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094 Vighan Vinashak Sthiti
Spiritual Classes

094 Vighan Vinashak Sthiti

Dadi Gulzar Ji
36:50151
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094 Vighan Vinashak Sthiti
Dadi Gulzar Ji
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Essence

बाबा का प्यार अपार है। हम सब ब्राह्मण, प्रभु प्यार और परमात्मा की श्रश्रीमत चल रहे हैं। श्रीमत मिलती है मुरली से; और प्रभु प्यार तो सभी ने अनुभव किया है। बाबा ने सभी ब्राह्मणों को प्यार की सब्जेक्ट में सर्टिफिकेट दिया है। प्यार की रस्सी इतनी आकर्षित है कि हर एक आत्मा को परमात्मा की ओर खींचती है। यह परमात्मा का प्यार संगम युग में अनुभव होता है और २१ जन्मों की प्रालब्ध  मिल जाती है।

अगर प्रभु प्यार में विघ्न पड़ता है, तो बाबा ने कहा कि योग एक अग्नि है और प्यार एक लगन है। तो यदि विघ्न पड़ता है, तो योग से परिवर्तन करना है। अग्नि में या तो परिवर्तन हो जाता है या भस्म हो जाता है। तो अगर प्यार में विघ्न आता हो — चाहे मन के संकल्प का, चाहे संबंध-संपर्क का, चाहे देह के हिसाब-किताब चुकतु करने का — तो योग की लगन की अग्नि को बढ़ाना है। 

ब्राह्मण जीवन ही प्रभु प्यार की पालना है। श्रीमत पर कदम-कदम रखकर हम श्रेष्ठ बन रहे हैं। तो क्या हमारा परमात्मा प्यार अटूट है? चेक करो। बार-बार अगर याद दिलाना पड़े, तो यह अटूट प्यार नहीं है। अटूट प्यार से २१ जन्मों की प्रालब्ध मिलती है। दिल को आराम देने वाला दिलाराम बाबा है। तो इस अटूट प्यार को टाइट करते जाओ।

हम कौन हैं? बाबा कहते हैं कि आप तो परमात्मा की संतान हो। तो हमारे नयन, हमारी चाल, हमारी चलन — कितनी रूहानी नशे वाली होनी चाहिए। रूहानी रुबाब होना चाहिए।

आजकल सब सुनना नहीं चाहते। अगर आप भाषण करो तो भाविक आत्माएं तो सुनेंगी, पर जो आम जनता है वो कहती है — “बहुत सुना है हमने”, क्योंकि द्वापर से सब आत्माएं सुनते आ रही हैं — थक गई हैं। तो अब हमारी मनसा सेवा होनी चाहिए। मनसा श्रेष्ठ संकल्पों द्वारा शुभ भावना, शुभ कामना देने की सेवा करनी है। क्योंकि संकल्प बीज है। अगर बीज पॉवरफुल है, तो सभी कर्मेंद्रियाँ भी पॉवरफुल होंगी।

हम साधारण नहीं हैं। हमारा चेहरा ही परिचय दे कि हम कौन हैं। इसलिए बाबा कहते हैं — दो शब्द याद रखो: स्वमान को याद करो। रोज मुरली में कोई न कोई स्वमान, टाइटल देते हैं। अगर टाइटल याद नहीं रहते, तो बाबा रोज जो टाइटल देते हैं — “मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चे” — यह तो याद रहता है ना? तो उसे रिवाइज़ करो।
जहां स्वमान है, वहां विघ्न नहीं आ सकता। विघ्न का कारण है देह अभिमान। और अहंकार ही सबसे बड़ा देह-अभिमान है। तो किसी न किसी रूप में, सूक्ष्म या स्थूल रूप में विघ्न आएगा। जहां अभिमान है, वहां विघ्न है। अगर स्वमान याद रहेगा, तो हम विघ्न-विनाशक बन जाएंगे।

स्व-परिवर्तन के बिना श्रेष्ठ नहीं बन सकते। दूसरों की गलती हमें देह-अभिमान के कारण ही दिखती है। लेकिन अपनी गलती दूसरों पर थोपने की आदत ६३ जन्मों से है। “मुझे बदलना है” — यह ख़याल किसी को नहीं आता।

बाबा ने कहा — “दुःख लेना नहीं है। देने वाला कितनी बार देगा, आखिर थक जाएगा। अगर आप दुःख लोगे नहीं, तो सबका कल्याण हो जाएगा।” तो सेवा भी हो गई और विश्व कल्याण भी — क्योंकि देने वाला और लेने वाला, दोनों ठीक हो गए।

फीलिंग की बीमारी लंबी चलती है, इसलिए फीलिंग में नहीं आना है। तो दृढ़ संकल्प करो — “दुःख लेना नहीं है।” हमारा ऑक्युपेशन है — विश्व कल्याण करना।

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