ज्ञानसुधा
भाग-3
दो शब्द प्रकाशक की ओर से
जैसे नल से पानी की धारा बहती है, वैसे ही निरन्तर मनन-चिन्तन के द्वारा ज्ञान-रत्नों की सतत धारा प्रवाहित करने वाले आदरणीय भ्राता जगदीश जी को विश्व के निराकार पिता शिव ने और साकार पिता प्रजापिता ब्रह्मा ने कलमधर बनाया। मुरलीधर बाबा की मीठी शिक्षाओं को इस अनोखे कलमधर ने मनन-चिन्तन के अगणित मोतियों से सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाकर सर्व के लिए स्वीकार्य, सुग्राह्य, प्रेरणाप्रद और रमणीक बना दिया। वे इस यज्ञ में उस समय आये जब पगडंडियाँ तैयार नहीं थीं, वे अपनी ओजस्वी लेखनी से, अपने बाद आने वालों के लिए बीहड़ (ऊबड़-खाबड़) के बीचोंबीच सुलभमार्ग बनाने में निरन्तर लगे रहे। इस एकनिष्ठ तपस्वी ने मास्टर भगीरथ बन अपने एक-एक संकल्प, श्वास और समय को यज्ञपिता की आज्ञानुसार, यज्ञ और यज्ञ-वत्सों की सेवा में बलिहार कर दिया।
प्रभु-प्रेम में डूबे उनके निर्मल हृदय-सरोवर में उपजे भाव-कमल जब शब्द बनकर काग़ज़ पर उतरे या शब्दामृत बनकर उनके मुख से बहे तो किसी के लिए वे मार्गदर्शक, किसी के लिए सान्त्वनादायक, किसी के लिए आशा के दीपक, किसी के लिए लाइट हाउस और किसी के लिए आशीर्वाद तथा वरदान सिद्ध हुए। उन्हीं भाव-कमलों में से चुनिंदा को इस 'ज्ञानसुधा-तीन' में संकलित किया गया है।
कई भाई-बहनों को आज भी अपने दिल में एक ऐसा कोना महसूस होता है जो जगदीश भाई को साकार में ना देख सकने के कारण खाली है। प्रस्तुत पुस्तक उस खाली कोने को अवश्य भरेगी। दिल के आइने सदृश इस पुस्तक में उनकी समय पाबन्दी, संकल्पशक्ति का पूर्ण सदुपयोग, सम्मान देने की अलौकिक रीति, उमंग-उत्साह, बाबा के प्रति अनन्य समर्पण भाव,एक-एक ब्राह्मण आत्मा की उन्नति का ओना आदि स्पष्ट दृष्टिगोचर होने हैं। उनकी भीतरी दृष्टि इतनी पैनी (तीक्ष्ण) और पवित्र थी कि किसी भी क्षेत्र में घटने वाली छोटी-सी घटना को लेकर भी उनका विशाल ज्ञान-झरना मस्ती के साथ फूट पड़ता था। उनके उदाहरण, बात को स्पष्ट और सिद्ध करने की उनकी कला, महत्त्वपूर्ण बात से मिलती-जुलती दूसरी और तीसरी बात सुनाकर उसका महत्त्व दर्शाने की उनकी विधि, हँसते-हँसते आत्म-साक्षात्कार कराकर परिवर्तन की दृढ़ता भर देने की उनकी विशेषता हर लेख में देखते ही बनती है।
प्रस्तुत पुस्तक के लेखों को पढ़कर उमंग-उत्साह और पुरुषार्थ में तीव्रता, धारणाओं के प्रति जागरूकता तथा कर्त्तव्यपरायणता तो बढ़ती ही है, साथ-साथ आत्मोन्नति और आत्म-परितर्वन का मार्ग भी स्पष्ट दिखने लगता है। नारी जाति को आगे करने, ऊँचा उठाने, मान देने और उसकी आध्यात्मिक उन्नति के प्रति निरन्तर प्रयत्नशील रहने की उनकी प्रवृत्ति वन्दनीय है। अनेक लेखों में भगवान के समान ही 'वन्दे मातरम्' का नारा बड़ी बुलन्द आवाज़ के साथ उन्होंने लगाया है।
ऐसे चरित्र के धनी, गुणों के धनी, लेखनी के धनी, सच्चे ईश्वरीय प्रेम के धनी भ्राता जगदीश जी की स्मृति में आज हम नतमस्तक और नतहृदय हैं। उनकी यह पुस्तक हरेक पाठक के मन-मस्तिष्क में अलौकिकता तथा वैराग्य का शुभ प्रकाश अवश्य फैलायेगी। मैंने स्वयं भी, इसे पढ़कर कई नयी प्रेरणायें और धारणायें पायी हैं। ऐसी ही शुभकामना मैं हरेक पाठक भाई-बहनों के प्रति रखता हूँ।
- ब्रह्माकुमार आत्मप्रकाश ।
भ्राता जगदीश चन्द्र जी के बारे में:
वे सादा जीवन और उच्च विचार के आदर्श थे
ब्रह्माकुमारी चक्रधारी बहन जी जो कि दिल्ली, शक्ति नगर और रूस के सेवाकेन्द्रों की निमित्त संचालिका हैं, भ्राता जगदीश चन्द्र जी के साथ कमला नगर और शक्ति नगर सेवाकेन्द्रों में लगभग चालीस सालों तक रह ईश्वरीय सेवा करने का सुवअसर प्राप्त की हुई सौभाग्यशाली आत्मा हैं। वे भ्राता जी के बारे में अपने संस्मरण इस प्रकार सुनाती हैं -
किसी व्यक्ति को याद करना माना उसका रूप-रंग याद करना नहीं है अपितु उस व्यक्ति के गुण और योग्यताओं को स्मृति में लाकर उनको अपने में लाने की प्रेरणा लेना है। जगदीश भाई, प्यारे बाबा की प्रेरणाओं से भरपूर विशेष और महान् आत्मा रहे। बाबा की उन प्रेरणाओं को खुद जीवन में उतारकर, दूसरों को भी उनसे प्रेरित कर सबको आगे बढ़ाने का प्रयत्न सदा करते रहे। उनके साथ के सारे अनुभव तो मैं नहीं सुना पाऊँगी परन्तु कुछ ही अनुभवों को आपके सामने रखूँगी।
जबसे मेरा समर्पित जीवन शुरू हुआ तब से मैं भाई साहब के पास रही यानि लगभग चालीस वर्ष भाई साहब के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पहले गुलज़ार दादी जी, भाई साहब, मैं और एक भंडारे की बहन होती थी। उसके पश्चात् जब देहली, पाण्डव भवन बना, तो गुलज़ार दादी जी वहाँ चली गयीं, मुझे कमला नगर में छोड़ दिया। लेकिन जगदीश भाई होने के कारण मैं सदा निश्चिन्त रही क्योंकि पग-पग पर वे हमारा मार्गदर्शन करते थे। हालांकि सब कार्य स्वयं करते थे लेकिन नाम हमेशा बहनों का करते थे। कहते थे, ये सब-कुछ बहनें ही करती हैं। हर बात हमें सिखाते स्वयं, फिर पीछे हो जाते थे और हमें आगे कर देते थे।
जब मैं सेवाकेन्द्र में आयी, वहाँ उस समय एक चारपाई थी, दो कुर्सियाँ थीं और एक मेज़ थी। गुलज़ार दादी जी उस चारपाई पर सोती थीं। इतना ही फर्नीचर था सेन्टर पर। हमें सोने के लिए चटाई थी, हम उसी को इस्तेमाल करते थे। बाद में किसी ने एक छोटा-सा खटोला दिया, जिसमें छोटे बच्चे को सुलाया जाता है। उसको गुलज़ार दादी जी की खटिया के नीचे डालते थे, रात को वहाँ से निकाल कर उस पर मैं सोती थी। भाई साहब के पास भी एक टेडी-बाँकी-सी खटिया थी। फिर भी उस समय बड़े आनन्द का जीवन था। मुझे एक बार संकल्प आया कि यहाँ कोई ठीक कुर्सी नहीं, मेज नहीं, सोफा नहीं। एक ही अलमारी थी, उसमें चार ताक़ (खाने) थे। एक में भाई साहब के कपड़े होते थे, दूसरे में मेरे होते थे, तीसरे में भंडारे वाली के होते थे और चौथे में जनरल कपड़े होते थे। बस ये चार खाने थे, इसी एक अलमारी को तीस साल तक हमने इस्तेमाल किया। उस घर के मालिक ने एक गॉदरेज की अलमारी दी थी, वह दादी जी के पास रहती थी, उसमें वे अपने कपड़े और यज्ञ का सामान रखती थीं। सेन्टर में बहुत कम ही सामान था, कोई परदा भी नहीं होता था।
यहाँ तो वो ही सिन्ध की दो कुर्सियाँ और एक मेज थी, और कुछ था नहीं, तो मुझे लगा कि यहाँ एक सोफा होना चाहिए। वो भी यज्ञ के पैसे से नहीं। एक भाई आया था, उसने कहा था कि दीदी, यज्ञ के लिए कोई चीज़ चाहिए तो बता दीजिये। उससे मैंने एक सोफा लिया। कमरे में सोफा बिछाकर मैं मधुबन या कहीं दिल्ली से बाहर चली गयी। जब वापिस आयी, तो सब जगह ढूंढ़ा लेकिन वहाँ कहीं सोफा था ही नहीं। मैंने पूछा, भाई साहब, एक सोफा रखा था, वो कहाँ है? उन्होंने पूछा, क्या करना है आपको? मैंने कहा, अगर करना नहीं था तो उसको में लायी किस लिए थी? मैंने फिर पूछा, सोफा कहाँ है? भाई साहब ने कहा, यह आश्रम है, आश्रम में सोफे नहीं रखे जाते। मैंने कहा, भाई साहब, आश्रम में दो कुर्सियाँ हैं, अगर दो से ज़्यादा लोग आ जायें तो कहाँ बैठेंगे? मैं तो सेवा के लिए ले आयी थी, स्वयं बैठने के लिए नहीं। मैंने फिर पूछा, वह है कहाँ? उन्होंने कुछ कहा नहीं, वहाँ से चले गये। लेकिन किसी ने मुझे कान में बताया कि उसको बेच दिया गया है और उस पैसे को भण्डारी में डाल दिया गया है। उनका जीवन एकदम सादा था लेकिन सेवा उनकी एकदम उच्च कोटि की होती थी।
उस समय हमें यह मालूम ही नहीं था कि यज्ञ के जीवन में प्रेस किये हुए कपड़े होते हैं। लौकिक में तो हम घर में प्रेस किये हुए कपड़े पहनते थे लेकिन यज्ञ में कोई उस समय प्रेस किये हुए कपड़े नहीं पहनते थे। कपड़े धुलते थे, उनको अच्छी तरह से पानी लगाया जाता था और गुलज़ार दादी जी की खटिया पर सारे कपड़े रख देते थे। उन कपड़ों पर एक दरी बिछाते थे। गुलज़ार दादी जी रात को उस पर सोती थीं तो सुबह तक नीचे रखे हुए सारे कपड़े प्रेस हो जाते थे। दादी जी सोती थी तो यह सेवा भी हो जाती थी। वहाँ कोई अलग से प्रेस करने की सिस्टम नहीं थी। भाई साहब जहाँ भी बाहर जाते थे, सूई-धागा साथ में रखते थे, अगर रास्ते में भाई साहब का पायजामा या कुर्ता फट जाता था तो रिक्शा में बैठे-बैठे सिलाई करके आगे चल पड़ते थे।
भाई साहब को सदा यह रहता था कि यज्ञ की कोई भी छोटी-सी चीज़ भी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए, उसकी हानि नहीं होनी चाहिए। शुरू से उन्होंने जो भी काम किया बहुत एक्यूरेट किया और जल्दी से जल्दी किया। भाई साहब की दिनचर्या सुबह दो-ढाई बजे से शुरू होती थी। प्रिंटिंग प्रेस में सुबह आठ बजे के अन्दर मैटर देना होता था। थोड़ी-सी देर हो जाती थी तो दूसरों का मैटर छपना शुरू हो जाता था। कैसी भी परिस्थिति आयी, तबीयत कैसी भी रही लेकिन उन्होंने अपनी दिनचर्या नहीं बदली। न सिर्फ स्वयं समय का पालन करते थे लेकिन हमें भी सिखाते थे। दिल्ली में कहीं दस बजे मीटिंग है, हमें वहाँ पहुँचने के लिए बीस मिनट चाहिएँ तो वो पौने दस बजे ही आकर खड़े हो जाते थे और हमें कहते थे कि आप अभी तक क्यों नहीं जा रहे हो? जल्दी निकलो, देर हो रही है।वहां पहुंचने के लिए बीस मिनट चाहिएं, पहले ही पांच मिनट देर हो चुकी है, आप जल्दी निकलो। मैं कहती थी, भाई साहब, दस बजे कहते हैं, शुरू साढ़े दस बजे ही होगी। कहते थे, वो चाहे साढ़े दस बजे शुरू करें लेकिन आप अपने संस्कार को खराब मत करो। एक्यूरेट समय पर रहना चाहिए, आप क्यों इसको चेन्ज करते हो? धीरे-धीरे एक-दूसरे को देख सब टाइम पर पहुंचना शुरू करेंगे तो हर कार्य टाइम पर हो जायेगा। जब तक हम नीचे नहीं उतरते, तब तक वे वहां से नहीं हिलते थे। अगर हम नास्ता नहीं भी किये होते थे तो वे स्वयं हमारे नाश्ते को डिब्बों में डालकर कार में रख आते थे और कहते थे, आपका नास्ता गाड़ी में रखा है, रास्ते में गाड़ी में ही नाश्ता करना, पहले यहां से जाओ, गाड़ी निकालो, देर हो गयी है। शुरू से मैने उनमें समय की पाबन्दी देखी।
एक बार बड़ी दीदी ने मुझे पत्र लिखा था कि जगदीश दिन-रात सेवा करता रहता है, वह सैर नहीं करता इसलिए आप उसको रोज सैर करने ले जाना। मैंने उनसे कहा, भाई साहब, यह दीदी का पत्र है और मुझे उन्होंने यह ड्यूटी दी है, उनकी आज्ञा का पालन करना मेरा कर्तव्य है, आप चलिये सैर पर। एक-दो दिन तो चले सैर पर। पांच मिनट के अन्दर ही कह देते थे, में समझता हूँ, काफी हो गयी सैर। चलो सेन्टर पर चलते हैं। सेवा के बारे में उनका यह होता था कि जो बाबा की आज्ञा है, वह कार्य जल्दी होना चाहिए। बाप की प्रत्यक्षता में लेट नहीं होनी चाहिए। समय बीतता जा रहा है, संगमयुग निकलता जा रहा है। ऐसे समय पर मै सेवा करूं या सैर करूं? मुझे याद आता है कि भाई साहब अस्पताल में थे, गुलज़ार दादी जो भी वहां थी, उस समय एक दिन वे कहने लगे कि मैं बाबा को प्रत्यक्ष नहीं कर सका। कहते-कहते उनकी आंखों में आसु आ गये। मुझे बहुत फील हुआ क्योंकि जिन्दगी में पहली बार मैंने उनकी आंखों में आंसू देखे।
कभी-कभी उनको हम फलों का रस निकाल कर देते थे कि आज तो थोड़ा-सा पी लो। लेकिन हमने कभी यह नहीं देखा कि वे पी ले। पहले यह पूछते थे कि बहनों ने पीया? मैं कहती थी, भाई साहब, आप बताइये, इस समय हम आठ बहनें हैं, आठ बहनों को जूस पिलायें और उसके बाद आपको पिलायें, यह नहीं चलता। इतना जूस कहाँ बैठकर निकालेंगे? एक ही दिन इतना समय कहीं दे पायेंगे? आज आप पीइये, कल किसी एक बहन को, परसों किसी एक बहन को पिला देंगे। लेकिन अकेले पीते हुए उनको मैने कभी नहीं देखा, आठ कटोरी में उस जूस को डालकर बाकी बचे हुए को वे पीते थे। कभी उनके लिए ज्यादा भी निकाल कर देते थे तो कहते थे, इतना ज्यादा क्यों निकाला? यज्ञ का क्यों वेस्ट करते हो? यज्ञ का एक कण, हीरे के बराबर है। कोई भी चीज हो, उसको वे अपने लिए कम से कम इस्तेमाल करते थे। कहते थे, मेरे ऊपर कम से कम लगना चाहिए और सेवा में ज्यादा से ज्यादा हो।
यज्ञ में जब मैं आयी तो बहुत छोटी थी। उस समय मुझे ज्ञान सुनाना आदि नहीं आता था। भाई साहब पहले मेरे से भाषण लिखवाते थे। उसके बाद साथ ले जाते थे तो रास्ते में मुझे सारी प्वाइटस याद दिलाते थे कि बोलो, इसके बाद क्या प्वाइंट बोलोगे, इसके बाद कौन-सा प्वाइंट बोलोगे। भूल जाती थी तो याद कराते थे। पूरे रास्ते में रटाकर, स्टेज पर बिठाकर, भाषण शुरू कराकर, फिर वहीं से जाते थे। यह सिर्फ मेरे लिए नहीं, जितनी भी बहनें थी, क्लास में आने वाली जितनी भी माताये थी उनके प्रति भी करते थे। सप्ताह में दो बार माताओं के लिए क्लास रखते थे और भाषण कैसे करें, यह ट्रेनिंग देते थे, लिखवाते ये। भाषण माताओं से लिखवाने के बाद, उसको सुनते थे उनके द्वारा ही। उनसे पूछते थे कि आप रटा हुआ सुनाती हैं या दिल से सुनाती है? बाबा ने उस क्लास का नाम दिया था 'मुरलीधर क्लास'। इस क्लास में भाषण करने वाली, कोर्स कराने वाली मातायें आती थीं। ऐसा नहीं कि भाई साहब ने सिर्फ ज्ञान दिया, सेवा में भी हड्डी मेहनत की। हरेक कार्य खुद करके हमें सिखाया। अगर समझो, सुबह तीन बजे संगठन का योग रखा है तो पौने तीन बजे हॉल में जाकर वे बेल पर बेल बजाते थे ताकि हम जल्दी उठकर आ जायें। इस प्रकार, वे हमें कदम-कदम पर समय का महत्त्व रखना सिखाते थे।
कमला नगर तो किराये का मकान था और उस समय सेन्टर की स्थिति भी साधारण थी। जब हम शक्ति नगर आ गये तो बाबा का खुद का मकान बन गया। उस मकान में 24-25 कमरे थे, हमने सोचा, कुछ फर्नीचर हो जाये। हमने कहा, भाई साहब, इनमें कुछ सामान रखेंगे या वैसे ही सब कमरे खाली रखेंगे? उन्होंने कहा, सोचेंगे। उन्हीं दिनों कोई भाई शिफ्ट (स्थानान्तरित) होकर जा रहे थे, उनको सामान लेकर नहीं जाना था। उनके पास एक डायनिंग टेबल, छह कुर्सियों और चार पलंग थे। साढ़े सात सौ में देना चाहते थे। किसी माता ने वो साढ़े सात सौ रुपये दिये. हम उस सामान को ले आये और सेन्टर को सजाया। हमेशा वे यही कहते थे कि सादगी में सेवा ज्यादा होती है, सजधज में सेवा नहीं होती। यही पैसा किसी सेवा में लगाओ।
सन् 1952 में भाई साहब ज्ञान में आये और सन् 1953 में कमला नगर सेन्टर के मकान को उन्होंने ही किराये पर लिया था। प्रथम सेवाकेन्द्र खोलने के लिए निमित्त बनी थी यह आत्मा। बाबा ने भाई साहब को यह कहा था कि ऐसा मकान किराये पर लेना जिसकी एक दीवार भी विकारियों के घर से न लगी रहे। बाबा ने यह भी कहा था कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के सामने ही यह स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी होनी चाहिए। कमला नगर, दिल्ली यूनिवर्सिटी से 4-5 मिनट के रास्ते की दूरी पर है। वहां यह एक ऐसा मकान था इसके चारों तरफ दरवाजे थे और एक ही बीच का मकान था। उस मकान का मालिक भाई साहब का बहुत रिगार्ड रखता था, उसने इनके नाम से ही मकान किराये पर दिया था। वह मकान 160 रुपये किराये पर लिया था। जब मकान मालिक ने हमें मकान किराये पर दिया था तब उनके बच्चे छोटे-छोटे थे, जब उन बच्चों के भी बच्चे हो गये, वो भी बड़े हो गये तो सहज है कि उनका परिवार काफी बड़ा हो गया। उन्होंने कहा कि हमें मकान चाहिए, आप खाली कीजिये। तब भाई साहब ने कहा, ठीक है, आज से ही हम मकान ढूंढना शुरू करते हैं, जैसे ही मकान मिलेगा फौरन आपका मकान खाली कर देंगे। जब मकान खाली करने का समय आ गया तो कई लोगों ने कहा कि आप इतने सालों से रहे हुए हो, ऐसे हो नहीं छोड़ना, उसके लिए उनसे पैसे लेना। भाई साहब ने कहा, एक आदमी ने हमें किराये पर मकान दिया है, उसका मतलब यह नहीं है कि हम उस मकान के मालिक हैं। उस मकान को खाली करने से पहले एक-एक छेद को भी सीमेन्ट से भरवाया, पूरे मकान की सफेदी करायी। जैसा मकान उनसे लिया था, वैसा उनको लौटाया। उसके बाद, मकान वालों को एक साल के लिए कहीं जाना था, उन्होंने कहा, आप लोग इतने सालों तक रहे हैं, अभी हम सारे घूमने जा रहे हैं, घर खाली छोड़ना ठीक नहीं, क्या करें? भाई साहब ने कहा, आपको जितना समय जाना है, जाओ, इस घर का ध्यान में रखूँगा। हम बहने शक्ति नगर वाले मकान में रहे और जगदीश भाई लगभग एक साल तक कमला नगर वाले मकान में रहे। भाई साहब का खाना-पीना हम शक्तिनगर सेन्टर से भेजते थे।
वे समय को बहुत महत्व देते थे। कहते थे, गया समय कभी हाथ नहीं आता, वो भी संगम का समय एक बार खो दिया तो कल्प-कल्प खोना पड़ेगा। हमने देखा, वे एक क्षण को भी व्यर्थ जाने नहीं देते थे। कभी हम तो सोच लेते थे, अभी थोड़ा समय है, यह कार्य बाद में कर लेंगे लेकिन वे कहते थे, उस थोड़े समय में भी कुछ तो कर सकते हैं। उस थोड़े समय को भी व्यर्थ क्यों किया जाये? हमेशा भाई साहब का कहना होता था कि कभी अच्छा अवसर आता है तो उसको हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। यह अवसर किसी व्यक्ति द्वारा लाया हुआ नहीं है, यह श्रेष्ठ कार्य का अवसर है, प्यारे बाबा के द्वारा ही मिला है। इस प्रकार हर क्षण का, हर मौके का सदा लाभ लेते हुए आगे बढ़ते उनको हमने देखा।
उनमें ज्ञान इतना था कि बात मत पूछिये। कोई एक बात निकली तो उसकी दस बातें सुना देंगे। जैसे नल खोलने से पानी की धारा गिरती ही रहेगी निरन्तर, वैसे वे बोलना शुरू करेंगे तो ज्ञान की धारा गिरने लगती थी। एक बार वे अपना अनुभव सुना रहे थे कि "ऐसी कभी कोई बात होती तो मैं मम्मा को कहता था, मम्मा, अगर यह ऐसा होता तो इसके दस फायदे हो सकते हैं। मम्मा हंसते हुए बोलती थी कि आपको हर फायदा पहले से ही मालूम होता है! अच्छा बताओ, कौन-से दस फायदे होंगे। मै अंगुली पर दस फायदे गिना देता था। फिर कहता था कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसके पन्द्रह नुकसान होंगे। मम्मा कहती थी, अभी तो बात हुई है, पहले से आपके पास पन्द्रह नुकसान आ गये? पूरे पन्द्रह नुकसान उसी समय गिनकर दिखा देता था।" उनकी बुद्धि में ज्ञान इतना स्पष्ट था और भरपूर था कि किसी बात के लिए ज्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
मैंने देखा, उनके सामने कोई गणितज्ञ (Mathematician) आया, जीवशास्त्रज्ञ (Biologist) आया, कोई मनोविज्ञानी (Psychologist) आया या कोई अन्य विषय का तज्ञ आया, उसको उस रूप से, उस ज्ञान से प्रभावित करना यह उनके लिए अति सरल रहता था। कोई पूछ लेते थे कि आपने रिसर्च किस विषय में किया है? वे कहते थे, मैं तो कम पढ़ा हुआ आदमी हूँ। मैंने किसी विषय पर रिसर्च नहीं किया है। ऐसे लगता था कि हर विषय का अति गहराई से उन्होंने अध्ययन किया हुआ है। जब भी वे दिल्ली में होते थे, रात्रि क्लास कराते थे। वे ज्ञान की गुह्य बातें बहुत स्पष्ट और सरल रूप से समझाते थे। इसलिए हम कभी उनकी रात्रि क्लास मिस नहीं करते थे। कितनी भी सेवा हो, कोई भी बहन उनकी रात्रि क्लास मिस नहीं करती थी।
कई बार वे सच को ऐसे कह देते थे कि सुनने वालों को बहुत कटु लगता था। मैं उनसे कई बार कह चुकी थी कि आप बोलकर क्यों बुरे बनते हैं, जब सब कह रहे हैं कि यह अच्छा है और ताली बजा रहे हैं, आप भी बजाइये। कहते थे, यह मेरे से नहीं होगा। आज नहीं तो कल, वे मेरी यह बात समझेंगे। वे सत्य बताये बिना रहते नहीं थे। उनके सामने कई ऐसे प्रसंग लेकर भाई-बहने आते ये तो कहते थे कि मेरी बात आपको अच्छी नहीं लगती होगी, मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूं, जो बात अच्छी नहीं है, उसे बताना मै अपना फर्ज समझता हूं। आपके प्रति मेरा कोई भी बुरा भाव नहीं है, आपके प्रति मेरा हृदय का स्नेह है। मैंने जहां तक नोट किया कि उन्होंने चाहे किसी को कुछ कह दिया लेकिन उनके प्रति अन्दर नफ़रत या घृणा हो, ऐसा कभी नहीं। अगर कोई उनके सामने किसी के प्रति नफ़रत की बात कहता तो उनको फौरन बोल देते थे कि नहीं, कभी किसी के प्रति नफरत की भावना नहीं लाना। ठीक है, हर किसी में कमी-कमज़ोरी होती है लेकिन उनके प्रति हमें अपने मन में कमी-कमजोरी की भावना नहीं रखनी है।
कई लोग समझते हैं, जगदीश भाई बहुत गंभीर रहते थे। ऐसा नहीं, वे सिर्फ गंभीर नहीं थे, रमणीक भी बहुत थे। कभी उनको हंसते हुए देखकर कई लोग आकर हमसे पूछते थे कि क्या जगदीश भाई हँसते भी हैं? वे रमणीक होते हुए भी, जो जैसा व्यक्ति है उसके साथ ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करते थे और हमें भी ऐसा करने के लिए कहते थे। रमणीकता में अलौकिकता कभी नहीं भूलते थे और भूलने वालों को चेतावनी भी देते थे कि क्या ऐसे शब्द आपको प्रयोग करना उचित था?
वे व्यवहार कुशलता में भी नंबर वन थे। अगर किसी कार्यक्रम में वे जा रहे है, गाडी खाली है, अपने ही कोई भाई-बहनें खड़े हैं, उनको भी उसी जगह पर जाना है. तो कहेंगे गाडी खाली है. इनको भी क्यों नहीं बिठायें? बिठाकर जाते थे। ऐसा नहीं, गाड़ी उनके लिए है तो अकेले ही जायें। ऐसा उन्होंने कभी नहीं किया। वे कहते थे, हम तो बाबा के सर्वस्व त्यागी बच्चे हैं, यह धन उनका है. जो कमाकर यज्ञ में देते हैं। उन्होंने यह धन ईश्वरीय सेवा में दिया है। सेवा में उस धन का सदुपयोग जरूर होना चाहिए। उस पर कभी हमारा अभिमान नहीं होना चाहिए कि यह चीज मेरी है। यह हमारी नहीं है, इस पर उन सबका अधिकार है।
भाई साहब कहते थे कि अगर किसी के खुशी के मौके पर न जा सके तो कोई हर्जा नहीं लेकिन बीमारी के समय उनके पास ज़रूर जाओ। जाते समय कोई फल-फूल आदि ले जाओ। ऐसे समय पर उनको उमंग-उत्साह भरने की आवश्यकता होती है। अगर क्लास में आने वाला विद्यार्थी बीमार पड़ा होता तो हमें कहते थे चलो, मैं भी आपके साथ चलता हूं। ऐसे उनमें व्यवहार कुशलता, पारिवारिक भावना बहुत थी और हमें भी सिखाते थे। भाई साहब कहते थे कि नष्टोमोहा बनना माना हर किसी से रिश्ते-नाते तोड़ना नहीं है। नष्टोमोहा का अर्थ कई लोग उल्टा ले लेते हैं। हमारी आन्तरिक स्थिति नष्टोमोहा हो और हममे व्यवहार कुशलता भी हो।
भाई साहब कमला नगर में रहे, शक्ति नगर में रहे और डेरेवाला में भी रहे लेकिन हमेशा सबसे ऊपर की मंजिल में ही रहे। वे कहते थे कि जब में लिखने का या पढ़ने का काम करता हूँ तो उस समय किसी डिस्टर्वन्स से लिंक न टूटे। कितनी भी गरमी हो लेकिन वे ऊपर ही रहते थे, आपको पता है, दिल्ली में साल में आठ मास गरमी रहती है।
जब कोई बहन मधुबन या दूसरे स्थान पर जा रही होती तो वे स्वतः नीचे आकर और सब भाई-बहनों को बुलाकर जाने वालों को विदाई देते थे। विदाई देने से पहले हमें कहते थे, टोली लेकर आओ, जाने वाली बहन या भाई को भी खिलाओ और वो भी सबको खिलाकर जाये। अरे, सेकण्ड का भरोसा नहीं, आज हम आपस में मिलते हैं, पता नहीं, कौन कब बिछड़ जायेगा। सब बाबा के चुने हुए बच्चे हैं, अगर उनको हम स्नेह और सम्मान नहीं देंगे तो दूसरों को कैसे करेंगे कि ये विश्व की विशेष आत्मायें हैं, परमात्मा की चुनी हुई आत्मायें हैं। इस प्रकार, जाने वालों को नीचे तक, सेन्टर के बाहर तक छोड़ने आते थे। हम कहते थे, भाई साहब आप बड़े हैं, आप यहीं से ही विदाई दे दें, हम बाकी लोग उनको छोड़ने बाहर तक जायेंगे। लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। जब वे बिल्कुल बीमार पड़ गये, नीचे उतरना उनके लिए मना था, तब वे अपने कमरे से ही जाने वालों को विदाई दिया करते थे। जब वह भाई या बहन बाहर से या मधुबन से होकर वापिस आते थे तो उनके स्वागत के लिए फूल मंगाकर रखते थे। कहते थे, हमारा देवी परिवार है, कोई आता है तो उनका सत्कार करो, उनके साथ दिव्यता का व्यवहार करो। वे खुद ऐसा व्यवहार करते थे और हमें भी सिखाते थे। कहते थे, यह ईश्वरीय परिवार कल्प में एक ही बार मिलता है, ईश्वरीय परिवार में आपस में बहुत स्नेह और रिगार्ड होना चाहिए।
मान लीजिये, कभी-कभी दो बहनों का आपस में विचार-भेद हो गया और किसी तीसरे व्यक्ति से उनको पता चल गया कि दो बहनों में कुछ बात हो गयी। भाई साहब कभी उनको ऐसे ही नहीं छोड़ते थे कि कुछ समय के बाद आप ही ठीक हो जायेंगी। वे तुरन्त उन दोनों को बुलाते थे। हमें भी बोलते थे कि आप थोड़े समय तक भी उनको ऐसे छोड़ देते हो ना, उस थोड़े से समय में सेन्टर के वातावरण में फरक आ जायेगा। सेवाकेन्द्र का वातारण हमेशा दिव्यता का होना चाहिए। अगर किसी का मूड ऑफ है और आपने 15-20 मिनट ऑफ रहने दिया तो वो प्रकम्पन वहां फैलेंगे। इसलिए भाई साहब, पता चलते ही उनको बुलाते और सेकण्ड में उनका मूड ठीक कर देते। पहले एक को बुलाकर पूछते थे. सुना है. आज कोई बात हुई है, क्या बात है? वह अपनी बात सुनायेगी। सुनने के बाद भाई साहब उस बहन की विशेषता और योग्यताओं की महिमा करेंगे। कहेगे, आपको अपनी विशेषताओं के बारे में पता नहीं है, बाबा जानता है. एक दिन आपकी प्रत्यक्षता होगी। ये मैं बाबा के बोल बोल रहा है। ऐसे बोलकर उस आत्मा में इतना उमंग और उल्लास भर देते थे कि उसका मूड आफ ही खत्म हो जाता था। इसी प्रकार, दूसरी को भी बुलाकर उसके गुणों से उसको बहला कर उसका मूड ठीक करते थे। फिर पहले वाली को भी बुलाकर, दोनों को इकट्ठा बिठाकर, कहते थे, देखें जरा, एक-दूसरे को प्यार से दृष्टि दो। एकदम दृष्टि देना तो मुश्किल होता है क्योंकि दोनों में मनमुटाव हुआ था। कहते थे, नहीं जब तक आपस में मीठी दृष्टि नहीं देंगे, मैं नहीं मानूंगा कि आप ठीक हैं। फिर उन दोनों के हाथ में टोली देकर, एक-दूसरे को खिलाने के लिए कहते थे। खिलाकर हाथ मिलाने के लिए कहते थे। रोज हमें यह याद दिलाते थे कि आज इस सेन्टर पर हो, कल और किसी सेन्टर पर। रोज नये-नये सेन्टर खुलते हैं, पता नहीं कब किसको किस समय यहां से बिछड़ जाना है। दूसरी जगह जाकर अपने-अपने सेन्टरों की सेवा में व्यस्त हो जायेंगे तो आपस में मिल भी नहीं पायेंगे। यही तो समय है मिलने का। इस प्रकार, पारिवारिक भावना जाग्रत कर, उनके मनमुटाव को मिटा देते थे। किसी बहन की तबीयत खराब हो गयी तो उनके बारे में इतना ध्यान रखते थे कि इनकी तबीयत क्यों खराब हुई, इन्होंने क्या खाया था, उनको क्या दवाई लेनी है सब प्रकार से सोचते थे।क्लास में आने वाले भाई बहनों के प्रति भी उनका बहुत ध्यान रहता था। अगर कोई भाई या बहन दो दिन क्लास में नहीं आये तो उनका संकल्प चलता था कि वे क्यों नहीं आये क्या तकलीफ हुई उनको। हमे कहते थे कि देखो आने वालो का जिनको हमें मंजिल पर ले जाना है. ख्याल रखें क्यों कि मंजिल आने से पहले के रास्ते से बिछड न जायें। हमें कहते थे, आपस में 10-10 या 15-15 विद्यार्थियो को बाँट लो, उनका ध्यान रखो। बहनें भी ऐसे करते थी और बड़ी बहन को समय प्रति समय उन भाई-बहनों का समाचार देती थी। भाई साहब हमें कहते थे कि आप बहनें दुनिया से परे हैं, उस कलियुगी दुनिया में रहने वालों को कई परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। जिस तरह बाबा हम समर्पित बच्चों को यज्ञ में रखकर पूरी तरह से पालना करते हैं, उसी तरह आपको भी क्लास में आने वाले बाबा के बच्चों का पूरी तरह ख्याल रखना चाहिए, ज्ञानमार्ग में आगे बढ़ते रहने का उमंग-उत्साह बढ़ाते रहना और जलौकिक पालना देते रहना है। भले आपके पास प्रसाद ज्यादा नहीं है, एक ही तोशा है, उसी को 3-4 टुकड़ा बनाकर तीन-चार भाई-बहनों को दे दो। बाबा का वही एक टुकड़ा प्रसाद उनमें शक्ति भरेगा। इस प्रकार भाई साहब हम बहनों को कई प्रकार की शिक्षायें देते थे।
यह बात उनके लिए सही लागू होती है कि सदा अच्छा सोचो और बुरे से बुरे के लिए स्वयं को तैयार रखो। आयु के लगभग बासठ वर्ष पूरे होने के बाद उनके मुख से ये शब्द निकलते रहे कि मैं केवल 72 वर्ष ही जीऊँगा क्योंकि मेरी आयु बहत्तर वर्ष है, इससे ज्यादा मै जी नहीं सकता। हम उनसे पूछते थे कि क्या आपको किसी ज्योतिषी ने कहा है? वे कहते थे, भृगु ऋषि की सन्तान किसी ज्योतिषी से पूछने नहीं जाती। मैं स्वतः ही जानता हूं कि मेरी आयु कितनी होगी। साथ में यह भी कहते थे कि जब मेरा अन्त होगा, वह पेट की किसी बीमारी से होगा। जाने के पांच साल पहले से उन्होंने नये कपड़े सिलवाने छोड दिये थे। मैं कहती थी, भाई साहब, आपके नाम से कितनी सौगातें आती हैं. आपके नाम से कितने कपड़े आते हैं, आप तो सिलवाते नहीं, पुराने ही पुराने कपडे चलाते हैं। कहते थे, जब पुराने कपड़े काम कर रहे हैं तो नये कपड़े क्यों सिलायें? मधुबन में मीटिंग थी, मीटिंग में आने से पूर्व, हालांकि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी तो उन्होंने कहा, अपनी जितनी भी अलमारियां हैं, उनमें जो सामान रखा है, उस सारे को मै देखना चाहता हूँ। दो दिन में सारा सामान निकाला और जितने भी कपड़े थे, वे सभी हमारे सामने लाकर रख दिये और कहा, इनमें से थोड़े-से कपड़े, जो आप उचित समझो कि मेरे काम में आयेंगे, उनको छोड़कर शेष सामान आप जिसको चाहो दे दो। वे पुराने कपड़े क्लास के भाइयों को, जिसको जिसको आते थे उनको बाँट दिये। लास्ट में उन्होंने अपने पास थोड़े-से ही कपड़े रखे थे, जिनको वे मधुबन आते समय ले आये थे। बाकी सब सामान बाँट दिया था। मैं बहुत कहती थी, आप ऐसा क्यों करते हैं? कहते थे, इतना सामान क्यों रखें? उनके पास जो चीज़ पड़ी थी, उनकी एक लिस्ट बनवायी थी। वे कहीं भी जाते थे, जो भी सौगात मिलती थी, आते ही हमें दे देते थे कि यह सौगात मिली है। कई बार कोई लौकिक वाले भी कोई लिफाफे दे जाते थे, उसको हाथ भी नहीं लगाते थे, हमें बुलाकर कहते थे, उसको उठाओ, यह यज्ञ के लिए है।
ऐसा नहीं कि उनको अपने शरीर का ज्ञान और ध्यान नहीं था। वे जानते थे कि इस शरीर को क्या खिलाना चाहिए और क्या नहीं खिलाना चाहिए। लेकिन वे यही सदा सोचते थे कि जब सस्ती चीज से काम चल सकता है तो महंगी चीज़ क्यों खायें? जहाँ तक मैं जानती हूं, शरीर को जितना विश्राम देना चाहिए था, वो उन्होंने नहीं दिया। कभी-कभी मैं देखती थी कि वे बहुत विचारमग्र रहते थे तो मैं कहती थी, भाई साहब, आप बहुत गहराई से विचार कर रहे हैं, क्यों इतना सोच रहे हैं, छोड़ दीजिये ना। तब कहते थे, मुझे विचार चलाना भी आता है और विचार को समेटना भी आता है। सचमुच मैंने यह विशेषता उनमें अन्त तक देखी। सोनीपत के नक्शे को जल्दी तैयार करने के लिए उन्होंने कहा था। एक नक्शा बनकर आया लेकिन पूरा नहीं था। पूरा नक्शा बनकर आने में दो दिन देर हो गयी। क्योंकि आर्किटेक्ट का एक्सीडेंट हो गया तो वह समय पर आ नहीं सका। इसलिए भाई साहब उस नक्शे को पूरा देख नहीं पाये। वे बार-बार कहते थे कि सोनीपत का काम जल्दी होना चाहिए, किसी काम में देर नहीं करो। उनको पता था कि शायद वे ज्यादा दिन रहने वाले नहीं है। जिस दिन उन्होंने यह कहा कि मैं ज़्यादा दिन नहीं ठहरूंगा, मैं चला जाऊंगा, अब मैं बचूंगा नहीं, उसके बाद सोनीपत के विषय में उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। ऐसा लगता था कि उन्होंने संकल्प को एकदम समेट लिया था। तब केवल एक ही बाबा की याद। अन्त में जब तक उनको होश रही, तब तक वे यही बोलते रहे, मीठा बाबा, प्यारा बाबा, सिकीलधा बाबा। दिल्ली में शुरू से ही हम लोगों को याद दिलाते थे कि रात को क्या बोलकर सोना है, उन्हीं शब्दों को वे लास्ट तक बोलते रहे कि मेरा बाबा, मीठा बाबा, सिकीलधा बाबा, लाड़ला बाबा, दयालु बाबा, कृपालु बाबा। शरीर छोड़ने से कुछ दिन पहले उन्होंने यह कहा कि कभी बाबा में संशय नहीं लाना, वह दयालु और कृपालु है, वह दया का भण्डार है।
अन्त तक वे त्याग की मूर्ति बनकर ही रहे। हमेशा वे यही कहते थे कि यश में पैसा आता है, देखो, बाबा के बच्चे, कैसे-कैसे मेहनत करके, बचत करके, अपने भी खर्च में कटौती करके बाबा को भेजते हैं, उसका सदुपयोग होना चाहिए, सेवा के लिए ही खर्च होना चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति के लिए। इस प्रकार, वे शुरू से लेकर अपने जीवन के अन्त तक त्यागी रहे, तपस्वी रहे और साधारण रहे।
स्वयं की पहचान से ही मूल्यनिष्ठ समाज की स्थापना
मैं देख रहा था कि आप योग में कैसे आनन्द विभोर हो रहे हैं, सुख-शान्ति का अनुभव कर रहे हैं। पहले आपके मन में जो प्रश्न उठते थे, अभी उनके समाधान मिलते जा रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि हम जिन चीजों को इन आंखों से देखते हैं उन पर ही विश्वास करते हैं; जो चीज हम देख ही नहीं सकते उन पर विश्वास कैसे करें? इस मान्यता पर वे कहते हैं कि आत्मा और परमात्मा को किसने देखा है? कैसे हम मानें कि उनका अस्तित्व है? लेकिन यह प्रश्न बहुत पहले किया जाता था।
आजकल बहुत-से वैज्ञानिकों ने भी इस विषय में बहुत खोज की है। बहुत से लोगों ने साइकेट्री (Psychiatry) में और मेडिकल साईंस में आत्मा के बारे में खोज और छानबीन की है। उसके अतिरिक्त ब्रेन माईटिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, ब्रेन सर्जन का भी एक ऐसा वर्ग है जिन्होंने यह जानने की कोशिश की कि क्या मनुष्य का ब्रेन भी एक कम्प्यूटर की तरह है, जो सब-कुछ करता है? मनुष्य के सारे व्यवहार की व्याख्या क्या हम मस्तिष्क द्वारा दे सकते हैं या मस्तिष्क के अतिरिक्त कोई ऐसी चीज है जो उससे काम लेती है, चाहे वह मस्तिष्क में नहीं हो, जैसे कम्प्युटर से काम लेने वाला अथवा उसका प्रोग्राम बनाने वाला उससे अलग होता है? इस बात को लेकर जो कुछ सामने आया है, उसके आधार पर जो विषय प्रकाशित हुआ है, विज्ञान से मान्यता प्राप्त है, संग्रहित है, उसके अनेक पहलू हैं। उनको देखकर कोई भी यह मानने के लिए बाध्य हो जाता है कि आत्मा नाम की कोई चीज है और परमात्मा का भी अस्तित्व है। उदाहरण के तौर से, कुछ लोगों ने ऐसे प्रयोग किये जिन्हें देहातीत अनुभव (Out of body experiences) अथवा मृत्यु के नज़दीकी अनुभव (Near to death experiences) कहते हैं। कुछ ऐसे मरीज़ थे जो अस्पताल में भर्ती थे और उनकी चिकित्सा हो रही थी। चिकित्सा के दौरान, डॉक्टरों के ज्ञान और परीक्षणों के अनुसार वे शरीर छोड़ चुके थे, उनकी मृत्यु हो गयी थी। मृत्यु होने की घोषणा करने के लिए जितनी भी परीक्षायें होती हैं, डॉक्टरों ने वे सब कर ली थी। इसके बाद सबने मान लिया था कि यह व्यक्ति मर चुका है। उसके शरीर को समाप्त करने का संकल्प कर लिया गया। लेकिन कुछ समय के बाद वह तथाकथित मुर्दा, सजीव हो गया। उसमें फिर से जान आ गयी। हालाँकि विज्ञान की दृष्टि से वह व्यक्ति मर चुका था लेकिन उसमें आत्मा वापिस आयी और उस व्यक्ति ने अपना अनुभव बताया। ये अनुभव केवल हिन्दुओं के अथवा आत्मा और परमात्मा में विश्वास करने वाले आस्तिक लोगों के नहीं थे बल्कि जो नास्तिक थे, आत्मा और परमात्मा को नहीं मानते थे या पुनर्जन्म को नहीं मानते थे, उनके भी थे। एक देश से नहीं बल्कि अनेक देशों से संग्रह करके उन्हें पुस्तक का रूप दिया गया है। उन अनुभवों में सब ने यही व्यक्त किया है कि कुछ समय के लिए वे इस शरीर में नहीं थे। तो कहाँ थे? क्या देख रहे थे? क्या अनुभव कर रहे थे? पूर्वकाल के क्या दृश्य उनको दिखायी दे रहे थे? किन-किन के साथ उनका क्या-क्या सम्बन्ध था? जो बातें वे भूल चुके थे, वे कैसे उनको स्मरण में आयी थीं? उनके अनुभव और कथनों को संग्रह किया गया है। यह संग्रह किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया। अनेक वैज्ञानिकों ने स्वतन्त्र रूप से उनके बारे में परीक्षण कर संग्रहित किया है और लिपिबद्ध किया है। यह एक पहलू है।
ऐसे ही मस्तिष्क शास्त्री (Brain Scientists) हैं, ब्रेन सर्जन हैं, मनोविज्ञानी हैं, इन्होंने भी आत्मा पर बहुत कुछ काम किया है। आप जानते हैं कि हमारा जो मस्तिष्क है उसके भिन्न-भिन्न भाग हैं। वह शरीर के भिन्न-भिन्न भागों से जुड़ा हुआ है। अनेक बार वैज्ञानिकों ने सम्मेलनों का आयोजन कर इन बातों की चर्चा की है कि मस्तिष्क के अलग-अलग भाग है, उनके अलग-अलग कार्य हैं। उन सबको जोड़ने वाली कोई अलग सत्ता है। जब कोई उद्दीपन आता है, उसका रेस्पान्स हमें मिलता है। ऐसे अनेक विषयों पर विचार गोष्ठी कर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान हमें यह मानने से मिलता है कि आत्मा नाम की कोई चीज है और वह मस्तिष्क में है। हमारे मस्तिष्क का जो भाग हाइपोथेलामस (अधः चेतन) कहलाता है जहाँ पिट्यूटरी ग्लेंड और हाइपोथेलामस मिलते हैं वहाँ आत्मा विराजमान है। मस्तिष्क के स्थान पर शरीर की सब कार्यवाहिनी और ज्ञानवाहिनी नसों का जुड़ाव हुआ है। जैसे कार में बैठा हुआ ड्राइवर अपनी सीट से कार के सब कार्यों को कन्ट्रोल करता है क्योंकि गाड़ी के सब मेकानिजम वहाँ होते हैं, ऐसे अनेक तरह से परीक्षण कर वैज्ञानिकों ने आत्मा का वास वहाँ माना है।
उसी तरह हिप्नोटिक रिग्रेसन का भी प्रयोग होने लगा है। कई लोग जल से डरते हैं, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं धमाका हो जाये तो डर जाते हैं अथवा बहुत दूर गोलियाँ चलती हों, तो सुनकर कांप जाते हैं। ऐसे लोगों की इस तरह की हरकतों के कारण जानने के लिए डॉक्टरों ने हिप्नोटिज़्म का इस्तेमाल किया। हिप्नोटिज्म से उस व्यक्ति को उसके अतीत काल में ले जाते हैं और यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसको यह क्यों हुआ, कारण क्या बना, किन हालातों में शुरू हुआ और उसका उपचार कैसे करना है। यह रिग्रेसन करते हुए एक जन्म, दो जन्म पीछे जाते-जाते वे 22-23 जन्मों तक जा पहुँचे। हिप्नोटिक रिग्रेसन में अतीत की उस मनोस्थिति (state of mind) के अपने हालात के बारे में व्यक्ति बताता है। उदाहरण के तौर पर, स्विट्जरलैंड में एक महिला को हिप्नोटिक रिग्रेसन में ले गये। उसने अरेबिक भाषा बोलना शुरू कर दिया, जिसका ज्ञान उसको इस जन्म में नहीं था। उसने अरबी भाषा सीखी नहीं थी और उसके मित्रों में से भी कोई अरबी जानने वाले नहीं थे। ऐसा कोई माहौल उसको जीवन में ना हीं मिला था जिसमें वह अरबी भाषा सीख सकें। फिर इतने सुचारू रूप से वह अरबी भाषा कैसे बोलने लगी? तो उससे पूछा गया कि अब आप इस समय कहां हैं, कैसे वस्त्र पहने है, क्या-क्या खाना खाती हैं? उसने कहा कि दक्षिण भारत के एक प्रान्त में एक नवाब है, वह उसकी बेगम है, उसके साथ अरबी भाषा में बात करती है। उसने जिस परिवार में जन्म लिया था, वे भी अरबी भाषा बोलते थे। उसने उस नवाब का नाम बताया, रहन-पहनावे के बारे में बताया और खान-पान के बारे में भी बताया। अपने घर की बनावट बतायी। इसके अलावा उसने बहुत-सी बातें बतायीं। इसके बाद उन वैज्ञानिकों ने दक्षिण भारत जाकर उस महिला के कथन अनुसार जब खोज की, तो सारी बातें सच निकलीं। यह तो मैंने एक मिसाल बताया लेकिन ऐसे बहुत-से मिसाल हैं।
जब कोई मर जाता है तो उसे दफना दिया जाता है या जला दिया जाता है। उसके पास ऐसी चीजें (स्मृतियाँ) बच जाती हैं जिन्हें फिर से नये जन्म में याद कर वे बताते हैं। बहुत से लोगों ने पुनर्जन्म के हालात बताने वाले बच्चों के कथन को रिकार्ड किया है। वे भी अपने प्रकार के प्रूफ (proof; प्रमाण) हैं। इस बारे में बहुत-सा विस्तार है। इस विषय में लौकिक में भी बहुत-से साहित्य प्रकाशित हो चुके हैं।
मैं यह कहना चाहता हूं कि जो योगाभ्यास करते हैं उनको दिव्य चक्षु प्राप्त होता है, जिसको तीसरा नेत्र कहते हैं। जैसे इन स्थूल चक्षुओं से प्रकृति की वे चीजें देख सकते हैं जो देखने की रेंज (range: क्षेत्र) में हैं, कानों से ऐसे शब्द सुन सकते हैं जो उनकी रेंज में हैं और अन्य इन्द्रियों से दूसरे-दूसरे अनुभव भी कर सकते हैं जो उनकी रेंज में हैं। वैसे जब हम आत्मा के स्वरूप में रहते हैं, मन को शुद्ध कर लेते हैं तो हमारे में जो सषप्त योग्यतायें हैं, उनको पुनः जाग्रत करने से हमारे में ऐसी शक्ति आ जाती है कि आत्मा का दिव्यदर्शन अथवा आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है। यह एक अलग बात है।
वैसे देखा जाये तो समाज में होने वाले अपराध और अनिष्टों के लिए स्वयं की पहचान अथवा आत्मज्ञान की कमी ही मूल कारण है। समाज में जितनी भी विषमतायें हैं, समस्यायें हैं उनके पीछे अलगाववाद है। भले वह जातिवाद हो या हिन्दू-मुसलमानों का झगड़ा हो, भाषा और प्रान्त का विवाद हो या राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्या हो इन बातों को लेकर अलगाववाद (separatism, divisionism) के आधार पर ही लड़ाई-झगड़े चल रहे हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए हम सबको एकजुट होना चाहिए। लेकिन सब एकजुट कैसे हो सकते हैं? अगर आपस में प्रेम नहीं होता, एक-दूसरे में सहयोग की भावना नहीं होती तो ये समस्यायें हल नहीं हो सकतीं। जब तक आपस में यह भाव रहेगा कि मै उत्तर भारत का हूँ, वह दक्षिण भारत का है, मैं गुजराती हूं, वह मराठी है, यह पंजाबी है, वह बंगाली है. यह आफ्रिका का है, वह अमेरिका का है तब तक विश्व में राष्ट्रभेद, भाषाभेद, रंगभेद रहेंगे। सब नारे लगाते रहते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई, आपस में हम भाई-भाई। जब तक इन नारों के भीतर का अर्थ नहीं समझते, तब तक इनसे कोई फ़ायदा नहीं। अगर हम मूल्यनिष्ट समाज की स्थापना करना चाहते हैं, आपस में एकता, प्रेम, सदभावना से रहना चाहते हैं और सब भेदभाव मिटाना चाहते हैं तो एक ही उपाय है कि हम आत्मा आपस में भाई-भाई समझें। यह शरीर पंचभौतिक तत्वों का है और एक साधन मात्र है। इसके द्वारा हम कार्य करते हैं, हम इस शरीर से अलग एक अविनाशी, अमर सत्ता ज्योति हैं। परमपिता परमात्मा की सन्तान होने के नाते हम आपस में भाई-भाई हैं या भाई-बहन है। यह विश्व एक बड़ा परिवार है। तब ही भाईचारे का दृष्टिकोण हमारे में आयेगा। मूल्यनिष्ठ समाज की स्थापना करने के लिए जरूरी वही है कि हमारा दृष्टिकोण (outlook) बदलना चाहिए और हमारी वृत्ति (attitude) बदलनी चाहिए। जब तक हमारे दृष्टिकोण और वृत्ति में परिवर्तन नहीं आयेगा, तब तक समाज में परिवर्तन नहीं आयेगा। वो परिवर्तन तब होगा जब हम पहले से बनाये ग़लत दृष्टिकोण को बदलें, हम अपने को मिट्टी का पुतला (शरीर) माने हुए हैं जो नाशवान चीज़ है। जो दाल-भात हम खाते हैं उनसे यह शरीर बना हुआ है। हमने अपने अस्तित्व को उससे जोड़ दिया है। यह शरीर तो भौतिक वस्तु है। इस भौतिक वस्तु को चलाने वाली एक अभौतिक चैतन्य सत्ता है. जिसको मनोविज्ञानी कान्शेसनेस (चेतना) कहते हैं, जिसका अध्ययन मनोविज्ञान में, दर्शनशास्त्र में और औषधिशास्त्र में होता है। अगर कान्शेसनेस अथवा चेतना नहीं होती तो हम सब जो सुन रहे हैं, देख रहे हैं, कर रहे हैं ये नहीं कर पाते। वह चेतना क्या है, उसका स्वरूप क्या है, इसको जानने की जरूरत है। इससे ही समाज में एकता आ सकती है और हम एक-दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं।
मनुष्य की दृष्टि और वृत्ति उसके निश्चय पर आधारित हैं। आप जैसे सोचेंगे, वैसे बनेंगे (As is the faith so is the man. As you think so shall you become)। यह एक मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है। इसको नकारने से हम आगे नहीं बढ़ पायेंगे। अगर अपने को शरीर समझते रहेंगे, अपने विचारों को नहीं बदलेंगे, अपने निश्चय को नहीं बदलेंगे और अपने को चैतन्य, अभौतिक आत्मा निश्चय नहीं करेंगे तब तक एक नये समाज का मॉडल (model; आदर्श, नमूना) नहीं ला सकेंगे, एक सुखमय संसार की स्थापना नहीं कर सकेंगे। दृष्टि और वृत्ति को परिवर्तन करने के लिए स्मृति को परिवर्तन करना आवश्यक है। जैसी हमारी स्मृति होती है, वैसी हमारी स्थिति होती है। राजयोग का अभ्यास किया जाता है, अपनी स्मृति के परिवर्तन के लिए। बार-बार यह स्मृति में रहे कि मैं एक आत्मा हूँ, ज्योतिर्बिन्दु हूँ, परमात्मा की सन्तान हूँ, संसार एक मुसाफिरखाना है, आखिर एक दिन मुझे यहां से चले जाना है। जब मेरे में यह स्मृति आयेगी तब मेरे में परिवर्तन आयेगा और एक मुल्यनिष्ट समाज की स्थापना हो सकेगी।
प्रश्नः कर्म करते हम योग कैसे करें? कर्म भी चलता रहे और साथ-साथ हम योग भी करते रहें यह कैसे हो?
उत्तरः कर्म करते समय हमारी दो प्रकार की स्मृतियों बनी रहती हैं। एक है चेतन अवस्था, जिसको जागृत अवस्था (Conscious) भी कहते हैं, दूसरी है अर्धचेतन अवस्था, जिसको सुषुप्त अवस्था (Sub-conscious) भी कहते हैं। जो भी कार्य हम करते हैं वह हमारे ध्यान में रहता है जिसको चेतन (जागृत) अवस्था कहते हैं। दूसरी, अर्धचेतन (सुषुप्त) अवस्था रहती है, उसमें भी कुछ बातें बनी रहती हैं। उदाहरणार्थ, एक आदमी दुकान में काम करता है। ग्राहक के साथ वह बात भी करता रहता है, चीजें भी दिखाता रहता है, फिर भी उसके मन में यह रहता है कि मैं तो सेल्समन (salesman; विक्रेता) हूँ, इस दुकान का मालिक और कोई है, मैं नहीं है। चाहे वह स्मृति उसके मन में स्पष्ट न भी हो लेकिन उसकी अर्धचेतन अवस्था में होती है। इसी तरह, कार्य करते वक्त हमें स्मृति रहे कि हम निमित्त हैं, ट्रस्टी हैं, परमात्मा के इनस्ट्रूमेंट हैं। निमित्त होकर इस शरीर से कार्य कर रहे हैं। अगर यह स्मृति सूक्ष्म रूप में भी बनी रहती है तो हमारा योग साथ-साथ बना रहता है। इसके लिए जरूरी है कि हर घंटे, डेढ़ घंटे, दो घंटे में एक मिनट के लिए एकान्त में बैठकर अपनी स्मृति को पुनः स्मरण करें कि मैं आत्मा हूं, मैं ज्योति स्वरूप हूँ, मैं लाइट और माइट हूँ, मैं अनादि और अविनाशी है, मैं शुद्ध और शान्त हूँ। यह अभ्यास हम बार-बार करते हैं तो कुछ समय के बाद कर्म करते हुए भी यह भावना स्वाभाविक हो जाती है कि मैं आत्मा हूँ, मैं निमित्त हूं, भगवान का इन्स्ट्रूमेंट हूँ। इसको भी हम कहेंगे योग की अवस्था ।
प्रश्नः आत्मा परमात्मा के साथ ही खुश रह सकती है तो परमात्मा ने आत्मा को अपने से अलग करके इस शरीर में क्यों भेजा ?
