यज्ञमाता जगदम्बा सरस्वती
(मम्मा)
आशीर्वचन
सारा संसार जिसे कामधेनु, आद्या, आदिशक्ति, सरस्वती और अन्य अगणित नामों से पुकारता है और एक झलक पाने के लिए वर्षों तप, जप, भक्ति और आराधना करता है, कितनी आश्चर्यचकित और आनन्दित करने वाली बात है कि वही सरस्वती माँ साक्षात् रूप में इस धरती पर चली तथा अपने कमल हस्तों से हज़ारों वत्सों को थपथपाया, दृष्टि द्वारा स्नेह और योग के प्रकम्पन दिये, ज्ञानयुक्त मधुर बोल से उनके आत्मन् को सींचा, शिशुवत् पाला-पोषा और सर्वशक्तियों का चुग्गा देकर आध्यात्मिक कर्म-क्षेत्र पर सफल होना सिखाया! उन हंसवाहिनी, विद्यादायिनी के सत्य किन्तु विचित्र जीवन-वृत्तान्त इस पुस्तक में समाहित हैं। ये अनुभव मोती उन ब्रह्मावत्सों के हैं जो साकार में उनकी गोद के सुता-सुत बने।
सृष्टि रंगमंच के सर्वोच्च पार्टधारी परमात्मा शिव और प्रजापिता ब्रह्मा के बाद जगदम्बा सरस्वती का पार्ट अपने तरीक़े से सर्व महान् है। वैदिक ऋचाओं में सरस्वती को 'शिवसहोदरा' कहा गया है। विद्या, ज्ञान, तप, सत्य, सेवा, त्याग आदि गुण उनके जीवन के हर चरित्र से झर-झर कर ही संसार में प्रचलित हुए हैं। वे ही आदि मानवी और आदि देवी हैं। भक्तिमार्ग में उन्हें पुस्तकधारिणी दिखाया गया है क्योंकि वे ही तो भाग्य की लकीर खींचने वाली भाग्यविधात्री तथा सर्व आध्यात्मिक शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। अनेकानेक लोग, विकारों से तपते हुए, भोगों में जलते हुए, बदलना चाहते हुए भी बदलने में स्वयं को असमर्थ समझते हुए, जब उनकी दृष्टि के दायरे में आ जाते थे तो चमत्कारिक रीति से परिवर्तित हो जाते थे और उनका आत्मन् बोल उठता था - "पवित्रता की ऐसी शीतलता ! निर्विकार जीवन का ऐसा आनन्द !! शुद्ध विचारों की ऐसी स्थिति !!! अहो ! हम धन्य हो गये। ओ माँ! हमें शरण में ले लो, हमारा सारा जीवन धन्य-धन्य कर दो।" वे ज्ञान, योग, धारणा, पवित्रता की साक्षात् देवी थीं। विपरीत परिस्थितियों में सदा अभय और पर्वत सम अडोल थीं। उनकी अभय अवस्था के यादगार के रूप में ही उन्हें सिंहवाहिनी दिखाया गया है। यज्ञ-दुर्ग की रक्षा करने वाली वे ही माँ दुर्गा थीं।
वे स्मृतिधर थीं, प्यारे बाबा के एक महावाक्य के अनेक राज़ खोल देने वाली राज़युक्त थीं। चातक पक्षी समान, ज्ञान-सागर की एक-एक ज्ञान-बूंद की अनुरागी थीं। ईश्वरीय ज्ञान-कक्षा में बच्चों के मुखमण्डल देखने के अलावा वे संसार के हर दृश्य से उपराम थीं। वे चलती-फिरती दिव्य परी थीं जिनका तन प्रकाश की रश्मियाँ प्रवाहित करता था और मन सदा अर्श निवासी प्यारे शिव बाबा की ही मधुर स्मृति में समाया रहता था। जादू की छड़ी की तरह, उनकी करुणा दृष्टि जिस पर पड़ जाती वह जन्म-जन्म की तपन, थकान और अज्ञान से मुक्ति पा जाता था। प्रेम और ममता की मूरत होते भी वे सदा न्यारी थीं। जब वे चलती थीं तो लगता था कि प्रकृति का कण-कण उनकी चरणरज लेने को आतुर है। रत्नागर के सर्व गुण-रत्नों से सजी हुई वह प्रथम नारी रत्न थीं, त्रिलोकज्ञ प्रभु का 'वन्दे मातरम्' का नारा उन्हीं के प्रति अभिनन्दन था। वे ही आदि योगिनी, आदि तपस्विनी थीं, अविनाशी खण्ड भारत की शान थीं, प्रभु की पहचान थीं, दिव्य गुणों की खान थीं। विश्व के लिए प्यार, दुलार, ममता और रक्षा की छाँव थीं, भवसागर पार कराने वाली दिव्य नाव थीं, हर ज्ञान- सुत और ज्ञान-सुता के लिए मंज़िल और ठाँव थीं। जिसने उनको देखा, सब कुछ देखा, उनको मातृ रूप में पाया तो मानो सब कुछ पाया। वन- वन की काठी में चन्दन सम खुशबू भरने वाली, योगाग्नि में तपाकर संस्कारों को उज्ज्वल करने वाली, ज्ञान-लोरी सुनाकर दिव्य पोषण करने वाली वे प्रथम शीतला माँ, ज्वाला माँ, अन्नपूर्णा माँ और सन्तोषी माँ थीं।
उनके योग-प्रकाश में देहाभिमान की कालिमा मिट जाती थी। उन्हें देखते ही आध्यात्मिक चेतना जाग उठती थी। कितनी महिमा करें, कितना वर्णन करें ? जैसे परमात्मा की महिमा में कहा गया है- 'सात समन्द की मसि...।' इसी प्रकार, परमात्मा की प्रथम रचना माँ सरस्वती की महिमा गाने में भक्तिमार्ग के कवियों की लेखनी अशक्त और ज्ञानमार्ग में सम्मुख मिलन का सौभाग्य पाने वाले बच्चों की वाक् शक्ति असमर्थ ही रही है। ऐसी माँ के दिव्य चरित्रों से जुड़े निजी अनुभव-पुष्पों को लेखनीबद्ध कर, हम सबको उनकी खुशबू लेने, रंगत देखने, उनसे परमानन्दित होने का सौभाग्य जिन्होंने प्राप्त कराया है वे सभी भाई-बहनें धन्यवाद के पात्र हैं। आशा है माँ सरस्वती की साकार झलक देने में, अनुभव-सागर के ये मोती सक्षम होंगे। नम्र अनुरोध के साथ हमारा दृढ़ विश्वास है कि प्रस्तुत पुस्तक को पढ़कर बहनें तथा भाई, माँ समान आत्मनिष्ठ और एकनिष्ठ बनने की ओर दृढ़ता से क़दम बढ़ायेंगे और पुस्तक की रचना का प्रयास पूर्णतः सार्थक होगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
- ब्रह्माकुमारी प्रकाशमणि
##दो शब्द
सर्वश्रेष्ठ विद्या की देवी माँ सरस्वती
विद्या के बिना मानव जीवन निस्सार है। मानव के सम्पूर्ण विकास में विद्या की अति महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विद्या, मानव की बौद्धिक शक्ति को अनुशासित करती है तथा उसे चरित्रवान और जगत-उपयोगी बनाती है। विद्या के बल से वह स्वार्थों से ऊपर उठ कर प्रकृति और मानव जाति से प्रेम करना सीखता है।
भौतिक विद्या, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में मिल जाती है परन्तु तत्व ज्ञान या सत्य आध्यात्मिक ज्ञान रूपी विद्या के दाता परमपिता परमात्मा हैं। ब्रह्मा के साकारी तन का आधार लेकर जब वे अवतरित हुए तो विद्या की देवी माँ सरस्वती ने उन्हें यथार्थ रूप में, तुरन्त पहचान लिया और सम्पूर्ण ज्ञान को धारण कर जीवन को दिव्यगुण सम्पन्न बना लिया। इस प्रकार, विश्व की अलौकिक माँ का मानो धरती पर अवतार हुआ, संसार में रहते भी वे मानो देवी के रूप में प्रत्यक्ष हुईं।
परमात्मा को पहचानने के लिए दिव्यबुद्धि व दिव्यदृष्टि की आवश्यकता है, इसी प्रकार, संसार को पुनः सुसंस्कारित करने के लिए निमित्त साकार मात- पिता पिताश्री ब्रह्मा और उनकी मुखवंशावली बेटी सरस्वती को पहचानने के लिए भी दिव्यबुद्धि की आवश्यकता है। विश्व पिताश्री ब्रह्मा बाबा एवं विश्व मातेश्वरी सरस्वती माँ के साथ मानवात्माओं के अलौकिक सम्बन्धों तथा आदर्श मात-पिता के रूप में उनके अलौकिक चरित्रों का गायन केवल धर्मग्रंथों में ही मिलता है लेकिन वर्तमान संगमयुग में, पुनः, मात-पिता के रूप में वे समस्त विश्व को दिव्यता तथा अलौकिकता की राह में अग्रसर करने का दिव्य कर्त्तव्य कर रहे हैं। आदर्श अलौकिक विश्व परिवार की नींव के रूप में उनका यह कर्त्तव्य समस्त मानवता के लिए सर्वोच्च प्रेरणा है। इसी के लिए कहा गया है- Follow Father and Mother (अलोकिक मात-पिता का अनुसरण करो)।
इस धरा पर, सर्वश्रेष्ठ विद्या की देवी माँ सरस्वती जी के सान्निध्य से प्राप्त अनुभवों पर आधारित यह अमूल्य भेंट, भले देर से प्राप्त हुई है परन्तु एक अद्भुत, अमूल्य ख़ज़ाने के रूप में आपके सामने है। सर्वात्माओं की सच्ची,अलौकिक माँ की सत्य पहचान इसके शब्द-शब्द में गुँथी हुई है। सिद्धि स्वरूप बनाने वाली माँ के वरद जीवन पर आधारित यह अमूल्य कृति सर्व बहनों- भाइयों के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध होगी। माँ के द्वारा की गयी अमृत वर्षा, पाठकों के लिए 'अमर भव'’ का वरदान सिद्ध होगी।
जिन बहन-भाइयों को कल्प के इतिहास का वह सर्वमनोहारी दृश्य, जिसमें माँ सरस्वती ने साकारी भूमिका निभायी, देखने का पदम भाग्य नहीं मिला, वे इस अमूल्य भेंट से स्वयं को धन्य धन्य महसूस करेंगे और इसको तैयार करने वाली निमित्त आत्माओं को हृदय से दुआयें देते हुए आभार प्रकट करेंगे।
विश्व मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती के जीवन के एक-एक चरित्र पर एक- एक ग्रंथ रचा जा सकता है। आपके हाथों में उपलब्ध यह कृति तो सागर को गागर में समाने के समान है। इस प्रस्तुति के लिए परम आदरणीया दादी प्रकाशमणि तथा अन्य सर्व निमित्त महान् आत्माओं को कोटि-कोटि बधाइयाँ एवं धन्यवाद-
- ब्रह्माकुमार निर्वैर
भूमिका
यज्ञमाता जगदम्बा सरस्वती
"यज्ञमाता जगदम्बा सरस्वती" नामांकित यह पुस्तक आप भाई-बहनों क हाथों में रखते हुए हमें बहुत हर्ष हो रहा है। इस पुस्तक में महान् तपस्विनी, बालब्रह्मचारिणी, वीर विरागिनी, इच्छाओं के लेशमात्र से भी अविद्या स्थिति वाली, सर्वस्व त्यागी, निःस्वार्थ सेवाधारी और सर्वगुणों एवं सर्व मर्यादाओं से सुशोभित बारी-रत्न सरस्वती माँ की जीवन-कथा है। उन्होंने कुमारी कन्या होते हुए भी 350 ने अधिक यज्ञवत्सों तथा हजारों ब्रह्मावत्सों की ममतामयी माँ बन कर उनको बाला, पोषा और ज्ञान-योग से संवारा, दैवीगुणों से श्रृंगारा तथा योगी और योग्य बनाया।
जिन यज्ञवत्सों और ब्रह्मावत्सों ने उनकी पालना ली, उनके सम्बन्ध - सम्पर्क में आये, उन महान् सौभाग्यशालियों में से कुछ के अनुभवों को लिखित या मौखिक रूप में प्राप्त कर अथवा ज्ञानामृत मासिक से साभार प्राप्त कर इस पुस्तक का निर्माण किया गया है। कई दादियाँ और दादायें अभी हमारे साथ नहीं हैं, उनकी ध्वनिमुद्रित कैसेटों से भी कुछ विषयवस्तु तैयार की गयी है।
मम्मा के साथ का अनुभव सुनाते-सुनाते कई बहनें भाई अतीत में खो जाते थे, कई भाव-विभोर हो जाते थे तो उनके नयन-सरोवर से प्रेम के मोती टपकते थे। कई गद्गद हो उठते थे और उनका गला ही भर आता था। ऐसी बहनों को भी हमने देखा, जो माँ के साथ के अनुभव सुनाते-सुनाते उनकी अक्षियों से तीक्ष्ण एवं बलशाली चमक छलक पड़ी। हर भाई-बहन ने यही अनुभूति व्यक्त की, "मातेश्वरी सिर्फ मेरी है, उस माँ ने सब से ज़्यादा मुझे ही प्यार किया है, दुलार दिया है।" सच, ये बहनें-भाई पदमापदम भाग्यशाली हैं, जो इन्होंने उस पालनहार, आदिशक्ति, सर्वमंगले, मातेश्वरी को साक्षात् देखा है, जाना है, उनके वरद महावाक्यों को सम्मुख सुना है और उनकी गोद ली है! एक बार मधुबन के आँगन में भ्राता जगदीश चन्द्र जी, मधुबनवासी भाई-बहनों के साथ वार्तालाप करते हुए कह रहे थे, "यह कितने सौभाग्य की बात है कि अपने इस जीवनकाल में हमने जगदम्बा सरस्वती को साक्षात् देखा। लोग जिसकी पूजा करते हैं, कहते हैं कि यह विद्या की देवी है, वह विद्या की देवी कैसी थी, क्या उनमें विशेषायें थीं जिन्होंने उनके साथ जीवन व्यतीत करते हुए, उनके साथ रहते हुए यह सब देखा, उनके अनुभवों को सुनना भी एक बहुत लाभकारी विषय है, जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मातेश्वरी जी के साथ जीवन व्यतीत करने वाले और उनको सुनने का अनुभव करने वाले वरिष्ठ भाई-बहनों के अनुभवों को पढ़ने का सुनहरी मौका किसी को छोड़ना नहीं चाहिए। उन्होंने माँ सरस्वती की विशेषताओं को देखा, उनकी पालना ली, लोरी सुनी, मीठी-मीठी बातें सुनीं, दृष्टि से निहाल हुए, गोद में जाकर शीतलता प्राप्त की, प्यार और दुलार पाया तथा आगे बढ़े हैं। अनुभव जीवन का अति अनमोल खजाना होता है, ड्रामानुसार बहुत भाई- बहने मम्मा की साकार पालना से वंचित रहे इसलिए मम्मा का साथ पाने चाले अनुभवियों की बातों को तो बहुत ध्यान से सुनना चाहिए, पढ़ना चाहिए, इससे प्रगति होती है।"
भ्राता जगदीश जी के इन प्रेरक शब्दों के साथ-साथ इस पुस्तक को बनाने के लिए प्रेरणा स्रोत आदरणीया दादी जी, भ्राता निर्वैरजी तथा अन्य वरिष्ठ भाई- बहनों के प्रति हम सब भाई-बहनें अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं।
पुस्तक का आकार बड़ा होते देख, कुछ भाई-बहनों के अनुभवों के लेख इसमें शामिल नहीं किये गये हैं। इसके दूसरे भाग में उनको प्रकाशित करने का पूरा प्रयास किया जायेगा। इस पुस्तक को बनाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में सहयोगी सर्व भाई-बहनों के हम आभारी हैं।
इस पावन पुस्तक के मूलस्रोत परमपिता,परमप्रिय, परमवंद्य परमपावन, निराकार शिव परमात्मा और परममाता आकारी ब्रम्हा बाबा को कोटि-कोटि धन्यवाद है।
- ब्रह्माकुमार आत्म प्रकाश
प्रस्तावना
पहचान आदरणीया माँ सरस्वती की
प्रजापिता ब्रह्मा के पश्चात् जगदम्बा सरस्वती का स्थान तो अपनी रीति से सर्व महान् है। यज्ञ की स्थापना में उनकी शिरोमणि पवित्रता, घोर तपस्या, अटूट निश्चय इत्यादि की तो जितनी महिमा की जाये उतनी ही कम है। जिन्होंने उनके मुख-मंडल को देखा है, उनसे पूछिये कि वे कुदरत की क्या कमाल थीं! उनको देख कर तो महा अज्ञानी भी कह उठता था-
"माँ, ओ माँ! तेरी ठण्डी छाँ!
तेरी शीतल बाँ! तेरी हाँ में हाँ,
ओ माँ! तू ले जा चाहे जहाँ,
हमें दिखता आसमाँ,
भूल गया जहाँ ! माँ ओ माँ ! ..."
कैसी थी वो भीनी-भीनी मुस्कराहट जो शिव और ब्रह्मा ने ज्ञान-रंग से चित्रांकित की हो ! उस मुस्कराहट को देख कर तो रोना सदा के लिए बन्द हो जाता। वे निर्मल नैन जिनसे योग-तपस्या की प्रकाश-रश्मियाँ जिस पर पड़तीं, उसे भी योग के पंख पर बिठा कर फर्श से अर्श पर ले जातीं। उनका वह दिव्य व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वे एक अहिंसक सेना की सेनापति दिखायी देती थीं। उनकी चाल-ढाल ही ऐसी थी कि जिसमें 'योग' और 'राज' मिलकर उसे इतना भव्य, दिव्य, सुसभ्य बनाते थे कि बात मत पूछिये। जिस किसी को भी उनका स्पर्श मिला, उसने अनुभव किया कि उसकी इंद्रिय चंचलता शान्त हो चली। जिस समय किसी ने उनके कमरे में प्रवेश किया तो देखा कि वे समाधिस्थ हैं, तपस्यारत है अथवा हंस-माता के रूप में ज्ञान-रत्नों को धारण किये है। क्या जादू था उनकी तस्वीर में! क्या सुगन्धि थी उनके व्यवहार में! कैसी महक थी उनके कर्मों में! जिसने उन्हें परिचययुक्त दृष्टि से देखा, उसका तो जीवन ही सफल हो गया। अतः हम सभी का कैसा सौभाग्य है कि हम ब्रहमाकुमार या ब्रह्मा-वत्स भी हैं और सरस्वती-पुत्र अथवा सरस्वती पुत्री भी हैं। लोग जिस देवी को विद्यादायिनी के रूप में विद्या का वरदान पाने के लिए पुकारते हैं, स्वयं उन्हीं के पुनीत हाथों से हमने अमृत पीया, स्वयं उनकी मुख-वीणा से ज्ञान की स्वर्ग-सुखदायिनी झंकार सुनी। उनके वरद हाथों ने हमारे सिर पर प्यार बरसाया। उनकी ज्ञानमयी गोद के हम सुत हैं। हमारे इन नेत्रों ने सरस्वती को इस धरा पर खड़े, बैठे, चलते देखा। हमने यदि और कुछ भी न पाया, क्या यह कम बात है? संसारमें इससे अधिक सुन्दर दृश्य और कोई हो सकता है क्या ?
ज़मीन-आसमान सूक्ष्म-दिव्य नाद करते थे जब वे चलती थीं। चंदा भी देर से जाता था जब वह रात-रात भर शिव पिता को याद करती थीं। अरे, वे ही पार्वती थीं जिसने पर्वत पर तपस्या की शिव के लिए। गौरी वे ही तो थीं। हिमराज की वह पुत्री ज्ञान-गुण की दृष्टि से अपार सुन्दर थीं। जिसने उन्हें साक्षात् नहीं देखा, उसने क्या देखा? जिसे संसार आदिदेवी, अम्बे मैय्या, ईव, हव्वा इत्यादि नाम से याद करता है, उन्हें देखने का यही तो मौका था। हम उनके संग- संग रहे, उनके हाथों से पले, उनकी छत्रछाया में खेले। वे दिन कितने निराले थे ! वह हमारे सौभाग्य की कितनी सुन्दर घड़ी थी! उस जैसा रोमांचकारी अनुभव तो और कोई हो ही नहीं सकता। भारत और भारत की नारी की वह शान थीं! योगियों में वे सर्व महान् थीं। धर्म-दर्शन-मज़हब और ईमान थीं। वह दिव्यगुणों की खान थीं। वह मदर-ए-जहान (World Mother) थीं। वह न होतीं तो कुछ भी न होता। वही तो प्रजापिता ब्रह्मा के मुख द्वारा परमात्मा शिव का ईश्वरीय ज्ञान सुनकर सभी यज्ञ-वत्सों को समझाती थीं। वह तो उनके सामने ज्ञान एवं योग का नमूना थीं। सभी यज्ञ वत्सों को संभालने के लिए वही तो निमित्त थीं। उन्हें प्रजापिता ब्रह्मा के समकक्ष स्थान पर बैठकर प्रतिदिन ज्ञान- वीणा वादन का अधिकार था।
उन्हीं मातेश्वरी ने दुर्गा का रूप धारण करके यज्ञ दुर्ग की रक्षा का, विघ्नों का सामना किया। जनता और सरकार द्वारा आयी विपत्तियों को झेला। भिन्न- भिन्न संस्कारों वाले यज्ञ वत्सों को संस्कारों की भट्ठी में से उन्हीं ने ही उज्ज्वल किया और एक-एक को ज्ञान-लोरी सुनाकर, ज्ञान-पालना दी। वही तो प्रथम शीतला माँ, सन्तोषी माँ और अन्नपूर्णा थीं।
स्वयं प्रजापिता ब्रह्मा उन्हें माला के युग्म मणके में स्थान देते, उन्हें 'यज्ञ-माता' की उपाधि देते तथा आदरणीया मानते थे। उन्हीं को आगे रख कर वे उदाहरण देते थे कि सभी "पुरुषों" को चाहिए कि बहनों-माताओं को आगे रखें। बाबा स्वयं कई बार उन्हें रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाते।
मैं लगभग 50 देशों में गया हूँ, रूप लावण्य में अनेकानेक सुन्दर नारियाँ भी देखी होंगी क्योकि आँख बन्द करके यात्रा तो नहीं करता था। विद्वता, समाज सेवा, प्रशासन और वक्तृत्व में अग्रणी महिलाओं को भी देखा परन्तु माँ की दिव्यता, उनकी शालीनता, उनका सौन्दर्य स्वर्गिक था! उनका विवेक अद्वितीय था। वे मानवता से ऊपर उठकर पवित्र पुनीत हंस वर्ण की थीं। उन्हें देख कर कोई पातक हो, घातक हो, चातक हो, सभी कहेंगे- "माँ"।
वे पृथ्वी पर होते हुए भी पृथ्वी पर नहीं थीं। उनकी आध्यात्मिक चेतना, उनका योगप्रकाश ऐसा था कि देखने वाला भी शरीर को भूल कर आत्मनिष्ठ हो जाता था। आत्मनिष्ठ न भी हो तो भी उसमें आध्यात्मिक चेतना जाग उठती थी। कम-से-कम थोड़े समय के लिए तो उनके तमोगुणी और रजोगुणी संस्कार बन्द हो जाते थे और उनकी जगह सतोगुण का उदय होता था। ऐसी थी हमारी जगदम्बा सरस्वती माँ !
माँ, तुझे शत्-शत् प्रणाम !
माँ, ओ माँ तेरी शीतल छाँ,
तेरी वरदायिनी बाँ,
तेरी हाँ में हाँ हमें दिखता है आसमाँ।
ओ माँ !!!
- ब्रह्माकुमार जगदीश चन्द्र ।
देवी सरस्वती का सांस्कृतिक, पौराणिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण
भारतीय संस्कृति में देवी सरस्वती का स्थान अत्यन्त सम्माननीय और अग्रगण्य है। सुर-असुर, योगी-भोगी, प्रवृत्ति-निवृत्ति, राजा-प्रजा, सिद्ध-पुरुष, योद्धा-पुरुष - समस्त मानवकुल, देवी सरस्वती की अर्चना और आराधना करते हैं एवं उनसे सकल सिद्धि प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।
सरस्वती-वन्दना
प्राचीन काल के गुरुकुलों से लेकर वर्तमान समय के विद्यालयों तक विद्याध्ययन आरम्भ होने से पहले सरस्वती वन्दना की जाती है। प्रायः हरेक विद्यालय के प्रांगण में अथवा उसके केन्द्रस्थान में देवी सरस्वती की मूर्ति का प्रतिष्ठापन किया जाता है। भारतीय मनीषियों ने देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री माना है। वे यहाँ तक मानते हैं कि यह देवी, देवपद प्राप्त कराने वाली और सर्व अभिष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। अतः सरस्वती- वन्दना की जाती है:-
हंसारुढ़ा हरहसितहारेन्दुकुन्दावदाता
वाणी मन्दस्मिततरमुखी मौलिबद्धेन्दुलेखा ।
विद्यावीणामृतमयघटाक्षरसजा दीप्तहस्ता
श्वेताब्जस्था भवदभिमतप्राप्तये भारती स्यात् ॥
जो हंस पर सवार है, परमात्मा शिव की मुस्कान, मोती का हार, चन्द्रमा और कमल के समान उज्ज्वल वर्ण वाली है, जो वाणी स्वरूपा है, जिसका मुख मधुर मुस्कान से सुशोभित है और मस्तक चन्द्ररेखा से विभूषित है और जिनके हस्त - वीणा, अमृतकलश, ग्रंथ और अक्षमाला से श्रृंगारित हैं, जो श्वेत कमल पर आसीन है वो सरस्वती देवी आपको सर्व अभिष्ट सिद्धि प्राप्त कराने वाली है।
भारतीय धर्मशास्त्र भी कहते हैं कि बुद्धिदायिनी भगवती सरस्वती की कृपा से ही मूढ़ता का नाश होकर सद्बुद्धि, सद्विद्या, वाक्-विकास और सज्ञान की प्राप्ति होती है। विद्या-बुद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने वाले साधक इसतरह से देवी सरस्वती की स्तुति करते है :-
दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्म सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण ।
या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना
सा में वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ।।
जिनके हाथों में स्फटिक मणि की बनी हुई अक्षमाला, श्वेत कमल, शुक और ग्रंथ शोभित हैं, जो कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिक मणि के समान देदिप्यमान और रूपवान हैं वो वाग्देवी सरस्वती परम प्रसन्न होकर सदा मेरे मुख में निवास करें।
यह भी उनसे प्रार्थना की जाती है कि-
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।
अर्चिता मुनिभिः सर्वेक्रीर्षभिः स्तूयते सदा ।।
—-------------------------- ।
एवं ध्यात्वा सदा देर्वी वाञ्छितं लभते नरः ।॥
जो श्वेत कमल पर आसीन है, जिसके शरीर में श्वेत चन्दन का लेप होता है, मुनिगण जिनकी अर्चना करते हैं और सर्व ऋषिवर सदा जिसका गुणगान करते हैं वो सरस्वती देवी मुझ पर अति प्रसन्न हो ! देवी सरस्वती की वन्दना इस प्रकार से भी करते हैं कि-
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं कुर्यात् ॥
सरस्वती च तां नौमि वागधिष्ठातृत्वताम् ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ।।
शरद् ऋतु में उत्पन्न कमल के समान मुखमंडल वाली और सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली देवी शारदा सब सम्पत्तियों के साथ मेरे मुख में सदा वास करें। मैं उन वचन की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है।
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः ।
वेदवेदान्त वेदाङ्गविधास्थानेभ्य एव च ।।
सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥
ऐसी सरस्वती को नित्य नमस्कार है, भद्रकाली को नमस्कार है और वेद, वेदान्त, बेदांग तथा विद्याओं की जननी को प्रणाम है। हे महाभाग्यवती ज्ञानस्वरूपा कमल के समान विशालाक्षी ज्ञानदात्री सरस्वती, मुझे विद्या प्रदान करो, मैं तुम्हें नमन करता हूँ।
देवी सरस्वती का जन्म
'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, देवी सरस्वती का उद्भव श्री कृष्ण की जिह्वा (जीभ) के अग्रभाग से हुआ। इस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन करते हुए ज्ञान के सागर परमपिता परमात्मा निराकार शिव ने यह बताया है कि सतयुग में जो आत्मा श्री कृष्ण बनी थी वही आत्मा जन्म-पुनर्जन्म लेते-लेते कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि के वर्तमान पुरुषोत्तम कल्याणकारी संगमयुग में प्रजापिता ब्रह्मा बनती है। प्रजापिता ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। उनके मुखकमल अर्थात् जिह्वा द्वारा जो ईश्वरीय त्रिकाल-ज्ञान उच्चारित होता है उसे सुनकर जगदम्बा सरस्वती का उद्भव अर्थात् अलौकिक जन्म हुआ। ब्रह्मा की उन श्रेष्ठ रचनाओं में जगदम्बा सरस्वती सर्वश्रेष्ठ थी। इस बात को ही ऋषि-कवियों ने शास्त्रों में लिखा कि सरस्वती का जन्म श्री कृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ।
'देवी भागवत पुराण' में यह भी लिखा हुआ है कि श्री कृष्ण ने ही इस संसार में देवी सरस्वती की पूजा का प्रचार किया। इस प्रसंग में हम यह बताना चाहते हैं कि संगमयुग में परमात्मा का और उनके सहयोगी अनन्य बच्चों का हर कर्म अथवा चरित्र भक्तिमार्ग में यादगार अथवा चित्र बनता है। यह बात भी उसी एक चरित्र का एक चित्र है। इस यादगार के एक चरित्र को सुनाते हुए भ्राता जगदीशचन्द्र जी ने अपने अनुभव में लिखा है- "एक बार साकार बाबा ने कहा कि छोटी-छोटी, पतली-पतली कुछ लकड़ियाँ चुनकर ले चलो तो माता जगदम्बा को अर्पित करना और सभी मिलकर माँ की महिमा का गीत गाना। उन्होंने मुझसे कहा - "बच्चे, क्या तुम जगदम्बा की महिमा के गीत जानते हो और आरती कर सकते हो ?" मैंने कहा कि "कुछ तो याद है"। तब हमने ऐसा ही किया। हम काठियाँ चुन कर उनका गट्ठा बना कर ले गये। उस दिन माँ हमारे साथ घूमने नहीं गयी थीं। जब हम पाण्डव भवन पहुँचे तो माँ वहाँ बाबा की आगवानी के लिए खड़ी थीं, हमने वह गट्टा उनके चरणों के निकट रख कर, हाथ जोड़कर, अर्ध- खुले नेत्रों से और भावविभोर होकर उनकी आरती करना शुरू कर दिया। अचानक ही यह देखकर माँ मुस्करा रही थीं और कुछ हँस भी रही थीं...। अरे, बस बड़ा आनन्द आ गया! हमारी भक्ति पूरी हो गयी। हमने भक्ति को माँ सरस्वती को समर्पित कर दिया। वह ऐसा दृश्य था कि उसका तो न चित्रण हो सकता है, न वर्णन ! हमें न धरती भासित हो रही थी, न समय की सुधि थी। साक्षात् सरस्वती माँ को इन नैनों ने निहारा और इस मुख ने हृदय के भावों को व्यक्त किया। क्या समझ सकते हैं कि माँ ने कितना प्यार किया होगा!"
सरस्वती का निवास-स्थान
ऋग्वेद के अनुसार, वाक्-कला की ईश्वरी वाग्देवी का नाम सरस्वती है। वाग्देवी सरस्वती के वासस्थान तीन हैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग। उसमें यह भी कहा गया है कि पृथ्वी की वाग्देवी का नाम इला है, स्वर्ग की वाग्देवी का नाम भारती है और अन्तरिक्षवासी वाग्देवी का नाम सरस्वती है।
देवी सरस्वती का मूल स्वरूप
'देवी भागवत पुराण' में कहा गया है कि समस्त जगत् की कारणभूत आदिशक्ति परमेश्वरी है। उसकी अभिव्यक्ति इस सृष्टि पर तीन रूपों में होती है- महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी। उसमें यह भी कहा गया है कि पराशक्ति (आदिशक्ति) का परिशुद्ध और सतोगुणोंका अंश अथवा स्वरूप ही महासरस्वती हैं।
देवी सरस्वती के अनेक नाम और गायन
भारती, वागीश्वरी, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, शारदा, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी, महाविद्या, महावाणी, स्वरात्मिका इत्यादि इनके नाम हैं। वीणापाणि, विद्यादायिनी, विपुल मंगलदान शीले, बुद्धिधात्री, आकाशगामिनी आदि इनके गायन हैं।
देवी सरस्वती के गुण और शक्तियाँ
शास्त्रों में सरस्वती के बारे में वर्णन किया है कि वे समस्त संशयों का निवारण करने वाली हैं और बोध स्वरूपिणी हैं। इनकी आराधना से सर्व प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। देवी सरस्वती संगीत, कला, साहित्य की अधिष्ठात्री हैं। स्वर, लय, ताल, राग, छन्द, अलंकार आदि का प्रादुर्भाव देवी सरस्वती से ही हुआ है। सप्त प्रकार के स्वरों से इनका स्मरण किया जाता है इसलिए इनको 'स्वरात्मिका' भी कहा जाता है। ये सात प्रकार के स्वरों का ज्ञान प्रदान करती हैं इसलिए ये 'सरस्वती' कहलाती हैं।
देवी सरस्वती की कृपा
जिस पर इनकी कृपा होती है वह महाविद्वान बन जाता है, कवि बन जाता है, साहित्यकार बन जाता है, वाक्-कला प्रवीण बन जाता है। इससे सम्बन्धित अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक कथायें प्रचलित हैं। पुराणों में यह कहा गया है कि एक बार ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी से कहा, "बच्ची, तुम किसी योग्य पुरुष की जिह्वा पर कविता-शक्ति बन कर निवास करो।" तब सरस्वती जी ब्रह्मा जी की आज्ञानुसार योग्य व्यक्ति की खोज में चल पड़ीं। खोजते-खोजते उन्होंने एक नदी के तट पर तपस्या में लीन ऋषि वाल्मीकि को देखा और उन पर प्रसन्न होकर उनकी जिह्वा पर उपस्थित हुईं। तब महर्षि वाल्मीकि के मुख से ये शब्द निकलेः-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
—--------------------------।।
इसी तरह, महाकवि कालिदास की जीवन-कथा में भी इससे सम्बन्धित एक प्रसंग आता है। महाकवि कालिदास बनने से पहले वह एक गडरिया थे। जब उन्होंने काली माँ की आराधना की तो उन्होंने प्रत्यक्ष होकर कहा, "हे वत्स ! क्या वर चाहिए, माँगो।" उन्होंने कहा, "माँ मुझे विद्या-बुद्धि चाहिए।" काली माँ ने कहा, "धन, कनक, राज्य, वैभव, अधिकार नहीं चाहिए?" कालिदास ने कहा, "नहीं माँ, मुझे विद्या-बुद्धि ही चाहिए"। तब माँ काली ने उसकी जीभ पर "ॐ" अक्षर लिखा। तत्क्षण उसके मुख से ये शब्द निकले :-
माणिक्य वीणामुपलालयन्तीम् ।
मधालन्सां मंजुल वाग्विलासं ॥
इसके बाद, बुद्धिहीन गडरिया से वे बुद्धिवान महाकवि कालिदास बन गये। काली माँ, जो विद्यादेवी सरस्वती का ही अन्य रूप हैं, उनकी जिह्वा पर सन्निविष्ट हुईं। अतः कवियों, साहित्यकारों, वाक्-कला प्रवीणों, संगीतज्ञों को 'सरस्वती पुत्र', 'सरस्वती पुत्री' कहते हैं।
विश्व की कई पौराणिक और ऐतिहासिक गाथायें भी अनन्त शक्ति और कलाओं से सम्पन्न देवी सरस्वती की जीवन-कथा का वर्णन करती हैं। जैसे भारतवासी शान्ति और शीतलता के लिए शीतला देवी को, विद्या-बुद्धि- कुशलता के लिए सरस्वती देवी को, निर्भयता और पवित्रता के लिए दुर्गा तथा काली माँ को पूजते हैं। इसी प्रकार, ग्रीस के लोग देवी अथेना को उसकी बुद्धिमत्ता और कला के लिए पूजते थे। रोम के लोग चन्द्रलोक की देवी डायना को उसकी निर्भयता और पवित्रता के लिए पूजते थे।
इस प्रकार, देवी सरस्वती विश्ववन्द्य हैं, विश्व की सर्व सभ्यताओं में उनका गायन और वन्दन है। उनका महात्म्य अनन्त और अपरम्पार है।
आदिदेवी जगदम्बा सरस्वती का परिचय
ब्रह्माकुमार दादा आनन्द1 किशोर जी जगदम्बा सरस्वती का परिचय देते हुए कहते हैं:-
हमारे शरीरों को जन्म देने वाली लौकिक (शारीरिक) माता तो हरेक की अपनी-अपनी है और आत्मा की दृष्टि से हम सबके 'माता-पिता' एक निराकार (अशरीरी) पारलौकिक परमात्मा ज्योतिर्बिन्दु 'शिव' हैं, जो हमारे लौकिक मात-पिताओं के भी माता-पिता हैं। लौकिक और पारलौकिक माता (तथा पिता) का तो सबको पता है, यद्यपि आज मनुष्यों को उस पारलौकिक मात- पिता के नाम, स्वरूप, धाम, कर्त्तव्य इत्यादि के बारे में सत्य परिचय नहीं है। परन्तु सृष्टि-चक्र के 5000 वर्ष के कल्प में एक समय वह भी आता है जब हमें अपनी अलौकिक माँ मिलती है। यह अलौकिक माता हमें कल्प में केवल एक ही बार और थोड़े से समय के लिए मिलती है। इनका ही नाम जगदम्बा आदिदेवी माँ सरस्वती है।
जगत् माता
अब प्रश्न उठता है कि निराकार परमात्मा शिव तो अविनाशी होने के नाते हम सभी आत्माओं के पिता हैं, पर जगदम्बा जो कि शरीरधारी हैं, वह सारे जगत् की माता कैसे हैं? इसका सही उत्तर जानने के लिए जगदम्बा के अलौकिक कर्त्तव्य को समझना होगा। इस अलौकिक माँ का पूरा कर्त्तव्यवाचक नाम 'शिववंशी ब्रह्माकुमारी आदिदेवी जगदम्बा सरस्वती' है। माँ सरस्वती को 'ज्ञान की देवी' (Goddess of Knowledge) तो सभी मानते हैं। उनके हाथों में वीणा का अलंकार उनके ज्ञान-वीणा बजाने का ही प्रतीक है। परन्तु विचारणीय बात यह है कि जब ज्ञान का सागर एक परमपिता परमात्मा शिव ही है तो फिर माँ सरस्वती के पास ज्ञान कहाँ से और कैसे आया? अवश्य ही माँ ने भी तो परमात्मा शिव से ही इतना ज्ञान प्राप्त किया होगा जो वह ज्ञान-ज्ञानेश्वरी अथवा ज्ञान की देवी कहलायीं! सृष्टि-चक्र में जब घोर कलियुगी पतित सृष्टि के अन्त का समय आता है, जब पाप का घड़ा भर जाता है, तभी गीता के भगवान निराकार परमात्मा शिव मनुष्यों को पतित से पावन बना कर नयी सतयुगी सृष्टि की पुनःस्थापना करने के लिए प्रजापिता ब्रह्मा के साकार रथ (भागीरथ अर्थात् भाग्यशाली शरीर रूपी रथ) में प्रवेश करके अवतरित होते हैं। यह भी सब मानते हैं कि परमात्मा ने ब्रह्मा द्वारा नयी सृष्टि की स्थापना की थी। ब्रह्मा मुख से सन्मुख सत्य ईश्वरीय ज्ञान रूपी गीता को सुनकर धारण करने वाले ब्रह्मा मुखवंशावली सच्चे ब्राह्मणों (ब्रह्माकुमार एवं ब्रह्माकुमारियों) की, विकारों से युद्ध करने वाली अहिंसक शिवशक्ति सेना की सेनानी माँ सरस्वती ही बनती हैं। वही ज्ञान सागर, अमरनाथ परमात्मा शिव के ज्ञान को बुद्धि रूपी कलश में धारण करके अन्य ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियों सहित चैतन्य ज्ञान-गंगा बनकर मनुष्यात्माओं को उस ज्ञानामृत द्वारा पतित से पावन बनाने की अलौकिक सेवा करती हैं। इस रूहानी सेवा से ही यह कलियुगी भ्रष्टाचारी सृष्टि काँटों के जंगल से बदल कर सतयुगी श्रेष्ठाचारी दैवी फूलों का बगीचा बन जाती है। इसी अलौकिक कर्त्तव्य की यादगार में भारत की नदियों के नाम गंगा, जमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, ब्रह्मपुत्रा इत्यादि रखे हुए हैं। सरस्वती गुप्त नदी है। अतः प्रजापिता बह्मा और शिववंशी ब्रह्माकुमारी सरस्वती ईश्वरीय ज्ञान-योग के बल से नयी सतयुगी दुनिया (नये जगत्) की पुनः स्थापना करते हैं। इसीलिए उनको जगत् के अलौकिक पिता और माता (जगजननी जगदम्बा) कहा जाता है। उनका यह अलौकिक कर्त्तव्य कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि के संधिकाल अथवा 'संगम' के समय चलता है। इसीलिए सरस्वती को 'संगम' पर दिखाते हैं परन्तु आज इलाहाबाद में पानी की नदियों के 'संगम' को ही सच्चा समझ लिया गया है जो वास्तव में 'संगमयुग' का भक्तिमार्गीय यादगार-मात्र है। नयी सृष्टि के 'आदि' के समय कर्त्तव्य किये होने के कारण जगदम्बा को 'आदिदेवी' भी कहते हैं।
नवरात्रि और रात्रि जागरण
जगदम्बा एवं अन्य शिवशक्तियों का, परमात्मा शिव के आदेश पर कलियुगी पतित दुनिया से किनारा कर अन्य मनुष्यात्माओं को सतयुगी वैकुण्ठधाम में, भविष्य 21 जन्मों के लिए जीवनमुक्त देवपद की प्राप्ति करवाने की ईश्वरीय सेवा का कर्त्तव्य बहुत श्रेष्ठ है इसलिए परमात्मा शिव के कलियुगी अज्ञानान्धकार रूपी रात्रि को मिटाने के लिए अवतरित होने की याद में मनाये जाने वाले 'शिवरात्रि' त्योहार के साथ ही इन शिवशक्तियों का भी यादगार त्योहार नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाया जाता है। भक्तों का रात्रि जागरण (जगराते) करना भी इन देवियों द्वारा कलियुग के अन्त रूपी रात्रि में मनुष्यों को ज्ञान सुनाकर घोर अज्ञान की कुम्भकर्णीय निन्द्रा से जगाने के कर्त्तव्य का ही यादगार है। देश भर में अलौकिक माँ जगदम्बा के मन्दिर दुर्गा, अम्बा, काली, सरस्वती इत्यादि विभिन्न नामों से पाये जाते हैं। किन्तु आज भक्तजन न तो इन देवियों के बारे में कुछ जानते हैं और न ही उन्हें इनसे सम्बन्धित पर्वों के महत्त्व का पता है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि गायन-पूजन तो सतयुगी श्री राधे, श्री लक्ष्मी, त्रेतायुगी श्री सीता इत्यादि राज-राजेश्वरी देवियों का भी खूब होता है परन्तु जो मेले दुर्गा, अम्बे, काली, सरस्वती तथा अन्य 'संगमयुगी' ज्ञान-ज्ञानेश्वरी देवियों के लगते हैं और भक्तो की जो भीड़ वहाँ होती है ऐसी बात राज-राजेश्वरी देवियों के सम्बन्ध में नहीं है। 'संगमयुग' पर परमात्मा शिव से ज्ञानामृत को धारण करके अन्य आत्माओं में उसका वितरण करने के फलस्वरूप ही तो ये शक्तियाँ भविष्य सतयुग त्रेता में 'राज राजेश्वरी' बनती हैं। आप देखेंगे कि भक्त लोग राज राजेश्वरी श्री लक्ष्मी से तो केवल 'धन' ही माँगते हैं परन्तु 'जगदम्बा' से तो वे धन, आयु, भाग्य, सन्तान इत्यादि सभी कुछ माँगते रहते हैं। वास्तव में, माँ अम्बा ही इन सम्पूर्ण सुख-शान्ति के साधनों को स्थायी तौर पर प्राप्त करवाने वाली 'कामधेनु' हैं। परन्तु उनके द्वारा यह प्राप्ति उनके जड़ चित्रों के सामने गायन-पूजन करने से नहीं बल्कि 'संगमयुग' पर उनसे परमात्मा शिव का ज्ञान सुनकर धारण करने से ही होती है। इसीलिए तो कहते हैं कि 'ईश्वरीय ज्ञान के बिना गति नहीं' और माँ सरस्वती तो ज्ञान की देवी हैं। आज तो मनुष्यों को 'संगमयुगी' ज्ञान-ज्ञानेश्वरी और सतयुगी त्रेतायुगी राज-राजेश्वरी देवियों के कर्तव्य तथा काल की भिन्नता के बारे में रिंचक-मात्र भी ज्ञान नहीं है।
भक्त लोग जैसे परमात्मा शिव को अमरनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ इत्यादि अनेक कर्त्तव्यवाचक नामों से याद करते हैं, उसी रीति उन्होंने जगजननी माँ को भी अम्बा, दुर्गा, काली, शीतला, सरस्वती इत्यादि बहुत से नाम दिये हैं। माँ को दुर्गा इसलिए कहते हैं कि उन्होंने अपनी मनसा वाचा-कर्मणा को एक 'दुर्ग' अर्थात् किले की तरह इतना मज़बूत बना लिया था कि माया को उनके सामने आने की हिम्मत ही न होती थी। आसुरी मनुष्य उनके सामने जाते हुए लज्जा महसूस करते थे और झट नतमस्तक हो जाते थे। अबलाओं को बल देने वाले परमात्मा शिव से योगयुक्त होकर उन्होंने शेरनी शक्ति का रूप धारण किया था, इसीलिए उनकी शेर पर सवारी दिखाते हैं। माँ को काली का विकराल रूप इसलिए दे दिया गया है क्योंकि उन्होंने आसुरी वृत्ति वाले मनुष्यों से उनके विकारों की बलि ली थी। परन्तु आश्चर्य है भक्तों की बुद्धि पर! वे बजाय अपने विकारों की बलि देने के, बेजुबान बकरे की हिंसक बलि देकर अहिंसा की साक्षात् मूर्त माँ को प्रसन्न करने की व्यर्थ चेष्टा करते हैं। हिंसा करना तो पाप है।
माँ ने परमात्मा शिव का ज्ञान सुना कर रूहों को राहत दी थी इसलिए उनको शीतला, सरस्वती भी कहते हैं। वर्तमान समय अति धर्मग्लानि का है। देवी-देवताओं के काल और कर्त्तव्य के बारे में सत्य ज्ञान बहुत काल से प्रायः लुप्त हो चुका है। उनके बारे में अनेक भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं। कई पुस्तकों ने तो उन पर झूठे कलंक लगाकर भारत की प्राचीन स्वर्णिम सभ्यता का बेड़ा ही डुबो दिया है। सरस्वती जी ब्रह्मा की पुत्री थीं। वास्तव में वह उनकी 'धर्म की बेटी' थीं। सरस्वती जी की ज्ञान और दिव्यगुणों की धारणाओं से ब्रह्मा पिता अति प्रसन्न थे और उनकी योग्यता के अनुसार ब्रह्मा जी ने उन्हें ज्ञान-यज्ञ की संभाल करने के लिए 'यज्ञमाता' नियुक्त किया था। चूँकि, नयी सृष्टि की आदि, स्थापना अथवा नव-निर्माण ब्रह्मा और सरस्वती के द्वारा ही होता है, इस नाते से वे, सृष्टि-मंच पर बाद में आने वाली सभी मनुष्यात्माओं के पूर्वज ठहरते हैं। इसी कारण ईसाई, मुसलमान आदि धर्मों के लोग भी इन्हें एडम और ईव (Adam and Eve) या आदम और बीबी (हव्वा) इत्यादि नामों से सृष्टि के आदि में हुआ मानते हैं परन्तु उनको इनके काल और कर्त्तव्य के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं है। जब भारतवासी ही उन अलौकिक माता-पिता के बारे में भूल चुके हैं तो यहाँ बाद में आने वाले धर्मों के लोगों को क्या दोष दिया जा सकता है? अब चूँकि सृष्टि चक्र में पुनः कलियुग का अन्त होने का समय आ चुका है और इसके विनाश के लिए परमाणु-शस्त्र इत्यादि भी तैयार हो रहे हैं तो परमात्मा शिव ने भी प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा नयी सृष्टि की स्थापना के लिए भारत में अपना रुद्र-गीता ज्ञान यज्ञ, हूबहू कल्प (5000 वर्ष) पूर्व की भाँति रचा हुआ है। इस यज्ञ का ही दूसरा नाम प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय है। ब्रह्माकुमारी सरस्वती जी ने परमात्मा के इसी यज्ञ की 'यज्ञमाता' बन कर जगदम्बा का कर्तव्य निभाया और लुप्त हो गयीं। (सरस्वती गुप्त जो ठहरीं!) हम सभी ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ उस अलौकिक माताजी ही की मुख वंशावली ज्ञान-सन्तान हैं।
श्वेत वस्त्रधारिणी, श्वेत चन्दनधारिणी, श्वेत-श्वेतेश्वरी- माँ सरस्वती
पटना के ब्रह्माकुमार भगवती प्रसाद जी कहते हैं, जगदम्बा श्री सरस्वती की महिमा में भक्तों ने गाया है:-
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता।
या वीणा वर दण्ड मण्डितकरा, या श्वेत पद्मासना।
श्री सरस्वती कुन्द, इन्दु (चन्द्रमा) और तुषार जैसी श्वेत हैं। वे श्वेत वस्त्र धारण की हुई हैं तथा श्वेत पद्म (कमल) पर आसीन हैं। ज्ञान की देवी के साथ सभी श्वेत वस्तुओं की ही कल्पना की गयी है। इसका क्या आध्यात्मिक रहस्य है? क्या इसका अर्थ सामान्य श्वेत रंग से है? वस्तुतः श्वेत कोई रंग नहीं होता। श्वेत रंग सप्त रंगों का सम्मिश्रण है। जब सूर्य की रश्मियाँ एक प्रिज़्म से गुजरती हैं तो वे सप्त रंगों में विभक्त हो जाती हैं। चर्म चक्षुओं द्वारा परिलक्षित होने वाले ये ही मुख्य सात रंग हैं। जिस तरह सर्व रंगों का सम्मिश्रण श्वेत बन जाता है, उसी तरह सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति श्वेत कहा जाता है। लाल, पीला आदि रंग एक-एक गुण के प्रतीक हैं। ज्ञान की देवी श्री सरस्वती सर्वगुण सम्पन्न थीं। अतः पूर्ण श्वेत रूप में उनकी कल्पना की जाती है। हम जिन वस्तुओं का त्याग करते हैं वही बन जाते हैं। जो धन का त्याग करता है वही सच्चा धनी है। जो यश का त्याग करता है वही सच्चा यशी है। जो जीवन का त्याग करता है वही सच्चा जीव है। जीवन का अर्थ ही है जीव न। जो जीते जी मृत्यु का वरण करता है वही सच्चा वर्णनीय है और उसी का जीवन सच्चा जीवन है। यह कथन कपोल कल्पना मात्र नहीं है। प्रकृति के पदार्थ भी यही प्रमाणित करते हैं। क्या आप जानते हैं कि वस्तुयें लाल, पीली या अन्य रंग वाली क्यों दिखायी पड़ती हैं?
सूर्य की सप्तरंगी किरणों में से जिस रंग का वे वस्तुयें त्याग (प्रकीर्णन) करती हैं उसी रंग की दिखलायी पड़ती हैं। लाल वस्तुयें सात रंगों में से छः रंगों को तो स्वीकार कर लेती हैं लेकिन लाल रंग का त्याग करती हैं, उन्हें वापस लौटा देती हैं। परिणामस्वरूप वे लाल दिखलायी पड़ती हैं। यही बात पीले या अन्य रंग की वस्तुओं के लिए भी है। जो वस्तुयें सत्त रंगों को अवशोषित कर जाती हैं, कुछ भी त्याग नहीं करतीं, वे वस्तुयें काली दिखलायी पड़ती हैं। इसके विपरीत जो वस्तुयें सातों रंगों का त्याग कर देती हैं वे श्वेत दिखलायी पड़ती हैं। अतः श्वेत सर्व त्याग का परिचायक है। जो रंच मात्र भी त्याग नहीं करता उस मानव का हृदय काला है और जो सर्व त्याग करता है वह श्वेत है। ज्ञान-मूर्त, गुण-मूर्त, योग-मूर्त जगदम्बा श्री सरस्वती जी सर्वस्व त्यागी थीं। अतः उन्हें पूर्णरूपेण श्वेत दिखलाया जाता है।
मनुष्य अपनी भावनाओं के अनुरूप रंग पसन्द करता है। अचेतन रूप से हम वही रंग पसन्द करते हैं जो हमारे स्वभाव और संस्कार के अनुरूप होता है। निष्कपट हृदय वाला व्यक्ति स्वभावतः श्वेत रंग पसन्द करता है क्योंकि श्वेत निष्कपट होता है। वह गन्दगी को अपने में छिपाता नहीं वरन् प्रकट कर देता है जिससे उसकी सफाई हो सके। श्वेत वस्त्र की तरह श्वेत हृदय भी गन्दगी को छिपाता नहीं वरन् प्रकट कर देता है जिससे उसकी सफाई हो सके और वह सदा स्वच्छ बना रहे। समान संस्कार होने के कारण श्वेत वस्त्र और श्वेत हृदय में तादात्म्य स्थापित हो जाता है। सप्त रंगों का शोषण करने वाला काला वस्त्र गन्दगी को अपने में छिपा लेता है। अतः विमल हृदय उसे कभी भी पसन्द नहीं करेगा। अन्य रंगों के वस्त्र भी गन्दगी को अपने में पचाते हैं। अतः पावन श्री सरस्वती जी सदा श्वेत वस्त्रधारिणी हैं। वही क्यों, उनका वाहन हंस भी सांगोपांग श्वेत है। ब्रह्मा, सरस्वती तथा फ़रिश्तों को सदा श्वेत वस्त्रों में इसीलिए ही दिखलाते हैं। अतः मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती सर्वंश त्यागी थीं, सर्वगुण सम्पन्न थीं, पवित्रता की देवी थीं।
सरस्वती का जन्म और उनकी महिमाओं का आध्यात्मिक रहस्य
भ्राता जगदीश जी2 माँ सरस्वती के अलौकिक जन्म और कर्म का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए लिखते हैं:-
श्रीमद्भगवद् गीता में कहा गया है कि परमपिता परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम से, यज्ञ द्वारा सृष्टि रची। अनेक प्रकार के यज्ञों का उल्लेख करते हुए यह कहा गया है कि सब प्रकार के यज्ञों में से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। निस्संदेह श्रेष्ठ अर्थात् सतयुगी दैवी सृष्टि की रचना के लिए परमात्मा ने ज्ञान-यज्ञ की ही स्थापना की होगी। इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि परमात्मा ने ईश्वरीय विश्व विद्यालय की स्थापना की, परन्तु 'ज्ञान' शब्द के साथ 'यज्ञ' शब्द को इसलिए जोड़ा गया क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान सुनने वाले लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार की तथा तन-मन-धन आदि की ज्ञान-यज्ञ में आहुतियाँ देते हैं। यदि आहुतियाँ न दी जायें तो इसे यज्ञ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। यज्ञ वो है जिसमें कुछ-न-कुछ आहुति अवश्य दी जाती है। इसलिए 'ज्ञान-यज्ञ' शब्द 'विश्व विद्यालय' शब्द से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
सरस्वती का जन्म
यह कहा जाता है कि महाभारत में वर्णित द्रौपदी का जन्म भी यज्ञ से हुआ था। इसलिए द्रौपदी को यज्ञसैनी भी कहा जाता है। इसी प्रकार, विद्या की देवी सरस्वती का जन्म भी यज्ञ से हुआ माना जाता है। सोचने की बात है कि अग्निकुण्ड वाले यज्ञ से तो किसी मानवीय देहधारी का जन्म हो ही नहीं सकता क्योंकि अग्नि तो शरीर को जला देती है। ज्ञान रूपी अग्नि ऐसी अग्नि है जो शरीर को भस्म नहीं करती। इससे शरीर का लौकिक जन्म तो नहीं होता परन्तु इससे संस्कार और स्वभाव पवित्र हो जाते हैं और उनके शुद्धिकरण से नया मानवीय जीवन आरम्भ होता है। इसे मरजीवा जन्म कहा जाता है। इसे अलौकिक अथवा दूसरा जन्म भी कहा जाता है। ब्राह्मणों को भी द्विज इसलिए कहा जाता है (द्विज जिसका दूसरा जन्म होता है) क्योंकि ज्ञान द्वारा दूसरा जन्म होता है। इसी तरह ही जगदम्बा सरस्वती का भी जन्म हुआ। इसका भाव यह है कि परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ज्ञान-यज्ञ की स्थापना की। अतः वहाँ ज्ञान से उनको नया जन्म मिला। शारीरिक रूप से तो पहले ही से वे थीं परन्तु ज्ञान द्वारा इनका मन, वचन और कर्म निर्मल अथवा कमल समान बने। इसलिये चित्रकार उन्हें कमलपुष्प पर आसीन दिखाते हैं। परन्तु आज कोई भी विद्वान ये नहीं बता सकता कि ज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म कैसे हुआ और प्रजापिता ब्रह्मा से उनका क्या सम्बन्ध है। ज्ञान-यज्ञ की रचना करने वाले ब्रह्मा ही को यज्ञ-पिता कहा जाता है। जिन्होंने उस ज्ञान से नया जीवन बनाया, उन्हें ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ कहते हैं। इस दृष्टिकोण से सरस्वती भी ब्रह्मा की पुत्री ब्रह्माकुमारी ही थी।
मन-बुद्धि इत्यादि की बलि देने के कारण काली
ज्ञान-यज्ञ में ब्रह्माकुमारों और ब्रह्माकुमारियों ने विकारों की आहुतियाँ डाली थीं और यथाशक्ति अपना तन-मन-धन दिया था। उससे ही वो यज्ञ चलता रहा और उससे अन्य ब्रह्माकुमारियाँ और ब्रह्माकुमार प्रगट होते रहे। तब वे नये ब्रह्मा-वत्स भी अपनी आहुतियाँ डालते रहे। तन और धन की आहुति डालना तो फिर भी सहज होता है परन्तु मन की आहुति डालना अधिक कठिन होता है क्योंकि मन चंचल है। सरस्वती जी ने अपने मन की भी पूर्ण आहुति दी। उन्होंने अपना सर्वस्व प्रभु-अर्पण किया। मन और बुद्धि पूर्णतः परमात्मा को समर्पित कर दिये। इन दोनों की बलि के कारण वे काली कहलायी। इस पुरुषार्थ में वे ब्रह्मा-वत्सों में से अद्वितीय और अग्रगण्य थीं। इससे उनके मन-बुद्धि का सम्बन्ध पूर्णतः परमपिता परमात्मा से जुट गया और उनकी बुद्धि का मिलान परमपिता से मिल गया। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने परिपक्व अनुभवों के द्वारा सभी यज्ञ-वत्सों को मातृवत् ज्ञान की पालना दी। इसलिए वे यज्ञ-माता कहलायी।
सभी नर-नारियों के प्रति उनके हृदय में वात्सल्य भरा था। इसलिए उन्हें जगदम्बा कहा गया वरना स्थूल रूप में तो कोई भी सारे जगत् की अम्बा नहीं होती।
ॐ की ध्वनि करने वाली ॐ-राधे, ज्ञान-वीणा वादन करने वाली सरस्वती और ज्ञान-लोरी सुनाने वाली माता जगदम्बा
सरस्वती नाम पड़ने से पहले उनका नाम राधे था। जब ॐ-मण्डली नाम से ज्ञान-यज्ञ का प्रारम्भ हुआ तो वहाँ वे ॐ की ध्वनि किया करतीं। देह से न्यारा होकर वे ईश्वरीय स्मृति में ऐसे मग्न हो जाती जो उनकी रूहानियत भरी वाणी सुनने वाले देह से न्यारे होकर ईश्वरीय प्रेम में भाव विभोर हो जाते। उनमें से कुछेक को दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती और वे श्री कृष्ण का साक्षात्कार भी करते थे। तब लोगों ने उन्हें राधे की बजाय ॐ राधे का नाम दिया। उन दिनों जब कभी ब्रह्मा बाबा दूसरे नगर में चले जाते तो वहाँ से वे ज्ञान के पत्र लिखकर ॐ राधे के पास भेजते थे तब वे उन पत्रों को ही पढ़ कर ज्ञान सुनाया करती थीं। उनकी वे विस्तृत व्याख्या करती थीं। सुनने वालों को ऐसा लगता था कि वे ज्ञान की लोरी दे रही हैं अथवा ज्ञान-गीत सुना रही हैं और वे उन्हें 'माता' शब्द से सम्बोधित करने लगे या मम्मा कहने लगे।
हंगामा और मातेश्वरी द्वारा योग-तपस्या से सामना
सब श्रोता उनके द्वारा सुनाये ज्ञान से इतने प्रभावित होते थे कि उनकी मधुर वाणी सुनने वालों ने प्याज, लहसुन, मांस, मछली, अण्डे, शराब, सिगरेट, बीड़ी इत्यादि सब छोड़ दिये थे। इससे तब सिन्ध में काफ़ी हलचल हुई थी। यहाँ तक कि लोंगों ने एक बार पिकेटिंग भी कर दी थी परन्तु मातेश्वरी सरस्वती जी ने सभी वत्सों को ऐसा अनुशासित किया था कि पिकेटिंग करने वाले भी प्रभावित हुए और उन्होंने अपना धरना उठा लिया। कुछ विरोधी तत्वों ने न्यायालय में अभियोग चला दिया परन्तु वहाँ भी मातेश्वरी जी ने निर्भय, निश्चिन्त, निःस्वार्थ और निर्मल स्थिति के द्वारा सबका सामना किया। उस दौर में विश्व के इतिहास में उनके जैसी कम आयु वाली कोई और कन्या नहीं होगी जिसने इस प्रकार की विषम परिस्थतियों का सामना किया होगा। परमपिता परमात्मा द्वारा दिये गये ज्ञान में अनेकानेक नवीनतायें होने के कारण जगह-जगह स्वार्थी तत्वों ने उनका घोर विरोध किया परन्तु मातेश्वरी सरस्वती सदा निश्चिन्त, निर्भय और नम्रचित्त बनी रहीं। जिस किसी विरोधी ने उन्हें देख लिया या उनसे थोड़ी बातचीत की वे उनके प्रशंसक बन कर रह गये। इस प्रकार, मातेश्वरी जी की स्थिति संसार के आकर्षणों से ऊँचा उठ कर शिव परमात्मा के आकर्षण-क्षेत्र में रहती थी। भले ही उनका तन इस संसार में था परन्तु बुद्धि शिव पिता से जुड़ी रहती थी। इसलिए उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली और रूहानी आकर्षण से भरा था। उनकी वाणी में मधुरता थी और बोल मन को शान्त करने वाले तथा मन में शक्ति संचारित करने वाले होते थे।
सदा निर्भय और निश्चिन्त
मातेश्वरी जी का तपोबल उच्च स्तरीय और विशुद्ध था। जब कभी उनके पास जाना होता था तो ऐसा महसूस होता था कि वे योग की शक्तिशाली स्टेज में स्थित हो कर पवित्रता एवं दिव्यता की किरणें विकिरण कर रही हों। उनके नयन स्थिर, चेहरे पर मुस्कराहट और मुखमंडल दिव्य आभा को लिये हुए होता था। वे केवल ज्ञान द्वारा ही जन-जन की सेवा नहीं करती थीं बल्कि अपने तपोबल और अपनी स्थिति से आत्माओं में बल भरती थीं और अपनी शीतलता से आत्माओं को शीतल कर देती थीं। उनके जीवन में अनेक घटनायें ऐसी हुईं जो भयावह एवं विकराल रूप धारण किये हुए थीं परन्तु वे इस विविधता पूर्ण विश्व नाटक (Variety World Drama) में अटल निश्चय होने के कारण सदा निश्चिन्त रहती थीं। अन्यश्च, यदि बाबा ने उनको कोई ऐसा कार्य सौंप दिया जिसका उन्हें अनुभव न हो या वह बहुत कठिन हो, तब भी उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि मैं इसे कैसे करूँगी, मैं तो इससे अपरिचित हूँ, बल्कि उन्होंने सदा "जी बाबा" - ऐसा कह कर ज़िम्मेवारी को स्वीकार किया और उसे सम्पन्न करके दिखाया।
मातेश्वरी जी का लौकिक जीवन-परिचय
मम्मा का लौकिक नाम राधे था। उनके पिता का नाम पोकरदास और माता का नाम रोचा था। उनका जन्म सन् 1919 में अमृतसर में हुआ। उनकी एक बड़ी बहन थी जिसका नाम पार्वती था। उसकी शादी पहले ही हो चुकी थी और एक इनकी छोटी बहन थी जिसका नाम गोपी था। उनके पिता सोने- चांदी का व्यापार करते थे और देशी घी के थोक व्यापारी भी थे। उनका व्यापार मुंबई, मद्रास और सिलोन (श्रीलंका) में था। अचानक राधे के पिता की मृत्यु हो गयी। सोने-चांदी के व्यापार में और सट्टेबाजी में उनका इतना घाटा हो गया था कि वे एकदम खाली हाथ हो गये। इससे उनको हृदयाघात हो गया। फिर राधे अपनी माँ और छोटी बहन गोपी के साथ सिन्ध हैदराबाद अपनी नानी और मामा के घर आ गयी। वे अमृतसर से ही हैदराबाद (सिन्ध) गये थे।
विद्यार्थी जीवन में भी अद्वितीय लक्षण
इस प्रकार, मम्मा की लौकिक जीवन कहानी बताते हुए ब्रह्माकुमारी दादी शान्तामणि जी3 आगे बताती हैं कि हैदराबाद में दोनों बहनें स्कूल में दाखिल हो गयीं। राधे पढ़ाई में हमेशा नम्बर वन थी। गाने में नम्बर वन और डान्स करने में भी नम्बर वन थी। स्कूल में जब भी कोई स्पर्धा होती थी तो राधे को ही प्रथम पुरस्कार मिलता था। राधे का मशहूर गीत था "ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार..."। सफ़ेद फ्राक और सिर पर हैट (Hat) पहन कर राधे डान्स करती थी तो लोग दंग रह जाते थे। राधे की हॉबी (शौक) थी कि बाज़ार में जो भी नये बढ़िया कपड़े आयें सबसे पहले वही खरीदती थी, इतनी फैशनकी शौकीन थी ! फ्राक पर जो डिज़ाइन होती थी उसको राधे खुद अपनी बुद्धि से निकालती थी। वे अपनी बड़ी बहन पार्वती से कहती थी और पार्वती अपनी मामी रूपवंती से डिज़ाइन की फ्राक बनवाती थी। रोज़ राधे नयी-नयी डिज़ाइन वाली फ्राक पहन कर स्कूल जाती थी। राधे के बाल तो बहुत लम्बे थे, साथ में वह बहुत सुन्दर भी थी। राधे की छोटी बहन गोपी का रूप-रंग भी राधे जैसा ही था। स्कूल से उनके आते-जाते समय लोगों की नज़रें सहज ही उन पर पड़ती थीं और वे अवाक् रह जाते थे। राधे हैदराबाद (सिन्ध) के कुन्दनमल मॉडल स्कूल में पढ़ती थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पढ़ी।
जीवन-पथ में आशा-दीप
हमारी माँ और मम्मा की माँ सगी बहनें थीं। इनकी एक और बहन अर्थात् हमारी दूसरी मासी थी, उसका नाम ध्यानी था। उसके पति का भी देहान्त हो गया था। वह भी हैदराबाद अपने पियर घर अर्थात् मम्मा के घर आ गयी। इस प्रकार, उस घर में दो अपने पतियों को खोकर और तीन बहनें अपने बाप को खोकर बहुत दुःखी थीं। वे दो मातायें तो दुःख से बहुत रोया करती थीं और भगवान से प्रार्थना करती थीं। हमारी माँ भी उनके घर जाकर प्रार्थना में उनका साथ देती थी,जप साहेब, सुखमणि आदि पढ़कर सुनाती थी ताकि उनका दुःख कम हो जाये और उनके मन को शान्ति मिल जाये। हमारी माँ उनके पास आया-जाया करती थी तो इनको रोज़ बाबा की पत्नी जशोदा माता अपने घर की खिड़की से देखती थी। एक दिन रास्ते में जशोदा माता और हमारी माता की मुलाक़ात हो गयी। उसने हमारी माँ से पूछा, आप रोज़ कहाँ जाती हो? हमारी माता जी ने कहा, हमारी दोनों बहनों के पति गुज़र गये हैं, वे बहुत दुःखी हैं, हम सब मिलकर शान्ति के लिए सत्संग करते हैं। तब उन्होंने कहा, दादा अपने घर में बहुत अच्छा सत्संग करते हैं, पहले आप आओ, अनुभव करो और आपको अच्छा लगे तो उनको भी लेकर आना। उनके निमंत्रण पर हमारी माँ दूसरे दिन वहाँ गयी। बाबा हाथ में गीता उठाकर उसके श्लोक पर समझा रहे थे। गीता के दूसरे अध्याय में आत्मा के ऊपर ही सारा ज्ञान है जैसे कि आत्मा अमर, अविनाशी है, मरती नहीं है, आत्मा पुराना शरीर छोड़ नया शरीर लेती है इसलिए रोने की दरकार ही नहीं है, यह सब आत्मा का खेल है आदि-आदि। बाबा जब सत्संग शुरू करते थे तब भी ॐ की ध्वनि लगाते थे और पूरा करते थे तो भी ॐ की ध्वनि लगाते थे। ॐ की ध्वनि सुनते ही सबको शरीर से भिन्न होने का अनुभव होता था। इसी प्रकार हमारी माँ को भी यह अनुभव हुआ तो अगले दिन वह अपनी दोनों बहनों (राधे की माँ और ध्यानी माता) को लेकर बाबा के पास गयी। बाबा से आत्मा का पूरा ज्ञान सुनने के बाद और शरीर से भिन्न होने का अनुभव करने के बाद ये दुःखी मातायें बहुत खुश हो गयीं। सत्संग से घर लौटी हुई अपनी माँ और मासी के खिले हुए चेहरे देखकर राधे को बहुत आश्चर्य हुआ। राधे ने उनसे पूछा, "कल तो आप दोनों बहुत रोती थीं, आज तो चेहरे खुशनुमा हैं, खिले हुए हैं, वहाँ क्या मिला आपको?" तब उनकी माँ ने कहा, "हम दादा के पास गये थे, वे बहुत अच्छा गीता के ऊपर समझाते हैं, तुम स्कूल में तो गीता के बारे में पढ़ती ही होंगी, तुम भी चलो, सुनने के बाद हमें भी उसका अर्थ समझाना।" इस प्रकार, राधे को भी अगले दिन सत्संग में लेकर गयीं। जब राधे को बाबा ने देखा तब उसी पल बाबा को लगा कि यह मेरी वारिस बेटी है और राधे को भी उसी क्षण महसूस हुआ कि यह मेरा बहुत काल से बिछुड़ा हुआ वही पिता है। बाद में, बाबा जैसे लौकिक रीति से हालचाल पूछते थे वैसे राधे से पूछा, बेटी, तुम क्या करती हो, कैसी हो आदि-आदि।
जीवन का फैसला एक पल में !
उस समय राधे की आयु करीब 17 वर्ष थी। घर में राधे की शादी की बात चल रही थी। एक दिन बाबा ने राधे से पूछा, "राधे, तुमको पितांबरधारी से शादी करनी है या सूट-बूट वाले से? इस ज्ञान से स्वयं का कल्याण और विश्व का कल्याण करना है या शादी करके घर संभालना है? सोच-विचार करके मुझे बताना।" बाबा ने राधे को 24 घंटे का समय दिया था जवाब देने के लिए लेकिन राधे ने एक पल में ही भविष्य जीवन का फैसला ले लिया और उसी पल बाबा को उत्तर दिया, "बाबा, मैं गिरधर गोपाल की वही राधे हूँ, मैं इस ज्ञानमार्ग में चलकर विश्व का कल्याण करूँगी।" उसी दिन से लेकर बाबा राधे के ऊपर ज्ञान की वर्षा बरसाने लगे और ज्ञान का कलश भी रख दिया। राधे सत्संग में ॐ की ध्वनि बहुत अच्छी करती थी। आने वाले सब ॐ की ध्वनि से बहुत आकर्षित होते थे। इसके कारण सब उसको ॐ राधे कहने लगे। बाबा भी ॐ राधे कहने लगे। इस तरह, राधे का नाम 'ॐ राधे' हो गया।
ॐ राधे बहुत सुन्दर गाती थी। जब उसने 'ॐ मंडली में आकर क्या देखा और क्या पाया' यह गीत लिख कर गाया तो बाबा बहुत प्रभावित हुए। बाबा रोज़ उनको एक गीत लिख कर देते थे और ॐराधे उसे क्लास में गाकर सुनाती थी। जब ॐराधे गीत सुनाती थी तो सुनने वाले बहुत खुश होते थे और उनके दिल पर अमिट छाप लग जाती थी। धीरे-धीरे सत्संग बढ़ता गया। उसमें मातायें भी आती थीं तो कन्यायें भी आती थीं।
ॐ राधे सो श्री अनुराधे
इसके बीच में बाबा अपने लौकिक परिवार के साथ काश्मीर चले गये। काश्मीर जाने के बाद बाबा रोज़ ॐराधे के नाम से और अन्य बहनों के नाम से पत्र भेजा करते थे। जिनके नाम से पत्र आते थे वे बहनें उन पत्रों को सत्संग में सुनाती थीं। सत्संग में और वृद्धि होने लगी। एक दिन ॐराधे की छोटी बहन गोपी क्लास में बैठी थी। ॐ की ध्वनि लगाते ही वह ध्यान में चली गयी। उसको श्री कृष्ण का साक्षात्कार हो गया और वह उठकर डान्स करने लगी। सत्संग में यह पहला-पहला साक्षात्कार था। इसके बाद, सत्संग में आने वाले अन्य भाई-बहनों को भी साक्षात्कार होने लगे। जब बाबा काश्मीर से आये तो उनको देखते ही गोपी को श्री कृष्ण दिखने लगा। उसी समय ॐराधे उसको श्री राधा दिखायी पड़ने लगी। तब वह दोनों को पकड़ कर रास करने लगी। दिव्यदृष्टि की लीला अथवा पार्ट तब खुल गया। धीरे-धीरे वहाँ आने वाले सब ध्यान में जाने लगे, श्री कृष्ण, श्री राधा अथवा श्री नारायण, श्री लक्ष्मी को देखने लगे और उनके साथ रास करने लगे। तब बाबा के मुखारविन्द से निकली पवित्रता की बात। बाबा कहने लगे, "बच्चे, श्री कृष्ण की राजधानी वैकुण्ठ में जाना है तो तुमको पवित्र बनना पड़ेगा।" जो कन्यायें थीं उनको तो कोई समस्या न थी, जो गृहस्थी थीं और जिनके पति व्यापारार्थ विदेशों में गये थे वे आये तो घरों में (पति-पत्नी के) झगड़े होने लगे। पति कहने लगे कि हमें विकार रूपी विष चाहिए, पत्नी कहने लगी कि हम ने तो परमात्मा को वचन दिया है कि हम पवित्र रहेंगे, हम विष दे नहीं सकतीं। तो उनके पति सोचने लगे और आपस में बातें करने लगे कि आख़िर यह कौन जादूगर आया है जो सबको श्री कृष्ण का दर्शन कराता है और उनको पवित्र रहने के लिए कहता है! फिर विरोध प्रदर्शन, पिकेटिंग आदि शुरू हो गयी। लेकिन ॐराधे सत्संग संभालने का अपना कार्य निश्चिन्त और अचल होकर करती रही। यह है सन् 1936 की बात। कोई पूछता था तो बाबा कहते थे कि मैं तो कुछ नहीं करता। यह सत्संग तो उन कन्याओं-माताओं का है। सत्संग वो कराता है। ऊपर वाला आता है, बोल कर चला जाता है। ऊपर वाला जैसे कहेगा मैं भी वैसे करने वाला हूँ। मुझे तो कुछ भी नहीं पता। ऐसे कह कर सबको ॐराधे की तरफ़ भेज देते थे। हमेशा बाबा ॐराधे को आगे रखते थे।
गोपी का साक्षात्कार का पार्ट पूरे एक वर्ष तक चला। बाद में उसको टायफाइड हुआ, हैदराबाद में उसने शरीर छोड़ दिया। तब बाबा ने सत्संग में जो भी मातायें-कन्यायें आती थीं उन सबको श्मशान घाट पर भेजा था। सिन्ध के इतिहास में यह पहली घटना थी, नहीं तो श्मशान घाट पर स्त्रियाँ नहीं जाती थीं। शवयात्रा में इतनी सारी महिलाओं को देख लोग आश्चर्य खा रहे थे। अग्नि संस्कार का कार्य ॐराधे ने ही किया था।
ॐ राधे बनी मम्मा अर्थात् मातेश्वरी
मम्मा 17-18 साल की कन्या थी लेकिन सब उसको मम्मा, माँ कहते थे। बाबा भी कभी मम्मा कहते थे, कभी बेटी कहते थे, कभी मम्मा-बेटी दोनों कहते थे। इस प्रकार, ॐराधे मम्मा बन गयी। धीरे-धीरे उनके शरीर में भी, इस नाम के अनुसार, परिवर्तन आ गया।
इस के बारे में बाबा की लौकिक बेटी दादी निर्मलशान्ता जी कहती हैं, "बाबा ने ही मुझे मम्मा के पास रखा था। मम्मा ही मेरी संभाल करती थी। मैं छोटी होने के कारण, बाबा ने सोचा होगा कि इसको लौकिक माँ की याद न आये इसलिए मम्मा के पास रखा। बाबा ने मुझे एक बार कहा, तुम्हारी पालना ॐराधे करती है इसलिए यही तुम्हारी मम्मा है। तब से मैं ॐराधे को मम्मा कहने लगी। तब तक सब उनको ॐराधे ही कहते थे। मैंने ही सबसे पहले मम्मा नामसे पुकारना आरंभ किया। उसके बाद सब ॐराधे को मम्मा कहने लगे।”
दिन प्रतिदिन सत्संग में वृद्धि होती चली गयी, तो बाबा ने ॐराधे को इस सत्संग के लिए अवैतनिक संचालिका नियुक्त किया और उनके साथ आठ अन्य ज्ञाननिष्ठ माताओं और कन्याओं की एक कार्यकारिणी समिति बनाकर अपनी समस्त धन और सम्पत्ति माताओं की समिति को अर्पित कर दी।
मम्मा का पुरुषार्थ
मम्मा के व्यक्तिगत पुरुषार्थ के बारे में एक बात अति महत्त्वपूर्ण है कि मम्मा को एकान्तवास बहुत प्रिय लगता था। वह रोज़ 2 बजे उठकर बहुत प्यार से बाबा को एकान्त में याद करती थी। मम्मा की याद इतनी प्यार भरी रहती थी कि उनकी आँखों से प्रेम के मोती निकलते थे। मम्मा चाँदनी रातों में बैठकर रात भर तपस्या करती थी।
मम्मा और जशोदा माता
बाबा की लौकिक पत्नी जशोदा माता भी मम्मा को मम्मा कहती थी और मम्मा की गोद में जाती थी। इनके बीच में बहुत अच्छे और अति मधुर सम्बन्ध थे। क्योंकि जब जशोदा माता, मम्मा को देखती थी तो उनको श्री लक्ष्मी का साक्षात्कार होता था। उनका भी बाबा पर और बाबा के महावाक्यों पर दृढ़ निश्चय था।
हमने बाबा-मम्मा के साथ बहुत खेला, घूमा, बहुत आनन्द लिया है। कराची में मम्मा, बाबा और हम एक स्थान पर नहीं रहते थे। बाबा अलग और मैं और मम्मा एक अलग स्थान पर। बाबा अपने स्थान पर रहकर सलाह-सूचना देते थे और मम्मा हमें बताती थी। हम सभी मम्मा के साथ रहकर सभी कार्य करते थे। जब आबू (राजस्थान) आये तो सब मिलकर रहने लगे। उस समय हम बाबा के सम्पर्क में ज़्यादा रहे। आबू की बृजकोठी में मम्मा का तपस्या का पार्ट चला। वहाँ भी हमें दिव्य साक्षात्कार होते थे जिनसे बाबा हमें बहुत बहलाते थे।
बेगरी पार्ट में मम्मा-बाबा का जो पार्ट था वो आश्चर्यचकित करने वाला और अवर्णनीय है! उस समय मम्मा-बाबा दोनों, जब तक सभी बच्चे नहीं खाते थे, तब तक कुछ नहीं खाते थे। बाबा की उपस्थिति में मम्मा कोई राय नहीं देती थी। जैसे बाबा कहे, जो करने के लिए कहे, वही करती थी और कराती थी। अगर बाबा नहीं है, तो उनकी गैरहाजरी में मम्मा अपना फैसला सुनाती थी। इतना बेहद सम्मान देती थी बाबा को !
