
परिवार में सबके साथ मिलकर चलना है तो कभी अन्दर कडुवापन, रूखापन ना हो
1) बाबा की मुरली का सार है - कारण वा समस्या शब्द को | छोड़ निवारण और समाधान स्वरूप बनो। मीठा मुखड़ा, मीठा मुख हो, रूखापन निकल जाए, नेचुरल मुस्कुराहट हो।
2) हमारे चेहरे में जरा भी चेन्ज न आये, जरा भी भारीपन न आये, ईश्वरीय स्नेह हमें रूहानियत में रहने देता है, जब तक मैं बाबा से ईश्वरीय स्नेह नहीं खींचती हूँ तब तक रूहानियत में नहीं रह सकती।
3) रूहानियत में रहना माना मेरे में पूरा इसेन्स भरा हो। कारण चारों ओर से आयेंगे लेकिन हमारे मन में कोई ऐसी उत्पत्ति न हो जो चेहरे पर आ जाए, उसके लिए विशेष हम ईश्वर के प्यार में इतना डूबे रहें जो कोई बात न आये। मन और दिल का गहरा कनेक्शन है। दिल में कोई भी सूक्ष्म आश है, इच्छा है वो पूर्ण नहीं हो रही है, तो जो बाबा मेरे को देने चाहता है वो मैं नहीं ले रही हूँ।
4) बाबा जब ड्रिल कराता है तब तो बाबा अपनी पावर से ड्रिल कराता है, इसलिए वो सहज हो जाता है लेकिन प्रैक्टिकली मेरे में इतनी पावर हो जो एक सेकेण्ड में अशरीरी हो शान्तिधाम में चली जाऊं फिर सुखधाम में चली जाऊं। ऐसी गुप्त रिहर्सल हो इतनी तमन्ना चाहिए।
5) दिल और मन इन दोनों का गहरा कनेक्शन है। मन चाहता है शान्ति में रहूं, पर दिल में जो बात है, बाबा को भी सुनाते हैं कि बाबा मैं तो अच्छा हूँ, पर यह बात ही ऐसी है ना। जैसे चार रास्ते पर अगर एक सेकेण्ड सोचा नहीं कि इधर जाने से क्या फायदा, इधर जाने से क्या नुकसान, गलत रास्ते पर जाने से नुकसान हो जाता है। इशारा लिखा हुआ भी है कि यहाँ से जाना है लेकिन दिल में कन्फ्यूज़न है, इशारे पर ध्यान नहीं गया तो फिर वापस लौटना पड़ता है।
6) बाबा ने कहा तुम बच्चों को कभी दिलशिकस्त नहीं होना है। दिलशिकस्त होने के कारण भी कई चले गये, उसको फालो करने वाले पैसेन्जर भी रांग चले जाते हैं, फिर वापस आना पड़ता है, इसमें टाइम तो वेस्ट जाता है ना। टाइम जब वेस्ट होता है तो दिलशिकस्त हो जाते हैं।
7) बाबा ने कहा है- समय बड़ा खजाना है, समय बड़ी कमाई कराता है। मैं जरा भी एक सेकेण्ड भी फीलिंग में आई, निमित्त भले यह तन बना, मन बना, धन बना या जन बना उसी चिन्तन में चली गई, तो उस जाल में फंस गई, बाप से दूर हो गई। किसी भी प्रकार के चिन्तन ने बाबा से मेरे को दूर कर दिया, अकेली हो गई तब व्यर्थ बातों ने व्यर्थ का घेराव कर लिया, उस घड़ी फिर मुश्किल ये है कि रांग महसूस नहीं होता है फिर औरों के लिए प्रेम भाव भी छूट जाता है।
8) वर्तमान समय चाहे ब्राह्मण हैं, चाहे बाहर वाले हैं - तीन बातें हैं - मूंझना, घबराना, डरना। हरेक अपने से पूछे कभी मैं डरती हूँ? अगर मैं मूंझती, घबराती या डरती हूँ तो मेरा भविष्य क्या है? अपने आप से सवाल पूछ करके स्पष्ट कर लें या बाबा की बातें याद करके स्पष्ट कर लें। कन्फ्यूज़ होना माना जैसे कोई फ्यूज उड़ जाये तो क्या होगा! मुंझारा हो जायेगा ना, अंधेरे में घबराहट होगी, डर लगेगा। अंधियारा हो गया तो चोर भी आ जायेगा।
9) कई बार कन्फ्यूज़ होने से बाबा की बात सुनाई नहीं देती है। माया पहले अकेला करती है फिर अकेले में वार करती है। अगर कडुवापन, रूखापन होगा तो किसी का साथ नहीं मिलेगा। बाबा भी देखता है, इसमें साथ लेने का, परिवार से मिलकर चलने का अक्ल नहीं है। सबके साथ अगर सम्बन्ध अच्छा है तो बाबा एक्स्ट्रा प्यार करता है।
10) जब परीक्षा आती है तो प्रतिज्ञा भूल जाती है। एक बारी मैने प्रतिज्ञा कर ली कि याद और सेवा मेरे दिल से नहीं जायेगी। तो ऐसे में बाबा भी साथ देता है। अगर मैं मूंझी हुई बैठी रहूंगी तो बाबा भी कैसे साथ देगा!
