबा देख बहुत खुश होता है कि मेरा घोड़ा बहुत अच्छा जा रहा है।
हम अपने 'मन के घोड़े' की लगाम को बड़े प्यार से अपने हाथों में रखें, ऐसे नहीं सिर्फ चाबुक मारते रहें। ऐसे क्यों करता है, ठीक क्यों नहीं दौड़ता है? उससे और ही वह टेढ़ा बन जाता है, हैरान करता है। आजकल डाँट से कोई भी सीधा नहीं होता है। अच्छा नहीं चलता है और ही परेशान करेगा। इसलिए खुद अपनी शान में रह, स्वमान में रह अपने मन-बुद्धि को ऑर्डर में रखना है। जो अपने को चलाने नहीं जानता है वह दूसरे के साथ सम्बन्ध में रह करके उनके साथ चलना भी नहीं जानता है।
जितना ज्ञान में आगे बढ़ते हैं, सेवा अर्थ, चाहे ईश्वरीय परिवार अर्थ, चाहे हम शिवशक्ति पाण्डव सेना है उनके अर्थ, हमारा आपस में बहुत बड़ा सम्बन्ध है। उसमें सफलता तब है जब रूहानियत, ईश्वरीय स्नेह और सच्चाई है। विशाल बुद्धि है। जिसका बाप से और बाप के धन से प्यार है उसमें रूहानियत, सच्चाई और ईश्वरीय स्नेह आ जाता है और उसे सफलता भी मिल जाती है। बुद्धि में हर समय बाबा की बातें याद रहती हैं तो हमारी जीत निश्चित है। सामने जो जैसी बात आ जाये, छोटी आये या बड़ी आये लेकिन बड़ी बात को भी छोटी समझना है। अगर छोटी बात हो तो उसको बड़ा समझ करके कभी एलाऊ नहीं करना क्योंकि छोटी भी कभी बड़ी हो जायेगी। तो छोटी को भी अन्दर से जड़ से खत्म कर देना है। यह तो छोटी बात है ऐसे कह करके उसको छुट्टी दे देंगे तो बार-बार आते-आते वह बड़ा रूप ले लेगी। यह है खबरदार रहना।
कोई भी बात सामने आयी तो घबराओ नहीं, आयी है विदाई लेने के लिए। उसको प्यार से छुट्टी दे दो। थोड़ा भी नर्वस हो जायेंगे, गर्म हो जायेंगे तो वह और बड़ा रूप धारण कर लेगी। और माया के दो रूप खास हैं एक डराने वाला, दूसरा खींचने वाला, चलायमान करने वाला इसलिए बाबा कहते हैं - निर्भय रहो। तो माया कैसा भी विकराल रूप धारण करे परन्तु हमारे साथ में सर्वशक्तिवान बाप है तो क्या बड़ी बात है। हम तो हैं देह से न्यारे और बाप के प्यारे।
जिसको बाप मिला तो सब कुछ मिला, सदा अन्दर खुशी में हैं, तृप्त हैं, सन्तुष्ट हैं। उसके सामने व्यक्ति, चाहे वैभव कितना भी खींचने वाला रूप धारण करे, उनकी आँख नहीं डूबेगी। अन्दर से निश्चय और नशा रहेगा क्योंकि पा लिया जो पाना था, अभी मेरा किसी से भी काम नहीं रहा। तो इस निश्चय और नशे में रहने का आदती बनना है तब ही नैचुरल याद रहेगी। बुद्धि में निश्चय हो कि मैं ईश्वरीय सन्तान हूँ। पढ़ाई की भी धारणा अगर है तो उसका भी अभिमान नहीं क्योंकि हमें बाप समान निरंहकारी मीठा बनना है। इसलिए नम्रता भाव को धारण करने से जहाँ भी जाओ तो सफलता मिलेगी। लेकिन निगाहों में किसके लिए भी नफ़रत है तो वह बाबा का सपूत, सर्विसएबुल बच्चों में नहीं गिना जायेगा। भले वह समझेगा मैं सर्विसएबुल हूँ, सेवा करता हूँ। किसी के प्रति भी सूक्ष्म नफ़रत की निगाह बड़ी नुकसानकारक है। नफ़रत की निगाह बाप में भी कभी नफरत ले आयेगी। यह नफ़रत बहुत खतरे वाली है। सारा दिन एक दो को सुनाते रहेंगे- देखा यह क्या करता है, इसको ऐसे नहीं करना चाहिए। ऐसी बुद्धि जो है, कभी भी खुद शान्तचित, शीतल स्वभाव वाला, नम्रचित बनने नहीं देगी। वह सदा सुखी रहने नहीं देगी, सदा औरों को सुख देने नहीं देगी। समझदार कभी किसी से नफ़रत व वैर नहीं रख सकता। सूक्ष्म नफ़रत - सच्चे ईश्वरीय स्नेह का अनुभव करने नहीं देगी।
अच्छी तरह से न पढ़ने वाले बाबा से प्यार नहीं खींच सकते हैं। श्रीमत को सदा सिर माथे पर रखने वाले बाबा का प्यार खिचवाते हैं। सिर्फ बेबी की तरह बाबा-बाबा करते रहेंगे तो बाप से क्या मिलेगा। कईयों में नफ़रत का अवगुण ऐसा है, जैसे चूहा फूंक देके काटता है तो पता भी नहीं चलता है, ऐसे ही नफ़रत की दृष्टि रूहानियत में रहने नहीं देती। नफ़रत की दृष्टि बाप से ईश्वरीय स्नेह जो हमको शक्ति देने वाला है, वह खींचने नहीं देती। तो बाबा की हम बच्चों के प्रति क्या इच्छा है? बच्चों में कोई अवगुण न हो। अवगुण पाँच विकारों के बच्चे हैं। कहेंगे हमको क्रोध नहीं है, लोभ नहीं है, यह नहीं है, वह नहीं है परन्तु यह थोड़ा-सा अवगुण है, यह कहाँ से पैदा हुआ ? तो जितना-जितना अन्दर आत्मा अपने आपको चेक करती है और चेन्ज होने की लगन है तो समय भी साथ देता है।
संगठन भी एक बहुत अच्छा आइना है। छोटे संगठन में तो पता नहीं चलता है लेकिन यहाँ जब शीशमहल में आते हैं तब पता चल जाता है। वहाँ ऐसे अलबेले हो सकते हैं, यहाँ नहीं हो सकते हैं। मधुबन का संगठन रियलाइ‌ज़ेशन कराता है। और हमने यह भी देखा है सिर्फ रियलाइज़ेशन हो, परिवर्तन न हो तो वह भी खुशनसीब नहीं। कई बातें धक से चेन्ज हो जाती हैं। जब बहुत मैल थी तो इतना बड़ा दाग भी पता नहीं चलता था। लेकिन सफाई होने के बाद छोटा दाग भी बड़ा दिखाई पड़ता है। अब वह मैल उतरेगी कैसे? स्व-चिन्तन और प्रभु-बिन्तन से। परचिन्तन करना माना अपने को मैला बनाना। रूप होगा शुभ भावना का, अरे तुम स्वयं को सुधार। बाबा से मदद तुम लो, आप साफ़-स्वच्छ हो करके बाबा को ऑफर करो। मैली आत्मा और मैला शरीर बाबा के सामने नहीं लेके आना है। ऐसे अन्दर से स्वच्छता और सच्चाई हो तो वह आत्मा भगवान के प्यार को और शक्ति को खींच सकती हैं। ऐसी आत्माओं की लगन बाप के तरफ़ अपने आप बढ़ती है।
जिसको परिवर्तन लाने का संकल्प होता है वह हर बात अन्दर-ही-अन्दर एक्यूरेट करता जायेगा। एक महीने में भी कर लेगा किसी का कई वर्षों के बाद भी नहीं हो पाता। तो विशाल बुद्धि पराई और पुरानी कोई चीज़, कोई सम्बन्ध से प्रीत नहीं रख सकते हैं। पराई को अपना समझना यह तो चोर हो गया। उसको अलग से अपना समझ करके यूज़ करना, किसकी भी यूज़ करना यह क्या है। तो पराई और पुरानी से हमारी प्रीत न हो। उसको हाथ से टच करने का भी नहीं सोचें। अभी यह भी सच्चाई और सफाई चाहिए। रहन-सहन में भी सफाई चाहिए। रूहानियत में रहने, खुशनुमाः रहने, सबके साथ ईश्वरीय स्नेह से मिलन मनाने की आदत डालो। ज्ञान, समझ, सच्चाई और प्रेम वहीं मेरा है, मेरे साथ रहे और सबके साथ व्यवहार में वहीं यूज़ करें। तो कमाई ही कमाई होती रहेगी। तो सूक्ष्म भी किसके लिए नफ़रत न हो।
इसके लिए अन्दर अपने चिन्तन को देखना है, मैं किसी प्रकार के व्यर्थ चिन्तन के जाल में फसने वाली आत्मा तो नहीं हूँ। चिन्तन जैसे जाल की तरह से फसा देता है, फिर एक का छूटता है दूसरे का आता है। दूसरे का छूटता है तो तीसरे का आता है। शान्तचित हो करके, बाबा की याद में रहें तो फट से वह चिन्तन सामने आयेगा। जिसका किया वह सामने आयेगा, बाबा नहीं आयेगा। ऐसा अपना दुश्मन अपने को नहीं बनना है। अपना मित्र आप बनें, जो देह-अभिमान को छोड़, देह भान से परे रहने की आदत डालें तो सूक्ष्म बाबा से कनेक्शन जुटा रहेगा, बुद्धि की लाइन क्लीयर होगी। जब बुद्धि की लाइन क्लीयर है, मन साफ़ है तो अपने आपको देख सकते हैं और देख करके अपने सम्पूर्णता का आह्वान करेंगे। जो बाबा से मिला उसमें सम्पन्नता रहे, कुछ मिस न हो तो सम्पूर्णता हमारे लिए ठहरी हुई है। जो सम्पूर्णता का आह्वान करेंगे उनके पास ही सम्पूर्णता आयेगी। तो स्व-चिन्तन और प्रभु-चिन्तन सम्पूर्णता को ले आयेगा। सारा दिन बाबा का आवाज़ ही कानों में गूंजता रहे तो यह संगम की घड़ियाँ बहुत भाग्यशाली बनायेंगी। सच्ची दिल से पुरुषार्थ करने वाले को बार-बार बाबा की बातें ही याद आयेंगी।

खुशनसीब व ब्लिसफुल रहना है तो बाबा की ब्लैसिंग लेते चलो

सन्यासी भी एडाप्ट करते हैं, बाबा भी एडाप्ट करते हैं, कितना अन्तर है? वह चेला बनाकर रखते हैं। खुद जिसके चेले बनते, वह भी किसका चेला होगा। परन्तु हम ब्रह्मा बाप के बच्चे शिवबाबा के पोत्रे, वर्से के अधिकारी हो गये हैं। हमने कहा 'बाबा', बाबा ने कहा बच्चा.... तो पुराना सब खत्म हो गया। बाबा का बच्चा बनने से बाबा के वर्से के अधिकारी बन गये।
बाबा की मुरली में ब्लिसफुल शब्द बहुत आता है। जब बाबा की ब्लैसिंग मिलती है तो ब्लिसफुल बन जाते हैं। सदा आनंद में कौन रहेगा ? जिसको सदा यह फीलिंग है कि मेरे ऊपर बाबा की ब्लैसिग हैं। मांगते नहीं हैं लेकिन हमारी जीवन का आधार जैसे पढ़ाई है वैसे खुशनसीब रहने के लिए आधार है 'बाबा की ब्लैसिंग'। जब बाबा के बच्चे बने हैं तो बाबा ही हमारा सहारा है। पहले मात-पिता, फिर बड़े हुए तो शिक्षक सखा दोनों चाहिए। मात-पिता की पालना हम सबको ऐसी मिली है जो उसमें शिक्षायें भरी हुई हैं। माँ बाप की नज़रों के नीचे रहे हैं, कहाँ बाहर की कोई छाया न पड़े। माँ बाप अपनी नज़रों के नीचे रखते हैं, बाहर की छाया से बचाने के लिए। हमारे मात-पिता का हमारे में इतना प्यार है। औरों को कहते मोह को छोड़ो, लेकिन मोह जितना बाबा का है उतना और किसका नहीं। यह अविनाशी स्नेह सदा सुखदाई है। दुःख की अंश भी न हो, सुख सदा सम्पत्ति के मुआफ़िक हमारे पास हो जिसमें शान्ति भी है तो प्रेम भी है। मोह में सच्चा प्रेम शान्ति नहीं है, अन्दर दुःख समाया हुआ है। थोड़ा भी किसमें मोह होगा तो वह अतीन्द्रिय सुख में रह नहीं सकता। सदा सुख शान्तिमय जीवन बना नहीं सकता। इसलिए बाबा ने माँ का रूप धारण कर इतना प्यार भर दिया है। किसी में प्रेम स्वरूप का गुण है, मिलनसार का गुण है, किसमें रूखापन है। तो क्या समझेंगे ? वह गुण हुआ न कि ईश्वरीय स्नेह वा रूहानियत वाला स्नेह हुआ। बाबा हमको वह प्यार सिखाता है जो दुश्मन को भी मित्र बना लो। जिससे न बनती हो उससे भी मिलकर रहना सीख लो। इतनी रूहानी शक्ति, शुभ भावना हो। जैसे बाबा प्यार देकर हमारी सारी जीवन चेंज कर देता है। एक भी हमारे में अवगुण न रहे उसके लिए आँख दिखाता है। खबरदार रहो, यह कमी तुम्हारे में न हो। ऐसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर सिर्फ मोहित नहीं करता है परन्तु सीधा भी करता है। मुरली ध्यान से सुनने वाले सब समझ जाते हैं। कभी बाबा की मुरली में इशारे ऐसे होंगे। बाबा की मुरली में इशारे हैं, शिक्षा है, सावधानी है, समझानी भी है। मुरली में चारों बातें हैं।
पहले है समझानी, फिर है शिक्षा, फिर है सावधानी, फिर देता है इशारा। छोटे हैं इसलिए समझायेगा - बच्चे, इसमें तुम्हारा फ़ायदा है, तुम ऐसे करो। हम पहले पराई और पुरानी मत पर चलने वाले थे। अब वह मत चेंज हो जाए। श्रीमत को सिर माथे पर रखें, बड़ी प्यारी लगे, बाबा को देख खुशी हो, बाबा में बहुत कशिश है, रूह को खींच लेता है। आत्मा जैसे शरीर छोड़े तो उसमें थोड़ा दुःख हो सकता, परन्तु जब बाबा शरीर से अलग करता तो आनंद आ जाता है। कितना अटैचमेंट है - देह, संबंध, दुनिया से। सेवा से भी अटैचमेंट है तो भी अशरीरी नहीं बन सकते। किसकी अच्छाई खीचेंगी, किसकी बुराई में बुद्धि चली जायेगी। बाबा में वह कशिश है जो सेकण्ड में पार कर लेता। यह कशिश जो पार ले जाने वाली है, वह बाबा सिखाता है जैसे मैंने शरीर का लोन लिया है, ऐसे तुम भी इसे अमानत समझो। पुराना सब भूला हुआ हो। साथ होते हुए भी यह लौकिक है, यह अलौकिक है, वह पारलौकिक है यह स्मृति सदा बनी रहे तो न सिर्फ बुद्धि से निश्चय है, परन्तु स्मृति में नशा है। निश्चय कभी हिल सकता है। मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध में अलौकिकता, पारलौकिक बाप ने लाई है। पारलौकिक बाप ने हमारी जीवन को पहले अलौकिक फिर दिव्य बनाया है। अलौकिक बनने से दिव्यता आती है। जब तक लौकिकता है तो दिव्यता दूर है। विचार करो- दिव्यता क्यों नहीं आती है? देवतायें पारसबुद्धि हैं, उनमें सब गुण हैं, कलायें हैं, सम्पूर्ण पवित्रता है। जब तक हमारे में मनुष्यत्व का भान है माना कोई न कोई अवगुण होगा। अवगुण होगा तो कोई को दिखाई जरूर पड़ेगा। पहले खुद के गुणों का अभिमान था इसलिए अवगुण दिखाई नहीं पड़ता था। अभी बाबा कहता अन्दर अपने को देख एक परसेन्ट भी कोई अवगुण न हो। मुझे सावधान रहना है किसी का अवगुण न देखें। अवगुण देखने से मधुरता, सरलता, रूहानियत मेरे में नहीं रहेगी। चली जायेगी। ज़रा भी किसी का अवगुण मेरे ख्याल में आया, उस घड़ी अपना चेहरा देखो कैसा होता है। रूहानियत है? सरलता है? मधुरता है? नुकसान किसका हुआ ? अवगुण दूसरे का सोचा नुकसान किसको हुआ ?
कई पूछते हैं हम क्या पुरुषार्थ करें? हम कहती अपने को छिपाने वाले अपने ही दुश्मन बनते हैं। समझते हैं कोई देखता थोड़े ही है। परन्तु छिपता कोई भी नहीं है। बाबा ने खुली दिल से हमारे लिए भाग्य का भण्डार खोलकर दिया है, जितना चाहो बनाओ। ईश्वर कहता है तुम मेरे भी गुण ले लो। उसके लिए बाबा शक्ति देता है। बाबा की शक्ति लेकर हम गुण धारण कर लें तो बाबा का भी काम हो जायेगा। हमारा अवगुण ढक जायेगा, बाबा का गुण काम कर लेगा। तुम मेरे इशारों को समझो तो वह भी मैं दे दूंगा। अपने भी गुण के प्रभाव में नहीं रहो। दूसरों के गुण के प्रभाव में भी नहीं रहो। अपने लिए भी नफ़रत न रखो, औरों के लिए भी अपनी निगाहों में नफ़रत मत रखो। देवता पीछे बनेंगे, ईश्वर के बच्चे अभी हैं। मुख संतान अभी हैं। ब्रह्मा मुख से इतना सारा ज्ञान सुन-सुन कर हमारी जीवन श्रेष्ठ बनी है, बाकी जो थोड़ी रही है वह भी अभी बनायेंगे।
स्व-चिंतन, प्रभु-चिंतन दोनों आपस में साथी होकर रहते हैं। स्व और प्रभु .... प्रभु सब कुछ जानता है, उसकी लीला अपरमअपार है। प्रभु शब्द जब बोलते हैं- तो आता कि अन्त में सब कहेंगे अहो प्रभु, तेरी लीला ! बाबा आप आये, हमको अपना बनाया, इतना ऊँच पार्ट बजाने के लिए हमारे सामने खड़े हो गये। लेकिन जो जैसा पुरुषार्थ किया- वह साक्षात्कार होगा। कमी का साक्षात्कार अपने को होगा। कमिया चली गई तो बाबा ऐसे बच्चों का साक्षात्कार अनेक आत्माओं को करायेगा। साक्षात्कार की भी अन्त में धूम मचेगी। आना-जाना कब तक होगा ? दुनिया के हर कोने में कई आत्माओं को मैसेज देने का पार्ट भी कब तक ? तो वह जो अभी आने वाला समय है, उसके लिए हम क्या तैयारी कर रहे हैं? दो हज़ार वर्ष के बाद क्या होगा, इसके लिए लोग हैरान हो रहे हो लेकिन हम खुली दिल से लोगों से कहते हैं कि हम सब तैयारी करके बैठे हैं।
तो बाबा सामने आया माना बाबा की समझानी, शिक्षायें, सावधानी, इशारा सामने हो। जिसको सम्पूर्ण बनने की इच्छा होगी वह इशारों को कैच करेंगे। बाबा ने इशारों से चलाया है। माइण्ड तैयार है बाबा के सामने आने के लिए। बाबा का हमारे लिए और क्या इशारा है। हमारी अन्दर की स्थिति ऐसी योगयुक्त रहे जो एकाग्रता की शक्ति से सर्व शक्ति बाबा से खींच लें। जैसा बाबा कराने चाहे, आत्मा रेडी रहे, हल्की रहे। हल्की होगी तो रेडी होगी। सोचने का तरीका एक्यूरेट, राइट हो।
हम सबकी सारी जीवन का आधार पढ़ाई रही है। पढ़ाई के आधार से माता-पिता, सखा-स्वामी, सतगुरु, सर्व सम्बन्ध की शक्ति इस आत्मा में भर गई है। कोई भी सम्बन्ध के अनुभव की कमी माना बहुत नुकसान है। फायदा-ही-फायदा तब है जब सर्व सम्बन्ध एक बाप के साथ हैं। तो उनको अन्दर से सम्बन्ध का बल है। आत्मा में परमात्मा के सर्व सम्बन्ध का बल है। वह काम आत्मा पर भी करता है, अनेक आत्माओं पर भी कर सकता है। स्मृति में रहना और स्मृति दिलाना। हम सब एक परिवार हैं। हमारे इस झुण्ड का अन्त में साक्षात्कार होगा। पंछी अकेला आसमान में नहीं उड़ता है, एंज़िल कोई एक नहीं होगा। हम सबका साक्षात्कार अनेक आत्माओं को होगा। जैसे बाबा ने सिखाया है, चलाया है बहुतकाल से, तुम्हीं से खाऊँ, तुम्हीं से बैठू, तुम्हीं से सुनूँ, व्रत यहाँ से शुरू होता है। तुम्हीं से सुनूँ -इस बात ने बहुत कमाल किया है। तुम्हीं से बोलूँ और कोई साथी है ही नहीं जो बोलूँ। वहाँ से जो रेसपाण्ड मिलता है, तो रेसपान्सिबुल वह बन जाता है। मुझे जैसे चलाना है वैसे चलने के लिए तैयार हैं। बाबा जो आप खिलाओ वही खाऊँ। कभी ख्याल न आये इस खाने से यह होगा... भगवान ने यज्ञ रचा है। यज्ञ के दाने दाने पर मुहर है, यज्ञ का अन्न पेट में गया हुआ है। तुम्हीं से खाऊँ, तुम्हीं से बैठू, तुम्हीं से रास रचाऊँ। सबके स्वभाव-संस्कार मिलाकर जैसे रास कर रहे हैं, इनसे ही भगवत लीला का साक्षात्कार औरों को होगा। यह ऐसा है, यह ऐसा है तो रास का अनुभव नहीं होगा। सोचने और वर्णन करने से सूरत कैसी दिखाई देती है! पुरानी बातें, पहले वाली बातें भूलती नहीं हैं तो मेरी भी कैसे भूलेंगी?
हमारे अन्दर एक रट लगी है कि कल की बात भूल जा। अपने को सिखा लिया है। कल की बात, सवेरे की बात अभी भूल जा। भूल जाती है- कहना भी नहीं पड़ेगा। भुलानी न पड़े। प्रेजन्ट में खड़े रहो तो बाबा प्रेजन्ट हो जाता है। अगर आप कल में चले जायेंगे, फ्युचर में चले जायेंगे तो बाबा प्रेजन्ट नहीं होगा फिर अपसेट ज़रूर होंगे। यह सजा है। अपसेट होने का कारण क्या है? फ्युचर का कोई फ़िकर है या पास्ट की कोई बात पकड़कर बैठा है। पास्ट की बात पकड़कर बैठना माना उदासी का आह्वान करना। कुछ-न-कुछ व्यर्थ ख्याल आयेगा। दूसरों के साथ चलना अपने को मुश्किल लगेगा। यह मुश्किलात मैंने क्रियेट की, मुश्किलात है ही नहीं। खुद को भी समझा है इनको भी समझा है, सब बहुत अच्छे हैं। हमारी वृत्ति दृष्टि अच्छी है तो सब अच्छे हैं। यही कमाल बाबा ने सिखाया है। कैसों को अपना बनाकर हम सबका उद्धार किया है। कितना वैरायटी झाड़, कैसे सब इकट्ठे रहते, एक किचन में भोजन खाते हैं। बाहर में दो भाई एक भण्डारे में नहीं खा सकते। बाप-बेटा नहीं खा सकता। यहाँ हम सब एक भण्डारे से भोजन खायें, एक स्कूल में बैठकर पढ़ाई पढ़ें- कितना वण्डर है भगवान का और संगमयुग का। फिर हम कहें हम इसके साथ नहीं चल सकते, यह मेरे साथ नहीं चल सकता... यह किसकी कमी है। कोई भी कमी किसी की हो तो अपनी देख स्वाहा कर लो। ऐसा अपने लिए शुभ भावना वाला अटेन्शन सफलता स्वरूप बना ही देगा - यह भी गैरन्टी है, शुभ भावना है। अच्छा !

किसी की गलती चित्त पर न हो, चित्त साफ रखो तो चैन से रहेंगे

जब गीत सुनते हैं कि "अब घर जाना है"। तो दीदी की याद आती है। दीदी को लास्ट दिनों में यह जैसे धुन लगी हुई थी। जिसे यह लगन लग जाती है उसे बाप और घर के सिवाए और कुछ भी सूझता नहीं है। यह पुरानी देह, पुरानी दुनिया है, सब कुछ पुराना है...... इस स्मृति से उपराम हो जाते हैं। इस पुरानी देह में होते भी हमें नई दुनिया की स्थापना करनी है तो चुस्ती आ जाती है।
बाबा की पुरानी देह थी, अन्तिम जन्म के भी अन्त समय में शिवबाबा आया है फिर इसमें भी कितना काम किया। ब्रह्मा बाबा ने किया, शिवबाबा ने कराया फिर बापदादा दोनों ने मिल करके हम लोगों से कराया। बाबा आता है भक्ति का फल ज्ञान देने, ज्ञान का फल है मुक्ति और जीवनमुक्ति।
अभी हम जानते हैं कि पाँच विकारों ने हमको कितना तंग किया है, अभी भी ज़रा-सा भी कोई विकार अन्दर छिपा हुआ बैठा है तो शीतलता और शान्ति का अनुभव नहीं होता है। इसलिए बाबा कहते बच्चे बाबा को सच बताना चाहिए, छिपाना नहीं चाहिए। सच बताने से बाबा अन्दर से शक्ति दे करके उनसे मुक्त कर देगा क्योंकि बाबा उस्तादों का भी उस्ताद है, भूत भगाने वाला भूतनाथ है। बाबा कहते - बच्चे, अभी तुम्हारे अन्दर कोई भी विकार की अंश न हो। अपने आपको देखो कि किस विकार की अन्दर अंश है? हरेक में कोई-न-कोई विकार का अंश है तो हरेक जाँच करे क्योंकि अभी क्षमा का सागर, रहम का सागर, प्रेम का सागर बाबा हम बच्चों के प्रति अच्छा काम कर रहा है। बाबा के अन्दर अभी भी हमारे लिए इतना प्यार है, बाबा यह नहीं कहता है जितना समझाया है यह करते थोड़े ही हैं। बाबा थका नहीं है, अभी तक इतनी शिक्षायें देता, पालना करता ही रहता है। परन्तु अगर हमने उसका फायदा नहीं लिया है तो कहेंगे तकदीर। फिर भी बाबा बार-बार युक्ति बताता है, बच्चे तुम दूसरों को सुनाओ तो तुम्हारी जो आदत है वह छूट जायेगी। कोई-न-कोई विकार के कारण आदत होती है। लोभ, चोरी करायेगा, अभिमान, झूठ बुलवायेगा, गुस्सा किसी को दुःख देगा और काम विकार दृष्टि खराब रखेगा, रूहानी दृष्टि नहीं होगी। देह-अभिमान खींचेगा, घड़ी घड़ी बॉडी-कान्सेस तंग करेगा, मोह हैरान करेगा यह पाँचों भूत अन्दर बहुत दुःखी और अशान्त बनाते हैं। रोब होगा तो ईश्वरीय रूहाब नहीं रह सकेगा।
सतयुग में देवतायें कैसे चलते होंगे, बाबा कहते चलो तो भी सम्भलके, बोलो तो भी तौल कर बोलो, आवाज़ से नहीं बोलो, छोटे आवाज़ से काम हो सकता है। थोड़े शब्दों में बात करने से चल जाता है इसलिए लम्बी बात करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। मूवी में रहकर कारोबार को कर सकते हैं, हरेक को अपनी ड्यूटी मिली हुई है तो हम क्यों बुद्धि चलायें। बाबा ने कहा चलन अच्छी चाहिए, अगर चलते-फिरते किसी ने किसी को सुख नहीं दिया तो वह फ़रिश्ता बन नहीं सकता। आजकल एकानामी का कोई ख्याल नहीं करता लेकिन एकानामी से चलने का भी अन्दर बल जमा होता रहता है। यज्ञ में कोई दान करता है तो कैसे करता होगा जरा सोचो तो एकानामी करने का ख्याल आयेगा।
सेवा, हड्डी प्यार से, ध्यान से, शान्ति से बैठ करके करो, जो किसी के दिल को ऐसा लग जाये। जैसे बाबा कहते हैं आराम वह नहीं, लेकिन चिंता मुक्त रहने का, चिंता से फ्री होने का अभ्यास हो। शुभ भावना भले रखो, चिंता वा चिंतन किसी का भी नहीं करो। कई बार हम सोचते नहीं हैं परन्तु ध्यान रखो तो हमारे से सब एक्यूरेट होता है। अपने पास जो कुछ है, उसे सिर्फ व्यर्थ नहीं गँवाओ तो अपने को बहुत अच्छा मैनेज कर सकते हैं।
हमारा सब कुछ सफल होता रहे, यह सफल करने का भी एक सब्जेक्ट है। जैसे समय को सफल करने की बात है, बाबा ने इस समय आ करके हमको जगाया, स्मृति दिलाया, अपना बनाया और पढ़ाया जो पढ़ा वह औरों को भी सिखाते हैं। तो हम जब किसी को कुछ सिखाते हैं तो यह थोड़ेही है कि हमारा सीखना कोई पूरा हो गया। रिवाइज़ होता है, जैसे किसी को कुछ सुनाओ तो पहले अन्दर अपने से पूछेंगे या कोई हमारे मुँह में देखेंगे जो यह बोल रहे हैं, इनके अन्दर वह है। इनकी शक्ल से तो लगता है कि यह राय दे रहे हैं, बता रहे हैं। सबसे बहुत अच्छी बात यह है कि अपने को सिखाने के लिए कुछ घण्टे देना चाहिए। खास सेवा छोड़कर नहीं देना है, सेवा हाथ से होगी, मुख से भी ज़्यादा-से-ज्यादा कितना घण्टा बोलेंगे। बोलेंगे भी तब जब कोई सुनेगा, ऐसे तो नहीं बोलते रहेंगे। और जो अपने को पहले से सिखा करके ट्रेण्ड किया होगा, वह थोड़ा भी बोलेगा तो उसका कोई सुनेंगे। सिखाने वाला बाबा, फिर मैंने अपने को अच्छी तरह से सिखाया, चलन में लाया फिर मुख पर आया तो यह भी आपस में शेयर किया। हमारा आपस में प्रेम है, परिवार है तो हम क्या देवें, तो दाता ने जो दिया है वह दे नहीं रहे हैं परन्तु एक्सचेंज कर रहे हैं, कमाई हो रही है।
पर-दर्शन हमारी आँखों में धूल डाल देता है और पर-चिंतन दागी बना देता है। तो धूल और दाग। पर-दर्शन अर्थात् आँखों से किसी के भी अवगुण को देखा, बुराई को देखा तो जैसे आँखों के आगे धूल आई। अच्छाई दिखाई नहीं पड़ेगी। फिर दूसरे को भी मेरी अच्छाई दिखाई नहीं पड़ेगी। न हम किसी की अच्छाई को देख सकते हैं। इसलिए बाबा ने कहा 'स्वदर्शन-चक्र' फिराना सीखो तो धूल और दाग मिट सकता है। तो कितना अन्तर है स्वदर्शन और परदर्शन में। तो हरेक अपने ऊपर कृपा करे, रहम करे, तरस खाये... ऐसी अन्दर से कौन सी बात है जो मुझे आगे बढ़ने नहीं देती है। स्वमान में रहने नहीं देती है या बाबा के समीपता की शक्ति खींचने नहीं देती है, या बड़ों के समीप आने की ताकत नहीं होती है।
हर आत्मा अपने बन्धनों से फ्री हो करके उड़ता पंछी हो करके उड़े, अच्छी वृत्ति और वायब्रेशन से खुद उड़े तो औरों को उड़ने की प्रेरणा दे, परन्तु वह उड़ने की कला ही तभी आयेगी जब अन्दर से ज़रा-सा भी वह धूल न हो। दाग तो बड़ी बात है, धूल भी न हो। ज़रा-सा नज़र में भी न आये। एक होता है इन्फ्लुन्स, दूसरा होता है 'इफेक्ट'। तो कभी-कभी इन्फ्लुन्स पड़ जाता है या कभी इफेक्ट आ जाता है। इफेक्ट आना माना मन में ग्लानि अथवा दुःख आ जाता है। अपना स्व-मान भूल जाता है। बाबा के साथ अपने आपको देखना छूट जाता है, दूसरे का प्रभाव पड़ जाता है। बहुत अच्छा लगता है, यह आदत है इस आदत को विकार समझना चाहिए। किसी भी आत्मा का प्रभाव हमारे पर न पड़े, गुण उठाना अच्छी बात है, वह सतोगुण हो जायेगा लेकिन अवगुण देखना मेरा काम नहीं है। कभी एक दो का आपस में हिसाब होता है, आप इनके गुण-अवगुण के प्रभाव में हो या इफेक्ट में हो, उसका भी चिंतन मैं करूँ या मुख से वर्णन करूँ तो यह मैं दोषी बन गई। हिसाब-किताब दूसरे का है उसमें मेरा क्या जाता है, मैं उसका चिंतन क्यों करूँ। मैं अपने को फ्री रखूँ। कोई बात है तो बाबा को सुना दो, छिपाओ नहीं। ऐसे नहीं इसकी औरों को सुनाओ या खुद ही अन्दर चिंतन करो, मन में रखो। देखो, फिर चिन्तन करो फिर मन में दबाके रखो, फिर कहेंगे किसको क्या सुनायें, हमारा आपस में झगड़ा न हो जाये या किसी ऐसे को सुनाये जिसका उसके साथ कभी भी वैर-भाव हो जाये, यह पाप है। यह जो कमियाँ-कमज़ोरियाँ हैं वह भी हमको ईश्वरीय सुख में रहने नहीं देती हैं। कभी भी किसी के द्वारा हमारी इनसल्ट हुई या कुछ हुआ तो उससे स्वयं को किनारा कर दिया। ऐसे क्यों न समझूं कि उसने मेरी इनसल्ट की, मैं उनको मान दूँ, किनारा क्यों करूँ ? फिर मेरे को यह ख्याल आये कि मेरी यह फिर से इनसल्ट न कर दे इनसे तो किनारा हो जाओ। इसको क्या कहा जायेगा ? डरपोकता !
क्या ज्ञान माना कि जब कोई मान दे तो स्वीकार करो और जब कोई अपमान करे तो उससे किनारा कर लो। मान में चेहरा खुश, अपमान में मुरझा जाए यह कोई ज्ञान नहीं है। मान वाले के सामने फिर से खुश हो करके जाओ वह फिर-फिर मान देता रहे और अपमान वाले को कहे एकदम दूर हट जाओ! योगी तब ही माना जायेगा, इसका योग अच्छा है यह तभी समझेंगे जब अपमान करने वाला खुद कहे कि मैंने इतना इसका अपमान किया, यह तो देवता है इसने कभी कुछ मुँह से नहीं बोला। हमें महिमा योग्य बनना है परन्तु महिमा स्वीकार नहीं करनी है। अगर किसी ने महिमा की तो हम उसकी पास खातिरी करने न लगें। अगर किसी ने कुछ उल्टे शब्द भी बोल दिये तो हम उसको पॉजिटिव करके अच्छे रूप में ले लें, तो आगे चल करके वह महसूस करेंगे। इसमें चाहिए धीरज, शान्ति और प्रेम का गुण।
अगर ज़रा-सा भी कुछ चित्त पर होगा तो चेहरे पर वह चिह्न दिखाई पड़ेंगे। कोई कहे मेरे मन में तो नहीं है लेकिन पता नहीं मेरे चेहरे पर क्यों आता है? यह भी अपनी रियलाइ‌ज़ेशन नहीं है। जो अन्दर मन चित्त में है, मन में अभी का है चित्त में पुराना है, पुराना भी जो चित्त में है वह चेहरे पर जरूर आयेगा। पुराना चित्त वाला भी नैन-चैन में आता है इसलिए चित्त अन्दर इतना साफ़ हो। किसकी भी गलती मेरे चित्त पर न हो। अपने चित्त को साफ़ रखना, यह भी अपने ऊपर रहम करना है। हमारे से भी गलती जो हो गई, वह भी बाबा से माफी मांग करके फिर से न हो तो चित्त हमारा खुश रहेगा। उसके पास कोई प्रश्न नहीं होगा तो वह प्रसन्नचित्त सन्तुष्ट होगा। कोई किसके लिए मन में ग्लानी नहीं है, अन्दर अच्छा साफ़ है। आइने में भी थोड़ा दाग होता है तो दिखाई नहीं पड़ता है। हमारे आइने में ज़रा-सा भी दाग न हो, जो मैं अपने आपको देख न सकूँ। आइना साफ़ माना दिल दर्पण साफ़। मैंने क्या पुण्य किया है, क्या पाप किया है? हम अन्दर से इतना साफ़ अगर हैं तो मुझे दिखाई पड़ेगा। यह है अन्दर गुप्त, जो पहले पता नहीं था, दूसरों को दिखाई पडता था, खुद का छिपाते थे। अभी हम ऐसे स्वच्छ आइना बन जायें जो कोई-को-कुछ कहने की आवश्यकता न पड़े, आपेही वह समझे कि मुझे भी ऐसा पुरुषार्थ करना है। तो सच्चे पुरुषार्थी की निशानी है संकल्प किया और साकार हुआ। कुछ भी व्यर्थ नहीं हो तो बाबा हमको देख खुश होगा और दुआयें देता रहेगा और आत्मा को हर्षित होने का जैसे नैचुरल संस्कार बन जायेगा।
हमने देखा है मम्मा पुरुषार्थी थी लेकिन मम्मा से सदा हमको सम्पूर्णता की भासना आती थी। ईश्वरीय सन्तान का नशा था, जगत की माँ हूँ, इस संस्कार से ऐसी मीठी पालना देती थी। और अपने कर्त्तव्यों से भी पालना करती थी। मम्मा कुमारी होते भी जगत-अम्बा के रूप से उसका हरेक आत्मा के लिए अन्दर से रूहानी प्यार था। ऐसे मम्मा ने यह माँ शब्द स्वीकार नहीं किया, हमेशा कहती थी मैं ब्रह्मा की बेटी सरस्वती हूँ। लक्ष्मी के लक्षण तो पीछे आये, पहले जगत-अम्बा के, उसके पहले सरस्वती के, गॉडेज़ ऑफ नालेज के लक्षण थे। तो हम भी ऐसी अपने आपको पालना देवें। राधे मुरली की मस्तानी, सरस्वती के हाथ में ज्ञान की सितार, सेवा जगत की माँ समझकर की, फिर भविष्य में बनती है लक्ष्मी। तो हमारा भविष्य सतयुग का पीछे, अभी हमारा कैसा हो? इसमें सब बन्धनों से मुक्त, कोई कमज़ोरी नहीं, सम्पूर्णता साथ चलती चले। वह मेरे से दूर न हो, ईश्वर की सन्तान हूँ तो सत्यता की शक्ति साथ होगी।
तो हरेक अभी मधुबन में अपने आपको देखना, जानना फिर अच्छी तरह से अपने आपकी पालना करना। और फिर बाबा से पालना खींचना। कोई अभिमान की अंश न हो, यह यादगार अपना मधुबन में छोड़ना। अच्छा। ओमशान्ति ।

तपस्वी बनने के लिए त्यागी बनो, ज़रा भी इच्छा व आसक्ति न हो

हमारी सीरत बाबा समान ऐसी हो जो हमारी मूर्त से अनेक आत्माओं को अनुभव हो कि इन्हें बाप से क्या मिला है! बाबा, बाबा है परन्तु बाबा से जो मिला है, वह सबको बाँटते चलो।
हमारे पुरुषार्थ की प्रालब्ध क्या है? मुक्ति और जीवनमुक्ति। पुरानी बातों से, पुराने स्वभाव-संस्कार से मुक्ति। माया ने पुराने स्वभाव-संस्कार का जख्म भी बहुत गहराई से पहुँचाया है। अभी तक भी किसी-किसी के जख्म नहीं मिटे हैं अर्थात् पुराने स्वभाव-संस्कार से मुक्ति नहीं हुई है। तो पुरुषार्थ क्या किया ? कई तो इस जख्म के कारण बाबा से भी दूर हो गये, कोई दर्द सहन नहीं कर सके तो भाग भी गये और कोई रो-रो कर सहन करते चल भी रहे हैं। कोई यहाँ बैठे हैं परन्तु उनका जख्म अभी तक पूरा मिटा हुआ नहीं है। सर्व दुःखों की दवा क्या है? सदा खुशी में रहना, नशे में रहना। पहले खुशी रहे तो नशा रहे। नशा रहे तो स्थाई खुशी रहे।
एक बाबा शब्द को याद रखो तो जादू-मन्त्र का काम हो जायेगा। एक बाबा दूसरा न कोई, दूसरा जो जीते जी खुशी से मरे हैं। परवाने बन खुशी से फिदा हुए हैं, उनके जख्म मिट जाते हैं। बाबा ने कहा- कोई भी कंडीशन हो लेकिन तुम विजयी रहो तो एयरकण्डीशन की टिकट मिल जायेगी। कैसा भी वायुमण्डल हो, कितना भी घमसान हो परन्तु सेकण्ड में जैसे मच्छर आये और मर गये, ऐसे विघ्न समाप्त हो जायें। पता है ड्रामा में वैराइटी सीन आयेंगी। उसको खेल समझना है। अपनी घोट तो नशा चढ़े, जो बाबा ने दिया है उसी मनन-चिन्तन में रहो तो कुछ देखने, सुनने में आयेगा नहीं। अन्दर ही अन्दर मनन-चिंतन में बिज़ी रहो, तो जो बाबा ने दिया है उससे भरपूर रहने की आदत पड़ जायेगी।
एक राजाओं के अपने किये हुए पूर्व जन्म के दान पुण्य का, दूसरा जो तपस्वी, ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं उनकी सूरत से पता चल जाता है। चलन और उनके नयनों से पता चल जाता है। तपस्वी की सूरत पर त्याग झलकता है। बिना त्याग के कोई तपस्वी बन नहीं सकता। हम ब्रह्मा-वंशी ब्राह्मण भी बिना त्याग के तपस्वी नहीं बन सकते हैं। त्याग तो ऐसा 'त्याग' जो सर्व देह के धर्म भूले हुए हों, मन वृत्ति साफ हो। जरा सा भी आसक्ति वा इच्छा है तो उसको त्यागी नहीं कहेंगे।
हमारा आक्यूपेशन है- 'सेवाधारी'। किसकी सेवा ? ईश्वरीय सेवा। जो श्रीमत मिलती है उसी अनुसार चलने में सेवा है। यज्ञ सेवा भी कर रहे हैं, स्वयं की सेवा भी कर रहे हैं और विश्व को पावन बनाने की सेवा भी कर रहे हैं। तन को ताले लगा सकते हैं, लेकिन मन को कोई ताला नहीं लगा सकता है। हरेक अपने आपसे पूछे किसी कारण से भी मेरे दिल में बाबा के सिवाए और कुछ है? या बाबा से जो मिला है वह सदा है? ऐसा है जैसे हनुमान के दिल में राम और राम की दिल में हनुमान बैठा है। हम बन्दर से मन्दिर बनने वालों की सेना भी बहुत बड़ी है, परन्तु हनुमान ने राम के दिल में अपना स्थान बना दिया, यानि जरा भी वह उनसे दूर नहीं। जैसे जहाँ बच्चे बाप को याद करते हैं तो बाबा साथ होता है। इतना हम भी साथ निभा रहे हैं?
हमारे अन्दर जिसकी याद है औरों को भी उनकी याद आ जाये। जैसे बाबा ने विदेही बनने की बात की है तो सबके मन में यह क्वेश्चन उठ रहा है कि वह विदेही स्थिति क्या है और कैसे होगी? हमारी देह औरों को नज़र न आये। जैसे कभी मम्मा बाबा की देह हमको दिखाई नहीं पड़ती थी, शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा का सिर्फ निमित्त आधार ही नहीं लिया। लेकिन ब्रह्मा बाबा के अन्दर निमित्त बनने की इतनी शक्ति है जो शिवबाबा ही उनसे दिखाई पड़ा। ब्रह्मा बाबा, साकार है परन्तु वह भी सदा आकारी, व्यक्त से परे अव्यक्त फ़रिश्ता दिखाई पड़ा है। तो उसने सिर्फ इसका आधार नहीं लिया है परन्तु इसने सदा अपने आपको निमित्त समझा है।
ब्रह्मा बाबा जैसा और किसी का भी ऐसा साकारी फोटो है ही नहीं, हो भी नहीं सकता है क्योंकि यह फोटो नहीं विचित्र रूप है। देह में होते न्यारेपन का जो अनुभव है, फोटो से भी वही अनुभव होता है। साकारी होते आकारी, निराकारी कैसे रहें -यह अनुभव होता है। तो हमारी स्थिति भी अन्दर से ऐसी रहे। निमित्त पाँच तत्वों वाले शरीर में आत्मा है परन्तु आकारी और साकारी, वर्तमान फ़रिश्ता रूप और भविष्य देवता रूप अनुभव होता रहे, तब द्वापर में वर्तमान के आधार पर यादगार बनेगा। पूजा होगी।
अभी हमें सर्वोत्तम ब्राह्मण सो फ़रिश्ता बनना है। फ़रिश्ता माना क्या? जरा-सा कोई बात का स्पर्श भी न हो, ऊपर रहता है तो स्पर्श नहीं होता है। पहले कोई-न-कोई ज़रा-सा इफेक्ट आ जाता था, किसका डिफेक्ट देखा, कोई बात अच्छी लगी, कोई नहीं लगी तो चेहरे पर आया, किसके साथ हमारा स्वभाव मिलता है तो सहज है। किसके साथ नहीं मिलता है तो डिफीकल्ट लगता है.. सोचते हैं इनके साथ रहना, इनके साथ चलना तो बड़ा मुश्किल है, ऐसा सोचने वाले मास्टर गति-सद्गति दाता कैसे बन सकते हैं? लेकिन वर्तमान हमारी स्थिति ऐसी हो जो सबके साथ स्नेही, सहयोगी होकर रह सकें।
रूहानियत की शक्ति से सर्वशक्तिवान बाबा के साथ बुद्धि की लाइन क्लीयर रख करके, जैसे बाबा चला रहा है वैसे हम चलें तो दुनिया में जो मुश्किलातों से चिल्ला रहे हैं उनको हम मदद कर सकेंगे। हम डबल ट्रिबल-लाइट रहने के आदती बनें क्योंकि हमको ज्ञान की रोशनी मिली है, इतनी समझ है, अपने आपको भी समझें दूसरे को भी सेकण्ड में समझ जाऊँ। नम्रता और धैर्यता का गुण क्रोध वा आवेश की अग्नि को एकदम ठण्डा बना देता है। जरा सी आंच भी नहीं आयेगी, भले दूसरे को गुस्सा आ जाये लेकिन हमको उसका सेक भी नहीं आयेगा। अग्नि अपना काम करेगी। पानी अपना काम करेगा। लेकिन मैंने क्या किया? इतना अन्दर से अटेन्शन रख अपने आपको सम्भाल कर रखो तो वह हमको गर्म नहीं कर सकता है, हम उसे ठण्डा कर देंगे।
अधैर्य हुआ, आवेश आया, असर हुआ, तवे मुआफिक गर्मी बढ़ने लगी, सहनशीलता कम हो गई, नैन भर आये, गले का आवाज़ थोड़ा बदल गया या अन्दर दबा लिया फिर इन सबका डिप्रेशन हो गया, फिर पुरानी बात याद आने लगी। बाबा की जो बात सुन रहे हैं वह दिल को जंच नहीं रही है। कानों से सुन रहे हैं, समझ रहे हैं परन्तु पुरानी कोई बात की फीलिंग बार-बार बुद्धि में इण्टरफियर कर रही है। अन्दर से घुटन महसूस हो रही है, किसी को सुनाओ तो मुश्किल और न सुनाओ तो भी मुश्किल ऐसी स्थिति का हल क्या है? दिल से एक बाबा शब्द कहो तो सब बातें समाप्त। और इसका दूसरा हल है- अन्दर चले जाओ या ऊपर चले जाओ। अन्दर जाना माना 'अन्तर्मुखी' बन जाओ, परन्तु अन्दर बातें चली गई हैं इसलिए अन्दर जा नहीं सकते हैं। बाहर की बात अन्दर जाने से अन्तर्मुखी बन नहीं सकते। तो अपनी सेफ्टी के लिए कोई भी बाहर की बात अन्दर न जाये - यह ध्यान रखो। 'अन्तर्मुखी रहना' और सदा खुशी के झूले में झूलते रहना - यह है बाबा की छत्रछाया में रहना।
अन्तर्मुखी रहेंगे तो बाबा की याद आ जायेगी। देहधारियों की, मित्र-सम्बन्धियों की याद आई तो बाबा भूल जायेगा। अपने को अकेला समझके बाबा को याद करो तो कभी अकेलेपन की फीलिंग नहीं आयेगी। अगर दूसरे किसी को साथी बनाने के लिए सोचा भी तो बाबा साथ नहीं देगा, यह सब समझने वाली बातें हैं। किसी कारण से भी, कोई हमें मान देने वाला हो, चाहे अपमान करने वाला हो लेकिन हम उसको साथी नहीं बनायें। बाबा को साथी बनाना है तो इस प्रकार से अपनी बहुत सम्भाल रखनी है। मुझे मान-अपमान से परे रहना है यह है सेफ़्टी। और परे रहने के लिए एक अन्तर्मुखी रहना है, अपनी घोट तो नशा बढ़े। दूसरा एक बाबा दूसरा न कोई। तीसरी बात भी बहुत अच्छी है ड्रामा में जो हुआ सो अच्छा... सेकेण्ड भी संकल्प न चले तो बुद्धि बाबा के पास ऊपर चली जायेगी, बाबा खींच लेगा। ईश्वर का स्नेह चेहरे पर, अन्दर चित्त में खुशी ले आयेगा क्योंकि उन जैसा स्नेह कोई देता ही नहीं। इसलिए हम इसके उसके, इधर-उधर औरों के पीछे क्यों पडू ? कई हैं जो औरों का प्यार लेने के, मान के भिखारी हैं। ऐसे को बाबा भी प्यार नहीं देता है, वह भी सोचेगा।
लव और रिस्पेक्ट का आपस में बहुत गहरा कनेक्शन है। जहाँ भी कुछ लव मिलता है तो समझते हैं इसको मेरे लिए रिस्पेक्ट है। जहाँ से नहीं मिलता है तो समझते हैं इसको मेरा रिस्पेक्ट नहीं है। भगवान से लव और रिस्पेक्ट तभी मिलता है जब और कोई इंसान का स्वीकार न करे। इच्छा न रखे। लगाव और झुकाव का संस्कार ईश्वर का प्यार खींचने नहीं देता, जिस कारण आत्मा के अन्दर शक्ति नहीं रहती। कोई आत्मा में इतनी भी शक्ति नहीं है जो खुद को प्यार करे। हम खराब हैं तो हम अपने को अच्छा बनायें, अपने को प्यार करें। इसके लिए स्व-मान में रहें, किसी को न देख खुद को अन्दर से देखें। कोई अच्छे हैं तो अभिमान से देखते हैं। लेकिन दिल को साफ़ करके देखो, दिल में व मन में कोई भी बात नहीं रखो। आइने को साफ़ करो तो अपने आप अच्छा दिखाई पड़ेगा, खराबी होगी तो बाबा मिटा देगा। बाबा ने डायरेक्शन दिया है मुखड़ा देख ले प्राणी...... तो अपने को देखो किसी को नहीं देखो। पर-चिन्तन नहीं करो, स्व-चिन्तन में रहने का सुख लो। फिर कुछ कमी-कमज़ोरी भी होगी तो वह भी रूहानी शक्ति से मिट जायेगी - यह गैरण्टी है। यह विश्वास रखो, अपने को प्यार करो। जब आत्म-अभिमानी स्थिति होती है और बाबा की याद होती है तो अपना चमकता हुआ चेहरा फील कर सकते हो।
दिल से बाबा की महिमा करते रहो, बाबा आप न होते तो मैं कहाँ होती! बाबा आप मुझे मिले हो, सब कुछ मिला है, यह बोल अन्दर से अपने आप निकलते हैं, कोई सिखाता नहीं है। बाबा की महिमा करना कोई सिखा नहीं सकता। भक्ति में तो तोते की तरह से रिपीट करते हैं, जो सुना है वह बोलते हैं, परन्तु सुख का अनुभव नहीं करते हैं। भजन-कीर्तन में कनरस से गाते रहते हैं, दिल से नहीं गाते हैं, यह हम दिल से गाते हैं।
हमारी पढ़ाई में सिर्फ कनरस नहीं है, हमने किसको सुना लिया, सबने तालियाँ बजाई, यह सुनाने का भी रस होता है। इस तरह से सुनने-सुनाने के रस वाला अन्तर्मुखी बन करके सदा सुखी कभी नहीं रह सकता है क्योंकि उसमें भी मान-अपमान आयेगा। कोई बहुत अच्छा समझ है, औरों को भी अच्छा समझाता है, समझने-समझाने में दिमाग बहुत अच्छा होशियार है परन्तु अन्दर से खाली है। कोई हैं जो समझते हम तो अच्छे समझदार हैं, बहुत सीख लिया अब सीखने की भावना क्या रखें, बहुत कुछ सीख गये, इसमें भी खतरा है।
यह ज्ञान-मार्ग भी एक बहुत बड़ा पेचीला मार्ग है। कदम-कदम पर, हर संकल्प करते समय सोचना है इतना ज्ञान सुनते-सुनाते भी मैं अन्दर खाली क्यों ? उदास क्यों? कभी कोई बात होती है तो ज्ञान भी ऐसे लगता है जैसे सिरदर्द। अन्दर ही अन्दर युद्ध चलती रहती है। एक युद्ध पूरी नहीं होती है तो दूसरी सामने आ जाती है। एक दुश्मन जाता ही नहीं दूसरा पता नहीं कहाँ से आ जाता है। चूहा जाता है बिल्ली आती है, बिल्ली जाती है तो कुत्ता आता है.... यह तो कोई मेरे को छोड़ता ही नहीं है। लेकिन अन्दर ऐसी ताकत हो जो दुश्मन को नज़दीक आने की हिम्मत न हो, इतना अपने ऊपर पहरा हो। इसलिए बाबा कहते हैं कि सेवा और याद का डबल लॉक लगाकर रखो। इतना खबरदार, होशियार रहो तो कभी कोई हमारा खज़ाना लूट नहीं सकता है, खाली हो नहीं सकता है। जरा-सा भी खालीपन महसूस होता है, तो ज़रूर कोई होल है या तो क्रेक है। होल से जल्दी बह जाता है, क्रेक से धीरे-धीरे बहता है। ऐसा अपने आपको सम्भालने वाला कभी खाली नहीं होता है। कितना भी सुनो या सुनाओ परन्तु अन्दर से सम्पन्न रहने का, सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य भूले नहीं।
सिर्फ सुनने या लिखने में, सेवा में बिज़ी नहीं हो जाना। सेवा भले करो, सेवा भाग्य है कितने घण्टे भी करो। जो सच्चे सेवाधारी हैं वह ऐसे नहीं कहते कि अभी मैं बहुत थक गया हूँ, इसलिए सो जाऊँ। बाबा ने कभी कहा क्या कि अभी तो मैं थक गया हूँ, नहीं। थकता कौन है? जो व्यर्थ सोचता है, व्यर्थ बोलता है, व्यर्थ बातें सुनता है, कोई ऐसे संग में रहता है जहाँ से कोई समझ या कोई शक्ति नहीं मिलती है तो थकता है। थकावट में आवाज़ कैसा होता है? उसमें मिलनसार और रूहानियत का गुण नहीं होता। रूहानियत और बाबा से प्यार यह दो बातें कमाल का काम करती हैं। अन्दर से रूहानियत में रहने वाले राहत में रहते हैं। जितनी राहत होगी उतनी ताकत जमा होती जायेगी, उनके सामने कोई बात आयेगी भी तो सेकेण्ड में न्यारे हो जायेंगे। बात अच्छी है या खराब है, हो गई, ठीक है तू अभी आगे बढ़। इस प्रकार से रूहानियत की शक्ति आगे बढ़ाती है, कहाँ रुकने नहीं देती है।
वास्तव में ड्रामा अनुसार कोई बात रोकती नहीं है, रुकते हम अपने आप हैं। रूहानी यात्रा पर चलने वाले अपनी स्पीड को कहाँ भी ढीला नहीं छोड़ेंगे। हमको टाइम के पहले तैयार रहना है, पहुँचना है। अभी बाबा खींच लेवे, कहे आ जाओ बच्ची, जी हाँ, जी हजूर। ऐसे नहीं कहना पड़े नहीं बाबा अभी मंज़िल दूर लगती है, तो बाबा कहेंगे बुद्धू... अभी तुमको मंज़िल दूर लगती है क्या कर रही थी।
लोगों को तो मुसीबतें चला रही हैं और हमको मोहब्बत चला रही है। मुसीबतों में बिचारे कितने गधों की तरह से, हैवानों की तरह से चल रहे हैं- जैसे सरकार चलाये, जैसे समस्यायें चलायें, जैसे समाज चलाये, जैसे यह चलायें। तो हमेशा यह सोचो कि बाबा ने मुझे क्या बनाया है? बाबा ने क्या कहा है? अपनी घोट तो नशा चढ़े। जो बाबा ने सिखाया है वहीं करते रहो। दूसरा जो भी बात हो गई-दे दान छूटे ग्रहण। ग्रहचारी बैठ गई तो फिर मज़ाल है छोड़े। तरीका है- दे दान या सच्ची दिल से सुना लो, क्षमा मांग लो। बाबा कहता है सच्ची दिल से बाप के सामने आओ। यह नहीं कि बाबा जानी-जाननहार है यह सोच करके देह-अभिमान वश छुपाकर मत रखो। बाप को दिल से सुना दो। फिर से यह नहीं होगा। पुराने संस्कारों के वश हुआ, अभी योगाग्नि से पुराने संस्कारों को भी जला दो।
बाबा जीत पहनाने की मदद तो करता है, साथ-साथ मास्टर भी बना देता है। बाबा कहते मेरे जैसे बन जाओ। कभी कोई बाप या टीचर ऐसे कह नहीं सकता कि मेरे जैसे बन जाओ। या तो हम बिल्कुल बेअक्ल थे, माया से हारे हुए थे उस पर जीत पाने की शक्ति बाबा देता है और फिर कहता है- तुम मेरे समान बन जाओ। समीप आ जाओ। बाकी सब पुरानी बातों से इतना दूर आ जाओ कि जैसे वह न हमारी थी, न रही, न रहेंगी। अच्छा ओमशान्ति

अपनी स्थिति ऊँची बनानी है तो याद में रहने का गुप्त अभ्यास हो, साधारण बोलने व सुनने की आदत न हो

बाबा की मुरली सुनकर फिर रिवाइज़ करें तो सारा दिन भी याद रहता है और सदा के लिए भी याद हो जाता है। क्लास पूरा होते ही जो काम-काज में लग जाते हैं उनसे कोई कुछ पूछेंगे या वे अपने आपसे पूछेंगे तो उन्हें याद करना पड़ेगा। यह याद करना नहीं पड़ता है, परन्तु जो काम की बात होती है वह सदा ही हमारे साथ रहती है। ब्रह्मा बाबा ने शिवबाबा की बातों को अमल में लाने के लिए कितना प्यार से पुरुषार्थ किया, सेवा के लिए हमारे पास इतना ज्ञान हो जो कहाँ भी डिलेवरी करें। नये-से-नया अच्छा माल हो, पुराना माल कोई पसन्द नहीं करता है। नया माल जल्दी बिक जाता है। तो हमें ज्ञान सागर बाबा मिला है-ज्ञान रत्नों से बुद्धि रूपी झोली भरने के लिए।
हमें ऊँच उठाने के लिए ब्रह्मा बाबा बहुत साथ देते थे, अभी भी दे रहे हैं। ऐसे पुरुषार्थ करते-करते आखिर स्थिति ऊँची बन जायेगी, परन्तु पुरुषार्थ तो करते रहना पडेगा, इसमें कभी थकना नहीं है। थकावट हो तो उसको उतारने का तरीका ऐसा है, इतनी मीठी अच्छी ज्ञान की बातें रमण करने लग जाओ। हम जो भी काम करते हैं वह मनमर्जी से करते हैं इसलिए थकावट हो जाती है। बाबा की श्रीमत से जो ईश्वरीय सेवा करते हैं उसमें थकावट हो नहीं सकती है। थकावट का कारण है एक तो देह-अभिमान, दूसरा जब सोचते हैं कि मेरी सेवा का कदर कहाँ है, हमने इतना अच्छा काम किया फिर भी किसी ने शाबाश नहीं दिया, या कुछ भी नहीं कहा। किसी के स्वभाव-संस्कारों के बारे में सोचने से थकावट हो जाती है या जो कुछ बीती बातें हैं- किसकी मेरे साथ हुई या मेरी किसके साथ हो गई- वही चिन्तन वर्णन में थकावट होती है। और भी थकावट के ऐसे कई कारण हैं।
बाबा की याद में ब्रह्मा भोजन बनाने वाला, खिलाने वाला और खाने वाला उसकी अवस्था कैसी होगी? सेवा करने वाले की शक्ल बताती है कि सेवा में खुशी और कमाई कितनी है। कमाई तब होती है जब योगयुक्त होकर करते हैं। तो योग भी हुआ, सेवा भी हुई, चेहरे से सेवा की दुआयें योग का बल दिखाई देता है। बाकी -व्यर्थ सोचना - यह न योग है, न सेवा है। भले वह कितनी भी सेवा करता हो, चाहे कितना भी योग लगाता हो। बाबा नहीं मानता। मम्मा, बाबा को देखो। कभी भी कुछ भी बात हो जाये ड्रामा। उसको साक्षी हो करके देखने की इतनी अच्छी आदत बाबा मम्मा की पड़ी हुई थी, वही आदत हमारे में भी डाली। शरीर से न्यारा रहना- यह हुआ देही-अभिमानी स्थिति में रहना, परन्तु पार्ट बजाते साक्षी होकर रहना है। बुद्धि में 84 के चक्र का ज्ञान हो, बस मुझे हीरो पार्टधारी बनना ही है।
इस ड्रामा में एक्टर तो सब हैं परन्तु जैसा समय है उसी अनुसार किसी को सहयोग देना है, किसी को स्नेह देना है.. सब बातों में एक्टिव बनना यही हीरो पार्ट है। जहाँ आवश्यकता है वहाँ हाज़िर हो जायें। उसे देखकर कहेंगे यह तो वण्डरफुल है! इतना लाइट, इतना लायक इनको किसने बनाया? हमें यहाँ ही अनेक आत्माओं को फ़रिश्ते रूप का अनुभव कराना है। इसलिए बाबा कहता है मुझे ज्ञानी और योगी बच्चे प्यारे लगते हैं। ज्ञान भी बुद्धि में तब बैठता है जब बाबा की बातों को ध्यान से सुनते हैं। अपने बुद्धि की लाइन सदा क्लीयर रहे, यह अटेन्शन रहे - ऐसे बच्चे ही बाबा को बहुत अच्छे लगते हैं। बुद्धि की लाइन में एक बार भी अगर गडबड़ हुई तो खुद का व दूसरों का एक्सीडेंट करते रहेंगे। कांटे लगते रहेंगे या दूसरों को लगाते रहेंगे। कभी अपने को खुशनसीब महसूस ही नहीं करेंगे क्योंकि सही योग नहीं है।
जिसकी बुद्धि सारा दिन भटकती है यह होना चाहिए, यह ऐसे नहीं होना चाहिए.. ऐसा सोचने की ड्युटी तुमको किसने दी है? तुम जज या वकील हो क्या ? ऐसों की बुद्धि कभी भी शुद्ध हो नहीं सकती है। बाबा कहते हैं- धारणा के लिए ज्ञान इतना अच्छा मिलता है तो अपने विचारों को ऐसे ही चलायें। श्रीकृष्ण के मुख में और हाथ में मक्खन दिखाते हैं क्योंकि सारा विचार सागर मंथन करके मक्खन खाया और खिलाया है। इसीलिए अतीन्द्रिय सुख में रहने का झूला और मक्खन दिखाते हैं। मक्खन का गायन बहुत है। जिसको महाराजा-महारानी बनना है तो विचार सागर मंथन का मक्खन खाते रहो।
बाबा के डायरेक्शन में जितना जिसका विश्वास हो उतना उसको अपनी अवस्था आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी और बाबा भी उनका विशेष ध्यान रखेंगे। इसके लिए भी एक तो योग चाहिए दूसरा सरेण्डर बुद्धि चाहिए। सरेण्डर को भी उसकी रग देख करके ही डायरेक्शन देंगे। फिर जो उस डायरेक्शन पर चलेगा वह उतना अहो सौभाग्यवान बनेगा। इतना विश्वास हो जो कुछ भी हो जाये बाबा आपेही ठीक करा देगा। जो बाबा ने कहा उसमें कितना कल्याण समाया हुआ है। मुख्य तो भगवान ने मेरी डोरी अपने हाथ में रखी है माना मेरी रेसपान्सिबिल्टी उठाई है। बाबा कहते सिर्फ तुम मेरे होकर रहो और मैं जो कहूँ वह करो।
अपनी बुद्धि को चलाने की आदत को छोड़ो, क्योंकि सबसे खराब आदत है मनमत। भगवान का बनने में यह आदत बहुत धोखा देती है। दूसरी और खतरनाक बात है- दूसरे की मत के अण्डर चलने की आदत या दूसरों पर प्रभावित होकर चलना। फलाना ऐसे कहता है तो मैं क्या करूँ, उसको छोड़ना मुश्किल है। वही कहावत है कि ब्रह्मा भी उतर आये तो भी यह मानने वाला नहीं है क्योकि आदत से मज़बूर है। तो इन सब बातों को सामने रख करके विचार करना चाहिए। एक तो चलते-फिरते याद में रहने का बहुत अच्छा गुप्त अभ्यास हो, ज़रा-सा भी साधारण बोल बोलने व सुनने की आदत न हो तब ही ऊँची स्थिति बना सकते हैं।
साधारण से नीचे आना बिल्कुल सहज है इसलिए ऊँची स्थिति से साधारण भी न बने। बहुतकाल से अपने को साधारण भी बनने न देवें, व्यर्थ तो पहले से बिल्कुल नीचे गिरा ही पड़ा है, उसको साधारणता तक आना भी मुश्किल है। किसी को मैं सुख दूँ तो मुझे भी सुख मिलेगा। अपनी जीवन बनाने की अच्छी एम हो, सच्चे दिल का पुरुषार्थ हो, तो हमारी जीवन को देख सब खुश हो जायें। अच्छा ओम शान्ति ।

सतोगुणी दृष्टि-वृत्ति द्वारा आपस में सतोगुणी व्यवहार से अपनी सम्पूर्णता को समीप लाओ

बाप की याद कभी न भूले, उसकी विधि क्या है? घर में बाबा को याद करने से लगेगा- हम भी बाबा के घर के वासी हैं। बाबा परमधाम में रहने वाला है, हम भी तो वहाँ से आये हैं, यह महसूस होगा। भक्ति में तो सिर्फ कहते रहते कि आये कहाँ से, जाना कहाँ है? लेकिन हमें अभी कल्याणकारी बाबा मिला है और यह सब बतलाया है कि अभी तुमको कैसे वहाँ जाना है। अभी मैं तुमको लेने आया हुआ हूँ।
जो बाप ने स्वर्ग स्थापन किया है हमको उसमें आना है, हमको स्वर्ग के लायक बनाने के लिए बाबा को भी कितनी मेहनत करनी पड़ती है। बाबा इतनी मेहनत करते हैं तो हमको उसकी भेंट में कितनी मेहनत करनी चाहिए। हमको स्वर्ग में आ करके भी राज्य पद पाने के लिए बाबा पुरुषार्थ कराते हैं। तो कभी-कभी यह विचार तो चलता है कि हम स्वर्ग में राज्य करने वाले या स्वर्ग के राज्य में आने वाले हैं! स्वर्ग में आने वाले भी ऐसे होने चाहिए। त्रेतायुगी संस्कार वाले नहीं चाहिए, उन्हें स्वर्ग की वह खुशबू ही नहीं आयेगी, भासना ही नहीं आयेगी। तो हम स्वर्ग में राज्य करने वाले, राज्य में आने वाले हैं, तो हमारे संस्कार भी ऐसे चाहिए। राज्य करने वाले तो एकदम फ़ालो फ़ादर के संस्कार वाले होंगे, उनका जरा-सा भी कदम इधर-उधर नहीं जायेगा।
आत्मिक दृष्टि और रूहानी स्नेह की शक्ति पुराने स्वभाव-संस्कारों, भूलों को खत्म कर देती है। हमारी आपस की लेन-देन एक दो को आगे बढ़ने में मदद करे। यह नहीं कि यह आगे क्यों बढ़ रहा है, यह क्वेश्चन रूहानी स्नेह इमर्ज होने नहीं देगा। इसके लिए इतना हमारा बाबा से प्यार हो और इतना घर जाने की लगन हो जो हमारे में सत्यता और पवित्रता के ही संस्कार पड़ जायें क्योंकि बाबा सत्य है तो बाबा का प्यार भी सत्य है, बाबा पतित-पावन है, हमारे अन्दर बाबा इतनी सत्यता भर रहा है, पहले पवित्रता फिर सत्यता... इससे अपवित्रता खत्म हो गई।
बाबा कहते कि अभी सम्पूर्ण तो कोई नहीं बना है लेकिन सतोगुणी तो हो। जब से बाबा के बने हैं- सतोगुणी वृत्ति वाले, सतोगुणी दृष्टि वाले सदा सुखी रहें। अटल निश्चयबुद्धि रहने का भाग्य मिला है तो हरेक के प्रति हमारी गुणग्राहक दृष्टि होनी चाहिए। हरेक के गुण देख-देख फिर बाबा की महिमा करें। किसी के गुणों की महिमा नहीं करनी है लेकिन गुण देखने से हम बाबा का गुणगान कर सकते हैं। दूसरे के अवगुण देखने से हम बाबा के गुणगान भी नहीं कर सकते हैं। तो रजोगुणी बनने से कितना नुकसान पड़ता है। रजोगुणी को अवगुण दिखाई पड़ता है, सतोगुणी को नहीं दिखाई पड़ता है और जो अवगुण देखता है, उसको वह भूलता भी नहीं है क्योंकि आँखों से देख लिया है, वह किसको सुनाने के बिगर रह भी नहीं सकता है। उनके गुण की कोई महिमा करता है तो वह सुन नहीं सकता है। तो देखने, सुनने, बोलने में अवगुण ने अन्दर बिज़ी कर दिया है। इससे नुकसान किसको हुआ ?
बहुतकाल की सतोगुणी दृष्टि और वृत्ति, सतोगुणी व्यवहार सम्पूर्णता के समीप ले आता है। जैसेकि हमारा अधिकार हो जाये। हमारी कुछ कमी होगी तो वह भी सतोगुणी दृष्टि, वृत्ति से खत्म हो जायेगी। तो जैसे बाबा ने कहा सबके साथ स्नेही होकर रहो और अगर किसी में कुछ कमी है तो उनके ऊपर रहम करो क्योंकि रहम भावना जो है, उसकी कमी को अन्दर-ही-अन्दर खत्म करने में मदद करेगी। उसकी कमी को न तो देखेंगे, न वर्णन करेंगे बल्कि रूहानी शक्ति से उसे खत्म करने में मदद करेंगे। हम एक फैमली के हैं, एक बाबा के बच्चे हैं, हम पास होकर दिखायेंगे तो यही हमारी युनिवर्सिटी का शो और शान हैं। किसकी कमी देखना, वर्णन करना माना त्रेतायुगी बनना।
जो दिव्य दृष्टि से देखा है वह अभी इन आँखों से प्रैक्टिकल में देखेंगे, विनाश भी होगा तो दैवी धर्म की स्थापना भी बाबा अभी कर रहा है, इसमें जिन्हें आगे जाने का बहुत शौक है उनमें त्याग और तपस्या के संस्कार हो। तो पहले हम त्याग और तपस्या में आगे जाने का संस्कार बना लें। मधुबन को त्याग और तपस्या भूमि कहते हैं क्योंकि त्याग के बिगर तपस्या नहीं हो सकती है। तपस्या के बिगर सच्ची सेवा नहीं होती है। तो देह सहित देह के सब धर्म त्याग, ज़रा भी देह-अभिमान न हो तो तपस्या बहुत अच्छी हो सकती है। और तपस्या का प्रैक्टिकल स्वरूप है- देह भान से भी परे। उन्हें अहंकार वा अभिमान तो कभी आ ही नहीं सकता। वे देही-अभिमानी स्थिति में रहने की मेहनत से भी छूट जायेंगे।
पढ़ाई से जो कमाई हुई है, उसमें अन्दर समझ दी है तो रॉयल्टी आ गई है। तो जितना जो ज़्यादा पढ़ा हुआ होता है और फिर प्रैक्टिस की हुई होती है, उसके लिए हर बात इज़ी हो जाती है और हर बात में वह इज़ी रहता है। उसको कभी मुश्किल शब्द का अनुभव ही नहीं होगा और मुश्किलातें आना ही बन्द हो जायेंगी। औरों की मुश्किलातों को हटाने में, इज़ी करने में मदद करेंगे।
संगमयुग की इन घड़ियों में बाबा हमें राजयोग सिखला करके फिर से हमको राजाओं का राजा बनाते हैं तो हम अपने आपसे पूछें जो राजयोग बाबा ने हमें सिखलाया है उससे हमें अन्दर से यह भासना आती है कि राजाओं का राजा बनाने के लिए सिखलाया है। बाबा ने हमको न सिर्फ बुद्धि से समझदार बनाया है, बल्कि निश्चय का बल भर दिया है। जिनके पास यह निश्चय का बल है वही विश्व के सामने चैलेंज की बातें कर सकते हैं, माना अथॉरिटी से कह सकते हैं।
जैसे बाबा कहता है- मैं कल्प-कल्प सत् धर्म की स्थापना करने के लिए आता हूँ, ऐसे हमारे भी अन्दर से यह आवाज़ निकले कि हमारा कार्य क्या है? वही सत् धर्म की स्थापना करने में मददगार बनना। अधर्म का विनाश तो होना ही है ज़रूर, वह तो भावी है, कोई भी इसको टाल नहीं सकता है। परन्तु सत् धर्म की स्थापना जो बाबा कर रहा है, पहले हमारे अन्दर सत्यता आई है! सतयुग में आने वाली आत्माओं के अन्दर सत्यता की शक्ति होगी। त्रेता माना दुविधा, उदासी, चिंता, फ़िकर..। जो ड्रामा की भावी को समझा हुआ है वही निश्चित रह सकता है। ऐसे नहीं जो ड्रामा में होगा! ड्रामा की भावी को समझा हुआ है, उनको स्मृति रहती कि विनाश के पहले मुझे क्या करना है। कौरव तो लड़ेंगे, लेकिन हम पाण्डवों की प्रीत बुद्धि ऐसी है, जो किसी प्रकार से भी मन में भी लड़ने का संस्कार एक प्रतिशत भी नहीं होगा। बदला लेने का संस्कार तो आधा प्रतिशत भी नहीं होगा। बाबा को हमें सतयुग में ले आना है, लेकिन जिन्होंने अटेन्शन नहीं दिया तो बाबा क्या करेगा ? अपने आप त्रेता की टिकट ले लेंगे। विजय रत्न, एयरकण्डीशन की टिकेट जो लेनी चाहिए, वह नहीं ले सकेंगे। फिर तो क्यू में खड़ा होना पड़ेगा। क्यू में खड़े रहना भी कितना अपने स्व-मान की कमी है। क्यूँ, क्यूँ.. का क्वेश्चन मार्क आना ही स्व-मान की कमी है। यह ऐसे क्यों करता है... यह संकल्प आया माना ड्रामा की समझ की कमी है। ऐसे नहीं होना चाहिए। यहाँ कोई हमारा राज्य थोड़े ही है, मैं यहाँ राज्य करने थोड़े ही आई हू?। लॉ उठाने की ज़रूरत नहीं है। तो बाबा ने जो हमें समझ दी है उससे कई ऐसी बातें हैं, जो अपने को बार-बार समझा-समझा करके समझदार बनाना पड़ता है। कोई बात ऐसी न रहे जो कहें कि यह तो हमने समझा ही नहीं। परीक्षायें तो हरेक के पास आती हैं, पढ़ाई माना ही परीक्षा, लेकिन मूँझने-घबराने और डरने का ज़रा भी संस्कार न हो, नहीं तो वह भी त्रेता में ले जायेगा।
कम-से-कम निश्वयबुद्धि विजयीपन के संस्कार तो हों, थोड़ा भी हार खाई माना त्रेता में गया। कभी भी हार न खायें, सेकण्ड में समझ जायें। जिनका पढ़ाई पर पूरा अटेन्शन है वह हमेशा रेडी रहेगा। कैसे भी क्वेश्चन सामने आवें, उसके मन में यह क्वेश्चन ही नहीं उठेगा कि यह कैसे करूं व क्या करूं? सपूतपने में ज़रा भी कमी है तो नाम बाला नहीं कर सकेंगे। सपूत ही बाप का नाम बाला कर सकता है और सबूत देने वाले का नाम बाप बाला करता है। वह अपना नाम बाला नहीं करने वाले हैं। सबूत देने वाले के अन्दर यह तात-लात रहती कि अपने हर बोल से, हर संकल्प से, हर चलन से बाप का नाम बाला हो क्योंकि पढ़ाने वाला, सिखाने वाला और उनके पहले पालना देने वाला वही है मेरा। जिसको छोटेपन से ऐसी पालना मिली है तो उनकी पढ़ाई भी अच्छी रही है। माँ-बाप अच्छे पालनहार नहीं होते हैं तो बच्चों का दिमाग पढ़ाई में काम नहीं कर सकता है। क्या बच्चों को दोष देंवे क्योंकि पूरी पालना नहीं मिली है। हमको पालना बहुत अच्छी मिली है, अच्छी पालना ने पढ़ाई में मदद दी है।
तो जो बाबा ने कहा 8-10 स्टूडेंट बनाये फिर दो चले गये, तो पालना की कमी कहेंगे। कहाँ मेला हुआ अनेक निकले फिर देखो थोड़े समय के बाद कम होते-होते बाकी एक बचा, दो बचा तो क्या कहेंगे? पालना की कमी है। पालना जो मिली है वह देना होता है, ऑटोमेटिक उनके संग से, उनके व्यवहार में आने से कहेंगे बड़ा बल मिला है, किससे? पालना से मिला। पालना भी मिली है, पढ़ाई भी ऊँची है फिर पढ़ाई से धारणा करो तो वह शक्ति राज्य पद में ले आयेगी। राज्य पद में आने वाले में अपने निजी धारणा की शक्ति है। भगवान उसमें पीछे भरता है, पहले उसके पास निश्चय की शक्ति है। न सिर्फ रचता और रचना का ज्ञान है, परन्तु अचल-अडोल रहने का प्रैक्टिकल में उसके पास संस्कार है। कितना भी कोई हिलाने वाले हो, परन्तु कभी हिले नहीं हैं। बहुतकाल से मात-पिता को फ़ालो करने से, कदम-कदम पर श्रीमत पर चलने से राज्य पद का संस्कार अपना बना रहे हैं। हर बात में उनका और कोई चिंतन चल ही नहीं सकता, चिंता हो नहीं सकती।
हम भाग्यवान हैं जो शिवबाबा ने इस भागीरथ का आधार ले करके हम लोगों को कहा- तुम महारथी हो। यह भी सदा स्मृति रहे कि इस रूहानी सेना में बाबा बोले बच्चे, तुम महारथी हो। तो महारथी माना सदा मायाजीत जगतजीत। अभी तो प्रकृतिजीत की बात कर रहे हैं क्योंकि बाबा ने कहा है कि तत्व भी ऐसे हो गये हैं जो उसमें भी आसुरी वायब्रेशन्स आते हैं। आत्मा के साथ-साथ तत्वों को भी बाबा पावन बना रहा है। तो राज्य पद में आने वालों की ज़िम्मेवारी है- जैसा कर्म बाप करता है ऐसे हम करें। फिर जैसा कर्म मैं करूँगा मुझे देख और करेंगे। पहले जैसे कर्म बाबा करता है वैसे हमको करना है। जैसे बाबा के अन्दर यह भावना रहती है कि सबका कल्याण हो। वह हम आज प्रैक्टिकल देख रहे हैं विश्व का कल्याण बाबा कैसे कर रहा है, हम भी ऐसे करें। -
तो इन सब बातों से सिद्ध है कि बाबा आया ही है स्वर्ग की स्थापना करने, जो स्वर्ग की महिमा है वह तो हर धर्म वाला करता है। एंजिल की महिमा भी हर धर्म में है, जो बाबा हमको फरिश्ता बना रहा है। माला की महिमा भी सब धर्मों में है। 'माला, स्वर्ग और एंज़िल सब धर्म वाले मानेंगे।' ऐसा माननीय बाबा हमें बना रहा है, जिसको सारी दुनिया मानती है ऐसा माननीय हमको बना रहा है। देवता तो पीछे बनेंगे लेकिन फ़रिश्ते तो अब बन रहे हैं। तो प्रैक्टिकल देख करके हर धर्म वाली आत्मा को मानना आसान हो जायेगा। जैसे बाबा ने वायदा किया है, हमको भी उसी को निभाना है, माना राज्य पद लेना है। खींचकर नहीं लेना है, हल्का बनकर अधिकारी बन जाना है।
सत्यता और पवित्रता हल्का बना देती है। सत्यता की थोड़ी कमी है तो भारीपन आता है। अपवित्रता की अंश है तो रुकावटें आती हैं। ज़रा भी संकल्प में भी अपवित्रता की अंश निर्विघ्न स्थिति बनने नहीं देती है। ग्रहचारी बैठती है तो फिर कमाई में घाटा भी पड़ जाता है। किसी प्रकार से भी जरा-सी भी अपवित्रता ग्रहचारी को लाती है। तो इसमें खबरदार, होशियार रहना है क्योंकि यही तो ऊँच पद का आधार है। तो ऐसे न हो कि सेवाओं में इतना मस्त हो जायें जो स्व को देखना भूल जायें और औरों को देखने में लग जायें तो उसमें भी हमारा पद कम हो जायेगा। स्व को देखना जितना समय भूलेंगे उतना हमारा श्वाँस, संकल्प औरों को देखने में जायेगा। जो औरों को देखने में व्यस्त हो गये हैं, उन्हें स्व को देखने का टाइम ही नहीं मिलता। स्व को देखने का टाइम नहीं तो स्वराज्य-अधिकारी कैसे बनेंगे ! अच्छा।