मैं और मम्मा
मम्मा का श्री लक्ष्मी का रूप मुझे बहुत प्यारा लगता था। लगता था कि श्री लक्ष्मी मेरी माँ है। मैं मम्मा को कभी इस नज़र से नहीं देखती थी कि वह मेरी मासी की लड़की है, मेरी बहन है। लेकिन उसको इस नज़र से देखती थी कि यह मेरी माँ है, जगदम्बा है। मम्मा तो गुणों की खान थी, उसमें सब गुण विद्यमान थे। मुझे मम्मा का गंभीरता का गुण बहुत अच्छा लगता था। गंभीरता के साथ सहनशीलता और धैर्य इन तीनों गुणों को मैं भी अपने जीवन में धारण करने का और व्यवहार में लाने का ध्यान रखती हूँ।
ब्राह्मण परिवार के लिए सन्देश
मम्मा की तरफ़ से सर्व ब्राह्मण कुल भूषणों के लिए मेरा यही सन्देश है कि मम्मा हमेशा कहा करती थी, "आलवेज़ सी गॉड फादर और फॉलो ब्रह्मा फादर (Always see God-Father and Follow Brahma Father)। तुम बच्चों को परफेक्ट (सम्पूर्ण) बनना है तो सदा शिव बाबा को ही याद करो, उसकी श्रीमत पर चलो और ब्रह्मा बाबा का अनुसरण करो। हुकमी हुकम चला रहा है। कभी शिव बाबा पर संशय में नहीं आओ। सम्पूर्ण निर्विकारी बनो।"
मम्मा मेरी सहपाठी भी, सखी भी और अलौकिक माँ भी
ब्रह्माकुमारी दादी प्रकाशमणि जी4 मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी के साथ जुड़े अपने अनुभवों को इस तरह कहती हैं मम्मा की प्रारम्भिक शिक्षा- दीक्षा मुंबई से प्रारम्भ हुई क्योंकि मम्मा के लौकिक पिता मुंबई में रहते थे। मम्मा ने पढ़ाई अंग्रेज़ी में पढ़ी थी। मम्मा गुजराती और गुरुमुखी भी लिखना-पढ़ना जानती थी। मम्मा के पिता का आकस्मिक निधन होने के कारण वह अपने परिवार वालों के साथ सिन्ध हैदराबाद आ गयी। मम्मा जब यहाँ आयी, उस समय के हिसाब से, हैदराबाद सिन्ध की लड़की इतनी मॉडर्न (आधुनिक) हो- यह एक मिसाल थी। उस समय सिन्ध की लड़कियाँ ऐसे मॉडर्न नहीं होती थीं। मम्मा गाने में बहुत होशियार थी। मम्मा की आवाज़ बहुत मीठी थी जैसे गायकों की होती है। मम्मा जितना गाने में प्रवीण थी, उतना ही डान्स में भी होशियार थी, उतना ही पढ़ाई में भी और स्कूल के अन्य सभी कार्य-कलापों में भी।
पहली-पहली मुलाक़ात
पहली बार मैंने मम्मा को स्कूल के एक फंक्शन (कार्यक्रम) में देखा था। उसी फंक्शन में मम्मा ने 'ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार...' गीत पर डान्स किया था। इस डान्स पर मम्मा को इतने सारे इनाम पर इनाम मिलते रहे कि मैं देखते-देखते ही दंग रह गयी। उस समय मम्मा की उम्र लगभग 16 वर्ष रही होगी। मुझे भी मैट्रिक की पढ़ाई हेतु कुन्दनमल मॉडल स्कूल (जहाँ मम्मा पढ़ती थी) में जाना पड़ा। यह अंग्रेज़ी माध्यम का स्कूल था। मैट्रिक में मैं मम्मा की सहपाठी बन गयी। हम दोनों एक ही बेंच पर बैठती थीं मगर हमारे में उतनी मित्रता नहीं थी क्योंकि मम्मा बहुत मॉडर्न थी और मैं बहुत सिम्पल थी। लेकिन सहपाठी होने के नाते आपस में एक तरह का आकर्षण और स्नेह ज़रूर था। उस समय मैं उनका लौकिक परिचय भी नहीं जानती थी।
गहरी स्मृति-शक्ति
फिर थोड़े दिनों के बाद दीपावली की छुट्टियाँ हुईं। छुट्टी होने के कारण एक दिन मैं बाबा के सत्संग में गयी। उस समय बाबा का सत्संग शुरू हुए करीब डेढ़- दो मास ही हुए होंगे। उन्हीं दिनों में मम्मा भी सत्संग में आयी। जब हम आपस में मिलीं तो हमने भी उनसे कहा कि यहाँ बहुत अच्छा सत्संग चलता है, आप भी रोज़ आओ, हम भी रोज़ आते हैं। इसके बाद मम्मा प्रतिदिन सत्संग में आने लगी। मम्मा शुरू से ही बहुत होशियार, दूरान्देशी तथा अच्छी स्मृति वाली थी। मम्मा की स्मरण-शक्ति इतनी तेज़ थी कि एक बार सुना और बुद्धि में छप गया। बाबा की एक प्वाइंट सुनी, वह छप गयी और उसके 10 राज निकाल देती थी और हम सबको ज्ञान की गहराई में ले जाती थी। राज़ में राज खोलती जाती थी। बाबा की एक प्वाइंट पर मम्मा एक घण्टे तक बोल सकती थी। इतनी ज्ञान की गहराई थी उनमें ! मम्मा ने अपने जीवन में एक बार भी नहीं कहा कि मैं इसको भूल गयी। हाँ, शायद आप ने मेरे से कहा था... हाँ याद आया मुझे कहा था... ऐसे कभी नहीं कहा। इतनी अगाध स्मरण शक्ति की स्वामिनी थी मातेश्वरी जगदम्बा !
ममता से पूर्ण भी और ममता से परे भी
मम्मा सचमुच सबको इतना प्यार देती थी कि सभी प्यार से ओतप्रोत हो जाते थे। वैसे तो यज्ञ में मम्मा मेरे साथ सखी रूप में रहती थी, चलती थी और व्यवहार करती थी। फिर भी सम्बन्ध में हम बिल्कुल माँ-बेटी जैसे ही रहती थीं। कहीं भी बाहर जाना हो तो मम्मा मुझे साथ लेकर जाती थी। सखी होते हुए भी मातेश्वरी मम्मा बनकर ही रही और हम बेटी बन कर ही रही।
मम्मा अत्यन्त दृढ़ शक्ति सम्पन्न थी। अगर वह किसी बात पर दृढ़ निश्चय कर ले तो उनको हिलाना किसी के वश का काम नहीं। जो बाबा ने कहा, उसी बात की दृढ़ता से मम्मा हमारे से सेवा कराती थी। जितनी दृढ़ता उतनी ही निश्चयबुद्धि भी थी। मम्मा का निश्चय देखने लायक होता था! मम्मा की एक्टिविटी (क्रिया-कलाप) से यह बिल्कुल सबको मालूम पड़ता था कि यह बनी-बनायी राधे है, यज्ञमाता है। मम्मा के हर क़दम से यह मालूम होता था कि यह वही मम्मा है, वही राधे है और वही लक्ष्मी है।
मम्मा बहुत निर्भय थी। मम्मा प्रैक्टिकल (प्रत्यक्ष) में शेरनी, शक्ति स्वरूपा थी। साथ-साथ मम्मा क्या अनासक्त थी, बात मत पूछो ! कोई देह-अभिमान नहीं परन्तु स्वमान का नशा इतना था कि और किसी में न हो सके। अपने पर पूरा विश्वास, बाबा पर पूरा विश्वास और बाबा के कार्य में पूरा विश्वास। बाबा ने कहा और मम्मा ने करना शुरू किया। एक बाबा ही संकल्प, श्वास सब में था। प्यार भी सबके साथ मम्मा का इतना था, इतना था कि बराबर मेरे दिल से ये शब्द निकलते हैं- "मम्मा तू ममता की मूर्ति है, निर्मानता की निधि है।" उनमें ममता थी परन्तु कोई मोह नहीं। सबको इतना प्यार करते हुए भी मम्मा उतना ही निर्मोही थी, ममतामयी भी और ममता से परे भी।
सम्मान से दीक्षा भी और शिक्षा भी
चाहे पाण्डव हों या शक्तियाँ हों मम्मा सभी के दिल की बात सुनतीं, समझातीं बाद में सुनाने वालों की ग़लती भी बतातीं। मम्मा के पास शिकायत आती भी थी तो मम्मा उसे स्वयं में समाकर सुधार करती थीं और दोनों पक्षों को सन्तुष्ट करती थीं।
मम्मा के पास आने पर हमेशा उनसे कुछ-न-कुछ विशेष शिक्षा ज़रूर मिली। वहाँ से उठने पर यह लगता था कि उनसे कोई प्रेरणा व शिक्षा लेकर जा रहे हैं और जो कहने आये थे उसको वहीं भूल कर जा रहे हैं। मम्मा इतनी सन्तुष्टता की मूरत थी कि जो मिला, जितना मिला उसमें ही बहुत खुश।
वाक्-कलादेवी वागीश्वरी
मम्मा की भाषण करने की कला भी बहुत बलशाली और तर्कसंगत होती थी। मम्मा को वाद-विवाद में भी कोई हरा नहीं सकता था। मम्मा के जवाब भी ऐसे होते थे जैसेकि अर्जुन के तीर जो सीधे निशाने पर ही लगते थे। एक बार कराची के जिलाधिकारी भ्राता जगतशेर जी ने, जो बिल्कुल हमारे बंगले के सामने वाले बंगले में रहा करते थे, मम्मा से एक-दो असंगत प्रश्न पूछे, तो मम्मा ने उसको ऐसे उत्तर दिये कि वह मम्मा के चरणों में गिर पड़ा।
अभयहस्ते निर्भयरूपा माँ दुर्गा
एक बार मम्मा के ऊपर वारंट (अधिपत्र) निकला था। मनोहर दादी और अन्य दादियों के नाम से भी वारंट निकले थे क्योंकि ये नाबालिग थीं। वारंट उनके निकले थे जो अवयस्क थीं अर्थात् 16 साल से कम उम्र वाली थीं और घर छोड़ कर यज्ञ में आयी थीं। उस समय मम्मा 18 वर्ष की थी। रोज़ किसी-न- किसी का वारंट आता था। इसलिए रोज सुबह उसके बारे में चर्चा चलती थी। ऐसे एक दिन सुबह-सुबह बाबा ने कहा, "ॐराधे आज तुम्हारे पर भी वारंट आयेगा, तो घर जाना पड़ेगा।" बाबा ने बिल्कुल हँसी के रूप में कहा था। मम्मा ने भी बोला, "बाबा मेरा कोई है नहीं जो मुझे वारंट भेजे। मेरी तो एक माँ है, वह तो मुझे जानती है कि मैं 18 साल की हूँ। मेरे ऊपर वारंट आ नहीं सकता।" बाबा ने कहा अच्छा, अच्छा। बात हँसी की थी, वह पूरी हो गयी। हम बैठी थीं, ठीक सुबह 10 बजे कोर्ट से वारंट आया राधे पोकरदास के नाम पर। वारंट पर लौकिक माँ की सही (हस्ताक्षर) भी थी। मम्मा को बुलाया गया। मम्मा ने वारंट देखा और उससे कहा, "यह झूठी सही है, मैं दावा करती हूँ कि मेरी माँ ऐसी सही कर ही नहीं सकती। मुझे साबित करो कि मेरी माँ ने ही सही की है। इसके अलावा मेरी जन्म तारीख यह है, मैं 18 वर्ष की हो चुकी हूँ,इसलिए यह वारंट मेरे पर लागू नहीं हो सकता। आप कैसे कह सकते हो कि मैं अवयस्क हूँ। बुलाओ मेरी माँ को, वह कहे कि उसने ही सही की है।" परन्तु वारंट तो लेना पड़ता था, ले लिया। बाद में मम्मा गयी कोर्ट में और जज के सामने कहा कि ये तारीख, महीना और साल मेरी जन्मतिथि है। मेरी माँ की सही यह नहीं है। आप उनसे पूछ सकते हैं। मेरी माँ आकर कहे कि मैं ने ही तुम्हारे लिए यह वारंट भिजवायी है तो मैं अभी जाने के लिए तैयार हूँ।" यह सुनकर कोर्ट में हाहाकार मच गया। फिर उनकी माँ से पूछा गया। वह बोली मुझे पता ही नहीं है। मेरे से किसी ने नहीं कहा, मैंने सही की ही नहीं। जज फीका पड़ गया। फिर कोर्ट से बाइज्जत कार में मम्मा को वापस भेजा गया। मम्मा ने कोर्ट में जज से कहा था, आप ऐसे ही महिलाओं को कोर्ट में बुलाते हो? मम्मा की वाणी में इतनी ताक़त और निडरता थी जो जज को चुप रहना पड़ा! मम्मा निर्भय थी,घबराती नहीं थी, अडिग थी, निश्चयबुद्धि थी, स्पष्ट जवाब देती थी। इस प्रकार मम्मा माँ दुर्गा थी।
मर्यादायुक्त तथा सभ्यतायुक्त
मम्मा, बाबा की इतनी इज्जत करती थी कि बाबा के प्रति किसी से भी ऐसे-वैसे साधारण शब्द भी नहीं सुन सकती थी। एक बार की बात है। हम बाबा के साथ खेलकर आयी थीं। तब मैं मम्मा से बोली, "मम्मा, हम ने आज बाबा को जीत लिया।" तो मम्मा कहती है, "चुप, ऐसा कहा जाता है क्या कि मैंने बाबा को जीत लिया?" फिर हम कहते थे, "हाँ मम्मा, सच मैं ने बाबा को जीता है।" तब मम्मा कहती थी, "भले, तुम जीते हो लेकिन ऐसे थोड़े ही कहा जाता है कि मैंने बाबा को जीता है? तुमने खेल को जीता है, बाबा को नहीं इसलिए ऐसे बोलो कि मैंने खेल जीता है।" मम्मा हर शब्द का यथार्थ अर्थ बताकर उसको ठीक रूप से इस्तेमाल करने के लिए कहती थी। मम्मा हर बात में मर्यादायुक्त, सभ्यतायुक्त रहती थी।
स्वीकार किया, पुरुषार्थ किया और हो भी गया
मम्मा के साथ रहकर हम ने उनसे शिष्टाचार सीखा है। इस तरह, ॐराधे हमारी माँ भी थी, सखी भी थी, प्यारी भी थी, मीठी भी थी और अम्बा भी थी। मीठी मम्मा के जितने ही गुण गायें उतने थोड़े हैं। जितनी मम्मा ज्ञानी तू आत्मा, योगी तू आत्मा थी उतनी ही शिवशक्ति माँ थी। मम्मा त्याग की भी और सर्व गुणों की भी मूरत थी। बाबा कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयन्ति, वो एक सेकण्ड का प्रैक्टिकल सबूत हमने मम्मा में पूरा देखा। मम्मा को बाबा ने देखा या बाबा को मम्मा ने देखा लेकिन बाबा ने कहा, "ओ राधे, तुम अनुराधे हो, जगदम्बा हो।" जबकि मम्मा सामने ही आयी थी और बाबा ने कहा, "ओ राधे, तुम ॐ राधे हो। हे ॐ राधे, तुम जगत अम्बा हो, सब की माँ हो। मम्मा के आने से ही बाबा ने उनकी सारी जन्मपत्री ऐसी सुनायी कि हम भी देखते रह गये। हमने भी प्रैक्टिकल में देखा कि मम्मा ने भी उसी निश्चय से उस बात को स्वीकार किया, पुरुषार्थ किया और उसी प्रकार बन गयी।
वीणावादिनी माँ सरस्वती ज्ञान की वीणा इतना मधुर सुनाती थी कि सुनने वालों का मन हर्षित होता था। ज्ञान की देवी सरस्वती की मुरली राजभरी और गहराई भरी होती थी। मम्मा निर्भय दुर्गा माँ थी, शक्ति माँ थी। मम्मा आने से ही सिद्ध हुई जो बाबा कहता है विजयमाला का मेरु दाना। आने से ही लगा मम्मा सर्वगुणों की खान है।
सर्वगुणों रूपी मालाओं से सुशोभिते
हम आदि से ही मम्मा के अंग-संग रही हूँ चाहे ॐ मंडली में, चाहे ॐ निवास में, चाहे कुँज भवन में। मम्मा में हम ने यह देखा है कि सामने कोई भी आये, किसी भाव से भी आये, मम्मा की दृष्टि पड़ते ही वह चरणों में झुक जाता था। हम तपस्या में, 14 वर्ष मम्मा के अंग-संग रहे। रोज़ अमृतवेले दो बजे बिस्तर छोड़ती थी और कुर्सी पर बैठ योग करती थी। यह मम्मा की नियमित चर्या थी। मम्मा हमें सब प्रकार की कर्मणा सेवा साथ में बैठकर सिखाती थी। चाहे अनाज़ साफ़ करते थे, चाहे सब्जी काटते थे, मम्मा सबसे पहले आकर बैठती थी और कैसे साफ़ करें और काटें- वो भी सिखाती थी।
निमन्त्रण पर यज्ञ से पहली बार मम्मा सेवा में कानपुर के लिए निकली थी। उस समय मैं दिल्ली में थी। बाबा ने मुझे तार भेजा कि मम्मा के साथ तुम भी कानपुर जाओ। इस तरह एक नहीं, मम्मा के साथ कई टूअर (सेवायात्रा) पर बाबा ने मुझे भेजा। कहते हैं कि गुणों की माला 36 गुणों की होती है। उन सब 36 गुणों में मम्मा नंबरवन थी।
वैसे देखें तो मम्मा से भी बड़ी बहनें थीं परन्तु उन सबके साथ मम्मा सखी बन कर रहती थी और माँ बन कर भी रहती थी।
माँ की याद दिलाते हैं मधुबन के अंगूर
बाबा के बगीचे में जो अंगूर का पौधा है उसका पहला-पहला फल 23 जून, 1965 को तैयार हो गया था। बाबा ने मम्मा को कहा, बच्चों को अंगूर खिलाओ। जून 24 सुबह मुरली क्लास के बाद 9 बजे का समय था, जो भी उस समय मधुबन में थे सबको दो-दो दाना अंगूर खिलाया था मम्मा ने। यह अंगूर यादगार है मम्मा का।
एक सवाल तो सभी के दिलों में आता है कि आखिर मम्मा कहाँ है? बाबा ने कहाँ छिपाकर रखा है? परन्तु इस सवाल का जवाब तो बाबा ही जाने। बाबा आपकी गत-मत आप ही जानें। इस बात को अभी तक बाबा ने गुप्त रखा है। कहीं तो है मम्मा।
मातेश्वरी नन्हीं सी बच्ची भी और जगदम्बा माँ भी
ब्रह्माकुमारी दादी जानकी जी5 कहती हैं, "मम्मा को हम पहले से ही जानती थीं लेकिन जैसे कुमारका दादी (दादी प्रकाशमणि) की उनके साथ फ्रेंडशिप (मित्रता) थी, वैसे नहीं थी। वे दोनों उम्र में मेरे से छोटी हैं। मम्मा बहुत एक्टिव (चुस्त) थी, वह हम लोगों से न्यारी थी परन्तु जब ॐ मंडली में पहली बार हम ने देखा तो बहुत आश्चर्य हुआ। वह सफ़ेद फ्राक पहने हुए थी। अन्य बहनों की भेंट में मम्मा बहुत चमकती हुई नज़र आती थी। ॐ मंडली में आते ही उनका परिवर्तन देख सब को अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी लगा। जब मैं कराची में आयी तो किसी ने मेरे से पूछा, तुम ने मम्मा को देखा है? मम्मा से मिली हो ? मैंने समझा कि बाबा की युगल जशोदा माता के लिए कहा होगा। मैंने कहा, मिल लूँगी लेकिन 2-3 दिन बाद पता पड़ा कि ये लोग मम्मा किसको कहते हैं।
मम्मा सुनकर नहीं, अपने में समाकर ज्ञान सुनाती थी
एक-दो साल में मम्मा में जो परिवर्तन आया वो बहुत विचित्र बात थी। मम्मा के नयन, मम्मा के चैन, मम्मा के बोल, मम्मा का व्यक्तित्व- यह सब अलौकिकता में परिवर्तित हो गये थे। जब मम्मा ज्ञान सुनाती थी तो लगता था कि यह सिर्फ बाबा का सुनाया हुआ ज्ञान नहीं सुना रही है बल्कि उसको अपने में समाकर सुना रही है। एक दिन मम्मा को कुँज भवन की छत पर देखा था। मम्मा के कमरे के पास आँगन था। जब भी मैं मम्मा को देखती थी तो वह या तो छत पर या आँगन में कुर्सी पर बैठ चांदनी में बाबा से योग लगाते हुए दिखायी पड़ती थी। मम्मा को तपस्या करते हुए देख मुझे बहुत प्रेरणा मिलती थी।
मम्मा जब मुरली चलाती थी तो हम लोग ऐसे तन्मय होकर सुनते थे कि मूर्तिवत् हो जाते थे। मुरली डेढ़ घण्टा चलती थी तो हम भी एकाग्रता से बैठ सुनते थे। मम्मा की मुरली इतनी प्यारी होती थी कि बात मत पूछो। पूरे यज्ञ में देखा जाय तो मम्मा बहुत कम बात करती थी। मम्मा का यह गुण मुझे बहुत अच्छा लगता था। उस समय मैं भी बहुत कम बात करती थी। अन्तर्मुखता की यह प्रेरणा मैंने मम्मा से प्राप्त की। दूसरों के साथ बहुत कम सम्बन्ध रखती थी। कभी-कभी दीदी के साथ थोड़ा-बहुत बात करती थी। बातों-बातों में मैंने दीदी से यह कहा था कि मैं मम्मा से डरती हूँ, इसीलिए नहीं कि मैंने कोई ग़लती की थी लेकिन ऐसे ही उनके पास जाने में थोड़ी झिझक होती थी। यह मम्मा को मालूम पड़ा। एक दिन मम्मा ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा क्या जनक तुम मेरे से डरती हो? मैं ने कहा, डरती नहीं हूँ लेकिन कभी बात नहीं करती हूँ ना इसीलिए ऐसा कहा था ! मम्मा ने कहा, अच्छा, चलो आज आपसे ज्ञान की रूहरूहान करेंगे। मम्मा हरेक के साथ इतना प्यार से और रिगार्ड से बात करती थी कि सबका मन भर आता था !
मम्मा बोलकर नहीं, खुद करके सिखाती थी
मम्मा कहती थी कि जो ग़लती एक बार कर दी वो दूसरी बारी नहीं होनी चाहिए। मैंने यह गाँठ बाँध ली कि मैं मेरा रिकार्ड ऐसा रखूँ जो दुबारा मम्मा से शिक्षा लेनी न पड़े। मम्मा कभी भी कोई कार्य बोल कर नहीं सिखाती थी, खुद करके सिखाती थी। एक बार हम सुबह 4 बजे नहीं उठे थे क्योंकि लौकिक जीवन में तो हम जल्दी उठते नहीं थे। ॐमंडली में आने के बाद ही सुबह जल्दी उठना सीख लिया था। मम्मा चार बजे आकर देखती थी, कोई नहीं उठा तो वे धीरे-धीरे सीढ़ी उतरकर किचन में चली जाती थी। किसी-न-किसी को पता पड़ जाता था तब वे कहते थे, मम्मा देख कर गयी। तो हम सब उठकर तैयार हो जाते थे और मम्मा के सामने जाकर खड़े हो जाते थे। तब मम्मा मुस्करा कर कहती थी, "देखा, आपके मंदिरों में भक्त उठकर घंटी बजा रहे हैं, आप देवता सोये पड़े हैं!" तब से लेकर आज तक मैं अमृतवेले नहीं सोयी हूँ।
मम्मा, भोजन को परमात्म-प्रसाद समझकर स्वीकार करती थी
भोजन क्या है, कैसा है- मम्मा यह कभी नहीं देखती थी। जो मिला उसी को प्यार से स्वीकार कर लेती थी। कभी यह नहीं कहा कि आज नमक कम है, ज़्यादा है, आज सब्जी अच्छी है, अच्छी नहीं है। खाने के समय मम्मा कभी इधर-उधर नहीं देखती थी। ऐसे चुपचाप बैठी, खाया और चली गयी। भोजन को प्रसाद के रूप में स्वीकार करती थी।
मम्मा के सामने बाबा कुछ भी बात कहे, कुछ भी सुनाये, मम्मा कभी क्यों, कैसे - यह नहीं सोचती थी। सदा 'जी बाबा', 'हाँ जी बाबा' कहती थी। इतना रिगार्ड था उनका बाबा के प्रति ! मैं जब पूना में थी तब मम्मा हमारे पास तीन बार आयी थी। बाबा के हर बोल पर मम्मा का अटूट विश्वास था। एक बार किसी ने मम्मा से पूछा, मम्मा, पहले बाबा कहते थे कि जहाँ जीत वहाँ जन्म। आजकल बाबा उसके बारे में कुछ बोलते नहीं, आपका क्या विचार है? तब मम्मा बोली, मेरा विचार कहाँ से आ गया ? जो बाबा ने कहा है वही हम सबका विचार है। मम्मा ने कभी अपनी बद्धि का अभिमान नहीं दिखाया।
मनजीत पद्ममनोधारी मम्मा
पूना में ही और एक बार मम्मा से किसी ने पूछा था, मम्मा आप मन को कैसे शान्त रखती हैं? तब मम्मा ने कहा, यह मन तो हमारी छोटी बेबी है, मैं उसको कह देती हूँ कि अभी तुम शान्त रहो, जब जरूरत पड़ेगी तब मैं तुमको बुला लूँगी, वह चुप बैठ जाता है। ऐसे मम्मा मनजीत थी ! यह कराची की बात है, मम्मा ऑफिस में बैठी थी तो मैंने जाकर पूछा, "मम्मा हम क्या पुरुषार्थ करें?" तब मम्मा ने कहा, "सदैव समझो यह मेरी अन्तिम घड़ी है।" वो दिन और आज का दिन मम्मा का वो मंत्र मुझे भूला नहीं है कि हर घड़ी अन्तिम घड़ी है और मुझे बाबा की याद में रहना है।
गुप्तगामिनी सरस्वती माँ
मम्मा ने कभी अपना शो (दिखावा) नहीं किया। वह कितनी सेवा करती थी लेकिन कभी अपने मुँह से कहा ही नहीं कि मैंने इतनी सेवा की। मम्मा डेढ़ मास सेवा करके बेंगलोर से पूना आयी थी। उन्होंने बहुत सेवा की थी परन्तु फिर भी नहीं सुनाया कि यह-यह सेवा करके आयी हूँ। जो भाई उनको लेने गया था उसी ने थोड़ा सुनाया था। तब हमने मम्मा से पूछा, तो उन्होंने कहा- सेवा अच्छी थी। इतना ही कहा, इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा। इस प्रकार, मम्मा अपने बारे में, किये हुए कार्य के बारे में कभी दूसरों को नहीं बताती थी। वे जितना त्यागी थी, उतना ही वैरागी थी और उतना ही तपस्वी थी। मम्मा को मैंने राधे के रूप में भी देखा, सरस्वती के रूप में भी देखा, काली के रूप में भी देखा और जगदम्बा के रूप में भी देखा।
शिक्षा देने की गज़ब की विधि
बाबा, सभा में अर्थात् क्लास में सभी के सामने ही समझानी देते थे। किसी को व्यक्तिगत रूप में शिक्षा देनी होती तो उनको बाबा पत्र लिख देते लेकिन मम्मा का समझाने का तरीक़ा अलग था। मम्मा उस वत्स के कानों में कह देती थी अथवा इशारा कर देती थी और बहुत प्यार से कहती थी। ऐसे नहीं कि किसी की सुनी-सुनायी बातों के आधार पर मम्मा उसको शिक्षा देती थी। मम्मा समय देकर, उसको प्यार से समझाती थी और गज़ब की बात यह होती थी कि मम्मा उस व्यक्ति को भी महसूस नहीं होने देती थी कि मम्मा मुझे किसी के कहने अनुसार शिक्षा दे रही है। मम्मा की शिक्षा को हरेक यज्ञवत्स अपनी माँ की ही शिक्षा समझकर लेता था। हरेक को लगता था कि मम्मा जो भी हमें कह रही है, हमारी भलाई के लिए। बाबा की शिक्षा बहुत शक्तिशाली होती थी, कारण कि उसको सुनने और समझने की शक्ति चाहिए। शक्तिशाली आत्मा ही बाबा की शिक्षा हजम कर पाती थी। इस कारण, आमतौर पर किसी बच्चे को समझाना हो तो बाबा सीधा उस बच्चे को नहीं बोलते थे लेकिन उस बच्चे के सामने ही मम्मा को कहते थे। तो वह बच्चा समझ लेता था कि मेरे कारण मम्मा को इतनी सारी बातें सुननी पड़ीं। फिर वही मम्मा से अपनी ग़लती क़बूल करता था और आगे के लिए ध्यान रखता था।
रीति-रिवाज़, सभ्यता-संस्कृति की जननी
मम्मा ने कभी बाबा को साधारण समझा ही नहीं। बाबा की हर बात को पूर्णतः सम्मान दिया और सम्मान देकर उसका पूरा परिपालन किया। कई बच्चे, बाबा की बात को बहुत साधारण रूप में लेते थे, तो मम्मा सब बच्चों को बिठाकर समझाती थी कि बाबा को साधारण समझने की कड़ी भूल कभी नहीं करना। बाबा का एक-एक बोल बहुत मूल्यवान है। ऐसे कह कर हमें सभ्यता और अनुशासन सिखाती थी। मम्मा का बोलने का तरीका बहुत सम्मान, प्यार और मिठास वाला होता था। हमें मम्मा ने रीति-रिवाज़, सभ्यता-संस्कृति सिखाकर लायक बनाया और एक माँ का पार्ट बजाया और हम बच्चों का गुणों से श्रृंगार कर बाप के सामने रखा।
मम्मा में कौन-सी विशेषतायें थीं जो बाबा ने उन्हीं को यज्ञमाता बनाया ?
मम्मा को मैंने जब से देखा तब से उनमें, श्री लक्ष्मी के सब लक्षण स्पष्ट रूप में दिखायी पड़ते थे। मम्मा सर्व दैवीगुणों से सम्पन्न थी। मम्मा को देह से न्यारी होने के अभ्यास पर बहुत ध्यान रहता था। अशरीरी बनने का जो अभ्यास मम्मा का था वो हम सब के सीखने लायक था। मम्मा के सामने कोई भी आता था कुछ बात करने के लिए, तो उसकी आवाज़ ही बन्द हो जाती थी अथवा ज़्यादा बोल नहीं पाता था।
प्यूरिटी की पर्सनालिटी, रॉयल्टी, त्याग, फ़र्ज़ अदाई में सदा नम्बर वन थी। इतनी छोटी आयु में इतना बड़ा परिवर्तन अपने में कर लेना - यह बहुत बड़ी विशेषता थी। मम्मा ने, बाबा की वफादार बेटी बन कर्त्तव्य निभाने का और हम सब यज्ञवत्सों की अलौकिक माँ बन कर फ़र्ज़ अदाई का दोनों पार्ट बजाये। मम्मा के मुख से जो वाक्य निकलते थे, राय सलाह निकलती थी, सुनने वालों के लिए वे सब वरदान बन गये। सबको अनुभव होता था कि इसमें मम्मा का कोई स्वार्थ नहीं, वो तो हमारी भलाई के लिए ही इतनी मेहनत कर रही है। मम्मा को, दादा-परदादा की आयु वाले भी माँ कहते थे, अपनी हित-चिन्तक समझते थे। एक आदर्श माँ का काम होता है बच्चों को गुणवान बनाना और सभ्यता सिखाना। यह फ़र्ज मम्मा ने पूरा निभाया।
मम्मा का रूहानी रूप
मम्मा रोज़ मुरली ज़रूर पढ़ती थी अथवा टेप द्वारा सुनती थी। भले ही रात के 11 बजे हों लेकिन कल की मुरली सुनकर ही मम्मा सोती थी। जितनी अपने कर्त्तव्य पर पक्की रही उतनी ही ईश्वरीय पढ़ाई पर भी पक्की रही। हॉस्पिटल में भी मम्मा रोज़ मुरली सुनती थी। हमने मम्मा को सदा अलर्ट और एक्यूरेट (Alert and Accurate) देखा है। हमने कभी भी मम्मा की आँखें थकी हुईं नहीं देखी हैं। सदा उनके नयन बाबा की याद में मगन देखे हैं। मम्मा में नम्रता इतनी थी कि जब बाबा कहते थे - मात-पिता का याद प्यार और नमस्ते, तब मम्मा अपने को माता नहीं समझती थी। ऊपर इशारा करते कहती थी कि उस मात-पिता का याद और प्यार है। मम्मा केवल ज़िम्मेवारी निभाने में, पालना देने में अपने को माता समझती थी। मम्मा ने माँ का पद स्वीकार नहीं किया परन्तु माँ का कर्त्तव्य स्वीकार कर उसको पूर्णरूपेण निभाया। बाबा के सामने वह एक छोटी, नन्हीं- सी बच्ची का रूप धारण कर लेती थी और यज्ञवत्स और भक्तों के सामने आदिदेवी जगदम्बा माँ का रूप धारण कर लेती थी। इतनी महान् थी हमारी माँ सरस्वती !
मातेश्वरी गुणों की खान थी, गुप्त तपस्विनी थी
ब्रह्माकुमारी दादी निर्मलशान्ता जी6 कहती हैं, "मम्मा बहुत गंभीर और शान्त थी। मम्मा मुरली भी चलाती थी तथा यज्ञ की सारी जिम्मेवारी भी निभाती थी। सब कार्य कराना, संभालना उनको ही करना पड़ता था, फिर भी उनके चेहरे, चलन और व्यवहार में कोई भी अन्तर नहीं आता था। वे एकदम शान्त, गंभीर, मधुर और एकरस रही। उदाहरणार्थ, जब यज्ञ में बेगरी पार्ट आया, कई बार खाने के लिए किसी को कुछ नहीं मिला तो कइयों के चेहरे फीके, निस्तेज होते थे लेकिन मम्मा को खाना मिले, न मिले, उनके चेहरे पर सदा मुस्कान, निश्चिन्तता, धैर्यता और बाबा पर अचल अटल विश्वास छलकता था। यहाँ तक कि यज्ञ में किसी का शरीर भी छूट जाता था तो भी मम्मा के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं दिखायी पड़ता था। जब मम्मा की लौकिक माँ का देहान्त हुआ, उस समय भी मम्मा ऐसी रही जैसे लौकिक रीति से वे उनकी कुछ भी नहीं हैं। एकदम शान्त, स्थिर और एकरस। कभी कुछ हो जाय तो मम्मा हमें थोड़ा भी डाँटे अथवा नाराज़ होवे, ऐसा कभी नहीं रहा। हमने तो अपनी इस ज़िन्दगी में मम्मा में नाराज़गी कभी देखी ही नहीं। सन्तरी बहन बाबा के साथ रहती थी और मैं मम्मा के साथ रहती थी। मैंने मम्मा को तो बहुत करीब से देखा है।
मम्मा का व्यक्तित्व
मम्मा एकदम रॉयल थी। वह कभी ज़ोर से नहीं हंसती थीं। सिर्फ मुस्कराती थीं। मम्मा में गुस्सा था ही नहीं। मम्मा कहती थी कि काम, क्रोध, अहंकार आदि नरक के द्वार हैं इसलिए तुम बच्चों को कभी गुस्सा नहीं करना है। अगर कोई गुस्सा करता था तो उस समय मम्मा हंसते-हंसते बोलती थी, देखो गुस्से को क्या कहते हैं, क्रोध कहते हैं ना! क्रोध को भूत कहा जाता है। क्रोध आया माना अपने अन्दर भूत प्रवेश हो गया। इसलिए कभी भूत नहीं बनना अर्थात् क्रोध नहीं करना। कुछ भी हो जाये लेकिन क्रोध नहीं करना।
कोई आवाज़ से बोलता था तो मम्मा उसको प्यार से समझाती थी, देखो तुम आश्रम में रहते हो, ऊँची आवाज़ से नहीं बोलना चाहिए, बहुत धीमे से बोलना चाहिए। शान्ति से बोलना चाहिए। बहुत कम बोलना चाहिए, मीठा बोलना चाहिए। यदि किसी ने कोई बड़ी ग़लती भी की हो तो भी उनको कहती थी, "इधर आओ, यह ठीक हुआ?" जो ग़लती करेगा भला वो कैसे कहेगा कि यह ठीक हुआ। तो मम्मा कहती थी, "आगे के लिए ध्यान रखो, दुबारा ऐसी ग़लती नहीं होने देना।" मम्मा कभी यह नहीं पूछती थी कि यह ग़लती क्यों हुई? जो हुआ सो हुआ लेकिन उसको प्यार से सुधारने की युक्ति और शक्ति प्रदान करती थी। इस प्रकार प्यार से, इशारे से उस व्यक्ति के हृदय का परिवर्तन कर देती थी।
मुझे साक्षात्कार तो नहीं होता था मगर मैं जब भी मम्मा को देखती थी तो मुझे लगता था कि यह लक्ष्मी ही बनेगी, यह सतयुग की महारानी है। मैं सेवा नहीं करती थी, शहजादी जैसे रहती थी। मम्मा मुझे मुस्कराते हुए कहती थी, जाओ बच्ची, उनको ज्ञान समझाओ। सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा। जाओ उनको बाबा का ज्ञान सुनाओ। इस प्रकार मम्मा ने मुझे ज्ञान समझाना सिखाया, सेवा करना सिखाया।
मम्मा ही क्यों यज्ञमाता बनी ?
मम्मा बहुत गुणवान थीं। वह गुप्त तपस्विनी थी। देखने में साधारण लगती थी लेकिन वह गुणों की खान थी। हमने तो जीवन में, मम्मा का मूड ऑफ होते कभी नहीं देखा। बाबा के हर वचन का पालन शीघ्र और सम्पूर्ण रूप से किया करती थी। मम्मा में पालना की शक्ति अद्भुत थी। मैं मम्मा को 'माँ', 'मम्मा' कहती थी और लौकिक माँ को 'जशोदा मैय्या' कहती थी। इतनी पालना की शक्ति और प्यार की शक्ति थी मम्मा में! मैं तो बचपन से ही बहुत लाड-प्यार से पली थी। मुझे अपने व्यक्तिगत काम ही करने नहीं आते थे। अपने बाल भी बनाने नहीं आते थे। मैं तो शहजादी जैसी थी, हर काम के लिए घर में नौकर रहते थे। लेकिन मम्मा ने मुझे हर कार्य करना सिखाया। गाड़ी चलाना, ज्ञान समझाना, बर्तन माँजना आदि-आदि। इसका आधार मम्मा की स्नेह-शक्ति और पालना- शक्ति थी। इन्हीं श्रेष्ठ संस्कारों ने, मीठे स्वभाव ने एवं दैवी गुणों ने मम्मा को यज्ञमाता बनाया। हम मम्मा-बाबा के तख्तनशीन कैसे बनें ? पहली बात है, कोई भी ग़लती न करो। काम, क्रोध... आदि का अंश मात्र भी न हो, देह- अभिमान न हो, निरन्तर अशरीरी स्थिति में रहो, दिल से बाबा को याद करो और सेवा करो। तब मम्मा-बाबा के तख्तनशीन बनेंगे।
मम्मा की तरफ़ से ब्राह्मण परिवार के लिए सन्देश
मम्मा की तरफ़ से ब्राह्मण परिवार के लिए मेरा यही सन्देश है कि मम्मा हमेशा कहती थी, क्रोध भूत है। बाबा के बच्चो, कुछ भी हो जाये परन्तु क्रोध नहीं करना। अगर कोई नुक़सान भी हो जाये तो उसको भी प्यार से समझाओ।
शक्तिस्वरूपा और सिद्धिस्वरूपा मातेश्वरी
ब्रह्माकुमारी दादी चन्द्रमणि जी7 अपना अनुभव सुनाती हैं, मैं कुँज भवन में मम्मा की असिस्टेंट (सहयोगी) थी। इसके कारण मुझे मम्मा के साथ का, संग रहने का, उनसे सीखने का बहुत अवसर मिला। मम्मा के हर गुण मुझे बहुत अच्छे लगते थे। मम्मा तो सच्ची योगिन थी। कभी व्यर्थ बातों में, व्यर्थ कार्यों में समय गँवाये - यह हमने मम्मा में कभी देखा ही नहीं। हर किसी के गुण देखना, अवगुण न देखना, न वर्णन करना, दूसरों को ज्ञान समझाना, शिक्षा देकर किसी का जीवन बनाना, कन्याओं को निडर और शक्ति-शेरनी बनाकर बाबा को समर्पित कराना- ये सब विशेषतायें मैंने मम्मा से सीखी। इस प्रकार, हरेक भाई-बहन के (छोटे हों या बड़े) गुणों से प्यार करना मैंने मम्मा से ही सीखा।
मम्मा की विशेषतायें
मम्मा की समझानी सदैव बेहद की होती थी। उनका भाव सदा अनादि और आदि का होता था। हर बात को, हर व्यक्ति को वे बेहद के रूप में देखती थीं। मैं समझती हूँ कि मम्मा में इतने सारे दैवी गुणों की धारणा का कारण यही बेहद की दृष्टि, वृत्ति और भावना थी। मम्मा निर्भय बहुत थी। वह कभी किसी से डरती नहीं थी, शक्ति स्वरूपा थी, सदा योगनिष्ठ थी। कर्मेन्द्रियाँ सदा उनके अधीन थीं। वे सबको मातृप्रेम की भासना देती थी। आयु में छोटी थी फिर भी उनसे बड़ी आयु वाले भी उनको मम्मा कहते थे। इतना ही क्यों उनकी लौकिक माँ भी, उनको मम्मा ही कहती थी। इसका कारण मैं यही समझती हूँ कि मम्मा ही भविष्य में श्री लक्ष्मी बनने वाली हैं। मम्मा के ॐमंडली में आते ही बाबा ने उनको पहचान लिया था।
अपने भविष्य लक्ष्य और लक्षण में लवलीन
कई बार हम मम्मा से पूछते थे, "मम्मा आप क्या सोच रही हैं, कहाँ हैं?" तब मम्मा बोलती थी, "मैं यहाँ नहीं चल रही हूँ, मैं वैकुण्ठ की धरनी पर चल रही हूँ।" कभी-कभी हमें सुनाती थी कि मुझे महारानी श्री लक्ष्मी के रूप में ये-ये अनुभव हुआ, महाराजकुमारी श्री राधा के रूप में ये-ये अनुभव हुआ। अपने भविष्य और बाबा के महावाक्यों पर मम्मा का निश्चय शत-प्रतिशत था। बाबा ने कहा, उन्होंने माना और वैसे चलकर दिखाया। मम्मा की हर बात शक्तिशाली होती थी- योग में, ज्ञान में, धारणा में और सेवा में। मम्मा में न किसी के प्रति आकर्षण हुआ और न किसी से नफ़रत की। मम्मा ने सबको अपना बनाया और वह सबकी बनकर रही। इस प्रकार मम्मा शक्ति थी, माँ थी और असाधारण सिद्धिस्वरूपा थी।
गान विशारदे, संगीत शारदे मातेश्वरी
ब्रह्माकुमारी दादी मनोहर इन्द्रा8 जी मम्मा के बारे में सुनाते हुए कहती हैं कि मेरा ऐसा सौभाग्य था कि बाबा का घर भी मेरे घर के पास था और मम्मा का घर भी मेरे घर के पास ही था। लौकिक में भी बाबा के घर में हमारा जाना-आना होता था। जब पहली बार मम्मा सत्संग में आयी तो उन्होंने बाबा को देखा और बाबा ने उनको देखा तो क्या अनुभव हुआ होगा? मम्मा को लगा कि यही मेरा सच्चा अलौकिक पिता है। बाबा को भी लगा कि यही मेरी वारिस बच्ची है, यही मेरे स्थूल और सूक्ष्म खज़ानों की मालिक बच्ची है। उस दिन से मम्मा ज्ञान में आगे बढ़ने लगी। मम्मा का रूप भी बदलने लगा, आचार-विचार बदलने लगे, वेष-भूषा भी बदल गयी। ज्ञान में गहराई तथा योग में रुचि बढ़ने लगी। मम्मा गीत गाने में बहुत होशियार थी। लौकिक में किसी में कोई कला होती है तो वो कला अलौकिक में आते ही वृद्धि को पाती है और वह उस व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। मम्मा हारमोनियम के साथ भी और सितार के ऊपर भी बहुत अच्छा गीत गाती थी। एक बार मम्मा ने खुद अपने अनुभव का एक गीत बनाया और गाया। इतना अच्छा गाया, इतना अच्छा गाया कि सुनने वाले बहुत खुश हुए। वो गीत मम्मा ने ही सिन्धी में लिखा था जिसका हिन्दी में अर्थ इस प्रकार है:-
"हे सखियो ! मैं आपको क्या बताऊँ और कैसे बताऊँ
कि ॐमंडली में जाकर मैंने क्या देखा !
सखियो, उस सुख का भी मैं कैसे वर्णन करूँ ?
वहाँ ॐ का जो अलौकिक आलाप हो रहा था,
वह ऐसे तीर की तरह मेरे मन में लगा कि मेरा मन शीतल हो गया
और मेरे गम के चिट्ठों का अन्त हो गया !"
उसके बाद बाबा रोज़ एक गीत बनाकर देते थे और मम्मा तर्ज निकाल कर सत्संग में गाया करती थी। गीता ज्ञान और मम्मा के गीत गाने की मधुरता से आकर्षित होकर दिन-प्रतिदिन सत्संग में आने वालों की संख्या बढ़ती गयी। उनमें मातायें और कन्यायें ज़्यादा संख्या में थीं। उसी समय दिव्यदृष्टि दाता बाबा ने दिव्यदृष्टि का भंडार भी खोल दिया। ॐ की ध्वनि सुनते ही कई मातायें और कन्यायें ध्यान में चली जाती थीं। वे ध्यान में अनेक प्रकार के दिव्य दृश्य देखती थीं। माताओं को स्वर्ग तथा श्री कृष्ण के साथ खेलपाल करने के साक्षात्कार होते थे। आँखें बन्द हैं मगर वह श्री कृष्ण को देख रही हैं। श्री कृष्ण जा रहा है और वो उसके पीछे-पीछे जा रही हैं। बाबा को पता लगा कि ये मातायें मेरे में श्री कृष्ण को देख रही हैं और मुझे पकड़ने आ रही हैं तो बाबा सीढ़ी चढ़कर ऊपर के कमरे में जाने लगे। ये मातायें अपनी आँखें बन्द होने पर भी बाबा के पीछे अर्थात् श्री कृष्ण के पीछे सीढ़ी चढ़कर जा रही थीं, दौड़ रही थीं। यह बात फैल गयी कि दादा लेखराज के सत्संग में श्री कृष्ण का साक्षात्कार होता है। बहुत-से लोग आने लगे और सत्संग बढ़ता गया। जैसे-जैसे सत्संग बड़ा होता गया वैसे-वैसे मम्मा की ज़िम्मेवारियाँ बढ़ती गयीं।
मम्मा का लौकिक नाम राधे था। वह सत्संग में ॐ की ध्वनि लगाती थी तो बाबा ने उनका नाम ॐराधे' रख दिया। जब कोई भी किसी माता अथवा कन्या से पूछता था कि तुम कहाँ जा रही हो? तो वे कहती थीं कि ॐराधे के पास। क्यों जा रही हो? तो कहती थीं कि वो हमें ॐ की ध्वनि लगाना सिखाती है और उसका अर्थ समझा कर उसमें एकाग्र होना सिखाती है इसीलिए हम लोग ॐराधे के पास जाते हैं।
अपना बंगला और सत्संग की सारी ज़िम्मेवारियों को ॐ राधे को सौंप कर बाबा अपने परिवार के साथ काश्मीर चले गये। मम्मा जब भी सत्संग में आती थी तो सत्संग करने के बाद वहाँ कुछ-न-कुछ सेवा करके अपने लौकिक घर चली जाती थी लेकिन ना कभी प्रसाद खाती थी, न भोजन करती थी। मम्मा सोचती थी कि इससे कर्म का हिसाब बनता है। हम सेवा नहीं करते अथवा कम करते हैं और यज्ञ का भोजन अथवा प्रसाद खाते हैं तो उसका बोझ हमारे ऊपर चढ़ता है। हमारा काम है सेवा करना, न कि सत्संग में आकर खाते-पीते रहना। जब यह बाबा को पता पड़ा कि मम्मा ॐ मंडली में कुछ खाती-पीती नहीं है, तो काश्मीर से बाबा ने मम्मा को पत्र लिखा, "बच्ची, तुम्हारा वहाँ रहना ही बहुत बड़ी सेवा है, तुम्हारे वहाँ रहने से बहुतों की सेवा होगी। तुमको वहीं रहना है और वहीं खाना-पीना है।" तब से बाबा की आज्ञा के अनुसार मम्मा ने वहाँ खाना-पीना शुरू किया। नहीं तो मम्मा सुबह आती थी, सत्संग कराकर तथा सेवा कर दिन में अपने घर चली जाती थी। इसी प्रकार, शाम को आकर फिर रात को चली जाती थी। जब से मम्मा ने यज्ञ में रहना आरम्भ किया तब से मम्मा में बहुत परिवर्तन आने लगे।
बाबा काश्मीर से मम्मा के नाम, दादी कुमारका के नाम और दादी चन्द्रमणि के नाम से पत्र भेजते थे। लिखते थे कि यह ज्ञान का पत्र है, इसको पढ़कर धारण करो और साथ-साथ सत्संग में सुनाओ। मम्मा तो वैसे कर लेती थी लेकिन कुछ बहनें डरती थीं, तो मम्मा उनमें धैर्य और साहस भर कर ज्ञान सुनाना सिखाती थी। छोटी-छोटी कन्यायें क़रीब 16, 17, 18 साल की, बाबा से आये हुए ज्ञान के पत्रों को पढ़कर सुनाती थीं। सबको आश्चर्य होता था कि इतनी छोटी- छोटी कन्यायें इतना महान् ज्ञान सुनाती हैं! धीरे-धीरे मम्मा में इतनी रूहानी शक्ति भरने लगी कि मम्मा जब संदली पर बैठकर अथवा खड़ी होकर किसी को दृष्टि देती थी तो उनको कभी श्री राधे का, कभी श्री लक्ष्मी का साक्षात्कार होता था। जिस प्रकार आलमाइटी (सर्वशक्तिमान) बाबा, ब्रह्मा द्वारा श्री कृष्ण का साक्षात्कार कराकर सबको यह स्पष्ट करा रहे थे कि यह बाबा ही भविष्य में श्री कृष्ण अथवा श्री नारायण बनेंगे, उसी प्रकार ॐ राधे द्वारा सबको श्री राधा और श्री लक्ष्मी का साक्षात्कार कराकर यह स्पष्ट कराने लगे कि यही भविष्य में श्री राधा अथवा श्री लक्ष्मी बनेंगी। आगे चलते-चलते मम्मा में पालना का गुण प्रकट हो गया।
सिन्ध में व्यापारी लोग व्यापारार्थ विदेश जाते थे। जब पुरुष लोग विदेश गये होते तो मातायें घर में अकेली होती थीं अतएव उन्होंने सत्संग में आना शुरू किया। सत्संग में आते-आते वे ज्ञान की धारणा भी करने लगीं। उनका हाव- भाव बदलने लगा, जीवन सादा और सरल बनने लगा। वे मातायें पहने हुए जेवर उतार कर साधारण रूप में रहने लगीं। जब उनके पति लोग वापिस आये तो वे उनको देखकर आश्चर्यवत हो गये कि उनकी पत्नियों को क्या हुआ है! वे विकार नहीं दे रही हैं, शान्त और निराली हैं। जेवर आदि भी पहने नहीं हैं। तो वे अपनी स्त्रियों को मारने-पीटने लगे। उस समय मम्मा ने उन बाँधेली माताओं की ज्ञान से, मधुर वाणी से ऐसी पालना की, हिम्मत बढ़ायी, ताक़त भरी कि वे धीरे-धीरे अपने में रूहानी ताक़त भरकर विघ्नों का सामना करने तथा सहन करने के लिए तैयार हो गयीं। ऐसे करते-करते मम्मा का पालना का पार्ट चरम शिखर पर पहुँच गया। तब बाबा ने आठ माताओं और कन्याओं की एक कमेटी बनाकर अपनी सारी चल-अचल सम्पत्ति उस कमेटी को समर्पित कर दी। उस कमेटी में मम्मा का नाम पहले नंबर में था। जब सिन्ध में, सत्संग में आने वालों की पवित्रता की धारणा के कारण हंगामा हुआ तो बाबा ने कहा कि सत्संग में आने वाली कन्यायें और मातायें मम्मा के नाम से अपने घर वालों से अनुमति- पत्र लेकर आयें। उस स्वीकार-पत्र में यह लिखा रहता था, "मै………...अपनी बेटी को ॐ मंडली माता अथवा ॐराधे माता के पास ज्ञान-अमृत पीने और पिलाने के लिए खुशी से छुट्टी देती हूँ / देता हूँ।" इस प्रकार मम्मा कन्याओं और माताओं में शक्ति भरने वाली और उमंग-उत्साह बढ़ाने वाली साक्षात् दुर्गा माँ थी।
बाद में जब बाबा काश्मीर से आये तो आलमाइटी बाबा ब्रह्मा-तन द्वारा ज्ञान के गुह्य राज़ों को खोलते हुए मुरली सुनाते और यह स्पष्ट करते गये कि यह ब्रह्मा ही समस्त मानवकुल का पितामह है। यही भविष्य में श्री कृष्ण तथा श्री नारायण बनेंगे और यह ॐराधे ही जगदम्बा सरस्वती, ब्रह्मा की बेटी है। यही भविष्य में श्री राधे तथा श्री अनुराधे (लक्ष्मी) बनेगी। तब से मम्मा के रहन- सहन,बोल-चाल,आचार-विचार-व्यवहार में बहुत शालीनता और गंभीरता आने लगी। हमने मम्मा को जल्दी में चलते हुए देखा ही नहीं। वे हमेशा धैर्यवत् और योगयुक्त होकर चला करती थी। कई लोगों को घर बैठे मम्मा का, बाबा का तथा कभी-कभी श्री लक्ष्मी-श्री नारायण का साक्षात्कार होने लगा।
सत्संग में बच्चे भी आने लगे। बच्चे भाषण करने लगे और ज्ञान सुनाने लगे तो सुनने वालों को बहुत अच्छा लगने लगा। इस प्रकार, सेवा खूब अच्छी रीति चलने लगी। फिर बाबा ने कराची में बड़े-बड़े बंगले लेकर वहाँ 'ॐनिवास' खोला। हम सबने कराची में रहना आरम्भ किया। कराची में मम्मा का 'यज्ञमाता' का पार्ट शुरू हो गया। उस भवन में क़रीब 450 समर्पित बहन-भाई रहने लगे। मातायें अलग, कन्यायें अलग और कुमार अलग। इस प्रकार, चार अलग- अलग भवनों में रहने की व्यवस्था की गयी। मम्मा, कन्याओं के साथ रहती थी। बाबा का बंगला अलग था। अमृतवेले से लेकर रात तक की हमारी दिनचर्या मम्मा के हाथ में होती थी। सब व्यवस्था मम्मा के निर्देश में ही सम्पन्न होती थी।
मम्मा हर बात में बड़ी एक्यूरेट (Accurate) थी। उनका हर कार्य और व्यवस्था नियम प्रमाण चलते थे। मम्मा ने हमें कहकर कोई सेवा अथवा पाठ नहीं सिखाया। उन्होंने सबसे पहले खुद करके सिखाया। उदाहरणार्थ सब्जी अथवा अनाज साफ़ करने की सेवा में मम्मा सबसे पहले आकर बैठती थी। फिर बाक़ी सब अपने आप आते थे। ऐसे नहीं कि हरेक को बुलाती कि तुम आओ, तुम आओ। हमने देखा, मम्मा ने वाचा से बहुत कम काम लिया और कर्मणा से अधिक। पहले खुद कर्म करके सबको सिखाया। यज्ञ क्या है? यज्ञ-प्रसाद का महत्त्व क्या है? बाबा कौन है? बाबा कितना महान् है? उनको कैसे सम्मान देना है? इन सब आचरण के नियमों पर मम्मा ने खुद प्रैक्टिकल में चलकर दिखाया और सिखाया। बाबा के हर आदेश और आज्ञा को मम्मा ने कभी साधारण नहीं समझा। वे बाबा की आज्ञाओं को ईश्वर की आज्ञा, आलमाइटी बाबा का आदेश समझती थी।
मम्मा को, बाबा के बारे में कभी रिंचक मात्र भी संशय नहीं आया। साकार बाबा में सदा निराकार बाप को ही देखा। बाबा ने जो भी कहा, मम्मा ने उसको करके ही दिखाया। इतनी आज्ञाकारी और वफ़ादार थी जगदम्बा माँ। बाबा का हर संकल्प तक मम्मा को प्यारा लगा। जब डॉक्टर ने कहा कि मम्मा को ऑपरेशन कराना ही पड़ेगा, बिना ऑपरेशन यह बीमारी ठीक नहीं हो सकती तब बाबा ने कुछ नहीं कहा, चुप रहे और बाद में कहा कि बाबा को ऑपरेशन के लिए प्रेरणा नहीं आती। इस बात पर भी मम्मा राज़ी ही रही। कभी यह संकल्प नहीं किया कि डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए कहा है, कराना अच्छा रहेगा। नहीं, बाबा को जो पसन्द है, मुझे भी वही पसन्द है। इतनी वफ़ादार थी मम्मा ! मम्मा के शब्द ही थे 'हुकमी हुकम चलाये'। बाबा हुजूर जैसे चाहे वैसे हुक़म चलाये, जैसे चाहे वैसे करे, यह सब कुछ उसी का है, मेरा कुछ नहीं। बाबा ने कहा और मम्मा ने दिल से उसको स्वीकार किया। कोई भी प्रश्न नहीं, कोई संशय नहीं, दूसरा कुछ सोचा नहीं। इतना निश्चय और विश्वास था बाबा पर। बाबा भी मम्मा को इतना ही सम्मान देते थे। यज्ञ में कोई बात आयी अथवा कुछ करना होता था तो बच्चों को बाबा यही कहते थे, "मम्मा की क्या प्रेरणा है, पूछकर आओ। मम्मा की राय के बाद मैं अपनी राय दूँगा, यज्ञमाता मम्मा है।" इस प्रकार, मम्मा से पूछे बगैर बाबा कोई भी कार्य नहीं करते थे।
घर में जैसे माँ होती है, बच्चे की हर बात पर ध्यान देती है, उसी प्रकार मम्मा यज्ञवत्सों के हर क्रिया कलाप, उनकी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक जीवन की प्रगति के लिए हर संभव ध्यान देती थी। समस्याओं का समाधान करती थी। प्यार-दुलार से पोषण करती थी। मम्मा हर यज्ञवत्स का दिल जीत लेती थी। सब कुछ करते हुए भी, ज्ञान की गहराई में जाकर ज्ञान के रहस्यों को सुनाते हुए भी कभी सुनने वालों को यह महसूस नहीं होने देती थी कि यह मेरी विशेषता है, हमेशा शिव बाबा की ओर ही उनका इशारा होता था। एक बाबा की तरफ़ ही सबका ध्यान खिंचवाती थी। मम्मा, बच्चों की जिस्मानी और रूहानी दोनों प्रकार की पालना करती थी। इस प्रकार, मम्मा का नाम 'यज्ञमाता जगदम्बा सरस्वती' पड़ा।
बाबा के सामने मम्मा मुस्कराकर एवं सिर झुकाकर केवल एक बात कहा करती थी- 'हाँ बाबा' अथवा 'जी बाबा', अन्य कोई शब्द ही नहीं। बाबा मम्मा को मम्मा भी कहते थे और बच्ची भी कहते थे। यज्ञ में हमेशा यह रिवाज़ रहा कि बाबा की मुरली से 10 मिनट पहले, क्लास में मम्मा ज्ञान-सितार बजाती थी, बाद में बाबा आकर ज्ञान-मुरली बजाते थे।
ज्ञान की देवी, विद्या की देवी होते हुए भी, मम्मा का पढ़ाई से इतना प्यार था कि वह दिन में तीन-तीन बार मुरली पढ़ा करती थी। मम्मा कहती थी, देखो, मुरली को जितनी बार पढ़ेंगे उतनी बार हमें ज्ञान का नया-नया खज़ाना मिलेगा।
मम्मा की विशेष धारणा थी अन्तर्मुखता। मम्मा सबके साथ होते हुए भी अपनेआपमें अकेली रहती थी। आलमाइटी बाप के साथ वार्तालाप करती रहती थी। मम्मा अमृतवेले 2 बजे उठकर अपने कमरे में कुर्सी पर बैठ एकान्त में बाबा को याद करती थी। दिन में कर्म करते समय भी ज्ञान के मनन-चिन्तन में मगन रहती थी। मम्मा ने कभी हंसी-मजाक करके अथवा व्यर्थ बातें करके अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाया। मम्मा किसी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित होने नहीं देती थी। सदा उस माँ-बाप की ओर ही इशारा करती थी। मम्मा में बहुत मधुरता थी तो निर्भयता भी उतनी ही थी। मम्मा कहा करती थी कि जीवन में जिस भगवान से डरना चाहिए वही हमारा बन गया, फिर डरना किससे ? डरता वह है जो पाप कर्म करता है। हम तो श्रेष्ठ कर्म, सत्कर्म करने वाले हैं, ईश्वर की मत पर चलने वाले हैं, तो हम डरें क्यों? खाने-पीने में भी मम्मा की कोई आसक्ति नहीं थी। उन्होंने कभी यज्ञ-प्रसाद की ग्लानि अथवा टीका-टिप्पणी नहीं की। जो मिले, जैसा मिले, जितना भी मिले उसको आदर से और अनासक्त भाव से स्वीकार किया। अन्त में, हम यही कहेंगे कि मम्मा गुणों की खान थी, 16 कला सम्पन्न थी, सर्वगुण सम्पन्न थी, मर्यादा कुलोत्तमे थी।
मातेश्वरी हम सबकी हृदयेश्वरी थी
दिल्ली से ब्रह्माकुमारी दादी हृदयमोहिनी जी (दादी गुलज़ार जी, दिल्ली क्षेत्र की संचालिका) कहती हैं कि मीठी मम्मा जिन्हें हम मातेश्वरी कहते थे, हम सबकी हृदयेश्वरी थी। मातेश्वरी जी का नव विश्व की संरचना में कुशल प्रबन्धन अद्भुत और अद्वितीय था। मम्मा ने इतनी कन्याओं को जहाँ मातृ स्वरूप में पालना दी, वहीं पर उनकी परिवर्तन-शैली में भी निपुणता थी। मम्मा देखती थी कि भूल हो गयी है, यह कन्या सम्मुख आने में हिचक रही है और यह हिचक शर्मिन्दगी के कारण है तो मम्मा का प्यार वात्सल्यमय सम्बोधन में जाग उठता। ऐसे में यज्ञवत्सों को बुलाकर उनकी भूल बताती तो उन्हें भी वो कमज़ोरी तिनके के समान लगती। सामने वाला भूल स्वीकार कर सदैव के लिए उसे सुधार लेता था, दिल दर्पण स्वच्छ हो जाता था।
इतना ही नहीं, मम्मा ज्ञान की विवेचना करती थी तो लगता था कि मम्मा नहीं साक्षात् सरस्वती देवी ही बोल रही हों। एक बार सिकन्दराबाद में, समाज के कुछ लोग विरोध दर्शा रहे थे। पिताश्री ब्रह्मा ने मम्मा से कहा कि वहाँ जाइये। मम्मा ने श्रीमत सिर आँखों पर रखी और चल दी। मैं स्वयं भी मम्मा के साथ सिकन्दराबाद गयी थी।
मम्मा विरोधियों से मिली। मम्मा की मधुर और सारगर्भित वाणी सुनकर वे पानी-पानी हो गये। उन्हें लगा कि माँ सरस्वती स्वयं मुखर हो उठी हैं। माँ सरस्वती के इस स्वरूप को देख उन्होंने कहा- माँ क्षमा करें, हमें आपका परिचय नहीं था। आपके मुख-कमल द्वारा ज्ञान की जो विवेचना सुनी है वो अद्भुत है, चिन्तन योग्य है। हम आकर अनुकरण करें या ना करें परन्तु आप के आगमन से हमारे अन्तःचक्षु खुल गये हैं। उनके मन में परमात्मा के माध्यम पिताश्री के प्रति भी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी।
सद्भावना की मूरत मम्मा
कानपुर से ब्रह्माकुमारी दादी आत्मइन्द्रा जी (दादी गंगे जी, उत्तर प्रदेश क्षेत्र की संचालिका) लिखती हैं कि मम्मा क्षमा का प्रतिरूप थी। यज्ञ की व्यवस्था से सम्बन्धित यदि कोई भी शिकायत लेकर आता था तो मम्मा सामने वाले को समझाती थी कि आप के प्रति अमुक व्यक्ति के दिल में कोई भाव नहीं है, आपके दिल में भाव है तो उसे निकाल दो। मम्मा टूटे दिलों को जोड़ती थी। ड्रामा पर निश्चय, बाप पर निश्चय, स्वयं पर निश्चय होने के कारण ही मम्मा नम्बर वन बनी।
मम्मा अर्जुन की तरह एकाग्र थी। नम्बर वन में जाने का लक्ष्य रखा। मम्मा हम बच्चों को सदा कहा करती थी कि सदा विचार ऊँचे रखो तो बाप समान बन जायेंगे। सदा बाप को देखो। आप स्वयं को देखो, किसी अन्य को नहीं देखो। बाबा व ड्रामा पर निश्चय रखो तो कर्मातीत बन जायेंगे।
मम्मा ने मुझ में अपनी सारी दिव्य शक्तियाँ भर दी
बेंगलोर से ब्रह्माकुमारी दादी हृदयपुष्पा जी, मम्मा के साथ का अपना अनुभव बताती हैं कि कराची में एक दिन मेरे पेट में बहुत दर्द शुरू हुआ। मुझे लगभग 30 बार बाथरूम जाना पड़ा। इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं थी क्योंकि मेरा दृढ़ निश्चय था कि जीवन भगवान के हाथ में है, मेरा रक्षक भगवान है चाहे यहाँ रखे, चाहे अपने वतन में ले जाये, जैसी उनकी इच्छा। बाद में मैं बाबा... कहकर बेहोश होकर गिर पड़ी। यह समाचार बाबा के पास पहुँचा तो बाबा तुरन्त आये और मुझे दृष्टि दी। थोड़े ही समय के बाद मैंने आँखें खोली और बाबा- बाबा कहने लगी। बाबा ने तुरन्त मम्मा को बुलाया और कहा कि इसकी संभाल आपको करनी है। मम्मा ने कहा- जी बाबा। फिर बाबा ने सात दिन का पूरा प्रोग्राम दिया कि बच्ची को क्या खिलाना-पिलाना है। बाबा ने मम्मा को कहा कि दो दिन बच्ची को हर घंटे तीन-तीन चम्मच केवल पानी देना है। उसके बाद दो दिन हर घंटे में तीन चम्मच पानी और तीन चम्मच दूध देना। पाँचवें दिन दो- दो चम्मच खिचड़ी देना। मम्मा ने उसी प्रकार किया। मैं एक हफ्ते में ठीक हो गयी। माना दवा और दुआ ने ही मुझे ठीक कर दिया। परन्तु बाद में भी मम्मा मुझे अपने ही हस्तों से खिलाती रही तो मैंने कहा, मम्मा, अब मैं ठीक हूँ, मैं अपने ही हाथ से खाऊँगी। मम्मा ने कहा, यह बाबा का डायरेक्शन है, जब बाबा कहेंगे तब ही आप अपने हाथ से खा सकती हो। अगले दिन मम्मा ने मुझे रात को 10 बजे अपने कमरे में आने को कहा। मैं मम्मा के कमरे में गयी तो मम्मा ने संदली पर बैठ मुझे सामने बिठा कर रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक दृष्टि देकर योग करवाया। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मम्मा ने मुझ में अपनी सारी दिव्य शक्तियाँ भर दी हों और मैं एक दिव्य प्रकाश में बैठी हूँ। सुबह मम्मा ने कहा, अब अपने कमरे में जाकर सो जाओ।
सुबह कई बहनें मम्मा के पास गयीं और मम्मा से पूछा कि हृदयपुष्पा बहन ने ऐसी क्या तपस्या की है जो आप उसके ऊपर इतना ध्यान देकर उनकी सेवा कर रही हैं। मम्मा ने कहा, आप सब उससे ही पूछो कि आप ने ऐसा क्या किया है। सभी बहनें मेरे पास आकर पूछने लगीं कि आप ने कौन-सी तपस्या की है जो मम्मा ने स्वयं आपकी विशेष सेवा की। तो मैंने बताया कि मेरा तो एक शिव बाबा दूसरा न कोई, जीवन उसी को अर्पण किया है। जब से बाबा को जीवन दिया है तब से एक शिव बाबा के बिना और कोई भी दिखाई नहीं पड़ता। यही मेरी तपस्या है।
जब मधुबन से सेवा-अर्थ सभी बहनों को भेजा गया तो मुझे भी बेंगलोर भेजा गया। बेंगलोर में कई साल तक सेवा की वृद्धि नहीं हुई और वहाँ दिन भी मुश्किल में गुजरने लगे। बहुत सहन करना पड़ा क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान नया होने के कारण कोई भी सुनने को तैयार नहीं था। यह समाचार बाबा को मालूम पड़ा तो बाबा ने मम्मा को कहा कि मेरी बच्ची बहुत तकलीफ में है, आप बेंगलोर जाओ और साथ में लेकर आओ।
यह समाचार मुझे भी मिला कि मम्मा पहली बार बेंगलोर आ रही है। मैं योग में बैठ गयी। मुझे ऐसा अनुभव होने लगा कि मातेश्वरी जगदम्बा यहाँ आ रही है तो ज़रूर प्रकृति दासी बनेगी और ऐसा हुआ कि जैसे कोई कह रहा है कि "आप कमर्शियल स्ट्रीट में जाओ।" मैं योग से उठकर सोचने लगी कि कमर्शियल स्ट्रीट कहाँ है! मैं सेन्टर से निकल कर चलने लगी। पूछते-पूछते आख़िर कमर्शियल स्ट्रीट में पहुँच गयी। लेकिन कमर्शियल स्ट्रीट में किससे मिलना है यह पता नहीं था, मन में आवाज़ आयी कि आगे चलो। मैं आगे चल दी। थोड़ी दूर गयी तो देखा, एक बड़ा सेठ अपनी दुकान में जा रहा है, तो मुझे अन्दर में फिर आवाज़ आयी "इस दुकान के मालिक से जाकर मिलो, यह जगदम्बा का भक्त है।" मैं उस दुकान में गयी तो दुकान के मालिक ने पूछा, "माता जी आपको क्या चाहिए?" मैंने कहा, "आप जगदम्बा को जानते हो?" उसने कहा, "हाँ-हाँ, मैं तो जगदम्बा का भक्त हूँ।" तब मैंने कहा, "वह जगदम्बा अभी चैतन्य में है और बेंगलोर आ रही है।" यह बात सुनकर सेठ को बड़ा आश्चर्य होने लगा और कहा, "अच्छा, यह मेरा सौभाग्य है कि मैं चैतन्य में अपनी इष्टदेवी से मिलूँगा और वरदान लूँगा, आशीर्वाद पाऊँगा। मेरी जन्म- जन्मान्तर की इच्छा पूर्ण होगी।"
फिर सेठ ने कहा कि आपकी बात सुनकर मेरे सामने वह दृश्य आ रहा है कि मैं जगदम्बा से मिल रहा हूँ। मैंने कहा, "जगदम्बा से मिलने के लिए कई लोग उत्कंठित हैं।" फिर सेठ ने मुझसे पूछा, "इसके लिए मुझे क्या करना है, बताइये।" मैंने कहा, "बहुत लोग उनसे मिलने आयेंगे इसलिए एक बड़ा हॉल चाहिए, उनके रहने के लिए एक बड़ा बंगला चाहिए।" सेठ कहने लगा, "माता जी, अभी-अभी हमारी एक नयी धर्मशाला बनी है। उसका उद्घाटन थोड़े दिन पहले ही हुआ है। उस में रहने का प्रबन्ध भी है, आप एक बार देख लीजिये।" तुरन्त सेठ जी ने अपनी कार में मुझे बिठाया और धर्मशाला दिखाने ले गया। मैंने धर्मशाला देखी तो पसन्द आयी। धर्मशाला नयी थी और रहने का प्रबन्ध भी अच्छा था। फिर उसने गेहूँ, चावल, घी आदि राशन भेज दिया। प्रत्येक कमरे में चारपाई, बिस्तर आदि लगा था। मातेश्वरी जी के कमरे में चारपाई, बेडशीट, संदली आदि सभी तैयार कर दिया।
अब मम्मा के आने की तैयारी में निमंत्रण पत्र छपवाना था। विचार चला कि क्या करें? फिर अन्दर में अवाज़ आयी कि आगे जाओ। मैं आगे बढ़ी तो देखा एक प्रिंटिंग प्रेस है। मैं उसके अन्दर गयी तो प्रेस का मालिक पूछने लगा, "माता जी, क्या चाहिए?" मैंने कहा, "जगदम्बा सरस्वती बेंगलोर आ रही हैं तो हमें निमंत्रण-पत्र छपवाना है।" प्रेस के मालिक ने कहा, "आप बताइये, हम छाप देंगे।" मेरे मुँह से अंग्रेजी के ऐसे शब्द निकले जो पढ़ा-लिखा आदमी भी नहीं बोल सकता। वे शब्द थे, "मातेश्वरी जगदम्बा इज़ अराइविंग बेंगलोर, प्लीज़ हेव दि ब्लैसिंग्स आफ कम्पलीट प्यूरिटी, पीस एण्ड प्रास्परिटी फार मेनी बर्थस। आल आर इनवाइटेड । (Mateshwari Jagadamba is arriving Bangalore. Please have the blessings of complete Purity, Peace and Prosperity for many births. All are invited.) प्रेस के मालिक ने पैसा माँगा लेकिन मेरे पास तो कुछ नहीं था। मैंने कहा, मैं जाकर एक माता को पैसे देकर भेजूंगी, उनके हाथ में आप कार्ड दे देना। अब मातेश्वरी जगदम्बा का स्वागत कैसे करें? उसके लिए हार, फूल चाहिएँ! थोड़े दिन पहले ही एक माली भाई ने कोर्स किया था। उसने कहा, जगदम्बा माँ के लिए जितने हार, फूल चाहिएँ उतने मैं लाऊँगा।
अब तो मातेश्वरी जी के आगमन का ही इन्तजार था। वह दिन भी आ गया और मातेश्वरी जी बेंगलोर पहुँच गयी। हमने भव्य स्वागत किया। सेठ ने मम्मा को देखा तो उसे तो जैसे कि मन-वांछित फल मिल गया हो। वह तृप्त हो गया। मम्मा से कई बड़े-बड़े लोग भी मिलने के लिए आये और मम्मा की वाणी सुनकर बहुत आनन्दित हुए। ब्राह्मण परिवार भी मिला। सब बहुत खुश हुए। एक सप्ताह मम्मा बेंगलोर में रही। मम्मा के वापिस जाने का दिन आ पहुँचा तो मम्मा ने मुझ से कहा, "आपने हमको बाबा का घर तो दिखाया ही नहीं!" मैं बातों-बातों में टालती रही लेकिन मम्मा जब बार-बार कहने लगी तो मैं जहाँ रहती थी वहाँ ले गयी जो एक छोटा-सा कमरा था। उसी में खाना बनाना भी, खाना भी, क्लास भी कराना, विश्राम भी करना, कोर्स भी कराना। यह मम्मा ने देखा तो कहा, "आप लोगों को तो बाबा ने शहजादियों के माफ़िक पाला है। अभी आपका यह रहन-सहन मुझ से देखा नहीं जाता। इसलिए बाबा ने मुझे खास आपको ले आने के लिए भेजा है। तब मैंने कहा, "मम्मा, मैं कायर सिपाही नहीं हूँ। युद्धस्थल से वापिस नहीं लौटूंगी।" तब मम्मा ने कहा, "आप थोड़े ही आ रही हैं? बाबा बुला रहे हैं। आप मेरे साथ चलो।" मैंने कहा, "मर मिटेंगे लेकिन हटेंगे नहीं। मैं गुलदस्ता बनाकर ही बाबा के पास आऊँगी।" मेरा दृढ़-निश्चय सुनकर मम्मा वापिस बाबा के पास आबू पहुँच गयी।
इस तरह मम्मा ने विनम्र सेवाधारी माँ बनकर बीमारी के समय मेरा उपचार किया और संकटमय समय पर सेवास्थान पर आकर सहयोग दिया, स्नेह दिया तथा सेवास्थल पर आगे बढ़ने की मुझ में शक्ति भर दी।
वैकुण्ठ की स्वामिनी श्री भगवती
मम्मा की दृष्टि शक्तिशाली होती थी। एक दिन मम्मा चाँदनी रात में बैठकर योग कर रही थी। मैं जाकर उनके सामने बैठी, तो मम्मा ने दृष्टि दी और मैं ध्यान में चली गयी। ध्यान में देखा कि चारों तरफ़ प्रकाश ही प्रकाश है और उसके बीच में आलमाइटी बाबा दिखायी दे रहे हैं। मैं बाबा को देखती ही रही। फिर मम्मा ने पूछा क्या देख रही हो? मैंने कहा, "मम्मा, बाबा को देख रही हूँ।" मम्मा ने कहा, "ठीक है, देखो, बाप को देखती रहो।" यह कराची की बात है। उस समय मैं बहुत ध्यान में जाती थी। बाबा भी कहते थे, "मम्मा, इनको वतन में घुमाकर आओ।" तब मम्मा हमें वतन में भेज देती थी। हम वहाँ वैकुण्ठ देखते थे, सुबी रस पीते थे, श्री कृष्ण के साथ रास खेलते थे।
कोई भी सेवा के लिए कभी "ना" नहीं कहना
इस प्रकार अपना अनुभव सुनाते हुए ब्रह्माकुमारी दादी भगवती जी9 कहती हैं कि मुझे कपड़े सिलाई करना आता था, जैसे कुर्ता, पतलून आदि। एक दिन मम्मा ने मुझे बुलाकर कहा, "भगवती, तुम कोट सिलाई करती हो?" मैंने कहा, "नहीं मम्मा मुझे कोट सिलाई करना नहीं आता।" तब मम्मा ने बोला, "देखो कभी 'ना' नहीं बोलना। इस ड्रामा में 'ना' है ही नहीं। जब तुम शर्ट, पैंट सिलाई करती हो तो कोट की सिलाई करना नहीं आता? 'हाँ', बोलो, तो अपने आप काम करना आता जायेगा। कभी 'ना' नहीं कहना। 'हाँ' कहो, न आते हुए भी प्रयत्न करते-करते आ जायेगा।" इसी प्रकार कोशिश करते-करते कोट सिलाई करना आ ही गया। उस दिन से मैंने किसी सेवा को 'ना' नहीं कहा, हर बात में "हाँ जी, हाँ जी" करने लगी। तभी से मुझे यह वरदान प्राप्त हुआ कि जो कार्य मैं करती हूँ उसमें सफलता मिलती ही रहती है।
मम्मा, मम्मा कैसे बनी ?