उत्तरः पहला प्रश्न यह है कि आप कैसे कहते है कि परमात्मा ने आपको यहाँ भेजा है? या आप खुद आये हैं? आप देखते हैं, जो भी मनुष्य है, प्राणी हैं, देहधारी जीव हैं उनमें दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक है, वे कोई न कोई कार्य करना चाहते हैं। कुछ हलचल चाहते हैं। दूसरा यह है कि जब वे कार्य कर लेते हैं, थक जाते हैं, तंग हो जाते हैं तो उस कार्य से हटना चाहते हैं, विश्राम करना चाहते हैं। लेकिन कब तक विश्राम करेंगे? विश्राम करने के बाद वे चाहते हैं कि कुछ काम किया जाये, कुछ कार्यकलाप देखा जाये। मनुष्य का यह स्वभाव है। हरेक व्यक्ति में आप यह देख सकते हैं। आत्मा भी इस कर्मक्षेत्र पर कर्म करने आती है। यह उसकी योग्यता है, उसको हम क्रियाशीलता (creativity) कहते हैं। आत्मा कर्म करना चाहती है क्योंकि कर्म करने की प्रवृत्ति उसमें है। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो बिल्कुल कर्म नहीं करता हो। हरेक के विधि-विधान, अभिरुचि, पसन्द, योग्यतायें अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन कर्म हर कोई करना ही चाहता है। इसलिए कर्मेन्द्रियों का आधार लेता है, इस कर्मक्षेत्र पर आता है। लेकिन यहां पर वह दुःख पाता है गलत काम करने से। दुःख ऐसे ही नहीं मिलता है। जब दुःख मिलता है तो अशान्त हो जाता है। जब अशान्त हो जाता है तो कहता है कि मुझे मुक्ति चाहिए, मैं यहां से छूटना चाहता है। अपनी-अपनी भाषा में कोई कहता है कि मुझे निर्वाण चाहिए, कोई कहता है कि मुझे लिबरेशन (स्वतन्त्रता) चाहिए, कोई कहता है कि मुझे रिडम्पशन (मुक्ति) चाहिए। फिर वह परमधाम, निर्वाणधाम जाता है। लेकिन उस धाम में कैसे जाता है? कैसे जा सकता है वह अलग विषय है। जब तक आत्मा पवित्र न हो, शान्त न हो, पुराने विकर्मों से फारिग न हो तब तक वापिस नहीं जा सकती। उसकी भी एक प्रक्रिया है। उसके बाद आत्मा वहाँ परमात्मा के पास चली जाती है। मैंने पहले बताया था कि कार्य करने की प्रवृत्ति आत्मा में रहती है। शरीर से अलग रहने के बाद, उसके मन में आता है कि जाकर कर्मक्षेत्र पर कुछ कार्य करें। फिर यहाँ आ जाती है। उसके अपने ही संकल्प, उसके अपने ही विचार, उसकी अपनी ही इच्छायें उसको आने की प्रेरणा देती हैं। ऐसा नहीं है कि परमात्मा ही आत्माओं को अर्थात हमे यहां भेजता है। परमात्मा तो जब देखता है कि हम आत्मायें दुःखी हैं, अशान्त हैं, बुराई की दलदल में फंसे हैं, चिल्ला रहे हैं, रो रहे हैं तो वह दयालु, कृपालु होने के नाते हमें इन सबसे छुड़ाने के लिए, फिर वापिस घर ले जाने के लिए एक तरीक़ा बताता है। जैसे माँ की गोद से निकल कर बच्चा दलदल में लिप्त हो जाता है, अपने को मिट्टी में लथपथ कर लेता है तो मां उसको नहला-धुलाकर अपनी गोद में ले लेती है लेकिन बच्चा फिर मिट्टी में खेलने-कूदने लग जाता है, पुनः माँ उसको नहला धुलाकर स्वच्छ बनाती है, फिर वो बच्चा मिट्टी में लथपथ हो जाता है, फिर मां.... ऐसे ही यह प्रक्रिया चलती रहती है।
बाप समझाते हैं, मेरी सृष्टि ही पवित्र है। वहां कर्म, अकर्म होते है। तमोगुणी बुद्धि तो यह महसूस नहीं कर सकती कि पवित्र प्रवृत्ति कैसी चली है। पवित्र प्रवृत्ति की सृष्टि ही ऊंची गायी हुई है। यह समझना मनुष्यों के लिए मुश्किल हो गया है, तब तो गिरते आये हैं। अब वापस लौटना है। कर्मबन्धन से छूटने के लिए पूरी पवित्रता धारण करनी है।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
परमात्मा के कर्तव्य और अवतरण का समय
आज, मुरली क्लास से पहले एक गीत बज रहा था, "बाबा, आपको बुला रहे हैं, आपको आना ही होगा...।" सुनकर मेरे मन में यह विचार उदित हुआ कि हम कहते हैं कि संसार के लोगों को वह दृष्टि प्राप्त नहीं है जिसे हम ज्ञानचक्षु कहते हैं। उसमें सबसे बड़ी बात यह है कि उनको आदि से भी आदि (संगमयुग) के इतिहास के बारे में ज्ञान नहीं है। परमात्मा को भी इस सृष्टि पर आना होता है, जिसको हम कहते हैं कि मनुष्य के साकार तन में निराकार परमात्मा का अवतरण, यह बात संसार के इतिहास में है नहीं। सतयुग से लेकर कलियुग के अन्त तक यह जो इतिहास चलता है। उसमें मनुष्यात्माओं का अपना-अपना पार्ट है लेकिन उसमें भगवान का भी पार्ट है - यह किसी को मालूम नहीं है। इतिहास के दृष्टान्त एक से एक जुड़े हुए हैं। ये कैसे शुरू होते हैं, कैसे इनका अन्त होता है, इसके (सृष्टि के चक्र के) विषय में बाबा ने हमें विशेष रूप से समझाया है।
आजकल विदेशों में इस बात की बहुत रिसर्च हुई है कि पुनर्जन्म होता है लेकिन उनको यह मालूम नहीं है कि आत्मा 84 जन्म लेती है। यह आत्मा के जन्म-जन्मान्तर का इतिहास है। इतिहास के बारे में दो बातें हैं। एक इतिहास हमारा इस जन्म का है, इससे पहले भी हमारा इतिहास चल चुका है और आगे भी वह चलेगा। इतिहास का यह दृष्टिकोण किसी को मालूम नहीं है। दूसरा, लोग जानते हैं कि दुनिया पतन की ओर जा रही है, समाज में मूल्य नहीं हैं लेकिन उनको यह मालूम नहीं है कि यह पतन बहुत समय से हो रहा है। बाबा ने मुरलियों में यह बताया है कि परमात्मा के अवतरण की आवश्यकता क्यों है। बाबा ने यह भी बताया है कि परमात्मा के अवतरण का समय कौन-सा है। वो लोग बताते हैं कि परमात्मा द्वापरयुग में आया लेकिन उनको संगमयुग का मालूम नहीं है। संगमयुग का मालूम न होने के कारण, वे पद को प्राप्त नहीं कर सकते। जिनको भगवान के आने की आवश्यकता का पता नहीं होता, उनको इतिहास का भी पूरा पता नहीं हो सकता। विश्व-इतिहास का भी पता नहीं लग सकता अगर वे संगमयुग को नहीं जानें तो। सारे संसार के इतिहास में एक ऐसा समय आता है, इतनी समस्यायें हो जाती हैं कि लोग दुःखी और अशान्त हो जाते हैं। उनको रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं होता, समस्याओं से छुड़ाने वाला कोई नहीं होता। क्योंकि जो खुद ही शान्त न हो, सुखी न हो, मुक्त न हो वह कैसे दूसरों को मुक्त कर सकेगा? बाबा ने कहा है कि संसार में अनेक मतें हैं, इसलिए उनमें एकता और एकमत कभी नहीं हो सकती। बाबा कहते हैं, सतयुग में एकमत होती है इसलिए देहधारियों की अनेक मतों पर न चलो और ईश्वर की एक मत - श्रीमत पर चलो।
अगर यह बात हम समझें कि जितनी आत्मायें शरीरधारी है, उनकी कुछ सीमा होती है। शरीरों की सीमा होती है और जिस धर्म में, जिस जाति में. जिस काल में तथा जिस देश में वे हैं उन सबकी सीमायें होती हैं। सत्य ज्ञान इन सीमाओं से ऊपर है, पार है। शरीरधारी यह ज्ञान दे ही नहीं सकते। सत्य ज्ञान को वही दे सकता है जो इन देह और देह की दुनिया की सीमाओं से ऊपर है, अतीत है। वह ही आत्मा और शरीर रूपी नैय्या को उस पार ले जा सकता है। दुनिया वाले तो कहते हैं कि यह दुनिया गिरावट की ओर जा रही है लेकिन वे यह नहीं जानते हैं कि गिरावट किस लिए हो रही है, यह समझाने वाला और गिरावट से बचाने वाला कौन है। बाबा ने हमें समझाया है कि जब सारे संसार की आत्मायें दुःखी होती हैं, अशान्त होती हैं तब मैं आकर नयी दुनिया के लिए नया ज्ञान देता हूं। भगवान को 'हेवनली गॉड फादर' कहते हैं। बाप जैसा होगा उससे वैसा ही वर्सा मिलेगा। लौकिक बाप से लौकिक वर्सा मिलेगा और पारलौकिक बाप से पारलौकिक वर्सा मिलेगा। स्वर्ग की स्थापना करने वाले बाप से स्वर्ग का ही वर्सा मिलेगा। वे कहते तो है कि परमात्मा कियेटर है लेकिन उनको यह स्पष्ट रूप से नहीं पता है कि वह नयी सृष्टि का कियेटर Creator रचयिता) है। वे यह नहीं जानते कि भगवान हेवन का क्रियेटर (स्वर्ग का रचयिता) है। क्रियेटर का अर्थ लौकिक वाले यह समझते हैं कि परमात्मा ने सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि की रचना की। बाबा कहते हैं, मैं रचयिता होने के कारण बच्चों को इनहेरिटेंस (inheritence, विरासत, वर्सा) देता हूं। लोगों को पता नहीं है कि परमात्मा को कियेटर किस लिए कहा जाता है। वह क्रियेटर इसलिए नहीं कि उसने सात दिनों में यह दुनिया बनायी और कहा कि यहां छुट्टियां मनाओ। ऐसा नहीं है। किस कारण से उसको फादर कहा जाता है. इसका भी स्पष्ट ज्ञान लोगों को नहीं है।
मैने कहा था कि इस विश्व इतिहास में परमात्मा के पार्ट के बारे में जानना जरूरी है। क्योंकि यह कहा गया है कि इतिहास और कुछ नहीं है बल्कि महान व्यक्तियों की जीवनगाथा है (History is nothing but biography of great persons)। हम इतिहास में उन्हीं के वृत्तान्त पढ़ते है जो व्यक्ति बड़े हैं, महान् हैं, जिन्होंने विशेष कार्य किये हैं. समाज को बदलने का प्रयत्न किया है। उन बड़े व्यक्तियों में से भी बड़ा कौन है, किस का बड़ा पार्ट है यह एक बड़ा लुप्त बिन्दु (missing point) है । आपने देखा होगा कि कई लोग भाषणों में परमात्मा की भी अलोचना करते हैं कि वह ऊपर बैठकर तमाशा देख रहा है। उन लोगों को पता नहीं है कि जो जैसा रचयिता होता है, वह वैसी रचना रचता है। परमात्मा ने स्वर्ग रचा. अद्भुत दुनिया रची। वे कहते हैं कि आप कहते हैं, परमात्मा सर्वशक्तिमान है. दुयालु, कृपालु है तो आज दुनिया ऐसी क्यों हुई? लोग इतने दूखी हो गये हैं, परिस्थितियां इतनी खराब हो गयी हैं, फिर भी वह चुप क्यों बैठा है? अगर वह ज्ञानपूर्ण है, सब जानता है तो दुनिया को ठीक क्यों नहीं करता? लोगों को सुधारता क्यों नहीं? हम उनके बच्च्चे हैं तो हमें भी उन जैसे रहना चाहिए ना? हम क्यों इतने दुःखी हैं? ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछते हैं। हमें पता है कि उनको परमात्मा के पार्ट के बारे में, उसके अवतरण के समय के बारे में, उसके कर्तव्य के बारे में जानकारी नहीं है।
दुनिया में जब कोई किसी की महिमा करता है, तो वह उस व्यक्ति का जो सुप्त देवत्व या दैवीगुण (hidden potentialities) हैं, उनकी महिमा करता है। वैसे ही परमात्मा की महिमा गाते हैं कि ज्ञान का सागर, प्रेम का सागर, सुख का सागर..., ये उनकी गुप्त योग्यतायें, विशेषतायें और गुण-शक्तियां हैं। उनकी ही महिमा भक्त और बच्चे गाते हैं। अंग्रेज़ी में उनको कहते हैं Highest, Holiest, Almighty Authority (ऊँच से ऊँच, परम पवित्र, सर्वशक्तिमान)। विश्व इतिहास में एक विशेष काल आता है तब परमात्मा आता है और अपना पार्ट बजाता है, सारे विश्व को बदलता है। नरकमय दुनिया को स्वर्ग बनाता है।
फिर प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अगर परमात्मा आता है तो कैसे आता है? कहाँ आता है, किस विधि से आता है? अगर शरीरधारियों को ज्ञान देना है तो उसको भी शरीर में आना पड़ेगा। शरीर में आयेगा तो किस शरीर में आयेगा, किसके शरीर में आयेगा? हम कहेंगे कि भगवान भारत में ही आयेगा। वे कहेंगे कि वह भारत में ही क्यों आयेगा, अन्य देशों में क्यों नहीं आयेगा? हम कहें प्रजापिता ब्रह्मा के शरीर में आयेगा तो वे पूछेंगे, उनके शरीर में ही क्यों आयेगा, दूसरे व्यक्ति के शरीर में क्यों नहीं आयेगा? कई प्रश्न उठते हैं। अगर परमात्मा यू.के. अथवा यू.एस.ए. में आयेगा तो भी यही प्रश्न उठेगा कि वहाँ क्यों आता है. यहां क्यों नहीं आता? यह सृष्टि नाटक सुचारू रूप से तथा नियमप्रमाण बना हुआ है। परमात्मा भी उन नियमों के अनुसार ही चलता है। परमात्मा इस सुष्टि पर आता है क्यों आता है? मनुष्यों को देवता बनाने आता है। देवता बनाने हैं तो वह वहीं आयेगा जहां देवता बनने वाले होंगे, जिनमें देवता बनने की योग्यता, विशेषताये होगी। वह कहीं आयेगा जहां देवताई संस्कृति और परम्परायें होंगी। वह मी धरती पर आयेगा जिस पर दैवी सभ्यता थी और वह स्थान भी पुरातन होगा।
- जिस चीज की स्थापना होती है उसकी पालना भी होती है। हद का बाप घर बनाते हैं तो पालना के लिए भी रेस्पान्सिबल रहते हैं। बेहद का बाप भी रेस्पान्सिबल है लेकिन यह पुरानी दुनिया तो परमात्मा ने स्थापन नहीं की है, न इसकी पालना के लिए रेस्पान्सिबल है। यह पाँच भूतों ने स्थापना की है, वे ही पालना कर रहे हैं। अगर परमात्मा पालना करते तो दुःख-अशान्ति नहीं होती।*
परमात्मा जो स्थापना हमारे द्वारा कराते हैं उसकी पालना भी कराते हैं। ऐसी पॉवर देते हैं कि सुखमय पालना करते रहो जो 21 जन्मों तक चलती है। परमात्मा, जो रचता, पालनकर्ता गाया हुआ है, वह नयी दुनिया का है।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
कल्पवृक्ष में धर्मों का ज्ञान
कल्पवृक्ष में मुख्य रूप से छह धर्म दिखाये गये है द्वापरयुग में), इस्लाम धर्म, बुद्ध धर्म, किश्चियन धर्म, सन्यास धर्म, मुस्लिम धर्म और सिक्ख धर्म । किसी भी धर्म के बारे में जानने के लिए मुख्यतः पांच बातों की आवश्यकता होती है। एक है उसका सिद्धांत पक्ष, दूसरा है नैतिक पक्ष, तीसरा है उपासना या साधना पक्ष, चौथा है सेवा पक्ष और पांचवां है अनुसरण पक्ष।
सिद्धान्त पक्ष का मतलब यह है कि आत्मा के विषय में, परमात्मा के बारे में, जगत के बारे में, कालक्रम के बारे में, कर्मविधान के बारे में, उपासना के विषय में, जीवन के लक्ष्य के विषय में, जिनको हम सिद्धान्त कहते हैं. उनको जानना। संसार में जितने भी धर्म संस्थापन हुए है उनमें इन विषयों की चर्चा की गयी है। किसी ने या तो परमात्मा को माना है या उसको मानने में इनकार किया है। अगर माना है तो उसका स्वरूप बताया है, अगर नहीं माना है तो उसका कारण बताया है। जैसे बुद्ध धर्म में परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया। कुछ लोग कहते हैं कि स्वीकार करने या न करने का प्रश्न नहीं है लेकिन चर्चा नहीं की गयी। परमात्मा के बारे में वो धर्म मौन है। लेकिन इस्लाम में परमात्मा को प्रथम स्थान दिया गया। आप सुनते होंगे, रोज वे लोग जो नमाज पढ़ते हैं. उसमें सबसे पहले होता ही है, 'अल्लाह हो अकबर', परमात्मा सबसे बड़ा है। इस्लाम शब्द का मतलब ही है कि अपने को पूर्ण रूप से परमात्मा को समर्पित करो। मुसलमान या इस्लाम का अर्थ है समर्पण। परमात्मा के सामने हम अपना मस्तक झुकाये और उस परमात्मा के फरमान पर चले। यह उनका सबसे बड़ा मन्तव्य है, उनका मौलिक आधार यह है। वे परमात्मा को मानकर चलते हैं।
दूसरा है, नैतिक पक्ष। इसमें अच्छाई क्या है और बुराई क्या है, कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है. सही क्या है और गलत क्या है कर्म और विकर्म क्या है नैतिकता क्या और अनैतिकता क्या है मनुष्य को जीवन में कैसे रहना चाहिए । दूसरों के साथ व्यवहार कैसे करना चाहिए उनके मन-वचन-कर्म कैसे होने चाहिए उसका आचरण कैसा हो - इस आचारसंहिता की चर्चा की जाती है। कई लोग उसको धर्म का हृदय कहते है। जो इस विषय में चर्चा नहीं करता, वह धर्म धर्म ही नहीं। धर्म का मुख्य लक्ष्य ही यह होता है कि मनुष्य को सदाचार सिखाये और दूसरों के साथ सदव्यवहार सिखाये। नैतिक पक्ष धर्म का मुख्य पक्ष है और आवश्यक पक्ष है।
तीसरा है, उपासना पक्ष। एक दिन में तो किसी में अच्छाई आ नहीं सकती। इसके लिए अभ्यास चाहिए। इसलिए परमात्मा के साथ किस तरह से नाता जोडना चाहिए, जिसको कोई प्रार्थना कहते हैं, कोई प्रेयर कहते हैं, कोई उपासना कहते हैं, कोई नमाज कहते हैं, कोई योग कहते हैं। उस परमात्मा से नाता जोडने के लिए हरेक धर्म की अपनी-अपनी रीति है. पद्धति है अगर वे परमात्मा को मानते हैं तो। आत्मा को तो सब धर्म मानते है। धर्म की चर्चा ही यहीं से होती है कि जड़ और चेतन अलग हैं। जड़त्व को छोडकर कैसे चेतनता की प्राप्ति करें, सम्पूर्णता को प्राप्त करें या नैतिकता की परिपक्वता को प्राप्त करें, यह हरेक धर्म का मुख्य उद्देश्य होता है। उसके लिए उनकी चर्चा होती है। दिन के लिए बनने वाली योजना को दिनचर्या कहते हैं और जीवन के लिए बनने वाली योजनाओं को चर्या कहते हैं। इसमें जीवन भर क्या-क्या करना होता है और उसको करते-करते कैसे सम्पूर्णता प्राप्त करनी होती है- इसके बारे में वर्णन होता है। सारे जीवन के लिए अपने नियंम बनाना कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसको चर्या कहते हैं। इसमें भक्ष और अभक्ष (क्या खाना है और क्या नहीं खाना है) भी आ जाता है। हरेक धर्म में इस विषय पर चर्चा की गयी है। इसको उपासना पक्ष या साधना पक्ष कहते हैं।
चौथा है, सेवा पक्ष। हरेक धर्म में सेवा को भी बहुत महत्त्व दिया जाता है। जिस चीज़ से हम अच्छे हुए हैं, उस चीज को दूसरों को देकर या दिलाकर उनको भी अच्छा बनाने की विधि को सेवा कहते हैं। उस सेवा को वे धर्म-परिवर्तन या धर्म-शुद्धीकरण कहते हैं। हम भी ज्ञान-योग निखाकर दूसरों की सेवा करते हैं, इसको हम संस्कार-शुद्धीकरण कहते हैं। इस शुद्धीकरण में वे नाम बदल देते हैं, वस्त्र बदल देते हैं, उपासना की विधि बदल देते हैं। लेकिन हम कहते हैं कि बेशक आप अपने-अपने धर्मों में रहो, उससे कोई फरक नहीं पड़ता। आपका नाम कैसा भी हो, कोई भी हो इसमें हमारी कोई आपत्ति नहीं। हम यह कहते हैं कि अपने संस्कारों को बदलो, अपने कर्मों को बदलो, अपनी दृष्टि-वृत्ति को बदलो। हम धर्म बदलने के लिए नहीं कहते लेकिन यह कहते हैं कि अपने स्वधर्म को धारण करो, सदा उसमें स्थित रहो। धर्म के शास्त्र आप पढ़ेंगे तो आपको पता पड़ेगा कि हरेक ने इस विषय पर चर्चा की है लेकिन किसी ने इस बात पर जोर दिया, किसी ने नहीं दिया। आप इतिहास में देखते हैं कि औरंगजेब के जमाने में क्या हुआ। उन्होंने यह बनाया कि मस्जिद के ऊपर चढ़कर बांग दे दे तो जहाँ तक वह आवाज़ जाये वे सब मुसलमान हो जायें। दूसरों को काफ़िर कहकर, तलवार के जोर से उनका मज़हब बदलने की कोशिश की। कइयों ने जनता को प्रलोभन देकर धर्मपरिवर्तन किया। जैसे तुमको नौकरी देंगे, तुमको पैसे देंगे, तुम यहां शूद्र कहलाओगे, हम तुमको ऊंची जाति का बना देंगे। लेकिन हम आत्मा को आत्मा की दृष्टि से देखते हुए, सभी को उस परमात्मा की सन्तति मानते हुए, ऊंच-नीच की दीवारों को न मानते हुए, यह भाव रखते हैं कि सब अपने को आत्मा समझ उस परमात्मा से नाता जोड़कर उससे सुख-शान्ति पवित्रता का सम्पूर्ण वर्सा ले लें। यह हमारे शुद्धीकरण की विधि है, यह हमारा लक्ष्य है।
पांचवां है. अनुसरणपक्ष। आप देखे कि धर्म जब स्थापन हाता है उस धर्म के जो धर्मपिता है. वो जैसा जीवन जीते है. जैसी उसकी दिनचर्या रही, लोगों से बातचीत करने का, व्यवहार करने का तरीका रहा उनका अनुसरण किया जाता है। हमारे यहाँ भी आप देखिये, सभी बातें मुरली में नहीं होती। बाबा व्यक्ति-व्यक्ति से बात करते हैं, व्यक्तिगत रूप से मिलने हैं। जब वह आत्मा बाबा के सामने अपनी समस्या रखती है. उस पर बाबा समझाता है, बताता है। यहां यह कहा जाता है कि पिताश्री और मातेश्वरी जी के जीवन को सामने रखो और उनको फॉलो करो। इसी तरह से हरेक धर्म में उनके धर्मपिता या उसके बाद उस धर्म में जो उसके विशेष अनुयायी या विशेष पुरुष या महान् पुरुष हुए, उन्होंने जैसा किया, जो किया उसका अनुसरण करते हैं। इसलिए कहते हैं कि जैसे बड़ों ने किया वैसे मनुष्य को उनका मार्ग अपनाना चाहिए। कुछ लोगों का कहना है कि काहे को झंझट में पड़ते हो, जैसे हमारे बड़ों ने किया है, वैसे करते चलो, हमारा बेड़ा पार हो जायेगा। हरेक धर्म में ऐसा है कि जो उनके बड़े हुए, उन्होंने अपना जीवन जिस ढंग से जीया, लोग फिर उन तरीकों को अपने व्यवहार में स्वीकार लेते हैं। मिसाल के तौर पर, मुहम्मद साहब ने चार शादियों की, उनकी चार बेग़में थीं। आम मुसलमान ने क्या किया? उसके लिए यह एक आदर्श हो गया और वह भी चार-चार शादियां करने लगा। मोहम्मद साहब ने कहा कि जो हरेक पत्नी को बराबर प्यार दे सके वो एक से अधिक पत्नी रख सकता है। इससे उस धर्म में एक पत्नीत्व तो नहीं हुआ, बहुपत्नीत्व तो हो ही गया। एक पत्नी का नियम तो नहीं रहा ना! उनका प्रमुख जैसे था. वैसे उनके धर्मावलम्बी भी जीने लगे। जैसे काइस्ट था, वो अविवाहित था।
उनके जो प्रीस्ट हैं, वे भी अविवाहित हैं, वह्मचारी हैं। अभी बहुत समय से उनके यहां भी यह सवाल उठने लगा, पोप से भी कई दफा कहा गया कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं, जो बिशप हैं, फादर्स हैं उनको अभी शादी की इजाजत दी जाये। जैसे-जैसे समाज में गिरावट आती जाती है, लोग यही कोशिश करते हैं कि नियमों में ढीलापन किया जाये। अभी तक उनके यहाँ यही नियम है कि धर्मनेता द्वारा ब्रम्हचर्य का पालन किया जाये। कहने का भाव यह है कि हरेक धर्म में जो उनके बड़े होते हैं, वे जैसे जीये, वह उनके अनुचरों के लिए, अनुयाइयों के लिए आदर्श हो जाता है। वे वैसा जीवन जीने की कोशिश करते हैं। यही हरेक धर्म-सम्प्रदाय का नियम बन जाता है जैसे हिन्दू लॉ, मुस्लिम लॉ, क्रिश्चियन लां, जुइश लॉ इत्यादि बने हैं। सरकार भी जब नियमों को पास करती है, तो धर्म के उन नियमों को आधार मानती है। अगर सरकार धर्म के नियमों में हस्तक्षेप करती है, तो लोग भड़क उठते हैं क्योंकि उस धर्म के लोग मानते हैं कि उनके धर्मस्थापक परमात्मा से मिले हुए थे, उन्होंने जो कहा है वह सत्य है। इसलिए सरकार से कहते हैं कि आप धर्म में हस्तक्षेप मत कीजिये, आप राजनीति में बड़े हो सकते हैं, न कि धर्म में।
जब किसी भी धर्मपिता ने धर्मोपदेश या धर्म का ज्ञान दिया तो वो उस समय कोई दर्शनबद्ध नहीं होता है। दर्शन में क्या होता है? दर्शन में एक बात को शुरू किया जाता है और उसको आगे बढ़ाया जाता है तर्क करते हुए, एक नियमबद्ध तरीके से। कोई एक ऐसा सत्य, एक ऐसा सूत्र ले लेते हैं जो स्वयं सिद्ध है, उसको वे तर्कबद्ध रूप से सिद्ध करते हैं। एक बात को सिद्ध करके फिर उसको आगे बढ़ाते जाते हैं, अपने दर्शन का ढांचा बनाते चले जाते हैं। विद्या की एक विधि ही है कि एक जानी हुई बात से अनजान बात की ओर जाना (Known to unknown)। एक जानी हुई बात से या न जानी हुई बात होने पर उसको जानी हुई (Unknown to known). बनाकर, तर्कबद्ध तरीके से उसको आगे बढ़ाने की पद्धति को दर्शन कहते हैं। जब कोई धर्म स्थापन हुआ, तब उसका दूसरे धर्म से सामना हुआ, अपनी बात को साबित करने की जरूरत महसूस हुई। उसको पूरा करने के लिए धर्म के बड़ों ने जो बताया उसको दार्शनिक रूप देते है आप देखेंगे बाबा की मुरली में आत्मा के बारे में भी होगा परमात्मा के बारे में भी होगा सृष्टिचक्र के बारेमे भी होगा हर मुरली में सभी विषयों के बारे मे होगा लेकिन दर्शन में आज आत्मा की चर्चा की तो आत्मा की ही करेंगे वह पूरी होने के बाद परमात्मा की करेंगे। वह उस तरीके से होता है। धर्म के तरीके बहुत सरल है। बाबा मुरली में कई बार कहते है कि जैसे बुजुर्ग दादा परदादा बच्चों को पौत्रों को कहानी सनाते हैं. वैसे मैं भी तमको सृष्टि की कहानी सुनाता हूं। बच्चे यह पारिवारिक संस्था (Family Institution है। यह कोई वैसा विद्यालय नहीं है, यहां बाप बैठकर बच्चों को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की कहानी सुनाते हैं, हिस्ट्री-जॉग्राफी बताते हैं। धर्मपिता ने इसी तरह किया, अपने उपदेशों को बच्चों के जैसे पढ़ाया। इसलिए उनको धर्मपिता कहा गया। भले, धर्मपिताओं को अपने अनुकरो जो 'बच्चे' कहने की या अनुचरों को अपने धर्मपिताओं को 'बाबा' कहने की हिम्मत नहीं हुई लेकिन धर्मस्थापकों ने बच्चों को जैसे ज्ञान दिया जाता है. वैसे ही अपना ज्ञान दिया। क्रिश्चियन धर्म में चर्च के मुखिया को ये फादर ही कहते हैं ना! धर्मपिताओं का उपदेश तर्कबद्ध नहीं होता, अनुभवबद्ध होता है, सरल और बुद्धिगम्य होता है। वे शास्रार्थ और तर्क-वितर्क में ज्यादा नहीं पड़ते। हमने तो बता दिया, आप चाहें तो इसको ले लो, न चाहो तो छोड़ो। लेकिन बाद में दूसरे धर्म वालों को सुनाना पड़ता है, सिद्ध करना पडता है, तब वे उस ज्ञान को तर्कबद्ध बनाते हैं इसलिए हरेक धर्म का धर्मदर्शन, धर्मशास्त्र अलग बन गया।
है (Book: पुस्तक है। बाइबल माना किताब उसी प्रकार कुरान माना किताब यानि यह उस धर्म की किताब है। वेद भी कोई नाम नहीं है, वेद माना ज्ञान। इस्लाम धर्म का ग्रंथ लिखित रूप में न मिलने के कारण मुस्लिम धर्म के कुरान को ही दोनों अपना मानने लगे और दोनों धर्मों को एक धर्म मानने लगे। जिस संग-ऐ-असवद को इब्राहिम ने रखा था. उसी को बाद में मुहम्मद साहब ने भी फिर से रखा इसलिए लोग समझते हैं कि इब्राहिम मुस्लिम धर्म के पहले पैगम्बर थे और मुहम्मद साहब आखिरी पैगम्बर थे। अतः लोगों ने समझा कि धर्म तो दोनो एक ही है।
एक बात मैं यहां बताना चाहता हूं कि दोनों धर्म अलग-अलग हैं, मैंने
जो धर्म के पांच पक्ष बताये हैं, उनसे हमें पता पड़ता है कि दोनों अलग हैं आप देखेंगे, कल्पवृक्ष में बाबा ने संन्यास धर्म को अलग दिखाया है। उसकी शाखा अलग है। लेकिन हिन्दू समझते हैं कि हमारे धर्म के आचार्य वही हैं संन्यासी ही समाज में धर्म का उपदेश करते हैं। बाबा कहते हैं कि संन्यासियो का धर्म ही अलग है। इस धर्म को तो शंकराचार्य ने बाद में स्थापन किया यह निवृत्तिमार्ग का धर्म है। आपका है प्रवृत्तिमार्ग का धर्म जिसको आदि सनातन देवी-देवता धर्म कहते हैं। अगर इन पांच पक्षों को आप लेंगे तब आपको मालूम होगा कि संन्यास धर्म कैसे अलग है। आप इस्लाम धर्म के पाँच पक्ष लें कि इब्राहिम ने क्या कहा और मुस्लिम धर्म के पांच पक्ष में कि मुहम्मद साहब ने क्या कहा, उनकी साधना की विधि क्या थी और इनकी साधना की विधि क्या थी. उन्हाने क्या नैतिक नियम बताये और इन्होंने क्या नैतिक नियम बताये इत्यदि इत्यादि । तब तो कोई शक की बात नहीं रह जाएगी कि दोनों धर्म अलग थे। अगर आप बाहर का रूप देखे तो संन्यासियों के नाम भी वहीं होते हैं और हिन्दुओं के नाम भी वही होते हैं। इसलिए लोग समझते हैं कि संन्यासी भी हिन्दू धर्म के हैं।
जब मैंने पहली बार कल्पवृक्ष का चित्र देखा, देखते ही मुझे लगा कि यह ज्ञान भगवान के सिवाय और किसी का दिया हुआ नहीं हो सकता। इसमें यह बताया हुआ है कि श्रीकृष्ण का जन्म सतयुग में हुआ, गीता का ज्ञान श्रीकृष्ण ने नहीं दिया और इब्राहिम अलग था और मुहम्मद अलग था, संन्यासी अलग हैं। ऐसे क्रमबद्ध, व्यवस्थित रूप से जो जहां होना चाहिए, वहाँ दिखाना, उस तरीके से बताना आज तक किसी ने सोचा तक नहीं। ये बाते पहले जिसने पढ़ी हुई होंगी उसको यह मन में चमक जाता है कि ओहो, यह बात जो हमने नहीं समझी थी, देखो यहाँ स्पष्ट हो गयी।
जब मैं पाँचवीं कक्षा में इतिहास पढ़ता था, उसमें सबसे पहले रामायण और महाभारत बताया गया था। मुझे आज तक याद है कि उसमें लिखा था कि कुछ लोग कहते हैं कि कृष्ण सूर्यवंशी थे और कुछ लोग कहते हैं कि वे चन्द्रवंशी थे। ऐसे ही श्रीराम के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि वो बाद में हुए और कुछ लोग कहते हैं कि वो पहले हुए। मेरे मन में आया था कि जब मैं बड़ा होऊंगा तब इस पर रिसर्च करूँगा। यह क्या बात है, हम अपने धर्म के बारे में यह भी निर्णय नहीं कर पाते हैं कि कौन क्या है, कब है? जब हमने सुर्यवंश और चन्द्रवंश के बारे में अध्ययन किया तो उसमें यह बात है कि यज्ञ हुआ उस यज्ञ से सूर्यवंश और चंद्रवंश निकले। मैने सोचा अग्नि तो जला देती है, उससे जन्म कैसे हुआ मनुष्या का? जब कोई मर जाता है उसको अग्रि में जलाते हैं समाप्त करने के लिए और ये कह रहे हैं जन्म हुआ। ईश्वरीय ज्ञान मिलने के बाद जब मैं यहा आबू आया तब मालूम हुआ कि वह कौन-सा यज्ञ था। आपको मालूम होगा कि आबू में ही एक यज्ञस्थान हवनकुंड बना हुआ है। यहां की जो टरिस्ट गाइड छपी है उसमे आप देखेंगे यज्ञस्थान के बारे में लिखा हुआ है कि यह यज्ञ हुआ उस यज्ञ की अग्रि में सर्यवश और चन्द्रवंश निकले। जब मैं पहले-पहले आबु में आया था सन् 1952-53 में तब उस स्थान* को देखा था। जब मैं यहाँ बाबा के पास आया तब मुझे मालूम है कि भगवान ने कौन-सा यज्ञ रचा , वह कौन-सी अग्रि थी जिससे सूर्यवंश और चन्द्रवंश निकले, ये सब आबू में था। उसकी यादगार यहाँ हवनकुंड बना दिया। देखिये बात कहाँ से कहाँ हो गयी! अभी तक किसी को भी मालूम नहीं है कि वह यही यज्ञ है. यही संस्था है। बाबा कहते हैं कि एक तरफ यह चैतन्य दिलवाला मंदिर है, दूसरी तरफ़ वह जड़ दिलवाला मंदिर है। लोगों को अभी तक सच्चाई का पता नहीं है। कितनी विचित्र बात है। कल्पवृक्ष को देखते ही मुझे यह लगा कि सिवाय परमात्मा के यह ज्ञान और कोई बता नहीं सकता क्योंकि ब्रह्माकुमारी बहनें, पहले-पहले जो यज्ञ में थी, उन्होंने तो संस्कृत के बड़े-बड़े ग्रंथों का अध्ययन तो नहीं किया था, जिस तरीके से बताती हैं कि यह ऐसा हुआ, वह ऐसा हुआ यह इनके बस की बात नहीं, किसी इन्सान के वश की बात नहीं। और सब बातें तो मैंने छोड़ दी लेकिन भूतकाल की बातें इतने स्पष्ट रूप से जानता हो और संसार में निर्भय होकर, निर्भीक होकर सत्य बात बताये, सारे लोग इसका विरोध करें और वह कहे, यह बात ऐसे ही हुई थी जैसे उसके सामने प्रत्यक्ष हो-
*यह अग्निकुंड वशिष्ठ आश्रम के सम्मुख है। वशिष्ठ आश्रम गौमुख के आगे है गौमुख हनुमान मन्दिर से पाँच कि. मी. नीचे की ओर जंगल में है। लगभग १०० सीढ़ियां उतरने के बाद यह सुन्दर स्थान आता है। इसके आस-पास अनेक देवीं देवताओं की प्राचीन मूर्तियां हैं।*
यह मनुष्य कोई कह नहीं सकता। यह त्रिकालदर्शी ही कह सकता है। अच्छा मै इब्राहिम की बात कह रहा था। बहरहाल इब्राहिम ने कोई लडाई नहीं की थी. उसने कोई हथियार नहीं उठाया था, उसने हिंसा नहीं की जो मुहम्मद साहब के जीवन में हुई। इब्राहिम के जीवन में एक छोटी-सी लड़ाई जरूर हुई। उसको मालूम पड़ा कि उसका भतीजा लाट, जो उसमें अलग हो गया था, उस पर कुछ लोगों ने आक्रमण किया उसके पशुओं को छीनने के लिए। तब इब्राहिम अपने लोगों को लेकर भतीजे की सुरक्षा के लिए गया था। बहरहाल वह भतीजे की सुरक्षा के लिए गया था, और कोई लक्ष्य उसका नहीं था। उस समय तो द्वापर शुरू हो गया था, विकार प्रवेश हो गये थे, हिंसा शुरू हो ही गयी थी। लेकिन उसने वैसी हिंसा नहीं की जैसे मुहम्मद साहब के ज़माने में हुई थी। इससे हमें पता चलता है कि बाद में आये हुए धर्मों में हिंसा का प्रवेश होता गया। जैसे हम सिक्ख घराने में देखते है कि गुरुनानक जी ने हिंसा नहीं की, बाद में गोविन्द सिंह जी जिनको दसवे गुरु बोलते हैं, उनके ज़माने में हिंसा शुरू हुई। जब इस्लाम और मुस्लिम दोनों धर्मों के सिद्धान्त पक्ष, नैतिक पक्ष और साधना पक्षों को हम विस्तार से देखते हैं तो पता पड़ता है कि दोनों में अन्तर था।
मक्का में इब्राहिम ने जो संग-ऐ-असवद रखा था, उसके साथ एक कुआं है जिसको लमज़म का कुआँ कहते हैं, इब्राहिम को जब प्यास लगी थी तो वहां पर उन्होंने पानी पीया था। जैसे हमारे यहाँ सूर्यकुण्ड होते हैं, गंगा जल होता है उसको हम पवित्र और अमृत मानते हैं। वैसे ही जो मुसलमान वहाँ मक्का में हज करने जाते हैं, वे उस कुएँ के पानी को अमृत मानते हैं। भक्तिमार्ग में ऐसी मान्यता है। जैसे स्थान का महत्व है, वैसे यहां के पानी का भी महत्त्व होता है। अमृतसर है. वहां उनका सरोवर है, उसको अमृत मानते हैं इसलिए वह अमृतसर है, वह अमृत काही सरोवर है। उसी प्रकार मक्का में संग-ऐ-असवद के पास जो पानी है उसको वे भले पतितपावन नहीं मानते लेकिन अमृत मानते हैं। उसको वे आबे-हयात कहते हैं, जिसक अंग्रेजी में नेक्टर (Nector) कहते हैं। नेक्टर का अर्थ है अमृत। बात तो वो हो गयी। उनके लिए वह पानी पीना जरूरी है। इसलिए वहाँ पर जो भी जाते हैं उस कुएं का पानी भी पीते हैं। वह भी इब्राहिम से सम्बन्धित है।
मुहम्मद साहब की जीवन कहानी में आता है कि जब वे छोटे थे, उस समय धीरे-धीरे संग-ऐ-असवद में मूर्तियां लायी गयीं। उनमें देवियों की मूर्तियां अधिकतर थी। तो इन्होंने भी मूर्तियां तोडी इसीलिए लोगों ने यह समझा कि दोनों एक ही हैं। इब्राहिम के ज़माने में सितारों की पूजा विशेष होती थी। तारों की, सूर्य की, चन्द्रमा की पूजा होती थी, जैसे भारत में नवग्रहों की पूजा होती है। मुहम्मद साहब भी उसके खिलाफ़ थे। उसके उपदेश में यह आता है कि तुम इन सितारे, चाँद, सूर्य को, मूर्तियों को ईश्वर मानते हो, वे ईश्वर नहीं हैं। एक खुदा ही ईश्वर है, परमात्मा है, वह एक ही है। यह पहला नियम है, इब्राहिम का भी और मुहम्मद का भी।
आपको मालूम रहे कि यहूदी, ईसाई, मुसलमान आदि इब्राहिम को अपने धर्म का बड़ा मानते हैं। उसकी वजह यह है कि जो भी धर्म संसार में बाद में आया, हरेक से यह सवाल किया गया विरोधियों द्वारा कि आपका धर्म तो अभी स्थापन हुआ है। आपके धर्म से जो पहले लोग थे उनका क्या हुआ? उनको आपके धर्म का ज्ञान तो नहीं था, तो उनमें से किसी को भी मुक्ति-जीवनमुक्ति नहीं मिली होगी ! अगर आपको खुदा से ज्ञान मिला या गॉड से ज्ञान मिला तो परमात्मा ने न्याय क्या किया? परमात्मा ने आपके द्वारा ज्ञान दिया तो पहले वाले इससे वञ्चित ही रहे गये? इस प्रश्न का उत्तर सर्व धर्म वालों ने यह देने की कोशिश की कि उनका धर्म तो संसार के शुरू से चला आ रहा है। इसलिए वे ब्रह्मा को न जानने के बावजूद भी ब्रह्मा को अपना मूल मानते हैं। जैसे क्रिश्चियन कहते हैं कि हमारा धर्म एडम से शुरू हुआ, मुसलमान कहेगे हमारा आदम से शुरू हुआ जैनी कहेंगे हमारा आदिनाथ से शुरू हुआ। जब आदि से शुरू करेंगे तब बीच-बीच वालों को अपने धर्म वाले समझने लगे या समझना पड़ा। इसलिए इब्राहिम को भी मुसलमान अपने धर्म का बताते हैं। इब्राहिम को अनेक धर्मों का पैगम्बर या प्रॉफिट (Prophet; देवदूत) मानते हैं।
मैं मुहम्मद साहब के बारे में कह रहा था, मुहम्मद साहब के जमाने में काबा गिर गया था और संग-ऐ-असवद भी गिर गया था। फिर से दीवार बनाकर संग-ऐ-असवद को उसमें रखना था। उस जमाने में वहां के समाज में चार मुख्य परिवार थे, उनमें विवाद हो रहा था कि दीवार पर संग-ऐ-असवद हम रखें ताकि उसका श्रेय या सम्मान हमें मिले। बताते हैं कि मुहम्मद साहब वहीं से गुज़र रहे थे। लोगों ने सोचा, ये तो तटस्थ हैं, इनसे ही पूछ लेते हैं, ये जो फैसला करेंगे, वैसे करेंगे। सभी ने यह बात मान ली। मुहम्मद साहब की कहानी में बताते हैं कि मुहम्मद साहब ने कहा कि एक चादर ले आओ। चादर ले आये और मुहम्मद साहब ने उन चारों को कहा कि आप चारों, चादर का एक-एक कोना पकड़ो। उन चारों ने पकड़ा और मुहम्मद साहब ने संग-ऐ-असवद को चादर के बीच में रखा। फिर उन चारों को कहा गया कि उस चादर को मनुष्य की लम्बाई तक उठाओ, जब उन्होंने उठाया, मुहम्मद साहब ने उसको वहां से उठाकर दिवार पर रख दिया। अभी हिन्दुओं में जैसे मंदिर जाते हैं तो सात परिक्रमा लगाते हैं, वैसे वहां भी परिक्रमा लगायी जाती है। जैसे यहां देवियों की पूजा होती है, वहां भी देवियों की पूजा होती थी, अब नहीं होती। आज तक भी संग-ऐ-असवद वहां वैसे ही है, जैसे पहले था।
आज जब हम मुसलमानों से पूछते हैं कि संग-ऐ-असवद शिवलिङ्ग ही तो है, यह कहां से आया? आप कहते हैं कि परमात्मा का रूप हम नहीं मानते लेकिन इसको तो आप मानते हैं। वे आमतौर पर जवाब देते हैं कि यह काबा (खुदा का घर) बनाना था, उस समय अल्लाह ने अपनी तरफ से आधारशिला (Foundation Stone) भेजा था / संग-ऐ-असवद वही आधारशिला है। यह हमारी पूजा की चीज नहीं है। कुरान में लिखा है कि खुदा पांचवे आसमान पर रहता है, वहाँ से उसने इस पत्थर को फेंका है। सबस बड़ी बात यह है कि मुसलमान धर्म में आप कोई प्रश्न नहीं कर सकते। जो प्रश्न पछेगा उसको माना जाता है काफिर अर्थात धर्मभ्रष्ट प्रश्न करते हैं तो समझा जायेगा कि आपको ख़ुदा पर यकीन नहीं है। उनसे यह पूछेगा कौन कि इसको पांचवें आसमान से खुदा ने फेका कैसे? यह सारी बात कहने वा मेरा भाव यह था कि ये दोनों धर्म अलग हैं।
इब्राहिम के बाद वे लोग कहते हैं कि यहुदी धर्म आया। इसको कल्पवृक्ष में नहीं दिखाया गया है। विदेशों में बहुत-से यहूदी हैं। वे लोग हमसे पूछते है कि हमारा धर्म आपने क्यों नहीं दिखाया? वे कहते हैं कि मुहम्मद साहब हमारे बाद आया, हमारा धर्म उनसे पहले था। ये भी एडम और इब्राहिम को अपना मानते हैं। हम कहते हैं कि इब्राहिम ने इस्लाम धर्म स्थापन किया। हमारे मुताबिक जो मोसिस हुआ, जिसको वो लोग मूसा कहते हैं, वो उनका धर्मपिता है। एक कहावत भी है, लिखे मूसा पड़े ख़ुदा। एक लिखता है और उनको दुसरा पढ़ता है। जिसने उसको लिखा था वो भी उसको पढ़ नहीं मकता। हमारे यहां भी ऐसा होता था। लिखता बाबा और उसको पढ़ती थी इशू बहन। लिखे खुदा और पड़े ईशू। बाबा सिन्धी में लिखते थे, उसको पढना होता था या उसको हिन्दी में लिखवाना होता था तो बाबा ईशू बहन से पढ़वाते थे। बाबा अपने पत्र खुद नहीं पड़ते थे, ईशू बहन से कहते थे, बच्ची, पढ़ो, यह क्या लिखा है। हम खुद भी बाबा के पास बैठे रहते थे। बाबा लिख तो देते थे, जब उसको पढ़ना होता था, तो ईशू बहन से पढ़ाते थे।
मैं यहूदी धर्म के बारे में बता रहा था। इस्लाम धर्म के बाद यहूदी धर्म हुआ। यहूदियों के रीति-रिवाज ईसाई और इस्लाम धर्म वालों से मिलते जुलते हैं। उस धर्म की संख्या भी बहुत कम थी, उनका राज्य भी बहुत कम समय चला। बहुत समय तक वे दरबदर होते रहे। अभी जाकर वे इसराइल में बसे हैं। यह एक ही धर्म है जो कल्प की आयु 5000 वर्ष मानता है, यह एक विशेष बात उस धर्म की है। एक और बात आपको मालूम रहे कि ये जो ईसाई और यहूदी लोग हैं, एक अचम्बे की बात सुनिये कि वे लोग अभी कुछ समय पहले तक यह मानते आये थे कि नारी में आत्मा नहीं होती, आत्मा सिर्फ पुरुष में होती है। उनकी यह भी मान्यता है कि पशु और पक्षियों में आत्मा नहीं होती। ये मानते हैं कि यह सृष्टि पहले-पहले स्वर्ग थी, पेराडाइज थी। उनके साहित्य से लगता है कि वे परमात्मा को सर्वव्यापी नहीं मानते है। परमात्मा को एक पुरुष विशेष मानकर बात करते हैं और उसको फादर कहकर बुलाते हैं।
मुसलमान लोग जो है, वे ईश्वर को खुदा कहते हैं, मालिक कहते हैं लेकिन पिता नहीं मानते हैं। अगर आप मुसलमान लोगों को कहो कि परमात्मा हम सबका माता-पिता है तो वे बिगड़ जाते हैं। अगर आप कहेंगे, परमात्मा पिता है तो वे कहेंगे कि खुदा ने भी शादी की है क्या? अगर हम उसके बच्चे हैं तो उसकी बीबी भी होगी! वे यह समझ ही नहीं सकते कि पिता का और कोई अर्थ भी हो सकता है। वे कहते हैं कि ख़ुदा हमारा मालिक है और हम उसके बन्दे हैं, सेवक हैं इसलिए उसके आगे हमें झुकना चाहिए। इसलिए वे लोग दोनों घुटने टेककर नमाज़ पढ़ते हैं। हमारे यहां बताया जाता है कि परमात्मा को याद करना है तो चाहे लेट भी जाओ अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं हो तो। मुझे याद है, कानपुर से एक भाई मधुबन आया था। उसके पाँव में मोच आ गयी थी, इसलिए उसका क्लास में नहीं आना हुआ था। बाबा ने पूछा, फलाना बच्चा क्यों नहीं आया? किसी ने बोला, बाबा उसके पांव में मोच आ गयी है, वह चल नहीं सकता। बाबा ने कहा, यह क्या बात है, उसको कहो, यहाँ चारपाई पर लेट जाये लेकिन मुरली सुनता रहे ।बाबा कहते है कि बच्चे बाप तकलीफ नहीं देते है । याद तो मन का अभ्यास है।
बुद्ध धर्म के बारे में आप जानते हैं कि सबसे पहले बद्ध ने संसार में दुःख देखा, तभी उसने अपना राज्यभाग्य छोड़ा। इसलिए बुद्ध धर्म सिद्धान्त यही से शुरू होता है कि संसार दुःखमय है। यह संसार दुःखो का घर है। पहले-पहले बद्ध दर्शन को समझने के लिए उसका यह पहला सुत्र जानना पड़ेगा कि यह संसार दुःखमय है। संन्यासी लोग तो संसार का मानते ही नहीं हैं. वे कहते हैं. संसार ही नहीं है। अगर संसार या जगत ही मिथ्या है तो दुःख भी मिथ्या हो गया। बुद्ध धर्म वाला, संसार को मानता है, साथ साथ यह मानता है कि संसार क्षणभंगुर है. परिणामी है। यह क्षण क्षण में पल-पल में बदलता रहता है। जिसको आप संसार कहते हैं यह स्थिर नही है। अभी ऐसा है लेकिन अगले क्षण में यह बदल जायेगा। इसलिए उनकी उपासना, साधना, नैतिकता, सिद्धान्त आदि इसी बात पर आधारित हैं कि यह संसार नाशवान है, क्षणभंगुर है, परिणामी है, परिवर्तनशील है, नश्वर है। अतः इस संसार के सुखों को पाने की कोशिश करना बेकार है। इनके लिए अपना समय, शक्ति और सम्पत्ति का व्यय करना व्यर्थ है। दुःख से मुक्त होने के लिए उन्होंने आठ क़दम बताये हैं। हर शब्द के पहले वे लोग सम्यक् शब्द जोड़ते हैं। जैसे पहला है, सम्यक् ज्ञान। सम्यक् माना सही। सिर्फ ज्ञान नहीं, सही ज्ञान (Right Knowledge)। हम कहते हैं कि ज्ञान माना ही सही ज्ञान। अगर वह सही या सत्य नहीं हो तो ज्ञान कैसे हुआ? दूसरा है. सम्यक् विवेक आदि।
बुद्ध धर्म आत्मा को मानता है लेकिन हमारे में जैसे आत्मा के स्पष्ट रूप का ज्ञान है, वहां नहीं है। ईश्वरीय ज्ञान में आत्मा का रूप ज्योतिर्बिन्दु है, आत्मा शरीर में भ्रकुटि के बीच निवास करती है, आत्मा परमधाम से आती है. ये कुछ भी वहां नहीं बताया गया है। सिर्फ मै आत्मा हु, यह बताया गया है। वे कहते हैं कि आत्मा क्या है, कैसी है, आदि है या अनादि है?- इसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। बौद्धों का ग्रंथ जो है वह प्राकृत भाषा में है। उसमें मुक्ति के लिए निर्वाण शब्द का प्रयोग किया गया है। निर्वाण को हम कहते हैं, वाणी से परे। प्राकृत भाषा में निर्वाण को वे निव्वाण कहते हैं। उनके अनुसार निर्वाण या निव्वाण माना बुझ जाना। जैसे एक मोमबत्ती जल रही है, उसकी लौ बुझ जाये, वह निव्वाण हो गया। समझ लो, वह ज्योति समाप्त हो गयी, उसी को वे निर्वाण कहते हैं, निर्वाण की प्राप्ति कहते हैं। क्या यह प्राप्ति हुई? इसमें कुछ पाया गया या खोया गया? वे यह कहते हैं कि यह सारा संसार दुःखों का घर है और दुःखों के घर का कारण मनुष्य की आशा या इच्छा है। मनुष्य की आशा ही दुःख का मूल है। हमारे यहाँ बताया गया है कि सब दुःखों का मूल पाँच विकार हैं, पाँच विकारों का मूल देह-अभिमान है और देह-अभिमान का मूल अज्ञान है। अज्ञान आत्मा और परमात्मा के विषय में। उनका सिद्धान्त यह है कि संसार दुःखों का घर है और दुःखों का मूल मनुष्य की आशायें हैं। उन्होंने दो प्रकार के संसार नहीं बताये कि दुःखों का संसार भी है और सुखों का संसार भी है। वे कहते हैं कि ऐसे ही दुःख और अशान्ति का संसार चला आया है। जब तक तुम इस संसार में रहोगे, दुःख और अशान्ति होगी। इसलिए निर्वाण प्राप्त करना है और निर्वाण प्राप्त करने के लिए इच्छाओं को समाप्त करना है। तब इस आत्मा का अस्तित्व समाप्त होगा। आत्मा का अस्तित्व हमारी अलग-अलग इच्छाओं से बना हुआ है। जब इच्छा ही खत्म हो जाती तब अस्तित्व भी खत्म हो जाता है, अस्तित्व खत्म होता तो दुःख-अशान्ति से मुक्ति मिल जाती है। इसी को वे निर्वाण कहते हैं, यह उनका दर्शन है। आपको मालूम हो, कितने देशों के लोग बौद्ध हैं। कितने भिक्षु बन गये। इसका बड़ा इतिहास है कि किस प्रकार बौद्धी बनने से हमारे देश पर आक्रमण हुआ और घर-घर में संघर्ष पैदा हुआ। बुद्ध की जीवन-कहानी में यह भी आता है कि जब वह राज्यभाग्य त्यागकर तपस्या कर कुछ पाने लिए जंगल में गया था तब वह चार संन्यासियों से मिला। उनके साथ रह साधना करता रहा। वे बड़े लम्बे-लम्बे उपवास करते थे कई-कई दिन तक बैठे रहते थे समाधि लगाकर समाधि में क्या करते थे? कहा है कि सत्य की खोज करते थे। इन लम्बे उपवास और तप से बद्ध सुखकर कांग हो गया। उसके दर्शन (Philosophy) का एक यह भी उपदेश है कि मनुष्य को ज्यादा कठोर साधना नहीं करनी चाहिए। जब यह शरीर सुख जायेगा और काम का नहीं रहेगा तो क्या कर सकेंगे? वाराणसी में जाकर या दूसरी जगह जाकर उपासना के बारे में उसने उपदेश दिये कि वह सहज होने चाहिए, ऐसी कठोर नहीं होनी चाहिए कि उससे शक्ति का ह्रास हो । करुणा के बारे में, अहिंसा के बारे में भी उसने कहा है। यह हो गया बुद्ध धर्म का सिद्धान्त पक्ष। उसने आत्मा के बारे में उपरोक्त बातें कहीं। परमात्मा के बारे में उससे प्रश्न किया गया तो उसने कहा कि अगर किसी को तीर लग गया हो, उसके शरीर से खून बह रहा हो तो उस समय आप यह सोचोगे वि इसको तीर किसने मारा, कैसे मारा या उस व्यक्ति को बचाने की कोशिश करोगे? उसके इस उत्तर से यह स्पष्ट है कि उसको परमात्मा के बारे में ज्ञान नहीं था। इतने वर्षों तक लम्बे-चौड़े व्याख्यान देता रहा तो थोड़े समय तक तो परमात्मा के बारे में बता सकता था कि परमात्मा कैसा है, उसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है। कभी उसने परमात्मा के बारे में चर्चा की ही नहीं है. तो इससे पता पड़ता है कि उसको परमात्मा के बारे में जानकारी नहीं थी। दार्शनिक लोग कहते हैं कि देखो, बुद्ध ने कितना अच्छा दृष्टान्त दिया । लेकिन यहां आप देखिये, कितनी बड़ी बात है कि बाबा ने हमें अपना परिचय खुद दिया। बाबा ही गुण, शक्ति और नैतिकता का मूल आधार और मूल स्रोत है। जिसने इस संसार को सुखमय बनाया, जिसने मनुष्य को देवता बनाया, जिसका विश्व इतिहास में इतना बड़ा मुख्य पार्ट है, लोग उसकी चर्चा नहीं करते या चर्चा करना आवश्यक नहीं मानते और उसको जानते ही नहीं. उसका महत्त्व ही नहीं समझते कि सबसे पहले उसके बारे में बतायें । कितनी विचित्र बात है ! बाबा कहते हैं कि सबसे पहले परमात्मा की महिमा करो. बाबा-बाबा... बाबा का गुणगान करो। बाबा-बाबा कहने से ही तुम्हारा मुख मीठा होगा, उसी से ही तुम्हारे विकर्म दग्ध होंगे। उसी से हो संस्कार परिवर्तन होंगे। उसी से ही सतयुग आयेगा। उसी से ही दुःख और अशान्तिः समूल नष्ट होंगे। देख लीजिये, कितना अन्तर है उस धर्म में और इस धर्म में !
बाबा कहते हैं कि देखो, इन धर्माचार्यों ने कैसे भक्तों को परमात्मा से विमुख किया ! आप एक-एक धर्म को देखते जाइये, कई धर्मों में तो परमात्मा के बारे में चर्चा करते ही नहीं, यही तो धर्मग्लानि है। धर्म में जिसकी प्रथम चर्चा होनी चाहिए, जिसकी आदि वन्दना होनी चाहिए, जिसको प्रथम नमस्कार होना चाहिए, प्रवचन का मुख्य विषय होना चाहिए, उस परमात्मा की चर्चा ही नहीं करते ! कहते हैं कि उसकी क्या चर्चा करनी है। इसलिए बाबा कहते हैं कि पहले-पहले शिव बाबा का परिचय दो। शिव बाबा को नहीं समझेंगे तो कुछ भी नहीं समझा और उनको कुछ भी प्राप्ति नहीं होगी। देखिये, हमारी उपासना में, नैतिकता में, सेवा में, सिद्धान्तों में सब में कितनी प्राप्ति है ! हम तो प्रैक्टिकल अनुभव करते हैं कि हमें कितनी प्राप्तिया हैं लेकिन उन्होंने, लोगों को सर्व प्राप्ति कराने वाले परमात्मा से ही विमुख कर दिया। हज़ारों वर्षों तक लोग परमात्मा से विमुख होते रहे और परमात्म-स्मृति की प्राप्तियों से वञ्चित रह गये। देह-अभिमान बढ़ता गया। इतने बौद्ध लोग बढ़ते गये लेकिन संसार का कल्याण कहाँ हुआ?
कई बड़े-बड़े लोग भी कहते हैं कि संसार में शुरू से ही देवासुर संग्राम, अच्छे और बुरे लोग होते चले आये हैं। परमात्मा ने ही दोनों प्रकार के लोगों को पैदा किया है। अगर सर्वशक्तिवान, सर्वज्ञ परमात्मा ने ही शैतान लोगो को पैदा किया है तो हम शैतानी और शैतान लोगों को खत्म करने वाले किस खेत की मूली होते है अगर उसने ही दुष्टों की रचना की है क्या उन दुष्टों को नष्ट करके परमात्मा का विरोध करेंगे? उसके नियम के खिलाफ जाएंगे? कैसी बाते करते हैं लोग ! परमात्मा ने हमें पैदा किया, हमारे साथ हमारे विरोधियों को भी पैदा किया तो उसको हम पिता कहेंगे? तुम मात-पिता हम बालक तेरे कहेंगे? परमात्मा, जिसको दुःख में कष्ट में याद करते है क्या वही सबको दुःख देने के लिए दृष्ट लोगों को पैदा करता है? इससे स्पष्ट होता है कि उनको परमात्मा का यथार्थ ज्ञान नहीं था।
हम परमात्मा की मुखवंशावली है। अब इस पुरानी दुनिया से लौटने का समय है क्योंकि यह पुरानी दुनिया विनाश होनी ही है। खुद-ब-खुद सब किनारे हो जाने वाले हैं, तो क्यों न पहले से हम किनारा कर लें जिससे हमारी प्रालब्ध बने !
परमात्मा अब इस सूखी दुनिया से लौटा रहे हैं और नया घर बना रहे हैं। पुराने घर में रहकर नया बनाना होगा ना !
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
सर्व समस्याओं की समाप्ति के लिए एकमेव उपाय
जितने भी संसार के नर-नारी हैं, बच्चे-बूढ़े हैं, किसी आयू के हो, किसी वर्ग के हों सब समाज में रहते हैं। समाज से हमने बहुत लाभ लिया है। हमारे व्यक्तिगत प्रयत्न से हमारी सब आवश्यकतायें पूरी नहीं होती। आज जो साधन हमें उपलब्ध हैं, जो सुविधायें हमें प्राप्त हैं, यह जो हमारा विकास हुआ है, ये सब समाज से प्राप्त हैं। संक्षेप में यह कह दीजिये कि जो कुछ भी आज हम हैं और हमारे पास हैं, इनमें बहुत-सी बातें समाज की देन हैं। इनमें पोजिटिव भी हैं और निगेटिव भी हैं। यहां तक कि गाय-भैंस, भेड़-बकरी इनको भी चराने ले जाते हैं क्योंकि इन्सान अकेले जी नहीं सकता। अपनी जाति के साथ, उसके सहयोगी और उपयोगी जानवरों के साथ रहना चाहता है। कई दफ़ा आप देखते होंगे, ये जो आवारा गौएं हैं, वे भी आपस में जैसे कि सम्मेलन कर रही होती हैं। रात को आप किसी छोटे शहर में चले जायें, एक स्थान उनका निश्चित-सा लगता है, वहां इकट्ठी हो जाती है। सारा दिन सारे शहर में घूमकर कचड़ा आदि खाकर रात को वहाँ इकट्ठी होती हैं। बोलती तो कुछ नहीं लेकिन उनको महसूस तो होता होगा कि हम सब इकट्ठी हैं। हमजिन्स हैं, एक वर्ग की हैं। कई दिनों से, कई महीनों से. कई सालों से वे वहाँ इकट्ठी होती हैं, मिलकर रहती हैं। क्या कारण है? कोई भी व्यक्ति या जीव अकेले में नहीं रह सकता।
हमने देखा है, संन्यासी लोग भी, जो जंगल में कुटिया बनाकर रहते थे, जहां वे प्रभु-अनुभूति अथवा ईश्वर-प्राप्ति करने के लिए साधना करते रहते थे, वे भी चतुर्मास बनाते थे, साल में चार मास लोगों के पास जाकर प्रवचन आदि करने का। जंगल में रहते हुए भी, इन्सान की शक्ल देखने वे भी गांवों में शहरों में आते थे। मेरा कहने का भाव यह है कि मनार सामाजिक प्राणी है। मनुष्य को समाज से बहुत उपलब्धियां हुई हैं। हम पर एक प्रकार से समाज का ऋण है। इस बात को समाज के बुजुर्ग और अनुभवी लोग कहा करते थे कि मनुष्य पर मातृ ऋण, पितृ ऋण, आचार्य ऋण, गुरु ऋण इत्यादि होते हैं। समाज के हर एक व्यक्ति ने हमें आगे बढ़ाने के लिये कोई न कोई योगदान दिया है। इसलिए उनके प्रति हमें एहसान फ़रमोश (thankless) नहीं होना चाहिए। जिन्होंने हमें यहाँ तक लाया है या नाते के निमित्त बने हैं उनके प्रति हमें एहसानमन्द (thankful) हो रहना चाहिए। ऐसे समाज का भी हम पर एहसान है क्योंकि समाज ने भी यहां तक आने के लिए हमें योगदान दिया है। हमारे लिए समाज के हर वर्ग के व्यक्तिका योगदान है, एहसान है।
जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो किताब में एक कहानी थी। एक बुजुर्ग आदमी आम का पेड़ लगा रहा था। एक छोटा बच्चा वहाँ से जा रहा था. उसने उस व्यक्ति से पूछा, दादा जी, यह आम का पेड़ किसके लिए लगा से हो? आप तो बुजुर्ग हो गये हो। यह पौधा पेड़ होकर इससे आम आने में बहुत टाइम लगेगा। आप को तो आम मिलेंगे ही नहीं, फिर आप किसके लिए यह पेड़ लगा रहे हो? उस बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, बेटा, हमारे बुजुगों ने जो लगाया था उसके फल हमने खाये और हम लगायेंगे तो तुम्हारे जैसे बच्चे या आने वाली पीढ़ी खायेगी। यह चलता रहता है। हमारे बुजुगों ने भी हमारे लिए कुछ किया है, उनका एहसान भी हमारे ऊपर है। इसलिए हरेक को यह ख्याल रहना चाहिए कि हमें केवल अपने लिए नहीं जीना चाहिए। समाज के लिए कुछ सेवा भी करनी चाहिए। हम अपने स्वार्थ के लिए जीये तो क्या फायदा हुआ? कई लोग केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए ही जीते हैं। अपने परिवार के लिए जो करते हैं उसमें भी सेवा भाव नहीं रहता. वहाँ केवल कर्त्तव्य भाव रहता है कि मुझे अपने परिवार के लिए कुछ करना है। अपने परिवार तक ही उनकी बुद्धि सीमित रहती है। लेकिन हमने इस समाज का अन्न खाया है, पानी पीया है, नमक खाया है इसलिए हमारा फर्ज बनता है कि उसकी भी सेवा करें। समाज के और लोगों ने भी कछ किया है तब तो हमें लाभ हुआ। हमारा भी कर्तव्य है उनके प्रति कुछ करना। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही यह है कि उसके पास जो धन है, सम्पत्ति है, धान्य है, समय है, शक्ति है उनसे दूसरों की या समाज की सेवा की जाये, न कि सिर्फ अपने लिए लगाया जाये। इस उद्देश्य से ही समाज में बहुत सी समाज-सेवी संस्थायें बनी हुई हैं जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कर रही हैं। दुनिया में लाखों लोग समाज सेवा करने वाले हैं। उनको देखकर, उनसे बात कर मुझे बहुत खुशी होती है कि ये सिर्फ अपने लिए नहीं जीते, अन्य लोगों की सेवा भी करते हैं।
लेकिन हमें देखना यह है कि इतनी सारी समाज सेवी संस्थायें होने के बावजूद, समाज सेवा करने वाले इतने व्यक्ति होने के बावजूद, जिस समस्या को लेकर उनकी स्थापना हुई, क्या उन समस्याओं का निर्मूलन हुआ? मान लीजिये कि कोई कहता है कि हम गरीबों की सेवा करते हैं। गरीबी मिटाना हमारा उद्देश्य है। लेकिन रोज हम अखबारों में, समाचारों में पढ़ते हैं कि भारत में 50% से ज्यादा लोग निर्धनता की रेखा से नीचे का जीवन व्यतीत करते हैं। सिर्फ भारत ही नहीं है, ऐसे और 5-6 देश भी है जो निर्धनता की रेखा से नीचे जी रहे हैं।
महात्मा गाँधी की जीवन-कहानी से मुझे एक बात याद आती है कि गांधी जी एक गाँव में गये थे, लोगों ने उनको आमन्त्रित किया था। उनको भी हमेशा रहता था कि गाँव में जाये, ग्रामवासियों से मिलें। उन्होंने देखा कि एक पेड़ के नीचे बैठकर एक अध्यापिका छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाती थी। बच्चों के कपड़े बहुत मैले थे। गांधी जी ने सब कुछ देखा, उसके बाद उनको वहां से दूसरी जगह ले चले। रास्ते में उनसे पूछा गया कि यहाँ काम कैसे हो रहा है? आपकी कोई राय? गाँधी जी ने कहा, सब ठीक है लेकिन बच्चों के कपड़े बहुत मैले थे। व्यवस्थापक ने कहा, बापू जी, आपने तो उनका स्कूल देखा है, अभी उनकी बस्ती भी देखिये, उनकी कुटिया, उनकी रहन-सहन भी देखिये। गाँधी जी को उनकी बस्ती में लेकर गये। गाँधी जी ने देखा, उन घरों में रहने वाले लोग कपड़े ही नहीं पहने हुए थे। उस व्यवस्थापक ने गाँधी जी से कहा, एक घर में एक ही धोती होती है, पुरुष को बाहर जाना है तो पुरुष पहनकर जाता है और स्त्री को बाहर जाना है ते उसी को स्त्री पहनकर जाती है। तो बताइये, वे कपड़ों को साफ़ कब करें। यह हाल था उस गाँव का। मैंने पढ़ा हुआ है उस पुस्तक को। गाँधी जी ने कहा, हमारे देश की ऐसी हालत है? हमें गुलाम बनाकर, दूसरों ने हमारी यह हालत कर दी है? हम इस देश के मालिक हैं और हमारी ऐसी स्थिति है। जिन्होंने भारत को आज़ादी दिलायी, उन्होंने देश की इस स्थिति को देखा, तब तो उनके मन में यह पीड़ा उत्पन्न हुई कि हमारे देश में हम ही गुलाम । हमें कुछ करना चाहिए। वे सब काम छोड़कर इस काम में लग गये।
कितने लोग हैं भारत में जिनके बच्चों को आज भी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकी ! उनको रहने का कोई ठीक स्थान नहीं। घर में कोई बीमार हो जाये तो इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं। आजकल दवाइयाँ, इलाज इतना महंगा हो गया कि साधारण आदमी कैसे इलाज करा सकता है? किसी जनरल हॉस्पिटल में जाकर आप देखिये जहाँ दवाई लेने के लिए और डॉक्टर को दिखाने के लिए कितनी लम्बी-लम्बी लाइन लगी रहती है! मरीज़ की बात सुनने के लिए डॉक्टर को भी कहां समय रहता है? वह जल्दी-जल्दी मरीज को देख, फारिग होना चाहता है। आजकल डॉक्टरों को पेशेन्ट की बात सुनने के लिए टाइम ही नहीं है। आप सुनेंगे नहीं तो इलाज क्या करेंगे? डॉक्टर भी बढ़ते जा रहे हैं, हॉस्पिटल भी बढ़ते जा रहे हैं, मरीज भी बढ़ते जा रहे हैं, नयी-नयी बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही हैं।
मैं आपका ध्यान इस ओर खिचवाना चाहता है कि कोई ऐसा साधन है जिससे सारे संसार से दुःख और अशान्ति समाप्त हो जाये। गरीबी तो हमारी एक समस्या है। ऐसी अनेक समस्यायें हैं देश में। आप कोलकाता में चले आइये। कई ऐसे किस्से भी छपते हैं कि कहीं पर शादी हुई, बारात को पत्तलो में खाना खिलाया गया। किसी ने पूरा खाया, किसी ने अधूरा खाया और उन पत्तलों को फेंका गया। फेंकी हुई पत्तलों को एक तरफ कुत्ता छीन रहा है, दूसरी तरफ़ इन्सान छीन रहा है। खाने के लिए इन्सान और जानवर में लड़ाई हो रही है। कैसी हालत है संसार की! रोगियों की अलग, निर्धनों की अलग समस्यायें हैं। समाज में समस्यायें भी बढ़ती गयीं और समाज सेवी संस्थायें भी बढ़ती गयीं। फिर भी समस्याओं का कोई हल ही नहीं हुआ। ऐसा कोई तरीका है जिससे यह संसार सुखमय बने? आपने देखा होगा, संसार में बहुत-सी आध्यात्मिक संस्थायें भी हैं, बहुत-से आध्यात्मिक सिद्धान्त भी हैं। उनके अपने-अपने दर्शन हैं, जीवन दर्शन है। उनमें उन्होंने यह कह दिया कि यह संसार दुःखों का घर है (World is full of misery)। जैसे महात्मा बुद्ध ने भी यही कहा कि यह संसार दुःखों का आगार है। यही उनका मूल सिद्धान्त है। ऐसे बहुतों ने कहा है। नानक जी ने भी कहा, नानक दुखिया सब संसार है। हरेक दर्शनवादी ने कहा कि यह संसार बड़े दुःखों का घर है। एक दुःख निकलता है और दूसरा दुःख आता है। इस दुःख से छूटने के लिए हरेक ने अपनी-अपनी बात बतायी कि इससे मुक्ति कैसे प्राप्त हो। किसी ने कहा, सब छोड़छाड़ करके, संन्यास करके ईश्वर की शरण में जाये। किसी ने कुछ, किसी ने कुछ। सबने संसार को छोड़ने के लिए कहा। इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया कि अगर यह संसार दुःखों का घर बना है तो सुखों का घर भी बन सकता है।
भाई, यह संसार दुःखों का घर बना है तो हमारे कर्मों से बना है ना! अगर हमने अच्छे कर्म करना शुरू किया तो संसार सुखों का घर बनेगा। आज हम समाज में देखते हैं कि एक कुटुम्ब में पाँच सदस्य हैं, कोई किसी की सुनता नहीं है, मानता नहीं है। प्रेम से, सद्व्यवहार से आपस में रहते नहीं हैं। दहेज की समस्या और वधू जलाने की समस्या आमतौर पर हम सुनते हैं। ये क्या हैं? एक परिवार के सदस्य भी आपस में प्रेम-प्यार से मिलकर रह नहीं सकते? यह गृहस्थी जंजाल है, यह संसार नरकमय है-ऐसी-ऐसी बातें हमने सुनी हैं। अरे भाई, गृहस्थी ऐसी है तो ऐसी बनायी किसने? हम लोगों के कर्मों ने, हम लोगों के संस्कारों ने, हम लोगों के स्वभावों ने। उनको ठीक करो जो यह गृहस्थी सुखमय बन जाये। आप सबसे प्रेमभाव से व्यवहार करो, एक-दूसरे की सेवा करो और सहनशीलता का गुण धारण करो। अगर कोई एक बात कहता है तो उस बात को सुन लो. सहन कर लो। अन्दर से उसको एक दिन आवाज जरूर आयेगी कि मैंने इसको बोला, इसने मुझे कुछ नहीं बोला। ग़लती मेरी थी, मैंने कटुवचन बोल दिया। ऐसी कठोर चीज तो कोई है नहीं। कहते हैं सबसे कठोर है तो मन ही है और सबसे कोमल है तो भी मन ही है। कोई कहते हैं कि स्टील बहुत कठोर चीज है, उस कठोर स्टील को भी मन ने ही बनाया है ना! पुराने जमाने में कहते थे, सबसे नरम चीज़ मोम है लेकिन मोम से भी नरम चोज मन है।
किसी ने रिसर्च किया कि दुनिया में कड़वी से कड़वी चीज़ क्या है? काफी समय इस खोज में लगाया। फिर भी उसकी रिसर्च पूरी नहीं हुई। आखिर वह घर आया और दरवाजा खटखटाया। उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला और उसको खूब डाँटा कि इतने दिनों तक घर नहीं आया, घर का क्या हाल है, यह नहीं सोचा, घर पर बच्चे और औरत की क्या स्थिति है, तुमने इतने दिनों तक सोचा नहीं। उसने पति को खूब डांटा। बेचारा पत्ति हैरान हो गया। उसने सोचा था कि रिसर्च करके दुनिया को एक नयी पुस्तक दु। जब उसकी पत्नी उसके ऊपर बरसी तो उसको अनुभव हुआ कि संसार में सबसे कड़वी चीज यह है। उसने पत्नी से कहा, धन्यवाद, आपस ही मेरी थेसिस पूरी हुई। थेसिस के अन्त में उसने यही लिखा कि संसार में सबसे कड़वी चीज़ मनुष्य की कटु वाणी है, उससे कड़वी चीज़ और कोई नहीं।
अन्य लोगों ने भी बताया है कि सबसे तेज, तलवार से भी तेज घाव वाणी का है। तलवार का घाव भर सकता है लेकिन वाणी का घाव नहीं भर सकता। वर्षों तक वाणी का घाव भरता नहीं है। इसलिए कटु वचन, कटू वाणी बहुत तेज़ होती है। एक गरीब आदमी गुड़ के व्यापारी के पास गया। उसने कहा, श्रीमान जी, मेरे पास रोटी है, उसको किसके साथ खाऊँ ! मुझे गुड़ दीजिये। उस ज़माने में आज के जैसी दुकानें नहीं होती थीं शीशे वाली, अलमारी वाली। गुड़ को, चीनी को बोरी में रखते थे। उन बोरियों पर मक्खी आदि बैठती थीं तो उनको भगाने के लिए लोहे की छड़ी रखा करते थे। उस व्यापारी ने वो छड़ी दिखा कर उस व्यक्ति को कहा, यहां से भागता है या नहीं, एक मारूँ? तब उस गरीब व्यक्ति ने बोला, महाराज, गुड़ नहीं देते तो मत दो लेकिन गुड़ जैसा मीठा तो बोलो। मीठा बोलने के लिए खर्चा थोड़े ही लगता है? बोलने का वरदान हम इन्सानों को मिला है, हमें मीठे बोल, अच्छे बोल बोलने चाहिएं। लेकिन लोग कटु बोल बोलकर दूसरों को भी दुःखी बनाते हैं और खुद को भी दुःखी बनाते हैं। फिर कहते हैं कि इस संसार में दुःख ही दुःख है। अगर यह संसार दुःखमय बना है या नरक बना है तो हमारे कारण से ही बना है, हमने ही इसको ऐसा बनाया है। इसलिए हमें ही इसको ठीक बनाना है। बाबा ने बताया है कि बच्चे, सिर्फ अपनी ही मुक्ति-जीवनमुक्ति के बारे में सोचना भी स्वार्थ हो गया। जैसे संसार में अनेक प्रकार के लौकिक स्वार्थ हैं ऐसे यह भी आध्यात्मिक स्वार्थ हो गया। इसलिए आपका उद्देश्य यह होना चाहिए कि मैं भी मुक्त जीवनमुक्त होऊँ और भी सब मुक्त-जीवनमुक्त होवें। यह संसार ही दुःखमय न रहे। यह सारा संसार ही सुखमय बन जाये, शान्तिमय बन जाये। ऐसी सेवा करो। केवल अपने लिए ही सुखी संसार मत बनाओ। अपने लिए पैसा कमाया, पर मोटर रखी, एक-एक नहीं तीन-तीन। जहां भी आप जायेंगे लोग माला पहनाते रहेंगे, जयजयकार करते रहेंगे। इससे खुश मत हो जाओ। देखो, मैंने कितनों को सुखी बनाया है? कितने रोते हुए लोगों के आंसू पोछे है? कितने अशान्त लोगों को शान्ति दी है? आपके जीवन की सफलता इसी में है।
आप जानते होंगे, जो दीर्घ आयू जीकर मरते हैं उनकी अर्थियों विशेष निकाली जाती है। उत्सव जैसे मनाया जाता है। उसमें बहुत लोग शरीक होते हैं। ठीक है, यह भी एक रीति-रिवाज है। लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि कोई 90 साल 100 साल जीया, उसने इतनी लम्बी आयु तक केवल अपने लिए जीया या औरों के लिए कुछ किया? जीना उसका अच्छा है जो सिर्फ अपने लिए ही नहीं जीता, बल्कि दूसरों के लिए भी जीता है। अपना तन-मन-धन सिर्फ अपने लिए ही लगा दिया या उनसे दूसरों को लाभ दिया? यह एक सोचने की बात है। हमारा जीवन महान् कार्य में लगना चाहिए, न कि साधारण कार्य में। कर्म तो हरेक को करना ही है। कर्म के बिगर कोई रह नहीं सकता। गीता में कहा हुआ है, हे अर्जुन! हरेक व्यक्ति जो इस कर्मक्षेत्र पर आया है, जिसने कर्मेन्द्रियों का शरीर लिया है. उसको कर्म करना ही पड़ता है, बिना कर्म कोई रह नहीं सकता। खाना-पीना यह भी कर्म है, सोचना यह भी कर्म है जिसको मानसिक कर्म कहा जाता है। मनसा, वाचा, कर्मणा इनसे कई किस्म के कर्म हो सकते हैं। हरेक कर्म तो जरूर करता है। भगवान ने यहाँ तक कहा हुआ है कि कर्म करने के लिए इस संसार में मुझे भी आना पड़ता है। अगर मैं नहीं आऊँगा तो संसार में अव्यवस्था आ जाती है। लोग धर्म से हटकर अधर्मी हो जाते हैं। अत्याचार, पापाचार में लग जाते हैं। कर्म मैं भी करता है और मनुष्य भी करते हैं लेकिन मनुष्य कर्म, अकर्म और विकर्म की गुह्य गति न जानकर कर्म करते हैं इसलिए उनके कर्म विकर्म बन जाते हैं। इसलिए हमें कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। हमारे कर्म सेवामय हो। हमारे कर्म महान हों, श्रेष्ठ हों, सुखदायी हो। आज ऐसे कर्मों की ज़रूरत है, ऐसी सेवा की जरूरत है जिससे संसार में शान्ति और सुख हो, सारी समस्यायें ही समाप्त हो जायें।
आज इतनी सारी समाज सेवी संस्थायें होते हुए भी, विज्ञान के साधन बढ़ते हुए भी संसार में समस्यायें कम नहीं हुई बल्कि और बढ़ रही हैं। क्या कारण है? हमें इन समस्याओं का मूल कारण ढूँढ़ना होगा। जब कारण ढूंढेंगे तो निवारण अपने आप मिल जायेगा। देखिये, कई देश परमाणु अस्त्र बना रहे हैं। उनको पता है कि परमाणु अस्त्र संसार के लिए खतरनाक हैं। फिर भी बना रहे हैं, क्यों बना रहे हैं? इसका कारण तो होगा ! इसका कारण पता पड़ता है कि उनको डर है, यदि फलाने देश के पास परमाणु है और उसने हमारे ऊपर हमला किया तो हम उनके गुलाम बन जायेंगे। एक यह कारण है, दूसरा कारण भी है कि एक-दूसरे से द्वेष, ईर्ष्या और घृणा करते हैं। वह परमाणु अस्त्र बना रहा है तो मैं क्यों नहीं बनाऊँ, मैं क्या कम हूं। अगर इन सब कारणों का विश्लेषण किया जाये तो पता पड़ता है कि अरबों, खरबों रुपये जो परमाणु अस्त्रों के लिए खर्च हो रहे हैं, इसका मूल कारण है, आपस में ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, स्पर्धा और प्रतिशोध की भावना। अगर ये चीजें नहीं होतीं तो अरबों-खरबों रुपये क्यों खर्च होते? वही पैसे देश के सुधार के काम में लगा दिये जायें तो कितनी उन्नति होगी! इसलिए जब तक हम अपने अन्दर रहे हुए इन विकारों को, दुर्गुणों को नहीं निकालेंगे तब तक संसार में दुःख-अशान्ति बन्द नहीं होगी।
अगर मान लीजिये कि आपस में समझौता करके बम बनाना बन्द भी कर दें लेकिन जब उनको यह शक आयेगा कि क्या पता वे हम पर कब हमला कर दें? तब फिर से बनाना शुरू करेंगे। अगर उनका यह डर खत्म होगा कि हम पर कोई हमला नहीं करेंगे तब आओ, हम दोस्ती का हाथ बढ़ाए, आओ. आपस में हम प्रेम करें यह भाव पैदा होता है। जब भाव पैदा होता है, तब ही उन सब अस्त्रों को बमो को खत्म करेंगे ना ! हम किस नतीजे पर पहुंचे? अगर हम चाहते हैं कि संसार में कोई लड़ाई झगड़े न हों तो जरूरी है कि लोगों में प्रेम हो, घृणा न हो, द्वेष न हो, ईष्यां न हो, बदले की भावना न हो, हिंसा की भावना न हो, लोगों में सह अस्तित्व की भावना, मिलकर रहने की भावना हो। इन्सान, इन्सान से क्यो लड़ते हो? आपस में प्रेम-प्यार से रहो। पशु भी अपने जाति वाले को नहीं मारते हैं तो आप ऐसा निकृष्ट काम क्यों करते हो? इन्सान को सर्वश्रेष्ठ प्राणां (Best of creations) कहा गया है। इन्सान होकर हम दरिन्दों का काम क्यों कर रहे हैं? अगर यह समझ उनमें आ जाये तो फिर यह संसार सुखमय बन जायेगा। इसी तरीके से ग़रीबी क्यों है? हरेक व्यक्ति यह सोचता है कि मेरे पास धन हो, मेरे परिवार वालों के लिए धन हो, साधन हों। कारखानों में कर्मचारी दिन-रात मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं, मालिक को खूब लाभ होता है। उस लाभ में कार्मिक लोग भी हिस्सेदार हैं। पूंजीपति, मालिक अपने बच्चे की शादी करता है तो दस लाख रुपये खर्च करता है. बेचारे उस कर्मचारी को बच्चे की पढ़ाई के लिए दस सौ रुपये भी नहीं हैं। ठीक है, तुमने पैसा लगाया है लेकिन उन्होंने भी मेहनत की है। जैसे तुम अपने परिवार के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हो, उनको भी कुछ दे दो क्योंकि उनका भी हिस्सा बनता है। अगर अपने लालच के कारण से वह दूसरों के सुख के बारे में नहीं सोचता, केवल अपना ही सोचता है, जिसको शोषण कहते हैं, तो संसार में दुःख-अशान्ति, लड़ाई-झगड़े रहेंगे। जब तक मनुष्ध का स्वार्थ भाव नहीं मिटेगा, आप जितनी भी संस्थायें बनाओ, ग़रीबी मिटेगी नहीं। यह स्पष्ट मालूम होता है कि इन समस्याओं का मूल कारण है मनुष्य में, मनुष्य के प्रति प्रेम, सद्भावना, सन्तोष, भ्रातृत्व, सहानुभूति की भावना न होना।
भाइयो और बहनो, मैं यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि जितनी भी समाज सेवी संस्थायें आज समस्याओं को मिटाने का कार्य कर रहा है. अगर वे उन समस्याओं का मूल कारण जान जायें तो उन समस्याओं को मिटा सकती हैं। आज मैंने दो समस्याओं के कारण बताये। चलो, और एक समस्या को ले लेते हैं। और एक भयंकर समस्या है जनसंख्या विस्फोट। आबादी बढ़ती जा रही है, बढ़ती जा रही है। रोज़ कितने मकान बन रहे हैं। आज आप दिल्ली जाओ, कितना विस्तार पाया है! जिन्होंने सन् 1947 में देखी थी, आज वे वहाँ जाकर देखें तो हैरान हो जायेंगे क्योंकि बहुत विस्तार पा चुकी है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, हर शहर ने विस्तार को पाया है। दिल्ली में इतने वाहन है कि आदमी को सड़क पार करना मुश्किल होता है। लोग कितनी देर तक खड़े रहते हैं। एक के पीछे एक, एक के पीछे एक गाड़ियाँ आ रही हैं। बसें भरके जाती हैं, ट्रेने भरके जाती हैं, प्राइवेट गाड़ियों भी चलती हैं। कितने लोग है। कम से कम एक बार तो हरेक कारखाना बन्द हो चुका होगा लेकिन मनुष्यों को उत्पादन करने वाला कारखाना कभी बन्द नहीं हुआ, चलता ही रहता है, चलता हो रहता है।
जनसंख्या क्यों बढ़ रही है? मनुष्य की कामवासना, भोगवासना के कारण। आपने समाचार पढ़े होंगे कि इंग्लैण्ड में पैदा होने वाले चार बच्चों में एक अवैध बच्चा होता है, शादी से बाहर। पच्चीस प्रतिशत बच्चे ऐसे पैदा होते हैं वहाँ। आप सोचिये, यह मनुष्य की मनोवृत्ति हो चुकी है। मनुष्य की पैदाइश इतनी फटाफट हो रही है कि आप उन सबको मेडिकल उपचार दे नहीं सकते, रहने के लिए मकान बना नहीं सकते, उनकी शिक्षा के लिए स्कूल खोल नहीं सकते, उनके लिए रोजगार दे नहीं सकते। इससे वातावरण भी प्रदूषित होगा। जनसंख्या विस्फोट के लिए कारण क्या है? मनुष्य की कामवासना। इस वासना का कोई अन्त नहीं हो सकता। इसकी प्यास बढ़ती जाती है। भोग वासना ऐसी अग्रि है, जो सदा भड़कती ही रहती है। किसी ने भी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो भोग भोगकर कभी तृप्त हुआ हो। आज लोगों को ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो कि उनको संयम और नियम का जीवन सिखाये ।
कई लोग बहुत अचार, मुरब्बा खाते हैं। वे उनको बहुत स्वाद लगते हैं। एक दिन भी उनको ये चीजें नहीं मिलीं, तो कहेंगे आज खाने में मजा नहीं आया, खाने में कोई स्वाद नहीं था। ऐसे लोगों को भी मैंने देखा है, मर रहे हैं, कहते हैं, थोड़ा अचार तो खिला दो। उसका अन्त है, उसका ध्यान ईश्वर में लगा रहना चाहिए परन्तु उसका ध्यान लगा हुआ है आम के अचार में। ऐसे लोगों की गति क्या होगी? वह व्यक्ति बिस्तर पर मरणासन्न है फिर भी उसकी जीभ की तृष्णा मिटी नहीं। अगर लोग सोचे कि भोग भोगने से वे तृप्त हो जायेंगे, यह बहुत बड़ी भूल है क्योंकि आज तक ऐसे कोई व्यक्ति को हमने देखा नहीं है। अगर जीवन में हम ये संयम-नियम अपनाते हैं तो समाज सुखी बन जायेगा। आज संसार में जितनी समस्यायें हैं, वे कोई काम से, कोई क्रोध से, कोई लोभ से, कोई अहंकार से, कोई ईर्ष्या-द्वेष से या कोई आलस्य से हैं। आधे लोग दुनिया में हाथ पर हाथ रखकर, टाँग पर टांग चढ़ाकर बैठे हैं। बचपन में हमें बुजुर्ग एक कहानी सुनाया करते थे। एक व्यक्ति लेटा हुआ था बेर के पेड़ के नीचे। एक बेर गिरकर उसकी छाती पर पड़ा। वहाँ से एक व्यक्ति ऊँट पर जा रहा था। लेटा हुआ व्यक्ति उसको कहता है, अरे ऊंट वाले । ऊंट वाले ने इसको देखा तो समझा कि यह बहुत तकलीफ में होगा, मेरे से कोई मदद मांग रहा होगा, यह समझकर वह ऊँट से नीचे उतरा। आप जानते हैं, ऊंट से उतरना है तो पहले उसको बिठाना पड़ता है, उसके बाद ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति उत्तरता है। बेचारा ऊंट से उत्तरकर उसके पास आया और पूछा, क्या बात है भाई, क्या कोई तकलीफ है? लेटा हुआ आदमी कहता है, भाई, मेरी छाती पर बेर पड़ा है, उसको मेरे मुंह में डालो। देखिये, अपनी ही छाती पर पड़े हुए बेर को अपने ही मुंह में डालने के लिए उसने ऊंट पर बैठकर जाते हुए व्यक्ति को बुलाया है ! इतना आलसी महाराज और सुस्त महादेव है वह इसलिए संसार की सारी समस्याओं को दूर करने के लिए एक ही उपाय है कि इन्सान में बसे हुए हैं छह विकार, इनका उन्मूलन करें तो यह संसार सुखमय बन जाता है। अतः जो व्यक्ति निर्विकार है, पवित्र है, वही महान् व्यक्ति है।
आप सर्वे (survey; सर्वेक्षण) करें यह पूछकर कि आप सन्तुष्ट हैं? मैं नहीं समझता हूं कि आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो अपने जीवन से सन्तुष्ट है। राष्ट्रपति बन गया, वह भी सन्तुष्ट नहीं, प्रधान मंत्री बन गया, वह भी सन्तुष्ट नहीं, महामंडलेश्वर बन गया, वह भी सन्तुष्ट नहीं। हरेक व्यक्ति को जीवन में उसकी कोई न कोई इच्छा कचोट रही है। अगर वह इच्छा पूरी नहीं होती है तो स्वप्न में भी वह उसी का ही दर्शन करता है। यह हमने देखा है, हरेक मनुष्य के जीवन में यह स्थिति है। जो व्यक्ति अपने जीवन में इन संयम और नियमों को अपनाता है, श्रेष्ठ कर्म करता है वही एक व्यक्ति हो सकता है, जिसकी आत्मा उसको सच्ची गवाही देती है कि तू ठीक आदमी है। उसको सन्तोष होगा कि अगर आज ही मेरा शरीर छूट जाये, आज ही इस संसार से चला जाऊं, मुझे कोई आपत्ति नहीं। मृत्यु की कोई डेट नहीं होती। कहते हैं ना, आया परवाना और हुआ रवाना। मृत्यु के लिए कोई कह नहीं सकता कि आज मैं व्यस्त हूं, दस दिन के बाद आओ। आया और आदमी गया। यही दुनिया का हिसाब है। इसलिए हम अपने में झांककर देखें कि हम ऐसे कर्म कर रहे हैं जिससे हमारा स्वयं का जीवन भी सुखमय हो और दूसरों का जीवन भी सुखमय हो। संसार भी सुखमय तब होगा, समस्याओं से रहित तभी होगा, दुःख और अशान्ति से मुक्त तभी होगा जब व्यक्ति इन सबसे मुक्त होगा क्योंकि व्यक्ति समाज की इकाई है। आज समाज क्यों दुःखी है? क्योंकि समाज में रहने वाले सब व्यक्ति दुःखी हैं। जैसे-जैसे एक-एक व्यक्ति सुखी बनता जायेगा, वह भी दूसरों को सुखी बनाने में आगे बढ़ेगा और जो भी उसके मम्बन्ध सम्पर्क में आयगा उससे सुखी बनने का सन्देश या सुखी बनने की प्रेरणा लेता जायेगा। प्रक्रिया आगे चलती रहेगी और धीरे-धीर एक दिन सारा संसार सुखी बन जायेगा। सबसे पहली सेवा क्या हुई? कहते हैं चैरिटी बिगिंस एट होम पहले-पहले में पवित्र बनूँ, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से रहित होकर अपने जीवन को शुद्ध, पवित्र, निर्मल बनाऊँ और फिर दूसरों को उसकी प्रेरणा दूँ। जो जैसा होगा, उसके मित्र सम्बन्धी उसको देखकर उसका अनुसरण करेंगे और उस जैसे बनेंगे। जैसे माता-पिता होंगे, उनके बच्चे भी वैसे होंगे। माता-पिता होने के नाते, पालक होने के नाते, घर व बुजुर्ग होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी कई आयाम वाली होती है। क्योंकि आप से जो छोटे हैं वे आपसे सीखते हैं कि आप कैसे कार्य करते हैं। घर वाल तो आपको देखेंगे ही साथ-साथ आपके मित्र और सम्बन्धी भी आपको देखेंगे। इस प्रकार, आप के ऊपर आपके परिवार की और मित्रों की भी ज़िम्मेवारी होती है। सब समस्याओं का समाधान यही है कि हम निर्विकारी बनें, काम, क्रोध, अहंकार को छोड़े, संयम-नियम का पालन करें, जीवन में पवित्र बनें, महान् बनें। इससे न केवल अपना जीवन सुखमय होगा बल्कि संसार की सबसे अच्छी सेवा इस से होगी।
ठीक है, हम चाहते हैं कि पवित्र बनें, निर्विकार बने लेकिन बनें कैसे? जब हम योगाभ्यास करेंगे। ये विकार ऐसे हैं, किसी का पीछा ऐसे नहीं छोड़ते। ये हमारे मन में पूरी तरह से घर गढ़ चुके हैं। इन्होंने हमें अपनी कैद में पूरी तरह से बांधा हुआ है, जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ऐसे मजबूत जकडे हुए हैं कि चाहते हुए भी हम उनसे निकल नहीं सकते। कहते हैं ना, मैं तो कम्बल छोड़ता हूं लेकिन कम्बल मुझे नहीं छोड़ता। परमात्मा की जो स्मृति है, योग है, वही एक तरीका है जो इन विकारों से हमें छुड़ा सकता है। लोग परमात्मा में प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मेरे विषय-विकार मिटाओ। लेकिन उन विषय विकारों को मिटाने का जो तरीका है साधना है उसको अपनाते नहीं उसका अभ्यास करते नहीं हमे मन को पवित्र बनाना है। मन पवित्र तब ही बनेगा जब हम मन का नाता परमात्मा में जोड़ेंगे। मन का योग परमात्मा से जुटने से मन निर्मल होगा, बुद्धि स्थिर होगी। परमात्मा में हमको पवित्रता मिलेगी। परमात्मा हमें देना चाहता है। जैसे माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे बने। परमात्मा भी चाहता है कि मेरे सब बच्चे अच्छे बनें। लेकिन अच्छाई आये कैसे? अच्छाई तो सुक्ष्म चीज है। अच्छे विचारों से अच्छाई आयेगी। अच्छे विचार आयेंगे कैसे जब हमारा मनोयोग, बुद्धियोग, प्रेम, स्नेह का सम्बन्ध परमात्मा से जुटा हुआ होगा। इसलिए यहां कहा जाता है कि 'पवित्र बनो और योगी बनो'। यह संसार का ऐसा नारा है. इसे और किसी ने दिया नहीं। हरेक ने अलग-अलग नारे दिये हैं लेकिन यह नारा सिर्फ शिव बाबा ने ही दिया है। अगर आप सब समस्याओ को समाप्त करना चाहते हो तो एक ही उपाय है पवित्र बनो और योगी बनो।
वह दुनिया (स्वर्ग) इस दुनिया से न्यारी है। वह न्यारी दुनिया परमात्मा द्वारा ही रची जाती है। परमात्मा कहते है, में जो पवित्र सृष्टि रचता हूं, उसमें प्रालब्ध भी मै अभी देता हु। निर्विकारी पन से ही सृष्टि की वृद्धि होती है। यह है कर्मक्षेत्र, अच्छे और बुरे कर्म को जानना है।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
ग्रामीण सभ्यता और दैवी सभ्यता
भारत की जनसंख्या में दो तिहाई लोग गाँवों में रहते हैं। वास्तव में जो हम कहते हैं भारत की सभ्यता वह ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति है गांव में रहने वाले लोग प्रातः जल्दी उठते हैं। आप देखेंगे 99% ग्रामीण लोग बहुत जल्दी उठते हैं। उनको खेतों में जाकर काम करना होता है। इसलिए उनका सहज ही अभ्यास रहता है प्रातः जल्दी उठने का। विदेश के लोग तो 9-10 बजे तक सोये रहते हैं क्योंकि रात को काफी देर के बाद सोते हैं भारत की जो सभ्यता है, जो ग्रामीण सभ्यता है या संस्कृति है उसमें प्रातः उठना भी एक मर्यादा है, रिवाज है। यह परम्परा से चला आ रहा है। प्रातः जल्दी उठने वालों की कई बातें फ़ायदेमन्द होती हैं। प्रातः उठने से संस्कारो पर, व्यक्तित्व पर, व्यक्ति के रहन-सहन पर बहुत असर पड़ता है।
दूसरी विशेषता है, गाँव वाले जब आपस में मिलते हैं और जहां-जहां जाते हैं, एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं 'राम-राम जी', 'राम-राम जी' कहते हैं। कोई भी व्यक्ति, हिन्दू हो, मुसलमान हो 'राम राम जी' कहता है। राम-राम जी नहीं कहता होगा तो दूसरा शब्द कहता होगा। लेकिन उनमें यह सभ्यता है कि प्रातः किसी व्यक्ति से मिलते, एक-दूसरे के दर्शन करते भगवान का नाम लेकर, भगवान को याद कर उनका अभिवादन करें। बाबा भी हमेशा हमें कहते हैं कि बच्चे, एक-दूसरे से जब मिलते हो तो पूछो, 'शिव बाबा याद है?' कभी एक समय था तब यह बात बहुत चली थी। बाबा कहते थे, यह बहुत बड़ी सेवा है। अगर आपस में यह पूछते कि 'शिव बाबा याद है?' तो भूले हुए को बाबा की याद आयेगी। बाबा की याद में कमाई है। जब कोई व्यक्ति कहता है कि 'राम-राम जी', तो वह भगवान की याद दिलाता है। सुबह उठते हैं और उठकर राम नाम का जाप करते हैं या जिनकी जो परम्परा है वैसे भगवान को याद करते हैं। यह मन की लहर है. विचार धारा है। इससे मन पर और वातावरण पर कितना फरक पड़ता है आप जानते हैं। शहरों में आप देखते हैं, बहुत से लोग सुबह आलस्य वश सोये रहते है या उठने पर भी रेडियो सुनते रहते है या अखबार पढना शुरू कर देते हैं या आपस में मिलते हैं तो ढंग से नहीं मिलते। एक-दो को दुश्मनी की निगाह से देखते हैं। लेकिन गांवों में आप देखेंगे, चाहे सफाई कर्मचारी हो, चाहे किसान हो, चाहे जमीनदार हो, छोटा हो या बड़ा हो उनमें यह सभ्यता है कि एक बोलता है राम-राम जी, तो दूसरा भी बोलता है राम-राम जी। कम से कम बोलचाल तो बनी रहेगी अगर कोई किसी बात से नाराज भी हो गया हो और बोलता ही नहीं हो दूसरे से। राम-राम बोलेंगे तो कम से कम बोलने का रास्ता तो खुला रहेगा। राम-राम बोलेगा और थोड़ा-सा मुस्करायेगा। रोज-रोज़ राम-राम बोलता रहेगा तो दूसरा यह सोचेगा कि यह तो मुझे रोज राम-राम बोलता है, छोड़ो, नाराजगी क्या करना है। धीरे-धीरे दुश्मनी कम होती जायेगी, मनमुटाव हट जायेगा।
मैं आपको एक उदाहरण सुनाता हूं। पहले कमला नगर, दिल्ली में एक ही सेवाकेन्द्र था। उन दिनों में इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का बहुत विरोध होता था क्योंकि वह स्थापना का प्रारम्भ था। एक व्यक्ति बहुत कट्टर विरोधी था। डटकर विरोध करता था। बात सुनने के लिए तैयार नहीं था, जहाँ भी जाता था विरोध करता था। जब वह सैर करने जा रहा होगा, दूध लेने जा रहा होगा या जहाँ भी वह मिलता था, मैं उसको 'ॐ शान्ति' कहता था। वह जवाब नहीं देता था, मुंह मोड़ लेता था। कई वर्षों तक उसने जवाब नहीं दिया। मैं समझता हूँ, तीन-चार वर्षों तक उसने कोई जवाब नहीं दिया और हमेशा मुँह फेरता रहा। पता नहीं उसके मन में क्या था, जो बाहर निकला नहीं। एक दिन मैने सोचा, जब वह अपनी आदत से बाहर नहीं आता तो मैं क्यों अपना नियम छोड़ें? इसलिए मैं भी हमेशा उसको ' ॐ शान्ति' कहता था, भले ही वह जवाब नहीं दे। मैं मुस्कराकर उसको कहता था, भाई जी ॐ-शान्ति। एक दिन जब मैंने ॐ शान्ति कहा, तो वह खड़ा हो गया और मेरे पास आया। मैंने समझा कि पता नहीं यह लड़ने तो नहीं आ रहा है! उसने कहा, मैं हार गया और आप जीत गये। मैंने कहा, इसमें हार-जीत की कोई बात नहीं। कहता है, "मैंने आपका इतना विरोध किया, आपकी संस्था के बारे में इतनी ग्लानि की, जहर उगला, बदनामी की। फिर भी आप मुझे 'ॐ-शान्ति' कहते हैं। अब मैं मानता हूँ कि सचमुच आपकी यह आध्यात्मिक संस्था है और यहाँ पर व्यक्ति के संस्कारों को बदलना सिखाया जाता है, सबके प्रति शुभ-भावना और शुभ-कामना रखना, उनको प्रेम की दृष्टि से देखना, भाईचारे से चलना सिखाया जाता है। आपको मैं इतने सालों से देख रहा हूँ, आपमें बड़ी सहनशीलता है, मधुरता है और अपने नियमों के पक्के हैं। किसी ने आपको इतना पक्का कर दिया है, आप ॐ -शान्ति कहने से बाज नहीं आये। आज से लेकर मैं आपका सहयोगी हूँ, जो सेवा मुझे कहेंगे, मैं करूंगा।" इस तरह से हम देखते हैं कि किसी व्यक्ति से आप बनाये रखते हैं तो कभी न कभी उसमें परिवर्तन आयेगा और जीवन में कभी न कभी वह काम आयेगा। ग्रामों में शुरू से बोलते हैं कि 'राम-राम जी', 'कृष्ण-कृष्ण जी', 'हरि ॐ'। कोई न कोई देवता का नाम तो लेते हैं। भले ही उनको उन देवी-देवताओं का परिचय न हो, कम से कम उनका नाम तो लेते हैं। इससे सुबह-सुबह वायुमण्डल कितना अच्छा बनता है. मन की दशा कितनी अच्छी होती है। ग्रामवासियों में भगवत्प्रेम की भावना होने के कारण उनको ईश्वरीय ज्ञान बड़ी आसानी से समझ में आता है।
तीसरी बात है, ग्रामों में आतिथ्य, मेहमानों की सेवा बड़े दिल से करते हैं। मेहमानों की सेवा करना देखना हो तो गांव वालों में देखो। कितना दिल लगाकर सेवा करते हैं! असली घी से रोटी, परोठा बनाकर, सब्जियों में, घी डालकर, मक्खन रोटी पर रखकर, लस्सी का गिलास भरकर, खूब फल आदि देकर अतिथियों की भरपूर सेवा करेंगे। बड़े खुश होकर सेवा करेंगे, मजबूरी से नहीं। यह उनका रिवाज है अतिथियों की सेवा करना। यह शहरों में नहीं होता। ज्यादा मेहमान आयें तो शहरों में धर्मशाला अथवा होटलों में रखते हैं। साथ में यह भी सुनने में आता है कि हमारा घर धर्मशाला नहीं है, जब चाहे आ जाने के लिए। लोग सीधा-सीधा बोलते हैं, क्या हमारे घर को धर्मशाला समझा है? होटल में रहो, धर्मशाला में रहो, अपना कामकाज करके जाओ। गाँव वाले खुद ज़मीन पर सो जायेंगे लेकिन अतिथियों को अपनी चारपाई देंगे। दूध घर में ज्यादा नहीं होगा तो खुद पीना छोड़ देंगे, अपने हिस्से का दूध अतिथियों को देंगे। हमारी प्राचीन परम्परा ही है, माता को, पिता को और अतिथि को देव समझना। अतिथि माना जिसकी आने की कोई तिथि नहीं होती। अभी तो लोग फोन कर देते हैं, फैक्स भेज देते हैं, ई-मेल कर देते हैं कि मैं फलाने दिन, फलानी गाड़ी में आ रहा हूं। पहले ये साधन थोड़े ही होते थे? दरवाजा खटखटाया और कहा, मैं आ गया। उनकी आने की तिथि-तारीख होती नहीं थी। इसलिए उनको कहा गया है 'अतिथि', जिसकी तिथि कोई न हो। ऐसे लोगों की भी वे सेवा करते थे अच्छी तरह से और अभी तक भी करते हैं। यह आतिथ्य, अतिथि का सत्कार करना जो है, इसमें मन की सफाई, उदारता, प्रेम इन गुणों के साथ अन्य कई गुण लगे हुए रहते हैं। किसी को दिल खोलकर प्रेम से खिलाना-पिलाना यह भी एक दिव्यगुण है। ऐसे कई गुण ग्रामवासियों में होते हैं।
बाबा ने भी कई बार मुरलियों में कहा है कि शिव बाबा भी इस समय अतिथि है। क्या आपको मालूम है कि शिव बाबा का अवतरण कौन-सी तिथि पर हुआ था? किसी को भी मालूम नहीं है कि शिव बाबा ने किस दिन, किस तारीख, किसी समय ब्रह्मा बाबा के शरीर में प्रवेश किया। जिस दिन भक्त शिवरात्रि मनाते हैं, हम भी उसी दिन मनाते हैं। शिव बाबा ठीक किस दिन आये थे, वह किसी को मालूम नहीं है। शिव बाबा भी अतिथि ना? शिव बाबा कहते हैं कि जब अतिथि घर आता है. उसकी बात मानी जाती है और उसकी सेवा की जाती है। कई जगहों पर ऐसा रिवाज है अगर अतिथि यह कह दे कि यह तो बहुत अच्ची चीज है. कहाँ से मिलती है? तो समझेंगे कि यह चीज इनको पसन्द है। तो वे लोग यहाँ तक करते कि जाते समय उनको दे देते हैं क्योंकि इनको यह चीज़ अच्छी लगती है ले जाये। मना करने पर भी वे अतिथि को दिया करते हैं और कहते हैं कि यह आपके लिए है, आप ले जाइये। वे कहते हैं, 'यह आपके लिए है', यह हमारी संस्कृति है। लौकिक वाले भी सुनाते हैं ना, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग में क्या फरक है? सतयुग में कहते हैं, यह सब कुछ आपका है, हम भी आपके हैं। त्रेता में भी थोड़ी बहुत यह भावना रहती है। द्वापर में कहते हैं, आपकी चीज़ आपकी है और मेरी चोज़ मेरी है। न आप मेरी को हाथ लगाओ और न मैं आपकी को हाथ लगाऊँगा। ऐसे ही चलो, नहीं तो मुकद्दमा कर दूंगा। तुम अपनी चीज़ रखो, मैं अपनी चीज़ रखता हूं। वहां से मेरा-तेरा शुरू होता है। पहले मेरा-तेरा नहीं होता, सब आपका है। कलियुग में, मेरी चीज तो मेरी है ही, तेरी वाली भी मेरी है। जो अतिथि की इस ढंग से सेवा करते हैं कि ये सब आपके हैं, हम भी आपके हैं यह है प्राचीन सभ्यता। मैं एक मिसाल बता दूं एक गाँव का।
यह मिसाल है सन् 1947 का। उस समय हिन्दू-मुसलमानों के दंगे हो रहे थे। बहुत से लोग पाकिस्तान से निकल नहीं पा रहे थे। वहाँ से आने के साधन नहीं थे। मुसलमानों ने घेराव डाले हुए थे। काफी मार-काट हो रही थी। मैं उन दिनों जवान था। उस समय मुझे ख्याल आया कि इसके लिए कुछ करूं। मार्शल लॉ लगा हुआ था। शूट एट साइट (देखते ही गोली मारो) की आज्ञा थी। शाम को छह बजे से लेकर सुबह छह बजे तक रास्ते पर कोई चलता दिखायी पड़ा तो उसको गोली मार देते थे। क्योंकि उस समय दिल्ली में भी हिन्दू-मुसलमानों के बहुत दंगे हो रहे थे। उन दिनों सरदार वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे। मैं कोशिश कर छह बजे से पहले निकल कर उनके निवास पर पहुंच गया। वहां पहुंचा तो उनके निवास के बाहर मिलिट्री के कैम्प थे। वे मेरे से पूछने लगे, आप इस वक्त कैसे आ गये? छह बज गये हैं। आप बच कैसे गये? आपको रास्ते में किसी ने कुछ नहीं कहा? अन्धेरे-अन्धेरे में दीवार के साथ लगकर में वहां पहुंचा था। मैंने उनको आने का कारण बताया। उन्होंने पूछा, क्या आपकी कोई अपाइंटमेंट (appoint-ment; भेंट की अनुमति) है? मैंने कहा, नहीं। वे बोले, नहीं है तो वे आपसे कैसे मिलेंगे? उन दिनों, हमारे जो नेता थे, चाहे सरदार पटेल जी हो, नेहरू जी हों, राजेन्द्र प्रसाद जी हो, जनता के प्रति उनका रवैया आजकल के मंत्रियों से भिन्न था। वे मिल लेते थे लोगों से। कोई बात हो, साधारण आदमी भी कहे तो भी सुन लेते थे। क्योंकि वे अपने को जनता के सेवक समझते थे। मैंने उनसे कहा कि मिलना जरूरी है, इसलिए आया हूं। मिलिट्री वालों ने कहा, अभी तो आप मिल नहीं पायेंगे, सुबह ही मिल पायेंगे, जब वे बिरला मंदिर जायेंगे उसी समय आप रास्ते में मिल सकते हैं। अब आप घर जाओगे कैसे? अभी तो मार्शल लॉ शुरू हो गया है। अब रात को कैसे जाओगे? मैंने कहा, आप अपने कैम्प में ठहरा दो। उन्होंने कहा, क्या आप पागल हो? यहाँ बन्दूकें रखी हैं, हमारी सारी गुप्त चीजें और कार्य होते हैं। आप यहां रहकर हमको नौकरी से निकलवाना चाहते हो? आप कौन हो हमें पता नहीं है, यहाँ आपको कैसे रख सकते हैं? फिर मैंने कहा, क्या करें, ठीक है. यही बाहर ही बैठे रहता हूं। बाहर भी नहीं बैठ सकते क्योंकि वे पछेंगे कि यह कौन है, यहाँ क्यों बैठा है? इसलिए बाहर भी नहीं बैठ सकते। मैंने कहा, फिर करू क्या? बैठूंगा तो यहीं। फिर उनमें से एक ने शायद वह अफसर होगा) एक सिपाही को मेरे साथ भेजा और कहा, इनको साइकिल पर नजदीक वाले गाँव ले जाओ और गाँव वालों के पास इनको रात को रहने दो और सुबह-सुबह वहां से आ जाये। बहुत अन्धेरा था क्योंकि ब्लेक आउट था। सिपाही ने गाँव में एक आदमी के पास मुझे ले जाकर मेरी सारी बाते उसको बता दी और कहा कि रात को इनको अपने पास रखना और सुबह जल्दी यहां से रवाना कर देना। सिपाही तो चला गया। उस गाँव वाले ने जो मेरा आतिथ्य किया, सत्कार किया, बात मत पूछिये। उस आदमी ने पहले चारपाई बिछायी और कहा, पहले आप लेट जाओ। बहुत दूर से आये होगे, थक गये होगे, थोड़ा विश्राम करो। लेटने के बाद उसने अपने लड़के को कहा, इनका सिर दबाओ, टांगें दबाओ। जब वह लड़का टाँगें दबाये, मुझे बहुत हंसी आने लगी क्योंकि मैंने कभी टांगें दबवायी नहीं थीं। जब भी वह टांगों को हाथ लगाये, मेरी हंसी छूटे बहुत। मैंने उसको बहुत कहा कि मैं थका नहीं हूँ, मत दबाओ। वह कहता था, नहीं भैय्या नहीं, यह हमारा फर्ज है, आप हमारे मेहमान हो। सिर और टांग दबाता रहा। बाद में उन्होंने खाना खिलाया। (उस समय तो मैं ज्ञान में नहीं था, यह बात है सन् 1947 की)। आज तक मुझे वह खाना याद है। क्या गजब का घी उन्होंने मुझे खिलाया ! घर का बना हुआ घी था। सब्जी में घी डाला और रोटी पर खूब मक्खन लगाकर बहुत प्यार से मेरा आतिथ्य किया। इस प्रकार, खूब खिलाया। रात को सोते समय दूध का एक बड़ा गिलास ले आया, जिस दूध पर मलाई दाली हुई थी। मै हर चीज को मना करता रहा लेकिन उन्होंने थोड़ा ले लेना. थोड़ा ले लेना कहके खूब खिलाया। रात को जैसे-तैसे सो गया। सुबह उसे घर वाले ने खुद ही उठाया। उसने कहा, उठो भैय्या, उठो, वैसे सोये हुए को उठाना नहीं चाहिए क्योंकि यह पाप है लेकिन आप जिस काम के लिए आये हो, वह नहीं हुआ तो क्या फायदा? इसलिए उठो, आपको जाना है ना! मुझ जगाके नहाने-धोने का इन्तजाम किया।
जब मैं निकलने लगा तो मुझे छींके आ गई । वो मुझे कहता है कि अभी नहीं जाओ यही रुक जाओ। छींके आ गयी है. काम सफल कही होगा, ठहर जाओ। क्योंकि तीन छींके मुझे आ गयी थी। गांव वालो में यह होता है, हर काम में शगुन और अपशगुन देखते हैं। मुझे रोक लिया। थोडे समय के बाद जाने के लिए मै उठा तो एक बिल्ली मेरे सामने से गुजरी। में जा ही रहा था तो उसने आकर कहा, दो मिनट और ठहर जाओ। देखिये मेरी सफलता में भी वह व्यक्ति कितनी रुचि रखता था। उसको क्या जरूरत थी. मेरी सफलता के बारे में सोचने की? ऐसा वह सोच सकता था ना कि जल्दी चला जाये यहाँ से जितना हो सके उतना, हमने तो रात भर इसका ख्याल रखा, खिलाया, पिलाया। इसके काम के बारे में हमें क्या लेना-देना है? लेकिन उसने सोचा, यह हमारे पास आया है, यह हमारा अतिथि है इसलिए हमारा यह फर्ज बनता है कि इसका काम ठीक होना चाहिए। जाते समय वह मुझे कहता है कि भगवान आपकी मदद करे। बाद में उस व्यक्ति से मिलने की मैंने बहुत कोशिश की, वह नहीं मिला। क्योंकि जब मैं उस गाँव में गया था, वहाँ ब्लैक आउट था, तो उस गाँव का रास्ता भी नहीं पता रहा, वह व्यक्ति कौन था यह भी मैं ठीक तरह से देख नहीं पाया और उस गाँव का नाम भी मैं भूल गया। मेरे मन में यह बात रह गयी कि उस व्यक्ति ने मेरे लिए इतना सारा किया, मैंने उसके लिए कुछ नहीं किया। आज तक मैं उससे मिल नहीं सका। लेकिन मुझे यह याद आता है कि उस आदमी ने मेरा कितना सत्कार किया ! ऐसे तो मुझे गांव के बहुत से अनुभव हैं क्योंकि हमारी जमीनें भी गाँव में थीं। मैं यह कह रहा था कि गाँव वालों का जो आतिथ्य है, सेवाभाव है वह विशेष है। यह भारत की सभ्यता है, अतिथियों का अति प्यार और आदर से सत्कार करना। हम भगवान को बुलाते हैं। आओ, आकर धर्म की स्थापना करो, अधर्म का विनाश करो, फिर से गीताज्ञान सुनाओ। जब वे आयेंगे, वे आपके अतिथि होंगे ना! जब भगवान आपके अतिथि होंगे तो तब आपका क्या फर्ज बनता है? भगवान इस सृष्टि पर आये हैं। वे कहते हैं कि मैं एक चीज आप से चाहता हूं। बच्चे, मै सतयुगी पवित्र दुनिया स्थापन करने आया हूँ. इसलिए तुम पवित्र रहो और दूसरोको पवित्र बनाओ। यह मेरे लिए तुम्हारी सेवा है।
गाँव वालों की तीसरी विशेषता है. देने का सस्कार। सतयुग की संस्कृति और सभ्यता का सबसे मुख्य लक्षण है देना। देवता उसको कहते है जो दे। हाथ नहीं फैलाये किसी के आगे। देवता कोई मांगने वाले नहीं है, मनुष्य भीख मांगते हैं कि हमे कुछ दो। वह भी कलियुग में मांगते हैं, हरेक से कुछ न कुछ चाहते हैं. आशा रखते हैं लेकिन सतयुग में हरेक देना ही जानते है। आपने अनुभव किये होंगे कि देने से खुशी होती है। बाबा ने हमें क्या मंत्र दिया है? देना ही लेना है। देना - यह सीखो। गाँव वालों में आप यह देखेंगे कोई भी फसल तैयार हो गयी हो, मान लो आप किसी के खेत में गये, वहां खजूर तैयार है, आपको खजूर देंगे। खाने के लिए तो देंगे जरूर लेकिन उसके अलावा ले जाने के लिए भी देंगे। आम के फल लगे हुए हैं तो आपको आम खिलायेंगे और देंगे भी। आपको वे खाली हाथ जाने नहीं देंगे। यह उनकी सभ्यता है। ऐसे नहीं कि आप गये हैं तो एक आम काटकर आधा आपको देगे और आधा खुद खायेंगे। ऐसा नहीं, अच्छी तरह से आपको खिलायेंगे। अगर आप एक खायेंगे और कहेंगे बस, तो वे कहेंगे, क्या बात है, ये तो ताजा आम हैं, अभी तो पेड़ से उतारे हैं, और खाओ, ये बहुत अच्छे आम हैं. ऐसे कहकर और खिलाते रहेंगे। यह सतयुग की सभ्यता और संस्कृति जो देने की है, यह उन ग्रामवासियों में है। जब शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा में प्रवेश किया, उनकी (ब्रह्मा बाबा की) प्रवृत्ति भी यही थी देने की। साकार बाबा की सारी जीवन कहानी आप देखेंगे, उन्होंने कभी भी किसी से माँगा नहीं, माँगना तो दूर कभी किसी से लिया भी नहीं। कभी किसी से चाहा भी नहीं, आश रखी ही नहीं। देना, देना। देने का जो संस्कार है, यह बहुत बड़ा विशाल संस्कार है। यही संस्कार गाँव वालों में होता है। यह देने का संस्कार विशाल हृदय वाला हो धारण कर सकता है, न कि संकीर्ण हृदय बाला संकीर्ण हृदय वाला सोचेगा कि ऐसे में लुटाता रहे तो मेरे पास बचेगा का? दानी समझता है कि भगवान बरकत देगा। इसलिए दे दी। वे देना जानते हैं। ग्रामवासियों से जब आप मिले तो उनसे कहना है कि आप तो देना जानते हैं। हम आपके अतिथि है, हमें आपसे कुछ चाहिए। क्या चाहिए? हमें उनसे क्या दान लेना है?