समझ से व्यर्थ और निगेटिव को खत्म कर दो तो शान्ति-प्रिय बन जायेंगे

हम सब ब्रह्मा मुख वंशावली सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण हैं, बाबा के नूरे रत्न हैं। दृष्टि देके कहाँ-से-कहाँ उठा करके बाबा ने नूरे-रत्न बनाया है और इतना प्यार दे रहा है जिसमें पुराना सब भूल जाये।
बाबा के महावाक्य बार-बार याद आते रहे तो यह भी चढ़ती कला का एक अच्छा साधन है। जैसे कोई बात दिल को खराब लगती होगी तो न चाहते भी वह बार-बार याद आती रहेगी या कोई चिंता-फ़िकर वाली बात होगी वह भी बार-बार याद आती रहेगी। तो हमें देखना है कि दिन में बार-बार क्या याद आता है? मीठे बाबा के जो एक-एक बोल हैं वह श्रीमत्भगवत् गीता का सार है। ज्ञान सागर बाबा ने जो ज्ञान दिया है उससे हमें सागर के गहराई में जाने का अक्ल आ गया है, जिससे ज्ञान के रत्न हमारे अन्दर आते जायें। एक-एक वैल्युबुल रत्न है, सागर की गहराई में जाने से रत्न निकल आते हैं और नज़र ऊपर करके बाबा को ज्ञान-सूर्य के रूप में देखो तो सकाश मिलती है, सिर्फ रोशनी नहीं मिलती है, अन्धियारा ही नहीं मिटता है लेकिन जैसे इस सूर्य से क्या-क्या मिलता है, आज यह सूर्य न होता तो यह धरती किस काम की? आसमान भी किस काम का? जल भी किस काम का ? सूर्य नहीं होता, सागर-ही-सागर होता तो बादल कैसे बनते, वर्षा कैसे होती ? नदियाँ कहाँ से आती, मीठा पानी कैसे मिलता ? तो सागर और सूर्य का आपस में कितना कनेक्शन है। वह ऊपर और यह यहाँ। तो हमारी बुद्धि ऊपर भी रहे और गहराई में भी जाने का अभ्यास हो।।
तो सूर्य दिन भर में सारे जर्म्स को खत्म करने के साथ रोशनी भी देता। आजकल सारा आधार 'सोलार एनर्जी' पर हो गया है, सूर्य से वह ऊर्जा शक्ति खींचते हैं तो खाना भी बना सकते हैं, बिजली आदि सब कुछ ले सकते हैं। तो जैसे-जैसे साइन्स की कमाल देखते हैं वैसे हम साइलेन्स में जायें तो उनसे ज़्यादा कमाल कर सकते हैं। अनुभव और विवेक कहता है आत्मा सिर्फ परमात्मा की गहराई में चली जाये तो कितने कमाल का काम कर सकती है!
स्थापना का सारा कार्य साइलेन्स के आधार से हो रहा है, हरेक अपने आपको देखे जितना साइलेन्स में जाओ उतना यह अनुभव होगा। साइलेन्स माना अनेक बातों का सोचना, बोलना कम होता जाता है तो पीसफुल माइण्ड बन जाता है। शान्ति में रहने के लिए बहुत मेहनत व प्रयत्न नहीं करने पड़ते। निगेटिव, बुरे या व्यर्थ सोचने को समझ से खत्म कर दें तो शान्ति प्रिय बन जाते हैं। शान्ति भी हमको प्यार करती है, वह भी बिचारी हमारे बिगर हैरान हो गई है। संसार में शान्ति के लिए भटक रहे हैं, कान्फ्रेस आदि कर रहे हैं लेकिन जितना करते हैं उत्तना अशान्ति और दुःख का वातावरण बढ़ता ही जा रहा है। हम लोगों ने शान्ति को स्थान दिया है अर्थात् शान्ति को अपना स्व-धर्म बनाया है। कुछ भी हो जाये लेकिन हमारा जो अपना निज़ी स्व-धर्म शान्ति है वह नहीं छोड़ेंगे क्योंकि उसी से ही सारे विश्व में शान्ति स्थापन करेंगे, अशान्ति को खत्म करेंगे।
तो पहले अपने आपको शान्त-चित्त बनायें इसके लिए चित्त के अन्दर पुरानी बातें जो भरी पड़ी हैं उनको मिटायें। जिन बातों ने हमको बार-बार दुःख दिया है, अशान्त किया है- उसको अभी मुझे मिटाना ही नहीं बल्कि खत्म ही कर देना है। ताकि निजी जो मेरा स्वरूप शान्त है मैं वैसा शान्त और प्रेम से रह सकूँ। अगर आत्मा शान्त स्वरूप बनें तो अपने आप अपने लिए बहुत प्रेम पैदा होता है। जो शान्ति में बार-बार खो जाता है, इसका अभ्यास करता है उसके चेहरे से प्रेम और आनन्द का, साथ-साथ शक्तिशाली स्थिति का भी अनुभव होने लगता है। तो भाग्यवान वो जो इस अनुभव को बढ़ाता चले। तो शान्ति क्या बीज़ है इसको हमने अच्छी तरह से न सिर्फ बुद्धि से समझा है, जाना है परन्तु इसका अनुभव समझदार बना रहा है। कभी भी बुद्धि व्यर्थ सोच नहीं सकती। किसलिए सोचे और क्यों सोचे ? दूसरा हम शान्ति के सागर बाप के बच्चे हैं। जब तक हम शिवबाबा तक पहुँचे तब तक ब्रह्मा बाबा हमारे सामने है, इनकी सूरत-मूरत में शान्ति और प्रेम कितना है, कितनी उसकी रूहानी आकर्षण है, दिल कहता है बाबा के पास यूँ ही बैठे रहें। शान्ति और प्रेम से सब सुधबुध भूल जाती है। ऐसे बाबा पर तो बलिहार जाना चाहिए।
बाबा ने कहा- हे आत्मा, तुम्हारा स्व-धर्म शान्त है उसको हमने अपनाया है। तो शान्ति का सागर बाबा जैसा मुझे बनाना चाहता है वैसे मैं अपनी बुद्धि को यूज़ करूं। इसमें सिर्फ होशियारी न हो, बुद्धि में अभिमान का अंश न हो, बाबा कैसे हमारी बुद्धि को सतोगुणी और दिव्य बना रहा है, जिससे बुद्धि में सिवाए बाप के और कोई सोच-विचार हमारी नज़रों में दिखाई नहीं देता है। दिल कुछ और कहती है, बुद्धि कुछ और कह रही है, दिल चाहती है बाबा को याद करें परन्तु बुद्धि भटक रही है। बुद्धि स्थिर नहीं है, एकाग्र नहीं है तो याद नहीं कर सकती है फिर और किसकी याद आ जाती है। फिर कहेंगे क्या करूँ और किसकी याद आ गई इसलिए मुझ में स्थिरता नहीं है।
हम सच्चे बाबा के सच्चे स्नेही होकर रहें तब कहेंगे सच्चे सेवाधारी। बाप से स्नेह है तो न सिर्फ योग है परन्तु सहयोग भी है। हमारी याद है अपने बुद्धि को स्थिर बनाने के लिए, अगर स्थिरता और एकाग्रता बुद्धि में आयी तो एकाग्रता की शक्ति बाबा से मदद खींचने के पात्र बना देती है। बाबा देने वाला सबको देता है परन्तु खींचे कैसे ? तो बार-बार बाबा इशारा करते हैं कि यह बहुत आवश्यक है। अभी तो किसके सामने कोई खास परीक्षायें आयी नहीं हैं, भले कोई कहे हम बहुत परीक्षाओं से पास हुए हैं परन्तु यह तो कुछ नहीं हैं और आने वाली हैं। इसके लिए पहले तो हम एकाग्रता की शक्ति से पीसफुल रहूँ तो साइलेन्स में जा सकूँ। जो बाबा का खज़ाना है उसको अच्छी तरह से खोलकर देख सकूँ। ज्ञान, गुण, शक्तियाँ बहुत हैं वह सदा मेरे काम आ रही हैं, सब यूजफुल हैं। यह सिर्फ चितन-वर्णन करने के लिए नहीं हैं। जितना हमको काम दे रही हैं उतना उसकी वैल्यु बढ़ती जायेगी, जितना इसकी वैल्यु बढ़ती जा रही है उतना सिर्फ शब्दों से नहीं लेकिन अपने वृत्ति और वायुमण्डल से औरों का ध्यान खिचवा सकते हैं। शुद्ध वृत्ति और वायुमण्डल से आत्माओं को जो बल मिलता है, शान्ति या प्यार मिलता है या समझ मिलती है उससे उनको अपने-पन की फीलिंग आती है।
दुनिया की ऐसी अनगिनत आत्मायें हैं जो ऐसा धोखा खा-खा करके दुःखी हुई हैं। सम्बन्ध से, सम्पत्ति से, दुनिया की हालतों से सब एक-दो से धोखे खा करके, धोखे दे करके दुःखी हुए हैं। उन सबका इलाज़ है हमारी साइलेन्स की शक्ति ! इसके लिए सवेरे उठने से रात सोने तक स्वप्नों में भी ध्यान रहे कि मैं कौन हूँ? बाबा कहते बच्चे तुम्हारी देही-अभिमानी स्थिति ऐसी हो जो देह-अभिमान पुर्जा-पुर्जा हो जाए माना खत्म हो जाये। स्थिति की ऊँचाई निचाई का कारण ही है- देह-अभिमान। यह अति सूक्ष्म है।
फिर देह के भान से परे रहने अर्थात् विदेही रहने का नैचुरल अभ्यास हो। जितना हम सेवा के लिये या किसके लिये चिंतन या चिंता करते हैं उतना हम उसे ठीक कर नहीं सकते हैं। अनुभव और विवेक कहता है तुम ऐसी स्थिति में रहो। टॉवर आफ पीस हो करके रहो। टॉवर आफ पीस तो नालेज, पॉवर और प्युरिटी के बिगर तो बन नहीं सकते। सेकेण्ड की बात है। दूसरी बात है- अपने आपको अच्छी तरह से चेक करें, ऊपर से चेक न करें। चेकिंग भी ऐसी गहराई में हो तो पता चले कि मेरे में जरा-सा भी कहीं पर एक छोटा-सा दाग भी दिखाई न पड़े। आइना इतना साफ़ हो। अन्दर में ज़रा भी कोई कमी न रहे यह लगन जिसको होगी वह छोटे-से दाग को भी अपने आप देख सकेगा और उसको भी वह मिटाने का पुरुषार्थ करके साफ़ करेगा।
साफ़ रहने के आदती को अगर कभी कोई दाग नहीं दिखाई पड़े तो उसको बाबा इशारा करेगा अपने को देख, सम्पन्न बनने की इच्छा है तो बाबा हमारी इच्छा पूरी करता है। पहले मेरे को यह इच्छा हो, मुझे यहीं करना है तो उसके लिये पवित्रता और सत्यता का पिण्ड बन जाना होगा। पाँच तत्वों से बने हुए शरीर वाला नहीं, लेकिन इस शरीर में बैठे हुए झूठ, अलाए सब खलास हो जाये फिर अन्दर क्या रहा ? पवित्रता ने सत्यता को अपना लिया, सत्यता ने समझ से प्युरिटी को साथी बना दिया। सत्यता और पवित्रता जैसे यह दो नयन हैं तो काम के हैं।
बाबा कहते बच्चे, अन्धों की लाठी बनो। हमें सिर्फ लाठी पकड़ानी नहीं है परन्तु साथ दे करके जहाँ जा रहे हैं वहाँ तक लेकर भी जाना है। माना नयनहीन को राह ऐसी बताओ जो अपने आप चल पड़े और औरों को भी चलाने लग पड़े।
बाबा ने हमको सिर्फ यह नहीं कहा तुम आ जाओ परमधाम में, वह तुम्हारा घर है। लेकिन बाबा खुद आया है वहाँ ले जाने के लिये, उसके लिए पावन बना रहा है, शिक्षा दे रहा है। सत्यता के मार्ग पर चलना माना श्रीमत पर चलना तो बेड़ा पार हो जायेगा, जिससे असत्यता का अंश मात्र भी न रहे। अन्दर एक बाहर दूसरी है तो वह भगवान की श्रीमत पर नहीं चल सकते हैं और न ही भगवान के दिल पर चढ़ सकते हैं। वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते हैं। बाबा हाथ पकड़ कर कहेगा - चल मेरे साथ.... चंचल बच्चे हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हैं। तो बुद्धि की चंचलता न हो तब बाबा के साथ जाने लायक बन सकते हैं।
बाबा कहता है- मैं जानी-जाननहार नहीं हूँ, परन्तु रोज़ हमारे लिये मुरली ऐसी चलाता है जो हरेक कहते हैं बाबा ने मेरे लिए मुरली चलाई। भगवानुवाच -अर्जुन प्रति, तो एक अर्जुन तो नहीं है ना। मायाजीत सबको बनना है इसलिए तो युद्ध के मैदान में हम सब खड़े हैं। भगवान ने कहा है तुम महारथी हो इसलिये तुम माया से युद्ध करो। अशरीरी होकर देह सहित सब धर्मों को भूल, हर धर्म वाले के लिये ही नहीं, बल्कि हर आत्मा के लिए यह मैसेज है। तो औरों को यह मैसेज देंगे और हमारे लिये क्या मैसेज है? जरा सोचो। हमको बाबा कहता है- देह के साथ सम्बन्ध रखने वाली सब बातों को, संस्कार-स्वभाव सबको त्याग.. हमारी पुरानी आदतें बदल गई, खान-पान बदल गया परन्तु अन्दर से संस्कार में जो रजो-तमो का अंश भरा हुआ है, नेचर में जो कडुवापन भरा है, अपसेट होना... इसको भी त्याग। सत्यता और पवित्रता की शक्ति को महसूस करो। जब तक यह अनुभव न हो तब तक वह नेचर खत्म नहीं होगी। स्वभाव का संस्कार से कनेक्शन है, जो अन्दर संस्कार छिपा हुआ बैठा है, स्वभाव बताता है। जितना संस्कार में अन्दर से परिवर्तन है उतना स्वभाव द्वारा मालूम पड़ता है। स्वभाव माना ही है स्व का भाव, अन्दर का जो भाव है वह बोल से, चेहरे से पता पड जाता है वह छिपता नहीं है। तो हर पल यह ज़रूर सोचना है कि अब क्या करने का है? अभी की जो हमारी घड़ी है, हमारी स्थिति की भी अन्तिम घड़ी है। हर घड़ी को अन्तिम घड़ी समझो तो कोई भी आगे जा सकता है। अन्तिम घडी माना सावधान रहना! व्यर्थ-चिंतन व पर-चिंतन में टाइम नहीं गंवाना। तो जैसे मीठे माँ-बाप ने ऐसी ऐसी बातों से प्रैक्टिकल में पालना देकर इतना मज़बूत बनाया है, जो हमको कमल के फूल की तरह से रहने की अक्ल आ गयी है। पहले तो हम किसी का जरा-सा दुःख सहन नहीं कर सकते थे परन्तु अभी दूसरे का दुःख कैसे दूर करें इसका उपाय सीख गये हैं। अभी हमें बाबा जो कहता है सो करना है। यह तो सहज है, बहुत बड़ी साधना नहीं है लेकिन ऐसी स्थिति हो जैसी बाबा चाहता है। उस स्थिति में स्थित रहने के लिए अन्दर की एक हॉबी हो। और कोई हॉबी तो है नहीं, सेवा की भी हॉबी नहीं है- यह करूँ, वह करूँ...। कुछ भी करना नहीं है।
बाबा ने कहा है- बच्चे, तुम बेहद बाप की बच्ची हो तो जहाँ बाप रहता है वहाँ तुम बाप के साथ रहो। बस। साथ में अनुभव की शक्ति होती है। तो हर सेकेण्ड हर पल यही ख्याल आता है कि मुझे अब क्या करने का है? कल की बात याद नहीं करना है और आने वाली कल की बात, जो होगा सो देखा जायेगा, इसलिए अब जो करना है वह करो।
अभी जो बाबा ने कहा है 'विदेही' रहने का अभ्यास करो, यह भी साधारण बात नहीं है, यह हमारे काम की बात है। तो जो मुख्य काम की बात है वह अभी तक हमने नहीं किया है, तो हम जीवनमुक्ति का सुख पा नहीं सकते हैं। मुक्ति भी नहीं मिल सकती है। जीवन में, कार्य-व्यवहार में रहते न्यारे और प्यारे रहें, सदा फालो फादर करते जो बाप की आश है वह पूरा करें, बाप समान बनें तो बहुत-बहुत भाग्य हमारा लेकिन उनसे अनेकों का भाग्य जग जाये तब कहेंगे बहुत-बहुत-बहुत भाग्यवान हैं क्योंकि ऐसा करने के बाद ही बहुत दुआयें मिलेगी, जिससे फिर वह जीवनमुक्ति का सुख पा सकता है।
हम बाबा को फालो करते रहें, उसके साथ रहें तो संग के रंग में आखिर तो रंग लगेगा ही। अन्न भी खाया, संग भी मिला है, समझानी भी मिली है, शिक्षायें भी मिली हैं, श्रृंगार भी हुआ है। सब कुछ हुआ है फिर भी खुद साक्षात् रूप बनने के लिए और साक्षात्कार कराने के लिए अब पुरुषार्थ को तीव्र करना है। पहले ज्ञानी तू आत्मा बन बाबा के प्रिय बनें फिर योग ऐसा हो जो कितना भी आँधी-तूफान आये, हिलें नहीं। और सब बातों को समेटने के साथ, समाने की भी शक्ति हो तो स्मृति स्वरूप बनने में मदद करती है। अगर विस्तार में जाते हैं तो स्मृति में रह नहीं सकते हैं। विस्तार वाले संकल्प व बोल हमको नष्टोमोहा, स्मृतिर्लब्धा स्थिति का अनुभव करने नहीं देंगे।
छोटे हैं तो सहनशक्ति चाहिए, छोटी-छोटी बातों में अपसेट होने की ज़रूरत क्या है? एक सहनशक्ति का गुण न होने के कारण कभी कैसा, कभी कैसा...। सहनशीलता सयाना बना देती है, कोई पूछेंगे कुछ हुआ क्या? नहीं। अगर हुआ भी होगा तो कहेगा कोई बड़ी बात नहीं। न चेहरे ने बताया, न मुख ने वर्णन किया तो यह अक्लमंद हुआ ना। कोई ऐसे हैं जब तक किसी को वह पूरी बात बता न देवें तब तक उसको आराम नहीं आयेगा, नहीं सुनेंगे तो कहेंगे तुम सुनने नहीं चाहती हो। अब वह ज़माना पूरा हो गया अब जितना सोचना, बोलना कम करते जायें उतना उन्नति है। और हमारी उन्नति को देख दूसरों के अन्दर भी इच्छा उत्पन्न होगी कि मैं भी ऐसी उन्नति करूँ। तो सहनशीलता डीप पुरुषार्थ करने में सयाना बना देती है। सहनशीलता कभी भूल से उदास होने नहीं देगी। अगर उस पर हमने विजय पहनी तो समझो अभी उन्नति का मार्ग हमारा आगे बढ़ा। परन्तु आगे बढ़ने वालों के सामने बैरियर भी आयेंगे। ऐसे समय पर चुप होके साइलेन्स में खड़े हो जायें तो आपे ही वह चला जायेगा और तुम्हारा रास्ता क्लीयर हो जायेगा। कोई सोचे हमको ही घड़ी घड़ी बैरियर क्यों आता है? यह तो आयेगा। तुम साइलेन्स हो जाओ, तुम साफ़ सच्ची हो तो आपेही रास्ता क्लीयर हो जायेगा। उसको कोई हटाने जावे तो हटेगा ही नहीं। हमको रुका हुआ देख दूसरे कहेंगे कि यह तो मेरे सामने दीवार बनके खड़ी हो गई है। तो जम्प लगाने की मना कौन करता है। अगर सच्चाई है तो अपने आप साइलेन्स से हमारा वह रास्ता खुला हो जायेगा। हमारा टाइम वेस्ट नहीं जायेगा। अगर हमारी दिल साफ, सच्ची है तो कैसी भी और किस प्रकार की भी बातें आयेंगी, पहाड़ जितनी भी आयें तो उसमें हैरान नहीं होंगे। इसमें जम्प लगाने की हिम्मत चाहिए। अगर कोई ऐसी बातों को ही देखकर घबराने-डरने वाला है तो वह बाबा के पास कैसे पहुँचेगा? तो अन्दर मूँझने, घबराने और डरने का ज़रा भी संस्कार है तो जितनी रुकावटें आयेंगी उतना ही वह वहाँ ही रुकता रहेगा।
तो पहाड़ जितनी बात उनके पास आती है जो राई को पहाड़ बनाने वाले हैं। जो पहाड़ को राई बनाने वाले हैं उनके सामने कैसी भी छोटी-बड़ी बात आवे लेकिन उसको ऊपर उड़ने में या आगे जाने में कोई देरी नहीं लगती है। किसी को नीचे ऊपर देख मैं क्यों रुक जाऊँ, मुझे टाइम पर पहुँचना है। तो जिसको टाइम का कदर है उसके आगे कोई बात नहीं आ सकती है। मेरे हाथ से यह समय अगर गया, मेरे पुरुषार्थ की जो स्पीड है वह एक बारी स्लो हुई या कुछ हुआ तो फिर से मेरे से मेहनत नहीं होगी। तो मेहनत को बढ़ाके फिर अपने को हैरान करना.. मुझे यह नहीं करना है। बाबा आगे-आगे भागते-भागते कहाँ तक पहुँच गया, हम पीछे रह जायेंगे तो हमारा क्या हाल होगा? न भगवान साथी रहेगा न परिवार साथी रहेगा। न परिवार मदद करेगा, न बाबा करेगा तो फिर हम कहाँ जायेंगे? फिर हमारा कौन रहेगा? यह सब साथ अभी दे रहे हैं, परिवार प्यार तभी दे रहा है जब कुछ चलने का अक्ल है। अगर इधर उधर रुकती भटकती तो कोई पूछता भी नहीं था। ईश्वरीय परिवार में रहते ठीक तरह से चलना है। योगी भी रहना है, सर्व के साथ सच्चा सहयोगी भी रहना है। सेवा में कोई कामना नहीं है, शुभ भावना की कोई अन्त नहीं है। बाबा का भण्डारा सदा भरपूर है।
अविनाशी ज्ञान का थोड़ा भी विनाश नहीं होता, जिसमें यह ज्ञान का कणा-दाना पड़ा है, वह कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं काम में आयेगा। तो हमें अपने सोचने का तरीका ऐसा स्वीट और सरल बना देना वाहिए, जैसे बाबा ने पलकों पर बिठा करके हमारी पालना की है, ऐसे पलकों पर बिठा करके इतनी मंज़िल पार कराया है, पार ले जायेगा। सच से बेड़ा पार है। बाबा प्रालब्ध हमारे हाथों में दे रहा है। हमको कहता है - तुम सिर्फ सच्चे रहो, सयाने रहो, एक-एक श्वाँस, संकल्प को सेवा में सफल करते चलो।

बाबा ने जो सुनाया है उसे जीवन में लाने की हॉबी हो तो समझदार और सयाने बन जायेंगे

बाबा को याद करने की होंबी है तो अच्छा है। हमें जो ऊपर से मिल रहा है वह औरों को अपने आप पहुँच रहा है। हमारी जो भावना है अभी वह सूक्ष्म होती जा रही है और सच्चाई बढ़ती जा रही है। यही दो चीजें सूक्ष्म भावना और सच्चाई काम कर रही है। तो सच्चे बनने की हॉबी और सच्चे बाबा के साथ सच्चा सम्बन्ध रखने की, साथ-साथ औरों को भी ऐसा आप समान बनाने की हॉबी रखना बहुत अच्छी चीज़ है। हॉबी शब्द इसलिए यूज़ करते हैं जैसे कोई चीज़ पाने की इच्छा होती है तो और सब बातों की सुधबुध भूल जाती है। उस समय यही लक्ष्य रहता है कि यही मुझे करना है।
जो बात बाबा ने कही, बस! वही बुद्धि में है। अभी यह हो जाये, यह अन्दर से संकल्प होने से वह हो जाता है। और यह भी सूक्ष्म प्यार है जो बाबा ने कहा - वह अभी मैं कर दूँ। यही मुझे करना है यह संकल्प है तो उसमें यह ख्याल कभी नहीं आयेगा कि मैं यह चाहती हूँ लेकिन पता नहीं क्यों नहीं कर पाती हूँ? तो यह जो क्यों नहीं कर पाती हूँ, माना मेरे पुरुषार्थ में या लगन में कुछ कमी है तभी कर नहीं पाती हूँ या प्रत्यक्ष करने या सबूत देने का कोई लक्ष्य नहीं रखा है। अपने से भी सबूत न दिखाई देने का मुख्य कारण क्या है? इसका कारण न सोच करके निवारण का सोचें। कारण कैसा भी हो, कितना भी बड़ा हो वह मुझे रोक नहीं सकता है। इसलिए कारण खत्म करके हमको जो करना है सो करना है, वह भी अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे ? अब करना है, मुझे करना है और बाबा ने जो कहा वहीं करना है, बस! फिर देखो जो बाबा ने कहा सो होना है ज़रूर।
बाबा ने जो समझ दी है उसी अनुसार सोचो। ड्रामा अनुसार मुझे ही करना है क्योंकि मेरा ही ऐसा पार्ट है। इसलिए मैं और किसी को न देख खुद को देखें...। तो टाइम कहता है- तू अब कर। सामने से सर्वशक्तिवान बाबा कहता है - मैं शक्तिवान सम्मुख हूँ तो तुम सिर्फ करने का संकल्प करो क्योंकि कराने वाला मैं हूँ, तू कुछ न कर। कहना भी शब्दों में नहीं होता है, बाबा को जो कहना होता है वह सब मुरली में कह देता है, वह सुनते ही करने की शक्ति आ गई। इन्सान की आत्मा अगर शक्तिहीन बनती है तो भी एक सेकण्ड में और शक्तिशाली बनी है तो भी सेकण्ड में सिर्फ आवाज़ के आधार से। एक आवाज़ शक्तिहीन बनायेगा, दूसरा आवाज़ शक्तिशाली बनायेगा, इतना इन्सान की नेचर सेन्सीटिव होती है सिर्फ सेकण्ड की बात होती है। इसलिए जो बात अच्छी नहीं लगती है उसको एक कान से सुनो दूसरे से निकाल दो। इतना ही नहीं बल्कि जहाँ से सुना वहाँ से ही निकाल दो, नहीं तो सुनो ही नहीं।
हमारी बुद्धि में बहुत अच्छी बातें ढेर सारी हैं क्योंकि इतनी सारी अच्छी बातें सुनी हुई हैं, जिसको सोचते ही हम नाच सकते हैं। तो अभी ऐसी बात सुनें ही क्यों जो आँखें गीली हो जायें, इसमें कितनी एनर्जी फालतू खर्च होती है। झूठ है, सच है इसे सिद्ध करना, फलाना करना... कितना दिमाग को बेमतलब का दर्द। इस प्रकार से यह सारा सोच शक्तिहीन बना देता है तो अपनी सम्भाल करनी है। जो बाबा ने सुनाया है उस पर सोचो, उस पर अमल करो। यह हॉबी ज़रूर डालनी चाहिए कि बाबा से सुनना है, वही सोचना है, उस पर चलना है। औरों की भी कोई अच्छी बात है तो भले सुन लो, वह भी कभी-कभी मदद करती है। किसी ने किसी भाव से भी कहा, मैंने उसका भाव अच्छा ले लिया तो मेरा भला ही हो गया क्योंकि कई बार यह भी देखा जाता है कि अच्छी भावना वाली बात में भी अपने भाव मिक्स करके उसका फायदा नहीं उठाते हैं। तो यह भी हॉबी हो कि कोई खराब, एकदम निकम्मी बात हो तो भी उसका भाव चेन्ज करके उसको काम वाली बना दो। और जो काम वाली बात है उसको कभी निकम्मा नहीं बनाना।
अच्छे के साथ अच्छा रहना बहुत आसान है और जो अच्छा नहीं है, उससे अच्छा रहना- यह भी कमाल की बात हो जायेगी। तो हर बात में सयाना बनना चाहिए। अभी यह भी एक हॉबी होनी चाहिए सयाना कैसे बनें ? बाबा से जो सुना, जो समझा है वह जीवन में आया फिर मुख से ऐसा बोल निकला तो सयाना बना ना। वह तो स्टडी करके, ट्रेनिंग ले करके टीचर बन सकते हैं। और हमारी तो स्टडी और कमाई दोनों साथ-साथ चल रही हैं। तो यह पढ़ाई ऐसी है, हमको कितना रिच (धनवान) बना देती है। तो इस पढ़ाई में हमको सदा कमाई महसूस होनी चाहिए। सिर्फ पढ़ते रहेंगे तो शक्ल छोटी होती रहेगी, परन्तु साथ-साथ कमाई करते रहेंगे तो शक्ल में चमक आयेगी। मास्टर सर्वशक्तिवान, मालिक बन एक सेकण्ड में 'स्वदर्शन-चक्र' फिराओ तो उसी घड़ी चेहरे में चमक आयेगी। बाबा की याद है तो घर भी याद आ जाता है। तो जिसको अभ्यास करने का ढंग आता है, उसको यह हॉबी होती है कि अच्छा अर्थात् यथार्थ और जल्दी-जल्दी पुरुषार्थ करके सबसे पहले नम्बरवन में जायें। इससे अपने आप पर-दर्शन, पर-चिन्तन से एकदम हम फ्री हो जाते हैं। इतनी सहज युक्तियाँ होते हुए भी आगे बढ़ने के मार्ग को स्वयं ही हम डिफीकल्ट क्यों बनाते हैं?
हम यह भी जानते हैं कि हमारा यह मार्ग तो सहज है परन्तु उनको डिफीकल्ट बनाने की भी हॉबी हो गई है। छोटी बात को बहुत मुश्किल बना देते हैं, परन्तु बड़ी बात क्या है? बाबा ने तो हमको पंख दे दिया है ऊपर उड़ने के लिए। जब पंख मिले हैं तो बन्धन टूट गये हैं और देह से न्यारे हो करके ऊपर चले जाते हैं। आत्मा को ऊपर उड़ने में देरी थोड़े ही लगती है क्योंकि हम एक सेकेण्ड में त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बन सकते हैं। इतना बाबा ने सब कुछ दे दिया है तो हमारे लिए क्या बड़ी बात है! इसमें सिर्फ अपने सोचने के तरीके को रिफाइन बनाओ, इसके लिए फिर बुद्धि महीन चाहिए। मोटी बुद्धि से महीन बुद्धि कैसे बनेगी ? मोटी बुद्धि वाले चिन्ता और फ़िकर बहुत करते हैं। इतना ही नहीं लेकिन कभी-कभी बदला लेने का खराब ख्याल भी आ जाता है, सहनशक्ति नहीं है तो बहुत फीलिंग में रहते हैं। ज्ञान का मंथन करने की ताकत नहीं है, समझ नहीं है तो क्या करें, कैसे करें के विचारों की हेराफेरी में तंग, परेशान होते रहेंगे।
तो इतनी समझ चाहिए हर काम करने के लिए, सम्बन्ध में रहो तो भी समझ से, कर्म में रहो तो भी समझ से, योग में रहो तो भी समझ से...। तो सब बातों में 'समझ' चाहिए तब समझदार बनते-बनते सयाने बन जाते हैं। पहले समझदारी से काम करने का अक्ल आता है, वैसे भी कहा जाता है- कोई जन्म से सीख करके नहीं आता है लेकिन सीखते-सीखते समझदार हो जाता है।
प्रश्न - बाबा की पर्सनैलिटी में आपने विशेष क्या देखा? आपका पर्सनल अनुभव क्या है?
उत्तर- जिसके लिए जितना प्यार होता है उतना वह उसके लिए सारा दिन सोचता रहता है। तो जितना बाबा से हमारा गहरा सम्बन्ध होगा उतना हमारे लिए बहुत अच्छा है। ब्रह्मा बाबा की पर्सनैलिटी, चाहे परमात्मा की पर्सनैलिटी संसार की हर आत्मा से भिन्न और देवताओं से न्यारी है।
बाबा की पर्सनैलिटी में नम्रता और सत्यता की आकर्षण इतनी जो ईश्वरीय आकर्षण का अनुभव कराने वाली थी। सत्यता और नम्रता ने ईश्वरीय शक्ति को खींच लिया। ब्रह्मा बाबा ने भी सत्यता से नारायण पद पाया है इसलिए कहा जाता है - 'सत्यनारायण की कथा।' और लोग तो यह कथा सिर्फ सुनकर ही खुश हो जाते परन्तु यह हमने प्रैक्टिकल देखा है। सचमुच ब्रह्मा बाबा की पर्सनैलिटी में हमने इतनी सत्यता देखी है। सत्यता ने नारायण पद फिक्स कर दिया, राजाओं का राजा सत्यता से बना और नम्रता से सबको अपने राज्य में भी लाया है। सब कुछ करते, कराते हुए न्यारा बनना सिखलाया है। हमने कभी ब्रह्मा बाबा के चेहरे से नहीं देखा कि यह मैंने किया, मैं करता हूँ...। इस प्रकार से जिसको ख्याल आते हैं, वह कुछ नहीं कर सकता है। वह भगवान का काम नहीं करता है अपना भल करे, भगवान का काम करने के लिए ब्रह्या बाबा की पर्सनैलिटी बताती है, वह देखकर अपने में भी वह पर्सनैलिटी लाना होगा अर्थात् धारण करना होगा। सीखने की भावना हो तो वह देखेंगे, साथ में वह धारण भी करने लगेंगे।

विदेही बनना है तो पर-चिंतन, पर-दर्शन, पर-मत से मुक्त रह परोपकारी बनो

साक्षी होकर देखो तो बाबा की मुरली में हर रोज़ विदेही बनने की अच्छी-अच्छी बातें मिलती ही रहती हैं। जब यह देह भी मेरी नहीं है तो हम बेगर हो गये। सर्विस भी खूब करो फिर देह को भूलो, दुनिया को भूलो तो अवस्था परिपक्व बन जायेगी। जो भी बातें सामने आती हैं उनको साइड सीन समझो तो देह से न्यारे हो जायेंगे। इस पुरानी देह में रहते हमें मृत्युलोक से अमरलोक जाना है, यहाँ का हिसाब-किताब चुक्तू करना है। अभी हिसाब-किताब चुक्तू नहीं करेंगे तो वह खींचेंगा फिर विदेही बन नहीं सकेंगे।
तो हमारा योग इतना पावरफुल हो जो पुराना सारा भस्म होता जाये, राख को भी दरिया में डाल दो, इतना पुराने कर्मों के हिसाब-किताब को भस्म करना है। आत्मा ने इस पुराने शरीर द्वारा पता नहीं कितने पाप कर्म किये हुए हैं, शरीर छूटने के बाद, शरीर को भस्म करने से संस्कार तो भस्म नहीं होंगे। संस्कार आत्मा ले जायेगी। हमारे संस्कारों में जो आसुरी-पन भरा हुआ है, उसका सारा रूप रंग ही चेन्ज कर लेना है अर्थात् उन आसुरी संस्कारों को भी एकदम भस्म करना है जिससे आत्मा इतनी शुद्ध हो जाये। हम ईश्वरीय सन्तान हैं तो ईश्वरीय संस्कार कितने शुद्ध होने चाहिए। वह होंगे योगबल से। जिसके साथ योग होता है उन जैसे संस्कार होते हैं। पहले जिनके साथ सम्बन्ध थे, जैसे कर्म थे उनसे ऐसे आसुरी संस्कार बने थे। सतयुग से लेकर सम्बन्ध में आये, बन्धन में आये। अनेक जन्मों से जो विकारी कर्मबन्धनों में आये, उससे संस्कारों में अशुद्धि आ गई, पाप कर्मों के कारण कलियुगी किचड़े वाले नर्कवासी संस्कार पक्के बन गये, अब वह सारा किचड़ा जल जाये और सतयुगी पावन संस्कार बन जायें, उसके लिए इस देह को भूलने का अभ्यास हो, यह देह जैसे है ही नहीं।
जैसे बाप के संस्कार हैं वैसे हमारे बन जायें। इसके लिए दिन रात आत्मा इस देह, दुनिया को देखते हुए न देखे। निमित्त पार्ट बजा रहे हैं सेवा अर्थ, यह आत्मा में समझ है। जैसे मेरा बाबा बेहद का बाबा सदा सेवा में हाज़िर है। अभी हमारे सामने ब्रह्मा बाबा और शिवबाबा दोनों प्रत्यक्ष हैं। इन दोनों ने अपना बना करके हमको भाग्यशाली बना दिया। तो अनुभव कहता है ऐसे-ऐसे बातों के सिमरण की शक्ति 'विदेही' बनाती है।
जिनके दर्शन मात्र से भगत समझते हैं बस! हमें भगवान मिल गया, कितना उनके नयनों में नशा और खुशी दिखाई देती है और अभी वह हमारे सामने प्रत्यक्ष है, फिर बाबा कहता है- बच्चे, जितना जब जब तुम याद करेंगे जैसे ही याद करेंगे, मैं तुम्हारे सामने साकार में साथी के रूप में प्रत्यक्ष हो जाऊँगा। तो वह साथ का अनुभव देह भुला देता है क्योंकि निराकार साकार में प्रवेश हो करके हमें समझानी के साथ ताकत भी देते तो मदद भी देते रहते हैं, जिससे विदेही बनने का पुरुषार्थ सहज और सरल होता जाता है।
जितनी आत्मा अन्दर शुद्ध, शान्त होती जायेगी उतनी वह शीतल रहेगी। बाबा की वाणी इतनी मधुर है जो अन्दर ही अन्दर हमको मीठा बनाती है परन्तु मिठास तभी आती है जब पहले शुद्ध है, शान्त है, शीतल है। सिर्फ ऊपर ऊपर से मीठा बोलने से समझा जाता है यह तो इसकी चतुराई है। पता नहीं अन्दर कैसा है? बोलने में तो लगता है ठीक है लेकिन अन्दर कैसा है? तो अन्दर की इतनी सफाई चाहिए। इसके लिए तीन पर काट लो 1. पर-चिंतन 2. पर-दर्शन 3. पर-मत। यह तीनों ही विदेही बनने नहीं देंगे। हम अपना शत्रु बनते हैं पर-चिंतन और पर-दर्शन करने से और पर-मत के प्रभाव में आने से। फिर श्रीमत पर चल नहीं सकते हैं। इसलिए इन तीन "पर" को छोड़ो तो परोपकारी बनेंगे। यह तीन पर हमारे बहुत वैरी हैं। इसका रूप बड़ा अच्छा मीठा होता है, लेकिन अच्छी तरह से इसके गहराई में जायेंगे तो पता पड़ेगा कि यह कितना नुकसानकारक है। उसको छोड़ अभी हम साइलेन्स में बैठ अशरीरी बनने का पुरुषार्थ करने लग जाये। अभी सेवा भी ऐसी हो गई है जैसे पर-चिंतन क्योंकि आजकल सेवाओं में भेंट बहुत चलती है! अरे, बाबा बेहद है, बाबा की सर्विस है यह मुश्किल ही किसको याद आता है। आत्मायें बाबा के घर पर आ जाएँ, बाबा के बन जाएं यह लक्ष्य ही भूल जाता है। तो सेवा भी एक प्रकार से पर-चिंतन का साधन बन जाती है। सेवा का लक्ष्य क्या है? कोई भी आत्मा को बाबा का परिचय दें, बस। आत्मा बाप को भूली हुई है इसलिए भटकी हुई है, तो अभी उस भटकने से छूट जाये और पहचान ले कि मुझ आत्मा का बाप परमात्मा है, यही तो मुख्य सेवा है। -
सेवा से सुख ज़रूर मिलता है, दान करने से बढ़ता है। बाबा ने दिया है, मंगता से दाता बनाया है, तो दूसरों को देना फर्ज बनता है। तो सच्चाई सेवा कराती है। सच्चाई से योग लग जाता है। याद की गुप्त मेहनत लगातार करते रहें, इसके लिए अटेन्शन व हॉबी हो। तो इन तीन "पर" की बातों से आजाद हो जाएँ तो उड़ने के लिए पंख मिल जायेंगे। सेवा में उमंग-उत्साह कभी कम नहीं होगा। राइट टाइम पर जो हमारे योग्य सेवा होगी उसमें हाज़िर हो जायेंगे या सेवा हाज़िर हो जायेगी। इसके लिए सेवा का भी कोई चिंतन नहीं है और हमारे से कुछ मिसिंग भी महसूस नहीं होगी।
हम इस समय यज्ञ का अन्न खा रहे हैं, पेट में जा रहा है। यज्ञ का एक-एक दाना बहुत मूल्यवान है। दिन भर में कितना खाते रहते हैं, जो यज्ञ का खाते हैं, उसमें जिन्होंने यज्ञ की सेवा की, भण्डारी में डाला उनको तो फल मिला, जिन्होंने बनाया उन्होंने भी मेहनत करके अच्छी तरह से अपना भाग्य बनाया। खिलाने वाले ने भी खिलाया लेकिन मैंने खाया, परन्तु क्या सेवा दी? सिर्फ खाया या सेवा भी की ? जो भेंट करते हैं कि इनको ऐसा है, मेरे को ऐसा है तो वह कभी तृप्त आत्मा नहीं बन सकेंगे। विदेही बनने के पहले हमें तृप्त रहना है। तो स्थूल पदार्थों आदि में कोई आसक्ति न हो और किसके भी अधीन न हो। यह नहीं होगा या नहीं मिलेगा तो क्या होगा ? कोई व्यक्ति का सहारा लेना, यह भी देह में बुद्धि गई तो अन्त मति सो गति क्या होगी! विदेही बनने के लिए नष्टोमोहा भी हो, अनासक्त वृत्ति भी हो। इसका फल यह है।
देह अनेक प्रकार की इच्छाओं को पैदा करती है, बहाना होता है और भी कहेंगे- हाँ, बरोबर करना चाहिए, करना चाहिए यह अन्दर से मान रहे हैं, लेकिन यह सब करते हुए भी अन्दर से मुझे घर जाना है उसकी तैयारी करनी है। जितना हम घर के नजदीक पहुँचेगे उतना आत्माओं को खींच होगी। अभी अपने को समझ रहे हैं और बाबा का बनकर रहने वालों को भी देख रहे हैं। सारे विश्व भर में सेवायें ड्रामा प्लैन अनुसार चल रही हैं। यह करन-करावनहार की कमाल है। कराने वाला वही है, न सिर्फ हम भक्ति की तरह से कहते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल कराने वाला वही है। किसी-न-किसी को निमित्त बना देता है। सबको प्यार से सुनाते चलो तो दो से दस हो जायेंगे। और सेवा क्या है? जो अन्दर है वह मुख पर है,वहीं चेहरे पर है। चिंतन या चिंता करने की क्या ज़रूरत है, परन्तु ईर्ष्या - चिंतन कराती है।
अगर किसी को नम्बरवार में आना है तो ईर्ष्या भले करे और जिन्हें नम्बरवन में आना है तो इतनी अंशमात्र भी, एक प्रतिशत भी ईर्ष्या न करे, बिल्कुल खत्म हो जाये। ईर्ष्या अपने को अन्दर से असन्तुष्ट बनायेगी, सेवा में ऊपर की सफलता होगी, अन्दर की नहीं होगी। कभी कोई टेस्ट आयेगी तो जरूर दुःख, अशान्ति महसूस करायेगी। ईर्ष्या अशरीरी बनने नहीं देती, न हम किसी को अशरीरी बनने में मदद कर सकते हैं। भले मुख से दस बारी या हजार बारी बोलें कि तुम आत्मा हो, परमात्मा की सन्तान हो, पोपट की तरह रट लगाते रहो तो भी वाणी से परे जाने का अनुभव नहीं होगा। इसलिए बाबा हमेशा कहते कि सेवा में योग है तो सफलता है। बाबा को याद करने के लिए देह को भूलें, इस दुनिया को भूलें, इन सब बातों को भूलें, अपने पुराने संस्कारों को अन्दर से मारकूट करके शुद्ध शान्त बनायें तो बाबा की याद का बल आयेगा। और इस बल से एक तो विकर्म विनाश हो रहे हैं, दिखाई पड़ रहा है। दूसरा अभी भी किसके साथ हिसाब-किताब नहीं है। कोई हिसाब-किताब है तो उसे चुक्तू करो, कोई नया हिसाब-किताब नहीं बनाओ। सेवा के निमित्त भी हिसाब-किताब पैदा न करें। इतना ध्यान रखो कि कोई भी व्यक्ति वा वैभव हमको अशरीरी बनने में विघ्न न डाले। बाबा की याद में सामने कोई चीज़ याद न आ जायें। जब तक ऐसे ईश्वरीय सन्तान के संस्कार हमारे नहीं बने हैं तब तक हम ईश्वरीय सेवा पर हैं यह भान अच्छी तरह से नहीं आयेगा, वह नशा नहीं रहेगा। जिससे दूसरी आत्मा के भी दुःख-दर्द भूल जायें। ऐसी हमारी स्थिति हो, किसके भी सामने जायें तो उन्हें अनुभव हो कि यह फ़रिश्ते मेरे सामने आये हैं। आज इन्सानों की हालत ऐसी है जो कुछ, समझ काम नहीं करती है। ऐसे वायुमण्डल में अशरीरी स्थिति बनाने का ध्यान रहे, इस शरीर में यह आत्मा है, इसको भी पावन बनाना है, तत्वों को भी पावन बनाना है। जो सतयुग की दुनिया में हम आने वाले हैं, वहाँ राज्य करने वाले हैं या राज्य में आने वाले है, उन तत्वों को भी अभी सेवा करनी है।
हमारी ड्यूटी क्या है? न सिर्फ बुद्धि की भाग-दौड़, बुद्धि की भाग-दौड़ सेवा नहीं कराती है। बुद्धि को जितना शुद्ध-शान्त रखो, अशरीरी बनो तो जहाँ भी कदम है वहाँ कमाई-ही-कमाई है। एक काम में दस काम होंगे, यह सेवा में वरदान है कि बच्चे - तुम बच्चों के एक-एक कदम में अनेकों की सेवा होगी। तो एक तरफ जितना अशरीरी बनने का अभ्यास करते रहेंगे, उतना बाबा हमको खींचेगा, आसान हो जायेगा। जरासा देह-अभिमान, देह के भान में भी आ गये तो बाबा कैसे खीचेंगा, अनुभव कैसे होगा ? क्योंकि हम अगर विदेही बनते हैं तो इस देह से ही तो विदेही बनते हैं। वह सदा विदेही सो विजयी हैं। वह हमको विदेही बनाने का अनुभव कराता है, हम सिर्फ देह से न्यारे हुए तो विदेही नहीं बनेंगे। देह से न्यारे के साथ-साथ इतने अच्छे और शुद्ध संस्कार आत्मा में भरने हैं, उसके लिए योगबल चाहिए। तो आत्मा जो सदा अनेक जन्मों से देह के बन्धन में फसी हुई है उससे मुक्त हो जायें। जैसे ब्रह्मा बाबा देह में होते हुए कभी यह नहीं लगा कि यह बाबा कोई देह में है। अव्यक्त, निराकारी, फरिश्ते स्थिति का अनुभव कराया। बाजू में बैठो तो करेन्ट आयेगा, अशरीरी हो जायेंगे, दिल नहीं करेगा वहाँ से उठे। ऐसे बाबा के पास बैठ जाओ तो बाबा आपेही सेवा करायेगा।
जो बाबा ने हमको सुख दिया है वह भी ले लिया तो अपने आप सेवा होती रहेगी। तो अपने आपसे पूछे कि सेवा क्या है? सच्चा सेवाधारी किसी से रीस नहीं करता। सच्ची सेवा वह है जिससे दूसरों को फायदा हो। हमारी सेवा से दूसरों को फायदा मिलें, उनके अन्दर से दुआयें निकलें। इसके लिये प्रवृत्ति में रहते सम्पूर्ण पवित्र रहें। प्रवृत्ति को भी पवित्र बनाने वाले, न कि छोड़ने वाले। तो एक तो पवित्रता की शक्ति, दूसरा है जंक उतरी हुई सुई को चुम्बक खींच रहा है। तो जैसे बाबा ने हम आत्माओं को जीयदान दिया है वैसे हम भी अनेकों को जीयदान देने के निमित्त बनें। सिर्फ थोड़ा भी किसी का केयर करो, ख्याल रखो तो दुआ मिल जाती है। थोड़ा अनुभव का शेयर करो तो बड़ी अच्छी कमाई होगी। तो सेवा क्या है? केयरलेस नहीं होना है। ईश्वरीय स्नेह से एक दो की केयर करना है और जो बाबा ने दिया है, उसका शेयर करना है। तो इस प्रकार से हर श्वांस, संकल्प सफल करते चलो तो विदेही बनना सहज हो जायेगा। कर्त्तापन से परे रहो तो देह भान नहीं है। मैंने किया.. यह गिनती किया तो भान है, अभिमान है। मुझे करना है तो भारीपन आयेगा इसलिए बाबा कहते हैं करते हुए भी तुम डबल-ट्रिबल लाइट बनो। लाइट हाउस का काम करो। तो याद से मुक्ति है, सेवा से जीवनमुक्ति है। याद के बिना कोई ना कोई बन्धन आ जायेगा, वही नीचे उतारेगा, खींचेगा, हलचल में ले आयेगा और बाबा की याद से सब सहज हो जाता है।

अन्तर्मुखी बन जाओ तो आठों ही शक्तियाँ सखी के रूप में साथी और सहयोगी बन जायेंगी

मन को वश करने का मन-वशीकरण मन्त्र है ही मुख से और मन से चुप रहना। जो मन का मौन व्रत धारण कर लेते हैं वह बहुत कमाई जमा करते हैं। व्यर्थ बहुत गोरखधन्धे बढ़ाता है, इससे घाटा पड़ता रहेगा। सबसे अच्छा धन्धा है - सत्यनारायण की कथा सुनना, उसी पर ही सोचना, उसी पर ही बोलना, उसी वातावरण में रहना।
बाबा कितना नशा चढ़ाते हैं। एक तरफ़ हम गोप-गोपियाँ है तो गोप-गोपियों को नशा चढ़ा हुआ है, गोपियाँ मुरली के पीछे मस्तानी हुई हैं, जिससे सब सुधबुध ऐसी भूल जाती जो मोह क्या चीज़ है, पता ही नहीं रहता। ज़रा-सा मोह नारायणी नशा चढ़ने नहीं देगा, गोप-गोपियों का अनुभव नहीं करने देगा। अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करना तो दूर की बात रही, परन्तु उस सुख का वर्णन करना भी उसको मुश्किल लगेगा। अगर वह बतायेगा भी तो किसी को अनुभव नहीं करा पायेगा। बतायेगा, यह पढ़ाई भगवान पढ़ाता है, उनके द्वारा पढ़ते हैं तो इतना ज़रूर कहेगा कि शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा पढ़ाते हैं। परन्तु यह पढ़ाई है ही 'नष्टोमोहा' बनने के लिए। जैसा बीज बोयेंगे, वैसा फल खायेंगे। पढ़ाई शुरू यहाँ से हुई जिससे समझ आई है कि मैं पाण्डव हूँ, तो मेरी निश्चय के आधार से प्रीत बुद्धि अटूट रही। किसी भी हालत में कुछ भी हो जाये, कमाल देखी है कि निश्चय से प्रीत बुद्धि हैं। जब बाबा ने कहा है कि मरना तेरी गली में... गली में मरे या गले में मरे? सारा दिन बाबा के गले का हार बनने के लिए बलिहार बन गये हैं, तो उनमें मोह कहाँ से आ गया ? मोह की गहराई में जायें तो पता चलता है कि भगवान का अन्त पाना तो सहज हो गया लेकिन कईयों को मोह का अन्त पाना मुश्किल हो गया है। मोह का अन्त करना मुश्किल हो गया है।
हरेक विचार करे - कहाँ भी मेरी मोह की रग है तो बुद्धि की लाइन बाबा से क्लीयर हो नहीं सकती है। जिनके साथ मोह होगा उनका ज़रा-सा दुःख भी सहन नहीं कर सकेंगे और जिनके साथ प्यार नहीं होगा उनको अन्दर से स्नेह देना मुश्किल लगेगा, स्नेह से व्यवहार रखना मुश्किल लगेगा। मोह हम आत्माओं को परमात्मा के आगे समर्पण होने नहीं देगा। वर्सा लेने से वंचित करेगा। काम को भी छोड़ा, समझा महान शत्रु है यह योगी बनने नहीं देगा। विष और अमृत इकट्ठा रह नहीं सकेंगे तो उस समझ से वह छोड़ा। ब्राह्मण बनना स्वीकार किया परन्तु बलिहार जाना - यह कहाँ तक स्वीकार किया है? क्योंकि कामेषु सो क्रोधेषु है। काम विकार को मार माना इस शत्रु को मार फिर अंशमात्र क्रोध भी योगी को मीठा बोलने नहीं देता है। जड़ तो अधिमान ही है। क्रोध सुख-चैन से रहने नहीं देता है। जब गुस्सा आयेगा तो आँख या हाथ भल नहीं चलाया लेकिन मुख तो चलाया, नाराज़गी या रोब से चलाया... किस तरह से भी चलाया, एक बारी हुआ तो सम्बन्ध ठीक नहीं रहेगा। फिर न खुद रूहानी राहत में रह सकते हैं, न दूसरों को रहने में मदद कर सकते हैं इसलिए क्रोध को अन्दर से, महसूसता की शक्ति से समझ करके छोड़ना ही सच्ची समझदारी है। तो अपने को शीतल और मीठा बनायें। सच्चा योगी बनने के लिए अपनी सूरत और मूरत ऐसी बनावें जो बाबा से मिलने की दिल में सदा के लिए छाप लगी रहे।
लोभी की बुद्धि भी ज़रूर चंचल रहेगी, चाहिए, चाहिए छूटेगा नहीं... रॉयल रूप का भी चाहिए जो है, हम उसको लोभ मानते हैं। यह चाहिए, चाहिए-चाहिए, सेवा के लिए यह सैलवेशन चाहिए। वह नहीं मिला तो बड़ों के साथ या साथियों के साथ अच्छा सम्बन्ध नहीं रहेगा क्योंकि मेरी बात को माना नहीं जाता है- यह सब है- अभिमान की जड़।
अनासक्त वृत्ति ही सच्चा योगी बनाती है, नष्टोमोहा पीछे आयेगा, पहले अनासक्त वृत्ति चाहिए। चाहिए-चाहिए का संकल्प योगी बनने नहीं देता है। वह अन्दर से साइलेन्स में रहने नहीं देता है। एक एक बाबा का वर्शन लाखों का नहीं कह सकते हैं, अमूल्य है। बाबा से जो 21 जन्मों का वर्सा मिलता है, उसे पीछे रखो परन्तु हम कहते हैं संगमयुग पर जो बाबा से वर्सा है उसके आधार पर 21 जन्मों का वर्सा है। उसके आधार पर 84 के चक्र का, श्रेष्ठ पूज्य पुजारी का जो अधिकार है, वह वर्सा अब मिला है। इसके लिए बाबा शुरू से कहते आ रहे हैं कि बाप और वर्से को याद करो, बाबा मिला तो प्राप्ति कितनी जबरदस्त है, उसमें पाँचों ही विकार अन्दर से खत्म हो जाते हैं। लेकिन इसके लिए पहले चाहिए का जो संकल्प है, उसको अच्छी तरह से समझ करके अपने को फ्री करना है तब साइलेन्स में रह सकेंगे। सदा के लिए सच्ची शान्ति क्या होती है, उस अनुभव का रस लेने के लिए बुद्धि को व्यर्थ से छुड़ाना है।
बुरा व व्यर्थ न सुनेंगे, न सुनायेंगे, न बोलेंगे, न करेंगे... क्योंकि यह व्यर्थ है, यह श्रीमत नहीं है। करने के पहले बुद्धि कहती है- न सुनो न सुनाओ। तो बाबा को देख, अपने को देख.... साइलेन्स में रहना माना अन्दर से चुप रहना। फिर कभी हमारे चेहरे से शान्ति के साथ प्रेम भी सूक न जाये क्योंकि हमें कोई नदी या नाले से प्रेम नहीं मिल रहा है। नदी में किचड़ा पड़ सकता है, नाले में तो किचड़ा ठहरा हुआ होता है और यह तो प्रेम के सागर बाबा से शुद्ध और सच्चा प्यार मिल रहा है। बाबा ने इस राजयोग से हमको स्वराज्य-अधिकारी बनाया है। इसमें सिर्फ तुम शान्त रहना सीखो तो यह राज्य तुम्हारे हाथों में है। कोई सेन्टर तुम्हारे हाथों में होगा या बुद्धि में कोई बात व स्थान भी होगा तो स्वराज्य-अधिकारी नहीं बन सकते हैं।
बाबा ने खुद पर राज्य करने का अक्ल सिखाया है, बच्चे तुमको अच्छा ताज, तख्त, तिलकधारी बनाऊँगा... कितना ऊँच श्रेष्ठ नशा चढ़ाता है। लेकिन कहाँ भी रग गई तो नशा उतरा। जो चीज़ मेरी है वह मेरे पास रहे, जैसे भक्ति में कहते तेरा - मेरा हो जाये लेकिन मेरे को हाथ नहीं लगाना। हाथ लगाया तो बस, जब भगवान ने दिया है और भगवान ने ही ले लिया तो रोने की क्या बात है? लेकिन मोह लोभ के कारण फट से दिल में दर्द करेगा। कोई कुछ चीज़ पकड़कर बैठे हैं तो छूटेगा कैसे ?
हम पंछी भी हैं, यह पराया देश है, अब स्वदेश मिला है, स्व-बाप मिला है इतनी बड़ी प्राप्ति है तो इसके लिए हम किसी के मीत नहीं हैं। यह अन्दर से अपने आपको अच्छी तरह से देख, जान और पहचान फिर बाबा के आगे खड़े हो जायें तो उसी घड़ी खुशी के खज़ाने से भरपूर हो जायेंगे। बाबा की नज़रों में रहने वालों के मन में यही खुशी का पारा बढ़ा रहता है। नशा चढ़ता है तो ठीक है परन्तु जब नशा उतरता है तो बाबा से रूह-रूहान करो। बाबा से रूह-रूहान करने का भी अक्ल चाहिए, हम बाबा से ऐसी बातें करें जो उसमें मस्त हो जायें। और बातें सोचने-सुनने वाले बाबा से रूह-रूहान नहीं कर सकते हैं। हाँ, खुश करने के लिए बाबा जवाब देगा लेकिन बाबा ऐसे बच्चों से रीयली रूह-रूहान नहीं करेगा।
हमारी स्थिति कभी नीचे, कभी ऊपर या थोड़ा-सा उदास है, रोने जैसी है तो ऐसी स्थिति वाले बाबा के पास जाकर क्या करेंगे? बाबा के आगे कभी किसी की कम्पलेन्ट लेकर नहीं जाना चाहिए क्योंकि अपने मन में स्व प्रति या अन्य के प्रति जो भाव होता है वही बोल (शब्दों) के रूप में बाहर प्रकट हो जाता है। बाबा के पास जाना है तो पहले अपने को ठीक करके जाओ तब बाबा से रूह-रूहान करने का रेसपाण्ड और मज़ा कुछ और ही होता है। मन मेरा है और किसी का नहीं तो इसको स्वच्छ बनाना मेरा काम है। खराब बातों का चिन्तन करना या उन्हें मन में रख करके अपने मन को खराब करना माना राज्य पद गंवाना क्योंकि मन का बुद्धि से, बुद्धि का संस्कारों से गहरा कनेक्शन है। जैसे एक मुँह में ही आँख, कान, मुख एक-दूसरे से दूर नहीं हैं, सेकण्ड में यह बात यहाँ तक आयेगी। तो मन, बुद्धि और संस्कार की बात आपस में मिली हुई है। मन में कोई बात लाई माना अपने संस्कारों को हमने शुद्ध नहीं बनाया है बल्कि और ही अशुद्ध बनाया। बात दूसरे का संस्कार मेरा बन गया, यह कौन-सी बुद्धिमानी है? तो हमें अपने संस्कारों को शुद्ध बनाना है। जो कभी भी चुप नहीं रह सकते हैं, कभी भी शान्ति के स्वधर्म में टिक नहीं सकते हैं, वह कभी धर्म की शक्ति जमा नहीं कर सकते हैं। जब तक अन्तर्मुखी नहीं हैं तो कोई भी गुण सदा के लिए धारण होता ही नहीं है, आज धारणा में आया कल चला गया। अन्तर्मुखी नहीं हैं तो कोई शक्ति धारण नहीं कर सकते हैं, आठों ही शक्तियाँ दूर हो जाती हैं। 'अन्तर्मुखी' हैं तो आठों ही शक्तियाँ काम करती हैं, सखियों और साथियों के रूप में, सहयोगी के रूप में।
अगर अभी संगम पर यह आठों शक्तियाँ हमारे ऑर्डर में काम न करें, तो सतयुगी राज्य, ताज कैसे और किसको मिलेगा? कम से कम अभी तो वह चारों तरफ हाज़िर रहें। अभी जितनी बेहद की सेवायें बढ़ती जा रही है और बेहद का परिवार भी बढ़ता जा रहा है उतना ही लाइट रहने का अक्ल बाबा सिखा रहा है। लाइट तब रह सकते हैं जब मन साफ़ है। किसी की गलती मन में रखने वालों को बाबा लाइट रहने की गिफ्ट देगा ही नहीं। तो बाबा के पास हमारा ऐसा रिकार्ड हो जो हमें बुला करके, हमें प्यार से गोद में बिठा करके सदा के लिए कहे - अच्छा, ले लो। फिर कैसी भी बात आयेगी या होगी तो भी उसको कुछ ख्याल में नहीं रहेगा और कभी ऐसे ख्यालात चलेंगे भी नहीं।
बाबा पहले कहते थे कि टॉक नो इविल, हियर नो इविल, सी नो इविल, थिंक नो इविल... अभी यह थोड़े ही कहते हैं अभी कहते हैं कि व्यर्थ भी न हो। अभी हम लोगों ने भाषा चेन्ज कर दी है क्योंकि हम अभी उनसे छूट गये। ज़रा भी व्यर्थ, कमजोरी के ख्याल, किसी के प्रभाव और किसी के लिए मन में ज़रा-सा भी घृणा आयी तो वृत्ति, दृष्टि चेन्ज हो जाती है। तो हमको इससे क्या मिलेगा ? कितना भी मान मांगेंगे, मान नहीं मिलेगा, अपमान होता ही रहेगा। फिर सहन करो अपमान, अगर मान मांगते हैं तो अपमान होगा ज़रूर, फिर अपमान की लिस्ट एक-दो के पीछे आती रहेगी। कहाँ से भी मान नहीं मिलेगा, मान के बजाए अपमान मिलेगा। अभी उसको सहन तो करे। सहन करने की भी बात नहीं है क्योंकि निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सोई....। निन्दा करने वाले को मित्र बनाना यह है सच्ची सेवा। हम अपना मित्र बनें, कोई भी प्रकार की किसी से भी शत्रुता का अंश भी न हो।
स्वराज्य-अधिकारी बनने के लिए कोई भी कामचलाऊ काम न करके अपना सच्चा चार्ट रखना है और थोड़े में खुश नहीं होना है। अंशमात्र भी हमारे अन्दर अपने को अच्छा दिखाने व अच्छा समझने के मिया मिट्टू के संस्कार न हों क्योंकि बाबा कहते अभी तुमको सम्पूर्ण बनना है, तो वहाँ तक हमको जाना है तो सम्पन्न बनने का ही काम करना चाहिए। सम्पन्न माना मालामाल जो रहते हैं वह हमेशा हर बात में तृप्त रहते हैं और जो तृप्त है वह सम्पन्न बनेगा। तकदीर बनाने वाले ने हमारी इतनी ऊँची तकदीर बनाई है जो सब बातों में सम्पन्न कर दिया। सब बातों में बेहद में जाने से बेहद खुशी और बेहद का नशा रहेगा, और बाबा के दिल में हमारा स्थान है तो यही हमारे लिए सब कुछ है। दिल से बाबा अपना प्यार, दुआयें, शक्ति, सकाश दे करके चला रहा है यही सब कुछ है। कई कहते हैं इच्छा तो है 'परन्तु' यह शब्द छोड़ देवें। 'ट्राय' करेंगे यह भी छोड़ देवें। जरा सा 'डिफीकल्ट' है यह भी शब्द छोड़ देवें तो इन चार शब्दों से छुटकारा पाना माना सदा नशे में रहना और औरों को भी नशा चढ़ाते रहना, स्मृति में रहना और औरों को भी स्मृति दिलाना। अच्छा ओमशान्ति।

१०८ की माला में आने के लिए 'विदेही' बनने का अभ्यास करो, व्यर्थ और निगेटिव से मुक्त बनो

बाबा जो सुनाते हैं वह सुनना और समा लेना फिर अमल में लाना सहज हो जाता है। हम बच्चों के अन्दर में है कि बाबा हमारे से सामने में बोल रहा है कि बच्चे - तुम्हें सम्पूर्ण अव्यक्त फ़रिश्ता बनना है। भले कितनी भी बड़ी सभा हो लेकिन भगवानुवाच मुझ आत्मा के प्रति सुना रहे हैं। तो हमारे भाग्य का जो सितारा चमका है उसको देख अन्य आत्मायें उड़ती-उड़ती बाबा के पास आ जायें। आत्माओं में जो दुःख-अशान्ति भरी है वह सारी मिट जाये। जब हम किसको भासना देंगे तब वे शान्ति और परमात्म-आनन्द में खो जायेंगे। लेकिन उसके पहले वह इतना समर्थ बन जायें जो निगेटिव को पॉजिटिव बना लें। विदेही बनने के पहले निगेटिव को पॉजिटिव बनाना है। नहीं तो ऐसे ही विदेही कैसे बनेंगे ?
वातावरण को बदल शुद्ध वातावरण बना देना, व्यर्थ के प्रभाव में न आना, निगेटिव के अंश को खत्म कर देना तब तो पॉजिटिव का अनुभव कर सकेंगे ! जैसे निगेटिव का कोई अन्त नहीं वैसे पॉजिटिव का भी कोई अन्त नहीं है, यह अनुभव होने लग जाये तब कहेंगे व्यर्थ से मुक्त। पॉजिटिव माना इतना प्युअर जो मन में किसी भी प्रकार का पोल्यूशन न हो। पॉजिटिव होंगे तो प्युअर होंगे और जो प्युअर होंगे वह पावरफुल होंगे। तो अशुद्ध संकल्पों की अंश न हो, इतना ही नहीं किसी अन्य का हो तो वह भी बदल जाये इसके लिए विदेही रहने की प्रैक्टिस चाहिए।
अपने आपको समझना - मैं कौन हूँ? दूसरे के अन्दर जाना माना अपने को भूलना तो विदेही बन नहीं सकते हैं। बाबा ने कहा निगेटिव और व्यर्थ से फ्री रहने वाला ही 108 की माला में आ सकता है, तो हमारे बुद्धि में आया कि 108 बातों को खत्म करने से 108 की माला में आ सकते हैं। तो विचार करके व्यर्थ और निगेटिव की 108 प्वाइन्ट निकालो। जिसको 108 की माला में आना है वह अन्दर से गहराई में जायेंगे कि ऐसी कौनसी 108 बातें हैं जिसको अगर हमने खत्म नहीं किया है तो विजय माला में आ नहीं सकेंगे। किसके लिए मोह वश अच्छा और किसके लिए न अच्छा, यह प्रभाव जब तक है तब तक देह-अभिमान जाता नहीं।देह-अभिमान खुद को ही अच्छा बनने नहीं देता है बल्कि दूसरे की भी अच्छाई देखने नहीं देता है। सर्व की अच्छाई तब दिखाई देगी जब हमारा तीसरा नेत्र पूरा खुला हुआ होगा।
हम त्रिकालदर्शी, तीनों लोकों के मालिक आदि-मध्य-अन्त को जानते हैं, ड्रामा एक्यूरेट है, स्वदर्शन चक्र फिराया फिर किसके भाव-स्वभाव के चक्कर में आया माना स्वदर्शन चक्र घुमाना भूल गया। फिर उसको सिद्ध करना कि बरोबर यह स्वभाव है, औरों को भी नोट हो तो और ही चिन्तन दर्शन में भी आ गया। उसका फिर औरों को भी दर्शन कराना, इससे हम बाबा का सन्देश देने की सर्विस नहीं कर सकते हैं। तो हरेक समझे कि 24 घण्टे हम सेवा पर हैं, जिसको सेवा करने की ऐसी लगन है उसके स्वप्न में भी वही बातें आयेंगी क्योंकि संकल्प का स्वप्न और संस्कार से बहुत कनेक्शन है। बाबा हमारे सामने खड़ा है तो जैसा मेरा बाबा है उनके कदम-पर-कदम रखते बाबा जैसा रहने का पुरुषार्थ करना है। बस। बाप को फ़ालो न करके किसी और आत्मा को फ़ालो करना माना उसको देख करके मैंने किया या उसने जैसे किया वैसे मैंने भी किया तो 16,000 की माला में भी आना मुश्किल हो जायेगा। जैसे कोई करे ऐसे हम भी करें, यह क्या बात है? अपने में जो गुण वा विशेषता है उसी को ईश्वर अर्पण कर दो तो ईश्वर उसमें और भी 10 गुणा शक्ति भरके देता है। लेकिन अगर कहते कि यह मेरा गुण है या मेरी विशेषता है तो मेरा कहने से वह भी गया। हमने तो बाबा को दे दिया, भगवान ने उसमें शक्ति भर दी वह सेवा में आ गई जिससे हमको दुआयें मिली। तो नम्बरवन में आने के लिए यह कितनी सहज साधना है। दूसरे को देखना माना नम्बर में (लाइन में) खड़े हो जाना। बाबा जैसे बनाना चाहता है वैसे बनने लग जाओ, बस।
बाबा! शुक्रिया आपका बार-बार... जो कूड़े-किचड़े से आपने हमको निकाला, वह तो आपने मेहनत की। हरेक कूड़े-किचड़े के डिब्बे में पड़े हुए थे, अब फिर उसी किचड़े को याद करेंगे या ज़रा-सा भी साथ रखेंगे व किसी भी व्यक्ति, वस्तु और वैभव को अपना समझेंगे तो बाबा से अपनेपन की फीलिंग नहीं आयेगी। परिवार की फीलिंग नहीं आयेगी। परिवार भी एक दो को स्वीकार करे- यह भी भाग्य है। कोई हमारा तिरस्कार करे तो तिरस्कार करने वाले का दोष नहीं है, कुछ कारण होगा ज़रूर। तो हम अपने आपको ऐसा अनुभवी मूर्त बना दें जो हरेक का दिल से हमारे लिए प्यार हो। और कुछ न हो, दुवा निकले और प्यार की कण्डीशन यह है कि तुम देते चलो, देते चलो क्योंकि हम निमित्त हैं, भगवान ने दिया है तो तुम देते चलो तो खुटेगा नहीं। ऊपर वाला दाता देना छोड़ता नहीं है, हम वहाँ से लेना बन्द करके औरों से लेना शुरू कर देते हैं तो देते-देते कम हो जायेगा फिर दाता के बजाए मांगना शुरू करते हैं। ऐसे कहीं भी कोई किसी को बिना मांगे कुछ देते नहीं हैं, यह तो छोड़ो परन्तु आजकल तो मांगने से भी नहीं देते हैं।
अभी भगवान बिना मांगे सब कुछ दे रहा है, हमारी इतनी भावना और निश्चय भी नहीं था फिर भी दे रहा है, दिया तो कितना दिया है। तो हम अगर यह भूल करके इधर उधर झाकेंगे तो क्या होगा? तो हमारे जो सामने आये या हम कहाँ जायें तो हमारा क्या काम है? लेने वाले को लगे कि यह अपना नहीं दे रहे हैं, इसमें अपने सूक्ष्म देह-अभिमान से दूर होने से आत्मा को यह लगेगा कि यह नहीं दे रही है, इसको भी भगवान का दिया हुआ है। भले मुख से न भी बोले भगवान दे रहा है परन्तु उनको यह लगेगा कि यह भगवान का दिया हुआ दे रही है। अगर हमारे अन्दर अभिमान की अंश है तो उनको यह नहीं लगता है कि यह कोई भगवान का दिया हुआ दे रहे हैं क्योंकि उसने अपना विचार सागर मंथन करके अपनी प्वाइन्टस् निकाल करके दिया ना!
बाबा कहते हैं- रिसर्च करो परमात्मा ने क्या दिया है? सफलता और उम्मीदों के सितारे, भाग्य के सितारे बनाके बाबा ने हमको क्या से क्या बनाया? हम बच्चों ने क्या किया ? बाबा ! आपने हमारे में इतनी उम्मीदें रखी हैं तो वह कैसे पूर्ण करूँ ? कर सकेंगे? यह क्वेश्चन नहीं। बाबा कहता है कर लो तो क्वेश्चन नहीं। तो हमको जो भगवान ने गुणों को गिफ्ट के रूप में दिया है उन्हें सेवा में लगाना है, तब वही गुण फिर हमारे लिए वरदान बन जाते हैं। तो कोई यह नहीं कहे कि यह तो मेरा गुण है इसलिए मैंने यह काम किया है, ऐसे किये हुये की सफलता गई। दिया हुआ फिर वापस लिया तो पद भ्रष्ट हो गया, ऐसे गुण भी भगवान को दे करके वापस हमने लिया तो पद भ्रष्ट हो जायेगा।
चन्द्रवंशी में आना माना कलायें कम, कभी कैसी, कभी कैसी, कभी चढ़ती, कभी उतरती कला में आये तो सूर्यवंशी में पाँव रखने को भी नहीं मिलेगा, परन्तु सूर्यवंशी में आने वाले को सम्पूर्ण बनने के पहले सम्पन्न रहने के संस्कारों में, सुख-शान्ति, प्रेम, आनन्द और शक्ति में सम्पन्न रहना है क्योंकि यह सम्पत्ति सूर्यवंशी में खींचती है। भाग्यवान हैं जो बाबा ने जन्मते ही तिलक, ताजधारी बनाया और हमने बाबा को क्या दिया? दिल दिया, बस! दिल दिया तब तो 'मन्मनाभव' हुए हैं। अगर दिल से हमारा प्यार नहीं है तो मन्मनाभव हो नहीं सकते, विदेही बन नहीं सकते। सच्चे दिल से एक बाबा दूजा न कोई। जिस घड़ी से बाबा के बने हैं, कहाँ आँख न डूबे। I like this, I don't like this.. यह शब्द, यह सोच या विचार निगेटिव हैं। जरा सा भी "यह मुझे अच्छा नहीं लगता या यह मुझे अच्छा लगता" यह बोल हमको सूर्यवंशी में आने नहीं देगा इसलिए अच्छे और बुरे से पार रहो।
जब अच्छे-बुरे से परे रहो तब यहाँ से पार ब्रह्म-तत्व में रहने का स्थान बाबा देंगे। इस दुनिया के वातावरण से पार अपने घर में हमारा असली स्थान है। वहाँ जितना रहने के आदती बनेंगे तो वाणी में जल्दी से आना या व्यर्थ ख्यालात पैदा होगा ही नहीं। आना है तो सूर्यवंशी में, जाना है तो अपने वास्तविक घर में जाना है। वह भी बाबा के साथ जाना है। बाबा ने दृष्टि से पैदा किया, मुख द्वारा ज्ञान सुना करके मुख-वंशावली बनाया। उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण सो फ़रिश्ता बनने का पाठ पढ़ाया है। एक तो तुम बच्चे हो तो निश्चिंत रहो, दूसरी बात कि तुम ऑलमाइटी के बच्चे हो तो अथॉरिटी हो। छोटे हैं तो निश्चिंत हैं, सेवा पर हैं तो किसके बच्चे हैं यह याद रखो। बाप ने हमको लायक बना-बना करके उम्मीदें रखी और लायक बनाने की मेहनत की तो अपने बाबा को हम क्या देवें? बाबा ने तो जैसे अथॉरिटी भी दी, तो वह भी अटेन्शन बाबा ने खिचवाया कि 'निमित्त बनना माना स्टेज पर आना' इसलिए हम अभी ज़रा-सा भी ऐसे केयरलेस नहीं रह सकते हैं। बहाना नहीं दे सकते हैं।
हर कार्य में हर बात में मुझे सम्पन्न बनना है, इसमें स्वार्थ नहीं है। सम्पन्न मुझे बनना है या मैं दूसरे का ख्याल करूं? बाबा ने ऐसे इशारे दिये हैं, इतना प्यार से बात में समझाया हुआ है कि सर्व के गुण देखने से सम्पन्न बनेंगे। किसी का भी अवगुण देखेंगे तो सम्पन्न नहीं बन सकेंगे। और हमारे में जो कुछ गुण हैं, भगवान ने उसमें जो कला भरी है वह 16 कला बनायेगी। है एक गुण अनेक नहीं हैं, अनुभव कहता है, आज हम जो कुछ भी हैं भगवान ने हमको स्वीकार किया है, स्वीकार भी तब किया है जब अभिमान छोड़ा है। अभिमान होगा तो बाबा स्वीकार नहीं करेगा। भले कितना भी हम कहें कि मेरा यह गुण काम कर रहा है लेकिन अन्दर से भगवान का काम नहीं कर रहा है। कोई भी विशेषता जिस आत्मा में है तो हमारा फ़र्ज कहता है, एक तो हम अपने ऊपर अटेन्शन रखें, दूसरा बाबा के हर बच्चे में जो विशेषता है उसको हम मान देवें, यह भी हमारा फ़र्ज कहता है। एक-दो के विचारों का, विशेषताओं का, एक दो में मान-सम्मान का लेन-देन करते रहना है।
जितनी हम विशेषता को जानेंगे, मानेंगे उनको मान देंगे उतना बाबा कहते हैं सहयोग मिलेगा। किसी की विशेषता को मान नहीं देंगे तो सहयोग लेना मुश्किल हो जायेगा, मिलेगा तो भी समय पर नहीं मिलेगा। गुण एवं विशेषता को जानना भी देही-अभिमानी का काम है। तीसरे नेत्र से देखने में एक्सपर्ट बन जाना है। तीसरा नेत्र खुला रखो, भले वर्षों से एक-दो को हम जानते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके गुण और अवगुण को जानते हैं। हम जानते हैं कि हम कल्प पहले वाले हैं। बाबा ने कल्प पहले की स्मृति दिलाई है, अभी भी तुम क्या थे वह स्मृति दिला रहा है। ऐसा बनना ही है- हमको यह पक्का करा रहा है। तो जिस तरह से बाबा हमको अच्छी तरह से न सिर्फ पढ़ा रहा है परन्तु बना भी रहा है, साथ-साथ काम करा रहा है। हमको भी लगता है हम पढ़ भी रहे हैं तो सुन भी रहे हैं, तो साथ-साथ बन भी रहे हैं।
एक तो बाबा का बनने के बाद जो समय बीता है उसमें अगर पूरा पुरुषार्थ नहीं किया है, उसमें थोड़ा समय व्यर्थ गँवाया है तो भी फिर बाबा कहते हैं अच्छा, अब फिर कर, अपनी उन्नति करनी है तो पास्ट (कल) की बातें औरों की और अपनी बिल्कुल भूल जाएँ, इसमें अगर मैं पास हो गई तो आगे जा सकती हूँ। अगर मेरे से औरों की पास्ट भूल जायेगी तो उसे भी ज़रूर भूलेंगी। मैं नहीं भूलती हूँ तो कोई नहीं भूलेगा। तो दोष किसको नहीं दो। पहले तुम भूलो और वह भी एक कण्डीशन है जो याद करने वाली बात है वह भूलते नहीं हैं। लेकिन देखा जाता जो भूलने वाली बात है वह याद करते हैं, जो याद करने वाली बात है वह भूल जाती है। तो बाबा ने बहुत बड़ा काम दिया है, अन्दर अपने आपको देखने, जानने, पहचानने का। फिर जो लक्ष्य है उस प्रमाण उस लक्षण को अपने में लाना यह अन्दर इच्छा हो। अपने लिए शुभ इच्छा, सर्व के लिए भी तीव्र इच्छा हो। हम अकेले नहीं हमारा बड़ा परिवार है। 108 माला के मणकों को इकट्ठा करना - यह भी हमारा ही काम है। हमको करना है। आप समान रंग लगाना है, पारस का काम करना, वह तब होगा जब हम बाबा को देखते-देखते करते जायेंगे।
जैसे बाबा हमको अपनी कम्पनी दे करके पास बिठा करके अशरीरी बना देता है, ऐसे बाबा कहता है जहाँ भी रहो, जहाँ भी बैठो तो वहाँ का वायुमण्डल ऐसा अच्छा, शुद्ध और पावरफुल बन जाए। वह होगा अपनी अन्दर की वृत्ति और दृष्टि से। जैसे बाबा की दृष्टि महा सुखकारी वैसे हमारी भी दृष्टि हर आत्मा के प्रति सुखकारी हो। ऐसे नहीं जो बाहर वाले आवें उनके लिए सुखकारी हो, और साथ में बैठने वाले को सुखकारी महसूस न हो, तो भी सफलता नहीं। इसलिए यह भी तो ख्याल रखना पड़ेगा कि इधर उधर न देख पहले अपने को देखो। सेवा का भी पीछे सोचो। सूर्य, चाँद, सितारे यह कोई सेवा का सोचते नहीं हैं, उनसे सेवा स्वतः मिलती है। सूर्य को देखो, चाहे सागर को देखो, सदा सेवा पर उपस्थित हैं। हम जितना ज्ञान सागर बाबा की गहराई में जायेंगे, ऊपर लहरों में नहीं लहरायें, गहराई में जायें तो सदा सेवा अर्थ हैं। ऊपर मीठे बाबा को देखेंगे तो बाबा कितनी सकाश दे रहा है, कितना सर्व को सुख दे रहा है। तो जब योग से बुद्धि ऊपर जायेगी, ज्ञान से बुद्धि को गहराई में ले जायेंगे तब सेवा कर सकेंगे। इसके लिए चाहिए - 'अन्तर्मुखता'। अन्तर्मुखता देह से न्यारा बनाती है, अन्दर जा सकते हैं।
तो बाबा ने बार-बार ध्यान खिचवाया है कि श्वाँसों-श्वाँस स्मृति में रहने के लिए 'विदेही' बनने का अभ्यास करो, यही नम्बरवन में आने की सहज साधना है, इसमें सफलता साथ देती है। इसको हम कभी न भूलें।

