

सभी के दिल में यही शुभ आशा है कि बाबा जो कहते हैं, उसे करके दिखाना है। बाबा चाहते हैं कि उनके सभी बच्चे उनसे भी आगे बढ़ें। शिव बाबा और हम आत्माएँ निराकार हैं। शरीर में रहते हुए भी आत्म-अभिमानी स्थिति में रहना ही पहला और सबसे बड़ा पुरुषार्थ है—“मैं आत्मा हूँ।” 63 जन्मों तक बॉडी कॉन्शियसनेस में रहने से तन, मन, धन और जन कमज़ोर हो चुके हैं। बाबा के बने तो भी तन की बीमारी आ सकती है, क्योंकि पुराने कर्मों का हिसाब है। पर मन बीमार नहीं होना चाहिए। ज्ञान और योग से सहन व सामना करने की शक्ति आती है। बीमारी को _कर्ज़ का उतरना समझने_ से, खुशी बनी रहती है। मम्मा के उदाहरण से स्पष्ट है कि ज्ञान-बल से दुख हल्का हो जाता है। 350 बच्चों की जिम्मेवारी होते हुए भी ब्रह्मा बाबा, शिव बाबा पर अटल निश्चय के कारण _निश्चिंत_ और _बेफिक्र बादशाह_ बन मुस्कुराते रहे। जब आटे की कमी हुई, तब मनीऑर्डर आ गया — ऐसा निश्चय हम भी रख सकते हैं। स्वयं में, बाबा में, ड्रामा में और दैवी परिवार में निश्चय जरूरी है। एक भी जगह कमी हुई तो स्थिति हिल जाती है। हम केवल धर्म नहीं, राज्य स्थापना कर रहे हैं, इसलिए संगठन और दैवी परिवार से प्रेम आवश्यक है। 108 की माला संगठन से बनती है—एक दाना दूसरे से जुड़े। जब विजय न हो तो निश्चय के फाउंडेशन को चेक करो। ज्ञान, योग, सेवा और धारणा—चारों सब्जेक्ट में पास होना आवश्यक है। एक में भी कमी हुई तो पद घट सकता है। अब समय नहीं कि माया आए और हम भगाएँ; स्थिति ऐसी हो कि माया दूर से ही भाग जाए। यही बाबा की चाह है—निश्चय बुद्धि विजय। बाबा हर एक बच्चे को विश्व-कल्याणकारी और ठाकुर समझते हैं। उनकी ऊँची दृष्टि से हम पद्मपदम भाग्यवान हैं। बाबा को हम पर 100% निश्चय है और उनके वरदान को बार-बार स्मृति में रखने से हम वैसे बन जाते हैं। हम अपने में अटल निश्चय रखें। निश्चय से नशा, नशे से खुशी और खुशी से सफलता निश्चित है। बाबा चाहते हैं कि हर बच्चा निश्चय बुद्धि विजय रतन बने—योगाग्नि तेज होगी तो माया पास नहीं आएगी। ब्राह्मण जीवन मौज का जीवन है; कल्प पहले भी हम बने थे और अब फिर से बनेंगे।