मम्मा अपने गुण और कर्त्तव्य से मम्मा बनी। मम्मा अपनी ज़िम्मेवारियों को संभालने की शक्ति से, महानता से, समझाने और शिक्षा देने की विधि से, सबके प्रति सद्व्यवहार से मम्मा बनीं। मम्मा ने प्यार और पालना की शक्ति से सबके दिल को जीता और इस प्रकार यज्ञमाता बन गयी।
मम्मा ने ही मुझे योग सिखाया और योग्य बनाया
ब्रह्माकुमारी दादी धैर्यमणि जी10* अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि सन् 1937 में मैं पहली बार अपनी बहन भगवती के साथ सत्संग में आयी। जाते ही मुझे मम्मा ने देख लिया। उसी समय मम्मा ने मुझे गले लगाया और टोली खिलायी एवं मुस्करायी। मैं भी मुस्करायी तो मम्मा ने कहा, कल भी आना। मैं उस दिन से रोज़ जाती रही, ज्ञान सुना तो बहुत अच्छा लगा। मम्मा ही मुझे ज्ञान प्राप्त करने तथा यज्ञ में लाने के लिए निमित्त बनीं। मैं बहुत छोटी थी इसलिए मम्मा ने कहा, तुम ॐनिवास में रहकर ज्ञान-योग की पढ़ाई करो। मेरे माता- पिता तो छुट्टी नहीं दे रहे थे। मम्मा ने मुझे युक्ति बतायी कि जब माँ-बाप बहुत खुशी में हों तब जाकर तुम उनकी गोद में बैठो और प्यार से उनसे छुट्टी माँगो तो अवश्य दे देंगे। ऐसे ही हुआ। एक दिन जब मेरे माँ-बाप बहुत खुश मूड़ में थे तो मैंने उनसे छुट्टी माँगी और पिता जी ने पत्र लिखकर दे दिया, साथ में उस पर माता जी के हस्ताक्षर भी करवाये। इस प्रकार, मम्मा ने मुझे लौकिक बन्धन से मुक्त कराने में बहुत मदद की।
कर्मेन्द्रियजीत महाकाली
योग कैसे करें- यह भी मम्मा ने हमें सिखाया। वे अपने साथ संदली पर बिठाकर हमें योग कराती थी। हमारी अवस्था को चेक करती थी। कर्मणा सेवा करते समय भी मम्मा अपनी ही स्थिति में रहती थी। मैंने एक बार मम्मा से पूछा कि "मम्मा, आप अभी गेहूँ साफ़ कर रही हैं, अभी आपका क्या संकल्प चल रहा है?" मम्मा ने कहा, "हम गेहूँ साफ़ नहीं कर रहे हैं, हम साक्षीद्रष्टा होकर कर्मेन्द्रियों से साफ़ करा रहे हैं। मैं नहीं कर रही हूँ, करा रही हूँ।" उस समय ज्ञान का विस्तार उतना नहीं था लेकिन मम्मा-बाबा को देख-देखकर हमने जीना सीखा, जीवन बनाया और गुणों को अपनाया।
मम्मा का जीवन नैचुरल था। उनका स्वभाव बहुत सरल था। मिठास थी उनके व्यवहार में। उनमें सदा यह भाव रहता था कि सबको आगे बढ़ायें। मम्मा हरेक की योग्यता और विशेषता अनुसार वही कार्य दिया करती थी जो वह सहज कर सके।
मम्मा कैसे बनी ?
मम्मा सबकी पालना कर मम्मा बनी, सबको माँ की ममता देकर मम्मा बनी। सबको अपना बनाकर मम्मा बनी। अपनी पवित्रता, निःस्वार्थ प्यार की शक्ति से सबको आकर्षण कर मम्मा बनी। मम्मा में सहजता थी। मम्मा में मुझे श्री लक्ष्मी और जगदम्बा की भासना आती थी। मम्मा ने हमें यह विशेषता सिखायी कि किसी से भी वैरभाव नहीं रखना है एवं किसी का अवगुण नहीं देखना और न ही अपनाना है।
चन्द्रकान्ति में योग करने वाली सजग साधिका
हफ्ते में एक बार हम सुप्रीम पार्टी वाले मम्मा के साथ बैठकर अमृतवेले योग करते थे। जब मम्मा चाँदनी में बैठ योग करती थी तो हम भी जाकर एक- एक कोने में बैठ योग करते थे। कभी-कभी मम्मा को ही अपने ग्रुप में बुलाते थे और मम्मा 3.30 से 4 बजे तक हम सबको योग कराती थी। जब मम्मा के सामने बैठ हम योग करते थे तो हमें ज्ञान-चन्द्र माँ के शीतल प्रकम्पनों से शान्तिधाम का अनुभव होता था। इस प्रकार मम्मा ने हमें योगी के साथ-साथ योग्य बनाया।
मम्मा अमृतवेले दो बजे उठकर अकेले में योग करती थी। वह साढे तीन बजे तैयार होकर बाहर आती थी। चार बजे से पाँच बजे तक सामूहिक योग होता था, उसमें मम्मा अवश्य आती थी। उसके बाद स्नान आदि नित्यकर्म पूरा करती थी। नाश्ते के बाद 9 बजे प्रातः मुरली क्लास होती थी, उसमें आती थी। उसके बाद एक-एक दिन एक-एक बहन को संदली पर बिठाकर ज्ञान की कोई-न-कोई प्वाइंट पर समझाने के लिए कहती थी। इस प्रकार मम्मा सबको भाषण करना, क्लास कराना सिखाती थी। उसके बाद सेवा करते थे। दोपहर के भोजन के बाद विश्राम होता था। मम्मा 5 बजे ऑफिस में बैठती थीं और यज्ञवत्सों को टोली खिलाती थी। जब हमें कभी-कभी मम्मा से टोली खाने का मन होता था तो हम वहाँ जाकर मम्मा से टोली लेते थे। बाद में मम्मा ऑफिस का कामकाज़ देखती थी। उस समय मैं यज्ञ में मुरली लिखने की सेवा करती थी। शाम को हम भी यज्ञसेवा जैसे अनाज साफ़ करना, सब्जी काटना आदि करते थे। रात्रि भोजन के बाद मम्मा कचहरी कराती थी।
मीठी माँ की सुनायी हुई अनमोल शिक्षायें
- इस ज्ञान से सिर्फ अपना पेट नहीं भरना है लेकिन दुःखियों को भी शान्ति देने का उपाय करना है। यही सर्वोत्तम सेवा है।
- परमपिता परमात्मा तो विश्व का रचयिता है। वो तो नयी दुनिया रचने का काम कर ही लेगा लेकिन तुम बच्चे स्वयं अपने विकारों का विनाश और दैवी गुणों की रचना करो। जैसे किसी के शरीर पर कोई बोझ रखा हो तो वह जल्दी-जल्दी चल नहीं सकता, धीरे-धीरे चलेगा, इसी तरह, तुम बच्चों के सिर पर भी पापों के बोझ की बहुत भारी गठरी है। अगर तुम भी जल्दी-जल्दी उन्नति को पाना चाहते हो तो पहले पापों की गठरी उतारो अर्थात् आत्मा के पिछले पापों को दग्ध करो। इसकी युक्ति यही है कि श्वासों-श्वास अपने परमपिता परमात्मा शिव को याद करो। उनके साथ सर्व सम्बन्ध जोड़ पूरा हक़ जमाओ कि 21 जन्मों तक दैवी स्वराज्य प्राप्त कर के रहेंगे, ऐसा दृढ़ संकल्प अन्दर में पक्का हो।
- कोई-कोई आत्मा को घड़ी घड़ी पास्ट जीवन की याद आती है जिस कारण वह खुश नहीं रहती। इसमें अपने अन्दर देखना है कि मुझे अब पुराने चौपड़े को खत्म कर नया चौपड़ा (कर्मों का खाता) बनाना है। अगर नये में पुराना संकल्प-विकल्प मिक्स करते रहेंगे तो तुम आत्माओं का न पुराना साफ़ होगा और न नया चौपड़ा बन सकेगा। इसलिए पुराने मायावी संकल्प-विकल्प को भुला दो। पास्ट इज पास्ट (बीती सो बीती)। तुम आत्माओं का नया ईश्वरीय जन्म हो गया तो सदा खुशी में रहो।
- सर्विस करने का मतलब अपने जीवन को आदर्शमय जीवन बनाना है जिससे अन्य आत्माओं के ऊपर प्रभाव पड़ सके।
- अब तुम सच्चे राम की सच्ची सीतायें बनी हो तो रावण की कोई भी निशानी अपने पास न रखो।
मातेश्वरी जीवनभर अटल, अडोल और एकरस रही
ब्रह्माकुमारी दादी कुंज जी 11अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि मैं तो बाल-अवस्था में बाँधेली थी। हम लोगों को यज्ञ में आते ही मम्मा की पूरी पालना मिली। मैं कई बार घर से बिना खाये आती थी, पता नहीं मम्मा को कैसे मालूम हो जाता था, वे हमें बिठाकर, खुद भोजन खिलाकर घर भेजती थी और हमारे अन्दर हिम्मत और उमंग-उत्साह भरती थी। जिन कन्याओं को अपने माँ-बाप से छुट्टी नहीं मिलती थी, वे ॐमंडली के ॐस्कूल में पढ़ने आती थी। उनमें से मैं भी एक थी। वहाँ हमारी पालना मम्मा से होती थी। मम्मा को देखने से ही लगता था कि जैसे वह हमारी माँ है। मम्मा हमें कहती थी कि बाँधेलियों को तुम्हें ऐसे छुड़ाना है जैसे कि सती सीता को हनुमान ने रावण से छुड़ाया। मम्मा युक्तियाँ बताकर, शक्ति भरकर हमें निडर बनाती थी। उस समय मैं 9 साल की थी।
मम्मा का शिव बाबा के साथ-साथ ड्रामा के ऊपर भी अटल निश्चय था। मम्मा ड्रामा के ऊपर हमें दो-दो घंटे क्लास कराती थी। मम्मा कहा करती थी कि जितना बाबा पर निश्चय है उतना ही ड्रामा पर भी निश्चय होना चाहिए, तब ही आप ईश्वरीय जीवन में एकरस अवस्था में रह सकेंगे। मम्मा के सारे जीवन में हमने देखा कि ड्रामा पर अटल और अचल होने के कारण वे हमेशा एकरस रहती थी। पूरे युद्धस्थल (यज्ञ के कारोबार) में बाबा ने मम्मा को ही आगे रखा। यज्ञ ही मम्मा के नाम पर था। स्थापना के हर कार्य में जितनी भी परीक्षायें आयीं मम्मा ने शिवशक्ति सेना का नेतृत्व किया। कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ आयीं, विघ्न आये लेकिन मम्मा ने हंसते-हंसते, अचल अडोल होकर सामना किया और विजय प्राप्त की।
सर्व के प्रति समभाव और श्रेष्ठभाव
यज्ञ में सेवा करते समय, एक बहन मुझे दी जाती थी। मुझे कहा जाता था कि उसको साथ लेकर सेवा पूरी करो। मैं मम्मा के पास जाकर कहती थी, "मम्मा वो बहुत ढीली-ढाली है, बहुत धीरे-धीरे काम करती है। मुझे फलानी दो ना ! हम दोनों मिलकर जल्दी पूरा करेंगे।" तब मम्मा कहा करती थी कि तुम कैसे जानती हो कि वह बहुत ढीली-ढाली है? मैं कहती थी, "मम्मा, मैं रोज़ देखती हूँ ना साथ में काम करते हुए!" मम्मा कहती थी, "देखो, हरेक में कोई- न-कोई कमी-कमज़ोरी होती है। मैं माँ हूँ ना, मुझे सबको सेवा का अवसर देकर उनका भाग्य बनाना है! आज उसमें कमी है, तुम्हारे में जो कला है उसको देखते-देखते कल जाकर वह अपनी कमी-कमजोरियों को भर देगी और एक दिन वह भी तुम्हारे जैसी होशियार बन जायेगी। इसीलिए सबको साथ में लेकर चलना है।" ऐसे हमें प्यार से समझा कर मम्मा शिक्षा देती थी।
मम्मा हर चीज़ में हमारा ध्यान खिंचवाती थी। एक बार कराची में एक बहन ने शरीर छोड़ा। उसकी मात्र 2-3 दिन ही तबीयत खराब रही, इतने में ही शरीर छोड़ा। मम्मा ने सबको कहा, "देखो, सबको इसकी मृत्यु से सबक़ सीखना चाहिए। मृत्यु का कोई भरोसा नहीं। यह नहीं समझो कि हम तो अभी छोटे हैं, जवान हैं, हम तो अभी बहुत दिन जियेंगे। नहीं, काल कभी भी आ सकता है। इसीलिए रोज़ रात सोने से पहले अपने आपसे पूछो कि मैं अभी ही शरीर छोड़ने को तैयार हूँ? आज ही शिव बाबा का बुलावा आये तो एवररेडी हूँ?"
युक्ति रचकर बच्चों को योग्य बनाया और आगे बढ़ाया
कराची से ही मैं यज्ञ में राशन डिपार्टमेंट में असिस्टेन्ट (सहयोगी) के रूप में सेवा करती थी। डिपार्टमेंट की हेड एक बहन थी। जब वह गयी तो मम्मा ने मुझे कहा, कुँज, तुम हेड बन, यह डिपार्टमेन्ट संभालो। मैंने कहा, नहीं मम्मा, मैं हेड नहीं बनूँगी। उस समय तो स्टोर भरपूर था। अब बेगरी पार्ट है, अगर मैं किसी को कुछ 'ना' कहूँ तो वो मुझे क्या कहेंगे? हेड किसी बड़ी बहन को बनाओ, मैं उसकी असिस्टेन्ट बन सारे काम करूँगी। तब मम्मा मुझे बाबा के पास ले गयी और बाबा से कहा, "बाबा, देखो कुँज कहती है कि राशन डिपार्टमेन्ट की हेड नहीं बनूँगी।" बाबा मुस्कराये और बोले, "ठीक है ना बच्ची, स्टोर शिव बाबा का है, कुँज उसकी इंचार्ज ! यह कैसे हो सकता है? वह ठीक बोलती है। शिव बाबा के स्टोर के लिए हेड मैं हूँ ना, कुँज मेरी असिस्टेन्ट बनकर सेवा करेगी।" इस प्रकार, मम्मा युक्ति रचकर, हर बच्चे को ज़िम्मेवारी देकर अथवा दिलाकर आगे बढ़ाती थी।
जब बाबा मुझे सेवा के लिए बाहर भेजना चाहते थे तो मैं बाबा से जुदा होना नहीं चाहती थी। बाबा मुझे जाने के लिए कहते थे, तो मैं बाबा को कहती थी कि बाबा मैं आपको छोड़ कर नहीं जाऊँगी। एक बार बाबा ने मुरली में, सभा में कह दिया, "देखो, मैंने कुँज को वर्थ ए पाउण्ड (Worth a pound) समझा था, वह वर्थ नाट ए पेनी (Worth not a penny) निकली।" फिर भी मैं कहती थी कि बाबा मैं आप से दूर नहीं जाऊँगी। एक दिन बृजकोठी में मम्मा झूले में बिठाकर मुझे कहने लगी, "कुंज, तुमसे बाबा क्या चाहते हैं?" मैंने कहा, "मम्मा, बाबा चाहते हैं कि मैं सेवा पर जाऊँ। मेरे में वो शक्ति नहीं है कि मैं बाबा से दूर रहूँ ! मुरली सम्मुख सुनने के बदले काग़ज़ पर पढ़ू ! यह मेरे से नहीं हो सकता। मैं तो वहाँ रोती रहूँगी और रोती रहूँगी तो सेवा कैसे करूँगी?" तब मम्मा ने कहा, "देखो बच्ची, जब बाबा तुमसे सेवा चाहता है तो वे ज़रूर तुम्हें शक्ति देंगे, डरो नहीं। बाबा को 'हाँ' कहो, कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा।" ऐसे समझा कर मेरे में ताक़त और उत्साह भर कर मम्मा बाबा के पास ले गयी और बाबा से कहा कि कुँज सर्विस पर जाने के लिए तैयार है। मगर मैं एकदम चुप रही। बाबा ने कहा, वह कहाँ बोलती है? चुपचाप खड़ी है! तो मैं धीरे-धीरे बोली, बाबा मैं सर्विस पर जाने के लिए तैयार हूँ। मम्मा एक माँ की तरह मेरे में धैर्य, उमंग, उल्लास भरकर बाबा के पास ले गयी और सेवा में आगे बढ़ने का सुअवसर प्रदान किया। इस प्रकार, मम्मा सब तरह की ट्रेनिंग देती थी।
दादी (प्रकाशमणि) और मैं पटना में रहती थी। वहाँ एक भाई था, वह अपने ही स्वभाव का था। वह हम लोगों से जबर्दस्ती करता था कि सेवा करने आप वहाँ न जाओ, यहाँ न जाओ। हमने सोचा, मम्मा आयेगी तो हम मम्मा को उस भाई की सारी बातें बतायेंगे। मम्मा के आते ही हमने मम्मा से कहा, "मम्मा, हम जब आपके साथ बैठते हैं तो उस भाई को हमारे साथ नहीं बिठाना।" मम्मा कहती थी, "नहीं, देखो मैं उसका गेस्ट (अतिथि) हूँ, अब मैं उसको कैसे शिक्षा दूँगी ? तुम लोग सयाने बन जाओ।" ऐसे कह-कह कर छोटों को भी बड़े बना देती थी। ऐसे-वैसे व्यक्तियों को भी कैसे हैंडल करें- वह युक्ति भी मम्मा ने सिखायी। ऐसे-वैसे को भी कैसे झुका देना यह मम्मा की बड़ी विशेषता थी। जब पटना में सरस्वती की पूजा हुई थी तो उस भाई ने ही मम्मा को जेवर आदि से खूब सजाकर 56 प्रकार का भोग लगाया था।
बेहद विश्वास और प्यार
मम्मा को बाबा की हर बात पर इतना निश्चय रहता था कि बाबा की बातों पर किसी यज्ञवत्स की टीका-टिप्पणी सुन ही नहीं सकती थीं। बाबा के महावाक्यों पर बेहद प्यार और विश्वास था। एक बार मैंने मम्मा से कहा, "मम्मा देखो,बाबा ने आज इस प्वाइंट को बदल दिया। पहले कहता था, 'मैं ज्योतिर्लिंगम् हूँ', अभी कहता है कि 'मैं ज्योतिर्बिन्दु हूँ', यह क्या है?" तब मम्मा तपाक से बोली, "जब बाबा ने ज्योतिर्लिंगम् अथवा ज्योति स्वरूप बताया था तो तुमको साइज माप कर बताया था क्या कि कितना है?" यह बात बिल्कुल मम्मा नहीं सुन सकती थी कि बाबा ने प्वाइंट बदल दी। हमें कहा करती थी, "उस समय तुम छोटे थे, बिन्दु क्या है, नहीं समझ सकते थे, कुछ तो समझ में आये, इसलिए बाबा अपना रूप ज्योतिर्लिंगम् अथवा ज्योति स्वरूप बताते थे। आज बाबा ने तुमको अपना ओरिजनल (मूल) स्वरूप ज्योतिर्बिन्दु बता दिया। बाबा का असली रूप ज्योतिर्बिन्दु है, गुणों का वही सिन्धु है।" कराची की बात है। मैं, दादा विश्वकिशोर और दादा विश्वरतन आदि मिलकर चित्र बनाते थे। एक दिन में ज़्यादा से ज़्यादा 2-4 चित्र बना सकते थे। एक दिन बाबा ने कहा, "मम्मा, प्रिन्सेस एलिज़ाबेथ का बर्थ-डे है। मैं चाहता हूँ कि उस दिन उसकी फेमिली के 108 लोगों को ये चित्र जायें। यह हो सकता है?" मम्मा ने कहा, "जी बाबा।" हमारे पास आकर मम्मा ने कहा, "देखो, मैंने तो बाबा को हाँ कह दिया है, पन्द्रह दिन में 108 चित्र बनाने हैं।" तब हमने कहा, "मम्मा, एक दिन में मुश्किल से 2-3 चित्र ही बनते हैं, 15 दिनों में 108 चित्र कैसे बन सकते हैं? आप ही बताओ।" मम्मा कहती थी, "हमें कौन बोल रहा है! बाबा हमें कहे चन्द्रमा को उतारकर यहाँ लगाओ, तो भी हमें चन्द्रमा को उतारकर यहाँ लगाना चाहिए। बाबा के मुख से यह वाक्य निकला है तो कैसे नहीं होगा?" सच में मम्मा एकदम शक्तिरूपा बनकर पूरे विश्वास से बोलती थी। सचमुच, वह काम दो दिन पहले ही पूरा हो जाता था। इतनी शक्ति और दृढ़ विश्वास था मम्मा में !
मम्मा गुणों और शक्तियों की भंडार थी। उनका वर्णन करना किसी से भी साध्य नहीं है। मम्मा का शुरू से ही अव्यक्त और फ़रिश्ता रूप था। हमारा पुरुषार्थ प्रोग्राम प्रमाण होता है परन्तु मम्मा का पुरुषार्थ नैचुरल था, सहज रीति का था। इसलिए उन्होंने सहज रूप से सम्पूर्णता को प्राप्त किया।
मैंने अनुभव किया है कि मम्मा के अव्यक्त होने के बाद उनकी पूजा अर्थात् जगदम्बा की, दुर्गा की पूजा बहुत ज़्यादा बढ़ी है। अव्यक्त रूप में मम्मा दुर्गा का पार्ट बजा रही है, इसके कारण दुर्गा की पूजा और अर्चना बहुत-बहुत हो रही है। कलकत्ते में तो देखने वाला दृश्य होता है कि दुर्गा पूजा क्या होती है! हमें तो महसूस होता है कि जब मम्मा साकार में थी तब ज्ञान-ज्ञानेश्वरी बन ज्ञान की गंगा बहायी और अव्यक्त होने के बाद दुर्गा का पूरा-पूरा पार्ट बजा कर भक्तों को गुण और शक्तियों का वरदान दे रही है।
मम्मा की जितना भी महिमा करें फिर भी कम है। शिव बाबा ने ज्ञान का भंडार देकर हमको ज्ञान से मालामाल कर दिया लेकिन मम्मा ने तो प्रैक्टिकल में जीवन की रीति और नीति सिखाकर हमें महान् बना दिया। मम्मा शक्ति थी, गुणदायिनी थी, ममता की मूरत थी। हमारा जीवन बनाया, संवारा और योग्य भी बनाया।
मातेश्वरी - विश्व में एक अनोखा व्यक्तित्व
ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र जी मम्मा के सम्बन्ध में अपने अनुभव सुनाते हुए कहते हैं कि मम्मा का जो प्यार था, मम्मा का जो दुलार था, जो व्यक्तित्व था वह इतना प्रभावशाली था कि बाबा द्वारा दी जा रही शिक्षाओं का मूर्तरूप था। योगी के लिए गाया हुआ है कि उसका व्यक्तित्व परान्त सुखाय होता है, उसके मन में सबके प्रति सद्भावना रहती है, सबके प्रति प्रेम रहता है। वह किसी का भी बुरा नहीं सोचता, वह सबका भला सोचता है। बाबा के जीवनमें भी हमने इन बातों को प्रैक्टिकल देखा। सिर्फ कहने मात्र नहीं। जो निन्दा करते थे, बाबा ने उनको भी मित्र की तरह ही चलाया। बाबा कहते थे, "ये भी मेरे बच्चे हैं ना ! इनको ज्ञान नहीं है, इनका कसूर नहीं है। ड्रामा अनुसार इनका यही पार्ट है क्योंकि इन्होंने अभी समझा नहीं है ना! जब समझ जायेंगे तो ऐसा नहीं करेंगे। इसलिए इनकी बात को बुरा मानने की जरूरत नहीं है।" ऐसे ही हमने मम्मा में भी यही विशेषता देखी। उनके जीवन में एक चुम्बकीय शक्ति थी, वह इस कारण से थी कि उन्होंने सबको शिशुवत् समझा। उनकी यह प्रत्यक्ष अनुभूति थी। व्यवहार उनका ऐसा था जैसे वो सचमुच में साक्षात् जगदम्बा थीं चाहे उनकी आयु कुछ भी हो। आप सोचिये, यह देह-अभिमान खत्म हो गया ना ! जब आयु का भान नहीं, पुरुष है, स्त्री है इसका भान नहीं, शत्रु है या मित्र है इसका भान नहीं। किसी भी चीज़ का देह-अभिमान नहीं तो वह योगी होगा ना ! बिना योग के देह-अभिमान कैसे चला गया? योग की शक्ति सर्वश्रेष्ठ है। योगबल से ही विजय प्राप्त होती है। विजयमाला का मणका बनता है। तो यह हमने मम्मा की ज़िन्दगी में प्रैक्टिकल देखा।
भेदभाव रहित बेहद का प्रेम
देहली में एक व्यक्ति था जो अपनी पत्नी को बहुत तंग करता था। पवित्रता के कारण उसके घर में झगड़ा होता था। अपनी पत्नी की मार-पिटाई करता था। बहुत बार कहता था कि तुम घर से निकल जाओ। पास वालों और रिश्तेदारों से वह कहता था कि यह ऐसे करती है, वैसे करती है। जब से यह सत्संग में जाती है तब से घर में ठीक सेवा नहीं करती, बच्चों की ठीक देखभाल नहीं करती। वह ग़लत बोलता था। क्योंकि जो असली बात थी पवित्रता की वह कैसे बोल सकता था ! वह बहुत बिगड़ा हुआ था अपनी पत्नी पर। एक दिन उस बहनको उसने घरसे निकाल दिया। हमने उसको एक महिला आश्रममें
रखा, जब तक उनका फैसला न हो। उस समय राजोरी गार्डन में मम्मा आयी हुई थीं। मैं उस महिला आश्रम केप्रधान को मम्मा से मिलाने के लिए ले जा रहा था। इस बीच जिसने अपनी पत्नीको घर से बाहर निकाला था उस व्यक्ति को यह समाचार मालूम हुआ कि मम्मा वहाँ आयी हुई है। वह हमारे से पहले ही सेन्टर पर पहुँचा और दरी यहाँ-वहाँ फेंकी, बल्ब तोड़ा, कुर्सियोंको इधर-उधर फेंक दिया। काफ़ी अपना तमाशा दिखाया, जोश दिखाया और झगड़ा भी किया। वह बोलने लगा, मम्सा कहाँ है,मम्मा से मेरी बात कराओ, आज मैं अपना फैसला कराके ही जाऊँगा। बहनें तो डर गयी थीं कि वह झगड़ा करने आया है, हम कैसे उसको शान्त करें! कोई भाई उस समय नहीं था। मम्मा सबसे ऊपर की मंजिल पर थी। उसने फिर बोला, मम्मा कहाँ है? आप लोगों ने मम्मा को छिपाकर रखा है, बाहर क्यों नहीं आती ? मुझे उनसे बात करनी है। मेरे से बात कराओ। बहनों ने कुछ सुना नहीं तो वह अपने आप उस मकान में घुसा और मम्मा को ऊपर-नीचे ढूँढ़ा। लेकिन उसको कहीं मम्मा नहीं मिलीं। आखिरकार वह सबसे ऊपर की मंज़िल पर गया। वहाँ एक चारपाई थी और एक कुर्सी थी। कुर्सी पर मम्मा बैठी थी। जब वह व्यक्ति वहाँ पर गया तो मम्मा कुर्सी से उठी और चारपाई पर बैठ गयी। मम्मा ने उससे कहा, "आओ बच्चे, आओ। बैठो, कैसे आये हो?" बहुत प्यार से उसको कहा। आओ बच्चे, कुर्सी पर बैठो ! मम्मा के इन शब्दों को सुनते ही वह पानी-पानी हो गया और सच्चे मन से मम्मा, माँ कहने लगा। वह अपना प्रश्न ही भूल गया। केवल माँ, माँ, माँ कहता रहा। मम्मा कहने लगी, "बोलो बच्चे, कैसे आना हुआ?" वह कहने लगा, कुछ नहीं माँ, कुछ नहीं। वह मम्मा से इतना प्रभावित हुआ कि वह शान्ति और आनन्द की अनुभूति में खो गया। मम्मा ने उससे कुछ कहा नहीं था, सिर्फ कहा था कि कैसे आना हुआ। फिर मम्मा ने कहा, "आओ बच्चे, यहाँ बैठो कुर्सी पर।" वह बड़ी नम्रता से कहने लगा, "नहीं माँ, मैं यहीं नीचे बैठूंगा, वहीं ठीक है।" मम्मा ने फिर कहा तो वह कुर्सीपर बैठ तो गया लेकिन जब अपनी बात बताने का समय आया तो बता नहीं
पाया। मम्मा को देखता रहा। शान्ति से देखता रहा। मम्मा ने भी उसको दृष्टि दी। उस दृष्टि से उसको बहुत लाभ हुआ और अनुभव भी हुआ। फिर वह वहाँ से चला गया। बाहर जाकर बोलने लगा कि मम्मा तो बहुत अच्छी है। वह मम्मा के मातृत्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसका मन बहुत हल्का हो गया और कहने लगा कि मम्मा कितनी महान है! उसका मन परिवर्तित हो गया। फिर उसने मम्मासे कहा, "मम्मा, फिर मैं कभी आऊँगा"। ऐसे कहकर वह चला गया। मम्माने उससे यह नहीं पूछा - तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, किससे पूछकर अन्दर आये ? बहुत प्यार से उससे बात की, उसको सम्मान दिया। उसका मन परिवर्तित हो गया।
अपना हो या पराया सब कहते थे यह मेरी माँ है
उन दिनों में कई लोग बाबा की भी निन्दा करते थे। यज्ञवत्स अपनी निन्दा तो सुन लेता है, चलो उसके बाद संस्था की निन्दा करे, तो भी बर्दास्त कर लेता है, ख़ास करके जब कोई बाबा की निन्दा करने लगे, जिससे हमारा अनन्य प्यार है, जिससे हमने जीवन पाया है, उसके लिए कोई उल्टा-सुल्टा, खराब बोले तो किसी को भी उत्तेजना होती है। लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए यह मम्मा का जीवन देख करके हमने सीखा। जब तक कोई आदर्श सामने न हो, तो व्यक्ति किसका अनुसरण करे ? कोई सामने ऐसा आदर्श तो होना ही चाहिए। महात्मा की परिभाषा तो यह है कि जो मन, वचन, कर्म से एक है; अन्दर-बाहर से एक है। मम्मा का जीवन निर्मल, एकदम दर्पण की तरह था। कोई भी उनके पास आकर बैठे, चाहे वह अपना हो या पराया... वह यही कहता था यह मेरी मम्मा है।
ऐसे ही अमृतसर में हुआ था। अमृतसर में काफ़ी झगड़ा हुआ था। बहुत से लोगों ने विरोध किया। बहुत बड़ा ग्रुप इकट्ठा हुआ था। हम लोगों को तार आया कि आप लोग जल्दी पहुँचो। फिर मैं भी वहाँ पहुँचा और बृजमोहन भाई के पिता जी भी वहाँ पहुँचे। सुबह ही हम पहुँचे थे। योग में एक गीत बज रहा था। वहाँ क़रीब डेढ़ हज़ार लोग इकट्ठे हुए थे। वे लोग बाहर खड़े होकर वह गीत सुन रहे थे। दरवाज़ा बन्द था। वे लोग बार-बार दरवाज़ा खट-खटा रहे थे कि हमें अन्दर आने दो, हमें मातेश्वरी जी से बात करनी है। बहनें अन्दर बैठी थीं, उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला। आख़िर उन लोगों ने दरवाज़ा तोड़ दिया। तब बहनों ने कहा कि अभी मातेश्वरी जी आप लोगों से नहीं मिलेंगी। वे और बिगड़ गये। हम इतने लोग आये हैं, तो वे कैसे नहीं मिलेंगी? हमें सिर्फ 5 मिनट मिलना है। अब नहीं मिलेंगी तो कब मिलेंगी? बाद में आप कहेंगे कि वे चली गयीं। इसलिए हम मिलकर ही जायेंगे। जब दरवाजा तोड़ा तब उनमें 5-6 लोग जो मातेश्वरी जी से बात करने के लिए मुकरर्र हुए थे, वे अन्दर चले गये। वे ऊपर गये पहली मंज़िल पर जहाँ मम्मा बैठी थीं। वहाँ क्लास भी होती थी और योग भी होता था। मम्मा वहाँ योग में बैठी थी। वहाँ एकदम गहन शान्ति थी। कोई हलचल नहीं, कोई घबराहट नहीं, कोई चिन्ता नहीं। बहुत आनन्द में मम्मा योग में बैठी थीं।
मम्मा के योग को देख उन लोगों को भी गहन शान्ति का अनुभव होने लगा। उनमें भी कोई जोश नहीं, कोई आवेश नहीं। वे लोग जाकर मम्मा के सामने बैठ गये। वे भी धार्मिक भावना वाले होने के कारण सोच रहे होंगे कि मातेश्वरी ध्यान में बैठी हैं, उनको बाधा न डालें। वे मम्मा को देखते रहे। आँखें तो खुली हैं, हिलती नहीं हैं और स्थिर हैं। उनको भी बड़ा आनन्द आया। सारे कमरे में शान्ति के प्रकम्पन हैं। उनको अनुभव हुआ कि यह तो पवित्र हैं, कमलपुष्प समान हैं, कमलनिवासिनी हैं। उनको ऐसे कई प्रकार के अनुभव हुए। वे थोड़ी देर बैठे रहे और कुछ समय के बाद मम्मा की आँखों की ओर देखने लगे। मम्मा के नेत्रों से नूर ही नूर दिखायी पड़ता था। जैसे कोई टार्च की लाइट फेंक रहा हो। मम्मा के चारों तरफ़ तो प्रकाश ही प्रकाश उनको दिखायी पड़ता था। यह क्या है- वे समझते तो नहीं थे परन्तु इतना तो समझ लिया कि इनके पीछे बहुत बड़ी साधना की शक्ति है। इन्होंने साधना की है। वरना कोई सामान्य महिला अनजान व्यक्तियों को देख डर जायेगी अथवा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लायेगी अथवा झगड़ा करेगी। परन्तु यह तो एकदम शान्त है, निश्चल है! शान्ति की शक्ति से मम्मा ने उनको शान्त कर दिया। उस समय शान्ति की शक्ति देने की ज़रूरत थी, और कुछ बोलने की आवश्यकता नहीं थी। उन निर्बल आत्माओं को मम्मा ने शान्ति की शक्ति दी। वे कुछ देर बैठे रहे। उनको लगा कि अब कुछ बोलना भी नहीं चाहिए। उन्होंने समझ लिया था कि जिस जगह हम बैठे हैं वहाँ शान्ति में रहना ही ठीक है। उनको यह भी लगा कि यहाँ थोड़ी भी आवाज़ होना अच्छा नहीं लगता है। खुद उनको एहसास हुआ कि ये कोई आवाज़ से ऊपर की दुनिया में हैं, यह असाधारण बात है जो एक जगह पर, एक ही भंगिमा में, एक ही आसन पर काफ़ी देर तक बैठी रहें! शरीर को साध लिया, नेत्रों को साध लिया और मन को भी साध लिया इसलिए इतना स्थिर जो बैठी हैं ये महान् हैं! उनमें कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने धार्मिक पुस्तकें पढ़ी थी, भक्ति की थी। वे जानते थे कि योग ऐसा होता है, उसके आस-पास ऐसी शान्ति होती है। इस प्रकार, आये हुए वे लोग अपनी शत्रुता भूल गये और खुश होकर वहाँ से चले गये।
पुरुषार्थ का अर्थ
आज भी बाबा हमसे बार-बार कहते हैं, "बच्चे, आपके योग की अवस्था ऐसी हो जिससे मनसा सेवा कर सको। अन्त में ऐसी ही सेवा होगी, लोग बहुत घबराये हुए, दुःखी, अशान्त होंगे। आप दृष्टि देकर उनको शान्ति की शक्ति देना। मम्मा के जीवन में तो इन सब प्यारी अवस्थाओं को हमने देखा है। बाबा ने मम्मा को कोई बात बार-बार नहीं कही। यही मम्मा की विशेषता थी कि बाबा ने जब कोई एक शिक्षा दी, दुबारा कहने की ज़रूरत बाबा को नहीं रही। जी हाँ, कहके मम्मा ने उसको अपने जीवन में लाया। इसको कहते हैं, पुरुषार्थ। मम्मा खुद मुरली सुनाती थी। अपनी वाणी चलाती थी तो कहती थी कि जब आप कहते हो कि मैं पुरुषार्थी हूँ, तो आप यह पुरुषार्थी शब्द किस भाव से कहते हो, किस प्रसंग में कहते हो ? जब आपसे कोई ग़लती हो जाती है, नुक़सान हो जाता है तो दूसरे को कहते हो, "भाई, मैं अभी पुरुषार्थी हूँ ना !" गोया आप 'पुरुषार्थी' शब्द का भाव यह लेते हो कि पुरुषार्थी माना जिसमें कमियाँ हों, कमज़ोरियाँ हों, ग़लती वा भूल करता रहता हो? यह पुरुषार्थी का मतलब नहीं है। पुरुषार्थी सच्चे अर्थ में उसको कहा जाता है जिसको एक बार कोई बात समझाने के बाद फिर दुबारा समझाने की ज़रूरत न रहे। यह है सच्चा पुरुषार्थ। ऐसा पुरुषार्थ करना है। यह हमने प्रैक्टिकल उनके जीवन में देखा। बाबा ने जो शिक्षा दी, उसे उन्होंने उसी तरह से पालन किया और आचरण में लाया।
बाबा के सामिप्य का आधार - परिवर्तन
बाबा ने उनको निमित्त बनाया क्योंकि मम्मा ने थोड़े समय में उन गुणों को अपने जीवन में धारण कर लिया जिनको धारण करने में अभी तक सब लगे हुए हैं। संस्कार बदलना चाहते हैं, बदलते नहीं हैं। मम्मा ने बड़ी जल्दी से अपने संस्कारों को परिवर्तन कर लिया। यह कमाल थी मम्मा की !
दृढ़ निश्चय कैसे ?
मम्मा का निश्चय बहुत दृढ़ और अटूट था। निश्चय के भी कई प्रकार होते हैं। हर एक का निश्चय एक जैसा नहीं होता। कई मानते हैं कि शिव बाबा आ गये हैं, दुनिया बहुत खराब हो चुकी है... यह वह... सारी बातों में निश्चय होगा लेकिन इस दुनिया का विनाश हो जायेगा, यह कैसे होगा, उन्हें समझ में नहीं आता। कल्प की आयु पाँच हज़ार वर्ष है, तो कई लोग कह देते हैं कि इन बातों में अभी तक हमारा निश्चय नहीं है। वे क्लास में रोज़ आते हैं, मुरली रोज़ सुनते हैं, हम बाबा के बच्चे हैं, यह भी कहते हैं लेकिन शत-प्रतिशत निश्चय हो जिसको सम्पूर्ण निश्चय कहा जाता है उनमें वह नहीं होता है। एक है सम्पूर्ण निश्चय, दूसरा है दृढ़ निश्चय। मम्मा कभी अपने उस निश्चय से हिली नहीं।
इस ज्ञान में भी बहुत प्रगति आती गयी। कोई कह सकता है कि थोड़ा-थोड़ा अन्तर आता गया। पहले सब इतनी गहरी बातों को, महीन बातों को समझ नहीं सकते थे। तो बाबाने पहले-पहले जो बातें बतायीं और बाद में जो बातें बतायीं उनमें अगर कोई ध्यान दे तो थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। मिसाल के तौर से पहले यह कहा जाता था कि आत्मा अंगुष्ठ रूप है, तो बाद में यह कहा गया कि वह ज्योति बिन्दु है।अब अंगुष्ठ तो बड़ा होता है, ज्योति बिन्दु छोटा होता है। कई उपनिषदों में भी इस बात का उल्लेख है कि आत्मा अंगुष्ठ रूप है। तो यहाँ भी पहले-पहले यही कहा जाता था कि आत्मा अंगुष्ठाकार है। फिर यह समझाया गया कि आत्मा बहुत सूक्ष्म है, अंगुष्ठ रूप कैसे हो सकती है? कई लोगों का मानना है कि आत्माके कई शरीर हैं। एक तो यह स्थूल शरीर है फिर सूक्ष्म शरीर है जो मन, बुद्धि,संस्कारका है। फिर है कारण शरीर। कारण शरीर क्या होता है? कहते हैं जो जन्म-जन्मान्तर हमने कर्म किये हैं, उनका सार रूप से एक शरीर बना होता है। उनका मानना है कि व्यक्तिको कुछ भी होता है तो वह कारण शरीरसे शुरू होता है।
अटल निश्चय कैसे ?
एक बार मम्मा को कोर्ट जाना पड़ा। एक छोटी-सी कन्या, इतने बड़े-बड़े लोग वहाँ बैठे थे। उनके सामने मम्मा से कोर्ट में यह प्रश्न पूछा गया कि दादा लेखराज सबको गोद में क्यों लेते हैं? तो मम्मा ने कहा, "वो हमारे पितामह हैं। पिता अगर बच्चे को गोद में लेता है तो क्या ग़लत करता है? कमाल है आप यह प्रश्न करते हैं! क्या यह प्रश्न शोभता है? आप भी बाप हैं, आपने कभी अपने बच्चों को गोद में नहीं लिया है?" ऐसे मम्मा ने कड़केदार जवाब दिया। कोई संकोच नहीं किया, कोई लज्जा नहीं की। क्यों? क्योंकि उनको मालूम था कि बाबा का मन कितना निर्मल है, कितना शुद्ध है और उनकी गोद तो स्वर्ग से भी बढ़कर है! जो उनकी गोद में जाता है वह ईश्वरीय वर्से का हक़दार हो जाता है। तो यह निश्चय उनका अटल रहा। अपने निश्चय से वे कभी टली नहीं। कई बार कई लोग जान बचाने के लिए कुछ इधर-उधर की बात कह देते हैं। वे कहते हैं कि बाद की बात बाद में देखी जायेगी, अभी फिलहाल हम मुश्किल में पड़े हुए हैं, तो अभी ऐसा कह दो वैसा कह दो। लेकिन मम्मा में ऐसा नहीं था। शक्ति रूपा जिसको कहा जाये, वह शक्तिशाली निश्चय मम्मा का था। तो दृढ़ निश्चय, सम्पूर्ण निश्चय, अटल निश्चय और शक्ति से भरपूर निश्चय मम्मा का था। हरेक अपने-अपने निश्चय को देखें, क्या उसमें यह सारी बातें हैं? कभी मम्मा के जीवन में कोई ऐसी बात नहीं आयी जो उनका निश्चय थोड़ा डावाडोल हो। जैसे कई लोग कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करो तो दुनिया कैसे चलेगी ? बात तो ठीक है, कैसे चलेगी दुनिया ? जबकि हम खुद इस तरीके से पैदा हुए और लोगों को कहें कि तुम इस बात को न किया करो यह कैसे कहें? वे इतना डटकर यह पवित्रता की बात नहीं कर सकते। लेकिन मम्मा बहुत डटकर जवाब देती थी। कई दफ़ा लोग उनसे कहते थे कि जिसने लड्डू नहीं खाया है उनको स्वाद का क्या पता ? तो आप कन्याओं को क्या पता कि गृहस्थ में क्या मज़ा है? घर-परिवार में क्या मज़ा है? आप लोगों को कुछ अनुभव तो है नहीं। तो मम्मा कहती थी, तुम्हारा मतलब यह है कि एक का हाथ जल गया हो, तो हम भी हाथ जलाके देखें कि हाथ जलाने से क्या होता है? अरे ! एक ने हमारे सामने अनुभव किया, हम देख रहे हैं कि हाथ जलाने से क्या नतीज़ा निकला, तो हम भी जलाके देखें क्या ? तुम विकारी हो ना, तुमने क्या सुख पाया? बताओ, क्या सुख पाया ? बेधड़क होकर मम्मा बात करती थी और सम्पूर्ण निश्चय से। तो यह मम्मा की एक बहुत बड़ी विशेषता थी।
समस्त मानवजाति की माँ
कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता होगा कि मम्मा को ही बाबा ने क्यों आगे रखा, क्यों चुना? एक बात तो निश्चय की थी और दूसरी थी पवित्रता की। पवित्रता नाम सिर्फ ब्रह्मचर्य का नहीं है; पवित्रता अर्थात् मन, वचन, कर्म की पवित्रता। विकारों को परास्त करना, उन पर विजय प्राप्त करना यह पवित्रता है। जो निषेधात्मक या बुरे संकल्प हैं वह भी ना आयें। अरे ! मम्मा का मन इतना निर्मल था, इतना शुद्ध था कि जो कोई उनके सामने गया वह नतमस्तक हो गया ! माँ, माँ शब्द उसके मुख से निकला, चाहे वह 70 साल का हो, चाहे 80 साल का हो, चाहे वह 20 साल का युवा ही हो। उनको देखते ही सबके मुख से निकलता था यह 'माँ' है, 'यह मेरी माँ' है। मम्मा से मिलने कई शहरों से देवियों के कई पुजारी आते थे। समाचार पत्रों के बड़े पत्रकार आते थे, प्रसिद्ध लेखक आते थे जिनकी पुस्तकें बहुत चलती थीं, प्रचलित थीं। मम्मा से मिलने जब आये, तो वे दंडवत् हो गये। घुटने के बल, टाँगों के बल लेट गये। छोटे बच्चों की तरह माँ, माँ कहते रहे। आँखों से आँसू बहते रहे। क्या बात थी, क्या जादू था! यह हमने अपनी आँखों से देखा कि मम्मा का कितना प्रभाव था ! उनके व्यक्तित्व का कितना प्रभाव था! उनके जो मानसिक प्रकम्पन थे उनका लोगों पर कितना प्रभाव पड़ता था! मम्मा को देखकर उनको लगता था कि यह संस्था अच्छी है, इन लोगों की धारणायें अच्छी हैं। जैसे बाबा कहते कि आप बच्चे बाबा के शो-केस के शो-पीस हो, तो मम्मा एक सैम्पल थी।
मम्मा के प्रति बाबा का असीम प्यार और सम्मान
एक समय की बात है। बारिश का मौसम था। बहुत ज़ोर से बारिश हो रही थी। सेवा-अर्थ मम्मा बाहर कहीं अन्य शहर गयी हुई थी, उनको मधुबन में आना था। तब बाबा ने कहा, "बच्चे सोचो, मम्मा आ रही है, तुम सबको पता है वो जगत की माँ है, उस जगत की माँ को बारिश में उतारोगे?" उस समय आबू में बहुत बारिश होती थी। सुबह मम्मा को पहुँचना था। बाबा ने कहा, सुबह तक यहाँ आँगन में एक शेड (Shed) जैसा बना दो जिसके नीचे टैक्सी आ जाये और मम्मा उतरकर अपने कमरे में चली जायें। मम्मा के लिए बाबा के मन में क्या ऊँची भावना थी! जब मम्मा सेवार्थ बाहर जाती थीं तो बाबा उनको आबू रोड रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाते थे। बाबा शिक्षादाता है और सर्व बच्चों को सिखाने के लिए ही खुद करके दिखाते थे कि अपने से बड़ों का रिगार्ड कैसे करें ! किसका स्थान इस यज्ञ में क्या है, उनके प्रति आपके उद्गार, आपकी भावनायें, आपका बोलना, चलना, आपका व्यवहार क्या होना चाहिए - यह बाबा करके हम बच्चों को सिखाते थे।
मम्मा ने कैसे अपने संस्कार बदले ?
शिव बाबा शिक्षादाता है, सद्गुरु है तो उनसे जो शिक्षा मिली, मम्मा ने उसको जीवन में धारण किया। मम्मा का जो शरीर था या प्रकृति थी या उनका जो चेहरा था वह बहुत सेवा करता था। मम्मा की पवित्रता के प्रकम्पन बड़े शक्तिशाली थे जो मनसा सेवा करते थे। हम भी अपने में वैसी अवस्था लायें- यह मैं कहना चाह रहा था और यही मम्मा की आश थी हम सब बच्चों प्रति।
मातेश्वरी - समस्त संसार की माँ
ब्रह्माकुमार भ्राता रमेश शाह जी12 मम्मा के सम्बन्ध में अपना अनुभव सुनाते हैं कि सन् 1955 में मम्मा मुंबई आयी थी। मेरी लौकिक माँ ने मेरे से पूछा, मातेश्वरी आयी है, आप मिलने चलेंगे? मैंने कहा, ज़रूर चलूँगा, उनसे समय ले लेना क्योंकि उनसे मिलने वाले भी बहुत होते हैं और उनके कार्यक्रम भी बहुत होते हैं। शाम को 5-6 बजे के बीच का समय मुझे उन्होंने दिया था। पहली बार मैंने मम्मा को देखा। मम्मा पार्सी स्टाइल की साड़ी पहनती थीं। पहली मुलाक़ात में ही मम्मा से एक अदृश्य और अविनाशी सम्बन्ध जुट गया। उसी सम्बन्ध के कारण मेरे जीवन में काफ़ी परिवर्तन आ गया। काफ़ी समय मम्मा हमारे साथ रही, मम्मा ने हमारी माँ बनकर कई बातों को बताया और सिखाया। कहते हैं ना कि माँ प्रथम गुरु होती है, उसी प्रकार मम्मा ने हमारे ईश्वरीय जीवन की गुरु-माँ बनकर हमें बहुत कुछ सिखाया। मैं मम्मा से टेढ़े- मेढ़े सवाल पूछता था, फिर भी मम्मा उन सवालों का जवाब मुस्कराते हुए देकर दिल को तसल्ली देती थी।
एक बार मम्मा से पूछा, "आप से पहले भी आयी हुई बहनें यज्ञ में बहुत थीं, फिर भी आप अपने पुरुषार्थ में सबसे आगे बढ़ी, आप में ऐसी कौन-सी एक बात थी जो आप सबसे आगे चली गयी?" मम्मा ने कहा, "यह तो बहुत कठिन प्रश्न है क्योंकि कोई व्यक्ति एक ही बात से आगे नहीं बढ़ता। कई बातें होती हैं, उन सबके तालमेल से व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ता है।" मैंने कहा, नहीं, मैं एक ही बात जानना चाहता हूँ जिससे ही आप पुरुषार्थ में आगे बढ़ी। काफ़ी समय सोचने के बाद मम्मा ने कहा, मैं समझती हूँ कि मेरे में जो दृढ़ता है ना कि एक बार कोई संकल्प किया तो उसको किसी भी हालत में पूर्ण करना ही है, इसी गुण से मैं आगे बढ़ रही हूँ।
सर्व को सम्मान देने वाली सर्वमान्य माँ
मम्मा हरेक को बहुत स्नेह देने के साथ-साथ सम्मान भी देती थी। एक बार की बात है, मैंने मम्मा से कहा, "मम्मा, आपकी एक बात मुझे अच्छी नहीं लगती।" मम्मा ने कहा, "कौन-सी बात?" मैंने कहा,"मम्मा, लौकिक में कोई भी माँ अपने बेटे को आप-आप नहीं कहती, तू-तू कहती है या तुम-तुम कहती है। आप मुझे 'आप' शब्द का संबोधन करती हैं, इसका अर्थ है आपने मुझे अपना बच्चा स्वीकार नहीं किया।" मम्मा ने कहा, ऐसा नहीं है। आपने बाबा को अपना बनाया है उससे पूर्व मम्मा ने आपको अपना बनाया है। मैंने कहा, तो मुझे तुम क्यों नहीं कहती हैं? यह 'आप-आप' शब्द मुझे बहुत भारी लगता है। मैं उम्र में भी आप से बड़ा नहीं हूँ और आप भविष्य विश्व में विश्वमहारानी श्री लक्ष्मी के रूप में, वर्तमान में जगज्जननी अम्बा के रूप में, भगवती सरस्वती के रूप में पूजी जाती हैं, फिर भी आप मुझे ऐसे क्यों संबोधित करती हैं?" तो मम्मा कहने लगी, "देखो रमेश जी, इस सृष्टि नाटक में हर आत्मा श्रेष्ठ है, वह अपना पार्ट बजा रही है और हम सब उस परमपिता परमात्मा की सन्तान आत्मा भाई-भाई हैं। इसलिए आपस में प्यार और रिगार्ड से व्यवहार करना चाहिए। लोकव्यवहारार्थ मैं आप के लिए 'आप' शब्द का प्रयोग करती हूँ। आप यह नहीं समझो कि मम्मा ने मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार नहीं किया है।" इस प्रकार, मम्मा से हमें यह सीखने को मिला कि हर व्यक्ति के साथ दूरांदेशी बन सम्मान और स्नेह से व्यवहार करना चाहिए।
सदा सहारा और साथ देने वाली अभयकारी
मुंबई में जब पहली बार प्रदर्शनी करनी थी तो मैंने मम्मा से कहा। मम्मा ने कहा, कितना खर्चा आयेगा। मैंने कहा, मम्मा बाबा की छुट्टी तो मिलनी चाहिए ना! मम्मा ने कहा, बाबा की तरफ़ से मम्मा छुट्टी देती है, कितना खर्चा होगा बताओ। मैंने कहा, क़रीब इतने रुपये। मम्मा ने कहा, ठीक है, आप प्रदर्शनी कर लो। इस प्रकार मम्मा की सम्मति मेरे लिए हमेशा रही।
प्रदर्शनी के लिए चित्र बनाना पड़ता था। चित्र बनने के बाद करेक्शन (संशोधन) के लिए उनको बाबा को भेजते थे। बाबा करेक्शन करके भेज देते थे। एक बार तो बाबा ने पत्र में लिखा, बच्चा तो चित्र के पीछे पागल बन गया है। ज़्यादा चित्र लेकर क्या करना है। झाड़, त्रिमूर्ति, गोला ये तीन चित्र ही काफ़ी हैं। उस पत्र के नीचे कोने में मम्मा के उत्साह भरने वाले शब्द भी थे, रमेश बच्चे, आप जो कर रहे हो वो ठीक है, बाबा आपकी परीक्षा ले रहे हैं। आप चित्र बनाते रहो। इस प्रकार, हमारे जीवन में मम्मा का सहारा कहिये, हिम्मत कहिये, तरफ़दारी कहिये वह हमेशा रही। उसी साल 29 दिसंबर को प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ जिसमें मम्मा भी आयी थी।
ड्रामा पर अचल और अटल विश्वास
यह उस समय की बात है जब मैं मधुबन में था। मम्मा हापुड़ का चक्कर लगाकर आने वाली थी। उसी दिन शाम को मम्मा का आगमन हुआ। उस समय उनका भव्य स्वागत हुआ। रात को बाबा-मम्मा बैठे हुए थे। मम्मा हापुड़ के हंगामे के बारे में बाबा को समाचार सुना रही थी। मैं भी वहीं था। मम्मा, बाबा को सुना रही थी कि वहाँ के विरोधी लोगों ने क्या किया, कैसे किया आदि-आदि। बाबा शान्तचित्त होकर सुन रहे थे, मम्मा एकरस होकर बता रही थीं। मैं भी उनका वार्तालाप सुन रहा था। सुनता रहा। मेरे मन में एक प्रश्न उठा। बाद में मैंने मम्मा से पूछा, "मम्मा, आप खुद हापुड़ की परिस्थिति देख कर आयी हैं और वो सारी बातें बाबा को सुना भी रही हैं। जब आप ये सब देख रही थीं तो क्या आपके मन में कोई हलचल आदि उत्पन्न हुई थीं?" मम्मा ने कहा, "मुझे कोई हलचल नहीं होती है।" फिर मैंने पूछा, "क्यों नहीं होती है?" मम्मा ने बाबा को देखते हुए बताया, "एक बात का हमें पक्का निश्चय है कि 5000 वर्ष पहले जैसे स्थापना हुई थी, अब भी वैसे ही हो रही है। अभी जो उतराव- चढ़ाव, विघ्न-परिस्थिति आदि आ रही हैं वे 5000 वर्ष पहले भी आयी थीं। ऐसी कई बातें आयेंगी और जायेंगी। इसलिए इन बातों से हमारी अवस्था नहीं बिगड़ती है और हम भी हलचल में नहीं आते हैं।" इस प्रकार, ड्रामा के ऊपर मम्मा का जो अचल विश्वास था उससे हमें सीखने को मिला।
प्यार हम नहीं देंगे तो और कौन देंगे ?
मैंने एक बार मम्मा से पूछा, "मम्मा, आपके पास जो भी आता है, अपने कष्ट आदि सुनाता है या दूसरों की कमी-कमजोरियों के बारे में सुनाता है, कोई अच्छी बात सुनाने तो आता ही नहीं।" मम्मा ने कहा, "यह बात सच है।" फिर मैंने कहा, "ऐसे कोई हमें सुनाते हैं तो उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है और उस व्यक्ति को उसी दृष्टि से देखना शुरू करते हैं, तो आप के ऊपर ऐसा प्रभाव नहीं होता?" मम्मा ने कहा, "मैं समझती हूँ कि हरेक पुरुषार्थी है। हरेक पुरुषार्थ करके अपने को बदलने का, आगे बढ़ाने का प्रयत्न कर रहा है। प्रयत्न करते-करते कई आगे बढ़ते हैं, कई फेल हो जाते हैं, कई धीरे-धीरे चलते हैं, कई रुक जाते हैं। मम्मा यह भी जानती है कि यह एक स्कूल है। स्कूल में सब तरह के विद्यार्थी होते हैं- कोई तेज़, कोई डल (कमजोर)। परीक्षा में सब पहले नंबर में तो पास नहीं होते। कोई पहला, कोई दूसरा, कोई तीसरा, कोई नापास भी होते हैं। हमें इस बात का भी निश्चय है कि राजधानी स्थापन हो रही है, राजधानी में नंबरवार होते ही हैं। राजधानी के जो भी वर्ग हैं सब यहीं से बनने हैं और हरेक उस पद के आधार से बने संस्कार अनुसार यहाँ अपना पुरुषार्थ करते हैं। इसलिए कोई किसी के बारे में कुछ भी कहे लेकिन मैं किसी के अवगुण अथवा कमियों को अपने चित्त पर नहीं रखती। उस बच्चे के बारे में मैं अपने में नकारात्मक भाव का निर्माण कभी नहीं करती। जो बच्चा सुनाने आया है उसके प्रति भी और जिसके बारे में सुना रहा है उसके प्रति भी मेरे मन में कल्याण एवं स्नेह की भावना रहती है। सबको आगे बढ़ाने की शुभ-भावना ही रहती है। दोनों के प्रति मैं स्नेह और रिगार्ड दिखाती हूँ। क्योंकि उनको हम प्यार न देंगे तो और कौन देगा ?"
जब मम्मा मुंबई आयी थी, उस समय बाबा ने उनको श्री लक्ष्मी-श्री नारायण का चित्र बनाने की ज़िम्मेवारी दी। घाटकोपर की नलिनी बहन के पिता जी काकू भाई के पास परमानन्द नामक एक आर्टिस्ट था, उससे चित्र बनवाते थे। मम्मा कहती थी कि यह प्रथम विश्व महारानी विश्व महाराजा का चित्र है, इसलिए चित्र बहुत अच्छा होना चाहिए। हर बात के लिए मम्मा अव्यक्त बाबा के पास सन्देशी भेज कर पूछा करती थी। बाबा बताते थे कि श्री लक्ष्मी श्री नारायण के गले में माला कितनी होनी चाहिएँ, माला में कितनी हीरे, मोती, रत्न आदि होने चाहिएँ और यहाँ तक कि कमर पर बाँधने वाली कमरबन्ध पर भी कितने हीरे आदि होने चाहिएँ। इस प्रकार हर बात की सविस्तार जानकारी बाबा से मम्मा लेती थी। यह भी हमारे लिए भविष्य सेवा के लिए एक प्रशिक्षण था।
मुझे मातेश्वरी जी से अति प्रेम क्यों रहा ?
कई बार जब मैं अपनी मस्ती में मस्त होता हूँ तब अपने आपसे उल्टे-सीधे प्रश्न पूछता हूँ। एक बार ऐसी ही अवस्था में मैंने अपने आपसे प्रश्न पूछा, रमेश, तुझे बाबा से ज़्यादा प्यार है या मम्मा (श्री मातेश्वरी जी) से? यह प्रश्न हंसी में पूछा था। अन्दर से जवाब मिला कि ज़्यादा प्यार मम्मा से है। जैसे घर में भी छोटे बच्चे से पूछते हैं, तुझे मम्मी ज़्यादा मीठी लगती है या पाप्पा ? इसी तरह से यह भी छोटे बच्चों का प्रश्न था। इसका कारण भी कई बार सोचता हूँ तो मालूम पड़ता है कि मातेश्वरी जी हमारे साथ 18 मास हमारे लौकिक घर में रही। रोज़ मोटर में जाना, सेन्टर पर रोज़ मातेश्वरी जी की मुरली सुनना तथा रात को साथ में भोजन करना आदि कई बातों के कारण मातेश्वरी जी से ज़्यादा श्रद्धायुक्त प्रेम हो गया। जब मैं और ज़्यादा सोचता हूँ तो लगता है कि अहो ! मातेश्वरी जैसे कि अनुपम पुरुषार्थ की प्रतीक थीं। पिताश्री तो परमपिता परमात्मा के भाग्यशाली रथ भागीरथ थे, साठ वर्ष का उनका अनुभवी तन था और खुद भी अपार सम्पत्ति के स्वामी थे, इसलिए मेरी समझ में, उन्हें पहले नम्बर का पद पाने के लिए इतना पुरुषार्थ करने की ज़रूरत ही नहीं थी। यह पद तो उनके लिए स्वाभाविक ही था। मातेश्वरी जब इस यज्ञ में आयी, उनकी तो आयु भी छोटी थी, न उन्हें गृहस्थ-व्यवहार का अनुभव था और न ही पैसे आदि से मददगार बन सकीं अर्थात् सभी दृष्टि से देखें तो परिस्थितियाँ उनके लिए विपरीत ही थीं और पिताश्री को सभी प्रकार से परिस्थितियाँ सानुकूल थीं।
एक बार पूना में हम मातेश्वरी के साथ, पानशेत डैम जो टूट गया था और जिसके कारण वहाँ बहुत नुक़सान हुआ था, देखने के लिए गये। वहाँ थोड़ा पैदल चलना पड़ा। चलते-चलते हम सब आगे चले गये तो मम्मा अकेली पीछे रह गयीं। हम सब रुक गये मम्मा के लिए और हमने मम्मा से कहा, "मम्मा, आप तो चलने में पीछे रह गयीं। हमारे साथ कई बार बाबा भी घूमने आते थे परन्तु वह इतने वृद्ध होते हुए भी सदा साथ में रहते थे या कई बार हमसे आगे भी चले जाते थे।" मम्मा ने हंसते-हंसते कहा, "रमेश जी, बाबा की बात निराली है, वहाँ तो एक तन में दो आत्मायें और उनमें भी एक तो परमात्मा और दूसरी उनकी अपनी आत्मा, तो ज़रूर दो इंजन वाली गाड़ी एक इंजिन वाली गाड़ी से फास्ट जायेगी ना ! यहाँ पूना आने के लिए भी देखो रास्ते में दो इंजन लगाते हैं तो जरूर उसमें रहस्य भरा हुआ है। बाबा तो ज़रूर आगे जायेंगे क्योंकि हम सब तो एक इंजन वाले हैं। फिर बाबा तो है ही इंजन और हम सब हैं डिब्बे तो ज़रूर इंजन आगे ही रहेगा तभी तो डिब्बों को खींच कर ले जायेगा।"
मातेश्वरी जी का यह उत्तर सत्यता पर विशेष रोशनी डालता है और इसी कारण समझिये मुझे ज़्यादा प्रेम मम्मा से है क्योंकि उन्होंने अपना विश्व महारानी श्री लक्ष्मी का पद बहुत ही पुरुषार्थ से पाया है। अथक, संकल्पातीत पुरुषार्थ का चैतन्य रूप हमारी मातेश्वरी जी थीं। इसका कारण? कारण के उत्तर बहुत हैं परन्तु यहाँ पर कुछ ही बता रहा हूँ :-
- एक कारण यह था कि मम्मा कभी ज्ञान के बारे में अपना ही चिन्तन-मंथन और तर्क-वितर्क नहीं करती थीं अर्थात् जितना वह जानती थी, उतना ही दूसरों को बताती थीं। ज्ञान की कई ऐसी बातें हैं जो परमात्मा ने अभी तक स्पष्ट नहीं बतायी होंगी। तो उनके बारे में हम तर्क-वितर्क करते हैं कि ऐसा होगा या वैसा होगा अर्थात् हम अपनी मत को ईश्वरीय मत में मिलाने की चेष्टा करते हैं। उदाहरणार्थ, मैंने सन् 1962 में मधुबन में मातेश्वरी जी से प्रश्न पूछा था कि मम्मा, ये सब सन्देशियाँ कहाँ जाती हैं? उस समय उनकी आत्मा शरीर में होती है या कहीं और स्थान पर होती है? मम्मा ने फ़ौरन कहा था कि इस बात पर अब तक बाबा ने रोशनी नहीं डाली है। हमने पुनः कहा, आपने विचार तो किया होगा ना ? आपका विचार क्या कहता है? तब मम्मा ने कहा, हम तो विद्यार्थी हैं और पढ़ते हैं इसलिए जितनी पढ़ाई शिक्षक ने पढ़ायी है उतना ही सोचते हैं। जबकि पढ़ाने वाला सामने सम्मुख बैठा है तो क्यों नहीं उनसे पूछ लेते? मैं जो भी अपनी मत सुनाऊँगी वह मनमत हो जायेगी क्योंकि उसके लिए ईश्वरीय मत क्या है वह मालूम नहीं। रात को ही आप बाबा से यह प्रश्न पूछना। रात्रि क्लास में बापदादा ने वह रहस्य खोला जो आज सबको मालूम है। ज्ञान का अर्थ है अपनी शक्ति और अशक्ति दोनों का ज्ञान। मम्मा के पास दोनों बातों का पूर्ण ज्ञान था। इसलिए वह पुरुषार्थ में सबसे आगे निकलीं।
- मम्मा के तीव्र पुरुषार्थ का दूसरा कारण यह है कि मम्मा में दृढ़ संकल्प शक्ति थी। संकल्प शक्ति का माप करना मुश्किल है। परन्तु कम-ज्यादा कह सकते हैं। मम्मा ने जो एक बार निश्चय किया, वह हमेशा करके ही रहती थी। एक बार क्या हुआ कि कानपुर के अनन्य बहन-भाइयों ने मम्मा को निमंत्रण देने के लिए बहुत ही मीठे प्यार भरे गीत टेप करके मुंबई में भेजे। गीतों में दर्द भी था और उसी कारण सब सुनने वालों को उन गीतों ने घायल किया और सबकी आँखों से पानी बहने लगा। मम्मा की आँखों में भी पानी भर आया परन्तु मम्मा ने कहा कि यह बूँद आँखों से बाहर नहीं आयेगी। इतनी प्यार भरी आवाज़ को सुनकर भी अश्रुजल बूँद बनकर आँखों से बाहर तक नहीं आया। वह बूँद अपने आप आँखों के अन्दर ही छिप गयी। हमने मम्मा से पूछा कि आपकी आँखों से क्यों नहीं आँसू बाहर आये ? मम्मा ने तब अपने पुरुषार्थ का शब्दचित्र दिखाया। मम्मा ने कहा कि यज्ञ की शुरूआत थी। कराची में बाबा अलग क्लिफ्टन पर रहते थे और मम्मा और अन्य यज्ञवत्स अलग स्थान पर रहते थे। रात को अचानक बाबा की याद आयी और मम्मा की आँखों से सारी रात अश्रुजल बहता रहा। आँखों से इतना अश्रुजल बहा कि मम्मा का तकिया भीग गया। बाद में बाबा को मालूम पड़ा तो बाबा ने मम्मा को एकान्त में समझाया कि बच्ची, आज के बाद कभी रोना नहीं। मम्मा ने कहा कि उसी दिन से मैंने बाबा से वायदा किया है कि मेरी आँखों से एक भी बूँद आँसू नहीं गिरेगा। तब से आज तक मैं इस बात में नापास नहीं हुई हूँ। इसी कारण आज मैंने जब कानपुर के गीत सुने तब आपको बताया कि ये जल आँखों से बाहर नहीं निकलेगा। मम्मा से हमने एक बार पूछा था कि मम्मा बचपन में आपने अपने भविष्य के बारे में कुछ तो सोचा होगा! आप क्या बनना चाहती थीं? मम्मा ने कहा, "उस समय तो भक्तिमार्ग की कल्पना थी। मैं सोचती थी कि मीरा आदि का गायन अभी तक सब करते हैं तो मैं भी ऐसा कर्त्तव्य करके जाऊँ जो सारी दुनिया मुझे याद करे।" देखिये, सचमुच मम्मा ने अपने बचपन के संकल्प को सिद्ध कर दिखाया।
- तीसरी बात यह है कि मातेश्वरी जी के पास तर्क करने की बहुत ही जबर्दस्त शक्ति थी। सामने वाले को दो सेकण्ड में शान्त करना ये गुण मम्मा के पास था। हमने एक बार अपने लौकिक घर में, मुंबई की एक सांसारिक गीता पाठशाला के बहुत से शास्त्र पढ़े-लिखे मित्रों को, मम्मा से मिलाने के लिए बुलाया। मेरे मन में प्रश्न था कि मम्मा ने तो शास्त्र नहीं पढ़े हैं, फिर कैसे उन्हें ज्ञान से सन्तुष्ट करेंगी? पहला पहला प्रश्न यही निकला कि क्या आप इस गीता को झूठी गीता कहती हैं? मम्मा ने तुरन्त ही कहा, "आप प्राप्ति को देखो। पाण्डवों ने यह गीता सुनकर क्या प्राप्ति की ? गीता समाज के लिए थी परन्तु समाज कलियुगी बन गया। पाण्डव हिमालय चले गये। यादव यादवास्थली में ख़त्म हो गये। कौरव तो कुरुक्षेत्र के युद्ध में खत्म हो गये। ज्ञान इतना ऊँचा होते हुए भी क्यों समाज में विकृति पैदा हुई ? और यहाँ अब परमात्मा कहते हैं कि मैं सतयुग की स्थापना गीताज्ञान सुनाकर करता हूँ अर्थात् गीता से विश्व परिवर्तन करता हूँ। तो बोलो, जिस गीता से विश्व परिवर्तन हुआ, उसको सच्चा मानें या जिससे समाज में विकृति पैदा हुई उसको सच्चा मानें? इसमें अन्धश्रद्धा की बात ही नहीं, सत्यता की बात है। आप लोग पढ़े-लिखे हैं तो जरूर अन्धश्रद्धा से परे जाकर सत्यता के बारे में निष्पक्ष होकर सोचिये।" यह सुनकर एक ने दूसरे को कान में कहा कि अरे इन्होंने प्राप्ति की बात को लेकर हम सबका मुँह बन्द कर दिया। सचमुच बाद में चर्चा का रूप ही बदल गया।
- मातेश्वरी जी ने अपने पद और ज़िम्मेवारी को अन्त तक निभाया। थी तो वह एक कन्या परन्तु जिस क्षण उनको मम्मा का पद या तख्त मिला उसी क्षण के बाद वे उस तख्त या आसन से कभी नीचे नहीं उतरी। सदा उन्होंने सर्व के प्रति माँ की शुभ दृष्टि रखी। हम बच्चों को भी बाबा ने पद, तख्त या आसन दिया है कि आपस में भाई-भाई की या भाई-बहन की दृष्टि-वृत्ति रखो। क्या हम सदैव ये दृष्टि या वृत्ति रख पाते हैं? नहीं, तो इसका कारण यह है कि हम अपने पद को घड़ी घड़ी छोड़ देते हैं।
मातेश्वरी जी से सब सन्तुष्ट थे और मातेश्वरी जी भी सभी से सन्तुष्ट थी। मातेश्वरी जी किसी के भाव-स्वभाव के प्रभाव में नहीं आती थीं। सबको प्रेम से जीतती थीं इसीलिए कोई उनको पराया नहीं समझता था। ईश्वरीय ज्ञान की नयी बातों को न मानने वाले भी मातेश्वरी जी के व्यक्तित्व (Personality) की महिमा करते थे। उन्हें सभी अपनी माँ समझते थे।
मैं और मातेश्वरी
ब्रह्माकुमार भ्राता बृजमोहन जी13 मातेश्वरी जी के साथ का अपना अनुभव इस प्रकार लिखते हैं कि मैं उन सौभाग्यशाली बच्चों में से हूँ जिन्होंने मातेश्वरी जी से साकार में अलौकिक स्नेह और पालना ली है। मातेश्वरी जी से मेरी पहली मुलाक़ात 1955 में हुई थी। तब मैं चार्टर्ड एकाउंटेंट की पढ़ाई पढ़ रहा था और इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के दिल्ली (कमला नगर) सेवाकेन्द्र पर ईश्वरीय ज्ञान-योग की शिक्षा प्राप्त करते हुए मुझे कुछ महीने ही हुए थे। तभी अपने लौकिक माता, पिता और भाई के साथ मैं पिताश्री और मातेश्वरी जी (जिन्हें हम स्नेह से बाबा और मम्मा कहकर पुकारते हैं) से मिलने आबू पर्वत स्थित मधुबन स्वर्गाश्रम में गया था। प्रथम मिलन के समय हिस्ट्री हाल (History Hall) में सामने एक सन्दली पर पिताश्री जी और दूसरी पर मातेश्वरी जी विराजमान थीं। मैंने दोनों की ओर बारी-बारी से देखा। मम्मा एक अलौकिक छवि से मुस्करा रही थी। उनके मुखमंडल से रूहानियत टपक रही थी। उनके नयनों से असीम स्नेह बरस रहा था। मम्मा का व्यक्तित्व अति प्रभावशाली और सहज ही आकर्षण करने वाला था। मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने न तो कुछ कहा था और न ही कुछ बाह्य संकेत किया था। वह तो बस बैठी हुई मुस्कराये जा रही थीं। परन्तु उनकी उस मुस्कान में ही कुछ ऐसा जादू था कि मुझे उनकी ओर से बुलाने की स्पष्ट महसूसता हुई। मैं स्वतः ही उठा और जाकर अलौकिक माँ के पास बैठ गया ! अहा ! कितना तपत बुझाने वाला था उनका सान्निध्य ! उसी क्षण मैंने जान लिया कि भक्तजन माँ को 'शीतला' कहकर क्यों पुकारते रहे हैं! माँ ने अपने पंख समान कोमल और कमल समान पवित्र हस्तों से मुझे प्यार की थपकी देते हुए मेरा मुख मीठा कराया था।
जितने दिन मैं आबू में रहा, मैंने एक अजीब-सी उंलझन महसूस की जिसका जिक्र मैंने आज तक किसी से भी नहीं किया है। आप सोचते होंगे कि ऐसी भी कौन-सी अनोखी उलझन हो सकती है जिसको मैंने अब तक अपने पास ही रख छोड़ा है? वह बात दरअसल यह थी कि क्लास में, 'चैम्बर' में (उन दिनों बाबा और मम्मा क्लास के बाद ज्ञान की चिट चैट करने के लिए दूसरे कमरे में आकर बैठा करते थे जिसको 'चैम्बर' कहते थे। 'टोली' भी मिला करती थी) या जहाँ-कहीं भी बाबा और मम्मा दोनों विराजमान होते, तो मैं इस दुविधा में पड़ जाता कि दोनों में से किससे दृष्टि लूँ और किसकी दृष्टि से वंचित रहूँ ? एक ओर ज्ञानसूर्य का तेजस और प्रकाश होता तो दूसरी ओर ज्ञानचन्द्रमाँ की चाँदनी और शीतलता होती। मैं दोनों को ही इकट्ठा प्राप्त करते रहना चाहता था। खैर, बाद में तो मैंने उसका हल निकाल लिया और. दोनों से बारी-बारी से दृष्टि लेता रहता।
लौकिक माँ की भी अलौकिक माँ
यों तो मम्मा एक युवा अवस्था की कन्या ही थीं परन्तु यज्ञमाता का कार्य संभालते ही उनकी शारीरिक आकृति में भी इतनी आश्चर्यजनक तबदीली आ गयी थी कि वृद्ध से भी वृद्ध व्यक्ति की उनसे स्वाभाविक तौर पर माता की ही भासना आती थी। वैसे तो मैंने उसी दिन अपने लौकिक पिता तथा अन्य बड़ी आयु वाले 'बच्चों' को भी उनसे 'मम्मा-मम्मा' कहकर मिलते और बरतते हुए देखा था परन्तु इसका एक और अनोखा अनुभव होना अभी बाक़ी था। गुरुवार के दिन मधुबन आश्रम से ध्यानावस्था में जाकर शिव बाबा के पास भोग ले जाने वाली 'सन्देशी' शारीरिक नाते से मम्मा की लौकिक माता थीं। उस लौकिक माता को अपनी ही लौकिक बच्ची को अपनी 'अलौकिक माँ' के सम्बन्ध से और मम्मा को उसके साथ 'अलौकिक बच्ची' के सम्बन्ध से व्यवहार करते देखा, तो देखता ही रह गया। पहली बार जब मैंने इस दृश्य को देखा तो मेरे रोमाञ्च खड़े हो गये थे। मम्मा के सामने उनकी लौकिक माता वृद्धा होने के
बावजूद भी सचमुच उनकी बच्ची के समान ही लग रही थीं। किस प्रकार संस्कार,स्वभाव और कर्त्तव्य के बदल जाने से मनुष्यात्मा का सारा वातावरण तथा उसके सारे सम्बन्ध ही बदल जाते हैं, इस सत्यता की छाप मुझ पर उसी घड़ी लग गयी थी। मैं सौभाग्यशाली था कि मेरा भी सारा ही लौकिक परिवार ज्ञानमार्ग में चल पड़ा था। उस क्षण के अनुभव से 'लौकिक' नातों को 'अलौकिक' में परिवर्तित करने में मुझे बड़ी मदद मिली थी।
एक सम्पूर्ण मातृदेवी
मम्मा दिव्यगुणों की सम्पूर्ण साक्षात् देवी थीं। उनके संकल्प चट्टान की तरह अडिग, बोल मीठे तथा सारयुक्त और कर्म श्रेष्ठ तथा युक्तियुक्त थे। मम्मा इतनी योगयुक्त, गम्भीर और शान्त रहती थीं कि उनके आस-पास के वातावरण में सन्नाटा छाया रहता था जो सभी को प्रत्यक्ष महसूस होता था। ऐसा लगता था कि मानो वह कोई चलता-फिरता लाइट हाउस और माइट हाउस हो। मम्मा की चाल फ़रिश्तों जैसी थी। आश्रम-वासियों को पता भी नहीं चलता था कि कब मम्मा उनके पास से गुज़र गयी अथवा कब से वह उनके पीछे खड़ी हुई उनकी एक्टिविटी का निरीक्षण कर रही थीं। मम्मा के बोल बहुत ही मधुर, स्नेहयुक्त और सम्मान पूर्ण होते थे। मम्मा ने मुझे सदा 'बृजमोहन जी' कहकर बुलाया। पत्र में वह मुझे सदा 'लाडले बृजमोहन जी' लिखती थीं। पत्र द्वारा या व्यक्तिगत मिलने पर वह सबसे पहले शारीरिक तबीयत का हाल-चाल अवश्य पूछती थीं। उस अलौकिक माता का बच्चों से जितना असीम प्यार था उतना किसी लौकिक माता का क्या होगा ? मुझे तो ऐसे लगने लगा था कि जैसे कि मेरी लौकिक माँ भी मम्मा ही हैं।
प्रेमपूर्ण और नेमपूर्ण ज्ञानदेवी
हम बच्चे जब भी मम्मा से, 'प्रेम में नेम (नियम) नहीं' की उक्ति के अनुसार, कोई ऐसा कार्य करने को कहते जिससे हमारा अलबेलापन दिखायी देता हो, तो वह हमें बहुत ही मीठे ढंग से कर्मों की गुह्य गति के बारे में सावधान कर देती थीं। एक बार जब मम्मा अम्बाला छावनी सेवाकेन्द्र पर पधारी थीं तो मैं नंगल (जहाँ पर मैं सर्विस करता था) से उन्हें मिलने के लिए गया और वहीं उनसे नंगल चलनेका अनुरोध करने लगा। मम्मा कह रही थीं कि कुछ दिनों के बाद एक प्रोग्राम बनाओ। परन्तु मम्मा के भावार्थ को न समझने के कारण मैंने उनसे दुबारा अनुरोध किया कि मम्मा आप कल ही चलो ना! तो मम्मा ने कहा, "मैं तो चल सकती हूँ परन्तु जो अन्य आत्मायें पंजाब के भिन्न-भिन्न केन्द्रों से मुझे अम्बाला में मिलने आयेंगी और वे निराश होंगी, उसका बोझ तुम पर पड़ेगा।" तब मैंने समझा कि वह कुछ दिन के बाद नंगल चलने को इसलिए कह रही थीं कि सबको उनके प्रोग्राम की सूचना मिल सके। फिर तो मैंने उनकी बात मान ली और वह थोड़े दिनों के बाद नंगल पधारीं भी। इससे स्पष्ट होता है कि मम्मा लवफुल और लाफुल (प्रेमपूर्ण और नेमपूर्ण) की दोनों योग्यताओं का इकट्ठा प्रयोग किस कुशलता से करती थीं! वह प्रेम के लिए नेम या नेम के लिए प्रेम को तिलाञ्जलि नहीं देती थीं।
यज्ञ-रक्षिका माँ
साकार मम्मा ने तो रुद्र-ज्ञान-यज्ञ का कारोबार संभालने में पिताश्री का साथ अन्त तक दिया पर मम्मा के सम्पूर्ण होने के बाद जब अव्यक्त मम्मा की पधरामणी सन्देशी के तन में हुई तो आप जानते हैं कि उन्होंने पहले-पहले क्या कहा ? मम्मा ने उस समय उपस्थित बच्चों से यही कहा, "अब आप बच्चों को यज्ञ का कार्यभार संभालने में पिताश्री का पूरा हाथ बंटाना है। पिताश्री वृद्ध हैं, उन पर मम्मा के जाने से अधिक बोझ न पड़े।" कितनी पिता-स्नेही थीं हमारी मम्मा !