मुझे याद है, एक बार राखी के समय पर बहनें दिल्ली के मेयर के पास गयी थीं। उस समय हंसराज गुप्ता जी मेयर थे। जब उनको राखी बांधी तो उन्होंने कहा, आप तो मेरी बहनें हैं, राखी बाँधी तो भाई को कुछ न कुछ देना चाहिए, यहाँ का रिवाज है। मैं आपको क्या दूं? बहनों ने कहा कि हमें पांच खोटे पैसे दे दो। सुनकर वह बहनों को देखता रहा। क्या पाँच खोटे पैसे दे दूँ? दो-तीन बार बोलता रहा। मेयर साहब इस बात को समझा नहीं। वह सोचने लगा कि पाँच खोटे पैसे लेकर ये क्या करेंगे? उनकी ये हालत देखकर बहनें मुस्कराने लगीं और उनको बताया गया कि पाँच खोटे पैसे किसको कहते हैं। जानने के बाद मेयर साहब बहुत खुश हुए। इस प्रकार, हम ग्रामवासियों से कह सकते हैं कि आप तो उदारचित्त हो, आपमें देने का संस्कार है। हम सच्चे ब्राह्मण है, हम आपके पास आये हैं। हम योगी लोग हैं, हम आपसे क्या आशा रख सकते हैं? आप हमें क्या दे सकते हैं? ये पाँच विकार छोड़ दो, यही हमें दान दो। इस प्रकार, उनकी सभ्यता और संस्कृति के आधार से आप उनको ईश्वरीय ज्ञान समझा सकते हैं।
चौथी विशेषता है, बांटकर खाना है। आपने देखा होगा कि गांव में किसी के पास गौएं हैं, उनका दूध वे लेंगे, मक्खन बनायेंगे, छाछ बनायेंगे और भी उसकी कई चीजें बनायेंगे। बनाकर वे अपने पास नहीं रखते अथवा सब-कुछ खुद ही नहीं खाते-पीते, पड़ोस वालों को देंगे। ज्यादा दूध है तो आज एक-दो घर में भेजेंगे, कल दूसरे दो घरों में भेजेंगे। अगर आज छाछ ज्यादा बन गयी तो आज एक-दो घरों में भेजेंगे तो कल दूसरे एक-दो घरों में भेजेंगे। इस प्रकार, ग्रामीणों में दान का संस्कार यहाँ तक है कि कोई उनके पास अधिक मात्रा में है तो उसको अडोस-पड़ोस वालों को भेजत लेने वाला भी ऐसे ही नहीं लेगा, वह भी उसके बदले कुछ-न-कुछ रहेगा। यह उदारता का संस्कार और आपस में बांटकर खाना यह गांव वालों में देखते हैं। आजकल दुनिया में स्वार्थ बढ़ गया है। आज आदमी हरेक चीज अपने पास रखना चाहता है। दूसरे भले ही भूखे मरे लेकिन चीज अपने घर में भरपूर रहे यह आधुनिक मनुष्य की सभ्यता बन चुकी है। यह संकीर्णता आ चुकी है। हमारी भारतीय संस्कृति में गाँवों में कभी कोई से नहीं मरता था। क्यों नहीं मरता था? क्योंकि अगर किसी को कोई चीज की कमी हो, तो सब उसके थे। बाकी लोग उसको देते थे। कोई ऐसी कमी नहीं थी, एक-दूसरों को देने से बरकत भी होती थी। इसलिए मैं यह कह रहा हूं कि आपस में बाँट कर जीना यह बहुत बड़ा गुण है। आजकल कोई किसी के कष्ट में कुछ देना नहीं चाहता क्योंकि सोचेंगे कि इसको दिया तो हमारे बच्चों को कम पड़ेगा, हमें कौन देगा? लेकिन जिसके पास नहीं है, उसको जाकर देना यह ग्रामीण सभ्यता है। शहरों में माँगने पर भी नहीं देते, ग्रामों में बिना माँगे देकर सहायता करते यह ग्रामीण संस्कृति है।
आजकल के दिनों में मैं गाँव में नहीं गया हूँ। आज से 25-30 साल पहले गया था। उन दिनों उन लोगों के साथ रहकर ग्रामीण जीवन देखा है, उस समय ये सब परम्परायें, सभ्यतायें थीं। अभी कलियुग के अन्त में थोड़ी विकृति हो गयी होगी, फिर भी कुछ हद तक वह दैवी सभ्यता ग्रामवासियों में हम देखते हैं। कलियुग में भी यह सभ्यता इतनी है तो सतयुग में कितनी होगी, आप सोच सकते हैं। वहाँ कोई चीज़ की कमी होगी ही नहीं। लोग एक-दूसरे को कितना भरपूर करते होंगे। वो स्थिति थी यहां भारत में। मैं कह रहा था कि गाँवों में कोई भी भूखा नहीं रह सकता। यहाँ तक कि वे पशु-पक्षियों के लिए भी अन्न निकालते हैं। समझते हैं कि भई, इनका भी हिसाब बनता है उनको दो। इसलिए दो दो यह दातापन का जो सस्कार है. यह मनुष्य को देवता बनाता है। ऐसे दातापन के सस्कार गाँव वालों में पहले से ही होने के कारण उनको बाबा का ज्ञान देना, उनको विकारों से मुक्त कराना सहज होगा।
बचपन में जब में गांवों में खेतों में जाता था. मैंने देखा कि तराजू से बहुत कम लोग तोलते थे। मंडियों में तोलते थे, दुकानों में तोलते थे लेकिन घरो मे खेतों में नहीं। अन्दाजा दे देते थे और ऊपर से और अलग से दे देत थे। दुकानों में भी जब तोलते थे, तोलने के बाद भी कुछ अलग से वह चीज़ डाल देते थे। मझे याद है. जब मैं छोटा था मुझे दुध ले आने का काम दिया गया था। दूध लेने जब मैं जाता था, मेरे से पूछते थे, कितना दूध चाहिए? मैं कहता था, पाँच सेर चाहिए। पाँच सेर दूध डालेगा, उसके बाद आधा सेर जा पौने सेर ऊपर से डालेगा। तुम बच्चे हो ना, पढ़ते हो ना, यह मेरी तरफ़ से पी लो। तुम्हारी उम्र है पीने की। ऐसा करते थे लोग इसको बरकत कहते हैं। बरकत की चीजें देने बिगर किसी को भेजते नहीं थे। ऐसे देने बालों को बरकत होती भी थी। धीरे-धीरे हमने देखा, दूध निकालने वाले बर्तनों में कुछ ठोकाठोकी करके, देने वाले दूध में भी कुछ बचाने लगे, नियत खराब हो गयी। उस बर्तन को भी पूरा नहीं भरेंगे, थोड़ा कम भरेंगे ताकि कुछ दूध की बचत भी हो जाये। फिर आजकल क्या करना शुरू किया कि पहले से ही दूध निकालने वाले बर्तन में पानी डालकर बैठे रहेंगे और ग्राहक को ऐसे उस बर्तन को दिखायेंगे कि अन्दर का पानी दिखायी नहीं पड़ेगा और उस में दूध निकाल कर देंगे। अभी तो आप देखते होंगे कि दूध बाले क्या करते हैं। रास्ते में जहाँ-जहाँ म्यूनिसिपैलिटी के नल होंगे वहाँ खुल्लम-खुला दूध में पानी मिलाते हैं। एक लिटर को दो लिटर बना देते हैं। ऐसे दूध से कैसी मलाई बनेगी? ऐसे दूध को कैसे पी सकेंगे? पीने का मन कैसे होगा? उसको खाने-पीने से कोई फ़ायदा ही नहीं, कुछ बरकत ही नहीं रही। बरकत क्यों नहीं रही? क्योंकि नियत खराब हो गयी। लेकिन गांव वालों में काफी हद तक ये चीजें हैं। आज भी वहाँ ये शुद्ध चीजें मिल सकती हैं और वे आपको थोड़ा बरकत से देंगे। यह उदरता का गुण, देने का गुण, अपनेपन का स्नेह हम ग्रामीण लोगों में पा सकते हैं। स्नेह का और देने का, ये दो गुण उनमें हैं, इनसे वे ईश्वरीय ज्ञान में जल्दी आगे बढ़ सकते हैं।
पांचवीं विशेषता है, सरलता। एक और गुण गाँव वालों में आप देखेंगे, सरलता। अगर किसी गाँव वाले ने झूठ भी बोला होगा, सहज रीति से उसमे सच कहलवा सकते हो। वो चालाक और धोखा देने वाला नहीं होता। अगर कोई झूठ बोला हो, आपको पता पड़ गया कि इसने मेरे से झूठ बोला है: आप जाकर कह दो कि भगवान देखता है, तुमने झूठ बोला है, तुम को वह क्षमा नहीं करेगा तो वह तुरन्त कह देगा कि हाँ, झूठ तो बोला है. क्षमा करो दुबारा कभी झूठ नहीं बोलूँगा। इतनी सरलता उनमें होती है। अभी भी गांव वालों में भगवान का थोड़ा-सा डर है। चालाकी करना, धोखा देना, झूठ बोलना ये पाप हैं, इन चीज़ों को वे थोड़ा-सा समझते हैं क्योंकि उनका मन सरल है। सतयुग की पहली चीज़ यह है कि वहाँ के देवी-देवता बच्चों जैसे सरल होते हैं। उनमें मक्कारी, हेराफेरी, चालाकी, धोखेबाजी आदि नहीं होते जो शहर के लोग करते हैं। आजकल के लोग देखने में एक है लेकिन अन्दर से और कुछ हैं। गाँव वाले अन्दर-बाहर एक हैं, सरल स्वभाव के हैं। जो कुटिल होगा उसका योग नहीं लग सकता, यह निश्चित है। उसकी बुद्धि भटकेगी। वह इधर-उधर के दांव-पेच सोचेगा मक्कारी का. में इसका क्या करूं, कैसे करूं। हेराफेरी करने का सोचेगा। ऐसे व्यक्ति को भगवान कहां से याद आयेगा? आप ही बताइये, उसका योग कैसे लगेगा
जिसका मन सरल होगा, समझ लीजिये, उसके मन की धरनी योग के लिए तैयार है। ज्ञानयोग के बीज को आराम से बोया जा सकता है। सरल मन वाला ही सहजरूप से महान योगी बन सकता है। अक्सर सरलता का यह गुण गांव वालों में होता है।
छठवीं विशेषता है, बड़ों की इज्जत करना। आप देख सकते हैं कि अभी तक गांव के लोगों में बड़ों की इज्जत करने का संस्कार है। बड़े भाई ने जो कह दिया, ठीक कह दिया। बड़ा भाई बाप समान है। पिता जी बैठे हैं, पिता जी जिन्दा हैं तो उनका कहना सब बच्चे मानते हैं। पंचायत ने कुछ कह दिया, तो पंचायत की बात मानेंगे। मशहूर तो यह है कि पंचायत की बात सिरमाथे परन्तु परनाला यहीं रहेगा। लेकिन ऐसे केस कोई एक-दो होते हैं। आमतौर से पंचायत को लोग मानते हैं, उनकी इज्जत करते हैं। अगर कहीं बड़ों की बात कोई नहीं सुनता, माना वहाँ अराजकता है, अव्यवस्था है। अगर किसी घर में यह समझते हैं कि बड़ों की इज़्ज़त करना जरूरी नहीं है, मान लीजिये वहाँ अनुशासनहीनता है। उनको कैसे सुधारेंगे? जब मां-बाप के नियंत्रण में बच्चे नहीं हैं, आपस में भी एक-दूसरे का नियंत्रण नहीं है, जहां बड़े-छोटे का लिहाज़ नहीं है, किसी का कहना कोई सुनता नहीं है, तो आप सोचिये उस घर का, उस समाज का क्या हाल होगा। चाहे कोई नेता हो, चाहे कोई कमाण्डर हो, चाहे कोई शिक्षक हो, चाहे कोई गुरु हो। आज दुनिया में इतने गुरु हैं, वे भक्तिमार्ग की अच्छी बात भी कहते होंगे, तो भी कोई मानते नहीं। क्यों नहीं मानते? क्योंकि मूल, जो नियत है कि बड़ों का मानना, यह छोड़ दी गयी है जिसको नाफ़रमानबरदारी कहते हैं। बड़ों की अवज्ञा करने से कोई भी परिवार हो, संस्था हो, संगठन हो वह ठीक काम नहीं कर सकता, वहाँ कोई काम नहीं चल सकता। काम वहां चल सकता है जहां बड़ों का कहना माना जाता है। हम ने खुद अपने घर में देखा है, बड़े ने जो कहा, वही अन्तिम है, भले उससे मुझे दुःख हुआ। भाई को भी अनुभव हुआ कि मैंने भाई को ज़्यादा कह दिया, वह छोटा है लेकिन उसका मेरे लिए कहना भी अनिवार्य था क्योंकि उसको भी कारोबार चलाना है। लेकिन छोटों का काम है बड़ों की बात मानना, उनकी इज्जत करना। आजकल के बच्चे मां-बाप की इज़्ज़त करते नहीं हैं। आप देखते हैं, बच्चे घर छोड़कर चले जाते हैं। कहाँ जाते हैं, मुंबई जाते हैं। क्यों जाते हैं? एक्टर बनने जाते हैं। कई लड़के कार लेकर घूमते हैं, शराब पीते हैं। एक्सीडेण्ट कर लेते हैं, जेल में पड़े हैं, मां-बाप परेशान हैं। यह हालत हो गयी है दुनिया की। इसकी वजह क्या है? मूल जो है वह खराब हो गया है। गाँव में फिर भी अभी तक कुछ हद तक प्राचीन सभ्यता है। कई किस्से हमने देखे हैं।
एक दफा मुझे किसी गाँव में बुलाया गया था। उस गाँव में एक माता थी। वह माता मरने जा रही थी। उसके घर वालों ने उसको इतना परेशान कर दिया था कि उसका जीना ही मुश्किल हो गया था। उसने सोचा कि मै कहाँ जाऊँ? घर में रहना संभव नहीं है इसलिए अपने को ही खत्म कर दूँ। वह खुदकुशी करने गयी। काफी देर से खड़ी होकर सोच रही थी। उसको एक आदमी देख रहा था और सोच रहा था कि यह औरत बहुत समय से खड़ी है, कुछ नहीं कर रही है और उदास दिखायी पड़ रही है, क्या बात है? उसने जाकर उस माता से पूछा, क्या बात है माता, यहाँ क्यों खड़ी है, उदास क्यों है? उसने अपनी सारी कहानी बतायी। कहा, बेटा पूछ मत। अब जीना अच्छा नहीं लगता। इस दुनिया से मन उठ गया है। उसने कहा, तुम्हारा मतलब क्या है माता? मतलब यह है कि मैं उस घड़ी की इन्तज़ार में हूं कि मैं यहाँ से चली जाऊँ। भाई ने पूछा, क्या करना चाहती हो? माता ने कहा, इस दुनिया से मुक्त होना चाहती हूँ। उसने कहा, मैं तुमको ऐसी जगह ले चलता हूँ, जहाँ तुम्हारी समस्या का हल हो सकता है। वह भाई उसको ब्रह्माकुमारी संस्था में ले आया। वह उस माता को सेन्टर के सामने छोड़कर चला गया। वह जानता था कि इस माता की समस्या का हल यहाँ हो सकता है। फिर बहनों ने उस माता के रिश्तेदारों को बुलाया। मैं भी उस समय वहाँ था। रिश्तेदारों में से कोई बोलता है, यह घर से क्यों बाहर निकली? कोई कहता है, चुप रहो, तुम क्यों बीच में बोलते हो? कोई कुछ बोलता था.कोई कुछ बोलता था। उनमें एक छोटा था, वह बहुत बोलता था। वह बहुत तेज़ था। उसके बड़े भाई ने उसको दो-तीन दफ़ा बोला, तुम चूप रहो, क्यों बोलते हो बीच में? फिर भी वह बोल रहा था। आखिर बड़े भाई ने उसको मारा थप्पड़ जोर से। हैरान हो गये सब लोग कि इसने क्या किया। अचानक से उसको थप्पड़ मारा तो उसका सिर घूम गया। लोगों के कहने पर भी और बड़े भाई के कहने पर भी उसने बोलना बन्द नहीं किया, बड़ों की बात की इज़्ज़त नहीं की। लोग भी छोटे को डॉटने लगे कि तुमने बड़े भाई की बात क्यों नहीं मानी? कहने का भाव यह है कि अभी भी गाँवों में बड़ों का आदर करने की सभ्यता है। लेकिन शहरों से यह बात खत्म होती जा रही है।
शहरों में यह तमाशा भी देखने को मिलता है कि लड़की फैशन करके जा रही है कहीं सिनेमा देखने किसी बॉय फ्रेण्ड के साथ और लड़का जा रहा है कहीं किसी गर्ल फ्रेण्ड के साथ। माँ-बाप पूछते हैं, कहाँ जा रहे हो तो कोई-न-कोई झूठ बोलकर चले जाते हैं। ऐसे बच्चे भी हैं जो मां-बाप को कहते हैं, तुम्हारा क्या मतलब? यह देख लिजिये आजकल का जमाना ! यह ऐसी हालत क्यों हुई? क्योंकि बड़ों के प्रति मान्यता नहीं रही, आज्ञा पालन नहीं रहा। गांवों में अभी भी यह प्रथा है कि घर के बड़ों की माने, गुरु की माने, शिक्षक की माने या सन्त-महात्मा की माने। अभी तक गाँव वाले इन सबकी कदर करते हैं। ऐसे लोग भगवान की आज्ञा को भी सहज मान सकते
हमारे में भी कई ऐसे लोग हैं जो बाबा की शिक्षाओं को टाल देते हैं. जीवन में लाते नहीं हैं। कितने कितने साल हो चुके हैं, जिस पूर्ण रूप से हमें उन शिक्षाओं की पालना करनी चाहिए, करते नहीं हैं। उसका कारण तो कोई होगा ना ! बिना कारण तो कुछ नहीं होता। आदत पड़ी हुई है उल्लंघन करने की। गांव वाले भावना वाले हैं, फिर भी कुछ हद तक वे इन बातों का पालन करते हैं लेकिन शहर के लोग कहते हैं, किसने देखा है, विनाश कब होगा ! ठीक है, अच्छी बात है, सुन लो यहाँ जो सुनाते हैं। तुम तो पागल हो, बिलकुल उनके पीछे लग गये। हम इनकी बातें ऐसे ही नहीं मानते। सारी बातें ठीक थोड़ी ही हैं? ये कहते हैं, कल्प 5000 वर्ष का है। हम कैसे विश्वास करें कि इतने ही वर्ष का है? ऐसे लोग एक-न-एक दिन धोखा खाते हैं। माया ऐसी आती है कि उसके वशीभूत होकर गुम हो जाते हैं क्योंकि भगवान की बातें ही नहीं मानते।
अभी तक भारत के ग्रामों में प्राचीन सभ्यता की बातें हैं, इसलिए ग्राम में रहने वाले लोग परमात्मा के इस ज्ञान को सहज रूप से जान सकते हैं और मान सकते हैं। ग्रामवासियों की इस सभ्यता की वजह से, शहरों की भेंट में ग्रामों में चोरी आदि भी कम होती हैं। मुझे याद है, दिल्ली के एक नये इलाके में एक बूढ़ा और बूढ़ी रहते थे। एक दिन बाहर के लोग आये, दरवाज़ा खटखटाया, घंटी बजायी। दरवाज़ा खोला गया तो पिस्तौल निकाली, उन दोनों को गोली मारी और जो भी सम्पत्ति थी सब लेकर चले गये। दिल्ली में रोज़ ऐसे किस्से होते हैं, आज फलाने ज्वेलर की दुकान लूट ली, आज रास्ते में किसी को लूट लिया। ऐसे किस्से गाँवों में नहीं होते। ऐसा नहीं है कि वे सब देवता है। वहाँ भी कुछ शरारती लोग होते हैं, उनको सब गाँव वाले जानते हैं। अगर कहीं चोरी हो गयी तो उन लोगों को पता रहता है कि फलाने व्यक्ति के बच्चे चोर हैं, उनको इकट्ठा करके पूछो, सब मिल जायेगा। ऐसा होता है, उनको पकड़कर पूछताछ करने से मिल जाता है। वहाँ कुछ लोग चोर होते हैं, सारे नहीं। शहरों में कुछ लोग अच्छे होते हैं, बहुत-से लोग चोर होते हैं। कोई करोड़ों रुपयों का चोर है, कोई सरकार को ही लूटने वाला चोर है, कोई दुकानों को लूटने वाला चोर है, कोई जनता को लूटने वाला चोर है, कोई भक्तों को। उन सबकी नियत ही बिगड़ चुकी है, ये सब चोर, लुटेरे हैं।
जिस आदमी की आदत होती है चोरी और हरामखोरी की, वह आदमी ठीक नहीं हो सकता। ये दोनो खराब चीजे आदमी को ऐसे बना देती हैं कि उसका सुधरना मुश्किल हो जाता है। गांव के लोग अभी भी ऐसे हैं, कोशिश करके दूसरों की चीजों की चोरी नहीं करते हैं। माउण्ट आबू हो देखिये। अभी यह शहर है। कुछ साल पहले तो गांव ही था। अभी भी वहाँ के लोगों से पूछिये, आबू में साल में कितनी चोरियां होती हैं? वहां की चोरियों का और दिल्ली में होने वाली चोरियों का मुक़ाबला कर लीजिये। दिल्ली में चोरियों की गिनती ही नहीं है। आबू में दो साल में, तीन साल में एक-दो हुई होगी। दिल्ली में तो सुबह से लेकर रात तक चोर ही पीछे लगे रहते हैं। जिनकी अपराधवृत्ति होती है, उनका योगी बनना मुश्किल होता है। गाँव वाले व्यसनी जरूर हैं, उनमें दुर्व्यसन हैं लेकिन अपराधवृत्ति नहीं है, चोरी करना, धोखा देना, हेराफेरी करना ये नहीं होते। हुक्का, बीड़ी आदि पीने के व्यसन होते हैं।
योग के लिए कहते हैं, 'योगः चित्तवृत्ति निरोधः। योग चित्त-वृत्ति का निरोध है। सबसे खराब वृत्ति, जो योग लगने नहीं देती, वह है अपराधवृत्ति। अपराधवृत्ति क्या है? इस आदमी ने मेरा अपमान किया है, मैं इसको मजा चखाऊँगा, जब यह मेरे सामने आयेगा ना तब देखूंगा, मुझे इसने समझा ही क्या है ! इसको ऐसे बोलूंगा कि इसकी सारी आवाज ही गुम हो जायेगी - यह है अपराधवृत्ति। ऐसे सोचने वालों का योग नहीं लगेगा लेकिन उसको ऐसा ख्याल आयेगा बदला लेने का, अपराध करने का। वह अपराध बड़ा हो सकता है अथवा छोटा भी। जज भी अपराधी होते हैं। कई जज ऐसे हैं जो अपनी पत्नी की पिटाई करते हैं। आपको मालूम नहीं होगा, कभी-कभी समाचार पत्रों में आता है। कोर्ट में लोगों के केसों का फैसला करते हैं और घर में अपनी स्त्री की पिटाई करते हैं। यह अपराध प्रवृत्ति है। जिनकी अपराध प्रवृत्ति है, वे क्या योग सीखेंगे, क्या योग लगायेंगे?
सातवी विशेषता है. भावना। बाबा भी कहते हैं कि गाँव वाले भावना वाले है. भोले हैं. भोलेनाथ भगवान के प्रिय है। भावना एक बंधा हुआ शब्द है. उसके पीछे बहुत सारी चीजें हैं। सब गुण उसमे शामिल है। आपने देख होगा, गांव के लोग गांव की कन्या को बहन समझते हैं। अगर गाँव की कन्या को कोई छेडता है तो कन्या को बचाने के लिए अपनी जान भी दे दे। कहेंगे यह हमारे गांव की बहन है. यहां तक उनकी भावना होती है। शहर में तो बहन भी बहन नहीं है। गांव में गाँव की कन्या कोई भी हो, बहन है। देख लीजिये, उनकी दृष्टि-वृत्ति में और इनकी दृष्टि-वृत्ति में कितना फरक है। आपने ऐसे कहते हुए देखे होंगे या सुने होंगे कि 'यह मेरे गाँव की बात है'। मान लीजिये, एक गाँव वाला किसी दफ़्तर में काम कर रहा है, उस आफ़िस में उसके गाँव की कन्या आ जाये तो वह उस बहन के सारे काम करके देगा क्योंकि वह समझता है कि यह मेरे गाँव की बहन है। इतना उनमें संस्कार है। यह भी एक शुद्ध प्रवृत्ति की बात है। ऐसे लोगों को आत्मा का ज्ञान बहुत सहज रीति से समझा सकते हैं कि हम आत्मा कैसे एक परमात्मा की सन्तान भाई-भाई हैं, भाई-बहन हैं।
आठवीं विशेषता है, सामूहिक जीवन। लोकगीत हैं, लोकनृत्य है, सामूहिक गीत और सामूहिक नृत्य हैं, ये गाँव वालों की विशेष प्रवृत्तियाँ हैं। गांव वाले मिलजुल कर आपस में भोजन करते हैं, इसको सामुदायिक भोजन (Community Dining) कहते हैं। अभी तक गाँवों में इस प्रकार का पारिवारिक जीवन है। यह सारा विश्व ही एक परिवार है, हम सब एक परिवार के सदस्य हैं, इस भावना को उनमें सहज रूप से पैदा कर सकते हैं। अगर विश्व एक परिवार है तो हम आपस में भाई-बहन हैं। भाई-बहन है तो जरूर हमारा एक पिता है और पिता कौन हो सकता है? आत्माओं का पिता परमात्मा ही है। वह कौन है, यह जानने की जरूरत है। ऐसी चीजे गाँव वालों को बता सकते हैं।
बड़े कौन हैं ? उनके प्रति छोटों का क्या व्यवहार है?
सबसे पहले प्रश्न उठता है कि बड़ा कौन है? अगर यह स्पष्ट हो जायेगा कि बड़ा कौन है, तो छोटा स्वतः स्पष्ट हो जायेगा क्योंकि बड़ों की तुलना में ही छोटा होता है। इसलिए सबसे पहले हम यह जानना चाहेगे कि बड़ा कौन है? केवल एक दृष्टिकोण से कोई बड़ा नहीं होता। कोई व्यक्ति एक दृष्टिकोण से बड़ा होता है और दूसरा, दूसरे दृष्टिकोण से बड़ा होता है। अतः उनके प्रति हमारा व्यवहार भी उसी अनुसार मर्यादापूर्वक होना चाहिए क्योंकि हम मर्यादा पुरुषोत्तम बन रहे हैं। हम नया संसार रच रहे हैं। उस संसार का मुख्य लक्षण यह होगा कि वहाँ मर्यादा होगी। मर्यादापूर्वक व्यवहार करने के लिए यह जानना जरूरी है कि बड़ा कौन है?
कई भाई अथवा बहन आयु में हमसे बड़े होते हैं। जैसे कि किसी के लौकिक माता-पिता हैं, बड़े भाई, बड़ी बहन हैं। जो आयु में बड़े हैं, एक दृष्टिकोण से वे बड़े हैं। वे हमसे आशा करते हैं कि उनके प्रति छोटे आदर भाव से व्यवहार करें। उनके प्रति जो शब्द छोटे बोलें वे मर्यादापूर्वक हों, सम्मानयुक्त हों। हम यह नहीं कहें कि यह तो उनका देह-अभिमान है, देह की दृष्टि से वे बड़े होंगे, ज्ञान मिलने के बाद देह की बात ही छोड़ देनी है, हमें तो आत्मा को ही देखना है और देह की बात ही नहीं है। यह ठीक है, हमें आत्मिक दृष्टि से देखना है लेकिन हम जिस संसार में बैठे हैं, सेवा पर उपस्थित हैं उस संसार में बुजुर्ग हमसे आशा करते हैं कि सब हमसे सम्मान सूचक बोल बोलें। अगर हम वैसा नहीं बोलेंगे, हमारा व्यवहार वैसा नहीं होगा तो वे झट कहेंगे कि आप क्या ज्ञान सीखे हो? आपकी संस्था क्या आपको यही सिखाती है? कल तक आप हमसे रिगार्ड से बोलते थे, अब वह भी चला गया? क्या आपकी यही उन्नति है? क्या यही रूहानियत आपका वहीं सिखायी जा रही है? इसके कारण जो हम सेवा करना चाहते है जिस श्रेष्ठ समाज की हम स्थापना करना चाहते है. वह उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा। हमारी जो बड़ाई है, हमारी जो रूहानियत है वह इसी में है कि जो आयु से बड़े हैं, उनको हम आदर सूचक शब्द बोलें, भले ही वे हमारे विद्याथों क्यों न हो। बाबा ने हमें जो भी उपाधि दी है, हमारी जो विशेषता बतायी है. जो नशा चढ़ाया है, वे सब गुण अपने में भरने के लिए कहा हुआ है। हमे यह सोचना चाहिए कि बाबा इतने बड़े हैं, हम इतने छोटे हैं, हमारी इतनी महिमा कर रहे हैं तो हमें दूसरों के साथ कितने सम्मान पूर्वक चलना चाहिए, कितनी रॉयल्टी से व्यवहार करना चाहिए! इसलिए हमें यह ख्याल रहना चाहिए कि जो शरीर से बड़े हैं, उनको बड़े मानकर उनको सम्मान देना चाहिए।
दूसरी बात है, जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं अर्थात् हमारे से पहले ज्ञान में आये हैं, वे भी बड़े हैं। वे ज्ञान की दृष्टि से, ज्ञान की आयु से हमसे बड़े हैं। जैसे कोई कहता है कि में दो वर्ष का बाबा का बच्चा हूं। वह ज्ञान में आकर दो वर्ष होने के कारण, दो वर्ष का बच्चा है। किसी को आये हुए 25 वर्ष हो गये, उनकी सिलवर जुबली भी हो गयी। मर्यादा तो यही कहती है कि 25 वर्ष वाले को सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे ज्ञान में हमसे पहले आये हैं, उन्होंने मर्यादाओं को ज्यादा समझा है, ज्ञान को ज्यादा समझा है, बड़ों के सम्बन्ध-सम्पर्क में हमसे ज्यादा आये हैं। वे हमसे ज़्यादा समय से पुरुषार्थ कर रहे हैं तो वे ज्ञान में हमसे बड़े हैं। इस दृष्टि से उनको भी सम्मान देना चाहिए।
तीसरी बात है, धारणा के विषय में। जो धारणा में जागे हैं, भले ही वे ज्ञान में छोटे हैं, वे भी बड़े हैं। क्योंकि उन्होंने धारणा हमारे से ज्यादा की है। भले ही, वे ज्ञान में हमसे नये हैं लेकिन हमसे जल्दी सेवा में तन-मन-धन से समर्पित हो गये, ज्ञान-योग में लग गये तो वे भो बड़े है। उनमें विकल्प वा व्यर्थ सकल्प नहीं है. पर्वजन्म के अभ्यास से ईश्वरीय ज्ञान को झट से धारण कर लिया है, तो वे बड़े है। भले ही वे ज्ञान की आयु में बड़े नहीं है लेकिन धारणा में बड़े है। इसलिए निश्चित रूप से सबको मानना पड़ेगा कि वे बड़े है। यहां तो सारा परुषार्थ इसी बात (धारणा) का है। बाबा भी यही कहते हैं कि भले ही ज्ञान में छोटा हो या आयु में छोटा हो, उसका पुरुषार्थ तीव्र गति का है तो वह लास्ट सो फास्ट, फास्ट सो फर्स्ट आ सकता है। उसमें किसी को ईर्ष्या-द्वेष नहीं होना चाहिए। हम तो सोचते हैं कि यह तो अभी आया है और बातें ऐसे करता है। ठीक है वह अभी आया है लेकिन वह जो पार्ट बजा रहा है या संस्था की तरफ से उसको जो पार्ट या सेवा मिली है वह श्रेष्ठ है, ऊँची है, उसकी जो धारणायें हैं वे श्रेष्ठ हैं इसलिए वह बड़ा है।
कई दफ़ा आप देखते होंगे कि सेन्टर पर कोई जिज्ञासु आता है, नियमित रूप से विद्यार्थी बन जाता है, उसको ड्रामा अनुसार अच्छी सेवा मिल जाती है यज्ञ में। उसमें लौकिक विशेषतायें ही ऐसी हैं, उसका पुरुषार्थ ही ऐसा है, उसको वह पार्ट मिल जाता है, भले वह घर-गृहस्थ में रहता है। लेकिन निमित्त शिक्षिका से भी उसका पार्ट आगे बढ़ जाता है। वह राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सेवा के क्षेत्र में आ जाता है। उसको ज्ञान में लाने वाले या ज्ञान देने वाले जहाँ थे वहीं रहते हैं। उनको यह नहीं रहना चाहिए कि हमने ही इसको ज्ञान का जन्म दिया, हमने ही इसको आगे बढ़ाया है, यह क्या है? लेकिन आयु की दृष्टि से जो बड़ा है वह भी बडा है, ज्ञान की दृष्टि से जो बड़ा है वह भी बड़ा है और पुरुषार्थ तथा धारणा की दृष्टि से जो आगे है वह भो बड़ा है। इसके अलावा सेवा की दृष्टि से जो आगे निकल गया तो उसकी प्रशंसा होनी चाहिए और उसको भी बड़ा मानना बाहिए। यह खुशी होनी चाहिए कि यह हमारा विद्यार्थी आगे निकला है। अगर उसको आप सम्मान देंगे आदर करेंगे तो वह भी आपका आदर करेगा, सम्मान देगा जहां भी जायेगा यही कहेगा कि फलाने व्यक्ति ने मुझे ज्ञान दिया। उन्होंने मुझे इतना आगे बढ़ने का मौका दिया। अगर आप उसको पीछे खींचने की कोशीश करेंगे तो वह आपकी ग्लानि करता रहेगा और आप ही नई समस्या के निर्मित बनेंगे। इसलिए बाबा भी यही कहते है कि सम्मान दो और सम्मान लो।
फिर बाप देखेंगे कि कोई विभाग का इंचार्ज है, वह भी बड़ा है, चाहे वह आयु में छोटा है. चाहे वह ज्ञान में देर से आया है। किसी कारण किसी विशेषता से विभाग के निमित्त उसको इंचार्ज बनाया गया है तो वह भी बड़ा है। यह कोई विशेषता के वश हो सकता है अथवा उसके सौभाग्य के वश भी हो सकता है। विभाग की बात तो छोड़ दीजिये, किसी कार्य के लिए किसी को निमित्त भी बना दिया हो, वह और आप एक समय पर ज्ञान में आये हो, फिर भी वह आपसे बड़ा है क्योंकि बड़ों ने उसको निमित्त बनाया है किसी विशेष सेवा के लिए। भले ही वह आप से लौकिक पढ़ाई में छोटा हो, आयु में दोनों एक समान हो, अगर उसको आगे रखा गया है तो अनुशासन और प्रशासन की दृष्टि से उसको सम्मान और आदर देना पड़ेगा। क्योंकि प्रशासन ने उसकी किसी विशेष योग्यता और विशेषता को देखकर निमित्त बनाया है। जब उसको अधिकार दिया गया, स्थान दिया गया तो उस दृष्टि से हमको उसे बड़ा मानकर चलना होगा। अगर हम वैसा नहीं करेंगे तो व्यवस्था टूटेगी, अनुशासन भंग होगा, संगठन कमज़ोर हो जायेगा। कई समस्यायें उत्पन्न होंगी। इसलिए बाबा कहते हैं न समस्या बनो और न समस्याओं को पैदा करो।
जो किसी कार्य में, किसी क्षेत्र में प्रवीण हो उसको भी बड़ा कह सकते हैं। मिसाल के तौर पर किसी माता में रसगुल्ला बनाने की कला है। वह उसमें बहुत होशियार है तो उसको उस कार्य में बड़ी मान सकते हैं। क्योंकि वह कला मुझे नहीं आती या अन्य व्यक्ति को भी नहीं आती इसलिए उस माता को हमें आगे रखना पड़ेगा और उसको सम्मान देना पड़ेगा। उसी प्रकार, कई स्थानों पर क्लास में आने वाले विद्याथीं में भाषण करने की कला बहुत अच्छी होती है, ज्ञान समझाने की कला अच्छी होती है तो उसको हमें आगे रखना पड़ेगा और उसको बड़ा मानना चाहिए। अगर हम किसी व्यक्ति की विशेषता और योग्यताओं को जानकर उनका आदर-सत्कार नहीं करेंगे तो आगे जाकर हमारे लिए हम ही समस्यायें, बाधायें पैदा करेंगे। इस सृष्टि नाटक में हरेक का पार्ट अलग-अलग है, एक-दूसरे से भिन्न है और एक-दूसरे का पूरक है, न कि हानिकारक।
आप जानते हैं कि बाबा तो हरेक की जन्मपत्री जानते हैं, हम नहीं जानते हैं। अगर जानते भी हैं तो एक-दो की, न कि सबकी। हमें तो किसी-किसी में विशेषता दिखायी पड़ती है, किसी में नहीं। जब भी बाबा किसी से मिलते हैं तो उस बच्चे को देखकर कहते हैं, यह बच्चा आगे चलकर कमाल करके दिखायेगा। इस बच्चे में तो बहुत विशेषतायें हैं। अगर बाबा के बच्चे में हमें कोई विशेषता नहीं दिखायी पड़ती है तो वह हमारी कमी है क्योंकि बाबा ने कहा है कि वह बच्चा विशेष आत्मा है, कमाल करके दिखाने वाली आत्मा है। हो सकता है कि हम उसके अवगुण ज्यादा देखते हों और गुण कम देखते हों अथवा हम में परखने की शक्ति न हो। अगर हम यह कहें कि उस आत्मा को ऊपर उठाने के लिए बाबा ऐसे कह रहे हैं, यह बाबा की युक्ति है, वैसे तो वह है नहीं ऐसा कहना या मानना भी एक बड़ी गलती है, एक बड़ा पाप है क्योंकि हमने भगवान के महावाक्यों को झूठा साबित कर दिया अथवा भगवान के महावाक्यों पर हमें विश्वास नहीं है। कोई हमें कैसा भी दिखायी पड़े, बाबा की बातों को मानकर, बाबा जैसे बोलते हैं, वैसे ही उस आत्मा को स्वीकार कर हमें अपने को बदलना है, न कि ऐसे मानकर कि यह ऐसे ही है, इसको सिर पर चढ़ाकर रखा है। ऐसा सोचना गलत है। उसके बदले, यह समझे कि इसको पहचानने में हमारी भूल हई है. हमने नहीं पहचाना इसको। बाबा या बडे इस आत्मा के बारे में ऐसे कहते हैं क्योंकि उनको इसके बारे में हमारे से ज्यादा जानकारी है। हमारे से ज्यादा उनमे निर्णय शक्ति है, उनकी बात हमें माननी चाहिए। आप ऐसे भी समझते होंगे कि बड़े क्या जानें इसके बारे में? हम तो इसरे साथ चौबीस घण्टे रहते हैं, हम जानते हैं, यह कैसा आदमी है। आपको मालूम होना चाहिए कि माँ-बाप बच्चों के साथ बचपन से रहते हुए भी बच्चे को क्या बीमारी है- यह नहीं जान सकते परन्तु डॉक्टर उस बच्चे को पांच मिनट में पहचान लेता है उसकी जीभ और नाड़ी देखकर। जो व्यक्ति जिस विद्या में माहिर रहता है, उसको जानने में ज्यादा वक्त नहीं लगता क्योंकि उसे उस क्षेत्र में बहुत अनुभव है। बाबा ने निमित्त आत्माओं को विशेष शक्तियाँ दे रखी हैं इसलिए बड़ों की बातों को मानने में सबका कल्याण रहता है। हम तो अपने साथ चौबीस घंटे रहते थे लेकिन अपने आपको जानते थे क्या? हम कौन है, कहाँ से आये? हम देवी-देवता थे, हम सम्पूर्ण निर्विकारी थे- ये जानते थे क्या? नहीं जानते थे। बाप ने आकर ही ये सब राज समझाया। जब हम अपने को ही नहीं जानते थे तो दूसरों को या आस-पास वालों को, साथ में रहने वालों को कैसे जानेंगे? इसलिए बाबा या बड़े अगर कहते हैं कि फलाने व्यक्ति को ऐसे चलाओ, तो हमें उनकी बात मानकर ऐसे ही चलाना चाहिए।
कई भाई-बहनें ऐसे हैं कि वे बुजुर्ग हो गये हैं। अभी उनसे ज़्यादा सेवा नहीं होती, उनकी आयु 70-80 वर्ष हो गयी है। वे ज्यादा भाषण नहीं कर सकते, ज़्यादा स्थूल सेवा नहीं कर सकते। जब नयी सेवा शुरू हुई, जब सेन्टर खुले, उन्होंने लोगों के विरोध का सामना किया। जिस वक्त भगवान को कोई नहीं पहचान सका, उन्होंने पहले-पहले पहचाना। संसार के आगे बाबा को प्रत्यक्ष करने का कदम उन्होंने पहले उठाया लेकिन आज किसी कारण से शारीरिक असमर्थता है या उनको कुछ बौद्धिक हानि हुई है। जिस कारण से वे ऐसे नहीं हैं, जैसे हम है जैसे हम बहुत बड़ी बड़ी सभा में अच्छी तरह भाषण करते हैं, बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजते है। ये तो कुछ जानते ही नहीं ज्यादा सेवा भी नहीं कर पा रहे है है ऐसा समझना भी गलत होगा। जिन्होंने भी अपने-अपने समय में सेवा की है. जो त्याग किया है, तपस्या की है और संस्था को ऐसे स्तर पर ले आए हैं जो हमारे लिए सब सहज हुआ है। हमें बनी-बनायी चीज उन्होंने दो है। ज्ञान का विस्तार उनके निमित्त से हुआ है जो आज हमें स्पष्ट रूप से मिला है, सहज रूप से मिला है। यह विकास ऐसे तो नहीं हो गया। इस वृक्ष को उन्होंने भी सींचा है, पानी दिया है, देख-रेख और पालना की है, खुन-पसीना एक किया है। अगर हम उनका अनादर करें, बड़े नहीं समझें और अपने को बहुत होशियार और बड़े समझदार समझते हैं तो मान लीजिये कि हमारा दृष्टिकोण ठीक नहीं है। भले ही वे अभी कुछ नहीं कर पा रहे हैं लेकिन अतीत में उन्होंने किया है। उनका कोई नाम प्रचार नहीं, जैसे आपका है लेकिन वे छिपे हुए हैं। उन्होंने जो किया है वह तो है ना, उसके आधार पर तो हम आज इस मंच पर खड़े हैं। इसलिए जैसे बड़ों का सम्मान किया जाता है, आदर किया जाता है वैसे पुरानों को भी बड़े समझकर आदर-सत्कार करना चाहिए।
फिर हमारे सम्बन्ध-सम्पर्क में, सेवा में, सहयोग में ऐसे व्यक्ति आते है जो लौकिक स्थान-मान (Status) में बड़े हैं लेकिन ज्ञानी योगी नहीं है। उनको भी बड़ा मानना चाहिए क्योंकि उनसे बाबा की सेवा होनी है। बाहर उनका नामाचार है, अच्छा पद है, वे अच्छे वक्ता है। अगर वे बाबा के माइक बन जाते हैं तो उनके द्वारा बाबा के नये बच्चों की सेवा हो जायेगी, भले ही वे ज्ञान में न चले, उनके द्वारा अनेक लोग बाबा का सन्देश पा सकते हैं। अतिथि को भी बड़ा मानना चाहिए। हमारे पास कोई अतिथि है. भले ही वह हमसे बाद में छोटा है. पद में भी हमारे से छोटा है ता उसको बड़ा समझकर सम्मान देना चाहिए क्योंकि वह हमारे पास अतिथि बनकर आया है। आपके पास भोजन बनाने वाला नहीं है तो आप सोचे कि हम क्यों उसको भोजन बनाकर दें, दूसरे स्थान पर जाये। ऐसा सोचना है। अगर वह नियम प्रमाण आया है, बड़ों से छुट्टी-चिट्ठी लेकर आया है तो हमें उसका सत्कार करना चाहिए। सिर्फ ज्ञान ही किसी को नहीं बदल लेता है, ज्ञान के साथ हमारा व्यवहार भी किसी के परिवर्तन का कारण बनता है। इसलिए हमारे पास अतिथि के रूप में कोई भी आता हो. उसका मर्यादायुक्त, ईश्वरीय व्यवहारयुक्त सत्कार करना चाहिए। उस वक्त उसको बड़ा समझना चाहिए। कोई हमारे पास आया, दो मिनट उससे मिले भी नहीं क्योंकि वो तो छोटा है, किसी और को कह दिया कि उससे मिल लो। कोई व्यक्ति आपके पास आया है, माना आपसे कुछ आश रखकर आया है। आपसे कुछ चाहता है, इसलिए आपसे मिलने आया है। अगर आप उससे दो मिनट मिल लिये तो क्या पता आपके मिलने से ही उसका दुःख-दर्द दूर हो जाये, उमंग-उत्साह बढ़ जाये। यह भी एक सेवा है ना! अगर आपकी दो बातों से उसको खुशी मिल गयी, तो वह आत्मा आपको दुआयें देगी ना! इसलिए घर पर आये हुए व्यक्ति को, अतिथि को बड़ा समझकर उसका आदर कीजिये। अतिथि के लिए हमे समय निकालना होगा, उसका स्वागत करना होगा। स्वागत करने का अर्थ यह नहीं कि उसके ऊपर फूल चढ़ायें, गुलाब बाशी करें या कोई गीत बजायें या आरती उतारें। उसका मत से स्वागत कीजिये ताकि उसको लगे कि ये मेरे से व्यवहार ठीक कर रहे हैं। हमारे पास कोई अतिथि आता है तो उसके प्रति अच्छा व्यवहार करना हमारा कर्तव्य बनता है, इसी को ही अतिथि सत्कार कहते हैं।
हमारा मुख्य पुरुषार्थ भी वही है कि जीवन में दिव्यगुण लायें। दिव्यगुणी में एक बहुत बड़ा दिव्यगुण है नम्रता। कहते हैं ना, दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान । अभिमान या अहंकार जो है, यह बहुत-सी बुराइयों का मूल है। उस अहंकार को हम कैसे ठीक करेंगे? नम्रता से। अज्ञान अन्धकार को कैसे निकालेंगे? ज्ञान प्रकाश से और नम्रता से। जीवन में नम्र होकर चलना चाहिए। आप सर्व के प्रति नम्रता तब ही दिखा पायेंगे जब आप समझेगे कि ये हमारे से बड़े हैं। मिसाल देते हैं ना, बॉस की पूजा क्यों नहीं होती? हरेक चीज़ देवता के किसी न किसी काम आ जाती है लेकिन बॉस को देवता पर अर्पित नहीं करते। यहां तक कि अक के फूल भी पूजा के काम में आ जाते हैं लेकिन बाँस नहीं। क्योंकि कहते हैं, बॉस अकड़ा रहता है, बिल्कुल सीधा खड़ा रहता है। आपस में टकराकर आग लग जायेगी, हवा आयेगी गिर पड़ेगा लेकिन झुकता नहीं है, अकड़ा ही रहेगा। यह हमारे लिए एक उदाहरण है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में कोई टकराव न हो. आपसे में मनमुटाव रूपी आग न लगे, हम भगवान के किसी काम आये, हम देवता बनें तो हमारा व्यवहार नम्रतापूर्ण हो।
अतिथि सत्कार के तरीके अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग होते है। आपको पता होगा कि इंग्लैण्ड में किसी के घर में अतिथि कोट वा हैट पहनकर जायेगा तो उस घर का मालिक अतिथि का कोट और हैट उतारेगा। आप पूछेंगे क्यों? यह वहाँ का रिवाज है। जब अतिथि को जाना होगा, वहीं मालिक उसको कोट और हैट पहनायेगा। यह उनका रिगार्ड है। घर आया हुआ व्यक्ति छोटा भी होगा लेकिन उस घर का स्वामी जो है उसका कोट उतारेगा और फिर पहनायेगा।
अगर जीवन में हमारा व्यवहार नम्रतायुक्त है तो हम जरूर झुकेंगे। बड़ी दीदी की माता जी थीं जिनको 'क्वीन मदर' कहते थे, वे हमेशा यही कहती थी, झुक झुक, मर-मर। हम झुकना सीखे। झुकना महानता की निशानी है। जितने भी महान् लोगों की कहानी आप सुनेंगे, उनमें एक मुख्य गुण यह देखेंगे कि उनमे नम्रता थी. वे झुके। और किसी को छोडिये ब्रम्हा बाबा को ही देखिये। लौकिक में बाबा का क्या स्टेटस (स्थान-मान) था बह्या जो सष्टि के आदिपिता है. सष्टि के रचयिता है. उनके आगे उनसे बड़ा कोई है? उन्होंने भी अपनी रचना, अपने बच्चों के साथ कितनी नम्रता से व्यवहार किया हम नम्रता से तब ही व्यवहार करेंगे जब हम दूसरो को बड़ा समझेंगे।
शिव बाबा भी बच्चों को कैसे बड़ा समझते हैं, आपने मुरलियों में सुना ही होगा। बाबा कहते हैं बच्चे, तुम्हारी डबल पूजा होती है, मेरी सिंगल पूजा होती है। बच्च्चे तो बाप से बड़े होते हैं। बाप बच्चों के लिए तो कमाता है। बच्चे ही तो बाप के घर के श्रृंगार होते हैं। बच्चों को बाप कंधे पर बिठाता है। बाबा के मुख से कई बार हमने सुना है कि बच्चे, फलानो बच्ची अथवा फलाना बच्चा बाप से भी ज्ञान में तीखा है, इसे सन्त-महात्मा के पास ले जाओ। बाबा ने कई बार यह कहा है कि जो माताओं से यह ज्ञान नहीं सुनेगा, उसका उद्धार होगा नहीं। वैसे भी हमने देखा, बाबा बच्चों का कितना सम्मान करते थे ! मम्मा को भी हमने देखा। पाण्डव भवन में ईशू बहन के आफिस की तरफ जाते समय दरवाजे के ऊपर एक छत-सी बनी हुई है. जहां बहुत बड़ी लाइट है। अभी तो वह पक्की सीमेंट की बनी हुई है। उस समय सीमेंट शीट की या लकड़ी की बनी हुई थी। उससे पहले कुछ भी नहीं था। एक बार मम्मा बाहर सेवा के लिए गयी थी। उनको वापस आना था। बारिश के दिन थे। कनस्ट्रक्शन कराने वाले भाई से बाबा ने कहा कि बच्चे, मम्मा आने वाली है, कार से निकलकर अन्दर कमरे में जायेगी तो बारिश में भीग जायेगी इसलिए वहां एक छत जैसी बनाओ ताकि कार को इस छत के नीचे खड़ा किया जाये और कार से उतरकर मम्मा सीधी अपने कमरे में जाये। देखिये, मम्मा भी बह्माकुमारी थी ना! यज्ञ को संभालने के लिए तो बाबा ने मम्मा को, मम्मा का स्थान दिया, यज्ञमाता का स्थान दिया। देने वाला जो दाता होता है. वह लेने वालो से हमेशा बड़ा होता है। ब्रम्हा बाबा तो बाबा ही है। लेकिन बाबा ने क्या मर्यादा सिखाई ? हर एक का सम्मान करो। जब भी मम्मा सेवा के लिए बाहर जाती थी बाबा भी कहते थे कि चलो बच्ची मै भी आता हु आबू रोड तक छोड़ने के लिए !बाबा का स्थान क्या बच्चोका स्थान क्या? लेकिन बाबाने किस प्रकार से अपने जीवन में नम्रता धारण करके हम बच्चों को सिखाया ! यह भी सिखाया कैसे चलना होता है और चलाना होता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जीवन में नम्रता का गुण आता ही तब है जब हम हर एक को बड़ा समझते है। भले आज वे बड़े नहीं हैं स्टेज पर नहीं है लेकिन क्या पता पुरुषार्य कर कल हमसे भी आगे निकल जायें। बाबा ने तो कहा है. मार्जिन है। कोई भी परुषार्थ कर आगे जा सकते हैं। हमने कइयों को देखा है, व पुरुषार्थ कर आगे निकल गये। बाबा यह कहता है कि हरेक विशेष आत्मा है, मै करोडों में से सबको चुनकर ले आया हूँ। बाबा ने यह भी कहा है कि तुम बच्चे जन्म-जन्मान्तर ऊँचा पार्ट बजाते आये हो, तुम सारे कल्प में हीरो एक्टर हो। हमें कम से कम दैवी परिवार को तो उसी दृष्टि से देखना चाहिए कि ये जितने भी हैं, वे बड़े हैं। हमारा जीवन रॉयल होना चाहिए, हमारा सम्पूर्ण जीवन नम्रता का होना चाहिए। वह तभी होगा जब सबको हम बड़े समझे।
अगर हम अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जीवन में सुगंधी लाना चाहते हैं तो ईश्वरीय मर्यादाओं का पालना करना बहुत जरूरी है। कई बार हम दूसरों को बड़े समझते हैं और अपने को बहुत छोटे समझते हैं तो भी समस्या पैदा होगी। अगर अपने को बहुत बड़ा समझे और दूसरों को छोटे समझे तब भी समस्या पैदा होगी। सही यही है कि हमें अपने को भी बड़ा समझना चाहिए रूहानी रूप से, अलौकिक रूप से। उल्टे रूप का बड़ा नहीं, बाबा ने जो हमें टाइटल्स दिये हैं, स्वमान दिये हैं उनके रुहानी नशे में रहकर। अपने को भी और दूसरों को भी ब्राह्मण कुलभूषण, पुण्यात्मा,देवात्मा समझना अर्थात स्वयं भी ऊंची अवस्था में रहना और दूसरों को भी ऊंची नजर से देखना तथा उनके साथ व्यवहार करना। व्यवहार में भी नम्रता और रुहानियत तब ही आती है जब बाबा ने हमें जो स्वमान दिया है कि "मैं कौन हूँ" उसके नशे में रहते हैं। यह नारायणी नशा भी चाहिए। अगर यह नशा नहीं रहेगा तो हमारी गिरावट शुरू हो जायेगी, अवस्था हिल जायेगी। इसलिए नशा भी रहे कि हम कौन हैं और नम्रता भी रहे कि हमें सबका आदर-सत्कार करना है। हमारी भाषा आदर पूर्वक, मिठास पूर्वक और मर्यादा पूर्वक होनी चाहिए।
प्रश्न उठता है कि आदर किसको कहा जाता है और कैसे किया जाता है? जब हम बड़ों से मिलते हैं तो सबसे पहले उनका अभिवादन करें। अभिवादन करने का मतलब क्या है? जब बड़े आते हैं तो उठकर खड़े होना। लौकिक में तो उठकर प्रणाम करते हैं, यहाँ अलौकिक में ओम् शान्ति करना चाहिए। अगर हम जा रहे हैं, हमारे सामने कोई बड़े आये तो उनको मुख से ओम् शान्ति नहीं कह सके तो मुस्कराकर, नज़र से भी ओम् शान्ति कह सकते हैं। उनको देखकर ऐसे ही निकल पड़ते तो यह तो उनका अपमान हुआ, डिसरिगार्ड हुआ। उनको ओम् शान्ति करना या उनको सिर झुकाकर सम्मान देना ही अभिवादन करना है। कई बार हम बड़ों से नाराज होकर रास्ता काटकर भी चले जाते हैं। यह सबसे बड़ी ग़लत बात है। जब भी बड़े सामने आते हैं, मुस्कराकर, सम्मान पूर्वक दृष्टि से हम उनका अभिवादन करें। यह हमारे जीवन में एक धारणा होनी चहिए। आपने देखा होगा कि लौकिक में कोई बड़ों से मिलते हैं तो चरण वन्दन करते हैं, हाथ जोड़ते हैं, प्रणाम कहते हैं। ठीक है, उनका अपना तरीका है। हमें तो बाबा ने बताया है कि योगी लोग जो हैं वे नयनों से मुलाक़ात करते हैं। हम तो ओम् शान्ति कहते हैं, गुड मार्निंग कहते हैं। हमारी अपनी पद्धति तो है ना! सबसे पहली बात है बड़ों का अभिवादन करना। उनके साथ हम जो वाणी बोलेंगे वह आदर सूचक शब्दों से हो। जब हम अपने हमशरीक में बोलते है तो वे शब्द भी आदर सूचक होने चाहिए। छोटों से भी हमारे शब्द आदर सूचक होने चाहिएं। अगर बचपन से ही आपकी भाषा, आपके शब्द ऐसे हैं तो अब उनको बदल दो। क्योंकि बाबा कहते हैं कि लौकिक भाषा नहीं बोलो, अलौकिक, ब्राह्मण भाषा बोलो जिसमें सबके प्रति सम्मान सूचक शब्द होते हैं। यहाँ का हमारा शब्दकोष अपना है। अगर छोटों से वार्तालाप करते है अथवा उनका नाम भी लेते हैं तो वह सम्मान पूर्वक हो। एक बच्चे से किसी ने उसके बाप का नाम पूछा। उस बच्चे ने बोला कि मेरे बाप का नाम "मनोहर लाल" है। पूछने वाला अवश्य समझेगा कि इस बच्चे की शिक्षा कम है या यह अच्छे कुल का नहीं है। क्योंकि लौकिक में भी कहावत है कि 'बोल उसका कुल बताता है' अथवा 'वाणी उसकी जाति बताती है'। अगर वह बच्चा कहता है कि मेरे पिता जी का नाम 'श्री मनोहर लाल' अथवा 'लाला मनोहर जी' है। ऐसा कोई विशेषण जोड़कर बोलता है तो सामने वाला समझता है कि इस बच्चे को अच्छी शिक्षा मिली है अथवा यह बच्चा अच्छे संस्कार वाला है, अच्छी संस्कृति वाले घर का है।
एक-दूसरे को सम्मान देना- यह सतयुगी सभ्यता है। उससे पहले, ब्राह्मणों की सभ्यता है कि किसी से भी बात करें तो सम्मानजनक शब्दों से, सभ्यतापूर्ण व्यवहार से बात करें। समझ लीजिये, आपके घर पर अतिथि आया। आप उसको बैठने के लिए कहते हैं। कोई कहता है, आओ, बैठो, यहां बैठो। दूसरा अपने मेहमान को कहता है, आइये, बैठिये, यहाँ बैठिये। बैठो शब्द से बैठिये शब्द अच्छा है। 'बैठो' शब्द एक आज्ञावाचक शब्द है, 'बैठिये' यह सम्मानवाचक शब्द है। अर्थ तो दोनों का एक ही है, उद्देश्य भी एक ही है लेकिन कहने का और समझने का भाव बदल जाता है। एक कटुता दिखाता है, दूसरा मधुरता दिखाता है, एक आज्ञा दिखाता है, दूसरा नम्रता और बिनती दिखाता है। मुझे याद है, एक बार मैं दूसरे प्रान्त में गया था। उन्होंने अपनी शिष्ट भाषा में बहुत शिष्टाचार पर्वक कहा कि यह ले लिया जाये। पंजाब वाले कहेंगे 'यह ले लो जी, यह ले लो। यह भी कोई कह सकता है कि 'ले लीजिये यह भी कोई कह सकता है कि 'हम आपको यह दे रहे हैं। कहने के लिए कई बातें हैं लेकिन उसने कहा, 'यह ले लिया जाये'। जैसे वह विनती कर रहा है। यह तरीका है। हमारी भाषा मंजूल हो, शिष्ट हो, मर्यादापूर्वक हो और उसमें दिव्यता हो।
पहले-पहले मैं इस यज्ञ में बृजकोठी में आया था। वहाँ बोर्ड पर एव आदेश लिखा रहता था। उस आदेश को ऐसा लिखा हुआ था कि 'होवनहार देवताओं के प्रति'। देखिये, वह आदेश भी इतने मधुर शब्दों में होता था कि उसे पढ़कर मन खुश होता था। उसमें आदेश भी दिया जा रहा है लेकिन कितने आदर सूचक शब्दों में, 'होवनहार देवताओं के प्रति' ! सबको देवता समझकर उनको आदरपूर्वक आदेश दे रहे हैं। वह आज्ञा, आज्ञा नहीं लगतो थी, सम्मान पूर्वक दी जानी वाली बात लगती थी। सबका मन करता था कि हमें इसका पालन करना है। अगर उसी बात को सीधा कह दो, जैसे आज्ञा दी जाती है, तो पढ़ने वाला सीधा कह देगा, मैं नहीं करूंगा, तुमको जो करना है, कर लो। हमने खुद ही उस व्यक्ति को भड़का दिया अपने कटु शब्दों से। इसलिए सबके प्रति हमारे शब्द आदर सूचक होने चाहिएँ।
इससे ज्यादा, बड़ों के प्रति मन में विशेष आदर हो। मन में कैसे आदर हो? मन में आदर होगा तब ही वह शब्दों से, कर्म से प्रकट होगा ना? कर्मों से कैसे प्रकट होगा? समझिये, मुरली पूरी हो गयी, दादी जी अभी उठी नहीं, उनसे पहले ही हम उठकर चलना शुरू कर देते हैं। इसको संसार में बहुत बुरा माना जाता है। अगर कोई सभ्य आदमी देखेगा तो वह आश्चर्य खायेगा ! संस्था की प्रमुख अभी उठी ही नहीं हैं, उससे पहले सभा में बैठे लोग उठकर जा रहे हैं! लौकिक में जब तक राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री सभा से उठकर न चला जाये अथवा जब तक सभापति उठकर न चला जाये, उससे पहले कोई उठेगा नहीं। शिष्ट सभा का यह नियम होता है कि सभाजन बैठे रहते हैं। किसी-किसी की ड्यूटी है, सेवा पर जाना अनिवार्य है, उनको अनुमति दी हुई है। जैसे मधुबन के भाई-बहने हैं जिनको आप लोगों के लिए नाश्ता खिलाने की तैयारी करनी होती है. आठ बजे मजदूर आते है उनकी हाजिरी लेनी होती है. काम देना होता है। लेकिन कई लोग ऐसे होते है उनको कोई ऐसा काम नहीं होता. फिर भी उठकर चले जाते हैं। यह अच्छा नहीं है। बड़ों को आदर देने के लिए यह हमारा कर्तव्य है कि उनके उठने तक हम वहां बैठे रहे।
कई बार ऐसा भी होता है कि बड़े हमारे से बात कर रहे हैं खड़े होकर लेकिन हम बैठे हुए हैं, बैठे-बैठे उनसे बात कर रहे हैं। यह सभ्यता नहीं है। अगर बड़े खड़े हैं, आप उठकर उनको स्थान दीजिये या और एक आसन ले आकर उनको बिठाइये या आप ही खड़े हो जाइये। अगर आप कहते हैं कि बड़ों के प्रति हमारे मन में आदर है तो वह कर्म में प्रकट होना चहिए ना ! जब हम समझ रहे हैं कि वे हमसे बड़े हैं, तो हमें उनके प्रति क्या सत्कारः करना चाहिए? कई बार बड़ों को जल्दी जाना होता है, आगे निकलना होता है लेकिन कई लोग ऐसे होते हैं कि उनको जाने के लिए रास्ता ही नहीं छोड़ते, खड़े होकर देखते रहते हैं। बड़ों को रास्ता देना, स्थान देना, उनके सामने खड़े हो जाना ये भी उनका आदर करना है। अगर बड़े जा रहे हैं. उस समय उनके अति नज़दीक हम भी चल रहे हैं लेकिन उनके कंधे के साथ हमारा कंधा लग रहा है, तो यह भी उनके प्रति सम्मान नहीं है। हमें बड़ों से थोड़ी दूरी से चलना चाहिए। ये छोटी-छोटी बातें है फिर भी किसी व्यक्ति की पहचान के लिए सूक्ष्म संकेत हैं। जब बड़े बात कर रहे हैं, बीच में हम जाकर बात काट देते हैं अथवा वे हमें कुछ बता रहे हैं, समझा रहे हैं तो उसको पूरी सुनने की बजाय पहले ही उनकी बात काटकर, बोलना शुरू करते हैं कि मेरा कहने का भाव ऐसा नहीं था, ऐसा था। बड़ों की बात बीच में नहीं काटनी चाहिए। इस बात को लौकिक स्कूल में भी बचपन से सिखाया जाता है। हमारे यहां तो यह विशेष होना चाहिए। सिर्फ बड़ों की बात नहीं अगर आपसे कोई छोटा भी कुछ कह रहा है. उसको पुरी बात सुनाने दिजिए उसके बाद आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिये, न कि आधे में ही उसकी बात काट कर अपनी बात सुनाना शुरू करे। आदर का मतलब वह भी होता है कि बोलने की मर्यादा का भी पालन करें।
कई बार ऐसा होता है कि जो हमारी बात मानते है. उनको ही बडा समझकर उनको ही हम सम्मान देते हैं और उनकी बात ही मानते हैं। हमे जो शिक्षा देने आते हैं उनकी बात नहीं सुनते, उनके बुलाने पर नहीं जाते-यह भी आदर नहीं हुआ। जो आपको शिक्षा देते हैं, किसलिए देते हैं? आपकी उन्नति के लिए, आपकी मदद करने के लिए तो देते हैं ना ! आपके प्रति उनका प्यार है, इसलिए तो अपनी शिक्षा से आपका भला करने जा रहे हैं। अगर बुलाने पर भी उनकी बात मान कर उनके पास नहीं जायेंगे, यह भी बड़ों का अनादर हुआ, अशिष्ट व्यवहार हुआ। आप किसी को आदर तब ही देते हैं, बड़ा तब ही मानते हैं जब आप उनको अपने से अच्छा, श्रेष्ठ और अनुभवी समझते हैं और अनुभव करते हैं कि वे मुझे बहुत प्यार करते हैं। जो व्यक्ति जिससे प्यार करता है, वह उस व्यक्ति का कभी बुरा नहीं कर सकता। शिक्षा भी इसीलिए देता है कि आपका अच्छा हो। आपकी अच्छाई के लिए वह मदद करना चाहता है। जब वे हमारे से बड़े हैं, हमारे से आगे हैं, हमें प्यार करते है तो आपको यह नहीं लगता कि वे जो भी करेंगे हमारा कल्याण ही करेंगे? बड़ों की बात नहीं मानना, नहीं सुनना यह भी अनादर ही हुआ ना बड़ों के प्रति? जैसे काम, क्रोध आदि नरक के द्वार कहते हैं, ऐसे बड़ों की बात टालना या उल्लंघन करना या उनका अपमान करना ये भी अवनति के महाद्वार है। क्यों? क्योंकि आज एक बात टाल दी, कल दूसरी बात। यह आदत पड़ जायेगी बड़ों की बातों का उल्लंघन करने की। आगे जाकर जब यह सस्कार बन जायेगा तब आप अवनति के दलदल में फंसे रहेंगे उस समय आपको कोई मदद नहीं कर सकता, पश्चाताप करते रहना ही पड़ेगा क्योंकि बड़ों की निगाह से गिर जायेंगे। बड़ों की निगाह से गिर जाना माना बाबा के दिलतख्तनशीन नहीं रहेगे। बाबा के दिल में नहीं रहेंगे तो बाकी क्या रहा हमारे इस जीवन का ! हम ब्राह्मण बने, योगी बने फिर भी बाबा को सन्तुष्ट न कर सके तो क्या किया? बाबा को सन्तुष्ट करना माना क्या? बाबा ने जिनको निमित्त बनाया है, उनके आदेशों का पालन करना। अगर आप समझते हैं, बड़ों की बात में कमी है, न्याय नहीं है तो आप अपनी बात उनके सामने रखिये। फिर भी उनका निर्णय वही है तो आप स्वीकार कीजिये क्योंकि बहुतों की भलाई के लिए, यज्ञ की अच्छाई के लिए वह निर्णय ठीक है। आपके त्याग से बहुतों का अच्छा हो रहा है। वैसे तो सच, सच ही है, वह कभी छिप नहीं सकता। आज नहीं तो कल, उसकी प्रत्यक्षता हो जायेगी तब नाम आपका ही बाला होगा। आप कहेंगे कि सत्य की प्रत्यक्षता होने तक हमारा क्या हाल होगा? अगर हमारे एक नुकसान से, हमारे एक त्याग से बहुतों का भला होता है और यज्ञ का हित होता है तो इससे बड़ी सेवा और कौन-सी है? हमारा अपना है ही क्या? जो भी है यज्ञ का है ना. बाबा का है ना? यज्ञ का भला ही मेरा भला है। इसलिए बड़ों की आज्ञा का पालन करना ही मानसिक रूप से उनका आदर करना है।
कभी ऐसा भी होता है कि आपको लग रहा है कि बड़ों का मेरे प्रति कहना उचित नहीं है, फिर भी आप उस समय उस बात को मान लीजिये और समय आने पर युक्ति से उस बात को बड़ों के सामने रखिये। बाबा ने कहा है कि युक्ति से मुक्ति मिलती है। युक्ति क्या है? कई लोग समझते हैं कि युक्ति माना चालाकी। नहीं, चालाकी नहीं। जैसा योग है, वैसे ही युक्ति है। जैसे योग से मुक्ति मिलती है, वैसे युक्ति से भी मुक्ति मिलती है। बाबा कहते है योगयुक्त, युक्तियुक्त और राजयुक्त। किसी भी बात को समय, स्थान,व्यक्ति और व्यक्ति की अवस्था देखकर बोलने से सही फल मिलता है। बात तत्काल और तत्क्षण नहीं कहनी होती। उस समय आज्ञा का पालन करना पड़ता है। बाद में उचित समय पर, उचित स्थान पर, उचित अवस्था में, उचित व्यक्ति के सामने, उचित शब्दों में फिर वह बात की जाती है। अगर आपको लगता है कि बड़ों की बात बिलकुल ठीक नहीं है, मर्यादा के विरुद्ध है तो आप विनम्रतापूर्वक अपने विचारों को उनके सामने रखकर उनकी बात का निराकरण कर सकते हैं। यह जो औचित्य है इसी को युक्तियुक्त कहते हैं, मर्यादायुक्त कहते हैं। यही मेरी कुछ बातें हैं कि छोटों को बड़ों के प्रति कैसे व्यवहार करना चाहिए।
शिव बाबा के गोल्डन वर्शन्स है ना, जो डायरेक्ट महावाक्य उच्चारण करते हैं- मामेकम्। और कोई नहीं कहेंगे कि मुझे याद करो। मनुष्य कहेंगे, उनको (परमात्मा को) याद करो। बाबा तो डायरेक्ट सिखाते हैं, मुझे याद करो। उनकी बातों में तो सोना है जिनसे हम भी सोना अथवा पत्थर से पारस बन जाते हैं।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
दिव्य जीवन का आधार -ईश्वरीय व्यवहार
'नित्य याद करो बाबा को और दिव्य बनाओ जीवन को यह गीत कितना अच्छा है। हमें अपने में जांच करनी चाहिए कि इन दो बातो को हम कहाँ तक कर पाये हैं। अभी तक योग की जो हमारी स्टेज है उसमें कितना ऊपर-नीचे होता है भाई-बहने कुछ समय निकाल कर विशेष योग में देते हैं। योग में हमें आत्म-अभिमानी होकर, देह से परे होकर बैठना पडता है। जब ट्राफिक कण्ट्रोल का गीत बजता है और पूरा होता है तब तक कई भाई-बहनें आत्म-अभिमानी स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते। दिन भर में, शुरू से लेकर रात्रि तक हमारी सारी दिनचर्या देखें कि योग में हमारी जो स्थिति होती है, वह स्थिति योग के बाद भी ऐसी ही रहती है या नीचे उतर जाती है? थोड़ा उतरती है या बहुत? जब योग में बैठते हैं, आनन्द आता है, रस आता है, खुशी होती है- एक यह स्टेज है, और एक यह स्टेज है कि बुद्धि एकदम लौकिक देह और देह की दुनिया में रहती है। यह तो बिल्कुल नीचे की स्टेज है। बाबा कहते हैं कि जैसे मैं ऊपर से नीचे आता हूं, वैसे आप भी ऊपर से नीचे आते हो इस देह में पार्ट बजाने के लिए। जैसे मैं ब्रह्मा के शरीर का आधार लेता हूं, वैसे आप भी कर्मेन्द्रियों का आधार लेकर कर्म करते हो। यह शरीर भी आपका नहीं है, मेरे से लोन पर (उधार) मिला हुआ है। मैंने भी ब्रह्मा के शरीर को उधार पर लिया हुआ है। जब हमने अपना शरीर बाबा को दे दिया, फिर भी हम उसे यूज कर रहे हैं। यह एक प्रकार से बाबा से लोन (उधार) पर लेना हुआ। हम भी ऐसा अभ्यास करें और हमारी भी ऐसी स्थिति हो कि हम बाबा के पास बैठे रहे और अपना कार्य करके वापिस चले जायें। यह स्टेज हमारी कहाँ तक बन पा रही है, उसके कितने नजदीक है, कितने दूर हैं?
