

यज्ञ इतिहास - ओम निवास बार्डिंग स्कूल - (चैप्टर 5): 1939-1950 गुलज़ार दादी की ज़ुबानी मैं ९ साल की उम्र में ओम निवास आईं। मेरी लौकिक माँ, ऑलराउंडर दादी, ने मुझे बाबा को दिया। ८ साल की उम्र में ध्यान का गहरा अनुभव हुआ — कृष्ण का साक्षात्कार करते, नाचते गाते, बाबा के नए गीत सुनते। बचपन में कभी डांट या मार नहीं मिली। बाबा ने हम सबको आत्मा फील करवाया। हमारी इतनी पालना होती थी कि ब्रश पे पेस्ट भी लगा कर देते थे और कपड़े निकाल कर रखते थे और रोज मालिश होती थी और मच्छरदानी में बिठाकर सुलाते थे। ऐसी पालना द्वापर से लेकर अब तक के कोई प्रिन्स प्रिंसेस को नहीं मिली होगी। बाबा नया फल आने पर सबसे पहले बच्चों को देते और कहते, “मेरे ठाकुर को भोग।” दादियाँ पढ़ातीं और बाबा खुद लेसन व गीत हाथ से लिखते। बाबा एक-एक बच्ची को गोद में बिठाकर फल खिलाते। सुबह ६ बजे “मैं आत्मा हूँ” का पाठ होता, फिर चंद्रमणि दादी की ड्रिल और सैर। मम्मा–बाबा रोज सुबह गुड मॉर्निंग और रात को गुड नाइट करने आते। बाबा सिखाते — सुबह ब्रह्मा, दिन में विष्णु और रात को शंकर बनो। तीन मिनट का चार्ट लिखना, आत्मिक दृष्टि से देखना और “सो जा राजकुमारी” रिकॉर्ड से आत्मभिमान का अनुभव कराया जाता। 80 बच्चे लाइन में मच्छरदानी के अंदर बैठे होते तो दृश्य बहुत सुंदर लगता। ओम निवास की छत पर बल्ब का बड़ा सा “ओम” स्टेशन से दिखता था। ऑफिसर आते तो बाबा ने हमें सिखाया — “भूल भाई, आप कौन हो?… तुम आत्मा हो।” इस तरह वे समझ जाते कि हम ज्ञान सीख रहे हैं और उन्हें बुरा भी नहीं लगता। पिकेटिंग के समय मामा–काका सब मिले स्वीट और कोकाकोला दी, पर हमने फेंक दी — ठाकुर होने के नशे में मां–बाप को भी भूल गए थे। बाबा दृष्टि देता था और हम ट्रांस में चले जाते थे। कराची में पढ़ाई शुरू हुई। एक बार बाहर गईं, फिर लौटीं। वारंट आने पर एक साल घर गईं, बाद में ऑलराउंडर दादी ने फिर सत्संग में छोड़ा।