उस समय मुझे स्वप्न में भी यह विचार नहीं था
उस घटना को तो मैं कभी भूल ही नहीं सकता जो मम्मा के सम्पूर्ण होने से थोड़े ही समय पूर्व मेरे आबू जाने पर घटी थी। एक दिन मैं प्रातः क्लास के बाद नक्की झील का चक्कर लगाने निकल गया। सारा चक्कर लगाकर लौटते हुए मैं आश्रम के समीप पहुँचा ही था तो क्या देखता हूँ कि मम्मा अपनी ब्राह्मणी, जमुना बहन के साथ पाण्डव भवन से निकल झील की ओर जा रही हैं। मम्मा को देखते ही मेरी तो खुशी का ठिकाना न रहा। जमुना बहन के बताने पर कि मम्मा थोड़ा पैदल जा रही हैं, मैं पलट कर उनके साथ पुनः घूमने चल पड़ा। चलते-चलते हम उस जगह पहुँच गये जहाँ से अनादरा प्वाइंट को रास्ता जाता है। सहसा मम्मा ने कहा, चलो आज अनादरा प्वाइंट तक चलते हैं। मैं तो बहुत ही खुश हो गया और मम्मा के साथ तरह-तरह की बातें करके फूला नहीं समा रहा था। मैंने कहा, "मम्मा, अब तो आप जानती हो कि मैं बृजमोहन हूँ और मैं जानता हूँ कि आप मम्मा हैं पर सतयुग में तो यह सब याद नहीं रहेगा।" मम्मा रहस्यपूर्ण रीति से मुस्कराती रहीं। मम्मा से वह मिलना, बहलना इतना सुखद प्रतीत हो रहा था कि सारे रास्ते खुशी से मेरे रोम खड़े हो गये और मुझे बिल्कुलपता ही नहीं लगा कि मैं दुबारा इतना चल लिया हूँ। जमुना बहन ने बताया कि मम्मा भी रोज़ इतनी दूर नहीं जाती हैं। अगले दिन मम्मा और बाबा ने मेरे साथ फोटो निकलवाये जो आज भी मेरे कमरे में लगे हुए हैं। पर... पर तब मुझे स्वप्न
में भी यह विचार नहीं था कि कुछ ही दिनों बाद माँ हमसे विदाई लेने वाली हैं और इस कल्प की हमारी यह अन्तिम मुलाक़ात थी। पर लगता है कि मम्मा को यह सब ज्ञात था और शायद इसीलिए उस दिन मुझ पर इतना प्यार लुटाये जा रही थी !
विद्या विशारदा वाग्देवी ने ही मुझे वाक्-कला सिखायी
भ्राता ब्रह्माकुमार निर्वैर जी14 अपने अनुभवों को अपने स्मृति-पटल पर लाते हुए कहते हैं कि मम्मा ने हमें एक वरदान दिया था। किसी की भाषण कला इतनी अच्छी होती है कि लोग कहते हैं 'इनकी जुबान पर सरस्वती बसी हुई है'। उस तरह का वरदान मम्मा से मुझे मिला। मुंबई में एक सर्व धर्म सम्मेलन हो रहा था। हम लोगों को उसका निमंत्रण मिला। मैं उसमें नहीं जाना चाहता था। मम्मा ने कहा कि इनको (मुझको) भेज दो। वह सम्मेलन मुस्लिम नेताओं ने बुलाया था। था सर्व धर्म सम्मेलन लेकिन आयोजक मुस्लिम धर्म के थे। तब तक मैं व्यक्तिगत रूप में ईश्वरीय ज्ञान सुनाता और चर्चा करता था लेकिन सभा में भाषण नहीं किया था। जब मुझे निमंत्रण मिला, तो मैंने कहा, मैंने कभी भाषण किया नहीं, तो मैं कैसे जा सकता हूँ उस सम्मेलन में ! रात का समय था। यह बात मम्मा के कानों में पड़ी तो मम्मा ने कहा, उसको मेरे पास बुलाओ, मैं अभी उसको भाषण करना सिखा देती हूँ। मैं मम्मा के पास जाकर बैठा और मम्मा ने अपना हाथ मेरी पीठ पर रखा और धीरे-धीरे मुझे भाषण करना सिखाया। सम्मेलन का विषय था विश्व-शान्ति। चार मिनट तक मम्मा ने मुझे विश्व शान्ति क्या है, उसकी आवश्यकता क्यों है, विश्व में शान्ति कब थी और विश्व शान्ति का स्थापन-कर्त्ता कौन है? ये सब बातें बतायीं। जब मैंने जाकर भाषण किया तो 40 मिनट के उस भाषण को लोग एकाग्रचित्त होकर सुन रहे थे। लोगों को सबसे ज़्यादा आकर्षक हमारा ही भाषण लगा था। हम ने कल्पवृक्ष, सीढ़ी और सृष्टि- चक्र के चित्रों को दिखाकर भाषण किया था तो लोगों ने उन चित्रों की भी बहुत मांग की थी। इस प्रकार, खुद वाग्देवी सरस्वती माँ ने मुझे वाक्-कला सिखायी। यह हमारे जीवन का बहुत विशेष और स्मरणीय प्रसंग है।
माँ का निःस्वार्थ प्रेम
सबसे पहले मैं मम्मा से 1959 में मुंबई के वाटरलू मेन्सन एरिया जो कोलाबा के नज़दीक है, मिला था। उस समय ज्ञान में आते मुझे सिर्फ एक महीना ही हुआ था। मम्मा मुंबई में लगभग एक महीना रही। उस समय मेरी उम्र क़रीब 20-21 साल थी। मम्मा का व्यक्तित्व जो था वह बड़ा तेजोमय और स्वाभाविक रूप में एक माँ की भासना देता था। उनसे मिलने पर मुझे ऐसा लगा कि मैं पहले भी इनसे मिला हूँ। यह बात उनसे कही भी थी। मम्मा ने कहा, हाँ, कल्प पहले मिले थे परन्तु उस समय समझ में नहीं आया था।एक दिन भोजन के समय मैं उनके पास था, तो उन्होंने अपना भोजन शुरू करने से पहले, पहली गिट्टी मुझे खिला कर, बाद में स्वयं खायी। उस घटना से मुझे ऐसा अनुभव हुआ, जैसे बहुत दिनों के बाद मेरी माँ मुझे फिर से मिली। मम्मा ने कहा, हाँ, यह अलौकिक संगम है।
सदा अपने को बाबा के सामने एक विनम्र बच्ची के रूप में ही प्रत्यक्ष किया !
हर शाम को विशेष मम्मा का क्लास 5 से 6 बजे तक रखा जाता था। मैं भारतीय नौसेना में था, हमारे लिए यह एक अच्छी सुविधा थी। मम्मा की क्लास घंटा-पौना घंटा चलती थी। मम्मा का ज्ञान स्पष्ट करने का तरीका जो था वो बहुत विशिष्ट और सरल था। हमारे मन में ज्ञान के बारे में अथवा धारणा के बारे में कुछ प्रश्न होते थे लेकिन पूछते नहीं थे। आश्चर्य की बात यह है कि मम्मा की वाणी में उन सब शंकाओं और प्रश्नों के स्वतः ही उत्तर मिलते थे। इसके बारे में मैंने मम्मा से पूछा, मम्मा आप को कैसे मालूम कि हमारे मन में यही प्रश्न हैं, जिनके उत्तर आप ने दे दिये? मम्मा ने कहा, ऐसी बात तो नहीं, मैं बाबा को याद करती हूँ, बाबा की तरफ़ से जो प्रेरणा आती है उसके अनुसार मैं सुनाती हूँ। उन्होंने कभी यह नहीं कहा, मुझे पता पड़ा था। सदा माँ ने बाबा की तरफ़ ही इशारा किया, अपने को सदा उनकी विनम्र बच्ची के रूप में ही प्रत्यक्ष किया।
रोम-रोम में ज्ञान समाया हुआ था और अंग-अंग परमात्मा की याद दिलाता था
मम्मा जिस विषय को उठाती थी उसकी अत्यन्त गहराई में चली जाती थी। विशेष, उन दिनों में मम्मा कर्म के ऊपर बहुत विस्तार से और गहन रूप में समझाती थी। परमात्मा के परिचय के बारे में तथा पवित्रता की धारणा के ऊपर भी बहुत गहराई से समझाती थी। गहराई के साथ समझाने की विधि बहुत सरल, सहज और रमणीक होती थी। सुनने वालों को धारणा भारी और कठिन नहीं लगती थी। सचमुच, सुनने वाले को लगता था कि वे विद्या की देवी सरस्वती हैं और उनकी विद्या से उनका जीवन धारणा रूपी धन से सम्पन्न हो रहा है।
उनकी धारणा बहुत उच्च कोटि की थी। मम्मा बोलती बहुत कम थी। केवल क्लास में या किसी से व्यक्तिगत रूप में मिलते समय ही हम उनकी आवाज़ सुनते थे। परमात्मा की याद में लवलीन रहने की उनकी एक स्वाभाविक स्थिति होती थी। उनके आस-पास के प्रकम्पनों से जो अपनेपन का अनुभव होता था वह बहुत सुखद प्रतीत होता था। उनके हर शब्द में ज्ञान समाया रहता था। यूँ कहे, उनके रोम-रोम में ज्ञान समाया हुआ था। उनको देखते ही परमात्मा की याद में हमारा मन मगन हो जाता था। याद करने की मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। परमात्मा पिता की याद सहज आती थी।
कर्म के बन्धनों और लौकिक सम्बन्धों से मुक्त करने वाले उनके वरदानी बोल
जब मैं भारतीय नौसेना में था तो छुट्टियों में बाबा ने दो महीने के लिए सेवार्थ जयपुर भेजा था। ईश्वरीय सेवा में मुझे बहुत आनन्द आया। मैंने आकर मम्मा को सारा सेवा समाचार सुनाया। फिर मम्मा से कहा, मम्मा, मेरा दिल कर रहा है कि मैं इस ईश्वरीय सेवा में लग जाऊँ। मम्मा ने मुझे अति उत्साहवर्धक सलाह दी, "यह तो बहुत खुशी की बात है। मनुष्य को चाहिए क्या, खाने के लिए दो रोटी और पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े ! वो यज्ञ से मिल जायेंगे। भले ही, आप अपना और दूसरों का कल्याण करो।" मम्मा के ये प्रेरणादायक बोल, अपने सर्व लौकिक बन्धनों को प्यार से चुक्ता कर मुक्त होने में मेरे बहुत मददगार साबित हुए। मम्मा के साथ की वो बैठक, वो रूहरूहान मेरे जीवन के लिए एक अमूल्य निधि है। मुझे बहुत गर्व है कि ईश्वरीय सेवा में पूर्णरूपेण समर्पित होने के लिए मेरी प्रेरक और सहायक शक्ति मम्मा ही थी।
उनके लिए इस पुरानी दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं था
मुंबई में मम्मा 2-3 बार आयी। प्रथम प्रदर्शनी के चित्र सन् 1964 में तैयार हो रहे थे। उनके बारे में मम्मा कुछ सुझाव देने की सेवा के हिसाब से आयी थी। उस समय की एक घटना मुझे याद आ रही है। एक बार रमेश भाई की कार में हम जा रहे थे। पीछे की सीट पर मम्मा, जमुना दादी और सामने वाली सीट पर मैं और रमेश भाई बैठे थे। हम वाटरलू मेन्सन से रमेश भाई के घर की तरफ़ जा रहे थे। चौपाटी होकर जाना पड़ता है। चौपाटी पर एक विज्ञापन का बोर्ड लगा हुआ था रोजर ड्रिंक्स (रोजर कंपनी का पेय) का। एक बोतल थी उसमें से पेय नीचे गिलास में गिरता था तो वो बोतल खाली होती थी, फिर वो बोतल भर जाती थी और वह पेय नीचे गिलास में गिरता था और बोतल खाली होती थी। इस प्रकार का इलेक्ट्रानिक विज्ञापन बना हुआ था। रमेश भाई और हमारे बीच में बातचीत हो रही थी कि हम भी ऐसा एक ज्ञानयुक्त चित्र बनायें प्रदर्शनी के लिए। इसके बारे में हमने मम्मा से पूछा, "मम्मा, वह चित्र आपको कैसे लगा?" मम्मा ने तब हमें ऐसा उत्तर दिया कि वह हमारे संकल्प और सपने में भी नहीं था ! मम्मा ने कहा, "जिस समय मम्मा क्लास में होती है उस समय ही सामने दृष्टि डालती है, नहीं तो मम्मा के लिए इस दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं है।" इतना वैराग था मम्मा का इस पुरानी दुनिया और दुनियावी वस्तुओं से !
निमन्त्रण-पत्र आदि को अन्तिम रूप भी मम्मा ही देती थी
बाबा उन दिनों में बड़े-बड़े व्यक्तियों को अर्थात् राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय राजनेता, धर्मनेता तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को ईश्वरीय सन्देशयुक्त तार भेजते थे। उन तारों (टेलीग्रामों) की विषयवस्तु तैयार कर बाबा मम्मा को दिखाते थे कि वे उसको देखें और अगर उसमें कोई कमी वा परिवर्तन की आवश्यकता है तो पूरा करें अथवा करायें। उस समय मम्मा मुंबई में थी, उनके साथ विश्वकिशोर भाऊ भी थे। उन्हीं दिनों में यह समाचार आया था कि छठवें पोप पाल भारत में आने वाले हैं। उनको ईश्वरीय निमन्त्रण का एक तार भेजना था। तार का सन्देश बाबा ने, मम्मा की स्वीकृति के लिए मुंबई भेजा था। मम्मा, भाऊ, रमेश भाई और मैंने मिलकर उस निमन्त्रण को अन्तिम रूप दिया। उस दिन रात 12 बजे पोप को टेलीग्राम भेजा। उसमें सन्देश था "आपका भारत में आने के लिए हार्दिक स्वागत है। यह भारत परम पिता, परम शिक्षक और परम सद्गुरु की अवतरण भूमि है जहाँ पर आकर आप ईश्वरीय सन्देश लेकर अपने जीवन को इतना श्रेष्ठ बना सकते हैं कि मुक्ति और जीवनमुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। आपकी इस सेवा के लिए ब्रह्माकुमारी बहनें-भाई उपस्थित हैं।" इस टेलीग्राम के फलस्वरूप जगदीश भाई और रमेश भाई के परिश्रम पर पोप के साथ मुलाक़ात की अनुमति मिली थी। दादी जी, दादी निर्मलशान्ता जी, शील दादी, रमेश भाई, जगदीश भाई आदि पोप पाल छठवें से मिलने गये थे। उस समय उनको और उनके साथ के कई बिशपों को त्रिमूर्ति, गोला, कल्पवृक्ष आदि चित्रों को विशेष रूप में सजाकर सौगात के रूप में दिया गया था। उन दिनों में मम्मा मुरली को भी चैक करती थी। गणमान्य व्यक्तियों को पत्र अथवा तार आदि भेजना होता था तो विषयवस्तु को मम्मा ही अन्तिम रूप देती थी। इस तरह से उस समय मम्मा का विशेष पार्ट रहा। सभी में उत्साह भरने का, मनोबल बढ़ाने का और आगे चलाने का कार्य भी मम्मा करती थी।
अनुपम कुशल संगठक और प्रशासक
मम्मा में संगठन करने की शक्ति (Orgnising capacity) बहुत श्रेष्ठ और जबर्दस्त थी, सबको साथ लेकर चलने की कुशल कला थी। उनमें व्यक्तिगत धारणायें थीं, उदाहरणार्थ बाबा ने कहा और मम्मा ने धारण किया इसमें नम्बर वन थी। सहज रूप से माँ के जो संस्कार होते हैं वे उनके अन्दर पूर्णरूपेण थे। समर्पित होने का उनका वह तरीक़ा, जिसको झाटकू कहते हैं, कई भाई-बहनों के लिए एक आदर्श बना, बहुतों के जीवन-उद्धार का प्रेरणा-स्रोत बना। सबसे बड़ी बात है कि उनको सबने यज्ञमाता के रूप में स्वीकार कर लिया था। उनको देखते ही हरेक को स्वाभाविक रूप से माँ की भासना आती थी। उन्होंने हरेक की जरूरतों को बिना माँगे पूरा किया। किसी को कोई वस्तु माँगने का अवसर ही नहीं दिया। कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि इनकी उम्र क्या है, मेरी उम्र क्या है। किसी धर्म, जाति, पंथ वाला हो हरेक ने यही बेहद का अनुभव किया कि यह मेरी माँ है, मेरी हितचिन्तक है। उस महान् आत्मा में इतनी शक्ति थी ! इसलिए, ड्रामा कहिये या बाबा कहिये उनको ही यज्ञमाता, मातेश्वरी, मम्मा बनाया गया।
अहोरात्रि साधनालीन देवी गौरी
मम्मा ने शुरू से अन्त तक अपनी साधना में किसी भी प्रकार की ढील नहीं होने दी। रोज़ दो-ढाई बजे उठकर विशेष शान्ति में रहने का, बाबा को शक्तिशाली रूप में याद करने का अभ्यास करती थी। उनकी डायरी में ज्ञान के एक-एक विषय पर बहुत गहराई की बात लिखी हुई थी। उनकी डायरी पढ़ने का सुअवसर मुझे जयपुर में मिला था। एक बहन जो एक साल मम्मा के साथ थी उसने मम्मा की डायरी से उन ज्ञान-बिन्दुओं को अपनी डायरी में लिखा था, वह डायरी हमें पढ़ने के लिए मिली थी। उन ज्ञान-बिन्दुओं को पढ़कर मुझे लगा कि मम्मा ने ज्ञान का कितना विचार सागर मंथन किया होगा, कितना ज्ञान की गहराई में गयी होगी और कितना उनको धारणा करने का अभ्यास किया होगा! विद्यादेवी सरस्वती का वर्णन तो कवि, विद्वानों ने किया है लेकिन उस विद्यादेवी के रूप और कर्त्तव्य को हमने अपनी आँखों से देखा है, उनसे सीखा और उस माँ के बच्चे बने - यह हमारा परम सौभाग्य है।
मम्मा बहुत निर्मान थी
मधुबन से ब्रह्माकुमार दादा चन्द्रहास जी, जो मम्मा-बाबा के अति नज़दीक रहे हैं और यज्ञ के आदिरत्नों में एक हैं, अपने अनुभव सुनाते हुए कहते हैं कि एक बार मैंने मम्मा से पूछा, "मम्मा आप मम्मा कैसे बन गयी?" मम्मा ने जवाब दिया, "मैं मम्मा नहीं बनी हूँ, आप लोगों ने मुझे मम्मा बनाया।" मैंने पूछा, "कैसे?" मम्मा ने उत्तर दिया, "बाबा ने यज्ञ की ज़िम्मेवारी दीं और बच्चों ने भी मान लीं तो मुझे सबको अपने बच्चे समझकर चलना पड़ा।"
मम्मा से हमारा लौकिक रिश्ता था। हम दूर के सम्बन्धी थे। छोटेपन से ही हम मम्मा को देखते थे। लौकिक रिश्ते के कारण हमारा उनके घर में आना- जाना होता रहता था। मम्मा की स्टुडेन्ट लाइफ भी हमने देखी है। जब मम्मा, बाबा के सामने आयी तो हमें आश्चर्य हुआ कि यह वही राधे है जिनको हम स्टुडेन्ट-लाइफ में देखते थे ! मम्मा की बुद्धि इतनी तेज़ थी कि बाबा के महावाक्य कानों में पड़ते ही जीवन में धारण कर लेती थी। मम्मा ज्ञान में आते ही ऐसे परिवर्तित हो गयी कि हम देख कर बहुत आश्चर्य चकित रह गये। स्टुडेन्ट- लाइफ में जो इतना मॉडर्न और फैशनएबुल हो वो इतनी तीव्रगति से बाबा के ज्ञान को धारण करे, हमें बहुत वण्डर लगता था। बाबा ने भी मम्मा को इतनी जल्दी पहचान लिया। एक दिन मुरली सुनाते-सुनाते बाबा ने मम्मा से पूछा, "बच्ची बताओ, मैं तुम्हारे ऊपर बलिहार हुआ हूँ या तुम मेरे ऊपर बलिहार हुई हो ?" मम्मा चुप रही और मुस्कराती रही। फिर बाबा ने ही उत्तर दिया, "पहले बाबा मम्मा के ऊपर बलिहार हुआ, पीछे मम्मा, बाबा के ऊपर। कैसे ? मम्मा के आते ही बाबा ने एक कमेटी बना कर अपनी सारी प्रापर्टी उनको विल कर दी। समझा मम्मा, कैसे बाबा तुम्हारे ऊपर बलिहार हुआ!" यह सुन मम्मा हंस पड़ी। मम्मा के आते ही बाबा उनको पहचान कर, एक के बाद एक जिम्मेवारियाँ देते गये, देते गये और मम्मा भी उन सबको स्वीकार करते-करते यज्ञमाता बन गयी।
जैसे कोई चिड़िया घास अथवा अनाज के दाने को पहले टुकड़ा-टुकड़ा करती है और बाद में अपने बच्चों के मुँह में डालती है वैसे, मम्मा भी बाबा के गुह्य ज्ञान को पहले अपने में धारण कर, अनुभव कर उसको सहज बनाकर हम बच्चों को सुनाती थी। मम्मा, ज्ञान को इतना सरल बनाकर सुनाती थी कि ईश्वरीय ज्ञान से अनजान व्यक्ति को भी ज्ञान सहज समझ में आता था, उसकी बुद्धि में बैठ जाता था और वह खुश हो जाता था। मम्मा की यह खूबी देखकर बाबा उनको ज़्यादातर टूअर पर भेजते थे। मम्मा के अन्तिम 8 साल टूअर पर ही बीते। एक- दो बार मेरे को भी मम्मा के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। लखनऊ, कानपुर, पटना आदि शहरों में मम्मा के साथ मैं भी गया था।
मम्मा इतनी निर्मान थी कि साधारण सेवा भी वे अपने हाथों से ही करती थी। बाबा का भोग भी वे ही बनाती थी। मम्मा ने हर बच्चे को बेहद के प्यार से पाला, पोषा और हर ज़रूरत को पूरा किया। मम्मा की याद आती है तो हमें क्या कहें कुछ कहने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं, मन उनके स्नेह में गद्गद हो जाता है।
सर्व विद्याओं की सम्पूर्ण देवी- मातेश्वरी
ब्रह्माकुमार भ्राता सन्तराम जी15 मातेश्वरी जी के साथ के अपने अनुभवों को इस प्रकार लिपिबद्ध करते हैं कि सितम्बर 1956 में मेरा सौभाग्य जगा जब ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ। उसी साल अक्टूबर के अन्त में हम मधुबन में मम्मा- बाबा से मिलने आये। उस समय मुख्यालय कोटा हाउस में था तथा धौलपुर हाउस में हमको ठहराया गया था। जब प्रथम दिन कोटा हाउस के हॉल में बाबा- मम्मा से प्रथम मिलन मनाने के लिए आया तो देखा कि मीठी मम्मा शान्त मुद्रा में मुस्कराहट बिखेरती हुई अलौकिक आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं। बाबा की गोद लेने के पश्चात् मम्मा की गोद में गये। मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि मेरी बहुत समय की बिछड़ी माँ मुझे मिल गयी हो। उनकी दृष्टि इतनी निर्मल, स्नेहमयी तथा शक्तिशाली थी कि अपलक नेत्रों से देखता रहा, समय की विस्मृति हो गयी थी।
अवतरित देवी
वास्तव में, प्रथम मिलन में ही मुझे उनसे अवतरित देवी की भासना आ रही थी, जो पवित्रता, सर्व दिव्य गुणों एवं धारणाओं से सम्पन्न हो इस पतित दुनिया को पावन बनाने हेतु ही अवतरित हुई हों। उनकी दृष्टि में अलौकिक जादू था। वह जीती-जागती आध्यात्मिक चुम्बक अनुभव हो रही थी। मम्मा यज्ञ- प्रबन्धन का उत्तरदायित्व सम्भालते हुए बच्चों की उन्नति और शिक्षा के लिए भी समय निकाल लेती थीं।
सौभाग्य की परम लॉटरी
मैं मधुबन यात्रा पूरी कर, अभी कानपुर पहुँचा ही था कि हमारे सौभाग्य की परम लॉटरी खुली। बाबा का तार आया कि मम्मा प्रथम बार यज्ञ से बाहर निकलकर ईश्वरीय सेवार्थ कानपुर आ रही हैं। मम्मा के आने से वहाँ पर नया उमंग-उत्साह छा गया। प्रातः मुरली क्लास में और बाद में भी तिलक नगर सेवाकेन्द्र पर, जहाँ आदरणीया मम्मा ठहरी हुई थीं, हम पहुँच ही जाते थे।
इसके अतिरिक्त जब मम्मा आस-पास के स्थानों जैसे उन्नाव, लखनऊ अथवा इलाहाबाद जाती थीं तो वहाँ भी उनका सान्निध्य पाने हेतु हम जाते रहे। बाल भवन खुलने के पश्चात् मम्मा काफ़ी समय वहाँ रही। फिर पटना तथा कलकत्ते में भी ईश्वरीय सेवार्थ मम्मा का आगमन हुआ। इस प्रकार, मम्मा के अंग-संग रहकर उनकी विशेषताओं एवं सूक्ष्म शक्ति आदि को सूक्ष्म स्तर पर देखने, परखने, समझने तथा उनसे लाभान्वित होने का बार-बार अवसर मिला।
ज्ञान-ज्ञानेश्वरी
ज्ञान के क्षेत्र में मम्मा सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि थीं। परमात्मा के महावाक्यों को गहन रुचि तथा समझ के साथ बार-बार पढ़ती थीं। उनके अनुभव के अनुसार मुरली जीवन को सम्पूर्ण एवं सम्पन्न बनाने का एकमात्र साधन था। वास्तव में अभ्यास तथा गहन मनन-चिन्तन के आधार पर उन्होंने यह प्रतिभा विकसित कर ली थी कि ज्ञान-बिन्दु सुनते या पढ़ते ही वह उसके व्यवहारिक रूप का अनुभव कर लेती थीं तथा उसमें सहज स्थित हो जाती थीं। अतः ईश्वरीय ज्ञान पर उनका पूर्ण अधिकार हो गया था। वह किसी भी ज्ञान-बिन्दु को सम्पूर्ण अधिकार से समझाती थीं जिससे सुनने वाले को उसकी यथार्थता के विषय में सहज निश्चय हो जाता था एवं उसके संशय दूर हो जाते थे।
योग-योगेश्वरी
मम्मा को योग लगाना नहीं पड़ता था किन्तु वह निरन्तर, सहज व स्वतः योगिन थीं। मन्मनाभव, मध्याजीभव के महामंत्र को वह स्वाभाविक रूप में धारण किये हुए थीं। अतः इस धरा पर चलते-फिरते भी इससे न्यारी भासती थीं। ऐसा लगता था जैसेकि उनकी बुद्धि सदा परमधाम में लटकी हुई हो तथा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हो। वह जब योगनिष्ठ होती थीं तो वातावरण में सन्नाटा छा जाता था। अन्य व्यक्तियों को शान्ति एवं शक्ति के शक्तिशाली प्रकम्पन अनुभव होते थे। उनमें योगियों के समस्त लक्षण विद्यमान थे जिस कारण उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था।
दिव्यगुणों की जननी
दिव्यगुणों की धारणा के क्षेत्र में मातेश्वरी जी निश्चित ही अद्वितीय एवं सर्वगुण सम्पन्न थीं अथवा यूँ कहें कि वह दिव्यगुणों की जननी थीं। अन्तर्मुखता, गुणग्राहकता, गंभीरता, धैर्यता, मधुरता, हर्षितमुखता, प्रसन्नता, साक्षीदृष्टि, पवित्रता, शालीनता, अचल अडोल व एकरस स्थिति, ड्रामा पर सम्पूर्ण निश्चय आदि सर्वगुणों की साक्षात् चैतन्य मूर्ति थीं। जिस ब्रह्मा-वत्स ने भी उनका सान्निध्य प्राप्त किया, उनकी दिव्यता से प्रभावित हुए बिना रह नहीं सका।
इन दिव्यगुणों की कठिन परीक्षा एक बार तब हुई जब कोटा हाउस एवं धौलपुर हाउस के बंगलों को राजस्थान सरकार ने खाली कराने का निर्णय लिया। सरकार के अनेक पुलिस कर्मचारी व अधिकारी इन बंगलों को खाली कराने के लिए मुख्यालय में आये। उस समय यज्ञ में अनेक बूढ़ी मातायें एवं कुछ युवा समर्पित भाई-बहनें रहते थे। यज्ञ का समस्त सामान उन बंगलों में भरा हुआ था जो कई ट्रक लोड हो सकता था। कोई उचित अन्य स्थान उस समय उपलब्ध नहीं था, जहाँ पर मुख्यालय को स्थानान्तरित किया जा सके। उस समय यज्ञ आर्थिक संकट से भी गुजर रहा था। यज्ञपिता ब्रह्मा बाबा मधुबन के बाहर सेवा पर गये हुए थे। आप कल्पना करें कि ऐसी विकट परिस्थिति में किसी भी व्यक्ति की मनोस्थिति क्या होगी, कितनी हलचल व चिन्ताभरी सोच चलेगी! मम्मा ऐसी विषम परीक्षा के समय पर विशेष योग का प्रयोग किया करती थीं तथा स्वयं कठिन से कठिन परिस्थिति को भी अपनी परिपक्व, अचल, अडोल व एकरस स्थिति द्वारा पार कर लेती थीं। उस समय भी विशेष योग का कार्यक्रम रखा गया तथा स्वयं मम्मा ने, जो शक्तिसेना की सेनानी थीं, अपनी गहन शान्ति की शक्ति द्वारा उस स्थान को रूहानियत का मज़बूत किला बना दिया। उन्हें अचल- अडोल, एकरस स्थिति में देखकर अन्य यज्ञवत्स भी निःसंकल्प स्थिति में रहे एवं साक्षीद्रष्टा बनकर परिस्थिति का सामना किया। उस समय भ्राता जगदीश चन्द्र जी ने अदम्य साहस व शक्ति का परिचय देते हुए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी द्वारा मकानों को खाली कराने के लिए तीन मास का और अवसर ले लिया। उन्होंने दिल्ली से जयपुर आकर गृहसचिव से मिलकर उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया एवं उनके द्वारा आबू स्थित एस.डी.एम. को शीघ्रगामी स्थगन आदेश भिजवा दिया। इस परीक्षा की घड़ी में मातेश्वरी जी के अनेकानेक गुणों की परीक्षा तथा प्रत्यक्षीकरण भी हो गया। विजय हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है इसकी सत्यता का भी सबको प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।
अविचल निष्ठा और इच्छा मात्रम् अविद्या
सत्य तो यह है कि मम्मा ने ब्रह्मा बाबा के तन में अवतरित परमात्मा शिव के अति गुह्य व गोपनीय राज़ को अत्यन्त गहराई से परख कर, शीघ्र ही अपनी कुशाग्र एवं पवित्र बुद्धि का परिचय दे दिया था। यज्ञ के इतिहास से यह स्पष्ट है कि बापदादा की प्रेरणाओं व आज्ञाओं को यथार्थ रीति समझकर उन्हें यज्ञ में कार्यान्वित कराने का उत्तरदायित्व उन्होंने पूर्ण कुशलता से निभाया। वह अन्य यज्ञवत्सों को बार-बार समझाती थीं कि यह आज्ञा किसकी है! स्वयं जानी- जाननहार आलमाइटी अथॉरिटी की है। अतः ड्रामा में यह कार्य पहले से ही पूरा हुआ पड़ा है, हमें केवल निमित्त होकर हाथ-पैर चलाने हैं।
एक बाप दूसरा न कोई
उनके जीवन के अनेकानेक प्रसंगों का अध्ययन करने पर निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि मम्मा ने "मेरा तो एक शिव बाबा, दूसरा न कोई" महामंत्र के अति गुह्यतम राज को पूर्ण रीति से परख कर इसकी सत्यता का अनुभव कर लिया था। इस प्रकार देह तथा देह के सम्बन्धों एवं दैहिक जगत् से उनकी सम्पूर्ण वैराग्य वृत्ति हो गयी थी। वह देह में रहते भी सर्वथा देह से न्यारी आत्मा अनुभव करती हुई फ़रिश्ता बनकर कार्य-व्यवहार करती थीं। वह स्वयं इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति का अनुभव करते हुए अन्य वत्सों को भी इस धारणा को दृढ़ बनाने का महत्त्व बताती रहती थीं। सदा हर कर्म में मीठे बाबा को करावनहार अनुभव करते हुए कर्मेन्द्रियों से कर्म कराती थीं एवं इसी रूहानी मस्ती में सदा उड़ती रहती थीं। उनका प्रत्येक संकल्प, बोल और कर्म बेहद की सेवा की वृत्ति, स्मृति, भावना तथा कामना से संचालित होता था। उनके हर श्वास व संकल्प में बाबा ही समाया हुआ था।
पीड़ा हरने वाली माँ काली
मम्मा के कलकत्ता प्रवास के समय मैंने देखा कि पूरी लगन के साथ मम्मा मनसा एवं वाणी की सेवा करती थीं। उस समय वहाँ एक बड़ा अनाज का थोक मारवाड़ी व्यापारी आया जो सट्टे में बड़े घाटे के कारण जीवन से हार कर जीवघात करने के विषय में सोच रहा था। मैंने उसे बताया कि इस समय तुम्हारे ही भाग्य से, जगदम्बा सरस्वती जिनका मन्दिर यहाँ काली माँ के रूप में स्थित है व पूजा की जाती है, चैतन्य में तुम्हारी नगरी में पधारी हुई है। अतः उन्हें अपनी परिस्थिति व वेदना बताकर निराकरण पा लो। जब वह व्यक्ति मम्मा के सामने आया तो मम्मा ने उसे शक्तिशाली एवं रूहानी प्यार भरी दृष्टि दी तथा मुस्कराकर बोली, "बच्चे, यह जीवन तो हार-जीत का एक खेल है। इसमें कोई भी आत्मा सुख- दुःख, हार-जीत, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा से अछूती हो ही नहीं सकती। शिव बाबा के ज्ञान को गहराई से समझो, योगाभ्यास करो, ट्रस्टी होकर कार्य-व्यवहार करते रहो तो स्वतः ही सब ठीक हो जायेगा।" वह मम्मा की यह मीठी लोरी सुनता जा रहा था तथा उसके नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे थे। मम्मा ने पुनः मीठी रूहानी दृष्टि देकर उसके दिल की पीड़ा हर ली। उसके बाद मैं थोड़े दिन जब तक कलकत्ते में रहा वह नियमित क्लास में आता था। कुछ वर्ष पश्चात् जब मैं इलाहाबाद में कुम्भ के मेले की सेवा पर उपस्थित था तो एक दिन अचानक वही व्यक्ति अपनी कार से उतरकर आ गया एवं मुझे पुरानी स्मृति दिलायी। पुनः वह हर प्रकार से स्वस्थ, सम्पन्न तथा सुखी हो गया था एवं बार-बार मीठी मम्मा के उन ढ़ांढ़स देने वाले शब्दों को याद कर रहा था जिन्होंने उसमें नया जीवन फूँक दिया था।
सम्पूर्ण देवी
मैंने यह भी अनुभव किया कि यद्यपि सारे दिन मम्मा नये-नये व्यक्तियों के ज्ञान नेत्र खोलने की सेवा में लगी रहती थीं फिर भी व्यस्त रहते हुए भी थकती नहीं थीं। रात को सोने से पहले अगले दिन की मुरली पढ़कर ही सोती थीं। कलकत्ते के प्रवास के दौरान एक दिन अवसर पाकर मैंने उनसे पूछ ही लिया कि मम्मा आप तो सम्पूर्ण देवी अनुभव हो रही हैं, आप क्या पुरुषार्थ करती हैं? मम्मा मुस्करायी तथा बोली, "बच्चे, इस समय तो हर ब्राह्मण-आत्मा का मुख्य पुरुषार्थ ही है निरन्तर आत्मिक स्थिति में स्थित होकर परमधाम में बिन्दु रूप बाप को याद करना, उसको करावनहार समझकर व स्वंय को निमित्त समझकर यज्ञसेवा सच्चे दिल से करते रहना। मम्मा भी इसी पुरुषार्थ में व्यस्त रहती है।"
सचमुच, आज से 42 वर्ष पहले ही मातेश्वरी जी ने चारों विषयों के सार को गहराई तक अनुभव कर लिया था। इसी आधार पर सतयुग की प्रथम विश्व महारानी श्री लक्ष्मी बनकर वे विश्व में, सतोप्रधान राज्य-प्रणाली की परम्परा प्रारम्भ करने के निमित्त बनेंगी।
जन्मते ही पहले माँ का दर्शन, बाद में पिता का दर्शन
ब्रह्माकुमार भ्राता अमीरचन्द जी16 मम्मा के साथ का अपना अनुभव इस प्रकार बताते हैं कि मातेश्वरी जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1959, दिसम्बर मास में हुई। उस समय मुझे ज्ञान में चलते कुछ महीने ही हुए थे। मातेश्वरी जी कानपुर से सहारनपुर आने वाली थी। मैं उस समय करनाल में था। मातेश्वरी जी से मिलने की उत्सुकता मन में बहुत थी। जैसे ही मैं स्टेशन पर पहुँचा तो गाड़ी से मातेश्वरी जी उतर रही थीं। वे नीचे उतरकर सबसे नयन मुलाक़ात कर रही थीं। उस समय मैंने देखा कि उनका व्यक्तित्व रूहानी चुम्बक सदृश्य था। नयन, चेहरा रूहानी शक्ति से चमक रहे थे। जब उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी तो मुझे सहज ही अशरीरीपन की अनुभूति होने लगी। आज हम उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करते हैं लेकिन उस समय मातेश्वरी जी की नज़र पड़ते ही हमें वह अवस्था प्राप्त हुई थी। मातेश्वरी जी का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनको जो भी देखते थे, यहाँ तक कि लौकिक लोग भी, उनके सम्मान में खड़े हो जाते थे। उन्हें वे एक विशेष महात्मा नज़र आती थीं तथा मम्मा के चरण स्पर्श भी करते थे। मातेश्वरी जी उनको भी अपनी स्नेह भरी एवं करुणा भरी दृष्टि से निहाल करती थी।
उस समय समाज में यह ज्ञान नया होने के कारण आने वाले भाई-बहनों को कई प्रश्न और संशय होते थे। लेकिन मातेश्वरी जी इस ज्ञान को इतना स्पष्ट और सरल करके सुनाती थी कि उनके बहुत प्रश्नों का निवारण हो जाता था और वे निश्चयबुद्धि बन जाते थे। मैं उस समय 19 वर्ष का था। मैंने भी उनसे एक प्रश्न पूछा था - सच्चा ब्राह्मण किसे कहते हैं? उन्होंने कहा था कि ब्राह्मण माना सम्पूर्ण समर्पित । सब कुछ बाबा का है, लौकिक सेवा या व्यवहार केवल निमित्त हैं और बाबा की सेवा के लिए हैं, मेरा कुछ नहीं। उनके ये वचन मेरे लिए वरदान बन गये। कुछ समय के बाद ही मैं सेवाकेन्द्र पर रहने लगा। मैं इन वचनों को जीवनभर साथ लेकर चल रहा हूँ।
शालीनता की सम्पूर्ण मूर्ति
मातेश्वरी जी एक बार 3-4 दिनों के लिए करनाल आयीं। उस समय मुझे उनको अति नज़दीक से देखने का सौभाग्य मिला। मातेश्वरी जी गंभीरता की प्रतिमूर्ति थी। जब-कभी वे छोटे-से आंगन में टहलती थीं तो चलने-फिरने में रिचक मात्र भी आवाज़ नहीं होती थी। पूरा-का-पूरा मोहल्ला उनसे प्रभावित होता था। वे शालीनता की सम्पूर्ण मूर्ति थीं।
ज्ञान-चात्रक
मातेश्वरी जी में मैंने देखा कि उनको शिव बाबा के महावाक्यों पर बहुत ध्यान रहता था। उस समय आबू से साकार बाबा का मातेश्वरी के लिए पत्र आया था। उस पत्र में शिव बाबा के महावाक्यों की प्वाइंट्स और साथ में साकार बाबा का कारोबार का पत्र भी था। मातेश्वरी जी ने पहले शिव बाबा के महावाक्य पढ़े फिर बाद में साकार बाबा का कारोबार सम्बन्धी पत्र पढ़ा। उस समय दादी मनोहर इन्द्रा जी वहाँ थीं, उन्होंने मातेश्वरी जी से पूछा, "मम्मा, आपने पहले पत्र पढ़ने की बजाय ज्ञान-बिन्दुओं को ही क्यों पढ़ा?" तब मातेश्वरी जी ने कहा, "हमारे जीवन का आधार ही है शिव बाबा का ज्ञान। यह हमारा भोजन है। मुझे इसकी बहुत प्रतीक्षा रहती है। आते ही पहले इसी को पढ़ती हूँ। कारोबार के समाचार बाद में पढ़ कर जो करना है उसको करती हूँ।" इस प्रकार, ज्ञान की अथॉरिटी और ज्ञान की देवी होते हुए भी मातेश्वरी जी में ईश्वरीय ज्ञान-पिपासा सदा रहती थी। वे ज्ञान-वर्षा के ज्ञान-मोतियों की प्रतीक्षा में रहने वाली ज्ञान-चात्रक थीं।
माँ का दरवाज़ा बच्चों के लिए सदा खुला रहा
मातेश्वरी जी हरेक को कहती थीं कि किसी को मम्मा से किसी बात पर व्यक्तिगत रूप से मिलना हो तो किसी भी समय, बिना पूछे आ सकता है, किसीभी तरह की औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार, माँ अपना सारा समय बच्चों की उन्नति और सेवा के लिए दिया करती थीं। वे जितनी बड़ी अथॉरिटी थी उतना ही निर्मान भी थी।
मैंने देखा कि मातेश्वरी जी का ध्यान निजी पुरुषार्थ पर बहुत रहता था। सदा उनके मुख से यही शब्द निकलते थे कि "जैसा कर्म हम करेंगे, हमें देख दूसरे भी करेंगे।" ऊँचे स्वर से बोलते हुए उनको मैंने
कभी नहीं देखा, आवाज़ से हँसना तो दूर की बात थी।
सदा आज्ञाकारी एवं फरमानवरदार बच्ची
यद्यपि इस यज्ञ में मातेश्वरी जी बहुत बड़ी अथॉरिटी थीं, फिर भी मैंने देखा कि जब वे बाबा के सामने आती थीं तो एक छोटी बच्ची की तरह आज्ञाकारी बनकर रहती थीं, सदा 'हाँ जी बाबा', 'जी बाबा' कहती थीं। रोज बाबा के क्लास में आने से पहले, मम्मा को क्लास कराना पड़ता था। उनके सुनाते- सुनाते जब बाबा क्लास के अन्दर प्रवेश करते थे तो वे तुरन्त अपनी वाणी समाप्त कर देती थी। उनमें इतना रिगार्ड होता था बाबा के लिए! बाबा की मुरली के लिए भी बहुत ही सम्मान मम्मा दिया करती थी। जब ब्रह्मा बाबा में शिव बाबा की पधरामणी होती थी और जब वे मुरली चलाना शुरू करते थे तब मम्मा सभा की ओर मुँह करके नहीं बैठती थी, बाबा की तरफ़ मुड़कर बैठती थी और ध्यान से मुरली सुनती थी। मम्मा का बैठने का स्थान भी बाबा के बराबर ही होता था, फिर भी मम्मा बाबा की तरफ़ मुँह करके ही बैठती थी। इस प्रकार मम्मा में बाबा के प्रति सीमातीत सम्मान था।
असामान्य व्यक्तित्व
जब मम्मा योग में बैठती थीं अथवा दूसरों को दृष्टि देती थी उस समय हरेक को विचित्र अनुभव होते थे। मम्मा के स्थूल स्वरूप की बजाय लाइट का स्वरूप ही नज़र आता था। जब मम्मा सामने बैठती थीं तो, जैसे हम कहते हैं कि अव्यक्त वातावरण बनाओ, विदेह अवस्था में रहो, डेड साइलेन्स में रहो, वह सब सहज ही हो जाता था। भले ही, सब ब्रह्मा-वत्स जानते थे कि मम्मा कुमारी हैं लेकिन उनको जो भी देखता था माँ का, देवी का, फ़रिश्ते का दर्शन होता था। देहभान होता ही नहीं था, जैसे छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में सहज रूप से चला जाता है वैसे हर ब्रह्मा-वत्स मातेश्वरी जी की गोद में चला जाता था। मातेश्वरी जी में परखने की शक्ति बहुत थी। जब मैं उनसे मधुबन में पहली बार मिला तो मिलते ही मातेश्वरी जी ने कहा कि यह तो ज्ञानी तू बच्चा है। उससे पहले मैं ध्यान में जाता था, खेल-पाल करता था, भविष्य नज़ारे देखता था। लेकिन जब मातेश्वरी जी से मिलकर वापस करनाल गया तो मेरा वो ध्यान का पार्ट खत्म हो गया। आज तक पुनः एक बार भी साक्षात्कार नहीं हुआ। इस प्रकार, मम्मा के बोल मेरे लिए वरदान भी बन गये।
मातेश्वरी जी में निमित्त भाव सम्पूर्ण रूप में था। वे सदा कहती थीं कि यह शिव बाबा का कार्य है, वही करन-करावनहार है। हम तो सिर्फ निमित्त हैं, सब कुछ बाबा ही करते हैं। मम्मा का यह गुण मैंने भी अपनाने की कोशिश की है। विश्व परिवर्तन करना तो बाबा को है, हम तो उनके उपकरण हैं। करना और कराना उसका कार्य है। इस प्रकार, हमने मम्मा को सदा लाइट (निश्चिन्त) ही देखा।
कर्मभोग के समय भी निरन्तर योगी और निःस्वार्थ स्नेही
मेरी अन्तिम मुलाक़ात मातेश्वरी जी से मुंबई में हुई। हमें बताया गया था कि मातेश्वरी जी की तबीयत बहुत खराब है, कोई बात न करे। हमने मातेश्वरी जी से केवल नयन मुलाक़ात की। मातेश्वरी जी ने मुझे कुछ बोला नहीं लेकिन उस समय भी उनका चेहरा, उनकी दृष्टि, मस्तिष्क पर उनका तेज उतना ही शक्तिशाली था जितना पहले था। उनके स्नेह, स्वरूप और व्यवहार में लेशमात्र अन्तर नहीं था। ऐसा लगता ही नहीं था कि वे बीमार हैं अथवा उनकी तबीयत ज़्यादा नाजुक है। मुझे ऐसा स्पष्ट महसूस हुआ कि वे प्रकृतिजीत हैं।
निरहंकारिता तथा विनम्रता की विद्वद्जननी-माँ सरस्वती
ब्रह्माकुमार भ्राता रामऋषि शुक्ल जी17 लिखते हैं कि सन् 1956 की बात है, जब प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के तत्कालीन कोटा हाउस स्थित मुख्यालय में बाबा और माँ से प्रथम बार मैं मिला था। अप्रैल मास में हुई मुलाक़ातों का पहला दिन तो साक्षात्कारों में बीत गया किन्तु बाद के दिन विशेष अनुभूतियों के रहे। एक दिन तीसरे प्रहर की बात है, बाबा-माँ टेबल पर सामने बैठे हुए थे और मैं अकेला उनके सामने की कुर्सी पर बैठा था। बाबा ऐसे ही लौकिक ढंग से हाल-चाल पूछ रहे थे कि इतने में एक गुप्त चमत्कार हो गया। मैंने जैसे प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं स्थूल नेत्रों से निराकार शिव बाबा को वृत्ताकार में बाबा-मम्मा के पीछे देखा। उस दिन से ही यह मुझे दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास हो गया कि निराकार परमात्मा शिव ने विश्व परिवर्तन और विश्व-कल्याण के निमित्त बाबा-मम्मा को बनाया है।
अलौकिक माँ के साथ-साथ लौकिक माँ भी
आठ-नौ वर्षों की अल्प अवधि में माँ को बहुत निकट से देखने, उनसे बातचीत और विचार-विमर्श करने के अनेक सुअवसर इस आत्मा को प्राप्त हुए। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि माँ निजी मुलाक़ातों में ऐसी भासना देती थीं मानो वह अलौकिक माँ के साथ-साथ लौकिक माँ भी हों। वह ज्ञान तो समझाती ही थीं, गृहस्थ-व्यवहार सम्बन्धी उपयोगी शिक्षायें भी कुछ कम नहीं देती थीं। घर में कैसे रहो, लौकिक बच्चों को कैसे देखो, सम्बन्धियों से कैसे व्यवहार निभाओ- इन बातों की अचूक शिक्षायें हमें माँ से मिला करती थीं। यहाँ माँ की निरहंकारिता और विनम्रता के दो दृष्टान्त दे रहा हूँ। एक बार माँ हजरतगंज, लखनऊ सेवाकेन्द्र पर रुकी हुई थीं। कहीं से अनुरोध-पत्र आया कि माँ टेप पर कुछ महावाक्य बोल दें। थोड़ी देर माँ कुछ चिन्तनमग्न दृष्टिगत हुई। फिर उन्होंने बाबा की एक मुरली माँगी और उस मुरली के ही कुछ महावाक्यों को ज्यों-का-त्यों पढ़ दिया। अपनी ओर से एक शब्द भी उन्होंने नहीं जोड़ा। ऐसी थी माँ की निरहंकारिता, बाबा तथा उनके महावाक्यों में माँ की अगाध निष्ठा।
हजरतगंज सेवाकेन्द्र पर माँ के प्रवासों की अवधि में कई बार एकदम भोर में उनके कक्ष में उपस्थित होने का सुअवसर मुझे मिला। मैंने देखा और जाना कि मातेश्वरी जी प्रातः आँख खोलते ही पहला काम यह करती थीं कि बाबा की जो भी पोस्ट अथवा वाणी आयी रहतीं उन्हें वह शुरू से आखिर तक पूरा का पूरा पढ़ डालती थीं।
असीम विनम्रता
एक बार तो मातेश्वरी जी ने विनम्रता की हद कर दी। उनसे मिलाने के लिए मैं अपने एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र को ले आया जो उच्च शासकीय अधिकारी भी था और मातृभक्त भी था। निजी कक्ष में पत्रकार मित्र के प्रवेश करते ही मातेश्वरी जी ने गद्दी पर उनको बैठा दिया और हम दोनों ही एकदम स्तब्ध और अवाक् रह गये। वह मित्र भी समझ नहीं पाया कि क्या करें। माँ के आदेश को कोई बच्चा टाल ही कैसे सकता था! तब अनुभव हुआ कि माता-पिता किस प्रकार अपने बच्चों को सिर-आँखों पर बिठा कर ले चलते हैं!
एक दिन प्रातःकालीन क्लास में मैं अपनी प्रकाशित पुस्तक "उन्मेष" का मातृ-आह्वान वाला अन्तिम भाग भाव-विभोर होकर सस्वर पढ़ रहा था। अचानक माँ ने मुझे रोका और फिर ऊपर की ओर उंगली से इशारा करते हुए कहा, "यह नहीं, वो माँ, माताओं की माता, परात्पर माता स्वयं परमपिता निराकार परमात्मा।" ऐसी थी माँ की असीम विनम्रता की भावना !
अकाट्य और प्रभावकारी तर्क
कल्प पूर्व की ज्ञान-कलश धारिणी सरस्वती श्री मातेश्वरी जी ऐसे-ऐसे तर्क देती थीं और महावाक्य उच्चारित करती थीं कि सारे आसुरी तर्क अथवा कुतर्क कपूर की भाँति हवा में उड़ कर विलीन हो जाते थे। यहाँ हम परम आदरणीया श्री मातेश्वरी के कुछ अकाट्य और प्रभावकारी तर्क प्रस्तुत करते हैं:-
सत्य क्या है, कल्पना क्या है?
कुछ लोग कहते हैं कि 'ब्रह्माकुमारियों का ज्ञान इनकी और इनके पिताश्री की अपनी कल्पना है' लेकिन वे जिन बातों और मान्यताओं को प्रस्तुत करते हैं उनकी स्वयं की स्थिति क्या है? इन लोगों की मान्यताओं के अनुसार चलकर भारत कई हज़ार वर्षों से बराबर पतन के गर्त में गिरता ही आ रहा है और वर्तमान में भी गिरता ही जा रहा है। इसके विपरीत, पिताश्री जी के श्रीमुख से शिव परमात्मा द्वारा उद्घघटित सत्यों और मान्यताओं के अनुसार हमारा चरित्र सुधर गया है और हम चढ़ती कला में आ गये हैं। स्पष्ट है कि जिससे जीवन सुधरा है तथा चढ़ती कला में आ गया है वही सत्य है और जिससे बराबर पतन होता गया वही वास्तव में कल्पना या कपोल कल्पना है।
मार्ग एक ही है, न कि अनेक
अनेक प्रकार के मतवादी कहते हैं कि 'परमात्मा की प्राप्ति के अनेक मार्ग हैं।' उनका तात्पर्य यह है कि किसी 'भी रास्ते से या विभिन्न मार्गों से चलकर भी परमात्मा के निकट पहुँचा जा सकता है अथवा उनको प्राप्त किया जा सकता है। क्या एक प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं? कदापि नहीं। परमात्मा तो एक है, वह इसी एक संगम के समय पर प्रजापिता ब्रह्मा के साकार शरीर द्वारा हम मनुष्यात्माओं को अव्यक्त तथा आत्मिक रूप से प्राप्त होता है तथा कलियुग को सतयुग में परिवर्तित कर देता है।
यह सतयुग की स्थापना करने का समय है
कुछ लोगों का कहना है कि 'ब्रह्माकुमारी संस्था सतयुग की स्थापना और स्वर्ण युग के शीघ्र आ जाने की जो बात कहती है वह ठीक नहीं क्योंकि कलियुग तो अभी बच्चा है।' पर, क्या वर्तमान समय से भी अधिक धर्मग्लानि का और कोई समय हो सकता है? आज से 25-30 वर्ष पहले जब हमने आने वाले विनाश की बात कही थी तब लोग कहते थे कि हम लोगों को डराने के लिए ऐसा कहते हैं। भला ऐसा भारी विनाश किस प्रकार होगा! लेकिन एटम बम, हाइड्रोजन बम आदि के बन जाने के बाद अब विनाश की आशंका प्रकट हो गयी है। उनके मुखों से विनाश निकट होने की बात स्वीकार की जाने लगी है। अतएव, हमारी सतयुग स्थापना की बात भी लोग उसी प्रकार शीघ्र स्वीकार कर ही लेंगे, जिस प्रकार कि विनाश के बारे में हमारी बात अब लोगों की समझ में आने लगी है। तब हमारी यह बात भी लोग मान ही लेंगे कि कलियुग बच्चा नहीं बल्कि उसका यह अन्तिम समय है।
इस प्रकार, माँ की वाक्-शक्ति अद्भुत थी। ईश्वरीय महावाक्यों को परिभाषित करते हुए उन्होंने जो मृदु वचन उच्चारे वे सब प्रकार से अनुपम रहे हैं।
सर्व को सम्मान देने वाली विश्ववंद्यनीया माँ
भोपाल से ब्रह्माकुमार भ्राता महेन्द्र जी18 अपने अनुभव इस प्रकार लिखते हैं कि संसार में अनेक महान् विभूतियाँ जन्म लेती हैं और अलौकिक कर्त्तव्य करके चली जाती हैं, उनकी स्मृतियाँ दूसरों के हृदयों में अङ्कित हो जाती हैं। ऐसी ही अनुपम छाप छोड़ी है हमारी प्यारी मीठी जगदम्बा माँ ने। उनके कर्त्तव्यों की स्मृतियाँ भुलाये नहीं भूलतीं। जब कभी एकान्त में बैठता हूँ तो प्यारी माँ की मीठी शिक्षाप्रद लोरियाँ दिल को झकझोर देती हैं। कैसा कठोर परिश्रम किया है और कितनी आत्माओं के जीवन को आनन्दित किया है उन्होंने !
उनके मानस पटल पर पवित्रता की आभा थी, वाणी में ओज था, चेहरे पर रूहानी मुस्कान थी, विचारों में गंभीरता थी, क़दमों में फ़रिश्ते की चाल थी। उनकी रूहानियत से रूहों को राहत मिलती थी।
उनके प्रवचन सुनने का कई बार अवसर मुझे प्राप्त हुआ। ऐसी अनुभूति होती थी मानो साक्षात् सरस्वती की ज्ञानवीणा बज रही है। मम्मा किसी विषय को लेकर जो गहराई स्पष्ट करती थी, ऐसा लगता था बस सुनते रहें, सुनते रहें। प्यारी माँ के बोल दिल में समा जाते थे और हमने ऐसा ही बनने का लक्ष्य बना लिया तथा कुछ समय बाद, अल्पायु में ही जीवन सेवा में समर्पित किया। भले ही उस समय हज़ारों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परन्तु मम्मा के वचनों और पुष्प-पत्रों ने जीवन को सरल कर दिया। मम्मा की यह विशेषता थी कि छोटों से भी सम्मानपूर्वक व्यवहार करतीं और पत्रों में भी "जी" कहकर सम्मान करती थी।
ऊँचाई तक पहुँचाने वाली ऊँची शिक्षायें
मैंने एक बार मातेश्वरी जी से प्रश्न किया, आप को इतनी ऊँचाई तक पहुँचने में किन विशेष बातों का ध्यान रखना पड़ा? उन्होंने प्रत्युत्तर में तीन बातें बतायीं :
- मेरा निश्चय शिव बाबा तथा ब्रह्मा बाबा में सदा अचल, अटल और दृढ़ रहा है। मैं बाबा की आज्ञाकारी, वफ़ादार रही और हाँ जी का पाठ पक्का किया। बाबा ने जो कहा उसको करना ही है, चाहे कुछ भी हो जाये।
- मैंने कभी भी बाबा की मुरली (ईश्वरीय ज्ञान श्रवण) मिस (miss) नहीं की, चाहे कितनी भी व्यस्त क्यों न रही हूँ, बीच में समय निकाल कर अवश्य पढ़ती और चिन्तन करती हूँ।
- मैं किसी भी परिस्थिति में कभी रोयी नहीं, भले ही यज्ञ में भाव- स्वभाव, संस्कार, विघ्नों की अनेक बातें आयीं। मैं मन से और आँखों से कभी भी नहीं रोयी क्योंकि रोने से सहनशक्ति घटती है।
कभी अपने प्रति उपहार का उपयोग नहीं किया
मातेश्वरी जी जहाँ-तहाँ सेवाकेन्द्रों पर प्रवचन करने जाती थी। जितनी भी उपहार स्वरूप वस्तुयें मिलतीं, उन्हें न स्वयं प्रयोग करती, न दूसरों को प्रयोग करने देती। उन्हें लाकर पहले यज्ञ में यज्ञपिता को अर्पित करती थी।
माँ का स्वभाव, गुण सागर की तरह था। कभी भी किसी की ग़लती व अन्य कोई बात मम्मा के सामने आती तो वे सागर की तरह समा लेती। कोई बच्चा उनके पास कोई बात लेकर आता तो उसको ही समझा देती थी, उसकी बात किसी दूसरे से रिपीट नहीं करती थी। जब कोई प्यार से समझाने से नहीं समझता, तो कहती, मैं तुम्हारी माँ भी हूँ, फिर याद रखना मैं काली भी हूँ।
त्रिमूर्ति स्वरूपधारी
वास्तव में मातेश्वरी जी के तीन रूप दिखायी देते हैं सरस्वती के रूप में विद्या की देवी, ज्ञानधन बाँटने वाली लक्ष्मी और आसुरी वृत्तियों का संहार करने वाली दुर्गा। यह रहस्य भक्त नहीं जान पायेंगे कि जगदम्बा पृथ्वी पर आयी और चली भी गयी, हम पूजा और गुणगान ही करते रह गये।
सर्व मान्ये माँ ललिताम्बा
ब्रह्माकुमार भ्राता ओम् प्रकाश जी19,*अपना अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं कि बात सन् 1957 की है। कौशल्या नामक एक बहन रोज़ कमला नगर सेवाकेन्द्र पर आती थी। उसको ज्ञान और योग में बहुत लगन थी, वह पवित्र जीवन भी बिताती थी लेकिन उसका पति इस पवित्रता की बात पर बहुत लड़ाई-झगड़ा करता था। यहाँ तक कि एक दिन उसने अपनी पत्नी को बहुत पीटा भी। जब उसको पता पड़ा कि मम्मा आयी हैं तो वह खुद मम्मा से मिलने आया और मम्मा के सामने बहुत गुस्से से अपनी सारी बात कह दी। मम्मा शान्ति से उसकी सारी बातें सुन रही थी और उसको शान्ति का दान दे रही थी। जब उसकी बात पूरी हुई तब मम्मा ने उसको बच्चे, बच्चे कहते हुए उससे प्यार से बात की तो वह एकदम शान्त हो गया और शान्ति से चला गया। बाबा की मुरली थोड़ी जटिल होती थी अर्थात् सामान्य व्यक्ति अथवा जिज्ञासु अथवा नया वत्स उसको समझ नहीं पाता था क्योंकि वह गुह्य रहस्यों से भरी रहती थी। हमने देहली में देखा कि मम्मा रात को बाबा की मुरली टेप द्वारा सुनकर, चिन्तन-मंथन करके, पहले खुद उसको अपने में समाकर, फिर उसको सरल बनाकर बच्चों को सुनाती थी। मम्मा के समझाने पर हर वत्स यही समझता था कि यह ज्ञान-बिन्दु मेरे लिए ही है, इसे मुझे धारण करना ही है। इस प्रकार मम्मा की वाणी सरल और सहज होती थी। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय बी.पी. सिन्हा जी उन दिनों मम्मा से मिलने आये थे। मम्मा हमेशा मम्मा (माँ) बन कर ही रहती थी। हरेक की बात को अच्छी तरह सुनकर उसका हल करती थी। मम्मा को देख कर सिन्हा जी ने अलौकिक माँ की ममता का अनुभव किया। उन्होंने अपने अनुभव में यह व्यक्त भी किया कि यह मेरी रूहानी माँ है, देवी है, शक्ति है। उसने मम्मा के सामने कोई वाद-विवाद नहीं किया, बहुत प्यार से मिला और मम्मा की बातें सुनकर आनन्दित भी होता रहा। मम्मा से कोई भी बाहर वाले मिलते थे तो उनसे बहुत अच्छा प्रभाव लेकर जाते थे। मम्मा को देखकर किसी को कोई बात की शंका, भ्रम आदि पैदा होते ही नहीं थे। हरेक उनको देख अपनेपन तथा रूहानी प्रेम का अनुभव करते थे।
मम्मा का अपना स्व-पुरुषार्थ बहुत था
जब हम पहली बार मधुबन आये थे उस समय बर्तनों को मज़दूर नहीं माँजते थे। हम ही सभी काम करते थे। उस समय मम्मा ने हम सबको बिठाकर पापड़ बेलना भी सिखाया। आप जानते होंगे कि पापड़ बेलना बहुत कठिन काम होता है। मम्मा के साथ ज़्यादातर हमारा टूअर (सेवा के लिए बाहर आने-जाने) का ही पार्ट रहा। दिल्ली में तो कार से जहाँ जाना होता था वहाँ मम्मा चली जाती थी और हम अपनी साइकिल से वहाँ पहुँच जाते थे। मम्मा आश्चर्य खाती थी कि तुम अभी-अभी वहाँ थे अभी यहाँ पहुँच गये! इस प्रकार हम शुरू से ही मम्मा के बहुत नज़दीक रहे हुए हैं। जब मैं मम्मा के साथ सेवा में जाता था तो उस समय मेरी विशेष सेवा होती थी क्लास में टेप सुनाना। मैं बाबा की मुरली सबको सुनाता था। खाली टेप आबू भेजता था और मुरली की टेप सुनाता था। उस समय मम्मा भी मुरली सुनती थी। हमने मम्मा के व्यक्तिगत जीवन को आबू में भी देखा है और टूअर में भी देखा है। मम्मा का स्व-पुरुषार्थ बहुत था। मैंने मम्मा में हमेशा यह देखा कि वे ज़्यादा लौकिकता अर्थात् बाह्यमुखता में नहीं गयी। इधर-उधर की बातें अर्थात् ज्ञान, योग, धारणा, पुरुषार्थ के अलावा और कोई बात हमने कभी मम्मा के मुख से सुनी ही नहीं। पहले यह सिस्टम (पद्धति) थी कि जो भी बात करेगा वह उस दिन की मुरली की प्वाइंट्स से शुरू करेगा और अन्त भी मुरली की प्वाइंट्स से ही करेगा। बाबा या मम्मा किसी को भी पत्र लिखते थे तो भी उस पत्र के आरंभ और अन्त में उस दिन की ज्ञान-मुरली की प्वाइंट्स अथवा धारणा की प्वाइंट्स अथवा योग की प्वाइंट्स लिखते थे।
मधुर मुस्कान वाली देवी सुहासिनी
मम्मा सेन्टर पर भी बाबा की मुरली सुनाने से पहले 10 मिनट उस मुरली का सार सुनाती थी। उससे बाबा की मुरली समझने में सबको बहुत सहज होता था। जब भी मम्मा क्लास कराती थी, चाहे एक घंटे या दो घंटे, उस समय इतनी शान्ति होती थी कि सूई भी गिर जाये तो उसकी आवाज़ सुनाई पड़े। क्लास के बीच से कोई उठकर बाहर चला जाये, यह असंभव था। मम्मा में बहुत मिठास था। उनके बोल भी बहुत मधुर और धीमी आवाज़ के होते थे। जितनी ज़रूरत है उतना ही बोलती थीं। मैं समझता हूँ कि एक शब्द भी ज़्यादा नहीं। मम्मा में एक यह भी विशेषता थी कि वे कभी किसी को समय देकर नहीं मिलती थी। जो बच्चे जब भी चाहें, किसी भी हालत में चाहें उनसे मिल सकते थे। मम्मा का वो व्यवहार अथवा पार्ट कहें असाधारण था। हमने देखा कि अन्य सब बहुत हंसते थे, बहलते थे, रमणीकता में आते थे लेकिन मम्मा कभी नहीं। मम्मा भी हंसती थी परन्तु किसी को पता ही नहीं पड़ता था। शब्द रहित हंसी होती थी। वह मधुर मुस्कान होती थी। ज्ञान-ध्यान-योग के सिवाय और किसी में आसक्ति नहीं होती थी। अन्य लोग बाबा के साथ खेलना, रास करना आदि करते थे लेकिन मम्मा नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि मम्मा हर बात से किनारा करके अलग रहती थी, नहीं। मम्मा सब कार्यक्रम जैसे पिकनिक, घूमना, फिरना, खेल-पाल आदि में जाती थी परन्तु अपने पुरुषार्थ में मगन रहती थी। ये सब क्रिया-कलाप साक्षी होकर देखती थी। इस प्रकार मम्मा का स्व-पुरुषार्थ बहुत तीव्र था। मम्माने कभी अपना पुरुषार्थ ढीला नहीं छोड़ा।
दिव्य लोक दिखाकर दिव्य बनाने वाली कमलनयनी
मम्मा के देखने का ढंग ही विचित्र था। जैसे बाबा हमें देखते हैं और उनको देखते ही हम सब कुछ भूल कर एक अतीन्द्रिय अनुभव में चले जाते हैं, उसी प्रकार, मम्मा की दृष्टि, मम्मा का चेहरा इतना रूहानी होता था कि सामने वाला अपने को इस दुनिया से निराला अनुभव करता था। मम्मा हों अथवा बाबा हों, दोनों में कोई भी हमें योग कराते थे तो हम यहाँ नहीं रहते थे, कहीं दूर चले जाते थे, अनुभवों में खो जाते थे। उस समय हमें प्रैक्टिकल अनुभव होता था कि हम परमधाम में हैं। चार-पाँच घंटे तक भी हम सब और मम्मा-बाबा एक ही मुद्रा में बैठे योगस्थ रहते थे। शरीर बिल्कुल टस से मस नहीं होता था।
गोद में जाना अर्थात् धर्म के बच्चे बनना
उस समय जिज्ञासुओं को ज्ञान सीधा सुनाते थे, घूमा-फिरा कर नहीं। उसी के तहत मम्मा भी सदा परमात्मा के बारे में, परमात्मा के अवतरण के बारे में, आत्मा के बारे में, योग के बारे में और कर्म की गहन गति के बारे में सीधा ही ज्ञान सुनाती थी। मुख्य बात होती थी पवित्रता के बारे में। पवित्रता के ऊपर ही ज़्यादा ज़ोर होता था। सन् 1954 में मैं मम्मा से आबू में कोटा हाउस में सबसे पहले मिला था। मुझे ज्ञान दिल्ली, कमला नगर से सन् 1953 में मिला था। पहले जो भी मम्मा-बाबा से मिलने आते थे उनको गोद लिया जाता था। यहाँ गोद लेने के दो अर्थ हैं- एक उसको बच्चे मान कर गोद (adoption) लेना, दूसरा उस बच्चे का माँ-बाप बन उनको अपनी गोद में शरण देना। इस प्रकार, जब मैं मम्मा की गोद में गया तो मुझे ऐसा लगा कि मम्मा की हड्डी-माँस वाली काया है ही नहीं। मुझे उनकी गोद रुई जैसी अनुभव हुई। उनकी गोद में जाते ही पता नहीं मैं कहाँ, किस लोक में चला गया। मुझे अत्यन्त आनन्द और शान्ति का अनुभव होने लगा।
मातेश्वरी पवित्रता की जननी थी
ब्रह्माकुमार भ्राता विद्यासागर जी दिल्ली से लिखते हैं कि मैंने सन् 1963 में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया। इससे पूर्व संसार के प्रमुख ईश्वर प्रेमियों, भक्तों के अनुभव तथा ज्ञान पढ़ चुका था। सभी धर्मशास्त्र पढ़े, वेद, उपनिषद् इत्यादि का सार पढ़ा एवं आचरण में लाया। अन्त में आर्य समाज का पक्का अनुयायी बना। फिर भी सत्यता की खोज में रहा।
प्रथम बार दिल्ली राजोरी गार्डन में मातेश्वरी जी से मुलाक़ात
मातेश्वरी जी आबू से सन् 1963 में राजोरी गार्डन, दिल्ली पधारी। पहली बार मातेश्वरी जी से मिलते ही मुझे ऐसा दिव्य प्रकाश तथा पवित्रता का अनुभव हुआ, जो मैं देह को बिल्कुल भूल गया। मेरे चारों ओर आनन्द की लहरें छा गयीं। इन दिनों में मैं इस संस्था के केवल सम्पर्क में ही आया था और ईश्वरीय ज्ञान की गुह्यता को जानने में लगा था। उस समय इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के प्रति अनेक भ्रान्तियाँ समाज में थीं जो मुझे सुनने को मिली थीं और इस विश्व विद्यालय में आने के लिए अनेक लोगों ने मुझे रोका भी। फिर भी मैं इस ज्ञान एवं योग की गहराइयों का अनुभव करने में लगा रहा और मैंने यह निश्चय किया कि जब तक मैं खुद इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के बारे में कुछ ऐसा नहीं देखूँगा और सुनूँगा, तब तक इसे बिल्कुल नहीं छोडूंगा। मातेश्वरी जी के मिलन के पश्चात् पवित्रता के आनन्द एवं हल्केपन के अनुभव से ईश्वरीय विश्व विद्यालय की शिक्षाओं को पूर्ण रूप से अनुभव करने का उत्साह और बढ़ गया। मातेश्वरी जी से जितनी बार मिलना हुआ, मेरी कमजोरियों को, अवगुणों को मातेश्वरी जी ने नष्ट कर दिया। माँ के श्वासों से भी पवित्रता छलकती थी। मुझे दिव्य गुणों को धारण करने का वरदान प्राप्त हुआ।
सर्व अलङ्कार सुशोभिते
मातेश्वरी जी की पवित्र मुस्कान, रूहानी दृष्टि एवं बोल सदा ही वरदानी थे। मम्मा के कर्मों में पूर्ण रूप से धारणा देखी। मैंने समीपता से मातेश्वरी जी को देखकर अनुभव किया कि एक भी शब्द अथवा बोल माँ के मुख से ऐसा कभी भी नहीं निकला जो ज्ञानस्वरूप, प्रेमस्वरूप, योगयुक्त न हो। उन दिनों संसार में इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय का ज़ोर-शोर से विरोध हो रहा था लेकिन मैं माँ की आनन्द स्वरूप की स्थिति द्वारा दिनों दिन इसके अति समीप आता रहा और ऐसा अपने साथ वायदा किया, दृढ़ संकल्प किया कि मैं भी माँ की तरह बनूँ।जैसे किसी ने लिखा है-
"वृक्ष कबहुँ नहि फल भन्ने, नदी न संचै नीर।
परमार्थ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥"
मातेश्वरी जी तो साक्षात् सरस्वती, चैतन्य नदी थी। एक बार मैंने मातेश्वरी जी के सम्मुख ये शब्द उच्चारण किये कि हे माँ, मैं भी इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के कर्तव्य में अपना सारा जीवन समर्पित करना चाहता हूँ। माँ ने कहा कि अपने माँ-बाप के साथ रहते इस संसार में भीष्म पितामह का उदाहरण प्रत्यक्ष करो ताकि विश्व के नौजवान आपसे प्रेरणा लें। माँ की शिक्षाओं को ग्रहण करके आज लगभग 40 वर्षों से इस ईश्वरीय कार्य में कार्यरत हूँ।
माँ सरस्वती के जीवन से ऐसा दिव्य दिग्दर्शन होता था जो किसी भी अपरिचित व्यक्ति को यह सोचने को मजबूर कर देता था कि यह सचमुच दिव्य शक्ति सम्पन्न है। ऐसा मुझे अपने मित्रों एवं परिवार वालों के मुख द्वारा सुनने को मिला। आज मैं अपनी लेखनी द्वारा लिख रहा हूँ कि इस संसार में कोई भी ऐसी नारी नहीं देखी जो मातेश्वरी माँ जैसी हो। शायद भाग्यविधाता ने केवल मातेश्वरी जी को ही वरदान देकर इस धरती पर प्रकट किया था। मैंने देखा, मैंने पाया कि मातेश्वरी सचमुच सरस्वती, जगदम्बा थी। सरस्वती माना ज्ञान स्वरूप। कोई कर्म किया, व्यवहार किया लेकिन ज्ञान स्वरूप स्थिति में स्थित होकर।
मातेश्वरी जी की कृति, दृष्टि, भाषा, भावना ऐसी चुमबकीय शक्ति सम्पन्न थीं जो वे साक्षात् इस धरती पर चैतन्य देवी सिद्ध हुई। मैं और क्या लिखूँ, मेरी लेखनी लिखना चाहती है मगर किन शब्दों में मैं अपनी जागती ज्योति-माँ का दर्शन कराऊँ ? बस इतना ही कहूँगा, वह ज्योति थी, इस धरती पर चैतन्य ज्ञान- गंगा थी, प्राणदान देने वाली थी, सरस्वती थी, भवानी थी। हे सरस्वती माँ ! आपको कोटि-कोटि प्रणाम।
सदा अचल, अडोल रहने वाली दुर्गा माँ
चंडीगढ़ से ब्रह्माकुमारी अचल बहन जी अपने अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि मम्मा की शिक्षायें व उनका प्रेरणादायक जीवन हमें आध्यात्मिक मंज़िल पर आगे बढ़ाने में काफ़ी सहायक हुआ। सर्वप्रथम प्यारी माँ से मेरी मुलाक़ात आबू के कोटा हाउस में हुई थी। कितनी दिव्यता और आकर्षण था मम्मा में! माँ से मिलते ही मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे कि सरस्वती माँ सर्व शक्तियों एवं गुणों को समेटे हुए सम्पन्नता का साक्षात्कार करा रही है। मुझे कुछ दिन मम्मा के पास रहने का सुनहरा अवसर मिला। मैंने अनुभव किया कि उनके संस्कारों में कितनी मधुरता, कितना प्यार छलक रहा है! मैं बहुत हल्की होकर बात करती थी। प्यारी माँ मुझे समझाती थीं कि जितना अशरीरी अवस्था बनाने पर ध्यान दोगी उतना ही गुण रूपी मोती धारण कर औरों के सामने एक आदर्श बन जाओगी।
करुणा पूरित माँ सरस्वती
मैंने मम्मा का प्रैक्टिकल में धैर्यता, प्रेम और सहानुभूति का स्वरूप देखा। एक बार मम्मा जब अमृतसर में आयी थीं तो एक पार्टी ने बहुत हंगामा किया। वे चाहते थे कि मम्मा से मिलें। उस समय स्कूल के बच्चे बहुत ज़्यादा शोर कर रहे थे। मैं ऊपर की मंज़िल में मम्मा के पास खड़ी यह दृश्य देख रही थी। वात्सल्यमयी मम्मा ने यह दृश्य देख नीचे खड़ी बहनों को सन्देश भेजा कि इनके जो मुख्य हैं उन्हें मेरे से मिलाओ। हमें अन्दर से डर लग रहा था कि वे कुछ उल्टा न बोल दें। परन्तु मातेश्वरी जी के इतने शक्तिशाली स्नेह के प्रकम्पन काम कर रहे थे कि वह आत्मा मम्मा के सामने बहुत देर तक कुछ नहीं बोल सकी। धीरे-धीरे अति प्यार से एक-दो प्रश्न पूछे। सच में, अन्दर के संकल्पों को हर लेने वाली माँ थीं वे। क्रोधी को शीतल बनाने वाली शीतला देवी थीं।
प्यारी माँ बहुत निरहंकारी रूप का साक्षात्कार कराती थी ! मैं जहाँ लौकिक सेवा करती थी, वहाँ एक बार मैंने मम्मा को बुलाया। हज़ारों लोगों ने माँ के दर्शन किये। मैं मम्मा को कार में अमृतसर से लेकर गयी थी। रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी। गाँव में दूसरी कार आदि कोई साधन नहीं मिल पाया। मैं बहुत सोच में थी कि ऐसी ऊँची शक्ति को कैसे अमृतसर लेकर जाऊँ ! इतने में एक नयी बस वाला भाई आया और मुझे कहने लगा कि मैं माँ को अपनी बस में छोड़कर आता हूँ। दूसरी किसी सवारी को उसने नहीं बिठाया। मेरा संकल्प कामधेनु माँ ने जान लिया और मीठी शिक्षा दी कि ड्रामा का पार्ट ऐसे समय पक्का रखना चाहिए। बाबा हमें हर प्रकार से अनुभवी बना रहा है। आप कोई सोच न करो। प्यारी माँ की अचल, अडोल स्थिति कितनी प्रभावशाली थी !
