हमारे ईश्वरीय महाविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता पवित्रता है। यही हमारी नवीनता और पहचान है। पवित्रता ही सुख और शांति की जननी है। इसका अर्थ केवल ब्रह्मचर्य नहीं, बल्कि ब्रह्माचारी जीवन—अर्थात ब्रह्मा बाबा को फॉलो करना। पवित्रता केवल बाहरी नहीं, मन और बुद्धि की भी होनी चाहिए। मन पवित्र होगा तो संकल्प भी शुद्ध होंगे और चेहरे से भी उसकी झलक दिखाई देगी।
सेवा के लिए भी शुद्ध संकल्प चाहिए, परचिंतन नहीं। बाबा ने तीन "पर" से सावधान किया है—परमत, परदर्शन और परचिंतन। हमें किसी का जज या वकील नहीं बनना है। ब्राह्मण परिवार से किनारा नहीं करना, बल्कि संबंध-संपर्क में रहकर सबकी विशेषता देखनी है, गलती नहीं।
हम कोटो में कोई, कोई में भी कोई हैं। हर आत्मा में कोई न कोई विशेषता है। जैसे गुलाब के काँटे नहीं, उसका फूल देखते हैं, वैसे ही सबकी विशेषताओं को देखना है। फॉलो ब्रह्मा बाबा करना है, भाई-बहनों को नहीं। तीन "पर" छोड़कर केवल एक "पर" रखना है—परोपकार।
बाबा ने एक और विधि बताई है—हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभकामना रखो। बाबा भी हमें "मीठे बच्चे" कहकर हमारी अच्छाई ही देखते हैं। यदि किसी के लिए शुभ संकल्प करने के बाद भी सोचें कि उसमें परिवर्तन आया या नहीं, तो यह संशय और व्यर्थ संकल्प है।
यदि कोई दुख दे और हम श्रीमत पर चलकर सहन करें, तो सहनशीलता की दुआएँ मिलती हैं। जैसे सोना आग में तपकर शुद्ध होता है, वैसे ही ऊँची स्थिति के साथ पेपर भी आते हैं। माया अपने पेपर लाएगी, लेकिन श्रीमत पर चलेंगे तो हिसाब भी चुकता होगा और दुआएँ भी मिलेंगी।
ब्राह्मण जीवन की खुराक खुशी है। बात तो आकर चली जाती है, लेकिन उसे पकड़कर रखना ही दुख का कारण बनता है। मम्मा कहती थीं—व्यर्थ संकल्पों के पाँच शब्द हैं: क्यों, क्या, कौन, कैसे और कब। हम कौवे नहीं, होली हंस हैं। हमें मोती चुनने हैं, पत्थर नहीं।
व्यर्थ संकल्पों का गेट बंद कर याद और सेवा का डबल लॉक लगा दो। बाबा को दिल से अपनी हर बात सुनाओ, दिल हल्का हो जाएगा। बाबा को कंबाइंड रखो। वे हर संबंध निभाने वाले—पिता, माँ, सखा और खुदा-दोस्त हैं। जितना लाभ बाबा से ले सकते हो, उतना लो। यह हमारा अधिकार है। बाबा हमारे लिए आए हैं, इसलिए हर कदम पर उनकी मदद लेकर आगे बढ़ो।
