बाबा कहते हैं — योगी बनो, पवित्र बनो। पवित्रता का अर्थ केवल ब्रह्मचारी बनना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म तीनों में पवित्रता होना है। व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता है।
अगर कोई निंदा करे या डाँटे और हम फीलिंग में आ जाएँ, तो यह मोह, देह-अभिमान और मैं-पन की निशानी है। थोड़ा-सा मोह भी आगे चलकर बड़ा बन जाता है। इसलिए सूक्ष्म रूप से अपनी चेकिंग करनी है। छोटी-छोटी बातें भी योग में विघ्न डालती हैं।
अमृतवेले उठते हैं, लेकिन योग नहीं लगता, तो हम नियम के पक्के तो हैं, लेकिन योगी नहीं। बाबा से रिस्पॉन्स न मिलने का कारण है — श्रीमत पर न चलना और स्वयं अपनी गलती न देखना।
हमें विधि से योग करना है, विधि से मुरली सुननी है। आलस्य और अलबेलापन हल्का पाप बनकर योग में रुकावट डालता है, इसलिए अंदर से खुशी नहीं रहती।
ब्राह्मण जीवन मौज, योग और खुशी का जीवन है। इसलिए चेक एंड चेंज करते रहो। योगी जीवन में संतुष्ट रहने के लिए बुद्धि को खाली रखो — बाबा के संबंध के सिवा कुछ भी नहीं।
सेवा निमित्त बनकर करनी है, नहीं तो अभिमान आ जाता है। चार्ट रखकर मन, बुद्धि और संस्कार की चेकिंग करो — चेक करेंगे तो चेंज होंगे।
व्यर्थ बातें सुनने और सुनाने से बुद्धि भर जाती है, इसलिए बुद्धि को साफ और प्लेन रखो। अच्छी बात से शिक्षा लो, बाकी छोड़ दो।
हमारे लिए बाबा आया है — यह अधिकार रखो। बाबा से दिल से प्यार करो, तभी योग में मेहनत खत्म होगी और आनंद की अनुभूति होगी।
सर्व संबंधों से बाबा को याद करो, प्राप्तियों को याद करो, महिमा करो। जहाँ लगाव होगा, वहीं मन जाएगा। अगर बाबा से सच्चा लगाव है, तो मन-बुद्धि स्वतः बाबा की ओर रहेगी।