बीजरूप, विदेही बनना है तो छोटी-छोटी बातों के विस्तार में न जाकर, बुद्धि को शान्त और स्वभाव को सरल बनाओ

आज बाबा ने कहा भ्रमरी मिसल भू भू करना है, यह कितना अच्छा काम है। यह काम शान्ति और प्रेम से अथक होकर करने का है। जिस बिचारे का अपना कोई अस्तित्व है ही नहीं उसको चेंज करना, उसको अपने निजी स्वरूप की स्मृति दिलाना, फिर कल्प पहले की स्मृति दिलाना, फिर तुम किसका बच्चा है- यह स्मृति दिलाना यह सब काम करने के लिए कितना टाइम चाहिए। किस घर से आये हो यह याद दिलाना, सिर्फ भटके हुए नहीं हैं, गंद में पड़े हैं। 5 परसेन्ट सुख तो 95 परसेन्ट दुःख है। फिर कह देते हैं सुख दुःख भगवान ही देता है। दुःख से निकलने नहीं चाहते हैं, एक तरफ़ पुकारते हैं हे भगवान छुड़ाओ फिर भगवान कहेगा छोड़ो, तो कहेंगे कैसे छुटूं? उनको छोड़ेंगे तो उनका क्या हाल होगा? अच्छा वह हमको छोड़ देंगे तो मेरा क्या हाल होगा ? आज का इन्सान इतना तो फसा हुआ है।
आजकल के जमाने में हरेक कहता है कि हमारे पास टाइम नहीं है। इसलिए एक ही बार इतना अच्छा सुनायें जो दुबारा वह अपने आप आये। क्लास में स्टूडैण्ट्स की वृद्धि क्यों नहीं होती है? एक वर्ष में अगर 10 स्टूडैण्ट्स भी नहीं बढ़े तो दोष किसका ? जितनी मेहनत हमारे ऊपर हुई है, उनसे 1 परसेन्ट भी मेहनत हम नहीं करते हैं। और सेवाओं में बुद्धि बहुत चली जाती है, सेन्टर बढ़ाने में, गीता पाठशाला खोलने में... परन्तु सेन्टर इतना हरा-भरा, इतना क्लास की रौनक हो... जो स्थान है उसका एक-एक फिट भी यूज़ हो, वह सेवायें जो स्थापना के समय शुरु में जहाँ-जहाँ हुई थी, वह मेहनत है। अभी ज्ञान और योग की पालना चाहिए।
बाबा कहते हैं ऐसी सेवा के लिए पहले अपने ऊपर ध्यान दो कि सेकण्ड में आवाज़ से परे चले जाएँ, यह अभ्यास हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा? वह संस्कार दूसरे में कैसे आयेगा। इसमें खुद को टाइम देना पड़ता है। जब किसको अच्छी चीज़ मिलेगी तो कौन छोड़ेगा। आने वाले भी बहाना तब देते हैं जब प्राप्ति कम है। फिर कह देते हैं घर बैठे भी हम मुरली पढ़ लेते हैं क्योंकि वायुमण्डल का जो प्रभाव है या वायुमण्डल से जो प्राप्ति है वह नहीं है तो कैसे कोई बैठेगा ? ब्राह्मण बनाने की बात पीछे है पहले तो ज्ञान और योग का रस बैठे, उन्हें ऐसी बात सुनायें जो देह से न्यारे होने का उसी घड़ी अनुभव करें, घर बैठे ही कहें- वाह बाबा! एक दिन आत्मा का कोर्स किया, दूसरे दिन परमात्मा का किया, तीसरे दिन ड्रामा का किया... तो सब रफूचक्कर हो गया। बिचारे ने अपने को आत्मा समझा ही नहीं, परमात्मा को जाना ही नहीं तो ड्रामा को कैसे जानेंगे! फिर क्या होता है काम-चलाऊ बात करने से वह भी काम चलाऊ ही आते जाते चलते रहते हैं।
शान्ति और प्रेम से बैठ करके ऐसा वातावरण बनाओ जो आने वाला घड़ी-घड़ी कहाँ टाइम नहीं देखे। हमारा चित्त साफ़ हो, शुभ भावना हो तो वह देखेंगे कि इसको क्या ज़रूरत पड़ी है, जो मेरे ऊपर मेहनत करते हैं। धारणा करने वाला औरों के लिए एक मिसाल हो जाता है। जो कह रहे हैं वह ध्यान से सुन करके दिल से मानेंगे कि यही सत्य है, यह अच्छी तरह से समझा है।
भू-भू का असर तब होता है जब संग का रंग हो। इतना योग हो जो अन्दर ही अन्दर पारस का काम करे, पारस कुछ कहता नहीं है परन्तु उसकी क्वालिटी और कशिश ऐसी होती है जो अन्धकार को मिटाती है। ऐसे हमारी स्थिति एकरस है तो औरों की भी एकाग्रता बढ़ाते हैं। अपनी एकरस स्थिति नहीं है, हमारी ही बुद्धि इधर-उधर घूमती है तो जो आत्मा सामने आई है, उन बिचारों की बुद्धि शान्त कैसे होगी? जब तक कॉमेन्ट्री आदि का सहयोग है तक तक एकाग्र हुए लेकिन सदा के लिए एकाग्रता की शक्ति का सहयोग नहीं दे सकते हैं। तो भू-भू करने के लिए वायुमण्डल अच्छा चाहिए इसलिए भ्रमरी एक छोटा-सा मिट्टी का घर बना करके उसको बिठाती है। हम भी अगर साधनों के आधार से सेवा करेंगे तो हमारी साधना कहाँ गई? साधन तो लोगों के पास भी बहुत हैं उसके बिगर वह जी नहीं सकते, चल नहीं सकते हैं।
योग से प्राप्ति कितनी है, वह साधना से पता चलता है। योग पूरा नहीं है तो पारस बुद्धि नहीं बनते हैं। जो छोटी-छोटी बात के विस्तार में जाने वाला है, वह शान्त हो नहीं सकता है। तो मास्टर बीजरूप स्थिति हमको विदेही बनायेगी। श्रेष्ठ बोल हमको महान आत्मा बनायेगा, जो आया सो बोला... साधारण बोल हमको साधारण ही बनायेगा। बाबा अव्यक्त हुए तो बोल भी बाबा के अव्यक्त हैं, जिसमें व्यक्त भाव की अंश मात्र नहीं है। दुनिया में तो प्रेम सूखा हुआ है और यहाँ तो जैसे प्रेम की बरसात होती रहती है। इतना फ़र्क बाहर और यहाँ का देख कौन होगा जो यहाँ से वापस जायेगा ? लेकिन बाबा कहते हैं बच्चे, तुम सेवा अर्थ जाओ। बाबा के डायरेक्शन से जाते हैं। बाबा ने इशारा दिया बच्चे तुमको यहाँ से यहाँ जाना है- जी बाबा। बाबा भेज रहा है, बाबा को पता है क्यों भेज रहा है। जहाँ जाओ वहाँ कोई-न-कोई प्रभु का लाल बैठा है। उसको सिर्फ मैसेज देने की देरी है। थोड़ा-सा कुछ ज्ञान सुना दो तो फट से सफलता मिलेगी।
बाबा कहते - हर धर्म में ऐसी आत्मायें हैं जो यहाँ से बिछुड़ कर चली गई हैं, उनको वापस ले आओ। जहाँ तहाँ हैं दुनिया के हर कोने में हैं। जहाँ पाँव रखेंगे कोई-न-कोई प्रभु का लाल बैठा हुआ है, कहेंगे हमारे लिए आये हो। स्वयं भी सोचें कि हमने भगवान को ढूँढा है या भगवान ने हमें ढूंढ निकाला ? हम तो ढूँढते-ढूंढते थक गये थे। तो सच सुनाने में सदा रेडी रहें, हमें सत्य पिता का सच्चा ज्ञान सुनाना है। बाबा ने जो सर्विस सिखाई है वह हम क्यों छोंड़े। ट्रेन, प्लेन, बस स्टॉप पर सब जगह किस तरह से सेवा करना चाहिए, यह सब बाबा ने बता दिया है। हरेक आयेंगे हमारे पास, तो हमें ऐसे मौके पर उन्हें कोई-न-कोई चीज़ दे देना चाहिए, यही तो सर्विस है। इसी में हमारा समय आदि सब स्वतः ही सफल हो जाता है। कम-से-कम लिट्रेचर तो इतना प्यार से दे देना चाहिए। दिल से अच्छी चीज़ दे दो तो कोई छोड़ेगा थोड़ेही। तो सेवा सच्ची दिल से करना, किसी से भेंट न करना। तो चलते-फिरते योग में रहो और शान्ति का अनुभव कराओ।
जितना शान्त में रहो उतना अच्छा है। कोई बात के विस्तार में नहीं जाओ क्योंकि विस्तार में जाना बड़ा नुकसानकारक है। सोचना, बोलना, पहली वाली बातों को एड करना.. इससे सिद्ध है कि अभी बीजरूप की शक्ति नहीं है। वाणी थकाती है क्योंकि सिर्फ बोलते रहो तो सिर में दर्द पड़ेगा, तो कहेंगे अभी तो हम थक गये हैं। और बाबा के वरदान बोलो तो 12 घण्टा भी बोलने से थकान नहीं होती है। जो सामने आया, बाबा ने अथाह दिया है उनके काम की चीज़ तो उसको मिल जाये। बाबा के बोल में हरेक के लिए कोई-न-कोई काम की चीज़ तो है ही है।
बाबा ने एक मुरली में कहा था कि तुम जहान के नूर हो, इस नूर से लोग बाबा को देखेंगे। तो भगवान के प्यार की एक बूँद भी अगर किसको हमारे से मिल जाए तो यह कितनी अच्छी कमाल की बात है। इस प्रकार की सेवा कोई बैठ करके प्लान बनाने से या किसके कहने से नहीं होती है, परन्तु जैसा समय हो, इसमें बाबा के वरदान बहुत काम करते हैं। सिर्फ और सब बातों से बुद्धि को निकाल करके जो बाबा के बोल हमारे जीवन में काम कर रहे हैं, उनसे काम लेवें। तो बाबा ने कहा था जहाँ आवश्यकता है वहाँ हाज़िर हो जाओ। जो तुमको आवश्यक होगा वह आपेही मिलेगा - यह वरदान है। बाबा के बोल न सिर्फ लाखों-करोड़ों के हैं परन्तु जीवन में काम आने वाले हैं। जीवन ही रत्न जैसी बन जाए। बाबा के नज़रों में आने वाली बन जाए।
संगमयुग पर मेरा कुछ नहीं, बेगर बनने में बहुत मज़ा है, बाबा ने तो कहा है शरीर से भी बेगर बनो। भविष्य आँखों के सामने है परन्तु भविष्य के पहले जो बाबा ने कहा है- पहले तो उसमें सम्पन्न रहें, कोई कमी न हो, जिसको बाबा कहते हैं प‌द्मा-पद्मपति हैं। पद्मा-प‌द्मपति से कोई पूछ सकता है आपको कुछ चाहिए ? कमलफूल समान न्यारा रहो तो कोई पूछ नहीं सकता कि आपको कुछ चाहिए ? ड्रामा में जो हुआ सेकण्ड पास हुआ, सम्बन्ध में रहते भी न्यारे हैं तो उपराम हो जाते हैं। एक बाबा के साथ सर्व सम्बन्ध होने से चित्त शान्त, स्वभाव सरल हो जाता है।
कोई किसी की कम्पलेन्ट तभी करता है जब हमारा चित्त शुद्ध, शान्त नहीं है। चित्त में जो स्मृति भरी पड़ी है वह शुद्ध नहीं है, शान्ति वाली नहीं है। इतना हमारे अन्दर एक देही-अभिमानी स्थिति, दूसरा कल्प पहले जो हुआ था, सो ही होगा, एक्यूरेट होगा। इसमें लापरवाह भी नहीं होना है कि जो होना है वही होगा.. बीजरूप स्थिति से बाबा का आह्वान करते, बाबा को जो कहलवाना होगा वह अपने आप जवाब में मिल जायेगा। तो जिस तरह से बाबा हमको समान बनाना चाहता है वह सब इकट्ठा करते-करते पूरे ब्राह्मण बनें तो पास विद आनर बन जायेंगे। तो दुनिया विनाश की तैयारी कर रही है और हम जोर-शोर से अच्छी तरह से साइलेन्स और समझ के बल से नई दुनिया की स्थापना की सेवा में लगे हुए हैं। जो समझदार नहीं हैं उनकी बुद्धि चलती रहेगी, मजाल है उनकी बुद्धि शान्त हो! अरे अपने आपको शान्त बनाना तो सीखो, जो खुद को ही पहले शान्ति का बल मिले। फिर अन्य आत्मायें अपने आप शान्त होना सीखेंगी, नहीं तो बिचारों का दोष नहीं है, उनको तो चिंता करने की आदत पड़ी हुई है, वह तो व्यर्थ चिंता करने के बिगर रह नहीं सकते हैं तो ऐसों को कैसे सिखायेंगे। क्या कहकर सिखायेंगे कि तुम व्यर्थ न सोचो ! आप यह कहेंगे तो वह कहेंगे कि बात ही सोचने वाली है और तुम कहते हो सोचो नहीं। जवाब पर जवाब देंगे तो जितनी हमारे अन्दर ज्ञान और योग की पराकाष्ठा होगी, बहुत समय से बल जमा होगा वह ऐसे समय पर काम करेगा।
सच्ची दिल से सेवा किसको कहा जाता है यह समझ करके ऐसा वातावरण बनायें। यह परिवार है यहाँ ऐसे नहीं कहा जाता है कि हम तुम्हारी सेवा करते हैं। परिवार माना परिवार, परिवार में प्रेम से रहना होता है। तो जितने परिवार के मेम्बर बढ़ते जाते हैं उतनी खुशी होती है। परिवार में सब अच्छे बनते हैं तो और ही खुशी होती है, कोई अच्छा नहीं बनता है तो नाराज नहीं होते हैं। ऐसे नहीं कहेंगे कि इसको कितना बताया फिर भी नहीं माना तो हम नाराज़ हुए, इससे सिद्ध है कि हमने उसको जो बताया वह व्यर्थ बताया। क्यों नहीं हम ऐसे प्यार से बतायें जो वह कहे कि बात तो सही कही, मुझे माननी चाहिए। हम अपने अन्दर शुभ भावना का भण्डारा भरपूर रखें तो कोई विघ्न नहीं आ सकता है-न अपनी स्थिति में, न सेवा में... यह हम गारंटी देते हैं।
साथियों को बचाकर रखें, उनकी भी स्थिति निविघ्न रहे। तो बाबा ने जैसे किया है, वैसे कदम-पर-कदम रखते करते चलो। उसमें कोई तकलीफ है ही नहीं और कदमों की महिमा है, कदमों की पूजा है। सिर्फ कदम रखने से हम महिमा योग्य बन जायेंगे। आगे चल करके हम लोगों को वाणी में कम आना है परन्तु वाणी से परे रह करके औरों को वाणी से परे ले जाना है। ईश्वरीय सेवा, सच्ची दिल से सेवा का फल अभी अपने आप ऐसा निकल रहा है, जो बिना सोचे भी स्वतः ही हो रहा है। जो सोचा भी नहीं था, वह हो रहा है। सिर्फ सेवा और याद दोनों साथ-साथ हैं, तो ऐसे लगता है जैसे तीसरी कोई बात है ही नहीं, उससे दूर चले गये हैं।

प्राइज़ लेनी है तो नियमों पर चलो, थोड़ा भी कहाँ लगाव-झुकाव न हो

बाबा कण्डीशन भी डालता है टेम्पटेशन भी देता है तो यह सौदागर कितना होशियार है। जब बाबा दलाल की बात करते हैं तो हमको वह बात याद आती कि "गुरु गोविन्द दोनों खड़े हैं..." अभी किसको मानूँ...? यह तो कहता - न मैं गुरु हूँ, न गोविन्द.... तो यह क्या है? "गुरु वह है, गोविन्द कृष्ण है" तो बाबा इतना निरहंकारी है। लेकिन हम जानते हैं गुरु वह है, 'गोविन्द' यह है। गोविन्द माना 'गौ-पाल'। लेकिन इसमें भी पहले कौन ? जिसने बैठ करके पालना भी दी, खूब अच्छा खिला-पिलाकर मोटा ताजा बना दिया, तभी तो जो बाबा ने दिया है वह औरों को बाँटने की भी शक्ति हमारे पास है। यह शक्ति उसने ही दी है तो फिर प्रश्न उठता है कि दलाल कौन? जिसने उससे मिलाया। फिर बाबा कहते हैं- अशरीरी रहो। स्वदर्शन चक्र फिराओ। पहले स्वीट होम को याद करो, फिर राजधानी को याद करो। और इन सबका आधार है 'पवित्रता' और प्राइज़ भी मिलेगी - पवित्रता से। मददगार बनेंगे तो पवित्र बनेंगे। संन्यासी पवित्र बनते हैं सिर्फ थमाने के लिए। और बाबा हमको जैसा पवित्र बनाते हैं वैसा और कोई किसी को नहीं बना सकता है। बाबा एवर-प्युअर है इसलिए यहाँ कण्डीशन है कि पवित्रता से ही प्राइज़ मिलती है।
तो ज़रा भी अपवित्र संकल्प एकाग्रचित्त होने नहीं देंगे। मैं आत्मा भी बिन्दी, बाबा भी बिन्दी। परन्तु जब हम बिन्दी बन जाएँ। ज्ञान सागर बाबा ने इतना जो ज्ञान दिया है वह सिर्फ हमको पण्डितों की तरह से सुनाने के लिए नहीं लेकिन बाबा कहते उसका मंथन करो, सच्ची दिल से साहिब को राज़ी रखने के लिए इतना नियमों को पालन करो। प्राइज़ कैसे मिलेगी? मददगार कैसे बनेंगे? बाबा ने हमें नियमों की लिस्ट बनाकर दी है, ज़रा भी नियमों को भंग करेंगे तो प्राइज लेने के अधिकारी नहीं बन सकते। प्राइज देने वाला एक ही बाप है लेकिन किसको देगा ? जिसके दिन-रात संकल्प, श्वाँस में यह होगा कि 'आज ब्राह्मण कल देवता, उसके पहले बनना है फरिश्ता।' दिन-रात की यह स्मृति हमारी प्राइज़ फिक्स करती है। प्राइज़ आर्डनरी को मिल नहीं सकती है। जिसने प्रैक्टिकल ऐसा कुछ काम नहीं किया है तो उसको प्राइज कैसे मिलेगी ?
इस ईश्वरीय सेवा में जो रूल्स, रेग्युलेशन्स हैं इसकी बड़ी लिस्ट है परन्तु मुख्य बात अपवित्रता के अंश से किसी तरह का भी कहाँ थोड़ा लगाव-झुकाव है तो हम प्राइज़ लेने की लाइन में खड़े नहीं हो सकते हैं। थर्ड प्राइज़ भी नहीं मिलेगी। खुश करने के लिए भी नहीं मिलेगी। बाबा ऐसा वैसा दलाल नहीं है इसलिए इसमें पूरी चेकिंग करनी होती है। बाबा कहते है तुम्हीं चेक करो कि पवित्रता और सच्चाई कहाँ तक आई है? पहले रियलाइज़ करो कि सच्चाई क्या है? अगर झूठ का अंश भी है तो उसको सच्चा नहीं कहा जा सकता है। शक रहेगा, सोने में अलाय मिक्स है, लेकिन ऐसे पता नहीं पड़ता जब तक उसे कसौटी पर पूरा नहीं देखा है। कुछ मिक्स है, कितना है? क्या पता। सच्चा है तो सच्चा है, कुछ मिक्स है तो शक है।
तो हम अपने आपको देखें कि हमारे अन्दर कुछ मिक्स है? मिक्स होगा तो चेहरा भी बतायेगा, दिल भी बतायेगा। तो हम अपने दिल का आवाज़ सुनें कि कहाँ तक सच्ची हूँ? खुश करने के लिए नहीं, भगवान के तरफ़ से हमको यह सर्टिफिकेट मिलना चाहिए, परिवार की तरफ़ से मिले कि यह बिल्कुल सच्चे हैं। तो दुनिया भी यह कहेगी यह सच्चे हैं। सच छिपता नहीं है। थोड़ा झूठ मिक्स है तो हम सच बतायेंगे कि यह सच है तो कभी कोई विश्वास नहीं करेंगे। इसलिए हम बैठकर किसको विश्वास करायें, यह नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से किसको विश्वास बैठेगा नहीं। परन्तु जैसे सूर्य चमकता है तो अन्धेरा आपेही चला जाता है, ऐसे ही सच के आगे झूठ अपने आप चला जाता है। तो इसमें सिद्ध करने वा विश्वास बिठाने में अपनी एनर्जी को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
याद में सच्चाई माना सम्बन्ध में सच्चाई, और सर्व सम्बन्ध बाबा से हो, एक भी सम्बन्ध की कमी रही तो बाबा नहीं कहेगा कि यह सच्चे हैं। हम पूछते हैं योग क्या है? बाबा को माँ के रूप में देखो, बाप के रूप में देखो, टीचर के रूप में देखो। सतगुरु के रूप में देखो, उनकी एक-एक श्रीमत पर चलने में कितना सुख है उसका अनुभव करो। उसमें अगर जरा भी मनमत मिक्स करते तो सच्चा ज्ञान दे नहीं सकते। योग भी लग नहीं सकता। बाबा ने यज्ञ रचा है हमारा सब कुछ स्वाहा कराने के लिए। आज यह यज्ञ न होता तो हम ब्राह्मण कैसे बनते ? ब्राह्मण माना यज्ञ की सेवा करने वाले। गृहस्थी सेवा नहीं कर सकते हैं, जिसमें अपवित्रता की अंश है, सेवा करते-करते अपवित्रता का संकल्प आया तो वह यहाँ से भाग जायेगा। ऐसों को माया यहाँ से भगा ले जायेगी। यह ख्याल आता रहेगा कि अभी यहाँ कुछ नहीं है, ऐसे कई प्रकार के ख्याल आते-आते अपवित्रता जरा-सी पैदा हुई तो उनके पाँव यज्ञ में टिक नहीं पायेंगे।
भगवान ने हमारे लिए यज्ञ रचा है, तो जो हमारे पास है उसको सेवा में लगायें। संकल्प को भी सेवा में लगायें तो उसमें कमाई है। जो श्वास चलता है वह भी सेवा अर्थ है तो बाबा की याद है। श्वाँस में भी याद है तो लगता है कि अन्त मते सो गति कैसी होगी। अन्त मति क्या होगी ? जो श्वाँस चल रहा है वह चला जायेगा। कैसे गया ? याद और सेवा में गया। बहुतकाल की प्रैक्टिस होगी तो अन्त मति सो गति होगी। सत्यता और पवित्रता का पिण्ड बन जाओ तो बनाने वाला स्वतः सामने आ जायेगा। बाबा कहे बच्चे, सच्चे रहो जी बाबा। पवित्र रहना- हाँ बाबा। किसी को याद नहीं करना जी बाबा। कभी मनमत नहीं चलाना या कभी परमत के प्रभाव में नहीं आना जी बाबा। ऐसे हाँ जी, जी हाँ करने वाले ही सच्चे मददगार बनेंगे। थोड़ी-सी मदद में बाबा खुश नहीं होता है इसलिए करते चलो जितना किया उतना अच्छा। जो करेगा सो पायेगा। बीच में हम किसी को भी लायेंगे तो वह बीच से निकल जायेगा।
फलाने ने हमें समय-समय पर बड़ी मदद की है यह सूक्ष्म ख्यालात भी कहीं कहीं पुरुषार्थ में रुकावट डालते हैं। अगर मेरे को मदद की है तो मेरा हिसाब-किताब उनसे हुआ। फिर मेरे को ही चुक्तू करना पड़ेगा। इसलिए किसी को भी रिटर्न अगर मिलना है तो बाबा से मिलना है। मदद देने वाले की शुक्रिया करेंगे, परन्तु ऐसे थोड़ेही उन्हीं का चिंतन चलता रहेगा। चिंतन चला माना बोझ चढ़ा। फिर भी कहेगा मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, तुमने क्या किया। परन्तु मैं कौन हूँ ? शुरु-शुरु में यह सबको बहुत ध्यान रहता था कि मेरे से किसी का कोई हिसाब-किताब न बन जाए। हम बाबा के हो गये तो हमको जो मदद करेगा उसको बाबा ही देगा। तुम बाबा से ले लो, मेरे पीछे क्यों पड़ते? तो किसी से हिसाब-किताब न हो और कोई कर्मबन्धन भी न हो।
अगर किसी से कुछ हिसाब-किताब होगा या कुछ कर्मबन्धन होगा तो योग लगेगा ही नहीं, योग में सुस्ती आयेगी और क्लास मिस ज़रूर होगा। क्लास में जिसकी सदा प्रेजन्ट मार्क नहीं है, यह रिकार्ड भी ठीक नहीं है। क्लास कराने जाये, परन्तु क्लास में न आए तो उसका क्लास कौन सुनेगा? क्लास कराने जाना है तो रेडी हो करके टाइम पर जायेंगे, क्लास नहीं कराना है तो आये ना आये। ड्रामा प्लैन अनुसार बाबा ने इतने अच्छे नियम बनाकर दिये हैं जिससे हम सुस्त नहीं बन सकते हैं, केयरलेस नहीं हो सकते हैं, बहाना नहीं दे सकते हैं। जैसे कोई रोज़ मुरली पढ़ लेता है परन्तु उससे कोई सन्तुष्टी नहीं होती है जब तक क्लास में नहीं सुनी है। सुनो या सुनाओ। तो इतना जब तक बाबा के लिए रिगार्ड नहीं है, प्यार नहीं है तब तक प्राइज़ नहीं मिल सकती। हमारी जन्म पत्री बाबा के पास है। इसलिए एक चुप रहो, ज्यादा वाणी में नहीं आओ। हाँ, बाबा का परिचय दो, वह भी हम जितना स्मृति में रहेंगे तो मुख से बोलने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हमें स्मृति में देख दूसरों को स्मृति में रहने की मदद मिलेगी।
अगर कोई हिसाब-किताब वा कर्मबन्धन आत्मा को खींच रहा है तो आत्मा पर और ही जंक चढ़ती जाती है। कोई वस्तु खींच रही है या व्यक्ति खींच रहा है, किसी प्रकार से भी खींच रहा है और उसको अच्छा लग रहा है तो जंक चढ़ेगी या पहले वाली उतरेगी ? जरा-सा भी किसी ने खींचा तो जंक चढ़ी। फिर मीठे बाबा को याद करने से सिर में दर्द पड़ेगा और दूसरे को याद करने से सिर दर्द उत्तर जायेगा। तो ऐसी आत्मायें डबल लाइट नहीं रह सकती हैं। जो दिल की बातें एक बाबा को सुनाते हैं वह लाइट रहते हैं। बाबा कहता बच्चा, तू मेरा है तो सब कुछ मिल गया। बाबा के साथ-साथ घर की याद हो तो नीचे की बातें ऐसे लगेंगी जैसे यह मेरे कोई काम की ही नहीं हैं। बुद्धि को प्लेन (साफ) रखने से चेहरा सदा खुश, खिला हुआ रहेगा। और बातें बुद्धि को कनफ्यूज़ कर देती हैं, कभी तनाव में ले आती हैं... तो क्यों बैठकर अपने दिमाग को खराब करत!। बुद्धि कोई पत्थर तो नहीं है, उस पर क्यों इतना बोझ रखते! बाबा कहते - तुम मेरा बच्चा हो तो हल्के रहो ना। अच्छा!

भगवान से वरदान लेना है तो गफ़लत में आने के बजाए बुद्धि को स्वच्छ रखो

पुरुषार्थी आत्मायें अगर गफलत में रहती हैं तो बहुत धोखे में आ जाती हैं, इसलिए गफ़लत का संस्कार बिल्कुल न हो। सुस्ती, बहाना फिर गफ़लत। पढ़ाई में, चाहे कमाई में या लड़ाई में सुस्ती नहीं चल सकती है। लड़ाई के मैदान में रहने वालों को ऑर्डर प्रमाण जी हजूर करना पड़े, तब कहेंगे सेना में यह अच्छा वफ़ादार है। हरेक जानता है कि रावण की बहन है- सुस्ती। अगर सुस्ती होगी तो विकारों को भगा नहीं सकते हैं। सुस्ती के कई प्रकार होते हैं। मन भी कभी सुस्त हो जाता है तो तन भी कभी सुस्त हो जाता है। सम्बन्ध में, एक दो में प्यार से चलने में, व्यवहार करने में सुस्त हो जाते हैं। जिसको यह ख्याल रहता है कि मुझे बदलना है तो वह चुस्त रहता है। हर हालत में सुस्ती नुकसानकारक है। सुस्ती बहाना ले आयेगी, कोई भी अच्छे कार्य करने में कुछ बहाना आयेगा भी, और बनायेगा भी। जो दिल के सच्चे हैं वह सुस्त नहीं हो सकते हैं। जो सच्चे सेवाधारी हैं, जिसका पढ़ाई से प्यार है उनको सुस्ती नहीं आ सकती है। आजकल तो भाव-स्वभाव भी सुस्त बना देता है जैसेकि हाँ, मालूम है सबको देख लिया हमने...... तो सुस्त बन जाते हैं।
गफ़लत किसको कहा जाता है? सब कुछ समझते हुए भी समय का कदर नहीं करते। खाना और सोना, फालतू गपशप करना। इधर की बात उधर करना, यह सब करना बड़ी गफ़लत है। उसको राइट समझकर सोचना और बोलना, इन्ट्रेस्ट से सुनना - इसमें अपने आपको बहुत धोखे में रखना। सुस्ती और बहाना तो दिखाई पड़ता है, परन्तु गफ़लत का पता नहीं चलता। बुद्धि में नहीं आता कि यह समय फिर से हमारे हाथ में आने वाला नहीं है। पीछे कहेंगे गफलत में टाइम गँवाया, पश्चाताप भी करेंगे। बाबा भी कहते कि गफ़लत में रहने वाले अपने आपको आपेही श्रापित करते रहते हैं क्योंकि अपनी जीवन को हीरे तुल्य बनाने के बदले समय को ऐसे ही गंवाया, समय का फायदा नहीं लिया!
बाबा हमें इतनी ऊँची पढ़ाई पढ़ा करके प्रीत बुद्धि बना रहे हैं। निश्चय बुद्धि और प्रीत बुद्धि में कितना बल है, इसका प्रैक्टिकल अनुभव भी करा रहे हैं। यह न करके जो दिल कहे वह करते रहें तो क्या होगा? टाइम वेस्ट। जो मम्मा बाबा ने सिखाया वा जो ट्रेनिंग हमको दी है उस अनुसार न करना माना सब व्यर्थ। यज्ञ का भोजन और यज्ञ की सेवा, साथ-साथ यज्ञ रचता से प्यार हो तो समय सफल होता रहेगा। शिवबाबा इस ब्रह्मा मुख द्वारा जो ज्ञान देता है उसके लिए बहुत प्यार है, वही हमारा भोजन है, ज्ञान ही जीवन का धन है। ज्ञान सिमरण करने से भोजन की तरह शक्ति देता है। नफ़रत को खत्म करता है। और शिवबाबा के भण्डारे से जो ब्रह्मा भोजन खाते उससे भी शक्ति आती है। इसके साथ-साथ बोलने में भी ढंग हो, चाल-चलन भी अच्छा हो। अपनी अवस्था को बनाने का व्रत लेकर उसमें पक्के रहें। कम से कम शान्त रहें तो समय सफल होता रहेगा। शान्त रहना माना सीरियस शक्ल वाला नहीं। सच्ची शान्ति वाले की सूरत में प्रेम होता है, दबाकर शान्त रहने में रूखापन होता है। ऐसे चुप नहीं रहना है परन्तु जहाँ जितनी आवश्यकता है वहाँ उतना शेयर करें। बाकी अन्दर साइलेन्स में रहें और कर्म तथा सम्बन्ध में सत्यता को बरतें। हमारा एक-एक कर्म राइट हो, कोई गलती न हो जो सुधारना पड़े क्योंकि गीता में भी है और बाबा ने भी बार-बार इशारा दिया है-"जैसा हम करेंगे वैसा पायेंगे।" अपने लिए करते हैं। जितना अच्छा करने की आदत डालेंगे तो हमारे से अच्छा ही होता रहेगा। कभी गफ़लत में मिक्स करेंगे तो सदा के लिए ऐसे ही होगा। इसलिए अब कर्म में खबरदार, सावधान और होशियार रहना है। फिर कर्म का आधार है सोचना। "जैसा सोचेंगे वैसा करेंगे।" तो यह हम अपने लिए कर रहे हैं। दूसरा "जैसा कर्म हम करेंगे हमको देख और करेंगे"। हम सवेरे से रात तक जो भी कुछ करते हैं, वह छिप नहीं सकता है, हमको देख और करने लगते हैं। इस बन्धन में बाबा ने बाँध लिया है इसलिए हम स्वतन्त्र नहीं है। पुरुषार्थ में स्वतन्त्र हैं, कोई रोकता नहीं है, सच्ची दिल से पुरुषार्थ करें। न सुस्ती रखें, न बहाना बनायें, न गफलत में रहें। सेवा के अर्थ हमको जो इतना अच्छा संग मिला हुआ है, अभी उसका इतना फायदा नहीं लेते तो यह भी जैसेकि एक प्रकार से अपने भाग्य को गँवाते हैं। अन्दर एक बाहर दूसरी है, रफ़-डफ़ या साधारण चलन है, यज्ञ से सन्तुष्ट नहीं हैं, इतने बड़े ब्राह्मण कुल के लिए हमारे अन्दर रिगार्ड व प्यार नहीं हैं, गलतियाँ देखने व सोचने की आदत है तो यह सब भी गफलत है।
बाबा के घर में जो भी आत्मायें आती हैं तो एक दो को देख उनसे भी हम फायदा लेवें, एक दो के गुणों को, विशेषता को देखना, जानना उनसे सम्बन्ध में सीखने की भावना रखना, स्नेहयुक्त सम्बन्ध को कभी ढीला न करना... यह ध्यान है तो गफ़लत नहीं है। पढ़ाई में ही कमाई है, कमाई से ही शक्ति पैदा होती है, मायाजीत बनते हैं। जो मायाजीत बनते हैं उन्हें माया कभी भी तंग नहीं कर सकती है। हमारे पीछे नहीं पड़ सकती है क्योंकि हम सच्चे सुपात्र रहना चाहते हैं, सच्चे सेवाधारी रहना चाहते हैं और एक-दो के साथ ईश्वरीय अलौकिक सम्बन्ध में स्नेह की डोर को मजबूत रखना चाहते हैं। जो यह समझकर रहते हैं कि "मुझे गफ़लत में नहीं रहना है" वह सुस्ती को भी भगायेंगे और बहाना भी कभी नहीं देंगे। तो एक अपने लिए करते हैं दूसरा जो हम करेंगे हमको देख और करेंगे.. इससे या तो दुआयें मिलेगी या उनके दिल से निकलेगा कि यही ऐसे करते हैं तो मैं तो आज का आया हुआ हूँ, तो उन्हों के दिलों में क्या होगा ? पुरुषार्थ में हिम्मत और सच्चाई नहीं आयेगी, तो वह भी हम निमित्त बनें।
कहा जाता - कर्म बड़े बलवान हैं। परमात्मा सर्वशक्तिवान है, समय बहुमूल्य बनाने वाला है। कर्म भी जो करेंगे उससे सतयुग की प्रालब्ध बनेगी। कर्मातीत बनना है तो श्रेष्ठ कर्म ही करने हैं। कर्मेन्द्रियों द्वारा पहले वाले कोई भी उलटे कर्म भूल से भी अभी नहीं करो। मास्टर बन करके मन और कर्मेन्द्रियों को जीतना, उन्हें वश में रखना और उनको डिसीप्लेन सिखाने का कर्म करना इससे बल आता है। अनुशासन पर चलने में बल आता है, न सिर्फ सोचने से बल आता है। सोचा कुछ और, हुआ कुछ और... तो इसमें पर-चिन्तन होगा, जो सोचा कुछ और हुआ कुछ... सोचने के साथ स्व-चिन्तन है, रियलाइज़ेशन है तो जो सोचा वही होगा। स्व प्रति व सेवाओं प्रति हम अच्छा सोचें तो वह ज़रूर होगा, परन्तु गफलत अच्छा सोचने नहीं देती है। कहेंगे इसमें क्या है, इसमें क्या है.... इतना टू मच में थोड़े ही जाना है।
जो करना है सो अब करना है, वह भी मुझे करना है। और करावनहार सर्वशक्तिवान करा रहा है लेकिन किससे करायेगा ? क्या गफलत व सुस्ती करने वालों से करायेगा ? नहीं। अन्दर की कोई न कोई उलझन जो है या किसी की गलती को सोचने की जो घड़ी है वह बहुत नुकसानकारक है, इसलिए कहा जाता है एक घड़ी आधी घड़ी भी याद के सिवाए और कोई बात में न जाएँ। एक मिनट भी व्यर्थ गया तो बस ! आदत पड़ जायेगी व्यर्थ सोचने की, वह कभी व्यर्थ को व्यर्थ नहीं समझेंगे इतना बुद्धि को ताला लगता है। व्यर्थ सोचने से हमारे कर्म में कभी भी सच्चाई और पुरुषार्थ करने की शक्ति नहीं आयेगी। सेवा में खुशी नहीं होगी। सच्चाई में शक्ति है, शक्ति से खुशी है। इसमें सिर्फ ऊपर-ऊपर से काम चलाऊ ख्यालात होंगी तो जो भी काम करेंगे वह काम चलाऊ, बाबा से भी काम चलाऊ। जब बाबा से प्यार मिला तो बाबा बहुत अच्छा है, फिर बाबा ने कभी शिक्षा दिया तो कहेंगे बाबा मेरे को ही शिक्षा देता है, मैं तो सहन नहीं कर सकती हूँ तो कौनसा सम्बन्ध हुआ ? कभी-कभी दादियों से भी ऐसे होता है- प्यार किया, मान दिया, शान दिया तो दादी बहुत अच्छी है, अगर नहीं दिया, थोड़ी-सी शिक्षा दी तो कहेंगे- मेरे लिए तो सदैव शिक्षा रखी है। जब सामने जाओ तो शिक्षा ही मिलेगी, इसलिए दादियों से भी बात करने से फायदा ही क्या? मेरे को ही शिक्षा मिलेगी-यह सब गफ़लत में रहने की निशानियाँ हैं। शिक्षा सुनने की जिसमें शक्ति नहीं है वह पढ़ाई और कमाई के समय को, अमूल्य जीवन बनाने के समय को गँवाता है। पढ़ाई माना क्या ? रोज़ बाबा अटेन्शन खिचवाता है कि पढ़ाई में रेग्युलर रहो, पंक्चुअल रहो तो सर्व के गुण उठाने के लिए भी बुद्धि सतोगुणी रहेगी। गुण तो सबमें हैं, सिर्फ हमें देखना आना चाहिए। हँस बनने से होली बनेंगे। हँस क्या करता है? जो काम की चीज़ है वह ले ली, काम की चीज़ नहीं है तो वह नहीं ली। हँस क्वालिटी की आत्मा बोलती कुछ नहीं है परन्तु हर्षित और स्वच्छ रहती है। तो हमको भी हँस समान बुद्धिवान बनना है जिससे हम सदा के लिए राइट ही काम कर सकें।
जिसे अपनी बुद्धि को स्वच्छ रखने की लगन है, उन्हें ही भगवान से वरदान मिलते हैं, जिससे फिर वह बाबा के दिल पर चढ़ते हैं। सच्ची दिल से पुरुषार्थ करेंगे तो दिल में दुआओं का बल जमा होता रहेगा। कई बार हम औरों को दिखाते हैं कि हम बहुत अच्छे हैं, हम जो करते हैं वही राइट है और दूसरे भी हमको अच्छा-अच्छा कह करके हमें ऐसे ही खुश करके और ही हमको गफ़लत में डालते हैं। लेकिन अन्दर से सूक्ष्म गहराई में जाओ तो अपना विवेक हमको बताता है कि हम राइट हैं या नहीं। ज्ञान भी हमें बताता है परन्तु ज्ञान की भी अगर गहराई में नहीं जाते हैं, विवेक से काम नहीं लेते हैं तो अनुभव नहीं कर सकते हैं। ज्ञान कहता है - तुम आत्मा हो, परमात्मा की सन्तान हो, सबको भाई भाई की दृष्टि से देखो। फिर तुम ब्राह्मण आपस में भाई-बहन हो। सच्चा ब्राह्मण वह जिसका आहार-विहार-विचार शुद्ध हो। तो यह न सिर्फ समझ है परन्तु विवेक कहता है- हम अपने को अच्छा ब्राह्मण तभी समझेंगे जब याद रहेगा कि हम ब्रह्मा-मुखवंशावली हैं। हमारा आहार, व्यवहार, विचार सब ठीक होगा। इसमें भी हमें मिया मिठ्ठू नहीं बनना है लेकिन सबको यह फीलिंग आये कि यह संयम और नियमों में एक्यूरेट और पक्का है। तो जैसे हमारे बाबा ने यज्ञ में सब कुछ समर्पित किया, ऐसे हमें भी सब कुछ समर्पित कर देना है। पुरानी कोई बात कभी भूल से भी याद न आये, कोई खींचे नहीं। बाबा ने ऐसी स्मृति दिलाई कि तुम कल्प पहले वाले हो, तो अन्तिम जन्म वालों के साथ पुराने हिसाब-किताब की अन्त हो गयी। कर्म बन्धन कट गये, हिसाब-किताब की अन्त हो गयी, न उनको कुछ हमारे से चाहिए, न उनसे हमारे को कुछ चाहिए। अभी हमें किसी से कुछ नहीं चाहिए एक बाबा के सिवाए। उनको मेरे से क्या चाहिए ? जो मेरे को मिला है वह तू ले ले। हमको जो सेवा मिली है वह तुम ले लो माना सेवा करने में सहयोगी बनो।
तो बुद्धि को स्वच्छ रखना माना बर्तन को माँज कर साफ़ रखना। बर्तन माँजना बहुत अच्छा काम है। भाषण में तो कुछ मिक्स कर सकते हैं, उसके लिए कुछ प्वाइन्ट्स को इकट्ठा करके उस पर सोचना पड़ेगा इसलिए भाषण करना आसान है परन्तु बुद्धि को स्वच्छ सतोगुणी बनाना है तो अन्तर्मुखी रहना पड़ेगा, सदा स्व-चिन्तन में रहना पड़ेगा। बड़ा ध्यान रखना पड़ेगा कि बुद्धि में कोई कहीं से भी कुछ थोड़ा भी किसी भी प्रकार से किचड़ा न जाये, अगर चला गया तो बुद्धि रजोगुणी बन जायेगी। रजोगुणी बनें तो डाउट उठने लगेंगे। तमोगुणी बनेंगे तो क्वेश्चन ही क्वेश्चन, संशय ही संशय क्योंकि बुद्धि में कहीं से किचड़ा पड़ा। तो बात को अन्दर समाना, सहन करना, सीखने की भावना रखना, जो बोलना है वह समझ करके बोलना, नहीं तो उसका रियेक्शन हो जायेगा।
हँस बनना है तो सतोगुणी बनो और सतोप्रधान बनना है तो थोड़ी सी भी गफ़लत नहीं करना है। सतोगुणी नहीं बनेंगे तो सतोप्रधान बनकर सतयुग में नहीं आ सकेंगे। कई बार अपनी कॉन्सेस, अपना विवेक अन्दर से कहता है कि तुम यह राँग कर रहे हो, परन्तु फिर भी नहीं माना तो ज़रूर कोई-न-कोई बात का प्रभाव है। उल्टा या सुल्टा। फिर अच्छी बात मानने के लिए भी बुद्धि को ताला लग जाता है। उसके नज़दीक वाले भी अगर शुभ भावना से कोई बात उसको बतायेंगे तो भी वह उसका रूप उल्टा ले लेंगे। ऐसे सम्बन्ध में रहने नहीं देंगे और सुख-चैन से जीने नहीं देंगे। तो कभी भी गफलत में आना माना रियलाइज़ेशन की शक्ति खत्म करना। जो सदा अपनी बात को फट से अन्दर से रियलाइज़ करते हैं या कहाँ से कुछ इशारा मिलता है तो दिल से मानते हैं तो उनमें उम्मीदें रहती हैं। अच्छा- जो बीती सो बीती, अभी क्या करने का है, अभी एक दो के शुभ-चिंतक रह करके आगे बढ़ने की सेवा करनी और करानी है।
विश्व-सेवाधारी बनने के लिए एक दो को सच्ची मदद देनी है। जितनी सच्ची मदद एक-दो को देंगे, ईश्वरीय स्नेह-युक्त सम्बन्ध में रहेंगे तो माला में नज़दीक आयेंगे और दूसरों को लायेंगे। माला में हम अकेले तो नहीं आयेंगे ना। ईश्वरीय रूहानी स्नेह की शक्ति से, सच्ची भावना से सभी आत्मायें अपने आप नज़दीक आती जायेंगी सिर्फ इसमें हमारी अन्दर की यह शुभ भावना हो कि यह भी आ जायें, वह भी आयें तो हमारे लिए खुशी की बात है। तो रीस भी नहीं करो, रेस में रहो और एक-दो को सहयोग की, स्नेह की मदद करना एक फर्ज भी है। तो समय कहता है यही काम तुम करो। बाबा भी कहता है तुम यही करो, विवेक भी कहता है तुम यही करो, ईश्वरीय परिवार भी कहेगा यही करो... तो इन चारों की भी बात न सुनी तो क्या होगा ? बहुत बड़ी गफलत हुई। एक की भी अगर हमने नहीं सुनी तो चारों की भी नहीं सुनी। तो इतना सुनने और सुनाने की शक्ति धारण करके, अपने को समझदार बनाते आगे चलते रहना है। अच्छा।

बाप और मंज़िल सदा याद हो-तब कहेंगे सरेण्डर

नये साल में सिर्फ मुख से एक दो को मुबारक न दें लेकिन बार-बार, अनेक बार अपने भाग्य को मुबारक दें। सारे कल्प के अन्दर जो करना है सो अब कर लें। अभी कहने में आता है जो कुछ करना है सो अब कर लें क्योंकि हम आत्मायें परमात्मा तो बन नहीं सकती हैं। ऊँचे-से-ऊँचा एक है और सबका एक है। सृष्टि में कितनी भी मनुष्यात्मायें हैं, खास अभी सभी आत्मायें बाप के घर से मंच पर उतरी हुई है- अपना-अपना पार्ट बजाने के लिए। फिर अब वहाँ जाना है। आये तो अपने-अपने समय अनुसार लेकिन जाना हम सबको इकट्ठा है। यह समय है ऊपर जाने का, क्योंकि अब यह नाटक पूरा हुआ है।
सरेण्डर का अर्थ क्या है? सरेण्डर माना बाप और मंजिल याद हो। जैसे बाप सदा विदेही है, सिर्फ अभी ब्रह्मा बाबा के तन में प्रवेश हो करके हमको विदेही बनने की ट्रेनिंग देता है। ताकि आराम से सब हिसाब-किताब चुक्तू करके पुराने जो किये हुए पाप हैं उन्हें दग्ध करके वापस घर जा सकें। बाबा कहते- बच्चे, गलतियाँ तुमने की हैं लेकिन मैं तुम्हारा बाप होने कारण सब माफ करता हूँ। भले मैं धर्मराज भी हूँ परन्तु अभी मैं तुम्हारा बाप हूँ, इसलिए यह बाप क्षमा भी करता है, रहम भाव भी रखता हैं। तो बाप पहले क्षमा करता जिससे किये हुए विकर्म भूल जाएँ फिर रहम करके शक्ति भी देता जिससे आत्मा जैसी पावन थी वैसी पावन फिर से बन जाये।
फिर बाबा कहते - योग अच्छी तरह से लगाओ और अपने मंज़िल को सामने रखो। साथ-साथ जो बहुत दुःख पाये हुए हैं उसको खत्म करके सुख और शान्ति में सम्पन्न हो जाओ। एक तो हम परमात्मा से दूर हो गये। दूसरा - देह-अभिमान में आये तो विकारों ने घेराव कर लिया। तो अभी बाबा कहते हैं अच्छा, जो बीती है उसको भूल जाओ। मेरे से अलग हो गये तो यह सब हुआ, अभी मेरे पास आ जाओ, सरेण्डर हो जाओ। तो उस याद की शक्ति से बाप हमें क्षमा करके सब पापों से मुक्त करा देंगे। योग की अग्नि में किये हुए सारे विकर्म जल जायेंगे। फिर तुम आत्मा शुद्ध पावन हो जायेंगी। पावन बनने से तुम मन, वचन, कर्म इन तीनों के द्वारा श्रेष्ठ आत्मा बन जायेंगे। तो बाप ने कितना हमारे लिए मेहरवानी की है।
ऐसे मीठे-मीठे बाप को दिन भर में बार-बार, लाखों बार याद करते रहना चाहिए यानि उसकी याद में ही हमारा सब काम सहज और सरल होता रहे। जो कोई भूल करता है उसके लिए हमारा स्नेह टूट जाता है लेकिन यह बाबा तो जो कोई भूल करता है उसको और ही बड़े रहम भाव से, स्नेह दे करके उसको पढ़ाता है, भूल सुधार कैसे हो इसके लिए बैठ करके शिक्षायें देता है। लोग तो कहेंगे भूल करने वाले को तो माफ नहीं करना चाहिए। कई कहते हैं हमको इसके लिए तरस नहीं पड़ता है क्योंकि इसने बहुत पाप किया है। इसको कौन स्नेह और रिगार्ड देगा ? खुद भी नहीं देते और दूसरों को भी ऐसे बोलते हैं। लेकिन यह एक ही बाप है जो कभी हमारे साथ ऐसा नहीं करते हैं, तो ऐसे बाप से कितनी मीठी बातें करनी चाहिए ? बाबा कहते हैं- बाबा से मीठी-मीठी बातें करो तो क्या बात करें ? इतनी ऊँची बातें करने का अक्ल है? पहले अपने को दिल से रियलाइज़ करके माफ करो। एक खुद को माफ़ करना दूसरा भगवान से माफी माँगना और जिनके साथ कुछ हो गया उनसे भी माफी माँगना, मुझे फ्री करो। मैंने यह गलती किया है इसलिए मुझे माफ कर दो। बस। यह नहीं कि मैंने ही थोड़ी गलती की, उसने भी तो की, इसमें नहीं जाना है।
तो डीप रियलाइज़ेशन से परिवर्तन करने के लिए अपने अन्दर जो देह-अभिमान भरा पड़ा है, जिससे खुद को माफ़ करना और दूसरों को माफ़ करना बड़ा मुश्किल लगता है। खुद को भी अच्छा महसूस करें यह भी उनसे नहीं होगा। मैंने उनके साथ व्यवहार कैसा, क्या किया ? या किसने भी मेरे साथ व्यवहार क्या किया ? इसी के बारे में, इसी के विस्तार में टाइम पास करेंगे। अभी ज्ञान की समझ से हमारा योग परमात्मा से लगा है तो अपने को चेंज करना है। इसके लिए ऐसी रियलाइ‌जेशन हो जो पीछे हमको पश्चाताप न करना पड़े। पश्चाताप की वह घड़ियाँ अच्छी नहीं होगी क्योंकि अशरीरी परमात्मा बाप ने साकार में इस शरीर का आधार ले करके हमारे लिए बाप, शिक्षक, सतगुरु और सखा का प्रैक्टिकल रूप धारण करके हमें पढ़ाया, सिखाया, सावधानियों के साथ समझ दी, हर प्रकार से शिक्षा, पालना दी और भी सब कुछ जो भी करना था वह किया है और कर रहे हैं। तो समझ, शिक्षा और सावधानी दे करके बाबा कहते तुम बच्चे मेरे होकरके अब ऐसे मत करो। स्वयं परमात्मा बाप माँ बन करके एक-एक वैल्यूज़ को धारण कराने के लिए कितना पुरुषार्थ करा रहे हैं।
तो अभी ऐसे कोई बेकायदे कर्म करके अपने पाँव पर आपेही कुल्हाड़ा नहीं मारो। अभी तक एक-दो को दोषी बनाते हैं, उस समय कोई किसी को दोषी नहीं बना सकेंगे। तो यह मेरी गलती है इसीलिए बाबा ने हमेशा कहा है कि उस घड़ी साक्षात्कार होगा - अच्छा किया है तो बाप, घर और वैकुण्ठ का साक्षात्कार होगा। इस अन्तिम घड़ियों में सब पुराना खत्म करके एक बाप, दूसरा स्वीट होम, तीसरा स्वीट राजधानी उसके सिवाए और कुछ सामने नहीं आवे। मेरे लिए सब कुछ पास्ट हो गया और पास हो गये। पास विद् ऑनर में आने की लगन ने यह अनुभव कराया कि हम आने वाली राजधानी में क्या बनेंगे और साथियों का भी साक्षात्कार होगा। अभी हम सबको कहते हैं कि बी. के. हो या कोई भी हो मधुबन में आ जाओ, किसलिए आओ ? पुरानी सब बातों को भूल बाप के बनकर के बाप द्वारा जो समझ और शिक्षायें मिली हैं उसको धारण करके अपना श्रेष्ठ जीवन बनाओ तो आप अनेकों को श्रेष्ठ बनाने का काम करेंगे।
पुराने हैं चाहे नये हैं हरेक के लिए यहाँ एक ही बात है वह कौनसी ? जो करना है वो अब कर लो क्योंकि अब नहीं तो कब नहीं! इसलिए आज जो करना है सो कल नहीं लेकिन अभी करो। समय कहता है अब कर लें और बाबा कहता है- बच्चा, तू कर ले- मैं मददगार बैठा हूँ। कैसे करूं यह क्वेश्चन नहीं पूछो। तुम सिर्फ बुद्धि को श्रेष्ठ बनाओ और दृढ़ संकल्प रखो कि बाबा अभी मुझे यही करना है। जो आप करा रहे हो वही करना है। बाबा से पहले अपने से बात करो कि अब मेरे को क्या करना है? यहाँ बैठे डिसाइड करो, ज़्यादा सोचो नहीं, किसी से पूछो नहीं। वह आपको क्या बतायेंगे, सोचेंगे तो समय गँवायेंगे और पूछेंगे तो मूझेंगे इसलिए बाबा ने कहा है अपने से बात करो। अपने से क्या बात करना है? जो बाबा कहता है वह अपने से पूछो, फिर बाबा से बात करो।
बाबा से बातें करने से सब बातों की समझ आ जाती है जिससे फिर किसी भी बात में ज़्यादा सोचने और कहीं मूँझने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। तो चेहरे में चमक आती जाती है। जब हम एक बार भगवान के बन गये तो हमारे पीछे कौन पड़ेगा, जो पीछे पड़ेगा वह भी बन जायेगा। भले आ जाये, मेरे को वह खींच नहीं सकता है। अभी सबको बाप से मिलन मना करके पावन बनना है और घर जाके आने वाली नई दुनिया सतयुग के राज्य में आना है। न सिर्फ आना है परन्तु वहाँ ऊँच राज्य पद भी पाना है। तो दूसरों से भी यही बात करेंगे कि यह है ही कलियुग काला बनाने वाला। संगम है हीरे तुल्य बनाने वाला।
तो अभी हमारे मन और तन को बाबा ने कितना स्वच्छ बनाया है। आज इस घड़ी कोई भी इन्सान अपने को इतना स्वच्छ देव समान बना सकता है, परन्तु अपने को कॉमन और आर्डनरी आत्मा समझते रहेंगे तो क्या होगा ? कुछेक का तो रूप मनुष्य का परन्तु जीवन हैवान जैसा होता है, उनका खाना, पीना, सोना ही सब अलग होता है। तो अभी हमको वह करना है जो बाबा कहते हैं। तुम अपनी या और किसकी चिंता करेंगे तो तुम मेरे नहीं बनेंगे, मैं भी तुम्हारा जवाबदार नहीं बन सकता हूँ इसलिए चिंता को छोड़ो और स्व को पहचानो, साथ-साथ ईश्वरीय चिंतन में रहो। ईश्वर ही मेरा सच्चा माँ-बाप, सखा और साजन है, मैं तो उनका ही हूँ तो वह रेसपान्सिबुल है। तुम ऐसे मेरे बनो, निश्चित रहने वाले अटल निश्चयबुद्धि, कुछ भी बात हो जाये तो तुम्हारे चेहरे पर मीठी ज्ञान-युक्त मुस्कराहट हो, रूहानियत की झलक हो, किसके हैं उसकी फलक भी हो। ऐसे श्रृंगारे हुए बच्चे ही सच्चे सेवाधारी है।
बाबा कहते कर्म भले करो धन्धा- धोरी भले करो लेकिन लोभ नहीं रखो। सच्चाई से जो धन कमायेंगे वह सफल होगा। एक तो सच्चाई से कमाया दूसरा अपने प्रति वेस्ट नहीं गँवाया और रसम-रिवाज में भी नहीं गँवाया उसको फुलस्टॉप लगा दिया। फिर क्या करना है? ईश्वरीय सेवा में हाज़िर रह करके सबकी दुआयें लेते रहना है क्योंकि भक्ति में भी कहते हैं जो भगवान अर्थ करते हैं उन्हें भगवान भी दस गुणा करके देता है। और यहाँ ज्ञानमार्ग में जो भगवान अर्थ करते हैं उन्हें तो सौ गुणा मिलता है। तो हमारे इस प्रकार के श्रेष्ठ संकल्प में बहुत ताकत होती है। जरा-सा व्यर्थ संकल्प कमजोर बनाता है और भ्रमित करने वाला संकल्प मूँझने में टाइम गंवाता है। करूं या न करूँ इसमें जिसने टाइम गँवाया उसे पश्चाताप की घड़ी देखनी पड़ेगी।
तो समझ कहती है- तुम क्या सोचो ? शिक्षा कहती है आइने में देखो, क्योंकि तुमको बहुत सुन्दर बनना है। रूहानियत की राहत में रहना है, किसी को दुःख नहीं देना है। कोई देता है तो लेना नहीं है। भले कोई कितना भी दुःख दे फिर भी लेवे नहीं। देने वाला हमारी टेस्ट लेता है और लेने वाला लेना जानते नहीं हैं। फिर कहेंगे यह क्या हमारा हिसाब-किताब है, यह घड़ी-घड़ी मुझे दुःख देता है जिस घड़ी यह सोचा ना उस घड़ी फेल क्योंकि दुःख लेते ही क्यों हो! लेते समय ले लिया इसलिए और भी देता रहेगा। इसलिए सुखकर्ता बाप से बातें करके उनसे ही सुख लेते रहो तो दुःखी होने का सवाल ही नहीं है।
सभी कहते हैं बाबा ने कितना अच्छा ज्ञान दिया है परन्तु हम कहते हैं प्यार बहुत अच्छा दिया है क्योंकि प्यार न देता तो ज्ञान सुनने की बुद्धि कहाँ से आती ? उसके प्यार में हम सब खींचकर आये हैं क्योंकि हर आत्मा को ऐसे प्यार की आवश्यकता थी। जिन्होंने आत्माओं के प्यार में धोखा खा-खा कर बहुत ठोकरे खाई हैं, इधर उधर भटकते भिखारी बन गये, दुःखी हो गये, तो भगवान ने उनके लिए बहुत अच्छी एक युक्ति रची कि सच्चा प्यार दे करके अपना बना लिया और फिर अच्छा बनने की शिक्षायें दी। तो बाबा कहता है जो करना है अब कर। आज करने वाला काम भी अब करो तो कल बहुत अच्छा होगा। सब बातों से मुक्त, सदा जीवनमुक्त का अनुभव होगा। आज के दिन का सच्ची मेहनत का फल बहुत अच्छा मिलेगा यह गैरण्टी है। इतना दिल से परिवर्तन करना है। तो समझदार बन अच्छा सिकीलधा, बाबा का लाड़ला बच्चा बन नूर में बाबा को छिपा लें। पहले बाबा को दिल में छिपा लो तो दिल में दिलाराम की ताकत आती रहेगी। अच्छा।

कर्म और सम्बन्ध का पता गुणों से होता है, इसलिए कर्म में रूहानियत और सम्बन्ध में सच्चाई हो

बाबा के मीठे-मीठे बोल कानों द्वारा सुनकर चित्त शान्त हो जाता है और मुख हर्षित हो जाता है। चित्त शान्त होने से अनुभव कहता है - वृत्ति शुद्ध और पॉवरफुल बन जाती है। बाबा के हर बच्चे को अब यह लगन है कि मैं विजयी रत्न बनूँ। भाग्य विधाता ने भाग्य हमारे हाथों में दिया है। जो करेंगे सो पायेंगे। कुदरती जो करते हैं वह हस्तों से दिखाई पड़ता है। अच्छा बुरा कराने वाला मन है परन्तु करता है हाथों के द्वारा। इसलिए बाबा कहते हैं कि बाप की श्रीमत पर चलो। उनकी बताई हुए राहों पर चलते हुए आगे बढ़ते चलना है क्योंकि मंजिल ऊँची है, इसमें उतराई चढ़ाई आयेगी परन्तु अपने आपको सम्भालना है।
हमारा बाबा हमको राह भी बताता है तो साथ में भी ले चलता है। सिर्फ कहता है बच्चे, पवित्र बनो, योगी बनो। इसके लिए बाबा ने कितना अटेन्शन खिंचवाया है सच्ची दिल पर साहब राजी क्योंकि सच्ची दिल ही पवित्र बनाती है। साहब राजी तो धर्मराज कुछ कर नहीं सकता है। वह मेरा बाबा है, जो मुझे सर्व सम्बन्धों से सुख दे रहा है, पालना कर रहा है। ज्ञान-मूर्त, गुण-मर्त बनाने के लिए रोज़ ज्ञान की लोरी देता है। ज्ञान का पता चलता है मन, वाणी और चलन से। जब ज्ञान बुद्धि में बैठता है तो मन में एकाग्रता की शक्ति आती है जो चंचलता के संकल्पों को खत्म कर देती है। जब बुद्धि ज्ञानयुक्त है, तो बुद्धि की स्थिरता से स्थिति अचल-अडोल बन जाती है। अवगुण इतने थे जो गुण कोई रहा ही नहीं, निर्गुण हो गये यानि दैवी गुण सारे खत्म हो गये। आसुरी गुणों ने हमारे उपर राज्य कर लिया, अभी उसका राज्य चला जाए और दैवी गुण हमारे में प्रवेश हो जाएँ क्योंकि हम देवता बनने वाली आत्मा हैं।
हम आत्मा ने 84 का चक्र लगाया है, यह बोलने वाला ज्ञान नहीं है, सिमरण करने व स्मृति में रहने वाला ज्ञान है। भक्ति में तो सिर्फ राम का नाम ही सिमरण करते रहते हैं। लेकिन अभी उसकी स्मृति में रहने के लिए बाबा ने जो समझ व ज्ञान दिया है वह सिमरण करते-करते हम स्मृति स्वरूप बन जाते हैं क्योंकि जो बात बार-बार सिमरण की जाती है, वह अपने आप ही स्मृति में आ जाती है। कईयों को पुरानी बातें भूलती नहीं है यह उनकी बड़ी भूल है क्योंकि वह कभी अभुल बन नहीं सकेंगे। पुरानी बात भूल जाना यह अक्लमंद की निशानी है। पुरानी बातों की यादास्त बुद्धि को कमज़ोर बना देती है। जो काम ज़रूरी होता है वह धीरज, शान्ति और प्रेम से करने से वह काम पूरा कर सकते हैं और अगर कोई बीच में इंटररफेयर करता है तो थक जाते हैं। तो पुरानी बातें, पुराने संस्कार ही बहुत इण्टर फेयर करते हैं इसलिए धीरज और गम्भीरता का गुण बहुत सयाना बनाता है। ज्ञानी तू आत्मा की यह पहली निशानी है कि वह ज्ञानमूर्त और गुणमूर्त रहे जैसे हमारी मम्मा क्योंकि गुणों का कर्म और सम्बन्धों से पता चलता है।
तो हमारे कर्म में रूहानियत और सम्बन्धों में सच्चाई हो। तो रूहानी राहत में रहने की सबको सौगात देनी है। हमारा ईश्वरीय परिवार भी बहुत बड़ा है, मेरा कोई नहीं है परन्तु हमारे सब हैं। मेरा एक बाबा है परन्तु यह सब हमारे हैं। बाबा इन सबसे दैवी राजधानी की स्थापना का काम करवा रहा है। अभी यह ब्रह्मा-मुखवंशावली है, कल विष्णुवंशी बनने वाले हैं, ऐसे एक दो का दिव्य दर्शन करते अपने को स्मृति में रखना है कि हम थे, हैं और होंगे। तो यह बाबा हमारा है, लेकिन यही बाबा फिर धर्मराज भी है, यह कभी नहीं भूलना चाहिए। डर नहीं है लेकिन मेरा बाबा धर्मराज है तो मुझे सत्-धर्म और स्व-धर्म में रहना है तब शक्ति मिलेगी। फिर हमारे से कोई उल्टा काम नहीं होगा, किया हुआ खत्म हो जायेगा -यह स्मृति व्यर्थ सोचने, बोलने व करने में सावधान रखती है।
बाबा कहते - कभी किसी को गुस्सा किया, हाथ चलाया माना क्रोध है, मुख से खराब शब्द बोला माना क्रोध है, इससे रिकार्ड खराब किसका हुआ ? खुद का ही। तो बाबा कितनी अच्छी मीठी शिक्षायें दे करके सावधान करते हैं। खा रहे हो बाप के घर का और याद करते हो मित्र-सम्बन्धियों को, तो बुद्धि क्या कर रही है? बुद्धि बाहर क्यों जा रही है? बाबा कहते तुमको यह नहीं दीख रहा है कि यह सब मरने वाले है इसलिए बुद्धि को वहाँ से छुड़ा दो और बाप को याद करो। जानते हो बाप को याद करते-करते विकर्म विनाश होंगे इसमें माया भी किसी ना किसी तरह से इंटरफेयर करेगी लेकिन अपने बुद्धि को वहाँ से हटा करके बाप को याद करो। वह अनेक हैं, बाबा एक है। अनेकों से हटाओ, एक बाप को याद करो। बातें तो दिन भर में अनेक प्रकार की चटपटी और अटपटी आयेंगी, खिटपिट भी होगी। अनहोनी बातें भी आयेंगी लेकिन जिसको नष्टोमोहा बनने की, स्मृति-स्वरूप बनने की धुन या लगन लगी हुई है, वह उन बातों से परेशान नहीं होंगे। उन बातों में वह इन्ट्रेस्ट नहीं लेंगे। जब नष्टोमोहा हैं तब स्मृति-स्वरूप हैं। स्मृति में रहने से कितने फायदे हैं, इसकी लिस्ट निकालने से कभी बाबा को भूल ही नहीं सकते हैं। कर्म में भी बाबा याद आयेगा, बाबा करा रहा है ऐसा लगेगा। हम चल रहे हैं तो बाबा के साथ चल रहे हैं, हम खा रहे हैं तो बाबा हमें खिला रहा है...। इस प्रकार से स्मृति में रहना - यह प्रवृत्ति में रहने वालों को भी इज़ी है। सब कुछ बाबा के हवाले कर दिया फिर बाबा ने कहा ट्रस्टी होकर सम्भालो क्योंकि हमारा तन, धन बाबा क्या करेगा ? मन भी क्या करेगा? बाबा कहता है तुम याद करोगे तो तेरे पाप नाश होंगे। तन से सेवा करोगे तो उसका फल मिलेगा, बाबा और ही मददगार रहेगा। मन बाबा में लगाओगे तो 'मध्याजी-भव' याद रहेगा, अगर मन बीमारी में लग जायेगा माना इस शरीर को देखते रहेंगे तो प्रालब्ध क्या बनायेंगे? इसलिए बाबा कहते हैं कि ड्रामा का ज्ञान बुद्धि में इतना अच्छा हो जो क्यों हुआ? क्या हुआ ? यह क्वेश्चन भी न उठे। पता है यह पुराना शरीर है, बीमारियाँ आयेंगी फिर भी भाग्यशाली हैं जो कमाल है इसकी जो ऊपर लेके जा रहा है। यह पुराना शरीर कितना काम लायक है, 21 जन्म तो क्या, 84 जन्मों में श्रेष्ठ पूज्य-पुजारी बनाने वाला है। तो सारे कल्प में सफल करने का समय भी अभी है, जो बाबा कहते गरीब के एक रूपये का भी यज्ञ में कितना महत्व है क्योंकि गरीब में बहुत भावना होती है, साहूकार सोचेगा - करें ना करें या करें तो कितना करें? और गरीब क्या करेंगे? सुदामा मिसल चावल मुटठी देंगे। समझेंगे जो है वह बाबा का है। शुरू शुरू में पेट को पट्टी बाँध करके भी कईयों ने यज्ञ की सेवा की है। वो दिन भी अति प्यारे थे, छोटी-सी कुटिया में बैठकर बाबा ने बच्चों को लोरी दी है। पालना दी है। जिसकी शक्ति आज भी सेवा में काम आ रही है। अभी यह भी दिन प्यारे हैं अपनी रीति से।
तो बाबा हमारा धर्मराज भी है इसलिए हमको सच्चा दिलवाला बनना है। इतना भी छिपाया तो सच्चा कैसे कहेंगे। कहा जाता है सच्चाई से बेडा पार हो जायेगा, ले जाने वाला लेकर जा रहा है इसलिए कभी यह ख्याल आ नहीं सकता है कि क्या होगा ? दुनिया में कुछ भी हो जाए हमने बाप के हाथ में हाथ दिया है, हाथ में भी हाथ उसका है, सिर पर भी हाथ उसका है और पीठ पर भी हाथ है, इतना ही नहीं बल्कि दिल पर उसका हाथ है तभी तो कहते हैं- बाबा हमारा दिलवाला है तो ख्याल काहे का ? क्योंकि सब कुछ अच्छा हुआ पड़ा है, अच्छा हो ही जायेगा, ऐसे अन्दर से गैरन्टी वाले बोल निकलते हैं क्योंकि जो हुआ है उससे कुछ सीखने और जानने को मिला है, अनुभव करने को मिला है। अब क्या होगा ? बहुत अच्छा होगा। अब तो बस उड़ती कला का अनुभव करते रहेंगे। हम कहाँ रुकने वाले नहीं हैं क्योंकि साफ़, सीधा रास्ता है। दूसरी बात हम अकेले नहीं है क्योंकि इतने सब हमारे साथ इस यात्रा में चल रहे हैं और सबको सावधान करने वाला तो बाबा ही है, परन्तु इसमें पहले खुद सावधान रह एक-दो की उन्नति के लिए रास्ता साफ़ रखना है, तो यह यात्रा जल्दी सफल होगी।
हमारी 'अन्त मति सो गति' अच्छी हो इसके लिए क्या व्रत लें ? व्यर्थ संकल्प भूल से भी न आये। विकल्प तो छोड़ो उसको तो खत्म करो, परन्तु व्यर्थ संकल्प लाना भी भूल है। शुद्ध, श्रेष्ठ, दृढ़ संकल्प में रहना यह मेरा धर्म है। कभी भी हमारे संकल्प में कमज़ोरी न आये तो दृढ़ता क्या से क्या करा सकती है! इसमें संकल्प शुद्ध और श्रेष्ठ ज़रूर हों। ऊँचे-से-ऊँचे भगवान के बच्चे हैं तो अपने संकल्प की क्वालिटी ऊँची रखें। हम किसके बच्चे हैं यह अपने संकल्प से देखें। तो संकल्प की क्वालिटी को ऊँचा बनाना है क्योंकि हम हैं श्रेष्ठ सर्वोत्तम बाबा के बच्चे, विश्व-कल्याणकारी बच्चे। ऐसे कल्याणकारी बच्चों को बाबा अपनी नज़रों में ऐसे रखता है कि यह मेरा विश्व-कल्याणकारी बच्चा है। तो आप अन्दर से अपने आपको पूछो कि हम कितने महान भाग्यशाली हैं। ऐसी नज़रों में छिपाने वाले बाबा को दिल कहती है कि बार-बार शुक्रिया करते रहें। अच्छा।

१०८ में आने के लिए पुरुषार्थ-हीन बनाने वाले कमज़ोर व निगेटिव संकल्पों को समाप्त करो

जब बाबा शब्द आता है तो एक में तीन बाबा याद आते है। साकारी, आकारी, निराकारी, तीनों बाबा एक में है। साकार द्वारा निराकार बाप को जाना और उनके द्वारा मन कर्मेन्द्रियों को जीतने से अतिन्द्रिय सुख पाया। यह नज़रों से निहाल करने वाले नयन न होते तो निराकार शिवबाबा को हम कैसे देख पाते ! हम अपनी बुद्धि को वहाँ घर तक कैसे ले जा सकते ? ब्रह्मा बाप को साकार में होते हुए सदा अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप में देखा है। साकार में होते अनासक्त वृत्ति और नष्टोमोहा देखा है। योगी हो तो कैसा? ट्रस्टी हो तो कैसा? तो बाबा को देखने और जानने का अनुभव हमको चला रहा है।
१८ जनवरी डायरेक्ट बाबा की स्मृति दिलाने वाला दिवस है। किसकी स्मृति और कैसी स्मृति रहे? जो बाबा ने कहा मेहनत से मुक्त हो जाएँ। तो स्मृति में रहने वाले सहज ही मेहनत से मुक्त हो जायेंगे। यह स्मृति श्रेष्ठ बुद्धि बनाने वाली है, जब श्रेष्ठ बुद्धि है तो कोई ऐसा व्यर्थ या जो योग्य नहीं है, वह कर्म होता ही नहीं है फिर मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। साकारी, आकारी, निराकारी इन तीनों रूपों में अन्तर दिखाई नहीं पड़ता है परन्तु तीनों का अनुभव न्यारा होता है। तीनों में एक है, एक में तीन हैं। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, शंकर त्रिमूर्ति शिव है, ऐसे ही ब्रह्मा बाबा - अव्यक्त और निराकार का अनुभव, उपराम रहने का अनुभव करा देता है। हम कर्तापन के भान से दूर रहें तो वह अनुभव कराता है। इन अनुभवों से निराकारी स्थिति से अभिमान के अंश को चकनाचूर कर दो इसलिये बाबा कहते हैं-देही-अभिमानी भव।
जिसको ऊँच पद पाना है वह अच्छी तरह से सुनेंगे और धारण करेंगे, जिनको पद का ख्याल नहीं है वह अच्छी तरह से सुनेंगे भी नहीं और धारणा पर ध्यान भी नहीं देंगे। सुनते-सुनते और धारणा करते-करते हम नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनेंगे। सुनने बिगर धारणा नहीं होती है, कोई सुनी-अनसुनी करते हैं, कोई सुनते-सुनते बोर हो जाते हैं तो वह ऊँच पद कैसे पायेंगे! जो सुन करके अच्छी तरह से अमल में नहीं लाते हैं उसको खुशी कहाँ से आयेगी? दूसरों को अच्छी तहर से दान नहीं देते हैं तो आगे बढ़ेगा कैसे? ऊंच पद पाना है तो कोई ताज, तख्त या कपड़े नहीं चाहिए लेकिन ऊँचाई वह है जिसमें ज़रा अंशमात्र भी कलियुग के कोई अवगुण की प्रवेशता न हो, सर्वगुण हों।
सम्पूर्ण निर्विकारी भी किसको कहा जाता है उसका अनुभव करें। ज्ञान तो मिला विकारों को छोड़ो। वह तो चले गये, कैसे गये? पतित-पावन बाबा की यादों से और उनके संग से गये। सर्वशक्तिवान की शक्ति से गये। विकार गये हैं तो उसकी निशानियाँ क्या होंगी ? उनके हर संकल्प में, हर बोल में नम्रता आ जाती है, फिर सत्यता को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती है क्योंकि नम्रता सत्यता को दिखाती है। और सत्यता, अभिमान आने नहीं देती है। मैं जो हूँ जैसा हूँ जैसे हीरा मिट्टी में चमकता है, ऐसे उनको भी किसी बात को सिद्ध करने की कोशिश व मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। तो मैं सत्य हूँ यह सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं है। बाबा की शिक्षायें इतना सच्चा बनाने वाली हैं, बाबा ने हमको सत्कर्मी बना दिया है। जरा सा भी कुछ सिद्ध करने का संकल्प आया तो उसको फिर मिटाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। हम कहते हैं इतनी अच्छी समझ होने के बाद भी ऐसे फालतू मेहनत करने का काम करें ही क्यों? अपने को सिद्ध करने के पीछे इतना विस्तार में जाने की क्या ज़रूरत है? तो मेहनत से छूटने के लिए जो समझ मिली है उसको यूज़ करके, सेकण्ड में विस्तार को सार में समेट कर शान्त हो जाओ, तब जो हैं जैसे हैं वह स्वतः ही सिद्ध हो जायेगा।
मेहनत से मुक्त होने के लिए दिल सच्ची हो। जिनकी दिल सच्ची, साफ़ है, बड़ी दिल है, खुली दिल है तो उसके लिए मेहनत, मेहनत नहीं लगेगी परन्तु उसका फल अच्छा है, जितनी मेहनत कम उतनी सफलता ज़्यादा अनुभव होगी। "सफलता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है" यह अनुभव करने वाली बात है। जहाँ ठगी, चोरी, अन्दर एक बाहर दूसरा है ऐसे मिक्स वालों के पास सफलता छमछम करते नहीं जायेगी। ज़रा-सा भी भगवान से छिपाने वाला, दिल में रखने वाला, औरों को बताने वाला होगा तो उनके पास सफलता आयेगी नहीं। किसी का सहारा पकड़ने वाले के पास सफलता कैसे आयेगी? तो जिसका स्वयं कोई स्वार्थ नहीं है, जो सदा निष्कामी है। सदा दिल से सच्चा सेवाधारी है, ऐसों के पास सफलता लक्ष्मी जैसी छमछम करके आती रहेगी।
तो बाबा क्या करता है और क्या कराता है यह भी समझ हम बच्चों को दी है। कैसे निमित्त बनने वालों को सच्चाई और सफाई की धारणा कराके स्नेह से सेवा करा रहे हैं। तो प्लान उसके पास है उसको भी सोचने की आवश्यकता नहीं है, तुमको भी सोचने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम सोचोगे और वह यदि नहीं होगा तो उदास हो जाओगे। कोई मदद नहीं करेंगे तो अन्दर ख्याल आयेगा-देखो, समय पर कोई मदद नहीं करते हैं तो इन ख्यालों से तुम खाली हो जाओ। इसके लिए सब मिलकर भले प्लान बनाओ परन्तु प्लान को प्रैक्टिकल में लाने के लिए बुद्धि को प्लेन रखो। तो सबकी शुभ भावना से वह प्लान प्रैक्टिकल हो जायेगा। अगर आज नहीं हुआ तो कल होगा, परन्तु होना ज़रूर है, कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन इसमें सिर्फ अपने संकल्प और शब्द को ठीक रखो।
आज ब्राह्मण कल देवता बनने वाले बच्चों की यह सभा है। ऐसी सभायें कहाँ लगती नहीं हैं, सतयुग में राज-सभा होगी, अभी राजऋषियों की सभा है। तो बाबा जिस दृष्टि से हमको देखते हैं उसी स्मृति में हमको रहना है, यह सेवा का प्लान हो क्योंकि जितना हम इन स्मृतियों में रहेंगे उतना हमारा समय, प्लान सब सफल होता जायेगा। इसमें हूँ-हाँ करने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि जो हुआ पड़ा है, वो निमित्त करना है और बाबा करा रहा है। बाकी इस चिंतन से फ्री होना माना मेहनत से मुक्त होना।
लास्ट में बाबा ने कहा १०८ की माला में आओ, तो हम कहते हैं १०८ की माला में आने के लिए हमारे अन्दर जो १०८ निगेटिविटी हैं वह निकालें। निगेटिव माना सिर्फ हिंसक विचार नहीं लेकिन जो विचार अच्छा करने नहीं देते, अच्छा सोचने नहीं देते, उसमें कमज़ोर या व्यर्थ ख्याल आना भी निगेटिव है जिससे कर्मबन्धन कटते नहीं हैं। अन्त मति सो मेरी गति अच्छी हो वास्तव में मेहनत इसी में है, परन्तु उसके लिए अच्छी लगन हो, सच्ची लगन सब बातों को सहज कर देती है। लगन अपने आप खींचके ले आती है, न चाहते भी हो जायेगा। इसलिए पढ़ाई में वा पुरुषार्थ में ना ना नहीं करो, करते जाओ तो सब सहज होता जायेगा। अच्छा पुरुषार्थ करने की लगन पैदा करो और जो पुरुषार्थहीन बनाने वाले कुछ कारण वा विचार हैं उसको निगेटिव समझो। ऐसे विचार या कारण १०८ की माला में तो छोड़ो परन्तु १६,००० की माला में भी आने नहीं देंगे। तो कारणों को भगाओ और बाबा को याद करो तो १०८ की माला में आयेंगे।
ऐसी कोई बात हो जो हमारे पुरुषार्थ में थोड़ा टाइम वेस्ट करती है या फालतू बात आती है तो उसे अवाइड करो, तो अवाइड करने का अक्ल होना चाहिए तब हम विजयी बन सकते हैं। फालतू बातों में जाने की जरूरत क्या है, जो ज़रूरी नहीं है वह करते हैं और यह मिस करते हैं तो वह ऊँच पद कैसे पायेंगे। तो लगन को बढ़ाओ, सच्चा रहने का व्रत लो, झूठ की अंश न हो फिर देखो बाबा कैसे मदद करता है। जहाँ बाबा राज़ी है वहाँ बाबा के हाथ में हाथ है तो उसका सदा साथ है। ऐसे साथ में रहने से हमारे जीवन में परिवर्तन आता है।
जैसे शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा का रथ ले लिया और वण्डर तो यह है कि वह कहे शरीर इसका है, यह कहे उसका है। दोनों शरीर को यूज़ करते हैं फिर भी दोनों न्यारे और प्यारे रहते हैं- यह कितनी कमाल की बात है। तो हम जब मुरली सुनते हैं तो लगता है कि हमको कौन पढ़ा रहा है, पढ़ाने वाले से प्यार है तो फिर पढ़ाई में मेहनत नहीं लगेगी। हम प्रभु के लाल हैं, बाबा की कम्पनी से ही हम सब मालामाल हो गये हैं। भगवान हमें कम्पनी दे, कार्य में, योग में, चलने में भी उसकी ही कम्पनी है तो मेहनत किस बात की ?
कई ऐसे हैं जो बहुत प्यार से दिल व जान से बाबा को भोग लगाते-लगाते बहुत अच्छे योगी बन गये हैं, तो भोग लगाना भी कोई मेहनत नहीं है, प्यार से भोजन बनाने में भी मेहनत नहीं है। जहाँ प्यार है, सच्चाई है वहाँ मेहनत नहीं है। जहाँ आनेस्टी है वहाँ मेहनत नहीं है। ऑनेस्टी किसको कहा जाता है उसकी गहराई में चलें जाए तो पता पड़ेगा कि वृत्ति अनासक्त है? जरा-सा भी इच्छा, ममता की अंश नहीं है तो मेहनत नहीं है। दूसरा हमारा आपस में कोई लेना देना नहीं है। आपस में लेने-देने की बात करते हैं तो फिर वह हिसाब-किताब बन जाता है। एक तरफ कर्मबन्धनों को खत्म करें फिर दूसरी तरफ़ कहाँ बैठकर हिसाब-किताब जोड़े तो यह बोझ हो जायेगा, खींचेगा। इसलिए दाता-पन के संस्कारों को इमर्ज रखो, जो बाबा दे रहा है वह सबको मिले, यह भावना रखो।
मेहनत से फ्री होने के लिए साक्षी दृष्टा हो करके रहो तो प्रभु लीला को देख-देख हर्षित व मेहनत से मुक्त रह सकेंगे। तो अभी समय के समीपता को सामने रख हरेक को यह सोचना है कि विनाश के पहले अपने विकर्मों का विनाश कैसे किया जाए ? अब हमारी फ़रिश्ता-पन की स्थिति आ जाए तब प्राण तन से निकलें।
महात्मा किसको कहेंगे ? जिसके बोल-चाल में महानता हो, पुण्यात्मा किसको कहेंगे ? जो समय पर किसी को अच्छी तरह से मदद करे। मूंझे हुए को राह दिखाये। प्यासे को ठण्डा पानी पिलाये, निर्बल को बाबा से बल दिलाये। पुण्य कर्म जितना करना हो चलते-फिरते, संकल्पों में, स्वप्नों में भी कर सकते हो।
कहा जाता दे दान तो छूटे ग्रहण। जो हमारे अन्दर कूड़ा-किचड़ा है उसे दे दो तो ग्रहचारी छूट जायेगी फिर बृहस्पति की दशा बैठेगी। अपने को विशेष आत्मा बनाने की दिन-रात तात लगी हुई हो और जो विशेषता तुम्हारे में है वह ईश्वरीय सेवा में लगाओ। किसमें कोई विशेषता है, किसमें कोई विशेषता है.. उसे सुखमय संसार बनाने की सेवा में लगा दो तो अपने आप विशेष आत्मा की नज़रों में आ जायेंगे। ऐसे नहीं मुझे कोई देखे, कोई किसको देखने की आवश्यकता नहीं है। और कभी किसी से कुछ भी भेंट न करें, दूसरा किसी को न देख, खुद को बाबा के सामने देख उस मस्ती में रहने वाले मेहनत से मुक्त हैं वहीं फिर जीवनमुक्त का अनुभव कर सकेंगे।
तो हम ऐसे बिना मेहनत के सदा शान्त और हर्षितचित रह करके, तीनों बाबा को सामने रखते सदा पास विद् ऑनर में आने वाले और बाबा के पास रहने वाले हैं क्योंकि हर बात सहज पास हो रही है, सोचने वा बोलने की आवश्यकता नहीं है। बाबा ने पास विद् ऑनर का सर्टिफ़िकेट हमारे लिए तैयार रखा है, तो यह इनाम सबको लेना है। अच्छा।

