

हमारी अति प्यारी प्रकाशमणि दादीजी के शुरू के दिनों की कहानी — उनकी जुबानी (1936 दीपावली से 1938 दीपावली तक) हमारी भक्ति अच्छी थी। थिएटर भी नहीं देखा। साधु वासवानी को मानती थी। रात को मंदिर में जाकर भगवान को सुलाना। कभी कोई इच्छा नहीं थी। दो बहनों की शादी हो गई थी। पिताजी काम पर जाते थे। हमेशा वेजिटेरियन थी। एक बार मुझे छुट्टी थी दिवाली के पहले और मैं सोई हुई थी कि अमृतवेला मुझे स्वप्न आया कि बहुत सुंदर शाही ग्रीन गार्डन और दूर एक बहुत लाइट थी और श्रीकृष्ण छोटा सा नाचते-नाचते आया और मैं बहुत खुश हो रही थी। जब नज़दीक आया तो पीछे ब्रह्माबाबा को देखा। मैंने कभी ब्रह्माबाबा को नहीं देखा था। जैसे शास्त्रों में कहते हैं कि लक्ष्मी-नारायण बूढ़े तन में आएंगे तो जो सफेद लाइट में फरिश्ता लग रहे थे इतने सुंदर, तो कृष्ण को देखूं कि इनको देखूं — ऐसा लग रहा था। फर्क सिर्फ इतना कि बड़ी मीठी दृष्टि दे रहे थे, “बेटी, बेटी” कह रहे थे। लेकिन मैंने किसी को बताया नहीं क्योंकि कहते हैं बताने से वो चला जाता है। तो पूरा दिन मैं अंदर ही अंदर खुश हो रही थी। स्कूल में मम्मा भी पढ़ती थी और हम एक ही बेंच पर साथ बैठते थे। मेरी एक फ्रेंड के घर गई। लीला, उसका नाम था। वो ध्यान में बैठी थी और उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। उसकी माँ से पूछा तो कहा — पता नहीं, यह कोई सत्संग में जाती है तब से ध्यान में बैठी रहती है। फिर उसको मैंने पूछा तो कहने लगी कि तुझे श्रीकृष्ण के पास ले जाती हूँ। होश में आकर उसने बताया कि ॐ ध्वनि लगती है, दादा और दीदार होता है। तब ॐ मंडली नाम भी नहीं हुआ था। पंद्रह दिन ही हुए रहेंगे। विश्वकिशोर दादा, जो बाबा के भाई का बेटा था, उनके घर पर गीता का पाठ करता था। मेरे पिताजी ने माँ को कहा कि बहुत अच्छा प्रवचन करते हैं, तो तुम दोनों जाओ, वैसे भी छुट्टी चल रही है। दादा है, वो ॐ ध्वनि करता है, तो 10:30 बजे करते थे। एक रूम में सत्संग चल रहा था। जैसे ॐ ध्वनि चल रही थी सब ध्यान-दीदार में चले गए और मैंने सामने देखा तो लगा — सफेद वस्त्र में तो मैंने इन्हीं को देखा था। तो मेरे सामने हैं? ऐसे एक मिनट देखती रही। ॐ ध्वनि में ध्यान में चली गई और वही देखा हुआ सपना, वही बगीचा, वही कृष्ण को देखा, सफेद वस्त्र में फरिश्ता बाबा को देखा। और एक घंटा ऐसे ही बीत गया और जब आंख खुली तो आंसू थे और बाबा तो चले गए और थोड़े अभी भी ध्यान में थे। बाबा ने मुझे बुलाया। तो मैं घबरा गई। लेकिन उन्होंने थोड़ा पूछा। और घर गई और ध्यान में ही रही। तो लगन लगी ही है आज भी। दो दिन में दिवाली आई लेकिन बाबा का सत्संग चलता गया। लोग आने लगे और हॉल छोटा होने लगा। तो फिर बाबा के घर पर सत्संग शुरू किया। यह 1936 की बात है। बाबा कश्मीर चले गए और उन्होंने स्कूल की बिल्डिंग बनाने को दिया था ज्ञान के पहले। अब यह बिल्डिंग में बच्चों को पढ़ाओ, मम्मा को बोला। तब सिर्फ बहने ही थीं। मैं 15 साल की थी। हमने