

हमारे देश में पूछा जाता है— हाल-चाल कैसा है? हमारा हाल है “खुश” और चाल है “फरिश्ते” की। बाबा ने हमें डबल लाइट फरिश्ता बना दिया है तो हमारा हाल-चाल कितना सुंदर हो गया! दुनिया में तो सब पर बोझ है, लेकिन हमारा बोझ बाबा ने स्वयं ले लिया है। बाबा कहते हैं— मैं तुम्हारा कौन हूँ? ओबीडियंट सर्वेंट। बाबा ऐसे आज्ञाकारी हैं कि स्वयं आगे बढ़कर कहते हैं— अपना बोझ मुझे दे दो। बोझ देने से हम डबल लाइट बन जाते हैं, क्योंकि बोझ हमें नीचे खींचता है। बोझ मुक्त होने से हमारी दृष्टि और वृत्ति ऊँची हो जाती है। जब हम किसी को देखें, तो आत्मा को देखकर बात करें— भृकुटि के मध्य दृष्टि रखें। ऐसा करने से मन चंचल नहीं होता। शिव बाबा आत्माओं के पिता हैं, वे भी आत्मा ही हैं। इसलिए दिल से निकलता है— वाह बाबा, वाह! खुशी की स्थिति में शब्द निकलता है “वाह”, और दुःख में “हाय”। अगर कोई अपशब्द भी कह दे, तो अंदर से “वाह” कहना— क्योंकि वह हमारा पेपर है। सहन करने से सहनशक्ति बढ़ती है। कोई आपको गिराने की कोशिश करे, तो उसके प्रति घृणा भाव न रखें। सोचें— यह मेरा पेपर ले रहा है;या —उसने दिया तो है, लेकिन मुझे लेना ही नहीं है। अच्छी बातों को धारण करें, व्यर्थ को नहीं। धारण ही नहीं करेंगे, तो व्यर्थ चलेगा नहीं। व्यर्थ संकल्प समय की बर्बादी है। फ़ीलिंग में नहीं आएँगे, तभी डबल लाइट फरिश्ता बनेंगे। हमारा लक्ष्य है— ब्राह्मण से फरिश्ता और फरिश्ते से देवता बनना। पुरानी दुनिया से संबंध न हो — यही डबल लाइट है। आशीर्वाद कभी माँगे नहीं जाते। जब हम कोई अच्छा कार्य करते हैं, किसी को सुख या सहयोग देते हैं, तो किसी के दिल से स्वतः आशीर्वाद निकलता है। भक्ति मार्ग में आशीर्वाद हद की वस्तुओं से जुड़ा होता है, लेकिन ज्ञान मार्ग में आशीर्वाद दिल की आवाज़ है। यह निस्वार्थ प्रेम से निकलने वाली दुआ है— यही सच्चा आशीर्वाद है। शुभ भावना और शुभ कामना एक सेवा है। बाबा से जो शक्ति मुझे मिली है, वह किसी और आत्मा को मिले—यह भावना रखना ही सच्ची सेवा है, इसमें स्वार्थ नहीं। शुभ भावना तभी फलित होती है जब स्थिति शुद्ध और देह-अभिमान से मुक्त हो। बाबा सभी को समझाते हैं— जो धारण करता है, उसका बुद्धि का ताला खुलता है। हम विश्व कल्याणकारी आत्माएँ हैं। हमारी बेहद की वृत्ति से वाइब्रेशन बनते हैं, जिससे वातावरण और प्रकृति भी शुद्ध होती है। शुभ भावना सबके प्रति हो— अपने प्रति भी और दूसरों के प्रति भी। सर्व शक्तियों, सर्व गुणों का स्टॉक फुल होगा, तभी हम दे सकेंगे। वरदान वरदाता ही देता है। बाबा हमें वरदानी मूर्त कहते हैं, यानी बाबा से मिले वरदान को दूसरों तक देने वाले। शक्तियाँ हमारी नहीं, बाबा की दी हुई हैं—हम ने उन्हें धारण किया है। वरदान बाबा से मिलता है, आशीर्वाद आत्मा-आत्मा को देती है। वरदान में मेहनत नहीं, एकस्ट्रा लिफ्ट मिलती है। बाबा हर मुरली में टीचर, बाप और सतगुरु—तीनों रूपों से देते हैं। सच्चे, ईमानदार और आज्ञाकारी बच्चों के लिए बाबा की दिल से दुआ निकलती है। यही वरदान जीवन को सहज और हल्का बना देता है। संगम पर सब अच्छा ही अच्छा है।