योगी और पवित्र कैसे बनें ?
योगी और पवित्र कैसे बनें ?
योगी कौन ?
योगी वह है जो मन का नाता प्रभु से जोड़ता है, कर्मेन्द्रियों को अपने वश में करता है और काम-क्रोधादि मनोविकारों से उपराम रहता है, वह गृहस्थ जीवन में भी कमल-पुष्प के समान न्यारा और प्यारा होकर रहता है। उसकी लगन परमपिता परमात्मा से ही होती है और उसी में ही वह मग्न रहता है। कर्म करते समय भी उसका मन प्रभु-प्रेम में जुड़ा रहता है। घर-बार को छोड़कर जंगल की ओर भागने को वह कायरता मानता है। वह सर्वशक्तिवान परमात्मा से शक्ति लेकर संस्कारों को सतोप्रधान तथा दिव्य बनाता है। इस प्रकार का योगी बनने के विधि-विधान का ही इस पुस्तिका में संक्षिप्त वर्णन है।
फिर करोगे कब ?
यह कैसी अजीब बात है कि मनुष्य मननशील होते हुए भी कुछेक महत्वपूर्ण कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन अथवा परांगमुख बना रहता है और तो क्या, समझदार प्राणी होते हुए भी वह इस तथ्य के प्रति भी सचेत और सतर्क नहीं रहता कि वह सहज योग द्वारा इसी जीवन में ईश्वरीय आनन्द, मानसिक शान्ति, आध्यात्मिक शक्ति और कार्मिक पवित्रता की पराकाष्ठा तक पहुँच सकता है। इतना ही नहीं, यदि उसे अन्य कोई व्यक्ति जगाने का प्रयास करता है तो उसके सामने भी वह 'फुर्सत नहीं', 'हाँ कभी कर लूँगा', 'इसकी क्या ज़रूरत है' इस प्रकार के वाक्यों द्वारा किंकर्त्तव्य-विमूढ़ता प्रकट करता है।
कल क्या होगा ?
मान लीजिए कि कोई ज्ञान-निष्ठ व्यक्ति हित-भावना से अपने किसी युवक मित्र को सुझाव देता है कि वह भी ज्ञान-अमृत का प्याला पीये और योग का अभ्यास करे ताकि उसका आत्मन् भी ईश्वरीय हर्षोल्लास से ओत-प्रोत हो जाये। परन्तु, आज के भौतिकता-प्रधान युग में वह युवक उस मित्र से प्रेरणा न लेकर उपेक्षापूर्ण भाषा में कहता है "भाई! अभी तो मैं जवान हूँ..... अभी तो खाने-पीने और मौज उड़ाने का मौसम है..... चार दिन तो चस्का और चखाचुखी कर लेने दो..... ज्ञान लेना तो बुड्डों का काम है..... जवानी तो दीवानी और मस्तानी होती है..... अभी हमें मस्ती मना लेने दो. "।
कितना कुण्ठित है यह तर्क ! क्या हरेक व्यक्ति वृद्धावस्था के प्रांगण में प्रवेश करता भी है? क्या किसी मनुष्य ने भगवान से यह हस्ताक्षरकृत ठेका कर लिया हुआ है कि वह बुढ़ापे में उम्र ढलने तक न अपने साथ दुर्घटना देखेगा, न उसके हृदय की गति रुकेगी और न वह काल का ग्रास बनेगा? हम प्रतिदिन ही तो देखते हैं कि कितने ही कोमलतापूर्ण शैशव में और कितने ही कल्पना-भरी किशोरवस्था में, कितने ही उभरती जवानी में अथवा ख्यालों में तैरती तरुणावस्था में मृत्यु के मार्गगामी होते हैं। तब क्यों न मनुष्य अचानक ही आने वाले 'आखिरी तार' से पहले अपनी मंज़िल के लिए तैयारी कर ले।
तब तक तो संस्कार पक्के हो जायेंगे
फिर, हम ये भी तो देखते हैं कि एक धागा तोड़ना आसान होता है, परन्तु धागों से बना रस्सा तोड़ना दुश्वार हो जाता है। आग को भड़कने से पहले उसे बुझा देना कहीं ज़्यादा कठिन होता है। थोड़े से जंक को शुरू-शुरू में सुगमता से साफ़ किया जा सकता है और सारा जंक लग जाने पर उज्ज्वल बनाना मुसीबत मालूम होती है। तब क्यों न जीवन के प्रारम्भिक आयामों में -शैशव, किशोर और युवावस्था में संस्कारों को शुद्ध कर लिया जाय, विकारों की अग्नि को बुझा दिया जाये, बुरी आदतों को छोड़ दिया जाये।
पुनश्च, बुढ़ापे में भी मनुष्य के पास अवकाश कहाँ होता है? आज के जमाने में तो बुड्ढे आदमी को दूध-सब्जी लाने में और पोते संभालने में और शोक-शादी के मौके पर जाने में लगा दिया जाता है।
क्या कहें, बूढ़ा आदमी पके हुए संस्कार लिए, झुकी हुई कमर लिए, हिलती हुई गर्दन लटकाए, पोपले मुँह से राम-राम भी नहीं बोल सकता -वह तो "लाम, लाम" ही कहता है! खैर न की तुलना में तो किसी भी आयु में योग लगाना अच्छा है परन्तु चूँकि कल का भरोसा नहीं, इसलिए अभी से ही इसका अभ्यास करना अच्छा है। फिर, यह तो है भी सहज, इसमें कोई कठिनाई तो है ही नहीं और आनन्द भी मिलता है।
एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी की पुनि आध
यह जीवन चन्द रोज़ का है। इसमें मुनष्य का अधिकांश समय तो शरीर की आवश्यकताएँ पूर्ण करने में ही बीत जाता है। आटा-घी जुटाने में, दवा-दारू करने में, जीने-मरने की फ़िक्र में ही या खेल-खिलौने देखने में उसके दिन निकल जाते हैं। यदि मनुष्य शुरू ही से प्रतिदिन योग नहीं लगायेगा तो फिर कब लगायेगा?
हिसाब सीधा-सा है। मान लीजिए कि भारतवर्ष के मनुष्य की औसत आयु 50 वर्ष है। उसमें से जीवन के प्रथम 5 वर्ष तो मासूमियत में ही गुज़र जाते हैं। बच्चा रेत के मकान बनाता और बिगाड़ता रहता है; झुनझुनों और खिलौनों से खेलने में दिन बीतते पता नहीं लगता।
अब यह प्राथमिक शिक्षा के किसी स्कूल में प्रवेश पाता है। इसलिए अब वह पाँच घण्टे पढ़ाई-लिखाई में, घण्टा-भर स्कूल आने-जाने में और डेढ़-दो घण्टे पढ़ाई को दुहराने में लगाने लगता है। इस प्रकार आठ घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से पाँच वर्ष से बीस वर्ष की आयु तक की अवधि (16 वर्ष) में से पूरे पाँच वर्ष तो पढ़ाई-लिखाई में ही खर्च कर देता है।
इसके अतिरिक्त, हाकी, फुटबाल या अन्य खेलों में प्रतिदिन औसत एक घण्टा लगाने से अथवा मनोरंजन, मनोविनोद आदि के अन्य साधनों में भी समय लगाने से शेष 45 वर्ष के जीवन में से लगभग तीन वर्ष तो यूँ ही हवा की तरह उड़ जाते हैं।
अब मान लीजिए कि 20 वर्ष से 50 वर्ष की आयु तक मनुष्य जीविकोपार्जन के लिए किसी दफ्तर में नौकरी या किसी दुकान में आठ घण्टे प्रतिदिन व्यापार करता और दो घण्टे वह आने-जाने में लगाता है। इस अनुपात से उसके दस वर्ष तो शरीर को स्थिर रखने के लिए रोटी, कपड़ा कमाने में ही लग जायेंगे।
जीवन का लगभग एक तिहाई भाग निद्रा में
फिर, मनुष्य प्रतिदिन लगभग सात घण्टे सोता भी तो है। गोया जीवन का लगभग एक तिहाई से कुछ कम भाग तो सोये-सोये ही गुज़र जाता है।
आजकल के ज़माने में मनुष्य को दूध की बोतलें लेने, राशन इकट्ठा करने, तेल-कोयले की पंक्ति में ठहरने, साग-भाजी लेने में भी प्रतिदिन डेढ़ घण्टा तो लगता ही होगा? इस गणना के अनुसार जीवन के दो वर्ष तो इसमें भी लग ही जाते हैं।
पुनश्च, खाने-पीने और नहाने-धोने में यदि प्रतिदिन दो घण्टे लगते हों तो तीन वर्ष पेट-पूजा, पकौड़ी-पकवान और स्वच्छता-स्नान पर भी लग जाते हैं।
फिर, इस मृत्युलोक में कभी स्वयं को रोग है तो कभी किसी मित्र के यहाँ शोक। इस तरह की बातों में भी जीवन के चार वर्ष तो लगते ही होंगे?
इस प्रकार, जीवन के 45 वर्ष तो मनुष्य के शरीर-सम्बन्धी कार्यों में ही गुज़र जाते हैं। तब यदि मनुष्य शेष पाँच वर्ष अर्थात् प्रतिदिन एक घड़ी व आधी घड़ी भी ईश्वरीय स्मृति में न लगाये तो जीवन का लाभ ही क्या हुआ? पुनश्च, यह भी क्या मालूम कि मनुष्य का जीवन कितने वर्ष तक टिकता है? इसलिए टाल-मटोल और देर न करने में ही कल्याण है। मनुष्य को चाहिए कि योग सीख कर ईश्वरानुभूति का रस ले और आनन्द प्राप्त करे तथा बुरे कर्मों से बचे।
स्वयं को जानो !
योग, स्वरूप-स्थिति का नाम है। अतः योगी बनने के लिए पहले अपने स्वरूप को जानना ज़रूरी है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि मनुष्य इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं जानता कि "मैं कौन हूँ?" यूँ तो हरेक मनुष्य कहता है कि मैं स्वयं को जानता हूँ। वह कहता है कि "मैं एक वकील हूँ” या "डॉक्टर हूँ” या एक मनुष्य हूँ....। इस प्रकार के उत्तर वह देता है परन्तु वास्तव में यह सब तो शरीर का परिचय है। गोया मनुष्य शरीर निर्वाह के लिए जो धन्धा करता है, उसे ही अपना परिचय मान रहा है, शरीर की आयु को अपनी आयु बता रहा है और शरीर के घर को अपना घर समझे बैठा है। शरीर रूप चोले के कारण ही वह स्वयं को 'मनुष्य' मान रहा है परन्तु वास्तव में तो वह शरीर से भिन्न एक अनादि, अविनाशी एवं चेतन सत्ता है।
यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति शरीर छोड़ता है तो लोग कहते हैं -"ज्योति चली गई। मृत्यु होने पर शव को तो एक ठूंठ-सा मान कर श्मशान में दाह के लिए ले जाया जाता है क्योंकि जिससे सभी नाते थे, वह चेतन तो चला ही गया। वह चेतन रथवान शरीर रूपी रथ को छोड़ गया, तभी तो अर्थी (अ-रथी अर्थात् रथवान-रहित रथ) को अब ले जाया जाता है।
ऐसा भी नहीं कि 'आत्मा' को मानना कोई अन्धविश्वास है। आत्मा तो सत्य वस्तु है जिसे दिव्य दृष्टि द्वारा देखा भी जा सकता है। कितने ही बच्चे ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने पूर्व-जन्म का हाल सुनाया है। प्रश्न उठता है कि यदि शरीर एवं मस्तिष्क के सिवा और कुछ नहीं है तो उसके मर जाने तथा जला दिये जाने पर कौन-सी वस्तु रह गई थी जो पूर्व-जन्म के हालात बता रही है अथवा पूर्व कर्मों के आधार पर सुख-दुःख भोग रही है? यही तो,चेतन एवं अनादि-अविनाशी सत्ता है जिसे आत्मा कहते हैं, यही मैं हूँ।
यही आत्मा ज्योति-बिन्दु है। इच्छा, प्रयत्न, अनुभव इत्यादि इसी के लक्षण हैं। मस्तिष्क, स्नायु-मण्डल तथा शरीर द्वारा यही कर्म करती तथा फल भोगती है। वह आत्मा रथवान अथवा ड्राइवर है और शरीर इसका रथ है अथवा मोटर गाड़ी है।
आत्मा का स्वरूप
आत्मा ज्योति-बिन्दु रूप है। यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म है। जैसे रात्रि को नभ-मण्डल में तारा दिखाई देता है, दिव्य दृष्टि द्वारा आत्मा भी वैसे ही दिखाई देती है। आत्मा को भृकुटि में ही दर्शाया जाता है, तिलक भी भृकुटि में इसलिए लगाया जाता है और यह उक्ति भी है कि भृकुटि में चमकता है एक अजब तारा! ग़रीबां नू साहिब लगदा हे प्यारा! मनुष्य जब अपने भाग्य की चर्चा करता है, तब भी वह वहीं मस्तक पर ही हाथ लगाता है क्योंकि भाग्य की मालिक - उसे बनाने और भोगने वाली आत्मा का निवास यही है। यही अकाल आत्मा का तख्त है। यहीं आत्मा संकल्प करती, निर्णय करती तथा संस्कार बनाती है। अतः यह मन-बुद्धिमय, चेतन है।
यह जानकर योगाभ्यास के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं को ज्योति-बिन्दु आत्मा निश्चित करे। वह चलते-फिरते, उठते-बैठते 'मैं आत्मा हूँ' - इस स्मृति में स्थित होने का अभ्यास करे ताकि उसे जो देह-अभिमान हो गया है, वह मिट जाये।
आत्मा का अदिम स्वरूप शान्त और पवित्र है। उसी स्वरूप में हमें स्थित होना है। इसके लिए हमें इसी स्मृति में रहना है कि मैं आत्मा ज्योति-बिन्दु हूँ, शान्ति स्वरूप हूँ और अपने वास्तविक स्वरूप में पवित्र हूँ।
छोड़ो देह-अभिमान तो मिले समाधान
कई लोग सोचते हैं कि आत्मा निश्चय की बातें अथवा योगाभ्यास इत्यादि तो केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए हैं, इनसे समाज को क्या लाभ है? वे नहीं जानते कि योग से सभी समस्याओं का हल हो जाता है।
आज का विश्व समस्याओं का समूह है। मानव के चेहरे पर जो चिह्न हैं, उनसे ही मालूम होता है कि उसके मन में कोई-न-कोई समस्या है जिसका वह समाधान चाहता है। समाज सेवी और समाज के नेता भी इधर-उधर भागते-दौड़ते मालूम होते हैं। पूछो तो कहते हैं कि देश की किसी समस्या को सुलझाने में लगे हैं। सच तो यह है कि वर्तमान युग ही समस्या-प्रधान युग है, जबकि एक समस्या को सुलझाते-सुलझाते ही कई अन्य समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।
मैं कौन हूँ? - इस पहेली के हल से सभी समस्याओं का हल
समस्याओं की सूची बनाना सम्भव नहीं क्योंकि आज कदम-कदम में पद्म-पद्म नहीं बल्कि प्रश्न और प्रॉब्लम हैं। परन्तु यदि गहराई से देखा और सोचा जाय तो सभी समस्याओं का बीज देह-अभिमान ही है। मैं हूँ- तभी तो समस्याएँ भी हैं परन्तु मैं कौन हूँ? देह या आत्मा? मनुष्य ने इस पहली समस्या को भी हल नहीं किया है।
सभी समस्याओं का मूल - देह-अभिमान
उदाहरणार्थ: आज दक्षिण अफ्रीका में जगह-जगह झगड़ा होता है जिसका कारण यह है कि बाहर से आये कुछ लोग वहाँ के मूल निवासियों को कहते हैं- हम गोरे हैं, तुम काले हो। इसी प्रकार सभ्य माने जाने वाले देश- अमेरिका में भी गोरे और काले के रंग-भेद को लेकर नस्ली झगड़े हो जाया करते हैं। परन्तु सोचने की बात है कि गोरे और काले वास्तव में हम या तुम नहीं बल्कि हमारी और तुम्हारी चमड़ी है, हम जो चमड़ापोश हैं वह तो वास्तव में गोरी या काली पोशाक से अलग हैं। कोई सफेद कपड़ा पहने या काला - इसमें झगड़े की क्या बात है? लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि आज मनुष्य के पास वह चर्म-चक्षु तो है जिससे कि वह अपनी और दूसरों की चमड़ी को देख सकता है किन्तु उसे वह दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं कि जिससे वह गुदड़ी में छिपे लाल को देख सके; इस चमड़े में लिपटी दिव्य-वस्तु को निहार सके। यदि आज उसे आत्मा-दृष्टि मिल जाय तो न यह समस्या रहेगी, न इसके समाधान की ज़रूरत ही रहेगी, बल्कि भ्रातृत्व की भावना से प्लावित मानव हिंसा के बजाय अहिंसा और घृणा के बजाय प्रेम का मूर्तरूप बन जायेगा।
यही बात धार्मिक कटुता, असहिष्णुता और दंगों के बारे में भी कही जा सकती है। किसी ने हिन्दू के घर में देह ले ली तो वह हिन्दू कहलाने लगा और मुसलमान के घर जिस्म हासिल किया तो वह मुसलमान कहलाया। देह-गेह के इस भेद से एक-दूसरे पर टूट पड़ना- क्या कोई धर्म यह घृणा सिखाता है? यह घृणा न तो अल्लाह की बन्दगी में शामिल है, न ही प्रभु की पूजा में इसका स्थान है। धर्म तो मुसलमान को यह बताता है कि तुम रूह हो और हिन्दू को यह हितोपदेश देता है कि तुम आत्मा हो। यदि इस मूल तत्व में दोनों स्थित हो जायें तो झगड़ा ही कहाँ रहेगा? स्वयं को आत्मा निश्चय करने से ही भावात्मक एकता हो सकती है। इसी प्रकार पूँजीपति अथवा पैसे के पीर लोग जिस किसी प्रकार से बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपय्या की नीति अपना कर अन्य मनुष्यों का शोषण करने को भी उद्यत होते हैं, उनमें दूसरों के प्रति सहानुभूति, सह-अस्तित्व, सहायता और भ्रातृत्व की भावना का अभाव इसलिए होता है कि वे अपने को अ का पुत्र और दूसरे को ब का बेटा मानते हैं। यदि वे स्वयं को और दूसरों को आत्मा - परमात्मा की संतान निश्चय करें तभी तो वे वसुधा पर बसे लोगों को एक ही कुटुम्ब के मानकर उनके प्रति भाई की भावना से व्यवहार करने लगेंगे। गोया आत्मा-निश्चय में ही सभी समस्याओं का समाधान समाया हुआ है।
यही बात जनसंख्या में भयावह वृद्धि के बारे में कही जा सकती है। यदि नर-नारी स्वयं को आत्मा निश्चय करें तो उनमें ब्रह्मचर्य की धारणा तथा संयम-नियम का पालन आ सकता है। यह आत्मा-निश्चय और संयम-नियम ही योग के अंग हैं। फिर योग द्वारा मनुष्य को जो शान्ति मिलती है और उसका मानसिक संतुलन बना रहता है, उससे पारिवारिक, सामाजिक अथवा विश्व के सभी झगड़ों तथा लड़ाइयों की समस्या हल हो सकती है और कानून भंग की समस्या मिट सकती है।
योग क्या है ?
