
यह सृष्टि चक्र परिवर्तनशील है, इसमें स्वयं का भी परिवर्तन करते चलो
हम सभी को बाबा कहते लकी स्टार बच्चे। हमारा | कल्प पहले का लक ड्रामा में नूंधा हुआ है। हम अपनी तकदीर लेकर आये हैं। हम शिववंशी ब्रह्माकुमार कुमारी फिर विष्णुवंशी बनते हैं। आज बाबा की मुरली में था तुम बच्चे यहाँ ट्रांसफर होने आये हो, परिवर्तन होने आये हो। तो रोज़ अपने से पूछो - मैं परिवर्तन हुआ हूँ! मेरे में परिवर्तन करने की शक्ति है? हम पहले तो पुरानी दुनिया से नई दुनिया में ट्रांसफर हुए। फिर भक्ति से ज्ञान में ट्रांसफर हुए। भक्ति के संस्कार हैं ही देह-अभिमान के। देह-अभिमान के कारण ही दुःखी हो पुकारा क्योंकि रावण ने उतरती कला में लाया। तो अभी हमें पहले अपने उन संस्कारों का परिवर्तन करना है। देह-अभिमान के साथ सब दुर्गुण अवगुण भी परिवर्तन करने है। तो हरेक यही चार्ट देखे कि मैं कहाँ तक परिवर्तन हुआ हूँ!
सृष्टि के साथ-साथ जीवन चक्र भी परिवर्तनशील है। अभी मेरी बैटरी फुल होती जा रही है, ऐसा तो नहीं आज फुल नशा चढ़ा हुआ है, कल छोटी मोटी बात हुई तो डाउन हो जाए। फिर कहेंगे हम तो जाते हैं अपने लौकिक में, ऐसा कहना भी सिद्ध करता अलौकिक के बने ही नहीं। मरजीवा बने ही नहीं। उनका नशा जैसेकि बालू के ढेर पर है। जरूर वह खिसकेगा इसलिए उसे सीमेन्ट की दीवार दे दो तो उतरे नहीं। आज मैने बहुत अच्छा भाषण किया, तीर लग गया। मुझे नशा चढ़ गया। अगर मैं दो चार दिन सेवा नही करता तो मेरी खुशी गायब हो जाती ! आपस में दो चार दोस्त मिले तो खुश, अगर नहीं मिले तो खुशी गुम। यह सब कौन सी स्थितियां हैं? अज्ञानी तो करते लेकिन ब्राह्मणों में भी ऐसी बहुत माया है। वह कहेंगे मेरी ब्राह्मणी अच्छा क्लास कराती, तुम मेरे क्लास में आना। वह कहेंगी क्यों गये ! फिर चला परचिंतन का चक्र। यह भी उल्टा चक्र है। सेवा करने जायेंगे, भावना होगी दूसरे के कल्याण की। अन्दर में चलेगी पार्टीबाजी। पार्टी का करेंगे अकल्याण। बाहरी रूप बहुत अच्छा होता, अन्दर में चलेगी मीठी-मीठी छुरी - कभी आंख से तो कभी मुख से।
सबसे अच्छा गुण है, सदा बाबा की एक लगन में रहकर सब कुछ करूंगा, नहीं। आत्माओं पर डिपेन्ड नहीं करो लेकिन बाबा पर डिपेन्ड करो। रहना तुम्हें संगठन में है, ऐसे भी नहीं मेरा तो किसी से कनेक्शन नही। निर्मान बनो। निर्मानता के लिए हमें यह दो हाथ मिले हैं। निर्मान बनकर हमें संगठन में चलना है। यह पक्का पक्का वायदा करके जाओ। इन्डिपिन्डेंट रहो परन्तु इसका यह भाव नहीं कि मैं तो अपना
अन्दर में जो कभी-कभी हलचल होती शादी करें या न करें! यह थोड़ी भी हलचल मार डालेगी। अब हलचल को समाप्त करो। मुर्दे के अन्दर हलचल होती है क्या! हम पुरानी दुनिया से मुर्दे हो गये। कहते हैं संस्कार परिवर्तन नहीं होते। मैं कहती हो गये तब तो आये हो। माया ने छोड़ा तब तो बाबा के पास पहुंचे। माया बिचारी ने तुम्हें छुट्टी दी तब तो यहाँ तक पहुंचे हो। बाबा की गोद मिली है इसलिए कोई ऐसे संस्कारों की हलचल उठाओ ही नहीं। नींद नहीं आती, आप बाबा को याद करो। मुरली पढ़ो, यह तो अच्छी बात है, जागती ज्योति बनो। माया से चिढ़ते क्यों हो ! चिढ़ते हो तो चिढ़ाती है।
(एक ऋषि की कहानी) उसने कहा स्त्री का मुंह नहीं देखूंगा। एक अप्सरा ने कहा मैं बताती हूँ.... उसने झोपड़ी के पास जाकर खूब ज़ोर से चिल्लाया, ऋषि आवाज सुन बाहर आया उसे तरस पड़ा, उसने उठाया, देखते ही उसकी वृत्ति खराब हो गई। उसने थप्पड़ मारा बोला, तुम तो कहते थे हम स्त्री का मुंह नहीं देखेंगे फिर यह क्या करते हो। देखा तो मरा। तो हम भी मुर्दों को क्यों देखें! अगर आप एक आंख से देखेंगे तो वह चार आंख से देखेंगे। तंग होंगे तो वह तंग करेंगे।
सच्ची दरबार में आये हो - जो भी किचड़ा हो दे दान, देहधारी को हाथ लगाना, माना बिच्छू को हाथ लगाना। हमारी चंचलता बाबा ने समाप्त कर दी। बाबा ने हमें अचल बनाया। हम बाबा के अंगद बच्चे हैं। आपस में भी हाथ न लगाओ, बहुत खबरदार रहना है। अगर किसी को टच करते तो बाबा टच नहीं कर सकता, इसीलिए डोन्ट टच। अच्छा।
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