

संगम युग में बाबा ने हमारे सिर पर विश्व कल्याण की ताजपोशी, जिम्मेदारी का ताज पहनाया है। हमारा चेहरा और चाल-ढाल ऐसी होनी चाहिए कि हम स्वयं एक चैतन्य म्यूज़ियम बन जाएँ। चित्र म्यूज़ियम तो हर सेंटर पर हैं, लेकिन बाबा ने जो गुण और शक्तियाँ दी हैं, वे हमारे चेहरे से झलकनी चाहिए, ताकि लोग हमें देखकर कहें—“हमें भी आप जैसा बनना है।” यह जिम्मेदारी प्रवृत्ति में रहने वाले हर ब्राह्मण की है—चाहे बहन हो या भाई—हमारे जीवन से सेवा में कोई रुकावट न आए। आज विश्व स्टेज पर हमारा पार्ट चल रहा है, करोड़ों आत्माएँ हमें देख रही हैं, इसलिए हर समय सजग रहना है। बाबा कहते हैं—अगर शरीर से सेवा नहीं कर सकते, भाषण नहीं दे सकते, पढ़े-लिखे नहीं हो—कोई बात नहीं। मन ठीक है तो मनसा सेवा करो। कोई बहाना नहीं देना है। चेहरे से सेवा करनी है। जिम्मेदारी तभी निभेगी जब हम स्वयं को ट्रस्टी समझेंगे। बाबा कहते हैं—प्रवृत्ति वाले मेरे ट्रस्टी बच्चे हैं। ट्रस्टी का अर्थ है “तेरा”, गृहस्थी का अर्थ “मेरा”। हम ब्राह्मण न्यारे हैं। जो घर में बाबा का कमरा नहीं बना सकते, वे दिल में बना लें—तो हम कभी भी बाबा से बात कर सकते हैं। अंत का पेपर है—नष्टमोह और स्मृति स्वरूप। जो यह बनेगा वही पास होगा। माताओं में मोह और भाइयों में रोब प्रबल होता है—दोनों को समाप्त करना है। हमेशा याद रहे—मैं सेवा पर हूँ। जिम्मेदारी का ताज नीचे नहीं गिरने देना है। रहमदिल बनना है। हमेशा याद रखो; हम शांति दाता के बच्चे हैं, सेवा के लिए विश्व स्टेज पर हैं। बाबा के दिल तख्त पर बैठे हैं, भृकुटि कुटिया में बैठे हैं, फिर सतयुग के विश्व राज्य पर भी बैठेंगे—लेकिन देहभान की मिट्टी में पैर नहीं रखना है। बाबा की श्रीमत—अमृतवेला से रात तक—उसी पर चलना है, विकारों से दूर रहना है। बाबा का संदेश है; हम शिव शक्तियाँ हैं—जो चाहें कर सकते हैं, क्योंकि हमारा साथी स्वयं भगवान है। साथ रहकर, प्रवृत्ति में रहकर कमल फूल समान रहने का प्रमाण देंगे। वर्तमान समय मनसा सेवा और पावरफुल याद का है, इससे धारणा स्वरूप भी बनते जाएंगे। साइलेंस की शक्ति का झंडा विश्व में लहराना है। शिव शक्तियाँ ही बाबा को प्रत्यक्ष करेंगी। अब समय है अपने मिले हुए सर्व खज़ानों का अखंड महादानी बनने का—शांति और सुख की अंचली देने का।