11) बाबा बुद्धू किसको कहते हैं? अगर बाबा की बातों को समझ नहीं सकते, बुद्धि दूरादेशी, महीन नहीं है तो बाबा कहेगा यह बुद्धू है। बाबा दो टाइटल देता है - बुद्धू और भगत। जो विचार सागर मंथन न कर सके, जो समय पर सेवा में हाज़िर न हो सके वो बुद्धू हुआ ना। बाबा ने जो हमको ज्ञान धन दिया है, अगर हम दाता नहीं बन सकी तो बुद्धू हुई ना !
12) बाबा की साकार मुरली बुद्धि खोलने वाली है। बाबा की | बातों को समझने समझाने की ताकत तभी आ सकती है जब अन्दर वेस्ट नहीं है। दिल में कोई बात की भी इच्छा तमन्ना न हो तो बेड़ा पार है। अपने मन को स्वच्छ रखो, इसमें भले बुद्धू बनो।
13) बेगरी पार्ट के समय भी बाबा का निश्चय देखने जैसा था, निश्चय के बल से बाबा सदा निश्चित रहा। हम बच्चों का भी काम है सदा निश्चित रहना। बाबा हमारा साथी तब है जब हम एक-दो को बाबा के समीप लाने का ध्यान रखते हैं। अगर हम किसकी केयर नहीं करते हैं, ये तो ठीक नहीं है, ये ऐसा है, तो स्नेही बनकर नहीं रह सकते।
14) एक है सूक्ष्म ब्लाकेज़, जिस कारण जो मैं चाहती हूँ वह कर नहीं सकती। फिर आता है बॉण्डेज (बन्धन), मेरी बुद्धि बेहद में नहीं जा सकती। बाबा ने निर्बन्धन भव का वरदान दिया है तो मैं अपने को चेक करूं मैं कोई बन्धन में बंधी हुई तो नहीं हूँ? कोई का भी बंधन न हो, न सेन्टर का, न किसी का। ऐसे अपने आपको बन्धन मुक्त बनाना है तब ही बन्धनमुक्त होकर सेवा कर सकेंगे।
15) बाबा ने कहा है अपनी नेचर को नेचुरल बनाओ। अगर नेचर मेरी नेचुरल नहीं हुई तो मेरी कोई पुरानी नेचर या कोई न कोई की नेचर बैरियर बन जाती है। बन्धन भी नहीं है पर थोड़ी बैरियर है। छोटी-छोटी बातों में पेन (दर्द) हो जाता है तो आंखों में आंसू भर आते हैं। आंखे भर जाना यह अपने लिए खतरे की घंटी है। कभी भी किसी कारण से आवाज भारी हुआ तो इज्जत गई। क्या सेवा होगी! किसी को तीर कैसे लगेगा। तो न ब्लाकेज हो, न बॉण्डेज हो, न बैरीयर हो। फिर अनुभव कहता है कई सूक्ष्म सेवायें अनेक सम्पर्क वालों की, ब्राह्मण आत्माओं की, स्वयं की एक ही समय पर सब प्रकार की सेवा कर सकेंगे।
16) चार प्रकार की सेवा हर समय हमारे सामने है स्वयं की, साथियों की, ब्राह्मण आत्माओं की, सारे विश्व की, हर एक को हमारे से ऐसी फीलिंग आये कि ये हमारे हैं। इसके लिए सेल्फ पर पूरा ध्यान हो। अगर मैंने दूसरों पर अंगुली उठाई तो वो मेरे पर उठायेंगे। गुम्बज़ की तरह आवाज गूंजता है, जो मैं बोलूंगी वही मैं सुनूंगी। जैसा मैं सोचती हूँ, ऐसा मेरे लिए सब सोचेंगे।
17) जैसे भगवान रहम का सागर है वो किसी भी आत्मा के गुण अवगुण नहीं देखता है। बाबा भूल को भी भुलवा देता है। कोई अपनी भूल बताता नहीं है, बताता भी है तो आधी बताता है, छिपाता है। कोई बाबा को बताता है - बाबा मेरे से ये भूल हुई तो बाबा इतना रहम करता है जो भूल को भुलवा के उसको समझदार बना देता है। इस तरह से हम भी अपने ऊपर रहम करें।
18) बाबा ने हमारे में जो उम्मीदे रखी हैं वह कहाँ तक पूरी की हैं? जैसे साकार बाबा, चाहे अव्यक्त बाबा सेकेण्ड में अशरीरी बना देता है, ऐसे हम कहाँ तक बने हैं! बाबा ने ऐसी दृष्टि दी है जो हम हिल भी न सकें, कुछ बोल भी न सकें, अन्दर में खुशी हो गई। बाबा कहते इसमें बाप समान बनो।
19) हमारी नेचर बाप जैसी नेचुरल हो जाए। जब तक हमारी कोई भी नाम रूप वाली नेचर है, तो बाप जैसी सेवा नहीं कर सकते। सेकेण्ड में किसको हल्का कर दूं, एक सेकेण्ड में हल्का हो जाऊं, वह नहीं हो सकेगा। अगर कोई भी भारीपन है तो विश्व परिवर्तक, विश्व कल्याणकारी कैसे बन सकूंगी। अच्छा!
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