योग शब्द का अर्थ है- 'मिलन'। योग 'जोड़' अथवा सम्बन्ध को कहते हैं। इसका विपरीतार्थक शब्द 'वियोग' है। अतः आध्यात्मिक पुरुषार्थ के दृष्टिकोण से आत्मा और परमात्मा के मिलन का नाम 'योग' है अथवा आत्मा और परमात्मा का स्नेह एवं सम्बन्ध (मानसिक नाता) जुटाने का नाम भी 'योग' है। इससे ही आत्मा के आनन्द, शान्ति, पवित्रत, शक्ति इत्यादि में अभिवृद्धि होती है। इस दृष्टिकोण से 'योग' किसी आसन, प्राणायाम या हठ-क्रिया का नाम नहीं है बल्कि प्रभु की लगन में मग्न होने, ईश्वराज्ञा के अनुसार जीवन को पवित्र बनाने तथा भोग-विलासता के जीवन से मुख मोड़ने ही का नाम है।
यूँ तो हरेक आत्मा का अनादि सम्बन्ध परमात्मा से ही है। परमात्मा ही तो सभी के माता-पिता, परम शिक्षक, सद्गुरु, सखा अथवा सर्वस्व हैं। परन्तु जन्म-मरण में आते हुए आत्मा निज स्वरूप को भी भूल बैठी है और उसे परमात्मा का भी परिचय नहीं रहा। अतः अब उसका सम्बन्ध-विच्छेद हुआ-हुआ है। अब वह 'भोगी' अथवा 'वियोगी' अवस्था में है।
योग कैसे जुटे ?
अतः अब योग जोड़ने का अर्थ है- पुनः आत्मा के स्वरूप को जानकर, परमपिता परमात्मा को पहचान कर, स्वरूप-स्थित होना तथा परमपिता की लगन में मग्न होना- मन को उनकी अनन्य एवं एकान्तिक स्मृति में समाहित करना तथा चलते-फिरते एवं उठते-बैठते भी स्वयं को उस परमपिता का बालक निश्चय करते हुए तदानुसार गुण धारण किये रहना और उसकी आज्ञानुसार न्यासी (ट्रस्टी) होकर कर्त्तव्य-कार्य करना।
इस प्रकार के योग को ही 'ज्ञान-निष्ठा' अथवा 'मनोयोग' कहते हैं। 'बुद्धि योग' भी यही है। इसे ही 'कर्म योग' भी कहते हैं क्योंकि कर्म करते हुए भी आत्मा का नाता परमात्मा से जुटा रहता है। प्रसिद्ध 'राजयोग' भी यही है क्योंकि इसका अभ्यास करने वाला आत्मा, कर्मेन्द्रियों पर शासन करता है, वह मन के संकल्पों को भी स्व-शासन में रखता है और अन्ततोगत्वा 'माया जीते-जगत जीत' बन जाता है। यही 'सहज योग' भी है क्योंकि इसमें कोई कष्टदायक क्रियाएँ नहीं करनी होती हैं बल्कि केवल परमात्मा स्नेह, स्मृति और सम्बन्ध ही जोड़ने होते हैं।
इस प्रकार के योग के अभ्यास से मन की तथा बुद्धि की शुद्धि होती है, पुराने संस्कार मिटते हैं और अब उनके स्थान पर दिव्य संस्कार बनते हैं तथा पूर्व जन्मों में किये हुए विकर्म दग्ध होते हैं। इसी योग से मनुष्य सभी क्लेशों से मुक्त हो जाता है तथा जीवनमुक्ति भी प्राप्त कर लेता है। ईश्वरानुभूति तथा आत्मानुभूति का साधन भी यही योग ही है। इस योग से ही सच्ची शान्ति मिलती है। इसके अभ्यास करने वाले से जो सूक्ष्म एवं दिव्य प्रकम्पन (वायब्रेशन) निकलते हैं, वे प्रकृति के तत्वों को भी शुद्ध करते हैं तथा वातावरण में शान्ति भी फैलाते हैं। इससे मन का तनाव मिटता है और मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ती है। निंदा-स्तुति, मान-अपमान, हानि-लाभ इत्यादि में सम रहने की शक्ति इसी योग से मिलती है। गीता में भगवान ने इसी योग का रहस्योद्घाटन किया था। कल्प-कल्प कलियुग के अन्त और सतयुग के आरम्भ के बीच के काल में अर्थात् पुरुषोत्तम संगमयुग में स्वयं परमपिता परमात्मा शिव, प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा यही योग सिखाते हैं और अब उन्होंने पुनः इसकी शिक्षा दी है। इस योग का रहस्योद्घाटन कोई भी मनुष्य तब तक नहीं कर सकता जब तक स्वयं परमात्मा इसका परिचय न दें।
अब इस योग को सीखने के लिए स्वयं परमपिता परमात्मा ही हरेक मनुष्यात्मा को निमंत्रण दे रहे हैं। वे ही "योगी भव" के लिए आह्वान भी कर रहे हैं और वरदान भी दे रहे हैं। उनकी आज्ञा है कि अब सतयुगी पावन सृष्टि की पुनः स्थापना हो रही है। अतः अब पवित्र बनो और योगी बनो। इसके बिना आप परमधाम वापस नहीं जा सकते, न मेरे पास ही आ सकते हो।
अतः हमें चाहिए कि अब अपने ही कल्याणार्थ तथा विश्व की सच्ची सेवार्थ इस सहज योग को सीखें जिसकी शिक्षा भी निःशुल्क और शीघ्र ही उन्नति को देने वाली है।
इस योग में स्थित होने के लिए अब हम पहले परमात्मा का परिचय देते हैं तथा इस सृष्टि-चक्र का भी संक्षिप्त परिचय देते हैं। उसके बाद योग की विधि का उल्लेख करेंगे।
मन को मारना नहीं, संवारना है
बहुत-से लोग प्रभु से प्रार्थना करते हुए कहते हैं "हे प्रभु यह मन बड़ा पापी है, नीच है, शैतान है"। वे मन को स्वयं (आत्मा) से अलग मानते हुए 'मन को मारने' का यत्न करते हैं। वे उसका दमन करने की कोशिश करते हैं और इसके लिए कई-कई दिन तक भूखे रहते, जल में एक टाँग पर खड़े रहते तथा अन्य कई हठ-क्रियाएँ करते हैं। परन्तु परमपिता परमात्मा शिव कहते हैं कि मन आत्मा से अलग कोई प्रकृतिकृत नहीं है बल्कि स्वयं आत्मा के संकल्प, विकल्प इत्यादि का नाम है। आत्मा को 'चेतन' इसलिए ही तो कहा गया है कि उसमें सोचने, समझने, अनुभव करने, इच्छा एवं प्रयत्न करने की योग्यता अथवा शक्ति है। अतः स्वयं आत्मा ही के संकल्प करने का नाम मन, सोचने-समझने का नाम बुद्धि है। इन्हें मारना नहीं बल्कि ज्ञान एवं योग से सँवारना है।
परमपिता परमात्मा का परिचय
हमने पिछले अध्यायों में कहा था कि योग का अर्थ स्वयं को 'आत्मा' निश्चय करते हुए परमात्मा की स्मृति में मन को एकाग्र करना है। अतः इसके लिए परमात्मा का परिचय होना ज़रूरी है।
आप देखेंगे कि सभी धर्मों के लोग जो परमात्मा के अस्तित्व में आस्था रखते हैं, परमात्मा को 'पतित-पावन' मानते हैं। मुसलमान लोग उसे अपनी भाषा में 'पाक-परवरदिगार' कहते हैं तो ईसाई लोग अपने बाईबिल की भाषा में इन्हीं अर्थों को लिए हुए किन्हीं अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार, सभी लोग परमात्मा से शान्ति और सद्बुद्धि की भी माँग करते हैं। प्रश्न उठता है कि जिसे 'परमात्मा' कहकर सभी लोग याद करते हैं उसका स्वरूप क्या है?
परमात्मा का स्वरूप
सभी कहते हैं कि परमात्मा ज्योतिस्वरूप है, अल्लाह एक नूर है, गॉड इज़ लाइट। परन्तु वह लाइट कैसी है इसका स्पष्ट विवरण मालूम होने से ही तो मनुष्य उससे अपना मन का नाता जोड़ सकता है, मनोमिलन मना सकता है, अपनी बुद्धि को वहाँ ठिकाना दे सकता है, अपने चित्त को वहीं लगा सकता है और अपने संकल्पों को उसमें समाहित कर सकता है। परमात्मा के 'रूप अनूप' का ज्ञान होने से, मनुष्य मन के चक्षु से अपने उस प्रीतम को निहार सकता है और तन के यहाँ होते हुए भी अपना चित्त प्रभु को देकर वह आनन्द-रस में सराबोर हो सकता है।
कुछ लोग मानते हैं कि परमात्मा तो अरूप है, अलीक है, अलख है और निराकार है। परन्तु वे यह नहीं जानते कि 'निराकार' तो सापेक्ष शब्द है और उसका भाव यह है कि परमात्मा का कोई दैहिक आकार नहीं है और कोई दैविक आकार भी नहीं है क्योंकि न तो उसकी कोई स्थूल काया है और न ही कोई उसकी प्रकाशमय, देवताई काया है। तथापि उसका रूप अवश्य है और वह रूप ज्योतिर्मय है, कायिक न होकर आत्मिक है, विनाशी न होकर अविनाशी है और वह यद्यपि इन चर्म-चक्षुओं द्वारा 'अलख' (अदृश्य) है किन्तु दिव्य-चक्षु द्वारा दर्शनीय है। उसे 'अलीक' इसलिए कहा गया है कि उसके ज्योतिर्मयरूप द्वारा ज्योति की रश्मियाँ फूट-फूट कर चहुँ ओर फैल रही हैं। वह दिव्य ज्योति, परम प्रभावशाली, पवित्रकारी, शान्तिदायक साथ-साथ शक्तिवर्द्धक भी है।
परमात्मा का रूप-अनूप
उस ज्योतिस्वरूप का दिव्य रूप दीप-शिखाकार है, जिसकी प्रतिमा भारत में शिवलिंग नाम से प्रख्यात है। मन्दिरों में उसी के प्रतीक के रूप में ही दीपक जलाये जाते हैं और गिरजाघरों में उस ही की याद में मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं और पारसी लोग भी उसे अग्नि अथवा सूर्य के प्रकाश में देखने की कोशिश करते हैं।
अतः मनुष्य मात्र को यह मालूम होना चाहिए कि जैसे आत्मा ज्योतिबिन्दु है, वैसे ही परमात्मा भी ज्योतिबिन्दु है परन्तु वह गुणों का सिन्धु है, इसलिए ही हज़रत ईसा ने भी कहा था कि परमात्मा एक ज्योति है। आज जापान में भी बौद्ध लोग इसी आकार के एक पत्थर पर दृष्टि जमा कर उसे 'चिन-कन-सेकी' अर्थात् 'शान्तिदाता का चिह्न' मानकर समाधि के लिए अभ्यास करते हैं। मुसलमानों के मक्का शरीफ़ में भी इसी आकार का एक पत्थर है जिसे वे 'संग-ए-असवद्' कहते हैं और हज़ करते हुए उसे चूमते हैं। नानक देव ने भी उसी को ही 'एक ओंकार' कहकर उसकी ओर इशारा किया है। अतः उस परमात्मा को 'ज्योति बिन्दु' जानकर परम-पिता मानकर, उससे ही आत्मिक-स्मृति और स्नेह का नाता जोड़ना चाहिए। यह सहज बुद्धियोग अथवा राजयोग है। कर्म करते हुए भी इसी स्मृति में स्थित होना 'कर्म योग' है। इसे ही 'समत्व योग' भी कहते हैं क्योंकि इससे बुद्धि का सन्तुलन बना रहता है।
ब्रह्मलोक के वासी
प्रायः लोग यही कहते हैं कि यह संसार तो एक मुसाफ़िरखाना है, आखिर हमें एक दिन यहाँ से चले जाना है। परन्तु वे यह नहीं जानते कि आत्मा रूप मुसाफ़िर इस सृष्टि में आया कहाँ से है? जब कोई व्यक्ति बहुत दुःखी होता है, तब वह भी प्रार्थना करते हुए, ऊपर की ओर देखता है और कहता है - 'हे प्रभु, मुझे अपने पास बुला लो'! ऊपर की ओर देखते हुए भी वह स्पष्ट रूप से यह नहीं जानता कि प्रभु हैं कहाँ, वे हमें कहाँ बुला लें? पुनश्च, जब कोई महान व्यक्ति शरीर छोड़ता है, तब भी लोगों में यह कहने की प्रथा प्रचलित है कि - "वह परलोक वासी हो गया है, उसने मुक्ति प्राप्त कर ली है"। परन्तु उस परलोक अथवा ब्रह्मलोक का भी मनुष्य को स्पष्ट ज्ञान नहीं है। अतः इस बात को समझने की ज़रूरत है क्योंकि हमें यह मालूम तो होना ही चाहिए कि आखिर हमारा वास्तविक 'घर' अथवा धाम कौन-सा है अथवा हमारी मंजिल कौन-सी है?