शरू से लेकर बाबा ने यह कहा हुआ है कि यह रेस है जैसे घुड़दौड़ की रेस होती है। आप आत्माओं में भी यह रेस है. इसमें कोई आगे चल जाते कोई पीछे रह जाते है। बाबा ने यह भी कहा हआ है कि जो पीछे आते वे भी तीव्र पुरुषार्थ कर आगे जा सकते हैं। जैसे घडदौड़ में कुछ घोड़े पीछे होते हैं. वे अचानक इतना तेज दौडने लगते हैं कि अपने से आगे वाले से भी आगे चले जाते हैं। यह होता है. सम्भव है। ज्ञान में भी ऐसा देखा गया है लेकिन कितने आगे दौड़ेंगे? अगर घोड़ा हमसे बहुत ही आगे है, उसने हमारे से दो चक्र ज़्यादा ही लगा दिये हैं तो पहले उन दो चक्रों को पूरा करो, फिर उससे आगे बढ़ो, यह बहुत कठिन है। अगर थोड़ा-सा आपसे आगे हैं तो आप भी आगे जा सकते हैं, संभावना है। कभी-कभी हम यह भूल जाते हैं कि यह रेस है और बीच-बीच में रुकावटें आती हैं, कभी गिर भी जाते हैं। हमको पुरुषार्थ करना है, दूसरों को नहीं देखना है। हमेशा ये बातें याद रखनी चाहिए।
हम सभी यहाँ इसी ख्याल से आये हैं कि हम योगी बनेंगे, पवित्र बनेंगे। जब हम आये और बाबा-मम्मा को देखा, उनकी बातें सुनी, बड़ी बहनों को भी देखा तो लगा कि जीवन है तो यही है। हमको ऐसा बनना है, हमको और कुछ नहीं चाहिए। देख लिया है दुनिया को। लेकिन जब आये और ज्ञान में चलने लगे तो आप देखते हैं कि क्या हुआ? योग और ध्यान तो एक तरफ़ रहा और हम किसी और तरफ़ भटक गये। दूसरी तरफ चले गये, गुमराह हो गये। रास्ता ही ग़लत ले लिया। यहाँ ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले हम योगी हैं (First and foremost we are yogis) । हमारी पहली बात यह होनी चाहिए। अगर हमारा योग ठीक नहीं है तो कुछ भी ठीक नहीं है। हमारा जीवन व्यर्थ हो गया। बाबा का बनके, ज्ञान लेके, त्याग करके क्या किया? अरे, बहुत पछताने की बात होगी। बाद में खून के आंसू बहाने की बात होगी। हृदय फटेगा कि बाबा हमें बहुत बोलते रहे, बार-बार बोलते रहे। अव्यक्त वाणियों में हमें सावधानी देते रहे। बहुत प्यार से, दुलार से और तरीके से शिक्षा देते रहे। साल का, छह महीने का होम वर्क (Home work; गृहकार्य) देते रहे कि बच्चे, ऐसे बनो, बच्चे यह करो, बच्चे इस दफ़ा यह करो। किसी भी तरह से बच्चे आगे बढ़े, कोई बात तो करें। इतना बड़ा टीचर, इतनी बड़ी अथारिटी !
एक रस्म हो गयी जाकर बाबा के सामने बैठने की। जैसे कि सब लोग बैठ जाते हैं पाँच हज़ार, दस हजार, पन्द्रह हजार। हर कोई कोशिश करता है कि आगे-आगे बैठें। बाबा के सामने आगे बैठो लेकिन बाबा की दृष्टि में, बाबा के मन में आप आगे-आगे हो? यह नहीं देखते। हमारी धारणा, हमारी स्थिति, हमारा योग का चार्ट ऐसा है? पिछली बार बाबा ने करने के लिए जो बताया था, हमने किया? हमने कुछ नहीं किया। अब कैसे जाय उनके सामने ? कई दफ़ा लौकिक में ऐसा होता है कि कोई कहता है कि चलो, फलाने से मिलने। दूसरा कहता है कि नहीं भाई, मैं नहीं चलूंगा। क्यों? वह कहता है कि कई दफ़ा उसने यह करने के लिए कहा है, मैंने तो किया नहीं, अब उसके सामने जाऊँ तो कैसे जाऊँ? ऐसे कहते हैं। होता ही ऐसे है।
समाज में यह बड़े आश्चर्य की बात देखने में आती है कि बहुत-से लोग अपने आपको बड़ा समझदार समझते हैं। इसका क्या इलाज किया जाये? वह अपने को बहुत समझदार समझता है लेकिन होता कुछ है नहीं। इसके लिए क्या किया जाये? ऐसे समझदार को समझाना बड़ा मुश्किल है। अगर कोई व्यक्ति कहता है कि मै यह नहीं समझता, आप मुझे समझाओ, तो आप उसको समझा देंगे लेकिन आप समझा रहे हैं और वह कहता है कि मैं जानता हूँ, मुझे मालूम है, तो आप क्या करेंगे? वह अपनी प्रेस्टीज (Prestige, प्रतिष्ठा) बनाये रखने के लिए ऐसा कहता है। न समझते हुए - यह एक भी ऐसा कहता है ताकि ये लोग मुझे ऐसा न समझे कि मै नहीं जानता। कुछ नहीं समझते हुए भी अपने को बहुत समझदार समझकर बैठना-बड़ी समस्या है। इसीलिए आप देखेंगे कि कोई भी समाज में या संस्था में आगे चलकर एक विघ्न आता है कि उनका जो मुखिया रहता है, बड़े-बड़े कर्णधार होते हैं, काम करने वाले जो जिम्मेदार व्यक्ति है जिनके नाम गणमान्य व्यक्तियों की लिस्ट में होते हैं, उनको समझाना मुश्किल है। वे सब यह सोचकर बैठे हैं कि हम सब समझते हैं, हमें क्या समझना है? कोई भी सभा हो, उसमें वे नहीं आयेंगे। क्योंकि वे अपने आपको बहुत समझदार और बड़े समझते हैं। ऐसे हमारे में भी हैं, वे क्लास में नहीं आयेंगे, योग में नहीं आयेंगे। बाबा कहते हैं, सदा अपने को पहले एक विद्यार्थी समझो क्योंकि ईश्वरीय विद्यार्थी जीवन सर्वश्रेष्ठ जीवन है (Godly student life is the best life)। हरेक का ज्ञान सुनाने का तरीका अलग होता है। जब मुरली पढ़ते हैं, हरेक के पढ़ने में एक विशेषता है। हम सुन लें, क्या हर्ज है ! कुछ लोग समझते हैं कि नयी बहन सुना रही है, छोटी बहन सुना रही है, हम क्यों सुनें? हमने तो पढ़ ली है या बाद में पढ़ लेंगे। ऐसे लोगों का क्या करें? हम यहां सीखने आये हैं। हरेक में कुछ न कुछ अच्छाई होती है, उसको हमें सीखना है। यह अहंकार एक संस्था या संगठन में रहने वालों के लिए अच्छा नहीं हैं। संगठन में रहने वालों में नम्रता रहनी चाहिए और यह भाव बना रहना चाहिए कि हम यहां सीखने आये हैं। तो फिर बहुत आगे बढ़ेंगे, तरक्की करेंगे। ऐसे स्थान का वायुमंडल बहुत महान् होता है।
इस प्रसंग में मुझे एक कहानी याद आती है। एक स्कूल था। आपको पता है, स्कूल में हरेक क्लास के लिए एक-एक क्लास टीचर और एक मोनिटर (monitor, छात्रनायक) होता है। स्कूल में बच्चों को छुट्टी लेने के लिए अजों डालनी पड़ती है कि मुझे यह बीमारी है, मुझे यह तकलीफ़ है। एक बार क्लास टीचर ने अपने क्लास के बच्चों की अर्जियाँ क्लास के मोनिटर को देकर कहा कि उनको हेडमास्टर को दे आओ। वह लड़का हेडमास्टर के पास गया और उनको दे दिया। हेडमास्टर उन्हें देखता रहा। वहुत समय तक यह बच्चा (मोनिटर) खड़ा रहा। खरे-खड़े वह यक गया तो मेज का थोडासा सहारा लिया। यह देखकर हेडमास्टर ने उसको जोर से थप्पड़ मारा और गाली भी दी कि उल्लू के पट्ठे। बच्चे को बहुत दुःख हुआ। दर्द के कारण उसको रोना भी आया। वह सोचने लगा कि वे अर्जियां तो दुसरों की है. उन्होंने सच लिखा है या झूठ लिखा है वे जाने। इसमें मेरा क्या कसूर है कि हेडमास्टर ने मुझे थप्पड़ मारा और गाली भी दी। वह बच्चा रोते-रोते क्लास में आया. अपने क्लास टीचर को सारी बाते बतायी। फिर घर आने के बाद बाप के सामने रोने लगा और सारी बातें सुनायी कि हेडमास्टर ने आपके नाम से गाली दी। पिता को भी बहुत बुरा लगा कि स्कूलों में हेडमास्टर ही ऐसे गाली देते रहेंगे तो बच्चे उनसे क्या सीखेंगे? गाली देना ही सीखेंगे ना । अगले दिन वो बच्चे को लेकर स्कूल गया। स्कूल में हेडमास्टर से उन्होंने कहा, आपसे थोड़ी बात करनी है। उन्होंने कहा, क्यों नहीं, आइये। पिता ने हेडमास्टर से पूछा, क्या आपने मेरे नाम से गाली दी? हेडमास्टर ने तुरन्त बोल दिया कि किस उल्लू के पट्टे ने आपको कहा? उस व्यक्ति ने समझ लिया कि इसने यही गाली दी है। जहाँ पर बड़ा व्यक्ति ऐसे बोलता हो, वहाँ छोटे क्या सीखेंगे? किसी भी परिवार या संगठन या संस्था में रहने वाला बड़ा हो या छोटा भी हो, उसे बहुत नम्रता और शालीनता के साथ दूसरों से व्यवहार करना चाहिए। अगर वह दूसरों के साथ गुस्से से बात करता हो या सामने वाले व्यक्ति के साथ ऐसे व्यवहार करता हो जैसे उसको उसने खरीदा हुआ हो, तो यह कितनी खराब बात है। इसलिए बाबा कहते हैं कि कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो।
प्रेक्टिकल हमारी धारणाओ से ही लोग प्रभावित होकर संस्था की तरफ आते हैं। नया व्यक्ति आता है और वह सामने वाले से पूछता है कि फलाना (Department: विभाग) कहां है? उसका उत्तर दिया जाता है. मुझे क्या पता? उसको पता है. फिर भी सही जवाब नहीं देता। उससे बोलता है कि मझे क्या पता दुसरे देशों में जाओ और वहां के लोगों से मिलो तो पता पड़ता है. वे कैसे व्यवहार करते है। जब में पहली बार न्यूयार्क में गया तो मेरे साथ शील दादी और दूसरे कई थे। एक जगह पर पहुंचे। हम नक्शा खोलकर देख रहे थे कि हम कहाँ तक पहुंचे है और किधर जाना है। उतने में एक अमेरिकन वहां से गुजरा। उसने हमें देखा समझा कि ये दूसरे देश से आ रहे हैं, नक्शा खोलकर देख रहे हैं, इनको कुछ पता करना है। वह हमारे पास आया और पूछा, May I help you? आपकी क्या मदद करूं?) उसने ऐसा नहीं सोचा कि मैं क्यों इनको बताऊं। फालतु अपना समय क्यों बर्बाद करूं? जब इन्होंने मेरे से पूछा ही नहीं है तो मैं काहे को इनको बताने जाऊँ? लेकिन उसने सोचा, ये हमारे देश में आये हैं और इस वक्त इनको हमारी मदद की ज़रूरत है। इसी का नाम इन्सानियत है। दूसरे व्यक्ति को हमारी मदद की जरूरत है तो हम उसकी मदद करने में लग जाते हैं- यह है सभ्यता। देवता बनेंगे, जब बनेंगे तब बनेंगे। उससे पहले इन्सान तो बनो। अपने में इन्सानियत को धारण करो। बहुतों में इन्सानियत है, बहुतों में देवताई गुण हैं। मैंने कइयों में देखा है, अनुभव किया है कि उनमें इन्सानियत नामक चीज़ ही नहीं है। यह कितनी खराब बात है। योग सीखने हम आये थे, योग करने हम आये थे, देवी-देवता बनने हम आये थे। कहां चले? रास्ता कौन-सा ले लिया? गलत रास्ता ले लिया। उसका नतीजा यह हो गया कि सीधे रास्ते से गये ही नहीं, उल्टे रास्ते चले गये। अब हमें कितना समय लगेगा? पहले सारे गलत रास्ते से वापिस लौटें, फिर उसके बाद अच्छे रास्ते पर जायें। हमारा तो कार्य बढ़ गया। मेहनत बढ़ गयी। ये कितनी गलती हम करते हैं! यह पर्सनल जीवन की बात है।
मधुबनवासी तो बहुत बहुत विशेष है। कई अव्यक्त वाणियों में बाबा के उनसे बहुत बातें कही हुई हैं। मधुबन निवासियों के लिए बाबा का बहुत प्यार, रिगार्ड है! यह मधुबन शिव बाबा द्वारा स्थापित महायज्ञ है। उसकी संभाल करने की जिम्मेवारी हम सबकी है। अगर लौकिक में भी कोई यज्ञ रचते हैं, जैसे रुद्र यज्ञ है, शान्ति यज्ञ है तो उसमें आहुति देते हैं। कई सौ लोगों का इकट्ठा यज्ञ होता है, तो वे इकट्ठे आहुति देते हैं। उनका हवन कुंड भी बहुत बड़ा होता है। यज्ञों के जो बड़े होते हैं. मुख्य ब्राह्मण या पंडित होते है उनके बड़े नियम होते हैं। क्या करना है, कैसे करना है ये सब विधियां होती हैं, उन सबको निभाने पड़ते हैं। पहले के दिनों में तिलक लगाया जाता था लेकिन हमेशा नहीं, कभी-कभी। कोई यज्ञ हवन आदि रचते थे, कोई व्रत-नियम लेते थे तब। आजकल तो लोग जब चाहे तब, जो चाहे वो तिलक लगा देते हैं। पहले चन्दन का या सिंदूर का ही तिलक लगाते थे। आजकल तो बाज़ार में चमकीली रंग-बिरंगी चिन्दी आ गयी है. उनको सब लगाते रहते हैं। हरी साड़ी है तो हरी चिन्दी और काली साड़ी है तो काली चिन्दी लगाते हैं। पहले जमाने में काली साडी, काले कपडे पहनना और काली चिन्दी लगाना समाज में अशुभ माना जाता था। हमने देखा है. हरेक स्थान पर चाहे वह सामाजिक हो या धार्मिक हो, धीरे-धीरे चलकर तिलक लगाना, उसने एक रस्म का रूप ले लिया। उसका जो असली सार है. उससे हमें जो ग्रहण करना चाहिए, उसको छोड़ देते हैं, भूल जाते हैं। मै कह रहा था यज्ञ के बारे में। बाबा का यह महायज्ञ सारे विश्व को शान्ति देने वाला है। स्वयं रुद्र का रचा हुआ है। ऐसे यज्ञ का जो मूल कुण्ड है, स्थान है, उसके हम ब्राह्मण है। इस महायज्ञ में रहने वाले सब ब्राह्मण अपना सब-कुछ स्वाहा किये हुए हैं। उनका अपना कुछ भी नहीं है। यज्ञ में भी यही कहते हैं कि यह अग्नि के लिए है, मेरा नहीं है; यह जल के लिए है, मेरा नहीं है इत्यादि। वैसे हमारा भी कुछ नहीं है, जो कुल भी है वह बाबा का है। यह भावना हमारी रहे कि हम वे बाह्मण है जो हथियाला बाँधे हुए तिलक लगाये हुए हैं, तो हमारी स्मृति में रहेगा कि हमारा क्या कर्त्तव्य है।
सारे विश्व को हमें बाबा का सन्देश देना है। इसलिए हरेक को यह याद रहना चाहिए कि मुझे भी इस ईश्वरीय सेवा की जिम्मेवारी लेनी है। अपने आपको देखना चाहिए कि मेरे में क्या विशेषता और योग्यता है जिससे कि मैं अधिक से अधिक सेवा कर सकता हूँ। हम शुरू से जो कर रहे हैं वहां करते रहें, जहाँ बैठे हैं वहीं बैठे रहे इसका अर्थ है हमारे जीवन में प्रगति नहीं है। इसी का नाम सन्तुष्टता नहीं है। यह तो अपने आपको तसल्ली देना है कि जो है वो ठीक है, जितना है उतना ठीक है। कोई कहता है कि काहे को झंझट में पड़ना, मुझे जितना मिला है, उतना करते चलें।
एक आदमी आम बेचता था ठेला लेकर। बेचता रहा, बेचता रहा वर्षों तक। किसी ने कहा, भाई इतने वर्षों से तुमको देख रहा हूँ, ठेले में ही आम बेच रहे हो। आगे और काम नहीं करने का है क्या? वह कहता है, और क्या काम करूं? मैं तो यही काम जानता हूं। उसने कहा, ठीक है, तुम यही काम करो लेकिन इसी काम में आगे तो बढ़ो। वह पूछता है, क्या आगे बढ़ूं ? उसने कहा, पैसे इकट्ठा करके अपने व्यापार को बढ़ाओ। इससे तेरे नीचे कई लोग काम करेंगे, जगह-जगह पर तुम्हारी दुकानें होंगी। तुम एक बड़े व्यापारी हो जाओगे। यह ठेला लेके ऐसे ही घूमता रहेगा क्या गली-गली में सारी उम्र? वो कहता है, ठीक है, मेरे आदमी हो जायेंगे, दुकानें हो जायेंगी, पैसा होगा फिर और क्या होगा? उसने कहा, तुम बड़ा बनेगा, सेठ कहलायेगा? उसने कहा, फिर क्या होगा? वैसे पूछता गया। आख़िर उसने बोला, तुम सुख से रहोगे? तब ठेले वाले ने कहा, अरे भैया, सुख से मैं अभी भी रहता हूँ। उसी सुख के लिए इतने सारे झंझट में क्यों पड़ना है? फिर व्यापार बढ़ गया तो फुर्सत कहाँ मिलेगी? अभी इस ठेले से ही में सुखी हूं, मैं जहाँ खड़ा हूं वहीं ठीक हूँ।
बड़ा होने के लिए कुछ करना पड़ता है। हरेक में कई विशेषतायें हैं। वह पक्की बात है। में देखता हूँ, हरेक में विशेषतायें हैं, लेकिन हम उनको ठीक ढंग से प्रयोग में नहीं ला रहे हैं। बाबा का हरेक बच्चा बहुत बुद्धिशाली है, प्रतिभाशाली है। हम अपनी योग्यता से कुछ-न-कुछ सेवा करें। यह ख्याल रखें कि अपनी प्रतिभा को किसी-न-किसी सेवा में प्रयोग करते चलें। बाबा ने कहा है कि रोल (role; पार्ट) और गोल (goal; लक्ष्य) को याद रखो। गोल तो सबका एक ही है, देवी या देवता बनने का लेकिन रोल हरेक का अलग-अलग है। अभी का रोल तो ठीक है लेकिन आगे का तो सोचो। जीवन में कुछ एम (aim: उद्देश्य) तो होना चाहिए कुछ करने का।
बुद्धि में एक परमात्मा की ही याद रहनी चाहिए, दूसरे कोई को याद करने की दरकार नहीं है। उनका फ़रमान है कि मैं ही सर्व सम्बन्धों का तुम्हें साथ देता हैं।
वह है सर्वशक्तिमान इसलिए और किसी की याद की आवश्यकता ही नहीं रहती है। मनुष्य-आत्माओं की याद में तो ऐसे नहीं हो सकता।
परमात्मा तो सर्वसमर्थ है, फिर और किसी की याद का सहारा तेरे की आवश्यकता नहीं है।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
हमारे पुरुषार्थ का लक्ष्य क्या है?
हमारे पुरुषार्थ में सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण चीज़ है, हमारी वृत्ति। बाबा कहते हैं कि आपका है प्रवृत्तिमार्ग। द्वापर से अब तक हमारी जो प्रवृत्ति चली आयी है, वो अशुद्ध थी। सतयुग में जो प्रवृत्ति होगी, वह शुद्ध होगी। वह दैवी प्रवृत्ति होगी। कलियुग में हमारी प्रवृत्ति आसुरी बन गयी थी। इसलिए अभी सारा परिवर्तन वृत्ति का होना है। सतयुग तभी आयेगा, जब हमारी वृत्ति बदलेगी अर्थात् हमारी वृत्ति सतोप्रधान बनेगी। द्वापर तभी आया जब हमारी वृत्ति रजोगुणी बनी। इसका मतलब यह हुआ कि अब जो हमारा पुरुषार्थ है, मुख्य रूप से, वृत्ति परिवर्तन का है। इसको हम कहते हैं स्वपरिवर्तन (Self Transformation) ।
हमें जीवन में परिवर्तन लाना है। हमें कैसे मालूम पड़ेगा कि हमारे में परिवर्तन हुआ है या नहीं? हो रहा है या नहीं हो रहा है? दूसरों के बारे में भी कैसे पता लगेगा कि उनमें परिवर्तन हो रहा है या नहीं। जैसे डॉक्टर लोग थर्मामीटर लगाकर देखते हैं कि इसका टेम्परेचर कितना है, यह जिन्दा है या मर गया है, यह देखने के लिए कुछ चिह्न देखते हैं। ऐसे ही हमारा पुरुषार्थ जो है वो परिवर्तन के लिए है, सतोप्रधान बनने के लिए है, मनुष्य से देवता बनने के लिए है। हमारा योग भी मन की वृत्ति को बदलने के लिए है। मन को एक शिव बाबा में लगाकर, प्यार से विभोर करना, इसी का नाम योग है। जो दिव्यगुण हम धारण करते हैं, वे भी वृत्ति को दैवी बनाने के लिए हैं। जो ज्ञान हम सीखते हैं, वह हमें यही बताता है कि हमारी वृत्ति पतित हो गयी है, प्रदूषित हो गयी है, अब हमें उसको ठीक करना है। उसका साधन है आत्मा के स्वरूप में स्थित होना। लक्ष्य हमारा है वृत्ति परिवर्तन करने
का।
आप देखेंगे, बहुत-सी अव्यक्तः वाणियों में बाबा ने वृत्ति के परिवर्तन के लिए कई शिक्षायें दी हैं। वृत्ति के परिवर्तन में क्या-क्या आना चाहिए? वृत्ति को शुद्ध बनाने के लिए, दैवी बनाने के लिए, पवित्र बनाने के लिए किन-किन बातों को हमें जीवन में लाना है? वे विशेष रूप से छह बातें हैं जिन्हें वृत्ति में लाना है।
पहली बात है, बाबा ने कहा है कि वृत्ति में रुहानिपत और रूहाब। दूसरा है, रहमदिल। हमारी वृत्ति रहमदिल हो। शिव बाबा रहमदिल है। सारी दुनिया कहती है, गांड इज मर्सिफुल (God is Merciful) । परमात्मा दयालु है, कृपालु है, रहमदिल है। सभी धर्म वाले यही कहते हैं कि हे प्रभु ! हम पर रहम करो (O God! Mercy upon me) । परमात्मा 'सब पर रहम करता है। ऐसा नहीं, मनुष्य सब पर रहम करता है। वह किसी पर रहम करेगा, किसी से द्वेष रखेगा। परन्तु परमात्मा सब पर रहम करता है। हम सब अपराधी हैं जन्म-जन्मान्तर के, बहुत पाप किये हैं, नियम-मर्यादायें तोड़ी है, अवज्ञाये की है। इस सृष्टि में चलने के लिए जो नियम थे उनको तोड़ा है, सारी सृष्टि को खराब कर दिया है। अपने जीवन को भी बिगाड़ दिया है। भगवान के दिये हुए सब वरदानों को भी हमने बिगाड़ दिया है। तो भी परमात्मा रहम करने के लिए फिर आया है। कहते हैं, बच्चे, तुम बहुत दुःखी हो गये हो, चलो, तुमको ले चलू घर। कोई मनुष्य होता है, अगर उसका बेटा खराब हो तो कहेगा, चले जाओ यहां से, आज के बाद तू मुझे शकल नहीं दिखाना। मैं तुझे देखना भी नहीं चाहता, आज से तू मेरे लिए मर चुका है। वह उसे अपने घर से फ़ारकती दे देता है। लेकिन शिव बाबा कहते हैं कि प्यारे बच्चे, मीठे बच्चे। मैं तुम्हें ले चलूंगा, अगर तुम चलना भी नहीं चाहोगे, फिर भी मैं तुमको जबरदस्ती ले चलेगा। रहम भी जबरदस्ती करता है वो। ऐसे हमारे में भी सर्व के प्रति रहमदिल और रुहाब होना चाहिए।
तीसरी बात है. स्नेह । हरेक के प्रति स्नेह। जिसको बाबा कहते। मीठा बोलो. शुभ बोलो। जब तक हमे उस व्यक्ति के प्रति स्नेह नहो उससे हम कैसे मोठा बोलेंगे, शुभ बोलेंगे? गुस्से वाला आदमो नफरतवाला आदमी मीठा बोल सकेगा? कभी नहीं। स्वाभाविक रूप से मीठा वो बोलेगा जिसके मन में स्नेह होगा। मां बच्चे को कहती है. राजा, यहाँ आ जा यह खा ले, यह पी ले। ऐसे क्यों कहती है? बच्चे से प्यार है, इसीलिए ऐसे कहती है। हमारी वृत्ति में स्नेह हो। स्नेह को साथ रखने से बहुत बुराइयां, क्रोध, नफरत, बदले की भावना आदि समाप्त हो जाती हैं।
चौथी बात है, सेवा भाव। हम तो विश्व सेवक (World Servant) है, सेवा करना ही हमारा कर्त्तव्य है। साकार बाबा में हमने यह वृत्ति देखी कि मैं सेवक हूँ। जन्म-जन्मान्तर भक्तिमार्ग में गाते रहे, प्रभु जी, हम सेवक तेरे। अब बाबा ने हमें सेवा करने का तरीका बताया है, अवसर दिया है, क्या सेवा करो, लक्ष्य दिया है। अब हम समझते हैं कि हम भी कुछ है। सेवाभाव, सेवक भाव रखकर अब सेवा नहीं की तो कब करेंगे? हमारी वृति में सेवा भाव हो।
पांचवीं बात है, कल्याणकारी वृत्ति हो। हमें हरेक का कल्याण करना है। परमात्मा को 'शिव' क्यों कहते हैं? क्योंकि उसकी वृत्ति सदा कल्याणकारी है, वह 'सदा शिव' है। सदाशिव माना कभी किसी का अकल्याण सोचता ही नहीं। हम अपना फ़ायदा करने के लिए दूसरों को कोई नुकसान होता हो, तो भी चला लेते हैं। समझते हैं कि पहले अपना काम होना चाहिए, अपना फायदा होना चाहिए। दूसरों का उससे भला हो या नुकसान होता हो, कोई हर्ज नहीं। जहाँ यह बात आ जाती है, वहाँ कल्याणकारी वृत्ति नहीं होती। सदा हमारी कल्याणकारी वृत्ति हो।
छठी बात है, वृत्ति में निमित्त भाव हो। मैं तो निमित्त हूं, कराने वाला बाबा है। करनकरावनहार स्वामी वो है। ये छह भाव हमारी वृत्ति में हों। जैसे किसी पुस्तक में विषय सूची होती है कि इसमें कितने अध्याय हैं, किस-किस विषय पर हैं, इसी प्रकार हमारी वृत्ति में क्या-क्या भरा हुआ हो, समाया हुआ हो यह वो सूची है।
वृत्ति के बाद है, विदेह अवस्था। बाबा की बहुत-सी मुरलियां हैं अव्यक्त अवस्था अथवा विदेह अवस्था पर। विदेह अवस्था अर्थात् देह में रहते, देह से न्यारे। तभी हम अव्यक्त स्थिति को प्राप्त कर सकेंगे। यह हमारा पुरुषार्थ हो। विदेह अवस्था कैसे होगी? इस पर बाबा ने क्या प्रकाश डाला है? इसके लिए बाबा ने कहा है कि हमेशा उड़ती कला में रहो। यह सदा समझो कि मेरे जो गिरती कला के दिन थे, वे खत्म हो गये। यह निश्चय करके चलो। शिव बाबा कल्याणकारी है, वह हमें मिल गया। अब मेरी चढ़ती कला है, उड़ती कला है। पहले-पहले मन में यह भाव हो, विश्वास (belief) हो क्योंकि विश्वास मन का मार्गदर्शक (Guide) होता है। जैसे जनता को मार्गदर्शन करने वाले नेता होते हैं, शिष्यों को मार्गदर्शन करने वाले उनके गुरु होते हैं, ऐसे मनुष्य को आगे चलाने वाला, मनुष्य को मार्गदर्शन करने वाला उसका विश्वास होता है। जैसा आपका विश्वास हो, वैसा ही आपका कर्म होता है। मनुष्य के कर्मों का नेता उसका विश्वास होता है, उसका निश्चय होता है। इसलिए बाबा कहते हैं कि निश्चयबुद्धि आत्मा विजयन्ती। क्योंकि जो निश्चय करता है, निश्चय उसको सफलता तक ले ही जाता है। यह पक्की बात समझ लीजिये। कई लोग मानेंगे कि परमात्मा है, तो वे परमात्मा की तरफ जायेंगे। कई लोग सोचेंगे कि परमात्मा है ही नहीं, पैसा ही सब-कुछ है, वे पैसे की तरफ चले जायेंगे क्योंकि उनका विश्वास वहीं है। इनका नेता (विश्वास) इस तरफ ले जायेगा और उनका नेता उस तरफ ले जायेगा। सबसे पहले यह समझे या विश्वास करें कि मेरी उड़ती कला के दिन जा गये, मेरे तो अच्छे दिन आ गये, मैं खुशनशीब बन गया। मैं तकदीर जगाकर आया है। मेरे मायूसी के उदासी के दिन खत्म हो गये।
विदेही बनने के लिए हमेशा यह सोचो कि मैं फरिश्ता हूँ। चलते फिरते उठते-बैठते इसी चाल से चलो। आप जानते होगे, शेर कैसे चलता है. बिल्ली कैसे चलती है और चुहा कैसी चाल चलता है। हरेक पशु की चाल उसके निश्चय के मुताबिक है। चुहा ऐसा क्यों चलता है? क्योकिनिश्चय ही ऐसा है। उसको पता है कि आदमी मुझे पकडने आयेगा बिल में घुस जाना है। जायेगा फटाफट फटाफट देखेगा इधर-उधर, आ तो नहीं रहा है पीछे से। जहां देखेगा बिल है. उसमें घुस जायेगा। उसकी चाल-ढाल सब ऐसी है। क्योंकि उसके मन में रहेगा कि मैं पकडा जाऊंगा, मुझे पकड़ने वाले लोग बहुत हैं। मुझे छिपके ही काम करना है। उसकी चाल उस तरह से होती है। हाथी की चाल मस्त है, वह समझता है कि मैं तो बड़ा शक्तिशाली हूँ। मेरा कोई क्या कर सकता है! देखिये वह कैसे चलता है। ऊंट को देखिये, उसकी चाल अलग है। हरेक पशु की चाल अलग-अलग है। किसी ने कहा है कि व्यक्ति को पहचानना है तो उसकी गुफ्तार (बोलचाल), रफ्तार (चलने का ढंग) और दस्तार (पगड़ी) देखो। इन तीन चीज़ों से व्यक्ति को पहचान सकते हैं। इसी तरह से, हरेक व्यक्ति का जो निश्चय है कि मैं फरिश्ता हूँ, मैं फरिश्ता हूं, मैं फरिश्ता हूं उसके आधार पर उसकी स्थिति बनती है। एक पूरा दिन आप 'मैं फरिश्ता हूं, यह सोचकर देखो, आप उड़ने लगेंगे। अगर एक पूरा दिन आपने ऐसे सोचा कि मैं मोटा आदमी हूँ, मैं भारी आदमी हूं, उस दिन की अपनी अवस्था भी देख लो। आपको बहुत भारी देह-अभिमान होगा। यह एक स्मृति है, जागृति है कि मैं फ़रिश्ता हूं। इसी को बाबा कहते हैं कि लाइट के कार्ब में अपने आपको समझो। अपने को उस स्वरूप (लाइट के कार्ब) में देखो या तो योगी के स्वरूप में देखो कि कमल आसन पर बैठ परमात्मा की लगन में मगन हूँ। योग में मगन हूँ। परमात्मा की याद का आनन्द ले रहा हूँ। उसमे तल्लीन हूँ-इस स्वरूप में देखो। जैसा आप अपने को देखोगे या अपने बारे में समझोगे, जैसा दृश्य या रूप बनाओगे वही आपका दर्शन है, जीवनदर्शन है फिलासफी है। फिलासफी को भी दर्शन कहते हैं। आप अपने को कैसे देखते हैं यहां आपका जीवनदर्शन है। बाबा कहते हैं कि अपने को यह समझो कि मै फरिश्ता हूँ, जिससे आपको याद आयेगा कि फरिश्ता किसको कहते हैं. फरिश्ता क्या काम करता है, फ़रिश्ता क्या नहीं करता। दूसरा है, में लाइट हूं, मैं माइट हूँ। अपने को बार-बार स्मृति दिलाओ कि मैं लाइट हूँ, मैं माइट हूं। यही हमारा पहला पहला पाठ है कि में लाइट हूँ, माइट है। इससे ही हमारी विदेह अवस्था और लाइट और माइट की अवस्था होगी।
तीसरा है, विकर्म विनाशक अवस्था। इसके लिए बाबा ने कहा है कि तपस्या करो। हमारे ऊपर 63 जन्मों के विकमों का बोझ है। इसलिए बाबा कहता है कि विकर्म विनाशक अवस्था को धारण कर विकर्मों को भस्म करो। बच्चे, इसके लिए ओना होना चाहिए, फुरना होना चाहिए। बाबा कहते हैं कि तपस्या करो, तपस्वी कुमार बनो। साधन नहीं, साधना करो। ज़्यादा साधन इकट्ठे करने की कोशिश मत करो। साधना करो, साधना के ऊपर ध्यान दो। सिद्धि जो होगी साधनों से नहीं होगी, साधना से होगी। ज्यादा ध्यान साधना पर दो। बाबा कहते हैं कि इस अवस्था को पाने के लिए किसी भी वस्तु, व्यक्ति और वैभव से लगाव न हो, झुकाव न हो। फरिश्ते बनने के लिए, विदही बनने के लिए ये लगाव और झुकाव जंजीरें हैं। ये उड़ने नहीं देंगे, ये बाधा हैं। तीसरी बात है, अपने को समझें कि मैं पावर हाउस हूँ। दूसरों को भी लाइट और माइट देने वाला हूँ। मेरे नेत्र जो भी देखे, मेरी वाणी जो भी सुने, मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में जो भी आये, उनको शक्ति, करेंट मिलना शुरू हो जाये। चौथी बात है, एक बाप दूसरा न कोई। इस अवस्था से ही हमारे में सत्यता की शक्ति आयेगी। बाप सत्य है, उस एक के बनके रहने से ही हमारे में वह शक्ति आयेगी। एक बाप दूसरा न कोई इससे हमारी विकर्म विनाशक अवस्था होगी। जब तक हमारा जीवन इसपर नहीं टिका है. वह विकर्म विनाशक अवस्था नहीं होगी। हल्के-सल्के अनुभव होगे लेकिन शक्तिशाली अवस्था शक्तिशाली अनुभव नहीं होगे। पाँचवी बात है, अव्यभिचारी याद। एक बाप की याद देहधारियों की नहीं।
बाबा की बतायी कई इन बातों को जब हम अपने जीवन में लायेगे तब हमारी विकर्म विनाशक अवस्था होगी। बाबा कहते हैं कि पतिव्रता बनो। एक मुरली इसी विषय पर थी। सदा यह याद रखो कि मैं पतिव्रता नारी हूं। पतिव्रता नारी के क्या लक्षण होते हैं? भारत की पतिव्रता नारी सिवाय एक पति के और किसी को याद नहीं करती। जिस ब्राह्मण ने शादी कराई, उसको भी नहीं। उस ब्राह्मण ने जिससे सगाई करायी, जिससे शादी कराई सिर्फ उसकी याद। उसके बिना उसके मन में और कोई का संकल्प भी आता है, तो उसका पतिव्रत नष्ट हो गया। वह किसी को छूने तक भी नहीं देगी, किसी को भी अपने किसी अंग को स्पर्श करने नहीं देगी। मुरली में बाबा ने एक कहानी सुनायी थी। एक कन्या गाँव में कुंए पर पानी भर रही थी। मटका काफी बड़ा था, उसको सिर पर उठाना था। वह उठा नहीं पा रही थी। उतने में एक व्यक्ति आया और कहा कि मैं उठवा दूँ? उस कन्या ने कहा, भले उठवा दो लेकिन अंग, अंग से स्पर्श न करे, इस बात का ख्याल रखना। बाबा के कहने का भाव यह है कि हमारे मन की पवित्रता, शुद्धता यहाँ तक हो कि किसी व्यक्ति की याद स्पर्श तक न करे। उसके प्रति हमारा झुकाव, लगाव न हो। यह है विकर्म विनाशक अवस्था एक बाप दूसरा न कोई।
चौथा है, विलीन अवस्था, जिसको बाबा लवलीन अवस्था कहते हैं। लोग समझते हैं कि लवलीन माना आत्मा, परमात्मा में लीन होना। बाबा कहते है. बच्चे ऐसा नहीं। आत्मा तो अनादि अविनाशी है। शिव बाबा तो बिंदु है. उसमें आत्मा लीन कहीं से होगी? आत्मा और परमात्मा दोनों अनादि और अविनाशी है। आत्मा, परमात्मा के लब में लीन होती है। इमी को उन्होंने समझ लिया कि आत्मा, परमात्मा में लीन होती है। जब हम आत्मानों में विलीन भाव हो तब वह अवस्था हमारे में आती है। इसको बाबा मग्न अवस्था भी कहते हैं।
मग्न अवस्था या लीन अवस्था कैसे आयेगी? बाबा ने कहा है कि बेफिकर बादशाह बनो। विलीन तब होंगे जब कोई फ़िकर नहीं। बाबा है. सर्वशक्तिमान है, उसकी छत्रछाया में हम हैं। हम उसके बच्चे हैं। कराने बाला करा रहा है, मुझे क्या फ़िकर है? जब हम निश्चिन्त रहेंगे तब ही हमारे में विलीन भाव आयेगा। कहते हैं, मनुष्य को उसका कार्य (work) नहीं मारता लेकिन चिन्तायें (worries) मारती हैं। हमारे में ज्ञान-चिन्तन, आत्म-चिन्तन या परमात्म-चिन्तन होगा तब ही परमात्मा से योग लगेगा और अगर चिन्ता होगी तो परमात्मा से वियोग होगा।
फिर है, प्रेम भाव। बाबा कहते हैं, मुहब्बत वाले बनो। क्योकि मुहब्बत वालों को मेहनत नहीं करनी पड़ती। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई सेवा में मेहनत नहीं करो। दिल लगाकर खूब मेहनत करो। कोई काम है उसको अच्छाई से करो लेकिन आपकी शक्ति में जो है उसको करो। बाकी बाबा के ऊपर छोड़ दो, उस कार्य को प्रेम में रहकर करो, बाबा की याद में रहकर करो। उसको भूल कर कितनी भी मेहनत करोगे, खून-पसीना एक करके भी मेहनत करोगे, उसमें से निकलेगा क्या? बहुत कम फल निकलेगा। फल पूरा तब ही निकलेगा, जब शिव बाबा की याद में वह कर्म करोगे। इससे उसमें बरकत मिलेगी, मदद मिलेगी। मेहनत, मेहनत नहीं लगेगी, मौज लगेगी। शिव बाबा की शक्ति थोड़ी भी मिलेगी, आपकी शक्ति कई गुना हो जायेगी। अगर आप अपनी शक्ति से ही करते रहोगे, तो कहाँ तक करोगे? कब तक करोगे? जितनी आपकी क्षमता है. उतने तक करोगे, बाद में कर रुक जाओगे। इसलिए अगर उस सर्वशक्तिवान की शक्ति आपकी और के साथ जुट गयी तो वह हजार लाख गुना हो जायेगा। आपको सर्वशक्तिमान बाप की मदद वा शक्ति चाहिए तो उससे प्रेम करो, उसकी याद करो तो कार्य हुआ पड़ा है, कल्याण हुआ पड़ा है। वह विलीन भाव तब ही आयेगा जब आप इन सब बातों की धारणा करेंगे।
पांचवां है, विरक्त भाव। इसको बाबा बेहद का वैराग्य कहते है। बाबा कहते हैं कि संन्यासियों का है हद का वैराग यहाँ हमें सिखाया जाता है.. बेहद का वैराग। वैराग कोई अभ्यास करने से मिलने वाली चीज नहीं है। जैसे हम योग का अभ्यास करते हैं, ऐसे वैराग का अभ्यास करना नहीं होता। वैराग तो मन का एक स्वभाव है, उसकी वृत्ति है। जब तक वैराग न हो, तब तक योग नहीं लग सकता, हम योगी बन ही नहीं सकते। जब तक पुरानी दुनिया से मन खट्टा न हो, देहधारियों से मन हटा न हो, तब तक बाबा से मन लगेगा नहीं। इधर से हटेगा नहीं, तो वहाँ कैसे लगेगा? देहधारियों से हमारे आकर्षण हटे नहीं तो परमात्मा से कैसे लगेगा?
बेहद के वैरागी बनने के लिए बाबा ने बताया है कि यह भाव रहना चाहिए कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। बाप मिल गया तो मुझे कुछ नहीं चाहिए, कुछ भी नहीं चाहिए। इतनी बेहद की वैराग वृत्ति होनी चाहिए। दिल से वैराग वृत्ति होनी चाहिए, ऊपर-ऊपर से नहीं। फिर बाबा कहते हैं कि मेरे-तेरे की भावना नहीं होनी चाहिए। यह मेरा-तेरा छोड़ो। जब तुम ही मेरे हो गये तो, मेरा-तेरा कहाँ रह गया? अगर 'मेरा' शब्द कहीं लगाना चाहते हो तो उसको 'मेरा बाबा' में लगाओ। बाक़ी तो सब तेरा, सब बाबा का। इसी को बाबा सर्वाश त्यागी कहते हैं। अंश भी न हो क्योंकि अंश से ही वंश की उत्पत्ति होती है।
छठवीं बात है, विधि-विधान। बाबा कहते हैं कि जो भी कार्य करो वह विधि विधान से करो। विधि से सिद्धि होती है।बाबा के कई फार्मूले (सूत्र) है।विधि से सिद्धि होती है युक्ति से मुक्ति होती है।हमे यह मालूम नहीं था कि विधि कौन सी है सिद्धि कौन सी युक्ति कौन सी है और मुक्ति कौनसी है।ये नीति वचन तो भक्ती में भी थे।लेकिन उनका यथार्थ अर्थ हमे पता नहीं था, बाबा ने ही आकर हमें यथार्थ अर्थ बताया। बाबा कहते है कि यह विधि-विधान है। क्या विधान है? जो भी कार्य करो, पहले बाबा की याद में रहो। उस कार्य को बाबा के प्रति समर्पित करो। अपने को ट्रस्टी या निमित्त समझो। जब कार्य सफल हो जाता है तो उसको मालिक शिव बाबा को , करनकरावनहार को अर्पित करो। यह विधि और विधान है। अगर अमानत में ख्यानत की, इस विधि को तोडा, तो सिद्धि नहीं होगी। देखने में लगेगा कि हमने बहुत सेवा की, वह सेवा की लेकिन अन्दर से खोखला होगा। अतीन्द्रिय सुख जो होना चाहिए, वह खुशी जो होनी चाहिए , वह नहीं होगी क्योंकि आपने दिखावा किया। अन्दर में आपने पह समझा था कि इसको मैंने किया, यह योग्यता मेरे में थी, और कोई इसको नहीं कर सका, इसको करने वाला मैं ही था। अगर आपने ऐसा सोचा या आपके अन्दर ऐसा भाव है तो फिर वह आनन्द नहीं आ सकता। इसलिए बाबा कहते कि विधि-विधान से कार्य करो, सेवा करो।
पहले त्रिमूर्ति के चित्र में हम ब्रह्मा के नीचे लिखते थे कि बह्मा द्वारा सतयुग की स्थापना, शंकर द्वारा कलियुगी सृष्टि का विनाश, विष्णु द्वारा सतयुगी और त्रेतायुगी सुष्टि की पालना। ब्रह्मा द्वारा सतयुगी सृष्टि की स्थापना, ठीक है लेकिन किससे? पवित्रता के बल से, योग के बल से, ज्ञान के बल से। यह तो दुनिया भी जानती है कि बह्मा द्वारा स्थापना होती है। ब्रह्मा ने नयी सृष्टि रची उनको भो पता है। शास्त्रों में भी लिया हुआ है। लेकिन उनको यह नहीं मालूम कि ब्रह्मा ने पवित्रता से, योग से, ज्ञान से सतयुगी सृष्टि रची। इन तीनों शब्दों से इतना फरक पड़ जाता है। अगर हमारे कार्य करने में ज्ञान योग, पवित्रता नहीं है तो वो कार्य सतयुग रचना के कार्य में नहीं आ सकता। वह कार्य आपको मान-शान दे जायेगा लेकिन सतयुग की स्थापना के कार्य में नहीं आयेगा। इसलिए हमें हर कार्य का ईश्वरीय विधि से करना है यह हमारे ख्याल में रहे।
बाबा कहते हैं कि बच्चे, तुम विधायक हो, लॉ मेकर्स हो। अतः आप किसी लॉ को अपने हाथ में नहीं ले सकते। लां की मान्यता करो, लॉ का उल्लंघन नहीं करो। आप नियम-मर्यादाओं का पालन करने वाले हो, न कि तोड़ने वाले। बाबा कहते हैं कि बाबा की आज्ञा का पालन करो। 'बाबा की आज्ञा का पालन' का क्या मतलब है? जो ईश्वरीय लॉ हैं, नियम-मर्यादाये हैं. उनका पालन करो।
सातवां है, विनम्रता। जो भी कार्य करो विनम्रता से। इसी को निरहंकारीपन कहते हैं, नम्रता कहते हैं। विनम्रता हमारा अमोघ शस्त्र है। हमारी विजय का सबसे बड़ा शस्त्र यह है, झुककर चलना। लौकिक में लोग समझते हैं कि रोब डालने से, डराने-धमकाने से विजय होती है। हमारे पास अलौकिक शक्ति है, दैवी शक्ति है, ईश्वरीय शक्ति है, आत्मिक शक्ति है। हमारा अजेय (unconquerable) शस्त्र है, जिसके सामने बड़े से बड़े भो झुक जाये, वह है हमारी विनम्रता। नम्रता कोई कम शक्तिशाली नहीं है। वैज्ञानिक समझते हैं कि आणविक शक्ति हमारे बड़े शस्त्र हैं। हम योगियों का सबसे बड़ा शस्त्र है, नम्रता। यह समझना चाहिए कि विनम्रता हमारी सिद्धि का स्वरूप है। विनम्रता में हमेशा यह बात याद रखो कि मैं विश्व सेवक हूं। आमतौर पर जब हम संगठन में सेवा करते रहते हैं तो कभी-कभी मूह न निकल जाता है कि क्या में इसका नोकर हुं? यह मुझे क्या समझता है, में इसके बाप का नौकर हूं क्या? हो, तुम उसके भी नौकर हो और उसके बाप के भी नौकर हो। अरे, आप तो सारी दुनिया के नौकर हो। भगवान भी कहता है कि मै तुम बच्चों का ' अति विनम्र सेवक' (I am your Most Obedient Servant) हूं। इसलिए हम भी विश्व-सेवक हैं। विनम्र बनने के लिए अपने को मरजीवा समझो। लौकिक में भले आप बड़े आफिसर होंगे, अमीर होंगे लेकिन यहां तो बाबा के बच्चे हो। यहां मत समझो कि मैं वो था, ये था। नहीं, आप तो पुराने जन्म से मर चुके हो। तुम्हारे पास जो भी था, बाबा को दे दिया चाहे वह मान हो, चाहे शान हो, चाहे धन हो, चाहे दौलत हो। अभी अपने को फ़कीर समझो। बाबा कहते हैं कि बेगर टू प्रिन्स बनो। जितना आप बेगर (फ़कीर) बनोगे, उतना आप प्रिन्स (शहजादे) बनोगे। बेगर का मतलब यह नहीं कि मैं सबसे भीख मांगें । उसको बाबा कहते हैं, माँगने से मरना भला। बेगर माना, मन का भाव है यह होना चाहिए कि मेरा तो कुछ भी नहीं, जो कुछ था, जो कुछ है वह बाबा का। मैं तो फकीर हूं। जब यह भाव आयेगा तब विनम्रता ठीक ढंग से आयेगी।
आठवां है, विशेषता । बाबा कहते हैं कि हरेक आत्मा विशेष है, मेरा हरेक बच्चा विशेष है। अपने में भी जो विशेषता है उसको भी देखो और दूसरों में भी विशेषता देखो और उसको ईश्वरीय सेवा में इस्तेमाल करो तो आपका और दूसरों का भी भविष्य ऊंचा बनेगा। यह सत्य है कि आप दूसरों को जैसे देखोगे वैसे बनोगे। अगर आप दूसरों में विशेषता देखते रहोगे तो आप में विशेषतायें बढ़ती जायेंगी। अगर आप दूसरों में कमी-कमज़ोरी देखते रहोगे तो आपमें कमी-कमज़ारी बढ़ती जायेंगी। यह कुदरत का कानून है। बुराइयों को देखने वाला पुरुषार्थहीन बन जायेगा और उसमें रुकावट आयेगी, बाद में गिरावट भी होगी। अतः इन आंखों से दूसरों की बुराई नहीं देखो क्योंकि आंखों से ही बुराइयों आपके अन्दर घुस जायेंगी। इसलिए बाबा कहते हैं कि सो नो ईविल, बुरा मत देखो। सबकी विशेषता देखो, विशेषताओं का वर्णन करो। इससे आप में भी वे विशेषतायें आ जायेंगी।
और एक बात है, दूसरों की विशेषता देख ईर्ष्या न करो। क्योंकि बाबा ने उस आत्मा को इसलिए चुना है कि उसमें वो विशेषता है, जो आपमें नहीं है। अगर आप में जो विशेषता है, वही विशेषता उसमे होता, तो उस आत्मा को क्यों चुन लेता ? हरेक आत्मा की विशेषता अलग-अलग है. पार्ट अलग-अलग है. सेवा अलग-अलग है। इसलिए किसी की विशेषता या पार्ट देखकर ईर्ष्या न करो। ईर्ष्या ऐसी आग है जो आपको जलाकर बैगन का भरता बना देगी।
नौवां है, विकास योजना। बाबा कहते हैं कि प्लान बनाओ, स्व. उन्नति के लिए योजना बनाओ। सेवा की योजना तो बनाते हो, विद्यार्थियो की योजना तो बनाते हो लेकिन अपना विकास भी कैसे हो, स्व-उन्नति कैसे हो, अपने को आगे कैसे बढ़ायें - उसकी भी योजना बनाओ। ऐसे ही काम चलाऊ बाला जीवन नहीं बिताना, योजनाबद्ध जीवन बनाओ। रहे हुए विकार के अंश को मिटाने की योजना बनाओ। इसी को बाबा चार्ट रखना कहते हैं। इसके लिए मानसिक आलस्य और अलबेलेपन (Mental laziness) को भगा दो।
दसवाँ है, व्यवस्था। बाबा कहते हैं कि हरेक कार्य व्यवस्थित रूप (Organised way) में करो। मनोविज्ञान कहता है कि विचार (thoughts) व्यवस्थित हैं। गीता में भी लिखा हुआ है कि ज्ञानी और योगी का पहला लक्षण यही है कि वह हर बात में व्यवस्थित रहता है। आप बात कर रहे है या भाषण कर रहे हैं, तो व्यवस्थित रूप से करना चाहिए। आप जिस विषय पर बोल रहे हैं, उस विषय को छोड़ अन्य विषय पर बोलना यह व्यवस्थित रूप नहीं है। बाबा की मुरली सुना रहे हैं, सुनाते सुनाते मुरली छोड़ दी. दूसरी दूसरी बातें, कथा, उपकथा, इधर-उधर की बातें सुनाने लगे; नहीं. ऐसा नहीं करना। मुरली सुना रहे हैं तो मुरली को ही सुढंग से सुनानो। मुरली किसकी है? ज्ञानपूर्ण, ज्ञान सागर, त्रिकालदर्शी परमपिता परमात्मा की है, उसको उसी मूल्य से सुनाओ। उसके बीच सांसारिक बातें, सांसारिक लोगों की बातें सुनाकर, मुरली क्लास का मूल्य नहीं घटाओ । जो ज्ञानी और योगी होगा उसके विचार सुव्यवस्थित होंगे, उसके बोल और कर्म भी व्यवस्थित होंगे। उसका जीवन ही व्यवस्थित होगा। सबसे पहले उसका समय प्रबन्धन (Time managment) होगा, उसकी दिनचर्या व्यवस्थित होगी। दिनचर्या है क्या? सारे दिन में समय को सुव्यवस्थित रूप से कैसे इस्तेमाल करना है, इसकी योजना। ज्ञान के लिए कितना, योग के लिए कितना, सेवा के लिए कितना, विश्राम के लिए कितना, खान-पान के लिए कितना, कार्य के लिए कितना समय देना है इसकी व्यवस्था ही समय प्रबन्धन है, चार्ट है। दूसरा है, अर्थ व्यवस्था (Money Management)। पैसा है, उसको किसी काम में लगाकर बढ़ाना इनवेस्टमेन्ट (पूँजी निवेश) कहलाती है। पैसे को खर्च कर देना एक्सपेंडेचर (व्यय) कहलाता है। इन दोनों में बहुत अन्तर है। पैसा तो उसमें भी लगता है और इसमें भी लगता है। एक में पैसा लगाया, वह एक से दो, दो से चार बढ़ता गया; दूसरे में पैसा लगाया, वह खत्म हो गया। सेवा में भी ऐसा है। सेवा से सेवा बढ़ती रहती है। सेवा में लगे हुए धन से सेवा बढ़ती ही रहती है. धन अविनाशी होता रहता है। कोई ऐसी सेवा होती है, उसमें धन लगाने के बाद, वह सेवा भी खत्म और धन भी खत्म। इसलिए हमें यह भी समझ होनी चाहिए कि धन किस सेवा में लगाना है, कितना लगाना है। जैसे घर में मेहमान आये. उनको एक-दो प्रकार के व्यंजन बनाकर भी खिला सकते हैं और अपना भभका दिखाने के लिए बीस चीजें बनाकर भी खिला सकते हैं। क्या आप अपने धन को इस तरह खर्च करना चाहते हैं? जब आप बाबा के बन गये, यह धन बाबा का हो गया। अतिथि का सत्कार करना हमारा कर्तव्य है लेकिन उसको छत्तीस प्रकार के व्यंजन बनाके खिलाओ, इससे आपके पैसे भी व्यर्थ गये और उसके पैसे भो व्यर्थ गये क्योंकि आपका नह भारी भोजन खाकर उसको अगले दिन डॉक्टर के पास जाना पड़ा। इसका अर्थ है, आप धन का प्रबन्धन (Money Management) नहीं जानते। बाबा भी कई बार कहते हैं कि पेट से भी बचाकर सेवा में लगाओ जिससे अनेक आत्मा का उद्धार हो जाये खर्च करो जरूर करो। पेट भरा रहेगा तो सेवा कर पायेंगे। भूखे पेट से सेवा भी नहीं हो सकती। कम खर्च बालानशीन बनो। चीज बढ़िया हो. खर्च कम करो। तीसरा है. कार्यशक्ति प्रबन्धन (Energy Management) काम ही करना है। आप करते रहे, करते रहे करते ही रहे। एक दिन ऐसा आयेगा कि आपका शरीर बिगड़ जायेगा, बीमार पड जायेगे। आपने शरीर का ख्याल नहीं किया। हरेक व्यक्ति और वस्तु की सीमा है। डॉक्टर आपसे कहेंगे, तीन दिन आप बिस्तर पर ही लेटे रहो, आपकी तबीयत ठीक नहीं। क्यों ठीक नहीं? आप करते गये, करते गये, करते गये काम, अब जाकर पड़ो खटिया पर। आपको यही मालूम नहीं है कि आपके शरीर में कार्य करने की क्षमता कितनी है। गाड़ियों में भी संकेत होते हैं कि गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो रहा है, रिज़र्व में आयी है। उस समय आपको पेट्रोल डलवाना चाहिए। अगर आप नहीं डलवायेंगे तो आगे जाकर गाड़ी खड़ी हो जायेगी। नजदीक में कोई पेट्रोल स्टेशन है नहीं, तो धक्का लगाके ले चलो गाड़ी। हर चीज की कार्यक्षमता और योग्यता कितनी है-यह हमें मालूम रहना चाहिए। कभी-कभी आपात स्थिति (Emergency) है. अनिवार्य है तो भले करो। लेकिन बार-बार शरीर की कार्यशक्ति जाने बिगर करते रहो, करते रहो यह ठीक नहीं है, यह व्यवस्था नहीं है। इसीलिए बाबा कहते हैं कि आप फालतू कार्यों में अपनी शक्ति नहीं लगाओ। आप तो संसार में चहुत बड़े आदमी हो। आपका समय और शक्ति बहुत अनमोल हैं। सतयुगी सृष्टि को स्थापन करने की जिम्मेवारी आपको दी हुई है। इसलिए हमारे में समय का प्रबन्ध करने की और कार्यशक्ति का प्रबन्ध करने की कला होनी चाहिए। फालतू कार्य में, फालतू बातों में अपनी कार्यशक्ति को, कार्यक्षमता को नहीं गंवाओ, नहीं इस्तेमाल करो।
बाबा का नियम है कि रात 10 बजे सो जाओ। लेकिन हम क्या करते हैं? रात 12 बजे तक ड्रामा का अभ्यास करते हैं। जब अमृतवेले योग करने बैठते हैं तो न हमारा योग लगता है और न पास बैठे हुए व्यक्ति का योग लगने देते हैं। हम कौन-सा योग करते रहते हैं? नमाज पढ़ते रहते हैं। आप योग में झुटका क्यों लगा रहे हैं? क्योंकि आप ड्रामा की प्रैक्टिस कर रहे थे या ड्रामा'देख रहे थे। बाबा ने जिस कार्य के लिए प्रधानता दी हुई है कि अमृतवेले का योग ठीक रूप से करो, आपने उसका उल्लंघन किया। इसलिए पहले से ही अपना समय प्रबन्धन करो कि रात दस बजे के अन्दर ही आपके सारे काम पूरे हो जायें। इसलिए मैं यह कहता हूं कि हमारा जीवन अनुशासित (Disciplened) रहे, सुव्यवस्थित रहे। आखिर कार्यशक्ति की भी अपनी सीमा है, उसका सदुपयोग होना चाहिए। अगर आपको एक बार आदत पड़ गयी अमृतवेले न उठने की या अमृतवेले ठीक योग न करने की, तो आप जीवन भर योग ठीक नहीं कर पाओगे, योग का आनन्द ही नहीं ले पाओगे। योग करने बैठते ही आपको नींद आने लगेगी, आप योग में हमेशा सोते ही रहेंगे। इसलिए अमृतवेले योग में एक्टिव और अलर्ट रहने का और आनन्द का अनुभव करने का अभ्यास करो, आदत डालो।
हमारे जीवन का और हमारी दिनचर्चा का सबसे पहला और सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग है मेडिटेशन। पहले हम योगी हैं. बाद में बाकी कुछ-यह कभी नहीं भूलना। अमृतवेले का हमारा योग ऐसा गुणवत्ता का हो जिससे हम भरपूर हो जायें। ऐसा अनुभव होना चाहिए कि अहा! मजा आ गया, आनन्द आ गया, शक्ति मिल गयी। तब हमारा सारा दिन ठीक गुजरेगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए योग और ज्ञान को ज्यादा महत्व देते हुए अपनी दिनचर्या को सैट करना चाहिए।
कुल मिलाकर आपके संस्कार ही सुव्यवस्थित (well-organised) हो जाने चाहिएं। आपके सारे कार्यक्रम भी सुनियोजित (well-planned) होने चाहिए क्योंकि जो सतयुगी सृष्टि है, वह मर्यादा में चलती है। सब-कुछ व्यवस्थित पद्धति पर चलता है। हमारी दिनचर्या न केवल व्यवस्थित हो लेकिन उसके साथ तनावरहित भी हो। बाबा ने कहा है कि केयरफुल (careful) भी हो और चीअरफूल (cheerful) भी हो। हरेक कार्य को सावधानी से सोच-समझके करो। अवस्था खुश रहे. बैलेन्स रहे। स्थिती सावधानीयुक्त और हर्षयुक्त हो।
ग्यारवा है. विभिन्नता। जीवन में नवीनता हो, विभिन्नता हो। हमेशा एक ही चीज करने से आदमी ऊब जाता है। इसलिए नये-नये तरीके से पुरुषार्थ करो, उनका प्रयोग करो।
बारहवां है, विशालता (Global Thinking)। हमारा हर कार्य विशालतापूर्ण होना चाहिए। आप जो भी करो, सारी दुनिया को ध्यान में रखकर करो। आपका हर संकल्प और कर्म सारी दुनिया को प्रभावित करता है। इसलिए विशाल बुद्धि से कर्म करो। हद से हटकर, बेहद में जाकर, बेहद में रहकर करो। इसी को बाबा कहते हैं, बेहद में जाओ, हद में नहीं रहो। विशाल दिल से, विशाल बुद्धि से, उदारता से कार्य करो, सहयोग करो। यज्ञ में भी हम सेवा करते हैं, सहयोग देते हैं उसमें भी हमारा हृदय विशाल हो। विशालता बुद्धि की भी, विशालता हृदय की भी और विशालता दृष्टि की भी हो। हमारी दृष्टि भी विशाल हो, हमारा दृष्टिकोण भी विशाल हो. छोटा, हद का न हो। हरेक को आगे बढ़ाओ, उनमें उमंग-उत्साह बढ़ाओं। बाबा जब मुरली सुनाते हैं तब कहते हैं कि जब मैं मुरली सुनाता हूँ, मैं यह नहीं देखता, कितने बच्चे सामने बैठे हैं, उस समय सभी सेन्टर के बच्चे, सारे विश्व के बच्चे मेरे सामने होते हैं। जब पहली बार हम विदेश सेवा के लिए जाने लगे तो बाबा से पूछा, बाबा हम क्या करें, हमारा मार्गदर्शन कीजिये। बाबा ने कहा, अभी से आप सोचने लगो। मैंने पूछा. क्या सोचने लगे? यह सोचो, आपके सामने सभा इकट्ठी हुई है, आप सभा में भाषण कर रहे हैं। लोगों का आवाहन करो। अभी विश्व सेवा की सोचो। अभी बुद्धि को यहां से निकाल पुरे विश्व की सेवा का सोचो। तब आपकी वहाँ जाकर सफलता होगी। यह सोचने का तरीका है। जो भी सोचो विशालता से सोचो, जो भी करो विशालता से करो, जो भी बोलो विशालता से बोलो। तंग दिली न हो।
तेरहवां है. विजयी वत्स। सदा यह समझो कि में विजई वत्स हूं। विजय का तिलक बाबा ने मुझे लगा दिया है। विजय हमारी हई पड़ी है। विजय हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यह सब समझकर आप चलो तो आपकी अवस्था, आपका पुरुषार्थ श्रेष्ठ होगा।
इस समय तमोप्रधानता है, पाँच विकार प्रवेश हैं। बाबा आकर इन पाँच भूतों का विनाश कर सतोप्रधान बनाते है। यह बाबा की शक्ति है। बाकी मुर्दे को ज़िन्दा बनाना या ज़िन्दे को मारना, यह बाबा की शक्ति नहीं है। हाँ, हम माया से मरे पड़े थे और बाबा ने आकर सुरजीत किया है ज्ञान-संजीवनी बूटी से। तो यह है बाबा का जादू।
यह खुदा दोस्त है। त्वमेव माता च पिता त्वमेव... सब सम्बन्ध उनके साथ हैं। विद्या देने वाला टीचर भी वे ही बनते हैं। कहते हैं, मैं वह विद्या पढ़ाता हूँ जिससे तुम राजाओं का राजा बनते हो।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
परिवर्तन की कला
सोलह कला सम्पूर्ण बनने की बात हम कहते हैं लेकिन सोलह कला सम्पूर्ण हम तभी बनेगे जब हमें पहले परिवर्तन की कला आती होगी। परिवर्तन की कला नहीं आती होगी, तो सोलह कलायें भी आयेगी नहीं। बहुत दफ़ा कहा जाता है कि हमे बाप समान स्थिति प्राप्त करनी है। वर्तमान समय जो हमारी स्थिति है और बाप समान जो स्थिति है, उन दोनों के बीच जो खाई है, वह कैसे भरेगी? जब परिवर्तन आयेगा। बाप समान स्थिति में सब आना चाहते हैं, उस स्थिति को प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन कर नही पाते, उसका कारण क्या है? कारण है कि हमें परिवर्तन करने की कला पूर्ण नहीं आती। अगर परिवर्तन की वाला हमारे में आ जाये, तो बाप समान हमारी स्थिति बन जाये। इसी तरह से हम यह कहते हैं कि हमारे जीवन का लक्ष्य है मनुष्य से देवता बनना; या यह कहना और ही युक्तियुक्त है कि असुर से देवता बनना हमारा लक्ष्य है। क्योंकि वर्तमान जो संसार है वह सब आसुरी लक्षणों से युक्त हो चुका है। मनुष्य से देवता बनना या असुर से देवता बनना - यह क्या है? यह परिवर्तन की प्रक्रिया है। अगर परिवर्तन न हो तो मनुष्य से देवता कैसे बनेंगे? हमारा लक्ष्य कैसे पूरा होगा? जिसको हम पुरुषार्थ कहते हैं. वह पुरुषार्थ क्या है? परिवर्तन है। परिवर्तन का नाम पुरुषार्थ है। बाबा कहते हैं कि पुरुषार्थ तेज़ करो। 'पुरुषार्थ तेज़ करो' कहने का अर्थ क्या है? परिवर्तन की रफ्तार बढ़ाओ, परिवर्तन की प्रक्रिया को तीव्र करो। बाबा कहते हैं कि बच्चों की उतरती कला से चढ़ती कला और चढ़ती कला से उड़ती कला होनी चाहिए। पहले हम चले गये थे उतरती कला में, अभी हमें जाना है उतरती कला से उड़ती कला में। उड़ती कला में जायेंगे कैसे? जब हमें परिवर्तन की कला आयेगी। मुख्य हमारा सारा पुरुषार्थ है, यह इसी बात का है कि हमारे में परिवर्तन की कला आनी चाहिए।जिस घर में आप रहते हैं वहां आपका प्रभाव नहीं पड़ता या जिस ऑफिस में आप काम करते वहां लोग आपको सहयोग नहीं देते कई बातो में रुकावट डालते और सेवा में ज्यादा सफलता नहीं मिलती क्यों? क्यों कि आपमें परिवर्तन नहीं है। हमारे जीवन में परिवर्तन ऐसा प्रत्यक्ष हो कि लोगों को मालूम पड़े कि हम बहुत बदल चूके है। पहले हमारा जीवन क्या था और अभी क्या बन चुका है तब ही घर वालों पर प्रभाव पड़ेगा। परिवर्तन एक ऐसी चीज है. उसे देखकर सब खुद बोलेंगे कि पहले हमारे बच्चे में ये आदतें थीं, अभी इतना बदल गया है। पहले घर में काम नहीं करता था. गुस्सा करता था, लोगों के साथ उसका व्यवहार ऐसा था; अभी उसमें बहुत बदलाव आ गया है। जितना-जितना हममें परिवर्तन होगा, बाबा की प्रत्यक्षता भी हम उतना ही कर सकेंगे। मुरलियों में बाबा कहते हैं। कि बच्चे, बाबा की यह एक बात नहीं मानेंगे? बात मानने के अर्थ क्या है? परिवर्तन हो जाना। यह संगमयुग क्या है? सतयुग से लेकर संगमयुग तक हम जो कहानी पढ़ते हैं, सुनते हैं यह क्या है? परिवर्तन। संगमयुग क्या है? परिवर्तन का समय। कलियुग जा रहा है और सतयुग आ रहा है। हमें परिवर्तित होना है। अभी हमें कलियुगी से बदलकर सत्तयुगी बनना है। यह सारा ज्ञान हमने किसलिए लिया? लोगों को हम सिद्ध करके बताते हैं कि कल्प की आयु केवल 5000 वर्ष है, अरबों या खरबों वर्ष नहीं है। यह बताने का भाव क्या है? कलियुग जा रहा है और सतयुग आ रहा है, अब आप बदलो। कलियुगी आदतें छोड़ो, अपने को सतयुग के लायक बनाओ क्योंकि समय बदलने वाला है। ज्ञान का मुख्य सार या नींव या धुरी यह है कि हमे परिवर्तन करना है। कई बार बाबा से पूछा जाता है कि बाबा, विनाश कब होगा? सतयुग कब आयेगा? बाबा क्या कहते हैं? बच्चे, परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है? आमतौर पर बाबा मिसाल देते हैं कि नाटक में जब एक्टर पूरे तैयार हो जाते हैं, तब ही परदे को हटाया जाता है। बाबा यह भी कहते हैं कि आप पूछते हो कि विनाश कब होगा? मैं आपसे पूछता हूँ कि आप सब तैयार हो? आप आधारमूर्त और उद्धारमूर्त हो, सारी सृष्टि का परिवर्तन आपके परिवर्तन पर टिका हुआ है, आपके कारण रुका हुआ है। अगर आप परिवर्तन नहीं होंगे तो सृष्टि कैसे परिवर्तित होगी? में बदलूंगा तो विश्व बदलेगा - यहाँ तक बाबा हमारी जिम्मेदारी बताते हैं। बाबा कहते हैं कि आप बच्चे बदलेंगे तो संसार बदलेगा, आप के कारण ही यह संसार रुका हुआ है। सतयुग जो नहीं आ रहा है, वह आपकी वजह से ही देर हो रही है। आप देखिये, परिवर्तन की कितनी प्रमुखता है! आप यह समझ लें कि पहला-पहला हमारा लक्ष्य, उसको आप कोई भी नाम दे दो, जो केन्द्रबिन्दु है. जिस पर यह सारा कुछ घूमता है, वह है परिवर्तन की कला। परिवर्तन नहीं हुआ, आप कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। हमारा कोई भी मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता।
अब हम देखेंगे, परिवर्तन कैसे शुरू होता है? हमारे में परिवर्तन कैसे आये? मिले हुए या रहे हुए इस थोड़े से समय में हमें अपनी अन्तिम स्टेज कैसे प्राप्त हो? उसके लिए बाबा की जीवन-कहानी को अपने सामने रखना पड़ेगा। बाबा कैसे परिवर्तन हुए यह हम अनुसरण कर लें तो हमें परिवर्तन का एक मागदर्शन, एक रूपरेखा मिल जायेगी। बाबा के जीवन में तो ऐसी बहुत-सी बातें हैं परन्तु हम उन सबको अपने जीवन में न भी ला सकें, कोई बात नहीं लेकिन जो मुख्य दो परिवर्तन हैं, उन्हीं को हम अपने में लाये। जो पहला नम्बर नर से नारायण बने, उनके जीवन में परिवर्तन कैसे आया बाबा भी कहते हैं कि फॉलो फादर। किन बातों में हम बाप को फॉलो करें ब्रह्मा बाबा का किस रीति से परिवर्तन हुआ, उस रीति से हम फॉलो करें. तभी तो बाप समान बनेंगे।
बाबा की जीवन कहानी एक ऐसी कहानी है, जो मनुष्य के जीवन को परिवर्तन करने वाला है। अन्य कहानियो में और बाबा की जीवन कहानी में यह अन्तर है। जो भी अन्य कहानियाँ हैं वे कर्णरस की कहानिया हैं, जोवन को परिवर्तन करने वाली अथवा परिवर्तन करने की प्रेरणा देने वाली कहानियां नहीं हैं। वे केवल मनोरजन करने वाली कहानिया है। बाबा की जीवन कहानी अन्य व्यक्तियों की जीवन कहानी की तरह लौकिक नहीं है बाबा की अलौकिक जीवन कहानी है। जो भी उसको ठीक तरह पढ़ेगा उसमे परिवर्तन जरूर आयेगा। मुझसे कई लोग मिले हैं जो बाबा की जोवन कहानी पढ़कर ईश्वरीय ज्ञान में आये। हमने उनसे पूछा, आपको कैसा लगा। उन्होंने कहा, उस पुस्तक को पढ़ने के बाद हमारे जीवन में भी परिवर्तन आया और ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा हुई।
उस पुस्तक में पांच-छह बातें हैं, जिनसे बाबा के जीवन में परिवर्तन आया। अगर वे बातें हमारी बुद्धि में नहीं रहतीं या बुद्धि से खिसक जाती हैं तो भले ही हमारा पुरुषार्थ रुक नहीं जाता परन्तु उसकी गति धीमी तो जरूर होगी। पहले-पहले उस पुस्तक में हम यह पढ़ते हैं कि बाबा ने विनाश का और सतयुगी सृष्टि का साक्षात्कार किया। ये दो बातें बाबा के जीवन में परिवर्तनकारी हुई। बाबा तो हीरे-जवाहरात का धन्धा करते थे। लौकिक रोति से अपना अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे थे। ऐसी बात तो नहीं थी कि जीवन में पाने के लिए कुछ साधना करने की जरूरत हो। लेकिन ये दो साक्षात्कार उन्होंने किये, तो उनके मन में वैराग आ गया। उन्होंने देखा कि वह बहुत भारी विनाश था। उनको यह पक्का निश्चय हो गया कि यह पुरानी दुनिया खत्म होने वाली है। अगर आप देखेंगे कि किसी व्यक्ति को यह पक्का हो जाता है कि वह दो दिन का ही मेहमान है इस दुनिया में, तो उसका विचार और व्यवहार ही बदल जाता है। उसको दुनिया की हर बात से वैराग आ जाता है, उसके मन में यही रहता है कि बस, मुझे दो दिन ही यहां रहना है, इसलिए मुझे जाने की तैयारी करनी है। किसी बात में वह रुचि नहीं दिखायेगा क्योंकि वह जानता है कि उसे यहां से चलना है। उसी प्रकार ब्रम्हा बाबा को भी पक्का हो गया था कि यह सृष्टि विनाश होने वाली है। उसके बाद का जो साक्षात्कार था, वह स्वर्ग का था। इसमें उन्होंने समझ लिया कि मुझे नर से नारायण बनना है, स्वर्ग आने वाला है। तो उन्होंने अपना धन्धा छोड दिया और शिव बाबा का ज्ञान सुनने दूसरों को सुनाने में लग गये। उनके लौकिक जीवन का अध्याय समाप्त हुआ और जीवन को अलौकिक बनाने की, परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई। अगर हमे यह भूल जाता है कि इन आंखों से हम जिस दुनिया को देख रहे हैं, यह समाप्त होने वाली है, यह विनाश हुई पड़ी है, ये सब मरे पड़े हैं, तो हमें सांसारिक आकर्षण खींचते रहेंगे। अगर आकर्षण खींच रहे हैं तो हमारी अव्यक्त स्थिति, फरिश्ता स्थिति, बिन्दु स्थिति, बीज स्थिति आदि कैसे होगी? असंभव है। आप कितनी भी बातें सुन लीजिये, जीवन में परिवर्तन नहीं होगा। अगर सबसे पहले मन इस पुरानी दुनिया से उपराम नहीं होगा तो न इन सारी स्थितियों का अनुभव कर पायेंगे और न हम नर से नारायण बनेंगे। जब उपराम नहीं होंगे तो योग भी लगेगा कैसे? योग की ऊंची अवस्था कैसे होगी? जब मन इस संसार से टूट जायेगा, नष्टोमोहा होगा। नष्टामोहा बनने के लिए मुख्य चीज़ यही है कि मन में यह भाव रहे कि ये सब मरे पड़े हैं। यह संसार अब विनाश को प्राप्त करने वाला है। दूसरा यह याद रहे कि नयी सृष्टि आने वाली है, नया युग आने वाला है। वह देवताई सृष्टि होगी और वहाँ सब पवित्र होंगे। न कोई वहां विकारी होगा और न उनका सम्बन्ध विकारी होगा। उनकी दृष्टि-वृत्ति विकारी नहीं होगी। वहाँ पर विकारों का नाम-निशान नहीं होगा। वे सर्वगुण सम्पन्न होंगे। यह पहली पहली बात है जो बाबा के 'जीवन में परिवर्तन का कारण बनी।
अन्य जो भी भाई-बहनें अपने जीवन में परिवर्तन लाये हैं, उनका इसी तरीके से परिवर्तन हुआ है। सन् 1952 में, मै भी जब इस संस्था में आया. उन दिनों मैंने आई.ए.एस. (Indian Administrative Services; भारतीय प्रशासनिक सेवा ) के इम्तिहान का फॉर्म भरा हुआ था। एम.ए. का फॉर्म भरा हुआ था । जैसे हर एक सोचता है कि जीवन में ज्यादा से ज्यादा उन्नति करे ।वैसे मैने भी खयाली पुलाव बनाया हुआ था । जैसे ही मालूम हुआ कि सृष्टि का विनाश होने वाला है । तो यह बात बुद्धि में ठीक तरह बैठ गई । मुझे विश्वास हो चुका कि मनुष्य चरित्रहीन हो चुका है । मनुष्य इतना भ्रष्ट हो चुका है । संसार में इतना भ्रष्टाचार फैल चुका है विकार इतने प्रधान हो चुके है, विनाश होने के सिवाय इसका कोई इलाज ही नहीं चारा ही नहीं ।यह बिल्कुल ठीक बात है कि जमाना बदलना चाहिए। सतयुग आना चाहिए । तो मैंने अपना जीवन इस तरफ लगा दिया। हरेक अपने में ही देखे कि उनमे जो परिवर्तन हुआ है उसका अनुपात भी इस बात पर है कि उसने इन दो बातों को कहां तक बुद्धि में रखा है। अगर किसी की बुद्धि में यह है कि पता नहीं विनाश होगा या नहीं, पता नहीं विनाश होने में कितना समय पड़ा है, पता नहीं सतयुग कब आयेगा अर्थात् जो इन बातों में ढीला होता है . उसकी परिवर्तन की प्रक्रिया अथवा पुरुषार्थ भी ढीला होता है। यह बात भी बाप समान बनने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
फिर बाबा ने कहा, "अलिफ को अल्लाह मिला, वे को मिली बादशाही। आई तार अलिफ़ की, हुआ रेल का राही।" बाबा ने जल्दी-जल्दी अपना सारा व्यापार समेट लिया। काफी समय से व्यवस्थित किया हुआ धन्धा बाबा ने एकधक्क से समेट लिया। बाबा ने कितना सहन किया। लोगों ने कितना विरोध किया, आग लगाने की कोशिश की, कोर्ट में गये, क्या हंगामा नहीं किया। उन सबका सामना करने पर भी बाबा अपने लक्ष्य से हिला नहीं। उसका मूल कारण क्या था? पहले मैंने जो बतायी वे दो बाते थी।
मनुष्य के लौकिक जीवन में भी दो चीजें काम कर रही हैं। एक आकर्षण और दूसरा विकर्षण । संसार में ये दो शक्तियां हैं। यह काम विकार क्या है? आकर्षण। किसी के देह की रूपरेखा को देखकर या उसके रंग-ढंग को देखकर, उसके आकार के प्रति आकर्षण ही काम विकार है। मोह क्या है? मोह का दूसरा नाम ही आकर्षण है। लोभ, जो धन-दौलत कमाता है- यह क्या है? यह भी आकर्षण है सम्पत्ति के प्रति, धन के प्रति। उसी प्रकार खाने, पीने और पहनने के प्रति जो लोभ है, यह भी आकर्षण ही तो है। आप देखेंगे कि जितने भी विकार हैं, उनका मूल है आकर्षण। अगर आकर्षण नहीं है तो विकर्षण है। क्रोध क्या है? क्रोध आने से पहले उसको घृणा आती है, द्वेष पैदा होता है या ईर्ष्या पैदा होती है। ये सारे पैदा होना क्या है? विकर्षण। किसी व्यक्ति के प्रति विकर्षण ही उसके प्रति घृणा, द्वेष आदि पैदा करता है। ये पांचों विकार क्या हैं? आकर्षण और विकर्षण के फल। अभिमान क्या है? अभिमान आकर्षण और विकर्षण का मिश्रण है, अपने प्रति आकर्षण और दूसरों के प्रति विकर्षण। स्वार्थ क्या है? अपने प्रति आकर्षण और दूसरों के प्रति विकर्षण। सब-कुछ मुझे ही प्राप्त हो जाये, दूसरे भले भाड़ में जायें, इसका नाम स्वार्थ है। जितने भी अवगुण हैं, दुर्गुण है. आसुरी लक्षण हैं, बुराइयाँ हैं, विकार हैं जो जीवन में मनुष्य को दुःख देने वाली चीजें हैं उनकी नींव में, उनके मूल में जो दो शक्तियाँ काम कर रही है. वे हैं आकर्षण और विकर्षण। अगर हम इनसे छूटेंगे नहीं तो हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं आयेगा। आप जितना भी ज्ञान-योग करते रहिये लेकिन किसी देह और देह के सम्बन्धों की तरफ आकर्षण आ गया तो आपका ज्ञान-योग पारे की तरह उड़ जायेगा। कल तक उसका ज्ञान के प्रति आकर्षण था और संसार के प्रति विकर्षण था, आज उसका ज्ञान के प्रति विकर्षण हो गया और संमार के प्रति आकर्षण हो गया। संसार में आप इन्हीं दो चीजों को देखेंगे।
