

बाबा की याद में बैठते हैं तो बाबा भी सकाश देते है। बाबा खींच रहे है — यह कशिश महसूस होती है। कई आत्माएँ ऐसी हैं जो याद नहीं कर पाती, तो बाबा उन्हें खींच लेते है। मूल वतन की शांति और सूक्ष्म वतन की शांति में फर्क है — सूक्ष्म वतन में लाइट रहने की शांति है, मूल वतन में सब कुछ मर्ज होकर रहने की शांति है। मूल वतन में किसी भी प्रकार का रिंचक संकल्प नहीं उठता। सूक्ष्म वतन में फिर भी मिलन मनाने का संकल्प उठ जाता है। जब भी सूक्ष्म से मूल वतन में जाएंगे तो विश्राम महसूस होता है। बाबा के महावाक्य हैं: “बच्चे, तुम याद करते-करते आखिर मेरे पास चले आओगे।” यही रास्ता है बाबा के पास जाने का। जितना हम ऊपर रहते हैं, उतना ही औरों को रास्ता दिखाने के निमित्त बन सकते हैं। विश्व की अनेक आत्माओं को इसकी जरूरत है। जितना कर्म में लाइट रहेंगे, उतने ही संकल्प भी लाइट होंगे। तब हम कार्य-व्यवहार में भी लाइट हो जाएंगे और वह लाइट–माइट स्थिति में सेवा कर सकेंगे। गुप्त रूप से बाबा के मददगार बच्चे बन जाना — यह तीव्र इच्छा हो। दिन-रात चेक करना है कि इस दुनिया से मेरा क्या रिश्ता है। चेकिंग दिन-रात होती रहे और चेंज (परिवर्तन) भी होता जाए। और हम बाबा के शुद्ध संबंध में ऐसे आ जाएँ कि कोई पुरानी बात हमें खींच न पाए। स्थूल दुनिया से फ्री हो जाएँ।