

निश्चय का आधार और निश्चय बुद्धि की निशानी ज्ञान है। जिसमें भी निश्चय होता है, वह व्यक्ति सदा नयनों में समाया हुआ रहता है। निश्चय का आधार है — बाबा की पहचान, बाबा का परिचय — बाबा परमात्मा हैं और हम उनकी संतान हैं। हमें क्या प्राप्ति होती है? बाबा के गुण क्या हैं? अगर हम बाबा की याद में रहते हैं, तो बाबा के जो गुण हैं, वे हम में भी आ जाते हैं। बाबा ने तीन शब्दों के बारे में समझाया है ① जानना, ② मानना, ③ उसके आधार पर चलना। यहाँ शिव बाबा को जानना ही आधार (foundation) है। फिर योग (meditation) द्वारा मानना — जैसे हमारे पिता का प्यार अविनाशी और अलौकिक है — और फिर श्रीमत पर चलना, निश्चय से चलना — यही आधार है। नाम और रूप से परमात्मा का परिचय हमने जाना, हमने माना; पर यदि उस पर चलना नहीं हुआ, तो हलचल होगी। तीव्र पुरुषार्थी का foundation है निश्चय बुद्धि बनना। पहला निश्चय है — ‘मैं आत्मा हूँ’ और ‘परमात्मा मेरा पिता है’। अगर शरीर के भान से याद करेंगे तो बाबा से कनेक्शन नहीं होगा। जब व्यर्थ संकल्प चलते हैं, तो बाबा की याद नहीं रहती, योग नहीं लगता। लेकिन जब हम समझते हैं कि, ‘मैं आत्मा हूँ’ — तो बाबा की याद रहती है। योग मतलब आत्मा और परमात्मा का मिलन — जिसके लिए देही-अभिमानी बनना पड़ता है। हमें अपने में, परमात्मा में और ड्रामा में — तीनों में निश्चय होगा, तो प्राप्ति होगी। निश्चय बुद्धि विजयी, संशय बुद्धि विनश्यन्ति, अंश मात्र भी संशय आया तो अंश का वंश बन जाता है। ‘क्यों’, ‘क्या’ के सवाल ही संशय के अंश हैं। परमात्मा से सर्व संबंधों के सुख प्राप्त होते है । परमात्मा ही पिता, टीचर और सद्गुरु हैं। माया किसी भी रूप में आती है — संकल्प के रूप में, वाणी के रूप में, संबंध-संपर्क में भी आती है — लेकिन हमे हलचल में नहीं आना हैं। बाबा कहते हैं — जब हम ब्राह्मण बने, ज्ञान मिला, तो परमात्मा के साथ हो गए। इसलिए माया हमें खींचती है। माया से घबराना नहीं है। मम्मा कहती थीं — जैसे दादा-दादी को अपने पोते कभी बाल भी खींचते हैं, वैसे ही माया के पाँच विकार भी आपके पोते हैं और हम उनके दादा-दादी। हम माया से जितना तंग होंगे, माया हमें उतना ही तंग करेगी। इसलिए माया किसी भी रूप में आती है तो उसे पेपर समझो। माया आती है तो हम अनुभवी बनते हैं, और हमारा निश्चय भी बढ़ता है। ‘बाबा मेरा साथी है, सर्वशक्तिमान हमारे साथ है’ — इस निश्चय से चलो।