साधना करनी है तो स्वयं को कड़े बन्धनों से मुक्त कर फ्री और एकरस स्थिति बनाओ

हमारी साधना साधनों के आधार पर नहीं है। संसार में तो अनेक साधन निकले हैं परन्तु शुरू से ही हमको यह ख्याल कभी नहीं आया होगा कि यह साधन हो तो साधना करें। कुछ भी साधन न हों सिर्फ तीन पैर पृथ्वी पर जगह हो। शुरु में तो यह दरी, यह घड़ी आदि कुछ भी नहीं था। यह साधन चाहिए, वह चाहिए, यह चाहिए, चाहिए का संकल्प कभी साधना करने नहीं देगा। जहाँ हैं जैसे हैं वहाँ साफ-सुथरा होकर, एकाग्रचित्त बनके बैठ जाओ तो साधना कर सकते हो। फैसेल्टीज़ व सैलवेशन्स को टच न करते हुए साधना कर सकते हैं। जिसका मन, वचन, कर्म सब श्रेष्ठ है वही साधना कर सकता है। उनके शब्दों में अनेक आत्माओं को बल देने वाली, उलझनों से मुक्त करने वाली शक्ति हो। बोल में कटुता न हो।
साधना करने वाले का व्यक्ति, वस्तु, वैभव और स्थान से लगाव न हो। इस व्यक्ति के साथ मेरी बनती है, दूसरे के साथ कैसे बन सकेगी - यह फ़िकर न हो। यहाँ जो वैभव हैं वहाँ होंगे या नहीं यह चिंता न हो। तो जो साधना के इच्छुक हैं वह सच्ची दिल की समझ से इन सब बातों से अपने को मुक्त रखते हैं क्योंकि एक टाइम एक ही इंट्रेस्ट होता है या होगा, यहाँ या होगा वहाँ। तो ज्ञान, योग, धारणा और सेवा चारों ही मेरे लाइफ के अंग हैं। ब्राह्मण लाइफ इसीलिए बनी है और इंट्रेस्ट इसी में ही बहुत अच्छा मिल सकता है क्योंकि ज्ञान, योग, धारणा, सेवा चारों ही कहती है तुम साधना अच्छी करो। इस झाड़ में देखो तो ब्राह्मण फाउण्डेशन में बैठे हैं, ऊपर तो झाड़ की जड़जड़ीभूत अवस्था हो गई है तो ऊपर साधना में कैसे बैठ सकते हैं। एक सेकण्ड बैठकर तो देखो तो सारे हिल रहे हैं. इसलिए वहाँ से निकलकर फिर यहाँ आ करके बैठ जाते हैं। अन्दर डीप साइलेन्स से बैठ जाएँ - इसलिए भारत में खड्डे खोदकर अन्दर बैठ जाते हैं। एकदम अन्दर चले जाओ, कोई हमको न देखे।
गीता में भी है कि इन आँखों से देखने वाली चीज़ों को, व्यक्ति तथा वैभवों को न देखो क्योंकि यह विनाशी हैं। यह भी विनाशी, यह भी विनाशी... मैं आत्मा हूँ अविनाशी। तो जिसको जब यह समझ आयेगी तब उसकी साधना शुरू हो जाती है। जिसकी बुद्धि व्यक्ति, वस्तु तथा वैभवों में गई वह साधना किस घड़ी शुरू करेंगे ? कोई कहते कि मेरी बुद्धि नहीं जाती है परन्तु पता नहीं मेरे को कोई खींच रहे हैं, ऐसा लगता है। तो कोई किसको खींचता भी है तो भी गलती किसकी है? किसी भी कारण से खुद हिले या कोई खींचे तो हम सीधा खड़े हो नहीं सकेंगे क्योंकि कोई यहाँ से खींच रहा है, कोई कहाँ से खींच रहा है तो क्या होगा ? तो हम कहाँ लटक रहे हैं? ऐसों को सोल कान्सेस होने में डर लगता है, पता नहीं मर न जाऊँ और भगवान को याद करना उनको सिरदर्दी का काम लगता है क्योंकि भगवान तो ऊँचे-से-ऊँचा है तो ऐसों की बुद्धि कैसे ऊपर बाबा के पास जायेगी ?
जब किसी के साथ प्रेम हो जाता है तो बाकी और किसी के तरफ़ भी इन्ट्रेस्ट नहीं होता है। और इसी में ऋषि-मुनियों की भी बहुत परीक्षा हुई है। किसी की खुबसूरती पर या किसी खाने-पीने की चीज़ में बुद्धि गई तो यह भी माया है। और यह पहनें, इनसे बात करूं, इनके साथ प्यार करूँ, खाऊँ और पहनूं - इन बातों को जिसने नहीं समझा है वह योगी नहीं बन सकता। खाऊँ तो क्या ? पहनूं तो कैसा? बात करूं तो कैसे ? हमारा पहनावा ऐसा हो जो किसी की उसमें बुद्धि न जाये और आपस में बात करो तो बहन, भाई, भाई-भाई की दृष्टि से करो। तुम भी अपने से सुखी, मैं अपने से सुखी, इसमें एक-दो के सहयोगी भले रहें लेकिन अधीन न रहें। सहयोगी भी सच्चे सहयोगी, स्व-उन्नति और एक-दो की उन्नति के लिए हों। तो सयाने बन अर्न्तमुखी हो करके साधना के जो प्रिन्सीपल हैं उसको समझ करके उस पर चलने के लिए तैयारी कर लेनी है।
दृष्टि - काम वश भी होती है, क्रोध वश भी होती है, लोभ वश भी होती है, मोह और अहंकार वश भी होती है। तो इन पाँचों विकारों को सामने रखो और देखो कि इन पाँचों से मेरी दृष्टि कैसी होती है? अर्न्तमुखी होकर अपने आपको देखते जाओ। पूरी रीति से देखो, काम चलाऊ नहीं। हरेक महसूस करे कि काम वश दृष्टि कैसी है? क्रोध वश कैसे होती है? मोह तो सत्यानाश कर देता है। और अहंकार वाला साधना कैसे करेगा! तो मन से, वृत्ति से इन सबसे अपने आपको मुक्त करके साधना में बैठ जायें। सच्ची दिल से, अन्दर से अपने आपको इस कड़े बन्धन से फ्री करते जाओ। मुक्ति माना जैसे सारे विकार मर गये हैं। तो जो अपने आप मरना जानता है वह इन्सान अल्लाह के समान बन जाता है। इसलिए अपने आप जीते जी मरें, जीते जी मरने में कितना टाइम लगता है? शरीर से मरना तो एक सेकण्ड लगता है यहाँ से मरा वहाँ प्रवेश हुआ। अभी यहाँ ऐसे कौन हैं जो वहाँ दुनिया से, इच्छाओं से मरा, फलाने से मरा और बाबा के पास साधना में ऐसे बैठ गया।
यह भी वण्डर है कि शरीर से कोई मरता है तो यहाँ रोते हैं और जहाँ वह जन्म लेता है वहाँ के लोग हँसते हैं। हम शरीर छोड़ते हैं तो लोग रोते हैं, तो उन्हें रोने दो, हमारा तो नया जन्म हो गया है तो खुश हो गये हैं क्योंकि स्वयं भगवान माँ-बाप बनकरके प्यार से हमें पालना दे रहा है। लोग तो ब्रह्मा मेल होने कारण उन्हें बाप के सम्बन्ध से देखते हैं। माँ के रूप में जैसे हैं वैसे हैं, साफ-सुथरा करके हमारे ऊपर मेहनत करके बाप के हवाले कर देता है देखो, तेरा बच्चा है, अच्छा है। साधू है, चाहे भगत है, चाहे पापात्मा है तीनों का उद्धार करके भगवान के पास भेज देता है। तो यह साधना क्या है? कोई बड़ी बात नहीं है। कठिन नहीं है परन्तु कठिनाईयों से दूर होने के लिए है। औरों को कठिनाईयों से फ्री करने के लिए भी साधना है। तो बाबा ने सेन्टर क्यों बनाया है? सबको मदद करने के लिए। तो हम ऑफर करते हैं- Can I help you, Every where. खुदा ने अपने को खिदमदगार बनाया ही इसलिए है कि जहाँ ज़रूरत हो वहाँ हेल्प करें।
हम ब्राह्मणों को साधना किसलिए करनी है? हमारी ब्राह्मण लाइफ बिल्कुल पवित्र योगी रहने के लिए है। हम अल्पकाल की खुशियों के पीछे नहीं भटकेंगे, सदा के लिए खुशी में रह करके खुशी देंगे। ऐसे बच्चे हों तब तो बाबा प्राइज़ देवे। याद का सच्चा-सच्चा चार्ट हो। दृष्टि, वृत्ति अच्छी शुद्ध, पवित्र हो। अगर कभी कैसे रही, कभी कैसे रही तो बाप विश्वास कैसे रखे? इसलिए बाबा कहते हैं साधना ऐसी करो जो कभी कैसे, कभी कैसे नहीं परन्तु सदा एकरस ऊँची स्थिति रहे क्योंकि तुम हो फाउण्डेशन में, फाउण्डर बनकर गुप्त बैठे हो तो इतने मज़बूत रहो। दूसरी बात कि अभी हमको क्या बनना है, यह लक्ष्य सामने खड़ा है तो वह सारे लक्षण खींचने हैं। अगर लक्ष्य सामने नहीं है तो बुद्धि भटकती रहती है तो फिर वह लक्षण भी आ नहीं सकते हैं।
बाबा माली के रूप में हमको काँटों के जंगल से निकाल करके खुशबू फैलाने वाले खुशबूदार अच्छे फूल बना रहे हैं। फूल यह नहीं कहता कि मैं खुशबू फैलाऊँ परन्तु वह ऐसा है जो वह जहाँ होगा तो दूर से ही खुशबू खींचके आयेगी। तो चेहरा खिल उठेगा। तो साधना क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? सब बातों से फ्री हो करके साइलेन्स में बैठ जाना है। बाहर की दुनिया की तरफ़ न नज़र जाये, न कान जायें। हम सिर्फ कहते नहीं हैं कि टॉक नो इविल, हियर नो इविल, सी नो इविल, थिक नो इविल... बोलने और सुनने का सारा आधार सोचने पर है। तो कान भी उसके जाते हैं, आँख भी वहाँ उनकी जाती है जिसको ऐसी चीज़ों की आकर्षण होती है। मुख भी ऐसी बातें तभी करता है। बाबा कहता है हँसी-कुड़ी की बातें करना भी दोष है। तो सच्ची साधना वाला यह सब बातें समझ करके अपने को फ्री करके एकाग्र कर लेता है। गलती महसूस करके बाबा को कहता है, बाबा! अब तो मैं तेरा बन गया। अब पता चला है मुझे क्या करने का है। बाबा के गुणों की शक्ति अपने में खींचनी है और लोहे से सोने जैसा बनाने वाला पारसनाथ मिल गया तो साधना में अति खुशी हो रही है, शक्ति भी आ रही है। तो फिर जिसके सम्पर्क-सम्बन्ध में आते हैं उनको भी वह मिल जाता है।
तो बाबा कहते साधना करके मेरे साथ परमधाम में बैठ जाओ फिर सारे विश्व में यही लहर फैलती जाए। तो साधना पहले ऊपर आना जाना सिखाती है। साधना से मन शान्त हो गया है, बुद्धि में राइट सोचने की शक्ति आयी है। कोई कन्फ्यूज़न नहीं, यह करूँ न करूँ ? यही करना है, यह निर्णय कर सकते हैं। चित्त पर जो पुरानी बातें प्रिन्ट हुई पड़ी थी, वह मिट गई। अभी क्या करने का है? बहुत शान्तचित्त हो करके भगवान से 'माइट' ले करके 'लाइट' रह करके 'राइट' काम करने का है। यही हमारा धर्म और कर्म है, यह है साधना। अथक होके साधना करना है। हमें निरन्तर योगी, स्वतः योगी, सहजयोगी बनना है और कमल के फूल समान रहना है। साथ-साथ कर्म में, सम्बन्ध में आते ज़रा-सा भी छींटा न पड़े इसमें सम्भल कर रहना है।
जो अन्दर है वह चेहरे से पता चल जाता है। जैसे किसी को फ्लू है तो मालूम पडता है, उसके इन्फेक्शन से बचने के लिए खबरदार रहते हैं। शरीर के फ्लू से मन के फ्लू का इन्फेक्शन बहुत जल्दी फैलता है। तो किसी को अन्दर का फ्लू हो जाए तो क्या करें ? साधना फ्लू को खत्म करती है। तो साधना माना ऐसा वातावरण बनाओ जो कोई भी जर्म्स का इन्फेक्शन न हो जाए। ऐसे अपने मन की स्थिति को सदा खुश रखो जो यह खुशी भगवान की गिफ़्ट बन जाए। तो हम भी आपस में सदा खुश रहने की गिफ़्ट लेते देते रहें। समझो कोई अतिथि आ जाए तो दाता का दर खुला हुआ हो। दिल सदा देने वाली हो, ऐसे मांगने वाली न हो। तो गुप्त योगी रहो परन्तु जो मिला है वह छिपाकर नहीं रखो। मेरा नामाचार हो यह भूख न रखो। किसी ने दिया है, तो उसका अन्दर से शुक्रिया मानो। तो जिसको वह मिले वह उसका शुक्रिया मानें - यह है साधना से प्राप्ति और साधनों मुक्त रहने की शक्ति। साधना में रहने वाले कुछ न भी बोलें, केवल मुस्करायें और उससे कईयों को सुख मिले तो अच्छी बात है।
तो श्वाँस, संकल्पों को सफल करने का ध्यान रखो क्योंकि बाबा कहते -समय वैल्युबल है, तुम्हारा शरीर भी वैल्युबल है, और यह ज्ञान रत्न भी वैल्युबल हैं। रोज सुबह-सुबह बाबा गरम-गरम हलुवा खिलाता है, खाकर हम एंजिल जैसे नाचते-उड़ते रहते हैं। समझा !

सबके बीच रहते, सेवायें करते साधना करनी है तो संकल्प की क्वालिटी को अच्छा बनाओ

महावीर की निशानी क्या है? पहले वीर फिर महावीर। बाबा का बनना माना युद्ध के मैदान में युधिष्ठिर के मुआफ़िक सत्यता की शक्ति को ले करके खड़े हो जाना। महावीर वह है जो निर्मानचित्त होकर, अपने आपको परमात्मा का बना करके सेवा पर हाज़िर रहता है। बाबा का एक-एक बोल हमारे जीवन को अमूल्य बनाने वाला है। बाबा की मुरली आइने का काम करती है। मुरली से सफाई भी होती है तो दिखाई भी पड़ता है। और जो कोई कमी-कमज़ोरी है उसको मिटाने के लिए समझ के साथ शक्ति भी मिल जाती है, जिससे वह मिट भी जाता है। हर रोज़ मुरली से तीनों काम हो जाते हैं। तो मुरली जैसे जादू का काम करती है।
साधना से हर संकल्प की सिद्धि तब प्राप्त होगी जब संकल्पों में इतनी शुद्धता हो, इतने श्रेष्ठ और दृढ़ संकल्प हो। सबसे पहले तो हमारे संकल्प हमारे ऊपर काम करें फिर जो हमारे सम्पर्क में हैं या सेवा-साथी हैं उनके ऊपर काम करें तब कहेंगे साधना से सिद्धि स्वरूप आत्मा। अभी दिन प्रतिदिन वाणी से परे जाने की रफ़्तार तेज़ करनी है क्योंकि जितना वाणी से परे ज़्यादा रहेंगे उतना अच्छी स्पीड आयेगी। फिर सेवायें भी बढ़ती जा रही हैं, उसमें भी वाणी से परे जितना होंगे उतना सहज काम होता जायेगा। थोड़े टाइम में बहुत काम करने के लिए शुभ भावनायें चाहिए। इतना हमारा व्यर्थ समाप्त हो जो दूसरों का भी व्यर्थ समाप्त हो जाए। जो कोई पास्ट की बातों को मिला करके प्रेजन्ट को स्पष्ट करना चाहता है तो यह भी एक प्रकार से सूक्ष्म व्यर्थ ही है। तो जितना खुद के व अन्य के पास्ट को मिक्स करते रहेंगे उतना मेहनत बढ़ती रहेगी। खुद मेहनती हैं तो वह दूसरों को कैसे मेहनत से मुक्त कर सकेंगे। कम मेहनत से सफलता ज़्यादा हो, दूसरों को भी मेहनत से छुड़ाने में मदद करूँ अभी यह पुरुषार्थ हो।
पहले कई तो निगेटिव को नहीं समझते थे, कई तो फिर वेस्ट को भी नहीं समझते कि यह कोई वेस्ट है। अभी बाबा ने इन सब बातों को विस्तार में स्पष्ट रूप से रियलाइज़ कराया है। वेस्ट शब्द कहने में भी अभी हमें टाइम लगता है और अच्छा भी नहीं लगता है। तो ऐसी अच्छी साधना हो जिससे जो ज़रूरी नहीं है वह खत्म होता जाए और जो ज़रूरी है वो होता जाए। व्यर्थ को समाप्त करने के लिए साधना है या साधना से व्यर्थ समाप्त हो गया। बाबा तो शार्ट में इशारा देता जाता है। पहले कहा मेहनत नहीं करो। अगर अलबेला है तो उसे मेहनत ज़्यादा करनी पड़ती है या बहाना दे करके भी ऐसे काम चलाऊ चलते हैं तो मेहनत ज़्यादा करनी पड़ती है। तो पद भी ऊँच पाना है और मेहनत भी कम हो, प्राप्ति ज्यादा हो उसके लिए क्या करें? तो अभी साधना शुरू करो। सेवा छोड़कर साधना नहीं करनी है और सिर्फ अकेले बैठकर भी साधना नहीं करनी है। सबके बीच रह करके, पहले से दस गुणा ज़्यादा सेवा करते हुए भी साधना करनी है। पहले तो दस के साथ काम करते थे, अभी हज़ारों के साथ काम करते साधना करनी है। इसके लिए संकल्प की क्वालिटी अच्छी ऊँची बनाते चलो। और अपना श्वाँस, संकल्प व्यर्थ बातों में नहीं गवाओ। व्यर्थ माना जहाँ मेरी आवश्यकता नहीं है उसके संकल्प नहीं चलायें। दूसरे के पार्ट में इंटरफियर नहीं करें। दूसरे के लिए सोच करके कर्मबन्धन बढ़ाये नहीं। यह अच्छा करता है या नहीं करता है, या करता है कितना करता है- यह सोचने में टाइम नहीं गंवायें। किसके ऊपर प्रभावित या किसके लिए अन्दर से ग्लानि यह हमारी साधना में विघ्न डालने वाली बातें हैं। हमारे अन्दर में इतनी सच्चाई-सफाई हो जो सूक्ष्म में तिनके मात्र भी ऐसी कोई कखपन की बातें कहाँ से उड़के न आ जायें। तो चलते-फिरते, माया का कोई तूफ़ान बाहर का अन्दर में ज़रा भी न आये, साधना में यह स्वच्छता ज़रूर चाहिए। तो एकाग्र हो करके अच्छी साधना कर सकते हैं। नहीं तो एकाग्रता में बार-बार कोई-न-कोई बातें इधर-उधर से आती रहेंगी, हमारी साधना बीच-बीच में टूटती जायेगी। फिर मेहनत करते रहेंगे, सफाई करते रहेंगे... इससे फिर थकावट हो जायेगी। दिखाई पड़ता है कि सच्ची दिल से साधना करने वाले को खुशी बहुत होती है। अन्दर में शक्ति भी आती है जिससे फिर वह शक्ति सामने आने वाली बातों का सामना करने में काम आती है।
तो साधना में क्या प्राप्ति है वह समझके साधना करो तो उससे जो शक्ति जमा होती है वही शक्ति फिर सब काम करती है। पहले तो शक्ति जमा करके साधना करते थे और अभी साधना करो तो शक्ति जमा होगी। दो प्रकार की साधना करने वाले हैं। एक हैं भक्ति शुरू करेंगे, कुछ भी करेंगे तो बुद्धि कई बार बाहर जायेगी, धन्धे-धोरी में, बच्चों में, माता में, नौकर में, इधर-उधर जायेगी...। बैठे यहाँ है लेकिन बुद्धि वहाँ है - यह क्लीयर पता चलता है। और कोई ऐसे होंगे जो उनके आगे कोई जा भी नहीं सकता है। ज्ञान मार्ग में साधना करने वाले में भी दो प्रकार के देखे हैं। एक की बुद्धि घड़ी घड़ी बाहर जाती रहेगी और पाँच मिनट भी योग में बैठेंगे तो बुद्धि बाहर भटकती रहेगी। दूसरे हैं जो कोई कितने घण्टे बैठे होंगे तो भी बुद्धि कहीं नहीं जायेंगी। तो अपने से हम पूछे कि हम कौन हैं? इस प्रकार से जिसने साधना की ही नहीं होगी तो वह साधना का फल कैसे खायेंगे? तो पहले साधना को अच्छी तरह से समझना है कि साधना कहा किसको जाता है, फिर आता है साधना का फल।
हम आदि सनातन धर्म के हैं, हमारे ऊपर सारे झाड़ का आधार है। हम नीचे तपस्या में बैठे हैं। लक्ष्य सामने खड़ा है, बाबा के साथ बैठे हैं, बाबा थोड़े ही हिलता है जो हम हिलें। बाबा का तपस्वी रूप देखो कितना भी तूफ़ान आये, कोई भी बात आये बाबा ऐसे बैठा हुआ है। तो जो बाबा ने किया अभी तक वह वायब्रेशन काम कर रहे हैं। तभी तो सब मधुबन आना चाहते हैं क्योंकि यहाँ आने से उस वायब्रेशन का बल मिलता है। तो हमारी तपस्या भी ऐसी हो जो साधना में वह करेन्ट मिले। जो साधना करता है वह विश्व में वायब्रेशन फैला सकता है। साधना वाला यह नहीं कहेगा कि मुझे वैराग्य वृत्ति चाहिए। साधना वाला जैसे देखते भी नहीं देखता है। उनके सामने जो आते हैं वही पवित्र शुद्ध हो जाते हैं। वह आत्मा और प्रकृति दोनों को भी शुद्ध बनाता है। साधना वाला करता कुछ नहीं लेकिन अपने आप सब होता जाता है।
पहले हम सोचते थे कि बाबा करन-करावनहार है, फिर ब्रह्मा बाबा को देखा तो ब्रह्मा बाबा भी करन-करावनहार ही है। अभी बाबा क्या करता है? अभी बच्चों को मास्टर करनकरावनहार बनाने के लिए अन्दर-ही-अन्दर सकाश दे रहा है। अभी बाबा हर कार्य में बच्चों को सकाश देता है। बाबा हमारे वृत्ति और संकल्प को चेक करता है और जवाब में बाबा सिर्फ राज़युक्त मुस्कराते हैं। उस मुस्कराहट में ही करने-कराने की शक्ति अपने आप आ जाती है। इसलिए अब बाबा से कुछ पूछने का भी बाकी नहीं रहा है। तो अभी सिर्फ यह देखना है कि दिन-प्रतिदिन हम कहाँ तक पहुंचे हैं? और बाकी कहाँ तक जाना है? बस। अच्छा।

'चिंतन'- साधना में इण्टरफियर करता और 'सिमरण'- साधना द्वारा सिद्धि दिलाता है

हर एक के मन में मीठे बाबा के बोल दिन रात बार-बार याद आते। यही धुन लगी रहती है कि जो साधना करनी है अभी कर लें। बाबा साधना किसको कहता है?
आज बाबा ने कहा- अच्छे बच्चे, जो पक्के हैं वह सदा मस्ती में रहते हैं। खुशी, नशा और मस्ती .. बाबा का बनने से पहले मिलती है अपरमपार खुशी, अज्ञानता में है ही दुःख। भले भक्ति करते हैं, उससे जो थोड़े समय के लिए कामना पूरी हुई उसकी खुशी होती है। लेकिन जब ज्ञान मिला तो भक्ति छूट गई माना मांगना छूट गया। भक्ति में है मांगना, ज्ञान में मांगने की ज़रूरत नहीं है। समझ मिली है तो खुशी है। भले दुनिया में कितने दुःख हैं परन्तु हमारे पास ज्ञान से खुशी है। खुशी से हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। खुशी के साथ सदा नशा चढ़ा रहे - मैं कौन हूँ, किसका हूँ। नशा तब चढ़ता जब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते। कईयों को ऐसे याद करना नहीं आता है। अगर अपने को आत्मा समझ बाप को याद करें तो विचार करते हैं कि कितना नशा रहे! आत्मा ने बाप को याद किया माना आत्मा को अपने बाप की स्मृति रही तो देह, देह के सम्बन्ध से न्यारा होना आसान हो गया। देह, सम्बन्ध, दुनिया की आकर्षण से दूर हो गया। फिर बाबा हमको चुम्बक समान खींचता है। वह जो बाप की कशिश है वह और आकर्षणों से दूर कर देती है। व्यक्ति, स्थान, वैभव कोई नहीं खींच सकता। किसी का भाव-स्वभाव भी नहीं खींच सकता। अपने कोई कमज़ोर संस्कार हैं वह भी नहीं खींच सकते। अपने को आत्मा समझ बाबा को याद करना माना सर्व सम्बन्ध बाबा से। यह भी साधना की अच्छी विधि है आत्मा माना न सिर्फ देह से न्यारी लेकिन मैं वही कल्प पहले वाली आत्मा हूँ। जब रचता रचना का ज्ञान बुद्धि में अच्छी तरह से आ जाता है तो स्वदर्शन-चक्रधारी बन जाते हैं। मैं वह आत्मा हूँ, देह से न्यारी, कल्प पहले वाली, अपने घर की रहने वाली। अब वापस घर जाने का समय आया है, आत्मा को वह स्मृति आ गई। जो बाबा विधि बताते हैं, इसी साधना से स्मृति में रहने की लगन से, हम सो की स्मृति नशा चढ़ाती है। नशे से हम सो की स्मृति मज़बूत होती जाती है।
जैसे बाबा को भविष्य श्रीकृष्ण सदा नज़रों के सामने रहा, हम सो हूँ, यह बनने वाला हूँ। बाबा से सदा यह साक्षात्कार होता रहा। एक ही बाबा में चारों भासना साथ-साथ आती हैं- साकार, अव्यक्त, निराकार और भविष्य श्रीनारायण। शिवबाबा ने इनके द्वारा चारों ही भासना दी हैं। हर एक अन्दाज लगाकर देखे, सेकण्ड में बाबा हम सबको स्मृति दिलाकर सब बातों से मुक्त कर यह अनुभव करा देता है। समझ है सिर्फ बुद्धि तक नहीं, परन्तु दिल में जो बात लगी है वह दिल से कभी भूलती नहीं, मिटती नहीं। और यह फायदा बहुत होता है जो और सब बातें, जो काम की नहीं हैं वह मिट जाती हैं। जैसेकि हुआ ही नहीं था। ड्रामा की हर सेकण्ड की सीन साक्षी हो देखने और पार्ट बजाने की समझ बाबा दे देता है। समझ के साथ फिर उसकी शक्ति भी देता है। हर आत्मा का पार्ट अपना है, हर एक के फीचर्स अपने हैं, फिर हम भेंट क्यों करें, बितन भी क्यों करें। अपना व किसी का भी चिंतन साधना में विघ्न डालता है। किसी का चिंतन माना ही व्यर्थ। ऐसा क्यों..... जब पता है सब नूंधा हुआ है। हमको सावधान, सुजाग रहना है, बड़ी धीरज से अपनी अवस्था जमानी है। कोई भी प्रकार का चिंतन शुरू तब होता है जब अधीर्य होते हैं या बुद्धि का अभिमान होता है। ऐसा क्यों, ऐसे होना चाहिए.... लेकिन मुझे क्या करना है, मेरे लिए सेवा क्या है, मैंने तो बुद्धि बाबा को दे दी। बाबा ने कहा-बच्ची, बुद्धि को क्लीन रखो और लाइन क्लीयर रखो।
कोई पूछते हैं बाबा की हमारे लिए क्या प्रेरणा है? तो बाबा कहते- बच्चे, बुद्धि को क्लीन रखो और लाइन क्लीयर रखो। तुमको यही करना है। अपनी या किसी की भी बीती का चिंतन नहीं करो। भविष्य अपना ऊँचा बनाना तुम्हारे हाथ में है। बाबा सदा साथ दे रहा है, देता रहेगा। इसलिए समय अनुसार जैसे दुनिया का वातावरण है, बाबा ने हर बच्चे को निमित्त बनाया है, साधन सब खत्म हो जायेंगे, हम बच्चों की साधना चलती रहेगी। साधना में ही हमारा भला है। इससे ही अनेकों का भला करने के निमित्त बनने का भाग्य मिल जायेगा। साधना जो हमारे लिए या सेवा में काम आयेगी, वहीं हमें अभी करना है। हर मुरली में बाबा अवस्था जमाने के लिए इशारा करता है। तो अवस्था जमाने के लिए अपने आपसे बातें करो। मन में और कोई बात न करके, अपने आप से मीठी-मीठी बातें करो, जो बात बाबा सुनाता है वह सिमरण करो। हम चिंतन से भी फ्री हो, सिमरण के महत्व को जानें। सिमरण का महत्त्व बहुत बड़ा है। चिंतन साधना में इण्टरफियर करता है। बाबा की मीठी बातों का सिमरण साधना द्वारा तुरन्त सिद्धि प्राप्त कराता है।
इतना बड़ा बाबा कहता- बच्चे मैं तुम्हारे साथ स्टूडेंट हूँ, तुम बच्चे बाप से डरते क्यों हो, हम सब एक क्लास के स्टूडेंट है। बाबा कितनी नम्रता से आगे बढ़ाता, हल्का कर देता है। बाबा की बातों को कैसे सिमरण करें वह बैठकर सिखाता है। तो ऐसी मीठी बातें बाबा से सुनते, बाबा से रूह-रूहान करते उसी सिमरण में रहते तो देह और दुनिया सहज भूल जाती है। सहज बेहद के वैरागी बन सकते हैं। जैसे बेहद की वैराग्य वृत्ति से अच्छी साधना करने के लिए बाबा ने कहा है। तो बुद्धि में रहता यह दुनिया खलास हुई पड़ी है। यह दुनिया दिखाई ही नहीं पड़ती है। जिसको बाबा दिखाई पड़ता उसे दुनिया क्या दिखाई देगी! जो आत्मा समझ बाबा को देखने वाले हैं उनको यह दिखाई नहीं पड़ती। बाबा ने कहा-तुम पैगम्बर हो। धर्म स्थापक तो धर्म की स्थापना करते हैं, हम पैगम्बर हैं नई राजधानी स्थापन करने के लिए। कोई भी आत्मा थोड़ा भी सुनेगी तो राजधानी में आ जायेगी। इसलिए खूब सेवा करते चलो। एक तो हम खुद को पुण्य-आत्मा बनायें। हम विशेष आत्मायें हैं, करोड़ों में से कोई आत्मा को बाबा ने चुन लिया है। भगवान ने जो विशेषता दी है उससे सेवा करनी है, बाबा अपनी वह शक्ति भरता है। मेरी विशेषता को कोई जाने या न जाने, भगवान ने जानकर कहा- बच्ची, तुम यह कर लो। 'जी बाबा'। महान आत्मा बनना हो तो सदा अपने को मेहमान समझकर चलते चलो। पुण्यात्मा बनना हो तो पुण्य-कर्म करते चलो, किसी को बताने व चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है। चितन से फ्री निश्चित रह जो बाबा सिखाता है वही करते चलो। तो बाबा के एक-एक बोल से हमारी सच्ची साधना होती रहेगी। साधना के बिगर हमारा एक श्वाँस, संकल्प भी नहीं चल सकता है। तो यहाँ जितनी हैं सेवायें, उतनी है साधना की सहज विधि। उससे अपने अनुभव की शक्ति को बढ़ाते चलो। अच्छा।

दिल सच्ची हो, अथक और लगातार पुरुषार्थ हो तो मायाजीत बन जायेंगे

ओम शान्ति। जो 'ओम शान्ति' के अर्थ स्वरूप में रहते हैं वह माया को जल्दी परख भी लेते हैं फिर जीत भी लेते हैं। मायाजीत बनने के लिए पहले माया को पहचानना आवश्यक है। बाबा को तो पहचान लिया जिसको ढूँढते थे उसको जान लिया, वह हमारा बाप है यह भी दिल से मान लिया। न सिर्फ बाप है परन्तु मात-पिता, सखा-स्वामी, सतगुरु है... इन सम्बन्धों से उनको अपना बना लिया। जब बाबा को इस तरह से अपना बनाना शुरू किया तो माया ने भी सामना शुरु कर दिया कि तुम कौन है, कहाँ जा रहे हो? जिसके इतना समय गुलाम थे, अन्दर माया ने अच्छा दबा कर रखा था, माया माना ही पाँच विकार, इसके साथ अनेक कमी-कमज़ोरियों ने भी वार करके अपने वश में रख लिया और माया ने बहाना बनाना भी सिखाया जिससे यह बाप से दूर रहें।
तो ऐसी माया को जानने के लिए बुद्धि की बड़ी स्वच्छता चाहिए। बाबा से सच्ची दिल हो तो बाबा भी इशारा करेगा बच्चे, यह माया है। मुरली से भी कोई इशारा मिल जायेगा तो समझेंगे कि यह माया है। तो बुद्धि इतनी साफ़ हो जो फट से समझ सके कि बरोबर यह माया है इसलिए उससे मुझे दूर रहना है, अभी वह मुझे वश नहीं कर सकती है क्योंकि हमने पहचान लिया तब तो बाबा ने हमें अपना बना लिया। इसलिए बाबा कहते कि तुम्हारे अन्दर से अब यह आवाज़ निकलना चाहिए - शुक्रिया बाबा !
जैसे माँ-बाप अपने बच्चों को दिल से प्यार करते हैं और दोस्ती में भी आपस में दिल से प्यार करते हैं तो हम भी हरेक सम्बन्धों से बाबा को दिल से प्यार करें तब समझ में आयेगा कि माया क्या चीज़ है, माया झूठी है और मेरा बाबा सच्चा है - यह रियलाइज़ेशन होती है। तो जिसको सच और झूठ को परखने की शक्ति है, वह परखने की शक्ति मायाजीत बना देती है। और माया भिन्न-भिन्न रूप से आती है, माया किसी के मन को ऐसे अशुद्ध संकल्पों से अटैक करती है जो बात मत पूछो, ऐसे कोई शब्द होते हैं वह खींच लेते हैं। कर्म भी कोई ऐसा हो जाता है जो यह भूल जाता है कि यह राइट है या रांग है? इसलिए फिर उनसे राइट कर्म हो नहीं सकते हैं। माया बुद्धि को ताला लगाके परमात्मा से ऐसा मुँह मोड़ देती है जो वह मायाजीत बन नहीं सकते हैं।
हम अभी बाबा के बच्चे बन गये तो माया-रावण से बच गये हैं। बचाया किसने ? मेरे बाबा ने। तो बाबा ने कई बार कहा है कि माया को जीतना है तो सिर्फ यह कह दो कि "मेरा बाबा" तो माया बिचारी डरकर भाग जायेगी क्योंकि माया यह देख लेती है इसके दिल में और कोई नहीं है, अच्छा सहारा पकड़ लिया है। तो मायाजीत बनने के लिए पहले तो अपने को यह समझें कि मैं बाबा की गोद का बच्चा हूँ फिर मुझे बाबा के गले का हार बनना है, यह लक्ष्य रखो। गले का हार बनने के लिए फिर विजयी बनना है। दूसरा जो बाबा रोज़ वरदान देते उसमें निश्चय हो जैसे कि खुद में, बाप में, परिवार के साथ सच्चे प्रेम में, किसी में भी डाउट न हो, किसके लिए ग्लानि न हो। और ड्रामा की हर सीन को देख करके, साक्षी हो करके जो हो रहा है उसमें खुश एवं हर्षित रहें, क्यों, क्या के क्वेश्चन में न जायें। अगर क्वेश्चन पूछा माना माया ने खींचा, चिंतन चला। ऐसे चिंतन चलने से अपने को फ्री करने वाला मायाजीत बन सकता है।
माया कितने भी प्रकार से आये लेकिन होशियार रहें, खबरदार रहें, सावधान रहें क्योंकि "मैं कौन हूँ?" और किसकी हूँ? इसमें बहुत सच्चा और अथक लगातार पुरुषार्थ करते-करते माया पर जीत पा सकते हैं। ऐसे पर माया की अटैक तो क्या परन्तु कभी छाया भी नहीं पड़ सकती है क्योंकि बाबा के छत्रछाया के नीचे रहते हैं। कोई हमको खराब दृष्टि से देख भी नहीं सकता है, न हम किसी को बॉडी कॉन्शस की दृष्टि से देख सकते हैं। बाबा ने अपनी दृष्टि से निहाल भी किया है तो पावन भी बनाया है, बाबा की दृष्टि हमारे लिए महा-सुखकारी है। देहधारी की दृष्टि महा-दुःखकारी है। तो यह बहुत अटेन्शन अपने ऊपर रखें कि अन्तर्मुख रहें, एकान्तप्रिय रहें, अच्छा संग हो, अपना मन-वचन-कर्म श्रेष्ठ हो, श्वास-संकल्प-समय सफल हो ऐसे ध्यान रखने वाले माया जीत बन सकते हैं। किसकी माया कभी मूर्छित हो जाती है तो कभी फिर से खड़ी हो जाती है, तो बाबा की मदद से, स्वयं की सच्ची दिल से मायाजीत बन सकते हैं।
फिर प्रकृति के भी कितने रूप हैं, यह पाँच तत्वों का शरीर भी प्रकृति है। पाँच तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन सबका प्रभाव स्वभाव-संस्कार पर पड़ता है। आत्मा का निजी स्वरूप मन, बुद्धि, संस्कार हैं- यह पता है, वह भी प्रकृति के वश हो गये हैं। मैं आत्मा हूँ परन्तु मन, बुद्धि, संस्कार मुझ आत्मा की प्रकृति के अधीन हो गये हैं। जैसे प्रकृति चलाये वैसे चल रहे हैं इसलिए कईयों को पहले समझ में नहीं आता है कि मैं आत्मा कोई परमात्मा की सन्तान भी हूँ। आत्मा या तो परमात्मा की होकर रहेगी या फिर प्रकृति की। माया और प्रकृति दोनों आपस में मिल गये हैं और आत्मा उसके पीछे फँस गई है। जब मायाजीत बनते हैं तो प्रकृति जीत पीछे बनेंगे। सारी साइंस कहाँ से निकली है? प्रकृति से। निकाली तो मनुष्यों ने ही है लेकिन उसका अभिमान कितना है? और हरेक उससे सुख लेना चाहता है, बस वह है तो सब कुछ है, कुछ मिस नहीं होना चाहिए। आत्मा प्रकृति के अधीन हो गई है, तो आत्मा पहले माया की अधीनता से फ्री हो फिर प्रकृति की अधीनता से तब न्यारी हो अशरीरी स्थिति का अनुभव कर सकती है। जैसे हमारा बाबा विदेही है, दूसरा स्नेहीं है दोनों की आकर्षण प्रकृति की अधीनता से छुड़ा देती है।
हमारी लाइफ मम्मा-बाबा के समान बने भी और रहे भी। बाबा देखो स्नेही भी है तो निर्मोही भी है क्योंकि बाबा का हमारे से स्नेह इतना है जो हमें और सब सम्बन्धों से छुड़ा दिया। एक बाबा ने अपना बना लिया, सचमुच कितना प्यार है उसमें, कितनी रीयल रूहानी आकर्षण है जो हम लोहे जैसे को भी पिघला करके सोना बना लिया है। बाबा क्या से क्या बना रहे हैं। तो अभी हम आत्मायें भी ऐसी साधना करें। जैसे बाबा ने किया वैसे हम भी करें तो यह है साधना। ऐसी साधना करते हुए साकार में ब्रह्मा बाबा समान अव्यक्त फरिश्ता जैसे दिखाई पड़े। बाबा साकार में होते भी सदा विदेही रहे, ट्रस्टी रहे। इतने बड़े यज्ञ के रचता होते हुए भी बाबा इतना नम्रता और सत्यता के अवतार रहे। तो जैसे ब्रह्मा बाबा ने साधना की है उसको अच्छी तरह से समझ करके हमको भी वैसी ही साधना करके नम्बरवन में आना है। हमको नम्बरवार क्यू में खड़ा नहीं होना है।
तो अभी से जो नहीं करने का है वह सदा के लिए खलास, जो करने का है सो अभी करेंगे आज करेंगे और इसी घड़ी करेंगे। अब तक क्यों, क्या की कन्फ्यूज़न में जो टाइम गँवाया है, उससे अभी अपने आपको सीधा करना है। सारा ध्यान इसी में रखना है कि अभी ऐसी गलती दुबारा न हो। इसलिए किसी की कमी को न देख अपनी कमी को निकालना है। मन में ऐसी साधना की लिस्ट बनानी है, यह भी नहीं, यह भी नहीं...।
हमको साधना करने के लिए साधू-संन्यासियों की तरह कोई गुफा आदि में वा हिमालय पर्वत के ऊपर जाके नहीं बैठना है परन्तु चलते-फिरते, सबके साथ रहते साधना करनी है। नम्रता, सत्यता और दिव्यता हमारे गुणों में हो। साधना करने वाला फिर तपस्वी मूर्त भी रहता है। साधना की सफलता मिलती है- त्याग और तपस्या से। अशरीरी हो करके एकटिक स्थिति में स्थित हो जाएँ। तपस्या माना ही हमें निरन्तर योगी रहना है और पुरुषार्थ माना ही है एक के साथ लिंक जोड़कर रखना। आत्मा इस शरीर में होते अशरीरी रहे तो शिवबाबा से शक्तियाँ लेते-लेते, जैसे शिव और शक्ति एक हो जायेगी, माना एकरस स्थिति हो जायेगी। इसी को ही भक्ति में शिव और शंकर को मिला हुआ दिखाते हैं। ऐसी तपस्या हमारे अन्दर से सारे अनेक जन्मों के विकर्मों को भस्म करती है। तपस्या हमारे संस्कारों को अन्दर-ही-अन्दर चेंज करती है। आत्मा के अन्दर से अशुद्धि की अलाए को निकाल शुद्ध सच्चा सोना बना देती है। तपस्या हमारी आत्मा से जंक को उतारती है। तो तपस्या करना नहीं पड़ता है परन्तु खींच होती है, तब सच्ची सुई को चुम्बक खींचता है फिर आत्मा को बाबा के साथ रहने में बड़ा अच्छा लगता है, ऐसा लगता है यहीं बाबा के पास बैठे रहें तो यहीं तो साधना है।
तपस्या से ऐसी अवस्था बन जाती है जो हम यहाँ से न्यारे और बाप के समीप अव्यक्त फ़रिश्ता रूप का अनुभव करते हैं। जैसे बाबा के तपस्वी मूर्त ने मधुबन के सारे वातावरण को इतना शक्तिशाली बनाया है जिसका अनुभव हर एक को अभी भी होता रहता है। तो योग, साधना और तपस्या इन तीनों का कनेक्शन अपना है, परन्तु योग नाम से कहेंगे हमारी बुद्धि बाबा के साथ सर्व सम्बन्ध से है, यह कहने में थोड़ा सोचना पड़ता है। हम बाहर की आकर्षणों से दूर हो करके ईश्वर की आकर्षण में खींचने के लिए पूरी साधना कर रहे हैं। रिचक मात्र भी वृत्ति में कहाँ लगाव-झुकाव तो नहीं है, तभी कहेंगे बेहद का वैराग्य है। तो किसी भी तरफ़ हमारा लगाव, झुकाव नहीं हो यह साधना हमको करनी है।
हम योगियों के लिए बाह्यमुखता बहुत वैरी है जो साधना करने नहीं देगी। साधना करने के लिए बेहद का संन्यासी चाहिए। स्थूल नहीं अन्दर से बिल्कुल संन्यासी। संन्यासी, वैरागी और त्यागी तीनों में अन्तर भी है परन्तु तीनों का कनेक्शन बहुत है, उसमें पहले चाहिए वैरागी फिर बनें त्यागी तब बनेंगे संन्यासी। तो अन्दर से हमारा किसी से कोई तैलुक नहीं है। जो अन्दर से बेहद की वैराग्य वृत्ति को धारण करते हैं उनकी स्थिति निर्विघ्न रहती है। साधना में विघ्न भी आयेंगे, योग में माया घुसेगी। माया समझेगी प्रभु का न बनें, मेरा बनकर रहे तो उसके लिए अन्दर से फैसला कर लेना चाहिए कि हमें ईश्वर का ही होकर रहना है। वैराग्य के साथ फिर त्याग ऐसा हो, जो हमें बाहर का कोई बोल-चाल, खान-पान आदि आकर्षण न करे। कभी खींच ही न हो। दुनिया के वातावरण की खींच होगी या किसी से बातचीत करने की कोई आदत होगी तो यह भी बहुत बड़ा विघ्न है।
जो सच्ची साधना करने वाला है वह स्थूल सब चीज़ों को अवाइड करेगा। जिसको अन्दर से शान्तचित्त और हर्षितमुख रहने की लगन होगी वह अपने आपको ऐसे विघ्नों से दूर रखेगा। और थोड़ी मान की इच्छा भी जो है वह भी विघ्न डालती है। अपमान की जो फीलिंग है वह भी विघ्न डालती है। कैसे हमें सब देख रहे हैं, हम कौन हैं- यह हमें अच्छी तरह से जानते हैं? यह संकल्प भी विघ्न है। विघ्न-विनाशक बनने के लिए एक तो हम कहाँ विघ्न-रूप न बनें। हमारे कारण से यज्ञ की सेवाओं में कोई बाधा न पड़े क्योंकि यह बाधा वा विघ्न डालना माना अपने पर बोझा चढ़ाना। दूसरा कोई विघ्न आये तो हम घबरायें नहीं, मूझे नहीं। मूँझने वाले के ऊपर इसका प्रभाव बहुत जल्दी पड़ सकता है। तो अन्दर से अपनी स्थिति को ऐसा बनाकर रखें जो किसी भी प्रकार के विघ्नों का इफेक्ट हमारे ऊपर ना पड़े। इसके लिए चुप रह, शान्त में बैठ करके विघ्नों को भगाते रहना है क्योंकि बोलने से या चिंतन करने से विघ्न भागेंगे नहीं और ही विघ्नों का वातावरण बनेगा। तो अन्दर की शान्ति और सच्चाई की शक्ति विघ्नों को खत्म करेगी। हमेशा अपने से पूछना चाहिए कि - "मैं कौन हूँ?" बाबा के यज्ञ में विघ्न रूप तो नहीं हूँ? या विघ्नों से घबराती तो नहीं हूँ? या विघ्न-विनाशक हूँ?
अपने एनर्जी की बचत करने के लिए अन्दर से सच्चाई सफाई को बढ़ाओ। दूसरा - ज्ञान और योग में बहाना नहीं दो। बाबा ने माया की जेल से मुक्त किया है तो फिर से जेल बर्ड नहीं बनो। सत्कर्म की एनर्जी जमा करो। उल्टा कर्म करना माना झोली में छेद करना। उस छेद में जो निश्चय का बल था वह संशय में बला गया तो वह एनर्जी कहाँ रहेगी?
भगवान क्षमा का सागर है परन्तु किसको क्षमा करेंगे? जो अपनी गलती को महसूस करेगा। हरेक अपने कर्म से अपनी सज़ा फिक्स कर लेते हैं, तो इसमें बाबा क्या करेंगे! बाबा ऐसे ही किसी के ऊपर दया नहीं करते परन्तु बाबा कहते कि अपने पुराने किये हुए विकर्मों को भूल जाओ, अभी आगे कोई भूल नहीं करो - यही सबसे बड़ी दया है। तो बीती को भूलो और श्रीमत पर चलकर सत्कर्मों का पुण्य जमा करो। जिन कर्मेन्द्रियों से उल्टा काम किया है अब उन्हीं कर्मेन्द्रियों द्वारा सुल्टा काम करो माना अन्दर से ईश्वरीय चिंतन करो, कुछ-न-कुछ सेवा करो तब बाबा ऐसों की बुद्धि का ताला खोलेगा। तो जब तक भगवान से माफी नहीं लिया तब तक बुद्धि का ताला खुलेगा नहीं। इसलिए अन्दर से अपनी रियलाइज़ेशन को बढ़ाओ।
एक ही बाप जो हम सबका साथी सहारा है, यह सत्य है यह दुनिया में चारों तरफ़ सन्देश पहुँच जाये और अनुभव करें तो वह भी दिल से बाप को प्रत्यक्ष करने में लग जायेंगे। तो एक-एक करके माइक नहीं बनाना है, उसमें टाइम लगेगा। अभी समय कम है इसलिए अभी होलसेल सेवा में लग जाओ तो अपने आप माइक निकलेंगे। अच्छा।

ज्ञानी और योगी का मुख्य लक्षण है मुश्किल को सहज बनाना

हम बच्चे बाबा की महिमा दिल से गाते हैं। जैसे हमारे अन्दर से मेरा बाबा निकलता है, ऐसे अब हर आत्मा के अन्दर से यह आवाज़ निकले क्योंकि संसार में जिसको मेरा, मेरा, मेरा... कहा वह मेरा कुछ नहीं रहा। उस मेरा में दुःख अशान्ति पाई है, फ्युचर कुछ नहीं है। और बाबा को मेरा कहा तो भविष्य हमारी नज़रों के सामने दिखाई पड़ता है। दुनिया वालों को सुख-शान्ति दिखाई नहीं पड़ती, हमको दुःख-अशान्ति दिखाई नहीं पड़ती। दुःख का अन्दर से नाम-निशान गुम हो गया क्योंकि अब हमारी ज्योत जगी हुई है। जैसा मेरा बाबा विश्व-कल्याणकारी है - ऐसे मैं आत्मा भी विश्व-कल्याणकारी हूँ। बाबा, बाबा है और हम बच्चे, बच्चे हैं लेकिन बच्चों को बाबा कहता है मेरे समान बनो। बाप कहाँ बच्चे कहाँ, लेकिन इतना बाबा हमारे में उम्मीदें रखते हैं, तो उन उम्मीदों को पूर्ण करने वाले हम हैं। हरेक व्यक्तिगत समझे कि मैं, बाबा आपकी उम्मीदें पूर्ण करने वाली आत्मा हूँ। लाखों-करोड़ों में से आपने मुझे चुन लिया है।
आज की इस दुनिया में सभी आत्मायें तमोप्रधान प्रकृति के साधनों के अधीन हैं, वश हैं। शरीर ऐसा है, दुनिया ऐसी है उसमें बैठे हुए भी हम उसके अधीन न रहें। निमित्त इसका आधार ले करके खुद को पावन बना रहे हैं, प्रकृति को भी पावन बना रहे हैं क्योंकि पतित-पावन बाप के साथ बैठे हैं। पहले तो मायाजीत बनें फिर है प्रकृतिजीत। माया का अंश मात्र भी हमारे में न रहे, इतना ध्यान अवश्य हो। बाबा मिला, सब कुछ मिला तो माया कोई तरह से न डरा सकती है, न हमको अपने तरफ खींच सकती है। माया दो रूप धारण करती है, एक मोहिनी रूप धारण करती है, दूसरा विकराल रूप धारण करती है। तो कमज़ोर डर के मारे माया का बन जाता है या जो कुछ इच्छाओं के वश होता है, वह माया के वश हो जाता है। तो मायाजीत फिर प्रकृतिजीत माना उसके अधीन नहीं लेकिन उसको अधीन करके निमित्त उसका साथ लेकर सर्व प्राप्तियों के मालिक बनने के पुरुषार्थ में लगे रहें। राजाई वहाँ करेंगे परन्तु राजाई लेंगे यहाँ। रावण-राज्य खत्म हो रहा है, राम-राज्य स्थापन हो रहा है, अभी फिर हम अपनी राजाई ले रहे हैं।
योग, साधना और तपस्या में क्या फर्क है? बाबा कहते योग अक्षर निकाल दो इस शब्द से लोग मूँझ जाते हैं क्योंकि लोग इसको बड़ा डिफीकल्ट समझते हैं। योग माना याद। याद माना याद, फिर कोई कहाँ खींचे नहीं, एक बाबा दूसरा न कोई। सर्व सम्बन्ध एक बाप से हो। उसके लिए फिर साधना चाहिए। ऐसा सम्बन्ध बाबा से हो, साधना के लिए त्याग और वैराग्य हो। पहले वैराग्य फिर है त्याग, जब त्याग है तो बाबा देखता है इनका और कुछ है नहीं, न व्यक्ति, न वैभव... तो त्याग वृत्ति तपस्या करा देती है। जब तक त्याग नहीं है तब तक तपस्या नहीं है। साधना हमको त्याग सिखाती है। सदा के लिए वैराग्य माना कहाँ भी कोई लगाव नहीं। तो योग, साधना का लगातार सच्चा पुरुषार्थ हो, उसके लिए है- तपस्या। तपस्या सारे पास्ट के अनेक जन्मों के विकर्मों को विनाश कर देती है। वर्तमान समय तपस्या का बल वायुमण्डल को बड़ा पावरफुल बना देता है और तपस्या हमको एकदम परिवर्तन करके क्या से क्या बना देती है। लोहे जैसे को सोना बना देती है-यह तपस्या की पहचान कहो व कमाल कहो।
अब इतना सब ज्ञान बुद्धि में है, इच्छा भी है ऐसा करें, इनके जैसा बनें परन्तु फिर भी कईयों को कठिन क्यों लगता है? अभी ऐसा कोई उपाय हो जो सब सहज लगे। कठिन हम अपने संकल्प से बनाते हैं परन्तु देखा जाए कितनी कठिन बातें हरेक की लाइफ के अन्दर आई होंगी। परन्तु कोई कहेंगे बड़ी कड़ी परीक्षायें आई हैं और कोई कहेंगे भगवान की दया से अपनी अच्छी शुभ भावना से अच्छा पास करते आये हैं। वह कभी मुख से यह नहीं कहेंगे कि मेरे पास यह कठिनाई है, लेकिन ऐसा कौन नहीं बोलेंगे? जो अच्छे कुल वाले हैं। वह हमेशा भाषा ऐसी रखेंगे जिसमें गम्भीरता, सयानप और सच्चाई हो। तो पुरुषार्थ में कोई कठिनाई नहीं है। विचार करके देखें, योग के लिए, चाहे ज्ञान के लिए, चाहे सम्बन्ध में, चाहे धारणा में सयानप, सच्चाई और गम्भीरता यह तीन बातें हमारे पास अगर हैं तो कभी किसी बात में कठिनाई व मेहनत नहीं लगेगी। हर बात मुख से बोलने के पहले, सोचने के पहले यह करना है, ऐसे करना है बड़ी बात नहीं है। कोई कहे तो सहन करो और शान्त रहो, बड़ी बात नहीं है। यह कहाँ से आवाज़ आया ? सच्चाई से आवाज़ आया, सयानप से आवाज़ आया, गम्भीरता ने कहा ठहर थोड़ा अच्छा ही होगा। तो जो ज्ञानी और सच्चे योगी हैं उनके मुख्य लक्षण हैं- मुश्किल को सहज बनाना।
दूसरा - अभी बाबा ने कहा है तुम वी. आई. पीज़ की सेवा करके माइक तैयार करो, इसका मतलब यह नहीं कि हम उसकी सेवा करें और वह हमारी तरफ़ से बोले, वह ऐसे नहीं बोलेगा, जितना हमारे अनुभव की शक्ति बढ़ती जायेगी, हम उसको यह सिखायेंगे। उनके अन्दर से आवाज़ तभी निकलेगा जब अनुभव होगा कि यही सत्य है। अभिमान टूटेगा, रियलाइज़ेशन आयेगी। समय अनुसार दुनिया वाले कई बातें रिसर्च कर रहे हैं, ढूँढ रहे हैं। आपस में भी कान्फ्रेन्स, मीटिंग, विचार-विमर्श आदि कर रहे हैं परन्तु कोई जवाब नहीं मिल रहा है। उनका जवाब हमारे पास है। जिसकी परमात्मा बाप से प्रीत बुद्धि है, सदा सफलता ने, विजय ने उसको साथ दे करके वैजयन्ती माला में पिरो लिया है।
अभी हम सबको मिल करके व्यक्तिगत पुरुषार्थ में क्या ध्यान रखना है? प्रीत बुद्धि का आधार है- मर्यादायें। प्रीत बुद्धि का प्रैक्टिकल स्वरूप है- श्रीमत। हम सिर्फ मुख से ज्ञान सुनाने वाले नहीं परन्तु सच्चे स्नेही भी है। बोले कुछ और, सोच कुछ और हो, दृष्टि कुछ और हो, नहीं। दृष्टि में जो बाबा ने सत्यता, दिव्यता भरी है वह दृष्टि ही सबको अनुभव करायेगी। जैसे हम लोगों को बाबा की दृष्टि से ही अनुभव होता है।
१९९९ में हरेक ऐसे समझे जैसे नवरात्रि पर ९ दिन के लिए व्रत रखते हैं, ऐसे कम-से-कम ९ दिन अन्दर से ऐसा अभ्यास करते रहें, सारी लिस्ट सामने रखें। हमारे पुरुषार्थ के सफलता में कोई विघ्न न हो। तो विघ्नों का कारण क्या है? विघ्न कोई फ्री नहीं बैठे हैं हमारे पास आने के लिए। हम अलबेले, सुस्त हैं, पक्के नियमी नहीं हैं तो विघ्न और बहाने आते हैं, जो पुरुषार्थ में आगे बढ़ने नहीं देते हैं। तो विघ्नों को हम बुलाते हैं, वह आपेही नहीं आते हैं। फालतू चिंतन करके उसको विघ्न रूप बनाते हैं। क्रिटिसाइज़ करने की नेचर या अवगुण उठाने की नेचर विघ्न बना देती है। विघ्न कहाँ से आते हैं, उसको हम पैदा करते हैं। फिर कोई अपनी नेचर अनुसार विघ्न-रूप बन जाते हैं यानि विघ्न और ही डालने वाले बन जाते हैं, कोई विघ्नों को देख घबराते हैं। अरे, इसके पास आता है तो मेरा क्या हाल होगा? परन्तु अपने से पूछना चाहिए मुझे क्या बनना है? मुझे विघ्न-विनाशक बनना है। कोई आया तो भी उसकी परवाह नहीं की, हनुमान और अंगद के मिसल इतनी स्थिति मज़बूत हो जो कोई हलचल आये तो हम हिलने वाले नहीं हैं। निर्विघ्न स्थिति वाले हों।
तो जो बात हम प्रैक्टिकल होने की भावना से ध्यान पर रखते हैं वह हो जाता है, यह सच्ची और अनुभव की बात है। जिस स्थान के निमित्त हैं वह भी सब निर्विघ्न रहें, चाहे विश्व में जहाँ तहाँ बाबा के बच्चे हैं उनको भी कोई विघ्न न आये। उसके लिए कोई चिंता नहीं है कि विघ्न न आयें, घबराते नहीं हैं लेकिन इतनी योग, साधना और तपस्या दृढ़ता से शुरू करें जिससे हमारे में कोई नवीनता आ जाये और हमारी स्थिति सदा निर्विघ्न, विघ्न-विनाशक की बनें। शान्तचित्त, हर्षितमुख रहें। बाबा जैसे हमें अपने समान बनाना चाहते हैं। बाबा अभी हमें सब कुछ वर्से में दे रहा है इसलिए बाबा कहते अभी जो मैं दे रहा हूँ वह तुम्हारे पास सदा के लिए रहे। और यह देखा जाता है जो बाबा से मिला हुआ है उसका ही सिमरण चलता रहे तो बहुत अच्छी बात है। यही सिमरण हमको शान्तचित्त बनायेगा। चेहरा हर्षितमुख बना देगा। तो ऐसा पुरुषार्थ कम-से-कम ९ दिन हम सब लगातार करें।

ईश्वरीय-सेवा व विश्व-सेवा का आधार स्वयं में व सर्व में विश्वास (विदेशी भाई-बहनों की भट्टी में)

बाबा की हम बच्चों के लिए यही आश है कि हम खुश रहें, खुशी मनाते रहे और औरों को भी उदारचित होकर, विशाल दिल से खुशी बाँटते या देते रहें। 'उदारवित्त' शब्द की महिमा बहुत बड़ी है क्योंकि इसी से महान आत्मा बनना बहुत आसान है। उसके लिए पहले विशाल दिल चाहिए, बुद्धि छोटी-मोटी इधर उधर की बातों से परे हो। बाबा ने जो इतनी अच्छी नॉलेज दी है उससे हम समझदार बनते हैं, नालेज से ही हम भविष्य में देवता बनेंगे लेकिन उसके पहले हम फ़रिश्ता बनेंगे। ऐसे कहा जाता है कि हम इस राजयोग से मनुष्य से देवता बनते हैं। लेकिन पहले लाइट हाउस बनने के लिए अव्यक्त फरिश्ता बनना है। इसके लिए बहुत उदारचित्त होना पड़े क्योंकि फ़रिश्ते उदारचित्त होते हैं, उनका वित्त एकदम साफ़ होता है इसलिए वह सदा हर्षित रहते हैं, उड़ते रहते हैं। खुली दिल से वायब्रेशन देते रहते हैं। उनको बाहर का कोई अटैचमेन्ट नहीं होता है, जो आता है उससे पार चले जाते हैं इसलिए जो संकल्प करो, बिना मेहनत के सहज साकार हो जाता है। तो आजकल यह भट्टी करना माना फ़रिश्तों की भेंट में, हमारे पुरुषार्थ में जो कमी रह गई हो उसको समाप्त करना। इसके लिए इधर-उधर देखने, सुनने-सुनाने की बिल्कुल रिचक मात्र भी रुचि न हो तब हरेक अपने आपको अन्दर में अच्छी तरह से देख करके गहराई में जा सकते हैं, अपनी कमियों को निकाल सकते हैं। तो भट्टी में इस तरह से सच्चाई और सफाई की तैयारी के साथ बैठ जाना है क्योंकि जब अन्दर की सफाई अच्छी है, चित्त साफ है तो जो बाबा की मीठी शिक्षायें हैं वह उनके चित्त पर प्रिन्ट हो जाती हैं। तब उनको हर्षित रहने के सिवाए और कुछ सूझता ही नहीं है। तो जिसने अपनी चित्त को साफ़ करने की मेहनत कर ली, उन्हों को फिर सदा हर्षित रहने की मेहनत नहीं करनी पड़ती है। तो बाबा से बिना मांगे जो हमको आवश्यक है वो अपने आप अन्दर-ही-अन्दर मिलता रहता है। जो बाबा की शिक्षा-समझानी है वह जैसे हमारे अन्दर खज़ानों के रूप में हमारे साथ है, यह अनुभव होता रहेगा।
ज्ञान की प्वाइन्ट्स को सिर्फ नोट करने से या पढ़ने से वह खुशी नहीं रहती, परन्तु वह हमारे पास हो तब बेहद की और सदा खुशी होगी। ऐसे तो बैंकों में कितने नोट इधर-उधर घूमते रहते हैं लेकिन खुशी तब होती है जब वो चीज़ मेरी है। तो जहाँ इन्ट्रेस्ट है, वहाँ कमाई-ही-कमाई है जैसेकि बैंकों में पैसा रख करके इन्ट्रेस्ट से ही काम चलाते रहते हैं। बाकी और बातों से हमारा इन्ट्रेस्ट नहीं है क्योंकि जहाँ कमाई है वहाँ इन्ट्रेस्ट है। हम बड़े बाबा के बड़े बच्चे हैं तो हमें अपने ध्यान को जहाँ ज़्यादा इन्ट्रेस्ट मिलता हो उसी बिजनेस में इन्वेस्ट करना चाहिए। इसमें चाहिए विशाल बुद्धि क्योंकि छोटी-मोटी बुद्धि वाले ऐसे काम नहीं कर सकते हैं। समझो हमारा एक सेकण्ड भी कहाँ फालतू बातों में चला गया और वही मेरी अन्तिम घड़ी हो जाए तो मेरी गति क्या होगी? यह ऐसा क्यों होता है? जब खबरदार, होशियार नहीं रहते। और-और बातों में चले जाने से और बातें ही सुनाई पड़ती हैं फिर कुछ भी बात अपने को नीचे-ऊपर करने वाली ही सुनाई पड़ेगी।
ऐसे बाबा की मुरली सुनते-सुनते बड़ी खुशी में आ जाते हैं, बाबा ने जैसे कहा वैसे नाचने और गाने भी लग पडते हैं फिर कोई बुद्धि में इधर-उधर की बात याद आ गई या किसने कुछ सुनाई तो वह खुशी, वह नाचने और गाने की मस्ती गायब हो जाती है। अचानक चलते-चलते कानों में ऐसा आवाज़ सुनाई पडता है, जो अच्छा नहीं लगता है। फिर बाबा की बातें जो सुनी हुई हैं वह भूल जाती हैं फिर दुःख और दर्द पैदा कर लेते हैं। इसलिए बाबा कहता है अभी तक बच्चों में वेस्टेज़ ज़्यादा है। निगेटिविटी कम है क्योंकि हम सबका चार्ट बाबा के पास है। तो यह भट्टी माना ही अपने आपको देखना, जानना और पूर्ण रूप से परिवर्तन लाना। भट्टी से संगठन की शक्ति मिलती है और मधुबन की धरती, यहाँ का वायुमण्डल ऐसा है जिससे जितना पुरुषार्थ करना चाहो उतना दिल व जान से कर सकते हैं। और इस तरह से सच्ची दिल से पुरुषार्थ करने वाले ही विशाल दिल यानि बड़े दिल वाले बन जाते हैं माना हदों से बिल्कुल पार चले जाते हैं।
जो कोई सेवा का भाग्य मिलता है तो कभी ख्याल ही नहीं आता है कि कैसे होगा? कईयों को आता है। सब कहते हैं, बाबा भी कहते हैं, स्वयं की भी इच्छा है कि यह करो परन्तु आता है कैसे होगा? जो बात अच्छी होने वाली है उसके निमित्त बाबा बनाता है और यही ड्रामा में नूँधा हुआ है परन्तु ईश्वरीय स्नेह और सहयोग का अनुभव कहता है कि हो ही जायेगा। अगर ईश्वरीय स्नेह की शक्ति नहीं है तो ख्याल आता है कि यह कैसे होगा क्योंकि कोई भी काम अकेला तो नहीं करेंगे इसलिए सेवा में सबका कनेक्शन है। ईश्वरीय स्नेह की शक्ति और संकल्प की शक्ति को बढ़ाओ। संकल्प में शक्ति होती है, संकल्प की ही कमजोरी है। खुद में विश्वास बैठता है। संकल्प में पहले आयेगा कि हम करें फिर करते-करते विश्वास बैठ जाता है। कई समझते हैं कि मेरा अपने में ही कान्फीडेन्स नहीं है, कोई कहते हैं कि औरों का मेरे में नहीं है। इनके कारण मेरा भी नहीं है... इस प्रकार के जरा सा ख्यालात भी आगये तो समझो पुरुषार्थ और सेवा दोनों में घाटा पड़ जाता है। घाटा जब पड़ना शुरू होता है या पड़ता है तो घाटे में ही जायेंगे, यह बात बिजनेस वाले अच्छी तरह से जानते हैं। और हम ज्ञानी तु आत्मा भी जानते हैं।
लौकिक और अलौकक इन दोनों में भी बहुत अच्छा घाटे और फायदे का कान्ट्रास्ट है। अच्छा करना चाहते हैं परन्तु होता है बुरा। सब यही चाहते हैं कि सदा अच्छा ही अच्छा होता रहे। कभी बुरा हो ही नहीं इसके लिए हमको बड़ा खबरदार रहना है। हम अगर घाटे में जायेंगे तो औरों का भी मेरे से विश्वास छूटेगा। हमारे संग में आने से सर्व का फायदा ही फायदा होता रहे इसमें चाहिए विशाल बुद्धि क्योंकि इसमें ही सारे कल्प की कमाई है। जिसके संस्कार में रोयल्टी और रॉयल्टी है वह कभी निर्धन हो नहीं सकते हैं और उनको कमाई करने के लिए बैठकर मेहनत नहीं करनी पड़ती है। तो हम अभी दैवीगुणों की सम्पत्ति में बड़े धनवान हो रहे हैं। स्थूल कमाई भी गुणों से आती है, धन से धन नहीं आता है, गुणों से धन आता है। अवगुण से चला जाता है, ऊँचा चरित्र भी धन है, ऊँचे चरित्रवान का मान ज्यादा होता है। धनवान कितना भी हो, राजाई हो परन्तु चरित्र ऊँचा न हो तो सबकी नज़र में वह कैसा होगा ? तो बाबा हमको श्रेष्ठ संकल्पों की शक्ति से कितना श्रेष्ठ और सबसे ऊँचे-से-ऊँचा बना रहे हैं।
बाबा के संकल्प में कितनी पावर है जो इतने हज़ारों को साइलेन्स में खींच लेता है, सबके संकल्पों को न सिर्फ शान्त करता है लेकिन अपने प्रेम का, खुशी का, आनन्द का अनुभव भी करा लेता है। तो कितना भी हलचल का वातावरण हो, उस समय एक सेकण्ड में शान्त में जाने की अपनी अवस्था बन जाये यह बहुत अच्छी रिहर्सल करनी है। जैसे ड्रामा के पार्टधारी होते हैं, आने वाली सीन के लिए बड़ी अच्छी रिहर्सल कर लेते हैं। आने वाले समय में जो समस्यायें आनी हैं या अभी जो हालातें हैं, जो प्रकृति की हलचलें हैं उनके लिए अन्दर इतनी तैयारी पहले से ही हुई पड़ी हो। उस घड़ी तैयारी करने लगेंगे, उस घड़ी सोल-कान्सेस होने की कोशिश करेंगे तो कभी नहीं होगा। उस घड़ी बाबा को याद करेंगे तो बाबा सामने आयेगा ही नहीं। जब कोई घबराहट या कोई मोह वाली बात आती है तो उस घड़ी बाबा नहीं आयेगा, लेकिन अब क्या होगा यह याद आयेगा। उस घड़ी मुसीबत दिखाई पड़ेगी तो हमारी पहले से ही ऐसी प्रैक्टिस हो। हमारे सामने कोई मुश्किल बात है तो साइलेन्स शक्ति से उस मुश्किल को हम सहज बना सकें। सेकण्ड में ड्रामा और बाबा के नालेज की शक्ति से अपने संकल्प को बहुत शान्त, शीतल बनाना है। ज्ञान के आधार से शान्त रहना है न कि दबाके शान्त रहना है, या क्या करें ऐसे समय पर शान्त रहना पड़ता है, ऐसे नहीं। नैचुरल हमारा जो स्वधर्म है उस प्रकार से शान्त रहने की अवस्था बनायें और दूसरी बात कि शान्ति के सागर बाप से जो हमारा सम्बन्ध है, उनसे भी वह शक्ति ले भरपूर हो जाना है। बाबा कहते- बच्चे, तुमको धरती पर पाँव रखने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम हो ही अशरीरी इसलिए तुम आत्म-अभिमानी हो रहने की प्रैक्टिस करने वालों को इस धरा पर पाँव रखने की आवश्यकता नहीं है। जैसे अच्छी तरह से डान्स करने वाले के पैर धरती पर कहाँ होते हैं, क्योंकि वह तो उड़ते रहते हैं, दूसरों को भी उड़ाते रहते हैं। तो अभी ऐसी स्टेज बनाना यह है अन्दर अपने ऊपर रहम करके अपने को शक्तिशाली बनाना, बाप समान बनाना। परन्तु इसका इन्ट्रेस्ट चाहिए। तो इन्ट्रेस्ट पर इन्ट्रेस्ट मिलता रहेगा, बात मत पूछो इसमें बहुत कमाई है! जिसको बाबा कहते- 'प‌द्मापद्म भाग्यशाली' माना जिनकी कमाई सदा ज़ोर है,जिस कमाई से अनेकों को सुख और जीवन-दान मिलता है और हमारे इस कमाई से ही सारे विश्व में शान्ति का, सुख का, सच्चे प्यार का वायब्रेशन मिल सकता है। तो इतने बड़े काम के निमित्त बाबा ने हमको बनाया है उसको छोड़ और बातों के झंझट में जाने से पहले तो अपना ही नुकसान हो जायेगा इसलिए अभी ज्ञान की गहराई में जाकर अपने अन्दर की अच्छी तरह से सफाई कर लो ताकि वह सफाई ही शक्ति के रूप में प्रकट हो जाये।
अपने अन्दर की सच्चाई और सफाई से ही अपने आप पर विश्वास बैठता है। भगवान में भावना और विश्वास रहता है। हमारे ईश्वरीय व विश्व-सेवा का आधार क्या है? एक-दो में विश्वास। कईयों का एक-दो में विश्वास भी बहुत कम रहता है, सच पूछो तो ५ परसेन्ट भी नहीं होगा। एक-दो में विश्वास रखो तो बहुत कमाल का काम हो सकता है, परन्तु यह काम वही कर सकता है जो बहुत विशाल दिल और उदारचित्त वाले हैं। जिसके साथ प्यार होता है, उनको प्यार से याद करने का ढंग आ जाता है। बाबा ने हमारे में विश्वास रखा है कि यह काम यहीं करेंगे, तो हम कहेंगे 'जी बाबा, जी हजूर...' तो बाबा के इस विश्वास से हम सब काम सीख जाते हैं। इसलिए जो बाबा कहें वह करते चलें तो बाबा भी काम देता रहेगा। जो प्रीत बुद्धि वाले बच्चे हैं वह सहयोग की अंगुली से विश्व-सेवा का पहाड़ उठाने वाले हैं। तो आज भट्टी में क्या करेंगे? यह सब काम जिसका जो रहा हो, जो कमी हो वह अपनी पूरी करना है। जिससे यह अनुभव हो कि अब कोई इच्छा नहीं, बाकी सब अच्छा है! अच्छा।