तैयारी की कि जो माताएं आती थीं उनके बच्चे यहां पढ़ेंगे। तो सब ने हाँ कहा और लौकिक पढ़ाई छोड़ दी और बोर्डिंग बनी और भगवान और बेबादशाही, हिंदी सिखाई, ॐ मंडली का गीत, ॐ ध्वनि। एक फ्लोर पर सोते थे, एक फ्लोर पर पढ़ते थे, एक फ्लोर पर नहाना और खाना पकाना, माताएं रहती थीं। और तब से अपने हाथों से खाना बनाना शुरू हुआ। तो नया पलंग, नया बिस्तर, नया भंडारा, नई कॉपियां, नई किताबें — सब कुछ नया। 1937 की दीपावली के दिन उस स्कूल का ओपनिंग हुआ। वही दीपावली का दिन था जब बाबा ने भी घर छोड़ा और बोर्डिंग में रहने को आए। तीन पार्ट थे बोर्डिंग के। दो फ्लोर बोर्डिंग को दिया और एक फ्लोर बाबा का। ऊपर के फ्लोर पर बड़ा हॉल था, उसमें सब पलंग पर सोते थे और करीब 60 बच्चे-बच्चियां थीं। उनमें से ये सैंपल — गुलज़ार बहन, ईशु बहन, लच्छु बहन, पाली बहन थीं। उन सबकी उम्र 5 साल से 9 साल के बीच में थी। मैं 15 साल की टीचर थी। चंद्रमणि दादी, शांतामणि दादी और एक बहन थीं वो चली गईं, पाँच टीचर थे। सब दिवाली के दिन समर्पित हुए। सिस्टम पड़ी घर से चिट्ठी लेने की। तो एक दिन पहले ही हमारे घर से चिट्ठी दी कि हमारी बेटी श्रीकृष्ण अर्पणम्। बाबा ने भी लिखा कि यशोदा — कृष्ण अर्पणम्। और यशोदा ने भी लिखा — कृष्ण अर्पणम्। सब ने चिट्ठी लिखी। बाबा ने लिखा खुद के लिए — ॐ मंडली माता को अर्पणम्। ॐ निवास नाम रखा। ऐसा ट्रेनिंग दिया जैसे हम शहज़ादियां हैं। बाबा की दिल बड़ी। अकेले बाबा के पैसों से ॐ निवास हुआ। मम्मा ने भी दीपावली के दिन घर छोड़ा। ॐ भवन मिला मम्मा को। मम्मा 800–1000 लोगों का सत्संग चलाती थीं। ध्यानिदादी ॐ निवास को संभालती थीं, वो मम्मा की मासी लगती थीं। एक साल में समर्पण हुआ। सब कुछ बाबा ने कायदे से ॐ मंडली माताओं को वील/समर्पण किया। सत्संग ॐ मंडली में और स्कूल 15 मिनट पैदल था। मम्मा संभालती थीं। फिर पिकेटिंग हुआ, एक तूफान था पवित्रता के लिए। वंडर यह होता था कि बाबा रात को 2–2:30 बजे कराची चले जाते थे। कलेक्टर आते थे बाबा को घमासान करने, पर बाबा था ही नहीं। ऐसे 3–4 बार हुआ। बाबा ने प्रेरणा से सिंधु नदी पार करके कराची चले जाने को कहा। अब बोर्डिंग कराची में की। एक बड़ा शाही बंगला था, वो लिया ॐ निवास। फिर सब तैयारी की और 1938 की दिवाली को कराची गए। यज्ञ स्थापना हुई, 14 साल तपस्या की यहाँ। 1936 दीपावली — ॐ मंडली हैदराबाद, 1937 दीपावली — ॐ निवास हैदराबाद, 1938 दीपावली — ॐ निवास कराची। इसलिए दीपावली में दीपक जले। मम्मा जन्म से मुंबई में रहीं। उनके पिताजी ने शरीर छोड़ा तो हैदराबाद आईं। मम्मा इतना स्वीट गाती थीं कि हजारों की सभा खड़ी हो जाए। स्कूल में डांसर, मॉडर्न, गंभीर, होशियार — उतनी ही स्वीट। ॐ की ध्वनि मम्मा लगातीं तो सब मस्त हो जाते थे। बाबा की ध्वनि से हम खो जाते थे। बाबा कोई कवि नहीं थे लेकिन वो ऐसे गीत बनाते थे और तर्ज भी देते थे और मम्मा गाती थीं। रोज बाबा एक गीत लिखते थे। बाजे पर मम्मा गाती थीं।