कहते हैं कि हम फरिश्ते बनेंगे। फरिश्ते के लिए कहते हैं कि उनके रिश्ते नहीं होते। उसके रिश्ते नहीं होते है इसका मतलब क्या है? उसका आकर्षण नहीं होता किसी से। कहते हैं कि फरिश्ते को हड्डियाँ नहीं होती, उसको पृथ्वी आकर्षित नहीं करती। वह ऊपर ही ऊपर उड़ता रहता है। पृथ्वी का आकर्षण नहीं होता अर्थात् सृष्टि की कोई वस्तु, व्यक्ति, सम्बन्ध उसे आकर्षित नहीं करता। हम फरिश्ता बनना चाहते हैं तो हमें क्या करना होगा? इन आकर्षणों पर विजय प्राप्त करनी होगी। अगर हम इन पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे तो हमारी अव्यक्त स्थिति, फरिश्ता स्थिति, बाप समान स्थिति कैसे होगी? केवल लक्ष्य रह जायेगा, परिवर्तन की प्रक्रिया आयेगी ही नहीं।
यह जो विनाश की बात है, यह संसार के प्रति हमारे में विकर्षण पैदा करती है। सतयुग की बात हमारे में आकर्षण पैदा करती है। जब तक हमारे लिए कोई ठीक आकर्षण न हो और जो अभी आकर्षित करता है उसके प्रति हमारा विकर्षण न हो, तब तक हमारा पुरुषार्थ नहीं होगा। यह जो दो साक्षात्कार बाबा ने किये, इनसे उनको हो गया कलियुग से विकर्षण और सतयुगी दुनिया से आकर्षण। कल तक बाबा को हीरे, हीरे दिखायी पड़ते थे, वे ही आज बाबा को कौड़ियों जैसे, कोयले जैसे दिखायी देने लगे। बाबा ने देखा, सतयुग में हीरे तो दीवारों में जड़े हुए हैं। वहां हीरों का कोई मूल्य नहीं। ऐसी दुनिया में में जाने वाला हूं। तो उनका मन उधर आकर्षित हो गया और कलियुग की तरफ़ विकर्षण हो गया।
जब हम पाण्डव भवन में प्रवेश करते हैं तो वहां महाद्वार के पास पीकृष्ण का चित्र बना हुआ है। उसमें श्रीकृष्ण कलियुग को लात मार रहा है और हाथ में गोला लिया हुआ है सतयुगी सृष्टि का। यह क्या दिखाता है? उसके प्रति विकर्षण और इसके प्रति आकर्षण। इस संसार में ऐसे बहुत आकर्षण है। अभी लोग टी. वी देख रहे है। मनुष्य को बड़ा प्रलोभन आता है। लोग कहेंगे, महाभारत के सीरियल बहुत अच्छे आ रहे हैं। आप देखते नहीं है, आप तो पागल है। उसको देखने से क्या नुकसान होगा? आपका योग ही कच्चा है। आप क्या साधना करते हैं? महाभारत तो धार्मिक सीरियल है। आप इसको भी देख नहीं सकते? ऐसे घर वाले हो या साथीसम्बन्धी हो आपको प्रलोभन दिलायेंगे। हमें मालूम है कि ये सब नष्ट होने वाले है। ये टी.वी. टी.वी. दिखाने वाले, टी.वी. बनाने वाले सब नष्ट होने वाले है नाश होने वाले हैं। बाबा कहते हैं कि यह टी.वी. टी.बी. की बीमारी है। अगर टीवी पर हमारी कोई फिल्म आ रही है. हमारा प्रोग्राम आ रहा है, तो वो बात अलग है। अगर आकर्षण में आकर हम देखते हैं तो यह ठीक नहीं। मै आकर्षण की बात कह रहा हूँ। किसी चीज को हम शिक्षा के हिसाब से या ईश्वरीय सेवा के लिए इस्तेमाल करते हैं तो वो बात अलग है। अगर उसके आकर्षण में आकर इस्तेमाल करते हैं तो हम उस पर विजयी नहीं हो सकते। संसार में बहुत-से आकर्षण दिन-प्रतिदिन पैदा हो रहे हैं। लोग इसी दुनिया को स्वर्ग समझ रहे हैं। लेकिन जब हम इन सब सांसारिक आकर्षणों का प्रतिरोध करके, इन प्रलोभनों को पार करेंगे, उनके प्रति विकर्षण आयेगा तब ही हमारे में परिवर्तन की प्रक्रिया आयेगी। अगर हमने दिव्यदृष्टि से न सही लेकिन दिव्यबुद्धि से साक्षात्कार किया हो कि इस संसार को आग लगनी है, विनाश होने वाला है तो हमारे में विकर्षण शक्ति आयेगी और परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होगी। अगर बुद्धि में यह स्पष्ट नहीं है तो आप में परिवर्तन या विकर्षण नहीं आ सकता।
साकार में बाबा को जब कोई अनेक मंज़िल वाली इमारत दिखाने ले जाते थे तो बाबा कहते थे कि बच्चे उसको क्या देखना है. यह तो ताश के पत्ते की तरह गिरने वाली है. विनाश को प्राप्त करने वाली है। हमारी बुद्धि में यह स्पष्ट रहना चाहिए कि अति के बाद अन्त होने वाला है। संसार की नयी-नयी चीजों को देखकर आकर्षित होने की बजाय हमारे मन में यह आना चाहिए कि विनाश का समय नजदीक आता जा रहा है। संसार अति की ओर जा रहा है। यह कहावत मशहुर है कि अति के बाद अन्त निश्वित है। इस भावना से भी हमारे में विकर्षण आता जायेगा।
जितना जितना सतयुगी पवित्र सृष्टि की तरफ हमारा आकर्षण होगा, उतना उत्तना हम पवित्र बनेंगे। तभी तो हम दिव्यगुण धारण करने की कोशिश करेंगे। तभी तो हम नर से नारायण, मनुष्य से देवता बनने का पुरुषार्थ करेंगे। बाबा कहते हैं कि सतयुगी सृष्टि जो है वह बहुत विचित्र दुनिया (Wonder of the world) है। उसका वर्णन करने के लिए कोई शब्द ही नहीं, उसका कोई मुकाबला नहीं। वहां किसी प्रकार का दुःख-अशान्ति नहीं और ऐसी कोई सुख-शान्ति नहीं जो वहां उपलब्ध न हो। जब उसका पूरा चित्र हमारे सामने हो तब हमारे परिवर्तन की प्रक्रिया बड़े जोरदार रूप में शुरू होगी।
बाबा कहते हैं कि मरजीचा बनो। मरजीवा बनना भी परिवर्तन की नींव है। अपना नया जन्म समझो। जब कोई मर जाता है तो पिछले उसके सम्बन्धी भूल जाते हैं। पिछला धन, पिछली बातें, पिछली सारी कहानी भूल जाती है और उसका नया सम्बन्ध, नये सम्बन्धी, सब-कुछ नया होता है। बाबा कहते हैं कि पहले परिवर्तन की शुरुआत यहां से करो कि मैं उस दुनिया से मर चुका है, मेरा मरजीवा जन्म है। हमारा पहला पहला यह लक्ष्य हो कि मुझे बदलना है। परिवर्तन आपका परम लक्ष्य हो। दूसरा बदलता है या नहीं बदलता है लेकिन मुझे बदलना है, मुझे अपने में परिवर्तन लाना है. मुझे आगे बढ़ना है. पुरुषार्थ की रफ्तार तेज करनी है।
कई भाई-बहने मेरे से पूछते हैं कि लक्ष्य बहुत ऊंचा है, हम तो अभी आये हैं। हमें समय तो बहुत कम मिला है। हम कैसे बाप समान बन सकते है? हमने बाबा-मम्मा को बहुत करीब से देखा, उनमें बदलने की प्रक्रिया तेज थी। उन्होंने थोड़े से समय में बदला। हम अपने एक-एक संस्कार का बदलने में वर्ष ले लेते हैं। हमें सब कहते हैं कि आप बहुत अच्छे है लेकिन आपमें यह आदत खराब है, यह छोड़ दो। उस एक आदत को छोड़ने में कितना समय लगता है। मम्मा के जीवन में हमने यह देखा कि एक बात बाबा ने मुरली में कह दी, बाबा ने दोबारा वह बात उनको कहने की आवश्यकता महसूस नहीं की। कहते है ना देवता को इशारा ही काफी । हम जीवन में यह समझ ले कि सिद्ध करने की या जिद्द करने की जरूरत नहीं है कि यह व्यक्ति गलत है और हम ठीक है। सीधी-सी बात तो यह है कि बदलना तो मुझे है। हम अपने जीवन का यह लक्ष्य बना लें कि दोबारा कोई हमे यह सावधानी न दे कि आप में यह सस्कार खराब है। कहने से पहले बदल जायें। कहने का दूसरा अवसर हम किसी को दें ही नहीं। समय तो उतना ही रहेगा चौबीस घंटे का दिन उससे ज्यादा बढ़ेगा नहीं। आप उतने ही समय में चलकर अन्तर मिटाना है। कैसे? चलने की गति को तेज करने से। किस बात में तेज़ चलेंगे? परिवर्तन जल्दी करें। बाबा कहते हैं। उड़ती कला में जाओ। उड़ती कला कैसे आयेगी? इन आकर्षणों को जल्दी-जल्दी छोड़ते जाओ। एक-एक संस्कार को बदलने में समय नहीं लगाये, एक ही धक्क से पुराने संस्कारों को बदल दें। तब बाप समान बनने का आपका लक्ष्य पूरा होगा।
बाबा की जीवन कहानी से सबसे पहले हम यह सीखते हैं कि दुनिया मरी पड़ी है, अब खत्म हुई कि हुई। 'बीती सो बीती देखो और दुनिया न जीती देखो', 'बीती से बोती जानो, पुरानी दुनिया न जीती जानो।' पुरानी बातें भूलते जाओ, यह बाबा का कहना है क्योंकि नयी सृष्टि आनी वाली है। बाबा कहा करते हैं कि एक आँख में मुक्ति और एक आँख में जीवनमुक्तिः। तो जल्दी हम यहां से फारिग हो जायेंगे। दिन-प्रतिदिन हमारी उन्नति होती रहनी चाहिए, परिवर्तन होता रहना चाहिए। परिवर्तन पीछे की तरफ नहीं. आगे की तरफ़; मनुष्यत्व की तरफ़ नहीं, देवत्व की तरफ। इस बात की आप ध्यान रखो कि हमारे पुरुषार्थ की गति तीव्र हो, एक ही बात पर बाबा हमे बार-बार कहे नहीं। बाबा ने कहा और हमने किया। परिवर्तन की प्रक्रिया पहले मुरली से शुरू होती है। कैसे? जो बात मुरली में कही ग़ई है. उस पर मुझे चलना है। किसी ने कहा है कि सत्य बाण के समान है (Truths are like arrows), जैसे कि तीर जाकर मनुष्य को लगता है और मनुष्य मर जाता है। जब हम ज्ञान सुनते है तब उसकी हरेक बात हमे लगनी चाहिए। बाबा की कोई बात फालतू नहीं है। हर बात सत्य है, सरल है और प्रयोगात्मक है। जो बुद्धिमान व्यक्ति होता है, वह उतनी ही बात कहता है। जितनी कहनी जरूरी हो। वह अपने शब्दों को व्यर्थ नहीं बहाता। परम बुद्धिमान, ज्ञान का सागर परमपिता परमात्मा शिव बाबा है, उनके महावाक्यों में, उनकी मुरली में एक शब्द, एक अल्प विराम, एक पूर्ण विराम जो है, आप मुझे बता दीजिये कि यह फालतू है, इसके बिना भी काम चल सकता था। बाबा की मुरली में एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य, एक-एक बाण के समान है। तो आपको लगा वो तीर वो बाण? आपने देखा होगा, बाबा अभी भी जब सारी बातें सुनायेंगे, होमवर्क देंगे, उसके बाद कहेंगे, समझा? थोड़ी देर के बाद फिर कहेंगे, अच्छा बच्चे, समझा? क्यों पूछते हैं, अब समझा? सब सुन तो रहे है, समझ तो रहे हैं, फिर भी बाबा पूछ रहे हैं कि समझा? बाबा के पूछने में जरूर कोई अभिप्राय है। इसका मतलब यह है कि बहुत-से लोगों ने नहीं समझा। समझते हुए भी नहीं समझा । समझा होता तो बाबा की इतनी अव्यक्त मुरलियां चल चुकी हैं, हमारे में कितना परिवर्तन हो गया होता ! हमने सुन तो लिया, समझ तो लिया लेकिन वो बात तीर के समान नहीं लगी। हमारे अन्दर छिपे हुए हमारे जो शुत्र हैं. काम, क्रोध... उनको लगी नहीं। ये तीर उन शत्रुओं के लिए तो है मुरली में। कोई बात किसी दुश्मन के लिए और कोई बात किसी दुश्मन के लिए। हमने मरली सुन ली लेकिन हम वहाँ के वहीं रह गये। जमीन तो हिल गई लेकिन हम वहीं के वहीं बैठ गये। जो भी मुरली हम सुनते हैं, जितनी भी मुरली हम सुनते हैं, सुनने के बाद हमे यह महसूस होना चाहिए कि यह हमारे लिए थी और बाबा की बात से हमारा यह शत्रु मारा गया। | महाभारत में हम पढ़ते आज के दिन अश्वत्थामा मारा गया. आज के दिन फलाना मारा गया। है ना ।।इस महाभारत में हमारे अन्दर का कौन मारा गया? अगर नहीं मारा गया तो भगवान जी के सारे तीर व्यर्थ गये? हमारे ऊपर एक भी नहीं क्या कवच पहना था कवच पहनना चाहिए माया के विरुद्ध हमने पहन लिया मुरली के विरुद्ध बाबा की बातें हमें ऐसी लगे कि अन्दर छिपे हुए बिलकुल अन्दर गहराई में छिपे हए जो हमें पता भी नहीं है वो दुश्मन मारें जाये और हमे लगे कि हाँ आज मै हल्का हो गया, आज मेरी यह मुसीबत टल गयी। इसलिए पहले हमे मन में यह धारणा पक्की कर लेनी चाहिये बाबा की जो मुरली हमने सुनी या हम सुनते हैं, उसको धारण करना हो है।
मम्मा देहली में आयी हई थी। उनसे मिलने दिल्ली का एक बड़ा बिजनेसमैन आया हुआ था। उसको सेन्टर की बहन ने बुलाया था मम्मा से मिलाने के लिए। क्योंकि उसकी पत्नी ज्ञान में चलती थी और पवित्र रहना चाहती थी, वह आदमी नहीं मानता था। वह आदमी बुजुर्ग होने के बाद भी विकार छोड़ता नहीं था। रोज घर में झगड़ा होता था। पत्नी के रास्ते में विघ्न डालता था। टीचर ने उसे बहुत समझाया था लेकिन उसकी समझ में नहीं आया। टीचर ने सोचा कि अगर मम्मा इसको समझाये तो वह समझ जायेगा फिर उनके घर से और भी ज्ञान में आ सकेंगे और उस माता का बन्धन टूट जायेगा। टीचर ने मम्मा से उन दोनों का परिचय करवाया कि मम्मा, यह इसकी धर्मपत्नी है और यह उसका पति है, इनकी यह समस्या है। मम्मा ने उस व्यक्ति को एक बात समझायी कि यह अन्तिम जन्म है. बाबा कहता है कि अन्तिम जन्म का भी यह थोड़ा-सा समय है, बच्चे, थोडे-से समय के लिए बाप की बात नहीं मानेंगे? पवित्र नहीं बनेंगे? जन्म जन्मान्तर के लिए सुख-शान्ति-पवित्रता का खजाना प्राप्त नहीं करेंगे? थोड़ी देर के बाद मम्मा ने उससे पछा. समझा? वह ऐसे सिर हिलाये कि नही समझा। मुख से हां या ना नहीं बोला लेकिन सिर हिलाता रहा। मैं भी मम्मा के पास बैठा हुआ था। उसको देखकर मम्मा बहुत हंसे। मम्मा बहुत मधुर थी, बहुत प्यार से किसी को समझाती थीं। हम लोगों में से कोई होते तो कहते थे कि यह मुढमति आदमी, समझता ही नहीं, काहे को अपना दिमाग खराब करें। अरे भाई, इसकी छुट्टी करो, दूसरे आदमी को मिलाओ, समय व्यर्थ जा रहा है। लेकिन मम्मा उसको देखकर हंसती थीं और उस पर परीक्षण भी कर रही थीं। फिर मम्मा ने समझया कि पवित्र रहने से स्वर्ग की बादशाही मिलती है। उसके बाद फिर मम्मा ने पूछा, समझा? उसने फिर सिर हिलाया कि मैंने समझा नहीं। मम्मा ने अपने चार-पांच तीर छोड़े लेकिन उसको एक भी तीर लगा नहीं। क्लास का समय हो रहा था, मम्मा को क्लास कराने जाना था। मम्मा ने कहा, अच्छा बच्चे, सोचना, विचार करना, हम क्लास में जाते हैं। मम्मा क्लास में चली गयी। वो शाम की क्लास थी। दूसरे दिन यह आदमी सुबह की क्लास में फिर आया। पहले मुरली सुनानी थी, उसके बाद में मम्मा की क्लास थी। वह मुरली सुन रहा था। मुरली में आया हुआ या कि जो दूसरे के वस्त्र खींचता है, दूसरे को नग्न करता है वही दुशासन है। बाबा के ये शब्द उस आदमी ने सुने। तो उसको लग गया कि वो दुशासन मै हूं. वो दुशासन मै हूं, वो दुशासन मै हूं। उसके अन्दर यह आवाज गूंजती रही कि वो दुशासन मै हूं। वो आवाज़ उसको अन्दर कचोटती रही कि वो दुशासन मैं हूं। उसको महसूस होने लगा कि ये शब्द मेरे लिए कहे गये हैं क्योंकि मैं अपनी पत्नी के साथ ऐसी हरकतें करता हूं। मैं वो दुशासन हूं। अभी तक तो वह यह समझता था कि महाभारत में एक दुशासन था जिसने द्रौपदी का चीरहरण किया था। आज उसको लगा कि वो दुशासन मै हूँ। बाबा ने कहा था. जो भी ऐसा करता है, वही दुशासन है। यह बात उसको लग गयी कि मैं भी ऐसा करता हूं तो में ही दुशासन हूं। मुरली क्लास समाप्त हो गयी और मम्मा की क्लास भी समाप्त हो गयी। उसके बाद वह आदमी टीचर से कहता है कि मझे दो मिनट मम्मा से मिला दो। टीचर ने समझा कि कल तो इसने मम्मा का समय खराब किया है. आज भी करेगा। उसने कहा, मम्मा का समय बहुत कीमती है. उनको औरों से भी मिलना है. आप तो कल मिন चुके हो। उसने कहा, मैं ज़्यादा समय नहीं लूँगा, दो मिनट माना दो ही मिनट, मुझे उनसे मिला देना। जब मम्मा क्लास से बाहर आयी तो उनसे मिलाया। उसने मम्मा से कहा कि मम्मा, आज मैं समझ गया। मम्मा ने पूछा, क्या समझा? कहता है, मम्मा, आज बाबा ने जो मुरली में कहा कि जो व्यक्ति दूसरे को नग्न करता है, चीर हरता है वह दुशासन है। मम्मा, वो दुशासन मैं हूं। यह कहते हुए उसकी आंखें गीली हो गयीं और आंसू टपक रहे थे। मम्मा के सामने सिर झुकाकर खड़ा हो गया। मम्मा ने उसको बहुत प्यार किया और पूछा, अब तो ठीक रहोगे? उसने कहा, हाँ मम्मा, आज से लेकर मैं ऐसी हरकते नहीं करूंगा। बाबा की वो बात उसको बाण की तरह लगी थी।
हम भी मुरली सुनते हैं लेकिन हमारे में परिवर्तन आना चाहिए। मुरली अर्थात् ज्ञान। यह ज्ञान क्या है? यह ज्ञान परिवर्तन का साधन है। मुरली को या ईश्वरीय ज्ञान को केवल श्रवण मात्र का साधन नहीं समझें। मुरली का हरेक शब्द, हरेक वाक्य परिवर्तन की युक्ति है। बाबा की सारी मुरलियाँ हैं युक्तियां जिनसे मुक्ति मिलती है, सारी मुरलियाँ हैं विधियां जिनसे सिद्धि मिलती है। आप उनको इस दृष्टि से नहीं सुनते हैं अथवा यह नहीं समझते हैं कि यह मुरली मेरे लिए है इसीलिए आपमें परिवर्तन नहीं आता। लोग रोज़ गीता पढ़ते हैं और सुनते हैं कि हे अर्जुन ! काम, क्रोध, लोभ, मोह... नरक के द्वार हैं। अगले दिन भी वहीं पड़ते हैं कि हे अर्जुन ! काम, क्रोध.. नरक के द्वार हैं। रोज पढ़ने या सुनने पर भी लोग क्यों नहीं बदलते? क्योंकि वे समझते हैं कि भगवान ने अर्जुन को कहा है, हमें नहीं। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि बाबा ने हमें कहा है, मेरे लिए कहा है, मुझे करना है तब तक हमारे में भी परिवर्तन की प्रक्रिया आयेगी ही नहीं। इसीलिए जब हम मुरली सुनते हैं तो समझना चाहिए कि यह ज्ञान परिवर्तन की चाबी है। यह युक्ति है मुक्ति देने वाली। यह विधि है सिद्धि देने वाली। जिन विघ्नों में हम पड़े हुए हैं, उनको हटाने वाली यही एकमेव परम चाबी है।
सर्व सहारे देने वाला समर्थ वह एक परमात्मा बाप है, अब वह खुद अपनी एक्ट कर रहे हैं। हमारा सम्बन्ध है ही उनसे। सभी का सहारा वह एक ही है, करनकरावनहार भी वह है। स्थापना, पालना, विनाश कराने वाला भी वह एक हुआ ना! उससे सर्व प्राप्तियाँ हो जाती हैं इसलिए उनको बाप, टीचर, सतगुरु कहते हैं। वही नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर है।
अब उनका फरमान है कि मुझे याद करने से तुमको बल की प्राप्ति होगी जिससे पुराना खाता विनाश करना है और नया जोड़ना है। तुम मात-पिता... भी उनको ही कहते हैं।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
योगविद्या, जिससे सारे पुरुषार्थ सम्पूर्ण हो जाते हैं
योग हमारा मुख्य विषय है। हमें इसमें दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमारे परिवर्तन का भी योग से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। हमारे में कई गहरे संस्कार हैं, जो हमसे भी छिपे हुए हैं। हमारा जो मन है उसमें भी बहुत-सा हिस्सा छिपा हुआ है, हमें मालूम नहीं है कि उसमें क्या-क्या पड़ा हुआ है। मन के अन्दर जन्म-जन्मान्तर के दबे हुए, छिपे हुए संस्कार हैं। उनको भी समाप्त करने वाला योग ही है। बहुत गहराई में छिपी हुई, दबी हुई हमारी उन विकृतियों, जन्म-जन्मान्तर के विकारजनित संस्कारों को दग्ध करना है। वो भी योग से, योग की अग्नि से ही हो सकता है। अगर वे छिपे हुए संस्कार परिवर्तित नहीं होंगे तो हमारा पूर्ण परिवर्तन, स्थाई परिवर्तन कैसे होगा? योग की भी ऐसी शक्तिशाली अवस्था चाहिए उन दबे हुए संस्कारों को दग्ध करने के लिए।
योग के बारे में हमें इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में पहले दिन ही समझाया जाता हैं कि योग आत्मा का, परमात्मा से मिलन है। आत्मा को अपना नाता परमात्मा से जोड़ना इसी का नाम योग है। हमें बताया गया है कि आत्मा में मन-बुद्धि-संस्कार होते हैं। अगर आत्मा को योग परमात्मा से लगाना है तो योग में ये सब हमारे काम आते हैं। यह मन यानि संकल्प शक्ति, बुद्धि यानि निर्णय शक्ति या निश्चय शक्ति या विवेक शक्ति का भी योग से सम्बन्ध है। आत्मा में ये जो शक्तिया हैं, इन सबका सामूहिक नाम ही 'आत्मा' है। हम मनुष्य कहते हैं, मनुष्य एक शब्द है लेकिन उसमें आँख, कान, मुंह, हाथ, पांव सब आते हैं ना ! इन सबको मिलाकर मनुष्य कहते हैं। मनुष्य कहने से हमारा अभिप्राय इन सब अंग-प्रत्यंगों वाला व्यक्ति है। इसी प्रकार से आत्मा जो चेतन शक्ति है उसमें ये सब शक्तिया है मन बुद्धि संस्कार, स्मृति भावनाये। जब हम आत्मा का योग परमात्मा से लगाना चाहते है, उसमें इन सबका प्रयोग जरूर होगा। अगर हम गहरा योग लगाना चाहते है तो उसमें इन सबकी तरफ ध्यान देना जरूरी है।
मन का या आत्मा का सबसे पहला चिह्न है, इच्छा। इसको कहते हैं इच्छा शक्ति (will power)। जिसमें इच्छा शक्ति प्रबल होती है, वह व्यक्ति जो सोचता है वह कर डालता है। उसके लिए कोई काम असंभव नहीं है। आत्मा में इच्छा शक्ति नहीं है तो यह शरीर हिल ही नहीं सकता। हम योग में बैठ ही नहीं सकते। योग का संकल्प ही नहीं कर सकते जब तक पहले इच्छा न हो। इसलिए शुरुआत यहां से होती है। आत्मा को किसी भी कर्म में, पुरुषार्थ में प्रवृत्त करने वाली भी वो इच्छा है। बाबा ने योग की व्याख्या की हुई है कि लगन में मगन होना ही योग है। योग करने की इच्छा इतनी तीव्र हो, लगन की तरह से हो। एक होती है साधारण इच्छा, जिसको हम कहते हैं चाहना (liking)। एक होती है लगन, जो चीज़ चाहिए होती है, वह मिलने तक, वह कार्य होने तक छोड़ नहीं देना। जब तक लगन ही तीव्र न हो, इच्छा ही गहरी न हो, योग आपका कैसे गहरा लगेगा? जिस व्यक्ति को भूख ही नहीं लगेगी, खाना ही नहीं खायेगा उसके शरीर में शक्ति कैसे आयेगी? इच्छा-शक्ति के बारे में बाबा ने अनेक मुरलियों में सुनाया है, आप उनका अध्ययन करें।
एक तरफ बाबा कहते हैं 'इच्छा मात्रम् अविद्या', दूसरी तरफ़ है, इच्छा बिगर योग नहीं लगता। इसका क्या मतलब है? किन इच्छाओं की अविद्या हो? यह जो संसार है. इसके पदार्थों की इच्छा, इसके व्यक्तियों की इच्छा, भोग के पदार्थों की इच्छा, तृष्णा जो पहले से हमारे में रही हुई हैं, इनकी अविद्या। जितनी इन भौतिक इच्छाओं की अविद्या होगी उतनी हमारे योग की गुणवत्ता होगी। योग की हमारी इच्छा जितनी प्रबल होगी उतनी इन दुनियावी इच्छाओं की अविद्या होगी। वरना संसार के प्रति हमारा आकर्षण होगा, संसार के पदार्थों को प्राप्त करने की इच्छा रखेंगे। जितना हम उनकी तरफ भागे, उतना हमारा योग कम लगेगा और उतना हम योगी जीवन से दूर होते जायेंगे। जब हमारे में यही एक इच्छा होगी कि हमें बाप समान बनना है, और कुछ नहीं चाहिए तब योग लगेगा। बाबा ने सुनाया है कि हम में कौन-सी इच्छायें होनी चाहिएँ और कौन-सी इच्छाये नहीं होनी चाहिएं। योग की इच्छा इतनी तीव्र हो कि वह लगन का रूप ले ले। बाबा कहते हैं, योग अग्नि है और लगन को भी कहते हैं अगन है। इसलिए इच्छा की यह लगन जितनी तीव्र होगी, उतनी योग की अगन भी तीव्र होगी। हमारी इच्छा इतनी तीव्र हो कि मैं ऊँचे दर्जे का योगी बनूँ। मेरा मन बाबा में टिका रहे, मैं उस आनन्द रस को पीता रहूँ, मेरा सब भोग-विलास समाप्त हो जाये। मेरा मन कौए की तरह इस संसार रूपी कचड़े पर बैठना छोड़कर, अब हंस बन जाये। अब मैं परमात्मा के ज्ञान-मोती चुगता रहूं। जैसे चात्रक पक्षी के लिए कहा है कि स्वाति नक्षत्र की बारिश की बूंद पीकर, उसको मोती बना देता है, वैसे मैं भी बाबा से ज्ञानामृत पीता रहूं। जीवन में मुझे यही इच्छा हो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। अब मुझे शिव बाबा मिल गया, अब मेरा मन शिव बाबा में रमज़ा है। मैं उसी में मगन रहूं। यही मेरी एकमात्र इच्छा हो। यही इच्छा सब इच्छाओं को समाप्त करने वाली इच्छा है।
योग में मगन अवस्था निर्भर है लगन पर, लगन निर्भर है इच्छाओं पर। इच्छा क्या है? हमारे मन का सम्बन्ध कईयों से लगा हुआ है, कई वस्तुओं में आसक्ति है, आकर्षण है, उसी का नाम सामूहिक रूप से इच्छा है। कुछ न कुछ वहाँ से चाहिए, उनसे कुछ उम्मीद रखी हुई है। कुछ सहारा, कुछ आधार वहां का लिया हुआ है। मनको उन सबसे निकाल कर एक तरफ लगाना है। इसी को मन्मनाभव कहते हैं। मन वहां जाता है जहाँ मनुष्य की इच्छा हो मनमनाभव भी कैसे होंगे? जब हमारी इच्छा यही होगी कि मुझे
एक बाप को याद करना है, उसी से ही सब कुछ पाना है। एक परमपिता परमात्मा दुसरा न कोई यही इच्छा शक्ति का दूसरा नाम है। जिसकी पह शक्ति कमजोर होगी उसका योग कमजोर होगा। इसलिए यह हमारी श्रेष्ठ इच्छा हो इच्छा की पराकाष्ठा हो कि एक बाप, दूसरा न कोई।
दुसरा है. विचार शक्ति, संकल्प शक्ति (Thought power)। योग क्या है श्रेष्ठ संकल्पों की स्मृति। हमारे ये संकल्प जिनने तीव्र होंगे उतना हमारा योग भी तीव्र होगा। ये श्रेष्ठ संकल्प है याद के सकल्प। ये याद रूपी सकल्प है। इन संकल्पों में और कोई संकल्प मिश्रित नहीं होगे। ऐसा नहीं, एक संकल्प आ गया कि मैं आत्मा हूं. दूसरा आ गया कि में डॉक्टर हु. मुझे डिस्पेंसरी में जाना है। तो हमारा योग कैसे लगेगा? योग करने के लिए बैठ गये, योग करना आरम्भ किया उतने में याद आया कि अरे, आज तो मुझे रसोई में जाकर खाना बनाना है। यह योग नहीं हुआ। योग है जिसमें एक संकल्प की धारा होती है। धारा में अन्तर नहीं होता, निरन्तरता (continuity) होती है। तेल की धारा में अन्तर नहीं होता, तेल की बूंद एक से एक मिली हुई रहती है। निरन्तर गिरता रहता है। ये जो हमारे संकल्प है एक से एक जुटे हुए हैं, आत्मा के, परमात्मा के, परमधाम के, स्वधर्म के, स्वस्थिति के। इनके बारे में ही हमारे संकल्प हों, दूसरे संकल्प कोई न आये। ये शक्तिशाली संकल्प हों, अखण्ड संकल्प हो, निश्चयात्मक संकल्प हो। योग का दूसरा नाम ही निश्चय है। 'मैं आत्मा हूं', यह सिर्फ संकल्प नहीं है, यह निश्चय है, इसमें मैं निश्चयात्मक रूप में स्थित होता हूँ कि मैं आत्मा हूँ। जब हम निश्चयपूर्वक संकल्प करेंगे तभी अनुभव होगा। वैसे ही साधारण संकल्प से अथवा सिर्फ यह सोचने से कि मैं आत्मा हूं, इससे अनुभव नहीं होगा। अगर किसी को योग में अनुभव नहीं होता है माना उसने योग में जो भी संकल्प किया, निश्चयात्मक संकल्प नहीं किया अर्थात् उसके संकल्पों में निश्चय नहीं था। इसलिए योग में हमारे निश्चयात्मक संकल्प हो ताकि अनुभव कर सके। तीसरी है, विवेक शक्ति जिसको हम निर्णय शक्ति कहते है। जब तक हमारा सदविवेक जाग्रत न हो, हमने निर्णय न किया हो कि यह संसार अब विनाश होने वाला है, यह नरक बन चुका है, यह आसुरी संसार है, यह तमोप्रधान हो चुका है, यह निःसार हो चुका है और हमको जाना है सतयुग की ओर जहाँ सुख का भण्डार है, हमको जाना है वापिस घर, समय आ चुका है, तब तक हम योग की गहराई में जा नहीं सकते, अनुभव कर नहीं सकते। मम्मा हमेशा यही सुनाती थी कि समय अपना फैसला दे रहा है, भगवान अपना फैसला दे रहा है, अब तुम भी अपना फैसला करो कि करना क्या है। जब तक कोई मनुष्य अपने जीवन में अन्तिम निर्णय नहीं लेता, तब तह कार्य पूर्ण रूप से आरम्भ नहीं होता। अगर होता भी है तो ठीक ढंग से नहीं होता। जिसका मन अस्थिर होगा, हिलने-डोलने वाला होगा वह व्यक्ति खुद ही मुंझा हुआ होगा कि क्या करूँ, क्या न करूँ, क्या सही है, क्या गलत है। इसलिए जिसका जितना प्रबल निर्णय है, जिसमें जितना यह विवेक जाग्रत हो चुका है, जिसमें ये ज्ञान की बातें ठोस रीति से बैठ गयी है, आप देखेंगे उसमें योग की पराकाष्ठा भी उतनी ही रहेगी। जिस दिन उसके मन में बाबा के बारे में, आत्मा के बारे में या और किसी ज्ञान के विषय में संशय होगा, आप देखेंगे उस दिन उसकी स्थिति डाँवाँडोल होगी। इसलिए सशक्त योग के लिए हमारी विवेक शक्ति अथवा निर्णय शक्ति भी अटल हो। योग में अनुभव करने के लिए हमारी इच्छा शक्ति, विचार शक्ति, निर्णय शक्ति साथ देगी।
ईश्वरीय विश्व विद्यायल का जो पाठ्यक्रम है, अध्ययन का विषय-क्षेत्र है. उसमें योग बहुत अधिक महत्त्व रखता है। बाकी जितने भी विषय हैं वे योग के लिए सहायक है। हमारे जीवन की जीत और हार का जो प्रश्न है. जाति और अवनति का जो प्रश्न है, वह योग से ही जुटा हुआ है। बाबा कई दफा कहते हैं कि यह योग एक रेस (Tace दौड) है, इसमें सब हिस्सा ले रहे है. इसमें आपको आगे बढ़ना है, पुरुषार्थ को तीव्र करना है। सारे पुरुषार्थ के लिए योग का विशेष महत्त्व है। इसलिए हरेक को योग पर ध्यान देना होगा, योगी बनना होगा क्योंकि हमारा जीवन ही योगी जीवन है। केवल हमें योग करना नहीं है या योग का अभ्यास करना नहीं है लेकिन जीवन ही हमारा योगी जीवन हो, योगी पद्धति हमारे जीवन की पद्धति हो। योगी का दृष्टिकोण, योगी का व्यवहार, योगी का आहार, योगी का सोना-उठना-बैठना योगिक होना चाहिए। योगी की दिनचर्या, संसार के जो अन्य लोग हैं उनसे भिन्न होती है। हम अभ्यास भी योग का ही करते रहें और हमारा जीवन भी योगी का हो - इसी पर ही हमारे सारे पुरुषार्थ का आधार है। आप जानते हैं कि भविष्य 21 जन्मों की प्रालब्ध का आधार भी योग है। इससे पता पड़ता है कि योग का कितना महत्त्व है ! बहुत-से दर्शनों (Philosophies) में एक प्रश्न उठाया जाता है कि वह कौन-सी विद्या है, जिस विद्या के अध्ययन से, जिस विद्या की पढ़ाई से या जिस विद्या को धारण करने से सर्व प्राप्तियां हो जायें, और किसी भी पुरुषार्थ की आवश्यकता न हो। उसका उत्तर यही है कि वह स्वयं को जानने की विद्या है। स्वयं को जानने की वह विद्या केवल भौतिक रूप से, शाब्दिक रूप से नहीं। जानने का अर्थ है अनुभव करना। मैं आत्मा हूं, शरीर से भिन्न सत्ता हूँ, उसका अनुभव मुझे होना चाहिए। परमात्मा हैं, वे शान्ति के सागर हैं, आनन्द के सागर हैं... इसका अनुभव मुझे होना अनुभव के बिना वह कैसे मालूम होगा कि वो आनन्द क्या है. परमात्मा का प्यार क्या है। अगर अनुभव नहीं किया तो वह जानना, न जानना एक समान है।
योग ऐसी विद्या है, जिससे सारे पुरुषार्थ सम्पूर्ण हो जाते हैं। लौकिक में अलग-अलग प्राप्ति के लिए अलग-अलग पुरुषार्थ करना पड़ता है। मान लीजिये. बीमार पड गये तो डॉक्टर के पास जाना पडता है। आजीविका के लिए कमाई धन्धा आदि करना पड़ता है। लेकिन योग हमें 21 जन्मों लिए सदा निरोगी सदा सुखी और सदा सम्पत्तिवान बना देता है। इसलिये बाबा की हर मुरली में आता है कि योगी बनो. योगी बनो। अगर इस पर ध्यान नहीं देते तो हम अपने को धोखे में रखते हैं. अन्धेरे में रखते है गलतियों में रखते है। आप कितनी भी बातें सुने या सुनायें लेकिन योग नहीं करें तो समय पर मंजिल पर पहुंचेंगे नहीं। पहुंचेंगे तो जैसे कहते हैं ना, अंत में सब मच्छरों जैसे चलेंगे, उनमें एक मच्छर हम भी होंगे। वो बात अलग है। लेकिन अपने पुरुषार्थ से हम उस स्थिति को प्राप्त करें, यह तभी होगा जब हम योग का अभ्यास करेंगे।
उस अभ्यास के लिए मैं कह रहा था कि आत्मा की जो शक्तियां है इच्छा शक्ति है, वह कितनी शक्तिशाली हो जैसे कोई आदमी पानी बिगर तड़प रहा हो। मछली के लिए जैसे कहते हैं कि मीन जल बिन कैसे तडपती है, वैसे शिव बाबा से मिलने की हमारी इच्छा इतनी प्रबल हो कि हम उसके बिना रह न सकें। हमारा मन शिव बाबा के प्यार में इतना विभोर हो जाये कि हमारी कोई आश न रहे। हमारे जीवन में एक धुन सवार हो, एक लगन लगी हुई हो, एक कसक, एक तड़प हो कि मैं शिव बाबा का हूँ, मैं योगी हूं। वह योग की पराकाष्ठा कैसी होगी, कैसे मन उसमें रमा हुआ होगा, क्या मुझे चाहिए - वह इतनी तीव्र प्यास हो तब ही लगन में मगन होने की बात आती है।
मनोविज्ञान में भी यही बात आती है कि मनुष्य को कोई भी कार्य करने के लिए पहले प्रेरणा (motivation) चाहिए। मनुष्य को कार्य करने की इच्छा या प्रेरणा ही नहीं आयेगी तो वह करेगा कैसे? आपको पता होगा. महाभारत में दुर्योधन कहता है कि धर्म क्या है, मैं जानता हूं लेकिन मेरी प्रवृत्ति ही नहीं है, मेरी इच्छा ही नहीं है उसकी पालना करने की। धर्म क्या अधर्म क्या है न्याय क्या है अन्याय क्या है पाप क्या है या सारी समझ मुझे भी है लेकिन मैं अधर्म को छोडू उसके लिए भी मेरी इच्छा नहीं होती और धर्म को करूं, उसके लिए भी मेरी इच्छा नहीं होती। कोई भी कर्म करने के लिए इच्छा चाहिए।
योग के लिए सबसे पहले मन के द्वार खुले हो। मन के भी कई द्वार खिड़कियां है। शिव बाबा के प्रति मन को खोलने वाली है-यह इच्छा।कोई भी कार्य करने से पहले एक इच्छा होती है। वो इच्छा जितनी भड़की हुई होगी धधकी हई होगी तीव्र होगी, उत्कट होगी उतनी आपकी योग ज्वाला प्रज्वलित होगी। जितनी प्रबल इच्छा हमारी होती है, उसके अनुसार ही योग की हमारी अवस्था बनती है उतना ही हम योग में मगन होते है। योग में सबसे पहली बात है ध्यान (attention) योग क्या है? मन की एकाग्रता। मन की एकाग्रता क्या है? ध्यान की जो पराकाष्ठा है उसका नाम एकाग्रता है। ध्यान की परम सीमा को हम एकाग्रता कहते है। योग में क्या किया जाता है? सब तरफ से ध्यान को हटाकर शिव बाबा पर एकाग्र करते है। ध्यान भी उस तरफ जाता है जहां इच्छा हो। इच्छा के पीछे पीछे मनुष्य चलता है।
दूसरा है संकल्प शक्ति। योग के लिए संकल्प बड़ा तीव्र चाहिए। कहते है न कि इरादे का पक्का। दुनिया की कोई भी बात हमें विचलित न करे, हमारे इरादे को कमज़ोर न करे। नेपोलियन ने कहा कि तोपें पहाड़ी पर चढ़ा दो। सैनिकों ने कहा, यह कैसे हो सकता है? इतनी भारी तोपें पहाड़ी पर कैसे चढ़ेंगी, यह तो असंभव है। नेपोलियन ने कहा, असंभव शब्द मुर्खो के सब्दकोष में होता है (Impossible is a word in the dictionary of fools)। ये ले जाओ, पहाड़ी पर। ये जायेंगी, ले चलो ऊपर। मेरे शब्दकोष में 'असंभव' शब्द नहीं है। बड़े-बड़े सेनानियों ने बड़ी-बड़ी लड़ाई कैसे जीती? उनके मन में जो संकल्प था वो दृढ़ संकल्प था। उसने तोपें चढ़ाई पहाड़ी पर। लोग कुछ भी करें लेकिन करने वाला कर गुजरता है। चलता रहता है. आगे बढ़ता ही रहता है। इसलिए योग क्या है? योग का दूसरा नाम ही यात्रा है। यात्रा पर कोई पैदल चलता है. हर कोई किसी न किसी साधन द्वारा चलता है लेकिन योग की यात्रा पर हम मन से चलते है। शरीर हमारा यहाँ होता है और मन हमारा परमधाम पहुंच जाता है जो हमारा परम तीर्थ है, जहां पर शिव बाबा साक्षात् विराजमान है। परमधाम पहुंचेंगे कैसे संकल्प से. तो हमारा संकल्प कितना तेज होना चाहिए। संकल्प की तीव्रता इतनी होनी चाहिए कि सारी दुरिया खत्म कर, पार कर शिव बाबा के पास पहुंच जाये।
दूरियां कौन-सी हैं, आपको पता है? एक दूरी है दूरी-ए-मकाँ। मान लो आप रहते हैं मद्रास (चेन्नई) में और दादी जी रहती हैं मधुबन (आबु) में। यह जो फ़ासला है, दूरी-ए-मकाँ। है (distance of space) । दादी की के रहने का स्थान दूसरा है और आपके रहने का स्थान दूसरा है। यह जो स्थानों का फ़रक है, यह है दूरी-ए-मकाँ। शिव बाबा परमधाम में और हम यहाँ। यह दूरी है, यह दूरी पार कैसे हो? सिवाय संकल्प के यह दूरी पार नहीं हो सकती। दूसरी है, दूरी-ए-जमाँ, (distance of time) सम्राट अशोक हुए और हम आज हैं। अशोक हमारे सामने तो नहीं है लेकिन उसका इतिहास हम पढ़ सकते हैं। वो कभी था, अभी नहीं है। उसमें और हममें किस तरह की दूरी है? समय की दूरी है। यह है दूरी-ए-ज़माँ। तीसरी दूरी है, दूरी-ए-इलम। ज्ञान की दूरी, पहचानने की दूरी। कोई व्यक्ति आपके नज़दीक से गुजर गया, मालूम नहीं वह कौन है, उसी से आप मिलने जा रहे हैं। जब आपने उसके घर जाकर पूछा, तो घर वालों ने कहा, साहब, वे अभी-अभी यहाँ से गुज़रे, रास्ते में आपको मिले होंगे, उसी रास्ते से आप भी आये हो। आपको लगेगा, हाँ, ऐसे व्यक्ति को जाते हुए मैंने देखा था। वह व्यक्ति आपके नज़दीक से गया, आप आपस में बात कर सकते थे लेकिन आपको उसकी पहचान नहीं थी। जो ज्ञान है, पहचान है उसकी दूरी है। पहचान की, ज्ञान की दूरी होने के कारण दो व्यक्ति पास में बैठे हुए भी पहचान नहीं सकते। यह है दूरी-ए-इलम।
स्वतन्त्रता संग्राम का समय था। महात्मा गांधी जी रेल में पात्रा कर रहे थे। चित्रों में आपने देखा होगा, वे किस तरह के वस्त्र पहनते थे। एक छोटी-सी धोती पहनते थे, कुर्ता पहना या न पहना, चल पड़ते थे। थर्डक्लास डिब्बे में सफ़र कर रहे थे। उसी डिब्बे में उनके साथ दो किसान बैठे थे। रात को गांधी जी को नींद आने लगी। टांगें ऊपर करके बैठे-बैठे सो रहे थे। नींद में बाजू वाले किसान को उनकी टांग लगी। उस किसान ने गांधी जी की टांग पकड़कर धेकेल दी पीछे और कहा, अरे बूढ़े, ठीक तरह से बैठ, क्या कर रहा है, हमें टांग मारता है? बैठना नहीं आता तुझे? गाँधी जी ने मुस्कराकर टॉग पीछे कर ली। थोड़ी देर के बाद फिर सोये। फिर उनकी टांग वैसे हो गयी। फिर उस किसान ने कहा, पीछे हटाता या नहीं हटाता? बार-बार टांग मारता है, ऐसे कहकर टांग फिर धकेल दी। फिर गाँधी जी ने सोचा कि यह ठीक नहीं है, तो वे दोनों टाँगें नीचे करके बैठ गये। उस किसान को मालूम नहीं था कि ये महात्मा गाँधी जी हैं। वो समझा था यह भी कोई गरीब किसान होगा हमारे जैसे। जब उतरने का समय आया, गाड़ी स्टेशन पर पहुंची, लोगों की भीड़ थी। नारा लगा रहे थे कि 'महात्मा गाँधी जिन्दाबाद', 'देश के नेता जिन्दाबाद', 'आजादी लेकर ही रहेंगे।' लोगों ने देखा कि गाँधी जी इस डिब्बे में बैठे है. फूल माला लिये हुए उस डिब्बे की तरफ जाने लगे। दोनों किसान उठकर दरवाजे पर खड़े हुए थे. महात्मा जी उनके पीछे खड़े हुए थे। वे किसान बाहर खड़े हुए लोगों को कह रहे थे, हटो वहीं से रास्ता छोडो, यहाँ कोई महात्मा गांधी नहीं है. दिखायी नहीं पड़ता तुम लोगों को? गांधी जी पीछे खड़े हुए मुस्करा रहे थे। जब उतरे लोग उनको फूल माला पहनाने लगे। यह देखकर उन दोनों किसानों को अफसोस हुआ कि रातभर यह व्यक्ति हमारे साथ रहा, हमने इसका कुछ सुना नहीं इसकी सेवा की नहीं बल्कि उसको आराम से बैठने भी नहीं दिया। वे बिल्कुल पास में बैठे थे लेकिन वो चीज क्या थी? दुरी-ए-इलम, एक-दूसरे का परिचय नहीं था। भक्तिमार्ग में हमे परमात्मा का परिचय नहीं था। अब वो दूरी-ए-इलम समाप्त हुई। दूरी-ए-जमां भी समाप्त हई। अब हम आत्मा भी है और परमात्मा भी साक्षात है। अभी हमारे बीच में कोई दुरी नहीं है। तीसरी है, दूरी-ए-इरादा दो व्यक्ति एक स्थान पर रहते है, साथ-साथ रहते हैं. दोनों समकालीन हैं लेकिन उनके विचार आपस में नहीं मिलते। दो दोस्त हैं, दो भाई हैं, आपस में बहुत अच्छी तरह जानते भी हैं, साथ रहते भी हैं लेकिन दोनों के विचार मिलते नहीं हैं, भिन्न हैं तो यह है दूरी-ए-इरादा या दूरी-ए-ख्याल। वे आपस में कितने भी घनिष्ठ हों, नज़दीक भी ते लेकिन उनके एक-दूसरे के विचारों में दूरी है, मन का फासला है। इस दूरी को मिटाने के लिए हम क्या करते हैं? हम अपने विचारों को छोड़कर बाबा के विचारों को मन में लाते हैं। जो शिव बाबा के संकल्प हैं उन संकल्पों को अपने मन में लाते हैं। जैसे शिव बाबा शान्ति का सागर है, मै आत्मा शान्ति स्वरूप हूं, शिव बाबा आनन्द का सागर है, मैं आत्मा आनन्द स्वरूप हूँ। उन संकल्पों से हमारा स्वधर्म, हमारे ख्याल, हमारे इरादे वही होते हैं जो शिव बाबा के हैं। इस प्रकार हम शिव बाबा से तालमेल स्थापित करते हैं स्थान की दूरी, समय की दूरी, ज्ञान या पहचान की दूरी को मिटाकर। बाबा के रूप, गुण, देश, काल, कर्त्तव्य को हम अपना बना लेते हैं और सारी दूरियों को हम संकल्प शक्ति से खत्म कर देते हैं। चौथी दूरी है, दूरी-ए-ईमान। धर्म की दुरी। कोई कहता है, मैं मुसलमान हूं, कोई कहता है कि मैं हिन्दू हूं। कोई कहता है कि मैं विश्चियन हूं। तीनों के धर्म बदल गये तो तीनों के धर्मस्थान भी बदल गये, एक गया मस्जिद, दूसरा गया मंदिर और तीसरा गया चर्च । यह ईश्वरीय ज्ञान में आकर हमारी वो दरी भी मिट गयी क्योंकि हमारा स्वधर्म एक है. मेरा स्वधर्म भी शान्ति और पवित्रता है और परमात्मा शान्ति और पवित्रता के सागर ही है। हमारी दुरी-ए-ईमान नही रही। इस प्रकार, सब प्रकार की दुरी समाप्त करने के लिए संकल्प ही एकमात्र अति है। इस शक्ति से एकधक्क से सारी के सारी दूरियां समाप्त हो जाये और हम जाकर बैठ जाये परमधाम में शिव बाबा के पास।
विचार या संकल्प से तेज चीज और कोई होती नहीं है। इसलिए हम योग की जो भिन्न-भिन्न अवस्थाओं - विदेह स्थिति, बिंदु स्थिति, बीजरूप स्थिति, फरिश्ता स्थिति, कर्मातीत स्थिति में एकाग्र होकर बैठना चाहते हैं तो संकल्प ही एकमात्र साधन है। जितना आपका संकल्प शक्तिशाली होगा उतना ही आपके योग की अवस्था शक्तिशाली होगी।
तीसरी है विवेक शक्ति। बुद्धि में यह पक्का रहना चाहिए कि बस हमने सब-कुछ देख लिया, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मन पुरानी दुनिया से उठ जाना चाहिए, पुरानी दुनिया से मन खट्टा होना चाहिए। जितनी हमारी विवेक शक्ति शक्तिशाली होगी, उतनी ही हमारी योगाग्रि शक्तिशाली होगी। जब बुद्धि में वैराग आयेगा, दुनिया और दुनियावी साधनों से मोह नष्ट होगा तब ही पुरुषार्थ तीव्र होगा, योग अग्नि का रूप धरेगा।
पुराने जमाने के योगी लोग अपने सारे शरीर को भभूत से लेपित करते थे। जैसे हम लोग योग करते समय लाल लाइट जलाते हैं, गीत बजाते हैं ताकि हमें याद रहे कि हमें परमधाम को याद करना है, बाबा की याद में रहना है वैसे वे भी राख लगा देते थे या भगवा कपड़े पहन लेते थे। भगवा कपड़ा पहनना माना कफ़न ओढ लेना। याद रहे कि हमारे लिए सारी दुनिया मरी पड़ी है। हमने कफ़न पहन लिया, हम मर चुके हैं। मरजीवा बनने के प्रतीक के लिए वो कपड़ा पहन लिया। राख भी इसलिए लगा देते थे कि हमारे लिए यह दुनिया राख की मुट्ठी है, जली पड़ी है। यह संसार हमारे लिए धूल है। जब तक हम मन से दुनिया की तरफ का राग नहीं मिटाते, तब तक योग लगेगा नहीं। राग, अनुराग और आकर्षण कैसे मिटेंगे? जब हमारा विवेक जागेगा कि दुनिया में कोई सार नहीं है. सब निस्सार है, राख हई पड़ी है। जब विवेक में यह जाग्रत होगा तब मन योग में मगन होगा।
इसके बाद है. त्याग की शक्ति। जितनी हमारे में त्याग की शक्ति होगी उतना हम अपने जीवन में सादगी रखेंगे. अपने ऊपर कम खर्च करेंगे और प्रलोभनों में नहीं जायेंगे। अगर प्रलोभना में जायेंगे तो जीवन आपका खराब हो जायेगा, पैसे भी उनमें लगाओगे। धीरे-धीरे आपके जीवन में भोग प्रवेश करेगा और योग हट जायेगा, आपका योगी जीवन ही खत्म हो जायेगा। त्याग क्या है? मेरा सब-कुछ बाबा की सेवा के लिए है। बाबा ने त्याग पर कितनी मुरलियाँ चलायीं ! मनोविकारों का त्याग और देह-अभिमान का त्याग, ये तो हैं ही सर्व प्रथम और सर्व श्रेष्ठ त्याग। बाबा ने कहा है कि त्याग से भाग्य बनता है। त्याग, तपस्या और सेवा ये हमारे अलौकिक जीवन का त्रिविध पुरुषार्थ है। तपस्या का त्याग से सम्बन्ध है। जो व्यक्ति त्याग नहीं कर सकता, उस व्यक्ति की तपस्या भी नहीं हो सकती। उसका यही रहेगा कि मुझे नाम मिले, शान मिले, यश मिले, स्थान मिले। जिसको ये अपेक्षाये होंगी, इच्छायें होंगी, तृष्णायें होंगी और जिसने इन्हें त्यागा नहीं होगा वह तपस्या कैसे करेगा? यह जो त्याग है, इसकी भी शक्ति होती है, यह भी भक्ति का रूप धारण करता है। कमजोर व्यक्ति त्याग नहीं कर सकता। त्याग करने की भी शक्ति चाहिए, बल चाहिए। क्लास में आने वाला कोई व्यापारी भाई कहता है कि बहन जी, क्लास छोटा पड़ता है, बैठने के लिए सबको तकलीफ होती है, आप जगह लेकर मकान बनाओ, हम उसमे सहयोग देंगे। कुछ दिन के बाद वह व्यापारी सोचता है कि अरे पैसे इनको क्यों दे, व्यापार में लगा लिया तो अधिक पैसे आ जायेंगे, मेरा व्यापार बढ़ेगा। इनको देगा तो ये मकान में लगा देंगे। उसका विचार बदल जायेगा क्योंकि उसमे त्याग करने की शक्ति नहीं है। मन कमजोर है. कभी कहता है कि भाई सेवा में पैसा लगाकर सार्थक करो, भगवान की सेवा में सहयोगो जो फिर अगले दिन उसके पुराने संस्कार जाग्रत होते हैं तो मन कहता है कि ये पैसे व्यापार में लगाओ तो और पैसे बढ़ेंगे। उसमे त्याग की शक्ति नहीं है, जो त्याग नहीं करेगा वह तपस्या कैसे करेगा? पुराने संसार को भुलेगा कैसे? इच्छा उसको खेच रही है। सबसे बड़ी शक्ति है त्याग की शक्ति, स्व-समर्पण (Self-surrender) की शक्ति, एक शिव बाबा की शरण में जाने की अक्ति। अपने को उसके हवाले कर देना यह है त्याग की पराकाष्ठा मेरा कुछ है ही नहीं, सब-कुछ शिव बाबा का है, मैं तो फकीर हूं। मेरा और कुछ नहीं संसार में, मेरा एक ही सहारा है, शिव बाबा। जब वह यह समझ तेगा, तब ही उसके जीवन में योग की वह पराकाष्ठा आयेगी। हमारी वृत्ति ही त्याम की बन जाये। यह भी हमारी योग की ज्वाला को प्रज्वलित करने लिए मदद करेगी।
योग को तीव्र करने वाली और एक श्रेष्ठ शक्ति है, प्रेम की शक्ति। शिव बाबा से हमारा प्यार अनन्य हो, अटूट हो। वह प्यार सर्व रूप से हो। प्यार किसी न किसी सम्बन्ध से होता है। बिना सम्बन्ध के प्यार नहीं होता। जैसे भाई-बहन का प्यार है। ये दोनों भाई-बहन हैं, इनमें भाई-बहन का सम्बन्ध है इसलिए, उनमें भाई-बहन का प्यार है। जैसे दोस्तों का प्यार है। उन दोनों में दोस्ती का सम्बन्ध है इसलिए उनमें दोस्ती का प्यार है। पिता-पुत्र का प्यार है, वे दोनों पिता-पुत्र हैं इसलिए उनमें बाप-बेटे का प्यार है। प्यार के जितने भी प्रकार हैं, वे किसी सम्बन्ध से जुटे हुए हैं। बिना सम्बन्ध के प्यार नहीं होता। अगर शिव बाबा से हमारा पूरा प्यार होना है, तो माता-पिता, स्वामी-सखा सब वह हमारा एक ही है। आत्मा के सारे सम्बन्ध शिव बाबा से ही जुटे हुए हैं। वही हमारा दिलबर है। यह भावना जब तक हमारे में नहीं होगी प्यार हमारा सब तरह से उससे जुटा नहीं होगा तब तक हमारा योग श्रेष्ठतम होगा नहीं। एक तो प्यार, सम्बन्ध से होता है. दूसरा प्यार, प्राप्ति से
होता है। जब आपके ख्याल में यह रहेगा कि शिव बाबा से हमे क्या प्राप्ति होती है. तब भी आपका योग लगेगा। हरेक अपने जीवन में झांककर देखिये बाबा ने आपको सर्व दुःखो और दलदल से निकालने के लिए क्या नहीं किया होगा। उसको याद करके बाबा को शुक्रिया करते उसके प्यार में लवलीन हो जाइये। बाबा ने हमारे ऊपर जो कृपा, दया की है उसी को याद करो तो योग अपने ऊंचे स्तर पर चला जायेगा। बाबा को याद करने की बात तो छोड़ दो, उनकी याद ही नहीं भूल सकती क्योंकि उन्होंने इतनी हमारी रक्षा की है, शिक्षा दी है। त्याग की शक्ति के अतिरिक्त जो प्रेम की शक्ति है यह भी योग की अग्नि को प्रज्वलित करती है। जितना हमारा प्रेम शिव बाबा से जुटा होगा, उतना हमारा योग परिपक्व होगा, स्थाई होगा, निरन्तर होगा और गहरा होगा।
इसके अतिरिक्त है सहनशक्ति। कहते हैं, धर्म के रास्ते पर चलना है तो धर्म के धक्के खाने पड़ेंगे। कई परिस्थितियों को सहन करना पड़ेगा। हमारा योग तोड़ने के लिए कई परीक्षायें आयेंगी। उस समय हमारे में सहनशक्ति चाहिए। सहनशक्ति नहीं है तो आपका योग टूट जायेगा और ईश्वरीय मार्ग पर आप कमज़ोर हो जायेंगे, रुक जायेंगे, गिर जायेंगे। हमेशा जीवन में यह भी लक्ष्य रखो कि हमारे योगी जीवन में सहनशक्ति बहुत जरूरी है। बहुत बाते, परीक्षायें आयेंगी, जरूर आयेंगी। आज जो आपको प्यार करते हैं, सम्मान करते हैं कल वे आपका साथ छोड़ देंगे, आपको किनारे कर देंगे। जब आप संकट में होंगे, आप से दूर हो जायेंगे। आपने जिन पर भरोसा रखा था, मानते थे कि वे जरूर इस परिस्थिति में सहयोग देंगे, वे भी उस समय हाथ ऊपर कर देंगे। ऐसी परिस्थिति में आपमें सहन शक्ति न हो तो आपका मन टूटेगा, मन टूटेगा तो योग भी टूटेगा। यहां तक कि ज्ञान को भी छोड़कर चले जायेंगे। ऐसे किस्से हमने देखे हैं। यह सहनशक्ति एक बहुत बड़ी शक्ति है जो हमारे योग को टूटने से रोककर रखेगी। जैसे एक बड़ी इमारत की मज़बूत नींव उसको गरमी, सदी, बारिश और भूचाल से टूटने नहीं देती, वैसे सहनशक्ति योग रूपी इमारत की मजबूत नींव है जो योग को टूटने नहीं देती, आत्मा को योग के पथ से हटने नहीं देती।
और दो शक्तियाँ हैं, एक सन्तुष्टता और दूसरी मैत्री। ईश्वरीय मार्ग में अन्त तक परीक्षायें आयेंगी लेकिन हमें सन्तुष्ट रहना पड़ेगा, वो भी अन्त तक। हम कई वस्तुओं से वंचित रह जायेंगे या वंचित किये जायेंगे। जीवन में निराशा की, उदासी की परिस्थितियां आयेंगी लेकिन वे सब आने के बावजूद भी ड्रामा के अनुसार, पुरुषार्थ के अनुसार, हिसाब-किताब के अनुसार और किसी कारण के अनुसार जो वर्तमान है वह ठीक है, उसमें सन्तुष्ट रहो। अगर आप सन्तुष्ट नहीं रहेंगे तो आपका योग लगना ही बन्द हो जायेगा। योग में बैठेंगे, इच्छा शक्ति को जगायेंगे, बुद्धिशक्ति को जगायेंगे, प्रीत जुटायेंगे लेकिन सन्तुष्टता न होने के कारण मन शिव बाबा पर टिकेगा नहीं। जिस व्यक्ति के व्यवहार से या जिस वस्तु की कमी से आप असन्तुष्ट हैं, मन बार-बार उस तरफ़ ही भागता रहेगा। चाहे वह असन्तुष्टता अपने से होगी या दूसरों से लेकिन असन्तुष्टता योग में रहने नहीं देगी। ऐसा भी नहीं कि आपके साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप करके सहते रहो। अगर आप समझते हैं कि श्रीमत के खिलाफ़ चलकर फलाना व्यक्ति आप से अन्याय कर रहा है, किसी सेवा या वस्तु से वंचित कर रहा है तो आप उसको बताइये। वो नहीं मानता है तो निमित्त बड़ों से बात कीजिये, वे हल करेंगे। अगर वे भी हल नहीं करेंगे, उसकी ही तरफ ले रहे हैं तो बात बाबा को बताकर, ड्रामा पर और कर्म सिद्धान्त पर निश्चय रखकर अपना पुरुषार्थ करते चलिये। आज नहीं तो कल, सच अपने आप ही सामने आयेगा क्योंकि सच कभी छुपता नहीं है। बाबा भी सदा सच की तरफ़ होते हैं, जहाँ बाबा हैं वहां विजयश्री निश्चित है। सदा सबके साथ मैत्री रखो। सब हमारे मित्र हैं, हमारी किसी से दश्मनी नहीं। बाबा कहते हैं कि निन्दा हमारी जो करे मित्र हमारा सो ।निन्दा करने वाले भी हमारे मित्र है। यह बहुत कठिन बात है। बिना कोई गलती अगर कोई व्यक्ति हमारी ग्लानि करता रहे, हमारी बदनामी करता रहे और हम उसको मित्र समझे उसके प्रति हमारी शुभभावना, शुभकामना निकले यह बहुत बड़ी बात है, महान साधना है। मन को ऐसा स्तर पर लाना एक बड़े परिश्रम का कार्य है। लेकिन बाबा ने कहा है कि यह भी करना है, इसलिए इसका अभ्यास करना है। कठिन अवश्य है लेकिन असंभव कदापि नहीं है क्योंकि यह बाबा ने कहा है। यह भगवानुवाच है। भगवान ने कहा है माना वह सत्य है और संभाव्य है। हरेक के प्रति, अपकारी के प्रति भी दिल से उपकार की भावना, शुभभावना और शुभकामना रखो। यह कठिन परीक्षा है लेकिन हमें इसको भी पास करना है। यह है योगी का लक्षण, यह है महानता की पराकाष्ठा, यह है योगविद्या की कमाल। इसलिए सदा हमारे में सन्तुष्टता और मित्रभाव बना रहे तो हमारा योग अपनी चरम सीमा पर पहुंचेगा, नहीं तो धराशायी हो जायेगा। जब आप इन शक्तियों के मिलाकर चलो तो योग आपका श्रेष्ठ स्तर का, गणवत्ता का बन जायेगा, फिर आपका जीवन ही योगमय बन जायेगा।
दृष्टि और दृष्टिकोण
बाबा कहते हैं कि नयी सृष्टि की स्थापना के लिए यह नया ज्ञान है। फिर से हमें नये बनाने के लिए यह नया ज्ञान है क्योंकि हम आत्मायें पुरानी हो चुकी है। हम पुराने कैसे हो चुके हैं? संस्कार पूराने हो चुके हैं। संस्कारों को फिर से नये बनाने के लिए बाबा हमे यह नया ज्ञान दे रहे हैं। यह ज्ञान नयी सुष्टि स्थापन करने के लिए मुख्य साधन है। बाबा के इस महावाक्य को हम सदा सामने रखें कि नयी सृष्टि स्थापन करने के लिए यह एक क्रान्तिकारी नवा ज्ञान है, यह ज्ञान हमारे जीवन में क्रान्ति लाने वाला एक साधन है और उस तरह से इस ज्ञान की हमें धारण करना चाहिए।
आमतौर पर कई भाइयों से मुझे सुनने में आता है कि दृष्टि चंचल होती है. खराब होती है, इस पर हमें समझाइये। बाबा ने भी कई मुरलियों में कहा है कि ये आंखें धोखा देती है और क्रिमिनल आई (criminal eye; कुदृष्टि) हो जाती है। सिविल आई के बदले क्रिमिनल आई हो जाती है, दृष्टि पवित्र होने के बदले अपवित्र हो जाती है। हमें यह सोचने की जरूरत है कि हमारी यह दृष्टि या हमारी आंखे स्वयं में न खराब हैं, न अच्छी हैं। ये तो साधन है। हमारी अच्छी दृष्टि या बुरी दृष्टि हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर है। दृष्टि का आधार है दृष्टिकोण। अगर हम दृष्टिकोण को परिवर्तन नहीं करेंगे तो दृष्टि भी परिवर्तन नहीं होगी। आंखें तो देखने का एक माध्यम हैं जैसे कैमरे में लेन्स होते हैं। मन की जो वृत्ति है, वह आधारित है हमारे दृष्टिकोण पर क्योंकि वृत्ति बनती है दृष्टिकोण से। हमारा दृष्टिकोण (outlook) निर्भर है हमारे इनलुक (inlook; अन्तर्दृष्टि) पर अर्थात् हमारे मन में क्या भरा हुआ है उस पर क्या हम आशावादी है या निराशावादी है, सकारात्मक सोचते हैं। या नकरात्मक सोचते हैं. यह जो हमारी सोचने की विधि है, इसको दृष्टिकोण कहा जाता है, इस पर दृष्टि निर्भर करती है। आप जितना भी सुन लीजिये,जितनी भी कोशिश कीजिये आपकी दृष्टि तब तक ठीक नहीं जब तक आपका दृष्टिकोण ठीक नहीं होगा। आप देखते होगे,पहले जमाने में कवि लोग सन्दर चेहरे के लिए चाँद का मिसाल दिया करते थे। अपनी प्रियतमा के लिए कहते थे कि उसका मुखड़ा चांद जैसा सुन्दर है। दृष्टिकोण यह था कि चांद बहुत सुन्दर है। उनकी जो दृष्टि थी सुन्दरता की वह उनके दृष्टिकोण पर आधारित थी। अब जब चाँद पर आदमी उत्तरा, उसने देखा कि वहां तो बहुत खड्डे हैं. रेत ही रेत है। अब चांद के बारे में जिसने इस बात को जाना तो वह यही समझेगा कि कवि, नारी की महिमा करने के बदले उसका अपमान कर रहा है क्योंकि चाँद में खड्डे है खराबी है। यह खराबी हमें दुर से दिखायी नहीं देती। वहाँ से जो फोटो लेकर आये हैं. उनको आप देखेंगे तो पता पड़ेगा कि चाँद तो भद्दी चीज है।
जिन्होंने जीवशास्त्र पढ़ा है. इन्सान के चेहरे को माइक्रोस्कोप से देखा है. उन्हें पता है कि हमारे रोम, जिनसे पसीना निकलता है, वहां खड़े ही खड्डे है । जिसको हम सुन्दर चेहरा समझते हैं, वह कीटाणुओं से भरा पड़ा है। शरीर के अन्दर कीड़े, रोगाणु और गंदगी भरी पड़ी है। यह तो चमड़ी रूपी अच्छे से प्लास्टिक से ढका हुआ है, जो हमें कुछ मालूम नहीं पड़ता। संडास में जो कुछ होता है, वो सब इस शरीर में है। कचड़ेदान में जो कचड़ा वाते हैं, थूकदान में जो कुछ आप थूकते हैं वह सब इसमें है। संसार की कौन-सी गंदगी है जो इसमें नहीं है? लेकिन वह सब कचड़ा, गंदगी एक अच्छे-से. रंगीन प्लास्टिक से ढका हुआ है। जिस व्यक्ति का यह दृष्टिकोण है कि यह शरीर बाहर से देखने में सुन्दर है लेकिन अन्दर क्या है? क्या उसको शरीर के प्रति आकर्षण होगा? कभी भी आकर्षण नहीं होगा। इसलिए दृष्टि तब तक नहीं बदलेगी जब तक दृष्टिकोण नहीं बदलेगा।
जो कुछ भी पहले हम बाहर से देखते हैं. वह सन्देश के रूप में ही मन में जाता है। मान लीजिये, छह फुट के एक आदमी को हमने देखा। यह पुरुष है या स्त्री है वह हमारे सामने आया। आंखे तो हमारी छोटी सी है लेकिन आदमी छह फुट का है। फिर हमने उसको देखा कैसे? हमारे मस्तिष्क पर उसका बहुत छोटा-सा प्रतिबिंब पड़ता है। उसका रूप क्या है रंग क्या है. चेहरे के लक्षण क्या है, उसकी बनावट क्या है, उसकी बात कैसी है यह चित्र चित्रित होता है। सन्देश मस्तिष्क को पहुंचने के बाद में आत्मा इन सबका विश्लेषण करती है कि यह क्या है क्या नहीं है। जो विश्लेषण (interpretation) की अवस्था है जिसको हम विश्लेषण की प्रक्रिया कहते है जब तक यह परिवर्तन नहीं होगी तब तक दृष्टि परिवर्तित नहीं हो सकती। बाहर से जो सन्देश आया वह उद्दीपन (stimulas) है यह पहुंचने के बाद वहाँ से प्रतिक्रिया (response) आती है कि यह छह फुट का मनुष्य है, पुरुष है या स्त्री है। यह फलानी जगह का रहने वाला है या वाली है। इसको मैंने कई साल पहले देखा था। इसका नाम यह है। उसका वो सारा रिकार्ड खोलकर चित्रित करता है। उस आदमी का नाम या सारा परिचय तो उसके चेहरे पर नहीं लिखा रहता। मन के अन्दर या आत्मा के अन्दर जो सारा रिकार्ड है, उससे तुलना करके आत्मा उसको पहचानने की कोशिश करती है। अन्दर की जो प्रतिक्रिया है, प्रत्युत्तर है, बाहर का जो उद्दीपन है उसकी प्रतिक्रिया या प्रत्युत्तर है वह कैसे बदले? वह प्रतिक्रिया किस पर निर्भर है? अन्तर्दृष्टि (inlook) पर। जब तक मनुष्य की अंतर्दृष्टि नहीं बदलेगी तब तक बाहर की दृष्टि नहीं बदलेगी। वो दृष्टिकोण कैसे बदलेगा? बाबा की ज्ञान-मरलियों से। बाबा मरलियों में सुनाते हैं कि सब मरे पड़े हैं, ये मूर्छित हुए पड़े हैं, ये सब आसुरी सम्प्रदाय वाले है इत्यादि-इत्यादि। ये सारी बातें हम सुनते हैं, फिर हमारा प्रत्युत्तर (response) उसके अनुसार होता है। जैसे कम्प्युटर में प्रोग्राम डाला जाता है और कम्प्यूटर की प्रोग्राम अनुसार चीज हमारे सामने लाता है। जब बाबा का दिया हुआ ज्ञान बुद्धि में भरता जाता है, धारण होता जाता है तब हमारा दृष्टिकोण बदलता है। जब दृष्टिकोण बदल जाता है तब दृष्टि भी बदलती है। क्या दृष्टिकोण से पहला परिवर्तन होता है वृत्ति में फिर वृत्ति से बदलती है स्मृति और स्थिति। उससे फिर हमारी दृष्टि जो है स्वयं बदल जाती है। अगर हम चाहते हैं कि हम अखंड पवित्रता का पालन करें, पवित्रता रूपी श्रेष्ठ जो खजाना है. बाबा का दिया हुआ जो वरदान है उसको किसी भी रीति से न गंवाये, वह सदा हमारा बना रहे, उसके लिए हमारी दृष्टि ठीक रहे।
पवित्रता हमारी अनमोल निधि है। ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति यही है। हम चाहे दुनिया की दृष्टि से बिल्कुल गरीब ही सही, किसी भी दृष्टि से हम लोगों से बहुत पीछे ही सही लेकिन बाबा ने हमें जो पवित्रता रूपी अनमोल खज़ाना दिया है, यह तो अतुल है, इसका कोई मूल्य नहीं लगा सकता। सारी दुनिया के खज़ाने इसके सामने तुच्छ हैं। हम चाहते हैं कि हमारी दृष्टि ठीक रहे तो अपने दृष्टिकोण को ठीक रखें। दृष्टिकोण ठीक रखना है तो रोज़ हम मुरली सुनें। मुरली सुनते-सुनते हमारा दृष्टिकोण, हमारी अन्तर्दृष्टि, हमारी वृत्ति, हमारा सोचने का, देखने का तरीका बदले। जब वो बदलेगा तब हमारी दृष्टि धोखा नहीं देगी। जब तक हमें पूरी रीति से यह समझ नहीं होगी कि हम कौन हैं, किसकी सन्तान है, कहां से आये हैं, कहां जाना है तो हमारे में अन्तर्-परिवर्तन (inter change) नहीं होगा। अगर हमारा अन्तर-परिवर्तन नहीं होगा तो हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं होगा। इसलिए जब अन्तर-परिवर्तन होगा, तब ही बाह्य परिवर्तन होगा।
अगर हम केवल बाहरी परिवर्तन करने की कोशिश करेंगे, जैसे सूरदास ने अपनी आंखें निकाल दीं, तो क्या नतीजा निकला? उसकी सारी रचनाओं को आप पढ़कर देखिये कि आंखे निकालने के बाद भी उसके मन की स्थिति क्या थी, वो पता पड़ेगा। वह कहता है, हे गोपाल! संसार एक सागर है। इसमें काम रूपी मगरमच्छ, क्रोध रूपी ग्राह आदि सब मुझे खा रहे हैं। है गिरधर मुझे बचाओ। कविता की दृष्टि से उनकी कवितायें बहुत अच्छी रचनायें है। उन कविताओं को जिस विषय पर लिखा है, वो विषय उसके मन को प्रतिबिंबित करता है. उसकी अवस्था को झलकाता है। कई लोग भगवान के वास्ते सब-कुछ माँ-बाप, पत्नी पुत्र घर-संसार छोड़कर चले जाते हैं। लेकिन फिर साधना के पथपर चलते-चलते जमीन-जायदाद, स्थान-मान, धन-सम्पत्ति के पीछे लग जाते हैं। जैसे आपने राजा भर्तृहरि की कहानी सुनी होगी। उसका उदाहरण मै कई बार दे चुका है। वह अपने राज्य, महल, वैभव, धन, कनक, रानी को छोड़कर वैरागी बन जंगल में जा रहा था। जब चाँदनी में चमकती हुई एक चीज़ को अशर्फी समझ उठाने लगा तो पता पड़ा कि वह पान की थूक थी। उसकी आंखें उसको धोखा दे गयी। उसे वैराग तो आ गया था पत्नी पर। जब पत्नी को छोड़ा, तो उसके साथ सब-कुछ छोड़ चला लेकिन धन के प्रति उसका मोह नहीं टूटा था। पत्नी के प्रति उसकी दृष्टि बदली थी लेकिन धन के प्रति उसकी दृष्टि नहीं बदली थी। दृष्टि क्यों नहीं बदली थी? क्योंकि उसका दृष्टिकोण नहीं बदला था। इसलिए जब तक दृष्टिकोण नहीं बदलेगा तब तक दृष्टि नहीं बदलेगी, यह पक्का है। दृष्टिकोण तब बदलेगा जब हम मुरली को उस विधि से पढ़ते हैं, सुनते हैं। मुरली सुनने की विधि क्या है? सबसे पहले हम आत्म-अभिमानी होकर बैठें। दुनिया में ऐसा कोई सत्संग नहीं है कि पहले कुछ देर तक योग में बैठें। पहले कुछ समय योग में बैठने से मुरली सुनने में अन्तर पड़ जाता है। विदेह अवस्था में, देह से न्यारे होकर, शिव बाबा की याद में मुरली सुनकर तो देखो, क्या अनुभव होता है। उस समय हमारी ग्रहण करने की अवस्था होती है। समझने की जो कुशलता होती है, वह अधिकतम (maximum) होती है। मुरली कोई भी सुनाये लेकिन हम यह समझें कि हमारे सामने शिव बाबा हैं। शिव बाबा प्रजापिता बह्मा के मुख से या किसी साकार के माध्यम से यह मुरली सुना रहे हैं और हमारे मन में वो भाव हो कि हम आत्मा है. परमपिता परमात्मा हमारे कल्याण के लिए यह ज्ञान दे रहे है। उस दृष्टिकोण से जब हम ज्ञान सुनेंगे आप देखेंगे उसकी छाप मन पर पडती जायेगी। उससे हमारा जो दृष्टिकोण बनेगा, उस आधार पर हमारी दृष्टि बदलेगी।
सबसे पहले माया मुरली मिस कराने के रूप में आती है या मुरली साधारण स्थिति में सुनने लायक बना देती है। मुरली को हम परिवर्तन सर्वोत्तम माध्यम नहीं समझते हल्के रूप से सुन लेते है या पढ़ लेते हैं। इससे हमारे परिवर्तन की गति धीमी पड़ जाती है।
अगर हमारे से कभी गलती हो जाती है तो हम यह ध्यान रखें कि वह ग़लती दुबारा न हो। ग़लतियाँ बार-बार पुनरावृत्त होने से आदमी में बहुत-सी खराबिया और आ जाती हैं। बार-बार ग़लतियों करने से, उनको रोकने में बार-बार फेल होने से उस व्यक्ति के अन्दर अपने बारे में ही निराशा पैदा हो जाती है और उसका दृष्टिकोण यही बन जाता है कि मैं कभी अच्छा कर नहीं सकता, मैं भूलों पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। उसमें हीन भावना आ जाती है। हीन भावना वाले का जीवन में आगे बढ़ना कठिन हो जाता है। फिर ग़लती करने का संस्कार बन जाता है। जो कार्य हम बार-बार करते हैं, वहीं संस्कार बन जाता है। भूलों की पुनरावृत्ति करना माना उस संस्कार को और पक्का करना और आगे बढ़ने के बदले पीछे हटते जाना। इसलिए मन में यह दृढ संकल्प होना चाहिए कि अगर हमसे ग़लती हो भी गयी तो उसको कभी दुबारा पुनरावृत्त होने नहीं देना है।
बुरा मत सुनो, बुरा मत सुनाओ...
