
अपने भाग्य और भाग्यविधाता बाप को याद कर रुहानी मौज का अनुभव करो
हम सबको बाबा के यज्ञ की धरनी पर सेवा करने का चान्स मिला है। यज्ञ सेवा के लिए लोग क्या नहीं करते हैं, गुरूद्वारे में जाओ तो बड़े-बड़े मिनिस्टर भी जूते साफ करते हैं, झाडू लगाते, सफाई करते... कारण क्या? गुरु का द्वार समझते हैं, उसमें बहुत भावना रहती है। यह तो सतगुरु का द्वार है। तो यहाँ सेवा का चान्स मिलना भी कितनी बड़ी बात है। भले साधारण रीति से हम कहेंगे चलो हमने अप्लीकेशन की, हमको चान्स मिल गया, ठीक है। मिल तो गया लेकिन चान्स की वैल्यू है? यह तो समझो कल्प-कल्प आपके भाग्य की नूँध हो गई और उसी नूँध अनुसार आपको भाग्य मिल भी गया। लेकिन मिले हुए भाग्य को कहाँ तक आगे बढ़ाते जाते हैं, वह तो हमारे हाथ में है। हम तो सिर्फ कहते हैं कि अगर सिर्फ अपने भाग्य को भी याद करें तो भाग्य के साथ भगवान भी याद आता ही है। भगवान और भाग्य, यही सिर्फ याद रखें तो भी बहुत खुशी और बहुत ही उन्नति होती है।
लेकिन भगवान हमारा बाबा हो गया है, इसलिए कभी कभी हमने भगवान को भी जैसे साधारण मान लिया है। लेकिन भगवान क्या है? कौन मिला है? किस भाग्य के आधार पर हमको मिला है? यह अगर स्मृति रहे तब तो माया आ ही नहीं सकती। और वास्तव में माया का आह्वान तो हम ही करते हैं। कोई भी शक्ति की, गुण की कमी होती है तो मानों आपने माया को आह्वान किया। आती क्यों है? जैसे डा. क्या कहते हैं? कोई भी बीमारी हो कहेंगे फलानी कमी के कारण यह बीमारी आई है, चाहे विटामिन की कमी हो, चाहे खून की कमी, चाहे कोई भी कमी के कारण आपको बीमारी हुई है। बीज़ तो यही बताते हैं, तो यहाँ भी बीज़ क्या है? कोई न कोई शक्ति या गुण की कमी हो जाती है इसलिए हम जैसे खुद ही माया को निमन्त्रण देते हैं या
आह्वान करते हैं। फिर कहते हैं क्या करें? आ जाता है ना, हो जाता है ना, बिन्दी तो लगाते हैं लेकिन हो जाता है – क्यों? बिन्दी के बजाए क्वेश्चन मार्क लग जाता है, आश्चर्य की मात्रा लग जाती है। तो बाबा ने कहा न क्वेश्चन मार्क लगाओ, न आश्चर्य की मात्रा लगाओ। बस । बिन्दी, बिन्दी, बिन्दी। सारा बिन्दी के ऊपर ही आधार है। जैसे 1 से 10 वा 100 कैसे होता है? बिन्दी ही तो लगती है। बिन्दी की तो कमाल है, जैसे उसमें भी बिन्दी की कमाल है। ऐसे कोई भी बात हुई, तो उसे पास्ट इज़ पास्ट कर दो। अगर बिन्दी लगा दी, फुल स्टॉप तो हमारा व्यर्थ संकल्प चलेगा ही नहीं। बिन्दी लग गई फिर व्यर्थ क्यों चलेगा!
आजकल व्यर्थ संकल्प की लीला बहुत भारी है। कोई अर्थ ही नहीं, कोई बुरे संकल्प नहीं लेकिन व्यर्थ बहुत है। बात करते-करते पता नहीं कहाँ का कहाँ चले जाते हैं, किसके लिए बुरा भी नहीं सोचेंगे, कोई ऐसा निगेटिव भी नहीं सोचेंगे लेकिन वेस्ट बहुत जाता है। चाहे समय, चाहे संकल्प, चाहे बोल ऐसे ही व्यर्थ चले जाते हैं। जहाँ दो शब्दों में हमारा काम हो सकता है, वहाँ बहुत लम्बा-चौड़ा स्पष्टीकरण देंगे। अपने मन में भी स्पष्टीकरण करेंगे तो लम्बा-चौड़ा सोचेंगे। दो मिनट की बात 15 मिनट चलती रहेगी। यह भी एक आदत होती है। वेस्ट करने की आदत जैसे कॉमन हो गई है, पता ही नहीं पड़ता है कि वेस्ट हो रहा है। यह तो जब तक अन्तर्मुखी होकर चेक नहीं करेंगे तब तक पता नहीं पड़ेगा। अपने को चेक भी ठीक करें, कई बार चेक करने के लिए बैठेंगे तो अलबेलापन आ जायेगा, कहेंगे यह तो चलता है, ठीक है, ऐसा कौन बना है...।
