
दीदी मनमोहिनी जी के अव्यक्त होने के पश्चात दादी जी द्वारा दीदी जी की विशेषताओं का वर्णन (1983)
1) दीदी की शुभ भावनायें आज भी हमारे साथ हैं। यह आवाज हरेक के दिल से निकलता है क्योंकि दीदी ने स्वयं प्रति सर्व कामनायें समाप्त कर औरों के लिए शुभ कामनायें रखी। यादगार हृदय में छप जाता और शिक्षायें मस्तक पर छप जाती है। वो भूल नहीं सकती। दीदी की मीठी शिक्षायें आज भी सबको याद हैं और याद रहेंगी।
2) दीदी के लिए बाबा ने कहा - ईष्ट और अष्ट को कोई कष्ट नहीं हो सकता। रूप ऐसा है जो किसको दिखाई नहीं पड़ता। अगर दुःखधाम को सामने रखकर देखते तो दुःख की महसूसता होती है लेकिन राज़ों भरा राज़ गुप्त में था। भाग्यविधाता ने ऐसा पार्ट दिया है, इक्ट्ठे रहे हैं, इक्ट्ठे रहेंगे, दुःख की तो बात ही नहीं। यह मुहब्बत तो न मिटी है, न मिटेगी। रूहानी मुहब्बत जो कर्मातीत बनने में, एक दो को आगे बढ़ाने में दुआ का काम करती है। इस पार्ट को देखते और भी उमंग बढ़ता बढ़ता है कि अब हमें नम्बरवन में दीदी समान बनना है। समान बनने की प्रैक्टिस भी करनी है, और उनके समान हर संकल्प में सेवा की भावना, समीप लाने की भावना भी रखनी है।
3) दीदी जी कोई भी कारण का निवारण सेकण्ड में निकाल कर दे देती थी। सेवा करते भी पहले बाबा को आगे रखती थी। निचाई ऊंचाई भी बाबा देखे, आगे भी बाबा, पीछे भी बाबा, वह जो कराये, हमें क्या करना है। दो पुरों के बीच में। जैसे गेहूँ दो पुरों के बीच में आकर पीसे तो खाने लायक बनें। ऐसे ही आगे पीछे बाबा को रखने से आत्मा पीस जाती है यानी पवित्र बन जाती है, लायक बन जाती है, तभी आत्मा नई दुनिया के लिए योग्य बन सकती है।
4) सजनी वो जो साजन के साथ चले, जैसे चलाये वैसे चले। सखा, साजन का सम्बन्ध जुड़ाने के निमित्त हमारी दीदी बनी। उन्होंने ट्रेनिंग मुख से नहीं, लाइफ से दी। दीदी से हमें मर्यादा सम्पन्न सहज लाइफ मिली, उनकी शिक्षायें बहुत प्यारी लगती हैं। दीदी कहती थी टीचर को अपना फैन्ड बना लो तो शिक्षायें सहज ही जीवन में आ जायेंगी, यह सहज युक्ति है।
5) तुम्हीं से खेलूं, तुम्हीं से खाऊं.. दीदी को इसी संस्कार ने बाप समान बना दिया। जैसे दीदी ने बाबा को मेरा बनाया, तो मेरा बनाने से बाबा के साथ-साथ सबको सकाश देने के निमित्त बन गई, ऐसे ही बाबा ना सिर्फ मेरा है, जो मेरा है वह सबका है।
6) दीदी को जन्म से ही सयानी कहते थे। सयाना वो जो जल्दी मोल्ड हो जाए। जो खुद इशारे से चले और इशारे से चलाये। कोई कोई होते जो बात को सीधा नहीं बोलते, बात को घुमा-फिराकर कहते हैं, वह सयाने हैं लेकिन उन्हें सयाना नहीं कहेंगे। हम ऐसे सयाने बने जो कुछ भी मिक्स न करें। सच्चाई और सफाई से सयाने बन जाएं।
7) मम्मा ने हमें धारणामूर्त बनाया और दीदी ने हमें पतिवृता बनाया। दीदी की दिल के अन्दर यही रहता कि इसका झुकाव और किसी आत्मा के प्रति न हो जाए। सदा एक बाबा प्रति ही रहे। भगवान के घर में कभी कोई झूठ न बोले। यही दीदी की आश रहती थी।
8) दीदी जी जब हॉस्पिटल जा रही थी तो बाबा ने कहा, साथ रहते, साथ बैठते साथ निभाया, साथी बनाया, तुम बाप के साथ हो, बाप तुम्हारे साथ है। साथ रहने का वायदा जन्मते ही किया। शरीर भल छूटे लेकिन यह साथी हमें छोड़ नहीं सकता। लौकिक में कोई भी ऐसा साथ दे नहीं सकता।
