

यज्ञ इतिहास - तपस्या काल (चैप्टर 3): 1939-1950 मुख्य झलकियां: विघ्न समाप्त हुआ और तपस्या शुरू हुई। मौन में रहकर काम करना था। जगह-जगह पर पेपर-पेंसिल लटकाए गए थे, जिसे जो डायरेक्शन देना होता, वह लिखकर बताना होता। गुलजार दादी ध्यान में चली गईं और पहली बार सूक्ष्म वतन देखा। वहाँ उन्होंने ब्रह्मा बाबा को ट्रांसपेरेंट लाइट वाले स्वरूप में देखा। बाबा ने वापस भेजा कि यह कौन है? तब पता चला कि वह संपूर्ण ब्रह्मा स्वरूप है। फिर मुरली में स्पष्ट समझाया कि सूक्ष्म वतन क्या है, कहाँ है, क्यों बनाया गया है—सब मालूम कराकर बताया। बाबा पत्र ऐसा लिखते थे जिसमें सतयुग कैसा होगा, क्या भाषा होगी, क्या खाते थे, शादी कैसे करते थे, कारोबार कैसे चलता था—सब साक्षात्कार कराते थे। धीरे-धीरे परमधाम का साक्षात्कार करवाया। बाबा बिंदु स्वरूप कैसे थे, परमधाम का प्रकाश कैसा था—सब स्पष्ट किया। तब केवल तपस्या थी, सेवा नहीं थी। इसलिए फ्री थे, तो धर्मराज क्या करेंगे? सतयुग के नज़ारे जो देख कर आते थे, उन्हें प्रैक्टिकल में दिखाना होता था। ग्रुप्स बनाए जाते थे और हर एक ग्रुप को रात १ बजे से सुबह ६ बजे तक ध्यान में बैठना होता था, बाबा के पास जाना होता था। बाहर की दुनिया की कोई खबर नहीं होती थी, केवल शांति होती थी। एक ओर विश्व युद्ध था और दूसरी ओर ध्यान व दीदार चल रहा था। समुद्र के पास बालू के पहाड़ पर मस्ती में बैठकर तपस्या करते थे—मम्मा और बाबा के साथ। जब पाकिस्तान बना, तो वहाँ के कमिश्नर फोन करते थे कि आज शहर में घमासान है, बाहर मत निकलना। बाबा अलग-अलग टॉपिक पर भाषण लिखने को कहते थे, तो हम ऐसे लिखना सीखे। कमला माता ने निमंत्रण दिया, तो बाबा ने दीदी, दादी, निर्मल शांता दीदी, आनंदकिशोर भाई, निर्मल शांता, और शील को मुंबई भेजा। वहाँ वे तीन महीने रहे और ज्ञान सभी को बहुत अच्छा लगने लगा। फिर मूलचंद और गंगेश्वर ने कहा कि अब भारत आओ।