

ब्राह्मण परिवार की पहचान है – ओम शांति। इसी शब्द से हम विघ्न-विनाशक बन जाते हैं (ओम शांति, यानी मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ)। इस शब्द से स्वयं का भी फायदा होता है और सेवा भी हो जाती है। हर एक के सामने परिस्थिति आनी ही चाहिए, क्योंकि यहाँ हमारी पढ़ाई है। पढ़ाई में पेपर न आए तो पढ़ाई किस काम की? पेपर ही क्लास आगे बढ़ाता है, हमें अनुभवी बनाता है। अगर हम स्व-स्थिति में स्थित होंगे, तो परिस्थिति हमारा कुछ नहीं कर सकती — वह आती है और चली भी जाती है। जैसे मैं आत्मा आदि अविनाशी हूँ, वैसे मेरी स्थिति भी अविनाशी हो। बाबा तो पहले से ही कहते हैं कि माया आएगी, लेकिन हमें हाई हाई नहीं करना है। हर परिस्थिति हमें कोई बड़ी शिक्षा देने आती है, लेकिन हमारा ध्यान “क्यों, क्या” में होता है। यह नहीं सोचते कि यह तो पेपर है। अगर किसी ने हमारी इंसल्ट की और हमें फीलिंग आ गई, तो वह भी रॉन्ग है। (इन्सल्ट करने वाला तो रॉन्ग है ही लेकिन हम फीलिंग में आ गए वो भी रॉन्ग) हम अपनी गलती नहीं देखते, दूसरों की तुरंत देख लेते हैं। इसमे अपना टाइम और एनर्जी वेस्ट हो जाता है और अवस्था भी नीचे-ऊपर हो जाती है। इसलिए “बीती को बिंदी लगाना” सीखना है। कोई भी परिस्थिति हमें हिला न सके। बात कितनी भी बड़ी हो, अगर हम बाबा के साथ परमधाम में बैठ जाएँ, तो बात छोटी नज़र आएगी। मुरली में बाबा जो टाइटल देते हैं, वह स्वमान हमें नहीं भूलना है। परिस्थिति जैसे की साइड सीन है — सब सीन अच्छे नहीं होते। साइड सीन को पास किया जाता है। जैसे की, साइड सीन में एक टेढ़ा वृक्ष आया, तो हम यह नहीं सोचेंगे कि ऐसा टेढ़ा वृक्ष किसने लगाया, इसे नहीं लगाना चाहिए था। कोई भी बातें आती हैं, तो हमें सोचना है कि हम विजयी कैसे बनें। हम विजयी रत्न हैं, तो परिस्थिति से डर नहीं सकते। बाबा ने एक स्लोगन दिया था: हमारे लिए तो तीनों काल अच्छे से अच्छे हैं — जो बीत चुका, वह भी अच्छा; जो हो रहा है, वह भी अच्छा; और जो होने वाला है, वह उससे भी अच्छा। अगर हम अच्छा न देखें और “क्यों-क्या” में जाएँ, तो परिस्थिति स्व-स्थिति को खत्म कर देती है। बाबा जो मुरली चलाते हैं, उसे प्रैक्टिकल जीवन में लाना है। सिर्फ अच्छा-अच्छा कहना नहीं है, लेकिन जब समय आए तब उसे करके दिखाना है; तब कहेंगे — मुरली अच्छी थी। जो मुरली हम सुबह सुनते हैं, सारा दिन उसी का मनन करें और उसे दिन में यूज़ करें, तो हमें मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दो शब्द — बाबा को याद करो और सेवा करो। बाबा के साथ हमारा अनादि, अविनाशी संबंध है, इसलिए याद करना मुश्किल नहीं है, अगर बाप के साथ दिल का संबंध है। जितना बाबा में “मेरापन” की फीलिंग है, उतनी याद सहज है। योग के समय कई कहते हैं कि बुद्धि इधर-उधर जाती है (कर्म करते समय इतना नहीं), क्योंकि कर्म करते समय बुद्धि बिज़ी रहती है। बाबा की याद से फायदा हमें ही है। हमारे ही पाप कटेंगे और वर्सा भी हमें ही मिलेगा। हम याद भूल जाते हैं, इसलिए बाबा बार-बार याद के बारे में मुरली में सुनाते रहते हैं। परिस्थिति से घबराना नहीं है। सर्वशक्तिवान मेरे साथ कंबाइंड है, मेरा साथी है — फिर सब कुछ सहज हो जाएगा और सहज ही प्राप्ति हो जाएगी।