विशेष आत्मा बनने के लिए अनेक बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है। संकल्प यह नहीं होना चाहिए कि मुझे कोई अवसर (chance) मिले, बल्कि यह होना चाहिए कि मेरे भीतर योग्यताएँ उत्पन्न हों। क्योंकि जब योग्यताएँ आती हैं, तो वे अपनी स्थिति (stage) स्वयं बना देती हैं।
यदि हमें विशेष आत्मा बनना है, तो कभी भी ईर्ष्या (jealousy) नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्या आत्मा को royal, real-quality आत्मा नहीं बनने देती। यह सेवा में भी निर्विघ्नता बनाए नहीं रखती।
जहाँ भविष्य, भगवान और भाग्य मेरे साथ हैं — वहाँ किसी से ईर्ष्या करने की आवश्यकता ही नहीं है। क्या भगवान तुम्हारे साथ नहीं हैं कि ईर्ष्या करने की ज़रूरत पड़े? अपने उत्साह और नशे को इतना ऊँचा रखो कि विशेष आत्मा होकर भी मन में ईर्ष्या का नाम-निशान न रहे।
जब हमें दूसरों का कोई अवगुण दिखाई न दे और केवल गुण ही दिखें, तब हम कह सकते हैं कि हम सतोप्रधान आत्मा बन गए हैं। गुणग्राही दृष्टि और गुणग्राही वृत्ति — यही परिवर्तन हमें अपने भीतर लाना है।
बाबा कहते हैं:
“संपूर्ण बनने की निशानियों का आह्वान करो।
सच्चाई और सफाई से प्यार रखो।”
और साथ ही बाबा का यह अमृत वचन —
“मोल्ड होते जाओगे, तो रियल गोल्ड बन जाओगे।”
ॐ शांति।
