

यज्ञ इतिहास - तपस्या काल एवं भारत में आगमन (चैप्टर 4): 1939-1950 मुख्य झलकियां: बाबा ने हमें कराची में प्रैक्टिकल में ज्ञान, योग, तपस्या, सेवा, देहभान मिटाना, मामेकम् याद करना, संगठन में रहना, श्रीमत पर चलना, रॉयल जीवन, बैगर टू प्रिंस और प्रिंस टू बैगर बनना सब सिखाया। सादगी और त्याग का पाठ सीखा। एक रूम में 7-8 बहनों का साथ रहना, सूती कपड़े पहनना, मम्मा के उदाहरण से संन्यासी जीवन अपनाना – ये सब परिवर्तन कराए गए। देह और देह के सारे संबंधों को प्रैक्टिकल में पूरी तरह छोड़ना सिखाया। जशोदा बाबा को बाबा कहे और बाबा जशोदा को बेटी कहे ये भी वंडर था। मम्मा की मां “मम्मा” कहे और मम्मा “रोचा” कहे – ऐसी नष्टमोहा स्थिति बाबा ने बनाई। बाबा ने सिखाया कि सब धर्म वाले कैसे आएंगे, और विश्व सेवा की रणनीति कैसे बनेगी। विश्वकिशोर दादा के पास झाड़ और त्रिमूर्ति का चित्र, गोल्डन किताब झपवाई। क्वीन एलिजाबेथ और गांधी जी को पत्र भिजवाए। राजाओं के पास जब सेवा को जाएंगे तो तुम उनको कैसे समझाएंगे वो लिखकर बताओ ऐसे हम सब को ट्रेनिंग दी। बाबा बना रूहानी हाइएस्ट सर्जन। सबको एक बल, एक भरोसे का अनुभव होता था। कोई संकल्प, विकल्प नहीं चलते थे। बाबा ने कहा १५ दिन ज्वार की रोटी और लाप्सी पीना है तो कोई भी बीमार नहीं पड़ा। कराची में रहते हुए बाबा ने जीवन एकदम बनवास जैसा बना दिया गया था। जैसे राम बनवास में थे वैसे हम वनवास में थे। बाबा ने हम सब को बाहर की दुनिया से सेफ रखा, यहाँ तक कि बँटवारा कब हुआ ये भी हमें पता नहीं चला। बाबा ने इकोनॉमी में रहना सिखाया – सस्ती सीजन की सब्जियाँ, गाय का दूध, और एकसाथ इकठ्ठा भोजन करना। सेवा में कोई छोटा-बड़ा नहीं। कर्मणा सेवा भी ऐसे की जैसे सब की समान– कपड़े धोना, गाड़ी ठीक करना। हर सेवा का टर्न था किसी का खाना पकाने का, सफाई का, लॉन साफ रखने का। भाऊ के सुझाव पर आबू जाने का निर्णय हुआ। मुस्लिम मंत्री भी कहते थे – "आप खुदा के बंदे हैं, हमें छोड़कर क्यों जा रहे हो?” मुस्लिम कलेक्टर-मिनिस्टर ने मदद की। हमारे सामान को बिना चेक किए ले जाने की अनुमति मिली। आते हुए कलेक्टर ने कोई भी सामान चेक नहीं होने दिया। 5/5/1950 को पहले ओखा बंदरगाह फिर आबू पहुँचे। सब एंजेल जैसे दिख रहे थे। आबू में साधारण बड़ी कोठी थी, लेकिन बाथरूम कम थे। जंगली जानवरों की आवाजें आती थीं, पर बाबा ने निर्भय बनना सिखाया। बाबा ने कहा – जानवरों को शांति की दृष्टि दो। बाबा की पालना और सेवा भावना “चैरिटी बिगिन्स एट होम” से शुरू हुई। लौकिक परिवारों को आने-जाने की छूट दी। आबू में महंगाई थी, फिर भी "बेफिक्र बादशाह" बनकर मनीऑर्डर और राशन का इंतजाम हो जाता था।