गुणवान बनना है तो किसी के अवगुण चित्त पर नहीं रखो

हम सवेरे से लेकर रात्रि तक हर श्वाँस, संकल्प में खुश रहें, यह खुश रहने का आर्ट सर्वगुण सम्पन्न बनाता है और सर्वगुणों की सम्पन्नता आने से खुश रहते हैं। खुश रहने से गुणग्राही बन जाते हैं। बाबा ने कहा कि जब तक सतयुग की राजधानी स्थापन नहीं हुई है तब तक बाबा हमारे लिए मुरली चलाता ही रहेगा और हम भी सम्पूर्ण देवता बनने तक सुनते रहेंगे। हम जो यहाँ बैठे हैं वह इतने लक्की है कि अपने भाग्य का महिमा कर नहीं सकते हैं। एक तरफ़ है बाबा की महिमा, एक तरफ़ है अपने भाग्य की महिमा और संगमयुग की महिमा। बाबा तो कहते कि मेरी महिमा नहीं करो क्योंकि मैं तो ड्रामा प्लैन अनुसार कल्प-कल्प आता रहता हूँ। बाबा अभी हमको महिमा के लायक बना रहे हैं फिर भक्तिमार्ग में हम बाबा की महिमा करेंगे। उसके पहले हमारे में बाबा अभी दिल से गाने और खुशी में नाचने की विशेषता भर रहे हैं जो स्वाभाविक रूप से हमारी नेचर बन रही है।
अपनी पहले वाली नेचर को परिवर्तन करने के लिए अन्दर में ऐसा गुप्त व्रत रखना है, जिस व्रत में दृढ़ता हो। व्रत के महत्त्व को समझ करके व्रत रखो तो वह व्रत पक्का हो जायेगा। जैसे बाबा ने हमें बताया कि सबसे पहले ब्रह्मचर्य के व्रत में पक्के बनो इससे सच्चाई-सफाई आयेगी फिर सर्वगुण भी आयेंगे। और सर्वगुण तभी हमारे में आयेंगे जब किसी का अवगुण हमारे चित्त पर नहीं होगा। एक तो अपने आपको जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहना है। जो मुझ आत्मा के निज़ी गुण हैं-ज्ञान, प्रेम, आनन्द, शान्ति, शक्ति...। उसी स्वरूप में हम सदा रहें। सिर्फ अपने को आत्मा समझने से ऐसी स्थिति नहीं बनती है। आत्मा को अपने निज़ी गुण सदा याद आयें। आत्म-अभिमानी स्थिति माना आत्मा के जो निज़ी गुण थे वह इमर्ज हो जाएँ।
इस ज्ञान को बुद्धि से समझने के साथ-साथ बार-बार स्मृति आवे तब वह स्वरूप बनेंगे। तो ज्ञान से प्रेम, प्रेम से आनन्द, आनन्द से शान्ति, शान्ति से शक्ति... फटाफट आती जाती है। इन बातों की गहराई में जितना जाओ उतना सदा अपने स्वरूप में स्थित होने की हॉबी हो जायेगी फिर वह नेचर बन जायेगी। परन्तु हमारे में जो पहले वाले अवगुण थे उन सबको निकालना होगा, नहीं तो वह अवगुण हमारे सारे गुणों को खत्म कर देगा। अपने व अन्य के अवगुण के बारे में अगर एक बारी भी सोच लिया, देख लिया तो पर्सनल जो आत्मा के गुण हैं वह भी ढक जायेंगे माना वह काम नहीं करेंगे। हमको सम्पन्न बनना है तो सर्व से गुण उठाना है, किसी के अवगुणों का हमारे पर कोई इफेक्ट न आये इसके लिये अपने असली स्वरूप में टिक जायें।
मम्मा को बाबा ने कहा - तू लक्ष्मी बनेंगी बस एक बारी कहने से मम्मा की सूरत, सीरत बदल गई। मम्मा सचमुच मोहिनी-मूर्त लगती थी, क्योंकि मम्मा को यह पक्का था कि मुझे गुणवान बनना है, गुण देखना है, गुण दान करना है... यह तीन बातें मम्मा को पक्की थी। इसलिए इनकी उम्र भल कम थी लेकिन धारणा में बड़ी होने कारण उनको सब बड़े-छोटे दिल से 'मम्मा' कहने लगे, उस समय तो मम्मा की पर्सनैलिटी के मुकाबले में औरों की भी पर्सनैलिटी थी फिर भी मम्मा सबसे आगे नम्बर वन चली गई। -
तो हमारी भी चलन ऐसी हो जो औरों को प्रेरणा दे। हमारा बोल-चाल ऐसा हो जो अन्य आत्माओं को स्वतः ही गुणग्राही वृत्ति बनाने का सहयोग प्राप्त होता रहे - यह भी एक प्रकार से गुप्त दान यानि सहयोग है। इसलिए दान हमेशा गुप्त किया जाता है, किसको बताकर करने की आवश्यकता नहीं है कि हमने इनको इतना दान दिया है...। यह भी पता है कि गुप्त दान का महापुण्य होता है। अपने को परिवर्तन भी करना है तो बड़ा गुप्त रीति से और अच्छी तरह से ज़िगर से अपने को जान करके, पहचान करके मेरे में बाकी क्या रहा है। यह सूक्ष्म चेकिंग करके चेंज होते जायें। ज़रा-सा भी अवगुण हो तो वह निकल जाये। अवगुणों को निकालना बिल्कुल आसान है, निकल सकता है परन्तु पहले यह जानें तो सही कि यह कोई अवगुण है?
इसमें देही-अभिमानी स्थिति से अपने आपको जानने की आवश्यकता है कि मुझ आत्मा में क्या अवगुण है? दूसरों में अवगुण है वह तो अच्छी तरह से दिखाई पड़ता है, इसके लिए उस पर नाराज़ भी हैं कि इसका यह अवगुण खराब है। परन्तु मेरा अवगुण, मेरी कमी जो है... उसका क्या! हमको अभी सर्वगुणों में सम्पन्न बनकर सम्पूर्ण बनना है तो उसके लिए अभी हमको अवगुण वाली नेचर को खत्म करना है क्योंकि अवगुण के साथ स्वभाव का कनेक्शन है, अगर हमने किसी का अवगुण देख लिया तो वह हमारे स्वभाव से प्रकट हो जाता है, अपने फेस के द्वारा उसको दिखा देते हैं या हमारे गुण को कोई ने नहीं जाना तो हमारे को इस पर भी थोड़ी नाराज़गी आ जायेगी, यह भी हमारे चेहरे से पता पड़ता है। तो जो भावना होती है वह फेस पर आती है।
समझो किसी में माया आती है तो वह समझते हैं कि हमें कोई देख नहीं रहा है, किसी को पता नहीं है कि मेरे में कोई माया आई है... परन्तु जो अन्दर है वह कभी किसी से छिपता नहीं है इसलिए यह कभी नहीं समझना चाहिए कि कोई बात छिपती है। अगर ऐसा समझ लेते हैं तो यह बहुत बड़ी भूल है, इस प्रकार से छिपाना यह बड़ा अवगुण है। वह कभी अंतर्मुखी सदा सुखी' का अनुभव नहीं कर सकते हैं क्योंकि दिल और दिमाग में जो है वह फेस बताता है। अगर हम शान्त-चित्त है, हँस के मिसल हैं, अन्तर्मुख रहते हैं तो हम अपने आपको अच्छी तरह से जान सकते हैं, अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं। फिर वह जान-पहचान की स्मृति से वह स्वरूप बनते-बनते नैचुरल होता जायेगा। क्योंकि मम्मा-बाबा के बच्चे हैं तो उनको फ़ालो करना है यह भी अन्दर एक धुन लग जानी चाहिए।
बाबा राजधानी स्थापन करा रहे हैं तो हमको उनके राज्य में आना है, प्रजा में नहीं आना है। प्रजा में आने वालों को समय का, बाप का, स्वयं का कदर नहीं होता है। जिनको कदर है वही अन्दर-ही-अन्दर गुप्त पुरुषार्थ करके, बाबा को सामने रख करके बाप समान बनेगा। दूसरे को भी गुप्त आप समान बनायेगा। बाबा पराये को अपना बना रहा है, हमारे तो सब अपने हैं, आपस में इतना रूहानी हड्डी स्नेह से हम एक-दो के सहयोगी बनें। सच्चे ईश्वरीय स्नेह का एक-दो को सहयोग दें, यह भी बड़ा गुण नैचुरल हमारे में आ जाये। तो मम्मा-बाबा को फ़ालो करने वाले के संस्कार, राज्य-पद पाने वाले के संस्कार माँ-बाप के समान बनेंगे। बाबा को सच बोलने वाला बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि बाबा से सच्चा रहने में बहुत सुख मिलता है। अपनी गलती सुनाना मुश्किल लगेगा परन्तु दूसरों की गलती सुनाना सहज है। तो ऐसों को बाबा इशारा कैसे देगा, देगा तो भी वह कैच नहीं कर पायेंगे। तो बाप और बच्चे का आपस में इतना स्नेह, इतनी सच्चाई है जो कमाई होती रहे। सच्चाई के आधार पर हमारी सूरत और सीरत के द्वारा बाप की प्रत्यक्षता होगी।
जितनी सच्चाई उतनी गम्भीरता, उतना सयाना लगता है। गुण और शक्तियों का आपस में कनेक्शन है। गम्भीर जो होगा उसमें समाने, सहन करने, समेटने की सब शक्तियाँ होंगी। और सयाना उसको कहते हैं जिसमें परखने और निर्णय करने की शक्ति होती है। वह कभी धोखे में नहीं आ सकता है, न धोखा दे सकता है। वह कभी किसके प्रभाव में नहीं आ सकता, न अपना प्रभाव किस पर डाल सकता है। अपना प्रभाव डालना भी सूक्ष्म पाप है। हमको तो पहले से किये हुए पापों से, विकर्मों से मुक्त होना है, उन सबका विनाश करना है और अभी फिर मेरे से कोई ऐसा संकल्प, बोल व कर्म न हो जो पाप बन जाये। न हम अपनी वाणी से, चेहरे से प्रभाव डालें, न हमारे पर किसी का प्रभाव पड़े तब हमारे में ईश्वरीय गुण आयेंगे फिर वही सतयुग में दैवी ऊँच पद पायेंगे। यहाँ के ज्ञान और योग के बल से यह सारी दुनिया सतयुग में परिवर्तित हो जायेगी, उसमें भी यह काम करने वाले हम हैं। ऐसी बातों की जितना स्मृति रखेंगे उतना और बातों से फ्री रहेंगे। न अपने लिए ऐसी कोई पुरानी बात याद आये, न किसकी...।
शिवबाबा जो सुना रहे हैं उसका ही मंथन करना है, वही चिंतन, वही हमारे जीवन में आये उसके सिवाए और कोई चिंतन, वर्णन न हो तब हम सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण बन सकेंगे। बाबा बना रहा है, हमको बनना है बस और कोई ख्याल है ही नहीं। हम बनेंगे तो सब बनेंगे परन्तु पहले हमारी ज़िम्मेवारी है। हमारे सामने जो भी आयेंगे, वह कब-न-कब कोई जल्दी, कोई देरी से कुछ-न-कुछ बनेंगे ज़रूर। इसके लिए हमें हरेक के प्रति गुण-दान करते रहना है। अच्छा।

बाबा की समीपता का अनुभव करने के लिए निर्भय बनो, निर्भयता बहुत बड़ा गुण है

बाबा के दो प्रकार के बच्चे हैं- एक कहते हैं बाबा आपकी याद आती है दूसरे कहते आपकी याद भूल जाती है तो यह इतना अन्तर क्यों ? जो कहता है याद भूल जाती है उसका चेहरा कैसा होगा! जो कहता है उसकी याद आती है तो उसका चेहरा कैसा होगा। तो अपने आपसे पूछो हम किसमें हैं? समय अनुसार अभी अन्दर से यह आवाज़ निकले कि बाबा आपकी याद बहुत आती है, बाकी सबकी याद ऐसी भूली हुई हो जो भूल से भी याद नहीं आये क्योंकि भूल से भी और किसकी याद आई तो बाबा की याद में भूल हो जायेगी। जब कोई भूल हो जाती है तो पिछली बातों की भी याद आती है, बाबा की याद भूल जाती है। हमारी ब्राह्मण लाइफ सो देवी-देवताओं में ऊँच पद पाने की लाइफ का आधार 'याद' के ऊपर है। याद में रहने वाले को नीचे-ऊपर होने में थोड़ा डिफीकल्ट लगता है। नीचे-ऊपर होने का कारण क्या है? बाप की याद भूलना। ऐसे में सूक्ष्म साइलेन्स में चले जाओ तो उस कारण का पता चलेगा और अपनी श्रेष्ठ स्थिति में स्थित होना सहज होगा। फिर ज़रा-सा पाँव फिसलने पर हो तो अपने आपको बहुत सम्भालो।
जब स्थिति ऊपर-नीचे हो तो किसका हाथ पकड़ लो माना अच्छा पुरुषार्थ करने वाले का सहयोग ले लो। बाद में रहने की मदद ले लो। तो ऐसी स्थिति में नरवस होने की ज़रूरत नहीं, मूँझो नहीं क्या होगा, सोचो भी नहीं, बाबा ने इस बारी हम सबको बहुत शार्ट और स्वीट शब्दों में वरदान दिया है कि निर्भय बनो। निर्भयता एक बहुत बड़ा गुण है। निर्भय रहने से हम बाबा के समीपता की शक्ति का अनुभव कर सकते हैं। भय माना अन्दर गुप्त देह-अभिमान वश हैं। देह-अभिमान हमको वह ताकत जमा करने नहीं देता है इसलिए भय होता है। पता नहीं क्या होगा, पता नहीं क्या होगा... यह जरा-सा संकल्प स्पर्श भी हुआ तो भय है। सोचने में थोड़ा भय होगा तो वह कभी भी मास्टर आलमाइटी अथॉरिटी बन नहीं सकेंगे क्योंकि हमको बाबा ने कहा है कि तुम भी मेरे समान मास्टर आलमाइटी अथॉरिटी हो। तो इसके लिए बाबा से आल-माइट लेते रहो। वह माइट इतना काम करती है जो काम करेंगे वो सब राइट होंगे। हमारे अन्दर सच्चाई की शक्ति इतनी हो जो माइट खींच सकें, जिससे फिर हम सदा लाइट और निश्चित रहें।
निश्चित रहके लाइट रहना बहुत अच्छा है, ड्रामा पर अचल-अडोल रहने की आदत डालो तो निर्भय बनने में मदद मिलेगी। स्थिति को पहले अचल कहेंगे फिर अडोल कहेंगे। अचल का मतलब ही है कहाँ चलायमान न हो। व्यक्ति, वैभव, स्थान... कहाँ भी हमारा लगाव होगा तो यह भी उसके साथ अधीनता कहेंगे। उनको छोड़ने से असुरक्षित महूसस करेंगे। अडोल माना कभी स्थिति नीचे-ऊपर न हो, तो पुरुषार्थ में हर बात में जब एम रखते हैं तो वह उस अनुसार हो जाता है। यह टाइम ही अपनी स्थिति को ऐसा बनाने का है। और यह खुद को बनानी पड़ेगी, बातें तो बहुत आयेंगी, पहले भी आई हैं, अभी और ज़्यादा आयेंगी लेकिन उसके पहले अभी मुझे अचल-अडोल रहने का ध्यान रखना है। अचल-अडोल माना चिंतन और चिंता से फ्री हों, 'एक बल एक भरोसा' क्योंकि अन्त में सब आधार निकल ही जाने वाले हैं। तो आधार थोड़ा बहुत हो भी परन्तु फिर भी निराधार रहें।
इसमें परीक्षायें बहुत आयेंगी लेकिन बहुतकाल की गुप्त मेहनत उस घड़ी मदद करती है। पहले बहुतकाल से निश्चय के बल से अचल-अडोल स्थिति बनाने की मेहनत की हुई है तो वह आई वेल में मदद करती है। यह भी पक्का समझ लो कि अभी कोई परीक्षा आवे और बाबा को कहो कि बाबा मदद करो तो बाबा कभी मदद नहीं करेगा क्योंकि पहले बाबा से मदद ली नहीं है फिर अभी कैसे करेगा ? परन्तु पहले से ही बाबा से बहुत काल से मदद लेके स्टॉक रख दो। तो अचल-अडोल बनने से स्थिति मज़बूत बन जाती है। फिर सेवा में अनेकों के साथ सम्बन्ध होता है तो कभी कहाँ, कभी कहाँ पर कई प्रकार की बातें आती हैं परन्तु अन्दर की स्थिति मज़बूत होने कारण, मर्यादाओं के बैलेन्स को ध्यान में रखते हुए मिलनसार हो करके पार कर लेते हैं। कई ऐसे हैं मिलनसार तो होते हैं परन्तु गम्भीरता न होने कारण मर्यादाओं में ऊपर-नीचे हो जाते हैं। रमणीकता भी हो परन्तु लक़ीर के अन्दर हो क्योंकि हमें तो 'सच्ची सीता' बनना है।
तो कभी भी ईश्वरीय परिवार से नाराज़ नहीं होना चाहिए, इसके पहले हम किसी को नाराज़ नहीं करें। जरा-सा भी कहीं कुछ हो तो फौरन राज़ी कर लो, एक-दो को सावधान करके समझदार होके चलो तो एक-दो से अलौकिक मदद मिलती रहेगी। एक बार भी अगर किसी को नाराज़ होने की आदत पड़ गई तो उसकी नेचर बहुत नाजुक वाली हो जायेगी इसलिए अपने से यह पक्का कर लें कि कभी किसी से कुछ भी हो जाये फिर भी हम नाराज़ नहीं होंगे। नाजुक नेचर वाला भी बाबा को याद नहीं कर सकता है। खुशी की याद से अतीन्द्रिय सुख में रमण करने का जो आनन्द है, वह याद नहीं होगी। तो सूक्ष्म चेकिंग करना चाहिए कि नेचर में ऐसा क्या नाजुकपना है, अभिमान है या क्या है? जिसको मैं ऐसे खत्म करके, अन्दर से इतनी साफ़-सफाई करके अपनी स्थिति को अच्छा बनाने की कृपा करें, रहम करें। भले कितनी भी सेवा करो परन्तु अपनी स्थिति को अच्छा बनाने का भाग्य मिस नहीं करना चाहिए। सेवा का भाग्य अलग है, स्थिति ऊँची बनाने का भाग्य बहुत अच्छा है, उसमें बाबा की गुप्त मदद, सकाश व दुआयें ढेर की ढेर मिलती हैं।
जो अपनी स्थिति को अच्छी ऊँची बनाने की मेहनत करते हैं उनको देख बाबा बहुत खुश होते हैं और उनके लिए बाबा की दिल में गुप्त उम्मीदें बढ़ती हैं। बाबा उससे कई ऐसे गुप्त काम कराने के लिए उसको नज़र में रखता है। भगवान के पास हमारे से कई ऐसे गुप्त काम कराने की लिस्ट है। बाबा देखता है कि यह इस सेवा के लायक है। तो बाबा सिखा रहा है कि बच्चे ऐसे करो, ऐसे नहीं करो। जब सदा हजूर के सामने 'हाँ-जी' कहने की टेव (आदत) पड़ जायेगी तो बाबा अपने आप कई कार्य करा लेगा। 'हाँ-जी' कहना कईयों को थोड़ा मुश्किल लगता है। किसी को अच्छा लगता है यह भी अन्तर है, कोई खुश करने के लिए हाँ-जी कहेंगे, कोई कहेंगे देखेंगे......।
बाबा अन्दर-ही-अन्दर पत्थर से पारस बना रहा है, यह कम बात है क्या! लोहे से सोना बनो तो भी कोई बड़ी बात नहीं है। वह तो संग से लोहे से सोना बन जाता है परन्तु वह पारस भी बन जाये तो यह कितनी अच्छी और कितनी बड़ी बात है। पारसनाथ बाबा ऐसों को इतना नज़र में रखेंगे जिससे वह सोने जैसा तो बना अभी उसको पारस बना दूँ, इतनी अन्दर ईश्वरीय आकर्षण होगी। इसमें सिर्फ बुद्धि की लाइन क्लीयर रख करके अपने चरित्र को ऊँचा बनाने की बात है। जैसे ब्रह्मा का चरित्र बताता है कि नारायण कैसा होगा। वहाँ उनका राज्य है, यहाँ उनके चरित्र हैं, यहाँ उनकी पर्सनैलिटी इन आँखों से देखी है। 'पाण्डव' माना जिसकी प्रीत बुद्धि हो, 'शक्ति' माना जो परमात्मा से डायरेक्ट शक्ति खींचने वाली हो। इसलिए दोनों का कितना गायन है क्योंकि दोनों बहादुर, महावीर हैं।
तो देखा है जिस आत्मा का आदि से ऊँचा चरित्र है वह बाबा से शक्ति खींचते हैं। अपने आप उसको सकाश भी मिलती है क्योंकि नाम बाला करने में चरित्र काम करता है। जिनके साथ वह सम्बन्ध-सम्पर्क होंगे तो वह कहेंगे कि इनका चरित्र देख करके ही लगा कि हम भले भगवान तक पहुँचे या नहीं पहुँचें परन्तु इनको भगवान ने इतना अच्छा सुन्दर बनाया है। हमने पवित्रता से ही बाप को जान लिया, मान लिया और जीवन में धारण कर लिया फिर अपवित्र संकल्प हमको टच भी क्यों करें, अलाऊ नहीं है। किसी का नाम-रूप आकर्षण नहीं कर सकता है। कोई अपना ऐसा रूप दिखा नहीं सकता है जो हम मोहित हो जायें। ऐसा हम अपने पवित्रता की नींव को मज़बूत करें। जिसकी पवित्रता की नींव मज़बूत होती है उसको कोई हिला नहीं सकता है।
आदि सनातन देवी-देवता धर्म के आधार पर ही बाकी सब धर्म हैं, टाल-टालियाँ हैं इन सबकी नींव पवित्रता है। वह कहाँ से आई ? यहाँ से आई, संगम पर कैसे हम बच्चों को बाबा ने पतित दुनिया से निकाल करके अपनी आकर्षण से ब्रह्मा द्वारा पवित्र बनाया है। सतयुग में लाने के लिए विष्णु का साक्षात्कार करा करके सर्वगुण सम्पन्न बनाया है। इन सबके लिए क्या करना होगा ? अनेक और बातों में ध्यान न रख अपने उपर ऐसा ध्यान रखने से वह सब सहज होते जायेंगे। इसमें सिर्फ ध्यान वाली बात है। बाबा को पवित्रता बहुत प्यारी लगती है, इसमें ईष्यां, द्वेष भी अपवित्र बनाता है। किसी से हमारी नहीं बनती है, किसके साथ बहुत स्नेह से चलना और किसके साथ रूखा-सूखा होकर चलना तो यह भी अपवित्रता है। तो यह चेक कर लो कि कहाँ मैं किसी से नाराज़ तो नहीं हूँ? या मेरे से कोई नाराज़ तो नहीं है? हम किसी की गलती अपने अन्दर ले लेते हैं तब हमारा रूप चेंज हो जाता है। तो सोचो कितना हमें ध्यान रखना होगा? पवित्रता होगी तो सर्वगुण आयेंगे। पवित्रता की कमी होगी तो सर्वगुण नहीं आयेंगे।
आज संसार में गुण तो हैं परन्तु उन गुणों में ईश्वरीय आकर्षण नहीं है क्योंकि बिना ईश्वरीय आकर्षण के गुण होंगे तो वह प्रभावशाली तो होंगे लेकिन वह प्रभाव नुकसानकारक है। वह अपने में ही फँसाकर रखेंगे। इसलिए गुणों में ईश्वरीय आकर्षण चाहिए जो हर कोई ईश्वर के तरफ़ खींच आवे। जो सच्चा है वह काम चलाऊ पुरुषार्थ नहीं कर सकता है, वह सोचेगा करना है तो एक्यूरेट और राइट करना है। बाबा को सामने रख करके करना है, जैसा बाबा करा रहा है वैसे ही हमको करना है। जो हुआ सो ड्रामानुसार अच्छा ही हुआ और आगे अच्छा ही होता रहेगा इसलिए अन्दर में चिंता से चित्त फ्री है। ऐसे अन्दर-ही-अन्दर हर बात में हल्के और सच्चे होकर प्यार से चलो और दूसरों को साथ दो। हम भी आगे बढ़ें और दूसरे भी हमारे साथ-साथ आगे बढ़ते रहें तब हमारे आपसी प्यार में कोई कमी नहीं आयेगी और ना ही कोई थकावट होगी। एक-दो के साथ हल्का रहने से भी बहुत फायदा है, हल्का माना गुणग्राही। इसमें अकेला व्यक्तिगत भी पुरुषार्थ करना है और बाबा के साथ ऐसा अटूट प्यार हो जिससे सर्व सम्बन्धों का रस मिलता रहे।
बाबा से जो प्राप्तियाँ हमें होती हैं वही हमको सम्पन्न बनायेंगी इसलिए उन प्राप्तियों को सदा स्मृति में रखना है। हर समय की प्राप्ति ही, हमको अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खज़ानों में यह अनुभव करायेगी। तो अपने को ऐसा भाग्यवान समझने से बाबा की याद अपने आप आती रहेगी।

किसी को दोषी बनाने के बजाए स्वयं को स्वच्छ बना कर उड़ते जाना है

रोज़ सवेरे सवेरे मुरली हमें आत्म-स्वरूप में स्थित होकर रहने का, एक बाबा से सर्व सम्बन्ध रखने का, ड्रामा पर अचल-अडोल रहने का ध्यान खिचवाती है। और सब बातों को बुद्धि से निकाल बाबा की मुरली पर मनन-चिंतन करो। सवेरे-सवेरे मन को साफ़ करने के लिए मुरली का झाडू मिल जाता है। जैसे रोजाना घर में सफाई की जाती है। तो सफाई से जिसका प्यार होता है वह ज़रा-सा भी कहाँ पर किचड़ा देख नहीं सकता है। बाबा भी कहते हैं कि सफाई ऐसी हो जो मक्खी, मच्छर को आने का कोई चान्स न हो। तो सवेरे सवेरे मन की इतनी सफाई कर लो जो कोई मक्खी-मच्छर भी न आवे, कोई खटमल था जूँ भी न हों। यह सब होते छोटे-छोटे हैं परन्तु सब खून को खराब करने वाले हैं। सारा दिन सिर-खपाई वाली बात हो जाती है। मन में बीमारी पैदा कर देते हैं। इसलिए अन्दर की सफाई बहुत ज़रूरी है।
कई हैं जो इसकी उसकी बातें लेकरके, यहाँ वहाँ से किवड़ा इकट्ठा करके बीमार हो जाते हैं। जो बात कहीं देखी सुनी तो भी इन्फेक्शन हो जाता है, ऐसी आत्मायें हेल्दी माइण्ड कभी नहीं हो सकती हैं और बॉडी भी हेल्दी नहीं होगी, एवर हैपी रहना भी बड़ा मुश्किल लगेगा। कोई कुछ सुनाता है तो हम कोई डस्टबीन तो नहीं हैं। इसलिए क्या करना चाहिए? साफ़ और सच्चे रहो तो कोई गन्दगी की बातें आयेंगी ही नहीं। जहाँ सफाई है वहाँ किचड़ा फेंकने वाले को मूर्ख माना जाता है, दण्ड पड़ जाता है। हमारा मन भगवान का घर है, मन्दिर है। परमधाम में रहने वाले भगवान को यहाँ घर कहाँ से मिलेगा? तो मेरा मन किसका घर है? कोई देहधारी का घर है? किसी को याद आये तो उसके लिए घर है! जो जिस घड़ी जहाँ से भी आवे, वह मेरे मन में घुस जावे और फिर वह कहें कि मैं तुम्हारे मन का मालिक हूँ, इसलिए तुम बाबा को याद नहीं कर सकता है!
बाबा को तो बहुत घर हैं, हमने भी अपना घर उसको दे दिया है? या कोई भी इस घर पर अपना अधिकार जमा लेता है। जैसे आजकल किसी को कोई किराये पर घर दो तो किरायेदार थोड़े टाइम के बाद मालिक हो जाते हैं। आये तो मेहमान बन करके थे। परन्तु वह यहाँ ही मालिक बनकर बैठ जाते हैं। हमने भी किसी को अपना घर किराये पर दिया तो नहीं जो वह अपना अधिकार जमा ले।
हम ड्रामा की भावी को अच्छी तरह से जानते हैं, ड्रामा में हर पार्टधारी के पार्ट को जानकर साक्षी भाव धारण करो। उसमें आश्वर्य खाने की कोई बात नहीं है, दुःख या अफसोस करने की व रोने और रूठने की भी बात नहीं है। जिनके पास ड्रामा का ज्ञान नहीं होगा तो उन्हें रोना आयेगा। किसी से रूठ जाना या अपसेट होना माना ड्रामा को समझा ही नहीं है। कोई रोयेंगे कम, परन्तु रूसेंगे तुरन्त बहुत जल्दी, फिर वह सेवा से भी रूठेंगे। ड्रामा कितना धीरज, शान्ति, प्रेम सिखाता है। यह अनादि अविनाशी ड्रामा बना बनाया है, बाबा ने कहा हे बच्चे, मैं तुमको इतना गहरा गुह्य ते गुह्य ज्ञान समझाता हूँ, तुम उस पर विचार सागर मंथन करके हर्षित रहना तो सीखो। तो अपने को आत्मा समझने से शान्त बनना सीखेंगे, बाबा को सदा अच्छी तरह से, प्यार से जान करके सर्व सम्बन्ध से शक्ति ले करके प्यार के सागर बाबा से प्रेम खींचना सीखेंगे तो औरों को प्रेम दे सकेंगे।
किसी के साथ कभी-कभी हद वाले प्रेम से रहना, किसी के साथ रूखा रहना यह दोनों ठीक नहीं हैं। अगर रूखा है, रूठने वाला है तो उनसे बात करने में डर लगता है और किसी से थोड़ा-सा प्रेम से बात करो तो कहीं अटैचमेन्ट न हो जाये इसका ध्यान रखना पडता है, इसलिए यह दोनों बातें ठीक नहीं हैं। कई ऐसे समझते हैं कि रूखा रहना अच्छा है जिससे कोई कान्टैक्ट में नहीं आयेगा। और किसी से ज़्यादा प्रेम से काम लेने से तो बाकी भी अटैचमेन्ट ज़्यादा हो जायेगी तो भी मुश्किल है। तो क्या करना चाहिए? हम अपने को सही रूप से आत्मा समझ करके अपने स्व-धर्म में स्थित रहने का अभ्यास करें। आत्मा देखो इतनी छोटी है फिर कितनी प्युअर है और शरीर देखो कितना बड़ा है। शरीर छोटे से बड़ा होता है लेकिन आत्मा शरीर में जैसे प्रवेश होती है वैसे ही उतनी ही साइज में शरीर छोड़ती है। लेकिन उसमें जो पार्ट भरा हुआ है जिसमें स्थित रहकर बाबा से शक्ति खींचे।
आत्मा सबसे पहले शान्त रह बाबा को प्यार से याद करती रहे तो बाबा समझेगा कि यह आत्मा बहुत समझदार हो गई है। जैसे ही आत्मा अपने स्व-धर्म में स्थित होगी तो वह स्वयं को एकदम प्युअर फील करेगी जैसेकि परमधाम में आत्मा की स्टेज कितनी प्युअर होती है और आदि में कितना भरपूर होती है, ऐसे अनुभव होने लगेगा। आत्मा कैसी है यह शरीर द्वारा पता पड़ता है, जिस तरह से हम ब्रह्मा की आत्मा से यह जानते हैं कि कृष्ण की आत्मा कैसी होगी। ब्रह्मा की आत्मा में शिवबाबा भी है क्योंकि उसके द्वारा ज्ञान के सागर, प्रेम के सागर ने जिस प्रकार से जो सेवा की है, वह शक्ति संस्कार के रूप में ब्रह्मा की आत्मा में भर गयी है। और बाबा ने कहा- हे आत्मा बच्चा, मैं तेरे में भी अपना और सबका ज्ञान भर रहा हूँ। तो जब बाप हम आत्मा में इतना ऊँचा श्रेष्ठ ज्ञान भर रहा है तो उस भरपूरता से हमारी सदा हर्षित रहने की नेचर बन जाये। तो इस तरह बाबा की बातें न सिर्फ बातें हैं लेकिन यह खुराक है, शक्ति है।
रेस में दौड़ने वाले ऐसे घड़ी घड़ी देखेंगे वह फेल हो जायेंगे, जिसको दौड़ना है या उड़ना है तो किसी को नहीं देखना है। जिनको दौड़ लगाना होता है, वह अपना रास्ता आपेही क्लीयर करते रहते हैं। क्यों, क्या का क्वेश्चन करेगा तो पीछे रह जायेगा तो इसमें बड़ा अक्लमंद बनना है। लक्ष्मी-नारायण बन विश्व की राजाई लेनी है, राजधानी स्थापन करके वहाँ राज्य किया है तो यह बहुत बड़ा अक्ल का काम है। ड्रामा में जो बना हुआ है वह एक्यूरेट है, इसलिए कभी कोई यह न कहे तो छोड़ो, संकल्प भी न करे कि यह ऐसा क्यों करता है...। ऐसा कहना माना बाप के रचना की गलती निकालना। इसलिए धीरज से ड्रामा को अच्छी तरह से समझ करके चलने वाली आत्मा गम्भीर, सयानी होगी। रोने और रूसने वाला नज़दीक कैसे आयेगा। वह तो प्रजा की भी प्रजा बनेंगे।
यहाँ भी बाप के समीप और सतयुग में भी बाप के समीप आना - बड़ा अक्ल चाहिए, ऐसा नहीं कि हमें समीप आने नहीं देते हैं। किसी का काम नहीं है समीप लाना। बाप के समीप सच्चाई, रूहानियत, गम्भीरता ले आती है इसलिए किसी को दोष नहीं दो, अपने को भी निर्दोष बनाओ क्योंकि ड्रामा में हरेक का अपना पार्ट है, वह कल्प पहले मुआफ्रिक उतना ही पुरुषार्थ करेगा। हरेक आत्मा का पार्ट नूँधा हुआ है तो हमें साक्षी हो करके प्ले करते रहना है, किसी के स्वभाव-संस्कारों को छूना भी नहीं है और अपने स्वभाव-संस्कारों को स्वच्छ बना करके उड़ते जाना है, अभी चलने का टाइम पूरा हुआ, दौड़ने का भी पूरा हुआ। चलने में स्पीड कभी कैसी, कभी कैसी, दौड़ने में कभी श्वाँस चढ़ता है और उड़ने में शान्त रहते हैं। पंख आ गये जैसे प्लेन को भी पाँव होते हैं परन्तु जब उड़ता है तो पाँव को अन्दर कर देता है और जब थोड़ा उतरने लग जाता है तो पाँव को नीचे रखता है। अभी हम उड़ती कला नहीं सीखेंगे तो बाप को प्रत्यक्ष नहीं कर सकेंगे। इस दुनिया से पार रहने के लिए हर बात से परे जाना है।
यह ड्रामा अनादि अविनाशी है, वह बदलेगा नहीं कितना भी माथा टक्कर खायेंगे तो भी सीन चेंज नहीं होगी तो काहे को अपना माथा खराब करूँ। फिर थोड़ा सूक्ष्म शॉक आया मेरा जो विचार था, मेरी जो राय थी वह नहीं मानी गई तो मेरी इज्जत चली गई। तो ड्रामा को तुम्हारी परवाह है क्या, तुम्हारी इज्जत जाये या न जाये - इसकी न ड्रामा को परवाह है, न बाबा को परवाह है। तो सोचो कि ऐसे कमाल का काम करके मैंने अपनी इज्जत को बढ़ाया या गँवाया ? ड्रामा की नालेज हमारी शान को बढ़ाती है। ड्रामा की नालेज को जितना अन्दर मनन-चिंतन करते उतना गुणवान बनते हैं। बाबा कहते कि तुम्हारा यह रोल है इसलिए हे आत्मा तुम अपने पार्ट को जानो। तुमको सतयुगी राज्य में आना है, थोड़ा मकान पुराना हो जायेगा तो मज़ा निकल जायेगा।
बाबा ने मुझे माला का मणका बनाने के लिए चुना है तो मुझे बाबा के गले का हार बनना है। उसके लिए बाबा हमें ज्ञान का एक-एक रत्न लाखों रूपयों का रोज़ देते रहते हैं, उसको छोड़कर हम अनेकों दुनियावी बातों में बड़े मस्त रहते हैं। तो देखना चाहिए कि हमने अपनी वैल्यु को कहाँ कम कर दिया है? हम अपनी वैल्यु आपेही कम करते हैं। तो ड्रामा, बाबा या मैं (स्वयं), इन तीनों में से पहले किसको प्यार करें!
शिवबाबा कहते कि ब्रह्मा बाबा को फ़ालो करो और ब्रह्मा बाबा कहते कि शिवबाबा को याद करो तो दोनों की मानकर चलना पड़ेगा। कोई कहे हम तो निराकार को याद करते हैं तो वह काना है एक आँख वाला। कोई कहता है हम तो साकार को ही याद करते हैं तो उसको क्या कहें। इसलिए सबसे अच्छा यह है कि बापदादा के बीच में हम बैठ जायें क्योंकि बच्चे को हक है। दोनों को पहचानो फिर ड्रामा में अपने पार्ट को समझ अच्छी तरह से मैं जो हूँ, जैसा हूँ, मेरा बाबा जो है जैसा है और संगमयुग है, भगवान और भाग्य बस, भावी बड़ी ऊँची बनी हुई है, यह कलम हमारी तकदीर अच्छी बना रहा है। तो हम अपनी तकदीर को समझ से बनाते चलें, किसी को दोष मत दो। कोई बात मन में फालतू मत रखो जो मौज के बजाए मूंझा हुआ और उदास चेहरा हो, वह बाबा को अच्छा नहीं लगता है। तो अपने आपको सम्भालने के लिए मौज में भी रहें, हर्षित भी रहें ताकि बाबा कहे-'तुम मेरे रत्न हो।'

प्रकृतिजीत, प्रकृतिपति बनो

जब तक आत्मा और परमात्मा का पूरा ज्ञान नहीं है तो न सोलकान्सेस रहने का रस रहता है, ना परमात्मा के पूरे ज्ञान की सर्व शक्तियों का अनुभव होता है। परमात्मा पिता से सर्व शक्तियों का अनुभव करना है तो बीती को चितओ नहीं। जो पुरुषार्थ किया वह अच्छा ही किया है। बाकी जितनी भी पुरुषार्थ में कमियाँ रही हैं, वह अभी से पूरी करो।
पुरुषार्थ में नवीनता लाने के लिए बहुत समझ करके सहज विधि से सिद्धि पा सकते हो। आत्मा जो मन कर्मेन्द्रियों के अधीन है, उससे मुक्त होकर मास्टर बनो। परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ो तो परमात्मा से शक्ति खींच सकते हो। आत्मा-परमात्मा से अलग हुई तो प्रकृति के अधीन हुई है। प्रकृति ने आत्मा को अपना गुलाम बना दिया अथवा मास्टर-पना भूल गया है। संकल्प शुद्ध चलाना चाहो तो भी अशुद्ध संकल्प इण्टरफियर करते हैं। कर्मेन्द्रियों से अच्छा कर्म कराना बाहो तो साधारण कर्म खुशी से कर लेंगे और श्रेष्ठ कर्म अवाइड करेंगे। संग से, नेचर से या प्रकृति के आधार से, दुनिया के रसम-रिवाज अनुसार साधारण कर्म कर लेंगे, परन्तु समझ से मास्टर होकर के जो राइट करना है, वह अब करना है। वह मास्टर होकर ही कर सकते हैं। बाकी गुलाम तो कभी कर नहीं सकता। तो आत्मा को अपनी समझ आई है, मैं कौन हूँ? पाँच तत्वों के शरीर से मैं अलग आत्मा हूँ। मुझे मास्टर रहना है। परमात्मा की सन्तान हूँ, परमधाम में रहने वाली हूँ। सतयुग में प्रकृतिपति होकर उतरती हूँ, कलियुग में सब प्रकृति के अधीन हैं। आत्मा भी कलियुगी पतित बन गई है इसलिए उनको पता है कि गुलाम का गुलाम बनी हूँ। अगर किसी का मेरे ऊपर दबाव या प्रभाव है माना प्रकृति की मैं गुलाम हूँ और प्रकृति मुझे गुलाम बनाकर चला रही है। तो अपने आपसे पूछो मेरी गति क्या होगी? अगर मैंने अपने आपको मोह वश, लोभ वश अटैच करके रखा है या मान की, रिस्पेक्ट की भिखारी हूँ तो वह देखे मुझे किसने वश में रखा है? फिर सोलकान्सेस होने की कोशिश करेंगे तो भी नहीं हो सकेंगे। तो अब सोचना कि मैं, मन-कर्मेन्द्रियों का राजा नहीं हूँ तो कौन हूँ? फिर मेरी अन्त मती सो गति क्या होगी ?
जैसे मुझे शरीर चलाता है वैसे मैं चलूँ? क्या करूँ, हवा पानी ऐसा है तो सम्भालना पड़ता है। जिसके साथ रहती हूँ उसके साथ अगर उनकी बनकर नहीं रहूँ तो मेरे लिए मुश्किल होता है! मेरी नेचर स्वभाव ऐसा है मैं क्या करू, मेरे में सहन शक्ति नहीं है! यह कौन कह रहा है? गुलाम बात कर रहा है। जो कर रहा है वह किस हिसाब से कर रहा है? तो बाबा ने कहा मेहनत से मुक्त रहो। मेहनत करने से जो तनखा मिलती है वैसे चल रहे हैं। याद का या सेवा का रूटीन बना है। खुशी नहीं है, शक्ति दिखाई नहीं पड़ती। कोई भी बात सामने आये तो बुलाओ सहन-शक्ति और सामना करने की शक्ति को। तो सब मेरे ऑर्डर में हैं या मैं उनके आर्डर में हूँ? तो प्रकृति के मालिक बनकर रहने से सहज सफलता होती है। जो सम्पर्क-सम्बन्ध में आया हुआ हो उनका भी समय सफल हो। आत्मा, परमात्मा और प्रकृति को समझ जाएँ। परन्तु इन तीन बातों को जिसने नहीं समझा, वह क्या करेंगे! तो ऐसी बातें विचार सागर मंथन करके समझायें तो खुशी का पारा चढ़े और संस्कार बदल जायें, कैरेक्टर ऊँचा हो जाए। हर एक गुण हमारे से औरों को दिखाई पड़े। हर एक प्रैक्टिस करे मैं आत्मा हूँ, परमात्मा का बालक हूँ और प्रकृति का मालिक हूँ। यह सारी बातें अभी से अनुभव करें तब मायाजीत, विश्वजीत, प्रकृतिजीत बनेंगे। तो आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध से विकर्म विनाश होंगे, हिसाब-किताब चुक्तू होंगे। दूसरा श्रेष्ठ कर्मा का खाता, पुण्य का खाता जमा होगा। तीसरा अपनी तरफ़ कोई खींचेंगा नहीं। हमारा पुरुषार्थ है कि अन्त में कुछ भी याद ना आये।
हमारी कर्मातीत अवस्था कैसे बनेंगी? हमें अपनी नाजुक नेचर को बदलना है। खुद मजबूत बनूँ, कोई बात सामने आये तो और मज़बूत बन जाऊँ। मेरी मज़बूती ऐसी हो जो सूक्ष्म में दूसरों को भी शक्ति मिले।

बाप समान बनना है तो समाने की शक्ति धारण करो, रायॅल और रीयल बनो

मधुबन के ओमशान्ति भवन के हाल में बैठे बाबा के बोल तो कानों द्वारा सुनते हैं लेकिन हमारे अन्दर से क्या निकलता ? बाबा की महिमा करें, मधुबन की महिमा करें, अपने भाग्य की महिमा करें, समय की महिमा करें, किसकी महिमा करें ? बाबा कितना मीठा, कितना प्यारा है जिसने हम आत्मा को, सोई हुई को जगाया है। आत्मा अज्ञान की नींद करती है, तब कहते हैं कुम्भकरण को जगाओ। इसलिए कहते हैं 'ज्ञान सूर्य प्रगटा अज्ञान अंधेर विनाश।' तो बाबा ने हमारी आँख भी खोली फिर सूर्य प्रगटा तो रोशनी सामने आई। एक होता है अंधेरा, दूसरे हैं सोये हुए, अंधेरे में सोये थे, अभी हमारे लिए अंधेरा नहीं है, ज्ञान की रोशनी है। कोई सोया हुआ हो, रोशनी भी हो जाए तो उसके लिए एक ही बात है। रात हो या सवेरा। अभी बाबा ने रोशनी दी है, आत्मा में जागृति दी है, फिर समझ आई है कि अब मुझे क्या करने का है?
आज बाबा ने कहा बच्चे को भी ड्रेस अच्छी लगती है। अच्छे कपड़े दो तो खुश हो जाता है। छोटी बच्ची को कोई ज्वेलरी पहनाओ तो खुश हो जाती है। अच्छी चीज़ आत्मा को अच्छी लगती है। श्रृंगार भी अच्छा पहनेंगे। पुराने फैशन को अवाइड करेंगे। जो बात दिल को जंचती है, अच्छी लगती है वह यूज़ करेंगे। जो रॉयल रीयल होंगे वहीं यूज़ कर सकेंगे। जिसका सच के साथ प्यार है उसको झूठ अच्छा नहीं लगेगा। सच्ची ज्वेलरी जो पहनने चाहता है, वह आर्टिफिशल दिखाने के लिए नहीं पहनेंगे। झूठ है दिखावा। सच्चे में दिखावा नहीं है। ड्रेस भी फुल ऐसी हो, घड़ी घड़ी हमारी स्टेज बदले नहीं, कभी ऊँची, कभी नीची नहीं हो। ऐसी स्थिति हो, शान है। फिटिंग पूरी हो। हर बात एक्यूरेट हो, कुछ कमी न हो जो किसी को नज़र आये। जब बहुत अवगुण थे तो पता नहीं था कि हम भी कोई गुणवान बनेंगे या देवताई गुण हमारे में आ सकते हैं, सोच भी नहीं सकते थे। विकारी पापी हैं तो देवताओं के आगे कहेंगे हम ऐसे हैं, तू ऐसे हो। कल हम पुजारी थी, आज बाबा हमको पूज्य बना रहा है। कल देवताओं की महिमा करते थे वह ऐसे हैं, अभी हम ऐसे बन रहे हैं। मांगने के संस्कार बदल गये। रहन सहन बैठक बोलचाल नयन कहाँ आँख नहीं डूबेगी। यह चाहिए... नहीं। कितनी भी चीज़ आफर करो लेकिन आँख नहीं जायेगी। पहले था कि सब मेरे पास आ जाए, कम न हो जाए। रॉयल कहता है देने वाला दे रहा है, भले ले लो। बाप समान बनना माना ही दाता बनना। समान बनना माना हर बात समा जाए। समाने की शक्ति वाले के लिए जैसे कुछ हुआ ही नहीं। अन्दर गहराई में जो रत्न हैं वह हैं ही। सागर किचड़े को बाहर उछालकर फेंक देता है। वह अपना काम करता ही है। हम ज्ञान के सागर, प्रेम के सागर बाबा के बच्चे हैं। बाप के गुणों से हमारा श्रृंगार है। तो देखा जाता है ज्ञान जब अन्दर काम करता है, समझ को यूज़ करते हैं। माँ बाप बच्चे को सब
सिखाते हैं, तो परमात्मा माँ बाप के रूप में हर बात सिखाता है, सोचो तो कैसा, बोलो तो कैसा, देखो तो कैसा? मेरे बच्चे की दृष्टि ऐसी रूहानियत वाली, ईश्वरीय प्रेम में मस्तानी हो। तो उसकी दृष्टि अनेकों को सुख देने वाली बन जाती है। मास्टर कल्याणकारी तब बनेंगे जब मास्टर सर्वशक्तिवान होंगे। सर्वशक्तिवान से इतनी शक्ति ले ली जो बालक सो मालिक बन गया। शक्ति ने बेबी-पन छुड़ाया। अलबेलापन छुड़ाया। बुजुर्ग सयाना, बालग बुद्धि बनाया। बालग बनने से सच्चाई आयेगी, दिखावा नहीं होगा। छोटी-छोटी बातों में नहीं जायेंगे। बात को बढ़ायेंगे नहीं, सोचेंगे नहीं। बाबा हमको ऐसी दृष्टि से देखता है, जैसा बाप वैसा बच्चा। हम बच्चे भी इच्छा रखते हैं बाबा समान बनें। तो समाने की शक्ति हो। हर बात में बाबा को सामने रखें। हर प्रकार की एकॉनामी हो, एक का नाम हो। उसका नाम तब बाला होता है जब सीखने वाले अमल करके नम्बरवन में आते, नम्बर विन करते हैं। अन्दर से है कि हम हर बात में जीत पहनें। हार न खायें। हार वाला संकल्प भी टच न करे। कैसी भी सीन सीनरियाँ सामने आयें लेकिन अन्दर से हो कि हमारी विजय है। विजय में हमारा निश्चय है। कहावत है 'निश्चयबुद्धि विजयन्ती'। विजय हुई पड़ी है, वह हमारे निश्चय को अटल बना देती है। फिर अचल हैं, कहाँ आँख नहीं डूबती, फिर अडोल हैं, कैसी भी परिस्थिति में डोलायमान होने वाले नहीं हैं क्योंकि विजय में निश्चय है। ऐसे निश्चयबुद्धि वाले वैजयन्ती माला में आ जाते हैं। स्वतः योगी सहजयोगी बनकर माला में आ रहे हैं। माला कैसे बनेंगी? वह नम्बर अपना १६ हज़ार से १०८ में, फिर १०८ से ८ में ले आते। उनको और कोई न चिंता है, न चिंतन है। बेफ़िक्र वहीं रह सकता है जो सयाना बनकर ड्रामा की हर सीन को साक्षी होकर देखता है और अचल-अडोल रहने का आदती बना लेता है। ऐसे नहीं हमें तो अडोल रहना चाहिए था, परन्तु बात ऐसी आ गई। वह समझे कि मुझे वैजयन्ती माला में आने की परमीशन नहीं मिलेगी।
दो बातें हर एक के बीच में रुकावट डालती हैं कौन-सी ? एक मेरे जैसा अच्छा कोई नहीं, दूसरा- मेरे जैसा बुरा कोई नहीं, मैं योग्य नहीं हूँ। यह ख्याल अन्दर से जाता ही नहीं है। अपने आप यही सोचता यह बहुत अच्छा है। मेरा पता नहीं क्या पार्ट है, पता निकालने में ही टाइम लगाया है। बाबा जो है जैसा है उसको पहचानना, बाबा ने मुझे स्वीकार कर लिया। बाबा ने कुछ नहीं कहा कि तुम कैसी हो, जैसी हो वैसी हो मेरी हो। बाबा ने सम्भालकर रखा है, भले दूसरा कुछ भी कहे। मैं बाबा की होकर रहूँ यह मुझे ध्यान पर रखना है और कोई भी आवाज़ कानों में न पड़े। बाबा अच्छा बना रहा है, मैं कहूँ मैं नहीं हूँ। कोई फिर कहते मेरे जैसा कोई नहीं, मैं कितनी सेवा करती हूँ, कितना त्याग किया है, कितनी तपस्या की है यह लोग जानते नहीं हैं। यह भी अभिमान का सूक्ष्म घेराव है। इसलिए जहाँ जीना वहाँ सीखना। अगर हमको अच्छी तरह से गुप्त सच्चा पुरुषार्थी होकर आगे बढ़ना है तो अपने सोचने की क्वालिटी ऊँची बनाकर रखें। थोड़ा सा खाना हो लेकिन ताकत वाला हो जिससे शक्ति मिले। बहुत नहीं सोचो, अन्दर से एक शक्तिशाली संकल्प आत्मा को बाबा की तरफ खींचता है। भले पॉजिटिव सोचें लेकिन बहुत सोचें तो भी बाबा की याद नहीं रहेगी। अगर ख्याल करते रहेंगे कि मुझे निगेटिव नहीं सोचना है, तो निगेटिव पीछा छोड़ेगा नहीं। पॉजिटिव में भी शुद्ध श्रेष्ठ दृढ़ संकल्प रखना है। अपने दिल को साफ़ रखना है। इतनी साफ़ हो जो दिल दर्पण में मैं बाप को देखें। कभी संकल्प न आये कि मुझे पता नहीं क्या है। अपना डाक्टर, अपना टीचर स्वयं बनो। कभी मुख पर यह शब्द नहीं आये कि मैं टीचर हूँ, मैं खुद की टीचर हूँ। सिखाने वाली नहीं हूँ, सीखने वाली हूँ। स्टूडैण्ट हूँ। अपने को सिखाने से बुद्धि विशाल, दूरांदेशी बनेंगी। अपने को सिखाने के लिए सर्व के गुण नज़र आ रहे हैं। किसका अवगुण देखेंगे तो उसका अवगुण अपने में आ जायेगा। यह अपनी सम्भाल करो। अवगुण देखने, सोचने की आदत पड़ी तो वह छोड़ेगा नहीं। उस घड़ी लगेगा नहीं कि यह मैं अवगुण देख रही हूँ, सोच रही हूँ। मुझे विशेषता, गुण फिर नज़र नहीं आयेगा। क्रिमिनल आई माना सिर्फ अपवित्र दृष्टि नहीं। क्रिमिनल आई तो हमारी हो नहीं सकती लेकिन अवगुण देखना भी तो अच्छी दृष्टि नहीं है। अवगुण सोचें तो योग नहीं रह सकता।
बाबा बार-बार हमारा ध्यान खिंचवाता है बच्चे, देही-अभिमानी बनो। आत्मा को देखेंगे तो अपने आप दृष्टि, वायब्रेशन पावरफुल हो जायेंगे। हर एक अपने बाबा के यादों की मस्ती में हो तो वायब्रेशन ऐसा बन जायेगा। अपनी स्थिति से वातावरण बनता है। यह हमारी ड्युटी है अपनी भावना अपने लिए चाहे सबके लिए शुद्ध श्रेष्ठ बनाना है। यह अपने को सिखाना है, जितना हम सीखेंगे उतना सिखाने वाला बाबा खुश होगा। बच्चा सयाना है, बोलता कुछ नहीं है, अन्दर गुप्त सच्चाई से आगे बढ़ता जा रहा है, किसी से रीस नहीं करता है। जैलसी के संस्कार दुःखदाई हैं। जैलसी का संस्कार दिल दिमाग को दुःखी बना देता है। दिमाग का दिल से कनेक्शन है। हम अपने आपको इस धंधे से छुड़ाये। दिल चाहती है- मैं बाबा के दिलतख्तनशीन रहूँ। बाबा के दिलतख्त को छोड़ा तो फांसी के तख्त पर चढ़ जायेंगे। व्यर्थ संकल्प फांसी पर लटका देते हैं, फिर कुछ नहीं कर सकते। कोई छुड़ा नहीं सकता है। जब तख्ते पर बैठा तो माँ बाप, वाइफ कोई नहीं छुड़ा सकता, सब कहेंगे - तुम्हारे कर्म। तो हम ऐसे कर्म क्यों करें? हम ऐसे कर्म करें जिसमें कोई बहाना न हो। जैलसी न हो, केयरलेस न हो। गफलत न हो। सदा बाबा के दिलतख्त पर बैठने से श्रृंगारा हुआ देख अन्दर गुप्त नशा रहेगा- हम वह हैं! स्व-दर्शन चक्रधारी बाबा के सिकीलधे बच्चे, नूरे रत्न हैं। हम बाबा के सिकीलधे कल्प पहले वाले ब्राह्मण कुल भूषण नूरे रत्न हैं। मैं उसमें हूँ, इतना अपने को पढ़ाकर सिखलाकर लायक बनायें। यह बाबा के सत्य वचन हैं, यह देख आत्मा बाबा के गुण गाती है। बाबा से प्यार माना सच से प्यार। सच से प्यार मिलता है। सच वाला प्यार मांगता नहीं है, वह प्रेम स्वरूप होता है। सच्चाई के आधार से प्यार खींच रहा है, वही उसके जीवन का आधार है। अनेकों को बाबा से सूक्ष्म प्यार दिलाकर निमित्त आधारमूर्त, उदाहरण बनता है। और कुछ न सोच मुझे क्या करना है... जिसको अच्छा पढ़ना है, अच्छा धंधा करना है वह अपने समय का कदर करता है। जिसको अपना टाइम सफल करना है उसका टाइम कोई वेस्ट नहीं कर सकता। हमको अपने समय का कदर हो, बाप को सिखाई हुई शिक्षायें हमारे लाइफ में हों।

'तीन-शब्द' अपनी डिक्शनरी से निकाल दो -

एक 'बट' बट शब्द कभी नहीं बोलो तो अच्छी अवस्था रहेगी। कोई बहाना नहीं देंगे।
दूसरा - इच्छा तो है, चाहना भी है लेकिन 'मुश्किल' लगता है। है तो सहज परन्तु मुश्किल लगता है। अच्छा भी लगता है, इच्छा भी है परन्तु मुश्किल लगता है। मुश्किल क्यों बनाया? जब एक बारी मन ने मान लिया फिर मुश्किल क्यों? जो कमज़ोरी है उसे खत्म करो। मुश्किल को सहज करना है न कि सहज को मुश्किल, इतनी समझ हो।
तीसरा 'ट्राय करेंगे।' इसमें भी अपने में डाउट। बहन भाई सब उमंग दिला रहे हैं, तू कर। फिर भी कहते ट्राई करेंगे। फिर न बाबा की मदद, न साथियों की। ऐसे ऐसे जो शब्द हैं, वह यूज़ करने से आत्मा पुरुषार्थ में आगे नहीं बढ़ती। आत्मा ज्ञान को यूज़ नहीं करती। वहीं पहले वाली बातों की रट लगती है। उसमें परिवर्तन कैसे आये? पहले वाली बातें बदल जाएँ, बाबा ने जो लक्ष्य दिया है वह सूरत-मूरत में आ जाए। तो ऐसे जो शब्द कामन भाषा के हैं उन्हें निकाल दो तो भाषा हमारी उत्साह-उमंग, हिम्मत हुल्लास में आगे बढ़ायेगी और सबकी मदद मिलेगी।
किसी के साथ बनें, किसी के साथ न बनें, यह रिकार्ड ऊँच पद पाने में विघ्न डालता है। सब बाबा के बच्चे हैं, बेहद का बाबा है। सारा विश्व, बाबा हमारे हाथों में दे रहा है। विश्व का गोला सेवा के लिए हाथ में दे रहा है और हम आत्मायें छोटी-छोटी बातों में क्यों जाऊँ। बाबा कितना सुन्दर बनाता है, हम तेरा-मेरा में क्यों जायें! वह तो तंग दिल वाला, छोटी दिल वाला बना देते हैं। बाबा जो कराये उसमें दिल बड़ी हो। छोटी दिल वाले दूसरा जवाब फट से दे देंगे। कहेंगे यह तो बातें हैं, करना आसान थोड़े ही हैं! बाबा कहे एक, बच्चा कहे दूसरी ! वह बहुत दूर दिखाई पड़ते हैं। हम बाबा के समीप रहें, इशारों से समझें, समय अनुसार चलें। लाइट रहें। सहज अपने को चेंज कर लें, बड़ी बात नहीं है, सहज बात है। अच्छा।

निराकार बाप समान अकर्ता, अभोक्ता, असोचता कैसे बनें ?

आज बाबा ने कहा बच्चे तुम्हारे नयन शीतल हों। नयन शीतल कैसे होंगे ? दृष्टि, वृत्ति पावन होने से नयन शीतल बन जाते हैं। शीतल नयन बहुत पावरफुल, रूहानी कशिश वाले, बाप से शक्ति खींच औरों को देने वाले होंगे। वह खुद भी सहज योगी का अनुभव करेंगे और जो अन्य आत्मायें सम्पर्क में आयेंगी, वह भी सहज योगी स्वतः योगी बन जायेंगी। फ़रिश्तों को कान दिखाई नहीं पड़ते, मुख से बोलते नहीं हैं परन्तु मीठे नयन हैं। वह नयन बताते हैं कि कैसे वह हमारे रक्षक हैं। एंजिल के लिए सभी का इसीलिए प्यार है जो फील करते हैं कि यह हमारे रक्षक हैं। उनकी आत्मा इतनी प्योर बनी है, जो प्योर आत्मा बनने से उनका आकार भी सेवा करता है। तो साकार में होते हुए आकारी फ़रिश्ता स्वरूप की स्थिति बनाने वाले कहाँ भी होंगे तो बाप के साथ का अनुभव करेंगे और सबकी रक्षा करते रहेंगे।
बाप के साथ का अनुभव सदा रहे उसकी विधि क्या है? इस दुनिया को देखते हुए न देखो, न सुनो, न सोचो। इस दुनिया में होते हुए हम यही बल भर रहे हैं कि बाहर जाकर न देखें, न सुनें, न सोचें। जाना तो होगा ही। यहाँ बैठ जायेंगे तो सेवा कौन करेगा? यहाँ आते हैं अपने में बल भरने के लिए। नालेज के द्वारा इतनी शक्ति आ जाए जो न देखें, न सुनें। कानों द्वारा कई बातें सुनाई देती हैं परन्तु जो काम की बात है, जिसका जवाब देना है वह भूलेंगे नहीं, तुरंत करेंगे, सोचने में टाइम नहीं गंवायेंगे। करने योग्य है तो अब कर लें। सोचने पूछने की बात नहीं है। अच्छी बात ज़रूरी बात करने वाली है तो अब कर लें, तो बाबा की मदद भी मिल जायेगी और तुरंत दान का महापुण्य होगा। तो अच्छी बात, ज़रूरी बात सबके भले की बात कभी मिस न हो। वह अभी करें। अपने उन्नति वाली बात है या सर्व के भले वाली बात है या वायुमण्डल को अच्छा बनाने की बात है, वह अभी करें। अब करने से बाबा साथ देता है। कई सोचते हैं अभी टाइम नहीं है, हमारे में शक्ति नहीं है... तो बाबा का साथ नहीं मिलेगा। लेकिन अन्दर से आये कि बाबा करा लेगा। वन्डर है यह। फिर क्या होगा? तुरंत-दान का फिर महापुण्य हो गया। किसी को कुछ देना है तो तुरंत दे दो। उसी घड़ी उसको मदद करो। परन्तु कोई-कोई की नेचर होती है- बहुत सोचने की, करें या न करें.... पूछते रहेंगे। यह नेचर नुकसानकारक है। साक्षी होकर देखते हैं कि एक बात १० बार सोचेंगे या पूछेंगे, यह नेचर तुरत दान महापुण्य में विघ्न डालती है। सोच में पड़े हैं तो बाबा की मदद खींच नहीं सकते। हेल्प मिलेगी या नहीं मिलेगी? सोचते रहेंगे। सोचना अकेला बनाता है। अकेले बैठकर सोचते हैं तो बाबा फिर मदद कैसे करे ?
बाबा कहते- बच्चे, असोचता बनो। असोचता कैसे बनेंगे? भगवान को कहा जाता है- अकर्ता, अभोक्ता, असोचता। भगवान तो है ही निराकार। साकार में आता है, करता भी है परन्तु उसका फल भोगने की उसको इच्छा नहीं है। कर्ता वह है जिसमें सबका कल्याण है, इसलिए साधारण मनुष्यों से वा देवों से न्यारा है। करते भी अकर्ता है, अपने लिए नहीं करता है। कर्त्ता-पन के अभिमान से एकदम परे है। तो बाबा हमको सिखाता है तुम भी ऐसे बनो। पहले द्वापर से उल्टा सुल्टा किया और भोगते भी रहे। उसको समाप्त करने के लिए अब श्रेष्ठ कर्म करो। परन्तु अभिमान मत रखो, अपना प्रभाव मत डालो। प्रभाव डालना भी फल लेना है। देखूँ क्या रिटर्न मिलता है? लोग कितना पसन्द करते हैं, यह महिमा की इच्छा भी कर्तापन है। वह दान में नहीं माना जायेगा। दान माना ही गुप्त। गुप्त उसको खुशी मिले, बल मिले। ज्ञान मुख से दिया, कान से सुना तो उसको बल मिला, अन्दर से दुःख गया। जैसे बाबा दुःख हर्ता है, सुख दाता है, ऐसे किसी का दुःख दूर हुआ ! अकर्ता बनना है तो ऐसे, अभिमान ज़रा भी मिक्स होगा तो दूसरे को खुशी महसूस नहीं होगी। तो जैसे हमको बाबा ने अमर खुशी भी दी है, वरदान भी दिया है। तो अकर्ता पन की स्थिति को समझें। हम कर्म भी कर रहे हैं परन्तु कर्म का कोई भी बंधन नहीं है। सतयुग में कर्म श्रेष्ठ हैं, अच्छे हैं, सम्बन्ध भी हैं लेकिन बंधन नहीं है। कलियुग में वही कर्म बंधन हो जाता है। कर्म के बीच में विकार हैं इसलिए विकर्मी हैं। अभी उसको खत्म कर रहे हैं, जिसमें लोभ मोह है, अभिमान है उसको खत्म कर रहे हैं। कर्म सम्बन्ध में बहुत पवित्रता हो, दृष्टि ऐसी पवित्र हो जो दूसरी आत्मा भी हमारी दृष्टि से न्यारी हो जाए। दृष्टि से कोई देह में फंसता है, कोई देह से न्यारा हो जाता। दृष्टि ही देह-अभिमानी बनाती है, दृष्टि ही न्यारा कर देती है। तो अकर्ता, अभोक्ता बनें। सच्चाई का अन्दर से जो सुख मिलता है, अल्पकाल का सुख नहीं। अल्पकाल का सुख है तो बहुतकाल का दुःख भी है, वह भोगना पड़ेगा। अल्पकाल के सुख को भोगने की इच्छा न हो, उसे स्वीकार न करें। नहीं तो उसमें बहुतकाल का दुःख है। बाबा से हमें अविनाशी अमर ईश्वरीय सुख का वर्सा मिलता है, इससे अभोक्ता बनें। हमें सुख चाहिए ही नहीं, तो पहले जो दुःख पाया है वह खत्म हो जायेगा। अल्पकाल के सुख में बहुतकाल का दुःख मुझे नहीं चाहिए। तो अभोक्ता हो गये। फिर है असोचता। सोच किस बात का करें ? दूसरा कुछ अच्छा करते हैं तो उसके लिए शुभ भावना है, अच्छा है कर लो। खुद को भी कुछ करना है, तो संगमयुग है ही भाग्य बनाने का युग। हमारा भी भाग्य बने तो औरों का भी बनें, बाकी क्या सोचें। तो अपने आपको कभी दुविधा में नहीं डालना चाहिए। कईयों की नेचर में दुविधापन बहुत होता है। डिसीज़न लेने में टाइम लगायेंगे।
बाबा ने जो ज्ञान दिया है उसको धारण करके मुझे दानी, महादानी बनना है। इतना धन मिला है दानी बनूँ, महादानी बनूँ तो वरदाता, वरदानी भी बना देगा। अपने आपसे अच्छी तरह से प्यार से बातें करो। जितना बाप से प्राप्ति है उतना आटोमेटिक बाप की याद, प्यार से आती है। उसके लिए प्यार के शब्द भी बोलने के नहीं हैं, सिर्फ नयन गुलाबी हो जायेंगे। कोई पूछे कैसे हो? तो कहो - खुश हाल हूँ, फ़रिश्तों जैसी चाल है। बाबा के यह कितने मीठे बोल हैं!
अपने आपमें जो कभी कभी डाउट वाले शब्द उच्चारण हो जाते हैं, वह भी न हों। तो हमें अकर्ता, अभोक्ता, असोचता बनना है। निराकार बाप से यह निराकारी वर्सा ले रहे हैं। कर रहे हैं, परन्तु करने का भान नहीं है। उसमें बहुत पुण्य कर्म होता है। फल की इच्छा के संकल्प से परे हैं तो वह अन्दर बहुत काम करता है। जिसको वह पहुँचता है, उनके अन्दर भी लगता है जैसेकि कहाँ से ऊपर वाला हमको दे रहा है। जैसे लाइट हाउस ऊपर रहता है ऊपर ध्यान गया तो जैसे रास्ता साफ़ हो गया। और बातों से बुद्धि फ्री है। पहले बुद्धि को साफ़ रखो, फिर फ्री रखो तो बाबा अनेक कार्य कराने के निमित्त बनाता है।
कोई-कोई बात का संकल्प दृढ़ करना है, मुझे क्या करने का है, अपने से बात करने का शौक चाहिए। ज़्यादा सोचना नहीं है, कब ठीक होगा, कैसे होगा, इस संकल्प में कोई बिगड़ी बात को बना नहीं सकते और ही मेरी अवस्था बिगड़ जायेगी। अगर कोई समस्या या विघ्न ऐसे हैं, सोचते रहें यह तो बहुत बड़ा विघ्न -है, कैसे हटेगा, एक विघ्न जाता है, दूसरा आ जाता है, ऐसे सोच में चले जायें तो फट से एम्बूलेंस आयेगा, हॉस्पिटल में लेकर जायेगा या फिर अन्दर घुटके खाते रहेंगे। बीमारी बढ़ती जायेगी, फिर चेहरे पर खुशी नहीं, उदासी है, मुरझाये हुए हैं। कोई बात करेगा तो बात भी नहीं करेंगे। इसमें अगर संगठन से स्नेह है तो वह बड़ी मदद करता है। कितना उसको हमारा ख्याल है। मन में कुछ होता है तो तुम प्यार से कहो "बाबा" तो वह भी चला जायेगा। जी हजूर हाजिर हो जाता है। तो काहे को बैठ करके हम दुःख लें? हम दुःख हर्ता सुख दाता के बच्चे सुख शान्ति की दुनिया स्थापन करने वाले, खुशियों का खज़ाना औरों को बाँटने वाले हम खुश न रहें, कारण कितने भी हों, हमारी खुशी कोई चोर लूट नहीं सकता। कोई अन्दर घुस नहीं सकता। सिर्फ थोड़ा भी सोच में नहीं पड़ो, 'बाबा' कह दो। भक्ति में भी अनुभव हैं तुम भक्ति करते हो तो तेरे बच्चों का झूला भी भगवान झुलायेगा, तू ख्याल मत कर। करने और दूसरों से कराने वाला वह है। बाबा अपने आप किसी को टच करेगा। मांगो नहीं। तुमने मुख चलाया तो नाम खराब किया। बाबा भले टच करे। जो काम बाबा का है वह मैं नहीं करूँ। मेरा काम बाबा करेगा। यह भी समझ आ जाए। बाबा बुद्धिवानों का बुद्धि अपने आप करता है, वह कहता है- तू योगी, पवित्र बन। अपने संकल्पों को शुद्ध बनाकर फालतू सोच से फ्री हो जा। बस, मेरा तेरे से यही काम है। हम सेवा के लिए रेडी रहें, बिज़ी नहीं रहें। जो सेवा सामने आये खुशी से करें। अच्छा।

विदेशी भाई-बहनों के प्रश्न -दादी जानकी जी के उत्तर

प्रश्न - बाबाकी कम्पनी का फायदा कैसे और कौन ले सकते हैं?
उत्तर- जब कम्पनी शब्द कम्पैनियन के रूप में आता है तो बहुत अच्छा फायदा ले सकते हैं। कम्पैनियन हर एक को कम्पनी देने व लेने के लिए चाहिए। वास्तव में देखा जाए जब बाबा के बच्चे बनते हैं तो कम्पनी के नीचे हैं, गोद के बच्चे हैं। वह तो हमारी इतनी अच्छी पालना देता है जिससे हमारे अन्दर शक्ति पैदा हो जाती है। फिर जैसे समझदार बनते जा रहे हैं तो बाबा के नालेज की कम्पनी से समझ आ जाती है। सारा दिन कम्पैनियन के साथ अच्छी-अच्छी बातें करते हैं, खुश होते हैं, फ्रेश हो जाते हैं। तो माँ बाप के रूप में, वह हमें सम्भालते, साथ रखते, बड़े होते हैं तो उनकी ही कम्पनी में रहते, बुजुर्ग हो जाते हैं तो उसका ही आधार लेकर चलते हैं। बुजुर्ग को सहारा ज़रूर चाहिए। तो बचपन, युवा और वृद्ध तीनों अवस्थाओं में हमको बाप के कम्पनी की आवश्यकता है। बच्चे हैं तो माँ के रूप में, युवा होते हैं तो कम्पैनियन के रूप में। तो किसकी कम्पनी में रहना चाहिए इसका भी अक्ल हो क्योंकि जैसा संग होगा ऐसा रंग चढ़ेगा। बुद्धिवानों की बुद्धि शिवबाबा है, साथ-साथ इनकी (ब्रह्मा बाबा की) बुद्धि की भी कमाल है जो इसकी कम्पनी से हमारी बुद्धि शुद्ध श्रेष्ठ राइट टाइम पर राइट सोचने वाली बन सकती है। तो ऐसी कम्पनी का पूरा फायदा लेना चाहिए।
प्रश्न - किस कारण से बाबा की कम्पनी नहीं ले पाते हैं?
उत्तर- कम्पनी लेने का भी अक्ल चाहिए। जिसका जिसके साथ प्रेम होता है तो कार्य करते भी उसकी याद आती ही है। अगर कार्य व्यवहार में व्यस्त हो जाते हैं, याद भूल जाती है तो यह सच्चा प्यार नहीं है। कार्य बाबा का है, हम निमित्त हैं। याद का बल ही कार्य में सफलता ले आता है। सेवा भाग्य है, सेवा का फल मिलता है, खुशी होती है, दुआयें मिलती हैं। लेकिन याद के बल से पाप कटते हैं, आगे कोई पाप नहीं होता है। अनेकों के साथ सम्बन्ध में होते याद तीन प्रकार का काम करती है। एक पास्ट जो भी अन्दर रहा हुआ है, उसे भस्म कर संस्कारों को शुद्ध बनाती है। दूसरा फ्युचर के लिए ऊँच पद पाने का ख्याल रहता है। -तीसरा प्रेजन्ट हीरे तुल्य है, इसलिए हर घड़ी बाबा की याद रहे तो याद की शक्ति जमा होती जायेगी।
प्रश्न - मोह को कैसे खत्म करें? उसके लिए तीन चाबियाँ कौन-सी हैं? अभी तक मोह खत्म क्यों नहीं कर पाये हैं? अपना कोई अनुभव सुनायें ?
उत्तर- जब मैं बाबा के पास आई तो मेरे जैसा मोह का कीड़ा कोई नहीं
होगा। हमारा बहुत मोह वाला प्यार था, थोड़ा भी किसी का दुःख देख नहीं सकती थी। लेकिन छोड़ा तो सेकण्ड में छोड़ा। जितना समय थोड़ा बहुत बंधन में रही तो मोह वश ही रही। मोह बंधन में फंसाता है, जैसे मकड़ी जाल में फंस जाती है। उसे कोई उस जाल से मुक्त भी करा दे लेकिन एक जगह से मुक्त होकर दूसरी जगह अपना जाल बना लेती है। ऐसे यहाँ भी कोई मोह से छुड़ाए भी, तो एक जगह से धोखा मिलने से छोड़ भी देते लेकिन फिर दूसरी जगह जोड़ लेते हैं। मोह इतना कड़ा है इसलिए गीता के १८ अध्याय के अन्त में कहा है- नष्टोमोहः। जब स्मृति को समझा तब नष्टोमोहा बना। इसलिए गहराई में जाकर देह सहित देह के सब सम्बन्ध, कलवर जाति, पाति सबको अन्दर से त्याग. यह भी मोह है। मोह के साथ ममता भी होती है। ममता होती है स्थूल घर में, मोह होता है बाल-बच्चों में या मित्र सम्बन्धियों में। कहेंगे यह कुर्सी मैंने बहुत प्यार से ली है इसको कोई खराब न कर दे। यह घर मैने कितना अच्छा बनाया है। इन बाल बच्चों को कितना प्यार से मैंने सम्भाला है, यह देखो मेरे से क्या करते हैं। यह मोह दुःखी करता है। लेकिन फिर भी उसको पकड़कर बैठते हैं। तो एक मोह है मकड़ी की जाल, दूसरा मोह होता है बन्दर में, बच्चा मर जायेगा तो भी बन्दरी उसे छोड़ेगी नहीं। तो मोह में फैसने वाले परमात्मा से मिलन मना नहीं सकते, वह सुख नहीं ले सकते। इसके लिए तीन चाबियाँ -
१. पहली चाहिए 'रियलाइज़ेशन' की चाबी कि यह कितना नुकसानकारक है?
२. अन्दर से पुरुषार्थ में ध्यान हो कि कहाँ भी मेरा 'लगाव' न हो। जहाँ लगाव होगा वहाँ झुकाव होगा, वह परमात्मा की गोद में बैठने नहीं देगा। जहाँ लगाव होगा वहाँ फंस जायेगा।
३. अपने ऊपर दया करके, रहम करके मोह के बंधन से अपने को मुक्त करना है। लक्ष्य हो कि मुझे इस बंधन से मुक्त होना ही है। बाबा कहते हैं- बच्ची, मन्मनाभव, फिर होगा मध्याजी भव। हर समय अपने आपको चेक करना है। मेरी हर घड़ी अन्त घड़ी है। ऐसे नहीं कि मेरा पहले जैसा मोह नहीं है, यह भी जैसे थोड़े को रखने के लिए एलाउ किया है। लोहे की जंजीरे टूटी, सोने की जंजीरों से प्यार है तो भी बहुत धोखा देने वाली, अपने को दुःखी करने वाली बात है। कई सोने की जंजीर गले में डाल लेते हैं, कहते हैं यह तो होता ही है। सोने की जंजीर भी उतार करके फेंकनी है। देखने में बहुत सुन्दर दिखाई देती है, वह तोड़ नहीं सकेंगे। तो मोह को जानना क्या है, कैसा है, मुक्ति-जीवनमुक्ति के वर्से से वंचित करने वाला है, मुझे यह नहीं चाहिए, फेंकना है, दरियों में डालना है।
प्रश्न - सूक्ष्म रस्सी किसको कहेंगे, उसके कोई मिसाल सुनायें ?
उत्तर- अनेक जन्मों से अधीन रहने की आदत है, उसको आवश्यक समझते हैं। अपने शरीर में भी मोह होता है, पर्सनैलिटी अच्छी हो, ड्रेस अच्छी हो। कईयों की लाइफ साधनों के आधार पर होती है। कोई महिमा करता है तो कहेंगे यह मुझे अच्छी तरह से जानता है। कोई निंदा करता है तो कहेंगे यह मुझे जानता ही नहीं है। तो जहाँ से मुझे थोड़ा मान मिला यह सोने की जंजीर है। ज्ञान मार्ग का पहला लक्ष्य ही है- मान-अपमान, निंदा-स्तुति, हार-जीत, दुःख-सुख में समान रहूँ। उसमें सहनशीलता हो, सन्तुष्ट रहें तो मैं उसे स्वीकार ही नहीं करूंगी।
तुमको प्यार से कोई साड़ी दे, तो ऐसे नहीं यह मेरे काम की चीज़ है। कंघा भी कोई दे तो नहीं लेना। नहीं तो वह याद आयेगा, फलाने ने दिया। इसलिए बाबा कहता तुम यज्ञ से खाओ, यज्ञ से कपड़ा लेकर पहनो। यह कर्मेन्द्रियों को जो आदत पड़ी है उससे सोने की जंजीर बनाते हैं। लोहे की जंजीर से दुःख मिला। सोने की जंजीर से दुःख नहीं मिला है, सोचते हैं दुनिया में रहते हैं, लोगों से मिलते हैं तो अपना रूप-रंग ऐसा रखना ही पड़ेगा। उनको सिम्पल रहना, सच्चा रहना, उसमें सदा सुखी रहना - यह अभ्यास नहीं है। कहाँ से दुःख मिला, किसी की मेरे पास कम्पलेन है, हमने किसी को सुनाया, उसने मेरी दिल ले ली, वह मेरा दिलवाला बन गया। पड़ गई सोने की जंजीर। क्या करूं बीमार हूँ, कोई ने दो मोसम्मी तो लाकर दी, डाक्टर को बुला लाया, तो कहेंगे देखो इसने मेरे को मदद दी, फिर सारा दिन ख्याल आयेगा मैं इसको रिटर्न कैसे दूँ... ऐसे-ऐसे जो ख्यालात हैं उससे बड़ी अच्छी पतली सुनहरी जंजीर पहन लेते, कर्म के हिसाब-किताब से वह जंजीर बनती है, हम बनाते हैं फिर उसको छोड़ते नहीं हैं, प्यारी लगती है। कारण है मन का विचलित होना, चलायमान होना। या कभी भय वश अपने को असुरक्षित समझना, मेरा ख्याल करने वाला कोई तो हो, मेरे दिल की बात कोई समझाने वाला हो इससे चैन बना दी। वह चैन ऐसे छूटने वाली नहीं है। इसके लिए तो बुद्धि में रहे कि अगर उसने मेरी सेवा की, मदद की तो उस सेवा का रिटर्न बाबा उसे ज़रूर देगा। हमने तो बाबा को जीवन दी है।
प्रश्न- इस प्रकार की गोल्डन चैन से हम अपने आपका बचाव कैसे कर सकते हैं?
उत्तर- मंजिल ऊँची है, रास्ता बड़ा पेचदार है। हमको डबल इंजन मिली हुई है। जब पहाड़ी पर जाते हैं तो डबल इंजन आगे पीछे होती है। तो हमारे मात पिता बापदादा आगे पीछे हैं। वह गाइड भी है तो गार्ड भी है। हमको सम्भालने वाला है। बाबा शिक्षक है, उसकी शिक्षाओं से प्यार है, मर्यादा से प्यार है तो हम ऐसे बंधन की जंजीरों से बचकर रह सकते हैं, यह हमारा अनुभव है। बाबा की शिक्षा के अनुकूल मुझे चलना है। जो बाबा को अच्छा नहीं लगता है वह मैं कभी नहीं करूंगी, यह है मेरी प्रामिस। जो बाबा को अच्छा लगता है वह करके दिखाऊँगी, उसको मिस नहीं करूंगी। कोई पूछते हैं आपकी तबियत कैसी है? लेकिन मुझे अपने से पूछने का टाइम ही नहीं है। मन ठीक है तो तन ठीक है, धन कैसे आयेगा ? अरे बाबा का भण्डारा है, तू चिंता मत कर। दुनिया का क्या होगा ? सब अच्छा होगा, और कोई बात सोचने की फुर्सत ही नहीं है। हमेशा अपने पुरुषार्थ की क्वालिटी फ़र्स्ट क्लास बनानी चाहिए। ऊपर रहने वाला ऊपर वाले के साथ रहता है। उसे इज़ी है अपना बनाकर रखना, अगर हम बीच में लटक रहे हैं तो कभी नीचे हैं कभी ऊपर हैं।
हमारा एक बूढ़ा बाबा है, दूसरा बिन्दी बाबा है दोनों को मेहनत से छुड़ाओ। उसको मेहनत क्यों देते हो! क्यों नहीं ऐसे मीठे प्यारे सदोरे होकर रहें तो बाबा भी कहे - बड़ा मीठा प्यारा बच्चा है। बच्ची तुम अच्छी हो, सच्ची हो, बाबा के दिलतख्त पर विराजमान हो। बूढ़े बाबा से मैं इतनी मेहनत नहीं लूँ। वह यह नहीं कहता मेरे पाँव दबाओ। वह सिर्फ कहता है बड़े बाबा की लाज़ रखो। भगवान -हमारा हो गया तो बाकी क्या चाहिए! बाबा ने कहा बच्ची तुम याद करते रहना, मैने कहा- बाबा, आप मुझे भूल मत जाना। आपके लिए तो हज़ारों है, मेरे लिए तो आप एक हो। इसलिए आप वायदा करो, मुझे भूल न जाना। हमारा अधिकार है। बाबा भी याद करता है, फिर मदद भी करता है, दुआयें भी करता है, शक्ति भी भरता है, सकाश भी भरता है। वह हमें याद करके चला रहा है, हम भी उसके साथ के बिगर आगे नहीं बढ़ सकते हैं।
हम बाबा के बच्चे बाबा के बिगर कहाँ नहीं जा सकते, बाबा भी हमारे बिगर कैसे कहाँ जाए, इतना हमारा बाप और बच्चे का प्यार है जो हम एक-दो से अलग हो नहीं सकते। आत्मा-परमात्मा बिछुड़े हैं बहुकाल से। आत्मा ने बिछुड़ने का बहुत दुःख उठाया है, बहुत भटके हैं अब आप मिले हो, अब मैं फिर से नहीं बिछुडूंगी।
प्रश्न- क्या बाबा से प्यार लेना, मदद लेना यही राजयोग है, क्या इसे ही सरेण्डर होना कहेंगे ?
उत्तर - जब 'योग' शब्द कहते हैं तो योग लगाते ही हैं राजाई पाने के लिए, गुलामी छोड़ने के लिए। पहले गुलाम हैं फिर योग से राजाई ले रहे हैं। राजाई तब मिलेगी जब विजयी बनेंगे। विजयी तब बनेंगे जब बाप के आगे सरेण्डर होंगे। जब कोई दुश्मन के वश होता है, दुश्मन को अपने कैद में रखता है। वह समझेगा यह मेरा गुलाम होकर रहे। तो जब बाबा मिलता है तो गुलामी छुड़ाता है। तो सर्वशक्तिवान बाप के आगे बुद्धि सरेण्डर हो जाती कि यही मुझे बचाने वाला है, यही विजयी बनाने वाला है। सरेण्डर माना क्या? सफेद ड्रेस पहनना सरेण्डर होना है क्या ? सरेण्डर माना सच्चा साफ़। मन-बुद्धि-संस्कार में जो अन्दर किचड़ा भरा है, वह सब फेंक कर साफ़-स्वच्छ बनकर फिर बाप के पास आयें। योग पहले साफ़ बनाता है फिर सच्चा बनाता है फिर राजाई संस्कार पैदा होते हैं। तो सरेण्डर माना माया की गुलामी को छोड़ना, बाबा का बच्चा बनकर रहना। माया का दिखावा बहुत है, भभका बहुत है। वह अपने तरफ़ खींचेगी। माया लोभ, मोह वश खोचेंगी। बाबा तो सूक्ष्म है उसकी खींच भी सूक्ष्म है। इसलिए राजयोग उनके लिए है जो निश्चयबुद्धि हैं, जिनका एक बाबा से सच्चा प्यार है।
प्रश्न - सच्ची और साफ़ दिल कैसे बनेगी? इससे क्या अनुभव होगा ?
उत्तर- आप भी कभी बाबा से पूछो, बाबा आपको क्या चाहिए? बाबा को हमारी साफ़ दिल चाहिए। दिल इतनी साफ़ हो जैसे अच्छा साफ़ आइना। ऐसे न कहें कि बाबा आप तो जानीजाननहार हो ना। यह सच्ची साफ़ दिल वाले नहीं बोलते हैं। सच्ची दिल वाले अपने को साफ़ रखना बाहते हैं। अन्दर से कुछ छिपा नहीं सकते। वह जानते हैं मेरी दिल साफ़ होगी तो जो संकल्प करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। जो सच्ची दिल से बता देते हैं वह हल्के हो जाते हैं। बाबा को बताने के बिगर और किसको सुनाने से हल्के नहीं होंगे। सच्चाई नहीं होगी तो अन्दर दुःखी होते रहेंगे। दिल खाती रहेगी। साफ़ दिल वाला सदा सुखी रह सकता है। वह भले भोला हो, अनपढ़ा हो, भाषण न करता हो लेकिन बर्तन माँजते भी खुश रहता, मुस्कराता रहता है। अन्दर की सफाई नहीं है तो सच्चाई को परखने की समझने की शक्ति नहीं होती है। जैसे आइना साफ़ न हो तो ठीक तरह से अपने को नहीं देख सकते। ऐसे दिल साफ़ नहीं है तो बाबा को अच्छी तरह देख नहीं सकते। भले 'बाबा-बाबा' बोलते रहो लेकिन बाबा सुनता ही नहीं। कोई भूल भी जाए लेकिन पहचान से, सच्ची दिल से 'बाबा' कहा तो वह सेकण्ड में क्षमा कर देता है। दिल को साफ रखना माना अपने ऊपर रहम करना, अन्दर बाहर एक। बाबा कहे मेरी यह बच्ची सच्ची है। और मैं खुद से भी अन्दर सच्ची रहूँ। मेरा साहेब राजी है तो काजी भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि वह जानता है इन दोनों का सम्बन्ध बड़ा अच्छा साफ है, तो बीच में कोई कुछ कर नहीं सकता। जो कर्म एक बारी हो गया, लिख गया वह मिटता नहीं है, मिटना असम्भव है। इसमें भगवान भी कुछ नहीं कर सकता। वह भी कहेगा - तुम्हारे कर्म तुम जानो। तुमने अपना पद गँवाया। परन्तु फिर भी अगर साफ दिल है दिल से महसूस कर कहते बाबा, मेरे से हो गया, अभी असुल नहीं होगा, तो बाबा को रहम आता है फिर बाबा अन्दर से मदद करके जो लिखा है उसको मिटाता है, आगे के लिए शक्ति देता है कि अब पुण्य कर्म कर। हिम्मत रख। बाबा को यह अच्छा नहीं लगता कि बच्चा हिम्मत हारकर बैठ जाये। हिम्मत है तो बाबा की मदद है।
प्रश्न- अभी से कोई अपनी साफ़ दिल करना चाहे तो क्या कदम उठाये ?
उत्तर - पहले तो वह रियलाइज़ करें कि हमने बहाने बनाकर या किसी को दोषी बनाकर अपने को धोखा दिया है। अब किसी को दोषी नहीं बनाऊँ, जिस कारण से भूल हुई, उस कारण को समझें।
दूसरा - याद में रहकर मन को अच्छी तरह से साफ़ कर सकते। ज्ञान जो मिलता है उसे मनन-चिंतन करो तो किचड़ा निकल जायेगा। किसी-किसी को सफाई रखने की भी हॉबी होती है।
प्रश्न- दिल सच्ची नहीं है तो क्या यह भी अपवित्रता है?
उत्तर- अपवित्रता सत्यता को ढक देती है। पहले पवित्रता की गहराई में जायें, अपनी दृष्टि-वृत्ति को शुद्ध बनायें। सूक्ष्म अपवित्र वृत्ति-दृष्टि कोई-कोई जानबूझकर ऐसी बनाते हैं जिससे सत्यता दूर हो जाती है। जैसे सत्यता सर्व गुणों को साथ ले आती है, ऐसे अपवित्रता सर्व गुणों को अशुद्ध बना देती है। गुणों में ईश्वरीय स्नेह और सच्चाई की शक्ति चाहिए। सच्चाई तब आयेगी जब शुद्धि होगी। हीरा मिट्टी में भी चमकता है, धूल में भी छिप नहीं सकता। इतना अन्दर गुप्त साफ़ रहकर सच्चा बनना है। मन की सफाई होगी तो ज्ञान धारण होगा। सच्चाई से शक्ति आई, समझ से सफाई हुई। सफाई नहीं रखते हैं तो समझ की कमी है। सफाई करने चाहते हैं तो देह-अभिमान साफ़ करने नहीं देता है। सोचते हैं मेरा तो पहले का रिकार्ड बहुत अच्छा था, अगर अभी किसी को गलती का पता चला तो नजरों से गिर जाऊँगा इसलिए छिपाकर रखते हैं, यह भी अपने को कितना धोखा दिया। वास्तव में छिपता कुछ भी नहीं है, कहाँ-न-कहाँ से निकल आयेगा।
प्रश्न- जो बात है उसे अगर खत्म नहीं कर सकते हैं तो क्या करें ? क्या निमित्त बनी हुई आत्मा को बतायें ?
उत्तर - हाँ, निमित्त बने हुए को तुरन्त बताना चाहिए। छिपाने से और ही रिलेशन बिगड़ता है, रूहानियत चली जाती है, वायब्रेशन खराब होते हैं। भारीपन आता है। इसलिए सच बताना चाहिए, छिपाना नहीं चाहिए। मन साफ़ है, दिल खुश है, चित्त हर्षित है तो मुख अपने आप सदा हर्षित रहेगा। माया कभी दासी नहीं बनायेगी। उदास नहीं होंगे। तो माया के कभी दास नहीं बनना चाहिए। जो मायाजीत बन जाता है वह हर्षित रहता है। दिल साफ़, चित्त हर्षित, मुख भी हर्षित। बाबा भी हमारा हर्षितमुख देख खुश। हम बाबा के गुण गायें, बाबा हमारे गुण गाये। यह है बाबा के दिल पर चढ़ने का भाग्य।
हमारी भावना एक दो के प्रति भले की है तो कोई बुरा नहीं मानेंगे। शिक्षा से प्यार होना चाहिए। भले भूल है या नहीं। शिक्षा तो काम में आयेगी - आज नहीं तो कल। शिक्षा का तिरस्कार नहीं करो। यह ख्याल क्यों आये कि फलाने ने मेरी कम्पलेन क्यों की? यदि मम्मा बाबा से प्यार नहीं, शिक्षा से प्यार नहीं तो यह भूल है। देह-अभिमान है। जो कम बुद्धि वाले, साधारण बुद्धि वाले हैं वह समझते हैं किसी ने कहा होगा तब शिक्षा दी गई।
प्रश्न- अव्यक्त बापदादा लास्ट में जब जाते हैं, उस समय आपको क्या अनुभव होता है?
उत्तर- यह भी एक भाग्य है। दिल की सफाई से ही यह भाग्य मिलता है। साकार में बाबा के सामने आकर बैठती थी तो बाबा कहता था- भक्त, बाजू में आकर बैठो। तो बाजू में बैठने का भाग्य मिला है। बाबा स्नेह से बाजू में बिठाता है, करेन्ट देता है। हक भी है, भाग्य भी है। अन्दर से शक्ति सकाश जो आत्मा को मिलती है वह औरों को शेयर करना आसान हो जाता है। यह मुख से शब्दों से सुनाने वाला नहीं लेकिन यह साथ का अनुभव सदा रहता है।