समाज में ऐसे लोग मिलेंगे जो आपको ऐसी बाते सुनाएंगे ऐसे समाचार सुनायेंगे जो आपके लिए हानिकारक हो, आपके परिवर्तन की गति को कम करने वाले हो। मिसाल के तौर पर कोई आपको कहेगा, अरे आपको मालूम है. वो जो फलाना भाई आता था ना दस सालों में ज्ञान में चलता था, कितना अच्छा चल रहा था, हम सब समझते थे कि इसकी बहुत अच्छी धारणाएं है. उसने जाकर शादी कर ली। अच्छा इसको बताने का उसका उद्देश्य क्या है? कई व्यक्तियों की आदत होती है खराब समाचार सुनाना, दुसरों के मन को खराब करना। आप कहेंगे कि कोई बात नहीं, हमने तो सुन लिया और उससे किनारा कर दिया लेकिन कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो आपने सुना उसका बुरा या अच्छा प्रभाव मन पर पड़ने वाला ही है इसमें कोई शक नहीं। अभी नहीं तो कुछ दिनों के बाद, कुछ वर्षों के बाद तो उसका असर पड़ने वाला है। इतनी शक्ति तो हमारे में अभी तक आयी नहीं कि उसका प्रभाव हम पर न पड़ता हो। अभी तो हम पुरुषार्थ ही कर रहे हैं सम्पूर्ण बनने के लिए। ऐसी नेगेटिव बातें, सुनने वाले में धीरे-धीरे कमज़ोरी लाती है।
आप बाहर की दुनिया में जाकर कहो कि विनाश होने वाला है, ज्ञान-योग करके अपना कुछ कल्याण करो, तो वे क्या कहते हैं? भाई, दुनिया में करोड़ों लोग हैं, उनको जो होगा, हमें भी होगा, देखा जायेगा, क्यों चिन्ता करनी है। आप एक दीवार को हथौड़ी से मारते रहो, मारते रहो, उसको कुछ नहीं होता, ऐसा नहीं है। हथौड़ी लगते लगते एक ऐसी स्टेज भी आ जाती है कि दीवार टूट जाती है, अपना स्थान छोड़ जाती है। ऐसे कमजोरी की बाते निगेटिव बाते मनुष्य को जरूर प्रभावित करती है।इसलिए न ऐसे समाचार किसी से सुनना है और ना किसीको सुनाना है।क्यों? क्यों कि पुरुषार्थी को वह बहुत नुकसान पहुंचाता है।
मैं एक प्रैक्टिकल बात बताता हूं। यह सन 1957-58 की बात है। उत्तर प्रदेश के एक शहर में दो भाई थे। वे बहुत अच्छे थे ज्ञान में बहुत अच्छे चल रहे थे और बडा तीव्र पुरुषार्थ कर रहे थे, बहुतों से आगे निकल गये थे। बहत अच्छी धारणा थी उनकी। ज्ञान की पाइट नोट करना योग करना ईश्वरीय मर्यादाओं में चलना हर प्रकार से अच्छे चल रहे थे। उनमें एक भाई. दूसरे लोगों के संग में आया, उनकी बातों में आया और धीर धीरे उसके मन में विकृतियाँ आने लगीं। क्रोध करने लगा, ग्लानि करने लगा। मैंने देखा है, हरेक मनुष्य के सामने ऐसी परीक्षा आती है, ऐसा समय आता है कि उसके दबे हुए संस्कार, मरे हुए संस्कार फिर ज़िन्दा होने का, जाग्रत होने का मौका पा लेते हैं। ऐसा ही इस व्यक्ति को हुआ, उसको ज्ञान मे संशय आने लगा और धारणायें कमज़ोर होने लगीं। दूसरा भाई जो उसका दोस्त था, उसको लगने लगा कि इसकी धारणायें कमज़ोर होने लगीं, तो ऐसा व्यक्ति क्लास में नहीं आना चाहिए। जब पवित्रता की धारणा हो कमजोर है, तो इसको सेन्टर पर आने नहीं देना चाहिए। हमारा इतना पवित्र वातावरण है, इसको यहां बैठना नहीं चाहिए। इस भाई का उद्देश्य तो सही था क्योंकि उसका विचार था, ऐसे पवित्र स्थान पर अपवित्र व्यक्ति को आने नहीं देना चाहिए जिसकी दृष्टि-वृत्ति वायुमण्डल को खराब करें। इसकी जिम्मेवारी उसने अपने ऊपर ले ली। उन दोनों में कहा-सुनी हुई। इसके बाद सेन्टर के बाहर उन दोनों की हाथापाई हुई। उसने बोला, तुम कौन होते हो मुझे रोकने वाले, इसने बोला, सेन्टर पर आकर तो देखो। तुम्हारे जैसे आदमी को आने की कोई जरूरत नहीं। एक समय था जो दोनों घनिष्ठ मित्र थे, दोनों बड़े अच्छे चल रहे थे, एक की धारणाये कमज़ोर हो उसको क्लास में आने से छुड़ाने के लिए दुसरे ने जिम्मेवारी ली और दुसरे से झगड़ा करने लगे। जिसने झगड़ा किया. पहले उसमें भी क्रोध नहीं था लेकिन जन्म-जन्मान्तर से क्रोध तो रहता है। जब ज्ञान में आया, तो उसने क्रोध को ज्ञान-योग से दबा के रखा था। जब आपस में झगड़ा हुआ बात इज्जतकी आयी तो क्रोध को मौका मिला और वह बाहर निकला। बाहर होकर मोहल्ले में सबके सामने दोनों लड़े। इससे कितनी डिससर्विस (सेवाभंग) हुई होगी ! इतनी डिससर्विस हो गयी कि टीचर को उस स्थान में सेवा करना ही मुश्किल हो गया। लोग कहने लगे, हमने तो सुना था कि यह तो शान्त जगह है, यहाँ मनुष्यों को कोध आदि विकारों पर विजय प्राप्त करायी जाती है। हम इन दोनों को रोज़ आते-जाते देखते थे, इनको मानते थे लेकिन आज इनको क्या हुआ, आपस में लड़ रहे हैं।
हम सोचें कि यह हुआ कैसे? एक भाई जो ठीक चल रहा था वह रोज किसी से अपने दोस्त के बारे में यह सुनता था कि वह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं चलता। अगर कोई विद्यार्थी ठीक नहीं चलता है तो उसको ठीक करना टीचर का काम है। उसको बाबा की क्या शिक्षा देनी है, उसको कैसे समझाना - यह बहन जी का काम है। अगर मान लो टीचर ने भी उस तरफ ध्यान नहीं दिया, तो उसकी भी ग़लती है। लेकिन हम टीचर को बता तो सकते हैं कि बहन जी, इस व्यक्ति के बारे में कुछ सोचो। हम कितने भी बड़े हो, फिर भी हैं तो स्टूडेन्ट ही, टीचर दूसरे हैं। स्टूडेन्ट, स्टूडेन्ट है; टीचर, टीचर है। बाबा ने टीचरों को जिम्मेवारी सौंपी है। यह ठीक है, सेन्टर के प्रति हमारा भी कर्तव्य है लेकिन लॉ को हम स्टुडेन्ट हाथ में नहीं ले सकते। टीचर द्वारा ही सेवा या शिक्षा दिलानी है। हम यह कह सकते हैं कि बहन जी, इसकी धारणायें ठीक नहीं हैं, इसके आने से क्लास का वातावरण खराब होगा, इसलिए यह न आये, आप इसको समझाइये। अगर उसके बाद भी टीचर कुछ नहीं करती तो मुख्यालय को सूचित करें। उसके बाद भी कुछ नहीं होता तो आपका काम समाप्त हो गया। आपने अपनी ड्यूटी बजाया फिर उसको छोड़ दोजिये वह व्यक्ति भला, वह संस्था भली. आपका क्या जाता है? आप तो यहाँ ज्ञानी-योगी बनने के लिए आये हैं। अगर हम योगी बनते बनते फिर क्रोधी-विरोधी बन गये, घुणा अपने जीवन में लाई, द्वेष अपने जीवन में लाया तो क्या फायदा हुआ ज्ञान पाकर भी? बाबा कहते है आपके शत्रु और कोई नहीं है, विकार ही आपके शत्रु है। अगर किसी व्यक्ति को हमने अपना शत्रु मान लिया तो जो मन, योग में लगकर हमें आगे बढ़ा रहा था. हमारी जो प्रगति हो रही थी, हमारे में जो परिवर्तन की कला जा रही थी उसमें रुकावट आ जायेगी।
मैं कह रहा था कि जो व्यक्ति अच्छी तरह से ज्ञान में चल रहा था, दूसरे व्यक्ति को खराब होते देख, उसके साथ झगड़ा किया, क्लास के लोग उससे कहने लगे कि आप क्यों उसके साथ लड़ने गये? यह आपकी ग़लती है। यह व्यक्ति ठीक नहीं, ठीक है, आपने क्यों उसके साथ हाथापाई की? बाबा ने किसी मुरली में कहा नहीं है कि झगड़ा करो, किसी से हाथापाई करो, हिंसा करो। आपने यह काम क्यों किया? उनके प्रति भी वह व्यक्ति गरम होने लगा, आपको क्या पता वह व्यक्ति कैसा है? ऐसे व्यक्ति को क्लास में आने नहीं देना है। इसके बाद उस व्यक्ति को लगने लगा कि क्लास वालों के मन में मेरे प्रति भाव ही बदल गया, मोहल्ले वालों ने भी समझा कि मेरे में बहुत क्रोध है। इतने दिन तक क्लास वाले समझते थे कि मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूं योगी हूं, आज से वे समझेंगे कि मैं बहुत क्रोधी हूं। धीरे-धीरे उसने भी क्लास में आना छोड़ दिया। वो दूसरे को निकालना चाहता था लेकिन खुद ही बेचारा देहाभिमान में आकर ज्ञान से चला गया।
बचपन में हमने एक कहानी सुनी थी। गांव में एक धोबी था। उसके घर में एक गधा था और एक कुत्ता भी था। एक दिन वहाँ एक चोर आया और चोरी करने लगा। कहानी माना कल्पना ! गधा कहने लगा कुत्ते से, तुम्हारा काम ही है भौकना तू भौकेगा तो मालिक जायेगा। हमेशा मालिक से रोटी खाता रहा है. दूध पीता रहा है, भौंकता क्यों नहीं है? जब मालिक आता है तो उसके आगे-पीछे भौंकता है. अभी भौंकने का समय आया है तो भौंकता क्यों नहीं है? भौकना तुम्हारा फर्ज है. अभी भौक। कुत्ते ने गधेसे कहा तुम्हारा क्या मतलब है? तुम अपना काम करो, तुम कौन होते हो मुझे सलाह देने वाले? तुमको क्या पता, इस मालिक ने मुझे कितना तंग कर रखा है। इसने मेरा मुल्य ही नहीं समझा है। तुम्हारा मूल्य समझता इसलिए तुम्हारी इतनी परवरिश करता है। मुझे तो ऐसा-तैसा देखता है। आज चोरी हो जाये तब पता पड़ेगा कि मेरा मुल्य क्या है। गधे ने सोचा कि मालिक हमारे लिए इतनी मेहनत करता है और हमारी पालना करता है, कुत्ता गलती कर रहा है। गधे ने चिल्लाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज सुनकर मालिक जागा। सारे दिन मेहनत करके वह थका हुआ था, गधे की आवाज सुनकर उसे गुस्सा आया और उठकर लाठी से उसे मारने लगा। इसलिए नीति वचन है कि दूसरों के काम में तुम क्यों दखल देते हो? तुम अपने ही काम करो, बस। यह उसका कर्त्तव्य है, उसे करने दो। तुम अपने कर्त्तव्य करो। गधे ने कुत्ते का काम किया, तो उसको उसका प्रतिफल मिल गया। यह टीचर का काम है कि क्लास को कैसे चलाना है, स्टूडेन्टस को कैसे चलाना है। प्रशासक वह है, उसके अपने सहयोगी हैं। आपका काम यह है कि एक अच्छा विद्यार्थी होने के नाते, यज्ञ के मददगार होने के नाते, निमित्त आत्मा को विषय नहीं मालूम है तो उसको सूचित कर दो। आप अपना कर्तव्य करो लेकिन दूसरों के कर्त्तव्य में क्यों हस्तक्षेप करते हो? हरेक को अपना-अपना कर्तव्य मिला हुआ है, उस कर्त्तव्य को पूरी रीति से करने में ही सुन्दरता है। मैंने यह देखा है कि दूसरों से ऐसे नेगेटिव बातें सुनने से प्रभाव पड़ता है, उससे हम उत्तेजित हो जाते हैं। फिर हम बीच में पड़ जायेंगे। उसमें आगे-आगे बढ़ते जायेंगे और उसमें फंसते जायेंगे। फिर क्या नतीजा होता है? कहते है ना. 'आये थे हरिभजन करने, ओटन लगे कपास'। वही वाली हालत हो जायेगी।
सबसे प्रथम और अति प्रमुख (First and foremost) बात यह है हम वहां आये हैं अपने जीवन को परिवर्तित करने के लिए यह नहीं भूलना चाहिए। दसरे को परिवर्तन की राय हम दे सकते हैं, तरीका बता सकते है बाबा ने हमें जो यूक्ति दी है. शिक्षा दी है उनसे सेवा कर सकते हैं लेकिन उस व्यक्ति की वजह से हम अपना जो पवित्रता का मार्ग है. अनुशासन का मार्ग है. दिव्यता का मार्ग है. उसे छोड दें यह हमारा जन्म-जन्मान्तर के भाग्य से वंचित होना हो गया। इसलिए अगर आपसे ऐसा काम हो रहा है तो आप अपने को थाम लो, गिरने से, फंसने से बचा लो और अपने सही मार्ग पर लौट आओ। हमें समझना चाहिए कि योग एक अनुशासन है। योग कमेन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की कला सिखाता है। क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, कैसे सोना है, कैसे नहीं सोना है, क्या देखना, क्या नहीं देखना है, क्या पढना, क्या नहीं पढ़ना है, क्या पहनना है, क्या नहीं पहनना है- योग वे सब सिखाता है। यह अनुशासन है, यह स्व अनुशासन है। इस योग से हम अपने ऊपर राज्य करने का अनुशासन सीखते हैं। अगर उस अनुशासन के मार्ग पर हम चलते हैं तो किसी के कार्यों में हस्तक्षेप करने से हट जाते हैं। अगर अनुशासन को छोड़कर बने हुए अनुशासन और प्रशासन को या व्यवस्था में बनी हुई चीज़ को हम बिगाड़ते हैं, तो समझो हम योग के मार्ग से हट जाते हैं। अनुशासनहीन बनने का यह परिवर्तन आपका कुपरिवर्तन है, सुपरिवर्तन नहीं है; शुभपरिवर्तन नहीं है, अशुभ परिवर्तन है। इसलिए अगर कोई आपको गुमराह करता है या ऐसी परिस्थिति आपके सामने आती है. तो अपने दिल को टटोलना चाहिए कि हमने अपना सुमार्ग तो नहीं छोड़ा है, अनुशासन तो नहीं तोड़ा है, दबे हुए पुराने संस्कार तो जाग्रत नहीं हो रहे
हम यह क्यों करें कि गलत करने वाले व्यक्ति को ठीक करने के लिए स्वयं दूसरा गलत काम करें? हम ऐसा कर्म क्यों करें कि भगवान की निगाह में हम भी अपराधी बन जाये? गलत काम करने वाला तो अपराधी है ही उसको देखकर उस पर क्रोधित होना, ईर्ष्या द्वेष करना भी अपराध है। आपने एक तरह का अपराध किया और हमने दूसरी तरह का अपराध किया। हम यहाँ परिवर्तन होने आये हैं और हमारा यह संगठित जीवन है। इसलिए हमेशा यह याद रखो कि इस संगठित जीवन में हमें न्यारे और प्यारे होकर रहना है और चलना है। हम अपने योगी जीवन से विचलित न हों। किसी के कहने से, किसी के दबाव से, किसी के प्रभाव से कभी ग़लत काम करने न लगें। ऐसी परिस्थितियाँ जीवन में आयेंगी, मैं बता रहा हूँ, जरूर आयेंगी लेकिन आपको योगी जीवन से, ईश्वरीय मर्यादायुक्त जीवन से हटना नहीं है। कैसी भी परिस्थितियाँ आयें, परीक्षायें आयें हम यह समझें कि हमें मर्यादा में, अनुशासन में, संयाम में, नियम में चलना है। सर्वप्रथम हमारी प्रमुखता है योगी जीवन। योग को छोड़कर आप कोई गलत काम नहीं कर सकते। वो काम सांसारिक व्यक्ति करते हैं। बाबा कहते हैं कि परिस्थितियों को स्वस्थिति से जीतो ।
परिस्थिति को जीतें कैसे? जब बरसात के दिन शुरू हो जाते हैं तब हम क्या करते हैं? छाता, रेनकोट आदि का प्रबन्ध करते हैं। छत में कोई सुराख हो तो उसको बन्द कर देते हैं। बारिश से बचने के लिए हम कुछ न कुछ तैयारी करते हैं ना! तैयारी पहले से करके रखे रहते हैं। बारिश का इन्तजार नहीं करते कि आने के बाद देख लेंगे। बारीश आने से पहले सारे इन्तज़ाम करके रखे रहते हैं। ऐसे हमें पता रहता है कि कौन-सी परिस्थिति आने वाली है। उसके लिए आप तैयारी (इन्तज़ाम) करके तैयार रहो। बाबा ने मुरलियों में बता दिया है कि कैसी-कैसी परिस्थितियां, परीक्षायें आयेंगी। बाबा ने यह भी बताया है, उन परिस्थितियों के लिए क्या-क्या इन्तजाम करें। अगर हम इन्तजाम नहीं करेंगे तो क्या होगा? परिस्थितियाँ प्रभावित करेगी उस समय हम डगमग हो जायेंगे अवस्था अचल नहीं रह सकती। परिणाम यह होगा कि हम विचलित हो जायेंगे, पर जायेंगे। इसलिए परिस्थितियों का सामना करने के लिए पहले से ही इन्तजाम करो। मैंने पहले भी कहा था कि बाबा की मुरली पढ़ते समय यह लक्ष्य रखो कि आज की मुरली से मेरा कौन-सा पूराना संस्कार खत्म होता है। दूसरा यह देखो कि मझे कौन-सी यूक्ति या विधि मिल रही है जिससे में आने वाली परीक्षा के लिए इन्तजाम करूं अर्थात यह देखो कि कौन-सी परिस्थिति के लिए बाबा कौन-सा इन्तज़ाम बता रहे है। जब आप मुरली पढते हो या सुनते हो तो यह देखो कि बाबा यह इन्तजाम किस परिस्थिति के लिए बता रहे हैं। फिर जैसी परिस्थिति आने वाली होगी उसके लिए पहले से अपने में वो शक्ति भरो ताकि हम अंगद जैसे अचल रहे जिस कारण माया हमें हिला न सके। इस ढंग से मुरली को समझने की कोशिश करो कि कैसी भी परिस्थिति में हमारी स्वस्थिति बनी रहे।
एक बात अन्त में मैं यह बताना चाहता हूँ कि सबसे अधिक परिवर्तन उसका रुक जाता है, जिसका सीखना बन्द हो जाता है। जो यह समझ लेता है कि मैं सीख चुका हूँ, मैं तो जानता हूं, यह बात तो मैंने मुरली में पढ़ी थी, कोई और बात है तो बताओ - जिसकी यह मनोवृत्ति हो जाती है, वो आगे नहीं बढ़ सकता। अगर कोई बड़ा भाई या बड़ी बहन उसको कोई बात समझाये, वह कहे कि यह क्या नयी बात है, मुझे तो पहले से मालूम है, तो समझो उसका परिवर्तन समाप्त हो गया। वह सीख नहीं सकता। वह बूढ़ा हो गया। आमतौर पर बूढ़े आदमी बदल नहीं सकते, पढ़ नहीं सकते। वह व्यक्ति भी ज्ञान की दृष्टि से बूढ़ा हो गया, ज्ञान में और सीख नहीं सकता, परिवर्तन हो नहीं सकता। उसके परिवर्तन की प्रक्रिया रुक गयी क्योंकि वह अपने बड़ों की भी नहीं सुनता, अपने मित्र या शिक्षिका की भी नहीं सुनता । अपने को ही बहुत समझदार समझता है। वह किसी की भी मानता नहीं है। अर्थ है. उसकी गिरावट शुरू हो गयी। जो बड़ों की दृष्टि से गिर गया. वह गिर गया। उसको कोई पकड़ नहीं सकता थाम नहीं सकता। यह जीवन के अनुभव से बता रहा हूं। इसलिए कम से कम हमसे जो वरिष्ठ है. बड़े है. अनुभवी है, जिन्होंने ईश्वरीय जीवन में अनुभव किये है. जिनका हमसे कोई स्वार्थ नहीं, हम से कोई दुश्मनी नहीं, हमारा भला चाहते है हमारे शुभचिन्तक हैं उनकी बात मानो उनकी अच्छी शिक्षा का स्वीकार करो। उनका शुक्रिया अदा करो कि आपने हमे अच्छा रास्ता बताया। कोशिश करो उनकी शिक्षाओं को जीवन में लाने की। उनके आशीर्वाद से. उनके सहयोग से उनकी शुभभावना और शुभकामना से आपकी कमजोरी हीनभावना सब खत्म हो जायेगी। सीखने की कला ही परिवर्तन की कला है। सीखे बिगर परिवर्तन नहीं हो सकता। जब हम सीखते हैं, तब परिवर्तन होते हैं। जब हमने सीखना छोड़ दिया तो समझ लो, हमने परिवर्तन करना भी छोड़ दिया। हम विद्यार्थी हैं। कौन-से विद्यार्थी हैं? परिवर्तन के विद्यार्थी हैं। हम अपने को कैसे परिवर्तित करें- इसके विद्याथीं है। यही हमारा अध्ययन है। हमारे जो चार विषय हैं, ये परिवर्तन के ही विषय हैं। इसलिए जब तक हमें जीना है, तब तक हमें सीखना है, अपने को परिवर्तित करना है। स्व-परिवर्तन से स्व को ही लाभ होता है।
समर्थ स्वरूप के लिए सोलह स्मृतियाँ
आज प्रातः प्यारे बापदादा ने मुरली में बार-बार यही शिक्षा यही चेतावनी दी कि कैसे हम आत्मा के स्वरूप में स्थित हो देह-अभिमान छोड देही अभिमानी बनें ईश्वरीय स्मृति तथा स्व-स्वरूप की स्मृति में रहे। यह केवल आज की मुरली में नहीं बल्कि प्रतिदिन की मुरली में हम सुनते हैं। हमारे सब विषयों का सार भी यही है और हमारे पुरुषार्थ का महत्त्व भी इसी में है। जो इस परुषार्थ पर ध्यान देता है. वही अपने लक्ष्य तक ठीक रीति पहुंच पाता है। लेकिन सभी अनभवी है कि जब हम याद में रहने का अभ्यास करते हैं. कई परीक्षाये, विघ्न ऐसे आ जाते हैं जो रुकावट डालते हैं और याद में जितना हम रहना चाहते हैं, जिस स्टेज को प्राप्त करना चाहते हैं, उतना समय उस स्टेज में नहीं रह पाते हैं। आज की मुरली में भी यही था कि योग का यह विषय सबसे अधिक सहज भी है और कठिन भी है। उसका कारण यह है कि ईश्वरीय स्मृति में या ईश्वरीय याद में रहने के लिए भी कुछ और बातों की याद में रहना बहुत जरूरी है। अगर उनमें से कोई याद भूल जाती है तो हमने देखा है कि ईश्वरीय याद भी भूल जाती है। ईश्वरीय याद रहती है तो वो याद रहती है और वो याद रहती है तो ईश्वरीय याद भी रहती है। ये दोनों अन्योन्याश्रित है, एक-दूसरे पर अवलम्बित है। लेकिन बापदादा उन बातों को भी याद रखने में बार-बार हमारा ध्यान खिंचवाते हैं। वो कौन-सी बातें हैं जिन्हें हमें याद रखना चाहिए?
वैसे एक बात हमें स्पष्ट रूप से मालूम हो कि भक्तिमार्ग में या नास्तिकवाद में कई लोग कहते हैं कि परमात्मा को याद करने की क्या जरूरत है? लेकिन हमने इस बात को पूरी तरह से समझ लिया है कि स्मृतिसे स्थिति का सम्बन्ध है। अगर हम शान्त, आनन्द, प्रेममय, पवित्र स्थिति में रहना चाहते हैं तो उसके लिए ईश्वरीय स्मृति अर्थात् परमात्म-स्मृति में रहना जरूरी है। किसी ने कहा है कि जैसे सोचोगे, वैसे बनोगे। जब हम परमात्मा के बारे में सोचते हैं, उसके स्वरूप का मनन-चिन्तन करते हैं, तो हमारी स्थिति भी तदाकार, तद्रूप (जैसी) बन जाती है। यह एकः शाश्वत नियम है, एक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है। इस पर ही मेडिटेशन या योग आधारित है। यह अनुभव पर आधारित है। इस बात पर परीक्षण हो चुके हैं और यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य की जैसी स्मृति होती है, वैसी उसकी स्थिति होती है। बहुत से लोग यह कहते हैं कि अपनी वृत्ति को परिवर्तन करो, अपने व्यवहार को बदलो, अपनी दृष्टि और वृत्ति को बदलो। लेकिन दृष्टि, वृत्ति, स्थिति, कृति इन सबका आधार स्मृति है। जब तक स्मृति को नहीं बदला गया, तब तक मनुष्य की न दृष्टि बदल सकती है, न उसकी वृत्ति बदल सकती है, न उसकी कृति बदल सकती है, न उसकी स्थिति बदल सकती है। लोग कहते हैं औरों को कि शान्त रहो, शान्त स्थिति को धारण करो। लेकिन शान्त स्थिति तब ही हो सकती है जब स्मृति शांत हो। कई कहते हैं कि आपकी दृष्टि ही ठीक नहीं, आपका दृष्टिकोण ही ठीक नहीं। दृष्टि और दृष्टिकोण भी तभी बदलेंगे, जब पहले हमारी स्मृति बदलेगी।
ईश्वरीय स्मृति हमारी स्थिर हो, उसके लिए कौन-सी स्मृतियों की जरुरत है, किन बातों को हम याद रखें- आज उस पर चर्चा करेंगे। बाबा ने पहले-पहले कहा है कि अपने स्वरूप की स्मृति में रहो, आत्मा की स्मृति में रहते। अपने को देह समझना वह सबसे बड़ी भूल है, जिसको बाबा एकज भूल कहते है।एक भूल नहीं एकज भूल ।एकज भूल का अर्थ है, जिस एक भूल से अनेक भूलो का जन्म हुआ हो । यह एक ऐसी भूल है जिससे सारी भूलों का वृक्ष निकला है। यह भूलों का बीज है। हम अपने आपको भूल गये अपने स्वरूप को भूल गये और अपने को देह मानने लगे।बाबा की कहना यह है कि सबसे पहले ठीक तो इसको करना है। बहुत से लोग कहते हैं कि हम गलत थोडे ही करते हैं? झूठ थोडे ही बोलते है जानते हैं कि मनुष्य को यह पता नहीं है कि सबसे पहला झूठ वह यह बोलता है कि मैं देह हूं, मनुष्य हू। अपने आपको शरीर समझ रहा है। ① पहले-पहले मै आत्मा हूं. मेरा स्वरूप क्या है इस सत्य को भूल गया।झूठ की नींव तो वहीं से पड़ गयी।
हमें अपने स्वरूप की स्मृति रहे, इसके लिए बाबा ने हमें मूरलियों में अनेक तरीके से कहा है। बाबा कहते हैं कि पोजिशन (स्वमान) में रहो तो माया का आपोजिशन (सामना) समाप्त हो जायेगा। अपने स्वरूप में रहने को बाबा ने इतना महत्त्व दिया है कि जैसे पोजिशन में रहना। कोई मनुष्य प्रधान मंत्री की पोजिशन (पद) पर होता है तो उसकी पॉवरफुल पोजिशन होती है। अगर हम भी अपने स्वरूप की स्थिति में होते हैं तो कोई परिस्थिति नहीं आयेगी। कई दफ़ा हम कहते हैं कि परिस्थितियाँ हमारे आपोज़िशन (विरोध) में आ जाती हैं, वे हमारे रास्ते में रुकावट बन जाती हैं। बाबा का कहना यह है कि आप सीट पर सैट रहोगे या पोजिशन में रहोगे तो माया या परिस्थिति आपोजिशन छोड़ देगी। बाबा ने यह भी कहा है कि अगर पोजिशन में नहीं रहते तो पॉवर कम हो जाती है और विल पॉवर कम हो जाती है। नैतिकता में ही बल है और नैतिकता का आधार है अपने स्वरूप की स्मृति। इसीलिए बाबा ने हमें पहले-पहले इस बात पर ध्यान खिंचवाया है। आज बाबा भी यही कह रहे थे कि हमें पण्डित नहीं बनना है, प्रैक्टिकल बनना है। बहुत-से लोग यह कहते हैं कि हाँ जी, हमें भी मालूम है कि हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं। भारत का बच्चा बच्चा भी जानता है कि देह नाशवान है, प्रकृति का बना हुआ है। आत्मा चैतन्य है, अविनाशी है, अजर, अमर है। हम सब में आत्मा का वास है। लेकिन केवल जानने मात्र की बात नहीं,उनको व्यवहार में लाना है। हमारे आचरण में यह सिद्धान्त आना चाहिए। इसलिए बाबा ने कहा है कि केवल फिलासफर, पण्डित नहीं बनना है लेकिन फिलासफर के साथ स्पिरिचुअल भी बनना है। जीवन में रूहानियत लाना है। वह तब होगी जब इन बातों को प्रैक्टिकल में लायेंगे।
मुरली में बाबा ने यह भी कहा था कि स्मृति से समर्थी आयेगी, सामर्थ्य आयेगा। 'स्मृति सामर्थ्य है' यह किसी ने नहीं कहा। बाबा का ही यह महावाक्य है कि स्मृति सामर्थ्य है। आत्मा सामर्थ्यहीन हो चुकी है, वह सोचती है कि आज मै क्रोध नहीं करूंगी। जब कार्यक्षेत्र में आती है, परिस्थिति आती है, समाज में जाती है और कोई कुछ कह देता है तो क्रोध कर बैठती है। फिर शाम को कहती है कि सोचा कुछ और था और कर बैठी कुछ और। सोचा कुछ और था और हो बैठी कुछ और इसका कारण क्या है? मन, वचन, कर्म एक क्यों नहीं है? क्योंकि कमजोरी है। सामर्थ्य कैसे आये? जिसे हम सोचे उसे कैसे कर पाये? जब हम स्मृति में रहें।
एक मुरली में बाबा ने कहा था कि आत्मा को 'स्व' कहते हैं और देह को 'पर' कहते हैं। बाबा ने कहा था कि 'पर' की स्मृति में आने से ही परिस्थिति आती है। हम कहते हैं ना, हम ठीक रहना चाहते थे लेकिन परिस्थिति ने रहने नहीं दिया। जब हम 'स्व' से 'पर' में चले जाते हैं, देह की स्मृति में आ जाते हैं, तो परिस्थितियां भी ऐसी आ जाती हैं। इसलिए बाबा ने कहा था, न आप 'पर' स्मृति में रहेंगे और न परिस्थितियाँ आयेंगी जो आपको परेशान करें। स्व की स्थिति में रहेंगे तो परिस्थितियों आयेंगी ही नहीं। 'स्व' स्वरूप में रहने से सामर्थ्य आयेगा, इससे ही परिस्थितियां शान्त होगी. इससे ही आपोजिशन समाप्त हो जायेगी।
अभी मैने आपको स्व स्वरूप की बात बताई कि मै एक आत्मा हूं,मै एक ज्योतिबिन्दु हूं - सबसे पहली बात यह है। दूसरी बात, आत्मा का जो स्वरूप है जिसकी याद में हमे रहना है, उसकी भी स्टेज क्या है? अगर हमें -यह याद नहीं रहेगा तो भी स्वरुप की याद भूल सकती है। बाबा ने यहां एक बात हमें विशेष बतायी है। भक्तिमार्ग में कहते है कि में नीच हूं,दास हूं ,पापी हूं, मैं जन्म जन्म का अपराधी हूं। सारे भक्तों की वाणी पढ़ लो तो भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! में जन्म जन्म का अपराधो हूं। विषय वैतरणी में खूब गोते मैंने खाये हैं। सुरदास की वाणी पढ़ लो, कबीर की पढ़ लो, जिसकी भी आप पढ़ लो, उन्होंने प्रार्थना की है कि हे गोपाल, आप मुझे निकाल लो। मैं तो विकारों के नूपुर घुघरू बांधकर नाच रहा हूं खूब माया की चाल से। हमने यह गलत समझा हुआ था कि मैं शरीर हूं, आत्मा नहीं हूं। अब बाबा ने आकर हमें सही ज्ञान बताया कि मैं शरीर नहीं हूं, आत्मा हूँ। हम तो उल्टे लटके पड़े थे कि हम हैं ही नीच, माया के दास, पापी, अपराधी। बाबा ने हमें पहले-पहले आश्वासन दिया, स्मृति दी जिससे मन में सामर्थ्य आया। वो स्मृति क्या थी? बाबा ने कहा, बच्चे, आपका अनादि और आदि स्वरूप ही शुद्ध है। अनादि स्वरूप में जब आप परमधाम में थे तब भी आप शुद्ध और पवित्र थे और जब आप आदि स्वरूप में सतयुग में आये तब भी आप पवित्र थे, देवी-देवता थे और शुद्ध थे। अशुद्धि आपका रुप है ही नहीं। जब हमें यह याद रहती है कि मेरा अनादि और आदि स्वरूप क्या है तो इस स्मृति से भी हमें अपने स्वरूप में स्थित होने में मदद मिलती है। हमें यह याद रखना है कि मैं ज्योतिबिन्दु आत्मा हूँ, मेरा वास्तविक स्वरूप शान्त है, शुद्ध है, पवित्र है आदि भी और अनादि भी।
आप देखेंगे, संसार में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाता है कि मनुष्य का पूर्वज वानर था; वानर जाति से हम लोग आये हैं। सिर्फ पूंछ हमारी नहीं रही, बाकी सब वैसे के वैसे ही रहे। पाश्चात्य सभ्यता ने यह हमें देन दी है। बहुत से लोग यही कहते हैं कि थोड़ा-सा आक्रामक (agressive) होना जरूरी है। आखिर तो हम उतरे तो वहीं से हैं माना वृक्ष से, जहाँ से बन्दर नाचता, कूदता है। आपको मालूम हो हमारे शरीर के कुछ हिस्से भी ऐसे हैं, जैसे अपेंडिक्स है, डॉक्टर लोग कहा करते हैं कि यह शरीर का जरूरी हिस्सा नहीं है। पहले हम वानर (बन्दर) थे, वहां पूंछ थी, अभी वह नहीं रही लेकिन अपेंडिक्स रहा हुआ है। थोड़ा बहुत हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं, कोई बात नहीं, यह तो स्वाभाविक है क्योंकि हम बन्दरों के वंशज हैं, बन्दर से मनुष्य बने हैं। हमारे यहाँ हनुमान जी तो हैं ही। जब भारत में हनुमान जी की पूजा होती है तो लोग समझते हैं कि हो सकता है, हमारे पूर्वज वानर होंगे, हम बन्दरों के वंशज होंगे। यहां तो गणेश जी भी बने हुए हैं, हनुमान जी भी बने हुए हैं। ऐसे हमारे यहां कच्छ अवतार, मच्च्छ अवतार, वराह अवतार सब हैं। उसको देखकर मनुष्य समझ लेता है कि शायद पहले हम किसी समय प्राणी होंगे। वैसे भी यहां की मान्यता है कि मनुष्य कर्म के हिसाब से पशु-पक्षी योनियों में जाता है। अगर कोई गुस्सा करता है तो कहते हैं, हो सकता है, पिछले जन्म में जंगल में शेर बन दहाड़ता होगा, अभी वो संस्कार पूरा न गया हो। बाबा ने आकर हमारी मारी भ्रान्तियाँ मिटा दीं। बाबा ने कहा, मनुष्य-आत्मा, मनुष्य योनि में ही रहती है और आपके पूर्वज पूज्य देवी-देवता थे इसलिए आप अपने स्वरूप को याद रखो। जिन श्रीलक्ष्मी श्रीनारायण को आप पूजते हो, ये आपके ही यादगार हैं, ये आपके ही पूर्वज हैं। वास्तव में यह आपका आदि स्वरूप है। यह याद रखने से हमें समर्थी आती है कि हमें फिर से पवित्र बनना है क्योंकि हम जब देवी-देवता थे तब पवित्र थे। बाबा ने आकर -तत्वमसि' की स्मृति दी है कि आप ही श्रीलक्ष्मी श्रीनारायण थे, आपका ही वह स्वरूप है। आप वही शद्ध आत्मा हा पवित्र आत्मा हो। जब यह स्मृति हमें आयी और पवित्रता का नशा चढ़ा तो हमारे में समर्थी आयी है कि मैं वही पवित्र, देव आत्मा हूं। न सिर्फ यह याद रखना है कि मै ज्योतिबिंदु आत्मा हूं बल्कि यह भी कि मै शद्ध आत्मा हूं, मेरा आदि और अनादि स्वरूप शुद्ध है. पवित्र है. दिव्य है, दिव्यगणों से युक्त है।
इन दो स्मृतियों के अतिरिक्त तीसरी स्मृति है, हर मुरली में बताया जाता है शिवबाबा की याद शिव बाबा की याद भी तभी टिकती है जब हम आत्मा के स्वरूप में बैठते हैं। लोग कहते हैं कि ईश्वर की स्मृति में मन एकाग्र नहीं होता, तन्मयता नहीं होती। कारण यही है कि वे देह-अभिमान में रहते हैं। स्मृति का नियम यह है कि जिसकी आप स्मृति करते हैं. स्वयं भी उस स्थिति में होना चाहिए। जब हम निराकार स्थिति में होगे, तब ही हम निराकार को याद कर सकेंगे। जब हम साकार स्थिति में होगे तब साकार को याद कर सकेंगे। जब हम सुक्ष्म आकार स्वरूप होगे तब सक्ष्म आकारी को याद कर सकेंगे। बाबा ने आकर हमें पहले-पहले यह बताया है कि आप जब अपने को ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप आत्मा समझेगे, तब ही उम ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप परमात्मा की याद टिकेगी, आत्मा और परमात्मा का मिलन हो सकेगा। जब हम शिव बाबा को याद करते हैं, आत्मा और परमात्मा के मिलन से जो अग्नि प्रकट होती है, उससे विकर्म दग्ध होते हैं। बहुत से लोग योग या मेडिटेशन करते हैं, वे पूछते हैं कि मेडिटेशन में परमात्मा को याद करने की क्या जरूरत है? अगर हम शान्त होकर बैठ जाये या कोई भी संकल्प या विचार को आने ही न दें, क्या उसको हम मेडिटेशन नहीं कहेंगे? योग नहीं कहेंगे? नहीं; क्योंकि उससे विकर्म दग्ध नहीं होंगे, संस्कार नहीं बदलेंगे और जन्म-जन्मान्तर से हमारे द्वारा किये हुए जो संचित कर्म हैं, वो दग्ध नहीं होंगे। अगर वो दग्ध नहीं होंगे तो वे बार-बार आकर हमें बुरे रास्ते पर या विकर्मों की ओर ले जायेंगे। इसीलिए विशेष स्मृति जिसको हम योगाभ्यास कहते हैं, आत्मा-परमात्मा का मिलन कहते हैं, वह है शिव बाबा की स्मृति। जब हम निराकार की स्मृति में रहते हैं, तो हमारी निराकारी स्थिति होती है और उस निराकारी स्थिति में ही योगाग्रि प्रज्वलित होती है, यही हमारे जन्म-जन्मान्तर के विकर्मों को दग्ध करती है। ईश्वरीय विश्वविद्यालय की यह विशेषता है कि यहाँ पतितो को पावन बनाने वाले पतित पावन शिव बाबा का परिचय दिया जाता है।बाहर आश्रमों में लोग योग करते है फिर काशी या हरिद्वार जाते है स्नान कर पतित से पावन बनने के लिए या तो किसी गुरु की शरण में जाएंगे। उनको यह पता नहीं है कि परमात्मा की स्मृति से ही हम पतित से पावन बन सकते। अशक्त से सशक्त बन जाते हैं. दुःखी से सूखी बन जाते है।
चौथी स्मृति है. सम्बन्ध की। एक स्मृति है कि हम अपने आपको क्या (आत्मा) समझे और दुसरी स्मृति है, बाकी लोगों के साथ हमारा क्या सम्बन्ध रहे। पहले हम देह के अनेक सम्बन्धों की जंजीरों में है और उनकी स्मृति हमें आती थी। अब हम आत्मा भाई-भाई एक पिता की सन्तान है. इस प्रकार हमारे सम्बन्ध की स्मृति भी बदल गयी। पहले वाले सम्बन्ध की स्मति और थी जिससे मोह, ममता और कई विकारों का जन्म होता था। अब अपने जीवन को योगी और निर्विकारी जीवन बनाना है और नष्टोंमोहा होना है। स्मृतिलब्धा का नष्टोमोहा होने के साथ सम्बन्ध है। मोह नष्ट होंगे, तब ही परमात्मा में स्मृत्ति टिकेगी। जब हम उस स्मृति में स्थित होंगे तब ही मोह नष्ट होंगे। मोह नष्ट करने के लिए और स्मृति में स्थित होने के लिए यह जरूरी है कि पहले जो देहजनित, देहाधारित हमारे सम्बन्ध हैं उनसे निकल कर, अब आत्मा के जो सम्बन्ध हैं वे परमात्मा के साथ जोड़ने हैं।
भक्तिमार्ग में जिस भगवान को याद करते हैं, वो भी देहधारी है, चाहे कृष्ण, राम, हनुमान, गणेश, पार्वती, सरस्वती आदि जो भी इष्ट है, जो भी माननीय, वन्दनीय, पुजनीय, प्रार्थनीय हैं, जिनको भक्त याद करते हैं, वे सब हैं देहधारी और भक्त स्वयं भी देह में टिके रहते हैं। अब जब हमें शिव बाबा का पता लगा, अपने स्वरूप का भी पता लगा, तो सबसे पहली बात यह होती है कि हम देह के सब सम्बन्धों से निकल जाते हैं। ईश्वरीय ज्ञान से हमें सबसे पहले यह पता पड़ता है कि देह के साथ हमारा क्या सम्बन्ध है। पहले हम आत्मा को ही देह और देह को ही आत्मा माने हुए थे। अब यह देह हमारे आधीन है और कर्म करने के लिए हमारा यह यन्त्र है। देह के साथ हमारा मात्र यही सम्बन्ध है।देहधारियों के साथ भी हमारा सम्बन्ध कि ये भी आत्मा है जैसे शिवबाबा मेरे मात-पिता है. वैसे इनके भी मात-पिता है और ये मेरे भाई है बना है। इससे हमारी दृष्टि, वृति, स्मृति कृति में परिवर्तन आता है। अगर सिर्फ हम सम्बन्धों में आ जायेगे तो आत्मा की याद भूल जायेगी। अगर हमें आत्मा याद रहेगी तो सम्बन्ध याद आयेगा और वे संबंध भी ठीक रहेंगे, फिर हमारी आत्मिक स्मृति भी बनी रहेगी इसलिए यह याद रखना जरूरी है कि जिनको हम देखते हैं, जिनसे पहले हमारे लौकिक सम्बन्ध थे, उनको आत्मा के सम्बन्ध से देखना चाहिए।
जब शुरू में हम इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में आये, तब एक अचम्भे की बात हमने यहां देखी कि बाबा यहाँ थे, बाबा की लौकिक युगल भी यहा थी, मातेश्वरी जी यहां थी, मातेश्वरी जी की लौकिक मां भी यहां थी। लेकिन कोई भी लौकिक सम्बन्धों को याद करता नहीं था। सब आत्मिक सम्बन्ध में रहते थे। यही योगी जीवन की विशेषता है। महात्मा बुद्ध की जीवन-कहानी आपने पढ़ी होगी। सिद्धार्थ को जब ज्ञानोदय हुआ, बोधिसत स्थिति प्राप्त की और बुद्ध नाम पड़ा, उसके बाद उनका एक मुख्य शिष्य था जिसका नाम आनन्द था, उसने उनको पूछा कि आप अपनी पत्नी को क्यो नहीं उपदेश देते, क्यों नहीं दीक्षा देते? आपको मालूम हो कि महात्मा बुद्ध ने अन्त तक पत्नी और बच्चे को दीक्षा नहीं दी। बद्ध के शिष्यों ने उनसे कहा कि आप सारे संसार को दीक्षा देते हैं, इन्होंने क्या बिगाडा है? इनको क्यों नहीं आप दीक्षा देते? उनके शिष्यों के बार-बार कहने पर जब उस दोनों (बुद्ध की पत्नी और पुत्र) को उनके पास ले आये, तब मजबूरी से. अन्त में दीक्षा दी परन्तु उनको अपने साथ या अपने आश्रम में नहीं रखा। यहां बाबा को देखिये ! चैरिटी बिगन्स एट होम। बाबा कहते हैं सिर्फ दृष्टि को बदलो आत्मिक दृष्टि से सबको देखो। जब सम्बन्धों में परिवर्तन आता है. तभी हम उसको रूहानियत कहेंगे। इस प्रकार, शिव बाबा से हमारा सम्बन्ध होना चाहिए और अन्य आत्माओं से क्या सम्बन्ध होना चाहिए. ये जानकर उनको प्रयोग में लाना चाहिए।
ऐसे ही बाबा ने हमें वृत्ति को शद्ध बनाने के लिए कौन-सा तरीका बताया है? भक्ति में तो हम अपने को भगवान का दास समझते थे और मनुष्यों में किसी को अपना मित्र, किसी को अपना शत्रु, किसी को अपना किसी को पराया समझते थे। बाबा ने आकर ज्ञान और योग द्वारा हमारी समग्र दृष्टि वृत्ति, स्मृति और सम्बन्धों को ही बदल दिया। बाबा ने कहा बच्चे, तुम मेरे नयनों के नूर हो, मेरे सिर के ताज हो, मेरे लाडले और सिकीलधे हो। ऐसे कहकर हमारी वृत्ति को ही बदल दिया। वैसे तो 'योग दर्शन' में लिखा है कि योग, चित्त की वृत्तियों का निरोध है। वे कहते हैं, वृत्ति का निरोध ही करते रहो। लेकिन बाबा ने आकर वृत्ति का विरोध और निरोध छोड़कर, उसको शुद्ध कर दिया। उसको खराब करने वाली जो चीज थी, काटा था उसको निकाल दिया।
⑤पांचवीं प्रकार की स्मृति है, वर्तमान स्वरूप की स्मृति, संगमयूग की स्मृति। हमें बाबा का ज्ञान प्राप्त हुआ, शिव बाबा मिला, बाबा के मुखारविन्द से हमने पवित्र जन्म लिया, जीवन हमारा पवित्र बना। यह तो है ही कि हम आत्मा है, हमारा आदि-अनादि स्वरूप शुद्ध और श्रेष्ठ है, इसके साथ-साथ बाबा ने हमें जो स्वमान दिये हैं, उनकी स्मृति में रहना है। तब हमें ईश्वरीय स्मृति भी रहती है और आत्मिक स्मृति भी रहती है। स्वमान में बाबा ने कहा है कि आप ब्राह्मण हो। सबसे पहले आप ब्राह्मण हो। लौकिक में लोग अपने वर्ष और जाति का बहुत अभिमान या नशा रखते हैं। कोई पूछते हैं। कि आप कौन हैं जी? वह कहेगा, मैं यादव हूं, मैं राजपूत हूं। लेकिन बाबा रहते हैं कि बच्चे, आप सच्चे सच्चे ब्राह्मण हो, आप ब्रह्मा के मुखारविन्द से पैदा हुए हो। तुम तो ब्राह्मण हो जो मन, वचन, कर्म से पवित्र हो।तुम वो ब्राह्मण हो जिनको ईश्वरीय स्मृति है। बच्चे, तुम वो ब्राह्मण हो जिनका कर्तव्य है विश्व कल्याण करने का। बाबा ने हमे लक्ष्य दिया है कि विश्व का कल्याण करना है, विश्व में सुखमय संसार स्थापन करना है। हम है और सुखकर्ता परमात्मा की सन्तान हमारा कर्तव्य भी यही है कि सबको दुःख से मुक्त कर, सुखी बनाना। बाबा ने यह भी बताया है कि ब्राम्हणों का आसन क्या होता है, ताज, तिलक और तख्त क्या होता है। बाबा ने कहा है कि कमलपुष्प आपका आसन है, आत्म-स्मृति आपका तिलक है. विश्व सेवा आपका ताज है और परमात्मा का दिलतख्त आपका तख्त या सिहासन है। बाबा ने कहा है, तुम पाण्डव हो। तुम वही कल्प पहले वाले पाण्डव हो जिनकी महिमा महाभारत में है। वही पाण्डव आप हो, वही शिवशक्तिया आप हो। वहीं अंगद, अर्जुन आप हो। शास्त्रों में जिनका ही गायन है, वे सब आप हो। पहले हम पढ़ते थे कि वे हमारे पूर्वज हैं, हमारे देश के हैं। अभी हमें पता पड़ा कि ये हमारे ही कर्त्तव्यों का गायन है, यादगार है तो हमें नशा चढ़ेगा कि हम ही वो देव-देवियाँ हैं।
'देवी भागवत' में लिखा हुआ है कि देवी ने एक 'हू' कहा तो एक लाख असुर मर गये। बाबा ने कहा है कि आप वही 'असुर निकन्दिनी' देवियां हो, आप ही 'अष्टभुजाधारी' देवियाँ हो। ज्ञान के ही आपके अस्त्र, शस्त्र, अलंकार हैं। बाबा ने अब हमें सच्ची मान-शान दी है। अन्य मान-शान की इच्छा छोड़कर, बाबा की दी हुई मान-शान में रहें तो स्वरूप में स्थित रहना सहज हो जायेगा। बाबा ने हमें बहुत से टाइटल्स दिये हैं। जैसे आप आधारमूर्त हो, उद्धारमुर्त हो। यह टाइटल कितनी जिम्मेवारी वाला है कि हम विश्व के आधारमूर्त और उद्घारमूर्त हैं। एक मुरली में बाबा ने कहा था कि आपकी वजह से ही विनाश रुका हुआ है। कई बच्चे पुछते हैं कि विनाश कब होगा? बाबा पूछता है कि आप तैयार हैं? अगर स्टेज पर कोई एक्टर्स तैयार नहीं है और परदा खीच दिया जाये तो खींचने वाले को कहेंगे कि अरे भाई, तुमने क्या कर दिया? कोई एक्टर कुर्ता पहन रहा है कोई पायजामा पहन रहा है तो वह दृश्य कैसा लगेगा आप ही बताये। बाबा कहते है कि बच्चे तैयार है तो बताओ, मैं तो परदा हटा दूं। परदा हटाने में कितना समय लगता है? एक सेकण्ड मेरा काम है एक सेकंड का। लेकिन सतयुग के लिए हम अभी तैयार हो रहे है। सतयुग में रहने वाले ही तैयार नहीं हैं तो बाबा सतयुग कैसे लायेगा? हम ही आधारमूर्त और उद्धारमूर्त है हमारी वजह से ही यह सृष्टि रुकी हई है अगर यह हम समझ जाये तो योग लगाकर हम कितनी जल्दी-जल्दी तैयार हो जायें? इस प्रकार, बाबा ने हमें वर्तमान समय के बहुत-से टाइटल्स दिये हैं जो हमें बहुत खुशी में लाने वाले हैं और कर्त्तव्य की स्मृति देने वाले हैं। मैं आत्मा ज्योतिस्वरूप हु इसके साथ इन स्वमानों की भी स्मृति में रहना जरूरी है।
शिव बाबा के रूप, गुण और शक्तियों की स्मृति में रहने के साथ-साथ बाबा के साथ जो सम्बन्ध हैं उनकी स्मृति में रहना और जीवन में उनको प्रयोग में लाना भी बहुत ज़रूरी है। जैसे शिव बाबा हमारा मात-पिता है, शिक्षक-सद्गुरु है, सखा-साजन है, इन सबकी स्मृति का भी रस लेना और व्यवहार में आना, इससे भी जीवन में जो परिवर्तन आता है, वो परिवर्तन विशेष है। इस स्मृति से भी हमारी स्मृति में बल आता है। यह बात हमें स्मृति में नहीं रहती है कि बाबा किस रूप में कौन-सी बात कहते हैं तो उस बात का महत्त्व हल्का रह जाता है।
① सातवीं प्रकार की स्मृति है, अपने भक्तिमार्ग के वायदों को याद करना। बाबा कहते हैं कि याद करो कि भक्तिमार्ग में बाप से क्या प्रार्थना करते थे? कहते थे, विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। हे प्रभु, मैं आपके संग खाऊं, आपके संग बैठूं, आपसे ही सुनूं, आपके संग ही सब-कुछ करूं। परमात्मा से हम यह इच्छा प्रकट करते थे। बाबा हमें ये भी याद दिलाते हैं कि तुमने प्रार्थना की थी. अब मै आया हूं तो विषय-विकार छोडो कहते थे तो सही लेकिन अन्दर से नहीं, ऊपर ऊपर से? हम तो ऐसे नहीं है ना जैसे कोई चर्च में जाता है तो कहता है कि है परमात्मा हे मेरे पिता! आप तो परम पवित्र है. मुझे भी पवित्र बनाओ (O God! Our Father! Thou are Holy, Let me be also holy)। लेकिन मन में क्या कहता है? अभी नहीं (But not yet) । बाहर सबके सामने वही प्रार्थना करता है हे प्रभु, मै पवित्र बन जाऊँ लेकिन मन में समझता है कि परमात्मा ग़लती से यह नहीं समझे कि यह प्रार्थना आज से ही शुरू हो जाये। इसलिए मन में कहता है, अभी नहीं। ऐसे जन्म-जन्मान्तर हम भी कहते चले आये कि हे प्रभु। इस पाप की दुनिया से कहीं दूर ले चलो, और कहीं ले चलो। जब वह लेने के लिए आया है तो हम कहते हैं, अरे भाई, इतनी जल्दी? वह है ना एक नाटक, 'स्वर्ग में एक सीट खाली है'। सभी ने कहा, अभी नहीं, मुझे तो बहुत काम करने हैं, तुम कहते हो स्वर्ग में चलो। हम तो ऐसे नहीं हैं ना ! बाबा कहते हैं, भक्तिमार्ग में जो वायदे किये थे उनको याद करो। अभी वही समय है, उन सब प्रार्थनाओं, आशाओं को पूर्ण करने के लिए मैं आया हूं। यह भी एक युक्ति है उन वायदों को स्मृति में लाकर प्रैक्टिकल में लाने की।
⑧ आठवी स्मृति है, भक्ति में बाबा से जो वायदा किया था उसको पूरा करना। कहते थे ना तन-मन-धन तुम्हारा, मेरा क्या लागे? कहते थे ना तन-मन-धन तुझे अर्पण। अभी करो, बाबा आया है।
९. नौवीं स्मृति है, मुझे पास विद् ऑनर होना है। जब विकट परिस्थितियों आती हैं, उनको ज्ञानयुक्त होकर पार करना। बाबा कहता है कि जब जीवन में अति विकट परिस्थिति आती है, जैसे कोई अति निकट का व्यक्ति मर जाता है, व्यापार में बहुत भारी नुकसान होता है या अपने को भी बहुत बड़ी बीमारी आ जाती है तब ज्ञानमार्ग में डावांडोल होने के बदले अपना जन्म जन्मान्तर का हिसाब-किताब चुक्ता हो रहा है. ऐसा समझकर अचल हो। मुझे बाबा का बनकर रहना है ऐसे अपने आपको अचल, अडोल और अटल बनाओ। बाबा को नहीं भूलना है क्योकि ऐसे समय पर खास बाबा और ज्ञान-योग भूल जाते हैं। माया ऐसी परिस्थिति का पूरा उपयोग कर लेती है। इसलिए खास विकट परिस्थितियों में ऐसे समझे कि हमारी परीक्षा हो रही है. मुझे इसमें पास होना है।
दसवी स्मृति है. मैं बाबा को भोग लगा रहा हूं। बाबा कहता है कि अभी मुझे संकल्पों का भोग लगाओ। जैसे बाबा को शुद्ध भाजन का भोग लगाया जाता है. वैसे तुम बच्चे भी मुझे श्रेष्ट संकल्पों का शुद्ध संकल्पों का भोग लगाओ। आपके संकल्प बाप पर बलिहार होने जैसे श्रेष्ठ हो।
म्यारवी स्मृति है, अब मुझे घर जाना है। बाबा एक बात सदा याद रखने के लिए कहता है कि अब हमें घर जाना है। यह भूलने से ही हमारे से बहुत-सी भूलें हो जाती हैं। इसके लिए बाबा अलग-अलग युक्ति बताते रहते हैं कि अपने को मेहमान समझो, अपने को यात्री समझो इत्यादि। बाबा कहते हैं कि अभी नाटक पूरा हुआ, अभी घर जाना है। बाबा कहते हैं कि घर जाना है तो सारे विकर्म दग्ध करने हैं, इसलिए योग को ज्वाला स्वरूप बनाओ, तेज़ करो। हमारी अव्यक्त स्थिति भी तभी होगी, हमारी कर्मातीत स्थिति भी तब होगी, लाइट और माइट भी तभी बनेंगे जब यह याद रहेगा कि मुझे अब वापिस घर जाना है, परमधाम जाना है। बाबा भी कहते हैं कि इसकी बार-बार प्रैक्टिस करो। कर्म करते हुए भी यह स्मृति रखो कि मैंने भी इस शरीर में प्रवेश किया है और मुझे वहां जाना है। तो देह से न्यारा होने की, परे होने की प्रैक्टिस हो जायेगी। यह अभ्यास आपको अन्त में शरीर छोड़ते समय काम आयेगा। बाबा यह भी कहता है कि कर्म करते हुए प्रैक्टिस करो और बीच-बीच में कर्म से मुक्त होकर भी प्रैक्टिस करो कि मैं अशरीरी आत्मा हूं, इस शरीर से परे हूं, मैं परमधाम निवासी हूं।
बारहवीं है, हमारा घर कैसा है। बाबा कहते हैं कि घर को याद करो। तो हमारा घर एक कैसा है? यह स्वाभाविक है कि मनुष्य को घर की याद आती है। घर हमारा कैसा है बाबा ने घर का परिचय हमे दिया है कि वहां लाइट ही लाइट है. वहां कोई अशुद्ध आत्मा का प्रवेश नहीं हो सकता। अगर यह हमे याद है तो यह भी याद रहेगा कि हमे जो दाग दब्बे लगे हुए है. पिछले जन्मों के विकर्म है उनको साथ लेकर जा नहीं सकते। हमें जाना है तो जाने के लिए क्या ले जाना है और क्या छोड देना है इसकी तैयारी करेंगे। हमारा घर परमधाम है, पावन धाम है, लाइट का धाम है. अगर यह याद रहेगा तो हम भी लाइट स्वरूप बन जायेंगे।
तेरहवीं स्मृति है, सतयुग की। बाबा कहते हैं कि सतयुगी सृष्टि, जहां तुमको जाना है, उसकी तैयारी करो। बाबा ने कई मिसाल दिये हैं जैसे कि मुर्दे को श्मशान ले जाते हैं, तब सिर दूसरी ओर घूमा देते हैं। आप भी मरजीवा बन चुके हो, आपका भी ध्यान सतयुग की तरफ होना चाहिए, इस दुनिया की तरफ पांव होने चाहिएं। इसके साथ-साथ हमें यह भी याद करना है कि जिस दुनिया में हम जाने वाले हैं वह सतयुगी दुनिया कैसी होती है, वहां कैसे लोग आपस में बहुत प्यार और इज़्ज़त से रहते हैं, उनमें कितने दिव्य गुण होते हैं। उनमें कोई आसुरी संस्कार, आसुरी गुण नहीं हैं। जब हमें भी उस दुनिया में जाना है तो वैसे लक्षण धारण करने हैं।
चौदहवी स्मृति है, स्वराज्य की। बाबा ने यह भी कहा है कि जो यहां स्वराज्य अधिकारी होंगे, वही भविष्य राज्य अधिकारी बनेंगे। स्वराज्य अधिकारी माना कर्मेन्द्रियों का मालिक बनके रहना, सूक्ष्मेन्द्रिय मन, बुद्धि, संस्कारों का भी अधिकारी बनकर रहना, न कि अधीन। मन जैसे सोचे ऐसे हमें नहीं चलना है, हम जैसा चाहे वैसा मन सोचा करे। मैं जैसा करना चाहूँ, वैसा कर्म-इन्द्रियां काम करें। अधिकारीपन के संस्कार को जब हम यहाँ धारण करेंगे, तब सतयुग में भी जाकर अधिकार चलायेंगे।
15 अभी पन्द्रहवों स्मृति है, लक्ष्य को याद रखना। बाबा कहते हैं कि जैसा लक्ष्य हम रखेंगे वैसे लक्षण हम धारण करेंगे। जब लक्ष्य भूल जाता है तो हम लौकिक में आ जाते हैं और लौकिक रीति से कर्म करना आरम्भ करते हैं। बाबा कहते हैं कि अभी भी आप लौकिक रीति से कर्म करेंगे तो अलीकिक जन्म लेकर क्या फायदा हुआ? अलौकिक जन्म लेकर अलौकिक कर्त्तव्य करना है, अलौकिक रीति से हर कर्म करना है। अलोकिक कर्म करने के लिए हमें अलौकिक लक्ष्य रखना है। अलौकिक लक्ष्य है सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम, अहिंसा प्रधान देवी-देवता बनने का। फिर हमारे जीवन में लक्षण भी वैसे आयेगे।
सोलहवीं है, समय की स्मृति। जब समय की याद भूल जाती है, तो अलबेलापन और आलस्य आ जाता है। पुरुषार्थ ढीला हो जाता है, पुरुषार्थ की रफ्तार धीमी हो जाती है। समय की स्मृति में यह याद रहे कि धर्मग्लानि का समय चल रहा है, गीता में भगवान ने जो वादा किया था कि मैं धर्मग्लानि के समय आकर शिष्ट जनों की रक्षा और दृष्ट जनों का संहार करके सत्य धर्म की स्थापना करूंगा, यह वही समय है और भगवान आ चुके हैं, हम भी भगवान के उस कर्त्तव्य में सहयोगी हैं यह याद रहती है तो हम भी अपने कर्त्तव्य में तत्पर हो जायेंगे।
हमें अपनी योगयुक्त और निराकारी स्थिति लानी है। योग की ऐसी अग्नि प्रज्वलित हो जिससे इस कलियुग के अधर्म, सभी बुराइयाँ दग्ध हो जायें, ऐसी स्टेज हमको लानी है। अगर ये स्मृतियाँ, शिव बाबा की स्मृति और आत्मा की स्मृति के साथ रहेंगी तो उन स्मृतियों से हमारा स्वरूप भी ऐसा ही शक्तिशाली बनेगा।
अन्तिम समय के लिए आध्यात्मिक तैयारियाँ
अन्तिम समय किसको कहेंगे? पहले यह समझना होगा उसके बाद क्या तैयारी करनी है, उसके बारे में सोचना होगा। वह अन्तिम समय अपने जीवन का होगा या इस सृष्टि नाटक का होगा। वह इस सृष्टिनाटक में हमारे 84वें जन्म का अन्तिम समय होगा। इन दोनों को हम अन्तिम समय कहेंगे। अन्तिम समय की तैयारी करना अर्थात् अन्तिम परीक्षा के लिए तैयारी करना। हम सब विद्याथीं हैं। विद्यार्थियों को एक दिन तो परीक्षा देनी ही पड़ेगी।
बाबा कहते हैं कि उनके पास बहुत बड़ी टी. वी. स्क्रीन है। उसमें सब कुछ देख सकते हैं। हर समय हमारी परीक्षा होती है और हमारा रिकार्ड बाबा की टी.वी. में रखा जाता है। इसलिए हम कभी न भूलें कि बाबा देख रहा है। ऐसे भी नहीं समझना चाहिए कि हमारी अन्तिम परीक्षा अन्त में ही होगी लेकिन समझना चाहिए कि हर समय हमारी परीक्षा होती है और हर वक्त हम परीक्षा हॉल में बैठे हैं।
जब पहली बार मैंने इस संस्था में कदम रखा तब एक बात मुझे बहुत अच्छी लगी। उस समय जिस बहन ने मुझे ज्ञान की कई बातें सुनायी, उसमे एक बात उसने खास बतायी कि गुस्सा नहीं करना है। मैंने सोचा, यह क्या बड़ी बात है? हर धर्म में कहा जाता है कि क्रोध करना बड़ा पाप है, क्रोध नहीं करना चाहिए। फिर उसने कहा कि न केवल हमें गुस्सा नहीं करना है। बल्कि अन्दर भी गुस्सा नहीं रखना है और न दिखाना है। मैंने सोचा यह क्या नयी बात है? सब धार्मिक लोग भी यही कहते हैं। लेकिन मुझे इनकी और बातें जानने की इच्छा थी इसलिए चुप बैठकर सुन रहा था। उस बहन ने आगे कहा कि हम सब ईश्वरीय विद्याथों है, हम सब यहाँ ईश्वरीय ज्ञान सुनते है। यह ईश्वरीय विश्वविद्यालय है. ईश्वर यहाँ ईश्वरीय पढ़ाई पढ़ाता है। जब पढ़ाई पढ़ाते हैं तो परीक्षायें भी होती है। आपकी भी परीक्षाये होगी। मैने सोचा कि यहां भी परीक्षा की कोई सिस्टम होगी। मुझे कोई प्रश्नपत्र दिया आयेगा उसके उत्तर लिखने पड़ेंगे। मैंने सोचा कोई बात नहीं. मैने यूनिवर्सिटी में इतनी परीक्षाये दी हैं. यह भी दे देगा। फिर वह आगे बोलने लगी कि यह सारा संसार हो परीक्षा हॉल है। लौकिक में स्कूल कालेजों में परीक्षा होती हैं तो विद्यार्थियों को सूचना दी जाती है कि फलानी तारीख, फ़लाने विषय पर फलाने स्थान पर आपकी परीक्षा होगी। समय, स्थान, विषय और दिनांक वहाँ निश्चित किया रहता है। लेकिन उन्होंने कहा कि यहां आपके लिए कोई स्थान, विषय, समय, दिनांक फिक्स नहीं होता। कभी भी, कहीं भी, किसी रीति में भी, किस समय भी आपकी परीक्षा हो सकती है। मैंने समझा, यह तो अच्छी बात है, यह एक नये तरीके की परीक्षा होगी। मुझे ध्यान रहेगा कि हर वक्त मेरी परीक्षा होगी। मुझे यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि हर घड़ी कोई मुझे देख रहा है। उस दिन से लेकर आज तक, अब की घड़ी तक मेरी परीक्षा चलती ही आ रही है। हम कोई भी कर्म करते हैं, उस समय भी हमारी परीक्षा होती रहती है। उस परीक्षा में मिलने वाले परिणाम से हमारे ऊपर प्रभाव होता रहता है।
हम हर वक्त बदल रहे हैं। लोग कहते हैं, हम परिवर्तन होना नहीं चाहते हैं लेकिन हर घड़ी हम परिवर्तित हो रहे हैं क्योंकि हर घड़ी परिवर्तन होता है, क्रिया-प्रतिक्रिया होती रहती है। परिवर्तन प्रकृत्ति का अटल नियम है. इसको कोई रोक नहीं सकता। अन्तर यह है कि हम उसको स्व-इच्छा से स्वीकार करते हैं या समय आने पर मजबूरी से स्वीकार करते हैं। स्वीकार हरेक को करना ही होगा। कहते हैं ना, चाहे प्यार से या तो मार से। जीवन में हर समय हमारी परीक्षा होती है इसलिए हमें तैयारी करनी पड़ती है और तैयार रहना पड़ता है। साथ-साथ अन्तिम घड़ियों की परीक्षा के लिए भी तो तैयारी करनी पड़ती है। चाहे वह अपने जीवन की अन्तिम घड़ियों की हो चाहे सृष्टिचक्र की अन्तिम घडियों की हो। मान लो कोई बीमार है। डॉक्टर कहते हैं कि इसको ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। वह इतना समय ही जिन्दा रह सकता है, उसके बाद मर जायेगा। मान लीजिये कि कोई अहमदाबाद जा रहा था, रास्ते में एक्सिडेंट हो गया। उसने दादी जी से कहा था कि दादी जी मैं कल अहमदाबाद से वापस आऊँगा, आकर आपसे बात करूंगा। इतना बड़ा एक्सिडेंट हुआ है कि वह बचेगा या नहीं। इसलिए आगे का कुछ पता नहीं चलता। हमारी अन्तिम घड़ी भी कई बातों पर आधारित होती है। कोई एक्सिडेंट हो सकता है, कोई बीमारी हो सकती है, कोई प्राकृतिक आपदा हो सकती है। इनमें से कोई न कोई कारण से जीवन समाप्त हो सकता है। वही इस जीवन का अन्तिम समय है। जीवन समाप्त होने से पहले हमें सब तैयारी कर तैयार रहना है। कहा जाता है कि मौत किसी को बोलकर नहीं आती, उसका कोई समय नहीं होता। मौत का कोई कैलेण्डर नहीं है।
इसके बारे में महाभारत में एक कहानी है। यक्ष और युद्धिष्ठिर का संवाद है। यक्ष युद्धिष्ठिर से प्रश्न पूछता है कि सबसे आश्चर्यजनक बात क्या है? यद्धिष्ठिर उत्तर देता है कि संसार में हर व्यक्ति जानता है कि उसको एक दिन मरना ही है, शरीर छोड़ना ही है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि वह भूल जाता है कि उसको भी मरना है। अतः धन कमाता है, सम्पत्ति का संग्रह करता है, सुख-सुविधा के अनेक साधनों को इकट्ठा करता है जैसेकि उसको यहाँ सदा के लिए रहना है। यही संसार में बहुत आश्चर्य की बात है।
यह बात सब क्यों भूल जाते हैं? क्योंकि हम भ्रमित हो जाते हैं। अगर हमें सदा याद रहे कि हमें शरीर छोड़ना है तो ऐसा कोई भी कर्म नहीं करेंगे जिससे पाप बन जाता है। एक आदमी था, उसने अपने गुरु से कहा, मुझे एक समस्या है. आप उसका समाधान करेंगे? गुरु ने पूछा, क्या समस्या है? उस पुजारी ने कहा कि मै बहुत बुरा आदमी हूं । मैने बहुत पाप किये हैं। मै अभी अच्छा आदमी नहीं बन सकता, मेरे जैसा बड़ा पापी कोई नहीं है। बदलने की मैंने बहुत कोशिश की लेकिन बदल नहीं पाया। गुरु ने कहा कि तुम पुरी लगन से मेहनत करो, बदल जाओगे। उस व्यक्ति ने कहा, गुरु जी, मैंने बहुत प्रयत्न किया है. हो नहीं सका। मैं अपने आप तो नहीं बदल सकता क्योंकि मै बहुत कमजोर हू। अगर आप अपनी शक्ति से मुझे बदल सकते हैं तो बदल लीजिये। गरु ने कहा, अभी सबकुछ भूल जाओ। पह भी भूल जाओ कि मुझे अच्छा आदमी बनना है। फिर आदमी ने पूछा कि तो अब मैं क्या करूं? गुरु ने कहा, कुछ नहीं करो, जाओ, खाओ, पीओ और मौज करो। जो चाहे करो, जैसे चाहे करो, खुश रहो। आदमी हैरान हो गया कि गुरु क्या कह रहे हैं। वह सोचने लगा कि गुरु शायद मेरी बात समझ नहीं पा रहे है या वे मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं। फिर गुरु ने कहा, तुम अभी चले जाओ, तुम्हारी आयु केवल एक हफ्ता बाकी है, इसलिए इस एक हफ़्ते में जो चाहे, जितना चाहे खुशी मनाओ। वह आदमी हैरान हो गया, क्या मुझे एक हफ्ते में मरना है? पहले उसने सोचा कि गुरु ने उसको मौज-मस्ती करने के लिए खुशी से छुट्टी दे दी। फिर गुरु ने कहा कि तुम्हारा जीवन बाकी एक सप्ताह का है तो वह चिन्तित हो गया। जब उसको यह चिन्ता लग गयो कि मुझे एक हफ्ते में मरना है तो उस चिन्ता में वह खाना-पीना भूल गया, शराब पीना, पाप करना भूल गया। मन ही मन वह सोचने लगा कि बस मुझे मरना है, यहां से जाना है। एक दिन बीत गया, दो दिन बीत गये। इस प्रकार वह दिन गिनती करने लगा। मन में सोचने लगा कि अगर मुझे जीवित रहना है तो भगवान ही मदद कर सकता है। जब सातवां दिन आया तो कुछ नही वह मरा भी नहीं। उसने सोचा कि गरु के पास जाकर पूछूंगा की उन्होंने मुझे झूठ क्यों बोला, मेरा मजाक क्यों उड़ाया, मेरा अपमान क्यों किया गुरुजी की बातों में आकर न ठीक से खाना खाया, न ठीक से सोया , यह चिन्ता लगी रही कि मुझे मरना है। गुरु ने मेरे जीवनसे खिलवाड की है।
वह गुरु के पास गया और कहा, गुरुजी आपने कहा था कि मै सात दिन में मरने वाला हूं। लेकिन मैं अभी जिन्दा हूं। तब गुरु ने उससे पूछा कि इन सातों दिनों में तुमने कोई पाप कोई गलती की, जो पहले किया करता था? उस व्यक्ति ने कहा, नहीं। गुरु ने कहा कि पाप कर्म करने से तुमका छुड़वाने के लिए यह यूक्ति अपनानी पड़ी। अभी तुमको पता पड़ा कि हम पापों से कैसे बच सकते है? अगर तुम यह सदा याद रखोगे कि मुझे मरना है तब भूले नहीं करोगे। ऐसा नहीं समझो, मैं एक हफ्ते के बाद मरूंगा; नहीं, अभी इस घड़ी भी मर सकते हो। मृत्यु का कोई भरोसा नहीं होता, समय नहीं होता। वह कभी भी, किसी भी स्थान पर आ सकती है। तब उस व्यक्ति ने गुरु से क्षमा माँगी और कहा कि मैं आपकी बातों से नाराज हुवा था, आपकी इन बातों को मैं कभी नहीं भूलूँगा और पाप नहीं करूंगा।
देखिये, यह कितनी आश्चर्य की बात है कि जानते हुए भी मनुष्य मूल जाता है कि मुझे मरना है। इसलिए अन्तिम घड़ी के लिए इन्तज़ार करना, यह तो बहुत बड़ा भ्रम है, अपने आपको धोखा देना है क्योंकि हमारा श्वास कब बन्द हो जायेगा क्या पता? आप जानते होंगे हमारी वायु सेना का एक एअर मार्शल जापान गया हुआ था। वहाँ एक होटल में रहा। वह भोजन कर रहा था, भोजन में मछली खा रहा था। मछली का टुकड़ा उसके गले में फंस गया, उसको श्वास लेना नहीं हो रहा था और उसी घड़ी डायनिंग टेबल पर बैठे-बैठे मर गया। उसके मन में देश के बारे में कितनी योजनायें थी! वह वहाँ भारत के प्रतिनिधि के रूप में गया था। वह अपना कार्य सम्पन्न नहीं कर सका और चल बसा। क्या उसको मालूम था कि उसकी अन्तिम घड़ी जापान के एक होटल में आयेगी और वह भी भोजन करते-करते? जो खाना उसको बहुत पमन्द था. वही खाना खाते खाते वह मर जायेगा क्या उसको पता था। अन्तिम घड़ी कब भी आ सकती है इसलिए हमे हमेशा तैयार रहना है। यह सोचना गलत हो जाता है कि जब अन्तिम समय आयेगा तैयार हो जायेंगे। बाबा हमेशा कहते है कि सदा एवररेडी रहो।
वृद्धावस्था के लक्षण अथवा मृत्यु समीप आने के लक्षण पहले से दिखायी पड़ते है, जैसे कान से सुनाई न पड़ना, आंखों से दिखायी न पड़ना, टांगों से चल न पाना हाथ कांपने लगना इन सब लक्षणों से प्रकृति हमें चेतावनी देती है कि अभी तैयार रहो, यात्रा पुरी करने के लिए कभी भी तुमको रथ छोड़ना पड़ेगा। सिर्फ बूढ़ों के लिए नहीं है, जवानों के लिए भी बड़े शक्तिशाली व्यक्तियों के लिए भी एक पल में मृत्यु आ सकता है। चाहे राजा हो, चाहे प्रजा, सबके शरीरों को एक दिन मिट्टी में मिलना ही पड़ता है। एक घड़ी आती है जब यह सब धन-दौलत, शान-शोहरत मिट्टी में मिल जाती है। इसलिए हमें उस अन्तिम घड़ी के लिए अभी से तैयारी करनी है। उसके लिए हमें क्या करना है? बाबा ने जो करने के लिए कहा है, हमें वही करना है। उसके लिए कुछ ईश्वरीय नियम हैं, उनका अनुसरण करना है। लौकिक में भी अगर कोई सरकार के नियमों का उल्लंघन करता है तो न्यायालय पैसे का जुर्माना लगाता है और जेल की सज़ा देता है। अगर वह जुर्माना नहीं दे सकता है तो सज़ा के दिनों को और बढ़ाया जाता है। उसको कहा जाता है कि अगर यह नहीं कर सकते हो तो, वह करो, यह नहीं कर सकते हो तो, वह करो। अगर आप बाबा से कहेंगे कि मीठे बाबा, प्यारे बाबा, मैं तो बहुत कमजोर हूं, इतने सारे मैं नहीं कर सकता हूं, मैं बहुत पापी हूं, कपटी हूं. मैं देरी से ज्ञान में आया हूं, पुरुषार्थ करने के लिए मुझे ज्यादा वक्त भी नहीं मिला है, आप कहते हैं, यह करो. वह करो। बाबा, आप तो बुद्धिवानों के भी वृद्धिवान हो। आप ही समझो ना कि मैं इतनी जल्दी कैसे तैयार हो सकता है? कैसे सम्पूर्ण बन सकता है? इसलिए मुझे इससे भी सरल विधान बताओ मिसाल के तौर पर बाबा कहते है कि आठ घंटे सेवा करो आठ घंटे विश्राम करो और अतः घंटे योग करो ।बच्चे कहते की बाबा आठ घंटे योग करना नहीं हो रहा है। तब बाबा कहते ठीक है चार घंटे योग करो। चार घंटे भी कैसे याद करें यह भी युक्ति बताते है। बच्चे अमृतवेले उठो बाबा को याद करो हर घंटे दो मिनट या एक मिनट ट्रैफिक कंट्रोल करो। कोई कार्य करने से पहले दो मिनट बाबा को याद करो। नाश्ता करते समय भोजन करते समय पानी चाय पीते समय मुझे याद करो । बाथरूम में नहाते समय मझे याद करो। बच्चे यह नहीं कर सकते हो ना यह करो, यह नहीं कर सकते हो तो वह करो। इस प्रकार, याद करने की अनेक यूंक्तियां बाबा हमे बताते है। हमे हर क्षण को अन्तिम क्षण समज़ कर तैयार रहना चाहिए क्योंकि अन्तिम क्षण कभी भी आ सकता है। मम्मा भी यही कहती थी कि हर घड़ी अन्तिम घड़ी समझ कर चलो। यह अन्तिम क्षण कहीं भी आ सकता है और किसी रूप में भी आ सकता है। आयेगा ही, यह निश्चित है।
दूसरी बात, महाविनाश तो होना ही है। बाबा भी कहता है कि महाभारी महाभारत लड़ाई होनी है। यह कब होगा यह नहीं बताऊंगा, दिनांक नहीं बताऊंगा। बाबा डेट क्यों नहीं बताते, इसका कारण मुझे लगता है कि विनाश एक डेट पर नहीं होगा, कई डेट पर होगा। एक डेट पर कहीं प्राकृतिक आपदाओं के रूप में, एक डेट पर कहीं सिविल वार के रूप में, एक डेट पर कहीं अणयुद्ध के रूप में होगा। एक डेट पर कहीं बीमारियों के रूप में होगा। किसी डेट पर सारा शहर पानी में डूब जायेगा। इस तरह एक ही तारीख पर, एक ही बार सारा विनाश नहीं होगा। अनेक तारीखे हैं। इसलिए बाबा कहते हैं कि बच्चे, विनाश की तारीख क्यों पूछते हो? परन्तु यह बात निश्चय है कि विनाश होगा क्योंकि यह भगवानुवाच है। एक भगवान ही भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाला त्रिकालदर्शी है और ज्ञानपूर्ण है। उसको पता है कि यह होना ही है। इस विषय में आपको मै अपने जीवन के अनुभव सुनाऊ। बाबा ने जो कुछ भी कभी कहा है. वह होता आया है। बाबा सत्य है. वे कभी वो बात नहीं कहेंगे जो नहीं है अथवा नहीं होने वाली है। मनुष्य कोर्ट में जाते है तो झूठ बोलते हैं। जैसे बडे-बड़े देश के मिनिस्टर्स, प्राईम मिनिस्टर्स और प्रेसिडेंट्स न्यायालय के सामने झूठ बोलते हैं अपने को बचाने के लिए। वे कसम खाते है कि में सच ही बोलूंगा, सच के बिगर कुछ नहीं बोलूंगा । लेकिन अपने को बचाने के लिए उन्होंने झूठ बोला। लेकिन परमात्मा सत्य है। परमात्मा का दूसरा नाम है सत्य । ऋषि-मुनियों ने सत्य की परमात्मा के साथ तुलना की है। इसलिए परमात्मा के महावाक्य कभी झूठ नहीं हो सकते। उसने तो बता दिया है लेकिन हमारे ऊपर निर्भर करता है कि कहाँ तक हमारे में उनके प्रति विश्वास है, उनके महावाक्यों पर निश्चय है। बाबा ने तो सब-कुछ स्पष्ट किया है। उन पर विश्वास रखकर अपना कल्याण करना या उन पर संशय लाकर अपने आपको धोखे में डालना ये सब आपके ऊपर निर्भर है। बाबा ने बार-बार कहा है कि मोठे बच्चे, यह होना है, इसके लिए आपको तैयार रहना है। यह और प्रकार की तैयारी है जो होने वाला है, उसके लिए तैयारी करना। भले हम उस महाविनाश तक न भी जीये या समझ लो जी भी लिया , उस समय की तैपारी अभी से करनी है, उस परीक्षा के लिए अभी से तैयार रहना है।
कई लोग कहते हैं कि उस भविष्यवक्ता ने यह कहा, इस भविष्यवक्ता ने यह कहा। लेकिन यह तो सोचो, परमात्मा ने क्या कहा है? हमें तो बाबा ने क्या कहा है और क्या कहता है उसको स्पष्ट रूप से समझना है, उनके आंदेशों का पालन करना है और तैयारी करनी है। दोनों अन्त जीवन के अन्त और सुष्टिचक्र के अन्त के लिए हमें कोई अलग-अलग तैयारी नहीं करनी है, दोनों की तैयारी एक ही है। पहले हम सोचेंगे कि जीवन के अन्त के लिए क्या तैयारी करनी है? पहली बात है. बाबा को पर्ण रूप से हमें समर्पित हो रहना है। हमे तो यह पता भी नही था कि शरीर अलग है और आत्मा अलग है। अगर हमन पढ़ा होगा या सुना भी होगा कि शरीर में आत्मा है लेकिन यह तो बिल्कुल भी पता नहीं था कि मै ही आत्मा हूं, यह शरीर मेरा वस्त्र या साधन है ।हमे यह भी पता नहीं था कि हम कहां से आये हैं। यह भी पता नहीं था कि हमने कितने जन्म लिए है । बाबा से मिलने के पहले हम तो एकदम सौ फीसदी अज्ञानी थे। कई लोग दुनिया में बहुत नशा दिखाते हैं कि हम बहुत समझते हैं. हमारे में बहुत ज्ञान है। लेकिन मैं यह कहूंगा कि आपको कुछ भी नहीं पता है। बाबा ज्ञान का सागर है. हम उनके सामने मन, वचन, कर्म से और तन-मन-धन से (जो है. जैसे है। सम्पूर्ण समर्पित होना है। कई लोग समझते हैं कि सर्व रूप से हम परमात्मा को समर्पित हो जायें तो हमारे पास स्वतन्त्रता कैसे होगी? भगवान को सब सौंप दो तो आप सर्व रूप से स्वतन्त्र होंगे। हर प्रकार से स्वतन्त्र होंगे। आप विकारों से स्वतन्त्र होंगे, बुराइयों से स्वतन्त्र होंगे, व्यर्थ से स्वतन्त्र होंगे, तो आपको और कौन-सी स्वतन्त्रता चाहिए? स्वतन्त्रता का मतलब स्वेच्छाचार नहीं है। मनमानी करना, व्यसनों में लिप्त रहना, पाप करना यह कोई स्वतन्त्रता नहीं है। यह स्वतन्त्रता के नाम पर पाप करने की स्वच्छन्दता (licence) है। आजकल स्वतन्त्रता के नाम का अनर्थ हो रहा है।
स्वतन्त्र का अर्थ है विकारों से, पाप कर्मों से, व्यसनों से स्वतन्त्र । इसलिए पहले अपने आपको बाबा को समर्पित करो। समर्पित होना यह कोई कठिन काम नहीं है, बहुत सहज है। बाबा यह नहीं कहता कि अच्छे मकान में नहीं रहो, अच्छे कपड़े नहीं पहनो, आराम से नहीं रहो। बाबा कहते हैं कि जीवन के लिए जो ज़रूरी हैं, उन सबको करो लेकिन निमित्त बनकर, अपने को ट्रस्टी समझकर, बाप को बीच में रखकर, बाप की श्रीमत की लकीर के अन्दर रहकर। फ्रैंकफर्ट में एक चित्रसंग्रहालय है। वहाँ बहुत वित्र हैं जो दिखाते हैं कि उस जमाने में कैसे गुलामों के साथ व्यवहार किया जाता था। उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था। उनको बहुत मारते थे, बहुत कष्ट देते थे। मानव अधिकारों का ही खुन किया है। यह तो बहुत बुरी बात है। यह मानव जाति के लिए ही एक कलंक है। मनुष्य, मनुष्य से ऐसा बुरा व्यवहार करता है कि मानवजाति के लिए ही शर्म की बात है। वे थे जिन्होंने अपनी स्वतन्त्रता गंवायी थी। बाबा ऐसे आपकी स्वतन्त्रता नहीं लेते, वे तो और ही आपको स्वतन्त्र करते हैं। यहाँ कोई नियम भी हैं तो वे हमारी स्वतन्त्रता को कम करने के लिए नहीं हैं बल्कि हमें पूर्ण स्वतन्त्र, समग्र स्वतन्त्र बनाने के लिए सहायक है। अतः सम्पूर्ण स्वतन्त्रता पाने के लिए बाबा को सम्पूर्ण समर्पित हो जाओ।
कोई भी परीक्षक (Examiner) पहले यह नहीं बताता कि परीक्षा में कौन-से प्रश्न आयेंगे। परीक्षा हॉल में ही आपको पता पड़ेगा, जब आपके हाथ में प्रश्नपत्र आता है। लेकिन यहां तो ऐसा विचित्र परीक्षक तथा शिक्षक है कि वह पहले से ही हमें प्रश्नों को सुना देता है कि ये ये प्रश्न आयेंगे। बाबा यह भी कहते हैं कि आपके प्रश्नपत्र में कई प्रश्न होंगे लेकिन दो प्रश्न अति मुख्य हैं। अन्य प्रश्नों को भी पास करना है लेकिन दो को तो तुमको जरूर पास करना पड़ेगा। बाबा केवल हमारा शिक्षक ही नहीं है. साथ-साथ हमारा मार्गदर्शक (Guide) भी है। बाबा कहते हैं कि आप जिस समय इस पाठशाला में प्रवेश करेंगे उस समय से, उस घड़ी से ही आपकी परीक्षा आरंभ होगी, वे प्रश्न आयेंगे। वे दो प्रश्न कौन से हैं? पहला प्रश्न है- आप आत्म-अभिमानी हो या देह-अभिमानी हो? हमारे कोर्स का यह पहला प्रश्न भी है और हमारी पढ़ाई का अन्तिम प्रश्न भी है। हमारी अन्तिम परीक्षा इसी पर निर्भर होगी। जब हम शरीर छोड़ेंगे उस समय हम किस अभिमान में है आत्म-अभिमान में या देह-अभिमान में? क्योंकि लोग उस समय रोते रहेंगे, चिल्लाते रहेंगे, गलियों में खून की नदी बहती रहेगी, आग लगी होगी। उस समय हम किस अवस्था में होगे आत्म-अभिमानी अवस्था में या देह अभिमानी अवस्था में? यह हमारी परीक्षा होगी। उसके लिए तैयारी करनी है और अभी से तैयारी करनी है। बाबा ने तो कह दिया है कि सदा आत्म-अभिमानी स्थिति में रहो, यही तैयारी करो। चलिये, तैयार हो जाइये।
दूसरा है, बाबा कहते हैं कि मुझे ही याद करो, और किसी को याद नहीं करो। देहधारियों को याद नहीं करो। जब बाबा ने कहा है कि अपनी देह को ही भूल जाओ, तो दूसरों के देह को क्यों याद करते हो? आध्यात्मिक उसी को कहा जाता है जो आत्मिक चीज़ को याद करता है। देह और दैहिक वस्तुओं को जो याद करता है अथवा पूजता है उसको आध्यात्मिक नहीं कह सकते। हरेक धर्म वाले, मनुष्य को देह-अभिमानी ही बनाते हैं क्योंकि वे देहधारियों की ही अर्चना और आराधना सिखाते हैं। शिव बाबा एक ही है जो देह और देह की वस्तु-वैभवों से परे ले जाकर देही अभिमानी बनना सिखाता है। श्रीकृष्ण का शरीर बहुत सुन्दर होता है, पवित्र होता है। वह सब नेचुरल चीज़ों को खाता है, फलों को खाता है, सब्जियों को खाता है इसलिए उनका शरीर बहुत अच्छा होता है। फिर भी वह शरीर है ना। शरीर को याद करने वाला शरीर-अभिमानी बनता है। आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण की पूजा करने वाले उसकी क्या महिमा करते हैं? उसके हाथ में क्या है, उसके सिर पर क्या है, उसकी गले में कौन-सी माला है इन स्थूल वस्तुओं का ही वर्णन करते हैं। उसके हरेक अंग का वर्णन करेंगे। नहीं तो वे घंटा-आधा घंटा पूजा कैसे करेंगे? मन को कैसे टिकायेंगे? नहीं तो मन भागता रहेगा गांव से दिल्ली तक या दिल्ली से लंदन तक। इसलिए भक्तिमार्ग का जो भी विधि-विधान है वह देह-अभिमान का है, न कि आत्म-अभिमान का। भक्ति में हम थोड़े ही परमात्मा को याद करते थे? देह को अर्थात् प्रकृति को याद करते थे। इसलिए बाबा कहते हैं कि मुझ निराकार को ही याद करो, कोई देहधारियो को नहीं याद करो। यह बाबा की श्रीमत है आज्ञा है है, शर्त है।
बार-बार बाबा से बात करने का यह अभ्यास चाहिए कि हे मेरे मीठे बाबा प्यारे बाबा, आप मझे कितना प्यार करते हो, मेरे ऊपर आपकी कितनी कृपा है! आपने मझे कितने वरदानों से भरपुर किया है। बाबा आपने मुझे कितने अधिकार दिये हैं। बाबा आपने मुझे कितना ऊंचा ज्ञान दिया है। बाबा ने हमें दो बातें बतायीं है. एक है मुझे सम्पूर्ण समर्पित हो जाओ और दूसरा है, आत्म-अभिमानी बन मुझ एक को ही याद करो।
अन्तिम जो परीक्षा आवेगी वह मोह की होगी। इसलिए बाबा बार बार कहते हैं कि नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप बनो। भले ही और विकार भी है जैसे काम, क्रोध, लोभ, अहंकार लेकिन बाक़ी ये सब विकार आते ही हैं 'मोह' के कारण। वह मोह अपने देह से हो या दूसरों की देह से हो। जितने ही विकार हैं वे मोह से उत्पन्न होते हैं। अगर इन सब विकारों को जीतना बाहते हैं तो सबसे पहले मोह को जीतना होगा। मोह ही सबसे पुराना दुश्मन है। अगर आप अपनी उन्नति करना चाहते हैं तो सबसे पहले 'मोह' पर जीत पाओ। मोह केवल व्यक्ति से नहीं है लेकिन वस्तु से अथवा किसी वैभव या साधन से भी हो सकता है या खाने-पीने की चीजों से भी हो सकता है। बाबा कहते हैं कि किसी प्रकार का भी मोह न हो, उससे अविद्या हो जाओ, वह नष्ट हो जाये। नष्ट माना जड़ से खत्म। मोह यहां तक खत्म हो कि उसकी राख भी न रहे। यह हमारी अन्तिम परीक्षा होगी।
वह परीक्षा कल हो सकती है अथवा विनाश के समय हो सकती है या आज ही हो सकती है या इसी घड़ी भी हो सकती है। अगर हम मोह को नहीं छोड़ेंगे तो बाद में हमें बहुत तकलीफ होगी। जिसको अपने शरीर से मोह नहीं होता वही सहज रीति से देह का त्याग करेगा। कई लोग दूसरे देहधारियों से प्यार नहीं रखते लेकिन अपनी देह से बहुत प्यार रखते हैं। अगर अपने शरीर के प्रति भी थोड़ा-सा मोह होगा, तो भरोर छोड़ने में उनको बहुत तकलीफ होगी। कई लोग ऐसे भी होते हैं जिनको अपने शरीर से मोह नहीं है. दूसरों के देह से भी मोह नहीं है परन्तु अपने विचारों से मोह है। देखो, मै कितने अच्छे विचार देता हूं, कितनी अच्छी बातें सुनाता हूं लेकिन लोग मेरा विचार समझते नहीं हैं, पहचानते नहीं हैं। ऐसे लोग अपने विचार, अपनी योजना और तर्क पर बहुत मोहित रहते हैं। उन बातों में उनका मोह इसलिए होता है कि वे उनकी रचनायें हैं। बाबा का हमसे बहुत प्यार है क्योंकि हम उनकी रचना हैं। उसी प्रकार, बाबा से हमारा भी प्यार है क्योंकि वह हमारा रचयिता है। मेरापन और मैंपन को भी भूलो, प्रभु अर्पण कर दो। अगर आपको ये विचार आये हैं या प्लॉन सूझे हैं तो भी किससे? बाबा की टचिंग से ही ना! बाबा की टचिंग से आपको ये विचार आये हैं तो ये बाबा के हो गये, न कि आपके। जैसे पुजारी अपने इष्ट के ऊपर अपने फूल आदि अर्पित्त करता है, वैसे ही आप भी अपने सब विचार या सलाहों को बाबा पर अर्पित कर दो कि बाबा, ये विचार मुझे आये हैं, मैं आपको अर्पित करता हूँ। उनको जिस प्रकार उपयोग करें, यह आपका काम है, मैं केवल निमित्त हूं, मैंने अपना विचार व्यक्त कर दिया, बस। यह भाव हमारे मन में रहना चाहिए।
इसके साथ-साथ हमारा जीवन बिल्कुल साधारण रहना चाहिए। हम अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करें। जितनी जरूरत है उतना ही उपयोग करें। यह चाहिए, वह चाहिए चाहिए चाहिए की लिस्ट लम्बी नहीं बनाओ। जितना साधारण जीवन जी सको, उतना साधारण जीवन जीओ। मेरा कहने का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ छोड़ दो। बाबा कहते हैं कि साधारण रहो क्योंकि सादे जीवन से ही आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, ऊंचा पुरुषार्थ कर सकते हैं और ऊँचे पुरुषार्थ से श्रेष्ठ आत्मा, महान् आत्मा, पवित्र आत्मा बन सकते हैं। अपने पास जरूरी चीजें भी कम से कम होनी चाहिए किसी चीज के प्रति आकर्षण न हो, किसी वस्तु पर अवलंबित न हो। हमारी ऐसी मनोदशा नहीं होनी चाहिए कि फलानी किसी वस्तु व्यक्ति या वैभव के प्रति आकर्षण है तो आप फरिश्ता नहीं तो मैं यह सेवा नहीं कर पाऊंगा। इसलिए बाबा कहता है कि किसी वस्तु व्यक्ति या वैभव के प्रति आकर्षण है तो आप फरिश्ता नहीं बन सकेंगे।
दूसरी बात है. सबसे दुआये लो। किसी की भी ग्लानि न करो। किस
के लिए बुरा नहीं सोचो, बुरा नहीं करो। जहाँ तक हो सके सबको सन्तुष्ट करो, उनकी सेवा करो ताकि उनसे दुआयें मिल सके। दुआयें लेना जीवन में यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह जरूरी नहीं है कि सब आपको दुआये देंगे। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि आप उनकी कितनी भी सेवा करो, वे सन्तुष्ट नहीं होंगे। फिर भी आप अपनी तरफ़ से उनको सन्तुष्ट करने का प्रयास नहीं छोड़ो, उनको जितना हो सके सहयोग दो, स्नेह दो, अच्छी भावना दो।
तीसरी बात, कई बार मुरलियों में बाबा ने बताया है कि सबके प्रति शुभ-भावना और शुभ-कामना रखो। भले ही कोई आपसे बुरा व्यवहार करता है, उसके प्रति भी कभी बुरा नहीं सोचो। अगर कोई आप को बहुत तंग करता हो तो भी आप उसके प्रति बुरा नहीं सोचना क्योंकि जिसने आपको तंग किया वह उसका कर्म है, उस कर्म का फल उसको मिल ही जायेगा। आप उसके प्रति शुभ ही सोचो, शुभ ही करो। आप सोचो कि बाबा इसको सद्बुद्धि दे, शिव बाबा इसका भला करे। ये शुभ संकल्प और कर्म आपको शुभ फल ही देंगे। यह कभी नहीं संकल्प करो कि यह मुझे तंग कर रहा है, इसको कुछ न कुछ ऐसा होना चाहिए या यह मर जाना चाहिए। यह सोचो कि यह नादान है, अज्ञानी है. बेसमझ है इसलिए ऐसा करता है। अगर इसने बाबा को और बाबा के ज्ञान को अच्छी रीति समझा होता तो ऐसा नहीं करता। इसका कल्याण हो जाये। कभी भी किसी को बद्दुआ नहीं दो क्यों कि आपकी बददुआ शायद सच भी हो जाए । अगर अगर आपने सोच लिया कि फैलाने व्यक्ति ने मुझे बहुत तंग किया है वह मर जाना चाहिए।अगर वह व्यक्ति मर गया तो उसके रिश्तेदारों से ज्यादा आप रोएंगे। क्यों कि आपने उसको श्राप दिया था कि वह मर जाए। ज्ञानी और योगी होने के कारण आपकी अंतरात्मा सदा खाती रहेगी कि मेरी बददुआ के कारण वह व्यक्ति मर गया।ज्ञानी होकर भी ऐसा संकल्प किया तो आप बहुत बड़े दंड के अधिकारी बनेगे। इसलिए आप किसी के प्रति बुरा सोचो ही नहीं, जो जैसा करेगा, वैसा ही पायेगा। यह नियम अटल है, शाश्वत है। वह अपने रास्ते से चल रहा है, आप अपने रास्ते से चलो। उसके प्रति सदा अच्छा सोचों कि उसके अच्छे दिन आ जाये, वह भी अच्छा बन जाये। आप खुश रहो, बाबा की याद और सेवा में मस्त रहो।
चौथी बात है, सम्बन्ध किसी से बिगाड़ो नहीं। ध्यान हमारा इस बात पर होना चहिए कि हमारा सम्बन्ध किसी से न बिगड़े। इसके लिए हमें कम बोलना है। बाबा कहते हैं, कम बोलो, मीठा बोलो, धीरे बोलो। बाबा ने ऐसा भी बोला है कि बिल्कुल चुप रहो। चुप माना, दूसरों को भी ऐसी-वैसी बातें नहीं बोलो, उन विचारों के बारे में अपने से भी नहीं बोलो।
पांचवीं बात है, रोज अपनी चैकिंग करो। प्रतिदिन अपनी उन्नति का चार्ट चैक करो। स्वयं का जज बनो, स्वयं का डॉक्टर बनो, स्वयं का टीचर बनो। देखो, क्या मैं दिन-प्रतिदिन प्रगति पा रहा हूँ? सदा यह मन में हुनर रहना चाहिए कि मुझे आगे बढ़ना है, मुझे आगे बढ़ना है। आगे बढ़ते चलो, और आगे बढ़ते चलो। हिमालय एक युवक को कह रहा है कि तुम आगे बढ़ते चलो, कितने भी आंधी-तूफ़ान आयें, तुम रुको नहीं, बढे चलो, तुम बढ़े चलो। शक्तिशाली बनो, आगे बढ़ना ही जीवन है। रुको नहीं क्योंकि रुकना ही मृत्यु है। यह तब संभव है, जब हम अपनी चेकिंग करते हैं, चार्ट रखते हैं और कमी-कमजोरियों को मिटाते चलते हैं। रोज़ कम से कम एक कदम हमारा आगे बढ़ना चाहिए। कल से आज एक कदम आगे आज से कल एक कदम आगे और कल से परसो एक कदम आगे । आगे बढ़ते ही जाना है. कभी नहीं रुकना चाहिए। आखिर तो मंजिल पर पहुंच ही जाये।
छटी बात है. बाबा का आज्ञाकारी रहना। अगर हम बाबा के आज्ञाकारी है फिर भी कोई कमी-कमजारी रह जाती है तो उसको मिटाने के लिए बाबा की मदद भी मिल जायेगी। सदा यह स्मृति रहनी चाहिए कि मुझे हर संभव बाबा का आज्ञाकारी बन चलते रहना है। बाबा भी कहते है कि मैं तुमको ग्रेस माक्र्स (Grace marks; अनुग्रह अंक) दे दूंगा क्योंकि तुम जीवन भर मेरे आज्ञाकारी बने हो, कभी किसी बात पर 'ना' नहीं कहा। जो आज्ञाकारी होते हैं और विश्वासपात्र होते हैं वे बाबा से विशेष मदद और आशीर्वाद पाते हैं। समय पर बाबा से मदद प्राप्त करना ही बाबा से आशीर्वाद पाना है। इसलिए विश्वास पात्र बनो। इसी को बाबा कहते हैं, फरमानबरदार बनो, वफादार बनो। सब बाबा के बच्चे है, हरेक में अलग-अलग विशेषताये हैं लेकिन हमें 'वफ़ादार, फरमानबरदार, ईमानदार, सपूत बच्चे की लिस्ट में जाना है।
फिर बाबा कहते हैं, जीरो बनो तब आप हीरो बन सकेंगे। यहाँ बेगर बनेंगे तब ही वहाँ प्रिन्स बनेंगे। मेरा कुछ नहीं है, सब-कुछ जो भी है बाबा का है। सब परमात्मा को समर्पित करना अलग चीज़ है, परन्तु मेरा कुछ भी नहीं है, यह भाव रहना अलग चीज़ है। किसी पर भी मैं अपना अधिकार नहीं रख सकता। किसी भी चीज़ को मैं अपने साथ नहीं ले जा सकता। अगर समझिये आप एक सेन्टर की इंचार्ज हैं, आपका दूसरे सेन्टर पर ट्रान्सफर हो गया तो आप पुराने सेन्टर से कोई भी चीज़ साथ नहीं ले जा सकते कोई भी वस्तु आपकी है ही नहीं। किसी भी वस्तु पर ही नहीं, सब जो भी आपके पास था या है वह बाबा का है। आपको बाबा ने सब-कुछ दिया हुआ है इसलिए आपका मन होता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए बाबा ने माझे बहुत कुछ दिया है. बाबा मेरे साथ है तो किस बात की कमी है। मैं सन्तुष्ट हूं, मुझे कुछ नहीं चाहिए यह आपकी भावना होगी।
आठवी बात है. एडजस्टमेन्ट (adjustment), सबके साथ समायोजन करके रहना और चलना समायोजन में सहन करने की शक्ति समाने की शक्ति सहयोग करने की शक्ति आदि आ जाती है। ये सब शक्तिया जब हमारे में है तब ही हम दूसरों के साथ एडजस्ट कर सकते है। अगर हम परिवार में एडजस्ट होकर चलते हैं तो बाबा बहुत खुश होंगे, बाबा से दुआयें मिलती रहेंगी। किसी आत्मा की बुराइयों को, कमी-कमजोरियों को नही देखो। यहां तक कि किसी देहधारी को देखो ही नहीं, बाबा को देखो। बाबा कहते हैं, सी फादर, फालो फादर। बाप को ही देखो और बाप का ही अनुसरण करो, किसी देहधारी के अवगुण और कमजोरियों को देखते ही क्यों हो? ये कुछ बातें हैं जो हमारे मन में, कर्म में होनी चाहिएँ। तब हम अन्तिम परीक्षा का सहज रीति से सामना कर सकेंगे और पास हो पायेंगे।
बाबा ने कहा है कि आप बच्चों में भी कोई होंगे अन्तिम विनाश देखने के लिए। जिसकी आयु लम्बी होगी, उस समय तक जी सकेंगे वे देख पायेंगे। बाबा ने यह भी कहा है कि उन दृश्यों को देखने के लिए बच्चों में बहुत हिम्मत चाहिए, बहुत शक्ति चाहिए। जब ब्रह्मा बाबा ने विनाश का साक्षात्कार किया तो उनकी आंखों में भी आंसू आये, कहने लगे, हे भगवन् बस करो, बस करो, यह दृश्य मै नहीं देख सकूँगा। यहाँ तक कि वह दृश्य देख ब्रह्मा बाबा खड़े नहीं हो सके। हे ईश्वर, हे परमेश्वर! यह मुझे क्यों दिखा रहे हो? इसको बन्द करो, इसकी जगह पर मुझे अपना सुन्दर रुप दिखाओ। गीता में भी आता है, जब अर्जुन ने विराट रूप देखा तो भगवान से कहता है कि बस करो, बस करो, अपना मोहिनी रूप दिखाओ।
आप भी जानते होंगे कि विनाश का समय कैसा होगा! उस समय सांप्रदायिक दंगे होंगे, लोग धर्म के नाम पर आपस में लड़ेंगे। जब विनाश होगा तब जीने के लिए जो जरूरी चीजे चाहिए वे नहीं होगी तो जिनके पास होंगी उन पर लोग हमला करेंगे, उनको लुटेंगे। इस प्रकार उस समय लूट-मार होती रहेगी। अमीरों पर गरीब चढ़ाई करेंगे, छीनेंगे, मारेंगे, खून करेंगे। उस समय यातायात, सूचना प्रौद्योगिकी ठप्प हो जायेगी तो उस समय दुनिया की क्या परिस्थिति होगी आप अन्दाजा लगा सकते हैं। आज दुनिया बिजली और परिवहन पर इतना अवलम्बित है कि अगर एक दिन के लिए ये दोनों ही बन्द हो जायें तो हाहाकार मच जाये। बाबा कहते हैं, खुने नाहक खेल होगा, खून की नदियाँ बहेंगी। उस समय परीक्षा किस रूप में आयेगी? भय, असुरक्षा और दुश्चिन्ता। अन्तिम परीक्षा में इन तीनों रूप में प्रश्नपत्र आयेगा। ऐसी स्थिति में जब लोग रो रहे होंगे, चिल्ला रहे होंगे, एक-दूसरे को मार-काट रहे होंगे, लूट रहे होंगे तब आपको मन एकाग्र करना होगा, स्थिर करना होगा। योगयुक्त हो रहना पड़ेगा, विदेह अवस्था में, आनन्द की स्थिति में स्थित रहना पड़ेगा। ये सब तब सम्भव होंगे जब आपको इन अवस्थाओं में रहने का अभ्यास बहुत काल का होगा। हमारी अन्त की स्थिति जैसी होगी वैसी ही हमारी गति होगी। हमारा भविष्य हमारे अन्त की मति पर आधारित होगा। इसलिए अन्तिम विनाश के समय अगर हम रहेंगे तो हमारी अवस्था ऐसी होनी चाहिए कि बाबा, मैं तो आपकी गोद में हूं, यह देह आपकी अमानत है, मैं आपके पास आ रहा हूं। बाहर के सब-कुछ भयानक दृश्य और रोदन देखते हुए, सुनते हुए हमें बाबा की याद में मगन रहना चाहिए। इस अवस्था में जब हमारा शरीर छूटेगा, तब हमारी गति अथवा भविष्य श्रेष्ठ बनेगा।
बाबा ने यह भी कहा है कि विनाश के समय पांच विकार और पांच तत्व भी वार करेंगे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ये भी परेशान करेंगे। वे भी बड़े रूप में आयेगे। ये आपके मन में भी आयेंगे किसी न किसी कोने से और अन्य मनष्यों के अन्दर भी आयेंगे जिनमें काम वासना जोरो पर रहती है। उस समय कोई पुलिस नहीं होगी. कोई सरकार नहीं होगी, कोई किसी को बचाने वाला नहीं होगा। उस समय सारे विकार अपने चरम स्वरूप में होंगे। यह है अन्तिम समय का दृश्य, उसके बाद सब आसुरी शक्तिया हो जायेंगी। लेकिन उससे पहले विकार और विकारी भी आपको परेशान करेंगे, आपका पीछा करेंगे परन्तु अगर आप आत्म-अभिमानी होंगे और परमात्म-अभिमानी होंगे तो उनको आपका प्रकाश रूप दिखायी पड़ेगा, आप देवी रूप में दिखायी देंगी, फ़रिश्ते के रूप में दिखायी देंगी। आप पर वे हमला नहीं कर सकेंगे, या तो डर कर भाग जायेंगे, या भक्ति भाव से नमस्कार करके चले जायेंगे। आप उस समय ऐसी शक्तिशाली अवस्था में होंगे, ऐसी योग अवस्था में होंगे तो वे आप के पास आ नहीं पायेंगे। उस समय आपको न पुलिस मदद करेगी और न आप के पड़ोस वाले मदद करेंगे। आपको अपने योग बल से ही, योग अवस्था से ही मदद मिलेगी।
यह है एक रूप, दूसरा रूप है उस समय प्राकृतिक प्रकोप होंगे। बाढ आयेगी, भूकम्प आयेगा। उस समय जल के प्राणी भी बाहर आ जायेंगे। सांप, बिच्छू आदि भी जल से बाहर आयेंगे तो लोग घर के बाहर भी रह नहीं पायेंगे। ऐसे समय जो योग में रहेंगे, बाबा के साथ का अनुभव करते रहेंगे उनको इन जानवर आदि से कुछ भी हानि नहीं होगी। इसलिए बाबा कहते. बच्चे फ़रिश्ता बनो, अशरीरी बनो, देही अभिमानी बनो। अगर हम अभी से तैयारी करेंगे तो उस अन्तिम परीक्षा का सामना करेंगे और पास होंगे।
तपस्यामय योग
हम अपने योग को तपस्यामय बनाना चाहते हैं तो हमारे सामने आठ उद्देश्य होने चाहिए। पहला है. ज्ञान की अनुभूति ईश्वरीय विश्वविद्यालय में हमें बताया गया है कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा है, शरीर नहीं है। परमात्मा भी ज्योतिर्बिन्दु है परन्तु वह गुणों का सागर है, वह परमधाम का वासी है। यह हमने शाब्दिक रूप से सुना। कुछ-कुछ उसका अनुभव भी किया। लेकिन हमें उसका बहुत गहरा अनुभव करना है, आत्मा का शरीर से तो न्यारापन है, उस न्यारेपन में स्थित होकर आत्मा की विशेष अनुभूत्तियों का अनुभव करना है। परमधाम क्या है, कर्मातीत अवस्था क्या होती है, मुक्ति अवस्था क्या है इनका अनुभव करना है। इस ईश्वरीय जीवन में, ब्राह्मण जीवन में, तपस्वी जीवन में परमधाम का अनुभव करना, एक विशेष प्राप्ति है। दूसरे शब्दों में यूं कहें कि पहला उद्देश्य हमारा यह रहेगा, जो ज्ञान हमने सुना, अब उसका अनुभव करें। अनुभव की भी गहराई में जायें। -
दूसरा है, बाबा के साथ जो सम्बन्ध हम गाते हैं कि वह माता भी है, पिता भी है, सखा भी है, शिक्षक भी है, साजन भी है, स्वामी भी है, साथी भी है, सहायक भी है, मार्गदर्शक भी है, सद्गुरु भी है, उनका भी अनुभवः करना। बाबा के साथ के अनुभवों में ही विशेष प्राप्ति है। केवल उनको समझने से, उनका गायन करने से सम्बन्धों का अनुभव नहीं होता। सम्बन्ध जोड़ने से और निभाने से अनुभव होते हैं। परमात्मा के पिता रूप का प्यार क्या है, सखा रूप का प्यार क्या है जब हम विकट परिस्थिति में होते हैं. तब वह सहायता किस प्रकार देता है इन सबको अनुभव करने का तरीका हमे आये। हम बुद्धि का संग उसके साथ जोड़ते हैं तो हमे क्या-क्या अनुभव होते है ये सब अनुभव करना।
तीसरा उद्देश्य है. शिव बाबा के गुण जो गाये हुए हैं कि वह आनन्द का सागर है प्रेम का सागर है शांति का सागर है सर्वशक्तिमान हैं - इन सबका भी अनुभव करना। वह आनन्द क्या होता है आनन्द में विभोर हो जाना बजाना, एकदम आनन्द ही आनन्द उसकी पराकाष्टा में लवलीन हो जाना। इससे सर्वोत्कृष्ट प्राप्ति और कोई है ही नहीं। अगर इस संगमयुगी जीवन में अतीन्द्रिय सुख और आनन्द की प्राप्ति न की तो बाकी क्या किया समय तो निकल गया सारा। बाबा की जो महिमा गाते है उन हरेक गुण और शक्ति का अनुभव करना है। उनका अनुभव कुछ देर के लिए या ऊपर-ऊपर से नहीं करना है. गहराई से अनुभव करना है। जितना लूट सके उतना ज्यादा अनुभवों की लूट करना है। भक्तिमार्ग में कहते हैं 'राम नाम की लूट है. लूट सके तो लुट’। वह जो आनन्द है, जितना लूट सकते हो लूट लो । बाबा शान्ति का भण्डार है। वह शान्ति का भण्डार अपने में भर लो। यही लूट आपकी सम्पूर्णता की स्टेज बनायेगी, यही आपको सोलह कला सम्पूर्ण बनायेगी। आप इस ईश्वरीय आनन्द को जितना पाओगे, उतना ही सम्पूर्णता को पाओगे। जब समय समीप आया है, फिर भी हम संसार के लफड़ों में फंसे रहें तो जिस खान के पास हम पहुंचे हैं, जिन रत्नों के नज़दीक खड़े हैं, अभी भी उनको नहीं लिया तो बाक़ी कौन-सा समय आयेगा प्राप्त करने का? अभी नहीं लिया तो कब लोगे?
