

क्लास में दादी जी तृष्णा और आशा के बीच का अंतर समझाती हैं: तृष्णा तमोगुणी होती है — जब तक वह पूरी न हो, तब तक चैन नहीं आता। आशा राजोगुणी होती है — और यदि वह पूरी न हो, तो निराशा होती है। बाबा ने सतोप्रधान बनने वाली आत्माओं को बहुत अच्छी ट्रेनिंग दी है — आशा और तृष्णा को समाप्त कर, जब कोई भी इच्छा न रहे, तब "इच्छा मात्र अविद्या" के सब्जेक्ट में पास होते हैं। तृष्णा वाले भूत-पूजारी होते हैं; आशा वाले देव-पूजारी। ममता को छोड़ने के लिए पहले आशा-तृष्णा को खत्म करना होता है, फिर इच्छा भी नहीं रहेगी। बाबा के साथ जाने और पीछे आने वालों में भी फर्क है। यहाँ प्रश्न उठता है — कौन साथ जाएगा? जिसको बहुत काल का साथ है वो साथ जाएगा। हम सजनी हैं; बारात में आने वाली लाखों-करोड़ आत्माएँ पीछे-पीछे आती रहेंगी। जिन्होंने बहुत कल्पों से बाप का साथ लिया है, वही साथ जाएंगे। और कुछ नहीं चाहिए — बस साथ जाना है। एक है सुस्ती, दूसरी है लापरवाही, और फिर है गफलत। यदि ये तीनों बातें हों, तो सजाओं से छूट नहीं मिल सकती। ये तीनों हमारे दुश्मन हैं — ठीक वैसे ही जैसे पाँच विकार दुश्मन हैं। सुस्त आत्मा कभी भी माया-जीत नहीं बन सकती। लापरवाह आत्मा कभी मेच्योर नहीं बन सकती। गफलत तब होती है जब हम किसी के प्रभाव में आकर विवेक और बुद्धि से काम नहीं लेते — और बाद में पछताना पड़ता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम सुस्त भी नहीं होते, लापरवाह भी नहीं होते, पर गफलत में होते हैं — किसी प्रभाव या आकर्षण के अधीन।