

दादीजी का सेवा और मर्यादाओं पर क्लास। आज की मुरली में बाबा ने क्या कहा की, ब्राह्मण वे जो सेवा करें। बुद्धि में ज्ञान होगा तो सेवा करेंगे। हमें ऐसा पक्का धारणाओं वाला ब्राह्मण बनना चाहिए। मर्यादाओं की लिस्ट अपने पास रखनी है। गुणों से देवता बनते हैं; मर्यादाओं से पुरुषोत्तम बनते हैं। अगर मर्यादाओं का अच्छी तरह पालन करें तो एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष वाले दस–बीस–तीस वर्ष वालों से आगे जा सकते हैं। मर्यादा पवित्रता से शुरू होती है। मर्यादा का पालन वह कर सकता है जिसके दिल में पवित्रता की बहुत बड़ी वैल्यू है। दही-अभिमानी स्थिति में नहीं रहेंगे तो बाबा से शक्ति नहीं खींच सकते। जो अच्छी तरह मर्यादा पर चलने वाले हैं, वे ब्राह्मण कुल में कोई विरला होता है—उसकी स्पीड देखो, कितनी फास्ट भी है और आराम से आगे बढ़ते है। मर्यादा हमें निर्विकारी और निराकारी रहने में बहुत मदद करती है। सेवा ऐसी करो कि जिज्ञासु अपने आप आते रहें, समझाने का तरीका इतना आकर्षक हो, योगयुक्त वातावरण हो, और प्रेम जहां से मिलता है वहां अपने आप आत्माएँ खिंच जाती हैं। बाबा ने अटेंशन दिलाया—निराकारी स्थिति में रहकर, निरहंकारी होकर सेवा करना है। घर बताने की सेवा है, पर हमे ही घर याद नहीं होगा तो रास्ता कैसे बताएंगे। संगम युग पर हमें बाबा का वरदान है कि जो मैं तुमको सुनाता हूँ, उसे दूसरों को सुनाओ। कहा जाता है—"सच्चे दिल पर साहेब राजी", पर साहेब तभी राजी है जब खुद राजी हो, और खुद तब राजी रह सकता है जब सबको राजी करता है। खुशी की खुराक खाते हुए सदा सेवा में रहो।