9) बाबा के हर कदम के पीछे अनेक गुह्य राज़ हैं और संगम का हर पल कल्याणकारी है। जैसे पहले हमने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि हमारा बाबा अव्यक्त होगा, लेकिन हमने ड्रामा की वह भी नई रंगत देखी। पहले शुरू में 14 वर्ष बाबा ने हम बच्चों से तपस्या करवाई फिर देश विदेश में बेहद की सेवा कराई। एक तपस्या जिससे रूद्र यज्ञ की स्थापना हुई, दूसरी तपस्या जिससे देश विदेश में सेवा का विस्तार हुआ।
10) बाबा ने दीदी को निमित्त बनाए आबू पहाड़ की चोटी पर बिठाया। इस आबू पर्वत पर रहते निमित्त बेगरी पार्ट बजाया, यज्ञ कुण्ड के अनेक कुण्ड बनाये, उसके बाद बाबा ने अपने अनेकानेक वारिस बच्चों को निकाला। कितने बच्चे तन-मन-धन से सहयोगी, निश्चयबुद्धि बने। भारत जो बाबा की जन्म भूमि है, उसमें पहले त्याग तपस्या और सेवा का कार्य चला। मम्मा बाबा ने भारत में कई स्थानों पर जाकर अनेक सेवायें की। अनेक वारिस बच्चे पैदा किये। फिर बाबा ने यह पाण्डव भवन बनाया। यहाँ से हर कार्य बाकायदे चला। यहाँ से बच्चों को चारों ओर सेवा का अनुभव कराने भेजा। अपनी 16000 की माला तैयार कराई। तो मैं एक ओर देखती - कहाँ बेगरी पार्ट, कहाँ अनेक वारिस बच्चे और कहाँ बेहद सेवा... फिर बाबा ने अव्यक्त बन अपना पार्ट बजाया, उसके पहले हमारी प्यारी माँ और भाऊ विश्वकिशोर को गुप्त रीति से हम बच्चों के बीच से उड़ा लिया, उनके जाने की भी बड़ी गुप्त कहानी है, आगे चल इसका भी राज़ खुलेगा। हम जानते हैं कोई बहुत बड़े विशेष पार्ट के लिए हमारे यज्ञ के वारिस गये हुए हैं।
11) यह भी कैसा स्वप्ना हुआ जो बाबा अव्यक्त हुआ, अव्यक्त होने के बाद विश्व सेवा का विस्तार हुआ। विश्व की अनेकानेक आत्माओं के दिलों में बाबा की छाप बैठी। बाबा जो कहता मैं सर्व आत्माओं का, सर्व धर्मो का भी ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर हूँ, वह पार्ट अव्यक्त होने के बाद प्रत्यक्ष हुआ। अभी विदेशों में ऐसा पार्ट बज रहा है, जो देश तो देश है लेकिन विदेश देश से भी दुगुना आगे जा रहा है। बाबा ने ऐसी चाबी बनाई है जो बुद्धिवानों की बुद्धि बन सबकी बुद्धि को चेन्ज कर रहे हैं। दूर दूर से बच्चे आते, बाबा के दो शब्द सुनकर कितना खुश हो जाते, अव्यक्त में भी साकार का अनुभव कर जीवन के लिए बल भर जाते।
12) अव्यक्त होने के 14 वर्ष बाद बाबा ने जिस दीदी को निमित्त बनाया, उसे ही अपनी गोदी में नई रचना के लिए, योगबल की शुरूआत के लिए बुला लिया। दीदी को बाबा ने कैसे अपनी गोदी में छिपाकर बिठाया है, आज दीदी बेहद के तख्त पर बैठ विश्व में घूम रही है। दीदी बाबा के साथ अनेक सेवायें कर रही है।
13) बाबा हमेशा कहते - तुम शक्तियों का अन्त में विशेष पार्ट है, तो अब शक्तियों का पार्ट भी तो खुलना चाहिए। शक्तियों का पार्ट भी तब खुले जब कोई कमान्डर आगे जाए। तो यह भी दीदी का एक निमित्त पार्ट है। बाबा ने शक्ति रूपधारी हम सबकी प्यारी दीदी को निमित्त बनाया है, विशेष कोई पार्ट बजाने।
14) अगर सोचें - तो आता दीदी चली गई। लेकिन फीलिंग आती मधुबन में दीदी सदा हाज़िर है। यह भी अनायास कोई न कोई कारण बनता जो बाबा हरेक को हिलाता है। दिखाई देता है जो भी आत्मायें चली गई हैं वह फिर से हाथ पकड़ेंगी....ऐसी अनेक आत्माओं को नजदीक लाने का, उन्हें अंचली देने का यह भी दीदी का पार्ट है। यह प्रैक्टिकल रील चल रहा है। हमारी दीदी से अनेक आत्माओं का पुराना सम्बन्ध है, नाता है, वह फिर से आकर अपना वर्सा लेंगे। यह भी पर्दा खुलता जायेगा।