कई चित्रों में पहले लिखा रहता था कि 'फिर करोगे कब?'। हमारे मन के दरवाज़े पर यह खटखट आवाज़ आती रहनी चाहिए कि 'फिर करोगे कब?' अगर अब नहीं करोगे तो फिर कब करोगे? सारी उम्र सांसारिक कर्म, गृहस्थ जीवन के कर्म ही करते रहोगे तो तपस्या कब करोगे? बाबा ने हमें स्लोगन दिया है कि 'योगी बनो और पवित्र बनो, इसको इसी समय के लिए दिया है। पहले प्रदर्शनियों में हम लिखते थे 'अब नहीं तो कब नहीं'। बाबा ने हम बच्चों को भी यही कहा है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। अब बहाना करने का समय नहीं है, टालने का समय नहीं है। जो करना है, जो तपस्या करती है. अभी करनी है। इसको स्थगित करने का समय नहीं है कि बाद में कर लेंगे। अपने से बातें करो, अब नहीं तो फिर करोगे कब? कई बार हम कहते हैं या सोचते हैं कि आज फुर्सत नहीं है, कल देखेंगे, समय निकालेंगे। नहीं, आज नहीं तो फिर करोगे कब? कल नाम तो काल का है। यह जो सूक्ष्म अनुभव है आनन्द का, शान्ति का, प्रेम का, सुख का, सर्वशक्तियों का. अभी करें। मैंने बताया, हमें अनुभव करना है पहले ज्ञान का, दूसरा है सर्व सम्बन्धों का, तीसरा है गुणों का।
चौथा है, एकाग्रता का अनुभव। मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। मन की आदत है भटकना, कभी व्यर्थ संकल्पों के माध्यम से, कभी व्यर्थ दृश्यों को देखने की इच्छा के माध्यम से, कभी व्यर्थ बोल बोलने की इच्छा से। तपस्यामय जीवन के लिए हमें एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाने की आवश्यकता है।
पांचवां उद्देश्य है, एकरस अवस्था में रहने का। कोई हमारी स्तुति करे या निन्दा हमें उसके प्रभाव में नहीं आना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में -एक रस, एक भाव में रहना चाहिए। हमें बाबा मिला है, बाबा से मुझे ये सारे खजाने लेने हैं। हमारा तो तपस्वी जीवन है। हम किसी महिमा पर या निन्दा पर थोड़े ही खड़े हुए हैं? हम तो बाबा के लिए आये हैं, बाबा की सेवा के लिए आये हैं, अपने कल्याण के लिए आये हैं। हमें अपने नशे में रहना चाहिए। बाबा कहते हैं कि अपनी घोट तो नशा चढ़े। बाबा ने हमें जो विधि बतायी है. साधन बताये हैं उनसे हमें साधना करनी है और सिद्धि प्राप्त करनी है। हम परमात्मा के कहने अनुसार अपना जीवन बना रहे हैं। दूसरों के कहने पर हम क्यों चले? इस प्रकार, हम अपनी अवस्था को एकरस बनाकर रखें और जीवन को तपस्यामय बनाते चले ।
छठा है, संस्कार परिवर्तन का। हमारी कई आदतें अभी तक गयी नहीं है। ज्ञान में आये हमें इतने साल हो गये, इतने सालो से इतना ज्ञान सुना,फलाना संस्कार नहीं बदला। इसलिए हमे इस बात का पूरा ध्यान रहे कि अभी तक जिन आदतों को साधारण संस्कार को हम मिटा न सके सबको मिटाना है. जलाना है। आपके बुरे संस्कारो को दूसरे जाने या न जाने हरेक अपने आप तो जरूर जानता है कि मेरे में क्या-क्या बुरी आदते है. कौन-सा संस्कार परेशान करता है कि आदतों का गुलाम बना हूवा है। उनको हम छोड नहीं पा रहे है। हम उनको साथ में न परमधाम ले जा सकते और न स्वर्ग ले जा सकते। बीच में धर्मराजपूरी में हमें रोक देंगे, घर जाने का दरवाज़ा बन्द कर देंगे। जब तक चुंगी नहीं देंगे, तब तक तो हमें परमधाम भी जाने नहीं देगे। जब उनको हमें छोडना ही है तो यहीं छोड़ दे. मार खाकर क्यों छोड़ना है? हमारे में ऐसी आदते हैं, उनसे दूसरे भी परेशान है और हम भी परेशान हैं। शुरू से बाबा कहते आये हैं कि बच्चे, आप से में क्या चाहता हूं? में कुछ नहीं चाहता, सिर्फ आप में जो कचड़ा है, वह मुझे दे दो। जिन चीज़ों से आप परेशान हो उनको मुझे दे दो। हमारी तपस्या ऐसी हो, अभी तक जो आदतें गयी नहीं हैं, वे हमेशा के लिए मिट जावे, भस्मीभूत हो जाये।
सातवां उद्देश्य है, हमारी फरिश्ता अवस्था हो, उड़ती कला हो, डबल लाइट हो। यह कब बनेगे? कहां बनेंगे? यहीं बनना है, अभी ही बनना है, भविष्य में नहीं। जो फरिश्ता नहीं बनेगा, वह देवता नहीं बनेगा। इसमें और एक है, बिन्दु रूप स्थिति। एकदम लाइट और माइट का गोला- इसका अनुभव करें। यह अनुभव हमें भी होना चाहिए और दूसरों को भी होना चाहिए।
आठवां है, शक्तियों का अनुभव। जैसे परखने की शक्ति है, बाबा कहते हैं कि आपके सामने कोई भी आये, आप को परख होनी चाहिए कि यह आत्मा क्या चाहती है. शान्ति चाहती है. वा सुख , ज्ञान चाहती है या योग? मुक्ति की प्यासी है या जीवनमुक्ति की ऐसे अनेक प्रकार की शक्तियां है जो योग से प्राप्त होती है। उनके लिए हमे पुरुषार्य नहीं करना है, जैसे जैसे हमारे योग की अवस्था बढ़ेगी बद्धि की लाइन क्लियर होगी, वैसे-वैसे सुक्ष्म शक्तियों आ जायेंगी।
ये आठ उद्देश्य अगर हमारे परुषार्थ में हो तो हमारा योग तपस्यामय होगा। इन उद्देश्यों का कुल परिणाम या विशेष फल यह रहेगा कि हमारी योग की स्थिति निरन्तर नहीं भी हो लेकिन निरन्तर जैसी हो जायेगी। ये बात उद्देश्य आपके सामने रहे और आप इनको चेक करते रहे कि हमारे ये उद्देश्य पूर्ण हो रहे हैं या नहीं? हमारा तपस्या का जीवन, हमारा यह ईश्वरीय जीवन, हमारा यह योगी जीवन तब ही सफल है या सार्थक है जब हमें हर दिन, हर पल इनकी प्राप्तियाँ हो रही हैं, इनका विकास हो रहा है। अगर नहीं हो रहा है तो समझ लो हमारी तपस्या ठीक नहीं हो रही है। उसको ठीक करो।
मनुष्य के लिए पुरुषार्थ है, अपनी प्रवृत्ति को पवित्र बनाना। श्रेष्ठ कर्मों से प्रालब्ध भी श्रेष्ठ बनती है। श्रेष्ठ कर्म इस सहज ज्ञान और सहज योग से ही बनते हैं। कर्मबन्धन की जो प्रवृत्ति है उससे हमको हिसाब-किताब चुक्त करना है, बदलना है। इसलिए बाबा कहते हैं कि पवित्र बनो, योगी बनो।
मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
तपस्यामय जीवन
हमने यह जाना कि हमारा योग तपस्यामय हो इसके लिए क्या करे। अब जानेगे कि अपने जीवन को ही तपस्यामय कैसे बनाये जीवन तपस्यामय बनाने के लिए हम खुद तपस्वीमूर्त बने। न केवल हम अपने योग की अवधि बढ़ा दें लेकिन हमारा जीवन ही तपस्वी हो जाये। तपस्वी जीवन का क्या अभिप्राय है? जीवन को तपस्वी बनाने के लिए भी हमें आठ बातों का ध्यान रखना पड़ेगा। सबसे पहली बात है कि हमारे जीवन में सादगी हो। बाबा ने कई बार कहा हुआ है कि सिम्पल (सादा) और सेम्पल (आदर्श) बनो। जो तपस्वी होगा वह चाहे करोड़पति भी होगा लेकिन सादा जीवन जीयेगा। अपने व्यक्तिगत जीवन पर कम ध्यान देकर सेवा पर ज्यादा ध्यान देगा, पुरुषार्थ पर ज़्यादा ध्यान देगा।
दूसरा है, हमारा जीवन आदर्श हो। दूसरे भी कहें कि इनको देखकर बड़ी खुशी होती है। आपको देखकर लोगों को कहना चाहिए कि आप दूसरों से न्यारे हैं, आप कहाँ से शिक्षा प्राप्त करते हैं? आपका जीवन तो प्रेरणाप्रद है। बात क्या है? आपका बोलना, चलना, देखना, उठना, बैठना सब प्रकार से दूसरों से अलग ही है। आप सदा मुस्कराते रहते हो, सबको प्रेम से देखते रहते हो। किसी से आपका झगड़ा होता नहीं, किसी से अनबन आपकी होती नहीं। आपका व्यवहार मधुर है। सबसे प्रीत निभाते हो। कुल मिलाकर हमारा पूरा जीवन दूसरों के लिए आदर्श हो, प्रेरणाप्रद हो। बाबा कहते हैं कि तुम बच्चे ही मेरा शोपीस (show-piece; प्रदर्शन-वस्तु) हो, तुम बच्चे ही चैतन्य म्यूजियम हो। इसलिए सदा हमारे ध्यान में रहे कि हम ऐसे कोई कार्यकलाप न करें जो आदर्श न हो।
मनुष्य कहते हैं कि हम तो मनुष्य हैं, मनुष्य ग़लती का पुतला है। ऐसे कहकर ढीला छोड़ देते हैं। जैसे, एक आदमी है, वह बहुत ऊंचा-ऊंचा बोलता है। दूसरा कहता है कि भाई धीरे बोलो। वह कहता है कि मेरी आदत ही ऐसी है. मैं ऊंचा ऊंचा बोलता हूं। वह इतना ऊँचा बोलेगा कि सुनने वाले समझेंगे कि यहाँ क्या झगड़ा हो रहा है। उसका यह सामान्य रीति से बोलना है. सुनने वाले समझेंगे अगर हम भी इससे बोलेंगे तो हमारे साथ भी वह झगड़ा ही करेगा। हमारा जीवन पूरा आदर्शमय हो, इसके लिए आजकल एक्सेलेन्स (Excellence) 'श्रेष्ठता', 'उत्तमता' शब्द का प्रयोग करते हैं। ईश्वरीय ज्ञान और योग से हम उत्तम बनें, पुरुषोत्तम बनें।
तीसरी बात है, सात्त्विकता। हमारा जीवन सात्त्विक हो अर्थात् पहनना, खाना, रहना- सब सात्त्विक हो। मिर्च-मसाले, अचार-मुरब्बे, कचोड़ियां-समोसा इन सबसे दूर, जिनको खाने से जीभ जलकर मुँह से निकलता है कि हा... हा.... इश... इश...। ये सारी चीजें कोई सात्विक नहीं हैं। हम दूसरों को बताते हैं ना, शराब नहीं पीना चाहिए, सीगरेट नहीं पीना चाहिए, सिनेमा नहीं देखना चाहिए, नॉवेल नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि ये सब असात्त्विक हैं, तामसिक हैं, ऐसे ये भी हैं। सात्विक भोजन में आता है बाबा की याद में बना हुआ, फल अधिक होना, हल्का होना। अभी तक हम स्वाद के पीछे पड़े हैं, जीभ के गुलाम हैं, किसी इन्द्रिय के पीछे लटके हुए हैं तो हम तपस्वी कैसे बन सकते हैं? ये चीजें भोजन के हिस्से नहीं हैं, ये जीभ के स्वाद के हिस्से हैं। ऐसा नहीं, हम खाना-पीना ठीक नहीं रखें। हमे अच्छा भोजन, सात्त्विक भोजन, योगयुक्त भोजन स्वीकार करना है लेकिन इन्द्रियवश होकर, स्वाद के अधीन होकर नहीं।
चौथी बात है, अलौकिकता। जो भी कार्य हम करें उसमे अलौकिकता हो। हम कोई भी कार्य करते हैं, भले ही वह सांसारिक कार्य हो, उसमें भी अलौकिकता होनी चाहिए। हमारा हरेक कार्य ज्ञानयुक्त हो, अलौकिक हो क्योकि बाबा ने हमारी दृष्टि-वृत्ति, रहन-सहन सब बदल दिया। बाबा ने कहा है कि इच्छा मात्र अविद्या हो। कम से कम इच्छायें हो,आशाये हो । इच्छायें चाहिएँ, इच्छाओं बिगर कोई जी नहीं सकेगा लेकिन हमारी इच्छायें अलौकिक हो. सात्त्विक हो. पारमार्थिक हो। हमारी लौकिक इच्छा कम से कम हो। इच्छाओ से ही संसार में बहुत से संघर्ष पैदा होते हैं। अवैध इच्छा रखने से ही हमारी अवस्था खराब होती है। इसलिए बाबा ने सार में कहा है कि बच्चे, इच्छामात्रम् अविद्या बनो। समझो कि एक बाबा मिल गया तो इसी खुशी में हमें सब-कुछ मिल गया। अगर तृष्णायें बढ़ती गयी तो हम उनके गुलाम बन जायेंगे।
पांचवीं है, यह उद्देश्य रखना है कि कम से कम हमें चार घंटे योग में रहना है। हमारा योग अखण्ड हो। अखण्ड का मतलब है योग की अग्नि जलती ही रहे, बुझ न जाये। भले ही योग सदा ज्वाला रूप का न हो लेकिन योग की आग जलती ही रहे, योग करते बीच-बीच में टूटे नहीं, एकरस रहे, बाबा से सम्बन्ध अटूट रूप में जुटे रहें। ऐसा नहीं, सिर्फ चार घंटे ही योग में रहें, बाकी समय कुछ भी करें या बुद्धि, ज्ञान-योग से खाली होकर बिल्कुल सांसारिक बातों में चली जाये। बाक़ी समय हम ज्ञान का स्मरण-मनन करें, स्वदर्शनचक्र फिराते रहें, बाबा की याद के कोई गीत सुनें, मुरली पढ़ें, मुरली की प्वाइंट्स पढ़ ले, जो अपनी डायरी में लिखे होते हैं। कहने का भाव है कि हल्के रूप में ही सही पर याद रहे कि मैं आत्मा हूं, देह नहीं, शिव बाबा मेरा पिता है, अब मुझे परमधाम जाना है, स्वर्ग में जाने का मैं पुरुषार्थ कर रहा हूं- इतना तो बुद्धि में रहे। इसको मैं कहता हूं कि योग की अग्नि कुछ न कुछ प्रज्वलित रहे।
हमारा योग अखण्ड भी हो और साथ-साथ प्रचण्ड भी हो। प्रचण्ड माना तीव्र। योग की अग्नि तीव्र हो, शक्तिशाली हो। तपस्वी जीवन का अर्थ है कि हमारे जीवन में योग की आग धधकनी चाहिए। जैसे लोहे को पिघलाने वाली अग्नि होती है, वैसे हमारी योग की अग्नि भी उतनी प्रचण्ड होनी चाहिए कि हमारी पुरानी आदतें बदले, विकर्म दग्ध हों और हमारे संस्कार भी बदलें। हमारे योगी जीवन की अवस्था हत्की-सल्की न हो. भट्टी की आग जैसी होनी चाहिए।
संक्षिप्त में यह कहें कि हमारे तपस्वी जीवन की रूपरेखा ऐसी रहे। सबसे पहले हम प्रतिज्ञा करें। आप जानते होंगे, पुराने जमाने में कोई कार्य करना होता था तो ब्राह्मण लोग प्रतिज्ञा करवाते थे, चाहे हथियाला बांधते या जल लेकर संकल्प करवाते थे। लेकिन हमे मन में दृढ़ संकल्प करना है, प्रतिज्ञा करनी है। क्या प्रतिज्ञा करे? सबसे पहली प्रतिज्ञा यह है कि मै अलबेलापन नहीं आने दूंगा। जीवन का यह (अलबेलापन) बाहुत बड़ा दुश्मन है। इसको छोटा मत समझो, यह तो बहुत बड़ा धोखेबाज है। पाँच विकार भी इससे ही आते हैं। यह आपको बाबा का नाफरमानबरदार बच्चा, कुपुत्र, कुपात्र बनायेगा। इसको छोटा मत समझो, यह भगवान की आज्ञा का उल्लंघन कराने वाला है। जो भगवान की आज्ञाओं का उल्लंघन करता है उसका भगवान से सम्बन्ध ही टूट जाता है। सम्बन्ध टूट गया माना खत्म, ॐ-शान्ति। पहले-पहले यह प्रतिज्ञा करो कि किसी परिस्थिति में मैं श्रीमत का उल्लंघन नहीं करूँगा। आलस्य बहुत मीठे रूप में आता है जैसे, आज बारिश है, क्लास में नहीं जा सकता, आज सर्दी है, मेरे कान ठण्डे हो रहे हैं. नाक ठण्डा हो रहा है, कल जाऊँगा, कल डबल योग करूंगा। नहीं, अगर कोई अड़चन आती है तो उसके लिए कोई साधन तैयार करो, उसके लिए अपने नियमों को छोड़ो नहीं। आज इस रूप में आयेगा तो कल दूसरे रूप में आयेगा। इसलिए टालने का, चलाने का यह अलबेलापन जीवन में न आये, इसकी प्रतिज्ञा करो।
दूसरी प्रतिज्ञा है, आलस्य नहीं करना। मान लो, सुबह अमृतवेले योग करते हैं, योग में हल्का-सा आलस्य आता है तो योग करने के बदले नमाज पढ़ना शुरू करेंगे। बाबा कहते हैं, आलस्य छटा विकार है। योग में अलर्ट होकर, चुस्त होकर बैठो। आप योग में हैं माना माया के साथ युद्धस्थल में है। अगर सिपाही है सरहद पर दुश्मनों की गोली चल रही और वे सोए हुए है तो क्या हाल होगा? अगर पहरेदार ही सोए पड़े है तो रक्षा कौन करेगा ? बैठे है योग में योग से हम बाबा से सर्व शक्तियां लेकर सारे संसार को तत्वों को पावन करना है, हमारी इतनी बड़ी जिम्मेदारी है और हम झुटके खा रहे है! हम यह ध्यान रखें पा प्रतिज्ञा करे कि जीवन में मस्ती या आलस्य आने नहीं देंगे।
तीसरी प्रतिज्ञा करनी है कि किसी भी प्रकार की अशुद्धि न आये। कौन-सी अशूद्धि? पहली है - बुद्धि की अशुद्धि। जितना जितना हम योग करते जायेंगे, ज्ञान धारण करेंगे, बुद्धि पत्थर से पारस बनती जायेगी। इसमें रत्न भरते जायेंगे। बुद्धि दिव्य बनती जायेगी, विशाल बनती जायेगी, उसमें बल भरता जायेगा। सांसारिक ज्ञान बुद्धि को मैला करता है, खराब करता है। ईश्वरीय ज्ञान बुद्धि को शुद्ध करता है। बुद्धि को खराब करने वाली बाते कौन-सी हैं? एक है संशय, फिर है सांसारिक ज्ञान, नॉवेल आदि। दूसरी है मन की अशुद्धि। इसमें दृष्टि-वृत्ति भी आ जाती है। तीसरी है, तन की अशुद्धि। जैसे मल विसर्जन करते हो तो स्नान करो, स्वच्छ वस्त्र पहनो। अपने बिस्तर और रहने करने के स्थान को साफ़ रखो। आपका तपस्वी जीवन है, वहां का वातावरण भी ऐसा हो। चौथी है, भोजन की अशुद्धि। शुद्ध और सात्त्विक भोजन के बारे में तो आप जानते ही हैं, इसके बारे में मैंने इससे पहले भी बताया है।
पांचवीं है, अध्ययन की अशुद्धि। कोई ऐसा साहित्य नहीं पढ़े जिससे मन भ्रमित हो। छठी है, संग की अशुद्धि। कभी कुसंग न करो। सत्संग, सुसंग करो। सातवीं धन की अशुद्धि। कमाई भी अच्छे काम से होनी चाहिए। ग़लत काम से होने वाली कमाई भी गलत होती है, अशुद्ध होती है। किसी को झूठ बोलकर, किसी को धोखा देकर, किसी का शोषण कर, किसी का गलत काम कर होने वाली कमाई नहीं होनी चाहिए। अशुद्ध कमाई से लाया गया अन्न भी अशुद्ध होगा, तो हमारा मन तपस्वी कैसे होगा?
आठवी है वायमण्डल की अदि हमारा आवास-निवास हमारा घर कमरा शुद्ध हो। जो लोग आपका निवास दे उनको अनुभव होना चाहिए कि इनका जीवन योगी जोवन है तपस्वी जीवन हैं. इनका घर आश्रम जैसा है। घरो व कमरों में ऐसी कोई चीज नही जो अशुद्ध बात को याद दिलाये। सब शद्धि की तरफ ले जाने वाली चीजें हो। दीवारों पर बाबा के महावाक्य हो, अच्छे-अच्छे स्लोगन हो, ईश्वरीय शान के चित्र हो। कुल मिलाकर घर का वातावरण साफ और सुथरा हो। ये कुछ प्रकार की शद्धियाँ मैने बतायी, ये प्रतिज्ञा में शामिल है।
मैंने अभी तक आपको तीन प्रकार की प्रतिज्ञाये बतायी - पहली है, मै अलबेलापन नहीं आने दूंगा, दूसरी है कि आलस्य नहीं आने दूंगा। तीसरी यह कि अशुद्धि नहीं आने दूंगा।
चौथी प्रतिज्ञा है, अभिमान को आने नहीं दूंगा। कई दफा क्या होता है कि आपका योग अच्छा लगने लगा, आपका मन एकाग्र होने लगा। आपमें कुछ योग की शक्ति आयी। आनन्द में रहना आपने शुरू कर दिया। आपको टचिंग अच्छी होनी शुरू हो गयी। अभिमान आ गया कि मैं बहुत बड़ा योगी हूं, मैं बहुत बड़ा महारथी हूँ। दूसरों से बात करना शुरू करोगे जैसे उनको कुछ पता ही नहीं, वे नये-नये हैं। यह है अभिमान। हमें सिद्धि प्राप्त हो गयी, किससे हुई? बाबा से ना? ये सिद्धियों, प्राप्तियां बाबा की है तो हमें और नम्र होना चाहिए। ये सिद्धियां मेरी नहीं हैं, बाप से प्राप्त हैं। बाबा ने मुझे पे प्रदान करके मुझे मालामाल बना दिया, यह तो उसकी कृपा है, उसकी दया है मेरे ऊपर। इसलिए अभिमान में आने का कोई अर्थ ही नहीं। देने वाला दाता तो वह है, उसने अपनी चीज़ मुझे दी हुई है, मेरा अपना तो कुछ नहीं है। सारा खज़ाना उसका है।
पांचवी प्रतिज्ञा है कि मैं योग की अग्नि कभी बुझने नहीं दूंगा। पूरी तरह प्रज्वलित न भी हो लेकिन हल्की-सल्की भी जला के रखूंगा अर्थात् एक दिन भी योग करना नहीं छोडूंगा, रोज कुछ न कुछ समय निकालकर योग करूंगा।
छठी प्रतिज्ञा है, कभी हिम्मत नहीं हारूंगा। कई दफ़ा क्या होता है, महीनों भर योग किया लेकिन कोई पुरानी आदत नहीं मिट रही है, तो निराश होकर छोड़ ही देते हैं कि यह मेरे वश का नहीं है। ऐसा कभी नहीं सोचो। हिम्मत नहीं हारो। हिम्मते बच्चे, मददे बाप। बाबा ने वायदा किया है, बच्चे, एक कदम तुम आगे चलो, मैं तुमको सौ क़दम मदद दूंगा। अपने में आत्म-विश्वास नहीं खोना। करते चलो, करते चलो, हिम्मत नहीं हारो, एक दिन आपकी विजय होगी। छोड़ मत दो पुरुषार्थ को कि कुछ प्राप्त नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं है कि कभी कुछ मिलने वाला नहीं। कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। आप जो भी करो वह व्यर्य कभी नहीं जायेगा। धीरे-धीरे ही सही आज नहीं तो कल उसका फल निकलेगा, रंग में निखार आयेगा। यह प्रतिज्ञा करो कि मैं अपने में निराशा आने नहीं दूंगा, हिम्मत नहीं हारूंगा, असमर्थता को महसूस नहीं करूंगा। बाबा मेरे साथ है, समर्थ सद्गुरु बाबा मेरे साथ है। बाबा का वायदा है कि मैं तुम्हारे साथ रहूंगा। भगवान का वचन सत्य है, वह कभी गलत नहीं हो सकता।
सातवी प्रतिज्ञा है, मैं आदतों को बदल करके ही रहूँगा। कई लोग कहते हैं कि मेरी यह आदत अभी तक नहीं मिटी, जब कि मेरा मरने का समय आ गया। आदत क्यों नहीं मिटी? क्योंकि उसको छोड़ने की प्रतिज्ञा नहीं की, दिल से उसको छोड़ना चाहा नहीं। यह दृढ़ प्रतिज्ञा करो कि मैं आदत छोड़कर ही दिखाऊँगा। जब कोई व्यक्ति किसी बात के लिए कमर कस लेता है तो वह उसको छोड़कर ही, मिटा कर ही दिखाता है।
आठवीं प्रतिज्ञा है, अपनी उन्नत्ति पर ध्यान देना। यह नहीं सोचना कि फलाने व्यक्ति को 30 साल हो गये 40 साल हो गये कुछ बदला ही नहीं, मेरी छोटी-मोटी कमी कमजोरी है तो क्या बड़ी बात है? उसमें भी क्रोध है तो मेरे में भी थोड़ा-बहुत क्रोध है तो क्या हुआ? वह तो अमृतवेले उठता ही नहीं है. फिर मैंने कभी-कभी अमृतवेले का योग मिस किया तो क्या बडी बात है? मैं तो उससे बहुत देर से आया हूं, मैंने नहीं किया तो क्या हुआ? ऐसा सोचना यह बहुत गलत तरीका है। हमारे में यह धारणा पक्की रहनी चाहिए कि मैं अपनी उन्नति करके ही रहूँगा। अपने ऊपर ध्यान रखो, उसको मत देखो। आपके लिए आदर्श वह है क्या? बाबा कहते हैं कि मुझे फॉलो करो, आप उसको क्यों फॉलो करते हो? फॉलो हमेशा अपने से श्रेष्ठ और उँचे व्यक्ति को किया जाता है, न कि छोटे और नीचे व्यक्ति को। आप खुद ही समझते हो कि उसमें यह कमी है, तो आप उसको क्यों फॉलो करोगे? गिरते हुए व्यक्ति को देख आप भी गिरना चाहोगे? गिरते हुए को देखकर उसको बचाना चाहिए। अगर बचा नहीं सकते तो खुद सावधान होना होता है कि हम न गिर जायें। ऐसे नहीं, वह गिरता है तो हम भी गिरे। ये आठ प्रकार की प्रतिज्ञा हम करके चले या हथियाला बांध करके चले तो हमारा जीवन भी तपस्यामय बनेगा।
सृष्टि के नियम अनुसार हम जानते हैं कि कर्मों के आधार पर ही सृष्टि का चक्र बना हुआ है। आत्मा को कमों में आना ही है। कर्म अनादि हैं इसलिए परमात्मा ने भी कर्मयोग को सिद्ध किया है। उसको जानना है। उस असली श्रेष्ठ कर्म को न जानने के कारण ही वियोग हो गया है, गिर पड़े हैं। परमात्मा ने आकर के श्रेष्ठ कर्म करना सिखलाया
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
मामेकम् शरणम् व्रज...
क्या हम भगवान का अरमान पूरा कर सकते है जिसमे हमारा भी अरमान समाया हुआ है? यह संगमयुग जीवन जो हीरेतुल्य है, इसका ऐसे ही समाप्त कर दिया तो क्या किया? सब कुछ लुटाके होश में आये तो क्या फायदा? हर कोई चाहता है कि मेरा जीवन विशेष हो। बाबा भी कहते हैं कि हर ब्राह्मण आत्मा विशेष है। भगवान सत्य स्वरूप है इसलिए उनके बोल सत्य हैं। उनका एक-एक अक्षर सत्य है क्योंकि वह सत्य स्वरूप है। मिश्री को आप जिधर से भी चखेंगे, उसमें मिठास ही होगा, नमकीन नहीं होगी। मिश्री का स्वभाव ही यह है, स्वरूप ही यह है। सत्य स्वरूप जो भगवान है, उनसे कही हुई हरेक बात सत्य है। वह हमें यह कहता है कि आप मेरे विशेष बच्चे हैं। आप सबमें विशेषतायें हैं क्योंकि करोड़ों में से आप एक हैं। आपको मैं उनमें से चुन-चुनकर लाया हूँ। भगवान की हमारे लिए एक प्लान (योजना) है। वह चुनकर ऐसे ही तो नहीं लाया है। हम भी कोई चीज़ ढूंढकर लाते हैं या बाज़ार से खरीदकर लाते हैं तो हमारे मन में कोई उद्देश्य होता है कि इसको ऐसे प्रयोग करेंगे या इससे ऐसा काम लेंगे। भगवान तो परम बुद्धिवान हैं, उन जैसे बुद्धिवान और कोई हैं नहीं। वह बुद्धिवानों का भी बुद्धिवान है। वह हमें चुनकर लाया है करोड़ों में से, वह भी बड़े सिक से, प्यार से। वह तो भविष्य द्रष्टा है, भविष्य स्रष्टा भी है। कई बार कहा जाता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि भविष्य द्रष्टा थे लेकिन उन्होंने भविष्य देखा भी था क्या! चलो, मान भी लेते हैं, थोड़ा बहुत देखा होगा परन्तु भविष्य स्रष्टा तो नहीं थे ! उन्होंने कोई सतयुग की स्थापना तो नहीं की ! युग परिवर्तन तो नहीं किया। मनुष्य मात्र के भाग्य की रेखा तो नहीं बदली ! परन्तु परमात्मा तो विधि के विधाता हैं। नये जगत के निर्माता हैं। अगर उन्होंने हमें चुना है, तो किस उद्देश्य से चुना है? उनको नये जगत का निर्माण करना है इसलिए चुनकर लाया है। उनके मन में भी यही है कि नये जगत के लिए इनको लायक बनाऊंगा। यह उनके ही मन में है। भगवानका संकल्प अटल होता है। उसका जो चिन्तन होता है वह अमर चिन्तन होता है ,अमोघ(अचूक अव्यर्थ चिन्तन होता है। उसके रास्ते को कोई पहाड मोड नहीं सकता, तुफान रोक नहीं सकता। सारे मनुष्य एक तरफ हो जाये लेकिन भगवान का संकल्प व्यर्थ नहीं जा सकता, खाली नहीं जा सकता। उसका हरेक तीर अचूक है. निशाने पर ही बैठता है। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है परम है और भविष्य को स्पष्ट रूप से जानता है. देखता है। वैसे ही करने में समर्थ है इसलिए उसका वार कैसे खाली जा सकता है (?) वह स्वय कह रहा है कि आप मेरे विशेष बच्चे हैं, मैं स्वयं आपको लेकर आया हूं।
बाबा यह भी कहते हैं कि सतयुग के निर्माण के लिए आप विधायक (Law Makers) हो। लॉ मेकर्स (विधि निर्माताओं) को 'मनु' कहते हैं, जिसने 'मनुस्मृति' लिखी। उसने और भी कई ग्रंथ लिखे हैं लेकिन उनमें से 'मनुस्मृति' प्रसिद्ध है। धर्म क्या है, अधर्म क्या है, मनुष्य को क्या करना चाहिए , क्या नहीं करना चाहिए, जो नियम है, मर्यादाये हैं, द्वापरयुग से चले आते हैं, उनको मनु ने लिपिबद्ध किया जिसका नाम हुआ 'मनुस्मृति'। आज तक लोग उसे धर्मशास्त्र मानते हैं। उसके अनुसार ही ब्राह्मण लोग, पण्डित-पण्डे-पुजारी वर्ग चलते हैं। नियम बनाने वाले को 'मनु' कहते हैं। वो नियम नहीं जो सरकार बनाती है। उन नियमों को तो एक सरकार बनाती है तो दूसरी सरकार आकर बदल डालती है। ये नियम हैं धर्म के, मानव जीवन के, नैतिक जीवन के। इन नियमों को बनाने वाले को 'मनु' कहते हैं, जो शाश्वत नियम हैं, जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले नियम हैं। कहते हैं 'मनु नियम निर्माता है' (Manu is the Law Maker)। वास्तव में वे मनु आठ हैं, जो नयी दुनिया का निर्माण कर रहे हैं, परमात्मा ने जो (Laws) बताये हैं, उनके अनुसार वे स्वयं चलते हुए उनको दुनिया के आगे नियम रख रहे हैं कि वास्तविक नियम यही हैं और इनसे ही लॉफूल संसार बनता है जिसमें नियमों के उल्लंघन करने वाले रहेंगे ही नहीं आज लॉ बनानेवाले अलग है, तो ले अमल में लाने वाले अलग है. उनको तोड़ने वालों को पकड़ने वाले अलग है। उनका निर्णय करने वाले अलग है। न्यायालया में लॉ की वकालत अथवा उसकी व्याख्या करने वाले अलग है। इतने सारे लॉ बननेपर भी दुनिया में लॉलेसनेस (अराजकता नियमहीनता) है। एक न्यायाधीश निर्णय देता है, दूसरे न्यायालय का न्यायाधीश उसको रद्द कर दूसरा निर्णय देता है। इसलिए लोग हाईकोर्ट में जाते हैं, फिर सुप्रीमकोर्ट में जाते हैं, फिर भी सही न्याय नहीं मिलता। कई बार अन्तिम और सही न्याय मिलता है लेकिन उस आदमी को मरे कई साल हो जाते हैं। उसके जीवनकाल में निर्णय नहीं होता।
मुझे याद है दिल्ली की एक घटना। एक मालिक के घर में एक किरायेदार बैठ गया, वह घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। मालिक कोर्ट में गया, 45 साल लग गये उसका निर्णय मिलने में। किरायेदार बड़ा चालाक आदमी था। वह अच्छे से अच्छा वकील लेकर उस केस को 45 साल तक चलाता रहा। आखिर मकान वाले को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। वह मालिक भी मर गया, उसका बेटा भी मर गया, उसके पोतों को वह मकान मिला। पैतालीस सालों तक कोर्ट में लड़ने के बाद क्या मिला? अपने घर से एक किरायेदार को निकाला। अपने घर को ही छुड़ाने के लिए 45 सालों तक न्याय के लिए लड़ना पड़ा। देखिये लॉ कैसे हैं! खोदा पहाड़, निकला चूहा। वह भी मरा हुआ चूहा ! पैतालीस सालों बाद उस मकान की हालत क्या हुई होगी ! ऐसे हैं कलियुगी कानून। बाबा ने कहा है कि आप हैं लां मेकर्स। आपका भविष्य क्या है। लोग ज्योतिषी को दिखाते हैं अपना हाथ, भविष्य को जानने के लिए। लेकिन परमात्मा हैं हमारे भाग्य की रेखा को बढ़ाने वाले । न सिर्फ भाग्य की रेखा बनाने वाले और बढ़ाने वाले लेकिन यह कहते है कि यह अधिकार में आपको भी देता हूं। जो भाई-बहने दुसरों को ज्ञान देते है. योग सिखाते है, पवित्र बनाते हैं. उन्होंने भी तो उनके भाग्य की रेखा बनायी ना! दुनिया में कोई है जो 5000 वर्षों के लिए किसी के भाग्य की उज्वल महान सर्वश्रेष्ठ बना दे और 2500 वर्षों तक किसी भी प्रकार का दुःख, अशान्ति, कष्ट, क्लेश तन का, मन का, धन का किसी भी प्रकार का न हो?
कई बार तो लोग आपस में चर्चा करते हैं, एक-दूसरे की कटु आलोचना करते रहते हैं कि यह चोरबाजारी करता है, ब्लैकमार्केटिंग चलाता है, वह भ्रष्ट आदमी है। जब उनमें से कोई मर जाता है तो कहते हैं या अखबारों में वही लोग बयान देते हैं कि वह बहुत अच्छा व्यक्ति था, इसकी मृत्यु से देश के लिए काफ़ी हानि हुई, अभी इसकी जगह भरनी मुश्किल है। वही लोग कल तक उसको कहते थे कि वह गद्दार आदमी है, देश के लिए खतरनाक आदमी है इत्यादि इत्यादि। जब वह ज़िन्दा था, उसके खिलाफ प्रदर्शन करते थे, उसको बुरा-भला कहते थे लेकिन वह मर गया तो उसको श्रद्धाञ्जली देते समय उसका गुणगान करते हैं, जैसे कोई महान् देशभक्त, देशप्रेमी मर गया। क्योंकि जुबान को तो कोई हड्डी नहीं है, जहां चाहे वहाँ मोड़ लो। कल ऐसा बोलता था, आज बोल रहा है, बहुत अच्छा इन्सान था, बहुत शरीफ़ था। सत्य तो है नहीं। इसलिए बाबा कहते हैं कि कलियुग में झूठ तो झूठ, सच की रत्ती भी नहीं। रत्ती क्या होती है, जानते हैं? पहले तोला, माशा, रत्ती, मन, छंटाक होते थे तोलने के लिए। आठ चावल की एक रत्ती होती थी। आठ चावल का जितना वजन होता है उसको एक रत्ती कहते थे। बाबा कहते हैं, इतना भी सत्य इस दुनिया में नहीं है। ऐसा है कलियुग ! सतयुग ऐसा है कि सच ही सच, झूठ की रत्ती भी नहीं। ऐसी झूठ की दुनिया में रहकर हम सबको सच की दनिया के लायक बनना है, बाबा के अरमान पूरे करने वाले बनना है।
एक बार मै लन्दन गया था। वहाँ एक कार्यक्रम रखा गया था। वहां एक बहन को देखा जो बहुत डिस्टर्ब थी। उसको टेन्सन था, डिप्रेशन था।मन की शान्ति ही नहीं थी। वह अपनी बहन से कहती थी कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है (1 am not well), मेरा मूड ऑफ़ है। उसकी बहन ने पूछा, क्या बात है, क्या हुआ? उसने कहा, पूछो मत, आज मेरा मन बहुत अशान्त है। उसकी टीचर ने कहा, क्लास कर लो, किताबें पढ़ लो, ऐसे कई सुझाव दे दिये। वह पूछने लगी, यह कैसे करूं? फिर उसकी टीचर ने कहा, मेडिटेशन करो। वह कहती है, मेडिटेशन को ही कैसे करूं? मेरा मन ही अशान्त है.मन लगता ही नहीं है, मेडिटेशन करने को मन करता ही नहीं है तो मैं मेडिटेशन कैसे करूं? मेडिटेशन करने का विचार ही मुझे नहीं आता। मेरा मन उखड़ा हुआ है। कहें कैसे? ऐसे, हमें खुशनुमा बनना है लेकिन बने कैसे? इस बात को जाने बिना हम कहें, जगत के रहनुमा बने, खुशनुमा बनें, कैसे हो सकता है? यह बनने के लिए कुछ ऐसी बाते हैं, उनका जानना और प्रयोग में लाना परम आवश्यक है। जैसे योगी के लिए दिखाते हैं, चार स्तम्भ (ब्रह्मचर्य, शुद्ध अन्न, दैवोगुण और सत्संग), वे उसमें हैं? अगर हमारे जीवन में ये चार स्तम्भ नहीं तो हमें योगी नहीं कहा जायेगा। वे चारों योगके आधार स्तम्भ हैं। अगर वे न हों तो जीवन ही योगी का नहीं है। उसीप्रकार, आप जो बनना चाहते हैं, वह बनने का कोई विधि-विधान है? कोई तौर-तरीका आपके पास है? उसके लिए कोई उपाय है? क्रिया है? साधना करने की विधि है? उन तौर-तरीकों को जानना परम आवश्यक है। आपमे बहुत-से लोग पढ़े-लिखे हैं। आप जानते होंगे, पुस्तकों में लिखा रहता है मुख्य बात अति मुख्य बात अत्यन्त मुख्य बाते। जब आप परीक्षाओं के लिए तैयारी करते है उस समय इन प्रमुख बातों पर विशेष ध्यान देकर तैयारी करते हैं। सारी हिस्टी पढ़ेंगे, वह सब पढने के बाद भी कुछ मुख्य भाग या विषयों पर विशेष ध्यान देते है। बाबा ने हमारे सामने कल्पवृक्ष का इतिहास रखा है. उसमें सारे जो आंकडे दिये हैं. वे सब बहुत मुख्य आंकड़े हैं। ऐसे तो वृक्ष में पत्ते बहुत है। शाखाये है उपशाखायें फिर उनकी उपशाखाये बहुत है। इतिहास तो बहुत विस्तार का है लेकिन सार रूप से आप जान सकते हैं कि सारी दुनिया की अब क्या हालत है। उसी प्रकार कल्पवृक्ष के हरेक पत्ते को जानने के बदले बड़ी-बड़ी और उपशाखाओं को जान लिया तो बहुत हो गया। हमें एकाग्र करना है उन बहुत मुख्य और परमावश्यक चीजों पर।
अगर हम भी बाप समान बनना चाहते हैं और बाप का अरमान पूरा करना चाहते हैं तो कुछ प्रमुख बातें जानना जरूरी है। उनमें से एक बात यह है कि "मामेकम् शरणम् व्रज", एक मेरी शरण में आओ। एक मेरी शरण में आओ यह ज्ञान का, योग का, धारणा का, आध्यात्मिक जोवन का एक महत्त्वपूर्ण महावाक्य है। सिर्फ़ महत्त्वपूर्ण नहीं, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अगर इससे आप चूक जाते हैं, तो ज्ञान से, योग से सबसे चूक जायेंगे। आगे और कहा गया है कि 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः'। मै तुझे सब पापों से मुक्त करूंगा'। "मैं", मैं करूंगा तुझे मुक्त। जैसे कोई दोस्त कहता है कि मैं बैठा हूँ ना ! फलाना मेरा परिचित है, फलाना मेरा रिश्तेदार है, मेरे पास पैसा है, तू चिन्ता क्यों करता है? मेरे ऊपर छोड़ दे। तू चल. निश्चिन्त हो जा। तू काहे को माथा भारी करके बैठा है? चलो, जरा मुस्कराकर दिखा दो। फिर दोस्त को कहता है, कुछ भी हो, मैं हूंना मै ठीक कर लूंगा, तू चिन्ता मत कर, मेरे भरोसे पर छोड़ दे। वहां कहने वाला तो मनुष्य है, यहां तो भगवान कहता है। यह बात कोई गुरु भी कह नहीं सकता। कल्पवृक्ष के नीचे, सुष्टिचक्र के नीचे आप देखेंगे, उसमें बाबा लिखवाते थे कि कोई भी मनुष्य किसी को मुक्ति दे नहीं सकता। मुक्ति और जीवनमुक्ति का दाता एक है। एक परमात्मा ही मुक्ति और जीवनमुक्ति का दाता है। किस मुक्ति का दाता है? विकारों से मुक्ति का चिन्ताओं से मुक्ति का. दुःखों से मुक्ति का सब प्रकार की मुक्ति का दाता एक है। उसे कहते हैं कि सबका दाता एक राम सब कहते है परमात्मा एक है। एक का मतलब क्या है? अगर परमात्मा एक है तो मुक्तिदाता एक है सर्वशक्तिमान एक है, ज्ञान का प्रेम का शान्तिका सागर एक है।हमारा मात-पिता एक है. हमारा सदगुरु एक है। हमारा गति सद्गति करने वाला एक है। इसको सार में कह दिया कि 'परमात्मा एक है। परमात्मा एक का अर्थ है. दूसरा कोई नहीं है। परमात्मा कल्याणकारी है अर्थात दुसरा कोई कल्याणकारी नहीं है, दूसरा कोई गति सद्गतिदाता नहीं है।
परमात्मा कल्याणकारी कैसे है? मुक्ति-जीवनमुक्ति कैसे देता है? उसके लिए परमात्मा की पहली शर्त यह है कि 'मामेकम शरणम् व्रज'। तू मेरी एक की ही शरण में आओ। बाकी चीजें भूल जाओ निश्चिन्त हो जाना। मेरे ऊपर छोड़ दो। जब इतने आश्वासन दिलाता है, और कोई है इतना आश्वासन दिलाने वाला दुनिया में? तुम जैसे भी हो, अजामिल जैसे पतित भी हो, तेरे जैसे नालायक दुनिया में कोई भी न हों, तेरे जैसे महामूर्ख दुनिया में कोई भी नहीं हों, भले सारे दुनिया के अपराध कर रखे हों, कोई बात नहीं, मैं बैठा हूं। मैं तेरी जिम्मेवारी लेता हूँ लेकिन तू एक मेरी ही शरण में आओ। फिर भी हम उसको जिम्मेवारी नहीं देते। इसलिए बाबा कहता है कि समझदार से समझदार को देखना हो तो यहाँ ही देखो और मूर्ख से मूर्ख को देखना हो तो भी इस दुनिया में देखो। मूर्ख किसको कहा जाता है? आप जानते होगे इतिहास में दो मूर्ख राजाये हो गये हैं, एक मोहम्मद तुगलक और दूसरा फिरोज तुगलक। मोहम्मद तुगल के बारे में कहते हैं, वह पढ़ा-लिखा मूर्ख (educated fool) था। उसने पढ़ा तो बहुत था लेकिन प्रेक्टिकल में निल (nill; शून्य) था, मूर्ख था। ऐसे काम उसने किये हैं, आपने सुना होगा। उसने दौलताबाद राजधानी बनायी। उसने कहा, दिल्ली को छोड़ो, सब लोग वहीं चलो। उसके वज़ीर आदि कहते हैं, महाराज, सारी राजधानी पुरी तैयार हई नही है. लोग कैसे जायेंगे? कहता है. यह महाराजा का हुकुम है। आज रात होने से पहले सबको वहाँ पहुंचना होगा। दिल्ली आज ही खाली होनी चाहिए। अगर कोई यहाँ रहा तो उसको जेल में डाल दिया जाये। दिल्ली के लाल किले में साउण्ड और लाइट का एक शो भी दिखाया जाता है. उसमें सब लोग रो रहे हैं. आवाज आती है रोने की। उन दिनों में बसे,ट्रक थे नहीं। बेलगाड़ी में घोडे-गधो पर सामान लादकर ले जाना पड़ता था। झाडू आदि घर के सामान और बच्चे आदि को लेकर लोग जा रहे है।बच्चे रो रहे हैं, जानवर भाग रहे हैं। वहां जाकर देखा तो पानी का इन्तजाम नहीं है, यह नहीं है, वह नहीं है। फिर वहां पहुंचने के बाद कहता है, चलो, फिर वापिस दिल्ली चलो, यह बादशाह का हुकम है। इसको क्या कहें? मूर्खता ही कहेंगे ना? कई बार हम भी ऐसा काम करते हैं। सुनाते हैं ना तोतेकी कहानी? तोता खुद नल पर बैठकर कहता था, 'गंगू राम नल पर मत बैठो'। हम समझते हैं कि यह नहीं करना चाहिए और दूसरों को भी समझाते हैं कि यह नहीं करना चाहिए लेकिन खुद वही काम करते हैं। तो ऐसे को
क्या कहा जाता है, समझते हुए भी नहीं करने वालों को? मूर्ख ! एक होता है नादान, बेसमझ (stupid) भूल करने वाला जिसको पता नहीं रहता, दूसरा होता है बेवकूफ़ (foolish) जो जानते हुए भी बार-बार वही भूल करता है और बार-बार समझाने पर भी वही भूल करता है। कहने का भाव है कि हमें यह समझना है कि जब तक मै उस परमात्मा की शरणागति नहीं लूंगा, तब तक मेरा उद्धार होने वाला नहीं है। भक्त कहते हैं कि भगवान भक्तवत्सल है। भक्तों पर उसकी कृपा होती है। आप भी जानते हैं, अनुभवी हैं कि जो जिसके भक्त हैं, श्रद्धालु हैं, जिसका जिसके साथ प्यार है उसके प्रति उसकी मोठी दृष्टि तो होती है ना? कोई व्यक्ति आपकी सेवा करता है, आपकी बातों को अमल में लाता है, आपके प्रति उसका आदर है, प्यार है तो स्वाभाविक है, उसके प्रति आपके मन में थोड़ी-सी भावना तो होती है। यह सम्बन्ध की बात है। इसी तरह भगवान शरणागत वत्सल है। आपको कोई चीज मिलगा कैसे? सौदे में इस दुनिया में भी सौदा होता है. कैसे होता है? एक हाथ में दो दूसरे हाथ में लो । अगर आप चाहते हैं कि हम कुछ भी न दे और मिले बहुत यह कैसा हो सकता है? संभव ही नहीं देना ही पड़ेगा। यह अलग बात है कि परमात्मा भोलानाथ है। आप थोडा देगे तो आपको वह कई गुणा देगा लेकिन देना तो पड़ेगा। बिगर दिये कुछ मिलेगा यह असंभव है। भगवान कहते हैं कि अगर मेरे प्रति समर्पित होंगे तो मेरे पास जो भी है, उसके साथ मैं भी आपका समर्पित हो जाऊंगा। बच्चे, अगर आपका सब-कुछ मेरे लिए हो जायेगा, तो मेरा सब-कुछ आप के लिए हो जायेगा। इससे ज्यादा सहज और कोई उपाय है। आप कैसे भी हो, जब उसने कह दिया है कि मेरी शरण में आओ, बाकी सब मैं कर दूंगा। भक्त भी कहते हैं कि भगवान की कृपा से लूला भी चलने लगता है, लंगड़ा भी चढ़ने लगता है, गूंगा भी बोलने लगता है, तो भगवान खुद हमें कह रहा है कि मेरी शरण में आओ, बाक़ी सब मैं कर लूंगा, तो देर किस बात की?
जब आप भगवान को समर्पित होंगे तो सारी दुनिया आपको समर्पित हो जायेगी। दुनिया अनुभव करेगी कि यह तो शक्तिरूपा है, मातृरुपा है, यह तो मेरी इष्टदेवी है। आपके श्रेष्ठ वायब्रेशन्स उनको यह अनुभव करायेंगे। आपका मन उस परमात्मा के मन से मिला हुआ है, आप और बाप मिले हुए हैं, तो फिर आपको कुछ भी चिन्ता करने की नहीं है। इसलिए वह कहता है कि 'मा शुचः'। भगवान अभयदान दे रहा है कि चिन्ता करने की, भय करने की जरूरत नहीं। इतिहास में बहुत-सी घटनायें आती हैं कि फलाना व्यक्ति फलाने की शरण में गया। उस आदमी की रक्षा करने में उसने अपना सब-कुछ कुर्बान कर दिया। उसने यह समझा कि यह मेरी शरण में आया है, भले ही मेरा सारा नष्ट हो जाये, मेरी शरण में आये हुए की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। उसका शत्रु पहले मुझे मारे, बाद में उसके पास पहुंचे यह भान होता शरण देने वाले का। लेकिन यहाँ हमें कौन कह रहा है 'मा शुचः'। चिंता मत कर शोक मत कर। भगवान कह रहा है, सर्वशक्तिमान कह रहा है। बच्चे प्यारे बच्चे मिठे बच्चे मेरी शरण में आओ। मैं तुझे सब पापों में मुक्त कर देगा। तुझे सर्वश्रेष्ठ पद दूंगा। तेरा अरमान पूरा करूंगा तु रहनुमा बना दूंगा तू चिन्ता न कर। इस बात को स्वीकार करो और उसकी श्रीमत पर चलो इसको कहा जाता है शरणागत, समर्पित ।
परमात्मा को याद तो सब करते हैं परन्तु हम अभी उनको जानकर के याद करते हैं। भक्तिमार्ग में भी परमात्मा को इतना तो समझते हैं कि वह जानीजाननहार, सर्वशक्तिमान है परन्तु वह कैसे सर्वशक्तिमान, जानीजाननहार है- यह उनके द्वारा अब हमने समझा है।
भक्तिमार्ग में तो सिर्फ परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते आये हैं। समझते हैं, "परमात्मा ने उठाया, परमात्मा ने बिठाया.... परमात्मा बिगर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। जो भी कुछ चलता है, वह परमात्मा ही चला रहा है।" क्या उनका कर्त्तव्य, उनकी विशालता, उनकी शक्ति यही है? यह कोई यथार्थ ज्ञान नहीं है।
मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि...
