

दादियों की विशेषताएं प्रकाशमणि दादी की जुबानी: दादी जानकीजी बेहद की बुद्धि। सबके लिए समान बुद्धि और समान स्नेह रखती थीं। इस समानता की विशेषता के कारण उन्हें देश-विदेश की दादी कहा। जितना बाबा से प्यार, उतना मधुबन से प्यार, उतना ही विदेश से प्यार। एक समान। चंद्रमणि दादीजी शेरनी की शक्ति। सेवा सर्व तरफ अथक। उनकी विशेषता है मालिक सो बालक का पाठ प्रैक्टिकल में सीखना। परदादी निर्मलशांता दादीजी परदादी माना दादी। दादीजी सबके लिए बड़ी माँ समान। जैसे बाबा का फ़राक दिल है वैसे दादी का भी। रॉयल, सदैव रुआब देने वाली। संत्रुदादी मीठी जूस जैसी। सब उनसे प्यार करते। दादा की कॉन्फिडेंशियल संदेशवाहक और उतनी ही गंभीर। ऑलराउंडर दादी जैसे नाम है वैसे ही – पढ़ाई, सेवा, ओल्ड स्टूडेंट्स जीवन – सबमें रुचि। सबको “लाल” (माना बच्चे) कहतीं। बाबा ने नाम रख दिया ऑलराउंडरलाल। शीलबहन बाबा ने नाम दिया “मुंबई की गवर्नर।” जैसे गवर्नर का काम होता है सब जगह ध्यान रखना और एक्यूरेट करना, वैसे ही इनसे सीखने वाली बात है – लौकिक व अलौकिक दोनों का पार्ट बराबर बजाना। कॉन्फिडेंशियल संदेशी भी। मनोहर दादी “पहले आप” का गुण उनसे सीखना। दादी का ध्यान रहता कि हर आत्मा बाबा के घर से भरपूर होकर जाए। इसलिए सब मधुबन से रिफ्रेश होकर जाते – यह मनोहर दादीजी की वजह से। गुलजार दादीजी विशेषता: ज्ञानी, योगी, ध्यानी – “तू आत्मा, बाबा की।” परंतु अव्वल नंबर में उड़ती। गुणवाचक नाम निर्संकल्प भी। गंगे दादी बहुत सितम सहन किए। बेहद सेवा में तत्पर रहीं। रतनमोहिनी दादीजी बाबा ने आदि से ही वरदान दिया – सर्विस प्लान, सर्विस प्रोग्राम, सर्विस पॉइंट्स में एक्यूरेट। इसलिए सर्विस में कंट्रोलरशिप एक्यूरेट। ब्रिजेंद्र दादीजी उनकी खूबी – बापदादा की तरह प्यार देना। शांतामणि दादीजी जैसा नाम, वैसे ही शांत। सारे यज्ञ की सेवा उन पर थी, फिर भी न्यारी, प्यारी, शांत, योगी, तपस्वी। विश्वरत्न दादा शांत, योगी, एकाग्र, अंतर्मुखी, गंभीर, कॉन्फिडेंशियल, निर्संकल्प, आज्ञाकारी। कभी “ना” नहीं बोले। ‘जी हाँ’ का पाठ उनसे सीखना। बाबा ने नाम रखा – सुखदेव। सदा दृष्टि, बुद्धि, वृत्ति व वाइब्रेशन्स – सब प्योर। आनंदकिशोर भाई जितना बड़े ऑफिसर, उतने ही त्यागी व सिंपल। न्यारा रहना, काम से काम रखना। चंद्रास भाईजी ज्ञान का खज़ाना। जैसे टेप्स, पुरानी मुरली सब सुरक्षित रखते। आर्किटेक्ट नहीं, पर हर काम एक्यूरेट किया। प्रकाशमणि दादीजी हम सबकी मन-पसंद, प्रभु-पसंद, विश्व-पसंद दादी। ईश्वरीय विश्व विद्यालय में जो प्रैक्टिकल सच्चा सर्टिफ़िकेट लेते हैं – वही प्रभु-पसंद और लोक-पसंद। “तेरी खुशी में मेरी खुशी” कहना – यही उनकी शान। पुरुषार्थ अभी क्या कर रहे हैं बापदादा का फरमान है कि योगबल से मनसा सेवा द्वारा विश्व की सेवा करो। एकरस अवस्था और योगबल का अभ्यास। “एक बल, एक भरोसा” – ऐसा अटल निश्चय उड़ती कला है और उमंग-उत्साह के पंख हमें स्वतः बाप देते हैं। परिस्थिति आए तो लगे “कल्प पहले