

सभी भिन्न-भिन्न क्लासेस सुनते हैं जिससे बाबा की बातें रिवाइज भी हो जाती हैं और अटेंशन भी रहता है। ज्ञान का सार है — हम बाबा के हो गए, बाबा हमारा हो गया। किसी का बनना अर्थात उसे दिल में बिठाना। अगर दिल में बाबा को बिठा दिया, तो सब निकल जाएंगे... एक ही बाबा रहेगा। अगर बाबा के साथ (दिल में) दूसरों को भी बिठाया, तो बाबा की याद खिसक जाएगी। पुरुषार्थ सहज बनाने का तरीका है कि, बस बाबा ही याद रहे। अगर बाबा से जिगरी याद है या दिल का प्यार है, तो न चाहते हुए भी वह याद आता है। कुर्बान जाने का मतलब है — जो वह कहता है, जो वह चाहता है, जैसे वह चलता है, हम वैसे स्वतः ही चलें। जिससे गहरा प्यार होता है, उसकी बात आप स्वतः ही मानते हो। तो अगर बाबा से हमारा प्यार है, तो जो बाबा कहता है, वह हम मानेंगे ही। बाबा ही हमारा संसार है। बाबा से ही हमारे सर्व संबंध हैं और बाबा से ही हमारी सर्व प्राप्तियां हैं। यह सुख, शांति, आनंद, ज्ञान, प्रेम की प्राप्तियां हमें वरसे में बाबा से ही प्राप्त होती हैं। बाबा मिला तो हमारा जीवन बदल गया; दुखी से सुखी हो गए। अशांति से शांति हो गई। बाबा का प्यार ऐसी चीज़ है जो दुनिया भुला देती है। याद करने की आवश्यकता नहीं होती लेकिन स्वतः ही याद आती है। अगर आपको किसी से कुछ भी चाहिए तो देने से मिलेगा। कहने, माँगने, सोचने से नहीं मिलेगा लेकिन देने से ही मिलेगा। दाता के बच्चे बनो, देते जाओ। सारे दिन में दिल से जिनको याद करते हो, वह कौन हैं? दिल से शिव बाबा को अपना बनाया है या नॉलेज के आधार से दिमाग से याद करते हो - अपनी चेकिंग करो। दिल से माना बाबा मेरा ही है। जो वारिस क्वालिटी होंगे, बाबा के खजाने के अधिकारी होंगे, वह अच्छे से अच्छा बनने का पुरुषार्थ करेंगे। बाबा से दिल का प्यार माना — आप बाबा के ऊपर न्योछावर और बाबा भी आपके ऊपर न्योछावर। फिर कोई मेहनत नहीं लगेगी। सहज योगी, स्वतः योगी, मौज की जीवन बन जाएगी। ज़्यादा बातों में जाने वाला मौज में नहीं रह सकता। हर एक में विशेषताएं होती है। हमारा काम है — विशेषता देखना। विशेषता देखते हुए यह न भूलें कि यह विशेषता देने वाला कौन है। स्वयं आत्मा की विशेषता नहीं है, परमात्मा की देन है - प्रभु प्रसाद है।