साकार लोग अथवा कर्म-क्षेत्र
लोक कुल तीन हैं। इसलिए ही परमपिता परमात्मा को 'त्रिलोकीनाथ' कहा जाता है। उनमें से एक लोक तो यह है जहाँ हम इस समय हैं, इसे 'साकार लोक' कहा जाता है क्योंकि हमने यहाँ साकार शरीर धारण किया हुआ है। इसे ही 'कर्म-क्षेत्र' भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ हरेक शरीरधारी कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करता है और उसका फल भी सुख या दुःख के रूप में भोगता है। इसे ही लीलाधाम अथवा विराट रंगशाला भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ पर हरेक आत्मा अभिनेता (एक्टर), शरीर रूप पोशाक पहन कर अपना-अपना पार्ट करता है। इसलिए यहाँ जो कुछ हो रहा है, उसे चलचित्र एवं वाक् चित्र कहा जाता है। यह सृष्टि आकाश तत्व के अंशमात्र में है। यह अनादि है, इसका पूर्णतः नाश कभी नहीं होता। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग और पुरुषोत्तम संगमयुग इनका एक चक्र पूरा होते ही तुरन्त दूसरा चक्र प्रारम्भ हो जाता है। इस सृष्टि-चक्र का वृत्तान्त हम आगे के अध्यायों में दे रहे हैं। अतः योगी वह है जो इस सृष्टि में स्वयं को आत्मा मात्र समझता है। वह इसके हर्ष-शोक, सुख-दुःख की परिस्थितियों को इस ड्रामा के बदलने वाले दृश्य मानकर इनसे प्रभावित नहीं होता बल्कि द्रष्टा की न्यायी न्यारा और प्यारा होकर जीवन व्यतीत करता है।
सूक्ष्म लोक
साकार सृष्टि के सूर्य-चाँद और तारागण के पार, आकाश तत्व से परे प्रकाश तत्व है। यह अव्यक्त है। इसे हम इन चर्म-चक्षुओं द्वारा नहीं देख सकते। उनमें तीन पुरियाँ हैं जिन्हें 'ब्रह्मापुरी', 'विष्णुपुरी' तथा 'शंकरपुरी' कहते हैं। उनमें सूक्ष्म, प्रकाशमय, दिव्य शरीर वाले ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर का वास होता है। वहाँ ध्वनि नहीं बल्कि वह ध्वनि-रहित, शान्त देश है। वहाँ बातचीत होती है परन्तु आवाज़ नहीं होती। इस लोक का साक्षात्कार दिव्य-दृष्टि द्वारा ही हो सकता है। इसे ही 'सूक्ष्म लोक' या 'देवलोक' भी कहा जाता है।
ब्रह्मलोक, परलोक अथवा परमधाम
सूक्ष्म लोक से भी ऊपर परात्पर जो लोक है, वहाँ प्रकाश-ही-प्रकाश है। इस दिव्य प्रकाश को 'ब्रह्म तत्व' कहा जाता है। इसमें ही ज्योति-बिन्दु रूप आत्माएँ अशरीरी एवं मुक्त अवस्था में वास करती हैं। इसमें ही ज्योति-बिन्दु परमपिता परमात्मा का भी वास है। इसलिए ही इसे 'शिवपुरी' भी कहते हैं। प्रार्थना करते समय इसलिए ही मनुष्य ऊपर की ओर मुँह करता है और दुःखी मनुष्य भी इसलिए ही कहता है कि "हे प्रभु, मुझे अपने पास बुला लो"।
योगाभ्यास के लिए मनुष्य को अपने मन को एकाग्र करना होता है। उसे मन को एक स्थान पर स्थिर करना होता है। अतः उसे चाहिए कि वह ब्रह्मलोक में ज्योति-बिन्दु शिव पर ही मन को एकाग्र करे।
क्या परमात्मा सर्वत्र है?
योगाभ्यास के लिए मन को अन्य सभी ओर से हटा कर एक परमपिता परमात्मा ही पर एकाग्र करना होता है। योगाभ्यास के लिए मनुष्य को परमपिता परमात्मा ही के स्वरूप की स्मृति में तन्मय होना होता है। इस पुरुषार्थ को ही पातंजलि ने 'प्रत्याहार' (मन को विषयों, व्यक्तियों से व चहुँ ओर से हटाना), 'धारणा' (उसे एक स्थान पर स्थित करना) और 'ध्यान' (परमात्मा की स्मृति में स्थित करना) कहा है। अब सोचने की बात है कि यदि परमात्मा सर्वव्यापक है तो 'ध्यान' किसका किया जाय, मन को कहाँ टिकाया जाये, प्रभु से कैसे प्रीति की जाये? हम अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं कि परमात्मा का दिव्य, ज्योति-बिन्दु रूप है, वह हमारा परमपिता है और ब्रह्मलोक का वासी है। मन को सब ओर से हटा कर उस पर एकाग्र करना ही 'योग' है, आप इसे स्वयं अनुभव कर सकते हैं, परन्तु विडम्बना यह है कि आज प्रायः सभी आस्तिक लोग यह मानते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापक है। अपनी इस मान्यता की पुष्टि में वे कुछेक प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। परन्तु यदि हम उनके कथनोपकथनों पर विचार करें तो उनमें अन्तर्विरोध पाया जाता है और वे अनुभव की कसौटी पर भी ठीक नहीं उतरते।
कुछेक दृष्टान्तों पर विचार
उदाहरण के तौर पर एक दलील यह पेश की जाती है कि "जैसे पुष्प में सुगन्धि होती तो है परन्तु सूक्ष्म होने के कारण वह चर्म-चक्षुओं को दिखाई नहीं देती, वैसे ही परमात्मा भी सभी जीव-प्राणियों में निवास तो कर रहे हैं परन्तु सूक्ष्मतम होने के कारण वे हमारे लिए अदृश्य ही बने रहते हैं क्योंकि सुगन्धि के समान उनका भी कोई रूप नहीं है"। इस दलील पर निष्पक्ष भाव से विचार करने पर हम यह तो मानेंगे ही कि भले ही सुगन्धि दिखाई नहीं देती किन्तु उसका अस्तित्व सूँघने से तो अनुभव में आता ही है, तभी तो हम कहते हैं कि पुष्प में सुगन्धि है। इसी प्रकार, यदि परमात्मा सर्वत्र है तो उनके गुण -शान्ति, आनन्द, प्रेम और पवित्रता इत्यादि भी सब में भासित तो होने चाहिए? किन्तु, हम तो देखते हैं कि आज आनन्द के बजाय सर्वत्र हाहाकार है; तब कैसे कहा जा सकता है कि परमात्मा यत्र-तत्र-सर्वत्र है? पुनश्च, खुशबू तो एक गुण है जोकि अपने अधिष्ठान, पुष्प में निवास करती है। गुणी अथवा वस्तु तो पुष्प ही है और उसका तो रूप होता ही है। इसी प्रकार, परमात्मा के गुणों - शक्ति, आनन्द, प्रेम का तो रूप नहीं है परन्तु जिसमें ये गुण विद्यमान हैं वह परमात्मा स्वयं तो किसी-न-किसी रूप वाला होगा ही और जब उसका रूप होगा तो हम उसे सर्वत्र कैसे मान सकेंगे?
परमात्मा को सर्वव्यापक मानने वाले लोग कहते हैं कि परमात्मा वैसे ही हरेक वस्तु में व्याप्त है जैसे कि अग्नि। परन्तु उनका यह प्रमाण भी उनके विरुद्ध ही जाता है क्योंकि हम देखते हैं कि जब अग्नि में लोहा तपाया जाता है तो उसमें भी अग्नि के संग से दाह का गुण तो आ ही जाता है। और, अधिक संग से वह स्वयं भी अग्नि जैसा लाल हो जाता है। तो यदि आनन्द स्वरूप परमात्मा सबके हृदय में है, तब सब में आनन्द व्याप्त क्यों नहीं?
मनुष्य व्यवहार में भी सब में परमात्मा नहीं मानता है। तभी तो बिल्ली को दूध झुठाते देखकर वह उसे भगाने के लिए दौड़ता है, गधे के रुक जाने पर उसे चाबुक लगाता है और दूसरे आसुरी मनुष्यों के लिए दण्ड का विधान करने को उद्यत होता है। तो कहना होगा कि परमात्मा सर्वव्यापक नहीं है, हाँ वह सर्वज्ञ है। जबकि एक मनुष्य एक स्थान पर बैठकर चाँद में उतरने वाले अन्तरिक्षयान को काबू में रख सकता है, चाँद पर होने वाली बातें देख सकता है व अनेक देशों में अपने दफ्तरों द्वारा कार्य कर सकता है, तब परमात्मा जोकि शरीर, कर्म, क्लेश, अज्ञानता और काल से अबाध्य है, वह क्या नहीं जान सकता है? स्पष्ट है कि परमात्मा ब्रह्मलोक का वासी है।
सतयुग और त्रेतायुग का सही चित्रण
योगाभ्यास के द्वारा मनुष्य न केवल स्वयं पवित्र और शान्त बनता है बल्कि वह सारे विश्व में पवित्रता तथा शान्ति स्पन्दन (वायब्रेशन) भी फैलाता है। यहाँ तक कि कलियुग के अन्त में परमात्मा शिव जो योग सिखाते हैं, उस द्वारा सतयुग स्थापित हो जाता है जिसमें सम्पूर्ण पवित्रता, सुख एवं शान्ति होती है। तब सभी देवी और देवता होते हैं, कोई लड़ाई या झगड़ा नहीं होता परन्तु आज मानवी सृष्टि के आदिकाल के बारे में अनेक भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं। कुछ लोग कहते हैं कि सतयुग और त्रेतायुग में भी असुर अथवा दैत्य थे और तब दुःख-दैन्य भी थे तथा अशान्ति भी थी।
किन्तु, सोचने की बात है कि किसी भी युग का नाम तो उस समय के लोगों के रहन-सहन की शैली, विचार-प्रणाली या उस काल के किसी मुख्य वृत्तान्त या किसी विशिष्ट व्यक्ति के नाम से ही जुड़ा रहता है। उदाहरण के तौर पर, जब संत तुलसीदास, भक्त कबीर, नानक देव, मीरा, दादू इत्यादि भक्ति का प्रचार कर रहे थे, उस काल को बाद में लोगों ने 'भक्तियुग' नाम दिया। जिस समय महात्मा गाँधी जी के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विचारों से भारत थोड़ा-बहुत प्रभावित हो रहा था, उस काल को कुछ लोगों ने 'गाँधी युग' नाम देना उचित समझा। जब अणु का विस्फोट करके अणु-शक्ति का आविष्कार किया गया तो लोगों ने उस युग को 'अणु युग' नाम दे दिया। इसी प्रकार 'सतयुग' नाम से भी यही इंगित होता है कि उस युग में लोग सत्य धर्म और सत्य कर्म, सत्य मर्यादा और सत्य आचारण वाले ही रहे होंगे।
इसी युग के जो अन्य नाम - सत्वयुग, कृतयुग, देवयुग हैं, उनसे भी यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उस युग में लोग सतोगुणी थे, उनके सभी संकल्प सहज ही सिद्ध होते थे और वे दैवी गुण सम्पन्न थे। उस युग का नाम किसी विशेष व्यक्ति के नाम से नहीं जुड़ा है बल्कि विशेष गुण के नाम से जुड़ा है। इससे सिद्ध है कि उस काल में कोई ऐसे एक-दो व्यक्ति नहीं थे जोकि महान हों बल्कि उस काल में सभी नर-नारी सतोप्रधान स्वभाव वाले और 'पूर्ण काम' (तृप्त) थे।
कुछ लोग कहते हैं कि सतयुग में प्रह्लाद के समय में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष जैसे असुर थे और त्रेतायुग में राम के समय में रावण और कुम्भकर्ण जैसे असुर भी थे। ऐसे लोगों को मालूम होना चाहिए कि वास्तव में प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष की कथा तो एक आध्यात्मिक रूपक ही है वरना, सोचने की बात है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का जो वर्णन श्रीमद्भागवत् में आया है, वैसा तो अशरशः ऐतिहासिक हो ही नहीं सकता। उसी प्रकार त्रेतायुग में श्रीराम भी हुए अवश्य लेकिन रावण-जैसा दस सिरों वाला कोई असुर नहीं हुआ क्योंकि दस सिर वाला कोई मनुष्य (चाहे वह आसुरी स्वभाव वाला हो) हो नहीं सकता। बल्कि 'रावण' शब्द वास्तव में 'माया' (स्त्री और पुरुष में पाँच-पाँच विकारों) ही का वाचक है और राम और रावण की कथा कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि के पुरुषोत्तम संगमयुग के समय निराकार राम से सम्बन्धित है, इस बात का विस्तारपूर्वक एवं विवेक-सम्मत स्पष्टीकरण किया जा सकता है।
अतः मालूम रहे कि सतयुग और त्रेतायुग में लोग देवताई स्वभाव वाले थे तथा प्रभामण्डल और रत्न-जड़ित स्वर्ण-मुकुट दोनों ताजों से युक्त थे।
उन्होंने यह पद पुरुषोत्तम संगमयुग में योगाभ्यास द्वारा प्राप्त किया था। वहाँ कोई असुर अथवा दैत्य नहीं थे, न ही किसी प्रकार का दुःख-दैन्य था, न कलह-कलेश। वे लोग आत्म-निष्ठ थे, सदा प्रसन्नचित्त थे, हर्षोल्लास में थे किन्तु विलासी नहीं थे बल्कि सर्व रस सम्पन्न, अनेक प्रकार के व्यंजन होते हुए भी अथवा धन-धान्य सम्पन्न होते हुए भी वे अनासक्त और तृप्त थे। ऐसी ही सृष्टि की स्थापना परमपिता परमात्मा ने की थी। जो लोग यह मानते हैं कि सतयुग में भी आसुरीयता और दुःख था, वे परोक्ष रूप से देवाधिदेव, सुख-शान्ति के दाता, सृष्टि के रचयिता परमात्मा पर आक्षेप लगाते हैं। वे सृष्टि के सही इतिहास से अपरिचित हैं। मालूम रहे कि अब फिर सतयुग स्थापन हो रहा है। अतः अब पुनः स्वयं को योगी बनाकर नर से श्रीनारायण बनने की शुभ वेला है।
द्वापर और कलियुग का वृत्तान्त
परमपिता परमात्मा शिव ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा पुरुषोत्तम संगमयुग में जो योग सिखाया था, उसका अभ्यास करने वाले नर-नारी जीवनमुक्त देव पद प्राप्त कर सतयुग और त्रेतायुग दो युगों तक पवित्रता-सुख-शान्ति सम्पन्न रहे। तब धर्म और कर्म जुड़े हुए थे।
परम्परा से यह बात प्रसिद्ध है कि सतयुग में धर्म चार पाद, त्रेता में तीन पाद और द्वापर में दो पाद होता है। द्वापरयुग से ही सृष्टि में द्वैत और द्वेष शुरू होता है। राग और द्वेष, आसक्ति और घृणा का प्रारम्भ जिस समय से हो, तब से ही द्वापरयुग का आदि मानना चाहिए।