याद से अन्दर के किचड़े को भस्म करो और सेवा से कर्मबन्धनों को काटो

हम ज्ञान सुनने बैठे हैं या प्यार करने बैठे हैं? लोग समझते हैं ज्ञान माना शास्त्रों का ज्ञान, बाबा कहते ज्ञान माना बाबा के प्यार का ज्ञान। बाप को प्यार कैसे किया जाए। हम प्यार करेंगे तो वो हमको करेगा। ये कुदरत का नियम है। हम बाबा को दिल से प्यार करें तो बाबा की दिल है ही हमारे लिए। हमारे दिलों को जीतने वाला हमारा बाबा है। ब्रह्मा माँ के बिना पारलौकिक बाप का वर्सा मिल न सके। हमारी माँ जो गले लगाती है, गोद में बिठाती है। बाबा के सिर माथे पर बिठा देती है, नूरे रत्न बनाने के लिए। हमारी पालना कैसे हो रही है- यही याद रखो। शुरू से लेकर आज दिन तक अंदर से ये नशा है किसका खाते हैं। कोई चेहरे से देखे तो सही ये खाना खाता है! ज्ञान का भी दिलपसन्द खाना मिलता है। दिलपसन्द माना टेस्ट वाला नहीं लेकिन इसमें ही रस व ताकत भरी हुई है, और कोई बात सुनने-सुनाने की इच्छा नहीं। मर्यादाओं पर चलने से मज़बूत बन जाते हैं। धारणा पर ध्यान देने वाला स्व-चिंतन करता है। जिसका ध्यान धारणा पर नहीं है वो पर-चिंतन करता है। बाबा हमेशा लक्ष्मी-नारायण का चित्र सामने रखता था, हमें ऐसा बनना है। लक्ष्मी-नारायण भले वो बने, हमें तो इन जैसा बनना है। वर्सा ले लेंगे फिर वहाँ भी तख्त पर बैठ जायेंगे। बाबा के अव्यक्त होने से पहले कभी ख्याल ही नहीं था कि बाबा जैसा बनना है। बाबा से बहुत प्यार, अति प्यार है। भले आपस में रूहानी स्नेह है लेकिन प्यार एक बाबा से है। मात-पिता, साथी-सखा, सब सम्बन्धों से बाबा से प्यार है। बाप से प्यार खींचने के लिए बुद्धि सूक्ष्म और मन सच्ची भावना वाला चाहिए। मोटी बुद्धि बाबा का प्यार नहीं खींच सकती। मोटी बुद्धि मोटी-मोटी बातें सोचती, वो थोड़े में खुश हो जाती। हमारे को रियलाइज़ेशन और गहरी हो। अपने को सूक्ष्म देखने की आँख तेज़ हो। दूसरे अच्छे हैं या नहीं, उससे मेरा कोई तालुक नहीं है। हरेक अच्छे हैं, हरेक में विशेषता, महानता अपनी-अपनी है। हमारी अच्छी आँख है तो सबकी विशेषता और महानता को महत्त्व देंगे। ये महत्त्व देना भी अक्ल चाहिए। प्रभावित होना अक्ल की कमी हो गई, महत्त्व देना अक्लमंद का काम है। साकार बाबा की इसी एक महान खूबी ने कमाल की। पता नहीं कैसे बाबा ने हरेक के गुणों को लेकर उसको गुणवान बना दिया। एक ही गुण, एक ही विशेषता को लेकर उसमें अपना प्यार और उम्मीदें भरकर योग्य बना दिया। ऐसी माँ कितनी मीठी माँ, अपने बच्चे को माँ तो जानती है ना। हमको नया जन्म देने वाली वो जानती है मेरे अन्दर क्या है।
तो कईयों को देखा है पहली बार आये हैं परन्तु ऐसे समझते हैं- बस, बाबा के घर आ गये हैं, बाबा से जो मिलता है वो कहीं से नहीं मिलता है। ये लेते रहेंगे और औरों को देते रहेंगे। ये ख्याल आटोमेटिक आता है। कैसे देंगे.... ये क्वेश्चन नहीं, बाबा मेरे से करायेगा। ये आवाज़ अंदर से निकलता है। कभी सोचते हैं हम कितना बदल गये हैं, पहले हमारी सोच कैसी थी..। बाबा ने क्या किया ? अपना बनाकर बोझ उतार दिया। किसी ने कहा मुझे तीन बच्चे हैं उनका ख्याल तो रहता है ना। बाबा ने कहा तुमने बच्चे पैदा कब किए ? तू तो मेरा बच्चा है। वो तो पुराने बच्चे हैं ना। मोह वाले की शक्ल कैसी होती है! मेरे को तीन बच्चे हैं ना! बाबा को हज़ारों, लाखो बच्चे हैं। इस पिता की महिमा इतनी है क्योंकि जगत पिता है ना! इतने सारे जगत का पिता होते हुए भी ऐसे थोड़े ही कहता है- मेरे को इतने बच्चे हैं! ऐसी शक्ल थोड़ेही बनाता है।
बाबा को देखो कितना निरहंकारी, निर्मोही है। निर्मोही मूर्त भी बाबा की देखी है, स्नेही-मूर्त भी देखी है। स्नेह इतना जैसे लगता बाबा मेरे को ही प्यार करता है। प्यार इसीलिए देता है कि बच्चे को रूहानियत की राहत मिले। अल्पकाल के प्यार से छुड़ा कर सच्चा प्यार, अविनाशी प्यार, अमर प्यार देता है, उस प्यार की शक्ति हमें विदेही बनने में मदद करती है। बाप का प्यार हमको दैवी गुण धारण कराके दैवी राजधानी में ले आता है। बाबा का प्यार हमको सजाओं से छुड़ा रहा है। कहता है- सेवा में लग जाओ, कर्मबन्धन कट जायेंगे। जो कुछ करते कर्मबन्धन होने से खुशी नहीं होती, थोड़ी भी सेवा करते तो कितनी खुशी होती है। सच्ची खुशी मिलती है सेवा से, स्व-उन्नति से। कितनी भी सेवा हो स्व-उन्नति में जरा भी फर्क न पड़े। उसमें भी हमारी उन्नति होती रहे। कभी चढ़ती कला, कभी उतरती, कभी ठहरती कला नहीं। उतरती कला नहीं तो चढ़ती भी नहीं माना कुछ समथिंग अन्दर रांग है। या तो होल है, क्रेक है या बैरियर है। समथिंग रांग माना कुछ है जो खुशी अंदर सदा कायम रहे, खुशी में नाचते रहें और थोड़ा भी कोई उदास आये तो उसको मुस्कराना सिखा दो। किसी का दबाव माया की दासी बना देता है, किसी का फोर्स दासी बना देता है। जैसे लगता है इच्छा नहीं है परन्तु मज़बूरी है करने की। कईयों को यह ब्राह्मण लाइफ एक बन्धन लगती है। कईयों को फिर यह लाइफ इतनी अच्छी लगती है जो देखते ही अपने को बदल लेते हैं। सोचते हैं ऐसी लाइफ तो हमारे सम्बन्धियों की भी बनें। सारे संसार की बने। हमारे अन्दर तो तत्वों को भी सतोप्रधान बनाने की भावना है। पशु-पक्षियों को भी वायुमण्डल अच्छा चाहिए। बच्चे भी आजकल अच्छा वायुमण्डल चाहते हैं। तो पहले है हमारी उन्नति, हम सेल्फिश नहीं है। लेकिन मेरी उन्नति में सबका भला होगा, मेरे परिवर्तन से संसार का परिवर्तन होगा। तो दूसरी सब चिंतायें, ममतायें छोड़ योगी आसन पर बैठ जाओ और कुछ नहीं करो। ऐसे सिंहासन पर बैठो। सच्ची दिल से बाप के दिल पर बैठो। भारत में रिवाज़ है तिलक ज़रूर लगायेगे। तो स्मृति रहे-मैं कौन हूँ। घर की याद आये तो यहाँ की याद नहीं आती। घर ऊपर है ना बाप वहाँ का रहने वाला है, यहाँ आता है पढ़ाने के लिए। जब तक विनाश हो, पढ़ाई चलती रहेगी। वण्डर है यही रिवाइज़ कोर्स की मुरली हमने पाँच-छः बार सुनी है, परन्तु हर बार नई लगती है। भगवान के महावाक्य हर आत्मा के लिए अविनाशी सुख देने वाले हैं। अविनाशी सुख देने वाले भगवान के महावाक्य अन्दर के दुःख को भुलाने वाले हैं इसलिए बाप को सुख कर्ता कहते हैं। हम देखते किसी-किसी का चेहरा अभी-अभी बहुत अच्छा है, अभी-अभी उदास... क्या हुआ ? जहाँ से दुःख मिला वो याद आ गया। कितनी भूल है। सुख देने वाले बाप के महावाक्य अन्दर ही अन्दर सिमरण करें तो सदा सुखी रहेंगे। हरेक ये अन्दर-ही-अन्दर एक्सरसाइज़
करे - सदा सुखी रहने का। यह बहुत अच्छी साधना है मीठे बाबा के बोल को अन्दर-ही-अन्दर सिमरण करो। वो याद आयें तो खुशी में चले जाएँ, प्रेम में डूब जाएँ। संस्कारों में दुःख अशान्ति का कारण अपवित्रता है। अपवित्र संकल्प दुःखी बनाता है। पवित्रता जननी है, जब वो माँ ही गुम हो जाती है तो सुख-शान्ति दोनों बच्चे भटकने लगते। जहाँ पवित्रता है सुख शान्ति वहाँ सदा है। कोई काँटा लगाता है तो उससे अपनी सम्भाल करो। दुनिया काँटों का जंगल है, तुम सम्भलकर चलो। काँटो को दोष तो नहीं देंगे, तुमने नहीं सम्भाला। आज की दुनिया में सम्भल कर चलना है। जंगल को बगीचा बनाना है। सेफ भी रहो, सहयोग भी दो।इतनी चाहिए अन्तर-मन, मनोबल की शक्ति। व्यर्थ बात में मन को न लगाना, उसके लिए स्ट्रिक्ट रहना, हमारे पास टाइम नहीं है। कोई कमज़ोरी मेरा कांध नीचे कर दे। कमज़ोरी किस घड़ी भी कांध नीचे गिरायेगी। हमें स्वमान में खड़े नहीं रहने देगी। मेरे अन्दर ऐसा कोई संकल्प न आये जो बाबा दृष्टि न दे। जीवन में सदा खुशाल रखने वाली बाबा की दृष्टि है। कुछ भी हमारे से गलती हुई, उसे ठीक करने वाली बाबा की दृष्टि है। बाबा के सामने तो आऊँ, किनारे नहीं बैठ जाऊँ। बाबा ने लायक बनाया तो औरों को भी बनाओ। जिसका नियमों से प्यार है वो आत्माएँ बहुत आगे बढ़ी हैं। जो आगे नहीं बढ़ी या पीछे हटी तो इसका कारण है- नियमों को पालन नहीं किया है।
बाबा कहते तुम याद करो तो मैं तुम्हारे अन्दर का किचड़ा भस्म कर दूंगा। अभी इस जन्म के कर्म बन्धन हैं तो सेवा में लग जाओ तो बन्धन खलास हो जायेगे। सेवा की दुआएँ मिलेंगी तो बन्धन खत्म हो जायेंगे। कई भाई अपनी वाइफ को कहते- बच्चों को मैं सम्भालता हूँ, तुम जाकर सेवा करो। मोह होता है तो नहीं निकल पाते। माँ मोह करती तो बच्चे भी सेवा लेते। माँ वह है जो बच्चे का गुरु टीचर बने, मोह वाली नहीं बने। बाबा सिखाता है कर्म-बन्धन को बढ़ाओ मत। कर्म ऐसे करो जो उसको सुधारो, बिगाड़ो नहीं। नहीं सुधरने वाले हैं तो शुभ भावना रखो। तुम तो अपनी कमाई करो। तो बाबा बहुत शिक्षा देकरके हमें समझदार,सयाना बनाता है। तो हमारी लाइफ अनेकोंको प्रेरणा दे।

बड़ी बात को छोटा कर दो, तो सूली भी काँटा हो जायेगी

हर एक को अपने चिंतन को बहुत अच्छा स्वच्छ, शुभचिंतन वाला बनाना है। आज बाबा ने कहा बच्चे यह ज्ञान बहुत सहज है। तुमने बुद्धि से समझ लिया कि यह दुःखधाम है, घर मेरा शान्तिधाम है फिर आना है सुखधाम में। मन्मनाभव, मध्याजीभव यह भी लम्बे शब्द हैं, भक्ति में मुख से राम-राम कहते हैं, परन्तु यहाँ कुछ नहीं कहना है, बुद्धि ने समझ लिया है- यह दुःखधाम है वह शान्तिधाम है, सुखधाम में आना है। वह अनादि और आदि संस्कार हम भर रहे हैं। अनादि हम बाबा के घर के रहने वाले हैं, आदि देवता धर्म वाली आत्मा हैं, अभी यह आत्मा को स्मृति आ गई है। पहले समझ मिली। फिर घर की, बाप की स्मृति आ गई। परमात्म-प्यार से हमारे संस्कार राजाई बन रहे हैं। सतयुगी राजाई से भी यह ऊँचे संस्कार हैं। सतयुगी राजाई में हम आने वाले हैं परन्तु आने के पहले यह स्वराज्य है। कर्मेन्द्रियाँ शान्त हो गई हैं। कर्मेन्द्रियों की चंचलता नहीं है। इच्छा वश कर्मेन्द्रियाँ हमको अधीन नहीं बना रही हैं। तो समझ मिली है- अटेन्शन रखो कर्मेन्द्रियों के वश नहीं होना है, मन इच्छाओं के वश नहीं होना है। मान-अपमान, निंदा-स्तुति, हार-जीत, दुःख-सुख जो कुछ होता है, यह सब खेल है। हम उस दुःख-सुख से पार हैं। परमधाम में हम सुख दुःख से न्यारे हैं, कर्म भी नहीं है, सम्बन्ध भी नहीं है। वहाँ की रहने वाली मैं आत्मा हूँ, बाप हमारा विदेही है। वह इसमें आता है, कर्म करता है, हमसे कराता भी है। करते, कराते वह शान्ति का सागर है। प्रेम का सागर है। हमको शान्ति भी दे रहा है, प्रेम भी दे रहा है। विचार करें परमात्म-प्यार में हमको क्या नहीं मिला है! शान्ति का सागर, प्रेम का सागर, आनन्द का सागर, सर्वशक्तिवान वह हमारे अन्दर काम कर रहा है। वह हम बच्चों को शिक्षा देकर समझाकर ऐसा लायक बना रहा है। आत्मा ज्ञान स्वरूप बन गई है। ज्ञान है तो प्रेम-स्वरूप है। प्रेम है तो शान्त-स्वरूप है। ज्ञान ने प्रेम-स्वरूप बनाकर शान्ति-स्वरूप बनाया, अपने को दबाकर शान्त नहीं किया है। सब कुछ करते-कराते आत्मा का निज़ी गुण इमर्ज है। अनादि और आदि मूलवतन में यह गुण हमारे मर्ज हैं। पार्ट में आते इमर्ज हो जाते हैं। सतयुग में कर्म में आयेंगे,परन्तु धारण अभी कर रहे हैं। अभी आत्मा को निज-स्वरूप का ज्ञान मिला है, आत्मा अविनाशी है। पता है शरीर धारण करती है, शरीर छोड़ती है। बाल, युवा, वृद्ध अवस्था फिर मौत से पार करती है, लेकिन खुद अमर है। अनेक जन्म पार्ट बजाने वाली मैं आत्मा हूँ, आत्मा देह-भान वश अपने गुण, अपनी शक्ति खो बैठी थी। वह भूल गई कि मैं आदि सनातन धर्म की आत्मा हूँ। तो बाबा कहता वह अभी इमर्ज करो। व्यर्थ-चिंतन में भूल नहीं जाओ। मध्य के संस्कार जो छिपे हुए बैठे हैं उनको अन्दर से बिल्कुल तलाक दो। जैसे हमारा कोई कनेक्शन है ही नहीं, तो हमारी कर्मेन्द्रियाँ हमारे अधिकार में हैं। आँखें देखती हैं, कान सुन रहे हैं, मुख बोलेगा, जैसे ब्रह्मा मुख। सूक्ष्म वतन में जाते हैं, बाबा से मिलन मनाते हैं तो हम भी अव्यक्त वतनवासी हैं। व्यक्त भान जैसे है ही नहीं दिखाई ही नहीं पड़ता है। ऊपर रहने से नीचे की बातें बहुत छोटी लगती हैं।
बाबा हमको बड़ी बात को छोटा बनाना सिखा रहा है। बात बड़ी भी हो उसको सिम्पल छोटा कर दो तो छोटी हो जायेगी। सूली काँटा हो जायेगी। छोटी बात को बड़ा करने की भूल मत करो। अपना चिंतन इतना शुद्ध, श्रेष्ठ हिम्मत वाला हो, जो बड़ी को छोटा कर दें। व्यर्थ-चिंतन छोटी बात को बड़ा कर देता है। फिर वह ग्रहचारी बन जाती है। सफलता नहीं मिलती है। जो कुछ करते हैं, उसमें मेहनत लगती है, सफल नहीं होता है तो उसका कारण क्या? ज़रूर कोई ग्रहचारी है, इसलिए बाबा कहते हैं- दे दान तो छूटे ग्रहण। कोई भी बात मन में है तो खाली कर दो, ग्रहण हट जाए। आज बाबा ने कहा तुम लकी स्टार हो, दुनिया को रोशनी देने वाले हो। हम संगमयुगी हैं, कलियुगी नहीं हैं। संगम पर हमको पता है सतयुग में हम आने वाले हैं। अभी संगम पर खड़े हैं, यह स्मृति भी नष्टोमोहा बनाती है। कलियुगी बातों से अपने आप छुटकारा हो जाता है, मोह फसाता है। मेरे लिए कलियुग का नाम निशान न रहे, संगम है ही घर जाने के लिए और श्रेष्ठ कर्म करके सतयुग में श्रेष्ठ पद पाने की यह घड़ी है।
बाबा ने कहा माया को बड़ी परेशानी होती है, सोचती है यह बाबा को याद करेगा तो मेरे को छोड़ देगा। ऐसे देह के सम्बन्धियों की या किसी की लड़ाई क्यों लगती है? सोचते हैं अभी इसे मस्ती चढ़ गई है, अब हमको छोड़ देगा। फिर मोह अपनी छाया डाल देता है। फिर उस छाया के प्रभाव में आकर समझते हैं इनको दुःख होता है ना।
इसलिए बाबा कहता कुछ सफल करो, कुछ भूल जाओ। तन मन धन, मन-वचन-कर्म से सेवा करो, मन कहता है यह तन सेवा करे। इस तन में पहले मैं आत्मा मन्मनाभव रहूँ, बाबा को खूब याद करूं जो मेरा अन्त मते अच्छा हो जाए। तन में आत्मा या तपस्या करेगी या सेवा करेगी। बाकी क्या करेगी? त्याग। तन में आत्मा को अभी यह समझ आई है, बाबा ने ज्ञान दिया है तो क्या करेगी? तन जैसे पहले चलता था, कर्मेन्द्रियाँ जैसे पहले करती थी, अब नहीं करेंगी। मज़बूरी से भी नहीं करेंगी। इन कर्मेन्द्रियों के द्वारा मुझे यह नहीं करना है, फ़ाइनल फैसला है। उसमें माया जरा भी घुस न आये इसलिए योग लगाना है। ज्ञान समझा फिर है योगी बनना।
बाबा ने कहा बच्चा, मैं कहूँ बाबा, मेरा तो आपके सिवाए कोई नहीं है। अन्दर ही अन्दर इस बात की रट लगानी है, धुन लगानी है। कोई पूछे आपको कुछ चाहिए ? बोलो, कुछ नहीं चाहिए। मेरे को यह करके दिखाना है और किसी को नहीं देखना है। सदा मुझे सच्चा-साफ़ रहना है, जरा-सा भी अन्दर कोई किचड़ा नहीं रखना है, सुनना-बोलना नहीं है। तो अन्दर खुशी आयेगी- मेरी जैसे विजय हो गई। फिर व्यर्थ सोच चलेगा ही नहीं। क्यों सोचूँ, ज़रूरत नहीं है। बाबा ने कहा यह कर, ड्रामा कहता है- अभी यही समय है तुम्हारे करने के लिए। बाबा कहता -एकाग्रचित बनो और ड्रामा कहता है अचल अडोल बनो। बाबा कहता एक मुझ बाप को अकेली आत्मा समझकर याद करो। और कोई सीन आती है तो ड्रामा कहता है चुप। बना बनाया है, दोनों इंजन जैसे हमको खींच रहे हैं। दो इंजन हैं एक है-ड्रामा, दूसरा है- बाबा। प्योरिटी तो जैसे मेरी माँ है, पवित्रता अच्छी लग रही है, अपवित्र संकल्प मुझे टच नहीं कर सकता। मैं ब्रह्मा सो विष्णु बनने वाली आत्मा हूँ, मुझे पक्का वैष्णव बनना है। पक्का वैष्णव माना खान-पान में बाबा की पूरी याद, जीभ वश, लोभ वश नहीं, अच्छा लगा तो बहुत खाया, नहीं लगा तो नहीं खाया। ऐसे-ऐसे संस्कार चेंज करने हैं। ज़रा-सा भी अगर हमारे आदि-अनादि संस्कार की भेंट में कोई संस्कार ठीक नहीं है तो उसको मुझे ठीक करना है। बाबा इतनी करेन्ट दे रहा है, कोई खींचने वाला भी चाहिए। इतनी आत्मा स्वच्छ हो जो करेन्ट खींच सके। करेन्ट अशरीरी बना देती है। हम बनेंगे तो कलम लगेगा, दूसरों का भी व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। अशान्त आत्मा शान्ति के अनुभव में जाकर बाबा के प्यार में लीन हो जायेगी। करेन्ट मिलने से आत्मा शान्त हो जाती है, बाबा के प्यार मे लीन हो जाती है, सब कुछ भूल जाती है। मन वचन कर्म श्रेष्ठ हो तो सब सफल है। श्वाँस, संकल्प, समय सब सफल हो, बीच में कोई पुरानी बात याद आये तो उसको भूल जा। भूलने की शक्ति धारण करो। यह याद में रहने की शक्ति, वह भूलने की शक्ति। पुरानी कोई भी बात बीच में इण्टरफियर न करे। सार रूप में आत्मा, परमात्मा और ड्रामा तीनों की जो निज़ी शक्ति है, वह हमको श्रेष्ठ आत्मा बनने में, हर एक की विशेषता देखने और धारण करने में मदद करती है। तो हम सब बाबा की उम्मीदों के सितारे तो हैं, परन्तु सफलता के भी सितारे हैं फिर चमकते हुए सितारे भी हैं।

नम्बरवन गुण है सच्चाई का, इससे और सभी गुण स्वतः आ जाते हैं

भगवान हमारा साथी है..... यह गीत सुनते हर एक के दिल की फीलिंग कैसी रही ? जब दिल की फीलिंग बाबा के प्यार की होती है तो मन खुशी में नाचता है। जब दिल से बाप को प्यार करते हैं तो मन मौज में आ जाता है, मूंझना, घबराना खत्म हो जाता है। दिल सच्ची है, साहेब राज़ी है तो सन्तुष्ट खुशनुमः हैं। वह हर कदम सच्चे सेवाधारी बनकर सेवा करते हैं। सन्तुष्ट रहने वाला ही खुशनुमः रहता है। किसको हमारे से चाहिए कुछ नहीं। अन्दर जो खुशी, सच्ची दिल से बाबा से मिली हुई है वह अपनी वृत्ति और वायब्रेशन से शेयर करते हैं।
जब कोई का शरीर छूटता है तो दूसरे सोचते हैं कि हमारा भी ऐसे छूट जाए। दादी चन्द्रमणि ने एवररेडी का पाठ पढ़ा लिया है। एवररेडी माना अभुल बनो। कोई भूल न हो। मन-वचन-कर्म से कोई भूल हुई तो उसका दण्ड है। वचन से कोई भूल हुई तो भी मन बहुत खाता है। मैंने क्यों किसको ऐसे कुवचन कठोर वचन बोला। हमेशा कहते हैं ३२ दाँत क्यों हैं? खाना खाओ तो चबाकर खाओ। वैसे बोलो तो सोच-समझकर बोलो, पहले तौलो, फिर बोलो। इसकी रिज़ल्ट क्या होगी! स्व-मान में रहने वाला ध्यान रखता है, मेरा बोल बहुत मीठा युक्तियुक्त हो। किसका भला भरा हुआ हो, ऐसे बोल हों। इसलिए बाबा ने कहा है टीचर बनना आसान है, कोर्स कराना आसान है, मुख से रास्ता बताना भी आसान है। इशारा कर सकते हैं। गूँगा भी कर सकता है। दिल से कहता है, चेहरे से बताता है। घर जाना है यह इशारा बड़े प्यार से दे रहा है। बहुत बोलने की आवश्यकता नहीं है। दिन-प्रतिदिन हम चेहरे और चाल से सेवा करने वाले बनते जाते हैं। भक्ति मार्ग में किसको स्वप्न में भी फ़रिश्ते आ जाएँ तो कितने खुश होते हैं यह हमारे रक्षक हैं। वह फ़रिश्ते हम बन रहे हैं। पहले हम बाबा की शिक्षाओं से अपनी रक्षा करते आये हैं। बाबा शिक्षक है तो हमारा रक्षक भी है। इस पार से उस पार जाना है तो तैरना सीखना पड़ेगा या सब की नय्या में बैठना पड़ेगा। फिर विश्वास रखना पड़ेगा कितना भी नय्या डोलेगी, हिलेगी लेकिन कुछ भी नहीं हो सकता। ऊँची मंज़िल है, लम्बी खजूर है परन्तु ले जाने वाला नयनों पर बिठाकर उड़ाने वाला ऊँचे-से-ऊँचा बाप है। यह कोई सत्य-नारायण की कथा नहीं है, 'पढ़ाई' है। एम-आबजेक्ट हमारे सामने सदा खड़ी है।
हम बाबा के पास सवेरे-सवेरे गुडमार्निग करने जाती थी तो अन्दर रहता था कि आज बाबा क्या सुनायेगा? मैंने एक दिन बाबा को कहा- बाबा, त्रिमूर्ति में विष्णु को खड़ा क्यों किया है? जबकि ब्रह्मा बैठा है। बाबा ने कहा- बच्ची, यह कोई प्रश्न होता है। परन्तु बाबा को यह प्रश्न बहुत अच्छा लगा। बाबा बार-बार पक्का कराते, बच्चे, त्रिमूर्ति शिव को याद करो। त्रिमूर्ति का जो बाप है उसको याद करो, तो तीनों हमारे सामने खड़े हैं तो बाप की याद रहती है। यह, तपस्वी और यह एमआबजेक्ट तो याद समझ वाली रहेगी। ज्ञान से हम अशरीरी बन जाते हैं, कोई शरीर छोड़ नहीं देते हैं। बाबा हर बात कितनी स्पष्ट समझाता है। फिर बाबा ने मुरली चलाई कि विष्णु खड़ा क्यों है? विष्णु को अगर बिठा दें तो शोभेगा नहीं। भक्ति में भी विष्णु कभी बैठा हुआ नहीं दिखाया है। विष्णु माना सामने खड़ा हुआ मोहिनी मूर्त। शंख, चक्र, गदा, पद्म... ऐसी एमआबजेक्ट सामने खड़ी है। सदा यह बात ध्यान पर रहे कि यह पढ़ाई है, यह एमआबजेक्ट है। पहले शंख नहीं, पहले चक्र फिर गदा अर्थात् प्रकाष्ठा फिर पद्म (कमल फूल समान) फिर शंख। परन्तु आजकल शंख बजाने की प्रैक्टिस जल्दी हो जाती है। स्वदर्शन-चक्र फिराते नहीं। परन्तु बाबा कहते पहले योग का जौहर चाहिए, अपने को आत्मा समझो दूसरे को आत्मा समझो तब तीर लगे। भाई-भाई की पहले दृष्टि हो फिर बहन-भाई का सच्चा स्नेह हो। एक बाप के बच्चे हैं यह प्यार हो। हमारा बाबा शिवबाबा सर्व आत्माओं का पिता है, ब्रह्मा बाबा जगत पिता है। सारे जगत से चुन-चुन कर, जो ढूंढ रहे थे, भटक रहे थे उनको बाबा ने अपना बनाया है। बाबा ने जाति, रंग, धर्म नहीं देखा, बाबा ने सबको अपना बनाकर गोद में बिठाकर अमृत पिलाया है। तब बाबा के लिए बहुत प्यार है। हर आत्मा के अन्दर बाबा के लिए प्यार क्यों हैं? कहाँ से खींच कर सामने बिठाकर अमृत पिलाकर हमको मीठा बना रहा है। जैसे सर्प पालने वालों को अक्ल होता है, मुरली सुनाकर, ज़हर निकालकर फिर टोकरी में डाल कर रखते हैं उसको नचाते हैं। जिस सर्प से सब डरते हैं उसको नचा लेते हैं। बाबा हमको इन बातों में आप समान बना रहा है। बाबा इतनी बड़ी दिल वाला है उसको समान बनाने की लगन है। हम कहते वह परमात्मा और हम आत्मा कहाँ, बाबा ने सामने बिठाकर आँख खोली है, आत्मा को देह सम्बन्ध दुनिया को भुलवा देता है। आज भी मरो तैयारी कर लो। ऐसी तैयारी हुई पड़ी हो। ईश्वरीय परिवार का संगठन हो, ज्ञान-अमृत मुख में हो। कई बाबा के ऐसे बच्चे हैं, जो सोचते हैं मरने के समय यहाँ बैठे हों, और ओमशान्ति हो जाए। परन्तु वह तब होगा जब और किसकी याद नहीं आती होगी। कोई हमको याद नहीं कर सकता, न मुझे किसकी याद आये। हमें अपने अधीन किसको नहीं बनाना है। ऐसा कोई न कहे यह मर जायेगी तो मेरा क्या होगा? क्या अधीन होने के लिए खाते-पीते हैं। निराधार रहने के लिए और सर्व के साथ सच्चे सहयोगी रहने के लिए खाते हैं। खाते हैं कुछ काम करने के लिए। ब्रह्मा-भोजन खाते हैं। शिवबाबा के भण्डारे से खाते हैं। तो उसको रिटर्न में क्या देवें? कोई बच्चे कहते माँ-बाप का खाते हैं रिटर्न का क्यों सोचें। परन्तु कर्म की गति का ज्ञान चाहिए। तुम कुछ उसके अर्थ करते हो तब १० गुणा देता है। ज्ञान-मार्ग में सफल होता है तो खुशी होती है। सतयुग में तो पीछे मिलेगा अभी ही बड़ी खुशी है। यह नहीं सोचो करते हैं, करते नहीं जमा होता है। उस बैंक में भी जमा करने में डर लगता, पता नहीं बैंक खुट जाये। लेकिन बाबा तो ८४ जन्म तक हमको इन्ट्रेस्ट देता रहेगा। कईयों के पास इतना है जो इन्ट्रेस्ट से भी आराम से चल सकता है। हमें भी इनट्रेस्ट बना रहे तो हम कर्मातीत बनकर घर जा सकते हैं। हमारी इतनी कमाई होती रहे, ज्ञान भी अखुट खज़ाना है। योग जितना लगाओ उसमें उतनी कमाई है। उसकी याद में ही शक्ति है। वही जवाबदार है, हम निश्चित हैं। ड्रामा कल्याणकारी है, मेरा बाप विश्व-कल्याणकारी है। उसने कहा है 'तत्त्वम्', तुम मेरे बच्चे हो विश्व-कल्याणकारी रहो। तो यह सिर्फ बोल नहीं हैं, समझ है। प्रैक्टिकल है। सर्जन को, डाक्टर को ऐसे नहीं कहेंगे - यह फलाना सर्जन है, प्रैक्टिकल है। हम प्रैक्टिकल हैं। जैसे पश्चाताप महसूस होता है, वैसे यह भी होता है सब ठीक है, अन्दर दिल गवाही देती है क्योंकि बहुतकाल से सच्चा बच्चा, सर्व का स्नेही सहयोगी है, अपने ऊपर ध्यान रखने वाला है, प्रपंच में नहीं जाता है। कईयों के पास और कोई धंधा ही नहीं है, पता नहीं कहाँ-कहाँ की बातें ले आयेंगे, उसमें हमारा इन्ट्रेस्ट ही नहीं है, उसमें घाटा है। मूल भी चला जायेगा। पैसा कमाना बहुत जानते हैं परन्तु सम्भालना नहीं जानते हैं, सिर्फ कमाने का अक्ल नहीं चाहिए- जमा करने का, सफल करने का अक्ल चाहिए तब कहेंगे यह धर्म आत्मा है, पुण्य आत्मा है। पैसा तो चोरों के पास भी है, लड़ाई करके लूटने वालों के पास भी है, सतयुग में भी होगा। अब बोलना सच, खाना सच, चलना भी है ऐसे। सच में ही कमाई है। झूठ की रत्ती भी नहीं है, ठगी करना माना दिखाना एक, करना दूसरा, वह भी नहीं है। जो ऐसा करता है उसे घाटा-ही-घाटा है। इससे की कमाई खत्म हो जाती है। वैल्यू में सच्चाई नम्बरवन है जो सर्व गुण ले आयेगी, सर्व विघ्नों से पार लेकर जायेगी, बाबा जो खज़ाने दे रहा है उनसे भरपूर रखेगी। सबसे गुण ग्रहण करने की बुद्धि अच्छी रहेगी। गुड विशश का प्रवाह सबसे मिलेगा। वह किससे प्यार नहीं मांगेगा वह सबका प्यार पायेगा। वह उड़ने लग पड़ेंगे, बाबा उसके लिए पलकों पर बिठाने के लिए तैयार बैठा है। इतना बाबा से प्यार हो तो कहता है- आओ मेरे बच्चे। तो सच्ची दिल वालों को बाबा कहता है 'आओ मेरे दिलरुबा बच्चे।' बाबा के ही गीत गाने वाले बच्चे। आओ मेरे नूरे-चश्म बच्चे। तो अपने आप से पूछें कि ऐसे मीठे-मीठे बाबा के आवाज़ कानों में गूंज रहे हैं।
भगवान हमारा साथी है, बाबा का बनने से सुख मिला है इलाही। दिल कहे शुक्रिया बाबा तेरा.... यह गीत बहुत प्यारे लगते हैं। सदा ही दिल से शुक्रिया उसके दिल से निकलेगा जो सदा सन्तुष्ट है। मान-अपमान में समान रहने वाला, जो बात सामने आती है, वह अचल-अडोल बनाने के लिए आती है तो कहेंगे शुक्रिया बाबा! कोई बात थोड़ी टेस्ट लेने के लिए आती है, कभी निश्चय कम न हो, सम्भालने के लिए आती है। निश्चय में विजय समाई पड़ी है। बाबा कहता - तुम्हारा अधिकार है। बाबा कहते - तुम मेरे में निश्चय रखो, विजय तुम्हारी हुई पड़ी है। कई आत्मायें ऐसी हैं जिनका जन्म से ही बाप के हाथ-में-हाथ, सिर पर भी बाप का हाथ, पीठ पर भी बाप का हाथ। सतगुरु का सिर पर हाथ, छोटा बच्चा है तो बाप का हाथ है। जब कमाने जाता है तो उनको आशीर्वाद का हाथ चाहिए। सवेरे उठेंगे तो कहेंगे किसका मुँह देखा तुमने जो सारा दिन खराब हो गया। इसलिए बाबा कहते सवेरे उठते बाबा को सामने देखो। अन्तर्मुखी हो करके अपने को आत्मा समझकर बाबा को देखो तो सारा दिन अच्छा जाता है। भूल से और किसको देखा जिससे अपसेट हुए, भूलचूक हुई तो बाबा से माफी लेकर खुद को भी माफ करके वायदा करो कि दूसरे दिन मेरे से यह भूल न हो। फिर सवेरा हो कल का दिन पूरा हुआ। बाबा भी कहेगा बच्चा कल की बात भूल जाओ, आज तू अच्छा बन जाओ।
याद ऐसी है जो पाप कर्म का कूड़ा-किचड़ा है वह भस्म हो जाता है। जब भस्म करते हैं तो धुआँ भी आता है, इसमें धुआँ नहीं आता है, वायुमण्डल अच्छा शुद्ध हो जाता है। तो योग अग्नि से, तपस्वीमूर्त बनने से विष्णु का एम आबजेक्ट सामने खड़ा है। अभी ब्राह्मण हूँ फिर ब्रह्मा सो विष्णु बनूंगा। फिर सब अलंकार अपने आप आ जायेंगे। ऐसी प्रैक्टिस करते-करते आदत पड़ जायेगी। बाबा हमें बच्चे-बच्चे कहकर ले भी जाता है, वह भोलानाथ भी है, तो कालों का काल भी है। हमें भी कहता - बच्चे, तुम बहुतकाल से योग लगाते-लगाते अन्तकाल में ऐसी स्मृति में रहो जो तुम जब शरीर छोड़ो तो खुशी से। फिर खुशी अमर रहेगी। बाबा हमें अमर खुशी देता है।
सत-चीत्-आनन्द क्यों कहते हैं? आत्मा के पास सत्यता आई तो सदा आनन्द है। जो आनन्द स्वरूप रहते हैं वह अपने आप बैलेन्स से, ऊपर की ब्लैसिंग से ब्लिसफुल रहते हैं। यहाँ रखो बैलेन्स, ऊपर की हो ब्लैसिंग तो चेहरा ब्लिसफुल, चेयरफुल है। दया बाबा की है, दुआयें बाबा की हैं तो हमारे जैसा खुशनसीब कोई नहीं।

अनेक जन्मों के संस्कारों को चेंज करने के लिए समझ संग और अभ्यास की आवश्यकता

बाबा को हमेशा सच्चे बच्चे अच्छे लगते हैं। कोई और खूबी हो न हो परन्तु सच्चा साफ रहने से भगवान के दिल में बैठने का स्थान मिल जाता है। समझ कहती है- अशान्त होने की क्या आवश्यकता है! भले कितने भी कारण हो लेकिन दुःख करने की, अशान्त होने की क्या बात है। कईयों में अशान्त होने की, चिंता करने की आदत होती है। व्यर्थ चिंतन करने की भी आदत होती है। इसकी बात उसकी बात... सारा दिन व्यर्थ चिंतन करने की आदत है। समझ कहती है - यह छोड़, तू अपना चिंतन कर तो ईश्वर के चिंतन में रह सकेंगे। अगर स्वयं को सुधारने का ख्याल नहीं करेंगे, औरों के चिंतन में, औरों की कमियाँ देखने में समय बरबाद करेंगे तो बहुत नुकसान होगा।
तो बाबा प्यार से समझाते हैं, करना हमारा काम है। बार-बार हर रोज़ समझाते हैं। बाबा यह भी जानते हैं कि अनेक जन्मों के पहले के संस्कार बने हुए हैं, उसको चेंज करने के लिए तीन बातें ज़रूर चाहिए १- पूरी समझ, २- संग और ३- अभ्यास। यह करने की अन्दर लगन हो। निरन्तर योगी वही रह सकता जो अपने हर सेकण्ड, संकल्प, बोल और कर्म पर ध्यान रखता है। कर्म करो परन्तु यह अन्दर ध्यान रखो। योग बाबा से हो, गुण धारणा में हों, जीवन में हो। आसक्ति कोई में न हो और निर्मोही बनने का लक्ष्य हो, मोह किसमें न हो। रहो कर्म में, सम्बन्ध में। योगी माना कर्म संन्यासी नहीं। योगी माना कर्म करते, पुराने कर्म बंधन तोड़ना है। कर्मों का बोझ सिर पर नहीं चढ़ाना है। श्रेष्ठ कर्म की शक्ति से पुण्य-आत्मा बनना है। साधारण उल्टे कर्म करने से भी पाप आत्मा बन जायेंगे। साधारण करते कभी उल्टे हो जायेंगे। मुझे पुण्य-आत्मा बनना है तो पाप और पुण्य को अच्छी तरह से समझना है।
'योग' गुण धारण करने में मदद करता है। ज़रा-सा भी भूल हो गई तो फौरन सच बताकर क्षमा मांग लो तो बाबा माफ कर देगा। सच बताने वाले को प्यार करेगा। अच्छा सच बताया, अब बोती को चितओ नहीं, दिलशिकस्त नहीं हो जाओ। सच्चा बनकर रहो। एक सच्चा बनकर रहना है, अपने संकल्प और बोल को श्रेष्ठ बनाना है। यह ध्यान रखना है। पहले संकल्प शुद्ध हो, देवता बनने के लिए पढ़ रहे हैं। उस स्कूल में तो ५-६ घण्टा पढ़ेंगे यहाँ एक घण्टा पढ़ो। लेकिन ८ घण्टा इसकी प्रैक्टिस करो। ४ घण्टा अगर याद का चार्ट रखेंगे तो २० घण्टा क्या करेंगे? सोये रहेंगे या खाते रहेंगे। ४ घण्टे का योग तब अच्छा रहेगा जब २० घण्टा पूरा ध्यान होगा। २० घण्टे में थोड़ा भी नीचे-ऊपर हुआ, थोड़ी गलती की तो चार्ट खराब कर दिया। इसलिए अटेन्शन है समझ, संग और अभ्यास का। हर कर्म में चलते-फिरते संग का ध्यान रखना है। फालतू बातें सुनने-सुनाने के लिए टाइम नहीं है। कर्म भले करो, सेवा करो दिल से करो। कर्मेन्द्रियों से अच्छे कर्म करो।
बाबा कहता - खुशी पूछनी हो तो मेरे बच्चों से पूछो इतने लोगों की रोटी पका रहे हैं, चिंता-फ़िकर तो नहीं है। संग भी अच्छा मिला, फ़िकर कोई नहीं। कितनी कमाई हो गई। २१ जन्मों की कमाई हो गई। देवता बनने वाले ब्राह्मणों की महिमा है और बनाने वाले की महिमा है। ब्राह्मण माना भिखारी नहीं, मांगने वाले नहीं, 'ब्राह्मण माना सेवाधारी।' सच्चे, स्वच्छ। वहाँ ब्राह्मणों को पकाकर खिलाते हैं, या ब्राह्मण गृहस्थियों को पकाकर खिलाते हैं। कईयों को फीलिंग आती है- तुम लोग हमारा नहीं खाते हो। हम अपमान नहीं करते हैं लेकिन अगर उनकी बुद्धि कहाँ भटकी हुई होगी, क्रोधी होगा तो उसका असर हो जायेगा। कोई गुस्सा करके भोजन बनाये तो उसका कभी नहीं खाना चाहिए। बाबा को भोग भी नहीं लगाना चाहिए। जिसकी दृष्टि थोड़ी खराब हो उसके हाथ का नहीं खाना चाहिए। अपनी परहेज़ अपनी सम्भाल करनी चाहिए। बाबा कहते अगर बार-बार कोई बीमार पड़ता तो जरूर गफ़लत में है। बार-बार तुम ऐसी भूलें क्यों करते हो, एक भूल करो फिर छिपाओ, अपनी छिपाओ दूसरे की बताओ। दूसरे की भूल बताने में बड़े होशियार हैं। सारा दिन दूसरों को देखने का धंधा करते, बाबा कहता तुमको किसने कहा है-यह सब क्यों देखते सुनते हो। ऐसा देखने-सुनने वाले का संग भी नहीं करना चाहिए। फालतू बातें देखने वाला, सुनाने वाला, उसका संग नहीं करना चाहिए। यहाँ का पुरुषार्थ वहाँ काम में आयेगा। यहाँ बनाने वाला बना रहा है। वहाँ तो पुरुषार्थ नहीं करेंगे।
बाबा कहते बच्चे घर को और स्वर्ग को याद करो घर में आना है, स्वर्ग में जाना है तो उसके लिए लायक बनना है। एक भी अवगुण न रहे। कोई अन्दर विकार न रहे, कोई कमी भी न रहे, कोई कमज़ोरी भी न हो। थोड़ी भी कमी है तो रांग। इसलिए अपने आइने में देखो। मुरली आइना है मुरली सुनी माना आइने में अपने आपको देखा। मेरे में बाकी कौन-सा अवगुण रहा हुआ है। कोई बात है तो सुनाकर लिखकर खत्म कर दो। आगे के लिए मेरे से नहीं होगा। योग इतना अच्छा हो, इतनी शक्ति हो तो विश्व ही पावन बन जाये। हम बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं परन्तु राज्य कहाँ करेंगे ? बाबा ने कल्प पहले की स्मृति दिलाई है- बच्चे, तुम ही राजयोग सीख राजाओं का राजा बने थे, पहले स्वयं का राजा कर्मेन्द्रियों का राजा, मन के मालिक बनो। बुद्धि को एकाग्र करने की, एकाग्रचित रहने की बाबा शिक्षा देता है। बुद्धि शुद्ध हो तो शान्त हो जायेगी। योग माना कनेक्शन बाप से जुटा वहाँ से शक्ति आई तो बहुत लाइट हल्का-पन महसूस होगा। आत्मा समझने से लाइट, फिर बाबा की माइट मिली तो डबल लाइट, फिर सबकी दुआयें मिली तो ट्रिबुल लाइट। ऐसी दिल से मेहनत करने वालों को सफलता है।
तो भूल हो तो सच्ची दिल से माफी मांग लें, पुरुषार्थ भी करें तो सच्ची दिल से करें, याद करें तो भी सच्ची दिल से करें। ऐसे नहीं बैठे योग में है और याद किसी दूसरे को कर रहे हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु की याद न आये, अन्दर सम्भालो। पढ़ाई का रजिस्टर रखो। चरित्र का रिकार्ड रखो। अपना रिकार्ड कभी खराब न करो। कोई एक बार गुस्सा करता तो ६ महीना भूलता नहीं है, रिकार्ड खराब हो जाता है। गुस्सा छिपता नहीं है, आज इनसे बात नहीं करना। इसका मूड़ खराब है सबको दिखाई पड़ता है। गुस्सा जितना छिपाता है तो बाम फटता है अचानक। कोई चांस आया तो सबने देख लिया। सबको पता चल गया। कोई बताये या न बताये, कहेंगे हमने देखा ना इसमें इतना गुस्सा है। सारा रिकार्ड खराब कर दिया। समझदार कभी रिकार्ड खराब नहीं करेंगे। छोटी-सी ज़रा-सी चोरी की तो पाप आत्मा बन गये। सब कुछ मिलता है भगवान के घर से। नहीं भी मिले, जो मिले अच्छा है। ऐसे नहीं जो सामने है वह अच्छा नहीं है, मुझे और अच्छा चाहिए। यह भी आँख जाती है तो कभी चोरी करा देती है। जो है उसमें सन्तुष्ट नहीं है। हमको गैरन्टी है अनुभव है जो आवश्यक है, अपने आप मिलता है। डाक्टर दवाई भी अपने आप देता है। बाबा जानता है, बच्चे को आवश्यक है तो यज्ञ से सब देता है। यज्ञ में सच्ची दिल से सेवा करने वाले को अपने आप मिलता है। वह मांगता नहीं है। तुम सिर्फ रॉयल बनो, इच्छा-मात्रम्-अविद्या। इच्छा से जैसे इनोसेंट, इच्छा क्या होती है जैसे पता ही नहीं है। इससे सहज निरन्तर योगी बन जायेंगे। इच्छा चंचल बनाती है। इच्छा, लोभ सिखाती है, मोह पैदा करती है। कहाँ से प्यार चाहिए वह भी इच्छा। बाप समान प्यार के सागर के बच्चे हो तो उनसे लो। मेरे से भी मांगो मत, तुमको आपेही मिलेगा। इतना अच्छा खुला भण्डार है। मेरे से मांगो नहीं, प्यार दो, शान्ति दो। तुम सिर्फ शान्त-स्वरूप रहो, मीठे बनो तो देखो कितना प्यार पाते हो। बाप के प्यार में दुआ भी होगी तो आशीर्वाद भी होगी, शक्ति, स्नेह, सकाश सब कुछ होगा परन्तु हम सिर्फ मीठे बनें। कभी अपसेट न हों। कितना भी कोई अपसेट करने वाला हो, अच्छा, कोई बात नहीं। इसमें चाहिए गम्भीर और सयाना। रीएक्ट करना यह भी अक्ल की कमी है। बाबा हमको अक्ल सिखाकर अन्दर से गम्भीर सयाना अपने समान बनाता है। ध्यान खिचवाता है। उसमें दिल सच्ची, दिमाग ठण्डा, स्वभाव सरल हो। तो हम भी सन्तुष्ट, हमारे से सब सन्तुष्ट। और बाबा को हमारे से कुछ नहीं चाहिए। ऐसे बच्चे बनें तो बाबा कहेगा बस। ऐसे बच्चे बने तो माला तैयार हो गई, सिमरण योग्य हो गई। बाप की महिमा कराने योग्य माला बन गई। हम महिमा करें बड़ी बात नहीं है, हम ऐसे बनें तो बाप की महिमा सब करेंगे। बच्चे स्कूल में अच्छा पढ़ते तो टीचर की भी महिमा, स्कूल की भी महिमा। तो महिमा कराने वाले कौन ? जो अच्छा पढ़ते, अच्छी सेवा करते। अगर हम सेवाधारी ब्राह्मण न होते तो मधुबन की महिमा कैसे होती !
अच्छा ओमशान्ति ।

स्वयं को व्यर्थ सोच से फ्री और बुद्धि को पवित्र बनाओ तो बाकी सब काम बाबा आपेही करा लेगा

मधुबन है मालामाल बनने का स्थान, जितना चाहो उतना कमाई करो, जितना चाहो उतना संगठन से स्नेह की शक्ति अपने में भर लो। संगठन से स्नेह की शक्ति मिलती है। हम पहले कैसे भी थे, वह भूल अब ऐसे बनें, जो नैन शीतल और दृष्टि-वृत्ति पावन हो जाएँ। शीतल नैन बहुत पावरफुल रूहानी कशिश करने वाले होते। वह सहज योगी होते और औरों को भी सहज स्वतः योगी बना देते।
कई बार देखते हैं फ़रिश्तों के कान नहीं दिखाई देते, मुख भी दिखाई नहीं देता परन्तु मीठे नैन हैं, वो नैन बताते हैं कैसे वो हमारे रक्षक हैं। भक्ति मार्ग में भी एंज़िल के लिए बहुत प्यार है, फील करते हैं ये हमारे रक्षक हैं क्योंकि उनकी आत्मा इतनी प्योर है, इसलिए सदा आकारी उड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं।
बाप के साथ का अनुभव सदा रहे, उसकी लिए विधि क्या है? इस दुनिया को देखते भी नहीं देखो, न सुनो, न सोचो... नालेज द्वारा इतनी शक्ति भर जाए, जो न देखें, न सुनें। जो अच्छी ज़रूरी बात है वो अब करो, अपने उन्नति वाली बात है या सर्व के भले की बात या वायुमण्डल को अच्छा बनाने की बात है, अब करो। अब करने से बाबा साथ देता है। अगर सोचेंगे कि अभी हमारे पास टाइम नहीं, शक्ति नहीं है तो बाबा मदद नहीं करेगा। तुरंत दान का महापुण्य होता है इसलिए अभी करो। अभी किसी को कुछ देना है तो तुरंत दे दो। कोई-कोई की नेचर होती है पूछते रहेंगे - करेंगे कुछ नहीं। साक्षी होकर देखो एक बात दस बारी सोचना, पूछना ये नेचर भी तुरंत दान महापुण्य में विघ्न डालने वाली है या नहीं? कई हैं जो अकेले बैठकर सोचते हैं पता नहीं बाबा की मदद मिलेगी या नहीं। तो बाबा मदद कैसे करे ? हमें बाबा के शब्द याद आते हैं बाबा कहता बच्चे असोचता बनो, भगवान को कहा जाता है अकर्ता, अभोक्ता, असोचता। भगवान तो है ही निराकार, परन्तु साकार में आता करता भी है फिर भी उसको फल भोगने की इच्छा नहीं है। कर्ता वो है जिसमें सबका कल्याण है, इसलिए साधारण और दिव्य कर्म से वो न्यारा है, अपने लिए नहीं करता है, कर्तापन के अभिमान से एकदम परे है। तो बाबा हमको सिखाता है तुम भी ऐसे बनों। पहले तो द्वापर से उल्टा-सुल्टा करते रहे, भोगते रहे - वो करने और भोगने को समाप्त करने के लिए श्रेष्ठ कर्म करो। उसमें अभिमान न रख, अपना प्रभाव न डाल.... प्रभाव डालना भी फल लेना है। कईयों के अन्दर रहता है कि हमने जो किया उसका रिटर्न देखें क्या मिलता है! लोग कितना पसंद करते हैं! महिमा की इच्छा भी कर्ता-पन है। वो दान में नहीं माना जायेगा। खुद भी कहेंगे दूसरे भी कहेंगे बहुत अच्छा बोला, परन्तु दान में नहीं माना जायेगा। दान माना ही गुप्त और गुप्त करने से उसको खुशी बल मिलता है। ज्ञान मुख से दिया, कान ने सुना.. बल मिला। उसके अंदर का दुःख गया... बाबा ने कहा तुम दुःखहर्ता-सुखकर्ता हो। तो जैसे बाबा ने हमको अमर खुशी दी है, वरदान भी दिया है। बाबा का वह वरदान काम कर रहा है। तो अभी हम सब अकर्मी बन रहे हैं, कर्म कर रहे हैं लेकिन उसका कोई बन्धन नहीं है। सतयुग में कर्म में सम्बन्ध है, कलियुग में कर्म बन्धन हो जाता क्योंकि यहाँ कर्म के बीच में विकार हैं इसलिए विकर्मी हैं। अभी उसको हम खत्म कर रहे हैं। कर्म में सम्बन्ध में पवित्रता को धारण कर अपनी वृत्ति-दृष्टि को पवित्र बना रहे हैं। बाबा ने कहा दृष्टि से कोई देह में फँसता, दृष्टि ही देह से न्यारा बनाती है। सच्चाई से अन्दर का सुख मिलता है, जहाँ अल्पकाल का सुख है वहाँ फिर बहुतकाल का दुःख भोगना पड़ता। तो अल्पकाल के सुख भोग की इच्छा माना भोग विकार, उसमें बहुतकाल का दुःख मिलेगा। इसलिए बाबा कहते बच्चे अभोक्ता बनो। न सुख चाहिए, न दुःख। अल्पकाल का सुख जिसमें बहुतकाल का दुःख है वो चाहिए ही नहीं। अभोक्ता हो गये, फ्री हो गये। असोचता हैं, किस बात का सोच करें। अच्छी बात दूसरे करते हैं तो उसके लिए शुभ भावना है।
संगमयुग है ही भाग्य बनाने का युग, हमारा भी भाग्य बने, दूसरे का भी बने। तो अपने आपको दुविधा में न डालें। कईयों की नेचर में दुविधा-पन बहुत होता। अपने प्रति भी डाउट वाले शब्द उच्चारण न हों। अभोक्ता, असोचता यह वर्सा निराकारी बाप से ले लें। कर रहे हैं, परन्तु भान नहीं है। कर्ता-पन के भान से परे हैं।
अपने से बात करने का भी हमें शौक चाहिए। फ्री हैं तो अपने से बात करते हैं। फ्री नहीं हैं तो दूसरों की बातें याद आती हैं। ये कब ठीक होगा, कैसे होगा! नहीं। वो बात ठीक नहीं होगी, और इस संकल्प से मैं भी बिगड़ जाऊँगी। किसको सुनाने की बात नहीं है तो अन्दर घुटके खायेंगे। अन्दर-ही-अन्दर बीमारी बढ़ती जायेगी। कोई बात करेगा तो ठीक से बात भी नहीं करेंगे। संगठन का स्नेह बहुत मदद करता है। मन में कुछ भी दर्द हो, प्यार से 'बाबा' कहो तो चला जायेगा। बाबा हाज़िर हो जाता है, अनुभव है। हम दुःखहर्ता के बच्चे, सुख वाली दुनिया स्थापन करने वाले के बच्चे हैं। हमारी खुशी कोई चोर लूट नहीं सकता। कोई मन के अन्दर घुस नहीं सकता। भक्ति में भी गायन है। वैसे कई बाबा के कार्य ऐसे हैं, जो करने वाला वो है, कराने वाला भी वो है... तो जो काम बाबा का है वो मैं क्यों करूँ। बाबा बुद्धिवानों की बुद्धि है, अपने आप करेगा। हमको कहता तू अपनी बुद्धि को पवित्र बना। हम फालतू सोच से फ्री हो जाएँ, बाबा का मेरे से यही काम है। अच्छा।

एक बाबा के संग में रहो तो दूसरा संग नहीं लगेगा

विदेही बनने की खींच है माना बाबा के साथ चलने की तमन्ना है। है। बाबा कहते कि परमात्म-अभिमानी बनो यानि आत्मा में परमात्मा बाप की याद भरी हुई हो क्योंकि वही बाप है, टीचर, सतगुरु, सखा-स्वामी सब कुछ है। आत्मा में देह-अभिमान के साथ-साथ देह, देह के सम्बन्ध की, इस दुनियादारी के, कई प्रकार के ऐसे अभिमान भरे हुए थे। कितने प्रकार के अभिमान आत्मा में भरे हुए हैं- यह सूक्ष्म गहराई में जाकर देखने से ही पता चलता है। अभी आत्मा ऐसी सूक्ष्मता की ओर अपने अन्तर में जब जाती है तभी सोल-कान्सेस रह सकती है। हमारे कान्सेस में यह स्पष्ट रीति से चेकिंग होती रहे कि बाँडी-कान्सेस के ख्यालात कैसे होते और सोल-कान्सेस के ख्यालात कैसे होते? और अभी इससे भी आगे बाबा कहते कि परमात्म-अभिमानी रहो तो आपका कोई ऐसा बोल मुख से निकलेगा नहीं।
आत्मा में परमात्मा के जो महावाक्य हैं वह जब धारण होते हैं, तो एक दिव्य शक्ति आत्मा में भर जाती है जिस कारण से फिर बॉडी-कान्सेस का कोई चिह्न नहीं रहता। चलना, फिरना, बोलना यह सबमें अलौकिकता दिखाई देगी। सतयुग में भले बाबा हमारे साथ नहीं रहता है लेकिन आत्मा में जो साथ में रहने के संस्कार भरे हुए हैं उनसे ही वह राज्य चलता है, जिस कारण से ही उन्हें सतयुग में दैवी कुल की देव आत्मायें कहा जाता है। इस समय जिन्होंने अपने को पहचाना है और मैं आत्मा-परमात्मा बाप की सन्तान हूँ, इस स्मृति से अपने को शक्तिशाली बनाया है, देह-अभिमान का सारा किचड़ा खत्म किया है उनमें वह शक्ति भर जाती है। तो परमात्म-अभिमानी माना योग की अग्नि जिससे व्यर्थ को समाप्त करने की शक्ति आ जाती है। याद से हर समस्या का सामना करने की शक्ति आती है। याद में अनहोनी बात को भी कर देने की शक्ति आती है। खुद के परिवर्तन से और आत्माओं को परिवर्तन करने की शक्ति आती है। जिनको स्वयं को परिवर्तन करने की तमन्ना है वह बहुत भाग्यशाली हैं। लौकिक और अलौकिक की जो भी सेवायें हैं वा ज़िम्मेवारियाँ है, उन सबको करते भी पहले यह तमन्ना हो कि व्यर्थ को परिवर्तन कर समर्थ बनें। हमारा समय सफल हो, यही हमारी तमन्ना हो। यह तमन्ना उसकी पूरी होगी जो बिल्कुल अन्दर से सच्चे होंगे। सच्चा रहने की भी हिम्मत चाहिए। जो सच्चा होता है वह खुशी में नाचता है इसलिए बाबा मुरली में कहते कि 'सच तो बिठो नच'।
तो बाबा के संग का रंग माना सच्चा, जैसे लोहा पारस के संग में सोना बन जाता, ऐसे सच्चा बनना है। तो हम अपने आपको देखें, जरा भी लोहे का अंश तो नहीं है। अगर अंश भी होगा तो वैल्यु को कम कर देगा। तो आत्मा सोना बनें, उसमें सच्चाई हो, पवित्रता हो। अपवित्रता का अंश न हो। दृष्टि बड़ी शीतल, सर्व के कल्याण की, बड़ी मीठी रूहानियत भरी हो। जैसे बाबा में कशिश है तो आत्मा को वह खींच लेता है। बाबा के सामने बैठने से सब कुछ भूल जाता है। ऐसे आत्मा में वह कशिश आ जाए।
कृष्ण को अपनी माँ की गोद में भी इतनी खुशी नहीं होती होगी जितनी अभी हमको बाप के गोदी में खुशी है। इस खुशी का कोई माप नहीं कर सकता है। बाबा अपनी रूहानी दृष्टि से सारा अभिमान निकाल करके पावन बना रहा है। लोहे को, सिल्वर को पहचानना कोई बड़ी बात नहीं है, बाकी हीरे को परखने में बड़ी सूक्ष्मता चाहिए। तो जरा सा भी कहीं कोई दाग छिपा हुआ न हो। इसमें बड़ा बुद्धिवान चाहिए तब तो बाबा कहते हैं कि पहले ज्ञान से अपनी बुद्धि को महीन बुद्धि और सूक्ष्म बनाते चलो। और बाबा से गहरा सम्बन्ध जोड़ते जाओ तो पावर हाउस से आत्मा में पावर आती रहेगी। अगर पावर हाउस से कनेक्शन टूट जाए तो क्या होगा? अंधेरा ही अंधेरा। स्वीच ऑन करो तो रोशनी आ जायेगी। अंधेरे को कोई भगाना या मिटाना नहीं पड़ता है अंधेरा चला ही जाता है। व्यर्थ को कहो तुम जाओ, जाओ तो वह कभी नहीं जायेगा और ही चींटी मुआफ़िक पीछे घूमता रहेगा। व्यर्थ ऐसा माथा खराब करने वाला है, एक जायेगा दूसरा आयेगा, दूसरा जायेगा तीसरा आयेगा। चूहा जायेगा, बिल्ली आयेगी, बिल्ली जायेगी तो फिर कुत्ता आयेगा...।
चूहा भी घर में तब आता है जब गफ़लत होती है। अच्छी तरह से सफाई रखो तो चूहा आ नहीं सकता। बिल्ली हर चीज़ को जूठा कर देती है, तो बाबा कहते हैं सम्बन्ध में बहुत ईमानदारी रखो। सिर्फ ऊपर ऊपर से बाप से सम्बन्ध नहीं रखो। यहाँ बैठे हैं बाबा की याद में और अन्दर याद आती है और किसी की ? तो किसकी भी याद आई माना झूठा। माया बिल्ली म्याऊँ, म्याऊँ करके बाप से झूठा बना देती है। इसलिए बाबा यह नहीं कह सकते कि यह मेरा सच्चा बच्चा है। इसमें फिर बाबा बहुत पक्का है। बाबा से यह सर्टिफ़िकेट हर एक को ज़रूर ले लेना चाहिए कि इस बच्चे को कितना भी माया हिलाये पर यह हिलने वाला नहीं है। कोई स्टूडेंट को सर्टिफ़िकेट मिल जाता है तो अपने आप सभी को पता चल जाता है। कई बच्चे हैं जिन्हें पढ़ाई का बहुत शौक है उनको और कोई बात अच्छी नहीं लगती है। समझेंगे वेस्ट ऑफ टाइम है, मैं नापास न हो जाऊँ, यह ख्याल उन्हें सयाना बनाने में मदद करता है।
जिन्हें पढ़ाई का कदर होता है वह अपनी कमी को देख नहीं सकते हैं। बाप को क्या चाहिए? बच्चे की पढ़ाई, मैनर्स और कोई संग में न जाये, यही माँ-बाप सम्भाल करते हैं क्योंकि पढ़ाई से उसका फ्यूचर ठीक होगा, मैनर्स से माँ-बाप का नाम बाला करेंगे और संग अच्छा होगा तो उसका भविष्य में भी सब कुछ अच्छा ही होता रहेगा। बड़े हो या छोटे लेकिन 'संग का रंग' बहुत जल्दी लगता है। बुरा संग जल्दी लगता है, अच्छा मुश्किल से लगता है, ज़माना ऐसा है। निश्चय-बुद्धि को संशय में ले आयेंगे या मतभेद में मूझते रहेंगे तो क्या होगा! धीरे-धीरे क्लास से किनारा हो जायेगा। कहेंगे मुरली तो वही है, रोज़ सुनते-सुनते थक गये, सवेरे उठो झुटका खाओ इसलिए सवेरे उठने से क्या फायदा? इससे तो सो जाओ। यह सब हैं संग का रंग। लेकिन योग में नींद क्यों आती है? अन्दर का इन्ट्रेस्ट कम है या कोई-न-कोई आत्मा में किचड़ा भर गया है, तब अन्दर ज्ञान जाता ही नहीं है तो नींद आयेगी ही। कई सुनते भी हैं लेकिन चेहरे से नहीं लगता कि यहाँ बैठकर सुन रहे हैं, बुद्धि बाहर भटकती रहती है। फिर मुख से बोल भी नहीं सकते। जैसे माया ने अन्दर पकड़ करके उदास, सुस्त बना दिया है। तो संग सुस्त और केयरलेस बनाता है। संग गफलत कराता है, खराब काम कराता है। कहेंगे इसमें क्या है अगर ऐसे किया तो क्या हुआ? यह खाया तो क्या हुआ? कहाँ घूमने चले गये तो क्या हुआ ? जब अच्छा करना होगा तो बहाना बनायेंगे और जो अच्छा नहीं होगा तो बतायेंगे भी नहीं क्योंकि बतायेंगे तो मना करेंगे।
जिसका अच्छा दुकान होता, माल जिसके पास अच्छा होता, उसके पास ग्राहक अपने आप आते हैं। बिना बोर्ड लगाये, बिना पब्लिसिटी किये हुए भी अपने आप आयेंगे। सेल्समेन अच्छा हो तो सर्विस आपेही अच्छी होती रहेगी। जिसके पास शान्ति, प्रेम का खज़ाना है, उनसे सेवा तो स्वतः ही होती है। हम निमित्त हैं तो हमारे पास जो आये उसकी उठने की दिल न हो। जैसे बाबा के पास हम जब बैठते हैं तो हमको यह ख्याल ही नहीं आता है कि हम यहाँ से हिलें। कोई काम भी याद नहीं आयेगा। तो बाबा के पास बैठ जाओ तो निश्चित रहेंगे। यह है परमात्म-अभिमानी का या परमात्म-प्यार का नशा। आत्मा में वह संस्कार जो भरते हैं वह सतयुग में ले जायेंगे। परमात्म-प्यार जो अन्दर भरा हुआ है वह सारे चक्कर में काम आता है। और कहीं आँख डूबेगी नहीं, कोई और तमन्ना नहीं होगी मुझे यह चाहिए, मुझे यह चाहिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। कोई व्यक्ति का प्यार, कोई वैभव चाहिए ? कुछ नहीं चाहिए।
परमात्म-अभिमानी रहने से लगता है कि हम भरपूर हैं, सम्पन्न हैं। हमारे पास बहुत कुछ है, उनके नयन-चयन बताते हैं कि कोई कमी नहीं है। कमाल है बाप के पालना और पढ़ाई की जो सारे कल्प में कभी कमी महसूस नहीं होगी, यह गैरन्टी है। बाबा ने इतना दिया है जो हम श्रेष्ठ पूज्य और श्रेष्ठ पुजारी होंगे। पुजारी भी मांगने वाले नहीं होंगे, अच्छे मन्दिर बना करके लोगों को दर्शन कराते रहेंगे। अपने महल से भी ज़्यादा उनका मन्दिर ऊँचा बनायेंगे। यही तो सेवा है, सोचो सेवा क्या है? जो आये लेकर जाये, इस प्रकार से दाता बनें। हमें नशा होना चाहिए कि हम किसके बच्चे हैं, हमारा टीचर कौन है और वह क्या पढ़ा रहा है। पढ़ाई अच्छी पढ़ने वाले को अपने टीचर के लिए रिगार्ड है। हमको ऐसी क्वालिटी वाला बनना है। सतगुरु भी हमारा परमात्म-बाप है, कोई कहे तुम्हारा गुरु कौन ? अरे मेरा गुरु तो नहीं मेरा सतगुरु है इतना नशा हो क्योंकि गुरु तो अनेक हैं लेकिन सतगुरु एक है और वह मेरा गुरु है। तो यह है आत्मा में शुद्ध-अभिमान। कौन हैं, किसके बच्चे हैं, क्या कर रहे हैं यह नशा और निश्चय हो।

