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020 Bachat Ka Khata Jama Kaise Kare 01-08-99
Spiritual Classes

020 Bachat Ka Khata Jama Kaise Kare 01-08-99

Dadi Gulzar Ji
52:43225
020 Bachat Ka Khata Jama Kaise Kare 01-08-99
Spiritual Classes
020 Bachat Ka Khata Jama Kaise Kare 01-08-99
Dadi Gulzar Ji
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Essence

मुख का मौन न भी रख सको, फिर भी मन का मौन रखना है। जब मन में मौन रहता है, तब मुख से उतना ही बोल निकलता है जितना आवश्यक हो। ज्यादातर नुकसान या गलतियाँ उनसे ही होती हैं जो ज्यादा बोलते हैं।
ज्यादा बोलने वाले की निशानी यह है कि वे अपनी बात को बार-बार स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। और क्योंकि अपने बोलने पर उनका नियंत्रण नहीं होता, इसलिए मन और मुख—दोनों पर नियंत्रण नहीं रहता।

बाबा ने कहा है: बचत का खाता जमा करो। हमारे पास संकल्पों का बहुत बड़ा खज़ाना है। हम खुश होते हैं या डिस्टर्ब होते हैं—यह सब मन से ही होता है।
“मन जीते जगत जीत।” इसलिए मन की संकल्प-शक्ति को व्यर्थ नहीं गंवाना है, उसे बचाना है।

आत्मा और शरीर अलग हैं—आत्मा चलाने वाली है और कर्मेन्द्रियाँ चलने वाली (सहयोगी) हैं। मैं आत्मा मालिक हूँ या कर्मेन्द्रियाँ मालिक हैं—यह अपने अंदर स्पष्ट होना चाहिए। यदि कर्मेन्द्रियाँ मालिक बन गई, तो योग नहीं लग सकता।
जब पक्का अनुभव हो जाए कि मैं आत्मा करावनहार हूँ और कर्मेन्द्रियाँ मेरे साथी हैं, तब विदेही बनना या कर्मातीत स्थिति प्राप्त करना सहज हो जाता है।

हमें बेगमपुर के बादशाह बनकर बैठना है। बादशाह अर्थात राज्य-अधिकारी; और इस सिंहासन के चार पैर हैं—निराकारी, निरहंकारी, निर्विघ्न, निर्विकारी। यह स्थिति होगी तभी हम सिंहासन पर बैठ सकेंगे। इस स्थिति के लिए मन का मौन आवश्यक है।

बाबा बैठा है इसलिए अपने ऊपर बोझ नहीं रखना है। जहाँ बाप है, वहाँ पाप नहीं है। जहाँ ‘मैं-पन’ आता है, वहाँ झगड़े अवश्य होते हैं।
बाबा कहते हैं—‘कारण’ शब्द नकारात्मक है और ‘समाधान’ शब्द सकारात्मक।

हम अपने बचाव के लिए कारण बताते रहते हैं। लेकिन, उंच पद प्राप्त करने और स्वर्ग में जाने के लिए मरना है, मिटना है, ‘मेरे’ को मिटना है। मरने से डरना नहीं है।
जो तुम्हारी कमजोरी होगी, माया उसी रूप में आएगी। जैसे लाल मिर्च में लाल कीड़े आते हैं—इसलिए सावधानी रखना आवश्यक है।

बाबा कहते हैं—हमारी पूजा होने वाली है तो तन-मन से स्वच्छ रहना है। भक्त-लोग चरणामृत पीते हैं, इसलिए पाँव भी स्वच्छ होने चाहिए। मैले पाँव वालों की कभी पूजा नहीं होती।

अपने पर अटेन्शन रखना है, नहीं तो धरमराज की सजा भोगनी पड़ेगी। इसलिए बेहद का वैराग्य रखो, बेहद के वैरागी बनो तो विदेही बन जाएंगे, कर्मातीत बन जाएंगे। 

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