

प्रश्न 1: कर्म कब भाग्य बनाता है एवं कब बंधन बनता है? इसका आधार क्या है? जिस घड़ी कर्म की फिलॉसफ़ी मिलती है, उसी घड़ी वह कर्म करना शुरू करना चाहिए जिससे हमारा भाग्य बने। बंधन से किया हुआ कर्म, या जिसके कारण बंधन उत्पन्न हो, उसमें खुशी नहीं होती। जब हम अपनी इच्छा से, दूसरों की इच्छा से, दूसरों को देखकर या अपने संस्कारों के वश होकर कर्म करते हैं—और उस कर्म के भीतर इच्छा, ममता, आसक्ति का त्याग नहीं है—तो ऐसा कर्म बंधन बन जाता है। और, जिस कर्म में त्याग (की भावना) हो, उसमें खुशी उत्पन्न होती है—वह अविनाशी खुशी है। बंधन वाला कर्म में ख़तरा होता है। लोभ–मोह वश किए गए कर्म तो और अधिक बंधन में डालने वाले हैं, जबकि हम कर्म इसलिए करते हैं कि फ्री(मुक्त) हों। भाग्यवान वही हैं जो बंधनमुक्त हैं। बंधन वाला कर्म भोगी–रोगी बनाता है, जबकि भाग्य बनाने वाला कर्म योगी बनाता है। बाबा ने भी कहा है—past का कर्म-भोग हो, उसे कर्मयोग में परिवर्तन कर दो। प्रश्न 2: संगठन में रहते पुरुषार्थ का आधार क्या है? पुरुषार्थ दो प्रकार का होता है—एक व्यक्तिगत पुरुषार्थ, और दूसरा संगठन में रहकर पुरुषार्थ। संगठन में गुण-ग्रहण करने की शक्ति पुरुषार्थ में आगे बढ़ाती है। यदि सैकड़ों बच्चे बने हैं, तो किसी-न-किसी विशेषता के आधार पर बने हैं। हर एक की विशेषता और गुण को देखकर संगठन में बल मिलता है। परंतु यह बल उसी को मिलता है जो पुरुषार्थ करना जानता है। इतने बड़े संगठन में रहते हुए, दादा विश्व किशोर ने न कभी किसी को disturb किया होगा और न स्वयं disturb हुए होंगे। संगठन में रहकर भी—जैसे भोजन करते समय—दादा कभी बातें नहीं करते थे। यह है संगठन में रहते हुए — दूसरों की कमी न देखते हुए — यह ध्यान रखना कि मुझे कैसे संपूर्ण बनना है। संगठन में न बहुत बातों में आना है, न बहुत बात करनी है। यही है संगठन में रहते हुए युक्तियुक्त, राजयुक्त, और ज्ञानयुक्त रहने की विधि। • अनुभव की मूर्ति अनुभव की मूर्ति को सुनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती—मूर्ति स्वयं अनुभव करा देती है। संपूर्णता को खींचो, तो वह जल्दी आ सकती है; और स्वयं भी उसकी ओर थोड़ा बढ़ो—दोनों कार्य साथ-साथ करो। ऐसी शुद्ध स्थिति बनानी है और ऐसा पुरुषार्थ करना है कि सदा चेक करते रहें—कहीं अहंकार भीतर प्रवेश तो नहीं कर रहा? बलिहारी बाबा की, जिसने हमें छुड़ाया। जब हम बाबा के हो गए, तो हमारी भेंट भी बाबा से ही होनी चाहिए। जब हम बाबा के बन जाते हैं, तब यज्ञ, परिवार और श्रेमत स्वाभाविक रूप से प्रिय लगने लगते हैं। भाग्य-विधाता ने द्वार खोलकर रख दिए हैं—जो जैसा भाग्य बनाना चाहे, वैसा बना ले।