जब मनुष्य में राग हो तभी वह उससे मुक्त होने के लिए वैराग्य-भाव पैदा करने की कोशिश करता है। जब आसक्ति हो, तब ही लोग संन्यास का पथ लेने की चेष्टा करते हैं। जब वे पतित हो जाते हैं तभी वे पूजा का आरम्भकरते हैं और भगवान से पवित्रता के लिए प्रार्थना करते हैं। अतः द्वापरयुग में ही मनुष्य में राग और द्वेष और उनके साथ-साथ भक्ति-पूजा एवं वैराग्य-संन्यास इत्यादि की शुरूआत हुई। तभी पूजा के स्थान अर्थात् मन्दिर भी बनने लगे और संन्यासियों तथा वैरागियों के स्थान अर्थात् मठ और आश्रम भी स्थापित होने लगे। तभी भक्ति की कथाओं और आख्यानों तथा विधि-विधानों के ग्रन्थ अर्थात् शास्त्र और पुराण भी बनने लगे।
तब एक ओर लोग राज्य-भाग्य के लिए आक्रमण और बचाव की तैयारियाँ करने लगे और दूसरी ओर इस सबको झमेला मानकर शहर की हलचल से दूर आश्रम भी बनाने लगे। तब एक ओर कहीं रक्त की धारा बहती तो दूसरी ओर भक्ति की धारा बहती। आश्रम के निकट कहीं कुत्ता और बिल्ली इकट्ठे रह पाते तो दूर कहीं शेर-गाय पर झपट कर उसको खा रहा होता। मनुष्य के मन में अब दो-दो भाव जागने लगे और द्वन्द्व में पड़ कर दो विपरीत गुणों के बीच उसका मन अस्थिर रहने लगा। कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य, धर्म और अधर्म, पाप और पुण्य, प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच उसका मन झकझोले खाने लगा। परन्तु फिर भी उसकी निष्ठा, कर्त्तव्य और धर्म में ही अधिक रहती।
समय का पासा पलटा। मनुष्य इससे भी नीचे उतरा और उसके मन रूप तराजू की डण्डी विकार, हिंसा इत्यादि की ओर अधिक झुकी। अब उसके पग अधर्म की ओर बढ़े। आत्मा की आवाज़ की अवहेलना करके अब वह प्रकृति का पुजारी बना।
आज विश्व की स्थिति
धर्म के आधार पर भी खून-खराबा होने लगा। होते-होते आज तो समय ऐसा आ गया है कि न अनुशासन है, न आचार की श्रेष्ठता, न शान्ति है, न शील। सब जगह कोलाहल और कोहराम मचा है। ऊँचे-ऊँचे भवन हैं किन्तु उनसे चरित्रहीनता की दुर्गन्ध आती है। विषय-वासनाएँ सर्वत्र बढ़ती हुई दिखाई देती हैं और आहार तथा आचार की पवित्रता की चर्चा करने वाले व्यक्ति को 'पिछड़ा हुआ व्यक्ति' माना जाने लगा है।
इस युग की बलिहारी
परन्तु, यद्यपि यह युग निकृष्ट है, सब प्रकार से दुःख और अशान्ति का युग है तथापि इसमें ही एक ओर विज्ञान अपनी पराकाष्ठा को पहुँचता है, अनेक प्रकार की विद्याओं का प्रचलन होता है, मानव बुद्धिवादी और वैचारिक स्वतंत्रता को अपनाता है और दूसरी ओर यही वह युग है जब मानव-हृदयों की कालिमा को धोने के लिए, आसुरीयता को मिटा कर फिर से देवत्व की स्थापना करने के लिए स्वयं परमपिता परमात्मा का अवतरण होता है और प्रजापिता ब्रह्मा तथा जगदम्बा सरस्वती की ज्ञान-दुदुम्भी तथा वीणा बज उठती है। यही वह पुण्यवेला चल रही है जबकि परमात्मा पुनः सतयुग की स्थापना कर रहे हैं। वे पु नः सहज राजयोग सिखा रहे हैं। उसका अभ्यास करने से नर श्रीनारायण और नारी श्रीलक्ष्मी बन सकती है।
प्रभु से नाता
आत्मा को परमात्मा मानना भूल है क्योंकि आत्मा तो जन्म-मरण और सुख-दुःख में आने वाली और परमात्मा इनसे निकालने वाला, स्वयं इनसे सदा न्यारा है। वह सर्वशक्तिवान है तथा ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर, आनन्द का सागर और प्रेम का सागर है। मनुष्यात्मा उनसे ही योगयुक्त होकर इस ईश्वरीय सम्पत्ति अथवा जन्म-सिद्ध अधिकार को प्राप्त कर सकती है। मनुष्यात्मा को 'परमात्मा' मानना तो गोया योग की नींव को ही नष्ट करना है क्योंकि योग वास्तव में 'दो' के बीच के नाते को जोडने का नाम है। परमात्मा तो सर्व आत्माओं का अविनाशी माता-पिता, बन्धु तथा सद्गुरु है। अतः उसके साथ ही ये नाते मानकर अब क्रियात्मक अथवा व्यवहारिक रूप से मन के ये नाते जोड़ने हैं, इसी का नाम ही योग है। भगवान की आज्ञा है कि मन मुझ में लगाओ।
सतयुगी गृहस्थ और कलियुगी गृहस्थ की तुलना
भारत में गृहस्थ आश्रम को बहुत ऊँचा माना गया है क्योंकि इसी आश्रम पर अन्य तीनों भी आधारित हैं। परन्तु जब हम आज के गृहस्थ की ओर दृष्टि करते हैं तो हम आज के 'गृहस्थ' को 'उच्च' नहीं कह सकते क्योंकि इसमें महानता के दर्शन नहीं होते बल्कि अनबन, तनाव, काम, क्रोध, लोभऔर मोह के ही दर्शन होते हैं। आज के गृहस्थ प्रायः ब्लैक, रिश्वत, स्मगलिंग, पगड़ी, पैंतरेबाज़ी, हेरा-फेरी अर्थात् 'नम्बर दो' के पैसे से चलते हैं और आज गृहस्थी लोग प्रातः उठकर प्रभु की याद में बैठने की बजाय या तो प्रातःकाल अखबार पढ़ते हैं या रेडियो का स्विच ऑन करते हैं और 'गीता' की बजाय फ़िल्मी दुनिया अथवा जासूसी नॉवलों के अध्याय-पर-अध्याय पलटते हैं।
एक समय था जिसे 'सतयुग' कहा जाता था। तब पति-पत्नी क्रमशः श्रीनारायण और श्रीलक्ष्मी के समान थे। विष्णु चतुर्भुज की दो भुजाएँ उस युग की नारी - देवी लक्ष्मी की प्रतीक हैं और अन्य दो भुजाएँ - उस युग के नर - देवता श्रीनारायण की प्रतीक हैं और उनमें के अलंकार (शंख, चक्र, गदा और पदम) शुभ वचन और सृष्टि-चक्र के रहस्य-बोध, ज्ञान-बल तथा पवित्र जीवन के परिचायक हैं। गोया उनके जीवन में पवित्रता, दिव्यता और सात्विकता थी। इसके फलस्वरूप वे विष्णु के समान रत्न-जड़ित मुकुट अर्थात् सुख-सम्पत्ति से युक्त थे और प्रकाश के ताज अर्थात् पवित्रता एवं शान्ति से भी परिपूर्ण थे।
परन्तु आज का मनुष्य तो दरिद्र नारायण ही बन गया है जिसका चित्र हम सबके सामने है। अब परमपिता परमात्मा पुनः ज्ञान और योग की शिक्षा देकर नर को श्रीनारायण और नारी को श्रीलक्ष्मी बना कर गृहस्थ को सुश्रेष्ठ बना रहे हैं।
आदर्श गृहस्थ जीवन
योग द्वारा मनुष्य पतित से पावन, विकारी से पूर्णतः निर्विकारी, अवगुणी अथवा दुर्गुणी से सर्वगुण सम्पन्न और अमर्यादित से 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनता है। अतः योगाभ्यास करने वाले मनुष्य के सामने यही लक्ष्य रहता है कि वह ऐसी स्थिति को प्राप्त करे।
यह लक्ष्य सामने रखने से वह पुरुषार्थ करते-करते वैसा ही बन जाता है। जब तक मनुष्य के सामने कोई ऊँचा आदर्श न हो, तब तक उसका चारित्रिक स्तर ऊँचा नहीं हो सकता। यदि मनुष्य के सामने कोई लक्ष्य न हो तो उसमें उच्च लक्षण नहीं आ सकते। यदि उसकी दृष्टि में कोई दिव्य मूर्त न हो तो उसकी वृत्ति और कृति दिव्य नहीं बन सकती है। इस संसार रूपी समुद्र में जीवन रूपी जहाज़ का कोई-न-कोई लक्षित स्थान अवश्य निर्धारित करना होगा वरना जीवन के क्षण-पल लक्ष्यहीन यात्री की भाँति मनुष्य को गुमराह करने में ही खर्च हो जायेंगे। यूँ तो हरेक दम्पत्ति सुनहरे गृहस्थ के स्वप्न देखते हैं परन्तु वे स्वप्न साकार नहीं होते क्योंकि उन स्वप्नों के चित्र जिन रंगों और तत्वों से बने होते हैं, वे रंग और तत्व ही टिकाऊ नहीं होते। मनुष्य की कल्पना तभी मूर्त रूप लेती है जब वह कल्पना ज्ञान के धरातल पर खड़ी होती है।
विकारों वाला गृहस्थ जीवन
आज मनुष्य का जैसा गृहस्थ जीवन है उससे वह स्वयं भी असन्तुष्ट है। तभी तो वह गुरुद्वारे में जाकर कहता है "हे प्रभु, मुझमें कोई गुण नहीं, आप अवगुणहारी हैं, मेरे अवगुणों को दूर कीजिये। वह मन्दिरों में जाकर आरती करता है कि "हे देव! मेरे विषय-विकार मिटाओ और पाप हरो'! प्रश्न उठता है कि गुण-सागर परमात्मा की सन्तति, उस मनुष्य की ऐसी हालत क्योंकर हुई और पहले, आदिमकाल में वह किस स्थिति को प्राप्त था? इस प्रश्न का उत्तर हमें कुछ प्रचलित परम्पराओं से और मान्यताओं से भी मिल जाता है।
उदाहरण के तौर पर : विवाह पर जब वधु घर में आती है तो आज उसकी सास तथा सगे-सम्बन्धी कहते हैं कि लक्ष्मी घर में आई है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्राचीनकाल में वधु लक्ष्मी के समान कमल-हस्त, कमल-नयन, कमल-मुख अर्थात् पवित्र एवं दिव्य गुण सम्पन्न होती थी। तब अवश्य ही उसका धर्मपति श्री श्रीनारायण के समान सर्वगुण सम्पन्न और 16 कला सम्पूर्ण तथा सम्पूर्ण निर्विकारी होता होगा।
तभी तो आज पति-पत्नी श्रीलक्ष्मी-श्रीनारायण की भव्य मूर्तियों के सामने बैठकर कहते हैं - "आप सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम और अहिंसा-प्रधान हैं"।
आज जबकि कलियुग का अन्तिम चरण है और सतयुग की पावन वेला प्रारम्भ होने जा रही है तब परमपिता परमात्मा नर को श्रीनारायण और नारी को श्रीलक्ष्मी बनाने वाला सर्वोत्तम और सच्चा गीता-ज्ञान फिर से सुना रहे हैं तथा अपने कर्मों को दिव्य गुण-युक्त बनाने का विधि-विधान भी स्पष्ट रूप में हमारे सामने रख रहे हैं। अतः अब योगाभ्यास द्वारा श्रीलक्ष्मी और श्रीनारायण के समान पावन और पुनीत, ऊँचा और आदर्शमय जीवन बनाने का चिर-प्रतीक्षित एवं एक-मात्र सुअवसर है।
सहज योग के आधार -सम्बन्ध, स्नेह और स्मृति
कुछ लोग यह समझते हैं कि योग कोई बहुत कठिन क्रिया है। अतः वे स्वयं को गृहस्थ और व्यापार में व्यस्त पाकर यह मान लेते हैं कि वे तो योग का अभ्यास कर ही नहीं सकते। वास्तव में ऐसी धारणा भ्रम-मूलक है क्योंकि ईश्वरीय योग तो बहुत सहज है और उसका अभ्यास करने का गृहस्थी लोगों का भी अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति योग के विधि-विधान को और उसके आधारभूत नियमों को थोड़ा समझ ले तो वह हमसे अवश्य ही सहमत होगा कि योग सचमुच कोई कष्ट-साध्य क्रिया नहीं है।
इस बात को स्पष्ट करने के लिए हम एक लौकिक उदाहरण देते हैं। सभी जानते हैं कि एक सुकोमल शिशु का प्यार पहले-पहले केवल अपनी माता तक ही सीमित होता है। वह उससे इतना चिपटा रहता है कि यदि उसकी मौसी भी उसे अपनी ओर बुलाना चाहे तो वह मुँह फेर लेता है। इसका कारण यह है कि अभी वह माँ ही के लालन-पालन और हाव-भाव से प्रभावित है और उस ही के सम्बन्ध में उसका मन जुटा है। परन्तु जब वह कुछ बड़ा होता है तो गली-मोहल्ले के बच्चों के साथ खेल-कूद करने लगता है और उसका स्नेह माता से थोड़ा-कुछ स्थानान्तरित होकर दोस्तों से जुट जाता है। यहाँ तक कि कभी-कभी जब माता उसे लाड़-प्यार से घर वापस भी बुलाती है तो वह उसके आह्वान की भी उपेक्षा कर दोस्तों के साथ खेल में लगा रहता है।
जब वह कुछ और बड़ा होता है तो उसके सहपाठी और शिक्षक भी स्नेह-भाजन हो जाते हैं। फिर जब वह शादी कर लेता है तो उसका स्नेह पत्नी से अधिक जुट जाता है। इसके बाद सन्तान होने पर उसका स्नेह पत्नी से भी कुछ-कुछ स्थानान्तरित होकर बच्चों में जा टिकता है।
यह सबकुछ सहज और स्वतः ही होता है। किसी भी व्यक्ति को इस बात का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है कि वह अपने स्नेह को स्थानान्तरित करके दूसरे में कैसे लगाये बल्कि यह तो संसार का शाश्वत नियम है कि जिससे सम्बन्ध हो, उससे स्नेह होता है और जिससे स्नेह हो उसकी स्मृति अथवा याद स्वतः ही आती है। जिसके साथ स्नेह न हो, उसकी तो याद लानी पड़ती है। परन्तु, जिससे हमारा घनिष्ट स्नेह हो उसकी तो याद मीठे रूप से 'सताती' ही है। पुनश्च, स्नेह की मात्रा केवल सम्बन्ध पर ही निर्भर नहीं करती बल्कि उससे हमें प्राप्ति कितनी होती है अथवा हमारा भला कितना होता है, उस पर भी निर्भर करती है। ठीक इसी प्रकार, यदि हमारी बुद्धि में यह निश्चयात्मक ज्ञान हो कि परमात्मा हमारा माता-पिता, शिक्षक, सद्गुरु, बन्धु, सखा, नहीं-नहीं सर्वस्व है और वही हमारा एकमात्र कल्याणकारी भी है तो हमारा मन स्वतः ही उसकी याद में स्थित होकर आनन्द-मग्न होगा।
यूँ तो रोगी को भी डॉक्टर की और सेवक को स्वामी की याद आती है। परन्तु, उसमें सम्बन्ध का वह रस नहीं होता जो पिता-पुत्र के सम्बन्ध में या अन्य सम्बन्ध में होता है। अतः परमात्मा को अपना माता-पिता मानते हुए अथवा आत्मा के नाते से सर्व-सम्बन्धी मानते हुए उससे हार्दिक स्नेह-पूर्ण स्मृति का नाता जोड़ना ही योग है जोकि किसी भी प्रकार कठिन नहीं है।
योगाभ्यास की विधि
योगाभ्यास के लिए किसी विशेष आसन पर बैठने की आवश्यकता नहीं है बल्कि किसी भी स्वच्छ एवं एकान्त स्थान पर सहज रूप से बैठ जाइये ताकि आप बिना कठिनाई के कुछ समय तक स्थित हो सकें। योग के लिए किसी हठ-क्रिया या प्राणायाम की भी आवश्यकता नहीं बल्कि प्राणों के पति परमात्मा की सच्ची लगन की ज़रूरत है। किसी मंत्र की भी आवश्यकता नहीं बल्कि परमात्मा का प्रेम ही मंत्र है; उस इष्ट पर मुग्ध होना ही स्थिरता का परम साधन है। तब प्रश्न उठता है कि योगाभ्यास कैसे करना है?
अभ्यास कैसे ?
