
परचिन्तन-परदर्शन आत्मा को भटकाने वाली गलियां है, इन गलियों को बन्द करने के लिए परोपकारी बनो
सभी ने याद की यात्रा की, यह याद की यात्रा हम सबके लिए सहज भी है और श्रेष्ठ भी है। सदा हम लोगों के दिल में और है ही क्या! हम तो यही सोचते हैं कि जब से ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी बने तो संसार ही हमारा बाबा है। तो क्या याद आता है? संसार ही याद आता है ना। अगर बुद्धि जायेगी भी तो कहाँ जायेगी? संसार में ही जायेगी। तो संसार हमारा अभी क्या है? बाबा है ना क्योंकि संसार में दो ही चीजें हैं। जो अपने तरफ आकर्षित करती हैं एक व्यक्ति और दूसरा वस्तु। तो व्यक्ति की रीति से सम्बन्ध हैं तो सर्व सम्बन्ध हमारा किसके साथ है? बाबा के साथ है या कोई है, कोई नहीं है? हमारे लिए सर्व सम्बन्ध भी एक बाबा से हैं। तो यही चेक करो कि कोई भी सम्बन्ध रह तो नहीं गया है? अगर रह गया होगा या थोड़ा बाबा से भी होगा, थोड़ा और भी कहाँ होगा तो बाबा भूल जायेगा क्योंकि बीच में वह व्यक्ति आ गया ना! तो जहाँ व्यक्ति आयेगा वहाँ बाबा तो भूलेगा ना इसलिए एक बाबा दूसरा न कोई। तो सर्व सम्बन्ध भी शिवबाबा के साथ अर्थात् परमात्मा के साथ और वस्तु अर्थात् प्राप्तियाँ। हमको बाबा से क्या प्राप्तियां नहीं हैं? लिस्ट निकालो। प्राप्तियों के आधार से खुशी, सुख, शान्ति सब है और सदाकाल के लिए है, इसीलिए प्राप्तियां चाहिए ना। हमें खुशी कितनी है? हमारे खुशी की, अतीन्द्रिय सुख की, शान्ति की तुलना किससे है? क्योंकि हम तो सभी शान्ति के सागर में समाये हुए रहते हैं। तो जो सागर में समाये हुए हैं उनको कमी क्या है? जो जिसमें समा जाता है, वह समान बन जाता है। तो प्राप्तियां भी सर्व हैं और सम्बन्ध भी सर्व बाबा से हैं और क्या चाहिए? इसीलिए हम कहते हैं कि हमारा संसार ही बाबा है। तो जब संसार बाबा है तो बुद्धि जायेगी कहाँ। क्या और कुछ है? थोड़ा-थोड़ा कोई उल्टी गलियां तो नहीं रही हुई हैं? यह तो हाई वे है। लेकिन छोटी-छोटी गलियां अगर रही हुई होंगी तो फिर बुद्धि जा सकती है। और वह गलियां विशेष बाबा ने सुनाई चेक करो एक परचिंतन, दूसरा परदर्शन – यह दो गलियां हैं। यह गलियां बाबा को भुला देती हैं। अब इन गलियों को हमें बन्द करना है। वेस्ट थॉट चलते ही इससे हैं। बाबा ने कहा- इन गलियों को बन्द करने का रास्ता एक ही शब्द याद रखो – पर उपकारी। अगर पर उपकार की गली वा रास्ता खुला हुआ है तो यह गलियां जो हैं वह बन्द हो जाती हैं। यही पुरुषार्थ सभी करते हैं। अटेन्शन भी रखते ही हैं। परन्तु यदि कभी गलती से पुराने संस्कारों के वश इन गलियों में चले जाते हैं तो रिजल्ट क्या होती है? भटककर लौटकर ही आना पड़ता है ना। कुछ मिलता तो नहीं है। मंजिल तो नहीं मिलती है ना। भटककर लौटना ही पड़ता है। खुद को ही परेशान होना पड़ता है इसलिए उन गलियों को एकदम बन्द करो, ब्लाक करो। बन्द करने से क्या होगा बिल्कुल ही पर उपकारी और हमारे लिए संसार ही बाबा है, बस।
हम तो यही सोचते हैं कि बुद्धि जाये कहाँ। कुछ है क्या? नहीं है ना। यही तो योग है। योग का अर्थ भी यही है कि बाबा को याद करना। जब है ही संसार बाबा तो फिर क्या है? और अमृतवेले इस ही सर्व सम्बन्धों को, सर्व प्राप्तियों को फिर से रिवाइज करते रहते हैं। बाबा आप ही सर्व सम्बन्धी हैं, आप ही सर्व प्राप्तियों के दाता हैं। तो सारा दिन वही याद होगी ना।
तो हॉस्पिटल में नहीं लेकिन होली स्थल पर रहने वाले होलीहंस हो। सदा होली हैं और टोली खाते रहते हैं। होली, बोली और टोली। टोली ही हमारी गोली है। तो बहुत अच्छा प्रोग्राम रखा है और जिस उमंग उत्साह से यह प्रोग्राम रखा है उसमें सफलता तो है ही है। सफलता होगी या नहीं होगी, उसका तो क्वेश्चन ही नहीं है। हमारी विजय निश्चित है। विजय का तिलक पक्का है या कभी कभी ढीला हो जाता है? आज नहीं सदा। बाबा को सदा शब्द बहुत अच्छा लगता है। और हम चाहते भी सदा हैं, कभी कभी तो चाहते नहीं हैं इसलिए होलीहंसों का होलीस्थल है। यहाँ तो ब्रह्मा भोजन खाओ, ज्ञान अमृत पियो और मौज मनाओ और क्या करना है? हमारी लाइफ ही ऐसी मौज की है, जो अमृतवेले से मौज शुरू होती है और रात को सोते टाइम मौज से सो जाते हैं। क्यों? क्योंकि शिवबाबा का साथ है। जहाँ शिवबाबा का साथ है वहाँ मौज ही मौज है। या मूंझना भी है थोड़ा? मूंझना अभी बन्द हो गया। प्रश्न बन्द, प्रसन्नचित्त। योग तो जितना करो उतना अच्छे ते अच्छा है। आप लोगों के सम्बन्ध-सम्पर्क में जो आयेंगे उन्हों को भी वह शक्ति मिलेगी। अच्छा ।
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