अब की स्थिति ही अन्त में काम आयेगी इसलिए अपनी स्थिति बनाने पर ध्यान दो

जितनी बाबा की पहचान उतनी स्थिति सहज अपने आप अच्छी बनती जाती है। इसमें सोचने या पूछने की बात नहीं है। बाबा के बोल और बाबा की दृष्टि हमको ऊँचा उठाती है। चाहे हम पुराने हैं या आज के नये बच्चे हैं। आजकल तो पुरानों को भी चिन्ता लगी हुई है इतना समय हो गया है लेकिन अभी भी स्थिति बाप समान नहीं हुई है, क्या बात है, अभी तो जल्दी होनी चाहिए।
हमें अपनी स्थिति अच्छी बनाना है। यह धुन लगी हुई हो। बाबा की याद सदा के लिए तब रह सकती है जब अनासक्त और नष्टोमाहा हो। अन्दर-ही-अन्दर मोह को निकालते जाना है। शरीर में भी मोह न हो, सम्बन्ध में भी मोह न हो और दूसरी अनासक्त वृत्ति हो। कोई भी खान-पान, रहन-सहन में आसक्ति न हो। इन दोनों पर न सिर्फ ध्यान हो परन्तु बहुत-बहुत ध्यान हो क्योंकि दोनों हमारे याद में इन्टरफेयर करने वाले हैं, याद में रहने नहीं देते हैं। और बाबा कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो आसक्ति से मुक्त हो जायेंगे। मोह आत्म अभिमानी बनने नहीं देता है तो विदेही कैसे बनेंगे! तो मूल बात है कि कहाँ पर भी मोह का अनुभव ही न हो। बाबा के स्नेह का अनुभव हो। या रहेगा देहधारियों में मोह या रहेगा बाप में स्नेह। बाप का प्यार हमको अशरीरी बना देता है। रूहानियत में रहने वाली आत्मा शरीर में होते हुए भी साक्षी दृष्टा हो करके पार्ट बजाती है। यह अन्दर में अभ्यास दिन-रात चलता रहे। स्टूडैण्ट लाइफ है तो योगी जीवन है।
अन्त में स्थिति नहीं बनायेंगे लेकिन अब की स्थिति अन्त में काम आयेगी। सहनशीलता है तो सन्तुष्ट स्थिति है। दो गुण कमाल का काम करते हैं। सहनशीलता सयाना बनाती है। सन्तुष्ट रहना माना सम्पन्न बन जाते हैं, कोई कमी नहीं। जैसे तृप्त आत्मा, अपने को खुशनसीब समझते हैं। सिम्पल और सच्चे रहने में बड़ा मज़ा है। सहनशीलता मिलनसार बना देती है। रूहानी स्नेह, ईश्वरीय परिवार के साथ सच्चा प्यार किसके भाव-स्वभाव के चक्कर और टक्कर में नहीं आते हैं। कोई किसी के प्रभाव में आकर चक्कर में आ जाते हैं, कोई किसके टक्कर में आ जाते हैं तो अन्दर अशान्त, दुःख महसूस करते हैं। तो यह दो गुण जिसके अन्दर हैं वह मम्मा बाबा को पूरा फ़ालो करके अपनी स्थिति बहुत अच्छी बना सकते हैं।
बाप का खज़ाना हमारी लाइफ के अन्दर हमको 'रिच और रॉयल' बनाने वाला है। मम्मा की पालना मज़बूत बनाती है। मम्मा कहती थी- गम्भीर बनो, सयाने बनो, छोटे बेबी बुद्धि वाले नहीं बनो। जिद्द का स्वभाव, सिद्ध करने की आदत नहीं रखो। छोटी-सी भूल हो तो उसको महसूस करके अपने आपको चेक करके चेन्ज हो जाओ। दिखावे वाला समर्पण नहीं, दिल से समर्पण हो जाओ। मेरा कुछ नहीं है, बाबा मुझे चला रहा है, सिर्फ बुद्धि से नहीं प्रैक्टिकली यह अनुभव हो कि मेरा कुछ नहीं है। दिखाई तो दे रहा है कि भले कुटुम्ब परिवार के साथ हैं। अलौकिक परिवार के साथ हैं परन्तु कहाँ पर भी 'मेरा-पन' नहीं, 'मैं' का अभिमान नहीं। 'मैं' और 'मेरे-पन' से ममत्व नहीं, इनसे जो फ्री है, वही बाबा का सयाना बच्चा है।
मन में संकल्प आया तो कर्म में आने के बिगर छोड़ेगा नहीं इसलिए खबरदार रहो क्योंकि पुराने पाप कर्मों का बोझ ही सिर पर बहुत लदा हुआ है। पुराने अनेक जन्मों के पाप एकदम अगर विनाश हो गये हो, विकर्म विनाश हुए हो तो उनकी स्थिति बतायेगी। उनकी दृष्टि-वृत्ति बतायेगी, वह कभी किसके प्रभाव में नहीं आयेगा। न अपना प्रभाव डालेगा - यह उसकी निशानी है। वह अन्दर-ही-अन्दर बाबा के गुण गायेगा, वह अन्तर्मुखी रहने के आदती होंगे। अपने को बाप समान हर तरह से कल्याणकारी बनायेंगे। जैसे बाबा मुझ आत्मा को घर की घड़ी-घड़ी याद दिलाता है, बच्चे किसके हो ? जो आदि में उतरते समय हमारी स्थिति ऐसी थी अब अन्त में भी ऐसी स्थिति तैयार है? बाबा कहते यह चेक करो। याद रखो सतयुग में कैसे उत्तरे थे ? उस घड़ी हम कैसे थे? और अन्त में हम कैसे जायेंगे ? तो विकर्म जब विनाश होते हैं तो यही स्मृति बताती है कि अभी मन का संकल्प कभी अशुद्धता को टच भी नहीं करता, बुद्धि कहाँ खींचती नहीं। बाप जैसे संस्कार होंगे। बहुतकाल से जो कर्म बाबा ने सिखलाया है, करके दिखलाया है उसी अनुसार ही कर्म करते-करते बाप से सर्व सम्बन्ध की शक्ति से अपनी जीवन यात्रा सफल करते हैं।
बाबा तीनों रूप से सेवा करता है, निराकारी रूप से परमधाम में खींचता है। अव्यक्त रूप से कर्त्तापन के भान से दूर रहो, बेहद में रह करके मनोवृत्ति से सेवा करो जिसको 'मन्सा शक्ति' कहते हैं। तो अन्दर से जब विकर्म विनाश हो जाते हैं तो यही धुन लगी रहती है कि ऐसी स्थिति में रहकर सपूत बनने का सबूत देंगे। जो बात दिल को लगती है वह भूलती नहीं है इसलिए यज्ञ की सारी हिस्ट्री के अन्दर कितनी भी अनेक बातें हुई होंगी, वह कभी भूली हुई नहीं होंगी। बाकी सब बातें जो हमारे काम की नहीं थी, हमें वह याद भी नहीं हैं। इतना तो हमारा अक्ल होना चाहिए, हँस मिसल मोती चुगते रहें। एकदम जो हमारे काम की बात है वह ले लो, बस। अगर राजा-रानी बनना है तो 'होली हैस' बनो। इससे स्थिति अच्छी बनती है। किचड़ा लिया फिर फेंका इससे ना सेल्फ-कान्फीडेन्स रहता, न ही दूसरों का मेरे में विश्वास रहता है। तो हम आत्मा इतनी शुद्ध साफ़ रहें जो बाबा का मेरे में, मेरा बाबा में, सबका मेरे में विश्वास हो जाये। सच है तो यह है, यह सब कहें। सच और सादगी कहाँ देखेंगे? हमारे में देखेंगे ना! बाबा जो कहते हैं एकानामी के अवतार बन जायें तो एक का नाम भी है, एकानामी भी है, यह प्रैक्टिकल सबूत देख करके कई आत्मायें बाबा के नज़दीक आती हैं क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण बनता है।
हमारा बाबा से योग ऐसा लगे जो किये हुए जन्म-जन्म के विकर्म विनाश हो जाएँ। इस जन्म से ही पता चलता है कि पिछले जन्म-जन्म में कितने हमने पाप किये होंगे! मोटे-मोटे रूप में झूठ कितना बोला होगा? चोरीवो कितनी की होगी? और सबसे बड़ी निन्दा कितनी की होगी। किसकी इधर की उधर की। जैलसी वश हमने क्या नहीं किया होगा। क्रोध वश हमने क्या नहीं किया होगा ? हरेक अपना इस जन्म में देखे, तो यह सब पास्ट जन्म के संस्कार हैं, उन्हें हमें खत्म करना है। इसके लिए चाहिए - सच्चे दिल की याद। इसलिए बाबा ने कहा कि बाबा को दिमाग वाले नहीं चाहिए, दिल वाले चाहिए। पापों को खत्म करने के लिए बाबा ने हम बच्चों को अच्छा संग दिया है, तो यहाँ संग भी अच्छा है, तो शिक्षायें भी मिली हुई है। बाबा पापों को माफ करके फिर उसे फिर से न करने के लिए, सुधारने के लिए समझानी भी देते हैं। बाबा ऐसी शिक्षा देते हैं कि आत्मा अन्दर से ऐसा महसूस करती है कि यह पाप है, इसलिए यह कर्म मुझे नहीं करना है। और फिर पाप न करे लेकिन पुण्य भी करे, तो पुण्य-कर्म करने का भी ज्ञान यहाँ स्पष्ट रीति से मिलता है।
बाबा हम बच्चों की सच्चाई को देख कहते बच्चे जो कुछ पास्ट में हुआ उसे भूल जाओ। पुरानी बातें याद नहीं करो, बाबा बैठा है तुम गुड विशश (दुआयें) लेने का दरवाज़ा खोलकर रखो। झूठ कभी नहीं बोलना। सब से प्यार रखना क्योंकि सच्चाई ही फिर से जीवन में खुशी ले आयेगी। और झूठ बोलने वाला एक सेकण्ड में खुश रह नहीं सकता। हमें सदा खुशी देने वाला कौन है? 'सत्यम्-शिवम् सुन्दरम्।' सच्चा मेरा बाप, सबका कल्याण करने वाला हमको खुशी देता है, हमारा कल्याण करने के लिए। सच्ची खुशी ऐसी जो हमको तो काम में आ रही है, उसी अंदाज से और हम खुशी के आधार से जी रहे हैं। और औरों को खुशी देने के लिए खुली दिल है और तो हम कुछ दे नहीं सकते हैं।
दिमाग वाले नाम कमाते हैं और दिल वाले दुआयें लेते हैं इसलिए सदा जो करें वह दिल से करें। पुरुषार्थ करें तो दिल से करें, सेवा करें तो दिल से करें। ऊपर-ऊपर से न करें या दिखाने के लिए दिखावा नहीं करें। उमंग-उल्लास से करें और जो करना है सो वह सब अब ही कर लें। जितना करो उतना थोड़ा। कभी गिनती नहीं करें, अभी हमको अपार खुशी मिलती है, जो बाबा कहते हैं तुम्हारे खुशी का माप किया जाये ऐसा कोई साधन ही नहीं है। तो सत्कर्म का कोई हम अंदाज निकालेंगे क्या कि इतने किये हैं। तो जिनके अन्दर है कि हमको नई दुनिया में तो आना ही है, लेकिन अनेकों को लाना है, वह दृष्टि और वृत्ति से भी सेवा करेंगे। जैसे बाबा की दृष्टि हज़ारों को कितना सुख देती है। बाबा की दृष्टि में हर आत्मा के लिए कल्याण की भावना होने कारण अनेकों को सुख देती है और बाबा की वृत्ति में है कि सभी की सद्‌गति हो क्योंकि बाबा कहते कि मैं ही सर्व का सद्गति दाता हूँ, सबका कल्याण करने वाला हूँ। अगर ऐसा ही हम भी सिमरण करते हैं तो स्मृति-स्वरूप बनते हैं। बाकी और कोई बात से हमारा तैलुक नहीं है।
हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। अच्छा है तो अच्छा, नहीं अच्छा है तो भी हम चिन्तन या वर्णन नहीं कर सकते। कोई बात अच्छी नहीं भी है लेकिन हम अच्छे रहें। उस समय शान्त रहें। यह भी बहुत खबरदारी रखनी होती है। यह हमें अच्छा नहीं लगता है - तो हम क्या करेंगे? क्या गुस्सा करेंगे? रांग। किसी को कम्पलेन्ट करेंगे? रांग। उनसे किनारा करेंगे या मुँह फेर लेंगे? यह भी रांग। मन्दिर में मूर्ति कभी अपना मुँह चेन्ज करती है क्या? जैसे लाइन में वह दर्शन करते जाते हैं। हरेक अपने पुरुषार्थ और भावना अनुसार उनसे जिसको जो लेना हो, वह लेते जाते हैं। पापी आये, चाहे साधू आये, चाहे भगत आये... अभी हमको क्या करने का है? बाबा चैतन्य में ऐसा बना रहा है!
जब हमारे अन्दर दैवीगुण आ जाते हैं तो देवता कहा जाता है। हम वही हैं। आगे हमारे में अवगुण थे, अभी अपने निजी स्वधर्म में टिकने से पता चलता है कि आत्मा के असली गुण हैं- शान्ति, आनन्द, प्रेम। देह-अभिमान में आने से यह दिव्य गुण सारे खत्म हो गये थे और अवगुणों ने अच्छी तरह से प्रवेश कर लिया था। बॉडी-कान्सेस माना अवगुण प्रवेश हैं। सोल-कान्सेस माना अवगुण चले गये हैं। स्व-धर्म में टिकने की शक्ति से सारे अवगुण चले जाते हैं। तो जब बाबा को सामने देखते हैं तो सारे ईश्वरीय गुण हमारे में प्रवेश होने लगते हैं। जिससे फिर यह लगता है कि हम भविष्य में क्या बनेंगे। तो अभी आने वाली दुनिया के सारे संस्कारों को इमर्ज करना है। वहाँ इतनी कारोबार नहीं है परन्तु सतयुगी संस्कार वाला काम हम यहाँ करें क्योंकि पुण्य-कर्म करके पास्ट को परिवर्तन करना है। पुण्य पास्ट को चेन्ज करता है। प्रेजन्ट, फ्यूचर बना रहा है। तो एक है याद माना बाबा की छत्रछाया में रहो दूसरा मर्यादा की लकीर में रहो, न फालतू बात सुनना-सुनाना, न बोलना, समय सफल करना है। हर श्वाँस स्मृति में रहना है, संकल्प शक्ति से वृत्ति को शुद्ध बना करके वायुमण्डल को अच्छा बनाने का काम करना है, तभी 'अन्त मति सो गति' अच्छी होगी।
बहुतकाल से सत्कर्म किये हुए का बल हो तो हर कार्य में सफलता अच्छी मिलेगी। और संगठन में अनेकों के बीच में रहते भिन्न-भिन्न प्रकार से, वैराइटी संस्कार वालों के साथ रहते हुए भी सबकी विशेषता और महानता को देखते रहें तो स्वयं विशेष और महान बन जायेंगे। बाबा ने हरेक बच्चे की विशेषता को देखा तभी तो यहाँ खींचकर आये हैं और सेवाधारी बने हुए हैं। भले तपस्वी इतने नहीं बने लेकिन त्यागी बनकर सेवाधारी तो बने हैं। अच्छा गुणवान बनने के लिए इच्छा तो रखी है फिर भी अन्दर कुछ भी कोई समय माया हैरान करती है, परन्तु फिर भी मैं बच जाऊँ इसको अन्दर से यह चाहना तो है। तो यह भी एक विशेषता है ना। तो सोचना बन्द और करना है तो विश्वास से कर लें। इसमें थोड़ा चढ़ाव-उतराव होता है तो आगे यह सब ठीक हो जायेगा क्योंकि बाबा बैठा है। बाबा ने कहा है कि आईवेल में मदद करने वाले को बाबा भी मदद करता है, कुछ मार्क्स दे करके भी पास कर देता है। सच्चा सहयोगी रहने वाले को सहयोग मिलता ही है। किसी कारण से भी सहयोग देने के समय बहाना न दे, टाइम न देखे, यह भी अन्दर ख्याल न आये कि इसने क्या सहयोग दिया है जो हम इसको सहयोग दें, इसे भी पुण्य कर्म में नहीं माना जायेगा। तो न दिखाने के लिए मदद करनी है, न किसी को देख करके करनी है। तो हर बात में सच्चा रहने वाला ही सदा सुखी रह सकता है। उसकी जीवन यात्रा सफल है। कुछ भी हो जाए सच बोलने की एक ऐसी आदत पड़ जाए, जैसा मेरा बाबा है वैसे मुझको बनना है।
देखो, बाबा मुरली कैसे सुनाता है, दिल कहता है कि एक अक्षर भी मिस न हो। बार-बार सुनते अन्दर मन में चिन्तन करूँ। सुनते जाओ और समाते जाओ जैसे मम्मा समान। यह तभी होगा जब हमारा अन्दर मन साफ़ होगा तो एक अक्षर भी बाबा का मिस नहीं होगा। क्योंकि हम जैसा अन्न खा रहे हैं तो मन भी ऐसा बनता जाता है। भगवान का ज्ञान, भगवान से सुन रहे हैं, कौन सुना रहा है और किसको सुना रहा है? इस स्मृति में रहकर मुरली सुनना भी योग है। यह भी अभ्यास चाहिए कि जो बीती फिर वह चिन्तन नहीं चले। एक सेकण्ड में संकल्प शान्त हो जाएँ, वृत्तियाँ शुद्ध हो जायें, यह अभ्यास चाहिए। सेवा कितनी भी करो आवाज़ की आवश्यकता नहीं है। हाँ, रूह-रूहान ऐसी करो जो उसमें खो जाओ।
तो अन्दर से सच्चाई से, सीखने की भावना से अपने आप हमारे में नम्रता का गुण आता है। माया अभिमान का पंजा अचानक जो लगाती है उससे फ्री हो जाते हैं। किसी बात में भी कोई अपमान करे तो भी कोई हर्जा नहीं, अन्दर से स्व-मान रहे। अन्दर स्व-मान में रहने का, बाबा को साथी बनाने का और सर्व से गुण उठाने का यह बहुत सहज तरीका है। जिनके अन्दर सच्चाई है वही स्व-मान में रह सकेंगे। याद का बल स्व-मान में रहने देता है। उतारने वाले तो अनेक होंगे, अनेक बातें आयेंगी। कम-से-कम दिल दिलाराम को दी हुई है तो दिल कमज़ोर नहीं है जो तुरन्त ही दिलशिकस्त हो जाएँ, या जल्दी दिल को दुःख हो जाए। या मुख से किसी के प्रति क्या बोला, कैसे बोला यही चिन्तन चलता रहे, ऐसी आदत न हो।
हमारे में बाल जितनी भी कमी न रहे क्योंकि हमें सम्पूर्ण बनना ही है। माइण्ड नहीं करें। इसके लिए सुनने की शक्ति चाहिए। तो हरेक देखे, अपने से पूछे कि यह बात मेरे में है? हमको अपना चिन्तन करना है, यह बाबा हरेक को बताता है कि वह खुद करे। परन्तु जितना सच्चे बनते जायेंगे उतना सुखी रहेंगे। सम्पूर्णता और सम्पन्नता हमारे पास नहीं आयेगी तो और किसके पास जायेगी! अभी सम्पूर्णता आने की मौसम है।
आपस में इतना एक्स्ट्रा प्यार किसके साथ नहीं परन्तु सच्चा प्यार सबके साथ हौ। हमारा देखना, सुनना सबके भले वाला हो। इस तरह से अपने लिए बहुत खबरदार, होशियार रहना है तब ही हमारे अन्दर वह सम्पूर्णता आती रहेगी। और हमारी सम्पूर्णता को देख औरों को भी लगेगा कि हमको भी ऐसी सम्पूर्णता लानी है। इसलिए हमारी भाषा, बोल और हमारी भावना सबके लिए अच्छी हो तो सब अच्छा-ही-अच्छा हो जायेगा। पुरानी व साधारण भाषा हमारे लिए ही नुकसानकारक है। तो सदा बाबा की छत्रछाया के नीचे और मर्यादा की लकीर के अन्दर रह करके मायाजीत बनने वाले को बाबा बधाईयाँ देते हैं, और खुद भी अपने आपको भाग्यवान महसूस करते हैं। जो सर्व शक्तिवान के साथ ने माया को भगा दिया। न सिर्फ हमारे से भगाया लेकिन सबको ऐसी प्रेरणा दी। तो इसके अलावा अपने को कभी पुरानी कोई स्मृति न आये तो अन्त सुहेला होगा। सच्ची सेवा होगी, बाबा के साथ का अनुभव होगा। अच्छा ओमशान्ति।

मनोबल इतना हो जो काँटों के जंगल में सेफ भी रहो और सबको सहयोग भी दो

हम ज्ञान सुनने बैठे हैं या प्यार करने बैठे हैं? बाबा को प्यार कैसे किया जाए - यही ज्ञान हम सुनते हैं। हम प्यार करेंगे तो वो हमको करेगा, ये कुदरत का नियम है। हम बाबा को दिल से प्यार करें तो बाबा की दिल है ही हमारे लिए। हमारे दिलों को जीतने वाला हमारा बाबा है। इतना प्यार करेगा कौन ! पिता प्यार नहीं करता वो कहेगा लायक बनो, लायक बनो। माँ कहेगी मेरा बच्चा है मैं लायक बनाकर दिखाऊँगी। हैं माँ-बाप दोनों, परन्तु माँ को लायक बनाने की, बाप से वर्सा दिलाने की, ऐसी पालना देने की इच्छा रहती है। वह और कुछ नहीं चाहती। बाबा ने कहा ब्रह्मा से वर्सा नहीं मिलता, परन्तु ब्रह्मा द्वारा मिलता है। ब्रह्मा मां के बिना पारलौकिक बाप का वर्सा मिल न सके। हमारी माँ जो गले लगाती है, गोद में बिठाती है। बाबा के सर माथे पर बिठा देती है नूरे रत्न बनाने के लिए। ब्रह्मा बाप माँ के रूप में पालना दे रहे हैं। तो हमें जन्म देने वाली ब्रह्मा माँ है और पालना देने वाली जगत अम्बा माँ है, तभी तो हमारी आत्मा बहुत मज़बूत है। शुरु से लेकर आज दिन तक अंदर से ये नशा है कि किसका खाते हैं। कोई चेहरे से देखे तो सही ये खाना खाता है। दिलपसन्द खाना मिलता है, माना ताकत देने वाला खाना है। इसमें ही रस भरा हुआ है। और कोई बात सुनने-सुनाने की इच्छा नहीं है। मर्यादाओं पर चलने से मज़बूत बन जाते हैं। धारणा पर ध्यान देने से भी स्व-चिंतन रहता है। वो पर-चिंतन नहीं करता है। स्वयं पर ध्यान देता है। बाबा को कहता - बस, जैसा आप बनाना चाहते हो। लक्ष्मी-नारायण भले वो बनें, हमें तो इन जैसा बनना है। बाबा के अव्यक्त होने से पहले कभी ख्याल ही नहीं था कि हमें बाबा जैसा बनना है। बाबा से प्यार बहुत, माता-पिता, साथी सखा सब सम्बन्ध रूप से बाबा से प्यार। बाप से प्यार खींचने के लिए बुद्धि सूक्ष्म होनी चाहिए और मन सच्ची भावना वाला चाहिए। मोटी बुद्धि वाला बाबा का प्यार नहीं खींच सकता। वह मोटी-मोटी बातें सोचते, वो थोड़े में खुश हो जाते। हमारे को रियलाइज़ेशन और गहरी हो। अपने को अति सूक्ष्म देखने की आँख तेज़ हो। दूसरे अच्छे हैं या नहीं अच्छे हैं, उसमें मेरा कोई ताल्लुक नहीं है। रीयली हर एक अच्छे हैं, हरेक में विशेषता, महानता अपनी-अपनी है। हमारी अच्छी आँख है तो सबकी विशेषता और महानता को महत्त्व देंगे। ये महत्त्व देने के लिए भी अक्ल चाहिए। प्रभावित होना अक्ल की कमी हो गई, महत्त्व देना अक्लमंद का काम है। साकार बाबा की इसी एक महान खूबी ने कमाल की। पता नहीं कैसे हरेक के गुणों को लेकर उसको गुणवान बना दिया। एक ही गुण, एक ही विशेषता को लेकर उसमें अपना प्यार और उम्मीदें भर के योग्य बना दिया। ऐसी माँ, कितनी मीठी माँ अपने बच्चे को माँ तो जानती है ना। हमको नया जन्म देनी वाली वो जानती है मेरे अन्दर क्या है।
बाबा को हज़ारों लाखों बच्चे हैं। इतने सारे जगत का पिता होते हुए भी ऐसे नहीं कहता कि मेरे को इतने बच्चे हैं, बाबा को देखो कितना निरहंकारी है, निर्मोही है। निर्मोही मूरत भी बाबा की देखी तो स्नेही मूर्त भी देखी। स्नेह इतना जैसे लगता बाबा मेरे को ही प्यार करता है। और मेरे जैसे कोई चले गये तो उनको याद भी नहीं किया। बाबा से पूछा तो मुस्करा के बोला उसको मैं याद क्यों करूं? प्यार भी देता है, जिससे रूहानियत की राहत मिले। अल्पकाल के प्यार को छुड़ा के सच्चा प्यार, अविनाशी प्यार, अमर प्यार देता है। वो प्यार की शक्ति हमें विदेही बनने में मदद करती है। बाप का प्यार हमको दैवीगुण धारण कराके दैवी राजधानी में ले आता है। बाबा का प्यार हमको सजाओं से छुड़ा रहा है। कहता है सेवा में लग जाओ, कर्मबन्धन कट जायेंगे। जो कुछ करते हो कर्मबन्धन होने से खुशी नहीं होती है लेकिन थोड़ी भी सेवा करते तो कितनी खुशी होती। सच्ची खुशी मिलती है सेवा से, स्व-उन्नति से। तो कितनी भी सेवा हो स्व-उन्नति में फर्क न पड़े। कहाँ भी सेवा हो हमारी उन्नति होती रहे। कभी चढ़ती कला, कभी उतरती, कभी ठहरती कला नहीं। उत्तरती कला नहीं तो चढ़ती भी नहीं माना कुछ समथिंग अंदर रांग है। या तो होल है, क्रेक है या बैरियर है। समथिंग रांग माना कुछ है जो अंदर सदा खुशी में नाचते नहीं। थोड़ा भी कोई उदास हो तो उसको मुस्कराना सिखा दो। उदासी माना माया की दासी। किसी का दबाव दासी बना देता है, किसी का फोर्स दासी बना देता। जैसे लगता है इच्छा नहीं है परन्तु मज़बूरी है करने की। तो ऐसी ब्राह्मण लाइफ भी कब तक चल सकती है। कईयों को ब्राह्मण लाइफ में बन्धन लगता है। लेकिन हमारी ऐसी लाइफ है जो हर एक की ऐसी बने, यही भावना है। औरों की बनें माना सम्बन्धियों की नहीं, सबकी बनें। मेरा एक सम्बन्ध नहीं है, परन्तु सारा संसार ही परिवार है, सबकी जीवन ऐसी बनें। तत्वों को भी सतोप्रधान बनाने की भावना है। पशु पक्षियों को भी अच्छा वायुमण्डल चाहिए। बच्चे भी आजकल अच्छा वायुमण्डल चाहते हैं। तो पहले है हमारी उन्नति, हमारी उन्नति में सबका भला होगा, मेरे परिवर्तन से संसार का परिवर्तन होगा। सारी विश्व का ख्याल, छोटी ज़िम्मेवारी का ताज सिर दर्द है। चिंता, ममता छोड़ योगी के आसन पर बैठ जाओ और कुछ नहीं करो। ऐसे सिंहासन पर बैठो। सच्ची दिल से बाप के दिल पर बैठो। भारत में रिवाज़ है तिलक ज़रूर लगायेगे। स्मृति रहे मैं कौन हूँ। घर की याद आये तो यहाँ की याद आती नहीं है। बाप वहाँ का रहने वाला यहाँ आता है पढ़ाने के लिए। जब तक विनाश हो पढ़ाई चलती रहेगी। वण्डर है पढ़ाई चल रही है। भगवान के महावाक्य हर आत्मा को अविनाशी सुख देने वाले हैं। इसलिए बाप को सुख कर्ता कहते हैं। हम देखते किसका अभी-अभी चेहरा बहुत अच्छा है, अभी-अभी उदास... क्या हुआ? जहाँ से दुःख मिला वो याद आ गया। कितनी भूल है। सुख देने वाले बाप के महावाक्य अंदर-ही-अंदर सिमरण करो तो सदा सुखी। हरेक ये अंदर ही अंदर एक्सरसाइज़ करे। मेरे को अनुभव है सदा सुखी रहने का। बहुत अच्छी साधना है, बस मीठे बाबा के बोल को अंदर-ही-अंदर सिमरण करो। वो याद आये तो खुशी में चले जायेंगे, प्रेम मे डूब जायेंगे। दुःख अशान्ति का कारण अपवित्रता है, अपवित्र संकल्प दुखी बनाता है। पवित्रता जननी है जब वो माँ ही गुम हो जाती है तो सुख-शान्ति दोनों बच्चे भटकने लगते है। सुख-शान्ति की पालना कौन करे ? जहाँ पवित्रता है वहाँ सुख-शान्ति सदा है। तो काँटा चुभने या चुभाने की आदत को रियलाइज़ करके चेन्ज करो। किसी ने काँटा लगाया तो उससे अपने आपको सम्भालना है। दुनिया काँटों का जंगल है तुम सम्भल कर चलो।। दोष किसको देंगे, कपड़ा तुम्हारा फटेगा। काँटों को दोष तो नहीं देंगे। आज की दुनिया में सम्भाल कर चलना है। जंगल को बगीचा बनाना है। सेफ भी रहो सहयोग भी दो। इतनी मनोबल की शक्ति चाहिए। व्यर्थ बात में मन को न लगाना, उसके लिए स्ट्रिक्ट रहना-हमारे पास टाइम नहीं है। कोई कमज़ोरी मेरा कांध नीचे कर दे। कमज़ोरी किस घड़ी भी कांध नीचे गिरायेगी। हमें स्व-मान में खड़ा रहने नहीं देगी। ऐसा संकल्प मेरे अन्दर न आये जो बाबा दृष्टि न दे। सारे जीवन को प्राण देने वाली बाबा की दृष्टि है, सदा खुशहाल रखने वाली बाबा की दृष्टि है। कुछ भी हमारे से गलती हुई उसे ठीक करने वाली बाबा की दृष्टि है। बाबा के सामने तो आऊँ, किनारे नहीं बैठ जाऊँ। बाबा ने लायक बनाया तो औरो को भी बनाओ।
बाबा सिखाता है- कर्मबन्धन को बढ़ाओ मत। कर्म ऐसे करो जो बच्चों आदिको भी सुधारो, बिगाड़ो नहीं। नहीं सुधरने वाले हैं तो शुभ भावना रखो। तुम तो अपनी कमाई करो। तो बाबा बहुत शिक्षा देकरके हमें समझदार, सयाना बनाता है। तो हमारी लाइफ अनेकों को प्रेरणा दे। इससे अपने आप अनेक आत्माएँ बाबा के नज़दीक आयेंगी। बाबा की शिक्षायें हर पल काम आती हैं। अच्छा।

सेवा करते डबल लाइट रहना यही सबसे बड़ी सेवा है

ज्ञान से बाबा को समझा है तो निश्चय पक्का हो जाता है। निश्चय का बल अपने ऊपर भी काम करता है। कहेंगे निश्चय ने मुझे मज़बूत बना दिया है। महावीर माना ही 'अशरीरी स्थिति' में रहने वाला। बाप को सदा प्यार करने वाला। महावीर के लिए भक्ति मार्ग में भी गाया है एक हल्का अशरीरी दूसरा परमात्मा के साथ बहुत प्यार। जैसे वो चलाये वैसे चलने वाला। बाबा मेरा, मैं बाबा का। बाबा मेरा हो गया तो सब बोझ खत्म हो जाते। समझदार रहते हैं, कर्मयोगी रहते हैं। याद और सेवा का बैलेन्स डबल लाइट बनाता है। सेवा करते हुए भी हम डबल लाइट रहें, यही सेवा है। सेवा में भारीपन आये तो ये सेवा नहीं है। डबल लाइट रहें यही सेवा है। ज्ञान लाइट बनाता है, श्रीमत डबल लाइट बनाती है। मनमत थकाती है, पर-मत भारी कर देती है। क्या करूँ, क्या न करूँ... जितने मनुष्य उतनी बातें। अरे, एक मनुष्य भी अनेक बातें करता। एक बाबा सर्व प्रकार की प्रवृत्ति में कैसे रहो उसके लिए श्रीमत देता है। वह श्रीमत लाइट बनाती है कोई किसी का फोर्स नहीं है, किसी का बन्धन नहीं है। बाबा ऊपर बैठे भी करेन्ट देता है। तो वृत्ति उपराम हो जाती है। स्नेह में बातें करते रहो तो नींद फिट जाती है। कईयों को योग में नींद आती है। बाबा से मीठी-मीठी बातें करो तो नींद फिट जायेगी। दिन-प्रतिदिन हमारा सोना भी चेन्ज होता जायेगा, नींद के वश नहीं होंगे। बाबा से पूछते थे - बाबा, निद्राजीत कैसे बनें। थोड़ा-सा नींद कम करें तो दूसरे दिन तबियत बिगड़ जायेगी। आखिर भी शरीर पुराने, दुनिया वही, कर्मेन्द्रियों द्वारा भी कर्म आगे से ज़्यादा करा रहे हैं, थकावट कम हो इसके लिए अशरीरी बनने का अभ्यास हो। हम नींद नहीं करते लेकिन विश्राम लेते हैं।
माया हार खिलाने की कोशिश बहुत करती है। छोड़ती किसी को भी नहीं है। हम सुजाग रहते हैं तो आगे आती नहीं है। जो बड़े-बड़े वी. आई.पी. होते हैं उनके पास सेक्यूरिटी का प्रबन्ध होता है। हम बड़े रॉयल ऊँच पद पाने वाली आत्माएँ है। तो बाबा हमारी सुरक्षा का प्रबन्ध रखता है कि माया कहाँ से भी कोई अटैक नहीं करे। इस बाबा को ख्याल रहता है। बुद्धियोग हमारा बाबा से लगा रहे इसलिए बाबा बहुत शक्ति देता है। हम कल्प पहले वाले हैं, बापदादा के सामने बैठे हैं-मायाजीत जगत के मालिक बनने के लिए।
ब्राह्मण और डिप्रेशन ! ये शब्द ब्राह्मण के लिए नहीं शोभता है। क्षत्रिय होगा तभी डिप्रेशन होता है। विश्व को चिंता होगी। क्षत्रिय की होती है युद्ध, डर लगता है हार न खाऊँ, ये न हो जाए। कुछ नहीं होगा, बाबा बैठा है। कुछ भी हो जाए-बाप बैठा है। बाबा ने सुख दिया है औरों को सुख देने के लिए। सब अविनाशी ज्ञान-रत्नों से खेलकर खुशी रहे। ऐसे भावना वाले को कभी दुःख नहीं हो सकता, डिप्रेशन नहीं हो सकता। फालतू सोचना आत्म-विश्वास की कमी रखना, अच्छा काम नहीं करना यही डिप्रेशन का कारण है।

नम्रता और सत्यता को अपना साथी बना लो तो हर बात एक्यूरेट होगी

जब घर की याद आती है तब फिर कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। कहेंगे जल्दी घर जायें। हम जानते हैं कि यह देश पराया है, दुनिया पराई और पुरानी है। जो पराई और पुरानी है उनसे प्रीत लगाना कहाँ तक शोभा देता है? तो हरेक गहराई में जाकर देखे कि किसी में भी मेरी मोह की रग तो नहीं है, मेरे को कोई खींचता तो नहीं है? किसी में भी मोह होगा तो वह मुझे बाबा की याद में रहने नहीं देगा, घड़ी घड़ी उसका मोह मेरे बीच में आयेगा। सच्ची-सच्ची दिल से कोई अपना चार्ट देखे। जब बाबा को याद करते तो क्या किसी की भी सूरत सामने आती है। किसी ने मेरे को दुःख दिया उसकी सूरत सामने आई तो वह दुःख आ जायेगा।
किसी ने अल्पकाल का सुख दिया तो अल्पकाल का सुख ईश्वरीय सुख लेने नहीं देगा। अल्पकाल के सुख की प्राप्ति कहाँ से हुई तो फिर वह ईश्वरीय सुख खींचने नहीं देगा। एक ईश्वर बाबा, है अकेला लेकिन देता बहुत कुछ है परन्तु कण्डीशन्स भी बहुत डालता है। अनेकों की याद छोड़ मुझ एक को याद कर, एक बाप दूसरा न कोई.. यह कण्डीशन है। जब अनेकों को याद करते थे तब तो ऐसी कोई कण्डीशन नहीं थी। कोई साधू-संत ने भी नहीं कहा कि मुझ एक को ही याद कर। भगवान जो सर्वशक्तिवान है वह कहता है कि या रहूँगा मैं या रहेगी दुनिया! तो सोच-समझके मेरे से सौदा कर। ज़रा-सा किसी को बीच में लाया तो वह कर्म बन्धन, उसमें भी विकारी कर्म-बन्धन मेरे से मिलने नहीं देगा, मेरे आगे आने नहीं देगा। और भिखारी बन करके मेरे से शान्ति और सुख मांगता रहेगा। बाबा कहते हैं अगर तुम मेरे बच्चे हो तो सुख, शान्ति, प्रेम के खज़ानें के अधिकारी हो। इसमें चाहिए निश्चय, भला हुआ ही पड़ा है, होने वाला ही है, सतयुग आने वाला ही है। भगवान को जो अपना काम करना है, वह करने वाला ही है लेकिन निश्चय का बल हमारा बेड़ा पार करेगा क्योंकि निश्चय के बल से, श्रेष्ठ भावना से हम ऊँच पद पा लेंगे। टाइम अनुसार सतयुग आना ही है, विश्व भी सारा परिवर्तन होना ही है परन्तु अपना परिवर्तन हमको स्वयं ही करना होगा। मेरे में परिवर्तन आयेगा तो विश्व में -परिवर्तन आ जायेगा। फिर हमारा निश्चय का बोल प्रत्यक्ष हमारे लाइफ का प्रमाण ही सारी विश्व में परिवर्तन कराने के निमित्त बनेगा। तो हमको इसके लिए क्या करने का है क्योंकि सबको अपना-अपना काम करना है, लेकिन मुझे अब भगवान का ही काम करना है और क्या करते हैं, उसको देखते रह नहीं जाना है। और तीन शब्द हमारे संकल्प और बोल में भी न हो कि क्यों होगा, कैसे होगा और कब होगा ? क्या होगा अच्छा ही होगा, कैसे होगा ऐसे ही होगा... जैसे बाबा सिखा रहा है, कब होगा ? अब होगा। खुशी के, उमंग के, विश्वास के आवाज़ ताकत देते हैं। किस आधार पर खुशी है? अल्पकाल सुखों के हम भूखें नहीं हैं। है तो भी हमारा इन्ट्रेस्ट नहीं है माना उसमें फंसे हुए नहीं है। हम चाहिए-चाहिए करना जानते ही नहीं है।
बाबा कहते कि इस शरीर में आत्मा को जो आवश्यक होगा, वह बाबा आपेही देगा। परन्तु सेवा में जहाँ तुम्हारी आवश्यकता है वहाँ तुम्हें हाज़िर रहना पड़ेगा। जैसे मिलेट्री में होता है, शहर में भूखें मरेंगे परन्तु मिलेट्री वालों को खिलायेंगे क्योंकि देश की सेवा करते हैं। देश के बचाव के लिए उन्होंने अपने को बलिहार किया है। उनको अवश्य खिलायेंगे, दवा आदि भी जल्दी देंगे। तो बाबा भी पहले हमारी सम्भाल करता है। इसलिए फ़िकर नहीं है कि हम कहाँ से खायेंगे, खिलाने वाला खिला रहा है तो हम खा रहे हैं। बेगरी पार्ट में हम सबने बहुत अच्छा अनुभव किया है।
तो संगमयुग पर हमें सच्चा सेवाधारी बनना है, जिसमें बहुत कमाई है। एक तो बाप की मदद, दूसरा सबकी दुआयें। सारे कल्प में यह भाग्य नहीं मिलेगा। अभी का यह मज़ा देवतायें भी नहीं ले पायेंगे। यह जो अभी का सुख है, अभी की जो सच्चाई है, अभी की जो खुशी-मौज है, वह ऋषियों-मुनियों के पास भी नहीं है। राजे-रजवाड़ों के पास भी नहीं है। तो किसके पास है? जिसने अन्दर से सब बातों से वैराग्य किया हो। वैराग्य माना जो काम की चीज़ नहीं है, जो छूटने वाली है उसको हम पकड़ कर नहीं बैठे हैं। बाकी हम कोई सूखे नहीं बनते हैं। अन्दर से यही आवाज़ आता है कि मेरे साथ क्या चलने वाला है? मेरी अब की संगमयुग की बाप की याद और सेवा की कमाई ही साथ जायेगी।
सेवा करने के निमित्त बनें माना अपनी कमाई जमा की। सेवा औरों कि की, लेकिन कमाई मेरी हुई। इसलिए बाबा कहते कि सब कुछ सेवा में सफल करते चलो तो कमाई जमा होती रहेगी। व्यर्थ संकल्प भी न हों और अयथार्थ संकल्प भी न हो। एक है दान, दूसरा है पुण्य। दान करना तो कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि पाप में जो जायें उससे तो अच्छा है कि वह अच्छे काम में जाये यह है दान। और समय अनुसार जिस प्रकार की जिसको मदद की ज़रूरत हो वहाँ हाज़िर होना - यह है पुण्य का काम करना। अचानक बिगर कोई टेलीफोन के कैसी भी सेवा के लिए तैयार हो जाना। उस घड़ी यह न कहे अभी सर्दी है, गर्मी है मेरी तबियत ठीक नहीं है, मेरे को खाँसी हो रही है, मेरे को यह है, वह है... तो फेल। ऐसे मामलों में बाबा ने हमारी बहुत टेस्ट ली है प्रैक्टिकल में। तो जिसको जो बाबा कहता है वह करते चलो, तो अच्छा और सच्ची सेवा करके अपने पुण्य की कमाई बहुत जमा कर सकते हैं। बाकी हम इसके बारे में किसकी चिन्ता नहीं करेंगे, न कोई मेरी चिंता करे - यह ध्यान रखे क्योंकि इसी में ही संकल्प व्यर्थ व अयथार्थ चल सकते हैं।
मोह चिन्ता कराता है, मोही व्यक्ति खुद भी अपनी चिन्ता करते तो दूसरों की भी चिन्ता करते हैं। ऐसे मोह को अब मारकर खत्म करो। नष्टोमोहा माना ही है कि मोह को नष्ट करो। मोह की सोनी जंजीरें हैं, वह तोड़ने जाओ तो वह कभी नहीं टूटेगा क्योंकि जब कोई सोने की जंजीरों को तोड़ने की कोशिश करेंगे तो नहीं तोड़ सकेंगे क्योंकि वह अच्छी लगेगी। कहेंगे यह खराब थोड़े ही हैं, यह तो सबमें है इसलिए चलता है। कई इस बात को बड़ी बात नहीं समझते हैं। यह मोह माया ऐसा रूप धारण करती है जैसेकि अच्छी बात है, कोई बड़ी बात नहीं है। किसी तरह से भी उसका कुछ स्वीकार किया तो वह मुझे कभी नहीं छोड़ेगा। मानो कोई किसी को कुछ सहारा देते, सुख देते हैं तो उसके लिए कहेंगे कि तेरे बिना मैं मर जाऊँगी। जैसे कि उनके सुख का आधार वही है। तुम्हारा संग बहुत फायदे वाला है, ऐसा सोचकर मोह को और ही पक्का करते रहेंगे तो कैसे मोह से छूट जायेंगे ? तो इसको अन्दर-ही-अन्दर समझ लेना है और इससे मुक्त होना ही है क्योंकि यह सब मुझ आत्मा को ऊपर से उतार करके अपने में फसाने वाली बातें हैं। एक बारी फस गये तो बस, फिर तो निकलना उनके लिए ऐसा हो जायेगा जैसेकि पिंजड़े के पंछी की तरह। तो इसमें है छोड़ो तो छूटो।
एक होता है पिंजड़े का पंछी, दूसरा है उड़ता पंछी, तीसरा है डाली को पकड़कर बैठने वाला पंछी। बन्द भी नहीं है परन्तु उड़ भी नहीं सकता है क्योंकि पकड़ करके बैठा हुआ है। पंछी होकर पकड़कर बैठा है तो कौन क्या करे ? आत्मा देह को छोड़कर, कभी भी कहीं भी जा सकती है परन्तु पकड़कर बैठी हुई है। इसलिए कोई तो देह छोड़ने पर भी छोड़ती नहीं है। फिर वहाँ ही आकर जन्म लेगी। फिर हिसाब-किताब लेना-देना पड़ेगा, इसलिए आये थे अकेले, जाना है अकेला माना कोई कर्मबन्धन नहीं है, विकर्मों का विनाश। और थोड़ा रहे हुए कर्म का हिसाब-किताब चुक्तू, कर्जा नहीं चाहिए, बोझा नहीं चाहिए। न मैं किसी के ऊपर बोझा रहूँ, न कोई मेरे ऊपर बोझा हो। मैं हल्की रहूँ और श्रेष्ठ कर्म यानि सबके भले वाला कर्म करती रहूँ। श्रेष्ठ कर्म की कोई गिनती नहीं करनी है क्योंकि पाप अनगिनत किये हैं। एक पाप मिटाने के लिए १०० पुण्य करने पड़ेंगे।
गलती करो और भगवान से माफी मांगो, यह कौन-सी बुद्धिमानी है! कब तक गलती करते रहें और कितनी बार माफी मांगते रहें? तो एक गलती की माफी के लिए १०० गुणा पुण्य करना पड़ेगा तब गलतियाँ माफ होंगी। १०० गुणा श्रेष्ठ कर्म करना पड़ेगा। चलो किसी ने पाप कर्म न किया हो, व्यर्थ किया हुआ है, अयथार्थ किया हुआ है। इतना एक्यूरेट नहीं है, किसके भले वाला नहीं है तो वह किस खाते में गया ? या जरा-सा कामना वाला कर्म है, निष्कामी नहीं है, मान की इच्छा वाला है, कोई भी इच्छाओं वाला है तो वह किस काम का ? वह किस खाते में गया ? बाबा ने कहा- कर्मों की गुह्य गति को जानो। कर्म बड़े बलवान हैं और श्रेष्ठ कर्म करने वाला न कभी मूझता है, न कभी पूछता है। करूँ-न-करूँ यह पूछने व सोचने में समय नहीं गँवाते। अच्छा है और अच्छा करना है तो कर लें ना! इसमें पूछने की क्या बात है। लेकिन इसके लिए अन्दर की बुद्धि बड़ी शुद्ध चाहिए। अपने मन-बुद्धि को अच्छा सोचने की अक्ल सिखाना है। तो अन्दर के संस्कार परिवर्तन हों, जिसको यही इच्छा होगी तो वह हमेशा यही सोचते कि बस, अब तो जो करना है, अब कर लें। कल पर भरोसा नहीं और क्या करना है, जो बाबा करता वही कापी करो यानि फालो करो। बस।
पाँच पाण्डव में नकुल का गायन कला के रूप में है, अर्जुन को भगवान ने गीता सुनाई। युधिष्ठिर मैदान में धर्मराज का रूप लेके खड़ा हो गया। भीम भण्डारा सम्भालता था। सहदेव सहयोगी रहता था। नकुल कापी करता था, जो भगवान कह रहा है वह कापी करता था और कुछ नहीं करता था। और बाहर के स्कूलों में तो कापी करने का दोष है। और यहाँ इस बेहद के स्कूल में भगवान के पास छुट्टी है, इसलिए छुपके-चुपके कापी करते जाओ और जैसे बाबा बैठा है वैसे बैठ जाओ। यह ब्रह्मा बाबा, शिवबाबा की याद में जैसे खड़े हैं वैसे तुम भी खड़े हो जाओ। जैसे स्कूल में टीचर बच्चों को सिखलाते हैं कि हैण्डसप तो स्टूडैण्ट मुख से थोड़े ही कहता है कि हैण्डसप। नहीं। वह करके दिखलाता है। तो शिवबाबा कहे मुझे याद करो, हम कहें कैसे करें? आप वहाँ रहते हैं हम तो यहाँ रहते हैं, तेरा देश ही अलग है तेरा रूप ही ऐसा है तो कैसे याद करें? तो जो ज्ञान बाप दे रहा है उसे प्रैक्टिकल धारण कैसे करो, वह सब इनके द्वारा करके सिखलाता है। हर बात, हर कर्म, बोल, दृष्टि, वृत्ति सब सिखा रहे हैं और करके भी दिखा रहे हैं।
देखो, बाबा की दृष्टि कितनी सुखकारी है। कितना रहम भावना वाली दृष्टि है। बाबा कितनी सच्ची बातें बताता है। यह भी जानता है ड्रामा बना पड़ा है। होने वाला वही है तो शिक्षा अच्छी तरह से देता है। फिर कैसे करें उसके लिए स्नेह की शक्ति भी देता है। उसके लिए वायुमण्डल ऐसा हो जो वायुमण्डल भी करने का उमंग देता है। कई सोचते हैं ठीक है, जो हो सकेगा सो कर लेगा। आज तो सो जाऊँ। क्लास में नहीं जाऊँगा ठीक है। सेवा के लिए कह दूँगा मेरी तबियत ठीक नहीं है। परन्तु एक बारी यह बहाना देना शुरु हुआ तो फिर रोज़ का शुरू हो जायेगा। परन्तु समझदार सयाना अपने को थकने नहीं देता है। हर बात एक्यूरेट करने की अन्दर से लगन हो तो बाबा की मदद मिलती है। वह नम्रता और सत्यता को साथी बना देता है। सत्यता को सिद्ध करने की मेहनत नहीं करता है क्योंकि उसमें धीरज का गुण होता है।
इगो आया उसको भगाया, उसमें मेहनत है। नम्रता देवी कहती है तुमको अगर ऊँच देवी-देवता का पद पाना है तो मुझे कभी नहीं छोड़ना। हम कहते हैं पवित्रता जननी है, सुख-शान्ति उसके बच्चे हैं। पवित्रता को हम छोड़ेंगे तो सुख-शान्ति बिचारे भटकेंगे, तो फिर मेरा हाल क्या होगा? पवित्रता में बल है, सुख-शान्ति अपने आप उनके साथ आते हैं। अगर उस माँ की आज्ञा पालन नहीं करते, अपवित्रता जरा मेरे पास आती है तो सत्यता गुम हो जाती है। खुशी खत्म हो जाती है फिर अपने आप अन्दर में दुःख पैदा हो जाता है, फिर मेहनत बढ़ जाती है। फिर थकावट होती है तो शरीर भी जैसे दर्द में टूटता रहता है। गुस्सा भी आता है फिर पुरुषार्थ करते हैं मीठा बनने का। तो अन्दर-ही-अन्दर एक सेकण्ड में अपने आपको सम्भालना है। हमने किया ही क्या है जो थकने की बात करते हैं। सिर्फ व्यर्थ और अयथार्थ काम किया होगा या ठीक तरह से नहीं किया होगा, अन्दर इगो को एलाउ किया होगा, किसी कारण से अपसेट हुए होंगे... इस कारण से थकावट हुई है।
तो बाबा को देख करके हमेशा कहते हैं कि बाबा मुझे और कुछ नहीं चाहिए आप जैसे अथक रहते हो ऐसे मुझे भी ऐसी कोई दवाई पिला दो जो मैं सदा अथक रहूँ क्योंकि थकना ज्ञानी तू आत्मा का लक्षण नहीं है। योग की शक्ति खींचने वाला क्यों थकेगा ? कराने वाला करा रहा है, ड्रामा में हुआ पड़ा है, यह तो खुशी हुई है बहुत। कमाई हुई है, चलो दूसरे का साथ मिला ऐसा साथ फिर कभी सतयुग में भी नहीं मिलेगा। दूसरा कौन थकाता है? भाव-स्वभाव। मैं इनके साथ नहीं चल सकता हूँ, इनका स्वभाव ऐसा है। आई थकावट। किसने ज़ोर से बोल दिया, मेरे से सहन नहीं हुआ तो थकावट। कोई बात बार-बार बोले मुझे पता थोड़े ही था कि ज्ञान में आने के बाद भी यह बातें होगी? मैं तो सिम्पल रहने वाली एकान्त में रहने वाली, मैं क्या जानें झंझट को? ऐसे इस प्रकार से संकल्प आये तो आई थकावट। बोल-चाल, आवाज़ एक्शन, नैन... सब चेन्ज हो गये। तो ज्ञान कहता है कि तू सोचके ख्याल कर। ख्याल ऐसा कर जो फिर उस ख्याल को मिटाना न पड़े। अच्छा ख्याल और राइट ख्याल करो। काम वाला ख्याल करो। ऐसा ख्याल नहीं करो जो ख्याल तुमको थकावे। इसलिए सदा अच्छी शुभ भावना अपने लिए, चाहे सबके लिए, चाहे सेवा के लिए चाहिए तब अपने को खुशनसीब बना सकेंगे। नसीब में खुशी है, किस्मत से माना किसकी मत से.. हमारा सितारा चमकने लगा है तो अभी क्या करना है?
कल की बात भी छोड़ दो, आज और अब क्या करने का है? वह सोचो। जिसमें भविष्य का भाग्य तुम्हारे हाथों में हो, वही करना है। तो भविष्य को सामने रखो फिर भाग्य हमारे हाथों में है। और किसके हाथ में नहीं है। उल्टा करू या अच्छा करूँ हमारे हाथों में है। हेड, हार्ट, हैण्ड... यह भी नम्बरवार कहने में आता है। पहले हैण्ड नहीं होगा। अगर किसी का पहले हाथ काम करता है पीछे दिमाग काम करता है फिर दिल काम करता है तो ज़रूर वह उल्टा कर्म होगा। और दिल-दिमाग अच्छा सोचने वाला हो तो हाथों से सुल्टा कर्म ही करायेगा। पाँव भी वहाँ ही जायेगा, ऐसे ही कहाँ नहीं जायेगा क्योंकि कमल समान रहना है। हमारे कदम-कदम में पद्म है। यह भगवानुवाच है। यह प्रैक्टिकली हम आप सब देख भी रहे हैं और अनुभव भी कर रहे हैं।
जहाँ भी बाबा ने भेजा होगा ज़रूर वहाँ कोई-न-कोई प्रभु का लाल छिपा हुआ बैठा होगा। यज्ञ के इतने वर्ष की हिस्ट्री में जहाँ भी पाँव रखा होगा, वहाँ ज़रूर कोई बैठा है, उस एक को निमित्त बनना है फिर दस बनें, फिर सेन्टर खुल गया। तो यह संगमयुग उत्तम पुरुष बनने का युग है, यह कभी न भूले। अभी टाइम कितना है, अभी १२ बजे कि बजे। अब मुझे क्या करना है, कराने वाला जो करा रहा है वही करना है। और समय भी कहता है तू यह कर, हमको सिर्फ अडोल-अचल रह करके, निश्चय के बल से निश्चित भावी को ध्यान में रख साक्षी दृष्टा हो निश्चित भी रहना है। फिर देखो, कितना मज़ा आयेगा, खुशी में नाचते खुशी बाँटते, उड़ते उड़ाते रहेंगे। अच्छा।

बुद्धि शान्त व एकाग्र तब रहेगी जब सच्चे रहेंगे, जो सच्चे हैं उन्हें डर व चिंता नहीं हो सकती

यह एक बात हरेक के अन्दर ज़रूर आती है कि मेरी बुद्धि एकाग्र रहे। बुद्धि को अशान्त होने, दुःखी होने, मूँझने-घबराने की आदत पड़ी हुई है। अनेक प्रकार की इच्छायें हैं, क्या करूं क्या न करूँ, समझ में नहीं आता है इसलिए बुद्धि कभी एकाग्र नहीं होती है। तो अभी एकाग्रता की शक्ति को कैसे बढ़ायें? इस पर अच्छी तरह से सोचो। अनुभव कहता है कि हमारा बुद्धि योग अच्छा है तो बल मिलता है।
योग लगता है पवित्रता के आधार से, शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्पों के आधार से। आप अनेक प्रकार की चिन्ता, ममता वाले फ़िकर में रहो और कहो मैं शिवबाबा को याद करूँ तो कभी कर नहीं सकेंगे। चिन्ता, ममता का जो घेराव है वह बुद्धि को ऊपर जाने नहीं देता है। चिन्ता और ममता के कारण डर है, फ़िकर है अन्दर खुशी नहीं है। स्वयं को खुश रखने और औरों को खुश करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु जब तक बुद्धि शान्त नहीं है, अच्छा सोचकर शिवबाबा की याद में नहीं रहती है तब तक खुशी नहीं आती है। और कितनी भी कोई कोशिश करे, परन्तु मेरे अन्दर का दुःख खत्म हो तब तो खुशी आवे। इसलिए गोप-गोपियों का 'अतीन्द्रिय सुख' गाया हुआ है।
तो गोपियों को कौन-सा सुख था? कहा ही जाता है अतीन्द्रिय सुख, इन्द्रियों को जीतने से सुख। कर्मेन्द्रियों के वश रहने वाला सुखी नहीं हो सकता है। मन को भटकाने वाला, अनेक प्रकारों के रसों में खींचा हुआ सुखी नहीं रह सकता है। तो साक्षी हो करके मन से पूछना चाहिए तेरे को क्या चाहिए? वास्तव में बिचारे को कुछ नहीं चाहिए, वह भी भटक-भटक करके, धोखा खा-खा करके थका हुआ है। उनको ईश्वर का प्यार चाहिए, सच्चाई चाहिए। देह की इस दुनिया के सम्बन्ध में जहाँ तहाँ सबके साथ रहते हुए सच्चाई नहीं है तो एक-दो से डर है। खुद में चाहे औरों में विश्वास नहीं है। भाई-भाई का भी आपस में फेथ नहीं है। जो सच्चाई को खो बैठे हैं वह सच्चाई से चल नहीं सकते हैं, सच्चाई से रह नहीं सकते हैं। सच्चाई के आधार से व्यवहार में रहकरके कितना सुख है, यह कभी सोच भी नहीं सकते हैं। सच की ही जय है, ज़रा भी सब की कमी होगी तो झूठ छिप नहीं सकता। बुद्धि शान्त, एकाग्र नहीं होती है तो उसका कारण भी अन्दर की सच्चाई नहीं है। इसलिए पहले अपने को सच्चा बनाओ। सच्चे साहेब को राज़ी करने के लिए सच्चे रहो। सच्चा रहने में डर नहीं होता है, चिन्ता नहीं रहती है। अन्त में विजय तो मेरी ही होगी यह अन्दर से अडोल हैं, अचल हैं, सच्चे हैं ना इसलिए मेरा अन्त अच्छा होगा। आज भी शरीर छूट जाये, आत्मा तैयार है- अपने आपको लोभ, मोह और अभिमान से छुड़ा करके फ्री बैठी है। कहा जाता है सच का संग तार देता है, कुसंग डुबो देता है। इसलिए सत्संग में रहो अर्थात् बुद्धि एक बाप से लगाओ। अपना आहार-विहार, व्यवहार शुद्ध बनाओ। अगर हमारा खाना-पीना, रहन-सहन सब अच्छा है, शुद्ध है तो ज्ञान को धारण करना और उसका चिन्तन करना, बुद्धि को बाबा में लगाना सहज लगता है। बाबा कहते हैं इस शरीर में तुम आत्मा सच्चा ब्राह्मण बन मन को मन्दिर के समान बना लो। उन ब्राह्मणों को खिलाया जाता है, गृहस्थी खिलायेंगे, यहाँ ब्राह्मण बाबा की याद में औरों को खिलायेंगे, गृहस्थी का नहीं खायेंगे। प्रवृत्ति में होते हुए भी मन कर्मेन्द्रियों के राजा हो करके रहो। प्रवृत्ति है तो उसको पवित्र बनाने के लिए मन को कर्मेन्द्रियों का राजा बनाओ। पहले तो मन के गुलाम थे, कर्मेन्द्रियों के भी गुलाम थे, संसार के रसम-रिवाज के अनुसार चलने में भी गुलाम थे। अब नहीं क्योंकि अभी मालिक हैं।
गुलामी से छूटने का साधन है मालिकपन की स्मृति। गुलामी से क्यों छूटना है? क्योंकि कलियुग से सतयुग में आना है। चक्र का राज़ समझ लिया है, संगम पर खड़े हैं। घड़ी सामने है, टाइम बहुत थोड़ा है, इतने थोड़े से टाइम में मुझे तैयार होकर घर जाना है फिर सतयुग में आना है। संगम का भी राज़ बाबा ने इतना अच्छा समझाया है कि बच्चे, यह हीरे-तुल्य बनाने वाला युग है। अपनी जीवन कौड़ी मिसल मत बनाओ। संगमयुग पर जो संगठन मिलता है उसमें बहुत कमाई है। और उसमें भी मधुबन का संगठन तो ऐसे है जैसे शीशमहल। यहाँ पता चलता है कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या करना चाहिए! आगे पुरुषार्थ कैसा करूँ जो मैं भी इनके समान बनूँ। इतना मुझे लाइट रहना है, मन को मूंझा हुआ नहीं रखना है। मौज में रखना है।
खुशी, मौज और आनन्द में भी फर्क है। जिनको बाप मिला है उनको अपरम्पार खुशी है। अभी हमें ऐसी खुशी है जो कोई हमारे से छीन नहीं सकता है। फिर वह खुशी कायम तब रहती है जब कोई कहीं भी मूझता नहीं है, सदा ही मौज में रहता है। सेकेण्ड में समझ जाओ कि मुझे इस समय यह करना चाहिए। बस। मूँझने वाला कभी एक्यूरेट काम नहीं करेगा, न दूसरों से करायेगा। जो खुद ही मूंझा हुआ है, वह दूसरों को ठीक राय भी दे नहीं सकेगा। मूझते कौन हैं? जो शान्ति से बैठ अच्छा सोचने और फिर करने नहीं जानते हैं, उनके सोचने, बोलने और करने में फ़र्क है। सोचते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं, वह मूझते हैं। मौज में वहीं रहते हैं जिनका सोचना, बोलना और करना तीनों समान है। उन्हें सिखाने वाले के शिक्षाओं की स्मृति है। किसी को न देख जो खुद को और बाप को देखता है वह मौज में रहता है।
तो कभी किसी कारण से भी अन्दर से दुःख फील करने वाली बातें न सोचो, न बोलो, तो अपने सोच पर सारी लाइफ का आधार है। सतयुग की बात पीछे, अभी भी मैं अन्दर से समझें कि मेरे जैसे प‌द्माप‌द्म भाग्यशाली बहुत कम लोग हैं। संसार में कितने लोग हैं उनमें से बाबा ने चुना फिर अपना समझ, समझदार बनाकर पुरुषार्थ कराया जिससे भाग्य बना। १०८ में कौन आता है या ८ रत्न में आने की हिम्मत कौन रखता है? जो अच्छा सोचता है। सिर्फ सोचने का अक्ल और ढंग अच्छा होना चाहिए। तो अपने सोच, बोल और कर्म को ऐसा बना दो तो १०८ में आ जायेंगे।
हम शुरु से बाबा को देखते हैं। बाबा ने हम बच्चों को अपनी नज़रों में छिपाकर बिठाया है। अपनी पलकों में बिठा करके साथ ले जाने की ज़िम्मेवारी उठाई है, वह भी काम उसको करना ही है। और तो कुछ काम है ही नहीं, जिसके साथ प्यार होता है, उसको स्थान कौन-सा देते हैं? एक दिल दूसरा नैन। एक माँ अपने बच्चे से प्यार कैसे करती है? उसे दिल से लगाती है और नयनों से प्यार करती है। तो हमको क्या करना है? अगर १०८ में आना है तो एक को याद करना है। जो हुआ उस हर बात को बिन्दी लगाना है, अष्ट शक्तियाँ धारण करना है माना उन शक्तियों को साथ में रखकर उसका उपयोग करना है। ऐसी तैयारी सभी दृढ़ता से करें तो सफलता मिलेगी ही।
फिर यह क्वेश्चन न उठे कि कैसे करूं, क्या करू...। नहीं। यह क्वेश्चन आया माना पुरानी बात याद आई तो पुरानी बातें आगे बढ़ने नहीं देती हैं इसलिए आगे बाबा को ही देखो। बाबा की मीठी-मीठी बातों को सुनो, सिमरो, स्मृति में रखो। ऐसे स्मृति स्वरूप रहने से बाबा के गले की माला बनेंगे और विष्णु की वैजयन्ति माला में पिरोये जायेंगे। उसके लिए सदा यह याद रहे मैं अभी ब्राह्मण हूँ, कल देवता होंगे। इसके बीच में देवता बनने के पहले सो फरिश्ता बनना है माना धरती पर पाँव न हों। ज्ञान योग के पंख आ गये तो उड़ने की कला आ गई है। अपनी शुद्ध वृत्ति के, वायब्रेशन के आधार से उड़ रहे हैं और बाबा कहते हैं औरों को भी उड़ाते चलो।

अशरीरी बनने के लिए बेहद के वैरागी बनो, जब तक वैराग्य वृत्ति नहीं तब तक अपवित्रता छोड़ेगी नहीं

बाबा ने हमें लाखों में से चुनकर निमित्त बनाया है, तो निमित्त बनने वालों पर ज़िम्मेवारी है अनेकों को निमित्त बनाने की। और सब ज़िम्मेवारियाँ तो बाबा सम्भाल रहा है, परन्तु यह जो निमित्त बनने की ज़िम्मेवारी है, वह हमारी है। इसलिए यह नहीं कहेंगे कि टाइम नहीं मिलता है, इस बात को हम नहीं मानते हैं। यह अलबेलाई और सुस्ती कहलवाती है कि टाइम नहीं है। इस समय हमारा सारा टाइम है ही इसलिए। निमित्त हैं तो टाइम हमारे पास है तभी तो निमित्त बनें। अगर टाइम न होता तो कर्मबन्धनों में फंसे होते। जब कर्मबन्धन से मुक्त बनें तब तो निमित्त बनें। बाकी जिस किसी से थोड़ा बहुत मुक्त होना है वह कोई बड़ी बात नहीं है। बाबा कहते बच्चे अभी समय थोड़ा है। तो इस थोड़े से समय में जो रही हुई बातें हैं वह पूरी करनी है। यह एक अन्दर से अपने लिए भावना और दृढ़ सकंल्प हो तो वह काम करेगी ज़रूर। इसके लिए भी सबसे पहले अपने अन्दर अपने को शुद्ध बनाकर, शुद्ध रखने की बहुत तीव्र तमन्ना हो फिर कुछ भी हो उसके लिए कैसी भी मेहनत करके अपने को ब्रह्मा बाप समान आकर्षण वाला बना सकते हैं।
अभी अगर आपके सामने श्रीकृष्ण, शिवबाबा और ब्रह्मा बाबा- यह तीनों ही आकर खड़े हो जायें तो सबसे ज़्यादा कौन प्यारा लगेगा? जिसने करके सिखलाया है, वही प्यारा लगेगा। जिसने हमारे ऊपर मेहनत की है, कहता है शिवबाबा करता है परन्तु मुख इनका, दृष्टि भी इनकी है। इसने अपने आपमें उसको छुपाकर रखा है, हमको दिखाने के लिए। तो वह सब देखते-देखते, जानते-जानते हमारी वृत्ति और संस्कार शुद्ध हो जायेंगे। यह सब शुद्ध होने वाले ही हैं। लेकिन अभी दिल से अपने ऊपर मेहनत करके शुद्ध करना है। यह मेहनत मेरे को करनी पड़ेगी, मेरे लिए कोई नहीं करेगा, बाबा भी नहीं करेगा। अभी तो बाप का स्नेह का रूप है फिर तो धर्मराज का रूप होगा तब क्या करेंगे। इसलिए अपने में झूठ छिपाकर नहीं रखना चाहिए। अपनी सत्यता पर नाज़ रखना चाहिए।
एक तो साक्षी (न्यारा) होना है इस देह से, दूसरा साक्षी हो करके देखो कि आत्मा बाबा के समीप कितना आई है? आत्मा के ऊपर से जंक उतर गई है? जंक उत्तरते-उत्तरते आत्मा भी चुम्बक बन जाये क्योंकि बाबा कहते तुमको हर बात में मास्टर बनना है। देह-अभिमान की ज़रा-सी जंक होगी या देहधारियों के लगाव की और किसके अधीनता की जंक होगी तो चुम्बक खींचेगा नहीं। कोई कहे कि यह मुझे बाबा का होकर रहने ही नहीं देती है, श्रीमत पर चलने ही नहीं देती है, पर-मत के प्रभाव के दबाव में रखती है तो यह सब क्या है? इसलिए अच्छी तरह से अपने आपको जानना, समझना और क्या बनना है, उसके लिए पुरुषार्थ करना है, बनाने वाले को याद करना है तो यह धुन लगी रहे तब बाबा कहेगा धन्य हो बच्चे, धन्य हो।
पुरुषार्थ में ध्यान रखने से सफलता मिलती है क्योंकि वरदाता बाप ने वरदान दे दे करके हमारी झोली भर दी है। हमारे संकल्प में केवल एक सेवा के ही संकल्प होने चाहिए क्योंकि सेवा का एक संकल्प भी बहुत अच्छी सेवा कराता है। परन्तु इसके साथ-साथ अपने लिए भी संकल्प शुद्ध श्रेष्ठ हो तो वह एकदम साकार हो ही जाता है। संकल्प सेवा अर्थ है, स्व की उन्नति के अर्थ है तो वह काम में आता है, वह साकार रूप ले लेता है। सेवा शब्द भी क्या कहें? परन्तु यही संगमयुग का 'योग और संयोग' है। याद में रहना, सहयोगी रहना.. यह सर्वोत्तम सुहावना समय है।
जब तक वैराग्य वृत्ति नहीं है तब तक अपवित्रता छोड़ेगी नहीं। पवित्रता क्या होती है? यह भी उसको अच्छी तरह से महसूस नहीं होगा। जैसे वैष्णव कुल वालों को जरा-सा भी अगर शराब का छींटा भी लग जाए तो भी जाकर स्नान करेंगे। तो यहाँ भी जरा-सा इतना भी अपवित्रता का संकल्प भी आया तो अशुद्ध माना जायेगा। पवित्रता माना सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन ब्रह्मा बाप जैसा हमारा आचरण हो। कई पूछते हैं यह ब्रह्मा बाबा का फोटो क्यों रखें? लेकिन यह कैसे याद करता है, वह देखने के बिगर हमारी बुद्धि ऊपर कैसे जायेगी। नहीं तो बुद्धि इधर-उधर जाती है। लोग तो आँख बन्द करके ध्यान करते हैं लेकिन कान तो बन्द करते नहीं। ब्रह्मा बाचा की सूरत-मूरत बताती है कि याद करना है तो कैसे ? सम्बन्ध में रहना है तो कैसे ? कर्म करना है तो कैसे ? तपस्या करनी है तो कैसे? वैराग्य रखना है तो कैसे ?
ब्रह्मा बाबा को देखने से सब बातों का स्पष्टीकरण हो जाता है। किसी से राग (लगाव) नहीं, प्यार सबके साथ है। बाबा को किसी का नाम भी याद नहीं, बस, बच्ची और बच्चे कहके बुलाता था परन्तु इतनी रूहानियत, इतना स्नेह और इतनी सच्चाई, साथ-साथ ऐसा तपस्वी मूर्त, ऐसी अशरीरी स्थिति जो हम बाजू में बैठे भी डिटैच हो जायें। भले बाबा किसी को ऐसे बैठ करके दृष्टि नहीं देते थे परन्तु बाबा के पास बैठे होंगे तो ज़रा-सा भी हिलने-डुलने का दिल नहीं करता, बस यूँ ही बैठे रहें। मतलब और कोई संकल्प आता ही नहीं था। बाबा के सामने बैठ जाने से सारे दुःख-दर्द मिट जाते हैं। बाबा को हमारे लिए यही प्यार और रहम भावना है कि बच्चे अच्छे हो जायें। कल्प पहले की स्मृति इनको आ जाये। मैं किसकी हूँ, कौन हूँ... यह नशा चढ़ जायें। मुख से नहीं भी बोलें परन्तु बाबा की कशिश दुनिया की आकर्षण से पार कर देती है। पहले शुरु-शुरु में तो यह त्याग, वैराग्य जैसे शब्द और उनकी भिन्न-भिन्न परिभाषायें आदि कुछ भी नहीं थे। सिर्फ एक बाबा को ही देख करके हम यह सब सहज करते गये और आज यह दिल से गीत गा रहे हैं कि 'बाबा मिला तो सब कुछ मिला।'
सदा तृप्त रहने वालों को वैराग्य लाने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि उनको यह पता ही नहीं होगा कि यह कोई मेरे काम की चीज है। ज्ञान में वैराग्य शब्द के बजाए 'समझ' शब्द ठीक है। यह मेरे काम की चीज़ नहीं है इसलिए इसको हम टच भी नहीं करेंगे। कोई चमड़ी हो या दमड़ी.. कहीं भी आँख नहीं डूबेगी। कोई विशेषता हो या न हो उसमें हमारा क्या? सब अच्छे हैं, कोई खराब नहीं है। अच्छे हैं तो सब अच्छे हैं। बाबा ने ऐसी दृष्टि दे करके हमको अच्छा बना दिया है। बाबा मम्मा ने यह कभी किसी को नहीं कहा होगा कि यह खराब हैं। कोई किसी की कुछ खराबी अगर बाबा को बताये भी तो बाबा उन्हें खुश करने के लिए सुनते थे परन्तु अन्दर से नहीं सुनते थे क्योंकि जानते हैं कि मेरे बच्चे हैं। तो अगर हमें बेहद का वैरागी बनना है, तपस्या करनी है वा अशरीरी स्थिति में रहना है... तो यह सब सहज तब हो सकता है जब समय अनुसार सम्भलकर, समझकर चलेंगे। जो नुकसानकारक है वह हम नहीं करें तो कोई मेहनत नहीं लगेगी यह सब करने में।
जैसे अपने को ठीक रखने के लिए परहेज रखना होता है। कोई पूरी परहेज नहीं रखते हैं तो डाक्टर की दवाई असर नहीं करती है। ऐसे ही मन है, उसे ठीक रखने के लिए वा अच्छी स्थिति बनाने के लिए हमारी विचारधारा बड़ी श्रेष्ठ हो, साफ और शुद्ध हो, साथ-साथ दृढ़ संकल्प हो। कभी कैसा, कभी कैसा.. ऐसी दुविधावाला न हो। हाँ, कभी किसी के संगठन के प्रभाव में आ जाने से हो सकता है थोड़े टाइम के लिए ठीक हो जाये, वह बात अलग है परन्तु फिर ऐसी कोई बात आ जाने से वैसे के वैसे ही बन पडते हैं। तो कई ऐसे हैं जो पुरुषार्थ करते हैं परन्तु फिर अपना वही संस्कार निकल आता है, समझते भी हैं कि यह नुकसानकारक है। जैसे गुस्से के संस्कार के कारण आपसी सम्बन्ध बदल जाते हैं तो फिर चलाना पड़ता है, ऐसे ही ऊपर ऊपर से रिसपेक्ट देना पड़ता है। अन्दर का नहीं क्योंकि थोड़ा सा बड़ा समझकर गुस्सा किया, छोटा समझकर अपसेट हुए। तो अभी बड़ा समझकर हमको गुस्सा नहीं करना है, छोटा समझकर अपसेट नहीं होना है।
हम बड़े बने हैं तो क्या हुआ, बड़े हैं तो क्या गुस्सा करने के लिए बड़े हैं? बड़े कभी गुस्सा नहीं कर सकते हैं। तो बड़ा बनकर इस गुस्से पर विजय पानी है और अगर कोई छोटे हैं तो अपने मन को इतना स्ट्रांग बनाना है जो कहीं भी हमारा मन, मूड आफ या अपसेट वाली नेचर इमर्ज न हो जाये। अन्य को न देख उनको स्नेह-सम्मान देते हुए उनके गुणों को देखना है। छोटों को इतना सेन्सीटिव बन करके सोचना नहीं है। यह तो मेरे लिए टू मच है, घड़ी घड़ी होता है.. ऐसे न मुँह से कुछ बोलना है, न अपनी शक्ल को बदलना है। अभी हम सबकी तथा समय की वानप्रस्थ अवस्था के अनुसार भी अगर यह नेचर चेन्ज नहीं की तो हम अशरीरी कैसे बनेंगे? मुक्ति वर्ष कैसे मनायेंगे? अगर हमें जरा भी फीलिंग आई तो इम्प्युअर थॉट चलेंगे ना ? व्यर्थ का तो पता चलता है कि यह व्यर्थ है परन्तु अयथार्थ वह है जिसका कोई अर्थ ही नहीं है। एक्यूरेट नहीं है। तो मुख्य बात अशरीरी होने के लिए भी शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति चाहिए जो सेकेण्ड में देह और दुनिया से पार कर देती है। ड्रामा और बाबा कहता है तुम आ जाओ मेरे पास। तो इस प्रकार के यथार्थ सोच-विचार के द्वारा अन्तर्मुखता की सीट पर बैठ जाओ।
तो बार-बार ऐसे अन्दर से अपने आपको चेक करो कि हमको बाहर के ख्याल खींचते हैं या हम बाहर चले जाते हैं। चलते-चलते, बैठे-बैठे मेरी बुद्धि बाहर गई तो मेरी गलती है या बाहर के वातावरण ने बुद्धि को खींच लिया तो देह से न्यारे कैसे हो सकेंगे। दूसरी बात - जब तक बीती को भूलना नहीं आता है तब तक देह से न्यारे नहीं हो सकते हैं। बीती को भूलने की निशानी है- देह से न्यारेपन का अनुभव होना। देह से न्यारे हो जाने से बीती को भूलना आसान हो जायेगा। नहीं तो हरेक सच्ची दिल से स्वयं से पूछे कि मेरे को कोई भी बात जो काम की नहीं है, उसको भूलने में कितना टाइम लगता है? और कितना वारी याद आती है? जितना बार वह याद आती है या जितना बार उसे भूलाना पडता है तो बाबा की याद कैसे आयेगी क्योंकि बाबा की याद में कण्डीशन है अपने को आत्मा समझ बाप को याद करने का। तो हमको अगर मुक्ति वर्ष को अच्छी तरह से मनाना है, जीवनमुक्ति का अनुभव करना है, औरों को प्रेरणा देने की सेवा करनी है, ईश्वरीय परिवार में आने वाली स्नेही आत्माओं को सहयोग देना है तो हमारे में जरा-सा रिंचक मात्र भी, अंश मात्र भी कोई ऐसी बात न हो जो डिफेक्ट रह जाए और परफेक्ट बनने न दे। सम्पूर्णता तभी आयेगी जब कोई भी होल न हो। जैसे मटके में कोई क्रैक है, फुल होने देता ही नहीं है थोडा-थोडा करके सब बहता जाता है या बैरियर है जो आगे जाने नहीं देता है, विघ्न का रूप लेकर खड़ा हो गया है तो यह सब क्या है? कमज़ोरी। यह कमजोरियाँ हमको शक्तिशाली बनने नहीं देगी। योग से शक्ति मिलती है परन्तु ज्ञान से शक्तिशाली बन करके, बाबा के सम्बन्ध से सर्वशक्तिवान से शक्ति लेनी है। सर्वशक्तिवान की शक्ति तब मिलेगी जब हम एनर्जी वेस्ट नहीं करेंगे। व्यर्थ बातों में टाइम नहीं गँवायेंगे। व्यर्थ सोचने से श्वांस भी व्यर्थ और उनसे बुद्धि भी कमज़ोर हो जाती है। व्यर्थ सोचने वाले की बुद्धि कुछ निर्णय नहीं कर सकती है। राइट क्या है, वह नहीं कर सकती है, रांग माना जो नहीं करने योग्य है वह कर लेती है यह व्यर्थ सोचने की सजा है। व्यर्थ सोचने वाला कमज़ोर होता है। राइट कर्म करने के समय कमज़ोर वाले के सामने कोई-न-कोई बहाना हो जायेगा, कारण बन जायेगा और कहेंगे हम नहीं चाहते थे परन्तु हमारे से राँग हो गया। किसने कराया? अच्छा करने के समय हिम्मत नहीं, विश्वास नहीं या आज्ञा मानने का अक्ल नहीं है।
बड़ो ने जो इशारा दिया है उसमें ही भला है, वह भला नहीं समझा। अच्छा करने के लिए इन्कार किया किसी कारण से भी। यह भी अपना चार्ट देखें कि आदि से लेकर आज दिन तक कितना बारी मैंने इन्कार किया है? जो सेवा मिले, जहा बिठायें मैंने हाँ जी, जी हजूर किया? कभी चिन्तन नहीं किया, इसमें ही भला है तो ऐसे सोचने वाले अशरीरी बन सकेंगे। बाबा के तरफ बुद्धि खींचेगी, घर की याद आ जायेगी। हमसे कभी कोई अवज्ञा न हो, हम सदा आज्ञाकारी रहें। योगी माना बहुतकाल के आज्ञाकारी, बहुतकाल से अन्तर्मुखी, बहुतकाल से शिवबाबा को याद करने और ब्रह्मा बाबा को फ़ालो करने के व्रत में पक्के।
अशरीरी और यह शरीर वाला इन दोनों के मिलन से ही हम सबको मात-पिता का सुख मिला है। और जिसने ऐसे मात-पिता का सुख पाया है उसका अगर किसी भी देहधारी के तरफ़ ध्यान गया तो बाबा कहेंगे यह व्यभिचारी है। ऐसा टाइटल हमें नहीं चाहिए। ऐसों का योग कभी नहीं लगेगा। योगी माना सच्चे, शीतल। अपने आपसे पूछो कि मैं कभी यज्ञ में विघ्न रूप तो नहीं बना हूँ? अन्य के द्वारा आये हुए विघ्नों को देख घबराया तो नहीं हूँ? अचल-अडोल, निश्चयबुद्धि वाले न विघ्न रूप बनते हैं, न विघ्नों से घबराते हैं। परन्तु यज्ञ हमारा है, बाबा हमारा है, जिनका बाबा की शिक्षाओं से प्यार रहा है, जो सावधान रहे हैं तो आज भी वह बाबा के इशारों को समझ करके जैसा समय वैसा सेकण्ड में खबरदार हो जायेंगे क्योंकि समय कहता है अभी खबरदार रहने का समय है, होशियार रहने का समय है। अलबेला रहने का समय नहीं है इसलिए बाबा कहता है- बच्चे, विदेही रहने की प्रैक्टिस करो। अपवित्र संकल्प को टच नहीं करो।
क्योंकि अपवित्र संकल्प ऐसी खराब चीज़ हैं जो बहुत तंग करते हैं। निगेटिव फालतू ख्यालात थोड़ा भी पैदा हो जायेंगे तो बात मत पूछो वह ऐसा तूफ़ान मचायेंगे, हैरान करके, नींद फिटायेंगे। कोई समझायेगा तो सुनेंगे नहीं। १०० कारण सुनाकर सिद्ध करेंगे, और सब रांग है अपने को ही राइट महसूस करेंगे। अपवित्र या अशुद्ध संकल्प पूरा अपवित्र बनाने के बिगर छोड़ेंगे नहीं इसलिए खबरदार रहो। अपवित्र संकल्प खतरे की घण्टी हैं। निगेटिव ख्याल कितना खतरनाक होता है इसके सब अनुभवी है ही। यह पैदा ही होते हैं अपने संस्कारों से। एक अलबेलापन दूसरा पर-चिन्तन। और जिस घड़ी पर-विन्तन शुरू हुआ तो स्व को देखना भूल गया। मुझे क्या करना है अभिमान वाला औरों के लिए सोचता है कि इनको यह करना चाहिए, यज्ञ में यह सिस्टम होनी चाहिए, फलाना यह होना चाहिए... लेकिन उसे यह भूल जाता है कि मुझे यज्ञ के लिए सच्चा सहयोगी,स्नेही होकर रहना है। वो व्यर्थ संकल्पों को ही राइट समझते हैं। यह भी सूक्ष्म अभिमान है। निगेटिव ख्याल तब आता है जब कभी भी कहाँ से अपमान की फीलिंग आती है। तो स्व-मान में रहने का जो आदती नहीं है, श्रेष्ठ स्थिति ज़माने का जिसको ध्यान नहीं है वहीं ऐसे ख्यालात के जाल में फँसता है फिर उससे निकलना मुश्किल होता है। ज़रा-सी भी आत्मा उस घड़ी फीलिंग में आई, अपमान महसूस हुआ तो स्वमान भी नहीं रहता है और दिल में किसके लिए भी मान नहीं रहता है। कोई उसको अच्छा नहीं लगेगा यह सजा है। किससे ईश्वरीय स्नेह खींचेगा नहीं, कोई दिल से देगा तो भी उसको समझेगा यह ऊपर से दे रहा है। एकदम घड़ा उल्टा हो जाता है तो इन सब बातों को अच्छी तरह से महसूस करना, बुद्धि में इन बातों का स्पष्ट ज्ञान हो तब हम उनसे मुक्त हो करके विदेही और ट्रस्टीपन का अनुभव कर सकते हैं।
हमारे पास मेरा शरीर है, मन है, वचन है, कर्म हैं, सेवा है... हमारे पास जो भी कुछ है, इतना ही नहीं बल्कि हमारा श्वाँस भी अमानत है, समय भी अमानत है तो इन सबको शुद्ध कार्य में लगाकर सब कुछ सफल करना है। संकल्प की शुद्धि भी एक अमानत है। मेरी दिल खराब हो गई, मेरा मन ऐसा है, मैंने देख लिया... अरे यह सब क्या है! यह भी अन्दर का अभिमान जो भरा हुआ है वह बाहर आता है। संस्कार- मन-बुद्धि का सहारा ले करके तूफ़ान मचाते हैं। फिर बाबा कहेगा एक वह कहेंगे दूसरी। मज़ाल है उस घड़ी वह किसकी मानें ! अपमान किसी बड़ों की भी बात मानने नहीं देगा। यह मेरे साथ क्यों ऐसा हुआ ? मेरी गलती नहीं थी। भले तुम्हारी गलती नहीं थी, परन्तु शिक्षा तो अच्छी थी। आज तुम्हारे काम की नहीं, कल काम आ सकती है उसे सम्भाल कर रख दो। नहीं तो और किसके काम में आयेंगी। परन्तु यह ख्याल क्यों चला कि यह शिक्षा मुझे क्यों मिली ? शिक्षा क्यों मिली, यह ख्याल आया तो बड़ों से या साथियों से स्नेह का सम्बन्ध जोड़ नहीं सकेंगे। इसलिए शिक्षा से प्यार रखो। कोई भी हमें शिक्षा दे उसको स्वीकार करना है। तो वह काम आयेगी। हम अगर किसकी शिक्षा प्यार से स्वीकार करेंगे तो मेरी भी कोई करेगा। तो शिक्षा लेने और देने में होशियार बनना है। रास्ते चलते भी कई जगह से शिक्षा मिलती है। चलो किसी ने मिसअण्डरस्टैंण्डिग में भी कहा लेकिन हमारा मन इतना खुला हो, जो कोई अपमान करने के भाव से भी ऐसे शब्द अगर बोल लेवे तो भी यह ख्याल नहीं आवे कि यह मुझे क्यों कहता है। देही-अभिमानी स्थिति हो तो हँस मिसल अच्छी बात ले लेंगे। जो बात नहीं अच्छी है वह अपने आप चली जाती है। हरेक के सामने कई बातें आती हैं। काम की हैं तो ले लो, नहीं हैं तो छोड़ दो। लेकिन जो हमारे संस्कारों में थोड़ा गुस्सा है- यह है कोमल नेचर, यह अशरीरी बनने नहीं देती है। सुख चैन से सदा सन्तुष्ट रहकर जीने नहीं देती है क्योंकि रीस करते हैं, रीस की बहुत बड़ी बीमारी है। जिसके पास रीस होगी या भेंट करेंगे तो अन्दर व्यर्थ ख्यालात ज़रूर चलेंगे। जो डरने वाला होगा या डराने वाला होगा, वह भी अशरीरी नहीं बन सकता है। कोई किससे डरता है या अपने रोब से किसी को डराता है तो उसके संग रहना मुश्किल हो जाता है फिर वह अशरीरी कैसे बनेगा। अशरीरी माना ही है सब बातों से, संस्कारों से, अशुद्धि से, रूखेपन से, मूड आफ बनने से हम फ्री हो जायें। तो सदा ऐसी अन्दर की एकरस स्थिति बनाते-बनाते सहज देह से न्यारे रहने की या इस द्वारा कर्मेन्द्रियों के साथ कर्म करके कछुवे मिसल समेटने की आदत पड जाये।
समेटने की शक्ति और सहनशीलता की शक्ति अशरीरी बनने में बहुत मदद करती है। सन्तुष्ट रहने में बहुत मज़ा है। बाबा चला रहा है, बाबा खिला रहा है, बाबा करा रहा है...। अधीनता किसकी भी न रहे, न साधनों की, न सम्बन्धियों की, न साथी की तो अशरीरी बनना सहज है। यह नहीं कहेंगे कि मैं आत्मा हूँ अशरीरी बन जाऊँ पर आटोमेटिकली शरीर द्वारा करा रही हूँ निमित्त, मैं तो मालिक हैं, चाहूँ तो शान्ति से बैठ जाऊँ........ जब ज़रूरत पड़ती है तो इनसे काम लेते हैं, जब ज़रूरत है तो संकल्प में आते हैं, नहीं है तो शान्तचित रहते हैं।
बाप की दया और दुआ मेरे पास है तो मेरे नयनों में भी बाप के समान सबके लिए दया और दुआ हो और कुछ न हो। दया-भाव कभी हमको कडुवा बनने नहीं देगा। जैसे बाबा ने मीठे बच्चे, मीठे बच्चे कह करके हमारा सारा ज़हर पी लिया है, हमको मीठा बना लिया है। ऐसे हम भी बाबा के बच्चे हैं तो हम भी ऐसे मीठे बनें और अनेकों को बनायें। अपने को ऐसा मीठा बनाने के लिए न आवाज से बोलें, न ज़्यादा बोलें और वही बोलें जो काम का हो। सर्व के साथ निःस्वार्थ-भाव हो। सेवा भाव हो, 'तु'-'मैं' या 'तेरा' 'मेरा' नहीं हो। अपने पाँव से चलना है किसकी जुत्ती में पाँव नहीं डालना है। आगे जाने के लिए कोई किसी को मना नहीं करता है, परन्तु हम किसी को धक्का मारके भी तो नहीं जा सकते हैं। युक्ति से मुक्ति है, समझ से सयानप से बाबा को याद करते आगे बढ़ते जाना इज़ी है। और दूसरे को भी आराम से सहयोग देना अच्छा है, भले आगे जाये। इसमें कईयों को सूक्ष्म होता है कि यह मेरे से आगे न चला जाये। इसलिए लकीर लगा देंगे, आगे नहीं चला जाये। अरे! बाबा तो कहते- बच्चे, बेहद में रहो। उसके लिए एक बहुत अच्छी विधि है कि ग्लोब के ऊपर रहो, क्योंकि बाबा वहाँ रहता है तो बाबा साथी रहेगा। ग्लोब को हाथों में रखो।
अशरीरी बनना है, विदेही बाप को याद करना है तो जो सदा विदेही है, उस पावर-हाउस से सम्बन्ध ठीक हो तब करेन्ट मिलेगी। बल्ब में भी रोशनी तब आती है जब पावर-हाउस से कनेक्शन हो। भले स्वीच, वायर, इलेकट्रिक आदि सब कुछ फिट हो, परन्तु लाइट तभी आयेगी जब कनेक्शन ठीक होगा। तो हमारा भी कनेक्शन ऊपर वाले के साथ हो तो हम अशरीरी, आत्म अभिमानी, विदेही, सब बातों से मुक्त, उपराम न्यारे और बाबा के प्यारे रह सकते हैं।
अच्छा - ओमशान्ति ।