अभ्यास का सारा खेल मन पर ही आधारित है। मन में पहला संकल्प यह आना चाहिए कि ' मैं ज्योति-बिन्दु आत्मा हूँ'। फिर मन को सूर्य-चाँद-तारागण इत्यादि के भी पार परमधाम अर्थात् ब्रह्मलोक में ले जाना चाहिए। इसे ही कुछ लोगों ने 'प्रत्याहार' (अन्य विषयों एवं वस्तुओं से मन को हटाना) कहा है। अब वहाँ परमपिता परमात्मा ज्योति-बिन्दु शिव पर मन को एकाग्र करना है। इसे ही 'धारणा' और 'ध्यान' कहा गया है। इसके लिए परमपिता परमात्मा के परिचय को ही मन में दोहराना है अर्थात् परमात्मा को ही सम्बोधित करते हुए, उनके गुण, कर्म, प्रभाव इत्यादि की प्रेममय स्मृति को मन में दोहराना है ताकि मन उसमें स्थित हो जाये। जब इसमें स्थिति होगी तब ईश्वरानुभूति होगी तथा आप प्रकाश, शक्ति, शान्ति और आनन्द के अविरल प्रवाह में स्वयं को अनुभव करेंगे। लग्न में मग्न होने की यही विधि है।
बार-बार मन को परमधाम (ब्रह्मलोक) में ले जाएँ। वहाँ पर सूर्योदय के समय के जैसा अव्यक्त प्रकाश ही सर्वत्र है। इसी प्रकाश तत्व (ब्रह्म) में ज्योतिस्वरूप, बिन्दु रूप, परमपिता शिव पर मन को एकाग्र करते हुए, इस प्रकार मनन करें - "मैं एक ज्योति-बिन्दु आत्मा हूँ..... शिव बाबा, मैं आपका बच्चा हूँ.....। आप ज्ञान के सागर, शान्ति के सागर, आनन्द के सागर, प्रेम के सागर और सर्वशक्तिवान हैं....."।
इस योग के अभ्यास के लिए आहार एवं व्यवहार को शुद्ध बनाये रखना तथा संयम-नियम से जीवन व्यतीत करना ज़रूरी है। इसके लिए नियमित रूप से किसी भी ईश्वरीय सेवाकेन्द्र पर पधार कर अभ्यास-विधि को सीखा जा सकता है।
स्मृति ही वृत्ति और कृति का आधार
मनुष्य की जैसी स्मृति होती है वैसी ही उसकी वृत्ति होती है और तदानुसार ही दृष्टि होती है। उदाहरण के तौर पर जब मनुष्य को यह स्मृति आती है कि अमुक मनुष्य उसका शत्रु है, तो उसकी वृत्ति में घृणा और द्वेष आ जाते हैं और उसकी दृष्टि भी वैसी ही बन जाती है। इसी प्रकार जब मनुष्य की स्मृति में यह भाव आता है कि अमुक मनुष्य उसका हार्दिक मित्र एवं सहयोगी है तो उसकी वृत्ति में प्रेम, सद्भावना तथा सहयोग-भावना जागृत होती है। फिर, मनुष्य की जैसी वृत्ति और दृष्टि हो, वैसी ही उसकी कृति होती है और कृति (कर्म) के अनुसार ही उसकी गति होती है।
इस सत्यता को जानते हुए योगी अपने मन को परमात्मा और उसके गुणों की स्मृति में लगा देता है। इससे उसकी वृत्ति, दृष्टि, कृति और संस्कार दैवी बन जाते हैं। मनुष्य से देवता बनने का यही साधन है।
चरित्र गया तो सबकुछ गया !
योगी वह नहीं जो परिस्थितियों से भाग कर या तो जंगल में चला जाये और या परिस्थितियों तथा वातावरण से प्रभावित होकर नैतिक मूल्य ही छोड़ दे तथा उच्च आदर्श से गिर जाये अथवा डाँवाँडोल स्थिति में आ जाये। योगी वह है जिसमें सदाचार की और चरित्र की नींव सुदृढ़ है। वह माया के सामने डट कर रहता है और चरित्र को अपनी अनमोल निधि मानते हुए उसे बढ़ाता है।
कुछ लोग सुख और समृद्धि तक पहुँचने के लिए सदा लघुतम रास्ता (शॉर्ट-कट) निकालना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि कोई ऐसा ढंग अपना लिया जाय जिससे कि वह खूब पैसा भी बनाए, मान भी मिले, मेहनत भी न करनी पड़े और किसी नियम की पाबन्दी भी न रहे। परन्तु यह एक निश्चित बात है कि संयम-नियम के जीवन को छोड़कर व्यसनों को अपनाने से मनुष्य को अन्त में पश्चाताप ही का सामना करना पड़ता है। नैतिक मूल्यों को छोड़ने से एक दिन मनुष्य का मान मिट्टी में मिल जाता है। धोखेबाज़ी से इकट्ठा किया हुआ धन अन्ते मनुष्य के दुःख ही का कारण बनता है। सच तो यह है कि चरित्र गँवा देने से मनुष्य शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति, बौद्धिक प्रतिभा, हार्दिक हर्ष, जन-मन में स्नेह-सम्मान और धन-दौलत सबकुछ गँवा बैठता है।
चरित्र नाश से सर्वनाश
मान लीजिये कि एक व्यक्ति को शराब का व्यसन लग जाता है। वह नशे का गुलाम तो बन जाता है, साथ में बुद्धि का संतुलन और स्वमान भी गँवा बैठता है। लोग उसे नालियों में पड़ा हुआ देखते हैं और जैसे-तैसे घर उठा लाते हैं। नशे में अनजाने से न जाने वह क्या कुछ बक देता है और सभी के मन में अपने लिए घृणा पैदा करता है।
जाम-पर-जाम, प्याले-पर-प्याला चढ़ाने पर मज़बूर वह मनुष्य शराब के लिए रिश्वत तक लेने पर मज़बूर हो जाता है। अब उसके लिए घर-गृहस्थी, समाज और सरकार के नियम और कानून कुछ भी कीमत नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि आख़िर वह एक दिन पकड़ा जाता है, पुलिस उसे हथकड़ी लगा कर ले जाती है। उसकी शराबखोरी और घूसखोरी उसकी इज़्ज़त की लुटिया डुबोते-से मालूम होते हैं। टैक्स की चोरी और रिश्वत के अपराध से स्वयं को साफ़ सिद्ध करने के लिए वह वकील को साथ लेकर न्यायालय में प्रवेश करता है। इस चक्कर में उसे चिन्ता भी चिपट जाती है और अब धन भी चौपट होने लगता है।
इतने से पल्ला नहीं छूटता बल्कि देखा-देखी उसके बच्चे भी बुरी संगम में फंस कर जुए और जेब-तराशी के शौकीन हो जाते हैं।
परिणाम क्या होता है कि मनुष्य को चिन्ता, भय, अफ़सोस और अपमान रोगी बना कर मार डालते हैं। हाय! हाय !! चरित्र को चट करने वाला मनुष्य धन, मान, शान और ईमान खोकर खाली हाथ अपनी अन्तिम यात्रा पर चल पड़ता है! और, अगले जीवन में समाज के निकृष्ट वर्ग में निःसहाय और निर्बल हालत में जैसे-तैसे दिन काटता है। संसार के सजीव चित्र को देखकर यह सच मानना पड़ता है कि चरित्र गया तो सबकुछ गया। इस बात को ध्यान में रखते हुए योगी चरित्र को उच्च बना कर सर्वस्व प्राप्त कर लेता है।
एक का अनेक पर प्रभाव
आज बहुत-से लोग कहते हैं जहाँ संसार के सभी लोग हैं, हमें भी वहीं रहने दो क्योंकि आज के युग में 'पवित्रता' से काम नहीं चलता। दूसरी ओर संसार में ऐसे भी लोग हैं जो चरित्र का महत्व तो मानते हैं परन्तु चरित्र के नियमों का पालन नहीं करते हैं। वह कहते हैं "अकेले हमारे चरित्रवान बनने से क्या होगा? मैं तो चरित्रवान बनने को तैयार हूँ परन्तु दूसरे लोग भी चरित्र की मर्यादा को अपनाएँ, तभी तो कुछ बात बने। एक अकेले के चरित्रवान बनने या न बनने से तो संसार में कोई अन्तर पड़ेगा नहीं"। इस प्रकार के निर्बल तर्क प्रस्तुत करते हुए वे स्वयं तो चरित्र-धन से अथवा पवित्रता के आनन्द से वंचित रहते ही हैं परन्तु वे दूसरों को भी हत्सोत्साहित करते हैं।
एक व्यक्ति अनेकानेक को प्रभावित करता है
परन्तु कोई देखना चाहे तो एक का महत्व संसार में स्पष्ट दिखाई देता है। आज एक व्यक्ति साधारण है, कल वह अपने परिश्रम से तथा जन-सहयोग से नेता बन जाता है। तब वह जैसा बोलता है, जो कुछ कहता है और करता है उसका प्रभाव हज़ारों मनुष्यों पर पड़ता है। आज किसी पाठशाला में छोटा-सा बालक अथवा विद्यार्थी है, कल वह युवा होकर एक बड़े दफ्तर में सुपरिंटेंडेंट (अधीक्षक) बन जाता है और अनेकानेक व्यक्ति उसके अधीन, उसकी बनाई रूपरेखा के अनुसार काम करते हैं। उसकी गतिविधियों का, रीति-नीति का, विचार-विमर्श का दूसरों पर भी कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है। आज जो कन्या है, कल वही बड़ी होकर माता बन जाती है और जैसा उसका स्वयं का चरित्र होता है वैसी ही लोरी और वैसा ही प्रशिक्षण वह अपने नन्हें-मुन्नों को देती है, गोया वही कल के परिवार की विधात्री का काम करती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक का प्रभाव अनेकानेक पर पड़ता है। कहावत भी है कि खरबूजे को देखकर खरबूज़ा रंग पकड़ता है।
इस विषय में अकबर और बीरबल से सम्बन्धित एक किस्सा भी मशहूर है। किस्सा इस प्रकार मशहूर है कि अकबर ने एक बार बीरबल से पूछा कि - "बीरबल इस नगर में ईमानदार लोग ज़्यादा हैं या बेईमान'? बीरबल ने कहा - "जनाव ! एक हफ्ते की मोहलत दीजिये ताकि इस बात की जाँच की जा सके"। अकबर ने कहा "बीरबल, एक हफ्ते में सभी मनुष्यों की जाँच कैसे कर सकोगे?" बीरबल हाज़िर जवाब तो था ही, बोला "महाराज सरकार की ओर से एक खाली तालाब बनवा दिया जाये और इस नगर में ढिंढोरा पिटवा कर यह राज़-आज्ञा सुनवा दी जाये कि अमुक तिथि को रात्रि के अंधेरे-ही-अंधेरे में प्रातः होने से पहले, हर व्यक्ति एक लोटा दूध का उसमें डालकर जाये।
हुआ यह कि हर व्यक्ति ने यह सोच लिया कि सब लोग तो दूध डालेंगे ही, तब यदि मैंने दूध की बजाय पानी का लोटा डाल दिया तो इसका कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। जैसा विचार, वैसा आचार की उक्ति के अनुसार हरेक ने रात के अंधेरे में पानी का लोटा तालाब में डाल दिया। प्रातः अकबर ने जब निरीक्षण किया तो यह देखकर हैरान रह गया कि किसी ने भी दूध का लोटा नहीं डाला था। कहने का भाव यह है कि हमें दूसरे मनुष्यों को नहीं बल्कि आदर्श को अपने सामने रखना चाहिए और यह भी समझना चाहिए कि व्यक्ति समाज की इकाई है। यदि हम आदर्श को सामने रखते हुए पवित्र नहीं बनेंगे तो 'योगी' कैसे बनेंगे?
मोह और ममता को त्यागो
योगी और भोगी में एक मुख्य अन्तर यह है कि योगी 'नष्टोमोहः' होता है जबकि भोगी में मोह अथवा आसक्ति होती है। अतः योगी बनने का अर्थ है - घर-गृहस्थ में रहते हुए भी मोह को त्यागना।
लोग नहीं जानते कि दुनिया में मोह बहुत-से पापों की जड़ है; बल्कि वे तो कहते हैं कि मोह के बिना गृहस्थ की गाड़ी चल नहीं सकती! वे दलील देते हैं कि मोह के बिना न तो माँ, बच्चों का पालन कर सकती है, न ही पिताजी रोजगार के लिए दफ्तर की कोफ्त कर सकते हैं। परन्तु वास्तव में इन दलीलों में कोई तथ्य नहीं क्योंकि गृहस्थ की गाड़ी मोह से चलती नहीं बल्कि बिगड़ती है और रोज़गार बनता होगा परन्तु संसार का कार्य-व्यापार-व्यवहार तो बिगड़ता ही है। तभी तो मोह की गणना नरक के द्वारों में है।
मोह-वश माँ, बच्चे को सारा दिन खर्चने के लिए पैसे और खाने के लिए मुँह-माँगी चीजें देती रहती है। नतीजा यह होता है कि बच्चा बड़ा होकर फजूल खर्च बन जाता है और पेटुआ बन कर कई इल्लतों तथा बीमारियों में फँस जाता है। माँ का मोह उसे इन्द्रियों और आदातों का गुलाम बनने में साधन सिद्ध होता है; बताइये, क्या यह ठीक हुआ?