मम्मा एक बार बटाला में आयी। वहाँ कन्याओं का झुण्ड मम्मा से मिल रहा था, तो कन्याओं को अति मीठे स्वर में मम्मा समझा रही थी- "शिव-शक्तियों को शक्ति रूप होकर रहना है। किसी के अवगुणों को चित्त पर नहीं रखना है। बीती बातों का चिन्तन नहीं करना है। आप को कभी भी सर्विस पर जाने के लिए 'ना' नहीं करनी है। बाबा का प्यार, सेवा करने से ही ले सकेंगे।" प्यारी माँ की शिक्षाओं का प्रभाव कन्याओं पर इतना पड़ा कि सभी कन्यायें अलग-अलग सेवा-स्थानों पर चली गयीं।
ऐसी थी शक्ति स्वरूपा, प्रेरणा की स्रोत, गुणों की खान, प्यारे बाबा के क़दम पर क़दम रख चलने वाली हमारी प्यारी मम्मा।
पिताश्री ब्रह्मा के हर कर्म का अनुसरण कर 'ब्राह्मी' पद-प्राप्त ब्रह्मासुते श्री सरस्वती
हरिद्वार से ब्रह्माकुमारी प्रेमलता बहन जी अपना अनुभव लिखती हैं कि विगत की स्मृति को प्यार कहते हैं और प्यार को चुप रहना शोभता है परन्तु अनेक महान् आत्माओं के आग्रह ने आज मेरी चुप्पी को तुड़वाकर कुछ लिखने को बाध्य कर ही दिया। मातेश्वरी जी के साथ मेरा सम्बन्ध लगभग एक दशक तक रहा परन्तु लगता है कि कई जन्मों की प्रगाढ़ता है। उन्होंने अपनी वाणी द्वारा उपकृत ही नहीं किया वरन् एक अलौकिक माँ की तरह हमारी पालना भी की। उनकी वे शिक्षायें आज भी हमारे साथ हैं।
एक परिपूर्ण व्यक्तित्व
सर्वप्रथम मातेश्वरी जी से मिलने का सौभाग्य अमृतसर में बहुत छोटी आयु में प्राप्त हुआ। दिव्यता, सौम्यता, सरलता, सहृदयता से परिपूर्ण उनके व्यक्तित्व को देखकर मेरे मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि जीवन हो तो ऐसा हो। मम्मा जब बोलती थी तो ऐसा धारा प्रवाह बोलती थी कि उसके कानों में गूंजने से जीवन में अलौकिकता का संचार होता था। मम्मा ने बाबा की दी हुई ज्ञान-ज्योति से सबको ज्वलन्त किया। उनकी वाणी में सागर की गहराई, आकाश की ऊँचाई और गंगा का प्रवाह था जिसको सुन करके मन में बार-बार यही संकल्प आता था कि हमें भी मम्मा समान अपना जीवन बनाना है।
सहज बातों से भी श्रेष्ठ शिक्षा
मम्मा की एक विशेषता यह थी कि छोटे-बड़े सभी को बहुत प्यार से पालना देकर आगे बढ़ाती थी। जैसे कि कोई शिल्पी अपनी मूर्ति की रचना कर रहा हो, उसे संवार रहा हो। मम्मा यज्ञ-वत्सों की छोटी-छोटी बातों, जिज्ञासाओं या भूलों पर इतना प्यार से बैठ समझाती थी कि सुनने वाला सहज ही अपने अन्तःकरण में उतार लेता था। एक बार मम्मा ने मुझे यज्ञ के पुराने फोटो एल्बम ठीक करने का काम बताया। उनमें से जो यज्ञ-वत्स, यज्ञ छोड़कर जा चुके थे उनके चित्र निकाल कर वर्तमान बच्चों का एल्बम बनाना था। मम्मा मुझे बताती जा रही थी और मैं छांटकर अलग कर रही थी तो मेरे मन में विचार आया कि ये लोग ऐसे प्यारे बाबा, मम्मा और परिवार को छोड़कर क्यों चले गये! मैंने मम्मा से पूछा- मम्मा, क्या कारण है कि ये लोग बाबा को छोड़कर पुरानी दुनिया में चले गये ? तो मम्मा ने मुस्कराते हुए बड़ी सरल भाषा में मेरी इस जिज्ञासा को शान्त किया और कहा कि जो पुरुषार्थ में अलबेले होकर चलते हैं उन्हें माया किसी-न-किसी रूप से खींचकर पुरानी दुनिया में ले जाती है।
पिताश्री की हर बात को दिल से स्वीकार किया
एक बार लच्छु बहन, एक काग़ज़ के टुकड़े पर चिड़िया के दो छोटे-छोटे अण्डे रखकर बाबा के कमरे में दिखा रही थी कि देखो, बाबा की झोपड़ी में चिड़िया ने अण्डे दिये हैं। बाबा ने उन अण्डों को देखकर बड़े ही रमणीक रूप से कहा- मम्मा को बुलाओ। मैं बहुत छोटी थी, मुझे इसका रहस्य समझ में नहीं आया कि बाबा मम्मा को क्यों बुला रहे हैं। मैं उत्सुकतावश बाबा के पास खड़ी हो गयी। जब मम्मा, बाबा के कमरे में आयी तो बाबा ने मम्मा को कहा-मम्मा, मुँह खोलो, ये चिड़िया के अण्डे बाबा तुम्हें खिलायेंगे। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मैंने देखा कि मम्मा ने बच्चों की तरह बाबा के आगे मुँह खोल दिया और बाबा बहुत ही प्यार भरी दृष्टि देते मुस्कराने लगे और कहने लगे, मम्मा 'जी बाबा' के पेपर में पास हो गयी। उस समय मेरे बाल-मन में हलचल पैदा हो गयी। परन्तु ये तो केवल चिटचैट कर बाबा ने हमें शिक्षा दी थी कि बाबा कल्याणकारी है और 'जी बाबा' की धारणा मम्मा में कितनी दृढ़ थी ! प्रत्यक्ष अनुभव किया कि दृढ़ संकल्प से मम्मा की जीत कैसे हुई !
मर्यादाओं को सिखाने वाली मीठी माँ
बाबा के साधारण रूप से कहे गये वाक्यों को भी मम्मा महावाक्य के रूप में स्वीकार करती थी। एक बार यज्ञ में स्थान के अभाव के कारण बाबा ने कहा कि पलंग को ऐसे सैट (set) करो कि बड़े पलंग के नीचे छोटा पलंग आ जाये ताकि दिन में नीचे डाल दिया जाये और रात्रि में बाहर करके सो सकें। बाबा पुराने भवन के हाल में (जहाँ अभी भूरी दादी आदि सोती हैं) स्वयं डाल कर देख रहे थे। बाबा मम्मा के साथ मैं भी वहाँ खड़ी थी। बाबा ने एक भाई को कहा कि इस पलंग के नीचे ये पलंग डालकर देखो, तो मुझे लगा कि ये पलंग इसके नीचे नहीं आयेगा और फट से मैंने बाबा को बोल दिया, बाबा ये पलंग इसके नीचे नहीं आयेगा। फिर भी उस भाई ने बाबा की आज्ञानुसार उसे डालने का प्रयास किया परन्तु वह नहीं आया। मेरे लिए यह घटना साधारण-सी बात थी। मुझे बिल्कुल भी नहीं लगा कि मैंने कोई भूल की है। परन्तु शाम को जब मैं मम्मा के पास गयी तो मम्मा ने मुस्कारते हुए कहा, प्रेम, तुम्हारी बुद्धि बहुत अच्छी है, जल्दी सही निर्णय करती हो। मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि मम्मा आज ऐसे क्यों कह रही है। पहले तो मम्मा ने कभी ऐसे नहीं कहा। मैंने मम्मा से पूछा, मम्मा, आज आप मुझे ऐसे क्यों कह रही हो, क्या मुझसे कोई भूल हुई है ? तब मम्मा ने पलंग डालने वाली घटना पर बड़े ही प्यार से मुझे समझाया और कहा कि जैसे बाबा कहते हैं कि पहले दूसरे की बात को सम्मान दो, फिर उसमें जो कमी हो, वह बता दो तो उसे बुरा नहीं लगेगा। उस समय मेरी लगभग 17 वर्ष की उम्र थी। तब भी मम्मा ने बड़े ही प्यार से कहा कि तुम्हारी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण है और निर्णय भी ठीक लेती हो परन्तु जब बाबा खड़े थे और कह रहे थे कि इस पलंग को ऐसे डालो तो हमारा काम है डालना। जब वह नहीं आयेगा तो बाबा स्वयं ही कहेंगे कि निकाल दो, तो निकाल देंगे। फिर भी मुझे समझ में नहीं आया। मैंने मम्मा से कहा कि आप स्पष्ट बताओ कि मेरी क्या भूल थी। तब मम्मा ने कहा, देखो, इसी प्रकार बुद्धि को चलाने और बोलने का अभ्यास रहेगा तो आगे चल ऐसी स्थिति आ सकती है जो तुम्हें अपनी बुद्धि का अभिमान आ जाये कि देखो मेरी बुद्धि कितना ठीक निर्णय देती है! तब यह बुद्धि दिव्यबुद्धि नहीं बन सकेगी। बाबा की हर आज्ञा का पालन करने से ही बुद्धि दिव्य बन सकती है। उस घड़ी से लेकर मैंने भी यह संकल्प किया कि बाबा जो कहेंगे बिना अपनी बुद्धि चलाये उसे जीवन में धारण करूँगी। इस घटना ने मेरे सोचने के तरीके को ही बदल दिया। मैंने कई बार यह अनुभव किया कि मम्मा से प्राप्त इस संस्कार के कारण हर परिस्थिति में पुरुषार्थ के मार्ग पर मैं सरल और सन्तुष्ट रही।
जगत् माता जगदीश्वरी
सन् 1960 में जब मैं अम्बाला में थी तब मातेश्वरी जी का आगमन हुआ। मातेश्वरी जी के संग दिन-रात रहने का सुअवसर मिला जिसमें देखा कि मम्मा एक-एक भाई-बहन पर व्यक्तिगत रूप से ख़ास ध्यान देकर उनकी हर समस्या का समाधान करती थी और सब ऐसे गद्गद हो जाते थे जैसे बच्चे अपनी माँ को पाकर सब दुःख भूल जाते हैं। बड़े-बड़े भाई-बहनें भी अपना पद, आयु, स्थान सब भूल कर मम्मा के सामने बच्चे बन जाते थे। सन् 1963 में एक सप्ताह के लिए मम्मा देहरादून पधारी। उस समय देहरादून सेवाकेन्द्र को खुले केवल एक ही वर्ष हुआ था। बाबा के नये-नये बच्चों की अथक पालना कर मम्मा ने उन्हें ज्ञान से, मधुरवाणी से ऐसे सिंचित किया कि वे आजीवन मम्मा की उस अथक सेवा को भूल नहीं पाये। मम्मा की वाणी की यह विशेषता रही कि वे बाबा के हर शब्द को इतना सरल रीति से स्पष्ट करके समझाती थी कि छोटे से छोटे, नये से नये बाबा के बच्चों को ज्ञान की गुह्यता का अनुभव हो जाता था। मम्मा ने एक सप्ताह तक लगातार सेवा करके इस धरनी को फलीभूत किया। मम्मा के इस स्वरूप को देखकर ये अनुभव हुआ कि सरस्वती की वाणी का ही क्यों गायन होता है। माँ सरस्वती, पिता ब्रह्मा बाबा के हर कर्म को जीवन में अक्षराक्षर उतार कर ज्ञान की चैतन्य मूर्ति बनी थी जिसका साक्षात् अनुभव मैंने किया।
न भूतो, न भविष्यति
मुंबई की ब्रह्माकुमारी उषा बहन जी अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि ओहो ! क्या मम्मा थी! क्या मम्मा का प्यार था! क्या शक्ति-स्वरूपा थी ! देखा जाये तो बाबा-मम्मा जैसे अप्रतिम और महान् सारी दुनिया में न कोई हुए हैं और न होंगे। न भूतो, न भविष्यति। ऐसा वण्डरफुल व्यक्तित्व, तेजस्वी जीवन मम्मा का था। जब हम पहली बार मधुबन आये थे तो हमें ईश्वरीय ज्ञान नहीं था। बाबा ने निमंत्रण देकर हमें बुलाया था। हम एकदम नये-नये थे, यह सन् 1961 की बात है। मुंबई के करीब 8-10 लोग बैठे थे। बाबा से हम मिल रहे थे। उस समय हापुड़ में कुछ हंगामा चल रहा था। बाबा वहाँ के भाई-बहनों से समाचार सुन रहे थे। बाबा ने कहा, कोई बात नहीं बच्चे, कल तो मम्मा आ रही है, सारा काम निपटा लेगी, चिन्ता नहीं करो। बाबा निश्चिन्तता, विश्वास और दृढ़ता से मम्मा के बारे में कह रहे थे तो मुझे आश्चर्य लग रहा था कि मम्मा कैसी होगी, बाबा उनकी इतनी महिमा कर रहे हैं तो वह अवश्य ही बहुत विचित्र पर्सनैलिटी वाली ही होगी! ऐसे-ऐसे मैं सोच रही थी। क्योंकि मैंने तो मम्मा को तब तक देखा ही नहीं थी। अगले दिन मम्मा आयी तो बाबा ने उनका ज़ोरदार स्वागत किया।
मैं तो एक छोटी बच्ची बन गयी
उस दिन मम्मा बाहर से आयी थी। मम्मा शाम को आये हुए सभी बच्चों से मिल रही थी। सब बच्चे मम्मा की गोद में जाते थे। मम्मा से वह मेरा पहला मिलन था। मैं भी मम्मा की गोदी में गयी। जब मैं मम्मा की गोद में गयी तो मुझे ऐसा अनुभव होने लगा कि मैं एक छोटी बच्ची हूँ और माँ की ममता के पालने में झूल रही हूँ। मैं बहुत हल्कापन और आनन्द अनुभव कर रही थी। बहुत अच्छा लगा।
मैं अपने आपको भूल गयी
मम्मा से मिलने से पहले जब हम बाबा से मिले तो बाबा मुझे कह रहे थे, बच्ची, तुम मम्मा को पहचानती हो? मैंने कहा, बाबा हमने मम्मा को देखा ही नहीं तो पहचानें कैसे ? बाबा ने कहा, देखो बच्ची, कल मम्मा आ रही है, उनको तुम अच्छी तरह से देखना, वो कैसे बैठती है, कैसे उठती है, कैसे चलती है- यह सब पूरा निरीक्षण करना। मैं सोचने लगी, यह कोई कहने की बात है क्या ? जैसे इन्सान बैठता है, उठता है, चलता है वैसे ही चलती होगी। फिर भी मैंने कहा, जी बाबा।
एक दिन मैं नाश्ता कर रही थी। सामने से मम्मा आ रही थी। मैं ने देखा तो देखती ही रह गयी। मैं अपने आपको भूल गयी। जैसे-जैसे मम्मा नज़दीक आती गयी तो मुझे महसूस होने लगा कि कोई शीतल हवा का झोंका मेरी तरफ़ आ रहा है। मम्मा मेरे नज़दीक से गुज़र कर किचन की तरफ़ गयी। वहाँ किसी बहन को कुछ सेवा का डायरेक्शन दे रही थी। डायरेक्शन देने का तरीक़ा ऐसा था कि वे धीरे से उनके कान के पास जाकर बोल रही थीं। पाँच-दस मिनट वहाँ उनको जो कहना था कहकर धीरे-धीरे जा रही थीं। उनका चलना तथा दूसरों के साथ बात करने की विधि देखने लायक और सीखने लायक थी। मम्मा वहाँ से धीरे-धीरे जा रही थी तो जैसे चुम्बक के आकर्षण में लोहा खिंचा हुआ जाता है वैसे ही मैं भी बिना चाहे उनके पीछे खिंची जा रही थी। फिर एक दिन मम्मा, किसी से अपने कमरे में मिल रही थी, तो मैं उनके कमरे के दरवाज़े के पास गयी और पर्दे को थोड़ा हटाकर देखा तो उनकी बैठक बहुत आकर्षक लगी। मम्मा का चलना, बोलना, बैठना सब बहुत निराला था। तब मुझे एहसास हुआ कि बाबा ने इसी लिए मुझे कहा था कि बच्ची मम्मा के हर कर्म का निरीक्षण करना।
मम्मा हमारे घर में ही रहीं
हमें मम्मा के बहुत नज़दीक रहने का और उनको देखने का सौभाग्य मिला। मम्मा अपने अन्तिम सालों में क़रीब 22 महीने मुंबई में रहीं। उसमें से 18 महीने तो हमारे घर में ही रहीं। हम मम्मा के साथ ऐसे रहते थे जैसे अपनी लौकिक माँ के साथ रहते हैं।
मम्मा असाधारण र्थी। अलौकिक थीं। उनका वर्णन शब्दों की सीमा में नहीं आ सकता। वे सीमातीत थीं, वर्णनातीत थीं। ऐसी माँ की लालना-पालना में पले हम बच्चे अति भाग्यशाली हैं।
त्रिकालदर्शी मातेश्वरी
मजफ्फपुर से ब्रह्माकुमारी रानी बहन जी अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं कि मैं आज से 50 वर्ष पूर्व, मम्मा से जब आबू के कोटा हाउस में मिली तब मेरी आयु केवल 6 वर्ष थी। हम बाबा और मम्मा के सामने आकर बैठे तो मातेश्वरी का वो चुम्बकीय व्यक्तित्व, माँ का वो रूहानी आकर्षण और उनका दिव्य स्वरूप ऐसे लगा जैसे कि मम्मा अव्यक्त लोक से सम्पूर्णता लेकर आयी हो। मैं अपने स्थान से उठी और मम्मा की गोद में चली गयी। मम्मा ने सिर पर अपना वरदानी हाथ रखते हुए मेरी पीठ पर भी हाथ फिराया। उस समय मेरे अन्दर बहुत शक्ति भर गयी। मुझे यह अनुभव हुआ कि मैं इस लोक में नहीं हूँ, दूसरे और कोई लोक में हूँ, मैं वहाँ से जैसे कि गुम हो गयी।
जब भी मम्मा का दिल्ली में आना होता था तो हमें सेवाकेन्द्र पर मम्मा के स्वागत के लिए डान्स करना सिखाया जाता था। बचपन से ही मेरे अन्दर डान्स करने का संस्कार था। एक दिन मेरा डान्स देखकर, स्कूल में हमारी टीचर ने कहा कि तुम स्कूल में भी डान्स करो। उस समय मैं क़रीब 8 वर्ष की थी। जब मम्मा दिल्ली में आयी तो मैंने मम्मा से पूछा, "मम्मा, हमारे स्कूल की टीचर ने डान्स के लिए निमंत्रण दिया है, क्या मैं जा सकती हूँ?" मम्मा ने कहा, "बच्ची, तुम साधारण बच्ची नहीं हो, तुम्हारा पार्ट विशेष है, अगर निमंत्रण दिया है तो इस बार उसको स्वीकार करो, दुबारा उस सांसारिक वातावरण में तुम्हें कभी नहीं जाना है।" किसी भी कुसंग में नहीं जाने की यह प्रेरणा मातेश्वरी जी ने मुझे दी।
सदा बाप के संग में ही रहना
एक बार हमारे रिश्तेदारों ने कहा कि तुम सभी सदा एक ही जैसे सफ़ेद कपड़े पहनते हो, यह ठीक नहीं है। जब लौकिक में जाते हो तो लौकिक वालों जैसे रहना चाहिए और सत्संग में जाते हो तो सत्संग वालों जैसे रहना चाहिए। मैंने मातेश्वरी जी से सारी बातें कही तो उन्होंने कहा, "बच्ची, तुम सच्चे बाप के सच्चे बच्चे हो, तुम बच्चों का रूप बदल नहीं सकता। कैसा भी वातावण हो तुम्हारे वस्त्र सफ़ेद ही रहेंगे, तुम कहीं भी जाओ तुम्हारा मन, वचन और कर्म एक ही जैसा रहना चाहिए। वे तो सांसारिक मनुष्य हैं, मायावी रंग में रंगे हुए हैं इसलिए हर रोज़ अनेक रूप बदलते रहते हैं। तुम्हें किसी के प्रभाव में नहीं आना है, सदा एक बाप के संग में रहना है।"
मेरी उम्र छोटी थी लेकिन हमने अनुभव किया कि मम्मा ने हमें छोटे बच्चे समझकर कोई कमी हमारे अन्दर रहने नहीं दी। मम्मा हर प्रकार की धारणा की बातें सुनाती थीं। हमें याद ही नहीं है कि हमने बाहर के लोगों के घर का खाना खाया हो अथवा रंगीन कपड़े पहने हों। मैं सदा सफ़ेद कपड़े ही पहनती थी। स्कूल जाते हुए भी सफ़ेद कपड़े ही पहनती थी। मुझे संकल्प भी नहीं आता था कि मैं रंगीन कपड़े पहनूँ और बाज़ार की चीजें खाऊँ। मैंने अमृतसर सेवाकेन्द्र में रहकर ही नौवीं और दसवीं की पढ़ाई पढ़ी।
मम्मा आबू से जब पहली बार सेवा के लिए बाहर निकली तब वे दिल्ली आयी थीं। उनका स्वागत कार्यक्रम हुआ, मैं वहीं भीड़ में खड़ी थी और मम्मा को ही देखती रही लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उस भीड़ में भी मम्मा की दृष्टि मेरे पर पड़ी, उन्होंने आकर मेरी उंगली पकड़ी और अपने साथ कार में वहाँ ले गयीं जहाँ उनको ठहरना था। जब तक मम्मा दिल्ली में रहीं तब तक मुझे अपने पास ही रखा। इस प्रकार मम्मा की रूहानी दृष्टि ने मेरे जीवन को परिवर्तन कर मेरे भाग्य को जगा दिया।
प्यार की शक्ति वाली पराशक्ति माँ
एक बार मम्मा अमृतसर में आयी थीं। एक दिन वहाँ सबको आइसक्रीम खिलायी गयी। मैंने छोटी होने के कारण आइसक्रीम थोड़ी ज्यादा ही खा ली होगी। अगले दिन मेरी तबीयत खराब हो गयी। बहुत सर्दी, जुखाम, बुखार और यहाँ तक कि श्वास लेने में भी कष्ट हो रहा था। जब मम्मा को यह पता पड़ा तो मम्मा हमारे पास आयी और मुझे अपनी गोद में करीब आधा पौना घंटा बिठाकर पीठ पर हाथ फेरती रहीं। तब जाकर मेरी श्वास लेने की क्रिया ठीक हुई और धीरे-धीरे बुखार भी उतरा। अगले दिन मैं ठीक भी हो गयी। इस प्रकार, मम्मा ने अपने वरद हस्तों से, अपने प्यार की शक्ति से मेरे कष्ट को हर लिया। मुझे छोटी उम्र में ही दमा हो गया था। मैं एक बार आबू आयी थी। उस समय बस स्टैण्ड से हमें पाण्डव भवन पैदल आना पड़ता था। पैदल आने में मेरा श्वास चढ़ गया। तो बाबा ने मुझे अपने कमरे के पीछे वाले कमरे में एक खटिया दे दी। बाबा ने मम्मा से कहा, "मम्मा, जितनी बार आप बाबा से मिलने आयेंगी उतनी बार इस बच्ची के पास जाकर दृष्टि देते रहना, यह ठीक हो जायेगी।" मम्मा ने भी ऐसे ही किया और बाबा भी जितनी बार बाहर निकलते थे, मुझे मिल कर, मेरी पीठ पर, सिर पर हाथ फेरते थे और दृष्टि देते थे। आश्चर्य की बात है कि मेरा दमा बिना कोई दवाई के उस समय ही ठीक हो गया।
यह हमारा परम सौभाग्य है कि माँ सरस्वती की पालना ली, उनकी ज्ञानवीणा की मधुर तान सुनी। मम्मा हमारे जीवन का आधार बनीं। उनकी याद और आदर्शमय जीवन हमारे लिए संजीवनी है।
कष्टहारिनी, दुःख निवारिणी माँ दुर्गा
जालन्धर (पंजाब) से ब्रह्माकुमारी शुक्ला बहन जी लिखती हैं, मुझे बाबा का ज्ञान अमृतसर में सन् 1954 में मिला। इन्हीं दिनों, मम्मा अमृतसर आयी थी। तब मेरी भोजन बनाने की सेवा थी। मेरे मन में ऐसी भावना थी कि मम्मा चेतन दुर्गा है। जब मम्मा किचन में आती थी तो कहती थी, अच्छा, माँ के लिए भोजन बना रही हो? एक दिन की बात है कि किचन में एक माता जब गुड़ का दलिया बना कर ले जाने लगी तो पतीला हाथ से छूट गया। मेरे हाथ-पाँव पर दलिया गिर पड़ा। उसी समय बहनें मम्मा को बुला लायीं। मम्मा ने देखा तो कहा, "मम्मा के लिए खाना बना रही थी, कोई बात नहीं, ठीक हो जायेगा।" उसी समय मुझे ऐसे लगा कि मेरा पाँव शीतल हो गया और मम्मा ने मेरा सारा दर्द हर लिया। सब पूछने लगे कि दर्द तो नहीं हो रहा? मैंने कहा, "मुझे तो पता ही नहीं चला कि दर्द भी था !" मम्मा की चाल को देखकर बाबा कहते थे कि देखो, धरती भी मम्मा को प्यार करती है। फ़रिश्तों की तरह मम्मा हमेशा हल्की रहती थी। मम्मा कितनी भी सेवा करती थी लेकिन कभी भी उनके चेहरे पर थकावट नहीं नज़र आती थी। सदा मुस्कराती और हल्की नज़र आती थी। बाबा जब भी मम्मा को कोई सेवा देते तो मम्मा सदा 'जी बाबा' कहती। बाबा भी सदा कहते थे कि मम्मा इतनी पक्की पिड्डी है कि एक शिव बाबा को ही दिलवर बनाया है, और किस को भी दिल की बात नहीं सुनाती। जब भी मम्मा किसी जगह से विदाई लेती थी तो सबकी आँखें नम हो जाती थीं पर, मम्मा इतनी पक्की थी कि कभी भी उनकी आँखों में आँसू नहीं आते थे। मम्मा कहती थी, बहाओ आँसू, कोई बात नहीं, लेकिन प्रेम के आँसू हों। अगर प्रेम के आँसू हैं, तो मोती बन जायेंगे।
मम्मा हर एक के दिल की बात ऐसे सुनती थी जैसे कि कोई माँ अपने बच्चे का दुःख सुन रही हो। सब मम्मा से ऐसे हल्के होकर जाते थे जैसेकि मम्मा ने सारा बोझ उतार दिया हो। सब का मम्मा से बहुत प्यार था। मम्मा सारी बात सुनकर कहती थी कि इतनी बटोला-बटोली की, अब कोई अपनी बात भी सुनाओ कि तुम्हारे अन्दर कौन-सी कमी है!
मम्मा ने मुझे निडर बनाया
मैं मम्मा-बाबा का भोजन बनाती थी इसलिए एकदम सारी बात मम्मा-बाबा को निस्संकोच बता देती थी। मैंने एक दिन मम्मा को बोला, मम्मा, आप कहते हो कि हम तो शिवशक्तियाँ हैं लेकिन मैं डरती छोटी-सी बात से हूँ। उसी समय मम्मा ने कहा, पहले दिन में ग्यारह बार बोलो कि मैं शिवशक्ति भारत माता हूँ, फिर मेरे पास आना। इस रीति से मम्मा ने मुझे निडर बनाया। जब भी कोई सेवा करके आते थे तो पहले मम्मा को सुनाते थे कि आज यह जिज्ञासु आया, उसने ऐसे प्रश्न पूछा, तब मम्मा-बाबा उसका तरीक़ा बताते थे कि इसका क्या जवाब होना चाहिए। फिर जब मम्मा-बाबा पत्र लिखते थे तो पूछते थे कि बाबा को पत्र किस-किसने लिखा है, उसी के नाम पत्र में लिखते थे क्योंकि बाबा कहते थे कि जिसने पत्र लिखा है वो तो इन्तज़ार में होगा, जिसने नहीं लिखा वो थोड़े ही इन्तज़ार में होगा ?
जब मम्मा अमृतसर आयी थी तो उस समय हमें छोड़कर अन्य किसी के भी माता-पिता ज्ञान में नहीं चलते थे। उस समय लोग कहते थे कि यह ब्रह्माकुमारियाँ लोगों को भगाती हैं। तब, यह सिद्ध करने के लिए कि ये भगाती नहीं हैं बल्कि सेवा के लिए भेजती हैं, मम्मा ने प्रोग्राम रखा तो हमारे परिवार वालों ने हमें मम्मा के आगे अर्पण किया और हमारे लौकिक बाप ने मम्मा के आगे गीत गाया कि "मैं दो कलियाँ लेकर आया हूँ। साथ खुद भी अर्पण होने आया हूँ...।" जब मम्मा वापिस आबू आयी तो बाबा ने मम्मा से पूछा, क्यों मम्मा, अकेली आयी है, कोई बलि नहीं चढ़ा? तो मम्मा ने मुझे और राज बहन जी (मेरी लौकिक बड़ी बहन) को आगे किया। हम बाबा के पास चले गये। बाबा फिर हमें एक घंटा दृष्टि देते रहे और योग से ही हम दोनों में इतनी शक्ति भर दी जैसे हम सूक्ष्मलोक में बैठे हों। मम्मा-बाबा की दृष्टि जीवन को सुखदायी और निर्मल बनाने वाली थी।
भक्तों ने भी गाया- हमारी माँ आयी है
मम्मा से प्रथम मुलाकात सन् 1954 में मधुबन में हुई। जब मैंने पहली बार मम्मा को देखा तो देखते ही ऐसे अनुभव हुआ जैसे कि कई सालों से माँ से अलग हुआ बच्चा अपनी माँ से मिल रहा हो। मन बिल्कुल हल्का हो गया और दिल करे कि मम्मा की आँखों में देखती रहूँ और साथ-साथ मेरी आँखों से आँसू भी बहते रहे।
सन् 1964 में जब मम्मा पहली बार जालंधर आयी तो मैंने क्या विशेष बात देखी कि मम्मा के आने पर हमने कोई माइक, कलाकार आदि को नहीं बुलाया पर कई कलाकार अपने आप आये जिनका नाम तक हमें पता नहीं था। उन्होंने रो-रो कर गीत गाये कि हमारी माँ आयी है। जब उनसे पूछा कि भाई, आप कैसे आये? तो उनमें से कइयों ने कहा कि हमें सपने में पता मिला कि माँ यहाँ आयी हुई हैं। किसी ने कहा कि सफ़ेद वस्त्रों में हमें दिखायी दी। सभी ने बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव सुनाये। इन बातों से मैंने जाना कि मम्मा के अन्दर माँ की पालना करने की दिव्य शक्ति है जिससे उनके स्नेह के प्यासे बच्चे खींचे चले आये।
मम्मा ने मुझे चुन्नी पहनायी
मधुबन की बात है। एक दिन मम्मा मुझे अपने कमरे में ले गयी और कहा कि तुम्हें क्या चाहिए? हमने कहा कि बस आपका प्यार सदा साथ रहे। तो मम्मा ने भगवा (मोगिया) रंग की दो चुन्नियाँ ली; एक राज बहन जी को और एक मुझे अपने हाथों से पहनायी।
इस प्रकार, मम्मा के उस अलौकिक प्यार का अनुभव आज भी हमेशा मेरे साथ है और उसको जब स्मृति में ताजा करती हूँ तो मेरे पुरुषार्थ में तीव्रता आती है।
जीवन का फैसला हो गया
बठिण्डा से ब्रह्माकुमारी कमलेश बहन जी अपना अनुभव सुनाती हैं कि सन् 1954 में ईश्वरीय विश्व विद्यालय से मेरा परिचय हुआ। एक-डेढ़ वर्ष के बाद आबू से हमें सन्देश आया कि मातेश्वरी जी पंजाब के टूअर (Tour) पर निकली हैं। हमने अपना अहो सौभाग्य समझा कि हमारे छोटे-से गाँव (श्रीहरगोविन्दपुर) में भी श्री मातेश्वरी जी आयेंगी और हम सबसे मुलाक़ात करेंगी ! मातेश्वरी जी का हमारे गाँव में आना हुआ। हमारा गाँव छोटा होते हुए भी वहाँ कुमारियों का झुंड था। हम सब कुमारियों ने मिलकर एक गीत बनाया और मातेश्वरी जी के सामने गाया। उस गीत की दो पंक्तियाँ मुझे अभी भी याद
हैं,
"निकलेंगी हम शक्तियाँ कुरुक्षेत्र के मैदान में,
होती चलेंगी पास निश्चय के इम्तिहान में।"
मातेश्वरी जी ने इस गीत को सुनते हुए बहुत प्यार भरी दृष्टि से हमें निहारा। जब उन्होंने मधुर ज्ञान-सितार बजायी तो उसमें यही कहा कि अगर ऐसी शिव की शक्तियाँ मैदान में उतरें तो बाबा का नाम बाला कर सकती हैं। मातेश्वरी जी के ये बोल सुनकर हमारा इरादा और पक्का हो गया। उस समय मैं नौवीं क्लास में पढ़ रही थी।
दो साल के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए चण्डीगढ़ गयी। उस समय वहाँ सेवाकेन्द्र नहीं था। एक बार मुझे पत्र आया कि मातेश्वरी जी जब पंजाब टूअर पर आयेंगी तब चण्डीगढ़ युनिवर्सिटी के क्षेत्र में रुकेंगी। परन्तु मुझे यह पता नहीं था कि मातेश्वरी किसके निमंत्रण पर, कहाँ ठहरेगी। फिर भी मैंने उस घर को ढूँढ़ने का प्रयास किया परन्तु नहीं मिला। फिर, जो पता मिला था उसके आधार पर मैंने एक पत्र लिखा कि अगर यह पत्र आपको मिले तो आप मेरे को फलाने पते पर सूचित करें कि मातेश्वरी जी किस दिन आयेंगी। वह पत्र उनको मिल गया, वे मेरे पास खुद आये और मुझे निमंत्रण देकर चले गये। मैं वहाँ गयी। मम्मा ने मुझे एक सेवा दी कि तुम हर रोज़ यहाँ आकर क्लास कराओ और गुरुवार के दिन भोग लगाओ। मैं लौकिक पढ़ाई पढ़ते हुए भी समय निकाल कर बाबा की सेवा करती रही। फिर चंडीगढ़ में सन् 1960 में सेवाकेन्द्र स्थापित हुआ। फिर वहाँ मातेश्वरी जी का आगमन हुआ। उस समय मातेश्वरी जी दो दिन वहाँ रहीं। उनको देख कर मुझे यही प्रेरणा बार-बार आती थी कि जैसे मातेश्वरी जी धारणा मूर्ति हैं, गंभीर हैं, सरल स्वभाव की हैं ऐसे मुझे भी बनना है। जब मातेश्वरी जी सामने बैठी होती थी तो ऐसा लगता था कि जैसे शेरनी शक्ति बैठी हैं और हमको ऐसा बनाने के लिए इशारा कर रही हैं। उनके महावाक्य सुनते ही मन में उमंग-उत्साह भरता था कि हम भी क्यों नहीं बाबा के कार्य में हाथ बटायें।
लौकिक पढ़ाई के समय, बीच-बीच में मुझे मातेश्वरी जी के पत्र आते थे। उनमें वे लिखती थी, "बच्ची, तुम शेरनी शक्ति हो, कैसी भी परिस्थिति आये, तुम्हें डरना नहीं है, पास होना है। तुम्हें एक बल, एक भरोसे के निश्चय के बल से उन परीक्षाओं में पास होना है।" इन प्रेरणाओं से मैं आगे बढ़ती गयी और पढ़ाई पूरी करके, कुछ समय लौकिक सेवा और साथ-साथ ईश्वरीय सेवा भी की। एक समय आया जब मेरे सारे लौकिक बन्धन टूट गये और सन् 1962 में पूर्णतः ईश्वरीय सेवा में समर्पित हो गयी। उसके बाद चंडीगढ़ में सेवा पर रही। जब भी मैं मम्मा को देखती थी तो मुझे ऐसे लगता था कि ये न केवल मेरी अलौकिक माँ हैं परन्तु लौकिक माँ भी हैं। उनसे पालना भी ऐसी ही मिली, क़दम-क़दम पर उनका मार्गदर्शन मिला। उन्होंने सदा आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी किया।
अभी मम्मा साकार में नहीं हैं लेकिन जब भी मैं मधुबन आती हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मम्मा-बाबा हमारे संग-संग हैं, क़दम क़दम पर हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। जब योग में बैठते हैं तो कभी-कभी मम्मा की मूरत सामने आती है और प्रेरणा मिलती है, इशारा मिलता है कि तुमको आगे बढ़ना है, सी फादर और फॉलो फादर (See Father and Follow Father)। अव्यक्त रूप में हमें आज भी मम्मा की सूक्ष्म प्रेरणायें मिलती हैं, सदा आगे बढ़ाने के लिए।
दिव्यदृष्टि विधात्री मातेश्वरी
गुरुदासपुर से ब्रह्माकुमारी सुमन बहन जी अपना अनुभव सुनाती हैं कि मातेश्वरी की भावना इतनी पवित्र और परिशुद्ध होती थी कि उनका दर्शन करते ही कैसे भी विरोधी भाव वाले अथवा अन्य भाव वाले व्यक्ति हों, पूर्णतः बदलकर शीतलता का अनुभव करते थे और महसूस करते थे कि इस महान् आत्मा के दर्शन पाकर हम धन्य हो गये। मातेश्वरी जी का इतना प्रभाव था कि उनके सामने कोई भी, कैसी भी आत्मा आये परिवर्तित होकर जाती थी।
अमृतसर में एक बार मम्मा का सत्संग हो रहा था। हमारे घर से सब बहुत खुशी-खुशी में जा रहे थे। मुझे भी उन्होंने कहा कि मातेश्वरी जी आ रही हैं, तुम भी चलो। मैं भी उनके साथ गयी। वहाँ मातेश्वरी को देखा तो मुझे प्रेरणा आयी कि मुझे भी उन जैसा बनना चाहिए। उनके जैसा आदर्श जीवन जीना चाहिए। यह सोच ही रही थी कि मातेश्वरी की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। वे मुस्करायी और अपनी शक्तिदायिनी दृष्टि मेरे ऊपर बरसायी। जब मम्मा, दूसरी बार अमृतसर आयी, तो मैं उस दिन क्लास में नहीं गयी थी। तब मम्मा ने मेरी माता जी के हाथ शक्तियों की एक तस्वीर भेजी और कहा कि उस कन्या से पूछना कि इन शक्तियों जैसा बनना है? उस चित्र को देख मुझे लगा, हाँ, ऐसा बनना है। उस दिन से मातेश्वरी से मेरा प्यार और बढ़ गया और मुझे बार-बार अनुभव होने लगा कि यह मेरी माँ है। उस प्यार से मेरा जीवन पूरा परिवर्तित हो गया।
जब पहली बार मैंने मम्मा को देखा तो मुझे मम्मा अष्ट भुजाधारी देवी दिखायी पड़ी। ताज पहने हुए थी, चमकीले रंगीन वस्त्र थे, सर्व अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित माँ शक्ति के रूप में दिखायी पड़ी। मम्मा का जीवन बहुत ऊँचा था। एक बार की बात है, मम्मा के सामने कई कन्यायें बैठी थीं। मम्मा उनसे मिल रही थी। मैं भी थी। जब मुझसे मम्मा मिल रही थी तो मम्मा ने पूछा, "बच्ची, ईश्वरीय जीवन में बहुत परीक्षायें आयेंगी, तुम उनको पास करोगी?" मैंने कहा, "हाँ मम्मा, ज़रूर।" फिर पूछा, "इतनी इतनी मिर्ची खानी पड़ेगी, खाओगी?" मैंने कहा, "हाँ जी।" आगे फिर कहा, "इतने बड़े-बड़े घड़ों पानी पीना पड़ेगा, पिओगी?" मैंने कहा, "हाँ जी।" पुनः पूछा, "इस संसार में चलना है तो बहुत-सी परीक्षायें देनी पड़ेंगी, देगी?" मैंने कहा, "हाँ मम्मा, ज़रूर दूँगी।" इस प्रकार, चलते-चलते हमारे पास कोई परीक्षा आती भी है तो हमें मम्मा से किया हुआ हमारा वायदा याद आता है। इससे मन में और ताकत आती है और हमें उस परीक्षा में पास होने का साहस आ जाता है।
भवभयहरनी शक्ति माँ
करनाल की ब्रह्माकुमारी कमला बहन अपना अनुभव ऐसे सुनाती हैं कि मम्मा के अन्दर निर्भयता का संस्कार बहुत प्रबल था। वे सत्य ज्ञान को इतना निर्भयता से सिद्ध करती थीं कि सुनने वाला कितना भी पढ़ा-लिखा, तर्क- वितर्कवादी हो वह झुक जाता था। एक बार की बात है कि करनाल में मम्मा के निमित्त एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया था। मम्मा उस समय कर्म सिद्धान्त के बारे में भाषण कर रही थीं। वहाँ का नगरपालिका अध्यक्ष कुछ लोगों के साथ विरोध प्रकट करने के लिए आया। मम्मा ओजस्वी भाषण उस भरी सभा में सुना रही थी। मम्मा ने पूरे एक घण्टे तक भाषण किया। भाषण पूरा होने के बाद मम्मा स्टेज से उतरने जा ही रही थी कि वह नगरपालिका अध्यक्ष आकर मम्मा को साष्टाङ्ग नमस्कार करते, माँ-माँ कह आँसू बहा रहा था। उसको मम्मा से शक्ति माँ का साक्षात्कार हुआ था। इस प्रकार, मम्मा के निर्भयता के गुण ने कई आसुरी संस्कारों वालों को पराजित किया था और उन्हें शरण में आने के लिए मजबूर किया था।
सेवा ही सम्मान दिलाती है
मम्मा के इस निर्भयता के गुण ने मुझे परिवार के लौकिक बन्धनों को तोड़ने की प्रेरणा दी। क्लास में आने के लिए ही मुझे बन्धन डाला जाता था, तो समर्पित होने की बात तो मेरे लिए दूर की बात थी। लेकिन मम्मा के निर्भयता के गुण को मैंने अपनाया और सारे बन्धनों को तोड़ डाला। इस प्रकार, हमें निर्बन्धन बनाने में मम्मा के बोल ही पूरे सहयोगी रहे।
मुझे ज्ञान की बातें दूसरों को सुनाने में डर लगता था। एक दिन मम्मा कई सेवा करने वाली बहनों के नाम ले रही थीं। मुझे भी अन्दर से इच्छा हो रही थी कि मम्मा मेरा भी नाम लें। उस दिन मैंने मम्मा से पूछा, "मम्मा, आपने मेरा नाम क्यों नहीं लिया ?" तब मम्मा ने कहा, "बच्ची, मम्मा उनके ही नाम लेती है जो बाबा की बहुत सेवा करते हैं, तुम भी बाबा की खूब सेवा करो तो तुम्हारा नाम भी लूँगी।" तब मुझे मन में आया कि मुझे बाबा की सेवा करनी है। तब से मैं बाबा के ज्ञान को सुनाने की सेवा करने लगी। मम्मा के उन शब्दों ने मुझे बेझिझक ईश्वरीय ज्ञान सुनाने की प्रेरणा दी। उसके बाद मैं बड़ी-बड़ी सभाओं में बाबा का सन्देश निर्भयता से देने लगी।
पाँच तत्वों को भी कष्ट नहीं देना
एक बार करनाल में, क्लास के बाद मम्मा हम कन्याओं के साथ बैठी थी। मम्मा के बहलाने में भी बहुत कुछ राज भरे रहते थे। मम्मा सदा कहा करती थीं, सदा सबको सुख दिया करो। पाँच तत्वों को भी दुःख नहीं देना। अगर कोई ज़ोर-ज़ोर से चप्पल से आवाज़ करते हुए चलता है तो मम्मा कहती थी कि धीमे-धीमे चला करो, धरती को भी कष्ट नहीं देना। तत्वों को भी तुम सुख दो ताकि ये तत्व भी तुम्हें सुख दें। जिस प्रकार, एक माँ अपनी बच्ची को हर बात समझाती है कि कैसे बात करें, कैसे चलें, कैसे व्यवहार करें, वैसे मम्मा भी हर तरह की शिक्षा देकर हम बच्चों को योग्य बनाती थी। जब भी मैं मम्मा को देखती थी तब मम्मा मुझे सजी-सजायी, ताजधारी शक्ति के रूप में दिखायी पड़ती थी।
सबके प्रति समान और सम्मान-दृष्टि
माँ होने के कारण मम्मा के लिए सब अपने ही बच्चे थे। वे किसी तरह का भेद-भाव नहीं करती थी। जिस प्रकार लौकिक माँ अपने बुद्धिवान बच्चे को भी प्यार करती है और बुद्धिहीन बच्चे को भी प्यार करती है। उसी प्रकार, कोई यज्ञवत्स मम्मा के पास किसी की शिकायत लेकर जाता था तो मम्मा कहती थी, बच्चे, उसका कोई अवगुण बताने से पहले तुमको उसका कोई एक अच्छा गुण सुनाना पड़ेगा। पहले उसका एक अच्छा गुण सुनाओ, बाद में उसका अवगुण सुनाओ। जब वो उसके अच्छे गुण के बारे में सोचने लगता था तो उसमें जो जोश होता था वह धीरे-धीरे ठंडा हो जाता था। उसका अच्छा गुण सुनाने के बाद उसका अवगुण कैसे सुना सकता था ! इस प्रकार, मम्मा प्यार से दोनों बच्चों का झगड़ा स्नेह में परिवर्तित कर देती थी और अपने दोनों बच्चों के प्रति एक समान दृष्टि रखती थी।
दिव्य रूप दिखाने वाली देवी माँ
कैथल की ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी बताती हैं कि इतनी सारी जिम्मेवारियाँ होते हुए भी मम्मा शान्त और गंभीर रहती थी। गंभीरता ऐसी कि उसका भेद कोई पा नहीं सकता था अर्थात् उनके अन्दर क्या है- यह जान नहीं सकता था। आम आदमी जो होते हैं उनके अन्दर में जो भी होता है उसको वह दस आदमियों को सुनाकर अपने को हल्का कर लेता है लेकिन मम्मा से पूछने की किसी को हिम्मत नहीं होती थी कि मम्मा आपके मन में क्या है। इतनी वह सागर की तरह गंभीर रहती थी। इसका अर्थ यह नहीं कि मम्मा हर्षितमुख नहीं थी। मम्मा हंसती थी लेकिन शालीनता के साथ।
जब मैंने पहली बार करनाल में मम्मा को देखा तब उनको मैंने जगत् माँ के रूप में देखा। मम्मा महीना भर करनाल में रही। मम्मा बड़े-बड़े बुजुर्गों को भी बच्चों की तरह पालना देती थी। मम्मा की दृष्टि उन पर पड़ते ही वे माँ, मम्मा कहकर उनका लाड-दुलार पाने के इन्तज़ार में रहते थे। मम्मा अपनी दृष्टि से निहाल कर देती थी और वे मम्मा का दर्शन पाकर प्रेम के आँसू बहाते थे।
भक्तों की भी ममतामयी माँ
एक बार मम्मा करनाल में आने वाली थी। उनके स्वागत के लिए कई भाई-बहनें स्टेशन पर गये थे। उनमें बुजुर्ग भी थे, प्रौढ़ तथा वयस्क भी थे। वहाँ कुछ लोगों ने पूछा कि ये कौन हैं। किसी ने कहा, यह हमारी माँ है। लोगों को आश्चर्य हुआ कि यह तो उम्र में छोटी लगती है और जो बूढ़े-बूढ़े हैं वो भी कहते हैं कि यह हमारी माँ है! फिर मम्मा वापिस आबू आ रही थी तो स्टेशन पर सबको दृष्टि दे रही थीं। उतने में स्टेशन मॉस्टर ने आकर पूछा कि ये कौन हैं? उसको कहा गया- ये हमारी माँ हैं। उसने भी आश्चर्य चकित होकर मम्मा को देखा और मम्मा ने भी उसको देखा। मम्मा की दृष्टि पड़ते ही वह मम्मा के चरणों में गिर पड़ा और वह माँ, माँ कहने लगा। इस प्रकार, अनेक भक्तों को भी आभास होता था कि मम्मा एक देवी शक्ति हैं, देवी माँ हैं।
मैं बहुत बाँधेली थी। एक बार मैं छिपकर मम्मा से मिलने गयी। मैंने मम्मासे कहा, "मम्मा, मेरे बहुत कड़े बन्धन हैं, क्या करूँ?" तब मम्मा ने कहा, "ईश्वरीय सेवा एक ऐसा मधुर और श्रेष्ठ बन्धन है जो सर्व स्थूल बन्धनों को काटकर फेंक देता है।" इस प्रकार, मम्मा ने मेरी ईश्वरीय सेवा में रुचि बढ़ायी और सर्व बन्धनों से मुक्त कर ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित होने का भाग्य भी बनाया।
सदा बाबा की तरफ़ ही इशारा
एक बार मैंने मम्मा से कहा, "मम्मा, मैं आपके ऊपर बलि चढ़ती हूँ।" मम्मा ने कहा, "मेरे पर नहीं, शिव बाबा पर बलि चढ़ो।" मैंने कहा, "बाबा तो सामने है नहीं, सामने तो आप हैं, इसलिए आप पर बलि चढ़ती हूँ।" मम्मा ने कहा, "देखो बच्ची, बलि चढ़ना आसान नहीं, सारे लोग देख रहे हैं, दुनिया भी देख रही है।" मैंने कहा, "मम्मा मैं तो पहले ही आप पर बलि चढ़ी हुई हूँ।" मम्मा ने कहा, "बलि पूरा चढ़ना पड़ेगा।" मैंने कहा, "हाँ मम्मा।" उसी समय मम्मा ने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा, तुम अभी शिव पर बलि चढ़ गयी हो। मम्मा ने बलि अपने ऊपर नहीं चढ़ने दिया, कहा, तुम शिव पर बलि चढ़ी हो। इस तरह मम्मा हमेशा एक बाबा की तरफ़ ही इशारा करती थी और कहती थी कि उसी एक का अनुसरण करो और उसी को याद करो।
बाबा के प्रति और यज्ञ के प्रति अटूट स्नेह
बाबा की हर बात पर मम्मा सदा हाँ जी, हाँ जी करके चलती थी। मम्मा ने साकार बाबा में सदा निराकार बाबा को देखा। उनकी किसी भी बात को कभी हल्के रूप से न देखा, न लिया। सदा आलमाइटी की आज्ञा समझकर चली और दूसरों को भी यही सिखाती रही।
मम्मा के प्रति बाबा का दृष्टिकोण
बाबा, मम्मा को बेटी के रूप में देखते थे, तो माँ के रूप में भी देखते थे। बाबा ने उनको हमेशा यज्ञमाता का ही सम्मान दिया। कभी बाबा, मम्मा को कहते थे, "मम्मा आप तो यज्ञमाता हैं, जगत् माता हैं, बच्चों को याद प्यार दो।" तो मम्मा बाबा के कहने अनुसार याद-प्यार देती थी। इस प्रकार, बाबा भी मम्मा को बहुत इज्जत देते थे और वैसे व्यवहार भी करते थे। इस प्रकार, बाबा, मम्मा को बेटी के रूप से आज्ञा भी करते थे और यज्ञमाता के रूप से अथाह सम्मान भी देते थे।
सज़ा से कोई सुधरता नहीं
कचहरी में मम्मा, ग़लती किये हुए व्यक्ति को सज़ा नहीं देती थी अथवा डाँटती नहीं थी परन्तु यह ज़रूर कहती थी, "आगे के लिए ध्यान रखो और दुबारा ग़लती होने नहीं देना। अच्छा कर्म करो।" मम्मा यहाँ तक कोशिश करती थी कि इनकी बात यहाँ तक ही रह जाये और बाबा तक भी न जाये।
यह क्या, सब देवियाँ यहीं आ रही हैं ?
सन् 1965 की बात है, हमारे घर के ऊपर ही आश्रम था। मैं उस समय ज्ञान में तो नहीं थी लेकिन बहनों को देखकर खुशी होती थी। एक दिन एक बहन किसी से कह रही थी कि हमारे यहाँ मम्मा आने वाली है। वह कभी कहती जगदम्बा आने वाली है, कभी कहती कि वैष्णो माता आने वाली है। मैं सोच में पड़ गयी कि क्या ये सब देवियाँ यहीं आयेंगी? अम्बाला सिटी की ब्रह्माकुमारी सरोज बहन जी अपना अनुभव सुनाते हुए आगे कहती हैं कि मम्मा की कार सेवाकेन्द्र के पास आयी और मम्मा कार से उतर रही थीं। मैं सबसे पीछे थी। मम्मा ठीक तरह से दिखायी नहीं पड़ रह थी इसलिए मैं आगे चली गयी।
दीदी, ये लाल वस्त्र पहनी हैं या सफ़ेद ?
मैं छोटी थी तो मुझे आगे जाते हुए देखकर कोई कुछ बोला नहीं। जैसे ही मम्मा कार से उतरी और उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी, तो मुझे लगा कि मम्मा कारसे नहीं उतर रही है लेकिन शेर के ऊपर से वैष्णो माता उतर रही है। मैं मूँझ गयी।मैं यह क्या देख रही हूँ! वह कभी सफ़ेद वस्त्र में दिखायी पड़ती थी तो कभी लाल वस्त्र में दिखायी पड़ती थी। मैंने बहन जी से पूछा, "दीदी, यह लाल वस्त्र पहनी हैं या सफ़ेद ?" उन्होंने कहा, "अभी चुप रहो, बाद में बता दूँगी।" मम्मा के स्वागत के लिए मैंने जाटनी और मेरे भाई ने जाट बन उनके सामने एक नाटक किया। उस समय मैंने मम्मा में जो अलौकिक आकर्षण देखा था उसको आजतक भी नहीं भूल पायी हूँ।
मम्मा का कन्याओं के प्रति बहुत प्यार था। बटाला में रोज़ शाम को क़रीब 40 कन्याओं की क्लास होती थी। सारी की सारी कन्यायें बाँधेली थीं। फिर भी कोई-न-कोई बहाना बनाकर हम सेवाकेन्द्र पर मुरली सुनने आती थीं।
असुर संहारिणी
बटाला में एक बड़ी हवेली थी। उसके ऊपरी मंजिल पर आश्रम था। नीचे हवेली में मालिक रहता था, साथ में दूसरे किरायेदार और हमारे परिवार वाले भी रहते थे। बहन जी ने मुझे बहुत बार कहा था कि तुम एक बार उस मकान मालिक को आश्रम पर ले आओ, वह तुम्हारी बात सुनेगा। क्योंकि मैं बहुत छोटी थी और उनका मेरे से बहुत प्यार था इसलिए मेरी बात पर कभी ना नहीं करते थे। उस समय मम्मा बटाला में आयी हुई थी। मैं सुबह-सुबह मकान मालिक का दरवाज़ा खटखटाने लगी। उन्होंने दरवाज़ा खोला तो मैंने कहा, "अंकल, आज आपको ऊपर आश्रम में चलना ही है।" उन्होंने कहा, "मैं तो शराब बगैर एक सेकेण्ड भी नहीं रह सकता, ऐसी स्थिति में तुम मुझे उन देवियों के पास जाने के लिए बोल रही हो? यह नहीं हो सकता।" मैं भी बहुत हठी थी, वहीं बैठ गयी। मैंने कहा, "जब तक आप नहीं चलोगे मैं यहाँ से नहीं हटूंगी। आज आप स्नान करके आओ, मुझे आपको लेकर जाना ही है।" स्नान करके बाहर आते ही मैंने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये, बोतल छूने तक नहीं दी और कहा कि अभी आपको चलना ही है। वे मज़बूर होकर मेरे साथ चल पड़े। उस समय वहाँ मम्मा की क्लास चल रही थी। जैसे ही हम दरवाजे के पास पहुँचे और अन्दर का दृश्यदेखा तो उनके मुँह से निकला 'यह तो वैष्णो माता का दरबार है।' ऐसे कहते, मेरा हाथ छोड़कर अपने आप अन्दर चले गये। सीधा मम्मा के पास जाकर उनके चरण पकड़ लिये। तब मम्मा ने कहा, अच्छा बच्चे, आ गये? आओ। ठीक है ना? उन्होंने कहा, जी माँ, ठीक है। उस दिन से आज तक उन्होंने शराब छूई तक नहीं। पहले वह सुबह, दोपहर, शाम, रात्रि चारों प्रहर शराब पीता ही रहता था। आज वह पक्का वैष्णव बन जी रहा है। इस प्रकार, मम्मा में इतनी अलौकिक शक्ति थी कि चाहे कोई भी बच्चा हो, जवान हो, बूढ़ा हो वह चुम्बक की तरफ़ सूई की तरह खिंचा आता था और अपने में बसे हुए असुरत्व को त्याग देता था।
भक्तों की इष्ट
आम तौर पर मम्मा सुबह 3.30 बजे तक तैयार होकर कमरे से बाहर आ जाती थी। एक दिन क़रीब सवा तीन बजे ही तैयार होकर बाहर आ गयी। तब जमुना दादी ने उनसे पूछा, "मम्मा, अभी तो समय हुआ ही नहीं, आप जल्दी क्यों बाहर आ गयी?" मम्मा ने कहा, "आज एक भक्त मेरे से मिलने आने वाला है। इसलिए मुझे जाने दो।" मम्मा अभी परदे के अन्दर ही थी, इतने में एक भाई अमृतसर से वहाँ आ पहुँचा। वह अपनी कार से उतरा और तीसरी मंजिल पर दौड़ कर चढ़ रहा था क्योंकि मम्मा तीसरी मंजिल पर थी। वह गीत गा रहा था, "माँ तेरे दर पर खड़ा हूँ...", "जय अम्बे जगदम्बे काली खप्परवाली..." मम्मा ने खड़े होकर उसको दर्शन दिया और कहा, "बच्चे, तुम भक्त बनके गीत ही गाते रहोगे या बच्चे बन कर माँ से कुछ पाओगे ? माँ ने तो अपने बच्चे को पा लिया, तुम माँ को पाओगे?" वह माँ-माँ कहते मम्मा के चरणों में गिर पड़ा और आँसू बहाता रहा। फिर मम्मा ने उसको क्लास में बिठाया, ज्ञान समझाया, प्रसाद खिलाया इस प्रकार, मातेश्वरी जी भक्तों को भी सन्तुष्ट करती थी और उनके आगमन का आभास पहले ही कर लेती थी। मग्मा बच्चों की एवं भक्तों की आश पूर्ण करने वाली कल्पतरु थी।
विदेह स्वरूपिणी, विकार मर्दिनी - माँ महाकाली
बटाला से ब्रह्माकुमारी गीता बहन अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं, मैंने पहली बार मम्मा को सन् 1963 में बटाला में देखा। उस समय मैं 12 वर्ष की थी। जैसे ही मैंने मम्मा को देखा तो मुझे ऐसा लगा कि मैं जगदम्बा को देख रही हूँ। मुझे जगदम्बा का साक्षात्कार हुआ। मम्मा ऊपर हॉल में जाकर बैठी तो वहाँ सन्नाटा छा गया जैसे कि कोई फ़रिश्ता आ गया हो।
मम्मा मुझसे इतना प्यार किया करती थी कि मैं वर्णन नहीं कर सकती। हमेशा मम्मा मुझे गुड्डू कहती थी। उनके शब्दों में इतना मिठास भरा होता था कि जब वे मुझे गुड्डू कहती थीं तो मैं कहीं भी हूँ, दौड़कर मम्मा के पास आ जाती थी। मम्मा में कोई देह-अभिमान अथवा मैं-पन नहीं था। मैं समझती हूँ कि मम्मा को अपनी देह की स्मृति तक नहीं रहती थी।
अभयदायिनी, पापविनाशिनी
एक दिन मम्मा क्लास करा रही थीं। क्लास पूरी होने पर सभी चले गये। एक माता नहीं गयी, वह बाँधेली थी। मम्मा से उसने कहा, "मम्मा, मैं घर नहीं जाऊँगी, मेरा पति बहुत तंग करता है।" तब मम्मा ने कहा, "कुछ नहीं होगा, तुम जाओ घर, वह तुमको कुछ नहीं कहेगा।" वो माता जब घर गयी तो उसके पति ने कहा, "मैं तुम्हारे आश्रम पर आया था लेकिन ऊपर सीढ़ी नहीं चढ़ सका। मुझे लगा वहाँ कोई बड़ी हस्ती आयी हुई है।" तब उस माता ने कहा, हमारी मातेश्वरी जी आयी हुई है। उसके पति ने खुद ही पूछा कि क्या मैं उनका दर्शन कर सकता हूँ। वह माता अपने पति को मातेश्वरी जी के पास ले आयी। मातेश्वरी जी को देखते ही वह उनके चरणों में गिर गया। मम्मा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और दृष्टि दी। इससे उसने गद्गद होकर अनुभव किया कि माँ ने मेरे जन्म-जन्म के पाप दग्ध कर दिये।
एक बार क्लास में मम्मा ने सभी कन्याओं को अलग से बिठाया। फिर हम कन्याओं से मम्मा ने एक प्रश्न पूछा कि किस-किसको यह जीवन अच्छा लगता है, हाथ उठाओ। मैंने भी उठाया तो मम्मा ने कहा, इस बच्ची पर इसकी माता का बहुत मोह है, धीरे-धीरे वो भी ख़त्म हो जायेगा और यह बन्धनमुक्त हो जायेगी। मम्मा के यह बोल मेरे लिए वरदान बन गये और मेरे सर्व लौकिक बन्धन धीरे- धीरे कट गये।
करुणामयी कात्यायनी
एक बार मम्मा बटाला से जम्मू जा रही थी। मैं मम्मा के सामने खड़ी होकर रोने लगी कि मैं भी आपके साथ चलूँगी। मम्मा ने एक पल सोचा और फिर मुझे अपने साथ जम्मू ले गयी। वहाँ ले जाकर मुझे एक सुन्दर नया फ्राक पहनाया तो मुझे बहुत रूहानी नशा चढ़ गया कि मम्मा ने मुझे फ्राक पहनाया है। उस रात मम्मा ने मुझे अपने साथ ही सुलाया। अगले दिन किसी एक भाई के साथ मुझे बटाला वापिस भेजा। मम्मा में प्यार की बहुत शक्ति थी। मम्मा कहती थी कि कभी भी किसी भी हालत में आँसू नहीं बहाना। आँसू आ भी जायें तो उनको बाहर नहीं निकलने देना।
मम्मा को कोई भी समाचार विस्तार में सुनाने की आवश्यकता नहीं थी। वे एक क्षण के अन्दर उस समाचार का सार समझ लेती थी और समाधान भी देती थी। मम्मा में रहम की भावना बहुत थी, साथ में निर्मानता की भावना भी। किसी के प्रति रिंचक मात्र उनमें नफ़रत की भावना नहीं थी। भले ही, कैसा भी बच्चा आया हो, उसको दया और प्रेम की भावना से ही देखती थी। एक बार मम्मा को रबड़ी बनाकर दी गयी तो मम्मा ने उसी चम्मच से सबको रबड़ी खिलायी। कैसा प्यार दुलार था उस माँ का, मुझसे तो वर्णन ही नहीं किया जाता !
