

हम सभी बापदादा के स्नेही हैं। इस स्नेह का स्वरूप ही तपस्या है। बापदादा से स्नेह करना अर्थात् योग। बाप समान बनने के लिए तपस्वी और सम्पूर्ण बनना आवश्यक है। ब्रह्माकुमार–कुमारी का अर्थ ही है तपस्वी। “बाबा ही मेरा संसार है” — यही तपस्या है। तपस्या का मतलब है एकाग्र रहना। योग भी दो प्रकार का होता है — साधारण और शक्तिशाली। बाबा कहते हैं — चार का पाठ पक्का करो — एकाग्र, एकनामी, एकरस, एकांत । मन एकाग्र और एकरस हो। बाबा की याद में एकनामी रहने से व्यर्थ विचार समाप्त होते हैं। यही विधि से सिद्धि है। बाबा हमसे शक्तिशाली याद चाहते हैं। कम से कम 8 घंटे याद में रहना है — टेंशन नहीं, अटेन्शन रखना है। अमृतवेला, मुरली, ट्रैफिक कंट्रोल और नुमाशाम योग से बाबा से कनेक्शन बना रहता है। पूरे दिन में थोड़ा-थोड़ा योग करते हुए 8 घंटे पूरे हो सकते हैं। बाबा हमसे शक्तिशाली याद चाहते हैं। कम से कम 8 घंटे याद में रहना है — टेंशन नहीं, अटेन्शन में रहना है। अमृतवेला, मुरली, ट्रैफिक कंट्रोल और नुमाशाम योग के द्वारा बाबा से कनेक्शन बना रहता है। पूरे दिन में थोड़ा-थोड़ा योग करते हुए 8 घंटे पूरे हो सकते हैं। मनमनाभव — यह बाबा का दिया महामंत्र है, यही हमारा आधार है। मास्टर सर्वशक्तिमान की सीट पर बैठना है। इस सीट पर न होने से मन, बुद्धि और संस्कार हमारे वश में नहीं रहते। “बाबा मेरा है और मैं बाबा का हूँ” — यह अनुभव दिल से निकलता है। यदि बाबा से निश्चय और प्यार है, तो बाबा को भूल नहीं सकते। मन ही ऊपर-नीचे होता है, इसलिए मन को बिठाने का पुरुषार्थ करना है। एकरस स्थिति ही हमारा आसन है। मन को एकाग्र रखना है, क्योंकि चंचल मन से तन भी चंचल हो जाता है।