गृहस्थ - मोह के बिना अच्छा चल सकता है
मान लीजिये कि किसी बच्चे को बार-बार पैसा माँग कर खाने-पीने की तथा जुआ खेलने की आदत पड़ गई है। पिताजी बच्चे को पैसा देने से इंकार कर देते हैं परन्तु उसकी भोली सूरत और तोतली भाषा पर मोहित होकर माँ उसे पैसा दे देती है। तब परिणाम क्या होगा? बच्चा जुआरी बन जायेगा और बड़ा होकर घर की दौलत को एक दिन दाव पर लगा डालेगा न? इससे अच्छी तो उस गृहस्थ की गाड़ी चलेगी जिसमें माता-पिता बच्चों के मोह-जाल में न फँस कर उनमें अच्छी आदत डालेंगे और उन्हें अच्छे खेल खेलने को कहेंगे। गोया सच्चा प्यार तो यही हुआ कि जिससे बच्चों का भला होता है।
इसी प्रकार, मान लीजिये कि आज दफ्तर से पति को समय पर घर आने में देर हो गई क्योंकि कार्य कुछ अधिक था। इसी बीच पत्नी को मोहवश चिन्ता लग गई कि पता नहीं पतिदेव क्यों नहीं आये। चिन्ता में उसे दुर्घटना के भी चित्र दिखने लगते हैं और वह स्वयं को वेदना में पाती है। नतीजा यह होता है कि थके हुए पतिदेव के लौटने पर, वह उन पर भी भरे मन से और थके चेहरे से प्रश्नों की बौछार कर देती है। बताइये, झगड़ा ही तो होगा न, जो चिन्ता और भय ने सताया था सो अलग। इससे अच्छा तो यह था कि धैर्य धारण करते हुए, प्रभु-स्मृति में टिका जाता और पति के लौटने पर खुश होकर, थके पति को स्नेह से स्वादिष्ट भोजन दिया जाता। इससे दिव्य गुण का भी लाभ होता, आनन्द का भी और सम्बन्धों में स्नेह भी बढ़ता।
अनुमान कीजिये कि घर में बच्चा बीमार हो गया। माता जी मोह के कारण चिन्ता से मरी जा रही हैं! उनके हाथ-पाँव सुन्न-से हो रहे हैं और परवश होकर वे सेवा भी नहीं कर सकती। तो बात बिगड़ेगी ही न? इसके बजाय तो नर्स की भान्ति यदि बच्चे की सेवा की जाये और प्यार से उसे स्वास्थ्य का आश्वासन दिया जाये तो अच्छा होगा। अतः ठीक ही कहा है कि मोह के नाते तोड़ कर ईश्वर से नाता जोड़ो और सभी से शुद्ध, आत्मिक-प्यार करो और गृहस्थ में कमल-पुष्प की तरह रहो! योगी की यही रीति और नीति है। उसके लिए यही विधि और विधान है।
सहनशीलता महानता का चिह्न है
दिव्य गुण योग में सहायक होते हैं और आसुरी लक्षण बाधक। अतः योगयुक्त अथवा स्थित-प्रज्ञ होने के लिए दिव्य गुण धारण करना ज़रूरी है। उन दिव्य गुणों में सहनशीलता का विशेष महत्व है।
देखा जाये तो वास्तव में हरेक दिव्य गुण मनुष्य को महानता के शिखर पर ले जाता है, उसे धन-हानि और अशान्ति से बचाता और उसे सुख तथा शान्ति रूपी अनमोल निधि भी देता है। 'सहनशीलता' नामक दिव्य गुण पर ही विचार कीजिये। जब एक मनुष्य झगड़ा करता है और दूसरा सहन कर लेता है तो बात वहीं थम जाती है; तब न पुलिस में जाने की नौबत आती है, न मुकद्दमेबाज़ी की और न ही बाद में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत जब दो पक्ष सहनशीलता को ताक पर रखकर आपस में टकरा जाते हैं तो वे मकानों को आग लगा देते हैं, चलते कारखाने बन्द हो जाते हैं। अतः निश्चय ही सहनशीलता एक बहुत उच्च गुण है।
योग द्वारा सहनशीलता और सहनशीलता द्वारा योग-स्थिति
सहनशीलता ईश्वरीय ज्ञान और योग ही की उपज है। ज्ञान तथा ईश्वरीय स्मृति ही मनुष्य को शीतलता और सहनशक्ति प्रदान करते हैं। उदाहरण के तौर पर मान लीजिये कि एक सास अपनी बहू से जल-भूनकर अपने बच्चे के समक्ष उसकी खूब ग्लानि, निंदा और शिकायत करती है। बहू के कानों में इसकी भनक पड़ जाती है। परन्तु, यदि वह ज्ञानवान है तो सास के प्रति उसके मन में घृणा और रोष पैदा नहीं होता बल्कि उसके साथ किन्हीं पूर्वजन्मों का हिसाब-किताब मानकर मन को प्रभु की स्मृति के रस में लवलीन कर लेती है। वह प्रसिद्ध युक्ति "निन्दा हमारी जो करे, मित्र हमारा सो" के अनुसार सास के प्रति भी मैत्रीभाव बनाये रखती है। अन्ते उसकी महानता छिपी नहीं रहती।
उसका पति भी माँ द्वारा उसकी निन्दा सुनकर तिलमिलाता नहीं क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान उसे इस सत्यता के प्रति सचेत करता है कि कान और आँख में चार अँगुली का अन्तर होता है क्योंकि हम देखते तो अपनी आँखों से हैं और सुनने वाला हमें सुनाता है अपने दृष्टिकोण से, अपना अनुमान लगाकर, अपनी व्यक्तिगत शैली का प्रयोग करके और उसमें कुछ नमक-मिर्च लगाकर। अतः यह समझते हुए, पति भी अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रखता है।
इसी प्रकार, मान लीजिये कि एक व्यक्ति स्टेशन पर कोई पॉर्सल कराने गया है। तौल की मशीन के पास खड़े हुए उस व्यक्ति पर अचानक ही, अनजाने से एक मजदूर भारी पेटी गिरा देता है। तब उस व्यक्ति के मन में एक क्षण के लिए क्रोध तो आना चाहता है परन्तु ईश्वरीय ज्ञान उसे यह स्मृति
दिलाता है - परमात्मा दुःखहर्त्ता और सुखकर्त्ता है, शान्ति दाता और कल्याणकारी है और इसलिए उस परमपिता का पुत्र होने के नाते उसका भी कर्त्तव्य है कि वह किसी को दुःख न दे और दूसरों को भी आत्मिक दृष्टि से तथा भले के नाते से देखे। इस प्रकार का ईश्वरीय ज्ञान और ऐसी ईश्वरीय स्मृति (योग) उसे सहनशीलता प्रदान करनी है कि जिसे देखकर अपराधी भी करबद्ध होकर उसकी महानता के समक्ष नतमस्तक हो जाता है।
गुणग्राहकता
योगी बनने के लिए ज़रूरी है कि मनुष्य सदा परमपिता ही के गुणों का चिन्तन करता रहे और दूसरों में भी गुणों को ही देखे, उनके अवगुणों को चितवन न करे, वरना उसका योग टूट जायेगा अर्थात् वह योग-भ्रष्ट हो जायेगा। सभी के गुणों को धारण करने से ही हम सर्वगुण सम्पन्न बन सकते हैं और भाव-स्वभाव के टकराव से सुरक्षित रह सकते हैं।
सद्गुणों से ही मनुष्य देवता बनता है और उनको दबा देने से असुर। गुण-ग्राहक मनुष्य ही वास्तव में प्रभु-पसन्द और मन-पसन्द होता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि जैसे हँस मोती चुगता है अथवा क्षीर ले लेता है, नीर छोड़ देता है, वैसे ही वह सद्गुण ग्रहण कर ले और अवगुणों को त्याग दे।
फूलों से प्रेरणा
देखो तो सुन्दर-सुन्दर फूल समीर में सुगन्धि बिखेरते हैं, वह सुगन्ध उनमें पैदा कहाँ से होती है? उन्हें जो खाद दी जाती है वह तो बहुत ही सड़ान्ध तथा दुर्गन्धपूर्ण होती है और कालिमा, कुरूपता तथा कठोरता को लिए होती है। परन्तु पुष्प उसमें से भी किसी प्रकार कोमलता, रंगीनगी, सौन्दर्य और सुगन्धि लेकर ऐसा तो खिल जाता है कि उसे देखने वाले के मुख पर भी मुस्कान, उनके नेत्रों में ताज़गी और उसके मन में हर्ष भर जाता है!
संसार में मनुष्य के सामने भी अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ आती हैं और उसका सम्पर्क भी विभिन्न प्रकार के लोगों से होता है। यदि वह उन परिस्थितियों में भी गुण-ग्राहकता का दृष्टिकोण बना ले और हरेक मनुष्य में जो गुण हैं, उन्हीं को देखे तो एक-एक व्यक्ति से एक-एक गुण लेते हुए भी वह सर्वगुण सम्पन्न बन सकता है।
वृत्ति, दृष्टि और स्थिति का सम्बन्ध
सचमुच, मनुष्य की दृष्टि और वृत्ति पर बहुत कुछ निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर, मान लीजिये कि एक व्यक्ति अपने दो मित्रों को स्नेह-भरे स्वर में भोजन के लिए आमंत्रित करते हुए कहता है कि - "भाई! कभी हमारे गरीबखाने में भी पधारो! काफी समय से हम लोग मिले भी नहीं हैं। कुछ हँसेंगे, बहलेंगे और बातचीत भी करेंगे"। दोनों मित्र निमंत्रण स्वीकार कर नियत दिन पर उसके यहाँ भोजन करने जाते हैं और वह मेजबान बिना किसी तकल्लुफ़ के, परन्तु प्रेम और सादगी से बनाया गया भोजन उनके आतिथ्य में पेश करता है। वापस लौटते हुए उनमें से एक व्यक्ति दूसरे से कहता है - "इसने तो हमें निमंत्रण देकर सादा-सा ही खाना खिलाया है। मैं तो फिर कभी इसका निमंत्रण स्वीकार करके अपना समय नष्ट नहीं करूंगा"। दूसरा उसे उत्तर में कहता है "अरे भाई! यह क्या कह दिया? जहाँ अपनापन होता है, वहाँ तकल्लुफ़ थोड़े ही होता है? उसने तो हमें अपने घर का ही समझ कर जैसा हो सका, वैसा खिलाया है। तुम यह नहीं देखते कि उसमें कितना स्नेह था? अरे भाई! खाने का निमंत्रण तो एक बहाना ही था। वास्तव में भाव तो यह था कि हम दिल खोलकर बातें करेंगे"। देखिये तो एक गुण-ग्राहक बन हर्षित हो रहा है और दूसरा अवगुण ले जल-भून रहा है!
सद्गुणों के सागर तो एक ज्योति स्वरूप परमात्मा शिव ही हैं जो ही प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा हमें अब फिर से सर्वगुण सम्पन्न बना रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम उस शिक्षा को धारण करें।
क्रोध रूप अग्नि जन्म-जन्म जलाये
मनुष्य योगाभ्यास से निर्विकार बनता है। वह जितना जितना निर्विकार बनता है, उतना-उतना ही उसका योग अच्छी तरह लगता है अथवा वह आनन्द अनुभव करता है। क्रोध मनुष्य को प्रभु से विमुख करता है, अतः मनुष्य को शान्त रहना चाहिए। योगी सदा शान्त होता है।
भगवान के महावाक्य हैं- "हे वत्स, काम-क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं"। परन्तु यह कैसी आश्चर्य की बात है कि मानव भगवान के इन महावाक्यों से अवगत होने पर भी इस द्वार से पीछे हट पवित्रता रूप सुख-शान्ति के द्वार में नहीं जाता। वह प्रतिदिन गीता का पाठ भी कर लेता है, आरती करते हुए भगवान से यह प्रार्थना भी कर लेता है कि "हे प्रभु, मेरे विषय-विकार मिटाओ और पाप हरो"। और फिर दिन-भर लोभ-लालसा में, मोह-ममता में, क्रोध-विरोध में ही पड़ा रहता है और काम के कीचड़ में तो मोरी के कीड़े की तरह पड़ा रहता है।
काम-क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ये पाँचों विकार पंचाग्नि ही हैं जोकि आत्मा को जन्म-जन्मान्तर जलाते हैं। परन्तु इनमें से क्रोध तो स्पष्ट रूप से मनुष्य के मानस को जलाता दिखाई देता है और छूआछूत की बीमारी की तरह व अग्नि की लपटों की तरह एक से दूसरे को अपनी पकड़ में ले लेता है।
हर परिस्थिति में शान्त
मान लीजिये कि किसी मनुष्य को एक दिन खाना स्वादिष्ट नहीं मालूम होता। इसका भीतरी और मूल कारण तो उसकी अपनी मानसिक उलझनें ही होती हैं परन्तु अपनी समस्याओं से सताया हुआ वह व्यक्ति स्नेही गृहिणी द्वारा लाया हुआ खाना भी निरादर-भाव से उठाकर फेंक देता है। गोया अपनी ही कमाई को खाक में मिला देता है और बन्धु-बान्धवों से नेह का नोता तोड़ कर अपने लिए काँटे बोता है। वह स्वयं तो क्रोधाग्नि में बुरी तरह जलता ही है, पर उसका कुप्रभाव घर के दूसरे सदस्यों पर भी पड़ता है। उसे क्रोध करता हुआ देखने वाला बच्चा भी कल को ऐसा ही विकर्म कर बैठता है और तंग आई हुई उसकी पत्नी भी बच्चे के भोलेपन को भूलकर उस पर डण्डे बरसाने पर उतारू हो जाती है। गोया सारा घर नरकमय ही बन जाता है।
क्रोध में आकर कर्मचारी उस कारखाने पर भी पथराव कर देते हैं जोकि उनके रोटी-कपड़े का साधन है। गुस्से में आकर कारखाने के मालिक भी अनिश्चित दिन तक कारखाना बन्द कर देते हैं और इस प्रकार घाटे का काम करते हैं।
अन्ते, अभिमान और कामनाओं की चिंगारियों से सुलगने वाला क्रोध इतना विकराल रूप भी ले लेता है कि जिससे सारी दुनिया इसकी लपेट में आ जाती है और इसका अधिकांश भाग रूस, अमेरिका इत्यादि देशों द्वारा चलाये गये एटम बमों तथा हाइड्रोजन बमों द्वारा जलकर खाक हो जाता है। अब ऐसा ही समय आ पहुँचा है।
सदा शीतल रहो
इसके विपरीत, ज्ञानवान तथा योग-युक्त मनुष्य सहनशील और शीतल स्वभाव का होता है। यदि भूल-चूक से घर में किसी सदस्य द्वारा कोई नुकसान हो भी जाये (मान लो कि कोई घड़ी ही हाथ से छूट कर टूट जाये) तो वह कलह नहीं करता बल्कि धीरज बंधा कर, कोमल भाषा में आगे के लिए सावधान मात्र करता है। वह इस सृष्टि को विराट नाटक मानकर, साक्षी भाव से इसे देखता तथा लगाव-रहित स्थिति में अभिनय करता है।
वास्तव में हम सभी को चाहिए कि हम क्रोध को एक भूत मानते हुए, इससे बचकर रहें अथवा इसे अग्नि मानते हुए इससे सुरक्षित रहें। यही सुख-शान्ति का उत्तम उपाय है।
मत कर बन्दे अभिमान...
यह संसार दो घड़ी का मेला है और मनुष्य का धन-मकान, उसका सौन्दर्य और मान श्रावण-भादो की धूप-छाओं की तरह आने-जाने वाली चीजें हैं। अत इनका अभिमान मिथ्या है।
ये सब नश्वर हैं
परन्तु हम देखते हैं कि किसी स्त्री को अपनी चमड़ी (त्वचा) के रंग-रूप का अभिमान है तो किसी पुरुष को अपनी दमड़ी का। आश्चर्य की बात है कि मनुष्य दूसरे के चमड़े को तो अशुद्ध मानता है परन्तु अपनी त्वचा, जिसके नीचे सीवर और परनाले से हैं, उनकी बाहरी बनावट या रंगीन दिखावट पर इतराता है! मनुष्य यह भूल जाता है कि उमरिया बीती जाती है और शरीर रूप रैन बसेरे से आत्मा-रूप मुसाफ़िर कभी भी चला जा सकता है। वह देखता भी है कि पाँच मिनट पहले जो व्यक्ति टेलीफोन पर बात कर रहा था और अपनी साहूकारी की शान जतला रहा था, अभी-अभी हृदय-पीड़ा से तड़प-तड़प कर मर गया है और उसके धन-दारा यहीं धरे-के-धरे रह गये हैं। परन्तु फिर भी समझदार मनुष्य की यह ना-समझी है कि धन-दौलत के नशे में चूर होकर अथवा अपनी खाल और खोपड़ी (बुद्धि जो वास्तव में खो पड़ी है) की डींग मारता रहता है!
दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि मनुष्य को अपनी जाति का अथवा कुल का भी नाज़ होता है। यह कुल और कलत्र तो देह के साथी हैं और देह तो स्वयं भी आत्मा का स्थायी साथी नहीं और काल तथा धर्मराज तो मनुष्य के कर्मों ही को पूछते हैं और कुल की या जाति की परवाह नहीं करते। अतः इसका अभिमान गोया मिथ्या ही अभिमान है।
धन का गर्व किसलिए?
कुछ लोग स्कूल-कालेज में थोड़ा पढ़-पढ़ा लेते हैं अथवा कुछ धन-दौलत कमा-बना लेते हैं तो वे भी उसके नशे में अपने बुर्जुगों को भूल जाते हैं अथवा उनको डाँट-डपट देते हैं। "हम स्वयं कमाले वाले हैं, अतः हमारी कमाई से हम बुरा-भला जो भी चाहें सो करें आपका इससे क्या मतलब"? ऐसे क्रूर शब्दों द्वारा वे अपने माता-पिता को भी खरी-खोटी सुना दिया करते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह गोल पैसा और यह काग़जी नोट चल-चला और फट-फटा जाया करते हैं और सोना-चाँदी भी सदा साथी नहीं बने रहते; साथ तो मनुष्य के गुण, कर्म और संस्कार ही रहते हैं।
जो इस बात को समझते हैं, वे ही वास्तव में समझदार हैं; वे ही योगी बन सकते हैं। वे जाति-पाँति का अभिमान न करके सभी को आत्मिक दृष्टि से एक ही परमपिता की संतान मान कर भ्रातृत्व की भावना से ओत-प्रोत रहते हैं तथा मधुरभाषी और मित्र-मान्यतापूर्वक व्यवहार करते हैं। वे हितैषीजनों की राय-सलाह कान खोलकर सुनते हैं, नम्रतापूर्वक उनका अभिवादन करते हैं, बाँस की भाँति न अकड़ कर रहते हैं, न दूसरे से टकराते हैं, बल्कि हरे-भरे वृक्ष की न्यायी सेवा रूपी फल-फूल सभी को अर्पित करते हुए जीवन को सार्थक करते हैं। योगी निराकारी (विदेह अवस्था में), निर्विकारी और निरहंकारी होता है।
वास्तविक संन्यास
कई लोग यह माने बैठे हैं कि योगी बनने के लिए मनुष्य को गृहस्थ का संन्यास करना पड़ता है। परन्तु वास्तव में उनका यह विचार ग़लत है। वास्तव में तो योगी को मनोविकारों का, बुरी आदतों का अथवा देह-अभिमान और पर-चिन्तन का संन्यास करना होगा।
आज जन-साधारण को यही मालूम है कि 75 से 100 वर्ष की आयु को 'संन्यास आश्रम' कहते हैं। इसके अतिरिक्त, वे ऐसा भी मानते हैं कि जो लोग इस आयु-भाग से पहले घर-बार को और शरीर के सम्बन्धियों को छोड़कर भगवा अथवा गेरुवा वस्त्र पहन लेते हैं, वे भी संन्यासी ही हैं।
परन्तु आज तो भारतवर्ष के लोगों की औसत आयु भी 50 वर्ष से अधिक नहीं है। अतः बहुत से लोग 'संन्यासाश्रम' तो क्या वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश करने से पहले ही शरीर रूपी चोला बदल लेते हैं। तब क्या समझा जाय कि 90 प्रतिशत लोगों को ईश्वरानुभूति के लिए पुरुषार्थ करने का अवसर ही प्राप्त करने का अधिकार नहीं है? पुनश्च, 75 वर्ष की आयु तक तो आजकल के मानव का शरीर जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। उसके बनावटी दाँत भी नहीं टिक पाते, ऐनक के प्रयोग से भी उसे देखना मुश्किल हो जाता है और सरकार के दफ्तर से अपनी पेंशन ले आना भी उसे संकट मालूम पड़ता है। उसके सब शरीरांग शिथिल ही नहीं होने लगते बल्कि उसके संस्कार भी कपड़े पर काले रंग की तरह चढ़ चुके होते हैं, तब संन्यास करने का प्रयोजन ही क्या है?