तो कभी भी अगर आप दिलशिकस्त होते हैं, तो अपनी विशेषताओं को सामने लाओ। और कोई भी विशेषता हमारे में नहीं है, ठीक है, लेकिन एक विशेषता तो है कि इस | जीवन में हमने भगवान को पहचान लिया और उसके बन गये। यह विशेषता तो सभी में है या नहीं है! क्या ऐसे ही पहुँच गये हैं! दुनिया में नौकरी करना बहुत मुश्किल है, यहाँ खाओ पिओ मौज करो, ऐसे तो नहीं आये हो! यहाँ रहे पड़े हैं लाइफ पास कर रहे हैं, ऐसे तो नहीं है? जिस स्थान पर आये हैं, जिस लक्ष्य से आये हैं, वही बार-बार याद रहता है? अगर इसी रीति से आये होंगे कि चलो अपनी जीवन व्यतीत करना है, कमी तो यहाँ है ही नहीं, नुकसान तो है ही नहीं, खाना तो मिलना ही है। दुनिया में लोग कमाई किसलिए करते हैं? कपड़ा, खाना, मकान.. इसी के लिए करते हैं। वह तो यहाँ सब मिल जाता है। तो ऐसी अगर साधारण लाइफ हमारी होगी, लक्ष्य कुछ भी नहीं। कहाँ आये है? क्यों आये हैं? किसके पास आये हैं? अगर वह स्मृति में नहीं है तो जन्म-जन्म हमारी साधारण स्थिति रहेगी। हम सारे कल्प में कभी भी ऊंच जन्म नहीं ले सकेंगे। जब संगम के समय पर हमको ऊंच बनने का चान्स है, उस समय हम साधारण रहे तो और जन्मों में क्या ऊंचे बनेंगे? साधारण ही बनेंगे। अब की अगर साधारण लाइफ है तो सारे कल्प में आप साधारण ही रहेंगे, तो क्या किया? यह लाइफ है क्या? इसलिए ही कहते हैं कि ब्रह्मा ने जब भाग्य बाँटा तो आप कहाँ थे? क्या सोये हुए थे? तो हम सोये हुए तो नहीं हैं? अलबेलापन भी तो एक नींद है ना। वह नींद तो फिर भी थकावट दूर करती है। लेकिन यह अलबेलेपन की नींद हमेशा के लिए हमको नीचे ही रखती है। तो अपने आपको यह जरूर चेक करो कि हम किस लक्ष्य से यहाँ आये हैं? उस लक्ष्य के अनुसार अपने लक्षण को भी चेक करो।
कई कहते हैं कि हमारा लक्ष्य तो बहुत ऊंचा है। अभी लक्ष्य ऊंचा तो सभी रखते हैं। छोटा बच्चा भी कहता है मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा, फिर भले इंजीनियर नहीं बने, हैमर लगाने वाला बने, लेकिन लक्ष्य तो वह भी रखता है, मैं डाक्टर बनूँगा, मैं इंजीनियर बनूँगा, मैं यह यह करूँगा लेकिन लक्षण भी चाहिए ना! लक्ष्य तो है लेकिन लक्षण कहाँ तक हैं? प्राप्ति तो लक्षण से होगी, सिर्फ लक्ष्य से तो नहीं होगी। तो लक्षण हमारे कौन-से हैं? और बाबा से दिल का प्यार है या
जीवन व्यतीत करने का प्यार है? लाइफ पास हो रही है ठीक है, ऐसे तो सारी दुनिया की लाइफ पास हो रही है। हमारी और ही अच्छी हो रही है तो लाइफ पास करने के लिए हम नहीं आये हैं लेकिन लाइफ बनाने के लिए आये हैं। अगर भाग्य बनाने का चान्स मिलते भी हम साधारण रीत से अपना टाइम गँवाते हैं या पास करते हैं तो उसका पश्चाताप हमको ज्यादा होगा। दूसरों को इतना नहीं होगा।
अच्छा, आप बाबा के बने हो, कुछ बना नहीं सकते हो तो बोझ तो नहीं बनो। और बोझ बनने से क्या होगा, समझो साधारण लाइफ है तो हमारे ऊपर बोझ तो चढ़ रहा है ना! इतना कीमती जो अन्न आता है, धन लगता है। जो जिज्ञासू डालते, करते हैं, वो किस लक्ष्य से करते हैं, कितनी ऊंची नज़र से भण्डारी में डालते हैं। अभी तो चलो जमाना बदल गया है लेकिन हमको याद है जब साकार में बाबा थे तो मातायें अपनी हिस्ट्री लिखती थी बाबा हमारे पास तो कोई पैसे नहीं, मैं तो गरीब हूँ, मैं अपना भाग्य कैसे बनाऊंगी, तो क्या करती थी! पति अपने काम पर जाता था तो सिलाई का काम करके, मशीन चलाके या फैक्ट्री में दो घण्टा जाके काम करके पीछे वो पैसे मनीआर्डर करती थी। उन दिनों में 8 आने का भी मनीआर्डर आता था। और लिखती थी बाबा एक ईट आठ आने की मेरी लगा दो। तो यहाँ हम अन्न खा रहे हैं, धन यूज़ कर रहे हैं, कोई भी काम में, वह इतना महत्व वाला है, इतना अमूल्य है, उसको अगर हम साधारण रीति से अपनी लाइफ पास कर लें, तो क्या रिजल्ट होगी? पश्चाताप तो हमको करना पड़ेगा ना! तो यह जरूर चेक करो कि हमारी लाइफ साधारण तो नहीं है? हमारा आधा दिन तो ऐसे ही बीत गया, काम-काज करते। बाबा कभी याद आ गया.... तो वह हुई साधारण लाइफ। तो इतना भाग्य मिलते हुए अगर हम साधारण लाइफ पास करते हैं तो इसे क्या कहेंगे ! हमको इतना अमूल्य जो भाग्य मिला है, उस भाग्य को हम यूज़ कर रहे हैं? नहीं तो वही गीत हमें सुनना पड़ेगा - रात गँवाई सोके और दिन गँवाया खाके या काम करके... बस । तो ऐसी लाइफ नहीं होनी चाहिए। अच्छा- ओम् शान्ति ।
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