क्षमा कर क्षमाशील बनाना
एक बार की बात है। मम्मा अमृतसर आयी हुई थी। वहाँ एक बहन के हाथों से दूध का पतीला गिर गया। मम्मा ने उसको कुछ नहीं कहा, बदले में उससे पूछा, तुम्हारे ऊपर तो नहीं गिरा? हाथ जल तो नहीं गया ? इस प्रकार से उसको सांत्वना दी। अगले दिन उसका मन शान्त होने के बाद उसको समझाया गया कि कैसे दूध को संभाल कर ले जाना है। मम्मा के अन्दर करुणा भाव और क्षमा भाव बहुत था। इन भावों के आधार पर ही वे शिक्षा देती थीं।
मातेश्वरी जी के वो बोल मेरी ज़िन्दगी को खुशहाल कर गये
चण्डीगढ़ की ब्रह्माकुमारी उत्तरा बहन जी कहती हैं कि मम्मा के बारे में जब मैं सुनती थी तो लगता था कि मम्मा शायद बहुत चमत्कारी सूरत वाली होंगी। मम्मा को हर आत्मा पहचान लेती थी, पहले दिल से, बाद में आँखों से। इसके विषय में एक घटना सुनाती हूँ।
आँख न जाने, दिल पहचाने
मैंने पहली बार मम्मा को सन् 1962 में बटाला सेवाकेन्द्र पर देखा। उस समय मम्मा के स्वागत के लिए एक अन्धी बहन फूल माला लेकर खड़ी थी। मैंने उसको देख कर आश्चर्य खाया कि ये तो देख नहीं सकती परन्तु मम्मा को माला पहनायेगी कैसे ? मैंने उससे पूछा बहन, तुम मम्मा को कैसे पहचानोगी और माला पहनाओगी? उसने कहा, बहन आप देखना मैं कैसे पहचानूँगी। मम्मा चलकर आ रही थीं, उनसे आगे बहुत से भाई-बहनें उस बहन के सामने से निकले। जब मम्मा उसके सामने आयी, ठीक उसी समय उसने मम्मा के गले में फूल माला डाली। यह तो एक चमत्कार ही था। इसी को कहा जाता है- "आँख न जाने, दिल पहचाने"।
मैं जब मम्मा से पहली बार मिली तो उस समय मेरा जीवन संघर्ष में चल रहा था। घर के बहुत कड़े बन्धन थे। मन भारी-भारी रहता था। मुझे अन्दर से आ रहा था कि मैं भी मम्मा जैसा जीवन बनाऊँ। मम्मा भी मुझसे बहुत प्यार से मिली और अचल दीदी से कहा, देखो, इस बच्ची का ख्याल रखना, आगे जाकर यह बहुत सेवा करेगी। जब मम्मा वहाँ से जा रही थी तो मुझे देख फिर अचल दीदी के सामने वही शब्द दोहराये कि इस बच्ची का ख्याल रखना। मैंने इन शब्दों को सुना तो मुझे कोई खासियत नज़र नहीं आयी क्योंकि उस समय बहुत बन्धन होने के कारण मैं यह सोच भी नहीं सकती थी कि मैं यज्ञ में समर्पित होकर बाबा की सेवा कर सकूँगी। लेकिन मम्मा के वे बोल मेरे लिए वरदान बन बन गये। बाद में, मैं निर्बन्धन बनकर ईश्वरीय सेवा पर उपस्थित हुई।
वो काली माँ का सान्निध्य था
मम्मा का जीवन बिल्कुल सादा था। उनका हृदय विशाल था, उनमें अचूक परख शक्ति थी। उनके बोल वरदानी थे, सत्य थे। मम्मा धारणा की सम्पूर्ण मूर्त थी। मैंने देखा, एक व्यक्ति मम्मा से मिलने आया। वह ब्रह्मा-वत्स नहीं था, कारण कि पवित्र जीवन नहीं बिताता था। मम्मा ने केवल वरदानी हस्त ऊपर करके उसे वरदान दिया। वह व्यक्ति रोने लगा और कहने लगा, "मम्मा, क्या मैं आपके सान्निध्य में नहीं आ सकता? तब मम्मा ने कहा, "देखो बच्चे, यह काली माँ का सान्निध्य है। हर कोई व्यक्ति उसको पा नहीं सकता। इस प्रकार, मम्मा शीतल देवी थी तो काली माँ भी।
शिक्षा देने की निराली पद्धति
मम्मा की शिक्षा देने की विधि बहुत निराली थी। अगर कोई ग़लती करता था तो मम्मा सदा उसको इशारे से, प्यार से समझानी देती थी। एक बार हम कई कन्यायें मम्मा के सामने बैठी थीं, उस समय मम्मा ने सबसे पूछा, तुम्हारे में कोई बाज़ार की चीजें खाती हैं? तब हरेक ने अपनी-अपनी बातें बता दीं। तब मम्माने प्यार से समझाया कि देखो तुम किसकी सन्तान हो ! श्रेष्ठातिश्रेष्ठ परम पिता परमात्मा की सन्तान हो! साधारण बच्चे नहीं हो। उस दिन से हम लोगों में धारणा इतनी पक्की हो गयी कि हमने कभी बाज़ार की वस्तु खायी ही नहीं।
परम तपस्विनी शिवे
मम्मा को देखते ही सामने वालों को दीदार व अनुभव क्यों होते थे ? मम्मा की गहन तपस्या और उनकी धारणा ही थी जो देखने वालों को दीदार हो जाते थे। बाबा का साक्षात्कार हो जाता था। मम्मा के सामने कैसा भी कठोर विरोधी व्यक्ति झुक जाता था। किसने झुकाया? मैं समझती हूँ कि मम्मा के आदर्श, धारणायुक्त, तपस्वी जीवन और बाबा के प्रति उनकी अगाध समर्पण भावना ने। एक व्यक्ति, जो हमारा पड़ोसी था, वह हमारे पिता जी को भड़काता था, "तुम अपनी बच्ची को संभालो, वहाँ नहीं जाने दो।" लेकिन, जब वह मम्मा से मिला तो उसके सारे भाव-स्वभाव बदल गये और उसने साप्ताहिक कोर्स किया। आख़िर उसने ही हमारे पिता जी से कहा, "तुम अपनी बच्ची को रोको नहीं। वहाँ बहुत ऊँचा ज्ञान है। उसको जाने दो। मैंने इनकी माँ को देखा है, वह बहुत ऊँची हस्ती है। तुम झगड़े को छोड़ो, ज्ञान समझने की कोशिश करो।" उसके उन शब्दों से हमारे पिता जी परिवर्तित हो गये। तब जाकर वे भी सेवाकेन्द्र पर आये और ज्ञान समझकर हमें बन्धनमुक्त कर दिया। मम्मा की स्मृति हमारे लिए विस्मृत होना असंभव है क्योंकि वे महान् थीं, ममतास्वरूपा र्थी, परोपकारिणी थीं।
क्यों नहीं, तुम वही कल्प पहले वाली बच्ची हो
"बहुत से स्त्री-पुरुष तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं, मैं भी उनमें शामिल हो गयी। वे आपस में बातें करते जा रहे थे कि आज ज़रूर ईश्वर के दर्शन करके ही वापस लौटेंगे। चलते-चलते वे एक पहाड़ पर चढ़ने लगे। मैं भी उनके साथ पहाड़ पर चढ़ने लगी। ऊपर आकर देखा कि एक बहुत बड़ा सभागृह है जिसमें एक बालकनी बनी हुई है और एक पर्दा बालकनी पर लगा हुआ है। धीरे-धीरे वह पर्दा हटता गया और वहाँ सफ़ेद वस्त्र पहने, बाल खुले एक तेजोमय चेहरे वाली महिला खड़ी थी। एक अलौकिक रूहानी आर्कषण मुझे उस महिला के प्रति अनुभव हो रहा था और मैं उनके मुखमण्डल को निहारती रही। वह तेजोमय महिला वहाँ उपस्थित सभी लोगों को दृष्टि दे रही थी, धीरे-धीरे उनकी दृष्टि मेरी दृष्टि से मिली और मैं एकदम अलौकिक अतीन्द्रिय रूहानी सुख-शान्ति की अनुभूति करने लगी। मैं अपनी सुध-बुध ही भूल गयी। कुछ समय पश्चात् वह दृश्य गायब हो गया और जो यात्रा में आये स्त्री-पुरुष थे वे निन्दा करने लगे कि अरे, हम इतनी दूर से पैदल चलकर थके-हारे आये कि देवी के या ईश्वर के दर्शन होंगे पर यहाँ तो कुछ भी नहीं मिला, वह तो साधारण स्त्री थी... आदि-आदि। उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत बुरा लग रहा था कि ये उस देवी की निन्दा क्यों कर रहे हैं। मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा था, आत्मिक शान्ति और सुख का अनुभव हो रहा था।
इस प्रकार, अजमेर की ब्रह्माकुमारी राधा बहन जी मातेश्वरी जी के साथ के अपने साकार और अव्यक्त अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि इतने में मेरी आँखें खुल गयीं और मेरा स्वप्न टूट गया। मैंने देखा कि सुबह के चार बज रहे थे। यह बात उस समय की है जब मैं लगभग 10-12 वर्ष की थी। उस दिन सुबह से ही फिर स्थायी रूप से ईश्वर से मिलने की लगन लग गयी। मैं जंगल में जाकर तपस्या करूँ, यह संकल्प दृढ़ता से बार-बार उठ रहा था। मैं प्रातः 9 बजे के लगभग घर से जंगल में जाने के लिए चुपचाप निकल गयी परन्तु चलते-चलते जैसे मुझे कोई कह रहा था कि घर छोड़कर जंगल में जाने से भगवान थोड़े ही मिल जायेगा ? अभी तुम पढ़ाई करो, समय आयेगा तब घर बैठे ही भगवान अवश्य मिलेगा। इस प्रेरणा को पाकर मैं पुनः घर लौट आयी और मनोयोग से अपनी लौकिक पढ़ाई में जुट गयी।
जिनको सपने में देखा था, उनको अपने सामने देखा
सन् 1960 की बात है, मेरी दसवीं क्लास की परीक्षा पूरी हो गयी थी। मेरे लौकिक पिता जी रेलवे पुलिस में जयपुर में अफ़सर थे। आबू रोड रेलवे पुलिस थाना उनके कार्यक्षेत्र में आता था। मेरे भाई और माँ छुट्टियों के कारण मेरे ननिहाल जा चुके थे। मेरे एक-दो पेपर बाक़ी थे इसलिए मैं पिता जी के पास जयपुर में ही थी। जब परीक्षा पूरी हो गयी तो पिता जी ने कहा कि मैं आबू रोड थाने का निरीक्षण करने जा रहा हूँ, तुम भी मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें माऊण्ट आबू घूमने भेज दूँगा। यहाँ आने के बाद उन्होंने आबू रोड रेलवे पुलिस थाने के एक कर्मचारी के परिवार के साथ मुझे जीप से आबू घूमने भेज दिया। वह कर्मचारी सिन्धी था और दिलवाड़ा मन्दिर देखकर लौटते हुए पोकरण हाउस (वर्तमान में पाण्डव भवन) के आगे जीप रोक कर अन्दर परिवार सहित मुझे भी ले आया। पोकरण हाउस के अन्दर गेट में प्रवेश करते ही दाहिने हाथ की तरफ़ जो छोटा- सा बगीचा और ठण्डे पानी की मशीन अब लगी है वहाँ पर, उस समय एक छोटा टेंट लगा हुआ था। वहाँ 4-6 मूढ़े और एक टेबल पड़ी हुई थीं। टेबल पर कुछ साहित्य पड़ा था। उस पुलिस कर्मचारी ने अन्दर आते ही घण्टी बजायी। थोड़ी देर तक कोई नहीं आया। मैं भी टेंट से निकल बाहर आकर खड़ी हो गयी। दुबारा फिर जब उसने घण्टी बजायी, तो वर्तमान समय जो इशु दादी और दादी प्रकाशमणि जी के ऑफिस का मुख्य गेट है, वहाँ सिन्धी फ्रॉक और सिन्धी पजामा पहने एक महिला आकर खड़ी हो गयी और हमारी तरफ़ देखने लगी। उस महिला को देखते ही मुझे बचपन में देखा हुआ वह स्वप्न याद आ गया और तुरन्त यह विचार आया कि यह महिला तो वही है जिसने मुझे स्वप्न में दृष्टि देकर अतीन्द्रिय सुख और रूहानियत की अनुभूति करायी थी। मैं उन्हीं स्मृतियों की डोर में बँधी हुई आगे बढ़ने लगी और उस महिला से 7-8 फुट की दूरी पर जाकर खड़ी हो गयी। वह मुझे निहारने लगी और दृष्टि देने लगी। मैं एकदम हल्कापन अनुभव करने लगी। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझसे पूछा, "बच्ची, कैसी हो, कहाँ से आयी हो?" मैंने कहा, "मैंने आपको बचपन में स्वप्न में देखा था और आज मैं सचमुच जागते हुए आपसे मिल रही हूँ, आपको देख रही हूँ, अहो सौभाग्यमेरे!" उन्होंने कहा, "क्यों नहीं बच्ची, तुम तो कल्प पहले वाली वही बच्ची हो।" मैंने उनसे पूछा, "आप कौन हो? यह आश्रम क्या है?" उन्होंने आवाज़ लगायी, "जमुना, ओ जमुना...।" इतने में एक अन्य महिला वैसी ही सिन्धी फ्रॉक, पजामा पहने आयी। उन महिला से कहा, "जमुना जाओ, इस बच्ची को अच्छी तरह परिचय दो, समझाओ।" वर्तमान समय पाण्डव भवन की जो डिस्पेन्सरी वाली गली है वहाँ वह महिला (मम्मा) चली गयी। जमुना दादी मुझे उसी टेंट में लेकर आयी और लगभग आधा घण्टा समझाया। उस समय मेरी आयु 16 वर्ष की थी। जमुना दादी ने छोटे, काले और सफ़ेद (Black & White) छपे हुए झाड़, त्रिमूर्ति पर समझाया परन्तु मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था क्योंकि मेरा पूरा ध्यान तो उस तेजस्वी महिला की स्मृति में ही लगा हुआ था। जमुना दादी ने वह झाड़, त्रिमूर्ति का चित्र और 'मनुष्य मत और ईश्वरीय मत में महान् अन्तर' की एक रजत रंग (Silver cover) की पुस्तक मुझे भेंट स्वरूप दे दी। मैं पुनः पिता जी के साथ आबू रोड से अपने लौकिक घर आ गयी। मैंने उस पुस्तक को पढ़ा और त्रिमूर्ति, झाड़ के चित्र भी पढ़े, मैं उन्हें देखती रहती थी परन्तु मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मैंने चित्र और पुस्तक अपने पिता जी को दे दिये। समयानुसार मैं भक्ति करती रही। कई प्रकार के योग भी सीखती रही और उधर पढ़ाई भी करती रही। अन्दर-ही-अन्दर ईश्वर-प्राप्ति की लगन भी तेज होती चली गयी।
भक्ति का फल प्राप्त होने का समय आ ही गया
मैं बी.ए. करके एल.एल.बी. फाइनल में पहुँच चुकी थी। दस अक्टूबर, 1965 को पहली बार जयपुर में, तिलक नगर में हमारे घर से 7 मकान छोड़कर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का एक नया केन्द्र प्रारम्भ हो रहा था जिसके उद्घाटन का निमंत्रण हमारे लौकिक पिता जी को मिला था। वे उस समय जयपुर में पुलिस अधीक्षक थे। इस बीच कुछ इस प्रकार की घटनायें हो गयी थीं कि मैं आस्तिक से एकदम नास्तिक बन गयी थी (शायद मेरी भक्ति पूरी हो गयी थी)। जब पिता जी ने ब्रह्माकुमारी केन्द्र के प्रारम्भ होने की बात कही और मुझे भी अपने साथ चलने को कहा तो मैंने एकदम मना कर दिया और कहा कि मुझे अब धर्म में कोई रुचि नहीं है, मैं नहीं जाऊँगी। परन्तु पिता जी के ज़ोर देकर कहने पर, उनका मान रखने के लिए मैं बिना इच्छा के भी उनके साथ चली आयी। वहाँ कुछ विरोधियों ने हंगामा किया, ब्रह्माकुमारी संस्था के खिलाफ बोला और छोटी-छोटी पुस्तकों को भी श्रोतागण में बाँटा। मुझे ब्रह्माकुमारी बहनों के प्रवचन अच्छे लग रहे थे और हंगामा करने वालों का पुस्तक वितरण करना बहुत बुरा लग रहा था। जैसे-तैसे कार्यक्रम पूरा हुआ।
दूसरे दिन सांयकाल 6 बजे मैं केन्द्र पर पहुँची। वहाँ क्लास में लगे चित्रों को देखने लगी। जब उस तेजस्वी महिला का चित्र भी दीवार में लगा देखा तो मैं एकदम रोमाञ्चित हो गयी कि अरे, ये तो वही हैं स्वप्न वाली और आबू वाली तेजस्विनी ! इतने में ब्रह्माकुमारी बहन क्लास में कोर्स कराने आयी। मैंने उन्हें उसी चित्र की तरफ़ इशारा करके पूछा कि यह किसकी तस्वीर है और वर्तमान में ये कहाँ पर हैं? उन्होंने थोड़े में उस महिला का परिचय दिया कि ये हमारी जगदम्बा सरस्वती मम्मा हैं, यज्ञमाता हैं आदि-आदि। मैं सुनते-सुनते पूरा परिचय पाकर गद्गद हो रही थी एवं मन ही मन सोच रही थी कि यह साप्तहिक पाठ्यक्रम पूरा होते ही आबू मम्मा से मिलने अवश्य जाऊँगी और उनसे ढ़ेर सारी ज्ञान- चर्चा करूँगी।
पूरे परिचय के बाद मुझे उन्होंने बताया कि इसी वर्ष 24 जून को उन्होंने देह त्याग दी है। मैं तो मानो एकदम हक्की-बक्की रह गयी और बोली, अब मैं इनसे कभी नहीं मिल सकूँगी ! मैं मम्मा से बिछुडने का दुःख महसूस करने लगी किन्तु दूसरे ही पल, आबू में उनकी दृष्टि द्वारा मिले अलौकिक अतीन्द्रिय सुख और शान्ति की अनुभूतियों में खो गयी।
सूक्ष्म और शाश्वत सहारा
उसी रात मैंने एक स्वप्न देखा कि एक सोने जैसी सुनहरी सीढ़ी आसमान की तरफ़ बहुत ऊपर तक बनी हुई थी, मैं अकेली उस सुनहरी सीढ़ी पर चढ़ती जा रही हूँ। चढ़ते-चढ़ते जब एकदम चोटी पर पहुँच जाती हूँ तो देखती हूँ कि थोड़ी-सी जगह ही चोटी पर है और पकड़ने आदि के लिए कोई घेरा और सहारा आदि कुछ भी नहीं है। बिना कुछ पकड़े मैं चोटी पर खड़ी थी तथा चारों तरफ देख रही थी। इतने में भयंकर आँधी-तूफ़ान चलने लगे और वह सीढ़ी जोर- जोर से हिलने लगी। मैं एकदम घबरा गयी और सहारा ढूँढ़ने लगी कि किसको पकडू। यह सोच ही रहीं थी कि एकदम आसमान में ऊपर मम्मा को खड़े देखा। मम्मा सामने ऊपर में अधर में खड़ी थी और मुझे कह रही थी कि बच्ची और किसी सहारे को मत ढूँढ़ो। बस एक शिव बाबा को ही याद करो, वही तुम्हारे सच्चे सहारे हैं। बच्ची, जीवन में सच्चाई पर चलने में बहुत आँधी-तूफ़ान आयेंगे, पर घबराना नहीं। एक शिव बाबा की याद में रहना। बाबा का हाथ और साथ कभी मत छोड़ना, अन्त में जीत सच्चाई की होगी और ये आँधी-तूफ़ान सब शान्त हो जायेंगे। बस, यह कहकर मम्मा अन्तर्ध्यान हो गयी और मैं एकदम शिव बाबा-शिव बाबा कहकर याद करने लगी। शिव बाबा, बस एक आप ही मेरे सच्चे सहारे हो और तूफ़ान आँधी सब रुक गये। एकाएक मेरी आँखें खुल गयीं तो मैंने देखा कि मैं अपने कमरे में सो रही थी।
मैंने आँखें फिर से बन्द कर ली तो बन्द आँखों से ही मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरा कमरा सफ़ेद प्रकाश से भर गया है, कोई मेरे सिर पर बहुत प्यार से हाथ फिरा रहा है। मैंने बन्द आँखों से ही पलट कर अपने सिर की ओर देखा तो मम्मा मेरे सिरहाने बैठी हुई थी, बहुत ही प्यार से मुझे देख रही थी। मैंने कहा, 'मम्मा, आप इतनी जल्दी क्यों चली गयी? मुझे तो आप से बहुत कुछ पाना था।" मम्मा ने कहा, "बच्ची मैं तो कहीं नहीं गयी, तुम्हारे पास ही हूँ, जब भी जरूरत होगी मैं सदा सूक्ष्म में तुम्हें मदद देती रहूँगी। बच्ची, ध्यान रखना माया बहुत आयेगी, परीक्षायें आयेंगी परन्तु बाबा का हाथ मत छोड़ना। बाबा तुमसे बहुत सेवा लेंगे।" मम्मा सिर पर हाथ फेरती रही, मुझे जैसे मम्मा सुला रही थी, मैं सचमुच गहरी नींद में सो गयी। सुबह उठी तो मम्मा की बातें और रात का स्वप्न याद आया। मैं सोचने लगी कि रात को जो हुआ वह सच था या स्वप्न था। सचमुच जीवन में अनेक परीक्षायें, आँधी, तूफ़ान आते हैं परन्तु एक बल एक भरोसे, एक शिव बाबा की याद में रहने से सब पास हो गये और होते जा रहे हैं, मेरी अवस्था अचल, अडोल निर्भय बनी हुई है। मम्मा की शिक्षायें सदा याद हैं और याद रहेंगी।
भक्तों को भी और बच्चों को भी साक्षात्कार कराने वाली जगदम्बा मा
बुरहानपुर (महाराष्ट्र) से ब्रह्माकुमारी सुधा बहन जी अपना अनुभव इस प्रकार लिखती हैं कि मेरा लौकिक जन्म अमृतसर के एक सम्पन्न धार्मिक परिवार में हुआ। आठ वर्ष की छोटी आयु में ही मुझे ज्ञान मिला, तब से ही अनेक साक्षात्कार होते थे। बचपन से ही बाबा से और यज्ञ से बहुत प्यार था। यज्ञ में छोटी-छोटी सौगातें भेजते रहते थे, प्यार से बाबा-मम्मा को पत्र भी लिखते थे, रिटर्न में बाबा-मम्मा भी बहुत प्यार से याद, सौगात, पत्र आदि भेजते थे। वे कहते थे कि कौन-सी बच्ची है जिसने बाबा को देखा भी नहीं और बाबा से इतना प्यार है! आखिर वह दिन भी आया जब मैं मधुबन पावनधाम पहुँच गयी, बाबा-मम्मा से मिली। मैं दृष्टि लेते लेते ही ध्यान में चली गयी, फिर बाबा ने मुझे कहा कि यह कल्प पहले वाली बच्ची है, बाबा के पास आ गयी है।
शक्तिस्वरूपा दुर्गा माँ
मम्मा को देखते ही उनका शक्तिरूप, तेजस्वी रूप और मातृ-प्यार खींचता था। वो पवित्रता की मूर्त थी। धीर, गंभीर तथा बाबा के हर क़दम का अनुसरण करने वाली शेरनी शक्ति महसूस होती थी। भक्तिमार्ग में हम दुर्गास्तुति पढ़ते थे तथा नवरात्रि में नौ दिन व्रत रखते थे। मम्मा हमेशा मुझे दुर्गा रूप में दिखायी देती थी। वह हमेशा हमारे में शक्ति भरती थी। मेरे लौकिक मामा जी के निमंत्रण पर मम्मा जब देहली आयी तो वहाँ उनके साथ रहने का सौभाग्य मिला। मम्मा कन्याओं में शक्ति भरती और कहती थी कि शिव बाबा का नाम बाला करने वाली शक्तियाँ, सेवाधारी बनो। यह सुनकर सब कन्याओं को बहुत नशा चढ़ता था।
एक बार मम्मा देहली आयी हुई थी। बहुत धूमधाम से उनका स्वागत हुआ, एक भाई ने साबुत नारियलों पर चाँदी का वर्क चढ़ाकर उनकी माला मम्मा के गले में पहनायी और गीत बजा, "तू है जगदम्बे, काली खप्पर वाली..." मम्मा उस भाई को दृष्टि दे रही थी, मम्मा का स्वरूप बड़ा शक्तिशाली था। वह भाई मम्मा के नज़दीक जाना चाहता था, मम्मा ने कहा, "बच्चे, माँ को पहचानते हो ? माँ काली है! माँ से कौन मिल सकता है? दुनिया देखनी है तो देख लो, ऐसा नहीं कि माँ की शरण लेकर फिर माया की शरण में जाओ, तो बहुत पाप चढ़ेगा।" वह रो-रोकर मम्मा से कहने लगा, "माँ, दुनिया देख ली, माया भी देख ली, अब तो आपका बच्चा हूँ, और बच्चा ही रहूँगा।"
दिल को आराम देने वाली दयामयी माँ
मम्मा उबला हुआ ठण्डा पानी पीती थी। एक दिन दोपहर को वस्त्र धुलाई करते हुए मुझे याद आया कि पानी उबल रहा है, कब ठंडा होगा। मैं उठकर पानी ठण्डा करने के लिए ले जाने लगी तो हाथ फिसल कर पतीला नीचे गिर गया। उबला हुआ सारा पानी मेरे पैरों पर गिर गया। जमुना दादी ने मुझे उठाकर सरसों का तेल, नमक आदि लगाया। बहुत जलन हो रही थी पर मैं बाबा की याद में शान्त थी। सभी देख रहे थे। मम्मा को पता लगा। मम्मा आयी और मेरा सिर अपनी गोदी में रखकर कहा, तू पुष्पाल की बच्ची होती तो रोती परन्तु तू मम्मा
की बच्ची है ना। देखो, बाबा की याद में शान्त है।
माँग लिया तो पानी बराबर, छीन लिया तो खून बराबर
मम्मा अमृतसर में कुछ दिन रहीं। सभी कन्याओं ने मम्मा से अनुभव पूछा तो मम्मा ने अपने बारे में कहा, "मैंने अपने जीवन का फैसला एक सेकण्ड में किया। मुझे बाबा, बाबा का कार्य, श्रीमत और ईश्वरीय ज्ञान आदि किसी भी बात में कभी भी संशय नहीं आया। बाबा का बनने के बाद दुःख का आँसू नहीं बहाया। अमृतवेले दो बजे के बाद कभी नींद नहीं की।"
जब मैं बटाला में रहती थी तो मम्मा वहाँ आयी। सभी बहनें भी वहाँ पहुँचीं। मम्मा ने सर्विस का बल भरा और कहा कि सर्विस का शौक चाहिए। बार-बार मुख पर हाथ रख कहे "मैं काली हूँ, अपने आप मिले तो दूध बराबर, माँग लिया तो पानी बराबर, छीन लिया तो खून बराबर।"
देह त्यागने का पूर्वाभास
कुछ समय से मम्मा की तबीयत खराब थी। मैं मम्मा से कमरे में मिली। बाबा कुर्सी पर बैठे थे, अन्य भी मम्मा से दृष्टि लेने गये, मम्मा को इतनी तकलीफ़ होते भी सभी को आम दिया। दर्द के बावजूद भी मम्मा का चेहरा हर्षित था। मैं मधुबन से वापिस आयी, उस दिन बुखार था। रात 3 बजे नींद में मैंने देखा कि ऑफिस के बाहर मम्मा, बाबा से दृष्टि ले रही हैं, आँखों से प्रेम के आँसू बहाते हुए मिल रही हैं। मेरे मन में आया कि मम्मा ठीक हो गयी हैं और बहुत दिनों के बाद बाबा से मिल रही हैं। मैंने क्लास में सभी से कहा, मम्मा से मिलने मधुबन चलते हैं। शाम को फोन आया कि मम्मा अव्यक्त हो गयी। मतलब यही है कि मम्मा शरीर छोड़ने से पहले कइयों को अव्यक्त रूप में मिली थीं। कइयों ने मम्मा को उड़ते हुए देखा, कइयों ने जगदम्बा की मूर्ति से सफ़ेद वस्त्रधारी खुले बाल वाली का साक्षात्कार किया। भक्तों को भी साक्षात्कार कराया और बच्चों से भी मिल कर वतन में गयी।
जिस अम्बा माँ को संसार पुकारता है उस माँ को हमने देखा है
वर्तमान समय दुनिया जगदम्बा को माँ कहकर पुकार रही है, रात भर जागरण कर उसकी प्रार्थना करती है, उस माँ को हमने इन स्थूल आँखों से देखा, जाना, पहचाना, वार्तालाप किया, दृष्टि ली और पालना पायी है। धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) की ब्रह्माकुमारी उमा बहन अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि सन् 1964 में मम्मा से पहली बार मुलाकात हुई, उस समय मेरी आयु 18 वर्ष की थी। हम घर से ज्ञान सुनने के लिए सेन्टर पर आते थे। पता चला कि 15 दिन के लिए मम्मा अमृतसर आ रही हैं। मम्मा से जब दृष्टि मिली तब लगा कि मुझ आत्मा के अन्दर शक्ति भर रही है। मन खुशी में झूमने लगा। मुझे एहसास हुआ कि बिछुड़ी हुई मेरी माँ मुझे मिल गयी। सच में, मम्मा जगत् की भी माँ थी, उनमें बेहद का प्यार, बेहद की दृष्टि थी। उस समय मम्मा ने मुझे बुलाकर कहा, बच्ची सेवा करोगी, तुम सेन्टर पर रहोगी? मैं सेन्टर पर रहना उस समय पसन्द नहीं करती थी। घर से आना-जाना ही ठीक समझी थी लेकिन मम्मा की इन बातों में इतनी रूहानियत, मिठास और प्यार था कि मैं ना नहीं कह सकी। मैंने कहा, जी मम्मा, आप जैसे कहेंगी वैसे ही करूँगी। उस दिन से मम्मा ने मुझे 15 दिन अपने साथ ही रखा। इन 15 दिनों में मैंने देखा कि मम्मा रोज़ अमृतवेले 2 बजे उठकर बाबा को याद करती थी। उनके साथ रहकर मैं इस दुनिया को भूल गयी। मुझे खुशियों भरी ज़िन्दगी मिल गयी।
मधुरभाषी शारदाम्बा
मम्मा की वाणी इतनी सरल, मधुर और कशिश वाली होती थी कि सुनकर हमारे विचार ही बदल गये, हमारा जीवन ही बदल गया, उन जैसा बनने की प्रेरणा मिली। मम्मा में परखने की शक्ति और निर्णय करने की शक्ति बहुत तेज़ थीं। मम्मा ने हमें परख कर, प्यार देकर समर्पण करा दिया।
मैंने जब मम्मा को देखा तो मुझे दिखायी पड़ा जैसेकि मम्मा सफ़ेद वस्त्रधारी अष्टभुजा वाली हैं। फिर रंगीन वस्त्रों में शेर पर सवार जगदम्बा का रूप दिखायी पड़ा। मम्मा के अन्दर रूहानियत बहुत थी।
धरा निवासिनी नहीं, अन्तरिक्ष वासिनी
जब भी मैं उनको देखती थी तो उनके चारों ओर सफ़ेद लाइट ही लाइट दिखायी पड़ती थी। ऐसे लगता था कि मम्मा शरीर में नहीं है, ऊपर सफ़ेद प्रकाश में रहती है। फ़रिश्ता नज़र आती थी। मम्मा दिन-रात बाबा को याद करती थी। हम कभी रात को उठकर दरवाज़े के सुराख से देखते थे तो मम्मा कुर्सी पर बैठी नज़र आती थी। कभी बालकनी में बैठ योग करती थी, कभी चाँदनी में बैठ योग करती थी। मैं समझती हूँ कि योग से ही मम्मा इतनी महान् बनी। मम्मा ने कभी अपनी तरफ इशारा नहीं किया। मम्मा हमेशा कहती थी मेरी मम्मा को याद करो, मेरी उस माँ को याद करो।
चलते-चलते मम्मा हमारे से पूछती थी, "बच्ची, बाबा को कितना याद करती हो ? बाबा से कितना प्यार करती हो?" इस प्रकार, ज्ञान की लोरी के साथ योग का भी ध्यान खिंचवाती थी। मम्मा जब दृष्टि देती थी तो उनकी आँखें इतनी चमकती थीं जैसे कि उन आँखों से बाबा देख रहा हो। मम्मा की दृष्टि से उनका सम्पूर्ण स्वरूप दिखायी पड़ता था। मम्मा ऐसे लगती थी कि वे यहाँ की नहीं हैं, वे ऊपर से आयी हैं। वे देहधारी नहीं लगती थीं, सूक्ष्म शरीरधारी लगती थीं। उनकी दृष्टि में इतनी ताक़त थी कि जिसको भी वे देखती थीं उसके विचार ही बदल जाते थे।
दृष्टि से जीवन-सृष्टि रचने वाली
मम्मा की निर्णय शक्ति बहुत अचूक थी। चन्द्रमणि दादी कहती थीं, मम्मा, देखो ना, ये कन्यायें (मैं और मेरी छोटी बहन) सेन्टर पर रहने के लिए तैयार नहीं हैं। हैं तो बहुत अच्छी, इनको ज्ञान भी अच्छा लगता है, रोज़ क्लास में आती हैं लेकिन सेन्टर पर रहने के लिए मानती नहीं हैं, आप ही कहो ना। मम्मा ने हमें दृष्टि देकर एक पल में ही परख लिया और प्यार और पालना देकर हमें बाबा पर कुर्बान करा दिया। उनको पता था कि ये कन्यायें प्यार की पालना से ही समर्पित होंगी। उसी आधार से मम्मा ने खूब प्यार और दुलार देकर हमारा परिवर्तन कर दिया।
मम्मा विद्यादायिनी सरस्वती होते हुए भी छोटे-छोटे बच्चों को भी बहुत रिगार्ड देती थी। सरल अर्थात् निरहंकारी थी। ऐसी थी हमारी माँ जगदम्बा सरस्वती।
मातेश्वरी जी विद्या की देवी होते हुए भी एक परम विद्यार्थिनी थी
नागपुर की ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन जी कहती हैं कि ईश्वरीय सन्तान बनते ही हमारा सबसे पहला कर्त्तव्य होता है ईश्वरीय पढ़ाई। क्योंकि बाबा हमारा परम पिता भी है तो परम शिक्षक भी। मम्मा का, सबसे पहले पढ़ाई के ऊपर बहुत ध्यान रहता था। जब बाबा मुरली सुनाते थे तो मम्मा पूरे ध्यान से मुरली सुनती थी जैसे एक चात्रक विद्यार्थी विद्या अर्थ अपने शिक्षक से सुनता रहता है। मम्मा ने अन्त तक पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान दिया। अन्तिम समय में मम्मा की शारीरिक स्थिति इतनी नाजुक थी कि एक मिनट भी ठीक से बैठना मुश्किल था परन्तु कहा जाता है ना कि योगी प्रकृतिजीत होते हैं। यह हमने मम्मा में प्रैक्टिकल देखा वे प्रकृतिजीत थी। उन्होंने लास्ट दिन तक भी बाबा की मुरली मिस नहीं की, भले ही मम्मा क्लास में नहीं आ सकती थी। माइक का कनेक्शन कमरे में दिया गया था। अक्सर हम देखते हैं कि कोई बीमार रहता है तो बिस्तर पर लेटकर वा सोकर मुरली सुनता है वा पढ़ता है लेकिन मम्मा ने कभी भी ऐसा नहीं किया। मम्मा कहती थी कि यह मुरली हमारी पढ़ाई है। यह पढ़ाई कौन पढ़ा रहा है? परम शिक्षक, परमात्मा। इसलिए हमें ईश्वरीय पढ़ाई को विद्यार्थी के रूप में पढ़ना चाहिए। तो मम्मा बाक़ायदा तैयार होकर, खटिया पर तकिये के सहारे बैठकर मुरली सुनती थी। तबीयत इतनी खराब रहने पर भी एक घण्टे तक मम्मा बैठकर ही मुरली सुनती थी। यह हम ईश्वरीय विद्यार्थियों के लिए एक महान् मिसाल है।
भले मम्मा कुमारी थी लेकिन गंभीर और निर्भय थी। हमें ऐसा नहीं लगता था कि मम्मा में यह फलाना गुण नहीं है। यह हो ही नहीं सकता। हर गुण मम्मा में देखने में आता था। मम्मा सर्व गुणों की एक सम्पूर्ण मूर्त थी। जैसे मम्मा खुद गुणमूर्त थी वैसे वह चाहती थी कि सब बच्चे भी गुणवान बनें। जैसे एक अच्छी माँ अपने बच्चों को अच्छी रीति से श्रृंगार कर, अच्छे वस्त्र पहनाकर, अच्छी बातें सिखाकर उनके पिता के सामने भेजती है अथवा ले जाती है वैसे ही मम्मा भी यज्ञवत्सों का गुणों से श्रृंगार करके बाबा के सामने ले जाती थी। की अगर कोई गलती कर देता था अथवा किसी को कुछ बोल देता था तो मम्मा उसको इतना प्यार देती थी कि वह खुद आकर अपनी ग़लती बता देता था। तब मम्मा उसको प्यार से ग़लती सुधारने की युक्ति बताती थी। हमेशा बच्चों की ग़लती को मम्मा अपनी ग़लती समझती थी और उनको सुधारने के लिए मेहनत करती थी। मम्मा ऐसे कहती थी कि देखो तुम तो पूरे सोने के हो, परन्तु थोड़ा-सा तुम्हारे में लोहा है, उसको निकाल दो तो तुम सच्चा सोना बन जाओगे। इस प्रकार, बहुत प्यार से शिक्षा देकर मम्मा कमियों को रियलाइज कराती थी।
एक दिन क्लास पूरा हुआ था। चेम्बर में बाबा भी थे और मम्मा भी। बाबा खास कर कन्याओं को देख बहुत खुश होते थे। उस दिन 6-7 छोटी-छोटी कन्यायें बाबा के सामने बैठी थीं। एकाएक हमको देख कर बाबा ने पूछा, "बच्ची, आज तुम लोग भोजन बना सकती हो?" उस समय मधुबन में 200 भाई-बहनें थे। सच पूछिये तो हम सब कन्याओं में से किसी को भी भोजन बनाना नहीं आता था क्योंकि सब स्कूलों में पढ़ने वाली थीं। बाबा ने कहा, "तुम आज भोजन बनाओ, बाबा-मम्मा बच्चों को भोजन खिलायेंगे।" हमने बहुत खुशी- खुशी से कहा, हाँ बाबा हम भोजन बनायेंगे। हम भोजन बनाने के लिए भोली दादी जी के पास गये और कहा, बाबा ने हमें भोजन बनाने के लिए कहा है, आज हम सभी भोजन बनायेंगे। मम्मा ने सोचा, बाबा के कहने अनुसार ये बच्चियाँ भोजन बनाने के लिए खुशी से चली तो गयी परन्तु इनको भोजन बनाना नहीं आता है। इस कारण मम्मा उस दिन के अपने सब कामकाज़ एक तरफ रख कर हमारे साथ भोजन बनाने किचन में आ गयी। जब तक भोजन पूरा नहीं बना तब तक मम्मा वहीं रही। उस समय मम्मा ने हमें चावल धुलाई करने की विधि से लेकर दाल बनाने तक सिखाया। क्योंकि हमें यह भी पता नहीं था कि कड़ाही में तेल कितना डालना होता है, तेल में पहले क्या डालना होता है, अन्त में क्या डालना होता है। मम्मा ने हमें पूरा भोजन बनाना सिखाया। भोजन इतना स्वादिष्ट बना था कि बाबा बहुत खुश हो गये। मम्मा-बाबा दोनों ने खुद सब भाई-बहनों को खिलाया। हम सब भी बहुत खुश हो गये। मम्मा बच्चों को, हर प्रकार की सेवा कैसे करें यह सिखाती थी और योग्य बनाती थी।
एक झलक ने हमारे जीवन का लक्ष्य ही बदल दिया
'हर एक के जीवन में भिन्न-भिन्न स्वभाव-संस्कार वाले व्यक्ति सम्बन्ध- सम्पर्क में आते हैं और चले जाते हैं। परन्तु कभी-कभी कोई ऐसी दिव्य विभूतियाँ जीवन में आती हैं जो सदा के लिए अपनी अमिट छाप छोड़ जाती हैं। ऐसे ही सन् 1964 में मातेश्वरी जी हमारे जीवन में आयी और सदा के लिए अपना बना गयी।'
उपरोक्त अनुभव सुनाते हुए मुंबई, सायन से ब्रह्माकुमारी सन्तोष बहन जी कहती हैं कि पहली बार मैंने मम्मा को तब देखा जब वे मुंम्बई में सेवा प्रति आयी हुई थी। मम्मा की शीतल और गंम्भीर मूर्त को देखते ही ऐसा अनुभव हुआ कि हम साक्षात् सरस्वती देवी को देख रहे हैं। मेरा तो यही अनुभव रहा कि मम्मा की एक झलक ने हमारे जीवन के लक्ष्य को ही बदल दिया। ऐसा लगा कि बनना है तो मम्मा के समान बनना है, जीना है तो विश्व-सेवा के लिए जीना है। मम्मा के चेहरे की पवित्रता की झलक ने इतना प्रभावित किया जो मैं सुध-बुध भूल गयी। मम्मा के मधुर बोल ने मुझे होश में लाया कि 'सन्तोष' सिर्फ नाम नहीं परन्तु बहुत बड़ा गुण तथा खजाना है जिसे आप परमात्मा द्वारा पा सकती हो। लौकिक माँ ने मेरे शरीर का नाम सन्तोष रखा परन्तु अलौकिक माँ ने मुझ आत्मा को सन्तुष्टता का वरदान देकर सन्तुष्टमणि बना दिया।
परम त्यागी और परम तपस्विनी
मम्मा को देखने से ही तपस्या और त्याग की मूर्ति का अनुभव होता था। मम्मा तुरन्त दान महापुण्य जमा करने वाली थी। इसका मिसाल बृजइन्द्रा दादी ने हमें सुनाया था। एक बार हैदराबाद (सिन्ध) में एक ऑफिसर ब्रह्मा बाबा से मिलने आया था क्योंकि लोगों के मन में गलत धारणायें थीं कि बाबा माताओं- कन्याओं का घर-बार छुड़ाते हैं, जादू करते हैं आदि-आदि। तो बाबा उस ऑफिसर को समझा रहे थे कि देखो मैं इन बच्चियों को क्या देता हूँ? ना गहने देता श्रृंगार के लिए, ना अच्छे कपड़े देता हूँ। इनको गहने और कपड़ों से भी ऊँचा श्रृंगार ज्ञान-श्रृंगार मिलता है जिससे इन्हें आत्मिक सुख मिलता है जिस कारण ही ये भौतिक सुखों को त्याग कर आत्मिक सुख की ओर भागती हैं। यह वार्तालाप मम्मा और बृजइन्द्रा दादी ने बाहर बगीचे में टहलते हुए सुना। मम्मा, बृजइन्द्रा दादी को कहने लगी कि देखो, बाबा हमारे लिए क्या कहता है। परन्तु हमने तो अब तक ये विनाशी गहने पहने हुए हैं। मम्मा ने भी उस समय थोड़े बहुत गहने पहने हुए थे और बृजइन्द्रा दादी को तो बाबा ने लौकिक जीवन में बहुत शृंगारा था। मम्मा की यह बात सुनकर बृजइन्द्रा दादी ने कहा कि हमारे इन झूठे गहनों से बाबा के बोल झूठे लगेंगे क्योंकि हमने गहने पहने हैं और बाबा कहते हैं कि ये झूठा श्रृंगार छोड़ सच्चा श्रृंगार करती हैं। अब क्या किया जाय ? तो मम्मा ने कहा, चलो हम दोनों ये झूठे गहने उतार देती हैं। तो उन दोनों ने तुरन्त ही गहने उतार दिये। उन्हें देखकर सारे यज्ञ वत्सों ने अपने सब गहनों का स्वयं ही त्याग कर दिया। मतलब यह है कि मम्मा सदैव बाबा के महावाक्यों को साकार करने में नम्बर वन रही।
सदा मन्दस्मिते
शिव बाबा हमेशा कहते थे कि बाबा नम्बर वन है परन्तु तुम्हारी माँ तो प्लस वन में गयी। मम्मा के चेहरे पर हमने कभी भी उदासी नहीं देखी, उनका सदैव मुस्कराता हुआ चेहरा था। मम्मा का एक-एक बोल सुख देने वाला था। मम्मा के दृढ़ता भरे बोल सदैव औरों को भी दृढ़ संकल्पधारी बनाते थे। मम्मा की दृष्टि पाते ही कइयों को अशरीरीपन का अनुभव होता था। मम्मा की शीतल गोद जन्म-जन्मान्तर के विकारों की तपत बुझाने वाली थी। अनोखा अनुभव होता था। मम्मा बाबा को फॉलो (अनुसरण) करने में नम्बर वन थी इसलिए बाबा की सारी दिनचर्या सवेरे से लेकर रात तक कैसे चलती थी - उसको सुनकर फॉलो करती थी।
कराची में बाबा के साथ 'बाबा भवन' में बृजइन्द्रा दादी रहती थी तथा बाबा की संभाल करती थी। मम्मा, 'मम्मा भवन' में रहती थी। रात को बाबा के सो जाने के बाद मम्मा, बृजइन्द्रा दादी को अपने पास बुलाती थी और कहती थी कि आप बाबा की एक-एक बात सब रिपीट करके सुनाओ, कुछ भी मिस (miss) नहीं करना। खुली छत पर बैठकर ये दोनों बाबा की बातें करती थीं और सवेरे उठने का गीत "जाग सजनिया जाग" बजता था तब बृजइन्द्रा दादी 'बाबा भवन' जाती थी। इस प्रकार मम्मा, बाबा की दिनचर्या सुनकर उसे फॉलो करती थी और सारी रात जागकर तपस्या करती थी।
मधुबन में मम्मा जब बाबा द्वारा मुरली सुनती थी तो ऐसा महसूस होता था जैसे कि चातक पक्षी बरसात की एक-एक बूँद को मोती बनाने के लिए इन्तज़ार कर रहा है। मम्मा, बाबा के एक-एक महावाक्य को सुनने के लिए तरसा करती थी और ग्रहण कर उसे तुरन्त जीवन में उतार कर ज्ञान का स्वरूप बन जाती थी। मम्मा की याद आते ही यही आवाज़ दिल से निकलती है-
"जीवन अमर नहीं है प्यारे, नाम अमर कर जाना।
जग में अनमोल बोल से, सबका दिल बहलाना ।"
सर्व कलासम्पन्न कलाधीश्वरी - माँ सरस्वती
मुलुन्द से ब्रह्माकुमारी गोदावरी बहन जी लिखती हैं कि प्यारी मम्मा से प्रथम मुलाकात सन् 1962 में मुम्बई वाटरलू मेन्शन में हुई थी। मीठी माँ को पहली बार देखते ही मुझे साक्षात् जगदम्बा माँ का साक्षात्कार हुआ। उनके दिव्य व्यक्तित्व को देखकर ऐसा लगा कि सच, परमात्मा ने ही इन शक्ति अवतार को इस धरा पर भेजा है।
मीठी माँ के सम्पर्क में आते ही उनकी श्रेष्ठ, प्रतिभाशाली, चमत्कारी बुद्धि का एहसास हुआ और चैतन्य में एक दैवी शक्ति का अवतार है, ऐसा अनुभव हुआ। प्यारी मम्मा के जीवन में धैर्य, गम्भीरता, शान्ति, सरलता और प्रसन्न मुखमुद्रा से शिक्षा देने की कला बहुत ही आकर्षक थी।
मम्मा को हमने दृढ़ता, अटल निश्चय और साहस की चैतन्य मूर्ति के रूप में देखा। वे हमेशा निश्चिन्त रहती थी। यदि बाबा ने उनको ऐसा कार्य सौंप दिया जिसका उन्हें अनुभव न हो वा बहुत कठिन हो, तब भी उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि मैं इसे कैसे करूंगी ? उन्होंने सदा ही 'जी बाबा' ऐसा कहकर हर ज़िम्मेवारी को स्वीकार किया और उसे सम्पन्न करके दिखाया।
उच्च कोटि के प्रशासकीय गुण और प्रबन्धन क्षमता
मधुबन में जो भी पार्टियाँ आती थीं उनके ठहरने तथा भोजन आदि का प्रबन्ध स्वयं मातेश्वरी जी किया करती थीं। उनकी पालना ऐसी थी जो किसी का भी मधुबन से वापस जाने का दिल नहीं होता था। मातेश्वरी जी का यज्ञ से बहुत स्नेह था। वे कहा करती थीं कि यज्ञ की कोई चीज़ बेकार नहीं जानी चाहिए। एक बार की बात है कि यज्ञवत्स गेहूँ साफ़ करके बोरी में भर चुके थे। कुछ गेहूँ इधर-उधर बिखरे हुए थे। मातेश्वरी जी ने ध्यान दिलाते हुए बड़े ही स्नेह से कहा कि एक-एक गेहूँ का दाना एक-एक मोहर के बराबर है। वे यज्ञ की एक-एक चीज़ की कीमत जानती थीं एवं बतलाती भी थीं। वे कुशल प्रबन्धक थीं। यज्ञवत्सों की स्थूल के साथ सूक्ष्म आध्यात्मिक पालना पर भी उनका विशेष ध्यान रहता था।
मम्मा कुशल प्रशासक के रूप में छोटी उम्र में ही यज्ञ-कारोबार की ज़िम्मेवारी सम्भालने के निमित्त बनी और सभी के दिलों को जीत लिया। मम्मा की बहुत सारी विशेषतायें नज़रों के सामने आ जाती हैं परन्तु मुझे मम्मा की ये विशेषता और शिक्षा अच्छी लगी कि किसी के भी अवगुणों का चिन्तन न कर, सदा गुणग्राही बनना चाहिए। सभी आत्माओं की विशेषताओं को देखो, हंस की तरह मोती चुगो। इस विशेषता से मैं बहुत ही प्रभावित हुई, जीवन में लाने का प्रयास किया।
मम्मा से हमने विभिन्न कलायें सीखीं, जैसे- शिक्षा देने की कला, पालना करने की कला, मायाजीत बनाने की कला, मधुर हास्य कला, एकता के सूत्र में पिरोने की कला, रोते हुए को हँसाने की कला, ज्ञानामृत का पान कराकर ईश्वरीय वर्से का अधिकारी बनाने की कला आदि-आदि। माँ सरस्वती दिव्य गुणों की खुशबू फैलाने वाली गुणदायिनी, ज्ञानवीणावादिनी, सर्वहितकारिनी, माया- मर्दिनी थीं।
भाग्यविधात्री जगदम्बा जो परमपिता परमात्मा की पहचान है
मुम्बई घाटकोपर की ब्रह्माकुमारी नलिनी बहन जी, अपना अनुभव लिखती हैं कि भाग्यविधात्री जगदम्बा जिसकी महिमा अपरम्पार है, बेजोड़ है, बेमिसाल है वह स्वयं सर्वशक्तिवान परमपिता परमात्मा की पहचान है। सर्व गुणों से अलंकृत, दिव्य शक्तियों से सम्पन्न, सर्व की प्यास बुझाने वाली, सर्व की मनोकामनायें पूर्ण करने वाली, ईश्वरप्रदत्त सर्व गुणों की शाश्वत, निर्मल, स्वच्छ, शीतल, पवित्र, शान्त, गंभीर सिद्धिस्वरूपा है। ऐसी प्राण-प्यारी मातेश्वरी सरस्वती का गायन, वर्णन स्वयं परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा के मुखकमल द्वारा किया है।
जगत अम्बा के विषय में मैं जो लिखूँ, जितना लिखूँ कम ही है। यह मेरा परम सौभाग्य है कि मुझे प्राण प्यारी जगत अम्बा प्रति भावनाओं के स्नेह-श्रद्धा सुमन रूपी शब्दों को आपके सामने रखने का परम अवसर प्राप्त हुआ है। ओ माँ ! प्राणेश्वरी माँ ! प्यारी जगत अम्बा ! मेरी मम्मा, मेरे अलौकिक जीवन की अलौकिक जन्मदाता ! याद आता है वह शुभ और सर्वोत्तम क्षण, श्रेष्ठ, पवित्र और पावन बेला के वे पल जब मेरी लौकिक माँ मुझे प्रथम बार मम्मा की गोदी में बिठाने ले चली ताकि मैं अपना दिव्य नेत्र खोल, समस्त जगत के अद्भुत रचयिता, चैतन्य कलाकार "सत्यम् शिवम् सुन्दरम्" को और जीवन धन्य करने वाली उसकी सुन्दरतम रचना को देख सकूँ। उनका परिचय प्राप्त कर संसार की सर्वोत्तम, आन्तरिक सुन्दरता को महसूस कर सकूँ। वे अतीन्द्रिय सुख भरे क्षण आज भी तरोताज़ा हैं, जब मेरे नैन सब कुछ भूलकर उन नैनो में खो गये, तब दिल और दिमाग उस मोहिनी सूरत को देख मोहित हुए और हर्षित हुए। मैंने देखा तो बस देखती ही रह गयी और दिल ही दिल में उसके आकर्षण में बँध गयी।
तब कुछ ही क्षणों में मधुर, मंजुल स्वर कानों में पड़ा और मैं हर मधुर स्वर का जागृत दशा की बेहोशी में जवाब देती गयी और आख़िर जब यह प्रश्न उस मुखकमल से निकला, "तुम्हारे जीवन का लक्ष्य क्या है?" जवाब था "खाना, पीना और मौज़ करना।" मीठी माँ का मीठी प्यार भरी दृष्टि से देखना, मन्द मन्द मुस्कराना और इतने में क्या हुआ? कमरे में ट्युब लाइट के ऊपर एक चिड़िया का घोंसला था उसमें छोटा-सा, नन्हा-सा, प्यारा-सा, कोमल-सा बच्चा चोंच खोल इन्तज़ार में निहार रहा था। उतने में उसकी माँ ने खिड़की से प्रवेश किया और घोंसले में स्थित उस बच्चे के खुले हुए मुख में उसका भोजन दाने के रूप में डालने लगी। कितना भव्य दृश्य था! दुनिया के सर्व सम्बन्धों में से सर्वोत्तम सम्बन्ध होता है- माँ और बच्चे का। फिर मंजुल मधुर स्वर में प्यार भरा प्रश्न, "देख रही हो?" "हाँ जी!" "क्या देखा?" "माँ अपने बच्चे को खिला रही है!" "सोचो ! तुम्हारे में और उसमें क्या फ़रक है? ईश्वर का वरदान मनुष्य जीवन को मिला है, वही बुद्धि-प्रदत्त मनुष्य ने भी किया अर्थात् बड़े हुए, बाल बच्चे पैदा किये, उनकी पालना हेतु खिलाना-पिलाना किया- वह तो पशु-पक्षी भी करते हैं। यदि मनुष्य होकर हमने भी यही किया तो हमारे और उनमें अन्तर क्या रहा ? मनुष्य प्राणी फिर उत्तम क्यों? मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता क्या ? मनुष्य जीवन का महत्त्व क्यों?" यह सुनाते ही प्राण प्यारी माँ ने अपनी सर्व प्राप्ति व सर्व मनोकामनायें पूर्ण करने वाली गोद में ममता की थपथपी लगायी। रूहानी प्यार का हाथ फिराया और फिर जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए, मनुष्य जीवन कैसे हीरे तुल्य है, हम अपना जीवन देवता जैसा दिव्य, श्रेष्ठ व आदर्श कैसे बनायें - उस विषय पर क़रीबन एक घंटा समझाया और अज्ञानता की गहरी निद्रा में जो बुद्धि का नेत्र बन्द था उसे खोला। अपनी मन्द, मधुर, शक्तिवर्धक मुस्कराहट द्वारा ऐसी शक्तियाँ भर दीं जिससे जीवन को सही दिशा मिली, जीवन को सही मंज़िल मिली। आज भी यह जीवन माँ की पालना की, ममता की, ज्ञान-गुण-शक्तियों की अंगुली पकड़े मंज़िल की ओर आगे बढ़ता चला जा रहा है।
मेरा जीवन, उस माँ की देन
ब्रह्माकुमारी विमला बहन जी, चाँदनी चौक दिल्ली से लिखती हैं कि सर्व प्रथम मैं मम्मा से दिल्ली, राजोरी गार्डन सेवाकेन्द्र पर मिली थी। मम्मा की दृष्टि से गहरी आत्मीयता की अनुभूति हुई। मुझे एक दिव्य-अलौकिक शक्ति एवं उत्साह का अनुभव हुआ। मुझे लगा कि मुझे मेरी सच्ची माँ मिल गयी। एक रूहानी प्यार की छाप आत्मा पर पड़ी। मैनें ब्रह्मा बाबा को भी कुछ समय पहले राजोरी गार्डन सेवाकेन्द्र पर ही देखा था। इस मिलन से मुझ पर अलौकिक पवित्रता की छाप लगी थी। मैंने निश्चय किया कि जो सुख मुझे मिला है, अन्य आत्माओं को भी देना है।
इस कार्य के लिए मम्मा ने हमारे में विशेष शक्ति भरी। मम्मा से हमारा कई बार मिलना हुआ। मैं कॉलेज से भी खास मम्मा से मिलने राजोरी गार्डन जाती थी। मम्मा ने एक दिन कहा, अपने लौकिक पिता को भी सम्मुख लाओ। मेरी लौकिक माँ का देहान्त हो चुका था। शीघ्र ही मैं अपने लौकिक पिता जी को भी मम्मा से मिलाने ले गयी। पिता जी पर भी मम्मा के अलौकिक वार्तालाप का गहरा प्रभाव पड़ा।
मैं सन् 1958 में दिल्ली इन्द्रप्रस्थ कालेज की बी. ए. फाइनल की विद्यार्थिनी थी। मेरी आध्यात्मिकता में रुचि बचपन से ही थी। मैंने गीता के ज्ञान की एक परीक्षा, जो बनारस विश्वविद्यालय की तरफ़ से दिल्ली के विद्यार्थियों के लिए आयोजित की गयी थी, दी थी तथा मुझे उसमें इनाम भी मिला था। उसके तुरन्त पश्चात् मुझे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ।
मैंने मम्मा से गम्भीरता का गुण सीखा तथा दृढ़ लगन से कार्य करना भी सीखा। मम्मा में समाने की शक्ति, सागर के समान दिखायी पड़ी। मम्मा के स्वरूप में सत्यता की और निर्भयता की शक्ति विशेष दिखायी दी। मैं अपने जीवन में सत्यता और निर्भयता की शक्ति को सदा साथ रखने पर विशेष ध्यान देती हूँ।
मम्मा में जितनी गम्भीरता थी उतनी ही रमणीकता भी थी। सन् 1963 में जब मम्मा दिल्ली में थी तो मैं रोज़ मम्मा की मुरली सुनने प्रातः राजोरी गार्डन सेवाकेन्द्र पर जाती थी। कुछ भाई-बहनों में उमंग था कि हम भी मम्मा के सामने कोई गीत, ड्रामा, डायलॉग (संवाद) आदि करें। तो हमने मम्मा से कहा, मम्मा एक दिन आप हमारे गीत, ड्रामा, डायलॉग आदि सुनिये। मम्मा ने रविवार शाम का समय निश्चित किया। सारी सभा को भी बुलाया। सभी ने मिलकर बहुत सुन्दर मनोरंजन का कार्यक्रम तैयार किया। कोई बहन मम्मा बनी, उसने कविता में गाया कि अगर मैं मम्मा होती तो यह-यह करती, जो मम्मा करती है। कोई लक्ष्मी बनी। कोई कुछ, कोई कुछ। कार्यक्रम बहुत रमणीक रहा। मम्मा ने सारा कार्यक्रम सभा के बीच सामने बैठकर बहुत रुचि और प्रेम से देखा तथा खूब सराहना की। हमें ऐसा लगा जैसेकि सचमुच जगदम्बा माँ सब बच्चों की मनोकामना पूर्ण करने वाली हैं।
मातेश्वरी जी मेरी अलौकिक जन्मदात्री भी और भाग्यविधात्री भी
आस्ट्रेलिया की ईश्वरीय सेवाओं में व्यस्त ब्रह्माकुमारी डॉ. निर्मला बहन जी अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि यह हमारा सौभाग्य था जो इस ज्ञानी जीवन में न सिर्फ मम्मा से मिलना हुआ बल्कि उन द्वारा पालना भी हुई। मेरे ज्ञान में आने के बाद भले ही वे दो-ढाई वर्ष साकार में थीं परन्तु मैजारिटी समय उन्होंने मुंबई में व्यतीत किया। इसलिए शुरू-शुरू में मम्मा से मुझे काफ़ी पालना मिली। बाबा मेरे लिए कहते थे, यह मम्मा का फूल है, मम्मा की रचना है।
दिव्य-बुद्धिदायिनी
उन दिनों हर रविवार शाम को मुंबई वाटरलू मेन्सन में मम्मा का क्लास ऐसा होता था जैसे सार्वजनिक सभा होती है। उस समय मुंबई की उषा बहन ज्ञान में आयी थी। उसने मुझे इस कार्यक्रम का निमन्त्रण पत्र भेजा। जब कार्ड मिला था तो मैंने उतना ध्यान नहीं दिया। उषा बहन ने फिर शुक्रवार को फोन पर पूछा कि इस संडे को क्या कर रही हो। मैंने कहा, फ्री हूँ। तो उसने कहा रविवार शाम को प्रवचन में आओ। मैंने कहा, ठीक है। आश्रम पर जाते ही मम्मा से मिलने का सौभाग्य मिला। मम्मा से प्रवचन सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मम्मा मुंबई में नौ मास रही। मम्मा, श्री लक्ष्मी श्री नारायण का चित्र बनाने के लिए मार्गदर्शन कर रही थी। मम्मा ध्यान में तो नहीं जाती थी लेकिन ध्यान में जाने वालों से ज़्यादा उनको देवी-देवताओं के बारे में जानकारी थी। उन्होंने अपने बुद्धियोग से सब कुछ जान लिया था। दिव्य बुद्धि की समझ थी। इसलिए मम्मा चित्रकारों (आर्टिस्टों) को गाइड करती थी। शीलइन्द्रा दादी, जो दीदी मनमोहिनी जी की छोटी बहन थी, मुंबई में थीं। वे ध्यान में जाती थीं। मम्मा और शील दादी दोनों चित्रकारों को राय-सलाह देती थीं। इस कारण मम्मा को मुंबई में ज़्यादा दिन रहना पड़ा।
मैंने पहले दिन मम्मा का प्रवचन सुना और उषा बहन ने मुझे मम्मा से मिलाया। बाद में उषा बहन ने कहा, साप्ताहिक कोर्स करोगी? मैंने कहा, हाँ। कोर्स पूरा हो गया। फिर उषा बहन मुझे मम्मा से पर्सनल मिलाने ले गयी। मम्मा से परिचय कराते हुए उसने कहा, मम्मा यह मेरी सहेली है, लौकिक में डॉक्टर है, कोर्स पूरा किया है आदि-आदि। तब मम्मा ने मुझ से पूछा, कैसे हो, क्या करती हो, ज्ञान समझ में आता है, कोई प्रश्न है तो पूछो। मैंने कहा, मम्मा, श्री कृष्ण भी सतोप्रधान है, क्राइस्ट भी सतोप्रधान है, उन दोनों में क्या अन्तर है? तब मम्मा ने कहा, क्राइस्ट भी सतोप्रधान है लेकिन उसके जन्म का समय था रजोप्रधान, इसलिए वह उतना सतोप्रधान नहीं था जितना श्री कृष्ण था। श्री कृष्ण है सतोप्रधान (सत्य) युग की प्रथम सतोप्रधान आत्मा।
मर्यादापुरुषोत्तमे
मम्मा हमेशा सवेरे क्लास कराती थी। मेरी ड्युटी भी हॉस्पिटल में सवेरे होती थी। इस कारण मैं सवेरे क्लास में नहीं जा सकती थी। परन्तु हर रविवार सवेरे क्लास में जाती थी। मम्मा खुद धारणामूर्त होने के कारण धारणा की क्लास ही ज़्यादा कराती थीं। वो क्लास सबको बहुत आकर्षित करती थी। मम्मा ने अमृतवेला कभी मिस (miss) नहीं किया। एक बार मुंबई में एक मंत्री जी मम्मा से मिलने आये। मंत्री जी के जाते-जाते रात के बारह बज गये। दूसरे दिन मम्मा अपनी दिनचर्या के अनुसार सुबह दो बजे ही उठी। उन दिनों मम्मा रमेश भाई (शाह) के घर में रहती थी। तब रमेश भाई ने पूछा, मम्मा, आप तो क़रीब एक बजे सोयी होंगी फिर आप अपने समय पर इतनी जल्दी उठ गयी? तब मम्मा ने कहा, देखो उस मिनिस्टर की अपॉइन्टमेण्ट (appointment) के कारण मैं रात को जाग सकती हूँ तो सवेरे अमृतवेले मेरी अपॉइन्टमेंट हमारे पियू के साथ होती है, यह हम कैसे मिस (miss) कर सकते हैं? इस प्रकार, मम्मा ने कभी अमृतवेला मिस नहीं किया।
कष्टनिवारिणी और पापनाशिनी
मम्मा जब वाणी चलाती थी तो वह हरेक के दिल को लगती थी। इसलिए मम्मा की वाणी सुनने बहुत लोग आते थे। जब मम्मा सेवा के लिए अन्य सेवाकेन्द्रों पर जाती थीं तो वहाँ मातायें, जिनके पति अथवा पुत्र ज्ञान में नहीं चलते थे, बन्धन डालते थे, उनको वे मम्मा से मिलाने ले आती थीं। मम्मा उनका प्यार से हालचाल पूछती थीं और ईश्वरीय साप्ताहिक कोर्स करने के लिए कहती थीं तो वे कोर्स करते थे। कोर्स करने के बाद उनका मन परिवर्तन हो जाता था। फिर वे अपनी पत्नी अथवा माँ को बन्धन नहीं डालते थे। इस प्रकार, मम्मा ने कई माताओं को बन्धनों से छुड़ाया।
मैं ज्ञान में सन् 1962 में आयी। डेढ़ साल के बाद पहली बार साकार बापदादा से मिली। उन्होंने कहा, बच्ची, तुमको तो डबल डॉक्टर बनना है। फिर हमारे लौकिक पिता जी ने एक मकान दिया उसमें मैंने एक क्लिनिक खोला और सेवाकेन्द्र भी। अव्यक्त बापदादा और दादी जी ने सन् 1972 में मुझे सेवा के लिए लंदन भेजा। उस समय ही दादी जी की आज्ञानुसार अपना क्लिनिक बन्द करके विदेश सेवा में गयी। इस प्रकार, मेरे जन्म और समर्पण में माँ सरस्वती का ही पूरा योगदान है। वे ही मेरी अलौकिक जन्मदात्री हैं और भाग्यविधात्री हैं।
सर्वगुणों से सम्पन्न शिवशक्ति माँ
दिल्ली, ॐशान्ति रिट्रीट सेन्टर से ब्रह्माकुमारी आशा बहन जी अपने अनुभवों को बाँटते हुए कहती हैं कि इस ईश्वरीय ज्ञान में लौकिक माँ-बाप को बहुत लगन थी। हमारी लौकिक माँ भोजन बनाने में बहुत होशियार थी। पाँच भाई- बहनों में मैं सबसे बड़ी हूँ। मेरे माँ-बाप को इतनी लगन थी कि जब मम्मा-बाबा आते थे तो वे सारा दिन सेवाकेन्द्र पर ही बिताते थे। एक बार मम्मा कानपुर, सिविल लाइन सेवाकेन्द्र पर आयी हुई थी, लगभग 15 दिन मम्मा वहाँ रही थी। एक दिन मम्मा ने गंगे दादी से पूछा कि निर्मला (मेरी लौकिक माता जी) सारा दिन सेन्टर पर रहती है, इनके बाल-बच्चे नहीं हैं क्या? गंगे दादी ने कहा, मम्मा इनके पाँच बच्चे हैं। तो मम्मा ने पूछा, फिर उन बच्चों को क्या करके आती है? उन्होंने उत्तर दिया, ताले में बन्द करके आती है। ममतामयी माँ का हृदय स्पन्दित हुआ तो उन्होंने तुरन्त कहा, क्या बच्चों को ताले में बन्द करके आती है? मैं उन ताले में पलने वाले बच्चों को देखूँ तो सही! मम्मा ने दूसरे ही दिन हम लोगों को निमंत्रण दिया अपने साथ भोजन करने के लिए। उस समय मेरी आयु 10-11 वर्ष की होगी। उस समय का दृश्य मुझे आज तक बहुत स्पष्ट याद है। मम्मा बैठी थी, उनके बगल में मैं बैठी थी, मेरी छोटी बहन और मेरा छोटा भाई बैठा था। भोजन परोसा गया। तो हमने देखा कि मम्मा ने आधी रोटी ली। तो हमने लज्जा से एक ही रोटी ली। मम्मा का भोजन पूरा हुआ तो हमने भी अपना भोजन पूरा किया। मम्मा ने कहा, बच्चे और कुछ ले लो। हमने कहा, मम्मा, हमारा पेट भर गया। मम्मा ने कहा, नहीं-नहीं, तुम बच्चे हो, अच्छी तरह खाओ। यह था हमारा मम्मा के साथ का पहला व्यक्तिगत मिलन।
आज तुम्हारा डिपार्टमेंट ठंडा है
उसके बाद मेरा मधुबन आना हुआ। उस समय बाबा का ज़्यादा ध्यान कन्याओं पर होता था। मैं छोटी थीं तो हमें कोई-न-कोई सेवा देकर भेज देते थे कि तुम यह सेवा करो। सुबह बाबा की मुरली चलती थी, मम्मा शाम को उसे रिवाइज (revise) कराती थी। मम्मा का ध्यान भी कन्याओं पर ज़्यादा होता था। बड़ी कुमारियों का एक ग्रुप था तो छोटी कुमारियों का भी एक ग्रुप होता था। अभी जो निर्वैर भाई का ऑफ़िस है उस समय वहाँ पहाड़ी थी। हम वहाँ बैठकर मुरली का अध्ययन करते थे। दोपहर में कर्मणा सेवा होती थी। हमारी ड्युटी थी दिन में भोजन के लिए थाली, कटोरी तैयार करना। उस समय गामदेवी की निम्मू बहन हम बच्चों की इंचार्ज थी। हम बच्चे तो खेलते थे। हमें बताया गया था कि जब भोजन की घंटी बजेगी उस समय तुरन्त आ जाना, आते ही थाली-कटोरी तैयार करना। एक दिन हम खेल-खेल में भूल गये। मम्मा राउण्ड पर आयी, देखा तो भोजन की तैयारी ही नहीं हुई थी। निम्मू बहन भी परेशान, क्या करें अभी सब भाई-बहनें आयेंगे खाने के लिए, तैयारी तो हुई नहीं। निम्मू बहन हम बच्चों को डाँटने लगी। डर के मारे हम आँखें नीची करके काम कर रहे थे। मम्मा दूर खड़ी थी लेकिन निम्मू बहन को पता नहीं था। मम्मा भी उस समय कुछ नहीं बोली, चुपचाप खड़ी थी। बाद में मम्मा ने निम्मू बहन को कहा, निम्मू, आज तुम्हारा डिपार्टमेण्ट ठंडा है। सिर्फ इतना ही कहा लेकिन उस समय के इन शब्दों का अर्थ हमें बड़े होने के बाद मालूम हुआ कि मम्मा में यज्ञ के सारे कामकाज़ के लिए कितनी एक्युरेसी और पंक्चुआलिटी थी।
आदर्श माँ का पार्ट बजाकर जगत माता बन गयी
मम्मा आयी थी अपनी छोटी उम्र में, केवल 17 साल की उम्र कोई बड़ी नहीं होती। आजकल हम छूट देते हैं कि युवा है ना लेकिन मम्मा ने अपनी युवा अवस्था को तपस्या से तपाया। वह तपस्या का स्वरूप दिखायी देती थी। आजकल समाज में लाखों शिक्षिकायें हैं लेकिन माँ स्वरूपा शिक्षिकायें बहुत कम हैं, गिनती की हैं। मम्मा माँ स्वरूपा टीचर थी। माँ का प्रथम कर्तव्य है सारे परिवार को एकता के सूत्र में बाँधकर रखना। मम्मा यह कार्य करने में नंबर वन थी। दो यज्ञवत्सों में कोई मनमुटाव हुआ तो मम्मा उस मनमुटाव को मिटाकर उन दोनों के दिलों को जोड़ने का कार्य करती थी। समझिये, एक घर में दो बच्चे आपस में झगड़ा कर बात करना छोड़ दें तो माँ के दिल पर क्या बीतती है? उसी प्रकार, ऐसी कोई घटना यज्ञ में घटी तो मम्मा भी उन दोनों को मिलाने का काम करती थी। हर बच्चे की कमी और कमज़ोरी को मम्मा अपने में समा लेती थी। बाबा को भी उतना ही बताती थी जितना बहुत ज़रूरी हो। एक आदर्श माँ का यही लक्षण होता है कि बच्चों की ग़लतियों को समाना और उनको बच्चों से निकालना। उसी प्रकार, मम्मा इशारे से शिक्षा देती थी और सशक्त बनाने के लिए योग का दान करती थी।
कानपुर में मम्मा को हार्मोनियम बजाते हुए मैंने देखा है। मैंने मम्मा के साथ गंगा जी में बोटिंग की है। मधुबन में बैडमिंटन खेला है।
मम्मा को चैतन्य फूल पसन्द हैं
कानपुर में हमने मम्मा के स्वागत के लिए एक गीत गाया था, डायलॉग किया था तो मम्मा ने पूछा, तुम बच्चों को बाबा याद आता है या मम्मा याद रहती है? तुरन्त मम्मा हमारा ध्यान खिंचवाती थी। मम्मा हमेशा कहती थी कि मम्मा को नहीं, मम्मा को ऐसा बनाने वाले बाबा को याद करो। एक बार कानपुर में मम्मा को गुलाब के फूलों की मालायें पहनायी गयी थीं। उनसे मम्मा ढक गयी। तब मम्मा ने कहा था, ये फूल लेकर मम्मा क्या करेगी, मम्मा को चैतन्य फूल चाहियें। मम्मा को चैतन्य फूल पसन्द हैं।
मम्मा अवगुण के बारे में किसी को भी सीधा नहीं बताती थी। पहले उसको पास बिठाकर, टोली खिलाकर, अच्छे गुणों का वर्णन कर, उनके महत्त्व को बताकर बाद में कहती थी कि तुम तो सोना हो लेकिन तुम सोने में थोड़ा-सा यह अवगुण रूपी अलॉय (मिश्रण) है, उसको निकाल दो तो तुम पक्का सोना बन जाओगे और बाबा के अति प्यारे बन जाओगे। इस प्रकार, मम्मा पहले उसकी अच्छाई का अनुभव कराकर बाद में उसकी कमी-कमज़ोरियों को मिटा देती थी।
मुझे इस बात का नाज़ है कि मैंने अपना समर्पण-पत्र मम्मा को लिख कर दिया था। जैसे यज्ञ की शुरूआत में, यज्ञवत्स मम्मा (ॐराधे माता) के नाम से पत्र लेकर आते थे अपने माँ-बाप से। उसी प्रकार, मैं भी अपने लौकिक माँ- बाप से मम्मा के नाम से पत्र लेकर आयी थी।
मम्मा ने ही मुझे चक्रधारी कह कर बुलाया
रशिया में ईश्वरीय सेवाओं के निमित्त ब्रह्माकुमारी चक्रधारी बहन जी मम्मा के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं कि यह ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किये मुझे कुछ ही दिन हुए थे, मम्मा देहली में आयी। हमारी लौकिक माता जी सुबह-सुबह तैयार होकर मम्मा से मिलने जा रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आप कहाँ जा रही हो? उन्होंने कहा, हमारी मातेश्वरी जी आयी हैं, मैं उनसे मिलने जा रही हूँ। मैंने पूछा, क्या मैं भी आ सकती हैं? उन्होंने कहा, हाँ चलो। मैं भी चली मातेश्वरी जी से मिलने। अभी क्लास शुरू नहीं हुआ था। मम्मा अपने कमरे के बाहर खड़ी थी। कुछ अनन्य बहनें नम्बरवार मम्मा से गले मिल रही थीं। हमने सोचा कि यहाँ की पद्धति ही ऐसी होगी। मैं भी उसी लाइन में खड़ी हो गयी। जब मैं मम्मा के पास गयी तो मम्मा ने मेरे दोनों कन्धों को पकड़ कर कहा, अच्छा, यह हमारी चक्रधारी है। बाबा ने मुझे पत्र में लिखा था कि तुम ही चक्रधारी हो। मम्मा ने मुझे पुकारा कि यह हमारी चक्रधारी है तब सब भाई- बहनों ने समझ लिया कि इसका नाम ही चक्रधारी है। उस दिन से सभी मुझे चक्रधारी कहने लगे। बाबा ने लिखा, मम्मा ने बुलाया और ब्राह्मणों के मुख से यह नाम घोषित हो गया। इस प्रकार मेरा नाम चक्रधारी हो गया।
एक बार हमको मुंबई में बाबा के साथ एक महीने तक रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उस समय मम्मा देहली में थीं। मम्मा ने सन्देश भेजा था कि जो बच्ची बाबा से मिलकर आयी है वो अपना अनुभव मम्मा को सुना दे। मम्मा ने अपने कमरे में मुझे अलग से बुलाकर पूछा, कैसा रहा बाबा का साथ का अनुभव, क्या सुनाया बाबा ने ? जब मैं अपना अनुभव सुना रही थी तब मम्मा का सुनने का तरीका बहुत विचित्र था। मुझे आज भी वह दृश्य सामने आता है, मम्मा एकदम लवलीन होकर बाबा की बातें सुन रही थीं, बाबा की याद और प्रीत में खो गयी थीं। हमें लगा कि मम्मा को बाबा के प्रति, बाबा के बोल के प्रति कितना प्यार और सत्कार है! मम्मा गद्गद होकर सुन रही थीं। मम्मा एक बाबामें दो रूप देखती थीं- एक परम पिता का और दूसरा जगत पिता का। मम्मा ने बाबा को पूरा- पूरा जान लिया था कि ब्रह्मा बाबा में कौन बैठा है, कौन यह महान् ज्ञान सुना रहा है।
मम्मा ने बाबा का पूरा-पूरा अनुसरण किया। बाबा भी रोज़ सुबह दो बजे उठते थे। एक बार जब मैं मधुबन आयी तब मुझे बाबा के बाजू वाला कमरा रहने के लिए मिला था। हमने देखा बाबा दो- ढाई बजे उठकर टेबुल लैम्प जलाकर उसके ऊपर एक नेपकिन ढककर थोड़ी-सी रोशनी में कुछ लिख रहे हैं। अगले दिन मैंने बाबा से पूछा, बाबा, आप कल रात कुछ लिख रहे थे। तो बाबा ने बोला, हाँ बच्ची, आलमाइटी बाबा ने जो आज्ञा दी थी, जो काम दिये थे उनको पूरा कर रहा था। मुझे जो काम मिलता है उसको मैं पूरा करूँ तब तो अन्य बच्चों से कुछ पूछ सकता हूँ। तो ऐसे बाबा रात जाग जाग कर आलमाइटी बाबा की आज्ञा का पालन करते थे।
मम्मा का जीवन बहुत आकर्षक अर्थात् चुम्बकीय जीवन था। उनको जो भी देखता था वह अपना महसूस करता था, अपनी माँ अनुभव करता था अथवा देवी माँ का दर्शन पाता था। देहली, कमला नगर में एक माता आती थी, उसका पति अच्छा था लेकिन लोगों की भड़काने वाली बातों में आकर वह अपनी पत्नी को आश्रम पर जाने नहीं देता था। वह माता चुपके-चुपके आती थी। जब उसको पता पड़ा कि मम्मा सेवाकेन्द्र पर आ रही है, तो उसने अपने पति से कहा, देखो मातेश्वरी जी आ रही हैं, वह अम्बा है, देवी है, उनसे आप एक बार मिलो,उनका दर्शन करो। अगर उनसे मिलने के बाद भी आपको लगे कि इस संस्था में जाना अच्छा नहीं है, तो मैं वहाँ जाना बन्द कर दूँगी। ऐसे कहकर वह पति को लेकर आयी। मम्मा उन दोनों से पर्सनल मिली। पाँच मिनट दोनों को मीठी दृष्टि दी और मधुर महावाक्य सुनाये। मम्मा का दर्शन पाकर तथा महावाक्य सुनकर वह व्यक्ति गद्गद हो रहा था। उससे उसकी पत्नी ने कहा, देखिये, जहाँ हमारा घर है, वहाँ एक सेवाकेन्द्र है। वहाँ मम्मा को आने के लिए निमंत्रण दे दीजिये। हमें भी लाभ होगा और वहाँ रहने वालों को भी लाभ होगा। उसके पति ने तुरन्त मम्मा से कहा, मम्मा, आप हमारा निमंत्रण स्वीकार कीजिये, उस सेवाकेन्द्र पर हम आपके लिए सब प्रबन्ध करेंगे। मम्मा ने बड़े प्यार से उनका निमंत्रण स्वीकार किया। आठ दिन के लिए उन्होंने बहुत सुन्दर सब प्रबन्ध वहाँ किये। आठ दिन तक वह व्यक्ति सर्व प्रथम आकर मम्मा के सामने क्लास में बैठता था, वह यहाँ तक सोचता था कि मम्मा को हमने निमंत्रण देकर बुलाया है, इसलिए सेवाकेन्द्र पर कोई चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए। इसके बाद वह इतना पक्का बाबा का विद्यार्थी बना कि जब उसने नया मकान बनाया तो नीचे स्वयं रहे और ऊपर का मकान सेवाकेन्द्र के लिए दे दिया। इस प्रकार, मम्मा की पालना जिसने भी ली वह बाबा का वारिस बच्चा बन गया।
वो वरदायिनी थी, त्रिकालदर्शी थी, विश्व-कल्याणी थी
दिल्ली, कृष्णा नगर से ब्रह्माकुमारी दादी कमलमणि जी लिखती हैं कि हम कितनी सौभाग्यशाली आत्मायें हैं जो इस सुहावने संगमयुग में, सारे कल्प के 84वें जन्म में, बचपन की 7 वर्ष की आयु में अर्थात् 1937 में अलौकिक दिव्य जन्म लेते ही अलौकिक माँ-बाप की पालना मिली। हम छोटे बच्चों के लिए शिव बाबा ने ब्रह्मा बाप द्वारा रूहानी बोर्डिंग खोला जिसका नाम 'ॐनिवास' रखा। हमारा ईश्वरीय बचपन बहुत ही अलौकिक और दिव्य रहा। दिव्य जन्म लेते ही एक सेकण्ड में लौकिक माँ, बाप, सम्बन्धियों से बुद्धि का सम्बन्ध ऐसे टूट गया जैसे कि वह हमारे हैं ही नहीं। इस शरीर का जन्म तो उन्हों के द्वारा हुआ परन्तु हमारी आत्मा का कल्प पहले के संस्कार अनुसार, अलौकिक माँ-बाप व ईश्वरीय परिवार से सहज ही रूहानी सम्बन्ध जुट गया।
मम्मा से पहली मुलाक़ात
पहली मुलाक़ात हमारी प्यारी माँ से ॐनिवास में हुई। उस समय मम्मा का नाम मम्मा नहीं था, ॐराधे था। हम छोटे बच्चों को देख मम्मा बोली अब तुम बच्चों को अपने घर के रंगीन वस्त्र नहीं पहनना है। सफ़ेद वस्त्र पहनना है जिस वस्त्र में ॐ की कढ़ाई की हुई थी। हमें बड़ी खुशी हुई कि मम्मा हमें ॐ की ड्रेस पहना रही है। मम्मा बोली, यह ॐ इस ड्रेस में क्यों बनाया है, क्योंकि हम ॐ अर्थात् एक आत्मा हैं- इसी स्मृति में रहना है।
यज्ञमाता के साथ यज्ञ-कारोबार का विशेष अनुभव
मम्मा ने हमको बाबा की मुरली से पाइन्ट्स कैसे बनाये जायें- यह सिखलाया जिससे किसी भी आत्मा को सहज समझ में आ जाये। मम्मा ने बहुत कापियाँ सिन्धी भाषा में लिखवायीं, बाद में भी उन कापियों से बहुत सेवा हुई। इस प्रकार और भी कई यज्ञ के स्थूल कार्य सिखलाती रही जैसे, खाना बनाना, कपड़े धुलाई करना, चप्पल सिलाई करना, कपड़े सिलाई करना आदि-आदि। सभी स्थूल कार्यों में अनुभवी बनाया। करना न आते हुए भी मम्मा के सामने हाँ जी का पाठ पक्का किया जिससे हर कार्य सहज हो गया।
बड़े से बड़ा कार्य भी सहज अनुभव कराया
हम गुड़गाँव सेवाकेन्द्र पर रहते थे। मम्मा ने मुझको कहा, मैं दो दिन के लिए गुड़गाँव सेवाकेन्द्र पर आऊँगी। यह बात सुनकर हमें खुशी तो हुई लेकिन साथ-साथ हमने मम्मा को कहा, मम्मा, मैं तो छोटी हूँ, मुझे इतनी बड़ी तैयारी करना तो नहीं आयेगा। तो मम्मा ने कहा, "देखो, कमलमणि तुम छोटी हो परन्तु छोटी होकर मम्मा को बुलाया, यह बात सुनकर सभी बहनें तो तुम्हारी प्रशंसा करेंगी इसलिए तुम यह कार्य करने में ना नहीं करो। बड़ी दीदी (मनमोहिनी जी) तुमको मदद देगी।" ऐसे मम्मा ने हमें बड़ी हिम्मत दिलायी और गुड़गाँव सेवाकेन्द्र पर दो दिन मम्मा रही, बहुत बड़ा कार्य होते भी सहज हो गया। दो दिन तक मम्मा ने खूब सेवा की, सवेरे का क्लास कराना, बाद में भाई-बहनों से व्यक्तिगत रूप में मिलना आदिसे हमें बड़ा अच्छा अनुभव हुआ कि मम्मा कैसे सर्विस करती है, हमको भी ऐसेही करनी है।
कोई भी आत्मा असन्तुष्ट न हो उसकी सहज विधि
मम्मा को हमने कहा कि एक भाई (जैन भाई) की कोई बात न मानी जाये तो वह बहुत असन्तुष्ट होता है। तो मम्मा ने कहा कि देखो - जैसे कोई को प्यास लगे उसको पानी ना देकर 36 प्रकार का भोजन दो तो राजी होगा? इसलिए इस आत्मा के संस्कार को देख उसकी बात मानकर सन्तुष्ट करना है, फिर उस भाई के संस्कार को देखकर मम्मा ने उसका नाम रखा 'ओके' (OK)। उस भाई को बहुत स्नेह हो गया। ओके नाम रखने से वो ओके हो गया अर्थात् परिवर्तन हो गया। मम्मा के बोल, जैन भाई के लिए वरदान बन गये। इस प्रकार, मम्मा वरदानी थी, त्रिकालदर्शी थी और विश्व की समस्त आत्माओं की भलाई करने वाली विश्व-कल्याणी थी।
अष्टभुजाधारी दुर्गा माँ
सोनीपत से ब्रह्माकुमारी जनक बहन जी लिखती हैं, मेरा लौकिक जन्म बटाला (पंजाब) में हुआ और लौकिक, अलौकिक पालना श्रीहरगोविन्दपुर में हुई। श्रीहरगोविन्दपुर में मम्मा और बाबा दोनों आये हुए थे। प्रेम और स्नेह की मूर्ति मम्मा ने हम सब की पालना माँ बन कर की। मम्मा हम कुमारियों को शेरनी शक्ति के टाइटल से पुकारती थी। मम्मा को कुमारियों से बड़ा प्यार था। पहली बार मम्मा जब श्रीहरगोविन्दपुर में आयी तो 15-16 कुमारियाँ हम इकट्ठी निकलीं। तो मम्मा के अलौकिक शब्द इतने उत्साहवर्धक होते थे कि निर्बल आत्मा में शक्ति भर देते थे। मैं कुछ बीमार रहती थी तो मैंने कहा, "मम्मा, मैं तो बीमार रहती हूँ, मैं क्या सेवा करूंगी।" मम्मा ने एकदम मुख पर अंगुली रखते हुए कहा, "शेरनी शक्तिस्वरूप आत्मा ऐसे कमज़ोर संकल्प कभी नहीं करती। तुम्हारे साथ कौन है? ये तुम भूल गयी हो?" तो मेरे अन्दर शक्ति की लहर दौड़ गयी और मैं भूल ही गयी कि मैं बीमार हूँ। सेवा के क्षेत्र में आकर फिर कभी ऐसा संकल्प नहीं आया।
दुर्गा स्वरूपा माँ को जब मैंने पहली बार देखा तो मैं एकटक देखती ही रही। मम्मा ने पूछा, "बच्ची, क्या देख रही हो?" तो मैंने कहा, "मम्मा, आपको पहली बार देखते ही ऐसा लगा जैसे शेर पर सवार अष्टभुजाधारी दुर्गा रूप और अभी-अभी साधारण रूप यह क्या है? यह क्या जादू है? आपने इतनी जल्दी वस्त्र कैसे बदले?" मम्मा ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "यह तुम्हारी भावना है। तुम्हें दुर्गा माँ बहुत अच्छी लगती है ना?" मैंने कहा, "हाँ मम्मा।" तो मम्मा ने कहा, "तुमको दुर्गा का साक्षात्कार हुआ है।" मुझे पूर्ण निश्चय हो गया कि यही दुर्गा माँ है जिसको मैंने बहुत पूजा है।
मनोहारी मीठी माँ का वरदानी हाथ आज भी हमारे सिर पर है। मम्मा शक्ति स्वरूपा थी और प्रेम-स्नेह की मूर्ति थी। कभी भी जब मुझे कोई कमज़ोर संकल्प आता है तो माँ का निर्भय स्वरूप सामने आता है। मम्मा कभी भी विघ्नों से घबराती नहीं थी। मेरे इस 40 वर्ष के अलौकिक जीवन में कई प्रकार के विघ्न आये लेकिन मम्मा के निर्भय और शक्ति स्वरूप ने मुझे निर्भय और विजयी बना दिया। मम्मा के सामने अपने वायदे के रूप में मैंने एक गीत प्रस्तुत किया था जिसकी पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:-
निकलेंगी हम शक्तियाँ युद्ध के मैदान में,
होती चलेंगी पास हम निश्चय के इम्तिहान में।
ज्ञान के जेवर पहनेंगी हम
योग का करें श्रृंगार भी।
लेकिन कमर में बाँधेंगी हम
ज्ञान की कटारियाँ।
निकलेंगी शक्तियाँ युद्ध के मैदान में...
