मौन ही सच्चा संवाद है।
मौन की शक्ति आत्मा का उड़ान मार्ग है।
जब हम शांति में बैठे होते हैं — तन शांत, मन शीतल — तभी सच्चे अर्थों में हम शांति के संदेशवाहक बनते हैं, शांति की राह दिखाने वाले बनते हैं।
बाबा कहते हैं — उत्पत्ति और उत्पन्न से दूर हो जाओ।
जब मन शांति और शीतलता से भर जाता है, तो आत्मा की ऊर्जा स्वतः बढ़ती है।
शांति और शीतलता से ही सच्ची शक्ति उत्पन्न होती है।
जब कर्मेन्द्रियाँ शीतल हो जाती हैं, तो आत्मा को शांति बहुत प्रिय लगती है।
एकांत में रहकर, एक बाबा और मैं आत्मा — यही स्थिति बनाओ।
मौन की शक्ति संचित करनी है।
जब यहाँ का सब कुछ भुला हुआ होता है, तब ही आत्मा बाबा की टचिंग पकड़ पाती है।
बुद्धि को मुक्त रखो, क्योंकि बाबा कॉल करते हैं, पर व्यस्तता के कारण हम टचिंग रिसीव नहीं कर पाते।
जब बुद्धि फ्री होती है, तभी बाबा हमसे कोई भी कार्य करवाते हैं और टचिंग सटीक कैच होती है।
कर्तापन के भाव से परे रहने का अभ्यास करो।
जब मौन में बैठे हो, तो बाबा से दृष्टि भी ले रहे हो और दूसरों में भ्रकुटि के बीच चमकती आत्मा को भी देख रहे हो — और कुछ नहीं।
मौन में रहने से सभी सूक्ष्म कीट, जो मन को व्यस्त रखते हैं, बाबा के साक्ष से समाप्त हो जाते हैं।
बाबा ने केवल ‘नूर रतन’ और ‘विजय रतन’ कहा ही नहीं, बल्कि बनाया भी है।
जब आवाज़ में आते हैं, तो बाबा से दूरी महसूस होती है;
और जब मौन में रहते हैं, तो बाबा बहुत निकट अनुभव होते हैं।
मौन में रहने से ड्रामा में अपना पार्ट स्पष्ट हो जाता है — कि मेरा रोल क्या है, मैं हीरो हूँ या हीरोइन।
मौन में रहने वाली आत्मा प्रश्नों से परे, संतुष्ट और स्थिर रहती है।
मौन के द्वारा बाबा से मेरा सीधा संचार होता है।
जब टचिंग पावर सटीक हो और समय पर कैचिंग पावर भी हो, तब आत्मा सच्चे अर्थों में बाबा की संतान बनती है।
ड्रामा के दो पंख हैं — “ड्रामा को जानना” और “ड्रामा को मानना”।
ये दोनों पंख आत्मा को चढ़ती कला से उड़ती कला में ले जाते हैं।
मौन की शक्ति आत्मा को उड़ती कला में स्थिर कर देती है।
अब बुद्धि में यही विचार आता है — “घर जाना है।”
इसलिए यहाँ रहते हुए उपराम वृत्ति में रहो, संबंधों में स्नेह और प्यार रखो।
यही मौन की शक्ति पूर्णता की ओर ले जाएगी।
न्यारे अपने लिए और प्यारे सेवा में बनो।
जितना मौन में रहेंगे, निर्णय की शक्ति और परखने की शक्ति उतनी ही स्वतः दिनभर कार्य करती रहेगी।
मौन ही सच्चा संवाद है — मौन में ही बाबा से साक्षात्कार होता है।