स्वधर्म में रह पराधीनता को समाप्त करो

बाबा हमको जो इशारा करते हैं वह करने की इच्छा अगर हमारे मन में दृढ़ हो तो संकल्प शक्ति बहुत काम कर सकती है। कमज़ोर संकल्प ने टाइम वेस्ट किया है, चाहते हुए भी सफलता कम पाई है। ऐसे नहीं सफलता नहीं हुई है जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं मिली है। लेकिन बाबा को साथी बना दो तो अनुभव होगा कि सफलता हमारे पीछे घूम रही है। स्व की स्थिति के आधार से सेवा में भी सफलता अवश्य होती है।
जो विशाल दिल वाले होते हैं वह कभी कोई हद में नहीं आते हैं। यह भी तो अण्डरलाइन करने वाली बात है। हद जो है वह सच्ची और बड़ी, खुली दिल बनने नहीं देती है, लेकिन सच्चे दिल से इच्छा है तो फिर सफलता हाँसिल हो जाती है। स्व के लिए चाहे सेवा के लिए भले कितना ही अच्छा संकल्प और श्रेष्ठ संग हो लेकिन हृद है तो सफल करने नहीं देगी। इसलिए बाबा हमेशा कहते हैं कि एक तो हदों से पार हो जाओ, दूसरा समय अनुसार हर बात को बिन्दी लगाओ।
जैसे समय अनुसार हर धर्म वाली आत्मायें नीचे आती हैं ऐसे अभी समय अनुसार जो आत्मायें बिछड़ गई हैं या दूर चली गई हैं वह समीप आयेंगी। उन्हें मधुबन, बाबा, ज्ञान सब अपना लगेगा, अच्छा प्यारा लगेगा। यही हमारे लिए है बस, बाबा के सिवाए और कोई नहीं है क्योंकि जितना बाप ने समझ दी है, अज्ञान का अन्धकार मिटाया, भटकने से छुड़ा करके सही रास्ता दिखाया। अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलना सिखाया। जो अपने को बाबा के सच्चे पक्के बच्चे समझते हैं वही इस झूले में झूलेंगे। हमारी भावना क्या है? सच्चा और पक्का बनना है। नियम जो बाबा ने बनाकर दिये हैं, उसको पालन करते हुए हमको पक्का बनना है। याद हमको किसकी भी न आये, पराधीनता नहीं चाहिए क्योंकि पराधीन आत्मा कभी सुखी नहीं हो सकती है।
स्वधर्म में रहें तो सर्वशक्तिवान बाबा की शक्ति को खींच सकते हैं। बाबा का साथ माना बाबा की सर्व शक्तियाँ हमारे साथ काम करती रहें, जैसे शक्तियाँ ही हमको चला रही हैं। तो इस परिवर्तन से हमें नई लाइफ मिली है, नई जीवन जीने की कला हमें बाबा ने सिखाई है। अभी बाबा जो नालेज दे रहे हैं, उससे हम भविष्य प्रारब्ध बना रहे हैं। सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे परन्तु सतयुग की प्रालब्ध भी इस नालेज के आधार से ही होती है। इसलिए बाबा अभी कहते कि स्वराज्य-अधिकारी बनो, अधीनता को छोड़ो। अटेन्शन वाली बात यह है कि अधीनता को छोड़ अधिकारी बनना है। जैसे बाबा के ऊपर हमारा अधिकार तब है जब हमारा अपने मन-बुद्धि पर अधिकार हो। माया भी पकड़ती है मन-बुद्धि को, संस्कार भी इमर्ज होते हैं-मन-बुद्धि के द्वारा। तो अधीनता छोड़ अधिकारी बनना है।
हर आत्मा को वापस बाबा के घर कर्मातीत बनकर जाना है, यह सबको धुन लगी है क्योंकि जो करता है सो पाता है। एक-दो को सहयोग दे सकते हैं, सहयोग देने वाला बड़े दिल से देता ही रहे, लेकिन लेने वाला भी थक न जाए। दिलशिकस्त हो करके यह सहयोग लेने का दरवाजा बन्द नहीं करो। ऐसे नहीं कि अब तो मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने सब पुरुषार्थ कर लिया, अभी बस टू मच हो गया... कई तो ऐसे करते-करते लॉक लगाते जा रहे हैं।
कभी मेरे से या किसी और से गलती हुई तो फुलस्टॉप लगाओ क्योंकि अभी इस समय फिर भी मेरा बाबा बैठा है। बाबा की मदद मुझे मिल रही है, इतना सब जो हो रहा है वह सब बाबा की मदद से ही हुआ है। अभी भी बाबा मुझे छोड़ नहीं रहा है।
बाप के और निमित्त बनी हुई आत्माओं के समीप रहने में बहुत सुख समाया हुआ है। इसलिए कुछ भी हो जाये, हम इनसे दूर न हो जायें - यह ध्यान रखें। दूर होना आसान है, समीप आना कठिन है। समीपता हमको विजयी रत्नों में ले आ रही है। हरेक मणका पुरुषार्थ से एक्यूरेट, माला में आने लायक बन रहा है परन्तु समीपता के बिगर, स्नेह के सूत्र के बिगर नम्बर कैसे आयेगा, १६ हज़ार में से १०८ में कैसे आयेगा? और फिर आयेगा तो समानता के आधार से आयेगा। डिटैच और स्नेही यह दो गुण समीप ले आते हैं। वह एक-दो से गुण उठाते-उठाते सर्व गुणों में सम्पन्नता लायेंगे। तो सम्पूर्ण बनने के लिए तीव्र पुरुषार्थ हो। जरा-सी कमी रह जाये तो शोभा नहीं होगी। तो सोचो कितना सूक्ष्म और महीनता से पुरुषार्थ करना होगा। जरा-सी कमी होगी तो कांध नीचे होगा। बाबा से ऐसे स्नेह और दुआओं भरी दृष्टि लेने के अधिकारी नहीं होंगे। तो मधुबन में बैठ करके यह गहराई से रियलाइज़ करें कि मेरे में क्या कमी है और कितनी कमी रह गई है। दूसरे की गलती देखना, बताना, इज़ी है परन्तु मेरी गलती को देखने के लिए इतना बड़ा पावरफुल संगठन ही महसूस कराता है क्योंकि स्वयं की गलती स्वयं को बताने में शर्म सी लगती है।
अभी इसमें हम परिवर्तन नहीं लायेंगे तो वह थोड़ी-सी रही हुई कमी भी कभी जायेगी नहीं और पाँच कमियाँ जो छिपी हुई बैठी होंगी, उसका सहारा ले करके मुझको दूर हटायेंगी। समौप आना है तो अपने को चेक करना है। सम्पन्नता हमारे अन्दर आये, सम्पूर्णता सामने खड़ी हो और वह बनाने वाला बाबा है। बाबा के हाथ में जिसका हाथ है वह अष्ट शक्तियाँ काम करती हैं तो फिर माया की कोई धूप व छाँव नहीं लग सकती है। समय अनुसार हम अष्ट शक्तियों रूपी छतरी के नीचे हैं, ज़रा-सा इधर-उधर होंगे या अलबेले बनेंगे तो क्या होगा! आप जानते ही हो। जब अलबेलापन और आलस्य दोनों आपस में इकट्टे हो जाते हैं तब पराधीनता आ जाती है। फिर वह राज्य-अधिकारी नहीं बन सकेंगे क्योंकि कण्ट्रोलिंग पावर नहीं होगी। बाबा के इशारे ही हमको कण्ट्रोलिंग पावर सिखा रहे हैं। वैसे आटोमेटिक अपने ऊपर रूल करना, लॉ और आर्डर में रहना है। तो जितना हम रहेंगे हमको देख अपने आप औरों को बाबा के नज़दीक आना आसान हो जायेगा। और अगर कोई दूर हट जाते हैं तो वह हमारे ऊपर बोझा हो जाता है। तो लॉ और आर्डर में रहना है, कर्मों की गुढ़गति को समझ करके श्रीमत पर चलना है क्योंकि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा, हम करेंगे तो सारा विश्व करेगा। अच्छा।

निर्भय बनना है तो निर्वैर बनो, मित्रता की सच्ची भावना रखो

हम बाबा को याद करें या बाबा भी हमें याद करे। ऐसी हमारी याद हो जो याद से करेन्ट मिले। औरों को करेन्ट देने की बात तो पीछे की बात है परन्तु पहले हमको याद की करेन्ट कैसे मिले, वह खींच कैसे हो! बाबा ने कहा बाप तो याद करता है लेकिन याद खिचवाने वाले चाहिए। इसके लिए अशरीरी रहने का अभ्यास हो जो करेन्ट मिले। आत्मा के ऊपर जो इतनी जंक चढ़ी हुई थी वह उतरती है तो आपेही करेन्ट मिलती है। जैसे चुम्बक जंक उतरी हुई सुई को खींचता है। तो याद माना ही हमारी सारी जंक उतर जाए। कईयों की जंक उतर भी जाती है फिर अचानक कारणे अकारणे कोई जंक ऐसी बढ़ती है जो वह बेकार हो जाती है। उसको दुरुस्त भी कर नहीं सकते हैं। तो यह अन्दर ही अन्दर अपने आपकी सम्भाल करना, किसी और चिन्तन में अपना टाइम वेस्ट न करना, अपने चिन्तन को शुद्ध बनाना यह है करेन्ट लेने वाले पुरुषार्थियों की अवस्था।
जो स्व के चिन्तन और बाप के चिन्तन में चले जाते हैं, उन्हें बाबा को सबूत देने का फ़िकर रहता है। बाबा ने हमें जो सुनाया है उसका प्रैक्टिकल सबूत देना है। प्वाइन्टस् के रूप में रिपीट नहीं करना है लेकिन प्वाइन्ट-स्वरूप बनकर उसका अनुभव करना और कराना है। जैसा समय, स्थान और व्यक्ति है वैसे एक्यूरेट राइट टाइम पर उनको जो आवश्यक है वह मिले। जैसे कम्प्युटर में भर तो लेते हैं परन्तु जो जिस समय आवश्यक है वह निकालने की कला चाहिए। अभी ज्ञान और योग से हम लोगों की बुद्धि भी इतनी रिफाइन होती जा रही है। ज्ञान ने बुद्धि को सोने मिसल सतोगुणी बनाया है, जिसमें ज्ञान की धारणा हो सके यह भी एक बहुत अटेन्शन अपने ऊपर रखना है कि हमारे बुद्धि की क्वालिटी अच्छी हो, माना अच्छी चीजें ग्रहण करने वाली हो, जो न काम की बात है उसको अवाइड करने, न देखने-सुनने की आदत हो। तो अभी अपनी बुद्धि को पहले सतोगुणी बना करके फिर सतोप्रधान बनाने की आदत बनाना है।
सच्चे भक्त जो होते हैं वह अपना समय किसकी निन्दा में गंवायेंगे नहीं। खराब संग में जायेंगे नहीं। तो सच्चे बाबा के बच्चों की भी निशानी है कि वह अपना समय सफल करेंगे। हम कहें हमारे पास कुछ भी नहीं है, तन ठीक नहीं है, धन मेरे पास नहीं है परन्तु मन तो हमारा बहुत अच्छा समय को सफल करता है। समय को मन द्वारा सफल करने से ही हमारे पास कण्ट्रोलिंग और रूलिंग पावर आती है। गीत है ना जहाँ हमारा मन होगा वहाँ हमारा तन होगा, जहाँ हमारा मन होगा वहाँ हमारा धन होगा क्योंकि जहाँ तन है वहाँ मन है, धन भी वहाँ ही जायेगा जहाँ हमारा मन होगा। इसलिए हम तन और धन को मन के द्वारा सफल करते हैं। भले कैसे भी यूज़ हो लेकिन मैंने मन द्वारा सफल करने की इच्छा रखी है। मन कहता है तुम्हारा यह भी सफल हो यानि कर्मेन्द्रियों द्वारा श्रेष्ठ कर्म हो तो सफल है। मन ने अच्छी तरह से फैसला कर लिया है कि इस तन को ईश्वरीय सेवा में सफल करना है। यह संकल्प है तो वाणी भी मुख से ऐसी निकले जो हमारा समय सफल हो, दूसरों का भी सफल हो। तो सारा आधार है 'मन' के ऊपर। बुद्धि भी अच्छा सोचती है मन के आधार पर, संस्कार भी बदलते हैं मन के आधार पर।
तो अपने व्यर्थ निगेटिव ख्यालात पर पूरी जाँच करके अपने को इससे फ्री करना - यह है अपने ऊपर कृपा करना। हरेक के कर्म का हिसाब-किताब अपना है। उसके चिन्तन में मैं हिसाब-किताब न जोडू। भले कोई लौकिक-अलौकिक सगे सम्बन्धी हों, कुछ भी है मुझे कर्मातीत बनना है, मुझे पुराना सब हिसाब-किताब चुक्तू करना है और रहा हुआ समय सफल करना है। जोड़ना नहीं है, यह खबरदारी हो तो हम अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करेंगे। हमारे में कण्ट्रोलिंग और रूलिंग पावर आयेगी, स्वराज्य-अधिकारी होंगे। कई पूछते हैं- हमें सूक्ष्म भय जो है, उससे हम निर्भय कैसे बनें? ऊपर से भले कितने ही बहादुर हों, कितना भी बाहुबल वाला देखने में हो परन्तु उनके अन्दर भय है। आप हम सब हरेक अपने अन्दर से चेक करें कि हम अन्दर से निर्भय हैं? निर्भय वह है जो निर्वैर है। मेरे से भले कोई वैर भाव रखे, मैं न रखूँ। मित्रता दुश्मन को भी मित्र बनाती है, सच्ची मित्रता की भावना दूसरे को बदल देती है। मेरे में बदला लेने की ज़रा-सी भावना होगी तो दस गुणा और सामने वह मेरे से बदला लेने आयेंगे। यह पहले ही भय होता है। कण्ट्रोल नहीं है तो मैंने कुछ कह दिया, कुछ कर दिया परन्तु अन्दर से समझते हैं उसकी रिज़ल्ट क्या होगी ?
कईयों को काल (मृत्यु) का भय होता है लेकिन हमको नहीं है क्योंकि बाबा ने कहा है कि तुम तो काल पर विजय पाते हो माना अन्तकाल अच्छी रहे, बहुतकाल का पुरुषार्थ करने वाले को काल का भी डर नहीं होता है। अगर शरीर छूट जाए तो भी डर नहीं है। अपने किये हुए पापों की कुछ बाबा से क्षमा मांग कर और कुछ योगबल से अपने आपको स्वच्छ बना लिया है तो सारा जो पुराना बोझा है वह उतरा हुआ है, तो मृत्यु का भी डर नहीं होता है। आज समाज में देखते हैं कि कोई ऐसे होते हैं जो कर्जा लेते रहते हैं। लेकिन कोई ऐसे होते हैं जो वह भले सूखी रोटी खायेंगे, परन्तु कर्जा नहीं लेगे क्योंकि वह समझते हैं कर्जा लेना माना यह बड़ा मर्ज है। इसलिए दान भले करो परन्तु न कर्जा दो, न कर्जा लो। दिया तो भी घड़ी घड़ी बुद्धि जायेगी लेने के लिए, दिया फिर वापस नहीं किया यह ख्यालात करते रहेंगे तो रूहानियत खत्म हो जायेगी। ऐसे ही सेवा कितनी भी करो, अच्छा है दुआ मिलेगी क्योंकि ईश्वरीय सेवा है परन्तु बोझा नहीं बढ़ाओ। हम न दूसरों के लिए बोझा बनें और न ही कोई दूसरे हमारे लिए बोझा बन जायें।
तो अन्दर चेक करना है कि एक तो मेरा बाबा से कितना प्यार है? अपने को खुश करने के लिए मेरा बाबा से प्यार है या मैंने रीयल में बाबा को अपनी पलकों में छिपाकर रखा है।
बाबा कहता है हे आत्मा राजा, तू अपनी कर्मेन्द्रियों से पूछ, ठीक आर्डर में काम कर रही हैं? कान से ऐसी कोई बात सुने ही क्यों जो फिर हमको गुस्सा आवे ? ऐसे नहीं कि मैंने देखा तो आ गया। सुना तो मैंने समझा कि यह राइट कहते हैं। जो बात मेरे काम लायक है, बाबा की सेवा अर्थ है वही बात सुनेंगे, जो नहीं है उसको फिर सुनने की आवश्यकता ही नहीं है। सुनने में अपनी भावना भी तो मिक्स भरी हुई होती है। तो यह भी फालतू टाइम वेस्ट है। अपनी भूल न सुनाकर दूसरे की भूल सिद्ध करने के लिए सुनना या सुनाना यह भी वेस्टेज़ है।
तो हमको भी सोचना चाहिए कि ड्रामा में भगवान ने इतना ऊँचा पार्ट हमारा बनाया है, तो हमारा चेहरा और चाल-चलन भी सेवा करे। अगर मैं आँखें ऐसे-ऐसे मलती रहूँगी व कान ऐसे-ऐसे करती रहूँगी तो क्या होगा ? फिर कोई-न-कोई इन्फेक्शन होगा। कईयों में व्यर्थ सुनने का बहुत इन्ट्रेस्ट होता है। बहरा होगा तो भी अपनी बात सुनने के लिए कान खुल जायेंगे, वायब्रेशन आयेंगे मेरी कोई महिमा कर रहा है। कुछ सुनने की इच्छा है, स्तुति कर रहा है तो खुश हो रहा है, कोई निन्दा कर रहा है तो दुःख हो रहा है। उसके अन्दर से वह ख्याल चल रहा है, नींद फिट रही है। निन्दा करने वाले के साथ अपना बर्ताव कैसा हो? निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सोय। हमने देखा है १०० गाली देने वाले का भी आज उद्धार हो रहा है. तो उसका दोष नहीं है, कोई मेरा पूर्व का हिसाब-किताब है इसलिए चुक्तू कर रहा है। बाकी हम यह नहीं कहें कि अरे तुम क्यों करता है। अरे चूक्तू करने के लिए ही आया है, करता है तो करने दो। कुछ बोल करके नया हिसाब-किताब नहीं बनाओ। चलो, अभी मेरे से कोई भूल है या मेरी कुछ और बात है तो मैं अपने आपको धीरज, शान्ति सिखा लूँ। समाने की शक्ति को धारण करके मम्मा के समान गम्भीर रहना सीख लो।
कोई ज़रा-सी भी व्यर्थ वा निगेटिव बात है उस हर बात का पाजिटिव जवाब है। निगेटिव को पाज़िटिव कैसे किया जाये, उसका हल बाबा ने सब बताया है। तो फिर अपने मन को बीमार क्यों बनायें। तन के लिए दवाई है, मन की दवाई तो बाबा के पास ही होगी, इसके लिए वह डॉक्टर कुछ नहीं कर सकता है। डॉ. हमको कहें आप ठीक हैं? उसके पहले हम उन्हें कहें कि आप ठीक हैं? वह हमें पूछ नहीं सकते है। तो जो डॉ. होते हैं वह मुस्कराते हुए कहेंगे आप ठीक हैं। इतना हम अपने आपको सम्भालें। हमको कोई यह भी नहीं कहे कि आप ठीक हैं ना! कैसे हैं आप ? मौज में रहने वालों से ऐसा नहीं पूछा जाता है कि आप कैसे हो ? कहेंगे यह तो सदा ही मज़े में रहता है। और मूँझ में रहने वालों से पूछेंगे कुछ है क्या आपके पास ? कहेंगे बात मत पूछो, १० बातें शुरु करेंगे।
यदि कोई संशय होगा तो निश्चय में रहने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। संशय पता नहीं कहाँ से लाया या आया। अगर आया तो तुमने बिठाया क्यों ? उसी समय भगा देते। ज्ञान तो तुम्हारे पास है। बाबा एवं परिवार मेरा है। ज्ञान मुझ आत्मा के लिए है, सेवा मैंने भविष्य प्रालब्ध बनाने के लिए की है और कर भी रहा हूँ तो संशय की क्या बात है! परन्तु एक बार भी अगर संशय आया तो हर बात में संशय आयेगा, क्वेश्चन एक बारी उठा तो आन्सर मिलते भी क्वेश्चन उठता रहेगा क्योंकि बुद्धि का अभिमान होता है। पूछने वाले को हैरान करना चाहता है, हार खिलाना चाहता है। परन्तु जो बात हो रही है या जो बात कोई कर रहा है। हो रही है वह हमें सिखाने के लिए, सम्पूर्ण बनाने के लिए है यह याद रहे तो लाइफ में सर्व गुण आते जायेंगे। इसलिए बाबा कहते हैं कि दतात्रेय मिसल चलते-फिरते गुणग्राही रहो। दतात्रेय का मिसाल क्यों दिया जाता? उसने बिच्छु, सर्प और कुत्ते आदि से भी गुण उठाया। तो हम भी चलते-फिरते गुणग्राही बनें। अच्छा- ओमशान्ति।

प्यार मांगने के बजाए स्व-मान में रहो और सबको मान दो तो प्यार के पात्र बन जायेंगे

बाबा कहते, बच्चे मज़े में भी रहो तो मौज में भी रहो। मौज और मजे में क्या फर्क है? मैं सदा खुश रहूँ, मुझे गम कभी न हो यह मेरी पर्सनाल्टी है। गम में गमी, खुशी में खुशी, वह तो संसार के साधारण लोगों को होती है। हमारी पर्सनाल्टी में गम का नाम निशान न हो। हम बेगमपुर के बादशाह हैं। खुशी इतनी हो जिसे कोई माप न सके। वह खुशी नशे में रखती है। नशे में रहने वाला सदा ही आनन्द में रहता है। भगवान के बोल हैं कि बहुतकाल का योगी परमानन्द को पाता है। परमात्मा के लिए कहा जाता है 'सत् चित आनन्द स्वरूप है।' आत्मा ने बाप से बिछुड़ करके अपना आनन्द खो लिया है। अभी ज्ञान से प्रेम, शान्ति, शक्ति, आनन्द-स्वरूप बन रही है।
ज्ञान माना प्रेम, प्रेम माना बाबा से सच्चा प्यार खींचें और औरों को भी वह प्रेम अपने स्वरूप से नैचुरल अनुभव करावें। नयनों में भी प्रेम, मुस्कराने में भी प्रेम, चलने में भी प्रेम। ज्ञान माना ही प्रेम लेकिन प्रेम उसके पास है जिसके पास शान्ति की शक्ति है। उसके लिए एकान्त चाहिए। एकान्त में जाना माना बाबा से जो सुना है उसकी गहराई में जाना। बाप समान बनना है तो समाना सीखना है। जैसे कुछ हुआ ही नहीं, इतनी अन्दर से शान्ति, धीरज और प्रेम की शक्ति चाहिए।
पहले जमाने में बहुत सयाने लोग थे। वह आपस में झगड़ा आदि करने नहीं देते थे इसलिए उस समय यह कोर्ट कचहेरी कुछ नहीं थे। बाबा फिर से वह ज़माना ले आ रहा है। सतयुग में क्या होगा वह तो ठीक है परन्तु संगम पर बाबा ने क्या सिखाया है। कलियुग अन्त तक भी ऐसी सयानप के लोग देखे हैं, घर का ही कोई मेम्बर इतना पावरफुल होता था जो वही सबको सम्भालता था। कोई बात का फैसला हो तो वह घर में ही आपस में होता था, इसलिए घर की बात घर में रहती थी। सबको अपना समझते थे। कोई भी हो, पराये को अपना समझना यह बहुत बड़ी बात है। और आजकल के परिवार में क्या होता है? वह कभी इकट्टे बैठ करके खाना नहीं खायेंगे। एक उधर खायेगा, एक इधर खायेगा। जब खाने का टाइम होगा तो कहेंगे भूख नहीं है, जब वह खाकर पूरा करेंगे तो खाना शुरू करेंगे। यह सूक्ष्म जो इस प्रकार के संस्कार हैं- वैर-भाव के, मान-अपमान, सुख-दुःख में समान न रहने के... वह सब कुछ होते हुए भी रूखा सूखा बना देते हैं, सुखी नहीं रह पाते हैं। तो ऐसे समय पर बाबा का ज्ञान बहुत मदद करता है। इसी के आधार से सतयुग के अपार सुख का अनुभव अभी संगम पर ही कर सकते हैं।
अभी लोगों को चाहिए सबूत। सबूत बनने के लिए आइना बनकर रहना है। आइना कुछ कहता नहीं है, लेकिन आइने में कोई दाग होगा तो किसको क्या दिखाई पड़ेगा। आइना यह नहीं कहता कि तुम्हारा दोष है। वैसे कोई किसको कहेगा तो उसको बुरा लगेगा, अपमान महसूस होगा। लेकिन आइने के सामने जाकर देखेगा तो वह थोड़े ही कुछ कहेगा या अपमान थोड़ेही महसूस होगा। यह एक कुदरती ऐसा है जो हरेक दूसरे को देख सकता है, खुद को नहीं देख सकता है। यह आँखें भी दूसरे को देख सकती हैं, यह काला है या गोरा है या ऐसा है परन्तु यह आँखें खुद को नहीं देख सकती हैं। और ज्ञान में भी अज्ञान का ऐसा पर्दा है जो दूसरे को जल्दी देख सकते हैं और खुद को देखने का टाइम नहीं है क्योंकि खुद को देखने के लिए तो टाइम देना पड़ता है। दूसरे तो अपने आप दिखाई पड़ते हैं।
बाबा की इच्छा क्या है? मेरे बच्चे सब पावन बन करके घर चलें और जितना समय आत्मा इस शरीर में है उतना समय खुद को तथा औरों को पावन बनने-बनाने में मदद करे। कई बिचारे ऐसे हैं जो कहते हैं कि तुम्हारे कनेक्शन में कितने सालों से हूँ, तुमने प्युरिटी पर पहले मुझे क्यों नहीं समझाया ? जो आज मुझे इतना काम विकार हैरान कर रहा है। कोई चाहता थोड़े है है कि हम इतना विकारों के वश रहें। तो दोष दे रहा है कि तुमने क्यों नहीं समझाया ? अभी फिर भी समझने की और अपने को सिखाने की, सुधारने की घड़ी है।
गलती दूसरे की, याद मैं करूं तो नुकसान किसको पड़ेगा, दूसरे की गलती दूसरे को सुनाऊँ तो पाप किस पर चढ़ेगा ? तो मुझे अपने आपकी सम्भाल करनी है या दूसरों में ही अपना समय गँवाना है। तो इन बातों को जितना हम गहराई से जानेंगे, उतना हम पापों से मुक्त होते जायेंगे। अब कोई पाप अपने सिर पर नहीं चढ़ावे क्योंकि पहले ही जन्म-जन्मान्तर के विकर्मों का बोझा सिर पर लदा हुआ है और छोटे-छोटे पाप भी महापाप में गिने जाते हैं। जिसका बोझा फिर खुश रहने नहीं देता है तो फिर महिमा के भूखे हो जाते हैं। कई ऐसे हैं जो महिमा के भूखे भगवान को छोड़ देते हैं। फिर से वापस आने में उन्हें लज्जा आती है। इसलिए कर्मों की गुह्य गति को जान हम सुजाग रहें ताकि हम बाबा को अपना मुँह दिखा सकें।
स्वधर्म में टिकना, बाबा की यादों में सर्व सम्बन्धों की शक्ति खींचना, ड्रामा की हर सीन को साक्षी हो करके देखना। पार्ट बजाते हुए सेकेण्ड में न्यारे हो जाना, किसके संस्कार को स्पर्श न करना। अपने संस्कार को भी कभी इमर्ज न करना... इससे हमारा सब कुछ सफल होता रहता है। या रहेगी बाबा की याद या रहेगी कोई पुरानी याद। पुरानी याद और पराई याद दोनों खतरे वाले हैं। हमको याद में यह दोनों विघ्न डालेंगे। मुझे बाप की याद से अपनी स्थिति निर्विघ्न, एकरस, अचल-अडोल बनानी है। हमारी इस प्रकार की लगन है तो बाबा का प्यार काम करता है। फिर ईश्वरीय परिवार में भी हरेक प्यार देता है। ईश्वरीय परिवार में हम किसको दोष नहीं दे सकते हैं कि फलाना मुझे प्यार नहीं करता है। दोष मेरा है, प्यार मांगा नहीं जाता है। जो स्वमान में रहता है, दूसरों को मान देने में दिल बड़ी है उसे स्वतः प्यार मिलता है। जो स्व-मान में नहीं रहता है वह अपमान जल्दी फील करता है और दूसरे का अपमान करने में उसको देरी नहीं लगती है। तो मुझे यह धन्धा नहीं करना है।
ज्ञान का मतलब ही है कि यह रियलाइज़ हो कि मेरा धन्धा क्या है? बाबा कहते - बच्चे, तुम अपकारी पर उपकार करो तो मीठे बाबा के यह मीठे बोल हमको सिखा रहे हैं कि तुम यह करो, यह नहीं करो। इसमें मुख्य बात है अपने चिन्तन को बहुत अच्छा ऐसा बनाना, जो उसी चिन्तन में मरूं तो ऊँच पद पाऊ और बाबा के गले का हार बनूँ। तो अभी तुम अपने से पूछो कि इस गति में अगर हमारा शरीर छूटे तो हमारी प्रालब्ध क्या होगी? इसलिए सम्पूर्ण बनने के लिए अन्दर तीव्र पुरुषार्थ चलता रहे। किसी को न देख बाबा को देखते रहें, यही है मजे में रहना, मौज में रहना।
आज बाबा की मुरली में था सब कुछ सफल करो। मन कहता है तन, तू सेवा कर। इस तन में मैं आत्मा मन्मनाभव रहूँ। इस तन में मैं आत्मा बाबा को खूब याद करू जो मेरा अन्त मते अच्छा हो जाए। तन में आत्मा को अभी समझ आई है, बाबा ने ज्ञान दिया है। तो क्या करेंगे? कर्मेन्द्रियाँ जो पहले विकारों वश कर्म करती थी वो अभी नहीं करेंगी। मजबूरी में नहीं करना है। इन कर्मेन्द्रियों के द्वारा मुझे ये नहीं करना है, फाइनल फैसला है। माया जरा भी न आये इसलिए योग लगाना है। ज्ञान समझा फिर लगता है मुझे योगी बनना है। बाबा ने कहा- बच्चा ! मैं कहूं बाबा! बस आपके सिवाए मेरा और कोई नहीं है। बस अन्दर-ही-अन्दर इन बातों की धुन लगानी है। अभी मुझे क्या करना है? बाबा को ये करके दिखाना है। मुझे न तो किसकी बुराई देखनी है, न करनी है। बाबा ने कहा- ज्ञान से तुम्हारा बर्तन सोना हो जाता है, तो उस बर्तन में ज़रा भी किचड़ा नहीं रखना है। तो अंदर खुशी आयेगी मेरी विजय हो गई। व्यर्थ सोच चलेगा ही नहीं। ज़रूरत ही नहीं। बाबा ने कहा ये कर। ड्रामा कहता है अभी यही समय है कर्म करने का। बाबा कहता है एकाग्रचित्त बनो, ड्रामा कहता अडोल-अचल बनो। बाबा कहता एकाग्रचित्त बनो। फिर कुछ सीन आती है तो ड्रामा कहता चुप! बना बनाया ड्रामा है तुम सोच मत। दोनों इंजन हमको खींच रहे हैं ऊपर। प्युरिटी इतनी जैसे मेरी मां जननी। बहुत पवित्रता अच्छी लग रही है अपवित्र संकल्प मेरे को टच नहीं कर सकता, मैं वैष्णव कुल की हूँ। पक्का वैष्णव माना ही क्या? वैजीटिरियन तो है, परन्तु खान-पान बाबा की याद में। लोभ वश नहीं। मुझे ऐसे संस्कार को चेन्ज करना है। जरा भी संस्कार अगर हमारे आदि और अनादि की भेंट में ठीक नहीं हैं तो हमको ठीक करना है। बाबा तो करेन्ट दे रहा है परन्तु आत्मा खींचने वाली चाहिए। आत्मा करेंट खींच सके तो अशरीरी बनने में मदद मिलेगी। तो व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। अशान्त आत्मा भी बाबा के प्यार में लीन हो जाती है। सब कुछ भूल जाती है। तो मन वचन भी श्रेष्ठ हो, श्वाँस-संकल्प भी सफल हो। बीच में कोई पुरानी बात याद आती तो उसको भूल जाओ। भूलने की शक्ति अपने में रखो। एक याद की शक्ति, एक भूलने की शक्ति। सार रूप में आत्मा, परमात्मा और ड्रामा के ज्ञान की शक्ति हमको श्रेष्ठ आत्मा बनने में मदद करती है। हरेक की विशेषता देखने और धारण करने में बाप को बीच में रखो तो हम सब बाबा के उम्मीदों के सितारे तो हैं परन्तु सफलता के चमकते हुए सितारे बन जायेंगे।

खुशी का खज़ाना सदा कायम रहे इसके लिए पॉजिटिव सोचने का तरीका सीखो

अपने को अच्छा समझना दूसरे को खराब समझना - इसको बाबा कहते हैं मिया मिड्डू समझना, माना अपने को ठगना। मैं औरों की नज़रों में अच्छा दिखाई पहुँ, सारा दिन वही चक्कर... ये मैं पन का अभिमान मिक्स, अपने को अन्दर ठगने की निशानी है। औरों से मैं अच्छा दिखाई पहूँ। जो और सेवा कर रहे हैं, उनसें मैं क्या सेवा करूं जो अच्छा दिखाई पहूँ। अच्छा बनूँ, ये नहीं बल्कि अच्छा दिखाई पडू - ये है ठगना। ठगी जो करते हैं उनके तरीके बड़ी चतुराई और होशियारी के होते हैं। ठगी करने वाले बड़े होशियार होते, दिखाई नहीं पड़ेगा कि इसमें कुछ मिक्स है। बाहर से कुछ और अन्दर से कुछ और। भगवान तो जानता है ना बाहर से कैसा है अन्दर से कैसा है।
संगम है परमात्म-प्यार लेने का युग। ये युग, ये घड़िया जब से बाबा के बने हैं, बाबा के प्यार लूटने का खिंचवाने का समय है। जैसे बाबा ने कहा चुम्बक साफ़ सुई को खींचता है। घर में सब कुछ हो परन्तु सुई न हो तो काम का नहीं। ज़रा-सा जंक बढ़ी हो, तो काम की नहीं। सुई हो, धागा न हो तो भी सुई क्या करेगी।
बाबा ने कहा बच्चे तुम रहमदिल बनो, कल्याणकारी बनो। किसी को दोष मत दो। कुछ भी हो जाए, अच्छी तरह से पुरुषार्थ करके स्वयं को बिल्कुल स्वच्छ साफ़ बनाओ। ये तो ड्रामा बना हुआ है। जानते हैं। अगर हो तो भी दोष दृष्टि से न देखें। बल्कि क्षमा दृष्टि हो, जो वो भी बदल जाए। मेरा क्या है? रहमदिल, कल्याणकारी बनना। किसका दोष देखना, किसको दुःखाना ये मेरा दोष है। अपने को निर्दोषी बनाकर दूसरों को दोषी बनाना ये ठगी और चोरी है। हमको गुणचोर बनना है। कोई पूछे तो मेरे पास सबके गुण गठरी हो। गुण होंगे तो किसको भी बाबा का सहयोगी बना सकते हैं। मेरा सहयोगी होकर रहे, नहीं। आत्मा बाबा के समीप आये। इसके लिए रहमदिल, कल्याणकारी बनना है। तो विचार करो कैसे मैं कल्याणकारी बनूँ। स्नेही रहूँ, स्नेही तब रहेंगे जब साफ सुई होगी। धागा भी हो, सुई भी हो परन्तु जंग लगी हुई हो तो काम की नहीं। धागा भी कहाँ से कच्चा हो तो भी फायदा नहीं। पुराने ज़माने में मातायें घर में बैठ रील बनाती थी तो घड़ी घड़ी टूटता था। हमारी याद का धागा घड़ी-घड़ी टूटे तो अच्छा नहीं लगता। अभी-अभी चेहरा बहुत खुशीमें अच्छा चमक रहा है, और कुछ बात हुई या कोई याद आया तो चेहरा बदल गया। क्यों बदला ? मेरी नेचर या मेरा संस्कार उसकी छाया पड़ गई, खुशी चली गई। पहले अपने आप से क्वेश्चन पूछे, अन्दर सच्ची खुशी है? अगर किसी भी कारण से मेरी खुशी चली गई तो न मेरे साथ वालों को, न मेरे दर पर आनेवालेको मिलेगी। कारण कुछ भी हो लेकिन खुशी तो हमारी गई। अविनाशी बाबा से मेरेको अविनाशी खुशी मिली है। यह खुशी रूपी रत्न गायब न हो। कोई कुछ बोलते भी हैं, जैसे पत्थर मारते हैं तो भी खुशी गुम नहीं हो। इसके लिए पोजिटिव को बहुत-बहुत जमा करके रखे। तो एक तो पुरुषार्थ में कोई ठगी करते हैं, रीयल नहीं है। कोई ठगी नहीं करते परन्तु अच्छी तरह से सच्ची कमाई करने का ढंग नहीं हैं। इतनी सच की कमाई करें जो कुछ भी जाए। आत्म स्थिति के लिए सेवा के लिए। सेवा किसने की? सच्चाई ने मैंने नहीं की। मैं अभिमान को डालेंगे तो चोरी है। ज्ञान मिला बाबा से उसको मिक्स करके अपना बना के दिया, तो यह चोरी है। जो बाबा ने दिया उससे अपने अंदर में रग-रग में पावन बनने की शक्ति आई। पावन बनने की शक्ति है तो करेन्ट लगेगा। उसको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बस बीती सो बीती। अभी बाबा की याद की कमाल है। पवित्रता कठिन नहीं लग रही है लेकिन नैचुरल लग रही है। तो बहुत ध्यान में रखने की बात है। अपने आप को समझने और अपने आप को सुधारने वाली बात है। अपने को ठगना नहीं है। दूसरों का भी हमारे में वा ज्ञान में विश्वास तब होगा जब हमारे अन्दर पवित्रता और शान्ति की शक्ति होगी। जितना शीतलता उतनी मिठास, वो तब हमारे अन्दर आयेगा जब बाबा से प्यार होगा। बाबा से प्यार तभी होगा जब बाबा के सिवाय किसकी याद भूल से भी नहीं आये। मैं तो याद नहीं करूं परन्तु दूसरा भी मेरे को याद न करे। मेरे नाम-रूप को याद न करे। जब ज्ञान में आते हैं तो छः-सात मास बहुत खुशी होती, भगवान मिला। फिर थोड़ी खुशी कम हुई तो क्वेचन उठता खुशी कम क्यों हुई ? बाबा से पूछते - खुशी कम क्यों हुई? तो बाबा कहते- बच्चे, तुमने तो सब कुछ छोड़ा लेकिन तुम्हारे घर वालों ने तुमको नहीं छोड़ा। वही तुम्हारी खुशी को कम कर रहा है। मेरे में भी किसी का मोह न रहे, उसके लिए आत्म-अभिमानी स्थिति में रहने का अभ्यास चाहिए। पहले शरीर से तो मर गये ना। मरे को याद में किया तो वो भूत बन के लगेगा। इतना पुरुषार्थ जो उनका भी तुम्हारे में मोह न हो। जब तन समर्पण हो गया तो आत्मा भी समर्पण हो गई। तो तन, चाहे मन सब बाबा का है, या मैं क्यों समझें - मेरा फ़र्ज कहता है उनकी शादी में, उनकी मौत जाना चाहिए। नहीं। मरे तो मरे। जब हमारा लौकिक बाप शरीर छोड़ रहा था मैंने बोला- मैं क्यों सामने रहूँ, उसका मोह पड़ेगा वो बाबा को याद करे। मतलब न मेरा किसी में मोह हो, न किसी का मेरे में। अंदर होता मोह है परन्तु कहते हैं रहम। तो बाबा की मीठी शिक्षाओं को और बाबा के स्वरूप को साकार, अव्यक्त, निराकार तीनों को सामने रख करके हम अपना अच्छा सुधार कर सकते हैं।
संगम पर दो बातें कर लो। एक सब कुछ सफल करो, तन-मन-धन, श्वाँस-संकल्प समय सब सफल करो। दूसरा जो बीती बातें हैं उन्हें भूल जाओ। दो काम करो। फ्री हो जाओ। क्वालिटी वाला संकल्प, वाणी, कर्म हो। एक कर्म से अनेकों का कल्याण हो। और समय सफल हो, श्वाँस भी सफल हो तो आयु बढ़ेगी। बाबा की याद में रहने के आदती बनें। संकल्प ऐसा हो जो ड्रामा में हुआ पड़ा है, बाकी बीच में कोई बात आती तो भूल जाओ। देखते भी न देखो तो इससे हमारी याद की यात्रा अच्छी रहेगी। तो ऐसे बाबा की याद में रहने के आदती रहें। दौड़ने की हिम्मत नहीं तो उड़ने के लिए ज्ञान की गहराई और योग का बल चाहिए। परन्तु वो जब तक आये तब तक रूको नहीं, हिम्मत से आगे बढ़ो। कोई भी बात हमें रोक नहीं सकती। गीत है ना - निर्बल से लड़ाई है बलवान की...। बाबा दीवा जलाते हैं, तूफ़ान आता है। परन्तु हरेक को अपने दीवे की सम्भाल करनी है। तूफ़ान तो तूफ़ान है, उसको रोक नहीं सकते हैं, दीवा मेरा जगा रहे। ज्ञान का घी डालते चलो। कितनी भी हवा आये परन्तु दीवा जगा रहे। हमको ये काम करने का है। तो लिस्ट निकालनी है किसमें सेवा समाई है। हिम्मत और विश्वास, सच्चाई से पुरुषार्थ है तो बाबा मदद करता है। परन्तु हम बाबा को अलग करके मेहनत करते हैं। तो ऐसे मेहनत से अपने को छुड़ाना है। सच्चाई से पुरुषार्थ करना है।

बाबा के दिल तख्त पर बैठना है तो चारों सब्जेक्ट पर ध्यान देकर चारों अलंकार धारण करो

बाबा की हम बच्चों के प्रति यही इच्छा है कि जल्दी-जल्दी हम सम्पूर्ण बन जाएँ। सम्पूर्ण बनेंगे तो सहज ही हमारी सूरत से साक्षात्कार होगा। आत्माओं को सन्देश तो देना है परन्तु अगर साक्षात्कार हो जाए तो कभी उनको भूलेगा नहीं। अचानक किसको थोड़ा-सा लाइट का, फ़रिश्तों का साक्षात्कार हो जाता तो कितना भाग्यवान समझते हैं, उस घड़ी को भूल नहीं सकते। तो जैसे बाबा ने चारों सब्जेक्ट पर ध्यान खिंचवाया है। ज्ञान है तो सेवा है फिर ज्ञान भी तभी मुख से उच्चारण होता है जब ज्ञान दाता के साथ योग है। फिर जो शिक्षायें हैं वह हमारे जीवन में हों। बाबा ने कहा तुम कर्मयोगी, सहजयोगी रहो तो जिनके निमित्त बनेंगे उनके लिए सहज हो आयेगा। हम सिर्फ निमित्त बनेंगे। निमित्त बनने वाले को कर्मयोगी, सहजयोगी बनकर रहना है। लौकिक है चाहे अलौकिक उसमें ट्रस्टी रहना है। और अशरीरी रहने का अभ्यास करना है। अगर थोड़ा सा भी बोझ है तो पलड़ा नीचे आ जायेगा फिर धरती को आकर्षण और नीचे खींच लेगी। इसलिए बाबा ऐसी विधि सिखाते हैं जिससे एक सेकण्ड में अपने को हल्का कर सकें। सेकण्ड में शरीर से न्यारे हो जाएँ। दूसरा जितना भी कार्य व्यवहार है, बाबा का समझ कर करो तो हमारे पर बोझ नहीं होगा। सहयोगी हैं, बाबा की याद है, सेवा है तो श्रीमत अनुसार कर रहे हैं। शरीर निर्वाह अर्थ अन्दर से कार्य करते भी एक याद और दूसरा श्रीमत को पालन करने में मन बहुत शान्त रहता है। हर श्रीमत को पालन करने वाला सदा ही सफलता को पाता है। मनमत परमत ईश्वरीय मत को धारण करने में बड़ा इन्टरफियर करती है। मन-मत और पर-मत में अपने, चाहे दूसरों के पुराने संस्कार मिक्स हो जाते हैं। तो हमारे संस्कार शुद्ध नहीं बनते हैं। ईश्वरीय संतान के संस्कार नहीं बनते हैं, भविष्य ऊँच पद पाने के संस्कार नहीं बनते हैं। कम-से-कम हम बाबा के बच्चे, बाबा के दिल तख्त पर बैठने के लायक बनें। वहाँ एक बैठता है। आठ को नहीं बैठायेंगे। परन्तु हम तो अष्ट-रत्नों में आ सकते हैं। बाबा के दिल तख्त पर बैठने के लिए चारों अलंकार धारण करने होंगे। स्वदर्शन-वक्र सदा फिरता रहे। दूसरों का चिंतन करना बड़ा सहज है, भले पहले उसका रूप अच्छा होगा। धीरे-धीरे पर-दर्शन शुरु हो जायेगा। पर-दर्शन बहुत धोखा देता है। स्वदर्शन-चक्र में अन्तर्मुखता, एकान्त-प्रियता बाबा के साथ रहने का भाग्य अनुभव करना है। स्वदर्शन, अन्तर्मुखी एकान्तप्रिय बनाता है। एक बाबा के साथ रहने का भाग्य दिलाता है। उनसे जो प्राप्ति होती है तो लगता है मैं वो हूँ! एक तो कल्प पहले की स्मृति पक्की रहेगी। दूसरा हम आदि सनातन धर्म की स्थापना के कार्य में मददगार हूँ, तो ऊँच पद पाने का संकल्प सदा काम करता रहेगा। स्वदर्शन-चक्र फिराने वाले को यह ध्यान होगा कि सर्व गुण हमारे में आ जाएँ, एक भी जरा भी अवगुण न हो। दूसरे का भी अवगुण हमारी वृत्ति में न हो। वृत्ति का दृष्टि से दिखाई देता है। हमको विशेष आत्माओं की लिस्ट में आना है तो विशेषताओं को देखते चलें। हरेक की विशेषता से हमको प्राप्ति है और उनके लिए लव रिस्पेक्ट पैदा होता है। तो जितनी संकल्पों में स्वच्छता, सफाई है वही हमको बाबा के समीप ले आती है। औरों को अपने आप स्वच्छता और सत्यता बाबा की तरफ़ खींचेगी। हमारे अंदर अगर सफाई-सच्चाई है तो कैसा भी मन का रोगी होगा, उसको विश्वास बैठेगा कि हम यहाँ से ठीक हो जायेंगे। जो खुद उमंग-उत्साह में रहने वाला है, अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाला है। चारों ही सब्जेक्ट में पूरा ध्यान रखने वाला है, वह बिल्कुल लाइट रहता है। स्वदर्शन चक्र हमको लाइट बनाता है, पर-दर्शन भारी बनाता है। फिर कमल फूल समान न्यारे हैं। फिर शंख बजाए आवाज़ दूर तक पहुँचाने वाले सेवाधारी हैं। उस आवाज में कल्याण भावना होगी, बाबा के बोल का सार होगा। वृत्ति और वाइब्रेशन द्वारा दूर तक आवाज पहुंचेगा, जैसे हमें कोई बुला रहा है। तो सच्चे सेवाधारी बनने के जो इच्छुक हैं, वो पहले तीन सब्जेक्ट पर पूरा ध्यान रखेंगे। ज्ञान के बिगर योग नहीं, योग के बिगर धारणा नहीं। धारणा की कमी है तो कहेंगे योग नहीं। योग की कमी है माना ज्ञान की कमी है, और ज्ञान क्या है 'बाबा मेरा मैं बाबा का।'
किसी ने कहा मुझे बाबा से डर लगता है। लेकिन कोई कैसा भी बच्चा होगा माँ-बाप से कभी नहीं डरता। माँ-बाप कहेंगे कैसा भी है बच्चा मेरा है। हमें संगमयुग पर बहुत अच्छा भाग्य मिला है। लौकिक रीति से अगर हमारी मोह की रग टूटी है, कोई लोभ लालच नहीं है तो परमात्मा से माँ-बाप का प्यार ले सकते हैं। सुधारने का उसको ख्याल बहुत है, प्यार करेगा। दीदी ने सिखाया बाबा से सखा रूप में प्यार कैसे रखो। कोई बात और किसी से करने की आवश्यकता नहीं जो करना है बाबा से करो। और किसी को मन की बात सुनाने की आवश्यकता नहीं है। तो कहेंगे आपस में क्या बात करें! स्व-उन्नति की करो। मन की बात बाबा को सुना दो। हमें सारी लाइफ का अनुभव है- साकार में होते हुए भी भले ऐसे बाबा से कुछ नहीं पूछते थे। बाबा सप्ताह में एक बारी मुश्किल से मिलता था। लेकिन रात को अगर कोई प्रश्न उठा तो उसका जवाब सवेरे की मुरली में मिल जाता था। मैजारिटी को यह अनुभव होगा। बाबा कहता बच्चे, तीन पेज़ का पत्र रोज़ तुमको लिखता हूँ, रोज़ तुम्हारे पास आता है। प्रेम से पत्र पढ़‌कर हृदय से लगाओ। प्रियतम का पत्र होता है तो बार-बार पढ़ते हैं। मुरली ऐसे ही नहीं सुननी-पढ़नी है। एक-एक बोल हमारे लिए काम लायक है। कम से कम इतना तो सहज देखें। हमारा सभी सब्जेक्ट में बैलेन्स ठीक है तो कभी ऊपर-नीचे होता। एक्यूरेट हों, आलराउण्डर होंगे, अलर्ट होंगे। अलबेलापन, सुस्ती हमारे पास आयेगी नहीं। कोई बहाना नहीं बनायेंगे। एवररेडी रहेंगे। जैसे साइन्स वाले बटन दबाने तब पहुँच गये हैं, ऐसे सेकण्ड में बाबा की याद आई, दूसरों को साक्षात्कार हुआ। इतनी हमारे अन्दर साइलेन्स शक्ति जमा हो। मुरली हमारा भोजन है, इसका कभी उपवास नहीं रखना है। बड़ी जॉब वाले भी दो दिन हॉली डे रखते हैं। हमें तो २१ जन्मों के लिए कमाई करनी है। बाबा कहता है ४ घण्टा याद करो तो २० घण्टा क्या करेंगे? भूल जायेंगे। नहीं। रात को सोयेंगे भी तो बाबा की याद में। बीच में आँख खुलेगी तो भी देखेंगे बाबा की याद है। हम आपस में बातचीत करते हैं, जरा-सा भी फालतू बात आई तो एक दो को भी सावधान करो, खुद भी रहो कि ज़रा भी न आये क्योंकि पहले ज़रा-सी ज्ञान की बात रहेगी। सेवा की रहेगी फिर फालतू हो जाती है। कोई ज़रूरत नहीं है। हमने ऐसा स्ट्रिक्ट पुरुषार्थ किया है, उसका बहुत फायदा है। ज्ञान की बात है तो आठ के बीच में भी कर सकते हैं, अकेले क्यों! ये बहाना होता है हम ज्ञान के बारे में बात कर रहे हैं या फालतू। सच्चा योग माना एक सेकण्ड में आवाज़ से परे जाना। अब तो मुझे अन्दर साइलेन्स में पावरफुल स्थिति में रहना है। अंदर की पावर जमा करनी है।
बाबा पावन बनाने के लिए बहुत प्यार करता है, इशारा करता है- ये तुम्हारे पास अपवित्रता है। जो कहाँ न कहाँ बुद्धि खींचती है जिससे तुम्हारी शान्ति भंग होती है। तुम्हारी कमजोरी के कारण माया एडवान्टेज लेती है पकड़ने का। तो हमें निरन्तर योगी बनना है। कर्म में भी योगी। व्यवहार में भी, सम्बन्ध में भी बाबा के साथ योग है। आत्मा इस देह में है ही विदेही बनने के लिए, देह में बैठे यह पुरुषार्थ कर रही है। दूसरे की देह का आकर्षण मुझे विदेही बनने नहीं देगा।
हम सब आपस में एक क्लास के फ्रैण्ड हैं। एक-दो के लिए भाई-भाई की दृष्टि है। कोई किस पर आर्डर नहीं करते, सब आर्डर में चलता है। बाबा हमको आने वाली दुनिया के लिए संगमयुग पर राजा बना रहे हैं। बाबा हमारा साथी है, हम बाबा के साथी हैं- ये है संगमयुग के मिलन की शक्ति।

जो सच्चे, स्वच्छ और सर्विसएबुल हैं वही बाप के प्यार के पात्र हैं

बाबा उन बच्चों को याद करता है जो अच्छी तरह से पढ़ते हैं, बाबा को याद करते हैं और जो खुशबूदार फूल हैं, जो सबको सुख देते हैं। जैसे परमधाम निवासी बाबा को सेवा चाहिए। भक्तों की भी सेवा, बच्चों की भी सेवा.. इसलिए परमधाम निवासी बाबा ब्रह्मा बाबा के तन में आया। बाबा कहते थे जिसको ज्ञान दो उसे बाबा का टेलीफोन नम्बर और एड्रेस दे दो। बाबा का फोन नम्बर कौन-सा है? पत्र लिखना हो तो एड्रेस कौन-सी है? केयर आफ ब्रह्मा, माउण्ट आबू। बाबा राजस्थान में, माउण्ट आबू में आया, ब्रह्मा बाबा के तन में आया। ब्रह्मा बाप द्वारा उनको देखा। अगर कोई सवाल पूछे कि क्या तुमने भगवान को देखा है? तो क्या जवाब देंगे ? बाबा ने कहा कि तुम जवाब दो कि पहले ब्रह्मा बाप द्वारा उसे जाना है। फिर जानने से देखा है। अच्छी तरह से जाना है फिर उनके द्वारा पाया है। फिर उनके द्वारा जो प्राप्ति है वो औरों को कराते हैं। यह पढ़ाई बताती है कि भगवान के बिगर कोई नहीं पढ़ा सकता है। शिवबाबा कैसे पढ़ा रहा है। ब्रह्मा का मुख है परन्तु बोल उसके हैं। बाप कहता है मुझे याद करो और ये कहता है उसे याद करो। जैसे बाबा खुद निष्कामी है। जैसे हैं वैसे हैं सबको पावन बनाता है, सबका उद्धार करता है। पापी, साधू, भक्त सबका उद्धार करता है। पहले उद्धार किसका करेगा? भगवान के सामने एक पापी, एक साधू आता है, एक भक्त आता है - पहले उद्धार किसका होगा? पापी कहेगा हे भगवान हमको क्षमा करो, वो जल्दी सुधर जायेगा। भगत को भक्ति छोड़ना मुश्किल है। उसमें भावना बहुत है। साधू अपने अभिमान में है, इतने सब मेरे फालोअर्स हैं। वो अभिमान छोड़े, वो भावना छोड़े। पापी कहता है मुझे क्षमा करो। रियलाइज़ेशन पापी को जल्दी होती है। मेरे को भगवान पावन बना रहा है। बस, शरण पड़ूं मैं तेरे! तुम फिर भी मेरा उद्धार करते हो। तो भगवान को क्या चाहिए? सिर्फ उनके बच्चे होकरके रहो। समझदार को एक सेकण्ड में आता है कि ये सच है। यही सहारा देने वाला है। यहीं हमको सुधार करके इन्सानियत सिखा रहा है। देवता पीछे बनेंगे, पहले इन्सान तो हों। इन्सान को झूठ-सच, पाप-पुण्य को समझने और मानने का बुद्धि-विवेक है। कोई भी धर्म हो। दिल सबके एक जैसे हैं, वृत्ति शुद्ध-अशुद्ध एक जैसे हो सकती है। फीलिग खराब या अच्छी एक जैसे हो सकती है। कम से कम रहमदिल और सच्चा तो रहो। सन्तुष्ट तो रहे। मीठा तो रहो। किसको गुस्सा तो नहीं करो। छोटी बात में असन्तुष्ट तो नहीं हो जाओ। बाप की शिक्षा से पता चलता है, ये शिक्षा हर धर्म जति रंग वाले के लिए है। भगवान प्यार दे करके हमें शिक्षाएँ देता है। हमेशा बाबा की शिक्षा याद आती रहे। एक बाबा की समझानी स्पष्ट है जो बुद्ध भी समझ जाए। शिक्षा भी है, सावधानी भी है, समझानी भी स्पष्ट है। ऐसे नहीं जल्दी हाँ जी करो। समझो, सोचो, करो। बाबा बार-बार स्पष्ट समझाता रहता है। जब से बाबा के पास आते हैं, समझाना छोड़ता नहीं है। ये भी नहीं कहता है कि मैंने इतनी बार समझाया, तुम क्यों नहीं समझते हो! और टीचर तो गरम हो जाए- मैं इतना बारी रोज़ समझाता हूँ। आयरन एज बुद्धि को, कलियुगी बुद्धि को चेन्ज करते-करते सतयुग में लाने के लिए उसकी बुद्धि को इतना चेन्ज कर रहा है। कलियुग से निकल संगम पर आये हैं सतयुग में जाने के लिए। बाबा समझा के कहता है- समझा!
जब से हम बाबा के बनते हैं तब से सोचते हैं टाइम बहुत थोड़ा है। सच्चा बाबा का बच्चा कभी नहीं कहेगा टाइम पड़ा है। नहीं, मुझे जल्दी एवररेडी बनना है। बाबा मैं आपकी पलकों में बैठ घर चला जाऊँ। बस, बाबा-बाबा, आप मेरे हो, मेरे को आपके सिवाए न कोई अच्छा लगता है, न इच्छा है, न कामना है, न स्वार्थ है..... बाबा आपने मुझे फ्री कर दिया। उसके अंदर से आवाज़ निकलेगा। भावना से नहीं विवेक और विश्वास से तथा अनुभव से कहेंगे बाबा आपने तो कमाल कर दिया। भगवान को दिल की सफाई बहुत प्यारी लगती है। जो एकदम सच्चे हैं, राइट हैं वह बाबा का प्यार खीचते हैं, बाबा का प्यार उन्हें पावन बनाता है। बाबा की मुरली है 'प्यार का पत्र।' बाप उन बच्चों को याद करता है जिनको सर्विस से सच्या प्यार है। जो पढ़ाई पर ध्यान देते हैं, योगयुक्त हैं, अभिमान में नहीं हैं। तो ऐसे जो स्वच्छ हैं वो बाप के प्यारे हैं। बाबा का मेरे ऊपर राइट हो (अधिकार हो) बाबा कहता है - मेरा तेरे पर अधिकार है। बाबा को राइट हैण्ड चाहिए। भुजा तो दोनों हैं परन्तु लेफ्ट हैण्ड माना थोड़ी वीकनेस। थोड़ा सा करेगा थक जायेगा माना लेफ्ट हैण्ड। राइट हैण्ड माना अथक। राइट हैण्ड कहेगा बाबा करा रहा है, लेफ्ट हैण्ड कहेगा - मेरे को करना है, कर सकूँगा या नहीं। हमें तो राइट हैण्ड बनना है। अच्छा।

कर्मो की गुह्य गति को समझ सच्चे बनो तो शक्तिशाली बन जायेंगे

जैसे श्वांस नैचुरल चलता है वैसे बाबा की महिमा, बाबा के गुण अपने आप अन्दर से गाते रहना माना अतीन्द्रिय सुख में रमण करते रहना सहज हो गया है। गीत खुशी में गाये जाते हैं, गाने वाले को और सुनने वाले को बड़ी खुशी होती है। गाने वाले का मुख गा रहा है, सुनने वाले का पाँव नाच रहा है। तो संगमयुग इतना सुहावना युग है जो सतयुग से भी हमको प्यारा लगता है। सतयुग में तो स्थूल में भी प्रकृति के द्वारा अथाह सुख आटोमेटिक होंगे। यहाँ प्रकृति अपना काम कर रही है, प्रकृति के अधीन न होने के कारण प्रकृति भी सेवा में, चाहे स्व-उन्नति में साथ दे रही है।
हम सच्चे बाबा के बच्चे हैं, बाबा के बने हैं और सदा बनके रहें यह मन में हम सभी का अच्छी तरह से वायदा है। माया अपने तरफ़ हमारा मुँह फेर न लेवे इसलिए खबरदार हैं और अन्त मते सो गति अच्छी हो यह भावना अपने लिए है। इतनी अच्छी हमारी अन्त मते हो जिसका पता हमें अभी ही चलता हो, इतना ख्याल अन्त मते का अभी है। हर एक का अपना-अपना पार्ट होते हुए बाबा कर्मों की गुह्य गति समझा करके आगे बढ़ाने के लिए समझदार बनाके सबकी सद्‌गति करा रहे हैं। इसके लिए एक खुद को समझें और बाबा को अपना बना देवे।
सोचने और कहने में बाबा मेरा और करने में मैं बाबा की हूँ और किसी की नहीं हूँ- यह फीलिंग हो तो बाबा कहेगा मैं तेरा तू मेरी हो। यह बड़ा अच्छा और सस्ता सौदा है। भगवान से डायरेक्ट ऐसा सौदा करने का चांस संगम पर ही मिलता है। एक देवे दस पावे यह सौदा कितना अच्छा है। तो समझदार वह जो ऐसा चांस न गँवाये क्योंकि 'अब नहीं तो कब नहीं'। यह अपने आपको चेतावनी देने के महावाक्य है। 'अब' का 'कब' के साथ कनेक्शन है। कर्मों का जो बोझ है वह आत्मा को बहुत हैरान, परेशान करता है। इसी बोझ के कारण वह मन तथा कर्मेन्द्रियों के गुलाम हो गयी है। इन विकारी कर्म-बन्धनों ने गुलाम बना दिया है। सच्चा होकर रहने के लिए स्वतंत्र नहीं है। माया पहले तो झूठ बोलना सिखाती है, झूठ बोलने वाला यह कह नहीं सकेगा कि मैं बाबा की हूँ, बाबा मेरा है। इसलिए अपने आपको समझकर सच्चा रहना है और सदा के लिए अविनाशी सच्चा सुख पाना है, फिर सन्तुष्ट भी रहना है। अपने आपको समझा है, कर्मों की गति को समझा है, हल्के हैं, सच्चे हैं, श्रेष्ठ कर्म करने में स्वतंत्र हैं। उल्टे कर्म हमारे से हो नहीं सकती है इसलिए हम इससे भी फ्री हो गये हैं। कोई ऐसा उल्टा काम हमारे से करा भी नहीं सकता है। साधारण भी अच्छा नहीं लगता है क्योंकि समय सफल नहीं हुआ। तो आत्मा अपने आपको समझके कहती है मैं तो अभी मालिक हूँ। मालिकपने का नशा तभी रहेगा जब मैं बाबा की बालक हूँ। बालक हो तो मालिक हो।
बाबा सच बोलने की ट्रेनिंग देता है, किसी को समझाने के लिए रूहाब चाहिए। वो सच्ची बात सुनाने में हिचकेंगे नहीं और ढंग से, युक्ति से सुनायेंगे। किसका उद्धार करने के लिए सुनायेंगे। फिर सच सुनाने में कोई अन्दर डरेंगे नहीं। सच्चा रहने में बहुत फायदा है। सारे पुराने विकर्मों का विनाश करना हो, अभी भी रहे हुए जो कर्म बन्धन हो या कुछ हिसाब-किताब हो उसको चुक्तू करना हो और भविष्य के लिए ऊँची प्रालब्ध पानी हो तो और कुछ न हो लेकिन सच्चे रहो। सपूत वो जो सबूत दे। सच्चाई का सबूत हरेक के दिल से निकलेगा कि यह सच्चा है। वह खुद नहीं बोलेगा देखो, मैं सच्चा हूँ। उनको थोड़ा सा झूठ या बनावटी बोल आयेगा नहीं।
जो सच्चे हैं वह सदा सन्तुष्ट रहते हैं। सच्चे हो करके रहने से सदा विजयी हैं। सच्चे को हिम्मत है, जो सच्चा होता है वह सदा सम्पन्न होता है। वह कभी हलचल में आ नहीं सकते हैं। और उसमें कुछ भर भी नहीं सकता है। सच्चे रहने वाले को कभी कोई दुःख पिन मात्र भी महसूस नहीं होगा। उसके पास धीरज और शान्ति का गुण रहता है इसलिए किसी परीक्षा में घबराता नहीं।।
तो हमारी दृष्टि वृत्ति में एक दो के भले की भावना के लिए सच्चाई हो क्योंकि सच्चाई में प्रेम समाया हुआ होता है। सच्चाई में समझ है। मन में पूरी और यथार्थ सच्चाई नहीं है तो समझ ठीक काम नहीं करती है। कईयों में अपनी समझ का भी अभिमान होता है। सच्चा अन्दर से कोई भी प्रकार के अभिमान से फ्री रहता है। सच्चे की यही एक इच्छा होती है कि जैसा बाबा है, वैसे मैं रहूँ। बाप समान बनने के लिए वह फालो करता रहेगा। बाप समान बनने लिए सच्चा रहना है बस, और कुछ नहीं करना है क्योंकि कदम में पदम है, श्रीमत अच्छा बनना सिखाती है, अच्छा बनने में मदद करती है। मन-मत माना मन में श्रीमत के अलावा और भी कुछ बातें हैं। तो सच्चे को श्रीमत पर चलना बड़ा सहज है। उनके आगे कोई मुश्किलात आ नहीं सकती है। आती है तो वह चली जायेगी और सच्चे की जय हो जायेगी, यह गैरंटी है। यह हमने देखा है और हमें अनुभव भी है। तो सच्चाई का प्रत्यक्ष फल क्या है? शक्ति। खुशी तो है परन्तु शक्ति भी है।
सच्चाई की शक्ति हमको आगे बढ़ाती है। सत्थता की शक्ति से अपने आपको बाप समान बना सकते हैं। आत्मा बाप के संग में रहे तो आत्मा के अन्दर वह सत्यता की शक्ति आयेगी। आत्मा में जो झूठ भर गया है वह अलाए निकल जायेगी। इस शरीर में ही आत्मा अपने को बाबा की याद से, उनके संग से सतोप्रधान बना रही है जिसके आधार से फिर शरीर भी वैसा मिलेगा। तो अभी आत्मा और शरीर दोनों को पावन बना रहे हैं क्योंकि बाबा कहते कि तुम अभी देवता बन रहे हो तो तुम्हारे लिए ऐसी नई दुनिया बन रही है। पुरानी दुनिया का विनाश भी हमारे लिए ही बाबा करा रहा है। वह विनाश करने वाले माना सफाई करने वाले अपना काम कर रहे हैं और हमको अपना काम करना है। हमारे काम में कुछ मेहनत नहीं है सिर्फ सच्चा रहना है। और यह पुरुषार्थ सच्ची दिल से करना है क्योंकि मैं बाबा की हूँ फिर बाबा की हो करके रहने के लिए बाबा कहेगा तू मेरी बच्ची ! सच्ची बन। सच्चे बनेंगे तो मजबूत हो जायेंगे और जो मज़बूत हैं वही माया से विजयी रहेंगे।
सच्चे रहेंगे तो हमारी खुशी कोई छीन नहीं सकेगा, उसको और ही खुशी दे देंगे। तो कर्मों की गुह्य गति को समझने से ही सच्चे बनते हैं। किसके लिए हम झूठ-चोरी करू, किसके लिए मैं थोड़ा ऊपर-नीचे करूं... जैसे वाल्मीक डाकू का मिसाल है। झूठ, चोरी, ठगी और निन्दा यह चार बातें जिसमें होंगी उनको कौनसा डाकू कहेंगे ? ईमानदारी क्या होती है, उस वैल्यु का पता न होने के कारण वह ठगी कर लेता है। ठगी वाला, दिखावे वाला, काम चलाऊ काम करता है। करना कुछ और सोचना कुछ और बोलना कुछ और... यह सब ठगी है। तो ऐसों में किसी का विश्वास नहीं होगा। और सबसे बड़ी डिफीकल्टी है- निन्दा न करें न सुने। भूल से भी निन्दा किसी के संकल्प में भी न आये, इन सबसे मैं जब फ्री हो जाऊँ तब तो सतयुग में आने का सोचें, पुरुषार्थ करूँ। तो उसके लिए पहले स्वराज्य-अधिकारी बनना है। सतयुग में विश्व के राज्य-अधिकारी बनने के पहले अभी जो
स्वराज्य-अधिकारी बनने का नशा है, खुशी है वह बहुत निराला है तो अभी उसका आनन्द लेना है।
हम जब साकार बाबा को देखते थे तो लगता था कि बाबा इतना हल्के कैसे हैं! सारे विश्व सेवा की ज़िम्मेवारी बाबा के ऊपर है परन्तु बाबा विष्णु के तरह से लेटा हुआ है और विचार-सागर मंथन कर रहा है, साथ-साथ तपस्या में भी बैठा हुआ है। फिर हर कार्य करते हुए कभी बाबा यह नहीं कहता मैंने किया, कर्त्तापन के भान से कोसों दूर है। चेहरे से भी नहीं लगता कि बाबा को यह करना है या बाबा ने यह किया है। विश्व पर राज्य करना है तो वह संस्कार अभी यहाँ बनाने हैं, यथा राजा तथा प्रजा वहाँ होंगे। वहाँ प्रजा भी बहुत सुखी होगी क्योंकि उन्हों में भी यथा शक्ति सत्यता की शक्ति, पवित्रता का बल होगा तब तो सतयुग में आयेंगे। परन्तु बहुतकाल से ले करके सच्चा रहने वाला, किसी हालत में भी मुख से चाहे मन में किसके प्रति निन्दा न किया हुआ हो। निन्दा करने, सुनने अथवा उस दृष्टि से देखने की आदत जो है, वह आत्मा को शीतल और शान्त रहने नहीं देगी। अन्दर जैसे गुस्से वाला लगेगा क्योंकि अन्दर में माना बुद्धि में निन्दा रूपी भूसा भरा हुआ है।
जिसके प्रति निन्दा है वह मुख से जब तक नहीं बोलेंगे तब तक उसका चेहरा देखने वाला होता है। कोई ने किसी कारण से भी उसकी निन्दा की है तो रिटर्न में उसकी निन्दा करने के बिगर उसको नींद नहीं आयेगी। उसको ऐसे साथी चाहिए सुनने वाले। वह सारा दिन इसको उसको सुनाने के चिन्तन में ही होंगे। तो ऐसे क्या बाबा को याद करेंगे?
कर्मों की गुद्धा गति में निन्दा भी बहुत-बहुत कर्म-बन्धन में फंसाती है। जिसकी निन्दा की, जितना समय चिन्तन में भी की तो हिसाब-किताब जुटा। जिस घड़ी उसकी शक्ल याद आती है तो गुस्सा आता है ऐसे मेरे से क्यों किया ? इसके कारण उनसे बात नहीं करेंगे, तो अभी यह क्या है? अरे उनसे बात भले न करो परन्तु तुमने बाबा से बात करना क्यों बन्द किया? अन्दर इतना गुस्सा होता जो बाबा से मुझे बातें करनी हैं, अपने को शीतल बनाना है यह भूल जाते हैं।
बाबा ने कहा है- बच्चे, चलो ठीक है, अभी तो बीती सो बीती करो और अपने को ठण्डा करो। तो किसको माफ कैसे करो फिर भूल कैसे जाओ ? अगर इन चारों बातों से मुक्त होना है तो अपने को माफ करो, दूसरों को भी माफ करो। माफकरने के बिगर भूलेंगे नहीं। फिर फिर उसकी भूल याद आयेगी तो बुद्धि भटकेगी। एक बार का किसी का किया हुआ गुस्सा मेरे को बार-बार याद आता रहे तो सोचो मेरी क्या गति होगी? मान लो उसमें ही मैं मर जाऊँ, शरीर छोड़ दूँ तो उसका वहीं गुस्से वाला चेहरा सामने आयेगा तो फिर मेरा क्या हाल होगा? अभी अगर हम ख्याल करेंगे कि हमारी अन्त मते अच्छी हो, तो अच्छी हो माना सब कुछ भूला हुआ हो। कोई किसकी याद न आवे, अगर अभी मेरा यह पुरुषार्थ किया हुआ होगा, मेहनत की हुई होगी तो हम गैरन्टी से कह सकते हैं कि ८४ जन्म ही मेरी गति अच्छी होगी। फिर कभी हमारे लिए कोई काल नहीं आयेगा यह पक्का है। तो किसके प्रति भी हमारे मन में दुःख-ग्लानि की बातें न हो।
चलो किसकी कुछ भी नेचर हो परन्तु मैं अपनी नेचर को ऐसा नाजुक न बनाऊँ, जो किसी की बात से मेरी नींद फिट जाये। नाजुक नेचर स्व सहित सर्व के लिए बहुत खतरनाक होती है। बहुत दुःखी बनाती है तो अपनी नेचर को कोमल नहीं बनाना है। कमल के फूल के समान रहने वाला बनाना है। जो हुआ ठीक है। गम्भीरता, सच्चाई और सयानप कहती है ठीक है। इसके लिए मम्मा को सामने रखो। ऐसी अच्छी-अच्छी बातें बाबा सिखा करके हमें अक्लमंद बनाता है। जितना अक्लमंद बनते हैं, बाबा की मीठी-मीठी बातों को मन में रखते हैं उतना मन मौज में रहता है। विवार करके और इस बात का अनुभव करके देखो। दूसरे कई ऐसे भी हैं जो अभी-अभी मौज में होंगे, अभी अभी मूझे हुए होंगे तो यह फिर क्या है। उसमें भी नाजुक नेचर कोई बात निर्णय करने नहीं देती है क्योंकि शक्ति नहीं है। कोई अच्छी राय देता है तो वह उसको समझता नहीं है क्योंकि राय को समझाने के लिए भी मन मौज वाला होना ज़रूरी है। मूँझने की नेचर राइट काम करने, राइट समझने नहीं देती है। कहेंगे अभी तो मेरे को छोड़ दो क्योंकि मेरा मुड़ ठीक नहीं है।
अगर कोई चाहे कि मेरी सद्गति अच्छी तरह से हो तो इसके लिए १. मूझना २. घबराना ३. डरना। यह तीन बातें उसके पास नहीं होनी चाहिए। मूँझने में ही टाइम जा रहा है, घबराने में ही घबराहट आ रही है और अन्दर डर लग रहा है। तो यह बातें बहुतकाल से अन्दर संस्कारों में जो भरी पड़ी है, उसको अभी समझ (ज्ञान) और योग से निकालकर अपने संस्कारों में शुद्धता और शीतलता लानी है। पहले उल्टे कर्म किये हैं इसलिए यह तीनों बातें हैं। अभी अच्छे कर्म करने से यह तीनों बातें बदल गयी। कैसी भी बड़ी बात आयेगी तो घबरायेंगे नहीं। बाबा कहते हैं - तुम निर्भय बनो और निर्भय वह बनता है जो निर्वैर है। किसके लिए भी वैर भावना नहीं है। किसके लिए भी वैर-भाव है तो उसको डर ज़रूर होगा। तो अपने आपको समझना और सुधारना यह है अपने ऊपर कृपा करना। देखा जाता है जो सदा इसी चिन्तन में रहता है उसको ईश्वरीय परिवार से मदद मिलती है। वही सबके प्यारे बनते हैं। किसी बात की भी चिंता नहीं है, किसी भी पर-चिन्तन से परे हैं तो फ्री हैं। जो इस प्रकार से फ्री हैं, परे हैं वही सबको प्यारे लगते हैं। और ऐसे न्यारे प्यारे रहने वाले किसी की बात के बीच में भी नहीं आते हैं।
अपने आपको सेफ रखना हो तो फालतू किसी के झंझट में नहीं जाना है। हरेक का कर्म-बन्धन अपना है। हम कहें बिचारे का यह हाल है, अरे तुम बिचारा-बिचारा कह करके अपना टाइम तो वेस्ट नहीं करो ना। हमें तो बाबा का सच्चा मददगार बनना है। बाबा का मददगार बनना माना सबका मददगार..... मददगार हैं तो सबके हैं। एक के नहीं और खास किसके नहीं हैं। खास किसके लिए अगर किसी को तरस पडता है तो कर्मों का हिसाब-किताब है। खास किसको मदद करने के लिए मुझे ख्याल आते हैं तो अटैचमेन्ट (मोह) है। हमको तो निर्मोही बनना है। एक तरफ़ सर्विसएबुल बन सेवा करनी है, दूसरे तरफ़ निर्मोही बनना है। सच्ची सेवा करते हुए भी किसी का नाम रूप-सामने न आये। तो मेरे अन्दर में व मेरे सामने सदा बाबा का ही नाम-रूप आये - यह ध्यान रखें। बाबा का नाम-रूप घड़ी घड़ी सामने आये तो यह बड़ी अच्छी बात है क्योंकि बाबा का नाम-रूप इस दुनिया से न्यारा है।
अभी सदा बाबा के साथ रहने का अनुभव करो क्योंकि बाबा के साथ जाना है और सतयुग में आना है तो बाबा के साथ के अनुभव की शक्ति सतयुग में ले आयेगी। भले बाबा कहते हैं मैं वहाँ साथ नहीं आता हूँ, परन्तु साथ का अनुभव तो साथ में आता है। अभी हम बाबा के साथ होंगे तो माया की छाया भी नहीं पड़ सकती है क्योंकि छत्रछाया है। छतरी हाथ से पकड़कर ऊपर रखते हैं, हाथ है माना साथ है। जब शादी भी करते हैं तो हथियाला बाँधते हैं, हाथ, हाथ में देते हैं। भक्तिमार्ग में जब कोई शरीर छोड़ते हैं तो उस घड़ी भी उनके हाथ से दान कराते हैं। समझेंगे यह अन्तिम घड़ी है ना इसलिए यह अपने हाथ से कुछ दान-पुण्य करे।तो हाथ में बड़ी कमाल है, कहते भी हैं ना कि यह हाथ की कमाल है। न दिल को देखते हैं न दिमाग को देखते हैं, फटाफट जो आता है सो करते रहते हैं। इसलिए पहले तो अपने दिल पर हाथ रखो। तो पहले है दिल इसलिए दिलवाला बाप का गायन है। तो दिल से पूछना होता है- मैं सच्ची दिल से बाबा को याद करती हूँ? सच्ची दिल मेरी बताती है। सेवा सच्वी दिल ही तो करा रही है। कभी कहते हैं कि बाबा करा रहा है फिर हम कहते हैं बाबा कैसे करायेगा। सच्ची दिल से बाबा करा रहा है। सच्ची दिल से साहेब भी राज़ी। सब राज़ी कोई नाराज़ नहीं होगा। कोई अगर हमारे से नाराज होता है तो मेरी सच्ची दिल नहीं है। सच्ची दिल वाले अगर साहेब को राजी कर सकते हैं तो क्या आत्माओं को नहीं कर सकते हैं? नाराज होने वाले का अपना स्वभाव है, हम उसके वश क्यों बने ? हम अपना स्वभाव राजी रहने और राज़ी करने का बनायें। बाबा कहते कि तू किसको नाराज़ मत कर। इसके लिए एक गुण की आवश्यकता है? धीरज। पीसफुल नेचर मीठा बनाती है, सबको राजी करती है। पहले धीरज को धारण करो तो मीठा बनेंगे। नहीं तो मीठा बनना बहुत मुश्किल है, अगर धीरज नहीं है तो सेकण्ड में कड़वा शब्द निकल जायेगा। तो पहले हमको अन्दर से हो कि मेरा बाबा मेरे से राज़ी रहे। मेरा बाबा मेरे ऊपर राज़ी रहा तो मैं स्वराज्य-अधिकारी ज़रूर बनूँगी। अच्छा - ओमशान्ति ।