भारत की ज्योति जगायेंगी हम
ज्ञान का अमृत पिलायेंगी हम।
आज भी मम्मा की शिक्षायें, मम्मा की पालना बार-बार याद आती हैं। परन्तु, यह प्रश्न उठता है कि मम्मा का वही चेहरा, वही रूप, वही शिक्षा फिर कब मिलेगी ? उत्तर मिलता है 5000 वर्ष के बाद। मन कहता है, अच्छा मम्मा मैं इंतज़ार करूँगी, मैं इन्तज़ार जरूर करूँगी।
जो भी मिला मातेश्वरी से, वो बन गया ईश्वर का वारिस
ब्रह्माकुमारी सुन्दरी बहन जी, दिल्ली, मालवीय नगर से अपना अनुभव लिखती हैं कि सन् 1961 में हम मधुबन में आये और मीठी माँ को देखा तो ऐसा लगा जैसेकि मैं दुर्गा व वैष्णो माँ के सम्मुख आयी हूँ। देवियों को हमेशा पहाड़ों पर गुफाओं के अन्दर दिखाते हैं। उनके आगे सदा ज्योति जगी हुई दिखाते हैं। वास्तव में, मुझे ऐसे अनुभव हुआ, माँ अपनी ऊँची स्थिति में, अन्तर्मुखता की गुफा में बैठी हैं, ज्योति जग रही है और नैनों से बिल्कुल शेरनी शक्ति की भासना आ रही थी। मम्मा गम्भीरता और निर्भयता का स्वरूप थी। मम्मा ने दृष्टि दी तो ऐसे लगा जैसेकि हमारी कमज़ोरियाँ खिंच कर बाहर आ रही हों। दृष्टि में इतना तेज था और बहुत ही मीठे बोल मम्मा के मुख से निकले, बच्चे आ गये हो, भल पधारे। ऐसे कह मम्मा ने अपने गले से लगा लिया। मम्मा से मिलते ही एक अजीब-सी शक्ति का मेरे रोम-रोम में संचार होने लगा और रूह को राहत मिली। मैंने मम्मा का प्यार जीवन में पहली बार पाया।
मम्मा को सदैव हमने बालक रूप में देखा। मम्मा हमेशा मधुबन के आंगन में फ्रॉक और पजामे में रहती थी। मम्मा का भोला-भाला और मुस्कराता हुआ रूप एक निष्कपट बालक और संत जैसा दिखता था। वह रूप बहुत ही मीठा और प्यारा रूप था जिसमें विकारोंका कोई भी अंश तक नहीं था। कहावत है-
"संत बडे परमार्थी
शीतल जिनके अंग।
तपत बुझाये और की
देते अपना रंग ॥"
जैसे मम्मा शीतला स्वरूप थी वैसे बाबा के आगे एक छोटा बालक बन रहती थी। बाबा, मम्मा को कुछ कहता तो मम्मा कहती 'जी बाबा'। मम्मा का 'जी बाबा' कहना इतना मीठा था जो रोमाच पैदा करता था, ऐसी थी हमारी माँ सरस्वती !
सन् 1963 की बात है, मम्मा हमारे पास तीन दिन जम्मू में रही। वह अमृतसर से जम्मू में आयी। हमने उनको निमंत्रण दिया था। नया-नया सेन्टर खुला था बहुत कन्यायें, मातायें एवं भाई आते थे। मैं और न्यूयार्क वाली मोहनी बहन एक साथ रहती थीं। हमारे पास न बर्तन थे, न फर्नीचर था। उन दिनों मिलेट्री के मेजर की युगल नयी-नयी ज्ञान में आयी थी, हमने उनको बताया कि हमारे पास जगदम्बा सरस्वती जी पधार रही हैं। वह अपने घर से नये बर्तन और सोफा ले आयी। सेवाकेन्द्र को सजा दिया। जैसे ही मम्मा ने प्रवेश किया तो मेजर की युगल को मम्मा से जगदम्बा का साक्षात्कार हुआ और वह निहाल हो गयी। वो तो बिल्कुल बदल गयी। मीठी मम्मा हमारे पास 3 दिन रही। मम्मा की अथक सेवा और मीठी मुरली ने हमें मस्त बना दिया। मम्मा अमृतवेले दो बजे उठती थी और दिन के दो बजे तक बाबा की याद और बच्चों की सेवा पर उपस्थित रहती थी। उनके जीवन धारणाओं की से अनेक आत्माओं ने लाभ उठाया और वाह, वाह के गीत गाये। मम्मा के जीवन से प्योरिटी की पर्सनाल्टी झलकती थी और मम्मा साक्षात् दिव्यगुणों की मूर्ति थी। तीन दिन में मम्मा से बहुत कुछ सीखा, हमारी खुशी का पारावार नहीं था, अजीब-सा नशा चढ़ा हुआ था। तीसरे दिन जब मम्मा की विदाई की घड़ी आयी तो हम सबकी आँखों से आँसू छलक पड़े। ऐसे लगा कि हम गोपियों के बीच से कृष्ण चला गया। ऐसी थी हमारी मीठी ममता भरी माँ।
सन् 1963 में ही मीठी जगदम्बा माँ दिल्ली में आयी, हम साउथ एक्सटेंसन् में रहते थे। एक भाई, जो ज्ञान में चलता था, वह लखनऊ चला गया। लखनऊ से वह एक बार दिल्ली में आया था। उसका एक्सीडेन्ट हो गया था। हमें पता लगा तो हम उससे मिलने गये। वह अपने सम्बन्धी डॉक्टर माथुर जी के पास आया हुआ था। उस भाई ने डॉक्टर माथुर जी से हमारा परिचय कराया। हमने उनको सेन्टर पर आने का निमंत्रण दिया। उन्होंने कहा, मैं भगवान को नहीं मानता। वह वैज्ञानिक था। उन्होंने कहा, मेरी पत्नी पूजा करती है राम कृष्ण की। मेरा इन बातों में विश्वास नहीं है। हमने कहा, कोई बात नहीं, कल हमारे पास आबू से मातेश्वरी जी आ रही हैं, आप उनसे ज़रूर मिलना। उसने हाँ कर दी। हमने कहा, आप दोनों आना। दूसरे दिन मम्मा हमारे पास आयी और डॉक्टर माथुर जी भी अपनी पत्नी सहित वहाँ आये। मम्मा से मिलते ही उसने सवाल किया, भगवान कौन है? मम्मा ने फौरन कहा, प्वान्ट ऑफ लाइट (Point of Light) 1 उसने कहा, विज्ञान भी यही कहता है कि कोई सोर्स ऑफ एनर्जी (Source of Energy) है, जो विश्व को चलाती है। ये बात उसको जैच गयी। मम्मा ने कहा, कल से आप कोर्स करना। बाद में दोनों पति-पत्नी बाबा के बच्चे बन गये। उन्होने शिव बाबा को वारिस बना लिया। पक्के निश्चय बुद्धि, अचल, अडोल रहे। उनकी डायरी में एक दिन भी मुरली मिस (miss) नहीं थी। अभी दोनों ने शरीर छोड़ दिया। दिल्ली डिफेन्स कॉलोनी में उनके घर पर सेवाकेन्द्र चल रहा है।
मम्मा ने मुझे निर्भय और सच्चा रहना सिखाया
गाजियाबाद से ब्रह्माकुमारी सुतीष बहन लिखती हैं कि मेरे माता-पिता वैष्णो माता के पुजारी थे। वे हर वर्ष तीन-चार बार वैष्णो देवी की यात्रा करने ज़रूर जाते थे। इस प्रकार, घर में भक्ति-पूजा का वातावरण था जिससे शक्ति- आराधना के संस्कार मेरे में भी आ गये। मैंने जब होश सम्भाला तब से मेरी भी आस्था वैष्णो माता में थी। मैं सोचा करती थी कि मैं भी ऐसी देवी बनूँ परन्तु कैसे बनूँ, यह समझ नहीं थी। मैं अपने लौकिक पिता जी से बचपन में पूछा करती थी कि क्या मैं भी ऐसी देवी बन सकती हैं? वे कहते थे, तुम सच्ची दिल से इनकी पूजा किया करो तो ऐसी बन जाओगी। मैं जब अकेली बैठती थी तो मेरे यही विचार चलते थे कि मैं भी देवी बनूँगी। ऐसे-ऐसे विचार बहुत अधिक चलते थे। मैंने एक बार स्वप्न में देवी माँ का साक्षात्कार भी किया, मैंने देखा कि एक बहुत सुन्दर बड़ा-सा कमरा है, उसमें लाल लाइट दिखायी पड़ी तो मैं उस कमरे के अन्दर चली गयी। वहाँ एक सफ़ेद गद्दी, सफ़ेद बिस्तर और साथ में एक सफ़ेद कुर्सी थी जिस पर सफ़ेद पोशाक में मम्मा बैठी थी। मैं इनकी तरफ़ बहुत खुशी से देखते हुए आगे बढ़ने लगी। मम्मा ने मुझे स्नेह भरी दृष्टि दी और प्यार से कहा, तुम यहाँ रहोगी ? यह वचन सुनते ही मेरी आँखों में आँसू भर आये, मैं देवी माँ (मम्मा) की तरफ देखती ही रही। कुछ समय पश्चात् मम्मा ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, बच्ची, तुम जल्दी आओगी। इस प्रकार, शक्ति स्वरूप स्थिति का साक्षात्कार मैंने किया। वह दृश्य मेरी आँखों में घूमने लगा। मैं मन-ही-मन माँ को याद करती रहती थी।
आखिर वो दिन आ ही गया
उसके बाद जब पाकिस्तान-हिन्दुस्तान का बँटवारा हो गया तब सन् 1947 में हम लाहौर से देहली आ गये। उस समय मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी। हमारा लौकिक परिवार दिल्ली, सब्जी मण्डी में रहता था। मैंने जो साक्षात्कार में मातेश्वरी का रूप देखा था वही याद आ रहा था। सदा यही आशा रहती थी कि मुझे माँ कब बुलायेगी। इन्तज़ार करते-करते वह दिन भी आ गया। उस समय मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। हमारी गर्मियों की छुट्ठियाँ थीं। हम सुबह-सुबह सैर करने यमुना नदी के किनारे जाते थे। अचानक क्या देखा कि वहाँ पर कुछ सफ़ेद वस्त्रधारी बहनें बैठी हैं। आध्यात्मिक ज्ञान-चर्चा चल रही थी। मैं इनको देखकर वहीं चली गयी और सामने बैठ गयी। दिल के अन्दर इतना आकर्षण होने लगा कि ये मेरी अपनी ही हैं। दिल करने लगा कि मैं भी इनके पास ही रहने लगें। फिर इन बहनों को एक धर्मशाला में ठहराया गया, जो हमारे घर के पास ही थी। मैं वहाँ आती-जाती रहती थी। एक दिन मैंने इन बहनों के पास कल्पवृक्ष का चित्र देखा जिसमें जगदम्बा माँ तपस्या में बैठी है, यह वही चित्र था जो मैंने पहले साक्षात्कार में देखा था। मैंने बहनों से पूछा कि यह माँ कहाँ है? क्या आप इनको जानते हो? उन्होंने कहा कि यह हमारी यज्ञमाता है। मुझे बहुत खुशी हुई कि अब मुझे देवी माँ मिलेगी। ऐसे चलते-चलते मुझे तीन वर्ष हो गये। मन में जिस प्राप्ति की आशा थी वह दिन भी आ गया। सन् 1954 में मम्मा देहली में पधारी। तब तक देहली में कमला नगर सेवाकेन्द्र खुल गया था। मम्मा उसी सेवाकेन्द्र पर आयी थी। मन बहुत अतीन्द्रिय सुख में झूम रहा था। हम मम्मा के स्वागत के लिए हार, गुलदस्ते लिये खड़े थे। जब मम्मा गाड़ी से उतरी तो मैंने मम्मा को माला पहनायी, तो मम्मा ने मुझे मेरे नाम से ही पुकारा, सुतीष कैसी हो ? उन्होंने कहा, जो चाहती थी मिल गया ना। उसी समय स्नेहमयी, शक्ति रूप माँ ने ऐसी दृष्टि दी कि मेरी खुशी का पारावार ही नहीं रहा। क्योंकि जिस माँ का मैंने साक्षात्कार किया था वही माँ मुझे मिल गयी। उसके पश्चात् मैंने ईश्वरीय पढ़ाई कभी नहीं छोड़ी। जितना समय मिलता मैं सेवाकेन्द्र पर ही रहती।
कई विघ्न आये परन्तु मैं हारी नहीं
चलते-चलते लौकिक परिवार वालों को कुछ लोगों ने संस्था के विपरीत व मेरे विपरीत उल्टा-सुल्टा कहना शुरू कर दिया। मेरे ज्ञान में आने के एक वर्ष पहले ही मेरे लौकिक पिता जी ने शरीर छोड़ दिया था। अतः भाइयों ने मुझे संस्था में जाने से रोकना चाहा और कहा कि हमें दुनिया में रहना है, इस दुनिया के सब नियम निभाने हैं, वैसे भी सारा जीवन कोई बिना शादी किये अकेला नहीं रह सकता। सब मुझे समझाते थे कि वहाँ नहीं जाना परन्तु मैं रुकी नहीं। तब इन्होंने सोचा कि इसकी शादी कर देनी चाहिए, यह ठीक हो जायेगी। परन्तु मेरी पूरी लगन भगवान से लग चुकी थी। ऐसे कई प्रकार से इन्होंने विघ्न डाले परन्तु मैंने कभी मम्मा-बाबा का साथ नहीं छोड़ा। ऐसी-ऐसी परीक्षायें पार करके मैं सन् 1956 में पूर्ण रूप से ईश्वरीय सेवा में समर्पित हो गयी। कुछ समय मम्मा- बाबा दिल्ली में राजोरी में रहे, मैं भी इनके संग वहीं रही। वहाँ मम्मा ने मुझे ईश्वरीय मार्यादाओं में चलना सिखाया। अन्य आत्माओं को आध्यात्मिक पढ़ाई का कोर्स देना भी सिखाया।
बुराइयों की बलि लेकर कष्ट हरने वाली सुखदायी माँ
सबसे पहले मैंने एक वृद्धावस्था वाले भाई को कोर्स कराया। वह भाई शराब बहुत पीता था। उसे शराब छोड़ना मुश्किल लगता था। परन्तु उसे ज्ञान अच्छा भी बहुत लगता था। एक दिन अचानक ही वह सुबह-सुबह क्लास में आ गया जब मम्मा की मुरली चल रही थी, वह बड़े ध्यान से मुरली सुनता रहा। अन्त में वह उठकर बोला, माँ मुझे माफ़ कर दो, ऐसे कहकर उसने रोना शुरू कर दिया। मम्मा ने उसे ममतामयी दृष्टि दी। उसने मम्मा से बहुत माफी माँगी। अपनी यह कमज़ोरी मम्मा के आगे रख दी और कहा कि मुझे इस बुराई से छुड़ा दो। तब मम्मा ने कहा कि यह कमी मुझे दे दो। इस प्रकार, उस व्यक्ति का उद्धार हो गया। मम्मा सबके कष्ट, स्नेहमयी दृष्टि और शुभभावना से दूर कर देती थी। मैं 6 मास मधुबन में रही जहाँ मम्मा ने मुझे अपनी मीठी शिक्षाओं से निर्भयता का और सच्चाई का गुण सिखाया। मम्मा कहती थी, यज्ञ माता-पिता के साथ सच्चा रहने से तुम्हारा जीवन श्रेष्ठ बन जायेगा। ऐसे, हमारी मातेश्वरी हर तरह की शिक्षा दिया करती थीं।
माँ सरस्वती ने ही मुझे गुरुमुखी लिखना-पढ़ना सिखाया
अहमदाबाद से दीदी सरला जी मम्मा के सम्बन्ध में अपना अनुभव सुनाती हैं कि मीठी मम्मा से जो मधुर मिलन इस जीवन में हुआ है और अलौकिक अनुभव और प्राप्ति हुई है उसका वर्णन करने में मुझे अलौकिक आनन्द का अनुभव हो रहा है। आज से 49 साल पहले मुंबई मातुंगा में हमारे पड़ोस में ब्रह्माकुमारी बहनें पधारी थीं और सबसे पहले हमारी मुलाक़ात दादी बृजेन्द्रा जी से हुई। बृजेन्द्रा दादी होली मनाने आबू जाने वाली थी। वो हमारी लौकिक नानी और बड़ी बहन को साथ ले जाने के लिए आयी थीं क्योंकि वे आश्रम में आते- जाते रहते थे। तब मैंने एस.एस.सी. की पढ़ाई पूरी की थी। हमने कहा हमें भी मधुबन ले चलो। मैं भी उनके साथ आबू चली आयी। उस समय कोटा हाउस और धौलपुर हाउस में आश्रम था। मुझे उस समय यह भी पता नहीं था कि पिताश्री कौन है, मातेश्वरी कौन है, उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है। जब वहाँ पर पहुँचे तो हॉल में एक संदली पर पिताश्री और दूसरी संदली पर मातेश्वरी विराजमान थे। उस समय पाँच-छः सेवाकेन्द्र ही पूरे भारत में थे और इन सब सेवाकेन्द्रों से थोड़े-थोड़े बहनें भाई होली मनाने पहुँचे थे। हम भी होली मनाने पहुँच गये थे। बाबा-मम्मा के साथ हमने होली मनायीं, उससे हमारा मन बहुत प्रसन्न हुआ।
साधना देवी बन, मातृदेवी बन गयी
मम्मा कुमारी होते हुए भी पुरुषार्थ करके मातेश्वरी, यज्ञमाता बनी और आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ी। उनको देख हमें उन जैसा बनने की प्रेरणा मिली थी। बाबा ने हमें हंसी में पूछा था, बच्ची, तुम्हें मम्मा जैसा बनना है? बनना है तो मम्मा की पूँछ पकड़ लो अर्थात् मम्मा का अनुसरण करो, कहते हैं कि कामधेनु की पूंछ पकड़ने से इस संसार रूपी सागर से पार हो जाते हैं, वैसे तुम्हें भी मम्मा जैसा बनना है तो मम्मा की पूंछ पकड़ो।
मंत्रमुग्ध करने वाले दो शब्द
मम्मा संगीत विद्या में प्रवीण थी। उनका प्रतिभाशाली व्यक्तित्व था। मम्मा पूरी-पूरी रात योग लगा कर पुरुषार्थ किया करती थी। पुरुषार्थ के प्रति उनको बहुत लगन और प्रीत थी। इन बातों ने हमें भी उन जैसा बनने की प्रेरणा दी। जब भी बाबा, मम्मा को बुलाये अथवा कोई सेवा बताये तो मम्मा के मुख से दो शब्द ही निकलते थे "जी बाबा"। इन दो शब्दों में बाबा के प्रति उनका सम्मान और स्नेह इतना भरा रहता था कि सुनने वालों को वो शब्द मंत्रमुग्ध कर देते थे।
दैवी सभ्यता के संस्कार भरने वाली आदिशक्ति
मम्मा हमें शिक्षा देती थी कि आपस में जब बात करते हैं तो बहुत धीमे स्वर में करनी है, यहाँ तक कि दो बात करते हैं तो तीसरे व्यक्ति को सुनाई नहीं देना चाहिए। मम्मा चलती भी ऐसे थी कि किसी को पता भी नहीं पड़ता था कि मम्मा आयी कब और गयी कब। मम्मा कहती थी कि बच्चे हमारी चलन भी ऐसी हो कि धरती को कष्ट न हो। कई लोग ऐसे चलते हैं जैसेकि रावण। कहानियों में आता है कि रावण जब चलता था तो धरती हिलती थी, कांपती थी। हम देवता बनने वाले हैं इसलिए हमारी चाल देवताओं जैसी होनी चाहिए। बिल्कुल आवाज़ ही नहीं होनी चाहिए। मम्मा ने यह भी सिखाया कि कैसे एक-दूसरे को बुलाना होता है। जब हम मुंबई में रहते थे तो हमारे घर के सामने हमारी नानी का घर था। जब हमें किसी को बुलाना होता था तो हम अपने घर में ही रहकर आवाज़ से बुलाते थे कि इधर आओ, यह बात सुनो। एक बार वहाँ क्लास में मम्मा ने सुनाया कि एक-दूसरे को ज़ोर से आवाज़ देकर नहीं बुलाना चाहिए, उस व्यक्ति के नज़दीक जाकर कहो, आपसे हमें कुछ बात करनी है, आप आओ। इस प्रकार शान्ति से, प्रेम से और धीमे स्वर से बोलना चाहिए। मम्मा कहती थी कि आप देवता बनते हो, देवता कभी ज़ोर-ज़ोर से हंसते नहीं, बोलते नहीं और चलते नहीं। सब कुछ धीमे से, शान्ति से करते हैं। अतः आपको भी ऐसे ही चलना चाहिए। मम्मा कहती थी कि अगर कोई आपको शिक्षा देता है तो उसको प्यार और संयम से सुनना चाहिए। उसी समय उनको यह नहीं कहना चाहिए कि यह ऐसा नहीं, वैसा नहीं, मैंने किया ही नहीं। हो सकता है कि वह बात अभी लागू नहीं होती हो, शायद भविष्य में काम आने वाली हो। इसलिए शिक्षा को मान देना चाहिए, उसे सम्मान से स्वीकार भी करना चाहिए।
मुझे रंगीन कपड़े पहनने का और दो चोटी बनाने का बहुत शौक था। एक दिन रात्रि को मैं बृजेन्द्रा दादी के साथ मम्मा को गुड नाइट करने गयी थी। तब मम्मा ने कहा, सरला, तुमने देवियों की तस्वीर देखी है, उनके बाल कैसे दिखाते हैं? मैं चुप रही। फिर मम्मा ने कहा, देवियों के बाल या तो खुले रहते हैं या एक ही चोटी होती है। ऐसे कहते हुए उन्होंने मेरी दोनों चोटियों को खोलकर हमेशा के लिए एक बना दिया। इस प्रकार, मम्मा बच्चों को क़दम क़दम पर सावधानी और शिक्षा देती थी। यहाँ तक कि मम्मा ने ही मुझे साड़ी पहनना सिखाया, गुरुमुखी लिखना-पढ़ना सिखाया।
लौकिकता की बलि लेने वाली काली माँ
मम्मा ने ही हमें बाबा को अर्पण किया। मम्मा हंसी में कहती थी, सरला, यह मम्मा माँ भी है और काली भी है। काली तो तुम्हारी बलि ज़रूर लेगी। मैं मुस्कराती थी। मेरी लौकिक माँ की सेवा मुझे ही करनी पड़ती थी। एक दिन सभा में ही मम्मा ने मुझे ललकारा कि तुम अपनी एक माँ के लिए खुद जगत माता बनने से वञ्चित रहोगी? यह बात मेरे मन में तीर की तरह चुभ गयी। मैं उसके बाद ईश्वरीय सेवा में समर्पित होने के लिए तैयार हो गयी। मेरी बड़ी और छोटी बहन भी थीं, वे हमारी लौकिक माँ की देखभाल करने लगीं। इस प्रकार, माँ काली ने मेरी बलि लेकर मुझे शिव पिता को अर्पित कर दिया, मुझे कर्म बन्धन और लौकिक बन्धन से छुड़ा दिया।
समर्पित होने के बाद मम्मा ने पहले मुझे बृजेन्द्रा दादी के पास ही रखा था। कुछ समय के बाद मम्मा ने पूछा, सरला, तुम पूना जाओगी? मैंने कहा, मम्मा आप जो कहेंगे, जहाँ भेजेंगे वहाँ जाऊँगी। तब मम्मा ने पूना भेजते समय मुझे ऐसी शिक्षा और हित-वचन उच्चारे कि सब अपना सो बाबा का समझ निमित्त भाव से सेवा करना, आगे बढ़ते रहना।
सब कुछ करते हुए गुप्त पुरुषार्थी बनकर रहो
मम्मा कहती थी, हमारा पुरुषार्थ सदा गुप्त होना चाहिए, दिखावा नहीं। सेवा छोड़कर सब से अलग होकर योग में नहीं बैठना है। सब कुछ करते हुए, सबके साथ रहते हुए गुप्त पुरुषार्थ करना चाहिए। मम्मा भी खुद ऐसे ही करती थी। मम्मा को देख मुझे कभी शीतल माँ का, कभी काली माँ का अनुभव होता था। मम्मा जगदम्बा ही थी, देवी थी, सर्व मनोकामनाओं को पूरा करने वाली कामधेनु माँ थी।
सरस्वती माँ ने ही मुझे ज्ञान सिखाया, योग कराया
मधुबन की ब्रह्माकुमारी मोहिनी बहन जी अपने अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि मैं पहली बार सन् 1955 में आबू में ही मम्मा से मिली। उस समय मैं 14 साल की थी। जब मैंने मम्मा-बाबा को देखा तो वे मुझे लाइट के कार्ब में दिखायी पड़े। उनकी मीठी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ते ही मैं सोच में पड़ गयी कि मैं कहाँ आ गयी हूँ, किन फ़रिश्तों की दुनिया में आ गयी हूँ, जो उस दुनिया से बहुत प्यारी भी है और न्यारी भी। उस समय मुझे इस ज्ञान की इतनी समझ नहीं थी परन्तु इतना तो ज़रूर निश्चय था कि ब्रह्मा बाबा के तन में शिव पिता का अवतरण हुआ है, वे यह ईश्वरीय ज्ञान दे रहे हैं।
बाबा ने मुझे देखकर मम्मा से कहा, मम्मा, इस बच्ची को सात दिन का कोर्स कराओ। मुझे भी बाबा ने कहा, तुम मम्मा से सात दिन ज्ञान सुनो। बाबा का छोटे बच्चों से विशेष स्नेह था और ज्ञान की पालना देने में विशेष ध्यान था। बाबा कहते थे, ये छोटे-छोटे बच्चे बैठकर किसी को ज्ञान सुनायेंगे तो सुनने वाले बहुत प्रभावित होंगे और सोचेंगे कि हम भी इन जैसे बनें अथवा हमारे बच्चे भी इन जैसे बनें। मम्मा ने हमें तीन दिन में इस ईश्वरीय ज्ञान का साप्ताहिक कोर्स कराया। रोज़ शाम को बाबा उस पढ़ाई का पेपर लेते थे। बाबा प्रश्न पूछते थे और मेरे उत्तर सुनकर बाबा बहुत खुश होते थे। इस प्रकार, ज्ञान-ज्ञानेश्वरी सरस्वती माँ ने मुझे ज्ञान सिखाया, योग का अभ्यास कराया।
मम्मा की विशेषता थी-पालना की शक्ति। मम्मा ने मुझे इतना प्यार दिया जितना कि शायद लौकिक माँ ने भी न दिया हो। मम्मा के इशारों ने, पालना ने और प्यार ने मेरे जीवन को ही बदल दिया। मम्मा ने ही मुझे भाषण करना भी सिखलाया। एक बार मम्मा भाषण करने बाहर जाने वाली थी। मम्मा ने कहा, तुम भी मेरे साथ चलना, वहाँ पहले तुम भाषण करो, बाद में मैं भाषण करूँगी। मैंने कहा, मम्मा, मुझे तो भाषण करना आता ही नहीं और इतने आदमियों के सामने मैं कैसे बोलूँगी ? तब मम्मा ने कहा, तुम उन बड़े-बड़े शरीरों को थोड़े ही ज्ञान सुना रही हो? तुम्हें तो आत्माओं को ज्ञान सुनाना है। तुम आत्माओं को देखो, छोटी-छोटी बिन्दु आत्माओं को देखकर भाषण करो। उस समय मैंने आत्मा पर भाषण किया। पहले मैंने भाषण मम्मा को लिख कर दिखाया था और मम्मा ने उसमें करेक्शन करके भी दिया था। इस प्रकार, मम्मा ने मुझे प्यार दिया, पालना दी, ज्ञान समझाया, योग का अभ्यास कराया और भाषण करना सिखाया।
मम्मा, बाबा की एक महान् आज्ञाकारी बच्ची थी। इसका एक उदाहरण आपको सुनाती हूँ। एक बार की बात है, आबू में एक पार्टी आयी थी, बाबा- मम्मा से मिलने। उनको उसी दिन जाना था। वे लोग जब बाबा-मम्मा से विदाई लेने गये तो बाबा ने मम्मा से कहा, मम्मा, बच्चे जा रहे हैं इनके लिए साबूदाने का हलवा बनाओ। मम्मा ने कहा, जी बाबा। मैं तो मम्मा की बात सुनकर हक्की-बक्की रह गयी। वे लोग तो अभी जा रहे हैं, साबूदाने का हलवा बनने में तो बहुत समय लगता है, इतनी जल्दी हलवा कैसे बनेगा ? तब मम्मा मुस्करायी और कहा, बाबा ने कहा है तो बन ही जायेगा। मम्मा हलवा बनाने बैठ गयी। पार्टी वाले तो निकल गये। मैंने जाकर मम्मा को कहा, मम्मा, वो चले गये। मम्मा ने कहा, ठीक है, वे बनाती ही रहीं। फिर मैंने बाहर जाकर देखा, वे तो गेट से बाहर निकल गये थे। मैंने फिर आकर मम्मा से कहा, मम्मा, वे उधर तक गये। मम्मा ने कहा, ठीक है। मम्मा बनाती गयी, बनाती गयी। वे चले गये बस- स्टैण्ड। फिर बाबा आये, पूछा, मम्मा, हलवा बन गया ? मम्मा ने कहा, हाँ बाबा, बन रहा है। आखिर हलवा बन गया, बाबा ने हलवे को एक डिब्बे में भरा और एक भाई को कहा, यह डब्बा बस स्टैण्ड जाकर उन बच्चों को देकर आओ। उस समय कोई गाड़ी तो थी ही नहीं यज्ञ में। वह भाई दौड़ कर बस स्टैण्ड पहुँचा। बस निकल रही थी, उस भाई ने हाथों से इशारा किया तो बस रुक गयी। बस से पार्टी का एक भाई बाहर आया। बाबा का भेजा हुआ हलवा पाकर वे सब गद्गद हो उठे कि बाबा-मम्मा ने हमारे लिए हलवा बना कर भेजा है। उन्होंने आबू रोड पहुँचते ही बाबा के लिए प्यार और धन्यवाद भरा पत्र लिखा और खुशी में मगन होकर बाबा की याद में हलवा खाया। इस प्रकार, मम्मा-बाबा ने बच्चों को सुख-सन्तोष में रखना ही अपना कर्त्तव्य समझा।
मम्मा के नयन, मम्मा की सूरत इतनी रूहानी होती थी कि जो भी उनको एक बार देखता वह जीवन भर नहीं भूलता था। जिन्होंने भी मम्मा का प्यार और पालना पायी, वे इस ज्ञान में अचल और अडोल होकर चले हैं और चल रहे हैं। मम्मा का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली था। मम्मा के सामने कोई भी बाहर का व्यक्ति हो या यज्ञवत्स हो, झूठ नहीं बोल सकता था। उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी। उनके सामने आते ही वह उनकी रूहानी दृष्टि से प्रभावित होकर अपने को बच्चा महसूस करता था, उनको अपनी माँ अथवा देवी, शक्ति अनुभव करता था। बात जैसी होती थी वैसी ही कह देता था। मम्मा हमारी छोटी-छोटी भूलों को भी देखना नहीं चाहती थीं। वे चाहती थीं कि हर बच्चा भूलों से मुक्त हो जाये। मम्मा यह भी हम बच्चों को सिखाती थी कि हमारे कारण अन्य किसी की दिनचर्या में तकलीफ न हो अथवा उनके कार्यमें बाधा न पड़े। इस विषय में मुझे एक घटना याद आती है। मैं मधुबन में पहले-
पहले मुरली लिखने की सेवा करती थी। मेरा लक्ष्य यही होता था कि सुबह नाश्ते के बाद लिखना शुरू किया तो उसको पूरा करके ही भोजन करना है अर्थात् दोपहर भोजन तक मुरली लिखना पूरा करना है। कई बार क्या होता था कि कोई-कोई मुरली बड़ी होती थी तो पूरी करने में देर हो जाती थी। सब भोजन
करके चले जाते थे और मैं अकेली रह जाती थी। मेरे कारण ही भोजन खिलानेवाली माता इन्तज़ार करते बैठा करती थी। मम्मा ने इसको पहली बार देखा, तो कुछ नहीं कहा। फिर दुबारा भी ऐसा हुआ, तो मम्मा ने मुझे बुला कर कहा, देखो मोहिनी, तुम्हारे कारण उस माता को देर तक बैठना पड़ता है। तुम देरी करती हो तो उसको भी भोजन देरी से करना पड़ता है और आगे के उसके काम जैसे बर्तन आदि यथा स्थान पर पहुँचाना और व्यक्तिगत कार्य करना ऊपर-नीचे होता है। इसलिए तुम समय पर खाना खाया करो। मैंने कहा, जी मम्मा। दो-तीन दिन के बाद मैं पुनः अपनी योजना अनुसार ही पूरी मुरली लिखकर भोजन करने गयी, तो माता मेरा इन्तज़ार कर रही थी। फिर मम्मा ने मुझे बुलाया और कहा, मोहिनी
आज से 15 दिन तक भोजन खिलाने की सेवा तुम करोगी। मैं चुप हो गयी और मम्मा का कहना मान लिया। उस दिन खाना खिलाने के लिए बैठी तो सबका खाना पूरा होने तक मेरी स्थिति ही खराब हो गयी। सबको खिलाने के बाद मुझे खाना पड़ा। उसके बाद सारे बर्तन सम्बन्धित स्थान पर पहुँचाना आदि करते मेरा हाल बेहाल हो गया। अगले दिन ही मैंने मम्मा से कहा, मम्मा, मेरे से यह सेवा नहीं होगी, मैं आगे से समय पर आकर भोजन करूँगी, देरी नहीं करूँगी। लेकिन मम्मा ने कहा, एक दिन में तुम इतनी परेशान हो गयी ? वो माता तो रोज़ ऐसी परिस्थिति का सामना करती है। वो कैसे कर रही थी? फिर भी मम्मा ने कहा, तुमको 15 दिन तो यह सेवा करनी ही पड़ेगी। इस प्रकार, मुझे मम्मा ने सेवा देकर अनुभव कराया कि एक की छोटी-सी भूल से कितनों को दिक्कत होती है और हरेक व्यक्ति द्वारा अपना-अपना काम ठीक ढंग से तथा ठीक समय पर करनेसे सेवा में सबको कितना सहयोग और सफलता मिलती है। उस दिन से मैंने यह धारणा बना ली कि मेरे कारण दूसरों की सेवा में अड़चन न हो और यह ध्यान मैं आज तक रखती आ रही हूँ।मम्मा के मुँह से कभी भी ये शब्द नहीं निकले कि हम कोशिश करेंगे, देखेंगे। बाबा ने कहा और मम्मा अपनी सेना को साथ लेकर उस कार्य में तत्पर हो गयी क्योंकि मम्मा हमें यही कहती थी कि यह कार्य किसने सौंपा है। अगर यह कार्य न होने वाला होता, तो वो क्यों कहते ? बाबा ने यह कार्य हमें ही क्यों कहा ? उसको करने की योग्यता हमारे में है इसीलिए कहा है ना। बाबा की कोई भी आज्ञा अथवा सेवा के लिए "ना" नहीं कहना। इस तरह, मम्मा से बहुत प्रेरणा लेकर, उनके दिखाये हुए मार्ग पर मैं चल रही हूँ और आध्यात्मिक जीवन को उन्नति के शिखर पर पहुँचा रही हूँ।
मम्मा के वरदानों से ही मैं चल रही हूँ
गांधीनगर से ब्रह्माकुमारी कैलाश बहन जी लिखती हैं कि बात सन् 1959 की है, मैं बहुत छोटी थी, उस समय मेरे मम्मी-पापा ज्ञान में चलते थे। उनके साथ-साथ मैं भी हर रोज़ सेन्टर पर जाती थी। मुझे बहनों का जीवन, व्यवहार और प्यार बहुत ही अच्छा लगता था। उन्हीं दिनों मम्मा जालंधर सेवाकेन्द्र पर आयी थी। मैं भी मम्मी-पापा के साथ जालंधर गयी थी। मम्मा से भी मिली और मम्मा के आगे एक गीत भी गाया। मम्मा को बहुत अच्छा लगा। वे मुस्कराती रही और कहा, "बहुत पुरानी जानी-पहचानी बाबा की बच्ची हो, यज्ञ से ही गयी थी और यज्ञ में ही आ गयी हो। देखो बच्ची, बाबा सेवा के लिए अलग- अलग स्थानों पर अलग-अलग तरीकों से भेजते हैं। बाबा आपसे अपने आप ही सेवा करायेंगे, मेहनत नहीं करनी पड़ेगी" मम्मा का दिया हुआ यह वरदान मुझे सदा याद रहता है। आज भी बाबा निमित्त बना करके सेवा करा रहे हैं।
फिर मेरे को थोड़ा-सा ताऊजी का बन्धन आया लेकिन बाबा का बहुत ही साथ और मदद मिली। हमारे ताऊ जी की ऐसी इच्छा थी कि मैं बहुत ही अच्छी तरह से, धूमधाम से अपनी बच्ची की शादी कराऊँ लेकिन मैं मन में पक्का कर बैठी थी कि चाहे कुछ भी हो, मुझे ब्रह्माकुमारी बहनों जैसा जीवन बनाना है और खूब बाबा की सेवा करनी है। मित्र-सम्बन्धियों की ओर से भी मुझे कोई साथ नहीं मिलता था, और ही सब विरोधी बन गये। मेरी मम्मी और पिता जी की इच्छा थी कि बच्ची ब्रह्माकुमारी बने। कोई भी सेवा करते मुझे अलौकिक खुमारी चढ़ी रहती थी। पढ़ी-लिखी भी नहीं थी इसलिए अन्दर ही अन्दर बहुत सोचती रहती थी। फिर मेरे को विचार आया की मैं अन्दर की बात और बन्धनों की बात बाबा-मम्मा को पत्र द्वारा सुना दूँ। मैंने मम्मा और बाबा को पत्र में लिखा, मम्मा, मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, मुझे कुछ भी आता नहीं है और मुझे हमेशा के लिए सेन्टर पर ही रहना है, तो मैं क्या करूँ और कौन-सी बातों का ध्यान रखूँ ? कुछ दिनों के बाद मम्मा का पत्र आया। मम्मा ने बहुत ही प्यार भरा पत्र लिखा था। बहुत मीठी, बहुत अच्छी जीवन में ध्यान रखने जैसी बातें पत्र में लिखी हुई थीं। मैंने एक बहन को बुला करके सारा पत्र सुना।
पहले तो मम्मा ने लिखा था कि बच्ची, जब तुम अपने घर से बाबा के घर में आओ तो यह याद रखना कि यह मेरा सदाकाल के लिए घर है। इस घर के सिवाय और मेरा कोई घर नहीं है। बाबा-मम्मा और दैवी परिवार के सिवाय मेरा और कोई परिवार नहीं है। दूसरा, बाबा ने लिखा था कि यह भी याद रहे कि मैं जीवित आयी थी, अब बाबा के घर से मरकर निकलूँगी। तीसरी बात, बच्ची, ये ध्यान रखना
कि सेवा-अर्थ बहुत-सी जगहों पर जाना पड़ता है सो कभी भी एक घर की बात दूसरे घर नहीं बताना। इन सब बातों को अमल में लाकर, बाबा का अन्त तक बने रहेंगे। जैसे कन्या की शादी हो जाती है तो वह पिछले घर को छोड़कर और भूलकर ससुराल घर की बन जाती है। तब ही वह अच्छी तरह सबको और अपने को खुश रख सकती है। बार-बार अपने पियर घर की ही बातें करती रहे तो अच्छा नहीं लगता। ऐसे ही जहाँ भी बाबा भेजे, जैसे भी रखे, जैसा भी स्थान हो, जैसे भी साथी हों हमें अच्छी तरह से सबके साथ रहना है। सबके साथ सबको देख करके चलना है। सबके साथ स्वभाव-संस्कार मिल जायें-
ऐसे चलना है। बस वो दिन और आज का दिन मुझे यह शिक्षा सदा याद रहती है। उसी अनुसार मैं ध्यान रखकर चलती रही हूँ और बाबा चला रहा है। ये बोल कोई साधारण बोल नहीं थे लेकिन ये बोल मेरे लिए वरदान बन गये। बस,बाबा-मम्मा के वरदानों से ही और सब आत्माओं की दुआओं से चल रही हूँ।
माँ ओ माँ ! तू है जग की ठण्डी छाँ !
बीदर (कर्नाटक) से ब्रह्माकुमारी सन्तोष बहन जी लिखती हैं कि नारी जीवन झूले की तरह कभी इस पार, कभी उस पार होता है। मगर मेरी मीठी प्राणदायिनी माँ ने मेरे जीवन को उस पार से सिर्फ इस पार कर दिया जिसके आनन्द का तो पारावार ही नहीं है। लौकिक जन्म में ही जगत-पालक की मेहरबानियों से जीवन में सम्पन्नता रही।
बात सन् 1965 की 31 मई की है। लौकिक मात-पिता तथा दादी कमलसुन्दरी ने मेरा हाथ मीठी माँ और बापदादा के हाथों में सौंपा और कहा कि आज से यह बच्ची आपकी है। मैंने मानो कोई गुप्त पहेली सुनी हो- "बच्ची आपकी है"। मेरी 15 वर्ष की अबोध-सी अवस्था में मेरे हितचिन्तक मेरे लिए क्या-क्या योजना बना रहे हैं मेरी समझ से बाहर था। सन् 1950 की 31 मई को पूना में शारीरिक जन्म हुआ था। ठीक 10 वर्षों के बाद पहली बार लौकिक माँ-बाप के साथ सेवाकेन्द्र पर जाने का शुभ दिन आया, वो भी 31 मई (1960) का दिन था। तीसरे जन्म में प्रवेश पाने जैसी घड़ी 31 मई, 1965 को आ पहुँची जब प्रातः नाश्ता साकार माँ के साथ, दोपहर का भोजन साकार माता-पिता के साथ, शाम को पिकनिक और रात्रि भोजन अलौकिक, लौकिक मात-पिता एवं प्रेरणास्रोत दीदी कमलसुन्दरी जी के साथ किया। भोजन के बाद बापदादा बोले, कठपुतली सन्तोष, तुम तो खास मम्मा की बेटी लगती हो, लौकिक माता से तो बिल्कुल मिलती नहीं हो। मेरा दिल धन्यता से उछालें मारने लगा। रात्रि क्लास के बाद विश्राम-कक्ष में प्रवेश पाने से पहले, मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए मीठी माँ ने मधुर महावाक्य उच्चारे, "तुमने जो किया वो समझ कर किया। बाबा के हाथ में हाथ दिया है, संग-संग जीने का वादा भी किया है, समझ कर किया है ना!" मैंने कहा, "जी मम्मा।" "तो मिर्ची के बोरे के बोरे खाने पड़ेंगे, खा सकोगी?" "जी मम्मा।" मम्मा ने फिर कहा, "पानी के घड़े पीने पड़ेंगे, पीओगी?" "जी मम्मा।" पीछे-पीछे दादी जमुना आ रही थी। प्रचंड शीतलता सम्पन्न मगर नुरानी मशाल माँ के कक्ष में प्रवेश कर चुकी दादी जमुना जी ने पूछा, हर बात में 'हाँ जी', 'हाँ जी' तो कह दिया, इसका अर्थ भी जानती हो ? मैंने कहा, "ना जी।" "ओहो ! तो कल कमरे में आना तुम्हें अर्थ समझाऊँगी।" उनसे पहले ही बापदादा ने अमृतवेले के मधुर महावाक्यों में अर्थ भी समझा दिया। कितना रूहानी आकर्षण भरा वातावरण था जिसमें कठिनाई जैसी कोई बात नहीं लगी। मानो कि प्यारी माँ ने उच्चारण करके कवच पहना दिया था जो आज तक भी पहना हुआ है। वो कवच नया का नया ही है। लिखते-लिखते अनेक मधुर यादें मानस पटल पर उभरने लगी हैं। कौन-सी बात लिखूँ, कौन-सी नहीं लिखूँ। मम्मा का निर्देश था कि हर स्थूल, सूक्ष्म कार्य जो भी करो, सम्पूर्णतासे भरपूर, पूरे मन से करो। रोटीभी बेलो तो चन्द्रमा-सी गोल जिससे वो गोल रोटी उस लाल-लाल गोल ज़्योतिकी भी संग-संग यादें दिलाती रहे। खाने वाले भी शक्तिशाली हों।
एक दिन सांयकाल 6.30 पर मैं प्रेस करने के लिए बड़ी मेहनत कर रही थी। छोटे-छोटे हाथों से बड़ी प्रेस उठाकर स्वयं की साड़ी प्रेस कर रही थी। मम्मा फरिश्ता पीछे से आकर, कब से मेरे सफलता और असफलता के इस प्रयत्न को निहार रही थीं, मुझे पता ही नहीं पड़ा। अचानक मुझे एक तरफ़ हटने लिए कहा और स्वयं साड़ी प्रेस करके दिखाने लगीं। मैं आनन्द विभोर स्थिति में यह कहना भी भूल ही गयी कि अब मैंने सीख लिया, बाक़ी मैं कर लूँगी। माँ ने मुझे वस्त्र ही नहीं दिये बल्कि माया की चोटों से मुक्त रहने के लिए बुलेट प्रूफ कवच पहना दिया जिसे पहनने पर दिल गा उठता है-
हे दाता, हे माता
जीऊँगी तेरी गली में मरूँगी तेरी गली में।
चली आयी माँ अपनों के गाँव में
भूल, धूप दूर, तेरी ठण्डी-ठण्डी छाँव में।
चली आयी माँ...
क़बूल रखना माँ अपनी शक्तिशाली बाहों में
मैं तो बस आयी, आ गयी, आ ही गयी
माँ तेरी शक्तिशाली बाहों में ॥
करुणाशीले क्षमापूर्ण प्रेममयी माँ सरस्वती
पूना की दादी बृजशान्ता जी अपने अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि एक बार हम 30 कुमारियों को एक कमरे में ध्यान में बिठा दिया गया। उस समय वहाँ इतनी शान्ति छा गयी कि कई कन्यायें तो ध्यान में चली गयीं। बाबा ॐ निवास में रहते थे और हम ॐ मंडली में रहते थे जिसका पहले जशोदा निवास नाम था। तब बाबा को फोन पर बताया गया कि कई कन्यायें ध्यान में चली गयीं, वे ध्यान में पियू-पियू बोल रही हैं। बाबा आये और उनको ध्यान से उतारा।
मम्मा में ज्ञान समझाने की विधि बहुत प्रभावकारी थी। मम्मा जिस किसी को ज्ञान सुनाती थी वह जरूर प्रभावित होता था। हमारे बाप और दादा भी रोज़ ज्ञान सुनने ॐ मंडली में आते थे। सिन्ध में इस ज्ञान के लिए, बाबा के लिए अथवा मम्मा के लिए किसी की कोई शिकायत वा विरोध नहीं था। शिव बाबा को उस समय हम आलमाइटी बाबा कहते थे। जब पवित्रता की धारणा के नियम लागू किये तब से विरोध प्रारंभ हुआ। इससे पहले ॐ मंडली की सब प्रशंसा करते थे, इज्जत करते थे।
एक दिन टेनिस कोर्ट में ले जाकर मम्मा ज्ञान सुना रही थी। उस समय मम्मा ने कहा, देखो, बृजशान्ता इधर देखो, तुम्हें कौन सुना रहा है? यह ज्ञान तुमको कौन दे रहा है? तुम्हारे सामने कौन खड़ा है? ऐसा कहते मुझे देखने लगी। मम्मा के बोल में, मम्मा के रूप में साक्षात् बाबा का स्वरूप अनुभव हो रहा था। उस समय हम ब्रह्मा बाबा को साधारण रूप में कभी नहीं देखते थे। हम ब्रह्मा बाबा को निराकार का साकार पार्ट मानते थे। उस समय बापदादा शब्द नहीं था। निराकार शिव बाबा को आलमाइटी बाबा और साकार को बाबा कहते थे। हम जानते थे दोनों अलग-अलग हैं फिर भी हमें अनुभव होता था कि दोनों कम्बाइण्ड हैं। उस समय मुझे मम्मा में बाबा का कम्बाइण्ड रूप अनुभव हुआ। तब मैंने कहा, हाँ मम्मा, मैं समझ गयी।
मम्मा बहुत रहम दिल थी। सज़ा मिलने से ही कोई व्यक्ति सुधरता है- इस बात पर उनका विश्वास नहीं था। मम्मा मानती थी कि जो व्यक्ति अपनी ग़लती पर प्रायश्चित करता है अथवा अपनी गलती का एहसास कर उसको सुधारता है वही अच्छा व्यक्ति है और वह क्षमा का हकदार है। ऐसे व्यक्ति पर मम्मा अपना प्यार बरसाती थी। ऐसी ही एक घटना मेरे साथ हुई। कराची में हम लोग रोज ड्रिल की वर्दी पहनकर टेनिस कोर्ट में ड्रिल करने जाते थे। चन्द्रमणि बहन हम सबको ड्रिल कराती थी। कभी-कभी मम्मा भी आती थी। ड्रिल करने जाते थे तो सब जूते पहनते थे। जिस दिन देखने के लिए मम्मा आयी थी उस दिन मैंने चप्पल पहनी थी। मम्मा ने मुझसे पूछा, "तुमने जूते क्यों नहीं पहने हैं?" मैंने कहा, "मम्मा, 2-3 दिन से पाँव में दर्द है इसलिए जूते नहीं पहने हैं।" लेकिन बाद में मेरा मन अन्दर ही अन्दर खाने लगा कि मैंने मम्मा महारानी से झूठ बोला क्योंकि उस दिन तो मेरे पाँव में दर्द नहीं था, उस दिन मैं जूते पहन सकती थी। फिर भी मैंने मम्मा से झूठ बोला। उन दिनों बाबा हम लोगों से कहते थे कि किसी से कोई भूल हो जाये तो इसके बदले सज़ा के रूप में एक दिन का नाश्ता अथवा भोजन छोड़कर अपने आप को सज़ा दो। बाबा की यह बात मुझे याद आयी तो मैं जल्दी-जल्दी नाश्ता खिलाकर बाहर आ गयी, खिलाने की ड्युटी मेरी और आत्ममोहिनी बहन की थी। आठ बजे तक नाश्ता खिलाना पूरा हो गया था। नौ बजे मम्मा अपने कमरे से नीचे आयी। नीचे एक बेंच रखा रहता था जिस पर मम्मा बैठती थी और उनके सामने हम सब बहनें नीचे बैठती थीं और कचहरी जैसी होती थी। इस कचहरी में सब अपने आप अपनी भूलें बताते थे। मैंने भी खड़े होकर अपनी भूल बता दी कि मम्मा मैंने आज आपसे झूठ बोला है इसलिए मैंने अपने आपको सज़ा दी है। मम्मा ने पूछा, क्या भूल की है और क्या सज़ा दी है। मैंने सारी बात बता दी। मम्मा ने कहा, क्या तुमने नाश्ता नहीं किया? मम्मा का भी नाश्ता अभी तक नहीं हुआ है, मम्मा के साथ तुम भी नाश्ता करो, चलो। मैंने कहा, नहीं मम्मा, मैंने आपसे झूठ बोला है, मुझे सजा भोगने दो। तब मम्मा ने कहा, बृजशान्ता, मम्मा आज तुम्हारे साथ नाश्ता करना चाहती है, क्या तुम अपने साथ मम्मा को नाश्ता नहीं करने दोगी? फिर मम्मा मेरी अंगुली पकड़कर ले चली और कहा, तुम्हें छोड़ कर मैं नाश्ता नहीं करूँगी। आख़िर मम्मा ने अपने साथ बिठाकर मुझे नाश्ता खिलाया। इस प्रकार मम्मा माँ थी, करुणामयी थी, क्षमामयी थी और वात्सल्यमयी थी।
हम देखते थे कि मम्मा हमेशा मन्मनाभव की स्थिति में रहती थी। जब देखो तब ऐसा ही लगता था कि मम्मा योग में है, मगन अवस्था में है। मम्मा का देखना, चलना, बोलना, मुस्कराना आदि सब में अलौकिकता और आकर्षण देखने में आता था। मम्मा की खुशी और नशा कभी कम नहीं होता था।
मम्मा ने मुझे जगत माता कह पुकारा
काशी (वाराणसी) से ब्रह्माकुमारी सुरेन्द्र बहन जी लिखती हैं कि वो क्षण कितना न अद्भुत, अलौकिक और दिव्य अनुभूतियों से भरा था, जब मुझे शास्त्रों में वर्णित विद्या-दायिनी, वीणा-वादिनी जगदम्बा सरस्वती से साक्षात् मिलन मनाने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अनुपम महामिलन को व्यक्त करने में शब्द असमर्थ हैं। हमने तो भक्ति में देवियों की महिमा सुनी थी परन्तु मम्मा के दिव्य मिलन से तो मैं स्वयं देवी बन गयी। यह सब कुछ पल भर में ही हो गया। न सोचने, न समझने, न तर्क-वितर्क करने, न ही भविष्य के प्रति संशय करने के लिए समय। मानो वक्त ठहर गया हो। मैं इस दिव्य मिलन में भूल गयी थी इस नश्वर शरीर, असार संसार और समय को। आज भी मम्मा से प्रथम मुलाक़ात के क्षण आँखों से मोतियों के रूप में छलक पड़ते हैं।
भक्ति का संस्कार जन्मजात होने के कारण नित्य मन्दिर में जाकर पूजा- वन्दना करती थी। शिव और शक्ति स्वरूपा देवी दुर्गा की उपासक थी। मन में इच्छा थी देवी बनने की। यही बात में भगवान से प्रार्थना में भी कहती थी। एक दिन जब मैं शिव के मन्दिर में बैठकर ध्यान कर रही थी तो अचानक सामने का शिवलिङ्ग अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर प्रकाशपुंज निकलने लगा और मन्दिर के दरवाजे पर सफ़ेद वस्त्रधारी व्यक्ति का साक्षात्कार हुआ। मैं ध्यान में चली गयी। आकाशवाणी हुई "बच्ची जो चाहती हो बन जाओगी। जब आँखें खुलीं तो देखा कि सामने शिवलिङ्ग और बाहर नन्दीगण की केवल मूर्ति है, अन्य कोई नहीं। बाद में यही साक्षात्कार मुझे मम्मा से मिलन कराने का अनोखा माध्यम बना क्योंकि इस साक्षात्कार के बाद मुझे सचमुच देवी बनने की धुन-सी सवार हो गयी। मन में यही आता था कि कहीं हिमालय की कन्दराओं में जाऊँ और तपस्या करके देवी बन जाऊँ लेकिन कन्या होने के कारण आगे कदम नहीं बढ़ा पाती थी। धैर्य की परीक्षा की भी तो एक सीमा होती है। आख़िर मेरे जीवन में ड्रामा की वो घड़ी आ ही गयी जब मुझे सत्संग में जाने का सुअवसर मिला। सत्संग चल रहा था, चन्द्रमणि दादी जी योग करा रही थी। मैं जब वहाँ योग में बैठी तो तुरन्त ध्यान में चली गयी। ध्यान में, शिव बाबा ने पूछा, 'बच्ची, जगदम्बा सरस्वती से मिलना चाहती हो?' मैंने कहा, हाँ बाबा। तब फिर बाबा ने कहा - "बच्ची, तुम अब देवी बन जाओगी'। मैं खुशी के मारे झूम रही थी। जब मैं ध्यान से सामान्य अवस्था में आयी तो देखा कि ब्रह्मा बाबा का फोटो वहाँ लगा हुआ है जिनको साक्षात्कार में पाँच वर्ष पूर्व देखा था। यहीं पर मुझे मातेश्वरी जगदम्बा के अमृतसर आने का समाचार मिला।
मैंने सुना था कि मातेश्वरी जगदम्बा साक्षात् देवी हैं। (ये बातें बाबा ने मुझे ध्यान में भी बतायी थीं) मैं मम्मा से मिलन के क्षणों की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी। आख़िर वह दिन आ ही गया। जब हम सब क्लास में थे और मातेश्वरी जगदम्बा सामने थी तो पहली दृष्टि मम्मा पर ज्यों ही पड़ी, मुझे मम्मा के बदले वीणा-वादिनी साक्षात् सरस्वती का साक्षात्कार हुआ और उनके चारों ओर प्रकाश का चक्रमण करता हुआ पुंज दिखायी दिया। मम्मा के इस तेजोमय स्वरूप को देखकर मैं अभिभूत हो गयी। इसके बाद मम्मा सन्दली पर बैठी। अचानक मम्मा के स्थान पर कभी दुर्गा, कभी लक्ष्मी और कभी भक्तिमार्ग वाली सरस्वती दिखायी पड़ी। यह देखते-देखते मैं ध्यान में चली गयी। मैं शुरू से ही ध्यान में सहज रूप से चली जाती हूँ। इसके बाद मम्मा ने मुरली चलाना प्रारम्भ किया। मम्मा के एक-एक शब्द का जादुई चमत्कार था जिसे छोटे-बड़े सब सहज रूप से समझ सकते थे। उस समय मेरी उम्र लगभग 12-13 वर्ष थी, फिर भी मम्मा के प्यार ने मुझे लौकिक माँ का प्यार भुला दिया और मैं मम्मा को ही लौकिक, अलौकिक माँ स्वीकार करने लगी।
पहली बार जगदम्बा माँ के मुखारविन्द द्वारा ज्ञान-मुरली सुनकर जीवन में सर्वाधिक खुशी हुई। मम्मा की आवाज़ के साथ-साथ मुझे सितार की मधुर ध्वनि भी सुनायी पड़ रही थी। मुरली के बाद मम्मा ने मुझे वरदान देते हुए कहा- मुरली को सुनकर दूसरों को सुनाना यह तुम बच्चों का ही कार्य है। तुम शिव शक्ति हो। शक्ति सेना में सम्मिलित होकर बाबा के कार्यों को पूरा करो। तभी मैंने मन-ही-मन वायदा किया कि मैं अपनी इस माँ के वचनों को अवश्य ही पूर्ण करूँगी।
दूसरी बार मम्मा से मिलने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ पंजाब के बटाला शहर में। दादी चन्द्रमणि जी की पालना में पली हुई कन्याओं से तब सारा हॉल भरा हुआ था। इतनी कन्याओं को देख मम्मा बेहद खुश दिखायी दे रही थी। मम्मा ने सेवा और सेवा करने की विधि के ऊपर अच्छी क्लास करायी और हमें ईश्वरीय सेवाओं में निकलने के लिए प्रेरित किया। उम्र में मैं सबसे छोटी और दुबली-पतली थी, फिर भी मम्मा की क्लास से प्रेरणा लेकर मैंने सेवाओं में निकलने की दृढ़ प्रतिज्ञा की। चन्द्रमणि दादी जी द्वारा मिली ईश्वरीय पालना और स्नेह के कारण किसी भी कन्या का दिल बाहर जाने का नहीं हो रहा था परन्तु मैंने मम्मा से कहा- "मम्मा, मैं बाहर ईश्वरीय सेवार्थ जाऊँगी। इस पर मम्मा ने मेरे निश्चय की परीक्षा ली और पूछा कि अगर तुम्हारी माँ ने मना किया तो क्या करोगी? तब मैंने संकोचवश कहा कि मम्मा आप ही तो मेरी माँ हो, तब तक मैं अपनी लौकिक माँ को सचमुच जैसे भूल चुकी थी। यह मम्मा के प्यार का जादुई चमत्कार था। फिर मम्मा ने कहा- "मैं तुम्हें शेरों के पास भेज दूँ तो डरोगी नहीं ? शेरों का शिकार करोगी ना!" यद्यपि मैं शेरों का भावार्थ नहीं समझ पा रही थी फिर भी मैंने उत्तर दिया, "हाँ जी मम्मा।" फिर मम्मा ने जैसे कि एक से एक परीक्षा लेते हुए मुझे फुल माक्स देकर काशी के विद्वान, पण्डित, महामण्डलेश्वर, शंकराचार्य एवं विद्वत परिषद् की सेवार्थ भेजा।
ईश्वरीय सेवा में निकलने से पहले मम्मा ने हमें अपनी विशेषताओं से भरपूर किया। हमने अपनी आँखों के सामने उस समय के प्रतिष्ठित, उम्रदराज व्यक्तियों को भी मम्मा की अलौकिक शक्ति के आगे नतमस्तक होते हुए देखा। यह उनकी असीम ईश्वरीय शक्ति का ही चमत्कार था। मम्मा न केवल मीठी और मधुर वाणी बोलती थी बल्कि उनके नयनों की भाषा भी इतनी ही मधुर एवं मीठी थी जो कोई भी नज़र मिलाये उसे सहज आभास होता था कि मम्मा हमें कितना प्यार करती है।
मेरे अन्दर कम बोलने और अधिक संकोच करने का संस्कार बचपन से ही था। इस पर मम्मा ने कहा, "तुम्हें शक्ति की देवी, दुर्गा बनकर सेवा करनी है। दुर्गा देवी कभी संकोच नहीं करती है।" इस प्रकार मम्मा ने मेरी अनेक सूक्ष्म कमजोरियों का अपनी मीठी-मीठी शिक्षाओं द्वारा बहुत ही सहज परिवर्तन कर दिया। फिर मम्मा ने मुझे समझाया कि तुम जगतमाता हो। जगतमाता के सम्मुख हर प्रकार के बच्चे आयेंगे, कोई प्रेम वाले, कोई नटखट...। मैंने मम्मा के दिये इस स्वमान का विशेष प्रयोग किया और सेवाक्षेत्र पर सेवा में सफलता प्राप्त करने में विशेष मदद अनुभव की। आज भी मुझे लगता है कि मम्मा सूक्ष्म रूप में मेरे सम्मुख उपस्थित हैं और समय प्रति समय मार्गदर्शन करती रहती हैं। मम्मा अपने आप में ज्ञान, योग और दिव्यगुणों की प्रतिमूर्ति थी। भला मम्मा की महिमा को शब्दों की सीमाओं में कैसे व्यक्त किया जा सकता है!
