

देह के साथ देह के सभी संबंधों का त्याग करना है — यही है मनमनाभव की निशानी। जो हमारे मात-पिता हैं, वही हमारे बाप-दादा हैं। पहले कहेंगे मात-पिता; फिर कहेंगे बाप-दादा। पहले माँ ने अडॉप्ट किया; पिता ने माँ के द्वारा अडॉप्ट किया। वे न सिर्फ जन्म देते हैं, शृंगार भी करते हैं और पालना भी करते हैं। कभी प्रश्न उठता है कि हमारा शृंगार ज्ञान से होता है या योग से? जितना ज्ञान को अच्छी तरह धारण करेंगे, उतने गुण आएँगे; गुणों से ही श्रृंगार होता है; जितना गुणवान बनते हैं, उतने शोभित लगते हैं। गुण अपने मात-पिता, बाप-दादा का शो करने के निमित्त बनते हैं। बच्चे बाप का शो करेंगे तो कैसे करेंगे? — गुणों से ही करेंगे। ब्राह्मणों को दो प्रकार के दुख होते हैं — एक बुरे या वेस्ट खयालात; दूसरा है, कोई न कोई ऐसा अवगुण जो जाता ही नहीं। ज्ञान ऐसा है — खर्चे न खूटे, चोर न लूटें। अंदर कोई चोर होता है जिसका पता नहीं चलता। बाबा कहते हैं — अपनी घोंट तो नशा चढ़े। ज्ञान घोटने से मोती-बुद्धि, मणि-बुद्धि बनती है। पास विद ऑनर्स बनने के लिए बाबा ने सहज बातें सुनाई हैं — एक तो मन्मनाभव। जिसको घर जाने का खयाल अभी कम है, वह 108 में नहीं आ सकता। घर जाना है — हिसाब-किताब चुका कर, कर्मातीत स्थिति में जाना है। घर और बाबा के सिवाए कोई बात बुद्धि में न हो। जिसको बाप के साथ जाना है उसे यह चिंता नहीं होगी कि मेरा फ्यूचर क्या होगा। मेरा भाग्य भागीरथ के हाथों में है, तो मुझे क्या चिंता करनी है! जो श्रीमत का पालन करता है, वह श्रेष्ठ बनता जाता है, हिम्मतवाला बनता जाता है। पास विद ऑनर्स बनना है तो पहले पुण्य-आत्मा बनना होगा। यह कोई बड़ी बात नहीं है — हर एक पास विद ऑनर्स बन सकता है।