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003 Murli Ka Mahatv
Spiritual Classes

003 Murli Ka Mahatv

Dadi Gulzar Ji
48:24166
003 Murli Ka Mahatv
Spiritual Classes
003 Murli Ka Mahatv
Dadi Gulzar Ji
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Essence

मधुबन वरदानी भूमि है। मधुबन की विशेषमहावाक्य यहाँ बाबा की याद आसानी से आती है। पढ़ाई पढ़ते समय कितनी बार “बाबा” शब्द आता है. जेसे की मुरली कौन सुना रहा है — स्वयं भगवान हमें पढ़ा रहे हैं। भले दादी पढ़ रही हो, लेकिन पढ़ाने वाले तो भगवान हैं।

मुरली का मज़ा तब आएगा जब हम यह समझेंगे कि बाबा मुझ से पर्सनली बात कर रहे हैं, मुझे पर्सनली पढ़ाने आए हैं। जब बाबा कहते हैं “मेरे मीठे-मीठे बच्चे,” तो समझना है कि बाबा यह मुझसे कह रहे है — मैं ही वह हूँ जो 5000 वर्ष का चक्कर लगा कर अभी संगम युग पर पहुँचा हूँ।

जब बाबा कहते हैं कि “परमधाम से तुम आए हो,” तो ऐसा अनुभव करो कि मैं परमधाम से इस सृष्टि पर अपना पार्ट बजाने आई हूँ। बाबा सूक्ष्म वतन की बात करते हैं कि वहाँ लाइट ही लाइट है — बहुत सुंदर है, तो सोचो — वह बाबा का वतन, मेरा भी वतन है।

भगवान आए हैं महावाक्य सुनाने, और मेरा ध्यान इधर-उधर जाए—तो क्या फायदा। हम कौड़ी से हीरे तुल्य बनते हैं—वह भी मुरली से। कोर्स भी मुरली के आधारित बना हैं।

मुरली मिस की, तो समझेंगे की वही वही प्वाइंट होगी। पर हर मुरली में नई प्वाइंट पर अटेंशन खिंचवाया जाता है। शब्द भले वही हों, लेकिन अटेंशन अलग होता है। जैसे ड्रामा की बात—कभी “नथिंग न्यू” का कनेक्शन देंगे, कभी “हम हीरो एक्टर हैं” यह समझाएंगे।

जितना मुरली से प्यार होगा, उतना बाबा से प्यार होगा। और जितना बाबा से प्यार होगा, उतनी ही सहज याद हो जाएगी—क्योंकि जिसे प्यार होता है उसे भूलते नहीं। जब हम ब्रह्मा बाबा के पास जाते थे, वह पूछते थे —मुरली पढ़कर आए हो? बाबा मुरली को इतना महत्व देते थे। अगर आपको मुरली से प्यार नहीं, तो मुरलीधर से भी प्यार नहीं—ऐसे बाबा कहते थे।

बहुत भाई–बहन कहते हैं कि व्यर्थ संकल्प चलते हैं। व्यर्थ संकल्प में बुद्धि कहा से कहा पहुंच जाती है — इतनी तेज़ गति से चलते है, जबकि शुद्ध संकल्प की गति नॉर्मल होती है। व्यर्थ संकल्पों से दिमाग की एनर्जी और समय वेस्ट होते हैं, और उन्हें रोकना मुश्किल होता है। उन्हें बदलने के लिए शुद्ध संकल्प चाहिए — जो मुरली में मिलता है। सार याद करें, वरदान याद करें, स्लोगन याद करें। बार-बार उनके अर्थ में जाएँ तो व्यर्थ संकल्प शुद्ध संकल्प में बदल जाएंगे।

अभी इस एक जन्म में हमें इतने शुद्ध संकल्प करने हैं कि आधा कल्प उसी आधार पर ऊँचा पद प्राप्त हो। सतयुग में जाएँगे, लेकिन सीट कैसी मिलेगी—यह सोचना है। भगवान के बच्चे बनकर छोटा पद मिले तो अच्छा लगेगा? शिवबाबा तो सतयुग में न्यारे हो जाते हैं, पर ब्रह्मा बाबा के साथ रहेंगे—इसमें मज़ा है क्योंकि उनसे हमारा प्यार है।

ब्रह्मा बाबा के लास्ट शब्द थे: निराकारी, निर्विकारी, निरअहंकारी। इन तीन शब्दों को धारण कर लें तो भी बाप समान स्थिति बन जाएगी। ब्रह्मा बाबा के साथ जाना है तो उनके समान बनना ही होगा।

5 बार ट्रैफिक कंट्रोल इसलिए दिया है क्योंकि हम कर्म-कॉन्शियस हो जाते हैं। यह याद को आसान बनाने की अच्छी ट्रिक है।
अमृतवेला बाबा को याद किया, मुरली क्लास में बाबा को याद करके बैठो, नाश्ता उन्हें पहले भोग लगाकर करो, काम करते समय ट्रैफिक कंट्रोल, शाम को भी याद करके खाना खाओ, रात को सोने जाओ तो बाबा की गोद में—तो विकार नहीं आएगा। बाबा ने कितनी सरल विधि बनाई है जिससे याद सहज हो जाती है।

बाबा साथ हैं—उन्हें यूज़ करो। संग का रंग लगेगा। दिलशिकस्त नहीं होना है। माया आएगी, लेकिन हमें महावीर बनना है।
दिनचर्या, विधि अनुसार चलो और अनुभव करो।

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