भी देखा था” – नथिंग न्यू का पाठ पक्का होता है और सहज योगी लगते हैं। सदैव मनसा, वाचा, कर्मणा – तीनों में एक्यूरेट, एक समान रहकर अपना पार्ट बजाना। ब्राह्मण परिवार में मेरी विशेषता है – स्नेह और एकता का किला मज़बूत करना, उसके लिए मैं निमित्त बनती हूँ। वर्तमान समय ऐसा है कि बुद्धि सदैव एकाग्र रहे। हलचल न आए। मन भी सदा एकाग्र हो। व्यर्थ संकल्प न उठे। ज्ञान का चिंतन स्वाभाविक व ज्ञानस्वरूप हो। कर्म ऐसा हो कि दूसरों को लगे – यह साक्षात् बाप-स्वरूप है। बापदादा के वरदान प्रैक्टिकल में मन-वचन-कर्म में स्वरूप रूप में स्थित हों। यही पुरुषार्थ है – बाप समान बनना। हर कार्य में बच्चों को देखकर बाबा याद आए और बाबा को देखकर पुरुषार्थ की याद रहे। मनसा-वाचा-कर्मणा ऐसे कार्य करूँ कि सबको बाप और मधुबन याद आए। ऐसा सैंपल बनना कि हमें देखकर सबका मन हो – हम भी बाबा के प्यारे बनें। बाबा कहते हैं – अटेंशन में रहो, तो टेंशन न हो। विश्व कल्याणकारी सेवा है। विश्व का मालिक बनने का संस्कार बन रहा है। जितनी दिल की सच्चाई होगी, उतनी सहज मदद बाबा करेंगे। मैं अपनी स्थिति बैलेंस में रखती हूँ। यह परिवार मेरा है – सबके प्रति समान स्नेह। दिल का उद्गार: स्थिति एकरस, स्नेह में एकता। दादी की आश यही – संस्कार अलग हों लेकिन हम सब एक सूत्र के मोती। हमारी यूनिटी का झंडा विश्व में ऊँचा हो। बाबा करन-करावनहार है। जैसे ब्रह्माबाबा को निमित्त रखा, वैसे हम भी साथी हैं। बाबा जो कराते हैं, निर्संकल्प होकर उमंग-उत्साह से करते हैं। बाबा तीन रूप – बाप, टीचर, सतगुरु – बनकर पालना करते हैं। हर बात की शिक्षा दी। साथ का अनुभव करना ही पुरुषार्थ है। बाबा ने गोद में आते ही वरदान दिया – “सच्ची, वफ़ादार, फ़रमानबरदार बच्ची।” श्रीमत पर चलने से उमंग-उत्साह और खुशी रहती है। बाबा ने पालना दी – वैसे ही हमें भी बाबा के बच्चों को पालना देना है। यही शुभ भावना, शुभ चिंतन, शुभ कामना है। बाबा की मीठी टोली “दिलखुश मिठाई।” हम खुश रहें और सबको बाँटें। जब हम खुश रहें तो खुशियों की दुनिया आए। यही हमारा पुरुषार्थ है। आत्मिक स्थिति में रहना और बाबा साथी है – यह स्मृति सदा रहे। हर कार्य में परफेक्ट बनाना, त्यागवृत्ति रखना, भौतिक कामनाओं से दूर रहना। स्वयं को सिंपल व सैंपल बनाना ताकि सबको प्रेरणा मिले। बाबा से इतना प्रेम पाया कि स्वरूप ऐसा बन जाए कि सबको अनुभव हो – प्रैक्टिकल में पालना मिल रही है। लौकिक बाप से मिली शिक्षाएँ अलौकिक जीवन में काम आईं। पहले स्वयं धारणा कर दूसरों को शिक्षा दी। बाबा ने लौकिक से अलौकिक में लाया। शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा को रथ बनाया – नई दुनिया बनाने के निमित्त। उन्होंने धर्म को धन से पहले महत्व दिया। तपस्या की, अंतर्मुखी बने। शिवबाबा ने पुरुषार्थ कराया। फिर एक दिन शिवबाबा ने तन में प्रवेश कर कहा: “निजानंद स्वरूपं शिवोऽहम्, प्रकाशस्वरूपं शिवोऽहम्, आनंदस्वरूपं शिवोऽहम्, ज्ञानस्वरूपं शिवोऽहम्।”