सच्चा संन्यास
जैसे कि हम पहले कह आये हैं कि वास्तविक संन्यास तो विकारों ही का संन्यास है। समस्याओं से जूझने के बजाय भाग जाना तो मन की कमज़ोरी है। मान लीजिये कि किसी नवयुवक को उसके पिताजी बहुत ही डांट-डपट देते हैं और वे अपने दूसरे बच्चे को सदा ही उससे ज़्यादा प्यार किया करते हैं। अब हो सकता है कि उसके परिणामस्वरूप नवयुवक के मन में विचार आये कि अब इस घर में रहने के बजाय तो जंगल में ही जाकर एकान्तवास करना चाहिए। परन्तु ऐसा विचार घृणा, द्वेष तथा ईर्ष्या पर आधारित है। इसकी अपेक्षा, इन विकारों को छोड़कर, शान्तचित्त होकर तथा साक्षी-पन से व्यवहार करना ही वास्तविक संन्यास माना जायेगा।
इस प्रकार, मान लीजिये कि किसी व्यक्ति की पत्नी अतीव सुन्दर है। वह उसके रूप पर मोहित होने के कारण पवित्र नहीं रह सकता परन्तु उसे ब्रह्मचर्य का पालन करने की उत्कट अभिलाषा है। अतः उसके मन में एक ओर तो यह विचार उठता है कि "मैं पत्नी को छोड़कर वन की राह लूँ और साधु वेश धारण कर लूँ और दूसरी ओर उसे यह विचार आता है कि यह पत्नी तो देवी रूपा है अथवा शक्ति है। अतः इसके प्रति आसक्ति होने की अपेक्षा मेरे मन में सम्मान और पवित्र भाव होना चाहिए"। यदि वह पहले भाव को अपनाता है तब तो उसे 'पलायनवादी' ही कहेंगे और यदि वह दूसरे भाव को आचरण में लाता है और ब्रह्मचर्य का पालन करता है तो उसे 'सच्चा संन्यासी' कहेंगे।
इसी तरह, मान लीजिये कि एक व्यक्ति यह देखता है कि हरेक काम रिश्वत देकर ही करना पड़ता है और इस दुनिया में सब झूठ ही का धंधा चल रहा है। यह देखकर उसके मन में एक विचार तो यह आता है कि इस दुनिया ही को छोड़ दें और दूसरा विचार यह आता है कि दुनिया को नहीं, बुराई को छोड़ दिया जाये यह दूसरा विचार ही वास्तविक संन्यास की भावना को लिये हुए है।
कहने का भाव यह है कि वास्तव में बुराई का संन्यास ही सच्चा संन्यास है और इस संन्यास-धर्म का पालन बच्चे तथा बूढ़े सबको करना चाहिए। ऐसे ही संन्यास के कारण इस योग को 'संन्यास योग' भी कहते हैं।
गृहस्थ आश्रम
योग के लिए घर छोड़ कर जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि ब्रह्मलोक रूपी घर को याद करने की ज़रूरत है; यह संसार दुःख रूपी काँटों का जंगल तो है ही; तब अन्य किसी जंगल में जाने की क्या ज़रूरत है? आत्मा भृकुटि रूपी कुटिया में रहती है; इसके लिए जंगल में कुटिया बनाने की आवश्यकता क्या है? एक परमात्मा के अन्त में मन को टिकाना ही एकांत में रहना है, तब निर्जन स्थान ढूँढ़ने की क्या बात है?
वास्तव में गृहस्थ ही संसार के क्रिया-कलाप का केन्द्र-बिन्दु है। किसी भी देश के दस-बीस गृहस्थियों को देख लेने से वहाँ के समाज की दशा को जाना जा सकता है। और तो क्या, गृहस्थ और परिवार की स्थिति बदलने से ही युग का भी नाम बदल जाता है।
आज की गृहस्थी का नक्शा कुछ अटपटा-सा है। इसमें सतोगुण, स्नेह, सहयोग और संयम-नियम का नितान्त अभाव दीख पड़ता है। रोग, शोक, कलह-क्लेश, चिंता और चिलपों का आज हर घर में डेरा है। बच्चे भी बीमार-से दिखाई देते हैं। चेहरों पर उदासी छायी मालूम होती है और सम्बन्धों में अनबन अथवा तनाव बने रहते हैं। धर्म और शर्म, शान्ति और शालीनता के स्थान पर भौतिकता और बनाव-श्रृंगार तथा खटपट और अमर्यादा आसीन मालूम होते हैं।
आज गृहस्थ रूपी गाड़ी कुरीतियों, भद्दे रस्म-रिवाजों और अनेक प्रकार के व्यसनों से भरी है और गृहस्थी मनुष्य महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है तथा मिलावट से मरा जा रहा है और कठिनाई के कारण चिल्ला रहा है।
कुछ लोग ऐसे गृहस्थ को जंजाल और बबाल समझ कर तथा नगर को 'मगर' मानकर आबादी को छोड़कर जंगल में कुटिया बनाकर आबाद हो जाते हैं। वे उस कुटिया को 'आश्रम' कहते हैं। परन्तु इस बात को सभी मानेंगे कि इस पलायनवाद से गृहस्थ 'आश्रम' नहीं बनता बल्कि गृहस्थ अलग और 'आश्रम' अलग बन जाते हैं। इस पलायनवाद से समस्या का समाधान नहीं होता। संसार का स्थायी कल्याण तो तभी हो सकता है जब मनुष्य देह रूपी घर के भान का संन्यास करके स्वयं को भृकुटि रूपी कुटिया में रहने वाला आत्मा निश्चय करे।
आज गृहस्थ और आश्रम अलग-अलग
आज गृहस्थ और आश्रम अलग-अलग बनाकर मनुष्य यह मान बैठा है कि वह घर में तो पाप और संताप के कर्म कर सकता है और आश्रम में जाकर उन कर्मों के लिए दो क्षण प्रायश्यित करने के लिए जा सकता है। वास्तव में देखा जाय तो आश्रम भी बने हुए तो ईंट और पत्थरों से ही होते हैं; घर और आश्रम में अन्तर तो यह होता है कि आश्रम में मनुष्य माँस, मदिरा आदि म्लेच्छ आहार नहीं करता, सत्संग करता है, देह के नातों और व्यापार में हेरा-फेरी की चर्चा नहीं करता और स्वयं तो शान्त रहता ही है, यदि अन्य कोई किसी से झगड़ाबाज़ी कर रहा हो तो उसे भी समझाता है कि "भाई! यह आश्रम है, यहाँ क्रोध मत करो, शान्त रहो, शान्त रहो!
क्या ही अच्छा हो कि यही शान्ति, सत्संग, आस्तिकता और पवित्रता हम घर में बनाये रखें। तब यह गृहस्थ भी आश्रम हो जायेगा और पति 'धर्मपति' तथा पत्नी 'धर्मपत्नी' होंगी। तब परमपिता परमात्मा की स्मृति में रहते हुए मनुष्य योगी बन सकेगा।
गीता-ज्ञान की जीवन में धारणा
भारत में गीता-शास्त्र लोगों को अन्य सभी शास्त्रों से अधिक प्रिय है। वे प्रतिदिन इसके कुछ अध्यायों अथवा श्लोकों का पाठ करके ही अपनी दिनचर्या का प्रारम्भ करते हैं। परन्तु, बहुत-से लोग गीता माता के आदेश-निर्देश को अपने आचरण में नहीं लाते। वे प्रातः काल कुछ श्लोकों का, जिनमें कहा गया है- "काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं" पाठ तो कर लिया करते हैं परन्तु, पुनः रात्रि को काम-काम रूप नरक-द्वार से गुज़रते हैं और दिन में भी उनकी दृष्टि तथा वृत्ति भटकती ही रहती है। क्रोध तो मानो उनका सहज स्वभाव ही बन गया है और लोभ उनके व्यापार तथा आहार का मूलतंत्र ही है। यह कैसी विडम्बना है कि आज मनुष्य पढ़ता कुछ है और करता कुछ और है!
तोता रटन !
ऐसे लोगों की तुलना उस तोते से की जा सकती है जो एक बार पानी के नल पर जा बैठा और भीग कर सर्दी से काँपने लगा। उसके मालिक ने उसके पर पोंछ कर उसे स्नेह से कहा "गंगाराम, नल पर न बैठना। तोते ने मालिक के इस वचन को रट लिया परन्तु वह इसके अर्थ स्वरूप में नहीं टिका। अगली बार पिंजड़ा खुलने पर फिर नल पर जा बैठा और पानी में भीगते हुए भी रट लगाने लगा "गंगाराम नल पर न बैठना"।
ऐसे लोगों को, जोकि गीता के व्याख्यान तो बड़े लम्बे-चौड़े रटते हैं परन्तु उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करते, भला गीता का सत्य-अर्थ बोध कैसे हो सकता है और वह कैसे यह दम भर सकते हैं कि वे जानते हैं कि गीता का ज्ञान किसने दिया था?
गीता में तो योग की व्याख्या है। भगवान ने भोगी से योगी बनने की शिक्षा दी है। हमारा कर्त्तव्य है कि हम विकारी से निर्विकारी अर्थात् भोगी से योगी बनें।
कर्म और विकर्म
मनुष्य जन्म-जन्मान्तर से देह-अभिमान अथवा अज्ञानता के कारण काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, भय, घृणा इत्यादि के वशीभूत होकर जो कर्म करता आया है, इन्हें 'विकर्म' कहा जाता है। ये विकर्म ही दुःख का कारण हैं। काम की जगह ब्रह्मचर्य, क्रोध की बजाय शान्ति और धैर्य, लोभ के स्थान पर त्याग-भावना और अनासक्ति, मोह के बजाय शुद्धात्मिक प्रेम और अहंकार के स्थान पर नम्रता और सेवा-भाव ही मनुष्य को शान्ति, सुख और कल्याण देने वाले हैं। इन द्वारा कर्म सत्कर्म, श्रेष्ठ कर्म अथवा महान कर्म बनते हैं।
दिव्य गुणों की धारणा
संतोष, सहनशीलता, अन्तर्मुखता, गम्भीरता, निर्भयता, धैर्यता, त्याग, स्वच्छता, मधुरता, नम्रता, सरलता, शीतलता, सेवा इत्यादि सद्गुणों को धारण करने से ही योग में निरन्तर और अचल स्थिति हो सकती है और योगाभ्यास इन सद्गुणों की धारणा तथा उनके विकास के लिए अत्यन्त ज़रूरी है। योगी, मन-वचन और कर्म से एक होता है और सबके प्रति कल्याण की भावना रखता है। इन दिव्य गुणों की धारणा के लिए आहार और संग का सतोगुणी होना आवश्यक है। माँस-मदिरा, प्याज-लहसुन, अण्डा इत्यादि योगी के भोजन में सम्मिलित नहीं हैं, न ही योगी सिनेमा देखता या नॉवल इत्यादि पढ़ता है। वह तो अनिवार्य रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करता तथा मन-वचन व कर्म से पवित्र रहता है।
सबसे ऊँची शक्ति
हरेक मनुष्य को जीवन में शक्ति की बहुत आवश्यकता है। निर्बल मनुष्य न औरों को, न स्वयं को अच्छा लगता है। जो भी कमज़ोर व्यक्ति अथवा वस्तु होती है, उसे ढहाने में कोई भी संकोच नहीं करता। उदाहरण के तौर पर आप जानते हैं कि शेर एक बहुत ही बलवान पशु है लेकिन जब वह घायल और शक्तिहीन हो जाता है तो छोटे-छोटे पशु भी उसके समीप जा करके उसे तंग करने लगते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि अब यह कुछ भी नहीं कर सकेगा। इसी प्रकार, जब कोई मकान पुराना और कमज़ोर हो जाता है तो सरकार उसे गिरा देती है। जब मनुष्य के दाँत कमज़ोर हो जाते हैं तो वह उन्हें मुख से निकलवा देता है। जब मनुष्य बूढ़ा और कमज़ोर हो जाता है तब सरकार भी उसे अवकाश दे देती है अर्थात् उसे रिटायर कर देती है क्योंकि तब यह समझा जाता है कि अब इसमें शक्ति नहीं है और यह सरकार के काम का नहीं रहा। अतः शारीरिक शक्ति भी मनुष्य के लिए आवश्यक है वरना मनुष्य चलने-फिरने के लिए भी दूसरों का मोहताज हो जाता है और पानी तक के लिए भी उसे दूसरों का आधार लेना पड़ता है। सभी बीमारियाँ भी कमज़ोर मनुष्य ही के तन में घुस जाती हैं। अतः शारीरिक शक्ति का भी महत्व है क्योंकि शरीर द्वारा ही मनुष्य कर्म करके सुख के साधन जुटा सकता है, परन्तु तन की शक्ति के अतिरिक्त धन की शक्ति का भी काफ़ी महत्व है।
धन-शक्ति
जिस मनुष्य के पास धन-शक्ति न हो, उसे बहुधा सम्मान प्राप्त नहीं होता, इज़्ज़त नहीं मिलती। निर्धन मनुष्य जब किसी के पास जाता है तो लोग समझते हैं कि यह कुछ माँगने और लेने आया है। धनवान मित्र-सम्बन्धी भी अपने निर्धन सम्बन्धी से दूर हटकर रहते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि निर्धन सम्बन्धी के साथ होने से उसके मान-शान में कमी आयेगी। धन से केवल प्रतिष्ठा ही प्राप्त नहीं होती बल्कि मनुष्य संसार में बहुत काम कर सकता है। बहुत लोग कहते हैं - "इस संसार में पैसे से क्या नहीं नहीं हो सकता?" धन को 'सिल्वर की' (चाँदी की चाबी) अथवा 'मास्टर की' भी कहा जाता है जिससे कि सब ताले खुल जाते हैं। जिसके पास धन हो, लोग कहते हैं, आपके पास चाकियाँ हैं, आप क्या नहीं कर सकते? इस विषय में एक कहानी भी प्रसिद्ध है।
कहते हैं, एक बार एक मुसाफ़िर किसी धर्मशाला में सामान रखकर कुछ समय के लिए बाहर बाज़ार चला गया। रात्रि का समय था। उसे लौटने में कुछ देरी हो गई। जब वह वापस आया तो उसने देखा कि दरवाज़ा बन्द है। उसने जब दरवाज़ा खटखटाया तो सराय के चौकीदार ने दरवाज़े के पास आकर अन्दर से कहा "भाई, क्या बात है? अब दरवाज़ा बन्द हो चुका है और चाबी तो मेरे पास नहीं है"। मुसाफ़िर ने अपनी जेब से चाँदी का एक रुपया निकाला और उसे दरवाज़े की दरार में से अन्दर सराय में डाल दिया और चौकीदार को कहा "हाँ भईया, यह लो चाँदी की चाबी"। उसे लेकर चौकीदार ने दरवाज़ा खोल दिया। इसलिए धन को 'चाँदी की चाबी' कहते हैं।
आपने देखा होगा कि मन्दिर के दरवाज़े रात को बन्द कर दिये जाते हैं। तब पुजारी लोग कहते हैं - "अब देवता विश्राम में हैं"। परन्तु यदि कोई राजा वहाँ रात को आ जाये और पाँच-दस हज़ार रुपये की भेंट चढ़ा दे तो उसी समय दरवाज़ा खोल कर शायद वे भी राजा को दर्शन करा देंगे। इसी तरह ईसाई लोग भी जब हिन्दुस्तान में आये तो उन्होंने पैसे से यहाँ व्यापार शुरू किया और धीरे-धीरे सारे भारत पर अपना राज्य जमा लिया। धन में तलवार से कम शक्ति नहीं है।
