
ऐसे क्वालिटी वाले बनो जो मुरझाये हुए को संजीवनी बूटी देकर मुस्काराना सिखा दो
सदा आत्म-विश्वास बैठ जाये - यह सफलता जो शुरू हुई है वो अन्त तक चलेगी। न मेरे को डाउट उठे, न किसी को डाउट उठे। संगमयुग की अभी थोड़ी-सी घड़ियाँ हैं इसलिए निरन्तर पुरूषार्थ चालू रखना है। बीच-बीच में ब्रेक हो जाने से उसमें फिर और मेहनत बढ़ जाती है और कभी दिलशिकस्त भी हो जाते हैं। पुरुषार्थ में निरंतर सफलता न मिलने का कारण है - पुरानी कोई आदत है, कोई नेचर है। वो संस्कारों में भरी पड़ी है, उसी को हम यूज़ कर रहे हैं। पुरानी नेचर व आदत चलाती है।
अच्छी भावना वाला पुरुषार्थ नहीं किया है, वो स्वाभाविक नहीं बना है। तो परिवर्तन नहीं आता। परिवर्तन ऐसा हो जैसे लोहे और सोने में कितना अन्तर है! लोहा कितना भारी है और सोना एक तो सच्चा सोना है, कुछ अलाए मिक्स नहीं है तो वैल्यू में कितना फ़र्क है? सोने में जरा भी अलाए मिक्स न हो तब तो बाबा से गोल्डन कप का अधिकार ले सकेंगे।
दृढ़ संकल्प भी तभी होगा जब इतना अच्छा रियलाइजेशन हो। परिवर्तन आयेगा दृढ़ संकल्प से। तो संकल्प में दृढ़ता तभी आयेगी जब समय की, स्वयं की रियलाइजेशन हो। समय जा रहा है। जैसे जब फुल मून डे होता है तो कितना मज़ा आता है, खींच होती है। ऐसे अपनी सम्पूर्णता को सामने रखो तो बड़ा अच्छा लगता है। तो जैसा लक्ष्य सामने रखते हैं वैसे बन जाते हैं। इजी है। अपना ही फेस चेन्ज हो जाता है। उस घड़ी अपने को लगता ही नहीं है मैं जानकी हूँ या फलानी हूँ...। अपना नाम रूप भूल जाता है। तो अपने पुरुषार्थ की स्पीड अच्छी रखो जो टाइम के पहले हम पहुँचे हुए रहें क्योंकि टाइम चला गया और सम्पूर्णता भी दूर दिखाई पड़ती है तो दौड़ी नहीं लगा सकेंगे, जम्प नही लगा सकेंगे। जब किसको भी नहीं देखेंगे तब दौड़ी लगा सकेंगे, कोई पत्थर भी आयेगा तो जम्प लगाके पार कर लेंगे। पत्थर को देख रूकेंगे या उसे तोड़ेंगे तो टाइम वेस्ट हो जायेगा। तुम चल उस पार, तो जो दौड़ना जानता है वो जम्प भी लगा सकता है। जो दौड़ना नहीं जानता है वो बिचारा जम्प कैसे लगायेगा? तो बाबा ने कहा
कारण कभी नहीं देखना। बाबा ने जैसे स्ट्रिक्ली मना किया है। क्योंकि कारण को देखा माना पत्थर को देखा, काँटे को देखा, फलाने को देखा.. कुछ भी देखा तो बैठ गया। तो ऐसी भूल इस साल में कभी नहीं करना। कोई बड़ी समस्या भी आ जाये तो बाबा सामने आ गया तो समस्या चली गई, समाधान हो गया।
फिर बाबा ने कहा कभी भी कडुवा नहीं बोलना, कडुवा बोला माना अन्दर सन्तुष्ट नहीं है या थका हुआ है या किसी की नेचर अनुसार बिचारा मूँझा हुआ है, तो आवाज़ में फ़र्क पड़ जाता है। जिससे रूहानियत और ईश्वर से जो ईश्वरीय स्नेह पाया हुआ है वो खो लेता है और अभी पा भी नहीं सकता है। तो यह बहुत गहरी बात है इसलिए इस बात को अच्छी तरह से समझो। तो कुछ भी हो जाये, कोई बड़ी बात नहीं है जवाब है नथिंग न्यू बाबा।
झांसी की रानी के समान हम भी मन के घोड़े पर बैठ करके ऐसे जम्प लगा देवें, हिम्मते बच्चे हजार गुणा मदद बाप की। तो जिसको हिम्मते बच्चे मददे बाप का अनुभव है वो तो दीवारों को भी ऐसे पार करेगा। सेकेण्ड में अशरीरी हो बाबा के पास ऊपर चले जाना, कोई बड़ी बात नहीं है। तो अभी यह बार-बार रिहर्सल करना है कि पहले शान्तिधाम फिर सुखधाम में अपने मन-बुद्धि को लेके जाओ। इतना ईश्वरीय नॉलेज का अन्दर मन में अमृत पिया हुआ है, जिस कारण मन मजबूत है, जो बाबा ने कहा कन्ट्रोलिंग पॉवर हो तब तो रूलिंग पॉवर आयेगी। अगर मन कमजोर है, कन्ट्रोलिंग पॉवर नहीं है, तो माया देखती है यह तो पहले भी कमजोर है, बाकी भी मैं इसको अपना बना दूँ। तो माया बाबा का बनने नहीं देगी। माया की आकर्षण किसी तरह से भी है तो असुरक्षित महसूस करते हैं, अधीनता हो जाती है फिर आधार चाहिए। अगर किसी की चिंता लगती है कि इसको मुझे आधार देना पड़ेगा तो यह भी खतरा है। यह जो रियलाइजेशन की कमी है, आधार देना या आधार लेना, अधीन बनना या अधीन बनाना, वो कभी ईश्वरीय स्नेह की शक्ति का अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा ओम् शान्ति ।
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