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल
दिल्ली, हरिनगर से ब्रह्माकुमारी शुक्ला बहन जी अपना अनुभव लिखती हैं कि मम्मा से मेरी पहली मुलाक़ात अमृतसर में सन् 1956 में हुई थी। मम्मा अपने आप में एक अद्वितीय शक्ति थी। आप सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान एक शीतल और शान्त आभा को लिये हुए थी। आपका जीवन एक खुशबूदार गुलशन था, दिव्य गुणों की खान था। आपके कर्मों में सद्गुणों की सुगन्ध महकती थी। मम्मा के नयनों में मातृस्नेह, करुणा एवं रूहानियत की अलौकिक रोशनी थी। आपको देखने से अथवा आपके सान्निध्य में ऐसा महसूस होता था कि आप ही देवी स्वरूप सरस्वती हैं। आप सागर के समान शान्त स्थिति वाली रहीं। पहली मुलाक़ात में ही आपकी तेजस्वी दिव्य स्वरूप चुम्बकीय शक्ति ने मुझे अपनी ओर आकर्षित किया।शुभ्र श्वेत वस्त्र, बड़ी-बड़ी आँखें और लम्बे-लम्बे बालोंमें आप पवित्रताकी साक्षात् देवी लगती थीं।
आप पवित्रता की देवी थी
आपके व्यक्तित्व में निर्भयता, निश्चिन्तता, निर्माणता, निश्छलता जैसे गुणों का पूर्ण समावेश था। आपके नजदीक जाते ही मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पवित्रता और शीतलता की किरणें अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। मेरे समस्त विकार मुझसे दूर भाग रहे हैं, बहुत ही हल्कापन और खुशी छा रही थी। आपके अनूठे व्यक्तित्व की मेरे ऊपर गहरी छाप लग गयी जो मैंने यही दृढ़ संकल्प कर लिया कि मुझे मम्मा जैसा ही जीवन जीना है। मम्मा सम्पूर्ण पवित्रता की एक जीती जागती मिसाल थी।
आप त्याग, तपस्या और सेवा की प्रतिमूर्ति थी जो सबको आकर्षित करती थी। आपके सामने कैसे भी संस्कारों वाली आत्मा आये, आप उनकी बात बड़े ध्यानपूर्वक सुनती थी, मौन भाषा में उसे शक्ति प्रदान करती हुई पूर्ण रीति से मार्गप्रदर्शना देती थी।
जीवन के लिए रूहानी, चमत्कारी, वरदानी बोल
जब शिवशक्ति सेना की सेनानी मातेश्वरी जी अमृतसर की भूमी में तीसरी बार आयी तो मेरी लौकिक माता जी ने बड़े आदरपूर्वक, प्रेम से जन-जन की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मीठी मम्मा के आगे फिर यही प्रश्न रखा कि आप शुक्ला को समझाइये कि यह शादी करे, नहीं तो मेरे लौकिक परिवार और अमृतसर की इस धरा पर इसका प्रभाव ठीक नहीं पड़ेगा। तब शुभचिन्तक मम्मा ने मुझे बड़े प्यार और दुलार से समझाया कि बच्ची, तुझे शादी करनी है। मैंने मम्मा को कहा, आपके तो हर श्वास में पवित्रता का वास है, आप पवित्रता की महान् देवी हैं, आप सभी जन मानस के हृदय में ज्ञान-प्रकाश वा ज्ञान-वीणा के द्वारा पवित्र संस्कारों को जागृत करती हैं, सभी को पवित्र बनने का आदेश और सन्देश देती हैं, फिर मुझे ऐसा आदेश क्यों देती हैं कि तुझे शादी करनी है? मम्मा की परखने और निर्णय करने की शक्ति बहुत तीक्ष्ण थी। वे कहने लगीं, तुझे इस आत्मा अर्थात् अपनी लौकिक माँ का उद्धार करना है और अपने जीवन की धारणाओं से जन-जन को सन्देश देना है। तब मैं उस अद्वितीय शक्ति को बोली, मुझे तो फुलकास्ट ब्राह्मण बनना है, बालब्रह्मचारिणी रह अपने जीवन को शिवशक्ति के रूप में सार्थक करना है। फिर भी उस शिवशक्ति सेना की सेनानी ने मुझे शादी की ही प्रेरणा दी और कहा कि बापदादा आपके द्वारा कोई विशेष कार्य करायेगा, जो भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य जैसों को भी दिखा सकें कि नारी ही शक्ति है और नारी ही दुर्गा है।
आज मैं बहुत ही वात्सल्य से, सम्मानित और गौरवशाली शब्दों में कह रही हूँ कि प्राणों से भी प्रिय मम्मा की मीठी-मीठी दृष्टि और मीठे मीठे उत्साह वर्धक बोल मेरे लिए वरदान बन गये जो असम्भव कार्य भी सहज रीति से सम्भव हो गया। मैं कहीं भी जाती हूँ, रहती हूँ लेकिन अपने को सदा ईश्वरीय शक्तियों से ओत-प्रोत महसूस करती हूँ। मुझे सदा यह ध्यान रहता है कि मेरा जीवन प्रभु की अमानत है और मीठी प्यारी माँ ने मुझे जो सशक्त जीवन जीने की शक्ति दी और वरदानों से सुसज्जित किया उनको जीवन में धारण करते हुए सत्यता, दिव्यता, पवित्रता तथा रूहानियत की मूर्ति बन मात-पिता का नाम रोशन करना है। कहा जाता है:-
"लाली मेरे लाल की, जित देवा उत लाल।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल।।"
मातेश्वरी जी की एक झलक यह भी
मातेश्वरी भगवती थी, शिवसती थी
गुडगाँव से ब्रह्माकुमारी सुदर्शन बहन जी लिखती हैं कि मेरा अलोकिक जन्म करनाल में सन् 1959 में हुआ। पहली बार जब मैं मधुबन में आयी तो मम्मा-बाबा सामने सन्दली पर बैठे थे। ऐसा महसूस हुआ कि मेरे जन्म-जन्मान्तर के बिछड़े हुए माँ-बाप मिल गये। अपनापन महसूस हुआ।
मम्मा के एक-एक अंग में रूहानियत भरी हुई थी। मम्मा की पहली दृष्टि जब मेरे ऊपर पड़ी तो मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसेकि मम्मा ने सारी चाँदनी मेरे ऊपर बिखेर दी हो। मम्मा के अनेक रूप देखने में आये, लगा कि यही जगदम्बा है, दुर्गा है, काली है। नैनों को ऐसी रोशनी मिली जो मेरी कालिमा धुल गयी। माँ का प्यार इतना था जिसका वर्णन करना मेरे लिए मुश्किल है।
मम्मा की आवाज़ इतनी सुरीली थी कि उसे सुनकर तो चलता हुआ व्यक्ति भी खड़ा हो जाता था। मम्मा की मुरली की तान सुनकर एक रूहानी मस्ती चढ़ जाती थी। मम्मा ऐसी सरल भाषा में ज्ञान देती थी, जो कैसे भी अनपढ़ को भी सहज समझ में आ जाता था। अभी भी मम्मा की याद आती है तो मीठी मम्मा का खिला हुआ और मुस्कराता हुआ चेहरा सामने आ जाता है, दिल गद्गद हो जाता है। मम्मा के मस्तक में ऐसी चमक थी जिसको देखते ही सुध-बुध भूल जाती थी। दिल करता था कि माँ तुझे देखती रहूँ। इतनी माँ में रूहानियत थी। एक बार करनाल में, मैं लौकिक परिवार को माँ से मिलाने के लिए लेकर आयी। हमारे लौकिक भाई ने महसूस किया कि यह तो जैसे कि भगवान है परन्तु माँ भगवान नहीं थी, वह भगवान की भगवती, शिवसती थी।
मम्मा ने मुझे सफल जीवन के पाँच सूत्र बताये
कानपुर की विद्या बहन, मम्मा के सम्बन्ध में अपने अनुभव कुछ यूँ बयान करती हैं कि माँ एक अद्भुत रूहानी चुम्बक थी। चलते-फिरते, मम्मा के सामने आने पर मैं वहीं ठहर जाती थी। मम्मा प्यार से सिर पर हाथ फेर देती थी। एक दिन मम्मा ने पूछा- मुरली सुनते समय कैसी अवस्था रहती है? फिर समझाते हुए कहा -
(1) देखो ब्रह्मा बाबा के मुख द्वारा शिव बाबा सुनाते हैं तो आपके कान तक आते-आते बीच में माया प्रवेश न हो। ध्यान रखना कि बाबा के मुख और तुम्हारे कान के बीच अन्तर है इसलिए सदा रूहानी स्थिति में स्थित होकर ही मुरली सुनना।
(2) मम्मा ने कहा कि जीवन लिफाफे की तरह बन्द नहीं बल्कि पोस्टकार्ड की तरह सदा खुला होना चाहिए।
(3) तीसरी शिक्षा माँ ने दी कि सदैव "हाँ जी" का पाठ पक्का करना। समझो कोई ने कोई कार्य सौंपा लेकिन आपको नहीं आता तो सीधा ना नहीं बोलना। ना माना नास्तिक। उससे यह पूछना कि ये कैसे होगा ? यदि आप हमें तरीक़ा बता देंगे तो वैसे हम कर लेंगे।
(4) चौथी बात मम्मा ने समझायी कि कभी भी कोई बात हो तो उसका वातारण नहीं बनाना यानि गंभीरता का गुण अपनाना।
(5) पाँचवीं बात मम्मा ने बताई कि अपनी मत को जीवन का ज़िम्मेवार नहीं बनाना। बाबा को जीवन दी है, उसे ही जिम्मेवार माना तो मदद मिलेगी। अपनी मत व जिम्मेवारी से बाप की मदद व शक्ति नहीं मिलेगी।
इस प्रकार, मम्मा ने प्रथम गुरु बन मुझे कई अनमोल शिक्षायें दी।
मातेश्वरी में एक अलौकिक कशिश थी
इन्दौर के ब्रह्माकुमार ओम् प्रकाश जी मम्मा के प्रति अपने भाव इन शब्दों में प्रकट करते हैं कि "मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था। ज्ञान में आये मुझे अभी थोड़ा समय ही हुआ था। सन् 1956 में मेरी मुलाक़ात मातेश्वरी जी से अम्बाला छावनी में हुई। मैं जब उनसे पहली बार मिला तो उनकी दिव्यबुद्धि को देखकर अचम्भित हो गया। मैंने कई धार्मिक व्यक्तियों को देखा था लेकिन ऐसे अलौकिक व्यक्तित्व को पहली बार देख रहा था। उनके सामने जाने से ही मेरे अन्दर एक अलौकिक कशिश पैदा होने लगी। मुझे लगा कि सच में यही जगदम्बा हैं, यही शक्ति हैं, भक्तिमार्ग में जिसकी भक्ति करते थे, व्रत रखते थे।"
ज्ञान की स्पष्टता मम्मा के प्रवचन की विशेषता होती थी
मधुबन के भ्राता ब्रह्माकुमार करुणा जी मम्मा के बारे में सुनाते हैं कि सन् 1960 में जब मैं मम्मा से मिला तो मम्मा के मुख से जो शब्द निकले वे मेरे लिए वरदान बन गये। पहली मुलाकात में उन्होंने कहा, "ये तो कल्प पहले वाला बच्चा है।" इसका अर्थ ईश्वरीय विश्व विद्यालय में यही बताया जाता है कि यह अविनाशी बच्चा है और हर कल्प अर्थात् पाँच हजार वर्ष पहले आया था, अभी भी आया है और भविष्य कल्प में भी आयेगा। मातेश्वरी जी ने मेरे अविनाशी पार्ट के बारे में भविष्यवाणी की और वरदान उच्चारण किये थे।
बाबा की मुरली तो त्रिकाल-ज्ञान का अथाह भंडार है। इसमें ज्ञान के सब तरह के हीरे, मोती, रत्न, माणिक्य हैं परन्तु मातेश्वरी जी उस भंडार से कभी हीरे निकाल कर देती, कभी रत्न, कभी माणिक्य। बेंगलोर में मम्मा ने जितने भी भाषण दिये उन भाषणों में हमने उनका सरस्वती के पार्ट का साक्षात् दृश्य देखा। जिज्ञासुओं की सभाओं में, भक्तों की सभाओं और विज्ञानियों की सभाओं में उन्होंने इस ईश्वरीय ज्ञान का स्पष्टीकरण किया। उनकी उन दिनों की ज्ञान-सेवा से ही आज दक्षिण भारत ईश्वरीय सेवा से समृद्ध है।
मातेश्वरी बहुत तेजस्वी और ओजस्वी मूरत थीं
कलकत्ते से ब्रह्माकुमारी रुक्मिणी बहन मम्मा के प्रति अपना अनुभव सुनाती हैं कि सन् 1963 में कलकत्ते में पहले-पहले एक धर्मशाला में एक प्रदर्शनी लगी जिसमें मम्मा भी आयी थी। सन् 1964 में दीदी (दादी निर्मलशान्ता जी) को और मम्मा को बाबा ने कलकत्ते में ही सेवा के लिए निमित्त बनाया। उस समय बाबा ने क़रीब 90-100 भाई-बहनों को सेवा के लिए कलकत्ता भेजा था। मम्मा भी बीस दिन वहाँ रही थी। मुझे याद है, उस समय मैं 6 साल की थी। मम्मा बच्चों को भी बहुत प्यार करती थी। हम लोगों को अपनी गोद में बिठा कर टोली खिलाती थी। उस समय हमें ज़्यादा समझ में नहीं आता था लेकिन इतना तो अनुभव होता था कि मम्मा बहुत महान् है, देवी है। उनको देखकर खुशी होती थी। मैं चुपचाप बैठकर उनको देखती थी और देखती ही रहूँ, यह इच्छा होती थी। हमें लगता था कि मम्मा बहुत तेजस्वी और ओजस्वी मूरत हैं। मम्मा की बैठक भी बहुत प्रभावकारी और आकर्षक होती थी। मम्मा में परखने की शक्ति बहुत थी। वे दूर से ही कौन व्यक्ति, कैसा है- पहचान लेती थीं।
मम्मा प्रेरणा की मूरत थी
मानसा (पंजाब) की ब्रह्माकुमारी सुदेश बहन कहती हैं, "आज से 39 वर्ष पहले सन् 1964 में पहली बार अम्बाला कैन्ट में मम्मा से मेरा मिलना हुआ। उस समय मैं 12 साल की थी। मेरी लौकिक माता जी क्लास में जाती थी। मम्मा अम्बाला छावनी आयी थी, मैं अपनी माता जी के साथ क्लास में गयी थी। मम्मा तीन दिन अम्बाला में रहीं। मातेश्वरी जी को जब देखा तो मन नहीं कर रहा था कि मैं वहाँ से वापिस घर जाऊँ। पर बाल्यकाल होने के कारण घर जाना ही पड़ा। मम्मा को देख मुझे ऐसी प्रेरणा मिली कि मुझे बनना है तो इन जैसा ही बनना है।
भले ही, मम्मा के साथ मुझे रहने का सुअवसर नहीं मिला लेकिन उनको देखकर ही मेरा जीवन परिवर्तन हुआ और मुझे अलौकिक जीवन बनाने का दृढ़ संकल्प आया। आज भी उनकी प्रेरणा से ज्ञानमार्ग में आगे बढ़ती जा रही हूँ।
मम्मा को देखकर मुझे लगा कि ये बहुत अच्छे-अच्छे भोजन और ज़्यादा से ज़्यादा भोजन करती होंगी। जब एक दिन मैंने अपनी लौकिक माँ के साथ मातेश्वरी जी को भोजन करते हुए देखा तो मैं अवाक् रह गयी। क्योंकि मम्मा एकदम साधारण भोजन स्वीकार कर रही थी जो उबला हुआ और बिना नमक, मिर्च, मसाले वाला था। वे बहुत थोड़ा ही भोजन स्वीकार करती थीं। मुझे अनुभव हुआ कि उनकी तन्दुरुस्ती का मूल कारण था ईश्वरीय नशा और योगबल।
बच्चों की सेवा में ही सदा तत्पर रहने वाली कामधेनु माँ
ब्रह्माकुमार छोटे लाल भाई, जो मधुबन में 'चाचा जी' के नाम से जाने जाते हैं, अपने अनुभव में बताते हैं कि सन् 1960, जनवरी माह की बात है। मम्मा कानपुर आयी थी। हम गाँव सीहमऊ में रहते थे। उस गांव में गीता पाठशाला चलती थी। कानपुर से सीहमऊ तक आने में बस द्वारा तीन घण्टे लगते हैं। कुछ भाई सीहमऊ से निमन्त्रण लेकर कानपुर मम्मा के पास गये। मम्मा ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। वे कानपुर से बस में शाम को निकलीं लेकिन कच्ची सड़क होने के कारण और बीच-बीच में नहर कटी हुई होने के कारण सीहमऊ पहुँचनेमें सारी रात लग गयी। मम्मा सुबह आकर वहाँ पहुंचीं। हमने मम्मा के इन्तज़ार में रात भर बैठकर योग-भट्ठी की। वहाँ बस में मम्मा भी सारी रात जागती रही। हमें अनुभव हो रहा था कि मम्मा हमें याद कर रही है, शक्ति दे रही है।
मम्मा ने गीता पाठशाला पहुँचते ही वहाँ की वस्तुस्थिति देखी और सारा काम अपने हार्थो से किया। आटा मँगवाया, खुद रोटी बनायी और सब बच्चों को गिट्टी खिलायीं। हमने माँ का असीम प्यार देखा, अनुभव किया और धन्य- धन्य हो गये। जगदम्बा सरस्वती जी ने अपने बारे में रिचक मात्र सोचे बगैर बच्चों की सेवा की, दुलार दिया। उसके बाद मम्मा ने चावल मँगाया, साफ़ किया और दोपहर के लिए सारी तैयारी कर ली।
वहाँ एक ठाकुर की कोठी थी जहाँ मम्मा सबसे मिलीं। वहाँ 50-60 लोग इकट्ठे हुए थे। उनमें कई साधु-संन्यासी भी थे। वहाँ कुर्सी-मेज़ तो थीं नहीं, मम्मा ने घण्टों खड़े होकर ही प्रवचन दिया। वहाँ सभी लोगों और सन्तों आदि ने भी पूरा समय खड़े होकर ही ज्ञान सुना। उनमें से कई ऐसे लोग भी थे जो हमारे ज्ञान पर टीका-टिप्पणी करते थे। वे भी कुछ न बोलते हुए, चुपचाप ध्यान से सुनते रहे। जब प्रवचन पूरा हुआ और वे जाने लगे तो हमने उन लोगों से कहा, आपने तो मम्मा से कुछ पूछा नहीं, हमारे से तो आप बहुत कुछ पूछा करते थे। उन्होंने कहा, हमें आपकी मातेश्वरी जी से पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। ऐसा लग रहा था जैसे हमारा मुँह ही बन्द हो गया हो। इस तरह, मम्मा की वाणी शक्तिशाली, सरल और स्पष्ट होती थी। उनका सेवाभाव भी बहुत उत्कृष्ट था। मम्मा ने कभी यह नहीं देखा कि यह गाँव है, अनपढ़ लोग हैं, जाने में तकलीफ़ होती है, नहीं। बाबा की सेवा के लिए वे हर समय दिन हो, रात हो, शहर हो, गाँव हो, सुशिक्षित हो, अशिक्षित हो, तैयार रहती थीं। इसीलिए ही उनको सर्व की मनोकामना पूर्ण करने वाली कामधेनु कहा गया है।
माँ ने मुझे अपना शीतला रूप दिखाया
बटाला के बी. के. नन्दकिशोर भाई कहते हैं कि जब मम्मा बटाला में आयी थीं तब मैंने उनको पहली बार देखा था। मम्मा ने पहले दिन सभा को संबोधित किया था। अगले दिन ब्राह्मणों से मुलाक़ात थी। मम्मा एकदम शान्त मुद्रा में थीं। जब मम्मा से मिलने की मेरी बारी आयी और मम्मा के सान्निध्य में जब मैं गया तो जैसे माँ की गोद में बच्चा सुख पाता है, चैन पाता है वैसे ही मुझे अनुभव हुआ। मम्मा की गोद मुझे फूलों से भरी हुई लगी। जब मम्मा को मैंने बाहर से देखा तो मुझे वैष्णो देवी का अनुभव हुआ, जब गोद में गया था तब शीतला देवी का अनुभव हुआ। इस प्रकार, मैंने मम्मा में देवियों का साक्षात् स्वरूप देखा।
मम्मा की पहली नज़र से ही मुझे यह अनुभव हुआ कि यह मेरी माँ है। मैंने देखा कि मम्मा में आकर्षण शक्ति बहुत थी। उनके सामने कोई भी विपरीत संकल्प वाला भी आ जाये, तो व्यर्थ संकल्प जैसे बन्द ही हो जाते थे। वे उनके सामने बच्चे बन जाते, माँ-माँ कहने लग पड़ते थे।
मम्मा, सबके विघ्न हरने वाली थी
ग्लोबल हास्पिटल में सेवारत ब्रह्माकुमार रमेश कोहली जी अपना अनुभव सुनाते हैं कि मम्मा को मैंने पहली बार मधुबन में सन् 1962 में देखा था। मैं अपने पिता जी के साथ आया था। हर बच्चे को मम्मा-बाबा गोद में लेते थे। उस समय रेल में शयन कक्ष न होने के कारण सफ़र की परेशानियों के कारण मधुबन पहुँचने तक हमारा हाल बेहाल हो जाता था। सारे कपड़े गन्दे, शरीर थका हुआ था। जब बाबा-मम्मा ने हम बच्चों को गोद में लिया तो सारी थकावट दूर हो गयी। जैसे कोई व्यक्ति तपती धूप में पैदल कर रहा हो और उसको रास्ते में कोई छाया वाला पेड़ और ठंडा पानी मिल जाता है तो उसको राहत मिल जाती है, उसी प्रकार, बाबा-मम्मा का सान्निध्य था जिसे प्राप्त कर हम हर्षित हो प्रेम के आँसू बहाते थे और मन हल्का हो आनन्द में उड़ता था। जब हम मम्मा की गोद में गये तो ऐसा अनुभव हुआ कि हम छोटे बच्चे बन माँ की गोद में समा रहे हैं। उस समय कोई देहभान की स्मृति भी नहीं थी, अपने देह को ही हम भूल जाते थे।
मम्मा में एक बड़ी विशेषता थी कि कोई भी बड़ी समस्या हो उसको वे बहुत सहज रीति से हल करती थीं। कितनी भी बड़ी परीक्षा हो लेकिन मम्मा सदा शान्त, अचल, अडोल होकर रहती थी और उसका समाधान निकालती थी। इस प्रकार, मम्मा एक विशेष व्यक्तित्व वाली थी।
मातेश्वरी एक महान् विदुषी थी
मुंबई निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट ब्रह्माकुमार आनन्द भाई कहते हैं कि मैं ज्ञान में सन् 1962 में आया। मम्मा से मेरी मुलाक़ात मुंबई में सन् 1963 में वाटरलू मेन्सन में हुई। वहाँ मम्मा की क्लास होती थी। रमेश भाई (मुंबई वाले) के निमंत्रण पर ही मैं मम्मा से मिलने वहाँ गया था। मेरी शादी हुए केवल तीन मास हुए थे। इस संस्था के बारे में भ्रान्तियाँ बहुत थीं। वाटरलू मेन्सन में एक कमरे में पर्दा लगाया गया था। मैंने सीधा ही मम्मा से पूछा, आप बताइये, यह पर्दा क्यों लगाया है, वहाँ क्या हो रहा है? तो मम्मा ने मुस्कराते हुए कहा, जाओ, आप खुद देखो वहाँ क्या हो रहा है। मैंने जाकर देखा तो मैं आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि वहाँ सामूहिक योग चल रहा था। वहाँ का वातावरण मन को शान्ति और आनन्द देने वाला था। मैंने देखा, मम्मा कोई भी बात पर वाद- विवाद नहीं करती थी बल्कि उसकी खुद जाँच करने के लिए कहती थी और उस व्यक्ति को खुद अपनी भ्रान्ति निवारण करने का मौका देती थी।
मम्मा की क्लास रोज़ शाम को होती थी। मम्मा की भाषा बहुत सरल और मनाकर्षक होती थी। भाषा में शालीनता होती थी। मम्मा ने कोई वेद, शास्त्र आदि का अध्ययन नहीं किया था परन्तु उनकी भाषण शैली से ऐसा लगता था कि ये एक महान् विदुषी हैं। उनकी समझाने की कला बहुत सरल, स्पष्ट और अर्थयुक्त होती थी। मम्मा की ज्ञान देने की विधि ऐसी होती थी कि कितना भी साधारण व्यक्ति हो उसको भी महसूस हो जाता था कि मुझे भी श्रीलक्ष्मी- नारायण जैसा देवता बनना है। जब मम्मा क्लास कराती थी तो किसी को देवी का, किसी को जगदम्बा शक्ति का साक्षात्कार होता था और सुशिक्षित लोग, उनकी सुनाने की रीति से समझ जाते थे कि ये बहुत बड़ी ज्ञान की अथॉरिटी है, ज्ञान का भंडार है। मम्मा की पवित्रता, सरल स्वभाव, हर्षितमुखता, नम्रता, सबके साथ मिलजुल कर रहना, बात करना आदि गुणों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
महाप्रयाण से पूर्व की तैयारी
शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में बहुत बड़ी परीक्षा
उनके जीवन में एक बहुत बड़ी परीक्षा उनके शारीरिक स्वास्थ्य ने ली। उन्हें जब विकराल रोग ने आ घेरा और उन्हें जब ये मालूम भी हो गया कि अब उनका ये शरीर अधिक समय तक रहने वाला नहीं है, तब भी वे निर्भय और निश्चिन्त बनी रहीं। मनुष्य को सबसे अधिक भय मृत्यु का होता है और सबसे अधिक चिन्ता सुरक्षा की होती है परन्तु जब इन दोनों के बारे में पता लग गया तो भी न कभी किसी ने उनके चेहरे पर या उनके हाव-भाव में चिन्ता देखी, न कभी लेशमात्र भी भय देखा। उन्होंने अपना जीवन शिव बाबा को अर्पित कर दिया था और उन्हें अटल विश्वास था कि अब जो कुछ होगा उसमें कल्याण ही समाया हुआ है। रोग के कारण भी उनकी दिनचर्या में कुछ अन्तर नहीं आया। वे प्रातः सभी वत्सों से पहले उठकर योग में स्थित होती थीं और वैसे ही नित्य की तरह सेवा में लगी रहती थीं।
अन्तिम श्वास तक ईश्वरीय सेवा
जिस दिन उनके शरीर और आत्मा का बिछोह था उस दिन भी वे सभी वत्सों से मिलीं। उन्होंने मातृवत् हरेक वत्स को स्नेह और मुस्कान की मौन भाषा में सम्बोधित किया और उनसे नेत्र मिलन किया तथा अपने हाथों से हरेक को स्नेह के सूचक सेब और अंगूर प्रसाद अथवा सौगात के रूप में दिये। ये मालूम होते हुए भी कि वे थोड़े समय की मेहमान हैं या इसके बाद वे प्रस्थान करने वाली हैं, उनमें व्याकुलता नहीं हुई। आखिर एक क्षण ऐसा आया जब शक्ति सेना की नायिका जगदम्बा सरस्वती ने शरीर से प्रस्थान किया। उन्होंने पहले भी अपना जीवन बाबा की सेवा के लिए समर्पित किया हुआ था और अब बाबा ने समर्पित आत्मा को आगे और सेवा पर नियुक्त किया।
- ब्रह्मकुमार जगदीश चन्द्र ।
जीवन के अन्तिम समय तक सेवा करते हुए देखा मातेश्वरी जी को
चौबीस जून, 1965 सुबह 10 बजे मम्मा सब को अंगूर दे रही थी। किसी को पता तो क्या, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि आज ही मम्मा अपना शरीर त्याग करेंगी। मम्मा को देखने वाले को ऐसा कभी महसूस ही नहीं हुआ। मम्मा मुस्कराते हुए सबको अंगूर दे रही थी, साथ में इतनी शक्तिशाली दृष्टि भी दे रही थी कि मानो देवी माँ सबको वरदान दे रही है। मैंने भी मम्मा से अंगूर और दृष्टि ली। उस दृष्टि में मुझे लाइट का अनभव हुआ।
मैं मम्मा से पहली बार कलकत्ते में मिली थी। उस समय मेरी आयु 27 साल की थी। मम्मा मुरली चला रही थी, मैं उनके सामने बैठी थी। मुरली सुनाते समय मैंने मम्मा की आँखों को देखा तो अनुभव किया जैसेकि उनकी आँखों से रोशनी निकल कर मेरे ऊपर पड़ रही थी। मुझे अनुभव हो रहा था कि मम्मा से मुझे बहुत शक्ति मिल रही है, जैसे कोई देवी शक्ति की वर्षा कर रही है। जो भी मम्मा को देखता था वह उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होता था। अनुभव होता था कि यह कोई देवी हैं, इनको सदा देखते ही रहें और इनके नज़दीक रहें।
- ब्रह्माकुमारी सत्यवती, तिनसुकिया।
मम्मा का अन्तिम समय और मैं
दिल्ली से मधुबन जाने से पहले मम्मा ही मुझे देहली, कमला नगर सेन्टर पर छोड़कर गयी थीं। जब मुझे पता लगा कि मम्मा की तबीयत ज़्यादा खराब है, उनको मुंबई से आबू लेकर आये हैं, तो मैं उसी समय अकेली ही आबू चली आयी मम्मा को देखने के लिए। जब मम्मा ने शरीर छोड़ा था तो वहाँ हम पाँच कन्यायें थीं। बाबा ने हम से ही चटाई बिछवायी, उस पर मम्मा की बॉडी रखवा कर हमें ही वहाँ बिठाया था। मम्मा के शरीर को जिस अर्थी में ले जाना था उस अर्थी को हम पांच कन्याओं ने ही सजाया था, अन्य किसी का हाथ नहीं लगा था। इस प्रकार, मैंने मम्मा के शरीर के अन्तिम क्रिया-कर्म में भी भाग लिया था।
- ब्रह्माकुमारी चक्रधारी, रशिया।
माँ सरस्वती ! तूने खुद ही खुद को बनाया
मातेश्वरी जी को अन्त में कैन्सर रोग ने आ घेरा, मगर माँ सरस्वती ने अपने स्वरूप द्वारा प्रत्यक्ष किया कि उनके पास कोई बीमारी है ही नहीं। माँ ने 24 जून, 1965 को पुराने शरीर का त्याग किया। मैं 23 जून से मधुबन में ही था। उन दिनों माँ सरस्वती रोग के कारण अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी। फिर भी बापदादा के महावाक्य स्पीकर द्वारा कमरे में सुनती थीं। बापदादा ने 23 जून को माँ से कहा कि आपको सभी बच्चों को आम देना है। माँ ने सहर्ष बाबा की आज्ञा का पालन करते हुए हर बच्चे को स्नेहपूर्ण, शक्तिसम्पन्न दृष्टि देते, बड़े आराम से, बगैर जल्दबाजी किये आम की टोली दी और स्नेह मिलन करते वरदान दिये। माँ उस समय ऐसी स्थिति में थी कि बैठ भी नहीं सकती थी क्योंकि रोग का पूर्ण रूप से तीव्र आक्रमण था। मगर माँ सरस्वती ने प्रकृतिजीत का प्रत्यक्ष प्रमाण देते हुए बाबा की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी सम्पूर्णता का साक्षात्कार कराया। मैंने आज तक बहुत कैन्सर के मरीज़ों को देखा है, वे अन्त समय असहाय और शक्तिहीन होते हैं और असहनीय दर्दों से ओत-प्रोत होते हैं मगर माँ सरस्वती जी ने ईश्वरीय ज्ञान-योग का प्रत्यक्ष प्रमाण देकर इस असाध्य रोग को भी परास्त कर दिया था। चोबीस जून को माँ सरस्वती जी ने हर्षित चेहरे द्वारा अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त कर इस नश्वर देह का त्याग किया। दिल्ली के कवि भाई ने कविता द्वारा अपनी श्रद्धाञ्जली अर्पित करते हुए कहा-
"इस यज्ञ में शिव ने ब्रह्मा पद था बनाया,
लेकिन, हे मम्मा सरस्वती तूने खुद को खुद ही बनाया।
जब यह यज्ञ स्थापन हुआ तो शिव बाबा ने कहा कि इस दादा के तन का आधार लेकर मैं सतयुगी दैवी दुनिया की स्थापना करता हूँ। यही ब्रह्मा है। लेकिन मम्मा जगदम्बा सरस्वती जी ने अपने ही पुरुषार्थ द्वारा अपने आप को प्रत्यक्ष किया, यज्ञमाता बनकर सम्पूर्ण रूप से जिस्मानी तथा रूहानी रूप से यज्ञ को संभाला।
- ब्रह्माकुमार विद्यासागर, दिल्ली
मातेश्वरी नष्टोमोहा स्मृतिस्वरूपा थीं
शायद बाबा को पता था कि आज मम्मा अपना शरीर छोड़ने वाली हैं। इस कारण बाबा ने उस दिन सुबह ही मम्मा के हाथों से सब यज्ञवत्सों को अंगूर दिलवाये थे। बाबा, दिन में विश्राम कर, 4-00 या 4.15 बजे उठे और मुझसे कहा, बच्ची, जाओ मम्मा को देखकर आओ। मैंने बाबा के हाथ में पानी का गिलास दिया और मम्मा के कमरे में गयी। मम्मा की गर्दन बाजू में झुकी हुई थी, मैं तुरन्त बाबा के पास दौड़कर आयी और बाबा-बाबा कहने लगी तो बाबा समझ गये, बाबा तुरन्त उठकर मम्मा के कमरे में गये। मैं भी उनके साथ गयी। बाबा ने मम्मा को देखा और कहा, "अच्छा, मम्मा, शिव बाबा के पास चली
गयी!" वहाँ से बाबा अपने कमरे में जाकर पत्र लिखने लगे। उसी वक्त दो बहनें बाबा के पास आयीं। बाबा ने कहा, आ गयीं बच्ची। वे रोने लगीं तो बाबा ने कहा, "क्या तुम बाबा के सामने मम्मा का दुःख जताने आयी हो ? तुम बाबा के सामने रो रही हो ? रोते कौन हैं? विधवा। मम्मा तो तुम्हारी थी ही नहीं, वह शिव बाबा की थी और शिव बाबा के पास चली गयी।"
ब्रह्माकुमारी दादी सन्तरी जी।
वो गुरुवार का दिन था !
चौबीस जून 1965, गुरुवार सुबह 10 बजे मम्मा ने सभी को अंगूर दिये। उस समय अंगूर का बगीचा बहुत बड़ा था। अंगूर भी बहुत निकले हुए थे परन्तु मम्मा की बीमारी इतनी बढ़ गयी थी कि कई दिनों से मम्मा ने बाहर आना ही बन्द कर दिया था। बोलना बहुत कम कर दिया था लेकिन मम्मा की अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। पहले जैसी ही उनकी वरदानी दृष्टि थी, पहले के जैसे ही मुस्कराहट थी। वही निश्चिन्त और अचल भाव था। अभी जो इशु बहन का ऑफिस है वहाँ मम्मा ने हर बच्चे को चार-चार अंगूर अपने हाथों से दिये। बाद में जमुना बहन बाबा को मम्मा के कमरे में लेकर आयी। बाबा ने देखा और तुरन्त डॉक्टर को बुलाने किसी को भेजा। डॉक्टर आया और चेक करके बताया कि मम्मा ने शरीर छोड़ दिया है। बाद में सब जगह सन्देश भी भेज दिया। मम्मा ने चौबीस जून शाम करीब चार बजे शरीर छोड़ा और पच्चीस जून को मम्मा का अन्तिम संस्कार किया गया।
- ब्रह्माकुमार ओम् प्रकाश, मधुबन
मम्मा के अन्तिम दिनों के साथ का अनुभव
मुंबई से ब्रह्माकुमार भ्राता रमेश जी कहते हैं कि अप्रैल, 1964 से मम्मा के साथ मेरे व्यक्तिगत अनुभव बहुत ही गहरे और हृदयस्पर्शी थे। मम्मा, अप्रैल 1964 में मधुबन से सेवाकेन्द्रों पर चक्कर लगाने गयी थीं। मम्मा पंजाब का चक्कर लगाते हुए कानपुर पहुँची। मैं मुंबई में था। एक दिन अचानक कानपुर से मुझे फोन में बताया गया कि कल मम्मा को एक डॉक्टर को दिखाया गया तो मम्मा की छाती पर एक गाँठ दिखायी पड़ी। एक अन्य डॉक्टर को दिखाया तो उस डॉक्टर ने कहा कि यह गाँठ कुछ विचित्र लगती है इसलिए मातेश्वरी जी को मुंबई ले जाना चाहिए और वहाँ टाटा हॉस्पिटल में जाँच करानी चाहिए। फिर कानपुर के भाई-बहनों ने कहा, हमने बाबा को बताया तो बाबा ने कहा कि मम्मा पहले आबू आये। मम्मा के आबू आने के बाद क्या करना है, क्या नहीं करना इसका फैसला बाबा करेंगे।
बीमारी की गंभीरता को जानते हुए मैंने फोन द्वारा मधुबन में बाबा से विचार-विमर्श किया। मम्मा को कानपुर से सीधा मुंबई ले आने का निर्णय लिया गया। दादा विश्वकिशोर भी मधुबन से मुंबई आये। दादा विश्वकिशोर के साथ मिलकर मैंने अपनी पहचान वाले डॉ. जैसवाल जी से टाटा हास्पिटल में चैकअप कराने का कार्यक्रम बनाया। चैकअप करने पर डॉक्टरों ने ऑपरेशन करने का फैसला लिया।
ऑपरेशन का समय निश्चित हो गया। दो दिन के बाद फिर हम मम्मा को हॉस्पिटल लेकर गये। ऑपरेशन थियेटर तक मम्मा को मैं और विश्वकिशोर भाऊ ही लेकर गये, वार्ड बॉयज को नहीं दिया। ऑपरेशन थियेटर में मम्मा के साथ मेरी लौकिक बहन डॉ. अनिला भी थी, वह आकर जैसे-जैसे समाचार सुनाती थी वैसे-वैसे हम मधुबन में बाबा को सब समाचार साथ-साथ बताते रहते थे। उसके बाद अस्पताल से मम्मा को मुंबई में अपने घर ले आये। ऑपरेशन के बाद मम्मा मुंबई में डेढ़ महीने रहीं।
बाद में हम मम्मा को लेकर मधुबन आये। डॉक्टर ने कहा था कि हर तीन महीने में चैकअप कराने के लिए मम्मा को मुंबई लाना पड़ेगा। मम्मा आती रही। जनवरी 12, 1965 को मम्मा को टाटा हॉस्पिटल में फिर दिखाया। जाँच के बाद डॉक्टर ने तीन महीने बाद फिर चैकअप कराने को कहा। मम्मा मुंबई से बेंगलोर गयी। वहाँ डेढ़-दो महीने रहीं, बाद में पुणे आयीं। अप्रैल 18 को मम्मा चैकअप के लिए मुंबई आयीं। मम्मा के साथ जमुना दादी और अनिला बहन गयीं, मैं नहीं गया क्योंकि उस दिन मैं ऑफिस गया था। जब ऑफिस से वापिस आया तो अनिला बहन का चेहरा उदास और पीला हो गया था। मैंने उनको बाहर गैलरी में ले जाकर पूछा, "आपका चेहरा पीला क्यों हो गया है? डॉक्टर ने क्या बोला, मुझे बताओ।" वो बात को घुमाने लगी। मैंने कहा, "सच बताओ, डॉक्टर ने क्या बताया।" उन्होंने कहा, "तुम सुन नहीं सकोगे।" मैंने कहा, "मेरी चिन्ता न करो, वास्तविकता का सामना तो करना ही पड़ेगा, छिपाने से वो टलती नहीं है।" फिर उन्होंने कहा कि मम्मा का कैन्सर दावानल (Wild fire; जंगल की आग) की तरह फेफड़े की ओर फैल रहा है। इसका अर्थ डॉक्टर ने बताया है कि मरीज़ ज़्यादा से ज़्यादा 3-4 महीने तक जी सकेगा।
दूसरे दिन मैं शील दादी के पास गया और कहा कि वतन में जाकर अव्यक्त बाबा को आवश्यक कार्य के लिए अपने तन में आने का अनुरोध करो। शील दादी ने कहा, "आपको जो भी सन्देश देना है मुझे दे दो, मैं सुबह उनके पास ले जाऊँगी। बाबा इतना साधारण है क्या कि जब चाहे आप बुलाओ और वो आ जाये !" मैंने कहा, "बात ऐसी ही है जो मैं आपको सन्देश में भी नहीं सुना सकता इसलिए आप बाबा के पास जाइये, मुझे पूरा विश्वास है कि बाबा ज़रूर आयेगा। बहुत गुप्त और महत्त्वपूर्ण बात है इसीलिए आप जाइये।" वे ध्यान में गयीं और पाँच मिनट के बाद बाबा उनके तन में आये। बाबा से बातचीत हुई, सारा समाचार बताया। फिर बाबा ने कहा, "बच्चा, यह ड्रामा की भावी है, टल नहीं सकती। अच्छा, तुमको एक काम करना है, यह बात तुम एक काग़ज़ पर मम्मा के लिए लिखो कि डॉक्टर ने आपके जीवन की अवधि केवल 3 महीने ही बतायी है।"
आप सोचिये, दुनिया में कौन-सा ऐसा बच्चा होता है जो अपनी माँ को लिखेगा कि माँ तुम्हारा जीवन सिर्फ 3-4 महीने शेष है, उसके बाद आप शरीर छोड़ेंगी? अभी तो मैं बहुत शान्ति से आपको बता रहा हूँ लेकिन उस समय बाबा के सामने ना-ना कहता था और आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। मैं कह रहा था, "बाबा, मेरे से यह काम नहीं होगा, नहीं होगा।" बाबा कहने लगे, "यह कार्य तुमको ही करना होगा। बाबा तुम्हें शक्ति देंगे। आज रात को ऑफिस में जाओ, मम्मा को पत्र लिखो और मम्मा के हाथ में ही दो। फिर मम्मा के पढ़ने के बाद उस पत्र को एक लिफाफे में डालकर मधुबन भेजना। ऊपर लिखना 'साकार बाबा को ही मिले। तुम्हारी लिखत साकार बाबा ही पढ़ेंगे और कोई नहीं पढ़ सकेंगे।"
मैं ऑफिस गया और लिखना शुरू किया। पाँच-छह बार कोशिश की परन्तु लिखने की हिम्मत ही नहीं आयी। आख़िर किसी प्रकार मम्मा को पत्र लिखा और उसे एक लिफाफे में बन्द किया। फिर रात के भोजन के बाद, मम्मा के कमरे में गया, वह चिट्ठी मम्मा को दी और कहा, मम्मा यह आपको पढ़नी है। मम्मा ने कहा, यह किसकी चिट्टी है? मैंने कहा, "अव्यक्त बाप ने मुझसे लिखवायी है।" मम्मा ने पढ़ा और कहा, ड्रामा की भावी। देखिये, मम्मा का ड्रामा पर कितना निश्चय था कि सब कुछ जानते हुए भी कितनी निश्चिन्त और अडोल थी। चिट्ठी पढ़कर मुझे वापिस की। मैंने उसको आबू में साकार बाबा के लिए भेज दिया। उस महीने की 19 और 20 तारीख के ये दिन मेरे लिए बहुत कठिन परीक्षा के दिन थे जिनका मुझे सामना करना पड़ा। दिल पर पत्थर रख कर मैंने इस पेपर को पास किया।
उसके बाद रेडियेशन कराने के लिए रोज़ मम्मा को हॉस्पिटल ले जाना पड़ता था ताकि कैन्सर और जगह नहीं फैले। अन्तिम बार डॉक्टर के पास मम्मा को अनिला बहन लेकर गयी। जाँच करवायी, तब डॉक्टर ने कहा, "अब कैन्सर बहुत बढ़ गया है, दुनिया की कोई भी दवाई अब काम नहीं करेगी, आप कृपया इनको जहाँ चाहे वहाँ ले जाइये ताकि ये शान्ति से अपना शरीर छोड़ सकें।" मम्मा को श्वास लेने में भी बहुत तकलीफ हो रही थी। जब डॉक्टर ने कहा कि उसको जहाँ चाहे वहाँ ले जाइये, तब अनिला बहन को गैरन्टी हो गयी कि हम बाज़ी हार गये। फिर हमने साकार बाबा को फोन पर बताया कि डॉक्टर ने ऐसा- ऐसा कहा है, क्या करें। बाबा ने कहा, "मम्मा को आबू भेज दो।"
चार जून, 1965 को जब मम्मा हमारे घर से मधुबन के लिए विदाई लेने वाली थी उस दिन मैं गीत का एक नया रिकार्ड घर लेकर आया था। वो था, 'ओ जाने वाले हो सके तो लौटके आना...।' दादी कुमारका और दादी बृजेन्द्रा बाहर बैठी हुई थीं। दादी जी को मैंने कहा कि यह तीन मिनट का रिकार्ड है, पूरा होने के बाद आप इसको फिर से चलाना, मैं 6 मिनट मम्मा के साथ व्यतीत करूँगा। मैं मम्मा के कमरे में गया और गीत बजना शुरू हो गया। जब दादी जी ने यह गीत सुना तो उसको बन्द कर दिया। दादी जी कहने लगीं कि ऐसा गीत नहीं बजाना चाहिए, क्या समझते हो रमेश जी? मैंने कहा, "दादी, हम अपने घर से मम्मा को विदाई दे रहे हैं, यह हमारा निमंत्रण है।" इस प्रकार दादी जी को हमने मना लिया। उनको पसन्द नहीं था, फिर भी उन्होंने रिकार्ड चलाया।
मुझे मालूम था कि मम्मा की क्या स्थिति है और भविष्य में क्या होने वाला है। मम्मा ने मेरे हाथ में अपना हाथ रखा और 6 मिनट तक मुझे प्यार भरी दृष्टि देती रहीं, मैं भी दृष्टि लेता रहा। बाद में मम्मा को व्हील चेयर पर नीचे लेकर आये और कार में बिठाया। ट्रेन में भी मम्मा को विदाई दी गयी। विदाई के समय पर मम्मा की आँखों में प्रेम के आँसू भरे थे। आगे क्या होगा यह मम्मा को भी मालूम था और मुझे भी। अन्य यज्ञवत्स यह सोच भी नहीं सकते थे कि मम्मा हमारा साथ छोड़ जायेंगी। फिर मम्मा को जमुना दादी, अनिला बहन और ब्रह्मा बाबा के लौकिक बेटे नारायण भाई के साथ आबू भेज दिया।
अगले दिन गुरुवार था। उस दिन शील दादी भोग लेकर जा रही थी। उनको हमने कहा कि बाबा के पास हमारा एक सन्देश ले जाना कि बाबा हमने आज तक आपसे कुछ भी नहीं माँगा। आज एक चीज़ माँग रहा हूँ कि जब मम्मा शरीर छोड़े उस समय मैं वहाँ हाज़िर रहूँ। शील दादी एकदम बोल पड़ी, क्या आप इतने नास्तिक बन गये? मम्मा कभी शरीर छोड़े, ऐसा कभी हो सकता है? ऐसी बातें करते हो ? मैंने कहा, आप सिर्फ बाबा को मेरा सन्देश दे देना। अगर मम्मा शरीर छोड़ने वाली नहीं होगी, तो बाबा बता देंगे कि मम्मा शरीर नहीं छोड़ने वाली है और यह भी बता देंगे कि कैसे बाबा उनको आबू में नयी-नयी दवाई देंगे और मम्मा कैसे ठीक हो जायेगी। यह बात शील दादी को भी अच्छी लगी। वे सन्देश लेकर गयी। बाबा ने कहा, ड्रामा को मंजूर है तो रमेश वहाँ पहुँच जायेगा। नीचे आने के बाद शील दादी ने कहा, बाबा ने तो यह नहीं कहा कि आपका सन्देश ग़लत है। ड्रामा को मंजूर है तो रमेश वहाँ पहुँच जायेगा, तो इसका अर्थ क्या है? मैंने कहा, मुझे क्या मालूम, यह तो चतुर सुजान बाबा ही जाने। दिन बीतते गये। मम्मा ने जब शरीर छोड़ा तो पहला-पहला ट्रक-काल बाबा ने मुंबई ही कराया था और वह फोन मैंने ही उठाया था। बताया गया कि मम्मा ने शाम को 4 या 4.10 पर शरीर छोड़ा है। जब फोन आया था उस समय सब क्लास में थे। आपस में विचार-विमर्श किया गया कि क्या करें। फैसला यह किया गया कि कुमारका दादी, सीता माता ये दोनों और इनके साथ मैं रात्रि 9 बजे चलने वाली गुजरात मेल से निकलें, निर्वैर भाई हमको स्टेशन तक छोड़ आयें। मैंने कहा कि मैं अपनी लौकिक बहन अनिला के घर जाकर सीधा स्टेशन आता हूँ, आप मेरे लिए टिकट ले लेना और मेरे लिए एक सीट रखना। जब अनिला बहन के पास गया तो उन्होंने कहा, बॉडी तो ज़्यादा समय नहीं रख सकते इसलिए नहीं जायें तो अच्छा है। हम नहीं गये। निर्वैर भाई उनको छोड़ने गये थे तो दादी ने कहा, "निर्वैर भाई, रमेश भाई आया नहीं, तो आप ही चलो हमारे साथ।" वे साथ में चले गये। फिर हम अपने घर पर गये, थोड़ा जलपान किया फिर वाटरलू सेन्टर पर गये। वहाँ सब मुझे कहने लगे कि आपको जाना चाहिए। सुबह 6 बजे अहमदाबाद के लिए फ्लाइट थी, तुरन्त उसमें टिकट बुक करवा ली। हम पाँच थे। मेल ट्रेन अहमदाबाद से सुबह 8 बजे निकलती थी, फ्लाइट एयरपोर्ट पर 8.15 पर पहुँचती है। जब हम टैक्सी द्वारा मेहसाना तक पहुँचे तब मेल फ्लैटफॉर्म पर खड़ी थी, हम भी दादी के साथ मिल गये। रात को ही हमने मम्मा के लिए फूलों की चद्दर, चन्दन की लकड़ी आदि ले लिये थे। नीचे भूरी दादी स्टेशन पर थी, पहुँचते ही उन्होंने कहा, आप सब अपना सामान यहीं छोड़ देना और अन्तिम संस्कार के स्थान पर जाना, आपके लिए सब इन्तज़ार कर रहे हैं। हम सब वहाँ पहुँचे, सबको चन्दन के टुकड़े दिये, फूलों की चद्दर बॉडी पर बिछायी और अग्निस्पर्श का कार्य सम्पन्न हुआ। इस प्रकार, हम ड्रामा अनुसार मम्मा के अन्तिम संस्कार पर पहुँच गये। मम्मा के बारे में बताने की कई बातें हैं, उनसे सीखने की कई शिक्षायें हैं लेकिन कितना भी उनके बारे में बताते जाओ उनके चरित्र और व्यक्तित्व का गुणगान पूरा नहीं होगा।
मम्मा के बारे में अव्यक्त सन्देश
सर्व सेन्टर के स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण कुलभूषण भाइयो और बहनो,हम मधुबन निवासियों की हार्दिक यादप्यार स्वीकारम् । आपको माँ का समाचार तो मालूम हो ही गया होगा कि मीठी माँ स्थूल वतन छोड़ सूक्ष्म वतनवासी बन गयी। आह्वान तो बच्चों ने ब्रह्मा बाबा के संग बहुत- बहुत किया लेकिन आलमाइटी बाबा ने अर्जी मंजूर नहीं की। मीठा ड्रामा ही कहें।
मुरली समाप्त कर, दोपहर 2 बजे माँ को मधुबन धरनी से विदाई देने का प्रोग्राम था। आलमाइटी बाबा ने डायरेक्शन दिया था कि माँ के लिए बहुत सजा हुआ चौडोल बनाना है। उसी डायरेक्शन प्रमाण रंग-बिरंगे फूलों से, सफ़ेद चादरों से चौडोल को सजाया गया था। पूरे डेढ़ बजे माँ के पार्थिव शरीर को फूलों से और चन्दन के तिलक आदि से सजाकर तैयार किया गया था। फिर, लास्ट टाइम आधा घण्टा बापदादा और हम सब बच्चे अन्तिम नैन-मुलाक़ात हेतु हॉल में योग में बैठे और अन्त तक यही आह्वान किया कि अब भी बाबा हमारी माँ को वापिस भेज दें। आख़िर तीन बजे माँ के शरीर की चौडोल पर पधारमणी दी गयी और तस्वीरें आदि खींची गयी। सब गोप-गोपियाँ लाइन में खड़े थे और चौडोल आगे-आगे बढ़ता गया। साकार बाबा भी मधुबन के फाटक तक कंधा देने आये। मधुबन गेट के बाहर निकलने के बाद, अपने युनिफॉर्म पहने हम सब बच्चों ने बहुत साइलेन्स में तीन-तीन की लाइन बनायीं। पहले भाई, पीछे बहनें जा रही थीं। बस, यह सीन तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई फ़रिश्तों का जलुस जा रहा है। बच्चे नम्बरवार कंधा देते अग्नि-संस्कार स्थल की ओर बढ़ते गये। रास्ते में सब लोग यह विचित्र और अलौकिक नज़ारा बड़े आश्चर्य से देख रहे थे और कह रहे थे कि यह क्या आश्चर्य है जो इतने लोग और फिर इतनी शान्ति ! आख़िर तो रास्ता तय करके उस स्थान तक पहुँच गये जहाँ अन्तिम क्रिया करनी थी। वहाँ भी सब योग में बैठे रहे और दूसरी तरफ़ प्रबन्ध होता रहा। उस अन्तिम समय में मुंबई के ब्रह्मावत्स हवाई जहाज और रेल द्वारा यात्रा कर सीधे वहीं पहुँचे। माँ के मृतक शरीर को देख सभी बड़े गंभीर रूप में भावी को देखते रहे। साथ में बहुत फूल और चन्दन आदि लाये थे। आखिर वह भी समय आ पहुँचा जो माँ के चौडोल पर लकड़ियाँ रखी गयी। बस, उस समय ऐसा सन्नाटा छा गया जो सूई भी गिरे तो भी आवाज़ आये। अब तो सब को निश्चय हो गया कि अब माँ स्थूल वतन से विदाई ले रही है। फिर तो विश्वकिशोर भाई ने बहुत दिल को थमाते हुए मुखाग्नि दी। बस, अग्नि ने सब कुछ पंच तत्वों को अर्पित कर दिया। फिर सब शान्ति में, लाइन में ही मधुबन लौट आये।
साकार वतन वासी मीठी माँ की, सूक्ष्मवतन वासी बनने के बाद अव्यक्त वतन में रूहरिहान
(सन्देशी गुलजार दादी द्वारा मधुबन में 7 दिन का भोग का समाचार)
पहला दिन, 26-6-65
नुमः शाम का समय था। हम वतन में पहुँची तो मीठी मम्मा बड़े आराम से बाबा की गोद में विश्रामी थी। हम जा पहुँची, बाबा ने मम्मा को अपने हाथों से भोग स्वीकार कराया और कहा कि मम्मा बड़ी थक कर आयी है इसलिए विश्राम करा रहा हूँ। हमने कहा, मम्मा, सबने कहा है मम्मा को ले आना, तो आप चलिये, सब बहुत याद कर रहे हैं। माँ बहुत मीठा मुस्कराते हुए बोली, बच्चे आप सब तो बहुत बार वतन में घूमते रहते हो, मैं आज आयी हूँ तो लेने आयी हो ? मुझे सूक्ष्मवतन बहुत भाता है। सब बच्चों को हमारी तरफ़ से बहुत याद- प्यार देना।
दूसरा दिन, 27-6-65
नियम प्रमाण भोग स्वीकार कराने के बाद आज मीठी माँ को आलमाइटी बाबा के साथ गद्दी पर विराजमान देखा। दोनों आपस में बातें करने में इतने मग्न थे जो कुछ सेकण्ड तक हमें भी देखा ही नहीं। फिर बाबा ने कहा, मम्मा, आपके प्रति यज्ञप्रसादी आयी है। आज तो आप भोजन ही भूल गयी ना। फिर माँ सुना रही थी कि बाबा आज मुझे कह रहे थे कि मम्मा आज आपको सेवा-अर्थ भेजूँ ? मैंने कहा, बाबा अभी तो मैं वतन में ही रहूँगी, जैसे साकार बाबा के साथ रही हूँ वैसे आकारी वतन में आपके साथ रहूँगी। फिर मम्मा को सब अनन्य बच्चों की याद दी। बस, याद देते ही ऐसे महसूस हुआ जैसेकि माँ के नैनों रूपी दूरबीन में, एक-एक वत्स की प्रेम सम्पन्न याद की मूर्त बस रही थी और एक- एक से मुलाक़ात हो रही थी। उस समय माँ के नैन बच्चों के स्नेह में गीले हो रहे थे। माँ को कहा, मम्मा, सबसे मिलने के लिए चलेंगी? माँ बोली, जैसे बाबा चलायेंगे वैसे चलूँगी। बाक़ी बाबा मुझे बहुत बहलाते हैं, वह कल सुनाऊँगी।
तीसरा दिन, 28-6-65
आज माँ को बाबा के साथ बगीचे में देखा और साथ में सम्पूर्ण मम्मा को भी देखा। दूर से ऐसा लग रहा था जैसे मेरी आँखें एक माँ के दो रूप तो नहीं देख रही हैं लेकिन नज़दीक जाने से मालूम हुआ कि सम्पूर्ण मम्मा और साकार मम्मा दोनों थीं। फीचर्स (लक्षण) तो एक ही थे, ट्रान्सपेरेन्ट (पारदर्शीपन) दोनों थीं लेकिन दोनों की फिर भी पहचान हो सकती थी। मुलाक़ात होने के बाद सम्पूर्ण मम्मा देखने में नहीं आयी। बाबा बोले, मम्मा से पूछो कि आज कहाँ-कहाँ सैर किया। मम्मा बोली, "आज बाबा मुझे सब सेन्टर्स की सैर पर ले गये। वहाँ देखा कि कई बच्चों को शिव बाबा की याद भले ही थी लेकिन माँ की याद का पलड़ा भारी था। कइयों के चेहरे बहुत सन्नाटे में और गंभीर भी देखने में आये। कोई-कोई के तो मुरझाये हुए चेहरे भी थे। कोई हर्षितमुख भी थे जो देख-देख मुस्करा रहे थे। सारा चक्कर लगाने के बाद बाबा मधुबन में ले आये। अपनी संदली पर बैठ जैसे मैं मुरली सुनती थी वैसे सुनी। बच्चों का और मेरा ध्यान मुरली में ही था।" फिर माँ ने सुनाया कि आज 6 बजे से इन्तज़ार कर रहे थे। बाबा हमें वतन के फल दिखा रहे थे और कह रहे थे कि जो अच्छे लगें वे तोड़कर खाओ। हमने मम्मा से पूछा, मम्मा, आप जब साकारी वतन से जा रही थी तो सबसे विदाई भी नहीं ली, क्या आपको मालूम था कि मैं जा रही हूँ? माँ बोली, कल यह सुनाऊँगी। माँ को मधुबन में आने का निमंत्रण दिया। आज मम्मा को कुछ स्थूल वतन की स्मृति अधिक थी और वह बहुत रिफ्रेश थी। बाबाने कहा कि आज मम्माको भक्तोंके पास ले जाना है।
चौथा दिन, 29-6-65
मम्मा तो बाबा के साथ ही थी। भोग स्वीकारने के बाद मम्मा से पूछा कि कल कहाँ-कहाँ बाबा ने सैर करायी? माँ बोली- बाबा ने कहा, आधे भक्त तेरे और आधे भक्त मेरे हैं, अब बताओ आप के भक्तों के पास ले चलूँ या अपने भक्तों के पास ? फिर तो बाबा ने बहुत सैर करायी लेकिन एक काली का मन्दिर था वहाँ बाबा ले गये। वहाँ देखा तो बहुत भीड़ थी। भक्त अपने नियम प्रमाण जा रहे थे। एक भक्त बहुत व्याकुल था और प्रतिज्ञा कर रहा था कि अगर दर्शन नहीं होंगे तो प्राण त्याग कर दूँगा। बाबा बोले, मम्मा, भक्तों की पुकार सुनते रहम नहीं आता ? अब इनके सामने जाओ। तो मैं जाकर मूर्ति के आगे खड़ी हो गयी। भक्त इस साधारण रूप को देख बेचारा हर्षित भी हो रहा था तो दुविधा में भी पड़ गया। बाबा ने कहा, उसके मस्तक पर हाथ धरो। तो मैं जाय उसके आगे ठहरी, मस्तक पर हाथ रखा। वह ध्यान में चला गया और देखा कि कैसे वो ही काली, अम्बा के रूप में आये खड़ी है। बस, चेतन रूप में प्राप्ति देख भक्त तो गद्गद हो गया।
फिर बाबा ने विदेशी युगल दिखाया जो अति नौधा भक्त थे। बहुत घायल रूप में अंग्रेज़ी में प्रार्थना कर रहे थे और माँ-माँ कह बहुत मिलने की अभिलाषा प्रकट कर रहे थे। बाबा ने सुनाया कि भले ही अब ये क्रिश्चियन हैं लेकिन हैं भारतवासी पक्के भक्त। कोई हिसाब के कारण वहाँ जन्म मिला है।
कल जो पूछा था कि अन्तिम समय आपको महसूसता थी या नहीं, उस पर मम्मा ने सारा समाचार सुनाया कि 4 दिन पहले आलमाइटी बाबा से मुलाक़ात हुई थी तो उस लास्ट मिलन में बाबा की बातों से मुझे 100% निश्चय बैठा था कि अब मुझे जाना है। लेकिन एक प्रतिशत ना का था क्योंकि पहले जब बाबा हमसे मिलता था तो कहता था कि अभी तुमको बहुत सेवा करनी है, अब जाने की बात ही नहीं। सोचो, तुम्हारा तो बहुत बड़ा पार्ट है... आदि-आदि। लेकिन इस बारी जब हमने पूछा कि बाबा कब तक और कितना समय यह हिसाब- किताब है? तो बाबा बोले, बाक़ी थोड़े समय का ही है। अब जल्दी ही अन्त होना है और आदि से बाबा उस दिन गंभीरता से मुस्करा रहा था जो लगता था कि कोई गुह्य रहस्य छिपा हुआ है, साथ में फिर बीच-बीच में यही कहता था कि बेटी, सूक्ष्मवतन में चलेगी? वहाँ चल खेलेगी, बहलेगी? इन सब चरित्रों से पक्का महसूस हो रहा था कि बाबा अपने पास मुझे खींच रहा है। साथ में शरीर की कमज़ोरी बढ़ती हुई देख और भी पक्का होता जा रहा था। आखरी दिन दिक्कत हुई, उसमें भी महसूस हो रहा था कि जैसे श्वास खिंच रहे हैं। दो घण्टे पहले मेरी शारीरिक शक्ति कम होने लगी थी और पक्का समझ में आ गया था लेकिन मैं बोलूँ - यह संकल्प नहीं था। आखिर कुछ सेकण्ड में ऐसी अवस्था हो गयी जैसेकि देह में हूँ लेकिन देह से न्यारेपन का, साक्षीपन का और अशरीरी, कर्मातीत अवस्था का अनुभव हो रहा था। यह संकल्प ही बाबा ने मर्ज करा दिया कि मैं जा रही हूँ और क्या कह रहे थे इस सुनने से भी मैं परे थी। अपने सामने बाबा का पारदर्शी रूप देखा ज़रूर लेकिन उस समय भी साकार वतन की, साकारी शरीर की भासना नहीं आती थी। उसके बाद फिर हमने पूछा, मम्मा, श्मशान की सीन बाबा ने आपको दिखायी? माँ बोली, हाँ, बाबा ने सारी सीन ऐसे दिखायी जो अपने ही शरीर को साक्षी हो देख रही थी। साथ में आप बच्चों के दृश्य को भी देख रही थी कि क्या-क्या करते हैं, कैसे-कैसे सबकी स्थिति है!
पाँचवाँ दिन, 29-6-65
आज वतन में भोग स्वीकार कराने के बाद माँ ने सब बच्चों की याद में हमको गिट्टी खिलायी। बाबा बोले कि बच्चे समझते हैं कि माँ से हमको ही प्यार है लेकिन बाबा का भी तो मम्मा से प्यार है इसलिए वतन में बुला लिया है। फिर मुस्कराते हुए बोले, बच्चे समझते हैं कि माँ हमें भूल गयी है लेकिन नहीं, माँ तो अब भी बच्चों की सेवा में है। साकार में तो जहाँ रहती थी वहाँ ही सेवा कर सकती थी लेकिन अब तो जहाँ चाहे एक सेकण्ड में वहाँ पहुँच सकती है। मम्मा बोली, जैसे मैं सूक्ष्म रूप में हूँ वैसे तुम भी आत्मा रूप में रहेंगे तो महसूस करेंगे कि माँ कैसे सेवा कर रही है। इन तीन दिनों में बच्चों की सूक्ष्म में सेवा कैसे की है- वो आगे सुनाऊँगी। उसके बाद हमने पूछा, आपका जब आह्वान कर रहे थे तो उस समय आपको क्या अनुभव होता था ? मम्मा बोली, आप सबके योग के आह्वान का प्रवाह पहुँचता तो ज़रूर था लेकिन मेरा तो इस शरीर से सम्पूर्ण ही सम्बन्ध टूट चुका था इसलिए फिर से वापस कैसे आ सकती थी? भले ही, खींच होती थी और ऐसे महसूस होता था जैसे कोई चीज़ को अनेक चींटियाँ चटक जाती हैं और घसीट-घसीट कर ले जाती हैं। वैसे सूर्य की किरणों समान माइट की तारें हम आत्मा को आकर्षण कर घसीट रही थीं लेकिन कर्मबन्धन खत्म होने के कारण संकल्प ही नहीं उठता था कि जाना है। तो कर्म कैसे हो सकता था ?
फिर मम्मा ने सुनाया कि सारी रात जब आह्वान कर रहे थे तो बीच में दो बार बाबा ने मुझे इसी शरीर में चक्कर लगाकर आने के लिए भेजा था कि अनुभव करो कि शरीर के बन्धन-वश आत्मा का क्या हाल होता है और शरीर के बन्धन से मुक्त आत्मा उसी शरीर में जाती है तो कैसा अनुभव करती है- वह अनुभव करके आओ। भले ही दो बार आयी लेकिन ऐसे लगा जैसे कि कोई पराई जगह चक्कर लगाने आयी हूँ और शरीर बहुत ठण्डा हो चुका था इसलिए भले ही आत्मा प्रवेश हुई लेकिन चुर-पुर नहीं हुई। बाक़ी मैं आकर देख गयी थी। इस पर हमने कहा, मम्मा, जाते-जाते हम सबको 4 से 5 बजे तक 2-3 बारी चेहरे पर मुस्कराहट और चमक-सी महसूस हुई कि माँ आयी है और सबसे मिल रही है। ऐसी रूहरिहान कर स्थूल वतन लौट आयी।
छठा दिन, 30-6-65
आज जब हम गयी तो माँ साकार बाबा से मिलकर लौटी थी और आलमाइटी बाबा को समाचार सुना रही थी। हमारे पहुँचते ही मम्मा ने खुद ही बच्चों की याद-प्यार का समाचार पूछा और बोली, देखो, मैं साकारी रूप के बजाय अब सूक्ष्म रूप में मददगार हूँ। बच्चों को मेरा यही सन्देश देना कि अगर माँ से प्यार है तो माँ का यही कहना है कि साकार में साकारी बाबा के मददगार तो अब तुम बच्चे ही हो, तो पूरे मददगार हो चलते चलना और छोटी-छोटी बातों पर ज़्यादा मेहनत नहीं लेना। अब तो इस पार्ट से जान गये होंगे कि समय बहुत नज़दीक आ रहा है। ना सिर्फ विनाश का लेकिन साथ-साथ प्रभाव (प्रत्यक्षता) का भी समय नज़दीक आ रहा है इसलिए अपने को सम्पूर्ण बनाने में तीव्र पुरुषार्थी बनते चलो। फिर हमने पूछा कि मम्मा, सूक्ष्म में हम बच्चों की कैसे सेवा करती हैं? इस पर माँ समझा रही थी कि अब स्थूल शरीर से तो पार्ट खत्म हुआ, अब तो रहा रूहों का रूहों के साथ सम्बन्ध। तो जैसे शुरू-शुरू में तुम्हें याद होगा कि मम्मा तुम्हारी रूहों से बात करती थी। इसी रीति यहाँ भी अभी हर बच्चे की रूह को इमर्ज कर उनके जो कड़े संस्कार हैं उन्हों को योग-शक्ति, रूहानी शक्ति से भस्म करने की सेवा चल रही है। ऐसे नहीं कि मुझे सब भूल गया है, नहीं। सब वत्सों का नक्शा हमारे सामने है और अमृतवेले हर रूह को इमर्ज करती रहती हूँ लेकिन तुम बच्चे भी जब रूह रूप में होंगे तब इस रूहानी सेवा की महसूसता कर सकेंगे। जब तक रूह रूप में स्थित न होंगे तो अनुभव ही नहीं कर सकते। तो न चाहते भी माँ की याद तुम्हें रूह के रूप में स्थित करायेगी और योगयुक्त देही- अभिमानी बनायेगी। उन्हों को अनुभव प्रैक्टिकल में होगा कि माँ हमसे बोल रही है, मिल रही है, यह-यह बोल रही है। इसके बाद माँ ने ज्वेलरी का बॉक्स खोला। उसमें ज्वेलरी का सैट भरा हुआ था, वो ऐसा अनोखा व अलौकिक था जिसको कब देखा ही नहीं था। माँ बोली, देखो, मैं सारा दिन इन्हीं दिव्यगुणों रूपी गहनों से आप बच्चों को सजाती रहती हूँ। यही माँ की सेवा है।
सातवाँ दिन, 1-7-65
आज वतन में माँ से मुलाक़ात करते समय समाचार की लेन-देन करने के बाद माँ बोली कि बाबा हमें वहाँ ले चला जहाँ विनाश की तैयारियाँ हो रही हैं। वहाँ बहुत नाजुक हथियार तैयार पड़े हुए थे, साथ में मार्शल लोग प्लान बनाये तैयार हुए खड़े थे। सिर्फ एक सेकण्ड की देरी है ऑर्डर मिलने वा शुरू करने की। तो बाबा ने कहा, ये विमान इसलिए दिखाये हैं कि देखो, एक तरफ़ विनाश की तैयारियाँ, दूसरी तरफ़ फिर स्थापना के निमित्त आपकी शक्ति सेना की स्थापना की तैयारी कहाँ तक है। तो स्थापना और विनाश की तैयारियों में दिन-रात का फरक था। इस पर मम्मा सुना रही थी कि दिखने में ऐसा आता है कि अब बच्चों का पुरुषार्थ कोई समझाने से तीव्र नहीं होगा। लेकिन एक तरफ़ कुछ विनाश की रिहर्सल, दूसरी तरफ़ फिर अब प्रभाव का भी समय नज़दीक आ रहा है तो उसमें बच्चों की बुद्धि बिज़ी हो जाने से ही पुरानी बातें व पुराने संस्कार मिट जायेंगे। अब भल बच्चे कहते हैं कि हम बिज़ी हैं लेकिन सबकी बुद्धि बिज़ी नहीं हैं। भले मुख बिज़ी है लेकिन बुद्धि बिज़ी होनी चाहिए। बाद में फिर बाबा ने एक गुह्य रहस्य सुनाया कि देखो विनाश का कार्य अब क्विक चल रहा है, एक सेकण्ड में बुद्धि को टच कर कार्य करा लेते हैं। इस ही रीति से अब स्थापना का कार्य भी जल्दी-जल्दी होना है। इसलिए मम्मा को भी सूक्ष्मवतन वासी बनाया हूँ ताकि वह भी बुद्धियों को प्रेरित कर स्थापना का कार्य जल्दी करा सके और प्रभाव निकल जाये। इस प्रकार, थोड़े समय में तुम बच्चे अन्तःवाहक शरीर द्वारा अन्तः प्रेरणाओं से की हुई माँ की सेवा का प्रभाव देखते जायेंगे।
देखो, शुरू-शुरू में जब प्रेरणा से वा टच होकर तुम लोग आयीं तो कितनी जल्दी स्थापना हुई और मेहनत भी कितनी कम लगी और अनन्य रत्न भी कितने निकले। अब देखो, कितनी मेहनत और कितना समय लगता है। तो अन्त में फिर अब टचिंग का ही पार्ट चलना है इसलिए बच्चों को यही समझना चाहिए कि अब समय बहुत नज़दीक है। ऐसा ना हो कि कई पाइंट, मिसला ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु है, अभी इतना समय पड़ा है, आदि किसी भी आधार पर न ठहर, पुरुषार्थ करते चलो। साथ में बाबा ने यह भी सुनाया कि किसी देश का बड़ा आदमी आदि अन्य देश में जाते हैं तो उनकी कितनी मेहमान निवाज़ी करते हैं और सब मुख्य चीजें खिलाते हैं, सैर कराते हैं! इस रीति, मम्मा भी सूक्ष्मवतन वासी बनी है तो मम्मा को विष्णुपुरी, शंकरपुरी, निर्वाणधाम आदि की बहुत सैर करानी है। अच्छा, आज गुरुवार है, मम्मा को भी निमंत्रण दिया हुआ है आने के लिए। यह तो बच्चों को बतलाया है कि अब मम्मा सूक्ष्मवतन में बाबा के पास रहने वाली है। बाबा को बुलाय पूछा था कि इनको तो हमारे साथ अन्त तक चलना था, फिर आपने इनको अपना साथी बना लिया? बाबा ने बोला, ड्रामा में जो नूँध है सो तो होगा ही। मुझे इनसे बहुत काम कराना है। इनका जो हिसाब- किताब था वो भोगना से चुक्त हो गया। यह तो हमारा राइट हैण्ड है। बच्चों को मम्मा आकर सारा समाचार सुनायेगी कि अन्त में क्या हुआ, कैसे चली गयी, सब सुनायेगी। आत्मा को सब मालूम है ना। मम्मा को बहुत अच्छी लिफ्ट मिली है। इसमें तो और ही खुशी हो जानी चाहिए।
अच्छा, गुलज़ार सन्देशी उड़कर वतन पधारी और प्यारी मीठी माँ गुलजार के रथ पर सवार हो मधुबन पधारी। पहले-पहले तो साकार बाबा से नैन मुलाक़ात कर हाथ में हाथ दिया। बाबा बोले, मम्मा आयी है, पधारी है। अब बच्चों से मुलाक़ात करेगी और अपना समाचार भी सुनायेगी। प्राण माँ ने महावाक्य उच्चारे, सब बच्चों का याद और प्यार का रेस्पाण्ड करने के लिए यहाँ पधारी है। अब तक सूक्ष्मवतन में ही निवास करती है। शिव बाबा ने, कुछ योगबल से कुछ कर्मभोग से जो भी अनेक जन्मों का हिसाब-किताब था वह जल्दी ही चुक्ता करा दिया। इसलिए, अब निर्बन्धन आत्मा बन जैसे आप बच्चों की सेवा में थी वैसे ही हैं और अन्त तक साथ रहेंगी। सिर्फ साकार वा आकार का अन्तर हुआ है। बाक़ी तो यह साथ अनादि और अविनाशी है ही। रोज़ बच्चों से मिलते भी रहते हैं, आगे भी मिलते रहेंगे। अन्त समय में कुछ समय पहले, कष्ट कम महसूस होने लगा था और अशरीरी कर्मातीत अवस्था का इस शरीर में होते हुए भी कुछ सेकण्ड अनुभव हुआ था और उस ही अन्त मते के हिसाब से कर्मातीत अवस्था की गति प्राप्त हुई। अन्त के समय का यही अनुभव है। अब निर्मोही,अनासक्त,कर्मातीत कर्मबन्धन-मुक्त होकर सारी दुनिया की सेवा में शिव बाबा के साथ उपस्थित हूँ। फ़िकर की कोई बात नहीं। हम बहुत राजी-खुशी में हैं और आपके साथ हैं। इसलिए आप सब भी जल्दी-जल्दी अनासक्त, अन्तर्मुखी और अचल स्थिति को प्राप्त करो और अपने राज्य की स्थापना के कार्य में मददगार बनते चलते चलो।
साकार बाबा ने कहा, मम्मा, आप जैसे सब बच्चों को भोग देती थी वैसे ही अपने हाथों से सबको प्रसाद दो। फिर नियम प्रमाण सबको अमृत पिलाकर बापदादा अव्यक्त मम्मा के पास भेजते गये और मम्मा हर एक को मीठी दृष्टि देते भोग का दोना हाथ में देती रही। बीच में, किसी से इशारे से सुख-समाचार भी पूछती गयी, किसी से ख़ास मुस्कराते मुलाकात की। कोई ने किसी की. याद दी तो उसके प्रति फल भी दिया। मतलब ऐसे लग रहा था जैसेकि प्यारी माँ, रूप बदल कर आयी है। इस प्रकार, भोग देते-देते लगभग दो घण्टे बीत गये। जब सबको भोग मिल गया तब बापदादा मीठी माँ के सामने संदली रख बैठे और नैन मुलाक़ात के साथ-साथ अव्यक्त मुलाक़ात होने पर हस्तकमल से प्यारी अव्यक्त माँ को घर के फल और भोग का सगुन कराते रहे। आमरस भी निकाला गया था, वह भी पिलाया गया और माँ ने फिर बाबुल को खिलाया। जैसे कभी-कभी साकार में होता था वैसे ही हुआ। बाद में फिर माँ सब बच्चों से नैन मुलाक़ात कर और बापदादा से मधुर मिलन मनाते हुए विदा हो गयी और उसके बाद सभा समाप्त हुई। उस दिन ब्रह्मा भोजन भी था।
सोमवार, 6-7-65
आज सोमवार है, प्राण माँ को मधुबन से विदाई लिये 12 दिन हुए हैं। आज ख़ास प्राण माँ की याद में भोग लगाया गया है और प्राण माँ को बच्चों से मिलने के लिए निमंत्रण भेजा हुआ है। प्राण माँ की पधरामणी हुई तो उनसे नैन मुलाक़ात कर हाथ मिलाते हुए बापदादा बोले, मम्मा अब कहाँ निवास स्थान है? प्राण माँ बोली, सूक्ष्मवतन में। बाबा बोले, सेवा पर तत्पर हो? (इशारे से हाँ)। आज बुलाया गया है बच्चों को कुछ दो शब्द भी सुनाओ, समाचार भी कुछ सुनाओ, देखो, ये बच्चे कहाँ-कहाँ के हैं, पहचानती तो होंगी बहुतों को, आगे तो कचहरी भी करती थी, सैलवेशन भी पूछती थी।
सूक्ष्मवतन वासी माँ बोली, सबकी सेवा के साथ-साथ शिव बाबा के साथ विनाश की तैयारियों का भी साक्षात्कार कराते रहते हैं, जो अनन्य भक्त हैं उनके पास भी जाते रहते हैं और आप वत्सों की भी रूहानी सेवा करते रहते हैं। यहाँ अन्त समय प्रभाव निकालने के निमित्त जो व्यक्ति हैं उनका भी इनअडवान्स साक्षात्कार करते रहते हैं। अन्तः प्रेरणा से अन्तः वाहक शरीर द्वारा उन्हों की बुद्धियों को प्रेरने की सेवा चलती रहती है।
फिर तो भोग की तैयारियाँ हुईं और माँ ने अपने होली हस्तों से सबको भोग दिया। बाद में बापदादा ने सबको गोद में बिठाया और प्राण माँ मुख में टोली देती गयी। लगभग डेढ़ घण्टे तक यह अनोखी रंगत रही। बाद में प्राण बाबा ने प्राण माँ को स्थूल वतन से विदाई दी।
सन्देश
आज वतन में बाबा ने ख़ास मम्मा को बुलाया था और हम सब बच्चों ने भी (मम्मा को बुलाने का) बाबा को सन्देश दिया था। जाते ही मम्मा और बापदादा बाह्य रूप से तो दो मूर्ति थीं लेकिन वास्तव में त्रिमूर्ति हैं। दूर से ही बहुत दिनों के बाद ही वतन में मम्मा को देखा तो पहले तो थोड़ी-सी खुशी हो रही थी फिर यह भी आ रहा था कि बहुत दिनों के बाद मुखड़ा देखा। मम्मा का देखना बड़ा निर्मोही था, उपराम तथा न्यारा था। प्यार तो उसमें भरा हुआ रहता ही है। ऐसी अवस्था के आगे हमारा कुछ चल नहीं सकता। बाबा ने कहा माँ से मिलो। हम आगे बढ़ी तो मम्मा ने कहा- नहीं, पहले बाप, फिर माँ। फिर बाबा के पास बढ़ी और मिली। मम्मा ने कहा, सुनाओ तो विशेष याद किसकी थी? हमने कहा, वैसे तो बीज को याद करते हैं परन्तु आपकी भी याद थी। मम्मा ने हालचाल पूछा, सभी बच्चे किस रफ्तार से चल रहे हैं। फिर कहा, तुम बताओ, तुम क्या समझती हो ? तो मैंने कहा, उमंग तो बहुत है। उमंग के साथ क़दम भी उठा रहे हैं। मैजारिटी सब में उमंग है कि जैसे हमारे मम्मा-बाबा का यादगार रहा वैसे हम भी कर्तव्य करें। मम्मा ने कहा, यादगार अपना क़ायम कैसे होता है? क्या मुख्य बात ध्यान में रखें जो हमारा यादगार क़ायम रहे? मम्मा-बाबा ने क्या किया जो यादगार रहा ? मम्मा ने सुनाया, जो जितना जितना याद में रहकर के कर्म करता है उसका यादगार बनता है। याद में रहकर कार्य नहीं करते हैं तो नहीं। तो याद का फल बनता है यादगार। तो हरके बच्चा अपने को अभी भी देख सकता है कि मेरे बाद मेरा यादगार कितना रहता है। याद में रहना है, तो याद में भी जितनी स्टेज और परसेन्टेज रहेगी उतना यादगार बनेगा। जैसे कोई-कोई आत्मायें ऐसी स्टेज वाली हैं- अभी-अभी याद रहे, अभी-अभी भूले।
सन्देश, 22-7-65
सर्व रूहानी सेन्टर के दैवी बहनों और भाइयों को हम मधुबन निवासियों की याद स्वीकार हो। आप सबके दिलों में तो उमंग अवश्य उठा ही होगा कि वर्तमान समय मधुबन की स्टेज पर क्या पार्ट प्ले हो रहा है। समय प्रति समय मुरलियों द्वारा हम बच्चों को बापदादा बहुत-बहुत रिफ्रेश कर रहे हैं। खास इस बारी मधुबन कंठे पर कुम्भ का मेला बड़ा भारी हुआ जहाँ पर सर्व सेन्टर्स के हैण्डस तथा उनके स्टूडेन्ट्स ने हर प्रकार की रिफ्रेशमेन्ट पायी। इस समय मधुबन में बिल्कुल शान्ति लगी पड़ी है। अमृतसर, बटाला, कुछ-कुछ मुंबई, पुणे, दिल्ली व नांगल की पार्टियाँ हैं। बारीश की मौसम भी चालू हो गयी है। ठण्डी- ठण्डी हवायें, कुछ धूप, कब बादल तो कब बरसात- यह रंग-बिरंगा मौसम चलता रहता है। मधुबन में जो प्यारी माँ का पार्ट पंछी (सन्देशी) द्वारा प्ले हुआ वो दिनचर्या तो मुरली द्वारा आपके पास पहुँच ही गयी है लेकिन इस बार जो अचानक माँ का पार्ट प्ले हुआ वह भी अनोखा ही था।
गुरुवार प्रातः साढ़े पाँच बजे बापदादा ने अचल, सती और देवी इन तीन सन्देशियों द्वारा शिव बाबा को मम्मा की मधुबन में पधरामणी का निमंत्रण भेजा। साथ में बाबा ने यह भी सन्देश भेजा कि पूछकर आना कि इन तीनों सन्देशियों में से माँ की पधरामणी किस तन में होगी। शिव बाबा बोले कि साकार बाबा आप ही जान लेंगे कि माँ किसके तन में आयी हुई है। क्लास पूरा होने के बाद हमेशा के प्रोग्राम अनुसार भोग प्रारम्भ हुआ। तीनों पंछियों को बड़ी गद्दी पर बिठाया गया। बाबा अपना सिंहासन छोड़ उन्हों की बाजू में बैठे। तीनों को दृष्टि देते रहे। पल में तीनों ही जाये वतन में पहुंचीं। इतने में ही देवी बहन और सती बहन के रथ में सम्पूर्ण मम्मा तथा आलमाइटी बाबा की पधरामणी हुई। अचल बहन के तन में साकारी मीठी मम्मा की पधरामणी हुई। हम बच्चे भी तीनों से बारी-बारी दृष्टि लेते टोली लेते गये। साकारी माँ (अचल बहन के तन में) बच्चों से मीठी दृष्टि से मुलाक़ात करते हुए हर एक के प्रति बहुत धीमी आवाज़ से कुछ-न-कुछ शिक्षा देती रही। सती बहन और देवी बहन तो पार्ट बजाये वापस आ गयीं
लेकिन बाबा ने माँ को यहाँ की देखरेख करने भेजा था। क्लास समाप्त होने के बाद माँ को बाबा अपने कमरे में ले गये जहाँ माँ ने अपना प्रोग्राम बताया कि बाबा ने कुछ समय के लिए बच्चों से मिलने भेजा है। फिर साकार बाबा के डायरेक्शन अनुसार जिस रीति से पहले माँ का कमरा बनाया गया था, उस रीति से बनाया गया। फिर दो बच्चों से पर्सनल बात की। बाद में भण्डारे तरफ़ चली। वहाँ भी हम बच्चों को शिक्षाओं से सजाया जिसमें खास ब्रह्मा भोजन के महत्त्व को बताया। कहा, तुम जब ब्रह्मा भोजन बनाते हो, सब्जी काटते हो तो उस समय एक ही शिव बाबा की याद में रहकर करने से इस ब्रह्मा भोजन में ताक़त रहती है। 5000 वर्ष बाद वही देवता झाड़ के बिछुड़े हुए बच्चे डायरेक्ट आ मिले हैं। डायरेक्ट ब्रह्मा भोजन का बड़ा महत्त्व है। तो ऐसे ब्रह्मा भोजन को प्यार से बनाना है। यह बाबा की दुकान है जहाँ बहुत सच्चाई व ईमानदारी से सेवा करनी है। देखादेखी की सेवा नहीं करनी है लेकिन बड़े प्यार से घर का मालिक समझ सेवा करने से कुछ बनता है। यह मेरा ही घर है, मेरा ही परिवार है- ऐसा समझने से फिर दूसरा भाव नहीं उठता है। फिर वो कोई बात में आना-कानी नहीं करते हैं। लेकिन जब इस मेरेपन के भाव से निकलते हो तो द्वेष उठता है। जिसका एक अथक बाप से बुद्धियोग है वो कब थक नहीं सकता है। बाबा अथक है, जिन्हों का बुद्धियोग अथक के साथ है, वो कब थकेगा नहीं। तो यज्ञ को मेरा समझ बड़े प्यार से चलना है। इस यज्ञ की सम्भाल के लिए इतना क्यों कहा जाता है? ऐसा भी नहीं होगा कि जो देरी से आयेंगे वो जल्दी स्वाहा हो जायेंगे लेकिन जो पहले अर्पण हुए हैं और पूरा पहचान कर नहीं चलते हैं तो नयों का फिर सम्पूर्ण स्वाहा करने में देरी हो जायेगी। आहुति दी हुई चीज़ बाहर निकलती है तो फिर स्वाहा होने में मेहनत लगती है। बच्चों की अवस्था के ऊपर ही इन सारे स्थूल यज्ञों के स्वाहा होने का मदार है। तुम रूहानी रूहों को सेवा करनी है जैसे अशरीरी बाप सेवा करते हैं। उनको याद करते हो तो बल मिलता है, इस रीति तुम रूहानी रूहों को रूहानी रीति से कई अज्ञानी रूहों की सेवा करनी है। ऐसा भी नहीं समझना है, यह दादी-दीदियों का काम है, मैं तो छोटी हूँ लेकिन तुम सब मालिक हो। ऐसे मालिकों को सब ध्यान रखना है। तब बाबा की प्रेरणाओं को पकड़ेंगे। बाबा चाहते हैं कि बच्चे जल्दी आयें। बाबा को बच्चे भी साथ देंगे तो जल्दी होगा। एक अनुभव, जब कोई झाड़ की चोटी पर चढ़ता है तो उसको देख कई साहस करते हैं चढ़ने का लेकिन एक चोटी पर चढ़ कर गिरता है तो उसे देख कोई को भी चढ़ने का साहस नहीं होता। बापदादा से अब बहुत मेहनत नहीं लेनी है। बहुत सेवाकेन्द्रों पर चक्कर लगाती रहती हूँ, अजुन बाप की पूरी पहचान नहीं है जिस कारण बहुत भूलें होती रहती हैं। तुमको सबके लिए आदर्श बन खड़े रहना है। कई ऐसी आत्मायें, जो टच हो वर्सा लेने आती हैं, आदेश को प्रैक्टिकल न देख पीछे हट जाती हैं। सेवा भी एक की याद में ही करनी है। उनकी याद से जो सेवा करते हो तो सबूत भी जल्दी निकलता है। ऐसे-ऐसे शिक्षाओं से सजाया माँ ने, कुछ समय के बाद विदाई ली।
Footnotes
-
दादा आनन्द किशोर जी यज्ञ के आदिरत्नों में से एक थे। ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद वे मधुबन में ऑफिस का सारा कार्य-व्यवहार संभालते थे तथा बहुत चुस्त कार्यकर्ता थे। इक्कीस सितम्बर, सन् 1998 को उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग किया। ↩
-
भ्राता जगदीश चन्द्र जी ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के मुख्य प्रवक्ता थे, साहित्यकार थे, ईश्वरीय साहित्य के लेखक थे। उन्होंने 200 से भी अधिक हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में पुस्तकें लिखीं। उन्होंने 12 मई 2001 को पार्थिव शरीर का त्याग किया। ↩
-
ब्रह्माकुमारी दादी शान्तामणि जी यज्ञ की आदिरत्न हैं। इनके माता-पिता सहित पूरा परिवार ईश्वरीय विश्व विद्यालय (उस समय की मंडली) में सम्पूर्ण समर्पित हो गया। दादी शान्तामणि जी मातेश्वरी जी की लौकिक में मौसेरी बहन हैं। वर्तमान समय ये मधुबन के बृहद् सेवास्थान शान्तिवन में सेवारत हैं। ↩
-
ब्रह्माकुमारी दादी प्रकाशमणि जी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका 'अभिनव सरस्वती' हैं। गौरवान्वित डॉक्टरेट पद से सम्मानित और राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कई पदकों से सुशोभित दादी जी को विश्व में एक कुशल महिला प्रशासक के रूप में देखा जाता है। वे आज मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी का ही कार्यभार संभाल रही हैं। ↩
-
ब्रह्माकुमारी दादी जानकी जी भी यज्ञ के आदिरत्नों में से एक हैं। वे ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संयुक्त मुख्य प्रशासिका हैं। विदेश में उनको ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य संचालिका नियुक्त किया गया है। वे वर्तमान समय लन्दन में ईश्वरीय सेवारत हैं। ↩
-
दादी निर्मलशान्ता जी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संयुक्त प्रशासिका हैं और ईश्वरीय विश्व विद्यालय के ईस्टर्न जोन की सेवा शाखाओं की इंचार्ज हैं। वर्तमान समय आप जोन मुख्यालय कोलकाता में रहती हैं। ↩
-
दादी चन्द्रमणि जी इस अविनाशी रुद्र गीताज्ञान यज्ञ की आदिरत्न थीं। वे ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश इत्यादि प्रान्तों के सेवाकेन्द्रों की संचालिका थीं। उन्होंने मार्च 12, 1997 में नश्वर शरीर का परित्याग किया। ↩
-
दादी मनोहरइन्द्रा जी यज्ञ की आदिरत्न हैं। यज्ञ की स्थापना के समय से ही बाबा-मम्मा के संग रही हुई हैं। वर्तमान समय ईश्वरीय विश्व विद्यालय के मुख्यालय परिसर ज्ञानसरोवर विद्यापीठ की निमित्त संचालिका हैं। ↩
-
दादी भगवती जी भी यज्ञ के आरम्भ से ही समर्पित हुई आदिरत्न हैं। वे दिल्ली, मेरठ, आदि स्थानों में ईश्वरीय सेवा करते हुए, पिछले 46 वर्षों से सहारनपुर में सेवारत हैं। ↩
-
ब्रह्माकुमारी दादी धैर्यमणि जी का लौकिक नाम पालू है। बाबा ने उनका नाम धैर्यमणि रखा। उन्होंने दिल्ली, हापुड़, मेरठ, अमृतसर, अजमेर, मद्रास, लखनऊ, मथुरा में ईश्वरीय सेवायें की हैं। वर्तमान समय आबू रोड स्थित संगम भवन में सेवारत हैं। ↩
-
दादी कुंज जी यज्ञ के आदिरत्नों में से हैं। आप वर्तमान समय ईश्वरीय विश्व विद्यालय की बिहार प्रान्त की शाखाओं की निर्देशिका हैं तथा पटना में रहती हैं। ↩
-
भ्राता रमेश जी इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के वरिष्ठ भाइयों में से एक हैं। वे मुंबई में रहते हुए ईश्वरीय विश्व विद्यालय की जिम्मेवारियों को सक्रियता पूर्वक संभालते हैं। वे न्यायविद् प्रभाग के अध्यक्ष हैं। ↩
-
भ्राता बृजमोहन जी, ईश्वरीय विश्व विद्यालय के वरिष्ठ भाइयों में से एक हैं। वे वर्तमान समय पाण्डव भवन दिल्ली में रहते हुए अंग्रेजी मासिक 'प्युरिटी' के मुख्य सम्पादक के रूप में सेवारत हैं और राजनीतिज्ञ प्रभाग के अध्यक्ष भी हैं। ↩
-
भ्राता निर्वैर जी भी इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय के वरिष्ठ भाइयों में से एक हैं। वे ईश्वरीय विश्व विद्यालय के सेक्रेटरी जनरल हैं। शिक्षा प्रभाग के अध्यक्ष और ग्लोबल अस्पताल तथा रिसर्च सेन्टर के कार्यकारी न्यासी हैं। वे अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय, आबू में रहते हैं। ↩
-
ब्रह्माकुमार भ्राता सन्तराम जी, कानपुर के सुप्रसिद्ध वकीलों में से एक हैं। वे वर्तमान समय, मुख्यालय आबू में ईश्वरीय विश्व विद्यालय के लीगल विभाग में सेवारत हैं। ↩
-
ब्रह्माकुमार भ्राता अमीरचन्द जी पंजाब जोन की ईश्वरीय सेवाओं के निर्देशक हैं। वे समाजसेवा प्रभाग के अध्यक्ष हैं। वर्तमान समय, पंजाब जोन के मुख्यालय चंडीगढ़ में रहते हैं। ↩
-
भ्राता रामऋषि शुक्ल जी एक जानेमाने पत्रकार एवं लेखक थे। लखनऊ में निवास करते हुए उन्होंने ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अलौकिक साहित्य-संरचना के कार्य में विशेष योगदान दिया। ↩
-
भ्राता महेन्द्र जी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के भोपाल (म.प्र.) जोन की सेवा-शाखाओं के निर्देशक हैं तथा ज्ञानवीणा हिन्दी पाक्षिक के मुख्य संपादक हैं। ↩
-
भ्राता ओम् प्रकाश जी वर्तमान समय मधुबन में ट्रान्सपोर्ट (यातायात) विभाग में सेवारत हैं। वे ट्रान्सपोर्ट प्रभाग के अध्यक्ष हैं। ↩