जन-शक्ति
आज जनता की शक्ति को भी एक बड़ी शक्ति माना जाता है। कहावत है कि एकता अथवा संगठन में बहुत बल है। सारी जनता यदि परस्पर संगठित हो जाये तो वह क्या नहीं कर सकती? आज करोड़ों जनसंख्या वाले चीन को अपनी जन-शक्ति का ही अभिमान है। भारत की जनता की संगठन-शक्ति को देखकर ही तो अंग्रेज़ अस्त्र-शस्त्र होते हुए भी भारत छोड़ गये थे।
विज्ञान-शक्ति
धन की तरह विज्ञान में भी एक बहुत बड़ी शक्ति है। पहले पानी के लिए लोगों को इतना कष्ट करना पड़ता था, परन्तु आज विज्ञान ने घर-घर में पानी को हर समय हाज़िर रखने का साधन निकाल लिया है और पानी को बाँध कर बाँध (डैम) भी बना दिये हैं। इसी प्रकार, अग्नि जलाने के लिए भी पहले मनुष्य कितना परिश्रम करते थे, कपड़ा खाड़ से धोते थे, सवारी के लिए बैलगाड़ी अथवा घोड़ा-गाड़ी ही होती थी और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में बहुत समय लग जाता था। परन्तु विज्ञान की शक्ति से अब अनेकानेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
विचार-शक्ति
ऊपर जिन शक्तियों का विवेचन किया गया है, विचार-शक्ति उनसे भी बड़ी शक्ति है। उदाहरण के तौर पर आप जानते हैं कि पहले एक व्यक्ति ने साम्यवाद के सिद्धाँत के रूप में अपना विचार लोगों के सामने रखा। उस विचार ने लोगों को प्रभावित किया और अनेक देशों की जनता ने धन, तन इत्यादि सबकुछ इस विचार को साकार करने में लगा दिया।
इसी प्रकार, एक समय था जब राजा का राज्य हुआ करता था। तब प्रजा-तंत्र का रिवाज़ नहीं था। परन्तु धीरे-धीरे प्रजा-तंत्र का विचार इतना ज़ोर पकड़ गया है कि बहुत थोड़े ही देश हैं जिन्होंने इसे नहीं अपनाया है और जहाँ लाखों-करोड़ों रुपये हर चार-पाँच वर्ष के बाद इस विचार पर आधारित शासन-सत्ता को निर्वाचित करने पर खर्च न किये जाते हों।
आध्यात्मिक-शक्ति
परन्तु इन सभी से उच्च आध्यात्मिक शक्ति है। उदाहरण के तौर पर एक राजा की शक्तियों से इसकी तुलना कीजिये। प्रायः राजा में शारीरिक क्षमता भी होती है, धन-शक्ति और विचार-शक्ति भी। राजा में विज्ञान-शक्ति अथवा विचार-शक्ति न भी हो तो भी वह उसे खरीद सकता है। लेकिन प्रायः राजा भी धर्मात्माओं अथवा महान आत्माओं के आगे अपना मस्तक झुकाते रहे हैं। राजा जनक के बारे में यह बात प्रसिद्ध है कि राज-सत्ता होते हुए भी वह उपदेशकों को कहा करते थे "मुझे वह ज्ञान सुनाओ जिससे कि मेरा मन वश में हो जाये"। अष्टावक्र ने उससे कहा "राजन, इसके लिए तुम क्या दोगे?" राजा ने कहा "इसके लिए मैं सबकुछ देने को तैयार हूँ"। कहते हैं कि राजा ने अपने समेत अपना सारा राज्य-भाग अष्टावक्र को देने का वचन किया। उसने यह सब किसलिए किया? आध्यात्मिक-शक्ति प्राप्त करने के लिए। इसी प्रकार, मीरा भी एक रानी थी, उसने भी अपना सबकुछ आध्यात्मिक शक्ति और सुख के लिए ही न्योछावर कर दिया। राजा भर्तृहरि और राजा गोपीचन्द के उदाहरण भी बहुत प्रसिद्ध हैं। भले ही उन सभी को धन आदि की शक्ति प्राप्त थी परन्तु मनुष्य जीवन का जो लक्ष्य है, वह उन्हें प्राप्त नहीं था। अतः बड़े-बड़े राजा भी देवताओं को नमस्कार करते थे। आज भी बड़े-बड़े मंत्री, संन्यासियों इत्यादि को नमस्कार करते हैं।
आत्मिक-शक्ति, विज्ञान-शक्ति से भी उच्च है। भले ही वैज्ञानिकों ने सुविधा के लिए अनेक साधन बनाये हैं परन्तु उन्होंने मनुष्य की समस्याएँ और आवश्यकताएँ और भी बढ़ा दी हैं, यहाँ तक कि उनके जीवन को ही खतरे में डाल दिया है। भले ही वैज्ञानिकों ने पानी, वायु इत्यादि को थोड़ा-बहुत वश में किया है परन्तु वे स्वयं को वश में नहीं कर सके। वे मन-जीत (विकार जीत) और जगत-जीत नहीं बने बल्कि वैज्ञानिकों ने तो आज जगत के महाविनाश का सामान तैयार कर लिया है। आज वैज्ञानिकों के जीवन में भी सच्चा सुख-शान्ति कहाँ है?
इसी तरह विचार-शक्ति के फलस्वरूप जहाँ-तहाँ प्रजा-का-प्रजा पर राज्य तो है लेकिन इससे भी समस्याओं का अन्त तो हुआ नहीं; आज भी देशों और व्यक्तियों में लड़ाई-झगड़े तो होते ही रहते हैं। स्थाई और सर्वांगीण सुख-शान्ति तो प्रजा-तंत्र से भी उपलब्ध नहीं हुई। शान्ति के लिए तो लोग फिर भी मन्दिरों अथवा 'सत्संगों' में ही जाते हैं। आप देखेंगे कि यद्यपि आज संसार में बहुत उच्च कोटि के जो वैज्ञानिक (विज्ञान-शक्ति वाले) और विचारक (विचार-शक्ति वाले) मौजूद हैं, परन्तु उन्हें 'महात्मा' नहीं कहा जाता; 'महात्मा' तो आध्यात्मिक शक्ति वाले ही मनुष्यों को कहा जाता है। अतः सबसे महान शक्ति 'आध्यात्मिक शक्ति' है।
एटामिक-शक्ति से आत्मिक शक्ति अथवा साइंस की शक्ति से साइलेंस की शक्ति बड़ी है। लौकिक शक्ति से अलौकिक शक्ति और माया की शक्ति से ईश्वरीय शक्ति का बड़ा होना स्वाभाविक है। आध्यात्मिक तथा अलौकिक शक्ति के कारण ही ईश्वर की शक्ति सबसे ऊँची मानी गई है और ईश्वर को 'सर्वशक्तिवान' माना गया है।
अतः मनुष्य को चाहिए कि वह उस सर्वशक्तिवान परमात्मा से योग-युक्त होकर आध्यात्मिक एवं अलौकिक शक्ति प्राप्त करे और विचार-शक्ति को भी सात्विक बनाये। इससे उसे मन की शक्ति प्राप्त होगी।
शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा द्वारा वास्तविक सहज राजयोग सिखाया
आज कुछ लोग धरती को खोदकर, श्वास रोक कर उसके नीचे दबे पड़े रहते हैं; अन्य कई ठण्डे जल में या थल पर एक टांग पर चिरकाल तक खड़े रहते हैं। कई साधक बहुत समय तक एक आसन पर हठपूर्वक बैठकर प्राणायाम करते हैं तो अन्य कई अग्नि पर चलकर यातना सहन करते हैं। इन सभी प्रकार के योगों में स्वयं को किसी-न-किसी प्रकार से कष्ट देने की तथा हठ करने की क्रियाएँ हैं। योगेश्वर शिव बाबा कहते हैं "बच्चे ! मैं तो आप सभी आत्माओं का परमप्रिय परमात्मा हूँ, मुझसे मिलने के लिए स्वयं को इस प्रकार कष्ट देने, आँखें मूँदने, अपने प्राण रोकने, अचेत की तरह बैठने की क्या आवश्यकता है? ओह, आप तो यह भी भूल गये हो कि आप मेरे बच्चे हो और मैं आपका प्रेम-सागर, दया-सागर, सुख-दाता परमपिता हूँ! पिता और पुत्र के निकटतम एवं स्नेह-पूर्ण सम्बन्ध में इस प्रकार की नट-क्रियाओं एवं यातनाओं की क्या आवश्यकता? सुखदाता पिता से मिलने के लिए आत्मा को यह कष्ट क्यों? वत्सो, मैं तो आप बच्चों के प्रेम में सदा बांहें पसारे खड़ा हूँ, परन्तु मैं आँख मूँदने, श्वास रोकने आदि हठ-क्रियाओं द्वारा नहीं मिलता हूँ। इन क्रियाओं द्वारा स्वयं को कष्ट देना तो एक प्रकार की हिंसा करना है। वत्सो ! इन क्रियाओं द्वारा मन को दमन करने की कोई आवश्यकता नहीं, बल्कि मुझ परमपिता के प्रकाशमान एवं शान्तिमय स्वरूप को जानकर, मानकर अमन करने की अर्थात् उसमें समाहित एवं शान्त करने की आवश्यकता है"।
कुछ लोग कुण्डलिनि को जागृत करने अथवा मंत्र का जाप करके मन को एकाग्र करने का यत्न करते हैं। परन्तु यह भी अस्वाभाविक रीति से मन को रोकने का यत्न करने की क्रियाएँ हैं। वास्तव में रोकना न तो प्राणों को है, न मन को बल्कि मन को प्राणनाथ परमात्मा की आनन्ददायक स्मृति अर्थात् उसके गुणों की अनुभूति में टिकाना है। उसके लिए परमपिता परमात्मा का परिचय (ज्ञान) होना ज़रूरी है। पिता को जाने बिना बच्चा उसे याद कैसे कर सकता है? अतः परमपिता परमात्मा को जानकर, संसार की नश्वरता को सामने रखते हुए प्रभु की एकान्तिक स्मृति में सहज रीति से मन को लवलीन करना ही वास्तविक सहज राजयोग है। यही योग प्रियतम प्रभु ने अर्थात् परमपिता शिव ने ब्रह्मा बाबा द्वारा प्रैक्टिकल रीति सिखाकर मनुष्यात्माओं को भोगी से योगी बनाया है। आज कुछ लोग अपने गुरुओं पर, कुछ किसी देवी या देवता पर और अन्य कोई घर-बार का संन्यास करके ब्रह्म-तत्व में मन टिकाने का पुरुषार्थ करते हैं। गुरुओं की भी सद्गति करने वाले, देवताओं के भी रचयिता, उस एक ज्योतिस्वरूप, जन्म-मरण से न्यारे परमपिता को न जानने के कारण ही वे ऐसा करते हैं। वास्तव में, सभी आत्माओं के सद्गुरु अर्थात् मुक्ति और जीवनमुक्ति दाता तो एक परमात्मा ही हैं। वही देवों के भी देव हैं, वह ब्रह्मतत्व में वास करने वाले परमपिता हैं। उस एक ही की ज्ञान-सहित स्मृति बुद्धि में धारण करना वास्तविक सहज योग है। परमपिता शिव ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा यही बुद्धियोग सिखाया है।
ब्रह्मा बाबा को आदर्श एवं सर्वश्रेष्ठ राजयोगी के रूप में अनुभव करके, उनके प्रैक्टिकल जीवन से इसका अभ्यास सीख कर ही आज विश्व के हज़ारों जन आत्मिक-सुख का लाभ ले रहे हैं। बाबा हठ-क्रियाओं से तथा दर-दर प्रभु की खोज में भटकने से बचाने के निमित्त बने, उन द्वारा शिव बाबा ने सहज-योग सिखा कर आत्मा को सन्तुष्ट, तृप्त और पावन करने का सहज मार्ग दर्शाया।
योग क्या है ?
योगेश्वर शिव बाबा ने सर्वश्रेष्ठ राजयोगी ब्रह्मा बाबा द्वारा हमें प्रैक्टिकल रीति से समझाया कि भारत का सर्व प्राचीन सहज राजयोग, जोकि आज प्रायः लोप हो चुका है, वास्तव में क्या है और उसका अभ्यास कैसे होना चाहिए। उनके अनुसार 'योग' शब्द निम्नलिखित मुख्य अर्थों में प्रयोग होता है -
1. योग का अर्थ है- 'जोड़ना'। जैसे पावर हाउस से तार जुड़ी होने से बल्ब जग जाता है, वैसे ही पावर हाउस (सर्वशक्तिवान) परमपिता परमात्मा से याद (स्मृति) रूपी तार जुड़ी होने से आत्मा को भी ईश्वरीय शक्ति एवं प्रकाश (लाइट और माइट) प्राप्त होता है। अतः योग का अर्थ है आत्मा की, परमात्मा से याद रूपी तार (कनेक्शन) जोड़ना।
2. 'योग' का अर्थ यह भी है मन को परमात्मा पिता की स्मृति में एकाग्र करना। आज मनुष्य का मन इधर-उधर बहुत भटकता है। उसे अन्य सभी देहधारियों तथा साँसारिक एवं नश्वर वस्तुओं की लग्न से हटा कर एक आनन्द-सागर, अशरीरी, परमात्मा शिव की स्मृति में एकाग्र करना ही योग है। यही मन का संयम भी है। मन को एक ओर जोड़ने के लिए दूसरी ओर से हल्का करना ज़रूरी है। अतः एक (परमात्मा) को ही मन रूपी आँख के आगे (अग्र) रखना ही 'एकाग्रता' अथवा योग है।
3. यह भी कहा जा सकता है कि ईश्वरीय गुणों का मनन-चिन्तन ही योग है। मन को एकाग्र करने का भाव यह है कि मन को साँसारिक विषयों तथा अनुभवों से उपराम करके इस परमात्मा ही के दिव्य गुणों का मनन करना, उसका रसास्वादन करना अथवा अनुभूति करना।
4. परमपिता परमात्मा को सहृदयता से, प्रेम से, लग्न से याद करना, उसकी अनन्य स्मृति में मग्न हो जाना ही योग है। जिधर मनुष्य की लग्न होती है उधर ही उसका मन मग्न होता है। लग्न उससे होती है जिससे लाभ हो, जिससे सम्बन्ध हो, स्नेह हो। अतः परमात्मा ही को सच्चे स्नेह से याद करना, उसकी स्मृति में मन का स्वभावतः मग्न होना ही योग है।
5. प्रभु से मिलन मनाना ही योग है। जो लोग आत्मा को ही परमात्मा मानते हैं, वे यह मिलन नहीं मना सकते। क्योंकि मिलन सदा दो में होता है। अतः आत्मा और परमात्मा को अलग मानकर बहुतकाल से इन्हें बिछुड़ा हुआ मानकर, अब इनका मनोमिलन अथवा रूह-रूहान ही योग है। जैसे दो प्रेमी वियोग के बाद मिलते, मन से एक-दूसरे के हो जाते, प्रेम-विभोर होकर उद्गार व्यक्त करते अथवा मौन भाषा में प्रेम व्यक्त करते हैं, ऐसे ही आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है।
6. परमात्मा से हमारा आत्मिक सम्बन्ध है, न कि दैहिक। अतः देह-भान को भूलकर स्वयं को आत्मा-निश्चय करके परमात्मा पिता, जोकि हमें सम्पूर्ण पवित्रता, सुख और शान्ति का वर्सा देते हैं, उनमें सम्बन्ध जोड़ना ही योग है।
7. यही योग एक प्रकार की यात्रा है। अपने शरीर रूपी मकान से मन निकाल कर, दैहिक सम्बन्धों से मन हटाकर, संस्कारों और विकल्पों को भी छोड़कर, प्रेम-विभोर होकर परमात्मा की याद में बुद्धि द्वारा जाना ही यात्रा है।
शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा द्वारा हमें ऐसा सर्वोत्तम योग सिखाया है जिससे कि हमारा जीवन अतीन्द्रिय सुखमय बन गया है।
