

बाबा ने हम सबको लक्की सितारा बना दिया। सबसे श्रेष्ठ सितारा है सफलता का सितारा! सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यह वरदान बाबा ने हम बच्चों को दिया है—इसे कोई लूट नहीं सकता। अब हमने अपने जीवन को कहाँ तक सफल बनाया है, यह हमारे ऊपर है। कभी-कभी सफलता स्वरूप नहीं लेकिन सदा। सफलता का आधार है ज्ञान को प्रैक्टिकल में लाना। समय पर उसका उपयोग करना आना चाहिए। ज्ञान सभी के मन और बुद्धि में है। बुद्धि में अष्ट शक्तियाँ का ज्ञान भी हैं। योग भी सभी लगाते हैं, पुरुषार्थ भी करते हैं, लेकिन समय पर इन शक्तियों को कार्य में लगाना आना चाहिए। जब क्रोध आए तो सहन-शक्ति का उपयोग करना आना चाहिए। कोई insult करे तो भी क्रोध नहीं करना है। ब्रह्मा बाबा के जीवन में भी कई लोगों ने उनका अपमान किया, गलत बातें बोलीं, लेकिन उन्होंने समय पर सहन-शक्ति का उपयोग किया। एसे ही, हमे कोई खराब चीज देता है, तो हमे लेनी नहीं है। दुःख देना भी नहीं है और दुःख लेना भी नहीं है। लेने से ही हमें परेशानी होती है। हम जब संबंध-संपर्क में आते हैं, वही हमारे पेपर लेने वाले होते हैं। वे हमारे हिसाब चुक्ति कराने के निमित्त बनते हैं। पेपर मतलब कागज पर नहीं आएँगे—समस्याएँ पेपर बनकर आएँगी। स्वमान में रहो और स्व-परिवर्तन की तरफ ध्यान दो। स्व-परिवर्तन होगा तभी विश्व-परिवर्तन होगा। हमारी धारणा होगी तभी जब हम किसी को बोलें, तो उसका असर होगा। अपने मन-बुद्धि को busy रखने से कोई भी व्यर्थ बातों का प्रभाव हम पर नहीं पड़ता। हम कमल-पुष्प समान रह सकते हैं। अमृतवेले और मुरली के समय बाबा याद आए—परन्तु कार्य करते समय यदि बाबा की जगह उस कार्य के संकल्प चलें, तो व्यर्थ नहीं चलेगा — लेकिन जमा क्या किया? शुद्ध संकल्प किया? संगमयुग का बहुत महत्व है। सदा एव़र-रेडी रहना है। मन और बुद्धि का टाइम-टेबल बनाना है। हर घंटे 2–3 मिनट अपनी चेकिंग करें—कोई नकारात्मक संकल्प आया हो तो उसे सकारात्मक में परिवर्तन करें। चेक करो और चेंज करो। डबल-लाइट रहना है। अपने को प्रभू के हवाले कर दो। प्रवृत्ति में रहो, लेकिन trustee बनकर—गृहस्थी बनकर नहीं। ज्ञान का मनन करो। योग को बढ़ाओ। बाबा बोझ लेने के लिए आए हैं—इसलिए बोझ दो और हल्का बनो। खुशी नहीं गँवानी है। कुछ भी बात आए तो बिंदी लगाओ।