हम बाबा से वायदा करते हैं कि आप जहाँ बिठायेंगे वहाँ बैठूंगी, जो खिलायेंगे वही खाऊँगी और जो पहनायेंगे वही पहनेंगी। लेकिन जब समय आता है, परिस्थिति आती है तो हम मुकर जाते हैं और मुकरजी बन जाते है. वायदा भूल जाते हैं। अपनी बातों से इनकार कर जाते है। वह वायदा हमने किससे किया था? भगवान से ! भक्तिमार्ग में कहते हैं ना, गुरु का निन्दक ठौर न पाये। अगर तूने भगवान की आज्ञा का पालन नहीं किया, कहा कुछ और करते कुछ और हो। उसने जहाँ बिठाया, तुम वहाँ नहीं बैठते तो तुम्हें तीनों लोकों में कहीं भी ठौर मिलेगा ही नहीं, जाओ। कहीं भी जगह मिलेगी नहीं। भगवान की आज्ञाओं का उल्लंघन करने की सजायें बहुत सूक्ष्म होती हैं। भगवान से किये हुए वायदे को भूलने से या उसका उल्लंघन करने से बहुत भारी सज़ा मिलती है। सज़ा वैसे नहीं जैसे कि पुलिस वाला लाठी से किसी अपराधी को पीटता है। यह सजा सूक्ष्म होती है। उसका योग लगेगा नहीं, ज्ञान की धारणा होगी नहीं, मुख से अच्छे शब्द निकलेंगे नहीं, सेवा जमेगी नहीं, मन में खुशी होगी नहीं। इससे बड़ी सज़ा और क्या हो सकती है? ये सब सजायें तो हैं। योग लगता ही नहीं, क्यों? कोई भूल की होगी। कोई अवज्ञा की होगी। ना फरमानी की होगी। भगवान के साथ प्रण करके हट गये होंगे। कुछ ऐसा काम किया होगा। आप चाहेंगे, परमधाम में कुछ देखें, वतन में कुछ देखूं लेकिन ठौर मिलेगा नहीं। बुद्धि को ठिकाना मिलेगा ही नहीं। मन भटकेगा इधर से उधर, उधर से इधर। अच्छी जगह मिलेगी नहीं।
भगवान ने आपको वहीं क्यों भेजा ? एक तरफ़ उसको आप कहते हो, ज्ञान का सागर है, उसने ही आपको वहाँ बिठाया है। वह जानता है, आपको वहां क्यों बिठाया है। अगर आपको ज्यादा मन में यह आता है तो यह कह दो, प्रभु जी, प्रभु जी। बाबा, आपने मुझे यहां बिठाया है? कोई बात नहीं, मैं आपके साथ ही यहाँ बैठूंगी। आप जहाँ मुझे बिठायेंगे, वहां में आपको भी अपने साथ बिठाकर बैठूंगी। आप पर मैं कुर्बान, न्योछावर हूँ। आप मुझे क्या देते हो ! उसके बदले में मेरे पास क्या है? कुछ नहीं। दुनिया में तो कितना दुःख है। उसकी भेंट में यह कुछ भी नहीं। मैने आपसे वादा किया है, बाबा तुम मेरे हो, में तुम्हारी हूँ। यह मेरा प्रण है, वादा है। आप मिल नये तो सब-कुछ मिल गया।
अगर हमें कुछ हो भी गया, हमारा जिम्मेवार कौन है। हमारा मात-पिता, स्वामी-सखा, शिक्षक रक्षक कौन है? वो जानता है कि किसकी कहां बिठाना है, कैसे चलाना है। बाबा कल्याणकारी है, उसने जो भी किया है. हमारे कल्याण के लिए किया है। हमारे से क्या कराना है और हमें जो देना है, यह योजना उसके पास है। हम तो कुर्बान करना नहीं चाहते. केवल उससे प्राप्त करना चाहते हैं। यह कैसे होगा? ईश्वरीय ज्ञानमार्ग कुर्बानी का मार्ग है। हम खून देने वाले मजनू नहीं हैं, दूध पीने वाले मजनू है। सुनी है मजनू की कहानी? मजनू बैठता था वहाँ टीले पर। लैला ने एक लड़के को कहा कि मजनू को दूध दे आओ। उसने कहा कि मजनु कैसा है? लैला ने कहा, पतला, सुखडा-सा है, वहां टीले पर बैठता है। उसको जाकर यह दूध का गिलास दे दो। यह लड़का गया टीले पर उस पतले-से आदमी को ढूंढ़ने। रास्ते में एक छोटी पहाड़ी थी, उस पर एक पतला सा आदमी बैठा था। उस आदमी से उस लड़के ने पूछा, मजनू तू है? उसने पूछा, क्या बात है। वह लड़का कहता है कि यह दूध का गिलास है। तो वह कहता है कि हाँ, मजनू मैं हूं। दूध पी गया। रोज वह लड़का दूध भरा गिलास ने जाता था, वह आदमी पीता था। लैला ने सोचा, क्या बात है, इतने दिन हुए, मजनू का कोई सन्दशा नही आया है. कोई अपना हाव-भाव व्यक्त नहीं करता है? शायद यह लड़का गलत दे आता है। या तो खुद पीता होगा या तो गलत व्यक्ति को दे आता होगा।एक दिन लैला ने उस लड़के से कहा तुम उससे कहो लैला बहुत बीमार है।हकीम कहता है कि उसको खून चाहिए उसके लिए तुमको खून देना है। उस लड़के ने उस आदमी के पास जाकर लैला की बात सुनाई । तब वह आदमी कहता है कि मैं तो दूध पीने वाला मजनू हु ।खून देने वाला मजनू वो बैठा है। हम वैसे ही है प्रेम करना चाहते है लेकिन प्रेम के लिए कुछ त्याग करना नहीं चाहते। दूध पीने वाले मजनू है , खून देने वाले मजनू नहीं है । यज्ञ के लिए कोई कुर्बानी करनी पड़े, उसके लिए तैयार नहीं है। अजीब प्रेमी है परमात्मा के हम भी यह तो प्रोत की रीत नहीं है। जितनी भी प्रेम कहानियाँ हम सुनते है उनमें कितने उत्तराव चढाव आते हैं. कितने संघर्ष होते हैं। किस तरह उन प्रेमियों को कुर्बानी करनी पडती है। यह ईश्वरीय मार्ग बलिदान का मार्ग है, कुर्बानी का मार्ग है. त्याग का मार्ग है। भक्तिमार्ग में तो शिव के आगे जाकर काशी कलवट करना शुरू किया था। उनके सामने हमारा त्याग कुछ भी नहीं है। वहां ना शिव की मूर्ति के सामने कुर्बान होते थे. यहाँ तो शिव साक्षात् है, वह तो शरीर की कुर्बानी नहीं मांगता है, वह हमारे में रहे हुए अवगुण, विकार निर्बलताओं की कुर्बानी माँगता है। बाबा कहता है कि मैं-मैं रूपी बकरी और मैंपन की कुर्बानी करनी है। यह मेरापन-तेरापन जो है, यह नाम-मान-शान जो है इसकी कुर्बानी चाहिए। इसलिए मैं और मेरा कहने वालों का यही हाल होता है बकरे की तरह।
अगर हम चाहते हैं कि हमारे में सुगंधी भरे, हमारे में दिव्यगुणों की खुशबू भरे, हम महान् बनें, हमारा जीवन असाधारण हो, उसके लिए हमें मन, वचन, कर्म से समर्पित हो रहना है, बुद्धि से पूर्ण रूप से अर्पित होकर चलना है, बाबा की हर आज्ञा को सिर माथे मानकर दिल से उस पर चलना है। बाबा हमेशा कहते हैं कि जब तक आप धोबी को कपड़े नहीं देते हैं. कपड़े साफ़ कैसे होंगे? जब तक धोबी उन कपड़ों को भट्ठी में डालेगा नहीं. वे स्वच्छ कैसे होगे? जब तक आप अपने को बाबा को देगे ही नहीं पुरा तन से,मन से, बुद्धि से संस्कारों से सबसे, तब तक आपका जीवन श्रेष्ठ होगा ही नहीं। सर्व पापों से मुक्त होंगे नहीं। बाबा ने कहा है, "सर्वपापेभ्यो मोक्षविष्यामि…”। मुझे समर्पित हो जाओ, मैं तुमको सर्व पापों से मुक्त कर दूंगा। इस जन्म में ही हमारे से कितनी गलतियाँ हई है और होती है। कहासुनी होती है, भाव-स्वभाव होता है। मन में कितने व्यर्थ विचार आते हैं! बाबा रोज़ ही कहते हैं, यह व्यर्थ बहाव समाप्त करो, बन्द करो। उसको पूर्ण विराम लगाओ, बिन्दु लगाओ। इस संगमयुग में जब से ज्ञान मिला है, योगी बने हैं फिर भी इतनी ग़लतियाँ होती हैं, यह हाल हमारा है। इससे पहले पिछले जन्मों में, विकारी जन्मों में पता नहीं कितनी निन्दा हमने की होगी, कितनी चुगली की होगी! कितना गाली-गलौच किया होगा, कितनों के साथ लड़ाई-झगड़ा किया होगा! पता नहीं क्या-क्या किया होगा, कितने पाप किये होंगे! कितने चूहों को खाया होगा इस बिल्ली ने । हज करने तो अभी आये हैं। उससे पहले चूहों को खाता रहा यह बिल्ला ! अब बाबा कहता है कि उन सब पापों को मैं क्षमा कर दूंगा, उन पापों से तुमको मुक्त कर दूंगा, मेरी शरण में आओ। फिर भी यह सौदा हमें मंजूर नहीं है, तो वह कहेगा कि ठीक है, ना मंजूर तो ना सही। नुकसान किसका है? इसलिए में यह समझता हूं कि बहुत-से हमारे प्रश्नों का. बहुत-सी हमारी कठिनाइयों का समाधान हो जाता है अगर हम यह सोचें कि हम सम्पूर्ण स्वाहा...। वे जो यज्ञ करते हैं, अग्नि में जो सामग्री डालते हैं, कहते हैं कि यह अग्नि के लिए है, मेरे लिए नहीं है, स्वाहा...। उसके बाद कहते हैं कि यह देव के लिए स्वाहा...। हम भी जब तक पूर्ण रूप से स्वाहा नहीं होंगे, हमारे में वह दैवी सुगन्धी, यह खुशी आयेगी कैसे? कहते हैं ना, बातों में बात यह है, सार यह है। यह बात क्या है? बात यह है कि जब तक तुम समर्पित नहीं होंगे तब तक गति-सद्गति होगी नहीं. कल्याण होगा नहीं। समर्पित होने के बाद परीक्षाये बहुत आएगी। लेकिन पास होना है। मैं समझता हूं, जिसको जितनी ज्यादा परीक्षाये आयेगी उतनी उसकी जल्दी-जल्दी प्रगति हो रही है। उसका कोई महान पार्ट है। उसकी मंजिल ऊंची है। बड़े से बड़ी परीक्षा पार कर वह बड़ा पद प्राप्त करने वाला है। जिसके जीवन में कोई विशेष घटनायें ही नहीं है जिसको विशेष मौके ही नहीं आते, उनका पार्ट भी साधारण है और पद भी साधारण है। आप देखते है, जिस दिन भारत का रिपब्लिक डे (गणतंत्र दिवस) होता है, उस दिन भारत के राष्ट्रपति, जो वीर जवान होते है. देश की रक्षा के लिए विशेष परीक्षा पास किये रहते या बलिदान दिये रहते हैं, उनको परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीरचक्र देकर सम्मानित करते हैं। वे ज़िन्दा नहीं होते तो मरणोपरान्त उनकी माँ या पत्नी को देते हैं।
आप देखते होंगे या जानते होंगे कि युद्ध के मैदान में कोई जवान आराम से भी बैठकर खाना नहीं खा सकता। चारों तरफ़ से दुश्मनों से घिरा रहता है, आठ-आठ दिनों, दस-दस दिनों तक उसको खाना नहीं मिलता, सर्दी में, गरमी में धरती पर सोया रहता है, उसको थोड़े ही वहाँ डनलप के बिस्तर, रजाई, कंबल, पलंग होते हैं? देश की खातिर लेटे हुए हैं। ऐसा नहीं कि उनके कोई बन्धु, रिश्तेदार नहीं होते। उनको भी सब होते हैं माँ-बाप, भाई-बहन, स्त्री-बच्चे। फिर भी वे सोचते हैं कि पहले मातृभूमि की रक्षा, बाद में मेरे अपनों की रक्षा। वे अपना जीवन देश के खातिर बलिदान करते हैं। आपको पता होगा कि मिलिट्री में भी सन्त, पण्डित होते हैं, वे जवानों को गीता, ग्रंथ साहेब आदि सुनाते हैं। गीता में आता है कि जो जीतेगा तो स्वराज्य पायेगा और लड़ते हुए मरेगा तो स्वर्ग पायेगा। मिलिट्री में भी सैनिकों को यही सुनाया जाता है कि देश के लिए तुम लड़ोगे या लड़ते हुए मरोगे तो तुम स्वर्ग में जाओगे। ऐसा ही यहाँ जो काम, क्रोध आदि विकारों से लड़कर जीत पायेगा वह स्वर्ग में आदि से आयेगा और जो लड़ते-लड़ते शरीर त्यागेगा स्वर्ग के बीच में या अन्त में आयेगा। उन फौजिया का जीवन विना होता है! कितना अनुशासनयुक्त होता है। बाबा भी हमे कहते है कि तुम रुहानी फौजी हो। हम रूहानी योद्धा है. माया पर विजय प्राप्त करने बिगर हमे स्वर्ग मिलेगा ही नहीं। इसलिए बात यह है। क्या है? भगवान को समर्पित हो जाओ। सब-कुछ उसको अर्पित कर जाओ, उसकी शरण में चले जाओ निश्चिन्त होकर साधना और सेवा में तत्पर हो जाओ।
पहले जब मैं भी गीता पढ़ता था. यह महावाक्य उसमे आता था तो मै कहता था कि हे प्रभु! मैं जैसा हूं, तैसा हूं, तेरा हूं। मै अबोध हूं, नालायक हू अशांत हूं, मूर्ख हूं. पापी हूं, अधर्मी हूं, जो कुछ हूँ हूं तो तेरा। तुझे ही मेरा कल्याण करना है। जब मुझे ज्ञान मिला और बाबा के मुख से यह बात सुनी किं बच्चे, तुम चिन्ता मत करो, तुमको मैं नयनों पर बिठाकर ले चलूंगा, पलकों पर बिठाकर ले चलूँगा, अपने साथ ले चलूँगा, गोद में ले चलूंगा। तुम मेरे बहुत प्रिय हो, तुम्हारे लिए मेरा सब कुछ है। मेरी सारो सम्पत्ति तुम्हारे लिए है - ऐसे-ऐसे बोलों को सुनकर मुझे लगा कि यही गीता के भगवान के महावाक्य हैं। यह मेरे सौभाग्य की पराकाष्ठा है कि मुझे सर्व समर्थ भगवान मिला।
हमारे लौकिक पिता राधास्वामी मठ में जाते थे। उस मठ के जो स्थापक थे उनका फोटो लगा हुआ था घर में। पिता जी जब कोई बड़ा काम, कठिन काम करने जाते थे, तब उस चित्र के सामने खड़े होकर कहते थे, गुरु जी मदद करना। मैं छोटा था, उनके पास खड़े होकर सुनता था। जब मैं ज्ञान में आया तो उनको ज्ञान देने की कोशिश की। मैंने बताया कि ज्ञान ले लीजिये। उन्होंने कहा कि हमने तो गुरु किया हुआ है, तुम्हारी मर्जी है. तुम जहाँ जाना चाहते हो जाओ। मैंने उनको कहा कि आपको यह कहते हुए हमेशा सुना है कि गुरु जी मदद करना, ऐसा क्यों कहते हैं? उन्होंने कहा, पत्र-व्यवहार करके मैंने उनसे पूछा था तो उन्होंने वायदा किया था कि जब तुमको कठिनाई आये, मझे याद करना, मै मदद करूंगा। यह भी उन्होंने मुझसे वायदा दिया था कि जब तुम शरीर छोड़ोगे हम वहां मदद करेंगे। मैने पूछा, वहाँ माना कहाँ? कहते है. वहाँ जहाँ आड़ा लकड़ा है ना वहाँ जहाँ पर टोल टैक्स लेते हैं. वहां। फिर मैंने पूछा, आपके गुरु जो आडे लकडे के पास बैठे हुए हैं? आपका सिद्धान्त है कि ज्योति ज्योत में समा गया। आप कहते हैं कि जो महान लोग होते हैं वे ज्योति ज्योत में समा जाते है. आत्मा, परमात्मा में लीन हो जाती है। लीन होने के बाद आपके गुरु वहां कहां बैठेंगे? इसका मतलब या तो आपके गुरु परमात्मा में लीन नहीं हुए या तो आड़े लकड़े के पास वे नहीं होंगे? वे कब तक वहां बैठे रहेंगे? उनके सब शिष्य तो एक ही समय नहीं जाते वहाँ। क्या आपके गुरु सारा समय वहीं बैठे रहेंगे? वहां बैठकर यह कहेंगे कि यह मेरा शिष्य आया है, इसको छोड़ दो। मेरी ये बात सुनकर वे हंसने लगे और कहने लगे कि मैंने यह बात सोची ही नहीं थी। तुम्हारी बात तो ठीक है, वहां थोड़े ही वे बैठे रहेंगे? क्या उनकी सारी साधना अपने शिष्यों के इन्तज़ार में ही गयी, वहां टोल नाके पर? इस वार्तालाप के कुछ दिनों बाद पिता जी भी ज्ञान में चलने लगे।
इसलिए कोई भी मनुष्य किसी का उद्धार कर नहीं सकता अथवा किसी को मुक्त-जीवनमुक्त बना नहीं सकता। एक परमात्मा ही है जो तीनों कालों में अस्तित्व में है। वह कभी न शरीर लेता है, न शरीर छोड़ता है. वह निराकार है। यह सर्वसमर्थ है। वे यहाँ ही मनुष्यों को योग से पवित्र बनाकर, दिव्यगुण सम्पन्न बनाकर, मुक्ति में ले जाते हैं। अगर यह बात हमारे मन में स्पष्ट नहीं हुई तो हम भ्रमित हो सकते हैं, पद भ्रष्ट हो सकते हैं। हम अपने मार्ग से विचलित हो सकते हैं, तनावग्रस्त हो सकते हैं, व्यग्रमनस्क हो सकते हैं। मैं समझता हूँ कि सर्व मानसिक बीमारियों की दवाई एक ही है, भगवान पर समर्पण। जब कहते हैं कि हम बाबा के हैं और बाबा हमारे हैं-इसका भाव क्या निकलता है? समर्पित समर्पित किसको कहा जाता है? बाबा कहते हैं. सारे तो मेरे बच्चे है लेकिन जो मेरे वफादार है, फरमानबरदार हैं वे मेरे सगे बच्चे हैं, वे ही समर्पित हैं। जो बाप की आज्ञा मानता ही नहीं, तो वह बाप का कैसा बच्चा है? जो उनका विश्वासपात्र नहीं, वह उनका कैसा बच्चा है? जिसका हर परिस्थिति में बाबा पर अचल अखण्ड निश्चय होता है. विश्वास होता है वहीं सच्चा समर्पित है, सच्चा बच्चा है। कई बच्चे कभी-कभी ऐसे भी कहते हैं कि इस यज्ञ का मालिक बाबा है, तो यहां ऐसा भी होता है क्या? बाबा इस समय क्या कर रहा है? वह देखता नही है क्या? उस समय उनका निश्चय थोड़े समय के लिए हिल जाता है। जिसकी निष्ठा, जिसका निश्चय अटल नहीं है, उनकी स्थिति भी कैसे अचल हो सकती है? अचल स्थिति भी तब होगी जब अटल विश्वास होगा। ये एक-दूसरे के पूरक हैं, सम्बन्धित हैं। अगर हमारा विश्वास ही लड़खड़ा जाता है, डगमगा जाता है तो हमारी स्थिति भी डगमगायेगी। आज कहते हैं कि मैं आत्मा हूं, ज्योतिर्विन्दु हूँ, लाइट माइट हूँ। यह क्या है? यह विश्वास है। आपको विश्वास है, आप मानते हैं इसलिए कहते हैं कि मैं आत्मा हूं। इससे पहले आप मानते थे कि मैं शरीर हूँ। आपने अपने विश्वास को बदल दिया, पहले अपने को जो शरीर मानते थे, अभी अपने को आत्मा मानने लगे। उस आत्मिक विश्वास की स्मृति से आपकी स्थिति भी आध्यात्मिक हुई। अगर आपका विश्वास ही डगमगा रहा है कि पता नहीं मैं आत्मा हूं या शरीर? ऐसी स्थिति में योग कैसे लग सकता है? हमें विश्वास है कि परमात्मा कल्याणकारी है। शिव माना हो कल्याणकारी। जब हम कहते हैं कि 'शिव' माना कल्याणकारी, क्या हम सोचकर कह रहे हैं? समझकर कह रहे हैं? कई जब हम कोई बात किसी से कहते हैं तो वे हमें कहते हैं, सोच लें, कह तो रहे हैं, और एक बार सोच लें । आप कहेंगे, हां जी, मैंने तो अच्छी तरह से सोच लिया है, यह मेरे मन में स्पष्ट है। अगर हमने सोच लिया है कि परमात्मा कल्याणकारी है. दूसरा कोई कल्याणकारी है ही नहीं तो समर्पित होने में आनाकानी किस बात की है? देर किस बात की है? फिर सोच क्या रहे हो। खड़े किसलिए हो? आगे बढ़ते क्यों नहीं हो?
अगर हमें यह विश्वास है कि वह हमारा कल्याणकारी पिता है, कल्याणकारी टीचर है और कल्याणकारी सद्गुरु है, वही हमारा गति और सद्गति दाता है तो उसके वफ़ादार और फरमानबरदार क्यों नहीं होते? बाबा कहते हैं कि बच्चे तो मेरे सारे हैं लेकिन जो बच्चे वफादार और फरमानबरदार हैं वे बच्चे मुझे प्रिय हैं। जिसको बाप पर अटल और अचल विश्वास होता है उनको अटल, अखण्ड, निर्विघ्न और अति शुभकारी राज्य मिलेगा। हमारा जो सतयुग का राज्य है, उसकी विशेषता क्या है? अटल। कोई राजा उस पर हमला नहीं करता वहाँ पर। कोई दुश्मन वहां नहीं आता है। वहाँ कोई हिलाने वाला नहीं होता। यहाँ देखिये, कोई प्रधान मंत्री बना, तो उसको अधिकार से उतारने में लोग लगे रहते हैं। कलियुग में तो राज्य अटल होता नहीं। सतयुग में जो राज्य मिलता है वह अटल, अखण्ड और अति सुखकारी होता है। वह तभी होगा जब हमारा निश्चय अटल होगा, हमारा विश्वास अटल होगा। हमने एक दफ़ा निर्णय कर लिया, एक दफ़ा ठान लिया, एक दफ़ा वायदा कर लिया तो हम उसी के हो गये। उसी पर कुर्बान हो गये। फिर वापिस आने का सवाल ही पैदा नहीं होता। वहां से हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हमारी स्थिति अचल, अडोल और अटल होगी। अगर आप चाहते हैं कि हमारी स्थिति उतार-चढ़ाव में न आये, स्थिर रहे, तो उसके लिए हमारा विश्वास भी स्थिर रहे, उसमें कोई बदलाव न आये। उस कल्याणकारी के हाथ में हमारा हाथ है, इस कल्याणकारी ड्रामा में हमारे साथ जो भी हुआ है वह कल्याणकारी है। उस कल्याणकारी पिता ने हमें जो भी दिया है, उसमें कल्याण है इसलिए हमारा बाल भी बांका हो नहीं सकता। हमारा कोई नुकसान होने वाला नहीं है। अगर किसी ने हमारे बारे में गलत फैसला कर भी लिया. हमारे लिए भगवान की जो स्कीम है, प्लान है उसमें कोई प्रवेश कर अपनी मनमत से हमे नुकसान करने की धोखा देने की कोशिश करे भी तो वो बैठा है। वह हमारे लिए बैठा है। परन्तु समस्या यह है कि हम उस पर छोड़ते ही नहीं है। हम मनुष्य पर आधारित होते हैं। इसको कहते हैं, उसको कहते हैं। समझते है कि यह हल कर देगा, वह हल कर देगा। जब उसने (परमात्मा ने) कहा है कि मामेकम् शरणम् .... इस बात को भूल जाते हैं। उसने यह नहीं कहा है कि मेरी शरण में भी आओ और दूसरों की शरण में भी जाओ। उसने कहा है, शरण मेरी एक की लो। आप एक बल, एक भरोसा, एक की शरण में रहकर तो देखिये, उस जीवन का अनुभव तो करके देखिये, खुद अनुभवों का सागर आपके सामने आ जायेगा।
दुनिया तो अब बिगड़ी हुई है। यह तो सब समझते भी हैं लेकिन उसको सुधारने की तरकीब है क्या - यह वह एक परमात्मा ही जानता है। जो खुद ही बिगड़े हुए हैं, वे कैसे इस तरकीब को एक्ट में ला सकते हैं! मामला सारी दुनिया का बिगड़ा हुआ है। पाँच तत्व आदि सब बिगड़े हुए है। हर चीज का सुधार एक रचयिता परमात्मा के हाथ में ही है।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
गुण एव सर्वत्र पूज्यन्ते
रात को अव्यक्त बापदादा की मुरली हम सुन रहे थे। आप सबको को याद होगा कि बाबा ने कहा, हमे सर्वगण सम्पन्न तो बनना ही है लेकिन किसी एक विशेष गुण का विशेषज्ञ (Specialist) बनना है। उसका हमे अभ्यास करना है. उसकी रिसर्च करनी है। अगर आप देखे वास्तव में यह सारा जो ड्रामा है सतयुग के आदि से लेकर कलियुग के अन्त तक और संगमयम को भी उसमे ले लीजिये, यह गुणों का ही खेल है। जिसको हम सतोप्रधान, सतो, रजो, रजोप्रधान, तमो और तमोप्रधान का विशेषण देते हैं या देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण इत्यादि की संज्ञा या नाम देते हैं, ये सब गुणों ही पर आधारित हैं। गुणों ही का खेल है। यह सारी जो उत्थान और पतन की कहानी है, यह गुणों की ही कहानी है। अभी हम पुरुषार्थ कर रहे हैं मनुष्यसे देवता बनने का या नर से श्रीनारायण और नारी से श्रीलक्ष्मी बनने का, श्रीलक्ष्मी-श्रीनारायण भी दिव्यगुणों की ही तो मूर्ति हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कहें कि हम गुणवान बनने का, दिव्यगुणों की धारणा करने का पुरुषार्थ कर रहे हैं।
अगर हम योगाभ्यास करते हैं तो भी हमारा लक्ष्य यही है कि उस आत्म-स्मृति से हममें गुण स्थिर हो जायें। अगर हम ज्ञान का अध्ययन करते हैं तो उसके पीछे भी हमारा मूल भाव यही होता है कि हम जान लें कि हमारा पतन क्यों हुआ? दुःख और अशान्ति क्यों हुई? उसके कारण को जानकर और उस कारण के परिणाम को जानकर, आगे के लिए हम समझ जायें कि अवगुणों को, दुर्गुणों को और आसुरी गुणों को छोड़ते जायें और दिव्यगुण धारण करें। संसार में जितने भी धर्म हुए उन सबने बात गुणों की ही की है। लेकिन उन गुणों की पराकाष्ठा, उनकी उच्चत्ता, उनका वह प्रमाण उनमें नहीं था जो बाबा ने आकर बताया है। उदाहरण के तौर से उन धर्मों के भी जो साधु संत महात्मा संन्यासी थे थोड़ा बहुत ब्रम्हचर्य के लिए उनको कहा गया। आम लोगों के लिए ब्रम्हचर्य पालन करने के लिए नहीं कहा गया ।गृहस्थ में संयम नियम रखने के लिए कहा गया है।लेकिन पूर्ण ब्रम्हचर्य व्रत रखो यह नहीं कहा गया है। बाबा के ज्ञान का विशेष सर यही है कि हमे दिव्यगुण सम्पन्न बनना है और सारे गुण धारण करने है। कुछ थोडेसे गुण नहीं सारे गुण सर्व गुण सम्पन बनना है।
इसके साथ-साथ बाबा कहते है कि अपने ध्यान को एकाग्र करने के लिए किसी एक गुण का विशेषज्ञ बनो। मनुष्य का ध्यान बिखर जाता है ना किसी कार्य में ऊँचाई या पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। अगर एकटिक किसी एक बात पर जम जाता है. उसके पीछे लग जाता है तब जाकर कही कुछ पा लेता है। इसलिए बाबा कहते हैं. किसी एक दिव्यगुण के पीछे लग जाओ। बाबा के कहने का हरके बात में राज होता है। दरअसल हम एक को भी धारण करने का प्रयत्न करेंगे तो यह निश्चय हो जानिये कि उसके साथ दूसरे गुण भी आयेगे ही आयेंगे। ये गुण भी एक साथ रहते हैं। इनकी आपस में बड़ी दोस्ती है। एक गुण आता है तो उसके साथ लगा हुआ, जुड़ा हुआ दूसरा गुण स्वतः ही आता है। एक बुराई आती है तो चार बुराइयाँ उनके साथ ज़रूर आती हैं। ये बुराइयाँ भी इकट्ठी रहती हैं, इनका भी आपसमें सहवास है, परस्पर घनिष्ठ सम्पर्क है, सम्बन्ध है। ऐसे गुणों का भी आपसमें अटूट सम्बन्ध है। आप यह न सोचें कि अगर एक गुण की तरफ़ ध्यान देंने से बाकी गुण रह जायेंगे और हमारे में कमी रह जायेगी। ऐसा नहीं, एक के साथ दूसरे आ ही जायेंगे स्वतः । इस ईश्वरीय ज्ञान में मेरे भी कई साल गुजरे है, मैंने देखा है कि इस ईश्वरीय मार्ग में गुणों का ही सारा खेल है, जो गुणों की धारणा में आगे थे वे पुरुषार्थ में आगे निकल गये। यह बहुत बड़ा गुप्त यूद्ध भी है और राज भी है। जब बाबा कहते हैं तो हमें बहुत सहज लगता ।। जब हम करने उतरते हैं तो कठिन लगता है। हमें उतरना भी तल पर है । बाबा ने कहा है कि गुणों के सागर के तल में उतरो और वहाँ पर रत्न लो।
मैने देखा है गुणों के इस खेल में किसी किसी को सफलता नहीं मिलती, इस युद्ध में हार जाते हैं। कई तो आगे चले जाते हैं. कई पीछे रह जाते है। पीछे रह जाने के लिए कुछ कारण होते है। अगर उनको पूरी तरह से हम समझ जायें और समझने के बाद हम स्थिर हो जाये तो हम आगे निकल सकते हैं। बहुत बार हम उस बात को समझते भी है लेकिन वक्त पर यह बात बद्धि से खिसक जाती है। बाबा कहते हैं कि यह ज्ञान पारे की तरह है। हथेली पर पारे को रखते ही खिसक जाता है, ऐसे ही वो बात बुद्धि से खिसक जाती है। सिर्फ समझना ही काफी नहीं है, उस समझ को बनाये रखना, उसकी स्मृति को स्थाई बनाना भी जरूरी है। वे बातें कौन-सी है जिनसे गुणों की धारणा या न धारणा, दोनों का सम्बन्ध है। मैं समझता हूं अनुभव से कि एक चीज हम कई बार भूल जाते हैं इन गुणों की धारणा में, वो है कर्म सिद्धान्त (Law of Karma, Karma Theory)। इस सिद्धान्त में एक बड़ी बात है कि कर्म स्वयं ही अपने में एक फल है (Karma is its own reward)। कई दफ़ा हम कर्म का फल चाहते हैं कि हमने काम किया लेकिन फल तो निकला नहीं। इस आदमी के साथ मैंने अच्छा व्यवहार किया लेकिन नतीजा तो यह हुआ कि आज वह आदमी मेरे से दुश्मनी करता है। मैंने इस व्यक्ति को व्यापार में मदद की, आज वह अच्छा व्यापारी बन गया और वह मेरी जड़ काटने की कोशिश करता है। ऐसे वक्त पर हमें द्वेष आ जाता है, घृणा आ जाती है, बदले की भावना आ जाती है। कर्म तो हमने अच्छा किया था, उसको हमने अच्छा सहयोग दिया था। हमने उसके साथ मित्र भाव रखा था, भ्रातृत्व भाव रखा था। जब हमने उस व्यक्ति का व्यवहार दूसरा देखा तो हमारी दृष्टि, वृत्ति, स्मृति, स्थिति सब नीचे गिर गयी, बदल गयी। हम यह भूल जाते हैं कि कर्म का फल निकलेगा जरूर। परन्तु उसका फल तुरन्त चाहते हैं हम।
रात को बाबा से एक भाई मिल रहा था। बाबा उससे कह रहे थे कि आप कई दफा जल्दी कर्म का फल चाहते हो। समझते हो कि अभी-अभी इसका फल निकल आये। लेकिन किसी-किसी कर्म का फल निकलने मे समय लगता है. थोडा धीरज धरा करो। इसका मतलब यह हुआ कि कर्म सिद्धान्त जानते हुए भी उस समय हम उसको भूल गये ना! तुरंत हम किसी कार्य का, मदद का फल चाहते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि मुझे भलाई का फल मिलेगा ज़रूर। अगर यह व्यक्ति मेरे साथ बुरा व्यवहार कर रहा है, इसका फल भी उसको मिलेगा जरूर। अगर मै सहन करूंगा तो उस सहन करने के कर्म का फल मुझे मिलेगा ज़रूर। अगर सहन न करके, घृणा-द्वेष करूंगा उसका फल भी मुझे मिलेगा जरूर। जब यह भूल जाते हैं तब हम गुणों से हटकर अवगुणों, दुर्गुणों और आसुरी गुणों की तरफ़ चले जाते हैं। इसलिए हमें इस बात को बड़ी स्थिरता से धारण करना चाहिए कि कर्म स्वयं ही अपने में एक फल है।
जब मैं कोई अच्छा कर्म करता हूँ, सबसे पहले मेरी अन्तरात्मा, मेरी ज़मीर मुझे कहती है कि तूने ठीक कर दिया। यह बहुत बड़ी बात है। एक आदमी को शान्ति होती है जब वह किसी प्यासे आदमी को पानी पिलाता है। किसने उसकी सराहना की या न की और जिसको उसने पानी पिलाया उसने धन्यवाद बोला या न बोला लेकिन उसकी अन्तरात्मा ज़रूर यह कहती कि वह प्यास से मर रहा था, मेरे पास पानी था, मैंने उसकी प्यास बुझा दी, पानी सफल हुआ और मेरे शरीर का जो अस्तित्व है वह भी सार्थक हुआ। में जो सजीव व्यक्ति हूं, मेरा जीना भी सफल हुआ और मुझे सन्तोष होता है कि मैंने एक अच्छा कर्म किया। इस बात को जब हम भूल जाते हैं तो यह हैं कि हमें फल मिले, तुरन्त फल मिले और सबको पता पड़े कि इसने अच्छा काम किया, इसको फल मिल गया। जब यह चाह रखते हैं तो हम गुण चाहते धारण नहीं कर सकते। इसलिए अगर यह हमें मालूम रहे कि संसार चाहे कुछ भी करे वा यह भी कहे कि ब्रह्माकमारी संस्था में तुम मत जाओ। अगर हम यह समझते हैं कि यहाँ अच्छी शिक्षा दी जाती है, अच्छे संस्कार दिये जाते हैं, मैं इससे अच्छा बन रहा हूँ, दिन प्रति दिन मेरे में सद्गुण आ रहे हैं तो उनका कहना उनके साथ है और आपकी धारणा आपके साथ है। दूसरों की बात सुनकर आप उत्तेजित क्यों होते हो? उस व्यक्ति के प्रति घृणा भाव क्यों? हम उसको नीचा दिखाने की कोशिश क्यों करें? हम क्यों परेशान हो जाये दूसरों की बात सुनकर? हम क्यों यहाँ आना छोड़ दें, उन लोगों की आलोचना सुनकर? ऐसे सोचने के बदले, आलोचकों की बातों में आकर कई लोग उल्टा सोचकर क्लास में आना छोड़ देते हैं।
मैंने कई बार देखा है, कई भाई-बहनें ज्ञान में आये और चले भी गये। एक दिन दादी जी भी सुना रही थीं कि एक बार मै एक सेन्टर पर गयी थी, वहां पर पांच व्यक्ति नये थे। अगली बार जब उसी सेन्टर पर गयी, वे पांच चले गये थे और दूसरे पाँच आये थे। वे पाँच कहाँ चले गये? क्यों चले गये? वे चले गये किसी की सुनने से, किसी की मानने से। किसी ने कहा, अरे. तुम ब्रह्मचर्य का पालन करते हो? अरे, ऋषि-मुनि भी न कर सके, तुम कैसे करोगे? ऐसे उनकी बातों में आ गये। उस समय वे लोग भूल गये कि जितना हम ऊंचा और अच्छा काम करते हैं उतना ही ऊंचा, महान् और अच्छा फल प्राप्त होता है। मैंने यह देखा कि दिव्यगुणों का विशेषज्ञ बनने की बात तो दूर रह गयी, सामान्य रूप से भी गुणों की धारणा करने में हम पीछे हट जाते हैं क्योंकि हम यह भूल जाते हैं कि कर्म स्वयं ही अपने में एक फल है। जो मनुष्य शीतल है, अन्तर्मुखी है, सहनशील है, सन्तुष्ट है वह स्वयं से ही स्वय में शान्ति का अनुभव करता है। शान्ति कितने भी पैसे खर्च करने से नहीं खरीदी जाती। वैज्ञानिक, शान्ति का कितना आविष्कार करने की कोशिश करें लेकिन प्राप्त कर नहीं सकते। सिर पटक देने से भी शान्ति नहीं मिल सकती या सारे संसार को पराजित करने से भी शान्ति नहीं मिल सकती। जो गुणों को धारण करता है. जो दिव्यगुण सम्पन्न बनता है वहीं शान्त होता है। यह एक पहला फल है। अगर क्रोध को हम छोड़ते है तो हमारा मन शान्त होता है। इस प्रकार जब हमने खुद जो शान्ति प्राप्त की यह हमार लिए स्वयं फल है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अच्छा कर्म करने से अच्छा फल मिलता है। लोग कुछ भी कहते रहे लेकिन हमे उन बातों को ख्याल में नहीं लना चाहिए।
दूसरी बात है, दृढ़ता। चाहे आप कितना भी पुरुषार्थ करें लेकिन अगर आप में दृढ़ता नहीं होगी तो किसी भी गुण के विशेषज्ञ बन ही नही सकते। विशेषज्ञ तब ही बन सकते हैं जब पहले आपमें दृढ़ता हो। आपने सोचा कि मुझ में सहनशीलता थोड़ी कम है, मैं सहनशीलता को धारण करूंगा। किसी व्यक्ति ने आपको छेड़ दिया, परेशानी में ला दिया, कोई ऐसी उत्तेजनादायक बात कर ली, अन्याय कर दिया, आप के खिलाफ झूठ बोल दिया, निन्दा कर दी। आप तो अच्छा काम करते हैं, फिर भी आपकी बेइज्जती की। इससे आप उत्तेजित हो उठे और सहन नहीं कर सके। सुबह ही आपने संकल्य किया था कि आज से मैं सहनशीलता का गुण धारण करूंगा। लेकिन आाज के दिन में ही परीक्षा आयी और आप भड़क उठे उस पर जिसने आपकी ग्लानि की थी। आप अपनी प्रतिज्ञा या संकल्प पर दृढ़ नहीं रहे इसलिए भड़क उठे। जिस प्रकार, बुनियाद दृढ़ न हो तो कोई भी भवन टिक नहीं सकता। इसी प्रकार, दृढ़ता न हो तो दिव्यगुणों की ईमारत भी टिक नहीं सकती। पहली पहली चीज है दृढ़ता. ध्रुव।
ध्रुव की कहानी में आता है कि ध्रुव ने कहा कि मैं परमात्मा को प्राप्त करके ही दिखाऊँगा। उसने सोचा, किया और ध्रुव बन गया। लोग कहते हैं कि आकाश में जो ध्रुव तारा है वह वही है। बाबा ने कहा है कि वास्तव में तुम बच्चे ही धरती के चैतन्य तारे हो, तुम ही चैतन्य ध्रुव तारे हो। यह तुम्हारी बात है। हम भी अपने लक्ष्य में ध्रुव हो जायें दृढ़ हो जाये। इसको बाबा कहते है अंगद बन जाओ। अंगद शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है यह शब्द दो शब्दों से बना है “अंग” और “द”।”अंग” 'माना शरीर की इन्द्रिया और “द” माना देना। इन्द्रियों को हम बाबा को दे दे तब ही अचल बन सकते हैं। यह शरीर हमारा है ही नहीं। हम तो बाबा के हो चुके है। यह शरीर परायी चीज होगी। अब यह हमारे पास अमानत हो गयी। अमानत में ख्यानत हम कैसे कर सकते हैं? किसी की रखी हुई चीज में हम हस्तक्षेप कैसे कर सकते हैं? जब हमारी भावना ऐसी होगी तभी हम अंगद बन सकते हैं। बताया जाता है कि अंगद की टांग भी हिली नहीं। जब टाँगे उसकी थी ही नहीं तो कैसे हिलेगी? वह तो सब-कुछ भगवान को अर्पित कर चुका था। जो भगवान की होंगी उनको कौन हिला सकेगा? बाबा ने कहा है ना, बाबा-बाबा कहो तो माया भाग जायेगी। फिर रावण कैसे ठहर सकेगा?
मैं यह कह रहा था, अगर दृढ़ता ही दृढ़ नहीं हो तो कैसे आगे बढ़ सकेंगे? किसी-किसी की दृढ़ता ही दृढ़ नहीं होती। कहते है ना, नमक में ही नमकीनता नहीं रही। अगर नमक में ही नमकीनता नहीं रही तो दुनिया में नमकीन चीजें कहां रहेंगी? अगर दृढ़ता न रहे तो दृढ़ता का गुण कहां रहा? इसलिए दृढता का गुण धारण करने के लिए भी पहले-पहले दृढता चाहिए। दृढ़ता के बिना कोई भी गुण टिक नहीं पायेगा। अगर दृढ़ता नहीं होगी तो उसका परिणाम क्या होगा? निराशा। कोई काम जमके नहीं करोगे. पूरे दिल से नहीं करोगे तो निराशा होगी। लोग कहते हैं कि मेरे में सहनशीलता का गुण नहीं है। मैं सहनशीलता का गुण धारण करने के लिए सोचता हूं। लेकिन पूरा दिल जुटाता नहीं, पूरा इरादा, पक्का इरादा करता नहीं। अगर बार-बार इसमें असफल हो जाता हूं तो नतीजा यह हो जाता है कि मैं अपने से निराश हो जाता हूँ। निराश होकर कहने लगता हूं कि बहन जी, मैं तो देवता नहीं बन सकता। यह मेरे वश का नहीं है। या तो मैं क्षत्रिय बनेगा, मेला के अन्त में आऊंगा या मै देवता घराने का नहीं है। या तो शक होने लगता है, या तो धीरज खो बैठता है। इसलिए मैं यह समझता हूं कि कोई भी कार्य हम करे, दिल-जान लगाकर करें। जब हम समझते हैं कि गुणों की धारणा हमें करनी ही है, यही हमारा लक्ष्य है तो दृढ़ता से करनी चाहिए ना ! हिन्दी में लक्ष्य शब्द के दो अर्थ है। एक है, जिसको हमने जीवन में लक्ष्य बनाया, दूसरा है, कोई भी सिपाही बन्दूक से किसी चीज को निशाना बनाता है तो उसको भी लक्ष्य कहा जाता है। वह सैनिक उस निशाने पर आंख बिल्कुल जमाकर रखे रहता है। अगर उसकी आँखें इधर-उधर गयी तो उसका निशाना चुक जाता है। बाबा ने कहा है कि लक्ष्य से लक्षण आते हैं।
जब आपका यह पक्का इरादा हो गया कि मुझे सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम बनना है, दिव्यगुण धारण करने हैं, तो उस लक्ष्य में जुटे रहो। बाबा कहते हैं कि इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय में पहले-पहले यह लक्ष्य और उद्देश्य बताया जाता है, और कहीं नहीं बताया जाता है। हमें मालूम है कि यहाँ क्या पढ़ाया जाता है और हमें क्या बनना है। जब तक किसी को मालूम नहीं है कि जाना किधर है, तो कहाँ जायेगा? आवारागर्द और मुसाफिर में क्या फ़रक होता है? मुसाफ़िर अपनी मंजिल-ए-मकसूद की तरफ जाता है। आवारागर्द जो होता है वह कहीं भी चला जाये। उसका कोई लक्ष्य तो है ही नहीं। हमने तो लक्ष्य धारण किया है ना! भक्तिमार्ग में हम क्या करते थे? हमारा कोई लक्ष्य ही नहीं। किसी ने हमें पढ़ाया नहीं था कि हमें कहां जाना है, जीवन को किधर ले चलें? जब हमने यह लक्ष्य बना लिया कि हमें दिव्यगुणधारी बनना है तो हमें उस लक्ष्य की ओर चलना चाहिए।
मैं यह कह रहा था कि हमें सभी गुणों की धारणा करनी चाहिए क्योंकि जीवन में गुणों की ही महानता है। भक्तिमार्ग में भी, मुझे याद है, लोग कहा करते थे कि “गुण एव सर्वत्र पूज्यंते” हे मनुष्यों गुणों की ही सब जगह पूजा होती है । कृष्ण की पूजा होती लेकिन उसके बाप वासुदेव की पूजा नहीं होती थी कृष्ण भी उसका नमन करता होगा लेकिन पूजा कृष्ण की होती है क्यों कि गुण कृष्ण में होते है।इसलिए जिसमें गुण हो वही तो महान होता है।किसी ने यह भी कहा है कि उम्र से कोई बड़ा नही होता, धारणाओं से बड़ा होता है। सारे ज्ञान-विज्ञान का यह सार है कि हे मनुष्य! गुण धारण करो। अगर दुख और अशान्ति से हमेशा के लिए छुटना चाहते हो तो गुण धारण करो, दिव्यगुण धारण करो।
सबसे पहले यह याद रहे कि जो कर्म हम करते है उसका फल अटल है। चाहे कोई योगी कहलाये, चाहे महात्मा कहलाये, कोई साधारण व्यक्ति कहलाये कर्म उसका पीछा नहीं छोड़ेगा। वह कहीं भी चला जाये, कर्म उसके साथ ही चलेगा, इस चोले (शरीर) में हो या अगले चोले में हो। यह पक्का समझ लो, भले पुलिस छोड़ेगी, सरकार छोड़ेगी लेकिन अपना कर्म नहीं छोड़ेगा। मनुष्य की छाया भी उसको छोड़ जायेगी लेकिन उसके कर्म नहीं छोड़ेंगे, उसके पीछे ही रहेंगे, साथ ही रहेंगे। क्यों न हम अच्छे कर्म करें, दिव्यगुणयुक्त कर्म करें? दूसरा है, दृढ़ता। हम क्यों नहीं दृढ़ता अपनाये कि हमें इस दिव्यगुण की धारणा करनी ही है।
तीसरी बात है, सन्तुष्टता। मैंने यह कहा था कि एक गुण से दूसरे गुण भी आते हैं लेकिन सन्तुष्टता धारण करने में बहुत राज़ है। अगर आप इसकी गहराई में जाये तो यह सिर्फ गुण नहीं है बल्कि गुणों का सेनानी है। सन्तुष्टता के साथ सहनशीलता, धैर्य, मधुरता ये सारे गुण आपस में जुटे हुए हैं। कैसे देखिये, एक व्यक्ति है, आपसे वह ठीक व्यवहार नहीं करता। ईर्ष्या-द्वेष करता है। अनुचित, मर्यादाहीन व्यवहार करता है। एक बार, दो बार नहीं. जब भी मौका मिला आपको काटे चुभाता ही रहता है। आपको जगह-जगह नीचा दिखाने की कोशिश करता है, परेशान करता है। आप कहेंगे ऐसी परिस्थिति में कौन सन्तुष्ट रह सकता है। असंभव है ! एक व्यक्ति पीछे पड़ गया हाथ धोकर हमारे क्या बात है ? हम अपना रास्ता अलग करते है तो भी वह हमारा पीछा नहीं छोड़ता। बात क्या है, वो भी हमे नहीं मालूम। तो कैसे हम अपने जीवन से उसके व्यवहार से संतुष्ट रहे ? पहले भी मैने यह बात कही थी कि कर्म स्वयं में एक फल है। आपने यह नहीं सोचा कि कर्म का फल कब मिलेगा? मिलेगा तो बाद में मिलेगा। लेकिन कभी भी मिले कर्म का फल अटल है। सदगुण या अच्छा कर्म स्वयं में एक फल है आप उसको सामने रखकर जरा सोचे। आप यह क्यों भूल गये कि अगर वह व्यक्ति मेरे प्रति ही ऐसा उल्टा कर्म कर रहा है तो इसका मतलब है कि यह मेरे ही पूर्व कर्म का फल है। क्योंकि हमने मान लिया है कि कर्म फलदायक है। कर्म तो ऐसा नहीं है कि नष्ट हो जायेगा। अनुचित या मर्यादाविहीन, दुःखप्रद, बदला लेने वाला ईर्षा-देष पर आधारित जो कर्म वह कर रहा है तो अपना हिसाब-किताब होगा। हिसाब-किताब है तो चुक्ता करो। यहाँ बुक्त करेंगे तो धर्मराजपुरी में नहीं करना पड़ेगा।
हिसाब-किताब चुक्ता करने का दूसरा तरीका है, बाबा कहते हैं. योग लगालो। अगर उसके व्यवहार और बातों को महसूस करते रहेंगे तो आपका योग लगेगा ही नहीं। इसलिए क्यों नहीं हम सन्तुष्टता से उसको हिसाब-किताब या अपना ही कर्म का फल समझकर, स्वीकार कर, खुशी-खुशी से चुक्त करें! अगर आप कहेंगे कि में कैसे मानू कि यह मेरे कर्म का ही फल है? वह खुद ही तो मेरे प्रति उल्टा कर्म कर सकता है! सारा मेरे ही सिर पर दोष क्यों? उसका भी तो दोष हो सकता है! सब कहते हैं कि उस व्यक्ति की आदत खराब है। उसके संस्कार अच्छे नहीं हैं। वह हरेक के साथ ऐसे ही करता है, उसका स्वभाव ही ऐसा है। चलो, आपके पूर्वजन्मों के हिसाब-किताब नहीं हैं, उस व्यक्ति का ही सही। आप क्या चाहते हैं? वह न करे। आप ज्ञानी-योगी होते हुए भी उस व्यक्ति से परेशान होने से दूर नहीं हो रहे हो तो वह अज्ञानी, वियोगी व्यक्ति कैसे अपने संस्कारों को इतनी जल्दी बदलेगा? इसलिए आपको ही सहन करना पड़ेगा। आपका लक्ष्य ही है कि मुझे गुण धारण करना है, सहन शक्ति को धारण करना है, सन्तोष को धारण करना है। उसका लक्ष्य हो या न हो, आपका लक्ष्य तो है ना कि मुझे गुण धारण करना है? जब आपने इस लक्ष्य को धारण किया है तो उस व्यक्ति को क्यों देखें? बाबा ने कहा है कि लक्ष्य से लक्षण आयेंगे, अगर आप उसको देखेंगे तो आप में लक्षण आयेंगे नहीं। हर लिहाज से आपका विवेक, आपका निर्णय, आप में जो ज्ञान है कर्म सिद्धान्त का, आपको यह बताता है कि यह गुण धारण करने में ही तुम्हारा फल है।
अगर आप सन्तोष को धारण करते हैं, आप देखिये इसमें कितनी गहराई समायी हुई है। आपमें सहनशीलता तो आ ही गयी। सन्तोष तो उससे ऊंची चीज है। सन्तोष या सन्तुष्टता तभी आयेगी जब आप पहले सहनशीलता को धारण करेंगे। सहनशीलता से पहले तो सन्तुष्टता का गुण आयेगा ही नहीं। सन्तुष्टता तो टिकी हुई है आपकी सहनशीलता पर। सहनशीलता है आधार, वही न रहे तो उसके ऊपर टिकने वाली चीज़ कैसे रह सकती है? आप इस एक को धारण कर लीजिये कि सदा मैं सन्तुष्ट रहूंगा तो सन्तोष का गुण अपने आप आ जायेगा क्योंकि सन्तुष्टता स्वयं में खुशी है। कहते हैं, सन्तोष धन सबसे बड़ा धन है। संसार में इस जैसा धन कोई नहीं। एक व्यक्ति करोड़पति हो सकता है लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि उसमें सन्तुष्टता न हो। लेकिन एक व्यक्ति निर्धन हो सकता है, वह सन्तुष्ट भी रह सकता है। कहा जाता है, सन्तुष्टता अथवा सन्तोष ही वास्तविक धन है। इसलिए क्यों नहीं हम सन्तुष्टता का गुण धारण करें?
सन्तोष के पीछे सहनशक्ति जुटी हुई है। सहनशक्ति अकेली नहीं है। अगर सहनशक्ति धारण कर ली तो तंग करने वाले व्यक्ति के प्रति आपकी घृणा नहीं रहेगी। अगर आपमें घृणा रहेगी तो आप सहन नहीं कर सकेंगे, आपसे शीतलता नहीं होगी तो सहन नहीं कर सकते। अगर उस व्यक्ति के बारे में मित्र भाव नहीं रहेगा तो आप सहन नहीं कर सकेंगे। सहनशक्ति तभी आयेगी जब आप समझेगे कि वह मेरा भाई है. हम एक पिता की सन्तान है. बेचारा यह अपने संस्कारों से मजबूर है। आज यह माया का कैदी है. मुरीद है। आज नहीं तो कल ठीक हो जायेगा। मुझे इसको भी उस कैद से छूड़ाना चाहिए मै क्यों इसकी अज्ञानता के कारण अपने पथ से विचलित हो जाऊँ? जब आपमें यह अच्छा भाव आयेगा तभी आपमें संतुष्टता आयेगी। देखिये एक सन्तुष्टता के गुण में कितने गुण समाये हुए हैं।
मैंने आपको तीन बातें बतायी। एक है, कर्म ही अपने आप में एक फल है। सामान्य फल नहीं, मीठा फल है, सुफल है, मधुर फल है और पुरस्कार रूपी फल है। दूसरा, मैंने कहा, दृढ़ता। दृढ़ता के बिना धारणा नहीं होगी। तीसरा मैंने कहा, सन्तुष्टता का गुण। चौथी बात है, उसको हम धारण नहीं कर सकते हैं तो जीवन में उदासी, मायूसी आ जाती है। वह है उत्साह। उत्साह के बिना मनुष्य जैसे मरा हुआ है। जब मनुष्य का उत्साह चला जाता है, तब वह जिन्दा होते हुए भी मुर्दा है, जिन्दा लाश है। मुर्दा तो जहाँ रखो वहीं पड़ा रहता है लेकिन यह उत्साहीन व्यक्ति जैसे एक बड़े पत्थर जैसा है जो खुद भी नहीं तैरता और किसी के साथ उसको बाँध दो तो उसको भी डुबो देता है, मार देता है। ऐसा उत्साहीन व्यक्ति न केवल स्वयं मरा हुआ होता है लेकिन कइयों को डुबो देता है। मैंने ऐसे बहुत से मिसाल देखे हैं।
मान लीजिये, किसी को क्लास में जाने का उत्साह नहीं है, वह क्या करेगा? अपने दोस्त को भी कहेगा कि क्या यार! तुम रोज-रोज़ क्लास में जाते हो। चलो, चलो आज फलाना काम करते हैं, फिर कभी क्लास में जाना। अगर कोई सेवा करने जा रहा हो तो कहेगा, क्या यह रोज-रोज सेवा करने में लगे हो। चलो, चलो आज कहीं घूमने जायेंगे, पिकनिक करने जायेंगे। ये बहनें तो रोज़ कोई न कोई काम बताती ही रहेंगी। यह उत्साहहीन व्यक्ति जहां-जहां जायेगा, वह उत्साहहीनता नामक रोग फैलाता ही रहेगा। वह बम जैसा है, जहां भी जायेगा वह अपने बोलचाल में विध्वंस करेगा। उत्साहै व्यक्ति बहुत खतरनाक होता है। इसलिए जर में उत्साह बहुत बड़ी चीज है। इस विश्वपरिवर्तन के महाकार्य में उत्साह बहुत बड़ी भूमिका बनाने वाली एक जबर्दस्त चीज है। यह आत्मशक्ति का विकास करने वाली चीज है। कोई महान कार्य करने के लिए योग्यता न होते हुए भी अगर उत्साह रूपी एक गुण है तो वह संसार को सिद्ध करके दिखाया कि योग्यता न होते हुए भी. साधना करके, परिश्रम करके, उत्साह रूपी अस्त्र से अजेय कार्य पर भी जय प्राप्त की जा सकती है। अभ्यास करते-करते इन्सान क्या नहीं कर सकता ! इसलिए उत्साह एक बड़ी शक्ति है, एक महान् गुण है। जब उत्साह है तो धैर्य उसके साथ-साथ आयेगा क्योंकि उत्साह और धैर्य एक सिक्के दो पहलू हैं। धैर्य के बिगर इन्सान में उत्साह नहीं हो सकता। जिसके पास धैर्य नहीं है, उसके हाथ-पाँव बार-बार काँपने लगेंगे। वह थोड़े ही कोई काम कर सकेगा? उसको बार-बार प्यास लगेगी। बार-बार बाथरूम जायेगा।
जब उत्साह का यह गुण हमारे में आता है तब हम आगे बढ़ते जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि जब तक बाबा को अपने सामने नहीं रखेंगे, इन गुणों को धारण भी नहीं कर सकेंगे। बाबा भी कहते हैं कि सी फादर, फालो फादर (एक बाप को देखो और उसी का अनुसरण करो)। हमारे सामने एक आदर्श होना चाहिए, एक मूर्ति होनी चाहिए जिसको धारण करें और अनुसरण करें।
जब हम इतिहास पढ़ते हैं तब हमें मालूम पड़ता है कि कोई कहता है कि मैं शिवाजी जैसा बनूंगा। कोई कहता है कि मैं राणा प्रताप जैसा बनूँगा, कोई कहता है कि मैं पृथ्वीराज चौहान जैसा बनूंगा, कोई लड़की कहती है कि मैं झांसी की रानी जैसी बनेंगी। जीवन में जिसको जैसी प्रेरणा मिलती है. उससे प्रेरित होता है और वह वैसा बनने का ही अभ्यास करता है या लक्ष्य रखता है। उस प्रेरणा से प्रेरित होकर प्राणभूत होता है और समझता है। कि मैं उस लक्ष्य को प्राप्त करूंगा। जब तक हमारे सामने ऐसा आदर्श नहीं होगा जिसका हम अनुसरण करें तब तक अपनी मंजिल पा नहीं सकते। हमारे लिए कौन ऐसा आदर्श हो सकता है इस अलौकिक जीवन में? अगर बाबा को हम अपने सामने नहीं रखेंगे तो नतीजा यह होगा कि कोई एक सांसारिक व्यक्ति होगा। विज्ञान भी कहता है कि संसार में कहीं भी पूर्ण रिक्त स्थान है ही नहीं (There is no perfect vaccume in the world)| ऐसा कभी नहीं हो सकता कि हमारे मन में कोई का चित्र या आदर्श नहीं है। हर व्यक्ति के लिए कोई न कोई आदर्श होता ही है। इसलिए अगर हमारे सामने आदर्श रूप में बाबा नहीं है तो कोई सांसारिक व्यक्ति होगा जो अपूर्ण और कमी तथा त्रुटियों से युक्त होगा। अगर वह सांसारिक व्यक्ति प्रेरणास्रोत होगा तो हम सम्पूर्ण ही नहीं सकते क्योंकि हमारा आदर्श अपूर्ण है, त्रुटिपूर्ण है, देह-अभिमानी है, सांसारिक है। अतः हम पूर्ण रूप से दिव्यगुणों को धारण नहीं कर सकते और पूर्ण दिव्यगुणधारी नहीं बन सकते।
सारे संसार में ऐसी एक ही आत्मा है जिसने शिव बाबा के अंग-संग रहकर पार्ट बजाया। ब्रह्मा बाबा इतने समय तक सूक्ष्मवतन में, शिव बाबा के साथ रहकर विश्व सेवा कर रहे हैं, उन्होंने ऐसा पुरुषार्थ किया है जो आज तक किसी ने किया नहीं है। यह सौभाग्य उस एक ही आत्मा को है। उस आत्मा का कितना बडा परुषार्थ होगा। शिव बाबा भी उनको कितना पसन्द करते हैं। जरूर उन्होंने भी शिव बाबा को उतना ही पसन्द किया होगा। उनके जीवन में शिवबाबा की याद उतनी रही होगी जितनी दुसरों के जीवन में नहीं होगा। ब्रह्मा बाबा का नाता भी एक शिव बाबा के साथ उतना अटूट होगा इसलिए शिव बाबा ने भी उस एक को ही अपनाया, उनके तन का आधार लिया। ऐसे बाबा को हम अपने सामने आदर्श के रूप में नहीं रखेंगे तो हम विव्यगुणधारी नहीं बन सकेंगे।
गुण का कोई मूर्त रूप नहीं है, वह अमूर्त है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह हमेशा चित्र को, मूर्ति को सामने रखता है। बाबा ने भी हमें यह नियम बताया है कि चित्र से ही चरित्र बनता है। इसलिए बुद्धि में चित्र रखना पड़ेगा। लोगों को सूक्ष्म ज्ञान समझाने के लिए हम भी चित्र बनाते हैं ना ! कल्प का इतिहास बताने के लिए बाबा ने सृष्टिचक्र और कल्पवृक्ष के चित्र बनवाये। लक्ष्मी-नारायण कैसे थे इसको बाबा ऐसे ही कह सकते थे शब्दों में लेकिन बाबा ने उनका चित्र बनवाया। ऐसे शिव बाबा का परिचय भी वे ऐसे ही बता सकते थे लेकिन शिव बाबा का भी चित्र बनाया। चित्र मनुष्य के मस्तिष्क पर एक छाप लगा देता है। इसलिए जब आप साकार बाबा का चित्र देखेंगे तो उसके साथ उनका चरित्र, उनके साथ जुड़ी हुई सारी यादें आ जाती हैं। जैसी यादें होती हैं, जैसी स्मृति होती है वैसी स्थिति होती है। यह भी नियम है। जब हम एक बाबा को याद रखते हैं तो उनके गुण स्वतः ही हमारे में प्रवेश करते हैं। ये कुछ मूलभूत बातें हैं दिव्यगुणधारी बनने के लिए।
मनुष्य समझते हैं कि परमात्मा के बहुत अवतार होते हैं, हर युग-युग अवतार होते हैं। परन्तु युग-युग में तो आने की दरकार ही नहीं है क्योंकि सृष्टि-चक्र को तो फिरना ही है। अब हम चक्र के नियम को समझते हैं। इसे समझकर हमें श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए जिससे हमारी प्रालब्ध बने।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
शिवसंकल्पमस्तु, शुभसंकल्पमस्तु, सशक्तसंकल्पमस्तु …
पुरुषार्थ की नींव या आधार-शिला है हमारा संकल्प। बहुत-से पुराने शास्त्र है, उनमें बार-बार आता है कि 'शिवसंकल्पमस्त'। सारा मंत्र पढ़के, आाखिर में आता है, 'शिवसंकल्पमस्तु', 'शिवसंकल्पमस्तु'। हमारा कल्याणकारी संकल्प हो। मेरे से पूछो, इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सबसे महान् देन क्या है? मै यही कहूंगा कि संकल्प का महत्त्व। आपके संकल्प का महत्त्व क्या है? उसकी ताकत क्या है? उसकी विशेषता क्या है? ये सब बातें बाबा ने बतायी हैं। बाबा की ये बातें और कहीं नहीं बतायी गयी है। बाबा की ये बातें बहुत-बहुत अमोध हैं, जो आपको कहीं नहीं मिलेगी। सारा इतिहास आप पढ़ डालो, सारे धार्मिक ग्रंथ, शास्त्र, पुराण पढ डालो; संकल्प का महत्त्व जो बाबा ने बताया है, किसी ने नहीं बताया।
पहली बात है, बाबा ने कहा है कि संकल्प से सृष्टि रची जाती है। ओहो! संकल्प इतना बड़ा है, जिससे सृष्टि रची जाती है! सृष्टि कहाँ और संकल्प कहाँ। लेकिन बाबा कहते हैं कि संकल्प से सृष्टि रची जाती है, संकल्प में वो शक्ति है। कहते हैं विचार, संसार को बदल देते हैं (Ideas move the world)। संसार विचारों पर टिका है। विचार ही संसार की नीव हैं। बाबा कहते हैं कि आपके संकल्प से सृष्टि रची जाती है। अगर आप अशुद्ध संकल्प करेंगे तो अशुद्ध सृष्टि रची जायेगी। अगर आप शुद्ध संकल्प करोगे तो शुद्ध सृष्टि रची जायेगी। तो आप कनिष्ट विचार (negative thoughts) छोड़ोगे या नहीं छोड़ोगे? अगर आप समझेंगे कि मेरे संकल्प से ही अच्छी या बुरी, सुखमय या दुःखमय सुष्टि रखी जायेगी तो अब आपको निर्णय कर लेना चाहिए कि मेरा संकल्प कैसा हो? पहली बात बाबा यही कहते हैं कि बच्चे, संकल्प से सृष्टि रची जाती है, यह याद रखो। इस बात का महत्त्व कभी मत भूलो। यह मत सोचो कि मेरे मन में बुरा सकल्प आया था, उसको बाहर आने नहीं दिया, उसको वहीं खत्म कर दिया। बाबा ने यह नहीं कहा, वचन या कर्म से सृष्टि रची जाती है। बाबा ने कहा है, संकल्प से सृष्टि रची जाती है। वचन और कर्म तो बाद में आते हैं। इन सबका नींव संकल्प है। संकल्प से सृष्टि रची जाती है यह आप याद रखोगे तो परिवर्तन आयेगा। आपके शक्तिशाली संकल्प हों ताकि शक्तिशाली सृष्टि रची जाये। आपका संकल्प बहुत ही शक्तिशाली होना चाहिए। संकल्प में शक्ति किस चीज की हो? पवित्रता की, ज्ञान की, योग की, अष्ट शक्तियों की। हम मास्टर सर्वशक्तिमान हैं क्योंकि हमें एक नयी सुष्टि रचनी है हमारे संकल्प से।
पहले यह समझो कि मैं मास्टर रचयिता हूं। आपने बाबा की जीवन कहानी में सुना होगा। बाबा ने ब्रह्मा बाबा को एक दृश्य दिखाया, दो सितारे ऊपर से उत्तर आये और वे देवी-देवता बन गये। उसके बाद बताया गया, आपको ऐसी नयी सृष्टि बनानी है। ब्रह्मा ने बोला, उसने बताया तो नहीं, नयी सृष्टि कैसे बनानी है? लेकिन धीरे-धीरे शिव बाबा ने क्या बताया संकल्प से सृष्टि रखी जाती है। आपको जो सृष्टि रचनी है, उस सृष्टि को संकल्प से रचना है। पहले-पहले यह समझो कि मैं मास्टर रचयिता हूँ। अपनी पोजिशन को समझो, अपने रोल को समझो, अपने गोल को समझो। यह हमारा लक्ष्य (गोल) है कि नयी सृष्टि रचनी है। हमारा पार्ट (रोल) है मास्टर रचयिता बनना। उस पार्ट और लक्ष्य को पूरा करने का तरीका क्या है? शक्तिशाली संकल्प। शक्तिशाली संकल्प माना योग से युक्त, रूहानियत से युक्त, पवित्रता से युक्त संकल्प। ऐसे संकल्प से सृष्टि रची जायेगी।
दूसरा, बाबा ने कहा है कि यह संकल्प तीली है। जैसे माचिस की तीली होती है, उसको जलाकर फेंक दिया तो बड़ी-बड़ी इमारतों को भी वह जला देती है। एक चिनगारी से सारा भवन भस्म हो जाता है। संकल्प रूपी जो तीली है, चिनगारी है इसको जलाकर अपने पुराने संस्कारों को दग्ध करना है। संकल्प का यह दूसरा रूप है। आपको नयी सृष्टि रचनी है, संकल्य से। आपको विकर्म दग्ध करने हैं, संकल्प से। यह सोचो कि मेरे संकल्प ऐसे हो जिससे मेरे पुराने सारे विकर्म दग्ध हों।
बाबा कहते हैं कि जैसा लक्ष्य, वैसे लक्षण होते हैं। हमारा लक्ष्य तो बहुत ऊँचा है लेकिन हमारे में वो लक्षण नहीं हैं। लक्ष्य और लक्षण के बीच जो खाई है उसको कैसे भरें? उसको जोड़ने वाला पुल है संकल्प। जब तक आपका संकल्प रूपी पुल नहीं होगा कि मुझे गैप (खाई) को भरना है, तब तक वह गैप ऐसे ही रहेगा। यह भी याद रखो कि संकल्प लक्ष्य और लक्षणों को जोड़ने वाला पुल है। यह कौन-सा संकल्प है? बाप समान बनने का संकल्प। बाप जैसा मुझे बनना है यह संकल्प जो है, एक पुल है। यह पुल ही आपकी वर्तमान स्थिति और भविष्य में क्या बनना चाहते हैं, उसको जोड़ने वाला है। उन दोनों को मिलाने वाला, दोनों के बीच का रिक्त स्थान खत्म करने वाला यह संकल्प है। बाप को हमेशा सामने रखो। अपने संकल्पों को, विचारों को बाप से टैली (तुलना) करो, मिलाओ। जो कर्म करो तो देखो बाप ने ऐसा कर्म किया था? हां, तो तब उसको करो। जब यह संकल्प आपको रहेगा कि मुझे बाप समान बनना है, तब वह गैप पूरा होगा। अगर यही संकल्प आपकी बुद्धि से खिसकेगा तो यह गैप भरेगा नहीं। देखिये, संकल्प का कितना महत्त्व है !
बाबा कहते हैं, यह संकल्प रहे कि मैं ब्राह्मण हूँ। तो शूद्रों का संकल्प मुझे आ नहीं सकता। ब्राह्मण कभी म्लेच्छों का काम नहीं कर सकता। लौकिक में भी जो शुद्ध ब्राह्मण होगा, उसको कहो, तुम मांस खाओ, वो कहेगा, क्या बात करते हो? मैं ब्राह्मण हूं, म्लेच्छ भोजन नहीं खा सकता। अभी तो वह सब खत्म हो गया, अभी तो एक ही वर्ण रह गया। उस समय के ब्राह्मण को सदा यह स्मृति रहती थी कि मैं ब्राह्मण हूं, मै कोई म्लेच्छ कर्म नहीं कर सकता, कोई म्लेच्छ अन्न खा नहीं सकता। आपको यह संकल्प होगा कि मै सच्चा-सच्चा ब्राह्मण हूं; शुद्धि, पवित्रता, सात्त्विकता, योग ये ही मेरे ब्राह्मणत्व हैं, मेरे कर्तव्य हैं। इस तरह का संकल्प आप में सदा जाग्रत रहता है तो आप में शालीनता तथा दैवी लक्षण आयेंगे जिसको बाबा रॉयल्टी कहते हैं।
बाबा कहते हैं कि संकल्प इतना शक्तिशाली होता है कि जब वह योग में लगन का रूप ले लेता है, सशक्त प्रेम का रूप ले लेता है, योग अग्नि का रूप ले लेता है तो उससे ही सारे विकर्म दग्ध होते हैं। अपने संकल्प को अगर प्रेम से लवलीन कर दो, संलग्न कर दो तो वही संकल्प आपकी अग्नि बन जायेगा। संकल्प तीली भी है, संकल्प अग्नि भी है। अगर आप चाहते हैं कि आपका योग श्रेष्ठ स्तर का हो, उसके लिए संकल्प को प्रेम से भर दो अथवा योग में आपका संकल्प ही प्रेम का स्वरूप हो। संकल्प के अन्दर प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी न हो। जब संकल्प का यह रूप होगा तो और कुछ सूझेगा नहीं, तब योग अग्नि का रूप होगा।
बाबा कहते हैं कि संकल्प टिकट है। फ़रिश्ता बनने की टिकट कटा लो। आबू आने के लिए आपको अपने-अपने स्थानों से टिकट लेनी पड़ती है। कोई भी यात्रा करने के लिए, फलाने स्थान पर जाने के लिए टिकट कटानी पड़ती है। हमको जाना है अव्यक्त वतन में। स्वाभाविक बात है कि वहाँ जाने के लिए भी टिकट लेनी पड़ेगी। हमें कौन-सी टिकट या यात्रा-पत्र चाहिए अव्यक्त वतन जाने के लिए? मुझे फरिश्ता बनना है यह संकल्प रूपी यात्रा-पत्र। फ़रिश्ता बनने की टिकट यही है। यही संकल्प है, में फरिश्ता हूं, मुझे फरिश्ता बनना है।
बाबा कहते है. जो संकल्प करते हो, उसको पुरा करो, कर्म में पुरा लाओ। सोचो और करो। संकल्प करके छोड़ो नहीं, कल के लिए टालो नहीं। आधे मन से मत सोचो, जो भी सोचते हो पूरे मन से सोचो। करो भी पुरा दिल, जान लगाकर करो। बाबा कहते है, सकल्प में प्रेम और नियम का सन्तुलन होना चाहिए। पूर्ण संकल्प माना उसमें लव और लॉ का, स्नेह और शक्ति का, ज्ञान और योग का बैलेन्स रखने के लिए बाबा ने कहा है. उन सबका पूरा बैलेन्स (सन्तुलन) होना चाहिए। इन सब बातों का पालन करेंगे तो हम तीव्र पुरुषार्थ कर सकेंगे, पर्ण पुरुषार्थ कर सकेंगे।
परमात्मा समझा रहे हैं कि अब कहानी पूरी हुई। अभी अन्त का भी अन्त है। फिर नयी कहानी शुरू होती है। यह चक्र अथवा कहानी अनादि बनी बनायी है। यह सब नॉलेज बुद्धि में है इसलिए अपने को खुशी है कि फिर से जो कहानी शुरू हुई है उसमें हमारा भी पार्ट है, हम उसमें पूरा सुख लेते हैं।
अपने को मालूम है कि इस नॉलेज को पूरा जानने वाला वही दूर का मुसाफ़िर है। वह मुसाफिर खुद ही वापस ले जाने फिर आता है। मनुष्य यह काम कर नहीं सकता। अगर मनुष्य-आत्मा करे तो वह आदि-मध्य-अन्त में नहीं आनी चाहिए। वह तो चक्र से अलग चीज चाहिए। वह है एक परमात्मा स्वयं मालिक।
- मातेश्वरी जगदम्बे सरस्वती।
बाबा के प्रति मेरा अन्तर्भाव
जब भी मैं बाबा के सामने जाता हूं,तो मेरा हाथ ऐसा होता है (सिर झुकाकर प्रणाम करने का) क्योंकि उन्होंने मुझ पर बहुत अहसान किया हैं, उपकार किया है. कल्याण किया है। बाबा कहते हैं कि मै बाप भी हू, शिक्षक भी हूं और सद्गुरु भी हूं। ये तीनों रूप मुझे साथ-साथ दिखायी देते हैं। इसलिए अनजाने में भी बाबा के सामने मेरे हाथ जुड़ जाते हैं, जैसे नमस्कार है सद्गुरु को। मैं उनका कृतज्ञ हूं, उन्होंने सदा मेरा साथ दिया है, संरक्षण किया है। बहुत विनम्र भाव से मैं उनके प्रति खड़ा होता हूं। वे कहां, मैं कहाँ! ठीक है, मैं उनका बच्चा हूं। जो राजा का बच्चा हो, उसका अपना स्थान होता है लेकिन यहां बात कुछ और है। शिव बाबा, जिसको सारी दुनिया याद करती है और मैं एक छोटा-सा व्यक्ति, जो आवारागर्द था, उसको उन्होंने क्या बनाया, क्या सिखाया। उनकी कमाल है। मेरे मन का उद्गार उस रूप में प्रकट होता है। जब बाबा को देखता हूं, बाबा के पास भी मेरा वो भाव पहुंचता है और उनका भी मेरे प्रति पहुंचता है। मेरे से कोई भी भूल हुई हो, चूक हुई हो, क्षमा कीजिये। आप अत्यन्त महान् हैं। मैंने अज्ञानतावश आपकी कोई बात नहीं मानी होगी, नाफरमानबरदारी की होगी, जैसे आप कहते हैं कि जैसे शिष्य को गुरु की बात माननी चाहिए, अगर मैं नहीं मान पाया हूंगा, अपनी असमर्थता से, आलस्य से, कोई और कारण से हो सकता है, मुझे क्षमा कीजिये।
मुझे यह भी मालूम है कि बाबा क्षमा नहीं करते लेकिन मेरा भाव यह होता है कि मुझे क्षमा कीजिये। गीता में भी आपने पढ़ा होगा। पहले संवाद है अर्जुन का और भगवान का। वह जो संवाद है उसमें अर्जुन प्रश्न भी करता है, बातें भी करता है और संशय भी प्रकट करता है। समझता है कि यह मेरा सम्बन्धी है। उस भाव से बात करता रहता है। बाद में जब उसको दिव्यदृष्टि मिलती है, साक्षात्कार करता है कि यह कौन है मेरे सामने । लाइट ही लाइट एक जबर्दस्त लाइट और माइट। तब वह कहता है. नमस्कार में आपको नमस्कार करता है। आप मेरे श्रद्धेय है. आप मेरे पुज्यनीय है।
मैं यह कह रहा था कि जिस प्रसंग में, बाबा, मैंने अपनी अज्ञानता में कुछ भी कहा होगा, उसको क्षमा कर दीजिये। अब मैं समझा कि आप कौन हो। साकार बाबा के सामने भी जब मैं जाता था तब भी मेरे मन में यही भाव होता था। कमाल है, बाबा ने मेरे लिए क्या नहीं किया ! मैं आपसे सच बताता हूँ। मैं कुछ भी नहीं था, कुछ काम का नहीं था। उन्होंने मेरे लिए क्या नहीं किया ! मुझे क्या से क्या बनाया। जो भी बनाया मुझे, उन्होंने ही बनाया। लोग समझते हैं कि इसने यह किंया, वह किया। करनकरावनहार तो बाबा है। मैंने कुछ भी नहीं किया। अगर मैंने किया हो, वो बाबा की टचिंग (touching: प्रेरणा) से किया। लेकिन टचिंग तो उनकी थी। काम करवाया उन्होंने। मैं सच बताता हूँ आपको, मैंने कुछ नहीं किया। बड़े-बड़े जनसमूह का, शहर के शहर का मैंने सामना किया, हमारी संस्था के विरोध में, तलवार लिये हुए, मारने को तैयार! ऐसे कई किस्से हुए है। सामने तो मैं था लेकिन मेरे साथ कौन था? मुझे बचाया किसने? अगर मैंने कोई तरीका भी अपनाया, वह टचिंग किसकी थी? वह उनकी थी। यह मै ऊपर-ऊपर से नहीं कह रहा हूं, अनुभव से कह रहा हूँ। ये अनुभव ऐसा हल्का-सल्का नहीं, गहरा, बिलकुल स्पष्ट। यह सब उसका है। इसलिए यह भाव, यह कृतज्ञता मेरे से निकलती है जब मैं बाबा के सामने जाता हूँ।
दूसरी बात यह है कि हमेशा मेरा विचार रहता है कि जो बड़ों का आदर नहीं करता है, वह बेकार आदमी है। क्या सीखेगा वो? व्यक्ति को जिसका कदर नहीं है, जिसका सम्मान नहीं है, उससे क्या सीखेगा? जो भी हमसे बड़े हैं, वरिष्ठ हैं उनके प्रति हमारा क्या सत्कार होना चाहिए- आजकल मुझे वह दिखायी नहीं पड़ता है। मान लीजिये, हम सब कुर्सी पर बैठे हैं। कोई बहुत बड़ा आ जाता है तो सब के सब उसको ऑफर (offer) प्रस्तावित) करेंगे कि यहाँ आइये, यहाँ बैठिये। लेकिन मैं बैठा हूं. मेरे से थोडा सीनियर मेरे पास जा जाता है तो मै उठने का कष्ट नहीं करूंगा। सोचुंगा कि दुसरी कुर्सी ले आये और बैठे यह देर से क्यों आया है? पहले आना चाहिए था, कुर्सी मिलती थी, मैं कहाँ जाऊंगा उठकर मैं ऐसा मानता हूं कि जहाँ बड़ों का सम्मान नहीं होता, वह किसी व्यक्ति या परिवार या संस्था की प्रगति के लिए बड़ा घातक है। हमें अपने बड़ों को देखकर गदगद होना चाहिए और उनके प्रति सम्मान का भाव आना चाहिए। लौकिक में तो सुबह उठकर बड़ों को हाथ जोड़ते हैं, उनके पांव भी पड़ते हैं जिसको चरणवन्दन कहते हैं। पहले जमाने में कोई बड़े, घर में आते थे तो बच्चे जाकर उनके पांव छूते थे, तब वे बच्चों की पीठ फेरते थे, प्यार करते थे, आशीर्वाद देते थे। बड़ों का आशीर्वाद भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। उन दिनों यह भी था कि अगर बड़ों ने डांट भी दिया, कुछ कह भी दिया, छोटे उसका बुरा नहीं मानते थे। भले उस वक्त रो भी देंगे लेकिन उनको पता है कि इनको हमारे लिए प्यार है। थोड़ी देर में वे उनसे प्यार कर भी रहे हैं। यह जो भाव है बड़ों के प्रति आदर का, अगर वो नहीं है तो मेरे विचार में, देवी-देवता बनने का विचार छोड़ दीजिये, इन्सान बनने के भी लायक नहीं हैं। देवी-देवता तो सर्वगुण सम्पन्न, सर्व कला सम्पूर्ण, सकल मर्यादाओं से पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी और अहिंसा परमोधर्मी होते हैं। देवता वही बनेगा जो ईश्वरीय गुणों और व्यवहार की धारणा यहीं करेगा।
मैं जब भी बाबा को देखता हूँ, मुझे बहुत-बहुत घनिष्ठत्ता महसूसः होती है। उनका मुझसे इतना गहरा प्यार है जिसका कोई वर्णन नहीं। मेरा भी उनसे गहरा प्यार है जो मैं उसका वर्णन कर नहीं सकता। जब बाबा के सामने खड़ा होता हूं, यह मुझे अनुभव होता है। बाबा तो देखते हरेक को हैं. देखने का भाव हरेक को अलग-अलग पहुंचता है। शुरू से लेकर वे मुझे जिस ढंग से देखते थे आज भी उसी ढंग से देख रहे हैं। पहले जितना प्यार उन्होंने साकार में दिया है, आज भी उतना ही प्यार दे रहे हैं। साकार में बाबा अमृतवेले दो बजे उठ जाते थे। मैं भी दो बजे उठ जाता था और लाइट जला देता था। मेरे कमरे में लाइट जली हुई बाबा देखते थे या और कोई देखकर बता देते तो बाबा पहरे वालों से कहते थे, लाइट जल रही है, अगर जगदीश बच्चा उठा है तो उसको बुला लो। उस समय बाबा को कोई ज्ञान की बिन्दु याद आती थी या कोई सेवा की प्रेरणा होती थी तो बाबा के सामने कोई न कोई चाहिए जिसको बताये। अगर कोई न होता तो बाबा नोट कर लेते एक-दो बार मुझे ऐसे बाबा का बुलावा आया। पहरे वाले ने कहा, बाबा आपको याद फरमा रहे हैं। मैं चला जाता था। फिर हमेशा यह कोशिश की कि मैं भी दो-ढाई बजे नहाकर तैयार रहूं। बाबा के पास जाऊँ और नहाया हुआ न हूं, यह नहीं होना चाहिए। बाबा के पास नहाकर जाना चाहिए। हमेशा मैं नयी दुल्हन की तरह तैयार होकर बाबा के पास जाता था। बाबा मुझे बुलाते थे। क्या बात करते थे, बात मत पूछिये! बाबा कभी कटोरी में या कप में दूध पी रहे होते। मुझे भी पिला देते थे। कभी कुछ, कभी कुछ खिलाते या पिलाते थे। छोटे बच्चे को जैसे उसका दादा या बाबा प्यार करता है, वैसे मुझे अपने पास बिठाकर सुबह-सुबह प्यार देते थे। सारा विश्व सुबह-सुबह भगवान को याद कर रहा है लेकिन भगवान सुबह-सुबह मुझे याद कर रहा है और कहता है, जगदीश बच्चे को बुला लो। कभी भी बाबा ने मुझे डांटा नहीं। ऐसे भी नहीं कहा कि जगदीश को बुला लो। बाबा हमेशा कहते रहे, बच्चे से कहो, 'बाबा याद फरमा रहे हैं'। कभी बाबा ने मुझे यह नहीं कहा कि यह काम करो, वह काम करो। बाबा कहते थे, बच्चे, यह काम करोगे? हमेशा बाबा मुझे ऐसे ही कहते थे। आश्चर्य की बात है, इतने छोटे-से, अकिंचन (नाचीज) व्यक्ति को बाबा का आदर देखिये ! इससे लगता है कि उनमें कितनी महानता है! देखिये, इतनी बड़ी हस्ती, मुझ से कहते थे, बच्चे, यह करोगे? जब ऐसे व्यक्ति आपसे कहेंगे तो आप करना क्या, जान भी दे देगे। सारी दुनिया एक तरफ, कितने भी विघ्न आयें अगर आपका ऐसा हुकम है, आदेश है तो अवश्य करेंगे। कुछ भी हो जाये, हम करेंगे। हमेशा मेरा और बाबा का इस प्रकार का सम्बन्ध रहा।
बाबा का बोलने का तरीका, व्यवहार क्या रॉयल था! बाबा कमाल के थे। सारे चित्र मेरे सामने आते हैं। मेरे सामने शिव बाबा भी है, बह्या बाबा भी है, बापदादा हैं। जब वे आये हुए होते, दोनों ने मुझे बहुत आशीर्वाद दिया। बहुत दिया है, बहुत हो दिया है।
साकार बाबा के अव्यक्त होने के बीस दिन पहले से ही मुझे लगा कि बाबा अव्यक्त होने वाले हैं। मुझे शुरू से ऐसी टचिंग होती थी कि यह आत्मा जाने वाली है। दीदी के बारे में भी मैंने बड़ों को बताया था कि इनके जो भी हस्ताक्षर कराने हों तो करा लो। सब-कुछ सभी से तो नहीं कह सकते। जिनसे मेरी खुलकर बातचीत होती थी, उनसे मैं कहता रहा कि इनका पार्ट पूरा होने वाला है। उसी तरह जब मैं कमला नगर में था तो बाबा के बारे में भी ऐसा महसूस होने लगा। मैंने गुलज़ार दादी से कहा कि मैं मधुबन जाना चाहता हूं। मुझे पूछने लगी, मधुबन में क्या है? मैंने कहा, संस्था के इतिहास में एक बड़ा तूफ़ान आने वाला है। कहती थी, तूफ़ान आने वाला है! क्या तूफान आने वाला है? कैसी बातें कर रहे हो? मैंने कहा, यह नहीं बता सकता, आप ही इसको समझने की कोशिश कीजिये। उन्होंने कहा, मैं कैसे समझू, आप बताओ ना, कौन-सा तूफ़ान आने वाला है। मैंने कहा, मैं नहीं बता सकता। थोड़े समय के बाद, उन्होंने कहा, ठीक है, मैंने समझ लिया। उनको भी अच्छी तरह टचिंग होती थी लेकिन वे मेरे मुंह से सुनना चाहती थीं। फिर मैंने कहा, मैं मधुबन जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा, जाओ।
मैं आया बाबा के पास। बाबा यहां कुटिया में बैठते थे। उन दिनों. बाबा ज्यादातर कुटिया में बैठते थे। मैं पांच-छह दिन रहा होऊंगा, 100% मझे निश्चय हो गया कि बाबा की यह अव्यक्त होने की स्टेज है बाबा जा रहे हैं। बिलकुल पक्का । बाबा को लगा कि यह समझ गया है, उसको भगाओ यहाँ से। यह औरों से न कहे। बाबा ने मेरे से पूछा बच्चे तुम कितने दिन यहाँ रहोगे? अभी रिफ्रेश तो हो गये, दिल्ली में काम नहीं है क्या? जाओ, फलानी, फलानी किताब छपाओ। अभी वो किताब छपायी नही है, बच्चे माँगते हैं। 'महान् अन्तर' नामक किताब, जिसमें आत्मायें क्या कहती हैं और परमात्मा क्या कहता है, वह छपवाओं जाकें। मैंने कहा, बाबा उसको छपवाने में कोई दिक्कत नहीं है, में छपवा दूंगा, मुझे यहां रहने की इच्छा है। और कुछ दिन मुझे यहां रहने दीजिये। बाबा ने कहा, नहीं, नहीं जाओ। उन पुस्तकों को बाँटना है हमको। मैने कहा, बाबा, उस पुस्तक को कम बाँटना है क्योंकि लोग कहते हैं, झगड़ा होता है। बाबा ने कहा, कौन कहता है, उसका नाम बताओ। मैं नाम कैसे बताऊँ? मैं कोशिश कर रहा था कि मुझे ना भेजें। बाबा कह रहे हैं, तुम जाओ। आखिर बाबा के आगे मुझे मानना ही पड़ा, मैं चला गया। रास्ते में, स्टेशन में सारा समय यह अन्दर खाता रहा कि मैंने यह क्या किया! यह जानते हुए कि बाबा जा रहा है, मेरे प्रियतम जा रहे हैं, मैं उनको छोड़कर आ गया ! धिक्कार है मुझे। मैं इतना भी कुछ नहीं कह सका, अपनी बात नहीं मनवा सका। जिद ही कर लेता कि बाबा अभी मैं नहीं जाता, रोने लग जाता, कुछ कर लेता । मुझे आना नहीं चाहिए था। स्टेशन पर बार-बार संकल्प आ रहा था कि टिकट कैन्सल कराऊँ, वापिस ऊपर जाऊँ, टिकट कैन्सल कराऊँ, ऊपर जाऊँ, दिल्ली नहीं जाऊँ। लेकिन जाना ही था क्योंकि बाबा की आज्ञा थी। गाड़ी आ गयी, मैं चला आया।
आप में से कोई ने दिल्ली कमला नगर का सेन्टर देखा होगा। एक तरफ मेरा कमरा था, दूसरी तरफ़ गुलज़ार दादी का कमरा था और बीच में और एक कमरा था जहाँ टेलीफोन रखा रहता था। उसकी तार लंबी लगायी हई थी। उनको चाहिए तो वे अपने कमरे में कर लेते थे और मुझे चाहिए तो में उसको अपने कमरे में कर लेता था। उस रात को जब हम सोने लगे, टेलिफोन मैंने अपने कमरे में लाकर रख दिया। रात को फोन आया। मैंने नहीं उठाया। मुझे पता था कि यह वही फोन है। बहुत समय तक घंटी बजती रही लेकिन मैंने नहीं उठाया। गुलज़ार बहन सोचने लगी कि यह फोन क्यों नहीं उठा रहा है। वह भागती हुई आयी अपने कमरे से, आकर फोन उठाया। वह दादी जी का टेलिफोन था। दादी जी ने बाबा के अव्यक्त होने का समाचार दिया, फिर गुलज़ार बहन ने टेलिफोन मुझे दिया। दादी जी ने मेरे से बात की और सुबह हम वहां से निकले मधुबन के लिए।
बाबा के साथ जब मैं बैठता था तो समाधि अवस्था में हो बैठता था। बाबा सारा समय कुटिया में ऐसे नहीं बैठते थे जैसे पत्र लिखता हुआ फोटो है जिसमें तकिये के सहारे बैठे हैं। नहीं, हमेशा ऐसे नहीं बैठते थे। सीधा ही बैठते थे। उन दिनों में तो मधुबन में ज्यादा लोग नहीं होते थे, 30-40 ही होते थे। बात तो मेरे से ही ज्यादा करते थे। बाबा से मिलने के लिए मुझे काफी समय मिल जाता था। जब मैं उनके सामने बैठता था, आनन्द ही आनन्द । वो स्थिति होती थी, वो अनुभव होता था। इसलिए मधुबन से जाने का मन नहीं करता था। साकार बाबा के साथ के वे दिन बहुत निराले ही थे।