15) इस ड्रामा में यह 14-14 वर्ष का भी बड़ा खेल बना हुआ है। अब देखेंगे कि आगे 14 वर्ष में क्या होता है। कायदे अनुसार फिल्म का यह प्यारा रील चलता रहता है। कोई ऐसा कारण बनता है जो सबकी दिलों में आता कि अब घर जाना है। कल भी कहते आज भी कहते हैं कि घर जाना है, लेकिन अब यह दिल के अन्दर से आता, लहर आती कि अब हमें भी बाबा के वतन जाना है, कर्मातीत होना है।
16) बाबा, बाप-टीचर-सतगुरू के साथ धर्मराज भी है। कई दीदी से भी डरते थे। क्यों? दीदी को हमारी भूल का पता ना चले। दीदी हमेशा कहती सच्चे दिल पर साहेब राज़ी। जरा भी बात होती तो दीदी ने कभी भी बाबा से नहीं छिपाई। दीदी सामने आती थी तो बाबा का चेहरा ही कुछ और हो जाता था। सच्चाई की शक्ति ऐसी हो जो परमात्मा से प्रेम खींच सके, मांगने से प्रेम नहीं मिलता और सब कुछ मिल सकता, ज्ञान भी सुन और सुना सकते पर प्रेम पाने के लिए सच्चाई चाहिए।
17) दीदी की खूबी, जो भी सामने आये उससे कौन सी सेवा लेनी चाहिए, ताकि उसका भाग्य बन जाए। कैसे ईश्वर से उसका स्नेह जोडकर उनसे सेवा करायें ताकि उसका भाग्य बनता रहे। तो हमें भी उनसे यही प्रेरणा लेनी है।
18) ड्रामा के इस विचित्र पार्ट के अनुसार मीठी दीदी ने हम सबको यही लेसन दिया है कि अब सभी उपराम बनो। तो हम सबको अपनी इन अन्तिम श्वांसों में उपराम रहकर इस थोड़े से समय में हमें फुल मार्क्स लेनी हैं। जितनी जितनी हमारी वृत्ति उपराम रहेगी उतना व्यक्त भावों की वृत्ति खत्म होती जायेगी। कहा भी जाता - तुम्हें लेना क्या, देना क्या, तू साथ क्या ले जायेगा। हरेक जब जाता है तो अपने गुण ही छोड़ जाता, जिन गुणों का ही फिर सब गायन करते हैं।
19) आज दीदी के प्रति हरेक के दिल से प्यार का आवाज निकलता क्योंकि दीदी ने सबकी प्यार से सेवा की है, उस सेवा के कारण ही सबको दीदी की आकर्षण होती, सबके मुख पर दीदी है इसीलिए सब याद करते हैं, गुणगान करते हैं।
20) हरेक का दीदी के प्रति प्यार तो अटूट है, लेकिन उस प्यार का अब रिटर्न भी देना है। ऐसा रिटर्न दो जो कोई भी यह फील न करे कि दीदी चली गई या दीदी अबसेन्ट है। कई पूछते हैं - दीदी की जगह कौन? मैं कहती हरेक समझें हम सब दीदी के अंग हैं। हम सब दीदी की विशेषताओं को स्वयं में भर ले तो हम ही दीदी की जगह पर हैं। हम स्वयं दीदी का रूप बनें। तो यह प्रश्न ही खत्म हो जाता।
21) हम कोई वैरागी बाबा या हठयोगी बाबा नहीं हैं लेकिन हमारी स्थिति वानप्रस्थी उपराम चाहिए। उपराम वृत्ति से व्यक्त वायब्रेशन खत्म हो जाते हैं। हम योग के वायब्रेशन से ही अपने किले को पावरफुल बना सकते हैं। कम से कम 8 घण्टे योग का चार्ट जरूर बनाना है। हरेक को यह पुरुषार्थ करना है। | कभी भी किसी के पुरुषार्थ को देख टोन्ट नहीं कसना है। उसकी हंसी नहीं उड़ानी है। एक छोटी सी हंसी के आधार पर ही सारा महाभारत बना है इसलिए कभी भी टोन्ट नहीं मारो। टोन्ट भी दुःख देता है। हमारे किसी भी शब्द से किसी को दुख न हो। ऐसा कोई भी बोल न निकले जिससे नुकसान हो जाए।
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